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मणिपुर में बलात्कार एक सुनियोजित नरसंहार का हिस्सा है।

दो महिलाओं को नग्न करके घुमाने के बाद उसके साथ बेरहमी से सामूहिक बलात्कार करने और उन्हें उपद्रवियों के हवाले छोड़ देने का कृत्य एक सुनियोजित नरसंहार है। इस घटना का एक वीडियो वायरल है। एक महिला के रूप में, यह कहना कि यह वीडियो रीढ़ तक भय और क्षोभ की झिनझिनाहट से भरा है कोई अतिशयोक्तिपूर्ण कथन नहीं है। यह किसी बात पर गुस्साये लोगों द्वारा बेहद सुनियोजित ढंग से किया गया कृत्य है। लगता है कि उनके क्रोध ने उनक विवेक को नष्ट कर दिया है। हालांकि इस कृत्य को अंजाम देने से लगता है कि वे विवेक शून्य ही थे।

हमेशा क्या करना है ये मिथ्याचारी स्त्रीद्वेषी लोग हैं जिन्हें किसी काम को पूरा करने के किराये पर लगाया जा सकता है। और वह कार्य क्या है? सरल भाषा में कहें तो यह कुकी समुदाय के लोगों के बीच इतना आतंक पैदा करने का काम है कि वे स्वेच्छा से मणिपुर से बाहर चले जाएं और जिसके बाद इम्फाल घाटी के मैतेई लोगों द्वारा उन छोड़ी गई जगहों पर कब्जा कर लिया जाएगा, यही कार्यप्रणाली रही है। यह तथ्य कि नफरत और बदले की विचारधारा से प्रेरित ये युवा खुद मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की देखरेख में प्रशिक्षण ले रहे हैं और उन्होंने उनके प्रति अटूट वफादारी की शपथ ली है, बताने के लिए काफी है कि उन्हें एक कार्य दिया गया था और उन्होंने इसे अंजाम तक पहुंचाया है। न केवल शरीर बल्कि दो पूरी तरह से असहाय महिलाओं की आत्मा को नष्ट करने के भयानक कृत्य को दर्ज किया जाना चाहिए। इस कृत्य में परपीड़कता की झलक है, निम्नतम स्तर की चरित्रहीनता साफ दिख रही है, जिसके बारे में लोग मानते हैं कि सभ्य समाज में अब मौजूद नहीं है लेकिन क्षमा करें, मणिपुर में दूसरों के दमन, परपीड़न की प्रवृत्तियां मौजूद है और मैतेई समाज की तथाकथित महिला संरक्षकों- मीरा पैबिज- द्वारा इनका उत्साहवर्धन किया जाता है। उन्होंने अतीत में ऐसे रक्त-पिपासु खलनायकों की गिरफ्तारी को इस दलील पर रोका है कि वे मैतेई गौरव की रक्षा कर रहे हैं। और अब ‘मीरा पैबिज’- माशलची महिला संरक्षक चुप हैं! उनका दावा रहा है मानवाधिकारों के लिए मशाल जलाने का।

क्या उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है जब दूसरे समुदाय की महिलाओं को सबसे क्रूर दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ता है? क्या महिलाएं आदिवासी और जातीय वफादारियों से इतनी बंधी हो सकती हैं कि वे बैठकर अपने बेटों और भाइयों को स्त्रीत्व की पवित्रता को तार-तार करते हुए देख सकें? मणिपुर में भी बहुत सारे शिक्षाविद हैं जो इस मुद्दे पर वाक्पटुता से बात कर रहे हैं और उन्होंने खुले तौर पर पक्षपातपूर्ण रुख अपनाया है। क्या वे अब इस बर्बर कृत्य के खिलाफ बोलेंगे जो न केवल ‘कुकी-ज़ो’ महिलाओं के खिलाफ, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है? किसी ने ठीक ही कहा है कि जब कोई दार्शनिक राजनीतिज्ञ बनने का प्रयास करता है, तो वह दार्शनिक नहीं रह जाता।
युद्ध में बलात्कार को एक हथियार माना जाता है। तो क्या मणिपुर में कोई युद्ध चल रहा है, जहां कुकी-ज़ो लोगों को वश में करने और आतंकित करने के लिए बलात्कार को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया है? इन अत्याचारों की उत्पत्ति इस कथा में है कि कुकी-ज़ो लोग मणिपुर के मूल निवासी नहीं हैं, बल्कि बर्मा की चिन पहाड़ियों से आए प्रवासी हैं।

इतिहास हमें बताता है कि कुकी-ज़ो-पाइते लोग बर्मा की चिन पहाड़ियों में रहते थे जब क्षेत्रीयता का विचार अभी तक अज्ञात था और जब आज का उनका इलाका कम ऊबड़-खाबड़ और अधिक उत्पादक लगा तो वे मणिपुर में चले गए। तथ्य यह है कि उन्हें मैतेई राजाओं ने स्वीकार कर लिया और 1820 के दशक में बर्मा के खिलाफ लड़ाई में उनके योद्धा बन गए। बर्मा में भी मैतेई रहते हैं, इसलिए यह कहना कि कुकी-चिन घुसपैठिए हैं जिन्हें अब उनके घरों और चूल्हों से बाहर निकालने की जरूरत है, न केवल किसी भी सूरत में काबिले-बर्दाश्त नहीं है, बल्कि यह इतिहास को फिर से लिखने जैसा है, जो जोखिम भरा है।

सोशल मीडिया पर बातचीत में अंतर्निहित क्रूरताएं; लोकप्रिय मैतेई गायक ताप्ता द्वारा रचित गीत, जो खुले तौर पर कुकी के नरसंहार का आह्वान करता है और जिसके खिलाफ 13 जुलाई को शत्रुता, मानहानि और हिंसा को बढ़ावा देने के लिए एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी, सभी एक ही बात की ओर इशारा करते हैं – कुकी-ज़ो के लिए अंतर्निहित नफरत।
ध्यान रखें, तप्ता मैतेई के लिए एक नायक है। यह कुकी के प्रति जन्मजात घृणा है जो इतने समय से निष्क्रिय पड़ी है और जो अब अलग-अलग तरीकों से और विभिन्न चरमपंथी संगठनों द्वारा प्रकट हो रही है, जिनके पास हथियारों की कोई कमी नहीं है। यह पूछना ज़रूरी है कि हथियार कहां से आ रहे हैं! ताजा वीडियो का मामला, जिसने भारत और दुनिया भर में महिलाओं और पुरुषों के एक बड़े वर्ग के वजूद को झकझोर दिया है और जो अब कुकी-ज़ो समुदाय के साथ एकजुटता में खड़े हैं, केवल एक निंदा में समाप्त नहीं होना चाहिए। विवेक की इन आवाज़ों को क्षेत्र में जातीय-केंद्रित संघर्षों और दुर्लभ संसाधनों, विशेष रूप से भूमि की लड़ाई में अंतर्निहित संरचनात्मक हिंसा के ट्रिगर्स को खत्म करने पर काम करना चाहिए।आज मणिपुर को शीर्ष पर एक प्रबुद्ध व्यावहारिक व्यक्ति की जरूरत है, न कि एक ऐसे मुख्यमंत्री की जो खुले तौर पर पक्षपाती राजनीतिज्ञ है और जो मणिपुर को एक विफल राज्य में बदलते हुए देख रहा है। एक राज्य, जहां कानून का शासन खत्म हो गया है और वह केवल एक समुदाय (मैतेई ) के साथ खड़ा है। कुकी-ज़ो लोग मणिपुर की पहाड़ियों के निवासी हैं और उनके खिलाफ कोई भी उत्पीड़न तथ्यों को नहीं बदल सकता है।


अचानक के इस संघर्ष में वे शायद अब लड़ने में सक्षम नहीं होंगे। लेकिन आज के पीड़ित कल के उत्पीड़क हो सकते हैं। मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक हमें यही बताते हैं। भारत के उत्तर पूर्व में आदिवासी सुन्न मनस्थिति में हैं; वे स्तब्ध हैं, प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे, लेकिन वे किसी बिंदु पर प्रतिक्रिया देंगे और यह कुछ ऐसा है, जिससे भारतीय राज्य को दो-चार होना पड़ेगा, संघर्ष करना पड़ सकता है ।

याद रखें यह एक संघर्ष क्षेत्र रहा है। भारत सरकार के साथ कई समूह अपनी गतिविधियों के निलंबन के समझौते के तहत रुके हैं। यदि ये समूह भूमिगत हो जाते हैं और फिर से राज्य से लड़ते हैं तो यह देश के हितों के विरुद्ध होगा।

India Today से साभार। अनुवाद: स्त्रीकाल डेस्क

परिवारो में असमानता

इस आलेख में प्रज्ञा मेश्राम बेहद छोटी और सामान्य सी दिखती घटनाओं के जरिये समाज में सहज हो चुकी स्त्री-पुरुष असमानता को स्पष्ट कर रही हैं:

यू तो भारतीय परिवार व्यवस्था के गुणगान गाये जाते हैं। कहा यह जाता है कि हमारी संस्कृति और संस्कारो की वजह से भारतीय परिवार व्यवस्था टिकी हुई है। यह कुछ मायनो में सही है।क्योकि भारतीय परिवार व्यवस्था मे लडकियों को अलग संस्कार और लडको को अलग संस्कार दिये जाते है। लडकी को खाना बनाना आना ही चाहिये और लडको को खेलकूद मे आगे बढने मे । पूरा घर लडके के करिअर की चिंता करता है। लडकी के देखभाल उसके व्यक्तिमत्व को सवारने मे किसी को ज्यादा रुचि नहीं होती है। लडकियों को थोडा बहुत पढाया भी इसलिए जाता है ताकी अच्छा लडका घर परिवार मिले । लडकी की जिम्मेदारी शादी तक ही समझी जाती है। कई बार लड़कियां इस प्रक्रिया में पढ़ लेती हैं। अच्छी डिग्रियां ले लेती हैं।

फिर शादी के बाद लडकी की जिंदगी जैसे गीता से सीता बना दी जाती है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वो सभी घरवालों के लिए नास्ता बनाये । बेचारी लडकी रात को इसी चिंता में सोती है की सुबह को नास्ते मे क्या बनाये ? अगर इडली डोसा बनाना है तो एक दिन पहले लिए ना बनाये।बेचारी लडकी रात कोइ सी चिंता में सोती है की सुबह को नाश्ते मे क्या बनाये ?अगर इडली डोसा बनाना है तो एक दिन पहले सुबह उसे दाल चावल़ भिगो के रखना पडता है और रात को पीस कर रखना पडता है। ढोकला, दोसा इडली के साथ कौन सी चटनी बनानी है उसकी साम्रगी घर पर लाके रखनी पडती है । साथ मे सांबर छोले भटूरे बनाने है तो रात को ही छोले भिगा कर मसाला पीस कर रखना पडता है ताकि सुबह जल्दी से नास्ता तैयार हो जाये। अब आप बोलेंगे पोहा बनाओ जल्दी हो जाता है लेकिन रोज रोज पोहा कौन खाता है भला ?

तो आपने देखा जो लडकी अपने सौहर जितना ही पढी लिखी थी, लडके जैसे ही होस्टेल मे या बाहार जाकर पढी थी, शादी हो तेही उससे अपेक्षा बदल गई जबकी लडके के साथ ऐसा कुछ बदलाव नही हुआ उल्टा उसके हाथ में टिफीन, टावल, मोबाईल, शर्ट , पॅन्ट साथ मे नास्ता खाना पानी देने वाली आ गई आप को लगेगा इसमे क्या बडी बात है। सभी करते आ रहे है। परंपरा है। इतना औरते करती ही हैं। क्या आपको इसके पिछे छिपी हिंसा नजर नही आ रही । लडकी का शोषण नही दिख रहा।एक ही जेंडर को क्यों करना है ये सब? कहाँ है समानता?

साथ में खाना खाना-
हम देखते है कि संयुक्त परिवार पद्धति में साथ में खाना खाने पर बहुत जोर दिया जाता है । कहा जाता है इससे परिवार में प्यार बढता है। पर क्या आपने गौर किया अगर प्रगतिशील घरो में भी महिला पुरूष साथ में खाना खा भी ले तो परोसता कौन है ?औरत । खाना बनाया किसने ? और कुछ कम ज्यादा लगा तो डायनिंग रूम से दौडकर किचन में किसको जाना है -नमक कम है तो औरत दौड लागाएगी, सलाद की फरमाईश हुई तो औरत बनाएगी । यहाँ पर कुछ पुरुष आकर बोलेंगे की हम भी खाना बनाते है । भाई महीने मे एक बार खाना बनाने मे और दिन में तीन बार खाना बनाने का मुकाबला क्या है?

बातचीत बंद-
घर में अगर कहा सुनी हो जाती है तो, या औरत से कुछ कम ज्यादा हो जाये तो, सीधे पुरूष बातचीतत बंद कर देते हैं- क्योंकि वह तो प्रगतिशील है, मार नही सकता । मारना गुनाह है, ये इनको पता है। या एक-आध बार एक-आध थप्पड लगा भी देते हैं। इसमे कौन सी बडी बात रहती है उनके लिए। अगर लडका बहू को मार भी रहा है यह पता भी चले तो वही संयुक्त परिवार पद्धति के घर के सद्स्य उनके बीच नही आयेंगे। उनके अनुसार ये दोनो के आपस का मामला है कहेंगे। इस बीच घरवाले बातचीत बंद कर देते है। लडकी को ही इग्नोर करते है । उसी की गलती निकालते है। ‘‘चुप्प रहना था, उस समय इसने बोलना नही चाहिए था’’। ‘‘इसने आवाज उॅंची करके बात नही करनी चाहिए थी’’। ‘‘मायके नही जाना चाहिए था’’। ‘‘सहेलियों संग जाना नही चाहिए था’’। ‘‘घर आने में देरी नही करनी चाहिए थी’’। ‘‘महंगी साडी नहीं खरीदनी चाहिए थी’’। ‘‘बाहर खाने की मांग नही करनी चाहिए थी’’। ‘‘वही जोर से हसना नही चाहिए था’’। ‘‘ऐसे कपडे नही पहनने चाहिए थे’’। ‘‘घरवालों की सेवा करेगी तो क्या मर जाएगी’’। ‘‘हमारे जमाने मे तो क्या-क्या नही करते थे’’। ‘‘ससुरालवालो तक का मारना पीटना सह लेते पर उफ्फ तक नही करते थे।” ‘‘आजकल की लड़कियां एक थप्पड नही सह सकती’’। ‘‘इनके माँ बाप कुछ संस्कार ही नही दिये लडकी को’’। ‘‘इतना पढाने से अच्छा होता घर के काम काज सिखाते लडकी को तो आज ऐसे दिन न देखने पडते’’।

छिपी हिंसा :
रात को पति का मुंह मोड़ कर सोता है, या किसी-किसी का मॅरीटल रेप होता है। तो कोई कोई कपल महीनो तक संबंध नही बनाते हैं।यह भी तो हिंसा है।अगर शादी के बाद लडकी की इच्छा होने के बावजूद उसको नौकरी या व्यवसाय नही करने दिया जाता, यह भी हिंसा ही है। वह लडकी रात-रात भर को जागकर दिनरात एक करती है। पढाई करती है और फिर किसी दिन उसकी शादी होने के कारण उसके नौकरी करने पर रोक लगा दी जाती है , यह भी तो छिपी हिंसा ही है।

दोहरा बोझ
अगर किसी घरमें नौकरी या व्यवसाय करने भी दिया जाता है।तो घर की पूरी जिम्मेदारी संभालकर नौकरी/व्ययसाय करने की अपेक्षा की जाती है। ‘‘करना है तो कर, नही तो छोड दे’’। हम ने तो पहले ही बोला था नही करना। अब ज्यादा काम होते हैं। तो हम क्या करे’’। ‘‘जबसे नौकरी करने लगी है मेरे बेटे की तरफ तो ध्यान ही नही इसका, अरे मेरे बेटे का नही कम से कम अपने बच्चों का खयाल करना चाहिए’’।तो मुझे जानना है कितने प्रतिशत पुरूष घर के काम करके नौकरी करने जाते है ? और कितने परसेंट पुरूष आफिस छुटते ही घर की ओर आते है? ‘हिरणी’ की तरह? काम से लौटते ही काम पर लग जाते है? फिर औरत पर ही क्यों है ये डबलबर्डन? इसमें औरत को मानसिक और शारीरिक हालत कमजोर होने की संभावना होती है।

नाम बदलना-
शादी के बाद कुछ लड़कियों के नाम बदले जाते हैं। कारण दिया जाता है हमारे घराने मे फलाने फलाने अक्षर की बहुएं घर के लिए सफल साबित हुई है । हमारे घर में यह नाम पहले से है । इसका भी यही नाम, उसका भी वही नाम, इसलिए।तो इस तरह के ढेरों कारण बताये जाते है।शादी के बाद पुरूष के नाम बदलते है ये सुना है कभी आपने?

सरनेम बदलना-

शादी के बाद तुरंत लड़की अपने पति की सरनेम की पूछ जोड देती है। अपना नाम बताते हुए अपना सरनेम पुरी तरह से बाद में महत्त्वपूर्ण कागजों पर भी बदल ही देती है। शादी के बाद लडकी का सरनेम बदलने के रिवाज का इतना सामान्यी करण हुआ है कि, यह पढते वक्त भी पाठकों को लगेगा यह क्या बात है, यह तो सदियों से चलता आ रहा है। अगर शादी के बाद लडके का नाम नही बदलता, तो सिर्फ लडकी का नाम ही सदियों से क्यों बदला जा रहा है?

कन्यादान-
आज भी लडकी को दान में दिया जाता है। यह दान बडी धूम धाम से हजारों लोगो के सामने दिया जाता है।कन्यादान प्रथा बंद होना जरूरी है । क्यों देना है दान ?क्या बेटादान सुना है कभी आपने?

शादी की भिन्न जिम्मेदारी-
शादी के बाद शादीसुदा दिखने की जिम्मेदारी भी औरतो पर ही है। वह शादी कर चुकी कि नहीं, यह बिन बताये समझने के लिऐ मंगलसूत्र, बिछुये पहना दिए जाते हैं और मांग मे सिंदुरभर दिया जाता है। जबकि शादी के बाद पुरूष की शादी हुई है या नही हुई है यह जानने के लिए उसके शरीर पर कोई निशानी नही लादी जाती है । न वह मंगलसूत्र पहनता है, वो मांग में सिंदुर भरता है, न वह बिछुये पहनता है।यह सब परंपरा औरतो के सिर परही मढी जाती है ।

व्रत-
करवाचौथ जैसे व्रत, छठ पूजा जैसे तमाम व्रत औरतो को ही करने पडते हैं। जबकी त्योहार मे दोहरा श्रम औरतो को करना पडता है और उपर से भूखा भी रहना पडता है ।

स्थानांतरण-
अ) घर और अपनो को छोडना-
भारतीय परिवार व्यवस्थामें शादी के बाद लडकी को ही अपना घर छोडना पडता है।उसके अपने घर छोडने पडते है।एक दो मामले मे ही लडका घरजमाई बनकर आता है। घर जमाई बनना भी समाज की नजर मे निचलेस्तर का समझा जाता है । इसमें वो सम्मान नही दिया जाता जो ‘घरबहू’बनाने मे दिया जाता है । घरजमाई भी घरबहू की तरह काम नही करते। इसमे उनको विशेषाधिकार मिल जाते हैं।

ब) शादी करते समय ही लडकी हर तरह से कमजोर देखी जाती है। लडके से कम पढी, लडके से कम हाईट की, लडके से कम कमाने वाली, लडके से कमजोर आर्थिक स्थिति की, ताकि वो शादी के बाद भी दबी हुई रहे, जो घर की राजनीति में सत्ताधारी है उसकी गुलाम बनकर रहे। शादी के बाद वह अपना मायका छोडकर लडके के घर रहने आती है।यह उसका पहला स्थानांतरण होता है। बाद में लडका जहाँ-जहाँ जाब करेगा उसके पीछे पीछे उसका भी सिर्फ घर संभालने के लिए स्थानांतरण होता है। सरकारी नौकरी वाला पति हो, तो जहाँपति का ट्रान्सफर हुआ, उसके पीछे चली जाती है।उसका करिअर, उसके सपने, इनका मोल बहुत ही कम है।

क) बिदाई-
अगर जेंडर इक्वालीटी के हिसाब से देखा जाये तो एक ही जेंडर की बिदाई प्रथा पर रोक लगानी चाहिए।विदेशों की तरह दोनो की बिदाई उनके अपने घर में होनी चाहिए।

स) वेशभूषा में परिवर्तन-
शादी के वक्त से ही लडकी की वेशभूषा में परिवर्तन अपेक्षित रहता है। टी शर्ट, लोअरमें घुमनेवाली लडकी साडी और भारी भरकम लहंगे में शादी करती है।शादी मे पारंपारिक कपडे फैशन के नाम पर पहना दिये जाते है । क्योंकि ये समाज स्वीकृत होते है । शादी के बाद लडकी जो कपडे पहनती है उसको समाज की स्वीकृति होना अति आवश्यक समझा जाता है। ज्यादा से ज्यादा सलवार पहनने की सहुलि यत कुछ परिवारों में मिल जाती है। शादी के बाद सिर्फ साडी ही नहीं पहनना होता है, साड़ी का पल्लू ओढकर घर के काम करना पडता है । यह हिंसा बुजुर्ग के मानसम्मान के नाम पर होती है। मानसम्मान लडकी को ही क्यो करना है? लडका शादी के बाद एक आध टावल, दुपट्टा ओढकर अपने ससुराल वालों का मानसन्मान क्यो नही करता? यह अपेक्षा एक ही जेंडर से क्यो की जाती है?

बच्चे किसके पास रहते है?
देखा जाता है कि, जहा स्त्री और पुरूष दोनो नौकरी करने वाले होतो हैं, घर में वापस आने के बाद घर का दोहरा बोझ औरत ही उठाती है। साथ-साथ यह भी देखा जाता है कि दोनो अलग-अलग जगह पर नौकरी पर हो तो बच्चे हमेशा नौकरी करनेवाले औरत के साथ ही रहते हैं, अगर बच्चे दूध पीते नही हों, फिर भी। यह भी बडी असमानता भारतीय परिवारो मे देखी जाती है।

इस तरह से हम देखते है अनेक घरों में विविध तरह की असमानतायें देखी जा सकती है अगर हम जागरूक होकर जेंडर-समानता की दृष्टि से देखना चाहें तो।

सामाजिक न्याय की विरासत को बचाओ यारो

एक इंसान की जिंदगी के कई पहलू हो सकते हैं– इसमें आम पहलू तो सबको पता होता है लेकिन कुछ अनछुए पहलू ऐसे होते हैं जो कभी आम नहीं हुए होते। एक बिजनेसमैन की जिंदगी के अलग पहलू हो सकते हैं तो एक कलाकार के अलग पहलू। किसी के पास सिर्फ एक ही पहलू हो सकता है तो किसी के पास कई पहलू। लेकिन एक नेता की जिंदगी के दो पहलू बहुत खास होते हैं। एक तो यह कि वह सार्वजानिक जीवन में क्या कर रहा है और दूसरा यह कि उसकी निजी जिंदगी कैसी है!

जब एक इंसान अपनी जिंदगी को सामाजिक न्याय को स्थापित करने के लिए आंदोलन की राह पकड़कर राजनीति की मंजिल तय करता है तो उसकी निजी जिंदगी कहीं गुम सी हो जाती है और उसकी राजनीतिक जिंदगी उसके व्यक्तित्व पर हावी हो जाती है। आगे चलकर यही राजनीतिक जिंदगी उसकी पहचान बनती है। इस बात को अंग्रेजी के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक फ्रैंक हुजूर ने बड़ी ही शिद्दत से महसूस किया और पाया कि सार्वजनिक जीवन जी रहे एक व्यक्ति की राजनीतिक जीवनी बहुत सारे अनछुए पहलू भी सामने आ सकते हैं। इसी सिलसिले में फ्रैंक हुजूर ने ‘नेताजी’ के नाम से मशहूर राजनेता धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक जीवनी लिखने की परिकल्पना को साकार किया। इसके लिए उन्हें नेताजी से जुड़े बेशुमार लोगों से मिलना पड़ा और उनसे उन अनछुए पहलुओं पर बात करनी पड़ी जिनके बारे में भारत का राजनीतिक तबका भी ज्यादा कुछ नहीं जानता। जब यह किताब तैयार हुई तो फ्रैंक ने इसका शीर्षक रखा– ‘सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव’। यह किताब मूलत: अंग्रेजी में है जिसका अनुवाद किया है नीरज कुमार ने।

किताब– सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव

लेखक– फ्रैंक हुजूर

समीक्षक– वसीम अकरम

मूल्य– 499

हिंद युग्म प्रकाशन से छपी इस किताब की प्रस्तावना लिखने वाले अमेरिका के अटलांटा में स्थित सीएनएन के वरिष्ठ पत्रकार रहे मरहूम जिम सदरलैंड कहते हैं– ‘मेरे हिसाब से यही सही वक्त है जब सोशलिस्ट (एक समाजवादी) जैसी किताब लिखी जा रही है। कैसे देश के पिछड़े इलाके में भाषा पढ़ाने वाला एक मास्टर ऐसी ताकत बन जाता है और जो कामगारों की बेहतरी, उनकी हालत सुधारने और उनकी सुरक्षा के लिए कदम उठाकर दुनिया के सामने अपने राज्य को एक उदाहरण के तौर पर पेश करता है। हम उनके उदाहरण से सबक ले सकते हैं और इसे दुनिया के तमाम देशों में पिछड़े समाज की बेहतरी के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।’

जिस सदरलैंड की यह बात निश्चित रूप से एक राजनीतिक सीख की तरह है। क्योंकि आज का राजनीतिक माहौल जिस तरह से कुत्सित हो गया है और सामाजिक समरसता का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो गया है, देश में सांप्रदायिकता अपने चरम पर है, ऐसे में नेताजी की राजनीतिक जिंदगी इस समाज का मार्गदर्शन कर सकती है। आज केंद्र में विपक्ष जैसी किसी ताकत की कल्पना करना भी नामुमकिन नजर आ रहा है। लेकिन नेताजी कहते थे कि विपक्ष ही लोकतंत्र का दिल होता है। यानी उनका मानना था कि बिना विपक्ष के लोकतंत्र एक तानाशाही प्रवृत्ति अख्तियार कर लेता है जो आम जनता के लिए बहुत घातक सिद्ध होता है।

इसका दूसरा पहलू यह भी है कि जो नेताजी हमेशा हिंदी की वकालत करते रहे (नेताजी अंग्रेजी के खिलाफ नहीं थे) उनकी जीवनी जब फ्रैंक हुजूर ने लिखी तो अमेरिकी बड़ी अंग्रेजी मीडिया कंपनी सीएनएन के वरिष्ठ पत्रकार जिम सदरलैंड ने इस किताब की प्रस्तावना लिखी। इससे यह बात भी साबित होती है कि नेताजी की शख्सियत दुनिया में सराही जा रही है और लोग उनकी राजनीति को भारत के लिए बेहद जरूरी मान रहे हैं। तभी तो ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा में रहने वाले विवेक ग्लेनडेनिंग उमराव मानते हैं कि– ‘जनता और मीडिया द्वारा जिस तरह रूस में लेनिन का मान-सम्मान किया जाता है, ठीक उसी तरह मुलायम सिंह को भी भारत में जनता और मीडिया द्वारा मान-सम्मान दिया जाना चाहिए था।’ जाहिर है, समाजवाद की राह पर चलकर ही जातिवादी क्रूरता को खत्म किया जा सकता है क्योंकि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था के कारण ही योग्यता और प्रतिभा को अब तक अच्छी तरह से सहेजा ही नहीं जा सका है।

क्या ही अफसोस की बात है कि नेताजी के इस दुनिया से चले जाने के बाद उनकी राजनीतिक जीवनी हमारे बीच आई है। यह तो समय का चक्र है। समय का चक्र तो नेताजी का भी था जो गांव से शुरू होकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से होते हुए देश का रक्षा मंत्री बनने तक पहुंचा। समाजवादी आंदोलन के प्रखर योद्धा ‘धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव’ का इस दुनिया से जाना देशभर के समाजवादियों के लिए एक बड़े दुख का दिन था जब 10 अक्टूबर 2022 की सुबह 82 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ। हम सब उन्हें नेताजी के नाम से भी जानते हैं। भारत की राजनीति में एक बड़ी ही लंबी पारी खेलने वाले नेताजी कुल 9 बार विधायक रहे, 7 बार सांसद रहे, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के 3 बार उत्तर मुख्यमंत्री रहे और एक बार वो देश के रक्षामंत्री भी रहे। नाम से मुलायम मगर अपने राजनीतिक फैसलों के लिए उतने ही सख्त नेताजी ने कभी भी विपरीत हालात से समझौता नहीं किया। यही अदा उन्हें भारतीय राजनीति में एक कद्दावर सख्सियत की पहचान दिलाती है। हर हाल में गरीबों, पिछड़ों और वंचितों की लड़ाई लड़ने की पहचान। और इसी पहचान को अपनी लेखनी में शामिल करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और लेखक फ्रैंक हुजूर ने नेताजी की राजनीतिक जीवनी लिखने की ठानी जो अब ‘सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव’ के रूप में आपके सामने है। इस किताब के छपते ही ढाई-तीन महीने में ही इसके पहले एडिशन का बिक जाना इस बात की गवाही देता है कि नेताजी को बड़ी शिद्दत से चाहनेवाले लोग हैं।

बिहार के बक्सर में जन्मे फ्रैंक हुजूर मूलतः अंग्रेजी के लेखक और जर्नलिस्ट हैं। राँची के सेंट जेवियर्स, और दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज से शिक्षा प्राप्त फ्रैंक अपनी इंगलिश पोएट्री और ड्रामा (हिटलर इन लव विथ मैडोना) से चर्चित हुए। इसके बाद इन्होंने नाटक ‘ब्लड इज बर्निंग’ और ‘स्टाइल है लालू की जिंदगी’ लिखा। मात्र बीस वर्ष की उम्र में अंग्रेजी मैगजीन ‘यूटोपिया’ के संपादक बनने वाले फ्रैंक ने प्रख्यात क्रिकेटर और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की राजनीतिक जीवनी ‘इमरान वर्सेस इमरान: दी अनटोल्ड स्टोरी’ भी लिखी है। मुलायम सिंह की राजनीतिक जीवनी ‘सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव’ लिखने के बाद फ्रैंक अपने पहले नॉवेल पर काम कर रहे हैं। फ्रैंक का यह शानदार लेखकीय सफर यह साबित करता है कि उनकी किताबें कितनी गहराई लिए होंगी। ऐसे में देशभर के सुधी पाठकों के लिए ‘सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव’ किताब को पढ़ा जाना बेहद जरूरी हो जाता है।

किसी भी व्यक्ति की जीवनी का आधार उसकी जड़ों में ही निहित होता है। इसलिए राजनीतिक जीवनी को जानने-समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि नेताजी की जड़ें कहां से लगती हैं और किस तरह वह राजनीति में आकर एक बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बने। नेताजी का जन्म 22 नवंबर 1939 को उत्तर प्रदेश के सैफई गांव में एक यादव परिवार में हुआ था जो कि एक किसान परिवार था। जैसे-तैसे पढ़ाई पूरी करके वो अध्यापक तो बन गए लेकिन शरीर से इस पहलवान का मन पढ़ाने में नहीं लगा और राम मनोहर लोहिया के विचारों के प्रभाव में आकर महज 21 साल की छोटी उम्र में मुलायम ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत कर दी। हालांकि राजनीति में कदम रखने के साथ ढेर सारी मुश्किलें उनकी जिंदगी पर हावी होती चली गईं लेकिन उन्होंने कभी पीछे पलटने के बारे में नहीं सोचा। हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे और 51 की उम्र में पहली बार 1989 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए और आखिरी सांस तक अपनी जन्मभूमि को नहीं छोड़ा। लोगों को जरा-सी प्रसिद्धि क्या मिलती है वो सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ने लगते हैं। लेकिन मुलायम ऐसे राजनेता नहीं थे, बल्कि वो तो जननायक थे और किसानों, पिछड़ों और गरीबों की आवाज बुलंद करते रहते थे। इसीलिए पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने मुलायम को ‘नन्हे नेपोलियन’ के खिताब से नवाजा था।

नेताजी के समकक्षों ने इस किताब में दर्ज अपने साक्षात्कारों में यह बताया है कि समाजवाद की सशक्त आवाज और देशहित के लिए शानदार नीतियां बनाने वाले नेताजी की जिंदगी राजनीतिक आदर्शों की एक बहुत बड़ी मीनार है जहां से सांप्रदायिक सौहार्द से ओतप्रोत एक खूबसूरत हिंदुस्तान दिखाई देता है। भारतीय राजनीति के अक्षयकोष नेताजी समाजवादी सोच एवं निडर शख्सीयत थे जिसने गांव-समाज की राजनीति को सत्ता की कुर्सी पर ला बिठाया। लोहिया के सिपाही नेताजी के दिल में हमेशा गांव, खेती-किसानी, हिंदी भाषा को लेकर मुहब्बत बनी रही और यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में नेताजी के साहस के चलते ही आज सामाजिक रूप से पिछड़े और गरीबों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिखाई दे रहा है। लेकिन इस प्रतिनिधित्व को जिस तरह से खत्म करने की साजिश चल रही है, उसमें फिर से नेताजी की जिंदगी प्रासंगिक बनके उभरती है। यह किताब इसी बात को जगह-जगह रेखांकित करती है कि आज देश में नेताजी जैसी शख्सियत की कितनी जरूरत है।

इस किताब में यह पड़ताल दर्ज है कि समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव किस तरह से लगभग पांच दशक से ज्यादा समय तक देश की राजनीति में सक्रिय रहे। उनकी पहचान एक राष्ट्रीय नेता की भले रही, लेकिन उन्होंने कभी अपनी जमीन और अपने राज्य उत्तर प्रदेश को नहीं छोड़ा और हमेशा उसे उत्तम प्रदेश बनाने के बारे में सोचते रहे, तत्पर रहे। भले ही वह सत्ता में रहे हों या न रहे हों। इस सियासी मुहिम में वो एक हद तक कामयाब भी हुए लेकिन राजनीतिक जिंदगी में कुछ खास करने के मौके भी कुछ साल के लिए ही आते हैं।

इस राजनीतिक जीवनी को पढ़ते हुए नेताजी के विचारों और उनके चिंतन को समझा जा सकता है। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को मजबूत करने की उनकी सोच इतनी गहरी थी कि इसके लिए वो राज्य के किसी भी कोने में अपने कार्यकर्ताओं से मिलने पहुंच जाते थे और उनको संबल प्रदान करते थे। इस बारे में नेताजी के चचेरे भाई रामगोपाल यादव बताते हैं कि– ‘उत्तर प्रदेश में ऐसी कोई तहसील नहीं जहां के गांवों में नेताजी न गए हों। लोगों से मिलना उन्हें अच्छा लगता था क्योंकि लोगों से मिलकर ही उनका दुख-दर्द समझा जा सकता है।’ शायद इसीलिए उन्हें धरतीपुत्र कहा जाता है।

कुल 39 अध्यायों वाली इस किताब में कुछ अध्याय तो इतने प्रासंगिक हैं कि उन्हें देश-दुनिया के विश्वविद्यालयों के राजनीतिक विभागों में पढ़ाए जाने की जरूरत है। उन अध्यायों में– नन्हा समाजवादी, शहनाई की गूँज, सियासत भी रोमांस भी, सियासत और जंगबाजी, समाजवाद की राह, किसानों का मसीहा, क्रांति रथ का घूमता पहिया, गुलाब क्रांति, मंडल और कमंडल की आग, मंदिर या मस्जिद, जिसका जलवा कायम है उसका नाम मुलायम है, धर्मनिरपेक्षता का रक्षा कवच, कार्यकर्ताओं के अभिभावक, जमीन से निकला मजबूत समाजवादी, और मुलायम बनाम लेनिन आदि प्रमुख हैं। इन अध्यायों के शीर्षक से यह साफ जाहिर है कि नेताजी की राजनीतिक राह बिल्कुल भी आसान नहीं रही होगी। और जाहिर है, मुश्किल राहें ही तो आगे आने वाले पथिकों के लिए बेहतरीन मार्गदर्शक बनती हैं। इसलिए यह किताब राजनीति के विद्यार्थियों के लिए, मीडिया के क्षेत्र में राजनीतिक अध्ययनों के लिए और शोध छात्रों के लिए किसी मार्गदर्शक से कम नहीं है।

लोहिया की राजनीति के ब्राइट स्कॉलर-स्टूडेंट प्रोफेसर आनंद कुमार जेएनयू से समाजशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं और वह आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक हैं। प्रोफेसर आनंद कुमार बताते हैं– ‘अगर देश भर में किसी ने लोहिया को जिंदा रखा है तो वो मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश में जिंदा रखा है। मुलायम के कई अच्छे कामों में यह सबसे बड़ा कामयाब काम है। बहुत हिम्मत की बात थी। अपनी मजबूरियों के बीच में नेताजी ने ऐसा कर दिखाया। मुलायम को राम मनोहर लोहिया का राजनीतिक वारिस भी कह सकते हैं क्योंकि यदि किसी ने लोहिया के समाजवाद को सत्ता तक पहुँचाया है तो वो मुलायम सिंह ही हैं।’ यह सच बात है– आज हिंदुस्तान में अगर समाजवाद कुछ बचा हुआ है तो वह मुलायम की ही देन है। यह किताब इस बात की ओर इशारा भी करती है कि जिस तरह आज सांप्रदायिकता का माहौल बना हुआ है उसमें मुलायम का समाजवाद कितना जरूरी हो जाता है। लोहिया के समाजवाद को तो मुलायम आगे ले आए, लेकिन क्या ऐसा कोई नेता है जो मुलायम की विरासत यानी उनके समाजवाद को आगे लेकर जाए ताकि सांप्रदायिकता को कड़ी टक्कर देकर कुत्सित राजनीति को सामाजिक न्याय के हथौड़े से बार-बार ‘ऑर्डर’ कहकर किसी कोने में बिठाया जा सके। ऐसा हुआ तभी देश में समरसता का समाज स्थापित हो पाएगा।

मुलायम की राजनीतिक शख्सियत के अनछुए पहलुओं को सामने लाने के लिए लेखक फ्रैंक हुजूर ने एक से बढ़कर एक प्रतिष्ठित और सम्मानित शिक्षाविदों, सांसदों एवं विधायकों के साथ नेताजी के साथ काम कर चुके उनके कार्यकर्ताओं के दिल की बातों को जानने की जो कोशिश इस किताब में की है, वह बहुत ही बड़े कौशल का काम है। भारतीय राजनीति का आदर्श चेहरा बन चुके नेताजी की महानता के पीछे उनके जो छुपे हुए संघर्ष हैं, उनकी जो मेहनत है, उनका जो विजन है, उनकी जो सकारात्मकता है, उन सबको बाहर लाकर फ्रैंक ने शब्दों का जो गुच्छा तैयार किया है, वह बहुत ही प्रेरणादायी है। इसके साथ ही इस किताब में मुलायम की कुछ तस्वीरें भी हैं जिनमें उनके साथ कुछ राजनीतिक तो कुछ गैर-राजनीतिक लोग मौजूद हैं। यह देखना भी अपने आप में दिलचस्प है और इस नतीजे पर पहुंचना भी है कि नेताजी ने अपने मूल्यों से समझौता न करते हुए भी किस तरह प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के लोगों के साथ रिश्ते निभाते आ रहे थे। यह कोई राजनीति का विरला ही होगा जो अपने खिलाफ खड़े लोगों की भी इज्जत करता हो।

पेड पीरियड लीव के लिए अभियान गीत हुआ रिलीज

नई दिल्ली, 28 मई, विश्व माहवारी-स्वच्छता दिवस पर बिहार निवास में पेड पीरियड लीव (सवैतनिक माहवारी अवकाश) पर एक विचार गोष्ठी हुई एवं इस अवसर पर पेड पीरियड लीव की मांग को प्रोमोट करने के लिए एक गाने को भी रिलीज किया गया। ‘पेड पीरियड लीव’ गाने का लेखक और उसके फिल्मांकन का निदेशक सुमन्त यादव हैं तथा गायक होमेन्द्र भारती और दीक्षा धनगर हैं। इसे मयारू स्टूडियो ने प्रोड्यूस किया है। इसे 28 मई को ब्रॉडकास्ट रिलीज खबर लोक चैनल ने किया।

 

गौरतलब है कि बिहार पहला राज्य है जहां 1992 में दो दिवसीय सवैतनिक पीरियड अवकाश घोषित की गयी थी। महिला संगठनों की मांग पर सरकारी महिलाकर्मियों के लिए महीने में दो दिन के विशेष अवकाश की व्यवस्था तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने की थी।

ओडिशा के संबलपुर की रहने वाली कानून की पढ़ाई कर चुकी रंजीता प्रियदर्शिनी ने अपनी नौकरी छोड़कर पेड पीरियड अभियान शुरू किया है। रंजीता ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, दिल्‍ली, राजस्‍थान, बिहार, मध्‍य प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, पुडुचेरी व झारखंड समेत अन्य कई राज्‍यों के नेताओं से मुलाकात कर पेड पीरियड लीव लागू करवाने के लिए ज्ञापन दे चुकी है।कामकाजी महिलाओं को पेड पीरियड लीव की सुविधा मुहैया करवाने के लिए वह केंद्रीय मंत्रियों से भी मिलती रही हैं।

रंजीता के अभियान ने कई निजी कंपनियों में पेड पीरियड लीव लागू कराया है। रंजीता लंबे दौर तक कॉरपोरेट में एचआर में काम कर चुकी हैं और अपने काम के लिए नेशनल सम्मानों से सम्मानित भी हैं।

उनकी पहल पर बिहार निवास में गोष्ठी का आयोजन किया गया।
मुख्य अतिथि थे विधायक ललन कुमार, जिन्होंने बिहार विधानसभा में बजट सत्र में यह मांग उठाई कि निजी क्षेत्रों में भी यह छुट्टी मिले।

हालांकि जिस दिन विधायक ने यह मांग की उसके दूसरे दिन ही बिहार में ठेके पर कार्यरत महिला कर्मियों को पेड माहवारी लीव की सुविधा से वंचित कर दिया गया था। जिसका व्यापक विरोध हुआ।

इस पृष्ठभूमि में बिहार निवास में हुई गोष्ठी बेहद महत्वपूर्ण है। पेड पीरियड लीव के लिए गाने को रिलीज करने के बाद इस पर इसी नाम से फ़िल्म बनाने की घोषणा भी पेड पीरियड गाने के निदेशक सुमन्त यादव ने किया।

इस अवसर पर स्त्रीकाल के सम्पादक संजीव चंदन , छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ बोर्ड मेम्बर, डा. आशा, सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अनिता महापात्रा आदि वक्ताओं ने पेड लीव की आवश्यकता पर बात की और इस अभियान को समर्थन दिया।

वक्ताओं ने इस अभियान को एक व्यक्ति के रूप में महिलाओं को स्वीकार किये जाने का एक अभियान और प्रसंग बताया। माहवारी महिला स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है और उनके रिप्रोडक्टिव राइट्स से भी।

रंजीता जुनून और जज्बे व समझदारी से काम पर लगी है। यह गोष्ठी उसी शाम हुई जब भारतीय रिपब्लिक की विदेश मंत्री निर्मला सीतारामन भगवाधारी पंडितों से दूर खड़ी होने के लिए विवश की गयीं-वजह साफ है। स्त्रियां माहवारी के कारण अछूत हैं इन पंडितों के लिए।

रंजीता जहां एक ओर पेड लीव के लिए आर्टिकल 15 के रेफरेंस से राजनीतिक हस्तक्षेप के जरिये पहल चाहती हैं। वे उस देश में बोल रही हैं जहां देश की एक विधानसभा माहवारी की छुट्टी पर बात करने से इसलिए इनकार कर देती है कि ऐसे अपवित्र विषय के लिए विधानसभा नहीं है।

रंजीता प्रियदर्शिनी के अभियान को सपोर्ट करने के लिए चेंज डॉट ओरजी पर उन्हें समर्थन दें।

कार्यक्रम में कई साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, सोशल एक्टिविस्ट शामिल हुए।

रंजीता जल्द बिहार में लालू प्रसाद जी और माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी व अन्य नेताओं से मिलकर अपने अभियान को गति देने वाली हैं।

योनि शुचिता: स्त्री की देह पर पितृसत्ता के नियंत्रण का परिणाम

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स्त्री की देह पर पितृसत्ता के नियंत्रण

देह-स्त्री और पुरुष दोनो की, परिवार, समाज और स्टेट की राजनीति के द्वारा निर्देशित और शासित होती है। स्त्रियों की देह को अधिक राजनीतिकरण का शिकार होना पड़ा है। उनकी यौनिकता पर पितृसत्तात्मक कब्जा और निर्देशन अधिक गहरा है। समाज, राज्य, परिवार, बाजार, सब उसकी निजता और उसकी देह पर उसकी अपनी एजेंसी को खत्म कर अपना प्रभुत्व जमाते हैं।

इस सेंट्रल आयडिया के साथ प्रेस क्लब, नई दिल्ली में 26 मई को देह की वैयक्तिकता और राजनीति पर देर शाम हुई विचार-गोष्ठी में वरिष्ठ स्त्रीवादी लेखिका आशा काचरू की किताब ‘ योनि पवित्रता’ पर बात करते हुए वक्ताओं ने अपनी बात रखी। किताब के विमोचन के बाद लेखिका आशा काचरू ने ‘ देह पर समाज, जाति, धर्म के नियंत्रण और देह शुचिता के कंसेप्ट के कारण महिलाओं पर अतिरिक्त शुचिता और नैतिकता के भार को चिह्नित करते हुए बताया कि योनि पर पवित्रता की जिम्मेवारी थोपने के कारण महिलाओं की दोयम स्थिति बनती है। देह संबंधों के प्रति अजनबियत भी पुरुषों की बलात्कारी कुंठा को बढ़ावा देता है।’ आशा काचरू कश्मीर के अपने शुरुआती जीवन के बाद जर्मनी में अपनी सक्रियता और 9वें दशक से भारत में महिला आंदोलनों के साथ सक्रियता से परिचित कराया। उन्होंने पश्चिम में आज भी भारतीय महिलाओं को एक टाइप्ड नजरिये से देखे जाने को चिह्नित करते हुए कहा कि उन्हें उनकी वास्तविक छवि में देखा जाना जरूरी है, जो वे हैं।

स्त्रीवाद की वैचारिकी में अपने शोधों और हस्तक्षेपों से योगदान कर रहे स्त्रीवादी विमर्शकार विजय झा ने कहा कि ‘ स्त्री की यौनिकता पर पुरुष के नियन्त्रण के लिए फ्रेडरिक ऐंगल्स की अवधारणा से अलग गर्डा लर्नर की अवधारणा रही है। ऐंगल्स ने परिवार, स्टेट और निजी संपत्ति को वजह बतायी है। गर्डा लर्नर निजी संपत्ति की अवधारणा के पहले से ही स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण की ऐतिहासिकता को सामने लाती हैं। विजय झा ने भारतीय स्त्रियों के लिए औपनिवेशिक समझ के जरिये एक खास वर्ग की स्त्रियों की समस्या को सबकी समस्या बना देने को चिह्नित किया- जिसने 19वीं सदी में सती, विधवा विवाह आदि सवर्ण समाज की बीमारियों को भारत के किसान और दलित समाज की स्त्रियों की भी समस्या बता दिया गया था।’

लेखिका और यौनिकता के प्रसंग में साहसिक और रैडिकल स्वर अणुशक्ति सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि लिबिडो कारणों से स्त्रियों की यौनिक क्षमता से पुरुषों की यौनिक क्षमता कमजोर होती है। इसे स्वाभाविक न मानकर पुरुषों के भीतर ताकत के साथ खुद को सिद्ध करने की प्रवृत्ति पैदा हुई-बलात्कारी मानसिकता पैदा हुई, जिसे समाज के विविध स्तरों ने एक राजनीतिक तर्क दे दिया, संरक्षण दे दिया।’ अणुशक्ति ने समलैंगिक विवाह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पक्ष-विपक्ष की चल रही है बहसों के स्त्रीवादी पक्ष पर भी बात की।

स्त्रीकाल के संस्थापक संपादक संजीव चंदन ने कहा कि ‘ देह में प्राकृतिक रूप से जैव वैज्ञानिक स्थितियां ही सिर्फ व्यक्तिगत है-शेष राजनीतिक। जब स्त्री-पुरुष सामाजिक गढ़न हैं तो उनकी यौनिकता भी पूर्ण रूप से एक गढ़न ही है। उन्होंने कहा कि बलात्कारों में जाति और धर्म की सत्ता निहित होती है। लेकिन हर बलात्कार की घटनाओं में सिर्फ धर्म या जाति के अलग होने भर से उन्हें जाति या धर्म आधार के बलात्कार नहीं कहा जा सकता। संजीव ने कहा कि अनौपनिवेशीकरण की कोशिशों में सावधानी जरूरी है, वरना गोलवलकर की विचारधारा के अनुरूप प्राचीन महानता की ग्रंथि में फंसना संभव है। अंग्रेजों ने बेहद जरूरी स्त्रियों दलितों के जरूरी मुद्दों को भी सामने लाया। जैसे कैथरीन मेयो ने मदर इंडिया किताब में अथवा जॉन मिल स्कूल ने।

वक्ताओं ने और अन्य भागीदारों ने जंतर मंतर पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ बैठी महिला पहलवानों के साथ सरकार और समाज के पितृसत्तात्मक रवैये को चिह्नित किया।

भागीदारों में कई लेखक, पत्रकार व संस्कृतिकर्मी शामिल रहे

संचालन करते हुए युवा आलोचक अरुण कुमार ने देह को जाति और धर्म के द्वारा नियंत्रित किये जाने को चिह्नित करते हुए अपनी भूमिका रखी।

टूट रही हैं वर्जनाएं: अनेक रिश्तों में होना आखिरी टैबू

एक ही समय में एक से अधिक लोगों के साथ रोमांटिक प्रेम में होना (पॉलिअमरी ) शायद आखिरी मौजूदा वर्जना है। यहां तक कि विचारों में बहुत खुले व्यक्ति भी तब हिचकते हुए पाए जाते हैं जब प्रेम की एकनिष्ठा को चुनौती दी जाती है।हमारी कहानियों, फिल्मों, गीतों और कविताओं में उस विक्षोह, मिलन, ‘सच्चे प्यार’ के खोने, पाने को सेलिब्रेट किया जाता है जिससे प्रेम में एकनिष्ठा को सामाजिक मुहर प्राप्त होता है,मान्यता मिलती है।

मैं 50 वर्ष की हूं। मैं किसी भी समय दो से चार भागीदारों के साथ सहमति से संबंधों में रही हूं। लेकिन मैंने देखा है कि पॉलिअमरी,अनेक संबंधों के इर्द-गिर्द होने वाली बातचीत अक्सर बेहद असहज होती है और बाज़ वक़्त एकदम घटियास्तर पर उतर जाती है। क्या यह इसलिए है, क्योंकि यह परिवार के उस विचार को खंडित कर देता है जिसके हम अभ्यस्त होते हैं? या इसलिए कि राज्य के लिए अपने नागरिकों को नियंत्रित करना यह असंभव बना देता है? जबकि कोई भी एक माँ के अपने सभी बच्चों को प्यार करने की क्षमता पर सवाल नहीं उठाता है, एक से अधिक लोगों को रोमांटिक और सेक्सुअल प्यार करने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।

 

इस प्यार का क्या नाम दूँ

मुझे जल्दी ही एहसास हो गया था कि मुझमें एक समय में एक से अधिक लोगों से प्यार करने की इच्छा और क्षमता है, जिनमें एक स्थायित्व की उम्मीद भी थी। लेकिन मैं आशंका भय से भर गयी थी। मेरा एक मित्र कौशिक था जिसके साथ मेरी इस बारे में पहली चर्चा तब हुई जब मैं अपने बीसवें साल में थी।

वह खुले तौर पर अनेक संबंधों,बहुप्रेम,में था। उसने मुझे ‘द एथिकल स्लट’पढ़ने की सलाह दी-एकल और जोड़ों के लिए कई, लेकिन नैतिक और भावनात्मक रूप से स्थायी संबंध, बनाने के लिए एक गाइड है यह किताब।वह अमेरिका में रह रहा था और गैर-पारंपरिक परिवारों को जानता था, जिसमें तीन या चार जोड़े शामिल थे, जो रोमांटिक, यौन और बच्चों के पालन-पोषण की जरूरतों को साझा करते थे।

लेकिन बहुत पढ़ने और आत्मीय लोगों के साथ बात करने के बाद मैं सहज हो सकी, अपने होने को स्वीकार किया, और अनेक संबंधों में होने के बारे में बात करने में सहज महसूस करने लगी।

पॉलीअमरी (बहुप्रेम) को परिभाषित करने के अनेक तरीके हैं, क्योंकि ऐसे रिश्ते में अनेक लोग भागीदार होते हैं-अनेक पुरुष अनेक स्त्री, अलग-अलग जेंडर आइडेंटिटी से, हेट्रोसेक्सुअल हो, बायसेक्सुअल हो, होमोसेक्सुअल हो। मैंने सुना है कि पॉलीअमरी (बहुप्रेम) को लोग सिर्फ ‘पॉली’ कहते हैं। इसका मतलब सिर्फ ‘बहुत’ है। मैं पूछती हूं, ‘ इसमें प्यार कहां है?’ मेरे लिए, पॉलीअमरी सभी शामिल लोगों की सहमति से, यौन अंतरंगता के साथ या उसके बिना प्यार के विभिन्न रिश्तों में जीना है ।

पॉलीअमरी (बहुप्रेम) अल्पकालिक या दीर्घकालिक हो सकते हैं, प्राथमिक भागीदार के साथ या उसके बिना, और कभी-कभी विभिन्न भागीदारों के साथ परिवार के वैकल्पिक सर्किल बना सकते हैं। पॉलीअमरी (बहुप्रेम) के लिए मैं सबसे करीबी बांग्ला शब्द ‘बहूमोनोरथ’ कह सकती हूं। इसका अर्थ है ‘कई इच्छाएं’। मुझे वास्तव में यह पसंद है।

 

अनेक भ्रांतियां

कौशिक ने एक बार मुझसे कहा था कि पॉलीअमरी (बहुप्रेम) के बारे में सबसे बड़ी ग़लतफ़हमियों में से एक यह थी कि यह ‘एक कथित सच्चे प्यार’ को पाने में असफलता की प्रतिक्रिया स्वरूप होता है। मुझे उन लोगों की याद आती है जो फुसफुसाते हैं ‘वह समलैंगिक है, क्योंकि उसे कोई पुरुष नहीं मिला है?’

मैं एक से अधिक लोगों से प्यार इसलिए नहीं करती कि ‘सभी ज़रूरतें एक व्यक्ति द्वारा पूरी नहीं की जाती’, या ‘एक व्यक्ति जल्दी ही उबाऊ हो जाता है’।

मैं ऐसा इसलिए करती हूं क्योंकि मेरा दिल सुंदरता, साहस ईमानदारी, दया और करुणा एक से अधिक लोगों में देखता है और उनसे जुड़ने की इच्छा होती है। – यही कुछ वजहें हैं कि कोई भी व्यक्ति एक व्यक्ति के प्यार में पड़ जाता है। मैं सिर्फ यह कहने से इनकार करती हूं कि ‘रुको, फिर से प्रेम में मत पड़ो । आपका ‘एक जीवन, एक प्यार’ का कोटा पूरा हो गया है।’

 

आर ने एक और गलतफहमी की ओर इशारा किया – ‘बहु-प्रेम वाले लोग किसी के भी साथ सोते हैं।‘ पुरुष अक्सर मेरे मेसेज में गंदे अनुरोधों और तस्वीरों के साथ आते हैं। लेकिन जो लोग एक से अधिक व्यक्तियों के साथ सेक्स करना पसंद करते हैं, उनके बारे मेंयह मान लेना कि उनका किसी के भी साथ यौन संबंध हो सकता है, ‘सहमति’ को अप्रासंगिक बना देता है।

इस समाज में अनेक रिश्तों में रहने वाले लोग और एक सेक्स वर्कर, दोनों ही भेदभाव झेलते हैं। प्यार के लिए भी यही सच है। एक बहुप्रेमी व्यक्ति को अक्सर दूसरों को समझाना पड़ता है कि वे उनके प्रति ‘प्यार’ क्यों नहीं महसूस करते हैं। यह परेशान करने वाला मसला हो सकता है, लेकिन यह महत्वपूर्ण है। मैं कभी-कभी बताती हूं कि एक व्यक्ति या कई लोगों से प्यार करना, दोनों समय के साथ व्यवहार में निर्मित एक कंस्ट्रक्ट है।

हमें यह विश्वास दिलाया जाता है कि एकल प्रेम स्वाभाविक है और बहुप्रेम विचलन। क्या एकल प्रेम अचूक होता है? मैं अपने आस-पास अलग-अलग तरह के एकलप्रेमी जोड़े को देखती हूं – खुश, संघर्षशील, इंसानी मुश्किलों से जूझते हुए ।कई लोगों के अपने एकल-रिश्ते (जोड़ी) के बाहर संबंध होते हैं, साथी पार्टनर की जानकारी में या बिना जानकारी के। जीवन जटिल है। बहुप्रेमी होने के नाते, मैं शरीर और आत्मा की ज़रूरतों को गहराई से समझती हूँ। मैं जिस चीज से असहमत हूं, वह ‘युगल-पवित्रता’ का अनुष्ठान है, इसे महिमामंडित करने के लिए बनाए गए मिथक हैं।और जो कुछ भी इसके बाहर है उसका तिरस्कार। बहुप्रेमी लोगों को अक्सर यह बोझ ढोना होता है गोयाइस पवित्र दुनिया में सिर्फ वे ही अपवित्र हैं।

सह-प्रेमी होना

बहुप्रेमी संबंधों में होने की राह सीधी नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं है। हम कभी-कभी लंबी दूरी के रिश्तों में होते हैं। हम पल भर में अपने डेट्स तय नहीं कर सकते हैं, या बिना किसी योजना के एक से दूसरे ठिकानों पर जाते हुए सप्ताहांत व्यतीत नहीं कर सकते हैं। एक साथी की अन्य साथी के साथ प्रतिबद्धता हो सकती है। इसलिए हमें प्रत्येक साथी के खुलेपन, उसकी सीमा और उपलब्धता के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता है। लेकिन उज्जवल पक्ष भी हैं। एक से अधिक साथी होने का मतलब है कि हम एक के साथ सांस्कृतिक अवकाश पर जा सकते हैं, तो दूसरे के साथ एक साहसिक यात्रा पर, निर्भर करता है साझा रूचियों के होने पर।

 

क्या आपको कभी जलन नहीं होती? यह एक और सवाल है जो मेरे दोस्त पूछते हैं। कई दार्शनिकों और मनोविश्लेषकों द्वारा पता लगाया गया है कि अगर हमारे प्रेमी दूसरों के साथ अंतरंग होते हैं तो हमें जलन या गुस्सा क्यों महसूस होता है?

 

मुझे अपने लिए दो उत्तर मिले। सबसे पहले, कोई प्रेमी को अपनी संपत्ति के रूप में देखता है। ‘तुम मेरे हो’ ने कई सदाबहार गीतों के बोल तय किये हैं, जो किसी ‘अतिक्रमण’, ‘हद पार करने’ के विचार को नकारते हैं। संपत्ति पर कानूनी अधिकारों की तरह प्रेमी पर ‘वफादारी’ का अधिकार प्रबल होता है।
दूसरे, प्रेमी को अपने ही विस्तार के रूप में देखा जाता है। ‘तुम और मैं एक’ भी लोकप्रिय गीत हैं। इस मामले में, बिना सहमति केअंतरंगता, स्वयं पर, स्वत्व पर हमला बन जाती है।

इस तरह हम सोचने और महसूस करने के लिए अनुनुकूलित हैं। हालांकि, अगर हम चाहें तो इस तरह की सोच को बदलना असंभव नहीं है। लेकिन इसमें समय लगता है,और दिल को पीड़ा भी होती है।

सम्मिलन का विचार

मुझे भी कभी-कभी जलन महसूस होती थी। लेकिन ईर्ष्या के बरक्स मेरी खोज में मैं ‘सम्मिलन’ पर आकर ठहर गयी, जिसमें एक प्रेमी यह जानकर खुशी महसूस करती/ता है कि उसके प्रियजन को दूसरों से प्यार और खुशी मिलती है।

मैं समझती हूँ कि सम्मिलन बहुप्रेम की आधारशिला है। जिस व्यक्ति के साथ आपके प्रेमी का रिश्ता है, वह ‘सह-प्रेमी’ बन जाती/ता है, यह एक नया शब्द है, जो मैंने सीखा। मैंने सह-प्रेमियों के मामले में दो समस्याओं पर ध्यान दिया है।

इतिहास में ‘बहुपत्नी विवाह’ में एक पुरुष की सह-पत्नियों के पूर्व उदाहरण हैं। हालांकि महिलाओं के खित्ते में बहनापा और दोस्ताने पाए जाते रहे हैं,अक्सर बैडरूम में पहुँच, उपस्थिति और पहुँच की बारंबारता पितृसत्ता के एक टूल की तरह इस्तेमाल किए गए हैं -पुरुष और महिला दोनो द्वारा। बहुप्रेम में सीधे प्रतिस्पर्धा के लिए कोई जगह नहीं है, लेकिन कोई भी उस दिशा में बढ़ सकती/ता है अगर वह सावधान नहीं है।

पितृसत्ता हममें गहरे पैठी है। मैंने खुद अपने साथी के अन्य प्रेमियों की तुलना में खुद को हीन महसूस किया है और कई दिनों तक दुखी महसूस किया है।

 

 

हालाँकि, सह-प्रेमियों के रूप में पुरुषों के लिए स्थिति लगभग अभूतपूर्व है क्योंकि अधिकांश संस्कृतियों में पुरुषों के बीच बहुविवाह प्रचलित था। इसलिए पुरुषों को शून्य से शुरू करना होगा यह समझने के लिए कि सह-प्रेमियों के साथ कैसे रहना है। लेकिन यहां भी मैंने देखा है कि पुरुष इसका इस्तेमाल अपने साथी से स्नेह का फायदा उठाने और सोने के बहाने के रूप में करते हैं।
मुझे लगता है कि हमारे जीवन के पितृसत्तात्मक संदर्भ को देखते हुए, महिलाओं को बहुप्रेम में पुरुषों की तुलना में अधिक सावधान रहना होगा।

मुझे कई स्थितियों में जलन महसूस होती रहती है। लेकिन मैं अलग तरह से प्रतिक्रिया देने के लिए खुद को प्रशिक्षित करना जारी रखती हूं। मैं इसके बारे में अपने सहयोगियों से बात करती हूं जो ध्यान से सुनते हैं, इसके कारणों का पता लगाते हैं। मैं खुद को याद दिलाती हूं कि मैं बहुप्रेम का अभ्यास क्यों करती हूं।

और खुशियाँ इस तुच्छ बेचैनी से कहीं अधिक हैं। मुझे लगता है कि बहुप्रेम के अभ्यास के लोग ईर्ष्या के बारे में ज्यादा बात नहीं करते। उन्हें बात करनी चाहिए। इस तरह, हम सनकी के रूप में नहीं देखे जाएँगे, बल्कि हमें दूसरों की तरह ही देखा जायेगा, किसी भी अन्य की तरह, जो इन सब से संघर्ष कर रहे हैं।

विभिन्न सह-प्रेमियों के साथ वर्षों तक बात करने के बाद, मुझे लगता है कि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को वैसे ही प्रेम कर सकती/ताहै जैसे किसी कविता के अनुगूंज को या महासागर के किनारे को करती/ता है बिना उसपर अधिकार जताये। जब दूसरे उनका आनंद लेते हैं तो वह भी आनंदित हो सकती/ता है।

कुछ मायनों में,

बहुप्रेम में सह-प्रेम का अभ्यास पारंपरिक ‘अन्य’ को स्वीकार करना, गले लगाना और उसका जश्न मनाना सीखने की एक प्रक्रिया है।

मुश्किल है या आसान?

एकल प्रेम की जरूरतों से जूझ रहे मेरे दोस्तों को लगता है कि बहुप्रेम आसान है। दोनों के मेरे अनुभव से मैं कह सकती हूँ कि ऐसा नहीं है। दोनों के ही अपने अलग संघर्ष हैं। हमारी कंडीशनिंग के कारण, पारंपरिक प्रेम और रिश्तों को भूलना मुश्किल था।

ये जटिल बहुमुखीसंबंध हैं, जहां एक के बारे में निर्णय दूसरों को प्रभावित करते हैं। साथ ही,लोग बेशक हमारे बारे में कुछ भी सोचें, हमारी प्रतिबद्धताएं वास्तविक होती हैं और चूंकि वे अलग-अलग लोगों के साथ होती हैं, इसलिए हमें सचेत रहना चाहिए कि उनमें परस्पर संघर्ष नहीं हो।

 

मिमी,एक प्रिय मित्र जो एकल प्रेम की अभ्यासी है,अक्सर मेरे साथ चर्चा करती है कि अलग-अलग जीवन की अपनी पसंद के लिए हम अलग-अलग कीमत चुकाते हैं, वे कठिन तो होते हैं पर हमें अधिक समृद्ध करते हैं – उसे अधिक स्थिर और मुझे अधिक स्वतंत्र के रूप में देखा जाता है।

मैं कहूंगी कि यह कमजोर दिल वालों के लिए यात्रा नहीं है, या वह यात्रा नहीं है जिसे आप अपने साथी की सहमति के बिना वैवाहिक प्रतिज्ञाओं के पीछे छिपकर करते हैं। सहमति की तरह ईमानदारी कुंजी है। बेईमानी एक डीलब्रेकर है।
अगर मुझे लोग ‘दिलचस्प’ लगते हैं,तो मैं उन्हें यह बताने के लिए सही समय का इंतजार नहीं करती कि मैं बहुप्रेमी हूं। मैं इसे सीधे तौर पर कहती हूं और उनसे अपेक्षा करती हूं कि वे अपनी स्थिति के बारे में भी बतायें। इस सब के बावजूद मुझे भी केई ऐसी दुर्घटनाओं से गुज़रना पड़ा है -‘सुखद दुर्घटनाएँ’ नहीं हैं।

 

दीपिका का कहना है कि एक बहुप्रेमी व्यक्ति के रूप में वह अक्सर अकेले कई काम करती है। लोग हमारे बारे में जो सोचते हैं, यह उसके बिल्कुल विपरीत है। एकल प्रेम में युगल से एक साथ काम करने की अपेक्षा की जाती है – अक्सर इच्छा न रहते हुए भी और कभी-कभी दिखावे के लिए। हालांकि बहुप्रेम में जब हम चाहें तब हमारे साथी हमारे लिए हाज़िर नहीं हो सकते हैं। ऐसे में उनके प्यार पर सवाल उठाना आसान है।

लेकिन मैं एक अलग सवाल पूछती हूं – क्या इससे हमारे रिश्ते की प्रकृति बदल जाती है, या मुझे बस चोट लगती है? क्या आहत होने को रिश्ते की गुणवत्ता में बदलाव से अलग देखा जा सकता है’? मुझे समय-समय पर उम्मीदों के व्यापक नक्शे बनाना और भागीदारों के साथ साझा करना पसंद है, यह पता लगाना कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है। उनसे समान प्रतिबद्धताओं की अपेक्षा ज़रूरी नहीं है, बशर्ते वे सहमति के साथ हैं। और अगर वे बदलते हैं,तो मुझे फिर से खुद को समायोजित करना होगा। रोज़ाना इस धैर्य और समझ का अभ्यास करते रहना थका देने वाला हो सकता है।

 

मेरे लिए अपने बहुप्रेम के जीवन में सबसे कठिन समय वह रहा है, जब कुछ साल पहले एक साथी को किसी एक से प्यार हो गया और उसने एकल प्रेम के रिश्ते में रहने का फैसला किया। यह दुखद था, क्योंकि यह सिर्फ मेरे लिए सिर्फ शोक का विषय नहीं था। उसने बहुप्रेम के बारे में एक ‘मूल्य निर्णय’ के साथ इसे छोड़ा, एक वैकल्पिक जीवन और दुनिया को एक साथ बनाने का वादा छोड़ दिया।

मैं अपने अन्य साथियों के साथ अपने दिल टूटने पर चर्चा नहीं करना पसंद करती हूं। वे क्यों व्यर्थ कष्ट सहें? लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैंने ‘प्यार’ से ब्रेक ले लिया है। खैर, मुझे लगता है कि मैं भाग्यशाली रही हूं कि मुझे लगातार दोस्तों और दोस्तों के दोस्तों के बीच अद्भुत साथी मिले। मैं डेटिंग ऐप्स के लिए बहुत पुराना स्कूल की हूं, लेकिन इसके लिए जरूरी साहस से मैं चकित रहती हूं जो मेरे कुछ दोस्तों के पास है।

अनेक प्रेम के अभ्यासी के रूप में, मैं जितना आनन्दित हुई हूँ, उससे कहीं अधिक दुखी हुई हूँ, टूटी हूँ और विफल हुई हूँ। मैं पारंपरिक, ज्ञात, करने योग्य अभ्यस्तता की सुरक्षा की ओर भागी हूँ । हालांकि, ये भावनाएं बीत चुकी हैं। जो चीज मेरे लिए इसे संभव बनाती है और इसके प्रतिआकंक्षा से भरी रखती है, वह एक ऐसी दुनिया को चाहने का जुनून है जहां प्यार ‘कब्जे’ से मुक्त हो। मैंने कुछ लोगों को एकल प्रेम में वापस जाते देखा है। प्रभात की तरह, जिसने कहा कि यह बहुत कठिन था।

 

लेकिन क्या मैं ‘सेटल’ नहीं होना चाहती? मेरी माँ, हालांकि मेरी पसंद को स्वीकार करती है और मेरे पार्टनर्स को, या ‘दोस्तों'(जैसा कि वह उन्हें बुलाना पसंद करती है) को स्वीकृति देती है, फिर भी मेरे जीवन में अकेले और स्थायी साथी की कमी के बारे में चिंता करती है- यही अंतिम गंतव्य है, अधिकांश आपको यही बताएंगे। लेकिन मैं अपनी बहुप्रेम यात्रा में इतनी आनंदित हूं कि ‘अंतिम गंतव्य’ सारहीन है। सिर्फ ‘धूल ही तो जमती है’।

और इसलिए…

एक समय था जब मैंने ‘प्यार’ को संरक्षित सीमाओं के भीतर परिभाषित किया था, जहाँ आवारा जीवन पर सख्त प्रतिबन्ध होता था और स्वच्छंद जीने की जबरदस्त मनाही। आज, मेरे उम्र के इस मुक़ाम पर मैं प्यार को एक अलग नज़र से देखती हूं- नाजुक, धूसर, धुंधलाया,आप्लावित जो रोमांस, दोस्ती, प्रेम, परिवार के बीच की सीमाओं को मिटा देता है। परिभाषाएँ अब मायने नहीं रखतीं। मैं अपने दिल पर हाथ रखकर समझती हूँ कि जब निर्वासितों के लिए प्यार और जमीन उदार होते हैं,तब जीवन समृद्ध होता है।

डेक्कन हेराल्ड से साभार।

अंग्रेजी से अनुवाद: संजीव

(नोट: मेरे अनुभव ज्यादातर विषमलैंगिक संबंधों के भीतर रहे हैं, इसलिए मेरी अंतर्दृष्टि उस दृष्टिकोण से है। बहुप्रेम में अन्य लिंगों और कामुकता से अन्य कहानियां हो सकती हैं।)

पत्रकारिता जगत में जातीय भेदभाव से जूझ रहे दलित-पिछड़े पत्रकारों की कहानी

वरिष्ठ पत्रकार जितेंद कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में पत्रकारिता जगत में जातिगत भेदभाव का एक मुद्दा वरिष्ठ पत्रकार अजित शाही के एक पोस्ट के बहाने उठायी है। स्त्रीकाल के पाठकों के लिए साभार।

“अमेरिका रहते हुए दो साल हुए थे. मैं एक इंटरव्यू पैनल में था. कैंडिडेट से सवाल जवाब चल रहे थे. मैंने पूछ लिया, “How old are you?” क्योंकि एप्लिकेशन पर डेट ऑफ़ बर्थ नहीं लिखी थी.
इंटरव्यू ख़त्म होने के बाद फ़ौरन इंटरव्यू पैनल के चीफ़ मुझे बोले, “ये अमेरिका है. यहाँ आप किसी भी उम्मीदवार से उम्र, वैवाहिक स्टेटस, धर्म, परिवार, आदि के बाबत कोई पर्सनल सवाल नहीं कर सकते. आइंदा ऐसा मत करिए.
लखनऊ से चौवालीस साल पहले अमेरिका आए एक प्रोफ़ेसर साहब से पिछले दिनों बातचीत हुई. अपने करियर में प्रोफ़ेसर साहब बहुत सफल हैं. उनको बाइडेन सरकार में डेपुटेशन पर रखा गया है.
प्रोफ़ेसर साहब मुझे बोले,

“अजित भाई. चालीस सालों से यहाँ अमेरिका में काम कर रहा हूँ. काम करने की जगह पर आज तक किसी ने मुझसे नागरिकता नहीं पूछी. हम यहाँ किसी की भी नागरिकता नहीं पूछते हैं.”

कहने लगे,

“जिन मुल्कों से अमेरिका की दुश्मनी रही है जैसे ईरान वहाँ से भी आए लोगों के साथ मैंने काम की जगह भेदभाव नहीं देखा है. हमें अंदाज़ा है कि फ़लाना ईरानी मूल का है लेकिन न हमें पूछने का हक़ है और न ही सरकारी तौर पर ये शेयर किया जाता है कि उनका मूल क्या है.”

मेरा निज अनुभव यही है. चार साल से अमेरिका में रह रहा हूँ. किसी दफ़्तर में, दुकान में, पड़ोस में किसी ने आज तक इनडायरेक्टली भी जानने की कोशिश नहीं की कि मैं किस मूल का हूँ.
मेरी पोस्ट पर आपत्ति जताने वाले मित्रों को पहले ही बता देता हूँ कि ये मेरा निजी अनुभव है. आप मुझे गैसलाइट न करें कि मेरा अनुभव ग़लत है और अमेरिका के बारे में आपके आयडियोलॉजिकल पूर्वाग्रह ही सही हैं.
Ajit Sahi के पोस्ट को आगे बढ़ाते हुए

‘मी टूः’ न्यूज रुम में जाति

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अपने देश, खासकर गर्व करनेवाले गोबरपट्टी में हम नाम इसलिए पूछते हैं कि सामने वाले की जाति व धर्म का पता चल जाए (वैसे भी, धर्म तो पहले से ज्ञात ही रहता है). पूछनेवालों को पहली दिक्कत तब होती है जब नाम से उसकी जाति का पता नहीं चलता है, फिर वह महान आत्मा बाप (मां का नहीं) का नाम पूछता है, उससे भी पता नहीं चलता है तो प्रांत, जिला या उस सामनेवाले के लोकल रिहाइश तक पहुंचता है, फिर वहां के जातीय समीकरण का अनुमान लगाकर आपकी जाति जानने की भरसक कोशिश करता है, फिर भी असफल होता है तो अंत में यह कहते हुए पूछ ही लेता हैः ‘वैसे मेरा इस सबमें कोई विश्वास नहीं है, और हम बिल्कुल नहीं मानते हैं लेकिन आप कौन जाति या समाज से आते हैं?’
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मैं अपना एक निजी अनुभव यहां शेयर करना चाहता हूं.

साल ठीक से याद नहीं (शायद 2002-03 हो सकता है), लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे. मैं एक सज्जन से नौकरी के सिलसिले में उनसे मिलने उनके दफ्तर गया था. उपर लिखी सारी बातें मेरे साथ भी हुई. अगर उनमें धैर्य होता तो शुरु में ही पता चल जाता कि मेरी जाति क्या है, क्योंकि मेरे बायोडेटा में इसका जिक्र है, चूंकि मैंने अपना सीवी उनको मेल पर भेजा था और अटैचमेंट में था और शायद वे सज्जन उस समय तक इतने भिज्ञ नहीं थे कि तत्काल सीवी को खोलकर देखा जा सकता है इसलिए इनको काफी कवायद करनी पड़ी और अंततः मुझसे पूछकर मेरी जाति जान ली गयी थी!
तब तक लगभग दस मिनट का वक्त गुजर चुका था, उन्होंने मेरे लिए चाय भी मंगवा ली थी और वास्तव में इंटरव्यू का सिलसिला शुरु हो गया था.

उन्होंने मुझसे पूछ लिया था कि मेरा वैचारिक रूझान क्या है और मैंने उन्हें बता भी दिया था कि मैं वामपंथी हूं या कह लीजिए कि अति वामपंथी हूं. चूंकि उनको पता चल गया था कि- मैं यादव हूं- इसलिए उनका सवाल था कि मुझे लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव में कौन पसन्द है? इसपर मेरा जबाव था-तीनों. मेरे इस जबाव से उन्होंने आश्चर्य वक्त किया और चौंकते हुए पूछा-क्यों? इसपर मैंने उनसे कहा, ‘ठीक वैसे ही, जैसे आपको अटल बिहारी वाजपेयी पसन्द है!’

मेरे इस वाक्य पर उन्होंने हल्के से प्रतिवाद किया और कहा कि यार देखो, पूरी तरह मैं उन्हें पसन्द नहीं करता हूं लेकिन यह बताओ, उनके स्टेचर का नेता अभी देश में कोई है क्या? लेकिन आपको तीनों क्यों पसन्द है? इसपर मैंने उनसे कहा कि सर, आपको वाजपेयी तो सिर्फ जातीय आधार पर पसन्द है न, वैचारिक रुप से तो आप कांग्रेसी है और आप जानते हैं कि वाजपेयी न सिर्फ घटिया राजनीतज्ञ है बल्कि बहुत ही अलोकतांत्रिक व अलोकतांत्रिक संगठन से जुड़ा है जो देश में एक समुदाय के रहने के पूरी तरह खिलाफ है, जो संविधान विरोधी काम है (शब्द पूरी तरह याद नहीं है लेकिन भावार्थ बिल्कुल यही थे). लेकिन लालू यादव ने संविधान की रक्षा के लिए लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया था और मुलायम सिंह यादव ने संविधान को बचाने के लिए कार सेवकों पर गोलियां चलवायी थीं (मैंने शरद यादव के बारे में कुछ नहीं कहा क्योंकि तबतक वह एनडीए का हिस्सा बन चुके थे और उनके बचाव में मेरे पास कोई तर्क नहीं था सिवा इसके कि शरद यादव ने मंडल आयोग को लागू करवाया था).

वैसे वे तीनों ऐसे लोग हैं जिन्होंने गैरसंवैधानिक कुछ भी नहीं किया है. आपको यह भी पता है कि वामपंथी हूं फिर भी आप मुझसे मेरी जाति से जोड़कर सवाल पूछ रहे हैं और अपेक्षा करते हैं कि मैं आपके नजरिए से तीनों को बदमाश, भ्रष्टाचारी व अपराधियों को शरण देनेवाला बताऊं? आपलोगों की जातिवादी सोच जाती ही नहीं है. इतना सुनाने-सुनने से शायद वे दंग रह गये थे. उन्हें शायद कल्पना ही नहीं थी कि कोई याचक (हिन्दी पत्रकारिता में पत्रकारों की हैसियत उस समय तो याचक की होती ही थी, संभवतः आज भी पुराने लोगों के सामे यही है) नौकरी की परवाह किए बगैर इतना खरी-खरी बोल सकता है!
मैंने उनसे चाय पिलाने के लिए उन्हें धन्यवाद भी कहा और बाहर निकलने लगा, फिर उन्होंने मुझे बैठाने की कोशिश की और कहा कि आपके साथ काम करके मजा आएगा, बताइए आप क्या-क्या करना चाहेंगे? मैंने विनम्रता से नहीं लेकिन साफगोई से कह दिया कि मुझे आपके साथ काम करने में बड़ी परेशानी होगी और मैं परेशानी में काम नहीं कर पाता हूं. फिर मैं वहां से निकल आया.

बाद में तो ‘न्यूज रुम में जाति’ को लेकर अनिल चमड़िया और योगेन्द्र यादव के साथ जो सर्वे किया उसके बाद तो अपवादों को छोड़कर हिन्दी के सभी सवर्ण पत्रकारों का जानी दुश्मन ही बन गया. हां, अंग्रेजी वालों ने उस रुप में मेरे साथ जातीय भेदभाव नहीं किया जो हिन्दी के बड़े-बड़े व ‘प्रखर’ पत्रकारों, संपादकों व बुद्धिजीवियों ने की है! एक बात और, इस जातीय भेदभाव को मैंने सहा है, एक ओबीसी होकर, तो दलितों के साथ कितना भेदभाव होता होगा, इसका अंदाजा लगाइए!
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सभी के कुछ न कुछ अनुभव होंगे-खासकर पत्रकारिता में जूझ रहे पत्रकारों की. अगर मीडिया में मौजूद न्युनतम दलित-पिछड़ों की अपनी कोई कहानी हो तो उसे शेयर करें जिससे कि बात अधिक लोगों तक पहुंचे!

मीडिया में गैर सवर्ण समाज कहां है- गैर सवर्ण पत्रकारिता सम्‍मान 2023 से सम्‍मानित हुए बिहार के12 पत्रकार

पटना: मासिक पत्रिका वीरेंद्र यादव न्‍यूज और वीरेंद्र यादव फाउंडेशन चेरिटेबुल ट्रस्‍ट के संयुक्‍त तत्‍वावधान में गैर सवर्ण पत्रकारिता सम्‍मान समारोह का आयोजन पटना के जगजीवनराम संसदीय अध्‍ययन और शोध संस्‍थान में किया गया। बिहार विधान परिषद के उप सभापति रामचन्द्र पूर्वे की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में बिहार विधान परिषद सदस्य प्रो रामबली सिंह, श्रीमती कुमुद वर्मा, पूर्व मंत्री श्याम रजक, पूर्व विधान पार्षद उपेन्द्र प्रसाद विधायक छत्रपति यादव और जगजीवनराम के निदेशक नरेंद्र पाठक ने क्रमशः रामअवधेश सिंह पत्रकारिता सम्‍मान वेद प्रकाश को, राजेंद्र प्रसाद यादव पत्रकारिता सम्‍मान को हेमंत कुमार, कृष्‍ण मुरारी किशन पत्रकारिता सम्‍मान छायाकार जावेद आलम को , सूर्यनारायण चौधरी पत्रकारिता सम्‍मान प्रमोद यादव को, उपेंद्र नाथ वर्मा पत्रकारिता सम्‍मान योगेश च्रक्रवर्ती को, रघनुीराम शास्‍त्री पत्रकारिता सम्‍मान राजीव कुमार को, मधुकर सिंह पत्रकारिता सम्‍मान उपेंद्र कश्‍यप को, प्रभात शांडिल्‍य पत्रकारिता सम्‍मान सन्‍नी कुमार को, गुलाम सरवर पत्रकारिता सम्‍मान अनवार उल्‍लाह को, रवींद्र सिंह लड्डू पत्रकारिता सम्‍मान प्रसिद्ध यादव को, अब्‍दुल कय्यूम अंसारी पत्रकारिता सम्‍मान वकील प्रसाद को और आरएल चंदापुरी पत्रकारिता सम्‍मान से डा.दिनेश पाल को सम्‍मानित किया। सम्मान स्वरूप, प्रशस्ति पत्र, शाल और 4 किताबें प्रत्येक सम्मानित पत्रकारों को भेंट की गई।

गैर सवर्ण पत्रकारिता सम्‍मान समारोह 2023
गैर सवर्ण पत्रकारिता सम्‍मान समारोह 2023

इस मौके पर वीरेंद्र यादव न्यूज के गैर सवर्ण मीडिया विशेषांक का लोकार्पण किया गया। तत्पश्चात् मीडिया के सामाजिक सरोकार विषय पर बातचीत हुई। डा. मो. दानिश ने बहुत गहराई और बेबाकी के साथ अम्बेडकर के दौर से लेकर आज तक की की मीडिया पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि इस मीडिया में जबतक व्यापक समाज की हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं की जाएगी यह लोकतांत्रिक नहीं हो पाएगा। सम्मानित होने वाले पत्रकारों ने अपने जीवन और पेशे में जाति के कारण हुए कटु अनुभव साझा किए और वैकल्पिक मीडिया विकसित करने की जरूरत पर बल दिया। इन पत्रकारों ने जाति जनगणना पर कोर्ट द्वारा रोक लगाये जाने से लेकर बिहार में विभिन्न आयोगों और निकायों की निष्क्रियता के कारण बहुजन समाज पर हो रहे प्रभाव के संबंध में अपनी चिंताएं साझी की।


आयोजन के उद्देश्य की चर्चा करते हुए पत्रकार वीरेंद्र यादव ने बताया कि गैर सवर्ण समाज के 12 पत्रकारों की याद में आयोजित यह कार्यक्रम मीडिया में गैर सवर्ण पत्रकारों को एक सम्मान जनक जीवन जीने की प्रेरणा दे और वे अपने समाज के सरोकार को डंके की चोट पर उठाते रहें। यही हमारा मूल मकसद है। जगजीवनराम के निदेशक नरेंद्र पाठक ने आगत अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर उन्हें पुस्तक भेंट की गई।
कार्यक्रम के आरंभ में मशहूर कवि हीरा डोम की कविता अछूत की शिकायत का पाठ किया गया। इसे बहुत ही सस्वर और प्रभावी रूप में पटना विश्वविद्यालय की छात्रा पूजा कुमारी ने संभव किया।
बिहार विधान परिषद के उप सभापति श्री रामचंद्र पूर्वे ने कहा कि जाति आधारित समाज में भेदभाव का प्रभाव हर दौर में प्रभावी रहा है ।अंबेडकर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने भी जब राजनीति में कदम रखा तो उन्हें महसूस हुआ इस जाति आधारित समाज में जबतक हम नेहरू, मालवीय सी राजगोपालाचारी नहीं बनेंगे यह समाज हमें प्रतिष्ठा नहीं देगा। फलस्वरूप उन्होंने अपने समाज को संगठित किया जिसने उन्हें सामाजिक राजनीतिक ताकत दी। उन्होंने माना कि समाज में बहुजन समाज में विकास के लिए कभी भी स्थितियां अनुकूल नहीं रहीं। उन्होंने वीरेंद्र यादव की इस पहल की तारीफ की और नियमित रूप से इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करते रहने का आग्रह किया।
समारोह को मंच पर आसीन श्याम रजक, उपेंद्र प्रसाद, छत्रपति यादव, कुमुद वर्मा और रामवली सिंह चंद्रवंशी ने भी संबोधित किया। इन सभी वक्ताओं ने वीरेंद्र यादव की इस पहल की तारीफ की और धारावाहिकता में इस तरह के कार्यक्रम किये जाने की जरूरत पर बल दिया।
कार्यक्रम का संचालन अरुण नारायण ने किया। इस मौके पर श्रीमती अलका वर्मा, अरुण कुशवाहा, प्रो दिलीप कुमार, सुबोध कुमार, विनोद पाल, संतोष यादव, शशिप्रभा, रमाशंकर,कासिफ, महेंद्र यादव, मीरा यादव, मुसाफिर बैठा, हरेंद्र कुमार, गौतम कुमार,प्रमोद यादव, आदि लोगों की उपस्थिति अंतिम समय तक बनी रही।

द केरला स्टोरी – क्या वाकई 10 साल के बाद केरल एक मुस्लिम स्टेट हो जाएगा?

द केरला स्टोरी सुदीप्तो सेन के निर्देशन में बनी फिल्म है. इसके निर्माता विपुल अमृतलाल शाह हैं, द केरला स्टोरी, यह फिल्म रिलीज से पहले से काफी चर्चा में है, चर्चा में होने की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि यह फिल्म इस देश के एक अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय को टारगेट करती है और कुछ एक उदाहरण जो रहे होंगे कन्वर्जन के,धर्म परिवर्तन के उनको पेश करके यह उस धार्मिक समुदाय को लक्षित करती है और यह बताती है अगर नहीं रोका गया तो पता नहीं केरल के किसी मुख्यमंत्री ने कभी कहा था कि 10 साल के पश्चात केरल एक मुस्लिम स्टेट हो जाएगा. धारणा आप समझ सकते हैं, इरादा आप समझ सकते हैं,  इंटेन्ट आप समझ सकते हैं.

फिल्म के बहाने – कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और व्यापक रूप से पूरी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में जो एक दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी और भक्त समुदाय का उदय हुआ है और वे जिस तरीके से फिल्में बना रहे हैं या दिखाना चाह रहे हैं और जिस लक्ष्य की पूर्ति करना चाह रहे हैं जिस विचार को वे फैलाना चाह रहे हैं यह उसी मकसद से बनी हुई फिल्म है,यह पूरी तरह से एजेंडा परक  फिल्म है, प्रोपेगेंडा फिल्म है. अगर फिल्म की कसौटी पर, सिनेमाक्राफ्ट की कसौटी पर इस फिल्म को कसेंगे तो यह एक बहुत ही कमजोर फ़िल्म है. स्क्रिप्ट में दिक्कतें हैं, अभिनय में दिक्कतें हैं, परफॉर्मेंस  क्वालिटी नहीं है, क्यों नहीं है? एक तो कलाकार ही ऐसे चुने गए हैं, अदा शर्मा  हिन्दी फिल्मों की एक अभिनेत्री रही हैं,उन्हें मुख्य भूमिका  मिली है, उनके अलावा लगभग नई लड़कियां हैं, लगभग नए लड़के हैं. नए लोगों को लेना कोई गलत बात नहीं है यह बहुत अच्छी बात है कि आपने नई  प्रतिभाओं को मौका दिया है लेकिन क्या नई प्रतिभाओं में वह क्षमता है जो आपका अभिप्रेत है उसको अच्छे तरीके से पेश कर सके? ऐसा नहीं होता है.

क्या है इस फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी केरल के पृष्ठभूमि में है. वहां दिखाया गया है कि एक क्लास में पढ़ रही चार लड़कियां है. उनमें से एक मुस्लिम समुदाय की है, दो हिंदू धार्मिक समुदाय की  है और एक  ईसाई है. मुस्लिम लड़की आसिफा काफी एक्टिव है वह इन दोनों- तीनों को बरगलाती है और कोशिश करती है कि इनका धार्मिक परिवर्तन कर दिया जाए वो इस्लाम कबूल कर ले. वह हमेशा इनका ब्रेनवाश किया करती है. यहां तक कि हिंदू देवी देवताओं का भी मजाक उड़ाती है और ईसा मसीह का भी मजाक उड़ाती है और बताती है कि सिर्फ अल्लाह ही है जो इस दुनिया को बचा सकता है. यह बिल्कुल एकांगी चित्रण है उस मुस्लिम लड़की का और कहीं ना कहीं निर्देशक और लेखक यह साबित करना चाहते हैं  या बताना चाहते हैं कि यह समुदाय कितना प्रोएक्टिव है और किस तरीके से कन्वर्जन की तैयारियां कर रहा है, लोगों को कन्वर्ट कर रहा है.

क्या है धर्मान्तरण की असली हकीकत

ऐसा कहते हैं कि केरल में कन्वर्जन हुआ है तो कन्वर्जन की वजहों में जाना चाहिए. यह फ़िल्म उन वजहों की बात नहीं करती है. क्यों किसी एक खास धर्म के नागरिक एक खास समय पर।धर्म परिवर्तन करते हैं. धर्म परिवर्तन करने की जो कहानियां हैं उनके पीछे आप जाएं तो सबसे बड़ा कारण आर्थिक उसके अलावा असमानता  उसके अलावा प्रलोभन. प्रलोभन किस चीज का?  कैरियर का.प्रलोभन, एक अच्छी जिंदगी का प्रलोभन अगर कोई धार्मिक समुदाय अपने पंथ के व्यक्तियों को अपने पंथ के नागरिकों को सही जीवन नहीं दे पा रहा है और वह कहीं घुटन महसूस कर रहा  है  तो वह दूसरे धर्म में जाता है. अंबेडकर के समय  काफी लोगों ने बौद्ध धर्म धारण कर लिया था, ऐसे ही इस्लाम में काफी लोग गए. हिंदू धर्म में भी काफी लोगों को लाया गया है. यह हमेशा होता रहा है, किस प्रकार से बौद्ध धर्म जो भारत में बहुत ही प्रचलित धर्म था, उसको खत्म किया गया और कैसे हिंदू आए यह सभी कहानी अगर आप इतिहास में जाते हैं, अगर हम इस तरह की बातें करते हैं  तो इन सारे डिटेल में  भी जाना पड़ेगा. मुझे यह फिल्म बेहद कमजोर लगी है, प्रोपेगैंडिस्ट लगी है. एजेंडा परक  लगी है. और एक खास इरादे से बनाई गई फिल्म जान पड़ती है, बाकी आप  जब देखे अपनी राय दें.

 

WFI के अध्यक्ष बृज भूषण सिंह के खिलाफ POCSO कानून के तहत FIR दर्ज, लेकिन अब तक गिरफ़्तारी क्यों नहीं?

भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ देश के दिग्गज पहलवानों का धरना जारी है. कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह की मुसीबत बढ़ गई है. दिल्ली पुलिस ने आखिरकार बृजभूषण शरण के खिलाफ दो FIR दर्ज कर ली हैं. अहम बात ये है कि इनमें (POCSO) पोक्सो एक्ट के तहत भी केस दर्ज किया है. FIR दर्ज होने के बाद भी पहलवान धरने पर बैठे हुए हैं. कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और यौन शोषण के आरोप में केस दर्ज हुआ है. ये कार्रवाई एक नाबालिग समेत 7 महिला रेसलर्स की शिकायत पर हुई है. इस आरोप पर बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि मेरे खिलाफ जो आरोप लगाए हैं वो बेबुनियाद हैं.

आपको बता दें कि इस (POCSO) एक्ट के अंतर्गत केस दर्ज होने पर तुरंत गिरफ़्तारी का प्रावधान है. बावजूद इसके बृजभूषण शरण सिंह को दिल्ली पुलिस ने अबतक गिरफ्तार नहीं किया है.

गिरफ़्तारी में देरी पर क्या है कानून के एक्सपर्ट्स की राय

यूपी के पूर्व DGP विक्रम सिंह के मुताबिक पुलिस गिरफ्तारी से पहले आरोप की सत्यता की जांच कर सकती है, लेकिन अगर प्राथमिक जांच में पुलिस को आरोप सही लगता है तो आरोपी को गिरफ्तार होने से कोई नहीं रोक सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट विराग गुप्ता के मुताबिक पॉक्सो कानून में केस दर्ज होने के बाद अपराधों की जांच और उनके ट्रायल के लिए विशेष व्यवस्था बनी है. ऐसे मामलों में गिरफ्तारी के बाद जमानत मिलना भी आसान नहीं होता है और काफी मुश्किलें आती हैं.

संसद सत्र के दौरान यदि किसी सांसद की गिरफ्तारी होती है तो स्पीकर को सूचित करने का नियम और प्रोटोकॉल है, लेकिन भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष और सांसद होने के नाते बृजभूषण शरण को विशेष कानूनी कवच नहीं मिला है.

 

 बृज भूषण सिंह को कितना सजा होगी?

बृज भूषण सिंह के खिलाफ महिला की लज्जा भंग करने के आरोप में IPC की धारा 354, 354(A), 354(D) के तहत केस दर्ज किया गया है. इस मामले में अगर वो दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें अधिकतम 3 साल तक की सजा हो सकती है. वहीं, एक केस पॉक्सो एक्ट में भी दर्ज किया गया है. पॉक्सो एक गैर-जमानती अपराध है. इसमें दोषी पाए जाने पर कम से कम 7 साल की जेल और अधिकतम उम्रकैद तक की सजा हो सकती है.

वहीँ जंतर मंतर पर धरने पर बैठीं विनेश फोगाट ने  24 अप्रैल को कहा था कि –

‘हम तीन महीने से मेंटल टॉर्चर से गुजर रहे हैं. सिर्फ इसलिए कि हमें इंसाफ मिले. यह खिलाड़‍ियों के सम्‍मान की बात है. अगर इस देश में ही हम सुरक्षित नहीं हैं तो बाकी लड़कियों के भविष्‍य के बारे में हम क्‍या सोच सकते हैं.’

बृजभूषण के आरोपों के जवाब में विनेश फोगाट

इस मामले में कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष ने खुद सामने आकर अपना बचाव किया और पहलवानों पर साजिश रचने का आरोप लगाया. अब पहलवान विनेश फोगाट ने बृजभूषण सिंह के आरोपों पर पलटवार किया है. पहलवान विनेश फोगाट ने कहा कि उन्होंने केवल चार नेशनल नहीं खेले हैं बीते 14 साल में, मैंने पहले भी नेशनल खेला और आज भी खेलूंगी. बजरंग और बाकी लोग भी ट्रायल देकर ही गए थे, कोई भी खिलाड़ी देश से बड़ा नहीं है. नेशनल के नियम बदलने की बात बेबुनियाद और झूठी है. वहीं बजरंग पूनिया ने कहा कि शिकायतकर्ता नाबालिग है ये बात बृजभूषण को आखिर कैसे पता चली, हम ये सवाल पूछना चाहते हैं.

पहलवान बजरंग पूनिया ने कहा कि हम संवैधानिक पदों पर बैठे सभी लोगों का मानसम्मान करते हैं. हम कोई ऐसी बात नहीं कहते हैं कि उनके मानसम्मान को चोट पहुंचे. लेकिन हमारा भी मानसम्मान है, हमारा भी सम्मान है. इस बात का जवाब दें कि कैसे कमेटी की गोपनीय बातें उनतक पहुंची. यहां का बिजली , पानी तक काट दिया गया और बेड और बिस्तर भी नहीं है. पहले हमारी मजबूरी थी कि हम नहीं बोल पाए.

पहलवानों के समर्थन में उतरी प्रियंका गाँधी, पहुंची जंतर मंतर

इस बीच कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी जंतर मंतर पर पहलवानों से मिलने के लिए पहुंची.बृजभूषण सिंह पर महिला पहलवानों के साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न का आरोप है.पहलवानों का कहना है कि सिर्फ़ एफ़आईआर दर्ज होने से वे प्रदर्शन बंद नहीं करेंगे.उनका कहना है कि जब तक बृजभूषण सिंह की गिरफ्तारी नहीं होती, तब तक वे घर नहीं जाएंगे.

पहलवानों से मिलने जंतर-मंतर पहुंची प्रियंका गांधी वाड्रा
पहलवानों से मिलने जंतर-मंतर पहुंची प्रियंका गांधी वाड्रा

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने शनिवार को भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई को लेकर धरने पर बैठे पहलवानों से मुलाकात की और उनके प्रति समर्थन जताया. दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार को सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दो प्राथमिकी दर्ज की थी. इस दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा,

‘जो एफआईआर दर्ज कराई गई है, उसमें क्या है, इसकी जानकारी किसी को नहीं है. वे इसे क्यों नहीं दिखा रहे हैं?’

सरकार बृजभूषण शरण सिंह को क्यों बचा रही है?: प्रियंका गांधी

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने कहा कि जब ये पहलवान पदक जीतते हैं तो हम सभी ट्वीट करते हैं और गर्व महसूस करते हैं. लेकिन आज ये सड़क पर बैठे हैं और इन्हें न्याय नहीं मिल रहा है. ये सभी महिला पहलवान इस मुकाम तक आने के लिए काफी संघर्ष करती हैं और मैं यह नहीं समझ पा रही हूं कि सरकार उन्हें (बृजभूषण शरण सिंह) क्यों बचा रही है?

प्रियंका गांधी ने कहा कि मुझे पीएम से कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि अगर उन्हें इन पहलवानों की चिंता है तो उन्होंने अभी तक उनसे बात या मुलाकात क्यों नहीं की. देश उनके साथ खड़ा है और मुझे बहुत गर्व है कि इन पहलवानों ने ऐसे मुद्दे के खिलाफ आवाज उठाई है. प्रियंका गांधी कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार के लिए रवाना होने से पहले शनिवार की सुबह-सुबह जंतर-मंतर पहुंची. उन्होंने महिला पहलवानों से अलग से बातचीत भी की और कुछ देर वहां बैठीं रहीं. इस दौरान राज्यसभा सदस्य दीपेंद्र हुड्डा भी उनके साथ थे.

छुट्टी लेकर आएं और पहलवानों का साथ दें: सीएम केजरीवाल

जंतर-मंतर पर पहलवानों के धरने पर शनिवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी पहुंचे. यहां पहुंचकर उन्होंने पहलवानों से मुलाकात की और मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि, मुझसे जो बन पड़ेगा मैं पहलवानों का साथ देने के लिए वो करूंगा. इस दौरान  सीएम ने कहा कि, मैं लोगों से अपील करता हूं कि वे यहां छुट्टी लेकर आएं और पहलवानों का समर्थन करें.

जंतर मंतर पर पहलवानों के धरने के समर्थन में पहुंचे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल
जंतर मंतर पर पहलवानों के धरने के समर्थन में पहुंचे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल

“हमारे देश के वो पहलवान, जिन्होंने दुनिया में भारत का नाम रोशन किया वो एक हफ्ते से जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि इनकी पार्टी के नेता ने भारत का नाम  रोशन करने वाली लड़कियों के साथ गलत काम किया. कोई लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करें तो ऐसे व्यक्ति को फांसी पर लटका देना चाहिए, लेकिन इस मामले में देरी क्यों हो रही है ?”

 

ये जंतर-मंतर बहुत पवित्र जगह है. हम भी यहां से निकले हैं. अन्ना हजारे ने यहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया था. इसलिए मैं आप से अपील करता हूं कि यहां आकर पहलवानों का साथ दीजिए. सीएम ने अपनी इस अपील को दोहराते हुए कहा कि जो भी पहलवानों के साथ है वह छुट्टी लेकर यहां पहुंचे और इनका समर्थन करे.

कानून में विश्वास, कहीं भाग नहीं रहा: WFI चीफ बृजभूषण सिंह

भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने अपने खिलाफ लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों के बीच  कहा कि वह एफआईआर दर्ज करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का ‘स्वागत’ करते हैं, क्योंकि उन्हें कानून में विश्वास है और वे आरोपों की जांच करने में हर तरह से सहयोग करने के लिए तैयार हैं.

 ‘देखिए मैं न्यायपालिका के निर्णय से खुश और बेहद प्रसन्न हूं. दिल्ली पुलिस को जांच मिली है. मैं कहीं भाग नहीं रहा. अपने आवास पर ही हूं. जांच में जहां भी सहयोग की आवश्यकता होगी, मैं सहयोग करने के लिए तैयार हूं. न्यायपालिका से बड़ा कोई नहीं है इस देश में. मैं भी न्यायपालिका से बड़ा नहीं हूं.’

मैं सुप्रीम कोर्ट से बड़ा नहीं हूं. मैं उस फैसले का स्वागत करता हूं. जब ओवरसाइट कमेटी बनी थी, तब भी मैंने सवाल नहीं उठाया था. मैंने हर नियम कानून को माना था. इन लोगों को इंतजार करना चाहिए था. इंतजार नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट गए. सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया और ये फैसला लिया.

 

 

 

 

 

 

बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ 2 FIR दर्ज

दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ सात महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के सिलसिले में शुक्रवार को दो प्राथमिकी दर्ज की. इनमें पहली प्राथमिकी एक अवयस्क पहलवान के आरोपों पर पॉक्सो कानून के तहत दर्ज की गई, जबकि दूसरी मर्यादा को ठेस पहुंचाने के संबंध में है.

बृजभूषण ने कहा , ”महिला पहलवानों की सभी मांगें मान ली गई हैं, मेरे खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है, फिर भी वे धरने पर बैठे हैं. क्यों?’ उन्होंने कहा कि उनका कार्यकाल पूरा हो चुका है और महासंघ के अध्यक्ष के चुनाव के साथ अपने आप ही इस्तीफा हो जाएगा. नए चुनाव तक वह सिर्फ कार्यवाहक की भूमिका निभा रहे हैं. उन्होंने सवाल दागा कि यदि वह पिछले 12 साल से खिलाड़ियों का यौन शोषण कर रहे था, तो वे आज तक कभी पुलिस स्टेशन, फेडरेशन अथवा सरकार के पास शिकायत लेकर क्यों नहीं गए? सीधा जंतर-मंतर पर धरना देने क्यों पहुंच गए.

डब्ल्यूएफआई के चीफ बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवान जंतर-मंतर पर जमकर प्रदर्शन कर रहे हैं। रेसलर्स ने बृजभूषण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। ओलिंपिक मेडलिस्ट बजरंग पूनिया, साक्षी मलिक जैसे बड़े पहलवान इस प्रदर्शन को लीड कर रहे हैं। कई सीनियर रेसलर्स इस प्रोटेस्‍ट का हिस्‍सा हैं।