हाशिये का हर्फ या वर्चस्ववादी विमर्श !

 ( पाखी के सितम्बर अंक के सम्पादकीय पर स्त्रीकाल ने एक टिप्पणी प्रस्तुत  की थी , टिप्पणी की थी इसके सम्पादन मंडल की सदस्य और कवयित्री एवम वरिष्ठ  पत्रकार निवेदिता ने . यह नई टिप्पणी स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के एक और सदस्य एवम युवा आलोचक धर्मवीर सिंह कर रहे हैं  )


आप किन मुद्दों पर बोलते हैं और किन पर चुप हैं , बोलने के लिए आपका चुनाव क्या है , किन प्रतीकों और बिम्बों में बोलते हैं , तय  इसीसे होता है कि आपका पक्ष क्या है. मसलन आप तथाकथित ‘ लवजिहाद’ ‘गो ह्त्या’ आदि से दुखी हैं और उसके लिए चिंतित अभिव्यक्तियाँ कर रहे हैं या आपकी चिंता में इन फर्जी मुद्दों के जरिये हो रहा देश का साम्प्रदायीकरण है !आप स्त्रियों से  छीने जा रहे स्पेस से दुखी हैं , जिसे बमुश्किल उन्होंने अपने लिए बनाया या किसी स्पेस पर उनकी अभिव्यक्ति से छटपटा रहे हैं , कुछ हिलता दिख रहा है आपको ! 
पाखी के सम्पादकीय ‘ मैं चाँद पर हूँ मगर कब तक’ हाशिये के हर्फ़ सीरीज से लिखे जा रहे सम्पादकीय की राजनीति तय करता है . इस पड़ताल में हम जायें कि ‘हाशिये का हर्फ़’ में कितना हाशिया है और कितना उसका हर्फ़ है, एक अलग लेख की मांग करता है . इसी नाम से सम्पादक के एक किताब से गुजरकर हालांकि हाशिये का ‘ भारद्वाजी’ विमर्श समझा जा सकता है . फिलहाल सम्पादकीय की मुख्य चिंताओं पर गौर करें और सम्पादक  का अपना पक्ष चिह्नित करने की कोशिश करें तो सारी तस्वीर स्पष्ट हो जाती है , यह स्पष्ट हो जाता है कि सम्पादक महोदय हाशिये के साथ हैं या उसके बरक्स विमर्श कर रहे हैं - पक्षधरता की आड़ में  प्रहार कर रहे हैं !
 निवेदिता की टिप्पणी पढने के लिए क्लिक करें : ( हर पुरुष की चमड़ी के भीतर मर्द होता है 

सम्पादक स्वयं लिखते हैं कि ‘ हमारी शुभकामनाएं रामसजीवन के साथ हैं , जिसके लिए किसी को जीना ही उसे प्रेम करना है .’ रामसजीवन उदय प्रकाश की कहानी का एक पात्र है . एक ऐसा पात्र जो लोकतंत्र के साथ बने नए समाज में अपने सामंती मूल्यों के साथ मिसफिट है . उसका खात्म होना ही उसकी नियति है , घुट –घुट कर मरना . उससे सहानुभूति हो सकती है उसके द्वारा चुने  अपने मानसिक मकडजाल में खुद उसे घुटते हुए देखकर.  उसकी  त्रासद विडम्बनाओं को कोई उदय प्रकाश जैसा कहानीकार ही पूरी संवेदना के साथ प्रस्तुत कर सकता है , पाठक जिससे सहानुभूत तो हो सकता है लेकिन उसकी मौत पर शोकग्रस्त नहीं हो सकता . उसे मरना ही है , लोकतंत्र के फैलाव के साथ , उसे मरना ही है उसके सपनों की ‘ शाहजादी’ की खुदमुख्तारी के बाद . वह किसी लड़की के लिए ‘देवदासीय’  अंदाज में जीता है , जब तक उसकी पारो उसके इशारों पर उसकी फैंटसी की नायिका है तब तक तो वह जान हथेली पर लेकर घूमेगा उसके लिए लेकिन जैसे ही वह लड़की अपने स्पेस पर अपना निर्णय लेते हुए अपने व्यत्क्तित्व के साथ खड़ी होती है तो उसका स्वनिर्मित ख्वाब टूट जाता है . वह एक ऐसे परिवेश से है , जहां गाना गोटी खेलती , गलियों में चहकती लड़की किशोर होते ही किसी के ख्वाब का हिस्सा हो जाती है , वह स्कूल , कॉलेज नहीं जाती है , जे एन यू तो कतई नहीं . बंद कमरे में अपने पुरुष मित्र के साथ अपने कोर्स की किताब पढ़ती लडकी रामसजीवन की कल्पनालोक को उद्दीप्त कर देती है , उसे करिअर की ऊंचाई चढ़ती लडकियां नहीं चूल्हे के धुंए से आंसू पोछती लडकियां आदर्श दिखती है, जिसका होना उसके प्रेमी या पति के लिए होना है , खुद के लिए नहीं . ऐसे रामसजीवन की नियति ही आत्महत्या है, क्योंकि लडकियां अब क्लास में उससे अव्वल , ऑफिस में उसका बॉस और बिस्तर पर अधिक सक्रिय हैं .

वही रामसजीवन प्रेम भारद्वाज के सम्पादकीय में अपनी सम्पूर्ण कुंठाओं और वासनाओं के साथ चालीस साल की औरत से  अपने लिए वह सबकुछ पाना चाहता है , जो वह जे एन यू में अपनी प्रेमिका से नहीं पा सका. वह आज भी उतना ही आत्मकेंद्रित है जितना आत्महत्या के पूर्व था , जबकि आज स्त्रियाँ उसके आत्महत्या के सम्पूर्ण कारणों के साथ और मुक्त हुई हैं , उन्होंने अपने स्पेस हासिल कर लिए हैं , अभिव्यक्त भी हो रही हैं.
पिछले दिनों फेसबुक पर चली बहसों में पाखी के सम्पादकीय के बचाव में मूलतः तर्क यही दिया जा रहा है कि ‘ मैं चांद पर हूँ मगर कब तक’ में रामसजीवन के बयान एक पात्र के हैं स्वयं सम्पादकीय लेखक के नहीं . यह एक बेवजह तर्क है . किसी टेक्स्ट में लेखक अपने किसी प्रिय पात्र के साथ अपने को उपस्थित करता है . तुलसीदास की उपस्थिति ‘राम’ में है , वेदव्यास की ‘ कृष्ण में.’ तो प्रेमचंद ‘ वंशीधर के साथ हैं . प्रेम भारद्वाज का अपना पक्ष रामसजीवन का ही पक्ष है , जिसे वे छिपाते भी नहीं हैं . प्रेम भारद्वाज का  राम सजीवन किस बात से दुखी है. वह दुखी इसलिए है कि ४० साल के बाद की स्त्रियाँ प्रेम तो कर रही हैं , “लेकिन सोती पति के साथ हैं’ यहाँ फिर से रामसजीवन जे एन यू वाला पूर्ण समर्पण की जिद्द लिए है .’ उसकी नज़रों में ४० साल की इन महिलाओं का अपराध है कि वे प्रेम भी कर रही हैं और पति , घर गृहस्थी में भी फंसी है . सवाल है कि वे स्त्रियाँ रामसजीवन जैसे किसी आत्मग्रस्त प्रेमी के लिए घर छोड़ कर बाहर आ भी जाती हैं , तो उन्हें हासिल क्या होगा , फिर से एक सनक भरा साथ और दूसरी कैद के सिवा !  वे कितनी बार  घर छोड़ेंगी , कितने रामसजीवनों के लिए !


 पूरे सम्पादकीय का ताना बाना  इस एक स्वनिर्मित धारणा के साथ बुना गया है कि  फेसबुक इन महिलाओं का  ‘ आखेट’ स्थल है , लाइक, कमेन्ट ,और प्रेम प्राप्त करने का , फ्लर्ट करने का . पता नहीं यह धारणा सम्पादक पुरुषों के लिए क्यों नहीं बना पाते हैं . उन्हें  यह पता तो जरूर होगा कि महिलाओं ने रसोई घर की दीवारों पर अभिव्यक्त होने की शुरुआत कर फेसबुक की दीवाल पर लिखना शुरु किया है , जहां उन्हें किसी स्वनामधन्य सम्पादक की किसी कृपा की जरूरत नहीं है , वे हैं और उनके पाठक हैं . फिर सम्पादक महोदय इतने बेचैन क्यों हैं . हाशिये के हर्फ़ में मरने की नियति प्राप्त किसी रामसजीवन को शामिल होना चाहिए या जीने की आकांक्षा से भरपूर चालीस साला स्त्री को , जो विवाह और परिवार के भीतर अपने लिए स्पेस बना रही है - इसके बाहर विकल्प क्या है , रामसजीवनों की कुंठा या एक दूसरा परिवार और विवाह ? वैसे आप तलाक के आंकड़ों से तो परिचित ही होंगे , जो दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है , महिलाओं की सक्रियता के साथ, उनके आकार लेते व्यक्तित्व के साथ, अन्यथा ४० साला सक्रिय पुरुषों ने तो ‘ रखैल’ की व्यवस्था विकसित कर ही ली थी .
सम्पादक महोदय बड़ी चालाकी से चालीस साल की महिलाओं को मध्यवर्ग का प्रतीक बना देते हैं , भाई वे प्रतीक नहीं बल्कि हैं ही इसी मध्यवर्ग से और उसकी जड़ताओं से अपनी सीमाओं में लड़ सकती हैं. और आपको दिख रहा है कि ये महिलायें ही इस मध्यमवर्ग की प्रतीक हैं .

क्यों आप हर किसी से इरोम , मेधा और अरुणा राय होने की उम्मीद रखते हैं या थोपते हैं बाबू रामसजीवन . आपके कल्पना लोक के बाहर भी एक सन्नी लियोन या शर्लिन चोपड़ा हो रही है तो आप आतामहत्याग्रस्त  क्यों हो रहे हैं ! आपके डाल्स हाउस की गुड़िया अब आपके इशारों से बाहर –भीतर नाचने वाली ‘ भद्र महिला’ भर नहीं है , जिसकी आँखों पर पट्टी बांधकर कल्पना में और बिस्तर पर अपने पसंदीदा आसनों से गुजर जाना चाहते हैं इस उम्मीद के साथ कि वह सुबह आपको रसोई घर में आँचल का पल्लू सर पर डाले दिखेगी या आपकी माँ की तरह तुलसी में जल डालते हुए . आप कराह उठते हैं जब उसी भोर में आपकी उम्मीदों के विपरीत वह अपनी इच्छाओं के साथ सविता भाभी या सनी लियोन के रूप में अवतरित होती है. ‘ मस्तराम’ , जिसे आप तकिये के नीचे पढ़ते थे जे एन यू के दिनों में और इंटरनेट पर सविता भाभी डॉट कॉम पढ़ कर आये हैं ,४० साला महिलाओं के लिए फैंटसी लिए , उसकी नायिकाएं अब जीवित रूप में आपकी निर्मित आस्थाओं को चुनौती दे रही है. आपकी नियति मौत है . आप खुद ही बताएं कि उसी मध्यवर्ग के पुरुषों में से कितने विनायक सेन , सुधीर ढवले , या सुनील हो पा रहे हैं ! सक्रियता के हिसाब से देखें तो अनुपातिक तौर पर महिलाओं की भूमिका ज्यादा प्रशंसनीय है रामसजीवन बाबू , प्रशंसा की आपकी कसौटी पर .
  
 

संपादकीय में परकाया प्रवेश की निर्थक कोशिश की गई है . महिलाओं के बयान भी लिखे गए हैं . पहले तो परकाया प्रविष्ट पुरुष स्त्री के छदम रूप में आर्तनाद करता है और फिर मातृत्व के गौरव गान में लग जाता है . वैसे भारद्वाज जी आपको तो शायद यह पता ही होगा कि हर्फ का एक अर्थ किसी विचारधारा को विकृत रूप मे पेश करना भी होता है , आप वही कर रहे हैं. महिलाओं की आवाज मे बोलने का भी छद्म रचा है आपने अपने सम्पादकीय में , जिसकी भाषा रुदाली की सी है और फिर तो मां बना कर सहला भी दे रहे हैं उन्हें. यानी उसी  स्टीरियोटाइप का महिमामंडन , जिसे पुरुष ने स्त्री के लिए तय किया है . यही संकट है ,मां और प्रेयसी की स्वनिर्मित छवि के ताप से दग्ध है रामसजीवन लेकिन उसे हर मोड़ पर बेवफाई दिख रही है, किसी ‘ पवित्र प्रेम’ के खिलाफ व्याप्त माहौल दिख रहा है – प्रेम भी अराजनीतिक नहीं होता रामसजीवन जी. ७० के दशक की सिनेमाई रूमानियत से निकालिए तो प्रेम की राजनीति दिखेगी. ४० साल की महिलाओं के प्रेम की भी.

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