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खरसावां गोलीकांड, जब मशीनगन से भून दिए गए थे एक हजार आदिवासी

आज़ादी मिले अभी १५० दिन भी नहीं हुए थे , देश का संविधान अभी बन ही रहा था, महात्मा गांधी ज़िंदा थे। देसी रियासतें औरराजघराने अभी भी भारत की एकता के  रास्ते में रोड़े बने हुए थे। हिन्दुस्तान पहली बार आज़ाद हवा में नए साल का जश्न मना रहा थातभी  जनवरी १९४८ की दोपहर जालियावाला बाग कांड हो गया। अपने ही देश के सेना और पुलिस ने अपने ही  लोगों को गोलियों सेभून डाला हज़ार लोग मारे गए इतने ही लोग बुरी तरह जख्मी हुए खरसावां नरसंहार, देश के इतिहास के पन्नों का वो काला अध्याय है जिसे ग़ैर आदिवासियों द्वारा साज़िशन मिटाने की कोशिश की जाती रही लेकिन झारखंड के निर्माण के लिए दी गई सबसे बड़ी शहादत को कोई भी झारखंडी भूल नहीं सकता

क्या हुआ था जनवरी १९४८ को, कितने लोगों की जान गई थी, कितने हमेशा के लिए अपंग हुए और कौन था इसके लिए ज़िम्मेदार इसकी पड़ताल झारखंड के इतिहास को समझने के लिए बेहद ज़रूरी है। जनवरी १९४८ को हुए खरसावां नरसंहार की आँखों देखी को सुनने के लिए ११ जनवरी १९४८ को खरसावां में  आदिवासी महासभा के अध्यक्ष और झारखंड राज्य की आवाज़ बुलंद करने वाले जयपाल सिंह मुंडा का वो ऐतिहासिक भाषण सुनना ज़रूरी हैं जिसमें उन्होंने कहाहमलोग यहाँ दो कारणों से इकट्ठा हुए है पहलायहाँ से कुछ ही गज की दूरी पर ओड़िशा प्रशासन द्वारा एक हज़ार लोगों की नृशंस हत्या के प्रति अपना शोक जताने के लिए और दूसरा पूरी दुनिया को ये बताने के लिए हम।छोटानागपुर की प्रशासनिक व्यवस्था को छिन्नभिन्न करने की तमाम कोशिशों को हम नाकाम करने के लिए प्रतिबद्ध है

जयपाल सिंह मुंडा के इस ऐतिहासिक भाषण को सुनने के लिए लगभग ३५ हज़ार लोग इकट्ठा थे जो हजारीबाग,जमशेदपुर,राँची जैसे शहरों से भी पहुँचे थे उन्होंने हज़ारों की भीड़ के सामने खरसावां नरसंहार के ख़िलाफ़ आक्रोश प्रकट करते हुए कहायहाँ जनवरी की घटना के चश्मदीद मौजूद हैं , लेकिन मैं आपका बताना चाहता हूँ कि उस दिन यहाँ क्या हुआ था जनवरी को खरसावां के बाज़ार में आम सभा आयोजित की गई थी सभा की इजाज़त ली गई थी और ग़ैर अनापत्ति पत्र भी नईनई स्थापित ओड़िशा प्रशासन द्वारा प्राप्त की गई थी सब कुछ व्यवस्थित चल रहा था सभा में चाईबासा,जमशेदपुर, मयूरभंज, राज ओआंगपुर जैसी जगहों से लोग पहुँचे थे सभा शुरू होने से पहले आदिवासी नेता खरसावां के राजमहल पहुँचे और उनसे बातचीत हुई राजा ने खरसावां को ओड़िशामें शामिल करने की इजाज़त दे दी थी लेकिन आख़िरी सेटलमेंट अभी लंबित थी।। बजे आदिवासी नेता महल से लौटे और सभा स्थलपर पहुँच कर भाषण हुआ,   बजे सभा में मौजूद ३५ हज़ार लोगों को अपनेअपने घरों में लौटने के लिए कहा गया, आधे घंटे बाद घर लौटते आदिवासियों पर ओड़िशा प्रशासन ने मशीनगन द्वारा गोलियों की बौझार कर दी। आधे घंटे तक फ़ायरिंग चलती रही।  सभा में आए आदमियों, बच्चों, महिलाओं, की पीठ गोलियों से छलनी हो गई, यहाँ तक की गाय और बकरियों को भी गोलियाँ लगीं, खरसावां बाज़ार खून से लाल हो गया

जयपाल सिंह मुंडा ने सभा में खरसावां नरसहांर को आज़ाद भारत का जालियाँवाला बाग करार दिया उनके भाषण को ७२ साल बादभी सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जनरल डायर तो अंग्रेज था जिसने।अमृतसर के जालियांवाला बाग में क्रूरता की सारीं हदें पार कर दी थी । लेकिन आज़ाद देश के प्रांत ने बेक़सूर आदिसवासियों के साथ जो बर्बरता की वो  आज भी नाक़ाबिले माफ़ी है उन्होंने ११ जनवरी कोदिए अपने भाषण में आगे कहा

जैसे ही फ़ायरिंग खत्म हुई खरसावां बाज़ार में खून ही खून नज़र रहा था.चारों ओर मांस के लोथड़े थे, लाशें बिछीं थी, घायल तड़परहे, पानी माँग रहे थे लेकिन ओड़िशा प्रसाशन ने ना तो बाज़ार के अंदर किसी को आने दिया और ना ही यहाँ से किसी को बाहर जाने कीइजाज़त दी घायलों तक मदद भी नहीं पहुँचने दी। आाजाद हिन्दुस्तान में ओड़िशा ने जालियाँवाला बाग कांड कर दिया यही नहीं नृशंसता की सारी हदें पार करते हुए  शाम ढलते ही लाशों को ठीकाने लगाना शुरू कर दिया ट्रकों में लाशों को भरकर या तो दफनकर दिया गया या फिर जंगलों में बाघों के खाने के लिए फेंक दिया गया   नदियों की तेज धार में लाशें फेंक दी गई घायलों के साथ तो और भी बुरा सलूक किया गया जनवरी सर्द रात में कराहते लोगों को खुले मैदान में तड़पते छोड़ दिया गया माँगने पर पानी भी नहीं दिया गया

जब जयपाल सिंह मुंडा बर्बरता की इस खूनी दास्ताँ को सुना रहे थे तब पूरी सभा में सन्नाटा छाया हुआ था लगभग ३५ हज़ार लोगों के जेहन में सिर्फ आक्रोश था और जनवरी को  अख़बारों के अंदर के पृष्ठों में एक कॉलम की खबर छपी वो भी ओड़िशा सरकार कीप्रेस विज्ञप्ति के हवाले से   जनवरी को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर की हेडलाइन थी ‘’ Orissa Police Fire on Adibasis, 35 Killed” अख़बार ने अंदर लिखा

तीर और धनुष के साथ ३० हज़ार आदिवासी बाहर से (खरसावां राज से बाहर ) से आए थे उन्होंने शांतिपूर्ण तरीक़े से प्रदर्शन किया  लेकिन अचानक आदिवासी उग्र हो गए थाने पर हमला कर दिया, उन्हें समझाने की कोशिश की गई लेकिन वे नहीं माने तो मौजूदप्रशासन को गोली चलानी पड़ी जिसमें ३५ लोगों की मौत हो गई। पुलिसकर्मियों को तीर लगे।  ओड़िशा ने २५ में २३ रियासतों को शांतिपूर्ण तरीक़े से अपने अधीन कर लिया था लेकिन सरायकेला में आदिसवासी उग्र हो गए

ओड़िशा सरकार के मुताबिक़  बिहार से आए आदिवासी नेताओं ने खरसावां के लोगों को उकसाया इंडियन एक्सप्रेस में दूसरे दिनयानी जनवरी १९४८ को फिर खबर प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था “Firing in Kharsawan State, 40 Killed 26 Injured “ ओड़िशा सरकार के हवाले से एकपक्षीय रिपोर्ट के मुताबिक फ़ायरिंग की घटना उकसावे पर हुई, आदिवासियों ने पहले तीर और धनुष से हमला किया

द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर

दरअसल आज़ादी के बाद देश में राज्यों के एकीकरण का काम चल रहा था,देसी रियासतों का विलय किया जा रहा था ओड़िशा में २५ रियासतों का विलय तय था, विवाद सरायकेला और खरसावां रियासत को लेकर था, मूल तौर से छोटानापुर का हिस्सा रहे इस रियासत को ओड़िशा जबरन अपने नक्शे में शामिल करना चाहता था, आदिवासी इसका विरोध कर रहे थे , जनवरी १९४८ कोखरसावां के सत्ता स्थांतरण की तारीख़ तय थी इसके लिए बालासोर के जिलाअधिकारी और ओड़िशा के एडिशनल डीआईजी को सेनाके साथ भेजा गया था जिनके इशारे पर सीधेसाधे आदिवासियों पर फ़ायरिंग हुई

मृतकों और घायलों की मदद के लिए अपील

जयपाल सिंह मुंडा ने ११ जनवरी को खरसावां में दिए अपने भाषण के दौरान मृतकों की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौनर खते हुए तीन प्रस्ताव रखा   पहला प्रस्ताव थाओड़िशा प्रशासन को फ़ौरन खरसावां से हटाया जाय और छोटानागपुर की सभी १०रियासत सरगुजा, जशपुर,उदयपुर, कोरिया,चांगबााखर, बोनाई,गांगपुर,बेमरा और सरायकेला खरसावां को अंतरिम तौर बिहार में विलयकिया जाए दूसरा प्रस्ताव थाछोटानागपुर के दसों रिसायसतों को फ़ौरी तौर विलय कराया जाए और तीसरा था जयपाल सिंह मुंडाको रियासतों के राजाओं और संघीय सरकार के बीच बातचीत के लिए प्रतिनिधि नियुक्त करने का, तीनों प्रस्ताव सर्वसम्मित से पारित कर दिए गए। अपने इसी भाषण में उन्होंने अलग झारखंड राज्य की लड़ाई की जारी रखने का वचन देते हुए कहा  किसंविधान सभामें प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने आदिवासी प्रतिनिधियों से अलग झारखंड राज्य के प्रस्ताव पर अपनी सहमति जताई है दूसरेराज्यों के गठन के साथ ही झारखंड का भी गठन होगा, हमने बड़ी माँग रखी और और बड़ी चीजें वक्त लेती हैं आप धीरज रखें, झारखंड की आज़ादी तय है तब तक हम हर चुनाव झारखंड के मुद्दे पर लड़ेंगे

जयपाल सिंह मुंडा का प्रस्तावित कार्यक्रम

इसी सभा में खरसावां राहत कोष का गठन किया गया और जिसमें स्थानीय आदिवासी नेताओं ने हज़ार मृतकों के परिजनों और इतने ही घायलों की मदद की ज़िम्मेदारी उठाई हिन्दी में हस्तलिखित ये अपील आज भी राष्ट्रीय अभिलेखागार झारखंडियों की शहादत कासबूत है   इस अपील में लिखा थाओड़िशा सरकार की गोली से तड़पते घायलों की पुकार, चोट ख़ास हुए मानवता की पुकार

जयपाल सिंह मुंडा का ऐतिहासिक भाषण

मृतकों के आकंड़ों को लेकर जो तरह तरह के दावे किए जा रहे हैं उसका सबसे पुख्ता सबूत है ये अपील और जयपाल सिंह मुंडा का ११जनवरी १९४८ को दिया गया भाषण बिहार में उस वक्त श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री थे, देश के बड़े नेताओं में शुमार श्रीबाबू ने ओड़िशा सरकार द्वारा की गई इस नृशंस कार्रवाई पर गृहमंत्री पटेल को चिट्ठी लिख कर दखल की मांग की। जवाब में पटेल ने भी किसी भी क़ीमत पर खरसावां को ओड़िशा में विलय का विरोध किया।  हांलाकि सरायकेला के राजा आदित्य प्रसाद देव ओड़िशा में शामिल।होना चाहते थे। लेकिन भाषाई और सांस्कृतिक तौर से आदिवासी  किसी भी क़ीमत पर उड़िया भाषी के साथ मिलने के लिए तैयार नहीं थे  बिहार सरकार ने इसकी जाँच रिपोर्ट भी तैयार की थी लेकिन वो आज तकप्रकाशित नहीं हो सकी 

 

नारी अस्‍मिता के वृत की त्रिज्‍याएं , चुनौतियां एवं संभावनाएं

नारी अस्‍मिता के वृत की त्रिज्‍याएं , चुनौतियां एवं संभावनाएं

आज के इस लोकतांत्रिक माहौल में स्‍त्री अस्मिता का स्‍वर अभी भी अनुसना ही रह जाता है और यही वजह है कि पितृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था अपने वर्चस्‍व को चुनौती देती इन आवाजों को हाशिए पर धकेलने की साजिशें करने लगती। अब तक नारी अस्मिता का जो वृत्‍त है , उसकी त्रिज्‍याएं क्‍या हैं ? , समग्रता में क्‍या है नारी अस्मिता ? ऊपरी तौर पर हमें नई स्‍त्री दृष्टि या स्‍त्री चेतना में महत्‍वपूर्ण बदलाव नजर तो आ रहा है बल्कि शुरूआती दौर में स्त्रियेां की स्थिति को लेकर बड़े बड़े नामचीन मुक्तिदाताओं ने क्रांतिकारी नारेबाजी की और इस तरह  हमारे देश में स्‍त्री दमन के प्रति विद्रोह व प्रतिरोध की चेतना दिनोंदिन जाग्रत होती गईं। धीरे धीरे जब हम स्‍त्री जीवन की ऊपरी चकाचौंध की अंदरूनी अंधेरी परतों की तरफ देखते हैं जहां पसरी है अनगिनत गैर बराबरी के प्रसंग , शिक्षा व अन्‍य जरूरी चीजों से वंचित कर दी गई इस आधी दुनिया के जीवन में पैठी विसंगतियों व विडंबनाओं की संश्लिष्‍ट तस्‍वीरें नजर आने लगती ।

स्‍त्री की सामाजिक हैसियत , आर्थिक पराधीनता एवं वृहत्‍तर संदर्भो में उसकी भूमिका आज भी दोयम दर्जे की है , इसमें जरा भी संदेह नही। बेशक कुछ मायनों में उसकी बेहतर समझ बनी है व उनकी संवेदना का विस्‍तार भी हुआ है जिसके मूल में था उसका शिक्षित होकर  स्‍वालंबन की दिशा में बढाया गया सेाचा समझा कदम  पर क्‍या सही मायनों में इस आजादी की आंच हमारे सुदूर गांवों , कस्‍बों या दूर दराज के छोटे छोटे कस्‍बों में भी उतनी ही धमक से पहुंच पा रही हैं। क्‍या एक आजाद , स्‍वायत्‍त मनुष्‍य की तरह अपना फैसला खुद लेकर मजबूती से आगे बढ़ने की हिम्‍मत हैं उसमें ? उसके मूलभूत अधिकार व आत्‍म निर्णय की पराधीन स्थितियां तो जस की तस है ।

आधुनिकता की चपेट में बढ़ते पूंजीवाद और विश्‍व स्‍तर पर फैल रहे बाजारवाद ने  स्‍त्री जीवन को चारों तरफ से प्रभावित किया और एक विभ्रम की स्थिति पैदा कर दी जिससे ऐसा आभास होता है कि इस रास्‍ते वे ज्‍यादा आजाद हुईं हैं लेकिन यह बड़ा अंतर्विरोध है कि स्‍त्री आजादी के नाम पर वहां एक बहुत बड़ी साजिश रची गईं यानी उन्‍मुक्‍त यौनाचार वनाम दैहिक स्‍वतंत्रता के नाम पर वे धीरे धीरे पुरूष की भोगवादी लालसा का शिकार होती गईं। कहां कम हुआ इससे पुरूष वर्चस्‍ववाद ? सजग , सचेत व आत्‍मनिर्णय से लैस तेजस्‍वी  स्‍त्री क्‍या यही थी ? स्‍त्री की स्‍वतंत्र गरिमा , उसकी सामाजिक सक्रियता व सरोकारों वाली भूमिका क्‍या समग्रता में हमारे सामने आ पाई है , पूरी तरह तो ये सच नही है । बाजारवाद एवं बढ़ते भौतिकतावाद की चपेट में स्‍त्री की सामाजिक हैसियत या मानसिक धरातल पर कहीं कुछ बदलाव नजर आता है ? क्‍या आज वह अपने बूते अपनी पसंद के करियर का चुनाव कर , अपनी पसंद के साथी के साथ अपनी मर्जी से रहने या सिंगल जीवन बिताने का या स्‍वतंत्रता कायम करने की रहा पर चलने में सक्षम हो पायी है ? शायद नही ,  आए दिन होने वाले मर्डर इस बात के गवाह है कि , आज भी वे अपनी मर्जी से जीवन जीने का जोखिम उठाएंगी तो पुरूष सत्‍ता उनकी हत्‍या कर सकती है ।

बेशक समाज बदल रहा है मगर यथार्थ की परतें कितनी बहुआयामी व जटिल हैं जिन्‍हें भेदकर अंदरूनी सचाई तक पहुंच पाना आसान नही। आज के इस रंगीन समय में नई बढ़ती चुनौतियों से टकराती स्‍त्री की क्रान्तिकारी आवाजें हम सबको सुनाई दे रही हैं मगर यही कमाऊ स्‍त्री जब समान अधिकार और परिवार में लोकतंत्र की अनिवार्यता पर बहस करती य सही मायनों में लोकतंत्र लाना चाहती तो वहां इस बदलाव की राह में तमाम पगबाधाएं मसलन-  धर्म , भारतीय संस्‍कृति , समर्पण , सहनशीलता , नैतिकता या यौनशुचिता जैसे सामंती मूल्‍य ही उसकी स्‍वीकार्यता की कुंजी बनते रहे।

जहां आधिपत्‍य , दमन और अवमानना के इस समूचे पितृसत्‍तात्‍मक मूल्‍य व्‍यवहार से टकराती आजाद देश की नई स्‍वतंत्र स्‍त्री को लगता था कि चलो , अब कामकाजी माहौल में वे आत्‍मसम्‍मान और व्‍यक्तित्‍व की आत्‍मपर्याप्‍तता को मिले स्‍पेस के चलते स्‍त्री स्‍वाधीनता का भरपूर लुत्‍फ उठाएंगी मगर आज के बाजारवाद द्वारा परोसी गई स्‍त्री के बारे में सोचते ही हमारे सामने ढेरों फैसलों के जरिए सुंदर स्‍त्री के नकली चेहरे कौंध जाते हैं जिन्‍हें देखकर तमाम सवाल तेजी से बेचैन करने लगते। आखिर ऐसा क्‍या हैं इनमें ? अपेक्षित दृष्टि सम्‍पन्‍नता  , प्रचुर आत्‍मविश्‍वास या आत्‍मबल से भरी पूरी अस्मिता के नए निशान लगाती आधी दुनियां हैं क्‍या यहां ? नही , कतई नही। जब भी वह अपने लिए मुकम्‍मल स्‍पेस या बाजिब हक की बात छेड़ती , उसे पुरूष विद्रोही या घर तोड़ू जैसे अनर्गल आरोपों से मढ़कर उसका मनोबल तोड़कर आगे बढ़ने से हतोत्‍साहित किया जाता है जब कि ये पूर्वाग्रही सोच सिर से निर्मूल या आधारहीन है। पुरूष वर्चस्‍ववाद से जूझकर अपने जीवन की चुनोतियों से खुद निबटने का बूता उसके अंदर आता है तभी वे बदले सामाजिक , राजनैतिक व आर्थिक मार्चे पर पूरी निडरता व निधड़कता से स्‍वत्‍व की जमीन पर पैर टेक पाएंगी ।

हिंदी साहित्‍य आधुनिकता के दौर में 1960 के बाद उभरे नई कहानी आंदोलन में स्‍त्री से जुड़े सवालों को उठाया जाता रहा। स्‍त्री जीवन के संघर्ष और समस्‍याओं को अनुभव की प्रामाणिकता के साथ उभारने का श्रेय जाता है , हमारी वरिष्‍ठ कथाकार कृष्‍णा सोबती , उषा प्रियंवदा , मन्‍नू भंडारी , मृदुला गर्ग , ममता कालिया , मृणालपांडे , चित्रा मुद्गल , मंजुल भगत , चंद्रकिरण सोनरिक्‍सा , प्रभा खेतान व नासिरा शर्मा जैसी सशक्‍त लेखिकाओं ने पुरूष वर्चस्‍ववाद के खिलाफ परंपरागत रूढि़यों व टिपिकल मर्दवादी मानसिकता को तोड़ने का रचनात्‍मक साहस दिखाया। उन्‍हेांने पुरूष संरचना व पुरूष द्वारा गढ़े एक तरफा मूल्‍येां व मान्‍यताओं को सिरे से नकारते हुए स्‍त्री जीवन को सर्वथा नए कोण से रचा व सालों से दबाई उसकी आवाज को उसी की जुबान में शब्‍द मिले , नई भाषा मिली और नया लोकतांत्रिक  नजरिया भी जिसमें उनकी कठपुतली वाली नकली छवि को पूरी ताकत से तोड़ा गया ।  प्रेम , विवाह व करियर के बीच संघर्ष करती स्‍त्री की एक नयी जीवंत तस्‍वीर सामने आई और स्‍त्री मुक्ति को नयी दिशा मिली ।

स्‍वातंत्रयोत्‍तर देश में एक ओर जहां समूचे सामाजिक आर्थिक शिंकंचे में कैद स्‍त्री की चीखें आजाद हुई , वहीं दूसरी तरफ नारी लेखन में ‘ अनारो , बेघर , शेष यात्रा ‘ सरीखी नायिकाओं के संवेदनशील व्‍यक्तित्‍व ने ‘ मैं नीर भरी दुख की बदली ‘ छवि से टकराकर अपने निजी सपनों व आकांक्षाओं को विस्‍तार दिया। धीरे धीरे स्‍वावलंबी स्‍त्री पुरूष वनाम पति पत्‍नी की सबलता से प्रभावित ‘  बंटी ‘ का सूक्ष्‍म मनोवैज्ञानिक विश्‍लेषण हुआ । कहीं उग्र नारीवाद उभरा तो कहीं यथास्थितिवाद से समझौता करता संस्‍कारों से सीधे न टकराकर समन्‍वय वादी रवैया अपनाया गया , जैसे सूर्यवाला जी की कहानियां । मगर ये एक बड़ी उपलब्धि थी कि नारी चेतना अपनी स्‍वतंत्र सोच व सप्राण संवेदना के साथ रचनात्‍मकता के बहुआयामी रूपों में मुखरित होनी शुरू हो गयी । इस नई स्‍त्री ने आधुनिकता के साथ नई करवट ली और ‘ पचपन खंभे लाल दीवारें ‘ में नए किस्‍म के यथार्थ को उभारा गया ।

घर से बाहर निकल कमाऊ स्‍त्री को आसान आजाद औरत समझ उसे हथियाने के लिए पितृसत्‍ता ने तमाम हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए। लोभ लालच के वशीभूत करने की साजिशें रची गयी या भावात्‍मक दोहन के जाल बिछाए गए जिसे बखूबी उजागर करने के लिए लेखिकाओं की एक नई जमात उभरकर आयीं – सुधा  अरोडा , मेहरून्न्शिा परवेज , निरूपमा सेवती , नमिता सिंह , मैत्रेयी पुष्‍पा जैसी सशक्‍त कथा लेखिकाओं ने सक्रिय स्‍त्री के प्रतिरोध को व्‍यापक संदर्भो में मुखरित किया जिसमें उसकी सामाजिक , आर्थिक व राजनैतिक हैसियत को आंकते हुए उसकी त्रासदी के जिम्मेदार कारकों की सघन पड़ताल की गयी कि वे अब अपनी तरह से सोचने लगीं हैं व तमाम चुनौतियेां से निबटने में सक्षम हैं । बेशक इस प्रक्रिया में कई वर्जनाएं टूटी मगर उस पर लादे गए अनावश्‍यक दबाव भी कमतर होते गए। जिस तरह से उसकी पारिवारिक परिवेश ने सालों तक उसकी मानसिकता को आक्रांत कर रखा था , धीरे धीरे अब वे अपने हकों से वाकिफ होती गई। अपने सपनों व निजी आकांक्षाओं को गतिशीलता से आगे बढ़ाती आज की स्‍त्री पूरी विविधता व समग्रता से अपना आकाश तलाशना सीख रही हैं। क्रमश: आजाद देश  की स्त्रियां आईटी , सेना , एअरफोर्स , चिकित्‍सा , इंजीनियरिंग , वैज्ञानिक , बैंकर , विश्‍वविद्यालय में प्रोफेसर , पुलिस अधिकारी या समाज सुधारक आदि न जाने किन किन भूमिकाओं में कामयाबी के शिखर छू रही हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नही जहां आज की महिलाओं ने अपनी छाप न छोडी हो। भारतीय महिला बैंक की सीएमडी उषा अनंत सुब्रहमण्‍यम हों या भारतीय स्‍टेट बैंक की सीएमडी अरूंधति जी या आईसीआईसीआई की अध्‍यक्ष जैसे जितने शानदार नाम , काम में भी वे उतनी ही कुशल , दक्ष व प्रखर मेधा का परचम लहराती हुई। कह सकते हैं कि आधी नही , पूरी दुनियां हमारी हैं। सारा आकाश हमारा हैं।

सच तो ये है कि आधुनिक स्‍त्री की स्‍वाधीन छवि के प्रति समाज / परिवार अभी भी पूरी तरह तैयार नजर नही आते मगर हां , उपभोक्‍ता संस्‍कृति उसे प्रयोज्‍य वस्‍तु की तरह जरूर इस्‍तेमाल करने से नही हिचक रही। सच बताएं तो इस ऊपरी चकाचौंध के पीछे की तस्‍वीरें इतनी कुरूप हैं , इतनी भयावह और वितृष्‍णा जगाने वाली हैं जो हमारी आजादी की सालगिरह पर एक ऐसा तमाचा हैं जहां आज भी अखबार ऐसी जघन्‍य बलात्‍कार की घटनाओं से रंगे रहते। सच है कि आए दिन अखबार महिलाओं के प्रति अपराधों से भरे रहते। फिर ये कैसी आजादी ? कैसा लोकतंत्र ? क्‍या वाकई लोकतंत्र नजर आता है ? चारों तरफ स्‍त्री को लेकर होने वाले अपराधों की खबरें ही खबरें , हत्‍या से आत्‍महत्‍या तक , घर की गली से अगले मोड़ तक , मोड़ों से आगे मिलती लंबी सड़क से राष्‍ट्रीय राजमार्ग तक , सब तरफ बैठे हैं गिद्ध ही गिद्ध , बेहद हिंसक , गैर जिम्‍मेदार , क्रूर एवं प्रभुता के मद में चूर , उन्‍हें अपनी पशुता का अहसास तक नही , मलाल तो दूर की बात हैं , जो अपनी प्रेमिका को पाने की खातिर अपनी मरती हुई पत्‍नी की चीखें सुनना चाहता हैं , ओफ . . सच तो ये है कि महिलाओं के प्रति पुरूषों की सोच इतनी घटिया , संकरी , इकहरी  और पूर्वाग्रही है कि आज भी उनका हंसना , बोलना या अकेले अपनी मर्जी से घूमना फिरना सवालों के घेरे में। आए दिन गैंग रेप की हिंसक वारदातें , स्‍त्री प्रताड़ना के दिल दहलाने वाले खौफनाक सच्‍चे कारनामे इस सभ्‍य सुसंस्‍कृत समाज के माथे पर कलंक का टीका है जो हमारे लोकतंत्र व न्‍यायव्‍यवस्‍था को कटघरे में खड़ा कर देता है।  .

कहने को विश्‍वविद्यालयों में महिला अध्‍ययन केंद्र खुलने लगे हैं मगर लैंगिक भेदभाव कम हुआ क्‍या इससे ? प्रेम , विवाह व करियर के बीच संघर्ष करती स्‍त्री को उसका वाजिब हक कब और कैसे मिलेगा , आज भी एक ज्‍वलंत सवाल है। कई भूमिकाओं का कुशलतापूर्वक निर्वहन करती स्‍त्री पूरे दम खम के साथ आत्‍मविश्‍वास की जलती लौ के सहारे न जाने कितनी पीढि़यों को ऊर्जस्वित रखती आई हैं। आज के बहुआयामी यथार्थ की देहरी पर उसके जीवंत व तेजस्‍वी व्‍यक्तित्‍तव की दस्‍तक सुनाई देने लगी हैं जहां वह अपनी सोच को पर्याप्‍त आधार देते हुए परिवार व समाज में बहुमुखी प्रतिभा की छाप छोड़ने लगी हैं सो अब उसे और ज्‍यादा दरकिनार कर हाशिए पर नही ठेला जा सकता।

स्‍त्री की सच्‍ची स्‍वाधीनता का अहसास तभी हो पाएगा जब वह आजाद मनुष्‍य की तरह भीतरी आजादी को महसूस करने की सुखद स्थितियों में होगी  , तभी सही मायनों में वह एक खुदमुख्‍तार मजबूत इंसान की तरह समाज की मुख्‍य धारा में अपनी सशक्‍त भूमिका निभा पाएगी। न , केवल आर्थिक आजादी सही मायनों में आजादी का पर्याय नही बल्कि सामाजिक , राजनैतिक परिप्रेक्ष्‍य में उसकी ठोस भागीदारी एवं मनुष्‍यता के समान अधिकारों से लैस समानता चाहिए , संरक्षण नही । आज के कथा सहित्य में धीरे धीरे उसे समग्रता में देखा जाने लगा है जो एक सुखद अहसास है , हवा के ताजे झोंके की तरह ।

स्‍त्री लेखन की चुनौतियों के बारे में सोचते ही कई सारे बिम्‍ब स्‍मृतिपटल में मूर्त होने लगे : अलसुबह अधनींद में उठते ही वह बगल में सोए बच्‍चे के लिए दूध तैयार करते करते चाय चढ़ा देती । फिर चाय का कप हाथ में लेकर बमुश्किल मिले एकांत में कुछ समय अपने लिए तलाशती अपनी पसंदीदा किताबों को उलटते पलटते विचारों की आवाजाही में खोयी कि अचानक बच्‍चे के रोने की आवाज सुनकर फिर तेजी से उसके पास चल देती । इन्‍ही क्षणों में उसके भीतर कौधती रचनात्‍मकता के कई बिम्‍बों को परे धकेल वह तेजी से निबटाती है रूटीन काम , मसलन बच्‍चे को स्‍कूल भेजना , नाश्‍ता तैयार करके खुद भी तैयार होकर दफ्तर के लिए निकलना। कामकाजी होने को नाते घर से बाहर तक की दुनियां के अनगिनत कामों की श्रृंखला में उसकी रचनात्‍मकता का स्‍फुरण अंदरूनी जगत में अनवरत होता रहता पर फाइलों पर काम निबटाते निबटाते पूरा दिन निकल जाता और शाम होते ही फिर वही रूटीन काम उसे घेर लेते । सुबह के छूटे शब्‍द उसे कभी कभी शाम या फिर रात तक घेरे रहते यानी चैन से नही जीने देते । तमाम जाने अनजाने , चीन्‍हे अनचीन्‍हे प्रसंग , दिल दहलाने वाली घटनाएं , आसपास के हौलनाक हादसे और आसपास की दुनियां के सच्‍चे किस्‍से उसकी स्‍मृति में लगातार दस्‍तक देते उसे बेचैनी से भर देते फिर तो एक ऐसी स्थिति आ जाती कि लिखे वगैर उसे कैसे भी चैन नही मिलता तब उसके अंदर की रची बुनी दुनियां में शब्‍द बेतरतीबी से जमा हो जाते जिन्‍हें कागज पर उतारने के लिए वह विकल हो उठती । फिर खुद को आश्‍वस्‍त करती – दिन गया , कोई बात नही। अभी पूरी रात तो अपनी है , ये कहां भागकर जा सकती है भला ।

जी हां , अधिकांश स्त्रियों का लेखन इसी जेद्दोजेहद और इसी भागमभाग के बीच अपने लिए अभिव्‍यक्त्‍िा के रास्‍त्‍ेा तलाशते हुए कागजों पर उतरता रहा हैं । मेरा अधिकांश लेखन रात 11 बजे से 1 या 2 बजे तक हुआ है जब मैं अपनी समूची एकाग्रता और तन्‍मयता से दिमाग में फैले विचारों , भावनाओं एवं चोट खायी संवेदनाओं की बिखरी अनुभूतियों को सिलसिलेवार पन्‍नों में गूंथते हुए शब्‍दों को भाषिक व शैल्पिक ताने बाने में पिरेाते हुए कहानी , उपन्‍यास या लेख का जामा पहना देती । इस समय घर की शांति व अटूट सन्‍नाटा मेरी रचनात्‍मकता को संवर्धित करता है । वैचारिक ऊर्जा व अंदरूनी बेचैनी का सहमेल से उपजते हैं शब्‍द जो स्‍वत:स्‍फूर्त आवेग से फर फर चलती हवा की तरह हर पन्‍ने पर उतरने के लिए आवेग से अपने आप दौड़े चले आते गोया नौ महीने के बाद स्‍त्री की कोख से बाहर आने के लिए बच्‍चा खुद अकुलाने लगता है , ठीक उसी तरह होती है सृजन की जमीन जहां शब्‍द किसी जादुई शक्ति से खुद ही रचवा लेते अपने को या उन्‍हें  आकार प्रकार मिल जाता ।

अपनी रचनात्‍मक यात्रा के 15 साल पीछे मुड़कर देखती हूं तो ऐसा लगता है जैसे मेरी हर रचना किसी मायावी दुनियां से अपने आप अवतरित हुई हो । अक्‍सर लेाग पूछते हैं – आपकी इतनी व्‍यस्‍त जीवन शैली में समय कहां से कैसे मिलता है , मेरे पास इस सवाल का यही एकमात्र जवाब होता कि कुछ भी पूर्वनिर्धारित नही होता । मसलन , मैं कहानी का पहले से ही प्रारूप सोचकर बैठूं कि आज एक लंबी कहानी लिखनी मगर जब पन्‍नों पर शब्‍दों की चादर फैलाती तो पता चलता , अरे , ये तो उपन्‍यास रचा जा रहा है । एक लंबी कहानी कब और कैसे अपने अवांतर प्रसंगो से कहानी से औपन्‍यासिकता का ताना बाना पहनने लगती है , खुद रचनाकार को पता नही चल पाता । उंगलियों में फंसा पेन पन्‍नों पर तेजी से चलता दौड़ता रहता है मगर यहां भी वह अपनी मनमर्जी से चलता , किसी तानाशाह की तरह । सच्‍ची में , न तो वह लेखक के पहले से बुने विचारों या भावनाओं की पुकार सुनता है , न ही पहले से तय प्रारूप पर कार्य करने की गुहार सुनता है । यहां वह किसी की नही सुनता , गोया बच्‍चा अपनी जिद के आगे किसी की नही सुनता । । बस , विचार व गहन अनुभूतियां तेजी से पन्‍नों पर उतरती जाती है । शब्‍द अनायास गढ़ लेते अपना आकार प्रकार और रचनाकार का सोचा जस का तस कुछ का कुछ सूरत लेने लगता । बेशक कागज पर सृजित यह शब्‍दलोक उसके पूर्व निर्धारित कल्‍पनालोक से बेहतर होता है , इसी वजह से कहा जाता है कि ये शब्‍द किसी मायावी दुनियां की तरह अपना जादू खुद बिखेरते हैं पन्‍नों पर और रचते जाते एक नयी काल्‍पनिक नयी दुनियां जहां हमारे पाठक विचरते हैं तो वहां वे खुद को एकाकार करते हमसे पूछते हैं – आप यहां कहां पर हो , यानी साधारणीकरण का जादू यहां पूरे सौंदर्य से उतरता है और हम ठगे से देखते रह जाते है खुद की सृजित इस अद्भुत रचनात्‍मकता को , फिर खुद ही आश्‍चर्य से भर जाता है मन ।

पहला उपन्‍यास ‘ कही कुछ और ‘ एक तलाकशुदा इंजीनियर महिला के पुनर्विवाह पर आधृत कहानी थी मगर अंत तक आते आते कथा नायिका खुद ही अकेले रहने का फैसला सुना देती है । इसी तरह ‘ किशोरी का आसमां ‘ सबसे पहले एक लंबी कहानी के रूप में लिखना शुरू किया था मगर जैसे जैसे कहानी ने आकार प्रकार लेती गयी , तुरंत उसको पहनाए गए कहानी के कपड़े कम होते गए यानी कहानी के अंदर परत दर परत अन्‍य कहानियां तेजी से पनपती और विस्‍तार लेती गयी । फिर क्‍या था , कहानी अपने मूल सांचे ढांचे को तजकर दो पीढि़यों के अंतर्दन्‍द , पारिवारिक मूल्‍यों का दो पीढि़यों का संघर्ष क्रमश : दो समय की आवाजाही में बदलता गया । मां बाप व बच्‍चों की दुनियां में बदलते समय के अंदर चल रही रचनात्‍मक यात्रा महीनों मेरे भीतर रचती , बसती फिर उसके किरदार मेरी आंखों के सामने ही रोज लिखाने की अपील करते दिखते जिसे मैं भरसक टालती रहती या बाहरी परिवेश की व्‍यस्‍तताएं मुझे नही लिखने देती । मगर फिर रचना ऐसी जिद पर उतर आती जैसे कोई हठी बच्‍चा अपनी मांग पूरी किए बिना मानता ही नही है । सो एक ऐसा दिन जरूर आ धमकता जब मेरा टालने की प्रवृति पर रचनात्‍मक मांग हावी हो जाती और ‘ अब लिखे वगैर सांस नही ले पाऊंगी ‘  यानी लिखे वगैर चैन नही पड़ता । अंदरूनी दुनियां की आग तेजी से धधकने लगती कि फिर तो हर हाल में बैठना अनिवार्य बन जाता । ‘ एक न एक दिन ‘ उपन्‍यास लिखने के दौरान ऐसी ही अनुभूति हुई थी। पहले सोचती थी , बच्‍चे बड़े होने के बाद लिखेंगे , मगर रचना जब जिद पर उतार आती तो अपने को लिखवाकर ही सुकून से बैठ पाती । घर पर इस तरह का बिम्‍ब बनता , कि बच्‍चे पढ़ रहे हैं और उनके संग हम भी लिख या पढ़ रहे होते । बेटी को हिंदी का डिक्‍टेशन दे रही हूं मगर पढ़ रही हूं हिंदी की साहित्यिक पत्रिका और उसी में से हिंदी के कठिन शब्‍द निकालकर लिखवा रही होती पर बेटी बीच में पूछ बैठती – ‘ पर ,  ये तो हमारी बुक में है ही नही , मैं बताती –  तो क्‍या हुआ , तुम्‍हें आना तो चाहिए न ? ‘

वाकई , स्‍त्री की रचनात्‍मक चुनौती के रूप में सबसे बड़ा अवरोध है – उसकी पारिवारिक या घरेलू मोर्चे पर निरंतर सक्रियता और उसकी रचनात्‍मक अस्त्तित्‍व या लेखकीय महत्‍ता को शून्‍य समझने का पुरूषवादी एकांगी नजरिया । फिर आते हैं बाहरी दुनियां के झंझट झमेलों का घनचक्‍कर । वह हमेशा दो अतियेां के बीच विचरते हुए कैसे भी संतुलन साधने की कोशिश करती रहती । इसी दरम्‍यान उसके अंदर के संसार में मचती खलबली  और अनाम संवेदनाओं की उथल पुथल के बीच शब्‍द पन्‍नों की तलाश में फड़फड़ाते रहते कि कही से , कैसे भी उसे एक झरेाखा तो मिले और वह अपनी एकरस , उबाऊ या नीरस जिंदगी में से कैसे भी हवा का ताजा झोंका महसूस कर लिख सके अपनी सोच व संवेदना की गहन अनुभूतियों को मगर कई बार भीतर की आवाजें अनुसनी रह जाती हैं और कहानी दिमाग व भावनाओं के मकड़जाल में फंसी हवा में उड़ भी जाती है । कई लेखिकाओं के साथ ऐसे रचनात्‍मक हादसे हुए है जब वे चाहकर भी बाद में अपना रचनात्‍मक लेखन नही कर पाती , यानी इस व्‍यस्‍तता से घबराकर जिसने लेखन तज दिया कि बाद में फुरसत में लिखेंगे मगर बाद में  पता नही किन कारणों से उनकी रचनात्‍मकता सूख जाती है और आजादी से , अपने एकांत में लिखने के सपने महज सूखे फूल की तरह गुमनामी के गर्त में चले जाते ।

वैचारिक प्रतिरोध पर रचनात्‍मकता में दखल देने का एक और बड़ा अड़ंगा आता है – तुम ऐसे क्रांतिकारी विचारों वाली कहानी या उपन्‍यास लिखती ही क्‍यों हो  ? बंद करो इस तरह के पुरूष विरेाधी लेख लिखना यानी ऐसे नही , वैसे लिखो जैसा हम चाहते हैं । हां , यहां पर लेखिकाओं को साफ शब्‍दों में अपने घर पर बताना होगा कि ये उसकी अपनी रची नितांत मौलिक दुनियां है जहां उसे किसी का दखल मंजूर नही । हरेक स्‍त्री को ये बात अपने तईं तय करनी होगी कि आजादी से लिखना उसका मूलभूत हक है जो उससे कोई नही छीन सकता , चाहे वह उसका कितना बड़ा हितैषी ही क्‍यों न हो । उसे रचनात्‍मक आत्‍मविश्‍वास के सहारे अपने रचे के प्रति पूरा भरोसा जरूर होना चाहिए । सच तो ये है कि लिखते वक्‍त हम वही नही रह जाते जो हैं यानी रचने के दरम्‍यान हमारा मनोजगत हमें किसी और ही दुनियां में खीच ले जाता है और यही है रचने का अनर्वचनीय सुख कि शब्‍दों के पन्‍नों पर उतरने के बाद मैं किसी खुशबूदार रंगीन फूल सा हल्‍की होकर उन्‍मुक्‍त उड़ान के लिए हाथ पैर फैलाकर निकल पड़ती हूं किसी अनजान से सफर पर , मस्‍ती के कुछ निजी पलों का आनंद लेने । गूंगे के गुड़ की तरह यह होता है वो अनिर्वचनीय आनंद जिसमें अवगाहन करता है रचनाकार और इस अमूर्त अनिर्वचनीय आनंद अहसास के साथ जीता है रचनाकार ।

आज के इस लोकतांत्रिक माहौल में स्‍त्री अस्मिता का स्‍वर अभी भी अनुसना ही रह जाता है और यही वजह है कि पितृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था अपने वर्चस्‍व को चुनौती देती इन आवाजों को हाशिए पर धकेलने की साजिशें करने लगती। समग्रता में क्‍या है नारी अस्मिता ? ऊपरी तौर पर हमें नई स्‍त्री दृष्टि या स्‍त्री चेतना में महत्‍वपूर्ण बदलाव नजर तो आ रहा है बल्कि शुरूआती दौर में स्त्रियेां की स्थिति को लेकर बड़े बड़े नामचीन मुक्तिदाताओं ने क्रांतिकारी नारेबाजी की और इस तरह  हमारे देश में स्‍त्री दमन के प्रति विद्रोह व प्रतिरोध की चेतना दिनोंदिन जाग्रत होती गईं। धीरे धीरे जब हम स्‍त्री जीवन की ऊपरी चकाचौंध की अंदरूनी अंधेरी परतों की तरफ देखते हैं जहां पसरी है अनगिनत गैर बराबरी के प्रसंग , शिक्षा व अन्‍य जरूरी चीजों से वंचित कर दी गई इस आधी दुनिया के जीवन में पैठी विसंगतियों व विडंबनाओं की संश्लिष्‍ट तस्‍वीरें नजर आने लगती । स्‍त्री की सामाजिक हैसियत , आर्थिक पराधीनता एवं वृहत्‍तर संदर्भो में उसकी भूमिका आज भी दोयम दर्जे की है , इसमें जरा भी संदेह नही। बेशक कुछ मायनों में उसकी बेहतर समझ बनी है व उनकी संवेदना का विस्‍तार भी हुआ है जिसके मूल में था उसका शिक्षित होकर  स्‍वालंबन की दिशा में बढाया गया सेाचा समझा कदम  पर क्‍या सही मायनों में इस आजादी की आंच हमारे सुदूर गांवों , कस्‍बों या दूर दराज के छोटे छोटे कस्‍बों में भी उतनी ही धमक से पहुंच पा रही हैं। क्‍या एक आजाद , स्‍वायत्‍त मनुष्‍य की तरह अपना फैसला खुद लेकर मजबूती से आगे बढ़ने की हिम्‍मत हैं उसमें ? उसके मूलभूत अधिकार व आत्‍म निर्णय की पराधीन स्थितियां तो जस की तस है । पुरूष वर्चस्‍ववाद से जूझकर अपने जीवन की चुनौतियों से खुद निबटने का बूता उसके अंदर आता है तभी वे बदले सामाजिक , राजनैतिक व आर्थिक मार्चे पर पूरी निडरता व निधड़कता से स्‍वत्‍व की जमीन पर पैर टेक पाएंगी ।

आधुनिकता की चपेट में बढ़ते पूंजीवाद और विश्‍व स्‍तर पर फैल रहे बाजारवाद ने  स्‍त्री जीवन को चारों तरफ से प्रभावित किया और एक विभ्रम की स्थिति पैदा कर दी जिससे ऐसा आभास होता है कि इस रास्‍ते वे ज्‍यादा आजाद हुईं हैं लेकिन यह बड़ा अंतर्विरोध है कि स्‍त्री आजादी के नाम पर वहां एक बहुत बड़ी साजिश रची गईं यानी उन्‍मुक्‍त यौनाचार वनाम दैहिक स्‍वतंत्रता के नाम पर वे धीरे धीरे पुरूष की भोगवादी लालसा का शिकार होती गईं। कहां कम हुआ इससे पुरूष वर्चस्‍ववाद ? सजग , सचेत व आत्‍मनिर्णय से लैस तेजस्‍वी  स्‍त्री क्‍या यही थी ? स्‍त्री की स्‍वतंत्र गरिमा , उसकी सामाजिक सक्रियता व सरोकारों वाली भूमिका क्‍या समग्रता में हमारे सामने आ पाई है , पूरी तरह तो ये सच नही है । बाजारवाद एवं बढ़ते भौतिकतावाद की चपेट में स्‍त्री की सामाजिक हैसियत या मानसिक धरातल पर कहीं कुछ बदलाव नजर आता है ? क्‍या आज वह अपने बूते अपनी पसंद के करियर का चुनाव कर , अपनी पसंद के साथी के साथ अपनी मर्जी से रहने या सिंगल जीवन बिताने का या स्‍वतंत्रता कायम करने की रहा पर चलने में सक्षम हो पायी है ? शायद नही ,  आए दिन होने वाले मर्डर इस बात के गवाह है कि , आज भी वे अपनी मर्जी से जीवन जीने का जोखिम उठाएंगी तो पुरूष सत्‍ता उनकी हत्‍या कर सकती है ।

बेशक समाज बदल रहा है मगर यथार्थ की परतें कितनी बहुआयामी व जटिल हैं जिन्‍हें भेदकर अंदरूनी सचाई तक पहुंच पाना आसान नही। आज के इस रंगीन समय में नई बढ़ती चुनौतियों से टकराती स्‍त्री की क्रान्तिकारी आवाजें हम सबको सुनाई दे रही हैं मगर यही कमाऊ स्‍त्री जब समान अधिकार और परिवार में लोकतंत्र की अनिवार्यता पर बहस करती य सही मायनों में लोकतंत्र लाना चाहती तो वहां इस बदलाव की राह में तमाम पगबाधाएं मसलन-  धर्म , भारतीय संस्‍कृति , समर्पण , सहनशीलता , नैतिकता या यौनशुचिता जैसे सामंती मूल्‍य ही उसकी स्‍वीकार्यता की कुंजी बनते रहे। जहां आधिपत्‍य , दमन और अवमानना के इस समूचे पितृसत्‍तात्‍मक मूल्‍य व्‍यवहार से टकराती आजाद देश की नई स्‍वतंत्र स्‍त्री को लगता था कि चलो , अब कामकाजी माहौल में वे आत्‍मसम्‍मान और व्‍यक्तित्‍व की आत्‍मपर्याप्‍तता को मिले स्‍पेस के चलते स्‍त्री स्‍वाधीनता का भरपूर लुत्‍फ उठाएंगी मगर आज के बाजारवाद द्वारा परोसी गई स्‍त्री छवियों ने हमारे सामने सुंदर स्‍त्री के नकली चेहरे कौंध जाते हैं जिन्‍हें देखकर तमाम सवाल तेजी से बेचैन करने लगते। आखिर ऐसा क्‍या हैं इनमें ? अपेक्षित दृष्टि सम्‍पन्‍नता  , प्रचुर आत्‍मविश्‍वास या आत्‍मबल से भरी पूरी अस्मिता के नए निशान लगाती आधी दुनियां हैं क्‍या यहां ? नही , कतई नही। जब भी वह अपने लिए मुकम्‍मल स्‍पेस या बाजिब हक की बात छेड़ती , उसे पुरूष विद्रोही या घर तोड़ू जैसे अनर्गल आरोपों से मढ़कर उसका मनोबल तोड़कर आगे बढ़ने से हतोत्‍साहित किया जाता है जब कि ये पूर्वाग्रही सोच सिर से निर्मूल या आधारहीन है।

समकालीन लेखिकाओं ने पुरूष वर्चस्‍ववाद के खिलाफ परंपरागत रूढि़यों व टिपिकल मर्दवादी मानसिकता को तोड़ने का रचनात्‍मक साहस दिखाया। उन्‍हेांने पुरूष संरचना व पुरूष द्वारा गढ़े एक तरफा मूल्‍येां व मान्‍यताओं को सिरे से नकारते हुए स्‍त्री जीवन को सर्वथा नए कोण से रचा व सालों से दबाई उसकी आवाज को उसी की जुबान में शब्‍द मिले , नई भाषा मिली और नया लोकतांत्रिक  नजरिया भी जिसमें उनकी कठपुतली वाली नकली छवि को पूरी ताकत से तोड़ा गया ।  प्रेम , विवाह व करियर के बीच संघर्ष करती स्‍त्री की एक नयी जीवंत तस्‍वीर सामने आई और स्‍त्री मुक्ति को नयी दिशा मिली ।

घर से बाहर निकल कमाऊ स्‍त्री को आसान आजाद औरत समझ उसे हथियाने के लिए पितृसत्‍ता ने तमाम हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए। लोभ लालच के वशीभूत करने की साजिशें रची गयी या भावात्‍मक दोहन के जाल बिछाए गए जिसे बखूबी उजागर करने के लिए लेखिकाओं की एक नई जमात उभरकर आयीं –सशक्‍त कथा लेखिकाओं ने सक्रिय स्‍त्री के प्रतिरोध को व्‍यापक संदर्भो में मुखरित किया जिसमें उसकी सामाजिक , आर्थिक व राजनैतिक हैसियत को आंकते हुए उसकी त्रासदी के जिम्मेदार कारकों की सघन पड़ताल की गयी कि वे अब अपनी तरह से सोचने लगीं हैं व तमाम चुनौतियेां से निबटने में सक्षम हैं । बेशक इस प्रक्रिया में कई वर्जनाएं टूटी मगर उस पर लादे गए अनावश्‍यक दबाव भी कमतर होते गए। जिस तरह से उसकी पारिवारिक परिवेश ने सालों तक उसकी मानसिकता को आक्रांत कर रखा था , धीरे धीरे अब वे अपने हकों से वाकिफ होती गई। अपने सपनों व निजी आकांक्षाओं को गतिशीलता से आगे बढ़ाती आज की स्‍त्री पूरी विविधता व समग्रता से अपना आकाश तलाशना सीख रही हैं। क्रमश: आजाद देश  की स्त्रियां आईटी , सेना , एअरफोर्स , चिकित्‍सा , इंजीनियरिंग , वैज्ञानिक , बैंकर , विश्‍वविद्यालय में प्रोफेसर , पुलिस अधिकारी या समाज सुधारक आदि न जाने किन किन भूमिकाओं में कामयाबी के शिखर छू रही हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नही जहां आज की महिलाओं ने अपनी छाप न छोडी हो। कह सकते हैं कि आधी नही , पूरी दुनियां हमारी हैं। सारा आकाश हमारा हैं। कितनी संभावनाओं से लैस है आज की महिला मगर कितनी जकड़बंदियां भी जिन्‍हें उसे सिरे से नकारना होगा । अपनी संभावनाओं के प्रति सचेत रहकर ही वह इस परिवार या समाज व्‍यवस्‍था में अपना बहुमूल्‍य वैचारिक व अन्‍य तरी‍के से सशक्‍त व सार्थक योगदान देकर अपनी जगह बना सकती है ।

सच तो ये है कि आधुनिक स्‍त्री की स्‍वाधीन छवि के प्रति समाज / परिवार अभी भी पूरी तरह तैयार नजर नही आते मगर हां , उपभोक्‍ता संस्‍कृति उसे प्रयोज्‍य वस्‍तु की तरह जरूर इस्‍तेमाल करने से नही हिचक रही। सच बताएं तो इस ऊपरी चकाचौंध के पीछे की तस्‍वीरें इतनी कुरूप हैं , इतनी भयावह और वितृष्‍णा जगाने वाली हैं जहां आज भी अखबार ऐसी जघन्‍य बलात्‍कार की घटनाओं से रंगे रहते। सच है कि आए दिन अखबार महिलाओं के प्रति अपराधों से भरे रहते। फिर ये कैसी आजादी ? क्‍या वाकई लोकतंत्र नजर आता है ? चारों तरफ स्‍त्री को लेकर होने वाले अपराधों की खबरें ही खबरें , हत्‍या से आत्‍महत्‍या तक , घर की गली से अगले मोड़ तक , मोड़ों से आगे मिलती लंबी सड़क से राष्‍ट्रीय राजमार्ग तक , सब तरफ बैठे हैं गिद्ध ही गिद्ध , बेहद हिंसक , गैर जिम्‍मेदार , क्रूर एवं प्रभुता के मद में चूर , उन्‍हें अपनी पशुता का अहसास तक नही , मलाल तो दूर की बात हैं , जो अपनी प्रेमिका को पाने की खातिर अपनी मरती हुई पत्‍नी की चीखें सुनना चाहता हैं , ओफ . . सच तो ये है कि महिलाओं के प्रति पुरूषों की सोच इतनी घटिया , संकरी , इकहरी  और पूर्वाग्रही है कि आज भी उनका हंसना , बोलना या अकेले अपनी मर्जी से घूमना फिरना सवालों के घेरे में। आए दिन गैंग रेप की हिंसक वारदातें , स्‍त्री प्रताड़ना के दिल दहलाने वाले खौफनाक सच्‍चे कारनामे इस सभ्‍य सुसंस्‍कृत समाज के माथे पर कलंक का टीका है जो हमारे लोकतंत्र व न्‍यायव्‍यवस्‍था को कटघरे में खड़ा कर देता है।  . ।  प्रेम , विवाह व करियर के बीच संघर्ष करती स्‍त्री को उसका वाजिब हक कब और कैसे मिलेगा , आज भी एक ज्‍वलंत सवाल है।

कई भूमिकाओं का कुशलतापूर्वक निर्वहन करती स्‍त्री पूरे दम खम के साथ आत्‍मविश्‍वास की जलती लौ के सहारे न जाने कितनी पीढि़यों को ऊर्जस्वित रखती आई हैं। आज के बहुआयामी यथार्थ की देहरी पर उसके जीवंत व तेजस्‍वी व्‍यक्तित्‍तव की दस्‍तक सुनाई देने लगी हैं जहां वह अपनी सोच को पर्याप्‍त आधार देते हुए परिवार व समाज में बहुमुखी प्रतिभा की छाप छोड़ने लगी हैं सो अब उसे और ज्‍यादा दरकिनार कर हाशिए पर नही ठेला जा सकता।

स्‍त्री की सच्‍ची स्‍वाधीनता का अहसास तभी हो पाएगा जब वह आजाद मनुष्‍य की तरह भीतरी आजादी को महसूस करे , तभी सही मायनों में वह एक खुदमुख्‍तार मजबूत इंसान की तरह समाज की मुख्‍य धारा में अपनी सशक्‍त भूमिका निभा पाएगी। न , केवल आर्थिक आजादी सही मायनों में आजादी का पर्याय नही बल्कि सामाजिक , राजनैतिक परिप्रेक्ष्‍य में उसकी ठोस भागीदारी एवं मनुष्‍यता के समान अधिकारों से लैस समानता चाहिए , संरक्षण नही ।

रजनी गुप्‍त

मेरे भीतर की स्‍त्री

मेरे भीतर की स्‍त्री

मेरे भीतर का संसार , हमारी अंदरूनी दुनियां का हाहाकार , सालों से दबायी  आवाजों का हलाहल और अनकहे शब्‍दों का भयावह कोलाहल जैसे खुद से अनवरत लड़ाई चल रही हो जिसमें एक तरफ थी मैं और दूसरी तरफ मेरे अपने यानी पितृसत्‍तानुमा प्रतिपक्ष के बेतुके सवाल , तर्को वनाम कुतर्को के बीच एकपक्षीय हमले और उनमें उलझती प्रतिकार करती स्‍त्री को बाहर निकलने का कोई रास्‍ता ही नही सूझता था । जब समूची पितृसत्‍ता की पारिवारिक संरचना द्वारा प्रदत्‍त अमोघ हथियारों से निहत्‍थी स्‍त्री बेधी जाए और आर्थिक मोर्चे पर असहाय स्‍त्री पितृसत्‍ता के वर्चस्‍व तले दोयम दर्जे की साबित कर दी जाए , ऐसे एकपक्षीय माहौल में स्‍त्री अपने भीतर के स्‍पेस को लगातार सुदीर्घ करती जाती है । पितृसत्‍ता द्वारा चली साजिशों और उसे धर्म , परंपराओं की परिपाटी में जबरन बांधने के ऐसे बेतुके हथकंडों से उसे घेरने की चालें चली जाएं कि वह देखते ही देखते मूक असहाय सी बेपनाह सन्‍नाटों में खुद को घिरा पाती है जिसके चारों तरफ दीवारें ही दीवारें हों और वह एक ऐसे अलक्षित कटघरे में कैद कर दी गयी हो जिसे उसके सिवाए कोई और नजर ही न आए तब बेबस औरत चुप रहने के सिवाए करे तो क्‍या करे  ।

ऐसी शाब्दिक या मानसिक हिंसा के सैकड़ों सवाल उसके कंठ तक आते हैं मगर जिसे गरल समझ अंदर ही अंदर गुटकने के लिए मजबूर है वह । आखिर किस मुंह से वह अपनी उस वेदना , उस घुटन को शब्‍द दे जिसके बोलने भर से पितृसत्‍ता की चूलें हिल जाएं । धीरे धीरे वह अपने भीतर रचती जाती है एकांत का विशाल आकाश , जहां मंडराते हैं चुप्प्‍िायों के धूसर धूमिल बादल , जहां कभी कभार नजर आते हैं क्षणिक इंद्रधनुषी रंगों का सौंदर्य । उस सपाट सूने आसमान में पूरी निधड़ता से दौड़ती हांफती वह अपने एकांत में रचती रहती अपने अधूरे सपनों को । उधेड़ते बुनते सपनों के उसके संसार में भूले भटके भी सेंध नही मार सकता कोई । यूं ही सालों से बूंद बूंद भरते हैं दुख के बादल जो अनायास उमड़ते घुमड़़ते शेार मचाते हुए अंततोगत्‍वा वेग से फट पड़ते हैं और ऐसे ही तबाही मच जाती है समूची पारिवारिक समाज व्‍यवस्‍था की चूलें हिल जाती हैं , दरक जाती है सहन करने वाली धरती और टूट जाते हैं पहाड़ । चारों तरफ प्रलय के प्रचंड तांडव देखकर बाकी औरतें डरी सहमी चुप रहने में ही अपनी भलाई समझने लगतीं । आखिर कौन इतना बवंडर झेल पाएगा । इतना दबाव , ऐसी तबाही जिसके खौफ से वे बौखला जाती हैं और पहन लेती हैं चुप्‍पी का ताला । बूंद बूंद इकट्ठा आंसू बादल बनकर छलक पड़ते हैं धरा पर , अपने ही असहनीय बोझ से आक्रांत बादल अक्‍सर बरसकर दिलों को राहत पहुंचाने में लगे रहते ।

अपने भीतर की स्‍त्री केा टटोलने बैठूं तो बचपन के कुछ वाकये हू ब हू स्‍मृति में टंके रहते – इसे कोएड में मत पढ़ाना । वहां के लड़के कमेंट करते हैं जिसे मैं बर्दाशत नही कर सकता । ‘ भाई की हां में हां मिलाते चाचाजी कहने लगते – हां, बस इतना पढ़ा दो जिससे अच्‍छा लड़का मिल जाए। मन मारकर चुप साथ लेती मगर डॉक्‍टर बनने का सपना चकनाचूर हो गया। हालात बद से बदतर होते गए कि अचानक एक अंधेरी काली रात पिताजी की निर्मम हत्‍या कर दी गयी और आधी रात को मां पिता को लेकर चिरगांव आई ताकि किसी अच्‍छे डॉक्‍टर से इलाज हो सके मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक किशोर बच्‍ची के हाथ खाली, दिमाग शून्‍य और परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल कि वह अपने पांव तले की जमीन ही बचा ले, यही बहुत था यानी किसी तरह बीए एमए कर ले, यही बहुत बड़ी बात थी। वह नया आकाश रचना चाहती थी मगर कैसे ?

 

मां सब बच्‍चों संग गांव छोड़कर कस्‍बे चिरगांव में रहने आ गयीं जहां रहकर भाई डॉक्‍टरी पढ़ने इलाहाबाद निकल गए और अपने अधूरे सपनों संग मैं वहीं रह गयी । वह लडकी अपने सपनों को नया मोड़ देकर कुछ लीक से हटकर ऐसी दुनियां रच डालना चाहती है जो अलहदा हो पर कैसे, नही पता। 16 , नही समझ पाती । साल की लड़की की सोच तो साफ है कि उसे खूब पढ़कर उड़ान भरने लायक ताकत संजोनी है और वह तभी होगा जब वह बीए एमए प्रथम श्रेणी में पास करे । सपने

हम जैसा सोचते है या जैसी योजनाएं बनाते हैं , कुदरत उन्‍हें जस का तस कहां रहने देता ? सच तो ये है कि जीवन किसी के हांके कभी नही चलता । डकैती के दौरान पिताजी की निर्मम हत्‍या ने समूचे परिवार को तहस नहस कर दिया और अंतरतम के नाजुक तंतु क्षत विक्षत हो गए। पिताजी की यादों का रेला उमड़कर आता और फिर देर तक छत पर अकेले बैठे बैठे काले बादलों के बीच पिताजी को तलाशा करती , उम्र लगभग 13 साल । पिता की तस्‍वीर के साथ संवाद करती वो लड़की। कैसी तो विकलता थी जो छूटती ही नही थी। कैसे विकट हालात थे कि एक हाथ में पिताजी की तस्‍वीरें तो दूसरे में किताबें जिनके जरिए अपने सपने रोपकर मुकम्‍मल फसल तैयार जो करनी थी।

10 वीं बोर्ड के पेपर्स ऐसे ही दे दिए , न वैसा जोश , न वैसी मुकम्‍मल तैयारी मगर नतीजा देखकर भैया को ताज्‍जुब हुआ। एडमिट कार्ड से रोलनंबर देखकर ही वे मेरे प्रथम श्रेणी से पास होने पर यकीन कर पाए मगर इस नतीजे ने मुझे इतना आत्‍मविश्‍वास जरूर दिया कि जब ऐसे चलताऊ ढंग से पढ़ने से फर्स्‍ट आ सकती है सो अब कायदे से पढ़ेंगे और जिंदगी को नया आयाम देंगे मगर अफसोस कि हमारे चिरगांव में तब गर्ल्‍स इंटर कॉलेज था नही सो आगे की पढ़ाई व्‍यक्तिगत छात्रा के रूप में ही करनी पड़ी 1 एक ग्रन्थि खुलती तो ऐन मौके पर दूसरी तैयार हो जाती। अपनी रचनात्‍मक यात्रा की शुरूआती बीज तो 10 वीं के बाद शुरू हो गए थे जब भाई संग हमने एक साथ दैनिक जागरण झांसी के अखबार के बालमंडल पेज पर चंद तुकांत देशभक्त्‍ि! पूर्ण कविताएं लिख भेजी जो छपी तो लिखकर छपने की ललक भी बढी और हौसला भी।

कुछ लोगों ने मेरे घर पर शिकायत कर डाली कि भले घर की लड़कियों का नाम अखबार में नही आना चाहिए एवं उनकी शादी करवा देनी चाहिए। तब शादी के प्रसंग पर मुझे स्‍टैंड लेना पड़ा- जब तक अपने पैरों खड़ी न हो जाऊं, शादी नही करवाएंगे, चाहे जो हो जाए। संयोग सुंदर बन गया कि मेरी सहपाठी कविता ने एक अखबार की कतरन दिखाई और इस तरह शुरू हो गया मेरा जेएनयू जाने का सिलसिला। सचमुच , ये मेरे जीवन के सुंदरतम पल है , खूब संजाकर रखने लायक जहां जीने का भरपूर आजादी थी , मनचाहा कुछ भी करने की या अपनी मर्जी से जीने का अनूठा सुख , दोस्‍तों संग झेलम लॉन में चलती गप्‍पें व ठहाकों के असंख्‍य दौर । जीवन रस के अनगिनत रंध्र एक साथ खुल गए हों जैसे और

ठहाकों के असंख्‍य दौर चलते झेलम लॉन में और इतने लोकतांत्रिक परिवेश में जीवन जीने की कला सीखी। वरिष्‍ठ आलोचक मैनेजर पांडेय, कविवर केदारनाथ सिंह एवं प्रोफेसर नामवरसिंह से सीखा, समझा गुना साहित्‍य का क ख ग। जब भी नामवरसिंह जैसे गुरू से कुछ पूछने जाती, वे तत्‍काल कुछ किताबें बता देते- तुम्‍हें नेट का पैसा मिलता है, जाओ और ये सारी किताबें खरीदकर पढ़ो।

पिता से यतकिंचित मिली मुझे संवेदनशीलता , उदारता , सरलता या सहजता मगर व्‍यावहारिकता में चतुर , चालबाज दुनियां से निबटने में कुशल बेहद कर्मठ मेरी खुदमुख्‍तार और जीवटता की धनी मेरी मां को वक्‍त ने खूब बार बार पटखनी दी , ऐसी निर्मम जानलेवा मार दी कि धीरे धीरे उनके भीतर से संवेदनशीलता का क्षरण होता गया। अपने कलेजे के टुकड़े की सड़क दुर्घटना में दारूण मैात के हादसे ने उन्‍हें तोड़कर रख दिया। फिर एक के बाद दूसरे असहनीय हादसों से उनकी संघर्षशीलता , यातनाएं , हताशाएं ओर दुखों से अनवरत लड़ते देख मेरा मन अफसोस से भर जाता मगर फिर भी उन हालातों में उन्‍होंने हमें कभी कोई कमी का अहसास नही होने दिया , मां के सिर पर जिम्‍मेदारियों का बोझ बढ़ता ही जा रहा था , मगर अपने कर्त्‍तव्‍य निर्वहन में कभी पीठ नही दिखाई। धूप भरे आकाश तले तमाम वंचनाओं या अवमानना झेलती रहीं वे मगर अपनी इस अनवरत लड़ाई में कभी हार नही मानतीं वे , न ही कभी दयनीयता का भाव ही उनमें नजर आता मगर इन दुर्भाग्‍यपूर्ण निर्मम वज्रपातों ने उन्‍हें निर्मोही जरूर बना दिया। आज जीवन उन्‍हें निरर्थक -निस्‍सार लगने लगा क्‍योंकि वक्‍त ने पूरी क्रूरता से कई बार जानलेवा मानसिक प्रहार खूब किए हैं उन पर। अनवरत तकलीफें झेलने के बावजूद वे आज भी आस्तिक हैं ,भक्तिभाव से पूरी एकाग्रता से गीता पाठ करतीं , रामायण बांचती और आसपास के मंदिरों में चल रहे प्रवचनों को दत्‍तचित्‍त से सुनती। वे धीरे धीरे निरासक्‍त या निर्मोही जरूर होती जा रहीं , वापस अपनी पुरानी कस्‍बाई दुनियां की तरफ मुड़ जातीं , जहां पुरा – मुहल्‍ले की दर्जनों औरतें उनके पास किसी न किसी सलाह मशवरे के लिए आती जाती रहतीं । शायद उन्‍हीं के बीच वे चैन से रहने लायक ऊर्जा बटोर पातीं हों , मगर हां , कभी भी मेरी उदासी , निराशा या हताशा के क्षणों में वे फोन पर दो पंक्तियां जरूर दुहरा देतीं- ‘ लक्ष्‍य न ओझल होने पाए /कदम मिलाकर चल/ सफलता तेरे कदम चूमेगी /आज नही तो कल।

किताबों से इतर पढने का शौक 10 वीं से ही तेजी से बढने लगा था । उस दौर की नंदन , चंपक , चंदामामा और पराग की रूपहली सुनहरी दुनियां खूब आकृष्‍ट करने लगी। गर्मियों की छुटिटयों में यह पुस्‍तक प्रेम परवान चढता फिर आसानी से यह नशा नही उतरता। कभी जासूसी रहस्‍य भरे उपन्‍यासों की मायावी दुनियां में गोते लगाते हुए अतल समुंदर की गहराइयों में उतर जाती तो कभी बादलों संग आसमान की उंचाई तक पहुंच कल्‍पना लोक की सैर पर ऐसे निकलती फिर लौटकर आने की सुधि बुधि बिसार देती। पुस्‍तक प्रेम का यह सफर क्रमश: सामाजिक राजनैतिक उपन्‍यासों की दुनियां से होकर सामाजिक उपन्‍यासों और फिर नितांत कल्‍पना में रची बसी दुनियां की मायावी सैर भी बेहद लुभावनी लगती। बचपन से उभरता उमडता यह स्‍वत:स्‍फूर्त प्रेम ही धीरे धीरे मुझे साहित्‍य की दुनियां की तरफ खींच लाया।

विश्‍वविद्यालय परिसर में पुस्‍तकालय में बिखरी अनगिनत विषयों पर केन्द्रित सामग्री और ढेर सारी साहित्यिक किताबों को आंखों ही आंखेां में पीती रहती। फिर मंत्रमुग्‍ध तन मन से एकाग्रचित्‍त देखकर मन पुलकित और हाथ किन किताबों को पहले पकडें , बेचैन आंखें किन्‍हें जल्‍द पढकर उस अनूठे पठनीयता के सुख को महसूसें , यह याद नही मगर इतना जरूर याद है कि 1985 से 1990 का वो खूबसूरत दौर बखूबी याद है जब जेएनयू , साहित्‍य अकादमी , श्रीराम सेंटर लाइब्रेरी के साथ दिल्‍ली पब्लिक लाइब्रेरी समेत दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के पुस्‍तकालय की खाक छानती फिरी , कदम दर कदम अपने आप आगे बढते रहे , हाथ अपने आप किताबें बटोर लाते और फिर किसी भी जगह बैठक घंटों एकाग्रचित्‍त् पुस्‍तकों की विशाल दुनियां के सैर पर निकल जाती। बेशक पुस्‍तकों के जरिए मैंने सीखा , जीवन के अंधेरे पक्षों का मुकाबला करने के लिए किस तरह के आत्‍मबल को कैसे संचित किया जाए। महापुरूषों की आत्‍म कथाएं या उनके द्वारा रचित किरदार जिंदा होकर जीने की ताकत बख्‍सने लगे।

पुस्‍तकों में निहित ज्ञान का आलोक अदभुत होता है , ये किताबें ही है जो दुख के गहनतम क्षणों में हमारी उंगली पकड हमें आगे चलने को उत्‍प्रेरित करती हैं।

इधर एमए पूरा होते ही शादी की तखती टांगे घर वाले तो उधर अनायास जेएनयू में शोध हेतु विज्ञापन थमाती मेरी दोस्‍त कविता । फिर क्‍या था , लिखित परीक्षा पास करके भाई मुझे लेकर दिल्ली गये इंटरव्यू दिलाने । न जाने ये कौन सी जिद या कैसा जूनून या बेचैनी पसरी थी कि मेरे सपने मेरा हाथ थामे मुझे दिल्ली ले गए । भीतर धड़कते सपनों के भ्रूण को बस एक मौके की तलाश थी और जेएनयू में एडमीशन के बाद मेरी नयी यात्रा शुरू हुईं जहां प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करने का दवाब था तो जेआरएफ पास करना सबसे जरूरी बात ताकि घर से पैसे न मंगवाने पड़ें । आज सालों बाद पीछे मुडकर देखती हूं तो ये कितनी मामूली सी घटना लगती है पर ‘ चिरगांव से नई दिल्‍ली का सफर पहली बार कोई लडकी झांसी से आयी है , नामवर सिंह जी के कहने पर मैं खुशी से बौरा गयी थी ।

क्रमश: मेरे भीतर की दुनियां बड़ी , विशाल व सुदीर्घ होती जा रही थी । जेआरएफ क्‍वालिफाई करते ही मेरा ये अलक्षित सपना खूब तेजी से नजर आने लगा था जहां से नील गगन की ऊंचाइयां मुझे लुभाने लगी थी , जहां से हिमालय के पर्वतों को लांघकर कैसे दुर्गम रास्‍तों पर चल पड़ने के लिए खुद को तैयार कर पाती थी । स्‍त्री के इस अलक्ष्‍िात संसार में सपनों के इतने रंग , इतने विविध रूप आकार लेने लगे थे जो हर पल अपना नया चेहरा दिखाने लगते कि इसे पा लिया है तो अब इसे भी पा लो । उसी चांद तारे से झिलमिलाते आसमान में खिलने लगे थे प्रेम के अंकुर यानी जिजीविषा या जीवंतता से भरी लड़की युवावस्‍था की रंगीनियत में खोयी अपने आसपास के माहौल में जादुई बातों के भंवर में डूबी रहती । तब का झेलम लान हमारे सहपाठियों संग लंबी बहसों का अड्डा था , अंतहीन लंबे तर्क , अस्त्तित्‍ववाद , मार्क्‍सवाद व अन्‍य वादों पर तीखी बहसों ने मेरी दृष्टि को संवर्धित किया । ज्ञान पिपासु मन जिज्ञासु होता गया और इस तरह साहित्‍य की गहन अध्‍येता बनती गयी । यही वह दौर था जब धीरे धीरे जीवन में चांद खूबसूरत लगने लगा था । रातें बेहद मनोरम और दोस्‍तों संग जेएनयू का परिवेश बेहद आकर्षक । वहां की पहाडियां , टीले और वहां के हास्‍टल , लाइब्रेरी आदि का संग साथ मेरे भीतर के खालीपन को संतृप्‍त करता था ।

तब ये जमीन अंतहीन नजर आती बल्कि पूरी दुनियां का ओर छोर ही पकड में नही आता था । दिल्‍ली की सडकें नापते हुए अंदरूनी सपने बडे होने लगे तो मन का समंदर खूब फैन उगलता नित नए सिरे से अपना विस्‍तार तलाशने लगता । इस तरह का जीना , दोस्‍तों संग लंबे सफर पर निकल जाना धरती से आसमान उतार लेना जैसा लगता था  मगर यह सब कब तक चलता ? धीरे धीरे नौकरी और शादी के बाद की रूटीन जिंदगी में कुछ साल गुजारने के बाद वह विशालकाय दुनियां सीमित , संकरी और इकहरी नजर आने लगी । घर के आसपास रहतीं औरतेां में से ज्‍यादातर अपने विघटित सपनों व बुझे मन के साथ समझौतापरस्‍त जीवन जीने के गुर सिखाने लगतीं । वे कभी बच्‍चों का हवाला देकर खुद को समझातीं या परिवार संस्‍था को बचाए बनाए रखने पर जोर देती , फिर चाहे ऐसा करते हुए उन्‍हें खुद के सपनों की तिलांजलि ही क्‍यों न देनी पड़े मगर वे इसकी आदी हो चुकी थीं । उनका मन या तो रिक्त हो चुका था या उजाड़ सो वहां सपनों के घोंसले भला कैसे बनते  ? उनके विचारों , सोच या जीवन शैली में इसके अलावा विकल्‍प जैसा कोई शब्‍द ही नही बचा था । हर रात उनके सपने रौंदे जाते मगर सुबह होते ही वे अपने मन के आकाश पर अपने बनाए निजी कोने में विचरती और उसे सार्वजनिक न होने की ठान लेतीं ।

सोचो तो जरा , इस दुनियां में भला कौन होगा जिसे किसी से कभी प्रेम हुआ ही न हो  ? कैसे नही होगा  ? मगर खुद की आवाज को सालों से जबरन दबाए वे इस अहसास को परे धकेलती और धीरे धीरे इसकी आदी होतीं चलीं जातीं । अंदरूनी एकांत को जीते हुए खुद को जब कभी आइने में निहारतीं जहां उन्‍हें अपनों की याद आती मगर पितृसत्‍ता का खौफ उन पर इस कदर तारी रहता कि वे सपने तक देखना भूल चुकी थीं । अपने सपनों को खोकर उनकी आंखें सूनी नजर आतीं ।

 

आधी दुनिया की औरतें निबड एकांत में किसके साथ करेंगी बातें, किसका हाथ थामे निकल पाएंगी सुदूर दुनिया में अपने सपनों का जीने, न, ऐसी कोई उम्‍मीद नही दिखती फिर वे बच्‍चों की उंगली थाम उनके सपनों में रंग भरने लगतीं। कुछ सालों तक यह सपने जिंदा रहते पर बड़े होते ही बच्‍चे उनके सपने छोड़कर अपने सपनों को जीने लगते, तो वे अकेली पड़ जातीं और अपने पुराने राग अनुराग पर चढ़ी धूल को झाड़ना चाहती मगर बुझे मन से फिर से नेह का दीया नही जल पाता।

मगर बुझे मन से फिर से नेह का दीया नही जल पाता । अफसोस कि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । हममें से ज्‍यादातर औरतें ऐसी भी हैं जो अपने जिद व जुनून को ताक पर रखकर दी गयी जिंदगी जीने की आदी होती जातीं मगर खुद से एकालाप करती स्‍त्री जब तक खुद को किसी कला , संगीत या मन की सपनीली सुनहरी खिडकी से नही जोड लेती जहां वह अपने जीने लायक आसमान को देखकर चांद की एक झलक के लिए बौरा जाए , तब तक जीना बोझ जैसा लगेगा ।

मैं हर रोज अपनी खिडकी खोलकर बाहर का खुला आसमान देखती हूं , सपनेां में हर रोज कोई चिडियां आती है

हर रोज कोई चिडि़यां कानों में आकर मधुर राग घोलते हुए पूरी ताकत से कहना चाहती है, मुट्ठी में भर लो शानदार लम्‍हे, क्‍यों कि यह भी किसी न किसी रोज सिमटने वाली है। ये लम्‍हे कंठ में पुकार लिए वह चिडि़यां फिर किसी और को दस्‍तक देने कहीं और निकल जाएगी। पर मैं अपने सुख दुख को शब्‍द देने के लिए लपककर पकड़ लेती हूं कलम, उतरते हैं शब्‍द दर शब्‍द पन्‍नों पर और रचती जाती हूं एक समानांतर दुनिया जिसकी तलाश में निकल पड़ती हूं रोज, आकाश, नदी, उपवन, जंगल और कंटीली खुरदुरी राहों पर। पकड़ती हूं खुद को, अछोर समंदर के पानी में हाथ डालकर थाह लेती हूं अपने वजूद की, और भीतर बसे अथाह पानी से भिगो देती हूं सूखी जमीन को। बादलों पर सवार होकर निकल पड़ती हूं घाटियों तक अविराम यात्रा पर, करती हूं असीम आकाश से खत्‍म न होने वाली ढेर सारी बातें, और खुद को पानी बनाकर भर जाती हूं खुशी से जिसकी महक से आप्‍लावित रहता है मेरा मन संसार।

तो यही है मेरे अंदर की स्‍त्री जो चाहती है कि वह बार बार निश्‍छल प्रेम में पड़े , निष्‍कंप लौ के जरिए अपने आसपास के अज्ञान के अंधेरे संसार को रॉशन करे , गढे एक निस्‍वार्थ दुनियां जहां हर स्त्री पुरूष समकक्ष हो ,  लोकतांत्रिक चेतना से लैस हो , समान अधि‍कारों की दुनियां में विचरती रहूं ,  छल कपट से परे मासूम प्रेम के जादू में डूबी रहूं और इस धरा पर मानवता की खूबसूरत मिसाल कायम करूं । अपने जीने को नया अर्थ दे सकूं , एक नयी मुहिम चला सकूं जहां सर्वधर्म समभाव व विश्‍वबंधुत्‍व की धुनें गूंजतीं हों । जहां पितृसत्‍ता जैसी किसी भी एकाधिकारवादी सत्‍ता का वर्चस्‍व न हो बल्कि स्‍त्री होने का गर्व , स्‍वाभिमान व अस्मिता पर गुमान कर सकूं । जहां रोक टोक , प्रभुता या एकाधिकार के मद में चूर पुरूषसत्‍ता दूर दूर तक नजर न आए , जहां स्‍त्री होने के प्रति मान सम्‍मान हो या अपने को बेहतर मनुष्‍य होने की तरफ कदम दर कदम बढा सकूं ।

तब यह मायवी बादलों से भरा रंगीन आसमान कितना स्‍वच्‍छ , कितना निर्मल कितना भव्‍य लगेगा । तब तो विविधता से भरे भांति भांति के जीव जंतुओं से भरा जंगल लुभावना नजर आएगा और अपने भीतर की विराट दुनियां को समाए मन का समंदर कितनी सारी विषमताओं के बावजूद मोहक लगेगा । नवसृजन के आलोक में नवल रागों से अनुराग के निश्‍छल स्‍नेह की अजस्र धारा में भींगते युगल , सपनों की दुनियां को साकार करते स्‍त्री पुरूष व बच्‍चे । वाकई , अपने जिद और जुनून के जरिए हासिल होती है मनचाही मंजिल और ये मंजिल बेहद खूबसूरत होगी , एक भरी पूरी दुनियां , भेदभाव से परे , प्रेम से नवसृजन की तरफ कदम बढाते हुए हम अंदरूनी खूबसूरती के नए वितान को बुनने में कामयाब होंगे ।

यही सपना है मेरा

और यह है मेरे भीतर बैठी स्‍त्री की आवाज

क्रमशः जारी

रजनी गुप्‍त

 

सबकी जमीन बचाने की लड़ाई मैं जीती -अपनी लड़ाई हार गई…

आज 25 दिसंबर 2022
सबकी जमीन बचाने की लड़ाई मैं जीती -अपनी लड़ाई हार गई…

मन मानने को तैयार ही नहीं हो रहा है की मैं अपने आशियाना को टूटने से बचा नहीं पाई। सभी सामाजिक लड़ाई जीतते रही, सबका जमीन, घर -द्वार बचाने में कामयाब रहीं, लेकिन मेरा आर्थिक रीढ़, मेरी चाय की दूकान की 3फिट जमीन को बचाने में बिफल रही।

1996 से सामाजिक न्याय की संघर्ष के रास्ते चलते रोजी रोजगार के लिए रांची के क्लब रोड़ में चाय नाश्ता की दूकान शुरु की। चाय दुकान चलाते बहुत उतार चढ़ाव देखे। चाय दुकान के साथ हमारी सफर 25 वर्ष पूरी हुईं। इन 25 वर्षो में सामाजिक न्याय के संघर्ष के यही मेरा आर्थिक आधार था। हमारे साथ समाज को जिंदगी यांही से मिली।।

आज मन उदास है, आगे नगर निगम पीछे सरकार।जीईल मिशन ने 9/15 फिट की जमीन मेरे पाती के नाम लीज में दी थी। इसके पीछे करीब 4 फिट जमीन पर दूकान का किचन था। आज इस किचन को सरकार हटाने के लिए मजबूर कर दिया। छत टूटा …मेरा मन टूटा .. सब लड़ाई मैने जीता, अपनी लड़ाई हार गई…
मेरे साथ सीधे तौर पर 10 परिवार बेरोजगार होगा.. बाकी मेरे पास शब्द नहीं…

वो दिन ताजा होता जा रहा है जब मेरे परिवार के हाथ से जमीन तकतवारों ने छीना था, जमीन वापसी का केस लड़ते मेरा परिवार कंगाल हो गया था। तब गांव से पलायन कर रांची पहुंचे थे। आगे और क्या होने वाला है… अब तो मन पत्थर हो चूका है….

राहुल की यात्रा क्या राजनीति का स्त्रीकरण कर रही है?

संजीव चंदन

महात्मा गांधी ने भारत में पहली बार राजनीति का स्त्रीकरण किया।  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गांधी के 2015 में भारत लौटने से  पहले भी स्त्रियां थीं, लेकिन उनकी संख्या बेहद नगण्य थी और उनमें से ज्यादातर उच्च वर्ग की महिलायें थीं।  ऐसा भी नहीं था कि उच्च वर्ग की इन महिलाओं कोई योगदान नहीं किया अपने बाद की पीढ़ी के लिए राजनीतिक स्पेस तैयार करने में। वे बेहद प्रतिभा सम्पन्न महिलाएं थीं।  उन्होंने महिलाओं की शिक्षा के पक्ष में प्रयास किये और  महिलाओं का मताधिकार पाने में इन्होने सफलता पायी थी। मताधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार।

राजनीति में महिलाओं के लिए व्यापक स्पेस, माहौल बनाने में महात्मा गांधी के राजनीतिक सिद्धांत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।  गांधी जब भारत में सक्रिय नहीं हुए थे तभी रवींद्रनाथ टैगोर का उपन्यास 1916 में आया था ‘घरे/ बाइयरे’।

उपन्यास की नायिका बिमला घर के चौखटे से बाहर आकर स्वदेशी आंदोलन में हिस्सा लेती है। बंगाली महिलाओं ने उपनिवेश विरोधी सशस्त्र आंदोलनों में हिस्सा लिया था, लेकिन बिमला ने अहिंसक प्रतिरोध का रास्ता चुना। राजनीति का अहिंसक वातावरण महिलाओं के अनुकूल होता है। गांधी ने अहिंसा, सत्याग्रह को राजनीतिक मूल्य बनाकर राजनीति को घरेलू  महिलाओं के लिए भी अनुकूल किया। जिसके बाद सामान्य घरों से भी महिलाएं  राजनीति में भागीदार हुईं। घर के चौखटे से बाहर निकलीं।  इसे राजनीति के स्त्रीकरण की तरह देखा गया।

लगभग सौ साल बाद फिर से महिलाएं, युवा, बुजुर्ग, हर समूह से राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हैं। यह उस वक्त हो रहा है जब लोकसभा में आज अधिकतम 14 % महिलाएं हैं।।  यह उस वक्त हो रहा है जब लोकसभा में आज अधिकतम 14 % महिलाएं हैं।  कई राज्यों की विधानसभाओं में वह प्रतिशत और भी कम है। यह ऐसे समय में भी हो रहा है जब राजनीति को घिनौना, हिंसक, भ्रष्ट रूप में देखा जा रहा है। इसलिए, महिलाओं के लिए भारत जोड़ो यात्रा में चलने वाले ज्यादातर पुरुषों के साथ शामिल होना महत्वपूर्ण है, हालांकि 30 प्रतिशत महिलाएं इस यात्रा में शामिल बतायी जाती हैं।

राहुल गांधी के बारे में जो ख़बरें यात्रा से आ रही हैं या जो तस्वीरें बाहर आ रही हैं, उनका असर भारतीय राजनीति पर व्यापक होने वाला है।  बशर्ते राहुल एक राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इस दिशा में काम करते हैं।  फिलहाल तो इन तस्वीरों से राजनीतिक स्पेस और भाषा के स्त्रीकरण की दूसरी परिघटना घट रही है भारतीय राजनीति में ऐसे में राजनीतिक स्पेस का स्त्रीकरण एक महत्वपूर्ण परिघटना होगी।  सबसे ज्यादा जरूरी है महिलाओं के लिए अनुकूल वातावरण हो राजनीति में।

मुंबई की क्वैर राइट्स एक्टिविस्ट और क्वैर स्त्रीवाद की प्रवक्ता चयनिका शाह कहती हैं कि राहुल गांधी के साथ भावुक रूप से मिलती स्त्रियों की आती तस्वीरों के बीच मैंने इन मिलन के वीडियो 15-15 मिनट तक देखे हैं। महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है टच की भाषा।  वे गुड टच-बैड टच को समझती हैं।  राहुल बेहद संवेदनशील ढंग से मिल रहे हैं।  महिलाऐं उनसे गले लगाकर सहज हैं।  इसलिए और और महिलाऐं उनसे इसी तरह मिल रही हैं।

 

 

 

चयनिका शाह का यह कथन बेहद महत्वपूर्ण है। उनकी गवाही कर्नाटक में एक दिन यात्रा में शामिल हो चुकीं पत्रकार मनोरमा की भी है।  ऐसे माहौल में जब राजनीति में मर्दवाद बेहद अहम हो चुका है।  56 इंच की भाषा हो या ‘गाय-बछड़े’ की भाषा, महिलाओं को असहज महसूस कराती हैं।  पीएम ने गाय-बछड़े का रूपक सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लिए दिया था।  संसद में उन्मुक्त हंसी हंसने वाली रेणुका चौधरी की हंसी का समवेत मजाक उडाने में प्रधानमंत्री भी शामिल रहे। वर्तमान केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण के सवाल को ही कुंद कर दिया है।

प्रधानमंत्री एक ओर तो लाल किले से महिलाओं के सम्मान का आह्वान करते हैं और दूसरी ओर उनका गृह मंत्रालय बिलकिस बानो के  सामूहिक बलात्कारियों को छोड़ देती है।  उनकी पार्टी की सरकारों के मंत्री और नेता बलात्कार का अपराधी सिद्ध हो चुके राम-रहीम के सम्मान में खड़े होते हैं।  प्रधान मंत्री कबूतर और चीता का रूपक खड़ा करते हुए खुद को चीता छोड़ने वाले गर्वीले भाव में पेश करते हैं।   ऐसे में राहुल गांधी से जुडी ऐसी ख़बरें, उनके बारे में ये टिप्पणियां आश्वस्त करती हैं।  राजनीतिक माहौल को महिलाओं के अनुकूल बनाना ही तो राजनीति का स्त्रीकरण कहा जाता है।

राहुल गांधी द्वारा स्त्रीकरण का यह संकेत तबतक अधूरा है, जबतक इसे ठोस पहल में न बदल दिया जाए।  घरे-बाइरे की विमला गांधी के आने के बाद 1930 के दांडी यात्री और 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन तक एक से अनेक हो गयीं। लेकिन  जल्द ही उनकी संख्या सीमित होती गयी।  कुछ सक्रिय राजनीति में रहीं, कुछ रचनात्मक कार्यों में लग गयीं।  यानी गांधी ने घर के चौखटे का ही विस्तार कर दिया था, बाहर अनुकूल स्थितियां नहीं बनीं महिलाओं के लिए, वह चौखट फिर  सिमट गया।  खतरा यही है।  यदि ठोस कार्यक्रम नहीं होंगे तो भारत जोड़ो यात्रा के बाद महिलाओं के लिए   बना एक सुखद अहसास वहीं थम जाएगा।

 

ठोस कार्यक्रम का अर्थ है क़ि राहुल गांधी घोषित करें कि महिलाओं के लिए आरक्षण वे कांग्रेस की सरकार बनते ही पास करवाएंगे।  सुनिश्चित करें कि महिलाओं के लिए हर संभव अनुकूल स्थितियां सुनिश्चित की जायेंगी।  राहुल गांधी को एक नैतिक आभा बनानी होगी महिलाओं के प्रसंग में।  बातों और इमेज से आगे जाकर।

हालांकि वह जमात जो गांधी जी की राजनीतिक पद्धति को कायरता मानती रही है, महिलाओं के लिए कई ठोस पहल लेने वाले नेहरू की ऐय्याश छवि गढ़ने की कोशिश करती है, वह राहुल गांधी की इन तस्वीरों के खिलाफ भी सिद्द्त से लगी है।  यह एक ऐतिहासिक रिप्लिका ही है कि अपने परिवार की एक महिला के साथ बेहद सहज तस्वीर नेहरू की भी अश्लील टिप्पणियों के साथ घुमाए जाती है और राहुल गांधी की भी घुमायी गयी।  ऐसे ही प्रोपगंडा के प्रयास में  भारतीय जानता पार्टी की  एक नेता की काफी किरकिरी हो चुकी है।

यह वह जमात है जो स्त्रियों के अनुकूल किसी भी प्रयास के खिलाफ रही  है।  इमेज के स्तर पर भी और ठोस पहलों के स्तर पर भी।  बाबा साहेब डा. अम्बेडकर  द्वारा हिन्दू कोड बिल को पास कराने के प्रयासों के खिलाफ भी यही जमात रही है।  मनुस्मृति की वकालत करने वाली यह जमात संविधान के पक्ष में भी नहीं थी।  ये कुछ ऐसी पहलें थी आजाद भारत के लिए जो स्त्रियों के लिए घर और बाहर, दोनों ही स्पेस पर अनुकूल स्थितियां बनातीं। राहुल गांधी को एक ठोस नजरिये के साथ आने की जरूरत है अन्यथा भारत जोड़ो यात्रा से आ रही खबरों, तस्वीरों और भाषा का असर एक इवेंट का बायप्रोडक्ट भर बनकर रह जायेगा, और जल्द ही अपना असर खो देगा।

 

 

 

 

क्यों अनंतपुर के पक्षियों और ग्रासलैंड के लिए खतरा हैं पवन चक्कियां

 

क्यों अनंतपुर के पक्षियों और ग्रासलैंड के लिए खतरा हैं पवन चक्कियां

( पवन चक्कियों का अनंतपुर की वनस्पति और जीवों पर प्रभाव, ग्राउंड रिपोर्ट)
मनोरमा

आंध्र प्रदेश का अनंतपुर जिला राजस्थान के जैसलमेर के बाद भारत का दूसरा सबसे शुष्क इलाका है, अल्प वर्षा और शुष्क भूमि के कारण इसे दक्षिण का रेगिस्तान कहा जा सकता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, अनंतपुर जिले की जनसंख्या 40,83 लाख है, जिले की कुल आबादी का 71.19 प्रतिशत ग्रामीण आबादी है। कुछ विशेषज्ञ  अनंतपुर जिले के  प्रागैतिहासिक अतीत को  ‘अनंतसागरम’ नाम से जोड़ते हैं, जिसका अर्थ है अंतहीन महासागर’,  आज के अनंतपुर के लिए इसे एक विडंबना ही माना जाएगा। जबकि 71.19 प्रतिशत ग्रामीण आबादी वाले आंध्र प्रदेश के इस सबसे बड़े जिले में पिछले तीन -चार सालों को छोड़ दें तो  बारिश की कमी और लगातर सिकुड़ते जलस्रोत गरीबी और पलायन की सबसे बड़ी वजहों में से एक रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक 2013 से 2018 तक अनंतपुर सूखे के चपेट में रहा और  2019 से 2022  यहाँ औसत से अत्यधिक बारिश हुई। कुल मिलाकर अनियमित बारिश खेती -किसानी को अभी भी यहाँ के लोगों के लिए रोजी -रोटी को मुश्किल बनाये हुए है।

 

बहरहाल, अनंतपुर की पहचान सिर्फ यही नहीं है, पिछले दो दशक में अनंतपुर  पवन ऊर्जा के प्रमुख केंद्र के रूप में भी उभरा है, पुरे जिले में पवन चक्कियों या विंड मिल्स का जाल बिछा हुआ है जो अनंतपुर को एक अलग भू दृश्य, पवन चक्कियों और पवन ऊर्जा के शहर में बदलता है।  रामगिरी, कदवकल्लू, वज्रकरूर, तलारीचेरवु, नालकोंडा, मुस्तिकोवेला, पेनाकचेरला कल्याणदुर्ग, उरावकोंडा, कादिरी से गुजरने पर पहाड़ों के साथं आप  विशाल पवन चक्कियों से भी होकर गुजरते हैं। आंध्रप्रदेश सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2021-22 तक राज्य की पवन ऊर्जा क्षमता , 8 गीगावाट है, फिलहाल राज्य में 4000 मेगा वाट पवन ऊर्जा उत्पादन हो रहा है जिसमें अनंतपुर का योगदान 2700  मेगा वाट है।  गेम्सा रिन्यूएबल्स, सुजलॉन एनर्जी, हरेऑन सोलर, लोंगी सिलिकॉन जैसी प्रमुख कंपनियों ने यहां  संयंत्र स्थापित किया है या कर रही हैं।

जिले में जहां भी हवा का वेग अधिक है, वहां बिजली उत्पादन के लिए पवन चक्कियां स्थापित करने के प्रयास किये गए, आमतौर पर अप्रैल से सितंबर तक अनंतपुर में  45 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलती हैं जो पवन ऊर्जा पैदा करने के लिए उपयुक्त होती हैं। इसके अलावा जिले की पहाड़ी भू संरचना भी विंड टर्बाइन के प्रभावी तरीके से काम करने के लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है। आंध्र प्रदेश के गैर-पारंपरिक ऊर्जा विकास निगम (नेडकैप) के द्वारा किये गए सर्वेक्षण में भी अनंतपुर जिले को  पवन चक्कियों की स्थापना के लिए आदर्श माना गया।

साल 2016 में आंध्र प्रदेश सरकार ने राज्य में पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए  32 उपयुक्त स्थानों  की पहचान की थी जिसमें  25 स्थान अकेले अनंतपुर में थे, बाकी सात स्थान कुरनूल, नेल्लोर, कडपा और विशाखापत्तनम जिलों में स्थित हैं। इसके कारण अनंतपुर को जिले में निवेश करने के लिए प्रमोटरों के साथ गैर-पारंपरिक ऊर्जा केंद्र का टैग भी हासिल हुआ। और  पिछले कुछ सालों के दौरान यह जिला  “विंड एनर्जी हब” के तौर पर उभरा।

 

लेकिन अनंतपुर की पवन चक्कियों वाली तस्वीर का ये एक पहलू है दूसरा पहलू पर्यावरण, बारिश, जंगल, हरियाली, जीव जंतु, पक्षी, तितलियों के अस्तित्व के गंभीर सवालों से जुड़ा है, साथ ही इन विंड टर्बाइन के साथ लगे गांवों के लोगों की सेहत उनकी खेती, जीविकोपार्जन, जमीन की कीमत और  मुआवजे से भी जुड़ा है। पिछले दो दशक में लगातार इस पर विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है और जो समय समय पर रिपोर्ट भी होती रही है कि वन और सरकारी भूमि पर पवन चक्कियां स्थापित किये जाने के कारण रायलसीमा क्षेत्र की  हरित पट्टी या जंगल बेदर्दी से नष्ट हो रहे हैं या हुए हैं, और जो कंपनियां पवन चक्की लगा रही हैं उनपर वैकल्पिक हरियाली विकसित करने की भी कोई जिम्मेदारी नहीं है या वो सिर्फ कागजी है, नेताओं, ठेकेदारों को कुछ पैसे या कमीशन देकर कागज पर हरियाली का विकास दिखा दिया जाता है। जबकि, उपयुक्त जलवायु परिस्थितियों और पवन चक्कियों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त भूमि की उपलब्धता के कारण देश विदेश की कई कंपनियों को अनंतपुर जिलों में सरकारी भूमि लीज पर विंड टरबाइन लगाने के लिए दिया गया है। इस सन्दर्भ में सम्बंधित विंड मिल कंपनियों के अधिकारियों से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन किसी भी अधिकृत अधिकारी का संपर्क मुहैया नहीं कराया जा सका जिससे कंपनियों के पक्ष के बारे में बात हो सके। जबकि एक बात बार बार दोहराई गई कि हम सरकार के निर्देश और मंजूरी के साथ काम कर रहे हैं।

 

अंनतपुर के ही टेकुलोड़ू गांव के इम्तियाज़ ने पवन चक्कियों की बात करने पर अपने कई दोस्तों के गांव का जिक्र किया जो खुद या उनका परिवार या रिश्तेदार इन विंड टर्बाइन्स के कारण प्रभावित हैं जिनसे हमने एक एक बार बात की उनके गांव जाकर। लेकिन इससे पहले वो इसे प्रसंग को अंनतपुर के इतिहास और अपने गांव के नाम से जोड़कर कहते हैं ऐसा पहली बार नहीं है, आप यकीन नहीं करेंगे अंनतपुर कभी बहुत हरा भरा इलाका हुआ करता था ऐसा उनके पिता और दादा कहते रहे हैं।  खुद उनके गांव का नाम टेकुलोड़ू  इसलिए है कि 1857 के बाद जब अंग्रेज भारत में अपना अधिपत्य स्थापित कर रहे थे तो रेलवे की शुरुआत, विकास और विस्तार हुआ, इम्तियाज़ के गांव से रेलवे के लिए पुरे इलाके से इतनी “टीक ” की लकड़ियां लादी जाती थी कि उनके गांव का नाम ही “टेकुलोड़ू ” यानी जहां टीक लोड होता है पड़ गया।

टेकुलोड़ू गांव के इम्तियाज़

इम्तियाज़ अपने पिता की ही स्मृतियों के हवाले से बताते हैं यहां के हरे भरे जंगल की लकड़ियों का अंग्रेजों ने जब वो भारत में रेल सेवा शुरू और विस्तार कर रहे थे जम का कर इस्तेमाल किया। इसके अलावा पुराने दस्तावेजों में कर्नल बेडडोम ने 1880 में इस बात का खासतौर पर जिक्र किया है कि अनंतपुर के सभी घरों के बीम देखकर कहा जा सकता है कि 30-40 साल पहले आसपास के गांव से बड़ी मात्रा में में  ठीक बीम प्राप्त किया जाता रहा है। 1880 में ही मिस्टर गैंबल ने भी दर्ज़ किया है कि उन दिनों अनंतपुर के जंगलों का सबसे बड़ा दुश्मनचूड़ी निर्माण उद्योग था। अनंतपुर में चूड़ियाँ बनाई जाने वाली

क्षारीय मिट्टी बहुतायत में पाई जाती थी। मिस्टर गैंबल लिखते हैं, इस उद्योग को बहुत अधिक ईंधन की आवश्यकता थी और ईंधन आपूर्ति आसपास के गावों के जंगलों से हो रही है, पेनुकोंडा तालुक के 14 गांव में 93 चूड़ी भट्टों से कम नहीं, जिनमें से 75 को छोड़ दिया गया और 18 काम कर रहे थे।

 

अनंतपुर में पवन चक्कियों के कारण पर्यावरण पर पड़े दुष्प्रभाव के सन्दर्भ में खोजबीन करने पर सबसे हैरान करने वाली बात इस जिले में टिम्बकटू कलेक्टिव नाम से काम कर रहे एनजीओ की इस मसले पर चुप्पी रही। टिम्बकटू कलेक्टिव ने 1992 में सीके बबलू गांगुली और मैरी वट्टमट्टम के नेतृत्व में कल्पावल्ली से लगभग 20 किलोमीटर दूर चेन्नेककोथपल्ली (सी के पल्ली) गाँव में बंजर भूमि पर ग्रामीणों के साथ संयुक्त रूप मिलकर जंगल विकसित करने और पुनर्जीवित वनों की रक्षा का काम दिया था। यह एनजीओ पिछले 30 साल से अनंतपुर में काम कर रहा है और अनंतपुर के चेननेकोथापल्ली, रोडडम और रामगिरी मंडल के तहत आने वाले  6,000 एकड़ में फैले कल्पावल्ली और आसपास के 181 गांवों में जंगल पुनर्जीवित करने साथ ही कल्पावल्ली और आसपास के गांव के   23,172 परिवारों के साथ मिलकर जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा देने का दावा करता है।  टिम्बकटू कलेक्टिव का दावा है कि अनंतपुर में इनके द्वारा कुल  9,000 एकड़  भूमि पर जिसमें  कल्पावल्ली सामुदायिक संरक्षण क्षेत्र (केसीसीए) भी आता है, में  वनों की कटाई, अतिवृष्टि, जंगल की आग, जलवायु परिवर्तन, आदि के कारण हुए नुकसान की भरपाई करने, जंगल,पारिस्थितिकी तंत्र और जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का काम किया गया है।  जैविक खेती कार्यक्रम के परिणामस्वरूप बेहतर पैदावार, बेहतर मिट्टी की गुणवत्ता, पौधों की विविधता में वृद्धि सुनिश्चित किया गया है। साथ ही कल्पावल्ली कार्यक्रम केसीसीए के तहत  सवाना घास के मैदान पारिस्थितिकी तंत्र और उष्णकटिबंधीय झाड़ी वन जो भालू, तेंदुए, काले हिरण और लकड़बग्घा का घर है को सफलतापूर्वक बहाल करने, भारतीय ग्रे वुल्फ आवास की रक्षा और संरक्षण, 250 से अधिक वनस्पतियों की  प्रजातियों, पक्षियों की 126 प्रजातियों, स्तनधारियों की 22 प्रजातियों  और हर्पेटोफ़ुना की 60 से अधिक प्रजातियों के संरक्षण का दावा करता है।

टिम्बकटू कलेक्टिव स्टोर

और उससे भी महत्वपूर्ण बात जिसके कारण अनंतपुर में पवन चक्कियों के द्वारा होने वाले पर्यावरणीय नुकसान के सन्दर्भ में  टिम्बकटू कलेक्टिव का जिक्र जरूरी है क्योंकि अक्षय ऊर्जा के तहत पवन ऊर्जा के  संभावित नकारात्मक प्रभाव पर टिम्बकटू कलेक्टिव एनजीओ, कल्पावल्ली सीबीओ, और एसपीडब्ल्यूडी के साथ मिलकर नई दिल्ली में भारत के ग्रीन ट्रिब्यूनल में सार्वजनिक मुकदमा दायर करने वालों में से रहा है।

लेकिन पुरे तीन महीने से ज्यादा टिम्बकटू कलेक्टिव से जुड़ें अलग अलग लोगों को संपर्क करने के बावजूद उनमें से कोई भी विंड टर्बाइन से होने वाले प्रदुषण पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं हुआ।

 

कई बार फोन और मेल के बाद अंततः टिम्बकटू कलेक्टिव की संस्थापक मेरी वट्टमट्टम  की ओर से मेल के मार्फ़त स्पष्टीकरण दिया गया कि  हाल के दिनों में हम कोविड महामारी से लंबित काम को पूरा करने में बहुत व्यस्त थे।  संवाद नहीं कर पाने का कारण यह हो सकता है। टिम्बकटू कलेक्टिव और कल्पावल्ली ट्री ग्रोअर्स कोऑपरेटिव  ने पवनचक्की कंपनियों द्वारा संरक्षित क्षेत्र को हुए नुकसान के संबंध में एनजीटी से संपर्क किया था। एनजीटी ने पवनचक्की कंपनियों को इसके लिए मुआवजा देने का निर्देश दिया था। हमें बताया गया कि यह मुआवजा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दिया गया है।

गौरतलब है कि है कि नालकोंडा पवन ऊर्जा परियोजना का कल्पावल्ली क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की बात की गई थी जिसे टिम्बकटू कलेक्टिव द्वारा स्थानीय वनीकरण के द्वारा बहाल किया गया था। वर्ष 2013 में इस क्षेत्र में जब  50.4 मेगावाट का पवन फार्म स्थापित किया गया था, तब  टिम्बकटू कलेक्टिव ने ही इससे वनस्पति आवरण और जलग्रहण क्षेत्रों को नुकसान पहुंचने की बात कही थी, साथ ही पहाड़ियों के कटाव और स्थानीय लोगों की आजीविका के प्रभावित होने की बात की थी।

जबकि परियोजना सीडीएम के तहत कार्बन क्रेडिट के लिए पंजीकरण का अनुरोध कर रही थी। यह भी कहा गया था कि इस परियोजना का नकारात्मक स्थानीय प्रभाव पड़ा है और परियोजना से पहले स्थानीय समुदायों से उचित परामर्श भी नहीं लिया गया है।

 

सीडीएम क्या है?

 

सीडीएम का मतलब है क्लीन डेपलपमेंट मैकेनिज्म यानी स्वच्छ विकास तंत्र। संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के जलवायु परिवर्तन पर क्योटो प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 12 में सीडीएम को परिभाषित किया गया है जिसके मुताबिक क्योटो प्रोटोकॉल (एनेक्स बी पार्टी) के तहत कम उत्सर्जन या उत्सर्जन-सीमा प्रतिबद्धता वाले देशों को विकासशील देशों में कम उत्सर्जन वाली परियोजना को लागू करने की अनुमति देता है।

सीडीएम विकासशील देशों में उत्सर्जन में कमी वाली परियोजनाओं को सर्टिफायड इमिशन रिडक्शन (सीईआर) क्रेडिट अर्जित करने की अनुमति देता है, जिसमें प्रत्येक एक टन CO2 के बराबर होताहै। इन सीईआर को क्योटो प्रोटोकॉल के तहत खरीदा बेचा जा सकता है और औद्योगिक देशों द्वारा अपने उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों के एक हिस्से को पूरा करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

 

नेशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल, दूसरा पक्ष     

उल्लेखनीय है कि पवन ऊर्जा परियोजना के कारण सामुदायिक  सहयोग के द्वारा विकसित जंगल को नुकसान पहुंचने के सवाल पर टिम्बकटू कलेक्टिव नेशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल के समक्ष जा चूका है। जिसके तहत पर्यावरण और वन मंत्रालय भारत सरकार, प्रमुख सचिव वन, आंध्र प्रदेश सरकार, आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, एनरकॉन (इंडिया) लिमिटेड और नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय भारत सरकार के खिलाफ कल्पावल्ली ट्री ग्रोवर्स म्यूचुवली एडेड कोऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड,टिम्बकटू कलेक्टिव और सोसाइटी फॉर  प्रोमोशन ऑफ़ वेस्टलैंड डेवलपमेंट ने नेशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल एक्ट, 2010 की धारा 15 के तहत 2013 में मिलकर याचिका दायर की थी।

 

मामले में वादी का दावा था कि इस क्षेत्र में 50.4 मेगावाट का पवन फार्म स्थापित किया गया था, जिससे वनस्पति आवरण और जलग्रहण क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा, पहाड़ियों का क्षरण हुआ। ग्रामीणों के मुताबिक सड़कों के निर्माण एवं पर्वतों की चोटियों को समतल करने के कारण  30,000 से अधिक पूर्ण विकसित पेड़ और हजारों छोटे पेड़ों का नुकसान हुआ। वृक्षारोपण कार्यक्रम के तहत ताजा लगाए गए वृक्ष और झाड़ियां  नष्ट हुईं। 10 किलोमीटर सड़क पर ट्रकों द्वारा लगातार भारी यातायात के कारण धूल  प्रदूषण बढ़ा, क्षेत्र में तापमान में वृद्धि, और कृषि की गिरावट आयी।

इससे स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है। 2007 में एनरकॉन ने कल्पावल्ली और आसपास के क्षेत्रों में 48 पवन चक्कियों की स्थापना के लिए आंध्र सरकार के साथ बातचीत शुरू की थी। लेकिन स्थानीय समुदायों से उचित परामर्श नहीं लिया गया, ये भी कहा गया कि कल्पावल्ली क्षेत्र ग्रासलैंड के लिए जाना जाता है, पहाड़ी ढलानों पर उगने वाली घास भेड़ों और बकरियों के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं, बारिश नहीं  होने पर भी कल्पावल्ली में प्रचुर घास उगती थी जो यहाँ के लोगों के पशुपालन आजीविका का आधार है। लेकिन खासतौर पर नालकोंडा पवन ऊर्जा परियोजना का कल्पवल्ली जंगल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा, इस इलाके में सड़कों के निर्माण के साथ, पहाडों के काटे जाने के कारण ,भूजल स्रोतों का विनाश हुआ और 48 विशाल विंड मिल संरचनाओं की स्थापना के कारण कल्पावल्ली की घास कम हो गई, पहाड़ पर भी मवेशी घास चरने में असमर्थ हैं क्योंकि पहाड़ों की ढलानें बाधित हो गई. इन सबके कारण कल्पावल्ली के लोगों की आजीविका का एक प्रमुख स्रोत बाधित हुआ। साथ ही पेड़ों के कटने से क्षेत्र के वन्य जीवन विलुप्त हुए टिम्बकटू के मुताबिक 384 वनस्पति प्रजातियों और 123 से अधिक जीवों की प्रजातियों से  समृद्ध इस क्षेत्र में 18 महीने की अवधि में  जैव विविधता और वन्य जीवन में नाटकीय गिरावट दर्ज़ हुई।

हालाँकि इस क्षेत्र को शुरू से पवन ऊर्जा के सन्दर्भ में लिए उच्च क्षमता वाला माना जाता रहा है लेकिन कल्पावली में 20 -25 साल में तैयार हुए जंगल की, सरकार और कंपनी दोनों ओर से उपेक्षा की गई। और राज्य सरकार के द्वारा इसे “बंजर भूमि” के रूप में संदर्भित किया गया, जो सही नहीं था।यूएनएफसीसीसी में दर्ज़ विवरण के मुताबिक भी नालकोंडा विंड फार्मपर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ), भारत सरकार के अनुसार, पवन ऊर्जा उत्पादन संयंत्र के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) अध्ययन एक आवश्यक आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह 1994 की ईआईए अधिसूचना में वर्णित ग्यारह श्रेणियों 12 के अंतर्गत या2006 और 2009 की संशोधित अधिसूचनाओं में शामिल नहीं है। परियोजना गतिविधि को पर्यावरण पर किसी भी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव का कारण नहीं माना गया है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए ) का कोई अध्ययन आयोजित नहीं किया गया है।

 

याचिका में “भूमि हथियाने का मुद्दा और इसमें इसके प्रभाव” को भी दर्ज़ किया गया था। जिसे बाद में ग्रीन ट्रायब्यूनल ने भी माना कि भूमि लिए अनुमोदन नहीं लिया गया। 2015 में अपने दिए गए फैसले में ट्रायब्यूनल ने माना कि यह दर्शाने के लिए कोई सामग्री नहीं है कि प्रतिवादी ने संभागीय वनाधिकारी से ऐसा कोई अनुमोदन प्राप्त किया और ना ही ऐसी कोई याचिका दी। इसके अलावा, डॉ. पी. एस. राघवैया, आई.एफ.एस., संभागीय वन अधिकारी, अनंतपुर द्वारा वन संरक्षक, अनंतपुर अंचल, अनंतपुर को प्रस्तुत रिपोर्ट भी यह नहीं दर्शाता है कि ऐसी कोई स्वीकृति प्रदान की गई। इसलिए, उपलब्ध सामग्री के आधार पर एक कहा जा सकता है कि कोई अनुमोदन नहीं प्राप्त किया गया था।

दूसरी ओर ट्रायब्यूनल ने ये भी कहा कि हालांकि आवेदक ये दावा कर सकते हैं कि उन्होंने  बंजर भूमि को जंगल में बदला। लेकिन PW2 द्वारा प्रस्तुत PW2/2 रिपोर्ट और गवाहों द्वारा दिए गए मौखिक साक्ष्य के साथ हमें यह मानने के लिए कोई सामग्री नहीं मिली कि वादी में से एक टिम्बकटू कलेक्टिव को इस जमीन का कोई अधिकार दिया गया था। मंडल राजस्व अधिकारी चेन्नेकाओथापल्ली की प्रक्रियाओं के मुताबिक भी टिम्बकटू कलेक्टिव को आंध्र प्रदेश सरकार की जीओएमएस संख्या 218 . में जारी दिशा-निर्देशों के तहत सप्पादी में और उसके आसपास सर्वे नं. 314 के 1000 एकड़ जमीन में वृक्षारोपण और वाटरशेड विकास दोनों की अनुमति थी। यह भी स्पष्ट था कि ना तो वादी और न ही उनके अधीन काम करने वाले किसी लाभार्थी को उस जमीन पर कोई अधिकार दिया गया था, हालांकि जंगल के उत्पाद के इस्तेमाल की उन्हें अनुमति थी। इसलिए, भले ही यह मान लिया जाए कि आवेदक भूमि का कायाकल्प कर रहे हैं; उक्त आदेश के आधार पर उन्हें मुआवजे का दावा करने का अधिकार नहीं है। साथ ही याचिका के तहत प्रकाश में लाये गए     आरोप कि विंडमिल्स से पशुओं का नुकसान हुआ है,  मसलन,  विंडमिल्स के लिए अन्य निर्माण और सड़क निर्माण के दैरान छोड़े गए मलबे के प्लास्टिक और धातु को खाने से कई मवेशियों की मौत हो गई, इसके पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं।

 

टिम्बकटू कलेक्टिव के द्वारा कल्पावेळी जंगल को हुए नुकसान के मुवावजे के मामले में सम्बंधित प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि जब आवेदकों का भूमि पर कोई अधिकार नहीं है, तो वे मुवावजे के दावेदार नहीं हो सकते। एक समझौते के आधार पर भी जो कि आवेदकों के अनुसार उन्होंने निरस्त कर दिया था किसी मुवावजे का दावा नहीं किया जा सकता। प्रतिवादी के वकील ने यह भी बताया कि वादी द्वारा उत्पन्न की जा की गई रुकावटों और शांति के लिए ताकि परियोजना का  सुचारू संचालन हो सके आवेदकों को 20,00,000/- का भुगतान किया गया था और वो भी सोशल रेस्पॉनिसिबिलिटी या  सामाजिक जिम्मेदारी के अंश के रूप में  इसलिए, आवेदक किसी भी राशि का दावा करने के हकदार नहीं हैं और वह भी तब जब वादी के द्वारा 12 लाख रुपये का चेक  यह कहकर भेजा गया कि वो कंपनी द्वारा दिए गए पैसे का पुनर्भुगतान कर रहे हैं लेकिन वो चेक बैंक में पर्याप्त फंड ना होने के कारण बाउंस हो गया। इसलिए वादी को कंपनी किसी भी नुकसान का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं है।

जबकि ट्रायब्यूनल ने माना कि सड़क निर्माण के दौरान पेड़ों की व्यापक क्षति हुई है, ट्रायब्यूनल ने कहा बेशक सबूत यह स्थापित करते हैं कि सड़क का निर्माण करते समय, यहाँ की टोपोग्राफी को आसपास के क्षेत्र, पारिस्थितिकी और पर्यावरण व्यापक नुकसान हुआ। इसलिए सम्बंधित प्रतिवादी को सड़क के दोनों ओर पेड़ खासतौर पर उस इलाके के स्थानीय पेड़ लगाने के निर्देश दिए, साथ ही सड़क निर्माण के दौरान क्षेत्र में उनके द्वारा जनित धूल आसपास के पर्यावरण के और प्रदुषण का कारण नहीं बनना चाहिए। मलबा और प्लास्टिक कचरा नहीं छूटना चाहिए। और पहाड़ की चोटी  जहां पवन टरबाइन स्थापित हैं, इस क्षेत्र में ऊपर तक निर्मित सड़क के दोनों ओर पेड़ लगाने होंगे  इन वृक्षों के रख-रखाव की जिम्मेदारी लेनी होगी और सम्बंधित प्रतिवादी को पवन टरबाइन के आस पास हरित क्षेत्र बनाये रखना होगा।

 

जैसे पहले बताया गया है पर्यावरण और वन मंत्रालय को आंध्र प्रदेश राज्य द्वारा अग्रेषित प्रस्ताव के अनुसार 38.90 हेक्टेयर वन भूमि का मेसर्स एनरकॉन इंडिया प्रा. लिमिटेड, के पक्ष में डायवर्जन की मंजूरी को पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा अनुमोदन प्रदान किया गया था। आंध्रप्रदेश राज्य द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव से पता चलता है कि डीएफओ ने गैर वन भूमि में डायवर्ट की जाने वाली 39 हेक्टेयर वन भूमि के लिए प्रतिपूरक वनीकरण योजना तैयार किया था। और जो मुख्य बातें कही गई उसके तहत सबूत और सामग्री से स्पष्ट है कि राज्य द्वारा प्रधान मुख्य संरक्षक को प्रदान किए गए अनुमति में विशिष्ट प्रावधान के बावजूद संबंधित प्रतिवादी को भूमि हस्तान्तरित करने का आदेश उपरोक्त क्षेत्र में सड़कों का संरेखण करने करने वाली मान्यता प्राप्त फर्म द्वारा किया जाना चाहिए थे और इसे संबंधित डीएफओ द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए था। लेकिन इस शर्त का पालन नहीं किया गया।

 

चूंकि, सबूत यह स्थापित करते हैं कि सड़क का निर्माण करते समय, भूआकृति,  आसपास के क्षेत्र, पारिस्थितिकी और पर्यावरण को व्यापक नुकसान हुआ, अतः सम्बंधित प्रतिवादी, पारिस्थितिकी और पर्यावरण की इस क्षति की भरपाई करने के लिए बाध्य है, और उसे इसके लिए आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एक माह के भीतर पचास लाख रुपये (50, 000, 00/-) का मुआवजा देना होगा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य वन विभाग के परामर्श से इस राशि का उपयोग केवल उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी और पर्यावरण को बहाल करने के लिए करेगा और दो महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश करना होगा।

 

इस पुरे प्रकरण में जो नोट करनेवाली बात है वो ये हैं कि अंनतपुर में विंडमिल्स लगाने के दौरान पर्यावरण के कई नियमों में छूट ली गई या उसे सुविधाजनक ढंग से अनुकूल बनाया गया।

 

 

क्या कहते हैं विंडमिल्स के पास के गांव के लोग?           

 

आगे जब हमने अलग अलग गांवों में जाकर लोगों से बात की तो तस्वीर ज्यादा सुस्पष्ट होकर सामने आने लगी, जबकि सरकार का दावा है कि जिले के लोगों को ऐसी कोई शिकायत नहीं। आंध्र प्रदेश के  न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ़ आंध्र प्रदेश लिमिटेड ( एनआरईडीसीएपी लिमिटेड, राज्य सरकार कंपनी ) में कार्यरत  जिला प्रबंधक श्री एम कोडंदरामा मूर्ति कहते हैं, सरकार के द्वारा लोगों को मुआवज़ा दिया गया है अगर उनकी जमीन का अधिगहण किया है। उन्होंने कहा विंड टरबाइन की आवाज, शोर इन्हें लेकर कुछ शिकायतें  आसपास के गांव के लोगों से कुछ शिकायतें जरूर मिली है लेकिन आवाज, शोर  से होनेवाला असर बहुत नकारात्मक रहा है।

 

हर सोमवार को हर मंडल के हेडक्वाटर में  सरकार के द्वारा हर तरह की समस्यायों की सुनवाई प्रशासनिक अधिकारीयों के मार्फ़त होती है, लोग विंड टर्बाइन्स के सन्दर्भ में वहां शिकायत कर सकते हैं. इसके अलावा सरकार के द्वारा 1902 हेल्पलाइन शुरू किया गया है, लोग इस लाइन पर संपर्क कर शिकायत कर सकते हैं। अभी तक हमें  विंड टर्बाइन्स से सम्बंधित कोई शिकायत नहीं मिली है।  श्री एम कोडंदरामा मूर्ति कहते हैं इस सन्दर्भ में किसी भी किस्म की पर्यावरण संबंधी अनदेखी या अनियमितता जैसे मसले की सुनवाई के लिए वैसे भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल या राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण है, अभी भी अपनी ऐसी किसी शिकायत के लिए लोग जा सकते हैं जैसे टिम्बकटू कलेक्टिव ने भी किया था। एम कोडंदरामा जी की बात सही है लेकिन शायद वो भूल रहे हैं गांव के लोग केवल अपनी क्षमता से इस स्तर पर लड़ाई नहीं लड़ सकते।

 

 

 

सबसे पहले हम एलजीबी  नगर गए जो  रोद्दम मण्डल के तहत आने वाला अनंतपुर जिले का एक छोटा सा गाँव है,  यह थुरकलापट्टनम पंचायत के अंतर्गत आता है।  100 घरों वाले इस गांव की आबादी 310 लोगों की है, जिसमें 20 घर के लोगों की जमीन पवन चक्कियों के नज़दीक हैं या उनके ऊपर से बिजली वितरण की लाइन गुजरती है।

 

एलजीबी नगर में ही रह रहे  10 एकड़ की खेती वाले मारुति रेड्डी बताते हैं उनके गांव में पिछले 10 साल से विंडमिल्स है, नागेंद्र पेशे से ड्राइवर है, रामकृष्ण  रेड्डी भी इसी गांव के हैं ड्राइवर हैं और उनके पास 4 एकड़ की खेती है, प्रकाश रेड्डी 10 भी एकड़ की खेती वाले किसान हैं, ये सभी किसान विंडमिल आने के बाद एकसाथ हरियाली की कमी की शिकायत कर रहे हैं थे, पशुओं के चारे की कमी सबकी सबसे बड़ी शिकायत थी, उनका कहना था जब विंड टर्बाइन्स नहीं थे तब  पहाड़ों पर पर्याप्त हरियाली हुआ करती थी और उनके पालतू पशु दिन भर वहां पर चारा खाते थे।  रामकृष्ण कहते हैं कि जिस भी खेत से पावर लाइन पावर गुजरती है है वहां के खेतों की कीमत कम हो जाती है। मारुति रेड्डी और प्रकाश रेड्डी दोनों कहते हैं गांव की दूसरी साइड में फिलहाल जमीन की कीमत तीस लाख प्रति एकड़ है जबकि जिन खेतों से बिजली की लाइन गुजर रही है उनकी कीमत सिर्फ 8 लाख प्रति एकड़ ही है।  यह अपने आप में बहुत बड़ा नुक्सान है। क्षतिपूर्ति के तौर पर जिन खेतों से बिजली की लाइन गुजरी है उन्हें मात्र 1 लाख रूपये प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया गया है।

 

मारुति रेड्डी बताते हैं विंड टरबाइन की आवाज के कारण पहाड़ों पर घूमने वाले जानवर जंगली जानवर जैसे जंगली सूअर लोमड़ी,हिरण नीलगाय और खरगोश मोर अब वहां नहीं जाते बल्कि खेतों की तरफ चले आते हैं जिसके कारण उनकी फसल को नुकसान होता है, जंगली जानवर गांव में भी आ जाते हैं नारायण और अरुणा स्कूटर से जा रहे थे उन्होंने सुना कि कोई विंडमिल से होने वाली  शिकायत सुन रहा है तो अपने स्कूटर रोक करके उन्होंने अपनी बात कही। जो खेत दूर हैं उनकी प्रति एकड़ प्रभावित नहीं हुई है लेकिन जो भी खेत विंडमिल के नजदीक है या जहां से लाइन गुजरती है उनकी प्रति एकड़ उपज भी कम हो गई है।

एलजीबी नगर गांव के लोग

हम  मुस्टिकोविला गांव पहुंचे जहाँ श्रीरामलू अपने खलिहान में ईश्वरम्मा,  मालम्मा  और नरसिंहा के साथ मिलकर खेत से काट कर लायी गई रागी और धान की फसल को पुआल से अलग कर रहे थे। मुस्टिकोविला अपेक्षाकृत बड़ा गांव है जहां लगभग 500 घर हैं और पिछले नौ साल से यहां विंड टर्बाइन्स लगे हुए हैं, बल्कि श्रीरामलू  का खलिहान ठीक उस पहाड़ी से लगा हुआ है जिसपर पवन चक्की पृष्ठभूमि में घूम रही थी और जिसकी आवाज़ हम तक भी आ रही थी।  श्रीरामलूके बेटे पहले विंडमिल लगाने वाली कंपनी सुजलॉन में सिक्योरिटी गार्ड थे, लेकिन 6 साल नौकरी करने के बाद साल पहले उन्होंने नौकरी छोड़ दी कारण वेतन मात्रा  4500-5000  हज़ार रुपए होना और काम के घंटे 12 तक भी हो जाना। अभी भी गांव के 12  युवक सिक्योरिटी गार्ड की दिन -रात की नौकरी कर रहे हैं।  इनका गांव विंड मिल्स से दूर हैं तो आवाज़ से तभी ज्यादा परेशानी होती है जब खेत में काम करने आते हैं, गांव तक आवाज़ नहीं पहुँचती।

श्रीरामलू, मुस्टिकोविला गांव

 

विंड टर्बाइन लगने के बाद पहाड़ी पर की हरियाली ख़त्म हो गई और लगातार बारिश भी कम होती गई, शिकायत करने पर पंचायत को कंपनी की ओर से पेड़ लगाने के लिए 20  लाख दिए गए, श्रीरामलू कहते हैं पैसा एक स्थानीय नेता गोपाल ने ले लिया और पहाड़ों पर वापस वृक्षारोपण भी नहीं कराया।  उन्होंने गोपाल के बारे में ये भी बताया कि  वो पहले टिम्बकटू कलेक्टिव से जुड़ा था और बाद में गांव का सरपंच भी बना।

मुस्टिकोविला गांव

 

 

कादिरप्पा भी इसी गांव से हैं और बताते हैं विंड टरबाईन लगने के बाद उनके इलाके में लगातार पहले 5 -6  साल तक बारिश हुई ही नहीं जबकि इससे पहले कम मात्रा में ही सही मौसम में बारिश जरूर होती थी, पिछले दो साल से चूँकि पुरे अनंतपुर में सामान्य से ज्यादा बारिश हो रही है तो उनके गांव में भी सूखा नहीं पड़ा। लेकिन ये बारिश भी सामान्य जलवायु चक्र नहीं है, उल्लेखनीय है कि आईएमडी के आकड़ों के मुताबिक पिछले दो दशक में साल 2000 से 2020 तक अनंतपुर ने 18 बार सूखे का सामना किया है, और पिछले तीन साल से यहाँ सामान्य से भी ज्यादा बारिश हो रही है। हालांकि इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध विंड टर्बाइन्स से हो इस प्रकार का ना कोई अध्ययन है और ना ही आंकड़े।

 

मुतियालप्पा भी पहले विंडवर्ल्ड कंपनी के विंड टर्बाइन के लिए सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे दो साल काम करने के बाद उन्हें वाईएसआर कांग्रेस और जगनमोहन रेड्डी की सरकार बनते नौकरी से निकाल दिया गया क्योंकि मुतियालप्पा टीडीपी के समर्थक रहे और विंड टर्बाइन एजेंसी का मालिक चंद्रगिरि रामू  वाईएसआर कांग्रेस समर्थक था।

इसके अलावा वेतन भी बहुत कम ( 5 हज़ार रूपये ) और काम के घंटे बहुत ज्यादा थे। मुतियालप्पा कहते हैं मुस्टिकोविला में 240 के करीब अलग अलग कंपनियों के विंड टर्बाइन्स हैं।

मुतियालप्पा

 

कंपनी वाले और सरकार की ओर से ग्रीन कवर के लिए मीटिंग हुई थी, टिम्बकटू कलेक्टिव ने भी अपनी आपत्ति दर्ज़ की थी , इनकी आपसी मीटिंग के बाद इनकी आपस में रजामंदी हो गई।  श्री रामलु और कादिरप्पा दोनों दावा  करते हैं टिम्बकटू कलेक्टिव ने भी ग्रीन कवर लगाने के नाम पर पैसे मिल जाने के बाद अपनी आपत्ति पर चुप्पी साध ली। श्रीरामलु , कादिरप्पा और मुतियालप्पा तीनों ने कहा  टिम्बकटू कलेक्टिव  के लोग शुरू में खूब आये क्योंकि कल्पावल्ली जंगल भी इस गांव से ज्यादा दूर है, विदेशी मेहमानों के आने पर भी टिम्बकटू कलेक्टिव  के लोग उन्हें अपना काम दिखाने को बोलकर गांव दिखाने लेकर आते रहे लेकिन हक़ीक़त में उन्होंने गांव के लिए कुछ भी नहीं किया। इस सन्दर्भ में टिम्बकटू कलेक्टिव का पक्ष जानने के लिए फोन फिर मेल किए जाने पर कोई जवाब नहीं मिला बाद में उनके द्वारा मेल पर जानकारी दी गई कि नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल द्वारा निर्देशित मुआवजे का भुगतान  कंपनी द्वारा प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड को किया गया है, टिम्बकटू कलेक्टिव को नहीं।

 

 

मुतियालप्पा बताते हैं विंड टर्बाइन्स से ख़त्म हुई हरियाली के नाम पर उनकी  खुद  जमीन पर  टिम्बकटू कलेक्टिव के लोग आए थे ये कहते हुए कि ये कल्पावल्ली फारेस्ट के तहत आनेवाली जमीन है और उन्हें उनकी ही जमीन से भगाने लगे, मुतियालप्पा ने जवाब में तलवार निकाल कर उन्हें दौड़ा दिया, वो कहते हैं मैंने अपनी और मेरे साथ के लोगों की जमीन ऐसे बचाई, उस घटना के बाद हमारी जमीन पर  टिम्बकटू कलेक्टिव के लोग कभी नहीं आए।

 

रामगिरि गांव के नवीन ने अभी अभी डिग्री ख़त्म की है, उनके गांव में 500 के करीब घर हैं और कहते हैं विंड टर्बाइन्स उनके गांव से दूर हैं इसलिए प्रत्यक्ष  किसी को कोई फर्क महसूस नहीं होता लेकिन गांव के बुजुर्ग बारिश की अनियमितता और हवा के लगातार शुष्क होने की बात कहते रहते  हैं।

रामगिरि गांव

 

इसी तरह रास्ते में गोंडीपल्ली, नागासमुद्रम गांवों से गुजरते हुए रास्ते में दोनों ओर विंड टर्बाइन्स ही दिख रहे थे और स्थानीय चरवाहे लिंगैया से बात करने पर उसने बताया इन पवन चक्कियों ने पहाड़ को खाली कर दिया, उनकी ही तरह आसपास के और चरवाहों को भी अपनी भेड़ और बकरियों के चारे के लिए गांव से दूर हरियाली वाले पहाड़ों पर  जाना पड़ता है।

स्थानीय चरवाहा

 

यहां उल्लेख करना जरूरी है कि अनंतपुर जिले में रामगिरी और तल्लीमदुगुला दो ऐसे स्थान हैं जहां दो दशक पहले पवन ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित की गई थीं। 100 मेगावाट पवन ऊर्जा की संयुक्त क्षमता के साथ 17 कंपनियों ने यहां संयंत्र स्थापित किए थे।

एलजीबी नगर गांव के रस्ते में  रूद्रप्पा मिले जो 4 साल से यहां पर रह रहे हैं लेकिन उनके आने से काफी पहले से यहां पर पवन चक्की है, चूँकि उनका फार्म  विंडमिल से थोड़ी दूरी पर है इसलिए उन्हें ज्यादा कुछ महसूस नहीं होता लेकिन अनियमित बारिश और हवा में नमी की कमी वो नोटिस करते हैं।

एलजीबी नगर गांव के ही लक्ष्मी नारायण रेड्डी अपनी पत्नी अनीता के साथ रोज पेनुकोंडा की ओर आते रहते हैं खासतौर पर अपने पालतू पशुओं के चारे के लिए, वो बताते हैं वैसे कोई बहुत बड़ा दुष्प्रभाव तो नहीं नोटिस हुआ है लेकिन विंडमिल्स के कारण बारिश की अनियमितता बढ़ी है और हवा पहले से ज्यादा शुष्क और गर्म हुई है।

एलजीबी नगर गांव के लक्ष्मी नारायण रेड्डी अपनी पत्नी अनीता के साथ

 

 

हमारी बात चीत उर्वकोंडा के रवि कुमार और एदुगुर्र्रालापल्ली  के कोंडापुरम विजय कुमार से और उनके दोस्तों से भी हुई। विजय कुमार के गांव और आसपास 20 के लगभग टर्बाइन्स हैं। विजय कुमार कहते हैं उनके गांव और आसपास 20 विंड टर्बाइन्स है और सभी टर्बाइन्स किसानों की उस जमीन पर है जो कभी मूंगफली की उपजाऊ जमीन हुआ करते थे, उनके रिश्तेदार की तीन एकड़ से ज्यादा जमीन विंड टर्बाइन्स के लिए ली गई। विजय कुमार आवाज से प्रदूषण की बात करते हैं लेकिन वो कहते हैं ये उनके जैसे आवाज के प्रति कुछ बेहद संवेदनशील लोगों को ही ज्यादा परेशान करता है जैसे सिर में गनगनाहट सा महसूस होना और अनिद्रा की शिकायत।

 

इसके अलावा  विजय विंड टर्बाइन्स  नाम पर किसानों को मिले अपर्याप्त मुआवजे की भी बात करते हैं उनके गांव में प्रति एकड़ 4 लाख मुआवजा दिया गया जबकि उनका ये भी कहना है गांव के लोग कहते हैं कंपनी की ओर से ज्यादा राशि दी गई थी लेकिन स्थानीय नेता ने उसे किसानों तक नहीं पहुंचने दिया।

 

विजय भी अनियमित बारिश और हवा के शुष्क होने की शिकायत करते हैं उनका कहना है लगातार विंड टर्बाइन चलने से पुरे इलाके की हवा में मौजूद आर्द्रता प्रभावित हुई है। सरकार की हेल्पलाइन की बात बताने पर जहां कोई भी अपनी किसी भी शिकायत को दर्ज़ करा सकता है, विजय कहते हैं इस बारे में ज्यादातर लोगों को जानकारी नहीं है।  लेकिन विजय की असली चिंता अपने गांव के पहले से ही बहुत शुष्क और बंजर होने की है जो विंड टर्बाइन लगने के बाद और ज्यादा शुष्क और बंजर जमीन में तब्दील होती जा रही है क्योंकि सरकार और कंपनियों की ओर से भी उनके गांव में वैकल्पिक हरियाली विकसित करने की कोई कोशिश अब तक नहीं हुई।

 

 

जंगलों में सड़कें बनाने से रैखिक विखंडन होता है, सड़कों का मतलब सिर्फ ट्रैफिक नहीं है, जिससे जानवर प्रभावित होते हैं और दुर्घटनाग्रस्त होकर मरते भी हैं, पहाड़ पर रोड को समतल बनाने के लिए पहाड़ी के किनारों को काटा जाता है यह  कटिंग अक्सर कई मीटर ऊंची होती हैं जिसे जानवर चढ़कर पार नहीं कर पाते और फिर पहाड़ पर नहीं चढ़ पाते इससे उनका आवास और भोजन की तलाश दोनों बाधित होता है। उर्वकोंडा के रवि कुमार भी विंड टर्बाइन्स के कारण खासतौर पर बारिश की अनियमितता और हवा की शुष्कता की बात करते हैं और कहते हैं इसे समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं होना चाहिए कि जिन पहाड़ों पर या जमीन पर विंड टर्बाइन्स हैं वहां की हरियाली स्वतः प्रभावित होती है पंखे के चलते रहने के कारण और इसलिए वहां के जानवर और पक्षी भी प्रभावित होते हैं विंड टर्बाइन्स के आसपास ना जानवर जाते हैं और ना ही पक्षी और इन सबका आपस में एक चेन जैसा संबंध भी है एक के ख़त्म होने से दूसरे पर असर होता है जैसे हरियाली, पेड़ के ख़त्म होने से स्वतः चिड़ियों का आवास ख़त्म हो जाता है यहाँ तक कि कई तितलियों और कीट पतंगों का भी। जंगली जानवरों का भोजन और आवास भी प्रभावित होता है जैसे उनके गांव में विंड टर्बाइन्स लगने के बाद जंगली सूअर और लोमड़ी पहाड़ों से किसानों के खेतों की ओर आने लगे हैं और फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।  रवि ये भी कहते हैं जिस भी जमीन या उसके आसपास विंड टर्बाइन्स हैं उसके साथ लगे जमीन की  कीमत अपने आप आधी से भी कम हो जाती है आखिर क्यों ? लोग कोई शिकायत नहीं भी करें लेकिन वो जमीन पर इसने दुष्प्रभाव को जानते हैं इसलिए।

 

लेकिन सच क्या हैं?  

 

पवन चक्कियों के पर्यावरण पर दुष्प्रभाव के क्रम में  खासतौर पर अनंतपुर या पुरे आंध्र प्रदेश में उस  तरह से उल्लेखनीय काम नहीं हुआ है जिस तरह से गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में हुआ है, “लेट इंडिया ब्रीद” से जुड़े यश लेखी भी इस बात को मानते हैं इसलिए “लेट इंडिया ब्रीद”    सक्रियता गुजरात, महाराष्ट्र  राजस्थान में ज्यादा है। इसलिए अनंतपुर की पवन चक्कियों और उनसे वनस्पतियों और जीवों पर होनेवाले दुष्प्रभाव के सन्दर्भ में इस रिपोर्ट में देश के अन्य राज्यों में हुए शोध, अध्ययन और  निष्कर्ष को पेश किया गया है।

पवन ऊर्जा को ग्रीन ऊर्जा कहा जाता है,लेकिन अरसे से इसके द्वारा वन्यजीवों पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव की भी बात होती रही है,   स्थलीय स्तनधारियों और सरीसृपों पर इसके नकारात्मक प्रभाव की बात की जाती रही है लेकिन पक्षियों और चमगादड़ों पर इसका ज्यादा असर पाया गया है। टरबाइन के घूमते  ब्लेड पक्षियों के टकराने और मौत का कारण बनते हैं. इसके अलावा, विंडमिल्स  क्षेत्र से पक्षियों का विस्थापन और शोर के कारण पक्षियों के व्यवहार  और अधिवास में परिवर्तन भी नकारात्मक प्रभाव है।

सबसे पहले इस बारे में  जानकारी 1990 में अमेरिका के अटामाउंट पास में बड़े पैमाने पर शिकारी पक्षी मृत्यु दर के दस्तावेजीकरण से प्रकाश में आयी थी, इसके बाद यूरोप और उत्तरी अमेरिका में विंडमिल्स के कारण पक्षी मृत्यु दर का बड़े पैमाने पर अध्ययन किया गया, लेकिन भारत में इस बारे में बहुत ज्यादा शोध नहीं किया गया है। चमगादड़ और पक्षियों पर महाराष्ट्र और गुजरात में  किये गए दो अध्ययन के  निष्कर्ष के बाद इसकी जरूरत समझी  गई है कि पूरे देश में फैले 554 महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्रों (आईबीए) में पक्षियों की समृद्ध विविधता को ध्यान में रखते हुए, पवन टरबाइनों की तेजी से बढ़ती संख्या और पक्षिजगत पर इससे पड़ने वाले संभावित प्रभावों की की जांच की जानी चाहिए।

हाल की रिपोर्टों में दुनिया के कुछ देशों में चमगादड़ और अन्य पक्षियों पर पवन टरबाइन के पर्यावरणीय प्रभाव पर लगातार चिंता व्यक्त की गई है, भारतीय संदर्भ में पक्षियों और चमगादड़ों पर पवन चक्कियों के प्रभाव का कम अध्ययन किया गया है और इस विषय पर बहुत कम शोध सामग्री उपलब्ध है। सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री से सम्बद्ध शोधकर्ता अब्दुल हमीद मोहम्मद समसूर अली द्वारा सितंबर 2011 में कच्छ, गुजरात में विंडमिल्स के पर्यावरण प्रभाव,पक्षियों और चमगादड़ो की मृत्यु दर पर शोध अवधि के दौरान उन्हें यहाँ ग्रेटर माउस-टेल्ड बैट राइनोपोमा माइक्रोफिलम के दो शव मिले जिनकी मौत पवन टर्बाइनों से टकराने के कारण हुई थी।

फिर सेल्वराज रमेश कुमार, वी. अनूप, पी. आर. अरुण, राजा जयपाल और ए मोहम्मद समसूर अली द्वारा बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री, कोयंबटूर के सौजन्य से कच्छ, गुजरात के समखियाली क्षेत्र और दावणगेरे, कर्नाटक के  हारपनहल्ली क्षेत्रमें  दो पवन फार्मों पर किए गए अध्ययन में कच्छ में  तीन वर्षों की अवधि में इस क्षेत्र में पायी जाने वाली पक्षियों की कुल 174 प्रजातियों में कम से कम 11 प्रजातियों से कुल 47 पक्षी शव मिले जबकि दावणगेरे कर्नाटक में एक वर्ष की अवधि में पक्षियों की कम से कम तीन प्रजातियों के सात शव पाए गए। कच्छ के लिए अनुमानित वार्षिक पक्षी मृत्यु दर 0.478 पक्षी/टरबाइन दर्ज हुआ और दावणगेरे  के लिए यह दर  0.466 पक्षी/टरबाइन रहा। ये आकड़ें छोटे स्तर पर ही सही लेकिन सच बताते हैं।

पवन चक्कियों से वनस्पतियों, जीव -जंतुओं और समस्त पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का सही आकलन इसपर दीर्घकालीन शोध से ही सामने आ सकता है जबकि भारत में अभी इस ओर बहुत व्यवस्थित शोध नहीं किया जा रहा है खासतौर पर सरकारों के द्वारा।  नाम उद्धृत नहीं किये जाने की बात पर एक विशेषज्ञ कहते हैं, विंडमिल्स के सन्दर्भ में विशेषज्ञों द्वारा दिशानिर्देश विकसित किये गए लेकिन सरकार द्वारा उसे किनारे कर दिया गया। भारत में इस ओर ज्यादा शोध वित्तीय एजेंसियों जैसे वर्ल्ड बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक या ऐसे ही संस्थानों के सौजन्य से हुए हैं क्योंकि ये संस्थाएं किसी परियोजना में निवेश करने से पहले अपने नियमों और शर्तों के अनुसार उससे सम्बंधित हर तरह की जानकारी जुटाती है और इसी आधार पर निवेश करने या नहीं करने का का फैसला लेती हैं। भारत में पवन-ऊर्जा के सन्दर्भ में पर्यावरण मंजूरी तक की जरूरत नहीं है  वेस्ट लैंड दिखाकर परियोजनाओं को मंजूरी दे दी जाती है जबकि पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य नियम होना चाहिए ।

 

 

क्या कहते हैं विशेषज्ञ 

 

डॉक्टर जस्टस जोशुआ ने किसी वित्तीय एजेंसी के लिए  2013 -14 में एक 1 साल के अध्ययन कार्यक्रम के तहत विंडमिल का पक्षियों खासतौर पर चमगादरों पर क्या असर पड़ता है इस पर महाराष्ट्र के सतारा इलाके में काम किया है। उन्होंने कच्छ के नकतवारा इलाके में भी इसी तरह का काम किया है, अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि विंड टरबाइन खासतौर पर पक्षियों टकराने और उनकी मौत की वजह बनते है। स्थानीय या प्रवासी दोनों पक्षियों के साथ वन्य जीवों के हैबिटैट और मार्ग में विंड टरबाइन की मौजूदगी उनके अधिवास और प्रवास दोनों प्रभावित करते हैं, वो उस इलाके आना बंद कर देते हैं।

वो मानते हैं कि उत्सर्जन के हिसाब से पवन ऊर्जा कम प्रदूषणकारी माना जाता है लेकिन इन्हें स्थापित करने के दौरान जो निर्माण होता है उससे पर्यावरण जरूर प्रभावित होता है। और जलवायु पर इसके असर के बारे में अभी अमेरिका में भी शोध जारी है।

हालाँकि इससे कितने पक्षी मरते हैं इसके बारे में ठीक संख्या बताना इसलिए मुश्किल मानते हैं कि भारत में इस सन्दर्भ में सिलसिलेवार शोध नहीं होता है लेकिन अपने शोध के दौरान सात माह के अवलोकन में डॉक्टर जोशुआ ने सतारा में विंड टरबाईन से टकराकर कुल 52 पक्षियों की मौत दर्ज की, जिसमें चमगादड़ों की 5  प्रजाति और 12 अन्य प्रजातियों के पक्षी शामिल थे। कच्छ में उन्होंने विंड मिल्स के स्थापित हो जाने के बाद उस इलाके में पहले से पाए जानेवाले पक्षियों की संख्या में भी कमी दर्ज़ जिसे वो हैबिटैट लॉस मानते हैं, क्योंकि उन्होंने विंड मिल्स की स्थापना से पहले भी काम किया था। डॉक्टर जस्टस जोशुआ ये भी कहते हैं जिस इलाके में पानीस्रोत केवल 1 हेक्टेयर या इससे कुछ कम क्षेत्रफल का हो वहां भी विंडमिल्स की स्थापना पर शोध किए जाने की जरूरत है।

डॉक्टर जोशुआ “वेस्ट लैंड ”  संकल्पना को पर्यावरण, वन्य जीवन और पक्षियों के लिए बहुत खतरनाक मानते हैं वो कहते हैं “वेस्ट लैंड ” जैसा कुछ होता नहीं ग्रासलैंड जैव विविधता और कार्बन सिंकिंग के भू-क्षेत्र होते हैं, वेस्ट लैंड बताकर बगैर किसी शोध या अध्ययन के तमाम ग्रासलैंड में विंडमिल्स को मंजूरी देने के दीर्घकालीन परिणाम गंभीर हो सकते हैं, सरकारों को इसपर ध्यान देने जरूरत है।

वेस्ट लैंड, अनंतपुर

 

ए एम समसूर अली, एस. रमेश कुमार, पी.आर. अरुण, एम. मुरुगेसन द्वारा गुजरात के कच्छ जिले के जंगी क्षेत्र में ‘पक्षियों और चमगादड़ों के विशेष संदर्भ में जंगी पवन ऊर्जा फार्म (91.8 मेगावाट) का  प्रभाव’ इस शीर्षक तहत एविफौना के प्रारंभिक सर्वेक्षण के सन्दर्भ में  किए गए शोध में यहाँ 45 पक्षी परिवारों से संबंधित पक्षियों की कुल 139 प्रजातियां रिकॉर्ड किया, जिसमें 67 प्रजातियां स्थानीय थीं  बाकी अलग -अलग किस्म  प्रवासी प्रवासी। सबसे ज्यादा संख्या में पसेरिफोर्म्स इसके बाद चराड्रिफोर्मेस, सिकोनीफोर्मेस, कोरासीफोर्मेस औरअंसेरिफोर्म्स। ल्यूकोसेफला), ओरिएंटल व्हाइट इबिस (थ्रेस्कीओर्निस मेलानोसेफालस), लेसर फ्लेमिंगो (फीनिकोप्टेरस) माइनर), ब्लैक-टेल्ड गॉडविट (लिमोसा लिमोसा), यूरेशियन कर्लेव (न्यूमेनियस अर्क्वेटा), ब्लैक-बेल्ड टर्नो स्टर्ना एक्यूटिकौडा) और यूरोपीय रोलर (कोरसिअस गर्रोलीयस )  ये सभी  आईयूसीएन 2011 की सूचि के तहत संकटग्रस्त अस्तित्व वाली प्रजातियों थीं । कच्छ के दक्षिण-पूर्व में लगभग 20 किमी दूर, भचाऊ तालुक के चार गांव  वंधिया, मोदपार, लखपार और जंगी समखियाली में किये गए शोध में पाया कि इस क्षेत्र के पक्षियों पर कोई पिछला अध्ययन उपलब्ध नहीं है।

 

क्षेत्र में उन्होंने 190 प्रजाति और 69 परिवारों समेत कुल 273 पौधों की प्रजातियां दर्ज की इनमें से 126 प्रजातियां जड़ी-बूटियों की थीं, 69 प्रजातियाँ पेड़, 34 प्रजातियाँ झाड़ियाँ, 22 प्रजातियाँ लताओं की और 22 प्रजातियाँ घास की थीं।

इन्होने पाया कि विंडमिल्स का असर पक्षियों पर होता है, पवन टर्बाइनों के साथ टकराव के परिणामस्वरूप इन्होने छह पक्षियों की मृत्यु दर्ज की ब्लू रॉक कबूतर (कोलंबा लिविया), हाउस क्रो (कॉर्वस स्प्लेंडेंस) चित्तीदार कबूतर (स्ट्रेप्टोपेलिया) चिनेंसिस), कैटल एग्रेट (बुबुलकस आइबिस), यूरेशियन कॉलर डव (स्ट्रेप्टोपेलिया डिकाओक्टो) और एक अज्ञात एग्रेट। इस इलाके की जैव विविधता खासतौर पर संरक्षणात्मक महत्व की कई प्रजातियां और विभिन्न प्रकार के एविफौना के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के कारण इन्होंने निष्कर्ष दिया कि यहाँ इनके संरक्षण पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए। और पक्षियों की आबादी और घनत्व पर पवन टर्बाइनों के प्रभावों को बेहतर समझने के लिए आगे जांच और शोध जरूर किया जाना चाहिए।

 

गुजरात के ही संगनारा गांव के सरपंच शंकर कहते हैं पवनचक्की से हमारा विरोध नहीं है लेकिन हम अपना जंगल बचाना चाहते हैं, हमारे अर्द्ध शुष्क इलाके में कंटीले झाड़ीनुमा पेड़ ज्यादा पाए जाते हैं जैसे बबूल, कीकड़, ऐसे जंगल तैयार होने में तीस -चालीस साल का समय लग जाता है, उनके काटे जाने  दोबारा लगाने पर भी तीस -चालीस साल की भरपाई कैसे हो सकती है?  उन्होंने बताया सांगनारा में प्रस्तावित 40 विंडमिल में से 2015 में केवल 7 विंड मिल्स  लगाए जा सके। सुजलॉन कंपनी के 7 विंडमिल्स  बाद हमने अपने गांव में प्रस्तावित और विंडमिल लगने ही नहीं दिया, क्योंकि एक विंडमिल के लिए 1000 -1500 तक पेड़ काटे जाते हैं और कंपनियां इस आदेश के साथ आती हैं कि वहां कोई पेड़ नहीं है। 2019 में  हमने इस आदेश को चुनौती दी  2020 में हम नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल गए तबसे आगे  काम बंद है। अडानी पावर और एक और कंपनी अभी भी इस गांव लगने वाले अपने प्रोजेक्ट पर कायम हैं, इनके हटने से हमारी जीत।

 

शंकर ये भी बताते हैं कि मोर उनके गांव और लोगों में बहुत पवित्र पक्षी माने जाते हैं लेकिन विंडमिल्स ट्रांसमिशन लाईन  के कारण 8-10 मोरों की मौत चुकी है, जिसमें से पांच की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी इनके पास है, जबकि हर मौत हम देख भी नहीं पाते हैं क्योंकि झटका लगने से मरने वाले मोर को आधे घंटे में भी दूसरे जानवर खा जाते हैं। शंकर गांव के लोगों द्वारा पंखों के शोर से भी असहज बात कहते हैं।1200 एकड़ में फैले सांगनारा गांव जहाँ की आबादी 14 सौ है, यहाँ के लोगों का मुख्य पेशा पशुपालन, थोड़ी बहुत खेती और मजदूरी है। 7 विंडमिल्स के कारण ही गांव के लोगों ने जंगल, घास और भूजल पर इसका असर देखा, उनके  गांव के पास एक ही मीठे पानी का स्रोत है किसी भी कीमत पर अपने आसपास की प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं चाहते। बल्कि वो गर्व  बताते हैं उनसे पहले  सरपंच ने भी इस मामले में कोई समझौता नहीं किया।  उनके गांव के लोग भी कंपनियों द्वारा नुकसान भरपाई के लिए पैसा दिए जाने की बात पर कहते हैं तुम अपना पैसा अपने पास रखो हमें हमारी प्रकृति चाहिए।

 

डॉ सुजीत नरवरे  प्रोजेक्ट साइंटिस्ट बीएनएचएस  का काम ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और लेसर फ्लोरिकन या  खरमोर पर है विलुप्त होती  श्रेणी की  ये दोनों प्रजातियां देश में जहाँ भी पायी जाती हैं सुजीत नरवाडे  ने वहां काम किया है, खासतौर पर दक्कन पठार के तहत पश्चिमी महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और कर्नाटक के कुछ  हिस्सों  और थार रेगिस्तान में। इस विषय पर उनके शोधपत्र और उनकी किताबें भी हैं जिसमें उन्होंने तमाम अन्य पक्षों के साथ उनके विलुप्त होने के कारणों पर भी लिखा है।  सुजीत नरवाडे विंडमिल्स के पंखे से ज्यादा पावर लाईन नेटवर्क को ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और लेसर फ्लोरिकन जैसे बड़े क्षेत्र में रहने वाली, लो फ्लाइंग पक्षियों के लिए जानलेवा मानते हैं, उनका विजन इस प्रकार से होता है कि वो अपने आगे आने वाले पावर लाइन को नहीं देख पाते और टकरा जाते हैं।  दूसरा कारण हैबिटैट लॉस को, दक्कन से ग्रेट इंडियन बस्टर्ड लगभग विलुप्त हो चुके हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह ग्रासलैंड को ग्रीन एनर्जी के नाम पर डिस्टर्ब कर दिया जाना और उनका सिकुड़ते जाना मानते हैं। भारत में जंगलों को श्रेणीबद्ध किया गया है लेकिन ग्रासलैंड को वेस्टलैंड  माना जाता है जबकि दक्कन का पूरा इलाका ग्रासलैंड ही हुआ करता था, ये  हजारों साल पुराने सिस्टम हैं।  लेकिन विंड टरबाईन के  कारण वनस्पति हटाए जाने, निर्माण कार्य और बड़े हेवी उपकरणों और वाहनों के गुजरने से ग्रासलैंड की टॉप सॉइल ख़त्म हो जाती है जिससे घास बदल जाती है और पूरी वनस्पति बदल  जाती है और अंत में जिससे वन्य  जीवों और पक्षियों का अधिवास ख़त्म होता है। आत्मकुर के वन्यजीव डीएफओ एलन चोंग के मुताबिक द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के आंध्र प्रदेश  से गायब हो जाने की संभावना है,आंध्र प्रदेश में एक ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को अंतिम बार कुरनूल जिले में लगभग 10 वर्ग किमी के एक छोटे से पैच रोलापाडु वन्यजीव अभयारण्य के बाहर देखा गया था। पिछले तीन वर्षों में, रोलापाडु और उसके आसपास इंडियन बस्टर्ड को एक दो बार देखा गया है। और इस साल यानी 2022 में इस पक्षी को एक बार भी नहीं देखा गया है।  2021 की  IUCN की रिपोर्ट के अनुसार इंडियन बस्टर्ड की आबादी पिछले कई वर्षों से घट रही है। वर्तमान में, इस प्रजाति की आबादी 50 से 249 के बीच है। जबकि कर्नाटक के सिरुगुप्पा के रेंज वन अधिकारी एन. मंजूनाथ के अनुसार, इस साल 15 मार्च को आखिरी बार ग्रेट इंडियन बस्टर्ड देखा गया था।

 

 

केंद्र सरकार द्वारा 14 वें (सीओपी) सम्मेलन  के दौरान संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन को प्रस्तुत किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि भारत ने एक दशक में  31 प्रतिशत, या 5.65 मिलियन हेक्टेयर घास के मैदान खो दिया, जिसका असर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे पक्षियों के दक्कन से गायब होने और गुजरात, राजस्थान में भी कम होते जाने के रूप में हुआ है। आंध्र  प्रदेश में ही 90  में 30-40 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड हुआ करते थे अब शायद इक्का -दुक्का रह गए हैं और जिसकी वजह हैबिटैट लॉस है।  वाइल्ड लाइफ हिस्ट्री ऑफ इंडिया के थार मरुभूमि पर आधारित आंकड़ों के मुताबिक पावर लाईन से हर साल देश में लगभग 1 लाख 18 हजार तक पक्षी मरते हैं।

 

भारत में विंडमिल्स पावर लाइनों के साथ ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के टकराव के साक्ष्य हैं भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा  किए गए सर्वेक्षण में  थार में,एक वर्ष में 7 बार दोहराई गई  80 किमी पावर लाईन्स के दायरे में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड समेत पक्षियों की लगभग 30 प्रजातियों के 289 शव मिले अध्ययन में 8 शव/ 10 किमी उच्च तनाव और 6 शव / 10 किमी निम्न तनाव पावर लाइन्स के पास मिली। और सर्वेक्षण से पहले विघटित हो जाने वाले शवों का मृत्यु दर अनुपात

अनुमानतः 5 पक्षी/ किलोमीटर /माह और 1 लाख पक्षी प्रति वर्ष 4200 वर्ग किमी क्षेत्र के भीतर है।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड  के संदर्भ में, 4 मृत्यु दर दर्ज की गई (2 सर्वेक्षण के दौरान और 2 सर्वेक्षण से इतर) सब उच्च तनाव संचरण लाइनों के कारण – कुछ उनमें से पवन टर्बाइनों से जुड़े हैं। 150 किमी हाई टेंशन लाइन द्वारा प्रतिच्छेदित बस्टर्ड अधिआवास में  लगभग 18 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड

के प्रति वर्ष मरने की संभावना होती है थार में लगभग 128 ± 19 व्यष्टि। यह उच्च मृत्यु दर (कम से कम 15% सालाना अकेले बिजली लाइनों के कारण) इस प्रजाति के अस्तित्त्व के लिए खतरनाक है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने पांच ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को पायलट आधार पर टैग किया था, जिनमें दो की मौत बिजली लाइन से टकरा कर हो गई, एक ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की मौत नलिया और अब्दासा तहसील के बीच पश्चिमी तटीय घास के मैदान में सुजलॉन के टरबाइन से जुड़े 33kv पावर-लाइन से टकराने से हुई थी। बस्टर्ड अपने अधिवास में लंबे समय तक जीवित रहने वाले पक्षी हैं लेकिन बिजली लाइनों के कारण अत्यधिक मृत्यु दर उनकी आबादी को अस्थिर और यहां तक ​​कि विलुप्त कर सकती है।

यूके के एक्सेटर विश्वविद्यालय के पीएच.डी.शोधकर्ता सिद्धार्थ दाभी जो कच्छ में विंडमिल्स का पर्यावरण और आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं, जो अगले सात -आठ महीने में पूरा होगा। सिद्धार्थ कहते हैं, कच्छ  एक शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र है, कच्छ गुजरात के कुल शुष्क क्षेत्रफल का 73%  है। कच्छ जिले में मिट्टी की गुणवत्ता बहुत खराब है और 51% क्षेत्र खारे रेगिस्तान से आच्छादित है लेकिन शुष्क क्षेत्र होने के बावजूद; कच्छ जैव विविधता की एक विस्तृत श्रृंखला के साथ संपन्न है जैसे रेगिस्तान, आर्द्रभूमि, ऊपरी भूमि, मिट्टी के फ्लैट, झाड़ियां, घास के मैदान, दलदली वनस्पति, खारे किनारे, खारे घास के मैदान, आदि जो वनस्पतियों और जीवों की एक विस्तृत विविधता का घर हैं। अपनी शुष्कता के कारण, कच्छ में बबूल सेनेगल, बबूल नीलोटिका, बबूल ल्यूकोफोलिया, ज़िज़ीफस एसपी, सल्वाडोरा एसपी, यूफोरबिया एसपी, बालनाइट्स एसपी, आदि जैसे झाड़ीदार वनस्पतियों के साथ घास के मैदानों से आच्छादित एक विशाल क्षेत्र है।  झाड़ीदार वनस्पति वाले ये घास के मैदान कच्छ के लोगों के लिए आजीविका के मुख्य स्रोत के रूप में पशुचारण और पशुधन के तौर पर  बहुत महत्वपूर्ण रहे हैं। इसके अलावा इन घास के मैदानों में स्तनधारियों और एविफ़ुना की एक विस्तृत श्रृंखला भी है; जिनमें से कई अब खतरे में हैं।

बन्नी सिद्धार्थ कहते हैं एक विंडमिल लगाने  में एक से डेढ़ हेक्टेयर  जमीन लगता है और कहीं भी एक विंड मिल नहीं लगाया जाता एक साथ कम कम 30 से 50 विंडमिल लगते हैं तो इससे जमीन खपत का अंदाजा लगाया जा सकता है साथ ही इस जमीन पर उगी वनस्पति और जीवों पर इसके असर का भी।  हैं पूरा तटीय कच्छ मिल्स विंडमिल्स से भरा हुआ है अब्रासा से लेकर सूजरबारी रिवर क्रीक तक और कच्छ का सेंट्रल रिज भी पाकिस्तान के नज़दीक तक, 30 से ज्यादा कम्पनियाँ विंडमिल्स लगा  रही हैं आप समझ  सकते हैं इसमें कितनी जमीन का इस्तेमाल होगा और किस स्तर तक ट्रांसमीशन लाइन बिछेगा।  जबकि कच्छ में पशुओं की संख्या मनुष्य से तीन गुना ज्यादा है भेड़ -बकरियां गाय और भैस, और वन्य जीवों की संख्या इससे अलग है। पालतू पशु कच्छ के लोगों की आजीविका का आधार हैं, सवाल है इन पशुओं के चरागाह तो विंडमिल्स के कारण बरबाद हो जाएगा  ही लोगों  आजीविका भी। सरकार इसे वेस्ट लैंड कह रही  जबकि कच्छ दुनिया में अपनी तरह का अकेला इकोसिस्टम है, जहाँ के कटीले जंगलों कई दशक में तैयार हुए हैं और रण में  उगी एक घास का भी बहुत ज्यादा पर्यावरणीय महत्त्व है और भारत सरकार के मुताबिक कच्छ के कंटीले वृक्षों वाले वन देश के आखिरी ऐसे बचे हुए वन हैं।

बन्नी सिद्धार्थ

 

इसके अलावा  बन्नी सिद्धार्थ एक महत्वपूर्ण बात ये भी बताते हैं कि  कच्छ और राजस्थान भारत में प्रवासी पक्षियों का प्रवेश बिंदु हैं लेकिन एंट्री पर ही विंडमिल्स इनका प्रवेश रोक सकती है। वो ये भी कहते हैं अपने शोध के पूरा होने पर वह निश्चित आंकड़ें बता पाएंगे लेकिन ये प्रभाव तुरन्त नज़र आनेवाले में से बेशक नहीं हैं, लम्बी अवधि में इसके दुष्प्रभाव स्पष्ट होंगे, इसलिए ऐसे शोध और अध्ययन की बहुत जरूरत है जो कि हो नही रहा।

 

हमने एस रितेश पोकर से भी बात की, रितेश पिछले आठ साल से सहजीवन संगठन से जुड़े हैं और इसके मार्फ़त मालदारियों, चरवाहों उनकी आजीविका, उनके कामकाज और ग्रासलैंड पर काम करते हैं। सहजीवन ने सेंटर फॉर पस्चरलिज्म शुरू किया है।  सहजीवन  प्रत्यक्ष रूप से विंडमिल्स पर काम नहीं करता लेकिन ग्रासलैंड पर काम करने के कारण इन्हें जहां विंडमिल्स लगे वहां के लोगों की  शिकायतें मालूम चलती है।  खेती के इलाकों और गांव के पास विंडमिल्स स्थापना के कारण लोगों को  तरह की परेशानी है। कच्छ के बन्नी ग्रासलैंड में सहजीवन ने बननी ब्रीडर असोसिएशन के साथ मिलकर एक रिसर्च सेंटर स्थापित किया है, रितेश पोकर इस स्टेशन को निर्देशित करते हैं।  रितेश सांगनारा गांव के बारे  बताते हैं कि शुरू में यहाँ 2 विंडमिल सरपंच  मंजूरी  लगवाई थी, उससे कोई  समस्या नहीं हुई लोगों को लेकिन अब वहां 100 टर्बाइन लगने वाले हैं।  गांववालों ने इसका विरोध किया  खिलाफ एनजीटी में गए क्योंकि इनके कारण उनके गांव  के साथ  जंगल ख़त्म  जाएगा, एक टरबाइन  लगने का मतलब 2 किलोमीटर जमीन का जंगल साफ़  हो जाना जबकि कटीले वृक्षों और झाड़ियों का यह  जंगल दशकों में तैयार हुआ है। इससे प्राकृतिक वाटर चैनल भी डिस्टर्ब होगा। लोग हमारे पास और भी शिकायत लेकर आ रहे हैं जैसे जिन जीव  वनस्पतियों  विलुप्त  खतरा है उनकी चिंता इसमें कुछ औषधीय पेड़ हैं जैसे गूगल जिससे दवाइयां और परफ्यूम  तैयार होता है, यह चिंकारा समेत कई विलुप्तप्राय वन्यजीवों का भी अधिवास है। मामले की  गंभीरता से इससे भी समझी जा सकती है कि गांववाले अलग-अलग  संगठनों के साथ मिलकर इसे बचाने की  रहे हैं।  एक सबसे बड़ा खतरा मोरों के बिजली के तारों से टकरा कर मरना है जिनके मरने की  संख्या  लगातार बढ़ती जा रही  है। इसकी तस्दीक तुषार पाटिल  जो डीसीएफ पच्छिमी कच्छ हैं की बात से होती है वो कहते हैं, पिछले तीन साल में  पवन चक्की से सम्बद्ध बिजली ट्रांसमीशन लाइन, टकराने और बिजली झटका लगने से 60 मोरों  हुई है जिसके कारण  यहाँ के आहार शृंखला और खेती प्रभावित हुई है।  मोर खेत के कीड़ों मकोड़ों समेत चूहों को भी खाते हैं इनकी घटती संख्या  कारन खेती में कीड़ें और चूहों  होनेवाला नुकसान बढ़ गया है।  इसके आलावा टर्बाइनों  आवाज और पंखों के आरपीएम के कारण मधुमक्खी यहाँ आती नहीं है या टकरा कर मर जाती हैं। इससे प्राकृतिक परागण प्रभावित हो रहा है  किसानों को बाहर से मधुमखियों  लाकर खेतों और पेड़ों पर छोड़ना पड़ताहै  है।

एस रितेश पोकर

 

डॉ पंकज जोशी भी सहजीवन के साथ जुड़े हैं जो प्लांट साइंस में पीएचडी और इकोलॉजिस्ट हैं और कच्छ, भुज में लम्बे समय से काम  कर रहे हैं। पंकज जोशी प्रत्यक्ष  विन्डविल्स से जुड़े नहीं है लेकिन वनस्पति और जैव विविधता के जिस लोकेशन में वो काम करते हैं वो अन्ततः विंडमिल्स से जुड़ जाता है। डॉ पंकज जोशी  कच्छ के इलाके में खासतौर पर ट्रॉपिकल थ्रोन फारेस्ट के अनोखेपन का जिक्र करते हैं, जो एक भी विंडमिल की स्थापना से प्रभावित होता है क्योंकि सिर्फ जंगल साफ़ करने की बात नहीं है ट्रांसमीशन लाइन, हेवी  गाड़ियों का आना आना और अन्य मानवीय गतिविधिया बढ़ जाती हैं जिससे आहार -शृंखला प्रभावित होती है और जिसका असर अंततः हैबिटैट के  सभी जीव  और वनस्पतियों पर पड़ता है फिर वन्य जीव उस अधिवास से चला जाता है। यहाँ करैकल, भेड़िया, हाइना चीता, पोक्सी चिंकारा मिलते हैं और 150 से ज्यादा प्रवासी पक्षी आते हैं, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया देहरादून ने विंडमिल्स के संदर्भ में विस्तार से लिखा है,वो कहते हैं हजारों  की संख्या में यहाँ आनेवाले प्रवासी डेमोइसेल क्रेन या  कुरजां के प्रवास बदलाव आ रहा है, ऐसे इलाकों में वो फीडिंग के लिए आ ही नहीं रहे हैं। ग्रासलैंड में बदलाव करने से आखिर यहाँ ग्रेट इंडियन बस्टर्ड हमेशा के लिए चले ही गए। डॉ पंकज जोशी अपनी बात ये कहकर ख़त्म करते हैं सीधे -गोली बन्दूक से ही किसी को नहीं मारा जाता आप किसी का घर तोड़ दें वो खुद  चला जाएगा या ख़त्म हो जायेगा। नाजुक विविधता के तमाम क्षेत्रों में छोटा सा बदलाव भी दूरगामी असर डालता है यहाँ तो बात बड़े बड़े विंड टरबाइन, हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन, भारी उपकरणों  की है, इन सबका असर आनेवाले सालों में स्पष्ट हो जायेगा।

 

 

भविष्य   

 

बहरहाल, दूसरी ओर, बीते साल नवंबर में संपन्न हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में, भारत पर 2050 तक ग्रीनहाउस गैसउत्सर्जन कुल शून्य पर लाने के लिए प्रतिबद्ध होने का काफी दबाव रहा है। उल्लेखनीय है कि एक अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट में कहा गया है “सफल वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के सभी रास्ते भारत से होकर जाते हैं,और ” “भारत का परिवर्तन वैश्विक परिवर्तन है।”

 

इस सन्दर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित 26वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (कॉप 26) में बहुत उल्लेखनीय घोषणा भी की जिसे “पंचामृत” कहा गया-

 

*2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को  500 गीगावाट (GW) तक किया जायेगा।

*2030 तक भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के  50 प्रतिशत की पूर्ति अक्षय ऊर्जा से करेगा।

* 2030 तक भारत अपने कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में एक अरब टन की कमी करेगा

*2030 तक, भारत अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता को 45 प्रतिशत से भी कम कर देगा

*और  साल 2070 तक भारत, कार्बन उत्सर्जन में नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा।

 

लेकिन पुनः पिछले दिनों इसमें भारत के द्वारा बदलाव किया गया है, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत क्या करेगा इस सन्दर्भ में भारत ने 2015 की वैश्विक स्तर की अपनी पांच प्रतिबद्धताओं में से दो को अद्यतन किया है जिसमें पहला यह है कि 2005 के स्तर की तुलना में 2030 तक भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 45% तक कम करेगा जबकि 2015 में  33-35% तक उत्सर्जन में  कमी करने की प्रतिबद्धता थी।  दूसरा बदलाव  2030 तक अपनी बिजली का लगभग 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करना है। 2015 का लक्ष्य 40% था। दूसरी प्रतिबद्धता के साथ ये भी स्पष्ट किया गया है कि इस लक्ष्य को  “प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और ग्रीन क्लाइमेट फंड सहित कम लागत वाले अंतरराष्ट्रीय वित्त की मदद से” हासिल किया जाएगा।

यहां प्रसंगवश इस बात का जिक्र जरूरी है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी केवल पांच प्रतिशत है जबकि विश्व की आबादी का 17 प्रतिशत भारत में रहता है। जाहिर है भारत की ओर से किये गए ये वायदे पर्यावरण और लगातार स्वच्छ और हरित ऊर्जा के लक्ष्यों की ओर बढ़ने के प्रति एक गंभीर और सुचिंतित पहल है।  इस क्रम में  पवन ऊर्जा या विंड एनर्जी भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है जो भारत में लागातर स्वच्छ और हरित ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण विकल्प रहा है।  भारत में साल  2022 तक पवन ऊर्जा की संभावित क्षमता  60,000  मेगावाट है और इसके लिए सात राज्यों को अनुकूल पाया गया है।  भारत सरकार  के नवीन और नवीनीकरण ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, पवन ऊर्जा कुल स्थापित क्षमता के सन्दर्भ में भारत दुनिया में चौथे स्थान पर आता है , वर्तमान में 39.25 GW (31 मार्च 2021 तक) की कुल स्थापित क्षमता के साथ साल 2020-21 के  दौरान पवन ऊर्जा से देश में लगभग 60.149 बिलियन यूनिट का उत्पादन किया गया। जहां आंध्र प्रदेश की कुल क्षमता 44228.60 एम डब्लू  है  जिसमें संस्थापित क्षमता फिलहाल 4096 . 65 एम डब्ल्यू है।

गौरतलब है कि भारत ने 2015 में, अपनी अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन प्रतिबद्धताओं के तहत,  2030 तक अपने  उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कटौती करने का वादा किया है और अपनी ऊर्जा का 50% लगभग 350,000 मेगावाट संस्थापित क्षमता से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।भारत अब इसी  वर्ष नवम्बर में आयोजित होने वाले अगले वैश्विक जलवायु शिखर सम्मेलन, COP27 से पहले अपना अद्यतन नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन  (NDC) संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) में प्रस्तुत करेगा।

भारत सरकार ने लगभग 54,000 मेगावाट के संस्थापित कुल पवन पार्क या पवन-सौर हाइब्रिड पार्क विकसित करने के लिए लगभग 10,800 वर्ग किलोमीटर भूमि की पहचान की है। लेकिन ऐसे पार्कों के लिए प्रस्तावित नीति पर्यावरण, भूमि और समुदायों से संबंधित चिंताओं के बारे में काफी हद तक चुप है लेकिन धीरे धीरे ये सभी सवाल इन परियोजनाओं के केंद्र में आएंगे और अरबों की परियोजनाओं समेत जीरो कार्बन उत्सर्जन प्रतिबद्धता को भी प्रभावित करेंगे ही। बेशक इसका हल  हरित ऊर्जा के नाम पर हरियाली के सवाल को दबाना नहीं बल्कि गांव के आम किसानों से बात करना है जैसे खुद हमें अनंतपुर में कागज पर सब ठीक नज़र आता रहा जब तक हमने गांव गांव जाकर उन किसानों और उनके परिवारों से बात नहीं की जहां या जिनकी जमीनों पर विंड टर्बाइन्स हैं। और जाहिर है उनकी परेशानी और उनके सवाल आने वाले दिनों में हरित ऊर्जा, पवन ऊर्जा के बड़े सवालों में से हैं जिनको हल किये बगैर आगे बढ़ना भारत सरकार के 2070 तक के जीरो कार्बन उत्सर्जन प्रतिबद्धता के लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम को पीछे करेगा।

 

 

(यह स्टोरी इन्टरन्यूज के अर्थ जर्नलिज़म नेटवर्क के सहयोग से की गयी है।)

छाया कोरेगाँवकर की कविताएं

कविता- छाया कोरेगाँवकर
अनुवाद- हेमलता महिश्वर

 

‘वह’ मुक्त ‘वह’ मुख़्तार –
‘वह’ सावित्री सत्यवान की,
साक्षात यम का आह्वान करनेवाली;

‘वह’ सावित्री ज्योतिबा की,
स्त्रियों के अस्तित्व को
अस्मिता की धुरी देनेवाली;

‘वह’ अभिमन्यु
गर्भ में ही युद्ध की
नाल समेट लेनेवाली;

उसके स्वातंत्र्य की बकवास
करनेवाले लड़वैयों को ही
स्वतंत्र होना होगा
‘पुरुष’ नामक
अनाम नशे से।

2.

कितना अच्छा हुआ
तू ज्योतिबा हुआ
इस सावित्री का
रटा-घोटा दिए धूलाक्षर
अंगुलियों के आदी हो जाने तक;
चुस्त कर दी पीठ पर धुरी
उसके पारंपरिक कुबड़ पर
स्नेहिल हाथ फिराकर;
साक्षरता का प्रमाणपत्र देते हुए
कितनी स्वाभाविकता से कहा,
“कुमकुम का कोई सत नहीं होता
गोदना ही मात्र तेरा है
चिता तक तो मैं साथ हूँ तेरे
मरना तुझ अकेले को ही होता है।”

3.

बचकाने दॉंव अधूरे ही रह गए
सो रानी अब रोती नहीं।
लगाती है पुनः नया दॉंव।
भगा देती है शिकारी कुत्ते
सिंदूर की आड़ से।
सिंदूर के सुरक्षित परकोटे में
रानी घुमती रहती है
नाच री घूमां!

अब रानी का दम घुटता है
रानी पोंछती है पुरानी पट्टी
उकेरती है नए सिरे से
स सावित्री का
स समता का
स स्वतंत्रता का
स सम्मान का
स संविधान का

राजा सावधान!
उसका प्रेम सघनतर होने लगा
और ताज के बदले
रानी पुनः शरणागत!

घूमां’ एक लोक नृत्य है जिसमें स्त्रियाँ घूम-घूमकर नाचती हैं।

4.

उसने कहा,
मैं तुम्हें हाथ दूँ
उसके पहले निकाल दो अपनी
कलाई से टचकी चूड़ियाँ;
हरी चूड़ियों की सनातन छनछन
मिटाए बग़ैर
मैं तुम्हें सुना न सकूँगा
शुद्ध मानवता के गीत.
मुक्त होने दो
सती-सावित्री के चमकदार रेशमी मिथकों में लिपटा
तुम्हारा आदिम स्त्रीत्व…
होने दो जाज्वल्यमान अपने भीतर
संस्कृति की कालिख से ढँका दीया …
और प्रकाशित होने दो उस उज्ज्वल प्रकाश में
तुम्हारे मेरे रिश्ते से परे जानेवाली
मानवता की पगडंडी

5.

शरीर के किस बिंदु से
आरंभ होता है स्त्री का स्त्रीत्व?
ठीक कौन-से ग्रंथ में समाया है
विशुद्ध वात्सल्य के विराट प्रवाह में …

कैसे कलंकित की जाती है उसकी समूची मानवता
यौन शुचिता के कागछुअन से

इतना घटिया फिर भी चीवट
स्त्रीत्व का मान बिंदु
किसने चिपकाया उसके मासूम मस्तक पर?

तब फिर रोपना तो पड़ेगा ही
स्त्रीत्व निरोधक रसायन
जन्मते ही आकार लेनेवाली
गर्भाशय में उसकी नन्हीं को!

6.

क्यों बढ़ा रही हूँ गुंथन मैं
तेरे- मेरे अंतस का?
और पूर रही हूँ अंगांग में
युगोंयुग की थकन
तुझमें बिला गई ‘मैं’ की करते तलाश

संभोग के अटल विराम के पश्चात्
पोछी जाती है त्वचा से
गहरे स्पर्श की महक पूर्णता के साथ

मेरी स्पर्शोत्सुक देह अब
देखती है होकर मुक्त
सीमित पारम्परिक बंधनों से-
उकेरकर देखती है स्वनिर्मित
ज़मीन के फलक पर
लिंगभेद के बरक्स नई बारहखड़ी

 

7.

एकांत की दीवार में चिनकर स्वयं को
मैं देखती हूँ रहस्य
मेरे भीतर की आदिम स्त्री का

छुड़ाती हूँ
‘उस’की जटिल गुँथन सनातन;

वृक्ष की जड़ पसरती है जैसे
शिलाखंड फोड़ती नमी की दिशा में
वैसी ही ‘उस’ की यात्रा
रिश्तों से रिश्तों की ओर

बढ़ती उम्र के साथ संपृक्त जीवन की
कोठरियाँ अनजाने खुलती चली जाती हैं
मॉं-बहन-प्रेमिका-सखी नामक
‘उस’ की सर्जक अंगुलियों की अथक यात्रा
तृषार्त,
एक सघन संवेद्य स्पर्श के लिए।

8.

पिंजरे के भीतर लगाया है वृक्ष
इसलिए दिया नहीं जा सकता
वचन, कली की सुरक्षा का
नोंच ली जाती हैं कलियाँ
गर्भ के गर्भ में ही अंकुरित होने के पूर्व
यहॉं तो खैरलांजी हत्याकांड से
निर्मित की जाती है दहशत
स्त्री के अवध्य गर्भागार में ही
विज्ञान-युग में कली खिलने हेतु
सुरक्षा-कवच का
होगा ही आविष्कार, ऐसा भी नहीं;
कदाचित तथागत को भी
आँखें खोलकर तलाश करना होगा
नगर-नगर में
बची-खुची ईसा गौतमी का …
अब सावित्री की बेटियों को
समयपूर्व ही होना होगा होशियार
धुलाक्षर उकेरने के पहले ही
हाथों में शस्त्र होने चाहिए
स्त्री के सतत् अस्तित्व के लिए

9.

बदलते नहीं उल्लेख वर्ष वर्षों तक
डायरी के हों या
जीवन के पन्ने

शिशु की स्मृति मात्र से उमड़ उठते
मॉं के वात्सल्य कुंभ
वैसी ही बेचैनी लगती है शब्दों को
डायरी के पन्नों में बह जाने की

तेरी चुप्पी के
काले कठोर पहाड़ को भेदते
क्षीण होती है
संपूर्ण स्त्रीत्व की मात्रा

तेरा बर्फीला अस्तित्व
हिमखंडी आत्म पर
लेता है ओढ़
शब्दों की आश्वस्त रजाई

एक ही छत के नीचे रहकर
आँच तक न लगी तुम्हें
घर में अखंड जलते
अग्निकुण्ड की;

मैं सहजता के साथ
घर के दरवाज़े की तरह
ओंठ भी बंद कर लेती हूँ
देहरी तेरे घर की जो आई हूँ
लांघकर

10

एक-दूसरे के कदमों से
क़दम मिलाकर
संग-साथ चलते हुए भी
राह विभाजित हो गई
एक अटल मोड़ में

श्वासोच्छ्वास मिलाकर
जीने के अद्वैत का
कोहरा विलीन हुआ
समांतर हुए हम एकमेक से

वैसे अब
रह भी नहीं गए छोटे
संसार नामक
बचकाने खेल में रमने लायक

सिंदूर पुँछ जाने पर भी
हरा ही रहता है गोदना
ऐसे ही, सारे रिश्तों के
विलीन हो जाने पर भी
तेरे मेरे में बची हुई
‘मैत्री’ बहुत है मेरे लिए
मंज़िल तक
पहुँचने को

भारतीय स्त्री अधिकार : एक ऐतिहासिक यात्रा

 

सुमुत्तिका, सुमुत्तिका, साधुमुत्तिकाम्हि मुसलस्स|

अहिरिको में छ्त्तकं वा पि, उक्खलिका मे देड्डुभं वा ति|| थेरी सुमंगलमाता

अहो! मैं मुक्त नारी हूँ! मेरी मुक्ति कितनी धन्य है!पहले मैं मूसल लेकर धान कूटा करती थी, आज मैं उनसे मुक्त हो गई हूँ| मेरी दरिद्रवस्था के वे छोटे-छोटे भांडे-बरतन, जिनके बीच में मैं मैली-कुचैली बैठती थी और मेरा निर्ल्लज पति मुझे उन छातों से भी तुच्छ समझता था, जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था. पृष्ठ 63

को नु ते इदमक्खासि, अजानन्तस्स अजानको|

दकाभिसेचना नाम, पापकम्मा पमुच्चति|| थेरी पुण्णा  पृष्ठ 204

गंगा-स्नान-शुद्धि से पाप-मुक्ति होती है, यह तुझसे किसने कहा? यह तो अज्ञानी, मूर्ख व्यक्ति का अज्ञानी मूर्ख के प्रति उपदेश है|

यह बारम्बार रेखांकित किये जाने योग्य है कि इसी देश की बौद्ध भिक्खुनियों ने इस पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध न केवल कदम उठाया अपितु अपनी गाथा लिखकर स्त्री स्वातंत्र्य का पहला लिखित दस्तावेज़ हमें उपलब्ध कराया.

समूचा वैश्विक परिदृश्य ही स्त्री विरोधी था वरना इस पर चिंतन न हो रहा होता और जॉन स्टुअर्ट मिल को यह न लिखना पड़ता –“सामाजिक और प्राकृतिक – सभी कारण मिलकर यह असंभव कर देते हैं कि महिलाएं संगठित तौर पर पुरुषों की सत्ता का विरोध कर सकें. वे इस अर्थ में पराधीन वर्ग से भिन्न स्थिति में हैं कि उनके मालिक उनसे वास्तविक सेवा के अतिरिक्त कुछ और भी चाहते हैं. पुरुष केवल महिलाओं की पूरी-पूरी आज्ञाकारिता ही नहीं चाहते, वे उनकी भावनाएं भी चाहते हैं. सबसे क्रूर और निर्दयी पुरुष को छोड़कर सभी पुरुष अपनी निकटतम सम्बन्धी महिला में जबरन बनाये गये दास की नहीं बल्कि स्वेच्छा से बने दास की इच्छा रखते हैं. अत: उन्होंने महिलाओं के मस्तिष्क को दास बनाने के लिए हर चीज का इस्तेमाल किया है. अन्य दासों के मालिक आज्ञाकारिता को बनाये रखने के लिए भय का प्रयोग करते हैं—उनका खुद का भय या फिर धार्मिक भय. स्त्रियों के मालिक साधारण आज्ञाकारिता से कुछ अधिक चाहते थे. और उन्होंने शिक्षा के पूरे बल का इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया. बचपन से स्त्रियों को यह सिखाया जाता कि उनका आदर्श चरित्र पुरुष के चरित्र से बिलकुल विपरीत होना चाहिए. इच्छा शक्ति और आत्म-नियंत्रण नहीं, बल्कि नियंत्रण और दूसरों के नियंत्रण के समक्ष झुक जाना उनका गुण होना चाहिए. सारी नैतिकता उन्हें यह बताती है कि यह महिलाओं का कर्तव्य है और सभी मौजूदा भावनाओं के अनुसार यह उनका स्वभाव है कि वे दूसरों के लिए जियें, पूर्ण आत्म त्याग करें और अपने स्नेह संबंधों के अतिरिक्त उनका अपना कोई जीवन न हो. स्नेह सम्बन्धों से तात्पर्य सिर्फ उन सम्बन्धों से है, जिनकी उन्हें इज़ाजत है—वे पुरुष जिनसे स्त्री सम्बन्धित हो या वे बच्चे जो पुरुष व उनमें एक अटूट व अतिरिक्त बंधन होते हैं.” विद्रोही स्त्री- जर्मेन ग्रीयर पृष्ठ 65

एक सुदीर्घ परम्परा के माध्यम से जड़ता की निर्मिती करते हुए स्त्री को अधिक से अधिक ग़ुलाम बनाकर रखने की साज़िश ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने क़ायम कर रखी थी. यह पुरुष अपने स्त्री नाते को मनुष्य की तरह नहीं बल्कि एक ऐसे रोबोट के तौर पर देखता है जो उसके संकेतों पर बगैर किसी देरी के, बगैर कोई दर्द महसूस किये ‘हुकुम मेरे आक़ा’ की तर्ज़ पर संचालित होता रहे. जर्मन ग्रीयर का उक्त कथन नि:संदेह स्त्री के पक्ष में है. तब भी यह चिंतन की माँग करता है. उन्होंने जिसे ‘सामाजिक और प्राकृतिक कारण’ कहा है, यहीं वह पेंच है जिसमें सुधार की आवश्यकता है. जिस कारण को सामाजिक के साथ प्राकृतिक बताया गया है, वह क्या है? प्राकृतिक बताते ही आपने दबाव को, डिस्क्रिमिनेशन को न्याय संगत बता दिया. चलिए मान लिया कि माहवारी और गर्भावस्था और आगे बढ़ें तो क्या इसमें धात्री को भी शामिल करेंगे(?) को प्राकृतिक कारण कहा जा रहा है तो बीमारी भी प्राकृतिक कारण है ही. कितने पुरुष बीमार नहीं पड़ते होंगे? क्या यह बीमारी अतिरिक्त देख-भाल की माँग नहीं करती? पर तब तो ‘स्त्री सत्ता’ जैसा कोई पद पुरुष के विरुद्ध सांगठनिक तौर पर कोई दमनात्मक व्यवहार नहीं करता. तो माहवारी या गर्भावस्था को कारण बताकर किसी भी तरह की छूट नहीं ली जा सकती.

स्त्री को सहज मानवोचित अधिकारों से लैस करने की लडाई लम्बी है. कानूनन हक़ सुरक्षित करने का सिलसिला आरम्भिक तौर पर देखा जाये तो एक सौ दस-पन्द्रह वर्ष दिखाई देते हैं. 28 नवम्बर 1890 जोतिबा फुले की मृत्यु और 14 अप्रेल 1891 डॉ आंबेडकर का जन्म लगभग 116 दिनों का अन्तराल है. स्त्री को मनुष्य के तौर पर स्वीकार्यता दिलाने के आन्दोलन का आरम्भ यानि सोचा जाये तो सन 1842 से सन 1955-56 तक अंजाम में ले आना एक महत्वपूर्ण यात्रा है. नि:संदेह इसके लिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के तौर पर पण्डित जवाहरलाल नेहरु की भूमिका भी असंदिग्ध है. किन्तु यह तय है कि महाराष्ट्र से स्त्री हक़ के लिए पुरजोर न केवल आवाज़ उठी अपितु वैधानिक काम भी किये गए. चित्तपावन ब्राह्मणों की सांस्कृतिक नगरी, पेशवाओं के  कार्यस्थल में अपने दम पर समस्त खतरों को उठाते हुए स्त्री को शिक्षा देने का कार्य फुले दंपत्ति ने किया था. यही कारण था कि फुले दंपत्ति को सार्वजनिक तौर पर 16 नवम्बर 1852 को मि. कैंडी ने सम्मानित किया. शिक्षित स्त्री कैसे समाज की मार्गदर्शक हो सकती है, यह सावित्री बाई फुले ने दिखा दिया.

नि:संदेह मनुस्मृति के माध्यम से भारतीय स्त्री ही नहीं, पुरुष को भी स्त्री विरोधी शिक्षा दी गई है जिसके संस्कार अब तक नहीं छूते हैं. आज तो हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना के साथ और भी सांसे भरते दिखाई दे रहे हैं. डॉ आंबेडकर ने ‘नारी और प्रतिक्रांति’ में स्त्री के समग्र विकास में अवरोध उत्पन्न करने वाले उन श्लोकों का संदर्भ दिया है जो मनुस्मृति में भी दर्ज़ हैं. इसके खिलाफ़ डॉ आंबेडकर ने हुंकार भरी थी. 19-20 मार्च 1927 को महाड चवदार तालाब के जल सत्याग्रह करने के बाद जो हालत निर्मित हुए थे, उसी का परिणाम था कि दिनांक 25 दिसम्बर 1927 को मनुस्मृति का दहन किया गया था.

27 दिसम्बर सन 1927 को दलित महिलाओं को सम्बोधित करते हुए बाबा साहेब ने उनसे मनुष्य की तरह बने रहने की अपील की. उन्होंने कहा-अस्पृश्यता निवारण की समस्या पुरुषों की न होकर स्त्रियों की ही है. आपने हम पुरुषों को जन्म दिया है. दुसरे लोग हमें जानवरों से भी गया-गुजरा समझते हैं. … आपको सोचना चाहिए कि ब्राह्मणों की स्त्रियों में जितना शील है, उतना ही आपमें भी है. ब्राह्मणों की स्त्रियों में जितना पातिव्रत्य है, उतना ही आपमें भी है और तुम्हारे भीतर जितना धैर्य, संकल्प और उत्साह है, वह ब्राह्मण स्त्रियों में नहीं है. ऐसे में तुम्हारे पेट से जन्म लेनेवाले बच्चे की अवमानना होती है. … यदि आपने सोचा होता तो पुरुषों के पहले आपने सत्याग्रह किया होता. … आप संकल्प लें कि ऐसी कलंकित स्थिति में हम जीवन नहीं गुजारेंगे. … दूसरे यह कि सारी पुरानी और गलीज़ परम्पराएँ छोड़ देंगे. ढ़ंग से साडी बांधे, गले भर और हाथ भर गिलट या चांदी के गहने न पहनें, एक ही काफ़ी है. और पहनना ही है तो सोने के आभूषण पहनें. गहनों के बदले कपड़े अच्छे पहनें. अपने पहनावे से ही आप अलग दिखाई देती हैं, सुरुचिपूर्ण रहें. पिछले मार्च से लोगों ने मरे हुए जानवर का मांस खाना बंद कर दिया है. पर यदि पुरुष ऐसा करता है तो स्त्री को चाहिए कि वह पुरुष को ऐसा न करने को ताकीद करे. डॉ बाबा साहेब आम्बेडकर लेखन और भाषण भाग 1, पृष्ठ 142-145

इस एक संबोधन ने दलित स्त्रियों में सम्मानपूर्वक जीने की ललक पैदा कर दी. अगले दिन जब वे अपने गाँवों को वापस जाने लगीं तो फाटे हुए ही सही पर उनके पहनावे में परिवर्तन दिखाई दिया. बाबा साहेब ने अपने सार्वजनिक जीवन में ही नहीं, अपने प्रशासनिक-राजनितिक जीवन में स्त्री अधिकारों की सुरक्षा के लिए मजबूत कदम उठाये.

28 जुलाई सन 1928 को बम्बई विधान मंडल में डॉ आंबेडकर ने प्रसूति लाभ विधेयक के संदर्भ में अपने मजबूत तर्क में कहा था- “किसी महिला का कोई नियोक्ता प्रसूति की अवस्था में महिला के हितों की रक्षा के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त होता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि नियोक्ता महिला को किसी उद्योग विशेष में इसलिए काम पर लगता है, क्योंकि उसको पुरुष की अपेक्षा महिला को काम पर लगाने से अधिक लाभ मिलता है… मेरा कहना है कि यद्यपि प्रसूति लाभ के मामले में निश्चित रूप से कुछ ज़िम्मेदारी सरकार को सौंपी गई है, तथापि मेरे विचार से यदि इन हालात में विधेयक में नियोक्ता को भी कुछ दायित्व सौंपा गया है, तो उससे विधेयक पूरी तरह गलत नहीं हो जाता. … इस विधेयक के माध्यम से सुझाये गए लाभ विधान-मंडल द्वारा उन गरीब महिलाओं को दिए जाने चाहिए, जो इस प्रेसिडेंसी में हमारी फैक्टरियों में कठिन परिश्रम करती हैं.” बाबा साहेब डॉ आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 3, पृष्ठ 185-187

जब भी भारतीय स्त्री के संवैधानिक अधिकारों की व्यवस्था की चर्चा होती है, हिन्दू कोड बिल का संदर्भ अवश्य आता है. नि:सन्देह हिन्दू कोड बिल भारतीय संविधान शिल्पकार बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेडकर का महत्वाकांक्षी बिल था. स्त्री मात्र  के सम्मान की कानूनन व्यवस्था डॉ आंबेडकर का सपना था. सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति लिखते हैं – “जब बाबा साहेब वायसराय की कौन्सिल के सदस्य थे, उस समय से ही उनके मन में हिन्दू कोड बिल को बनाने का कई बार विचार उठा था. सर अकबर हैदरी और सर बी.एन. राय आदि महानुभावों ने इसकी रुपरेखा तैयार करने का संकल्प लिया.” पृष्ठ 6-7 हिन्दू कोड बिल और डॉ आंबेडकर

हिन्दू कोड बिल तैयार करने इतना आसान कार्य भी न था जबकि “ भारत के स्वतंत्र होने से कुछ समय पहले से ही हिन्दुओं का सुधारवादी वर्ग मुस्लिम और ईसाईयों की भांति हिन्दुओं के लिए भी कोई वैद्य और प्रमाणिक कोड या कानून बनाने के लिए इच्क्षुक अवश्य था, किन्तु ऐसे जटिल और सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक क्रान्तिकारी कानून को कौन बनाये और संसद में उसे पारित कराये. ऐसा कोई भी शूरवीर एवं विधि विधानकों का अकाण्ड पंडित भी इस हिन्दू कोड को जो उस्तरों की माला था, अपने गले में पहनने के लिए तैयार नहीं था. हिन्दुओं में उच्च वर्णों में भी सुधारवादी व्यक्ति जन्म लेते रहे हैं. किन्तु वे जानते थे की राजनैतिक काम करने, जेलों में स्वराज्य प्राप्ति के लिए बरसों बंद रहने की अपेक्षा हिन्दुओं में धार्मिक और सामाजिक क्रांति लाना अति कठिन है. हिन्दू धर्मी राजनितिक तौर पर भले ही चुस्त रहे हों और स्वराज्य प्राप्ति के लिए अति भयानक पीड़ाएँ भी सही हों, किन्तु वे राजनितिक हिन्दुओं में धार्मिक और सामाजिक सधार या क्रान्ति लाने में अत्यंत धर्मभीरू और डरपोक रहे हैं. उनमें इतनी जुर्रत ही नहीं थी कि वे हिन्दुओं के धार्मिक और सामाजिक ढ़ाँचे में किसी प्रकार की क़ानूनी तब्दीली या परिवर्तन ला सकें.” पृष्ठ48 हिन्दू कोड बिल और डॉ आंबेडकर

डॉ आम्बेडकर ने विरोधियों से संवाद बनाकर बिल सम्बन्धी समस्त भ्रान्तियों को दूर करने का प्रयास भी करना चाहा पर असफल रहे. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति से एक ऐसा संस्कृत विद्वान ढूंढ़कर लाने को कहा जो बिल के पक्ष में संस्कृत शास्त्रों से संदर्भ तलाशकर दे. सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति की तलाश वेदों के सुप्रसिद्ध विद्वान पंडित धर्मदेव विद्यावाचस्पति पर ठहरी. पंडित धर्मदेव विद्यावाचस्पति ने तत्कालीन दैनिक ‘वीर अर्जुन’ में कुल 13 लेख माला प्रकाशित करवाई जिसमें हिन्दू कोड बिल को शास्त्र सम्मत ठहराने का प्रयास किया था.  यह लेख निम्नानुसार थे –

  1. हिन्दू कोड बिल हिंदुत्व का रक्षक है.
  2. विवाह सम्बन्धी धाराएँ
  3. विवाह-विच्छेद की परिस्थितियाँ
  4. विवाह-विच्छेद और स्मृति आदि ग्रन्थ
  5. दत्तक-विधान और संरक्षकता
  6. संपत्ति में स्त्रियों के अधिकार
  7. संपत्ति में स्त्रियों के अधिकार
  8. स्त्रियों के दायभागाधिकार
  9. स्त्रियों के दायभाग और स्मृतियाँ
  10. पुत्रियों के दायभागाधिकार पर विमर्श (पूर्वार्द्ध)
  11. पुत्रियों के दायभागाधिकार पर विमर्श (उत्तरार्द्ध)
  12. संयुक्त परिवार प्रथा
  13. हिन्दू कोड बिल की आवश्यकता

उक्त सारे प्रावधान का एक अत्यंत रेखांकित किये जाने योग्य कारण और भी है. महाड़ जल सत्याग्रह के बाद विविध स्थानों में दलित वर्ग की सभाएँ होने लगीं. इन सभाओं में स्त्री-पुरुष दोनों ही भाग लेते. दलित स्त्रियों की भी अलग-अलग स्थानों पर सभाएँ होने लगीं. साथ ही आंबेडकर दलित तरुण संघ (विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास –एच.एल.कोसारे पृष्ठ 279 भी स्थापित होने लगे. स्त्रियों द्वारा ली जा रही सभाओं में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से माँग के तौर पर जो प्रस्ताव पारित किये जा रहे थे, वे पूरी तरह से दलित स्त्री की राजनितिक भूमिका निर्मित कर रहे थे. दो-चार उदाहरण यहाँ दृष्टव्य हैं-

बुलढाणा ज़िला अस्पृश्य महिला परिषद

मतकापुर में दिनांक 28 मार्च 1934 को अस्पृश्य महिला परिषद का अधिवेशन मिसेस कमलाबाई रेगे की अध्यक्षता में हुआ।

परिषद में पारित प्रस्ताव-

(1) अस्पृश्य बालक बालिकाओं की शिक्षा के लिए सरकारी रिपोर्ट मतलब किलरो रिपोर्ट के अनुसार व्यवस्था करना

(2) शारदा बिल का अमलीकरण

(3) बालकों के नॉर्मल तथा बालिकाओं के फ़ीमेल नॉर्मल स्कूल में अस्पृश्य बालक-बालिकाओं को अधिक सुविधाओं की माँग। (4) मंदिर प्रवेश बिल आदि प्रस्ताव पर सौ. कांताबाई इंगले, राईबाई, केसरबाई वाकोडे, अहिल्यबाई, काशीबाई भगत, भारजाबाई, सौभद्राबाई, राधाबाई तायडे, सखुबाई तायडे, भीकाबाई वाघ, चिंधाबाई वाघ आदि के भाषण हुए। (जनता दिनांक 21-4-1934)

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 280

अस्पृश्य महिलाओं की सभा

जनता साप्ताहिक में 5 मई 1934 को प्रकाशित समाचार के अनुसार अप्रेल 1934 में तुमसर में सौ.सुभद्राबाई रामटेके (श्री नारायण दलाल रामटेके की पत्नी) की अध्यक्षता में अस्पृश्य महिलाओं की सभा हुई।

सभा में अग्रलिखित प्रस्ताव पारित हुए-

(1) सारी स्त्रियाँ अपने-अपने बच्चों में शिक्षा के प्रति रूचि जागृत करने का प्रयास करते हुए स्वयं भी थोड़ी-बहुत शिक्षा प्राप्त करने का प्रयत्न करे।

(2) कांग्रेस के नाम पर जो अस्पृश्यता निवारण का ढोंग और दिखावटी कार्य चला रहे हैं, उन कार्यकर्ताओं का निषेध

(3) अपने समाज के कुलनाशक गवई आदि अस्पृश्य मंडल और उन्हें गुमराह करनेवाले डॉ मूंजे आदि हिंदू सभावालों का तीव्र विरोध

(4) डॉ आंबेडकर के कार्यों को समर्थन

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे,पृष्ठ 281

अस्पृश्य महिला सुधारक मंडल

नागपुर इमामवाडा में दिनांक 26 अप्रैल 1937 को डॉ आंबेडकर के जन्मदिवस के अवसर पर सौ.जानकीबाई फूले (रावसाहेब फूले की पत्नी) की अध्यक्षता में नागपुर महिला वर्ग की ओर से सार्वजनिक सभा का आरंभ हुआ। इसमें कु.सत्याभामा पाटील, सौ.अंजनीबाई देशभ्रतार, सौ.सकुबाई मेश्राम, सौ.राधाबाई कांबले, कु.दालंबीबाई तोतडे, सौ.कौसल्याबाई आदि वक्ताओं के भाषण हुए और निम्नलिखित प्रस्ताव पारित हुए –

  1. अस्पृश्य महिलाओं के सुधार के लिए सामाजिक,धार्मिक और आर्थिक अधिकार दिलाने के लिए अस्पृश्य महिला सुधारक मंडल स्थापित करते हुए स्वयं के पैरों पर खडे रहने के लिए अपनी उन्नति करना।
  2. डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ही हमारे अस्पृश्य समाज के नेता हैं,उनके कदम से कदम मिलाकर हम अस्पृश्य महिलाओं का सुधार करेंगे, यही हमारा उद्देश्य होगा।

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 344

अस्पृश्य महिलाओं की सभा

धरमपेठ नागपुर में दिनांक 1 जनवरी 1938 को श्रीमती सखुबाई मेश्राम की अध्यक्षता में अस्पृश्य महिलाओं की सभा का आयोजन किया गया। सौ.अंजनीबाई देशभ्रतार और श्रीमती सखुबाई मेश्राम ने नागपुर में बड़े दिन के अवसर पर आयोजित अखिल भारतीय महिला परिषद में स्पृश्य बहनों के अस्पृश्य बहनों के प्रति पराएपन, विखंडित भाव, ओछापन और नीच वृत्ति के आचरण पर सोदाहरण बात की। इसके आगे उन्होंने बताया कि अस्पृश्य समाज की स्त्रियाँ अपना सुधार और उन्नति करें और अपने स्वाभिमान और स्वावलंबन का आंदोलन चलाकर समाज के लिए नि:स्वार्थ कार्य करें। दूसरे लोग हमारा सुधार करेंगे, यह भ्रामक धारण छोड़कर अपने ही पैरों पर खड़े होकर स्वयं का, अपने कुटुंब का और समाज का सुधार करे। इसी तरह शिक्षा, शुद्धता, स्वच्छता, सादा जीवन और भाषा और संगठन के संदर्भ में बहुत सारी बातें कहीं।

सभा में ऑल इंडिया महिला परिषद का अधिवेशन जो नागपुर में हुआ था, में स्पृश्य बहनों ने अस्पृश्य समाज की सौ.नाईबाई चौधरी वगैरह को भोजन के समय अलग दूर बैठालकर भोजन कराया और अस्पृश्य समाज से छूत मानते हुए अपमानित किया । इसलिए इस अखिल भारतीय महिला परिषद का तीव्र निषेध प्रस्ताव पारित किया गया।

इसके बाद ‘श्रीमती रमाबाई आंबेडकर महिला संघ’ की स्थापना हुई अध्यक्ष सौ. शारदाबाई तागडी चव्हाण, उपाध्यक्ष सौ.नगुबाई सूर्यवंशी, कोषाध्यक्ष सौ.यशोदाबाई सूर्यवंशी, सचिव श्रीमती सखुबाई मेश्राम, सह सचिव कु.चांगोनाबाई लांबधरे और अन्य सदस्य नियुक्त किए गए।

उपरोक्त मंडल के तत्वावधान में यहाँ एक ‘अस्पृश्य महिला नाइट स्कूल’ आरंभ करनेकी घोषणा की गई। (जनता दिनांक 22-1-1938)

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 354

उमरेड तालुक़ा महिला परिषद

दिनांक 20-4-1940 को उमरेड तालुक़ा महिला परिषद सौ.सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। इसमें डॉ आंबेडकर की दीर्घायु की कामना की गई। इसी तरह

  1. प्रदेश में विभिन्न स्थानों में महिला समता सैनिक दल की स्थापना की जाए।
  2. भावी संविधान में विधान-मंडल में अस्पृश्य महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित रखें जाएँ,जैसे प्रस्ताव पारित हुए। (जनता दिनांक 29-6-1940)

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 390

उक्त सभाओं का आयोजन स्त्रियाँ ही कर रही थीं और सचेत राजनितिक निर्णय ले रही थीं. शिक्षा के प्रति जो चेतना फुले और डॉ आंबेडकर ने जगी थी, उसे प्राप्त करने और बच्चों को शिक्षित करने की चाह में रात्रि पाठशाला की भी फल करती है. अपने साथ होनेवाले अस्पृश्य व्यव्हार को उजागर करने के लिए स्पृश्य स्त्रियों द्वारा किये गये छद्म व्यवहार का निषेध भी करती हैं. न केवल इतना अपितु विधान माडलों में अस्पृश्य स्त्रियों के लिए स्थान आरक्षित करने की संवैधानिक व्यवस्था की भी मांग करती हैं. डॉ अम्बेडकर के नेतृत्व में जो भूमिका लेती हुई ये स्त्रियाँ आज से लगभग अस्सी–नब्बे वर्ष पहले दिखाई देती हैं, उसी का परिणाम है कि हम आज संविधान के माध्यम से नागरिक होने का दर्जा प्राप्त कर रहे हैं.

इसी कड़ी में सन 1942 को नागपुर में संपन्न हुई एक और महिला परिषद का उल्लेख यहाँ विस्तार से करना समीचीन होगा. दिनांक 20 जुलाई 2022 को इस सभा को पूरे 80 वर्ष हो जायेंगे. दिनांक 19 जुलाई 1942 को अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद, नागपुर में आयोजित की गई. यहाँ दूसरे दिन यानि 20 जुलाई को स्त्रियों की सभा भी हुई जिसे डॉ आंबेडकर ने सम्बोधित किया. इसका पूर्ण विवरण निम्नानुसार है-

“अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद, नागपुर

दूसरा अधिवेशन 20 जुलाई 1942

कार्यकारी मंडल 

स्वागताध्यक्ष – सौ. कीर्तिबाई पाटील

उपाध्यक्ष – कु. लतिकाबाई गजभिये

श्रीमती राधाबाई कांबले

महा सचिव – सौ. इंदिराबाई पाटील

संयुक्त सचिव – कु. कौशल्या नंदेश्वर

संयुक्त सचिव –कु. मंजुला कानफाडे 

सदस्य – कु. राधाबाई बोश्वर

कु. प्रभावती रामटेके

श्रीमती जाईबाई चौधरी

कोषाध्यक्ष – श्रीमती दालंबाबाई हाडके

अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद का दूसरा अधिवेशन दिनांक 20 जुलाई 1942 को नागपुर के मोहन बाग में स्थापित अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद के भव्य मंडप में आयोजित हुआ। अधिवेशन में 75 हज़ार से अधिक लोग उपस्थित थे। और इनमें से 25 हज़ार दलित महिलाएँ थीं। मंच पर डॉ आंबेडकर और अन्य नेतागण थे। 

दलित वर्ग महिला परिषद की अध्यक्ष के रूप में मिसेज शिवराज का चयन हुआ था। मद्रास की मिसेज शिवराज अपरिहार्य कारणवश न आ सकीं इसलिए नासिक की कु. शांताबाई दाणी से निवेदन किया गया। उन्होंने अध्यक्ष पद सहर्ष स्वीकार किया पर ऐन वक्त पर बीमार पड़ गईं। इस कारण अलीगढ़ की कु नंदादेवी गौड़ को निमंत्रण दिया गया। पर उनका नागपुर आना संभव नहीं हो सका। अंतत: समय की कमी को देखते हुए अमरावती की सौ. सुलोचनाबाई डोंगरे का चुनाव दलित वर्ग महिला परिषद के अध्यक्ष के रूप में किया गया। और सौ. सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में परिषद का कार्य आरंभ हुआ। 

सौ. कीर्तिबाई पाटील ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। इसके बाद सौ. इंदिराबाई पाटील महासचिव ने अपना प्रतिवेदन परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया। दलित महिला अधिवेशन में बहुत सारे प्रस्ताव पारित किए गए। इन प्रस्तावों पर सौ. जाईबाई चौधरी, सौ. राधाबाई कांबले, कु. प्रभावती रामटेके, कु. भीमाबाई बडगे, कु. मंजूला कानफाडे, कु. लतिका गजभिये, कु. सुलोचना नाईक अमरावती, कु. वीरेंद्राबाई तीर्थंकर, कु. चंद्रभागा पाटील गोंदिया, कु. कौशल्या नंदेश्वर के भी भाषण हुए। 

डॉ आंबेडकर का भाषण

अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद, के अधिवेशन में डॉ आंबेडकर ने अपना बहुत छोटा पर महत्वपूर्ण भाषण दिया। परिषद में 20-25 हज़ार से ऊपर प्रचंड महिला समुदाय को देखकर उन्हें अपरिमित आनंद प्राप्ति बताते हुए डॉ आंबेडकर ने अपने भाषण में कहा कि, “स्त्री वर्ग में जागृति हुई तो वे अस्पृश्य समाज में बहुत बडी प्रगति निर्मित कर सकती हैं, मुझे इसका विश्वास है। महिलाओं की संगठित संस्थाएँ होना चाहिए, मेरा इस पर विश्वास है। उनकी सबसे बड़ी सेवा यह है कि उनमें सामाजिक दुर्गुण नहीं है। मैं अपने अनुभव से कहता हूँ। दलित समाज का कार्य जब मैंने अपने हाथों में लिया तभी यह निर्धारित किया था कि पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी आगे ले जाना चाहिए। इसी कारण हमारी परिषद के साथ ही महिला परिषद भी आयोजित हो रही है। स्त्री समाज ने कितनी प्रगति की है, इससे मैं दलित समाज की प्रगति को नापता हूँ। इस परिषद में महिलाओं की प्रचंड संख्या देखकर मुझे विश्वास हुआ और आनंद हो रहा है कि हमारी प्रगति हुई है।”

डॉ आंबेडकर ने दलित महिलाओं को जो संदेश दिया वह बहुत महत्वपूर्ण। उन्होंने आगे कहा,”स्वच्छता के साथ रहना सीखें। सारे दुर्गुणों से दूर रहें। अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करें। उनमें महत्वाकांक्षा निर्मित करें। वे बड़े महान बन सकते हैं, ऐसा उनके मन मे रोपें, उनके मन से सारी प्रकार की हीन भावना निकाल दें। उनकी शादी करने की जल्दी न करें क्योंकि शादी एक ज़िम्मेदारी है। शादी की ज़िम्मेदारी संभालने की उनकी कूव्वत जब तक नहीं होती तब तक शादी न करवाएँ। शादी के बाद ज्यादा बच्चे पैदा करना अपराध है, यह शादी करनेवालों को ध्यान रखना चाहिए। तुम्हें यदि सुख सुविधा उपलब्ध नहीं थी तब भी अपने बच्चों को अच्छी स्थिति में रखना माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। शादी करनेवाली हर लड़की को चाहिए कि वह अपने पति के उद्देश्य के पक्ष में खड़ी हो, उनकी दासी बनकर नहीं बल्कि बराबरी के नाते से, मित्र कहलाते हुए। इस संदेशानुसार यदि आपने अपने कर्तव्य किए तो आप अपने साथ-साथ दलित वर्ग का भी अभ्युदय करेंगे और सम्मान बढ़ाएँगे।

परिषद में पारित प्रस्ताव

अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद में अग्रानुसार महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकृत किए गए-

  1. अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद में दिनांक19 जुलाई 1942 को स्वीकृत हुए प्रस्तावों को यह परिषद अपने अंत:करण से समर्थन देती है।
  2. हमारे समाज में पति-पत्नी में अनबन होने पर समझौते के आधार संबंध समाप्त करने के अधिकार को क़ानूनी मान्यता दी जाए। इस संबंध में सरकार और समाज के नेता उचित सुधार करते हुए तत्संबंधी क़ानून बनाए,परिषद यह माँग करती है। 
  3. हमारे समाज में एक ही समय पर पुरुषों द्वारा एक से अधिक विवाह करने की जो रूढ़ प्रथा है,बहुत अन्यायी और ज़ुल्मी प्रथा होने के कारण अधिक शादियाँ करने की प्रथा क़ानूनन बंद की जाए, ऐसा निवेदन परिषद सरकार से करती है।
  4. भारत के कारख़ानों की मजदूर स्त्रियों,बीड़ी मजदूर स्त्रियों, म्यूनिसिपल और रेलवे की मजदूर स्त्रियों को अपने कारख़ाने में काम करते हुए अन्य नौकरियों की तरह वर्ष में 21 दिन का आकस्मिक अवकाश और एक माह का अर्जित अवकाश, काम करते हुए किए दुखद घटना घट जाए तो वाजिब नुक़सान की भरपाई मिलना चाहिए। इसी तरह से 20 वर्ष की नौकरी होने पर कम से कम 15 रुपये प्रतिमाह की पेंशन संस्था की ओर से मिलने की कानूनन व्यवस्था की जानी चाहिए। यह परिषद नागपुर वाइसराय के कार्यकारी मंडल के नेक नामी मजदूर मंत्री से आग्रहपूर्वक निवेदन करती है। 
  5. (अ) महिला वर्ग शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। उनमें शिक्षा का प्रचार करने के लिए प्रत्येक प्रांतीय सरकार प्रत्येक इलाक़े में50लड़कियों के लिए छात्रावास सरकारी खर्च से बनाए, यह परिषद सरकार से यह निवेदन करती है। 

(ब) अस्पृश्य घोषित किया गया समाज अत्यंत दरिद्र है. इस कारण अपने बच्चों को माध्यमिक और उच्च दर्जे की शिक्षा प्राप्त करनेवाली प्रत्येक छात्रा को सारी सरकारी और अर्द्ध सरकारी शालाओं में मुफ़्त और स्कॉलरशिप देने की व्यवस्था प्रत्येक प्रांतीय सरकार अविलंब करे, यह परिषद ऐसा गर्मजोशी और आग्रह की विनती करती है।

(स) प्रांतीय सरकार से निवेदन है कि अस्पृश्य मानी गई महिला वर्ग की अशिक्षा और पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर उनके लिए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा योजना बनाते हुए उसे शीध्रातिशीघ्र अमल में लाना आवश्यक है।

  1. मध्यवर्ती सरकार से निवेदन है कि मिलों में काम करनेवाली स्त्रियों के काम का निरीक्षण करने के लिए बहुत सारी जगहों पर पुरुषों की नियुक्ति की जाने के कारण कामगार महिलाओं पर अत्याचार और ज़ुल्म होते हैं,इसलिए मिलों या अन्य जगहों जहाँ स्त्रियाँ सामूहिक तौर पर काम करती हैं, उनके निरीक्षण के लिए स्त्री कामगार ही रखी जाएँ, सरकार कानूनन ऐसी व्यवस्था करे। 
  2. सरकार से निवेदन है कि जिस तरह से मध्यवर्ती और प्रांतीय विधान मंडल में,इसी तरह स्थानीय स्वराज संस्थाओं में स्त्री प्रतिनिधि ली जाती हैं, उसी तरह से अस्पृश्य मानी गई महिलाओं की सर्वांगीण उन्नति के लिए उनके प्रतिनिधि उक्त उल्लेखित सारे स्थानों पर आरक्षित स्थान के माध्यम से रखे जाने की व्यवस्था सरकार क़ानून के द्वारा करे। 
  3. यह परिषद यह तय करती है कि “अखिल भारतीय दलित महिला फेडरेशन” की स्थापना करते हुए उसके खर्च के लिए आवश्यक फंड जमा किया जाए।“विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 444 -446

            उक्त सन्दर्भ में गौर करने लायक तथ्य यह है कि डॉ आंबेडकर दलित स्त्रियों में सामाजिक राजनितिक चेतना तो जगा रहे हैं पर महत्वपूर्ण यह भी है कि दलित स्त्रियाँ कैसे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रही हैं. प्रस्ताव क्रमांक दो पर विशेष चर्चा की जानी चाहिए जब वे आपसी समझौते के आधार पर अलग हुए दंपत्ति को कानूनन अलग होने की व्यवस्था की माँग कर रही हैं. क्या ऐसी मांग और कहीं से उठी थी? सम्बन्ध-विच्छेद को क़ानूनी ज़ामा पहनने की माँग स्त्री के किस अधिकार की रक्षा करता है, क्या यह अब भी खोलने की ज़रूरत है जबकि तरह-तरह के केस न्यायालयों में स्त्री-उत्पीडन से सम्बन्धित हों?

आज सरकारी या गैर सरकारी नौकरी में जिस तरह से पेंशन, आकस्मिक अवकाश, प्रसूति लाभ आदि समस्त कर्मचारी अधिकार दिलाने के लिए डॉ आम्बेडकर के नेतृत्व में स्त्रयां अतत आवाज़ उठती रहीं. दलित समाज अंग्रेजों की प्रशंसा इसलिए करता है कि इस समय ही उनके मनुष्य होने को स्वीकार्यता मिली. अँगरेज़ सरकार ने ही सती प्रथा उन्मूलन 1829, विधवा पुनर्विवाह 1856, बालिका हत्या पर पाबन्दी 1870 पर कानून बनाये. “सन 1917 में स्त्रियों ने सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में विमेंस इंडियन एसोसिएशन के तत्वाधान में सर्वप्रथम पुरुषों के बराबर मताधिकार की मांग की थी.” भारत में स्त्री समानता – गोपा जोशी पृष्ठ100 डॉ आंबेडकर के नेतृत्व में दलित स्त्रियाँ विधान-मंडल और संसद में अपने लिए आरक्षित स्थान मांग रही थीं. पूना पैक्ट के सरे विवाद से परिचित ये स्त्रियाँ हिन्दुओं की चालाकी से परिचित थीं. 20 मार्च 1927 को महाड़ के चवदार तालाब के जल सत्याग्रह के बाद जिस तरह से गोबर और गोमूत्र से तालाब को शुद्ध किया गया था, यह घटना हिन्दुओं की दलितों के प्रति मानसिकता को प्रदर्शित करने के लिए काफ़ी थी. चवदार तालाब में दलितों को पानी पीने का क़ानूनी अधिकार सन 1936 को मिल पाया. और वह भी तब जबकि अंग्रेज सरकार थी. आज जबकि पूरा देश स्वतंत्रता का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहा है, दलितों, दलित स्त्रियों के उत्पीडन की जिस तरह से खबरें आ रही हैं, शर्मनाक है. शर्मनाक यह भी है कि सरकारी नौकरियों में आज भी बैकलाग बाकी है. जब सरकार का चेहरा धर्म-निरपेक्ष था, तब आरक्षित स्थानों में भारती नहीं हो सकी तो इस हिन्दू राष्ट्र की कल्पना के नक्कारखाने में अब क्या होगी? डॉ आम्बेडकर इसीलिए राजनितिक स्वतंत्रता के पहले सामाजिक समता को पर बल देते रहे.

अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद, नागपुर सन 1942 के अस्सीवें वर्ष में स्त्री सम्मान की यात्रा को देखना बिला शक़ रोमांचकारी है. जिनका कोई अस्तित्व नहीं था, उन्होंने समाज में सम्मान पाने के लिए जो संघर्ष किया, उस ज़ज्बे को नमन.

अभी मैं मुम्बई यात्रा पर थी. यहाँ एक खुबसुरत अनुभव हुआ. सभी मराठी स्त्री रचनाकार अपने जीवनसाथी का नामोल्लेख करते हुए ‘माझा जोतिबा’ कह रही थीं. सहजीवन का सबसे बेहतर आदर्श हमारे समक्ष जोतिबा-सावित्री फुले हैं. पहली बार जब मैंने श्यामल गरुड़ जी से ‘माझा जोतिबा’ यानि ‘मेरा जोतिबा’ सुना तो बहुत रोमांच हुआ. जब मैंने छाया कोरेगाँवकर जी से ‘माझा जोतिबा’ सुना, तो भी उतना ही रोमांच हुआ. पर अब सोच रही हूँ तो आनन्दाश्रु ढ़लक पड़े हैं. स्त्री जीवन को सम्मानित करने का श्रेय इसी फुले दंपत्ति को जाता है. कितना ही अच्छा हो कि ऐसे दम्पत्तियों को “फुले दंपत्ति सम्मान” दिया जाये जो मानव मात्र के जीवन स्तर को सामाजिक, धार्मिक बेड़ियाँ काटकर सतत प्रगति पथ पर ले जाने को किसी भी तरह से सन्नद्ध हों और उसे अंजाम तक पहुँचाएँ।

लेखिका का परिचय –
हेमलता महिश्वर
जसोला विहार, नई दिल्ली

हिन्दी नवजागरण और स्त्री प्रश्न

सुरेश कुमार

वास्तव में देखा जाए तो बीसवीं सदी का दूसरा और तीसरा दशक अस्मितावादी सरगर्मी से भरा रहा है। इस दशक में जहां हिन्दी लेखकों के भीतर पुराने मूल्यों के प्रति मोह भी दिखा, वहीं नवीन विचार अपनाने की ललक भी दिखायी दी। इसी दशक में साहित्यिक क्षेत्र में ‘चाँद’, ‘माधुरी’, ‘सुधा’, ‘विशाल भारत’, ‘मनोरमा’,‘त्यागभूमि’ आदि स्वाधीनतावादी चेतना से लैस पत्रिकाओं का उदय हुआ था। इन पत्रिकाओं के संपादक और लेखक    स्वराज की मांग के साथ स्त्री और अछूत समस्या का एजेंडा अपने लेखन में जोड़ लिया था। देखा जाए तो इस लेख के केंद्र में हिन्दी नवजागरण कालीन संपादकों और लेखकों के स्त्री संबंधी विचार है। इस लेख के पहले हिस्से में इस बात की पड़ताल करने का  प्रयास किया गया है कि बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में स्त्री लेखिकाएँ अपने अधिकारों की दावेदारी किस तरह पेश कर रही थी।  लेख के दूसरे हिस्से में इस बात की पड़ताल की जाएगी कि इस दशक के हिन्दी संपादकों और लेखकों का स्त्री संबंधी नज़रिया क्या था ? ऐसे में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि इस दौर की हिन्दी पत्रिकाओं में स्त्री प्रश्नों को कैसे देखा जा रहा था, और इन पत्रिकाओं के संपादक किस सामाजिक-धार्मिक भाषा में स्त्री प्रश्न को संबोधित कर रहे थे।

औपनिवेशिक भारत की बीसवीं सदी के दूसरे दशक में स्त्री समस्या का मुद्दा प्रमुख बनकर उभर था। हिंदी नवजागरणकालीन संपादक पत्र-पत्रिकाओं में बाल विवाह, विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा सरीखे प्रश्नों को तरजीह देने लेगे थे। इस समय स्त्रियों को लेकर उच्च श्रेणी हिंदुओं के सामाजिक बंधन इतने कठोर थे कि विधवा स्त्रियाँ चाह कर भी पुनर्विवाह नहीं कर सकती थी। सन् 1911की जनगणना में विधवाओं के आकड़ों देखकर कर नवजागरण कालीन लेखक सकते में आ गए थे। सन् 1911की जनगणना में दो करोड़ चौसठ लाख इक्कीस हजार विधवाएँ थीं। इनमें से तीन लाख पैंतीस हज़ार 15 वर्ष से कम अवस्था की थी।1   विधवा स्त्रियों का पुनर्विवाह नहीं होने से उन्हें सामाजिक जीवन में तमाम तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा रहा था। चाँद पत्रिका 1923 केअप्रैल अंक में कुमारी सुखालता ने विधवा समस्या पर एक बड़ा ही मार्मिक लेख लिखा। इस लेख में कुमारी सुखालता ने बताया कि पुरोहितों और पोथधारियों की मूर्खता के चलते विधवा स्त्रियाँ बिना किसी अपराध के कैदियों सा जीवन व्यतीत कर रही हैं। कुमारी सुखालता का कहना था कि सती प्रथा की अग्नि से स्त्रियों को तो जरूर बचा लिया गया पर विधवा स्त्रियाँ जीवित रहते हुए भी रोज़ दुख की अग्नि में जल-भून रही है। विधवा जीवन स्त्रियों के लिए कितना दुष्कर और भयवाह था, इसका अंदाजा कुमारी सुखालता के इस कथन से लगाया जा सकता है : “मैं मानती हूँ कि विधवाओं कों  जिन्दा जलने से ज़रूर बचा लिया गया किन्तु अब तो जीवित अवस्था में हो वे धीरे धीरे दुःख की अग्नि में भस्म होती रहती है। चिता की अग्नि उन्हें एक दो घड़ी में ही समाप्त कर देती थी किन्तु सामाजिक बन्धनों की तथा असहायता और दरिद्रता की अग्नि अब उन्हें आजीवन सुलगाती रहती है। पहले तो इस जीवन का जो कुछ यातनाएं हुआ करती थीं, थोड़ी देर में चिता पर समाप्त हो जाती थी किन्तु अब संसार रूपी चिता की अग्नि उन्हें तमाम ज़िन्दगी बराबर जलाती रहती है। क्या समाज ने विधवाओं को सती-चिता से मुक्त इसलिये किया है कि उन्हें उस से अधिक यातना पूर्ण चिता पर उम्र भर जलाया करें।”2  नवजागरण कालीन स्त्रियाँ  इस बात का दावा  बार-बार कर रहीं थी कि उच्च श्रेणी के हिन्दू अपनी बहू-बेटियों के दुख दर्द को महसूस नहीं करते है। वे सड़ी-गली प्रथाओं के चलते अपनी बेटियों  को पशुओं की तरह इधर-से उधर हांक देते है। विधवा विवाह,बालविवाह और कन्या भ्रूण जैसी कुप्रथाओं की झाड़ियों और काँटों में  फसकर हिन्दू स्त्रियों का जीवन नष्ट हो जाता है। कुमारी सुखलता विधवा जीवन के खौलते हुए यथार्थ के संबंध में लिखती है कि, “विधवाओं की आज दशा क्या है ? उनका जीवन आज कैसे व्यतीत होता है। इनका जीवन नदी की उस धारा के समान हैं, जो कङ्कड़ पत्थर में पड़कर झाड़िया और काटों से अच्छादित होकर अपने तमाम सौन्दर्य को खो बैठा हो। यह कंकड़ पत्थर और यह झाड़ी और कांटे क्या है ? यह हिन्दू समाज के मृणासन्न मर्यादाएं हैं और कुप्रथाएं हैं जिनके कारण विधवा के जीवन का पुष्प अधखिला होते हुए भी बिखेर दिया जाता है। हिन्दूधर्म आज विधवाओं की यातनाओं को महसूम नहीं करता! उसमे नवीन जीवन का बहुत कम संचार हुआ है। वास्तविक जीवन का अभाव सा पाया जाता और इसलिये इस धर्म में आज वह अध्यात्म और वास्तविक नीतिमत्ता और पवित्रता नहीं पाई जाती कि जो धर्म की प्राण वायु है।”3

बीसवीं सदी के दूसरे दशक में विधवा समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया था। इस मर्दवादी समाज में उन्हें आठ घड़ी और चौसठ पहर दुख की कन्दराओं में जीवन काटना पड़ रहा था। इतना ही नहीं समाज और परिवार विधवाओं को बड़ी हिकारत भरी नज़रों से देखते थे। चाँद पत्रिका में तमाम अनाम विधवाओं के पत्र छ्पे जिनमें विधवाओं ने बड़ी शिद्दत से अपने दुखों का बयान किया। एक खत्री परिवार की स्त्री अपने विवाह के केवल इक्कीस दिन बाद विधवा हो गयी थी। यह अनाम विधवा अपने बारे में बताती  है कि, “जिस समय मेरा विवाह हुआ उस समय मेरे पति को पहिले से ही संग्रहणी की बीमारी थी। जो शायद शादी विवाह में कुपथ्य ( बदपरहेज़ी ) के कारण बढ़ गई और ठीक 21 वें दिन तार आया कि वे परलोक सिधार गए। उस समय मेरी उम्र 8 वर्ष की थी। मैंने सुना था कि वे (पति) पहले से ही बीमार रहते थे । उनकी आयु जब विवाह हुआ तो 35 साल की थी और उनकी पहिली दो स्त्रियां प्रसुत रोग से मर चुकी थीं।”4  इसके बाद यह अनाम हिन्दू विधवा वेद-पुराण की आलोचना तो करती ही है, वह ऐसे  पुरुष पर भी सवाल उठाती है जो खुद तो चार-पाँच विवाह कर लेते थे लेकिन विधवा स्त्रियों के पुनर्विवाह का विरोध करते थे। यह अनाम विधवा अपने पत्र में लिखती है कि, “मुझे समाज से कुछ नहीं कहना है। मैं केवल यह बात जानना चाहती हूं कि किस वेद, पुराण या कुरान में ऐसी आज्ञा दी गई है कि पुरुष जब चाहें पैर की जूतियों के समान हमें त्याग कर एक, दो, तीन, चार अथवा पांच पांच विवाह करलें पर स्त्रियां बेचारी ऐसी स्थिति में रहते हुए भी, जैसी आज मैं हूँ-दूसरा विवाह न कर सकें । यह समाज की भयङ्कर नीचता नहीं तो और क्या है ?”5

  विधवा स्त्रियों पर परिवार और समाज का बड़ा पहरा  रहता था। वे अपनी इच्छा  से न तो कहीं जा सकती थी और न तो कुछ वरण कर सकती थी। हर वक्त उन पर निगरानी रखी जाती थी। इस पहरेदारी से तंग आकर कुछ विधवाएँ आत्महत्या करने की बात तक सोचने लगती थी। एक उच्च श्रेणी की हिन्दू विधवा का जीवन कितना पीड़ा दायक था। इसका अंदाजा इस अनाम विधवा के पत्र से लगाया जा सकता है : “सेवा में निवेदन है कि में एक विधवा दुःखियारी आपकी सहायता के लिए प्रार्थना करती हूं। मेरी अवस्था इस समय 18 वर्ष की है। मुझे विधवा हुए तीन साल होगए। मैं वैश्य अग्रवाल जाति की हूँ । मेरे एक लड़की हुई थो जो इस समय 2 वर्ष की है और कोई सन्तान नहीं हुई । मेरे माता-पिता जाति का डर होने के कारण और निर्धन होने के कारण चुप हैं और मेरे शत्रु बन रहे हैं । मेरे सास ससुर भी, जैसा हिन्दु विधवा के साथ , इस जाति में घोर अत्याचार प्रचलित है कर रखा है, करते हैं । शोक है मेरे जेठ जिनकी उम्र 50 वर्ष से कम नहीं है, जिसके दो लड़के 17 औ 12 वर्ष के, और एक लड़की 11 वर्ष की है-पिछले साल 26 साल की एक विधवा से विवाह कर लाए लेकिन मुझ दुःखिया पर जिस का न पिता के घर जीवका का सहारा है और ना ससुराल में किसी को परमात्मा के भय का भी ख्याल नहीं होता दिन भर सारे कुटुंब की सेवा करते रहने पर भी रोटी का सहारा नहीं दीखता! हर समय सब की घुड़कियों और तानों से अति दु:खित हो रही हूँ । कई बार जी में आता है कि कुएं में छलांग मार कर इस मुसीबत से छुटकारा पा लूँ।”6

हिन्दी नवजागरण कालीन स्त्री लेखिकाएं विधवा जीवन की दुश्वारियों को अपने लेखन में उठा रहा थी। इसी के साथ वह पुरुषों के चाल-चलन पर सवालियाँ निशान भी लगा रही थी। श्रीमती भाग्यवती देवी ने मनोरमा पत्रिका में बिधवा शीर्षक से दो विधवा स्त्री का आपसी वार्तालाप लिखा। भाग्यवती देवी ने यह दावा किया कि उनका यह वार्तालाप सत्य घटना पर आधारित है। इस वार्तालाप से पहले लेखिका ने मर्दवादी नैतिकता पर बड़े गंभीर सवाल खड़े किए। भाग्यवती का दावा था कि अधिकांश युवा कालेजों और स्कूलों में  पढ़ते समय अपना जीवन ख़राब कर चुके होते है। जिसका परिणाम यह होता है कि वह शीघ्र ही काल का ग्रास बनकर अपनी पत्नी को विधवा बनाकर चले जाते हैं। श्रीमती भाग्यवती देवी ने पुरुष नैतिकता की कलाई खोलते हुए लिखा कि,“हमारी उच्च कही जाने वाली जातियों में वैधव्य जीवन के द्वारा समाज का कितना नैतिक पतन होता जा रहा है यह किसी से छिपा नहीं ! आज हजारों की संख्या में वह बहिनें जिनकी माँग का सिंदूर अभी तक धुला भी नहीं था वैधव्यता को प्राप्त हो जाती है। आये दिन हजारों विधवाओं के होते जाने पर भी हमारे रूढ़ि के गुलाम भाई इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते कि क्यों इतनी शीघ्रता से हमारा ह्रास हो रहा है! क्या मैं आपको बताऊँ यह वैधव्य जीवन की बुलाने का पुण्य कार्य भी आप पुरुषों ही के द्वारा होता है! आप लोग अपनी अबोध कन्याओं को बूढ़े तथा दुर्बलेन्द्रिय नवयुवकों को जो अपना जीवन कालेजो और स्कूलों में ही प्रायः खराब कर चुके होते और इस आशा से कि लड़का पढ़ा हुआ है विवाह कर देते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि वह शीघ्र ही काल के ग्रास बन जाते हैं और अपनी उस साध्वी परिणीता भार्या को वैधव्य का दुःख दे जाते हैं ! उनके पश्चात् जो जो नाना भाँति अत्याचार सास श्वसुर ज्येष्ठ आदि करते हैं वह किसी से छिपे नहीं हैं । इन घरों के अत्याचार अलावा भी आज कल के फैशनेबुल शौक़ीन लोग नवयुवति विधवाओं को अपना शिकार बना लेते हैं।”7 यह लिखने के बाद भाग्यवती देवी ने लीला और मूर्ति नामक दो विधवाओं का वार्तालाप दिया है। लीला मात्र तेरह वर्ष की और मूर्ति  पंद्रह वर्ष  की अवस्था में विधवा हो गयी थी। मूर्ति अपने वार्तालाप में बताती है कि उसका पति बी.ए. करते समय चरित्र हीन हो गया था। नवजागरण कालीन उच्च श्रेणी की स्त्रियां किस  पीड़ा से गुजर रही थी। लीला और मूर्ति के इस वार्तालाप से महसूस किया जा सकता है :  

लीला– लीला अभी 13 वर्ष की बालिका थी कि यकायक उसके  सिर का सिंदूर पुछ गया। उसका विवाह हुए अभी  केवल दो मास ही हुए थे। हाय? वह कैसे पति का वियोग सहेगी। लीला के घर में पाँच प्राणी थे, माता, पिता, दो भाई, तथा लीला। लीला के पिता दो भाई थे। दोनों भाइयों में कन्या रत्न अकेली लीला ही थी इस कारण दोनों ही परिवारों में लीला को सब प्रकार से सुखी रखने का यत्न होता था और प्रेमाधिक्य के कारण वह सब की प्रेमपात्री बनी हुई थी। श्वसुरालय में केवल तीन जीव थे सास श्वसुर तथा पति। एकाएक पति वियोग हो जाने के कारण लीला को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। एवंहि नाना भाँति के दुःखों का साम्राज्य छा गया। अहो ? यह 13 वर्षीया बालिका कैसे इतना दुःख उठा सकेगी । आइये हम उनकी बात चीत आपको सुनावे जो वह आपस में कर रहीं हैं ।

लीला-प्रिय बहिन मूर्ति मैं  क्या करूं ? कैसे अपने जीवन को व्यतीत करूं, अभी मैंने संसार का देखा ही क्या है ? ठीक तौर से आँख भी न खोलने पाई थी कि सदैव के लिए बन्द दो गई !

 मूर्ति – बहिन मेरी दशा भी तुमसे  कोई  बड़ी नहीं- मैं भी इसी नाव में सवार हूँ ।  मैं 15 वर्ष की ही थी कि मेरे आराध्य देव मुझे बिलखता छोड़ कर स्वर्ग चले गये । मेरे पिता ने एक बड़े अच्छे कुलीन घराने में जो आगरा कालिज में बी.ए. में पढ़ता था विवाह किया था। माता की उमंग और पिता का अनन्य बात्सल्य भाव, देखने वाले कहते हैं अपूर्व था। वह इस बात की बड़ी तारीफ़ करते थे कि मेरा जामाता बी. ए. है परन्तु प्यारी बहिन मेरे वैधव्य का कारण तो यही कालेज की पढ़ाई का हुआ! मेरे पति देव कालेज में पढ़ते समय चरित्रहीन हो गये और उसी से शरीर में घुन लग गया जो उनका जीवन ही लेकर हटा ! मेरे वैधव्य को सुन माता पिता ने भी छट पटाकर प्राण दे दिये। मेरे अब भाई भावज के सिवाय कोई भी नहीं रहा जो मुझे धीरज बँधावे।

लीला- बहिन। तुम्हारी ही तरह मेरी स्नेह मयी माता भी मेरे अपार दुःख को न देख सकी और वह भी मुझे रोता छोड़ चल बसी। पिता जी मुझे  किसी प्रकार का भी दुःख नहीं होने देते पर मेरे अन्दर जो आग धधक रही है उसका क्या हो। जिस समय पिता जी ने मेरा विवाह  किया था उसी समय मुझे अपने भावी पति को जो घोड़ी पर चढ़कर द्वार पर आया था देख कर आशंका हो गई थी कि पिता जी मेरा बलिदान कर रहे हैं । बहिन कहने के लिये तो वह नव युवक था परन्तु उसका पीला रक्त हीन चेहरा बता रहा था कि यह विवाह के अयोग्य है। परन्तु हम बालिकाएँ इस विषय में मुंह खोल कर कुछ कह नहीं सकटी जिसका परिणाम आज मुझे मिल रहा है ।8

बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में व्यभिचार एक बड़ी समस्या बन कर उभरा था। विधवा स्त्रियों को उनके सगे संबन्धी नरम चारा समझ कर उन्हें पतित कर डालते थे। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि इसका सारा दोष विधवा स्त्री के सिर ही मढ़ दिया जाता था। विधवा स्त्रियों का शरीरिक शोषण कितनी गंभीर समस्या बन गया था। इसका अंदाज़ा एक उच्च श्रेणी की विधवा के इस पत्र से लगाया जा सकता है :  “मेरा जन्म आज से 29 वर्ष पूर्व हुआ था। मैं सारस्वत ब्राह्मणी हूँ । जब मैं पाँच वर्ष की थी, मेरे पिता की मृत्यु हो गई। अब माता और मैं चचा के पास रहने लगीं। मैं अपने फूफा के यहाँ भी दो-तीन वर्ष रही । वहाँ पर ही मैं मामूली हिन्दी पढ़ गई। जब मैं 18 वर्ष की हुई तो मेरी शादी जिला बुलन्दशहर में हुई। विवाह के एक वर्ष बाद एक पुत्र उत्पन्न हुआ । मेरे पति रेलवे में बुकिंग  कलर्क थे। दो वर्ष  बाद मैं पति के साथ रहने लगी। एक वर्ष बाद एक पुत्री हुई और फिर दो वर्ष बाद एक पुत्र हुआ। अभाग्यवश पार साल मेरा सिन्दूर पुछ गया- मैं अनाथ हो गई। मेरे श्वसुर बहुत दिनों से पागल हैं। पति के मरते समय रुपए -पैसे की हालत अच्छी न थी। जो कुछ थोड़ा -बहुत था, वह चिकित्सा में समाप्त हो गया । उनको क्षय रोग था। अब मैं अपने श्वसुर के पास आ गई और उनकी सेवा करने लग गई । थोड़े ही दिनों बाद मेरे बड़े पुत्र और कन्या की मृत्यु हो गई । मैं श्वसुर जी के पास दो महीने ही रहने पाई थी। इस समय मेरे जेठ, जोकि मेरे पति के चचा के लड़के हैं और एक जजी कचहरी में नायव नाजिर हैं, आ गए और मेरी ननद से तरह-तरह की बातें बना कर मुझको अपने साथ ले गए । हाय ! यदि मुझे यह मालूम होता कि मैं एक गहरे गढ़े में गिर जाऊँगी तो कभी न जाती। मैं उनके पास चार महीने रही। एक महीने तक तो उन्होंने कुछ न कहा । दूसरे महीने छेड़ना शुरू किया। उनकी  स्त्री भी मौजूद हैं, लेकिन उनकी स्त्री को ऐसी बातें देख कर आनन्द होता है और वे हँसती हैं। मुझे तरह-तरह के प्रलोभन दिए गए । हाय ! मूर्खा इतना न जान सकी कि ये प्रलोभन वह नारकीय कुत्ता किस लिए दे रहा था। एक रात को वह मेरी कोठरी में आ घुसा और प्यार की बातें करने लगा। मैं चिल्ला उठी- “जा, चला जा अपना काला मुंह लेकर चला जा। तिस पर बोला- “प्यारी- तुझे मालामाल कर दूंगा। सब घर तेरा ही है ।” और तरह-तरह की बाते की और कहने लगा- “अगर तू चिल्लाएगी तो  बदनामी तेरी ही होगी; मेरा क्या बिगड़ेगा ? कल निकाल कर बाहर खड़ा कर दूंगा ।” उस समय इन बातों का हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा । किन्तु मैं यह नहीं जानती थी कि पुरुष इतने स्वार्थी होते हैं कि मतलब निकल जाने पर मुँह से बात तक नहीं करते। हाय! मेरा सर्वस्व लूटा।  जिठानी जी देखती रहीं । यही नहीं, किन्तु हँसती रहीं । स्त्रियाँ भी ऐसी होती हैं , यह मुझे स्वप्न में भी आशा न थी। अब क्या था, काला मुँह हो गया। जिठानी के यहाँ जो कोई आता, उसी से वह ये सब बातें कहती । मुझे लज्जित होना पड़ता।”9

नवजागरण कालीन स्त्रियाँ एक तरफ पुरुष के नैतिक पतन की कहानी लिख रही थी तो वहीं दूसरी तरफ मर्दवादी अत्याचारों का प्रतिकार भी कर रही थी। श्रीमती मनोरमा देवी नवजागरण कालीन लेखिका थी। इनके अनेक लेख चाँद,माधुरी, सरस्वती, मनोरमा पत्रिका में बिखरे पड़ें हैं। मनोरमा पत्रिका सन 1929 के सितंबर अंक में श्रीमती मनोरमा देवी ने ‘अबलाओं पर अत्याचार’ शीर्षक से एक दिल को हिला देना वाला लेख लिखा। मनोरमा देवी ने इस लेख में स्त्री विमर्श की जमीन पर खड़ी होकर कहा कि स्त्रियाँ  दुखों की परवाह किए बगैर  पुरुषों पर अपना सर्वस्व निछावर कर देती हैं पर पुरुष इतने निर्दयी और अत्याचारी होते है कि उन्होंने स्त्रियों को कठपुतली और गुड़ियों का खेल समझ कर उन पर मनमाने अत्याचार करते हैं। इस लेखिका का कहना था कि स्त्रियाँ रक्त और मांस की बनी हुई हैं; इसके बावजूद यह मर्दवादी तंत्र स्त्रियों पर घोर सामाजिक अत्याचार करता है। श्रीमती मनोरमा का अभिमत था कि यह मर्दवादी समाज स्त्रियों की इच्छा-आंकक्षा का तनिक भी ख्याल नहीं रखता है।  यहाँ तक स्त्री को इस मर्दवादी तंत्र में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है। यदि स्त्री किसी बात पर अपना मुँह खोलती है तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। श्रीमती मनोरमा देवी इस मर्दवादी तंत्र के मुखौटा को उजागर करते हुए लिखती हैं कि, “अनेक स्थलों पर देखने में आता है कि बात-बात में  स्वामी स्त्री का त्यागकर देता है। वह  उससे हर तरह के छोटे बड़े काम लेता है दासी वृत्ति कराता है यहाँ तक कि वेश्यावृत्ति जैसा घृणित कार्य भी कराता है स्त्री ने किसी भी बात के विरुद्ध अपना मुँह खोला कि फिर वह घर से बाहर कर दी जाती है । कारण घर स्वामी है, दोष चाहे जिसका हो, स्वामी की जब तक इच्छा है स्त्री घर में रह सकती है, इच्छा नहीं रहने पर वह किसी तरह  घर नहीं रह सकती इस पर किसी को कुछ कहने का अधिकार नहीं । स्वामी प्रभु है, मालिक है, जो चाहे कर सकता है । इस प्रकार कितनी स्त्रियों का जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।”10 मनोरमा देवी आगे सवाल उठाती हैं कि इस समाज में स्वामी कितना ही अत्याचारी और दुष्ट हो पर स्त्री को उसके लात-जूते हस्ते हुए ही सहना पड़ता है। यहाँ तक स्त्री को अपने दुख को प्रकट करने का अधिकार नहीं कारण स्वामी देवता है।

नवजागरण कालीन स्त्रियाँ अपने लेखन में स्त्री अधिकारों की पहलकदमी करती दिखायी देती हैं। स्त्री अधिकारों के अंतर्गत स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, बाल विवाह जैसे मुद्दे अपने लेखन में उठा रही थी। नवजागरण कालीन लेखिका श्रीमती कौशल्या देवी श्रीवास्तव ने अपने एक लेख में स्त्री शिक्षा का सवाल उठाकर मर्दवादियों को सकते में डाल दिया था। इस लेखिका का कहना था कि स्त्रियों को गहने से लादने से अच्छा है कि उन्हें शिक्षा रूपी आभूषण से सुसज्जित किया जाए। इस लेखिका ने दावा किया कि मर्दवादी समाज स्त्रियों को इस लिए अनपढ़ बनाए रखता है कि कहीं स्त्रियाँ उनकी बराबरी न करने लगे। श्रीमती कौशल्या देवी, श्रीवास्तव अपने लेख में लैंगिक भेदभाव का मुद्दा भी उठाती हैं। इस लेखिका का साफतौर कहना था कि यह मर्दवादी समाज अपनी पुत्रियों की अपेक्षा पुत्रों की शिक्षा पर अधिक बल देते हैं।  इस नवजागरण कालीन लेखिका ने सुधारकों को चेतवानी देते हुये कहा कि जब तक स्त्री शिक्षा का उचित प्रबंध नहीं किया जाएगा, तब तक यह देश और समाज उन्नति नहीं कर सकता है। श्रीमती कौशल्या देवी, श्रीवास्तव अपने लेख में सुधारकों से स्त्री शिक्षा को लेकर अपनी अपील में लिखा कि, “हा ! विधाता तूने कैसा ज्ञान दिया है आजकल प्रायः ग्राम में भी स्कूल खुले हुए दृष्टि आते हैं उसमें पुत्र तथा कन्या दोनों ही पढ़ाई जा रही हैं किन्तु , कन्याओं को लोग दो ही एक दर्जे तक पढ़ा कर बन्द कर देते हैं परन्तु इस पढ़ाने से क्या पढ़ना न पढ़ना दोनों बराबर है-जब तक पूर्ण रूप से शिक्षा न दी जायगी तब तक सफलता प्राप्त होने की आशा नहीं है। अतः इसके लिये पूर्ण रूप से प्रबन्ध करने की आवश्यकता है। सुधारकों से मेरी प्रार्थना है कि वे इस ओर विशेष ध्यान दें । जब तक स्त्रियों के शिक्षा का पूरा प्रबन्ध न हो जायगा, तब तक इस प्यारे देश की उन्नति होने की आशा नहीं।”11 श्रीमती कौशल्या देवी अपने लेख में एक बड़ा ही अहम सवाल उठाती हैं कि लड़की का विवाह उसके मर्जी से किया जाए। इस लेखिका का अभिमत था कि अधिकांश माता-पिता अपनी कन्या पर दया नहीं करते हैं। वह आँख पर पट्टी बाँधकर कर अपनी कन्याओं के गले में विवाह नाम की कंठी लटका देते हैं। लेखिका उन माता-पिता से गुजारिश करती है कि लड़कियों का विवाह उनकी इच्छा से ही करें ताकि उन्हें जीवन में कष्ट नहीं उठाना पड़े। श्रीमती कौशल्या देवी लिखती हैं कि, “हमारा उन माता पिताओं से यही अनुरोध है कि वे अपनी कन्या की शादी जहाँ तक हो सके आँख बन्द करके न किया करें। ऐसा करने से उन्हें महान कष्ट भोगना पड़ता है । इस ब्याह से तो आजन्म कुमारी रहना अच्छा है किन्तु परतन्त्रता के कारण जो न हो वह थोड़ा है। ऐसे शादी करने से कितने ही पति ऐसे मिलते हैं जो उसे  प्यार की दृष्टि से देखते ही नहीं। उन्हें उनकी सूरत देखते भी घृणा उत्पन्न होती है। ऐसी शादी करने वाले पूज्य पिता ही सोचें भला यह जीवन भी सुखमय हो सकता है? कदापि नहीं। जो वस्तु अपने पसन्द की ख़रीदी जाती है उस पर अपना अगाध प्रेम रहता है और जो वस्तु पराए पसन्द की होती है उस पर अपना वैसा प्रेम कदापि नहीं रहता। एक न एक दोष निकल ही आते हैं। चाहे वह कैसी ही वस्तु क्यों न हो। अतएव माता पिता को चाहिये कि अपने पुत्र तथा पुत्रियों के इच्छानुसार ही शादी किया करें। ताकि स्त्री पुरुष दोनों का जीवन सुखमय हो।”12   नवजागरणकालीन स्त्रियों  इस बात को भली-भाँति समझ चुकी थी कि उनकी दुर्दशा की जिम्मेदार पितृसत्तावादी मानसिकता  है। वह मर्दवादवादियों को अपने लेखन के हवाले से आईना भी दिखा रही थी। वह इस मर्दवादी समाज से पूंछ रही थी कि स्त्रियों ने बड़ी यतनाओं में रहकर पुरुषों के लिए वृतादि सब कुछ किया है पर पुरुष स्त्रियों के बेहतरी के लिए क्या कभी व्रतादि  रखा है ?  नवजागरणकालीन लेखिका सौभाग्यवती विमला देवी ने ‘मानव जाति में स्त्री’ शीर्षक से एक लेख लिखा। इस लेख में मुख्यतौर पर स्त्रियों के पतन का जिम्मेदार मर्दवादी मानसिकता  को ठहराया गया। इस लेखिका ने कहा मर्दों की ओर से यहाँ तक कहा गया स्त्रियाँ जहां अपनी ज़ुबान खोलें वही ढ़ोल की तरह पीट कर  उनकी बोलती बंद करवा दी जाए। विमला देवी का कहना था कि इस मर्दवादी समाज को स्त्रियों का पढ़ना-लिखना सुहाता नहीं है। इन मर्दवादियों के चलते स्त्रियों को चहार दिवारी के भीतर सड़ना पड़ रहा है। सौभाग्यवती विमला देवी  स्त्री समाज का खौलता हुआ यथार्थ सामने रखते हुए लिखती हैं कि, “अफ़सोस! पुरुषों ने अपनी अज्ञानता के वश में आकर नारी-जाति को बिलकुल ही पतन के गहरे गर्त में ढकेल दिया, उन्होंने सदा के लिए पशु-जीवन में परिणत कर दिया। ओफ़! ऐसा भीषण प्रहार! ‘‘ढोल गवॉर शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी ’’ का ढोल पीटा जाय। जहाँ पर बोली बन्द कर दी गई । “ चुप रहो, तुम्हारा कुछ हक नहीं, पढ़ना लिखना कुलटाओं का चिन्ह है। पर्दे की चहार दिवारी के अन्दर सड़ती रहो ।” आदि – कर्ण- कटु शब्दों के द्वारा घोंसे बजाया जाय। अत्याचार ? जुर्म ? पैचाशिक काण्ड मचाये जाय किसके साथ? मानव जाति की बुनियाद, बन्दनीया नारी जाति के साथ! पेड़ काट कर पल्लव सींचने की योजना! कुपथ रखते हुए ऊरुज विमुक्त होने की आशा रखना! कैसा अनर्थ है ? जो नरों की खान हैं, मानव जाति के, विकाश-केन्द्र हैं ; उन्हीं के साथ ऐसा निष्ठुर व्यवहार ? पशुओं से भी हीनतर ! छिः! ”13  श्रीमती विमला देवी के इन सवालों का जवाब शायद ही मर्दवादियों के पास था।

उमा नेहरू हिन्दी नवजागरणकाल की प्रसिद्ध लेखिका थी। इस लेखिका ने स्त्री समस्या को केंद्र में रखकर अनेक लेख और कहानियां लिखी है। सन 1927 में  उमा नेहरू की स्त्री समस्या पर केन्द्रित एक बड़ी मार्मिक कहानी ‘स्नेहलता’ शीर्षक से मनोरमा पत्रिका में छपी। उमा नेहरू की इस कहानी के केंद्र में स्त्री शिक्षा से लेकर स्त्रियों को गुलाम बनाने वाली प्रथाओं को बड़ी शिद्दत के उठाया गया है। इस कहानी की नायिका स्नेहलता है। जो वैवाहिक कुरुतियों का शिकार हो गयी है। वह अपने कथन में एक जगह कहती है कि, ‘शादी हमारी बरबादी हुई।’ क्योंकि ‘जो जो असहनीय और अत्याचारी साधन हमारी शारीरिक और हार्दिक आज़ादी को मिटाने के लिए रचे गये वह एक न एक रूप में आज तक उपस्थित है।’ उमा नेहरू की यह कहानी  स्त्रियों को बेड़ियों में जकड़ने वाले रिवाज़ों और प्रथाओं को सामने रखती है।  इस कहानी की पात्र स्नेहलता एक जगह कहती है कि, “रिवाज़ क़ानून और लाठी ने मिला कर दुनियां में किसी को ऐसा नहीं दबाया, ऐसा नहीं मिटाया, जैसा हम स्त्रियों को। मज़हब आए, पहले, परन्तु हमारे लिए उन्होंने केवल इतना ही किया हमारी गुलामी की जंजीरों पर धार्मिक सोना चढ़ा दिया। अगर आत्मिक उन्नति के द्वारा कोई सूरत हमारी स्वतंत्रता प्राप्ति की हो सकती थी तो उसको भी सम्पूर्ण रीति से मिटा दिया। हमें निश्चय करा दिया कि ईश्वर ही ने हमको गुलाम पैदा किया है और वह यह चाहता है कि हम सदा गुलामी में अपना जीवन व्यतीत करें। मज़हब में यदि हमारे मुआफिक कोई बात मिली तो उसे क़ानून ने ठीक कर दिया। और अगर कानून भी पूरी सख़्ती न कर सका तो रिवाज़ ने हाथ बटाया।” उमा नेहरू की यह कहानी में स्त्री शिक्षा के  सवाल कों भी उठाती हैं। नवजागरणकालीन पुरुष स्त्री शिक्षा को बड़ी शंका से देखते थे। कुछ लोगो को कहना था कि स्त्रियाँ शिक्षा पाकर उद्दंड और विधर्मी  हो जाएगी। शिक्षा पाकर उनका रिपुबल तीव्र हो जाएगा जिससे पतिवृता धर्म स्थिर नहीं रह सकेगा। उमा नेहरू अपनी कहानी में इस विमर्श को दिशा देती दिखी कि मर्दवादियों ने स्त्रियों पर अपना नियंत्रण क़ायम रखने के लिए  स्त्रियों को शिक्षा से वंचित कर दिया। कहानी की पात्र स्नेहलता अपने कथन में कहती है- “हम शिक्षा न देकर, हमको सांसारिक अनुभवों से बिलग रखकर, हम पर यह इलज़ाम लगाया जाता है कि हम नासमझ हैं, हम निकम्मे हैं और दुनियां के महत्वपूर्ण बातों में भाग लेने के अयोग्य हैं। इतनी नहीं बल्कि हमारे मुनसिफ़ मिज़ाज मालिकों का यह कहना है कि यदि वह हमें स्वतंत्रता दे दें तो इसमें हमारी ही हानि होगी। इसलिए हमारी सारी बातों का इख़्तेयार वह स्वयं अपने हाथों में रखते हैं। समस्त स्त्री जाति गोया उन बच्चों और पागलों वा मुजरिमों की श्रेणी में शामिल कर दी गई है जिनकी देख भाल क़ानून दूसरों के सुपुर्द कर देता है। अन्तर केवल इतना है कि बच्चे बड़े होकर, पागल सेहत पाकर; और मुजरिम अपनी सज़ा भुगतकर स्वतंत्र होने का अधिकारी बन सकता है । परन्तु हमारा बचपन वह बचपन है कि उम्र जिसको रफ़ा नहीं कर सकती।”14 इस कहानी में यह घोषणा की गई है किआज भले ही मर्दवादियों का बोलबाला है पर वह समय दूर नहीं है कि जब मर्दवादी अपने इन अत्याचारों का अन्त देखेंगे।

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों से ही स्त्रियाँ  शिक्षा की पहलकदमी पर ज़ोर देने लगी थी। वह कविता और कहानियों के हवाले से स्त्री शिक्षा की मांग सामने रख रही थी। स्त्रियाँ अपनी कविताओं में यह बता रही थी कि उनकी शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इसका नतीजा यह हुआ कि स्त्रियाँ जीवन भर अज्ञान बनी रहती है। कुमारी अम्बा देवी विदुषी अपनी कविता में स्त्री पीड़ा का बयान इस तरह किया करती हैं –

हमको न पढ़ावत हो इससे नित मूढ़ बनी मुख जोवति हैं।

घर भीतर कैद पड़ीं दुखिया अनजान बनी अब रोवति है।।

बहु, बाल विवाह न रोक सके बन के विधवातन झोकति है।

न प्रसार सुरीति सके तुम तो  “अबला अबलौ अवलोकति हैं” ।।15

नवजागरणकालीन लेखिकाएं स्त्रियों कों शिक्षा का महत्व बड़ी शिद्दत के साथ समझा रही थी। वह यह भी कह रही थी कि स्त्री शिक्षा से मुक्ति संभव है। स्त्री शिक्षा के महत्व कों रेखांकित करती श्रीमती कृष्ण कला देवी की यह कविता देखिए :

विद्या पढ़ो हे बहिनों, यदि मान चाहती हो। क्यों मूरखा कहाकर, अपमान चाहती हो ॥

विद्या से धर्म उपजे, सुख धर्म ही से होवे । विदुषी बनो जो अपना, कल्याण चाहती हो॥

हर नारि-धर्म -पुस्तक, को ध्यान से पढ़ो तुम । धर्म की जो अपने, तुम आन चाहती हो॥

विद्या में स्वयं तुमको, होना निपुण उचित है । विद्वान तुम जो अपनी सन्तान चाहती हो ॥

विद्या पढ़ो पढ़ाओं, जग में हो यश तुम्हारा । दो विद्या- दान, देना यदि दान चाहती हो ॥

उठि प्रात विद्या सागर में तुम लगाओ गोते । यदि ज्ञान जल में करना, स्नान चाहती हो ॥

विद्या के भूषणों से हो जाओ तुम अलंकृत। यदि रूप का कुछ अपने अभिमान चाहती हो॥16

 

2.

अब इस पड़ताल की ओर बड़ा जाए कि नवजागरणकालीन पुरुष लेखकों का स्त्री प्रश्न पर दृष्टि कोण क्या था ? बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक के  हिंदी संपादक और लेखक विधवा समस्या को आपदधर्म के तौर पर देख रहे थे।  हिंदी लेखक सन 1911 की जनगणना के आकड़ों से इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ईसाई और मुसलमान उच्च श्रेणी हिन्दू विधवाओं को नरम चारा समझ कर चरे जा रहे है। इस प्रकार की शोच रखने वाले पंडित मन्नन द्विवेदी,गजपुरी बी.ए.(1885-1921) नवजागरण काल प्रसिद्ध लेखक थे। इनके कद का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रेमचंद ने इनसे अपने कहानी संग्रह ‘सप्तसरोज’ की भूमिका लिखवायी थी। सन 1921 में जब पंडित मन्नन द्विवेदी का इंतकाल हुआ तो प्रेमचंद ने इन्हें याद करते हुए ‘जमाना’ में एक श्रद्धांजली लेख भी लिखा था। इस नवजागरण कालीन लेखक ने स्त्रियों और अछूतों को ईसाई और मुसलमानों के चुंगल से बचाने के लिए बकायदा ‘हमारा भीषण हृास अर्थात हिन्दुओं! सावधान!!’ शीर्षक से एक किताब लिखी। उनकी यह किताब अक्तूबर 1917 में प्रताप कार्यलय, कानपुर से प्रकाशित हुई थी। इस किताब की पहले संस्करण में दो हज़ार प्रतियां छपी थी। एक साल बाद अर्थात नवंबर 1918 में इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ। पंडित मन्नन द्विवेदी का दावा था कि हिन्दू स्त्रियों को ईसाई और मुसलमान लेकर उड़े जा रहे हैं। इस नवजागरण कालीन लेखक ने विधवा समस्या को एक अलग ही रंग देते हुए लिखा कि, “आज जहाँ देखिए, मुसलमान गुण्डे हमारी विधवाओं के घरों के पास चक्कर लगाया करते हैं, ज़नाने मिशन की औरतें अपने जाल अलग बिछाये रहती हैं, पलक झपा नहीं कि वे इन देवियों को ले उड़ती हैं। ये लोग उनको धमच्युत कर के हमारे छाती पर कोदो दलते हैं। ऐसे नज़रे एक दो बार नहीं हज़ारों बार हो चुके है। अगर हमारे में आत्माभिमान और लज्जा होती तो हम अब तक या तो कोई उपाय किये होते या कर्मनाशा नदी में जाकर डूब मरते। आज कल हम अपनी विधवाओं को खाने पहरने की जितनी अधिक सुविधा करें अच्छा है। यह कहते हुए भी विधर्मियों की नजरों से जितना अधिक उनको बचायें उतना भी और अच्छा।”17 पंडित मन्नन द्विवेदी जैसे लेखक को स्त्री समस्या से  अधिक चिंता हिन्दू गौरव को बचाने की थी।

रामरख सिंह सहगल हिन्दी नवजागरण काल सबसे चर्चित संपादकों में से एक रहे हैं। रामरख सिंह सहगल नवजागरण काल की चर्चित पत्रिका चाँद के  उद्भावक और संपादक थे। चाँद पत्रिका का पहला अंक नवंबर 1922 को चाँद कार्यलय, इलाहाबाद से निकला था। चाँद पूर्णतया महिला केन्द्रित सचित्र मासिक पत्रिका थी। इस पत्रिका की संचालिका खुद रामरख सिंह सहगल की पत्नी श्रीमती विद्यावती सहगल थी। श्रीमती विद्यावती सहगल जानेमाने वकील लाला गंगाराम शास्त्री की बेटी थी और इन्होंने कन्या महाविद्यालय,जालंधर से शिक्षा प्राप्त की थी। संपादक रामरख सिंह सहगल ने चाँद, अप्रैल 1922 का अंक विधवा समस्या पर केन्द्रित किया। संपादक रामरख सिंह सहगल ने इस अंक में जो संपादकीय लिखा; वह पहली नज़र में बड़ा प्रगतिशील लगता है। उन्होंने संपादकीय लेख में विधवा विवाह के पक्ष में दलीले जरूर दी लेकिन रामरख सिंह सहगल ने विधवा समस्या को आपदधर्म बताकर  विधवा समस्या की गंभीरता से मुँह मोड़ लिया। इस संपादक का कहना था कि हम जानते हैं कि पतिव्रत धर्म का पालन करने और पुनर्विवाह के सिद्धान्त में कोड़ी और मोहर का अन्तर है पर अपदधम्म भी कोई चीज़ है अंग्रेजी में कहावत Imergency has no law आपदधम्म की ओर इशारा कर रहे हैं जिसे स्वय योगी राज महात्मा श्रीकृष्ण जयद्रथ वध के समय काम में लाए थे। …मान लीजिए विधवाओं के पुनर्विवाह का कार्य “मुंह काला करना” पर एक ही बार तो।18  इसके बाद रामरख सहगल ने अपने संपादकीय लेख में अपने मन की बात कहते हुए लिखा कि, “आज हज़ारो स्त्रियां भगाई और बेची जा रही हैं। बढ़ते हुए व्यभिचार की और दृष्टि करने से रोमांच आता है वेश्याओं की दिनों दिन वृद्धि देखकर शरीर एक बार थर्रा उठता है। दूध पीती बच्चियों का क्रंदन सुनकर जो अपनी माताओं की गोदियों में मुँह डालकर सिसक सिसक कर रो रही हैं। भला कौन ऐसा मानव हृदय  होगा जो करुणा से परिपूर्ण न हो जायेगा और कौन  ऐसा नेत्र होगा, जिससे आंसू न निकल पड़गे?”19

नवजागरण कालीन लेखक और संपादक विधवा समस्या के समाधान की बजाए उसे संप्रादायिक रंग देने की कयावद करते नज़र आए। नवजागरण कालीन हिन्दी संपादकों ने उच्च श्रेणी हिंदुओं के भीतर इस बात का भय पैदा करने का प्रयास किया कि हिन्दू विधवाएँ विधर्मियों के घर की देहरी रोशन करने में लगी हुई है। चाँद पत्रिका सन 1926 के अक्तूबर अंक में रामरख सिंह सहगल ने ‘वैधव्य और समाज’ शीर्षक एक लंबा संपादकीय लेख  स्त्री समस्या पर लिखा। इस संपादकीय में विशेष तौर पर इस बात पर ज़ोर दिया गया कि  हिन्दू विधवा स्त्रियाँ विधर्मियों के घर का दीपक बन उजाला करने पर तुली है। रामरख सहगल ने पहले तो इस बात पर रोष प्रकट किया कि उच्च श्रेणी के हिन्दू अपनी ललनाओं की रक्षा के लिए आगे क्यों नहीं आते है? इसके पीछे इनकी दलील थी कि युवक अपनी विलासिता की चिर निद्रा में सत्यासत्य का विश्लेषण नहीं कर सकते ! उनके हृदय में अपनी माताओं और बहिनों के कल्याण तथा उनकी शारीरिक एव नैतिक रक्षा की ममता नहीं रहती! उनकी भुजायें अपनी सहोदरा एवं कुल-ललना की मर्यादा नष्ट होती देख कर भी आततायियों का समूल नष्ट कर देने अथवा इस महामङ्गल-पथ में अपने जीवन की आहुति दे देने के लिये नहीं उठतीं ! उनकी आँखें मानवी सभ्यता के इन हत्याकारी भावों का पत्नीव चित्र देख कर तिलमिला नहीं जातीं! उनके रक्त अपने पापी समाज द्वारा उपेक्षित बहुओं को विधर्मियों की काम-पिपासा तथा विलासिता का शिकार एव उनके अँधेरे गृहों को प्रकाशमान करते हुए देख कर खौल नहीं उठते !20   रामरख सिंह सहगल आगे दावा करते हैं कि विधवा स्त्रियाँ प्रलोभन में आकर विधर्मियों के घर बैठकर अपने पूर्वजों की इज्जत को धूल में मिला देती है। रामरख सिंह सहगल अपने संपादकीय लेख में लिखते हैं कि, “हमारी बहुसंख्यक युवती विधवाओं को आजीवन संयम पथ पर आरूढ़ रहने का आदेश दिया जाता है। इसके अति रिक्त उनके संयम के मार्ग में भिन्न-भिन्न प्रकार के और भी प्रलोभन रख दिये जाते हैं, जो कि उनके हृदयों में अपने स्वजन और कुटुम्बियों के प्रति घृणा, तिरस्कार और क्रान्ति के भाव भर देते हैं और जिनके कारण वे अपने गृह के कैदखाने से निकल कर या तो वेश्या-जीवन धारण करती हैं अथवा किसी विधर्मी के घर में बैठ कर अपने पूर्वजों की उज्ज्वल कीर्ति को कालिमा से पूर्ण कर देती हैं।”21  

आप  से गयी जहान  से गई !!  

                                                       स्रोत : चाँद : नवंबर 1929, वर्ष : 8, खंड : 1, संख्या  : 1  

रामरख सिंह सहगल लगातार संपादकीय लेखों के हवाले से इस बात को हवा देते रहे कि हिन्दू स्त्रियों को विधर्मी लेकर उड़े जा रहे हैं। इस संपादक की दलील थी कि विधर्मी हिन्दू स्त्रियों को अपने जाल में फंसाकर अपनी संख्या में दिन दूनी वृद्धि करने में लगे हुए है। रामरख सहगल ने चाँद अक्तूबर 1927  के संपादकीय में फिर से एक बार विधर्मियों से स्त्रियों के संरक्षण पर बल दिया। इस संपादक का दावा था कि विधर्मी हिंदुओं की दुर्बलता का लाभ उठाकर हिंदुओं का भयंकर ह्रास करने पर तुले हुए हैं। रामरख सहगल ने अपनी मंशा प्रकट करते हुए लिखा कि, “हमारी इस दुर्बलता का लाभ विधर्मी उठा रहे हैं। वे हमारे बच्चों तथा हमारी स्त्रियों का-जिन्हें हम समाज के अत्याचारों के कारण अपनी छाती पर हाथ रख बड़ी निर्दयता के साथ बहिष्कृत कर निकाल देते हैं-अत्यन्त प्रसन्नता के साथ स्वागत करते हैं । इस कारण एक ओर हमारा नित्य भयंकर ह्रास हो रहा है ; और दूसरी ओर हमारे ह्रास के कारण विधर्मियों की संख्या दिन दूनी और रात चौगुनी गति से बढ़ रही है!”22   हिंदी नवजागरण कालीन लेखक और संपादक  स्त्रियों की दुर्दशा से ज़्यादा इस बात से चिंतित दिखे कि स्त्रियों को विधर्मियों के चुंगल से कैसे बचाए जाए। रामरख सिंह सहगल का दावा था कि यदि विधवा स्त्रियों के पुनर्विवाह का इंतजाम नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं हिन्दू घरों की बहू-बेटियाँ उनके मुँह पर कालिख पोत कर बपतिस्मा लेती पाईं जाएंगी।  रामरख सिंह सहगल ने अपनी चिंता प्रकट करते हुए लिखा कि, “हम इतना अवश्य कहेंगे कि अधिकांश विधवाएँ हिन्दू समाज के मस्तक को नीचा करने के लिए पर्याप्त साधन हैं; और यदि हिन्दू समाज शीघ्र ही अपनी स्थिति में परिवर्त्तन नहीं करता, तो वह दिन दूर नहीं है, जबकि हमारे घरों की अधिकांश बहू-बेटियाँ हमारे मुँह में कालिख पोत कर लाखों की संख्या में कलमा पढ़ते अथवा बपतिस्मा लेते पाई जाएँगी ! हम आराम से खाते पीते औौर मौज उड़ाते हैं, और हमारी आँखों के सामने हमारी बहू-बेटियाँ गुण्डों के द्वारा भगाई जा रही हैं ।”23  

हिंदी नवजागरण कालीन संपादक स्त्री उद्धार के नाम पर हिन्दू रक्षा की लड़ाई लड़ रहे थे। वह अपनी संपादकीय लेख के हवाले से यह बात बार-बार कह रहे थे कि विधर्मी उनकी स्त्रियों को लेकर उड़े जा रहे हैं। वह धार्मिक वर्चस्व को कायम करने के लिए मुसलमानों और इसाइयों का गुंडा की संज्ञा दे रहे थे। माधुरी हिंदी नवजागरणकाल की प्रतिनिधि पत्रिका मानी जाती है। माधुरी पत्रिका का पहला अंक अंक 30 जुलाई 1922 में लखनऊ के मुंशी नवल किशोर से प्रकाशित हुआ था। माधुरी पत्रिका हिन्दू विचारों की वाहक थी। वह खुले आम हिन्दू संगठन का समर्थन भी करती थी। अगस्त 1927 में माधुरी पत्रिका के पाँच साल पूरे हुए थे। इस अवसर पर संपादक द्वय (कृष्ण बिहारी मिश्रऔर प्रेमचंद) ने संपादकीय लिखकर माधुरी की नीतियों और उद्देश्य को स्पष्ट किया। इस अंक के संपादकीय में लिखा गया कि,“’हिंदू-धर्म और हिंदू-जाति की सेवा करन अपना अहोभाग्य समझेगी। उन सभी प्रकार के आंदोलनों से ‘माधुरी’ की सहानुभूति होगी, जिनका उद्देश्य हिंदू-धर्म और हिंदू-जाति की रक्षा करना है। स्पष्ट शब्दों में ‘माधुरी’ हिंदू-संगठन और शुद्धि के विशुद्ध और उचित रूप का निस्संकोच समर्थन करेगी। यह बात इतनी सख्त इसलिये लिख दी गई है कि कुछ लोगों में यह भ्रम फैला या फैलाया गया है कि ‘माधुरी’ हिंदू-हितरक्षा के मामले में या तो विरोधी-भाव रखती है, या उदासीन। यह बात बिलकुल मिथ्या है। माधुरी हिंदू-हित-रक्षा के उचित रूप का पूर्ण बल के साथ समर्थन करेगी।”24  माधुरी पत्रिका के सन 1925 के मई अंक में ‘हिंदुओं के प्रति मुसलमानों का व्यवहार’ शीर्षक से एक संपादकीय लेख लिखा गया। इस संपादकीय लेख में बातया गया कि मुसलमान हिंदुओं पर बड़ा अत्याचार कर हिन्दू युवतियों को जबरन मुसलमान बनाने पर तुले हुए हैं। माधुरी के संपादक ने मुसलमानों  टिप्पणी करते हुए लिखा कि, “इधर कुछ दिनों से हिंदुओं के प्रति मुसलमानों का व्यवहार साधारणतः बड़ा ही कटु हो रहा है। कोई दिन ऐसा नहीं बीतता, जिस दिन के दैनिक पत्रों में हिंदुओं के प्रति मुसलमानों के दुर्व्यवहार और अत्याचार की ख़बर पढ़ने को न मिलती हो। कम-से-कम सौ पचास स्थानों में अब तक हिंदू लुट-पिट चुके हैं, उनकी स्त्रियाँ बेइज्जत हुई हैं, उनके बच्चे जबरन् या धोका देकर मुसलमान बनाए गए हैं। सहारनपुर, हाबड़े आदि के दंगे अभी कल की घटना है। बंगाल के देहातों में अधिकतर मुसलमान गुंडे हिंदू-युवतियों को उठा ले जाकर उन पर अत्याचार करते हैं, और उनका यह क्रम लगातार जारी है। दिल्ली और पंजाब आदि में हिंदुओं पर मुसलमानों का अत्याचार सुसंगठित रूप से चल रहा है। हशन  निज़ामी की स्कीम के अनुसार मौल्वी लोगों ने काम जारी कर दिया है।”25  

माधुरी पत्रिका के संपादक लगातार संपादकीय लेख लिखकर हिन्दुओं को यह बता रहे थे कि उनकी स्त्रियाँ छीनी जा रही हैं। माधुरी के कई संपादकीय लेखों  में इसाइयों और मुसलमानों के प्रति ज़हर उगला गया। माधुरी पत्रिका 1925 के सितंबर अंक में ‘हिन्दू- संगठन क्यों आवश्यक है ?’ शीर्षक एक संपादकीय लिखा गया। इस संपादकीय लेख में इस बात का विशेष तौर पर जिक्र किया गया कि तीन उच्च श्रेणी कि हिन्दू स्त्रियाँ मिशनरियों के चुंगल में जा फंसी थी। जिन्हें हिन्दू महासभा ने बड़े परिश्रम से मिशनरियों के चुंगल से मुक्त कराया है। माधुरी पत्रिका के संपादक ने लिखा कि, “इस युग में निर्बल की खैर नहीं। उसके आदमी छिन जाते हैं, उसकी स्त्रियाँ ईसाई मिशनरियों के आश्रय में भेज दी जाती हैं, कहीं भी उसकी फ़र्याद नहीं सुनी जाती। लुटेरे धार्मिक उत्तेजना फैलाकर जब बलबा मचाते हैं, तब निर्बल ही पिटते, लुटते और मरते हैं । हमारे इस कथन के लिये प्रमाण ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है। गत 10-12 महीनों के इतिहास में इन सब आपत्तियों की कई बार कई जगह पुनरावृत्ति हो चुकी है। अभी हाल में, कलकत्ते में, तीन ब्राह्मणियाँ पुलीस की खैरवाही से मिशनरियों के फंदे में जा फँसी थीं। अंत को हिंदू-सभा के उद्योग से उनका छुटकारा हुआ।”26  माधुरी पत्रिका के संपादक यहीं तक नहीं रुके वह आगे भी विधर्मियों से हिन्दू अबलाओं को बचाने पर ज़ोर देते रहे।  

हिंदी नवजागरणकालीन बड़े-बड़े लेखकों ने इस बात का दावा किया कि उनकी स्त्रियाँ उनके हाथ से निकाल कर विधर्मी बनती जा रही हैं। पंडित अयोध्या सिंह जी उपाध्याय हिंदी नवजागरण काल के बड़ी कवि माने जाते हैं। इन्होंने विधवा समस्या को लेकर एक ‘अपने दुखड़े’ शीर्षक से एक  कविता लिखी थी। उनकी यह कविता चाँद पत्रिका अप्रैल 1923 के अंक में प्रकाशित हुयी थी। इस कविता में कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ने विधवाओं की दुर्दशा पर चिंता प्रकट करने के बजाए इस बात पर चिंता प्रकट की कि स्त्रियाँ इसाइयों की गोद में बैठकर उच्च श्रेणी के मर्दों  की मूछों को नीचा दिखाकर उनकी संख्या में वृद्धि कर रही हैं। पंडित अयोध्या सिंह जी उपाध्याय अपनी बहू-बेटियों को लेकर कैसी राय रखते थे। इस कविता  में  महसूस कीजिए :

दिन ब दिन बेवा हमारी हीन बन। दूसरों के हाथ में हैं पड़ रहीं ||

जन रही है आँख का तारा वहीं । जो हमारी आँख में हैं गड़ रहीं ॥

लाज जब रख सके न बेवो की । तब भला किस तरह लजायें वे ॥

घर बसे किस तरह हमारा तब । जब कि घर और का बासायें वे ॥

गोद में ईसाइयत इसलाम की । बेटियां बहुये लिटा कर हम लटे ॥

आह ! घाटा पर हमें घाटा हुआ । मान बेवों जा घटा कर हम घटे ॥

है अगर बेवा निकलने लग गई । पड़ गया तो बढ़तियों का काल भी ॥

आबरू जैसा रतन जाता रहा । खो गये कितने निराले लाल भी ॥27 

                                                                                 

औपनिवेशिक दौर के बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में हिन्दी नवजागरण कालीन संपादकों ने स्त्रियों से संबंधित एक नया सगुफ़ा छोड़ दिया। हिन्दी लेखकों और संपादकों का कहना था कि उच्च श्रेणी की स्त्रियाँ तैतीस करोड़ देवी देताओं को छोड़कर पीर-मज़ारों और कब्रों की पूजा करने में लगी हैं। चाँद,माधरी, सरस्वती आदि पत्रिकाओं में व्यंग चित्र और कविताओं में यह दर्शाया गया कि उच्च श्रेणी की हिन्दू स्त्रियाँ हिन्दू देवी देवताओं को छोडकर पीर-मज़ारों की पूजा करने पर तुली हुई हैं। चाँद दिसंबर 1925 के अंक में श्री शोभाराम धनुसेवक की एक पीर-पूजा शीर्षक से लंबी कविता छ्पी। इस कविता में इस बात का भय व्यक्त किया गया कि उच्च श्रेणी कि हिन्दू स्त्रियाँ  पीर-पूजा कर हिन्दू गौरव को मिट्टी में मिला रही हैं। बड़ी मेजे की बात यह है कि यह कविता स्त्रियों की प्रतिनिधि चाँद पत्रिका में छ्पी थी। श्री शोभाराम धनुसेवक की यह कविता हिन्दी नवजागरण कालीन लेखकों और संपादकों की मानसिकता को सामने रखती है :

देवियो ! तुम जड़ता वश , पीरों की पूजा करती !  पीरों फूल चढ़ातीं, दरगाहों पर, जा करके मस्तक धरती !!

दीजै मुझको पुत्र चाँझपन- से करिये मेरा उद्धार ! तुम्हें चढ़ाऊँगी मैं सिरनी, पूजो आशा पार मदार !!

कभी भटकती जा कब्रों पर, कभी ताज़ियों से मिन्नत ! कहती पूर्ण मुरादें करिये, बखशो जीवन में जिन्नत !!

कभी खोजती हो ख्वाजा को, कभी औलिया आला को ! शा साहब ! मंजूर कराओ, अरज़ी अल्ला ताला को !!

कभी अपरिचित दरवेशों से , बनवाती गंडे ताबीज़! बात लम्बी चौड़ी सुन कर , जाती उन पर शीघ्र पसीज !!

चकमों में या रंगे- सियारों के सहसा उन पर विश्वास ! कर लेती हो , फिर रोती हो , जब हो जाता सर्वस नाश !!

कभी फक़ीरों के फेरों में, कानों को फुंकवाती हो ! हाफिज मुल्लाओं से बच्चों के मुख पर थुकवाती हो !!

हितू समझती जिन्हें, वही हित हरने को तैय्यार खड़े ! अवसर पाकर सर्वनाश तक करने को तैय्यार खड़े !!

होता है संताप तुम्हारी, नासमझी पर बहिनों आज ! चरण- दलित होकर रोता है, तुम से हिन्दू-धर्म-समाज !!

वारि नहीं, वह मृग- तृष्णा है, जिसे देख कर भूली हो ! मणी गँवा कर तुच्छ काँच पर, बेसमझी से फूली हो !!

सन्तति सीता सावित्री की- हो, निज गौरव याद करो ! तज निज धर्म विधर्म ग्रहण कर, मत जीवन बरबाद करो !!

पति सेवा से सावित्री ने, यम पर भी जय पाई थी ! नत -मस्तक हो अखिल विश्व ने, जिस की महिमा गाई थी !!

सती शिरोमणि सीता को पा भारत जग में धन्य हुआ ! तुम्हीं बताओ आर्य धर्म सा, पूर्ण धर्म क्या अन्य हुआ ?

पति की सेवा से ना पालो , ऐसी कौन, असंभव चोज़ ?  स्वर्ग, मोक्ष तक तुम्हें सुलभ है, फिर क्या हैं गंडे ताबीज़ !!

बहिनों ! आज तुम्हारे कारण,शीश हमारा नीचा है ! क्यों जड़ता वश कल्प- वेल पर, विषम हलाहल सींचा है ?

नारी का सर्वस्व पतिव्रत, उससे होकर रीती तुम ! प्राप्त भवन का सुधा त्याग क्यों, गरल पराया पीती तुम ?

सोचा भी है बहिनों तुमने, क्या इसका परिणाम हुआ ! आर्य -धर्म पीरों को पूजा से कितना बदनाम हुआ ?

जगत्पूज्य थीं वही आज अब पीर पूजने जाती है ! मरुस्थल में कल-कंठ स्वर्ग की, हाय कूजने जाती है !

हुई !! राहु चन्द्रवत लक्ष्यों बहिनें, बेधर्मिन के ग्रास हुई । पतन वहाँ अनिवार्य जहाँ पर , धर्म भावना-ह्रास हुयी!!

चेतो अब भी आर्य देविया, पतित प्रथा से मुँह मोड़ो ! पूजा करो पती- देवाँ की, पीरों की पूजा छोड़ो !!

कहते हैं सत शास्त्र नारि के, लिये दूसरा देव नहीं !पतिव्रता के लिये पति  बिनु जग में कोई सेव नहीं !!

सतियो ! उसो सत्य आभूषण, से उर को सन्जित करिये !तज जीवन  सर्वस्व पूजकर- असत न कुल लज्जित करिये !!

आर्य देवियो जिस दिन तुम में, यही सत्य संचित होगा ! ऐसा कौन सुफल फिर जिससे, शुद्धि जीवन वंचित होगा ?

देखेंगा संसार चकित हो, अभिलाषाएँ पल भर में ! तुम पूजोगी, फिरना होगा- नहीं तुम्हें फिर दर दर में !!

देकर द्रव्य चरण में जिनके, पावन शीश झुकाती हो ! वक काकों को हंस समझ कर , जड़तावश पतयाती हो !!

तुम देखोगो वही तुम्हारे, पद में शीश झुकावेंगे !  जननी कह पद – धूलि शीश घर, जीवन सफल बनावेंगे !!

भारत ही क्यों धन्य धन्य फिर- तुम से जगतीतल होगा ! सतियो सत उत्कर्ष तुम्हारा, पुरुष वर्ग का बल होगा !!

आशा है इस सत्य- निवेदन, पर बहिनों तुम दोगी ध्यान ! भ्रान्त धारणाएँ छोड़ोगी, दिखला कर आदर्श महान !!

यदि श्रद्धा है सुर-पूजन में, तो निज देवों की अर्चा ! करिये पर हिन्दू रमणी में, उचित न पीरों की चर्चा !!

तैतिस कोटि तुम्हारे सुर है, उन्हें छोड़ कर पर की आश !  करना भारी भूल न होगी, मृग-तृष्णा से शान्त पिपास !!28

हिन्दी नवजागरण कालीन पत्रिकाओं  में व्यंग्य चित्र खूब छपते थे। यह व्यंग्य चित्र सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर कटाक्ष करते थे। बड़ी दिलचस्प  बात यह  चाँद, माधुरी, मनोरमा, सरस्वती आदि  पत्रिकाओं ने ईसाई और मुसलमानों के खिलाफ खूब व्यंग्य चित्र छापे । चाँद पत्रिका में कई ऐसे कार्टून छपे जिसमें में  दखाया गया कि हिन्दू स्त्रियाँ तैतीस करोड़  देवी-देवताओं  को छोड़कर पीर-पूजा करने जाती है।  बड़े मज़े की बात यह कि एक  व्यंग्य  चित्र में यह दिखाया गया कि मौलवी हिन्दू स्त्रियों पर कुदृष्टि रखते हैं। चाँद पत्रिका में छापा यह व्यंग्य चित्र देखिए :

                                                                                

                                                             पीर-पूजन  

 

                                                स्रोत : चाँद : नवंबर 1929, वर्ष : 8, खंड : 1, संख्या  : 1  

 

दूसरी तरफ हिन्दी नवजागरन कालीन पत्रिकाओं ऐसे भी व्यंग्य चित्र देखने को मिले जिनमें यह दिखाया गयाकि मुसलमान मनिहार उच्च श्रेणी की स्त्रियों को चूड़ी पहनने के बहाने उनके घरों में सुरंग लगाने पर आमादा है। माधुरी पत्रिका में एक ऐसा व्यंग्य चित्र छपा जिसमें दीखया गया कि मुसलमान चूड़ीहार हिन्दू स्त्रियों को अपने जाल में फंसा कर उनको विधर्मी बना डालते है। यह व्यंग्य चित्र देखिए :

 

                                            हिन्दू घरों में तबलीग का प्रोपोगैंडा

 

 

                           स्रोत : माधुरी अक्तूबर 1927, वर्ष :6  खंड :1  संख्या : 3 पृ.697  

चाँद पत्रिका ने भी  हिन्दू समाज के भीतर यह हवा खूब उड़ाई कि मियाँ चूड़िहारों से  हिंदुओं को सावधान रहने की जरूरत है। यह मियां चूड़िहार हिन्दू  स्त्रियों  को बहला कर अपने कब्जे में कर लेते हैं।  चाँद पत्रिका  में मियाँ चूड़िहार पर छपा यह व्यंग्य चित्र देखिए  :

 

 

स्रोत : चाँद : नवंबर 1929, वर्ष : 8, खंड : 1, संख्या  : 1  

बीसवीं सदी के तीसरे दशक में हिन्दी संपादक स्त्री-रक्षा  पर जोर देते दिखायी दिए। ऐसे संपादकों का कहना था कि विधर्मियों से स्त्रियों की रक्षा करना जरूरी है। माधुरी पत्रिका अगस्त 1927 के अंक में ‘स्त्री- रक्षा’ शीर्षक से एक लंबा संपादकीय लिखा गया। इस संपादकीय लेख में पहले तो स्त्रियाँ  के प्रति दया दृष्टि दिखाते हुये इस बात का स्मरण कराया गया कि स्त्रियाँ भी आदर की पात्र है। इसके बाद संपादकीय में कहा गया कि  स्त्रियों की रक्षा का  भार पुरुषों ने अपने ऊपर ले रखा क्योंकि ईश्वर ने पुरुषों को शक्तिशाली बनाया है। माधुरी के संपादक का अभिमत था कि हिन्दू समाज न तो अपनी स्त्रियों का आदर करता है न तो उनकी रक्षा का कोई उचित प्रबंध करता है। यह बड़े ही परिताप की बात है। माधुरी के संपादक ने दावा किया हिन्दू जाति के लोग  इतने कायर हो चुके हैं कि वह स्त्रियों की रक्षा विधर्मियों से नहीं कर प रहे है। माधुरी के संपकीय लेख में कहा गया कि, “वर्तमान हिंदू -समाज में न तो स्त्रियों का आदर है। और न उनकी रक्षा का प्रबंध है। यह बढ़े ही परिताप की बात है। पर यह परिताप सहस्र-गुना अधिक हो जाता है, जब हम देखते हैं कि मुसलमान गुंडे हिंदू स्त्रियों को नाना प्रकार से चरित्र भ्रष्ट करते हैं ; परंतु फिर भी हिंदू -समाज पर्याप्त परिमाण में संक्षुब्ध नहीं होता। जो जाति मरने पर होती है, जिसमें कायरता का प्राधान्य हो जाता है, वही जाति ऐसे अपमान सहन करने में समर्थ होती है । एक जीत-जागती जाति तो ऐसे दुराचरण को एक क्षण के लिये भी सहन नहीं कर सकती। समाचार पत्रों में नित्य ही यह समाचार पढ़ने को मिलता कि मुसलमान गुंडों ने हिंदू स्त्रियों का अपमान किया पर हिंदू लोग सिवाय इसके कि अपनी त्रियों से और भी अधिक परदा करा-उनको घर के बाहर और भी पैर न रखने में इसके सिवाय और कोई दूसरा प्रतीकार नहीं ढुड़ते हैं।”29  माधुरी के संपादक ने अपने संपादकीय लेख में  स्त्रियों के मसले पर कहा कि धार्मिक गुंडों को सबक सीखने के लिए  कठोरतम दंड का प्रावधान सरकार की ओर से निश्चय किया जाए। माधुरी के संपादक ने अपनी मांग रखते हुए लिखा कि, “यदि मुसलमान गुंडों का एक संगठित दल हो, जिनका काम केवल हिंदू स्त्रियों को ही छेड़ने का हो, जो प्रत्येक दशा में हिंदू स्त्रियों की इज्जत उतारने पर तुले हुये है, जिनमें यह भाव भरे गये हो कि हिंदू स्त्रियों का सतीत्व भंग करने से सवाब होता है तो ऐसे गुंडों की सजा हमारी राय में प्रचलित दंढ-विधान से नहीं हो सकती । ऐसे गुंडों को तो इतना कठोर दंड मिलना चाहिये कि एक बार सज़ा पा चुकने के बाद फिर उन्हें दोबारा गुंडई करने का साहस ही न हो । हमारा हिंदू समाज से यह नत्र निवेदन है कि ऐसे संगठित और ‘धार्मिक’ गुंडों को उचित पाठ पढ़ाने के लिये उन्हें सरकारी कानून को कठोरतम कराना होगा। यदि हिन्दू लोगअपनी स्त्रियों का सम्मान करना चाहते हैं, उनकी उचित रक्षा करना चाहते हैं, तो उन्हें अविलंब ऐसा कानून बन वाना चाहिये कि यदि ‘धार्मिक’ कारणों से प्रवृत्त होकर कोई गुंडई करता हो, तो उसको साधारण गुंडे से तीन चार गुना अधिक दंड दियाजाय।”30  

अब हम इस लेख की समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। निष्कर्ष में पाते है कि  बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक की स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति सचेत दिखायी देती हैं। वह अपने लेखन में विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह और व्यभिचार जैसे ज्लंत मुद्दे को सामने रख रही थी। बीसवीं सदी के दूसरे दौर की स्त्रियाँ अपने सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन में बदलाव के लिए मर्दवादी मानसिकता  के खिलाफ संघर्ष कर रही थी। इस पितृसत्तावादी समाज में स्त्रियाँ अपनी शिक्षा की दावेदारी का भी सवाल उठा रही थी। स्त्रियों की ओर से यह दावेदारी उस दौर में होती जब स्त्री बौद्धिकता पर मर्दवादियों का पहरा लगा हुआ था। आज के सौ साल पहले पितृसत्तावादी निर्मितियों के खिलाफ ज़मीन तैयार करना कोई छोटी बात नहीं थी। देखा जाए तो बीसवीं सदी के दूसरे और तीसर दशक के हिंदी संपादक स्त्री समस्या को आपदधर्म के तौर पर देख रहे थे। नवजागरण कालीन संपादकों और लेखकों की स्त्री-उद्धार की परियोजना हिन्दू धर्म की रक्षा करने पर टिकी थी। इसका नतीजा यह हुआ कि स्त्रियों की दावेदारी का मसला अलग-थलग पड़ गया। हिंदी संपादक और लेखक स्त्री परियोजना के बहाने धार्मिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे। नवजागरण कालीन स्त्री-उद्धार आंदोलन में यह भी देखा गया कि हिंदी लेखक और संपादकों द्वारा बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में स्त्रियों को ढाल बनाकर इसाईयों और मुसलमानों के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चेबंदी की पहलकदमी को अंजाम दिया। यहाँ तक हिन्दी नवजागरण कालीन संपादकों ने चूड़ी बेचने वाले मुसलमान मनिहारों को निशाना बनाकर उन्हें हिन्दू घरों में तबलीग फैलाने वाला बता दिया। यह सवाल लाज़मी है कि हिंदी नवजागरण कालीन संपादकों के लिए स्त्री मुक्ति से ज्यादा उनके लिए हिन्दू रक्षा का विषय प्रमुख मुद्दा बन गया था।

 

 

संदर्भ

 

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  • हिंदुओं के प्रति मुसलमानों का व्यवहार,विविध विषय,संपादकीय, माधुरी,मई 1924, वर्ष : 2,  खंड  : 2,  संख्या : 4
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  • स्त्री- रक्षा, संपादकीय, माधुर, अगस्त 1927, वर्ष : 6,  खंड  : 1 ,  संख्या :2  , पृ. 346

लेखक का परिचय – नवजागरणकालीन  साहित्य के अध्येता और शोधार्थी

 

नागरिकता, समता और अधिकार के संघर्ष अभी जारी हैं

आधुनिक भारत के  निर्माण में  आज़ादी से पहले  और आजादी के बाद के तमाम जनांदोलनों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है और इन आंदोलनों में  महिलाओं  की  भागीदारी  और ज्यादा  महत्वपूर्ण  है। साथ ही आजादी की लड़ाई जितना पुरुषों ने लड़ी उतनी ही महिलाओं ने भी 1857 में ये सिलसिला अगर  रानी   लक्ष्मीबाई , बेग़म हज़रत महल, झलकारी बाई, ऊदा देवी, अज़ीज़न बाई, अवंतिबाई लोधी और धार की रानी द्रौपदी से शुरू होता है तो ऐसे अनेकों गुमनाम नामों से भी जिन्हें इतिहास में दर्ज़ नहीं किया गया। दर्जनों स्त्रियों ने आज़ादी के जंग में अपनी कुर्बानी दी अंग्रेजों के द्वारा उन्हें फांसी चढ़ाया गया और जिन्दा जलाया गया।  एक गुमनाम इतिहास उस दौर की तवायफों का भी है जिन्होंने अपनी दौलत और अपनी जान सब इस देश और यहाँ के लोगों के लिए कुर्बान कर दिया, रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी पुस्तक  “ऑन द सिटी वॉल ” में  1857 के विद्रोह में वेश्यालयों की सक्रिय भागीदारी और तवायफों के निजी योगदान पर विस्तार से लिखा है।  इसके अलावा “1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता” किताब में शोभना देवी, इंद्र कौर, आशा देवी, भगवती देवी त्यागी, रहीमी, जमीला ख़ान, मन कौर, बख्तावरी देवी और उम्दा जैसी आम ग्रामीण विद्रोहिणियों के नाम हैं जिन्होंने केवल अपने पतियों और बेटों को ही विद्रोह की जंग में जाने प्रेरित नहीं किया बल्कि खुद भी आगे बढ़कर सक्रिय योगदान दिया।

जबकि आजादी के आंदोलन में भी महिलाओं की बहुत अहम् भागीदारी रही, इससे पहले सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख, पंडिता रमाबाई  जैसी महिलाओं का भी है जिन्होंने मध्ययुगीन प्रथाओं और परम्पराओं को चुनौती देते हुए जाती और लिंग से इतर इस देश में महिलाओं के लिए आधुनिक  शिक्षा की शुरुआत  की, विधवाओं के पुनर्वास पर काम किया। 1947 आजादी के आंदोलन में भी हजारों आम भारतीय स्त्री समेत कस्तूरबा,प्रभावती, मैडम बीकाजी कामा,अरुणा   आसफ अली, विजयलक्ष्मी पंडित, इंदिरा गांधी, सरोजिनी नायडू,सुचेता कृपलानी  जैसी तमाम महिला नेताओं ने सक्रिय योगदान दिया।

इस साल 15 अगस्त को  भारत को आजाद हुए 75 साल हो जाएंगे, इन पचहत्तर सालों में इस देश ने दुनिया को दूसरी महिला प्रधानमंत्री दिया, महिलाओं ने संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के साथ अपने अथक संघर्ष से राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर और भी बहुत से अधिकार हासिल किया। हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई। राजनीति में  सुचेता कृपलानी,  विजयलक्ष्मी  पंडित ,  इंदिरा  गांधी, नंदिनी   सत्पथी ,  मोहसिना   किदवई , सोनिया गांधी,  सुषमा   स्वराज ,  मायावती ,  शीला   दीक्षित ,  ममता   बनर्जी  जैसे नामों का सिलसिला है तो जनपक्षधर समाजिक सरोकारों के लिए लगातार संघर्ष करने वाली मेधा पाटेकर, सोनी सोरी, इरोम शर्मीला, अरुणा रॉय, सुधा भारद्वाज और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे नाम हैं, जो तमाम जनपक्षधर मसलों के लिए अभी भी संघर्षरत हैं, इनमें से कुछ पहले से जेल में बंद हैं तो तीस्ता सीतलवाड़ जैसी सामाजिक कार्यकर्त्ता पिछले हफ्ते ही गिरफ्तार कर ली गई हैं।

75 साल के भारत में संविधान के आर्टिकल 243डी के क्लॉज़ (3) के तहत पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। इसके मुताबिक प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी है) स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे और ऐसे  स्थान किसी पंचायत में भिन्न-भिन्न निर्वाचन-क्षेत्रों को चक्रानुक्रम  से आबंटित किए  जा सकेंगे । इस प्रावधान के कारण ग्रामीण स्तर पर भी  राजनीति  में  महिला  भागीदारी   का   संख्यात्मक   प्रतिनिधित्व   बढ़ा  है।महिलाओं  को  नया   आत्मविश्वास  मिला है, उनमें राजनीतिक चेतना का विस्तार हुआ है और समाजिक जारूकता बढ़ी है।  हालाँकि ये और बात है कि संसद और विधानसभाओं  में   महिला  आरक्षण का मामला 1998  से   लंबित   है।  एक और बात का जिक्र महत्वपूर्ण है और वो ये कि नब्बे के दौर के भूमंडलीकरण ने महिलाओं को साठ -सत्तर के दशक के मुकाबले में ज्यादा पब्लिक स्पेस मुहैया कराया, शिक्षा और जागरूकता के साथ उनकी मौजूदगी तमाम सार्वजानिक स्पेस में  बढ़ी इसलिए  उन्हें  अपने मसलों के लिए एकजुट होना,लड़ना और खड़ा होना भी पहले से बेहतर आया है।

बहरहाल, इस भूमिका का उद्देश्य आगे लेख की उस मूल बात के सन्दर्भ में बतौर पृष्ठभूमि है, पिछले कुछ दशकों में हमने लगातार महिलाओं को जनांदोलनों में ना सिर्फ सक्रिय भागदारी करते देखा बल्कि कई आंदोलनों को उन्होंने ही खड़ा किया, उनका नेतृत्व किया और अधिकार हासिल किया। पिछली सदी में आजादी के आंदोलन से अलग महिलाओं  के ये आंदोलन अगर सती प्रथा, बाल-विवाह रोकने, विधवा पुनर्विवाह, दलित महिलाओं के बराबरी के अधिकार आदि मसलों से संबधित थे तो  सत्तर के दशक में पेड़ों को बचाने के लिए मौजूदा उत्तराखंड तत्कालीन उत्तर प्रदेश में महिलाओं ने ही “चिपको आंदोलन ” खड़ा किया था। ताड़ी और शराब के खिलाफ भी महिलाओं ने आंदोलन किये। बांध विरोधी आंदोलन, विस्थापन के खिलाफ आंदोलन के साथ जल -जंगल -जमीन के सवालों से जुड़े तमाम आन्दोलनों के पीछे महिलाओं की ही अहम् भूमिका रही है। नर्मदा बचाओ आंदोलन महिलाओं के द्वारा संचालित आंदोलन रहा है। आंध्रप्रदेश में शराब के विरोध में महिलाओं ने बहुत प्रभावी अर्क -विरोधी आंदोलन किया और उत्तर पूर्व में एएफएसपीए -विरोध का आंदोलन कैसे  भुला जा सकता है जिसे इरोम शर्मिला और मणिपुर की माताओं बहनों ने लड़ा। हाल ही में कृषि बिल को वापस लेने के लिए एक साल से भी ज्यादा चले किसान आंदोलन की ही बात करें तो उसमें महिलाओं की समानांतर भूमिका रही लेकिन बड़े स्तर पर किसान आंदोलन पुरुष किसानों का आंदोलन था, वही उस आंदोलन का चेहरा थे, महिलाएं पूरक अवश्य थीं।

दरअसल, महिलाओं पर घरेलू हिंसा से लेकर, वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हैरेसमेंट और बलात्कार के विरोध में प्रभावी कानून को लेकर महिलाओं ने पिछले दो दशक में ही कई महत्वपूर्ण आंदोलन किये हैं और बदलाव को प्रेरित किया है बलात्कार और यौन हिंसा के सन्दर्भ में “निर्भया कानून ” ऐसे ही आंदोलन का हासिल है। बहरहाल,  हम इस लेख में खासतौर पर नागरिकता कानून के खिलाफ महिलाओं के द्वारा हाल ही में किये गए आंदोलन और  केरल में सबरीमला मंदिर में रजस्वला आयु की महिलाओं के प्रवेश के सन्दर्भ में महिलाओं की भागीदारी और भूमिका के बारे में बात करेंगे।

शुरुआत  नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध में शाहीन बाग में हुए आंदोलन से , जिसे लोकतंत्र की एक नई करवट के रूप में भी देखा गया। एक अनजान ,गुमनाम से इलाके में 101 दिन तक चला यह विरोध प्रदर्शन हालांकि कोरोना वायरस और उसके बाद लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के कारण मुकम्मल परिणति से पहले ख़त्म हो गया लेकिन ख़त्म होने से पहले भारतीय लोकतंत्र के सन्दर्भ में महिलाओं और खासतौर पर मुस्लिम महिलाओं की राजनीतिक समझ, उनके साहस और संकल्प की ताकत का अनुभव पुरे देश को करा दिया, शाहीन बाग़ एक राष्ट्रीय परिघटना के तौर पर दर्ज़ हुआ।  इसका असर इतना व्यापक हुआ कि 15 दिसंबर 2019 से 24 मार्च 2020 तक 101 दिन चले  इस विरोध प्रदर्शन के दौरान देश के कई राज्यों में 80 से ज्यादा जगहों पर नागरिकता (संशोधन) कानून का विरोध शाहीन बाग़ की तर्ज़ पर शुरू हुआ, हर शहर में नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध प्रदर्शन की जगह को उस शहर का “शाहीन बाग़ ” कहा गया।  यह अपनेआप में इतिहास दर्ज़ होने वाली बात है जब विरोध का कोई स्थान ही पुरे देश में उस ख़ास मसले पर विरोध का प्रतीक बन जाता हो। हमने देश के तमाम शहरों में “शाहीन बाग़” देखा जो दक्षिण -पूर्वी दिल्ली के जामिया नगर में बसे शाहीन बाग़ का विस्तार बनता  चला गया। दिल्ली के जीडी बिड़ला रोड, शाहीन बाग़ ,कालिंदी कुंज इलाके का 40 फुट का रोड दिल्ली के जंतर -मंतर और रामलीला ग्राउंड से अलग सत्ता के विरोध में खड़े होने का पर्याय बन गया, इसी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में तुर्कमान गेट, खुरेजी और हौजरानी समेत कुल 66 विरोध प्रदर्शन हुए और ये सब दिल्ली के अलग अलग शाहीन बाग़ थे। गौरतलब है कि इसी दौरान गृह मंत्रालय (एमएचए) के द्वारा लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया गया था  कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ दिल्ली में 66 विरोध प्रदर्शन हुए। इस दौरान कुल 11 मामले दर्ज किए गए हैं और 99 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

बहरहाल, शाहीन बाग़ पर जारी विरोध -प्रदर्शन को ख़त्म हुए 2 साल से ज्यादा का समय हो गया है लेकिन अब भी इसकी ताब बाकी है इस आंदोलन पर देश दुनिया में तमाम लेख लिए गए।  कुछ किताबें तक आ गई , आखिर क्यों नागरिकता कानून के विरोध का  शाहीन बाग की महिलाओं का आंदोलन अब तक के बाकी आंदोलनों से अलग है, या  क्यों इसे बहुत गंभीरता से देखे, समझे और विश्लेषित किये जाने की जरूरत है? सबसे पहली बात तो ये कि जब बहुसंख्य समाज इस कानून से सहमति नहीं होने के बावजूद इसे लेकर अपनी प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में बहुत गंभीर और जिम्मेदार नहीं दिख रहा था तब शाहीन बाग़ की आम घरेलु महिलाओं ने जो प्रायः पर्दे में, घरों में अपने घर-गृहस्थी के कार्यों में व्यस्त रहती थीं, बगैर डरे हुए इस कानून के खिलाफ बोलना और प्रतिरोध करना अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य समझा। जबकि  ये औरतें ना तो कोई एक्टिविस्ट थीं  ना ही किसी पार्टी की नेता कार्यकर्त्ता ना ही कॉलेज विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली प्रोफेसर। और हाँ ये औरतें अपने घर का काम करके इस प्रदर्शन में शामिल होने आ रही थीं।

वो भी तब जबकि दिसंबर के आखिर के दिन दिल्ली के सबसे सर्द दिनों में से होते है ,उस कड़ाके की ठंड में भी शाहीनबाग में पूरे जोश के साथ आंदोलन जारी रहा। आंदोलन में युवा  लड़कियां और छात्राएं भी थीं तो उनकी माएं भी,गोद में  बच्चे को लेकर आने वाली महिलायें भी थीं सबसे अनोखी बात बड़ी -बुजुर्ग महिलाओं का इसमें शामिल होना उनकी भूमिका रही, 90-100  साल से ऊपर की उम्र ही वृद्धाएं भी यहाँ 101 दिन बैठनेवालों में से थीं।  सभी का लक्ष्य एक था कि सरकार को इस बिल को वापस लेने पर मजबूर करना। ये अपने आप में बहुत खूबसूरत बात थी कि यहाँ हर उम्र की महिलाएं एक साथ नागरिकता कानून के विरोध में मज़बूत तेवर के साथ खड़ी थीं। दूसरी सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात इस आंदोलन  में किसी राजनीतिक पार्टी का सहयोग या संलिप्तता का नहीं होना कह सकते हैं,  यह एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन रहा जिसकी नेता व आयोजनकर्ता सब महिलाएं थीं,इसके बावजूद यह आंदोलन भारत के कुछ ऐसे आन्दोलनों में शामिल हो चुका है जिसके दौरान किसी भी किस्म की हिंसा या अराजकता का प्रदर्शन नहीं किया गया।  हाल ही में हमने  केंद्र सरकार की अग्निवीर योजना के खिलाफ छात्रों के विरोध प्रदर्शन देखा, जिसमें दर्जनों ट्रेन को आग लगा दिया गया। हालांकि उनका विरोध करना कहीं से गलत नहीं था लेकिन अराजकता , तोड़-फोड़ का समर्थन नहीं किया जा सकता।  यहाँ इस उदाहरण का जिक्र उस फ़र्क़ को दर्ज़ करने के लिए भी जरूरी है कि कोई भी विरोध प्रदर्शन या आंदोलन का नेतृत्व जब महिलायें करती हैं तो उनका अप्रोच कितना अलग होता है।

इस आंदोलन का महत्त्व लोगों में संविधान की समझ और उसमें भरोसा बढ़ाने का भी आंदोलन रहा और इस लिहाज से इसे लोकतंत्र की समझ व्यापक और मजबूत करनेवाला भी कहा जा सकता है।  जो कि भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अच्छा संकेत है।  इसे थोड़ा और विस्तार से ऐसे समझ सकते हैं कि ऐसे दौर में जब  लोग किसी भी विरोध -प्रदर्शन में शामिल होने से इसलिए बच और डर रहे हों कि पता नहीं उनपर कौन सी धारा लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा तब  भी इन औरतों ने   डटे रह कर लोगों की कुंद राजनीतिक -सामाजिक सोच को झकझोरा, उन्हें हस्तक्षेप की जरूरत और महत्त्व का एहसास कराया। घरेलु कही जाने वाली इन सभी महिलाओं की परिपक्व राजनीतिक समझ कई और तरह से भी दिखी जैशाहीन बाग़ के तमाम पोस्टर, बैनर इसकी तस्दीक करने वाले कहे जा सकते हैं मसलन, गाँधी, अम्बेडकर, भगत सिंह, मौलाना आज़ाद, फुले, पेरियार के नारे, कोट्स। सर्व धर्म समभाव के पोस्टर बैनर, ईश्वर, अल्लाह, जीजस, गुरुनानक सभी से जुड़े प्रतीकों का प्रतिनिधित्व।  इसके अलावा बहुत मजबूती से इस पुरे आंदोलन को किसी भी राजनीतिक दल या संघठन से अलग रखना, इसे किसी भी राजनीतिक दल या संगठन के पाले में नहीं जाने देना। साथ ही आंदोलन को पूरी तरह से जनता के सहयोग से संचालित करना किसी पार्टी या संगठन से कोई आर्थिक सहयोग नहीं लेना। ये सभी बातें इस आंदोलन में शामिल महिलाओं की परिपक्व राजनीतिक समझ का परिचय देती हैं।  और साथ ही उनकी दूरदृष्टि का भी क्योंकि इस आंदोलन के बहाने ही वो आनेवाली पीढ़ी को भी  लोकतंत्र, न्याय, प्रतिरोध के पाठ सीखा रही हैं और संविधान के मूल्यों को सुनिश्चित करते हुए लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, बराबरी के भारत की स्थापना के लिए प्रेरित कर रही हैं।

इस आंदोलन का एक सबसे महत्वूर्ण पक्ष महिलाओं के द्वारा पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा उनके लिए तय किए गए परदा समेत लैंगिक असमानता के तमाम  नियमों,आचार संहिताओं व वर्जनाओं को तोड़कर इस आंदोलन में शामिल होना भी कहा जा सकता है। जबकि नागरिकता कानून से प्रभावित केवल महिलायें ही नहीं होने वाली थी बावजूद इसके आंदोलन की कमान पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में रही।  जबकि अधिकतर राजनीतिक मसलें  अगर वो सिर्फ महिलाओं से जुड़े मसले ना हों तो उनका नेतृत्व पुरुषों के द्वारा ही किया जाता रहा है। साथ ही शाहीनबाग ने मुसलमान औरतों की एक दूसरी ही तस्वीर पेश की, यहाँ ये उल्लेख जरूरी है कि शाहीनबाग प्रदर्शन में समाज के सभी जाति धर्म के लोगों की भागीदारी रही लेकिन मुसलमान औरतों की संख्या बढ़चढ़ कर रही। इस मौके पर उन्होंने अपनी भागीदारी व प्रबंधन से इस देश की अपनी नागरिकता का शानदार क्लेम पेश किया उसे साबित किया। उन्होंने स्टेट के द्वारा किये जा रहे राजनीतिक फैसलों में अपने स्पेस और अपने अस्तित्व दोनों की दावेदारी पेश की और ऐसा करने के लिए वो खुद मैदान में उतरी, जनांदोलन के मार्फ़त जिसका संचालन, प्रबंधन और नेतृत्व सब उनके ही हाथ में था। इस तरह उन्होंने पितृसत्ता के बरक्स भी अपनी लड़ाइयों को खुद लड़ने की लकीर खींची। हालाँकि इससे पितृसत्ता के उनपर नियंत्रण की कहानी इतनी जल्दी नहीं बदलती लेकिन इसे एक शुरुआत तो कह ही सकते हैं।

आंदोलन में शामिल महिलाओं की प्रगतिशील सोच का इससे भी पता चलता है कि वो किसी भी धार्मिक मसले पर इस तरह से गोलबंद नहीं हुई थी हमने ढाई साल बाद नूपुर शर्मा और पैगम्बर साहब पर अपमानजनक टिप्पणी के मामले में भी मुसलमान महिलाओं का यही स्टैंड देखा जब वो इस तरह के धार्मिक मसले पर गोलबंद नहीं हुई जैसे वो सीएए और एनआरसी पर हुई थीं। हालाँकि ये आन्दोलन ख़त्म हो गया लेकिन बेशक इस विरोध प्रदर्शन ने भारतीय लोकतंत्र में एक नई इबारत तो लिख ही दिया है, आंदोलन ने अपनी शुरुआत में ही सत्ता को इस कदर दवाब में डाल दिया कि इस निजाम के द्वारा इस आंदोलन को बदनाम करने, ख़त्म करने की साजिशें और षड्यंत्रों की लगातार कोशिशें होती रहीं। लेकिन इस मामले में सरकार की मदद कोरोना वायरस और लॉक डाउन की घोषणा ने की। इसका असर इस तरह भी देख सकते हैं कि नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के तहत सरकार ने अभी तक किसी भी अल्पसंख्यक शरणार्थी को भारत की नागरिकता प्रदान नहीं की है क्योंकि इस कानून पर अमल के लिये जरूरी नियमों को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया गया है, इसके लिये जरूरी नियमों को अभी तक अधिसूचित नहीं किया जा सका है। दूसरी ओर इस कानून के तहत नियम बनाने के मामले में सरकार की ढिलाई भी काफी कुछ बयां करती है.नागरिकता संशोधन विधेयक संसद से पारित होने और उसे राष्ट्रपति की संस्तुति मिलने के साथ ही इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में एक एक करके करीब 140 याचिकाएं दायर हुई हैं, तो मामला इतना आसान भी नहीं रहा है सरकार के लिए।

महिलाओं के द्वारा हाल ही में किये गए आन्दोलनों में दूसरा महत्वपूर्ण आंदोलन  केरल में पथनमथिट्टा जिले के पश्चिमी घाटी में संरक्षित वन क्षेत्र में स्थित सबरीमला मंदिर में रजस्वला आयु की महिलाओं के प्रवेश के सन्दर्भ में है, महत्त्व की दृष्टि से केरल का सबरीमाला मंदिर को दक्षिण भारत का काशी विश्वनाथ नंदिर या अयोध्या  मंदिर कह सकते हैं, इस मंदिर में हर साल आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दुनिया में कहीं भी किसी धार्मिक स्थल पर जाने वाली सांख्य से ज्यादा है। अनुमानतः प्रति वर्ष यहाँ 4 -5 करोड़ लोग आते हैं। एक और जरूरी बात इस मंदिर का शैव और वैष्णव दोनों मतों का मेल होना भी है।अयप्पा स्वामी जिनकी यहाँ पूजा की जाती है वो शिव और विष्णु के स्त्री रूप मोहिनी की संतान हैं इसलिए अयप्पा स्वामी की आराधना शैव और वैष्णव दोनों के द्वारा होता आया है।  एक और ख़ास बात इस मंदिर परिसर के कुछ मंदिरों का दुनिया में किसी भी धर्म के लोगों के लिए खुला होना है।  लेकिन दूसरी ओर ये वही मंदिर है जहाँ रजस्वला स्त्री यानि 10 -50 साल की स्त्री का प्रवेश प्रतिबंधित रहा था और इस  प्रतिबन्ध को  धार्मिक परंपरा के तौर पर सामजिक स्वीकृति प्राप्त थी।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार  सबरीमाला मंदिर में पूज्य ईश्वर का स्वरूप नैश्तिका ब्रह्मचारी का है। परंपराओं और पुराणों के अनुसार इसी को आधार बनाकर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई गई थी।

दरअसल, पिछली आधी सदी में सबरीमला मंदिर में लैंगिक भेदभाव के मसले से ज्यादा लैंगिक ध्रुवीकरण वाला मसला शायद ही कोई और रहा हो। लेकिन ये भी सच है कि महिलाओं का एक हिस्सा लगातार मंदिर में प्रवेश से जुड़ें इस लैंगिक भेदभाव को लेकर सक्रिय रहा। इस पूरी मुहिम में महिलाओं की भागीदारी और भूमिका की बात है तो इसके मूल में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित होना और तमाम महिलाओं का इस प्रतिबन्ध के खिलाफ खड़े होना और कानूनन इस लिंग आधारित  भेदभाव पर रोक लगवाना रही है। दरअसल, मंदिर में महिलाओं के  प्रवेश को लेकर विवाद दशकों पुराना रहा है। लेकिन विवाद की शुरुआत तब हुई जब मंदिर के मुख्य ज्योतिषि परप्पनगडी उन्नीकृष्णन के द्वारा कहा गया कि भगवान अयप्‍पा की ताकत मंदिर में किसी महिला के प्रवेश करने की वजह से कम हो रही है। उनके  इस बयान के बाद कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला ने कहा कि 1986 में 27 साल की उम्र में वो सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर गई थीं और उन्होंने अय्यप्पा भगवान की मूर्ति का चरणस्पर्श किया था। उनके इस बयान के बाद  मंदिर का शुद्धिकरण करवाया गया और उनके  इस दावे के बाद ही सबको ये मालूम चला कि मंदिर में रजस्वला महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।  ये भी हैरान करने वाली बात है कि जयमाला जैसी अभिनेत्री जो इसी पत्रकार को 2016 के इंटरव्यू में कहती हैं कि भारत में सती प्रथा, देवदासी प्रथाएं भी हुआ करती थीं, दलितों को अब भी सामाजिक, धार्मिक भेदभावों का शिकार होना पढ़ता है, लेकिन हमने समय के साथ ऐसी परंपराओं और प्रथाओं की अमानवीयता को समझा और उन्हें हटाया। सबरीमाला मंदिर में भी 10 से 50 साल के बीच की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को जितनी जल्दी हटाया जाए एक प्रगतिशील समाज और देश बनाने  के लिए ये बहुत जरूरी है। 2019 में इस मसले पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर देती हैं।  इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का यह मामला कितना संवेदनशील रहा है।

बहरहाल, इसी प्रकरण के बाद मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश दिए जाने को लेकर 1990 में प्रतिबन्ध के  खिलाफ केरल हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। 1991 में केरल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में महिलाओं के प्रवेश को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर मंदिर के फैसले को सही ठहराया था। और कहा कि  मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं का मंदिर में प्रवेश निषेध न तो संविधान का और न ही केरल के कानून का उल्लंघन है। 2006 में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पांच महिला वकीलों का समूह केरल के यंग लॉयर्स असोसिएशन जिसमें भक्ति पसरीजा, प्रेरणा कुमारी, लक्ष्मी शास्त्री, सुधा पाल, अलका शर्मा शामिल थीं, सुप्रीम कोर्ट में गए। इसके बाद जुलाई 2016 में  सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को मौलिक अधिकारों का हनन कहा और मामले को  2017 में पांच सदस्‍यीय संवैधानिक पीठ को सौंप दिया गया।

सितंबर 2018 में सबीरमाला मामले पर  तत्कालीन मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के पक्ष में  ऐतिहासिक फैसला सुनाया जबकि एक सदस्य महिला न्‍यायधीश इंदु मल्होत्रा की प्रवेश के फैसले से असहमति थी इस फैसले ने जैसे पुरे दक्षिण भारत खासतौर पर केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु  में महीनों तक तनाव का माहौल पैदा कर दिया, सड़क पर दोनों समूह के लोग थे एक वो जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में थे और वो भी जो इस फैसले का स्वागत कर  रहे थे बात इस फैसले के वास्तविकता में भी उतरने की थी।  एक ओर प्रवेश के विरोध में 600 किलोमीटर से ज्यादा लम्बी ज्योति श्रृंखला बनायीं जा रही थी  दूसरी ओर मंदिर में प्रवेश के समर्थन में पचास लाख औरतों के द्वारा निर्मित 620 किमी लम्बी लैंगिक समानता की मानव श्रृंखला भी थी, इस मानव श्रृंखला में सभी धर्मों की महिलायें साथ आयी थीं, एक और अंतर इस समूह पर प्रतिबन्ध के समर्थक समूह के लोगों का आक्रामक होना था।  लैंगिक समानता की मानव श्रृंखला के दौरान  एक फोटो जर्नलिस्ट शाजिला अली फातिमा की एक तस्वीर वायरल हुई थी काम के दौरान उनपर हमला होने की और आँखों में आंसू के बावजूद शाजिला अली फातिमा का अपने कैमरे पर मजबूत पकड़ बनाये रखने और अपना काम करते रहने की। ये भी उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन पत्रकारों और एक्टिविस्टों पर भी हमले हुए जिन्होंने मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की मसलन  फैसले के बाद नारीवादी कार्यकर्ता रेहाना फातिमा, पत्रकार कविता जक्कल और एक महिला भक्त मैरी स्वीटी ने जब सबरीमाला में प्रवेश करने की कोशिश की तो उन्हें फैसले के खिलाफ भक्तों द्वारा मंदिर के प्रवेश के बजाय पुलिस सुरक्षा में लौटने  के लिए मजबूर किया गया। सच ये है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यथस्थितिवाद हावी है, धार्मिक परंपरा का पालन करने वालों की मर्जी अघोषित रूप से प्रैक्टिस में है इसकी तस्दीक इस बात से होती है कि 2018 में प्रतिबन्ध हटने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद सिर्फ 2 महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश किया जिनमें पहली महिला हैं बिंदु अम्मिणी जो एक वकील, व्याख्याता और दलित सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं, और दूसरी उनकी दोस्त कनकदुर्गा।  लेकिन मंदिर में इन दोनों का प्रवेश इतना सहज नहीं रहा सबसे पहले तो इनके प्रवेश और निकलने के बाद मंदिर कर शुद्धिकरण किया गया, इन दोनों के प्रवेश से मंदिर अपवित्र माना गया। बाद में बिंदु के घर पर हमला हुआ, तोड़ -फोड़ के गई और उन्हें लगातार जान से मार डालने की धमकी मिलती रही।कनकदुर्गा को मंदिर में प्रवेश करने के कारण उनके पति के द्वारा तलाक दे दिया गया। 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब  2022  है लेकिन अभी तक सिर्फ इन्हीं दो महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने की आधिकारिक जानकारी है हालाँकि जनवरी 2019 में केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कुल 51 औरतों के मंदिर में प्रवेश की जानकारी दी लेकिन बाद में इससे मुकरते हुए केवल दो महिलाओं के मंदिर में प्रवेश की पुष्टि की।

जाहिर है सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के मामले में सालों के संघर्ष के बावजूद सफलता अभी कागज पर मिली है जमीन पर नहीं, जमीनी हक़ीक़त ये है कि कांग्रेस जैसी पार्टी का इस मसले पर स्टैंड मौजूदा मुख्यमंत्री पिनरई विजयन से उलट सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप का है।  यानि अभी संघर्ष बाकी है, लैंगिक बराबरी के संवैधानिक मूल्य और स्त्रियों को लेकर प्रगतिशील फैसलों का व्यावहारिक धरातल पर उतरना अभी भी चुनावी राजनीति और वोट बैंक के नफा नुक्सान के हवाले हैं।  केरल जैसे अधिकतम साक्षरता वाले राज्य में ये हाल है जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 4 साल होने के बावजूद केवल 2 महिलाएं मंदिर में प्रवेश करती हैं और वापस आने के बाद उसकी सजा या दुष्परिणाम झेलती हैं।

पुनश्च:

यहाँ ये जान लेना भी जरूरी है आखिर नागरिकता संशोधन कानून 2019 है क्या?

दरअसल, देश में घुसपैठियों का मामला काफी समय से चर्चा में रहा था और घुसपैठियों को देश से बाहर करने की दिशा में सबसे पहले असम में एनआरसी (NRC) यानी नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस पर काम हुआ। लेकिन एनआरसी ने बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को भी नागरिकता की लिस्ट से बाहर रख दिया जो देश के ही मूल निवासी थे। इसी के जवाब में या समाधान में  सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून, 2019  पेश किया गया।

नागरिकता संशोधन कानून 2019 में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और क्रिस्चन धर्मों के प्रवासियों के लिए नागरिकता के नियम को आसान बनाया गया है। पहले किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए कम से कम पिछले 11 साल से यहां रहना अनिवार्य था। इस नियम को आसान बनाकर नागरिकता हासिल करने की अवधि को एक साल से लेकर 6 साल किया गया है यानी इन तीनों देशों के ऊपर उल्लिखित छह धर्मों के बीते एक से छह सालों में भारत आकर बसे लोगों को नागरिकता मिल सकेगी। आसान शब्दों में कहा जाए तो भारत के तीन मुस्लिम बहुसंख्यक पड़ोसी देशों से आए गैर मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने के नियम को आसान बनाया गया है।इस कानून को लेकर विवाद की वजह इसके प्रावधानों के द्वारा खासतौर पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जाना है जो सीधे -सीधे संविधान के अनुच्छेद 14  जो समानता के अधिकार की बात करता है का उल्लंघन है। एक धर्मनिरपेक्ष देश किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव कैसे कर सकता है?

यह आलेख स्त्रीकाल प्रिंट के ताजा अंक में प्रकाशित है