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कंचन भारद्वाज की कवितायें

कंचन भारद्वाज

कंचन भारद्वाज जामिया मीलिया इस्लामिया वि वि ,दिल्ली, में पढ़ाती हैं. संपर्क :kanchanbhardwaz@gmail.com

( कंचन भारद्वाज की ये कवितायें अभिव्यक्ति , अर्थ और कहन के साथ बड़ी     कविताओं में शामिल होंगी .)

1. लड़कियाँ 

लड़कियों की किताबें कवर चढ़ी होती हैं
किताबों के कवर के भीतर वे रख लेती हैं प्यार

लड़कियों के बालों से लट निकली होती है
बालों से निकली लट को चिपका लेती हैं गाल से
उनके गाल से चिपका होता है उनका प्यार

लड़कियां अपनी चाय का रंग तय करती हैं
अपनी चाय के रंग में घोलकर पी लेती हैं प्यार
लड़कियां अपने हर रंग को ख़ास बनाती हैं

लड़कियों के पर्स में कई डिब्बियां होती हैं
अपने पर्स की डिब्बियों में न जाने
कितनी बार खोलती बंद करती हैं प्यार

प्रेम पर लिखने वालो तुम्हें पता भी है क्या
लड़कियां कहां कहां छुपा लेती हैं अपना प्रेम

तुम उन्हें गुलाब और गुलाबी गालों में तकते हो
किताब के सूखे फूलों में चुनते हो
तुम्हें क्या पता लड़कियां प्रेम में
कहां कहां होती हैं तुम्हारे भीतर

तुम्हारी चाय के कप में
तुम्हारे बालों की लट में
तुम्हारे कंधे की छांव में
तुम्हारी उंगली के पोर में
तुम्हारे क़दमों की आहट में

लड़कियां नहीं होती सिर्फ
सुर्ख गुलाब और गुलाबी गालों या
न किताबों के पन्नों के बीच रखे सूखे हुए फूलों में

जैसे रख लेती हैं अपने कानों के संगीत में अपना प्यार
तुम उन्हें अपने कैनवस के रंगों में उतार लो

प्रेम की क़लम को थामने से पहले
प्रेमिका के दिल की झन्कार से पहले
ज़रा जान लेना दिल थामकर
लड़कियां कहां कहां छुपा लेती हैं अपना प्रेम
तुम्हें कुछ पता भी है!

2. आहटों का तांडव 

तीन पग में पूरी धरती
नापने का सपना देखने वाली औरत
असल ज़िंदगी में एक सड़क तक
अकेले पार नहीं करती !…

जब आदेश मिलता है
तो अकेली होने पर ज़हरीले जंगल में भी
पाल पोसकर तैयार कर देती है
दो वीर योद्धा …

फिर जब आदेश मिलता है
अग्नि -परीक्षा देने का
तो धरती फोड़ उसमें समा जाने का
हौसला रखती है

हौसले के कारण तो
टांग काट दिए जाने पर भी
एक औरत एवरेस्ट पर चढ़ गयी
एक औरत धरती में समा गयी
एक औरत ने गायब कर दीं
सारी सड़कें अपने ख़वाब में
और नाप ली सारी धरती
तीन पग में।

तीन पग में
धरती नाप लेने वाली औरत
अपनी खिड़की से
सड़क पार का चाँद नहीं ताका करती
वह भर लेती है अपनी दोनों आँखों में
चाँद और सूरज एक साथ
उसके हांथों की उँगलियों से
एक साथ झर उठते हैं
आकाश के टिमटिमाते तारे
जुगनुओं से भर गया है मेरा अहाता
किसी भैरवी की नयी बंदिश
अभी उठने को है….

हौसलों का डमरू
मेरे बादलों में गूँजता है
आहटों के तांडव से थिरक उठता है
कोई नटराज नयी मुद्रा लिए हुए.

3.   ताला , राखी , भाषा , आंखें 

ताला –
बेबस लटका रहा
घर के बाहर
चाबी के इंतज़ार में। ….

राखी-
बंधी पड़ी  रही
पोस्टमैन के पास
कलाई के इंतज़ार में। …

भाषा-
कतार में रही
उनकी जिद में
पहचान के इंतज़ार में । …

आँखें-
देर तक तकतीं रहीं
सपने में आसमान
इन्द्रधनुष के इंतज़ार में

4 . प्रतिकिया 

वह  प्रेम लिख रही थी ,
प्रतिक्रिया मिली – क्रांति लिखो

वह  क्रांति करने लगी,
प्रतिक्रिया मिली – प्रेम करो

वह बायो पढ़ने लगी ,
प्रतिक्रिया मिली -आध्यात्म जियो

वह घुँघरू की दुकान खोलकर बैठ गयी ,
प्रतिक्रिया नहीं मिली

इस बार कला जागी थी
पोस्टर बनने  लगे,
कविताएँ छपने लगीं ,
घुंघरू की दुकान के सामने खड़ी स्त्री ने अचानक
ब्रेकिंग न्यूज़ का बैकग्राउंड म्यूजिक बदल दिया है ,
अब गिफ्ट में घुंघरू का चलन चल निकला है

5  . धीमी आवाज़ का शोर 


उसकी दबती धीमी आवाज़ को
तेज कर सकने की हिम्मत मुझे चाहिए

नहीं सुननी उसकी आवाज़ केवल अपने कान में
चाहती हूँ कि उसकी आवाज़ और उसकी पीड़ा से
गूँज उठे यह धरती और ब्रह्मांड्

उसे धीमे से कहने की आदत है
उसमें प्रतिष्ठित लोगों के सामने घबराहट है
वह चाहकर भी चीख नहीं पाया कभी
उसकी पीड़ा में घुट गयी उसकी आवाज़ की तेजी

उसने बच्चों को देखा तेज दौड़ते हुए
उसने बच्चों की तेज आवाज़ को भी सुना
उसने भी औरों की तरह तेज़ दौड़ना चाहा
उसने भी औरों की तरह तेज बोलना चाहा

लेकिन उसके पाँव औरों की तरह नहीं थे
उसे कोई नहीं दे सकता सामान्य पाँव
लेकिन उसकी दबी हुयी आवाज़ तो तेज हो सकती है

उसकी धीमी आवाज़ उसकी घुटी हुयी पीड़ा है
उसकी दबती आवाज़ को तेज किया जा सकता है
उसके हौसले को ऊँचा करने की कोशिश में
उसकी आवाज़ भी ऊँची उठती जायेगी क्या ?

उसकी आवाज़ को तेज चीखना सिखाना है
उसकी घुटन को उससे बाहर निकालना है
उसके बँधे हाथ कंधे से ऊपर तक खड़े करने होंगे
उसका हाथ सिर्फ़ कोहनी तक ऊपर उठता है

कितना संकोच है उसके हाथों में, उसकी आवाज़ में
उसके मन की पीड़ा में,उसके मन की जरूरतों में

वह धीमी आवाज़ में तेज़ गति से जल्दी से
अपनी बात कहकर चुप हो जाना चाहता है
लेकिन अपनी आँखों के सपनों में वह चुपचाप
ख़ुद को किसी ऊंचाई पर अकेले देखता है

सपने देखने वाली उम्र में बच्चे तो
“शोर वाली जेनरेशन” का ताना सुनते हैं
लेकिन वह तो तेज आवाज़ निकालने के संकोच में
धीमे से ही कुछ कहकर जल्दी से शांत हो जाना चाहता है

मैं उसकी धीमी आवाज़ से उठती
किसी आक्रामक बैचेनी में हूँ

उसकी दबती धीमी आवाज़ को तेज़ करने की हिम्मत चाहिए

6  . लाल ग़ुलाब ….!!

मुझे चाँद नहीं चाहिए तुमसे
न ही कोई लाल ग़ुलाब !
गुलाब की खेती मैंने कर ली है और
चाँद की ओर मैंने कदम बढ़ा दिए हैं
न मेरे होंठों को गुलाबी पंखुड़ियाँ कहो और
न अपनी उँगली से मुझे चाँद का ख्वाब दिखाओ
मेरे होंठों में सवालों के काँटे हैं और
मेरे ख़वाब में मेरा पूरा आसमान
मैं सिर्फ़ ग़ुलाबी और लाल रंग कब तक पहनूं
तुम मेरे लिबास का रंग तय न करो
स्त्री !! तो तुमने रच ली नयी
जो खुले आम तुमसे प्रेम करे
तुम मेरी आँखों में न देखो, न रंग भरो मुझमें
एक अपना नया चित्र खींचो, कोई नयी बात बोलो
नहीं चाहिए मुझे तुमसे कोई ग़ुलाब न कोई चाँद
न रंग, न कोई ख़वाब , न कोई स्वप्निल प्रेमकथा
न अपने लिए चाहिए तुम्हारी रची कोई नयी भाषा
मैं एक नयी भाषा के साथ तुमसे संवाद करना चाहती हूँ

7. अभी तो उसे पैदा होने दो !


हाँ ,उस माँ को मालूम है
बेटी के होने का मतलब
कितना समझाया उसे कि
बेटी भी पढ़ -लिखकर आगे
तुम्हारा सहारा बन सकती है
नहीं माना उसने एक बार भी
आँसू भी नहीं थम सके उसके
न ही उसने मुझे कहने दिया –
अभी तो उसे पैदा होने दो !
वह खुद ही लगातार
एक के बाद एक ,
कई-कई किस्से
सुनाये जा रही थी लगातार
जीने की कोशिश में मरती हुई
मारी जाती ,जलाई जाती हुई
जलती हुयी ,घुटती हुयी ,तड़पती हुई
लड़कियों के किस्से-दर-किस्से
उन्हें घर में ही मारा और
जला दिया जाता
बिना किसी डर के।
वह माँ थी
आज ही बेटी के
पैदा होने से पहले ही
उसे जवान होकर मरता हुआ देख रही थी
“जल्लादों ने बहुत तड़पाकर मारा उसे
उनकी माँगों का मुँह बंद ही नहीं होता था”
अपनी अजन्मी बेटी की
जवानी की मौत पर
ज़ार-ज़ार रोये जा रही थी.।
उसके आँसुओं ने
जबड़ा थाम लिया था मेरा ,
और शब्द बहे जा रहे थे
उसके आँसुओं से मिलकर।
मैं अपनी धुन में
किसी नदी की राह में
उन अनवरत आँसुओं को
मिला देना चाहती हूँ
जो सींच सके उस धरती को
जो लड़कियों की लाशों के मलबे से
हर तरफ बंजर हुयी जाती है
एक हरा भरा उद्यान जहाँ
लड़कियाँ चिड़ियों सी हँसे
और इन्द्रधनुष सी चमके
उनके उन्मुक्त आकाश को
कोई धुआं काला न कर सके
कोई चहक घुटन न बन सके
बस करो !
अभी उसे पैदा तो होने दो।
उसे जिन्दा रहने की लड़ाई आती है
उसके साथ पूरी नई फसल का भरोसा है।
वह मार दिए जाने वाले
इन आंकड़ों से नहीं डरेगी
यू .पी और बिहार में सबसे ज्यादा होती हैं
दहेज़ हत्याएं और
कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़ों को तो
आँसू पोंछती माएँ रास्ता दिखा देंगी।

8 . बादलों के सफ़ेद फाये !

बंजर ज़मीन से टकराकर
बदहवास लौट आती है
दबी हुयी कोई चीख़
थके पांवों से बेहाल
छोड़कर अपनी चप्पलें
अपनी क़ैद में वापस !
फिर चढ़ जाती हैं नंगे पांव
ऊँचे ख़ूबसूरत पहाड़ों पर
लिपट-लिपट जाती है
हवा के किसी झोंखे से
उड़ जाती बादलों के फाये पर
बहने लगती है बेलगाम
तेज़ बहते पानी की लहरों संग
खिलखिला उठती है !
पानी की लहरों के बीच
किसी पत्थर पर बैठ
वह दबी हुयी चीख़
जो बरसों बाद
घर से बाहर भागती है.…
सुना नहीं गया उसे कभी भी !
न आज जब वह खिलखिला उठी
न तब जब उसे दबा दिया था जोर से
बहरे और गूँगे होने का चलन
अब हमारी चमकदार पहचान है
हम आबाद शहर के चौराहे पर हैं
जिसकी हर राह की मंज़िल
किसी वीरान बस्ती से मिलती है
जहाँ चीखें बेख़ौफ़ खिलखिलाती हैं
वीरान बस्ती का पता सबकी ज़ेब में है
ज़ेब में नन्हीं पाज़ेब खनकती है
ज़ेब में कोई लोरी सिसकती है
ज़ेब से जब निकल भागता है कोई मिल्खा
तब दुनिया के हाथों से ताली बज उठती है
वीरान बस्ती में हर रात
किसी थियेटर के मंच पर
यही रंगीन जश्न होता है
फ़िर कोई चीख बेख़ौफ़
खिलखिलाकर
बदहवास लौट आती है
किसी बंज़र ज़मीन से टकराकर
थके पांवों बेहाल
छोड़कर अपनी चप्पलें
अपनी कैद में वापस !
उसकी गोद में गिर पड़ते हैं
नीले बादलों के सफ़ेद फाये

एक क्रांतिकारी की पत्नी का आत्मकथ्य

सरस्वती भट्ट 


( निजी जीवन में अराजक और स्वप्न तथा कर्म से क्रांतिकारी रहे सुरेश भट्ट बिहार आन्दोलन के भी एक प्रमुख नाम हैं . यह आलेख उनकी पत्नी सरस्वती भट्ट का आत्मकथ्य है . आलेख मे उल्लिखित क्रांति चर्चित थिएटर आर्टिस्ट असीमा भट्ट हैं .


मेरी शादी अप्रैल, १९५५ में हुई. मैं ११ साल की और मेरे पति (सुरेश भट्ट) २४ साल के थे , जब हमारी शादी हुई. शादी क्यूँ और किसलिए होती है, मैं नहीं जानती थी. मेरी विदाई के साथ एक ‘दाई माँ’ भी साथ आई थी. जिस रात मैं ससुराल पहूँची उस रात जो कुछ रस्म होता था , हुआ. थकी थी  इसलिए जल्दी सो गयी. सुबह उठी तो अपने पलंग पर किसी मर्द को देखकर रोने लगी कि यहाँ मेरा अपना कोई नहीं है तो मुझे मर्द के साथ सुला दिया, मेरी दाई ने समझाते हुए कहा – “यह कोई गैर मर्द नहीं, आपके पति हैं .’ लेकिन मैं पति-वति कुछ नहीं समझती थी. मुझे रोज़ वो सजा-धजा कर नयी साड़ी पहना कर मेरे पति के कमरे में ले जाना चाहती और मैं उसकी साड़ी का आँचल पकड कर जोर जोर से रोने लगती  – “कुत्ती, मुझौसी…हम बाबु जी से  कह देव कि हमरा मरदाना के कमरा में सुतेलय भेजे छय…” मुझे रोते देखकर यही (मेरे पति) बोले  – “जाने दीजिये ना, काहे बच्चा को तंग करते हो, जहाँ उसका मन है, वहाँ सोने दो”.

सरस्वती और सुरेश भट्ट

पांच दिन वहां किसी तरह से कटा फिर मेरे नैहर ( मायके )  से मेरे बड़े भाई के साथ एक नौकर मुझे वापस लिवा ले जाने आये. मैं बहुत ख़ुशी -ख़ुशी वापस आ गई. यह बात अप्रैल, १९५५ की है. शादी के कुछ ही दिनों बाद अगस्त १९५५ में पटना में छात्र आन्दोलन हुआ. वो बनारस में पढ़ रहे थे, आन्दोलन की खबर सुनते ही पटना आ गए. पुलिस फायरिंग हुई. कई लोग घायल हुए. उसी में गोली कांड में दीनानाथ पाण्डे शहीद हुए. नवादा के उनके एक और साथी महेंद्र कुमार शहीद हो गए. दरअसल वह  गोली इनपर चली थी. ‘महेंद्र भाई जी’ ने इन्हें धक्का देकर दूर धकेल दिया और इनकी गोली खुद अपने सीने पर झेल ली. पूरे नवादा में खबर फ़ैल गई – “सुरेश भट्ट को पुलिस ने गोली मार दी.” मेरे ससुराल में भट्ट जी की दादी-बुआ–बहन थीं सब का रोना- पीटना शुरु हो गया

मेरे ससुराल में भट्ट जी के दादी-फुआ (उनकी माँ का देहांत हो चुका था और पिता जी ने दूसरी शादी कर ली थी) सबका रोना पीटना शुरू हो गया. उन दिनों टेलीफोन की सुविधा नहीं थी. तुरंत मेरे ससुर ने दो आदमी मेरे घर भेजा. खबर सुनकर हमारे यहाँ भी सब लोग रोने-पीटने लगे. मैं उस समय खेल रही थी .मेरी दादी भगवान को कोस कोस कर रो रही थी- “हे भगवान! इस छोटी सी बच्ची ने आपका क्या बिगाड़ा था. ऐसा अन्याय क्यों किया.” गांव घर की औरतें जमा हो गई, और मुझे पकडकर मेरा मांग धुलवा दिया गया. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह मेरे साथ क्या हो रहा है. एक हफ्ते बाद भट्ट जी घर (नवादा) आ गए. उनकी दादी उनसे गले लगाकर रोने लगी और तुरंत मेरे ससुर से कहा- “बडकी को घर बुलवा लो. वो सीता है, आज उसी की वजह से मेरा राम (भट्ट जी) जिंदा है.” मेरे ससुर जी ने तुरंत आदमी मेरे घर भेजा. मेरे घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई और मेरे घर वालों ने मुझे दुबारा मेरे छोटे भाई के साथ विदा कर दिया.

उसी केस के सिलसिले में गणेश शंकर विद्यार्थी, बृजनन्दन लाल और भट्ट जी तीनों को सात साल की सजा हो गई. बृजनन्दन भाई जी और गणेश शंकर विद्यार्थी तो साल दो साल में छूट गए लेकिन भट्ट जी पर काफी कड़ा केस लगा था. इसलिए वो पूरे सात साल बाद ही जेल से वापस आये . जेल से आने के बाद कुछ दिन अपने बाबूजी के सिनेमा हॉल चलाने में हाथ बटाने लगे और सामाजिक काम भी चलता रहा.

भट्ट जी की दादी और बुआ ने ही बताया था कि इनके क्रान्तिकारी स्वभाव के कारण इनके पिता जी इनसे क्षुब्ध रहा करते थे. मेरे ससुर शहर के सबसे नामी और धनी व्यक्ति थे इसलिए अँगरेज़ अफसरों का मेरे ससुर जी के घर पर आना जाना था. भट्ट जी को लगता की उनके पिता अंग्रेजों के मुखबिर हैं. उन्हें अपने पिता पर इस बात के लिए बहुत गुस्सा था लेकिन पिता से डर की वजह से कुछ नहीं कहते थे लेकिन एक दिन जब अँगरेज़ अफसर मेरे ससुर जी से मिलने आये और वो लोग बैठक खाने में बातें कर रहे थे  तो भट्ट जी, जो अंग्रेजों की जीप दरवाज़े पर खड़ी थी उसमें आग लगा कर भाग गए .

अंग्रेजो के लिये इनके मन में इतना आक्रोश भरा था कि पोस्टआफिस जला दिया था और रेलवे लाइन की पटरी उखाड़ दी थी ताकि अँगरेज़ नवादा से भाग ना सके. अंग्रेजों को सड़क पर खदेड़ खदेड़ कर मारा था, जिसके कारण उस कम उम्र में उन्हें जेल जाना पड़ा. जो आज़ादी के बाद ही जेल से बाहर आये. उनके इसी स्वभाव की वजह से उनके पिता जी चाहते थे कि इनकी शादी जल्दी करा दें. लेकिन भट्ट जी खुद के लिए आये रिश्ते और मेहमानों को खुद अपने बारे में उलटी – पुलटी मनगढ़त कहानियां सुना कर भगा देते. यहाँ तक कह दिया कि लड़का भांग-गांजा पीता है और लड़का पागल भी है.

मेरे पिता जी जब इन्हें देखने आये तो मेरे मौसा जी भी साथ आये थे. उनको भट्ट जी ने वही सब बताना शुरू कर दिया लेकिन मेरे पिता जी सब सुनकर बस हंस रहे थे क्योंकि उन्होंने पहले ही सबकुछ पता करा लिया था कि लड़का बनारस हिन्दू विश्वविद्दालय में पढता है. और बहुत ही तेज़ और होनहार छात्र है. ज्ञान इतना है कि किसी भी विषय पर बहस करा लो. बाबूजी को लगा बाकी सब शादी के बाद ठीक हो जायेगा. इसलिए मेरे पिता जी ने तुरंत बात पक्की कर दी. और १९५५ के अप्रैल में हमारी शादी हो गई. लेकिन शादी के बाद भी इनकी हरकतों में बदलाव नहीं आया. लगातार या तो जुलूस – आन्दोलन में उलझे रहते या फिर जेल में रहते….
मैं रोती कि मेरे बाप ने किससे शादी करा दी. एक-दो बार बाबूजी से कहा भी कि – आपने मेरी शादी सही नहीं करायी. वो कहते – “देखना सब ठीक हो जायेगा. लड़का हीरा है, बस थोड़ा भटक गया है. एक बच्चा हो जायेगा तो सब ठीक हो जायेगा.”

आम सभा को सम्बोधित करते जे पी

शादी के दस साल हो गए हमारा बच्चा नहीं हुआ.  ससुराल में सबको हमसे शिकायत होने लगी. लोग मुझे ‘बाँझ’ कहने लगे. ससुरजी को अपने वंश की चिंता होने लगी. अपने बेटे को बुलाकर कहा – ‘इसको बच्चा नहीं हो रहा. बाँझ है. आपको दूसरी शादी करनी पड़ेगी.’ इन्होने बाबूजी से साफ साफ कह दिया. ‘मुझे पहले भी शादी की ज़रूरत नहीं थी, आज भी नहीं है. मेरा तो पूरा देश ही बच्चा है.’ लेकिन इनके पिता जी नहीं माने और घर पर रिश्तेदारों का आना शुरू हो गया. एक दिन जब एक मेहमान आये तो भट्ट जी अपने पिता जी के सामने ही मुझे उन लोगों  के सामने बुला कर उनसे कहा –‘यह मेरी पत्नी है, आपको पता है ना. इसे बच्चा नहीं हो रहा है तो मैं इसके घर में रहते दूसरी शादी कर लूँ. इसकी क्या गारंटी है कि आपकी बेटी से बच्चा हो ही जायेगा और नहीं हुआ तो दोनों को घर में बिठाकर तीसरी शादी करूंगा तो आपको कैसा लगेगा?“

१३ साल हो गए मुझे बच्चा नहीं हुआ. कोई दवा नहीं, इलाज नहीं.  अचानक मुझे लगा कि मैं पेट से हूँ. लेकिन पूरी तरह यकीन नहीं हो रहा था क्योंकि मेरे ससुर जी दावा करते थे कि अगर इसे बच्चा हो गया तो मैं डाक्टरी छोड़ दुंगा. मुझे भी लगता, इतने बड़े ‘वैद्य’ हैं, भला यह कैसे गलत हो सकते हैं. डर से मैं तीन महीने चुप ही रही. फिर अचानक ४ महीने में मेरी सौतेली सास को ही कुछ शक सा हुआ उन्होंने पूछा – “कोई बात है क्या बड़की?”मैंने उन्हें बताया तो उन्होंने मेरे ससुर जी को बताया. ससुर जी बोले – “हो ही नहीं सकता ऐसा कई बार होता है कि कभी कभी औरतों को लगता ही कि वो पेट से है लेकिन वो भरम होता हैं. असल में पेट में पानी भरा होता है”

मेरी माँ मेरी शादी के दो साल बाद ही मर गयी थी. मेरी दादी थी जो कि सौतेली थी लेकिन सगी से भी बढ़ कर थी. मेरी माँ के मर जाने के बाद हम पांच भाई बहन को माँ से भी बढ़कर प्यार दिया. उन्हें जैसे ही मेरे माँ बनने की खबर मिली वो मेरे बड़े भाई को मुझे लिवा लाने भेजा क्योंकि वो जानती थीं कि  मेरी सौतेली सास है, जिनका बर्ताब मेरे साथ ठीक नहीं. वह  खुद हर साल एक बच्चे को जन्म देती थी और चूँकि मुझे बच्चा नहीं होता था. मैंने अपने देवर और ननद को अपने बच्चों जैसे ही प्यार से पाला. मेरी सौतेली सास कहती भी थी- ‘हम कुछ नहीं जानते हैं कि हमारा बच्चा कैसे पलता  है. हम तो खाली जन्म देते हैं. बाकी तो मेरा सब बच्चा बडकी के हाथ से ही पलता है.” कुल ९ बच्चे उनके हुए जिनमें कुछ की असमय मृत्यु हो गई पर चार बच्चों को मैंने ही बड़ा किया. सारे बच्चे अपनी माँ से कम और मुझसे ज़यादा घुले मिले थे. इन्हीं बच्चों को देख देखकर मैं अपने माँ बनने का अरमान पूरा करती.

जब मेरे भैया मुझे लेने आये तो ससुर कहने लगे – ‘क्या झूठ-मूठ तमाशा लगा रखा है? इसको ऐसे ही लग रहा है कि इसको बच्चा होगा और आप लोग भी बेवकूफ़ की तरह बात मान रहे हो. कहीं नहीं जाएगी. मैंने कहा ना इसके पेट में बस पानी है.”भैया कुछ नहीं बोल पाये. मैंने सास से कहा – “माय, जाने दीजिये न हमको नहरा. भैया आये हैं तो चले जाते हैं कुछ दिन के लिए. बच्चा हो चाहे ना हो.”

वो बोली – ‘अरे बाप रे. हमको मरना है तुमरे ससुर का हुकूम टालके.’मैं रोने लगी. मैं जानती थी कि इतने दिनों बाद भगवान ने मेरी सुनी है. यह मेरा भरम नहीं हो सकता. भट्ट जी से कहा – देखिये, आप बाबूजी से बात कीजिये, हमको जाने दीजिये. जानते हैं कि हमको यहाँ एकदम आराम नहीं मिलता. यहाँ हम पूरा दिन खटते रहते हैं, एक तो इतना  दिन पर मेरा अचरा भरा है. यहाँ ठीक से देखभाल नहीं होगा तो कुछ भी हो सकता है. वहां नहरा में दादी है. बडकी भाभी है, छोटी बहन. सब मेरा देखभाल करेगी.’

भट्ट जी बोले – ‘तुम जानो, तुम्हारा काम. हम मैया- बाबूजी से कुछ नहीं कहेंगे.’ अपने माँ बाबूजी को तो यह भगवान मानते थे. उनकी आज्ञा ऐसे ही निभाते थे जैसे भगवान राम.मैं बहुत रोयी, ऐसे भी तो पहला बच्चा नहरा में होता है. मुझे जाने दीजिये लेकिन मेरे ससुर बोले – ‘हमारे खानदान में ऐसा नहीं होता. देखती नहीं तुम्हारी सास का सब बच्चा यहीं होता है.’ .बात कुछ और ही थी. सास को चिंता थी कि मैं मायके चली गई तो इनके इतने सारे बच्चे कौन सम्हालेगा. क्योंकि सारे बच्चे मेरे साथ ही सोते थे. बल्कि बहने तो बड़ी हो गई थी तब तक अपने भाई (भट्ट जी) में सटकर ही सोती थी. भट्ट जी अपने सौतेले भाई-बहन को अपने बच्चों से बढ़कर मानते थे. और ससुर जी को लगता था कि बच्चा-बच्चा हैं नहीं. ढोंग कर रही है. कहीं ऐसा ना हो कि नैहर से किसी दूसरे का बच्चा लेकर चली आये.

1974 का आन्दोलन

दिन-रात ये सिनेमा में ही पड़े रहते थे. बस पैसे पंहुचाने घर आते थे. पूरे दिन भर सिनेमा के टिकट की जो कमाई होती वो अलग अलग थैलियों में करके अपनी माँ (सौतेली माँ, अपनी माँ का तो देहांत हो चुका था) को दे जाते. और कहते -“लाओ मईया! चार आना दो, सिगरेट पीयेंगे.” अपने बाबूजी से बहुत डरते थे. उनके सामने कभी सिगरेट नहीं पीते थे. सिगरेट पीना तो दूर की बात हैं, कभी अपने बाबूजी के सामने खड़े भी नहीं होते. वो जितना कहते, सर झुकाकर सुन लेते. हाँ, हूँ में जवाब देकर खिसक लेते. कभी सिगरेट पीते सामने पाए जाते तो जलती सिगरेट हाथों में दावा लेते. और अगर तब भी नहीं छुप पाता तो बाबूजी खड़ाऊ उतरकर पीटना शुरू कर देते और ये कुछ नहीं बोलते. इनकी दादी कहती – “अरे; घर में दुल्हिन है. इसकी शादी हो गयी है, अब तो रहने दो. जवान शादी सुदा बेटे पर ऐसे कोई हाथ उठाता है ?.” यह चुप चाप वहां से कट लेते.

जिस दिन मेरी बेटी हुई. उस दिन भी वो सिनेमा में ही थे. श्यामलाल बाबा (घर के सबसे बुजुर्ग और पुराने नौकर, बहुत जिद्दी और खूद्दार, उनके गुस्से से मेरे ससुर जी भी डरते थे). वे ख़ुशी ख़ुशी सिनेमा भागे, इन्हें बताने. -“अरे बड़े बाबू, घर में लक्ष्मी आयी.” यह दौड़े-भागे घर आये. जब तक यह घर पंहुचते, तब तक बाबूजी बच्ची को गोद में लेकर पंचांग (वे खुद ज्योतिष भी थे) देख चुके थे. खुश होकर बोले – “बहुत भाग्यशाली बच्ची है. साक्षात् ‘माँ भवानी’ का रूप हैं. उन्होंने नाम भी ‘भवानी’ रख दिया. पर सतैसा (kind of ritual on 27th day)  में पड़ी है, बाप पर भारी होगी. इसलिए २७ दिन बाद ही बड़े बाबू  इसको देखेंगे.

अब बड़े बाबूको कौन समझाए, वो तो बेटी को देखने के लिए उतावले हो रहे थे. इसपर मेरे देवर बोले – “इतना क्या है. इतने सालों (हमारी शादी के १४ साल हुई थी) बाद हुई भी तो बेटी.” तुरंत अपने भाई को डांटते हुए बोले – “बेटी नहीं. क्रांति हैं.”बाबूजी के हुक्म टालने की इनकी हिम्मत तो नहीं थी लेकिन सिनेमा विनेमा छोड़ कर घर में ही दिन भर घुर घुर करते रहते. और मौका देखकर मेरे कमरे की खिड़की के पास आकर गिगगिड़ाते. – ‘एक बार ‘बाबु’ को देखने दो ना, मुझे लगता भी कि एक बार दिखा दें, इतने सालों बाद खुद की बच्ची हुई है, दूसरों के बच्चों को बहुत प्यार करते थे, खूब खेलते थे. आज खुद की बेटी को देख नहीं पा रहे, मन तो बेचैन होता ही होगा. लेकिन मेरे कमरे में हमेशा एक दाई रहती थी. वो बोली – “हमरा बाबूजी मार के ज़मीन में गाड़ देंगे.”
बेटी को देखने के लिए इनका २७ दिन बड़ी कठिनाई से कटा. आखिर सतैसा हो गया. बेटी को गोद में लेकर ऐसे खुश थे जैसे सारी दुनिया की दौलत मिल गई हो. बेटी में तो जैसे जान बसती थी इनकी. छोटी सी बच्ची को भी सिनेमा में ही लेकर पड़े रहते थे. बच्ची बहुत प्यारी मगर कमज़ोर थी. कई औरतें जो देखने आती, वे मेरे मुंह पर ही कह देतीं – “चूहे के बच्चे जैसी है, बचेगी नहीं.” मैं रोने लगती. – “इतने दिनों बाद गोद भरी भी तो लोग ऐसी बातें करते हैं, हे भगवान! बच्चा देकर, छीन मत लेना.”

क्रांति जो अब असीमा हैं

ये कहते -“पागल! रोती क्यूँ हो? यह क्रांति है. देखना इसको कुछ नहीं होगा.“बेटी होने बाद यह बेटी में ही खोये रहने लगे. बेटी को लेकर बहुत खुश रहते, दिन-रात बस बेटी को लेकर सोना. बेटी को लेकर ही जागना. लोगों से कहते मेरी बेटी इंदिरा गांधी की तरह नाम करेगी. यह देखकर सौतेली माँ जल भून गयी. तुरंत ही बातें बनाने लगी और ताने देने लगीं. बेटी होते ही उन्हें लगने लगा कि सम्पत्ति का हिस्सेदार आ गया. घर में सौतेली सास का बर्ताव बिगड़ने लगा. घर के तनाव को देखते हुए ससुरजी ने हमें अलग कर दिया. घर से हमें ये बिलकुल खाली हाथ लेकर निकल आये. उन दिनों खुद सिनेमा हॉल चलाते थे. वहीँ सिनेमा हॉल के ऊपर वाले पुराने केबिन में लाकर हमें रख दिया. हम नहाकर  क्या पहनेंगे, क्या खायेंगे, इसका कुछ इंतजाम नहीं था. मैंने कहा भी भट्ट जी से कि कुछ सामान घर से मंगवा लेते. ये मुझे डाँटते हुए बोले – ‘तुम एकदम चुप रहो. जब माँ –बाबूजी नहीं सोच रहे हैं या सामान नहीं भिजवा रहे हैं. उनको यही सही लग रहा तो लगने दो. तुम चुप रहो.’  माँ-बाबूजी ने कुछ भी सामान भिजवाना ज़रूरी नहीं समझा. छह महीने तक हम छोटी सी बच्ची को लेकर ज़मीं पर सिनेमा के पुराने पोस्टर बिछाकर सोते रहे. और सिनेमा के होटल से खाना खाते रहे. बच्ची को देर रात कभी भूख लगती तो ना दूध का इंतजाम था न घर में कोई बर्तन की हम किसी तरह कुछ गर्म करके उसे दें. उस रोती हुई बच्ची को कंधे पर लेकर ये बाहर निकल जाते. कई बार देर रात को बंद होटल खुलवा कर दूध या कुच्छ मिठाई खिला देते. मुझसे बेटी का तकलीफ नहीं देखा जा रहा था. आखिर इसमें इस छोटी सी बच्ची का क्या कसूर.   मैंने दुबारा इनसे कहा कि माँ बाबूजी से बात करके घर का ज़रूरत का कुछ सामान ले आते है. इन्होंने मुझे दुबारा सख्त मना कर दिया. ‘देखते जाओ अभी, यह लोग और क्या क्या करते हैं.’ बच्ची की परेशानी मुझसे देखी नहीं जा रही थी. मैंने कहा ऐसे तो मेरी बेटी मर जाएगी. आप मुझे नैहर भेज दीजिये, वह नहीं माने क्योंकि बेटी के बिना एक मिनट नहीं रह सकते थे. मैंने कहा- ‘ठीक है, फिर सिनेमा से जो इतना पैसा कमाते हैं उसमें से कुछ दीजिये. आखिर इस पैसे पर इस बच्ची का भी हक है.’ यह बोले – ‘बिलकुल नहीं.’ और रोज सिनेमा की जो कमाई होती श्यामलाल बाबा (जो हमारे घर के सबसे भरोसेमंद, पुराने और बुजुर्ग नौकर थे) के हाथों घर भिजवा देते. कई बार शायमलाल बाबा भी गुस्सा करते- ‘बड़े बाबु आप सही नहीं कर रहे हैं तनिक बच्चा का मुंह देखिये.’ लेकिन भट्ट जी अपने सिद्धांतो से कहाँ हटने वाले थे. उन्होंने मुझे भी सास-ससुर के घर जाने से सख्त मनाही कर दी.

देखते देखते छह महीने बीत गये. मेरे गांव की एक बेटी की शादी नवादा में ही हुई थी. उसका बाप अपनी बेटी से मिलने आया था. वह आदमी मेरे घर भी आया. हमारी दशा देखकर जाकर मेरे बाबूजी को बताया. बाबूजी तुरंत भागे आये. पहले तो मुझे जी भर कर डांटा कि मैंने उन्हें कुछ क्यों नहीं बताया. बाद में मेरे ससुर जी से बात की. उन्होंने साफ़-साफ़ कहा कि- ‘समधी जी, आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी. आपको तो मैं विद्द्वान समझता था. इतने सालों बाद मेरी बेटी को एक बच्चा हुआ है और आप ऐसा कर रहे हैं आपको अपनी फूल सी मासूम पोती पर भी तरस नहीं आया.’मेरे ससुरजी ने जवाब दिया- ‘यह मेरे घर का मामला है. जब मेरा बेटा-बहु कुछ नहीं बोल रहा तो आप कौन होते हैं.’

उस समय मेरे दादा ससुर जी का २५ करोड़ की सम्पत्ति थी. पर ना भट्ट जी ने माँगा और ना मेरे ससुर जी ने दिया. फिर इमरजेंसी में यह जेल चले गए मैं अकेली छोटी सी बच्ची को लेकर वहां क्या करती. इसलिए नैहर चली आयी लेकिन वहां भी कितने दिनों तक रहती. भट्ट जी का कहीं कोई पता नहीं. मायके में एक बड़ी भाभी और और एक छोटी भाभी थी. मैंने बाबूजी से कहा- मुझे जाने दीजिये. परायी घर की भाभियाँ हैं. कब तक यहाँ रहूँगी, उन्हें बोझ लगूंगी. आप मुझे जाने दीजिये. जो भाग्य में होगा, देखेंगे. बाबुजी  मुझसे बहुत नाराज़ हुए. –जब तक मैं जिंदा हूँ किसी को भी कुछ बोलने का हक नहीं है. भट्ट जी का कहीं कुछ पता नहीं है. छोटी सी बच्ची को लेकर वहां जाकर क्या करोगी? कैसे  रहोगी?’

अब जो होगा, जैसे भी हो हम वहीँ रहेंगे. अपना घर अपना होता है, भाभी लोग कुछ बोले ना  बोले. मन में तो सोचेगी. मेरी क्या इज्जत रहेगी अगर मैं पूरी जिंदगी यहीं बैठी रहूंगी.गांव-समाज भी चार बातें बनायेगा. किस किस का मुंह पकड़ेंगे आप. जाने दीजिये बाबूजी. दादी ने भी मुझे समझाया, कि बहुत छोटी बच्ची है. कम से कम दामाद बाबु का कुछ पता चले तो चली जाना. लेकिन मेरा मन नहीं लग रहा था. भट्ट जी को चिट्ठी लिखने की भी आदत नहीं कि पता लगे की जेल में हैं कि भूमिगत हैं. खैर मैं जिद्द करके वापस नवादा आ गई. बाबूजी से कहा अगर आप मेरी मदद करना चाहते हैं तो मुझे एक सिलाई मशीन दे दीजिये. मैं सिलाई करके कुछ कमा लूंगी.    बाबूजी मेरी बात मान गए. उन्होंने एक सिलाई मशीन खरीद कर दे दी और हम वापस नवादा आ गए. साथ में चावल, दाल, चुड़ा. बड़ी, सब खाने का सामान भी भिजवा दिया. बाबूजी अपने जीते जी हमेशा खाने का पूरा सामान और कपडे हर त्योहारों पर भिजवाते रहे.

बेटी असीमा के साथ सुरेश भट्ट

नवादा आकर हम मुह्ल्ले की एक गरीब विधवा चाची थी, उसे साथ लेकर घर घर जाकर लोगों से सिलाई का कपडा मांग कर सिलाई करने लगे. जब यह बात मेरे ससुर जी को पता चली तो उन्हें लगा की इस तरह से उनके घर की बहू दूसरों का सिलाई करके गुज़ारा करेगी तो उनकी इज्ज़त जाएगी. गुस्से में आकर उन्होंने मेरे घर की बिजली कटवा दी. हम उनसे कहने गए कि बाबूजी बिजली कट गई है. अकेले बच्चे को लेकर अँधेरे में रहने से डर लगता है. वे बोले तो “हम क्या करें.”सास से मैंने कहा – ‘मायजी आप ही कुछ समझाइये ना बाबूजी को. एकदम वीरान है चारो तरफ. उस समय सिनेमा के आस-पास कुछ भी नहीं था. एकदम शहर से बाहर सिनेमा हॉल  था और पीछे नदी. जब तक सिनेमा चलता रौनक रहती. उनके बाद चारों तरफ सायं सायं करता. हम अकेले बच्चे को लेकर रात भर हनुमान चालीसा जपते हुए गुजार देते. एक बार श्यामलाल बाबा से बोले – बाबा बहुत, डर लगता हैं आप यहीं सोया कीजिये. और तब से वे वहीं मेरे घर के नीचे ठीक दरवाज़े के सामने सोने लगे. जब तक वो जिंदा रहे, वहीं सोते रहे. कई बार उन्हें गुस्सा  आता तो जाकर मेरे ससुरजी से झगड़ा करते. ‘वे भी इसी घर की बहु है. इज्जत है इस घर की,  लाज है आपकी. ब्याह कर लाये हैं ना आप. वो खुद उठ कर नहीं चली आई है कहीं से, आप जो इस तरह कर रहे हैं ठीक नहीं हैं. भगवान सब देखता है. यह शनिचरी (मेरी सास के बारे में) की वजह से जो आप पागल हो गए हैं. यह शनिचरी सबको खा जाएगी. देख लीजिये. सबको बरबाद कर देगी एक दिन.’मेरी सास ने साफ़ मना कर दिया कि बाबूजी से बात नहीं करेगी. वे बोली. वो क्या मेरा कहना में हैं?  .
सच तो यही था कि ससुरजी वही करते जो वो कहती थी, एक तरह से वो पत्नी के हाथ की कठपुतली बनकर रह गये थे. मेरी सास को लगता बेटा (भट्ट जी) इधर-उधर भागा ही रहता है या जेल में ही रहता. वे किसी दिन इसी तरह पुलिस की गोली से मारा जायेगा. यह अपने बच्चे के साथ जाकर नहरा में रहे. यहाँ रहेगी तो हिस्सा मांगेगी. और इस वजह से उन्होंने मुझे मेरे बच्चों के साथ उस सिनेमा के केबिन से निकलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कभी घर में चोरी करवा देना, कभी घर का सामान उठवा कर सडक पर फिकवा देना. एक बार मेरे घर में चावल दाल था, जो मेरे भाई पंहुचा गए थे. पूरा का पूरा बोरा उठवा कर सडक पर फेंकवा दिया. सडक पर बालू ही बालू था. इस चिंता में की बच्चे क्या खायेंगे. यह तो मेरे बच्चे का अन्न है. मैं पागल की तरह उस रेत में चावल और दाल चुनने की कोशिश करने लगी. लेकिन सब बर्बाद हो चूका था कुछ भी हाथ नहीं लगा. यह सब मेरे ससुरजी को पता था लेकिन वो सब जानकर अंजान बने रहते. भट्ट जी के साथी (कामरेड) कभी-कभार हमारा हाल जानने-पूछने आ जाते हम उनसे रो रो कर पूछते की भट्ट जी कहाँ हैं? लेकिन वे कुछ नहीं बताते. सिर्फ इतना कहते कि आ जायेगे. हां. यदि भट्ट जी जेल में होते तो कभी कभी हमें जेल मिलाने ले जाते. लेकिन ज्यादातर तो क्रांति ही जाती थी क्योंकि भट्ट जी क्रांति को जेल में भी याद करते थे इसलिए  क्रांति को भी डर नहीं लगता. वो आराम से उन लोगों के साथ ‘गया सेन्ट्रल जेल’ या हजारीबाग जेल चली जाती थी और शाम तक वापस भी आ जाती थी. वे लोग भी बताते थे कि कभी इसने किसी को रस्ते में तंग नहीं किया. हाँ, एक-दो बार रास्ते में जूता खोकर चली आती थी. बच्ची  थी. रास्ते में थक कर सो जाती थी. और नींद में ही कहीं जूता पैर से गिर जाता था. वे लोग भी ध्यान नहीं दे पाते. पर मैंने बेचारी को कई बार बहुत मारा. गरीबी में किसी तरह सब कुछ जुटाना और एक भी चीज़ खो जाये तो इस तकलीफ़ में कि नया कहाँ से आयेगा. झुंझलाहट होती थी.
एक बार की बात है जब हम साथ रहते थे यानि घर नहीं बंटा था. मेरे ससुरजी बनारस से मेरी सास के लिए दो साड़ी लेकर आये. उन दिनों हिन्दी सिनेमा में अक्सर नूतन, मीना कुमारी और वहीदा रहमान लाल बाॅर्डर और आंचल की साड़ी पहनती थी. मुझे खूब पसंद थी. मैंने सास से कहा  – ‘माय जी मुझे इसमे से लाल आंचल बाॅर्डर वाली साडी बहुत पसंद है. एक हमको दे दीजिये ना.’  वो बोली – ‘हम दोनों साड़ी में आग लगा देंगे लेकिन तुमको एक  नहीं देंगे.’

मैं मन मार कर रह गई, जब बड़ी बेटी क्रांति पटना आज अखवार में कमाने लगी तो ठीक वैसी ही साडी मुझे उसने दुर्गा पूजा पर लाकर दिया और कहा – “माँ, तुम यही साड़ी पहनकर पूजा करोगी.”बात तब कि है जब बड़ी बेटी क्रांति और बेटा प्रकाश (विप्लव) दोनों बाल भारती स्कूल में पढ़ते थे. क्रांति तीसरी में थी और प्रकाश दूसरी कक्षा में. दोनों के स्कूल के दो महीने की फीस  बाकी हो गयी थी. मास्टर ने दोनों बच्चों को पूरे स्कूल के सामने बुरी तरह बेंत की छड़ी से मारा. दोनों भाई-बहन रोते रोते घर आये. बच्चों का हाल देखकर मैं एकदम घबरा गयी. दोनों का हाथ पकड़ा और वैसे ही दोनों को लेकर ससुरजी के घर भागी. दोनों भाई-बहन की पीठ पर बेंत के लाल गहरे निशान पड़ गए थे. दोनों बच्चों के कपड़े उतार कर ससुरजी को दिखाया, देखिये बाबुजी. आप के जीते जी सिर्फ बीस रुपए के लिए आपके पोते-पोती को कैसे जानवर की तरह पीठ फाड़ कर पीटा गया है. तो उनका जवाब था – ‘यहाँ हमारे पास लेकर क्यूँ आयी हो, हमने कहा था बच्चा पैदा करने. बाप कुत्ते की तरह पैदा करके भाग गया तो हम क्या ठेका लिए हैं. पढ़ाई-लिखाई छोड़वा दो. पढ़ लिख कर क्या करेगा. चीनियाबादाम खरीद के दे दो. फुटपाठ पर बैठकर बेचेगा तो २ रुपया भी कमाएगा.

उस दिन के बाद से हमने कभी ससुरजी के घर पर पैर नहीं रखा और सोच लिया चाहे जो हो जाये. अपने बच्चों की पढ़ाई कभी नहीं छोड़वाउंगी. तब से और भी रात-रात भर जाग कर सिलाई-बुनाई करने लगी ताकि कभी मेरे बच्चे ना भूख से सोये और ना कभी उन्हें स्कूल की फी की वजह से मार खानी पड़े.१९५५ के छात्र आन्दोलन में भट्ट जी सात साल की सजा में हजारीबाग जेल में थे. छह माह उन्हें बेड़ी हथकड़ी में रखा गया. जेपी आन्दोलन में पूरे दो साल ‘गया सेन्ट्रल जेल’ में बेड़ी-हथकड़ी के साथ सेल (मीसा) में रखा गया. कभी कभी उनसे जेल मिलने जाती तो, देखकर दिल दहल जाता था. मैं मुंह से कुछ नहीं कहती, उनकी हालत देखकर रोने लगती. तो हँसते हुए कहते- ‘अरे पगली, रोती काहे हो? मरे थोड़े हैं. देखो भगत सिंह को. वो कैसे देश के लिए शहीद हो गया. हम ऐसे थोड़े मरेंगे, देखना कईयों को मार के मरेंगे. और देश पर मरने वाले कई भगत सिंह पैदा करके मरेंगे.’
‘नगरपालिका कर्मचारी आन्दोलन’ में डेढ़ साल और ‘बिजली आफिस कर्मचारियों के आन्दोलन’ में करीब एक साल जेल में रहे. जेल से छूटने पर कभी कभी घर पर होते भी तो ना के बराबर. अक्सर उनके घर पर होने पर लोगों की भीड़ जमा रहती. सब अपने अपने काम की पैरवी लेकर घर पर भीड़ लगाये रहते. कभी बीडी-मजदूर, कभी रिक्शा मजदूर संघ के लोग तो कभी ईंट भठ्ठा मजदूर घर पर आ आकर दिन भर इनको घेरे रहते. और सबसे हंसकर बड़े प्यार से बात करते. लेकिन हमसे बात करने या बच्चों से बात करने की कभी फुर्सत नहीं. एक बार भी नहीं पूछा कि घर कैसे चलता है. बच्चे कैसे पढ़ते हैं.

असीमा अब मुम्बई रहती हैं

बहुत बार रोकर, प्यार से समझाने की कोशिश की. अपने घर और बच्चों पर भी ध्यान दीजिये. इन्हें बाप की कमी महसूस होती है. यह भी आपकी जिम्मेवारी हैं. मेरा ना सही बच्चे की कुछ तो परवाह कीजिये. लेकिन उनको कभी कोई फर्क नहीं पड़ा. हँसते हुए कह्ते. ‘हाँ ठीक है., मेरा तो पूरा हिंदुस्तान ही बच्चा हैं. जिस दिन दुनिया के तमाम बच्चे पढ़ लिख जायेंगे. भर पेट खायेंगे. उस दिन मेरे बच्चे का भी भविष्य सुधर जायेगा. इनको कायर मत बनायो. सिखने दो, दुनिया की तीन तिहाई आवादी कैसे जीती है. आलिशान महलों की तरफ मत देखों. जो लोग झोपड़े में रहते है उनको देखो. उनके झोपड़े में ना चूल्हा जलाने के लिए किरासन तेल हैं ना लालटेन जलाने के लिए.’उनके बहस और तर्क के आगे मेरा एक नहीं चलता था. कभी ना उन्होंने मेरी बात सुनी और ना समझी. हमेशा रोकर, चीख-चिल्लाकर रह जाती. और यह घर से बाहर निकल जाते. और पता चलता कि कभी मुसहर टोली में, तो कभी पासी के घर पर ताड़ी पीकर पड़े हैं. जो बच्चा घर में है, उसे भर पेट अन्न नहीं मिल रहा उपर से बाहर से किसी भी दूसरों का बच्चा ले आने को उतारू रहते. एक बार एक १० साल का बच्चा कहीं झरिया या बेतिया से अपने साथ ले आये और कहने लगे कि आज से यहीं रहेगा. मैंने पूछा तो कहा कि इसके माँ-बाप को नक्सलियों ने गोली मार दिया. अकेला बचा है. आज से यहीं रहेगा. क्रांति और विप्लव (प्रकाश का नाम उन्होंने विप्लव रखा था) के साथ पढ़ेगा. पानी-वाणी भर देगा. बाज़ार से तरकारी ला देगा. मैंने भी उसे घर में रख लिया, अब ले ही आये थे तो क्या करते. हमारे बच्चों के साथ रहने लगा लेकिन कुछ समय बाद खुद ही कहने लगा हमको चाय की दुकान पर काम मिल गया है और ५ रुपया भी मिल रहा है.

पीछे की नदी में कई बार बच्चा फेंका हुआ इनको पता चलता तो ये सबसे पहले बच्चे को बचाने पंहुच जाते. लेकिन अक्सर बच्चा मारा हुआ पाया जाता. एक बार जाडे की रात में एक छोटी सी बच्ची घर के ठीक पीछे ही नदी  के पास सरकंडे की झाड में पड़ी थी. मुंह अंधेर हल्ला होने लगा कि कोई बच्चा है… कोई बच्चा फेंक गया है. यह तुरंत भागे. माचिस और नेवार लेकर. बच्ची को आग जलाकर सेंका शायद साँस चल रही थी. बच्ची को गोद में लेकर भागे हास्पिटल. वहां डाक्टर ने बताया कि रात भर की ठंढ से सिकुड़ कर बच्ची ने दम तोड़ दिया. उसके बाद उन्होंने ही अपने हाथों से बच्ची को कफन लाकर दफनाया. कई दिनों तक दुखी रहे कि बच्ची को बचा नहीं सके. अक्सर मुझसे कहते कि एकदम क्रांति जैसी थी ना . यहाँ तक कि क्रांति को भी कह दिया कि उसे उन्होंने उस्सी नदी के नाले में पड़े हुए पाया है कई दिनों तक क्रांति रोती रही. फिर मैंने ही डान्टा- ‘क्यों बच्चे को उटपाटांग बाते दिमाग में घुसाते हैं’ तो ऊपर से कहने लगे देखना एक दिन इसके ढेर सारे भाई-बहन ला देंगे. जितने भी आनाथ और बेघर बच्चे हैं सबको ले आयेंगे और एक आश्रम खोलेंगे- ‘अभय आश्रम’.

1978 की बात है, एक बड़ी बस भरकर विदेश से लोग आये थे, जिसमें मर्द-औरतों दोनों थे. सब मुझसे हाथ मिलाने के लिए बढ़ाते और मैं हाथ जोडकर सबको नमस्कार करती. औरतें गले मिलती. मुझे बड़ी शर्म आ रही थी. सिनेमा के प्रांगण में ही शाम से लेकर सुबह तक मीटिंग चली. भट्ट जी ने एक घंटे से ऊपर अंग्रेजी में ज़ोरदार भाषण दिया. उन्हें देखकर कभी ख़ुशी होती थी कभी अपनी हालत पर तकलीफ. शहर के बहुत बड़े-बड़े लोग जमा हुए थे. सबका खाना-पीना सब सिनेमा के मैदान में ही चला. सबलोग बहुत खुश लग थे. काफी लोग बंगाल और केरल से भी आये थे. सब मुझसे आकर आकर मिलते और मुझे  इज्जत दे रहे थे. मुझसे कहते कि हमे सुरेश भट्ट जैसे अपने नेता पर गर्व है. आपको भी होना चाहिए. मैं हाँ-हाँ में सर हिला देती. क्या कहें, कोई मेरी बात समझने वाला नहीं था.

कई बार हमारे घर नागार्जुन, फनीश्वरनाथ रेणु, राजकमल चौधरी, लाल धुँआ, कैलाशपति मिश्र, जार्ज फर्नांडिस, जाबिर हुसैन भी आते थे. कई और भी लोग जो उस समय के बड़े-बड़े मंत्री और सांसद थे. नागार्जुन और फनीश्वरनाथ रेणु को हम नहीं जानते थे कि वो देश के इतने बड़े लेखक हैं. वो बहुत बाद में मेरी बड़ी बेटी ने बताया कि वो दोनों पूरे देश में जाने जाने वाले बड़े लेखक हैं. हमसे वे दोनों बहन की तरह मिलते थे. उन्हें मेरे साथ चौका में बैठकर मेरे काम में हाथ बटाना अच्छा लगता था. मैं रोटी बनाती तो वे लोई बनाने लगते. दोनों को मछली बड़ी पसंद थी. मेरे हाथ की बनी मछली बड़े मज़े से खाते. बिलकुल ग्रामीण औरतों की तरह पारवारिक बातें करते. गीत गाते. रेणु जी के बाल बड़े सुंदर और चमकीले थे. वे अपने बालों का पूरा ध्यान भी रखते. और भी कई बड़े-बड़े साहित्कारों का ताँता लगा ही रहता. घर में कुर्सी के आभाव में मैं ज़मींन पर ही चादर बिछा देती. मुझे शर्मिंदगी भी होती कि इतने बड़े बड़े लोग हैं और ज़मीन पर बैठेंगे?. पर वे लोग घंटों वैसे ही बैठे कहानी-कविता का पाठ करते. जोर जोर से बातें करते. हंसी-ठहाका लगाते. घर में जो बना होता वही मांग कर खा लेते. कई बार सूखी रोटी प्याज़ बड़े प्यार से खा लेते. मैं सोचती भी ऐसे कैसे खायेंगे, जल्दी कुछ बना दें पर भट्ट जी मुझे मना कर देते. –‘अरे ज्यादा कुछ मत करो. जीने के लिए खाते हैं. खाने के लिए नहीं. जो है, वही लाओ दो’. और वहीं पुराने अख़बार पर रोटी.प्याज़-नमक-मिर्च धरकर सब मिल बाँट कर खा लेते और फिर धंटों वैसे ही बहस चालू रहते.

एक बार भट्ट जी बहुत सालों बाद जेल से छूटकर घर आये थे, इसलिए उनसे मिलने उनके खास दोस्त अनंत कुमार राय आये. रात काफी हो गई थी और भट्ट जी तब तक घर नहीं पहुंचे थे. वैसे भी नवादा में रहकर भी भट्ट जी के पैर घर में नहीं टिकते थे. मैं बोलती भूकती, कि सालों बाद घर लौटते हैं तो ज़रा घर पर भी पैर टिकाईये. उनका बस एक ही जवाब होता- ‘इतना दिन बाद बाहर आये हैं तो ज़रा बाहर का भी माहौल समझने दो.’ अनंत राय ( भाय जी ) हमारी शादी में बाराती बनकर भी गये थे. हमारे घर और हमारे बाबूजी का ठाट-बाट देख चुके थे. वे जानते थे कि हम कितने बड़े ज़मींदार परिवार से आते हैं. हमारी बेटी को जमीन पर सोते देखकर बहुत भड़के. गुस्से से तमतमा कर वहीं ज़मीन पर बैठे रहे कि जब तक भट्ट जी नहीं आयेंगे, तब तक वो नहीं जायेंगे. भट्ट जी काफी देर से लौटे. आनंत भाय जी ने उन्हे बहुत डान्टा. बहुत बुरा-भला कहा लेकिन भट्ट जी बस हँसते रहे. उन्हें किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था. असल में वो इससे इतमिनान रहते थे कि मेरे नेहरा से सबकुछ आ ही जाता है. जब तक बाबुजी और दादी जिंदा रही. खेती का सारा सामान रहे भेजते रहे. दादी मुझे और बच्चों को बहुत मानती थी लेकिन ना अब दादी है ना बाबूजी. तीन भाई हैं. सब का अपना परिवार हैं. सब नाती-पोते वाले हो गए और सब वहीँ झारखंड में दुमका-गोड्डा में बसे हैं.

भट्ट जी स्वतंत्रता संग्राम आंदोंलन में भी अपने कम उम्र में ही दो साल जेल में रहे लेकिन कभी अपने जीते जी ना स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन लिया और ना ही जेपी आन्दोलन वाला पेंशन.लालू यादव, नितीश कुमार, जार्ज फर्नांडिस, सी.पी. ठाकुर, शिबू सोरेन, यह सब भट्ट जी को अपना रानजीतिक गुरु मानते थे और गुरु जी कहके बुलाते थे. उसके बावजूद नितीश कुमार कहते हैं कि –‘किसको-किसको पेंशन दें, भेड़िया से ज्यादा गरेडिया हो गया है.’ शायद नीतीश जी को पता नहीं कि भट्ट जी अगर घर छोडकर समाज सेवा में नहीं रमते तो कम से कम वो खुद २५ करोड़ सम्पत्ति के मालिक होते. जिस आदमी ने अपना सारा जीवन सामाजिक काम में होम कर दिया वैसे आदमी की विधवा को कोइ भी पेंशन ना देकर नितीश जी खुद अप्रतिष्ठित हो रहे  हैं. समाज के नाम पर जिस सुरेश भट्ट ने अनेकों बार खून बहाया, गोली खायी, लाठी खायी. आज कोई समाज और प्रशासन नहीं देखने वाला कि आज मेरे साथ  मेरे घर में और हमारे बच्चों के साथ क्या हो रहा है. यह समाजसेवा किस काम आया. मेरा सौतेला देवर साल में १०-२० लाख रूपये सिर्फ गुंडों और पुलिस को खिलाता है. सारी सम्पत्ति हडप कर बैठा है. उसने मेरे देवर (भट्ट जी के छोटे भाई नरेश भट्ट) के दो बेटों की हत्या करवा दी. यह बात पुलिस भी जानती है और पत्रकार भी. लेकिन सब के सब रूपये की ताकत के आगे चुप हैं. एक बार मेरे बेटे प्रकाश पर जब वह सिर्फ ७ साल का था बम फेंकवा दिया. बुरी तरह जख्मी हुआ मेरे पिताजी आये और उसका इलाज करवाया. किसी तरह बच गया. फिर पिताजी उसको साथ ही ले गये. वो जानते थे कि यहाँ रहा तो फिर इस पर हमला होगा. वो १६ साल नानीघर में ही रहा और अपनी पढ़ाई पूरी करके जब वापस आया तो फिर कई बार उस पर  अलग अलग तरीके से हमला करवाया गया. वो अपने रास्ते में आने वाले सबको खत्म कर देना चाहता है. भट्ट जी ने अपनी पत्नी और बच्चों को इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया कि आज मेरा दुःख समझने वाला कोई नहीं है.

इतिहास का अंधकूप बनाम बंद गलियों का रूह -चुह : गया में यौनकर्म और यौनकर्मी : अंतिम क़िस्त

संजीव चन्दन 


( यह आलेख २००९ में एक शोध के सिलसिले में किये गये केस स्टडी का एक हिस्सा है :दो किस्तों में प्रकाशित , अंतिम क़िस्त  ) 

“यद्यपि गया का रेड लाइट एरिया शहर के केन्द्र में टावर चैक के समीप बसा है। इसकी मौजूदगी आज भी है और कल भी थी, लेकिन ‘कल’ के इतिहास को व्यक्त करता कोई दस्तावेज नहीं है। तमाम दूसरे स्थानों, क्षेत्र अथवा राज्यों की तरह मगध और गया का इतिहास भी राजा-रजवाड़ों की सामारिक गतिविधियों से भरा है या फिर आजादी के पूर्व और बाद तक के सिलवटों से भरा है इतिहास। यौनकर्मियों का इतिहास! इतिहास नहीं; स्मृतियों, अफवाहों और गप्पों से टूट-बिखरकर इतिहास लायक जो कुछ भी है-समझा जा सकता है वही इतिहास हो सकता है इनका।”

पहली क़िस्त को पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें :

( इतिहास का अंधकूप बनाम बंद गलियों का रूह -चुह : गया में यौनकर्म और यौनकर्मी : पहली क़िस्त ) 



इनसे मिलते हुए जो सवाल थे मेरे मन में वे क्रमशः इस प्रकार थेः-

1. फुर्सत के वक्त
क.अंतराल
ख.दिवस-भाग
2. फुर्सत के क्षणों में क्या करती हैं ?
3. समारोहों में भागीदारी
क. रूचि
ख. किस समारोह से विशेष लगाव है
4.सबसे तीव्र इच्छा, जिसे करने का मन करता हो?
5. क्या ईश्वर में आस्था रखती है?
6. क्या देवालय गयी हैं?
7. यदि नहीं तो क्या जाने की इच्छा होती है?
८. आपस में एक-दूसरे से किन-किन अवसरों पर मिलती हैं?
9.एक-दूसरे को किस प्रकार संबोधित करती हैं? आदि।

अधिकांश मामलों में ये स्त्रियाँ  आस्थावान हैं-ईश्वर आपसी साहचर्य, परिवार और निजी संबंधों के प्रति आस्थावान हैं-काम, जो वे कर रही हैं, वह उनका चुनाव भी है और मजबूरी भी, कुछ हद तक विकल्पहीनता एक कारण है। थोड़ा अफसोस है, परंतु कुंठा नहीं, अपराध बोध नहीं। अवकाश इन्हें भी नहीं है, तो इनका सवाल है कि क्या घर की महिलाओं को है! वे भी सब करती है, जो हम कर रहे हैं, रेखा ऐसा मानती है। इन्हें न तो अपने यौनकर्मी होने पर अपराध महसूस होता है और न स्त्री  होने का अफसोस ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजौ’ से इनका बहुत इतफाक नहीं है।

गया का मंगलागौरी मंदिर , कहते हैं यहाँ सती का स्तन कट कर गिरा था

मंटो उद्धरणीय हैं, (अवकाश का संदर्भ) ‘‘मेरे पड़ोस में कोई औरत हर रोज अपने खाविंद से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए जर्रा बराबर हमदर्दी पैदा नहीं होती। लेकिन जब मेरे पड़ोस से कोई और अपने खाविंद से लड़कर और खुदकुशी की धमकी देकर फिल्म देखने चली जाती है और मैं खाविंद को दो घंटे सख्त परेशानी की हालत में देखता हूं तो मुझे दोनों से एक अजीब व गरीब किस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है।’’ ।
यौनकर्मियों को अवकाश है ही नहीं-न वीकेण्ड का कोई संदर्भ और न काम के घंटों का कोई निर्धारण!

नागरिक भूमिका :(नागरिक अधिकार एवं भागीदारी तथा राजनीतिक जागरूकता)

नागरिक के रूप में यौनकर्मियों ने अपनी भूमिका बनायी है।
नगर बंधुओं के भवन नगरों के राजनीतिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र हुआ करते थे। लखनऊ की तवायफों ने नवाबों को तहजीब सिखलाये और स्वतंत्रता संग्रामों में बागियों को शरणगाह  भी उपलब्ध करवाये। बिहार के लोक गायक महेंद्र मिश्र और उनकी राजनीतिक गतिविधियों की खैरख्वाह मुजफ्फरपुर की वेश्याएं भी मानी जाती है। अनामिका ने अपने उपन्यास ‘तिनके-तिनके पास’ में मुजफरपुर (बिहार) के कोठों की राजनीतिक सक्रियता का उल्लेख किया है, ‘‘जीवन का रस और मजा तो संघर्ष की धार में है। यह उसकी मां ने उसे घुट्टियों में पिलाया था और मां की नानी, ढेलाबाईको उसकी नानी अफसाना बेगम ने , जो  1857 के गदर में अपने आशिक पीरजी घसियारे की नृशंस हत्या के बाद दिल्ली से बचती-बचती कानपुर आयी थीं और कानपुर से मुजफ्फरपुर…मुजफ्फरपुर में क्रांतिकारियों की शरणस्थली उनका कोठा रहा। एक अर्से तक क्रांतिकारी वेश्याओं का एक अखिल भारतीय मुखपत्र भी वहां से निकालती रहीं… पंडिता रमा बाई ने जब पुणे में ‘शारदा सदन’ खोला-वेश्याओं के गुरू जनकवि महेंद्र मिश्र की पहल पर उनकी नवासी, ढेलाबाई वहां ठुमरी-शिक्षिका भी नियुक्त हुई।’’

यौनकर्मियों के नागरिक भूमिका की वर्तमान स्थिति को मैंने उनके अधिकारों और उनकी जागरूकता, भागीदार आदि के खांचे में देखने का प्रयास किया है। मेरे दायरे में उनका वोट करना, उनकी पसंद की  पार्टी और पसंदगी का आधार, टैक्स, बी.पी.एल. सूची, राशन कार्ड आदि थे। साथ ही यौनकर्मियों को लायसेंस दिये जाने के आंदोलनों (? ) आदि के प्रति उनकी जागरूकता भी जानना शोध  के उद्देश्य में था।

मातृदेवी

गया से यौनकर्मियों के सदस्यों के बीच से एक जन प्रतिनिधि मुन्नी देवी 2005 में म्युनिसिपल काउंसिल में वार्ड सदस्य चुनी गयी। यद्यपि यौन कर्मियों के बीच उनके रिश्ते आज भी कायम हैं, परंतु वह वर्षों पहले एक दबंग बाहुबली की पत्नी हो चुकी थीं, इसलिए इस राजनीतिक प्रतिनिधित्व को पूरी तरह रेडलाइट एरिया के खाते में नहीं डाला जा सकता। खानगी से जुड़ी स्त्रियाँ  चूंकि लायसेंस धारक नहीं है, अतः बहुसंख्य स्थितियों में वे चुनावों में वोट नहीं डालतीं। कोठों पर लड़कियां आती जाती भी रहतीं हैं। इसलिए अधिकांश का वोटर लिस्ट में नाम भी होने का सवाल नहीं है। इनके पास न तो राशनकार्ड है और नहीं बी. पी. एल सूची में इनका नाम, यद्यपि इस एरिया को स्लम के तौर पर रखा जाता है।

लाइसेंस धारी नर्तकियां वोट डालती हैं। भाजपा और कांग्रेस जैसे राजनीतिक पार्टियां ही इनकी पसंदीदा पार्टियां हैं, यद्यपि स्थानीय कम्युनिस्ट नेता (मुस्लिम) की भी इनके बीच पैठ है। वे इनके मददगार भी साबित होते हैं। वोटों को स्थानीय विधायक मुन्नी देवी तथा दूसरे अन्य कांग्रेसी एवं कम्युनिस्ट नेता प्रभावित करते हैं।
इनमें से कई लड़कियों को यौनकर्म के लिए उठ रहे लायसेंस की मांग का पता नहीं है। परंतु कुछ इस आंदोलन से वाकिफ भी हैं। यद्यपि कोई भी लड़की मुझे ऐसी नहीं मिली जो ऐसे किसी आंदोलन में भागीदार हो। छोटे शहरों के रेडलाइट में रहनेवाली स्त्रियों  को अपने इन मुद्दों का बहुत पता नहीं है। पूरी तरह समझाने पर वे लायसेंस दिये जाने के पक्ष में ही अपना बयान देती हैं।

राजनीतिक पार्टियों के बड़े मुद्दों की भी इन्हें बहुत जानकारी नहीं है। यद्यपि बड़े राजनेताओं के नामों से वे वाकीफ  हैं, कुछ एक को छोड़कर पूरी उदासीनता के साथ। 2002-2004 के बीच गया के एक जिलाधिकारी की पत्नी ममता महरोत्रा, समाजसेवी रेणुका पालित आदि ने मिलकर इनके बच्चों के शिक्षण का कार्यक्रम चलाया था, परंतु कुछ तो ममता महारोत्रा के पटना डी.ए.वी. में शिक्षिका और इंचार्ज हो जाने के कारण और कुछ उचित मैकेनिज्म के अभाव में यह सिलसिला बहुत दिनों तक नहीं चल पाया।

स्पष्टतः इन यौनकर्मियों को न तो पूरी तरह नागरिक अधिकार प्राप्त हैं और न ही उनकी नागरिक भूमिका सक्रिय रूप से बन पाती है। ऐसी स्थिति में वे राष्ट्र के सबसे उपेक्षित और अलक्षित समूह हैं। इनके बीच कार्यरत गैर सरकारी सामाजिक संस्थान बिना किसी विशेष हस्तक्षेप के अधिकांशतः कंडोम उपलब्ध कराने की भूमिका भर ही निभा पाते हैं, एड्स और अन्य संक्रामक बीमारियों की जानकारी और उनसे बचाव की ट्रेनिंग देने के अलावा।

आंतरिक आवाजें: आत्मकथ्य और आह्वान 


यौन-बाजार में काम करने वाली स्त्रियां इस बाजार के उपभोक्ताओं को अथवा इससे बाहर रहने वाले लोगों की  दया या उपेक्षा की पात्र प्रतीत होती हैं। साहित्यकारों की अपनी दृष्टि है, सुधारकों की अपनी। फिल्मकार कुछ और कहते हैं, नीति नियंता कुछ और। शरत्चंद का देवदास चंद्रमुखी को, जो कि नर्तकी है, गणिका है, को पतिता समझता है, वहीं आश्रय पाता है और चंद्रमुखी बिना किसी सेल्फ (स्व) के उसके प्रति न्यौछावर है, बलिदानी  भूमिका में . फिल्मों में वेश्याएं नायक के प्रति उदात्त भाव से भरी, उस पर न्यौछावर तथा हरदम बलिदान को तत्पर होती हैं या उद्धारक के प्रति प्रस्तुत। अमृतलाल नागर के ‘ये कोठे वालियाँ’ में उल्लिखित स्त्रियां गलीज जिन्दगी जी रही हैं, पतित हैं और पारिवारिक स्नेह, पुरुष-प्रेम के लिए उत्कंठ रहती हैं। लेखक स्वयं भी उनके प्रति दयार्द्र हैं। लेकिन अनामिका की ‘तिनके-तिनके पास’ की नायिका एक कालगर्ल है, सुशिक्षित है, नृतत्वशास्त्र की शिक्षिका रही है, साहित्य, दर्शन और राजनीति की समझ रखती है. आत्मग्लानि से मुक्त है वैसे ही, जैसे मंटो की कहानियों में ‘काली शलवार’ की नायिका या ऐसी ही उनकी अन्य कहानियों की नायिका, जो ‘ठंडे गोश्त’ में तब्दील होकर भी अपने ‘स्वत्व’ को जीवित रखती है।

यौन कर्मियों के लिए समाज का मानस बनाने में शब्द, भाषा और साहित्य की बड़ी भूमिका है परंतु स्वयं यौनकर्मियों का आंदोलन और उनकी आवाजें ऐसी किसी भी ‘निर्मिति’ के खिलाफ हैं, या अपने प्रति दया या उद्धार अथवा घृणा के भाव को नकारती हैं।आंदोलनों ने  विभिन्न माध्यमों से , आपसी संवादों से  स्वयं इस पेशे से जुड़ी स्त्रिायों  को अपराध-भाव से मुक्त किया है। यही कारण है कि पढ़ी-लिखी लड़कियाँ या काॅलेज में पढ़ाती स्त्रियाँ  इस पेशे का चुनाव करती हैं, घोषणा भी करती हैं, किसी भी प्रकार की कुण्ठा से रहित। बल्कि प्रायः प्रयासरत भी हैं कि उन्हें अनैतिक , पाप-लिप्त अथवा असामान्य न समझा जाए।

जेनेट, जो कि नृतत्वशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं तथा साथ ही काल-गर्ल का पार्ट टाइम काम भी करती रही हैं, लिखती हैं , ‘ सुनो! काॅल गर्ल्स  मूल्यों का आदर करती हैं, उनके भी मूल्य होते हैं। हम भी अपने धर्म और नैतिकताओं से प्रेरित होकर वैसे ही निर्णय लेते हैं, ‘रिपब्लिकन’ हो सकती हैं या ‘डेमोक्रेट’ हो सकती हैं या समाजवादी अथवा उदारवादी। हममें से कुछ जानवरों से मुहब्बत करती हैं। हम भी विश्वास हासिल करती हैं और हम रहस्यों  को गुप्त रखना भी जानती हैं। हम बेटियाँ हैं, बहनें हैं, माँ अथवा पत्नियाँ हैं। सच्चाई है कि पुरुषों को हमारी जरूरत है और वे इस जरूरत से मुक्त भी होना चाहते हैं। वे हमें दोषी ठहराते हैं .  यही कारण है कि मुस्लिम महिलाएं पुरुषों से परदा करती हैं। यही कारण है कि ‘वेश्याएँ’ अनैतिक होती हैं, क्योंकि उनका काम हर इंसान के भीतर अवस्थित उस ‘अनैतिक’ को संतुष्ट करना है अतः अपनी निर्मितियों पूर्वग्रहों को खत्म करो। थोड़ी देर के लिए ही सही, अपने अपराधबोध, पूर्वग्रहों तथा अपने मूल्यांकनों को परे रख दो, तभी हमारी कहानी तुम सुन सकते हो, समझ सकते हो।’

किसी अपराध बोध से मुक्ति की स्थिति यह है कि 2008 में 22 वर्ष की  स्त्री -अध्ययन की एक छात्रा, नेटेल डायलन (छद्म नाम) ने खुलेआम अपने ‘कौमार्य की बोली लगवायी। वह कैलिफोर्निया की रहने वाली है। उसने स्त्री -अध्ययन में स्नातक किया है तथा ‘विवाह और परिवार चिकित्सा’ में स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए अपने ‘कौमार्य’ नीलाम करने की घोषणा की। उसकी बहन भी अपनी पढ़ाई के लिए ‘चकलाघर’ में काम करती है। इस नीलामी के साथ उसने घोषणा की, ‘‘मैंने अपने नाम को अपनी सुरक्षा के लिहाज से गुप्त रखा है, वह किसी नैतिक बोध की शिकार नहीं है तथा अपने निर्णय से खुद को शक्ति संपन्न महसूस कर रही है। मैं नहीं समझती कि मेरे कौमार्य की नीलामी मेरी सारी समस्याओं का हल है, परंतु इससे थोड़ी आर्थिक स्थिरता तो आयेगी ही। हम पूंजीवादी  समाज में रहते हैं, तो क्यों नहीं कौमार्य का मैं पूंजीकरण करूं।’  किसी ग्लानिबोध से मुक्त  यह 21वीं सदी के ‘कार्ल-गर्ल’ का आत्मविश्वास बोल रहा है।

बारबरा मेरा नाम की एक काल-गर्ल अपने लेख में समय के इस हिस्से में यौन बाजार में कार्यरत स्त्रियों  का मनोभाव व्यक्त करती है। वह काम के शुरुआत की झिझक, अनुभवहीनता से प्रेरित होकर काम की पूरी संलग्नता तक का विस्तृत विवरा प्रस्तुत करती हैं उसकी टिप्पणी गौरतलब है.’

कुछ ऐसी महान आत्माएं, जो इस पेशे से जुड़ी स्त्रियों  के प्रति दयाद्र होती हैं, उन्हें मुक्त कराना चाहती हैं, वे बड़ी ही दयनीय होती हैं सबसे निकृष्ट! वे क्षणिक भावुकता से भरे लोग हैं। वे समझते हैं कि हम इस पेशे से मुक्त होना चाहते हैं, बचना चाहते हैं। यदि कोई (यौनकर्मी) उनके इस मुक्ति अभियान में शामिल होने से इनकार कर देती है, तो उनके दिमाग पर हथौड़े जैसा प्रहार होता है। वे समझते हैं कि वे हमें इस अवांछित और असहनीय कार्य से मुक्त कराकर अपने प्रति कृतज्ञता हासिल कर लेंगे और फिर हमारा सिर उनके कदमों में होगा। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चलता है कि जिस अहिल्या के वे राम होना चाहते हैं, वह अपने पेशे में खुश हैं तो उनकी दुनिया ही बिखर जाती है। उनके प्रति हमें पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए और प्लेग की तरह उन्हें दूर रखना चाहिए। मुझे उस वक्त नफरत होती है, जब वे दयार्द्र हो कहती हैं , ‘ तुम्हारी जैसी अच्छी लड़की ऐसा काम क्यों कर रही है?’

जेनेट एंजल अपने अनुभव व्यक्त करती है और आह्वान करती है , ‘ अस्तित्व  को निरस्त करने या हम पर कोई निर्णय देने की तत्परता मत दिखाओ। हम तुम्हारी माँ हो सकती हैं, तुम्हारी बहन, तुम्हारी दोस्त, तुम्हारी बेटी। हाँ तुम्हारी प्रोफेसर भी।’

‘‘लोग इस संदर्भ में सवालों का बौछार कर देते हैं तुमने ऐसा किया? तुम बचकानी हरकत कर रही हो? कैसे लोग इस सेवा का उपयोग करते हैं? कैसे लड़कियाँ इस धंधे में आती हैं? जेनेट ने अपनी आत्मकथा लिखा  है,  अपना अनुभव तथा अपने पुरुष मित्र के धोखे से शुरू होकर अपने प्रथम अभिसार (!) के सुरुचिपूर्ण उल्लेख के साथ, अपने मित्र की लम्पटता पर लानत भेजते हुए अपने प्राध्यापकीय जीवन, अपने आनंद और फुर्सत के वक्त और अपने पेशे का तन्मयचित्राण के साथ। पेशे का प्रथम अनुभव सचमुच के प्रथम अभिसार (स्व-चयनित सुहागरात) जैसा ही था, इस नृतत्वशास्त्राी यौनकर्मी के लिए। धक्का उन्हें तब लगता है जब उनका मित्र, उनका महाराज उनसे  यौन-उपहार चाहता है, इस भाव में कि वह तो काल-गर्ल है, उसे क्या फर्क पड़ता है। वह बिखर जाती है रिश्ता तोड़ लेती है।

बारबरा इस पेशे के प्रति पाॅपुलर मानस से खिन्न हैं, वह लिखती हैं, ‘हम सबसे ज्यादा मीडिया से नाराज हैं। यदि कोई हमें फिल्मों में चित्रित करता है, तो ऐसे जैसे कि हम कोई जीती जागती आपदा हों तथा सभी दुर्गुणों से ग्रस्त हों। लड़कियाँ वैसी नहीं होतीं। यदि मेरे पास कोई एक विकल्प हो कुछ करने का तो मैं सबसे पहले उनके उपर आरोपित धब्बे से मुक्त होना चाहूंगी। जरूरी है कि कानून बदले, परंतु यह काफी नहीं है ‘आरोपित धब्बे’ को धोने के लिए। ऐसा सिर्फ लोगों की चेतना से ही संभव है। उदाहरण के लिए यदि मैं माँ हूँ तो तुम्हें मेरी बच्ची से ज्यादा सुपोषित-सुसंरक्षित ,स्नेह प्राप्त बच्ची नहीं मिलेगी। मुझे पता है कि मैं उसे खराब कर सकती हूँ, लेकिन जब वह मेरे साथ नहीं है, तब उसे मैं सबसे ज्यादा देखभाल करती हूँ। उसे अच्छे, खूब अच्छे स्कूल में भेजती हूँ। उसे किसी चीज की कभी कमी नहीं होने देती। उसका प्यारा घर है वह हर खतरों से मुक्त है फिर कौन कह सकता है कि मैं एक अच्छी माँ नहीं हूँ, यदि मैं ऐसा नहीं करती हूँ, सिर्फ अपना पेट भर लेती हूँ, तब तो मुझसे बुरी कोई माँ नहीं हो सकती (बारबरा, 1983)।

यौनकर्मियों के अनुभव, अंतर्संवादों और आह्वानों  का सारा प्रसंग भारत के संदर्भ में वैसा ही नहीं है, जैसा कि कैलीफोर्निया, आमर्सटरडम , जर्मनी में कार्यरत उनकी सहकर्मियों की। भारतीय मानस दुनिया के दूसरे पितृसत्तात्मक मानस की तुलना में ज्यादा संश्लिष्ट है। गरीबी के कारण जो लड़कियाँ इस पेशे में आती हैं, वे सबकुछ वैसा ही अनुभव नहीं कर सकतीं जैसा कि आस्ट्रेलिया में उनका कोई सहकर्मी अनुभव कर रहा हो। पूरी संवेदना के साथ, पक्षधरता के साथ, यौनकर्मियों के साथ सहानुभूति की जगह साख्य भाव में लिखित अनामिका का उपन्यास ‘तिनका-तिनके पास’ परिवेशगत सीमाओं में बांटा जाता है, कथा की नायिका वही है, काल-गर्ल, नृतत्वशास्त्र  की प्राध्यापिका जेनेट एंजेल का भारतीय संस्करण, अनामिका खुलासा करती हैं कि ‘जेनेट’ उन्हें बंग्लादेश में मिली थीं, उन्होंने उन्हें अपने डायरी के अंश दिये थे, जिसे वे शीघ्र ही अपनी आत्मकथा में ढालने वाली थीं, लेकिन अनामिका उसी डायरी के साथ जब ‘तिनका-तिनके पास’ में प्रस्तुत होती हैं तो कुछ इस तरह!

‘उन दिनों की अपनी डायरी पढ़कर छुट्टी करती हूँ!’ विश्वायन के बाद के एक कालगर्ल की डायरी! अंतरराष्ट्रीय नेक्सस पर औरत की दुर्गति का किस्सा… एक पढ़ी-लिखी औरत की दुर्गति का…अनामिका परिवेशगत प्रस्थान लेती है, अथवा इस पेशे के प्रति अपनी वैचारिक अवस्था से। जेनेट अपनी आत्मकथा में कहीं पश्चाताप नहीं करती, कहीं दुगर्ति का भाव नहीं देती हैं। परिवेश की सीमा यह भी है कि अनामिका की नायिका का प्रथम अभिसार ठीक उतना विस्तृत और बारीक वर्णनों से युक्त नहीं है, जितना की उसका अपना वर्णन। लेखिका की नायिका ‘बाल-यौन उत्पीड़न’ की शिकार भी है। प्रथम अभिसार के बाद उसकी अपनी माँ का रुआँसा चेहरा सामने है, जब उसके ‘रिश्ते’ के चाचा ने उसे कुछ ज्यादा ही मसल दिया था, विदा लेते वक्त! वह अपने पिता के आवेग को भी झेलती है।

मेरा शोध अनुभव भी यही कहता है, छोटे शहरों (गया) में काम करने वाली बारबरा मिकुल्सकी की सहकर्मी ठीक वैसा ही अनुभव नहीं करती जैसा कि वह करती हैं , उसके कुछ सहकर्मी यौनजन्य बीमारियों के प्रति सजगता अभियान में लगी हैं,  कम पढ़ी-लिखी हैं, हाँ अच्छी माँ हैं। उसके पूर्व की पीढि़यों ने भी ‘फर्स्ट  क्लास अफसर’ और प्राध्यापक पैदा किए हैं।

गया के चकलाघरों  में कार्यरत स्त्रियां अपराधबोध में तो नहीं है परंतु वह कहती हैं कि ‘अपनी जगहों पर, (जहाँ से वे आयी हैं, प्रायः सिलीगुड़ी या पश्चिम बंगाल से) वे ‘खराब’ औरतें नहीं हैं ,यानी वे अच्छी लड़कियाँ हैं वहां , क्योंकि वे वहां छुट्टी पर होती हैं.  वैसे बारबरा भी एक कालगर्ल की माँ वाली भूमिका में अपने बच्चे के प्रति ‘इस खराबी’ से मुक्त रखने की बात करती हैं। यद्यपि भारत में गणिकाओं की पीढि़यां भी समान पेशे का चुनाव करती रही हैं या लायी जाती रही हैं। गया में कार्यरत एक लड़की कहती है कि हम हैं तो कई माँ-बहनों की इज्जत बची है। अभी रेड हुआ था, हमारा व्यवसाय बंद था , तो बगल के मानपुर पुल पर बलात्कार हुआ।

मुम्बई की ‘आश्रय तिरस्कृत नारी संघ’ यौनकर्मियों की ऐसी ही सामाजिक भूमिका का पक्ष रखता है, इसके प्रतिनिधि आई. एच. गिलहड़ा के अनुसार ‘ वेश्यावृत्ति एक अनिवार्य बुराई है, जो परिवार को सुरक्षित रखती है तथा स्त्रियों  को बलात्कार से बचाती है। कुछ ऐसा ही विचार दिल्ली के समाजसेवी खैराती राम भोला का है,
‘‘यदि वेश्याएं अस्वस्थ होती हैं, तो बच्चों को प्रभावित करेंगी.  जो उनके पास स्फूर्त होने जाते हैं , वे सेक्स के भूखे होते हैं . वेश्याएं न हों तो अविवाहित युवा किसी  पर हमला बोल सकते हैं। मेरी दृष्टि में वो वेश्याएं माँ जैसी हैं, उनका आदर होना चाहिए।’

स्त्रीवादी  विचारक तथा पेशे से जुड़े कुछ लोग पुरुषों के अनियंत्रित उद्दाम यौन-उत्कंठा को पितृसत्तात्मक समझ मानते हैं। परंतु यदि यह समझ किसी यौनकर्मी के द्वारा व्यक्त अथवा उसके लिए काम कर रहे संगठन की है, तो वह इस दृष्टि से कि यह समझ इस व्यवस्था से जुड़ी स्त्रियों  को थोड़ा सम्मान, थोड़ी स्वीकृति दिला सके। पेशे से जुड़ी स्त्रिायों के अनुभवों का एक मार्मिक प्रसंग, जिसे जेनेट कम से कम मार्मिक समझती हैं तथा जिससे यह तय होता है कि स्त्रियाँ अपने ग्राहकों के प्रति मशीनी भाव के अतिरिक्त लगाव भी महसूस करती हैं, उल्लेख्य है। जेनेट लिखती है,

‘‘मेरा ग्राहक दुबला-पतला था, पीली त्वचा इस कदर कि पारदर्शिता का आभास देती हो। वह उदास और निर्दोष मुस्कान बिखेरता रहा, बहुत बात नहीं की। संगीत बैकग्राउंड में था, कोई नया ‘सिम्फाॅनी’। उसने मुझे शेरी (वाइन) परोसी और हम शयन-कक्ष में दाखिल हुए। उसने मुझे अंतर्वस्त्रों को छोड़कर सबकुछ उतारने का  आग्रह किया। मैं प्रायः दूसरी अन्य रातों की तरह ब्रा और पैंटी में थी, जिसके ऊपर पारदर्शी कैमिसोल था।

‘क्या तुम्हारे पास मेक-अप बैग है’, उसने बहुत ही आस और निर्दोष चेहरे के साथ पूछा। ‘मैं दरअसल तुम्हें मेकअप करते हुए देखना चाहता हूँ।’

‘सिर्फ मेक-अप! थोड़ी विस्मय में थी। ‘हाँ, और मुझसे बात करो।’

यह कई मायने रखता था। मैं समझ गयी कि ऐसा करते हुए मुझे अश्लील बातें करनी है, जो मैंने पहले भी कुछ ग्राहकों के साथ की थी। मैं बिस्तर तक गयी और अपने मेकअप के सामान उठाये।

‘तुम क्या बात करना चाहोगे?’


अब तक वह बिस्तर के पास ‘लुइस क्वीज’ चेअर पर बैठा था। ‘तुम कहो कि तुम्हारे डैडी के साथ बाहर जाने के लिए तैयार हो रही हूँ उसने कहा, उसकी आवाज ‘इको साउंड’ की तरह ध्वनित हुई ,कहीं दूर बाहर से आती हुई।’
‘मुझसे  कहो कि आया जल्द ही आती होगी। कहो कि डैडी तुम्हें डिनर के लिए कहाँ ले जा रहे हैं? उसने कहा। मैं तो जम सी गयी.  सच कहूँ, ईमानदारी से, मुझे रोने की तीव्र इच्छा हुई। मैंने वही किया जो वह चाहता था, मैं कर भी क्या सकती थी? मैं बोलती रही और अपने आईने में देखती रही, कुछ इस तरह कि वह हस्तमैथुन करता हुआ न दिखे, जब मैं उसकी माँ की भूमिका कर रही हूँ।’

‘‘मैं तुम्हें वहाँ पहुँचकर काॅल करूंगी। और जाने के पहले तुमसे विशेष ‘किस’ भी करूँगी।’’

मैं किसी तरह अपने आँसू उमड़ने से रोक सकी। उसने मुझे खूब पैसे दिये, सत्तर डाॅलर टिप के तौर पर, मेरे अपने रेट के अलावा।दूसरी लड़कियों ने इससे खूब मजा किया होता। एक आसान से काॅल के तौर पर और बाद में जी भरकर हँसी होतीं। मैं घर आयी भीतर से खोखली महसूस करती हुई, क्या हुआ होगा उसके बचपन में उसकी यौनिकता पर प्रहार करते हुए। आखिर उसने क्यों किसी मनोचिकित्सक के पास अपने दर्द की दवा ढूँढने की जगह कालगर्ल का चुनाव किया था… आखिर क्यों?

स्त्री-शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( राम का मुखौटा पहने — समाज, सत्ता, धर्म और खाप के कितने रावण! )

( आज से हिन्दुओं का पर्व ‘ नवरात्र’ प्रारम्भ  हो गया  है. इसके सन्दर्भ से कथाकार और स्त्री -अधिकार के  संघर्ष  में हमेशा तत्पर रहने वाली सुधा अरोड़ा अपना मत रख रही हैं – हिन्दू मिथों को छेड़े बिना , उनके अंतर्पाठ से मिथकों में अन्तर्निहित पितृसत्ता की पड़ताल कर रही हैं )

सीता की त्रासदी तमाम महिमामंडनों के बावजूद वैसी ही बनी हुई है और हमारे समाज के व्यवहार से कहीं न कहीं रिस-रिसकर बाहर आती रहती है। वह रावण की जबर्दस्ती का ही शिकार नहीं हुई बल्कि मर्यादा और प्रजा प्रेम के नाम पर राम की ज्यादती का भी शिकार हुई। समर्पण की पराकाष्ठा को छूते हुये उसने राजमहल की जगह जंगल का रास्ता चुना और शक की सुइयों से बिंधकर अग्नि-परीक्षा दी। क्रूरता के चरम का शिकार होकर वह जंगल में छोड़ दी गई और यातना के सीमांत पर पहुंच कर उसने धरती में समा जाने का निर्णय लिया। आज पारिवारिक ढांचे में स्त्री की दशा देखकर इनमें से कई सच्चाइयां  हमारे सामने तैर जाती हैं। लोग रावण का पुतला फूंकने की खुशी में यह भूल जाते हैं कि सीता का अपराधी केवल रावण ही नहीं है।
सीता हर जगह लड़ रही है और रावण अनेक रूपों में संक्रमित हो चुका है – प्रेमी, पति, पिता या भाई – वह कहीं भी हो सकता है। समाज, सत्ता, धर्म और खाप के न जाने कितने रावण हैं जो राम का मुखौटा पहने, महलों से लेकर झोपडों तक में, आसन जमाये बैठे हैं. वे आज मिथक से निकल कर हमारे रोजमर्रा के जीवन में पैठ रहे हैं.”

विजयादशमी को सालों से बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता रहा है ।  राम इस कथानक के नायक हैं और विजय का सेहरा उन्हीं के सिर माथे है । मिथक की ही बात करें तो क्या राम की विजय सिर्फ उन्हीं की विजय है ? क्या सीता की दृढ़ता, पार्वती (शक्ति) के वरदान की कोई भूमिका नहीं है ? क्या राम के संघर्ष और जीत में स्त्री-शक्ति की कोई भागीदारी नहीं थी ? आखिर क्यों हमारे पौराणिक आख्यानों में शक्ति-पूजा की परंपरा है ? क्यों हर संघर्ष से पहले देवी-पूजा का विधान है ? समय चाहे कितना भी बदल जाए, अंतिम विजय सिर्फ सद्शक्ति की मदद से ही मिल सकती है। यह सिर्फ रामकथा का ही सच नहीं है, आधुनिक युग का भी सच है।

जीवन के हर तरह के संघर्ष में जीत तब ही निश्चित हो पाती है, जब स्त्री किसी-न-किसी रूप में साथ हो चाहे स्त्री का मां रूप हो, बहन, पत्नी, बेटी या फिर दोस्त । पुरुष की शक्ति का स्रोत ही स्त्री है । जीवन के रोजमर्रा से जुड़ी घटनाओं में पुरुष की शक्ति के तौर पर कोई-न-कोई स्त्री खड़ी मिलती है। कुछ रचना हो, कहीं लड़ना हो, कहीं जीतना हो… स्त्री का वजूद पुरुष की मदद, संबल और सहयोग के लिए हुआ ही करता है । सामान्य सा तथ्य  है कि जिस पुरूष को अर्थ उपार्जन के कारण हम घर का कर्णधार मानते रहे, क्या। उसके बाहर जाकर कमाने के पीछे उसकी अनुपस्थिति में घर के बडे बुजुर्गो, बच्चों और समूचे घर की देखभाल करती स्त्रीे का कोई योगदान नहीं रहा ? यह बात अलग है कि उसे इसका श्रेय कभी दिया नहीं गया । संपत्ति का हकदार उसे कभी माना नहीं गया ।

जैसे जैसे समय बीतता गया, न सिर्फ़  इस शक्ति को अनदेखा किया गया, उसके मायने भी बदल गये । उसे पुरुष सत्ता ने सचमुच देवी की तरह ऊंचे आसन पर प्रतिमा की तरह स्थापित कर दिया और प्रतिमाएं मूक बधिर होती हैं, वे मंदिरों और पूजा पंडालों में सजी धजी ही भली लगती हैं, तभी वे पूजा अर्चना की पात्र बनती हैं। घर में अष्टभुजा बनकर सारे दायित्व निबाहती, सारी परंपराओं को अपने कंधों पर ढोतीं और बेटी, बहन और पत्नी बनकर सारी आचार संहिताओं का पालन करती स्त्री जब आंखें मूंद लेती थीं तो उसके सच्चरित्र, कुलशीला होने के बखान उसके परिवार और आस पड़ोस में किये जाते। इसी में उसके होने की सार्थकता मान ली गयी !

सदियों से स्त्री ने अपनी शक्ति को सिर्फ अपने पति और परिवार की उन्नति और विकास के लिये बनाए रखा। सिर्फ सौ साल पहले का समय देखें, स्त्रियों के नाम के साथ देवी या रानी लगाने का प्रचलन था। वे घर को घर बनातीं और घर की शोभा बढाती अपने-अपने देवता की देवियां थीं।  हर कहीं सहयोगी की भूमिका में — मौन, शांत और अन्तत: अनंत में विलीन… सब कुछ सहज गति से चल रहा था । सहयोग करती, सहती और चुप रहती स्त्री समाज को अपने अनुकूल लग रही थी। देवी की तरह प्रतिष्ठित कर उससे मानवी होने के सारे अधिकार और श्रेय छीन लिए गए। घर के किसी हिस्से में देवी प्रतिमा को पूरी साज-सज्जा के साथ स्थापित करने के बाद पूजा-अर्चना तक ही शक्ति-पूजा का सिलसिला चलता रहा। मुश्किल तब शुरू हुई जब स्त्री ने अपनी शक्ति को हथियार बनाया, अपने नैसर्गिक गुणों को अपनी ताकत में रूपांतरित किया और मुखर हुई। शिक्षा और जागरूकता ने स्त्री को सवाल करना सिखाया और उन्हीं सवालों ने एक तरफ स्त्री को अपनी शक्ति का अहसास कराया तो दूसरी तरफ पुरुष सत्ता को चुनौती की आहट सुनाई पडी । अब तक स्त्री ‘देवी-स्वरूप’ होकर खुश थी, लेकिन जैसे ही उसने सवाल उठाए, अधिकार मांगे, सत्ता की लडाई शुरू हो गई । सामाजिक संतुलन गड़बड़ाया और स्त्री का दोहरा संघर्ष शुरू हो गया। एक पुरुष के संघर्ष के साथ, दूसरा अपने वजूद के लिए ।

रामकथा को बुराई पर अच्छाई की जीत की तरह पढ़ने, देखने और मानने का प्रचलन है। बदलते समय के साथ उसमें नयापन ढूँढना एक गंभीर मसला है। खासतौर पर जब इसका अंतर्निहित सत्य आज के समय में स्त्रियों और दूसरे हाशियाई समुदायों के साथ उसके सम्बन्धों की नवीन व्याख्या हो। संस्कृति में भावना का पारंपरिक रूप तभी तक सुरक्षित होता है जब तक उसपर बाज़ार और आधुनिकता का नकारात्मक प्रभाव न हो। भारत में आज मिथकों और महाकाव्यों को लेकर जो एक विश्लेाषणात्मनक रवैया बन गया है वह दरअसल परंपरागत मान्यताओं को लेकर एकांगी पाठ रचता रहा है। वर्चस्व और आदर्श की पुरानी मूल्यव्यवस्था को भावनात्मक समर्पण इस हद तक जायज बनाता है कि प्रमुख चरित्रों के निजी दुख और यातनायेँ उनकी ‘‘लार्जर दैन लाइफ’’ इमेज के पीछे छिप जाते हैं। लोग उन पात्रों के साथ इतने एकात्म हो जाते हैं कि अपने जीवन में भी वैसा ही कुछ चाहते हैं। पुरुष बेशक राम की जगह कन्हैया हो जाये लेकिन पत्नी तो उसे सीता जैसी ही चाहिए। स्वयं वह कितनी ही गोपिकाओं के साथ रास रचाता रहे पर पत्नी के रूप में उसे कोई गोपी नहीं चाहिये। पत्नी  के लिये सीता वाला मानक ही मान्य है ।

रामकथा मौलिक रूप से स्त्रियों की केन्द्रीयता का आख्यान है हालांकि रावण जैसे महायोद्धा और राम जैसे सूझ-बूझ वाले चरित्र के टकराव को ही इसका मूल घटक माना जाता है। इस घटक के अतिरिक्त एक और घटक हम आसानी से देख लेते हैं और वह है स्त्री के साथ इन दोनों पक्षों का रवैया। जिस पक्ष में स्त्री का सम्मान है, वही विजयी है और उसी को आदर्श माना जाता है । राम का पक्ष इन्हीं कारणों से अलग और श्रेष्ठ हो जाता है। रावण का सारा ऐश्वार्य और ज्ञान इसीलिए क्षीण होता दिखता है क्योंकि वह एक स्त्री का अपहरण करने और जबरन उसे अपने पास रखने का अपराधी है। लोक में किसी स्त्री के साथ यह रवैया त्याणज्य  रवैया है। चाहे महल सोने का हो और चांदी के थाल में ही कोई क्यों न खाये लेकिन किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे अपने अधिकार या दबाव में रखना एक  कुत्सित और घटिया कर्म माना जाता है। कहीं न कहीं लोक के अवचेतन में यह बात गहरे पैठी है इसलिये उसकी सारी सहानुभूति मर्यादा पुरूषोत्तम  राम के साथ है।

दरअसल रामकथा को भारतीय सामाजिक संरचना और पारिवारिक संस्कृति के साथ उसकी आर्थिक संरचनाओं के बरअक्स देखना बहुत जरूरी है और इन सब में स्त्री हमेशा एक ऐसे पायदान पर रही है जहां उसका जीवन-संघर्ष घनीभूत और जटिल रहा है । इस प्रक्रिया में उसकी आत्मा पर कितना भी बड़ा बोझ हो और कितना ही उसे जूझना पडा हो, पूरी तरह से पति के प्रति समर्पण ही उसका सत्य रहा है । कौशल्या, सुमित्रा, सीता, उर्मिला, मंदोदरी, तारा आदि ऐसी ही स्त्रियाँ हैं। सीता का चरित्र इनमें सबसे विराट है। वह न केवल बाहर निकली बल्कि सौ दुख सहने के बावजूद उसने अग्निपरीक्षा दी और गर्भकाल में बेवजह जंगल में छोड़ दी गई। इन सबके बावजूद उसने राम की वंशबेल को बढ़ाया और संतान को योग्य  बनाया। सीता एकमात्र ऐसा चरित्र है, जिसने सबकुछ सहन करके पितृसत्ता की जड़ों को सबसे अधिक मज़बूत किया। एक सहनशीला पत्नी का इससे शानदार उदाहरण पूरी दुनिया  में नहीं मिलेगा। भारत में रोजगार और विस्थापन का शिकार निम्नवर्ग हो या देश-विदेश में दौलत का अंबार खड़े करते व्यापारी या फिर अपनी रंगरेलियों में मस्त सामंती मानसिकता वाला पूंजीपति, सबके लिए सीता ही सबसे अनुकूल और ज़रूरी पात्र है। सीता ही उस हजार कमियों से निजात दिलाकर उसकी प्रतिष्ठाे बरकरार रखने के लिए अपने जीवन को होम कर सकती है। कैसी विडम्बना है कि जीवनभर प्रेम के लिए यहाँ-वहाँ भटकने वाले को भी राधा जैसी प्रेमिल स्त्री नहीं चाहिए। सीता इसलिए सदियों से एक चाहत और आदर्श का प्रतिरूप है क्योंकि वह पुरुष के सभी गलत निर्णयों को बिना सवाल किये स्वीकार लेती है।

सीता की त्रासदी तमाम महिमामंडनों के बावजूद वैसी ही बनी हुई है और हमारे समाज के व्यवहार से कहीं न कहीं रिस-रिसकर बाहर आती रहती है। वह रावण की जबर्दस्ती का ही शिकार नहीं हुई बल्कि मर्यादा और प्रजा प्रेम के नाम पर राम की ज्यादती का भी शिकार हुई। समर्पण की पराकाष्ठा को छूते हुये उसने राजमहल की जगह जंगल का रास्ता चुना और शक की सुइयों से बिंधकर अग्नि-परीक्षा दी। क्रूरता के चरम का शिकार होकर वह जंगल में छोड़ दी गई और यातना के सीमांत पर पहुंच कर उसने धरती में समा जाने का निर्णय लिया। आज पारिवारिक ढांचे में स्त्री की दशा देखकर इनमें से कई सच्चााइयाँ हमारे सामने तैर जाती हैं। लोग रावण का पुतला फूंकने की खुशी में यह भूल जाते हैं कि सीता का अपराधी केवल रावण ही नहीं है।

सीता हर जगह लड़ रही है और रावण अनेक रूपों में संक्रमित हो चुका है – प्रेमी, पति, पिता या भाई – वह कहीं भी हो सकता है। समाज, सत्ता, धर्म और खाप के न जाने कितने रावण हैं जो राम का मुखौटा पहने, महलों से लेकर झोपडों तक में, आसन जमाये बैठे हैं। वे आज मिथक से निकल कर हमारे रोजमर्रा के जीवन में पैठ रहे हैं ।

जाहिर है स्त्री की भूमिका भी बदली है और स्वरूप भी। अब सीता बेवजह अग्नि-परीक्षा देने के लिए तैयार नहीं है, धोबी के लांछन से वह घर छोडने से इनकार करती है। स्त्री मुखर हुई है,उसकी शक्ति ज्यादा धारदार हुई है, तो उसके संघर्ष भी गहन और लंबे होंगे। यूं स्त्री सदियों से संघर्षरत है — सीता रावण से और द्रोपदी दुर्योधन-दु:शासन से। आज भी उसका संघर्ष थमा नहीं है। वह संघर्ष कर रही है, पुरुषों के मोर्चे पर पुरुषों के साथ और अपने मोर्चे पर पुरुषवादी स्त्रियों के साथ भी ।

वक्त के बदलने के साथ संघर्ष का स्वरूप भी बहुत कुछ बदल गया है। बस नहीं बदला तो स्त्रीं के संघर्ष की प्रकृति। सीता ने रावण से संघर्ष किया, लेकिन राम के अन्याय को सहा। आज की स्त्री रावण से भी संघर्ष कर रही है और राम के अन्याय से भी। संघर्ष दोहरा तिहरा नहीं, चहुंमुखा है और लंबा भी। यह बहुत जल्दी  समाप्त  होने वाला नहीं है। यह चल रहा है और आगे भी चलेगा। सकारात्मक उर्जा , शक्ति , प्रकृतिगत लचीलेपन और दूरदर्शिता से स्त्री  स्थितियों को बदल पाने में सक्षम होगी। किसी भी प्रगतिशील समाज के विकास और उन्नदति के लिये यह जरूरी भी है।

पंखुरी सिन्हा की कवितायें

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पंखुरी सिन्हा

मूलतः मुजफ्फरपुर की रहने वाली पंखुरी सिन्हा युवा साहित्यकारों में एक प्रमुख उपस्थिति हैं. संपर्क : nilirag18@gmail.com



सीढ़ियों का कद

मैं गिना सकती हूँ
हर एक सीढ़ी उनकी राह की
जो बनाई उन्होंने मेरे घर तक
और बता सकती हूँ
उन सीढ़ियों का कद
बहुत अदने और बौने थे सवाल उनके
उनका तब भी हस्तक्षेप था
उनका अब भी हस्तक्षेप है…………

आदतन

सारी मुश्किलें आसान नहीं होतीं
नौकरी से
कुछ खाली बर्तनो के
झनझनाने की आदत भी होती है
वो यों ही बजते हैं
आदतन…………..

कहने का हक़

मेरी सारी बातों को बदलकर
गणित में
मेरी सारी बातों को बनाकर
केवल कहने की स्थिति
वो जाने क्या क्या कहने का हक़
अख्तियार कर लेते हैं.

मेरुदण्ड

इतनी सीधी सादी परिभाषा
सभ्यता की
प्रतीत हो कड़ी
जटिल नहीं सख्त केवल
पर दरअसल ढीली ढाली ढुल मुल
ज़रा सा भी लीक से हटना जिसमे मंज़ूर नहीं हो
कुछ भी अलहदा नहीं
कोई अंतर नहीं ह

हमारी जीवन शैलियों में
इतना तय हो सब कुछ
कि ज़रा सा भी फ़र्क भटकाव लगे
अँटकाव लगे
ये दरअसल
एक लचर
मेरुदण्ड हीन
खोते हुए विश्वास का प्रतीक है.

लाल बिन्दी से रश्क

क्यों रश्क हो रहा है
उसकी लाल बिन्दी से मुझे
वो औरत जो लाल बिंदी लगाए
महफूज़ है अपने घर में
कुछ इस तरह कि मात कर दे
मेरी दौड़ती भागती दफ्तरी दुनिया की सारी फाइलें
मेरी सारी आज़ाद शख्सियत को मात कर दे
ऐसे हो कुछ सूत्र उसके पास
उसकी लाल बिन्दी कहती हो मुझसे
प्रेम से ज़्यादा बड़ी कोई बात………..

प्यार के बिम्ब

अपने आप निभ जाती है
शादी,  ज़िन्दगी, कविता
निभ जाते हैं
प्यार और बिम्ब
प्यार के भी
निभ जाता है संधि विच्छेद भी
अगर ईमानदारी से तोडा गया हो

घर बाहर

इन दिनों कहीं भी बाहर जाने पर
मेरा घर मुझे दिखवाया जाता था
उनकी नज़रों से
सामने वाले की खिड़की से
बगल वाले की भी
नीचे वाले की
सिर्फ दरवाज़े से दी गयी गवाही से
उसका वास्ता सिर्फ आवाज़ों से था
शायद बहुत सी
बहुत तेज़ आवाज़ें थीं
हमारे घर की
आवाज़ें ऊपर वालों की भी थीं
कुछ तो अनायास और आकस्मिक होंगी
कैसे नहीं होंगीं
ये फर्नीचर खिसकाने की आवाज़
जैसे किसी को फर्नीचर खिसकाने
की बहुत ज़रुरत हो
जैसे कि मेरी नानी टेबल खिसका कर ही
चलती थीं
लेकिन ये ज़रुरत कुछ ऐसे उत्पन्न हो
कि ताल बिठाए आपकी दिनचर्या से
उन सब बातों से भी
जो बस रोज़मर्रा की ज़िन्दगी हैं
और जिनका ऐसा कोई शोर नहीं
बस कटोरियों  के थाली में रखने
चम्मच बटोरने की आवाज़ है
और उसके तारतम्य में
बहुत कुछ इर्द गिर्द की
बहुत कुछ है बर्तन सजाने
बस धोकर यथास्थान रख देने की आवाज़ में
पुरानी होटलबाज़ी के किस्से हैं
न की गयी होटलबाज़ी के भी
दरअसल
कुछ चीख चिल्लाहटें मेरे घर के तोड़े जाने
के बाद की उपज हैं
टूटे हुए घर की बहुत सारी दरारें हैं
फिलहाल यहाँ
गीली मिटटी के साथ साथ
ईंट के बुरादे भी
सीमेंट की बोरिओं के निशान हैं
यहाँ, वहाँ
उन्हें उठाने के भी
कुछ हमारे हाथों
कुछ हमारे कन्धों पर
और कुछ उन लोगों की थकान है
हमारे चेहरों पर
जो सैलानियों  को पीठ पर बिठाये
घाटी दिखाते हैं
और कुछ उन लोगों की परेशानी
जिनका तबादला अभी अभी
एक ऐसे शहर में हो गया हो
जहाँ सुबह शाम बारिश होती हो
दोपहर को भी
या हर शाम आंधी आती हो
हमारे घर की बातें हमें बाहर सुनवाई जाती थीं
इस तरह
जैसे और लोगों के घरों से
टकराकर लौट रही हों
ये रोटी के कच्चे होने की चिकचिक
ये केवल दो रोटी खाने पर भी
कच्चे होने की चिकचिक
ये मेरी ही आवाज़ की तल्ख़ी
ये विदेशी कांफ्रेंस में कच्चे चावल की याद
ये भोजन के बिलकुल ही न पचने देने की राजनीती
ये मेरी ही आवाज़ की बेबस तल्ख़ी
बाहर की बातों का हवाला
हम क्या खा रहे हैं
फिलहाल
हम किसी और के हिस्से का पैसा नहीं खा रहे
न देश का
न घूस, न हड़प
हम तो किसी का दिमाग़ तक नहीं खा रहे

इतिहास का अंधकूप बनाम बंद गलियों का रूह-चुह : गया में यौनकर्म और यौनकर्मी : पहली क़िस्त

संजीव चंदन


( यह आलेख २००९ में एक शोध के सिलसिले में किये गये केस स्टडी का एक हिस्सा है :दो किस्तों में प्रकाश्य  ) 

यद्यपि गया का रेड लाइट एरिया शहर के केन्द्र में टावर चैक के समीप बसा है। इसकी मौजूदगी आज भी है और कल भी थी, लेकिन ‘कल’ के इतिहास को व्यक्त करता कोई दस्तावेज नहीं है। तमाम दूसरे स्थानों, क्षेत्र अथवा राज्यों की तरह मगध और गया का इतिहास भी राजा-रजवाड़ों की सामारिक गतिविधियों से भरा है या फिर आजादी के पूर्व और बाद तक के सिलवटों से भरा है इतिहास। यौनकर्मियों का इतिहास! इतिहास नहीं; स्मृतियों, अफवाहों और गप्पों से टूट-बिखरकर इतिहास लायक जो कुछ भी है-समझा जा सकता है वही इतिहास हो सकता है इनका।

स्पष्ट है स्वीकार्यता और उपेक्षा के द्वैध में फँसी इनकी जिंदगी को लिपिबद्ध कौन करेगा? स्त्रिायों और दलितों का उपेक्षित इतिहास तो आधुनिक परिघटना है। गया का इतिहास खंगालते वक्त कुछ भी लिपिबद्ध नहीं मिलता इनके विषय में। गया में बोली जाने वाली ‘‘मगही’’ भाषा का इतिहास लिखते हुए अब तक कोई भी किसी एक अनाम धोबी तथा एक कुम्हार (अतिशुद्र) जाति के व्यक्ति के द्वारा लिखित रामायण पर शोध नहीं कर पाया है-उपेक्षित इतिहास का दंश झेलते इन समूहों का इतिहास लिखते हुए स्त्राीवादी, दलितवादी इतिहासकार कुछ चुनने-बीनने का काम कर सकते हैं। गया के इतिहास में टेकारी की रानी के आंशिक उल्लेख, अहल्याबाई के द्वारा मंदिर निर्माण की चर्चा के अलावा कहाँ हैं स्त्रियां ? 1995 में पत्थर तोड़ने वाली मुसहर स्त्री  भागवती देवी (भगवतिया देवी), जो गया की पहली महिला सांसद बनी, के विषय में भी बहुत कुछ लिखा उपलब्ध नहीं होगा। यदि इनके संदर्भ में कहीं उल्लेख है तो आखिरकार शासक समुदाय में शामिल स्त्रियों  का ही उल्लेख है। डाॅ. सुरेन्द्र चौधरी धरी जैसा मार्क्सवादी  आलोचक भी गया के इतिहास को स्मृत करते हुए टावर चैक से रेडलाइट तक की यात्रा तो करते हैं, परंतु उन बंद गलियों में प्रवेश से हिचक जाते हैं- इतिहास का अंधकूप है वहाँ!!

डाॅ. चौधरी उन बंद गलियों तक जाकर लौट आते हैं : ‘रमना’ में वे 18वीं सदी के कुछ बंगलों के भाग थे। पुरानी जेल, पिलग्रीम अस्पताल उत्तरी भाग में थे। सन् 1842 में गया का नक्शा शेरविल का मिलता है। रेनल के बाद यह बिहार का दूसरा पुराना  नक्शा है। 18वीं सदी के अंत में उत्तरी गया में एक चुंगी द्वारा बनाया गया था। यह द्वार आज दुःखहरिणी फाटक के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ पर हिन्दुओं का एक छोटा पूजा स्थल भी है।’  (डाॅ. सुरेन्द्र चैधरी)।

गया टावर चौक इसी इलाके में हैं  यौनकर्मियों के घर

यानी डाॅ.  चौधरी पिलग्रीम अस्पताल से आगे बढ़ते हुए रुक जाते हैं, फिर दुःखहरिणी फाटक के पास ही आकर विराम ले लेते हैं, क्योंकि इसी प्रभाग में बसा है यौनकर्मियों का मुहल्ला, जोकि इतिहासकारों के लिए बंद गलियों जैसा ही है। गया के चौक  पर बने टावर (1888, में कलक्टर ओल्डहम के द्वारा) के पास ही बसा है यह मुहल्ला, जो कि नर्तकियों का मुहल्ला है, जिससे थोड़ी दूरी पर लगे मानपुर पुल से रमना रोड होते हुए स्टेशन तक जाने वाले रोड पर खानगी (देह व्यापार) से जुड़ी महिलाएँ रहती हैं, यहीं आकर इतिहास थम जाता है।
इतिहास के अंधकूप में प्रवेश के लिए जनश्रुतियों पर निर्भर होना पड़ता है अथवा गया की संस्कृति में इनके महत्वपूर्ण अवदान के कारण सांस्कृतिक झरोखे से देखना पड़ता है। शेष कुछ अनुमानित ही हो सकता है इतिहास की चुप्पियों से।

कोई डाक्यूमेंटड साक्ष्य तो नहीं उपलब्ध है, लेकिन इस इलाके को अकबर के मनसबदार मानसिंह (1540-1614) के द्वारा बसाया गया माना जाता है, जब उसने मानपुर(गया) की यात्रा की थी। यह व्यवस्था मानसिंह के सैनिकों के लिए की गयी मानी जाती है, परंतु इस पर न तो बुकानन ने कोई उल्लेख किया है या न ही राय चैधरी अथवा अन्य इतिहासकारों ने। मानसिंह 1588 में बिहार का सुबेदार (गवर्नर) नियुक्त हुआ था।

विष्णुपद में विष्णु का चरण

गणिकाओं की परंपरा बड़ी समृद्ध थी। भारतीय सिनेमा की सिरमौर-स्त्री  नर्गिस की माँ जद्दन बाई को यहाँ खूब शोहरत थी। ढेलाबाई की ठुमरी दूर-दूर तक मशहूर थी। चैक के इलाके में संगीत का एक केन्द्र ‘शनिश्चरी क्लब’ हुआ करता था। क्लब के संस्थापक थे टिकारी-राज के कैप्टन गोपाल शरण सिंह के राजगुरू पंडित वंशीधर शुक्ल! अध्यक्ष स्वयं गोपाल शरण सिंह थे तथा सचिव हुआ करते थे मुजफ्फर  नवाब। शनिवार को समृद्ध गयावालों की बिसात जमती थी, जहाँ गणिकाओं के नृत्य हुआ करते थे। 1918-30 तक यह क्लब गया के चौक  पर सक्रिय था। शिरकत करती थी चुलबुले वाली मलिका, छोटी मलिका, जद्दनबाई, छप्पनछुरी राजेश्वरी, तुलाबाई अथवा देश के दूसरे हिस्सों की मशहूर गणिकायें।

गणिकाओं की इन सार्वजनिक गतिविधियों के अतिरिक्त उनका कुछ भी व्यक्तिगत दर्ज नहीं है, लोगों की स्मृतियों में। व्यक्तिगत सार्वजनिक होकर जब कोई हलचल  पैदा करता, तो वह सब भी स्मृतियों का अंग बन जाता। मसलन गणिकाएं समृद्धों की ‘‘रखैल’’ भी हुआ करती थीं जो कभी-कभी दो ‘‘आन’’ वालों के बीच टकराव पैदा करती। समृद्ध परिवारों के संपर्क का यह दास्तान 80 के दशक तक भी यथावत रहा। मध्य बिहार के एक बाहुबली ने एक प्रसिद्ध गणिका को अपनी पत्नी बनाकर संपत्ति में हिस्सेदारी देते हुए मिसाल पेश की। यही गणिका 20वीं सदी के अंतिम दशकों में नगर-चुनावों में उम्मीदवार भी बनी।

गणिकायें परिवार की परंपरा जीती है, कुछ सिंदूर लगाती है। शोध के दौरान कमलादेवी का सिंदूर और उनके द्वारा उनके सबसे यादगार लम्हे के रूप में ‘‘पति-पत्नी के वे दिन’’ का दर्ज होना पारिवारिक आस्था को व्यक्त करता है। गया के गणिकाओं के कई बच्चे उँचे पदों पर है और अपने अतीत के संपर्क में भी।
कोठों की नवाबी संस्कृति आजादी के दिनों के बाद सिमटती चली गयी। पंडों की समृद्धि में गिरावट आई, नवाबी और जमींदारी समाप्त हुई। गणिकाएँ अब नए अवतार में शादी-विवाह अथवा अन्य उत्सवों पर नर्तकियां थी ,यही उनका आजीविका का मुख्य साधन बना। मुजरे कम हो गये, धीरे-धीरे समाप्त हो गए।
नवे दशक तक गया के गाँव सांस्कृतिक और आर्थिक टकराव के केन्द्र बनते गए। अति वामपंथी संगठनों के साथ-साथ सवर्ण जाति की सेनाओं ने भी उत्सवों के अवसर पर नर्तकियों की उपस्थिति को अपने नैतिक एजेण्डे का टारगेट बनाया। फलतः इनकी आजीविका का एक बड़ा हिस्सा इनसे छिनता गया। मुजरे पर निर्भरता बढ़ी, जिसका प्रचलन नवाबों और जमींदारों की विदाई के साथ समाप्त हो गया था। नर्तकियों के पास भी देह व्यापार का विकल्प शेष था-जिसे आज वे थोड़ी उँची कीमत पर (तुलनात्मक) और नृत्य-संगीत के आवरण के साथ अपनाने के लिए बाध्य हैं। कभी-कभी कोई मुजरा भी सज जाये, तो ‘रइसों’ के लिए नहीं ‘अवारा युवाओं के लिए’।

इतिहास के अंधकूप में सबसे उपेक्षित जीवन, जो कि स्मृतियों में भी शेष नहीं, ‘‘खानगी’’ से जुडी स्त्रियों  का है, कोई इतिहास नहीं-सिर्फ एकरूपीय वर्णन या अनुमान! देह व्यापार के प्रभागों का भी फैलाव हुआ है। गया जैसे छोटे शहरों में भी काॅल-गर्ल बड़ी संख्या में इस पेशे से आ जुड़ी हैं। एक गैर-सरकारी संस्था में कार्यरत  ऐसी ही काॅल-गर्ल की मां ‘‘सराय’’ की नर्तकी एवं गायिका थी। गावों में भी जी.टी.रोड अथवा अन्य मुख्य मार्गों से जुड़े गावों में स्त्रियाँ  इस पेशे से जुड़ी हैं। उपभोक्ता वहां भी और सराय में भी प्रायः ट्रक-ड्राइवर, रिक्शा-चालक अथवा मध्यमवर्गीय युवा है ,जो सस्ते दामों वाला क्रेता हैं। क्रेताओं में पारिवारिक अथवा यौन कुंठाओं के शिकार कुछ युवेतर भी है।

अभी गया के इस मुहल्ले में यौन-सेवा-प्रदाता स्त्रियों  को मुख्यतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। परिवार आधारित ,  अर्थात् नर्तकियों का लायसेंस प्राप्त घर तथा ब्रोथल आधारित यानी चकलाघर .

इन दिनों शहर में कई गैर-सरकारी संस्थायें भी काम कर रही हैं, जो कि इनके अधिकारों के लिए किसी संगठनात्मक गोलबंदी की जगह यथास्थिति के बीच इन्हें रोगमुक्त रखने के एजेंडे से काम कर रही हैं अथवा पुनर्वास का काम संपन्न करती हैं। इन संगठनों में दो प्रकार की स्त्रिायां पेशे से जुड़ी महिलाओं के बीच जाती है-
1 पेशे से अभी या अतीत में जुड़ी रही महिलायें
2 पेशे से बाहर की महिलाएं, पुरूष भी

काल-गर्ल्स  की संख्या में भी इजाफा हुआ है, परंतु स्थयी घरों में रहका सेवा-प्रदाता स्त्रिायों से वे अधिक मुक्त और निर्णयों के मामले में स्वावलंबी है। इनका समाजीकरण दूसरी प्रकार की स्त्रियों  से भिन्न है। ये आम समाज से मिलकर दूसरी अन्य सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल हैं।

संजू’ जो कि पेशे से कालगर्ल है, वह भी किसी गैर-सरकारी संगठन से जुड़ी है। इसने गया के प्रतिष्ठित राजकीय कन्या विद्यालय ये दसवीं तक की पढ़ाई की है। इसकी मां भी नर्तकियों के पेशे से जुड़ी थी, जिसे संजू के शब्दों में पिता ने छोड़ दिया था। वह 2005 से इस पेशे में कार्यरत है। वह दूरदर्शन पर धारावाहिक भी देख लेती  है। 12 से 1 बजे तक आने वाला ‘‘स्त्री ’’ धारावाहिक उसे पसंद है।

मेरे शोध (केस-स्टडी) के कुछ माह पूर्व ही रेड-लाइट एरिया पर पुलिस ने छापा मारा था। इसमें दो पुरूष संचालक, जिसके घर पर ये स्त्रियाँ किराये  पर रहती हैं, को गिरफ्तार किया गया। दरअसल सराय में प्रायः ब्रोथल -आधारित यौन-कर्म किराये के मकानों में ही संचालित हो रहा है। पकड़ी गई चार लड़कियों को जागरण नामक संस्था में पुनर्वास कराया गया था। पुनर्वास केन्द्र में मैं उनसे मिलने पहुंचा तो सिलिगुड़ी की दो लड़कियां अपने-अपने घरों में जा चुकी थीं, दो नाबालिक लड़कियों के परिवार वाले नहीं आये थे। बातचीत के दौरान भावुक लड़कियों ने बताया कि उनके मां-बाप नहीं हैं। चाचा-चाची ने उन्हें किसी के साथ घर से भेजा था, काम करने के लिए।

बंद गलियों में जीवन


‘चक्की पीसने वाली औरत, जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मीनान से सोती है, मेरे अफसाने की हीरोईन नहीं हो सकती। मंटो की हीरोईन एक चकले की टखयाई (रंडी) हो सकती है, जो रात को जागती है और दिन को सोते समय कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाजे पर दस्तक देने आ रहा है। उसके आरी-आरी पपोटे, जिसमें वर्षों की नींद जम गई है, मेरे अफसानों का मौजू बना सकते हैं। उसकी गलाजत, उसकी बीमारियां चिड़चिड़ापन, उसकी गालियां सबकुछ भाती हैं। मैं उसके मुताबिक लिखता हूं और घरेलू औरतों की शाइस्ता कलामी उनकी सेहत और नफासत पसंदी को नजर अंदाज करता हूँ ।’

सआदत हसन मंटो के उपरोक्त बयान यौनकर्मियों की गलाज़त भरी जिंदगी का खुलासा करता है-मंटो, जिन्होंने इन ‘त्याज्य मानी जाने वाली मानवों के अस्तित्व के सम्मान के साथ कहानियां लिखी हैं, इस शोध के लिए केस-स्टडी भी थोड़ी उपरोक्त अनुभूति और थोड़े भिन्न अनुभवों के साथ संपन्न हुआ-क्या यौनकर्मियों के पास है फुर्सत के वक्त? यदि है तो क्या करती हैं वे ऐसे समयों में?

फुर्सत अथवा अवकाश के वक्त से शोध का तात्पर्य मार्क्सवादी  अवधारणा के लीजर ( leisure) से है, जिसका अर्थ होता है, स्वतंत्र होना, फुर्सत में होना।  मूलतः लैटिन और  शब्द फ्रेंच के से चैदहवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में अस्तित्वगत माना जाता है। लीजर तथा लीजर टाइम (अवकाश) विक्टोरियन ब्रिटेन में 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में अपने वर्तमान अर्थबोध के साथ अस्तित्व में आया हुआ माना जाता है। 1870 के पूर्व फैक्टरियां अपने कामगारों को एक दिन में 18 घंटे काम के लिए बाध्य करती थीं, जबकि छुट्टी का दिन सिर्फ रविवार होता था। 1870 के बाद उद्योग जगत में मशीनीकरण की दक्षता तथा ट्रेड यूनियन के उद्भव ने सप्ताह में दो छुटिट्यां व्यवस्थित करायी और काम के घंटे कम करवाये।

लीजर (अवकाश) को एक ऐसे समय के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो काम और घरेलू काम (गतिविधियों) से मुक्त हो-शरीरतः, मानसिक भी। परंतु सवाल यह है कि क्या स्त्रिायाँ खासकर यौनकर्मियों  के पास वे अवकाश के समय हैं, जब वे अपने आर्थिक गतिविधियों से शारीरिक और मानसिक तौर पर मुक्त हों तथा आत्मगत हो मनोरंजन कर रहे हों।

श्रमिकों के श्रम से भी जो सरप्लस (अधिशेष समय) बनता है उसे अपने अवकाश के रूप में इस्तेमाल करनेवाला एक वर्ग पैदा होता है, जो इसका इस्तेमाल अपने सामाजिक अवस्थिति  ( Status)  विस्तृत करने में करता है। स्त्रिायों के श्रम से उत्पन्न सरप्लस पुरुष इस्तेमाल करता है अपने लीजर के तोर पर।

अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ


मेरे शोध क्षेत्र (गया का रेड लाइट एरिया) के नागरिक ही नहीं संबद्ध मगध क्षेत्र सहित देशभर में घरेलू काम और घर की जिम्मेदारियों से मुक्त अपने लिए स्त्रियाँ  नहीं जीती हैं.  मगध के गाँवों में, ड्योढ़ी में (घर के आगे के हिस्से), जो कि जनाने का पब्लिक स्फीअर होता है, स्त्रिायाँ (40-50 के बाद) यदि कुछ स्त्रियों  के साथ बातचीत करती दिखें भी, तो उनके हाथ से कुछ बीनने, चुनने अथवा अन्य घरेलू जिम्मेवारियों की गतिविधियाँ संचालित हो रही होती हैं। मुक्त अवकाश संभव ही नहीं, तो फिर यौनकर्मियों को अवकाश! त्याज्य और हाशिये की जिंदगी जी रही स्त्रियों  को अवकाश!!

मैं अपने शोध के लिए उन से मिलने गया तो प्रश्नावली का कोई पुलिंदा मेरे हाथ में नहीं था। डर थ कि वे उन प्रश्नों की औपचारिकता में जबरदस्त ‘दूसरेपन’ के भाव में न आ जायें।उन्हीं दिनों गया के रेड-लाइट पर पुलिस ने छापा मारा था। यौनकर्मियों को लगता था कि यह छापा उनके बीच काम कर रहे एक गैर सरकारी संस्था ने मरवाया था, जो कि एक पुनर्वास केन्द्र भी चलाता है। दरअसल उसी पुनर्वास केन्द्र के छापे से बरामद नाबालिग लड़कियों को पुलिस ने सुपुर्द किया था। मेरे प्रति भी उनका अविश्वास हो सकता था, ऐसा मेरे मार्गदर्शकों ने बताया था। हां, मरे ऊपर  विश्वास का एक कारण अवश्य था कि मेरी मार्गदर्शिका उनके बीच कभी काम कर चुकी महिला थी, जो कि अब एक सामाजिक संस्था की कार्यकर्ता थीं। एन.जी.ओ. की शब्दावली में उन्हें ‘ Peers’  (आंतरिक) कहा जाता है।

पहली बार जाते हुए, अपने शहर में होने के कारण, मैं थोड़ी झिझक में था। वहां सामान्य आना-जाना यद्यपि उसका प्रयोजन क्रेता या विक्रेता का न भी हो, तब भी, सामाजिक अपवाद का विषय है। मेरे एक परिचित कत्थक शिक्षक किसी नर्तकी के घर (कोठे पर) जाते हुए मुझे थोड़ी दूरी से दिखे। शायद मैं भी उन्हें दिखा होउंगा .  उन्होंने अपने सर पर नीेचे तक लटकता हुए गमछा रख लिया। वे शहर की सभ्य (तथाकथित) बस्तियों के भी शिक्षक थे।

मैं करीब 2 बजे के आस-पास शनिवार को नर्तकियों और यौनकर्मियों का मेहमान था। सवाल लिखित तौर पर तो नहीं थे, परंतु निश्चित सवालों के साथ मैं उनके अवकाश को जानने-समझने तो जरूर गया था।मरे पड़ाव दो समूहों में विभक्त थे, नर्तकियों के बैठक खानों में और खानगी (देह-व्यापार) से जुड़ी स्त्रियों  के मेहमान खानों में। नर्तकियां स्वयं को खानगी स्त्रियों  से श्रेष्ठ मानती हैं। मेरे मार्गदर्शिका भी दुनियादारी समझती थी। उनका हृदय खानगी स्त्रिायों से सहज जुड़ा था, लेकिन उन्होंने मेरे नर्तकी मेहनाननवाजों के समक्ष उनकी श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए बहुत चतुराई से मेरा परिचय कराया।

कमला देवी (उम्र 50 के आस-पास) नर्तकियों के पेशे से जुड़ी हैं। मैं पहले उनका मेहमान बना। शनिवार को 2 बजे के वक्त महफिल सजी थी। दीदी (सीता देवी, मेरी मार्गदर्शिका) ने महफिल के बीच से उन्हें बुलाया, महफिल से घुंघरू और गाने की आवाज आती रही। मैं झिझक रहा था इसलिए समय लेकर आने की बात करता रहा, लेकिन उन्होंने उसी वक्त मुझे एक कमरे में बैठाया। मैंने सामान्य परिचय के बाद माहौल को हल्का करते हुए उनके सबसे यादगार क्षणों के विषय में कुरेदा। उनका जवाब था सबका प्रायः ‘पति-पत्नी का वो क्षण’ ही यादगार होता है। पूरी बातचीत में वे परिवार के फ्रेम में ही बात करती रही। 2009 तक तो अधिकांश नर्तकियों के पास तो काम नहीं थे। इक्के-दुक्के ग्राहक आ जायें तो बात अलग है। 90 के बाद ही विवाह आदि समारोहों में उनके नाच-गाने की परंपरा पर कुठाराघात हुआ था। फिर  कभी-कभी सट्टा पर वे जाती ही हैं, यानी अवकाश ही अवकाश (?)।

सवाल यह है कि क्या यह अवकाश है? जब काम, आजीविका और जीवन का मुख्य साधन, प्रभावित हो तो खाली समय अवकाश नहीं हो सकता। अवसाद पैदा करता है। काम की चिंता से मुक्ति के बाद ही लीजर का पूर्ण संदर्भ बनता है। गया की नर्तकियों के लिए तो काम ही नहीं है, उससे अधिक काम पाने का तनाव है। कुछ नर्तकियां थोड़े अधिक पैसों में यौन सेवा भी दे रही है। ऐसा कुछ लोग बताते हैं। परंतु कमलादेवी जैसी नर्तकियां इसे स्वीकार नहीं करतीं। वे परिवार और विवाह के फ्रेम में ही सोचती हैं। खाली समय में ये टी.वी. देखती हैं। कमला देवी को टी.वी. के धारावाहिकों से सास-बहू पसंदीदा धारावाहिक है। नर्तकियाँ बाजार भी घूम आती हैं, जो कि उनके मनोरंजन का एक साधन भी है। सिनेमा भी जाती हैं। नर्तकियों के यहाँ मेरा सैम्पल बहुत ही छोटा था। वैसे इनकी संख्या भी बहुत कम है।

आपसी साहचर्य के तौर पर इनके बीच पारिवारिक रिश्ते हैं। एक कोठे पर रहने वाी लड़कियां आपस में बहनें हैं। इनके बच्चे अच्छे स्कूलों में भी पढ़ते हैं। पर्व-त्योहार (हिंदू और मुस्लिम अथवा अन्य धार्मिक परंपरा के अनुसार) उनके आपसी साहचर्य का एक माध्यम है। ईश्वर में वे समान रूप से आस्था रखती हैं। मेरे पास जो सुनिश्चित सवाल थे, उनके इर्द-गिर्द ही मैंने उनसे बातचीत की।फुर्सत के वक्त-अंतराल और दिन के भाग(घंटो, अवधि) के सांचे में मेरा पहला सवाल था। पुनः ऐसे अवकाश की अवधि में वे क्या करती है? मेरा दूसरा सवाल। तय था कि अवकाश जीवन के दैनंदिनी में कहीं पारिभाषिक तौर पर शामिल नहीं है-काम नहीं है, तो बोरियत है। यह जरूरी नहीं है कि दरवाजे पर बैठी कोई कोठे की मालकिन या नर्तकी अवकाश की स्थिति में बाहरी दुनिया का विहंगावलोकन कर रही होती है। काम का हिस्सा, मेहमान के आने का इंतजार। समारोहों में भागीदारी मेरे सवालों के दायरे में था। समारोह अधिकांशतः पर्व-त्योहार ही थीं, लेकिन पर्वों के दिनों में ग्राहकी भी बढ़ जाती है। यानि सामान्य उत्सव के बाद पर्व उनके लिए व्यस्तता के सर्वाधिक बड़े अवसर होते हैं।

नर्तकियों और खानगी पेशे की  स्त्रियाँ एक साथ ईश्वर में विश्वास रखती हैं, बिना किसी गिला-शिकवा के। देवालय नहीं जाती है, लेकिन ईश्वर अराधना में विश्वास है। कमला देवी खूबसूरत हैं। वे ठुमरी गाती हैं-दूसरे अन्य क्लासिकल (शास्त्रीय ) संगीत भी। उनके कोठे पर जब मैं गया तब फिल्मी गीत चल रहा था। मुजरे के तौर पर ग्राहक आज भी फिल्मी गीत पसंद करते हैं। मुकद्दर का सिकंदर का गाना ‘सलामे इश्क’ की आवाज ‘महफिल खाने’ से आ रही थी। गायन बहुत सुरीला नहीं था, गायिका बाहर जो बैठी थी हमारे साथ।

हमारे दूसरे पड़ावों में थे देह-व्यापार से जुड़ी स्त्रियों  के मेहमानखाने- दार्जलिंग से आयी दो बहनों के यहां, बहन 22-23 की। कोठे की मालकिन भी वहीं थी और सेवा प्रदाता भी। दिन के तीन बजे के आस-पास बड़ी बहन कौरीडोर से बाहर झांक रही थी, ग्राहकों के लिए प्रदर्शन का यह रूटीन काम था उनका। कौरीडोर भी हो सकता है क्या? एक रूम और बाहर के खाली स्पेस का दरबा जैसा है घर। नर्तकियों के घर की तुलना में अधिक सीलन भरा। खाली जगह रोड पर खुलता है, वही है कौरीडोर। बहने काम पर थीं यानी अवकाश का सवाल ही कहां हैं? छोटी बहन बड़ी के(चार-पांच साल) बच्चे के साथ कमरे में थी। हम लोगों के जाने पर बड़ी बहन ने अपने खुले घुटनें पर तौलिया डाल लिया, तय था कि सीता दीदी के साथ आने वाला मैं उनका ग्राहक नहीं था, ऐसा ही समझा होगा उसने। हमारे स्वागत के लिए स्टूल था, जिस पर मैं बैठा। दरवाजे की चैखटे पर सीता दी। उसने छोटी बहन को बुलाया और चार ग्लास मैंगो-ज्यूस भी।

वे खाना खुद नहीं पकाती हैं- खाना पकाने और बर्तन धोने के लिए काम वाली बाई आती है। यानी घरेलु काम से मुक्त हैं वे। वे ही नहीं इसके बाद में जिस किसी यौनकर्मी से मिला, सभी। सबका एकमात्र काम है, ग्राहक की सेवा। वे या तो ग्राहक की सेवा के पूर्व की स्थिति में होती है, ग्राहक की सेवा कर रही होती है या एक ग्राहक के सेवा के बाद दूसरे के इंतजार  के अंतराल (बचे समय) के बीच होती हैं-अवकाश का सवाल ही कहां है?

दार्जलिंग की इन लड़कियों की जिंदगी मोबाइल है। वे पांच-छह सालों से गया में है। बड़ी बहन छोटी को बहुत प्यार करती है- ‘है न सुंदर और मासूम मेरी बहन।’ दोनों बहनें कोठे से बाहर नहीं निकलतीं। स्कूल दोनों हीं बहनें कभी नहीं गयीं। एक दिन में दोनों बहनें चार-पांच या उससे अधिक ग्राहकों को निपटाती हैं दिन भर में 500 रूपये मिल गये तो काफी है, दलालों का भी रेट बंधा है। किराया देना है। घर भेजना है। बच्चे का भविष्य है। घर में न टीवी है और न टीवी देखने की फुर्सत। फिल्म नहीं देखतीं-देख भी नहीं सकती। गया के बाहर कभी कोई फिल्म देखा था। मैं गया में ही धंधे में हूं। दार्जलिंग में कोई नहीं जानता। अपना देश नहीं गंवाना चाहिए।’ वैसे दोनो के मां-बाप नहीं है। भाई-बहन हैं।

‘ईश्वर को मानती हूं। ईश्वर न हो तो दुनिया चलेगी ही नहीं।’ मैं उनसे पूछ  नहीं सकता था कि फिर ईश्वर उनके लिए किसी वैकल्पिक व्यवसाय की व्यवस्था क्यों नहीं देता? उमड़ता हुआ यह मेरा  सवाल ‘दूसरे पन’ की मेरी अवस्थिति के कारण था। वे अपने इस पेशे से शिद्दत से जुड़ी हैं। ग्लानि बोध में नहीं है। उनका कहना है, ‘हमलोग कई मां-बहनों को बचा रही हैं। अभी पुलिस का रेड हुआ, धंधा बंद रहा। मानपुर पुल पर बलात्कार हुआ। ‘हमलोग तो समाज को बचा रही हैं।’

पर्व मानती है, धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप। जीवन में कोई यादगार क्षण नहीं है इन बहनों के। छोटी सिर्फ मुस्कुराती है, बोलती कम है। दोनो बहनों की दिली ख्वाहिश है स्वतंत्र घूमने की, फिल्म देखने की बिना किसी घूरती निगाह के, अवकाश कहां!!

थोड़ी देर बाद हम किसी दूसरे कोठे पर बढ़ रहे थे कि इस घर पर हो रही हमारी मेहमाननवाजी को देख रही सामने के कोठे की लड़की ने हमें बुलाया। सीता दी सबसे घुली-मिली थी। बल्कि यहां ज्यादा सहज थी। इस घर की भी मालकिन आम छवि में बैठी कोई मौसी नहीं है, बल्कि वही लड़की है, जिसने हमें बुलाया ‘रेखा’। वह भी तथाकथित कौरीडोर से झांक रही थी। दो बूढ़ी स्त्रियाँ  सो रही थी। नीचे फर्श पर। बुआ कहकर उसने उन्हें जगाना चाहा। जागकर भी वे उठकर बैठी नहीं। वह बहुत बोलने वाली लड़की है, ऐसा उसने स्वयं बताया। कपड़े छोटे थे घुटनों से ऊपर , और नाभी  से भी। उसने कोई तौलिया नहीं डाला। बेफिक्र सी बैठी बातें करती रही चाय मंगवाना चाहा, लेकिन हमने मना कर दिया-अभी ज्युस पिया था।’

वह सिलीगुड़ी की है। रवीन्द्र संगीत जानती है-बंगला गीत गा सकती है।घर में टीवी नहीं है। डेक है, वह बातचीत के बीच उन्हें बजाना शुरू कर देती है। मैंने भी सिर्फ आवाज कम करवायी वह 12 साल से गया में है। उम्र 25-26 साल के बीच। उसने कोई फिल्म नहीं देखी है। ब्यूटी पार्लर भी नहीं गयी।

फुर्सत के वक्त। वह हंसने लगती है। कोई अपराध बोध नहीं। बुढि़या, जिन्हें वह बुआ कह रही थी, उनके प्रति वह बहुत स्नेहिल है और जिम्मेवारी से भरी है। बुढ़ापे के डरावने ख्वाब से उन्हें उसने लगभग मुक्त रखा है यानी जिम्मेवार पारिवारिकता से बंधी है। आपस में एक-दूसरे से मिलती है, लेकिन बहुत कम। ग्राहकों के इंतजार में झांकते हुए कई बार दूसरे से बात कर लेती हैं। वह किसी अपराध बोध से मुक्ति हैं, ‘गलत है, तो गया में ही गया के बाहर बताते भी नहीं।’

पुलिस तंग भी करती है, लेकिन यह सब रूटिन का हिस्सा है। उनके मानसिक उतार-चढ़ाव का अध्ययन अथवा मनोवैज्ञानिक बारीकियां मेरे शोध में शामिल नहीं थे। फिर भी मैने पूछा,
‘पुलिस तंग करती है।’
‘नहीं प्यार करती है।’
सीता देवी ने कहा, ‘तू आसानी से दे देती होगी।’
‘मैं बहुत बोलती हूं। मेरे बक-बक से वे भी परेशान हो जाते हैं।

इसी बीच सीढि़यों के पास दरवाजे पर दस्तक हुई। कौन के जवाब में उसने कहा, ‘मैं तुम्हारा चाचा’।
उसने दरवाजा खोलकर दुत्कारते हुए उसे भगा दिया। फिर शांत बातचीत में तल्लीन हो गयी। सीता दी ने बताया ग्राहक था। बहुत पीकर आए ग्राहकों को ये भगा देती हैं ।

‘खूब सोने की, निश्चित खाने की और प्यार करने की तीव्र इच्छा महज ख्वाब भर है।’

प्रतिरोध का सिनेमा उत्सव भी है ,और आंदोलन भी

अनुपम सिंह

अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com

जब  भारतीय संस्कृति के नाम पर सामंतवादी और पुरुषवादी मूल्यों के पुनर्रस्थापन  की बात ज़ोरों पर हो तो, ऐसे में उस संस्कृति के प्रतिरोध में एक वैकल्पिक संस्कृति की भूमि बनाना ,उसे जनता के बीच ले जाना,उस पर चर्चा-परिचर्चा करना आवश्यक हो जाता है । ‘जन संस्कृति मंच’ के द्वारा शुरू किया गया ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ऐसा ही एक वैकल्पिक मंच है, जहां अतार्किक ,भावुक,असहिष्णु ,एकांगी इस  संस्कृति का पुनर्मूल्यांकन किया जा सके । इसी कड़ी मे उदयपुर के  दूसरे फिल्मोत्सव का आयोजन किया गया था । यह  कार्यक्रम ख्वाजा अहमद अब्बास ,जैनुल आबेदिन ,ज़ोहरा सहगल और नबारुण भट्टाचार्य के उस क्रांतिकारी जज़्बे को समर्पित था ,जिससे भारतीय संस्कृति की सही पहचान की जा सकती है । इनके साथ ही यह कार्यक्रम उन तमाम तरक्की पसंद लोगों को भी समर्पित था  जिनसे प्रेरणा लेकर इस कार्यक्रम की शुरूआत संभव हो सकी थी । जब मैं उदयपुर पहुंची तो इस नयी संस्कृति के सृजन के उत्सव की शुरुआत हो ही रही थी ।एक बड़े से हॉल  मे जैनुल आबेदिन के चित्रों के साथ –साथ मुकेश बिजोले ,महावीर वर्मा के चित्रों की प्रदर्शनी को वहाँ पहुंचे हुये लोग उत्साहित हो कर देख रहे थे । वहीं दूसरे सटे हुये हॉल में उदयपुर फिल्म सोसाइटी के उत्साही युवा साथियों ने ‘बल्ली सिंह चीमा’ के गीत –“ले मशाले चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के ,अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के” से इस तीन दिवसीय कार्यक्रम का आगाज किया ।दूसरे उदयपुर फिल्मोंत्सव के संयोजक शैलेंद्र प्रताप सिंह भाटी नें मंच पर बैठे हुए अतिथियों का परिचय कराते हुए इस कार्यक्रम को करने के उद्देश्य एवं महत्व पर सार-संक्षिप्त रूप में बात रखी।   उदघाटन सत्र के अध्यक्ष : नरेश भार्गव ,प्रमुख वक्ता : संजय काक ,विशेष अतिथि : अशोक भौमिक ,मुकेश बिजोले,महावीर वर्मा थे । मंच पर प्रतिरोध के सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी जी भी उपस्थित थे ।

फिल्में कैसे अपने समय का प्रतिरोध रचती हैं  इस पर संजय जोशी ने विस्तृत रूप से अपनी बात रखी ।चर्चा नियमगिरी से शुरू होकर कुडनकूलम और फिलिस्तीन के लोगों के प्रतिरोध तक गयी ।बेदान्ता को डोगरिया कोंध आदिवासियों नें  नियमगिरी के जंगलो में  खनन करने से रोक कर अपने आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित किया है , तो वही तमिलनाडु के तिरुनेलवली जिले मे कुडनकुलम परमाणु संयंत्र को हटाने के लिए चल रहे लोंगों के प्रतिरोध मे साथ होने की बात कही संजय जी ने । इन तीन दिनों के कार्यक्रम की रूप-रेखा देखकर आशुतोष कुमार की यह बात पुष्ट होती है की ‘जब हम फिल्मोत्सव मानते है तो वह सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं होता है, बल्कि उसमे वे तमाम कला रूप शामिल होते हैं जिनसे प्रतिरोध की नयी जमीन को तैयार किया जा सके ,उसमे नयी पौध रोपी जा सके । ‘जन संस्कृति मंच’ ने सांस्कृतिक आन्दोलनों के अनेक रूपों को अपने इस प्रतिरोध के वैकल्पिक मंच के भीतर ही समाहित कर लिया है। ऐसा उयदयपुर के इस फिल्मोत्सव में देखने को मिला । फिल्म के साथ –साथ चित्र- प्रदर्शनी ,कविता ,कहानी ,गीत ,वाद –संवाद ,स्टैंड अप कॉमेडी आदि सांस्कृतिक विधाओं का प्रयोग इस फिल्मोत्सव में हुआ ।  अशोक भौमिक जी का कहना था कि, जब समाज में अनेक रूपों मे शोषण ,अत्याचार ,भ्रष्टाचार ,असमानता ,जातिवाद ,संप्रदायवाद आदि व्याप्त है तब केवल एक  कला माध्यम  सफल नहीं हो सकता । यह बात सच ही है । तभी तो  आज अनेक कला माध्यमों,साहित्यिक विधाओं, सोशल मीडिया आदि के द्वारा प्रतिरोध का  मंच तैयार करने की कोशिश देखने को मिल रही है ।

जैनुल आबेदिन के अकाल के चित्रों  पर  बात करते हुए भौमिक जी ने मेट्रो-कला का विरोध किया । और यह बात वहाँ  लगी मुकेश विजोले और महावीर वर्मा के चित्रों  की प्रदर्शनी से समझी जा सकती है । वर्तमान समय में  महानगरो को कलाओं का केंद्र मानने की जो प्रथा चल पड़ी है उस छवि को इन छोटे शहरों के कलाकार तोड़ रहे हैं। उदयपुर के लोगों के मन मे कला को लेकर अनेक जिज्ञासाएँ और अनगिनत सवाल थे जिसको उन लोगों ने मंच से साझा किया । दस्तावेजी फ़िल्मकार संजय काक जी मौजूद थे उनका कहना था  कि , आज प्रतिरोध की भाषा बदल गयी है ,प्रतिरोध की फिल्में भी अधिक बन रही हैं,परंतु मेरे जेहन में इस दुनिया को एक दिन में  बदलने का कोई तरीका नहीं हैं । संजय काक की इस बात से पूरी तरह सहमत हुआ जा सकता है।  जिस सभ्यता के विकास का  इतिहास इतना लंबा और दमनात्मक रहा हो कि, वह हमारी कल्पना में  ही न अटे सके तो उसके  संस्कृति कि लड़ाई उतनी  ही सूक्ष्म और लंबी लड़नी होगी । लेकिन इससे होने वाला परिवर्तन निःसंदेह स्थायी होगा । नरेश भार्गव का कहना था कि, आज दुनिया भर के समाजविज्ञानी ‘प्रतिरोध’ का समाजशास्त्रीय विश्लेषण कर रहे हैं । यह सही है कि, आज सिनेमा प्रतिरोध का एक सशक्त माध्यम है। शिक्षण संस्थाओं में फिल्मों पर काम करने का रुझान बढ़ा है,पिछले कुछ वर्षों में  सिनेमा से संबन्धित अच्छी पुस्तके भी आयी हैं । सिनेमा को  लेकर निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में जो नकारात्मक भाव था, वह टूटा है । लेकिन सवाल यह है कि, प्रतिरोध के इस वैकल्पिक सिनेमा को  हम उन गाँव और घरों तक कैसे ले जाएंगे ? तो शायद इसका जवाब यही  होगा कि , उदयपुर फिमोत्सव की  तरह से ही  गाँव और  शहरों में  फिल्मोंत्सवों का  आयोजन  और छोटे –छोटे फिल्म क्लबों का निर्माण करके जनपक्षधर सिनेमा का विकास किया जा सकता है  ।उदयपुर का यह फिल्म महोत्सव तब और सार्थक हो जाता है, जब यह वैश्विक प्रतिरोध को अपने इस प्रतिरोध के मंच से जनता के सामने प्रस्तुत करता है। फिलिस्तीन के साथ –साथ दुनिया के किसी भी कोने में जो फिलिस्तीन रोज  घट रहा है ,ऐसे फिलिस्तीनीयों के जिजीविषा और प्रतिरोध के समर्थन मे रफीफ ज़िहाद द्वारा “वी टीच लाईफ सर”अंग्रेजी मे 5 मि॰ की वीडियो काव्य प्रस्तुति की गयी ।उदयपुर की फिल्म सोसाइटी द्वारा जिन फिल्मों का चुनाव किया गया था  उसमे- ‘गुलाबी गैंग’,’विकास के नाम पर’,’माटी के लाल’,’छिपा हुआ इतिहास’,’व्हेयर हैवयू हिडन माय न्यू क्रिसेंट मून’, ’फ़ंड्री’, ’धरती के लाल’, ’इज्जतनगरी की असभ्य बेटियाँ’, ‘कैद’ ,’कंचे और पोस्टकार्ड’, ’ए घेटो फॉर द डेड’, ‘इन सिटीलाइट’, ‘भोभर’, ’आँखों देखी’,आदि थी। अभी हाल मे ही मुख्य धारा के सिनेमा ने भी ‘गुलाब गैंग’ नाम से फिल्म बनाई थी। उदयपुर में  जब मैंने निष्ठा जैन द्वारा निर्देशित ‘गुलाबी गैंग’फिल्म देखी तो दस्ताबेजी फिल्मों और मुख्य धारा की फिल्मों के पूरे चरित्र को बड़ी आसानी से समझने का अवसर मिला  । मुख्य धारा की फिल्मों में जिस तरह रंग –रोगन लगा कर समस्या का उपचार किया जाता है, वह पूरी तरह बाजार,पूंजीवाद और पारंपरिक भारतीय जनमानस को ध्यान मे रख कर ही किया जाता है । उनका प्रथमतः और अंततः उद्देश्य पैसा कमाना ही होता है । इस देश में जहां पुंषवाद ही सम्पूर्ण संस्कृति का निर्माता और निर्देशक हो वहाँ ‘गुलाबी गैंग’, ‘इज्जतनगरी  की असभ्य बेटियाँ’जैसी दस्ताबेजी फिल्में बनानी  अति आवश्यक है ।

‘इज्जतनगरी की असभ्य बेटियाँ’ का निर्देशन नकुल सिंह साहनी ने किया है । यह फिल्म हरियाणा के जाट समुदाय मे ’खाप पंचायत’ नाम की  सामाजिक पहरेदारी करने वाली संस्था के प्रतिरोध में बनी हैं । वर्तमान समय में इस फिल्म की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।  जब ‘लब जेहाद’ जैसी राजनीतिक रणनीति के माध्यम से इस देश में  स्त्रियों की आजादी को छीनने की कोशिश कुछ सांप्रदायिक संस्थाएँ कर रही हो ।’लब जेहाद’ और ’खाप पंचायत’जैसी संस्थाएँ एक समान उद्देश्य से चलायी जा रही है।  आजादी के इतने दिनों बाद भी इस देश मे स्त्री ,दलित ,आदिवासी आदि के लिए स्वाभिमान और आत्मसम्मान  के साथ जीवन जीने की कोई झलक नहीं दिखाई देती । दलितों की स्थिति में जो भी परिवर्तन हुआ है वह नाकाफी है । आज भी जो दलित साहित्य आ रहा ,जो फिल्में बन रही हैं उससे उनके विकास की सही पोल खुलती है । मराठी में जो आत्मकथाएं लिखी गयी हैं वह उनके जीवन का सही प्रमाण देती हैं  । और सिनेमा के माध्यम से उस यथास्थिति,असमानतापूर्ण नारकीय जीवन का यथार्थ चित्र उसके पूरे अंतर्विरोधों के साथ  ‘फ़ंड्री’ फिल्म( नागराज मंजुले द्वारा निर्देशित है) में दिख रहा है । उदयपुर फिल्मफेस्टिवल मे ‘फ़ंड्री’ के प्रोडयूशर विवेक कजरिया के साथ –साथ नकुल सिंह साहनी ,मोहम्मद गनी(कैद के निर्देशक ),सौरभ व्यास(सिटी लाईट्स, कंचे और पोस्टकार्ड),गजेन्द्र श्रोत्रिय (भोभर)  रामकुमार से संजय जोशी की बात-चीत ,जो फिल्म के विषय-चयन ,उसके वितरण ,खर्च आदि को लेकर थी वहाँ बैठे दर्शक साथियों मे उत्साह भरने वाली थी , मोहम्मद गनी से बात करके दर्शक-दीर्घा मे बैठे कई  साथियों का मानो फिल्म बनाने का सपना पूरा हो गया हो इस कदर उत्साह से भर गए । इस कार्यक्रम कि महत्ता इसके समवेशी चरित्र के कारण और  अधिक बढ़ जाती  है। जो इस कार्यक्रम कि प्रतिबद्धता भी है।  संजय काक द्वारा निर्देशित फिल्म ‘माटी के लाल’ देखने  के बाद दर्शको नें फिल्म में दिखाये गए आदिवासियों के जल ,जंगल, जमीन अर्थात जीवन को बचाने कि लड़ाई को, जो कि ‘माओवाद’ के नाम से जानी जाती है से संबन्धित कई सवाल पुछे। संजय काक का कहना था कि लड़ाइयाँ तो पंजाब ,कश्मीर ,उड़ीसा,छत्तीसगढ़ ,झारखंड, नार्थईष्ट सभी जगह लड़ी जा रही हैं,हाँ लड़ाइयों का रूप अलग हो सकता है।

इस कार्यक्रम में  बच्चों से जुड़ा एक पूरा सत्र ही था। जिसमें  बच्चों द्वारा बनाए गये चित्रों कि प्रदर्शनी लगी थी। बच्चों के नन्हें हाथों से खींची गयी आड़ी तिरछी रेखायेँ बहुत ही सुंदर लगी । संजय मट्टू ने बच्चों को बहुत ही रोचकीय ढंग से ‘ डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन’ कि कहानी सुनायी। कहानी सुनते समय बच्चे कभी तो आश्चर्य से  भर उठते तो कभी खुश होकर संजय मट्टू के साथ कहानी दुहराते ।कहानी से संबन्धित सवालों के जवाब भी बच्चों ने बड़ी समझदारी के साथ दिया।    बच्चों के साथ मेरा भी मन बचपन कि उन स्मृतियों में खो गया जब कहानी सुनने के लिए सबकी टहल बजाती थी । बच्चों के लिए चुनी गयी फिल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड; बहुत ही अच्छी फिल्म थी । जिसमें बच्चों के खेल-खिलौने , उनके दोस्तों की दुनिया और उनके मनोविज्ञान को समझने के लिए एक सरहनीय प्रयास था । आज का  बचपन बस्ते के नीचे दम तोड़  रहा है ,उनके खेल-खिलौने का निर्धारण पूरी तरह से बाजार के हाथों मे चला गया है ,दोस्तों की दुनिया  घर के कुछ सदस्य  तक सीमित हो गयी है। ऐसे समय मे यह बचपन बचाने की एक सफल शुरुआत है ।इसी  तर्क को  यदि आगे बढ़ाया जाय तो कई और भी सवाल पैदा होते हैं, जिनको मोहम्मद गनी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ क़ैद ‘मे उठाया गया है। स्कूलों और घरों में बच्चों के प्रति बरती जाने वाली  किसी भी तरह की  असंवेदनशीलता कैसे उनको मनोरोगी बना देती है। उस पर यदि परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो अशिक्षा ,अंधविश्वास जैसी कई बुराइयाँ घर के भीतर जड़ जमा लेती हैं । गनी की फिल्म को देखकर वहाँ बैठे शिक्षक ,अभिभावक और स्वयम बच्चों ने भी अपने –अपने अनुभव साझा किए। एक और बात का संकेत इस फिल्म में है जिसकी तरफ शायद दर्शकों का ध्यान नहीं गया ,वह यह की शिक्षा के निजीकरण होने से शिक्षको के जीवन मे अस्थायित्व आया है।  जीवन मे असुरक्षा का बोध बढ़ा है, जिसके चलते कर्तव्य बोध टूट है  और पेट भरने ,बढ़ी हुयी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वह अन्य माध्यमों से भी  पैसा बनाने की कोशिश करता है। मेरी दृष्टि में यह फिल्म- शिक्षक ,शिक्षार्थी और अभिभावक के आर्थिक सम्बन्धों को विश्लेषित करती है।  उदयपुर फिल्मोत्सव में युवा ‘वालेंटियर’ साथियों की सहभागिता,उनके सवाल ,जिज्ञासाएँ उनकी टिप्पणियाँ सुनकर लगा की इस देश में एक ऐसी  युवा पीढ़ी का उभार हो रहा है, जो मानव विरोधी संस्कृति और प्रतिगामी विचारों के खिलाफ सजग है ।  इस कार्यक्रम कि बहुत सारी स्मृतियाँ बाकी हैं, जिसको लिखना संभव नहीं हो पा  रहा है। लेकिन अंत मे वरुण ग्रोवर कि कॉमेडी का जिक्र करने से खुद को रोक नहीं पा  रही हूँ । कॉमेडी  के नाम पर खूब  कूड़ा- करकट उड़ रहा है।  स्त्रियों के प्रति बहुत ही  सूक्ष्म भाषिक हिंसा कि जा रही है।  ऐसे मे वरुण ग्रोवर कि राजनीतिक समझदारी, कॉमेडी और व्यंग को नयी दिशा दे रही है ।

हर पुरुष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

( पाखी के सम्पादक ने सितम्बर अंक के अपने सम्पादकीय में चालीस साल की स्त्रियों के प्रेम , उनके विश्वास और विश्वासघात तथा तथाकथित तौर पर उनमें साहस के अभाव सहित अभिव्यक्ति के नये आयाम के साथ ज्यादा उन्मुक्त होती स्त्रियों को अपना विषय बनाया है . ४० साल की यह उम्र सीमा समझ से परे है . वैसे पुरुषों के लिए स्त्रियों की उम्र और उनका कौमार्य बड़ा पुराना विमर्श -विषय रहा है . १९वी शताब्दी में तिलक और रानाडे आदि विवाह के लिए ९ साल या ११ साल की बहस में फंसे थे या फिर किस विधवा की शादी हो , जैसे विषय में . यानी बहस यह थी कि पति -संसर्ग कर चुकी विधवा का पुनर्विवाह हो या नहीं . पाखी के सम्पादक भी उसी कड़ी में विमर्श कर रहे हैं ,  शर्मिला इरोम  , अरुंधति राय , शोभना भारतीय , इंदिरा नुई , सुस्मिता सेन , विद्या बालन के समय में. या उस समय में जब स्त्रियाँ अपनी कामनाओं और इच्छाओं के साथ सक्रिय हैं . निवेदिता पाखी के विवादित सम्पादकीय के परिप्रेक्ष्य से अपनी बात कह रही हैं . आप भी आमंत्रित हैं . )

प्रेम भारद्वाज को पढ़ती रही हूं । मुझे उनको पढ़ना अच्छा लगता है। अच्छा इसलिए नहीं कि वे मित्र हैं, इसलिए कि लिखना एक कला है। उंनकी अभिव्यक्ति लेखन -कला के साथ जीवंत होती है . काला  जितनी उनके बाहर है उतनी भीतर। हम यह उम्मीद करते हैं कि कला के प्रति गहरा अनुराग रखने वाला इंसान स्त्री मुद्दों पर भी उतना ही संवेदनशील होगा ,जितना मनुष्यता को लेकर। सीमोन कहती हैं, ‘  स्त्री जन्म नहीं लेती स्त्री गढ़ी जाती है।’  मुझे लगता है पुरुषों के बारे में भी यह कहा जाना चाहिए कि ‘ हर पुरुष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है.’

पाखी के संपादकीय‘ चांद पर हूं…मगर कब तक’ में प्रेम भारद्वाज ने जो कुछ लिखा उससे अंधेरा और गहरा हुआ है। एक बार फिर स्त्री लहुलूहान हुई है। मैं नहीं जानती की जिन 40 पार की स्त्रियों का जिक्र संपादकीय में किया गया है वे किस दुनिया की स्त्री हैं? जहां प्रेम भी प्रेम जैसा नहीं है। टाइम पास है। सिनेमा का मध्यांतर है। जहां मौज मस्ती के साथ पाॅपकार्न खा लेने भर का ही वक्त है।  प्रेम भारद्वाज की यह स्त्री छलना है, पर पुरुष गामिनी  है। अपने घर के दायरे को सुरक्षित रखकर प्रेम करती है, मजा लेती है। यह वह स्त्री नहीं है, जो प्रेम के लिए मर जाती है या मार दी जाती है, जिसने घरती पर पांव जमाने के लिए खुरदरी जमीन पर अपनी मेहनत से फसल उगायी है। जिसने अपने हिस्से के आसमान के लिए खून से भरे शोक  के फर्श  पर सदियां बितायी है।

ये कौन स्त्री है? किस वर्ग की? किस दुनिया की जिसे अपने गोपन कक्ष में प्रेम करने की आजादी है। जहां वह प्रेमी के साथ जीती है,पति के साथ सोती है? और यह बेचारा पुरुष कितना मासूम, प्रेम में मरने वाला, जान देने वाला है। राम सजीवन जैसा पुरुष किस दुनिया में रहता है ? काश  कि किसी स्त्री के जीवन में इतने संवेदनशील  मर्द होते!

सब्जेक्शन आॅफ विमेन में जाॅन स्टुअर्ट मिल कहते हैं-‘पुरुष अपनी स्त्रियों  को एक बाध्य गुलाम की तरह नहीं बल्कि एक इच्छुक  गुलाम की तरह रखना चाहते हैं,सिर्फ गुलाम नहीं, बल्कि पंसदीदा गुलाम। इसलिए उनके मस्तिष्कों को बंदी बनाए रखने के लिए उन्होंने सारे संभव रास्ते अपनाए हैं।’

हर नैतिकता स्त्री से यही कहती फिरती है कि स्त्री को दूसरों के लिए जीना चाहिए। सच तो यह है पराजित  नस्लों और गुलामों से भी ज्यादा सख्ती और क्रूरता  से स्त्री को दबाया गया। यह हम नहीं कह रहे हैं यह स्त्री का इतिहास बताता है। क्या कोई भी गुलाम इतने लंबे समय के लिए गुलाम रहा है जितनी की स्त्री? क्या यह स्थापित करने की कोशिश नहीं है कि अच्छे पुरुष की निरंकुश सत्ता में चारों तरफ भलाई,सुख और प्रेम के झरने बह रहे हैं। जिसकी आड़ में  वह हर स्त्री के साथ मनमाना व्यवहार कर सकता है। उसकी हत्या तक कर सकता है और थोड़ी होशियारी बरत कर वह हत्या कर के भी कानून से बचा रह सकता है। वह अपनी सारी दबी हुई कुंठा अपनी पत्नी पर निकाल सकता है। जो अपनी असहाय स्थिति के कारण न पलट कर जबाव दे सकती है, न उससे बचकर जा सकती है। अगर यकीन न हो तो हर रोज मारी जा रही स्त्रियों के आंकड़े को उठा कर देख लें।

40 के पार की औरतोें अगर प्रेम में इतनी ही पकी होतीं तो हर रोज रस्सी के फंदे से झूलती खबरें अखबारों के पन्ने पर नजर नहीं आती। सच तो यह है कि उसकी पूरी जिन्दगी अपने घर को बचाने में चली जाती है। घर उसके जीने का केन्द्र है। उसके हंसने, बोलने, रोने का। इसलिए उसने घर को अपना फैलाव माना। उसे सींचा। पर इसके पेड़ का फल पुरुषों ने ही खाया। उसे राम सजीवन जैसा न कभी प्रेमी मिलता है न एकनिष्ठ पति। फिर भी वह अनैतिक है। पुरुष को नैतिक और  स्त्री को अनैतिक बनाने की मानसिकता के पीछे यह बताना है कि पुरुष नैतिक रुप से श्रेष्ठ है। नैतिकता और अनैतिकता को लेकर हमेशा  से अतंर्विरोध रहा है। जिसका नायाब उदाहरण है टाॅलस्टाय का उपन्यास अन्ना कैरेनिना। अनैतिक अन्ना विश्व  उपन्यास की सबसे यादगार चरित्रों में से है।  टाॅलस्टाय के नैतिकता संबंधी विचारों को उसकी कला ध्वस्त कर देती है।

जिस समाज में प्रेम अपराध है उस समाज में स्त्री को इस बात की छूट कहां कि वह प्रेम से भरी दिखे। वह प्रेम के लिए जिए। वह प्रेम कविता लिखे। पता नहीं प्रेम भारद्वाज को वैसी स्त्रियाँ  कहां दिख गयीं । जिस फेसबुक को स्त्री के लिए किसी दरीचे के खुलने  जैसा मान रहे हैं  उसके खुलेपन  से इतने आहत क्यों? फेसबुक पुरुषों का भी  चारागाह है। जहां वे शिकारियों  की तरह ताक में बैठे रहते हैं कि जाने कौन किस चाल में फंसे। दरअसल ये पूरी बहस ही बेमानी है। प्रेम को किसी अलग सदंर्भ में नहीं देखा जा सकता। हमारी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक और लैंगिक बुनावट तय करती है कि कौन सा समाज किन मूल्यों के साथ जीता है। इसी समाज में ईरोम भी है और अरुणा राय भी।

सवाल उठता है कि हम स्त्री को किस तरह से देखते हैं। एक आब्जेक्ट के रुप में या मनुष्य के रुप में ? अगर हम मनुष्य की तरह देखेंगे तो हमें तीसरी कसम का हीरामन ही याद नहीं आयेगा हीराबाई के प्रति भी हमारी गहरी संवेदना होगी। देवदास शराब में डूब कर मर जाता है पारो जिन्दगी से लड़ती है, पलायन नहीं करती। अगर लैेला नहीं होती तो आज मजनूं नहीं होता। न लैला कहती , ‘ मेरा कब्र वहीं बनाना ,जहां मैं पहली बार उससे मिली थी। उससे कहना कि मेरी कब्र पर आयें,और सामने क्षितिज की ओर देखे.  वहां मैं उसका इंतजार कर रही हूंगी। ‘ और जिन आंखों में मजनूं के सिवा कोई समाया नहीं था, वे आंखें हमेशा  के लिए बंद हो गयी।

‘ कागा सब तन खाइयो
चुनि-चुनि खाइयो मास
दुइ अंखियां मत खाइयो
पिया मिलन की आस।’ …

दरअसल प्रेम यही है। इससे इतर कुछ नहीं। वह 40 की पार औरतें हों या फिर 16 साल की मासूम उम्र,  जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियाबी रस्मों रीवाज छू पाते हैं।

घर की प्रताड़ना से फोटोग्राफी की मंजिल तक

( चर्चित फोटोग्राफर सर्वेश ने घरेलू हिंसा की असहनीय पीड़ा से मुक्त होकर फोटोग्राफी को अपनी मंजिल  चुना और मुकाम तक  पहुँची भी  . सर्वेश से परिचित करा रही हैं कवयित्री दीप्ति शर्मा  )

यह एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी एक ऐसी लडकी की कहानी है, जिसने अपना रास्ता खुद बनाया तमाम
बंदिशो ,कठिनाईयोँ को लांघकर वह आज एक अलग मुकाम पर खडी है.  बचपन से ही सर्वेश का सपना वकील बनने का था, वह कानून की पढाई करना चाहती थी पर 12 वीँ पास करते ही  ( बाद में उन्होंने बी ए की डिग्री ली . उसकी शादी पक्की कर दी गयी . वह  इस शादी के लिये तैयार नहीँ थी , परिवार ने उसे इस इनकार के लिए प्रताड़ित किया और उसकी शादी उसकी  बिना मर्जी के सन 1976 में  एक ऐसे व्यक्ति से कर दी  ,जो औरत को अपनी जरुरतेँ पूरी करने वाली एक मशीन समझता, बात बात पर पिटाई,गाली -गलौच मानो उसकी नियती बन गयी हो.

राहत पाने की चाह में एक दिन माता-पिता के पास पहुंची ,तो उन्होंने भी वह नरक भोगने की सलाह दी और कहा शादी हो गयी है ,अब निभाना ही पडेगा। सर्वेश ने कई बार महसूस किया कि उसका आत्मसम्मान, सुरक्षा के लिए  भी उसका पति तैयार नहीँ था ।

एक बार बालकानी से फेँका कूडा वहां से गुजर रहे एक व्यक्ति पर गिर गया ,वह व्यक्ति बहुत गुस्से में ऊपर घर पर आ पहुंचा बहुत मांफी मांगने पर भी वह आदमी अभद्र भाषा का प्रयोग करता रहा , गाली- गलौच करता रहा बॉलकानी से नीचे फेँक देने की धमकी भी दे डाली और उसका पति चुपचाप यह सब देखता रहा ,उसने कोई बीच-बचाव नहीँ किया .

इस घटना से  सोती हुई औरत जाग गयी और एकदम कडक आवाज़ में बोली ” हाथ लगाकर तो देख ” इस पर वह आदमी बुदबुदाता हुआ वहां से चला गया । यह सब देखकर वह समझ गयी थी की अब आगे उसे क्या करना है तो फिर क्या था नवम्बर सन 1988 में पति का घर छोड वह निकल पडी अपनी मंज़िल तलाशने ।

धीरे धीरे बहुत से लोग उसके सम्पर्क में आये . छोटे -मोटे रोजगार भी मिले .  नए दोस्तों के बीच वह किताबे पढ़ती . लेकिन जिन्दगी का अहम पड़ाव था एक दोस्त के द्वारा भेट किया गया कैमरा . शायद वह सर्वेश के अंदर छुपे हुनर को जान गया था ,इससे सर्वेश का पुरुष जाति पर फिर से भरोसा हुआ , उस कैमरे ने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी . वही उसका साथी हो गया हर सुख दुख का।

उसने अपने कैमरे से कई मृतप्राय वस्तुओँ में जान डाल दी . सर्वेश का  पहला professional फोटोग्राफ हिमाचल टाइम्स देहरादून में प्रकाशित हुआ । सन 1991 में उत्तराखंड में भूकंप के दौरान लिये गये फोटोग्राफ से उसकी एक अलग पहचान बनी , उसके  फोटो ग्राफ अधिकतर अखबारोँ में प्रकाशित हुए । पुरुष प्रधान समाज़ में जहाँ इस क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा अधिक दिखायी पडता है ,वहाँ उसने  हिम्मत नहीँ हारी और उत्तराखंड में डटी रहीं, एक  सप्ताह रोड पर सोकर गुजारा .  उस दौरान लिये गये तकरीबन ५० फोटोग्राफ देश के प्रमुख अखबारोँ में प्रकाशित हुए।

कारगिल  की लड़ाई में भी सर्वेश ने साहसिक फोटोग्राफी की . वहाँ खींचें गये 100 से अधिक फोटोग्राफ देश के महत्वपूर्ण अखबार एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए. कई औरतोँ बच्चोँ के जीवन की तमाम कडियोँ को उन्होनेँ अपने कैमरे में कैद किया। कोयले की अँधेरी खानोँ में उसके सम्वेदनशील कैमरे ने नयी जान डाल दी,  उसने   कई दंगों में ,हिमालय कार रैली, लद्दाख के त्यौहार, हर जगह पर अपने कैमरे का करतब दिखाया ।

गुजरात भूकम्प और सूखे की स्थिति हो या कुम्भ मेला  हरिद्वार या इलाहाबाद की तस्वीरें, मुरादाबाद के दंगे हो या उतरांचल का प्रसिद्ध नंदा राज जाट त्यौहार हर जगह सर्वेश के कैमरे ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की .

सर्वेश ने फोटोग्राफी  के लिए श्रीलंका , यू.के. भूटान ,नेपाल आदि देशोँ की यात्रा की .  फोटोग्राफी की कई किताबों की इस लेखिका के फोटोग्राफ  women in the time of flux  सीरीज के तहत दिल्ली, भोपाल, बरेली, मेरठ,लखनऊ और मैसूर में प्रदर्शित हुए .  मुम्बई, अहमदाबाद, कोच्चि, चेन्नई, कलकत्ता में की भी प्रदर्शनियों में सर्वेश की प्रमुख भागीदारी रही .  एकल प्रदर्शनी ‘ children in times of flux ‘के नाम से IIC ,दिल्ली, में  फरवरी 2008 में बहुत सफल और महत्वपूर्ण रही ।

कारगिल में ली गई एक तस्वीर के लिए सर्वेश भारत सरकार से सम्मानित हो चुकी हैं .हिन्दी अकादमी सहित विभिन्न संस्थानों से सम्मानित हो चुकी हैं . सर्वेश ‘गॉड फ्रे’ सम्मान से सम्मानित हैं .  आजकल वे एक सफल फ्रीलांस ( स्वतंत्र ) फोटोग्राफर के रुप में सक्रिय हैं।

अब तक सर्वेश एक बहुचर्चित नाम  हैं ,जिसे शायद आज हम सब बखूबी

जानते हैं.  एक आम लडकी जो अपने पति की प्रताडना से परेशान थी यहां तक कैसे पहुंची ? निश्चित ही अपने डर और अपने औरत होने के मनोविज्ञान पर काबू पाकर .

मीना खोंड की दो कवितायें

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मीना खोंड

मीना खोंड कवितायें लिखती हैं, लन्दन  में रहती हैं. संपर्क : meenakhond@gmail.com

१. 


क्या पूछते हमें
कैसे रहे ? कैसे जीए ?
हम तो बस
उन्हीं के हो गए
उन्होंने अपनाया
हम न हमारे रहे
उनके इशारे चलते रहे
बस, हम जीते रहे

क्या पसंद , नापसंद क्या
बेमतलब सवाल रहे
वे कहते रहे
हम सुनते रहे
अपने लिए , अपनी मर्जी से कैसे जीते !
आखिर औरत हूँ
कन्यादान में जो मिली हूँ
स्वतंत्र देश की गुलाम नागरिक हूँ

2. 


तेरा उडता आंचल
तेरा बहता काजल
गहरा अह्सास
कौन पह्चानता ?

दुःख दर्द आहें
आंसू भरी निगाहें
अर्थ उनका
कौन समझता ?

पल भर की देहभूख
पल भर का देह सुख
अस्तित्व तुम्हारा
यहीं सिमटता

तू माता भगिनी
तू कांचन कामिनी
तेरी एक ही औरत जात
हर कोई  समझता