Home Blog Page 166

यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था

0
निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

( किश्तों  में लिखा जा रहा यह संस्मरण निवेदिता के निजी जीवन और तत्कालीन समय को एक साथ दर्ज कर रहा है . इनमें एक स्त्री की यात्रा और कालचक्र एकाकार हो गए हैं . )

निवेदिता के संस्मरण के अन्य किश्त पढ़ने के लिए क्लिक करें :

जब ज़रा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार 

इसे भी  पढ़ें ( क्लिक करें ) :

उन्हें लड़ना ही होगा अपने हिस्से के आसमान के लिए 

हवा के साथ कुछ जलने की तीखी गंध मेरे भीतर उतर आयी।  नीले धुंए की लट उपर उठ रही थी।  कुछ जल रहा है।  मैं भागी। पतीली में मैंने दूध चढ़ाया था। जो उबल उबल कर  आग की लपटों में समा गया। मां दौड़ते आयी,  ‘ ओह! तुमने सारा दूध जला दिया। ध्यान कहां है तुम्हारा? ‘ मैंने कुछ नहीं कहा गीली पलकों से बूंद टपक पडे। मैं लिपट गयी मां से । मां रोक लो हरमीत को।  रोक लो मां । मैं रो रही थी बच्चों की तरह, जैसे उससे उसका कोई खिलौना छीन कर ले जा रहा हो। दंगे के दौरन हरमीत को पंजाब जाना पड़ा । मैं सोच रही थी किसी को अपनी जगह क्यों छोड़ना पड़े? सिर्फ इसलिए की वह सिख है.. मुसलमान है…इसाई है !

मैं कमरे से बाहर निकल आयी। कच्ची रौशनी में भीगी हुई शाम पसरी थी। मां चाय बना कर ले आयी। तारों के फीके आलोक में सड़क की तरफ उतरती पगड़डियां किसी नदी की तरह लग रही थी, जो धीमें-धीमें बह रही हो।यूनीवर्सिटी खुली और पढ़ाई तेजी से शुरु हो गयी। मेरे पास कई किताबें नहीं  थीं। काफी दिन हो गए थे लायब्रेरी का मुंह देखे। उन दिनों लायब्रेरी में किताबें मिल जाया करती थीं। काॅलेज कैंपस की ये सबसे खूबसूरत इमारत है। अंग्रेजों के जमाने का। सायेदार रास्तों से गुजरते हुए जब लाइब्रेरी पहुंचे  तो गेट पर श्रीकांत मिल गया .  उसने बताया आज कलाकारों की बैठक है। हमने कहा, ‘ आते हैं’ .  लाइब्रेरी से दो किताबें इशु कराया। मुझे पता था कि कौन सी किताब किस कोने में दुबकी रहती है। धूल भरे शीशों के भीतर मन माफिक किताबें तलाशना आसान नहीं था। हम लाइब्ररी से बाहर निकल आए। पीपुल्स बुक हाउस के पास जमघट लगी थी। देखा राणा बनर्जी  अपने चिर परिचित मुद्रा में गुणगुणा रहे हैं। हाथ में सिगरेट है। मैंने पीछे से एक हाथ जमाया , ‘  जब देखो सिगरेट पीते रहते हो।’  ‘ ओह! तुम हो। पता होता तो पहले पी लेता’.

राणा की आवाज पर हमसब मरते थे। वह जब गाता तो लगता धरती डोल रही है। लंबी-लंबी पलकें,सांवला रंग। खालिश  रोमैंटिक शक्ल  और ऐसा आदमी जिसपर बंगाली बालाएं जान देती थीं। राणा के पिता गुरुदत्त बनर्जी  खुद कम्युनिस्ट थे। राणा पर उनका गहरा असर था। राणा का छोटा भाई है संजीव, जो पत्रकारिता से जुड़ा है। जिसे हमलोग प्यार से तूफान कहते हैं। राणा जब आंठवी में पढ़ रहा था उसी समय वह वाम आंदोलन के सम्पर्क में आया और बाद में सीपीआई एम एल से जुड़ा । पर उसका एमएल के साथियों से ज्यादा समय हमलोगों के साथ गुजरता। इप्टा में वह खूब दिलचस्पी लेता। उसकी गहरी सांस्कृतिक समझ ने ही उसे दूसरे विरादराना संगठनों के नजदीक ला दिया था। उसकी शक्ल  मशहूर गायक हेमंत कुमार से काफी मिलती थी। बल्कि उसके पिता बिल्कुल हेमंत कुमार ही लगते थे। कई बार ट्रेन में सफर के दौरान लोगों ने हेमंत कुमार समझ कर उन्हें घेर लिया था बड़ी मुश्किल  से उन्हें यकीन दिलाना पड़ा कि वे हेमंत कुमार नहीं गुरुदत्त बनर्जी  हैं। राणा ने एक दिन यह किस्सा बताया था। हमलोग खूब हंसे थे।

वह चाय लिए मेरे पास आ गया। हम पीपुल्स बुक हाउस के पीछे वाले कमरे में बैठ गए।  मैंने पूछा, ‘ क्या हो रहा है ?’  उसने कहा, ‘इनदिनों नेहरु को पढ़ रहा हूं।’ मैंने तंज लहजे में कहा, ‘अच्छा अति क्रांतिकारी लोग भी नेहरु को पढ़ते हैं। वह हंसने लगा। तुम जानती हो व्यक्तिगत रुप से नेहरु मुझे काफी पसंद है। उनको पढ़ते हुए हैरानी होती है। वे तो मार्क्सवाद  के पक्षधर रहे हैं। तुम पढ़ोगी तो कायल हो जाओगी। एक जगह उन्होंने कहा-‘ मुझे पक्का यकीन है कि आज दुनिया और हिन्दुस्तान के सामने जो समस्याएं मुंह बाएं खडी  हैं,उन्हें हल करने की एकमात्र कुंजी समाजवाद है,जब मैं यह शब्द  जुबान पर लाता हूं तो उसके वैज्ञानिक,आर्थिक मतलब में इस्तेमाल करता हूं। समाजवाद सिर्फ आर्थिक सिद्धांत नहीं है। मुझे भारत के लोगों की गरीबी ,बेरोजगारी और गुलामी के खात्में के लिए कोई और रास्ता नहीं सूझता। इसके लिए हमारी राजनीतिक व समाजिक व्यवस्था में बड़ी और क्रांतिकारी तब्दिलियां जरुरी है। खेती में, उद्योग में अमीरों के बोलबाले को खत्म करना जरुरी है। हिन्दुस्तान के रजवाड़ों, सामंती तानाशाह  निजामों का  उखड़ना जरुरी है।’ राणा ने मुझे देखा, ‘  हमारे नेता क्या इससे ज्यादा क्रांतिकारी  बातें करते हैं?  मैंने चुटकी ली, ‘ तो अब एक क्रांतिकारी  बुर्जुआ से प्रभावित हो रहा है। वैसे मैं तुमसे सहमत हूं। नेहरु मुझे भी पसंद हैं। मैं उन कम्युनिस्टों में से नहीं हूं जो उन्हें सिरे से खारिज करते है !’  हमारी बातचीत लंबी हो रही थी। तबतक तनवीर अख्तर आ गए , ‘ अरे अभी तक तुमलोग यहीं हो, मिटिंग का समय हो गया।’ हमलोग मिटींग के लिए निकल गए। पटना के सभी कलाकारों की मौजूदगी थी। बिहार के सांस्कृतिक इतिहास में फिर कभी कलाकारों की इतनी एकता दिखी नहीं। मसला था प्रेमचन्द्र रंगशाला  में सीआरपीएफ के कब्जे का। मिटिंग लंबी चली। तय हुआ कि इस सवाल पर हमलोग जुलूस निकालेंगे। बिहार की सांस्कृतिक जमीन उर्वर रही है। यह वह दौर था जब सांस्कृतिक हलचल के लिए बिहार जाना जाता था। भारतीय जननाट्य संध इप्टा की बिहार में पहचान थी।  कलासंगम, अंकुर, बिहार आर्ट थियेटर,अनागत, किसलय,कला त्रिवेणी, मित्रम, भंगिमा, निमार्ण कला मंच, सर्जना और प्रेरणा जैसे संगठन भी कला के क्षेत्र में लगातार सक्रिय थे।

वापसी नाटक में निवेदिता , श्रीकांत और रूपा

देश राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। जनता पार्टी का प्रयोग विफल रहा था। बिहार की सामाजिक, राजनीतिक  और आर्थिक स्थितियों ने नक्सलवाद के लिए नई जमीन तैयार की,  जिसके असर से कलाकार भी अछूते नहीं थे। गीतों में कहानियों में, नाटकों के जरिये इस विचार धारा के पक्ष में सामाजिक स्थितियां तैयार की जा रही थी। अनागत जैसी मजबूत संस्था में बिखराव आ चुका था। अनागत से निकले परवेज अख्तर,रश्मी  सिन्हां, विनीत,और जावेद अख्तर अनागत छोड़कर इप्टा में शामिल  हुए। इन्हीं राजनीतिक पृष्ठभूमि में बिहार में इप्टा का पुर्नगठन हुआ। इप्टा के पुर्नगठन के बाद रंगमंच एक नए तेवर में जनता के बीच था। तनवीर अख्तर, कवि और लेखक कन्हैया जी,राजेन्द्र सिंह राजन, डा0 ए0के सेन जैसे लोगों के समूह ने, जिनका रुझान मार्क्सवाद  की तरफ था , इप्टा को नयी शक्ल  दी। उसी दौर में मैं इप्टा से जुड़ी। इप्टा में मेरा पहला नाटक प्रेमचन्द्र लिखित इस्तीफा था। मेरे लिए नाटक बिल्कुल नया अनुभव था। एक दिन पापा ने कहा कि चलों तुम्हें कुछ कलाकारों से मिलाते हैं। उन दिनों इप्टा का आॅफिस एनीबेंसेन्ट रोड में हुआ करता था। जिसे मैत्री-शान्ति  भवन के नाम से जानते हैं लोग। शाम  का समय था। जब मैं इप्टा के दफ्तर पहुंची तो  देखा कई नौजवान लड़के लड़कियां हाथ में कागज लिए जोर-जोर से संवाद बोल रहे हैं।

कुछ लोग हारमोनिम पर तान दे रहे हैं। मुझे काफी दिलचस्प लगा ये नजारा। पापा ने मेरा परिचय कन्हैया जी से कराया। मेरी बेटी है नाटक करना चाहती है। वे काफी खुश  हुए। थियेटर में लड़कियों की कमी हमेशा  रही है। उन्होंने बताया कि एक साथ कई लघु नाटक किए जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि निवेदिता करे। तनवीर अख्तर ने कहा कि कल शाम  को आएं। हमलोग तय करते हैं। दूसरे दिन इप्टा पहुंची। देखा एक  खूबसूरत शक्ल  वाला लड़का गा रहा है। मेरा परिचय कराया गया। ये संजय उपाध्याय हैं। अच्छे गायक हैं। उसने बड़ी शाइस्तगी से हाथ बढ़ाया। मैंने तपाक से हाथ मिलाया। इप्टा के शुरुआती  दौर में जो कुछ गहरे दोस्त बने उसमें संजय थे। समय के साथ जीवन में बहुत कुछ बदलता है। दोस्ती के रंग भी फीके पड़ते हैं।

मुझे बताया गया कि प्रेमचन्द्र की कहानी ‘  इस्तीफा’  के लिए मेरा चयन हुआ है। मेरे साथ अभिनय करेंगे परवेज अख्तर। मुझे स्क्रीप्ट दे दिया गया। मेरा दिल घबरा रहा था। परवेज अख्तर मंजे हुए कलाकार थे। मैं उनकी पत्नी की भूमिका कर रही थी। परवेज अख्तर बड़े इख्लाक़ से मिले। बड़ी अदा से आदाब अर्ज किया। मैंने देखा उंची पेशानी  , आंखें रौशन  और मुस्कुराती हुई। चेहरा इसकदर पुरकशिश कि देखते रहिए। मैं खुद  शर्मा गयी और ये सोच कर धबरा गयी की कहीं इन्होंने मुझे धूरते हुए देख तो नहीं लिया।

निवेदिता की बहन सोना  थियेटर के साथ धारावाहिक और फिल्म करती हैं

पापा ने उनलोगों सेे कल भेजने का वादा कर विदा लिया।  सारी रात मैं प्रेमचन्द्र की कहानी इस्तीफा में डूबती-उतरती रही। मुझे ठीक -ठीक याद नहीं पर कुल 6 लधु नाटकों का मंचन हुआ था। एक नाटक में रश्मि अभिनय कर रही थीं । उसी दौरान मेरे कई गहरे दोस्त बने। रश्मि  उस दौर की बड़ी अभिनेत्री थी। उसे देखकर लगता था कि वह अभिनय के लिए ही बनी है। रंगमंच का यह मेरा दूसरा अनुभव था। जब स्कूल में थी तो एन0एन0 पांडे के निर्देशन में ‘घर का भेदी’ नाटक किया था। एन0एन0 पांडे उन दिनों रंगमंच में काफी सक्रिय थे। राजेन्द्र नगर में रहते थे। हमलोग उनके पड़ोसी थे। उस नाटक की खूब तारीफ हुई थी। इस्तीफा नाटक में मूल रुप से तीन पात्र थे। पति-पत्नि और उनका बेटा। नाटक में बेटा के किरदार के लिए बच्चे की खोज शुरू हुई। हमारे निर्देशक  परेशान  थे। मेरी छोटी बहन सोना उस समय 10 साल की थी। मैंने कहा कि इस नाटक में अगर आप कहें तो बच्चे के रोल के लिए सोना को ले सकते हैं। नाटक मंचित हुआ। परवेज अखतर की वजह से नाटक सफल रहा। मैंने महसूस किया कि अभिनय मेरे बूते की चीज नहीं है। मैं अभिनय नहीं कर रही थी। बाद में अपूर्वानंद ने नाटक की समीक्षा करते हुए लिखा कि ‘मेरा चेहरा काठ का चेहरा था’। यह दूसरी बात है कि बाद में वही चेहरा उसे भाता था।

मेरी उम्र उस समय 16-17 साल रही होगी। नाटक को जीने का यह मेरा पहला अनुभव था। अभी मैं सीख रही थी। अभिनय की बारीकियों से मेरा वास्ता नही पड़ा था। एक कलाकार, जिस किसी भी कला माध्यम में काम करता हो, चाहे शब्द  में ,चाहे रंग में, उसका अनुभव क्षेत्र बहुत विशाल  होता है, जटिल भी। मैंने महसूस किया कि अभिनय के लिए यह जरुरी है कि आप अभ्यास में रहें। कई बार मांजते-मांजते भी अभिनेता में चमक आती है। मैंने कभी भी अभिनय में अपना पूरा समय नहीं दिया। बहुत बाद में वापसी नाटक के मंचन के बाद यह भरोसा हुआ कि शायद हम भी नाटक कर सकते हैं। वापसी की कहानी मजदूरों की जिन्दगी पर आधारित थी .  इस नाटक में मेरे पति की भूमिका श्रीकांत कर रहे थे। तनवीर अख्तर का निर्देशन  था। यह संयोग है कि दोनों नाटक में बच्चे की भूमिका में मेरी बहनों ने अभिनय किया। इस्तीफा में सोना ने अभिनय किया तो वापसी में रुपा बाल कलाकार के रुप में काफी सराही गयी। उन दिनों अक्सर दोपहर में हमारे नाटक का रिहर्सल  होता था .  हम काॅलेज से सीधे रिहर्सल में आ जाते थे। ऐनी बेसेन्ट की तंग गलियों के पास ही शांति-मैत्री भवन था। जहां हमलोग रिहर्सल किया करते थे। बरामदे के ठीक सामने एक बड़ा कमरा था, दाई तरफ आंगन, दालान के दूसरे सिरे पर चैकोर कमरा था, जिसमें सामान रखे जाते थे। खिड़कियों और दरवाजे से छनकर रौशनी आती थी। कमरे की चैड़ाई में एक पुरानी दरी बिछी हुई थी।  कमरे का यह हिस्सा सामने आम सतह से कुछ उंचा और नुमायां हो गया था। श्रीकांत वही धुनी  रमाये बैठे थे। कुछ लड़के चाय बनाने में लगे हुए थे। तनवीर अख्तर अभी आए नहीं थे। मैं सामने बैठ गयी। श्रीकांत के साथ नाटक करना सबसे ज्याद सहज था। वह हमेशा  मुझे भरोसा देता। मेरे संवाद पर मेहनत करता। अक्सर रिहर्सल से जब फुरसत मिलती हम किसी न किसी की कविताएं और नज्म पढ़ते रहते। फैज और साहिर मेेरे प्रिय शायर रहे हैं। श्रीकांत की आवाज में उनको सुनना अच्छा लगता था। रिहर्सल के बाद कई बार हमारा अड्डा विनोद के घर लगता था। साहिर की लंबी नज्म ‘ परछाईयां’  को मैंने श्रीकांत से ही सुना। विनोद को ये नज्म खूब पसंद थी। कभी-कभी दोनों इसका पाठ करते।
जिन्दगी अजीब होती है। जब आप अपने समय को जीते हैं तोे पता नहीं चलता कि उसमें कितना कुछ है जिसने आपके जीवन को बनाया। गुजरी हुई घटनाएं ऐसे याद आती हैं जैसे कल की बात हो। मुझे याद है। उस शाम,   जब विनोद के घर पहुंचे,  सूरज ढ़ल गया था, आसमान पर पीली रौशनी फैली थी। हमसब उसके कमरे में बैठ गए। श्रीकांत ने अदा के साथ कहा मतला हाजिर करता हूं, फिर वो शेर  पेश  करुंगा, जिसका वादा है। हमलोगों ने भी बड़ी अदा से कहा  , ‘  इरशाद  अता हो ! ‘  श्रीकांत की आवाज लोचदार और नफासत से भरी है। सुर निहायत साफ और उसमें दूर तक पहुँच  जाने की खसियत है। उसने साहिर को सुनाना शुरू  किया-

रूपा अब पत्रकारिता करती हैं

जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख्वाबे.मरमरीं की तरह
हसीन फूल , हसीं पत्तियाँ , हसीं शाखें
लचक रही हैं किसी जिस्मे.नाज़नीं की तरह
फ़िज़ा में घुल से गए हैं उफ़क के नर्म खुतूत
ज़मीं हसीन है ,ख्वाबों की सरज़मीं की तरह
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरतीं हैं


कभी गुमान की सूरत कभी यकीं की तरह
वे पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
इन्हीं के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
खामोश होठों से कुछ कहने.सुनने आए हैं
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते.जागते लमहे चुराके लाए हैं


यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था
यहीं से हमने मुहब्बत की इब्तिदा की थी
धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से
हुजूरे.ग़ैब में नन्हीं सी इल्तिजा की थी
कि आरज़ू के कंवल खिल के फूल हो जायें
दिलो.नज़र की दुआयें कबूल हो जायें
 तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

हम दम साधे सुनते रहे, बहते रहे। परछाइयां लंबी नज्म है। हमने ऐसी विचलित करने वाली लंबी नज्म इसके पहले नहीं सुनी थी।  देर काफी हो गयी थी। घर जाना था। मन में साहिर को लिए विदा हुई। आसमान साफ था। बहुत धीमी हवा थी,जो पेड़ों को छूकर हल्के से निकल गयी। वृक्षों की घने चमकीले पत्तों की सरसराहट में जैसे किसी ने कानों में चुपके से कहा- तसव्वुरात  की परछाइयां उभरती है।

दूसरे दिन हमारा रिहर्सल सुबह 10 बजे से ही था। मैं अपनी बहन रुपा को लेकर आयी थी। नाटक का एक संवाद ‘मछली चारा खायेगी’ बोलने में रुपा को मुश्किल  होती थी। तनु भैया ने देखा बच्ची परेशान हो रही है उन्होंने कहा तुम्हें जिस तरह बोलना हो बोलो। रुपा बचपन से ही जहीन है। वह जो भी करती थी समां बांध देती थी। लोग कहते नन्हीं सी बच्ची में ख़ुदा आ बसा है। एक दृश्य  में मुझे और श्रीकात को काफी करीब आना था। तनवीर अख्तर कहते- तुम दोनों को पति-पत्नी की तरह दिखना है। इस दृश्य  में ऐसा लगना चाहिए कि एक -दूसरे के प्रति गहरा अनुराग है। श्रीकांत को मुश्किल  हो रही थी। मैंने हंसते हुए कहा , ‘  भूल जाओ कि ये मैं हूं। मेरा आंलिगन इस तरह से करो’ – यह कहते हुए मैंने उसे समेट लिया। मेरा ये तरीका काम कर गया। श्रीकांत सहज हो गए। वह दृश्य  खूबसूरत बन पड़ा। नाटक लोगों को पसंद आया। मुझे भी भरोसा हुआ कि मैं अभिनय कर सकती हूं।

प्रसिद्ध रंगकर्मी जावेद

यादें खामोशी से सुलग रही हैं। कबीर की तरह, लुकाठी लिए हमसब बाजार में खड़े हैं। अपने अनुभवों को लिखते हुए मैंने कोशिश  की है कि उस समय को समग्रता में देख सकूं। इन्सान की शुरू  की आधी जिन्दगी पहाड़ की चढ़ाई की तरह होती है, दूसरा आधा हिस्सा ढ़लान का। अभी हम पहाड़ पर चढ़ रहे हैं। उबड़-खाबड़ और चुनौतियों से भरे पहाड़ पर।बिहार के सांस्कृतिक आंदोलन में प्रेमचंद रंगशाला  एक ऐसा आंदोलन है,  जिसने देश की सांस्कृतिक व राजनीतिक परिदृष्य को बदला। इस आंदोलन के पक्ष में देष भर के साहित्यकार , कलाकार व वामपंथी छात्र संगठन एकसाथ आए।

1971 में प्रेमचन्द्र रंगशाला बनकर तैयार था। पहली बार बिहार में कोई रंगशाला इतना खूबसूरत  बना, जिसमें मंचीय प्रस्तुति के लिए कई संभावनाएं थीं। उसमें कुछ कार्यक्रम भी हुए। पर बिहार में 74 आंदोलन के दौरान प्रेमचंद रंगशाला में सीआरपीएफ का कब्जा हो गया था। रंगशाला के मंच को जवानों ने अपना रसोईघर बना लिया था। हालात ये हुए कि स्टेज तक जल गया। परदे फट गए। करोड़ों की लागत से बना रंगशाला सीआरपीएफ के खाना बनाने और रहने में इस्तेमाल हो रहा था। उसी दौरान कुछ नौजवानों ने यह सवाल उठाया कि प्रेमचन्द्र रंगशाला में सीआरपीएफ क्यों है?

रंगशाला एक बड़ा मुद्दा  बना। 1980 में प्रख्यात साहित्यकार महादेवी वर्मा की अध्यक्षता में पटना में प्रेमचंद जयंती मनायी जा रही थी। उसी साल दुनिया के कई हिस्सों में प्रेमचंद जयंती मनी। उन दिनों प्रेमचंद रंगशाला का नाम राजकीय रंगशाला था। सम्मेलन के दौरान साहित्यकारों के बीच से किसी ने ये सवाल उठाया कि राजकीय रंगशाला का नाम प्रेमचंद रंगशाला होना चाहिए। महादेवी वर्मा ने कहा कि ‘ यह कितना बुरा है कि एक रंगशाला में सीआरपीएफ का कब्जा है।’  यह हैरानी की बात है कि कुछ अझात नौजवानों ने प्रेमचंद रंगशाला से सीआरपीएफ का कब्जा हटाओ के नारे लगाये। यह नारा देश भर का मुद्दा बना। हमलोग प्रेमचंद रंगशाला के मसले को लेकर बात-चीत कर रहे थे। तनवीर अख्तर ने कहा कि शहर में प्रेस बिल के मामले को लेकर धरना चल रहा है। हमलोगों को भी शामिल होना चाहिए।

1982 के आस -पास प्रेस बिल लागू हुआ। जिसके खिलाफ सारे पत्रकार सड़क पर आए। पत्रकारों का साथ सभी वाम-जनवादी संगठनों ने दिया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे के सवाल ने आंदोलन की जड़े मजबूत की। हमलोगों को पोस्टर बनाने का जिम्मा था। फ़ैज़ की नज्म- ‘बोल की लब आजाद हैं तेरे’ और जुबां पर मुहर लगी तो क्या ग़म है कि खूने -दिल में डूबो ली है उंगलियां मैंने’ जैसी नज्मों का खूब इस्तेमाल किया। कहते हैं फूलों की शक्लों  और उनकी रंगों-बू से सरावोर शायरी से भी अगर आंच आ रही हो तो यह मान लेना चाहिए कि फ़ैज़ वहां पूरी तरह मौजूद हैं।

लंबे आंदोलन के बाद सरकार को प्रेस बिल कानून वापस लेना पडा़। यह ऐसी जीत थी, जिसने यह हौसला दिया कि संघर्ष की जीत होती है। पर अभी लंबी लड़ाई थी। कई और मोर्चे पर डटे रहना था। शायद वह नवंबर का महिना था। धुली-धुली रुपहली घूप फैली थी। बिहार भर के कलाकार एस के मेमोरियल हाॅल में जमा हुए थे। युवा महोत्सव का आयोजन किया गया था। कलाकार संधर्ष समिति ने तय किया था कि जबतक प्रेमचंद रंगशाला खाली नहीं होता कोई भी सरकारी आयोजन नहीं होने देंगे। साथियो ने पुरुस्कार वितरण का बहिष्कार किया। पर्चा बांटा गया। जिसमें यह लिखा हुआ था कि हम क्यों बहिष्कार कर रहे हैं। बहिष्कार के आरोप में पांच छात्र गिरफ्तार कर लिए गए। जावेद अख्तर,अशोक  आदित्य,पुष्पेन्द्र,राणा बनर्जी ,  एक का नाम याद नहीं। जावेद उन दिनों बीएन काॅलेज के छात्र थे। उनकी गिरफ्तारी से हंगामा हो गया। बीएन काॅलेज के छात्रों को लगा कि उनके काॅलेज के छात्र को पुलिस ले गयी।  छात्रों ने खुद उस आयोजन का बहिष्कार कर दिया। नीरज, जो इनदिनों जद यू का एमएलसी है,  वह बीएन काॅलेज में एआईएसएफ का लीडर था। उसने अगुवाई  की, और प्रशासन को धमकी दी  कि गिरफ्तार किए गए छात्रों को छोड़ दिया जाय। प्रशासन पर छात्रों का इतना दबाव पड़ा की 24 घंटे के अंदर सभी छात्र रिहा कर दिए गए। कलाकार संघर्ष समिति ने तय किया कि वे सरकारी युवा महोत्सव के समानान्तर युवा महोत्सव आयोजन करेंगे। आयोजन के लिए पांच कनवेनर रखे गए। अपूर्वानंद, जावेद अख्तर खान,पुष्पेन्द्र,प्रो0 संतोष, कुमार ध्रुव । इतने बड़े आयोजन करने के लिए हमारे पास कोई साधन नहीं था। हमलोगों ने चंदा जमा करने के कई तरीके इजाद किया। जिसमें सड़को पर गाते हुए चंदा मांगना शामिल था। हर सुबह एक नये संघर्ष की सुबह होती थी। कोई लंबी चैड़ी महत्वकांक्षाएं नहीं थीं। सबके सब रंगकर्मी,छात्र, जिनकी आंखों ने छोटेे-छोटे सपने देखे। वह सपना था कि बिहार में प्रेमचंद रंगशाला मुक्त हो।

निवेदिता

1986 की बात है। पटना इप्टा की टीम गुवाहाटी गयी थी ,जहां ब.व कारंत से साथियों की मुलाकात हुई । परवेज  ने विस्तार से कारंत को बिहार में चल रहे आंदोलन की जानकारी दी। उसी के कुछ दिन बाद साहित्यक पत्रिका नटरंग में ब.व कारंत का साक्षात्कार छपा। जिसमें उन्होंने कहा-‘मुझे शर्म आती है कि मैं एक ऐसे देश  में रहता हूं जहां रंगशाला में सीआरपीएफ का कब्जा है.’ वहां से लौटने के बाद इप्टा के साथी युवा महोत्सव की तैयारी में लग गए। पटना में जितने भी हाॅल थे सब हमलोगों ने बुक कर लिया था। बिहार के सभी जिलों से कलाकार आए। उनदिनों रंगकर्मियों और लेखकों की कई जमातें थी। एक जमात वैसे लोगों की थी ,जो आर्थिक रुप से अच्छी स्थिति में थे। पर ज्यादातर लोगों की हालत खस्ता थी। फिर भी हमसब जीवन से भरे हुए थे। रोज एक नए अनुभवों से गुजरते हुए। मुझे याद है कि मेरा जिम्मा कालिदास रंगालय में था। कौन से नाटकों का मंचन होगा,  कितनी कविताओं का पाठ होगा। मैं कविताएं लिखती थी। पर अपने लिखे पर भरोसा नहीं करती। शर्म  आती थी अपनी रचनाओं के बारे में कुछ कहते हुए। यह संकोच आज भी बना हुआ है। अपूर्व ने कहा तुम्हें भी अपनी कविता का पाठ करना चाहिए। मैं धबरायी। उसने मेरा साहस बढ़ाया। अपनी तरह जीने और अपनी तरह कविताएं लिखने की जिद में मैंने काफी चोटें खाई है, अपमान सहा। पर मैं जानती थी कि मेरा फैसला मेरे पाठक करेंगे। हाॅल खचाखच भरा था। मैंने अपनी कविता पढ़ी। लोग खामोश  थे। अचानक तालियों की गड़गड़ाहट से महसूस हुआ कि कविता मेरी पीठ घीमें-धीमें थपथपा रही है। मेरी आंखों में खुशी  के आंसू थे। इस आयोजन का ये असर हुआ कि सरकार को अपना कार्यक्रम बंद करना पड़ा। नवंबर की गुलाबी ठंड भी हम कलाकारों का हौसला पस्त नहीं कर पायी। आंदोलन अपने चरम पर था।  1987 में केन्द्रीय संगीत अकादमी ने बिहार में राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव का आयोजन किया। जिसमें देश  के सभी वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी शामिल थे। ब. व कारंत, रतन थियेम,प्रतिभा अग्रवाल, बंगाल के बड़े अभिनेता कुमार राय और नेमीचन्द्र जैन आयोजन में शामिल थे। जिस दिन कार्यक्रम की शुरुआत थी हमलोगों ने एक बड़े कैनवास पर कारंत के बयान को लिखा-‘मुझे शर्म आती है कि मैं एक ऐसे देश  में रहता हूं,  जहां रंगशाला में सीआरपीएफ का कब्जा है’। यह बैनर लिए हुए हमसब हाॅल के अंदर गए और मंच पर कब्जा जमा लिया। शायद संस्कृति के इतिहास में यह पहली परिधटना होगी कि जब सरकारी आयोजन में शामिल होने आए सभी बड़े कलाकारों ने आंदोलन के पक्ष में अपनी आवाज दी। टाइम्स आॅफ इंडि़या ने इस खबर को फस्ट लीड़ बनाया और लिखा-‘ए टाईम टू प्रेाटेस्ट’।

आंदोलन ने गति पकड़ ली थी। आंदोलन करते हुए लगभग  एक साल गुजर गए थे। यह हमारा आखरी दांव था। हमसब ने तय किया कि प्रेमचंद जयंती  के मौके पर रंगशाला के मसले पर प्रदर्शन होगा । बिहार के सभी प्रमुख साहित्यकारों से अपील की गयी। डा0 ऐ.के सेन ने झंडी दिखाकर हमारे जुलूस को रवाना किया। नागार्जुन जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे। सैकड़ों नौजवानों ने लाल, पीली और सफेद झंडिया लहराई। बड़े बडे कैनवास पर यह लिखा हुआ था कि प्रेमचंद रंगशाला मुक्त करो। जिन शायरों और अदीबों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लिखा था , उनके लिखे शब्द  जुलूस में झिलमिला रहे थे। जुलूस शान्ति  से आगे बढ़ रहा था। आगे-आगे बाबा नागार्जुन,कविवर कन्हैया जी चल रहे थे। पुलिस ने चारों ओर से हमें घेर लिया। हम बढ़ते जा रहे थे। हमसब ने कहा कि आज प्रेमचंद रंगशाला को खाली कराये बगेर साथी पीछे नहीं हटेंगे। आर.ब्लाॅक चैराहे पर जुलूस रोक दिया गया। कन्हैया जी,बाबा नागार्जुन समेत सभी वरिष्ठ रंगकर्मी और साहित्यकार जमीन पर बैठ गए। सिर के उपर आसमान दहक रहा था। पुलिस का एक बड़ा जत्था  सामने आया। उसने चेतावनी  दीे, ‘ आपसब ये जगह खाली कर दें। नहीं तो हमें मजबूर होना होगा।’  हमलोग डटे रहे। सबने एक दूसरे का हाथ थामा। और हम आगे बढ़ने लगे। अचानक पुलिस की लाठियां बससने लगी। लोग डटे रहे। कन्हैया जी  के सिर पर लाठी पड़ी खून की धार बह गयी। पुलिस ने सबको खदेड-खदेड कर पीटा। हम खड़े रहे। एक दूसरे की बांह को कस कर थामें हुए। हमारी आवाज गीली थी,होठों पर लब्ज सूखे नहीं थे। हमलोगों ने चीखकर कहा-  संस्कृतिकर्मियों पर फैाजदारियां करने वालों और गोलियों चलाने वालों से कह दो कि दुनिया में वह गोली कहीं नहीं बनी है,  जो सच को लगे। शाम  हो गयी थी। कन्हैया जी को काफी चोट आयी थी। लहू उनके कंधों तक बहकर सूख चुका था। बाबा को भी गहरी चोट लगी थी। कई साथी बुरी तरह घायल हुए। हमसब घर की ओर निकले। कुछ दिनों बाद अखबारमें बड़ी सी खबर छपी प्रेमचंद रंगशाला सीआरपीएफ से मुक्त हुआ। जारी……

महिलाओं के खिलाफ हिंसा सिर्फ यौन हिंसा तक सीमित नहीं है : एनी राजा

( नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इन्डियन वीमेन  ११ -१२ -१३ सितम्बर को अपनी स्थापना का ६०वां वर्ष मना रहा है . इसकी राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा से स्त्रीकाल के लिए बातचीत की पत्रिका के सम्पादक द्वय संजीव चन्दन और धर्मवीर सिंह ने . प्रस्तुति और ध्वन्यांकन : रजनीश कुमार आंबेडकर )


महिला आरक्षण बिल नई सरकार के पहले लम्बे सत्र में भी लोकसभा में पेश नहीं हुआ, बल्कि एजेन्डॆ में था ही नहीं, 20 बिल एजेंडे में थे. आप इसको कैसे देखती है. जबकि कांग्रेस के शासन में बी जे पी ने पूर्ण समर्थन दिया था और आज यह तो पूर्ण बहुमत में है. राज्य सभा में यह बिल पास हो चुका है. और लोक सभा में किया जा सकता था यदि इरादा होता तो.





वर्तमान समय में महिलाओं के समक्ष कई तरह की चुनौतियां है और सरकार की नीति उस चुनौती को एड्रेस करना है भी नहीं.  16 दिसम्बर के बाद साईलेंटली ऐसा प्रयास हो रहा है कि महिला हिंसा को सिर्फ यौन-हिंसा तक सीमित मान लिया जाए . महिलाओं के खिलाफ हिंसा  की अगर बात करेगें तो सिर्फ यौन-हिंसा  , ही नहीं सांस्थानिक हिंसा , स्ट्रक्चरल हिंसा, घरेलू हिंसा ,  साइलेंट हिंसा ,लाउड हिंसा , आदि कई प्रकार की हिंसा की बात होनी चाहिए. तक भारतीय संविधान ने हर नागरिक को जो हक़ दिया है. वह हक़  हर एक महिला के लिए जब तक सुनिश्चित नहीं होगा , तब तक महिलाओं के खिलाफ हिंसा होती रहेगी . जब तक यह समझदारी राजनीतिक पार्टियों को , खासकर  सत्ता में जो भी राजनीतिक पार्टी है,  उसको नहीं होगा तब तक महिलाओं के प्रति यौन-हिंसा  बढ़ती जाएगी. एक तरफ पुरूष प्रधान समाज है और दूसरी तरफ  नई आर्थिक नीति है, जिसका का मूल मंत्र है कि ‘मनी-मनी-मनी’.  ‘मनी’ के लिए किसी को भी आप एक वस्तु की तरह प्रयोग करना चाहते है. सबसे आसान है, बिना किसी निवेश के महिला को एक वस्तु के रूप में प्रयोग करना , जिससे अच्छी प्रॉफिट मिलती है . इसलिए ट्रैफिकिंग का रिश्ता सिर्फ सेक्स से नहीं है ‘लेबर’ से भी है. बहुत सारी चीजों के लिए है. महिला के खिलाफ हिंसा बंद तो नहीं ही हुई है, उसका नेचर भी बदल गया है . अब उसकी आक्रमकता बढ़ी है . अब सिर्फ बलात्कार ही नहीं होता , पीडिता को मार भी देते हैं .

यह  तो इविडेंस खत्म करने का मामला है. यह  पितृसत्ता का एक रूप है.  अभी जो  नई सरकार बनी है , उसकी महिलाओं के पक्ष में राजनीतिक इच्छा शक्ति के बारे में बताइए.. 


राजनीतिक इच्छा शक्ति की ही बात कर रही हूँ . बहुत ही मजबूती के साथ पैट्रीयार्की और न्यू लिबरल इकॉनोमी  (नव उदारवादी आर्थिक नीति),  दोनों ही महिला के ऊपर हिंसा कर रहे है. महिला के संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है. जब से नई सरकार आयी है तब से देश के अन्दर एक नया कम्यूनल वातावरण पैदा हो गया. किसी भी  भी वायलेंस में खासकर कम्यूनल वायलेंस  में महिला सबसे ज्यादा पीड़ित होती है. पिछले कुछ सालों के अन्दर हम देख रहे है कि महिला के शरीर को तो  एक हथियार के रूप में प्रयोग कर रहे ही रहे हैं महिलाओं  को फ़ोर्स भी कर रहे है. महिला के खिलाफ  हिंसा में शामिल होने के लिए. पहले सिर्फ पुरुष  शामिल होते थे. अभी हमने यह  देखा है  चाहे वह  मध्यप्रदेश हो या उड़ीसा हो या फिर गुजरात ,हम देख रहे है कि महिला को फ़ोर्स किया जा रहा है. महिला के खिलाफ  हिंसा में शामिल होने के लिए.  नई सरकार मनुवाद को लेकर चलने वाली सरकार है. वह मानती है कि महिला को एक सीमित दायरे  में रखना है, उनकी स्वतंत्रता एक सीमा तक हो , उससे आगे नहीं जाना है. इसलिए हर सरकार, हर पार्टी महिला की ड्रेस पर फोकस कर रही है . सोचने वाली बात  यह है कि महिला सुरक्षा के नाम के पर महिला के लिए अलग पार्क बना रहे है. महिला के लिए अलग बस सुविधा दे रहे हैं . ये सारे प्रयास महिलाओं  को पीछे हटाने का काम कर रहे है. ऐसी सोच रखने वाली सरकार केंद्र में है, जिससे महिलाओं के लिए चुनौती बढ़ना स्वाभाविक है.

सीधा सवाल है कि आरक्षण को लेकर बी.जे.पी. की एक पालिसी रही है, उसने राज्यसभा में बिल को पास होने दिया/ या समर्थन किया. लोकसभा में भी पालिसी वाइज ये कहते रहे है, वीमेन रिजर्वेशन के पक्ष में स्टैंड लेते रहे हैं,  फिर यहां कहां समस्या आ रही है.


हमारे  संविधान संशोधन  के लिए क्या होना चाहिए?  दो तिहाई बहुमत . यह बहुमत बहुत दिनों से है. मगर महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका. कांग्रेस की सरकार बार-बार बोल रही थी सर्व सहमति चाहिए. संविधान के अनुसार दो तिहाई बहुमत की बातो को सर्व सहमति में बदल देना संविधान के उल्लंघन की बात हो गई .  अभी की सरकार यह बोल रही है किसी की जरुरत नहीं है, पूर्ण बहुमत में सरकार है, तो फिर  हमने  उनको यह बोला सबसे पहले  महिला रिजर्वेशन बिल पारित होना चाहिए. हम डेलिगेशन लेकर गए सुमित्रा महाजन के पास, एन एफ आई डवल्यु की तरफ से डेलिगेशन लेकर गए थे.  वह भी महिला के खिलाफ यौन हिंसा पर ज्यादा बात कर रही थी . हमने कहा कि महिलाओं पर दूसरी अन्य प्रकार की गंभीर हिंसा भी हैं. सबसे निपटने के लिए एक बड़ा कदम होगा महिला आरक्षण बिल . वह बोलती रही , हम देखते हैं . जब विपक्ष में थी तो सुषमा स्वराज भी इस पर गंभीर थी . अभी बोल रहे थे कि सेशन को बढ़ाने के लिए भी वे  तैयार हैं   आबादी की लगभग 50% महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण में बी.जे.पी.यदि वास्तविक विश्वास रखती है तो प्रथम बिल होना महिला आरक्षण बिल होना चाहिए था. लेकिन मुद्दा क्या  है ? मुद्दा यह है कि दोनो ही , बी जे पी , पितृसत्ता  और मनुवाद को बहुत मजबूत करने वाली पार्टी है. इनके  लिए महिला को  कुर्सी देना कोइ प्राथमिकता नहीं है . यह  सरकार तो बिल्कुल नहीं चाहती है.

जो दिखता है, उसके अनुसार  मुलायम या लालू की पार्टी महिला आरक्षण का विरोध करती रही हैं . लेकिन उनका जो मुद्दा है उससे हम सहमत हैं.  रिजेर्वेशन बिल को लेकर अब मजेदार बात यह है इस बार के चुनाव में प्रतिशत के आधार पर यदि देखें तो त्रिणमूल कांग्रेस के बाद दूसरे नम्बर पर समाजवादी पार्टी ने महिलाओं को रखा. पार्टी के स्तर पर आपकी पार्टी की तरफ से यह  होना चाहिए था. आपकी पार्टी की तरफ से भी ऐसा नहीं हुआ ! 


पार्टी की तरफ से होना चाहिए था ,इसमें कोई दो राय नहीं है. ऐसा होता तो अभी 50% महिला संसद के अन्दर होती. मगर यह  देश एक पुरूष प्रधान समाज है. इसमें हर एक पार्टी इसके  प्रभाव में है, वामपंथी पार्टियां भी हैं . इसमें कोई दो राय नहीं है. उसमें सिर्फ डिग्री में थोड़ा फर्क होगा. वामपंथी पार्टियां  हमेशा हम महिलाओं  की सशक्तिकरण के साथ हैं , महिला की आर्थिक सशक्तिकरण के साथ है. जब भी मौका मिलाता है ये लोग महिला के साथ खड़ी होती है. मगर अपने आप एक पहल कदमी करके महिला के साथ नहीं खड़ी होतीं . वामपंथी पार्टियों  के अन्दर भी लीडरशिप पुरूषों के हाथ में है. ये पार्टियां भी  पुरूष प्रधान सोच से मुक्त नहीं हैं . इसलिए चुनाव के समय सीटें  देते समय महिला सक्षम है कि नहीं यह  देखा जाता है. मगर जब पुरूष को सीट देते हैं , उस समय ऐसी कोई प्राथमिकता नहीं है. तो ऐसा है कि पार्टियां ,  वामपंथी पार्टियां भी ,यदि महिलाओं पर विश्वास रखतीं  तो आज संसद के अन्दर बहुत ज्यादा महिलाएं होती. मगर ऐसा नहीं हुआ.  पहले हमारा  संगठन ‘भारतीय महिला फेडरेशन ’ महिला आरक्षण के पक्ष में नहीं था. हम भी यही सोच रही थी कि आजादी मिली देश को अभी शिक्षा मिलेगी देश को एक समान शिक्षा मिलेगी. जिसमें महिलाएं भी आगे आ सकेंगी . इसलिए हमारी मगर  1975 में  ‘ टुवर्ड्स द इक्वालिटी रिपोर्ट’  , फुलरेणु गुहा की रिपोर्ट, ने हमारी आंखे खोली.

यह रिपोर्ट तो वीणा मजुमदार की थी न ?

बीना मजुमदार ने रिपोर्ट लिखा फूलरेणु गुहा की अध्यक्षता में  कमिटी गठित हुई थी. NFIW, AIWC और महिला कांग्रेस, तीनों संगठनों ने मिलकर सर्वे किया था.

आप लोग आरक्षण बिल में आरक्षण के भीतर आरक्षण से सहमत क्यों नहीं हैं ? 


हम इसके खिलाफ नहीं हैं  यदि संसद इसको लेकर आए तो हम लोग कौन होते हैं, जो इसका विरोध करें. पहले हमारा ऐसा सोचना था सबसे पहले महिला आरक्षण बिल आए, इसके बाद तो अपने आप भी ये महिलाएं इसमें शामिल हो जायेंगी . फिर हमारे ऊपर आरोप आने लगा कि इन महिला संगठनों की वजह से महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो रहा है क्योंकि आरक्षण के भीतर आरक्षण से हम ये सहमत नहीं हो रही हैं . फिर हमने एन एफ आई डवल्यु की ओर से एक मीटिंग बुलाई. इस मीटिंग में एन एफ आई डवल्यु ने साफ़ स्टैंड लिया कि हम इसके खिलाफ नहीं है यदि संसद उसी प्रकार का एक बिल लेकर आती है तो हम उसके साथ हैं . लिखित में यह बात सरकार को बताया और लिखित में यह बात सभी पार्टियों को भी बताया.

यह कहना कि संसद लेकर आती है तब हम सहयोग करेगें कि जगह यह कहा गया होता कि आरक्षण के भीतर आरक्षण ही हमारी मांग है, तो क्या बेहतर नहीं होता ? 


हमारी बेसिक मांग महिला आरक्षण ही है . आरक्षण में तो एस सी एस टी स्वतः आ जायेंगे, लेकिन ओ बी सी और धार्मिक मायनारिटी नहीं आ पायेंगे , संविधान में इसका प्रावधान नहीं है.  सबसे पहले संविधान संशोधन होना चाहिए इन्हें चुनाव में आरक्षण देने के लिए. हमारा कहना है कि पहले संविधान संशोधन बिल संसद में पेश होना चाहिए.   इसलिए हमारा कहना है कि पहले उसको लाना चाहिए.हमने सभी राजनीतिक पार्टियों से कहा कि पहले संविधान संशोधन बिल लाओ हम आरक्षण के भीतर आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं . बिल का पास न होना राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी और सामाजिक प्रतिबद्धता की कमी को बताता है .

आप  मैरिटल रेप को लेकर भी शायद कोई  कदम उठाना चाह रही थीं ? 


मैं चाहती हूँ कि मैरिटल रेप को लेकर क्रिमिनल एक्ट बने ,उसका दंड निर्धारित हो .

दिक्कत है कि बाल विवाह स्वीकार नहीं है उसके लिए 18 साल होना चाहिए. लेकिन अगर किसी की शादी हो गई और वह 16 साल से नीचे भी है,  तो उसके साथ यौन संबंध को बलात्कार नहीं माना जाता है . 


यही तो  एक कानून दूसरे कानून के काफी विपरीत हैं .  चाइल्ड की परिभाषा क्या है, लेबर के लिए 14 साल, शादी के लिए 18 साल और फांसी के लिए 16 साल होने वाला  है. सबसे पहले चाइल्ड की उम्र क्या है उसको अभी तक परिभाषित नहीं किया गया है.

उस दिशा आप में आप लोगों ने सरकार से बात की है क्या ? 


इस दिशा में अभी इस सरकार से हमने कुछ बात नहीं की है .

पिछली सरकार से आपने बात की थी ? 


हाँ , लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. मैं यह देख रही हूँ कि अभी भारत की महिला एक  वार लाइक सिचुएशन से गुजर रही है. यहाँ तक कि न्यायपालिका बार-बार  कहती है कि मैरिटल रेप अपराध नहीं है , अगले सप्ताह वह बोलती है  कि पति-पत्नी अकेले रह सकते हैं . लेकिन पत्नी ने अगर बच्चे का नामकरण किया और उस समय पति को नहीं सूचित किया क्योंकि दोनों अलग रह रहे है तो पति के केस पर वही कोर्ट बोल रहा है  कि इस केश में पति को न बुलाना बहुत बड़ा गुनाह है. पत्नी को बोला जा रहा है कि नामकरण में पति को नहीं बुलाया इसलिए उसको मानसिक क्षति पहुंची है. तो बहुत बड़ा गुनाह किया है. वही मैरिटल रेप उसे गुनाह नहीं लगता . न्यायपालिका भी महिला विरोधी है .

आपका संगठन  महिलाओं के राजनीतिकरण के लिए क्या कर रहा है ?  


जितनी हमारे  संगठन की क्षमता है, उतना हम प्रयास कर रहे है. इसलिए हमने 11,12,13 सितम्बर 2014 को राष्ट्रीय सम्मलेन बुलाया है.नए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के अन्दर हमारे  संगठन का रोल कैसा हो , हम इस पर  बात कर रहे हैं ?

आम तौर पर देखा जा रहा है कि राजनीतिकरण के अभाव में महिलायें यह नहीं समझ पा रही हैं कि उनका हित कहाँ है . बी.जे.पी. की सभाओं में मोदी को सुनने के लिए  महिलाएं पहुंच रही हैं…. 


मुझे नहीं लगता कि मोदी की सभाओं में अपने आप लोग पहुँच रहे हैं . उस भीड़ को देखकर हमारे संगठन पर आप सवाल नहीं कर सकते

मेरा खुद का शोध रहा महिलाओं के वोट बैंक को लेकर, मैंने कई जगह यह भी देखा कि मोदी फैक्टर कोइ फैक्टर नहीं था . यह सही है. लेकिन जब आप कोई मास स्तर पर आयोजन करें तो आप के साथ क्यों नहीं जुड़ पाती है ! 


इस सन्दर्भ में थोड़ी गहराई से देखा जाना चाहिए . देश में बढ़ती हुई मंहगाई से जनता बहुत परेशान है. कहीं स्वास्थय सेवाओं तक पहुँच नहीं है तो कोई शिक्षा नहीं दिला पा रहा है, तो कहीं रोजगार की  दिक्कत है. परिवार एक बहुत संकट के दौर से गुजर रहा है. इसको एड्रेस करने का काम पिछले 10 सालों से सरकार ने किया नहीं है. एन आर जी ए ( नरेगा ) लेकर आई जरूर  लेकिन ठीक से चला नहीं पाई . कम से कम इसको ठीक से चलाये तो बहुत कुछ ठीक हो सकता था . बाजार में काम नहीं, खाने के लिए पैसा नहीं है, लोग बहुत संकट के दौर से गुजर रहे है. परिवार संकट में है . जब मैं खुद संकट से गुजर रही हूँ और  मुझे आके कोई बोले,  हर वक्त टी.वी. में दिखा के बोले कि हमने बहुत सहा है अब बदलाव जरूरी है , तो असर पड़ता है. इधर क्या हो गया वामपंथी पार्टियों  ने एक राष्ट्रीय कन्वेंशन किया. उसमे पारित  प्रस्ताव को कूड़ेदान में डाल के वामपंथी पार्टियों ने बड़ी गलती की. उन्होंने जनता को कोइ भरोसा नहीं दिलाया . कोइ विकल्प सामने नहीं रखा . सरकार किसके साथ बनायेंगे यह भी विकल्प नहीं दिया. इसलिए वामपंथी पार्टियां फेल हो गयीं . कांग्रेस चुनाव से पहले ही भाग गई. फिर जनता को ये पूरा विश्वास हो गया कि ये लोग तो जितने वाले नहीं. इसलिए  वामपंथी पार्टीयां और लोकतांत्रिक पार्टियां असफल हो गयीं . हमारा  संगठन सीधे चुनाव में शामिल नहीं होता  है. हम  मुद्दे  उठाते हैं  राशन का मुद्दा, काम का मुद्दा, समानता का मुद्दा , हम संघर्ष करते हैं  मगर हम सीधे तौर  पर चुनाव में नहीं जाते है.

एक आम महिला की क्या समस्या है ?  हेल्थ है,  बच्चों की शिक्षा है, रोटी कपड़ा मकान है . आप लोग ट्रेड यूनियन की तरह  काम तो कर लेती हैं , आंगनवाडी की महिला को एड्रेस कर लेती है, लेकिन आंगनवाडी की महिलाएं जिनके लिए काम करती है उनको आप एड्रेस नहीं कर पाती हैं . मेरा सिर्फ इतना  कहना है कि रोज-रोज  की जिन समस्याओं से जो महिलाएं जूझ रही है. उनको नहीं एड्रेस करने के कारण  आप उनका  राजनीतिकरण नहीं कर पा रही हैं . 


NIFW एड्रेस कर रहा  है, लेकिन उन तक ये बात पहुंच नहीं पा रही है. गाँव की महिला को  एक मुत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए पंचायत में 10 बार जाना पड़ता है. उसको क्यों जाना पड़ रहा है ?  पंचायतमें ये  मुद्दे  हम लोग उठा रहे है. इधर एन जी ओ ने भी काफी नुकसां किया है . एन जी ओ का भी अराजनीतिकरण करने में बहुत बड़ा हाथ रहता है. बहुत सारे एन जी ओ हैं , उनको ले जाके 100 रुपये हाथ में देंगी . हमारे साथ 100 रूपये खर्च करके आना पड़ेगा.  एन जी ओ में जाने पर 100 रूपये उनको मिलेगा.  उन्हें पता है कि राजनीतिक संगठन उनके लिए काम कर रहे हैं . लेकिन यह भी नहीं हो सकता कि भूख से रोते हुए बच्चों को छोड़कर वे हमारे बुलाने पर आ
जाएँ .

आगे आने 5 सालों में आप क्या मुद्दें तय कर रही है?


इस देश की आम महिला के जो मुद्दें हैं, हम  उनको उठाते आ रहे है. महिला के स्वास्थ्य का एजेंडा है, महंगाई का मुद्दा है, फ़ूड सिक्यूरिटी एक्ट को लेकर काम कर रहे है. रोजगार गारंटी को लेकर, भ्रष्टाचार को लेकर, RTI के  सेक्शन 4 का ,जो सबसे बड़ा हथियार है, उसको कैसे ज्यादा प्रयोग करके निचले स्तर पर जो भ्रष्टाचार को ख़त्म किया जाए , इसके लिए हम काम कर रहे हैं.

आरक्षण को लेकर अगले संसद सत्र तक क्या योजना है ..  

संसद के अन्दर बैठने वाला खुद बोल दे कि मैं रेप करूंगा विपक्ष की महिला का तो स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है . हमलोग फिर भी इस विपरीत परिस्थिति में महिला आरक्षण के लिए दवाब बानाएंगे कि अगले सत्र में इसे जरुर लाना है.

लित महिलाओं के साथ  यौन-हिंसा में  जाति भी शामिल है कोई भी पार्टी इसे एड्रेस नहीं करती , वामपंथी पार्टियां  भी.  अभी भी वे क्लास तक सीमित हैं . अभी भगाणा कांड के लोग बैठे थे.


भगाणा कांड के खिलाफ  जो लोग बैठे हैं ,  उनके साथ हम ज्यादा सक्रिय तो नहीं हो पाए लेकिन उनके  मुद्दे  को जरुर उठाया है. चाहे वो महिला आयोग के स्टार पर हो या अनुसूचित जाति –जनजाती आयोग के स्तर पर. क्योंकि यह  सिर्फ एक रेप का मामला नहीं है. बलात्कार  तो इसलिए हो गया क्योंकि दलितों को  उधर से भगाना है. उसमें  भूमि का भी मामला है. जिन दलितों  के हाथ में भूमि है,  वे  पढ़ रहे हैं , आगे आ रहे है. यह उच्च जाति के लोगों को अच्छा नहीं लगा. निस्संदेह यह ‘जाति-हमला’ था.

संगठन के स्तर पर आपके यहां दलित महिलाएं है ! 
क्यों नहीं हमारे  संगठन में हर  ग्रुप की महिलाएं है. सिर्फ दलित  ही नहीं, मैं भी हूँ .

आप तो दलित नहीं कहलाएंगी ! 
मेरे  दोस्त दलित हैं . मैं क्रिश्चन हूँ.  ऐसा नहीं है कि मैंने जन्म से दलित नहीं हूँ तो मुझे कुछ पता नहीं है.

पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर महिला राजनीतिज्ञों की एक एकता बनी , अब लगता है टूट जाएगी. 


आरक्षण के मुद्दे को लेकर अभी भी एक जुट है.

लेकिन परिणाम कहां है ?


देखो एक दिन में ये परिणाम नहीं आयेगें. आजादी एक दिन में लड़कर मिलने वाली नहीं थी. ड्रेस कोड का जब मामला उठा तो सभी पार्टियों की महिलायें एक साथ आ गयीं . पितृसत्ता को चुनौती देना इतना आसान नहीं है. नहीं तो महिला आरक्षण बिल कब के  पास नहीं हो गया होता !  इस देश की पैट्रीयार्की इतना आसानी से कुर्सी नहीं देना चाहती है. हमारे देश में पूंजीवाद एक बहुत ही आधुनिक रूप में पहुंच गया है  मगर रूढ़िवादिता आज भी आधुनिकता के साथ बहुत मजबूती के साथ बढ़ रही है . लड़ना इतना आसान नहीं है , हम भी अब और अनुभव ले रहे हैं . हम 11 सितम्बर को ‘यंग वीमेन डे’  मना रहे हैं .  उसमे हमारी प्राथमिकता दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्ग की युवा महिला रहेगी.

स्त्री – संस्कृति का हरकारा : यू आर अनंतमूर्ती

प्रो.परिमळा अंबेकर

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो रहे लेखन का हिन्दी अनुवाद भी करती हैं . संपर्क:09480226677

( यूआरअनंतमूर्तीको याद करती प्रोफ. परिमला अम्बेकर )

उडुपी.राजगोपालाचार्य अनंमूर्ति का रचना संसार अपने आप में जीवन की
हर संभवित और संभावी सीमाओं को पहचानकर उन सीमाओं को तोडने की सृजनात्मक
प्रक्रिया का विराट स्वरूप है , उनके द्वारा प्रतिपादित वैचारिक कहन, हर
व्यक्ति के घर की अगली और पिछली दालानी व्यवस्था के साथ , बाहरी व्यवस्था
को समीकृत करने के टूकों को बताते हैं , और उनके द्वारा दिये गये अपने ही
तरीके के तर्क, विमर्शात्मक कथन, विवाद संवाद की अंगीठी की आग को फूॅंक
देकर हर जमीनी संवेदना को और हर प्रगतिशील सोच को जीवंत रखते हैं। देशीय
संवेदना और प्रादेशिक संस्कृति की महेक से स्पंदित यू आर अनंतमूर्ति का
रचना संसार बडी गंभीरता से राष्ट्रीय समकालीन और सार्वकालिक वास्तविकताओं
की ओर और जीवन के शाश्वत मूल्यों की ओर एक साथ, अपने मानवीयता के हाथ बढाता
है । विरोध विभाजन और विषमताओं के मध्य समन्वय, समीकरण और सामंजस्यता के
जीवन मूल्यों को खोज निकालने की पनडुब्बे की माहिरता  एवं प्रतिबद्धता
अनंतमूर्ति को हासिल थी । वर्ण ,जाति धर्म और भाषायी व्यवस्था के मूल में
निहित भारतीय मानसिकता को पहचानकर, अनुभव और चिंतन के बलबूते, मानवाधारित
मान्यताओं के तर्क प्रस्तुत करने  का तर्ज हमें , अनंतमूर्ति के जीवन और
साहित्यिक व्यक्तित्व में सहजता से मिलता है ।

कन्नड साहित्य लोक में, ये दो उपमाये अधिक प्रचलित है
एक, सनातनी  व्यवस्था के लिए अश्वथ् वृक्ष के प्रतीक का और दूसरा, जमीनी
संस्कृती की संवेदना को अपने व्यक्तित्व में रचायेबसाये , आध्यात्मिक चेतना
की ऊर्ध्वमुखी  विकास की व्यक्ति प्रज्ञा के लिए श्रवणबेलगोळ के
गोम्मटेश्वर की मूर्ति की प्रतिमा का सार्थक प्रयोग मिलता है ।  यू आर ए का
व्यक्तित्व इन उभय प्रतीकों के तात्पर्य को अपनी आंतरिक चेतना में बसाकर,
मानवीय समुदाय के विकास के लिए प्रस्तुत रहा एक कथात्मक प्रयोग लगता है ।
इसीलिए तो मूर्ति बडी सहजता से मातृ संवेदना को अपनी चेतना का हिस्सा बना
सके और मातृ संस्कृति को अपनी सोच का आधार भी। जितनी गंभीरता से यूआरए
परंपरा एवं आधुनिक प्रज्ञा पर अपनी लेखनी चलाते थे उतनी ही सहजता से वे
देशीय परिसर की संवेदना को अपनी कहानियों में चरित्र के रूप में गढते थे ।
ज्ञानपीठ पुरस्कार के अपने अधिवकतव्य में जितनी जागरूकता से भूमंडलीकरण और
आधुनिकता की होड में देसी संस्कृति और भाषायी अस्तित्व के प्रश्नों से
जूझते दिखायी देते हैं उतनी ही सहजता से वे भारतीय समाज के देसीय परिसर के
संरक्षण की और मातृ संस्कृति के पोषण के  सामाजिक दायित्व की भी चर्चा करते
थे ।

यू आर अनंतमूर्ती

मातृ संवेदना का एक और आयाम है आपसी साझेदारी की
, आपसी मेलमिलाप की । आधुनिक विकास, मेट्रो कल्चर की बेरोक दौड के चलते ,
मिटते जा रहे सामाजिक आपेदारी और आपसी मेलमिलाप के संदर्भ में प्रतिक्रिया
करते मंगलूर के किसी कार्यक्रम  में उन्होने कहा था, ‘‘ हमें फिर से जुओं
की संस्कृति को गले लगाने की जरूरत है । आज हम समाज के हर वर्ग और क्षेत्र
से इस संस्कृति  को मिटता हुआ देख रहे हैं । सिर के बालो में पलने वाले
जुएॅं सामान्य नही होते। वे हमारे समाज के बडे गंभीर सामाजिक अंर्तजालिक
व्यवस्था
(Social Networking System)
के हिस्से हैं । ‘ अनंतमूर्ति  का मानना था कि, पहले, घर का सारा कामकाज
खत्म करके मुहल्ले की सारी औरतें घर के आंगन में बैठ जाती थी । बोलती थी ,
सारे जहाॅं की बातें आपस में बाॅंटती थी साथ ही साथ अपने बच्चों के बालों
में पडे जुएॅं भी बीनती थी, मारती थी । इसीलिए जुएॅं की संस्कृति दुनिया
जहान  को जोडता है, आपसी साझेदारी की भावना को बढावा देता है और तो और आपसी
बहनापे की , आपसी नोक- झोक की , आपसी सामाजिक सहयोग की मातृ संस्कृति की
ऊष्मा  को भी बचाये रखता है ।

सनातन, संप्रदाय, आध्यात्मिकता , जीवनदर्शन के  गंभीर चिंतन
और वाद विवाद में डूबी हुई  प्रबुद्ध चिंतक और साहित्यकार की लेखनी और
सोच, अपने समाज में प्रचलित सहज देसीय आचार व्यवहार को , आचरण संवेदना को
भी उतनी ही गंभीरता से परिगणित करते हुए , अतीव आधुनिकीकरणता के टक्कर में
देसीय एवं अंचलीय अस्तित्व को बचाने की ,उसे फिर से अपनाने की माॅंग रखती
है , यह निस्संदेह अतीव सहज है प्रामाणिक है, अनुभव जन्य है । जैसे कबीर की
विरहिणी , परमात्मा के प्रति के अपने हृदयस्थ प्रेम को, आध्यात्मिक दर्शन
को यूॅं इतनी सहजता से, जमीनी अहसास के साथ बाॅंटती है – दुलहनी गावहुॅं
मंलचार।घरि आये हौं राजा राम भरतार ।’ मातृ या स्त्री संवेदना , की पहचान
जितनी सहजता से मध्ययुगीन भक्त कवि कर पायें हैं ,उतनी ही सरलता से यूआरए
कर सके हैं । सारे संबंधों से ऊपर उठकर, जिस तरह मातृ हृदय, अपने कोख के
जायों की, घर परिवार वालों की, सगे संबंधियों की अपने घेराव के सारे
सामाजिक अस्तित्व की अच्छाई और प्रगति चाहता है ठीक उसी तरह मूर्तिजी का
साहित्य और विचार, बहुभाषी और संस्कृति बहुल भारतीय समाज के विकास और
सौहार्दता के पक्ष में ठहरते दिखता है।

सम्मानित होते अनंत मूर्ती

सूरदास की गोपिकायें, अपने घर आंगन में उद्धव को घेरकर बैठती हैं,
उसके सामने अपना दुखडा रोती हैं, अपने प्रेम की असहायता की बातें करती
हैं, उद्धव को बातों में भरमाती हैं , व्यंग्य कसती हैं और अंत में अपने
सगुन प्रीति की सच्चाई का, सार्थकता का , अपने प्रेम की ब्रजीय अस्मिता का
ऐलान करती है, डंके के चोट पर अपने को कृष्ण की आराधिका होने की बात कहती
हैं, उनके गणित के अनुसार उनका सगुन कृष्ण, ईशपुर काशी के निरगुन रूपपर
हजार गुना भारी पडता है । मुझे लगता है , यू आर अनतमूर्ति भी सूर की गोपिका
की संवेदना रखते हैं । उनकी मानसिक संवेदना भी वैभव भरे मथुरा की तुलना
में प्रेमनेह भरे ब्रज की मिट्टी को चाहने वाली यशोदा और गोपियों की मानसिक
संवेदना के साथ टयूनिंग रखती हैं ।  ‘हे उद्धव हमतो नंदघोष के वासी ‘के
ऐलान में छिपी आंचलीय संवेदना की तीव्रता, स्थानीय अस्मिता का अहसास,
क्षेत्र एवं प्रदेश का नाभीनाल संबंध की चेतना हमे उडुपी.राजगोपालाचार्य
अनंमूर्ति की संवेदना और सोच के संसार में मुखरित मिलता है ।

भारतीय भाषा साहित्य में ऐसे अनेको अंग्रेजी/हिन्दी प्रोफेसरों के उदाहरण मिल जाएंगे,
जो अपने अध्ययन अध्यापन की भाषा और भाषा -संस्कृति को त्यागकर, रचनाकर्म
के लिए मातृभाषा की ओर अपनी मातृसंस्कृति की ओर मुडे  हैं । बी.एम.श्री की
ही तरह , उनके बाद, कन्नड के रोमांटिक युग के कवि ( कुवेंपु कुप्पळ्ळी
वेंकटप्प पुट्टपप)  की लेखनी ,Beginner’s Muse,
से निकल तो पडती है लेकिन वे बहुत जल्द ही मातृभाषा कन्नड का पांचजन्य
फॅूंकते हैं । अंगेजी में लिखना आरंभ करने वाले अनंतमूर्ति बडी ही
प्रज्ञापूर्वक मातृभाषा कन्नड में लिखना आरंभ करते हैं । भाषा समुदाय की
पहचान, भाषायी अस्मिता की संवेदना और भाषायी संस्कृति का अहेसास और अनुभव,
किसी भी गंभीर लेखक को अपनी जडों से दूर नहीं ले जा सकते । स्थानीय भाषा
एवं संस्कृति और वतनी संस्कारों की प्रामाणिकता अनंतमूर्ति को भी अधिक समय
तक अंग्रेजी भाषा संसार में ठहरने नहीं देती । उनका यह मानना था कि ‘‘मातृ
भाषा को त्यागकर अंग्रेजी में लिखना जैसे अपने बचपन को खोना है, अपनी बीती
दुनिया से जैसे दूर लेजाना है, अपने यार रिश्तेदारों को खोना है और तो और
अपने जडों को ही खोना है । ‘‘  भारतीपुर, संस्कार, घटश्राद्ध सुरगी, सूर्यन
कुदुरे आदि कथासृजन के परिश्रम की सफलता का श्रेय उनके अनेक विमर्शक और तो
और स्वयं अनंतमर्ति जी भी अपने इन्हीं जडों की पहेचान की दृष्टि को देते
हैं ।

मातृ संस्कृति हमेशा से मातृ भाषा का पोषक  रही है । आॅंचल
का आगोश, मातृत्वता और वात्सल्यता के संवहन के लिए सर्वदा से मातृ भाषा का
समर्थन करते आयी है ।  कारण अनंतमूर्तिजी सर्वदा से  मातृभाषा में शिक्षा
देने की वकालत करते रहे थे । उनका यह मानना था कि देश में श्रेष्ठ साहित्य
का सृजन केवल मातृ भाषा में शिक्षा प्रदान करने से  संभव है । कल्पना और
सपनो के पंखों का खिलना, सोच विचार की बुद्धिमत्ता की गहनता का रोपण केवल
मात्र मातृ भाषा के व्यवहार और अभ्यास से संभव है। प्रादेशिक भाषा साहित्य
की जडों को प्रादेशिक भाषाओं की संसकृति में पहेचानते हुए मूर्तिजी कहते थे
,‘‘ साहित्य को अल्पसंख्यक  और बहुसंख्यक  जैसे धार्मिक वर्गो में बाॅंटा
नहीं जा सकता। क्यूॅं कि साहित्यकार का परिचय तो उसकी प्रोदशिक भाषा और
संस्कृति के आधार को पाती है, धर्म का वह मोहताज नहीं।‘‘ एक और गंभीर अंश
की ओर अनंतमूर्ति संकेत करते रहे थे , ‘‘ जिस तरह पहले साहित्यकार का परिचय
अंतरपा्रंतीय होता था, बंगाली के टैगोर की और कन्नड के कारंत के साहित्य
की चर्चा दूसरे प्रांतों में भी होती थी, उस संस्कृती और सोच को हमें फिर
से दोहराना है ।
विचारगोष्ठियों में अपनी प्रांतीय साहित्य के साथ साथ
दूसरे भाषा और साहित्य को स्थान देना अधिक जरूरी है.’

मोदी आये तो उन्होंने देश का दुनिया ही छोड़ दी

सुरगी कर्नाटक के ब्राम्हण संप्रदायस्थ परिवारों में प्रचलन में रही प्रथा है ।
सुरगी, हर धार्मिक एवं उत्सविक आचरणों में संपन्न होने वाली विशिष्ठ मंगल
स्नान की विधि आचरण का नाम है। विवाह, उपनयन जैसे समारोह में वधू और वर को,
उपनयन के वटु को उनके अपने कुटुंब के सदस्यों के साथ बिठाकर, चहुॅं ओर
कलशों को धागे से बांधकर , सारी सुहागिनें मिलकर मंगल स्नान कराती है ।  यह
अपने आप में अद्भुत पवित्र प्रथा है जिसके साथ हर परिवार की अपनी अनिवार्य
सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतिबद्धताएॅं बंधी हुई  होती हैं। यह सचमुच
प्रतिकात्मक और संवेदनीय है कि यूआरए  ने अपनी आत्मककथा को सुरगी का नाम
दिया है ।  दिसंबर 21, 1932 में जिला शिवमोग्गा के तीर्थहळ्ळी के घने अरण्य
प्रदेश के मेळगे गाॅव से आरंभ हुआ उनका जीवन विभिन्न सामाजिक, राजकीय एवं
साहित्यिक लोक के घेराव की जिंदगी जीते जाता है । काल चक्र की अनंतता,
वर्तमान भूत और भविष्य के चिरंतन नित्य नूतन संबंध की कडियों को अपने
अद्भुत प्रामाणिक चिंतन और भावना की सूक्ष्मता से वे जोडते जाते हैं । हर
आधुनिक सोच और भाव के पीछे के विशाल और गहन परंपरा एवं संप्रदाय के कैनवास
को अपने साहित्य में उकेरते हैं और साथ ही परंपरा एवं संप्रदाय की अतीव
कट्टर प्रतिगामी आडंबरी आयाम की निष्क़्रियता  के जडों को प्रखर व्यंग्य और
खंडनात्मक रवैय्ये  का मठ्ठा देते हैं । स्थानीय मलेनाडू प्रदेश के
अजीबोगरीब जीवन संस्कृति, वहाॅं के जीवंत चरित्र और आंचलीय जीवन व्यवस्था
एवं मान्यताओं का विशाल सृष्टि रचते हैं । सुरगी के धागों के घेर में
परिवार और संप्रदाय के संस्कारों के बंधन से लेकर , बाह्य समाज और उसकी
व्यवस्था, समाज के अपने प्रतिबंधन, उसका अपना प्रामाणिक सांस्कृतिक जीवन और
हर जनांग और समुदाय वर्ग की अपनी धार्मिक प्रतिबद्धताओं के बंधन के धागे
भी जुडे हुये हैं । और इन सबसे बढकर धागों का एक अव्यक्त बाहरी घेराव भी
बंधा जुडा मिलता है , मानवीय जीवन बंधुत्वता का !! स्नेहमय विकासपूर्ण
संसार का !! यूआरए अपने लेखलोक में सुरगी के मंगन स्नान की पवित्रता और
श्रृजुता के माध्यम से जीवन के इन्हीं अंतरी और बाहरी प्रतिबद्धता के धेरों
के रूपक बांधते जाते हैं ।

आंतरिक संघर्षो में, भीतरी समाज- व्यवस्था के वर्ग-वर्णगत क्लेशों में,
विवादों के घेरों में सदा अपने आप को झोंकने वाले यूआरए ने  सर्वदा ही
बहुजन हिताय की सोची है । हर सोच और संवेदना के पक्ष और विपक्ष को एक साथ
परखकर विरोध के सारे संभावनाओं को प्रस्तुत करनेवाले सचेता वे रहे हैं ।
इसीलिए तो उन्होंने कहा हैं    ‘‘मैं जातिवादी ब्राह्मणों का समर्थन नहीं
कर सकता । उनके विरोधी रहे, लेकिन उनके ही जैसे ही रहे ब्राह्मणविरोधियों
का भी मैं समर्थन नहीं कर सकता । इसीलिए इन लोगों के आंतरिक कलहों में, मैं
कहाॅं अपने आप को खडा पाता हूॅं, इसका विवरण देने में ही मेरी सारी आंतरिक
शक्ति व्यय हो जाती है .’

मातृ संस्कृती का हरकारा, यू आर अनंतमूर्ति, अगस्त 22, 2014 के रोज ,
अपने जीवनरूपी सुरगी के आखरी मंगलस्नान को अग्निस्नान का रूपक प्रदान कर
गये । अनंत में लीन उस अनंत के प्रति, अनंत नमन प्रस्तुत है ……’लोचन
अनॅंत उघाडिया, अनॅंत दिखावणहार।’

सहायता सौजन्य:
1 विजय कर्नाटका , दैनिक, कन्नड पत्रिका .
2 डेक्कन हेराल्ड, दैनिक, अंग्रेजी पत्रिका .
3 कन्नड प्रभा, दैनिक, कन्नड पत्रिका .
4 विजय विहार, दैनिक, कन्नड पत्रिका .

वे लाइव पोर्न में प्रदर्शन के पूर्व ईश्वर को प्रणाम करती हैं !

स्वतंत्र मिश्र


स्वतंत्र मिश्र पेशे से पत्रकार हैं ,स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के सम्पादन मंडल के सदस्य भी हैं . इनसे उनके मोबाइल न 9953404777 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( स्वतंत्र मिश्र ने थाईलैंड की यात्रा के अपने बहुपठित यात्रा वृत्तांत का यह अंश स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए तैयार किया था . विशेषांकों के प्रकाशन के कारण हम इसे प्रकाशित नहीं कर पाए थे. स्त्रीकाल के ऑनलाइन पाठकों के लिए हम इसे यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं .)

थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर आदि कुछ ऐसे एशियाई देश हैं, जिन्हें ‘सेक्स टूरिज्म’ के रूप में प्रसिद्धि मिली या यूं कहें कि इनकी पहचान के तौर पर ये बातें चस्पां हो गई हैं। यही वजह है कि बिजनेस भास्कर में काम करने के दौरान मेरे संपादक यतीश के. रजावत ने आकर थाईलैंड जाने की पेशकश दी तो आॅफिस के ज्यादातर लोगों को लगा कि अब तो स्वतंत्र तो देह-स्नान (सेक्स) कर आएंगे। हमारे बीच ज्यादातर लोग धरती पर स्वर्ग का पाना कई-कई या रोज-रोज सेक्स मिलने को मानते हैं। आप ज्यादातर पत्र-पत्रिकाओं और उनके वेबसाइट को देखकर इस बात का अंदाजा ले सकते हैं। खैर, तीन-चार दिन की यात्रा में मैंने वहां की औरतों की जिंदगी को और वहां देह-व्यापार के बीच उनके भीतर दया,माया और करूणा को समझने की कोशिश की। इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट से उड़ान भरने के बाद बैंकाक और उसके बाद वहां से घरेलू वायु सेवा के जरिये फुकेट पहुंचा। फुकेट एयरपोर्ट पर टैंपो ट्रेवलर हमें अंडमान सागर की लहरों पर मौज कराने के लिए हमारा इंतजार करा रही थी। बहुत ज्यादा थके होने के बावजूद मैंने समुद्र के सीने पर खूब धमाचैकड़ी की। नमकीन पानी के छींटे आंखों में तेजाब की तरह जलन पैदा करते और अगर स्टीमर की तेज गति से उड़ने वाले पानी के छींटे मुंह के अंदर घुस जाते तो एकबार तो उल्टी करने का जैसा मन हो जाता था। पूरे दिन हम अलग-अलग पत्रकारिता संस्थान के पत्रकार मित्रों के साथ रिलायंस द्वारा प्रायोजित इस ट्रिप का लुत्फ उठाते रहे। ज्यादातर पत्रकार कई देशों का दौरा कर चुके थे। मेरे लिए हवाई जहाज और विदेश दौरे का यह पहला मौका था। दिनभर भर कुदरती नजारों का लुत्फ उठाने के बाद हमें एक पांच सितारा होटल ले जाया गया और यह तय हुआ कि दो घंटे बाद हम डिनर के लिए चलेंगे। एक भारतीय रेस्टोरेंट में स्वादिष्ट भोजन करने के बाद रिलायंस के अधिकारी शरद गोयल ने हमें सेक्सी शो जाने का आमंत्रण दिया। आज की तारीख में सेक्सी शब्द का इस्तेमाल बेटी अपने बाप को सुंदर या स्मार्ट बताने के लिए करती हैं, सो हमने इसे बहुत अनौपचारिक तौर पर लिया और पांच लड़कियों के साथ हम तीन लड़के जाने को तैयार हो गए। वहां हमें हमारी गाइड नाडिया के साथ भेजा गया। ढाई हजार बाट यानी तब भारतीय मुद्रा 4,000 रुपये के करीब का एक-एक टिकट लेकर हमें थमा दिया गया।

स्त्रीकाल पर स्वतंत्र मिश्र को पढ़ने के लिए क्लिक करें :

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम

किन्नर अब ‘ ‘थर्ड जेंडर’ की तरह पहचाने जाएंगे 

ज्यादा अश्लील हैं मर्दों के पहनावे : बुल टी शर्ट यानी अश्लील टी शर्ट !

थाईलैंड में देह व्यापार

सेक्सी नहीं, सेक्स शो था वह


हम अब जे. जे. क्लब के अंदर जाने की तैयारी करने लगे। मुझे लगा कि यहां डिस्को या ओपेरा जैसा कुछ चलता होगा। औरतें थीं इसलिए अंदर क्या होगा की कल्पना इससे ज्यादा करना मुनासिब भी नहीं था। हट्टे-कट्टे नौजवानों (बाउंसर) ने कैमरा और मोबाइल लाॅकर में रखवा लिया और हमें चाबी पकड़ा दी। अंदर घुसते ही औरतें अलग बैठ गईं और हम अलग। अंदर जो दृश्य दिखा, बस उलटे पैर भाग खड़े होने का मन हुआ। लेकिन बाउंसर की फड़कती भुजाएं और तने हुए चेहरे देख डर से एक कुर्सी से चिपक गया। मंच पर लड़कियां पूरी नंगी होकर मर्दों की हुकूमत को चुनौती देती हुई मुस्करा रही थीं। स्टेज पर पूरे लाइव पाॅर्न का बंदोबस्त था। लड़कियां अपने हाव-भाव से थियेटर में बैठे लोगों को उकसा रही थी। स्टेज के पीछे से एक नंग-धडंग छोटी उम्र का लड़का, छोटी कद-काठी, लेकिन सुडौल शरीर वाला पाॅर्न किंग की तरह दर्शकों के सामने पेश हुआ। उसने चुनौती देने वाली इन वस्तु किस्म की लड़कियों से चुनौती ली और यहां मौजूद लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि इनका भोग किस-किस तरीके से किया जा सकता है। वह लड़की से सेक्स करता है और उसकी कोशिश होती है कि लोगों को यह सब साफ-साफ दिखाई दे। वे अपने उपभोक्ता से वफादारी जो निभाना चाहते हैं। अब तक सड़कों पर या खुले में सेक्स करते तो कुत्ते, घोड़े, गधों या किसी अन्य जानवरों को ही देखा था। जानवरों को भी इस प्रक्रिया में बाधा पड़ने पर गुस्साते हैं। मनुष्यों ने अपने को सभ्य बनाया और उसने सेक्स जैसी बात को बहुत पर्दे में या निजी तौर पर रखने की कोशिश की। सेक्स उसे शरीर और मन की एक बड़ी जरूरत के तौर विकसित किया। इसे प्रेम की उन्नत अभिव्यक्ति के तौर पर जाना-समझा। सेक्स के सार्वजनिक प्रदर्शन को मनुष्य ने अश्लील माना। यही वजह है कि बिस्तर की बात उसे बहुत निजी लगती है। यह निजत्व उसे अधिकार और खुशी भी देती है। लेकिन पूंजीवाद ने इसे दिखावे और प्रदर्शन की वस्तु बना दिया। प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ हमबिस्तर होते हैं और उसका एमएमएस बनाकर प्रचारित करने लगे हैं।
यह सच है कि आज की तारीख में भारतीय समाज में ‘नंगा’ एक निरर्थक और घृणा के तौर पर इस्तेमाल होने वाला शब्द है। पर मैं यह देखकर हैरत में पड़ गया कि यहां तो नंगई देखने के लिए इतनी महंगी कीमत देने को भी लोग तैयार हैं। यह हमारे सभ्य समाज के विरोधाभास को भी उजागर करती है।

श्रमशील थाई स्त्री

यहां मंटो की एक कहानी ‘आवाजें’ की याद हो आई। कहानी में एक युवा किरदार की शादी होती है। वह दुल्हन को अपने घर ले आता है। उसका घर लोगों से भरा-पूरा है। कमरे कम हैं। इसलिए निजी क्षणों के लिए उसे कोई अलग से कमरा मुहैया नहीं कराया गया है। वह रात के समय छत पर या खुले में सोता है और अपनी उमंगों को परवान चढ़ाने की स्वभाविक ताक में भी रहता है। वह जब यौन-क्रिया में लिप्त होता है तो कभी किसी के खांसने या फिर करवट लेने में आवाज होने से उसे ब्रेक लगाना पड़ता है। उसकी सारी क्रियाएं ढीली पड़ जाती हैं और उसकी हताशा बढ़ने लगती है। प्रेम के लिए दो निजी पल मुहैया नहीं हो सकने की हालत में अंततः वह पागल ही हो जाता है। इस तरह के हालत आपको भारत की तमाम झुग्गियों में देखने को मिल जाएंगे। वास्तविकता तो यह है कि कोई भी संवेदनशील आदमी इस निहायत निजी क्रियाओं को जान-बूझकर सार्वजनिक होने की इजाजत नहीं दे सकता। संभोग के सार्वजनिक प्रदर्शन की इजाजत कोई बीमार मानसिकता वाला व्यक्ति ही दे सकता है। अंग्रेजी में भी सेक्स के लिए एक बहुत ही प्यारा शब्द ‘लव मेकिंग’ है। थियेटरनुमा इस हाॅल में गोरे और गोरियों की संख्या दो-तिहाई से भी ज्यादा थी। हाॅल के अंदर दर्शकों में कोई स्थानीय नागरिक नहीं नजर आ रहा था। वहां काम करने वाली लड़कियों और लड़के को स्थानीय तौर पर परेशानी नहीं पैदा हो, इसलिए ऐसी व्यवस्था की गई थी। औरतों को वस्तु के तौर पर दिखाने का सीधा प्रसारण मैने पहले सुने या काॅलेज में पोर्न मूवीज और टेलीविजन में ही देखे थे। हालांकि लगभग हिंदी सिनेमा में अब औरतों को वस्तु के तौर पर पेश किया जाता है। अब औरतें भी इसमें विशेषज्ञता हासिल कर चुकी हैं और उन्हें पता है कि किनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए। किनके लिए कितना किया जाना चाहिए। मैं यहां ग्लैमर्स जीवन जीने की आकांक्षा रखने वाली औरतों के बारे में बात कर रहा हूं। आम जीवन में भी खासकर महानगरों में लड़कियां खुद को कमोडिटी की तरह पेश कर रहीं हैं। खैर, नंगी आखों से यह सब देखने के बाद मुझे यह अनुभव हो गया था कि भारत के संपन्न लोग इन देशों में क्यों आते हैं? और क्या करने आते हैं? किन बातों के दम से इन देशों का पर्यटन गुलजार हो रहा है? यहां की सरकारों ने पर्यटन में मसाला डालने के लिए औरतों को वस्तुवादी बनाने की मौन सहमति दे रखी है।

थाई महिलायें शुक्रवार के बाजार में सामान बेचती हुई

यहां सेक्स या देह-व्यापार अपराध नहीं एक काम की तरह लिया जाता है। यात्रा के दौरान ही एक पत्रकार मित्र ने बताया कि यहां देह-व्यापार करने वाली औरतें अपनी बदन को पेश करने से पहले ईश्वर को याद करती हैं। हाथ जोड़ती है और फिर ग्राहकों के सामने खुद को परोसती हैं  शायद वे ऐसा अपने को इस पेशे को चुनने और अनजान लोगों के साथ हमबिस्तर होने के पाप ग्रंथि से बाहर करने के लिए करती होंगी। दूसरे या अनजान लोगों के साथ सेक्स एक पेशे के बतौर करना निश्चित तौर पर बहुत पीड़ादायी होता होगा। सेक्स दो लोगों को जोड़ने का काम करता है इसलिए वह बहुत आनंददायी भी होता है। लेकिन पेशा करते वक्त आप पैसा तय कर सकते हैं न कि किसके साथ और कब सेक्स करना है कि आजादी नहीं ले सकते हैं। जाहिर सी बात है कि ऐसे सेक्स का सुख तो पैसा देने वाले को ही मिल सकता है क्योंकि उसका हाथ वहां खरीददार की तरह उपर होता है। जो भी हो, वहां इस पेशे में नैतिकता भी है। अगर कोई व्यक्ति सेक्स का सौदा तय करने के बाद ऐसा नहीं करना चाहे तो उसे आदरपूर्वक पैसे वापिस कर दिए जाते हैं। ईश्वर का धन्यवाद तो थाईलैंड में लड़कियां बाॅडी मसाज करने से पहले भी करती हैं, इसका अनुभव तो मुझे भी अब है। खैर, इस शो के दौरान एक के बाद एक वाह्यात दृश्य पेश होतेे रहे और मैं तनावग्रस्त। इन बातों का मुझे इतना बुरा लगा कि मेरी नींद कम हो गई और डाॅक्टर राजीव कौशिक को मेरे उच्च रक्तचाप की गोली बदलनी पड़ी। अन्यथा, पिछले तीन साल से भी ज्यादा समय से सबकुछ सामान्य ही रह रहा था। लगभग 20-25 मिनट तक इसे झेलने के बाद मेरे साथ बैठे दो श्रद्धालु योद्धाओं को भी उबकाई आने लगी। हम बाहर आ गए। हमारे साथ गई लड़कियां हमसे पहले ही थियेटर से रफा-दफा हो गई थीं।

थाई दुल्हन

लगभग 12 बजे रात का समय हो रहा था सड़कों पर यातायात कम जरूर हो गया था लेकिन अभी भी रौनक कम नहीं हुई थी। सड़क के दोनों किनारों पर झुंड की झुंड सुंदर लड़कियां खड़ी थीं और लंबा आलाप लेकर राहगीरों और खासकर पर्यटकों को कामोत्तेजक अंदाज में ‘है……..ललो म…साज, है………ललो म…….साज’ कहकर आकर्षित करने की कोशिश में जुटी थीं। लेकिन न मेरे पास अनाप-शनाप पैसे थे और न ही जिंदगी में ऊर्जा की इतनी कमी। वैसे भी परदेस में हम जैसे वीर लोग पहली बार गांव से दिल्ली आते समय बुजुर्गों की दी गई सलाह (जीभ और ….. पर कंट्रोल रखोगे तो जहां में प्रतिष्ठा बची रहेगी) का खयाल रखने की कोशिश करते हैं। बुजुर्गों की कही बात मुझे सौ फीसदी सच लगती है। मैने उनकी बात लगभग 18 साल से ताबीज की तरह संभाल कर रखी हुई है। रास्ते में चलते-चलते ही जोयता और महुआ मिल गईं। वे खरीदारी कर रही थीं। मैं उनके साथ ठहर गया और देखने लगा कि शब्द (बेटा) या रीना (पत्नी)  के लिए कोई ऐसी चीज मिल जाए। आधे-पौने घंटे के बाद इस दुकान से उस दुकान में मोलभाव करने के बाद उन्होंने एक ढाबे पर ग्रीन चिकन और चावल खाया। यहां के ढाबे पंजाब की तरह चटख रंगों से सजे हुए थे। मुझे भी खाने के लिए उन्होंने बहुत कहा पर मेरी हिम्मत नहीं हुई। खाना खाने के बाद हम पैदल चलते हुए होटल आ गए।

मैं अपने कमरे पहुंचा तो उमेश्वर जी वहां नहीं मिले। आधे घंटे बाद जब वह आए तब मैंने उनसे शो के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि स्वतंत्र यहां की अर्थव्यवस्था इसी इंडस्ट्री पर टिकी हुई है। हमलोग इस प्रण के साथ नींद की आगोश में गए कि सुबह पाटोंग बीच पर माॅर्निंग वाॅक के लिए जाएंगे। लेकिन सुबह किसी अनजाने फोन काॅल के बार-बार आने के बाद हमारी नींद खुल रही थी और उसके बंद होते ही थकान की वजह से फिर आंख लग जा रही थी। लेकिन हमारे पास जगने के अलावा अब कोई चारा नहीं था। नहाने-धोने के लिए गया तो फिर से संडास के आगे झक सफेद तौलिया पड़ा हुआ पाया। उमेश्वर जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि यह परंपरा है। मुझे समझ में आया कि होटल अपनी सफाई की मिसाल पेश करने के लिए ऐसा करता हो। सुबह नाश्ता करके हम दिनभर रिलायंस के प्रेस कांफ्रेस में बैठे रहे और पेन और पेपर का खेल खेलते रहे। शाम को हमें होटल से 25-30 किलोमीटर दूर ‘फैंटेशिया’ शो दिखाने ले जाया गया। यहां औरतों की दूसरी तस्वीर हमें देखने को मिली जिसका जिक्र हिन्दुस्तान में मुझसे किसी भी मित्र ने नहीं किया था। इस शो में औरत की दया और करुणा की तस्वीर का रंग ज्यादा गहरा था। प्रेम में विरह पाने की पीड़ा की अभिव्यक्ति ने मेरे सामने थाईलैंड की बिल्कुल अलहदा तस्वीर रखी।

ओ कमला……..तुम कहां गई?


‘फैंटेशिया’ के इस शो के पोस्टर मैंने फुकेट एयरपोर्ट पर भी देखे थे। यहां खूब चटकीले रंगों से खिलौने और खाने-पीने की दुकानें सजी-धजी हुई थीं। थाईलैंड को हाथियों का देश क्यों कहा जाता है, अब समझ में आ रहा था। यहां बहुत सारे हाथियों की मूर्तियां लगी थीं। कहीं चीनी मिट्टी तो कहीं लोहे के तार से तो कहीं काले पत्थरों से बने हाथी स्वागत की मुद्रा में लगे हुए थे। बहुत सारी जगहों पर सचमुच के भी हाथी थे, जिनके साथ हमने फोटो भी खिंचवाई। गुफानुमा रास्तों से होकर हम एक भव्य थियेटर में पहुंचे। हाॅल खचाखच भरा था। थोड़ी देर में लेजर लाइट का प्रदर्शन शुरू हो गया। उसके बाद ओ कमला…….. (बाकी थाई भाषा में था इसलिए शब्द नहीं भावों को पढ़ने की कोशिश की) से शो शुरू हुआ। दरअसल, इस शो में एक प्रेमी और प्रेमिका के विरह का वर्णन दिखाया जाता है। शो के साथ जादू, जानवरों और पक्षियों के खेल भी दिखाए जाते हैं। कुछ सर्कस में जिमनास्टिक अदाओं वाले खेल भी होते हैं। वास्तविकता में ये सारे खेल विरह कथा के साथ चल रहे होते हैं। दर्शकों को बांधे रखने के लिए तो कुछ ऐसे खेल जरूरी होते हैं। इस शो में राक्षस, भगवान सबकुछ भारत जैसे ही दिख रहे थे। हमारे भगवान या नायक जिस तरह कोमल और मासूम छवि वाले होते हैं। उनके भी हू-ब-हू वैसे ही।एक घंटे के शो में बकरी, घोड़े, हाथी और कबूतर भी पूरी तरह प्रशिक्षित दिखे। सचमुच मैं इस शो को देखकर धन्य-धन्य हो गया। शो के बाद हम एक भारतीय रेस्तरां में खाने गए। इस रेस्तरां में मछली की रेसेपी बहुत ही लाजवाब। मजा आ गया। हम थके-मांदे होटल आए।

 दूसरे दिन सुबह 12 बजे हमें फुकेट एयरपोर्ट के लिए निकलना था। हम अपने-अपने कमरों में जा सो गए। हम अपने तय कार्यक्रम के हिसाब से टैंपो टेªवलर में 12 बजे दोपहर में बैठ गए और भारतीय समयानुसार रात 9 बजे हम दिल्ली के एयपोर्ट पहुंच गए। रीना और शब्द मेरा इंतजार करते हुए मेट्रो के बाहर मिले। शब्द अजीबोगरीब आवाजें निकालाता हुआ दौड़ा और कूदकर मेरी गोद चढ़ गया। दूसरे दिन जब आॅफिस  पहुंचा तो जाने से पहले वाले कल्पना लोक में ही मेरे मित्र घूम रहे थे। उन्हें मैंने भी जगाने का काम नहीं किया। मैंने उनकी उत्सुकता वाले पहलू पर कोई खास बातचीत नहीं की। मैं उन्हें जो बताना चाहता था, वे उसे सुनने की मानसिकता में नहीं थे। वहां खीची गई तस्वीर में भी उन्हें ऐसा कुछ नहीं देखने को मिला तो उन्होंने मुझे बुद्धू मान लिया। मैं भी उन्हें होशियार कहां मानता था, सो हम अपनी-अपनी बुद्धि के सहारे ही चलना ठीक मानते रहे।

प्रियंका सिंह की कवितायें

0
प्रियंका सिंह


प्रियंका सिंह कवितायें और कहानियां लिखती हैं . दिल्ली में रहती हैं . संपर्क: priyanka.2008singh@gmail.com

१. तुम कुछ नहीं

तुम पढ़
गयी हो
बिगड़ गयी हो
अच्छा होता
दीवार सी चिपकी रहती
अपनो की तस्वीर से

तुम बाहर क्या जाने लगी
बदचलन हो गयी
बेहतर होता बंधी रहती
हीरा जैसी आँगन में

तुम्हें सोचने को कहा था
बोलने को नहीं….
क्यूँ
सोचती हो
दिमाग से तुम्हारा
वास्ता नही जब
सही था गर तुम बस
पौध जनती और जनती जाती

बदज़बानी न करो
तुम मिट्टी हो…उसी में रहो
तुम प्यास बुझा सकती हो
पर अमृत नहीं बन सकतीं
तुमसे रिश्ता जोड़ना
तुमपे एहसान है पड़ी रहो चुपचाप

औकात तुम्हारी
भोगन भर की और ज़िम्मेदारी
मेरे घर की
मुंह सी ले…नज़रें जमीं और
मन कब्र में दफन कर दें
तब जी तुझे जैसा जीना है

ज़हर भी जो लगे ज़िन्दगी
पी….रोज़ पी
तुझे ये जीवन यूँही पीना है…

२. उपयोगिता

मैं नहीं जानती
उपयोग करने की कला
किसे…..? कैसे….?
किस लिए……? कब तक ?
उपयोग करना नहीं आता
नहीं …….
कभी ख्याल नहीं आता

हाँ
उपयोग होना सीखा है
माँ से.……
माँ कहती है इसमें सुख है.…

सुख ?
हाँ…….सुख
दबा-दबा सा सुख
झाँकता-छुपता सा सुख
कभी मंद-मंद सा मुस्कुराता सुख और
वक़्त के गुज़रते जाते ही
उसके चाको में
पिसता सुख, घिसता सुख
करहता सुख, दम तोड़ता सुख

देखा है मर्तबा मैंने
उपयोग चीज़ों का बेहतरी से
पर इंसान का उपयोग
डराता है

समझ नहीं पाती हूँ
कैसे वस्तु का स्थान
एक साँस लेते जीवित व्यक्ति को
दे दिया जाता है

यह शर्मनाक है, घिनौना है
अमानवीय है, दर्दनाक और वीभत्स है

मैं उपयोगिता के
स्तर को बाँट चुकी हूँ
बाँट रही हूँ……..
कई अर्थों में और
मज़बूर हूँ समय के आगे
उसके सामने मेरे हाथ फैले है
जिस पर समय ने
उपयोगिता की मुहर लगा रखी है और
अब मैं उपयोग होने के अलावा
कुछ नही कर सकती तब तक
जब तक
मुझ पर बैठा
वक़्त का तानाशाह
मुझे अपनी कैद से आज़ाद नहीं करता

जब तक
मेरी उपयोगिता की
समय सीमा समाप्त नहीं हो जाती
मुझमें बसने वाली एक भी उपयोगिता की नब्ज़
अपना दम नहीं तोड़ देती
तब तक……..
मेरे हाथ यूँही फैले रहेंगे

समय की मुहर
मेरे हाथों की लकीरों में
समा कर मेरे अंतर-मन में जा बैठी है
जो अब मुझे सोचने नहीं देती
समझने नहीं देती
जैसे मेरे मन का एक हिस्सा
सुन्न हो गया है, सब शान्त हो गया है

बस
समय है और उसमें बहती
मेरी उपयोगिता……..

तुम आए हो ना शब -ए-इंतज़ार गुज़री है …….

0
ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस


ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस कवितायें और कहानियां लिखती हैं . नोएडा में रहती हैं . संपर्क: rituparna_rommel@yahoo.co.in

जय और दिल की इस कहानी में शायद आपको कुछ नया नहीं लगे क्योंकि  पहले भी कितनी ही बार इस फ़साने का ज़िक्र बातों में आया ही करता है…  लेकिन नामालूम सी कोई कशिश ज़रूर है इस अफ़साने में कि हर बार उतनी ही शिद्दत से इसे दोहराती हूँ…  इस बार सोचा कि बेतरतीब  यादों को सिलसिलेवार वर्कों में टाँक दूँ…  और फिर से उन वक्तों को जी लूँ जब ज़िन्दगी इतनी उलझी   इतनी बिखरी नहीं  थी.

-पहला सफा-

पहली नज़र में प्यार जैसा इस किस्से में कुछ नहीं है. जय से पारिवारिक रिश्ते थे. घर में आना -जाना , मिलना जुलना एकदम सामान्य सा ही था. यह सन छियासी के शुरूआती महीनों की बात रही होगी … 16 साल की उम्र में भी दिल का बचपना या कहें कि खिलंदड़ापन बरक़रार था. बी एस सी फर्स्ट इयर के प्रैक्टिकल सर पर थे और हरबेरियम फाइल नदारद… क्या किया जाये… जंगली फूल-पौधों का कुछ तो जुगाड़ करना होगा.  क्या करूँ… ? अरे हाँ ! जय के घर के सामने एक बड़ा सा खाली मैदान है, जहाँ बहुत सारे जंगली पौधे , ख़त-पतवार उग आये हैं. वहीँ से कुछ तो मिल ही जाएँगे . दिल ने साइकिल उठाई और सीधे जय के घर.  आंटी  से अपनी परेशानी बताई  और उन्होंने परेशान दिल की मदद करने के लिए जय को बुलाया, जो शायद अपने कमरे में बैठा कुछ पढ़ रहा था. ‘ अच्छा हुआ जो माँ साथ नहीं हैं’ , दिल ने मन ही मन सोचा वरना अभी एक लेक्चर सुनने को मिल जाता. पढ़ने-लिखने में दिल ठीक-ठाक थी, दिमाग भी तेज़ था लेकिन थी एक नंबर की आलसी. जब तक बात सर पर ना आ पड़े तब तक सुध नहीं लेती थी . उधर  जय  एकदम सिन्सीयर … अच्छा बच्चा… जिसे पढ़ने के सिवाय कोई दूसरा काम नहीं था. और दिल को ऐसे पढ़ाकू बच्चों को लेकर अक्सर माँ के उलाहने सुनने पड़ते थे. खैर, आंटी के कहने पर जय दिल के साथ सामने वाले मैदान में फूल-पत्तियाँ तुड़वाने चला गया और दिल को याद है कि इस ‘ फूल-पत्ती तोड़ो अभियान’ के दरम्यान दिल ने अपनी आदतनुसार बकबक करके जय को खूब पकाया. बेचारा जय… चुपचाप दिल की बेफिजूल सी बातें सुनता और गाहे-बगाहे हाँ-हूँ करता रहा. लेकिन उस दिन जय से मन ही मन दिल ने दोस्ती का एक रिश्ता बुन लिया था. अब जब भी जय अंकल के साथ घर आता तो दिल को अच्छा लगता.  जय कम बोलता था. एम एस सी फिजिक्स का स्टूडेंट था, लेकिन साहित्य में उसकी रूचि,  उसके शब्दों में संजीदगी , परिष्कृत भाषा  दिल को भाती थी.  दिल के मन में जय की एक खास जगह बन रही थी जिसका आभास दिल को भी नहीं था.

– दूसरा सफा –

दिसम्बर की कड़कड़ाती सर्दियाँ थीं. रात से बारिश हो रही थी. ऐसे में कॉलेज जाने का मन किसका होता भला लेकिन मनोधीर सर की क्लास मिस नहीं की जा सकती. बहुत इम्पोर्टेन्ट टॉपिक पर है. खैर , देखा जाएगा.  अगर सीमा आती है तो चली जाऊँगी वरना आरामसे घर बैठूंगी. दिल सोच ही रही थी कि सीमा जी हाज़िर.
कॉलेज पहुँचे तो मालूम हुआ कि एम डी सर अभी नहीं आए हैं. क्लास-रूम में तीन- चार लड़कियाँ ही थीं . बाहर बारिश अभी भी हो रही थी और अन्दर सभी की कुल्फी जमी जा रही थी. मन ही मन सीमा पर गुस्सा भी आ रहा था लेकिन सीनियर थी तो बरदाश्त करना ही था . गाने – वाने गाते हुए समय बिताया जा रहा था लेकिन उफ़्फ़ यह सर्दी तो…  लगता है हड्डियाँ कीर्तन कर रही हैं. तभी दिल ने क्लास के सामने से जय को जाते हुए देखा. कुछ सोचा और सबसे कहा ,” चाय- समोसा कौन-कौन खाएगा… ?” सभी तैयार ! पर्स टटोले गए. हम्म्म्म ! पैसे तो है लेकिन कैंटीन जाकर लाएगा कौन ? सवाल मुश्किल था . आज का समय होता तो यह बात किसी के दिमाग में आती भी नहीं लेकिन वो दूरदर्शन का ज़माना था और वो भी ताज़ा-ताज़ा ही रंगीन हुआ था . उस दौर में सीनियर लडकियाँ ही कॉलेज कैंटीन के दर्शन करने की कूवत रखती थीं .  लेकिन इस मुश्किल को दिलेरी से हल करते हुए दिल ने बेबाकी से कहा, ” मेरे अंकल के बेटे हैं यहीं … तुम लोग कहो तो उनसे कहूँ ? ” इस पर किसको ऐतराज़ था भला . दिल और सीमा बाहर निकलीं तब तक जय अपने एक और दोस्त के साथ ज़रा दूर निकल गया था.  भीगते-भागते दोनों जय तक पहुँचीं और  कैंटीन से चाय समोसे लाने की फरमाइश कर दी . ” पैसे यह रहे…!” , दिल ने कहा. ” समोसे चाय ले आने दो, पैसे तभी दे देना” . जय ने हौले से  मुस्कुराते हुए कहा.   “ठीक है .” दिल बस इतना भर कह पाई और वापिस क्लास की तरफ मुड़ गई.

थोड़ी देर बाद जय अपने साथी के साथ क्लास में था. हाथ में चाय और समोसे .  लड़कियाँ खुश.  अब बारी थी पैसे देने की. महीने का आखिर था. ज़्यादातर की पॉकेट – मनी आखिरी साँसे गिन रही थी . वैसे भी पॉकेट- मनी के नाम पर जो भी मिलता था उसका अधिकतर हिस्सा तो सुशीला कॉलेज के पास फ्रूट चाट बेचने वाले मामाजी को हस्बेमामूल दे दिया जाता था . खैर , तमाम खंगाली के बाद जो भी बरामद हुआ सब जय के हाथों में रख दिया गया .

” कहाँ बैठ कर आई हो तुम लोग ! ”
” मतलब ? ”
” मतलब   यह कि इतनी चिल्लर कहाँ से बटोरी ! ”    जय के चेहरे पर एक शरारत भरी मुस्कराहट थी.

अल्लाह !  इस लड़के को कोई बताता क्यों नहीं कि उसकी मुस्कराहट दिल के दिल में उतरने लगी है   धीमे- धीमे .

तीसरा सफा-

जय की  मेहनत और प्रतिभा रंग लाई और पढ़ाई ख़त्म करते न करते  उसे नेवी में चुन लिया गया . बम्बई में ट्रेनिंग के बाद पहलीपोस्टिंग मिली उड़ीसा में. उस दौरान , फ़ोन-वोन तो नहीं हाँ कभी-कभार पापा के नाम जय के ख़त ज़रूर आते थे लेकिन उनमें दिल के बारे में अलग से ज़िक्र होता हो, ऐसा नहीं था.

एक दिन सुबह-सुबह दरवाज़े की घंटी बजी. दिल अपने कमरे में थी . सर्दियों में दिल की सुबह ज़रा देर से होती थी . घंटी फिर बजी. माँ दरवाज़ा क्यों नहीं खोल रहीं ? हो सकता है , छत पर कपड़े सुखाने गईं हो . दिल बिस्तर से उठी और दरवाज़ा खोला. दरवाज़े पर जय . चेहरे पर दिल के दिल में उतरने वाली वही पहचानी   खिली सी मुस्कराहट. अचरज और ख़ुशी का अजीब सा आलम था उसे देखकर . दिल ने जय को अन्दर आने को कहा और खुद सीधे गुसलखाने में . माँ के आने से पहले मुँह-हाथ धोकर फ्रेश हो जाना चाहिए वरना बेभाव की पड़ेगी . यह जय भी ना…. इतनी सुबह ही आ गया . एकदम औचक. लेकिन यह भी तो सच था कि जय के यही सरप्राइज दिल को भाते थे.

सर्दियों की शामें कितनी खूबसूरत होती हैं और कितनी रूमानी ! घर जाने की उतावली में सूरज बादलों की कूची से अनगिनत रंगों को आसमान में बिखेर देता है . ऐसी ही शामों की खुशबू दिल के अंतस में महकती है   इन दिनों .उन्हीं दिनों की बात है . पापा के एक पुराने मित्र सपत्नीक अमेरिका से आये हुए हैं . रात के खाने पर आमंत्रित हैं . उसी शाम जय भी घर आया . पापा को अचानक किसी काम से बाहर जाना पड़ा  और  अब मेहमानों की ज़िम्मेदारी दिल के जिम्मे . माँ रसोई में व्यस्त थीं. पापा की कुछ कविताओं की हाल में ही दूरदर्शन के लिए रिकॉर्डिंग हुई थी .  उनमें से कुछ कविताएँ दिल ने रिकॉर्ड कर रखी थी . उन अंकल की फरमाइश पर कैसेट प्लेयर में उन्हीं कविताओं का कैसेट था . पापा का स्वर और  सूफियाना मिज़ाज के उनके गीत मानों दिल की आत्मा को मथते हैं और एक अनकही सी बैचैनी आँखों के रास्ते धाराधार बहती है . यही हुआ उस दिन भी . आँसुओं से भीगे चेहरे को छुपाती दिल कमरे से बाहर निकल आई . खुद को सँभालने की कोशिश में थी कि दो मज़बूत बाजुओं ने उसे घेर लिया . दिलासा देते हाथ उसके बालों को धीमे-धीमे सहला रहे थे और जय के कंधे से लगी दिल बस रोये जा रही थी. निशब्द !

पहला स्पर्श !   एक अनछुए अहसास ने मन के आँगन को हरसिंगार के फूलों से भर दिया था .  रातें अब रूपहली थी और दिन नवेले.

– चौथा सफा – 

तेरह जनवरी का दिन यानी लोहड़ी . बरसों पहले का यह दिन दिल की यादों में आज भी गहरे बसा है . कुछ दिन से जय की तबीयत ठीक नहीं थी . पाँव में चोट थी . चलने में दिक्कत थी . लोहड़ी से दो दिन पहले की बात है . आँगन में मीठी – मीठी सर्दियों की धूप . जय आँखे बंद किए अपने ख्यालों में ही था कि तभी दिल की आवाज़ सुनाई दी . जब तक जय संभलता   दिल सामने . माँ से उसकी बातें बदस्तूर जारी  . ‘ यह लड़की इतनी बातें कहाँ से बटोरती है  ! ‘ जय सोच ही रहा था कि दिल अब उससे मुखातिब थी . ” कल अंकल आए थे . उन्हीं ने बताया कि आपके पैर में चोट है . अब कैसे हैं ? ”   जय मुस्कुरा दिया , ” ठीक हूँ .  एक- दो दिन में पट्टी खुल जाएगी तब मिलता हूँ .”

लोहड़ी की उस सुबह छुटकी स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी . दिल ने एक कागज पर कुछ लिखकर उसे दिया . ” स्कूल जाते समय इसे जय को देती जाना प्लीज़ ! ”  दिल की बात को छुटकी किसी हाल में नहीं टाल सकती सो जय के घर पहुँचकर उसे दरयाफ्त किया गया और आंटी और भैया की मौजूदगी में वही पुर्जा उसने जय को थमा दिया   ” दी ने आपके लिए दिया है. आप शाम को आएंगे ? ” जय भला क्या कहता  बस मुस्कुराकर हाँ में सर हिला दिया .

स्कूल से लौटकर छुटकी ने जय का सन्देशा दिल को दिया और   इंतज़ार की घड़ियाँ शुरू ! ‘ यह वक़्त इतना धीमे क्यों बीतता है ! शाम मानों दिल के सब्र को तौल रही हो और समय ज्यों ठहर ही गया हो .
शाम आई और  धीमे – धीमे रात में तब्दील हो गई . जय कहकर आया क्यों नहीं .  कहीं दिल का उसे यूँ आने को कहलवा देना जय को बुरा तो नहीं लगा .

तमाम ख्यालों से घिरी वो रात बड़ी उदास थी . लेकिन साहिर ने कीट्स को दोहराते हुए यूँ ही नहीं कहा था कि हर गहरी और मुश्किल रात के बाद सुबह बेतरह खुशनुमा होती है . आने वाला दिन भी दिल के लिए कई शीरीं और प्यारी स्मृतियों की सौगात लेकर आने वाला था .

– पाँचवां सफा –

आज इतवार है . हर बार की तरह आज भी पापा अपने दो तीन मित्रों के साथ डाइनिंग टेबल के इर्द-गिर्द बैठे टी वी पर ‘महाभारत’ देख रहे हैं . माँ चाय नाश्ते के इंतजाम में लगी हुई हैं .

रात की खलिश ज़हन में अभी भी घुमड़ रही है . ज़ाहिर सी बात है कि दिल का मूड उखड़ा हुआ है . देर तक अपने कमरे में बंद दिल किसी उधेड़बुन में उलझी है . ‘ दोपहर बाद दीया के घर ही चली जाती हूँ . शायद उस से बात करके चित्त ज़रा सहज हो. ‘ दिल ने सोचा , खुद को सहेजा  और फिर रोज़मर्रा के कामकाज में व्यस्त हो गई . वक़्त अपनी रफ़्तार से बीत रहा था . तीन बजे के आसपास का समय होगा दिल छत पर थी . हाथों में कोई पत्रिका थी  और ज़हन में जय के ख्याल  कि अचानक छुटकी की आवाज आई ,” ओ दी ! नीचे आओ , जय भैया आएँ हैं .”    दिल को लगा  छुटकी खिंचाई कर रही है लेकिन जाकर देखने में कोई हर्ज़ नहीं.   नीचे  जनाब बाकायदा कमरे में बैठे थे .  चेहरे पर वही ‘ किलर स्माइल ‘.    दिल के दिल को चुराने की जय की यह अदा कमाल है .  थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करने के बाद दिल ने कहा ,” मझे दीया के घर जाना है . आप मुझे वहां तक छोड़ देंगे ? मैं बस दो मिनिट में  तैयार होकर आती हूँ .”  जय असमंजस में . ” हाँ कहूँ कि ना . यह लड़की उलझा देती है . जहाँ कह रही है वहाँ ले जाना ही होगा  और कोई उपाय नहीं .”  जय अपनी सोच में ही था कि माथे पर नन्हीं सी काली बिंदी और गुलाबी शलवार कुर्ते में दिल सामने . “चलिए! ”  अजीब थी दिल भी .  दीन दुनिया से बेखबर  अपनी ही रौ में रहती .  ज़रा ना सोचा कि जय के साथ यूँ स्कूटर पर पीछे बैठकर जाएगी तो आसपास वाले क्या सोचेंगे  या  किसी अनजान लड़के को उसके साथ देखकर दीया के माँ- पापा क्या कहेंगे .  निपट बावरी लड़की है यह दिल भी !

दीया को दिल के आने की खबर थी लेकिन उसके साथ जय का होना बेचारी दीया के लिए भी किसी झटके से कम नहीं था .  जय को ड्राइंगरूम में बैठा छोड़ दिल दीया के कमरे में थी .
” इसे क्यों साथ ले आई ? ”
” क्यों ? तूने ही तो कहा था कि अब उसके मन में क्या है जान लेना चाहिए . तो चल , कहीं बाहर चलते हैं . कॉफ़ी-वॉफी पीएँगे . मैं तो नहीं कह पाऊँगी तू ही उससे इस बारे में बात कर लेना . ”
” ठीक ! लेकिन अम्मी को क्या बोलूँ कि कौन है यह ? ”
” अरे ! इसमें क्या ?  कह दे कि दिल के अंकल का बेटा है . ” दिल ने सुझाया .
” अम्मी , मैं दिल के साथ जा रही हूँ . कुछ किताबें लेनी है . जय हमें मार्केट तक छोड़ देगा .”
जबतक अम्मी की हाँ या ना होती  दिल और दीया दोनों घर से बाहर .
जय ड्राईवर की सीट पर   उसके पीछे थी दिल और फिर बैठी दीया . ” कहाँ चलना है ?”  जय ने कहा . ” ऐसा करते हैं कि  नवीन मार्किट चलते हैं . वहीँ कुछ खा – पी कर , किताबें लेकर वापिस आ जायेंगे .” यह दीया थी .

स्कूटर अब नवीन मार्केट की सड़कों पर था .  दीया के कहने के मुताबिक वहां के नामचीन साउथ इंडियन रेस्तरां में कॉफ़ी पीने के इरादे से तीनों पहुँचे तो देखा कि रेस्तरां खचाखच भरा .  ” ओह ! आज इतवार है . आज तो यहाँ भीड़ रहती ही है .  चलो कोई नहीं यहाँ पास में ही एक चाट वाले की दुकान है. चल वहीँ चाट खाते है .” दीया का प्लान टू रेडी था .   ” यह लड़की भी ना  जब देखो बस खाने की सूझती है इसे . गोलगप्पे  खाते खाते जय से क्या खाक बात करेगी मेरे बारे में .  दिल मन ही मन कुढ़ रही थी .  खाने-पीने का सेशन ख़त्म हुआ .  दीया को अब याद आया कि अम्मी से किताबें लेने की बात कह कर आई है . किताबें लिए बिना घर पहुँची तो अम्मी के हज़ार सवाल होंगे . ” यार, अभी किताबें भी लेनी हैं . तू चलेगी ? ”
” नहीं . तू जा . मुझे जय घर छोड़ देगा .” दिल ने दीया को टरका दिया .
अब स्कूटर पर दो ही जन थे . ” चलो, तुम्हें एक बढ़िया जगह कॉफ़ी पिलाऊँ .” हम्म्म ! तो जय भी उसके साथ समय बिताना चाहता है .”  दिल खुश .  लेकिन स्कूटर या बाइक पर पीछे बैठी लड़की की बाहें या तो  लड़के की पीठ को घेरे होतीं हैं या उसके काँधे पर टिकी होती हैं .  फिल्मों-विल्मों में कुछ ऐसा ही होता है ना . अब ऐसे ही  जय को छुए दिल तो जय  ना जाने क्या सोचे उसके बारे में . थोडा वक़्त यूँ ही  उहापोह में बीता .  अब दिल तो आखिर दिल   सो कह ही दिया , ” जय , मैं आपके कंधे पर हाथ रख लूँ ?”

जय के सामीप्य के अहसास ने मानों दिल की आकांक्षाओं को नयी परवाज़ दे दी हो . ” दीया की सारी आशंकाएँ – शंकाएँ गलत . जय मुझे चाहता है . यही सच है . बस्स ! ”

जय के साथ बीता हर एक लम्हा गुलाबी था . आज के इस दिलफरेब दिन के लिए जय को शुक्रिया कहना तो बनता ही था . घर के रास्ते में दिल ने जय को एक गिफ़्ट शॉप पर रुकने को कहा और जब लौटी तो उसके हाथ में जय के लिए एक छोटा सा पैकेट था  . आज की इस प्यारी शाम के लिए उस नई रोमांटिक फिल्म के गानों के कैसेट से बेहतर जय को दिल और क्या दे सकती थी भला !   जय अब जब भी यह कैसेट सुनेगा दिल की याद उसे पक्का आएगी .

कल की शाम कितनी बैचैन थी  लेकिन आज देखो  दिन इन्द्रधनुषी रंगों की छटा से लबरेज़  है . यह पहले नेह का राग-रंग है.

और   उस रात दिल ने बंद पलकों में संजोए स्वप्नों के फलक पर चाहत और उमंगों की कलम से एक नई इबारत लिखी थी.

– छठा सफा-

चौदह तारीख को जय से हुई मुलाक़ात पूरे चाँद की धवल रात सी दिल के ज़हन में बसी है . उस एक मुलाक़ात के बाद दिल ने जय के साथ आने वाले अनदेखे दिनों को ना जाने कितनी ही बार जिया . घर की छत पर दीया के साथ जय की अनगिन बातें बुनीं . अल्हड़पने के दिन थे वो . आँखों में रूपहले सपने संजोने के दिन .  अपनी ही जुगत से सोचने के मासूम दिन . उन्हीं दिनों की बात है !  हुआ यूँ कि,  दीया ने दिल को सुझाया कि दिल को लेकर जय की सोच को भी जान लिया जाये .  इस सारी कवायद के लिए उन्नीस तारीख़ तय की गई . जय को एक दिन पहले ही संदेशा भेज दिया गया . जगह वही . नवीन मार्किट का दक्षिण सागर रेस्तरां .सुबह से ही दिल के मन में धुकुर सी थी .   जय को पसंद हूँ मैं ? हाँ कहेगा वह ?  खुद बात करना ठीक भी होगा ?  दीया ने भी किस पचड़े में फंसा दिया ! लेकिन जय की दिल की बात जानने की उत्सुकता दिल को भी तो है . थोड़ी हिम्मत करनी होगी !

उन्नीस तारीख़ ! तीन बजे ! उस वक़्त भीड़ भाड़ ज़रा कम रहती है .बात आराम से हो जाएगी .  रेस्तरां के बाहर दिल और दीया .  जय को आने में कुछ देर थी .
” दीया , वो हाँ कहेगा ना ? !!! ”
” परेशान क्यों हो रही है ? मुझे तो लगता है उसकी हाँ ही है .” दीया ने दिल को दिलासा दिया .
” अच्छा ऐसा कर तू ही बात कर लेना  लेकिन मेरे सामने नहीं . वह खुलकर नहीं कह पाएगा . मैं बहाने से चली जाऊँगी फिर तू उससे पूछकर मुझे बताना . ”
“ठीक !”
तभी जय आता दिखाई दिया .  वही दिलफरेब मुस्कराहट . ” बाहर खड़ी हो तुम दोनों ? चलो , भीतर बैठते हैं !”
” अल्लाह , यह बस हाँ कह दे .” दिल अपनी ही सोचों में गुम थी .
” क्या लोगी ?  क्या सोच रही हो ? ”  जय पूछ रहा था .
” कुछ नहीं !”  दिल ने धीमे से कहा .  दिल ने इडली और जय और दीया ने दोसा मँगवाया .
” हुम्म ! बोलो , क्या बात है ? यहाँ क्यों बुलाया ? कुछ खास बात ? ” जय ने खाते- खाते पूछा .
” कुछ खास नहीं , बस यूँ ही ! दीया को आपसे कुछ बात करनी है ” दिल की आवाज़ में झिझक और हकबकाहट को छुपाने का प्रयास स्पष्ट था .
दीया ने दिल को इशारे से वहां से जाने को कहा . ” अभी आई  मैं .” कहकर दिल चली तो गई लेकिन मन में क़यामत की उथल-पुथल.
अब तक तो बात हो गई होगी . दिल मेज के पास पहुँची . दीया ने हल्के से ‘ ना ‘ में सिर हिलाया . मतलब  जय का इनकार . सपनों का शीराज़ा टूटने की आवाज़ नहीं होती बस उसकी किरचें अंतस को चीरती जाती हैं . गहरे तक ! यही हुआ था उस लम्हे .
” तुम दोनों बैठो . मुझे जाना है . अम्मी को जल्दी ही लौटने को कहकर आई हूँ . ”  कहकर दीया चली गई .
“जय ,  कहीं और चलते हैं . ” दिल बड़ी मुश्किल से आँसू रोक रही थी .”मुझे आपसे बात करनी है .”

सूकून !   नाम के मुताबिक ही जगह भी है . लेकिन पाँच दिनों में ही इस जगह का माहौल कितना बदला सा लग रहा है . दिल में अजीब सी बेचैनी है . आँखें में खारापन .
” देखो दिल , ग़लत मत समझना .मैंने अभी सेटल होने के लिए सोचा नहीं . शादी वगैरह की जिम्मेदारी के लिए अभी मुझे वक़्त चाहिए. ” कॉफ़ी पीते हुए जय कह रहा था .  दिल की बची हुई उम्मीदों को ध्वस्त करते हुए जय के शब्द मानों दिल के कानों तक पहुँच ही नहीं रहे .
” जय ,प्लीज़ ! मैं आप पर शादी के लिए कोई दबाव नहीं बना रही . मैं आपको पसंद नहीं हूँ या फिर कोई और बात है तो प्लीज़ आप मुझे बताएँ…  मैं बस आप के साथ रहना चाहती हूँ . आप चाहे तो मैं यूँ ही आपके साथ रह लूँगी लेकिन मुझे अपने साथ रहने दीजिये ना   प्लीज़ ! ”  दिल ने रूँधी आवाज़ में कहे जा रही थी .  किसी तरह … बस किसी तरह जय उसकी बात मान जाए . खुदाया !

” दिल ऐसी कोई बात नहीं . तुम अच्छी लड़की हो . मुझे पसंद भी हो लेकिन प्रॉब्लम मेरी है . मैं शादी के लिए अभी तैयार नहीं हूँ . वक़्त चाहिए मुझे . हो सकता है दो तीन साल बाद मुझे लगे कि शादी करनी चाहिए तो मैं इस बारे में ज़रूर सोचूँगा .”
” तब मेरे बारे ही सोचेंगे आप ? मुझसे ही शादी करेंगे ना ? !!! ”   दिल का मन में उम्मीद की हल्की सी रोशनी उमगी .
” हाँ , बिल्कुल ! और वैसे भी सभी उगते सूरज को ही सलाम करते हैं . तीन साल में स्थितियाँ बदलेंगी  थोड़ी .” वही दिलफरेब मुस्कराहट अब दिल को राहत सी दे रही थी .

तीन साल …!

घर आई तो मन बुझा सा था . बीते वाकये को रात को फिर से
जीते हुए दिल की आँखें फिर पनीली थीं . रात बेहद बोझिल थी . नींद ना जाने कहाँ गुम थी . तीन साल का अरसा . दिमाग बस वही अटका था. मालूम नहीं कि जय अब उससे मिलना भी चाहेगा भी या नहीं .क्या करूँ कि जय मान जाए . दीया कहती है कि जय को मैं पसँद हूँ . फिर  उसने मना क्यों किया . नहीं , उसने मना थोड़ी किया है बस तीन साल का वक़्त ही तो माँगा है.  दिमाग में ऊहापोह जारी थी .

अगला दिन बेहद मुश्किल था . दिल जितना कल की बातों को परे धकेलने की कोशिश करती रह रहकर वहीँ बातें ज़हन में घुमड़ रही थीं. खुल कर रो भी नहीं सकती . माँ पूछेंगी तो दिल के पास कोई जवाब नहीं होगा . शाम को दिल दीया के घर गई लेकिन वहाँ भी कुछ राहत नही . कितनी छटपटाहट … कितनी बेचैनी … कितनी पीड़ा …  मन को समझाने की सारी कोशिशें बेकार … बस एक ही बात पर सोच अटकी थी कि जय ने आखिर ऐसा किया क्यों ?  शायद दिल ने जिसे जय की चाहत समझा वह सिर्फ जय की शाइस्तगी थी. लेकिन दिल के साथ जय का वक़्त बिताना … यूँ गाहे बगाहे घर आकर दिल से बतियाना … क्या सचमुच जय की चाहत दिल का ख्याल भर ही थी . मालूम नहीं !  उन्नीस जनवरी के बाद जय से बस एक बार ही मिलना हुआ . छब्बीस जनवरी को दोपहर बाद जय घर आया था . दिल से जय की ज्यादा बात नहीं हुई . बस , माँ को उसने बताया कि अगले हफ़्ते वह वापिस जा रहा है .उस शाम दिल छत पर खूब रोई .

निराशा इतनी कि कभी शादी ना करने का फैसला ... और कभी सब कुछ छोड़ छाड़ कर नन बनने का इरादा . लेकिन खुद को संभालना होगा . सो दिल ने दिल्ली के एक इंस्टिट्यूट में पत्रकारिता का कोर्स ज्वाइन कर लिया . एक साल इसमें बीत जाएगा और फिर दो साल ही तो बचेंगे . दिल खुद को दिलासा देती . एक दिन बातों बातों में दीया ने उसे बताया कि उसने जय को देखा है . जय दिल से मिलने नहीं आया ? पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ . छुट्टियों में जय घर आता  दिल से ज़रूर मिलता . जय बदल रहा है ? !!!

वक़्त बड़ी तेज़ी से बीतता है . नया परिवेश … नया माहौल … नए दोस्त ! ज़्यादातर उड़ीसा के भुवनेश्वर शहर के बाशिंदे . यह संजोग था ?!!!   जय की पोस्टिंग भी तो उड़ीसा में भुवनेश्वर के पास चिल्का में ही है .  दिल दोस्तों से उनके शहर की खूब बातें करती.  उड़िया के नए नए शब्द सीखती . आखिर  शादी के बाद उसे उड़ीसा ही रहना है . उनसे मिलने आएगी वहाँ . अब बॉयफ्रेंड  गर्लफ्रेंड तुम्हीं सब को मुबारक . दिल का दिल तो पहले से ही जय के पास है . दिल दोस्तों से कहा करती .

उन्नीस सौ बयानवें का साल .  जय से मिले दो साल हो गए . इस बीच कोई खबर नहीं .  कोई राब्ता नहीं उससे . दिल की याद आती होगी उसे ? दिल अकेले में जय के बारे में सोचती .  एक ही साल बाक़ी है . जय आएगा ?!!!
फ़रवरी की जाती सर्दियाँ .  दिन का तीसरा पहर . दिल माँ के साथ सब्ज़ियाँ छिलवा रही है .  छुटकी का स्कूल से आना. गुस्से से बस्ता पटकना . ” माँ ,  अंकल ने हमें जय भैया की शादी में क्यों नहीं बुलाया ?  अनुभूति बता रही थी कि आठ तारीख़ को जय भैया की शादी थी . हमें नहीं बुलाया ?

माँ चुप !  दिल आँसू आँसू !!  छुटकी हैरान !!!
फिर लोकल अखबार में छपे छोटे से नोट से छुटकी की बात की तस्दीक !
दिल टूट गई थी .

तीन बरस का इंतज़ार कभी कभी एक ज़िन्दगी लम्बे इंतज़ार में तब्दील हो जाता है . बिखरे वक्तों के वर्कों को सहेजने के लिए कभी कभी सदियाँ भी कम होती हैं . उन्नीस जनवरी उन्नीस सौ नब्बे को दिल को इसका ज़रा इल्म ना था …..

झाड़ू

सुशांत सुप्रिय


सुशांत सुप्रिय कथाकार, कवि और अनुवादक हैं. अब तक दो कथा-संग्रह ‘हत्यारे’ (२०१०) तथा ‘हे राम’ (२०१२) और एक काव्य-संग्रह ‘ एक बूँद यह भी ‘ ( 2014) प्रकाशित हो चुके हैं। अनुवाद की एक पुस्तक ‘ विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ ‘ प्रकाशनाधीन है ।संपर्क: 09868511282 / 08512070086

स्मृति की पपड़ी को मत कुरेदो ,
घावों से ख़ून निकल आएगा ।

एक दिन पत्नी ज़िद करने लगी — ” अपने पहले प्यार के बारे में बताइए न । आपके जीवन में मेरे आने से पहले कोई तो रही होगी । स्टूडेंट-लाइफ़ में आपने किसी से तो इश्क़ किया होगा । ”

मैंने मुस्करा कर उसे टालना चाहा ।लेकिन वह अड़ गई — ” आज तो आपको बताना ही होगा । मैं आपके बारे में सब कुछ जानना चाहती हूँ । देखिये, यह आपके जीवन में मेरे आने से पहले की बात है । मैं बिलकुल बुरा नहीं मानूँगी । मेरी ओर से निश्चिंत रहिए । बताइए न, प्लीज़ । ”

यह स्मृति की जमी हुई झील की सतह पर स्केटिंग करने जैसा था । ख़तरा यह था कि न जाने कहाँ बर्फ की सतह पतली रह गई हो । आपने वहाँ पैर रखा नहीं कि सतह चटख़ जाए  और आप उस झील में डूबने लग जाएँ ।

मैंने पत्नी को टालना चाहा ।पर वह नहीं मानी । हार कर मैंने जोख़िम उठाने का निश्चय किया ।

” आज मैं तुम्हें झाड़ू की कहानी सुनाऊँगा ।” मैंने कहा । मेरी स्मृति में कहीं एक सलोनी छवि अटकी थी । अधमिटे अक्षर-सी बची हुई थी कोई अब भी मेरी स्मृति के पन्ने पर । अस्फुट ध्वनि-सी बजती थी कोई अब भी मेरे ब्रह्मांड के निनाद में ।

 मैं झाड़ू की नहीं , आपके पहले प्यार की कहानी सुनना चाहती हूँ । ” पत्नी ने ज़रा खीझकर कहा ।

” सुन सकोगी? ” मैंने पूछा ।
” हाँ, मैं तैयार हूँ ।” जवाब आया ।
” मैं जब भी झाड़ू देखता  हँू , मुझे किसी की याद आ जाती है । ” मैंने कहा ।
” किसकी ?”
” उसकी जो कहती थी– यातनाओं के सैकड़ों-हज़ारों वर्ष ज़िंदा हैं झाड़ू में ।”
कुछ शब्द आपको फिर से पीछे ले जाते हैं । उस अतीत की ओर जो किसी मरी तितली-सी बंद पड़ी होती है बच्चे की किताब के किसी भूले हुए पन्ने में …

जब भी काम वाली बाई नहीं आती, मैं झाड़ू उठा कर सारा घर ख़ुद ही साफ़ कर देता । पत्नी रोकती भी — ” लाइए, मैं झाड़ू मार देती हूँ । आप क्यों तकलीफ़ कर रहे हैं? ” लेकिन मैं नहीं रुकता । हालाँकि बेटा यह देखकर नाक-भौं सिकोड़ता । वह काॅन्वेंट स्कूल में पढ़ता था । एक दिन वह कहने लगा– ” पापा, ये तो गंदा काम
है । मेड्स का काम है । वहाइ डु यू डू दिस डर्टी वर्क? ”

 तब मैंने उसे समझाया — ” बेटा, अपने घर का सारा काम ख़ुद करना आना चाहिए । कोई काम गंदा नहीं होता । अगर एक हफ़्ता मेड नहीं आएगी तो क्या तुम गंदगी में ही पड़े रहोगे? फिर जो काम पसीना बहा कर किया जाता है, जो काम मेहनत से किया जाता है , वह काम कभी डर्टी नहीं होता । “धीरे-धीरे बेटा भी यह बात समझ गया । अब कभी-कभी काम वाली बाई के नहीं आने पर वह भी घर में झाड़ू लगा देता है ।

” … पहेलियाँ मत बुझाइए । अब साफ़-साफ़ बताइए कि किसकी याद आ जाती है आपको झाड़ू देखकर ? ” पत्नी पूछ रही थी ।

 वह काॅलेज में मेरी सहपाठी थी । उसकी माँ लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा मारती थी । उस इलाक़े के एक मास्टर साहब ने उसे मुँहबोली बेटी बना कर पढ़ाया-लिखाया था । उसका नाम कुछ भी हो सकता था — धनिया, झुनिया … । लेकिन असल में उसका नाम कमला था । ” मैंने कहा ।

” तो आपको एक काम वाली बाई की बेटी से इश्क़ हो गया! ” पत्नी ने व्यंग्य से कहा ।
” क्यों? काम वाली बाई की बेटी इंसान नहीं होती ? उससे इश्क़ करना गुनाह है क्या ? ” मैं बोला ।
इस पर पत्नी चुप रही ।
मैंने फिर कहना शुरू किया — ” जितनी मेधावी छात्रा थी वह , उतना ही ख़ूबसूरत उसका व्यक्तित्व था ।”
” फिर क्या हुआ? आपने उसी से शादी क्यों नहीं कर ली ? ” पत्नी ने पूछा । उसके स्वर में थोड़ी जलन थी ।

” हालाँकि वह मेरे साथ पढ़ती थी , हँसती-बोलती थी , लेकिन उसके चेहरे पर उसका दर्द भरा इतिहास हमेशा ज़िंदा रहता था । हमारे बीच जातियों के जंजाल का बार्ब्ड-वायर फ़ेंस मौजूद था । मैं इस कँटीली तार के फ़ेंस को पार करना चाहता था । फ़ेंस के उस पार वह थी । फ़ेंस के इस पार मैं । ” कमला की माँ की झुग्गी जिस जे. जे. क्लस्टर में थी उस जगह को एक बिल्डर ने ख़रीद लिया था । बिल्डर के गुंडे झुग्गी वालों को वहाँ से खदेड़ने के लिए उन्हं  डरा-धमका रहे थे । हालाँकि कमला अपने मुँहबोले पिता मास्टरजी के घर रहती थी लेकिन वह हफ़्ते में एकाध बार अपनी माँ और भाई-बहनों से मिलने के लिए माँ की झुग्गी में ज़रूर जाती थी । ”

 ” कमला के पिता नहीं थे क्या ?” यह पत्नी की आवाज़ थी ।
 ” तुमने खैरलाँजी और मिर्चपुर की घटनाओं के बारे में पढ़ा-सुना है न । कमला के पिता अपने गाँव में उस ज़माने के खैरलाँजी-मिर्चपुर की बलि चढ़ गए । ऊँची जाति वालों के हमले में कमला के चाचा, ताऊ दादा वग़ैरह भी मारे गए थे । तब कमला की माँ किसी तरह जान बचा कर , कमला और उसके दो छोटे भाई-बहनों को लेकर इस शहर में भाग आई थी । ” मैंने कहा ।
” ओह ! ” पत्नी के मुँह से निकला । ” फिर क्या हुआ ? ”
” बिल्डर के गुंडे लगातार झुग्गी वालों को डरा-धमका रहे थे । स्थानीय राजनेता और माफ़िया भी बिल्डर से मिले हुए थे । एक रात कमला अपनी डरी-सहमी माँ और भाई-बहनों से मिलने गई । देर हो जाने की वजह से उस रात वह अपनी माँ की झुग्गी में ही रुक गई । वह रात उसकी अंतिम रात बन गई । ” बाहर पाशविक झुटपुटा ढह रहा था ।

” क्या? ” पत्नी को जैसे झटका लगा ।
” हाँ! बीच रात में बिल्डर के गुंडों ने पूरी झुग्गी बस्ती में जगह-जगह आग लगा दी । झुग्गी वाले नींद में ही जल कर मर गए । उनमें कमला , उसकी माँ और उसके भाई-बहन भी थे । ” मैंने कहा । मेरी आवाज़ रुँध गई थी । गले में कुछ फँस गया था । आँखें नम हो गई थीं ।

पत्नी ने मेरा हाथ पकड़कर मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया । मुझ पर झुकते हुए उसने धीरे से पूछा — ” आप बहुत प्यार करते थे उससे ? ”

बाहर अब सलेटी अँधेरा चूरे-सा झरने लगा था । एक थरथराहट समूची शिला-सी बह रही थी मेरी धमनियों में । वह थरथराहट पत्नी के वक्ष में मुँह छिपाए थी ।
” बिल्डर के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं हुई ? ” पत्नी ने पूछा ।
” उसकी एप्रोच ऊपर तक थी । उसके पास रुपया था । कांटैक्ट्स थे । इस घटना को शाॅर्ट-सर्किट की वजह से हुआ हादसा बता कर रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया । कहा गया कि झुग्गी वालों ने पोल पर काँटे डाल कर बिजली के दर्जनों अवैध कनेक्शन ले रखे थे । उन्हीं में स्पार्किंग की वजह से यह दुर्घटना घटी । जानती हो , अब उस जगह पर क्या है ? ” मैंने पत्नी की गोद में से सिर उठा कर कहा ।
” क्या ?”
” वहाँ अब शहर का मशहूर अटलांटिक माॅल है जहाँ सभी मल्टी-नेशनल कम्पनियों की चमचमाती दुकानें हैं । शो-विंडोज़ में सजे-धजे मैनेक्विन्स हैं । एस्केलेटर्स हैं । शीशे वाली लिफ़्ट है । सारे चर्चित बहुराष्ट्रीय ब्रांड हैं । जहाँ रोज़ाना बाज़ार को ख़रीद कर घर ले आने के लिए अपार भीड़ जुटी होती है । वहीं जला कर मार डाली गई थी कमला , उसकी माँ, उसके भाई-बहन और उन जैसे दर्जनों बदक़िस्मत झुग्गी वाले । । ”
” अब आप उधर से गुज़रते हैं तो आपको कैसा लगता है? ”

 ” कहीं पढ़ा था — जगहें अपने-आप में कुछ नहीं होतीं । जगहों की अहमियत उन लोगों से होती है जो एक निश्चित काल-अवधि में वहाँ मौजूद होते हैं ।आपके जीवन में उपस्थित होते हैं । उसे भरा-पूरा बना रहे होते हैं । मैं जब-जब उस माॅल को देखता हूँ , मुझे कमला और दूसरे झुग्गीवालों की दर्दनाक मौत याद आती है । यह माॅल उनकी लाशों पर खड़ा है ।” मैंने कहा । एक पुराना दर्द जैसे ठण्ड के मौसम में फिर से उखड़ आया था ।

” एक बात पूछूँ ? क्या आपके कमला से अंतरंग सम्बन्ध थे? ” यह पत्नी थी । अपने अधिकार-क्षेत्र की सीमा पर मुस्तैद प्रहरी-सी …

और मुझे वह शाम याद आ गई जब काॅलेज के बाद कमला मेरे साथ मेरे किराए के मकान पर आ गई थी ।

सुबह मैं जल्दी-जल्दी काॅलेज के लिए भाग लिया था । सारा कमरा बेतरतीब पड़ा था । मेरा गीला तौलिया सिलवट भरी चादर वाले बिस्तर पर मुचड़ा पड़ा था । कुर्सी पर सुबह उतारे हुए जांघिया और बनियान पड़े हुए थे । ऐश-ट्रे बना दी गई एक कटोरी में ढेर सारी राख जमा थी और जल्दी में आधी पी कर बुझा दी गई एक सिगरेट भी वहीं पड़ी थी । कमरे में सुबह झाड़ू लगाना भूल गया था । फ़र्श गंदा था । मेज़ पर चाय की जूठी प्याली और एक तश्तरी पड़ी थी जिसमें सुबह हड़बड़ी में बनाकर खाए ब्रेड-आॅमलेट के कुछ टुकड़े भी बचे हुए थे । कोने में मकड़ी के जाले थे ।दीवार पर मधुबाला की पोस्टर थी जिस पर ग़र्द की एक परत कपड़े से साफ़ कर दिए जाने की प्रतीक्षा में बूढ़ी हो रही थी । तो यह था मेरा कमरा जहाँ कमला को बुलाने से पहले मैंने इस सब के बारे में सोचा ही नहीं था ।

मैंने जल्दी से कमरे की बेतरतीबी को कुछ ठीक किया । कमला कुछ सकुचाई-सी कुर्सी पर बैठ गई । पलंग के नीचे से झाड़ू निकाल कर मैं फ़र्श बुहारने लगा ।  और तब कमला ने कहा था — ” जानते हो प्रशांत, यातनाओं के सैकड़ों-हज़ारों वर्ष ज़िंदा हैं झाड़ू में ।” उसका आधा चेहरा रोशनी में , आधा अँधेरे में था । उसका कथन बिना प्रश्नवाचक चिह्न का एक सुलगता हुआ सवाल था जिसे अभी हल होना था । सदियों की पीड़ा जैसे उसके चेहरे पर जम गई थी ।

मैं झाड़ू बिस्तर के नीचे रख कर उसके पास चला आया था । कँटीली तारों के फ़ेंस के दूसरी तरफ़ । स्वेच्छा से    हौले से उसका हाथ पकड़ कर मैंने प्यार से कहा था — ” स्मृति की पपड़ी को मत कुरेदो । घावों से ख़ून निकल आएगा ।”

यह कह कर मैंने उसके चेहरे पर गिर आई बालों की लटों को पीछे हटा कर उसका माथा चूम लिया था ।कमला का खिंचा हुआ चेहरा मेरा स्पर्श पा कर धीरे-धीरे नर्म पड़ने लगा था ।फिर उसके चेहरे पर एक सलोनी मुस्कान आ गई थी जिसका मैं दीवाना था । हमारे भीतर इच्छाओं के निशाचर पंछी पंख फैलाने लगे थे । फिर कमरे की ट्यूब-लाइट बुझ गई थी और ज़ीरो वाट का बल्ब जल गया था । एक चाहत भरी फुसफुसाहट उभरी थी । फिर एक मादक हँसी गूँजी थी ।

खिड़की के बाहर एक सलेटी रात रोशनी के बचे-खुचे क़तरे बीन कर ले जा रही थी । लेकिन कमरे के भीतर हमारे अन्तर्मन रोशन थे ।

 धीरे-धीरे हवा कसाव से भर गई । दीवार पर दो छिपकलियाँ आलिंगन-बद्ध पड़ी थीं । मैं अपनी प्रिया के स्नेह-पाश में था ।जैसे सबसे ज़्यादा चमकता हुआ नक्षत्र मेरे आकाश में था । उसके भीतर से सम्मोहक ख़ुशबुएँ फूट रही थीं । ज़ीरो वाट के ताँबई उजाले में मांसल सुख अपने पैर फैला रहा था । मेरी धानी-परी मेरी बाँहों में थी । मेरी मरमेड मेरी निगाहों में थी । ऊपर गेंहुआ शंख-से उसके उत्सुक वक्ष थे जिनकी जामुनी गोलाइयों में अपार गुरुत्वाकर्षण था ।नीचे ठंडी सुराही-सी उसकी कमनीय कमर थी जहाँ पास ही महुआ के फूलों से भरा एक आदिम जंगल महक रहाथा । बीच समुद्र में भटकता जहाज़ एक हरे-भरे द्वीप पर पहुँच गया था ।

एक ऐसा समय होता है जब तन और मन के घाव भरने लगते हैं , जब सपने सच होने लगते हैं , जब सुख अपनी मुट्ठी में होता है और मुँदी आँखें फिर से नहीं खुलना चाहतीं । जब सारी चाहतें ख़ुशबूदार फूलों में बदल जाती हैं और जीभ पर शहद का स्वाद आ जाता है । वह एक ऐसा ही पल था — घनत्व में भारी किंतु फिर भी बेहद हल्का । समय का रथ एक उत्सव की राह पर से गुज़र रहा था ।

अब हम दोनों कँटीली तारों के फ़ेंस के एक ही ओर थे । मन में उजाला लिए । उस रात बिस्तर पर एक-दूसरे से लिपटे हुए हमने ढेर सारी बातें की थीं । सपने सँजोए थे । मुझे क्या पता था कि उन सपनों की तह में मौत थी । मुझे क्या पता था कि मैं फूटने से ठीक पहले एक पारदर्शी बुलबुले को देख रहा था । ठीक दो दिन बाद कमला अतीत बन गई थी ।  इतिहास बन गई थी । मेरी उड़ान का आकाश खो गया था…

 ” बताइए न , क्या आपके कमला से अंतरंग सम्बन्ध थे ? ” पत्नी दूरबीन ले कर मेरे अतीत की दिशा में दूर तक देखना चाह रही थी ।
मैंने अपने पैरों के नीचे स्मृति की जमी हुई झील की पतली परत को चटखते हुए महसूस किया । डूबने का ख़तरा मँडराने लगा था ।
जवाब में मैंने कुछ नहीं कहा । केवल पत्नी का माथा चूम लिया । मैं अपनी पत्नी से भी प्यार करता था । वह मेरे बच्चों की माँ थी ।
पता नहीं , पत्नी ने मेरी इस हरक़त का क्या अर्थ निकाला । शायद वह सब कुछ भाँप गई । स्त्री की छठी इंद्रिय सब जान जाती है । लेकिन वह इतनी बड़ी बात भी झेल गई । बहुत बड़ा कलेजा है उसका । मैं इसके लिए उसे सलाम करता हूँ ।

 इस घटना के बाद हमारे जीवन में केवल एक बदलाव आया । अब काम वाली बाई के नहीं आने पर जब कभी मैं पूरे घर में झाड़ू लगा रहा होता हूँ तो मेरी पत्नी मुझसे झाड़ू ले लेने का प्रयास नहीं करती है ।

महिला मताधिकार पर बहस : सन्दर्भ बिहार विधान परिषद ( १९२१ , १९२५, १९२९ )

डा मुसाफिर बैठा

डा मुसाफिर बैठा कवि और सामाजिक -सांस्कृतिक विषयों के चिन्तक हैं . सम्प्रति बिहार विधान परिषद् में कार्यरत हैं. संपर्क : 09835045947, musafirpatna@gmail.com

( बिहार विधान परिषद में महिला मताधिकार के प्रस्ताव तीन बार आये . १९२९ में महिला मताधिकार पारित करने वाला बिहार उन राज्यों में था , जो काफी हद तक इस अधिकार के खिलाफ  अड़ियल थे . १९२१ , १९२५ ,१९२९ में प्रस्ताव पर बहस में वे सारे पुरुषवादी विमर्श , कुतर्क और चालाकियां दिखते हैं , जो आज महिला आरक्षण बिल के सन्दर्भ में हमारे सामने हैं . अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद  और उसकी समीक्षात्मक प्रस्तुति कर रहे हैं डा. मुसाफिर बैठा .)

वाद-विवाद का यह भाग महिलाओं के मतदान के विषय में तीन मुद्दों पर बात करता है और यह उनके प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर बहस का वृहतर हिस्सा बनता है.महिलाओं के शिक्षा, स्वास्थ्य-सुविधा से वंचित होने एवं बाल-विवाह की प्रथा से नकारात्मक रूप से प्रभावित होने के चलते बिहार की महिलाओं की स्थिति तत्कालीन पढ़े-लिखे बिहारी अभिजन वर्ग के लिए चिंतन का विषय थी. विगत शताब्दी के आरंभिक दशकों में, बंगाल तथा मद्रास एवं बॉम्बे प्रान्त के मुकाबले बिहार में महिलाओं की साक्षरता दर काफी कम थी. महिला साक्षरता के इस परिप्रेक्ष्य में बिहार के शिक्षित मध्यम वर्ग द्वारा विधान परिषद् एवं अन्य सार्वजनिक विमर्शों में बाल-विवाह पर रोक एवं महिलाओं के मताधिकार मिलने पर एक साथ जोर दिया जा रहा था.सन 1912में मोहन राय सेमिनरी में श्रीमती मधोलकर की अगुआई में आयोजित एक सभा में बाल-विवाह के अभिशाप को खत्म करने एवं महिलाओं के बीच शिक्षा का प्रसार करने के लिए कुछ जरूरी उपाय सुझाये गए.
बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के आते-आते महिलाओं का मताधिकार विधान विषयक एक केन्द्रीय मुद्दा बन गया था. 22 नवंबर1921को बाबू देवकी प्रसाद सिन्हा ने सदन में महिला-मताधिकार पर एक विशेष संकल्प लाया. यह इस अर्थ में ‘विशेष’ था कि सदन द्वारा इसके पारित होने के बाद सरकार के लिए यह बाध्यकारी हो जाता कि वह इस सम्बन्ध में जरूरी कदम उठाये.अपने भाषण के केन्द्रीय बिंदु पर आने से पहले इस मुख्य वक्ता ने दो बातों पर जोर दिया. प्रथम कि महिलाओं के मताधिकार की मांग पर अन्य मंचों पर  बहस एवं विचार-विमर्श हुए हैं. उन्होंने 1918 के उस वाकये की भी हल्की चर्चा की कि कैसे बॉम्बे की कुछ नामचीन महिलाओं ने महिला-मताधिकार के प्रश्न पर बॉम्बे प्रांतीय सम्मलेन में प्रतिनिधित्व किया और सम्मेलन ने इसपर अपनी मुहर लगाई. उन्होंने सदन को यह भी बताया कि 1918 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग दोनों ने इसी तरह के एक संकल्प को अपनी स्वीकृति दी थी. उन्होंने एक महिला संघ की कुछ महिलाओं के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए सरोजिनी नायडू के लन्दन दौरे का सन्दर्भ भी दिया जोमहिला-मताधिकार के मुद्दे पर समर्थन जुटाने के प्रयास में था. यह प्रयास फलीभूत भी हुआ. लन्दन की सदन (ब्रिटिश पार्लियामेंट) की संयुक्त समिति ने इस मुद्दे पर संज्ञान लिया.

अपने इस संकल्प में उन्होंने सदन के सदस्यों के उन पूर्वग्रहपूर्ण ‘भ्रांत धारणाओं’एवं ‘आशंकाओं’का भी संज्ञान लिया जो संकल्प के पारित होने के बाद के प्रभावों के बारे में थीं.पहला, सदन में लिंग की स्थिति में परिवर्तन का था जो अगले चुनाव के बाद विधान परिषद् में महिलाओं के बढ़ी संख्या में आने और बैठने के फलस्वरूप घटित होना था. दूसरे, ऐसी व्यवस्था लागूकरना सम्भव  होने पर ‘सामाजिक क्रांति’ घटित होती, क्योंकि तब महिलाएं अपनी नैसर्गिक/पुरुष निर्मित ‘घर की चहारदीवारी’ के अंदर ही सीमित नहीं रहती. तीसरे, यह भी महसूस किया गया कि चूँकि वे शिक्षा और उत्तरदायित्वों से वंचित हैं अतः वे गंभीर विमर्शों में हिस्सेदारी के योग्य नहीं हो सकतीं. चौथी धारणा यह रखी गयी कि महिलाओं को यदि निर्बाध मताधिकार दे दिया गया तो उन्हें पुरुषों के अनुपात से अधिक ही मताधिकार मिल जायेगा क्योंकि पुरुषों के मताधिकार पर कतिपय निर्बंध भी लगे हुए हैं.

महिलाओं के मताधिकार की आवश्यकता के कारणों में विस्तार से जाते हुए उन्होंने अनुभव किया कि  महिलाओं के बीच पर्दा प्रथा के रहने के चलते समाज में उनकी व्यापक भागीदारी में बाधा हुई. दूसरे, लेकिन, उनके अनुसार,अगर सरकार में समुचित इच्छाशक्ति होती तो इससमस्या से पार पाया जा सकता था. उन्होंने यह बात भी जोर देकर कही कि प्रान्त के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका महिलाओं को मताधिकार मिलते देखना चाहता है .तीसरे, वे मद्रास और बॉम्बे की महिलाओं का उदहारण रखकर बताते हैं कि जब उन्होंने चुनाव में सफलतापूर्वक भाग लिया है तो कोई कारण नहीं है कि बिहार में उनकी समानधर्मा वैसा न कर सके. महिलाओं द्वारा सरकार को टैक्स देने और फलतः मत देने का अधिकार रखने के अन्तःसम्बन्ध की भी चर्चा की. इसके बाद उन्होंने मातृत्व, बल कल्याण, स्वच्छता जैसे मुद्दों पर सदन में अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी तरीके से अपनी बात रखने की महिलाओं की क्षमता का भी ध्यान कराया.अपने आप में यह भी रोचक था कि महिलाओं तक मताधिकार का विस्तार करते हुए मद्यपान निषेध की नीति को सफलतापूर्वक लागू करने के विषय को भी उससे नत्थी कर दिया गया. उन्होंने अमेरिकी राज्यों के उदहारण के हवाले से कहा कि जिन जिन प्रान्तों में महिलाओं को मताधिकार मिला वहाँ मद्यनिषेध लागू करने में सफलता मिली क्योंकि महिलाएं मद्यपान की बुराइयों को महसूस कर सकती थीं. और, इसी परिपेक्ष्य में उन्होंने आगे अपना पर्यवेक्षण रखते हुए कहा कि ‘जहाँ जहाँ महिलाओं ने मताधिकार पाया वहाँ वहाँ मद्यनिषेध तुरंत लागू होता गया’. फिर, उन्होंने महिला मताधिकार के समर्थन में कुछ मानवतावादी पहलुओं का जिक्र किया. उन्होंने उदाहरणों से अपने तर्क को समर्थित करते हुए कहा कि ‘राजनीति में महिला एवं पुरुष के बीच समानता एक जाना-माना सिद्धांत रहा है, लेकिन जब उन्हें वास्तवमें मताधिकार सौंपने का समय आता है तो हम इस कथन का सहारा लेते हैं- अभी तुम इस अधिकार को पाने योग्य नहीं हुए हो’. इस भेदभाव का सबसे बुरा पक्ष यह था कि वर्तमान मताधिकार नियमों के तहत महिलाओं को विदेशी, अल्पव्यस्क, पागल एवं बदमाश की श्रेणी में रखा गया था जिन्हें मतदान का अधिकार नहीं था.

बिहार विधान परिषद्

वाद-विवाद में हस्तक्षेप करते हुए राय बहादुर द्वारिकानाथ ने अपने युवा मित्र बाबू देवकी प्रसाद सिन्हा की उपर्युक्त बातों से अपनी सहमति जताई एवं उनकी भावप्रवण अपील की प्रशंसा की. उन्होंने अपनी त्वरित एवं सयानी टिप्पणी जड़ते हुए आगे कहा कि कोई भी युवा व्यक्ति इस तरह के परिवर्तनकारी संकल्प के लाये’ जानेपर गर्व महसूस कर सकता है. हालांकि लगे हाथ उन्होंने यह सुझाव भी दे डाला कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर हमें भावनाओं में न बहकर एक सतर्क रवैया अख्तियार करने की कोशिश करनी चाहिए.उनके अनुसार, ‘लिंगों की समानता’ एवं ‘बिना प्रतिनिधित्व के करअधिरोपन नहीं’ की संकल्पना वस्तुतः बहुत आकर्षक तो जरूर थी लेकिन, ‘प्रैक्टिकल पॉलिटिक्स’ के लिहाज से इनकी कुछ सीमाएं भी हैं. उन्होंने मशविरा दिया कि नगरपालिका के स्तर पर महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया जा सकता है. और, इस प्रयोग के सफल होने पर परिषद् स्तर पर भी इसे विस्तारित किया जा सकता है.

मौलवी मलिक मुख्तार अहमद ने उक्त प्रस्ताव का का कुछ सतही एवं अगंभीर आधारों पर विरोध किया. उनका तर्क था कि पुरुषों एवं महिलाओं के बीच ‘कार्यों का बंटवारा’ सदियों से चला आ रहा है और उसी के अनुरूप महिलाओं को ‘गृह प्रशासन’ यानी घरेलू काम-काज की देखभाल का जिम्मा दिया गया है.महिलाओं के लिए घर की चहारदीवारी के अंदर रहना सर्वाधिक उपयुक्त है. दूसरी तरफ, राय बहादुर हरेन्द्र नारायण महाशय ने खुले ह्रदय से प्रस्ताव का समर्थन किया. उन्होंने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि यद्यपि बंगाल में इसी तरह का एक प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया था लेकिन बम्बई एवं मद्रास प्रान्तों के सम्मेलनों तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लगातार सत्रों में इस तरह के प्रस्ताव पारित किये गए हैं.

खान बहादुर ख्वाजा मुहम्मद नूर ने प्रस्ताव की मुखालफत इस आधार पर की कि बम्बई, मद्रास एवं बंगाल प्रान्तों के मुकाबले चूंकि बिहार में महिलाओं की साक्षरता दार काफी कम है अतः “उन्हीं स्थितियों एवं आधारों को लेकर पुरुषों की तरह महिलाओं को भी मताधिकार प्रदान करना व्यावहारिक नहीं होगा.”
बाबू उमेश चन्द्र बनर्जी ने भी प्रस्ताव का विरोध का विरोध किया और अपने निर्णय के औचित्य को आधार देते हुए कहा कि उन्होंने एक पुरानी अंग्रेजी कहावत का हवाला दिया जिसका आशय था कि ‘पहले योग्य बनो फिर पाने की इच्छा करो’. उन्होंने इस बात का भी ध्यान कि बिहार शैक्षिक दृष्टि से एक पिछड़ा राज्य है और ऐसे में बम्बई एवं मद्रास जैसे राज्यों के विकास से बराबरी की बात सोचना बैल के आगे गाड़ी को रखकर आगे बढने की बेतुका काम करने के समान है. प्रस्ताव का विरोध करने के क्रम में आये उनके कुछ तर्क तो अशोभनीय तक थे. जैसे, उन्होंने कहा कि ‘सच के प्रति महिलाओं में सम्मान-भाव कम ही होता है’ तथा ‘वे बहुत बातूनी होती हैं एवं गुप्त बातों व मंत्रणाओं को छुपा कर नहीं रख पातीं’. उन्होंने ‘स्त्री-बुद्धि प्रलयंकारी’ जैसी पुरानी कहावत का भी उद्धरण दिया.उनके अनुसार, महिलाओं के व्यवहार के ये नकारात्मक गुण उन्हें मताधिकार पाने के अयोग्य ठहराते हैं.

राय बहादुर पूर्णेंदु नारायण सिन्हा ने प्रस्ताव का भरपूर समर्थन किया. उनके तर्क सुगठित थे.उन्होंने तो प्रथमतः यह बात जोर देकर कही कि महिलाओं को मताधिकार से वंचित करना एक मनमानी निर्बंधता है और यह न तो ‘औचित्य के सिद्धांत और न ही नैसर्गिक न्याय’ पर आधारित है. उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक विधान भी पुरुषों एवं महिलाओं के समान अधिकार की हिमायत करते हैं. उन्होंने महिलाओं के पक्ष में यह भी जोड़ा कि ‘हम हिंदू अपनी नित-प्रति की प्रार्थनाओं में राम और सीता का नाम लेते लेते हुए सीता-राम कहते हैं, न कि राम-सीता.

मताधिकार का प्रयोग करती महिलायें

बाबू निरसू नारायण सिन्हा ने प्रस्ताव का विरोध अपनी इस भावना के आधार पर किया कि महिलाएं ‘जनाना’ के भीतर रहकर अधिक सुरक्षित रह सकती हैं. उन्होंने जोर दिया कि यह उनके निवास-स्थान में शामिल है. ‘जनाना’ महिलाओं की पवित्रता की रक्षा का स्थान है न कि कोई कोई जेल.वे आगे भी अपने विचार रखते हुए कहते हैं कि यद्यपि वे खुद पर्दा-प्रथा के विरोधी हैं और यह सच्चाई है कि यह प्रथा राज्य में महिला-मताधिकार लागु करने में एक बड़ी बाधा है. उनकी यह धारणा भी सामने आई कि वंश को चलाने के लिए महिलाओं को साथ लेना एक प्राथमिक शर्त है. यद्यपि वे इस बात पर सहमत दिखे कि भविष्य में महिलाओं को मताधिकार दिया जाए लेकिन वे इस बात पर अड़े मिले कि अभी इसका उपयुक्त समय नहीं आया है. उन्हीं के शब्दों में,”भविष्य में जब लोग यह मान लेंगे कि अब वक्त आ गया है कि तो वे यह कर सकेंगे. हमारी अभी की कोई बात अथवा कार्य भविष्य पर बाध्यकारी नहीं हो सकता. और, परिवर्तित स्थितियों में लोग अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने को स्वतंत्र होंगे. लेकिन आज हमें इस तथ्य पर विचार करने की जरूरत है कि क्या अभी का समय ऐसे प्रयोगों के लिए उपयुक्त है?” जाहिर है, प्रस्ताव के प्रति उनका विरोध बड़ा जोरदार था. उन्होंने काफी बल देकर अपना पक्ष रखा. उनके शब्दों में, “मैं प्रस्ताव के विरोध में हूँ क्योंकि इस मत का हँथ कि उन्नत संविधान वाले किसी यूरोपीय राष्ट्र ने इस व्यवस्था को नहीं अपनाया है. मैं इसलिए भी इसका विरोध करता हूँ कि इंग्लैण्ड तक में महिला-मताधिकार अपना तो लिया गया है पर यह अभी वहाँ भी शैशवावस्था में ही है. और, कौन जानता है कि आगे इसके विरुद्ध कोई मत बन जाए? मैं इस कर्ण भी इसका विरोधी हूँ कि अभी बिहार महिला मताधिकार अंगीकृत करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि अभी पुरुषों ने ही बिहार की प्रतिनिधित्व-प्रणाली को ठीक ढंग से नहीं आजमा पाया है. अतएव, मैं इस प्रस्ताव का पूरा विरोध करता हूँ और साथ ही, आशा करता हूँ कि इसे अपने समाज में लागूकरने की सहमति देने के पूर्व हमारे दोस्त बार-बार सोचेंगे क्योंकि इससे समाज में उथल-पुथल मचाने की प्रबल शक्ति है.

मिस्टर ह्विटले ने मताधिकार के प्रस्तावक-पैरोकार बाबू पूर्णेंदु नारायण सिन्हा एवं प्रस्ताव के प्रमुख विरोधी बाबू निरसू नारायण सिन्हा के वाद-विवाद में सम्मोहक-प्रभावोत्पादक एवं ओजपूर्ण वक्तव्यों के सन्दर्भ लिए. उन्होंने कहा कि जिस पर्दा-प्रथा को महिला मताधिकार के प्रभावी होने में एक बढ़ा के रूप में देखा गया है, वह बहुत दमदार और विचारयोग्य तर्क नहीं है. उन्होंने इस बात भी बल देकर कही कि एक तर्क यह दिया जा रहा है कि बंगाल की विधान परिषद् ने इसे अभी नहीं अपनाया है. पर मैं समझता हूँ कि बिहार के मामले में इसको मद्देनजर रखने की कोई आवश्यकता नहीं है. उन्होंने एक शानदार प्रतिप्रश्न से सदन के समक्ष इस बात का जवाब यों रखा-“बिहार ही क्यों नहीं बंगाल के लिए एक पूर्वोदाहरण के रूप में सामने आये? सदन यह कदम उठा सकती है जिससे यह सन्देश जाए कि महिलाओं के चरित्र एवं क्षमताओं पर हमलोगों को भरोसा है”.
पी.के. सेन ने तो भारत के साथ-साथ समस्त संसार में ही महिला मताधिकार की मांगों में अन्तःसूत्रता जोड़ने पर बल देते हुए कहा कि मताधिकार की यह प्रक्रिया पूरे विश्व में ‘उद्भव का उत्पाद’ है न कि किसी किसी क्रांति की.और, इस मुद्दे कोप्रथम विश्व युद्ध ने निश्चित रूप से सामने लाया. वे आगे चर्चा करते हैं कि ‘प्रतिनिधित्व’ की संकल्पना हमारे देश में भी स्वीकृत हो चली है, और, इस परिप्रेक्ष्य में उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि इस पूरी बहस में वे (विरोधी) महिलाओं के प्रतिनिधित्व के अधिकार पर निषेध के पक्ष में एकी भी तथ्यपरक एवं तार्किक उदहारण नहीं जुटा सके. अपनी बातों का समाहार करते हुए उन्होंने कहा कि ‘यह एक गंभीर प्रश्न है और मुझे आशा एवं विश्वास है कि प्रस्ताव के परिणाम को निर्धारित करने में किसी पूर्वग्रह से काम नहीं लिया जाएगा तथा इसमें कोई पक्षपात नहीं बरता जाएगा, बल्कि महिलाओं को उनके यथोचित अधिकार दिलाए जाने के लिए तथ्य एवं न्याय से काम लिया जा सकेगा.डी.एन. मदन ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए मजबूती से अपना पक्ष रखा, कहा कि, स्वराज के लिए महिलाओं का शिक्षा एवं मताधिकार का पाना जरूरी है. इसके अलावा उन्होंने जोश-औ-जोर से कहा कि इन सवालों को ‘बिलकुल नयाय-दृष्टि’ से देखा जाना चाहिए.

बाबू गणेश दत्त सिंह ने यह मत रखा कि प्रस्ताव में अभी वैचारिक कच्चापन झलक रहा है. अभी की स्थिति में अधिक जरूरी स्त्री मृत्य दर में कमी और स्त्री शिक्षा में प्रसार करना है. स्त्री-शिक्षा पर बात करने के क्रम में उन्होंने कहा कि “मैं कहूँगा कि आप उन्हें मताधिकार दिलाने की बजाये शिक्षा दिलाएं एवं तत्पश्चात, शिक्षा के परिणामस्वरूप मताधिकार उन्हें स्वतः मिल जाएगा”. प्रस्ताव पर विरोधी मत रखते हुए उन्होंने आगे कहा कि “तत्कालीन मतदान-प्रणाली के चलन एवं सामाजिक स्थितियों से प्राप्त अनुभवों के आलोक में इस मुद्दे पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए”. उन्होंने यह भी कहा कि महिला मताधिकार पर जिस तरह से सदन ने फोकस किया है उसी गंभीरता से सदन ने उन दमित जातियों पर ध्यान नहीं दिया जो मताधिकार सम्बंधित समूह का बड़ा हिस्सा हैं. उन्होंने मशविरा दिया कि महिला मताधिकार के विचार को सबसे पहले नगर निकायों एवं डिस्ट्रिक्ट बोर्डों में अजमाया जाए.

मधुसूदन दास ने वाद-विवाद में भाग लेते हुए जोर दिया कि नारी सभी दैवी एवं ईश्वरीय तत्वों को समावेशित करने वाली है, उसका जीवन बलिदान का दूसरा नाम है. उनके अनुसार, महिलाओं के वोट देने कि अयोग्यता ने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में बाधा पहुंचाई है, अतः इस परिपेक्ष्य में यह संगत होगा कि उनतक मताधिकार का विस्तार किया जाए. लेकिन बाबू अम्बिका प्रसाद उपाध्याय ने उनके इस प्रस्ताव को ‘अव्यवहारिक, अनावश्यक एवं नितांत अपरिपक्व करार दिया”. हालाँकि अपने विमत को वे संतुलित करने का प्रयास भी करते नजर आये, क्योंकि उन्होंने महिला मताधिकार की संकल्पना को सैद्धांतिक रूप से उचित माना. इसमें उनका तर्क था कि ‘प्रैक्टिकल-पॉलिटिक्स’के ख्याल से यह करना अभी संभव नहीं है. उनके अनुसार, मुट्ठीभर महिलाओं की मांग को प्रान्त की समस्त महिलाओं की प्रामाणिक आवाज नहीं माना जा सकता.
उधर, बाबू छोटे नारायण सिंह प्रस्ताव से सहमत दिखे. उन्होंने यह मत व्यक्त किया कि सभ्यता के विकास में हर व्यक्ति को अपना विकास करने का अधिकार है तथा महिलाओं कि नैसर्गिक मेधा को पुष्पित-पल्लवित करने के लिए मताधिकार एक प्राथमिक पूर्व शर्त की तरह है. मौलवी सैय्यद मुबारक अली ने प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि महिलाओं को ब्रिटिश शासकों के संपर्क में नहीं आने देना चाहिए.कहा कि वे पर्दा के भीतर रहते हुए ही अपने गुणों एवं लाज को बचाए रख सकती हैं. हालांकि वे इस बात से इत्तिफाक रखते मिले कि स्वराज प्राप्ति के बाद महिला-मताधिकार को लागू किया जा सकता है.

महिलाओं का राजनीतिकरण : अधिकार लेने की पहल

बाबू श्याम नारायण शर्मा ने संक्षिप्त पर प्रभावी हस्तक्षेप करते हुए पूरे वाद-विवाद पर अपनी सार-टिप्पणी रखी. सर्वप्रथम उन्होंने यह निष्कर्ष रखा कि प्रस्ताव के समर्थक अपने विचारों के गंभीरी अथवा सार्थकता से सदन को आश्वत करने में सफल नहीं रहे हैं. न तो महिलाओं के बारे में आये संकीर्ण विचारों एवं पूर्वग्रहों को काटने में वे सफल हुए हैं और न ही बहस के विषय की गंभीरता को वे समझ सके हैं. उनके अनुसार, इतिहास का निर्णय महिलाओं के विरुद्ध है. उन्होंने आगे बताया कि पुरुषों की नजर में राजनीति से उनके बहिष्करण को नैसर्गिक माना जाता है और इसे महिलाओं पर पुरुषों का सामंती वर्चस्व एवं अन्याय में शुमार नहीं किया जाता. और, इस तरह, उन्होंने प्रस्ताव के विरोध में अपना मत दिया.बाबू देवकी प्रसाद सिन्हा, संकल्प के प्रस्तावक, अपने विचार पर अंत तक अडिग रहे. उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया कि यहाँ तक कि मताधिकार से विरोध करने वाले भी इस बात पर सहमत हैं कि यह सिद्धांत सही है परन्तु वे सावधानी बरतने पर जोर देते हुए इस ख्याल के हैं कि महिलाओं को पहले शिक्षित हो जाना चाहिए. लेकिन उन्होंने यह भी ध्यान कराया कि जो महिला-शिक्षा को पूर्व शर्त के रूप में रखने की वकालत करने वाले लोग हैं स्वयं उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने कि दिशा न के बराबर काम किया है तथा शिक्षा पर फोकस किये जाने परजोर दिए जाने के मूल में प्रस्ताव को निष्क्रिय करने की एक चाल है. उन्होंने यह भी कहा कि “पहले शिक्षा” का तर्क अब गलित सिद्धांत में आता है. मैं नहीं समझता कि बीसवीं शताब्दी में किसी के हाथों में इस मताधिकार को नकारा भी जा सकता है.

महिला मताधिकार’ पर दूसरा संकल्प बिहार विधान परिषद् के 20 मार्च, 1925को डी.एम. मदन द्वारा लय गया. उन्होंने कहा कि ‘महिला मताधिकार’ के समर्थकों को इसके पक्ष में बात-बहस करने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि समर्थन को निर्योग्यता की समाप्ति तथा जो वर्ग इस निर्योग्यता को महिलाओं पर थोपने के लिए सबसे पहले उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं उनके द्वारा एक स्वतंत्रतादायी युक्ति की ओर बढा एक कदम समझा जाए. प्रस्ताव के समर्थन में अपने तर्क रखते हुए उन्होंने अपने विचार सामान्य तौर पर व्यक्त किये. प्रथमतः उन्होंने इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट कराया कि चूँकि महिलाओं को संपत्ति एवं भूमि रखने का अधिकार प्राप्त है अतः उन्हें मताधिकार देने की गरज से भी पुरुषों के समान माना जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि अगर महिलाएं बड़े जमीन-जायदाद को सुचारू रूप से सँभालने में सक्षम हैं और वे उनपर कर-अदायगी करने के काबिल हैं तो उन्हें मताधिकार नहीं सौंपने का कोई तर्क नहीं बनता, क्योंकि यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि ‘अगर कोई कर-अदायगी के लिए जिम्मेवार है तो उसे प्रतिनिधित्व का अधिकार भी जरूर दिया जाना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि मतदाता सूची में महिलाओं को दर्ज कर लेने मात्र से यह अर्थ कतई ध्वनित नहीं हो जाता कि सभी महिलाएं अपने मताधिकार का प्रयोग करने को बाध्य ही हो जाएंगी. और अगर, अपने विविध सामाजिक पूवग्रहों एवं दकियानूस चालानों के चलते उनमें से अधिकतर अपने मत का उपयोग नहीं करना चाहतीं, तो अपेक्षाकृत कम जनसँख्या वाली इस महिला आबादी के मताधिकार को अतिक्रमित भी नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने एक अभूत ही संगत सवाल बहस में सहभाग करते विधायकों के समक्ष रखा कि “क्या आप सर्वथा उपयुक्त उस व्यक्ति को केवल इस आधार पर वोट देने के अधिकार से वंचित कर देंगे कि अभी बहुत से लोग वोट देने में रूचि नहीं रखते.

उन्होंने आगे सन 1921 के वाद-विवाद का सन्दर्भ दिया जिसमें यह कहा गया था कि बिहार और उड़ीसा में महिलाओं को मताधिकार सौंपने से पहले वे देश के विभिन्न हिस्सों में महिला मताधिकार के प्रभावों का आकलन करना चाहेंगे. इस परिपेक्ष्य में उन्होंने इंग्लैण्ड तथा अन्य भारतीय प्रान्तों से अनेक उदहारण दिए जिनमें पटना उच्च न्यायलय का ‘बार’ सीनेट एवं विभिन्न विश्वविद्यालयों के सिंडिकेट आदि पुरुष-वर्चस्व वाले संस्थाओं में महिलाओं को सम्मिलित किया गया है. उन्होंने कहा कि कहीं भी यह नहीं देखा गया है कि इन विशेषाधिकारों का कहीं गलत उपयोग अथवा दुरूपयोग हुआ है. उन्होंने पुनः दुहराया कि महिला मताधिकार न प्रदान कर विधायक बलात निर्योग्यता थोपने की कोशिश कर रहे हैं जबकि यह सब करने का कोई कारण नहीं रह गया है. बल्कि इसका प्रतिफल उस प्रांत विशेष के विकास को अवरुद्ध करने वाला है.
तीसरे, उन्होंने कहा कि महिलाओं को मताधिकार नहीं प्रदान करने में एक बहुत बड़े मानवतासमूह को सताना-दबाना हो जाता है.और,यह प्रांत के विकास की गति को कमतर करने वाला है. उन्होंने कहा कि ऐसे में यह समस्या उत्पन्न करेगा क्योंकि एक राष्ट्र के रूप में भारत को विकसित करने के प्राथमिक लक्ष्य की प्राप्ति हमारे विधायकोंको कभी नहीं हो सकेगी. इस लक्ष्य की प्राप्ति तभी हो सकेगी जब भारत के सभी प्रान्त इस दिशा में प्रयत्नशील होंगे.

चौथे, उन्होंने महिला मताधिकार के प्रायोगिक पहलुओं की विवेचना करते हुए कहा कि मैं यह नहीं कह रहा कि प्रान्त की समस्त वयस्क महिलाओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज हो ही जाएँ बल्कि मैं इस विचार का हूँ कि एक ऐसी व्यवस्था हो जिसमें मताधिकार पाने की इच्छुक महिलाओं को अपना नाम दर्ज कराने का मौका मिले.उन्होंने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि इससे पहला काम यह होगा कि सरकार के संसाधन का अनावश्यक रिसाव रुकेगा, दूसरे, समाज में मताधिकार की वास्तविक मांग एवं इच्छा करने वालों का पता लग सकेगा. उन्होंने यह भी कहा कि इससे “शिक्षित नारियों, मेधावी एवं संस्कारी नारियों’ का सामने आना सुनिश्चित हो सकेगा. उन्होंने यह भी बताया कि इससे यह भी सुनिश्चित हो सकेगा कि वैसी महिलाएं (जैसे कि पर्दानशीं महिलाएं) जो इस मत-प्रणाली में भाग नहीं ले सकेंगी उन्हें मतदातासूची के तैयार होने की प्रक्रिया में किसी असुविधा का सामना नहीं करना पड़ेगा. उन्होंने यह भी जताया कि यद्यपि मैं सामाजिक मूल्यों एवं पूर्वग्रहपूर्ण प्रचलनों के प्रति अत्यंत सम्मान-भाव रखता हूँ पर एक समाज सुधारक के रूप में इन प्रचलनों को उन महिला-समूहों पर जबरदस्ती थोपने पर अपनी सहमती नहीं दूँगा. अतः मताधिकार के प्रयोग के मामले में सभी महिलाओं को खुद ही निर्णय करने का अधिकार दिया जाना चाहिए. इसके बाद उन्होंने इस बात की विवेचना की कि कोई सरकार उन लोगों से मिलकर ही बननी चाहिए जिनपर शासन किया जाना है, और, इस हिसाब से मताधिकार के प्रश्न पर महिलाओं को अपवाद में रखना सही नहीं हो सकता. उन्होंने बतलाया कि अन्य मामलों में भी शैक्षणिक स्थिति काफी निम्न है, और ऐसे में अगर महिलाओं को अपना प्रतिनिधि खुद चुनने दिया जाता है तो इनसे जुड़ी समस्याओं का हल निकालने में काफी मदद मिल सकती है. और, इसके बाद उन्होंने अंतत अपना अंतिम निष्कर्ष विधायकों को इस तरह से संबोधित करते हुए रखा, “क्या आप महिलाओं को वह समानता का अधिकार, खुद को अपने प्रतिनिधियों द्वारासुने  जाने का अधिकार, अपना काम खुद अपने हाथ से करने का अधिकार तथा स्वयं को शासित करने  के अधिकार देने से मना कर सकते हैं जिसपर उनका हक बनता है?”

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के साथ महिला विधायक

इस प्रस्ताव पर बाबू बिशुन प्रसाद ने अपना विरोधी मत रखा. उनका तर्क था कि पर्दा प्रथा के कारण मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों सेघरों के ‘जनाना’ के बीच संपर्क कराय जानाचूँकि संभव न होगा अतः ऐसी मतदाता सूची का तैयार किया जाना वस्तुतः संभव न होगा. इसी तरह उन्होंने कहा कि चूँकि प्रस्तावक बिहारी समाज से नहीं आते अतः उनके प्रस्ताव-विषयक उनके अधिकांश तर्क बिहार के सन्दर्भ में उपयोगी नहीं जंचते.और, अन्तः में उन्होंने यह दलील भी दी कि महिलाओं को मताधिकार सौंपने से पहले शिक्षित किये जाने की जरूरत है ताकि वे मताधिकार अमल में लाने के प्रभावों को समझने के काबिल बन सकें.

बी.ए. कॉलिंस ने भी प्रस्ताव के विरोध में अपनी बातें रखीं. उन्होंने कहा कि भारत और इंग्लैण्ड की यहाँ तुलना करना अनावश्यक प्रतीत होता है क्योंकि दोनों देशों की परिस्थितियाँ बिलकुल अलग-अलग हैं.उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में तो पढ़ी-लिखी एकल जिंदगी जीने वाली महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या है जो अपने जीविकोपार्जन के लिए काम करती हैं, वहाँ इस तरह के विधान उनकी जिंदगी को सीधे-सीधे प्रभावित करने में सक्षम हैं.लेकिन भारत में यह बात लागू नहीं होती क्योंकि यहाँ संयुक्त परिवार की परिपाटी में परिवार के पुरुष की कमाई पर महिलाएं आश्रित होती हैं और इसलिए ऐसे विधानों से महिलाओं को प्रत्यक्षतः कोई लाभ नहीं मिलने वाला.उनका यह भी कहाँ था कि यहाँ इस प्रांत में महिला-मताधिकार की वस्तुतः कोई मांग उठी भी नहीं है. जहाँ तक इंग्लैण्ड की बात है, तो वहाँ युद्ध के प्रभाव में महिला-मताधिकार को लागू किया गया जबकि अभी भारत में इस तरह की कोई बात है भी नहीं. अंत में उन्होंने महिला-मताधिकार को लागू किये जाने परसंभावित नकारात्मक प्रभावों की चर्चा करते हुए कहा कि चूँकि महिलाओं में अधिकतर अशिक्षित ही हैं अतः मत प्रयोग के सिद्धांतों की बहुत समझ नहीं हो सकती और ऐसे में राजनेताओं एवं उनके एजेंटों द्वारा उन्हें बहलाना, फुसलाना और भरमाया जाने का डर हमेशा बना रहेगा, और ऐसा होने पर लोकतंत्र और कमजोर हो जाएगा. अंत में, प्रस्ताव पर वोट कराए जाने के पूर्व बाबू राजीव रंजन प्रसाद ने भी प्रस्ताव का विरोध करते हुए अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि पुराने समय में महिलाओं को मताधिकार देने अथवा राज-काज चलने में उनको हिस्सेदारी सौंपने की कोई जरूर नहीं महसूस की गयी क्योंकि महिलाओं को पुरुषों का अभिन्न अंग ही माना जाता रहा है, और अब भी ऐसा ही है, अतः महिलाओं को अलग से मताधिकार देने की कोई आवश्यकता नहीं है.और, अपने तर्क के समर्थन में में उन्होंने भारतीय सन्दर्भ के ‘अर्द्धांगिनी’ शब्द  का हवाला दिया जिसको विवाहित स्त्रियों के लिए पति के आसंग में प्रयुक्त किया जाता हैऔर जिसका शाब्दिक अर्थ ‘आधा अंग’ होता है.

और, इसके पश्चात प्रस्ताव पर मतदान कराया जाता है जो अस्वीकृत हो जाता है.


तीसरी बार महिला-मताधिकार के अनुमादन के लिए बिहार विधान परिषद् में 06 फरवरी, 1929  को प्रस्ताव लाया जाता है.वाद-विवाद की शुरुआत करते हुए बाबू गोदावरी मिश्रने कहा कि इसी तरह के प्रस्ताव पूर्व में दो बार सदन में लाए जा चुके हैं. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि ‘पुरुषों की दासता’ से उबार कर महिलाओं का सशक्तिकरण करने के प्रयास वाले अनेक आन्दोलन दुनिया भर में फ़ैल गए हैं और पुरुषों की तरह ही नारियां भी सार्वजनिक जीवन में दखल पाने के लिए कृतसंकल्पित हो रही हैं. उन्होंने आगे कहा कि राजनीति में महिला भागीदारी की अनुपस्थिति के चलते नीति निर्धारण में महिला हितों की अनदेखी हुई है जिसे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण तत्व में शामिल होना चाहिए था. उन्होंने बताया कि राजनीतिक हलके में महिलाओं की भागीदारी उनकी राजनीतिक समझदारी एवं नेतृत्व क्षमताको बढाएगा. उन्होंने बल देते हुए कहा कि इसी पृष्ठभूमि में बिहार और उड़ीसा प्रांत में महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया जाना चाहिए.
प्रस्ताव के समर्थन में कृष्ण महापात्र पहले वक्ता थे. उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में भारत में महिलाओं को बतौर राजनीतिज्ञ महत्वपूर्ण हैसियत प्राप्त थी लेकिन उनपर सामाजिक निर्योग्यताएं थोपे जाने के फलस्वरूप उनकी इस स्थिति में ह्रास आया है. उन्होंने बताया कि प्रांत में पर्दा विरोधी आंदोलन एवं अखिल भारतीय नारी सम्मलेन जैसे होने वाले आयोजन राज्य की महिलाओं के प्रगति-पथ पर अग्रसर होनेके सुबूत हैं.और, ऐसे संकल्पों के देश के अन्य हिस्सों में पारित होने को दृष्टिगत रखते हुए मैं इस पक्ष में हूँ कि यह प्रस्ताव बिहार विधान परिषद् में भी पास किया जाए.

शरत चंद्र राय ने भी इस प्रस्ताव का यह आधार लेते हुए स्वागत किया कि अब वह समय नहीं रहा कि महिलाओं को चुनावोंमें मतधिकार से वंचित रखा जाए.उन्होंने ‘दकियानूस मुस्लिम तुर्की’ एवं भारत के अन्य प्रान्तों द्वारा महिलाओं को मताधिकार दिए जाने के उदाहरणों को रखते हुए इस बात पर खास जोर दिया कि अगर यह नहीं होता है तो बिहार की छवि एक दकियानूस एवं पिछड़े प्रांत की बनेगी. लेकिन उन्होंनेयह भी कहा कि चूँकि संपत्ति धारण करने की सामान्य अर्हता अधिकांश महिलाओं में नहीं है अतः इसी अनुरूप अर्हता में भी बदलाव किया जाना चाहिए तथा इसमें न्यूनतम शैक्षिक अर्हता विषयक कोई परंतुक डाला जाना चाहिए. ब्रजनंदन दास ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया और कहा कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार प्रदान कर हम पुरातनपंथी समाज की जकड़नों से उन्हें मुक्त करने, उन्हें शिक्षित करने एवं एक सम्मानपूर्ण जीवन जीने की दिशा में उनके प्रयासों में उत्साहवर्द्धन कर सकेंगे.
केसरी प्रसाद सिंह संकल्प का समर्थन करते हुए इस मत के थे कि महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखकर हम स्वराज नहीं प्राप्त कर सकते क्योंकि स्वराज के लक्ष्य की प्राप्ति में महिलाओं का साथ लिया जाना नितांत आवश्यक है. उन्होंने यह भी कहा कि यह पुरुषों के हित में है कि महिलाओं को जल्द से जल्द मताधिकार मुहैया किया जाए न कि हम इस बात का इंतज़ार करे कि अंग्रेजी आन्दोलन की तरह हमारी महिलाएं भी मताधिकार के लिए कोई आन्दोलन छेड़े.

लेकिन सर गणेश दत्त इस प्रस्ताव के पुरजोर विरोध मेंउतरे. उन्होंने सबसे पहले यह कहा कि चूँकि महिलाएं अभी शैक्षणिक दृष्टि से काफी निम्न स्तर पर हैं, राजनीति की वास्तविकताओं का उन्हें ज्ञान नहीं है और पर्दा प्रथा चल रही है अतः अभी वेवोट देने का अधिकार रखने के योग्य नहीं हैं. उन्होंने कहा कि केवल कुछ महिलाएं ही मताधिकार पाने की इच्छुक हैं और व्यापक मताधिकार पाने हेतु उन्हें पहले अपने आपको इस अधिकार पाने लायक बनाना चाहिए तथा इसके बाद ही उन्हें इसकी चाह करनी चाहिए. उन्होंने प्रस्ताव के सम्बन्ध में आने वाली कुछ प्रत्यक्ष कठिनाओं की ओर भी ध्यानाकर्षण कराया. मसलन, संपत्ति रखने के अधिकार विषयक बंधन के चलते बहुत कम ही महिलाएं मताधिकार की योग्यता पा रही थीं. दूसरे, पर्दा प्रथा के चलन के चलते पूरी मतदाता सूची तैयार करना संभव न था. और, उन्होंने यह भी तर्क रखाकि महिलाओं को वोट देने का अर्थ उन्हें राजनीति के लिए और अधिक समय खर्च करने का अवसर देना तथा अपने घरेलू दायित्वों को नज़रअंदाज़ का मौका देना होगा.

जी.ई. ओवेन ने संकल्प का पक्ष लिया. उन्होंने कहा कि यूँ तो महिलाओं को मताधिकार सौंपने मात्र से समग्र राजनीतिक परिदृश्य में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं लाएगा पर यह महिलाओं के विकास, सामाजिक उत्थान एवं शिक्षा विषयक विधेयकों पर विचार-विमर्श पर जरूर सकारात्मक प्रभाव डालनेवाला साबित हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि प्रान्त में महिलाओं को जकड़ रखने वाली पर्दा प्रथा एवं तमाम अन्य दुर्बलताओं का खात्मा भी इसके परिणामस्वरूप हो सकेगा.

द्वारिका नाथ, जिन्होंने इसी भाव के पिछले दो प्रस्तावों का विरोध किया था, इस बार पक्ष में बोले. उन्होंने कहा कि मैं पिछले दो मौकों पर प्रस्ताव के विरोध में रहा क्योंकि तब मुझे लगा था कि बिहार और उड़ीसा प्रान्त की महिलाएं आमतौर पर उतना विकसित एवं शिक्षित नहीं हो सकी हैं कि वे मताधिकार पा सकें, लेकिन राज्य में विभिन्न पर्दा प्रथा विरोधी आंदोलन एवं महिला सम्मेलनों को देखते हुए मुझे यह एहसास हो चला है कि अब हमारे प्रदेश की आम महिलाएं विकसनशील शील हैं और इसलिए मैंने महिला-मताधिकार के पक्ष में मत देने का फैसला लिया है. उन्होंने यह भी कहा कि इससे विधान परिषद की सदस्यता तक पाने और ऐसे तमाम अन्य राजनीतिक अधिकार लेने की उनकी योग्यता की परीक्षा भी हो सकेगी.

पिछले दो अवसरों पर सदन में आये इस तरह के प्रस्तावों का जिन निरसू नारायण सिन्हा ने विरोध किया था, इसबार वे भी संकल्प के पक्ष में उतरे. उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पूर्व के ऐसे अवसरों पर संकल्प के विरोध में मत डालने का मेरा कारण यह था कि मैंने देखा था कि अभी तो विकसित देशों में भी महिलाओं को यह मताधिकार प्राप्त नहीं है, लेकिन इस समय तक अधिकांश विकसित राष्ट्रों ने महिलाओं को वोट का अधिकार प्रदान कर दिया है और उन्होंने यह सिद्धांत स्वीकार कर लिया है कि महिलाओं को पुरुषों के सामान ही राजनीति में भाग लेने का स्वाभाविक अधिकार है तथा इन अधिकारों से उन्हें वंचित रखना पुरुषों का अन्याय है. उन्होंने महिलाओं को बौद्धिक रूप से पुरुषों की बराबरी में रखते हुए कहा कि अगर शैक्षिक योग्यता को अगर अनिवार्य किया जाता है तो भारतीय आबादी का एक काफी बड़ा हिस्सा राजनीति में भागीदारी करने के अधिकार से वंचित रह जायेगा, अतः साक्षरता दर के कम होने के बहाने से इस मताधिकार को सीमित नहीं किया जाना चाहिए. निम्न साक्षरता स्तर, पर्दा प्रथा, राजनीति का जमीनीज्ञान आदि की निर्योग्यताओं के आधार पर वोट के अधिकार को स्थगित करने के सर गणेश दत्त की हिमायत का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि इन निर्योग्यताओं की प्रकृतिचक्रानुगामी होती है क्योंकि ये निर्योग्यताएं आम महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की वंचना के आधार पर पलती हैं. उन्होंने एक वैधानिक स्थिति का हवाला दिया जिसके तहत महिलाओं एवं पागलों को वोट देने का अधिकार नहीं है. उन्होंने एक बेहद तर्कसमृद्ध सवाल प्रतिभागी पार्षदों के समक्ष रखा कि “क्या आप किसी नियम के तहत अपने घर की महिलाओं को पागलों के साथ रखते देखना पसंद करेंगे?” उन्होंने अपनी बातों का समाहार करते हुए कहा कि यदि यह प्रस्ताव महिला समुदाय के लिए विशेषतः एवं समग्रतः देश की प्रगति के उद्देश्य से लाया गया है तो पार्षदों को इस संकल्प के पक्ष में वोट करना चाहिए.

इस संकल्प का सैयद अब्दुल अज़ीज़ द्वारा विरोध किया गया. उनका कहना था कि महिलाओं को मताधिकार प्रदान करने का अभी उपयुक्त समय नहीं आया है क्योंकि महिलाओं को वोट का अधिकार दिए जाने से उनके विकास एवं उत्थान में पुरुष अपना समर्थन देने में उदासीनता बरतने लगेंगेऔर इससे इन आन्दोलनों को धक्का लगेगा. उन्होंने यह भी बताया कि बिना समुचित विकास किये महिलाओं को मताधिकार दिलाने पर उन्हें चुनावी धंधेबाजों द्वारा आसानी दिग्भ्रमित किये जाने एवं बहलाए-फुसलाये जाने की सम्भावना रहेगी. अतएव, उन्होंने निष्कर्ष रखा कि महिला-मताधिकार प्रदान करने का समय अभी नहीं आया है. और, इस प्रकार से संकल्प/प्रस्ताव पर वाद-विवाद/बहस पूरी हुई एवं यह 14 के मुकाबले 47 के बहुमत से पारित हुआ.
ऊपर विश्लेषित किये गए तीनों वाद-विवादों में पहला, जो 1921 में घटित हुआ, तर्क-वितर्क की विविधता, भावनाप्रण/ज़ज्बाती अपीलों, तीव्र राजनीतिक तथ्यबयानी के साथ साथरूढ़िवादीअभिव्यक्तियों के ख़याल से एक शानदार दस्तावेज़ है.हम महसूस करते हैं कि इन वाद-विवादों का प्रकाशन और पहले होना चाहिए था क्योंकि स्त्री-इतिहास का कोई छात्र अथवा स्त्री विषय पर काम करने वाला कोई सामाजिक कार्यकर्ताआरंभिक चरणों के महिला-मताधिकार के एजेंडे की सघनता को इन बहसों में उतरे बिना नहीं समझ सकता.यद्यपि कि 1921 में आया यह प्रस्ताव गिर गया था लेकिन दीवार पर इसके द्वारा लिखी गयी इबारत का सन्देश साफ़ था, कि इस विचार को अपनाने का समय आ गया था. इसे कुछ समय के लिए टाला तो जा सकता था पर इसकी अनिवार्यता को झुठलाया कतई नहीं जा सकता था. आगे हुए 1925 एवं 1929 के वाद-विवाद इसका विस्तार मात्र थे जिससे यह ध्वनित हो रहा था कि महिला-मताधिकार को सहमति देने वाले स्वरों की संख्या में उतरोत्तर बढ़ोतरी ही नहीं हो रही थी बल्कि यह अधिक सकारात्मक आकार ग्रहण कर रही थी.

वाद-विवाद में संकल्प/प्रस्ताव के पक्ष-विपक्ष में रहे प्रतिभागी पार्षदों के नाम :

वर्ष 1921
प्रस्ताव के पक्ष में                                        मत प्रस्ताव के विपक्ष में मत
(21 वोट)                                                                    (31 वोट)

वर्ष 1925

प्रस्ताव के पक्ष में मत                                                                प्रस्ताव के विपक्ष में मत
(18 वोट)                                                                                       (32 वोट)

वर्ष 1929


प्रस्ताव के पक्ष में मत                                                                प्रस्ताव के विपक्ष में मत
(47 वोट)                                                                                    (14 वोट)

(बहस की यह प्रस्तुति अरुण नारायण के अतिथि सम्पादन और नीलिमा सिंह के सम्पादन में प्रकाशित ‘ निरंजना ‘ में प्रकाशित हुई थी . )

इस दुनिया से परे आख़िर है क्या

प्रांजल धर

( सविता सिंह के कविता संग्रह ‘स्वप्न समय’ की समीक्षा प्रांजल धर के द्वारा  )

कविता का एक काम यह भी है कि हमें वह एक ऐसी दुनिया में ले जाए जो हमारे अपने अनुभव के दायरे से, चाहे जिस वज़ह से सही, ज़रा दूर ही छूट जाया करती है। परिवर्तन की तरह स्थिर शायद ही कुछ होता हो, और इसी बात के काव्यात्मक पहलू को पकड़ने वाला सविता सिंह का कविता संग्रह ‘स्वप्न समय’ हमें एक ऐसे लोक का चरम निदर्शन कराता है जहाँ हम होकर भी नहीं होते और न होकर भी हम कहीं न कहीं अवश्य होते हैं। समाज में स्त्रियों की दशा किसी से छिपी नहीं है लेकिन यह बात भी जगज़ाहिर ही है कि स्त्री-विमर्श के नाम पर अधिकतर कबाड़ ही हिन्दी जगत में ‘रचा’ जा रहा है। कुछ ही रचनाएँ ऐसी हैं जो लैंगिक भेदभावों और उनके मूल में निहित आधारिक संरचनाओं का सार्थक वर्णन-विश्लेषण करती हैं और लैंगिक न्याय के स्वतःसिद्ध औचित्य को वज़नदार तरीके से रखती हैं। सविता सिंह जेण्डर और सेक्स के फ़र्क के प्रति बेहद सजग हैं और किसी कालातीत अव्याख्येय को सधे हुए अक्षरों में पिरोने का शानदार जतन करती हैं। उनका यह कविता संग्रह ‘स्वप्न समय’ मानवता के विशाल फलक को सामान्य तौर पर और आधे आसमान को सिर पर उठाने वाली स्त्रियों को विशेष तौर पर अपनी कविताई के केन्द्र में रखता है। ‘अपने जैसा जीवन’ और ‘नींद थी और रात थी’ के बाद सविता सिंह का हिन्दी में यह तीसरा कविता संग्रह है और इसमें कुल इकसठ कविताएँ हैं।

पहले के दोनों संग्रहों में अपनाए गये काव्यात्मक उपकरणों का विकास सहज ही इस तीसरे संग्रह की कविताओं में दिखता है। एक ख़ास अर्थ में यह पहले के दोनों संग्रहों की अगली कड़ी और उनका आनुभविक विस्तार है क्योंकि इस संग्रह की कविताओं में सविता सिंह ने न सिर्फ़ स्वयं को दुहराया नहीं है, बल्कि अपनी इन नवीन कविताओं के माध्यम से पाठकों को एक नितान्त भिन्न साहित्यिक स्वाद से परिचित भी कराया है। तमाम ऐतिहासिक आख्यानों से लेकर वर्तमान फ़ेमिनिज़्म तक स्त्री हाशिये की और दोयम दर्ज़े की ही नागरिक रही है। और तो और, सभ्य कहे जाने वाले प्राचीन यूनान के सिटी-स्टेट्स तक में स्त्रियों को तो नागरिकता ही नहीं प्राप्त थी, दोयम नागरिकता की तो बात ही दूर है। सविता सिंह की कविताएँ बड़ी सूक्ष्मता से असन्तुलित राजनीति और बेढंगे समाज में बेहद गम्भीर राजनीतिक हस्तक्षेप करती हैं और नारीवाद के इस ज़रूरी दर्शन से वाकिफ़ हैं कि जो भी व्यक्तिगत है, वही राजनीतिक है। ‘रक्त प्रेम का’ एक ऐसी कविता है जो किसी हतदर्प स्त्री के पराजय बोध से नहीं उपजी है, बल्कि किसी भी आम स्त्री को घेरने वाली विसंगतियों, विडम्बनाओं और निहायत दैनंदिन व्यतिक्रमों से पैदा हुई है। यहाँ स्व का विस्तार है और ऐसा विस्तार है जिसके क्षितिज तक पहुँचने के लिए किसी भी स्त्री को अपने कोमल स्वप्नों पर लम्बे समय तक कठोर और गम्भीर प्रयास करने पड़ते हैं।

आज जब मात्र यौनिकता के सहज, उच्छृंखल और बेहद चलताऊ वर्णनों को ही स्त्री विमर्श का पर्याय मान लिया गया है, तब यह बात उल्लेखनीय है कि इस ख़ास विषय पर लिखने वाला कोई रचनाकार अपने रूपकों की सर्जना किस अनोखे तरीके से करता है। कविता का एक अंश देखिये, “चली गयी थी/ उन विधवाओं के पास/ जिन्हें संभोग वर्जित है/ जिनके रेशमी स्तनों पर/ नहीं पड़ता बाहर का कोई प्रकाश/ मैं लौट सकने की हालत में नहीं थी वर्षों/ मैंने काट लिए थे अपने हाथ/ जिनसे स्पर्श कर सकती उस हृदय का/ जिसमें मेरे लिए उद्दाम वासना थी।” पश्चिम की चाहे जितनी बड़ी नारीवादी महिला क्यों न हो, चाहे वह उत्कट नारीवादी मेरी डॉली ही क्यों न हो, वह ठेठ भारतीय परिस्थितियों को समझने में समर्थ नहीं है और सविता सिंह की कविताएँ हमें इस बात की व्याख्या देती हैं कि क्यों पश्चिमी दुनिया के अनेक सिद्धान्त हमारे यहाँ लागू नहीं हो पाते। यहाँ आकर सविता की कविताएँ वैचारिकी का एक ऐसा पुख़्ता धरातल रचती हैं, जो हमारे लिए दुर्लभ क्या, करीब-करीब अलभ्य ही है।

सविता सिंह

सविता की कविता जीवन के खुरदुरे यथार्थ के पोर-पोर का जीवन्त रूपायन करती है। कला की महीन समझ रखने वाले एक दक्ष शिल्पी की तरह कवयित्री अपनी रचना-प्रक्रिया के हरेक बिन्दु पर सजग रही हैं। यह सजगता ‘सपने और तितलियाँ’, ‘चाँद तीर और अनश्वर स्त्री’ और ‘स्वप्न के ये राग’ जैसी कुछ लम्बी कविताओं में ख़ास तौर से महसूस की जा सकती है। पर, इन लम्बी कविताओं के बारे में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ क्या है? यह, कि इतने महीन मानसिक संसार में चलते हुए, जिसमें कि इस संग्रह की कवयित्री ने लगातार विचरण किया है, इतनी देर तक एकाग्रता से टिककर किसी भाव को लगभग असंदिग्ध अर्थों वाले चुनिन्दा शब्दों में बाँध ले जाना। और शायद इसीलिए ये कविताएँ अपने आकार में कुछ लम्बी हो गयीं हैं। संग्रह की एक कविता ‘तुम्हें लिखना’ इस दुनिया से और यहाँ के जाल-बवाल से पाठक को बहुत परे ले जाती है। पर, यह परे ले जाना पलायन हर्गिज नहीं है। और अपने गहनतम अर्थों में कविता है क्या ? उसे करना क्या चाहिए ? चाहे वह क्रान्तिगीतों से लबरेज कविताएँ हों या विश्व साहित्य की अन्य भावप्रवण कविताएँ, क्या यह सच नहीं है कि उन्होंने वर्तमान व्यवस्था की बुनियादी खोट को पुरअसर तरीके से उकेरा है ? ग़ौर से देखें तो सविता की कविता ‘तुम्हें लिखना’ अपने आप में ही एक कविता संग्रह है। यह हमें आधुनिक समय की जटिलताओं से जूझ रहे किसी पथिक के जीवन के उस अँधेरे कोने से दो-चार कराती है जहाँ जाने के बाद लौटना और भटकना एक जैसा ही हो जाता है, जहाँ डरना अतार्किक लगने लगता है क्योंकि डरने की चरम सीमा निडरता ही है। किसी ने शायद ठीक ही कहा है कि भय की चरम सीमा और कुछ नहीं, केवल आतंकवाद ही है। इसमें एक बारीक नज़रिये से सम्पन्न एक समर्थ कवयित्री की किंकर्तव्यविमूढ़ता है, “क्या लिखूँ यह देखने के बाद क्या कहूँ/ क्या करूँ कि अब लौटना और भटकना एक-सा हो/ खोना और मिल जाना एक/ तुम्हें लिखना इन्हीं को लिखना है/ प्रवेश करने जैसा उस अन्धकार में/ ले जाता है जो किसी अज्ञात प्रकाश की तरफ़।” पर इस किंकर्तव्यविमूढ़ता को अनिवार्य रूप से तथाकथित संकोच या हिचकिचाहट से अलग करके ही देखा जाना चाहिए। इस कविता में हरेक किस्म की अनभिज्ञता के ऐसे शव पसरे पड़े हैं जो अपनी मासूम मनुष्यता की छाप छोड़ना चाहते हैं, जिनके परिधान कठोर ज्ञान के उलझे तन्तुओं से बुने गये हैं।

सविता सिंह की कविताएँ कुछ हद तक रेडिकल हैं, पर अतार्किकता की उस सीमा तक नहीं कि मारिया रोजाइ, डाला कास्टा या सेलमा जेम्स की तरह घरेलू श्रम के लिए वेतन का प्रश्न उठाएँ, न ही इतनी ज़्यादा ठण्ढी हैं कि चुपचाप शोषण को सहन करते हुए घर-परिवार से नाना किस्म के तमगों को हासिल करती रहें। संकुचित अर्थों में कहें, तो यहाँ हमें ठेठ भारतीय मध्य मार्ग भी दिखता है जो सबके हित में ही अपना हित समझता है और यही तो साहित्य भी है शायद ! यहाँ एक कवयित्री की छोटी-छोटी नॉस्टैलजिक कामनाओं की व्याप्तियाँ हैं, तमाम बिसरी-भूली चीज़ों से जुड़ी आकांक्षाएँ हैं और आज के आपाधापी भरे जीवन की विडम्बनाएँ हैं : “आओ समा जाओ मुझमें हवा/ खेलो मुझसे/ देखूँ अपने चाँद, पहाड़, आकाश और चिड़िया/ सँभालना मुझको/ उमड़ी आती है भीतर सोन और गंडक नदियाँ/ अंग-प्रत्यंग टूटता है जाने क्यों/ बेमिल हो रही है चिरपरिचित भीतरी शालीनता/ उठती हैं लहरें ये कौन सी/ इतनी नयी।” कवयित्री यहाँ आधी दुनिया के उस कष्ट से भलीभाँति वाकिफ़ है जिसे जुडिथ मिलर ने ‘जेण्डर ट्रबल’ कहा है। इसी कष्ट का ही दुष्परिणाम है कि स्त्रियाँ चाहकर भी वह होना नहीं चाहतीं जो वे स्वयं तय करती हैं, बल्कि स्वयं अपनी ही मर्ज़ी के ख़िलाफ स्त्रियाँ वह होना चाहने लगती हैं जो होना उन्हें बताया, पढ़ाया या सिखाया जाता है। कहना चाहिए कि प्राथमिक समाजीकरण के दौरान ही ओढ़ा दिए गए उस लबादे को; जिसके कारण सिमोन ने कहा था कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है; स्त्रियाँ शायद चाहकर भी उतार नहीं पातीं। इसीलिए जब वेशभूषा, परिधान और आचार-व्यवहार जैसी बाहरी चीज़ों से लेकर संसर्ग तक की भीतरी और अन्तरंग चीज़ों पर भी तरह-तरह की बन्दिशें लगाकर उन्हें नियन्त्रित करने का प्रयास किया जाता है तब स्त्री पुरुष से न सही, प्रकृति से ही संसर्ग-सुख प्राप्त करने की तरफ मुड़ती है। ‘ऐ हवा’ कविता इसी मोड़ का हृदयस्पर्शी दस्तावेज़ है।

स्त्रियों के अलावा हाशिये पर रहने वाले अन्य लोगों के प्रति भी कवयित्री सावधान और संवेदनापूर्ण हैं। अगर ‘शैटगे : जहाँ ज़िन्दगी रिसती जाती है’ नामक कविता में वे रेड-इण्डियंस और पश्चिम के आदिवासियों का ज़रूरी उल्लेख करती हैं तो सुदीप बनर्जी को समर्पित कविता ‘स्वप्न के ये राग’ भारत के आदिवासियों के ऐसे आवासों का प्रभावशाली रेखांकन करती है, जिन्हें सभ्यताओं के आत्मतोष के लिए ‘जंगल’ कह दिया जाता है और उनमें रहने वाले लोगों को ‘जंगली’। खाँचे में बाँधकर देखना मनुष्य का प्रायः स्वभाव ही है क्योंकि इसमें उसे सुविधा है। लेकिन सविता सिंह की कविताएँ इस सुविधावादी सोच से जबरदस्त मुठभेड़ करती हैं। एलीना के बहाने व्यष्टि के ज़रिये समष्टि को अपने दायरे में लेने वाली कविता ‘शैटगे : जहाँ ज़िन्दगी रिसती जाती है’ पाठकों को भीतर तक झकझोर देने में सक्षम है क्योंकि यहाँ आकर अमरता मरणशील नज़र आने लगती है और मुमुक्षु जन मुमूर्षा के शिकार-से दीखते हैं। ज़िन्दगी का दरकना यहाँ कई मायनों में मौज़ूद है।

गुलज़ार हुसैन का चित्रांकन

भारत जैसे तीसरी दुनिया के किसी देश की ही बात नहीं है, जिस एंग्लो-सैक्शन धुरी को शक्ति और सत्ता का केन्द्र माना जाता था, वह भी अब उतना शक्तिशाली नहीं रह गया है। समकालीन एकध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में एक ग़ैर-यूरोपीय देश की ही तूती बोलती है और शक्ति के वैकल्पिक केन्द्रों की तलाश ज़ारी है। यह तलाश धुँधली अस्मिताओं की मुक्ति की आकुलता से भरी है। इसीलिए कभी यह आसियान, कभी सार्क यानी दक्षेस तो कभी यह यूरोपीय संघ के सत्ता समीकरणों से व्यक्त होती रहती है। फ्रांसिस फुकुयामा के इतिहास के अन्त और डैनियल बेल के विचारधाराओं के अन्त के इस अन्तवादी घोषणाओं के दौर में सविता की कविता अन्त की नहीं, नवीन प्रारम्भ और नयी सुबह की पहली वेला का व्यापक वितान रचती है। ये कविताएँ वहाँ तक जाती हैं जहाँ बिछड़ने की आशंका ज़ेहन में घर बनाने लगती है, जहाँ स्वप्न जागने लगते हैं, जहाँ एक नीला विस्तार है जिसका ज़्यादातर हिस्सा अज्ञात है। ज्ञात पर रुक जाना ज्ञान की दिशा नहीं है, जो ज्ञात हो जाता है उसे छोड़ना पड़ता है ताकि जो अज्ञात है वह ज्ञात हो सके। ये कवितायें इन्हीं अज्ञात या अल्पज्ञात इलाकों का संधान करती हैं और पाठकों को कोरी कल्पना की बजाय एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं जिसकी निर्मिति यथार्थ के थपेड़ों से हुई है।

संग्रह में प्रेम की गहन भावनाओं से परिपूरित अनेक कविताएँ हैं लेकिन ये वैसी प्रेम कविताएँ नहीं हैं जिनमें जब तक दो-चार बार प्रेम-प्रेम शब्द न आए तब तक हम मान ही न पाएँ कि यह भी भला कोई प्रेम कविता है ! यहाँ प्रेम कविताओं में सहज सौन्दर्य है, त्याग और परित्याग की भावनाओं की लम्बी-सपाट और दुर्गम सड़कें हैं, विसंगतियों का नया व्याकरण है, विडम्बनाओं से मुक्त एक प्रतिसंसार है : “जाओ अब तक वहीं पड़ा है वह चुम्बन/ जिसे छोड़ गयी थी लाल आँखों वाली चिड़िया/ उठा लाओ वह सफेद पंख/ जिसे गिरा गयी थी वह किसी और के लिए।” इसी और के लिए गिराए गए पंखों पर कितने ही लोग अपनी ज़िन्दगी और अपना घर-परिवार चला रहे हैं। जीवन में सर्वोत्तम कहाँ मिलता है किसी को ! शायद इसीलिए कहा भी जाता है कि हम बेस्ट नहीं, सेकेंड बेस्ट जैसी कुछ चीज़ों और लोगों से अपना जीवन संचालित करते हैं। ऐसे जीवन के द्वन्द्व इन कविताओं में बारम्बार उतरे हैं लेकिन ये द्वन्द्व अच्छे और बुरे के नहीं हैं, बल्कि उत्तम और सर्वोत्तम के हैं। पुनश्च, ये कविताएँ द्वन्द्वों में उलझकर ख़त्म या खर्च नहीं हो जातीं, बल्कि द्वन्द्वातीत मोहक जगत की कल्पना से हमें सराबोर करती हैं। यह इनकी प्रस्थापना है कि कोई भी यथार्थ फिर से नहीं आता, वह ख़ुद को दुहराता नहीं। उस तरह तो कतई नहीं जिस तरह नियतिवादी सिद्ध-अन्तों ने हम सबको बताया है।

ये कविताएँ एक दृष्टि देती हैं कि हम यथार्थ और स्वप्न के बीच के भावों का अहसास कर सकें, पल-पल उगती और पल-पल मिटती महत्वाकांक्षाओं की ऊँचाई और उनका भावात्मक आयतन माप सकें, गझिन होती कामनाओं के घनत्व को अपने हृदय में उतार सकें और अपने अस्तित्व के विचलन को अपने मनोमस्तिष्क में दर्ज़ कर सकें। ये कविताएँ बताती हैं कि औरत केवल रात नहीं है, महज़ रात की स्याही से उभारा गया एक जड़ रेखांकन नहीं है और वह केवल रात का स्वप्न भी नहीं है। किसी भी बात या विचार को व्यक्त करने की सविता सिंह की अपनी ही अनोखी शैली है और उनकी कविताओं में सदैव ऐसी कोई मर्मवेधी बात अवश्य मौज़ूद रहती है जिसका ज़िक्र उन्होंने अपनी कविता में किया ही नहीं होता है। उदासियों के महासमन्दर में गोते लगा-लगाकर खोजे गये ऐसे रत्न इन कविताओं में चमकते हैं जिनके बल पर कविता को रोशनी फैलाने वाली कोई ख़ास मार्गदर्शिका भी कहा जाता रहा है।

देश-देशान्तर से सम्बद्ध अन्तरभाषायी और अन्तर-अनुशासनिक समझ कवयित्री को एक नैसर्गिक शक्ति देती है जिससे वे जीवन की जटिलताओं में छिपे तथ्यों और घटनाओं को पहचानने में अनुपमेय कुशलता का परिचय देती हैं। कुछ यों कि इन इकसठ कविताओं में मानो जीवन के द्वन्द्व और घर्षण को समझने के इकसठ नए क्षेत्रों की खोज की गयी हो और उनके बारे में बिखरी-पसरी अनुभूतियों की तीव्रता को लिपिबद्ध किया गया हो। यहाँ हम स्वप्न की परतों को अनावृत होता हुआ पाते हैं, यहाँ कोई ग्रीवाविहीन शख़्स हार पहनता है और सुन्दरतम परिधान किसी अशरीरी देह की शोभा बढ़ाते हैं। यही तो इस कविताई का ढब है। चुकती-सी प्रतीत होती मनुष्यता की नई आवाज़ों में बचा हुआ धीरज हमें हमारी दुनिया के प्रति स्नेहपूरित ढाँढस बँधाता है। सच कहा जाए तो इन कविताओं के बारे में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि ये किस अप्रत्यक्ष तरीके से किस तरीके के प्रत्यक्ष और ज़रूरी सवालों को मुख्यधारा में खड़ा कर रही हैं। स्त्रियों का तो दरअसल यथार्थ ही इतना क्रूर और अमानवीय है कि रचनाकार को स्वप्न में जाना पड़ सकता है, जो कि यथार्थ की ही एक छाया और यथार्थ का ही एक बिम्ब है। कथ्य के स्तर पर तो ये बातें यहाँ लागू ही होती हैं, शिल्प के नज़रिये से भी देखें तो कविता की आन्तरिक लय, उनका आकार और वर्णनों का क्रम हमें इस दुनिया से भिन्न किसी चीज़ और इस यथार्थ से अलग किसी यथार्थ का अहसास कराते हैं। स्त्री-मुक्ति की कविता का जो सटीक शिल्प है, वह शायद जादुई यथार्थ से ही जुड़ता है और वह यहाँ मौज़ूद है। यहाँ एक चित्र पर दूसरा चित्र और एक बिम्ब पर दूसरा बिम्ब कुछ इस तरह गिरता है कि पाठक इस प्रक्षेपण पर भी कुछ सोचने को विवश हो जाता है। इस दुनिया से परे किसी जादुई जगत में ले जाने वाला यह संग्रह न सिर्फ़ पठनीय, बल्कि संग्रहणीय भी है।

समीक्ष्य कविता संग्रह – ‘स्वप्न समय ’
कवयित्री – सविता सिंह
प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड, 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नयी दिल्ली – 110002
संस्करण – प्रथम संस्करण 2013
मूल्य – दो सौ पचास रुपये

नगाड़े की तरह बजते है शब्द

डा सुनील जाधव

डा सुनील जाधव यशवंत कालेज नांदेड में हिन्दी पढ़ाते हैं . कवितायें और आलोचनात्मक आलेख लिखते हैं . संपर्क : मोबाईल : ०९४०५३८४६७२ , इ -मेल : suniljadhavheronu10@gmail.com

 ‘नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द’  संथाल आदिवासी लेखिका निर्मला पुतुल जी का  पहला कविता संग्रह हैं | साहित्य जगत में प्रवेश करते ही इसने तहलका मचा दिया था | पहली बार जंगल के बाहर शहर में किसी आदिवासी स्त्री ने अपने अस्तित्व का नगाड़ा बजाया था | जिसकी अनुगूँज सम्पूर्ण साहित्य में आज भी अपनी सम्पूर्णता में सुनाई देती है | आदिवासी स्त्री एवं आदिवासियों की  वेदना, पीड़ा, दर्द, टीस , उपेक्षा, अपमान, घुटन-टूटन, विवशता, विपन्नता, बदहाली के साथ,….. अपने अस्तित्व  की खोज करने वाली स्त्री, सदियों से पुरुष व्यवस्था की चूभन को सहते-सहते…. उसके भीतर के आक्रांत स्त्री ,ने विद्रोह का बिगुल बजाते हुए पितृसत्ता  सत्ता को चुनोती दे डाली | निर्मला जी की कवितायेँ मात्र स्त्री के दर्द की अभिव्यक्ति  एवं पुरुष व्यवस्था का विरोध ही नहीं करती अपितु स्वयं के अस्तित्व  की तलाश करती आदिवासी स्त्री, आदिवासी जनजाति के प्रत्येक क्षेत्र में किये जानेवाले शोषण को भी सशक्त रूप में उघाड़ती है | शहर के ठेकेदार एवं समतावादी राजनेताओं द्वारा विपन्न निरीह आदिवासियों के भोलेपन का फायदा उठाकर उनका ‘’यूज़ एंड थ्रो’’ करना एक हकीकत है  |

निर्मला अपने कविता में जंगलोसे धडल्ले से गायब होते पेड़ों को बचाने का सन्देश भी देती हैं  | आदिवासियों के जीवन पद्धतियाँ-  नृत्य,गीत-संगीत, श्रद्धा-अंधश्रद्धा के साथ आदिवासी स्त्री-पुरुष, लड़का-लड़की, माता-पिता, भाई-बहन, कबीले का सरदार आदि भी उनकी कविताओं के विषय रहे हैं | उनकी कविता आदिवासी स्त्री को केवल भोग्य वस्तु की दृष्टी से देखनेवाले पुरुष- समाज पर आक्रोश प्रकट करते हुए आदिवासी लड़कियों को विभिन्न प्रकार से सावधान करती है | इतना ही नहीं मुखिया एवं जंगल के आदिवासी पुरूषों-भाईयों से आदिवासी लड़कियों की अस्मिता के पक्ष में लड़ने  का आग्रह भी करती है |


इस संग्रह को निम्नांकित बिन्दुओं में पढ़ा जा सकता है : 


१.स्व का अस्तित्व  तलाशती आदिवासी स्त्री
२.पुरुष  व्यवस्था के प्रति विद्रोह
३.आदिवासी स्त्री के दर्द एवं वेदना की अभिव्यक्ति
४.आदिवासी लड़की और विवाह :-
५.आदिवासी स्त्री सौन्दर्य, गीत संगीत और नृत्य
६.आदिवासियों को फटकार
७.सभ्य शहरी समाज पर व्यंग्य
८. मुक्ति की चाहत

१.स्व का अस्तित्व  तलाशती आदिवासी स्त्री :- 


निर्मला पुतुल की स्त्री अपने होने की, स्वंय के अस्तित्व  की तलाश करती नजर आती है | वह पुरुष प्रधान समाज में घर, परिवार, प्रेम, रिश्ते-नाते सम्बन्धों में अपने स्थान को ढूंडती है | वह सदियों से किसी न किसी पुरुष पर निर्भर रही ,या फिर उसे रहना पड़ा , या उसे वैसा रहने के लिए बाध्य किया गया | उसे पिता, भाई, पति, पुत्र के सहारे जीवन जीना पड़ा | वह एक ही साथ स्थापित और निर्वासित होती रही है | बचपन से लेकर विवाह तक माता-पिता के घर और विवाह के बाद पति का अनजाना घर ..| वह प्रत्येक एकांत समय महसूस करती रही कि ‘मैं कोन हूँ ? मेरा स्थान क्या है ? मेरा अस्तिव क्या है ? जिन्होंने मुझे जन्म से लेकर अट्ठारह वर्षों तक लाड-प्रेम, ममत्व दिया | जिस कारण लड़की अपने परिवार से बिछड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकती | आचानक विवाह होने के उपरांत अनजाने घर में प्रत्येक स्थितियों में स्थापित करना पड़ता है | इसी दर्द ,पीड़ा, वेदना को पूरी संवेदना के साथ अपनी कविता में अभिव्यक्त करते हुए वह कहती है :

‘क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वंय को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री ?’’ १

निर्मला जी की कविताओं में अभिव्यक्त स्त्री अस्तित्व हीनता से उत्पन्न पल-पल के प्रश्नों का शमन चाहती है |  वह सदियों से अपना घर, अपनी जमीन तलाशती रही | ‘’अपने घर की तलाश में ‘’ कविता में वह कहती है :
‘’ धरती के इस छोर से उस छोर तक
मुट्ठी भर सवाल लिए मैं
दौड़ती-हाँफती-भागती
तलाश रही हूँ सदियों से निरंतर
अपनी जमीन, अपना घर
अपने होने का अर्थ ..’’ २

स्त्री चाहे माता-पिता के घर रहे या पति के घर में रहे , भले ही वह वहाँ समर्पित है, पर उसके भीतर के सुने एकांत में अक्सर एक प्रश्न उसका पीछा करते रहता है | मेरा घर कौनसा हैं ?,

‘’अंदर समेटे पूरा का पूरा घर
मैं बिखरी हूँ पूरे घर में
पर यह घर मेरा नहीं है |’’ ३

निर्मला जी ने स्त्री के उस रहस्य को उजागर किया है, जो शायद रहस्य न होते हुए भी रहस्य के समान लगता है |

२.पुरुष  व्यवस्था के प्रति विद्रोह:-

स्त्री को सदियों से चार दीवारों, चूल्हा-चक्की, घर-गिरस्ती तथा बच्चों को सम्हालना… तक सीमित रखा गया था | उसे प्रत्येक अवसर पर  घर रूपी पिंजरे में कैद तोते की  भांति जीवित रखा गया था | जब-जब उसने चौखट  लांघने की कोशिश की, या पुरुष के अन्याय के विरुद्ध आवाज उठायी, तब-तब उसे प्रेम से या क्रोध से पुन: अँधेरी खोह में धकेल दिया गया | उसमें हीरे की भांति चमक तो थी पर उसके लिए बहार की दुनिया प्रतिबंधित थी |  प्रत्येक अवसरों पर उसकी चाहत को दबा दिया गया था | वास्तव में उसे चाहने लायक रखा ही नही गया था | कभी उसे देवी  बनाकर उसके पैरों को जकड़ा गया तो कभी उसके शरीर को आघात पहुँचा कर अनंत काल तक सहन करने के लिए छोड़ दिया गया था | निर्मला पुतुल की कविताओं में अभिव्यक्त आदिवासी स्त्री भी ऐसे ही दर्द को सहते हुए नजर आती है |

आर्थिक विपन्नावस्था, पुरुष द्वारा किये जानेवाले अत्याचार से वह इतनी पीड़ित हुई कि उस दर्द को भीतर ही भीतर सहते-सहते वह दर्द का लावा बन गया | प्रकृति का नियम है कि जब-जब किसी बात का अतिरेक होता है ,तब-तब प्रकृति अपना रोद्र रूप दिखाती है | भूकंप से सारी धरती काँप उठती है | मार्ग में आनेवाली वनस्थली, जीव-जंतु, मानव आदि सबका वह विनाश करते चलती हैं | वैसे ही निर्मला पुतुल की स्त्री पुरुष व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का शंखनाद कर देती है | कविता संग्रह की पहली ही कविता ‘’ क्या तुम जानते हो ‘’ में वह कहती है :

‘’ क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न
एक स्त्री का एकांत |
घर प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी जमीन
के बारे में बता सकते हो तुम ?’’ ४

पुतुल जी की नजरों में स्त्री पुरुषों के लिए मात्र भोग्य वस्तु रही है | पुरुष ने स्त्री को इसके परे जाकर कभी समझा ही नहीं | ना ही स्त्री होने का दर्द कभी महसूस किया है | इसीलिए वह पुरुषों से आक्रांत होकर प्रश्न करती है कि तुम स्त्री के गर्भ में बीज तो छोड़ देते हो पर कभी गर्भवती स्त्री का दर्द, वेदना,पीड़ा को तुमने कभी समझा है | महसूस किया है | स्त्री पुरुष के नजरों में केवल शरीर ही रही | उससे परे उसने उसे नहीं समझा | यही कारण है कि निर्मला पुतुल अपनी कविताओं में आक्रोश प्रकट करते हुए प्रश्न करती है ,

‘’ तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गाँठे खोल कर
कभी पढ़ा है तुमने
उसके भीतर का खौलता ईतिहास ?
अगर नहीं !
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारें में …|’’ ५

निर्मला पुतुल

निर्मला पुतुल आँखें होकर आँखें बंद नहीं करना चाहती | कान होकर भैरी नहीं बनना चाहती | और जबान होकर गूंगी | उन्होंने जो समाज देखा, भोगा उसे किसी के भय के कारण झूठ की थाली में परोसा नहीं | वह तो कबीर,निराला, नागार्जुन की भांति डंके की चोट पर अपनी बात कहने की हिमायती है | उन्हमें जंगल की शेरनी की तरह गर्जना है, वे ‘’ खून को पानी कैसे लिख दूँ ‘’ कविता में कहती है:

‘’ पर तुम्ही बताओं, यह कैसे सम्भव है ?
आँख रहते अन्धी कैसे हो जाऊं मैं ?
कैसे कह दूँ रात को दिन ?
खून को पानी कैसे लिख दूँ |’’ ६

३.आदिवासी स्त्री के दर्द एवं वेदना की अभिव्यक्ति :-


एक ओर विश्व चाँद-मंगल ग्रह पर बस्ती बनाने की योजना बना रहा है | वहीं आदिवासी स्त्री की ओर नजर डालें  तो पता चलता है कि वह सिर्फ जंगल तक ही सीमित है | उसके लिए बाहर का विश्व अजनबी है | उसे पता ही नहीं कि उसके जंगल की  दुनिया के बाहर भी कोई दुनिया है , ‘’आदिवासी स्त्रियाँ ‘’ कविता में वह कहती है:

‘’ उनकी आँखों की पहुँच तक ही
सीमित होती उनकी दुनिया
उनकी दुनिया जैसी कई-कई दुनियांये
शामिल है इस दुनिया में ‘’ ७

आदिवासी स्त्रियाँ परिश्रमी होती हैं | वे पुरुषों के कंधो से कन्धा मिलाकर ही नहीं बल्कि उससे भी ज्यादा परिश्रम करती है | ऐसा कहना असंगत नही होगा | वह खेतों में काम करती हैं | पत्तल, चटई, पंखा, झाड़ू बनाकर बाजार में बेच कर अपना तथा परिवार की उपजीविका चलाने में विशेष योगदान देती है | जीन हाथों से वह वस्तु बनाती है, उन वस्तुओं का कोई ओर उपयोग करता है | उसे प्रतीक्षा करनी पड़ती है, अपने ही पेट भरने की | इसी विडम्बना को व्यक्त करते हुए ‘’ बाहामुनी ‘’ कविता में कहती है:

‘’ तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते है पेट हजारों
पर हजारों पत्तल भर नही पाते तुम्हारा पेट
कैसी विडम्बना है कि
जमीन पर बैठ बुनती हो चटाईयाँ
और पंखा बनाते टपकता है
तुम्हारे करियाये देह से टप..टप ..पसीना |’’ ८

आदिवासी स्त्री को पता ही नही होता कि उसकी बनाई चीजे, उसकी तस्वीरें देश की राजधानी दिल्ली कैसे पहुँच जाती हैं | जब उसी स्त्री पर शहरी पुरुष की ललचाई नजर पड़ती है | स्त्री के विवशता का फायदा उठाकर उसे मात्र भोग्य समझा जाता है, तब निर्मला जी ‘’ ये वे लोग है ‘’ कविता में कहती है :

‘’ ये वे लोग है जो खींचते है
हमारी नंगी-अधनंगी तस्वीरें
और संस्कृति के नाम पर
करते हमारी मिटटी का सौदा
उतार रहे है बहस में हमारे ही कपड़े …
जो हमारे बिस्तर पर करते है
हमारी बस्ती का बलात्कार |’’ ९

कवयित्री अपनी कविताओं में दुखी है, क्योंकि लोगों को हमारा सबकुछ चलता है | फूल-फल, लकड़ियाँ, सब्जियाँ | पर वर्जित है हमारा उनके घर में प्रवेश | वे हमारे अनगढ़  शरीर पर व्यंग्य करते है | हमारे हाथों छुआ पानी नही चलता है | चलता है तो सिर्फ उपयोगी वस्तु | ‘’ मेरा सबकुछ अप्रिय है उनकी नजर में ‘’ वे कहती है,

‘’ उन्हें प्रिय है
मेरी गदराई देह
मेरा मांस प्रिय है उन्हें |’’ १०

उनकी कविताओं में आदिवासी लड़की इसीलिए दुखी है क्योंकि उसे मात्र शरीर समझा जाता है | वह चाहती है कि उसके देह को छोड़ कर उसके परिश्रम, भोलेपन, ईमानदारी की प्रशंसा करें | ‘’ सुगिया’’ कविता में वह कहती है:

‘’ काश, कोई कहता कि
तुम बहुत मेहनती हो सुगिया
बहुत भोली और ईमानदार हो तुम
काश कहता कोई ऐसा |’’ ११

४.आदिवासी लड़की और विवाह :-

स्त्री के विभिन्न रूप होते है | माँ-बेटी, साँस-बहु, देवरानी-जिठानी, बहन आदि | उसे आदि रिश्ते निभाने पड़ते है . विवाह से पूर्व उसकी सारी यादे घर-आँगन, माता-पिता,भाई-बहनों में, गाय-भैंसों, भेड़-बकरियों, खेतों में, पानी के घड़े में आदि में बसी होती है | जब उसका विवाह कर दिया जाता है | तब अपना सबकुछ छोड़ कर दूसरों के आँगन को अपना बनाना पड़ता है | ऐसे समय ससुराल जाने से पूर्व अपनी माँ के सम्मुख रोते हुए अपना दर्द सुनाती है | ‘’ माँ के लिए, ससुराल जाने से पहले ‘’ कविता दृष्टव्य है:

‘’पर क्या सचमुच
जा सकूँगी पूरी की पूरी यहाँ से ?
आँगन में पड़े टूटे झाड़ू-सा
पड़ी रह जाऊँगी कुछ न कुछ यहाँ …
पानी के खली घड़े में
भरी रह जायेंगी मेरी यादे .. |’’ १२

आदिवासी लड़की अपना विवाह जंगल के बाहर कोसो दूर शहर में न कराने की बात जब अपने पिता से करती है, तब उसकी वेदना से ह्रदय द्रवित हो जाता है |

‘’ बाबा !
मुझे उतनी दूर  मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने खातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे ..|’’ १३

वह इसीलिए शहर में ब्याहना नहीं चाहती कि वहाँ इंसान से ज्यादा भगवान बसते है |  वह ऐसे लड़के से विवाह करना चाहती है, जिसमें इंसानियत हो  | वह अपने ही जंगल के किसी लडके से विवाह करना चाहती है |  जो ढोल-मांदल, बाँसुरी बजाने में पारंगत हो | जो बसंत में उसके जूडे के लिए फूल लाये….

‘’ जिससे खाया नहीं जाये
मेरे भूखे रहने पर,
उसी से ब्याहना मुझे |’’ १४

५.आदिवासी स्त्री सौन्दर्य, गीत संगीत और नृत्य :-

निर्मला पुतुल जी अपनी कविताओं में स्त्रियों के दर्द, वेदना, पीड़ा के साथ उनकी समस्या, चाहत , अजनबीपन का चित्रण करते हुए, उसके पारिश्रमिक सौन्दर्य को उसके गीतों, नृत्यों की भी अभिव्यक्ति करती हैं | ‘’ सुगिया’’ कविता में पुरुष की नजर से उसके सौन्दर्य को व्यक्त करते हुए कहती है:

‘’ तुम हँसती हो तो
बहुत अच्छी लगती हो सुगिया |
बादलों में बिजली से चमकते
उसके दांतों को देख ..
तुम बहुत अच्छा गाती हो
बिल्कुल कोयल की तरह
और नाच का तो क्या कहने
धरती नाच उठती है
जब नाचती हो तुम |’’ १५

६.आदिवासियों को फटकार एवं प्रोत्साहन  :- 

निर्मला पुतुल जब अपनी आँखों के सामने अपने भोले-भाले, ईमानदार एवं परिश्रमी आदिवासी भाई-बहनों का लोगों द्वारा स्तमाल होते देखती है | तब उनसे रहा नहीं जाता | वह अपने लोगों की आँखे खोलने के लिए फटकार लगाती है | झारखण्ड के लिए संघर्ष करने वाले अपने आदिवासी भाई को ‘’ भाई मंगल बसेरा’’ कविता में  कहती है:

‘’अभी यद्ध विराम हुआ है भाई
खत्म नहीं हुई है तुम्हारे हिस्से की लड़ाई
देखना वे फिर सटने की कोशिश करेंगे जो कल
साथ छोड़ गये थे तुम्हारा
मंजिल नहीं है यह
जो दे रहा है मंजिल होने का भरम
एक पड़ाव है तुम्हारी लम्बी यात्रा का |
थक गये हो तो थोड़ा सुसता लो
पर देखना कहीं निश्चिन्त होकर सो मत जाना मेरे भाई |’’ १६
बस्ती का प्रधान जब विदेशी दारू के बदले पूरा गाँव गिरवी रख देता है | तब पुतुल जी बेहद दुखी होती है ,
‘’ कैसे बिकाऊ है तुम्हारे बस्ती का प्रधान
जो सिर्फ एक बोतल विदेशी दारु में रख देता है
पूरे गाँव को गिरवी
और ले जाते है कोई लकड़ियों के गट्ठर की तरह
लादकर अपनी गाड़ियों में तुम्हारी बेटियों को
हज़ार पाँच-सौ  हथेलियों पर रखकर
पिछले साल
धनकटनी में खाली पेट बंगाल गयी पड़ोस की बुधनी
किसका पेट सजाकर लौटी है गाँव |’’ १७
स्त्री जो घर-परिवार, समाज-पुरुष सभी को सहती रहती है | और किसी एकांत कोने में घुट-घुट कर रोती है | तब वह उनके इस रूप को देखकर व्यंग्यात्मक शैली में फटकारते हुए कहती है,
‘’ हक की बात न करो मेरी बहन
मत मांगों पिता की सम्पत्ति पर अधिकार
जिक्र मत करों पत्थरों और जंगलों की अवैध कटाई का
सूदखोरों और ग्रामीण डॉक्टरों के लूट की चर्चा न करो बहन
मिहिजाम के गोआकोला की
सुबोधनी मारण्डी की तरह तुम भी
अपने मगजहीन  पति द्वारा
भरी पंचायत में डायन करार कर दण्डित की जाओगी
माँझी हाडाम ‘पराणिक’ ‘गुडित’ ठेकेदार
महाजन और जान गुरुओं के षड्यंत्र का शिकार बन |’’ १८

७.सभ्य शहरी समाज पर व्यंग्य :-


 निर्मला पुतुल जी ने अपनी कविताओं में शहर के उन लोगों पर व्यंग्य किया जो अपने आप को  सभ्य समझते है | पर भीतर से आदिवासियों से घृणा करते है | उन्हें नीचा दिखाते हैं | उनके अनघड शरीर का मजाक उड़ाते हैं | आदिवासियों को वे यूज़ एंड थ्रो करते हैं | अंतर्राष्ट्रीय महिला दिन के अवसर पर  शहरी महिलाओं को पुरुष के विरुद्ध आवाज उठाते हुए देखती हैं |  उन्हें वह सिर्फ दिखावा लगता हैं | उनपर ‘’ एक बार फिर’’ कविता में व्यंग्य करती हैं | ताकि सच में ही वे कार्य करें:

‘’ एक बार फिर
अपनी ताकत का सामूहिक प्रदर्शन करते
हम गुजरेंगे शहर की गलियों से
पुरुष-सत्ता के खिलाफ
हवा में मिट्ठी-बँधे हाथ लहराते
और हमारे उत्तेजक नारों की ऊष्मा से
गर्म हो जायेगी शहर की हवा |’’ १९

८. मुक्ति की चाहत :-

अपनी जमीन तलाशती आदिवासी स्त्री की मुक्ति की चाहत को अपनी कविताओं में वाणी दी है | स्त्री को सदियों से दबाया गया | चार दीवारों में कैद किया गया | उसकी चाहत का किसीने ख्याल नहीं रखा | आज वही स्त्री घर-प्रेम,जाति से अलग अपना अस्तित्व बनाना चाहती है :

‘’ मैं स्वंय को स्वंय की दृष्टी से देखते
मुक्त होना चाहती हूँ अपनी जाति से
क्या है मात्र एक स्वप्न के
स्त्री के लिए घर सन्तान और प्रेम ?
क्या ? ‘’ २०

वह अपना एक विशेष स्थान बनाना चाहती है | उसे किसी ओर के कारण नहीं बल्कि उसकी पहचान  स्वंय से करना चाहती है | वह ऐसी जमीन चाहती है, जिसे वह अपना कह सके:

‘’ अपनी कल्पना में हर रोज
एक ही समय में स्वंय को
हर बेचैन स्त्री तलाशती है
घर प्रेम और जाति से अलग
अपनी एक ऐसी जमीन
जो सिर्फ उसकी अपनी हो |’’ २१

वह मुक्त आकाश में खुली साँस लेते हुए बिनधास्त, बन्धनों से परे मुक्त होकर स्वच्छंद उड़ना चाहती है | वह ऐसा आधार चाहती है, जो उसे उसकी इच्छाओं को पूरा करने दें | जिसमे अपनापन हो:

‘’ एक उन्मुक्त आकाश
जो शब्द से परे हो
एक हाथ
जो हाथ नहीं
उसके होने का आभास हो ! ‘’ २२

वस्तुतः निर्मला पुतुल की कविताओं में स्त्री घर, परिवार, जाति, प्रेम, से परे अपना अस्तित्व तलाशती हुई दिखाई देती है | सदियों से पुरुष व्यवस्था द्वारा सतायी गई , प्रताड़ित की गई  स्त्री को पुरुष ने केवल उपभोग्य वस्तु समझा | स्त्री का अस्तिव घर, शरीर से परे भी है  | पुरुष ने कभी उसे स्त्री के रूप में समझा ही नहीं | इसीलिए वह आक्रांत होकर पुरुष व्यवस्था से प्रश्न करते हुए अपने मन की  भडास निकालते हुए कहती है,’’अगर नही ! /तो फिर जानते क्या हो तुम /रसोई और बिस्तर के गणित से परे / एक स्त्री के बारे में ..?’’

निर्मला पुतुल जी ने अपने कविता संग्रह में न केवल पुरुष व्यवस्था के प्रति विद्रोहात्मक कवितायेँ लिखी बल्कि आदिवासी स्त्री की वेदना, दर्द की अभिव्यक्ति करने वाली कवितायें कठोर हृदय को पिघला भी देती है | उन्होंने देखे और भोगे होए सत्य का काव्य में हुबहू चित्र खिंचा हैं | उन्होंने जो भी कहना चाहा, कबीर और निराला की भांति बेबाक एवं बिनधास्त कहा | वह डंके की चोट पर कहती है –‘’पर तुम बताओं, यह कैसे संभव है/  आँख रहते अन्धी कैसे हो जाऊ मैं ?/ कैसे कह दूँ रात को दिन ?/  खून को पानी कैसे लिख दूँ ?/’’
संग्रह की अन्य कविताओं में झारखण्ड के संथाल आदिवासी स्त्री के सौन्दर्य, गीत, संगीत और नृत्य का चित्रण हुआ है | साथ ही आदिवासियों के भोलेपन, ईमानदारी , दरिद्रता का बाहरी लोग किस तरह फायदा उठाते है | आदिवासियों को ‘’यूज एंड थ्रो’’ किया जाता है | इस पर कवियत्री उन्हें अपने अस्तित्व  का अहसास दिलाते हुए फटकार भी लगाती है | सदियों से पुरुष व्यवस्था को सहने वाली स्त्री घर, प्रेम, जाति, समाज से परे आक्रोश प्रकट करते हुए अपना अस्तित्व बनाना चाहती है | वह मुक्त गगन में स्वच्छंद उड़ना चाहती है |