सोनी पांडेय की कवितायें

सोनी पांडेय
कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com
अब मैँ यकीन कर लेना चाहती हूँ

अब मैँ यकीन कर लेना चाहती हूँ
कि सूरज दहकता है और
उसकी किरणेँ गाती हैँ
सतरंगी क्रान्ति गीत
दहकता है मलय पवन
शोला बन
गंगा की लहरेँ उफनतीँ हैँ
लावे की तरह
चूल्हे की चिन्गारी लिख सकती है
उत्थान पतन
हाँ बस करना होगा यकीँ
कि यहीँ लिखी जाती है
इबारत उन सभ्यताओँ की
जिनके अवशेष बताते हैँ
उस युग के क्रान्ति का आख्यान
और हम लेते हैँ सबक
नव क्रान्ति का
क्रान्ति होती रही है
क्रान्ति होती रहेगी
जब जब टकराऐँगीँ अहंवादी ताकतेँ
जीवन .जमीन .जंगल .
पहाड और पानी से
तब तब सूरज दहकता हुआ लाल रंग उगलेगा
और फिजा मेँ फैलाऐगा
सूर्ख लाल रंग
मेरी हथेलियोँ की मेँहदी
हाथ की चूडियाँ
माँग का सिन्दूर
और रसोँई की दीवार तक
फैलाऐगा लाल रंग
हाँ मुझे यकीन होने लगा है

मुझसे मत पूछना पता

सुनो !
मुझसे मत पूछना पता
काबे और काशी का
मत कहना जलाने को
दीया आस्था का
क्योँ कि मेरी जंग जारी है
अंधेरोँ के खिलाफ
मैँ साक्षी हूँ
इस सत्य का कि
अंधेरोँ की सत्ता कायम
आज भी
सुनो !
तुम्हारे आस्था के केन्द्र पर
मेरी माँ रखती थी
अपने विश्वास का कलश
पूजती थी
गाँव के डीह .ब्रह्म .शीतला को
निकालती थी अंगुवा पुरोहित को
देती थी दान .भूखे .नंगोँ . भिखमंगोँ को
कडकडाती ठंड मेँ नहाती थी कतकी
जलाती थी दीपक
तुलसी के चौरे पर आस्था का
रखती थी विश्वास कि
ये सारे जप .तप . होम .व्रत
की अटल दीवार
उसके परिवार को
बेटियोँ को
रखेगा सहेज कर
होगा चतुर्दिक मंगल
किन्तु नहीँ रोक पायी

शहीद होने से अपनी कोख के प्रथम अंश को
दहेज की बलिबेदी पर
वह आज भी चित्कारती है
पकड कर पेट को
नहीँ रोक पाये तुम्हारे काबे काशी
वेद पुराण
उसके कोख को छिलने से
इस लिऐ मुझसे मत पूछना पता
किसी काबे काशी का
मेरी जंग अंधेरोँ के खिलाफ जारी है ।


मैँ और मेरा अस्तित्व
जब भी तलाशने निकलती हूँ
अपना मैँ
वह दरवाजे पर
खूँटे से बँधी
गाय के गले मेँ लटक रही
मजबूत रस्सी मेँ अटक जाता है ।  हाँ , उस वक्त मैँ दुधार गाय सी लगती हूँ ।

कभी
दरवाजे पर टँगे पर्दे सा लगता है
मेरा मैँ
जो इस लिए टांगा जाता है
कि , अन्दर की बात अन्दर ही रहे
और छुपा रहे घर का रहस्य ।

हाँ , मैँने देखा है अपनी माँ को
रसोई में
लड़ते हुए अभावों , मंहगाई और असहमतियों से
हर बार हार जाता है मेरा मैं
रसोई में
केवल शेष बचता है माँ का अस्तित्व
और खत्म हो जाती है
उसी क्षण मैं की तलाश
शेष बचता है केवल और केवल
एक बन्धन माँ का
जानते हो पुरुष !
तुम इसी लिए जयी रहे सदा
क्योंकि कि तुमने जिन्दा रखा
मेरे मैं  में  समाहित
माँ का विराट अस्तित्व ।


 ये जो पर्दा है . . .


ये जो पर्दा है
मेरी सीमा रेखा से सटा , खडा
संस्कारोँ के सख्त चादर से बना है
इस्पाती ।

इसके एक -एक ताने -बाने मेँ
सैकड़ोँ नियम हैँ
जप, तप , होम , व्रत आदि . आदि ।

नैतिकता के साँचे मेँ
संस्कारोँ की सूई से
सिली गयी चादर
और धर्म , कर्म . पाखण्ड के
सैकड़ोँ बूटे टांके गये
मेरी सीमा रेखा से सटे परदे मेँ ।
इस पर्दे के बाहर पाँव रखते ही
मैँ घोषित कर दी जाऊँगी
बे - पर्दा औरत
रोक दिया जायेगा
आस - पास की औरतोँ को
मेरे निकट आने से
क्योँ कि सामाजिक नियमोँ के साँचे मेँ ढली औरत
मेरे निकट आते ही
तोड़ सकती है, इनके बनाये हुये
संस्कारोँ के तटबन्ध को
बह सकती है
अविरल , उन्मुक्त
परम्पराओँ की डयोढी उलांघ
बुन सकती है
एक नया पर्दा
जिसे सदियोँ से अपनी विजय पताका बना
लहराता रहा पुरुष
कहो पुरुष!
तुम क्योँ नहीं रखते कल्याण कामना के लिये
असंख्य निर्जला व्रत ?
क्या ये सारे ठेके
केवल मेरे हिस्से है ?

सीमा रेखा





एक बड़ी महीन रेखा
खीँची गयी
मेरे और तुम्हारे मध्य
उस दिन
जब मैँ तुम्हेँ जन्म दे रही थी ।

मैँ जन्म देकर धरती होगयी
और तुम मेरा अंश होकर आकाश ।

तुम्हारे आकाश मेँ
टंके थे
नवग्रह , सप्त ऋषि ,सूर्य . अन्द्र , तारे
तुम दिन मेँ दमकते
और रात को चमकते रहे ।

मैँने उगाया अपने गर्भ में
नदी , पहाड़ . झरने
जंगल और जीवन
अपना लहू पिला
साटे रही छाती से
फिर क्यों  रौँदी गयी?
कहो पुरुष !

 हाँ मैँ एक प्रश्न चिह्न हूँ . तुम सदियोँ से लगाते रहे हो
एक आरोप
कि , तुम्हारे देवता भी
मुझे समझने मेँ असमर्थ रहे हैँ।
तुम नहीँ पढ सकते नारी चरित्र
तुम्हारा ज्ञान और विज्ञान
असमर्थ है
मन का विज्ञान भी पानी मांगता है ।
कितना निर्थक है
हे देव पुरुष !
तुम्हारा अनर्गल आरोप
मुझे पढने के लिए
ब्रह्मांड की किसी पोथी की नहीँ
केवल दृष्टि चाहिए
मेरी
बन सको तो बनो
किसी की अनचाही संतान
किसी के प्रेम को समेट लो
मन की पिटारी मेँ
अपने अस्तित्व को समेट लो
घर के चौखट मेँ।
सहला सको उन घावोँ को
जिन्हेँ स ऊरी मेँ जीती रही
बेटी की भाँ ।
जीओ मुझे मेरे वजूद के साथ
देखना मैँ हल हो जाऊँगी
उसी क्षण
हट जाऐगा प्रश्न चिह्न ।
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