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संभोग के लिए हिंसक शब्दावली: पितृसत्तात्मक शक्ति संरचना में असामान्य शब्दों का सामान्यीकरण

“आपसी सरगोशियों से लेकर रोजमर्रा के सामान्य बातचीत और लड़ाई-झगड़े में ‘फकिंग’ ( आम बोलचाल में चोदना) शब्द जिस सहजता से इस्तेमाल होता है, क्या यह वाकई सामान्य और सहज है? जया निगम अपने ‘फेसबुक पोस्ट’ से इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर गंभीरता से विचार करती हैं. इस पोस्ट के जरिये वे इस बात की तरफ मजबूत इशारा करती करती हैं कि (आम बोलचाल) निजी और सार्वजनिक स्पेश में ‘फकिंग’ शब्द का प्रयोग सुनने वाले के लिए कितना क्रूरतापूर्ण और असहज कर देनेवाला अनुभव होता है.
जया अपने पोस्ट के जरिये इस प्रकार के शब्दों के पीछे के वर्ग चरित्र और शक्ति संरचनात्मक पहलू की ओर भी इशारा करती हैं जहाँ सुनने और सुनाने वाले के बीच शक्ति संबंध होता है और सुनाने वाले की आर्थिक सामाजिक हैसियत सुनने वाले से मजबूत होती है. हालाँकि यह पूरी तरह से सच नहीं है. कभी-कभी कमजोर वर्ग भी प्रतिरोध के प्रतीक के तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल करता है.”

-अंजलि कुमारी

पितृसत्ता में चोदना (Fucking) एक ऐसी क्रिया है जिसे दूसरे के लिए निम्नतम गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है और अपने लिए अधिकतम सुख के लिए.

 

चोदने (Fucking) में सेक्स को किसी के शरीर से नोच लेने या छीन लेने या परिष्कृत भाषा में कहें तो हासिल कर लेने का जो भाव है वो पूरी दुनिया में एक जैसा है.
इस अंतरंग क्रिया के लिए हिंदी में सहवास या संभोग जैसे शब्द भी बने हैं पर वो किताबी शब्दावली है क्योंकि इन शब्दों में वो भाव ही नहीं है जो सेक्स को लोक में प्रचलित नजरिए से प्रकट करे, लोक में जो भाव है उसके लिए हिंदी में ठीक ठीक यही शब्द याद आता है, शायद अन्य बोलियों में ऐसे और भी शब्द प्रचलन में होंगे पर इंग्लिश में इसका परिष्कृत शब्द इंटरकोर्स होगा.
पूरी दुनिया के पुरुष जब सेक्स के बारे में बात करते है तो कितने इंटरकोर्स का इस्तेमाल करते हैं जबकि fucking लगभग हर हॉलीवुड फिल्म में सुनने को मिल जाता है.
बहुत लोगों ने कल ये पूछा कि इस शब्द पर पोस्ट डाले जाने का मकसद क्या है, मेरा उनसे सवाल है कि जो शब्द सुनने में रोजमर्रा के हो चुके हैं उनके बारे में लिखा जाना या बात किया जाना उन्हें इतना बुरा क्यों लग रहा है!
मेरी वॉल पर सिर्फ पवित्र और सुसंस्कृत मुद्दे उठाए जायेंगे ऐसा कोई वादा अपने फेसबुक दोस्तों से मैने कभी नहीं किया.
प्रतीकात्मक तस्वीर

स्थिति 1:

आपसे अपने कार्यस्थल या कहीं बाहर या घर पर कोई गलती होती है और आपका बॉस या घर का कोई बुजुर्ग आदमी आपको बक्चोद, कंचोद, जैसे शब्द नियमित तौर पर बोलता हो (जिनमे मां बहन संग साथ के लिए न लगे हों) तो आपको ठीक ठीक क्या महसूस होता है!!
  1. अपमान
  2. यही दुनिया है
  3. अपनी हीन स्थिति
  4. मज़ाक/व्यंग्य
  5. उत्तेजना
  6. इनमे से कुछ नहीं
  7. कुछ और
प्रतीकात्मक तस्वीर

स्थिति 2:

आप बिस्तर पर अपनी बीवी के साथ हैं या ऐसी किसी स्त्री/पुरुष के साथ जिसकी आर्थिक हालत आपसे कमजोर है (गर्लफ्रेंड, सेक्स के लिए खरीदी गई स्त्री, वन नाइट स्टैंड पार्टनर) और वो आपके चोदने वाले उत्तेजक वाक्य के संदर्भ में जब कोई जवाब नहीं देती या आपको fuck you baby/man/ तेरी तो आज ले के रहूंगी टाइप जवाब नहीं देती तो आपको क्या लगता है, उसे कैसा महसूस होता है?
1. अपमान
2. यही दुनिया है
3. मज़ाक/व्यंग्य
4. अपनी हीन स्थिति
5. उत्तेजना
6. इनमे से कुछ नहीं
7. कुछ और
इन दोनो परिस्थितियों में एक समानता है कि fuck you/fuck off/ चोद दिया आज टाइप डायलॉग मारने वाला व्यक्ति आर्थिक, सामाजिक रूप से, सुनने वाले के मुकाबले पावरफुल स्थिति में है.

हां मुझे फर्क पड़ता है…

 

कुछ महीने पहले बीबीसी पढ़ते हुए एक स्टोरी पर नजर गई जो ईरानी महिलाओं पर थी। ईरान में महिलाओं को शादी से पहले वर्जिनिटी प्रमाण पत्र बनवाना पड़ता है जिससे ये साबित हो सके कि उन्होंने किसी के साथ सेक्स नहीं किया है। हालांकि वहां पर इसका विरोध भी हो रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने के बाद महिलाओं की स्थिति तो जगजाहिर है। जिंदगी को आम तरीके से जीने की कोशिश के बावजूद देश-दुनिया में होने वाली ऐसी तमाम घटनाएं बेचैन कर देती हैं, आखिर महिलाओं के साथ ही ऐसा क्यों। आमतौर पर ऐसी चीजों को लोग सामान्य मानते हैं और ऐसा सोचने वालों में महिलाएं भी शामिल होती हैं।

तमाम लड़कियों की तरह मुझे भी घर, परिवार समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ा। मेरी बुआ की पांच बेटियां और एक एक बेटा है। दादी अक्सर दुखी मन से कहा करतीं, बेटी क्या बुसा बोरी (भूसे की बोरी) हैं। ये उस पहाड़ी समाज की स्थिति है जहां महिलाएं ही अधिकतर काम करती हैं घर, खेती से लेकर जंगल तक के। मैं चार भाइयों में अकेली बहन हूं, लोग अक्सर कहा करते हैं वाह तुम तो बहुत खुशकिस्मत हो हालांकि इसका तर्क मुझे आज तक समझ नहीं आया। मैंने अपने पूरे बचपन में घरेलू हिंसा, लड़ाई-झगड़े का माहौल देखा जो कि बहुत ही बुरा था।

पहाड़ों में पुरुष अगर काबिल नहीं हो तो चल जाता है लेकिन महिलाओं का सभी कामों में, खास कर खेती में पारंगत होना बहुत जरूरी है। गांव भर में दो-चार पुरुष ऐसे होते ही हैं जिन्होंने पूरी जिंदगी कभी कुछ काम नहीं किया, तब भी उनकी जिंदगी किसी तरह गुजर ही जाती है। लेकिन इस तरह की महिलाओं के लिए जीवन बहुत ही दुखद होता है, जिसमें मेरी मां भी शामिल हैं।

मैंने देखा लड़के बड़े होने पर भी खेतों में खेलने जाते लेकिन लड़कियों की खेलने की उम्र बहुत ही सीमित सी होती है। मुझे बचपने की याद है, हम खाली समय में खेतों में खेला करते। जैसे-जैसे हम बड़े होते गए लड़के तो खेतों में तब भी खेला करते, लेकिन लड़कियां अब खेलों से गायब होने लगीं। मेरी सहेलियों पर काम का बोझ बढ़ने लगा। पहले शौक से छोटे घीड़े में घास काट कर ले लातीं फिर धीरे-धीरे घीड़ा बड़ा होने लगा, बंटे, गागर का आकार भी बढ़ने लगा। मैं भी सहेलियों के साथ खेतों जंगलों में जाती। फिर धीरे-धीरे वे अपने ससुरालों को जानें लगी। सहेलियों के ससुराल जाने के बाद मैंने हम उम्र भाभियों से दोस्ती करनी शुरू कर दी।

शिवरात्रि के पहले दिन हमारे यहां कई जगहों पर मेला लगता है। बचपन में पुजार गांव जाया करते जो कि बिल्कुल बगल का गांव था। फिर कुछ बड़े होने पर देवल मेला जाने का मन करता। अपने चार भाई तो हैं ही, अपने अगल बगल के ढेर सारे कजन भाई ऐसे भी वक्त में सबसे ज्यादा प्रकट होते। वे सब हमें देवल मेले में जाने के लिए मना किया करते। दरअसल देवल मेले में ज्यादा भीड़ और धक्का मुक्की होती। कई बार लड़के, लड़कियों के स्तनों को भी छूकर निकल जाते। लेकिन ये भाई लोग खुद भी उसी मेले में जाने के लिए लालायित रहते। जाहिर है लड़कियों को छेड़ने वाले लड़के भी हम में से किसी ना किसी के भाई हुआ करते हैं। लेकिन उन्हें कभी कोई मना नहीं करता मेला जाने के लिए।

हम लड़कियां भी कहां कम थीं, छुप-छुपाकर जैसे-तैसे देवल मेले जाया करती। ऐसा करने के लिए कई बार डांट और मार भी खानी पड़ती। भाइयों की भी घर में अलग ही सत्ता होती है। कई बार मांओं या पिताओं को भी जिन बातों से ऐतराज नहीं होता, भाई लोग उन मामलों में भी अपनी वीटो पावर इस्तेमाल कर लेते हैं।

मेरे मंझले भइया खूब घूमा-फिरा करते, घर में टिकना उन्हें कभी आया ही नहीं। मुझे लगता वाह ये कितना अच्छा है, मैं भी उसी तरह रहना चाहती थी। लेकिन मुझे वो कई बार टोकते कि कम घूमा कर। कुछ साल मैं दो बड़े भाइयों और दादी के साथ देहरादून में पढ़ाई के लिए रही। स्कूल से घर आने के रास्ते में  सहपाठी लड़को के साथ दिख जाने पर कई बार मार भी खाई। मैं घर से स्कूल और स्कूल से घर का रास्ता तय करती, बस इतना ही जान पाई मैं देहरादून के बारे में। भइया लोग बेइंतहा पाबंदियों में रखते। दादी भी खौफ में रहतीं कि लड़की है कुछ हो ना जाए। भइया लोग ग्रेजुएशन करने गए थे जाहिर है उनकी खुद की उम्र भी कम ही थी। वो उस वक्त मुझे लेकर अतिरिक्त जिम्मेदारी की भावना से भरे हुए थे। लड़की की जिम्मेदारी का मतलब होता है उसे संभाल कर रखना। ये जिम्मेदारी कैसे निभाई जाती है, ये बात कोई भी लड़की बता सकती है।

अतिरिक्त पाबंदी के चलते मेरा लड़कों की तरफ आकर्षण बढ़ा। हम लोग देहरादून से घर साल में एक बार आया करते गर्मियों की छुट्टियों में। अक्सर सोचती, मैं बड़ी हो जाऊंगी तो अकेले यात्रा करूंगी और अगल-बगल बैठने वाले लड़कों से दोस्ती और बातें किया करूंगी। हालांकि जब से अकेले यात्रा करनी शुरू की तब से ऐसे ख्याल नहीं आये।

लड़की होने के नाते मुझे अगर किसी चीज से वंचित रखा जाता या किसी भी तरह का भेदभाव होता तो मुझे वो समझ आ जाता, मुझे एहसास होता कि ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन कई बार लड़कियों को लगता कि भाई हैं, ठीक ही कह रहे हैं, लड़कियों को नाक नहीं कटानी चाहिए, अगर कुछ हो गया तो जैसी तमाम-तमाम बातें।

छुटपन से ही मेरा मन होता था कि मैं खूब पढ़ाई करूं और किसी बड़े से शहर में जाकर स्वतंत्र रूप से रहूं। लेकिन ऐसा होगा, मेरे लिए यह सोच पाना भी बहुत मुश्किल था। खासकर बड़े भाइयों के सख्त रवैये के बाद ये और मुश्किल लगता। लंबगांव डिग्री कॉलेज में मेरे एक शिक्षक थे, जिन्होंने बीए के दौरान मुझे पढ़ाया और लगातार प्रेरित करते रहे कि मैं आगे की पढ़ाई किसी शहर में जाकर करूं। ऐसा उन्होंने कई महीनों तक किया और मुझे सिलेबस के इतर की किताबों पढ़ने की भी सलाह देते रहे। एक दिन जब मुझे समझ में आया कि यह मुमकिन है, तो फिर मैंने वही बात घर में पिता से दोहरानी शुरू कर दी और लगभग दो ढाई साल तक मैं लगभग घर वालों से इस ख्वाइश का जिक्र करती रही। आखिरकार मुझे इसकी अनुमति मिल गई।

साल 2012 में, मैं जब पढ़ाई के लिए माखनलाल यूनिवर्सिटी, नोएडा आई तो यह मेरे लिए किसी बड़े सपने का सच होने जैसा था। पहली बार साउथ दिल्ली की चौड़ी-चौड़ी सड़कों से गुजरते हुए मैं खुद को एक अलग ही दुनिया में महसूस कर रही थी। अब मैं घर से दूर आजाद महसूस कर रही थी। लेकिन शुरुआती दिनों में साथ में डायरी लेकर घूमा करती जिसमें पीजी का पता और कुछ जरूरी नंबर रहते। रात होने से पहले मैं पीजी में आ जाया करती क्योंकि मुझे रात में बाहर निकलने से डर लगा करता।

बाद के दिनों में मैं मंडी हाउस में नाटक देखने जाने लगी और मुझे अकेले ही जाना पड़ता। नोएडा सेक्टर 15 मेट्रो स्टेशन आते-आते कभी 9.30 या कभी 10 बज जाया करते। मेट्रो स्टेशन से मुझे ऑटो से पीजी जाना होता, उस वक्त तक महिला यात्रियों की संख्या काफी कम हो जाती। जैसे ही कोई महिला दिखती तभी मैं सुरक्षित महसूस करती।

लेकिन घूमने और नाटक देखने का शौक कुछ ऐसा हुआ कि डर लगने के बावजूद मैं ऐसा करती। एक दोस्त था जो घूमने जा तो सकता पर वो जॉब भी करता था। लड़कियां अक्सर अपने एक-एक मिनट का हिसाब घर वालों को दिया करतीं या घर वाले उन से लिया करते, तो उनके लिए भी जाना मुश्किल था। एक और दोस्त था, जो था तो मूल रूप से उत्तराखंड का, लेकिन दिल्ली में पला बढ़ा था। जब मैंने कहा साथ में घूमने के लिए तो उसका जवाब भी कुछ अजीब ही था.. देख तू है लड़की, ये दिल्ली बहुत खतरनाक जगह है, मैं तेरे साथ नहीं घूमूंगा कहीं।

मैं उन दिनों एक लॉन्ग डिस्टेन्स रिलेशनशिप में थी। उस दौरान के प्रेमी ने अपने कुछ दोस्तों से मेरी भी दोस्ती करवाई जो कि दिल्ली में पत्रकारिता के ही एक दूसरे संस्थान में पढ़ते थे। वहां लड़को के साथ दोस्ती और सामान्य तौर पर रहने की शुरुआत हुई। उसके पहले जितने लड़के मिले थे सब एक अलग तरह की दूरी या नजदीकी बनाते थे। पहली बार लड़कों के साथ दोस्ती इतनी सामान्य लगी।

मेरे मामले में एक बात यह अच्छी थी बाहर निकलने के बाद मेरे घर वालों ने मुझ पर भरोसा किया और मुझसे कभी भी मिनट-मिनट की हिसाब नहीं लिया। हालांकि इस स्थिति की भी कुछ अलग तरह की मुश्किलें थीं, जिनका जिक्र फिर कभी किया जा सकता है।

बहुत शिद्दत से नौकरी की शुरुआत कर मुझे फिर से मुझे पढ़ाई करने का मन हुआ तो एमफिल करने वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय चली गई। वहां गर्ल्स हॉस्टल 10 बजे बंद हुआ करता है। हालांकि कई अन्य संस्थानों के मुकाबले ये बेहतर था, लेकिन हमारा भी मन होता कि ब्वाइज हॉस्टल की तरह गर्ल्स हॉस्टल भी रात भर खुले रहें।

हमारे सामने जेएनयू और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के उदाहरण था। कई बार इस पर बातचीत होती कि वर्धा कैंपस छोटा है और सुरक्षित भी। इसे भी रात भर खुला रखा जाना चाहिए। कई बार मन होता रात में लाइब्रेरी में बैठने या कबीर हिल जाने का। लेकिन 10 बजे के बाद यह संभव नहीं था। कई बार एमफिल और पीएचडी करने वाली लड़कियां ही समय ना बढ़ाने के खिलाफ तर्क देतीं, नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए। अगर कुछ हो गया तो किसी ने कुछ कर लिया तो। मुझे ये समझ नहीं आता, कुछ कर लिया क्या होता है। ज्यादा से ज्यादा कोई सेक्स कर लेगा, उससे ज्यादा क्या।

खैर पितृसत्तात्मक प्रैक्टिस इतनी गहरी है कि हमारे गांवों में महिलाएं पानी की गागर सिर पर लाती हैं और पुरुष कंधे पर। मैंने जब पहली बार सिर पर गागर लाने की कोशिश की तो मैं चल नहीं पाई। मैंने फिर पानी की गागर कंधे पर रखी। ये मेरे लिए वाकई बहुत ही आरामदायक तरीका था पानी ढ़ोने का। उसके बाद से आज तक मैं कंधे पर ही पानी लाती हूं। शुरू-शुरू में लोग हैरान होते या मजाक बनाते कि लड़की होकर कंधे पर पानी ला रही है, लेकिन कुछ दिनों बाद सब स्वीकार्य हो गया। लेकिन नए लोग जब मुझे इस तरह से देखते है तो वो अभी भी हैरान होते हैं।

मैं कई बार बैग को भी कंधे पर उठाकर चल देती हूं क्योंकि ऐसे सामान ढ़ोना आसान होता है। मेरे पार्टनर जो कि बिहार से हैं, यह देखना उनके लिए यह नया था। प्रेम के शुरुआती दिनों में वो अक्सर मेरी इस आदत पर बहस कर लेते। वो कहा करते, कुछ भी करती हो- कैसे भी रहती हो, कंधे पर सामान क्यों उठाया लोग क्या कहेंगे आदि-आदि। तब मैं समझ नहीं पाती थी इसमें गुस्सा करने वाली क्या बात है। फिर कोरोना का दौर आया, उन दिनों मैं मुनिरका में रहा करती। एक दिन मेरे पार्टनर बंगाल से बस की यात्रा कर दिल्ली आए। उस दिन दिल्ली में खूब बारिश हो रही थी, मुनिरका की गलियों में नाले की तरह पानी बह रहा था और एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ रहा था। उस दिन भी मैंने अपने पार्टनर का भारी सा बैग कंधे पर रखा और किसी तरह बच-बचाकर कमरे में पहुंचे। उस दिन बैग को खींचकर ले जाना नामुमकिन था, उस दिन के बाद उन्होंने कभी इस चीज के लिए नहीं टोका।

तब मुझे उनका इस तरह से नाराज होना नहीं समझ आता था। कुछ महीने पहले मेरी शादी हुई और ससुराल गई तो मुझे समझ में आया कि यह दो समाजों का फर्क था।

हम लोगों ने पहले कोर्ट मैरिज की और उसके बाद सामाजिक विवाह। हम लोगों ने तय किया था किसी तरह का कर्मकांड या पूजा पाठ नहीं करेंगे। हमारे परिवार इसके लिए सहमत थे। इसमें हम दोनों के पिताओं की अहम भूमिका थी। ऋषिकेश में शादी हुई जिसमें हम लोगों ने एक दूसरे को माला पहनानी थी और उसके बाद खाने का कार्यक्रम था। मेरी सास और ननद सिंदूर लेकर स्टेज के सामने अड़ गईं उनका गुस्सा मेरे लिए बड़ा अजीब था। वो जबरदस्ती सिंदूर लगवाना चाह रहे थे और ऐसा तब हुआ जब कि पहले से पूरा मामला स्पष्ट था कि ये सब नहीं करना है।

मेरे रिश्तेदार भी हैरान थे मैं सिंदूर क्यों नहीं लगवा रही। सब आकर समझाने लगे। हालांकि मेरा परिवार हमारे फैसले के साथ था। मेरी सास ने मेरी बड़ी भाभी से कहा कि वे हमें मनाएं, तो भाभी का कहना था जब वो नहीं चाहते तो जबरदस्ती क्यों करना चाहते हैं। इस तरह सिंदूर नहीं करने के लिए लिए भी छोटा -मोटा हंगामा हो गया।

मेरे पिता के अचानक चले जाने के बाद माहौल अजीब था, हम सब दुखी थे, इसके बाजवूद शादी हो रही थी। ये अलग ही तरह की स्थिति थी मेरे लिए। मेरा नया जीवन शुरू हो रहा था मैं कुछ उत्साहित भी थी लेकिन ये बड़ी अजीब शुरुआत थी। पार्टनर के घर वाले गुस्से में तुरंत खाना खाकर होटल चले गए। इस तरह मेरे पार्टनर वेडिंग हॉल में अकेले रह गए और इधर मेरे घर वाले और कुछ गिने -चुने रिश्तेदार थे। हमारी शादी और रिसेप्शन में एक हफ्ते का फासला था। विदाई के वक्त मैंने कुर्ता और जींस पहन ली और जैसे हमेशा रहती हूं वैसे ही रही, कोई अतिरिक्त मेकअप नहीं किया। हरिद्वार से ट्रेन देर रात की थी, सभी लोग हरिद्वार घूमने चले गए। हम दोनों स्टेशन के बाहर रह गए। एक नए सदस्ये को सम्मान देना तो दूर सभी लोग मुझसे दूर-दूर थे। कोई ठीक से बात नहीं कर रहा था मुझसे। मुझे लगने लगा अब तो वक्त ससुराल में बेहद बुरा बीतने वाला था।

मेरे बड़े भइया ने मुझे कुछ दिन पहले कहा था तेरा समाज शादी के बाद शुरू होगा। तूने अभी देखा ही क्या है। और ये बात मैं अभी महसूस कर रही थी। मुझे लगता था शादी के बाद मेरे जीवन में कोई बदलाव नहीं आने वाला लेकिन आ चुका था। सचमुच शादी लड़कियों के जीवन को बदलकर कर रख देती है। हालांकि मैं वर्किंग हूं और मुझे ससुराल में ज्यादा रहना नहीं होगा और इन चीजों का भी सामना नहीं पड़ेगा। तो एक तरह से यह स्थिति मेरे लिए ठीक है।

ससुराल जाने वाली ट्रेन रात में काफी लेट से आई, तो सब लोग ट्रेन में चढ़ते ही सीधे  सो गए। सुबह उठकर पिछले दिन के मुकाबले माहौल थोड़ा ठीक लगा, लोग थोड़ा बहुत बात कर ही रहे थे। मुझे खाना-पीना सब पूछा गया।

रात में आरा स्टेशन उतरना था और वहीं से कुछ घंटे की दूरी पर ससुराल है। फिर ट्रेन में ही नई चीजों के लिए बहस शुरू हो गई जैसे घूंघट करना। पार्टनर के घर वाले उन पर दबाव बनाने लगे कि वो मुझे घूंघट के लिए कहें। उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। उनके भाई-बहन कहने लगे कि तुमने हमारे पिता की नाक कटवा दी है। जबकि पिता हमारे फैसले के साथ थे और उन्हें अपनी नाक जैसी कोई चिंता नहीं थी।

मुझे लगा मैं ही बेवकूफ हूं जो लग रहा था सब सामान्य हो गया। एक लंबे समय तक जिस चीज को लोग मानते आए हैं वो परंपरा एक झटके में कैसे टूट सकती है। फिर से बहस और झगड़ा, हालांकि मैं इससे दूर थी। लेकिन मैं बहुत अजीब महसूस कर रही थी। लोग मुझे अजीब नजरों से देख रहे थे, इन सबके लिए मैं जिम्मेदार थी। अब मुझे लगने लगा बचपन से लेकर अब तक जो महसूस करती आई हूं लड़की होने की वजह से वो कुछ भी नहीं था। अब यहां मेरा कोई नहीं था पार्टनर के सिवा। मेरे दिमाग में घरेलू-हिंसा की घटनाएं घूमने लगीं। खासकर मैं दूसरे राज्य में जा रही थी जहां कोई भी परिचित नहीं था। ट्रेन से उतरने पर मेरे साथी की अपने परिवार के लोगों से बहस हुई। बहन ने रिसेप्शन में आने से इनकार कर दिया। पिता ने किसी तरह से बेटी को मनाया तो उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ आपके लिए आऊंगी इन लोगो से मुझे कोई मतलब नहीं है।

हम लोग जब ट्रेन से उतर रहे थे तो किसी ने कहा कि औरतें और सामान गाड़ी में ना छूट जाएं। महिलाएं क्या सामान हैं जो स्टेशन आने पर खुद से उतरने का ध्यान नहीं रख सकतीं। और भूलना ही हो तो कोई पुरुष भी भूल सकता है।

आरा से टैक्सी बुक की गई थी। टैक्सी में मेरी सास ने आकर मुझे कहा सिर पर दुपट्टा रख लो। मैंने मना किया, वो कहती रहीं कि रख लो उतनी ही बार मैंने मना कर दिया। उस वक्त मेरा मन हुआ कि मैं उस टैक्सी से उतर जाऊं।

मेरे अगल-बगल मेरी जेठानी और देवरानी बैठी थीं। देवरानी ने सिर पर साड़ी का पल्लू रख हुआ था। जेठानी सामान्य तरीके से बैठी थीं, जब सास ने मुझे इस तरह से कहा तो उन्होंने भी सिर पर पल्लू रख दिया। मैं उन्हें बार-बार समझाना चाह रही थी ये नॉर्मल नहीं है, शायद उन्हें लगा हो जो मैं कर रही हूं वही नॉर्मल नहीं है।

हम देर रात घर पहुंचे। मैं लोवर-टी शर्ट पहनकर सो गई। सुबह हुई तो इस पर भी पेशी हुई। मुझे कहा गया कि यहां ये कपड़े नहीं चलेंगे। साड़ी नहीं तो कम से कम सूट पहननी होगी। ये मेरे लिए नई लड़ाई थी। इस बार जब सास समझाकर थक गईं तो मुझे समझाने की जिम्मेदारी ससुर दी गई। अभी तक हमारे सभी फैसलों में वे साथ थे और हमारा सपोर्ट भी किया। लेकिन अब वो भी शायद थक या हार गए थे। उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि सूट पहन लो और दुपट्टा सिर पर रख लो। मैंने फिर से माथा पीट लिया कैसा समाज है ये सिर ढकने को लेकर इतना आग्रह। मैंने कहा कि मैं सूट पहन लूंगी लेकिन सिर नहीं ढकूंगी। हमारे पहाड़ी समाज में इस तरह से नहीं है तो मेरे लिए ये चीज बिल्कुल नई थी, इसलिए यह सब मुझे और ज्यादा असहनीय लगा।

इतना ही नहीं इस एक हफ्ते में मैं घर से बाहर भी नहीं निकली। यहां महिलाएं सामान्य तौर पर घर से बाहर नहीं निकलती हैं। घूमना टहलना तो दूर की बात। सामान भी लाना हो तो घर के पुरुषों से मंगाया जाता है या बच्चों से। पहले दिन तो मुझे लगा मैं यहां एक हफ्ता नहीं निकाल पाऊंगी। लोग आ आकर देखते और नसीहतें देकर चले जाते और मैं लोगों से मिलने से खौफ खाने लगी। मैं लोगों को इग्नोर भी करने लगी।

रिसेप्शन में हमारे कुछ दोस्त आए। इतने दिन बाद अपने साथ के लोगों से मिलकर मुझे अच्छा लगा। मैंने उनसे वे सारे अनुभव और परेशानियां शेयर की। उनमें से कुछ ने ये निष्कर्ष निकाला मैं ओवर रिएक्ट कर रही हूं। मेरे पार्टनर जो कि अब तक मुझे सपोर्ट कर रहे थे, रिसेप्शन के दिन उन्होंने भी मुझसे बहस कर ली। उनका कहना था कि मैं ओवर रिएक्ट कर रहीं हूं, लोगों को सम्मान भी नहीं दे रही हूं। मुझे अजीब लगा अचानक ये बदलाव कैसे हुआ। हालांकि मुझे अंदेशा था कि दोस्तों के आने के बाद इस तरह से क्यों हुआ, बाद में ये बात स्पष्ट भी हो गई। हमारे उन प्रगतिशील दोस्तों को लग रहा था कि मेरी प्रतिक्रिया अतिवादी है। मैं जिन परिस्थितियों का सामना कर रही थी, मेरे लिए वो सब झेलना मुश्किल था। खास कर घर से बाहर नहीं निकलना और घूंघट देखना मेरे लिए नया था।

अधिकांश मित्र ऐसे ही समाज से थे तो उनके लिए ये अच्छा भले ना रहा हो लेकिन सामान्य जरूर था। हालांकि दूसरों के मामले में विश्लेषण करना और निष्कर्ष निकालना आसान होता है और उन परिस्थितियों से गुजरना मुश्किल।

उन सब में सकारात्मक पक्ष यह रहा कि ससुराल की ही कुछ महिलाएं मेरे पक्ष में थीं। उनका कहना था अगर किसी लड़की ने ये सब देखा-जिया ना हो तो कैसे स्वीकार कर ले। कुछ टीएनजर लड़कियां भी मुझसे प्रभावित थीं। मेरे लिए यहां दोनों ही सबक थे, परंपरावादी स्त्रियों और प्रगतिशील मित्रों की समझदारी के अलग-अलग नमूने।

हालांकि धीरे-धीरे चीजें मेरे लिए थोड़ा सामान्य हुईं। मैंने देवरानी-जेठानी से पूछा आप लोगों को ऐसे रहना खराब नहीं लगता। वो हंसकर रह जातीं, कहती हमको आदत हो गई है और यहां तो सब ऐसे ही रहते हैं। लेकिन मुझे लगता है कुछ तो लगता ही होगा उनको, कुछ नहीं तो इतना तो सोचती होंगी काश लड़की ना होतीं तो ऐसा ना होता। मैं भी बचपन में इस तरह से सोचती थी काश मैं लड़का होती तो इस तरह की चीजों का सामना नहीं करना पड़ता।

रिसेप्शन के बाद हमारे दो और मित्र हमसे मिलने आए, जो कि मेरे ससुराल के पास के कॉलेज में पढ़ाते हैं। उनकी कोई मित्र हैं जो कि जेएनयू से पढ़ी हैं और बिहार के ही किसी कॉलेज में पढ़ाती हैं। वो सिंदूर, चूड़ी जैसे प्रतीकों से दूर थीं। लेकिन उनके सहयोगियों ने उन्हें सिंदूर लगाने, कंगन पहनने के लिए मजबूर किया। इस तरह की कई कहानियां सुनीं, किसी के मकान मालिक तो किसी के सहकर्मी ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया। वहां पर मुझे लगा ये तो बड़ा भयावह है। दिल्ली जैसे बड़े शहर कुछ मामलों में स्पेस तो देते हैं।

इस बीच मैंने अपने पार्टनर से शिकायत की तुमने तो नहीं बताया था यहां इस तरह की स्थितियां हैं। मैंने तमाम दोस्तों को फोन घुमाए और उनसे भी यही शिकायत की। दोस्तों का कहना था इसमें कहने जैसा कभी कुछ लगा ही नहीं, यहां ऐसा होता है और हमारे लिए यह सामान्य है। पार्टनर का कहना था कि मेरी बहुत कोशिश के बाद भी अगर ऐसा है तो क्या किया जा सकता है, वक्त के साथ चीजें बेहतर हो जाएंगी। ये तब हुआ जब मैं अपेक्षाकृत प्रगतिशील परिवार में थी। दोस्तों ने बताया कुछ परिवारों में स्थितियां और खराब हैं।

अब जब मैं लिख रहीं तो मुझे एक दो बार मन किया कि फिर से ससुराल जाना प्लान किया जा सकता है। हालांकि मैं वहां लंबे समय नहीं रहना चाहूंगी।

मैंने रिसेप्शन के दौरान की घटनाओं पर कई बार तसल्ली से सोचा, क्या मैंने वाकई ओवररिएक्ट किया था। लेकिन मुझे हर बार यही जबाव मिला, नहीं मैं सही थी। क्योंकि मुझे या हम में से किसी को भी अगर यह लगता है कि उस तरह की परिस्थितियों में मैं गलत थी, तो हमें अफगानिस्तान, ईरान या अन्य समाजों की आलोचना करने का नैतिक साहस कहां से मिलेगा।

 

 

 

एको एको जिंदगी, खुल के जिवांगें

एको एको जिंदगी, खुल के जिवांगें

पर लड़की का खुल कर जीना समाज के बंद दिमाग वालों को कब पसंद आया है? लड़की हो, लड़की की तरह रहो। लड़की का एक टाइप बना दिया गया है। तथाकथित समाज भले ही कह दे कि वह आधुनिक है, लेकिन हमारी मानसिकता आज भी पुरानी ही है। हमारी मानसिकता उस समय की है बनी हुई है जब लड़कियों को कोई अधिकार नहीं प्राप्त था। घर संभालना उनकी जिम्मेदारी बना दी गई थी। घर के बाहर का जीवन स्त्री के लिए मुश्किल था। समाज के लोग  बड़े सहज तरीके से कोई कह देते कि वह आधुनिक हैं। पितृसत्ता से ग्रसित नहीं हैं। उनके लिए स्त्री का अर्थ है एक गुडिया जो केवल इशारे पर चलने का काम करती है । इसके दिल दिमाग की हमें फिक्र नहीं ।

फिल्म ‘कली झोट्टा’ खुले दिमाग की लड़की ‘राबिया’ की कहानी है। राबिया एक ऐसी लड़की जो सबको प्यार करती है। उसके जीवन का उद्देश्य है सही को सही कहना और सबके साथ अच्छा व्यवहार करना।  कहानी की शुरुआत अनंत नाम की लड‌की से होती है जो वकील की प्रैक्टिस कर रही है। अनंत एक खुले विचारों वाली लड़की है, आधुनिक है। उसको अपने स्कूल का पियून अचानक दिखाई देता है तो वह अपनी सबसे अच्छी टीचर राबिया के बारे में उससे पूछती है। राबिया के बारे में कोई बात ही नहीं करना चाहता था। वह निराश होती है लेकिन बहुत खोज करने पर पता लगता है कि राबिया की मानसिक हालत खराब होने के कारण उसको हॉस्पिटल भेज दिया गया था। इतनी जिंदादिल लड़की हमेशा खुश रहने वाली उसको अचानक क्या हुआ? इसी संदर्भ में अनंत दीदार से मिलती है। दीदार और राबिया साथ कॉलेज में पढ़ते थे दोनों का आपस में नेह था लेकिन एक दूसरे से कभी कह न पाए। कॉलेज के बाद दीदार आगे की पढ़ाई के लिए शहर चला जाता है और राबिया की सरकारी स्कूल में नौकरी लग जाती है। वह कलाकार है, घर के कामों की जानकारी रखती है, नाचती गाती है, संगीत सुनना उसके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं।   सरकारी स्कूल का माहौल राबिया को सहन नहीं कर पाता है। वहां प्रिंसिपल और दो पुरुष अध्यापकों की नज़रों में राबिया का मिलसार होना, उसका हँसना-खेलना, बच्चों को डाँटने और सज़ा देने की बज़ाए छोटे-छोटे तौहफे देना गलत था। उसका सरकारी नौकरी में होने के बाद भी अविवाहित होना उसके खराब चरित्र की निशानी थी। पुरुष समाज की यह आम धारणा है कि हँसने वाली लड़की गलत होती है। वह अवसर होती है। उसका हँसना-खेलना बोलना यानी उसका किसी भी मर्द के लिए उपलब्ध होना है। इस तरह की घटिया मानसिकता को राबिया कई बार अपने स्कूल के प्रिंसिपल, मैथ टीचर से झेलती है। तभी दीदार राबिया के स्कूल में आने से राबिया के जीवन में फिर से वही हँसी-खेल उमंग आ जाती है जो कॉलेज के समय पर थी। राबिया का दीदार से इस तरह हँसी-मजाक और उसके साथ रहना स्कूल के मर्दों को नहीं पसंद था। उसका चरित्र तय किया गया। तभी राबिया को पता चलता कि दीदार की शादी तय हो गई, उसकी पत्नी उसी स्कूल में तबादला करवा लेती है। राबिया दीदार की पत्नी को भी नहीं सुहाती। ठीक इसी समय राबिया के बीमार पिता की मृत्यु हो जाती है। स्कूल की एक छात्रा को एक छात्र परेशान करता है, जिसके लिए राबिया अकेली क्लास में उस लड़के को डाँटती है। इसपर दीदार की पत्नी और प्रिंसिपल यह मतलब निकालते हैं कि राबिया छात्र के साथ कुछ गलत कर रही थी। राबिया को बस स्टैंड पर खड़ा देख प्रिंसिपल उसको जबरन लिफ्ट देना चाहता है। पास खड़ी महिला के फटकार लगाने पर उसको शर्मिंदा होना पड़ता है।  प्रिंसिपल और उसके साथ के दो पुरुष आध्यापक लगातार राबिया को परेशान करने की कोशिश करते हैं। एक दिन सुबह ही स्कूल की छुट्टी करवा कर राबिया को प्रिंसिपल अपने कमरे पर बुलाता है, जहाँ वह अन्य अध्यापक मिलकर दारू पी रहे थे। वह राबिया को मानसिक प्रताड़ना देते हैं। उसको जलील करते हैं। प्रिंसिपल करता है कि अब इसकी अकड़ चली जाएगी। इस घटना ने राबिया को बुरी तरह प्रभावित किया इसके बाद वह किसी भी स्पर्श से घबराने लगी। कोई भी स्पर्श उसको मानसिक रूप से परेशान करता था। वह सहम जाती थी।  बस राह चलते उसकी यह घबराहट बढ़ते-बढ़ते एक दिन उसको दिमागी अस्पताल में पहुंचा देती है। अनंत राबिया का केस लड़ती है। जहाँ वह अदालत को यह समझाने में कामियाब होती है कि रेप, हत्या जैसा ही जुर्म किसी को मानसिक प्रताड़ना देना है।  सभी के प्रयास के बाद राबिया थोड़ा ठीक होने लगती है।

यह कहानी अपने आप में एक अलग कहानी है। एक दर्द जो आपको महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा से रू-ब-रू करवाता है। हम शरीर के नुक्सान की बात करते हैं लेकिन मन पर लगे घाव की कोई सजा नहीं होती। मनसिक शोषण किस तरह से एक महिला के लिए नासूर बन सकता है कहानी उस सच को बताती है। आज जब रिश्तों में अकेले हो गए हैं तो यह घाव और गहरे हो जाते हैं। राबिया को यह सजा इसलिए मिली क्योंकि वह एक खुशमिजाज लड़की थी, अरेंज मैरिज वाले समाज में उसे दीदार से प्रेम था। वह अच्छी दिखाई देती थी। ठीक कपड़े पहनती थी। लड़कियों के लिए हँसना मना है उसे हँसना पसंद था। इसलिए समाज के ठेकेदारों ने उसको सबक सीखाया। यह कहानी हर उस लड़की की कहानी है जो अपनी शर्तों पर जीती हैं। समाज की पितृसत्ता उसको जीने नहीं देती। लोगों को हँसती- बोलती लड़की चरित्र की खराब लगती है। सड़क पर ऐसी लड़की को उसके जानने वाले छेड़ना अपना धर्म समझते हैं। प्रिंसिपल व अन्य पुरुष  शिक्षकों का राबिया के प्रति व्यवहार उनकी इसी मानसिकता को बताता है। उन लोगों के अनुसार वह क्योंकि खुले दिमाग की है इसलिए उसपर सबका हक है और क्योंकि वह अपने उपर किसी का हक होने नहीं देती इसलिए वह सबक सिखाने लायक है।

मन के घाव इतने तीखे होते हैं कि वह ताउम्र नहीं भर पाते। महिलाओं के साथ और भी दर्दनाक हो जाता है क्योंकि उन्हें समझने वाला कोई होता ही नहीं। राबिया जिंदगी में जब इन हादसों से गुजरी तक वह अकेली थी बहुत अकेली। यदि जीवन में कोई अपना साथ हो तो व्यक्ति दुख साझा कर सकता है लेकिन राबिया के जीवन में ऐसा कोई नहीं था। ऐसी स्थिति में परिवार सहायक होते हैं लेकिन पितृसत्ता से ग्रसित राबिया के परिवार में उसको समझने  वाला भी कोई न था। यह कहानी भारतीय समाज के उन घरों का प्रतिनिधित्व करती है जहां स्त्री की हैसियत घर में पड़े समान से भी कम आंकी जाती है।

हमारा बुरा वक्त भी सही होने की ताकत रखता है जब हमारे साथ हमारे अपने हो राबिया को उसके सदमे से बाहर निकालने में उसकी विद्यार्थी और दोस्तों का बहुत योगदान था। अस्पताल में डॉक्टर कहता भी है कि ‘इन लोगों से मिलने उनको वापस जीवन में लाने की कोई कोशिश नहीं करता आप कर रहे रहे हैं यह मेहनत सफल होगी’। और अंत में सबकी मेहनत सफल भी होती है।

विषय, निर्देशन, अभिनय, मन और दिमाग को छूने वाले संगीत और गानों के कारण वास्तव में यह ‘कली झोट्टा’ एक बेहतरीन फिल्म है।

महाश्वेता देवी की जंग का फ़ैसला , 25 साल बाद

महाश्वेता देवी की जंग का फ़ैसला , 25 साल बाद बुधन सबर को इंसापस थाने में टॉर्चर कर मारने वाले पुलिस कर्मी को 8 साल की सजा
महाश्वेता देवी की जंग का फ़ैसला , 25 साल बाद बुधन सबर को इंसापस थाने में टॉर्चर कर मारने वाले पुलिस कर्मी को 8 साल की सजा
25 साल और 10 दिन । ना बुधन ज़िंदा है और ना अन्याय के खिलाफ जंग करने वाली महाश्वेता देवी । ज़िंदा है तो इंसाफ और दोषी । पुरलिया के जज साहब ने तमाम बीमारियों से ग्रसित 71 साल के पुलिस अधिकार अशोक रॉय जैसे ही सजा सुनाई वैसे ही बुधन सबर की आत्मा को शांति मिल गई । 35 साल पुराना ये मामला डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए मील का पत्थर है । पहली बार ऐसा हुआ है जब पुलसिया अत्याचार के शिकार किसी डीएनटी के मामले में दोषियों को सजा मिली है । बुधन सबर जैसा की नाम से ही ज़ाहिर है की कथित सभ्य समाज से उसका कोई लेना देना नहीं था । बुधवार को पैदा हुआ इसलिए माँ-बाप ने बुधन ही नाम रख दिया । बुधवार को पैदा हुआ और बुधवार 1998 को ही मौत की खबर आई । बुधन की मौत बहुतों के लिए सामान्य थी । पुलिस कस्टडी में मौत । 20वीं शताब्दी में बहुत आम बात थी । और आदिवासियों और आदिम जनजातियों के लिए तो बहुत ही सामान्य बात । ऊपर से अगर किसी जमाने में डिनोटीफाइड ट्राइब्स का दाग रहा हो तब तो जरा भी फ़िक्र की बाद नहीं । मगर बुधन थाने में मार डाला गया था । बुधन की पत्नी श्यामली सबर को बर्दाश्त नहीं हुआ । उसने ऐसी जंग की शुरुआत की जिसमें जीतना नामुमकिन जैसा था । मैग्सेस पुरस्कार से सम्मानित और आदिवासियों के लिए जीवन समर्पित करने वाली महाश्वेता देवी का साथ नहीं मिलता तो ये जंग कब की खत्म हो जाती। थका देने वाली ये लंबी लड़ाई 35 साल तक पुरलिया की अदालत में चलती रही । 10 फ़रवरी 1998 को बुधन को बेवजह पुलिस ने पकड़ कर थाने में पाँच दिनों तक रख इतना टॉर्चर किया कि उसकी मौत हो गई । बुधन के लिए इंसाफ की माँग करने वाले दक्षिण छारा बजरंगे ने बुधन थियेटर के ज़रिए डिनोटिफाइड ट्राइब्स की आवाज बहरी दुनिया के कानों तक पहुँचाने की शुरुआत की । मगर मुख्यधारा की मीडिया के लिए ये कोई खबर नहीं है । कस्टोडियल डेथ में पुलिस वाले को सजा मिली है । बुधन को इंसाफ मिला है । खबर कहीं नहीं ।

कहानी शुरु होती है आज से पच्चीस साल पहले 10 फ़रवरी 1998 को । पुरलिया के बामुंडिया में बुधन सबर अपनी पत्नी श्यामली के साथ साइकिल पर बैठ अपने रिश्तेदार के घर भंगारडीह किसी समारोह में जा रहा था । क़रीब तीन चार बजे जैसे ही उसने पान खाने के लिए साइकिल दुकान पर साइकिल रोकी बाइकसवार पुलिस वाला ने उसे कॉलर से पकड़ कर खींच कर थाने ले जाने लगा । बुधन की पत्नी ने रोकने की कोशिश की लेकिन वो नहीं रूका । किसी तरह निजी बस से बुधन की पत्नी श्यामली बड़ा बाज़ार थाने पहुँची तो देखा कि बड़ी बेरहमी से पिटाई की जा रही है । उसने गुहार लगाई । मगर पुलिस वाले नहीं रुके । वो घर आ गई । सबर समिति से मदद की गुहार लगाई । इसी बीच 13 फरवरी 1998 को पुलिस बुधन के घर आई और डकैती और चोरी के सामान की तलाशी के नाम पर घर अस्त व्यस्त कर दिया । बुधन की पत्नी मना करती रही लेकिन पुलिस वाले नहीं माने । चोरी का कोई सामान घर से बरामद नहीं हुआ। पुलिस लौट गई । इस बीच श्यामली ने डीएम, एसपी समेत जिले के तमाम अधिकारियों से गुहार लगाई मगर किसी ने नहीं सुनी। इसी बीच 18 फरवरी 1998 को बुधन के घर पुलिस आती है और जानकारी देती की बुधन ने थाने में सुसाइड कर लिया है । हंगामा हुआ । विरोध हुआ तो 27 फरवरी को थाने में हत्या समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया गया। फिर भी कार्रवाई नहीं होते देख लेखिका महाश्वेता देवी कोलकाता हाईकोर्ट पहुँची तो जाँच सीबीसआई को सौंपी गई । साल दर साल बीतते गए । फ़र्ज़ी गवाह, दस्तावेज और तमाम हथकंडों के सहारे तारीख पर तारीख़ मिलती गई । बांस की टोकरियाँ बनाने वाले एक सबर के लिए इतने दिनों तक अदालतों के चक्कर लगाने कितना मुश्किल होता अगर इसमें अभियोजन पक्ष के गवाह और सबर कल्याण समिति के प्रशांता रक्षित और महाश्वेता देवी की पहल नहीं होती । महाश्वेता देवी तो अब इस दुनिया में नहीं रहीं, फिर अदालत ने सत्तर पन्ने के फैसले में उनके योगदान का जिक्र करते हुए माना है कि वो अगर नहीं होती तो इंसाफ की ये लड़ाई जारी नहीं रहती । पुलिस ने बुधन के शव को जला सबूत नष्ट करने की भी कोशिश की लेकिन सबर कल्याण समिति की जागरूकता ने अहम सबूत नहीं मिटने दिया । 25 साल 10 दिनों के बाद बुधन सबर के दोषी अशोक रॉय को अदालत ने आईपीसी की धारा 306 के तहत 8 साल की और धारा 330 के तहत 5 साल की सजा सुनाई । दोनों धाराओं में कुल मिलाकर 50 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया ।
25 साल और 10 दिन । ना बुधन ज़िंदा है और ना अन्याय के खिलाफ जंग करने वाली महाश्वेता देवी । ज़िंदा है तो इंसाफ और दोषी । पुरलिया के जज साहब ने तमाम बीमारियों से ग्रसित 71 साल के पुलिस अधिकार अशोक रॉय जैसे ही सजा सुनाई वैसे ही बुधन सबर की आत्मा को शांति मिल गई । 35 साल पुराना ये मामला डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए मील का पत्थर है । पहली बार ऐसा हुआ है जब पुलसिया अत्याचार के शिकार किसी डीएनटी के मामले में दोषियों को सजा मिली है । बुधन सबर जैसा की नाम से ही ज़ाहिर है की कथित सभ्य समाज से उसका कोई लेना देना नहीं था । बुधवार को पैदा हुआ इसलिए माँ-बाप ने बुधन ही नाम रख दिया । बुधवार को पैदा हुआ और बुधवार 1998 को ही मौत की खबर आई । बुधन की मौत बहुतों के लिए सामान्य थी । पुलिस कस्टडी में मौत । 20वीं शताब्दी में बहुत आम बात थी । और आदिवासियों और आदिम जनजातियों के लिए तो बहुत ही सामान्य बात । ऊपर से अगर किसी जमाने में डिनोटीफाइड ट्राइब्स का दाग रहा हो तब तो जरा भी फ़िक्र की बाद नहीं । मगर बुधन थाने में मार डाला गया था । बुधन की पत्नी श्यामली सबर को बर्दाश्त नहीं हुआ । उसने ऐसी जंग की शुरुआत की जिसमें जीतना नामुमकिन जैसा था । मैग्सेस पुरस्कार से सम्मानित और आदिवासियों के लिए जीवन समर्पित करने वाली महाश्वेता देवी का साथ नहीं मिलता तो ये जंग कब की खत्म हो जाती। थका देने वाली ये लंबी लड़ाई 35 साल तक पुरलिया की अदालत में चलती रही । 10 फ़रवरी 1998 को बुधन को बेवजह पुलिस ने पकड़ कर थाने में पाँच दिनों तक रख इतना टॉर्चर किया कि उसकी मौत हो गई । बुधन के लिए इंसाफ की माँग करने वाले दक्षिण छारा बजरंगे ने बुधन थियेटर के ज़रिए डिनोटिफाइड ट्राइब्स की आवाज बहरी दुनिया के कानों तक पहुँचाने की शुरुआत की । मगर मुख्यधारा की मीडिया के लिए ये कोई खबर नहीं है । कस्टोडियल डेथ में पुलिस वाले को सजा मिली है । बुधन को इंसाफ मिला है । खबर कहीं नहीं ।

कहानी शुरु होती है आज से पच्चीस साल पहले 10 फ़रवरी 1998 को । पुरलिया के बामुंडिया में बुधन सबर अपनी पत्नी श्यामली के साथ साइकिल पर बैठ अपने रिश्तेदार के घर भंगारडीह किसी समारोह में जा रहा था । क़रीब तीन चार बजे जैसे ही उसने पान खाने के लिए साइकिल दुकान पर साइकिल रोकी बाइकसवार पुलिस वाला ने उसे कॉलर से पकड़ कर खींच कर थाने ले जाने लगा । बुधन की पत्नी ने रोकने की कोशिश की लेकिन वो नहीं रूका । किसी तरह निजी बस से बुधन की पत्नी श्यामली बड़ा बाज़ार थाने पहुँची तो देखा कि बड़ी बेरहमी से पिटाई की जा रही है । उसने गुहार लगाई । मगर पुलिस वाले नहीं रुके । वो घर आ गई । सबर समिति से मदद की गुहार लगाई । इसी बीच 13 फरवरी 1998 को पुलिस बुधन के घर आई और डकैती और चोरी के सामान की तलाशी के नाम पर घर अस्त व्यस्त कर दिया । बुधन की पत्नी मना करती रही लेकिन पुलिस वाले नहीं माने । चोरी का कोई सामान घर से बरामद नहीं हुआ। पुलिस लौट गई । इस बीच श्यामली ने डीएम, एसपी समेत जिले के तमाम अधिकारियों से गुहार लगाई मगर किसी ने नहीं सुनी। इसी बीच 18 फरवरी 1998 को बुधन के घर पुलिस आती है और जानकारी देती की बुधन ने थाने में सुसाइड कर लिया है । हंगामा हुआ । विरोध हुआ तो 27 फरवरी को थाने में हत्या समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया गया। फिर भी कार्रवाई नहीं होते देख लेखिका महाश्वेता देवी कोलकाता हाईकोर्ट पहुँची तो जाँच सीबीसआई को सौंपी गई । साल दर साल बीतते गए । फ़र्ज़ी गवाह, दस्तावेज और तमाम हथकंडों के सहारे तारीख पर तारीख़ मिलती गई । बांस की टोकरियाँ बनाने वाले एक सबर के लिए इतने दिनों तक अदालतों के चक्कर लगाने कितना मुश्किल होता अगर इसमें अभियोजन पक्ष के गवाह और सबर कल्याण समिति के प्रशांता रक्षित और महाश्वेता देवी की पहल नहीं होती । महाश्वेता देवी तो अब इस दुनिया में नहीं रहीं, फिर अदालत ने सत्तर पन्ने के फैसले में उनके योगदान का जिक्र करते हुए माना है कि वो अगर नहीं होती तो इंसाफ की ये लड़ाई जारी नहीं रहती । पुलिस ने बुधन के शव को जला सबूत नष्ट करने की भी कोशिश की लेकिन सबर कल्याण समिति की जागरूकता ने अहम सबूत नहीं मिटने दिया । 25 साल 10 दिनों के बाद बुधन सबर के दोषी अशोक रॉय को अदालत ने आईपीसी की धारा 306 के तहत 8 साल की और धारा 330 के तहत 5 साल की सजा सुनाई । दोनों धाराओं में कुल मिलाकर 50 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया ।
बुधन के मुक़दमे में पुलिस किस कदर बर्बर हो चुकी थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बुधन के शव को जबरन जलाने जब पुलिस पहुंची तो पत्नी और केरिया सबर कल्याण समिति ने पुरज़ोर विरोध किया । बुधन की पत्नी श्यामली ने शव को झोपड़ी में ही दफ़ना दिया और रात भर उसपर सोई रही । बाद में कोर्ट के आदेश के बाद शव निकाला गया पोस्टमार्टम किया गया । बुधन की मौत के बाद ही फ़िल्मकार और डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए संघर्षरत दक्षिण छारा बजरंगे ने महाश्वेता देवी की पहल पर बुधन थियेटर बनाया और नाटकों के ज़रिए पुलिसिया अत्याचार की कहानी लोगों तक पहुँचाई। पच्चीस साल बाद आए इस फ़ैसले ने जहां सबर समेत तमाम दलित आदिवासियों के खिलाफ हुए सरकारी अत्याचार के लिए सबक़ है वहीं इस समुदाय के लिए बहुत बड़ी जीत । श्यामली सबर अभी भी अपने दो बेटों , एक बेटी और पोतों के साथ पुरूलिया में रहती है।

बुधन के मुक़दमे में पुलिस किस कदर बर्बर हो चुकी थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बुधन के शव को जबरन जलाने जब पुलिस पहुंची तो पत्नी और केरिया सबर कल्याण समिति ने पुरज़ोर विरोध किया । बुधन की पत्नी श्यामली ने शव को झोपड़ी में ही दफ़ना दिया और रात भर उसपर सोई रही । बाद में कोर्ट के आदेश के बाद शव निकाला गया पोस्टमार्टम किया गया । बुधन की मौत के बाद ही फ़िल्मकार और डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए संघर्षरत दक्षिण छारा बजरंगे ने महाश्वेता देवी की पहल पर बुधन थियेटर बनाया और नाटकों के ज़रिए पुलिसिया अत्याचार की कहानी लोगों तक पहुँचाई। पच्चीस साल बाद आए इस फ़ैसले ने जहां सबर समेत तमाम दलित आदिवासियों के खिलाफ हुए सरकारी अत्याचार के लिए सबक़ है वहीं इस समुदाय के लिए बहुत बड़ी जीत । श्यामली सबर अभी भी अपने दो बेटों , एक बेटी और पोतों के साथ पुरूलिया में रहती है।

महाश्वेता देवी की जंग का फ़ैसला , 25 साल बाद बुधन सबर को इंसाफ, थाने में टॉर्चर कर मारने वाले पुलिस कर्मी को 8 साल की सजा

25 साल और 10 दिन, ना बुधन ज़िंदा है और ना अन्याय के खिलाफ जंग करने वाली महाश्वेता देवी । ज़िंदा है तो इंसाफ और दोषी । पुरलिया के जज साहब ने तमाम बीमारियों से ग्रसित 71 साल के पुलिस अधिकार अशोक रॉय जैसे ही सजा सुनाई वैसे ही बुधन सबर की आत्मा को शांति मिल गई । 35 साल पुराना ये मामला डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए मील का पत्थर है । पहली बार ऐसा हुआ है जब पुलसिया अत्याचार के शिकार किसी डीएनटी के मामले में दोषियों को सजा मिली है । बुधन सबर जैसा की नाम से ही ज़ाहिर है की कथित सभ्य समाज से उसका कोई लेना देना नहीं था । बुधवार को पैदा हुआ इसलिए माँ-बाप ने बुधन ही नाम रख दिया । बुधवार को पैदा हुआ और बुधवार 1998 को ही मौत की खबर आई । बुधन की मौत बहुतों के लिए सामान्य थी । पुलिस कस्टडी में मौत । 20वीं शताब्दी में बहुत आम बात थी । और आदिवासियों और आदिम जनजातियों के लिए तो बहुत ही सामान्य बात । ऊपर से अगर किसी जमाने में डिनोटीफाइड ट्राइब्स का दाग रहा हो तब तो जरा भी फ़िक्र की बाद नहीं । मगर बुधन थाने में मार डाला गया था । बुधन की पत्नी श्यामली सबर को बर्दाश्त नहीं हुआ । उसने ऐसी जंग की शुरुआत की जिसमें जीतना नामुमकिन जैसा था । मैग्सेस पुरस्कार से सम्मानित और आदिवासियों के लिए जीवन समर्पित करने वाली महाश्वेता देवी का साथ नहीं मिलता तो ये जंग कब की खत्म हो जाती। थका देने वाली ये लंबी लड़ाई 35 साल तक पुरलिया की अदालत में चलती रही । 10 फ़रवरी 1998 को बुधन को बेवजह पुलिस ने पकड़ कर थाने में पाँच दिनों तक रख इतना टॉर्चर किया कि उसकी मौत हो गई । बुधन के लिए इंसाफ की माँग करने वाले दक्षिण छारा बजरंगे ने बुधन थियेटर के ज़रिए डिनोटिफाइड ट्राइब्स की आवाज बहरी दुनिया के कानों तक पहुँचाने की शुरुआत की । मगर मुख्यधारा की मीडिया के लिए ये कोई खबर नहीं है । कस्टोडियल डेथ में पुलिस वाले को सजा मिली है । बुधन को इंसाफ मिला है । खबर कहीं नहीं ।

श्यामली सबर के चेहर पर 25 साल की जंग की जीत की लकीरें

कहानी शुरु होती है आज से पच्चीस साल पहले 10 फ़रवरी 1998 को । पुरलिया के बामुंडिया में बुधन सबर अपनी पत्नी श्यामली के साथ साइकिल पर बैठ अपने रिश्तेदार के घर भंगारडीह किसी समारोह में जा रहा था । क़रीब तीन चार बजे जैसे ही उसने पान खाने के लिए साइकिल दुकान पर साइकिल रोकी बाइकसवार पुलिस वाला ने उसे कॉलर से पकड़ कर खींच कर थाने ले जाने लगा । बुधन की पत्नी ने रोकने की कोशिश की लेकिन वो नहीं रूका । किसी तरह निजी बस से बुधन की पत्नी श्यामली बड़ा बाज़ार थाने पहुँची तो देखा कि बड़ी बेरहमी से पिटाई की जा रही है । उसने गुहार लगाई । मगर पुलिस वाले नहीं रुके । वो घर आ गई । सबर समिति से मदद की गुहार लगाई । इसी बीच 13 फरवरी 1998 को पुलिस बुधन के घर आई और डकैती और चोरी के सामान की तलाशी के नाम पर घर अस्त व्यस्त कर दिया । बुधन की पत्नी मना करती रही लेकिन पुलिस वाले नहीं माने । चोरी का कोई सामान घर से बरामद नहीं हुआ। पुलिस लौट गई । इस बीच श्यामली ने डीएम, एसपी समेत जिले के तमाम अधिकारियों से गुहार लगाई मगर किसी ने नहीं सुनी। इसी बीच 18 फरवरी 1998 को बुधन के घर पुलिस आती है और जानकारी देती की बुधन ने थाने में सुसाइड कर लिया है । हंगामा हुआ । विरोध हुआ तो 27 फरवरी को थाने में हत्या समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया गया। फिर भी कार्रवाई नहीं होते देख लेखिका महाश्वेता देवी कोलकाता हाईकोर्ट पहुँची तो जाँच सीबीसआई को सौंपी गई । साल दर साल बीतते गए । फ़र्ज़ी गवाह, दस्तावेज और तमाम हथकंडों के सहारे तारीख पर तारीख़ मिलती गई । बांस की टोकरियाँ बनाने वाले एक सबर के लिए इतने दिनों तक अदालतों के चक्कर लगाने कितना मुश्किल होता अगर इसमें अभियोजन पक्ष के गवाह और सबर कल्याण समिति के प्रशांता रक्षित और महाश्वेता देवी की पहल नहीं होती । महाश्वेता देवी तो अब इस दुनिया में नहीं रहीं, फिर अदालत ने सत्तर पन्ने के फैसले में उनके योगदान का जिक्र करते हुए माना है कि वो अगर नहीं होती तो इंसाफ की ये लड़ाई जारी नहीं रहती । पुलिस ने बुधन के शव को जला सबूत नष्ट करने की भी कोशिश की लेकिन सबर कल्याण समिति की जागरूकता ने अहम सबूत नहीं मिटने दिया । 25 साल 10 दिनों के बाद बुधन सबर के दोषी अशोक रॉय को अदालत ने आईपीसी की धारा 306 के तहत 8 साल की और धारा 330 के तहत 5 साल की सजा सुनाई । दोनों धाराओं में कुल मिलाकर 50 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया ।

बुधन के मुक़दमे में पुलिस किस कदर बर्बर हो चुकी थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बुधन के शव को जबरन जलाने जब पुलिस पहुंची तो पत्नी और केरिया सबर कल्याण समिति ने पुरज़ोर विरोध किया । बुधन की पत्नी श्यामली ने शव को झोपड़ी में ही दफ़ना दिया और रात भर उसपर सोई रही । बाद में कोर्ट के आदेश के बाद शव निकाला गया पोस्टमार्टम किया गया । बुधन की मौत के बाद ही फ़िल्मकार और डिनोटिफाइड ट्राइब्स के लिए संघर्षरत दक्षिण छारा बजरंगे ने महाश्वेता देवी की पहल पर बुधन थियेटर बनाया और नाटकों के ज़रिए पुलिसिया अत्याचार की कहानी लोगों तक पहुँचाई। पच्चीस साल बाद आए इस फ़ैसले ने जहां सबर समेत तमाम दलित आदिवासियों के खिलाफ हुए सरकारी अत्याचार के लिए सबक़ है वहीं इस समुदाय के लिए बहुत बड़ी जीत । श्यामली सबर अभी भी अपने दो बेटों , एक बेटी और पोतों के साथ पुरूलिया में रहती हैं।

अमृता प्रीतम की पिंजर: पुरुष पात्र रशीद के अनैतिक से नैतिक बनने के प्रयास की यात्रा

 “[…] मैं अंदर कूद पड़ी, लेकिन … जब आप तंदूर में रोटी डालते हैं और वह पूरी तरह भरा होता है तो जो रोटियां ऊपर रह जाती हैं वो पकती नहीं है और उन्हें बाहर निकालना पड़ता है. इसी तरह कुआं पूरी तरह भर गया था और हम डूब नहीं सके […]”.[1]

यह कहना है बसंत कौर का, जिनकी आपबीती को उर्वशी बुटालिया ने अपनी बहुचर्चित किताब The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India (1998) में डॉक्यूमेंट किया है. 1947 के विभाजन की त्रासदी के 73 वर्ष बाद भी इसके घाव उतने ही ताज़ा है, जितनी इनके बारे में चर्चा. औरतों के शरीर पर देश का बंटवारा हुआ, यह बात जाने कितनी ही बार कितने लेखकों/लेखिकाओं और आम जनों ने अलग अलग-अलग भारतीय भाषों में कही और आने वाली पीढ़ी को इस पहलु से रूबरू करवाया और उन्हीं में से एक हैं बसंत कौर. बसंत कौर कहती हैं कि उनके गाँव में जब हमला हुआ तो उनके घर की अमूमन सारी औरतों को मार दिया गया, जिसमे उनकी अपनी बेटी भी शामिल थी. उनको उनके ही परिवार के मर्दों ने इसलिए मार दिया गया ताकि वो दुश्मनों के हत्थे ना लगे. बसंत कौर खुद लगभग सौ लोगों के साथ कुँए में कूद पड़ी थीं, जिसमे औरतें बच्चे और लड़के भी थे. इतने लोगों के वजह से कुआँ भर गया था और जो ऊपर रह गए वो डूब ना सके, जिनमे एक बसंत कौर भी थी.[2] अमृता प्रीतम की पिंजर (1950) बसंत कौर जैसी ही हजारों-लाखों महिलाओं की व्यथा की दास्तान है, जब विभाजन की लकीर औरतों के लहू से सींची गयी. बसंत कौर और उनके साथ की महिलाएं जिस अनदेखे दुश्मन के डर से कुँए में कूदकर जान देने के लिए मजबूर कर दी गयीं, उसकी झलक पिंजर उपन्यास के रशीद के चरित्र में मिलता है. इस लेख में रशीद के पात्र को नैतिकता और अनैतिकता के लेंस से देखने का प्रयास किया गया है. एक औरत को अगवा कर लेने जैसे अनैतिक कृत्य को अंजाम देने वाला रशीद का पात्र अमृता प्रीतम ने बारीकी से रचा है इस पात्र के जटिल मनोविज्ञान से पाठकों को रूबरू करवाया है: कौन सी बात/परिस्थिति/सन्दर्भ उसे अनैतिक कृत्य को अंजाम देने की प्रेरणा देती है और कैसे उपन्यास के अंत आते आते वह पात्र नैतिकता की पगडंडी पर डगमगाते हुए ही सही, कदम रखता है.

रशीद: अनैतिक से नैतिक बनने के प्रयास की यात्रा

“सुनना जी !कभी भूल से भी लाजो का निरादर न करना !” (…) लाजो के पति का मुंह  नीचा था, लाजो के भाई का मुंह नीचा था (…)” (पिंजर: 116)[3]

बंटवारे के दौरान दंगाईयों द्वारा लाजो का अपहरण कर लिया जाता है और अमृता प्रीतम के पिंजर की केंद्रीय पात्र  पूरो अपने पति रशीद के सहयोग से अपनी भाभी लाजो को ढूंढ कर उसे अपने परिवार से मिलवाती है. पूरो उपरांकित बात अपने भाई और लाजो के भाई से कहती है, ताकि लाजो को उसके घर में वही सम्मान मिले जिसकी वह हकदार है.

पिंजर की कहानी की शुरुवात बंटवारे से कई साल पहले 1935 में होती है. गाँव में साम्प्रदायिक कट्टरता के परिणामस्वरूप हिन्दू परिवार में जन्मी पूरो को उसकी शादी से पहले ही उसके गाँव का मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाला लड़का रशीद उसका अपहरण कर लेता है. पूरो जब उसके चंगुल के किसी तरह भाग कर अपने माता पिता के घर वापस जाती है तो पूरो के माँ बाप उसे अपनाने से इनकार कर देते है, उसकी माँ कहती है: “: “हम तुझे कहाँ रखेंगे ? तुझे कौन ब्याहकर ले जायेगा ? तेरा धर्म गया, तेरा जन्म गया.”( पिंजर: 23). पिंजर में सर्वव्यापी नैरेटर पात्र पुरो की इस पल की मनोस्थिति को बहुत संवेदना से लिखता है, जब पूरो का उसके अपने ही घर में तिरस्कार कर दिया गया हो और उस पर ही अपहरण का दोष मढ दिया गया हो: : “पुरो निर्दोष थी, वह कैसे समझ लेती कि उसकी माँ का दिल पत्थर हो जायेगा, उसके पिता का दिल लोहे का बन जायेगा, वे अपनी बेटी को घर से निकाल देंगे, उनके घर की दीवारें उसे अंदर लेने से इंकार कर देगी.” (पिंजर: 23). बाद के वर्षों में पूरो और रशीद का निकाह हो जाता है पर पूरो कभी अपनी स्थिति से समझौता नहीं कर पाती है और खुद को पिंजर यानी बिना हाड़-मांस का शरीर कहती है. वक़्त यूँ ही बीतता है और 1947 यानि बंटवारे की त्रासद घटना का वक़्त आता है और पूरो की भाभी लाजो को दंगाई उठा कर ले जाते हैं. पूरो अपने पति रशीद की मदद से लाजो को वापस उसके परिवार से मिलवाती है और मिलन के इसी पल में पूरो लाजो के पति यानि अपने भाई और लाजो के भाई से लाजो का आदर करने करने की बात करती है. यहाँ दोनों मर्दों के चेहरे नीचे झुके हुए हैं, इसलिए भी क्यूंकि पूरो को वापस ना अपनाकर उन्होंने सालों पहले उसका अपमान किया था. इस सन्दर्भ में मुंह नीचा होना उन दोनों के अंदर के शर्म अथवा लज्जा को बयां करता है. उनकी लज्जा शारीरिक परिलक्षित होती है. लाजो का भाई इस पल में कहता है: “पूरो हमें लज्जित न कर” (पिंजर: 116). अमृता प्रीतम की लेखनी में इन दोनों पुरुष पात्रों की लज्जा पूरो के पात्र के प्रति संवेदना, न्याय और समझ को दर्शाते है.

आगे इस लेख में पुरुष पात्र रशीद की चर्चा की गयी है, जहाँ इस उपन्यास में उसकी यात्रा को बारीकी से समझने की जरुरत है. रशीद का चरित्र अनैतिक से नैतिक बनाने के प्रयास की कहानी है. रशीद के चरित्र के अंदर एक बदलाव को दर्शाया गया है. पूरो को अगवा करने का पछतावा उसे सालता है. वह अपने अनैतिक कृत्य यानि एक औरत को बिना उसकी मर्जी के अपहरण करने और जबरन उसे अपने घर में रखने को अंजाम देता है. यहाँ से उसकी यात्रा शुरू होती है. इस लेख में रशीद के चरित्र में आये परिवर्तन का विश्लेषण किया गया है और साथ ही उन परिस्थितिओं और सवालों का भी, जो रशीद में आये बदलाव को अंजाम देते हैं. पर सबसे पहले चर्चा इस बात पर होगी कि रशीद पूरो को अपहरण करने जैसा एक अनैतिक कदम क्यूँ उठाता है?

समुदायों के बीच बदले की आग: रशीद और ‘टेलिओलॉजिकल सस्पेंशन ऑफ़ द एथिकल’ (teleological suspension of the ethical[4])

जब पूरो रशीद के पूछती है कि “तूने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया है?” (पिंजर: 19) तो रशीद उसे पारिवारिक दुश्मनी की कहानी सुनाता है. रशीद के दादा की लड़की को पूरो के दादा के लड़के ने अगवा कर रशीद के दादा के परिवार को बेइज्जतकिया था. सालों बाद रशीद के चाचा और ताऊ ने रशीद को उस बात का बदला लेने के लिए उकसाया और इसी उकसावे में वो पूरो को अगवा करता है. रशीद कहता है: “[…] मेरे दादा ने मेरे चाचा-ताऊओं को और मेरे पिता को कुरान उठवाकर कसमें दिलवाई थी, कि वे इसका बदला लेकर ही रहेंगे. […] अब जब तेरा काज इसी गांव में रचा जाने लगा, मेरे चाचा-ताऊओं के लहू में पुराना बदला खौलने लगा. उन्होंने मुझे कसमें दिलाईं, मेरे लहू को ललकारा और मुझसे कौल कराये कि मैं शाहों की लड़की को ब्याह से पहले किसी भी दिन उठा ले जाऊँ.” (पिंजर: 19). जब कुरान की कसमें दिलाई गयीं तब यह मसला रशीद के लिए आस्था का मसला बन गया. रशीद यहाँ तर्क नहीं करता है और उसके अनैतिक होने की यात्रा शुरू हो जाती है, जहाँ उसे अपने कृत्य के दूरगामी प्रभाव की चिंता नहीं थी. इसे ही स्योरण किर्केगार्ड (Søren Kierkegaard, 1813-1855) अपनी किताब Fear and Trembling में ‘teleological suspension of the ethical’ कहते हैं. ग्रीक भाषा के दो शब्द ‘telos’, जिसका अर्थ होता है ‘अंत’ और ‘logos’, जिसका अर्थ होता है ‘तर्क’ अथवा ‘विज्ञान’, के मिलने से ‘teleology’ शब्द बनता है. अतः ‘teleological suspension of the ethical’ का मतलब हुआ किसी नैतिक कृत्य के अंत या परिणाम या प्रभाव को ख़ारिज कर देना, ठीक वैसे ही जैसे किसी अनैतिक कृत्य के अंत परिणाम या प्रभाव को भी ख़ारिज कर देना. ओल्ड टेस्टामेंट की अब्राहम और इस्सक की कहानी को केंद्र में रख कर किर्केगार्ड नैतिकता की बात करते हैं. कहानी में अब्राहम आस्था की तरफ खड़ा होता है और नैतिकता को किनारे कर देता है. किर्केगार्ड अपनी किताब के चौथे भाग में ओल्ड टेस्टामेंट के अब्राहम को फिर से रचते हैं और अब्राहम को सोचने और तर्क करने वाले पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जहाँ अब्राहम यह तर्क करता है कि ईश्वर और उसकी आस्था किसी अनैतिक कृत्य के लिए कैसे हामी भर सकता है? ठीक इसी तरह पिंजर उपन्यास के पहले भाग में रशीद का चरित्र अनैतिकता की तरफ हो लेता है जब उसे कुरान की कसमे याद दिलाई जाती है और उसे परिवार और समुदाय के इज्जत के लिए बदला लेने के लिए उकसाया जाता है. पूरो को अगवा करने के वक़्त उसके मन में नैतिक और अनैतिक का द्वन्द नहीं चलता है और ना ही वह इस बदले की भावना के दूरगामी प्रभाव के बारे में सोचता है.

उपन्यास में स्त्रियों को ‘घर की इज्जत’ बताकर नवाजने वाले समाज में रशीद की बुआ पर अत्याचार होता है और उसका बदला पूरो को अगवा कर लिया जाता है. मर्दों की इस लड़ाई में इन दोनों परिवारों की औरतों की बलि चढ़ाई जाती है. उपन्यास में रशीद द्वारा पूरो को अगवा करने की घटना 1935 में घटती है यानि 1947 के बंटवारे से पहले. अमृता प्रीतम इसके द्वारा इस बात की तरफ इशारा करती है, कि बिभाजन के दौरान हुए बृहत् पैमाने पर औरतों का जबरन अपहरण, उनके ऊपर यौन हिंसा अथवा उन्हें बीभत्स यातना का शिकार बनाना इत्यादि एक अचानक की घटना नहीं थी, इसके बीज पहले से ही सामाज में थे जहाँ औरतों के शरीर पर परिवार और समुदाय की लड़ाईयां लड़ी जाती थी. पूरो का पात्र इस अत्याचार के खिलाफ रशीद से तर्क करता है:

“तेरी बुआ को मेरे ताऊ के लड़के ने उठा लिया, पर रशीद, इसमें मेरा क्या दोष ?” […]

“यही तो मैं कहता था, पर मेरे चाचा मुझपर फिटकार बरसाते थे.”

“तो रशीद, उनके उकसाने से तूने मुझे मार डाला ?”     (पिंजर: 20)

पूरो के तर्क के सामने रशीद निरुत्तर हो जाता है. पूरो का सवाल हर उन औरतों का सवाल है जो समुदायों के झगड़े में इस तरह की हिंसा का शिकार हुई है. वो देश, काल और इतिहास से पूछ रही हैं: “इसमें मेरा क्या दोष ?”.

रशीद द्वारा इस अनैतिक कृत्य को अंजाम देने के दो कारण हैं: बहकाबे और उकसावे का शिकार होना और बदले की भावना का होना. बाईस-चौबीस साल का रशीद के पात्र के बारे में उपन्यास का सर्वव्यापी नैरेटर लिखता है: “शायद उसके दिल में पुराने बदले की आग धधक उठी थी.” (पिंजर: 21). बदले का भाव एक नकारात्मक भाव है जो इंसान के अंदर की बुराई को बाहर ले आता है और यही रशीद के चरित्र को अनैतिकता की तरफ ले जाता है. किर्केगार्ड के शब्दों में कहें तो रशीद द्वारा पूरो के अपहरण में ‘teleological suspension of the ethical’ निहित है. यह करकर वह अपने परिवार और समुदाय की नज़रों में ऊपर उठना चाहता है और यह उसकी निजी इच्छा है. उसका कृत्य उसके न्याय के सामने अपराधी बनाता है और न्याय प्रणाली के लेंस से देखें तो रशीद को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. साथ ही रशीद के चरित्र में ‘सोचने’ की प्रक्रिया पूरी तरह से अनुपस्थित है. उसके अंदर की वैचारिक गरीबी और सोचने की क्षमता का ना होना ही उसे उकसावे और बदले की भावना का शिकार बनाता है. चूँकि परिवार और समुदाय की नज़रों में स्वीकृत होना और खुद को ऊँचा देखना उसकी अपनी इच्छा है, इसलिए अपने अनैतिक काम के लिए उसे खुद ही त्राण के लिए प्रयास करना पड़ेगा. आगे लेख में उसके इसी प्रयास और उसके चरित्र में आये सकारात्मक बदलाव पर चर्चा की गयी है. साथ ही इस बात की भी चर्चा की गयी है कि कौन सी बातें और परिस्थितियां उसे अनैतिक से नैतिक तक लेकर जाती है.

रशीद: नैतिकता की पगडंडी

“The ethical is the universal and as such, in turn, the divine.“

“A tragic hero can become a human being by his own strength […]“. (Søren Kierkegaard: Fear and Trembling: 96, 95)

प्रेम, शर्म और पश्चाताप, ये तीन भाव रशीद के अंदर आये सकारात्मक बदलाव के कारण हैं. रशीद का पूरो के प्रति आदर और प्रेम का भाव, उसे बार बार अपने अनैतिक कृत्य पर सोचने को मजबूर करते हैं. उपन्यास में सर्वव्यापी नैरेटर के द्वारा पाठकों को रशीद के अंतर्मन में चल रहे द्वंदों और पूरो के प्रति प्रेम का पता चलता है, जैसे कि: “रशीद को शायद सचमुच ही पूरो से प्रेम था […]“ (पिंजर: 26), “उसका मन कर रहा था, पूरो के बदन में से बहुत नहीं तो कम-से-कम आधी पीड़ा निकाल कर अपने में डाल ले.“ (पिंजर: 31).“अब रशीद का दिल बुझने लगा था. दिन-रात उतरता हुआ पूरो का चेहरा रशीद से देखा न जाता था. उसके घर में वीरानी ने अपने पैर जमा दिए थे. रशीद के चेहरे पर भी एक वेदना, एक मौन दीख पड़ने लगा था.” (पिंजर: 46). रशीद के प्रेम में पूरो के लिए करुणा और संवेदना थी और वह यह बात जितनी अधिक महसूस करता उसे अपने ऊपर उतनी ज्यादा शर्मिंदगी होती.

अगवा करने की घटना का गहरा असर पूरो के जीवन पर पड़ा था. वो रहती तो रशीद के साथ थी, पर पूरो ने  मन से रशीद को स्वीकार नहीं किया था. रशीद को पूरो का यह तिरस्कार बीमार कर देता है. तेज़ बुखार में वह बडबडाता है: “पूरो, मेरा गुनाह बख्श दे ! मेरा कसूर माफ़ कर !“(पिंजर: 46). वह अपने किये पर शर्मिंदा था और वह पश्चाताप की अग्नि में दिन रात जलता है. उसके इसी शर्म और पश्चाताप में बदलाव के बीज हैं, जो उसे नैतिकता की तरफ खड़ा करते हैं.

बंटवारे के दौरान हुए दंगे में जब पूरो की भाभी लाजो का दंगाई अगवा कर लेते हैं तब रशीद उसे पूरो की मदद से  छुड़ावाने का बीड़ा उठता है. जब रशीद लाजो को सफलतापूर्वक उसे अगवा करने वाले के घर से अपनी घोड़ी पर बिठाकर चल पड़ता है तब सर्वव्यापी नैरेटर रशीद के अंतर्मन की बात यूँ लिखता है:

“घोड़ी को पहली एड़ लगाते ही रशीद को वह समय याद आ गया, जब उसने पुरो को छत्तोआनी के कच्चे रस्ते से उठाकर अपनी घोड़ी पर डाल लिया था. रशीद आज हैरान था, उसे फिर एक बार अपनी घोड़ी दौड़ानी पड़ी. गांव की एक और लड़की फिर एक बार भगानी पड़ी. जवानी का उत्साह आज रशीद की बाँहों में नहीं था, पर रशीद सोच रहा था, पूरो को उठाने के बाद ज्यों-ज्यों वह अपनी घोड़ी दौड़ता जाता था, मनों भर का एक पत्थर जैसे उसकी आत्मा पर बैठता जाता था. कई वर्षों से वह बोझ उसकी आत्मा पर पड़ा रहा था. आज ज्यों-ज्यों रशीद की घोड़ी रत्तोवाल की सीमाओं को दूर छोड़ती जाती थी, रशीद को लगता था कि उसकी आत्मा पर पड़ा वह भारी बोझ सरकता जा रहा है.” (पिंजर: 100).

रशीद का पहला कृत्य अनैतिक था, जब उसने अपनी घोड़ी पर लादकर पूरो को अगवा किया था और दूसरा कृत्य नैतिक था जब उसने लाजो को घोड़ी पर बिठाकर उसे दंगाइयों के चंगुल से छुड़ाया था. अपने अनैतिक कृत्य के लिए रशीद के अंदर पश्चाताप था, जो सालों तक उसके अंदर पलता रहा (“कई वर्षों से वह बोझ उसकी आत्मा पर पड़ा रहा था.”). सर्वव्यापी नैरेटर लिखता है, “उसकी आत्मा पर पड़ा वह भारी बोझ सरकता जा रहा है”, जब सालों बाद वह लाजो को छुड़ाने में कामयाब रहा और खुद को पश्चाताप के बोझ से मुक्त करने का प्रयास किया. रशीद को यह भी पता है कि चाहे वह कुछ भी कर ले, लेकिन पूरो को अगवा करने वाले अनैतिक कृत्य से कभी पार नहीं पा सकता है. सर्वव्यापी नैरेटर उसकी इस मनोस्थिति को यूँ व्यक्त करता है: “रशीद की आंखें लाजो को बचाने के बाद भी लज्जित थी. उसे पूरो को उठाकर भगा लाना याद आ रहा था, फिर भी उसे लग रहा था कि उसके सर का क़र्ज़ कुछ न कुछ कम हो रहा था.” (पिंजर: 117). जैसे स्योरण किर्केगार्ड अपनी किताब Fear and Trembling के चौथे भाग में अब्राहम को एक तार्किक पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं उसी तरह अगर रशीद को जब कुरान की कसमें खिलाई गयी थी और कौल पढवाए गए थे, तब अगर उसने तर्क किया होता कि, क्या खुदा एक निर्दोष लड़की को अगवा करने का अनैतिक आदेश दे सकता है ?, तो इतिहास में रशीद के किरदार को नैतिकता की पगडण्डी पर खड़ा पाते.

बंटवारे के बाद जाने कितने ही रशीद शर्म और पश्चाताप के ज्वर में अपने गुनाहों से मुक्ति की फ़रियाद लगा रहे होंगे. एक सभ्य समाज के लिए लज्जा की बात तब होगी जब गुनाह को अंजाम देने वाले अपने अनैतिक होने की चेतना से मुक्त हो समय का पहिया घूमता देख रहे होंगे. रशीद के पात्र में उसके अनैतिक होने की चेतना का होना ही बेहतर समाज की आशा है. पुरो को पिंजर बना देने वाला रशीद अपने गुनाहों से कभी मुक्त नहीं हो सकता, लेकिन मुक्ति की पगडण्डी पर चलता हुआ वह इसकी कामना जरूर कर सकता है.

 

सन्दर्भ:

  • Butalia, Urvashi: The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India. New Delhi: Penguin 1998.
  • Kierkegaard, Søren: Fear and Trembling. By Alastair Hannay. London: Penguin Books 1985.
  • Pritram, Amrita: Pinjar, New Delhi: Hindi Pocket Books 2003.

[1]बसंत कौर की इस आपबीती को उर्वशी बुटालिया अपनी किताब The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India. Penguin. (1998) में डॉक्यूमेंट करती है. बसंत कौर की आपबीती के इस अंश का मूल अंग्रेजी से हिंदी में मेरा अनुवाद. पृष्ठ सं.: 200.

[2]देखें, Urvashi Butalia: The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India.Penguin.(1998). पृष्ठ सं.: 198-200.

[3] Amrita Pritram: Pinjar, New Delhi: Hindi Pocket Books 2003. आगे सभी उद्धरण इसी अंक से लिए गए हैं.

 

[4]स्योरण किर्केगार्ड अपनी किताब Fear and Trembling में ‘teleological suspension of the ethical’ की बात करते हैं, जिसके अनुसार आस्था मानवों को यह विस्वास दिलाकर अनैतिक कृत्य की तरफ ले जा सकता है कि उस अनैतिक कृत्य के परिणामस्वरुप कुछ अच्छा ही होगा. अंत में जो अच्छा होगा वह सिर्फ ईश्वर जान सकता है, मनुष्य नहीं.

नदियों की उदासी का छन्द रचती कविताएँ

 

नदी हमारी चेतना का अभिन्न अंग

नदियों की उदासी का छन्द रचती कविताएँ

नदी हमारी चेतना का अभिन्न अंग है | इतिहास साक्षी है कि मानव सभ्यता और संस्कृति का उत्स नदियों के किनारे हुआ | नदियों के बिना मानव जाति के विकास की परिकल्पना असंभव थी | नदियों ने मानव जाति के साथ सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाकर मानव जाति के विकास में पूरा सहयोग किया | उसकी दैन्दिनी की हर जरूरत को पूरा किया | परंपरागत समय में मानवजाति ने नदियों के इस आत्मीय सहयोग को पूरा मान-सम्मान दिया किन्तु आज लोभ और लाभ की मनोवृत्ति की वजह से नदियाँ संकट में है | कहीं नदियाँ अपने अस्तित्व को बचाने के लिए बिलख रही है तो कुछ अतिशय प्रदूषण से ग्रसित अपनी अस्मिता और सौन्दर्य को बचा पाने में असमर्थ दिख रही है | सेंटर फॉर साइंस अंड एनवायरमेंट द्वारा प्रकाशित ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका के संपादक सुनिता नारायण लिखती है – “जो समाज अपने सर्वाधिक कीमती प्राकृतिक खजाने –अपनी नदियों को खो देता है, वह समाज निश्चित रूप से अभिशप्त है | हमारी पीढ़ी अपनी नदियों को खो चुकी है |”1

प्रकृति को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा माननेवाली मनीषा झा समकालीन दौर की महत्वपूर्ण कवयित्री है | उनकी कई कविताएँ नदियों पर केन्द्रित है जिसके मार्फ़त वह नदियों के प्रति मनुष्य की असंवेदनशीलता, अतिशय भोगवादी मानसिकता, स्वार्थवृत्ति, औद्योगीकीकरण, बाजारीकरण, प्राकृतिक प्रदूषण की ओर ध्यानाकर्षित करती है | नदियों के प्रति उनमें एक गहन आत्मीय लगाव है | वह जानती है “पानी से पलती है संस्कृति / पानी के तट पर / बहती है सभ्यता”2 | बालासन नदी को संबोधित इन पंक्तियों में नदियों के प्रति कवयित्री की भावना सहज समझी जा सकती है – “एकांत की साथिन / मेरे कितने ही विचारों को संवारा होगा तूने / कितने ही आवेगों को / दिया होगा सहारा / कितनी ही पंक्तियां जन्मी होंगी / तेरे सान्निध्य में और समा गई होंगी/ किसी कविता में / जैसे बहते-बहते तू मिल जाती गंगा में”3

कवयित्री प्रकृति के इस महत्त्वपूर्ण अंग के साथ तदाकार हो जाती है | ऐसा प्रतीत होता है कि नदियों के बिना कवयित्री एकांगी है और नदियों को भी कवयित्री की निश्छल आत्मीयता पर पूरा भरोसा है | उनकी कविता में नदियाँ मानों सखी बनकर अपना दुःख-सुख बतियाने आती है | कवयित्री भी पूरी ईमानदारी के साथ इस नि:शब्द आत्मिक मैत्री संबंध का निर्वहन करती हुई दिखाई पड़ती है |

शहरीकरण की आँधी में नदियों का अतिक्रमण किया जा रहा है | खासकर शहरी क्षेत्रों में बहनेवाली नदियाँ अतिक्रमण का शिकार हो अस्तित्वहीन हो चुकी है या होने की कगार पर हैं | कवयित्री ‘उसके सिकुड़न की भाषा को पढ़’ लेती है – “पानी का सोता सूख जाने से /

सिकुड़ी पड़ी हैं तमाम नदियाँ  / मेरे बिल्कुल पास से बह जाने वाली / तीस्ता हो महानंदा या बालाशन की अंगडाइयां”4 (शिशिर का आना )

नदियों की इस दुर्दशा के मूल में शहरीकरण और व्यावसायिक मनोवृत्ति है | तथाकथित सभ्य  शहरी मनुष्यों के लिए नदियाँ धन उगाही का जरिया बन चुका है | जल प्रदूषण एक गंभीर समस्या बनी हुई है | विडंबना यह है कि नदियों का जल पीने योग्य नहीं रहा | न मानव के लिएन मानवेतरों के लिए | नदियों की इस दुर्दशा से आहत कवयित्री असंवेदनशील शहरी सभ्य मनुष्य से प्रश्न करती है –

“नदी की आँखों में केवल एक उबाल है / समझो / दूध उबल-उबल के हो जाए भूरा / फिर दूध का दूधियापन कहाँ खोजते हो ! / क्या खोजते हो ! / पानी में दूध या दूध में पानी / नगर में बसनेवालो, तुम नागरिक हो ! / नागर हो !”5

नदियों की महत्ता को अगर कोई समझता है तो वह है – ग्रामीण | शहरी लोग इन ग्रामीणों को गँवार मानते हैं | मनीषा झा मानती है कि ये गँवार कहे जाने लोग ही वास्तव में नदियों के रक्षक है | नदी उनके लिए पूजनीय है, नदी का मर्म वे बखूबी जानते हैं | वह लिखती हैं  –

“नदी का मर्म जानते हैं वे / जो रहते हैं तुमसे दूर / करते है उसे प्रणाम / नदी मिले तो मिले / नहीं तो जलाशय को ही / वे कहलाते हैं गँवार“6

मनीषा झा नदियों की महत्ता पर दो दृष्टियों से विचार करती है | शहरी लोगों के लिए नदी सौन्दर्य का साधन मात्र है | वे भोगवादी दृष्टि से प्रकृति को देखते हैं जबकि ग्रामीण लोगों के लिए नदी उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है | नदियों का जल है तो खेतों में अन्न है, हरियाली है, आरोग्य है, समृद्धि का सौन्दर्य है |

मनीषा झा ने अपनी कई कविताओं में नदियों की दुर्दशा का आख्यान रचा है | नदियों का उत्खनन भयावह रूप ले चुका है – “अब परिदृश्य में थी नदी / उत्खनन से उग आया घाव / जहाँ –तहाँ”7 अपनी पीड़ा से आहत कवयित्री जब नदी के पास पहुँचती है, तो “देखती हूँ उसके शरीर पर सैकड़ों घाव /  उत्खनन कर किसी ने बांध दिया था उसे”8 | जब से ‘रियल स्टेट’ का कारोबार बढ़ा है, नदियों का गैरकानूनी तरीके से उत्खनन बढ़ता जा रहा | जल, रेत, बालू आदि सब पर पूँजीवादियों का कब्जा है | नदी बेबस और लाचार दिख रही है | नदी की सिसकी को महसूसते हुए कवयित्री मनुष्य की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा का दृश्य खिंचती है – “रेत और बालू को पाना / रिक्त हो जाना नहीं उस आदमी के लिए / पूँजी के समन्दर में डुबकी लगा लेना है / बहुत सफाई से कोई खुंदवा रहा है / नदी की आत्मा / नदी सिसक रही है घायल होकर”9  

मनीषा झा की नदी केन्द्रित कविताओं में नदियों का बहुआयामी यथार्थ उभर आया है

मनीषा झा की नदी केन्द्रित कविताओं में नदियों का बहुआयामी यथार्थ उभर आया है | हमारी सभ्यता और संस्कृति की पहचान, सबके पापों को धोनेवाली, सहनशील, पूजनीय गंगा नदी मानवीय स्वार्थपरता की बलि चढ़ चुकी है | ‘माँ’ का संबोधन देकर भी उसे स्नेह, करूणा और सम्मान से वंचित किया जा रहा है | धर्म और आस्था का केंद्र गंगा नदी, पूँजी और व्यापार का केंद्र बन चुका हैं | गंगा नदी की धवलता और शुद्धता नष्ट हो चुकी है | इस विडंबना पर कवयित्री लिखती है – “गंगा तेरे नाम पर पूँजी अपार है / शोर है व्यापार है / धर्म है नीति है दंड है राजनीति है / श्रद्धा भी है थोड़ी बहुत / सिर्फ कमी है करूणा की / प्रेम का अभाव है तो क्या हुआ / गंगा तेरे नाम पर / कितना कुछ है व्यवस्था में / तू माँ है, सहना ही चाहिए तुझे / कहते हैं वे / और करते हैं मौज |”10

इस सन्दर्भ में सुनिता नारायण का कथन उल्लेखनीय है –“हम नदियों को चूस कर सूखा छोड़ देते हैं | नदियों को पूजते हुए भी हम उनमें कूड़ा-करकट, प्लास्टिक और न जाने क्या-क्या डाल देते हैं | हम यह सब करते हैं और फिर भी विश्वास है कि नदियां पूजा लायक हैं | या इसका अर्थ यह है कि हम एक मरी हुई या मरणासन्न नदी की पूजा करते हैं, उनकी दुर्दशा को नजरंदाज करते हुए | आज हमारी नदियाँ मर रही है –इनके कई हिस्सों में पानी में घुली हुई आक्सीजन की मात्रा शून्य है | इस कारण इनमें जीवन नहीं है |”11

दरअसल कुछ लोगों के लिए ‘धर्म’ और ‘धन’ में पार्थक्य नहीं है | यही कारण है कि ‘माँ’ तुल्य नदी को मारकर भी लोग मौज में है |

गंगा नदी के माध्यम से मनीषा झा ने पूँजीवादी शक्तियों के बढ़ते वर्चस्व और नदियों के प्रति मनुष्य की बढ़ती असंवेदनशीलता और अमानवीयता को बखूबी उजागर किया है | असल में गंगा नदी का घाट आज धर्म और पाखंड का अड्डा बन गया है जहाँ आस्था के नाम पर पूँजी का घिनौना खेल खेला जा रहा है – “गंगा तेरे नाम पर / गिरती जा रही मुद्रा / साधुओं –कीर्तनियों की झोली में / तेरे घाटों पर उछल-कूद कर / देखो कैसे चले जा रहे / गाते हुए गरदन फुलाकर”12

नदियों के विनाश में बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव

नदियों के विनाश में बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव भी एक प्रमुख कारक है | गंगा नदी की शुद्धता ही बाजारवाद की बलि नहीं चढ़ गयी है बल्कि जलचर प्राणियों का अस्तित्व भी खतरे में हैं  क्योंकि कवयित्री के शब्दों “ दरअसल पानी नहीं रहा पानी / सभी के लिए / कि दिन–दहाड़े विष घुलाए जा रहे हैं”13 प्लास्टिकों का बढ़ता प्रयोग, कल-कारखानों का कचरा, केमिकल नदियों में जहर घोल रहा है जिसके परिणामस्वरूप – “बीमार हो गयी कारखानों का मल खाकर / सिर्फ कुछ मछलियाँ / पॉलीथीन में फँसकर घुट गयी / कुछ / छोटे जलचर / केमिकल का रस पीकर / चल बसे जल की दुनिया से”14

मनीषा झा की दृष्टि व्यापक है | यही वजह है कि वह तथ्य की गहराई में उतरती है | नदियाँ सिर्फ जल-संसाधन नहीं, रेत या बालू प्रदाता नहीं बल्कि जलजीवों के लिए उनका सर्वस्व है | सिर्फ जलजीव ही नहीं, पेड़-पौधे, वन्यप्राणी और आकाश सभी की जीवन-रेखा है | आकाश के साथ नदी की आतंरिक संबद्धता को केवल मनीषा झा की सूक्ष्म और संवेदनशील दृष्टि ही देख सकती है – “आकाश काँप उठता है / पानी को झकझोरने से / चाहे नदी का हो / चाहे तालाब का / चाहे तलैया का / या अँजुरी का….”15

इसी तरह एक कविता है – ‘उदासी का छन्द’, जिसमें हवा की उदासी का सुन्दर बिम्ब खींचा गया है | मनुष्य द्वारा प्रकृति के अतिशय दोहन-शोषण से हवा उदास हो गयी है – हवा गा रही / उदासी / पृथ्वी अप्रसन्न लग रही / बसन्त में भी / समुद्र में सभ्यता का शोर है/ नदियाँ हो चली बेसुरी / सिमट रहा है झरनों का वेग”16

मनीषा झा ने अपनी कविताओं में कई नदियों का उल्लेख किया है |  हुगली नदी उनमें एक है | इस नदी के प्रति कवयित्री का विशेष अनुराग दिखाई देता है | घर और ऑफिस के बीच बहती हुगली नदी कवयित्री की भागदौड़ भरी जिन्दगी का एक अहम् हिस्सा है | इस नदी के साथ उनका एक सहज आत्मीय संबंध स्थापित हो चुका है तभी तो – “फिर चाहे जितनी भी जल्दी हो / काम पर जाने की / रोक ही लेती है नदी / और दे देती है/ थोड़ी फरहर नमी / ताकि मुस्करा सके हम / कामों के बीच”17  हुगली नदी की ‘फरहर नमी’ भरी आत्मीयता कवयित्री में न केवल शारीरिक ऊर्जा बल्कि मानसिक ऊर्जा का संचार भी करती है ताकि वह अपने कर्तव्य का निर्वहन अच्छे से कर सकें |

यह कहना गलत नहीं है कि जल प्रदूषण की स्थिति चिंतनीय है | मनीषा झा ‘हुगली नदी-2’ शीर्षक कविता नदियों की इसी समस्या का आख्यान है | साफ-सुथरी नदियाँ आज रक्तवर्णा हो रही है | कल-कारखानों से निकला कचरा नदियों के सौन्दर्य को ही नष्ट नहीं कर रहा अपितु उसे विषैला भी बना रहा है | उसकी धारा को अवरूद्ध कर रहा है जिससे उसमें रहनेवाले प्राणियों का जीवन संकट में है | नदी जो पेय जल का एक बड़ा संसाधन है मनीषा झा नदियों की इस दुर्दशा से चिंतित है – “देखो / नदी का पानी साफ था पहले / पानी की तरह / हो गई है नदी / अब मिट्टीवर्णा / नदी लगती है यह / धारा के कारण ही/ वरना यही लगेगा / कि मिट्टी का थक्का /  और देखो रक्तवर्णा / हो रही है नदी धीरे-धीरे / फिर मत कहना / कि खून बह रहा है |”18

अंतत: यह कहा जा सकता है कि प्रकृति प्रेमी, पर्यावरण सजग कवयित्री मनीषा झा की कविताओं में नदियों का बहुआयामी परिप्रेक्ष्य वर्णित है | वह नदियों की भाषा को समझती है, उनकी सिसकी को महसूस करती है | उनके साथ अंत:करण से आबद्ध होती है | नदियों को लेकर उनकी दृष्टि संवेदनात्मक है | वह अपनी कविताओं में नदियों की दुर्दशा का आख्यान ही नहीं रचती, मानव जीवन के सन्दर्भ में नदियों की महत्ता और आवश्यकता पर गहन चिंतन करती है | आज नदियों के संरक्षण के लिए कई योजनाएँ लागू की गयी है, फिर भी नदियों की आत्मा सिसक रही है | मनीषा झा इस तथ्य पर जोर देती है कि नदी और मनुष्य का पुरातन आत्मिक संबंध है, उस संबंध को पुनर्जीवित कर ही हम अपनी इस धरोहर का संरक्षण कर पायेंगे | नदियों को बचाना हमारा कर्तव्य ही नहीं हैं, हमारी जरूरत है– यह समझना बहुत जरूरी है |

 

सन्दर्भ :

  1. सं. सुनिता नारायण, डाउन टू अर्थ, सेंटर फॉर साइंस अंड एनवायरमेंट, नयी दिल्ली, 2020, पृ.3
  2. मनीषा झा, कंचनजंघा समय, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2017, पृ. 91
  3. धूमकेतु, कोलकाता, डिजिटल अंक, 2022, पृ. 14
  4. सं. शंभुनाथ, वागर्थ, भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता, जून 2022 अंक, पृ. 49
  5. मनीषा झा, कंचनजंघा समय, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2017, पृ.108
  6. वही, पृ. 108
  7. वही, पृ. 108
  8. सं. शंभुनाथ, वागर्थ, भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता, जून 2022 अंक, पृ. 49
  9. मनीषा झा, कंचनजंघा समय, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2017, पृ.61
  10. वही, पृ. 88
  11. सं. सुनिता नारायण, डाउन टू अर्थ, सेंटर फॉर साइंस अंड एनवायरमेंट, नयी दिल्ली, 2020, पृ.3
  12. मनीषा झा, कंचनजंघा समय, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2017, पृ.61
  13. वही, पृ. 93
  14. वही, पृ. 88
  15. मनीषा झा, शब्दों की दुनिया, आनन्द प्रकाशन, कोलकाता, 2013,पृ. 9
  16. मनीषा झा, कंचनजंघा समय, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2017, पृ 102
  17. मनीषा झा, शब्दों की दुनिया, आनन्द प्रकाशन, कोलकाता, 2013,पृ.18
  18. वही, पृ. 19

 

 

सिक्स पैक सीता

प्रिया सिंह मेघवाल

सिक्स पैक सीता

विप्लव रचयिता संघम (विरसम) के दो दिवसीय सम्मेलन में कई किताबों का लोकार्पण हुआ, जिसमें एक किताब के नाम ने अपनी ओर ध्यान खींचा-‘सिक्स पैक राम’। किताब तेलगू में थी, इसलिए मैं नहीं पढ़ सकती थी, लेकिन लोगों ने उस किताब के बारे में बताया कि इसकी लेखक पावनी ने राम के बदलते स्वरूप के साथ अपने बचपन के पुरूष दोस्तों के बदलने की दास्तान लिखी है। उन्होंने लिखा है कि जैसे विनयनत-शांत राम हाथ में तीर-कमान थामे एक गुस्सैल राम में बदल रहे हैं, साथ ही उनके साथ खेले गांव के लड़के भी ‘मैस्कुलिन सिक्स पैक पुरूष’ में बदल रहे हैं।

मुझे नाम के साथ विषय भी बड़ा रोचक लगा। साथ ही मेरे दिमाग में तुरंत हाल ही में चर्चा में आई बॉडीबिल्डर प्रिया सिंह मेघवाल याद आयी, जिन्होंने जब अपना ‘सिक्स पैक’ बनाया तो समाज ने उनका मज़ाक बनाया, सरकार की ओर से उन्हें उपेक्षा मिली और मार्कण्डेय काटजू जैसे प्र्रगतिशील सोच वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस ने प्रिया की सिक्स पैक वाली इमेज को ‘बेहूदा’ तक कहा। मैंने पावनी से इजाज़त ली कि मैं प्रिया पर लिखूंगी और उसका टाइटिल ‘सिक्स पैक सीता’ रखूंगी। उसने खुशी-खुशी इजाज़त दे दी।

कल जब देश की ख्यातिनाम महिला पहलवालों को भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण सरण सिंह के यौन उत्पीड़न के खिलाफ जंतर-मंतर पर धरना देते देखा, तो लगा कि राम की तरह सीता अगर अपना “सिक्स पैक” बनाना चाहे तो उसे कितनी अधिक मुश्किलों से गुजरना पड़ता है।
प्रिया सिंह मेघवाल बीबीसी को दिये गये अपने एक इण्टरव्यू में बताती हैं कि महिला को सिक्स पैक बनाने के लिए पुरूषों के मुकाबले तीन गुना अधिक डाइट, तीन गुना अधिक एक्सरसाइज और तीन गुना अधिक प्रोटीन की ज़रूरत पड़ती है। भारत के सन्दर्भ में इसमें यह भी जुड़ जाता है कि उसे पुरूषों के मुकाबले कई-कई गुना अधिक मानसिक मजबूती की जरूरत होती है, ताकि वे पुरूषों के घटिया कारनामों और पुरूषवादी टिप्पणियों को झेल सके।

विनेश फोगाट

एक और घटना भी बताना चाहूंगी, ये समझने के लिए कि मैं इन लड़कियों को “सीता” क्यों कह रही हूं। मेरी एक मित्र भारतीय विश्वविद्यालयों में लैंगिक समानता पर अध्ययन कर रही है। वो एक बार इलाहाबाद विवि में गिरिश चन्द्र त्रिपाठी का इण्टरव्यू करने गयी, क्योंकि वे उस समय बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति थे, 2017 में जब लड़कियों ने वहां के पितृसत्तात्मक माहौल के खिलाफ महत्वपूर्ण आन्दोलन किया था। उनके कमरे में जाते ही उसने देखा कि वह छात्रों से नहीं, बल्कि भगवाधारी साधुओं से भरा हुआ था। थोड़ी देर के इन्तज़ार के बाद उन्होंने अपनी बात की शुरूआत यहां से की कि ‘देखिये भारत में हमेशा से नारियों का सम्मान होता रहा है…. देखिये हमारे यहां तो नारियों के नाम को भी पुरूषों से आगे रखा जाता है, हम तो पहले राधे फिर श्याम’ बोलते हैं हम पहले सीता फिर राम बोलते हैं। हमारे यहां हर पुरूष राम और हर स्त्री सीता है, यही हमारी संस्कृति है। हमारे यहां हर जगह लैंगिक समानता है।’’

पहलवानों का धरना जारी

उनके कथनानुसार जंतर मंतर पर धरने पर बैठी सभी चैंपियन पहलवान लड़कियां और प्रिया सिंह मेघवाल भी सीता है। बेशक उन्होंने पुरूषों की दुनिया में कदम रखकर उन्हें चुनौती दी है, लेकिन प्रिया का इण्टरव्यू बताता है कि उनमें वास्तव में काफी ‘सीता’ है। प्रतियोगिता में जाने के लिए उन्होंने घर में इजाज़त ली। बिकनी या कास्ट्यूम के पहनने के बारे में उन्होंने घर में इजाज़त ली। घर में रहने पर वे हाथ भर-भर चूड़ियां पहनती हैं। वे अपने चेहरे को ही घूंघट में छिपाकर नहीं रखती, बल्कि मेहनत से बनाये गये सिक्स पैक को भी घाघरे-चोली में छिपा कर रखती हैं, जबकि मर्दों के लिए तो यह मेहनत हमेशा दिखाने की ही चीज़ है। प्रिया तीन बार राजस्थान विजेता और अन्तर्राष्ट्रीय विजेता हैं, लेकिन केन्द्र सरकार तो छोड़ दीजिये खुद उनकी राजस्थान सरकार तक ने उन्हें कोई सम्मान नहीं दिया। इसके पीछे उनका औरत होना और दलित औरत होना मुख्य कारण है। साक्षात्कार में प्रिया कहती है मेरे साथ भी बहुत कुछ गलत हुआ है, लेकिन बॉडी बनाने के बाद गलत करने की कोशिश करने वाले को वे पीट दिया करती हैं। लेकिन हर जगह तो ये संभव भी नहीं। भारतीय कुश्ती संघ के अंदर तक उनके साथ गलत हो सकता है।

कुश्ती संघ चीफ बृजभूषण सिंह

जंतर-मंतर पर धरना दे रहे अन्तर्राष्ट्रीय पदक विजेता पहलवानों ने महिला पहलवानों की ओर से भारतीय कुश्ती संघ पर आरोप लगाया है कि वहां राष्ट्रीय कैम्पों में महिला पहलवानों के साथ यौन दुर्व्यवहार किया जा रहा है और इसमें संघ के अध्यक्ष भाजपा सांसद बृज भूषण सरन सिंह खुद भी शामिल हैं। यह सब पिछले कई सालों से चला आ रहा है।

 

प्रसिद्ध पहलवाल साक्षी मलिक, विनेश फोगाट, संगीता फोगाट और बजरंग पुनिया ने सभी पीड़ित महिला पहलवानों की ओर से जंतर-मंतर पर आकर बयान दिया, तब इस मामले को सरकार ने नोटिस लिया। इसके पहले महिलाओं ने खेल मंत्री, प्रधान मंत्री तक को कई पत्र लिखे पर कुछ भी नहीं हुआ। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए आये पहलवानों ने बताया कि कोच और अध्यक्ष के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली महिला पहलवानों ने प्रशिक्षण रोके जाने ही नहीं, बल्कि अपनी जान की सुरक्षा की भी चिंता जताई है, क्योंकि ये इतनी ऊंची पहुंच वाले लोग हैं कि कुछ भी कर सकते हैं इस मामले का क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन ये ज़रूर है कि रामचरित मानस की सीता की तरह चुप रहने से तो ये स्थिति बेहतर है, कुछ हो न हो डर का लोड तो बदलेगा। अब तक डर का लोड सिर्फ सिक्स पैक बनाने वाली सीताओं पर था, अब कम से कम इन सीताओं का उत्पीड़न करने वाले रामों और रावणों में भी डर पैदा होगा।

हमारे देश में ‘सिक्स पैक राम’ बनना मुश्किल नहीं है, लेकिन ‘सिक्स पैक सीता’ बनना नामुमकिन जैसा काम है

हमारे देश में ‘सिक्स पैक राम’ बनना मुश्किल नहीं है, लेकिन ‘सिक्स पैक सीता’ बनना नामुमकिन जैसा काम है। वास्तव में सिक्स पैक बनाने के लिए लड़कियों को सबसे पहले सीता बने रहने की चिंता छोड़नी पड़ती है। प्रिया मेघवाल ने भी बताया कि पहले उन्होंने ये काम घर वालों से छिपा कर किया, सफलता मिलने के बाद घर में बताया। सीता बने रहकर यह संभव नहीं था। उन्होंने सिक्स पैक बनाने की यात्रा में बहुत कुछ सुना, बहुत कुछ सहा। जबकि लड़के राम बने रह कर भी सिक्सपैक बना सकते हैं। प्रिया सिंह मेघवाल के सिक्सपैक में सिर्फ उनके डोले शोले ही नहीं, उनका संघर्ष भी दिखता है, जब कोई उसे ‘बेहूदा’ कहता है, मज़ाक उड़ाता है, इससे सिर्फ और सिर्फ उस व्यक्ति की पितृसत्तात्मक-सामंती मानसिक बनावट का पता चलता है। जब कोई इन पहलवान बनती लड़कियों का यौन-उत्पीड़न और यौन हमले करता है, तो उसके अन्दर यह पितृसत्तात्मक विचार कूद रहा होता है कि कितनी भी मजबूत क्यों न हो जायं लड़किया, मर्दों के लिए मनोरंजन का साधन ही रहेगीं। वे जल्द से जल्द इस कुंठित विचार को मजबूत होती लड़कियों तक पहुंचाना चाहते हैं, ताकि वे उनके नीचे दबी रहें। लेकिन इनसे लड़ती-भिड़ती लड़कियां, हर चीज में तीन गुना अधिक मेहनत करती लड़कियां, अपनी मंजिल पर पहुंचती हैं। इसलिए जब भी किसी लड़की को‘सिक्सपैक ऐब’ में देखिये तो उसमें अपनी बेहूदगी नहीं, उसके सघर्षों की खूबसूरती को देखिये। सीता की छवि छोड़ कर जंतर मंतर पर धरना दे रही सिक्स पैक लड़कियों का समर्थन करना भी इस पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ खड़े होना है।

सीमा आज़ाद

पारसनाथ का सम्मेद शिखर,बादशाह अकबर के फ़र्ज़ी फरमान से लेकर आदिवासियों की ज़मीन दबोचने तक की कहानी

”’उसका मन टूट गया । उसके मिट्टी खोदने पर कोयला या अबरख क्यों निकलता है और साथ ही साथ आ पहुंचते हैं अंग्रेज-बंगाली-बिहार लोग इसका कारण क्या है ? उसे कहीं शांति क्यों नहीं मिलती वह कैसी ही निर्जन जगह क्यों न जाए, वहां की मिट्टी के नीचे से कुछ-न-कुछ जरुर निकलता और वहां अच्छी-खासी बस्ती बन जाती है। उसकी मुंडा धरती और भी छोटी हो जाएगी उसे कुछ नहीं चाहिए बस एक छोटा सा गांव हो जहां सब बाशिन्दे आदिवासी हों – हरम देवता की पूजा करनेवाले । पहान के अनुगत” महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘चोट्टी मुंडा और उसके तीर’ के इस अंश का ज़िक्र इसलिए क्योंकि इस बार अभ्रक और कोयला नहीं ‘धर्म’ निकला है ।

जिस पारसनाथ की पहाड़ियों पर जैन धर्म के 23 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया, जहां भगवान महावीर के पाँव पड़े उस धरती पर हज़ारों सालों से आदिवासी रहते आए । ना कभी संतों ने ऐतराज किया और ना ही ईश्वर ने , सच्चे श्रद्धालु भी आख़िरी इच्छा के तौर पर हज़ारों मुसीबतें झेलते सम्मेद शिखर पर पहुँचते रहे। बुजुर्ग, असहाय, कमजोर होते जैन यात्रियों को आदिवासियों का कंधा मिलता रहा। सैकड़ों सालों से ऐसा ही चलता रहा । जिसे इतिहास ने दामिन ए खोह कहा,जहां जंगलों को पार करना नामुमकिन था वहां एक सभ्यता पनपती रही । मगर अंग्रेजों के आने, दामिन ए खोह के भयानक जंगलों की भयंकर कटाई , ग्रैंड ट्रंक सड़क के निर्माण और रेलवे लाइन की शुरुआत ने ने देश भर के साहूकारों, सेठों, ज़मींदारों को जैसे जन्नत दे दिया । जंगल कटता गया, बंगले बनते गए, मधुबन, पारसनाथ में अजीब-अजीब पहनावे,बोली वाले लोग आने लगे । फिर शुरू हुआ ज़मीन का खेल, रेवन्यू का प्रपंच। जो कभी आदिवासियों के लिए ईश्वर थे वे कथित सभ्य समाज के लिए राजस्व का ज़रिया बन गए । जल-जंगल-ज़मीन सब की बोली लगा दी गई । पहाड़ के पहाड़ बिक गए । दिल्ली-मुंबई -कोलकाता के सेठों-साहूकारों ने पैसा फेंकना शुरू कर दिया। छोटे-छोटे राज अंग्रेजों की चमचागीरी में सब नीलाम करने लगे ।

ऐसी एक नीलामी हुई थी पारसनाथ पहाड़ की । पूरा का पूरा पहाड़ बेच दिया गया। क्योंकि दिल्ली वाली मीडिया की कहानी उतनी ही तह तक जाती है जहां तक कि उनका तहख़ाना बचा रहे इसलिए ये बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस पारसनाथ को लेकर आज आदिवासी-सरकार और जैन धर्म आपने-सामने हैं उसके लिए जैन समाज के बड़े-बड़े पूँजीपतियों ने कभी शहशांह अकबर का फ़र्ज़ी फ़रमान तक कोर्ट में पेश कर दिया था। इस फ़रमान की कहानी बताने से पहले हम आपको लिए चलते हैं आज से क़रीब एक सौ दस साल पहले । ईस्वी 1907 के जून महीने में बंगाल की सरकार ने हज़ारीबाग़ के पारसनाथ को हेल्थ रिसॉर्ट्स के तौर पर विकसित करने का प्लान बनाया । योजना को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका । अंग्रेजी सरकार ने पहाड़ को लीज़ पर देने का फ़ैसला किया । लीज़ की शर्तों पर जैन धर्म के श्वेतांबर समुदाय को ऐतराज था लेकिन दिगंबर समुदाय ने इसे मानते हुए पांच हजार रूपए जमा करा दिए । इधर श्वेतांबरों को ये अपमान की बात लगी तो उन्होंने अंग्रेज़ी ख़ज़ाने में दस हजार रूपए जमा कराने को तैयार हो गए । क्योंकि सरकार पहले दिंगंबरों से पांच हजार रूपए स्वीकार कर चुकी थी इसलिए श्वेतांबर की बात नहीं मानी गई । 30 नवंबर 1908 को उस वक्त की सबसे बड़ी लॉ फ़र्म मॉर्गन एंड कंपनी के वकीलों ने दिंगबरों के लिए समझौते का मसौदा तैयार करना शुरू कर दिया । इधर बंगाल की सरकार के वकील ने लीज़ के काग़ज़ात बीस जनवरी 1909 तक तैयार कर लिए । पहाड़ी की नपाई भी शुरु हो गई । इसी बीच पालगंज के जमींदार से श्वेताबंरों ने पारसनाथ पहाड़ी को लीज पर लेने की बात शुरु कर दी । राष्ट्रीय संग्रहालय में मौजूद ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं जिस सत्य-न्याय और अहिंसा जैसे सिद्धांतों को लेकर जैन तीर्थंकरों ने इस पहाड़ी पर वर्षों बीताए, निर्वाण प्राप्त किया उन सिद्धांतों पर चलने की बजाए जैन धर्म के दोनों पंथों दिगंबर और श्वेतांबरों में ज़बरदस्त झगड़ा होता रहा । इस संबंध में मौजूद ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि 18वीं शताब्दी के आख़िर दशकों से लेकर 19वीं शताब्दी के शुरूआती दशकों में पारसनाथ पहाड़ी में पूजा के लिए आने वाले दिगम्बरों को श्वेतांबर समुदायों की उलाहना,प्रताड़ना झेलनी पड़ती थी। झगड़ा इस कदर बढ़ा चुका था कि बात अदालतों के दरवाज़े तक जा चुकी थी । इसी बीच हज़ारीबाग़ कोर्ट के एक फ़ैसले के बाद लीज़ का मामला अटक गया। नवागढ़ के राज और पालगंज के राजा के बीच पारसनाथ के मालिकाना हक़ को लेकर चल रहा मुक़दमा कई साल तक चलता रहा । मामला पटना हाईकोर्ट पहुँचा । इसी दौरान पालगंज के ज़मींदार ने श्वेतांबरों को पारसनाथ पहाड़ी 2 लाख 60 हजार रूपए में बेच दिया । इधर नवागढ़ के राजा ने एक लाख रूपए की रक़म में पारसनाथ पहाड़ी को परमानेन्ट लीज़ पर दे दिया ।
दरअसल हक़ीक़त ये है कि श्वेतांबर समुदाय दिगम्बरों को पहाड़ी पर स्थित धार्मिक स्थलों पर पूजा के लिए बाधित करना चाहता था । इसीलिए 1912 में श्वेतांबरों ने हज़ारीबाग़ की अदालत में एक मुक़दमा भी दायर कर यह मांग की कि दिगम्बरों को तब तक पारसनाथ में पूजा की इजाज़त नहीं दी जाए जब तक कि वे श्वेतांबरों की पूजा पद्धति को स्वीकार कर उसी ढँग से पूजा नहीं करते हैं । हज़ारीबाग़ कोर्ट अपील ख़ारिज करते हुए 21 मंदिरों में दिगंबरों को पूजा की इजाज़त दे दी हालाँकि 5 मंदिरों में पूजा की पद्धति श्वेतांबरों के मुताबिक़ ही रही ।

अब कहानी का दिलचस्प मोड़ ये है कि श्वेतांबरों का पारसनाथ पर इतना पुरज़ोर दावा इसलिए था कि उनके पास शहंशाह अकबर और अहमद शाह का एक फरमान था जिसमें श्वेतांबरों को पारसनाथ देने की बात कही गई थी । कलकत्ता हाईकोर्ट ने मशहूर पिगरी केस ऑफ फैब्रिकेटेड डॉक्यूमेंट्स में इस फ़रमान को फ़र्ज़ी करार दिया । 25 जून 1892 को सर कूमर पेथराम ने श्वेतांबरों के दावे को ख़ारिज करते हए अकबर के कथित फरमान को फ़र्ज़ी बता दिया ।

अब चलते हैं उन्नींसवी शताब्दी से 21 वीं शताब्दी की ओर । सौ साल पहले पारसनाथ में सिर्फ 26 मंदिर थे। सम्मेद शिखर पर पहुँचना नामुमकिन जैसा था फिर भी आस्था में कमी नहीं थी । आज इस पहाड़ी पर शिखरजीडॉटकॉम चलाने वाली वेबसाइट बताती है कि “पारसनाथ और मधुबन में 50 से ज्यादा जैन संस्थाएं हैं, 100 से ज्यादा मंदिर हैं और 1000 के आसपास मंदिरों में तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं। उस दौर में उंगलियों में जैन संस्थाओं को गिना जा सकता था। जिनमें तेरहपंथी कोठी, बीसपंथी कोठी, जैन श्वेतांबर सोसाइटी थी इसके अलावा भोमिया जी भवन और कच्छी भवन निर्माणाधीन था । “ ज़ाहिर है पुरानी धर्मशालाएँ अब काम की नहीं रहीं । पैसे और रसूखदार लोगों के बोलबाले के बीच प्राकृतिक तौर से महत्वपूर्ण इस पहाड़ी पर धड़ल्ले से ज़मीन क़ब्ज़ाने का खेल चल रहा है । आलम तो ये है कि सरकार ने आदिवासियों को ज़मीन बंदोबस्ती के तौर पर रहने खाने के लिए दी थी उस पर क़ब्ज़ा होता जा रहा है । गरीब आदिवासी की सेठ साहूकारों के आगे एक नहीं चलती । ऐसा ही मामला है साल 2015 का जब आदिवासी समाज मौजी तूरी की ज़मीन धर्मशाला वालों ने कब्जे में कर ली । सात साल से सिर्फ नोटिस-नोटिस का खेल चल रहा है । अंग्रेज़ी राज में कम से कम फ़ैसला तो होता था मगर यहाँ अंचल कार्यालय से बात आगे बढ़ती ही नहीं । आदिवासियों की एकड़ के एकड़ ज़मीन धर्म की भेंट चढ़ती जा रही है मीडिया में धर्म का लबादा ओढ़े पत्रकार आलीशान संगमरमर के मंदिर,धर्मशालाएँ और मूर्तियों के आगे पत्रकारिता को झुका दिल्ली लौट जा रहे हैं ।

पारसनाथ! जहां मांस मदिरा खाने वाले कंधे तो मंज़ूर मगर कंधे पर रखा सिर’ नहीं

पारसनाथ में हथियार दिख रहे हैं । परंपरागत हथियार। दिल्ली की मीडिया को ये तीर-धनुष,फरसा-फावड़ा नहीं दिखे। उन्हें दिखे ‘शांतिपूर्ण’प्रदर्शन करते जैन धर्मावलंबी । इसीलिए चैनल्स के सेठों और मालिकों ने खर्चा कर पंद्रह सौ किलोमीटर दूर अपने पत्रकारों को विस्तृत कवरेज के लिए भेजा । टीवी की भाषा में ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग । खैर दो चार दिनों के प्रदर्शन का असर हुआ । टीवी वालों ने जैन धर्म के श्रद्धालुओं को पारसनाथ पहाड़ी दिला दी । आधिकारिक तौर से । सरकार ने अपने ही तीन साल पुराने फ़रमान को वापस ले लिया । कहते हैं पैसे में बड़ी ताक़त होती है । ‘अहिंसा’ में तो और बड़ी । गरीब-गुरबे को स्थानीय स्तर और सोशल मीडिया का ही सहारा मिला । चंद हजार आदिवासी मूलवासी उस पहाड़ी की तराई में इकट्ठा हुए जिसे उन्हें कभी भी हरा-भरा होने से नहीं रोका । कहते हैं पारसनाथ ही मरांग बुरू है । हर साल बैसाख पूर्णिमा के दिन हज़ारों आदिवासी मरांग बुरू सेंदरा मनाने पहुँचते रहे हैं । अब शायद नहीं पहुँच पाएंगें । सेंदरा पर्व आदिवासियों का परंपरागत पर्व है और इसे शौक़िया शिकार के तौर पर कभी नहीं देखा गया ।

बहरहाल दस जनवरी को झारखंड के पारसनाथ पहाड़ी में वो नजारा दिखा जो आज के पहले कभी नहीं देखा गया । अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं जब पूरी की पूरी पहाड़ी बेच दी जाती थी। उस वक्त भी आदिवासियों का हक़ महफूज रहा । लेकिन राजनीति के ‘भक्तिकाल’ में आदिवासियों को लग रहा है कि उनका मरांग बुरू छीन गया । उन्हें ठग लिया गया । पैसे की ताकत के आगे झुक सरकार ने उनकी संस्कृति पर हमला कर दिया । इसीलिए मोदी और हेमंत के खिलाफ आक्रोश दिखा । खैर आदिवासियों ने पारसनाथ की पहाड़ के एक किलोमीटर ऊपर बने पूजा स्थल दिशोम माँझी थान तक पहुँच विरोध दर्ज कराया। आदिवासी अपने मरांग बुरू को सफेद मुर्गे की बलि देते आए हैं । आदिवासियों का कहना है कि जो काम सदियों से शांतिपूर्ण ढंग से चलता आया है उसे रोकने का अधिकार किसी को नहीं ।

पारसनाथ की पहाड़ियों का माहौल मीडिया की मेहरबानी और सरकारों के ‘खेल’ की वजह से बिगड़ चुका है । वर्षों से जैन तीर्थयात्रियों क डोली ढो रहे स्थानीय भोला कहते हैं “ जिन कंधों पर यात्री 27 किलोमीटर की यात्रा करते हैं वे कंधे मांस-मदिरा का सेवन करने वाले हमेशा से ही रहे हैं अब उन्हें अब हिंसक नजर आने लगे हैं ।” स्थानीय लोग कह रहे हैं कि उन्हें हमारे कंधे तो चाहिए मगर हमारी संस्कृति, हमारा समाज नहीं चाहिए । ये दर्द एक का नहीं है । घूमने आने वाले स्थानीय पर्यटकों,स्कूली बच्चों को भी अब भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। आरोप तो ये भी लग रहा है कि उनसे सम्मेद शिखर पर धर्म भी पूछा जा रहा है । स्थानीय आदिवासियों और तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के बीच की समरसता खत्म होती नजर आ रही है ।

दिल्ली वालों ने अपना काम कर दिया । जैन गुस्से में क्यों ? सम्मेद शिखर किसका? जैन धर्म के सबसे बड़े तीर्थस्थल का विश्लेषण, जीत गया जैन समाज.. जैसे टैगलाइन से खबरें दिखाने वाले अब नहीं बता रहे हैं कि गुस्से में क्यों आदिवासी ?.. आदिवासियों के सबसे बड़े तीर्थस्थल का विश्लेषण , हार गया आदिवासी समाज । दिल्ली की मीडिया दिखाईएगी भी नहीं । क्योंकि ना तो कोई आदिवासी दुनिया का सबसे अमीर आदमियों की लिस्ट में शुमार है और ना ही आदिवासियों की इतनी हैसियत है कि वो मीडिया के विज्ञापनों की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी रखे । कारोबारियों से तो अंग्रेज भी नहीं जीत सके थे । उनके लिए मेहनत, मेहनत और मेहनत का मतलब होता है अपने और दूसरों के लिए पूरा शरीर झोंक देना । नहीं तो पारसनाथ के पीरटांड़ के नोकनियां गाँव के लोग पांच -पांच किलो सरकारी अनाज के मारे -मारे नहीं फिरते । जंगली बीज से रोली बना कारोबारियों से बदले में नमक लेने वाले पीरटांड के नोकनियां गाँव की महिलाएँ सम्मेद शिखर के संगमरमर और पहाड़ी रास्तों में बने लकदक धर्मशालाओं को देख आहें भी नहीं भरतीं। उनकी सोच संगमरमर तक पहुँच-पहुँचे गोबर से लीपे घर फ़र्श पर ही फिसल जाती है । बच्चों से पूछा दूध मिलता है तो जवाब मिला कभी नहीं । छोटी-छोटी लड़कियाँ पारसनाथ के पीरटांड़ के जंगलों से हर कई किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ जलावन की लकड़ियाँ इकट्ठा करतीं नजर आ जाएँगीं । स्कूल है तो मास्टर नहीं, मास्टर है तो मोदी के नीति आयोग की मेहरबानी स्कूल मिलों दूर । रही-सही कसर नक्सलियों के ख़ौफ़ ने पूरी कर दी । मगर सम्मेद शिखर चमक रहा है । हर साल करोड़ों का दान मिलता है । लाखों श्रद्धालु आते हैं । आलीशान धर्मशालाओं में रातें गुज़ारते हैं और पहाड़ की ख़ूबसूरती निहार अंग्रेंजों की देन पारसनाथ स्टेशन पर बैठ वापस धंधे में लग जाते हैं । अब पास में एयरपोर्ट भी बन चुका है । ऊपर-ऊपर पहाड़ चमक रहा है और अंदर ही अंदर उबल ।