नदी हमारी चेतना का अभिन्न अंग है | इतिहास साक्षी है कि मानव सभ्यता और संस्कृति का उत्स नदियों के किनारे हुआ | नदियों के बिना मानव जाति के विकास की परिकल्पना असंभव थी | नदियों ने मानव जाति के साथ सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाकर मानव जाति के विकास में पूरा सहयोग किया | उसकी दैन्दिनी की हर जरूरत को पूरा किया | परंपरागत समय में मानवजाति ने नदियों के इस आत्मीय सहयोग को पूरा मान-सम्मान दिया किन्तु आज लोभ और लाभ की मनोवृत्ति की वजह से नदियाँ संकट में है | कहीं नदियाँ अपने अस्तित्व को बचाने के लिए बिलख रही है तो कुछ अतिशय प्रदूषण से ग्रसित अपनी अस्मिता और सौन्दर्य को बचा पाने में असमर्थ दिख रही है | सेंटर फॉर साइंस अंड एनवायरमेंट द्वारा प्रकाशित ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका के संपादक सुनिता नारायण लिखती है – “जो समाज अपने सर्वाधिक कीमती प्राकृतिक खजाने –अपनी नदियों को खो देता है, वह समाज निश्चित रूप से अभिशप्त है | हमारी पीढ़ी अपनी नदियों को खो चुकी है |”1
प्रकृति को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा माननेवाली मनीषा झा समकालीन दौर की महत्वपूर्ण कवयित्री है | उनकी कई कविताएँ नदियों पर केन्द्रित है जिसके मार्फ़त वह नदियों के प्रति मनुष्य की असंवेदनशीलता, अतिशय भोगवादी मानसिकता, स्वार्थवृत्ति, औद्योगीकीकरण, बाजारीकरण, प्राकृतिक प्रदूषण की ओर ध्यानाकर्षित करती है | नदियों के प्रति उनमें एक गहन आत्मीय लगाव है | वह जानती है “पानी से पलती है संस्कृति / पानी के तट पर / बहती है सभ्यता”2 | बालासन नदी को संबोधित इन पंक्तियों में नदियों के प्रति कवयित्री की भावना सहज समझी जा सकती है – “एकांत की साथिन / मेरे कितने ही विचारों को संवारा होगा तूने / कितने ही आवेगों को / दिया होगा सहारा / कितनी ही पंक्तियां जन्मी होंगी / तेरे सान्निध्य में और समा गई होंगी/ किसी कविता में / जैसे बहते-बहते तू मिल जाती गंगा में”3
कवयित्री प्रकृति के इस महत्त्वपूर्ण अंग के साथ तदाकार हो जाती है | ऐसा प्रतीत होता है कि नदियों के बिना कवयित्री एकांगी है और नदियों को भी कवयित्री की निश्छल आत्मीयता पर पूरा भरोसा है | उनकी कविता में नदियाँ मानों सखी बनकर अपना दुःख-सुख बतियाने आती है | कवयित्री भी पूरी ईमानदारी के साथ इस नि:शब्द आत्मिक मैत्री संबंध का निर्वहन करती हुई दिखाई पड़ती है |
शहरीकरण की आँधी में नदियों का अतिक्रमण किया जा रहा है | खासकर शहरी क्षेत्रों में बहनेवाली नदियाँ अतिक्रमण का शिकार हो अस्तित्वहीन हो चुकी है या होने की कगार पर हैं | कवयित्री ‘उसके सिकुड़न की भाषा को पढ़’ लेती है – “पानी का सोता सूख जाने से /
सिकुड़ी पड़ी हैं तमाम नदियाँ / मेरे बिल्कुल पास से बह जाने वाली / तीस्ता हो महानंदा या बालाशन की अंगडाइयां”4 (शिशिर का आना )
नदियों की इस दुर्दशा के मूल में शहरीकरण और व्यावसायिक मनोवृत्ति है | तथाकथित सभ्य शहरी मनुष्यों के लिए नदियाँ धन उगाही का जरिया बन चुका है | जल प्रदूषण एक गंभीर समस्या बनी हुई है | विडंबना यह है कि नदियों का जल पीने योग्य नहीं रहा | न मानव के लिएन मानवेतरों के लिए | नदियों की इस दुर्दशा से आहत कवयित्री असंवेदनशील शहरी सभ्य मनुष्य से प्रश्न करती है –
“नदी की आँखों में केवल एक उबाल है / समझो / दूध उबल-उबल के हो जाए भूरा / फिर दूध का दूधियापन कहाँ खोजते हो ! / क्या खोजते हो ! / पानी में दूध या दूध में पानी / नगर में बसनेवालो, तुम नागरिक हो ! / नागर हो !”5
नदियों की महत्ता को अगर कोई समझता है तो वह है – ग्रामीण | शहरी लोग इन ग्रामीणों को गँवार मानते हैं | मनीषा झा मानती है कि ये गँवार कहे जाने लोग ही वास्तव में नदियों के रक्षक है | नदी उनके लिए पूजनीय है, नदी का मर्म वे बखूबी जानते हैं | वह लिखती हैं –
“नदी का मर्म जानते हैं वे / जो रहते हैं तुमसे दूर / करते है उसे प्रणाम / नदी मिले तो मिले / नहीं तो जलाशय को ही / वे कहलाते हैं गँवार“6
मनीषा झा नदियों की महत्ता पर दो दृष्टियों से विचार करती है | शहरी लोगों के लिए नदी सौन्दर्य का साधन मात्र है | वे भोगवादी दृष्टि से प्रकृति को देखते हैं जबकि ग्रामीण लोगों के लिए नदी उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है | नदियों का जल है तो खेतों में अन्न है, हरियाली है, आरोग्य है, समृद्धि का सौन्दर्य है |
मनीषा झा ने अपनी कई कविताओं में नदियों की दुर्दशा का आख्यान रचा है | नदियों का उत्खनन भयावह रूप ले चुका है – “अब परिदृश्य में थी नदी / उत्खनन से उग आया घाव / जहाँ –तहाँ”7 अपनी पीड़ा से आहत कवयित्री जब नदी के पास पहुँचती है, तो “देखती हूँ उसके शरीर पर सैकड़ों घाव / उत्खनन कर किसी ने बांध दिया था उसे”8 | जब से ‘रियल स्टेट’ का कारोबार बढ़ा है, नदियों का गैरकानूनी तरीके से उत्खनन बढ़ता जा रहा | जल, रेत, बालू आदि सब पर पूँजीवादियों का कब्जा है | नदी बेबस और लाचार दिख रही है | नदी की सिसकी को महसूसते हुए कवयित्री मनुष्य की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा का दृश्य खिंचती है – “रेत और बालू को पाना / रिक्त हो जाना नहीं उस आदमी के लिए / पूँजी के समन्दर में डुबकी लगा लेना है / बहुत सफाई से कोई खुंदवा रहा है / नदी की आत्मा / नदी सिसक रही है घायल होकर”9
मनीषा झा की नदी केन्द्रित कविताओं में नदियों का बहुआयामी यथार्थ उभर आया है
मनीषा झा की नदी केन्द्रित कविताओं में नदियों का बहुआयामी यथार्थ उभर आया है | हमारी सभ्यता और संस्कृति की पहचान, सबके पापों को धोनेवाली, सहनशील, पूजनीय गंगा नदी मानवीय स्वार्थपरता की बलि चढ़ चुकी है | ‘माँ’ का संबोधन देकर भी उसे स्नेह, करूणा और सम्मान से वंचित किया जा रहा है | धर्म और आस्था का केंद्र गंगा नदी, पूँजी और व्यापार का केंद्र बन चुका हैं | गंगा नदी की धवलता और शुद्धता नष्ट हो चुकी है | इस विडंबना पर कवयित्री लिखती है – “गंगा तेरे नाम पर पूँजी अपार है / शोर है व्यापार है / धर्म है नीति है दंड है राजनीति है / श्रद्धा भी है थोड़ी बहुत / सिर्फ कमी है करूणा की / प्रेम का अभाव है तो क्या हुआ / गंगा तेरे नाम पर / कितना कुछ है व्यवस्था में / तू माँ है, सहना ही चाहिए तुझे / कहते हैं वे / और करते हैं मौज |”10
इस सन्दर्भ में सुनिता नारायण का कथन उल्लेखनीय है –“हम नदियों को चूस कर सूखा छोड़ देते हैं | नदियों को पूजते हुए भी हम उनमें कूड़ा-करकट, प्लास्टिक और न जाने क्या-क्या डाल देते हैं | हम यह सब करते हैं और फिर भी विश्वास है कि नदियां पूजा लायक हैं | या इसका अर्थ यह है कि हम एक मरी हुई या मरणासन्न नदी की पूजा करते हैं, उनकी दुर्दशा को नजरंदाज करते हुए | आज हमारी नदियाँ मर रही है –इनके कई हिस्सों में पानी में घुली हुई आक्सीजन की मात्रा शून्य है | इस कारण इनमें जीवन नहीं है |”11
दरअसल कुछ लोगों के लिए ‘धर्म’ और ‘धन’ में पार्थक्य नहीं है | यही कारण है कि ‘माँ’ तुल्य नदी को मारकर भी लोग मौज में है |
गंगा नदी के माध्यम से मनीषा झा ने पूँजीवादी शक्तियों के बढ़ते वर्चस्व और नदियों के प्रति मनुष्य की बढ़ती असंवेदनशीलता और अमानवीयता को बखूबी उजागर किया है | असल में गंगा नदी का घाट आज धर्म और पाखंड का अड्डा बन गया है जहाँ आस्था के नाम पर पूँजी का घिनौना खेल खेला जा रहा है – “गंगा तेरे नाम पर / गिरती जा रही मुद्रा / साधुओं –कीर्तनियों की झोली में / तेरे घाटों पर उछल-कूद कर / देखो कैसे चले जा रहे / गाते हुए गरदन फुलाकर”12
नदियों के विनाश में बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव
नदियों के विनाश में बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव भी एक प्रमुख कारक है | गंगा नदी की शुद्धता ही बाजारवाद की बलि नहीं चढ़ गयी है बल्कि जलचर प्राणियों का अस्तित्व भी खतरे में हैं क्योंकि कवयित्री के शब्दों “ दरअसल पानी नहीं रहा पानी / सभी के लिए / कि दिन–दहाड़े विष घुलाए जा रहे हैं”13 प्लास्टिकों का बढ़ता प्रयोग, कल-कारखानों का कचरा, केमिकल नदियों में जहर घोल रहा है जिसके परिणामस्वरूप – “बीमार हो गयी कारखानों का मल खाकर / सिर्फ कुछ मछलियाँ / पॉलीथीन में फँसकर घुट गयी / कुछ / छोटे जलचर / केमिकल का रस पीकर / चल बसे जल की दुनिया से”14
मनीषा झा की दृष्टि व्यापक है | यही वजह है कि वह तथ्य की गहराई में उतरती है | नदियाँ सिर्फ जल-संसाधन नहीं, रेत या बालू प्रदाता नहीं बल्कि जलजीवों के लिए उनका सर्वस्व है | सिर्फ जलजीव ही नहीं, पेड़-पौधे, वन्यप्राणी और आकाश सभी की जीवन-रेखा है | आकाश के साथ नदी की आतंरिक संबद्धता को केवल मनीषा झा की सूक्ष्म और संवेदनशील दृष्टि ही देख सकती है – “आकाश काँप उठता है / पानी को झकझोरने से / चाहे नदी का हो / चाहे तालाब का / चाहे तलैया का / या अँजुरी का….”15
इसी तरह एक कविता है – ‘उदासी का छन्द’, जिसमें हवा की उदासी का सुन्दर बिम्ब खींचा गया है | मनुष्य द्वारा प्रकृति के अतिशय दोहन-शोषण से हवा उदास हो गयी है – हवा गा रही / उदासी / पृथ्वी अप्रसन्न लग रही / बसन्त में भी / समुद्र में सभ्यता का शोर है/ नदियाँ हो चली बेसुरी / सिमट रहा है झरनों का वेग”16
मनीषा झा ने अपनी कविताओं में कई नदियों का उल्लेख किया है | हुगली नदी उनमें एक है | इस नदी के प्रति कवयित्री का विशेष अनुराग दिखाई देता है | घर और ऑफिस के बीच बहती हुगली नदी कवयित्री की भागदौड़ भरी जिन्दगी का एक अहम् हिस्सा है | इस नदी के साथ उनका एक सहज आत्मीय संबंध स्थापित हो चुका है तभी तो – “फिर चाहे जितनी भी जल्दी हो / काम पर जाने की / रोक ही लेती है नदी / और दे देती है/ थोड़ी फरहर नमी / ताकि मुस्करा सके हम / कामों के बीच”17 हुगली नदी की ‘फरहर नमी’ भरी आत्मीयता कवयित्री में न केवल शारीरिक ऊर्जा बल्कि मानसिक ऊर्जा का संचार भी करती है ताकि वह अपने कर्तव्य का निर्वहन अच्छे से कर सकें |
यह कहना गलत नहीं है कि जल प्रदूषण की स्थिति चिंतनीय है | मनीषा झा ‘हुगली नदी-2’ शीर्षक कविता नदियों की इसी समस्या का आख्यान है | साफ-सुथरी नदियाँ आज रक्तवर्णा हो रही है | कल-कारखानों से निकला कचरा नदियों के सौन्दर्य को ही नष्ट नहीं कर रहा अपितु उसे विषैला भी बना रहा है | उसकी धारा को अवरूद्ध कर रहा है जिससे उसमें रहनेवाले प्राणियों का जीवन संकट में है | नदी जो पेय जल का एक बड़ा संसाधन है मनीषा झा नदियों की इस दुर्दशा से चिंतित है – “देखो / नदी का पानी साफ था पहले / पानी की तरह / हो गई है नदी / अब मिट्टीवर्णा / नदी लगती है यह / धारा के कारण ही/ वरना यही लगेगा / कि मिट्टी का थक्का / और देखो रक्तवर्णा / हो रही है नदी धीरे-धीरे / फिर मत कहना / कि खून बह रहा है |”18
अंतत: यह कहा जा सकता है कि प्रकृति प्रेमी, पर्यावरण सजग कवयित्री मनीषा झा की कविताओं में नदियों का बहुआयामी परिप्रेक्ष्य वर्णित है | वह नदियों की भाषा को समझती है, उनकी सिसकी को महसूस करती है | उनके साथ अंत:करण से आबद्ध होती है | नदियों को लेकर उनकी दृष्टि संवेदनात्मक है | वह अपनी कविताओं में नदियों की दुर्दशा का आख्यान ही नहीं रचती, मानव जीवन के सन्दर्भ में नदियों की महत्ता और आवश्यकता पर गहन चिंतन करती है | आज नदियों के संरक्षण के लिए कई योजनाएँ लागू की गयी है, फिर भी नदियों की आत्मा सिसक रही है | मनीषा झा इस तथ्य पर जोर देती है कि नदी और मनुष्य का पुरातन आत्मिक संबंध है, उस संबंध को पुनर्जीवित कर ही हम अपनी इस धरोहर का संरक्षण कर पायेंगे | नदियों को बचाना हमारा कर्तव्य ही नहीं हैं, हमारी जरूरत है– यह समझना बहुत जरूरी है |
विप्लव रचयिता संघम (विरसम) के दो दिवसीय सम्मेलन में कई किताबों का लोकार्पण हुआ, जिसमें एक किताब के नाम ने अपनी ओर ध्यान खींचा-‘सिक्स पैक राम’। किताब तेलगू में थी, इसलिए मैं नहीं पढ़ सकती थी, लेकिन लोगों ने उस किताब के बारे में बताया कि इसकी लेखक पावनी ने राम के बदलते स्वरूप के साथ अपने बचपन के पुरूष दोस्तों के बदलने की दास्तान लिखी है। उन्होंने लिखा है कि जैसे विनयनत-शांत राम हाथ में तीर-कमान थामे एक गुस्सैल राम में बदल रहे हैं, साथ ही उनके साथ खेले गांव के लड़के भी ‘मैस्कुलिन सिक्स पैक पुरूष’ में बदल रहे हैं।
मुझे नाम के साथ विषय भी बड़ा रोचक लगा। साथ ही मेरे दिमाग में तुरंत हाल ही में चर्चा में आई बॉडीबिल्डर प्रिया सिंह मेघवाल याद आयी, जिन्होंने जब अपना ‘सिक्स पैक’ बनाया तो समाज ने उनका मज़ाक बनाया, सरकार की ओर से उन्हें उपेक्षा मिली और मार्कण्डेय काटजू जैसे प्र्रगतिशील सोच वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस ने प्रिया की सिक्स पैक वाली इमेज को ‘बेहूदा’ तक कहा। मैंने पावनी से इजाज़त ली कि मैं प्रिया पर लिखूंगी और उसका टाइटिल ‘सिक्स पैक सीता’ रखूंगी। उसने खुशी-खुशी इजाज़त दे दी।
कल जब देश की ख्यातिनाम महिला पहलवालों को भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण सरण सिंह के यौन उत्पीड़न के खिलाफ जंतर-मंतर पर धरना देते देखा, तो लगा कि राम की तरह सीता अगर अपना “सिक्स पैक” बनाना चाहे तो उसे कितनी अधिक मुश्किलों से गुजरना पड़ता है।
प्रिया सिंह मेघवाल बीबीसी को दिये गये अपने एक इण्टरव्यू में बताती हैं कि महिला को सिक्स पैक बनाने के लिए पुरूषों के मुकाबले तीन गुना अधिक डाइट, तीन गुना अधिक एक्सरसाइज और तीन गुना अधिक प्रोटीन की ज़रूरत पड़ती है। भारत के सन्दर्भ में इसमें यह भी जुड़ जाता है कि उसे पुरूषों के मुकाबले कई-कई गुना अधिक मानसिक मजबूती की जरूरत होती है, ताकि वे पुरूषों के घटिया कारनामों और पुरूषवादी टिप्पणियों को झेल सके।
विनेश फोगाट
एक और घटना भी बताना चाहूंगी, ये समझने के लिए कि मैं इन लड़कियों को “सीता” क्यों कह रही हूं। मेरी एक मित्र भारतीय विश्वविद्यालयों में लैंगिक समानता पर अध्ययन कर रही है। वो एक बार इलाहाबाद विवि में गिरिश चन्द्र त्रिपाठी का इण्टरव्यू करने गयी, क्योंकि वे उस समय बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति थे, 2017 में जब लड़कियों ने वहां के पितृसत्तात्मक माहौल के खिलाफ महत्वपूर्ण आन्दोलन किया था। उनके कमरे में जाते ही उसने देखा कि वह छात्रों से नहीं, बल्कि भगवाधारी साधुओं से भरा हुआ था। थोड़ी देर के इन्तज़ार के बाद उन्होंने अपनी बात की शुरूआत यहां से की कि ‘देखिये भारत में हमेशा से नारियों का सम्मान होता रहा है…. देखिये हमारे यहां तो नारियों के नाम को भी पुरूषों से आगे रखा जाता है, हम तो पहले राधे फिर श्याम’ बोलते हैं हम पहले सीता फिर राम बोलते हैं। हमारे यहां हर पुरूष राम और हर स्त्री सीता है, यही हमारी संस्कृति है। हमारे यहां हर जगह लैंगिक समानता है।’’
पहलवानों का धरना जारी
उनके कथनानुसार जंतर मंतर पर धरने पर बैठी सभी चैंपियन पहलवान लड़कियां और प्रिया सिंह मेघवाल भी सीता है। बेशक उन्होंने पुरूषों की दुनिया में कदम रखकर उन्हें चुनौती दी है, लेकिन प्रिया का इण्टरव्यू बताता है कि उनमें वास्तव में काफी ‘सीता’ है। प्रतियोगिता में जाने के लिए उन्होंने घर में इजाज़त ली। बिकनी या कास्ट्यूम के पहनने के बारे में उन्होंने घर में इजाज़त ली। घर में रहने पर वे हाथ भर-भर चूड़ियां पहनती हैं। वे अपने चेहरे को ही घूंघट में छिपाकर नहीं रखती, बल्कि मेहनत से बनाये गये सिक्स पैक को भी घाघरे-चोली में छिपा कर रखती हैं, जबकि मर्दों के लिए तो यह मेहनत हमेशा दिखाने की ही चीज़ है। प्रिया तीन बार राजस्थान विजेता और अन्तर्राष्ट्रीय विजेता हैं, लेकिन केन्द्र सरकार तो छोड़ दीजिये खुद उनकी राजस्थान सरकार तक ने उन्हें कोई सम्मान नहीं दिया। इसके पीछे उनका औरत होना और दलित औरत होना मुख्य कारण है। साक्षात्कार में प्रिया कहती है मेरे साथ भी बहुत कुछ गलत हुआ है, लेकिन बॉडी बनाने के बाद गलत करने की कोशिश करने वाले को वे पीट दिया करती हैं। लेकिन हर जगह तो ये संभव भी नहीं। भारतीय कुश्ती संघ के अंदर तक उनके साथ गलत हो सकता है।
कुश्ती संघ चीफ बृजभूषण सिंह
जंतर-मंतर पर धरना दे रहे अन्तर्राष्ट्रीय पदक विजेता पहलवानों ने महिला पहलवानों की ओर से भारतीय कुश्ती संघ पर आरोप लगाया है कि वहां राष्ट्रीय कैम्पों में महिला पहलवानों के साथ यौन दुर्व्यवहार किया जा रहा है और इसमें संघ के अध्यक्ष भाजपा सांसद बृज भूषण सरन सिंह खुद भी शामिल हैं। यह सब पिछले कई सालों से चला आ रहा है।
प्रसिद्ध पहलवाल साक्षी मलिक, विनेश फोगाट, संगीता फोगाट और बजरंग पुनिया ने सभी पीड़ित महिला पहलवानों की ओर से जंतर-मंतर पर आकर बयान दिया, तब इस मामले को सरकार ने नोटिस लिया। इसके पहले महिलाओं ने खेल मंत्री, प्रधान मंत्री तक को कई पत्र लिखे पर कुछ भी नहीं हुआ। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए आये पहलवानों ने बताया कि कोच और अध्यक्ष के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली महिला पहलवानों ने प्रशिक्षण रोके जाने ही नहीं, बल्कि अपनी जान की सुरक्षा की भी चिंता जताई है, क्योंकि ये इतनी ऊंची पहुंच वाले लोग हैं कि कुछ भी कर सकते हैं इस मामले का क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन ये ज़रूर है कि रामचरित मानस की सीता की तरह चुप रहने से तो ये स्थिति बेहतर है, कुछ हो न हो डर का लोड तो बदलेगा। अब तक डर का लोड सिर्फ सिक्स पैक बनाने वाली सीताओं पर था, अब कम से कम इन सीताओं का उत्पीड़न करने वाले रामों और रावणों में भी डर पैदा होगा।
हमारे देश में ‘सिक्स पैक राम’ बनना मुश्किल नहीं है, लेकिन ‘सिक्स पैक सीता’ बनना नामुमकिन जैसा काम है
हमारे देश में ‘सिक्स पैक राम’ बनना मुश्किल नहीं है, लेकिन ‘सिक्स पैक सीता’ बनना नामुमकिन जैसा काम है। वास्तव में सिक्स पैक बनाने के लिए लड़कियों को सबसे पहले सीता बने रहने की चिंता छोड़नी पड़ती है। प्रिया मेघवाल ने भी बताया कि पहले उन्होंने ये काम घर वालों से छिपा कर किया, सफलता मिलने के बाद घर में बताया। सीता बने रहकर यह संभव नहीं था। उन्होंने सिक्स पैक बनाने की यात्रा में बहुत कुछ सुना, बहुत कुछ सहा। जबकि लड़के राम बने रह कर भी सिक्सपैक बना सकते हैं। प्रिया सिंह मेघवाल के सिक्सपैक में सिर्फ उनके डोले शोले ही नहीं, उनका संघर्ष भी दिखता है, जब कोई उसे ‘बेहूदा’ कहता है, मज़ाक उड़ाता है, इससे सिर्फ और सिर्फ उस व्यक्ति की पितृसत्तात्मक-सामंती मानसिक बनावट का पता चलता है। जब कोई इन पहलवान बनती लड़कियों का यौन-उत्पीड़न और यौन हमले करता है, तो उसके अन्दर यह पितृसत्तात्मक विचार कूद रहा होता है कि कितनी भी मजबूत क्यों न हो जायं लड़किया, मर्दों के लिए मनोरंजन का साधन ही रहेगीं। वे जल्द से जल्द इस कुंठित विचार को मजबूत होती लड़कियों तक पहुंचाना चाहते हैं, ताकि वे उनके नीचे दबी रहें। लेकिन इनसे लड़ती-भिड़ती लड़कियां, हर चीज में तीन गुना अधिक मेहनत करती लड़कियां, अपनी मंजिल पर पहुंचती हैं। इसलिए जब भी किसी लड़की को‘सिक्सपैक ऐब’ में देखिये तो उसमें अपनी बेहूदगी नहीं, उसके सघर्षों की खूबसूरती को देखिये। सीता की छवि छोड़ कर जंतर मंतर पर धरना दे रही सिक्स पैक लड़कियों का समर्थन करना भी इस पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ खड़े होना है।
”’उसका मन टूट गया । उसके मिट्टी खोदने पर कोयला या अबरख क्यों निकलता है और साथ ही साथ आ पहुंचते हैं अंग्रेज-बंगाली-बिहार लोग इसका कारण क्या है ? उसे कहीं शांति क्यों नहीं मिलती वह कैसी ही निर्जन जगह क्यों न जाए, वहां की मिट्टी के नीचे से कुछ-न-कुछ जरुर निकलता और वहां अच्छी-खासी बस्ती बन जाती है। उसकी मुंडा धरती और भी छोटी हो जाएगी उसे कुछ नहीं चाहिए बस एक छोटा सा गांव हो जहां सब बाशिन्दे आदिवासी हों – हरम देवता की पूजा करनेवाले । पहान के अनुगत” महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘चोट्टी मुंडा और उसके तीर’ के इस अंश का ज़िक्र इसलिए क्योंकि इस बार अभ्रक और कोयला नहीं ‘धर्म’ निकला है ।
जिस पारसनाथ की पहाड़ियों पर जैन धर्म के 23 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया, जहां भगवान महावीर के पाँव पड़े उस धरती पर हज़ारों सालों से आदिवासी रहते आए । ना कभी संतों ने ऐतराज किया और ना ही ईश्वर ने , सच्चे श्रद्धालु भी आख़िरी इच्छा के तौर पर हज़ारों मुसीबतें झेलते सम्मेद शिखर पर पहुँचते रहे। बुजुर्ग, असहाय, कमजोर होते जैन यात्रियों को आदिवासियों का कंधा मिलता रहा। सैकड़ों सालों से ऐसा ही चलता रहा । जिसे इतिहास ने दामिन ए खोह कहा,जहां जंगलों को पार करना नामुमकिन था वहां एक सभ्यता पनपती रही । मगर अंग्रेजों के आने, दामिन ए खोह के भयानक जंगलों की भयंकर कटाई , ग्रैंड ट्रंक सड़क के निर्माण और रेलवे लाइन की शुरुआत ने ने देश भर के साहूकारों, सेठों, ज़मींदारों को जैसे जन्नत दे दिया । जंगल कटता गया, बंगले बनते गए, मधुबन, पारसनाथ में अजीब-अजीब पहनावे,बोली वाले लोग आने लगे । फिर शुरू हुआ ज़मीन का खेल, रेवन्यू का प्रपंच। जो कभी आदिवासियों के लिए ईश्वर थे वे कथित सभ्य समाज के लिए राजस्व का ज़रिया बन गए । जल-जंगल-ज़मीन सब की बोली लगा दी गई । पहाड़ के पहाड़ बिक गए । दिल्ली-मुंबई -कोलकाता के सेठों-साहूकारों ने पैसा फेंकना शुरू कर दिया। छोटे-छोटे राज अंग्रेजों की चमचागीरी में सब नीलाम करने लगे ।
ऐसी एक नीलामी हुई थी पारसनाथ पहाड़ की । पूरा का पूरा पहाड़ बेच दिया गया। क्योंकि दिल्ली वाली मीडिया की कहानी उतनी ही तह तक जाती है जहां तक कि उनका तहख़ाना बचा रहे इसलिए ये बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस पारसनाथ को लेकर आज आदिवासी-सरकार और जैन धर्म आपने-सामने हैं उसके लिए जैन समाज के बड़े-बड़े पूँजीपतियों ने कभी शहशांह अकबर का फ़र्ज़ी फ़रमान तक कोर्ट में पेश कर दिया था। इस फ़रमान की कहानी बताने से पहले हम आपको लिए चलते हैं आज से क़रीब एक सौ दस साल पहले । ईस्वी 1907 के जून महीने में बंगाल की सरकार ने हज़ारीबाग़ के पारसनाथ को हेल्थ रिसॉर्ट्स के तौर पर विकसित करने का प्लान बनाया । योजना को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका । अंग्रेजी सरकार ने पहाड़ को लीज़ पर देने का फ़ैसला किया । लीज़ की शर्तों पर जैन धर्म के श्वेतांबर समुदाय को ऐतराज था लेकिन दिगंबर समुदाय ने इसे मानते हुए पांच हजार रूपए जमा करा दिए । इधर श्वेतांबरों को ये अपमान की बात लगी तो उन्होंने अंग्रेज़ी ख़ज़ाने में दस हजार रूपए जमा कराने को तैयार हो गए । क्योंकि सरकार पहले दिंगंबरों से पांच हजार रूपए स्वीकार कर चुकी थी इसलिए श्वेतांबर की बात नहीं मानी गई । 30 नवंबर 1908 को उस वक्त की सबसे बड़ी लॉ फ़र्म मॉर्गन एंड कंपनी के वकीलों ने दिंगबरों के लिए समझौते का मसौदा तैयार करना शुरू कर दिया । इधर बंगाल की सरकार के वकील ने लीज़ के काग़ज़ात बीस जनवरी 1909 तक तैयार कर लिए । पहाड़ी की नपाई भी शुरु हो गई । इसी बीच पालगंज के जमींदार से श्वेताबंरों ने पारसनाथ पहाड़ी को लीज पर लेने की बात शुरु कर दी । राष्ट्रीय संग्रहालय में मौजूद ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं जिस सत्य-न्याय और अहिंसा जैसे सिद्धांतों को लेकर जैन तीर्थंकरों ने इस पहाड़ी पर वर्षों बीताए, निर्वाण प्राप्त किया उन सिद्धांतों पर चलने की बजाए जैन धर्म के दोनों पंथों दिगंबर और श्वेतांबरों में ज़बरदस्त झगड़ा होता रहा । इस संबंध में मौजूद ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि 18वीं शताब्दी के आख़िर दशकों से लेकर 19वीं शताब्दी के शुरूआती दशकों में पारसनाथ पहाड़ी में पूजा के लिए आने वाले दिगम्बरों को श्वेतांबर समुदायों की उलाहना,प्रताड़ना झेलनी पड़ती थी। झगड़ा इस कदर बढ़ा चुका था कि बात अदालतों के दरवाज़े तक जा चुकी थी । इसी बीच हज़ारीबाग़ कोर्ट के एक फ़ैसले के बाद लीज़ का मामला अटक गया। नवागढ़ के राज और पालगंज के राजा के बीच पारसनाथ के मालिकाना हक़ को लेकर चल रहा मुक़दमा कई साल तक चलता रहा । मामला पटना हाईकोर्ट पहुँचा । इसी दौरान पालगंज के ज़मींदार ने श्वेतांबरों को पारसनाथ पहाड़ी 2 लाख 60 हजार रूपए में बेच दिया । इधर नवागढ़ के राजा ने एक लाख रूपए की रक़म में पारसनाथ पहाड़ी को परमानेन्ट लीज़ पर दे दिया ।
दरअसल हक़ीक़त ये है कि श्वेतांबर समुदाय दिगम्बरों को पहाड़ी पर स्थित धार्मिक स्थलों पर पूजा के लिए बाधित करना चाहता था । इसीलिए 1912 में श्वेतांबरों ने हज़ारीबाग़ की अदालत में एक मुक़दमा भी दायर कर यह मांग की कि दिगम्बरों को तब तक पारसनाथ में पूजा की इजाज़त नहीं दी जाए जब तक कि वे श्वेतांबरों की पूजा पद्धति को स्वीकार कर उसी ढँग से पूजा नहीं करते हैं । हज़ारीबाग़ कोर्ट अपील ख़ारिज करते हुए 21 मंदिरों में दिगंबरों को पूजा की इजाज़त दे दी हालाँकि 5 मंदिरों में पूजा की पद्धति श्वेतांबरों के मुताबिक़ ही रही ।
अब कहानी का दिलचस्प मोड़ ये है कि श्वेतांबरों का पारसनाथ पर इतना पुरज़ोर दावा इसलिए था कि उनके पास शहंशाह अकबर और अहमद शाह का एक फरमान था जिसमें श्वेतांबरों को पारसनाथ देने की बात कही गई थी । कलकत्ता हाईकोर्ट ने मशहूर पिगरी केस ऑफ फैब्रिकेटेड डॉक्यूमेंट्स में इस फ़रमान को फ़र्ज़ी करार दिया । 25 जून 1892 को सर कूमर पेथराम ने श्वेतांबरों के दावे को ख़ारिज करते हए अकबर के कथित फरमान को फ़र्ज़ी बता दिया ।
अब चलते हैं उन्नींसवी शताब्दी से 21 वीं शताब्दी की ओर । सौ साल पहले पारसनाथ में सिर्फ 26 मंदिर थे। सम्मेद शिखर पर पहुँचना नामुमकिन जैसा था फिर भी आस्था में कमी नहीं थी । आज इस पहाड़ी पर शिखरजीडॉटकॉम चलाने वाली वेबसाइट बताती है कि “पारसनाथ और मधुबन में 50 से ज्यादा जैन संस्थाएं हैं, 100 से ज्यादा मंदिर हैं और 1000 के आसपास मंदिरों में तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं। उस दौर में उंगलियों में जैन संस्थाओं को गिना जा सकता था। जिनमें तेरहपंथी कोठी, बीसपंथी कोठी, जैन श्वेतांबर सोसाइटी थी इसके अलावा भोमिया जी भवन और कच्छी भवन निर्माणाधीन था । “ ज़ाहिर है पुरानी धर्मशालाएँ अब काम की नहीं रहीं । पैसे और रसूखदार लोगों के बोलबाले के बीच प्राकृतिक तौर से महत्वपूर्ण इस पहाड़ी पर धड़ल्ले से ज़मीन क़ब्ज़ाने का खेल चल रहा है । आलम तो ये है कि सरकार ने आदिवासियों को ज़मीन बंदोबस्ती के तौर पर रहने खाने के लिए दी थी उस पर क़ब्ज़ा होता जा रहा है । गरीब आदिवासी की सेठ साहूकारों के आगे एक नहीं चलती । ऐसा ही मामला है साल 2015 का जब आदिवासी समाज मौजी तूरी की ज़मीन धर्मशाला वालों ने कब्जे में कर ली । सात साल से सिर्फ नोटिस-नोटिस का खेल चल रहा है । अंग्रेज़ी राज में कम से कम फ़ैसला तो होता था मगर यहाँ अंचल कार्यालय से बात आगे बढ़ती ही नहीं । आदिवासियों की एकड़ के एकड़ ज़मीन धर्म की भेंट चढ़ती जा रही है मीडिया में धर्म का लबादा ओढ़े पत्रकार आलीशान संगमरमर के मंदिर,धर्मशालाएँ और मूर्तियों के आगे पत्रकारिता को झुका दिल्ली लौट जा रहे हैं ।
पारसनाथ में हथियार दिख रहे हैं । परंपरागत हथियार। दिल्ली की मीडिया को ये तीर-धनुष,फरसा-फावड़ा नहीं दिखे। उन्हें दिखे ‘शांतिपूर्ण’प्रदर्शन करते जैन धर्मावलंबी । इसीलिए चैनल्स के सेठों और मालिकों ने खर्चा कर पंद्रह सौ किलोमीटर दूर अपने पत्रकारों को विस्तृत कवरेज के लिए भेजा । टीवी की भाषा में ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग । खैर दो चार दिनों के प्रदर्शन का असर हुआ । टीवी वालों ने जैन धर्म के श्रद्धालुओं को पारसनाथ पहाड़ी दिला दी । आधिकारिक तौर से । सरकार ने अपने ही तीन साल पुराने फ़रमान को वापस ले लिया । कहते हैं पैसे में बड़ी ताक़त होती है । ‘अहिंसा’ में तो और बड़ी । गरीब-गुरबे को स्थानीय स्तर और सोशल मीडिया का ही सहारा मिला । चंद हजार आदिवासी मूलवासी उस पहाड़ी की तराई में इकट्ठा हुए जिसे उन्हें कभी भी हरा-भरा होने से नहीं रोका । कहते हैं पारसनाथ ही मरांग बुरू है । हर साल बैसाख पूर्णिमा के दिन हज़ारों आदिवासी मरांग बुरू सेंदरा मनाने पहुँचते रहे हैं । अब शायद नहीं पहुँच पाएंगें । सेंदरा पर्व आदिवासियों का परंपरागत पर्व है और इसे शौक़िया शिकार के तौर पर कभी नहीं देखा गया ।
बहरहाल दस जनवरी को झारखंड के पारसनाथ पहाड़ी में वो नजारा दिखा जो आज के पहले कभी नहीं देखा गया । अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं जब पूरी की पूरी पहाड़ी बेच दी जाती थी। उस वक्त भी आदिवासियों का हक़ महफूज रहा । लेकिन राजनीति के ‘भक्तिकाल’ में आदिवासियों को लग रहा है कि उनका मरांग बुरू छीन गया । उन्हें ठग लिया गया । पैसे की ताकत के आगे झुक सरकार ने उनकी संस्कृति पर हमला कर दिया । इसीलिए मोदी और हेमंत के खिलाफ आक्रोश दिखा । खैर आदिवासियों ने पारसनाथ की पहाड़ के एक किलोमीटर ऊपर बने पूजा स्थल दिशोम माँझी थान तक पहुँच विरोध दर्ज कराया। आदिवासी अपने मरांग बुरू को सफेद मुर्गे की बलि देते आए हैं । आदिवासियों का कहना है कि जो काम सदियों से शांतिपूर्ण ढंग से चलता आया है उसे रोकने का अधिकार किसी को नहीं ।
पारसनाथ की पहाड़ियों का माहौल मीडिया की मेहरबानी और सरकारों के ‘खेल’ की वजह से बिगड़ चुका है । वर्षों से जैन तीर्थयात्रियों क डोली ढो रहे स्थानीय भोला कहते हैं “ जिन कंधों पर यात्री 27 किलोमीटर की यात्रा करते हैं वे कंधे मांस-मदिरा का सेवन करने वाले हमेशा से ही रहे हैं अब उन्हें अब हिंसक नजर आने लगे हैं ।” स्थानीय लोग कह रहे हैं कि उन्हें हमारे कंधे तो चाहिए मगर हमारी संस्कृति, हमारा समाज नहीं चाहिए । ये दर्द एक का नहीं है । घूमने आने वाले स्थानीय पर्यटकों,स्कूली बच्चों को भी अब भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। आरोप तो ये भी लग रहा है कि उनसे सम्मेद शिखर पर धर्म भी पूछा जा रहा है । स्थानीय आदिवासियों और तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के बीच की समरसता खत्म होती नजर आ रही है ।
दिल्ली वालों ने अपना काम कर दिया । जैन गुस्से में क्यों ? सम्मेद शिखर किसका? जैन धर्म के सबसे बड़े तीर्थस्थल का विश्लेषण, जीत गया जैन समाज.. जैसे टैगलाइन से खबरें दिखाने वाले अब नहीं बता रहे हैं कि गुस्से में क्यों आदिवासी ?.. आदिवासियों के सबसे बड़े तीर्थस्थल का विश्लेषण , हार गया आदिवासी समाज । दिल्ली की मीडिया दिखाईएगी भी नहीं । क्योंकि ना तो कोई आदिवासी दुनिया का सबसे अमीर आदमियों की लिस्ट में शुमार है और ना ही आदिवासियों की इतनी हैसियत है कि वो मीडिया के विज्ञापनों की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी रखे । कारोबारियों से तो अंग्रेज भी नहीं जीत सके थे । उनके लिए मेहनत, मेहनत और मेहनत का मतलब होता है अपने और दूसरों के लिए पूरा शरीर झोंक देना । नहीं तो पारसनाथ के पीरटांड़ के नोकनियां गाँव के लोग पांच -पांच किलो सरकारी अनाज के मारे -मारे नहीं फिरते । जंगली बीज से रोली बना कारोबारियों से बदले में नमक लेने वाले पीरटांड के नोकनियां गाँव की महिलाएँ सम्मेद शिखर के संगमरमर और पहाड़ी रास्तों में बने लकदक धर्मशालाओं को देख आहें भी नहीं भरतीं। उनकी सोच संगमरमर तक पहुँच-पहुँचे गोबर से लीपे घर फ़र्श पर ही फिसल जाती है । बच्चों से पूछा दूध मिलता है तो जवाब मिला कभी नहीं । छोटी-छोटी लड़कियाँ पारसनाथ के पीरटांड़ के जंगलों से हर कई किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ जलावन की लकड़ियाँ इकट्ठा करतीं नजर आ जाएँगीं । स्कूल है तो मास्टर नहीं, मास्टर है तो मोदी के नीति आयोग की मेहरबानी स्कूल मिलों दूर । रही-सही कसर नक्सलियों के ख़ौफ़ ने पूरी कर दी । मगर सम्मेद शिखर चमक रहा है । हर साल करोड़ों का दान मिलता है । लाखों श्रद्धालु आते हैं । आलीशान धर्मशालाओं में रातें गुज़ारते हैं और पहाड़ की ख़ूबसूरती निहार अंग्रेंजों की देन पारसनाथ स्टेशन पर बैठ वापस धंधे में लग जाते हैं । अब पास में एयरपोर्ट भी बन चुका है । ऊपर-ऊपर पहाड़ चमक रहा है और अंदर ही अंदर उबल ।
जयपालसिंहमुंडानेसभामेंखरसावांनरसहांरकोआज़ादभारतकाजालियाँवालाबागकरारदिया।उनकेभाषणको७२सालबादभीसुनकररोंगटेखड़ेहोजातेहैं।जनरलडायरतोअंग्रेजथाजिसने।अमृतसरकेजालियांवालाबागमेंक्रूरताकीसारींहदेंपारकरदी थी । लेकिनआज़ाददेशकेप्रांतनेबेक़सूरआदिसवासियोंकेसाथजोबर्बरताकीवोआजभीनाक़ाबिलेमाफ़ीहै।उन्होंने११जनवरीकोदिएअपनेभाषणमेंआगेकहा
नारी अस्मिता के वृत की त्रिज्याएं , चुनौतियां एवं संभावनाएं
आज के इस लोकतांत्रिक माहौल में स्त्री अस्मिता का स्वर अभी भी अनुसना ही रह जाता है और यही वजह है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था अपने वर्चस्व को चुनौती देती इन आवाजों को हाशिए पर धकेलने की साजिशें करने लगती। अब तक नारी अस्मिता का जो वृत्त है , उसकी त्रिज्याएं क्या हैं ? , समग्रता में क्या है नारी अस्मिता ? ऊपरी तौर पर हमें नई स्त्री दृष्टि या स्त्री चेतना में महत्वपूर्ण बदलाव नजर तो आ रहा है बल्कि शुरूआती दौर में स्त्रियेां की स्थिति को लेकर बड़े बड़े नामचीन मुक्तिदाताओं ने क्रांतिकारी नारेबाजी की और इस तरह हमारे देश में स्त्री दमन के प्रति विद्रोह व प्रतिरोध की चेतना दिनोंदिन जाग्रत होती गईं। धीरे धीरे जब हम स्त्री जीवन की ऊपरी चकाचौंध की अंदरूनी अंधेरी परतों की तरफ देखते हैं जहां पसरी है अनगिनत गैर बराबरी के प्रसंग , शिक्षा व अन्य जरूरी चीजों से वंचित कर दी गई इस आधी दुनिया के जीवन में पैठी विसंगतियों व विडंबनाओं की संश्लिष्ट तस्वीरें नजर आने लगती ।
स्त्री की सामाजिक हैसियत , आर्थिक पराधीनता एवं वृहत्तर संदर्भो में उसकी भूमिका आज भी दोयम दर्जे की है , इसमें जरा भी संदेह नही। बेशक कुछ मायनों में उसकी बेहतर समझ बनी है व उनकी संवेदना का विस्तार भी हुआ है जिसके मूल में था उसका शिक्षित होकर स्वालंबन की दिशा में बढाया गया सेाचा समझा कदम पर क्या सही मायनों में इस आजादी की आंच हमारे सुदूर गांवों , कस्बों या दूर दराज के छोटे छोटे कस्बों में भी उतनी ही धमक से पहुंच पा रही हैं। क्या एक आजाद , स्वायत्त मनुष्य की तरह अपना फैसला खुद लेकर मजबूती से आगे बढ़ने की हिम्मत हैं उसमें ? उसके मूलभूत अधिकार व आत्म निर्णय की पराधीन स्थितियां तो जस की तस है ।
आधुनिकता की चपेट में बढ़ते पूंजीवाद और विश्व स्तर पर फैल रहे बाजारवाद ने स्त्री जीवन को चारों तरफ से प्रभावित किया और एक विभ्रम की स्थिति पैदा कर दी जिससे ऐसा आभास होता है कि इस रास्ते वे ज्यादा आजाद हुईं हैं लेकिन यह बड़ा अंतर्विरोध है कि स्त्री आजादी के नाम पर वहां एक बहुत बड़ी साजिश रची गईं यानी उन्मुक्त यौनाचार वनाम दैहिक स्वतंत्रता के नाम पर वे धीरे धीरे पुरूष की भोगवादी लालसा का शिकार होती गईं। कहां कम हुआ इससे पुरूष वर्चस्ववाद ? सजग , सचेत व आत्मनिर्णय से लैस तेजस्वी स्त्री क्या यही थी ? स्त्री की स्वतंत्र गरिमा , उसकी सामाजिक सक्रियता व सरोकारों वाली भूमिका क्या समग्रता में हमारे सामने आ पाई है , पूरी तरह तो ये सच नही है । बाजारवाद एवं बढ़ते भौतिकतावाद की चपेट में स्त्री की सामाजिक हैसियत या मानसिक धरातल पर कहीं कुछ बदलाव नजर आता है ? क्या आज वह अपने बूते अपनी पसंद के करियर का चुनाव कर , अपनी पसंद के साथी के साथ अपनी मर्जी से रहने या सिंगल जीवन बिताने का या स्वतंत्रता कायम करने की रहा पर चलने में सक्षम हो पायी है ? शायद नही , आए दिन होने वाले मर्डर इस बात के गवाह है कि , आज भी वे अपनी मर्जी से जीवन जीने का जोखिम उठाएंगी तो पुरूष सत्ता उनकी हत्या कर सकती है ।
बेशक समाज बदल रहा है मगर यथार्थ की परतें कितनी बहुआयामी व जटिल हैं जिन्हें भेदकर अंदरूनी सचाई तक पहुंच पाना आसान नही। आज के इस रंगीन समय में नई बढ़ती चुनौतियों से टकराती स्त्री की क्रान्तिकारी आवाजें हम सबको सुनाई दे रही हैं मगर यही कमाऊ स्त्री जब समान अधिकार और परिवार में लोकतंत्र की अनिवार्यता पर बहस करती य सही मायनों में लोकतंत्र लाना चाहती तो वहां इस बदलाव की राह में तमाम पगबाधाएं मसलन- धर्म , भारतीय संस्कृति , समर्पण , सहनशीलता , नैतिकता या यौनशुचिता जैसे सामंती मूल्य ही उसकी स्वीकार्यता की कुंजी बनते रहे।
जहां आधिपत्य , दमन और अवमानना के इस समूचे पितृसत्तात्मक मूल्य व्यवहार से टकराती आजाद देश की नई स्वतंत्र स्त्री को लगता था कि चलो , अब कामकाजी माहौल में वे आत्मसम्मान और व्यक्तित्व की आत्मपर्याप्तता को मिले स्पेस के चलते स्त्री स्वाधीनता का भरपूर लुत्फ उठाएंगी मगर आज के बाजारवाद द्वारा परोसी गई स्त्री के बारे में सोचते ही हमारे सामने ढेरों फैसलों के जरिए सुंदर स्त्री के नकली चेहरे कौंध जाते हैं जिन्हें देखकर तमाम सवाल तेजी से बेचैन करने लगते। आखिर ऐसा क्या हैं इनमें ? अपेक्षित दृष्टि सम्पन्नता , प्रचुर आत्मविश्वास या आत्मबल से भरी पूरी अस्मिता के नए निशान लगाती आधी दुनियां हैं क्या यहां ? नही , कतई नही। जब भी वह अपने लिए मुकम्मल स्पेस या बाजिब हक की बात छेड़ती , उसे पुरूष विद्रोही या घर तोड़ू जैसे अनर्गल आरोपों से मढ़कर उसका मनोबल तोड़कर आगे बढ़ने से हतोत्साहित किया जाता है जब कि ये पूर्वाग्रही सोच सिर से निर्मूल या आधारहीन है। पुरूष वर्चस्ववाद से जूझकर अपने जीवन की चुनोतियों से खुद निबटने का बूता उसके अंदर आता है तभी वे बदले सामाजिक , राजनैतिक व आर्थिक मार्चे पर पूरी निडरता व निधड़कता से स्वत्व की जमीन पर पैर टेक पाएंगी ।
हिंदी साहित्य आधुनिकता के दौर में 1960 के बाद उभरे नई कहानी आंदोलन में स्त्री से जुड़े सवालों को उठाया जाता रहा। स्त्री जीवन के संघर्ष और समस्याओं को अनुभव की प्रामाणिकता के साथ उभारने का श्रेय जाता है , हमारी वरिष्ठ कथाकार कृष्णा सोबती , उषा प्रियंवदा , मन्नू भंडारी , मृदुला गर्ग , ममता कालिया , मृणालपांडे , चित्रा मुद्गल , मंजुल भगत , चंद्रकिरण सोनरिक्सा , प्रभा खेतान व नासिरा शर्मा जैसी सशक्त लेखिकाओं ने पुरूष वर्चस्ववाद के खिलाफ परंपरागत रूढि़यों व टिपिकल मर्दवादी मानसिकता को तोड़ने का रचनात्मक साहस दिखाया। उन्हेांने पुरूष संरचना व पुरूष द्वारा गढ़े एक तरफा मूल्येां व मान्यताओं को सिरे से नकारते हुए स्त्री जीवन को सर्वथा नए कोण से रचा व सालों से दबाई उसकी आवाज को उसी की जुबान में शब्द मिले , नई भाषा मिली और नया लोकतांत्रिक नजरिया भी जिसमें उनकी कठपुतली वाली नकली छवि को पूरी ताकत से तोड़ा गया । प्रेम , विवाह व करियर के बीच संघर्ष करती स्त्री की एक नयी जीवंत तस्वीर सामने आई और स्त्री मुक्ति को नयी दिशा मिली ।
स्वातंत्रयोत्तर देश में एक ओर जहां समूचे सामाजिक आर्थिक शिंकंचे में कैद स्त्री की चीखें आजाद हुई , वहीं दूसरी तरफ नारी लेखन में ‘ अनारो , बेघर , शेष यात्रा ‘ सरीखी नायिकाओं के संवेदनशील व्यक्तित्व ने ‘ मैं नीर भरी दुख की बदली ‘ छवि से टकराकर अपने निजी सपनों व आकांक्षाओं को विस्तार दिया। धीरे धीरे स्वावलंबी स्त्री पुरूष वनाम पति पत्नी की सबलता से प्रभावित ‘ बंटी ‘ का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण हुआ । कहीं उग्र नारीवाद उभरा तो कहीं यथास्थितिवाद से समझौता करता संस्कारों से सीधे न टकराकर समन्वय वादी रवैया अपनाया गया , जैसे सूर्यवाला जी की कहानियां । मगर ये एक बड़ी उपलब्धि थी कि नारी चेतना अपनी स्वतंत्र सोच व सप्राण संवेदना के साथ रचनात्मकता के बहुआयामी रूपों में मुखरित होनी शुरू हो गयी । इस नई स्त्री ने आधुनिकता के साथ नई करवट ली और ‘ पचपन खंभे लाल दीवारें ‘ में नए किस्म के यथार्थ को उभारा गया ।
घर से बाहर निकल कमाऊ स्त्री को आसान आजाद औरत समझ उसे हथियाने के लिए पितृसत्ता ने तमाम हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए। लोभ लालच के वशीभूत करने की साजिशें रची गयी या भावात्मक दोहन के जाल बिछाए गए जिसे बखूबी उजागर करने के लिए लेखिकाओं की एक नई जमात उभरकर आयीं – सुधा अरोडा , मेहरून्न्शिा परवेज , निरूपमा सेवती , नमिता सिंह , मैत्रेयी पुष्पा जैसी सशक्त कथा लेखिकाओं ने सक्रिय स्त्री के प्रतिरोध को व्यापक संदर्भो में मुखरित किया जिसमें उसकी सामाजिक , आर्थिक व राजनैतिक हैसियत को आंकते हुए उसकी त्रासदी के जिम्मेदार कारकों की सघन पड़ताल की गयी कि वे अब अपनी तरह से सोचने लगीं हैं व तमाम चुनौतियेां से निबटने में सक्षम हैं । बेशक इस प्रक्रिया में कई वर्जनाएं टूटी मगर उस पर लादे गए अनावश्यक दबाव भी कमतर होते गए। जिस तरह से उसकी पारिवारिक परिवेश ने सालों तक उसकी मानसिकता को आक्रांत कर रखा था , धीरे धीरे अब वे अपने हकों से वाकिफ होती गई। अपने सपनों व निजी आकांक्षाओं को गतिशीलता से आगे बढ़ाती आज की स्त्री पूरी विविधता व समग्रता से अपना आकाश तलाशना सीख रही हैं। क्रमश: आजाद देश की स्त्रियां आईटी , सेना , एअरफोर्स , चिकित्सा , इंजीनियरिंग , वैज्ञानिक , बैंकर , विश्वविद्यालय में प्रोफेसर , पुलिस अधिकारी या समाज सुधारक आदि न जाने किन किन भूमिकाओं में कामयाबी के शिखर छू रही हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नही जहां आज की महिलाओं ने अपनी छाप न छोडी हो। भारतीय महिला बैंक की सीएमडी उषा अनंत सुब्रहमण्यम हों या भारतीय स्टेट बैंक की सीएमडी अरूंधति जी या आईसीआईसीआई की अध्यक्ष जैसे जितने शानदार नाम , काम में भी वे उतनी ही कुशल , दक्ष व प्रखर मेधा का परचम लहराती हुई। कह सकते हैं कि आधी नही , पूरी दुनियां हमारी हैं। सारा आकाश हमारा हैं।
सच तो ये है कि आधुनिक स्त्री की स्वाधीन छवि के प्रति समाज / परिवार अभी भी पूरी तरह तैयार नजर नही आते मगर हां , उपभोक्ता संस्कृति उसे प्रयोज्य वस्तु की तरह जरूर इस्तेमाल करने से नही हिचक रही। सच बताएं तो इस ऊपरी चकाचौंध के पीछे की तस्वीरें इतनी कुरूप हैं , इतनी भयावह और वितृष्णा जगाने वाली हैं जो हमारी आजादी की सालगिरह पर एक ऐसा तमाचा हैं जहां आज भी अखबार ऐसी जघन्य बलात्कार की घटनाओं से रंगे रहते। सच है कि आए दिन अखबार महिलाओं के प्रति अपराधों से भरे रहते। फिर ये कैसी आजादी ? कैसा लोकतंत्र ? क्या वाकई लोकतंत्र नजर आता है ? चारों तरफ स्त्री को लेकर होने वाले अपराधों की खबरें ही खबरें , हत्या से आत्महत्या तक , घर की गली से अगले मोड़ तक , मोड़ों से आगे मिलती लंबी सड़क से राष्ट्रीय राजमार्ग तक , सब तरफ बैठे हैं गिद्ध ही गिद्ध , बेहद हिंसक , गैर जिम्मेदार , क्रूर एवं प्रभुता के मद में चूर , उन्हें अपनी पशुता का अहसास तक नही , मलाल तो दूर की बात हैं , जो अपनी प्रेमिका को पाने की खातिर अपनी मरती हुई पत्नी की चीखें सुनना चाहता हैं , ओफ . . सच तो ये है कि महिलाओं के प्रति पुरूषों की सोच इतनी घटिया , संकरी , इकहरी और पूर्वाग्रही है कि आज भी उनका हंसना , बोलना या अकेले अपनी मर्जी से घूमना फिरना सवालों के घेरे में। आए दिन गैंग रेप की हिंसक वारदातें , स्त्री प्रताड़ना के दिल दहलाने वाले खौफनाक सच्चे कारनामे इस सभ्य सुसंस्कृत समाज के माथे पर कलंक का टीका है जो हमारे लोकतंत्र व न्यायव्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर देता है। .
कहने को विश्वविद्यालयों में महिला अध्ययन केंद्र खुलने लगे हैं मगर लैंगिक भेदभाव कम हुआ क्या इससे ? प्रेम , विवाह व करियर के बीच संघर्ष करती स्त्री को उसका वाजिब हक कब और कैसे मिलेगा , आज भी एक ज्वलंत सवाल है। कई भूमिकाओं का कुशलतापूर्वक निर्वहन करती स्त्री पूरे दम खम के साथ आत्मविश्वास की जलती लौ के सहारे न जाने कितनी पीढि़यों को ऊर्जस्वित रखती आई हैं। आज के बहुआयामी यथार्थ की देहरी पर उसके जीवंत व तेजस्वी व्यक्तित्तव की दस्तक सुनाई देने लगी हैं जहां वह अपनी सोच को पर्याप्त आधार देते हुए परिवार व समाज में बहुमुखी प्रतिभा की छाप छोड़ने लगी हैं सो अब उसे और ज्यादा दरकिनार कर हाशिए पर नही ठेला जा सकता।
स्त्री की सच्ची स्वाधीनता का अहसास तभी हो पाएगा जब वह आजाद मनुष्य की तरह भीतरी आजादी को महसूस करने की सुखद स्थितियों में होगी , तभी सही मायनों में वह एक खुदमुख्तार मजबूत इंसान की तरह समाज की मुख्य धारा में अपनी सशक्त भूमिका निभा पाएगी। न , केवल आर्थिक आजादी सही मायनों में आजादी का पर्याय नही बल्कि सामाजिक , राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में उसकी ठोस भागीदारी एवं मनुष्यता के समान अधिकारों से लैस समानता चाहिए , संरक्षण नही । आज के कथा सहित्य में धीरे धीरे उसे समग्रता में देखा जाने लगा है जो एक सुखद अहसास है , हवा के ताजे झोंके की तरह ।
स्त्री लेखन की चुनौतियों के बारे में सोचते ही कई सारे बिम्ब स्मृतिपटल में मूर्त होने लगे : अलसुबह अधनींद में उठते ही वह बगल में सोए बच्चे के लिए दूध तैयार करते करते चाय चढ़ा देती । फिर चाय का कप हाथ में लेकर बमुश्किल मिले एकांत में कुछ समय अपने लिए तलाशती अपनी पसंदीदा किताबों को उलटते पलटते विचारों की आवाजाही में खोयी कि अचानक बच्चे के रोने की आवाज सुनकर फिर तेजी से उसके पास चल देती । इन्ही क्षणों में उसके भीतर कौधती रचनात्मकता के कई बिम्बों को परे धकेल वह तेजी से निबटाती है रूटीन काम , मसलन बच्चे को स्कूल भेजना , नाश्ता तैयार करके खुद भी तैयार होकर दफ्तर के लिए निकलना। कामकाजी होने को नाते घर से बाहर तक की दुनियां के अनगिनत कामों की श्रृंखला में उसकी रचनात्मकता का स्फुरण अंदरूनी जगत में अनवरत होता रहता पर फाइलों पर काम निबटाते निबटाते पूरा दिन निकल जाता और शाम होते ही फिर वही रूटीन काम उसे घेर लेते । सुबह के छूटे शब्द उसे कभी कभी शाम या फिर रात तक घेरे रहते यानी चैन से नही जीने देते । तमाम जाने अनजाने , चीन्हे अनचीन्हे प्रसंग , दिल दहलाने वाली घटनाएं , आसपास के हौलनाक हादसे और आसपास की दुनियां के सच्चे किस्से उसकी स्मृति में लगातार दस्तक देते उसे बेचैनी से भर देते फिर तो एक ऐसी स्थिति आ जाती कि लिखे वगैर उसे कैसे भी चैन नही मिलता तब उसके अंदर की रची बुनी दुनियां में शब्द बेतरतीबी से जमा हो जाते जिन्हें कागज पर उतारने के लिए वह विकल हो उठती । फिर खुद को आश्वस्त करती – दिन गया , कोई बात नही। अभी पूरी रात तो अपनी है , ये कहां भागकर जा सकती है भला ।
जी हां , अधिकांश स्त्रियों का लेखन इसी जेद्दोजेहद और इसी भागमभाग के बीच अपने लिए अभिव्यक्त्िा के रास्त्ेा तलाशते हुए कागजों पर उतरता रहा हैं । मेरा अधिकांश लेखन रात 11 बजे से 1 या 2 बजे तक हुआ है जब मैं अपनी समूची एकाग्रता और तन्मयता से दिमाग में फैले विचारों , भावनाओं एवं चोट खायी संवेदनाओं की बिखरी अनुभूतियों को सिलसिलेवार पन्नों में गूंथते हुए शब्दों को भाषिक व शैल्पिक ताने बाने में पिरेाते हुए कहानी , उपन्यास या लेख का जामा पहना देती । इस समय घर की शांति व अटूट सन्नाटा मेरी रचनात्मकता को संवर्धित करता है । वैचारिक ऊर्जा व अंदरूनी बेचैनी का सहमेल से उपजते हैं शब्द जो स्वत:स्फूर्त आवेग से फर फर चलती हवा की तरह हर पन्ने पर उतरने के लिए आवेग से अपने आप दौड़े चले आते गोया नौ महीने के बाद स्त्री की कोख से बाहर आने के लिए बच्चा खुद अकुलाने लगता है , ठीक उसी तरह होती है सृजन की जमीन जहां शब्द किसी जादुई शक्ति से खुद ही रचवा लेते अपने को या उन्हें आकार प्रकार मिल जाता ।
अपनी रचनात्मक यात्रा के 15 साल पीछे मुड़कर देखती हूं तो ऐसा लगता है जैसे मेरी हर रचना किसी मायावी दुनियां से अपने आप अवतरित हुई हो । अक्सर लेाग पूछते हैं – आपकी इतनी व्यस्त जीवन शैली में समय कहां से कैसे मिलता है , मेरे पास इस सवाल का यही एकमात्र जवाब होता कि कुछ भी पूर्वनिर्धारित नही होता । मसलन , मैं कहानी का पहले से ही प्रारूप सोचकर बैठूं कि आज एक लंबी कहानी लिखनी मगर जब पन्नों पर शब्दों की चादर फैलाती तो पता चलता , अरे , ये तो उपन्यास रचा जा रहा है । एक लंबी कहानी कब और कैसे अपने अवांतर प्रसंगो से कहानी से औपन्यासिकता का ताना बाना पहनने लगती है , खुद रचनाकार को पता नही चल पाता । उंगलियों में फंसा पेन पन्नों पर तेजी से चलता दौड़ता रहता है मगर यहां भी वह अपनी मनमर्जी से चलता , किसी तानाशाह की तरह । सच्ची में , न तो वह लेखक के पहले से बुने विचारों या भावनाओं की पुकार सुनता है , न ही पहले से तय प्रारूप पर कार्य करने की गुहार सुनता है । यहां वह किसी की नही सुनता , गोया बच्चा अपनी जिद के आगे किसी की नही सुनता । । बस , विचार व गहन अनुभूतियां तेजी से पन्नों पर उतरती जाती है । शब्द अनायास गढ़ लेते अपना आकार प्रकार और रचनाकार का सोचा जस का तस कुछ का कुछ सूरत लेने लगता । बेशक कागज पर सृजित यह शब्दलोक उसके पूर्व निर्धारित कल्पनालोक से बेहतर होता है , इसी वजह से कहा जाता है कि ये शब्द किसी मायावी दुनियां की तरह अपना जादू खुद बिखेरते हैं पन्नों पर और रचते जाते एक नयी काल्पनिक नयी दुनियां जहां हमारे पाठक विचरते हैं तो वहां वे खुद को एकाकार करते हमसे पूछते हैं – आप यहां कहां पर हो , यानी साधारणीकरण का जादू यहां पूरे सौंदर्य से उतरता है और हम ठगे से देखते रह जाते है खुद की सृजित इस अद्भुत रचनात्मकता को , फिर खुद ही आश्चर्य से भर जाता है मन ।
पहला उपन्यास ‘ कही कुछ और ‘ एक तलाकशुदा इंजीनियर महिला के पुनर्विवाह पर आधृत कहानी थी मगर अंत तक आते आते कथा नायिका खुद ही अकेले रहने का फैसला सुना देती है । इसी तरह ‘ किशोरी का आसमां ‘ सबसे पहले एक लंबी कहानी के रूप में लिखना शुरू किया था मगर जैसे जैसे कहानी ने आकार प्रकार लेती गयी , तुरंत उसको पहनाए गए कहानी के कपड़े कम होते गए यानी कहानी के अंदर परत दर परत अन्य कहानियां तेजी से पनपती और विस्तार लेती गयी । फिर क्या था , कहानी अपने मूल सांचे ढांचे को तजकर दो पीढि़यों के अंतर्दन्द , पारिवारिक मूल्यों का दो पीढि़यों का संघर्ष क्रमश : दो समय की आवाजाही में बदलता गया । मां बाप व बच्चों की दुनियां में बदलते समय के अंदर चल रही रचनात्मक यात्रा महीनों मेरे भीतर रचती , बसती फिर उसके किरदार मेरी आंखों के सामने ही रोज लिखाने की अपील करते दिखते जिसे मैं भरसक टालती रहती या बाहरी परिवेश की व्यस्तताएं मुझे नही लिखने देती । मगर फिर रचना ऐसी जिद पर उतर आती जैसे कोई हठी बच्चा अपनी मांग पूरी किए बिना मानता ही नही है । सो एक ऐसा दिन जरूर आ धमकता जब मेरा टालने की प्रवृति पर रचनात्मक मांग हावी हो जाती और ‘ अब लिखे वगैर सांस नही ले पाऊंगी ‘ यानी लिखे वगैर चैन नही पड़ता । अंदरूनी दुनियां की आग तेजी से धधकने लगती कि फिर तो हर हाल में बैठना अनिवार्य बन जाता । ‘ एक न एक दिन ‘ उपन्यास लिखने के दौरान ऐसी ही अनुभूति हुई थी। पहले सोचती थी , बच्चे बड़े होने के बाद लिखेंगे , मगर रचना जब जिद पर उतार आती तो अपने को लिखवाकर ही सुकून से बैठ पाती । घर पर इस तरह का बिम्ब बनता , कि बच्चे पढ़ रहे हैं और उनके संग हम भी लिख या पढ़ रहे होते । बेटी को हिंदी का डिक्टेशन दे रही हूं मगर पढ़ रही हूं हिंदी की साहित्यिक पत्रिका और उसी में से हिंदी के कठिन शब्द निकालकर लिखवा रही होती पर बेटी बीच में पूछ बैठती – ‘ पर , ये तो हमारी बुक में है ही नही , मैं बताती – तो क्या हुआ , तुम्हें आना तो चाहिए न ? ‘
वाकई , स्त्री की रचनात्मक चुनौती के रूप में सबसे बड़ा अवरोध है – उसकी पारिवारिक या घरेलू मोर्चे पर निरंतर सक्रियता और उसकी रचनात्मक अस्त्तित्व या लेखकीय महत्ता को शून्य समझने का पुरूषवादी एकांगी नजरिया । फिर आते हैं बाहरी दुनियां के झंझट झमेलों का घनचक्कर । वह हमेशा दो अतियेां के बीच विचरते हुए कैसे भी संतुलन साधने की कोशिश करती रहती । इसी दरम्यान उसके अंदर के संसार में मचती खलबली और अनाम संवेदनाओं की उथल पुथल के बीच शब्द पन्नों की तलाश में फड़फड़ाते रहते कि कही से , कैसे भी उसे एक झरेाखा तो मिले और वह अपनी एकरस , उबाऊ या नीरस जिंदगी में से कैसे भी हवा का ताजा झोंका महसूस कर लिख सके अपनी सोच व संवेदना की गहन अनुभूतियों को मगर कई बार भीतर की आवाजें अनुसनी रह जाती हैं और कहानी दिमाग व भावनाओं के मकड़जाल में फंसी हवा में उड़ भी जाती है । कई लेखिकाओं के साथ ऐसे रचनात्मक हादसे हुए है जब वे चाहकर भी बाद में अपना रचनात्मक लेखन नही कर पाती , यानी इस व्यस्तता से घबराकर जिसने लेखन तज दिया कि बाद में फुरसत में लिखेंगे मगर बाद में पता नही किन कारणों से उनकी रचनात्मकता सूख जाती है और आजादी से , अपने एकांत में लिखने के सपने महज सूखे फूल की तरह गुमनामी के गर्त में चले जाते ।
वैचारिक प्रतिरोध पर रचनात्मकता में दखल देने का एक और बड़ा अड़ंगा आता है – तुम ऐसे क्रांतिकारी विचारों वाली कहानी या उपन्यास लिखती ही क्यों हो ? बंद करो इस तरह के पुरूष विरेाधी लेख लिखना यानी ऐसे नही , वैसे लिखो जैसा हम चाहते हैं । हां , यहां पर लेखिकाओं को साफ शब्दों में अपने घर पर बताना होगा कि ये उसकी अपनी रची नितांत मौलिक दुनियां है जहां उसे किसी का दखल मंजूर नही । हरेक स्त्री को ये बात अपने तईं तय करनी होगी कि आजादी से लिखना उसका मूलभूत हक है जो उससे कोई नही छीन सकता , चाहे वह उसका कितना बड़ा हितैषी ही क्यों न हो । उसे रचनात्मक आत्मविश्वास के सहारे अपने रचे के प्रति पूरा भरोसा जरूर होना चाहिए । सच तो ये है कि लिखते वक्त हम वही नही रह जाते जो हैं यानी रचने के दरम्यान हमारा मनोजगत हमें किसी और ही दुनियां में खीच ले जाता है और यही है रचने का अनर्वचनीय सुख कि शब्दों के पन्नों पर उतरने के बाद मैं किसी खुशबूदार रंगीन फूल सा हल्की होकर उन्मुक्त उड़ान के लिए हाथ पैर फैलाकर निकल पड़ती हूं किसी अनजान से सफर पर , मस्ती के कुछ निजी पलों का आनंद लेने । गूंगे के गुड़ की तरह यह होता है वो अनिर्वचनीय आनंद जिसमें अवगाहन करता है रचनाकार और इस अमूर्त अनिर्वचनीय आनंद अहसास के साथ जीता है रचनाकार ।
आज के इस लोकतांत्रिक माहौल में स्त्री अस्मिता का स्वर अभी भी अनुसना ही रह जाता है और यही वजह है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था अपने वर्चस्व को चुनौती देती इन आवाजों को हाशिए पर धकेलने की साजिशें करने लगती। समग्रता में क्या है नारी अस्मिता ? ऊपरी तौर पर हमें नई स्त्री दृष्टि या स्त्री चेतना में महत्वपूर्ण बदलाव नजर तो आ रहा है बल्कि शुरूआती दौर में स्त्रियेां की स्थिति को लेकर बड़े बड़े नामचीन मुक्तिदाताओं ने क्रांतिकारी नारेबाजी की और इस तरह हमारे देश में स्त्री दमन के प्रति विद्रोह व प्रतिरोध की चेतना दिनोंदिन जाग्रत होती गईं। धीरे धीरे जब हम स्त्री जीवन की ऊपरी चकाचौंध की अंदरूनी अंधेरी परतों की तरफ देखते हैं जहां पसरी है अनगिनत गैर बराबरी के प्रसंग , शिक्षा व अन्य जरूरी चीजों से वंचित कर दी गई इस आधी दुनिया के जीवन में पैठी विसंगतियों व विडंबनाओं की संश्लिष्ट तस्वीरें नजर आने लगती । स्त्री की सामाजिक हैसियत , आर्थिक पराधीनता एवं वृहत्तर संदर्भो में उसकी भूमिका आज भी दोयम दर्जे की है , इसमें जरा भी संदेह नही। बेशक कुछ मायनों में उसकी बेहतर समझ बनी है व उनकी संवेदना का विस्तार भी हुआ है जिसके मूल में था उसका शिक्षित होकर स्वालंबन की दिशा में बढाया गया सेाचा समझा कदम पर क्या सही मायनों में इस आजादी की आंच हमारे सुदूर गांवों , कस्बों या दूर दराज के छोटे छोटे कस्बों में भी उतनी ही धमक से पहुंच पा रही हैं। क्या एक आजाद , स्वायत्त मनुष्य की तरह अपना फैसला खुद लेकर मजबूती से आगे बढ़ने की हिम्मत हैं उसमें ? उसके मूलभूत अधिकार व आत्म निर्णय की पराधीन स्थितियां तो जस की तस है । पुरूष वर्चस्ववाद से जूझकर अपने जीवन की चुनौतियों से खुद निबटने का बूता उसके अंदर आता है तभी वे बदले सामाजिक , राजनैतिक व आर्थिक मार्चे पर पूरी निडरता व निधड़कता से स्वत्व की जमीन पर पैर टेक पाएंगी ।
आधुनिकता की चपेट में बढ़ते पूंजीवाद और विश्व स्तर पर फैल रहे बाजारवाद ने स्त्री जीवन को चारों तरफ से प्रभावित किया और एक विभ्रम की स्थिति पैदा कर दी जिससे ऐसा आभास होता है कि इस रास्ते वे ज्यादा आजाद हुईं हैं लेकिन यह बड़ा अंतर्विरोध है कि स्त्री आजादी के नाम पर वहां एक बहुत बड़ी साजिश रची गईं यानी उन्मुक्त यौनाचार वनाम दैहिक स्वतंत्रता के नाम पर वे धीरे धीरे पुरूष की भोगवादी लालसा का शिकार होती गईं। कहां कम हुआ इससे पुरूष वर्चस्ववाद ? सजग , सचेत व आत्मनिर्णय से लैस तेजस्वी स्त्री क्या यही थी ? स्त्री की स्वतंत्र गरिमा , उसकी सामाजिक सक्रियता व सरोकारों वाली भूमिका क्या समग्रता में हमारे सामने आ पाई है , पूरी तरह तो ये सच नही है । बाजारवाद एवं बढ़ते भौतिकतावाद की चपेट में स्त्री की सामाजिक हैसियत या मानसिक धरातल पर कहीं कुछ बदलाव नजर आता है ? क्या आज वह अपने बूते अपनी पसंद के करियर का चुनाव कर , अपनी पसंद के साथी के साथ अपनी मर्जी से रहने या सिंगल जीवन बिताने का या स्वतंत्रता कायम करने की रहा पर चलने में सक्षम हो पायी है ? शायद नही , आए दिन होने वाले मर्डर इस बात के गवाह है कि , आज भी वे अपनी मर्जी से जीवन जीने का जोखिम उठाएंगी तो पुरूष सत्ता उनकी हत्या कर सकती है ।
बेशक समाज बदल रहा है मगर यथार्थ की परतें कितनी बहुआयामी व जटिल हैं जिन्हें भेदकर अंदरूनी सचाई तक पहुंच पाना आसान नही। आज के इस रंगीन समय में नई बढ़ती चुनौतियों से टकराती स्त्री की क्रान्तिकारी आवाजें हम सबको सुनाई दे रही हैं मगर यही कमाऊ स्त्री जब समान अधिकार और परिवार में लोकतंत्र की अनिवार्यता पर बहस करती य सही मायनों में लोकतंत्र लाना चाहती तो वहां इस बदलाव की राह में तमाम पगबाधाएं मसलन- धर्म , भारतीय संस्कृति , समर्पण , सहनशीलता , नैतिकता या यौनशुचिता जैसे सामंती मूल्य ही उसकी स्वीकार्यता की कुंजी बनते रहे। जहां आधिपत्य , दमन और अवमानना के इस समूचे पितृसत्तात्मक मूल्य व्यवहार से टकराती आजाद देश की नई स्वतंत्र स्त्री को लगता था कि चलो , अब कामकाजी माहौल में वे आत्मसम्मान और व्यक्तित्व की आत्मपर्याप्तता को मिले स्पेस के चलते स्त्री स्वाधीनता का भरपूर लुत्फ उठाएंगी मगर आज के बाजारवाद द्वारा परोसी गई स्त्री छवियों ने हमारे सामने सुंदर स्त्री के नकली चेहरे कौंध जाते हैं जिन्हें देखकर तमाम सवाल तेजी से बेचैन करने लगते। आखिर ऐसा क्या हैं इनमें ? अपेक्षित दृष्टि सम्पन्नता , प्रचुर आत्मविश्वास या आत्मबल से भरी पूरी अस्मिता के नए निशान लगाती आधी दुनियां हैं क्या यहां ? नही , कतई नही। जब भी वह अपने लिए मुकम्मल स्पेस या बाजिब हक की बात छेड़ती , उसे पुरूष विद्रोही या घर तोड़ू जैसे अनर्गल आरोपों से मढ़कर उसका मनोबल तोड़कर आगे बढ़ने से हतोत्साहित किया जाता है जब कि ये पूर्वाग्रही सोच सिर से निर्मूल या आधारहीन है।
समकालीन लेखिकाओं ने पुरूष वर्चस्ववाद के खिलाफ परंपरागत रूढि़यों व टिपिकल मर्दवादी मानसिकता को तोड़ने का रचनात्मक साहस दिखाया। उन्हेांने पुरूष संरचना व पुरूष द्वारा गढ़े एक तरफा मूल्येां व मान्यताओं को सिरे से नकारते हुए स्त्री जीवन को सर्वथा नए कोण से रचा व सालों से दबाई उसकी आवाज को उसी की जुबान में शब्द मिले , नई भाषा मिली और नया लोकतांत्रिक नजरिया भी जिसमें उनकी कठपुतली वाली नकली छवि को पूरी ताकत से तोड़ा गया । प्रेम , विवाह व करियर के बीच संघर्ष करती स्त्री की एक नयी जीवंत तस्वीर सामने आई और स्त्री मुक्ति को नयी दिशा मिली ।
घर से बाहर निकल कमाऊ स्त्री को आसान आजाद औरत समझ उसे हथियाने के लिए पितृसत्ता ने तमाम हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए। लोभ लालच के वशीभूत करने की साजिशें रची गयी या भावात्मक दोहन के जाल बिछाए गए जिसे बखूबी उजागर करने के लिए लेखिकाओं की एक नई जमात उभरकर आयीं –सशक्त कथा लेखिकाओं ने सक्रिय स्त्री के प्रतिरोध को व्यापक संदर्भो में मुखरित किया जिसमें उसकी सामाजिक , आर्थिक व राजनैतिक हैसियत को आंकते हुए उसकी त्रासदी के जिम्मेदार कारकों की सघन पड़ताल की गयी कि वे अब अपनी तरह से सोचने लगीं हैं व तमाम चुनौतियेां से निबटने में सक्षम हैं । बेशक इस प्रक्रिया में कई वर्जनाएं टूटी मगर उस पर लादे गए अनावश्यक दबाव भी कमतर होते गए। जिस तरह से उसकी पारिवारिक परिवेश ने सालों तक उसकी मानसिकता को आक्रांत कर रखा था , धीरे धीरे अब वे अपने हकों से वाकिफ होती गई। अपने सपनों व निजी आकांक्षाओं को गतिशीलता से आगे बढ़ाती आज की स्त्री पूरी विविधता व समग्रता से अपना आकाश तलाशना सीख रही हैं। क्रमश: आजाद देश की स्त्रियां आईटी , सेना , एअरफोर्स , चिकित्सा , इंजीनियरिंग , वैज्ञानिक , बैंकर , विश्वविद्यालय में प्रोफेसर , पुलिस अधिकारी या समाज सुधारक आदि न जाने किन किन भूमिकाओं में कामयाबी के शिखर छू रही हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नही जहां आज की महिलाओं ने अपनी छाप न छोडी हो। कह सकते हैं कि आधी नही , पूरी दुनियां हमारी हैं। सारा आकाश हमारा हैं। कितनी संभावनाओं से लैस है आज की महिला मगर कितनी जकड़बंदियां भी जिन्हें उसे सिरे से नकारना होगा । अपनी संभावनाओं के प्रति सचेत रहकर ही वह इस परिवार या समाज व्यवस्था में अपना बहुमूल्य वैचारिक व अन्य तरीके से सशक्त व सार्थक योगदान देकर अपनी जगह बना सकती है ।
सच तो ये है कि आधुनिक स्त्री की स्वाधीन छवि के प्रति समाज / परिवार अभी भी पूरी तरह तैयार नजर नही आते मगर हां , उपभोक्ता संस्कृति उसे प्रयोज्य वस्तु की तरह जरूर इस्तेमाल करने से नही हिचक रही। सच बताएं तो इस ऊपरी चकाचौंध के पीछे की तस्वीरें इतनी कुरूप हैं , इतनी भयावह और वितृष्णा जगाने वाली हैं जहां आज भी अखबार ऐसी जघन्य बलात्कार की घटनाओं से रंगे रहते। सच है कि आए दिन अखबार महिलाओं के प्रति अपराधों से भरे रहते। फिर ये कैसी आजादी ? क्या वाकई लोकतंत्र नजर आता है ? चारों तरफ स्त्री को लेकर होने वाले अपराधों की खबरें ही खबरें , हत्या से आत्महत्या तक , घर की गली से अगले मोड़ तक , मोड़ों से आगे मिलती लंबी सड़क से राष्ट्रीय राजमार्ग तक , सब तरफ बैठे हैं गिद्ध ही गिद्ध , बेहद हिंसक , गैर जिम्मेदार , क्रूर एवं प्रभुता के मद में चूर , उन्हें अपनी पशुता का अहसास तक नही , मलाल तो दूर की बात हैं , जो अपनी प्रेमिका को पाने की खातिर अपनी मरती हुई पत्नी की चीखें सुनना चाहता हैं , ओफ . . सच तो ये है कि महिलाओं के प्रति पुरूषों की सोच इतनी घटिया , संकरी , इकहरी और पूर्वाग्रही है कि आज भी उनका हंसना , बोलना या अकेले अपनी मर्जी से घूमना फिरना सवालों के घेरे में। आए दिन गैंग रेप की हिंसक वारदातें , स्त्री प्रताड़ना के दिल दहलाने वाले खौफनाक सच्चे कारनामे इस सभ्य सुसंस्कृत समाज के माथे पर कलंक का टीका है जो हमारे लोकतंत्र व न्यायव्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर देता है। . । प्रेम , विवाह व करियर के बीच संघर्ष करती स्त्री को उसका वाजिब हक कब और कैसे मिलेगा , आज भी एक ज्वलंत सवाल है।
कई भूमिकाओं का कुशलतापूर्वक निर्वहन करती स्त्री पूरे दम खम के साथ आत्मविश्वास की जलती लौ के सहारे न जाने कितनी पीढि़यों को ऊर्जस्वित रखती आई हैं। आज के बहुआयामी यथार्थ की देहरी पर उसके जीवंत व तेजस्वी व्यक्तित्तव की दस्तक सुनाई देने लगी हैं जहां वह अपनी सोच को पर्याप्त आधार देते हुए परिवार व समाज में बहुमुखी प्रतिभा की छाप छोड़ने लगी हैं सो अब उसे और ज्यादा दरकिनार कर हाशिए पर नही ठेला जा सकता।
स्त्री की सच्ची स्वाधीनता का अहसास तभी हो पाएगा जब वह आजाद मनुष्य की तरह भीतरी आजादी को महसूस करे , तभी सही मायनों में वह एक खुदमुख्तार मजबूत इंसान की तरह समाज की मुख्य धारा में अपनी सशक्त भूमिका निभा पाएगी। न , केवल आर्थिक आजादी सही मायनों में आजादी का पर्याय नही बल्कि सामाजिक , राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में उसकी ठोस भागीदारी एवं मनुष्यता के समान अधिकारों से लैस समानता चाहिए , संरक्षण नही ।
मेरे भीतर का संसार , हमारी अंदरूनी दुनियां का हाहाकार , सालों से दबायी आवाजों का हलाहल और अनकहे शब्दों का भयावह कोलाहल जैसे खुद से अनवरत लड़ाई चल रही हो जिसमें एक तरफ थी मैं और दूसरी तरफ मेरे अपने यानी पितृसत्तानुमा प्रतिपक्ष के बेतुके सवाल , तर्को वनाम कुतर्को के बीच एकपक्षीय हमले और उनमें उलझती प्रतिकार करती स्त्री को बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नही सूझता था । जब समूची पितृसत्ता की पारिवारिक संरचना द्वारा प्रदत्त अमोघ हथियारों से निहत्थी स्त्री बेधी जाए और आर्थिक मोर्चे पर असहाय स्त्री पितृसत्ता के वर्चस्व तले दोयम दर्जे की साबित कर दी जाए , ऐसे एकपक्षीय माहौल में स्त्री अपने भीतर के स्पेस को लगातार सुदीर्घ करती जाती है । पितृसत्ता द्वारा चली साजिशों और उसे धर्म , परंपराओं की परिपाटी में जबरन बांधने के ऐसे बेतुके हथकंडों से उसे घेरने की चालें चली जाएं कि वह देखते ही देखते मूक असहाय सी बेपनाह सन्नाटों में खुद को घिरा पाती है जिसके चारों तरफ दीवारें ही दीवारें हों और वह एक ऐसे अलक्षित कटघरे में कैद कर दी गयी हो जिसे उसके सिवाए कोई और नजर ही न आए तब बेबस औरत चुप रहने के सिवाए करे तो क्या करे ।
ऐसी शाब्दिक या मानसिक हिंसा के सैकड़ों सवाल उसके कंठ तक आते हैं मगर जिसे गरल समझ अंदर ही अंदर गुटकने के लिए मजबूर है वह । आखिर किस मुंह से वह अपनी उस वेदना , उस घुटन को शब्द दे जिसके बोलने भर से पितृसत्ता की चूलें हिल जाएं । धीरे धीरे वह अपने भीतर रचती जाती है एकांत का विशाल आकाश , जहां मंडराते हैं चुप्प्िायों के धूसर धूमिल बादल , जहां कभी कभार नजर आते हैं क्षणिक इंद्रधनुषी रंगों का सौंदर्य । उस सपाट सूने आसमान में पूरी निधड़ता से दौड़ती हांफती वह अपने एकांत में रचती रहती अपने अधूरे सपनों को । उधेड़ते बुनते सपनों के उसके संसार में भूले भटके भी सेंध नही मार सकता कोई । यूं ही सालों से बूंद बूंद भरते हैं दुख के बादल जो अनायास उमड़ते घुमड़़ते शेार मचाते हुए अंततोगत्वा वेग से फट पड़ते हैं और ऐसे ही तबाही मच जाती है समूची पारिवारिक समाज व्यवस्था की चूलें हिल जाती हैं , दरक जाती है सहन करने वाली धरती और टूट जाते हैं पहाड़ । चारों तरफ प्रलय के प्रचंड तांडव देखकर बाकी औरतें डरी सहमी चुप रहने में ही अपनी भलाई समझने लगतीं । आखिर कौन इतना बवंडर झेल पाएगा । इतना दबाव , ऐसी तबाही जिसके खौफ से वे बौखला जाती हैं और पहन लेती हैं चुप्पी का ताला । बूंद बूंद इकट्ठा आंसू बादल बनकर छलक पड़ते हैं धरा पर , अपने ही असहनीय बोझ से आक्रांत बादल अक्सर बरसकर दिलों को राहत पहुंचाने में लगे रहते ।
अपने भीतर की स्त्री केा टटोलने बैठूं तो बचपन के कुछ वाकये हू ब हू स्मृति में टंके रहते – इसे कोएड में मत पढ़ाना । वहां के लड़के कमेंट करते हैं जिसे मैं बर्दाशत नही कर सकता । ‘ भाई की हां में हां मिलाते चाचाजी कहने लगते – हां, बस इतना पढ़ा दो जिससे अच्छा लड़का मिल जाए। मन मारकर चुप साथ लेती मगर डॉक्टर बनने का सपना चकनाचूर हो गया। हालात बद से बदतर होते गए कि अचानक एक अंधेरी काली रात पिताजी की निर्मम हत्या कर दी गयी और आधी रात को मां पिता को लेकर चिरगांव आई ताकि किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज हो सके मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक किशोर बच्ची के हाथ खाली, दिमाग शून्य और परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल कि वह अपने पांव तले की जमीन ही बचा ले, यही बहुत था यानी किसी तरह बीए एमए कर ले, यही बहुत बड़ी बात थी। वह नया आकाश रचना चाहती थी मगर कैसे ?
मां सब बच्चों संग गांव छोड़कर कस्बे चिरगांव में रहने आ गयीं जहां रहकर भाई डॉक्टरी पढ़ने इलाहाबाद निकल गए और अपने अधूरे सपनों संग मैं वहीं रह गयी । वह लडकी अपने सपनों को नया मोड़ देकर कुछ लीक से हटकर ऐसी दुनियां रच डालना चाहती है जो अलहदा हो पर कैसे, नही पता। 16 , नही समझ पाती । साल की लड़की की सोच तो साफ है कि उसे खूब पढ़कर उड़ान भरने लायक ताकत संजोनी है और वह तभी होगा जब वह बीए एमए प्रथम श्रेणी में पास करे । सपने
हम जैसा सोचते है या जैसी योजनाएं बनाते हैं , कुदरत उन्हें जस का तस कहां रहने देता ? सच तो ये है कि जीवन किसी के हांके कभी नही चलता । डकैती के दौरान पिताजी की निर्मम हत्या ने समूचे परिवार को तहस नहस कर दिया और अंतरतम के नाजुक तंतु क्षत विक्षत हो गए। पिताजी की यादों का रेला उमड़कर आता और फिर देर तक छत पर अकेले बैठे बैठे काले बादलों के बीच पिताजी को तलाशा करती , उम्र लगभग 13 साल । पिता की तस्वीर के साथ संवाद करती वो लड़की। कैसी तो विकलता थी जो छूटती ही नही थी। कैसे विकट हालात थे कि एक हाथ में पिताजी की तस्वीरें तो दूसरे में किताबें जिनके जरिए अपने सपने रोपकर मुकम्मल फसल तैयार जो करनी थी।
10 वीं बोर्ड के पेपर्स ऐसे ही दे दिए , न वैसा जोश , न वैसी मुकम्मल तैयारी मगर नतीजा देखकर भैया को ताज्जुब हुआ। एडमिट कार्ड से रोलनंबर देखकर ही वे मेरे प्रथम श्रेणी से पास होने पर यकीन कर पाए मगर इस नतीजे ने मुझे इतना आत्मविश्वास जरूर दिया कि जब ऐसे चलताऊ ढंग से पढ़ने से फर्स्ट आ सकती है सो अब कायदे से पढ़ेंगे और जिंदगी को नया आयाम देंगे मगर अफसोस कि हमारे चिरगांव में तब गर्ल्स इंटर कॉलेज था नही सो आगे की पढ़ाई व्यक्तिगत छात्रा के रूप में ही करनी पड़ी 1 एक ग्रन्थि खुलती तो ऐन मौके पर दूसरी तैयार हो जाती। अपनी रचनात्मक यात्रा की शुरूआती बीज तो 10 वीं के बाद शुरू हो गए थे जब भाई संग हमने एक साथ दैनिक जागरण झांसी के अखबार के बालमंडल पेज पर चंद तुकांत देशभक्त्ि! पूर्ण कविताएं लिख भेजी जो छपी तो लिखकर छपने की ललक भी बढी और हौसला भी।
कुछ लोगों ने मेरे घर पर शिकायत कर डाली कि भले घर की लड़कियों का नाम अखबार में नही आना चाहिए एवं उनकी शादी करवा देनी चाहिए। तब शादी के प्रसंग पर मुझे स्टैंड लेना पड़ा- जब तक अपने पैरों खड़ी न हो जाऊं, शादी नही करवाएंगे, चाहे जो हो जाए। संयोग सुंदर बन गया कि मेरी सहपाठी कविता ने एक अखबार की कतरन दिखाई और इस तरह शुरू हो गया मेरा जेएनयू जाने का सिलसिला। सचमुच , ये मेरे जीवन के सुंदरतम पल है , खूब संजाकर रखने लायक जहां जीने का भरपूर आजादी थी , मनचाहा कुछ भी करने की या अपनी मर्जी से जीने का अनूठा सुख , दोस्तों संग झेलम लॉन में चलती गप्पें व ठहाकों के असंख्य दौर । जीवन रस के अनगिनत रंध्र एक साथ खुल गए हों जैसे और
ठहाकों के असंख्य दौर चलते झेलम लॉन में और इतने लोकतांत्रिक परिवेश में जीवन जीने की कला सीखी। वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय, कविवर केदारनाथ सिंह एवं प्रोफेसर नामवरसिंह से सीखा, समझा गुना साहित्य का क ख ग। जब भी नामवरसिंह जैसे गुरू से कुछ पूछने जाती, वे तत्काल कुछ किताबें बता देते- तुम्हें नेट का पैसा मिलता है, जाओ और ये सारी किताबें खरीदकर पढ़ो।
पिता से यतकिंचित मिली मुझे संवेदनशीलता , उदारता , सरलता या सहजता मगर व्यावहारिकता में चतुर , चालबाज दुनियां से निबटने में कुशल बेहद कर्मठ मेरी खुदमुख्तार और जीवटता की धनी मेरी मां को वक्त ने खूब बार बार पटखनी दी , ऐसी निर्मम जानलेवा मार दी कि धीरे धीरे उनके भीतर से संवेदनशीलता का क्षरण होता गया। अपने कलेजे के टुकड़े की सड़क दुर्घटना में दारूण मैात के हादसे ने उन्हें तोड़कर रख दिया। फिर एक के बाद दूसरे असहनीय हादसों से उनकी संघर्षशीलता , यातनाएं , हताशाएं ओर दुखों से अनवरत लड़ते देख मेरा मन अफसोस से भर जाता मगर फिर भी उन हालातों में उन्होंने हमें कभी कोई कमी का अहसास नही होने दिया , मां के सिर पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता ही जा रहा था , मगर अपने कर्त्तव्य निर्वहन में कभी पीठ नही दिखाई। धूप भरे आकाश तले तमाम वंचनाओं या अवमानना झेलती रहीं वे मगर अपनी इस अनवरत लड़ाई में कभी हार नही मानतीं वे , न ही कभी दयनीयता का भाव ही उनमें नजर आता मगर इन दुर्भाग्यपूर्ण निर्मम वज्रपातों ने उन्हें निर्मोही जरूर बना दिया। आज जीवन उन्हें निरर्थक -निस्सार लगने लगा क्योंकि वक्त ने पूरी क्रूरता से कई बार जानलेवा मानसिक प्रहार खूब किए हैं उन पर। अनवरत तकलीफें झेलने के बावजूद वे आज भी आस्तिक हैं ,भक्तिभाव से पूरी एकाग्रता से गीता पाठ करतीं , रामायण बांचती और आसपास के मंदिरों में चल रहे प्रवचनों को दत्तचित्त से सुनती। वे धीरे धीरे निरासक्त या निर्मोही जरूर होती जा रहीं , वापस अपनी पुरानी कस्बाई दुनियां की तरफ मुड़ जातीं , जहां पुरा – मुहल्ले की दर्जनों औरतें उनके पास किसी न किसी सलाह मशवरे के लिए आती जाती रहतीं । शायद उन्हीं के बीच वे चैन से रहने लायक ऊर्जा बटोर पातीं हों , मगर हां , कभी भी मेरी उदासी , निराशा या हताशा के क्षणों में वे फोन पर दो पंक्तियां जरूर दुहरा देतीं- ‘ लक्ष्य न ओझल होने पाए /कदम मिलाकर चल/ सफलता तेरे कदम चूमेगी /आज नही तो कल।
किताबों से इतर पढने का शौक 10 वीं से ही तेजी से बढने लगा था । उस दौर की नंदन , चंपक , चंदामामा और पराग की रूपहली सुनहरी दुनियां खूब आकृष्ट करने लगी। गर्मियों की छुटिटयों में यह पुस्तक प्रेम परवान चढता फिर आसानी से यह नशा नही उतरता। कभी जासूसी रहस्य भरे उपन्यासों की मायावी दुनियां में गोते लगाते हुए अतल समुंदर की गहराइयों में उतर जाती तो कभी बादलों संग आसमान की उंचाई तक पहुंच कल्पना लोक की सैर पर ऐसे निकलती फिर लौटकर आने की सुधि बुधि बिसार देती। पुस्तक प्रेम का यह सफर क्रमश: सामाजिक राजनैतिक उपन्यासों की दुनियां से होकर सामाजिक उपन्यासों और फिर नितांत कल्पना में रची बसी दुनियां की मायावी सैर भी बेहद लुभावनी लगती। बचपन से उभरता उमडता यह स्वत:स्फूर्त प्रेम ही धीरे धीरे मुझे साहित्य की दुनियां की तरफ खींच लाया।
विश्वविद्यालय परिसर में पुस्तकालय में बिखरी अनगिनत विषयों पर केन्द्रित सामग्री और ढेर सारी साहित्यिक किताबों को आंखों ही आंखेां में पीती रहती। फिर मंत्रमुग्ध तन मन से एकाग्रचित्त देखकर मन पुलकित और हाथ किन किताबों को पहले पकडें , बेचैन आंखें किन्हें जल्द पढकर उस अनूठे पठनीयता के सुख को महसूसें , यह याद नही मगर इतना जरूर याद है कि 1985 से 1990 का वो खूबसूरत दौर बखूबी याद है जब जेएनयू , साहित्य अकादमी , श्रीराम सेंटर लाइब्रेरी के साथ दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी समेत दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय की खाक छानती फिरी , कदम दर कदम अपने आप आगे बढते रहे , हाथ अपने आप किताबें बटोर लाते और फिर किसी भी जगह बैठक घंटों एकाग्रचित्त् पुस्तकों की विशाल दुनियां के सैर पर निकल जाती। बेशक पुस्तकों के जरिए मैंने सीखा , जीवन के अंधेरे पक्षों का मुकाबला करने के लिए किस तरह के आत्मबल को कैसे संचित किया जाए। महापुरूषों की आत्म कथाएं या उनके द्वारा रचित किरदार जिंदा होकर जीने की ताकत बख्सने लगे।
पुस्तकों में निहित ज्ञान का आलोक अदभुत होता है , ये किताबें ही है जो दुख के गहनतम क्षणों में हमारी उंगली पकड हमें आगे चलने को उत्प्रेरित करती हैं।
इधर एमए पूरा होते ही शादी की तखती टांगे घर वाले तो उधर अनायास जेएनयू में शोध हेतु विज्ञापन थमाती मेरी दोस्त कविता । फिर क्या था , लिखित परीक्षा पास करके भाई मुझे लेकर दिल्ली गये इंटरव्यू दिलाने । न जाने ये कौन सी जिद या कैसा जूनून या बेचैनी पसरी थी कि मेरे सपने मेरा हाथ थामे मुझे दिल्ली ले गए । भीतर धड़कते सपनों के भ्रूण को बस एक मौके की तलाश थी और जेएनयू में एडमीशन के बाद मेरी नयी यात्रा शुरू हुईं जहां प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करने का दवाब था तो जेआरएफ पास करना सबसे जरूरी बात ताकि घर से पैसे न मंगवाने पड़ें । आज सालों बाद पीछे मुडकर देखती हूं तो ये कितनी मामूली सी घटना लगती है पर ‘ चिरगांव से नई दिल्ली का सफर पहली बार कोई लडकी झांसी से आयी है , नामवर सिंह जी के कहने पर मैं खुशी से बौरा गयी थी ।
क्रमश: मेरे भीतर की दुनियां बड़ी , विशाल व सुदीर्घ होती जा रही थी । जेआरएफ क्वालिफाई करते ही मेरा ये अलक्षित सपना खूब तेजी से नजर आने लगा था जहां से नील गगन की ऊंचाइयां मुझे लुभाने लगी थी , जहां से हिमालय के पर्वतों को लांघकर कैसे दुर्गम रास्तों पर चल पड़ने के लिए खुद को तैयार कर पाती थी । स्त्री के इस अलक्ष्िात संसार में सपनों के इतने रंग , इतने विविध रूप आकार लेने लगे थे जो हर पल अपना नया चेहरा दिखाने लगते कि इसे पा लिया है तो अब इसे भी पा लो । उसी चांद तारे से झिलमिलाते आसमान में खिलने लगे थे प्रेम के अंकुर यानी जिजीविषा या जीवंतता से भरी लड़की युवावस्था की रंगीनियत में खोयी अपने आसपास के माहौल में जादुई बातों के भंवर में डूबी रहती । तब का झेलम लान हमारे सहपाठियों संग लंबी बहसों का अड्डा था , अंतहीन लंबे तर्क , अस्त्तित्ववाद , मार्क्सवाद व अन्य वादों पर तीखी बहसों ने मेरी दृष्टि को संवर्धित किया । ज्ञान पिपासु मन जिज्ञासु होता गया और इस तरह साहित्य की गहन अध्येता बनती गयी । यही वह दौर था जब धीरे धीरे जीवन में चांद खूबसूरत लगने लगा था । रातें बेहद मनोरम और दोस्तों संग जेएनयू का परिवेश बेहद आकर्षक । वहां की पहाडियां , टीले और वहां के हास्टल , लाइब्रेरी आदि का संग साथ मेरे भीतर के खालीपन को संतृप्त करता था ।
तब ये जमीन अंतहीन नजर आती बल्कि पूरी दुनियां का ओर छोर ही पकड में नही आता था । दिल्ली की सडकें नापते हुए अंदरूनी सपने बडे होने लगे तो मन का समंदर खूब फैन उगलता नित नए सिरे से अपना विस्तार तलाशने लगता । इस तरह का जीना , दोस्तों संग लंबे सफर पर निकल जाना धरती से आसमान उतार लेना जैसा लगता था मगर यह सब कब तक चलता ? धीरे धीरे नौकरी और शादी के बाद की रूटीन जिंदगी में कुछ साल गुजारने के बाद वह विशालकाय दुनियां सीमित , संकरी और इकहरी नजर आने लगी । घर के आसपास रहतीं औरतेां में से ज्यादातर अपने विघटित सपनों व बुझे मन के साथ समझौतापरस्त जीवन जीने के गुर सिखाने लगतीं । वे कभी बच्चों का हवाला देकर खुद को समझातीं या परिवार संस्था को बचाए बनाए रखने पर जोर देती , फिर चाहे ऐसा करते हुए उन्हें खुद के सपनों की तिलांजलि ही क्यों न देनी पड़े मगर वे इसकी आदी हो चुकी थीं । उनका मन या तो रिक्त हो चुका था या उजाड़ सो वहां सपनों के घोंसले भला कैसे बनते ? उनके विचारों , सोच या जीवन शैली में इसके अलावा विकल्प जैसा कोई शब्द ही नही बचा था । हर रात उनके सपने रौंदे जाते मगर सुबह होते ही वे अपने मन के आकाश पर अपने बनाए निजी कोने में विचरती और उसे सार्वजनिक न होने की ठान लेतीं ।
सोचो तो जरा , इस दुनियां में भला कौन होगा जिसे किसी से कभी प्रेम हुआ ही न हो ? कैसे नही होगा ? मगर खुद की आवाज को सालों से जबरन दबाए वे इस अहसास को परे धकेलती और धीरे धीरे इसकी आदी होतीं चलीं जातीं । अंदरूनी एकांत को जीते हुए खुद को जब कभी आइने में निहारतीं जहां उन्हें अपनों की याद आती मगर पितृसत्ता का खौफ उन पर इस कदर तारी रहता कि वे सपने तक देखना भूल चुकी थीं । अपने सपनों को खोकर उनकी आंखें सूनी नजर आतीं ।
आधी दुनिया की औरतें निबड एकांत में किसके साथ करेंगी बातें, किसका हाथ थामे निकल पाएंगी सुदूर दुनिया में अपने सपनों का जीने, न, ऐसी कोई उम्मीद नही दिखती फिर वे बच्चों की उंगली थाम उनके सपनों में रंग भरने लगतीं। कुछ सालों तक यह सपने जिंदा रहते पर बड़े होते ही बच्चे उनके सपने छोड़कर अपने सपनों को जीने लगते, तो वे अकेली पड़ जातीं और अपने पुराने राग अनुराग पर चढ़ी धूल को झाड़ना चाहती मगर बुझे मन से फिर से नेह का दीया नही जल पाता।
मगर बुझे मन से फिर से नेह का दीया नही जल पाता । अफसोस कि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । हममें से ज्यादातर औरतें ऐसी भी हैं जो अपने जिद व जुनून को ताक पर रखकर दी गयी जिंदगी जीने की आदी होती जातीं मगर खुद से एकालाप करती स्त्री जब तक खुद को किसी कला , संगीत या मन की सपनीली सुनहरी खिडकी से नही जोड लेती जहां वह अपने जीने लायक आसमान को देखकर चांद की एक झलक के लिए बौरा जाए , तब तक जीना बोझ जैसा लगेगा ।
मैं हर रोज अपनी खिडकी खोलकर बाहर का खुला आसमान देखती हूं , सपनेां में हर रोज कोई चिडियां आती है
हर रोज कोई चिडि़यां कानों में आकर मधुर राग घोलते हुए पूरी ताकत से कहना चाहती है, मुट्ठी में भर लो शानदार लम्हे, क्यों कि यह भी किसी न किसी रोज सिमटने वाली है। ये लम्हे कंठ में पुकार लिए वह चिडि़यां फिर किसी और को दस्तक देने कहीं और निकल जाएगी। पर मैं अपने सुख दुख को शब्द देने के लिए लपककर पकड़ लेती हूं कलम, उतरते हैं शब्द दर शब्द पन्नों पर और रचती जाती हूं एक समानांतर दुनिया जिसकी तलाश में निकल पड़ती हूं रोज, आकाश, नदी, उपवन, जंगल और कंटीली खुरदुरी राहों पर। पकड़ती हूं खुद को, अछोर समंदर के पानी में हाथ डालकर थाह लेती हूं अपने वजूद की, और भीतर बसे अथाह पानी से भिगो देती हूं सूखी जमीन को। बादलों पर सवार होकर निकल पड़ती हूं घाटियों तक अविराम यात्रा पर, करती हूं असीम आकाश से खत्म न होने वाली ढेर सारी बातें, और खुद को पानी बनाकर भर जाती हूं खुशी से जिसकी महक से आप्लावित रहता है मेरा मन संसार।
तो यही है मेरे अंदर की स्त्री जो चाहती है कि वह बार बार निश्छल प्रेम में पड़े , निष्कंप लौ के जरिए अपने आसपास के अज्ञान के अंधेरे संसार को रॉशन करे , गढे एक निस्वार्थ दुनियां जहां हर स्त्री पुरूष समकक्ष हो , लोकतांत्रिक चेतना से लैस हो , समान अधिकारों की दुनियां में विचरती रहूं , छल कपट से परे मासूम प्रेम के जादू में डूबी रहूं और इस धरा पर मानवता की खूबसूरत मिसाल कायम करूं । अपने जीने को नया अर्थ दे सकूं , एक नयी मुहिम चला सकूं जहां सर्वधर्म समभाव व विश्वबंधुत्व की धुनें गूंजतीं हों । जहां पितृसत्ता जैसी किसी भी एकाधिकारवादी सत्ता का वर्चस्व न हो बल्कि स्त्री होने का गर्व , स्वाभिमान व अस्मिता पर गुमान कर सकूं । जहां रोक टोक , प्रभुता या एकाधिकार के मद में चूर पुरूषसत्ता दूर दूर तक नजर न आए , जहां स्त्री होने के प्रति मान सम्मान हो या अपने को बेहतर मनुष्य होने की तरफ कदम दर कदम बढा सकूं ।
तब यह मायवी बादलों से भरा रंगीन आसमान कितना स्वच्छ , कितना निर्मल कितना भव्य लगेगा । तब तो विविधता से भरे भांति भांति के जीव जंतुओं से भरा जंगल लुभावना नजर आएगा और अपने भीतर की विराट दुनियां को समाए मन का समंदर कितनी सारी विषमताओं के बावजूद मोहक लगेगा । नवसृजन के आलोक में नवल रागों से अनुराग के निश्छल स्नेह की अजस्र धारा में भींगते युगल , सपनों की दुनियां को साकार करते स्त्री पुरूष व बच्चे । वाकई , अपने जिद और जुनून के जरिए हासिल होती है मनचाही मंजिल और ये मंजिल बेहद खूबसूरत होगी , एक भरी पूरी दुनियां , भेदभाव से परे , प्रेम से नवसृजन की तरफ कदम बढाते हुए हम अंदरूनी खूबसूरती के नए वितान को बुनने में कामयाब होंगे ।
आज 25 दिसंबर 2022
सबकी जमीन बचाने की लड़ाई मैं जीती -अपनी लड़ाई हार गई…
मन मानने को तैयार ही नहीं हो रहा है की मैं अपने आशियाना को टूटने से बचा नहीं पाई। सभी सामाजिक लड़ाई जीतते रही, सबका जमीन, घर -द्वार बचाने में कामयाब रहीं, लेकिन मेरा आर्थिक रीढ़, मेरी चाय की दूकान की 3फिट जमीन को बचाने में बिफल रही।
1996 से सामाजिक न्याय की संघर्ष के रास्ते चलते रोजी रोजगार के लिए रांची के क्लब रोड़ में चाय नाश्ता की दूकान शुरु की। चाय दुकान चलाते बहुत उतार चढ़ाव देखे। चाय दुकान के साथ हमारी सफर 25 वर्ष पूरी हुईं। इन 25 वर्षो में सामाजिक न्याय के संघर्ष के यही मेरा आर्थिक आधार था। हमारे साथ समाज को जिंदगी यांही से मिली।।
आज मन उदास है, आगे नगर निगम पीछे सरकार।जीईल मिशन ने 9/15 फिट की जमीन मेरे पाती के नाम लीज में दी थी। इसके पीछे करीब 4 फिट जमीन पर दूकान का किचन था। आज इस किचन को सरकार हटाने के लिए मजबूर कर दिया। छत टूटा …मेरा मन टूटा .. सब लड़ाई मैने जीता, अपनी लड़ाई हार गई…
मेरे साथ सीधे तौर पर 10 परिवार बेरोजगार होगा.. बाकी मेरे पास शब्द नहीं…
वो दिन ताजा होता जा रहा है जब मेरे परिवार के हाथ से जमीन तकतवारों ने छीना था, जमीन वापसी का केस लड़ते मेरा परिवार कंगाल हो गया था। तब गांव से पलायन कर रांची पहुंचे थे। आगे और क्या होने वाला है… अब तो मन पत्थर हो चूका है….
महात्मा गांधी ने भारत में पहली बार राजनीति का स्त्रीकरण किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गांधी के 2015 में भारत लौटने से पहले भी स्त्रियां थीं, लेकिन उनकी संख्या बेहद नगण्य थी और उनमें से ज्यादातर उच्च वर्ग की महिलायें थीं। ऐसा भी नहीं था कि उच्च वर्ग की इन महिलाओं कोई योगदान नहीं किया अपने बाद की पीढ़ी के लिए राजनीतिक स्पेस तैयार करने में। वे बेहद प्रतिभा सम्पन्न महिलाएं थीं। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा के पक्ष में प्रयास किये और महिलाओं का मताधिकार पाने में इन्होने सफलता पायी थी। मताधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार।
राजनीति में महिलाओं के लिए व्यापक स्पेस, माहौल बनाने में महात्मा गांधी के राजनीतिक सिद्धांत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। गांधी जब भारत में सक्रिय नहीं हुए थे तभी रवींद्रनाथ टैगोर का उपन्यास 1916 में आया था ‘घरे/ बाइयरे’।
उपन्यास की नायिका बिमला घर के चौखटे से बाहर आकर स्वदेशी आंदोलन में हिस्सा लेती है। बंगाली महिलाओं ने उपनिवेश विरोधी सशस्त्र आंदोलनों में हिस्सा लिया था, लेकिन बिमला ने अहिंसक प्रतिरोध का रास्ता चुना। राजनीति का अहिंसक वातावरण महिलाओं के अनुकूल होता है। गांधी ने अहिंसा, सत्याग्रह को राजनीतिक मूल्य बनाकर राजनीति को घरेलू महिलाओं के लिए भी अनुकूल किया। जिसके बाद सामान्य घरों से भी महिलाएं राजनीति में भागीदार हुईं। घर के चौखटे से बाहर निकलीं। इसे राजनीति के स्त्रीकरण की तरह देखा गया।
लगभग सौ साल बाद फिर से महिलाएं, युवा, बुजुर्ग, हर समूह से राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हैं। यह उस वक्त हो रहा है जब लोकसभा में आज अधिकतम 14 % महिलाएं हैं।। यह उस वक्त हो रहा है जब लोकसभा में आज अधिकतम 14 % महिलाएं हैं। कई राज्यों की विधानसभाओं में वह प्रतिशत और भी कम है। यह ऐसे समय में भी हो रहा है जब राजनीति को घिनौना, हिंसक, भ्रष्ट रूप में देखा जा रहा है। इसलिए, महिलाओं के लिए भारत जोड़ो यात्रा में चलने वाले ज्यादातर पुरुषों के साथ शामिल होना महत्वपूर्ण है, हालांकि 30 प्रतिशत महिलाएं इस यात्रा में शामिल बतायी जाती हैं।
राहुल गांधी के बारे में जो ख़बरें यात्रा से आ रही हैं या जो तस्वीरें बाहर आ रही हैं, उनका असर भारतीय राजनीति पर व्यापक होने वाला है। बशर्ते राहुल एक राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इस दिशा में काम करते हैं। फिलहाल तो इन तस्वीरों से राजनीतिक स्पेस और भाषा के स्त्रीकरण की दूसरी परिघटना घट रही है भारतीय राजनीति में ऐसे में राजनीतिक स्पेस का स्त्रीकरण एक महत्वपूर्ण परिघटना होगी। सबसे ज्यादा जरूरी है महिलाओं के लिए अनुकूल वातावरण हो राजनीति में।
मुंबई की क्वैर राइट्स एक्टिविस्ट और क्वैर स्त्रीवाद की प्रवक्ता चयनिका शाह कहती हैं कि राहुल गांधी के साथ भावुक रूप से मिलती स्त्रियों की आती तस्वीरों के बीच मैंने इन मिलन के वीडियो 15-15 मिनट तक देखे हैं। महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है टच की भाषा। वे गुड टच-बैड टच को समझती हैं। राहुल बेहद संवेदनशील ढंग से मिल रहे हैं। महिलाऐं उनसे गले लगाकर सहज हैं। इसलिए और और महिलाऐं उनसे इसी तरह मिल रही हैं।
चयनिका शाह का यह कथन बेहद महत्वपूर्ण है। उनकी गवाही कर्नाटक में एक दिन यात्रा में शामिल हो चुकीं पत्रकार मनोरमा की भी है। ऐसे माहौल में जब राजनीति में मर्दवाद बेहद अहम हो चुका है। 56 इंच की भाषा हो या ‘गाय-बछड़े’ की भाषा, महिलाओं को असहज महसूस कराती हैं। पीएम ने गाय-बछड़े का रूपक सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लिए दिया था। संसद में उन्मुक्त हंसी हंसने वाली रेणुका चौधरी की हंसी का समवेत मजाक उडाने में प्रधानमंत्री भी शामिल रहे। वर्तमान केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण के सवाल को ही कुंद कर दिया है।
प्रधानमंत्री एक ओर तो लाल किले से महिलाओं के सम्मान का आह्वान करते हैं और दूसरी ओर उनका गृह मंत्रालय बिलकिस बानो के सामूहिक बलात्कारियों को छोड़ देती है। उनकी पार्टी की सरकारों के मंत्री और नेता बलात्कार का अपराधी सिद्ध हो चुके राम-रहीम के सम्मान में खड़े होते हैं। प्रधान मंत्री कबूतर और चीता का रूपक खड़ा करते हुए खुद को चीता छोड़ने वाले गर्वीले भाव में पेश करते हैं। ऐसे में राहुल गांधी से जुडी ऐसी ख़बरें, उनके बारे में ये टिप्पणियां आश्वस्त करती हैं। राजनीतिक माहौल को महिलाओं के अनुकूल बनाना ही तो राजनीति का स्त्रीकरण कहा जाता है।
राहुल गांधी द्वारा स्त्रीकरण का यह संकेत तबतक अधूरा है, जबतक इसे ठोस पहल में न बदल दिया जाए। घरे-बाइरे की विमला गांधी के आने के बाद 1930 के दांडी यात्री और 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन तक एक से अनेक हो गयीं। लेकिन जल्द ही उनकी संख्या सीमित होती गयी। कुछ सक्रिय राजनीति में रहीं, कुछ रचनात्मक कार्यों में लग गयीं। यानी गांधी ने घर के चौखटे का ही विस्तार कर दिया था, बाहर अनुकूल स्थितियां नहीं बनीं महिलाओं के लिए, वह चौखट फिर सिमट गया। खतरा यही है। यदि ठोस कार्यक्रम नहीं होंगे तो भारत जोड़ो यात्रा के बाद महिलाओं के लिए बना एक सुखद अहसास वहीं थम जाएगा।
ठोस कार्यक्रम का अर्थ है क़ि राहुल गांधी घोषित करें कि महिलाओं के लिए आरक्षण वे कांग्रेस की सरकार बनते ही पास करवाएंगे। सुनिश्चित करें कि महिलाओं के लिए हर संभव अनुकूल स्थितियां सुनिश्चित की जायेंगी। राहुल गांधी को एक नैतिक आभा बनानी होगी महिलाओं के प्रसंग में। बातों और इमेज से आगे जाकर।
हालांकि वह जमात जो गांधी जी की राजनीतिक पद्धति को कायरता मानती रही है, महिलाओं के लिए कई ठोस पहल लेने वाले नेहरू की ऐय्याश छवि गढ़ने की कोशिश करती है, वह राहुल गांधी की इन तस्वीरों के खिलाफ भी सिद्द्त से लगी है। यह एक ऐतिहासिक रिप्लिका ही है कि अपने परिवार की एक महिला के साथ बेहद सहज तस्वीर नेहरू की भी अश्लील टिप्पणियों के साथ घुमाए जाती है और राहुल गांधी की भी घुमायी गयी। ऐसे ही प्रोपगंडा के प्रयास में भारतीय जानता पार्टी की एक नेता की काफी किरकिरी हो चुकी है।
यह वह जमात है जो स्त्रियों के अनुकूल किसी भी प्रयास के खिलाफ रही है। इमेज के स्तर पर भी और ठोस पहलों के स्तर पर भी। बाबा साहेब डा. अम्बेडकर द्वारा हिन्दू कोड बिल को पास कराने के प्रयासों के खिलाफ भी यही जमात रही है। मनुस्मृति की वकालत करने वाली यह जमात संविधान के पक्ष में भी नहीं थी। ये कुछ ऐसी पहलें थी आजाद भारत के लिए जो स्त्रियों के लिए घर और बाहर, दोनों ही स्पेस पर अनुकूल स्थितियां बनातीं। राहुल गांधी को एक ठोस नजरिये के साथ आने की जरूरत है अन्यथा भारत जोड़ो यात्रा से आ रही खबरों, तस्वीरों और भाषा का असर एक इवेंट का बायप्रोडक्ट भर बनकर रह जायेगा, और जल्द ही अपना असर खो देगा।
क्यों अनंतपुर के पक्षियों और ग्रासलैंड के लिए खतरा हैं पवन चक्कियां
( पवन चक्कियों का अनंतपुर की वनस्पति और जीवों पर प्रभाव, ग्राउंड रिपोर्ट) मनोरमा
आंध्र प्रदेश का अनंतपुर जिला राजस्थान के जैसलमेर के बाद भारत का दूसरा सबसे शुष्क इलाका है, अल्प वर्षा और शुष्क भूमि के कारण इसे दक्षिण का रेगिस्तान कहा जा सकता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, अनंतपुर जिले की जनसंख्या 40,83 लाख है, जिले की कुल आबादी का 71.19 प्रतिशत ग्रामीण आबादी है। कुछ विशेषज्ञ अनंतपुर जिले के प्रागैतिहासिक अतीत को ‘अनंतसागरम’ नाम से जोड़ते हैं, जिसका अर्थ है अंतहीन महासागर’, आज के अनंतपुर के लिए इसे एक विडंबना ही माना जाएगा। जबकि 71.19 प्रतिशत ग्रामीण आबादी वाले आंध्र प्रदेश के इस सबसे बड़े जिले में पिछले तीन -चार सालों को छोड़ दें तो बारिश की कमी और लगातर सिकुड़ते जलस्रोत गरीबी और पलायन की सबसे बड़ी वजहों में से एक रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक 2013 से 2018 तक अनंतपुर सूखे के चपेट में रहा और 2019 से 2022 यहाँ औसत से अत्यधिक बारिश हुई। कुल मिलाकर अनियमित बारिश खेती -किसानी को अभी भी यहाँ के लोगों के लिए रोजी -रोटी को मुश्किल बनाये हुए है।
बहरहाल, अनंतपुर की पहचान सिर्फ यही नहीं है, पिछले दो दशक में अनंतपुर पवन ऊर्जा के प्रमुख केंद्र के रूप में भी उभरा है, पुरे जिले में पवन चक्कियों या विंड मिल्स का जाल बिछा हुआ है जो अनंतपुर को एक अलग भू दृश्य, पवन चक्कियों और पवन ऊर्जा के शहर में बदलता है। रामगिरी, कदवकल्लू, वज्रकरूर, तलारीचेरवु, नालकोंडा, मुस्तिकोवेला, पेनाकचेरला कल्याणदुर्ग, उरावकोंडा, कादिरी से गुजरने पर पहाड़ों के साथं आप विशाल पवन चक्कियों से भी होकर गुजरते हैं। आंध्रप्रदेश सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2021-22 तक राज्य की पवन ऊर्जा क्षमता , 8 गीगावाट है, फिलहाल राज्य में 4000 मेगा वाट पवन ऊर्जा उत्पादन हो रहा है जिसमें अनंतपुर का योगदान 2700 मेगा वाट है। गेम्सा रिन्यूएबल्स, सुजलॉन एनर्जी, हरेऑन सोलर, लोंगी सिलिकॉन जैसी प्रमुख कंपनियों ने यहां संयंत्र स्थापित किया है या कर रही हैं।
जिले में जहां भी हवा का वेग अधिक है, वहां बिजली उत्पादन के लिए पवन चक्कियां स्थापित करने के प्रयास किये गए, आमतौर पर अप्रैल से सितंबर तक अनंतपुर में 45 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलती हैं जो पवन ऊर्जा पैदा करने के लिए उपयुक्त होती हैं। इसके अलावा जिले की पहाड़ी भू संरचना भी विंड टर्बाइन के प्रभावी तरीके से काम करने के लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है। आंध्र प्रदेश के गैर-पारंपरिक ऊर्जा विकास निगम (नेडकैप) के द्वारा किये गए सर्वेक्षण में भी अनंतपुर जिले को पवन चक्कियों की स्थापना के लिए आदर्श माना गया।
साल 2016 में आंध्र प्रदेश सरकार ने राज्य में पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए 32 उपयुक्त स्थानों की पहचान की थी जिसमें 25 स्थान अकेले अनंतपुर में थे, बाकी सात स्थान कुरनूल, नेल्लोर, कडपा और विशाखापत्तनम जिलों में स्थित हैं। इसके कारण अनंतपुर को जिले में निवेश करने के लिए प्रमोटरों के साथ गैर-पारंपरिक ऊर्जा केंद्र का टैग भी हासिल हुआ। और पिछले कुछ सालों के दौरान यह जिला “विंड एनर्जी हब” के तौर पर उभरा।
लेकिन अनंतपुर की पवन चक्कियों वाली तस्वीर का ये एक पहलू है दूसरा पहलू पर्यावरण, बारिश, जंगल, हरियाली, जीव जंतु, पक्षी, तितलियों के अस्तित्व के गंभीर सवालों से जुड़ा है, साथ ही इन विंड टर्बाइन के साथ लगे गांवों के लोगों की सेहत उनकी खेती, जीविकोपार्जन, जमीन की कीमत और मुआवजे से भी जुड़ा है। पिछले दो दशक में लगातार इस पर विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है और जो समय समय पर रिपोर्ट भी होती रही है कि वन और सरकारी भूमि पर पवन चक्कियां स्थापित किये जाने के कारण रायलसीमा क्षेत्र की हरित पट्टी या जंगल बेदर्दी से नष्ट हो रहे हैं या हुए हैं, और जो कंपनियां पवन चक्की लगा रही हैं उनपर वैकल्पिक हरियाली विकसित करने की भी कोई जिम्मेदारी नहीं है या वो सिर्फ कागजी है, नेताओं, ठेकेदारों को कुछ पैसे या कमीशन देकर कागज पर हरियाली का विकास दिखा दिया जाता है। जबकि, उपयुक्त जलवायु परिस्थितियों और पवन चक्कियों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त भूमि की उपलब्धता के कारण देश विदेश की कई कंपनियों को अनंतपुर जिलों में सरकारी भूमि लीज पर विंड टरबाइन लगाने के लिए दिया गया है। इस सन्दर्भ में सम्बंधित विंड मिल कंपनियों के अधिकारियों से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन किसी भी अधिकृत अधिकारी का संपर्क मुहैया नहीं कराया जा सका जिससे कंपनियों के पक्ष के बारे में बात हो सके। जबकि एक बात बार बार दोहराई गई कि हम सरकार के निर्देश और मंजूरी के साथ काम कर रहे हैं।
अंनतपुर के ही टेकुलोड़ू गांव के इम्तियाज़ ने पवन चक्कियों की बात करने पर अपने कई दोस्तों के गांव का जिक्र किया जो खुद या उनका परिवार या रिश्तेदार इन विंड टर्बाइन्स के कारण प्रभावित हैं जिनसे हमने एक एक बार बात की उनके गांव जाकर। लेकिन इससे पहले वो इसे प्रसंग को अंनतपुर के इतिहास और अपने गांव के नाम से जोड़कर कहते हैं ऐसा पहली बार नहीं है, आप यकीन नहीं करेंगे अंनतपुर कभी बहुत हरा भरा इलाका हुआ करता था ऐसा उनके पिता और दादा कहते रहे हैं। खुद उनके गांव का नाम टेकुलोड़ू इसलिए है कि 1857 के बाद जब अंग्रेज भारत में अपना अधिपत्य स्थापित कर रहे थे तो रेलवे की शुरुआत, विकास और विस्तार हुआ, इम्तियाज़ के गांव से रेलवे के लिए पुरे इलाके से इतनी “टीक ” की लकड़ियां लादी जाती थी कि उनके गांव का नाम ही “टेकुलोड़ू ” यानी जहां टीक लोड होता है पड़ गया।
टेकुलोड़ू गांव के इम्तियाज़
इम्तियाज़ अपने पिता की ही स्मृतियों के हवाले से बताते हैं यहां के हरे भरे जंगल की लकड़ियों का अंग्रेजों ने जब वो भारत में रेल सेवा शुरू और विस्तार कर रहे थे जम का कर इस्तेमाल किया। इसके अलावा पुराने दस्तावेजों में कर्नल बेडडोम ने 1880 में इस बात का खासतौर पर जिक्र किया है कि अनंतपुर के सभी घरों के बीम देखकर कहा जा सकता है कि 30-40 साल पहले आसपास के गांव से बड़ी मात्रा में में ठीक बीम प्राप्त किया जाता रहा है। 1880 में ही मिस्टर गैंबल ने भी दर्ज़ किया है कि उन दिनों अनंतपुर के जंगलों का सबसे बड़ा दुश्मनचूड़ी निर्माण उद्योग था। अनंतपुर में चूड़ियाँ बनाई जाने वाली
क्षारीय मिट्टी बहुतायत में पाई जाती थी। मिस्टर गैंबल लिखते हैं, इस उद्योग को बहुत अधिक ईंधन की आवश्यकता थी और ईंधन आपूर्ति आसपास के गावों के जंगलों से हो रही है, पेनुकोंडा तालुक के 14 गांव में 93 चूड़ी भट्टों से कम नहीं, जिनमें से 75 को छोड़ दिया गया और 18 काम कर रहे थे।
अनंतपुर में पवन चक्कियों के कारण पर्यावरण पर पड़े दुष्प्रभाव के सन्दर्भ में खोजबीन करने पर सबसे हैरान करने वाली बात इस जिले में टिम्बकटू कलेक्टिव नाम से काम कर रहे एनजीओ की इस मसले पर चुप्पी रही। टिम्बकटू कलेक्टिव ने 1992 में सीके बबलू गांगुली और मैरी वट्टमट्टम के नेतृत्व में कल्पावल्ली से लगभग 20 किलोमीटर दूर चेन्नेककोथपल्ली (सी के पल्ली) गाँव में बंजर भूमि पर ग्रामीणों के साथ संयुक्त रूप मिलकर जंगल विकसित करने और पुनर्जीवित वनों की रक्षा का काम दिया था। यह एनजीओ पिछले 30 साल से अनंतपुर में काम कर रहा है और अनंतपुर के चेननेकोथापल्ली, रोडडम और रामगिरी मंडल के तहत आने वाले 6,000 एकड़ में फैले कल्पावल्ली और आसपास के 181 गांवों में जंगल पुनर्जीवित करने साथ ही कल्पावल्ली और आसपास के गांव के 23,172 परिवारों के साथ मिलकर जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा देने का दावा करता है। टिम्बकटू कलेक्टिव का दावा है कि अनंतपुर में इनके द्वारा कुल 9,000 एकड़ भूमि पर जिसमें कल्पावल्ली सामुदायिक संरक्षण क्षेत्र (केसीसीए) भी आता है, में वनों की कटाई, अतिवृष्टि, जंगल की आग, जलवायु परिवर्तन, आदि के कारण हुए नुकसान की भरपाई करने, जंगल,पारिस्थितिकी तंत्र और जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का काम किया गया है। जैविक खेती कार्यक्रम के परिणामस्वरूप बेहतर पैदावार, बेहतर मिट्टी की गुणवत्ता, पौधों की विविधता में वृद्धि सुनिश्चित किया गया है। साथ ही कल्पावल्ली कार्यक्रम केसीसीए के तहत सवाना घास के मैदान पारिस्थितिकी तंत्र और उष्णकटिबंधीय झाड़ी वन जो भालू, तेंदुए, काले हिरण और लकड़बग्घा का घर है को सफलतापूर्वक बहाल करने, भारतीय ग्रे वुल्फ आवास की रक्षा और संरक्षण, 250 से अधिक वनस्पतियों की प्रजातियों, पक्षियों की 126 प्रजातियों, स्तनधारियों की 22 प्रजातियों और हर्पेटोफ़ुना की 60 से अधिक प्रजातियों के संरक्षण का दावा करता है।
टिम्बकटू कलेक्टिव स्टोर
और उससे भी महत्वपूर्ण बात जिसके कारण अनंतपुर में पवन चक्कियों के द्वारा होने वाले पर्यावरणीय नुकसान के सन्दर्भ में टिम्बकटू कलेक्टिव का जिक्र जरूरी है क्योंकि अक्षय ऊर्जा के तहत पवन ऊर्जा के संभावित नकारात्मक प्रभाव पर टिम्बकटू कलेक्टिव एनजीओ, कल्पावल्ली सीबीओ, और एसपीडब्ल्यूडी के साथ मिलकर नई दिल्ली में भारत के ग्रीन ट्रिब्यूनल में सार्वजनिक मुकदमा दायर करने वालों में से रहा है।
लेकिन पुरे तीन महीने से ज्यादा टिम्बकटू कलेक्टिव से जुड़ें अलग अलग लोगों को संपर्क करने के बावजूद उनमें से कोई भी विंड टर्बाइन से होने वाले प्रदुषण पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं हुआ।
कई बार फोन और मेल के बाद अंततः टिम्बकटू कलेक्टिव की संस्थापक मेरी वट्टमट्टम की ओर से मेल के मार्फ़त स्पष्टीकरण दिया गया कि हाल के दिनों में हम कोविड महामारी से लंबित काम को पूरा करने में बहुत व्यस्त थे। संवाद नहीं कर पाने का कारण यह हो सकता है। टिम्बकटू कलेक्टिव और कल्पावल्ली ट्री ग्रोअर्स कोऑपरेटिव ने पवनचक्की कंपनियों द्वारा संरक्षित क्षेत्र को हुए नुकसान के संबंध में एनजीटी से संपर्क किया था। एनजीटी ने पवनचक्की कंपनियों को इसके लिए मुआवजा देने का निर्देश दिया था। हमें बताया गया कि यह मुआवजा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दिया गया है।
गौरतलब है कि है कि नालकोंडा पवन ऊर्जा परियोजना का कल्पावल्ली क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की बात की गई थी जिसे टिम्बकटू कलेक्टिव द्वारा स्थानीय वनीकरण के द्वारा बहाल किया गया था। वर्ष 2013 में इस क्षेत्र में जब 50.4 मेगावाट का पवन फार्म स्थापित किया गया था, तब टिम्बकटू कलेक्टिव ने ही इससे वनस्पति आवरण और जलग्रहण क्षेत्रों को नुकसान पहुंचने की बात कही थी, साथ ही पहाड़ियों के कटाव और स्थानीय लोगों की आजीविका के प्रभावित होने की बात की थी।
जबकि परियोजना सीडीएम के तहत कार्बन क्रेडिट के लिए पंजीकरण का अनुरोध कर रही थी। यह भी कहा गया था कि इस परियोजना का नकारात्मक स्थानीय प्रभाव पड़ा है और परियोजना से पहले स्थानीय समुदायों से उचित परामर्श भी नहीं लिया गया है।
सीडीएम क्या है?
सीडीएम का मतलब है क्लीन डेपलपमेंट मैकेनिज्म यानी स्वच्छ विकास तंत्र। संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के जलवायु परिवर्तन पर क्योटो प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 12 में सीडीएम को परिभाषित किया गया है जिसके मुताबिक क्योटो प्रोटोकॉल (एनेक्स बी पार्टी) के तहत कम उत्सर्जन या उत्सर्जन-सीमा प्रतिबद्धता वाले देशों को विकासशील देशों में कम उत्सर्जन वाली परियोजना को लागू करने की अनुमति देता है।
सीडीएम विकासशील देशों में उत्सर्जन में कमी वाली परियोजनाओं को सर्टिफायड इमिशन रिडक्शन (सीईआर) क्रेडिट अर्जित करने की अनुमति देता है, जिसमें प्रत्येक एक टन CO2 के बराबर होताहै। इन सीईआर को क्योटो प्रोटोकॉल के तहत खरीदा बेचा जा सकता है और औद्योगिक देशों द्वारा अपने उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों के एक हिस्से को पूरा करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।
नेशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल, दूसरा पक्ष
उल्लेखनीय है कि पवन ऊर्जा परियोजना के कारण सामुदायिक सहयोग के द्वारा विकसित जंगल को नुकसान पहुंचने के सवाल पर टिम्बकटू कलेक्टिव नेशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल के समक्ष जा चूका है। जिसके तहत पर्यावरण और वन मंत्रालय भारत सरकार, प्रमुख सचिव वन, आंध्र प्रदेश सरकार, आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, एनरकॉन (इंडिया) लिमिटेड और नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय भारत सरकार के खिलाफ कल्पावल्ली ट्री ग्रोवर्स म्यूचुवली एडेड कोऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड,टिम्बकटू कलेक्टिव और सोसाइटी फॉर प्रोमोशन ऑफ़ वेस्टलैंड डेवलपमेंट ने नेशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल एक्ट, 2010 की धारा 15 के तहत 2013 में मिलकर याचिका दायर की थी।
मामले में वादी का दावा था कि इस क्षेत्र में 50.4 मेगावाट का पवन फार्म स्थापित किया गया था, जिससे वनस्पति आवरण और जलग्रहण क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा, पहाड़ियों का क्षरण हुआ। ग्रामीणों के मुताबिक सड़कों के निर्माण एवं पर्वतों की चोटियों को समतल करने के कारण 30,000 से अधिक पूर्ण विकसित पेड़ और हजारों छोटे पेड़ों का नुकसान हुआ। वृक्षारोपण कार्यक्रम के तहत ताजा लगाए गए वृक्ष और झाड़ियां नष्ट हुईं। 10 किलोमीटर सड़क पर ट्रकों द्वारा लगातार भारी यातायात के कारण धूल प्रदूषण बढ़ा, क्षेत्र में तापमान में वृद्धि, और कृषि की गिरावट आयी।
इससे स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है। 2007 में एनरकॉन ने कल्पावल्ली और आसपास के क्षेत्रों में 48 पवन चक्कियों की स्थापना के लिए आंध्र सरकार के साथ बातचीत शुरू की थी। लेकिन स्थानीय समुदायों से उचित परामर्श नहीं लिया गया, ये भी कहा गया कि कल्पावल्ली क्षेत्र ग्रासलैंड के लिए जाना जाता है, पहाड़ी ढलानों पर उगने वाली घास भेड़ों और बकरियों के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं, बारिश नहीं होने पर भी कल्पावल्ली में प्रचुर घास उगती थी जो यहाँ के लोगों के पशुपालन आजीविका का आधार है। लेकिन खासतौर पर नालकोंडा पवन ऊर्जा परियोजना का कल्पवल्ली जंगल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा, इस इलाके में सड़कों के निर्माण के साथ, पहाडों के काटे जाने के कारण ,भूजल स्रोतों का विनाश हुआ और 48 विशाल विंड मिल संरचनाओं की स्थापना के कारण कल्पावल्ली की घास कम हो गई, पहाड़ पर भी मवेशी घास चरने में असमर्थ हैं क्योंकि पहाड़ों की ढलानें बाधित हो गई. इन सबके कारण कल्पावल्ली के लोगों की आजीविका का एक प्रमुख स्रोत बाधित हुआ। साथ ही पेड़ों के कटने से क्षेत्र के वन्य जीवन विलुप्त हुए टिम्बकटू के मुताबिक 384 वनस्पति प्रजातियों और 123 से अधिक जीवों की प्रजातियों से समृद्ध इस क्षेत्र में 18 महीने की अवधि में जैव विविधता और वन्य जीवन में नाटकीय गिरावट दर्ज़ हुई।
हालाँकि इस क्षेत्र को शुरू से पवन ऊर्जा के सन्दर्भ में लिए उच्च क्षमता वाला माना जाता रहा है लेकिन कल्पावली में 20 -25 साल में तैयार हुए जंगल की, सरकार और कंपनी दोनों ओर से उपेक्षा की गई। और राज्य सरकार के द्वारा इसे “बंजर भूमि” के रूप में संदर्भित किया गया, जो सही नहीं था।यूएनएफसीसीसी में दर्ज़ विवरण के मुताबिक भी नालकोंडा विंड फार्मपर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ), भारत सरकार के अनुसार, पवन ऊर्जा उत्पादन संयंत्र के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) अध्ययन एक आवश्यक आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह 1994 की ईआईए अधिसूचना में वर्णित ग्यारह श्रेणियों 12 के अंतर्गत या2006 और 2009 की संशोधित अधिसूचनाओं में शामिल नहीं है। परियोजना गतिविधि को पर्यावरण पर किसी भी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव का कारण नहीं माना गया है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए ) का कोई अध्ययन आयोजित नहीं किया गया है।
याचिका में “भूमि हथियाने का मुद्दा और इसमें इसके प्रभाव” को भी दर्ज़ किया गया था। जिसे बाद में ग्रीन ट्रायब्यूनल ने भी माना कि भूमि लिए अनुमोदन नहीं लिया गया। 2015 में अपने दिए गए फैसले में ट्रायब्यूनल ने माना कि यह दर्शाने के लिए कोई सामग्री नहीं है कि प्रतिवादी ने संभागीय वनाधिकारी से ऐसा कोई अनुमोदन प्राप्त किया और ना ही ऐसी कोई याचिका दी। इसके अलावा, डॉ. पी. एस. राघवैया, आई.एफ.एस., संभागीय वन अधिकारी, अनंतपुर द्वारा वन संरक्षक, अनंतपुर अंचल, अनंतपुर को प्रस्तुत रिपोर्ट भी यह नहीं दर्शाता है कि ऐसी कोई स्वीकृति प्रदान की गई। इसलिए, उपलब्ध सामग्री के आधार पर एक कहा जा सकता है कि कोई अनुमोदन नहीं प्राप्त किया गया था।
दूसरी ओर ट्रायब्यूनल ने ये भी कहा कि हालांकि आवेदक ये दावा कर सकते हैं कि उन्होंने बंजर भूमि को जंगल में बदला। लेकिन PW2 द्वारा प्रस्तुत PW2/2 रिपोर्ट और गवाहों द्वारा दिए गए मौखिक साक्ष्य के साथ हमें यह मानने के लिए कोई सामग्री नहीं मिली कि वादी में से एक टिम्बकटू कलेक्टिव को इस जमीन का कोई अधिकार दिया गया था। मंडल राजस्व अधिकारी चेन्नेकाओथापल्ली की प्रक्रियाओं के मुताबिक भी टिम्बकटू कलेक्टिव को आंध्र प्रदेश सरकार की जीओएमएस संख्या 218 . में जारी दिशा-निर्देशों के तहत सप्पादी में और उसके आसपास सर्वे नं. 314 के 1000 एकड़ जमीन में वृक्षारोपण और वाटरशेड विकास दोनों की अनुमति थी। यह भी स्पष्ट था कि ना तो वादी और न ही उनके अधीन काम करने वाले किसी लाभार्थी को उस जमीन पर कोई अधिकार दिया गया था, हालांकि जंगल के उत्पाद के इस्तेमाल की उन्हें अनुमति थी। इसलिए, भले ही यह मान लिया जाए कि आवेदक भूमि का कायाकल्प कर रहे हैं; उक्त आदेश के आधार पर उन्हें मुआवजे का दावा करने का अधिकार नहीं है। साथ ही याचिका के तहत प्रकाश में लाये गए आरोप कि विंडमिल्स से पशुओं का नुकसान हुआ है, मसलन, विंडमिल्स के लिए अन्य निर्माण और सड़क निर्माण के दैरान छोड़े गए मलबे के प्लास्टिक और धातु को खाने से कई मवेशियों की मौत हो गई, इसके पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं।
टिम्बकटू कलेक्टिव के द्वारा कल्पावेळी जंगल को हुए नुकसान के मुवावजे के मामले में सम्बंधित प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि जब आवेदकों का भूमि पर कोई अधिकार नहीं है, तो वे मुवावजे के दावेदार नहीं हो सकते। एक समझौते के आधार पर भी जो कि आवेदकों के अनुसार उन्होंने निरस्त कर दिया था किसी मुवावजे का दावा नहीं किया जा सकता। प्रतिवादी के वकील ने यह भी बताया कि वादी द्वारा उत्पन्न की जा की गई रुकावटों और शांति के लिए ताकि परियोजना का सुचारू संचालन हो सके आवेदकों को 20,00,000/- का भुगतान किया गया था और वो भी सोशल रेस्पॉनिसिबिलिटी या सामाजिक जिम्मेदारी के अंश के रूप में इसलिए, आवेदक किसी भी राशि का दावा करने के हकदार नहीं हैं और वह भी तब जब वादी के द्वारा 12 लाख रुपये का चेक यह कहकर भेजा गया कि वो कंपनी द्वारा दिए गए पैसे का पुनर्भुगतान कर रहे हैं लेकिन वो चेक बैंक में पर्याप्त फंड ना होने के कारण बाउंस हो गया। इसलिए वादी को कंपनी किसी भी नुकसान का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं है।
जबकि ट्रायब्यूनल ने माना कि सड़क निर्माण के दौरान पेड़ों की व्यापक क्षति हुई है, ट्रायब्यूनल ने कहा बेशक सबूत यह स्थापित करते हैं कि सड़क का निर्माण करते समय, यहाँ की टोपोग्राफी को आसपास के क्षेत्र, पारिस्थितिकी और पर्यावरण व्यापक नुकसान हुआ। इसलिए सम्बंधित प्रतिवादी को सड़क के दोनों ओर पेड़ खासतौर पर उस इलाके के स्थानीय पेड़ लगाने के निर्देश दिए, साथ ही सड़क निर्माण के दौरान क्षेत्र में उनके द्वारा जनित धूल आसपास के पर्यावरण के और प्रदुषण का कारण नहीं बनना चाहिए। मलबा और प्लास्टिक कचरा नहीं छूटना चाहिए। और पहाड़ की चोटी जहां पवन टरबाइन स्थापित हैं, इस क्षेत्र में ऊपर तक निर्मित सड़क के दोनों ओर पेड़ लगाने होंगे इन वृक्षों के रख-रखाव की जिम्मेदारी लेनी होगी और सम्बंधित प्रतिवादी को पवन टरबाइन के आस पास हरित क्षेत्र बनाये रखना होगा।
जैसे पहले बताया गया है पर्यावरण और वन मंत्रालय को आंध्र प्रदेश राज्य द्वारा अग्रेषित प्रस्ताव के अनुसार 38.90 हेक्टेयर वन भूमि का मेसर्स एनरकॉन इंडिया प्रा. लिमिटेड, के पक्ष में डायवर्जन की मंजूरी को पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा अनुमोदन प्रदान किया गया था। आंध्रप्रदेश राज्य द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव से पता चलता है कि डीएफओ ने गैर वन भूमि में डायवर्ट की जाने वाली 39 हेक्टेयर वन भूमि के लिए प्रतिपूरक वनीकरण योजना तैयार किया था। और जो मुख्य बातें कही गई उसके तहत सबूत और सामग्री से स्पष्ट है कि राज्य द्वारा प्रधान मुख्य संरक्षक को प्रदान किए गए अनुमति में विशिष्ट प्रावधान के बावजूद संबंधित प्रतिवादी को भूमि हस्तान्तरित करने का आदेश उपरोक्त क्षेत्र में सड़कों का संरेखण करने करने वाली मान्यता प्राप्त फर्म द्वारा किया जाना चाहिए थे और इसे संबंधित डीएफओ द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए था। लेकिन इस शर्त का पालन नहीं किया गया।
चूंकि, सबूत यह स्थापित करते हैं कि सड़क का निर्माण करते समय, भूआकृति, आसपास के क्षेत्र, पारिस्थितिकी और पर्यावरण को व्यापक नुकसान हुआ, अतः सम्बंधित प्रतिवादी, पारिस्थितिकी और पर्यावरण की इस क्षति की भरपाई करने के लिए बाध्य है, और उसे इसके लिए आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एक माह के भीतर पचास लाख रुपये (50, 000, 00/-) का मुआवजा देना होगा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य वन विभाग के परामर्श से इस राशि का उपयोग केवल उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी और पर्यावरण को बहाल करने के लिए करेगा और दो महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश करना होगा।
इस पुरे प्रकरण में जो नोट करनेवाली बात है वो ये हैं कि अंनतपुर में विंडमिल्स लगाने के दौरान पर्यावरण के कई नियमों में छूट ली गई या उसे सुविधाजनक ढंग से अनुकूल बनाया गया।
क्या कहते हैं विंडमिल्स के पास के गांव के लोग?
आगे जब हमने अलग अलग गांवों में जाकर लोगों से बात की तो तस्वीर ज्यादा सुस्पष्ट होकर सामने आने लगी, जबकि सरकार का दावा है कि जिले के लोगों को ऐसी कोई शिकायत नहीं। आंध्र प्रदेश के न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ़ आंध्र प्रदेश लिमिटेड ( एनआरईडीसीएपी लिमिटेड, राज्य सरकार कंपनी ) में कार्यरत जिला प्रबंधक श्री एम कोडंदरामा मूर्ति कहते हैं, सरकार के द्वारा लोगों को मुआवज़ा दिया गया है अगर उनकी जमीन का अधिगहण किया है। उन्होंने कहा विंड टरबाइन की आवाज, शोर इन्हें लेकर कुछ शिकायतें आसपास के गांव के लोगों से कुछ शिकायतें जरूर मिली है लेकिन आवाज, शोर से होनेवाला असर बहुत नकारात्मक रहा है।
हर सोमवार को हर मंडल के हेडक्वाटर में सरकार के द्वारा हर तरह की समस्यायों की सुनवाई प्रशासनिक अधिकारीयों के मार्फ़त होती है, लोग विंड टर्बाइन्स के सन्दर्भ में वहां शिकायत कर सकते हैं. इसके अलावा सरकार के द्वारा 1902 हेल्पलाइन शुरू किया गया है, लोग इस लाइन पर संपर्क कर शिकायत कर सकते हैं। अभी तक हमें विंड टर्बाइन्स से सम्बंधित कोई शिकायत नहीं मिली है। श्री एम कोडंदरामा मूर्ति कहते हैं इस सन्दर्भ में किसी भी किस्म की पर्यावरण संबंधी अनदेखी या अनियमितता जैसे मसले की सुनवाई के लिए वैसे भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल या राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण है, अभी भी अपनी ऐसी किसी शिकायत के लिए लोग जा सकते हैं जैसे टिम्बकटू कलेक्टिव ने भी किया था। एम कोडंदरामा जी की बात सही है लेकिन शायद वो भूल रहे हैं गांव के लोग केवल अपनी क्षमता से इस स्तर पर लड़ाई नहीं लड़ सकते।
सबसे पहले हम एलजीबी नगर गए जो रोद्दम मण्डल के तहत आने वाला अनंतपुर जिले का एक छोटा सा गाँव है, यह थुरकलापट्टनम पंचायत के अंतर्गत आता है। 100 घरों वाले इस गांव की आबादी 310 लोगों की है, जिसमें 20 घर के लोगों की जमीन पवन चक्कियों के नज़दीक हैं या उनके ऊपर से बिजली वितरण की लाइन गुजरती है।
एलजीबी नगर में ही रह रहे 10 एकड़ की खेती वाले मारुति रेड्डी बताते हैं उनके गांव में पिछले 10 साल से विंडमिल्स है, नागेंद्र पेशे से ड्राइवर है, रामकृष्ण रेड्डी भी इसी गांव के हैं ड्राइवर हैं और उनके पास 4 एकड़ की खेती है, प्रकाश रेड्डी 10 भी एकड़ की खेती वाले किसान हैं, ये सभी किसान विंडमिल आने के बाद एकसाथ हरियाली की कमी की शिकायत कर रहे हैं थे, पशुओं के चारे की कमी सबकी सबसे बड़ी शिकायत थी, उनका कहना था जब विंड टर्बाइन्स नहीं थे तब पहाड़ों पर पर्याप्त हरियाली हुआ करती थी और उनके पालतू पशु दिन भर वहां पर चारा खाते थे। रामकृष्ण कहते हैं कि जिस भी खेत से पावर लाइन पावर गुजरती है है वहां के खेतों की कीमत कम हो जाती है। मारुति रेड्डी और प्रकाश रेड्डी दोनों कहते हैं गांव की दूसरी साइड में फिलहाल जमीन की कीमत तीस लाख प्रति एकड़ है जबकि जिन खेतों से बिजली की लाइन गुजर रही है उनकी कीमत सिर्फ 8 लाख प्रति एकड़ ही है। यह अपने आप में बहुत बड़ा नुक्सान है। क्षतिपूर्ति के तौर पर जिन खेतों से बिजली की लाइन गुजरी है उन्हें मात्र 1 लाख रूपये प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया गया है।
मारुति रेड्डी बताते हैं विंड टरबाइन की आवाज के कारण पहाड़ों पर घूमने वाले जानवर जंगली जानवर जैसे जंगली सूअर लोमड़ी,हिरण नीलगाय और खरगोश मोर अब वहां नहीं जाते बल्कि खेतों की तरफ चले आते हैं जिसके कारण उनकी फसल को नुकसान होता है, जंगली जानवर गांव में भी आ जाते हैं नारायण और अरुणा स्कूटर से जा रहे थे उन्होंने सुना कि कोई विंडमिल से होने वाली शिकायत सुन रहा है तो अपने स्कूटर रोक करके उन्होंने अपनी बात कही। जो खेत दूर हैं उनकी प्रति एकड़ प्रभावित नहीं हुई है लेकिन जो भी खेत विंडमिल के नजदीक है या जहां से लाइन गुजरती है उनकी प्रति एकड़ उपज भी कम हो गई है।
एलजीबी नगर गांव के लोग
हम मुस्टिकोविला गांव पहुंचे जहाँ श्रीरामलू अपने खलिहान में ईश्वरम्मा, मालम्मा और नरसिंहा के साथ मिलकर खेत से काट कर लायी गई रागी और धान की फसल को पुआल से अलग कर रहे थे। मुस्टिकोविला अपेक्षाकृत बड़ा गांव है जहां लगभग 500 घर हैं और पिछले नौ साल से यहां विंड टर्बाइन्स लगे हुए हैं, बल्कि श्रीरामलू का खलिहान ठीक उस पहाड़ी से लगा हुआ है जिसपर पवन चक्की पृष्ठभूमि में घूम रही थी और जिसकी आवाज़ हम तक भी आ रही थी। श्रीरामलूके बेटे पहले विंडमिल लगाने वाली कंपनी सुजलॉन में सिक्योरिटी गार्ड थे, लेकिन 6 साल नौकरी करने के बाद साल पहले उन्होंने नौकरी छोड़ दी कारण वेतन मात्रा 4500-5000 हज़ार रुपए होना और काम के घंटे 12 तक भी हो जाना। अभी भी गांव के 12 युवक सिक्योरिटी गार्ड की दिन -रात की नौकरी कर रहे हैं। इनका गांव विंड मिल्स से दूर हैं तो आवाज़ से तभी ज्यादा परेशानी होती है जब खेत में काम करने आते हैं, गांव तक आवाज़ नहीं पहुँचती।
श्रीरामलू, मुस्टिकोविला गांव
विंड टर्बाइन लगने के बाद पहाड़ी पर की हरियाली ख़त्म हो गई और लगातार बारिश भी कम होती गई, शिकायत करने पर पंचायत को कंपनी की ओर से पेड़ लगाने के लिए 20 लाख दिए गए, श्रीरामलू कहते हैं पैसा एक स्थानीय नेता गोपाल ने ले लिया और पहाड़ों पर वापस वृक्षारोपण भी नहीं कराया। उन्होंने गोपाल के बारे में ये भी बताया कि वो पहले टिम्बकटू कलेक्टिव से जुड़ा था और बाद में गांव का सरपंच भी बना।
मुस्टिकोविला गांव
कादिरप्पा भी इसी गांव से हैं और बताते हैं विंड टरबाईन लगने के बाद उनके इलाके में लगातार पहले 5 -6 साल तक बारिश हुई ही नहीं जबकि इससे पहले कम मात्रा में ही सही मौसम में बारिश जरूर होती थी, पिछले दो साल से चूँकि पुरे अनंतपुर में सामान्य से ज्यादा बारिश हो रही है तो उनके गांव में भी सूखा नहीं पड़ा। लेकिन ये बारिश भी सामान्य जलवायु चक्र नहीं है, उल्लेखनीय है कि आईएमडी के आकड़ों के मुताबिक पिछले दो दशक में साल 2000 से 2020 तक अनंतपुर ने 18 बार सूखे का सामना किया है, और पिछले तीन साल से यहाँ सामान्य से भी ज्यादा बारिश हो रही है। हालांकि इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध विंड टर्बाइन्स से हो इस प्रकार का ना कोई अध्ययन है और ना ही आंकड़े।
मुतियालप्पा भी पहले विंडवर्ल्ड कंपनी के विंड टर्बाइन के लिए सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे दो साल काम करने के बाद उन्हें वाईएसआर कांग्रेस और जगनमोहन रेड्डी की सरकार बनते नौकरी से निकाल दिया गया क्योंकि मुतियालप्पा टीडीपी के समर्थक रहे और विंड टर्बाइन एजेंसी का मालिक चंद्रगिरि रामू वाईएसआर कांग्रेस समर्थक था।
इसके अलावा वेतन भी बहुत कम ( 5 हज़ार रूपये ) और काम के घंटे बहुत ज्यादा थे। मुतियालप्पा कहते हैं मुस्टिकोविला में 240 के करीब अलग अलग कंपनियों के विंड टर्बाइन्स हैं।
मुतियालप्पा
कंपनी वाले और सरकार की ओर से ग्रीन कवर के लिए मीटिंग हुई थी, टिम्बकटू कलेक्टिव ने भी अपनी आपत्ति दर्ज़ की थी , इनकी आपसी मीटिंग के बाद इनकी आपस में रजामंदी हो गई। श्री रामलु और कादिरप्पा दोनों दावा करते हैं टिम्बकटू कलेक्टिव ने भी ग्रीन कवर लगाने के नाम पर पैसे मिल जाने के बाद अपनी आपत्ति पर चुप्पी साध ली। श्रीरामलु , कादिरप्पा और मुतियालप्पा तीनों ने कहा टिम्बकटू कलेक्टिव के लोग शुरू में खूब आये क्योंकि कल्पावल्ली जंगल भी इस गांव से ज्यादा दूर है, विदेशी मेहमानों के आने पर भी टिम्बकटू कलेक्टिव के लोग उन्हें अपना काम दिखाने को बोलकर गांव दिखाने लेकर आते रहे लेकिन हक़ीक़त में उन्होंने गांव के लिए कुछ भी नहीं किया। इस सन्दर्भ में टिम्बकटू कलेक्टिव का पक्ष जानने के लिए फोन फिर मेल किए जाने पर कोई जवाब नहीं मिला बाद में उनके द्वारा मेल पर जानकारी दी गई कि नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल द्वारा निर्देशित मुआवजे का भुगतान कंपनी द्वारा प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड को किया गया है, टिम्बकटू कलेक्टिव को नहीं।
मुतियालप्पा बताते हैं विंड टर्बाइन्स से ख़त्म हुई हरियाली के नाम पर उनकी खुद जमीन पर टिम्बकटू कलेक्टिव के लोग आए थे ये कहते हुए कि ये कल्पावल्ली फारेस्ट के तहत आनेवाली जमीन है और उन्हें उनकी ही जमीन से भगाने लगे, मुतियालप्पा ने जवाब में तलवार निकाल कर उन्हें दौड़ा दिया, वो कहते हैं मैंने अपनी और मेरे साथ के लोगों की जमीन ऐसे बचाई, उस घटना के बाद हमारी जमीन पर टिम्बकटू कलेक्टिव के लोग कभी नहीं आए।
रामगिरि गांव के नवीन ने अभी अभी डिग्री ख़त्म की है, उनके गांव में 500 के करीब घर हैं और कहते हैं विंड टर्बाइन्स उनके गांव से दूर हैं इसलिए प्रत्यक्ष किसी को कोई फर्क महसूस नहीं होता लेकिन गांव के बुजुर्ग बारिश की अनियमितता और हवा के लगातार शुष्क होने की बात कहते रहते हैं।
रामगिरि गांव
इसी तरह रास्ते में गोंडीपल्ली, नागासमुद्रम गांवों से गुजरते हुए रास्ते में दोनों ओर विंड टर्बाइन्स ही दिख रहे थे और स्थानीय चरवाहे लिंगैया से बात करने पर उसने बताया इन पवन चक्कियों ने पहाड़ को खाली कर दिया, उनकी ही तरह आसपास के और चरवाहों को भी अपनी भेड़ और बकरियों के चारे के लिए गांव से दूर हरियाली वाले पहाड़ों पर जाना पड़ता है।
स्थानीय चरवाहा
यहां उल्लेख करना जरूरी है कि अनंतपुर जिले में रामगिरी और तल्लीमदुगुला दो ऐसे स्थान हैं जहां दो दशक पहले पवन ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित की गई थीं। 100 मेगावाट पवन ऊर्जा की संयुक्त क्षमता के साथ 17 कंपनियों ने यहां संयंत्र स्थापित किए थे।
एलजीबी नगर गांव के रस्ते में रूद्रप्पा मिले जो 4 साल से यहां पर रह रहे हैं लेकिन उनके आने से काफी पहले से यहां पर पवन चक्की है, चूँकि उनका फार्म विंडमिल से थोड़ी दूरी पर है इसलिए उन्हें ज्यादा कुछ महसूस नहीं होता लेकिन अनियमित बारिश और हवा में नमी की कमी वो नोटिस करते हैं।
एलजीबी नगर गांव के ही लक्ष्मी नारायण रेड्डी अपनी पत्नी अनीता के साथ रोज पेनुकोंडा की ओर आते रहते हैं खासतौर पर अपने पालतू पशुओं के चारे के लिए, वो बताते हैं वैसे कोई बहुत बड़ा दुष्प्रभाव तो नहीं नोटिस हुआ है लेकिन विंडमिल्स के कारण बारिश की अनियमितता बढ़ी है और हवा पहले से ज्यादा शुष्क और गर्म हुई है।
एलजीबी नगर गांव के लक्ष्मी नारायण रेड्डी अपनी पत्नी अनीता के साथ
हमारी बात चीत उर्वकोंडा के रवि कुमार और एदुगुर्र्रालापल्ली के कोंडापुरम विजय कुमार से और उनके दोस्तों से भी हुई। विजय कुमार के गांव और आसपास 20 के लगभग टर्बाइन्स हैं। विजय कुमार कहते हैं उनके गांव और आसपास 20 विंड टर्बाइन्स है और सभी टर्बाइन्स किसानों की उस जमीन पर है जो कभी मूंगफली की उपजाऊ जमीन हुआ करते थे, उनके रिश्तेदार की तीन एकड़ से ज्यादा जमीन विंड टर्बाइन्स के लिए ली गई। विजय कुमार आवाज से प्रदूषण की बात करते हैं लेकिन वो कहते हैं ये उनके जैसे आवाज के प्रति कुछ बेहद संवेदनशील लोगों को ही ज्यादा परेशान करता है जैसे सिर में गनगनाहट सा महसूस होना और अनिद्रा की शिकायत।
इसके अलावा विजय विंड टर्बाइन्स नाम पर किसानों को मिले अपर्याप्त मुआवजे की भी बात करते हैं उनके गांव में प्रति एकड़ 4 लाख मुआवजा दिया गया जबकि उनका ये भी कहना है गांव के लोग कहते हैं कंपनी की ओर से ज्यादा राशि दी गई थी लेकिन स्थानीय नेता ने उसे किसानों तक नहीं पहुंचने दिया।
विजय भी अनियमित बारिश और हवा के शुष्क होने की शिकायत करते हैं उनका कहना है लगातार विंड टर्बाइन चलने से पुरे इलाके की हवा में मौजूद आर्द्रता प्रभावित हुई है। सरकार की हेल्पलाइन की बात बताने पर जहां कोई भी अपनी किसी भी शिकायत को दर्ज़ करा सकता है, विजय कहते हैं इस बारे में ज्यादातर लोगों को जानकारी नहीं है। लेकिन विजय की असली चिंता अपने गांव के पहले से ही बहुत शुष्क और बंजर होने की है जो विंड टर्बाइन लगने के बाद और ज्यादा शुष्क और बंजर जमीन में तब्दील होती जा रही है क्योंकि सरकार और कंपनियों की ओर से भी उनके गांव में वैकल्पिक हरियाली विकसित करने की कोई कोशिश अब तक नहीं हुई।
जंगलों में सड़कें बनाने से रैखिक विखंडन होता है, सड़कों का मतलब सिर्फ ट्रैफिक नहीं है, जिससे जानवर प्रभावित होते हैं और दुर्घटनाग्रस्त होकर मरते भी हैं, पहाड़ पर रोड को समतल बनाने के लिए पहाड़ी के किनारों को काटा जाता है यह कटिंग अक्सर कई मीटर ऊंची होती हैं जिसे जानवर चढ़कर पार नहीं कर पाते और फिर पहाड़ पर नहीं चढ़ पाते इससे उनका आवास और भोजन की तलाश दोनों बाधित होता है। उर्वकोंडा के रवि कुमार भी विंड टर्बाइन्स के कारण खासतौर पर बारिश की अनियमितता और हवा की शुष्कता की बात करते हैं और कहते हैं इसे समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं होना चाहिए कि जिन पहाड़ों पर या जमीन पर विंड टर्बाइन्स हैं वहां की हरियाली स्वतः प्रभावित होती है पंखे के चलते रहने के कारण और इसलिए वहां के जानवर और पक्षी भी प्रभावित होते हैं विंड टर्बाइन्स के आसपास ना जानवर जाते हैं और ना ही पक्षी और इन सबका आपस में एक चेन जैसा संबंध भी है एक के ख़त्म होने से दूसरे पर असर होता है जैसे हरियाली, पेड़ के ख़त्म होने से स्वतः चिड़ियों का आवास ख़त्म हो जाता है यहाँ तक कि कई तितलियों और कीट पतंगों का भी। जंगली जानवरों का भोजन और आवास भी प्रभावित होता है जैसे उनके गांव में विंड टर्बाइन्स लगने के बाद जंगली सूअर और लोमड़ी पहाड़ों से किसानों के खेतों की ओर आने लगे हैं और फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। रवि ये भी कहते हैं जिस भी जमीन या उसके आसपास विंड टर्बाइन्स हैं उसके साथ लगे जमीन की कीमत अपने आप आधी से भी कम हो जाती है आखिर क्यों ? लोग कोई शिकायत नहीं भी करें लेकिन वो जमीन पर इसने दुष्प्रभाव को जानते हैं इसलिए।
लेकिन सच क्या हैं?
पवन चक्कियों के पर्यावरण पर दुष्प्रभाव के क्रम में खासतौर पर अनंतपुर या पुरे आंध्र प्रदेश में उस तरह से उल्लेखनीय काम नहीं हुआ है जिस तरह से गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में हुआ है, “लेट इंडिया ब्रीद” से जुड़े यश लेखी भी इस बात को मानते हैं इसलिए “लेट इंडिया ब्रीद” सक्रियता गुजरात, महाराष्ट्र राजस्थान में ज्यादा है। इसलिए अनंतपुर की पवन चक्कियों और उनसे वनस्पतियों और जीवों पर होनेवाले दुष्प्रभाव के सन्दर्भ में इस रिपोर्ट में देश के अन्य राज्यों में हुए शोध, अध्ययन और निष्कर्ष को पेश किया गया है।
पवन ऊर्जा को ग्रीन ऊर्जा कहा जाता है,लेकिन अरसे से इसके द्वारा वन्यजीवों पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव की भी बात होती रही है, स्थलीय स्तनधारियों और सरीसृपों पर इसके नकारात्मक प्रभाव की बात की जाती रही है लेकिन पक्षियों और चमगादड़ों पर इसका ज्यादा असर पाया गया है। टरबाइन के घूमते ब्लेड पक्षियों के टकराने और मौत का कारण बनते हैं. इसके अलावा, विंडमिल्स क्षेत्र से पक्षियों का विस्थापन और शोर के कारण पक्षियों के व्यवहार और अधिवास में परिवर्तन भी नकारात्मक प्रभाव है।
सबसे पहले इस बारे में जानकारी 1990 में अमेरिका के अटामाउंट पास में बड़े पैमाने पर शिकारी पक्षी मृत्यु दर के दस्तावेजीकरण से प्रकाश में आयी थी, इसके बाद यूरोप और उत्तरी अमेरिका में विंडमिल्स के कारण पक्षी मृत्यु दर का बड़े पैमाने पर अध्ययन किया गया, लेकिन भारत में इस बारे में बहुत ज्यादा शोध नहीं किया गया है। चमगादड़ और पक्षियों पर महाराष्ट्र और गुजरात में किये गए दो अध्ययन के निष्कर्ष के बाद इसकी जरूरत समझी गई है कि पूरे देश में फैले 554 महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्रों (आईबीए) में पक्षियों की समृद्ध विविधता को ध्यान में रखते हुए, पवन टरबाइनों की तेजी से बढ़ती संख्या और पक्षिजगत पर इससे पड़ने वाले संभावित प्रभावों की की जांच की जानी चाहिए।
हाल की रिपोर्टों में दुनिया के कुछ देशों में चमगादड़ और अन्य पक्षियों पर पवन टरबाइन के पर्यावरणीय प्रभाव पर लगातार चिंता व्यक्त की गई है, भारतीय संदर्भ में पक्षियों और चमगादड़ों पर पवन चक्कियों के प्रभाव का कम अध्ययन किया गया है और इस विषय पर बहुत कम शोध सामग्री उपलब्ध है। सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री से सम्बद्ध शोधकर्ता अब्दुल हमीद मोहम्मद समसूर अली द्वारा सितंबर 2011 में कच्छ, गुजरात में विंडमिल्स के पर्यावरण प्रभाव,पक्षियों और चमगादड़ो की मृत्यु दर पर शोध अवधि के दौरान उन्हें यहाँ ग्रेटर माउस-टेल्ड बैट राइनोपोमा माइक्रोफिलम के दो शव मिले जिनकी मौत पवन टर्बाइनों से टकराने के कारण हुई थी।
फिर सेल्वराज रमेश कुमार, वी. अनूप, पी. आर. अरुण, राजा जयपाल और ए मोहम्मद समसूर अली द्वारा बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री, कोयंबटूर के सौजन्य से कच्छ, गुजरात के समखियाली क्षेत्र और दावणगेरे, कर्नाटक के हारपनहल्ली क्षेत्रमें दो पवन फार्मों पर किए गए अध्ययन में कच्छ में तीन वर्षों की अवधि में इस क्षेत्र में पायी जाने वाली पक्षियों की कुल 174 प्रजातियों में कम से कम 11 प्रजातियों से कुल 47 पक्षी शव मिले जबकि दावणगेरे कर्नाटक में एक वर्ष की अवधि में पक्षियों की कम से कम तीन प्रजातियों के सात शव पाए गए। कच्छ के लिए अनुमानित वार्षिक पक्षी मृत्यु दर 0.478 पक्षी/टरबाइन दर्ज हुआ और दावणगेरे के लिए यह दर 0.466 पक्षी/टरबाइन रहा। ये आकड़ें छोटे स्तर पर ही सही लेकिन सच बताते हैं।
पवन चक्कियों से वनस्पतियों, जीव -जंतुओं और समस्त पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का सही आकलन इसपर दीर्घकालीन शोध से ही सामने आ सकता है जबकि भारत में अभी इस ओर बहुत व्यवस्थित शोध नहीं किया जा रहा है खासतौर पर सरकारों के द्वारा। नाम उद्धृत नहीं किये जाने की बात पर एक विशेषज्ञ कहते हैं, विंडमिल्स के सन्दर्भ में विशेषज्ञों द्वारा दिशानिर्देश विकसित किये गए लेकिन सरकार द्वारा उसे किनारे कर दिया गया। भारत में इस ओर ज्यादा शोध वित्तीय एजेंसियों जैसे वर्ल्ड बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक या ऐसे ही संस्थानों के सौजन्य से हुए हैं क्योंकि ये संस्थाएं किसी परियोजना में निवेश करने से पहले अपने नियमों और शर्तों के अनुसार उससे सम्बंधित हर तरह की जानकारी जुटाती है और इसी आधार पर निवेश करने या नहीं करने का का फैसला लेती हैं। भारत में पवन-ऊर्जा के सन्दर्भ में पर्यावरण मंजूरी तक की जरूरत नहीं है वेस्ट लैंड दिखाकर परियोजनाओं को मंजूरी दे दी जाती है जबकि पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य नियम होना चाहिए ।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
डॉक्टर जस्टस जोशुआ ने किसी वित्तीय एजेंसी के लिए 2013 -14 में एक 1 साल के अध्ययन कार्यक्रम के तहत विंडमिल का पक्षियों खासतौर पर चमगादरों पर क्या असर पड़ता है इस पर महाराष्ट्र के सतारा इलाके में काम किया है। उन्होंने कच्छ के नकतवारा इलाके में भी इसी तरह का काम किया है, अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि विंड टरबाइन खासतौर पर पक्षियों टकराने और उनकी मौत की वजह बनते है। स्थानीय या प्रवासी दोनों पक्षियों के साथ वन्य जीवों के हैबिटैट और मार्ग में विंड टरबाइन की मौजूदगी उनके अधिवास और प्रवास दोनों प्रभावित करते हैं, वो उस इलाके आना बंद कर देते हैं।
वो मानते हैं कि उत्सर्जन के हिसाब से पवन ऊर्जा कम प्रदूषणकारी माना जाता है लेकिन इन्हें स्थापित करने के दौरान जो निर्माण होता है उससे पर्यावरण जरूर प्रभावित होता है। और जलवायु पर इसके असर के बारे में अभी अमेरिका में भी शोध जारी है।
हालाँकि इससे कितने पक्षी मरते हैं इसके बारे में ठीक संख्या बताना इसलिए मुश्किल मानते हैं कि भारत में इस सन्दर्भ में सिलसिलेवार शोध नहीं होता है लेकिन अपने शोध के दौरान सात माह के अवलोकन में डॉक्टर जोशुआ ने सतारा में विंड टरबाईन से टकराकर कुल 52 पक्षियों की मौत दर्ज की, जिसमें चमगादड़ों की 5 प्रजाति और 12 अन्य प्रजातियों के पक्षी शामिल थे। कच्छ में उन्होंने विंड मिल्स के स्थापित हो जाने के बाद उस इलाके में पहले से पाए जानेवाले पक्षियों की संख्या में भी कमी दर्ज़ जिसे वो हैबिटैट लॉस मानते हैं, क्योंकि उन्होंने विंड मिल्स की स्थापना से पहले भी काम किया था। डॉक्टर जस्टस जोशुआ ये भी कहते हैं जिस इलाके में पानीस्रोत केवल 1 हेक्टेयर या इससे कुछ कम क्षेत्रफल का हो वहां भी विंडमिल्स की स्थापना पर शोध किए जाने की जरूरत है।
डॉक्टर जोशुआ “वेस्ट लैंड ” संकल्पना को पर्यावरण, वन्य जीवन और पक्षियों के लिए बहुत खतरनाक मानते हैं वो कहते हैं “वेस्ट लैंड ” जैसा कुछ होता नहीं ग्रासलैंड जैव विविधता और कार्बन सिंकिंग के भू-क्षेत्र होते हैं, वेस्ट लैंड बताकर बगैर किसी शोध या अध्ययन के तमाम ग्रासलैंड में विंडमिल्स को मंजूरी देने के दीर्घकालीन परिणाम गंभीर हो सकते हैं, सरकारों को इसपर ध्यान देने जरूरत है।
वेस्ट लैंड, अनंतपुर
ए एम समसूर अली, एस. रमेश कुमार, पी.आर. अरुण, एम. मुरुगेसन द्वारा गुजरात के कच्छ जिले के जंगी क्षेत्र में ‘पक्षियों और चमगादड़ों के विशेष संदर्भ में जंगी पवन ऊर्जा फार्म (91.8 मेगावाट) का प्रभाव’ इस शीर्षक तहत एविफौना के प्रारंभिक सर्वेक्षण के सन्दर्भ में किए गए शोध में यहाँ 45 पक्षी परिवारों से संबंधित पक्षियों की कुल 139 प्रजातियां रिकॉर्ड किया, जिसमें 67 प्रजातियां स्थानीय थीं बाकी अलग -अलग किस्म प्रवासी प्रवासी। सबसे ज्यादा संख्या में पसेरिफोर्म्स इसके बाद चराड्रिफोर्मेस, सिकोनीफोर्मेस, कोरासीफोर्मेस औरअंसेरिफोर्म्स। ल्यूकोसेफला), ओरिएंटल व्हाइट इबिस (थ्रेस्कीओर्निस मेलानोसेफालस), लेसर फ्लेमिंगो (फीनिकोप्टेरस) माइनर), ब्लैक-टेल्ड गॉडविट (लिमोसा लिमोसा), यूरेशियन कर्लेव (न्यूमेनियस अर्क्वेटा), ब्लैक-बेल्ड टर्नो स्टर्ना एक्यूटिकौडा) और यूरोपीय रोलर (कोरसिअस गर्रोलीयस ) ये सभी आईयूसीएन 2011 की सूचि के तहत संकटग्रस्त अस्तित्व वाली प्रजातियों थीं । कच्छ के दक्षिण-पूर्व में लगभग 20 किमी दूर, भचाऊ तालुक के चार गांव वंधिया, मोदपार, लखपार और जंगी समखियाली में किये गए शोध में पाया कि इस क्षेत्र के पक्षियों पर कोई पिछला अध्ययन उपलब्ध नहीं है।
क्षेत्र में उन्होंने 190 प्रजाति और 69 परिवारों समेत कुल 273 पौधों की प्रजातियां दर्ज की इनमें से 126 प्रजातियां जड़ी-बूटियों की थीं, 69 प्रजातियाँ पेड़, 34 प्रजातियाँ झाड़ियाँ, 22 प्रजातियाँ लताओं की और 22 प्रजातियाँ घास की थीं।
इन्होने पाया कि विंडमिल्स का असर पक्षियों पर होता है, पवन टर्बाइनों के साथ टकराव के परिणामस्वरूप इन्होने छह पक्षियों की मृत्यु दर्ज की ब्लू रॉक कबूतर (कोलंबा लिविया), हाउस क्रो (कॉर्वस स्प्लेंडेंस) चित्तीदार कबूतर (स्ट्रेप्टोपेलिया) चिनेंसिस), कैटल एग्रेट (बुबुलकस आइबिस), यूरेशियन कॉलर डव (स्ट्रेप्टोपेलिया डिकाओक्टो) और एक अज्ञात एग्रेट। इस इलाके की जैव विविधता खासतौर पर संरक्षणात्मक महत्व की कई प्रजातियां और विभिन्न प्रकार के एविफौना के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के कारण इन्होंने निष्कर्ष दिया कि यहाँ इनके संरक्षण पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए। और पक्षियों की आबादी और घनत्व पर पवन टर्बाइनों के प्रभावों को बेहतर समझने के लिए आगे जांच और शोध जरूर किया जाना चाहिए।
गुजरात के ही संगनारा गांव के सरपंच शंकर कहते हैं पवनचक्की से हमारा विरोध नहीं है लेकिन हम अपना जंगल बचाना चाहते हैं, हमारे अर्द्ध शुष्क इलाके में कंटीले झाड़ीनुमा पेड़ ज्यादा पाए जाते हैं जैसे बबूल, कीकड़, ऐसे जंगल तैयार होने में तीस -चालीस साल का समय लग जाता है, उनके काटे जाने दोबारा लगाने पर भी तीस -चालीस साल की भरपाई कैसे हो सकती है? उन्होंने बताया सांगनारा में प्रस्तावित 40 विंडमिल में से 2015 में केवल 7 विंड मिल्स लगाए जा सके। सुजलॉन कंपनी के 7 विंडमिल्स बाद हमने अपने गांव में प्रस्तावित और विंडमिल लगने ही नहीं दिया, क्योंकि एक विंडमिल के लिए 1000 -1500 तक पेड़ काटे जाते हैं और कंपनियां इस आदेश के साथ आती हैं कि वहां कोई पेड़ नहीं है। 2019 में हमने इस आदेश को चुनौती दी 2020 में हम नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल गए तबसे आगे काम बंद है। अडानी पावर और एक और कंपनी अभी भी इस गांव लगने वाले अपने प्रोजेक्ट पर कायम हैं, इनके हटने से हमारी जीत।
शंकर ये भी बताते हैं कि मोर उनके गांव और लोगों में बहुत पवित्र पक्षी माने जाते हैं लेकिन विंडमिल्स ट्रांसमिशन लाईन के कारण 8-10 मोरों की मौत चुकी है, जिसमें से पांच की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी इनके पास है, जबकि हर मौत हम देख भी नहीं पाते हैं क्योंकि झटका लगने से मरने वाले मोर को आधे घंटे में भी दूसरे जानवर खा जाते हैं। शंकर गांव के लोगों द्वारा पंखों के शोर से भी असहज बात कहते हैं।1200 एकड़ में फैले सांगनारा गांव जहाँ की आबादी 14 सौ है, यहाँ के लोगों का मुख्य पेशा पशुपालन, थोड़ी बहुत खेती और मजदूरी है। 7 विंडमिल्स के कारण ही गांव के लोगों ने जंगल, घास और भूजल पर इसका असर देखा, उनके गांव के पास एक ही मीठे पानी का स्रोत है किसी भी कीमत पर अपने आसपास की प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं चाहते। बल्कि वो गर्व बताते हैं उनसे पहले सरपंच ने भी इस मामले में कोई समझौता नहीं किया। उनके गांव के लोग भी कंपनियों द्वारा नुकसान भरपाई के लिए पैसा दिए जाने की बात पर कहते हैं तुम अपना पैसा अपने पास रखो हमें हमारी प्रकृति चाहिए।
डॉ सुजीत नरवरे प्रोजेक्ट साइंटिस्ट बीएनएचएस का काम ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और लेसर फ्लोरिकन या खरमोर पर है विलुप्त होती श्रेणी की ये दोनों प्रजातियां देश में जहाँ भी पायी जाती हैं सुजीत नरवाडे ने वहां काम किया है, खासतौर पर दक्कन पठार के तहत पश्चिमी महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और कर्नाटक के कुछ हिस्सों और थार रेगिस्तान में। इस विषय पर उनके शोधपत्र और उनकी किताबें भी हैं जिसमें उन्होंने तमाम अन्य पक्षों के साथ उनके विलुप्त होने के कारणों पर भी लिखा है। सुजीत नरवाडे विंडमिल्स के पंखे से ज्यादा पावर लाईन नेटवर्क को ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और लेसर फ्लोरिकन जैसे बड़े क्षेत्र में रहने वाली, लो फ्लाइंग पक्षियों के लिए जानलेवा मानते हैं, उनका विजन इस प्रकार से होता है कि वो अपने आगे आने वाले पावर लाइन को नहीं देख पाते और टकरा जाते हैं। दूसरा कारण हैबिटैट लॉस को, दक्कन से ग्रेट इंडियन बस्टर्ड लगभग विलुप्त हो चुके हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह ग्रासलैंड को ग्रीन एनर्जी के नाम पर डिस्टर्ब कर दिया जाना और उनका सिकुड़ते जाना मानते हैं। भारत में जंगलों को श्रेणीबद्ध किया गया है लेकिन ग्रासलैंड को वेस्टलैंड माना जाता है जबकि दक्कन का पूरा इलाका ग्रासलैंड ही हुआ करता था, ये हजारों साल पुराने सिस्टम हैं। लेकिन विंड टरबाईन के कारण वनस्पति हटाए जाने, निर्माण कार्य और बड़े हेवी उपकरणों और वाहनों के गुजरने से ग्रासलैंड की टॉप सॉइल ख़त्म हो जाती है जिससे घास बदल जाती है और पूरी वनस्पति बदल जाती है और अंत में जिससे वन्य जीवों और पक्षियों का अधिवास ख़त्म होता है। आत्मकुर के वन्यजीव डीएफओ एलन चोंग के मुताबिक द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के आंध्र प्रदेश से गायब हो जाने की संभावना है,आंध्र प्रदेश में एक ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को अंतिम बार कुरनूल जिले में लगभग 10 वर्ग किमी के एक छोटे से पैच रोलापाडु वन्यजीव अभयारण्य के बाहर देखा गया था। पिछले तीन वर्षों में, रोलापाडु और उसके आसपास इंडियन बस्टर्ड को एक दो बार देखा गया है। और इस साल यानी 2022 में इस पक्षी को एक बार भी नहीं देखा गया है। 2021 की IUCN की रिपोर्ट के अनुसार इंडियन बस्टर्ड की आबादी पिछले कई वर्षों से घट रही है। वर्तमान में, इस प्रजाति की आबादी 50 से 249 के बीच है। जबकि कर्नाटक के सिरुगुप्पा के रेंज वन अधिकारी एन. मंजूनाथ के अनुसार, इस साल 15 मार्च को आखिरी बार ग्रेट इंडियन बस्टर्ड देखा गया था।
केंद्र सरकार द्वारा 14 वें (सीओपी) सम्मेलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन को प्रस्तुत किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि भारत ने एक दशक में 31 प्रतिशत, या 5.65 मिलियन हेक्टेयर घास के मैदान खो दिया, जिसका असर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे पक्षियों के दक्कन से गायब होने और गुजरात, राजस्थान में भी कम होते जाने के रूप में हुआ है। आंध्र प्रदेश में ही 90 में 30-40 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड हुआ करते थे अब शायद इक्का -दुक्का रह गए हैं और जिसकी वजह हैबिटैट लॉस है। वाइल्ड लाइफ हिस्ट्री ऑफ इंडिया के थार मरुभूमि पर आधारित आंकड़ों के मुताबिक पावर लाईन से हर साल देश में लगभग 1 लाख 18 हजार तक पक्षी मरते हैं।
भारत में विंडमिल्स पावर लाइनों के साथ ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के टकराव के साक्ष्य हैं भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए सर्वेक्षण में थार में,एक वर्ष में 7 बार दोहराई गई 80 किमी पावर लाईन्स के दायरे में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड समेत पक्षियों की लगभग 30 प्रजातियों के 289 शव मिले अध्ययन में 8 शव/ 10 किमी उच्च तनाव और 6 शव / 10 किमी निम्न तनाव पावर लाइन्स के पास मिली। और सर्वेक्षण से पहले विघटित हो जाने वाले शवों का मृत्यु दर अनुपात
अनुमानतः 5 पक्षी/ किलोमीटर /माह और 1 लाख पक्षी प्रति वर्ष 4200 वर्ग किमी क्षेत्र के भीतर है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संदर्भ में, 4 मृत्यु दर दर्ज की गई (2 सर्वेक्षण के दौरान और 2 सर्वेक्षण से इतर) सब उच्च तनाव संचरण लाइनों के कारण – कुछ उनमें से पवन टर्बाइनों से जुड़े हैं। 150 किमी हाई टेंशन लाइन द्वारा प्रतिच्छेदित बस्टर्ड अधिआवास में लगभग 18 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड
के प्रति वर्ष मरने की संभावना होती है थार में लगभग 128 ± 19 व्यष्टि। यह उच्च मृत्यु दर (कम से कम 15% सालाना अकेले बिजली लाइनों के कारण) इस प्रजाति के अस्तित्त्व के लिए खतरनाक है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने पांच ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को पायलट आधार पर टैग किया था, जिनमें दो की मौत बिजली लाइन से टकरा कर हो गई, एक ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की मौत नलिया और अब्दासा तहसील के बीच पश्चिमी तटीय घास के मैदान में सुजलॉन के टरबाइन से जुड़े 33kv पावर-लाइन से टकराने से हुई थी। बस्टर्ड अपने अधिवास में लंबे समय तक जीवित रहने वाले पक्षी हैं लेकिन बिजली लाइनों के कारण अत्यधिक मृत्यु दर उनकी आबादी को अस्थिर और यहां तक कि विलुप्त कर सकती है।
यूके के एक्सेटर विश्वविद्यालय के पीएच.डी.शोधकर्ता सिद्धार्थ दाभी जो कच्छ में विंडमिल्स का पर्यावरण और आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं, जो अगले सात -आठ महीने में पूरा होगा। सिद्धार्थ कहते हैं, कच्छ एक शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र है, कच्छ गुजरात के कुल शुष्क क्षेत्रफल का 73% है। कच्छ जिले में मिट्टी की गुणवत्ता बहुत खराब है और 51% क्षेत्र खारे रेगिस्तान से आच्छादित है लेकिन शुष्क क्षेत्र होने के बावजूद; कच्छ जैव विविधता की एक विस्तृत श्रृंखला के साथ संपन्न है जैसे रेगिस्तान, आर्द्रभूमि, ऊपरी भूमि, मिट्टी के फ्लैट, झाड़ियां, घास के मैदान, दलदली वनस्पति, खारे किनारे, खारे घास के मैदान, आदि जो वनस्पतियों और जीवों की एक विस्तृत विविधता का घर हैं। अपनी शुष्कता के कारण, कच्छ में बबूल सेनेगल, बबूल नीलोटिका, बबूल ल्यूकोफोलिया, ज़िज़ीफस एसपी, सल्वाडोरा एसपी, यूफोरबिया एसपी, बालनाइट्स एसपी, आदि जैसे झाड़ीदार वनस्पतियों के साथ घास के मैदानों से आच्छादित एक विशाल क्षेत्र है। झाड़ीदार वनस्पति वाले ये घास के मैदान कच्छ के लोगों के लिए आजीविका के मुख्य स्रोत के रूप में पशुचारण और पशुधन के तौर पर बहुत महत्वपूर्ण रहे हैं। इसके अलावा इन घास के मैदानों में स्तनधारियों और एविफ़ुना की एक विस्तृत श्रृंखला भी है; जिनमें से कई अब खतरे में हैं।
बन्नी सिद्धार्थ कहते हैं एक विंडमिल लगाने में एक से डेढ़ हेक्टेयर जमीन लगता है और कहीं भी एक विंड मिल नहीं लगाया जाता एक साथ कम कम 30 से 50 विंडमिल लगते हैं तो इससे जमीन खपत का अंदाजा लगाया जा सकता है साथ ही इस जमीन पर उगी वनस्पति और जीवों पर इसके असर का भी। हैं पूरा तटीय कच्छ मिल्स विंडमिल्स से भरा हुआ है अब्रासा से लेकर सूजरबारी रिवर क्रीक तक और कच्छ का सेंट्रल रिज भी पाकिस्तान के नज़दीक तक, 30 से ज्यादा कम्पनियाँ विंडमिल्स लगा रही हैं आप समझ सकते हैं इसमें कितनी जमीन का इस्तेमाल होगा और किस स्तर तक ट्रांसमीशन लाइन बिछेगा। जबकि कच्छ में पशुओं की संख्या मनुष्य से तीन गुना ज्यादा है भेड़ -बकरियां गाय और भैस, और वन्य जीवों की संख्या इससे अलग है। पालतू पशु कच्छ के लोगों की आजीविका का आधार हैं, सवाल है इन पशुओं के चरागाह तो विंडमिल्स के कारण बरबाद हो जाएगा ही लोगों आजीविका भी। सरकार इसे वेस्ट लैंड कह रही जबकि कच्छ दुनिया में अपनी तरह का अकेला इकोसिस्टम है, जहाँ के कटीले जंगलों कई दशक में तैयार हुए हैं और रण में उगी एक घास का भी बहुत ज्यादा पर्यावरणीय महत्त्व है और भारत सरकार के मुताबिक कच्छ के कंटीले वृक्षों वाले वन देश के आखिरी ऐसे बचे हुए वन हैं।
बन्नी सिद्धार्थ
इसके अलावा बन्नी सिद्धार्थ एक महत्वपूर्ण बात ये भी बताते हैं कि कच्छ और राजस्थान भारत में प्रवासी पक्षियों का प्रवेश बिंदु हैं लेकिन एंट्री पर ही विंडमिल्स इनका प्रवेश रोक सकती है। वो ये भी कहते हैं अपने शोध के पूरा होने पर वह निश्चित आंकड़ें बता पाएंगे लेकिन ये प्रभाव तुरन्त नज़र आनेवाले में से बेशक नहीं हैं, लम्बी अवधि में इसके दुष्प्रभाव स्पष्ट होंगे, इसलिए ऐसे शोध और अध्ययन की बहुत जरूरत है जो कि हो नही रहा।
हमने एस रितेश पोकर से भी बात की, रितेश पिछले आठ साल से सहजीवन संगठन से जुड़े हैं और इसके मार्फ़त मालदारियों, चरवाहों उनकी आजीविका, उनके कामकाज और ग्रासलैंड पर काम करते हैं। सहजीवन ने सेंटर फॉर पस्चरलिज्म शुरू किया है। सहजीवन प्रत्यक्ष रूप से विंडमिल्स पर काम नहीं करता लेकिन ग्रासलैंड पर काम करने के कारण इन्हें जहां विंडमिल्स लगे वहां के लोगों की शिकायतें मालूम चलती है। खेती के इलाकों और गांव के पास विंडमिल्स स्थापना के कारण लोगों को तरह की परेशानी है। कच्छ के बन्नी ग्रासलैंड में सहजीवन ने बननी ब्रीडर असोसिएशन के साथ मिलकर एक रिसर्च सेंटर स्थापित किया है, रितेश पोकर इस स्टेशन को निर्देशित करते हैं। रितेश सांगनारा गांव के बारे बताते हैं कि शुरू में यहाँ 2 विंडमिल सरपंच मंजूरी लगवाई थी, उससे कोई समस्या नहीं हुई लोगों को लेकिन अब वहां 100 टर्बाइन लगने वाले हैं। गांववालों ने इसका विरोध किया खिलाफ एनजीटी में गए क्योंकि इनके कारण उनके गांव के साथ जंगल ख़त्म जाएगा, एक टरबाइन लगने का मतलब 2 किलोमीटर जमीन का जंगल साफ़ हो जाना जबकि कटीले वृक्षों और झाड़ियों का यह जंगल दशकों में तैयार हुआ है। इससे प्राकृतिक वाटर चैनल भी डिस्टर्ब होगा। लोग हमारे पास और भी शिकायत लेकर आ रहे हैं जैसे जिन जीव वनस्पतियों विलुप्त खतरा है उनकी चिंता इसमें कुछ औषधीय पेड़ हैं जैसे गूगल जिससे दवाइयां और परफ्यूम तैयार होता है, यह चिंकारा समेत कई विलुप्तप्राय वन्यजीवों का भी अधिवास है। मामले की गंभीरता से इससे भी समझी जा सकती है कि गांववाले अलग-अलग संगठनों के साथ मिलकर इसे बचाने की रहे हैं। एक सबसे बड़ा खतरा मोरों के बिजली के तारों से टकरा कर मरना है जिनके मरने की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इसकी तस्दीक तुषार पाटिल जो डीसीएफ पच्छिमी कच्छ हैं की बात से होती है वो कहते हैं, पिछले तीन साल में पवन चक्की से सम्बद्ध बिजली ट्रांसमीशन लाइन, टकराने और बिजली झटका लगने से 60 मोरों हुई है जिसके कारण यहाँ के आहार शृंखला और खेती प्रभावित हुई है। मोर खेत के कीड़ों मकोड़ों समेत चूहों को भी खाते हैं इनकी घटती संख्या कारन खेती में कीड़ें और चूहों होनेवाला नुकसान बढ़ गया है। इसके आलावा टर्बाइनों आवाज और पंखों के आरपीएम के कारण मधुमक्खी यहाँ आती नहीं है या टकरा कर मर जाती हैं। इससे प्राकृतिक परागण प्रभावित हो रहा है किसानों को बाहर से मधुमखियों लाकर खेतों और पेड़ों पर छोड़ना पड़ताहै है।
एस रितेश पोकर
डॉ पंकज जोशी भी सहजीवन के साथ जुड़े हैं जो प्लांट साइंस में पीएचडी और इकोलॉजिस्ट हैं और कच्छ, भुज में लम्बे समय से काम कर रहे हैं। पंकज जोशी प्रत्यक्ष विन्डविल्स से जुड़े नहीं है लेकिन वनस्पति और जैव विविधता के जिस लोकेशन में वो काम करते हैं वो अन्ततः विंडमिल्स से जुड़ जाता है। डॉ पंकज जोशी कच्छ के इलाके में खासतौर पर ट्रॉपिकल थ्रोन फारेस्ट के अनोखेपन का जिक्र करते हैं, जो एक भी विंडमिल की स्थापना से प्रभावित होता है क्योंकि सिर्फ जंगल साफ़ करने की बात नहीं है ट्रांसमीशन लाइन, हेवी गाड़ियों का आना आना और अन्य मानवीय गतिविधिया बढ़ जाती हैं जिससे आहार -शृंखला प्रभावित होती है और जिसका असर अंततः हैबिटैट के सभी जीव और वनस्पतियों पर पड़ता है फिर वन्य जीव उस अधिवास से चला जाता है। यहाँ करैकल, भेड़िया, हाइना चीता, पोक्सी चिंकारा मिलते हैं और 150 से ज्यादा प्रवासी पक्षी आते हैं, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया देहरादून ने विंडमिल्स के संदर्भ में विस्तार से लिखा है,वो कहते हैं हजारों की संख्या में यहाँ आनेवाले प्रवासी डेमोइसेल क्रेन या कुरजां के प्रवास बदलाव आ रहा है, ऐसे इलाकों में वो फीडिंग के लिए आ ही नहीं रहे हैं। ग्रासलैंड में बदलाव करने से आखिर यहाँ ग्रेट इंडियन बस्टर्ड हमेशा के लिए चले ही गए। डॉ पंकज जोशी अपनी बात ये कहकर ख़त्म करते हैं सीधे -गोली बन्दूक से ही किसी को नहीं मारा जाता आप किसी का घर तोड़ दें वो खुद चला जाएगा या ख़त्म हो जायेगा। नाजुक विविधता के तमाम क्षेत्रों में छोटा सा बदलाव भी दूरगामी असर डालता है यहाँ तो बात बड़े बड़े विंड टरबाइन, हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन, भारी उपकरणों की है, इन सबका असर आनेवाले सालों में स्पष्ट हो जायेगा।
भविष्य
बहरहाल, दूसरी ओर, बीते साल नवंबर में संपन्न हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में, भारत पर 2050 तक ग्रीनहाउस गैसउत्सर्जन कुल शून्य पर लाने के लिए प्रतिबद्ध होने का काफी दबाव रहा है। उल्लेखनीय है कि एक अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट में कहा गया है “सफल वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के सभी रास्ते भारत से होकर जाते हैं,और ” “भारत का परिवर्तन वैश्विक परिवर्तन है।”
इस सन्दर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित 26वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (कॉप 26) में बहुत उल्लेखनीय घोषणा भी की जिसे “पंचामृत” कहा गया-
*2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट (GW) तक किया जायेगा।
*2030 तक भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के 50 प्रतिशत की पूर्ति अक्षय ऊर्जा से करेगा।
* 2030 तक भारत अपने कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में एक अरब टन की कमी करेगा
*2030 तक, भारत अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता को 45 प्रतिशत से भी कम कर देगा
*और साल 2070 तक भारत, कार्बन उत्सर्जन में नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा।
लेकिन पुनः पिछले दिनों इसमें भारत के द्वारा बदलाव किया गया है, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत क्या करेगा इस सन्दर्भ में भारत ने 2015 की वैश्विक स्तर की अपनी पांच प्रतिबद्धताओं में से दो को अद्यतन किया है जिसमें पहला यह है कि 2005 के स्तर की तुलना में 2030 तक भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 45% तक कम करेगा जबकि 2015 में 33-35% तक उत्सर्जन में कमी करने की प्रतिबद्धता थी। दूसरा बदलाव 2030 तक अपनी बिजली का लगभग 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करना है। 2015 का लक्ष्य 40% था। दूसरी प्रतिबद्धता के साथ ये भी स्पष्ट किया गया है कि इस लक्ष्य को “प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और ग्रीन क्लाइमेट फंड सहित कम लागत वाले अंतरराष्ट्रीय वित्त की मदद से” हासिल किया जाएगा।
यहां प्रसंगवश इस बात का जिक्र जरूरी है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी केवल पांच प्रतिशत है जबकि विश्व की आबादी का 17 प्रतिशत भारत में रहता है। जाहिर है भारत की ओर से किये गए ये वायदे पर्यावरण और लगातार स्वच्छ और हरित ऊर्जा के लक्ष्यों की ओर बढ़ने के प्रति एक गंभीर और सुचिंतित पहल है। इस क्रम में पवन ऊर्जा या विंड एनर्जी भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है जो भारत में लागातर स्वच्छ और हरित ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण विकल्प रहा है। भारत में साल 2022 तक पवन ऊर्जा की संभावित क्षमता 60,000 मेगावाट है और इसके लिए सात राज्यों को अनुकूल पाया गया है। भारत सरकार के नवीन और नवीनीकरण ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, पवन ऊर्जा कुल स्थापित क्षमता के सन्दर्भ में भारत दुनिया में चौथे स्थान पर आता है , वर्तमान में 39.25 GW (31 मार्च 2021 तक) की कुल स्थापित क्षमता के साथ साल 2020-21 के दौरान पवन ऊर्जा से देश में लगभग 60.149 बिलियन यूनिट का उत्पादन किया गया। जहां आंध्र प्रदेश की कुल क्षमता 44228.60 एम डब्लू है जिसमें संस्थापित क्षमता फिलहाल 4096 . 65 एम डब्ल्यू है।
गौरतलब है कि भारत ने 2015 में, अपनी अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन प्रतिबद्धताओं के तहत, 2030 तक अपने उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कटौती करने का वादा किया है और अपनी ऊर्जा का 50% लगभग 350,000 मेगावाट संस्थापित क्षमता से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।भारत अब इसी वर्ष नवम्बर में आयोजित होने वाले अगले वैश्विक जलवायु शिखर सम्मेलन, COP27 से पहले अपना अद्यतन नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन (NDC) संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) में प्रस्तुत करेगा।
भारत सरकार ने लगभग 54,000 मेगावाट के संस्थापित कुल पवन पार्क या पवन-सौर हाइब्रिड पार्क विकसित करने के लिए लगभग 10,800 वर्ग किलोमीटर भूमि की पहचान की है। लेकिन ऐसे पार्कों के लिए प्रस्तावित नीति पर्यावरण, भूमि और समुदायों से संबंधित चिंताओं के बारे में काफी हद तक चुप है लेकिन धीरे धीरे ये सभी सवाल इन परियोजनाओं के केंद्र में आएंगे और अरबों की परियोजनाओं समेत जीरो कार्बन उत्सर्जन प्रतिबद्धता को भी प्रभावित करेंगे ही। बेशक इसका हल हरित ऊर्जा के नाम पर हरियाली के सवाल को दबाना नहीं बल्कि गांव के आम किसानों से बात करना है जैसे खुद हमें अनंतपुर में कागज पर सब ठीक नज़र आता रहा जब तक हमने गांव गांव जाकर उन किसानों और उनके परिवारों से बात नहीं की जहां या जिनकी जमीनों पर विंड टर्बाइन्स हैं। और जाहिर है उनकी परेशानी और उनके सवाल आने वाले दिनों में हरित ऊर्जा, पवन ऊर्जा के बड़े सवालों में से हैं जिनको हल किये बगैर आगे बढ़ना भारत सरकार के 2070 तक के जीरो कार्बन उत्सर्जन प्रतिबद्धता के लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम को पीछे करेगा।
(यह स्टोरी इन्टरन्यूज के अर्थ जर्नलिज़म नेटवर्क के सहयोग से की गयी है।)