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फ्रेंच लेखिका एनी अर्नो (साहित्य की नॉबेल विजेता ) के 15 कथन

एनी का तमाम लेखन आत्मकथात्मक और ‘सत्य की चीर-फाड़’ करने वाला है। माना जाता है कि अपने जीवन को ही वे छद्म-पात्र-रचना (Impersonating) के ज़रिए प्रस्तुत करती रही हैं। उनके लेखन में उनकी माँ का अल्ज़ाइमर और उनका अपना कैन्सर भी है। वे एक साहसी महिला रही हैं। उन्होंने एक शादीशुदा विदेशी राजनयिक से प्रेम-संबंध रखा और उस समय गर्भपात कराया जब फ़्रांस में यह क़ानूनन अवैध था। प्रस्तुत हैं अंग्रेज़ी से अनूदित उनके कुछ महत्त्वपूर्ण उद्धरण-

 

  • “मैं समय और मृत्यु से जूझने के लिए लिखती हूँ। समय मेरे लेखन में हमेशा एक अहम किरदार रहा है।”
  • “सामाजिक उन्नति निर्वासन का ही एक रूप है। आप एक पूरा-का-पूरा संसार पीछे छोड़ते हुए, एक तरह से अपने आप को अलविदा कहते हैं। यह कठिन है।”
  • “स्वनिर्णय और सामाजिक उन्नति बहुत कठिन है- किन्तु यह आज भी संभव है।”
  • “जब आप अपने मूल सामाजिक-वर्ग से भागने की कोशिश करते हैं। जैसी मैंने कोशिश की, वापसी की, अपनी पढ़ाई के साथ, आप अक्सर ख़ुद से पूछते हैं: मुझे क्या परेशान करने वाला है? आख़िर में मुझे क्या रोकेगा ?  जब मैंने देखा कि मैं गर्भ से हूँ तो यह अचानक मुझ पर तारी हो गया : यह मेरी देह होगी, यही मुझे रोकेगी। उस समय अविवाहित गर्भवती ग़रीबी का प्रतीक थी। यह गारण्टी थी कि कभी तुम्हें मुक्त नहीं किया जाएगा। यह सब ख़त्म हो गया था।”
  • “मैं बस आगे बढ़ती रही। और इस सरकार के प्रतिबन्ध से ख़ुद को (गर्भपात करवाने से) रुकने नहीं दिया।”
  • “सच कहूँ, तो जो कुछ मैंने देखा और सुना है, उसे खोने के बज़ाय मैं मर जाना पसन्द करूँगी।”
  • “मैं ऐसी लेखक नहीं जो केवल जज़्बात को ध्यान में रखती है और यह ‘द इयर्स’ की विषय-वस्तु भी नहीं है। प्रमुख बिन्दु है निजता के बारे में न बोलना। निजी को तस्वीरों के विवरणों से भी एकत्र किया जा सकता है। मैं एक तस्वीर पर (हरेक दशक के लिए) वस्त्रों, प्रकाश और स्थानों को विवरणों के साथ उस क्षण रख सकती हूँ। तस्वीरों के माध्यम से मैं अपने पिता और बच्चों की मृत्यु का स्पर्श कर सकती हूँ, बहुत मुख़्तसर, लेकिन प्रायः मैं जज़्बात के बारे में नहीं बोलती।”
  • “ये दुर्लभ था, लेकिन मैं एक अकेली बच्ची थी- मेरी बहन मेरे जन्म से पूर्व ही मर चुकी थी। और क्योंकि मेरी माँ एक मज़बूत शख़्सियत थीं और पढ़ने से उन्हें प्यार था, मैं आगे बढ़ी थी। हाँ, इसने मेरे और मेरे परिवार के मध्य एक दूरी पैदा कर दी। चालीस साल पहले यही दूरी मेरी पहली क़िताब का विषय थी।”
  • “’मी टू’ पर मेरी पूर्ण सहमति है। निश्चित रूप से उसमें कुछ अति(याँ) हैं, किन्तु ख़ास बात यह है कि स्त्रियाँ इस तरह के व्यवहार को और अधिक स्वीकार नहीं करेंगी। फ़्रांस में हम सिडक्शन के बारे में बहुत सुनते हैं, परन्तु यह सिडक्शन नहीं है, पुरुष-प्रभुता है। दुराचार केवल यौन मामलों में ही नहीं है, साहित्य समेत यह प्रत्येक जगह है। महिला लेखकों को टेलीविज़न- कार्यक्रमों में बहुत कम आगे किया जाता है, वहाँ प्रत्येक स्त्री पर तीन मर्द होते हैं। वहाँ पर एक यह भी ख़याल है कि महिला केवल उपन्यासकार है और मर्द लेखक।”
  • “चुनाव करना कठिन है। मैंने जर्मेन ग्रीअर की ‘दि फ़ीमेल यूनक्’  उस समय पढ़ी, जब पढ़ना महत्त्वपूर्ण होता है और उसने मेरे लिखने के ढंग को प्रभावित किया। सार्त्र की ‘ला नौज़ी’ सिमोन की ‘दि सेकेंड सेक्स’ और वर्जीनिया वुल्फ़, एक अद्भुत लेखक, को मैंने अपने बीसवें साल में खोजा, और जॉर्ज पेरेक्। तमाम क़िताबें हैं जिन्हें मैं पढ़ना चाहती थी फिर उनके जैसा ही लिखना भी। मेरे लिए, केवल कहानी और विषय-वस्तु ही नहीं, शिल्प भी मायने रखता है।
  • “मैंने लिखा है, लाखों लड़कियों और औरतों पर की गई बर्बरताओं की स्मृति को सुरक्षित करने के लिए।”
  • मेरे बचपन की आँखें कहाँ हैं? वे डरे-डरे नयन जो उसके पास तीस साल पहले थे। आँखें, जिन्होंने मुझे बनाया?”
  • दुःख को बरकरार नहीं रखा जा सकता है। उसे परिमार्जित कर हास्य में परिवर्तित कर देना चाहिए।
  • “अस्तित्त्व में होना बिना प्यास के ख़ुद को पीना है।”
  • “बूढ़ा होना फ़ीका हो जाना है, पारदर्शी बन जाना।”

 

एनी अर्नो का काम प्रशंसनीय और उसका स्थायी महत्व

रमण कुमार सिंह

फ्रेंच लेखिका एनी एरनॉक्स को इस वर्ष का साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया है, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि समझौते नहीं करने वाला उनका चालीस वर्षों का लेखन एक ऐसे जीवन की खोज है, जिस पर लिंग, भाषा और वर्ग से संबंधित महान असमानताओं के निशान हैं। एनी एरनॉक्स 17वीं महिला लेखिका हैं, जिन्हें यह पुरस्कार मिला है। नोबेल समिति के अक्ष्यक्ष प्रोफेसर हेनरिक हेल्डिन ने कहा कि इस 82 वर्षीय लेखिका का काम ‘प्रशंसनीय और स्थायी’ महत्व का है। उन्होंने अर्ध आत्मकथात्मक कहानियों को सुनाने के लिए साहस और तटस्थ कुशलता का उपयोग किया, जो सामाजिक अनुभव के विरोधाभासों को उजागर करते हैं और शर्म, अपमान, ईर्ष्या और आपकी पहचान को देखने मे असमर्थता का वर्णन करते हैं।
एनी एरनॉक्स जन्म 1940 में नार्मंडी में हुआ, जहां उनका प्रारंभिक जीवन गरीब, मगर महत्वाकांक्षी था। उनके माता-पिता कैफे और किराने की दुकान चलाते थे। जब उनका मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि की लड़कियों के साथ सामना हुआ, तो उन्हें अपने कामकाजी वर्ग के माता-पिता और अपने माहौल की शर्म का एहसास हुआ। बाद में इन सब अनुभवों को उन्होंने अपने उपन्यासों में स्थान दिया। उनकी आधिकारिक जीवनी के अनुसार उनके रचनात्मक कार्य का मुख्य विषय देह और यौनिकता, अंतरंग संबंध, सामाजिक असामनता और शिक्षा के माध्यम से वर्ग परिवर्तन का अनुभव, समय और स्मृति, और इन जीवन अनुभवों को कैसे लिखना है का व्यापक प्रश्न था।
उनकी पहली पुस्तक क्लीन्ड आउट1974 में प्रकाशित हुई, जो 1964 में कराए गए उनके गर्भपात के अनुभवों पर आधारित थी, जब फ्रांस में गर्भपात अवैध था। एक विवाहित विदेशी राजनयिक के साथ उनके प्रेम पर आधारित पुस्तक ए सिंपल पैशन फ्रांस में बेस्टसेलर रही है। लेकिन फ्रांस से बाहर उन्हें द ईयर्स के लिए जाना जाता है, यह एक प्रयोगात्मक आत्मकथा है, जो फ्रांसीसी इतिहास की घटनाओं के साथ एरनॉक्स के जीवन के 70 से अधिक वर्षों की घटनाओं को एक साथ पिरोती है।
लंबे समय से आलोचक उनके साहित्य की प्रशंसा करते रहे हैं। उनके लेखन में कथा और आत्मकथा के बीच की रेखा धुंधली पड़ जाती है। उनके आत्मकथात्मक उपन्यास विधा की मांग (मेलोड्रैमेटिक अंतरंग रहस्योद्घाटन एवं कथात्मक आख्यान की सहजता) की अवहेलना करते हैं, लेकिन गंभीर प्रामाणिक जानकारी प्रदान करते हैं। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्होंने लिखने की कोशिश कॉलेज के समय में ही शुरू की थी, लेकिन प्रकाशक ने बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी बताकर उसे प्रकाशित करने से इन्कार कर दिया। फिर जब तक वह तीस की नहीं हो गईं, तब तक कलम नहीं पकड़ी, जब वह दो बच्चों की मां नहीं बन गईं। अपना पहला उपन्यास क्लीन्ड आउट उन्होंने सबसे छिपाकर लिखा। उन्होंने लिखा, ‘मेरी पहली पांडुलिपि को लेकर मेरे पति मजाक उड़ाते थे। मैंने पीएच. डी, थीसिस लिखने का बहाना बनाया। किताब प्रकाशित होने के बाद मेरे पति ने बहुत बुरी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यदि तुम गुप्त रूप से किताब प्रकाशित करवा सकती हो, तो मुझे धोखा भी दे सकती हो।’ जल्द ही उन्हें अपने उदास वैवाहिक जीवन के बारे में लिखना पड़ा। बाद के उपन्यासों में उन्होंने अपनी मां की एल्जाइमर की बीमारी, अपने कैंसर और प्यार के बारे में भी लिखा।

साभार फेसबुक पेज

राजेन्द्र सजल: एक कहानी सजग कहानीकार

सबसे पहली बात जो राजेन्द्र सजल जी के बारे में कही जानी चाहिए कि वे एक कहानी सजग कहानीकार हैं। हमारे यहाँ लेखक की सजगता का आकलन समाज के संदर्भ में ही किया जाता है। कोई लेखकअथवा कहानीकार समाज के मुद्दों को और उसकी समस्याओं को अपनी कहानियों में कितना उठाता है, कितना रचता है उतना ही हमारे लिए वह कहानीकार एक सजग कहानीकार होता है। किंतु कोई कहानीकार कितना कहानी सजग कहानीकार है यह बात प्राय: और कम से कम दलित आलोचकों और रचनाकारों के बीच तो चर्चा या आलोचना का विषय नहीं बनती। ऐसा करते ही हमें लगता है कि हम रूपवादी हो रहे हैं। हम साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र के प्रति झुकाव या लगाव प्रदर्शित कर रहे हैं और जैसे यह एक साहित्यिक अपराध है जो हम कर रहे हैं। असल में यह सब हमने शुरू भी नहीं किया। जैसे जैसे साहित्य में तथाकथित प्रगतिशील चेतना का वर्चस्व स्थापित हुआ वैसे वैसे संस्कृति, सौन्दर्य-शास्त्र, परंपरा नाम की प्रत्येक चीज से हमने दूरी बरतनी शुरू कर दी। उसे त्याज्य और घृणित मान लिया गया। यद्यपि नामवर सिंह इसके अपवाद रहे और नई कहानी के नएपन को उन्होंने कहानी के शिल्प के आधार पर ही चिह्नित किया। यहाँ यह बात बराबर ज़ोर देकर कहने की जरूरत है कि क्योंकि हिन्दी के दलित साहित्यकारों का पालन-पोषण इसी तथाकथित प्रगतिशील आंदोलन की निगरानी में हुआ इसलिए दलित आलोचकों और साहित्यकारों ने भी रचना में रचनात्मकता पर बात करने से परहेज किया। न केवल परहेज किया बल्कि बाद में तो एक हद तक कठहुज्जती भी की। यह सब बहुत ही सहज था। क्रिया की प्रतिक्रिया की तरह। ‘सौंदर्यशास्त्र’ के नाम तक से हमने नफ़रत होने लगीथी। जबकि कमाल की बात यह है कि हमारी रचनाओं में, कहानियों में, कविताओं में कमाल की रचनात्मकता मौजूद रही है। कहानी की कला, कविता की बुनावट के मामले में हमारे रचनाकार विशेष रूप से आश्वस्त करते रहे हैं। उनके भीतर अनुभूति की आँच इतनी प्रखर है कि वह आंच अपनी अभिव्यक्ति के लिए अपने आप एक ताल, एक धुन, एक रचनात्मक शिल्प तैयार करती है। कोई भी रचना अच्छी हुए बिना पाठकों के बीच जगह बना ही नहीं सकती। हांलाकि यह एक अलग और गंभीर मुद्दा है कि खानदानी प्रकाशकों, पार्टी चालित आलोचकों और अकादमिक ठेकेदारों के रहते अच्छी रचनाएँ पाठकों तक पहुँच भी नहीं पाती।

राजेन्द्र सजल एक कहानी सजग कहानीकार हैं, इसकी दो वजहें हैं एक, अपने कहानी संग्रह की भूमिका में उन्होंने अपनी इस सजगता का परिचय दिया है। और दूसरा संग्रह में शामिल उनकी कहानियों की शिल्पगत विविधता इसका परिचायक है। पहले बात करें भूमिका की, जहाँ वे लिखते हैं—“असल बात यह है कि कहानी, कहानी रहनी चाहिए और उसमें कहानीपन होना चाहिए।” अब ये कहानीपन किसी कहानी में आता कैसे है या उसे कैसे समझा जा सकता है? इसे समझाते हुए वे आगे लिखते हैं कि “जिसका (कहानी का) इस विशाल दुनिया में एक छोटा-सा संसार होता है। जिसमें पात्र और घटनाएँ इस दुनिया के प्रेम, पीर और प्रतिरोध को उमड़-घुमड़कर अभिव्यक्त करती रहें। जिसको पढ़कर लगे कि ‘हाँ, ये मेरा भोगा हुआ यथार्थ है, या फिर मुझसे जुड़े किसी शख्स, परिवेश अथवा समय की कहानी है। कहानी की दुनिया पाठक की अपनी दुनिया से जुड़ती चली जाए।” मतलब कहानी के पाठक को यह पता रहता है कि वह कोई कहानी पढ़ रहा है पर उसके बाद भी वह वहाँ घटित हो रही घटनाओं से, वहाँ विचरते चरित्रों से आत्मीय संबंध बना पाता है।  कहानी के भीतर के देशकाल और वातावरण को वह महसूस करता है। यह महसूस करना, उसे जीना है। जैसा कि स्वयं राजेन्द्र सजल जी ने लिखा है कि  “उस जमीन पर ( कहानी में) होने वाले हर मौसम को पाठक महसूस कर सके। कभी भीगता रहे तो कभी ठिठुरता- तपता रहे और आखिर बासन्ती रंग में रंगा हुआ महसूस करे।”  यह ठिठुरना, तपना, बासंती रंग में रंगा जाना भावना के धरातल पर कहानी को महसूस करना ही है। अपने वास्तविक जीवन के साथ कहानी के जीवन को भी जीना है। यहाँ विभिन्न तरह के भाव, जिन्हें काव्यशास्त्र में स्थायी भाव कहा गया है जो रस के रूप में पाठक के भीतर संचरित होते हैं; उन्हीं के बारे में राजेन्द्र सजल जी बात कर रहे हैं। असल में कहानी का कहानीपन यही हैकि कहानी पाठक के भीतर विभिन्न  भावों (रसों) का संचार कर सके।

साथ ही यह भी सत्य है कि आज के पाठक या कहें आधुनिक पाठक की बुद्धि भी उतनी ही सजग है जितनी उसकी भावनाएँ।  वह स्थितियों और घटनाओं को जीवन में ही नहीं कहानी के भीतर भी तर्क और अपने विवेक के धरातल पर जाँचता और परखता है। यह उसके आधुनिक होने का प्रमाण है। अब उसकी प्रवृति ही ऐसी बन चुकी है। ऐसे में कहानीकार को कहानी में दिमाग भी लगाना पड़ता है। पाठक इतना भी भावुक नहीं है कि बिना किसी ठोस आधार के उसकी भावनाएँ संचरित होना शुरू कर दें। अगर ऐसा है तो भी यह हमारे साहित्यकारों और आलोचकों का दायित्व है कि वे पाठकों को सावधान, और जिम्मेदार पाठक बनने की ओर अग्रसरित करें।  दलित साहित्य या कहें विशेष रूप से अस्मिता धर्मी साहित्य में पाठकों के ही नहीं रचनाकारों में भी अपनी अस्मिता को लेकर भावुक हो जाने की पूरी संभावना रहती है। राजेन्द्र सजल जी के यहाँ आधुनिक पाठक होने की यह सजगता पूरी तरह से विद्यमान है। उनकी कहानियाँ कोरी भावुक बनाकर रुलाने वाली, क्रोध में और आवेश में मुट्ठियाँ भींचने वाली कहानियाँ नहीं हैं। वे सबसे पहले पाठक के भीतर विश्वास पैदा करती हैं कि वे सच्चाई को दिखाने वाली कहानियाँ है। जैसे किसी कोर्ट में अपनी कोई भी बात रखने से पूर्व कटघरे में खड़ा व्यक्ति यह कसम खाता है कि “मैं जो कुछ कहूँगा सच कहूँगाँ, सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगा।” ऐसी ही कोई कसम लेकर राजेन्द्र सजल कहानी लिखना आरंभ करते हैं।  यह तो हम जानते ही हैं कि बाहरी दुनिया का सच कहानी में ज्यों का त्यों नहीं आता, उसे तराशना, काटना-छाँटना पड़ता है। और इस काम में राजेन्द्र जी माहिर शिल्पकार हैं। वे पूरी तरह जानते हैं कि “कहानी आनंद के साथ-साथ हृदय की उर्वरता को न बढाए और झकझोर कर चेतना को जगाए नहीं तो फिर क्या कहानी हुई।” (भूमिका से) इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजेन्द्र सजल जी की कहानियाँ एक ओर पाठक के भीतर विभिन्न रसों का संचार तो करती ही हैं। उसके भीतर सोए स्थायी भावों को रस के रूप में परिणत करती ही हैं, साथ ही वे ऐसा समाज और जीवन की विविध स्थितियों का यथार्थ चित्रण करके करती हैं। ये स्थितियाँ परिवेश और इतिहास जन्य हैं कोरी भावुकता या कल्पना इनके पीछे नहीं है।

अब इन बातों को उनकी कहानियों के जरिये जाने। इस संग्रह में कुल जमा उनकी दस कहानियाँ संग्रहित हैं।  कहानियों की विषयवस्तु अपने समय के तमाम बड़े और गंभीर मुद्दों को समेटे हुए हैं। जातिवाद, संप्रदायवाद, ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता और इन सबसे परिचालित अपने समय की राजनीति, सभी जरूरी मुद्दे इनकी कहानी में गुँथे हुए हैं। साथ ही साथ मनुष्य मात्र की विभिन्न प्रवृतियाँ, जिसमें प्रेम, ईर्ष्या, डर और लालच, चालाकी, समझदारी, हताशा और निराशा , संघर्ष और टकराव, जीत और हार सभी स्थितियाँ कहानियों को सहज बनाए रखती हैं। जैसे पहली ही कहानी ‘मास्टर माई’ को लें। कहानीकार इस कहानी में प्रेमचंद टाईप का कहानीकार है। प्रेमचंद टाईप से मेरा मतलब है ऐसा कहानीकार जो अपने पाठक का बहुत ध्यान रखता है। वह चाहता है कि वह जो कहानी कह रहा है उसे समझने में उसके पाठक को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसलिए वह कहानी में पात्रों की मन:स्थितियों की व्याख्या बहुत मन लगाकर करते हैं। मास्टर माई का अपने बेटे पर वैसे ही प्रेम और भरोसा है जैसे प्राय: माँओं का होता है। पर संतान के रंग-ढंग कैसे बदल जाते हैं, यही इस कहानी में बताया गया है। निश्चित रूप से यह कोई नया विषय नहीं है। संतानों का मतलबी निकलना, धोखेबाज होना सर्वविदित है। इस कहानी को विशेष बनाता है। माँ (मास्टर माई) को इस बात का एहसास क्रमश: किस तरह होता है और उसकी वह अजीब मुस्कान जो इस एहसास के बाद उसके चेहरे पर चिपक जाती है।  अपने बेटे को जवाब देती मास्टर माई की वह मुस्कान और गहरी हो जाती है। “हाँ, बेटा ढोर ही चर रहे हैं और मैं सो रही हूँ।” यहाँ व्यंजनार्थ में सामने खेत को चरते रोजडों का जिक्र नहीं है बल्कि मास्टर माई और उसके पति की कमाई आज कैसे उन्हीं का नकारा और निकम्मा सपूत चर रहा है और वह माँ अपने अंधे प्रेम में अब तक देख ही नहीं पा रही थी, इस बात का जिक्र है। ठीक वैसे ही जैसे “ बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।” कह कर प्रेमचंद कहानी का सारा मर्म एक वाक्य में निचोड़ देते हैं। कहानी में खेत, और खेतों पर रहने और काम करने वालों की जिंदगियों का चित्रण कर कहानी को विश्सनीय बनाया गया है। असल में राजेन्द्र सजल जी जानते हैं कि किसी कहानी को विश्वसनीय उसका कथानक नहीं बनाता बल्कि कथानक को अपने ऊपर खड़ा करने वाला परिवेश और देशकाल बनाता है। राजेन्द्र सजल की कहानियों में राजस्थान के एक क्षेत्र विशेष का जीवन इस कदर पिरोया गया है कि कहानी अपने आप जी उठती है।

राजेन्द्र जी की कहानियों में अधिकाँश कहानियाँ स्त्री चेतना की कहानियाँ हैं। इन कहानियों को यहाँ स्त्री विमर्श की कहानियाँ न कहकर स्त्री चेतना की कहानियाँ इसलिए कहा जा रहा हैक्योंकि कहानियों में जो केन्द्रीय स्त्री किरदार हैं वे पूरी तरह से अपने ऊपर हो रहे अनाचार और दुर्व्यवहार के प्रति सजग हैं। वे न केवल जानती हैं कि जो हो रहा है वह गलत हो रहा है बल्कि अपनी जितनी सामर्थ्य उनमें है उसके बल पर वे उन स्थितियों, परिस्थितियों से जूझती हैं, लड़ती हैं। वे चुपचाप आँसू नहीं बहाती। अब सारी करामात इसी बात में है कि उनकी यह लड़ाई कहानी के कहानीपन और पाठक के आधुनिक पाठक होने को कितना साथ लेकर चल पाती है। जैसे उनकी ‘मास्टर माई’, ‘इत्ती सी बात’, ‘बावली’ और ‘झमकू’  ये चार कहानियाँ सीधे-सीधे स्त्री चेतना की कहानियाँ हैं। ‘बावली’ श्यामवर्णी लड़की जिसे ब्याह के बाद उसका पति इसीलिए त्याग देता है कि वह सुन्दर नहीं। भारतीय समाज में सुंदरता का पैमाना गौरा होना ही है। गुण कोइ नहीं देखता। कृष्ण श्यामल हैं तो भी पूज्य हैं पर राधा तो गौरी ही होनी है। सांवली जिसे गाँव-मौहल्ले वाले ‘बावली’ कहने लगते हैं क्योंकि वह रोज-रोज ससुराल में अपना अपमान सह नहीं पाती और एक टूटी खंडहरनुमा हवेली में जाकर विक्षिप्त की तरह वहाँ रहने लगती है। यही बावली जब बिल्कुल विपरित हालातों में भी जी जाती है और एक बेटे को जन्म देती है तब उसका पति, उसके सास-ससुर उसे वापस ले जाना चाहते हैं। अब तो वह एक बेटे की माँ है। बेटे की माँ होते ही उसका मोल बढ़ जाता है। पर बावली अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती। वह जानती है कि यह उसका स्वीकार नहीं बल्कि उसके बेटे का ( घर के वंश चलाने वाले) का स्वीकार है। जो पति उसे सबके सामने पत्नी मानने को तैयार नहीं है, जिसे उसकी शक्ल से घिन आती है, वह रात के अँधेरे में अपनी हवस मिटाने उसी के पास आता था। उस पर जबरदस्ती करता था, उसी का परिणाम वह बेटा है।वह कैसे उस पति के घर वापस लौट सकती थी। “…ना माई ना! आज लल्ले की माँ हूँ, लल्ला खिलाने का सुख दुनियाँ का सब से बड़ा सुख है माई। इस सुख की खातिर वो राजी है, पण माई यो सुख मिलणो….तरसन दे माई, उनको तरसन दे। पतो तो चाले, बिछोह की पीड़ा काँई व्हे/ फेर माई, यो तो लल्लो हुयो परमात्मा भली करी, जे लल्ली होति तो म्हारो कांई होतो,…. दादा-दादी नै पोतो चाहे, बाप नै बेटो, अर मैं?” इस मैं का कोई जवाब नहीं है दुनिया के पास। इस ‘मैं’का जवाब न मिलने  का सारा भार वह बावली अपने जीवन को कुछ बेहतर बना पाने के रास्ते को ठुकराकर चुकाती है। वह भीख माँगकर खाती है, कोई यह भी कह सकता है कि बदले की भावना से भरी वह अपने बेटे की जिंदगी भी कष्टदायक बना देती है, पर जो है सो है। उसका यही तरीका है समाज से बदला लेने का।  आज भी स्त्री इस बात का जवाब माँग रही है दुनिया से, क्या संतान पैदा करने ( बेटा पैदा करने) के अलावा भी स्त्री की कोई जरूरत है पुरुष की जिंदगी में? और न भी हो तो क्या स्त्री को किसी पुरुष के बिना जीने की आज़ादी है?

राजेन्द्र जी की कहानियाँ स्त्री चेतना के चलताऊ मुद्दों की बजाए बहुत गहरे पैठे और बहुत हद तक सहज स्वीकृत मान लिये गए व्यवहारों पर  सवाल उठाती हैं। उनकी नायिकाएँ ग्रामीण समाज की तथाकथित अनपढ़ औरतें हैं जिनके बारे में पढ़ा-लिखा समाज प्राय: यह सोच रखता है कि उनमें किस बात की स्त्री चेतना हो सकती है। इन औरतों के अवसर कितने भी सीमित क्यों न हों पर वे भरपूर जवाब देती हैं। इस जवाब में उसकी सारी जिन्दगी निकल जाती है। पर यही उनकी जीत है कि वे लड़ती हैं और अंत तक समझौता नहीं करती।  “इत्ती सी बात” बहुत ही भावुक कर देने वाली और भीतर तक भेद जाने वाली कहानी है। मुझे यहाँ रजनी तिलक की वह कविता याद आ रही है जिसमें वे सहज स्वीकार करती हैं कि ‘हाँ मैं लड़ाका हूँ।’ पर इसका मतलब यह नहीं है कि ये स्त्रियाँ प्रेम, अपनेपन और जिम्मेदारी के एहसास से रहित है। दलित स्त्री के व्यक्तित्व की एक जो खास पहचान है वह है उसका कर्मठ होना। वह बहुत मेहनती और बड़े जिगरे वाली होती है।  प्रसिद्ध साहित्यकार रांगेय राघव की बहुत प्रसिद्ध कहानी ‘गदल’ भी इसी तरह की कहानी है। ‘गदल’ और इत्ती सी बात की ‘दादी’ स्त्री मुक्ति की आदर्श कही जा सकती हैं। वास्तव में मुक्ति दिमाग से चाहिए। कोई दूसरा, सामने का पुरुष और समाज आपको मुक्त नहीं करता, आप स्वयं इस मुक्ति की एहसास को अपने भीतर धारण करते हैं। निश्चित रूप से समाज में गैर बराबरी है पर आप आपकी जो भी स्थितियाँ हैं उनके बीच ही अपनी लड़ाई भरपूर लड़ते हैं, लड़ सकते हैं, आपको लड़नी चाहिए। ‘इत्ती सी बात’ की दादी बहुत कर्कश है, उसे कभी किसी ने हँसते नहीं देखा। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वह अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से पीछे हटती है। बल्कि अपने कर्मठ व्यक्तित्व के बल पर ही उसने वह औरा हासिल किया है कि अपनी शर्तों पर जी सके।  खुश होना और अपनी खुशी को हँस कर अभिव्यक्त करना यह नेमत प्रकृति ने अपने किसी जीव को नहीं दी। केवल मनुष्य है जो खुश होकर हँसता है और अपनी खुशी का इज़हार करता है। पर दादी के वैवाहिक जीवन की शुरुआत होती है उस झन्नाटेदार थप्पड़ से जो उसे इसलिए रसीद कर दिया जाता है कि नई नवेली आई बहु जो मात्र तेरह साल की है, ननदों के साथ मिल कर हँस बोल रही है। उसकी उन्मुक्त हँसी बाहर उससे लगभग दूनी उम्र के पति को सुनाई देती है और बस झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ “शर्म-हया है कि नहीं, बाबले ( मायके) ने कुछ नहीं सिखाया। बाहर मेहमान बैठे हैं और ही-ही कर रही है।”  औरत को सासरे में कोई और इज्जत दे न दे। कोई और समझे चाहे न समझे। पर पति नाम के प्राणी के साथ जिसके पीछे वह अपना सबकुछ छोड़ कर चली आती है, उससे प्यार और अपनेपन की वह उम्मीद करती है। और पति भी जब दूनी उम्र का हो, उससे समझदारी की उम्मीद ज्यादा रहती है।  वह चाहती तो थी कि  गौना कराकर वापस न आए। पर पिता ने अपनी इज्जत की पग़ड़ी उसके पैरों में रख दी। मजबूरन वह ससुराल आई पर अपने भीतर इस कसम के साथ कि वहाँ कभी नहीं हँसूगी। उसकी इस कसम से उसका पूरा जीवन रसहीन हो जाता है। अपनी इस कसम को पालने की खातिर वह अपना सारा जीवन प्यार और अपनत्व के इज़हार से रहित हो कर जीती है। यह एक ऐसा दंड है जो वह स्वयं के माध्यम से समाज को देती है। यह एक ऐसी कसम बन जाती है जिसका तावान उसे अपने आप को निचोड़ कर भरना पड़ता है। सबसे बड़ी बात सारी उम्र बीत जाती है और मरते समय तक किसी को उसके दुख का पता नहीं चलता। पति को तो अपनी उस गलती की गंभीरता का एहसास उस समय भी नहीं होता जब मरने से पहले वह उसे बताती है। “बस, इत्ती-सी बात! और तू उम्र भर…!” उसकी समझ में ही नहीं आता कि औरत की भी इज्जत है, उसका स्वाभिमान है। उसके स्वाभिमान को केवल उस पर हिंसा या यौन हिंसा करके ही नहीं कुचला जाता बल्कि उसके उठने, बैठने, हँसने और बोलने पर सरेआम प्रतिबंध लगाकर भी कुचला जाता है। जब एक नवयौवना को इस आधार पर, उसके घर वाले घुड़कते हैं तो उसका कोमल हृदय, उसका व्यक्तित्व जो अभी आकार ग्रहण करने ही लगे हैं कुंठित और विकृत हो जाता है।  यह समाज के लिए इत्ती सी बात हो सकती है पर दादी मुँह फेर कर यह कहते हुए मर जाती है “इत्ती सी बात ?”  कहानी में अंत मे आकर इन शब्दों की व्यंजना स्पष्ट होती है।  यहाँ कोई भी यह कह सकता है कि आखिर इस कसम से उसने क्या पाया।  पर कहने वाला इसकी व्याख्या किसी तरह से करता रहे पर कहानी अपना मकसद पूरा कर देती है। वह अपने पति से यह कह कर मरती है कि “अगले जन्म में मैं आदमी बनूँगी और तुम लुगाई बनना। मैं तुझे खूब हँसाऊँगी। तू हँसना, मैं नहीं मारूँगा…” ऐसा नहीं है उसे अपने पति से प्रेम नहीं है। वह उसकी इज्जत के लिए दोहरी मेहनत करती है। मरते-मरते यह कह कर जाती है कि “अगले जन्म की तैयारी है। तू बेगा आना। मैं बाट देखूँगी…” सारी उम्र उसका बेचारा पति यह समझ ही नहीं पाता कि उसकी हर सुविधा का ध्यान रखने वाली, उसकी सारी जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर ढोने वाली उसकी औरत को आखिर दो बोल हँसकर बोलने से क्यों परहेज है। झमकू भी एक ऐसी ही कहानी है जो समाज के इस सत्य को बयां करती है कि संतान न होने की जिम्मेवारी सिर्फ़ औरत को उठानी पड़ती है। गाँव में ब्याहली आई झमकू को उसका पति सास-ससुर इसलिए त्याग देते हैं कि सात साल में वह एक बार भी पेट से नहीं हुई। पर झमकू इस बात को नहीं मानती उसके भीतर कहीं विश्वास है कि बिना किसी सबूत के ऐसे कैसे उसे बाँझ करार किया जा सकता है। वह वहीं रहती है अनाथ हरिया का घर बसाती है। उसका विश्वास जीतता है जब वह पहले ही साल में गर्भ धारण करती है।

असल में राजेन्द्र जी की कहानियाँ अपने विषय- मुद्दों को लेकर इतना ध्यान नहीं खीँचती जितना उस विषय या मुद्दे के ट्रीटमेंट को लेकर। राजस्थानी आबो-हवा, भाषा, बोली बानी और मन:स्थतियों विशेष का चित्रण इन कहानियों को विशेष बनाता है। अलग अलग कहानियाँ अलग- अलग तरह से आगे बढ़ती हैं। कहानी काअपने भीतर के देशकाल में आगे-पीछे होना, कहानी में रोचकता पैदा करता है। झमकू कहानी की शुरूआत झमकू के इस एहसास के साथ होती है कि आज शायद तबियत कुछ गड़बड़ है। “झाड़ू उठाया ही था कि धरती घूमती सी जान पड़ी। वह आँख मूँदकर आँगन में बैठ गई। कुछ देर बाद उठी तो जी मतलाने लगा।….”  एक समझदार पाठक को बताने की जरूरत नहीं कि यह सब किस बात का संकेत है। वह अनुमान लगा लेता है कि यह उसके गर्भवती होने का संकेत है। और उस पर “झूँठ हुआ तो? लोग हँसेगे! हँसे तो हँसे। बाकी रहा ही क्या है।” से पाठक को समझ आता है कि ऐसा बहुत कुछ है जो घटित हो चुका है उसे जानकर ही कहानी को पूरा जाना जा सकता है। फिर, धीरे धीरे पीछे की कहानी खुलती है, और वापस वर्तमान में आकर खत्म होती है। वहाँ पहुँचकर झमकू को ही नहीं बल्कि उसके साथ पाठक को भी असीम शांति मिलती है। “चौधरी का झुका सिर मुश्किल से उठा। आसमान में उमड़ती बादली चाँद को ढक रही थी। वह जल्दी-जल्दी हवेली की तरफ़ बढ़ा। उसके कानों में शूल-सी हँसी टकराई। उसने पलट कर देखा, झमकू पागल-सी खिलखिला कर हँस रही थी।” ‘बादली’ झमकू थी जिसने चाँद के दाग को ढ़क लिया थाऔर साथ में चाँद को भी। अपने इस पुरुषार्थ पर वह खिलखिला के हँस रही थी।

राजेन्द्र जी के यहाँ कहानियों के मामले में काफ़ी विविधता है। यह विविधता कहानी लिखने और कहने के ढंग में भी है और जो कहा जाना है उसे लेकर भी है। एक तरफ़ जैसाकि पहले भी कहा गया कि वे प्रेमचंद टाइप के कहानीकार हैं। जो, जो कहना चाहते हैं उस पर केन्द्रित रहते हैं। आलतू-फालतू के वर्णन और विवरण वहाँ नहीं होते। अब तक हमने जिन कहानियों पर बात की वे ऐसी ही कहानियाँ हैं। बेशक कहानी के देशकाल और पात्रों के भीतर के जज्बातों का चित्रण करने में वे काफ़ी समय लेते हैं। इससे पाठकों को कहानियाँ बहुत बेहतर ढंग से समझ आती हैं। पर सभी कहानियाँ इस तरह की कहानियाँ नहीं हैं। ‘अंतिम रामलीला’ अपने भीतर औपन्यासिक कलेवर लिये हुए हैं तो ‘दिल्ली के बादशाह के दुख’ बाणभट्ट की ‘कादंबरी’ का सा असर पैदा करती है।

‘अंतिम रामलीला’ आजादी के दौर का बहुत नया और देसी विश्लेषण प्रस्तुत करती कहानी है। अपने बीते इतिहास को देखने समझने की एक दम नई समझ देने वाली। यह हनुतपुरा गाँव की कहानी है। गाँव जो आजादी से पहले मुस्लिम तेलियों का गाँव होता था। यहाँ की जमीन में तिलहन, सरसों, मूँगफली की जबरदस्त खेती होती थी। उस इलाके की रानी साहिबा ने यह सब देख समझकर गाँव बसाया था। गाँव में खेती करने वाली जातियों के साथ-साथ तेलियों और विभिन्न शिल्पी जातियों को भी बसाया गया। सबसे ज्यादा काम फलाफूला तेलियों और रैगरों का था। खेती के लिए रेगिस्तान में चड़स की जरूरत थी। चड़स बनाने के लिए रैगरों की। जो बूढ़े और मरे बैलों का इस्तेमाल करके प्रकृति का इको सिस्टम बनाये रखते थे।  जल्द ही इन दोनों जातियों का वर्चस्व छा गया। उनकी हवेलियाँ बन गईं। गाँव बहुत खुशहाल था। गाँव में नहीं थे तो राजपूत, ब्राह्मण और महाजन। लेखक लिखता है कि बेशक देश गुलाम था पर गुलामी का दंश इस गाँव ने सीधे नहीं झेला थाऔर न ही किसी को ऊँच-नीच के कारण हटकार-फटकार की वेदना से गुजरना पड़ाथा। आपस में झड़पे हो जाती थीं पर उनपर जाति और धर्म का रंग नहीं था। पर यह सब बदल गया जब देश आजाद हुआ। भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, धीरे-धीरे बाहर की खबरें ( मुसलमानों पर अत्याचार और उनके द्वारा देश छोड़ कर जाने की ) तेलियों को बेचैन करने लगीं। अंतत: उन्होंने भी गाँव छोड़ कर जाने का निर्णय लिया। इसके बाद उनकी हवेलियों, मकानों और दुकानों को सरकार ने बाहर से आए ब्राह्मणों और बनियों को सौंप दिया गया। ये ब्राह्मण और बनिये अकेले नहीं आए इनके साथ आई हिन्दू धर्म की विभाजनकारी नीति। पहली बार गाँव वालों को पता चला कि कौन जात ऊँची है और कौन नीची।  इस तरह से राजेन्द्र सजल जी यह कहना चाहते हैं कि बेशक विभिन्न पेशों पर आधारित जातियाँ भारतीय गाँवों की सच्चाई है पर उनके बीच मनुस्मृति के विभाजन कारी सिद्धान्त बाद में थोपे गए। यह सब भारतीय गाँवों पर अंग्रेजों के समय, आजादी के दौरान विकसित हुआ। वे कहना चाहते हैं कि भारतीय गाँवों का जातीय वैर-भाव बनियों और ब्राह्मणों का पैदा किया हुआ है। क्योंकि अंग्रेजी शासन और छापेखाने के विकास ने न केवल लिखे शब्द की कीमत बढ़ा दी बल्कि उन जातियों की सामाजिक आर्थिक हैसियत भी बहुत बढ़ गई जो परपंरा से लिपि पढ़ना और लिखना जानती थीं।  उन्होंने रातोरात नए नए शास्त्र रच कर ऐसे प्रचारित कर दिये कि जैसे वे हमेशा हमेशा से जन सामान्य में मान्य थे।  खैर कहानी में केवल इतना ही नहीं है। वह रैगरों के अपने हक और  संघर्ष की कहानी भी है। कहानी का वितान बहुत विस्तृत और व्यापक है।  बनियों और ब्राह्मणों के बीच की राजनीति भी है। ब्राह्मणों की मक्कारी और बनियों की चतुराई भी है। गाँव की छोटी बड़ी करार कर दी गई जातियों के बीच फूट की राजनीति भी है।  सबसे बड़ी बात है गाँव के सरपंच ( जो जात से रैगर है।)  द्वारा ब्राह्मणों और बनियों की इस राजनीति और चतुराई को समझ कर उसका ऐसा तोड़ निकालना की वह शातिरपना बेअसर हो जाए। गाँव में चुनाव होते हैं और ब्राह्मण और बनियों की सारे षड़यंत्र के बाद भी चूहे रैगर का बेटा सरपंच बन जाता है। अब ब्राह्मणों और बनियों ने यह देख लिया है कि लोकतंत्र के चलते उन्हें राजनैतिक सत्ता सभी जातियों के साथ बाँटनी पड़ेगी। कहानी में ब्राह्मणों के नेता आचार्य जी और बनियों के नेता सेठ धनपत जी की बातचीत का नमूना देखिये।बनियों का नेता सेठ धनपत आचार्य जी से कहता है कि… “यह तो निश्चित है कि अब सत्ता मंदिर से निकलकर खेत-खलिहानों और कांकड़ पर बसी बस्तियों में चली जाएगी और हम देख रहे हैं, आज़ादी के बाद से ही कई संगंठन बन गए हैं। आए दिन उनके नेता राजनैतिक जागरुकता के लिए सभाओं का आयोजन करते रहते हैं। ऐसे में अब न तो उनको धर्म और शास्त्र का हवाला देख आप नियंत्रित कर सकते हैं और न ही अछूत कहकर किसी को बहिष्कृत कर सकते हैं।” आचार्य जी जवाब देते हैं “नहीं, ऐसा नहीं है। धर्मस्थलों का सत्ता शून्य होने का अर्थ है, निष्प्राण होना और यह कभी संभव नहीं है। हाँ, कभी कभी सत्ता अपने मार्ग से भटक जाती है। यह एक जंगली हथिनी की तरह होती है, जो न तो अनाड़ियों के काबू में आती है और न ही अपना पुराना आवास भूलती है, देखना एक दिन फिर लोट आएगी।” इसके लिए वे पूरी योजना बनाकर काम करते हैं। सबसे पहले गाँव के पिछड़ी जातियों (किसानों) और दलित जातियों के बीच एक दूसरे के खिलाफ़ एक नए संघर्ष को जन्म दे देते हैं। और दूसरी और धर्म को खाने कमाने का धंधा  बनाते हैं और गाँव वालों का आर्थिक शोषण करते रहते हैं। गाँव में होने वाली रामलीला केवल भगवान राम की लीला नहीं बल्कि बनियों और ब्राह्मणों की लीला है। गाँव की किसान जातियों और दलित जातियों के बीच रामलीला में ज्यादा से ज्यादा दान देने का कंपीटिशन करवा के दोनों से न केवल रुपये ऐंठते हैं बल्कि दोनों के बीच कभी न मिटने वाली विभाजक रेखा भी खींचते हैं। वर्तमान भारत में हम यह देखते ही हैं कि दलितों को जाति के नाम पर प्रताडित करने वाले ज्यादातर पिछड़ी किसान जातियों के ही लोग हैं। इस कहानी में  गाँव का सरपंच जो एक पढ़ा लिखा दलित युवक है इस चाल को समझ जाता है और वह रातोंरात उस रामलीला मंडली का तंबू वहाँ से उखड़वाकरफेंक देता है।और फिर कभी उस गाँव में रामलीला न करवाने का निर्णय लेता है। यहाँ आकर कहानी खत्म होती है।  वास्तव में मैंने जैसा कहा कि कहानी का कथानक इतना विस्तृत और व्यापक है कि उस पर उपन्यास लिखने की जरूरत थी। यूँ  भी कहानी पचास पेज तक फैली है। कहानी को पढ़ते हुए बार-बार पिछले पन्नों पर लौटने की जरूरत होती है। इतने सारे पक्ष और झरोखें हैं कि बहुत कुछ एक साथ मौजूद है। पाठक ‘जय भीम’ भी सुनता है। रैगरों के लिए ‘गंगापुत्र’ होने की व्याख्या भी सुनता है। हिन्दू-मुसलमान भी है तो गाँव के वे मुहावरे जो इस कहानी को उस गाँव विशेष हनुतपुरा की कहानी बनाते हैं।

“हो ग्यो म्याऊँ को सो मूँडों

थारी शान बिगड़गी जी

आंटी मूँछयाळी बालम

थारी ढीली पड़गी जी”

‘दिल्ली के बादशाह के दुख’ कहानी मृणाल पाण्डे के उपन्यास ‘हिमुली हीरामन की कथा’ की याद दिलाती है। दोनों कहानियों का कथानक वर्तमान की राजनीति और राजनैतिक हस्तियों पर केन्द्रित है। यह वास्तव में अपने समय के राजनैतिक इतिहास को लिखने का परंपरागत भारतीय अंदाज है।  स्वयं पत्रिका के संपादक संजीव चंदन की कुछ कहानियों में कथा कहने का यह अंदाज मिलता है। इसमें लेखक सूत्रधार य़ा नट और नटी की तरह कहानी सुनाना आरंभ करते हैं। “एक राजा था। लोगों का मानना था कि वह राजा कम बादशाह ज्यादा था। अत: वह बिना किसी बहस में पड़े यह घोषित कर चुका था कि जिसको जैसा लगे, मान सकता है उसको कोई आपत्ति नहीं हैं। ‘राजा साहब कहो या फिर बादशाह सलामत। फिर भी जब किसी के मुख से वह ‘जहाँपनाह ! संबोधन सुनता तो छाती दूनी हो जाती थी।” यह सबकुछ बहुत व्यंजना परक है।कथा लोककथा की तरह कही गई है। पर लेखक बराबर यह आग्रह करता रहता है कि यह कहानी सच्ची कहानी है।वास्तव में यह लोककथ कहने का ढंग ही है। “कहानी को आगे बढ़ाने से पहले मैं यह बताना उचित समझता हूँ कि यह कहानी मुझे मेरे दादाजी ने सुनाई थी। उस वक्त मेरे और दादाजी के बीच जो संवाद हुआ वह उतना ही रोचक और जरूरी है जितनी कहानी है।” किसी लोककथावाचक की तरह लेखक भी यह दावा करता है कि यह कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह सुनाई जाती रही है। कहानी की सच्चाई के बारे में दादाजी कहते हैं कि “हाँ, मैं तुम्हें यह जरूर बता दूँ कि यह कहानी एक सच्ची कहानी है। भले ही इतिहास के पन्नों में इस कहानी के पात्रों और घटनाओं का कहीं जिक्र नहीं मिलेगा, किंतु एक सच्ची कहानी की यह विशेषता होती है कि जो भी उसको पढ़ता है या सुनता है वह उसकी अपनी हो जाती है। उसको लगता है कि यह मेरी या फिर मेरे समय की कहानी है।…” और सच में जब पाठक इस कहानी को पढ़ता है। तो अपने समय के राजनैतिक गलियारों में पहुँच जाता है।  इस तरह की कहानियाँ जो अपने समय के शासन और शासक की सच्चाईयों को अपने कथानक के दायरे में लेकर आती हैं वहाँ लेखक को यही शैली अपनानी पड़ती है। इस तरह की कहानियाँ इसी तरह लोककथा शैली में जादुई यथार्थ की तकनीक से कही जाती हैं। इस तरह की कहानियों में लेखक का ध्यान देशकाल और वातावरण को उसके यथार्थ में पकड़ने पर नहीं रहता। वह विवरण नहीं देता। वहाँ एक के बाद एक घटनाएँ कहानी को आगे बढ़ाती हैं। और पाठक बिना कोई सवाल किये कुतुहलवश आगे बढ़ता रहता है। यहाँ कहानी के भीतर एक नई कहानी है। बिल्कुल अलिफ़ लैला की तरह। हाँलाकि यहाँ आधुनिक कहानी का पक्ष कमजोर पड़ता है।

एक और कहानी है ‘कोख कोठरी और अनसुलझा रहस्य’।रहस्य और रोमांच से भरी यह कहानी राजेन्द्र सजल की कहानी कला का एक और नमूना है। जहाँ ‘मास्टर माई’ जैसी कहानियों में लेखक प्रेमचंद सरीखा कहानी को बहुत खोल कर एक एक बात समझाकर कहने वाला कहानीकार दिखता है वहीं इस कहानी में लेखक पूरी कहानी संकेतों में कहता है। उन संकेतों को पकड़कर और खोल पाने में सफ़ल होकर पाठक को एक अलग ही तरह का आनंद मिलता है। कहानी में एक नवाब साहब हैं जिनकी दो बीबियाँ हैं और है एक उनका घरेलू नौकर। बढ़ती उम्र के नवाब साहब की बीबियों से नौकर से बढ़ती नजदीकियाँ जहाँ नवाब साहब को बाप बनने का सुख देती हैं वहीं नवाब साहब का खानदानी खून उस नौकर की मौजूदगी से बार बार पछाड़ खा खाकर गिरता और उठता रहता है। उसी के कारण नवाब साहब भारत छोड़ कर पाकिस्तान जाने का निर्णय करते हैं। पर छोटी बीबी हैं कि वह उस नौकर को भी साथ लेकर चलना चाहती है।इसकी क्या वजह है इसे भी संकेतों में कहा गया है। अंत तक यह रहस्य सुलझ ही नहीं पाता कि असल में पाकिस्तान कौन दो लोग गए और किन दो लोगों को वहीं मारकर हवेली में ही बंद कर दिया गया। पाठक यहाँ अपनी सुविधा से कहानी को जिस तरह पढ़ना चाहें पढ़ सकते हैं। हो सकता है कि हवेली में मिलीं लाश छोटी बीवी और उस नौकर ही हो क्योंकि नवाब साहब उस नौकर को अपने साथ पाकिस्तान नहीं लेकर चलना चाहते थे, क्योंकि उसके सामने रहने से उन्हें हमेशा अपने नामर्द होने की याद आती रहेगी। हो सकता है वह लाश बड़ी बीबी और उस नौकर की हो क्योंकि उसबड़ी बहु का ही तो अवैध संबंध उस नौकर से था। यह भी तो हो सकता है कि वह लाश स्वयं बड़ी बीबी और नवाब साहब की ही हो, कहीं छोटी बीवी ने नौकर के साथ मिलकर उन दोनों की हत्या कर दी हो।  पाठक जिस दिशा में चाहे सोच सकता है, उसी के अनुसार उसे तर्क कहानी में मिल जाएँगे। इस तरह यह कहानी लगातार उसके जेहन में बनी रहेगी। यह इस कहानी की बहुत खास विशेषता है। इसके अलावा भारत पाकिस्तान के बँटवारे की पृष्ठभूमि में इस कहानी को जो खड़ा किया गया है उससे कहानी सच्ची होने का पूरा आभास देती है। बल्कि उसी के कारण कहानी जिंदा हो जाती है।  प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्णकुमार ने अपने एक व्याख्यान में बच्चों को कहानी से कैसे जोड़ें इस मुद्दे पर विचार करते हुए कहा कि कहानी इस तरह कही चाहे कि बच्चों को कहानी, सच्ची लगे।  इसके उदाहरण के लिए उन्होंने अपने एक प्रयोग के बारे में बताया कि कैसे एक स्कूल के छोटे बच्चों को उन्होंने एक बार ‘बुढ़िया की रोटी’ कहानी सुनाई जिस दिन कहानी समाप्त हुई उस दिन वे अपने साथ रात की बासी रोटी ले गए और ले जाकर उस रोटी को उन्होंने यह कहकर अपनी मेज पर रख दिया कि यह उसी बुढ़िया की वही रोटी है जिसे कव्वा ले गया था।  बस फिर क्या था वह कहानी जैसे बच्चों के लिए जिन्दा अनुभव हो गई। वे उस रोटी को उसी विश्वास के साथ देख रहे थे हो न हो यही वह रोटी है। क्योंकि वह रोटी साक्षात सामने थी इसलिए उन्हें बुढ़िया और कव्वे की लड़ाई पर पूरा भरोसा हो गया। ठीक यही काम राजेन्द्र सजल जी ने अपनी इस कहानी के साथ किया कोख कोठरी और अनसुलझे रहस्य को भारत-पाकिस्तान के विभाजन की सच्ची घटना के बीच पिरो दिया।

रघुवीर सहाय की कविताओं में अभिव्यंजित कथा संसार

सुमित कुमार चौधरी

रघुवीर सहाय ‘दूसरा सप्तक’ में शामिल ऐसे विरले कवि हैं जिनकी कविताएँ स्वतंत्र भारत का दस्तावेजीकरण करती हैं । इनकी कविताएँ यथार्थ का देखा हुआ कटु सत्य का रूप लेकर भारतीय जन मानस की व्यथा का चलचित्र प्रस्तुत करती हैं । यूँ तो रघुवीर सहाय की कविताओं में अक्सर कथा का चित्र उभरता नज़र आता है, पर यह चित्र या चरित्र किसी खास नायक का प्रतिनिधि नहीं होता है । वह आम जनसाधारण के रूप में आया हुआ चरित्र होता है । उनके ईद-गिर्द से लिया गया । यही उनकी कविता का केन्द्रीय तत्व है । नायक है । यह नायक नयी कविता या उसे पूर्व की कविता से बिल्कुल भिन्न है । वह इसलिए कि इनकी कविताएँ अधिकतर घटना प्रधान होकर कथ्य की बुनावट में प्रस्तुत होती हैं । वे लोकतांत्रिक मूल्यों के विध्वंसकारी नीतियों और बिडम्बनाग्रस्त विसंगतियों का वास्तविक चित्र खींचते   हैं । ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता कथा की शक्ल में उसी की बानगी है । सुरेश शर्मा ने ‘रघुवीर सहाय रचनावली’ के पहले भाग की भूमिका में लिखा है, “ ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताएँ रघुवीर सहाय के सिर्फ अपने अतीत से मुक्ति की कविताएँ नहीं हैं बल्कि पूरी काव्य परम्परा के यथास्थितिवादी माहौल से मुक्ति की कविताएँ हैं । उनमें नयी कविता के बाद ‘अकविता के ध्वंसवादी मूल्य और आत्महत्य की घोषणाओं के विरुद्ध एक जिम्मेदार हस्तक्षेप है ।”1 ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता अपने पूरे परिदृश्य में इसी विसंगति और विडम्बना को व्यक्त करते हुए जनसाधारण के जीवन को खबर की भाषा में पूरे नाटकीय अंदाज में प्रस्तुत करती है । इसमें चरित्रों का संगठन तात्कालीन राजनैतिक परिवेश को उद्घाटित करते हुए गहरे अर्थों में कथा की निर्मिति में सहायक होकर लोकतांत्रिक मूल्यों की ख़बर लेती है । एकदम खबर की शैली में होते हुए । सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की पेंच को उखाड़‌कर रख देती है-

“समय आ गया है जब तब कहता है सम्पादकीय

हर बार दस बरस पहले मैं कह चुका होता हूँ कि समय आ गया है ।

 

एक ग़रीबी, ऊबी, पीली, रोशनी, बीबी

रोशनी, धुन्ध, जाला, यमन, हरमुनियम अदृश्य

डब्बाबन्द शोर

गाती गला भींच आकाशवाणी

अन्त में टड़ंग ।”2

गौर करने वाली बात है कि ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता की शुरुआत पहली पंक्ति से ही अख़बारी बयान से शुरू होती है जबकि कविता की दूसरी पंक्ति में कवि वह सारी बातें पहले कह चुका होता है, जो दूसरी पंक्ति के बाद कविता में आयी है । गरीब, गरीबी से ऊबी जनता, जनता का मटमैला शरीर, घर की स्त्रियाँ या यह कह लें कि परिवार नामक संस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली-बीबी । धुन्ध में सना हुआ परिवेश, जाला लगा हुआ या जाले में फँसा हुआ समाज और अदृश्य ध्वनि शोर में बदल चुके हैं, जिसमें आकाशवाणी भी गला भींचकर जनता से संपर्क करती है । रघुवीर सहाय की यह दृष्टि उनकी कविता का कथ्य होकर कथा के रूप में ढलती है । यह शोख़ी उनकी कविता की कथात्मक में शामिल होकर भारतीय जीवन के रंग-रूप की सूरत बयान करती है । कवि भारतीय राजनीति में व्याप्त धूर्त, भ्रष्ट और काइयाँ लोगों का परिचय करवाता हुआ ‘मुसद्दीलाल’ जैसे पात्र से अवगत कराता है-

“नगर निगम ने त्यौहार जो मनाया तो जनसभा की

मन्थर मटकता मन्त्री मुसद्दीलाल महन्त मंच पर चढ़ा

छाती पर जनता की”3

यानी जनता की छाती पर चढ़ा यह मुसद्दीलाल जैसा व्यक्तित्व हमारे राजनितिक दलाल का भ्रष्ट चरित्र है । वस्तुत: यह भ्रष्ट चरित्र हमारे समाज का प्रतीक मात्र है । इस तरह के चरित्र अपनी हरकतों से कभी बाज नहीं आते । इन्हीं लोगों की पैरवी से अस्पताल से लेकर, कोटा, सुविधाएँ, शिफ़ारिश तक उसी के मातहत होता है । यह स्थिति भारतीय जन‌मानस बहुत बारीकी से जानता और समझता है-

“दोनों, बाप मिस्तरी, और बीस बरस का नरेन

दोनों पहले से जानते हैं पेंच की मरी हुई चूड़ियाँ

नेहरू-युग के औज़ारों को मुसद्दीलाल की सबसे बड़ी देन”4  

मुसद्दीलाल जैसे चरित्र भारतीय राजनीति या नेहरूयुग की राजनीति के लोकतंत्रीय प्रणाली को दीमक की तरह चाट जा रहे हैं । यह अराजक व्यवस्था केवल नेहरूयुग की भयावहता को ही नहीं दर्शाता बल्कि कवि की दूरगामी दृष्टि वर्तमान और भविष्य को भी रेखांकित करती है । इस तरह का अनैतिक चारित्रिक पतन भारतीय परिवेश में इस तरह पसर गया है कि अस्पताल में भी कोई व्यक्ति सुरक्षित महसूस नहीं कर पाता  है । एक उदाहरण देखिए-

“अस्पताल में मरीज़ छोड़कर आ नहीं सकता तीमारदार

दूसरे दिन कौन बतायेगा कि वह कहाँ गया ।”5

ध्यान देने वाली बात यह है कि नयी कविता में इस तरह की संवेदनात्मक कविता नहीं मिलती । इस नयी पद्धति या संवेदन शैली की कविता ‘गायब होता देश’ की ओर संकेत करती है । अपने पूरे कथ्य-रूप में यह पूर्व की कविताओं से इकदम भिन्न और नये मिज़ाज की कविता है । ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की इसी अख़बारी विशिष्टता को रेखांकित करते हुए रामस्वरूप चतुर्वेदी ने लिखा है, “अख़बार, राजनीति, दैनंदिन जीवन-ये सामान्यत: कविता के प्रतिरोधी रूप माने जाते रहे हैं । उनके लिए गद्य और कथा-साहित्य ही उपयुक्त माध्यम समझे गये हैं । रघुवीर सहाय एक साथ इस व्यापक अनुभव परिवेश को बिना किसी ऊपर से दिखते उद्यम या कि प्रदर्शन के कविता बना देते हैं ।

यही चेतना ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में एक नयी अटपटी शैली में फैली है । टूटे फूटे, अलग थलग बिंबों में सामान्य जीवन की व्यवस्था नहीं बल्कि क्रूर अव्यवस्था का चित्र यहां प्रस्तुत किया गया   है । रोशनी, धुंध, जाला, यमन, हरमुनियम अदृश्य, ‘अकादमी की महापरिषद की अनंत बैठक’, ‘मंथर मटकता मंत्री मुस‌द्दीलाल’, ‘एक फटा कोट एक हिलती चौकी एक लालटेन’, ‘अंग्रेजी की अवध्य गाय’, ‘मुन्न से बोले बिनोवा से जैनेन्द्र’, ‘भौचक भीड़ धांय धांय’, ‘समय आ गया है’- ऐसे टुकड़े  समकालीन परिदृश्य को उतना उकेरते नहीं जितना सुझा देते हैं । इन टुकड़ों में अर्थ निश्चित नहीं, हां सहानुभूति निश्चित है । पूरी कविता के केन्द्र में जनता या कि लोग हैं जो हर अर्थ में कवि के लिए एक ‘मुश्किल’ हैं ।”6  

‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता में कथा वाचक के रूप में कवि स्वयं उपस्थित है । भारतीय राजनीति के शिकार होते हुए जन की व्यथा को बहुत सजग होकर उद्‌घाटित करता है । वह अपने चारों ओर घट रही घटनाओं की विद्रूपता को भलीभाँति देख लिया है । तभी उसे बेचैनी छायी हुई है । वह ‘चिकनी पीठ’ वाले उदास व्यक्ति के पीठ पर हाथ नहीं रख पाता । यह बदतर हालत देखकर वह हृदय विदारक हो जाता है । फिर भी वह विद्रोही स्वर में बोल उठता है-

“कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा

न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का मेरे अन्दर एक कायर टूटेगा टूट

 

मेरे मन टूट एक बार सही तरह

अच्छी तरह टूट मत झूठमूठ ऊब मत रूठ

मत डूब सिर्फ टूट…”7  

कवि की यह निडर भावना कथा की वैचारिक नींव साबित होती है, क्योंकि कवि की यह धारदार ललकार ‘अंदर का कायर टूटने’ से ही ‘सत्ता के तिलिस्म’ को दरारे दे सकता है । कविता में इस तरह का वैचारिक आयाम कथा को समझने में महती भूमिका निभाता है । इस कविता के कथा को समझने के लिए ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता संग्रह के उस वक्तव्य को देखा जा सकता है जिसमें कवि लिखता है कि, “मैं कहानी, कविता या नाटक में बांटकर इस सवाल को आसान नहीं बनाना चाहता लेकिन इतना जरूर कहना चाहता हूँ कि तीनों में शब्द के तीन तरह के इस्तेमाल की वजह से रचना की मुश्किलें हमें तीन तरफ ले जाती          हैं ।……सबसे मुश्किल और एक ही सही रास्ता है कि मैं सब सेनाओं में लड़ूँ-किसी में ढाल सहित, किसी में निष्कवच होकर- मगर अपने को अंत में मरने सिर्फ अपने मोर्चे पर दूँ- अपनी भाषा के, शिल्प के और उस दोतरफा जिम्मेदारी के मोर्चे पर जिसे साहित्य कहते हैं ।”8 गौरतलब है कि रघुवीर सहाय के इस वक्तव्य से यह  स्पष्ट होता है कि वे ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ के लिए तीन मुश्किलों में से शिल्प का एक अलग रास्ता चुनते हैं । यानी अपनी आँखों-देखी चल-चित्र को व्यक्त करने के लिए ख़बर का रास्ता चुनता है । इस शैली या शिल्प में उपरोक्त वक्तव्य में वे तीनों विधाएँ शामिल हैं जिनको कवि विभेद कर देखने से बचता है, और होता यह है कि ख़बर की शिल्प अपने आवरण में कथा के रूप को धारण करती चलती जाती है । चूँकि कवि की संवेदना लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था के प्रति सचेत है । वह भाषा और शिल्प में यथार्थ को फेटकर जस का तस पेश कर देता है । शोषण, दमन और अत्याचार के गहराते रूप-चित्र को समग्रता में प्रस्तुत कर देता है । डॉ. माहेश्वर ने लिखा है कि, “रघुवीर सहाय कविता के मुख्य आशय के साथ आसपास के परिवेश में से संदर्भित तमाम छोटे-छोटे दृश्यखण्ड एकत्रित करते हैं और उन्हें कविता की केन्द्रीय संवेदना के आसपास फैला देते हैं । कविता का केन्द्रीय आशय उन छोटे-छोटे दृश्यखण्डों के बीच में से कहीं-कहीं चकाचौंध पैदा करता हुआ सा उभर आता है और उसके आलोक में वे तमाम धूमिल दृश्यखण्ड सार्थक तथा संदर्भगत दिखाई देने लगते हैं ।”9 यानी रघुवीर सहाय ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता में या यूँ कह लें कि उनकी कविताओं मे विराट भीड़ से उन चरित्रों और खण्ड-खण्ड दृश्यों का चुनाव करके उसे कथा की सूरत में ढ़ाल देते हैं । वस्तुतः यह स्थिति उनकी कविताओं में समय के मार से उपजी त्रस्त जनता की है, जिसमें लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण से उपजी हुई है । तभी वे कविता के अंत में कहते हैं-

“समय जो गया

मेरे तलुवे से छनकर पाताल में

वह जानता हूँ मैं ।”10

रघुवीर सहाय की कविताओं में चरित्र और चित्र का एक कोलाज देखा जा सकता है । उनके यहाँ घटना प्रधान कविताओं का बाहुल्य है । ऐसा नहीं है कि जिन कविताओं में घटनाएँ प्रमुख रूप से आयीं हैं वह कथा के मानिंद खरी नहीं उतरती । बल्कि इस तरह की कविताएँ कथा का रूप लेकर नये कवियों से भिन्न रूप ली हुई हैं । इसलिए रघुवीर सहाय के यहाँ कथा-नायक की जगह ‘चरित्र’ को केन्द्र में रखकर उसकी सार्वभौमिक महत्ता को पूरी संवेदना के साथ दर्ज़ करते हैं, जबकि अधिनायकवादी चरित्र  की महत्ता को अपने पैरो तले रौंदते हुए चलते चले जा रहे है । रघुवीर सहाय की एक कविता है ‘अधिनायक’ जिसमें ‘हरचरना’ भारत-भाग्य-विधाता का गुणगान करता है-

“राष्ट्रगीत में भला कौन वह

भारत-  भाग्य-  विधाता है

फटा सुथन्ना पहने जिसका

गुन  हरचरना  गाता  है ।”11

यह अधिनायकवादी चरित्र भारतीय राजनीति का है जिसमें एक व्यक्ति प्रतीक के रूप में ‘फटा सुथन्ना’ पहनकर पूरे जनसाधारण की व्यथा को व्यक्त करता है । यह साधारण जन अधिनायकवादी शासन व्यवस्था से इतना डरा हुआ है कि उसका ‘बाजा रोज बजाता है’ यानी वह हर क्षण व्यवस्था का  शिकार होता है । अर्थात् वह गुलामी प्रथा की बोझ से दबा है । यह छोटी सी कविता, जो सोलह पंक्तियों में सिमटी हुई है, वह हरचरना के माध्यम से आजाद भारत के बेहाली (साधारण जन) की कथा-व्यथा पूरी संवेदन रूप में प्रस्तुत करती है । इतना ही नहीं हत्या, अपराध की असल कथा कविता में रघुवीर सहाय बड़े निडर होकर लिखते हैं । वे ‘रामदास’ कविता में ‘रामदास’ की हत्या का ज़िक्र करते हैं कि हत्यारा ‘उसे बता दिया गया था कि उसकी हत्या होगी’ और यह हत्या, हत्या की शक्ल में बदल गई । यह हत्या किसी धनाढ्य व्यक्ति की नहीं बल्कि साधारण जन की हत्या है । एक की हत्या नहीं बल्कि बहुसंख्यकों को हत्या है । कवि यहाँ ख़ुद वाचक के रूप में होकर इस हत्या-अपराध को हूबहू दर्ज़ करता है । इस सिलसिलेवार कथा की कड़ी में अगर देखा जाय तो रघुवीर सहाय की तमाम ऐसी कविताएँ हैं जो कथा का रूप ली हुई हैं, जिसमें ‘रामदास’, ‘दयाशंकर’, जैसी कविताएँ शामिल हैं । इन कविताओं को  सही मायने में हम कथांश के रूप में देख सकते हैं । चूँकि रघुवीर सहाय के यहाँ ऐसे तमाम छोटे-छोटे चित्र, चलचित्र, दृश्य खण्ड, घटना उनकी कविता में कथात्मकता एवं कथांश का आवरण लिए हुए हैं । लीलाधर जगूड़ी ने अपने कविता संग्रह ‘महाकाव्य के बिना’ की भूमिका में लिखा है कि, “पहले और आज की कविता में यह लगभग एक ध्रुवीय अंतर है । अब कविता में नायक नहीं होते, व्यक्ति होते हैं । कोई स्थापित और लोक प्रचलित कथा नहीं होती । अनुभव और अनुभूति का आवेग ही अपने कथानक को रचता चलता है । घटनाएँ और स्थितियां ही बिम्ब बन जाती हैं । मनुष्य का व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन कई स्तरों पर विघटित व विकसित होता है । उनकी सघन और गहरी प्रस्तुति लंबे फॉर्म में ही संभव है ।”12 लीलाधर जगूड़ी के इस कथन को रघुवीर सहाय की कथा प्रधान कविताओं के सन्दर्भ में रखकर देखना सार्थक प्रतीत होता है । रघुवीर सहाय ही नहीं बल्कि सारे नए कवियों के यहाँ उक्त कथन की सार्थकता देखी जा सकती है । बहरहाल, रघुवीर सहाय नायक के मिथ को तोड़ते हुए ‘चरित्र’ की केन्द्रीयता को महत्व देते हैं । यह उन‌की कवि दृष्टि का संवेदन सूत्र है । चूँकि आजादी के बाद हमारे समाज में ऐसे तमाम चरित्र चारों ओर बिखरे पड़े हुए थे जिस पर गहरी दृष्टि रघुवीर सहाय ने डाली और हुआ यूँ कि साधारण जन कविता की केन्द्रीयता में उचित स्थान पाने लगें । जैनेन्द्र, रामदास, लोहिया, मुसद्‌दीलाल, बिनोवा, नरेन, प्रधानमंत्री, मंत्री, जैसे तमाम चरित्र कविता में आकर कथा तत्व की बुनावट में सहयोगी सिद्ध हुए ।

संदर्भ सूची-

  1. संपादक- सुरेश शर्मा, रघुवीर सहाय, रचनावली भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2000, पृ. सं. 19.
  2. 2. रघुवीर सहाय, आत्महत्या के विरुद्ध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1967, पृ. सं. 19.
  3. 3. वही, पृ. सं. 19-20.
  4. 4. वही, पृ. सं. 22.
  5. 5. वही, पृ. सं. 22.
  6. 6. रामस्वरूप चतुर्वेदी, नयी कविताएँ : एक साक्ष्य, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2015, पृ. सं. 42-43.
  7. 7. रघुवीर सहाय, आत्महत्या के विरुद्ध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1967, पृ. सं. 20-21.
  8. 8. संपादक- सुरेश शर्मा, रघुवीर सहाय, रचनावली भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2000, पृ.  सं. 103.
  9. 9. संपादक- नरेन्द्र मोहन, लंबी कविताओं का रचनाविधान, दि मैकमिलन कंपनी आफ इंडिया लिमिटेड, नई दिल्ली, 1977, पृ. सं. 144.
  10. 10. रघुवीर सहाय, आत्महत्या के विरुद्ध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1967, पृ. सं. 25.
  11. 11. वही, पृ. सं. 49.
  12. 12. लीलाधर जगूड़ी, महाकाव्य के बिना, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृ. सं. 8.

लेखक का परिचय – 
सुमित कुमार चौधरी
झेलम छात्रावास, 
शोधार्थी- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067

बहुरिया रामस्वरूप देवी

प्रियंका प्रियदर्शिनी
बिहार बलिदान की वह ऐतिहासिक धरती है जिसने जंग-ए-आज़ादी में ईंट का जबाब पत्थर से दिया है। आज़ादी के दीवानों ने गांधी के सत्याग्रह को तो अपनाया ही साथ में क्रांतिकारी तेवर को भी अपनाए रहे। यही कारण रहा की बिहार की धरती पर गांधी व भगतसिंह दोनों के कदम पड़े।
1857-1947 के बीच हुए स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न आंदोलनों में महिलाएं मजबूती से डटी रही हैं। हजारों-हजार महिलाओं ने शहादत दी तब जाकर देश ने आज़ादी पाई है। भारत की आज़ादी के लिए देश में दो प्रमुख रास्ते बन गए थे। एक रास्ता गांधी व कांग्रेस के साथ जाता था तो दूसरा भगतसिंह के हथियारबंद क्रांतिकारी मार्ग पर। बिहार की महिलाएं दोनों रास्तों पर चलीं। क्रांतिकारी मार्ग पर चलने का ही नतीजा था कि बिहार के छपरा जिले के मलखाचक गांव के क्रांतिकारी पुरुष राम विनोद सिंह का घर डायनामाइट से उड़ा दिया गया और छपरा की ही क्रांतिकारी तेवर की महिला ‘बहुरिया रामस्वरूप देवी’ के घर को भी अंग्रेजों ने आग के हवाले कर दिया था।
देश के इतिहास में केवल एक लक्ष्मीबाई की चर्चा की गयी और बाकियों को भुला दिया गया। बिहार की महिलाओं के इतिहास को उठाकर देखने पर पता चलता है यहां हजारों लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ और हजारों बलिदान दिए गए। यहां शहादत देने वाली महिलाओं के समक्ष कोई राज-पाठ नहीं था, थी तो केवल देशभक्ति की भावना। अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस और निःसंकोच आज़ादी की बलि बेदी पर प्राण न्योछावर करने का दृढ़ संकल्प। बिहार में ऐसी ही क्रांतिकारी तेवर की एक महिला हुईं ‘बहुरिया रामस्वरूप देवी’। बहुरिया रामस्वरूप देवी वह महिला थीं जिन्होंने बिहार में क्रांतिकारी तेवर की अगुआई की। उस निडर और बहादुर महिला ने न तो कभी स्वयं को अंग्रेज़ो के समक्ष झुकने दिया न ही उनसे डरकर अपने प्रण से पीछे हटी। अपने लक्ष्य में दृढ़ता से लगी रही और 18 अगस्त 1942 को छपरा के मढौरा थाने पर राष्ट्रीय ध्वज(तिरंगा) फहराया। गंगा जिस धरती को सिंचित करती हो वहाँ की फसलें और नस्लें दोनों कमाल करती हैं। शायद यही कारण रहा कि पर्दे में रहने वाली महिलाएं जब घरों से निकलीं तो गंगा का ओज और वेग साथ लिए निकलीं। रूढ़िग्रस्त और सामंतवादी ताकतें भी उनकी धारा नहीं मोड़ पायीं।
बहुरिया का जन्म भागलपुर जिले के कहलगांव थानांतर्गत बसे मुहान गांव में हुआ था। पिता श्री भूपनारायण सिंह भागलपुर जिले के ज़मीदार थे। बहुरिया का बचपन तो जमीदारी ठाट-बाट में बीता लेकिन बड़ी होने पर उन्होंने अपने लिए क्रांति का कठिन मार्ग चुना। अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी भाषाओं की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें दी गयी थी। पिता अपनी पुत्री को शिक्षित करना चाहते थे इसलिए उन्होंने बहुरिया को आगे भी पढ़ाया-लिखाया। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण किया और व्यवहारिक विषयों की शिक्षा में भी निपुण हुईं। बाल विवाह के उस दौर में रामस्वरूप देवी का विवाह भी नौ वर्ष की आयु में छपरा स्थित अमनौर के श्री हरमाधव प्रसाद से करा दिया गया। पिता के घर की ही तरह पति का घर भी सम्पन्न माना जाता था। अमनौर के जमींदार परिवार में उनका विवाह हुआ था। पति हरमाधव बाबू देशभक्त निकले, वे आज़ादी के आंदोलनों में भाग लेते थे व आज़ाद ख़याल व्यक्ति थे। लेकिन ससुराल के बाक़ी सदस्य परंपरागत पर्दे को मानने वाले थे। ससुराल में पति के प्रगतिशील विचार व व्यक्तित्व ने बहुरिया जी को सहज बनाया। ऐसा माना जाता है कि वह बचपन से ही क्रांतिकारियों की टोली में रहती थीं और उनके कामों में हाथ बटाती थीं। उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य भी पढ़ रखा था। शादी के पश्चात वह पति के साथ भी हर सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने लगीं।
विभिन्न आंदोलनों में बहुरिया जी की भागीदारी
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ब्रिटिश गुलामी के ख़िलाफ़ भारत में महत्वपूर्ण आंदोलन हुए, उन आंदोलनों में महिलाएं सक्रिय रूप से अपना योगदान दे रही थीं। रामस्वरूप देवी ने हुकूमत के विरुद्ध हुए तीन महत्वपूर्ण आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने सन 1921 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में, 1931 के नमक सत्याग्रह व 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था।
1921 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में रामस्वरूप देवी ने अपनी साहस और शिक्षा का परचम लहराया। ऐसा माना जाता है कि पूर्व बिहार से लेकर पश्चिम बिहार के कई क्रांतिकारी दलों के साथ उनका संबंध था, वे गुप्त रूप से क्रांतिकारियों की मदद करती थीं व उन्हें संरक्षण देती थीं। इस आंदोलन में वो खुलकर सामने आयीं और अंग्रेजी शासन को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए सत्याग्रह में शामिल हो गयीं। उन्होंने गांव-गांव में जाकर युवकों व महिलाओं के बीच राष्ट्रीय चेतना की चिंगारी भड़काई। इस अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के दौरान उन्हें बंदी बनाकर भागलपुर जेल में डाला गया था। बाद में जब उन्हें रिहा किया गया तब वे और अधिक जोश के साथ आंदोलनों में सक्रिय हो गयीं। 1921 ई. में गया जिले में अखिल भारतीय नारी कांग्रेस अधिवेशन का आयोजन किया गया था। बहुरिया जी के मजबूत इरादों व कुशलता से लोग पहले ही प्रभावित थे, उन्हें इस सभा के संचालन की जिम्मेदारी दी गयी। उन्होंने अधिवेशन में उत्तेजक भाषण दिए और लोगों को अंग्रेज़ो के विरुद्ध एकजुट होने को कहा। भारत की औरतों के लिए बहुरिया का संदेश था, “मर्दों की गुलामी से मुक्त होने के लिए यह आवश्यक नहीं कि उद्दंडता से काम लें। अपने कर्तव्य को पहचान कर आगे बढ़ो। यह मत भूलो कि तुम नारी हो और ममतामयी मां हो। हां! नारी व मां की आड़ में सुरक्षा ओढ़कर बेकार मत बैठो। एक पहिये की गाड़ी कितना रास्ता तय करेगी? दूसरा पहिया उसमें जुड़ना ही चाहिए। वह इतने स्वस्थ रूप में जुड़े कि जरा सा भार पड़ने पर चरमरा न जाए।”
बहुरिया के ये शब्द महिलाओं में ऊर्जा भर रही थी और अंग्रेज सिपाहियों के दिलों में खौफ़। एक महिला से खौफ़ खाने का ही वह मंजर था कि अधिवेशन के बाद उन्हें तीक्ष्ण व भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।  गिरफ्तारियां बहुरिया को कभी डरा नहीं सकी न ही उन्हें उनके लक्ष्य से डिगाने में सफल हुईं। वे छपरा जिले में लगातार सक्रिय रहीं। अंग्रेजों के विरुद्ध होने वाली लड़ाइयों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल रहीं। 1930 के नमक सत्याग्रह आंदोलन के वक्त वे अपने जिले में एक प्रभवशाली महिला के रूप में उभरीं। यह वह समय था जब सम्पूर्ण भारत में नमक आंदोलन ने क्रांति की लहर पैदा कर दी थी। महात्मा गांधी ने दांडी से सत्याग्रह की शुरुआत की थी और वह सत्याग्रह दक्षिण से शुरू होकर पूरे उत्तर भारत में फ़ैलने लगा था। अनेक सत्याग्रहियों पर लाठी बरसाए जा रहे थे, उन्हें जेलों में बंद किया जा रहा था। आंदोलनकारियों व नमक कानून भंग करने वालों को बंदी बनाया जा रहा था। इस क्रांति की लहर में क्रांतिकारी तेवर वाली बहुरिया जी का पीछे रहना मुश्किल था। वे पति के साथ नमक सत्याग्रह में शामिल हुईं। इस आंदोलन में उनके पति श्री हरिमाधव प्रसाद की गिरफ्तारी हुई। पति की गिरफ्तारी ने उन्हें आक्रोशित किया और उनके सब्र का बांध तोड़ दिया। अब बहुरिया गांवों में घूम-घूमकर लोगों को आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने को कहने लगीं। उन्होंने महिलाओं को आह्वान किया और कहा “उठो, जागो मेरी बहनों। जब देश पर संकट आ पड़ा हो तो हमें घर के भीतर रहना शोभा नहीं देता।” बहुरिया के इन प्रयासों और ख़िलाफ़त से अंग्रेजी सरकार घबराने लगी थी, अतः उसने बहुरिया को भी 1 जनवरी 1931 को जेल में डाल दिया।
इस बार जब बहुरिया जी को गिरफ्तार करके भागलपुर सेंट्रल जेल ले जाया जा रहा था तब एक ऐसी घटना घटी जिसे इस बात का सबूत माना जाना चाहिए कि रामस्वरूप देवी के विराट व्यक्तित्व की गहरी छाप जनता के मन पर थी-
आशारानी व्होरा ने अपनी पुस्तक ‘महिलाएं और स्वराज्य’ में लिखा है कि रामस्वरूप देवी को गिरफ्तार कर के जिस गाड़ी से जेल ले जाया जा रहा था, जनता उसके आगे लेट गयी और गाड़ी को रोक लिया। अंग्रेजी सिपाहियों के बहुत कोशिश के बाद भी जब जनता हटने को तैयार न हुई तो उनके अफसर ने भीड़ को कुचलकर गाड़ी निकाल लेने का आदेश दिया। अब स्थिति इतनी गंभीर हो गयी थी कि बहुरिया जी से चुप न रहा गया। उन्होंने उस अंग्रेज अफसर से चीखकर पूछा, ‘क्या मेरी इच्छा के बिना आप मुझे एक कदम भी आगे ले जा सकते हो? जब अंग्रेजी अफसर ने कोई जबाब नहीं दिया और निरुत्तर खड़े रहे तब उस दृढ़ संकल्पित महिला ने जनता का आह्वान किया, “मेरे वीर भाइयों, यह कैसी वीरता दिखा रहे हैं आप? यह वीरता नहीं नादानी है। सोचो तो, स्वर्ग से बढ़कर हमारी मातृभूमि आज गैरों के क़ब्जे में है। उसे छुड़ाने के लिए हजारों-लाखों नश्वर शरीरों के बलिदान की जरूरत है। यह मेरी गिरफ्तारी तो बहुत मामूली सी बात है। जाइये आपलोग भी आज़ादी की बलिबेदी पर न्योछावर होने के लिए तैयार रहिए।”
बहुरिया जी के कहने पर लोग उठकर एक तरफ खड़े हो गए। श्रद्धा से लोगों का माथा झुक गया और अंग्रेजी गाड़ी आगे बढ़ गयी। उनकी गिरफ्तारी से लोगों में क्षोभ था लेकिन अच्छी बात यह हुई की इसबार उन्हें अधिक दिन तक जेल में नहीं रहना पड़ा। गांधी-इरविन समझौते के तहत अन्य कैदियों के साथ उन्हें भी रिहा कर दिया गया।
छपरा क्रांतिकारियों की धरती रही है। यहाँ के महिला-पुरुष भगत सिंह के क्रांतिकारी विरासत के उत्तराधिकारी रहे हैं। यही कारण रहा कि रामस्वरूप देवी बलिदान की बातें इतनी सहजता के साथ कहा करती थीं।। उन्होंने मानो अपनी जान हथेली पर लेकर चलना मंजूर कर लिया था।  1937 ई. में बहुरिया जी के पति श्री हरिमाधव प्रसाद की मृत्यु हृदयाघात से हो गयी। पति की मृत्यु उनके लिए सिर्फ़ सुहाग का जाना नहीं था बल्कि उन्होंने अपना सबसे क़रीबी साथी को खोया था। पति की मृत्यु का दुःख असहनीय तो था लेकिन इस दुःख को बहुरिया ने कभी स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। क्योंकि वो जानती थीं की उन्होंने जो रास्ता चुना है वो बलिदानों की मांग करती है। उस विराटा स्त्री को अभी अपने जीवन के मुख्य लक्ष्य की प्राप्ति करनी थी जो अंग्रेजों को भारत से भागकर ही पूरी की जा सकती थी।
1942 का वह वर्ष भारतीय इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से भी मशहूर है। यह वह साल था जब भारत की सम्पूर्ण ताकत अंग्रेज़ो के विरुद्ध एकजुट हो गयी थी और विद्रोह अपने उच्चतम स्तर तक जा पंहुचा था। न सिर्फ पुरुष बल्कि देश की महिलाएं,बड़े-बूढ़े, बच्चे,छात्र-नौजवान आदि ने ठान लिया था कि अब स्वराज्य लेकर ही मानेंगे। 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में ‘करो या मरो’ के नारे के साथ पूरे देश में एक ज्वाला भभक उठी थी। बिहार में इसकी लपटें बहुत ऊंची उठी।
9 अगस्त 1942 ई. को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पटना की सड़कों पर हजारों छात्र-नौजवान सर पर कफ़न बांधकर निकल पड़े। रामस्वरूप देवी छात्र-नौजवानों के उस जुलूस में शामिल हुईं और इंकलाब जिन्दाबाद, वन्दे मातरम, भारत माता की जय आदि नारे लगाते हुए आगे बढ़ीं। बिहार के घर-घर से निकले उन वीर सपूतों को डराना और उनका हौसला तोड़ना अंग्रेजों के लिए एक चुनौती हो गयी थी। सात नौजवानों की एक टोली हाथों में तिरंगा लिए पटना के सचिवालय से यूनियन जैक का झंडा उतारकर तिरंगा फहराने को जब आगे बढ़ी तो अंग्रेज अपने क्रूरतम रूप में सामने आए। बौखलायी अंग्रेज़ी सेना ने सीधे नौजवानों के  सीने पर गोलियां दागी। एक-एक कर सातों नौजवानों ने बलिबेदी पर चढ़कर शहादत दी। इस घटना ने पूरे बिहार की जनता को भाव विह्वल किया। चारो ओर असंतोष की लहर दौड़ गयी। लोगों ने आर-पार की लड़ाई के लिए कमर कस ली। बहुरिया उन सात शहीदों के मौत का बदला लेने का ठान चुकी थीं। इस घटना के बाद वे आरा, छपरा, बलिया आदि जिलों में लोगों के बीच जाकर क्रांति की चिंगारी सुलगाने लगीं। छपरा जिले में क्रांति का मशाल लेकर वो अगली पंक्ति में खड़ी हो गयीं।
18 अगस्त 1942 ई. का दिन था रामस्वरूप देवी ने अपने हाथों से छपरा जिले के मढौरा थाने पर तिरंगा फहरा दिया। तिरंगा फहराने के बाद निकट स्थित उधोग परिसर के बाहर हो रही जनसभा में शिरकत किया। वहां वो जनसभा को संबोधित करने लगीं कि अंग्रेजी पुलिस दल वहां आ पहुंची और बिना बात किये ही सभा में मौजूद स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सबपर गोलियां चलाने लगी। हथियारों से लैस विदेशी सिपाहियों ने अंधाधुंध गोलियों की वर्षा की। लोग भागकर आस-पास के खेतों में छिपने लगें, जो न भाग सके वे मारे गए। लेकिन बहुरिया मैदान में डटी रहीं तभी गोलियों की बौछार से पेड़ की एक डाल टूटकर गिरी। लोगों ने जाना बहुरिया को गोली लग गयी। इस भ्रम ने लोगों के खून में उबाल भर दिया। देखते ही देखते फसलों में छिपे हजारों लोग बाहर निकल आये। क्रोध में तिलमिलाए लोगों ने जो कुछ ईंट-पत्थर मिला उससे गोरे सिपाहियों पर टूट पड़े। क्रुद्ध भीड़ ने सात गोरे सिपाहियों को मौत के घाट उतार व शेष को मैदान से भगाकर पटना में हुए सात शहीदों की शहादत का बदला लिया।
मारे गए सिपाहियों की लाशों को तुरंत उठाकर पत्थरों से बांधकर लोगों ने नारायणी नदी में डूबा दिया। प्रकृति ने भी क्रूर अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीयों का साथ दिया। उस दिन खूब वर्षा हुई जिससे खून के सभी धब्बे मिट गए। सारे सबूत नष्ट कर दिए गए थे जिस कारण मुकदमा नहीं चल सकता था। बदला लेने के लिए अंग्रेजों का दमन चक्र शुरू हुआ। 22 अगस्त 1942 को अंग्रेजों द्वारा बहुरिया जी के घर में आग लगा दी गयी। उनके सभी सामान जला दिए गए। पूरे गांव में अंग्रेजी सिपाहियों ने डेरा डाल दिया था। दिन भर वे घरों, खेतों और बागों में बहुरिया को ढूंढते रहते थे पर उन सिपाहियों को बहुरिया कहीं नहीं मिलीं क्योंकि जनता अपनी जान पर खेलकर भी उनकी रक्षा के प्रति कटिबद्ध थी।
अंत में अंग्रेजी सत्ता ने कांग्रेस पर दबाब बनाना शुरू किया। कांग्रेस का गुप्त संदेश पाकर बहुरिया समर्पण के लिए सामने आ गयीं। उनपर मुकदमे चलाकर उन्हें लम्बी सज़ा काटने के लिए भागलपुर जेल में भेज दिया गया। आख़िरकार 15 अगस्त 1947 ई. का वह दिन भी आया जिसके लिए जाने कितने देशप्रेमियों ने अपने लहू बहाए, शहादतें दी और जेलों की यातनाएं सही। आज़ादी की ख़बर सुन बहुरिया ने अपने स्वप्न को साकार पाया। जेल से बाहर आने के बाद वे फिर से राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हो गयीं। आज़ाद भारत के 1952 में हुए प्रथम आम चुनाव में रामस्वरूप देवी विधानसभा के लिए खड़ी हुईं। इस चुनाव में उनके ख़िलाफ़ छः प्रतिद्वंदियों ने चुनाव लड़ा। स्थिति यह हुई की छहों प्रतिद्वंदियों की जमानतें जब्त हो गयीं। बहुरिया के व्यक्तित्व ने जो छाप जनता के दिलों में छोड़ी थी उसी का नतीजा था कि वे अपार बहुमत से जीतकर विधानसभा की सदस्य हुईं। उन्नत भारत का स्वप्न देखने वाली और उसके लिए काम करने वाली उस महान वीरांगना को दुर्भाग्यवश आगे देश सेवा का अवसर प्राप्त न हो सका। वो चुनाव तो जीत गयीं लेकिन प्रकृति के नियमों के अनुसार उन्हें जीवन से हार जाना पड़ा।
संघर्ष के रास्तों पर चलकर कभी उनका हौसला नहीं टूटा लेकिन नश्वर शरीर कमजोर पड़ता गया। चुनाव के बाद वो बीमार पड़ गयीं और 29 नवम्बर 1953 की सुबह बिहार की उस सिंहनी के प्राण टूट गए।
राजद समाचार से साभार 

कथाकार राजेन्द्र सजल के कथा संग्रह ‘अंतिम रामलीला’ पर परिचर्चा

रिपोर्ट
प्रस्तुति – अरुण कुमार  

आम्बेडकरवादी लेखक मंच के तत्वावधान में दिनांक 7 अगस्त 2022 को राजेंद्र सजल की कहानियों की पुस्तक ‘अंतिम रामलीला’ पर परिचर्चा का आयोजन नेहरू युवा केंद्र, आईटीओ, दिल्ली  के सभागार में किया गया |  इस अवसर पर प्रमुख वक्ताओं के रूप में प्रो.गोपाल प्रधान, अध्यक्ष जनसंस्कृति मंच,  अनीता भारती, अध्यक्ष दलित लेखक संघ, प्रो. रजनी दिसोदिया, संस्थापक समय संज्ञान पत्रिका, संजीव चन्दन, संस्थापक स्त्रीकाल , प्रो. प्रमोद मेहरा, अध्यक्ष यूथ फेडरेशन ऑफ़ वर्ल्ड पीस एवं स्वयं लेखक राजेंद्र सजल उपस्थित थे |  संजय सहाय, संपादक हंस अपनी अस्वस्थ्यता के चलते कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाए | कार्यक्रम का सञ्चालन युवा कवि और आलोचक अरुण कुमार ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन शोध छात्रा पूजा सूर्यवंशी ने किया |

संचालक अरुण कुमार ने कार्यक्रम की भूमिका प्रस्तुत करते हुए बताया कि आम्बेडकरवादी लेखक मंच अपनी स्थापना से दलित साहित्य को लेकर गंभीर कार्य कर रहा है | इसी कड़ी में राजेंद्र सजल की सशक्त कहानियो को हिंदी की दुनिया से परिचित करवाने हेतु इस परिचर्चा का आयोजन किया गया है | इन कहानियों पर परिचर्चा  इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि लेखक की पहली कहानी ‘झमकू’ लगभग 20 वर्ष पूर्व दैनिक भास्कर में तथा दूसरी कहानी मधुरिमा में प्रकाशित हुई थी, उसके बाद पत्र-पत्रिकाओं में दस्तक दिए बिना ही सीधे अपनी पुस्तक में संकलित कहानियों के माध्यम से हिंदी साहित्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवायी है | लेखक का कहानी कौशल इतना जबरदस्त है कि आज नहीं तो कल आपको इन कहानियों से रूबरू होना पड़ेगा |

वक्ताओं में अपनी बात रखते हुए प्रो. रजनी दिसोदिया ने कहा कि राजेंद्र सजल सजग कहानीकार है | ये कहानी की बुनावट पर ज्यादा सोचते है | उन्होंने पुस्तक की भूमिका में इसे स्पष्ट रूप से कहानी की बुनावट पर बात की है, यह सोचना ही उन्हें अन्य लेखकों से अलग बनाता है | हम लोग दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र से परहेज करते है जबकि इस पर बात होनी चाहिए | इन कहानियों में जो स्थायी भाव है वह रस में परिणत हो जाता है | राजेंद्र सजल की कहानियों को भी दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र की दृष्टि से परखा जाना चाहिए | सजल की कहानियों में यथार्थ की अभिव्यक्ति है, ऐसा लगता है कि ये कहानियां आपके आसपास घट रही है | ‘इत्ती सी बात’ कहानी आपको बेहद भावुक कर देती है तो ‘मास्टर माई’ कहानी हमें हमारे घर के बुजुर्गों की समस्या से आँखे चार करवाती है | ‘अंतिम रामलीला’ कहानी एक दृष्टि, एक विश्लेषण की कहानी है जो कि अलग से एक चर्चा की मांग करती है | कुछ अर्थों में राजेंद्र जी प्रेमचंद जैसे कहानीकार लगते है, वह प्रेमचंद की तरह ही पाठक फ्रेंडली है | संग्रह की सभी कहानियां बेहद महत्वपूर्ण और पठनीय है |

प्रो. प्रमोद मेहरा ने बताया कि इस समय रीडरशिप की समस्या प्रगाढ़ हो चुकी है, कॉन्टेक्स्ट बड़ा चैलेंजिंग हो चुका है, रंगहीन, स्वादहीन की तरफ पाठक नहीं जाता है | 1.4 बिलियन लोगों के देश में क्या कहानियां आ रही है ? यह सोचना पड़ेगा | हमारी कितनी कहानियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना पाती है ? जबकि कहानी साहित्य की बेहद सशक्त विधा है | उन्होंने कहा कि जब द्वितीय विश्व युद्ध के समय  हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराया गया  तब शहरों की एक सूची बनी थी उसमें क्योटो शहर का भी नाम था, लेकिन बम गिराने वालों ने क्योटो शहर पर बम नहीं गिराया क्योंकि उसके किसी सदस्य ने क्योटो की खूबसूरती को किसी कहानी में पढ़ा था | गैटे ने भी अन्तरराष्ट्रीय साहित्य की बात की है | राजेंद्र सजल की ‘अंतिम रामलीला’ कहानी  प्रतिनिधि कहानी है, यह किसी गाँव की समस्या न होकर वर्तमान भारत की समस्याओं को केंद्र में रखती है | इसी प्रकार की कहानी ‘दिल्ली के बादशाह के दुःख’ है | ये कहानियां वैश्विक परिप्रेक्ष्य की कहानियां है और इनका अनुवाद अन्य भाषाओँ में होना चाहिए | स्वयं प्रमोद जी ने भी कहानी के अनुवाद करने की जिम्मेदारी भी ली |

स्त्रीकाल के संपादक, आलोचक संजीव चन्दन ने कहा कि संग्रह की कहानियां लेखक ने मुझे भूमिका लिखने हेतु प्रेषित की थी | भूमिका में ही मैंने बेहद जिम्मेदारी के साथ लिखा है कि ‘राजेंद्र सजल हिंदी कथा साहित्य की एक उपलब्धि होने वाले है’| इस बात की तस्दीक यहाँ मेरे पूर्व के वक्ताओं ने की है और बाद के वक्ता भी करेंगे | संजीव ने आगे कहा की हिंदी वाले बेहद अनुदार किस्म के लोग है | यहाँ अनुवाद की परंपरा को और अधिक मजबूत होना चाहिए खासकर भारत की अन्य भाषाओं से | राजेंद्र सजल वर्धा के साथी रहे है,वर्धा ब्राह्मणों के लिए ब्राह्मणों द्वारा संचालित विश्वविद्यालय है | बहुत से संघर्षों में के सजल साथी रहे, मित्रता का दबाव भी होता है मगर उनकी कहानियों को पढ़कर कोई भी दावा कर सकता है | ‘इत्ती सी बात’ कहानी में जो फेमिनिस्ट स्टेटमेंट है वही कहानी को महत्वपूर्ण बनाता है | सजल लोककथाओं से लोक परम्पराओं से उर्जा लेते है , उनकी शैली कहीं कहीं पर उन्हें विजयदान देथा के समकक्ष खड़ा कर देती है | इस संग्रह की सबसे अच्छी कहानी मुझे ‘कोख और कोठरी: अनसुलझा रहस्य’ लगी | ब्राह्मणवाद की सटीक पहचान उन्होंने संग्रह की प्रतिनिधि कहानी में की है | सजल वैचारिक रूप से संपन्न कहानीकार है, सभी कहानियां उम्दा है|

दलित लेखक संघ अध्यक्ष अनीता भारती ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि सजल की कहानियां चकित करती है| लम्बी कहानियों की अपेक्षा छोटी कहानियां ज्यादा प्रभावित करती है | ‘अंतिम रामलीला’ कहानी में मुझे ‘जय भीम’ नारे को लेकर काल क्रम का दोष लगता है | इस कहानी का गाँव राजेंद्र जी का अपना गाँव लगता है | कहानियों में पात्रों का चयन बड़ी सजगता से किया गया है | इनकी कहानियों में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध बहुत ही सहज रूप में आता है जो कि कहानियों की विशेषता है | इस संग्रह की सबसे सशक्त कहानी मुझे ‘रखवाला’ लगी | रखवाला की  ‘सुसली’ संग्रह की सबसे सशक्त स्त्री पात्र है |  ‘झमकू’ कहानी में बाँझपन की समस्या को चित्रित किया है | झमकू कहानी की स्त्री द्वारा यह निर्णय लिया जाना कि मैं अपने गाँव वापस नहीं जाऊँगी राजस्थान के जातिवादी, पितृसत्तात्मक समाज में बहुत बोल्ड डिसीजन है | ‘बावली’ कहानी स्त्री विमर्श की कहानी है, वही ‘काला भूत’ कहानी दलित विमर्श की कहानी है | भाषा की दृष्टि सभी अत्यंत मजबूत कहानियां है, ठेठ राजस्थानी भाषा का इस्तेमाल, कहानी की विश्वसनीयता को बढ़ाते है| प्रत्येक कहानी में राजस्थान की गंध है |

प्रो. गोपाल प्रधान ने अपनी बात रखते हुए कहा कि राजेंद्र सजल की कहानियां हिंदी कहानी की मुख्यधारा में बड़ा हस्तक्षेप है | इसके लिए हमें वर्तमान हिंदी की कहानी को देखना समझना पड़ेगा | कहानी में मुख्य उपस्थिति शहर की है और नवउदारवाद के दौर में हमारे पास यथार्थ मीडिया के जरिए आता है | इसने हमारे अनुभव जगत को बेहद सीमित कर दिया, समकालीन कहानी में यह एक ब्लाईंड स्पॉट की तरह है |  इसने पाठक की संवेदना का विस्तार नहीं होने दिया | राजेंद्र की कहानियों में यह यथार्थ अपनी पूरी भयावहता के साथ उपस्थित है | भाषा के मामले में  फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ ने जो शुरू किया उसे राजेंद्र ने आगे बढाया है, भाषा में यथार्थ पूरी तरह उभरकर आया है | इन कहानियों में स्त्री समुदाय लड़ते हुए, जूझते हुए, बेहद सशक्त रूप से चित्रित हुआ है जैसे गोदान में होरी प्रमुख पात्र है मगर ‘धनिया’ की तेजस्विता अन्यतम है | ‘अंतिम रामलीला’ कहानी कलर्डस्कोपिक  बहुरंगी यथार्थ की कहानी है जो कि मुझे बहुत पसंद है | सभी कहानियों में एक प्रकार की औपन्यासिकता है |  

अपनी कहानियों की रचनात्मकता और शिल्प पर बात करते हुए कहानीकार राजेंद्र सजल ने अपने जीवन के संघर्षों के बारे में रूबरू करवाया | उन्होंने बताया कि मेरे पैदा होने पर जब मेरे पिता मेरी कुंडली के बारे में पूछने के लिए पंडित के पास गए तो पंडित  दोपहर तक पिता से खेत में बेगार करवाते रहे, पंडित के मनमुताबिक कार्य न होते देख कर उसने मूलो में पैदा होना बताया तथा माता-पिता के लिए कष्टकारी बताया| जिसके चलते बचपन से ही माता-पिता का स्नेह मुझसे छिन गया और मुझे मेरी बड़ी बहन ने पाला |  कक्षा नौ तक आते आते पंजाब ईंट भट्ठे पर काम करने पहुँच गया | इस प्रकार संघर्षों की आँच में तपकर बाहर निकला | उन्होंने कहा कि ये मेरी कहानियों का यथार्थ मेरे इर्द गिर्द बिखरा हुआ पड़ा है, जो अभी तक की कहानियों में व्यक्त हुआ है यह प्रारंभिक स्तर का है | अभी बहुत कुछ आना बाकी है |

इस परिचर्चा में भाग लेने राजस्थान से आए रामस्वरूप रावत ने कहा कि ग्रामीण परिवेश में व्यक्ति क्या भोगता है वह शहर में बैठा आदमी महसूस नहीं करता है, लेकिन इस गोष्ठी में आकर मेरी यह धारणा बदली है | यहाँ विचार और मानसिकता अद्भुत समावेश देखने को मिला है | कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन पूजा सूर्यवंशी ने किया | इस परिचर्चा में  प्रसिद्द इतिहासकार एवं आम्बेडकरनामा के संस्थापक डॉ. रतन लाल, कवयित्री रजनी अनुरागी, नाटककार राजेश कुमार, कवि जावेद आलम खान, कवि समय सिंह जौल, कवयित्री संतोष देवी,शोध छात्रा संगीता झा,अजय कुमार, मनीषा, लारैब अकरम, द मूकनायक की संस्थापक मीना कोटवाल, राजा चौधरी सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे |

प्रोफ़ेसर रतनलाल की रिहाई!

यह आंबेडकरवाद और एकजुट लड़ाई की जीत है

एच. एल. दुसाध 

सत्ता का रवैया देखते हुए जिस बात की आशंका थी , वह सामने आ ही गयी. फेसबुक पर ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग, जिसे एक तबका फव्वारा बता रहा है , पर खास नजरिये से टिपण्णी करने के कारण आंबेडकरनामा के एडिटर, , इतिहास के प्रोफ़ेसर तथा भारत के अन्यतम श्रेष्ठ इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल के लेखन के शोधकर्ता प्रो. रतनलाल को कल 20 मई की रात साढ़े दस बजे गिरफ्तार कर लिया. इस गिरफ्तारी के खिलाफ प्रतिवाद जताने के लिए आधी रात को  दिल्ली पुलिस के साइबर थाना, मौरिस नगर पर सैकड़ों दलित व वाम एक्टिविस्ट, शिक्षक और छात्र जमा हो गए. सुबह होते-होते सोशल मीडिया प्रो. रतनलाल की रिहाई की मांग से पट गयी. यही नहीं उनकी रिहाई की मांग को लेकर देश के विभिन्न अंचलों में लोग सडकों पर भी उतर आये हैं.उनकी गिरफ्तारी की खबर वायरल होते ही देश के  छोटे-बड़े असंख्य बहुजन बुद्धिजीवियों के साथ वाम बुद्धिजीवी व संगठन इस घटना की भर्त्सना करने में जुट गए, लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक बसपा- सपा, राजद- लोजपा इत्यादि बहुजनवादी दलों की ओर से कोई प्रतिवाद नहीं जताया गया है. बहरहाल इस घटना से सिर्फ बहुजन बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट ही नहीं मुख्यधारा के बुद्धिजीवी भी स्तब्ध हैं.

सुप्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो. अजय तिवारी ने लिखा है,’ डॉ. रतनलाल की शिवलिंग विषयक टिपण्णी से असहमत हूँ, लेकिन उनकी गिरफ्तारी का विरोध करता हूँ. यह जनतांत्रिक आज़ादी का हनन है. उन्होंने पुराण- लेखकों से ज्यादा बुरी बात नहीं लिखी है.’ उनका समर्थन करते हुए कर्मेंदु शिशिर ने लिखा है,’ आपकी बात से शतप्रतिशत सहमत हूँ.’ वरिष्ठ चिन्तन कनक तिवारी ने लिखा,’ प्रोफेसर रतन लाल को केवल दलित लेखक कहकर हम उनका कद छोटा नहीं करते हुए कहेंगे. वे अभिव्यक्ति की आजा़दी के पहरेदार हैं. लेखक हैं. विचारक हैं. इस नाते अभिव्यक्ति की आजा़दी पर हमला उनकी गिरफ्तारी के जरिए हुआ है. यह केवल एक वर्ग विशेष पर नहीं पूरे भारतीय समाज पर है . हम सब इसका पुरजोर विरोध करेंगे . यह अंग्रेजों की मानसिकता की सरकार चल रही है आजकल’.

बहुजन बुद्दिजीवियों में प्रेमकुमार मणि ने लिखा,’ सोशल मीडिया से मिल रही खबरों के अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफ़ेसर रतनलाल को पुलिस ने कल गिरफ्तार कर लिया है . प्रोफेसर रतनलाल मेरे पुराने मित्र हैं . उनकी बौद्धिक सूझबूझ और विद्वता की मैं कद्र करता हूँ . उनकी तरह विनम्र और सभ्य मैंने बहुत कम लोगों को देखा है . उनकी गिरफ्तारी संभवतः उनके लिखे एक पोस्ट को लेकर हुई है . मेरी मान्यता है कि यह अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार पर हमला है . इसे मैं बिलकुल गलत मानता हूँ . मैं प्रोफ़ेसर रतनलाल के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करता हूँ . हुकूमत उन्हें अविलम्ब मुक्त करे और पूरे प्रकरण केलिए उनसे मुआफी मांगे’. प्रो. लाल के गिरफ्तारी की खबर मिलते ही प्रख्यात पत्रकार उर्मिलेश ने लिखा,’ दिल्ली विश्वविद्यालय(हिन्दू महाविद्यालय) के एसो. प्रोफ़ेसर रतनलाल जैसे मुखर और प्रगतिशील बुद्धिजीवी की गिरफ़्तारी अत्यंत निंदनीय है. सत्ता और व्यवस्था के लगातार और तेजी से निरंकुश होते जाने का यह ठोस उदाहरण है. जिस तरह निहायत सतही और निराधार आरोपो मे उन्हें रात के अंधेरे मे हिरासत मे लिया गया, वह किसी लोकतांत्रिक समाज में संभव नहीं.अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों-युवाओं और प्रगतिशील विचारकों के बाद अब निशाने पर दलित, ओबीसी और अन्य समुदायों के असहमत बुद्धिजीवी! प्रोफ़ेसर रतनलाल को अविलम्ब रिहा करो!.’

सत्येन्द्र पीएस ने बहुत ही तल्ख अंदाज़ में रोष व्यक्त किया,’ दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रतन लाल को गिरफ्तार कर लिया गया. लाल से पहली मुलाकात समाजवादी पार्टी द्वारा आयोजित एक मंच पर बहुत पहले हुई थी, जहां मुझे भी भाषणबाजी के लिए बुलाया गया था. उसके बाद दिलीप मंडल के साथ कई मुलाकातें और थोड़ी बहुत बात हुई. सोशल मीडिया पर उनको बहुत ज्यादा फॉलो नहीं कर पाता, लेकिन इतना पता है कि वह अम्बेडकरवादी हैं, अत्यंत मृदुभाषी हैं, सहृदय हैं.लिंग, योनि, यौन संबंध आदि आदि के बारे में जो हिन्दू धर्मग्रन्थों में लिखा गया है, वह अगर बताने पर लग जाया जाए तो धार्मिक लोगों को ऐसा फील होने लगेगा कि उनके कान में पिघला सीसा डाला जा रहा है. आश्चर्य की बात है कि एक ऐसे बयान पर गिरफ्तारी हुई है, जिसके बारे में तमाम महान विचारकों कबीर से लेकर ज्योतिबा फुले, भीमराव अंबेडकर, पेरियार आदि ने रतनलाल से 100 गुना उग्र होकर लिखा है.जब अम्बेडकर लिखा करते थे और गांधी से उस पर राय मांगी जाती थी तो गांधी कहा करते थे कि दलितों के साथ जो अन्याय हुआ है और उनके साथ जैसा व्यवहार किया जाता है, उसकी तुलना में अम्बेडकर की प्रतिकिया बहुत शालीन है.आप दलितों को सड़क पर पीट पीटकर मार डालते हैं, तरह तरह से जातीय मजाक बनाते हैं. आप या आपकी भावनाओं का कद्र वह क्यों करें? इसलिए कि आप गुंडे हैं, आप सत्ता में हैं? सरकार को न सिर्फ रतन लाल को तत्काल रिहा करने की जरूरत है, बल्कि एक सख्त संदेश देने की जरूरत है कि अगर ऐसे मामलों में आन्दोलन  होते हैं या पुलिस कोई गिरफ्तारी होती है या दलित चिंतकों को पीटा जाता है तो इतनी सख्त कार्रवाई होगी कि गुंडों की रूह कांप जाए. सरकार ऐसे नहीं चलती  नरेंद्र मोदीजी जी! कुछ तो लिहाज करिये गांधी और बुद्ध की धरती का, जहां आप पैदा हुए हैं! न्याय कीजिए, कुछ अच्छा कीजिए, जिससे आपको भी इतिहास याद रखे. यह नहीं चलेगा कि आपके शासन में आपके गुजरात में आपके देश में दलित पीटे  जाएं और यह कहकर आप अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लें कि दलित भाइयों की जगह हमें पीटें, या इस घटना के लिए खुद को माफ नहीं कर पाऊंगा. आपके सख्त बयान आने चाहिए कि इस तरह के दलितों के उत्पीड़न, दलित चिंतकों के मुंह बंद करने और उन्हें डराने की कवायद पर सरकार की नो टॉलरेंस नीति है। सरकार के कारकुनों, न्यायपालिका और जनता को आप उसी तरह संदेश दे सकते हैं जैसा गांधी ने दिया था. उस समय अंग्रेजों का शासन था, अभी तो आपका शासन है.आस्था पर चोट के नाम पर हम प्रतिरोध की आवाज को दबाने की प्रवृत्ति  को क्या कहें क्योकि दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और अम्बेडकरवादी विद्वान रतन लाल जी को प्राप्त सूचना के मुताबिक दिल्ली पुलिस के साइबर सेल ने गिरफ्तार कर लिया हैहम पुलिस की इस कार्यवाही पर प्रतिरोध जताते हैं’.

बहुजन विरोधी हर घटना पर आवाज उठाने वाले चंद्रभूषण सिंह यादव ने लिखा,’ प्रो रतन लाल जी अम्बेडकरिज्म को मानने वाले हैं. वे तार्किक बातें रखते हैं.यदि किसी को लगता है प्रो रतन लाल जी ने गलत बोला है तो उनसे उनके व्यक्तव्य पर स्पष्टीकरण मांगना चाहिए था,यदि सच में उनके कहने का आशय किसी के धार्मिक भावना को ठेस पंहुचाने वाली होती तो कोई बात नहीं लेकिन यदि इस तरह से एकपक्षीय कार्यवाही की जाएगी तो यह न्यायपूर्ण प्रक्रिया नही कही जाएगी क्योकि मेरी समझ से उनकी टिप्पड़ी ऐसे चीज पर थी जो शिवलिंग के शेप की नहीं है न कि शिवलिंग पर उंन्होने टिप्पड़ी की थी. हजारों लोगों द्वारा प्रो रतन लाल जी को गालियाँ और धमकियां दी जा रही हैं, क्या साइबर सेल उन गाली-धमकी देने वालों को गिरफ्तार कर सकेगा?क्या उन गालीबाजों या धमकीबाजो को चिन्हित कर साइबर सेल उनके गिरफ्तारी का प्रयास कर रहा है?क्या एससी-एसटी ऐक्ट के तहत जातिगत टिप्पड़ी करने वालों पर कार्यवाही की जा रही है?प्रो रतन लाल जी की मुखर आवाज को मुकदमा लिख दबाने की प्रबृत्ति अफसोसनाक व निंदनीय है. देश का सम्पूर्ण बुद्धिजीवी व बहुजन समाज प्रो रतनलाल जी के साथ है और उनके रिहाई के साथ सुरक्षा प्रदान करते हुये गालीबाजों और जातिवादी टिप्पड़ियां करने वालो पर मुकदमा लिखने की मांग करता है.’ सुप्रसिद्ध आलोचक वीरेंद्र यादव ने लिखा,’ आंबेडकरवादी बुद्धिजीवी, सबाल्टर्न चिंतक , इतिहास के अध्येता व दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक रतनलाल जी  की गिरफ्तारी एक बुलंद स्वर को चुप कराने की सत्ता की धौंसपट्टी है. जनतांत्रिक अभिव्यक्ति पर सत्ता की यह नकेलबंदी संवैधानिक अधिकारों पर हमला और संवाद की संस्कृति का हनन है. हम इसकी निंदा करते हैं और रतनलाल जी के साथ एकजुट हैं. रतनलाल जी को तुरंत रिहा कर जनतांत्रिक अभिव्यक्ति को सुनिश्चित किया जाना चाहिए.’

पटना के बुद्धिजीवी श्रवण कुमार पासवान ने कहा ,’ रतन लाल के गिरफ्तारी के खिलाफ़ एकजुट दलित एक्टिविस्ट दिल्ली विश्व विद्यालय के प्रोफेसर रतन लाल की गिरफ्तारी की घोर निन्दा करते हैं .रतन लाल ने कोई गलती बात नहीं की थी .धर्मों के नाम पर राजनीति गुंडागर्दी बंद हो.प्रोफेसर रतन लाल की देर रात गिरफ्तारी मुखर दलित आवाज को दबाने की दिशा में ब्राह्मणवादी सरकार की बड़ी भूमिका है.’. बुद्ध शरण हंस ने लिखा ,’प्रो रतनलाल विद्वान और मर्यादित व्यक्ति हैं. इनकी लेखनी और वक्तव्य सब मर्यादित होता है. कोई जरूरी नहीं कि रतनलाल अपनी हिफाजत के लिए भाजपा को खुश करनेवाली बात बोलें. रतनलाल तो बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों पर चलनेवाले साहसी व्यक्ति हैं. उन्हें गिरफ्तार कर सरकार ने कायरों का काम किया है. उन्हें शीघ्र रिहा करो.’इस घटना जितना रोष चंद्रभान प्रसाद ने दिखाया, वह चौकाने वाला रहा. उन्होंने एनडी टीवी पर घोषणा किया,’ यह गिरफ्तारी प्रो. रतनलाल के विचारों के वजह से हुई है. मेरा यह सोचना है कि दलितों और आरएसएस के बीच वैचारिक युद्ध की घोषणा हो चुकी है. पिछला दो लोकसभा चुनाव जीतकर  भाजपा को ऐसा वहम  हो गया कि उसने भारत पर कब्ज़ा कर लिया है. लेकिन दलित बुद्धिजीवी उनको चुनौती दे रहे हैं . इसीलिए प्रो रतनलाल को रात साढ़े  दस बजे इस अंदाज में गिरफ्तार किया गया मानों वह भारी आतंकवादी हैं. यह एक युद्द की शुरुआत है.’      

बहुजन- वाम  बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों ने जिस  एकजुटता और संघर्ष का प्रदर्शन  2018 के ऐतिहासिक 2 अप्रैल और 2019 में 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ किया था, उसकी आज छोटे पैमाने पर  एक बार फिर पुनरावृत्ति हो गयी. शून्यकाल.कॉम के संपादक भंवर मेघवंशी ने प्रो.लाल की गिरफ्तारी पर प्रधानमंत्री को जो तल्ख़ पत्र लिखा वह बहुजन आन्दोलन में एक ऐतिहासिक दस्तावेज की  जगह पायेगा. दलित लेखक संघ के संरक्षक के तौर पर हीरालाल राजस्थानी जो सन्देश दिया है, उसे भी नहीं भुलाया जा सकता. पटना से दीपंकर भट्टाचार्य ट्विट पर करके तथा हरिकेश्वर राम पोस्ट पर पोस्ट लिखकर सरकार पर लगातार दबाव बनाते रहे. संजीव चंदन, अनीता भारती, रमेश भंगी, डॉ. अनिल जयहिंद, पत्रकार महेद्र यादव, प्रो. हेमलता महिश्वर , मयंक यादव, मनोज अभिज्ञान, डॉ. सिद्धार्थ रामू, पीडीआर. मनीषा बांगर, रवेश कुमार, प्रियदर्शन, नवल  कुमार, पवन कुमार खरवार, जयंत जिज्ञासु इत्यादि भी अतीत की भांति फिर एक बार अपने-अपने तरीके से प्रो. रतनलाल की रिहाई में जुटे रहे. महान पत्रकार दिलीप मंडल और प्रो. लक्ष्मण यादव ने फिर एक बार साबित किया कि बहुजन हितों की लड़ाई में वे बराबर अग्रिम पंक्ति में खड़ा मिलेंगे. बहरहाल प्रो.रतन लाल की रिहाई एक बड़ी लड़ाई थी, जिसमे कोई भूमिका अदा करने में बहुजन समाज के नेता बुरी तरह विफल रहे:  इतना विफल रहे कि कल लोग उनके खिलाफ झंडा लेकर भी खड़े हो जाएँ तो विस्मय नहीं होगा . किन्तु बहुजन लेखक- पत्रकार- एक्टिविस्ट, छात्र और शिक्षकों ने उनकी कमी खलने नहीं दी जिसका परिणाम यह हुआ कि प्रो. रतन लाल को बेल मिल गया. लेकिन यह आसान नहीं था, यह संजीव चंदन के तीन बजे के पोस्ट से साबित होता है.’रतनलाल जी को जमानत मिलने की सूचना है. इन धाराओं में इतना आसान नहीं होता है, मजिस्ट्रेट के स्तर पर. यह आंबेडकरवाद, एकजुट लड़ाई की जीत है. न्याय, लोकतंत्र, संविधान की जीत है!’ लेकिन यह लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है ! पत्रकार दया शंकर राय के शब्दों में,’ मौजूदा सत्ता का जो फासीवादी चरित्र है ,उसे देखते हुए ये लड़ाई अनवरत और अभी लम्बी चलनी है.’ बहरहाल फासीवादी सत्ता के खिलाफ हमारी लड़ाई लम्बी चलेगी और हमें ख़ुशी है कि इस लड़ाई में साथ देने के लिए प्रोफ़ेसर रतन लाल के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर संघर्ष करने वाली उनकी की फायर ब्रांड जीवन संगिंनी शालिनी आर्य के शब्दों में,’ सिंघम इज  बैक’!

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.
संपर्क : 9654816191
             

मेरी साड़ी वो आशियाना है

भारती वत्स

चार्ली चैपलिन ने कहा था कि कविता पूरी दुनिया के नाम लिखा प्रेम पत्र है, आज के कुछ कवियों की कविताएं पढ़ते हुए मुझे लगा कि ये नौजवान कवि  भी अपनी आत्मा के द्वार पूरी दुनिया के लिए खोले खड़े हैं। इनकी कविताओं में एक ताव है जो पढ़ने वाले को ऊर्जा  देता है एक ज़िद है जो बोलने की निर्भीकता पैदा करती है एक रागात्मकता है जो मनुष्य की तरफ खड़ा करती है।

 अपने समय की छल छद्म से भरी राजनीति,गंदी व्यवस्था के बीच हम बार बार कबीर,रैदास,रहीम,से लेकर प्रेमचंद,निराला,मुक्तिबोध और दोस्तोवस्की की तरफ अपने आप को खड़ा पाते है आज के ये कवि भी अपने पुरखों की उस सोच की तरफ खड़े दिखाई दे रहे हैं जो मनुष्य को न्याय की तरफ खड़ा होना सिखाती है।

आधुनिक दौर में उत्पीड़न ,दमन और शोषण के खिलाफ हमारी चेतना में संवेदनाओं को जाग्रत करने में कविता की अग्रणी भूमिका रही है जो अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के दायरे में ही रहकर  अंततः राजनीतिक सीमा मे बंद हो जाती थी परंतु बाद की कविता ने उस द्वंद्वात्मकता को नये प्रतिमानों से बहुत गहराई और संवेदनशीलता के साथ सिरजा, जो प्रकृति,स्त्री ,प्रेम से लेकर ब्रम्हांड तक के रूपक बहुत सहजता से तो रच ही रही है राजनीतिक काइयाँपन, धूर्तता, दोगलेपन,विस्थापन,विकास की त्रासदियों और पर्यावरण के प्रश्नों को भी आक्रामक तरीके से उकेर रही है। दुनिया के प्रति इन कवियों की समझ गहन अध्ययन से या किसी खास धारासे नहीं बल्कि जिंदगियों की जद्दोजद और इस समय के बेगानेपन के बीच ये तीव्र ,आक्रामक भावभूमियां निर्मित हो रही हैं।

आज की कविता का जो वितान है,वह आक्रामक तेवर,गहरे असंतोष की पथरीली जमीन पर निर्द्वंद्व फैला हुआ है खास तौर पर कुछ कवि तो, एक ताव के साथ कविता में प्रवेश करते हैं, यही ताव कविता का मर्म बन जाता है इसे गुस्सा या भड़ास कह कर टाला नहीं जा सकता है यह आक्रोश की रचनात्मक रिदम है जिसे युवा कवि अराजक दुनिया के बीच साधे हुए हैं।

       कुछ रचनाकारों का न तो छपना लक्ष्य होता है न पुरस्कार पाना, पर वे समाज से सीधे संवाद कर रहे होते हैं आज के दौर में कुछ कवि ऐसे ही खड़े होने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं अपने मजबूत पैरों पर बिना किसी वैसाखी के। उनकी चर्चा इसलिए इस आलेख में शामिल कर रही हूं क्योंकि उनकी लगभग हर कविता अपील करती है, बोलती है आपके अंदर जगह बनाती महसूस है।

       आज की कविता राजनीतिक विचार से आगे जीवन के गहनतम गलियारों में दखल दे रही है यह कविता राजनीतिक संघर्ष की द्वेत्ता से परे वैकल्पिक चेतना की ओर जीवन की कविता है इस धारा को बहुत गहरे और सार्थक तरीके से आगे ले जाने वाले कविता को संवेदना के इस धरातल पर खड़ा करने वाले कवियों में विहाग वैभव ,अदनान कफिल, सबिकाअब्बास, वीरू सोनकर ,जसिंता केरकेट्टा की कविता को शामिल किया जाना चाहिए। इन्हें मैंने आभासी दुनिया से ही जाना है इनकी कोई भी किताब मैंने नहीं पढ़ी।

    वीरू सोनकर की कविता पढ़ते हुए मुझे एक शब्द ध्यान में आया गुरिल्ला कवि….। जो  जिंदगी के उन हिंसक अनुभवों को पूरी सृजनात्मकता के साथ लिखते हैं जिनका जिंदगी में होना ही जिंदगीयों को उदासियों में डूबो देता है वीरू भी उस उदासी से गुजरे होंगे तभी उनकी उदासी के रंग इतने तीखे और चटक हैं —-_—

        मैं बहुत दिन अपनी जाति के अहंकार में

        बोराया रहा

    बहुत दिन किशोरावस्था मैं किये सूअ रवध की  

        अपनी वीरता पर

        बहुत दिन ढांकता रहा

        इन से अपनी कायरता के बीज को

        जो कायरों को देख पता नहीं कब पनप गए थे

        मेरे भीतर…।

ये अपने आप से लड़ने के बीच बनी कविता है जो समाज से मिले संतापों से उपजी है उन संतापों से उबरने की लगातार कोशिश के बीच की आत्म स्वीकृति है यह कविता। उस अनुभव की कविता है, जब हम जो है उसे स्वीकार पाने की हिम्मत अपने अंदर पैदा कर रहे होते हैं और स्वीकार कर लेने के बाद अपने अंदर पैदा हुई ताकत को महसूस करते हैं। वीरू जीवन के उस साक्षात से भी गुजरते हैं जब हम कहीं अपने होने और ना होने की दुविधा में होते हैं । उस वक्त जब लोग हमें सब के बीच खड़ा देख रहे होते हैं ठीक उसी समय हम जीवन के उन खामोश स्पंदित नाजुक से कोनों में अपने आप के पास खड़े होते हैं जहां होना सिर्फ हम समझ पाते हैं । इस तरह लगातार दो दुनियाओं में जीते हैं जो होने और दिखने के अंतर के बीच मौजूद होती है —

           मैं तुम्हारे संगीत में नहीं अपने रुदन में था

          रुदन की हिचकियों में

          और कहीं अबोली शिकायतों में था

          मैं वहां-वहां था

         जहां हो सकने की स्वीकार्यताएं थी

         पर मैं अस्वीकार्यता में था…

मन के वे एकांत कोने, जहां हम अपने खालिस भरेपन के साथ होते हैं, जहां से हम दुनिया को उसके नग्न रूप में समझ रहे होते हैं तब अस्वीकार्यतायें हमारी ताकत बन जाती हैं दुनियादारी से भरी स्वीकार्यताओं के खिलाफ।

         वीरू सोनकर की कविता किसी राजनीतिक वाद से नहीं जन्मी है बल्कि उनकी कविता वैसी है जैसे रास्ते में हम चल रहे होते हैं और साथ वह सब कुछ अपने आप जुड़ता चलता है जो हमारी संवेदनशील अवलोकन की खिड़की से हमारे अवचेतन में बीज की तरह पहुंचता है और फिर बेचैनी के साथ आकार लेता है।

ये कवि उन धरातलों को दरका रहे हैं जो ऊपर से हमें समतल दिखाई देने लगे थे पर नीचे गजबजाती धरती थी।भरोसा किया जा सकता है साहित्यिक गुटबंदी को ये कवि तोड़ेंगे और एक नई जमीन तैयार करेंगे।

हर कवि की अपनी संरचना होती है जो उसकी गहन आंतरिकता से निकलती है तब कवि कविता करता नहीं है कविता होती है जो उसकी सहज अनुभूति से गहरे आब्ध्ध होती है इस तरह कविता का संबंध हमारे गहन अंतस्थल से है जो गहरी मानवी आकांक्षाओं से जन्म लेती है और हमारा रूपांतरण करती है तब कहीं जाकर बाहरी सरोकारों तक पहुंचती है।

कविता करना और कविता होने का अंतर इन कवियों की कविताओं में मिट सा जाता है अतः प्रज्ञ, स्वतः स्फूर्त, सतत प्रवाह नदी सा…। वैयतिक्ता से उद्भूत परंतु  एक हद तक वेयतिक्ता से मुक्ति की संभावनाएं इनमें दिखाई दे रही हैं.. समय की लहर लहर को आत्मसात करती कविता। शास्त्रीय शब्दावली में कहा जाए तो भाव और विभाव का संवेदनात्मक चित्रण ।

यह जो सृजन प्रक्रिया है इसके क्षण निराले होते हैं गहरे भावबोध से भरे हुए आनंद के क्षण… जहां पीड़ा और अवसाद भी सृजनात्मकआनंद की अनुभूति कराते हैं यह एकात्म भाव कवि से बेहद ईमानदारी और आग्रह पूर्ण एकाग्रता की मांग करता है वरना एक बार यदि सांस उखड़ी तो कविता की सांस भी उखड़ जाती है।

   विहाग वैभव की कविताएं पढ़ने के बाद लगा यह युवा जो कह रहा है वह वैसा नहीं है जो अमूमन अभी तक हम सुनते पढ़ते आए हैं बल्कि कुछ अलग है कुछ जुदा सा है पर यह जुदा होना किसी अवतरण चिन्ह में लिखी विशिष्ट उक्ति के समान नहीं है बल्कि ये अलग होना जीवन को भिन्न नजरिए से देखना है और महसूस करने की तरह था। जो अपनी ओर आकर्षित भर नहीं करता बल्कि अपने आप में बांधे रखता है क्रम से इनकी कविताएं पढ़ते गये और ये धीरे-धीरे हमारे  अंदर जगह बनाते  गए। विहाग की कविता, मां का सिंगारदान, मैं पढ़ रही थी पर पाठक की तरह नहीं बल्कि उसे पढ़ते हुए अपने आप कभी मां की तरह हो गई तो कभी मां के साथ हो गई और पढ़ते हुए पता नहीं कब मेरी आंखें नम हो गई —

               हमने मां को थकते हुए देखा

               थक कर बीमार पड़ते हुए देखा है

               पर मां को हमने

               कभी रोते नहीं देखा

               हमने मां को कभी जवान नहीं देखा

               बूढ़ी तो बिल्कुल नहीं

               ……………..

               मेरी दवाइयों के डिब्बे में

               सिमट कर रह गया

              मां का सिंगारदान

कविता पराएपन को खत्म करती है जहां से परायापन खत्म होता है वहां से संवेदना के गहरे तार जुड़ जाते हैं पाठक और कवि के बीच। विहाग अपने में सिमटे हुए से कवि होने का आभास देते हैं पर उनकी कविता जीवन के बहुत बड़े हिस्से को समेटे हुए है । विहाग अपने शोक को भी, अपने गुस्से को भी ऐसा रचते हैं कि वह आपका अपना हो जाता है, फिर चाहे वह, आझोती जारी है, हो, तलवारों का शोक गीत हो या आखिर कुछ नहीं कविता हो।

तलवारों का शोक गीत कविता,युद्धों की छद्म बाध्यता को पीठ पर ढोते हुए राष्ट्रों की कविता है जहां युद्ध, मानवीय समाज का एक निर्मम विकल्प बना दिया जाता है, जब युद्ध को सुरक्षा के एकमात्र  हल की तरह सत्ताएं प्रस्तुत करती हैं–

       तलवारों ने याद किया

       कैसे उस वीर योद्धा के सीने से खून

       धुले हुए सिंदूर की तरह बह निकला था 

       छलक-छलक

       और योद्धा की आंखों में दौड़ गई थी

       कोई सात -आठ साल की खुश

       बाहें फैलाए,दौड़ती,

        पास आती हुई लड़की

       दोनों तलवारों ने

       विनाश की यंत्रणा लिए

       याद किया सिसकते हुए…।

यह युद्ध की यंत्रणा के बीच संभावना से भरी कविता है ये, हिंसक रक्त रंजित भूमि से जीवन की ओर लौटाने वाली कविता है एक अलग कलेवर की कविता, जो सीधे-सीधे बात करती है कहीं कोई अबूझता नहीं कि जिसे बार-बार कई बार पढ़ने की जरूरत पड़े, बल्कि एक बार पढ़ते ही कविता मनोजगत का हिस्सा बन जाती है। युद्ध किस कदर अमानवीय दुनिया को रचते हैं सत्ताओं की महत्वाकांक्षाओं को ढोते सैनिक…। परंतु खास बात ये है कि कविता मे सैनिक नहीं सैनिक की बात  हथियार कर रहे हैं आपात मृत्यु के क्षणों में जीवन के जरिए युद्धों की व्यर्थता को उनकी निर्ममता को कविता कहती है जो आज का सबसे प्रासंगिक सवाल है।

          औरतों के साथ बरती जा रही हिंसायें यह बताती हैं कि हम कितने अशिक्षित और पिछड़े समय में रह रहे हैं।स्त्री कैसी दुनिया चाहती है?  कैसा साथ चाहती है? यह अभी भी समाज के सामने अनुत्तरित  है। आजादी कैसी? कितनी और किस से? यह प्रश्न बहुत बड़े और संजीदा है जिसके इर्द-गिर्द स्त्रियां घूम रही हैं। स्त्रियों के हस्तक्षेप और उनकी मौजूदगी हर स्तर पर दर्ज हो रही है, यह अलग बात है कि हम अभी भी पुराने औजारों को रंग रोगन कर,धो-पोंछ कर  आजमा रहे हैं। भविष्य के टूल्स क्या होंगे? और क्या होना चाहिए? अभी भी धुंधलके में है। इन कवियों की कविताएं इन बेचैनियों को रेखांकित करती हैं ।यह कविताएं शोर नहीं मचाती परंतु मन के अंदर बेचैनी भर देती हैं विहाग की एक और कविता का कुछ अंश पढ़िए —

         लोना आवाब को था कहना कुसुमकुमार से  

         यह सब

         जैसे गौरैया फुदक -फुदक कहती है माटी से

         जैसे बादल टपक- टपक कहता है धरतीसे

         जैसे पराग निचुड़-निचुड़ कहता है तितली से

         हां ठीक मुझे भी प्रेम है तुमसे

         बिलकुल वैसा ही उतना ही

        अकूत ,अनंत ,अथाह, अपरिमित…।

यह स्त्री मन की कविता है जो प्यार और परवाह की एक छोटी स्नेह से भरी दुनिया को अपने अंदर बुनती है उतनी ही पवित्र दुनिया जितनी गौरैया और मिट्टी की, जितनी बादल और धरती की । मैं कविता पढ़ती गई.. अपने आप के और और निकट पहुंचती गई ।थोड़ा समय लगा उससे उबरने में…..। अकस्मात यह ख्याल आया की एक पुरुष मेरी बात इतनी साफ और गहराई से कैसे कह सकता है? मेरा राजनीतिक विमर्श जागा क्या कविता की संवेदनात्मकता में कवि की निजी प्रतिबद्धताये  शामिल होती हैं? मन ने कहीं चाहा कि काश ये द्वैतता इन कवियों में न हो, जैसी की तथाकथित प्रगतिशील कवियों में अक्सर दिखाई देती है कहिनी और करनी में ।

       अदनान कफील की कविता भी प्रेम के एकांत  में जीवन का विस्तार होते देखने वाली कविता है —

          जब मैंने तुमसे प्रेम किया

          तब मैंने जाना

         की मेरे आस – पास  की दुनिया

         कितनी विस्तृत है

         मैंने हवा को खिलखिलाते देखा

         मैंने फूलों को मुस्कुराते देखा

         मैंने पहाड़ों को बतियाते दिखा

         ……………

         मैंने जाना कि आस-पास कितना कुछ है..।

प्यार हमेशा से कविता की मूल अनुभूति रहा है परंतु आज के युवा कवि  प्यार को जिस  ज़िद के साथ व्यक्त करते हैं वह रूहानी प्यार नहीं है बल्कि साक्षात दुनिया की तमाम ऊंच-नीच, सीमाओं, आचार संहिता के बीच गसा हुआ प्यार है जहां समर्पण नहीं है मित्रता है, एक बराबरी का भाव है, दो समकक्षों के बीच स्नेह सूत्र हैं जो विरह की विरुदावली से नहीं एक साथ होने की गहरी आकांक्षा से भरा हुआ है वैसे ही जैसे धरती पानी को सोख लेती है एक लय में अपने अंदर …..

       एक दिन मैं उतर आऊंगा

       अपनी ऊंचाइयों से

       पानी की तरह

       तुम्हारे समतल में

       फैल जाऊंगा एकदिन….।

यह कविता एक आश्वस्ति है की धरती पर प्रेम है अभी.. इससे खूबसूरत बात क्या हो सकती है।

साझी विरासत को आगे बढ़ाने वाला युवा कवियों का ये हिरावल दस्ता तमाम धार्मिक जड़ताओं  के बीच सेतु की तरह उपस्थित है।

बच्चों पर मंगलेश डबराल,चंद्रकांत देवताले,इब्बार रब्बी ने भी मार्मिक कविताएं लिखीं जो दमित समाज के साथ चल रहे बच्चों,भूख के साथ जीते बच्चों की बात कहती हैं परंतु अदनान हिंसा के खिलाफ बचपन को खड़ा करते हैं अबोध मन की पवित्रताओ को क्रूरताओं के सामने खड़ा करते हैं, जो मुझे लगता है यथास्थिति से आगे की कविता है।मेरी दुनिया के तमाम बच्चे —

                देखना वो तुम्हारी टैंकों में बालू भर देंगे

                और तुम्हारी बंदूकों को

                मिट्टी में गहरा दबा देंगे

              वो सड़क पर गड्ढे खोदेंगे

              और पानी भर देंगे

              और पानियों में छपा छप लोटेंगे…

              वो प्यार करेंगे उन सब से

          जिससे तुमने उन्हें नफरत करना सिखाया..।

     ये लिखते हुए अदनान दुनिया की उस हिंसक सोच के सामने खड़े होते हैं जिसने मनुष्य -मनुष्य के बीच भेद खड़ा किया, उन जहरीले इरादों को प्रश्नकित करते हैं जिनके चलते खुबसूरत धरती का गीत नफरतों में बदल गया है। पूंजीवादी सोच की मौका परस्ती और नफे नुकसान की संकीर्ण दुनिया को भी ये अपनी कविता की विषयवस्तु बनाते हैं और भूमंडलीकरण से बनी साम्राज्यवादी फासीवादी सोच तक भी पहुंचते हैं।

इन नौजवानों की कविता मनुष्य की तरफ खड़ा होना सिखाती है। इनकी कविताएं उदासी की कविताएं हैं परंतु निराशा में नहीं डुबोती, यह घुटन और नाराजगी की कविताएं हैं परंतु संभावना को खत्म करने वाली नहीं है ।

     कविता  बाह्यजगत से तब जुड़ती है जब वह कवि के अंतरजगत से गहरे गुजरती है कविता का संबंध अंतःस्थल से है पर यह अंतःस्थल वह आध्यात्मिक अंतःस्थल नहीं है जो भौतिक जीवन के खिलाफ खड़ा हो जाता है बल्कि इसका संबंध हमारी गहनतम मानवीय आकांक्षाओं से है जिसमें  हमारा बाह्य जगत भी शामिल होता है इस तरह कविता मानवीय सरोकारों का विस्तार करती है जो अंतःजगत की यात्रा से गुजर कर ही संभव होता है आध्यात्मिकता और जगत का यह द्वंद कविता की संवेदनशीलता को और गहरा कर देता है कवि के अंदर आभ्यंतरीकरण के बाह्यकरण की प्रक्रिया सतत जारी रहती है जो कभी सामंजस्य के रूप में व्यक्त होता है तो कभी द्वंद में, आज का कवि इस द्वंद को  अनुभव कर रहा है। कभी तल्खी, कुछ शिकायत ,कुछ नाराजगी के साथ उन पारंपरिक मूल्यों पर चोट कर रहा है जिनके चलते आजादी कटघरे में खड़ी दिखाई देती है। अब जिस कवि की चर्चा हम करना चाहते हैं उसकी तल्खी और तेवर कविता को किताब से निकाल कर सड़क पर खड़ा कर रहे हैं एक संवाद की तरह, एक मुलाकात की तरह, सड़क पर चल रहे हर एक आदमी से..

      इनकी कविता पद्यभासी है जो गद्य में लिखी गई है जिसकी अपनी लयात्मकता होती है परंतु गणितीय छंद विधान से मुक्त;पितृसत्ता को, फासीवादी सोच को, बेखौफ चुनौती देती सबिका अब्बास नकवी की कविताएं है..। वह अपनी कविता को विशिष्ट वर्ग के बीच ना तो सीमित करना चाहती हैं और ना अपना एक विशिष्ट वर्ग बनाना चाहती हैं सबीका की कविता रोमांटिक कविता नहीं है परंतु उन कविताओं में जीवन के प्रति भरी रागात्मकता उन्हें नए संदर्भों में रोमांटिक बना देती है जिन्हें सुनते हुए हम अपने अंदर एक खिंचाव महसूस करते हैं कविता को पूरा सुनने का…।

     सबिका की ‘साड़ी’ कविता,उल्लेखनीय है; साड़ी जिसे औरत के सांस्कृतिक पहनावे की तरह सामंती समाज ने तय किया,नारीवाद साड़ी को असुविधाजनक ,असुरक्षित,देह आकर्षण के प्रतीक के रूप में देखता है जिसे पहन कर औरते नौ गज के गोल घेरे में बंध जाती हैं जो किसी भी मेहनत करने वाली ,काम करने वाली औरत के लिए किसी भी तरह सुरक्षित और सुविधाजनक नही कही जा सकती परंतु सबिका साड़ी के पल्लू को परचम की तरह लहराना चाहती हैं  उसे धरती का बिछावन और सिर पर साए की तरह ओढ़ना चाहती हैं —

     मेरी साड़ी वो आशियाना है जिसे

     तुम आसमान कहते हो

     मेरी साड़ी ही तो वो जमीन है

     जिस फर्श पर तुम रहते हो..

     ये साड़ी वो नदी है की लहर है

     जिस पर हम इश्क की नाव चलाते हैं

     इसी साड़ी से हम फासीवाद को फांसी लगाते हैं

     ….

     इस साड़ी पर तुमने बहुत छेद बनाए हैं

     …

     लेकिन हम भी बेहतरीन रफूगर है

     ….

     तुमने जहां से जातिवाद की कैंची लगाई थी

     उस पर मैंने सावित्री फुले की साड़ी का

     बेहतरीन टुकड़ा सिल दिया है…।

कविता मैं वास्तविक जीवन का जितना व्यापक फलक होगा जीवन अनुभव जितनी सघनता और तीव्रता से व्यक्त होंगे, उत्पीड़ित की तरफ खड़ा रचनाकार मनुष्यता से जितने गहराई से एकात्म होगा कविता या किसी भी कला की सृष्टि भी वैसी ही होगी। आज का कवि इस सेधान्तिकी को अपनी शर्तों पर,अपनी लय के साथ सिर्फ स्पर्श करके गुजर नहीं रहा बल्कि अनहद नाद की तरह कविता में उतार रहा है —

        हमारी हिम्मतें हमें विरासत में मिली हैं

        है जमाने ने देखो मोहब्बत हमी से की है

        हैं पलकों पर अपनी फलक को उठाए

        हथेली पर हम जहां को सजाएं

        कि सूरज को मिलती है शिद्दत हमीं से

        ………

        है चौड़ी छातियों को मुसीबत हमीं से

        पल्लू से मेरे यह परचम बने हैं

        बैनर लगे हैं यह झंडे गड़े हैं…..

खासबात ये है कि सबिका की कविता राजनीतिक कविता है पर वो नारा नहीं है उसमे गुस्सा है पर वो गुस्सा संवेदना के रास्ते पाठक या श्रोता के अंदर घर कर जाता है जो सवाल उठाता है जो उसकी आत्मा का सहचर बन जाता है। सबिका कविता सुनाते हुए इतनी ज्यादा सहज होती हैं की वो सहजता असहज लगने लगती है कभी कभी ओढ़ी हुई सी,पर ये उनका अपना कलेवर है इस से उनकी कविता के मर्म पर असर नहीं पड़ता उसकी आंतरिक बुनावट उतनी ही महीन बनी रहती है।

सबिका वास्तव में जनमंच पर ,सैकड़ों की भीड़ में हर एक से बात करने वाली कवि हैं उनकी कविताओं को एकांत कोने में बैठ कर पढ़ा नही जा सकता और अगर पढ़ा भी जाए तो एकांत कोने में ज्यादा देर ये कविताएं ठहरने नहीं देंगी।

क्योंकि ये हमारे अंदर सवाल उठाती हैं जो हमे बेचैन करते हैं जिन्हें व्यक्तिगत स्तर पर हल नहीं किया जा सकता जाहिर है ये आंदोलित करने वाली कविताएं हैं जो समय से मुखातिब होने का  ज़िद भरा आग्रह करती हैं।एक लड़की का ये , गुस्से से भरा रचनात्मक और निर्भीक संसार है।

          कविता संवेदना से बनती है, कविता मन को आघात देने वाले अनुभवों से बनती है आप कह सकते हैं कि राजनीतिक सोच की उथलाहट कविता के मर्म को खंडित करती है परंतु जब पूरा कालखंड, पूरा समय उस गलीज राजनीति के नाम ही लिख दिया गया हो तब कविता उससे अछूती कैसे रह सकती है? हम राजनीति से मुक्त अपने आप को यदि मानते हैं तो यह एक कोरा झूठ होगा। इस अर्थ में ये कविता राजनीतिक है कि हम राजनीति को बनाते हैं राजनीति हमे नही। ना तो कविता कोमलकांत पदावली है सिर्फ, ना ही तुकांत की गठजोड़ है। कविता मन के महीन तारों की गहरी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है। इस पृष्ठभूमि में जसिंता केरकेट्टा की कविता को पढ़ा जाना चाहिए,उनकी कविता पढ़ते हुए  मुझे लगा जैसे वह कह रही हो औरत हैं तो सिर्फ औरत की यंत्रणाओं को ही नहीं लिखेंगे बल्कि हर उस निष्ठुरता, हर उस बदमिजाजी पर लिखेंगे जिससे न सिर्फ औरत  बल्कि हाशिए का हर आदमी गुजरता है ।परिवारों बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि पूरी सामाजिक संरचना, वैधानिक संरचना और राजनीतिक संरचना पर जिस तरह पितृसत्ता पसरी पड़ी है उनसे जसिंता कभी सीधे तो कभी परोक्ष रूप से मोर्चा लेते दिखाई देती है ।इस विद्रूप समय में जब स्त्रियां आजादी के छद्म को बाजार में जी रही  हैं और ढूंढ रही हैं उस चमकीली दुनिया में अपने लिए एक आर्द्र कोना उस औरत के समानांतर एक घरेलू औरत है जो देहरी के अंदर है परंतु दोनों के सच थोड़े किंतु परंतु के साथ लगभग एक से हैं।  जसिंता केरकेट्टा इससे इतर स्त्री के माध्यम से पर्यावरण के सवाल उठाती हैं बाजारवाद के सवाल उठाती हैं सत्ताओं की कुरूपता के सवाल उठाती हैं और हमारे अवचेतन में जमे बैठे जाति और राष्ट्रवाद को प्रश्नांकित करती हैं —

          नन्ही दौड़ पड़ी हम आ गए बाजार!

          क्या-क्या लेना है ?पूछने लगा-दुकानदार

          भैया, थोड़ी बारिश, थोड़ी गीली मिट्टी

         एक बोतल नदी, वह डिब्बाबंद पहाड़

         उधर दीवार पर टंगी एक प्रकृति भी दे दो

         और यह बारिश इतनी महंगी क्यों

 दुकानदार बोला- यह नमी यहां कि नहीं!!

प्रकृति की तरफ पीठ किए पूंजीवादी समाज के सामने प्रश्न करती संवेदनात्मक कविता है ये, ये कविता तंज है विकसित दुनिया पर।

  सीधी सरलता से कही गई संजीदा बात कोई बिंब विधान नहीं, कोई छंद का गान नहीं परंतु कविता की ये तीक्ष्ण अंतर्वस्तु, आज के सबसे जीवंत प्रश्न उठा रही हैं, बाजार के चमकीलेपन में छुपी मानवीय संभावनाएं..।

 जसिंता जिन प्रश्नों को उठा रही हैं वह नए नहीं है न ही पहली बार उठे हैं उनकी खासियत उनकी साधारण अभिव्यक्ति है जो उनके गहन कथ्य को असाधारण बनाती है काव्य विषय जब कविता की अन्तरवस्तु बनते हैं तो वह रचनाकार के मनोंमय  अभ्यांतरीकरण को व्यक्त करते हैं।

        जब मेरा पड़ोसी

        मेरे खून का प्यासा हो गया

        मैं समझ गया

        राष्ट्रवाद आ गया..

  जसिंता की कविता कोमल कविता नहीं है उनकी कविता विकल करने वाली कविता है जो बिना किसी सजधज के हमारे अंतर्मन तक सीधे पहुंचती है उसका अपना कलेवर है जो पाठक को आसक्त करता और शर्मनाक हालातों के प्रति अंदर कुढ़न पैदा करती है और सीधे अपने आप के सम्मुख खड़ा कर देती है।

 कवि के समानांतर चलती दुनिया या दुनिया के समानांतर चलता कवि, जिससे उसका चेतन अचेतन लगातार टकराता है यह टकराना ही कवि का आत्म संघर्ष है जो उसका मीठा और कभी बेहद बेचैन करने वाला एकांत होता है। दुनियावी प्रपंच से दूर सृजन के क्षणों में जसिंता आज के सबसे निर्मम सत्यों से साक्षात करती है।

  कोई सैद्धांतिकी नहीं, विचारों का कोई घना संजाल नहीं जो किसी विशिष्ट विचारधारा से बना हो परंतु इन कविताओं में तनाव के बौखलाए हुए संवेदनात्मक स्फुरण दिखाई देते हैं विचारों का आरोपण कहीं नहीं। अनुभूति भरी ईमानदार कविता:-

            ओ शहर

छोड़ कर अपना घर,पुआल मिट्टी और खपरे

पूछते हैं  अक्सर

 ओ शहर!

 क्या तुम कभी उजड़ेते हो

 किसी विकास के नाम पर?

  इन कवियों की कविताओं के साथ कभी- कभी ऐसा अनुभव हुआ जैसे आप किसी यात्रा में हो और आपके साथ बैठा कोई मुसाफिर आप से लगातार बात कर रहा हो और आप अनसुनी करते-करते कब उसकी बातें सुनने लगे हैं और उसमें डूब जाए पता ही ना चले।

 मानवीय संभावनाओं के अंतःस्फोट आज की कविता में सुनाई दे रहे हैं तभी कविता इतिहास बनती है अन्यथा पानी के बुलबुले की तरह लुप्त हो जाती है। यह सब कवि साबिका की तर्ज पर सड़क तक पहुंच लोगों से सीधा संवाद करने खड़े हो जाएं तो इस से बड़ी क्रांति क्या होगी?

 लेखक का परिचय –   भारती वत्स                              
bhartivts@mail.com    

मनोसांकृतिक संरचना एवं हिंसा का अंतरसंबंध : हेजेमोनी और दलित स्त्री

किसी भी हिंसक घटना की पृष्टभूमि में उसके मनोसांस्कृतिक आधार का महत्वपूर्ण स्थान होता है ।बिना मानसिक तैयारी के कोई भी हिंसक विचार आकार नहीं ले सकता।हिंसक प्रवृत्ति के लिए लंबे समय तक सामाजिक स्वीकृति का होना अनिवार्य होता है ।यह स्वीकृति ही वर्तमान समय में भीड़ द्वारा हिंसा किए जाने की मनोसांस्कृतिक संरचना का निर्माण कर रही है ।

वर्चस्व के लिए की गयी हिंसा कोई एकाएक घटने वाली परिघटना नहीं है ऐसी घटनाएं पहले भी घटती रहीं हैं लेकिन उसका स्वरूप छोटा था और उसका मीडिया में खबर बनना और निंदा करने का चलन नहीं था क्योंकि यह मान्य कर ली गई हिंसा के श्रेणी में आती थी । विशेष समुदाय पर सुनियोजित हिंसा और खासकर अपराध के सामाजशास्त्र में महिलाएं आसानी से मान्य कर ली गई कोई व्यक्तिनुमा वस्तु ही थी । महिलाएं, विशेष रूप से दमित वर्ग की महिलाएं परंपरागत हिंसा के लिए चुनी गई गुलाम रहीं हैं जिसे न तो दमित वर्ग के पुरुषों से कोई मनोबल मिलता है और ना ही उसके शोषक वर्ग की महिला से । उसके विरुद्ध हिंसा की लड़ाई में कई बार वह अकेली ही दिखाई देती है तब भी जब वह शोषित हो रही होती है और तब भी जब वह न्याय मांग रही होती है । इस पृष्टभूमि को हम निम्न प्रश्नों द्वारा स्पष्ट करने का प्रयत्न करेंगे-

  • दलित महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और मनोसंस्कृतिक संरचना का क्या संबंध है ?
  • वर्तमान समय में वर्चस्व वादी जातियों द्वारा किन माध्यमों से हिंसा का मनोशस्त्र गढ़ा जा रहा है ?

और बृहद समाज का ध्यान हिंसा के मनोशस्त्र के बनने के पीछे मनोसंस्कृतिक हिंसा कैसे कम करती है,  जो नेपथ्य में काम करती है उस हिंसा को उजागर करना इस लेख का उद्देश्य है ।

मनोसांस्कृतिक संरचना का पुनर्निर्माण :

पिछले कुछ सालों से भारत की प्रभुत्व वाली जातियों के लोगों द्वारा विभिन्न माध्यमों से उनके अपने वर्चस्व को यथास्थिति में बनाए रखने के लिए हिंसा को एक प्रमुख हथियार बनाए जाने के कई मामले सामने आए हैं । हिंसा के सूक्ष्म स्वरूपों की पड़ताल किए बिना भौतिक हिंसा की प्रकृति की आधी-अधूरी समझ ही विकसित हो पाती है । बलात्कार जैसी दृश्य हिंसाओं को ज़्यादा महत्व देने के कारण इसके नेपथ्य में काम कर रहीं हिंसाओं को कमतर देखा जाता है । यह 70 और 80 के दशक के महिला आंदोलन द्वारा कुछ खास हिंसक घटनाओं को आंदोलन के रूप में चुने जाने के कारण हुआ, जिससे परिवार में हो रही जातीय संरचनात्मक हिंसा की अनदेखी की गई । जेण्डर की हिंसा को बहस के केंद्र में रखे जाने के कारण प्रतिदिन की जाने वाली हिंसा जो कि संरचना में रची-बसी है वह हिंसा की परिभाषा की परिधि से दूर हो गई । भारत में वर्चस्व को बनाए रखने के लिए जाति एक ऐसा सशक्त साधन है जिससे स्वयं नारीवादियों, समाजवादियों तथा स्वायत्त महिला संगठनों से भी इसकी परतों में जाकर इसकी विवेचना करने से चूक हो गयी । जिससे हुआ यह कि [1]पूरे भारत में चल रहे महिला आंदोलन जाति के मुद्दों पर असंवेदनशील दिखायी दिए क्योंकि समकालीन दलित महिलाओं पर हो रही शारीरिक और मानसिक हिंसा पर वें सभी चुप रहे । 70 के दशक में चल रहे दलित संगठनों द्वारा जो मुख्यतः उग्र स्वरूप के थे उन्होंने भी दलित महिलाओं पर हो रही शारीरिक हिंसाओं पर तो आंदोलन किए जो जातिगत हिंसा की श्रेणी में भी आते थे लेकिन अपनी महिला के प्रति वें स्वतः निष्ठुर रहे और उन्होंने अपने परिवार में दलित महिलाओं पर दलित पुरुषों द्वारा की जा रही शारीरिक व मानसिक हिंसा की निंदा भी नहीं की । उनके मुद्दे केवल स्त्री शिक्षा, उन्हें जाति के बंधन और कर्मकांड से मुक्त करने तक ही सीमित रहे ।वर्तमान में भी दलित महिलाओं की मानसिक हिंसा जो सामाजिक संरचना में वर्चस्व के सिद्धांत माध्यम से  प्रभुत्व शाली जातियों द्वारा की जाति है उस पर कम ही बात होती है ।

21 जून 2018 UDHR (मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा 1948) की 76 वीं वर्षगांठ पर जिनेवा में आयोजित ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद’ के 38 वें सत्र में [2]‘ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच’ ने भारत में दलित महिलाओं द्वारा झेली जा रही जाति आधारित हिंसा से जुड़ी रिपोर्ट व वीडियो जारी किया, जिसमें भारत में दलित महिलाओं के विरुद्ध हो रही हिंसा के मुद्दे को चर्चा का विषय बनाया । उनका कहना है कि इस रिपोर्ट को पेश करने का उनका उद्देश्य यह है कि जाति आधारित हिंसा की समस्या से लड़ने के लिये सही नीति और क्रियान्वयन से जुड़े सुझावों को संयुक्त राष्ट्र के भीतर और बाहर खोजना और इस दिशा में अंतराष्ट्रीय स्तर पर साझेदारी बनाना था |  इस परिषद के 38 वें सत्र में ‘जातिगत बर्बरता के विरुद्ध आवाजें : भारत में दलित महिलाओं की कहानियां’ शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में खुले तौर पर इस बात की चर्चा की गयी है कि किस तरह मोदी सरकार में दलित महिलाओं को अत्यंत क्रूर हिंसा और दोषियों की सुरक्षा के लिए अधिकारियों के बीच मिलीभगत की विशेष संस्कृति का सामना करना पड़ रहा है | इस  रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत के विभिन्न राज्य जैसे बिहार, हरियाणा, उड़ीसा और महाराष्ट्र में दलित महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं के मामलों में पुलिस प्रशासन की कारवाई में ढिलाई तथा जातिगत भेदभाव के खिलाफ वें अपना प्रतिरोध भी दर्ज कराती है |

सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था में प्रतीकात्मक हिंसा वर्चस्वशाली जातियों द्वारा इस व्यवस्था से आरोपित की जाती है जैसे कभी-कभी यह तानाशाही न होकर प्राकृतिक लगने लगती है । यह कई बार शोषितों द्वारा स्वतः अपने अधिकार को छोड़े जाने और अपने अस्तित्व को नकारे जाने से भी लक्षित होता है । इस प्रकार की हिंसा की पृष्ठभूमि में शारीरिक हिंसा होती है । लेकिन यह हिंसा दैनंदिन जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में न सिर्फ साधारणतः स्वीकार कर ली जाती है बल्कि बेदभाव और शोषण की भी पुनरावृत्ति होती है । शोषितों द्वारा इसे स्वतः मौन स्वीकृति दे दी जाती है ।

[3]इटली के प्रसिद्ध समाजवादी अंटोनिओ ग्रामसी ने सत्ता के वर्चस्व के पीछे सांकृतिक तथा विचारधारात्मक रणनीति का होना आवश्यक तत्व के रूप में मान्य किया है । शोषित की सहमति के बिना सांस्कृति और ज्ञान का वर्चस्व जिससे हिंसा की जड़े मजबूती से जमायी जाती हैं वह स्थापित नहीं हो सकता । वें बताते है कि “आर्थिक केंद्रीयता सांस्कृतिक, नैतिक, वैचारिक वर्चस्व का निर्माण करती है और इसे कमजोर तबकों पर आरोपित करती है । यह मात्र राजनीतिक वर्चस्व के कारण ही नहीं होता इसके लिए आर्थिक गैरबराबरी आवश्यक है । इसीलिए यह ‘जबरदस्ती’ और ‘सहमति’ के बीच की बराबरी पर ध्यान देता है” । वर्चस्ववादी और दबंग वर्ग वैचारिक तथा सचेतन बुद्धि से शोषण करता है यह शोषण व्यावहारिक हिंसा को नहीं वरन वैचारिक हिंसा की ओर अग्रसर होता है ।

‘जिस काल में अमरीका जैसे देश में बलात्कार जैसी हिंसाओं के विरोध में प्रदर्शन किए जा रहे थे और अश्वेत नारीवादियों द्वारा अश्वेत महिलाओं के विरुद्ध व्यावहारिक और सांकेतिक हिंसा के रूपों को पहचान कर अपने अस्तित्व के लिए आंदोलन किए जा रहे थे ठीक उससे पहले यह काम भारत में किया जा चुका था’ ।[4] 1972 में महाराष्ट्र राज्य के नागपुर में बलात्कार पर पहली बार भव्य मुक विरोध प्रदर्शन किया गया यह अपने समय का पहला ऐसा मुक मोर्चा था जिसमें शोषित समुदाय की महिला की यौनिक स्वतंत्रता और उसे अपमानित किए जाने के बीच के फर्क को रेखांकित किया गया और लोगों के मानस में इस हिंसा की गंभीरता को मुखरता से स्पष्ट किया गया । ‘1975 में स्यूजन ब्राउनमिलर ने अपनी पुस्तक, ‘अगेन्स्ट अवर वील’ के माध्यम से पहली बार बलात्कार जैसी समस्या पर दुनिया का ध्यान खिंचा तथा इस हिंसा की गंभीरता पर प्रकाश डाला और समाज में स्त्री की शोषित अवस्था से सभी को अवगत कराया । ब्राउन मिलर के अनुसार “बलात्कार मूलतः राजनीतिक प्रक्रिया है और बलात्कार कामुक उत्तेजना से प्रेरित नहीं होता बल्कि राजनीतिक कारणों से प्रेरित होता है यानि वह पुरुष शक्ती की स्थापना और स्त्री-अधीनीकरण के विचार को संप्रेषित करता है’ ।[5] भारतीय संदर्भ में वर्चस्व की पुनरावृत्ति शारीरिक और मानसिक अधीनीकरण की प्रक्रिया के द्वारा दलित महिलाओं पर निरंतर हिंसक यौनिक हमलों के माध्यम से की जा रही है जो लंबी जातिगत घृणा का परिणाम होती है । यह हिंसक हमले किसी भी दमित समुदाय को निरंतर दासता की स्थिति में रखने के लिए उस समुदाय की महिला के विरुद्ध किए जाते रहे है जिससे उनके भीतर दमित मानसिकता की संरचना का पुनर्निर्माण होता रहे ।

बदलते समय के साथ हिंसा के रूप भी बदले हैं जैसे भीड़ द्वारा की गयी हिंसा और उस हिंसा का सामान्यीकरण करना, शिक्षा के क्षेत्रों में छात्र-छात्राओं पर हिंसक हमले, बलात्कारियों के पक्ष में निकाले गए मोर्चे, नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों में महिलाओं की सुरक्षा पर चिंताजनक स्थिति, नेताओं द्वारा दिये गए बयान जिसमें महिलाओं को उनके विरुद्ध की गयी हिंसा के लिए जिम्मेदार बताना जैसे, [6]‘रेप इंडिया में होते हैं भारत में नहीं’, धारा 370 के हटने के बाद हिंसा की खुली छूट देना जिसमें पुरुष प्रभुत्व को स्वीकृति देते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का बयान था कि अब हमारे लड़के वहाँ से लड़कियां ला सकते और हासिल कर सकते हैं । विक्रम सिंग जो मुजफ्फरपुर के एम. एल. ए. है उनके द्वारा कहा जाना कि बीजेपी. कार्यकर्ता वहाँ की गोरी चमड़ी वाली लड़कियों से विवाह करने के लिए उत्सुक है’ । इस तरह के हिंसक बयान के मात्र उच्चारण से ही बड़ी भीड़ को उस प्रतीकात्मक हिंसा का संकेत मिल जाता है । इन बयानों में जो कहा जा रहा है इसका सीधा हिंसक परिणाम गांव की उस दमित जातियों वाली युवतियों की यौनिक स्वतंत्रा पर होता है जो सामूहिक बलात्कार जैसी हिंसा के लिए आसान शिकार बना दी जाती है । जमीनी स्तर की हिंसा जो भौतिक आकार में नजर आती है उसका उपयोग विभिन्न माध्यमों से मानसिक हिंसा जो घृणा की संस्कृति का निर्माण करती उसके लिए जमीन तैयार कर रही होती है ।

आभासी प्रतीकात्मक हिंसा की पृष्टभूमि:

सोशल मीडिया जगत की बात करें तो  [7]‘हिंदु ट्रेड’ नामक एक समूह जो भारत में दलितों के विरुद्ध हिंसक भाषा का उपयोग कर उनके विरुद्ध की जाने वाली अन्य हिंसाओं के मनोशास्त्र को गढ़ता है और एक विशेष जाति समूह के लोगों पर आरोपित करता है तथा हिंसा को सामूहिक सहमति द्वारा अपने जाति समूह में सही घोषित करता है । इस समूह द्वारा जातिसूचक गालियाँ देना, दलितों कों ‘भीमट्या’ कह कर अपमानित करना, और दक्षिणपंथ की सत्ता कों बनाए रखने के लिए आपस में दलितों के विरुद्ध सामूहिक हिंसा के लिए सहमति देना यह सब किया जाता है । इसमें नाज़ियों द्वारा गैस चेंबर में डालकर कर किए गए नरसंहार जैसी हिंसा कों दलितों पर किए जाने की भी सहमति दी जाति है । यह हिंसा इंटरनेट पर  बातचीत का हिस्सा भले ही है लेकिन इस हिंसा की मनोसांस्कृतिक पृष्टभूमि जातिव्यवस्था की विभेदीकरण की राजनीति में तैयार की जाती है । मनोसांस्कृतिक संरचना की हिंसक पुनरावृत्ति इसी तरह के साधनों द्वारा की जा रही है ।

दलितों और उनकी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा जैसे उनका अपमान करना, उनके द्वारा की गयी आर्थिक उन्नति और उनके आत्मविश्वास को नष्ट करना, दलित स्त्री की दैहिक स्वतंत्रता को, उनकी यौनिकता को अपनी मर्दानगी के नाम पर नियंत्रित करने के लिए सामूहिक बलात्कार करना और उनकी हर प्रतिरोधी क्षमता को मार-पीट कर दबाना । यह हिंसा के ऐसे रूप है जिन पर बात होती है और लिखा भी जाता है लेकिन इन हिंसाओं ने कैसे पूरी पीढ़ी को मानसिक रूप से तैयार किया जिसमें हिंसा को हिंसा के रूप में देखे जाने के साथ ही जातीय दंभ और इसको शांत करने के लिए अपनायी गयी हिंसा के उत्सव मनाये जाने की संकृति का भी ज्ञोतक बनाया है जिसके घातक परिणाम हम देख चूकें हैं, इस पर बात की जानी जरूरी है ।

[8]उत्तराखंड और रायपुर में हुई धर्म परिषद में मुस्लिम महिलाओं के विरुद्ध लगाए गए हिंसक नारे जिसका तत्काल कोई परिणाम न भी दिखे लेकिन इससे किसी भी हिंसा के लिए  एक तैयार भीड़ का निर्माण किया गया। जो कभी भी किसी ऐसे समुदाय के विरुद्ध मारने-काटने की मासिक तैयारी के साथ आएगी जिससे उनका कोई संबंध भी नहीं होगा । यदि भविष्य में इसी भीड़ द्वारा किसी धार्मिक उन्माद में विशेष जाति समूह और उनकी महिलाओं के विरुद्ध बलात्कार होते हैं, उनकी संपत्ति नष्ट कर दी जाती है, या उनकी पूरी बस्ती को ही आग लगा दी जाती है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि यह हिंसक भीड़ कहा से आयी थी । इस हिंसा की तैयारी ऐसे ही कट्टरपंथियों द्वारा लंबे समय से कभी धार्मिक मंचों से तो कभी चुनावी मुद्दों में जातीय उन्माद को भड़काने का काम करती है जो नेपथ्य में रहकर बड़े नरसंहार का काम करती दिखायी देती है । राज्य की सत्ता समाज में धर्म की सत्ता के साथ मिलकर वर्चस्व को बनाए रखने का काम करती है इसके केंद्र में दलित महिलाओं के विरुद्ध की जाने वाली हिंसा होती है । यह करने के लिए आवश्यक है कि लोगों के मस्तिष्क में शोषित जातियों के विरुद्ध हिंसक भाषा का उपयोग कर उन्हें उकसाया जाए और उनके द्वारा हिंसा करने की जिम्मेदारी सौपी जाए जो पूर्ण रूप से जायज होगी । ऐसा ही हाथरस की सामूहिक बलात्कार की घटना में देखा गया कि कैसे पुलिस प्रशासन राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण मृतक युवती के विरुद्ध काम कर रही थी और बाद के दिनों में सवर्ण समाज के लोगों द्वारा जातीय अस्मिता के नाम पर पंचायत बुलाकर बलात्कारियों को बचाने के लिए, जो उनकी अपनी जाति के थे, सामूहिक सहमति का निर्माण किया गया । ऐसा करना बहुत नया चलन है जो रास्तों पर और सार्वजनिक रूप से बलात्कारियों के पक्ष में जन सहमति बनायी जा रही है । यहां कैसे एक जाति के लोगों द्वारा नीची समझे जाने वाली जाति के लोगों के लिए हिंसा का मनोशास्त्र काम करता है जहां हिंसा में कानून, जातीय दंभ और राज्य के पक्षपाति विचार के आधार पर की गयी राजनीति का अंतरसंबंध देखने को मिलता है । किसी बड़ी हिंसा के किए जाने के पहले की मानसिक तैयारी ही उस हिंसा के घटने की मनोसांकृतिक संरचना का निर्माण करती है । छोटी हिंसाएँ भविष्य में बड़ी हिंसा के लिए कच्ची सामग्री का काम करती है । इस संदर्भ में बात को स्पष्ट करने के लिए कवंल भारती अपने लेख  [9]‘हिंदु हिंसा न भवति’ में कुछ इतिहास के उदाहरण और कुछ वर्तमान से संदर्भ लेकर यह बताते है कि कैसे दलितों के साथ “हिंदुओं की हिंसा उनके समाजशास्त्र का अनिवार्य हिस्सा है”

जो काम जाति व्यवस्था ने पहले से कर रखा है उसे अब धार्मिक आधार पर की गयी राजनीति के माध्यम से राज्य की वे सभी इकाइयां मिलकर कर रही है जिससे जाति के आधार पर एक बृहद तबके को सालों साल शोषित रखा जाए और ब्रम्हणवादी पितृसत्ता का काम जो कि दलित महिला के शोषण को कायम रखना  है, करती हैं । वर्चस्व को दबंग जाति के लोगों द्वारा बनाए रखने के क्रम में मनोसांस्कृतिक संस्कारों के प्रभाव का होना आवश्यक तत्व के रूप में उभरकर आया है । दृश्य हिंसा की परंपरा को लोकतांत्रिक समाज द्वारा नकारे जाने के बाद यह आवश्यक हो गया है कि दमितों की उनके दमन, शोषण के लिए उनसे सहमति ली जाए । और यह सहमति वर्चस्व के विभिन्न माध्यमों (स्कूल) द्वारा प्राप्त करने का कार्य करते है जिसमें मुख्यतः धार्मिक ग्रंथ, सामाजिक परंपराएँ, विश्वविद्यालय, स्थानीय मूल्य, राजनीतिक तथा धनी व्यापारी वर्ग के आर्थिक हित, ज्ञान और विज्ञापन जगत में, सांस्कृतिक जीवन में इन सभी का व्यवहार आदि । वर्चस्ववादी और दबंग वर्ग वैचारिक तथा सचेतन बुद्धि से शोषण करता है यह शोषण व्यावहारिक हिंसा को नहीं वरन् वैचारिक हिंसा की ओर अग्रसर होता है ।

संभावित निष्कर्ष –

सामाजिक स्तरीकरण जो सामाजिक विभेदीकरण की व्यवस्था पर स्थित है जिसमें हिंसक वर्चस्व एक मुख्य साधन है, यह लोगों के दैनंदिन व्यवहार का अंग है जो प्रतीकात्मक हिंसा का प्रस्थंबिंदु है । यह अभिजात्य लोगों द्वारा शोषित पर इस तरह आरोपित कर दिया जाता है कि वह हिंसक वर्चस्व व्यवस्था का एक हिस्सा लगाने लगता है जिसकी स्वीकृति दमित वर्गों में कभी हिंसा के माध्यम से तो कभी हिंसा के सहायक साधनों से भी प्राप्त की जाती है ।

वर्तमान में जातीय वर्चस्व को निरंतर बनाए रखने के क्रम में इंटरनेट जैसे सशक्त माध्यमों का उपयोग एक बलात्कारी, हिंसक भीड़ जिसमें महिलाएं भी शामिल कर ली गयी का निर्माण किया जा रहा है । जिसका उदाहरण हम महाराष्ट्र की खैरलांजी की सामूहिक बलात्कार और हत्या की हिंसा से लेकर हाल-फिलहाल चंद्रपुर में काले जादू का आरोप लगाकर एक ही परिवार के सात सदस्यों को चौराहे पर पीटकर हत्या की, हाथरस में बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार और इसके पक्ष में भौतिक और आभासी साधनों पर जैसे वाट्स ऐप ग्रुप में सहमति तथा हिंसक भाषा का उपयोग तक के हिंसक व्यवहार को देख रहे है । जो लगातार मनोसंस्कृतिक हिंसक संस्कृति की सहमति का निर्माण कर रहे है । जिसमें खासकर दलित समुदाय की महिला और उनके लिए जो आदर्श है डॉ. आंबेडकर को अपमानित करने वाले वाक्य बोले जा रहे है और ऐसा करने वालों की उम्र महज 18 वर्ष से शुरू हो रही है जो भविष्य के दंगाई के रूप में कम करेंगे । इनको ऑनलाइन से ऑफलाइन होने में जरा भी समय नहीं लगेगा । हिंसा में शामिल होकर उस हिंसा का आनंद उठाना एक क्रूर आपराधिक मानसिकता को उजागर करता है जो सामाजिक स्वास्थ को खराब करता है और यह सामाजिक बीमारी ही समाज का विकास अवरुद्ध करती है ।

अशिक्षित, धार्मिक उन्माद में व्यस्त भीड़ हिंसाओं के परिणामों को नहीं देख पाती और यह किस के पक्ष में की जा रही है, इससे किसका फायदा होगा यह सब उनके सोच के परे होता है । हिंसा के मनोशास्त्र में हिंसक प्रवृति का उन्माद आने वाली कई पीढ़ियों को अपना अनुयायी बनाकर रखता है और उस वैचारिक जमीन पर नरसंहारों के बड़े भयानक खेल में उन्हें शामिल किया जाता है । भारतीय संरचना में इसी हिंसक मनोशास्त्रों के पुनर्निर्माण के लिए अब तक की सभी व्यावहारिक और वैचारिक दासता को रोपित किया जाता है इसके बिना हिंसक भीड़ जुटाना संभव ही नहीं क्योंकि घृणा की मानसिकता समय के साथ फीकी भी पड़ जाती है ऐसे में धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक रणनीति ही उस मनोशास्त्र को पोषित करती है । फिर वह हिंसा हिंसा नहीं लगती जाति की सुरक्षा के लिए अनिवार्य हो जाती है ।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची:

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  • Yengde Suraj, (2013 ), ‘for a rape ‘caste’ (does) matter in India’ sanhati.com/excerpted/6054/January 26

[1] Rege, sharmila.(2018). A Dalit feminist stand point:   https://www.indiaseminar.com/2018/710/710

[2] http://www. twocircle.net/2018jun 23/423873 26/022022 कों देखा गया

[3] http://www.powercube.net/other-forms-of-power/gramsci-and-hegemony/date-29-8-2021

 

[4] Colins, patricia hill. (2002), ‘Black feminist thought’: Routledge publication

[5] बैनर्जी सारदा (2017), ‘बलात्कार-संस्कृति और स्त्रीवाद’, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीबूटर्स(प्रा.) लिमिटेड नई दिल्ली, पेज नं.80 प्यारा, 2

[6]  http://zeenews.india  57415

[7] http://youtu.be/IYVnEfCIL4Q, 27/02/2022 कों देखा गया

[8] https://www. bbc./com/hindi/india -59774285

[9] भारती कवंल, संपादक राजकिशोर.(2000). ‘हिंदु हिंसा हिंसा न भवति’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली p.no,56

शिल्पा भगत, पीएच् .डी. शोधार्थी, स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा 

प्रधानमंत्री को पत्र लिखना हुआ गुनाह: 6 बहुजन छात्र निष्कासित

जब देश में अख़लाक़, जुनैद, तबरेज और ना जाने कितने नाम हैं तथा झारखण्ड में आदिवासियों को, राजस्थान, असम, छतीसगढ़, उत्तरप्रदेश और देश के कई हिस्सों में गाय के नाम पर हिन्दू संगठनों द्वारा प्रायोजित भीड़ द्वारा हत्या की जा रही है और देश के प्रधानमंत्री अमेरिका में कहते हैं “वहां सब अच्छा है” अब प्रधानमंत्री न मिडिया से वाकिफ़ होते हैं और न ही जनता से तो ये सवाल देश के अमन पसंद लोग कैसे पूछेंगे की यहाँ क्या सब अच्छा है आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 का निरस्त होना या अल्पसंख्यकों पर प्रायोजित ढंग से मॉबलिंचिंग? जेएनयू का छात्र नजीब जो तक़रीबन तीन साल से गायब है उसको आरएसएस की एक छात्र शाखा जो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् है इस संगठन के लोगों पर आरोप है की इनके द्वारा नजीब को पिटा जाता है और फिर गायब कर दिया जाता है, तो सवाल पूछना पड़ेगा, जब सवाल पूछा जाता है तो उनके ऊपर देशद्रोह का केस दर्ज कर दिया जाता है. रामचंद्र गुहा, मणिरत्नम और अपर्णा सेन अनुराग कश्यप श्याम बेनेगल समेत 49 अमन पसंद लोगों ने प्रधानमंत्री को खुला पत्र लिख कर उनको अवगत कराने का कोशिश किया गया की देश में मॉबलिंचिंग की घटनाएँ बहुत ज्यादा बढ़ गई है, लेकिन बिहार के मुजफ्फरपुर में इन 49 लोगों के खिलाफ गुरुवार को देशद्रोह का केस दर्ज कर दिया जाता है.

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ये सिलसिला आगे बढ़ता है जब महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के प्रशासन ने छह विद्यार्थियों को निष्काशित कर दिया जाता है, चन्दन सरोज, नीरज कुमार, राजेश सारथी, रजनीश अम्बेडकर, पंकज वेला और वैभव पिंपलकर इन लोगों ने इस अलोकतांत्रिक कार्रवाई का विरोध करते हुए 9 अक्टूबर को विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री को पत्र लिखने का सामूहिक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें छात्र-छात्राओं ने अपने पत्र में पीएम मोदी प्रधानमंत्री से देश के मौजूदा हालात को देखते हुए कुछ सवालों का जवाब मांगा है. छात्र-छात्राओं ने देश में दलित-अल्पसंख्यकों के मॉबलिंचिंग से लेकर कश्मीर को पिछले दो माह से कैद किए जाने; रेलवे-बीपीसीएल-एयरपोर्ट आदि के निजीकरण; दलित-आदिवासी नेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं बुद्विजीवी- लेखकों के बढ़ते दमन और उनपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने पर भी सवाल खड़े किए हैं. छात्र-छात्राओं ने महिलाओं पर बढ़ती यौन हिंसा व बलात्कार की घटनाओं के सवाल पर भी जवाब माँगा है. क्या ये सवाल जायज नहीं है? इन सवालों से देश की छवि खराब हो जाएगी?

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चन्दन सरोज कहते हैं की देश में आज दलितों-अल्पसंख्यकों की मॉबलिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के लिए बीजेपी-आरएसएस जैसे संगठन जिम्मेवार है. बीजेपी-आरएसएस के नेता मॉबलिंचिंग करनेवालों को सम्मानित करते रहे हैं। एक सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ नफरत फैलाने वालों को आज केन्द्र-राज्य की सरकारों में अहम ओहदे पर बिठाने का भी काम आरएसएस-बीजेपी ने ही किया है। ऐसी स्थिति में केन्द्र सरकार के मुखिया होने के नाते पीएम मोदी की ही यह जिम्मेदारी है कि वे इन घटनाओं पर रोक लगाएं.

शिल्पा भगत ने कहा कि आज देश में बलात्कार और यौन हिंसा के मामले थमने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं. कुलदीप सेंगर से लेकर चिन्मयानंद जैसों को बचाने में सरकार ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली सरकार महिला सुरक्षा के मुद्दे पर पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है. बलात्कारियों के पक्ष में जुलूस तक निकाले जा रहे हैं. इसलिए हम प्रधानमंत्री से उम्मीद करते हैं कि वे महिलाओं पर जारी यौन हिंसा-बलात्कार को रोकने हेतु सख्त कदम उठाएं.

रजनीश कुमार अम्बेडकर ने कहा कि संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए कश्मीर से जिस प्रकार धारा-370 हटाया गया और यह कहा गया  कि इससे कश्मीर के लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों की गारंटी होगी. जबकि आज दो माह से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी कश्मिरीयों को कैद कर रखा गया है. वहां आज भी कर्फ्यू जैसे हालात क्यों हैं? इसका पीएम मोदी को जवाब देना होगा.

वैभव पिम्पलकर ने कहा कि मोदी सरकार एक तरफ राष्ट्रीय गौरव और देशभक्ति की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ रेलवे, बीपीसीएल, एयरपोर्ट से लेकर कई अन्य राष्ट्रीय महत्व के उद्दमों को पूंजीपतियों के हाथों बेच रही है. सरकार देश के विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है और स्थिति यह है कि रिजर्व बैंक से लेकर अन्य बैंक कंगाली की तरफ बढ़ रहे हैं. कंपनियों में नौकरी करनेवालों की बड़ी पैमाने पर छंटनी हो रही है. बेरोजगारी कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है. छात्र-युवाओं के भविष्य के साथ किए जा रहे इस खिलवाड़ का प्रधानमंत्री मोदी को सामने आकर जवाब देना चाहिए. क्योंकि उन्होंने प्रतिवर्ष दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का देश की जनता से वादा किया था।

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नीरज कुमार ने कहा कि केन्द्र सरकार नागरिकता संशोधन कानून को सामने लाकर मुसलमानों में खौफ पैदा कर रही है. कई पीढ़ियों से किसी जगह पर रह रहे आम लोगों को लगातार भयभीत किया जा रहा है. देश के गृहमंत्री धर्म के आधार पर मुस्लिमों को नागरिकता के मामले में टारगेट कर देश-समाज में हिंसा, नफरत व अशांति फैला रहे हैं. प्रधानमंत्री को ऐसे गंभीर मामले में संज्ञान लेना चाहिए. यह देश सभी धर्म के लोगों का है. भारत का संविधान जाति, धर्म, वर्ण, लिंग, संप्रदाय के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करता है. पीएम को संविधान के इन मूल्यों की रक्षा करनी होगी.

इन विद्यार्थियों ने बहुजन नायक मान्यवर कांशीरामजी के पूण्यतिथि के कार्यक्रम करने के लिए प्रशासन को परमीशन के लिए पत्र दिया गया था लेकिन इनको कार्यक्रम करने का परमीशन यह बोल कर नहीं मिला की उसमें तारीख नहीं लिखा है. चंदन सरोज बताते हैं की यहाँ आरएसएस की शाखा बिना किसी परमीशन के रोज चलाई जा रही है और हमें कोई भी कार्यक्रम के लिए प्रशासन का परमीशन नहीं मिलता है. यहाँ के विद्यार्थियों के साथ सभी अमन पसंद लोगों, संगठनों को एक जुट होकर इनके पक्ष में खड़े होने की जरुरत है और इनका निष्कासन को तुरंत वापस लेना चाहिए.

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