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Same Sex Marriage | समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का विरोध | कपिल सिब्बल- क्या समाज इसे सुनने को तैयार

Same Sex Marriages: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की पीठ सेम सेक्स मैरिज को मंजूरी की मांग को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. केंद्र सरकार ने इन याचिकाओं का विरोध करते हुए एक अलग याचिका दायर की है. केंद्र ने समलैंगिंग विवाह को ‘शहरी एलीट’ विचार बताते हुए कहा है कि इस पर कानून बनाने का अधिकार संसद को है. केंद्र ने यह भी कहा है कि इस पर कोई कानून बनाने से पहले सक्षम विधायिका को धार्मिक संप्रदायों के विचारों को भी ध्यान में रखना होगा. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस एसके कौल, एसआर भट, हिमा कोहली और पीआर नरसिम्हा की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने मंगलवार को सुनवाई से पहले ट्वीट किया और पूछा कि समलैंगिक विवाह, सुप्रीम कोर्ट सुनने को तैयार है, लेकिन क्या समाज सुनने को तैयार है।

सेम सेक्स मैरिज के विरोध में सरकार का तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में धारा 377 को रद्द कर दिया था. इसके बाद से भारत में समान लिंग के बीच संबंध बनाना अप्राकृतिक नहीं रह गया था. धारा 377 खत्म करने के बाद से देश में लगातार समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने की मांग उठ रही थी. हालांकि, केंद्र इस मामले का शुरू से विरोध कर रहा है.

 

 

 

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था, लेकिन इसके आधार पर सेम सेक्स मैरिज को मान्यता देने का दावा नहीं किया जा सकता. केंद्र ने कहा है कि 18 अप्रैल को कानूनी मामलों के विभाग ने राज्यों के सभी मुख्य सचिवों को भी लिखा है कि अगर उन्हें नोटिस जारी नहीं किया जाता है तो समलैंगिक विवाह पर अपने विचार प्रस्तुत करें. राज्य 10 दिन में अपनी राय दें, ताकि केंद्र पहले अपना पक्ष रख सके.

सेम सेक्स मैरिज मामले में दूसरे दिन की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने राज्यों की भागीदारी की बात रखी. SG तुषार मेहता ने कहा कि राज्यों से परामर्श शुरू किया है. राज्यों को भी पार्टी बनाकर नोटिस किया जाए. ये अच्छा है कि राज्यों को भी मामले की जानकारी है. याचिकाकर्ता के वकील मुकुल रोहतगी ने इसका विरोध किया और कहा कि ये पत्र कल लिखा गया है, लेकिन अदालत ने पांच महीने पहले नोटिस जारी किया था. ये गैरजरूरी है. केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इस केस में हमारी प्रारंभिक आपत्ति है. ये संसद के क्षेत्राधिकार का मामला है.

“सवाल ये है कि क्या अदालत खुद इस मामले पर फैसला कर सकती है? ये याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं हैं. केंद्र को पहले सुना जाना चाहिए क्योंकि वह अदालत के समक्ष 20 याचिकाओं के सुनवाई योग्य होने का विरोध कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकता. संसद उपयुक्त मंच है. ये नीतिगत मामले हैं. बड़ी संख्या में हितधारकों से परामर्श करने की आवश्यकता है. ये सवाल है कि कौन सा मंच इस मामले में विचार कर सकता है. यह एक संवेदनशील मुद्दा है.”

याचिकाकर्ता की ओर से मुकुल रोहतगी ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट में जहां भी पति या पत्नी का जिक्र है, उसे जीवनसाथी से बदला जाए. जहां भी पुरुष या महिला का उल्लेख किया गया है, उसे लिंग तटस्थ बनाते हुए ‘व्यक्ति’ के तौर पर बदला जाए.

“हम जहां भी जाते हैं और आवेदन करते हैं, तो हमें ऐसे देखा जाता है जैसे हम सामान्य लोग नहीं हैं. यही मानसिकता है जो हमें परेशान कर रही है. मेरे पास ढाल है, लेकिन वह स्पष्ट होना चाहिए. निजता का अधिकार नैतिक है. मुझे पीड़ित या कलंकित नहीं किया जाएगा, क्योंकि मैं विषमलैंगिक समाज के अनुरूप नहीं हूं.”

रोहतगी ने कहा कि अगर अदालत आदेश देगी तो समाज इसे मानेगा. अदालत को इस मामले में आदेश जारी करना चाहिए. हम इस अदालत की प्रतिष्ठा और नैतिक अधिकार पर भरोसा करते हैं. संसद कानून से इसका पालन करे या न करे, लेकिन इस अदालत का आदेश हमें बराबर मानेगा. अदालत हमें समान मानने के लिए समाज पर दबाव डाले. ऐसा ही संविधान भी कहता है. इस अदालत को नैतिक अधिकार और जनता का विश्वास प्राप्त है.

  • समलैंगिक विवाह भारत के परम्पराओं के खिलाफ 
  • इसे देश की नागरिकों की निजता का मुद्दा नहीं माना जा सकता 
  • शादी के बाद झगडा होने पर पति और पत्नी की पहचान कैसे होगी 

विभिन्न धार्मिक संगठनों और एनजीओ ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिए जाने का विरोध करते हुए उनका पक्ष भी सुने जाने की मांग की है.आखिर श्री सनातम धर्म प्रतिनिधि सभा ने कहा कि समलैंगिक विवाह की अवधारणा “विनाशकारी” है और इसका भारतीय संस्कृति और समाज पर “हानिकारक प्रभाव” होगा. हिंदू संगठन ने इसके विरोध में वेदों का हवाला दिया है. सभा के मुताबिक, वेदों में कहा गया है कि जिनके पास पत्नियां हैं. उनके पास वास्तव में एक पारिवारिक जीवन हैं. जिनकी पत्नियां हैं, वे सुखी हो सकते हैं. जिनके पास पत्नियां हैं, वे पूर्ण जीवन जी सकते हैं. मनुस्मृति का भी उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया कि महिलाओं को मां बनने के लिए और पुरुष को पिता बनने के लिए बनाया गया है.इस विवादास्पद मुद्दे पर धार्मिक संगठनों की क्या राय है, आइए एक नजर डालते हैं.

सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा 

श्री सनातम धर्म प्रतिनिधि सभा ने कहा कि समलैंगिक विवाह की अवधारणा “विनाशकारी” है और इसका भारतीय संस्कृति और समाज पर “हानिकारक प्रभाव” होगा. हिंदू संगठन ने इसके विरोध में वेदों का हवाला दिया है. सभा के मुताबिक, वेदों में कहा गया है कि जिनके पास पत्नियां हैं. उनके पास वास्तव में एक पारिवारिक जीवन हैं. जिनकी पत्नियां हैं, वे सुखी हो सकते हैं. जिनके पास पत्नियां हैं, वे पूर्ण जीवन जी सकते हैं. मनुस्मृति का भी उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया कि महिलाओं को मां बनने के लिए और पुरुष को पिता बनने के लिए बनाया गया है.

 

 

 

 

जमीयत-उलेमा-ए-हिंद

मुसलमानों की संस्था जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने भी समलैंगिक विवाह का विरोध किया है. जमीयत ने कहा है कि दो विपरीत लिंग वालों में शादी होना, विवाह की मूल विशेषता है. इस्लाम में शुरुआत से ही समलैंगिकता को लेकर पाबंदी रही है. जमीयत ने एलजीबीटीक्यूआईए को पश्चिमी यौन मुक्ति आंदोलन से उपजा बताया है.

 

अखिल भारतीय संत समिति

हिंदू संगठन अखिल भारतीय संत समिति ने कहा है कि पति और पत्नी को साथ रखना ये प्रकृति का कानून है. हिंदू विवाह के दौरान कन्यादान और सप्तपदी मुख्य संस्कार हैं. संगठन ने समलैंगिक विवाह को पूरी तरह अप्राकृतिक बताया है.

तेलंगाना मरकजी शिया उलेमा काउंसिल

इस्लाम के शिया मत में भी समलैंगिक विवाह को लेकर ऐसा ही विचार है. तेलंगाना मरकजी शिया उलेमा काउंसिल ने दावा किया कि समलैंगिक जोड़ों द्वारा पाले गए बच्चों में आगे चलते डिप्रेशन, कम पढ़ाई लिखाई और नशा फूंकने की प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है. इसने आगे कहा है कि पश्चिम में धर्म काफी हद तक कानून का स्रोत नहीं रह गया है और यह निजी जीवन इसकी बहुत भूमिका नहीं रह गई है. दूसरी ओर, भारत में धर्म पारिवारिक और सामाजिक संबंधों के साथ ही व्यक्तिगत कानून को आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

 

 

‘हिंदू धर्म में शादी केवल यौन सुख का अवसर नहीं’, समलैंगिक विवाह पर VHP का बड़ा बयान

विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने कहा कि समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए दायर याचिका का निस्तारण करने में उच्चतम न्यायालय जिस प्रकार की ‘जल्दबाजी’ कर रहा है, वह किसी भी तरह से उचित नहीं है. विहिप के संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन ने कहा कि यह नए विवादों को जन्म देगा और भारत की संस्कृति के लिए घातक सिद्ध होगा. उन्होंने कहा कि इसलिए इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले उच्चतम न्यायालय को धर्मगुरुओं, चिकित्सा क्षेत्र, समाज विज्ञानियों और शिक्षाविदों की समितियां बनाकर उनकी राय लेनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक शादी को मान्यता देने की याचिका के साथ सुनवाई के लिए एनसीपीसीआर ने भी अपनी याचिका लगा दी है. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी NCPCR भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है. सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता के खिलाफ NCPCR भी कोर्ट पहुंचा है.  NCPCR ने कहा है कि समलैंगिक जोड़े द्वारा बच्चों को गोद लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. NCPCR ने कहा है कि समान लिंग वाले अभिभावक द्वारा पाले गए बच्चों की पहचान की समझ को प्रभावित कर सकते है. इन बच्चों का एक्सपोजर सीमित रहेगा और उनके समग्र व्यक्तित्व विकास पर असर पड़ेगा.

गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली सरकार के बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR) ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल कर समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं के साथ सुनवाई की मांग की है. डीसीपीसीआर ने कहा है कि समलैंगिक जोड़ों को भी बच्चे गोद लेने की अनुमति मिलनी चाहिए. इसके लिए याचिका में अलग-अलग तर्क दिए गए हैं. इसमें कहा गया है कि विषमलिंगी जोड़ों की तरह ही समलैंगिक जोड़े भी अच्छे या बुरे अभिवावक बन सकते हैं. इनका तर्क है कि दुनिया के 50 से ज्यादा देश समलैंगिक जोड़ों को बच्चा गोद लेने की इजाजत देते हैं.

साथ ही इन लोगों का कहना है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि समलैंगिक जोड़ों के बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास पर असर पड़ता है.

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का विरोध करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है. बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपने प्रस्ताव में कहा है,

‘ज्वाइंट मीटिंग की एकमत राय है कि समलैंगिक विवाह के मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए और विविध सामाजिक-धार्मिक पृष्ठभूमि के हितधारकों के एक स्पेक्ट्रम को ध्यान में रखते हुए, यह सलाह दी जाती है कि यह सक्षम विधायिका द्वारा विभिन्न सामाजिक, धार्मिक समूहों को शामिल करते हुए एक विस्तृत परामर्श प्रक्रिया के बाद निपटाया जाए.’

CJI चंद्रचूड़ ने कहा कि याचिकाओं पर फैसला करते समय बेंच पर्सनल लॉ के पहलुओं को नहीं छूएगी. पीठ ने कहा कि इस मामले में विधायी कार्रवाई का एक एलिमेंट शामिल है और इस प्रकार स्पेशल मैरिज एक्ट (SMA) के तहत समलैंगिक विवाहों को मान्यता देने के मामले के दायरे को सीमित करना विवेकपूर्ण होगा.

 

समाज में 15 प्रतिशत लोग ही सभी क्षेत्रों में अपना एकाधिकार जमाये हुए हैं: जीतनराम मांझी

बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर 132 वीं जयंती पर स्त्रीकाल परिवार की ओर से सादर जय भीम!

 ‘बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने इस देश के लिए जो काम किया, वह मील का पत्थर है। अपने समय का कोई भी ऐसा विषय नहीं रहा जिसपर उन्होंने विचार न किया हो। सेपरेट इलेक्ट्राल और काॅमन स्कूल सिस्टम आज देश भर में लागू करने की जरूरत है तभी बाबा साहब के सपने पूरे होंगे।’

 

ये बातें पूर्व मुख्यमंत्री श्री जीतनराम मांझी ने स्थानीय बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन हाॅल सभागार में कही। उन्होंने यह बात बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की 132वीं जयंती पर स्त्रीकाल और रिफार्मर्स की संयुक्त पहल पर आयोजित परिसंवाद ‘डाॅ. आंबेडकर: स्वतंत्रता और समता के पक्षधर’ विषय पर आयोजित परिसंवाद में कही।
इस गोष्ठी को वरिष्ठ लेखक प्रेमकुमार मणि, संजीव चंदन, शांति यादव और डाॅ. मो. दानिश ने भी संबोधित किया। इन वक्ताओं ने बाबा साहेब के स्त्रीवादी, दलितवादी और मानवतावादी सरोकार के मुताल्लिक बहुत गंभीर और सारगर्भित बातें कहीं।

’15 प्रतिशत लोग ही सभी क्षेत्रों में अपना एकाधिकार जमाये हुए हैं’

पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने आगे कहा कि ‘समाज में भले ही 85 प्रतिशत लोग बहुजन हैं लेकिन आज भी सच्चाई यही है कि अपने समाज में 85 प्रतिशत का चलता नहीं है, 15 प्रतिशत लोग ही सभी क्षेत्रों में अपना एकाधिकार जमाये हुए हैं। जो लोग कभी-कभार यथार्थ की बातें करते हैं, उस विचार को पनपने ही नहीं दिया जाता। अमीरों की खामियों को कोई नहीं देखता, गरीबों का मजाक उड़ाया जाता है।’
वरिष्ठ लेखक एवं पूर्व विधान परिषद सदस्य श्री प्रेमकुमार मणि ने बाबा साहब के संघर्ष से जुड़े कई घटना प्रसंग साझा किये। 1932 के कम्युनल अवार्ड की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अपने समय में बाबा साहब किस तरह के संघर्ष कर रहे थे, कैसी उनकी अनुभूति थी, उसका वस्तुनिष्ठ अध्ययन अभी शेष है। उन्होंने कहा कि तब गांधी के आमरण अनशन के समय बाबा साहब गांधी के सिरहाने बैठकर बात करते हैं यह समझ लीजिए कि बाबा साहब का तर्क सुनकर गांधी हिल जाते हैं गांधी को मुक्ति बाबा साहब दिलाते हैं इसके बाद गांधी वही गांधी नहीं रह जाते। श्री मणि ने बाबा साहब के स्त्री और अल्पसंख्यक संबंधी विचारों पर भी रोशनी डाली।
स्त्रीकाल के सम्पादक संजीव चंदन ने कहा कि बाबा साहब इस देश के ठोस स्त्रीवादी थे। उन्होंने कहा कि वे दो कारणों से बाबा साहब के प्रति आसक्त रहते हैं इसका एक कारण उनकी वैचारिक दृढ़ता में निहित है और दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक है। उन्होंने स्त्रीवादी अनुशासन में काम करने वाले बौद्धिक जमात पर चोट करते हुए कहा कि वहां भी जातिवाद की संकीर्णता अभी तक गई नहीं है यह दुखद है कि जिस बाबा साहब ने महिला आरक्षण का सवाल 42 में ही उठाया, किसी भी महिला इतिहासकार ने उसकी नोटिश नहीं ली।
वरिष्ठ साहित्यकार शांति यादव ने भी विस्तार से बाबा साहब के योगदान की और उनके स्त्री विषयक योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज और राजनीति में बाबा साहब पहले व्यक्ति हैं जो स्वतंत्रता और समता की अवधारणा को भारतीय संविधान में उसकी व्यापकता में उभारते हैं। शांति यादव ने धार्मिक जड़ता में लिप्त लोगों को उससे बाहर निकलने पर जोर दिया।
डाॅ. मो.दानिश ने कहा कि मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के सवाल पर बाबा साहब की सोच अपने दौर के अन्य नेताओं से न सिर्फ भिन्न थी अपितु दूरगामी भी। उन्होंने मुस्मिल वैल्यूज के सवाल को अपने तरीके से एड्रेस किया लेकिन यह दुखद है कि हिन्दुत्वादी शक्तियां उसे विकृत रूप में मुसलमानों के खिलाफ कड़े करने के षड्यंत्र में शामिल है।
स्वागत भाषण लारेब अकरम और पहले सत्र का संचालन अरुण नारायण ने किया। मंच पर आगत अतिथियों को भेंट स्वरूप स्त्रीकाल पत्रिका और किताब क्रमशः संतोष यादव, कंचन राय, गायत्री और गीता पासवान भेंट की।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में आंबेडकरवादी कविताओं का पाठ का कार्यक्रम था जिसमें एनके नंदा, शांति यादव, साकिब अशरफी, कृष्ण समिद्ध, मृत्युंजय पासवान, सुरेश महतो, राकेश शर्मा, कंचन राय, ज्योति स्पर्श, श्वेता शेखर, कुणाल भारती, संतोश यादव, लता प्रासर और नवीनत कृष्ण सरीखे कवियों ने अपनी अलग-अलग भावभंगिमा से पूर्ण समाजिक यथार्थ के अनुभवों से मुठभेड़ करती कविताओं का पाठ किया। इस सत्र का संचालन नवीनत कृष्ण ने किया।
इस मौके पर सुबोध कुमार, शैलेंद्र कुमार, मुसाफिर बैठा, रणविजय, पूनम कुमारी, अनुज, अमरनाथ यादव, नीला विजय कुमारी चैधरी, विनय कुमार चौधरी, रामविलास प्रसाद, अनिल कुमार रजक, आदि लोगोें की उपस्थिति अंत तक बनी रही।

पश्चिम बनाम पूरब, यूरोप बनाम भारत, अंग्रेज़ी बनाम हिंदी, राजनीति बनाम संस्कृति, वर्ग बनाम अस्मिता – नए विमर्शों का समायोजन

(यह रिपोर्ट शोधार्थी शशांक कुमार ने लिखी है)

भारतीय साहित्य सिद्धांत और नए विमर्शों के समायोजन

28-29 मार्च, 2023 को ‘हिंदी साहित्य पर पश्चिमी प्रभाव और देशज प्रतिमान’ विषय पर दो दिन की विचार गोष्ठी का आयोजन दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एनेक्सी में किया गया। आयोजन डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली की साहित्य अध्ययन पीठ के देशिक अभिलेख-अनुसंधान केंद्र (सीआए-आईआईएलकेएस) ने किया।

गोष्ठी का केंद्र बिंदु जिन प्रश्नों के इर्दगिर्द बुना गया था, उनमें प्रमुख थे कि साहित्यिक विधाओं की भारतीयता का क्या तात्पर्य है, तथा क्या भारतीय साहित्य सिद्धांत की आज कोई प्रासंगिकता है? जैसा कि आलोचक वैभव सिंह ने  विचार गोष्ठी के बीज पत्र को प्रस्तुत करते हुए कहा कि

“वर्तमान पीढ़ी आलोचना व साहित्य की पूर्व-परम्पराओं को विस्मृत कर रही है। उससे बौद्धिक जुड़ाव भी बाधित हो रहा है।” उन्होंने इस क्रम में गोष्ठी के वक्ताओं के समक्ष कई सवाल रखे, जिनमें प्रमुख थे कि  “क्या इस समस्या से उबरने में पश्चिम बनाम पूरब, यूरोप बनाम भारत, अंग्रेज़ी बनाम हिंदी, राजनीति बनाम संस्कृति, वर्ग बनाम अस्मिता के विचारधारात्मक द्वैत से संचालित बौद्धिकताएँ मददगार हो सकती हैं? क्या हिंदी आलोचना के इतिहास को नई दृष्टि से समझने की कोशिश नये रास्ते खोल सकती है? क्या दलित, ओबीसी, स्त्री और मार्क्सवादी विमर्श का इन सिद्धांतो से कोई समायोजन संभव है, या इन विमर्शों के प्रभाव में ये सिद्धांत हमारे किसी काम के नहीं रह गए हैं? पुराने पाठों को पढ़ने का कोई विउपनिवेशीकृत तरीका भी है या इसके लिए हमें पश्चिमी साहित्यशास्त्र के पास जाना ही पड़ेगा? क्या पश्चिम का प्रतिवाद हिंदी साहित्य-चिंतन का एक संभव एजेंडा बन सकता है?”

गोष्ठी में दो दिनों तक इन मुद्दों पर जमकर चर्चा हुए। कई नई स्थापनाएं सामने आईं, कई समस्याग्रस्त पदों पर नई रोशनी पड़ी और जैसा कि किसी बौद्धिक गोष्ठी के लिए स्वभाविक है, अनेक मुद्दे अनसुलझे भी रहे।

गोष्ठी में कवि उदयन वाजपेयी ने ‘औचित्य-विचार व शृंगार’ विषय पर अपना मत रखा। औचित्य विचार की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा, हम सब एक दूसरे से विशिष्ट इसलिए हैं,

क्योंकि हमारी औचित्य बोध अलग है और इसकी चेतना ही हमें सृजनशील बनाती है। इस औचित्य बोध के आत्मबोध से ही सृजन किया जाता है। एक साहित्यिक रचना में इस औचित्य बोध से जब सौन्दर्य की रचना होती है तो उसी समय एक विशिष्ट नैतिक बोध भी अनुस्यूत हो जाता है। चूँकि यह नैतिक बोध अन्य प्रकार के बोध से अलग होता है, इसके कारण यह हमारे कार्यकलापों को प्रश्नांकित करता है। राजनीति एक औसत नैतिक बोध से कार्य करती है, जब पाठक ऐसी कृति को पढ़ता है तो उसके भीतर विवेक और वह विशिष्ट नैतिक बोध उत्पन्न होता है जिससे वह राज्यसत्ता द्वारा व्यवहृत औसत नैतिक बोध को प्रश्नांकित करने में सक्षम होता है।”

जबकि आलोचक मदन सोनी ने ‘आलोचना की भारतीयता’ निमित्त कहा कि-

“हमारे आलोचना कि समस्या यह नहीं है कि वह पश्चिम से प्रभावित है, उसकी समस्या किसी विजातीय जमीन पर रोपे गये उस पौधे की तरह है जो निरंतर कुपोषण का शिकार बनाये रहते हुए एक ओर अपनी मूल जातीय पहचान खो चुका होता है, और दूसरी ओर उस जमीन से अपनी पहचान अर्जित नहीं कर पाता जिस पर उसे रोपा गया होता है। हमारी आलोचना का विद्रूप का स्रोत इस दोहरे अलगाव में है।”

प्रो. नन्द किशोर आचार्य ने ‘रस की अवधारणा’ पर कहा कि “साहित्य रचना की प्रक्रिया हो, सम्प्रेषण की प्रक्रिया हो और उस प्रक्रिया की जो व्याख्या रस सिद्धांत या दृष्टि करती है वो एक प्रकार से आत्म और स्व के पार्थक्य पर टिकी है, और जो उस पार्थक्य के आग्रह के कारण से जीवन के एकत्व पर आघात करती है उसका एक सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिवाद रस में द्रष्टव्य है।”

गोष्ठी का एक सत्र ‘मार्क्सवादी, स्त्री, दलित, ओबीसी और आदिवासी विमर्श’ पर केंद्रित था।  इस सत्र में असम विश्वविद्यालय के डॉ प्रमोद रंजन, दिल्ली विश्वविद्यालय डॉ. सुजाता चोखेरबाली और प्रोफेसर संजीव कुमार ने अपनी राय रखी।

प्रमोद रंजन का वक्तव्य ‘बहुजन साहित्य के प्रश्न’ पर केंद्रित था। अपनी बातों को रखते हुए बहुजन साहित्य की अवधारणा को पेश की। उन्होंने कहा कि ऐसा माना जाता रहा है कि महराष्ट्र में 1972 में दलित पैंथर की स्थापना से दलित साहित्य की शुरुआत हुई, जबकि वास्तविकता यह है कि दलित साहित्य उससे पहले से चला आ रहा था। दलित पैंथर ने दलित साहित्य को जन्म नहीं दिया बल्कि सिर्फ व्यापक बनाया, या दूसरे शब्दों में कहें कि उसका भूमंडलीकरण किया। इस तथ्य को नहीं जानने के कारण न सिर्फ साहित्य के इतिहास संबंधी हमारी समझ गड्मड् हो जाती है, बल्कि हम उन तंतुओं को भी समझने में असफल रहते हैं, जिन्होंने इसे निर्मित किया है। दलित पैंथर का जन्म अमेरिकी-अफ्रीकी लोगों के ब्लैक पैंथर की तर्ज पर हुआ था और दलित साहित्य में इसके दायरे में सिर्फ अनुसूचित जातियां नहीं बल्कि सामाजिक रूप से वंचित अन्य समुदाय भी थे। बाद में इस धारा का जोर अस्पृश्यता से मुक्त होने तक सीमित हो गया। यह एक बहुत महत्वपूर्ण और कठिन कार्यभार था, लेकिन इसके दायरे को अब फिर से विस्तृत करने की जरूरत है।

प्रमोद रंजन ने अपनी वक्तव्य में कहा कि पिछले कुछ समय से भारत के विभिन्न हिस्सों में साहित्य पर केंद्रित ऐसे अनेक कार्यक्रम होने लगे हैं, जिनमें किसी-न-किसी रूप में ‘बहुजन साहित्य’ शब्द-बंध का प्रयोग किया जा रहा है। सन् 2017 में जयपुर में बहुजन साहित्य महोत्सव’ मनाया गया, जिसमें ‘समकालीन साहित्य में बहुजन चेतना’ पर विस्तार से चर्चा हुई थी। सन् 2018 में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में ‘बहुजन साहित्य संघ’ की स्थापना की गयी और ‘बहुजन साहित्य की अवधारणा और सौन्दर्यबोध’ समेत बहुजन साहित्य से सम्बन्धित अन्य कार्यक्रम हुए। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में ‘बहुजन साहित्य:दशा और दिशा’ विषय पर गोष्ठी हुई। ऐसे दर्जनों कार्यक्रम हो रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोग भागीदारी कर रहे हैं। इन कार्यक्रमों को गूगल अथवा फेसबुक के सर्च इंजन में आसानी से तालाशा जा सकता है। हिन्दी के अतिरिक्त मराठी, गुजराती और तमिल में भी बहुजन साहित्य पर केंद्रित आयोजनों के होने की सूचनाएँ मिल रही हैं। तेलांगना में बहुजन साहित्य अकादमी सक्रिय है, जिसका एक बड़ा आयोजन पिछले दिनों दिल्ली में हुआ था। इस प्रकार केरल में बहुजन साहित्य अकादमी स्थापित हुई है।

ये आयोजन बहुजन अवधारणा के तहत होने वाले दलित,आदिवासी, मध्यवर्ती जातियों; जिन्हें भारतीय संविधान में ओबीसी कहा गया है; तथा हमारे विमर्श के दायरे से अलक्षित रहे अन्य सामाजिक समूहों की संस्कृति और साहित्यिक अभिव्यक्तियों में व्यक्त मूल्यों के साझेपन को अपने-अपने तरीक़े से चिह्नित कर रहे हैं। साथ ही इनमें सामाजिक स्तर पर द्विजवाद से संघर्ष के मुद्दों के साझेपन की तलाश की जा रही है। इन आयोजनों के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण यह भी है कि इन कोशिशों के पीछे कोई सुव्यवस्थित संगठन नहीं है, बल्कि यह स्वयमेव हो रहा है।

उन्होंने इस बात पर विशेष तौर पर गौर करने की आवश्यकता को रेखांकित किया किया कि साहित्य, संस्कृति को देखने का यह नया नज़रिया क्यों विकसित हो रहा है?

डॉ प्रमोद रंजन ने कहा कि बहुजन अवधारणा जाति व्यवस्था से उपजे अन्य कष्टकारी स्वरूपों को भी शामिल करते हुए भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हो रही है। इस अवधारणा का सूत्र वाक्य ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ है। यह अवधारणा जाति के स्थान पर विचार को प्रमुखता देती है। इसमें वंचित तबके आदिवासी, घुमंतू जातियां, अन्य धर्मों के पसमांदा, LGBTQ समुदाय मुख्य रूप से शामिल है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक काल में हिंदी में भिक्खू बोधानंद (1874-1952) से ‘बहुजन अवधारणा’ की शुरूआत को हम देख सकते हैं। उनके शिष्य चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु (1885-1974) ने  ‘बहुजन साहित्य की अवधारणा’ को प्रसारित किया था। इतिहास के पन्नों में इस धारा के खो जाने की मुख्य कारणों में से एक कारण था ‘भारतीय साहित्य को अपनी दृष्टि से न देखना।’ बहुजन अवधारणा की सैद्धांतिकी बुद्ध की वैज्ञानिकता की नींव पर खड़ा है, जिसका जोर नित नई खोजों पर दृष्टि रखने के लिए प्रेरित करता है। रंजन ने यह भी कहा कि, बोधानंद की पुस्तक- ‘भारतवासी और आर्य’ , त्रिवेणी संघ का घोषणापत्र ‘बिगुल’ का पाठ बहुजन साहित्य के संदर्भ में होना चाहिए।

 

आलोचक संजीव कुमार ने ‘आलोचना- जितनी मार्क्सवादी, उतनी ही हिंदी’, विषय पर हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना को रेखांकित करते हुए बताते है कि हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना कभी एकास्म नहीं रही और न ही भारतीय बनाम अभारतीय, पूरब बनाम पश्चिम, परम्परा बनाम आधुनिकता, जैसी कोई केंद्रीय विचार श्रेणियां रही। उन्होंने कहा कि “न तो अल्पमत में धकेले गये मार्क्सवादियों ने कथित परम्परा भंजन में भंजन जैसी कोई चीज थी, न ही बहुमत द्वारा स्वीकृत परम्परा के संतुलित द्वंद्वात्मक मूल्यांकन में कोई विशेष संतुलन और द्वंद था। अलबता इन दोनों पक्षों हिंदी के साहित्यिक परम्परा में अवगाहन सराहनीय और संस्मरणीय है। इस लिहाज से हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना जितनी मार्क्सवादी रही है उतनी ही हिंदी भी रही है। जहां-जहां उसने ज्यादा हिंदी होने की कोशिश की है, हिंदी साहित्य के प्रति अतिरिक्त गौरव बोध जगाने के प्रति कोशिश रहा है वहां वह समस्याग्रस्त रहा है।”

प्रोफेसर संजय कुमार ने ‘पाठ और साहित्य में गायन’, विषय पर बोलते हुए कहा कि आधुनिक पश्चिमी सभ्यता और उसके साथ-साथ आये प्रिंट कल्चर से नतीजा यह निकला कि साहित्य श्रेणी में जो वाचिक था उसको एक तरह से बहिष्कृत कर दिया, इससे यह मानने की शुरूआत हो गयी कि लिखित साहित्य ही साहित्य है। उन्होंने संगीत और गायन कला की महत्ता बताते हुए उसे साहित्य से जोड़ने पर बल दिया।

आलोचक गरिमा श्रीवास्तव ने ‘हरदेवी का वृत्तांत’ में श्रीमती हरदेवी के बारे में अपने ताजा शोध के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि श्रीमती हरदेवी 1887 में उत्तर-भारत से शिक्षण-यात्रा पर लन्दन जाने वाली पहली हिन्दी भाषी स्त्री हैं। उनके लन्दन-यात्रा और लन्दन जुबली शीर्षक वृत्तान्त भी हैं। एक बहुत प्रगतिशील परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद भी एक स्त्री का पढ़ाई के लिए उत्तर भारत से लन्दन जाना उन दिनों एक बड़ी खबर थी। इस खबर को कई अंग्रेजी और हिन्दी पत्रों ने इस खबर को सुर्ख़ियों में रखा। उनकी लन्दन यात्रा अकारण और निरुद्देश्य नहीं थी, वे लन्दन रहकर पढ़ीं वहां की संस्कृति को नज़दीक से देखा और पहले की अपेक्षा तीक्ष्ण दृष्टि सम्पन्न होकर भारत लौटीं। पुरुषों की दुनिया में श्रीमती हरदेवी ने अपनी उच्च शिक्षा के लिए कैसे स्पेस बनाया होगा, यह वास्तव में विचारणीय है।

पाठांतर के साथ कोई आख्यान कैसे परिवर्तित होता है और पहचान कैसे आमूल-चूल रूप से बदल जाती है इस बदलाव के क्या निहितार्थ होते हैं, इन प्रश्नों पर केंद्रित अपने वक्तव्य के माध्यम से डॉ. तृप्ति श्रीवास्तव ने ‘कबीर की पहचान के बदलते आख्यान’ को रखा, कबीर की वर्तमान छवि बनने में दो धाराओं की मुख्य भूमिका है। पहली प्राच्यवादी जिसमें कबीर को धर्मगुरु, भारत का मार्टिन लूथर, रहस्यवाद और पंथ संस्थापक बताया गया है, जबकि दूसरी धारा भारतीय है जिसमें कबीर का ब्राह्मणीकरण और अवतारीकरण किया गया है।

 

संगोष्ठी में  ‘विधाओं की भारतीयता का प्रश्न’ केंद्रित सत्र का उद्देश्य साहित्यिक विधाओं की भारतीयता से क्या तात्पर्य है्र इसे समझना था। इस सत्र में बीएचयू के प्रो. राजकुमार ने ‘विधाएँ-छापेखाने के इधर-उधर’ विषय पर, बीएचयू के प्रो. आशीष त्रिपाठी ने ‘हिंदी नाटक’ विषय पर तथा अम्बेडकर युनिवर्सिटी के प्रो. सत्यकेतु सांकृत ने ‘विधाओं पर पश्चिमी प्रभाव’ विषय पर अपनी-अपनी बातों को रखा।

संगोष्ठी में ‘भारतीय साहित्य सिद्धांत की प्रासंगिकता’ पर केंद्रित सत्र की अध्यक्षता प्रो. सुधीश पचौरी ने की। इस सत्र में जेएनयू के प्रोफेसर रमण सिन्हा ने ‘प्रासंगिकता के व्यापक आयाम’ विषय पर, प्रो. विनोद शाही ने ‘भाषा-चिंतन का संदर्भ’ विषय पर तथा प्रो. विश्वनाथ मिश्र ने ‘प्रामाणिक भविष्य का प्रश्न’ पर अपनी बातें रखीं।

गोष्ठी का उद्घाटन वक्तव्य वरिष्ठ कवि एवं कला-मर्मज्ञ अशोक वाजपेयी ने उद्घाटन वक्तव्य दिया। समाज विज्ञानी अभय कुमार दुबे ने गोष्ठी की संक्षिप्त प्रस्तावना रखी। गोष्ठी का समापन वक्तव्य आलोचक एवं मीडिया विश्लेषक सुधीश पचौरी ने दिया। संगोष्ठी का स्वागत वक्तव्य डॉ. नितिन मलिक (कुलसचिव, अम्बेडकर विश्वविद्यालय) द्वारा दिया गया।

 

शशांक कुमार ‘भूमंडलीकृत ग्रामीण यथार्थ और हिंदी उपन्यास’ विषय पर शोध कर रहे हैं.

हाशिये का समाज एवं रमणिका गुप्ता का संघर्ष

रमणिका गुप्ता ने आदिवासी, दलित, पिछड़ी महिलाओं के उत्थान के लिए सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम शुरू किया। इनका जन्म पंजाब में 22 अप्रैल1930 में हुआ। इनका कर्मक्षेत्र झारखंड और बिहार रहा। विधान परिषद की सदस्यता या विधानसभा के लिए चुनावी यात्राएं, केदला-झारखंड की कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के लिए लम्बी हड़तालें, आदिवासियों, दलितों और किसानों के विस्थापन और पलायन के विरुद्ध मुहिम,महिलाओं को डायन कहकर मारने वालों का विरोध, प्रेम-विवाह का विरोध करने वालों के खिलाफ जिहाद, आदिवासियों के लिए जल-जंगल-जमीन की संघर्ष यात्राओं को आखिरी समय तक जारी रखा। इन्होंने भारत- यायावर और रामविलास शर्मा की प्रेरणा से लेखन के माध्यम से भी अपनी लड़ाई जारी रखीं जिनमें प्रमुख रचना उनकी आत्मकथा “हादसे”और “आपहुदरी” में उनकी संपूर्ण जीवन संघर्ष की प्रस्तुति है।’हादसे’ में हजारीबाग के संघर्षों को दर्ज किया है तो वहीं स्त्री दृष्टि से ‘आपहुदरी’में अपने निजी जीवन और संघर्ष को आज के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

एक कहानी संग्रह-“बहु जुठाई”जिसमें स्त्री के अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए किए गए संघर्षों को कहानी के माध्यम से दिखाया गया है। इनकी दो उपन्यास “सीता”और “मौसी”जिसमें स्त्री के दोहरे शोषण के साथ-साथ उसके प्रतिकार स्वरूप को दिखाया गया है। “सीता” उपन्यास में सीता को~”त्याग और तपस्या की प्रतीक,सीता जब रामायण के युग से निकलकर आज के संघर्षों में भूख से जूझती हुई जवान होती है तो वह सर्वहारा वर्ग के लिए आधुनिक रावणों से लड़ती है।आज की सीता जूझी है हर रिश्ते से, उम्र के हर मोड़ पर। उसने मौत से छीना है जिंदगी को। सीता अब अपने से बाहर खड़ी सीताओं के लिए लड़ने लगी है। सीता अब एक कतार है, एक श्रृंखला है, एक पात है। पात-जो चुप थी आज तक अब बोलने लगी है। पांत-जो जड़ थी सदियों से अब फुंकारने लगी है। आज की सीता अपने बदलाव की बाढ़ में गली-सड़ी मानसिकता  को बहाए ले जा रही है समुद्र के गर्त में दफनाने के लिए।”

इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका प्राचीन भारत की स्त्रियों की स्थिति को दिखाते हुए वर्तमान में कहां तक पहुंची है और किस तरह अपने अस्तित्व के लिए लड़ना जारी रखती हैं और आगे भी हार नहीं मानने वाली है। सीता के बदलते स्वरूप को दिखाया है लेखिका ने। रमणिका गुप्ता के शब्दों में कहें तो-“सही मायने में दरअसल स्त्री- मुक्ति का अर्थ है पुरानी परंपरा, प्रतिबन्ध या प्रथाएं जो समाज,पुरुष सत्ता या धर्म ने उस पर थोप रखी हैं,उनसे मुक्त होकर एक मनुष्य की तरह आचरण करने का निर्णय लेने की स्वतंत्रता। “रमणिका गुप्ता ने अपनी कविता संग्रह के माध्यम से मानवीय संवेदना को गति प्रदान की । “गीत-अगीत” इनका पहला कविता संग्रह है जिसके माध्यम से वह काव्य जगत में आईं। उनकी कविताओं में राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता, मजदूर यूनियन की नेता और बिहार विधान सभा/विधान परिषद की सदस्यता के खट्टे -मीठे अनुभव, त्रासदी, संघर्ष,उपलब्धि, सबकी झलक मिलती है। लेकिन अपने अनुभव को काव्य की सुंदरता के साथ गढ़ने की पूरी कोशिश रमणिका जी ने की है।

रमणिका जी अपने निजी जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए संपूर्ण मनुष्य जाति के लिए लड़ती हैं  जो समाज में दोयम दर्जे के दंश को झेल रहे हैं। जिसमें समस्त स्त्री -जाति की पीड़ा और मजदूरों -किसानों के दुःख -दर्द से रूबरू होकर कविता में भी गूंज उठी -“कहते हैं लोग मेरे पास गवांने को कुछ नहीं,सिवा अपनी- बेड़ियां-गुलामी की-भूख की-लाचारी की।”
रमणिका गुप्ता ने लगभग 19 देशों की यात्रा की जिसका विवरण उन्होंने “लहरों की लय”नामक यात्रा संस्मरण लिखा। “आदिवासी अस्मिता का संकट”नामक अपनी पुस्तक में रमणिका जी ने आदिवासियों की क्या स्थिति है उसे दिखाने की पूरी कोशिश करती हैं और कहती हैं भारत में आदिवासियों के शोषण के लिए विदेशी उपनिवेशवाद से ज्यादा आंतरिक उपनिवेशवाद दोषी है। आदिवासियों के बसने में भारतीय प्रशासकों द्वारा दमन और शोषण तो होता ही रहा है।

रमणिका जी ने अपने साक्षात्कार में बहुत स्पष्ट व सहज रूप में सवालों के जवाब देती हैं और कहती कैसे शिक्षा दलित, पिछड़ों के लिए समाज में उनकी गैर बराबरी को खत्म कर सकता है। श्यौराज सिंह बेचैन जी ने भी इन दलित मुद्दों पर रमणिका जी से बहुत ही प्रासंगिक सवाल जवाब किए।


रमणिका जी ने अपने संघर्ष के एक बड़े हिस्से में उन सभी के लिए लड़ती है  जो हाशिए के समाज हैं। आदिवासियों एवं दलितों की स्थिति में एक बड़ा अंतर लेखिका यह दिखाती है कि-“दलितों को गांव के बाहर भारतीय संस्कृति से बहिष्कृत करने के बाद भी, उसी के अधीन रहकर उसे मानने पर मजबूर किया गया उसे जीने की मानवीय शर्तों से वंचित रखा गया।उसका आत्मसम्मान ध्वस्त कर दिया गया। इसके विपरीत आदिवासियों को सभ्यता से बहिष्कृत कर जंगलों में ठेल दिया गया। उनके पास जंगल और जमीन दोनों थे। आदिवासी ने अपनी संस्कृति की विरासत हमेशा कायम रखी और वह आत्मसम्मान के साथ जीता रहा, लेकिन अब उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना, स्वायत्तता और अस्तित्व पर ही खतरा पैदा हो गया है। उसका स्वावलंबी स्वभाव और आत्मसम्मान डगमगाने लगा है और वह भी हीनता -बोध का शिकार हो गया है। “रमणिका गुप्ता ने समस्त ज्वलंत प्रश्नों पर एवं समस्याओं पर ध्यान देकर उसका हल ढूंढने का प्रयास किया है।जो अन्याय उन पर हो रहे हैं उनका डटकर मुकाबला भी किया है। रमणिका गुप्ता एक सशक्त स्त्री के रूप में देखी जाती हैं। उन्होंने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, दृढनिश्चय के बलबूते पर जो भी कार्य हाथ में लिया उसे पूर्ण करके ही छोड़ा। अपनी सक्रिय राजनीति द्वारा दलितों की समस्याओं का निराकरण किया। विशेषत: कोयला खदानों का सरकारीकरण करके शोषण करने वालों के चंगुल से मजदूरों को आजाद कराकर उनके जीवन में खुशहाली भर दी। इस दृष्टि से उनका योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपनी मर्जी से पूरी श्रद्धा, लगन, श्रम और दुर्दम्य इच्छाशक्ति से महिलाओं, मजदूरों, भूमिहीनों की समस्याएं , खदानों के प्रश्नों के लिए वह संघर्ष करती रही हैं। इनकी मृत्यु 89 वर्ष की अवस्था में 26 मार्च 2019 को नई दिल्ली में हुई। रमणिका जी एक गैर दलित लेखिका होने के बावजूद पिछड़े,दलितों, मजदूरों के बीच रहकर उनकी  संघर्ष भरी जिंदगी को जिया है और न केवल जिया है बल्कि पूरे दम – खम के साथ लड़ी भी हैं। इसके लिए यहां तक कि उनकी हत्या की भी पूरी कोशिश की गई फिर भी इन्होंने हार नहीं मानी। इनके अपने घर में ही इनको “आपहुदरी”कहा जाने  लगा , जो की एक पंजाबी शब्द है जिसका हिंदी अर्थ जिद्दी लड़की है।

संभोग के लिए हिंसक शब्दावली: पितृसत्तात्मक शक्ति संरचना में असामान्य शब्दों का सामान्यीकरण

“आपसी सरगोशियों से लेकर रोजमर्रा के सामान्य बातचीत और लड़ाई-झगड़े में ‘फकिंग’ ( आम बोलचाल में चोदना) शब्द जिस सहजता से इस्तेमाल होता है, क्या यह वाकई सामान्य और सहज है? जया निगम अपने ‘फेसबुक पोस्ट’ से इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर गंभीरता से विचार करती हैं. इस पोस्ट के जरिये वे इस बात की तरफ मजबूत इशारा करती करती हैं कि (आम बोलचाल) निजी और सार्वजनिक स्पेश में ‘फकिंग’ शब्द का प्रयोग सुनने वाले के लिए कितना क्रूरतापूर्ण और असहज कर देनेवाला अनुभव होता है.
जया अपने पोस्ट के जरिये इस प्रकार के शब्दों के पीछे के वर्ग चरित्र और शक्ति संरचनात्मक पहलू की ओर भी इशारा करती हैं जहाँ सुनने और सुनाने वाले के बीच शक्ति संबंध होता है और सुनाने वाले की आर्थिक सामाजिक हैसियत सुनने वाले से मजबूत होती है. हालाँकि यह पूरी तरह से सच नहीं है. कभी-कभी कमजोर वर्ग भी प्रतिरोध के प्रतीक के तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल करता है.”

-अंजलि कुमारी

पितृसत्ता में चोदना (Fucking) एक ऐसी क्रिया है जिसे दूसरे के लिए निम्नतम गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है और अपने लिए अधिकतम सुख के लिए.

 

चोदने (Fucking) में सेक्स को किसी के शरीर से नोच लेने या छीन लेने या परिष्कृत भाषा में कहें तो हासिल कर लेने का जो भाव है वो पूरी दुनिया में एक जैसा है.
इस अंतरंग क्रिया के लिए हिंदी में सहवास या संभोग जैसे शब्द भी बने हैं पर वो किताबी शब्दावली है क्योंकि इन शब्दों में वो भाव ही नहीं है जो सेक्स को लोक में प्रचलित नजरिए से प्रकट करे, लोक में जो भाव है उसके लिए हिंदी में ठीक ठीक यही शब्द याद आता है, शायद अन्य बोलियों में ऐसे और भी शब्द प्रचलन में होंगे पर इंग्लिश में इसका परिष्कृत शब्द इंटरकोर्स होगा.
पूरी दुनिया के पुरुष जब सेक्स के बारे में बात करते है तो कितने इंटरकोर्स का इस्तेमाल करते हैं जबकि fucking लगभग हर हॉलीवुड फिल्म में सुनने को मिल जाता है.
बहुत लोगों ने कल ये पूछा कि इस शब्द पर पोस्ट डाले जाने का मकसद क्या है, मेरा उनसे सवाल है कि जो शब्द सुनने में रोजमर्रा के हो चुके हैं उनके बारे में लिखा जाना या बात किया जाना उन्हें इतना बुरा क्यों लग रहा है!
मेरी वॉल पर सिर्फ पवित्र और सुसंस्कृत मुद्दे उठाए जायेंगे ऐसा कोई वादा अपने फेसबुक दोस्तों से मैने कभी नहीं किया.
प्रतीकात्मक तस्वीर

स्थिति 1:

आपसे अपने कार्यस्थल या कहीं बाहर या घर पर कोई गलती होती है और आपका बॉस या घर का कोई बुजुर्ग आदमी आपको बक्चोद, कंचोद, जैसे शब्द नियमित तौर पर बोलता हो (जिनमे मां बहन संग साथ के लिए न लगे हों) तो आपको ठीक ठीक क्या महसूस होता है!!
  1. अपमान
  2. यही दुनिया है
  3. अपनी हीन स्थिति
  4. मज़ाक/व्यंग्य
  5. उत्तेजना
  6. इनमे से कुछ नहीं
  7. कुछ और
प्रतीकात्मक तस्वीर

स्थिति 2:

आप बिस्तर पर अपनी बीवी के साथ हैं या ऐसी किसी स्त्री/पुरुष के साथ जिसकी आर्थिक हालत आपसे कमजोर है (गर्लफ्रेंड, सेक्स के लिए खरीदी गई स्त्री, वन नाइट स्टैंड पार्टनर) और वो आपके चोदने वाले उत्तेजक वाक्य के संदर्भ में जब कोई जवाब नहीं देती या आपको fuck you baby/man/ तेरी तो आज ले के रहूंगी टाइप जवाब नहीं देती तो आपको क्या लगता है, उसे कैसा महसूस होता है?
1. अपमान
2. यही दुनिया है
3. मज़ाक/व्यंग्य
4. अपनी हीन स्थिति
5. उत्तेजना
6. इनमे से कुछ नहीं
7. कुछ और
इन दोनो परिस्थितियों में एक समानता है कि fuck you/fuck off/ चोद दिया आज टाइप डायलॉग मारने वाला व्यक्ति आर्थिक, सामाजिक रूप से, सुनने वाले के मुकाबले पावरफुल स्थिति में है.

हां मुझे फर्क पड़ता है…

 

कुछ महीने पहले बीबीसी पढ़ते हुए एक स्टोरी पर नजर गई जो ईरानी महिलाओं पर थी। ईरान में महिलाओं को शादी से पहले वर्जिनिटी प्रमाण पत्र बनवाना पड़ता है जिससे ये साबित हो सके कि उन्होंने किसी के साथ सेक्स नहीं किया है। हालांकि वहां पर इसका विरोध भी हो रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने के बाद महिलाओं की स्थिति तो जगजाहिर है। जिंदगी को आम तरीके से जीने की कोशिश के बावजूद देश-दुनिया में होने वाली ऐसी तमाम घटनाएं बेचैन कर देती हैं, आखिर महिलाओं के साथ ही ऐसा क्यों। आमतौर पर ऐसी चीजों को लोग सामान्य मानते हैं और ऐसा सोचने वालों में महिलाएं भी शामिल होती हैं।

तमाम लड़कियों की तरह मुझे भी घर, परिवार समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ा। मेरी बुआ की पांच बेटियां और एक एक बेटा है। दादी अक्सर दुखी मन से कहा करतीं, बेटी क्या बुसा बोरी (भूसे की बोरी) हैं। ये उस पहाड़ी समाज की स्थिति है जहां महिलाएं ही अधिकतर काम करती हैं घर, खेती से लेकर जंगल तक के। मैं चार भाइयों में अकेली बहन हूं, लोग अक्सर कहा करते हैं वाह तुम तो बहुत खुशकिस्मत हो हालांकि इसका तर्क मुझे आज तक समझ नहीं आया। मैंने अपने पूरे बचपन में घरेलू हिंसा, लड़ाई-झगड़े का माहौल देखा जो कि बहुत ही बुरा था।

पहाड़ों में पुरुष अगर काबिल नहीं हो तो चल जाता है लेकिन महिलाओं का सभी कामों में, खास कर खेती में पारंगत होना बहुत जरूरी है। गांव भर में दो-चार पुरुष ऐसे होते ही हैं जिन्होंने पूरी जिंदगी कभी कुछ काम नहीं किया, तब भी उनकी जिंदगी किसी तरह गुजर ही जाती है। लेकिन इस तरह की महिलाओं के लिए जीवन बहुत ही दुखद होता है, जिसमें मेरी मां भी शामिल हैं।

मैंने देखा लड़के बड़े होने पर भी खेतों में खेलने जाते लेकिन लड़कियों की खेलने की उम्र बहुत ही सीमित सी होती है। मुझे बचपने की याद है, हम खाली समय में खेतों में खेला करते। जैसे-जैसे हम बड़े होते गए लड़के तो खेतों में तब भी खेला करते, लेकिन लड़कियां अब खेलों से गायब होने लगीं। मेरी सहेलियों पर काम का बोझ बढ़ने लगा। पहले शौक से छोटे घीड़े में घास काट कर ले लातीं फिर धीरे-धीरे घीड़ा बड़ा होने लगा, बंटे, गागर का आकार भी बढ़ने लगा। मैं भी सहेलियों के साथ खेतों जंगलों में जाती। फिर धीरे-धीरे वे अपने ससुरालों को जानें लगी। सहेलियों के ससुराल जाने के बाद मैंने हम उम्र भाभियों से दोस्ती करनी शुरू कर दी।

शिवरात्रि के पहले दिन हमारे यहां कई जगहों पर मेला लगता है। बचपन में पुजार गांव जाया करते जो कि बिल्कुल बगल का गांव था। फिर कुछ बड़े होने पर देवल मेला जाने का मन करता। अपने चार भाई तो हैं ही, अपने अगल बगल के ढेर सारे कजन भाई ऐसे भी वक्त में सबसे ज्यादा प्रकट होते। वे सब हमें देवल मेले में जाने के लिए मना किया करते। दरअसल देवल मेले में ज्यादा भीड़ और धक्का मुक्की होती। कई बार लड़के, लड़कियों के स्तनों को भी छूकर निकल जाते। लेकिन ये भाई लोग खुद भी उसी मेले में जाने के लिए लालायित रहते। जाहिर है लड़कियों को छेड़ने वाले लड़के भी हम में से किसी ना किसी के भाई हुआ करते हैं। लेकिन उन्हें कभी कोई मना नहीं करता मेला जाने के लिए।

हम लड़कियां भी कहां कम थीं, छुप-छुपाकर जैसे-तैसे देवल मेले जाया करती। ऐसा करने के लिए कई बार डांट और मार भी खानी पड़ती। भाइयों की भी घर में अलग ही सत्ता होती है। कई बार मांओं या पिताओं को भी जिन बातों से ऐतराज नहीं होता, भाई लोग उन मामलों में भी अपनी वीटो पावर इस्तेमाल कर लेते हैं।

मेरे मंझले भइया खूब घूमा-फिरा करते, घर में टिकना उन्हें कभी आया ही नहीं। मुझे लगता वाह ये कितना अच्छा है, मैं भी उसी तरह रहना चाहती थी। लेकिन मुझे वो कई बार टोकते कि कम घूमा कर। कुछ साल मैं दो बड़े भाइयों और दादी के साथ देहरादून में पढ़ाई के लिए रही। स्कूल से घर आने के रास्ते में  सहपाठी लड़को के साथ दिख जाने पर कई बार मार भी खाई। मैं घर से स्कूल और स्कूल से घर का रास्ता तय करती, बस इतना ही जान पाई मैं देहरादून के बारे में। भइया लोग बेइंतहा पाबंदियों में रखते। दादी भी खौफ में रहतीं कि लड़की है कुछ हो ना जाए। भइया लोग ग्रेजुएशन करने गए थे जाहिर है उनकी खुद की उम्र भी कम ही थी। वो उस वक्त मुझे लेकर अतिरिक्त जिम्मेदारी की भावना से भरे हुए थे। लड़की की जिम्मेदारी का मतलब होता है उसे संभाल कर रखना। ये जिम्मेदारी कैसे निभाई जाती है, ये बात कोई भी लड़की बता सकती है।

अतिरिक्त पाबंदी के चलते मेरा लड़कों की तरफ आकर्षण बढ़ा। हम लोग देहरादून से घर साल में एक बार आया करते गर्मियों की छुट्टियों में। अक्सर सोचती, मैं बड़ी हो जाऊंगी तो अकेले यात्रा करूंगी और अगल-बगल बैठने वाले लड़कों से दोस्ती और बातें किया करूंगी। हालांकि जब से अकेले यात्रा करनी शुरू की तब से ऐसे ख्याल नहीं आये।

लड़की होने के नाते मुझे अगर किसी चीज से वंचित रखा जाता या किसी भी तरह का भेदभाव होता तो मुझे वो समझ आ जाता, मुझे एहसास होता कि ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन कई बार लड़कियों को लगता कि भाई हैं, ठीक ही कह रहे हैं, लड़कियों को नाक नहीं कटानी चाहिए, अगर कुछ हो गया तो जैसी तमाम-तमाम बातें।

छुटपन से ही मेरा मन होता था कि मैं खूब पढ़ाई करूं और किसी बड़े से शहर में जाकर स्वतंत्र रूप से रहूं। लेकिन ऐसा होगा, मेरे लिए यह सोच पाना भी बहुत मुश्किल था। खासकर बड़े भाइयों के सख्त रवैये के बाद ये और मुश्किल लगता। लंबगांव डिग्री कॉलेज में मेरे एक शिक्षक थे, जिन्होंने बीए के दौरान मुझे पढ़ाया और लगातार प्रेरित करते रहे कि मैं आगे की पढ़ाई किसी शहर में जाकर करूं। ऐसा उन्होंने कई महीनों तक किया और मुझे सिलेबस के इतर की किताबों पढ़ने की भी सलाह देते रहे। एक दिन जब मुझे समझ में आया कि यह मुमकिन है, तो फिर मैंने वही बात घर में पिता से दोहरानी शुरू कर दी और लगभग दो ढाई साल तक मैं लगभग घर वालों से इस ख्वाइश का जिक्र करती रही। आखिरकार मुझे इसकी अनुमति मिल गई।

साल 2012 में, मैं जब पढ़ाई के लिए माखनलाल यूनिवर्सिटी, नोएडा आई तो यह मेरे लिए किसी बड़े सपने का सच होने जैसा था। पहली बार साउथ दिल्ली की चौड़ी-चौड़ी सड़कों से गुजरते हुए मैं खुद को एक अलग ही दुनिया में महसूस कर रही थी। अब मैं घर से दूर आजाद महसूस कर रही थी। लेकिन शुरुआती दिनों में साथ में डायरी लेकर घूमा करती जिसमें पीजी का पता और कुछ जरूरी नंबर रहते। रात होने से पहले मैं पीजी में आ जाया करती क्योंकि मुझे रात में बाहर निकलने से डर लगा करता।

बाद के दिनों में मैं मंडी हाउस में नाटक देखने जाने लगी और मुझे अकेले ही जाना पड़ता। नोएडा सेक्टर 15 मेट्रो स्टेशन आते-आते कभी 9.30 या कभी 10 बज जाया करते। मेट्रो स्टेशन से मुझे ऑटो से पीजी जाना होता, उस वक्त तक महिला यात्रियों की संख्या काफी कम हो जाती। जैसे ही कोई महिला दिखती तभी मैं सुरक्षित महसूस करती।

लेकिन घूमने और नाटक देखने का शौक कुछ ऐसा हुआ कि डर लगने के बावजूद मैं ऐसा करती। एक दोस्त था जो घूमने जा तो सकता पर वो जॉब भी करता था। लड़कियां अक्सर अपने एक-एक मिनट का हिसाब घर वालों को दिया करतीं या घर वाले उन से लिया करते, तो उनके लिए भी जाना मुश्किल था। एक और दोस्त था, जो था तो मूल रूप से उत्तराखंड का, लेकिन दिल्ली में पला बढ़ा था। जब मैंने कहा साथ में घूमने के लिए तो उसका जवाब भी कुछ अजीब ही था.. देख तू है लड़की, ये दिल्ली बहुत खतरनाक जगह है, मैं तेरे साथ नहीं घूमूंगा कहीं।

मैं उन दिनों एक लॉन्ग डिस्टेन्स रिलेशनशिप में थी। उस दौरान के प्रेमी ने अपने कुछ दोस्तों से मेरी भी दोस्ती करवाई जो कि दिल्ली में पत्रकारिता के ही एक दूसरे संस्थान में पढ़ते थे। वहां लड़को के साथ दोस्ती और सामान्य तौर पर रहने की शुरुआत हुई। उसके पहले जितने लड़के मिले थे सब एक अलग तरह की दूरी या नजदीकी बनाते थे। पहली बार लड़कों के साथ दोस्ती इतनी सामान्य लगी।

मेरे मामले में एक बात यह अच्छी थी बाहर निकलने के बाद मेरे घर वालों ने मुझ पर भरोसा किया और मुझसे कभी भी मिनट-मिनट की हिसाब नहीं लिया। हालांकि इस स्थिति की भी कुछ अलग तरह की मुश्किलें थीं, जिनका जिक्र फिर कभी किया जा सकता है।

बहुत शिद्दत से नौकरी की शुरुआत कर मुझे फिर से मुझे पढ़ाई करने का मन हुआ तो एमफिल करने वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय चली गई। वहां गर्ल्स हॉस्टल 10 बजे बंद हुआ करता है। हालांकि कई अन्य संस्थानों के मुकाबले ये बेहतर था, लेकिन हमारा भी मन होता कि ब्वाइज हॉस्टल की तरह गर्ल्स हॉस्टल भी रात भर खुले रहें।

हमारे सामने जेएनयू और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के उदाहरण था। कई बार इस पर बातचीत होती कि वर्धा कैंपस छोटा है और सुरक्षित भी। इसे भी रात भर खुला रखा जाना चाहिए। कई बार मन होता रात में लाइब्रेरी में बैठने या कबीर हिल जाने का। लेकिन 10 बजे के बाद यह संभव नहीं था। कई बार एमफिल और पीएचडी करने वाली लड़कियां ही समय ना बढ़ाने के खिलाफ तर्क देतीं, नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए। अगर कुछ हो गया तो किसी ने कुछ कर लिया तो। मुझे ये समझ नहीं आता, कुछ कर लिया क्या होता है। ज्यादा से ज्यादा कोई सेक्स कर लेगा, उससे ज्यादा क्या।

खैर पितृसत्तात्मक प्रैक्टिस इतनी गहरी है कि हमारे गांवों में महिलाएं पानी की गागर सिर पर लाती हैं और पुरुष कंधे पर। मैंने जब पहली बार सिर पर गागर लाने की कोशिश की तो मैं चल नहीं पाई। मैंने फिर पानी की गागर कंधे पर रखी। ये मेरे लिए वाकई बहुत ही आरामदायक तरीका था पानी ढ़ोने का। उसके बाद से आज तक मैं कंधे पर ही पानी लाती हूं। शुरू-शुरू में लोग हैरान होते या मजाक बनाते कि लड़की होकर कंधे पर पानी ला रही है, लेकिन कुछ दिनों बाद सब स्वीकार्य हो गया। लेकिन नए लोग जब मुझे इस तरह से देखते है तो वो अभी भी हैरान होते हैं।

मैं कई बार बैग को भी कंधे पर उठाकर चल देती हूं क्योंकि ऐसे सामान ढ़ोना आसान होता है। मेरे पार्टनर जो कि बिहार से हैं, यह देखना उनके लिए यह नया था। प्रेम के शुरुआती दिनों में वो अक्सर मेरी इस आदत पर बहस कर लेते। वो कहा करते, कुछ भी करती हो- कैसे भी रहती हो, कंधे पर सामान क्यों उठाया लोग क्या कहेंगे आदि-आदि। तब मैं समझ नहीं पाती थी इसमें गुस्सा करने वाली क्या बात है। फिर कोरोना का दौर आया, उन दिनों मैं मुनिरका में रहा करती। एक दिन मेरे पार्टनर बंगाल से बस की यात्रा कर दिल्ली आए। उस दिन दिल्ली में खूब बारिश हो रही थी, मुनिरका की गलियों में नाले की तरह पानी बह रहा था और एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ रहा था। उस दिन भी मैंने अपने पार्टनर का भारी सा बैग कंधे पर रखा और किसी तरह बच-बचाकर कमरे में पहुंचे। उस दिन बैग को खींचकर ले जाना नामुमकिन था, उस दिन के बाद उन्होंने कभी इस चीज के लिए नहीं टोका।

तब मुझे उनका इस तरह से नाराज होना नहीं समझ आता था। कुछ महीने पहले मेरी शादी हुई और ससुराल गई तो मुझे समझ में आया कि यह दो समाजों का फर्क था।

हम लोगों ने पहले कोर्ट मैरिज की और उसके बाद सामाजिक विवाह। हम लोगों ने तय किया था किसी तरह का कर्मकांड या पूजा पाठ नहीं करेंगे। हमारे परिवार इसके लिए सहमत थे। इसमें हम दोनों के पिताओं की अहम भूमिका थी। ऋषिकेश में शादी हुई जिसमें हम लोगों ने एक दूसरे को माला पहनानी थी और उसके बाद खाने का कार्यक्रम था। मेरी सास और ननद सिंदूर लेकर स्टेज के सामने अड़ गईं उनका गुस्सा मेरे लिए बड़ा अजीब था। वो जबरदस्ती सिंदूर लगवाना चाह रहे थे और ऐसा तब हुआ जब कि पहले से पूरा मामला स्पष्ट था कि ये सब नहीं करना है।

मेरे रिश्तेदार भी हैरान थे मैं सिंदूर क्यों नहीं लगवा रही। सब आकर समझाने लगे। हालांकि मेरा परिवार हमारे फैसले के साथ था। मेरी सास ने मेरी बड़ी भाभी से कहा कि वे हमें मनाएं, तो भाभी का कहना था जब वो नहीं चाहते तो जबरदस्ती क्यों करना चाहते हैं। इस तरह सिंदूर नहीं करने के लिए लिए भी छोटा -मोटा हंगामा हो गया।

मेरे पिता के अचानक चले जाने के बाद माहौल अजीब था, हम सब दुखी थे, इसके बाजवूद शादी हो रही थी। ये अलग ही तरह की स्थिति थी मेरे लिए। मेरा नया जीवन शुरू हो रहा था मैं कुछ उत्साहित भी थी लेकिन ये बड़ी अजीब शुरुआत थी। पार्टनर के घर वाले गुस्से में तुरंत खाना खाकर होटल चले गए। इस तरह मेरे पार्टनर वेडिंग हॉल में अकेले रह गए और इधर मेरे घर वाले और कुछ गिने -चुने रिश्तेदार थे। हमारी शादी और रिसेप्शन में एक हफ्ते का फासला था। विदाई के वक्त मैंने कुर्ता और जींस पहन ली और जैसे हमेशा रहती हूं वैसे ही रही, कोई अतिरिक्त मेकअप नहीं किया। हरिद्वार से ट्रेन देर रात की थी, सभी लोग हरिद्वार घूमने चले गए। हम दोनों स्टेशन के बाहर रह गए। एक नए सदस्ये को सम्मान देना तो दूर सभी लोग मुझसे दूर-दूर थे। कोई ठीक से बात नहीं कर रहा था मुझसे। मुझे लगने लगा अब तो वक्त ससुराल में बेहद बुरा बीतने वाला था।

मेरे बड़े भइया ने मुझे कुछ दिन पहले कहा था तेरा समाज शादी के बाद शुरू होगा। तूने अभी देखा ही क्या है। और ये बात मैं अभी महसूस कर रही थी। मुझे लगता था शादी के बाद मेरे जीवन में कोई बदलाव नहीं आने वाला लेकिन आ चुका था। सचमुच शादी लड़कियों के जीवन को बदलकर कर रख देती है। हालांकि मैं वर्किंग हूं और मुझे ससुराल में ज्यादा रहना नहीं होगा और इन चीजों का भी सामना नहीं पड़ेगा। तो एक तरह से यह स्थिति मेरे लिए ठीक है।

ससुराल जाने वाली ट्रेन रात में काफी लेट से आई, तो सब लोग ट्रेन में चढ़ते ही सीधे  सो गए। सुबह उठकर पिछले दिन के मुकाबले माहौल थोड़ा ठीक लगा, लोग थोड़ा बहुत बात कर ही रहे थे। मुझे खाना-पीना सब पूछा गया।

रात में आरा स्टेशन उतरना था और वहीं से कुछ घंटे की दूरी पर ससुराल है। फिर ट्रेन में ही नई चीजों के लिए बहस शुरू हो गई जैसे घूंघट करना। पार्टनर के घर वाले उन पर दबाव बनाने लगे कि वो मुझे घूंघट के लिए कहें। उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। उनके भाई-बहन कहने लगे कि तुमने हमारे पिता की नाक कटवा दी है। जबकि पिता हमारे फैसले के साथ थे और उन्हें अपनी नाक जैसी कोई चिंता नहीं थी।

मुझे लगा मैं ही बेवकूफ हूं जो लग रहा था सब सामान्य हो गया। एक लंबे समय तक जिस चीज को लोग मानते आए हैं वो परंपरा एक झटके में कैसे टूट सकती है। फिर से बहस और झगड़ा, हालांकि मैं इससे दूर थी। लेकिन मैं बहुत अजीब महसूस कर रही थी। लोग मुझे अजीब नजरों से देख रहे थे, इन सबके लिए मैं जिम्मेदार थी। अब मुझे लगने लगा बचपन से लेकर अब तक जो महसूस करती आई हूं लड़की होने की वजह से वो कुछ भी नहीं था। अब यहां मेरा कोई नहीं था पार्टनर के सिवा। मेरे दिमाग में घरेलू-हिंसा की घटनाएं घूमने लगीं। खासकर मैं दूसरे राज्य में जा रही थी जहां कोई भी परिचित नहीं था। ट्रेन से उतरने पर मेरे साथी की अपने परिवार के लोगों से बहस हुई। बहन ने रिसेप्शन में आने से इनकार कर दिया। पिता ने किसी तरह से बेटी को मनाया तो उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ आपके लिए आऊंगी इन लोगो से मुझे कोई मतलब नहीं है।

हम लोग जब ट्रेन से उतर रहे थे तो किसी ने कहा कि औरतें और सामान गाड़ी में ना छूट जाएं। महिलाएं क्या सामान हैं जो स्टेशन आने पर खुद से उतरने का ध्यान नहीं रख सकतीं। और भूलना ही हो तो कोई पुरुष भी भूल सकता है।

आरा से टैक्सी बुक की गई थी। टैक्सी में मेरी सास ने आकर मुझे कहा सिर पर दुपट्टा रख लो। मैंने मना किया, वो कहती रहीं कि रख लो उतनी ही बार मैंने मना कर दिया। उस वक्त मेरा मन हुआ कि मैं उस टैक्सी से उतर जाऊं।

मेरे अगल-बगल मेरी जेठानी और देवरानी बैठी थीं। देवरानी ने सिर पर साड़ी का पल्लू रख हुआ था। जेठानी सामान्य तरीके से बैठी थीं, जब सास ने मुझे इस तरह से कहा तो उन्होंने भी सिर पर पल्लू रख दिया। मैं उन्हें बार-बार समझाना चाह रही थी ये नॉर्मल नहीं है, शायद उन्हें लगा हो जो मैं कर रही हूं वही नॉर्मल नहीं है।

हम देर रात घर पहुंचे। मैं लोवर-टी शर्ट पहनकर सो गई। सुबह हुई तो इस पर भी पेशी हुई। मुझे कहा गया कि यहां ये कपड़े नहीं चलेंगे। साड़ी नहीं तो कम से कम सूट पहननी होगी। ये मेरे लिए नई लड़ाई थी। इस बार जब सास समझाकर थक गईं तो मुझे समझाने की जिम्मेदारी ससुर दी गई। अभी तक हमारे सभी फैसलों में वे साथ थे और हमारा सपोर्ट भी किया। लेकिन अब वो भी शायद थक या हार गए थे। उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि सूट पहन लो और दुपट्टा सिर पर रख लो। मैंने फिर से माथा पीट लिया कैसा समाज है ये सिर ढकने को लेकर इतना आग्रह। मैंने कहा कि मैं सूट पहन लूंगी लेकिन सिर नहीं ढकूंगी। हमारे पहाड़ी समाज में इस तरह से नहीं है तो मेरे लिए ये चीज बिल्कुल नई थी, इसलिए यह सब मुझे और ज्यादा असहनीय लगा।

इतना ही नहीं इस एक हफ्ते में मैं घर से बाहर भी नहीं निकली। यहां महिलाएं सामान्य तौर पर घर से बाहर नहीं निकलती हैं। घूमना टहलना तो दूर की बात। सामान भी लाना हो तो घर के पुरुषों से मंगाया जाता है या बच्चों से। पहले दिन तो मुझे लगा मैं यहां एक हफ्ता नहीं निकाल पाऊंगी। लोग आ आकर देखते और नसीहतें देकर चले जाते और मैं लोगों से मिलने से खौफ खाने लगी। मैं लोगों को इग्नोर भी करने लगी।

रिसेप्शन में हमारे कुछ दोस्त आए। इतने दिन बाद अपने साथ के लोगों से मिलकर मुझे अच्छा लगा। मैंने उनसे वे सारे अनुभव और परेशानियां शेयर की। उनमें से कुछ ने ये निष्कर्ष निकाला मैं ओवर रिएक्ट कर रही हूं। मेरे पार्टनर जो कि अब तक मुझे सपोर्ट कर रहे थे, रिसेप्शन के दिन उन्होंने भी मुझसे बहस कर ली। उनका कहना था कि मैं ओवर रिएक्ट कर रहीं हूं, लोगों को सम्मान भी नहीं दे रही हूं। मुझे अजीब लगा अचानक ये बदलाव कैसे हुआ। हालांकि मुझे अंदेशा था कि दोस्तों के आने के बाद इस तरह से क्यों हुआ, बाद में ये बात स्पष्ट भी हो गई। हमारे उन प्रगतिशील दोस्तों को लग रहा था कि मेरी प्रतिक्रिया अतिवादी है। मैं जिन परिस्थितियों का सामना कर रही थी, मेरे लिए वो सब झेलना मुश्किल था। खास कर घर से बाहर नहीं निकलना और घूंघट देखना मेरे लिए नया था।

अधिकांश मित्र ऐसे ही समाज से थे तो उनके लिए ये अच्छा भले ना रहा हो लेकिन सामान्य जरूर था। हालांकि दूसरों के मामले में विश्लेषण करना और निष्कर्ष निकालना आसान होता है और उन परिस्थितियों से गुजरना मुश्किल।

उन सब में सकारात्मक पक्ष यह रहा कि ससुराल की ही कुछ महिलाएं मेरे पक्ष में थीं। उनका कहना था अगर किसी लड़की ने ये सब देखा-जिया ना हो तो कैसे स्वीकार कर ले। कुछ टीएनजर लड़कियां भी मुझसे प्रभावित थीं। मेरे लिए यहां दोनों ही सबक थे, परंपरावादी स्त्रियों और प्रगतिशील मित्रों की समझदारी के अलग-अलग नमूने।

हालांकि धीरे-धीरे चीजें मेरे लिए थोड़ा सामान्य हुईं। मैंने देवरानी-जेठानी से पूछा आप लोगों को ऐसे रहना खराब नहीं लगता। वो हंसकर रह जातीं, कहती हमको आदत हो गई है और यहां तो सब ऐसे ही रहते हैं। लेकिन मुझे लगता है कुछ तो लगता ही होगा उनको, कुछ नहीं तो इतना तो सोचती होंगी काश लड़की ना होतीं तो ऐसा ना होता। मैं भी बचपन में इस तरह से सोचती थी काश मैं लड़का होती तो इस तरह की चीजों का सामना नहीं करना पड़ता।

रिसेप्शन के बाद हमारे दो और मित्र हमसे मिलने आए, जो कि मेरे ससुराल के पास के कॉलेज में पढ़ाते हैं। उनकी कोई मित्र हैं जो कि जेएनयू से पढ़ी हैं और बिहार के ही किसी कॉलेज में पढ़ाती हैं। वो सिंदूर, चूड़ी जैसे प्रतीकों से दूर थीं। लेकिन उनके सहयोगियों ने उन्हें सिंदूर लगाने, कंगन पहनने के लिए मजबूर किया। इस तरह की कई कहानियां सुनीं, किसी के मकान मालिक तो किसी के सहकर्मी ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया। वहां पर मुझे लगा ये तो बड़ा भयावह है। दिल्ली जैसे बड़े शहर कुछ मामलों में स्पेस तो देते हैं।

इस बीच मैंने अपने पार्टनर से शिकायत की तुमने तो नहीं बताया था यहां इस तरह की स्थितियां हैं। मैंने तमाम दोस्तों को फोन घुमाए और उनसे भी यही शिकायत की। दोस्तों का कहना था इसमें कहने जैसा कभी कुछ लगा ही नहीं, यहां ऐसा होता है और हमारे लिए यह सामान्य है। पार्टनर का कहना था कि मेरी बहुत कोशिश के बाद भी अगर ऐसा है तो क्या किया जा सकता है, वक्त के साथ चीजें बेहतर हो जाएंगी। ये तब हुआ जब मैं अपेक्षाकृत प्रगतिशील परिवार में थी। दोस्तों ने बताया कुछ परिवारों में स्थितियां और खराब हैं।

अब जब मैं लिख रहीं तो मुझे एक दो बार मन किया कि फिर से ससुराल जाना प्लान किया जा सकता है। हालांकि मैं वहां लंबे समय नहीं रहना चाहूंगी।

मैंने रिसेप्शन के दौरान की घटनाओं पर कई बार तसल्ली से सोचा, क्या मैंने वाकई ओवररिएक्ट किया था। लेकिन मुझे हर बार यही जबाव मिला, नहीं मैं सही थी। क्योंकि मुझे या हम में से किसी को भी अगर यह लगता है कि उस तरह की परिस्थितियों में मैं गलत थी, तो हमें अफगानिस्तान, ईरान या अन्य समाजों की आलोचना करने का नैतिक साहस कहां से मिलेगा।

 

 

 

एको एको जिंदगी, खुल के जिवांगें

एको एको जिंदगी, खुल के जिवांगें

पर लड़की का खुल कर जीना समाज के बंद दिमाग वालों को कब पसंद आया है? लड़की हो, लड़की की तरह रहो। लड़की का एक टाइप बना दिया गया है। तथाकथित समाज भले ही कह दे कि वह आधुनिक है, लेकिन हमारी मानसिकता आज भी पुरानी ही है। हमारी मानसिकता उस समय की है बनी हुई है जब लड़कियों को कोई अधिकार नहीं प्राप्त था। घर संभालना उनकी जिम्मेदारी बना दी गई थी। घर के बाहर का जीवन स्त्री के लिए मुश्किल था। समाज के लोग  बड़े सहज तरीके से कोई कह देते कि वह आधुनिक हैं। पितृसत्ता से ग्रसित नहीं हैं। उनके लिए स्त्री का अर्थ है एक गुडिया जो केवल इशारे पर चलने का काम करती है । इसके दिल दिमाग की हमें फिक्र नहीं ।

फिल्म ‘कली झोट्टा’ खुले दिमाग की लड़की ‘राबिया’ की कहानी है। राबिया एक ऐसी लड़की जो सबको प्यार करती है। उसके जीवन का उद्देश्य है सही को सही कहना और सबके साथ अच्छा व्यवहार करना।  कहानी की शुरुआत अनंत नाम की लड‌की से होती है जो वकील की प्रैक्टिस कर रही है। अनंत एक खुले विचारों वाली लड़की है, आधुनिक है। उसको अपने स्कूल का पियून अचानक दिखाई देता है तो वह अपनी सबसे अच्छी टीचर राबिया के बारे में उससे पूछती है। राबिया के बारे में कोई बात ही नहीं करना चाहता था। वह निराश होती है लेकिन बहुत खोज करने पर पता लगता है कि राबिया की मानसिक हालत खराब होने के कारण उसको हॉस्पिटल भेज दिया गया था। इतनी जिंदादिल लड़की हमेशा खुश रहने वाली उसको अचानक क्या हुआ? इसी संदर्भ में अनंत दीदार से मिलती है। दीदार और राबिया साथ कॉलेज में पढ़ते थे दोनों का आपस में नेह था लेकिन एक दूसरे से कभी कह न पाए। कॉलेज के बाद दीदार आगे की पढ़ाई के लिए शहर चला जाता है और राबिया की सरकारी स्कूल में नौकरी लग जाती है। वह कलाकार है, घर के कामों की जानकारी रखती है, नाचती गाती है, संगीत सुनना उसके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं।   सरकारी स्कूल का माहौल राबिया को सहन नहीं कर पाता है। वहां प्रिंसिपल और दो पुरुष अध्यापकों की नज़रों में राबिया का मिलसार होना, उसका हँसना-खेलना, बच्चों को डाँटने और सज़ा देने की बज़ाए छोटे-छोटे तौहफे देना गलत था। उसका सरकारी नौकरी में होने के बाद भी अविवाहित होना उसके खराब चरित्र की निशानी थी। पुरुष समाज की यह आम धारणा है कि हँसने वाली लड़की गलत होती है। वह अवसर होती है। उसका हँसना-खेलना बोलना यानी उसका किसी भी मर्द के लिए उपलब्ध होना है। इस तरह की घटिया मानसिकता को राबिया कई बार अपने स्कूल के प्रिंसिपल, मैथ टीचर से झेलती है। तभी दीदार राबिया के स्कूल में आने से राबिया के जीवन में फिर से वही हँसी-खेल उमंग आ जाती है जो कॉलेज के समय पर थी। राबिया का दीदार से इस तरह हँसी-मजाक और उसके साथ रहना स्कूल के मर्दों को नहीं पसंद था। उसका चरित्र तय किया गया। तभी राबिया को पता चलता कि दीदार की शादी तय हो गई, उसकी पत्नी उसी स्कूल में तबादला करवा लेती है। राबिया दीदार की पत्नी को भी नहीं सुहाती। ठीक इसी समय राबिया के बीमार पिता की मृत्यु हो जाती है। स्कूल की एक छात्रा को एक छात्र परेशान करता है, जिसके लिए राबिया अकेली क्लास में उस लड़के को डाँटती है। इसपर दीदार की पत्नी और प्रिंसिपल यह मतलब निकालते हैं कि राबिया छात्र के साथ कुछ गलत कर रही थी। राबिया को बस स्टैंड पर खड़ा देख प्रिंसिपल उसको जबरन लिफ्ट देना चाहता है। पास खड़ी महिला के फटकार लगाने पर उसको शर्मिंदा होना पड़ता है।  प्रिंसिपल और उसके साथ के दो पुरुष आध्यापक लगातार राबिया को परेशान करने की कोशिश करते हैं। एक दिन सुबह ही स्कूल की छुट्टी करवा कर राबिया को प्रिंसिपल अपने कमरे पर बुलाता है, जहाँ वह अन्य अध्यापक मिलकर दारू पी रहे थे। वह राबिया को मानसिक प्रताड़ना देते हैं। उसको जलील करते हैं। प्रिंसिपल करता है कि अब इसकी अकड़ चली जाएगी। इस घटना ने राबिया को बुरी तरह प्रभावित किया इसके बाद वह किसी भी स्पर्श से घबराने लगी। कोई भी स्पर्श उसको मानसिक रूप से परेशान करता था। वह सहम जाती थी।  बस राह चलते उसकी यह घबराहट बढ़ते-बढ़ते एक दिन उसको दिमागी अस्पताल में पहुंचा देती है। अनंत राबिया का केस लड़ती है। जहाँ वह अदालत को यह समझाने में कामियाब होती है कि रेप, हत्या जैसा ही जुर्म किसी को मानसिक प्रताड़ना देना है।  सभी के प्रयास के बाद राबिया थोड़ा ठीक होने लगती है।

यह कहानी अपने आप में एक अलग कहानी है। एक दर्द जो आपको महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा से रू-ब-रू करवाता है। हम शरीर के नुक्सान की बात करते हैं लेकिन मन पर लगे घाव की कोई सजा नहीं होती। मनसिक शोषण किस तरह से एक महिला के लिए नासूर बन सकता है कहानी उस सच को बताती है। आज जब रिश्तों में अकेले हो गए हैं तो यह घाव और गहरे हो जाते हैं। राबिया को यह सजा इसलिए मिली क्योंकि वह एक खुशमिजाज लड़की थी, अरेंज मैरिज वाले समाज में उसे दीदार से प्रेम था। वह अच्छी दिखाई देती थी। ठीक कपड़े पहनती थी। लड़कियों के लिए हँसना मना है उसे हँसना पसंद था। इसलिए समाज के ठेकेदारों ने उसको सबक सीखाया। यह कहानी हर उस लड़की की कहानी है जो अपनी शर्तों पर जीती हैं। समाज की पितृसत्ता उसको जीने नहीं देती। लोगों को हँसती- बोलती लड़की चरित्र की खराब लगती है। सड़क पर ऐसी लड़की को उसके जानने वाले छेड़ना अपना धर्म समझते हैं। प्रिंसिपल व अन्य पुरुष  शिक्षकों का राबिया के प्रति व्यवहार उनकी इसी मानसिकता को बताता है। उन लोगों के अनुसार वह क्योंकि खुले दिमाग की है इसलिए उसपर सबका हक है और क्योंकि वह अपने उपर किसी का हक होने नहीं देती इसलिए वह सबक सिखाने लायक है।

मन के घाव इतने तीखे होते हैं कि वह ताउम्र नहीं भर पाते। महिलाओं के साथ और भी दर्दनाक हो जाता है क्योंकि उन्हें समझने वाला कोई होता ही नहीं। राबिया जिंदगी में जब इन हादसों से गुजरी तक वह अकेली थी बहुत अकेली। यदि जीवन में कोई अपना साथ हो तो व्यक्ति दुख साझा कर सकता है लेकिन राबिया के जीवन में ऐसा कोई नहीं था। ऐसी स्थिति में परिवार सहायक होते हैं लेकिन पितृसत्ता से ग्रसित राबिया के परिवार में उसको समझने  वाला भी कोई न था। यह कहानी भारतीय समाज के उन घरों का प्रतिनिधित्व करती है जहां स्त्री की हैसियत घर में पड़े समान से भी कम आंकी जाती है।

हमारा बुरा वक्त भी सही होने की ताकत रखता है जब हमारे साथ हमारे अपने हो राबिया को उसके सदमे से बाहर निकालने में उसकी विद्यार्थी और दोस्तों का बहुत योगदान था। अस्पताल में डॉक्टर कहता भी है कि ‘इन लोगों से मिलने उनको वापस जीवन में लाने की कोई कोशिश नहीं करता आप कर रहे रहे हैं यह मेहनत सफल होगी’। और अंत में सबकी मेहनत सफल भी होती है।

विषय, निर्देशन, अभिनय, मन और दिमाग को छूने वाले संगीत और गानों के कारण वास्तव में यह ‘कली झोट्टा’ एक बेहतरीन फिल्म है।

महाश्वेता देवी की जंग का फ़ैसला , 25 साल बाद

महाश्वेता देवी की जंग का फ़ैसला , 25 साल बाद बुधन सबर को इंसापस थाने में टॉर्चर कर मारने वाले पुलिस कर्मी को 8 साल की सजा
महाश्वेता देवी की जंग का फ़ैसला , 25 साल बाद बुधन सबर को इंसापस थाने में टॉर्चर कर मारने वाले पुलिस कर्मी को 8 साल की सजा
25 साल और 10 दिन । ना बुधन ज़िंदा है और ना अन्याय के खिलाफ जंग करने वाली महाश्वेता देवी । ज़िंदा है तो इंसाफ और दोषी । पुरलिया के जज साहब ने तमाम बीमारियों से ग्रसित 71 साल के पुलिस अधिकार अशोक रॉय जैसे ही सजा सुनाई वैसे ही बुधन सबर की आत्मा को शांति मिल गई । 35 साल पुराना ये मामला डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए मील का पत्थर है । पहली बार ऐसा हुआ है जब पुलसिया अत्याचार के शिकार किसी डीएनटी के मामले में दोषियों को सजा मिली है । बुधन सबर जैसा की नाम से ही ज़ाहिर है की कथित सभ्य समाज से उसका कोई लेना देना नहीं था । बुधवार को पैदा हुआ इसलिए माँ-बाप ने बुधन ही नाम रख दिया । बुधवार को पैदा हुआ और बुधवार 1998 को ही मौत की खबर आई । बुधन की मौत बहुतों के लिए सामान्य थी । पुलिस कस्टडी में मौत । 20वीं शताब्दी में बहुत आम बात थी । और आदिवासियों और आदिम जनजातियों के लिए तो बहुत ही सामान्य बात । ऊपर से अगर किसी जमाने में डिनोटीफाइड ट्राइब्स का दाग रहा हो तब तो जरा भी फ़िक्र की बाद नहीं । मगर बुधन थाने में मार डाला गया था । बुधन की पत्नी श्यामली सबर को बर्दाश्त नहीं हुआ । उसने ऐसी जंग की शुरुआत की जिसमें जीतना नामुमकिन जैसा था । मैग्सेस पुरस्कार से सम्मानित और आदिवासियों के लिए जीवन समर्पित करने वाली महाश्वेता देवी का साथ नहीं मिलता तो ये जंग कब की खत्म हो जाती। थका देने वाली ये लंबी लड़ाई 35 साल तक पुरलिया की अदालत में चलती रही । 10 फ़रवरी 1998 को बुधन को बेवजह पुलिस ने पकड़ कर थाने में पाँच दिनों तक रख इतना टॉर्चर किया कि उसकी मौत हो गई । बुधन के लिए इंसाफ की माँग करने वाले दक्षिण छारा बजरंगे ने बुधन थियेटर के ज़रिए डिनोटिफाइड ट्राइब्स की आवाज बहरी दुनिया के कानों तक पहुँचाने की शुरुआत की । मगर मुख्यधारा की मीडिया के लिए ये कोई खबर नहीं है । कस्टोडियल डेथ में पुलिस वाले को सजा मिली है । बुधन को इंसाफ मिला है । खबर कहीं नहीं ।

कहानी शुरु होती है आज से पच्चीस साल पहले 10 फ़रवरी 1998 को । पुरलिया के बामुंडिया में बुधन सबर अपनी पत्नी श्यामली के साथ साइकिल पर बैठ अपने रिश्तेदार के घर भंगारडीह किसी समारोह में जा रहा था । क़रीब तीन चार बजे जैसे ही उसने पान खाने के लिए साइकिल दुकान पर साइकिल रोकी बाइकसवार पुलिस वाला ने उसे कॉलर से पकड़ कर खींच कर थाने ले जाने लगा । बुधन की पत्नी ने रोकने की कोशिश की लेकिन वो नहीं रूका । किसी तरह निजी बस से बुधन की पत्नी श्यामली बड़ा बाज़ार थाने पहुँची तो देखा कि बड़ी बेरहमी से पिटाई की जा रही है । उसने गुहार लगाई । मगर पुलिस वाले नहीं रुके । वो घर आ गई । सबर समिति से मदद की गुहार लगाई । इसी बीच 13 फरवरी 1998 को पुलिस बुधन के घर आई और डकैती और चोरी के सामान की तलाशी के नाम पर घर अस्त व्यस्त कर दिया । बुधन की पत्नी मना करती रही लेकिन पुलिस वाले नहीं माने । चोरी का कोई सामान घर से बरामद नहीं हुआ। पुलिस लौट गई । इस बीच श्यामली ने डीएम, एसपी समेत जिले के तमाम अधिकारियों से गुहार लगाई मगर किसी ने नहीं सुनी। इसी बीच 18 फरवरी 1998 को बुधन के घर पुलिस आती है और जानकारी देती की बुधन ने थाने में सुसाइड कर लिया है । हंगामा हुआ । विरोध हुआ तो 27 फरवरी को थाने में हत्या समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया गया। फिर भी कार्रवाई नहीं होते देख लेखिका महाश्वेता देवी कोलकाता हाईकोर्ट पहुँची तो जाँच सीबीसआई को सौंपी गई । साल दर साल बीतते गए । फ़र्ज़ी गवाह, दस्तावेज और तमाम हथकंडों के सहारे तारीख पर तारीख़ मिलती गई । बांस की टोकरियाँ बनाने वाले एक सबर के लिए इतने दिनों तक अदालतों के चक्कर लगाने कितना मुश्किल होता अगर इसमें अभियोजन पक्ष के गवाह और सबर कल्याण समिति के प्रशांता रक्षित और महाश्वेता देवी की पहल नहीं होती । महाश्वेता देवी तो अब इस दुनिया में नहीं रहीं, फिर अदालत ने सत्तर पन्ने के फैसले में उनके योगदान का जिक्र करते हुए माना है कि वो अगर नहीं होती तो इंसाफ की ये लड़ाई जारी नहीं रहती । पुलिस ने बुधन के शव को जला सबूत नष्ट करने की भी कोशिश की लेकिन सबर कल्याण समिति की जागरूकता ने अहम सबूत नहीं मिटने दिया । 25 साल 10 दिनों के बाद बुधन सबर के दोषी अशोक रॉय को अदालत ने आईपीसी की धारा 306 के तहत 8 साल की और धारा 330 के तहत 5 साल की सजा सुनाई । दोनों धाराओं में कुल मिलाकर 50 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया ।
25 साल और 10 दिन । ना बुधन ज़िंदा है और ना अन्याय के खिलाफ जंग करने वाली महाश्वेता देवी । ज़िंदा है तो इंसाफ और दोषी । पुरलिया के जज साहब ने तमाम बीमारियों से ग्रसित 71 साल के पुलिस अधिकार अशोक रॉय जैसे ही सजा सुनाई वैसे ही बुधन सबर की आत्मा को शांति मिल गई । 35 साल पुराना ये मामला डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए मील का पत्थर है । पहली बार ऐसा हुआ है जब पुलसिया अत्याचार के शिकार किसी डीएनटी के मामले में दोषियों को सजा मिली है । बुधन सबर जैसा की नाम से ही ज़ाहिर है की कथित सभ्य समाज से उसका कोई लेना देना नहीं था । बुधवार को पैदा हुआ इसलिए माँ-बाप ने बुधन ही नाम रख दिया । बुधवार को पैदा हुआ और बुधवार 1998 को ही मौत की खबर आई । बुधन की मौत बहुतों के लिए सामान्य थी । पुलिस कस्टडी में मौत । 20वीं शताब्दी में बहुत आम बात थी । और आदिवासियों और आदिम जनजातियों के लिए तो बहुत ही सामान्य बात । ऊपर से अगर किसी जमाने में डिनोटीफाइड ट्राइब्स का दाग रहा हो तब तो जरा भी फ़िक्र की बाद नहीं । मगर बुधन थाने में मार डाला गया था । बुधन की पत्नी श्यामली सबर को बर्दाश्त नहीं हुआ । उसने ऐसी जंग की शुरुआत की जिसमें जीतना नामुमकिन जैसा था । मैग्सेस पुरस्कार से सम्मानित और आदिवासियों के लिए जीवन समर्पित करने वाली महाश्वेता देवी का साथ नहीं मिलता तो ये जंग कब की खत्म हो जाती। थका देने वाली ये लंबी लड़ाई 35 साल तक पुरलिया की अदालत में चलती रही । 10 फ़रवरी 1998 को बुधन को बेवजह पुलिस ने पकड़ कर थाने में पाँच दिनों तक रख इतना टॉर्चर किया कि उसकी मौत हो गई । बुधन के लिए इंसाफ की माँग करने वाले दक्षिण छारा बजरंगे ने बुधन थियेटर के ज़रिए डिनोटिफाइड ट्राइब्स की आवाज बहरी दुनिया के कानों तक पहुँचाने की शुरुआत की । मगर मुख्यधारा की मीडिया के लिए ये कोई खबर नहीं है । कस्टोडियल डेथ में पुलिस वाले को सजा मिली है । बुधन को इंसाफ मिला है । खबर कहीं नहीं ।

कहानी शुरु होती है आज से पच्चीस साल पहले 10 फ़रवरी 1998 को । पुरलिया के बामुंडिया में बुधन सबर अपनी पत्नी श्यामली के साथ साइकिल पर बैठ अपने रिश्तेदार के घर भंगारडीह किसी समारोह में जा रहा था । क़रीब तीन चार बजे जैसे ही उसने पान खाने के लिए साइकिल दुकान पर साइकिल रोकी बाइकसवार पुलिस वाला ने उसे कॉलर से पकड़ कर खींच कर थाने ले जाने लगा । बुधन की पत्नी ने रोकने की कोशिश की लेकिन वो नहीं रूका । किसी तरह निजी बस से बुधन की पत्नी श्यामली बड़ा बाज़ार थाने पहुँची तो देखा कि बड़ी बेरहमी से पिटाई की जा रही है । उसने गुहार लगाई । मगर पुलिस वाले नहीं रुके । वो घर आ गई । सबर समिति से मदद की गुहार लगाई । इसी बीच 13 फरवरी 1998 को पुलिस बुधन के घर आई और डकैती और चोरी के सामान की तलाशी के नाम पर घर अस्त व्यस्त कर दिया । बुधन की पत्नी मना करती रही लेकिन पुलिस वाले नहीं माने । चोरी का कोई सामान घर से बरामद नहीं हुआ। पुलिस लौट गई । इस बीच श्यामली ने डीएम, एसपी समेत जिले के तमाम अधिकारियों से गुहार लगाई मगर किसी ने नहीं सुनी। इसी बीच 18 फरवरी 1998 को बुधन के घर पुलिस आती है और जानकारी देती की बुधन ने थाने में सुसाइड कर लिया है । हंगामा हुआ । विरोध हुआ तो 27 फरवरी को थाने में हत्या समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया गया। फिर भी कार्रवाई नहीं होते देख लेखिका महाश्वेता देवी कोलकाता हाईकोर्ट पहुँची तो जाँच सीबीसआई को सौंपी गई । साल दर साल बीतते गए । फ़र्ज़ी गवाह, दस्तावेज और तमाम हथकंडों के सहारे तारीख पर तारीख़ मिलती गई । बांस की टोकरियाँ बनाने वाले एक सबर के लिए इतने दिनों तक अदालतों के चक्कर लगाने कितना मुश्किल होता अगर इसमें अभियोजन पक्ष के गवाह और सबर कल्याण समिति के प्रशांता रक्षित और महाश्वेता देवी की पहल नहीं होती । महाश्वेता देवी तो अब इस दुनिया में नहीं रहीं, फिर अदालत ने सत्तर पन्ने के फैसले में उनके योगदान का जिक्र करते हुए माना है कि वो अगर नहीं होती तो इंसाफ की ये लड़ाई जारी नहीं रहती । पुलिस ने बुधन के शव को जला सबूत नष्ट करने की भी कोशिश की लेकिन सबर कल्याण समिति की जागरूकता ने अहम सबूत नहीं मिटने दिया । 25 साल 10 दिनों के बाद बुधन सबर के दोषी अशोक रॉय को अदालत ने आईपीसी की धारा 306 के तहत 8 साल की और धारा 330 के तहत 5 साल की सजा सुनाई । दोनों धाराओं में कुल मिलाकर 50 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया ।
बुधन के मुक़दमे में पुलिस किस कदर बर्बर हो चुकी थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बुधन के शव को जबरन जलाने जब पुलिस पहुंची तो पत्नी और केरिया सबर कल्याण समिति ने पुरज़ोर विरोध किया । बुधन की पत्नी श्यामली ने शव को झोपड़ी में ही दफ़ना दिया और रात भर उसपर सोई रही । बाद में कोर्ट के आदेश के बाद शव निकाला गया पोस्टमार्टम किया गया । बुधन की मौत के बाद ही फ़िल्मकार और डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए संघर्षरत दक्षिण छारा बजरंगे ने महाश्वेता देवी की पहल पर बुधन थियेटर बनाया और नाटकों के ज़रिए पुलिसिया अत्याचार की कहानी लोगों तक पहुँचाई। पच्चीस साल बाद आए इस फ़ैसले ने जहां सबर समेत तमाम दलित आदिवासियों के खिलाफ हुए सरकारी अत्याचार के लिए सबक़ है वहीं इस समुदाय के लिए बहुत बड़ी जीत । श्यामली सबर अभी भी अपने दो बेटों , एक बेटी और पोतों के साथ पुरूलिया में रहती है।

बुधन के मुक़दमे में पुलिस किस कदर बर्बर हो चुकी थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बुधन के शव को जबरन जलाने जब पुलिस पहुंची तो पत्नी और केरिया सबर कल्याण समिति ने पुरज़ोर विरोध किया । बुधन की पत्नी श्यामली ने शव को झोपड़ी में ही दफ़ना दिया और रात भर उसपर सोई रही । बाद में कोर्ट के आदेश के बाद शव निकाला गया पोस्टमार्टम किया गया । बुधन की मौत के बाद ही फ़िल्मकार और डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए संघर्षरत दक्षिण छारा बजरंगे ने महाश्वेता देवी की पहल पर बुधन थियेटर बनाया और नाटकों के ज़रिए पुलिसिया अत्याचार की कहानी लोगों तक पहुँचाई। पच्चीस साल बाद आए इस फ़ैसले ने जहां सबर समेत तमाम दलित आदिवासियों के खिलाफ हुए सरकारी अत्याचार के लिए सबक़ है वहीं इस समुदाय के लिए बहुत बड़ी जीत । श्यामली सबर अभी भी अपने दो बेटों , एक बेटी और पोतों के साथ पुरूलिया में रहती है।

महाश्वेता देवी की जंग का फ़ैसला , 25 साल बाद बुधन सबर को इंसाफ, थाने में टॉर्चर कर मारने वाले पुलिस कर्मी को 8 साल की सजा

25 साल और 10 दिन, ना बुधन ज़िंदा है और ना अन्याय के खिलाफ जंग करने वाली महाश्वेता देवी । ज़िंदा है तो इंसाफ और दोषी । पुरलिया के जज साहब ने तमाम बीमारियों से ग्रसित 71 साल के पुलिस अधिकार अशोक रॉय जैसे ही सजा सुनाई वैसे ही बुधन सबर की आत्मा को शांति मिल गई । 35 साल पुराना ये मामला डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए मील का पत्थर है । पहली बार ऐसा हुआ है जब पुलसिया अत्याचार के शिकार किसी डीएनटी के मामले में दोषियों को सजा मिली है । बुधन सबर जैसा की नाम से ही ज़ाहिर है की कथित सभ्य समाज से उसका कोई लेना देना नहीं था । बुधवार को पैदा हुआ इसलिए माँ-बाप ने बुधन ही नाम रख दिया । बुधवार को पैदा हुआ और बुधवार 1998 को ही मौत की खबर आई । बुधन की मौत बहुतों के लिए सामान्य थी । पुलिस कस्टडी में मौत । 20वीं शताब्दी में बहुत आम बात थी । और आदिवासियों और आदिम जनजातियों के लिए तो बहुत ही सामान्य बात । ऊपर से अगर किसी जमाने में डिनोटीफाइड ट्राइब्स का दाग रहा हो तब तो जरा भी फ़िक्र की बाद नहीं । मगर बुधन थाने में मार डाला गया था । बुधन की पत्नी श्यामली सबर को बर्दाश्त नहीं हुआ । उसने ऐसी जंग की शुरुआत की जिसमें जीतना नामुमकिन जैसा था । मैग्सेस पुरस्कार से सम्मानित और आदिवासियों के लिए जीवन समर्पित करने वाली महाश्वेता देवी का साथ नहीं मिलता तो ये जंग कब की खत्म हो जाती। थका देने वाली ये लंबी लड़ाई 35 साल तक पुरलिया की अदालत में चलती रही । 10 फ़रवरी 1998 को बुधन को बेवजह पुलिस ने पकड़ कर थाने में पाँच दिनों तक रख इतना टॉर्चर किया कि उसकी मौत हो गई । बुधन के लिए इंसाफ की माँग करने वाले दक्षिण छारा बजरंगे ने बुधन थियेटर के ज़रिए डिनोटिफाइड ट्राइब्स की आवाज बहरी दुनिया के कानों तक पहुँचाने की शुरुआत की । मगर मुख्यधारा की मीडिया के लिए ये कोई खबर नहीं है । कस्टोडियल डेथ में पुलिस वाले को सजा मिली है । बुधन को इंसाफ मिला है । खबर कहीं नहीं ।

श्यामली सबर के चेहर पर 25 साल की जंग की जीत की लकीरें

कहानी शुरु होती है आज से पच्चीस साल पहले 10 फ़रवरी 1998 को । पुरलिया के बामुंडिया में बुधन सबर अपनी पत्नी श्यामली के साथ साइकिल पर बैठ अपने रिश्तेदार के घर भंगारडीह किसी समारोह में जा रहा था । क़रीब तीन चार बजे जैसे ही उसने पान खाने के लिए साइकिल दुकान पर साइकिल रोकी बाइकसवार पुलिस वाला ने उसे कॉलर से पकड़ कर खींच कर थाने ले जाने लगा । बुधन की पत्नी ने रोकने की कोशिश की लेकिन वो नहीं रूका । किसी तरह निजी बस से बुधन की पत्नी श्यामली बड़ा बाज़ार थाने पहुँची तो देखा कि बड़ी बेरहमी से पिटाई की जा रही है । उसने गुहार लगाई । मगर पुलिस वाले नहीं रुके । वो घर आ गई । सबर समिति से मदद की गुहार लगाई । इसी बीच 13 फरवरी 1998 को पुलिस बुधन के घर आई और डकैती और चोरी के सामान की तलाशी के नाम पर घर अस्त व्यस्त कर दिया । बुधन की पत्नी मना करती रही लेकिन पुलिस वाले नहीं माने । चोरी का कोई सामान घर से बरामद नहीं हुआ। पुलिस लौट गई । इस बीच श्यामली ने डीएम, एसपी समेत जिले के तमाम अधिकारियों से गुहार लगाई मगर किसी ने नहीं सुनी। इसी बीच 18 फरवरी 1998 को बुधन के घर पुलिस आती है और जानकारी देती की बुधन ने थाने में सुसाइड कर लिया है । हंगामा हुआ । विरोध हुआ तो 27 फरवरी को थाने में हत्या समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया गया। फिर भी कार्रवाई नहीं होते देख लेखिका महाश्वेता देवी कोलकाता हाईकोर्ट पहुँची तो जाँच सीबीसआई को सौंपी गई । साल दर साल बीतते गए । फ़र्ज़ी गवाह, दस्तावेज और तमाम हथकंडों के सहारे तारीख पर तारीख़ मिलती गई । बांस की टोकरियाँ बनाने वाले एक सबर के लिए इतने दिनों तक अदालतों के चक्कर लगाने कितना मुश्किल होता अगर इसमें अभियोजन पक्ष के गवाह और सबर कल्याण समिति के प्रशांता रक्षित और महाश्वेता देवी की पहल नहीं होती । महाश्वेता देवी तो अब इस दुनिया में नहीं रहीं, फिर अदालत ने सत्तर पन्ने के फैसले में उनके योगदान का जिक्र करते हुए माना है कि वो अगर नहीं होती तो इंसाफ की ये लड़ाई जारी नहीं रहती । पुलिस ने बुधन के शव को जला सबूत नष्ट करने की भी कोशिश की लेकिन सबर कल्याण समिति की जागरूकता ने अहम सबूत नहीं मिटने दिया । 25 साल 10 दिनों के बाद बुधन सबर के दोषी अशोक रॉय को अदालत ने आईपीसी की धारा 306 के तहत 8 साल की और धारा 330 के तहत 5 साल की सजा सुनाई । दोनों धाराओं में कुल मिलाकर 50 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया ।

बुधन के मुक़दमे में पुलिस किस कदर बर्बर हो चुकी थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बुधन के शव को जबरन जलाने जब पुलिस पहुंची तो पत्नी और केरिया सबर कल्याण समिति ने पुरज़ोर विरोध किया । बुधन की पत्नी श्यामली ने शव को झोपड़ी में ही दफ़ना दिया और रात भर उसपर सोई रही । बाद में कोर्ट के आदेश के बाद शव निकाला गया पोस्टमार्टम किया गया । बुधन की मौत के बाद ही फ़िल्मकार और डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए संघर्षरत दक्षिण छारा बजरंगे ने महाश्वेता देवी की पहल पर बुधन थियेटर बनाया और नाटकों के ज़रिए पुलिसिया अत्याचार की कहानी लोगों तक पहुँचाई। पच्चीस साल बाद आए इस फ़ैसले ने जहां सबर समेत तमाम दलित आदिवासियों के खिलाफ हुए सरकारी अत्याचार के लिए सबक़ है वहीं इस समुदाय के लिए बहुत बड़ी जीत । श्यामली सबर अभी भी अपने दो बेटों , एक बेटी और पोतों के साथ पुरूलिया में रहती हैं।

अमृता प्रीतम की पिंजर: पुरुष पात्र रशीद के अनैतिक से नैतिक बनने के प्रयास की यात्रा

 “[…] मैं अंदर कूद पड़ी, लेकिन … जब आप तंदूर में रोटी डालते हैं और वह पूरी तरह भरा होता है तो जो रोटियां ऊपर रह जाती हैं वो पकती नहीं है और उन्हें बाहर निकालना पड़ता है. इसी तरह कुआं पूरी तरह भर गया था और हम डूब नहीं सके […]”.[1]

यह कहना है बसंत कौर का, जिनकी आपबीती को उर्वशी बुटालिया ने अपनी बहुचर्चित किताब The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India (1998) में डॉक्यूमेंट किया है. 1947 के विभाजन की त्रासदी के 73 वर्ष बाद भी इसके घाव उतने ही ताज़ा है, जितनी इनके बारे में चर्चा. औरतों के शरीर पर देश का बंटवारा हुआ, यह बात जाने कितनी ही बार कितने लेखकों/लेखिकाओं और आम जनों ने अलग अलग-अलग भारतीय भाषों में कही और आने वाली पीढ़ी को इस पहलु से रूबरू करवाया और उन्हीं में से एक हैं बसंत कौर. बसंत कौर कहती हैं कि उनके गाँव में जब हमला हुआ तो उनके घर की अमूमन सारी औरतों को मार दिया गया, जिसमे उनकी अपनी बेटी भी शामिल थी. उनको उनके ही परिवार के मर्दों ने इसलिए मार दिया गया ताकि वो दुश्मनों के हत्थे ना लगे. बसंत कौर खुद लगभग सौ लोगों के साथ कुँए में कूद पड़ी थीं, जिसमे औरतें बच्चे और लड़के भी थे. इतने लोगों के वजह से कुआँ भर गया था और जो ऊपर रह गए वो डूब ना सके, जिनमे एक बसंत कौर भी थी.[2] अमृता प्रीतम की पिंजर (1950) बसंत कौर जैसी ही हजारों-लाखों महिलाओं की व्यथा की दास्तान है, जब विभाजन की लकीर औरतों के लहू से सींची गयी. बसंत कौर और उनके साथ की महिलाएं जिस अनदेखे दुश्मन के डर से कुँए में कूदकर जान देने के लिए मजबूर कर दी गयीं, उसकी झलक पिंजर उपन्यास के रशीद के चरित्र में मिलता है. इस लेख में रशीद के पात्र को नैतिकता और अनैतिकता के लेंस से देखने का प्रयास किया गया है. एक औरत को अगवा कर लेने जैसे अनैतिक कृत्य को अंजाम देने वाला रशीद का पात्र अमृता प्रीतम ने बारीकी से रचा है इस पात्र के जटिल मनोविज्ञान से पाठकों को रूबरू करवाया है: कौन सी बात/परिस्थिति/सन्दर्भ उसे अनैतिक कृत्य को अंजाम देने की प्रेरणा देती है और कैसे उपन्यास के अंत आते आते वह पात्र नैतिकता की पगडंडी पर डगमगाते हुए ही सही, कदम रखता है.

रशीद: अनैतिक से नैतिक बनने के प्रयास की यात्रा

“सुनना जी !कभी भूल से भी लाजो का निरादर न करना !” (…) लाजो के पति का मुंह  नीचा था, लाजो के भाई का मुंह नीचा था (…)” (पिंजर: 116)[3]

बंटवारे के दौरान दंगाईयों द्वारा लाजो का अपहरण कर लिया जाता है और अमृता प्रीतम के पिंजर की केंद्रीय पात्र  पूरो अपने पति रशीद के सहयोग से अपनी भाभी लाजो को ढूंढ कर उसे अपने परिवार से मिलवाती है. पूरो उपरांकित बात अपने भाई और लाजो के भाई से कहती है, ताकि लाजो को उसके घर में वही सम्मान मिले जिसकी वह हकदार है.

पिंजर की कहानी की शुरुवात बंटवारे से कई साल पहले 1935 में होती है. गाँव में साम्प्रदायिक कट्टरता के परिणामस्वरूप हिन्दू परिवार में जन्मी पूरो को उसकी शादी से पहले ही उसके गाँव का मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाला लड़का रशीद उसका अपहरण कर लेता है. पूरो जब उसके चंगुल के किसी तरह भाग कर अपने माता पिता के घर वापस जाती है तो पूरो के माँ बाप उसे अपनाने से इनकार कर देते है, उसकी माँ कहती है: “: “हम तुझे कहाँ रखेंगे ? तुझे कौन ब्याहकर ले जायेगा ? तेरा धर्म गया, तेरा जन्म गया.”( पिंजर: 23). पिंजर में सर्वव्यापी नैरेटर पात्र पुरो की इस पल की मनोस्थिति को बहुत संवेदना से लिखता है, जब पूरो का उसके अपने ही घर में तिरस्कार कर दिया गया हो और उस पर ही अपहरण का दोष मढ दिया गया हो: : “पुरो निर्दोष थी, वह कैसे समझ लेती कि उसकी माँ का दिल पत्थर हो जायेगा, उसके पिता का दिल लोहे का बन जायेगा, वे अपनी बेटी को घर से निकाल देंगे, उनके घर की दीवारें उसे अंदर लेने से इंकार कर देगी.” (पिंजर: 23). बाद के वर्षों में पूरो और रशीद का निकाह हो जाता है पर पूरो कभी अपनी स्थिति से समझौता नहीं कर पाती है और खुद को पिंजर यानी बिना हाड़-मांस का शरीर कहती है. वक़्त यूँ ही बीतता है और 1947 यानि बंटवारे की त्रासद घटना का वक़्त आता है और पूरो की भाभी लाजो को दंगाई उठा कर ले जाते हैं. पूरो अपने पति रशीद की मदद से लाजो को वापस उसके परिवार से मिलवाती है और मिलन के इसी पल में पूरो लाजो के पति यानि अपने भाई और लाजो के भाई से लाजो का आदर करने करने की बात करती है. यहाँ दोनों मर्दों के चेहरे नीचे झुके हुए हैं, इसलिए भी क्यूंकि पूरो को वापस ना अपनाकर उन्होंने सालों पहले उसका अपमान किया था. इस सन्दर्भ में मुंह नीचा होना उन दोनों के अंदर के शर्म अथवा लज्जा को बयां करता है. उनकी लज्जा शारीरिक परिलक्षित होती है. लाजो का भाई इस पल में कहता है: “पूरो हमें लज्जित न कर” (पिंजर: 116). अमृता प्रीतम की लेखनी में इन दोनों पुरुष पात्रों की लज्जा पूरो के पात्र के प्रति संवेदना, न्याय और समझ को दर्शाते है.

आगे इस लेख में पुरुष पात्र रशीद की चर्चा की गयी है, जहाँ इस उपन्यास में उसकी यात्रा को बारीकी से समझने की जरुरत है. रशीद का चरित्र अनैतिक से नैतिक बनाने के प्रयास की कहानी है. रशीद के चरित्र के अंदर एक बदलाव को दर्शाया गया है. पूरो को अगवा करने का पछतावा उसे सालता है. वह अपने अनैतिक कृत्य यानि एक औरत को बिना उसकी मर्जी के अपहरण करने और जबरन उसे अपने घर में रखने को अंजाम देता है. यहाँ से उसकी यात्रा शुरू होती है. इस लेख में रशीद के चरित्र में आये परिवर्तन का विश्लेषण किया गया है और साथ ही उन परिस्थितिओं और सवालों का भी, जो रशीद में आये बदलाव को अंजाम देते हैं. पर सबसे पहले चर्चा इस बात पर होगी कि रशीद पूरो को अपहरण करने जैसा एक अनैतिक कदम क्यूँ उठाता है?

समुदायों के बीच बदले की आग: रशीद और ‘टेलिओलॉजिकल सस्पेंशन ऑफ़ द एथिकल’ (teleological suspension of the ethical[4])

जब पूरो रशीद के पूछती है कि “तूने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया है?” (पिंजर: 19) तो रशीद उसे पारिवारिक दुश्मनी की कहानी सुनाता है. रशीद के दादा की लड़की को पूरो के दादा के लड़के ने अगवा कर रशीद के दादा के परिवार को बेइज्जतकिया था. सालों बाद रशीद के चाचा और ताऊ ने रशीद को उस बात का बदला लेने के लिए उकसाया और इसी उकसावे में वो पूरो को अगवा करता है. रशीद कहता है: “[…] मेरे दादा ने मेरे चाचा-ताऊओं को और मेरे पिता को कुरान उठवाकर कसमें दिलवाई थी, कि वे इसका बदला लेकर ही रहेंगे. […] अब जब तेरा काज इसी गांव में रचा जाने लगा, मेरे चाचा-ताऊओं के लहू में पुराना बदला खौलने लगा. उन्होंने मुझे कसमें दिलाईं, मेरे लहू को ललकारा और मुझसे कौल कराये कि मैं शाहों की लड़की को ब्याह से पहले किसी भी दिन उठा ले जाऊँ.” (पिंजर: 19). जब कुरान की कसमें दिलाई गयीं तब यह मसला रशीद के लिए आस्था का मसला बन गया. रशीद यहाँ तर्क नहीं करता है और उसके अनैतिक होने की यात्रा शुरू हो जाती है, जहाँ उसे अपने कृत्य के दूरगामी प्रभाव की चिंता नहीं थी. इसे ही स्योरण किर्केगार्ड (Søren Kierkegaard, 1813-1855) अपनी किताब Fear and Trembling में ‘teleological suspension of the ethical’ कहते हैं. ग्रीक भाषा के दो शब्द ‘telos’, जिसका अर्थ होता है ‘अंत’ और ‘logos’, जिसका अर्थ होता है ‘तर्क’ अथवा ‘विज्ञान’, के मिलने से ‘teleology’ शब्द बनता है. अतः ‘teleological suspension of the ethical’ का मतलब हुआ किसी नैतिक कृत्य के अंत या परिणाम या प्रभाव को ख़ारिज कर देना, ठीक वैसे ही जैसे किसी अनैतिक कृत्य के अंत परिणाम या प्रभाव को भी ख़ारिज कर देना. ओल्ड टेस्टामेंट की अब्राहम और इस्सक की कहानी को केंद्र में रख कर किर्केगार्ड नैतिकता की बात करते हैं. कहानी में अब्राहम आस्था की तरफ खड़ा होता है और नैतिकता को किनारे कर देता है. किर्केगार्ड अपनी किताब के चौथे भाग में ओल्ड टेस्टामेंट के अब्राहम को फिर से रचते हैं और अब्राहम को सोचने और तर्क करने वाले पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जहाँ अब्राहम यह तर्क करता है कि ईश्वर और उसकी आस्था किसी अनैतिक कृत्य के लिए कैसे हामी भर सकता है? ठीक इसी तरह पिंजर उपन्यास के पहले भाग में रशीद का चरित्र अनैतिकता की तरफ हो लेता है जब उसे कुरान की कसमे याद दिलाई जाती है और उसे परिवार और समुदाय के इज्जत के लिए बदला लेने के लिए उकसाया जाता है. पूरो को अगवा करने के वक़्त उसके मन में नैतिक और अनैतिक का द्वन्द नहीं चलता है और ना ही वह इस बदले की भावना के दूरगामी प्रभाव के बारे में सोचता है.

उपन्यास में स्त्रियों को ‘घर की इज्जत’ बताकर नवाजने वाले समाज में रशीद की बुआ पर अत्याचार होता है और उसका बदला पूरो को अगवा कर लिया जाता है. मर्दों की इस लड़ाई में इन दोनों परिवारों की औरतों की बलि चढ़ाई जाती है. उपन्यास में रशीद द्वारा पूरो को अगवा करने की घटना 1935 में घटती है यानि 1947 के बंटवारे से पहले. अमृता प्रीतम इसके द्वारा इस बात की तरफ इशारा करती है, कि बिभाजन के दौरान हुए बृहत् पैमाने पर औरतों का जबरन अपहरण, उनके ऊपर यौन हिंसा अथवा उन्हें बीभत्स यातना का शिकार बनाना इत्यादि एक अचानक की घटना नहीं थी, इसके बीज पहले से ही सामाज में थे जहाँ औरतों के शरीर पर परिवार और समुदाय की लड़ाईयां लड़ी जाती थी. पूरो का पात्र इस अत्याचार के खिलाफ रशीद से तर्क करता है:

“तेरी बुआ को मेरे ताऊ के लड़के ने उठा लिया, पर रशीद, इसमें मेरा क्या दोष ?” […]

“यही तो मैं कहता था, पर मेरे चाचा मुझपर फिटकार बरसाते थे.”

“तो रशीद, उनके उकसाने से तूने मुझे मार डाला ?”     (पिंजर: 20)

पूरो के तर्क के सामने रशीद निरुत्तर हो जाता है. पूरो का सवाल हर उन औरतों का सवाल है जो समुदायों के झगड़े में इस तरह की हिंसा का शिकार हुई है. वो देश, काल और इतिहास से पूछ रही हैं: “इसमें मेरा क्या दोष ?”.

रशीद द्वारा इस अनैतिक कृत्य को अंजाम देने के दो कारण हैं: बहकाबे और उकसावे का शिकार होना और बदले की भावना का होना. बाईस-चौबीस साल का रशीद के पात्र के बारे में उपन्यास का सर्वव्यापी नैरेटर लिखता है: “शायद उसके दिल में पुराने बदले की आग धधक उठी थी.” (पिंजर: 21). बदले का भाव एक नकारात्मक भाव है जो इंसान के अंदर की बुराई को बाहर ले आता है और यही रशीद के चरित्र को अनैतिकता की तरफ ले जाता है. किर्केगार्ड के शब्दों में कहें तो रशीद द्वारा पूरो के अपहरण में ‘teleological suspension of the ethical’ निहित है. यह करकर वह अपने परिवार और समुदाय की नज़रों में ऊपर उठना चाहता है और यह उसकी निजी इच्छा है. उसका कृत्य उसके न्याय के सामने अपराधी बनाता है और न्याय प्रणाली के लेंस से देखें तो रशीद को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. साथ ही रशीद के चरित्र में ‘सोचने’ की प्रक्रिया पूरी तरह से अनुपस्थित है. उसके अंदर की वैचारिक गरीबी और सोचने की क्षमता का ना होना ही उसे उकसावे और बदले की भावना का शिकार बनाता है. चूँकि परिवार और समुदाय की नज़रों में स्वीकृत होना और खुद को ऊँचा देखना उसकी अपनी इच्छा है, इसलिए अपने अनैतिक काम के लिए उसे खुद ही त्राण के लिए प्रयास करना पड़ेगा. आगे लेख में उसके इसी प्रयास और उसके चरित्र में आये सकारात्मक बदलाव पर चर्चा की गयी है. साथ ही इस बात की भी चर्चा की गयी है कि कौन सी बातें और परिस्थितियां उसे अनैतिक से नैतिक तक लेकर जाती है.

रशीद: नैतिकता की पगडंडी

“The ethical is the universal and as such, in turn, the divine.“

“A tragic hero can become a human being by his own strength […]“. (Søren Kierkegaard: Fear and Trembling: 96, 95)

प्रेम, शर्म और पश्चाताप, ये तीन भाव रशीद के अंदर आये सकारात्मक बदलाव के कारण हैं. रशीद का पूरो के प्रति आदर और प्रेम का भाव, उसे बार बार अपने अनैतिक कृत्य पर सोचने को मजबूर करते हैं. उपन्यास में सर्वव्यापी नैरेटर के द्वारा पाठकों को रशीद के अंतर्मन में चल रहे द्वंदों और पूरो के प्रति प्रेम का पता चलता है, जैसे कि: “रशीद को शायद सचमुच ही पूरो से प्रेम था […]“ (पिंजर: 26), “उसका मन कर रहा था, पूरो के बदन में से बहुत नहीं तो कम-से-कम आधी पीड़ा निकाल कर अपने में डाल ले.“ (पिंजर: 31).“अब रशीद का दिल बुझने लगा था. दिन-रात उतरता हुआ पूरो का चेहरा रशीद से देखा न जाता था. उसके घर में वीरानी ने अपने पैर जमा दिए थे. रशीद के चेहरे पर भी एक वेदना, एक मौन दीख पड़ने लगा था.” (पिंजर: 46). रशीद के प्रेम में पूरो के लिए करुणा और संवेदना थी और वह यह बात जितनी अधिक महसूस करता उसे अपने ऊपर उतनी ज्यादा शर्मिंदगी होती.

अगवा करने की घटना का गहरा असर पूरो के जीवन पर पड़ा था. वो रहती तो रशीद के साथ थी, पर पूरो ने  मन से रशीद को स्वीकार नहीं किया था. रशीद को पूरो का यह तिरस्कार बीमार कर देता है. तेज़ बुखार में वह बडबडाता है: “पूरो, मेरा गुनाह बख्श दे ! मेरा कसूर माफ़ कर !“(पिंजर: 46). वह अपने किये पर शर्मिंदा था और वह पश्चाताप की अग्नि में दिन रात जलता है. उसके इसी शर्म और पश्चाताप में बदलाव के बीज हैं, जो उसे नैतिकता की तरफ खड़ा करते हैं.

बंटवारे के दौरान हुए दंगे में जब पूरो की भाभी लाजो का दंगाई अगवा कर लेते हैं तब रशीद उसे पूरो की मदद से  छुड़ावाने का बीड़ा उठता है. जब रशीद लाजो को सफलतापूर्वक उसे अगवा करने वाले के घर से अपनी घोड़ी पर बिठाकर चल पड़ता है तब सर्वव्यापी नैरेटर रशीद के अंतर्मन की बात यूँ लिखता है:

“घोड़ी को पहली एड़ लगाते ही रशीद को वह समय याद आ गया, जब उसने पुरो को छत्तोआनी के कच्चे रस्ते से उठाकर अपनी घोड़ी पर डाल लिया था. रशीद आज हैरान था, उसे फिर एक बार अपनी घोड़ी दौड़ानी पड़ी. गांव की एक और लड़की फिर एक बार भगानी पड़ी. जवानी का उत्साह आज रशीद की बाँहों में नहीं था, पर रशीद सोच रहा था, पूरो को उठाने के बाद ज्यों-ज्यों वह अपनी घोड़ी दौड़ता जाता था, मनों भर का एक पत्थर जैसे उसकी आत्मा पर बैठता जाता था. कई वर्षों से वह बोझ उसकी आत्मा पर पड़ा रहा था. आज ज्यों-ज्यों रशीद की घोड़ी रत्तोवाल की सीमाओं को दूर छोड़ती जाती थी, रशीद को लगता था कि उसकी आत्मा पर पड़ा वह भारी बोझ सरकता जा रहा है.” (पिंजर: 100).

रशीद का पहला कृत्य अनैतिक था, जब उसने अपनी घोड़ी पर लादकर पूरो को अगवा किया था और दूसरा कृत्य नैतिक था जब उसने लाजो को घोड़ी पर बिठाकर उसे दंगाइयों के चंगुल से छुड़ाया था. अपने अनैतिक कृत्य के लिए रशीद के अंदर पश्चाताप था, जो सालों तक उसके अंदर पलता रहा (“कई वर्षों से वह बोझ उसकी आत्मा पर पड़ा रहा था.”). सर्वव्यापी नैरेटर लिखता है, “उसकी आत्मा पर पड़ा वह भारी बोझ सरकता जा रहा है”, जब सालों बाद वह लाजो को छुड़ाने में कामयाब रहा और खुद को पश्चाताप के बोझ से मुक्त करने का प्रयास किया. रशीद को यह भी पता है कि चाहे वह कुछ भी कर ले, लेकिन पूरो को अगवा करने वाले अनैतिक कृत्य से कभी पार नहीं पा सकता है. सर्वव्यापी नैरेटर उसकी इस मनोस्थिति को यूँ व्यक्त करता है: “रशीद की आंखें लाजो को बचाने के बाद भी लज्जित थी. उसे पूरो को उठाकर भगा लाना याद आ रहा था, फिर भी उसे लग रहा था कि उसके सर का क़र्ज़ कुछ न कुछ कम हो रहा था.” (पिंजर: 117). जैसे स्योरण किर्केगार्ड अपनी किताब Fear and Trembling के चौथे भाग में अब्राहम को एक तार्किक पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं उसी तरह अगर रशीद को जब कुरान की कसमें खिलाई गयी थी और कौल पढवाए गए थे, तब अगर उसने तर्क किया होता कि, क्या खुदा एक निर्दोष लड़की को अगवा करने का अनैतिक आदेश दे सकता है ?, तो इतिहास में रशीद के किरदार को नैतिकता की पगडण्डी पर खड़ा पाते.

बंटवारे के बाद जाने कितने ही रशीद शर्म और पश्चाताप के ज्वर में अपने गुनाहों से मुक्ति की फ़रियाद लगा रहे होंगे. एक सभ्य समाज के लिए लज्जा की बात तब होगी जब गुनाह को अंजाम देने वाले अपने अनैतिक होने की चेतना से मुक्त हो समय का पहिया घूमता देख रहे होंगे. रशीद के पात्र में उसके अनैतिक होने की चेतना का होना ही बेहतर समाज की आशा है. पुरो को पिंजर बना देने वाला रशीद अपने गुनाहों से कभी मुक्त नहीं हो सकता, लेकिन मुक्ति की पगडण्डी पर चलता हुआ वह इसकी कामना जरूर कर सकता है.

 

सन्दर्भ:

  • Butalia, Urvashi: The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India. New Delhi: Penguin 1998.
  • Kierkegaard, Søren: Fear and Trembling. By Alastair Hannay. London: Penguin Books 1985.
  • Pritram, Amrita: Pinjar, New Delhi: Hindi Pocket Books 2003.

[1]बसंत कौर की इस आपबीती को उर्वशी बुटालिया अपनी किताब The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India. Penguin. (1998) में डॉक्यूमेंट करती है. बसंत कौर की आपबीती के इस अंश का मूल अंग्रेजी से हिंदी में मेरा अनुवाद. पृष्ठ सं.: 200.

[2]देखें, Urvashi Butalia: The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India.Penguin.(1998). पृष्ठ सं.: 198-200.

[3] Amrita Pritram: Pinjar, New Delhi: Hindi Pocket Books 2003. आगे सभी उद्धरण इसी अंक से लिए गए हैं.

 

[4]स्योरण किर्केगार्ड अपनी किताब Fear and Trembling में ‘teleological suspension of the ethical’ की बात करते हैं, जिसके अनुसार आस्था मानवों को यह विस्वास दिलाकर अनैतिक कृत्य की तरफ ले जा सकता है कि उस अनैतिक कृत्य के परिणामस्वरुप कुछ अच्छा ही होगा. अंत में जो अच्छा होगा वह सिर्फ ईश्वर जान सकता है, मनुष्य नहीं.