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कार्बाइड का कलंक

स्वाति तिवारी


लेखन की कई विधाओं में सक्रिय स्वाति तिवारी मध्यप्रदेश सरकार की एक अधिकारी हैं.   संपर्क : stswatitiwari@gmail.com

( ३० साल हो गए हैं उस  हादसे के जब यूनियन कार्बाइड ने भोपाल में हजारो लोगों को तबाह कर दिया , देखते -देखते एक शहर मुर्दों के टीले में बदल गया था. स्वाति तिवारी ने इस हादसे की शिकार परिवारों की औरतों का दर्द दर्ज किया है , अपनी पुस्तक  ‘ सवाल आज भी ज़िंदा हैं’ में. दो दिसंबर को भोपाल त्रासदी की बरसी है , स्त्रीकाल के पाठकों के  लिए स्वाति तिवारी की किताब से दो अंश . कल ( दो दिसंबर ) का  अंश  पीड़ित/ प्रभावित  स्त्रियों से बातचीत और मुलाक़ात पर आधारित होगा . )

शुरू करते हैं यूनियन कार्बाइड से। एक ऐसा कलंक, जो हमारे माथे पर गहरा लगा है। हादसे ने तो इसे दुनिया के सामने जाहिर कर दिया। देश भर में हर दिन होने वाले छोटे-मोटे हादसों का एक सबसे बड़ा प्रतीक, जिनमें हमारी व्यवस्था उतने ही निष्ठुर और निर्मम रूप में सामने आती है, जितनी भोपाल में देखी गई। तारीख 11 जनवरी 2011। गैस पीडि़त औरतों की दुनिया में दाखिल होने से पहले मैं इसी कलंकित कार्बाइड को नजदीक से देखना चाहती थी। कीटनाशकों के उत्पादन का वह अमेरिकी उद्योग, जो भारत में मौत का दूसरा भयावह नाम बन गया। हादसे के ढाई दशक गुजरने के बाद वह किस हाल में है, यह जानने के लिए मैंने उसी की तरफ कदम बढ़ाए। मैंने जानबूझकर वहां तक जाने का लम्बा रास्ता चुना जो पुराने भोपाल से होकर जाता है। भोपाल की इन्हीं सडक़ों पर उस रात मौत का तांडव हुआ था। इन पर अब तक लाखों पन्ने लिखे जा चुके हैं। हजारों ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें छपी हैं। मैंने भी देखीं हैं। लाशों के ढेर। बच्चे, बूढ़े, जवान, औरतें और पशु-पक्षियों की मौत से लबालब तस्वीरें। मौत अपनी फितरत के मुताबिक ही बेरहम थी। उसने हिंदु, मुसलमान, सिख, ईसाई, अमीर, गरीब सब पर एक साथ हमला बोला। उसकी आमद सबसे ज्यादा थी इसी इलाके में।

जब मैं कार्बाइड के करीब जा रही थी तो बाजारों में रौनक दिखी और रास्तों पर भीड़। सडक़ किनारे सब्जी, भाजी के ठेले लगातार मुश्किल होते यातायात में सदाबहार किरदारों की तरह भीड़ जुटाए खड़े थे। ड्रायवर ने गाड़ी गलती से कारखाने के मुख्य दरवाजे से कुछ आगे बढ़ा दी थी। रुककर एक ऑटो वाले से कार्बाइड में जाने का रास्ता पूछा। उसने बायां हाथ उठाया और कहा, वो मौत का कारखाना तो पीछे छूट गया है। मैं जैसे ही पीछे मुड़ी तो देखा सामने एक स्मारक है, जो दुनियाभर में इस त्रासदी की पहचान बन चुका है। यह एक आदमकद मूर्ति है। एक मां की मूर्ति, जिसकी गोद में एक बच्चा है। बच्चा उसके आंचल को थामे हुए है। एकदम सादा इस सफेद मूर्ति को मैंने छूकर देखा, नीचे से ऊपर तक। फिर एक परिक्रमा की। मैं चारों ओर से उसे देखना चाहती थी। मां के अलावा और कोई शिल्प इतना बोलता, झकझोरता और मार्मिक नहीं हो सकता था। भोपाल की उस भयावह रात का सबसे संजीदा प्रतीक। मुझे इस प्रतिमा में वह युवती नजरआई, जो अपने होने वाले पहले बच्चे के लिए गुलाबी स्वेटर बुन रही थी। अगर उसका बच्चा हो भी जाता तो शायद इसी हाल में वह कहीं भीड़ में भागती हुई मारी जाती। मौत से बचने की कोई सूरत उस रात नहीं थी। यह सोचते हुए मेरी आंखें भीग गईं। मुझे लगा कि मैं ही हूं, जो भागते हुए गैस की शिकार हो गई हूं। मैं ही हूं, जिसके हाथों बना गुलाबी स्वेटर कहीं पीछे छूट गया है।
मैं सोच ही रही थी कि इस प्रतीक को एक मां ही गढ़ सकती है। तभी मेरी निगाह मूर्ति पर उकेरे शब्दों पर गई, जिस पर लिखा था-रुथ वाटरमेन। पता किया तो मालूम चला कि यह महिला नीदरलैंड  से कुछ दिनों के लिए भोपाल आई थी। यह मार्मिक यादगार उसी की बनाई है। एक स्त्री और मां ही यह कर सकती थी। फिर वह चाहे हिन्दुस्तान की हो या नीदरलैंड  की। औरत औरत होती है। उसकी प्रकृति और उसका अंतस एक सा ही होता है। वह किसी मुल्क, किसी मजहब और किसी कालखंड  की ही क्यों न हो।

हादसे का यह यादगार प्रतीक किसी हरे-भरे उद्यान से घिरे मैदान में इज्जत से स्थापित नहीं है, जैसा कि आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय पहचान के ऐसे स्मारक होते हैं। यह माँ तो कार्बाइड के ठीक सामने सडक़ पर खड़ी है, न कोई रखवाली करने वाला है और न ही कोई देखभाल करने वाला। भारत की उपेक्षित अवाम, खासतौर पर औरतों की एक सबसे असल और सशक्त प्रतीक! न जीते-जी किसी ने परवाह की और मरने के बाद बना दिए गए इस बेजान बुत के साथ भी वही सलूक। हमेशा से यही होता आया है। वे तहजीब के नाम पर परदों के अंधेरों में धकेली जाएं या ऑनर के नाम पर किल की जाएं। उन्हें इज्जत से बराबरी के दर्जे पर रखना अभी एक सुनहरा ख्वाब भर है!

इस स्मारक से सटी हैं वे इंसानी बसाहटें, जहां गैस ने सबसे पहले हवाओं में दस्तक दी थी। कार्बाइड की मौत उगलती चिमनियों से महज पांच सौ कदमों के फासले से शुरू होती हैं ये अभागी बस्तियां। वक्त के साथ तब की झुग्गियों की बनावट जरूर बदल गई है। कई रहने वाले भी बदल गए। अब यहां एक नई पीढ़ी सांसें ले रही है। लेकिन यहां की तीन पीढिय़ों को हादसे की स्मृतियां अनेक हैं। भोपाल हादसा और हिटलर के गैस चेम्बर अलग नहीं हैं। प्रथम विश्व युद्ध में फास्जीन मस्टर्ड गैस का उपयोग किया गया था। इसी जहरीली गैस ने दूसरे विश्व युद्ध में भी कहर ढाया था। हिटलर ने जर्मनी में लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने के लिए इसी जहरीली गैस का इस्तेमाल कुख्यात गैस चेंबरों में किया था। वही गैस पूरे भोपाल को भी जहरीले चेम्बर में बदल चुकी थी।

रूथ वाटरमेन के लिए यह मानसिक स्मृति यातना का दौर रहा होगा और जब पीड़ा का आवेग असहनीय हो गया होगा तो वे भारत की यात्रा पर निकल पड़ी होंगी। अपनी स्मृतियों में खोई हुई अपनी मां को यहां किसी मां में ढूंढती हुई वे जब यहाँ अनाथ ममता से मिली तो माँ की ममता का यह यादगार मूर्त रूप खड़ा कर गयी। मैंने कहीं  ‘रूथ वाटरमेन एण्ड स्टोरी आफ ममता।’ यह एक व्यथा है। ममता भी रूथवाटरमेन की तरह हादसे में माता-पिता और भाई को खो चुकी थी। स्मारक में ममता माँ के पीछे खड़ी है। यह उसकी जिंदगी में आई हादसे की काली रात की कहानी है। तब वह भी अपनी माँ के भी पीछे-पीछे थी। कब साथ छूटा पता ही नहीं चला। ममता की मां की बांहों में झूलता वह छोटा बच्चा वहीं मर गया था और रोती बिलखती बेबस मां भी मौत के मुंह में समा गई। उसे न इलाज का पैसा मिला न  इसीलिए वह पढ़ाई नहीं कर सकी। रूथ वाटरमेन अपनी ही तरह की पीड़ा से लड़ती उस नन्हीं ममता से मिली। ममता में उसने खुद की तकलीफों को जिंदा देखा तो जो शिल्प की शक्ल में सामने आया, वह यही स्मारक दुनिया के सामने था। स्मारक के रूप में यह गैस त्रासदी की पहचान बन चुकी मां है। कारखाने को पीठ दिखाती इस प्रतिमा पर तीन तरफ शिलालेख लगे हैं, जिन पर उर्दू, अंग्रेजी और हिन्दी में लिखा  है – हिरोशिमा नहीं..भोपाल नहीं..हम जीना चाहते हैं..उन हजारों लोगों को समर्पित जो २ और ३ दिसंबर की रात, बहुराष्ट्रीय हत्यारे यूनियन कार्बाइड के हाथों मारे गए।

ऐसा विकट हादसा झेलने वाला भोपाल दुनिया में इकलौता शहर है और भोपाल में यह जगह इकलौता ठिकाना है, जहां एक यादगार बननी ही चाहिए थी, जो आने वाली पीढिय़ों को इस भयानक हादसे की याद दिलाती। लेकिन हम यह नहीं कर सके। हम यह जाहिर नहीं कर सके कि हमने कोई सबक भी सीखे हैं। बल्कि हमने यह जाहिर किया कि हम दिसंबर 1984 के पहले जैसे थे। वैसे ही अब हैं। सुधार में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। जो हो रहा है, होने दीजिए। जो चल रहा है, चलने दीजिए। परवाह मत कीजिए। यहां लोगों की याददाश्त बहुुत कमजोर होती हैं। वे सब भूल जाएंगे। थोड़े दिन गुस्सा होंगे। गरियाएंगे। फिर किसे याद रहेगा कि क्या हुआ था? आप तो मजे कीजिए।क्या हमारी व्यवस्था और व्यवस्थापकों की नजर में गैस हादसा, हर दिन होने वाली दूसरी मामूली दुर्घटनाओं की तरह एक और दुर्घटना थी, जो उस रात घटी? अदालत में तो बाकायदा इस हादसे को इसी दिशा में मोड़ भी दिया गया था। हादसे के वक्त देखा ही कि किस तरह सरकारें सबूत मिटाने में लगी थीं। वे किसके लिए काम कर रही थीं? जाहिर है कि फिर किससे उम्मीद की जाए? यूनियन कार्बाइड के बाहर और इस बुत के सामने कई सालों से देश-विदेश के संवेदनशील कार्यकर्ता और कलाकार अपने दिल की बात दीवारों पर उकेरने आते रहे हैं। मैंने देखा कि एक जगह म्यूरल बनाकर कलाकारों ने अपने दर्द को दीवारों पर कुछ इस तरह बयान किया-
हमारे शहर पे जब मौत का गुबार गिरा
हवास खो गए, पैदल गिरा सवार गिरा।
जरा सी देर में सांसों के पड़ गए लाले
गिरा जमीन पर जो भी, वो बेकरार गिरा।
सिवाए अपने किसी जात की खबर न रही
सडक़ पे टूटके रिश्तों का एतबार गिरा।
वो हंसता-खेलता भोपाल बन गया मकतल
हर एक कूचे में लाशा जो बेशुमार गिरा।
-ज़फर सेहवाई

स्मारक और आसपास की कार्बाइड की दीवारों पर दर्ज तस्वीरों और नारों को पढ़ते हुए मैं 93 एकड़ के उजाड़ परिसर की तरफ बढ़ती हूं। अब यह ताकतवर अमेरिकी उद्योग परंपरा एक शानदार कारखाना नहीं बल्कि जहरीले अपशिष्ट से भरा एक सिरदर्द बन चुका है। अंदर-जाने के लिए कोई रोक-टोक नहीं है अब। कीटनाशकों के उत्पादन के अपने बेहतरीन दौर में शायद ही कोई बाहरी आदमी यहां दूर भी फटक पाता होगा। लेकिन अब इसका काम खत्म हुए 26 साल गुजर गए हैं। यह अपने घातक रसायनों के इस्तेमाल का असर इंसानी चूहों पर देख चुका है।

मुझे अंदर जाते हुए किसी ने नहीं रोका। होमगार्ड के चंद जवान सर्दी में धूप सेंकते हुए इसकी सुरक्षा के लिए तैनात जरूर थे, लेकिन शायद अब किसी को रोकने की जरूरत ही कहां थी? यह हत्यारी फैक्टरी अपना काम खत्म कर चुकी थी। धातु के इस बेजान ढांचे और खंडहर होती इमारतों में हर तरफ मख्खी और मच्छर जैसे कीटों की भरमार थी, जो बीमारियों की शक्ल में इंसानों के लिए हमेशा से ही मुश्किल पैदा करते रहे हैं। यूनियन कार्बाइड में इन्हीं कीटों के नाश के उपाय किए गए थे, लेकिन उन्होंने इंसानों के साथ ही कीट-पतंगों का सलूक किया। मैंने महसूस किया कि हमारे आसपास मंडरा रहे अनगिनत कीट-पतंगे कार्बाइड को चिढ़ा रहे हैं। मैं देख रही थी एक अमेरिकी आसुरी उद्योग का मायाजाली विस्तार। करीब 80 एकड़ जमीन पर। जहरीली दवा बनाने वाली फैक्ट्री के संयंत्र में हर तरफ झाड़-झंखाड़ और गाजर घास का कब्जा था। यह कारखाना भारत में इस बात का स्मारक जरूर है कि ताकतवरों के आगे अवाम की हैसियत कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा न आजादी के पहले थी, न आजादी मिलने के बाद है! जीते-जी यह कारखाना भी इसी हकीकत की मिसाल था और इसने दिसंबर 1984 में दुनिया के सामने इस हकीकत के सबूत भी दे दिए। बंद होने के बाद उजाड़ शक्ल में भी यह उसी हकीकत की याद दिलाता रहा है। शायद इसीलिए सरकारों को लगा हो कि अलग से किसी स्मारक को बनाने की जल्दी क्या है? लोग सीधे असली स्मारक को ही आकर देख लें। सर्दी की इस सुबह मैं इसी असली स्मारक के सामने थी।

दीवार फांदकर भीतर आने वाले बच्चे, जो पतंगें उड़ा रहे थे। बकरी चराती एक बूढ़ी औरत, जो सूनी आंखों से कभी कारखाने को देखती है तो मुंह फेर लेती है। कार्बाइड के पड़ोस की ये दो पीढिय़ां कभी भी यहां देखी जा सकती हैं। एक पीढ़ी ने हादसे को देखा और भोगा है और नई पीढ़ी ने सिर्फ सुना है या तस्वीरों और खबरों में देखा-पढ़ा है। कारखाने के बाहर आंखों के सामने हैं घनी बस्तियां। संकरी गलियां। गंदगी। बदइंतजामी। फटेहाली। बेबसी। गलियों में अंदर चहलकदमी कीजिए। किसी घर के दरवाजे पर दस्तक दीजिए। बेमकसद बैठे या टहलते लोगों की शक्लें देखिए। एक अजीब सा अहसास भीतर कड़वाहट घोल देता है। यहां आकर गैस हादसा पीछे छूट जाता है। सिर्फ सवाल सर्प की तरह फन उठाने लगते हैं। साठ साल से सरकारों के दावे, आश्वासन, नीयत और नीतियों, अरबों की योजनाओं और उनके बेईमान अमल का सबूत है यह सब। एक दिशाहीन देश की दर्दनाक तस्वीर! शाम ढले जब कारखाना देखकर घर लौटी तो सबसे पहले भरे मन से मैंने अपनी डायरी में लिखा-
कार्बाइड के इस आंगन में
उग आए हैं कुछ नीम के प़ेड
फुदकने लगी हैं कहीं-कहीं गौरय्या
दूर ऊंचे ताबूत पर आ बैठे हैं कबूतर
वो अनजान गाय चरती बैठी हैं
भोले बच्चे ले आए हैं पतंग की डोर
डर लगता है मुझको अब……
कहीं ऐसा ना हो…..
कहीं से कोई ले आए अनुमति
की कोई नई पतंग,
लिख दे जिस पर हुक्मरान
यहां फिर बनेगी जहरीली गैस
यह कहकर किसी बच्चे को
पक ड़ा दे डोर….जाओ उड़ाओ
हजारों चेहरों के गुब्बारे
भरकर मिक या फास्जीन
या कोई और
क्या पता…….?
पड़ी मशीनों पर तरस खाकर
उद्योगों को मध्यप्रदेश की धरती पर
जमाने की चाह में एक बार फिर
बनने लगे ऐसी ही कोई जहरीली चीज
खुदा ना करे….. फिर कहीं भोपाल
की पुनरावृत्ति हो…

यूनियन कार्बाइड वही है जिसे अमेरिका की वित्तीय मामलों की प्रसिद्ध पत्रिका ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ ने १९७९ के प्रारंभ में एक ‘भारी भरकम, भद्दा जोखिम भरा उद्योग’ कहा था। दुनिया भूली नहीं है कि साठ-सत्तर के दशक में इसे पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन ठहराया गया था। जो कुछ भोपाल ने भोगा इसी भयावह नतीजेे की आशंका को देखते हुए कई देश इसे नकार चुके थे। इसी कार्बाइड को कनाडा तथा स्कॉटलैण्ड से बाहर निकाल दिया गया था। वही जिसके बारे में अमेरिकी व्यापारिक पत्रिका ‘फॉरचून’ ने कहा, ‘यूनियन कार्बाइड मुनाफा खोरी से ग्रस्त एक ऐसा प्रतिक्रियावादी राक्षस है, जिसे नागरिकों की भलाई से कोई वास्ता नहीं है।’ भोपाल इस बात का गवाह है कि इसमें से कुछ भी गलत नहीं था। लेकिन गलती की परवाह हमारे यहां कौन करता है। भारत शायद दुनिया का अकेला देश है, जो मुसीबतों को गले लगाता है और इतिहास से कभी कोई सबक नहीं सीखता।
तभी तो यहां एक बड़े उद्योग की स्थापना के नाम पर कृषि मंत्रालय ने किसी बड़ी खुश खबरी की तरह बाकायदा अधिकारिक के जरिए एडुआर्डो म्यूनाज को सूचित किया था कि सरकार यूनियन कार्बाइड को प्रतिवर्ष पांच हजार टन कीटनाशक के उत्पादन का लाइसेंस प्रदान कर रही है।  यह वास्तव में सेविन के उत्पादन का निमंत्रण था, जिसका अर्थ था इस संयोजन में शामिल सभी रासायनिक तत्वों को भारत में ही तैयार किया जा सकेगा। शायद यही वह पहली भूल थी, जिसने भोपाल को मौत के मुंह में ढकेल दिया था।

बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड ने सन् १८८६ के आरंभ में शुष्क सेल बेटरी बनाना शुरू किया था। सन् १९१४ से १९१८ तक कुछ नए उत्पादों को इसने अपनी योजना में शामिल करते हुए बैटरियां, एसीटिलीन स्ट्रीट लाइट के लिए आर्म लैम्प और कारों के लिए हेड लैम्प बनाकर लोकप्रियता हासिल की।  इस तरह यह एक स्थापित कम्पनी बन गई। १९१७ में यूनियन कार्बाइड ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार शुरू किया और चार अन्य कम्पनियों का संविलियन करते हुए यूनियन कार्बाइड एवं कार्बन कार्पोरेशन की स्थापना की। देखते-देखते यह विश्व के ३८ देशों में १३४ विभिन्न उद्योगों का एक बड़ा साम्राज्य बनाने में कामयाब हो गई। पेट्रोल, कोयला और प्राकृतिक गैस के भण्डार खोजने वाली इस कम्पनी ने कनावा घाटी में ही विभिन्न कारखानों में दो सौ रासायनिक द्रव्यों का उत्पादन किया था।

कार्बाइड ने बहुत से द्रव्य एथलीन आक्साइड, क्लोरोफार्म, एक्रीलोनीट्राइल, बेंजीन, विनाइल क्लोराइड जैसे घातक रसायन तो बनाए ही, साथ ही पेट्रो केमिकल्स उद्योग में उपयोग की जाने वाली गैसों, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बनिक गैस मिथेन, एथीलीन प्रोपेन और रासायनिक द्रव्यों, अमोनिया और यूरिया की भी सबसे बड़ी आपूर्तिकर्ता बन गई। उच्च तनाव उपकरण एरोप्लेन टर्बाइन में प्रयुक्त कोबाल्ट, क्रोम, टंगस्टन जैसे उपकरण बनाकर अपने भाग्य को आजमाने लगी। इसके साथ ही वह संवेदनशील धातुओं के निर्माण के अलावा घरेलू उपयोग में आने वाली छोटी-छोटी वस्तुओं के निर्माण में भी लगी थी। जहर से लेकर रोजमर्रा तक अपना व्यवसाय फैलाने वाली यूनियन कार्बाइड प्लास्टिक बोतलें, खाद्य पदार्थ पैङ्क्षकग, फोटोग्राफिक फिल्म, एरोसोल लाई, ङ्क्षसथेटिक हीरे बनाते-बनाते मच्छर मारने का स्प्रे तक बनाने लगी और मच्छर मारते-मारते यह कृषि की तबाही के जिम्मेदार कीट पतंगों को मारने के स्प्रे भी बनाने का सोचने लगी।

प्रथम विश्व युद्ध में एक जहरीली गैस के प्रयोग ने कार्बाइड को एक नए कारोबार का विचार दिया। प्रथम विश्वयुद्ध में फॉस्जीन मस्टर्ड गैस का उपयोग किया था। इस जहरीली गैस ने हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। इसी जहर से प्रेरित होकर कम्पनी रसायनों के प्रति ज्यादा उत्साही हुई।  मीडिया प्रकाशनों और लेखकों ने इस जहरीली परंपरा के घातक परिणामों पर खूब लिखा है।दिनमान साप्ताहिक ने १६ दिसम्बर, १९८४ को बताया, ‘दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नागासाकी में इसी गैस ने कहर बरपाया था। हिटलर ने जर्मनी में लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने के लिए इसी जहरीली गैस का इस्तेमाल कुख्यात गैस चैंबरों में किया था।’  जनसत्ता ने बताया, ‘फॉस्जीन गैस पहली बार प्रथम विश्वयुद्ध में इस्तेमाल हुई। १९१८ की २५ एवं २६ जनवरी को जर्मनी ने पेनसेविले के नजदीक मित्र राष्ट्रों के सैनिकों पर इसका इस्तेमाल किया था और बदले की राजनीति की तरह इसके जवाब में जून १९१८ में अमेरिका ने भी फ्रांस के बोस-द-मोर्ट नामक स्थान पर जर्मनी के खिलाफ फॉस्जीन नामक इसी गैस का इस्तेमाल किया।’ मैक्सिको में इस गैस की मामूली मात्रा ने मौत और दहशत का बवंडर खड़ा कर दिया था। भोपाल का दुर्भाग्य था कि यह मात्रा पूरे चालीस टन थी। हादसे से जाहिर है कि यह 15 हजार लोगों को मौत के घाट उतारने के लिए काफी थी और लाखों को हमेशा के लिए अपाहिज बनाने में। अगली पीढिय़ों तक इसके असर दिखाई देेने वाले थे।

डोमिनीक लापिएर और जेवियर मोरो बताते हैं  कि 38 देशों, जहां यूनियन कार्बाइड ने अपना नीला और सफेद ध्वज फहराया था, इनमें से किसी भी देश ने कम्पनी के साथ इतने दीर्घकालिक एवं उत्साहपूर्ण सम्बन्ध स्थापित नहीं किए थे, जितने भारत ने। शायद ऐसा इस तथ्य के चलते था कि यह बहुराष्ट्रीय कम्पनी लगभग एक शताब्दी से करोड़ों भारतीयों को बिजली उपलब्ध करा रही थी। कार्बाइड के लैंपों ने भारतीय उप-महाद्वीप के सर्वाधिक दूर-दराज के गांवों में प्रकाश फैला दिया था। वार्षिक बीस करोड़ डॉलर टर्नओवर वाली, यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड न्यूयार्क मल्टीनेशनल ग्लोबलाइजेशन पॉलिसी का सफल नमूना था। भारत में यूनियन कार्बाइड सन् १९०५ में नेशनल कार्बन कम्पनी (इंडिया) लिमिटेड के नाम से आई। यहां सबसे पहले कम्पनी ने बैटरी के क्षेत्र में काम शुरू किया। यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन (अमेरिका), भारत में यूनियन कार्बाइड (इंडिया) लिमिटेड के नाम से सन् १९३४ में कलकत्ता में स्थापित हुई। इसका रजिस्टर्ड कार्यालय कलकत्ता में ही है। भारत में इसने तेरह कारखाने डाले। पहला केमिकल संयंत्र १४ दिसम्बर, १९६६ को स्थापित  किया। यह ट्राम्बी द्वीप के ऊपर था।

१९७० में यूनियन कार्बाइड ने भारत में ‘सेविन’ बनाने का लाइसेंस मांगा। सन् १९७३ में यूनियन कार्बाइड (इंडिया) लिमिटेड और यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन (अमेरिका) के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते में तय हुआ कि ‘सेविन’ और कुछ अन्य कीटनाशक भारत में ही बनाए जाएंगे लेकिन इसके लिए मिथाइल आइसोसाइनेट को अमेरिका से आयात किया जाएगा। साथ ही साथ सेविन बनाने के लिए आवश्यक मशीनरी भी आयात होगी। इस अभागे शहर में १९६७-६८ में जब कार्बाइड की स्थापना की गई तब यह इलाका नगर निगम क्षेत्र के बाहर था। आबादी बढ़ी तो शहर ने पैर पसारे। धीरे-धीरे शहर कार्बाइड के करीब आ गया। १९७५ में तत्कालीन नगर निगम प्रशासक महेश नीलकंठ बुच द्वारा यूनियन कार्बाइड को नोटिस दिया गया कि यह क्षेत्र अब निगम सीमा क्षेत्र में है। अत: कारखाने को शीघ्र ही सीमा से बाहर ले जाया जाए। कार्बाइड के सितारे बुलंद थे। बुच कुछ कह पाते इसके पहले ही उनका तबादला हो गया। कार्बाइड के तत्कालीन महाप्रबंधक सी.एस. राम द्वारा नगर निगम को वद्र्धमान पार्क के निर्माण के नाम पर २५ हजार रुपए का चन्दा दिया गया। नोटिस ठण्डे बस्ते में चला गया। और भोपाल में काली ग्राउंड स्थित कार्बाइड संयंत्र सघन आबादी के बीचों-बीच शान से खड़ा रहा।

कम्पनी ने अपनी सुविधाएं देखीं और सरकार ने एक बड़ा जोखिम अनदेखा कर दिया। अनदेखी का परिणाम ही था कि सरकार ने भोपाल स्थित काली परेड ग्राउंड की पांच एकड़ जमीन यूनियन कार्बाइड को आवंटित कर दी। यही सबसे खतरनाक भूल थी। सरकार ने यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि इस कारखाने में किस तरह के रसायनों का उत्पादन किया जाएगा। वैज्ञानिकों और पत्रकारों की चेतावनी को भी नकार दिया कि ये रसायन मनुष्यों और प्रकृति के लिए कहीं घातक तो नहीं। भोपाल संयंत्र १९६९ में प्रारंभ हो गया था, जिसमें सबसे पहले सांद्रित द्रव से कार्बमेट पेस्टीसाइड बनाता था। उसके बाद १९७५ में भारत सरकार ने यू.सी.आई.एल. को सेविन के नाम से कार्बोरिल बनाने का लाइसेंस दे दिया। इसके बाद इंडिया में जैसे यूनियन कार्बाइड की हर मांग को आंखें बंद कर स्वीकार करते जाने का चलन हो गया और १९७८ में वीरेन्द्र कुमार सकलेचा के मुख्यमंत्रित्वकाल में कम्पनी ने मध्यप्रदेश के प्रदूषण नियंत्रण मंडल से हरी झंडी हासिल की। यह ग्रीन सिगनल एक और बड़ी भूल साबित हुआ, क्योंकि यूनियन कार्बाइड ने फॉस्जीन जैसी अति घातक गैस बनाने का कनाडा प्लान्ट भोपाल स्थानान्तरित कर लिया। कनाडा सरकार ने जिसे हटाने का नोटिस दे दिया था।

कुछ वर्ष तक एम.आई.सी. वेस्ट वर्जीनिया स्थित यूका कारखाने से आयात की जाती थी। सन् १९७९ में भोपाल में ही दूसरी जहर एम.आई.सी. उत्पादन की इकाई भी स्थापित हो गई।  कारखाने के टैंक ६१० एवं ६११ में परिष्कृत एम.आई.सी. का संग्रहण किया जाने लगा। यह भोपाल में मौत की दस्तक की उलटी गिनती की शुरुआत थी…सरकार भले ही आंखें मूंदे रही हो, लेकिन ऐसा नहीं था कि सब सोए हुए थे। भोपाल मूल के वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार केसवानी के खाते में सिर्फ यह चमकदार क्रेडिट है कि उन्होंने सबसे पहले दुनिया को कार्बाइड के खतरे से चेताया।  एक अक्टूबर १९८२ को उन्होंने लिखा था कि ‘मानवीयता के विरुद्ध एक घृणित षडय़ंत्र चल रहा है। अपनी-अपनी धुन में डूबे लोग बेखबर से हैं जिनको खबर है वे चुप हैं। मौत दबे पांव आगे बढ़ती आ रही। भोपाल सो रहा है, फिलहाल अगली सुबह तक के लिए और किसी दिन शायद बिना अगली सुबह को जागने के  लिए।’

कार्बाइड के परिसर में जारी उत्पादन की गतिविधियों से भोपाल और देश का अवाम अनभिज्ञ था। यह बातें उसकी समझ के परे थीं कि कीटनाशक कितने खतरनाक रसायनों के सम्मिश्रण होते हैं एवं उनको प्रयोग करते वक्त किस तरह की जानलेवा लापरवाहियां होती हैं। दिसंबर 1984 में जो हुआ, वह तो दुनिया ने देखा ही, लेकिन यह एकमात्र हादसा नहीं था। यह हादसा कई छोटी-छोटी लापरवाहियों और दुर्घटनाओं के बाद का बड़ा धमाका था। एकमुश्त आखिरी धमाका। खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने माना था कि इससे पहले भी यूनियन कार्बाइड में गैस कई बार रिस चुकी थी। लेकिन न तो हमने केसवानी की चेतावनी पर कान दिए और न ही उन दुर्घटनाओं से कुछ सीखा, जो आने वाले कल की भयावता के इशारे कर रही थीं। क्या यह हादसा सोची-समझी चाल थी? क्या वाकई कोई परीक्षण हो रहे थे? इसलिए जब हादसा हो गया तो प्रतिष्ठित संस्था ‘एकलव्य’  ने लिखा कि एम.आई.सी. का प्रभाव मनुष्यों पर क्या होता है, दुनिया में इसका सबसे बड़ा प्रयोग भोपाल में हुआ। अभी तक प्रयोगशालाओं में एम.आई.सी. के प्रभाव के प्रयोग चूहों पर होते थे, लेकिन भोपाल ने तो जानवरों की जगह ‘मानव चूहे’ प्रयोग के लिए उपलब्ध करा दिए।

‘जन विज्ञान का सवाल’ शीर्षक से जारी दस्तावेज में दर्ज है कि ‘रसायन और जैविक युद्ध के बहुत से विशेषज्ञ, मनुष्य पर मिक के प्रभाव के अध्ययन करते हैं। क्लोरीन, फॉस्जीन, मिथाइल आइसोसाइनेट गैस सहित अन्य गैसों का उपयोग युद्ध में मनुष्यों को मारने के लिए कैसे किया जा सकता है। शायद आने वाले (तीसरे महायुद्ध) युद्धों में मिक के उपयोग पर उनकी आंख है।’ यूनियन कार्बाइड में जिस तरह से ये खतरनाक रसायन उपयोग होते थे, उसके हिसाब से सुरक्षा व्यवस्था और खतरे की चेतावनी देने वाले सूचक यंत्र बेहद नाकाफी थे। जो उपलब्ध थे वे काम नहीं कर रहे थे। खतरनाक मिक की इतनी ज्यादा मात्रा का भण्डारण क्यों किया गया? जबकि वैज्ञानिक जानते थे कि जरा सी भी लापरवाही बर्बादी का मंजर खड़ा कर सकती है तो उत्पादन बन्द होने की स्थिति में कर्मचारी एवं जनता व प्रशासन को खतरे की सूचना क्यों नहीं दी गई। यूनियन कार्बाइड ने सभी सुरक्षा साधन एक साथ निष्क्रिय कैसे होने दिए और आसपास के रिहायशी क्षेत्रों को बचाव की दृष्टि से प्रथम चिकित्सा प्रशिक्षण क्यों नहीं दिया गया। क्या हादसे में जीते-जी तबाह हो गई औरतों को यह कभी पता चल पाएगा कि हादसा होने दिया गया या हो गया?

मैंने यूनियन कार्बाइड के परिसर और आसपास के इलाकों को खामोशी से देखा। यह शहर मेरे लिए नया था। लेकिन अलग कुछ नहीं था। आमतौर पर जो अव्यवस्था और लापरवाही सडक़ों और टे्रफिक में देश में करीब-करीब हर जगह नजर आती है, वही बदइंतजामी यहां भी भरपूर थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि इन 26 सालों में कम से कम इस इलाके को तो रौनकदार बनाया ही जा सकता था। कुछ तो ऐसा हो सकता था, जो हमारे मानवीय सरोकारों का प्रमाण होता। क्या जापान ने हिरोशिमा और नागासाकी या अमेरिका ने वल्र्ड ट्रेड सेंटर के बरबाद बिंदुओं को नक्शे पर यूं ही रफा-दफा कर दिया था? नहीं। उन्होंने इन जख्मों को न सिर्फ भरा बल्कि इन जगहों को दुनिया की याददाश्त में लगातार जिंदा भी रखा है ताकि सदियों तक सनद रहे। भोपाल हादसे के इस इलाके में आकर किसी को लगेगा ही नहीं कि यहां कभी कुछ हुआ था? और यह वो देश है, जो अपने राजनेताओं के मरने पर आलीशान समाधियों और स्मारकों पर अरबों रुपए फूंक देता है, जबकि उनमें से ज्यादातर को लोग अपनी नजरों और यादों से उतार फेंक चुके होते हैं!

कार्बाइड के केम्पस से लौटने के बाद ऐसे ही कई सवालों से मैं घिरी रही। मैं उन लोगों से मिलना चाहती थी, जो असल में गैस की चपेट में आए। उन औरतों से जिनका सब कुछ बरबाद हो गया। वे किस हाल में रही हैं? मुझे गैस पीडि़त मजबूर औरतों के एक जनसंगठन के जाने-माने कार्यकर्ता बालकृष्ण नामदेव के बारे में पता चला। पता चला कि लिली टॉकीज के सामने तिब्बतियों की स्वेटर की मौसमी दुकानों के पीछे हर रविवार और शुक्रवार एक बैठक होती है। यह है भोपाल का नीलम पार्क। कई सालों से गैस पीडि़त निराश्रित महिलाएं यहां आती रही हैं। बैठक का तय वक्त रहा है-दोपहर बारह से चार बजे। नामदेव ने कहा कि आप वहीं आ जाइए…मुलाकात हो जाएगी। अब मैं उन महिला किरदारों से रूबरू होने वाली थी, जिनके सवाल मेरे लिए सबसे अहम थे। मेरा फोकस उन्हीं पर था। उनके बीच जाते हुए मैं डरी हुई थी। मैं एक ऐसी जमात से मिल रही थी, जो  26 साल से सिर्फ उम्मीदों के आसरे थी। जिसके लिए जिंदगी जीते-जी बोझ बन गई थी। एक हादसे ने उनकी दुनिया को उलट-पलट कर रख दिया था। कैसी दिखती होंगी वे? क्या सोचती होंगी? उनके दिन और रात कैसे कटते होंगे? जो खो गए उन अपनों की यादों के कितने टुकड़े उनके भीतर तैरते रहते होंगे? वे जो बेमौत मारे गए। आंखों के सामने। अपनी गोद में। हंसते-खेलते। मां, बाप, भाई, बहन, पति, बच्चे और पड़ोसी!

औरत ’चुप‘ रहे, तभी ’महान‘ है

सुधा अरोड़ा 
आज स्त्रीकाल के पाठकों के लिए सुधा अरोड़ा की एक छोटी सी टिप्पणी जो १९९७ में जनसत्ता में छपी थी . यह टिप्पणी सुधा अरोड़ा और अरविन्द जैन के स्त्रीकाल में प्रकाशित पिछले लेखों के साथ पढी जानी चाहिए . आलेखों के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें :

कलाकार के सौ गुनाह माफ़ हैं : सुधा अरोड़ा 
डार्क रूम में बंद आदमी की निगाह में औरत : अरविन्द जैन 

यूं भी औरत को भारतीय संस्कृति में इंसान का दर्जा दिया कब गया ? वह तो देवी है , श्रद्धा की मूर्ति है , पूजनीय-वंदनीय है और देवियां बोला नहीं करतीं। वे तो पूजा के पंडाल में सजी-धजी , मूक-बधिर ही अच्छी लगती हैं।

अपनी इस फितरत से हटकर जब वह बोलती है तो एक प्रबुद्ध पत्रकार उसे राय देते हैं – ’’आपको देर से ही सही ,अपनी-अपनी औकात का पता चल गया है तो उसको चैराहे पर चड्ढी  की तरह फींचने से कौन सा राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाएगा ?‘‘ (क्या आपने यह ’ चड्ढी  फींचना‘ मुहावरा सुना है ? मैंने तो नहीं सुना। वैसे यह अंग्रेजी के ’वाॅशिंग डर्टी लिनेन इन पब्लिक‘ का ’मौलिक‘ हिंदी रूपांतर है। )

12 जनवरी 1995 के जनसत्ता की रविवारीय साहित्य-पत्रिका ’सबरंग‘ के पृष्ठ  18 पर सत्येंद्र राणे का एक रेखांकन है, जिसमें औरत के चेहरे पर आंखें बंद हैं और होठों की जगह एक बंद ताला है। आज भी एक आदर्श औरत की तस्वीर यही है। यह बंद ताला जैसे ही खुलता है, औरत अपने सदियों पुराने गरिमामय-महिमामंडित ’एन्टीक‘ आसन से नीचे गिरा दी जाती है।

यह महज एक संयोग  नहीं है कि अस्मिता से जुड़े अधिकांश शब्द स्त्रीलिंग हैं – मर्यादा-प्रतिष्ठा, गरिमा-महिमा, व्यथा-पीड़ा, इज्जत-आबरू-हया, लज्जा-शर्म-यातना आदि आदि… क्योंकि ’लाज‘ रखने की पूरी जिम्मेदारी एक औरत के ही खाते में डाली गई है। एक अंग्रेजी पत्रिका ’सैवी‘ ने अपने 16 नवंबर 1995 के अंक में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेत्री लीला नायडू का एक लंबा साक्षात्कार प्रकाशित किया था। 1940 में जन्मी लीला का सोलह वर्ष की उम्र में प्रसिद्ध रायबहादुर ओबेराय खानदान के पुत्र तिलक राज उर्फ टिक्की से विवाह हुआ और एक साल बाद वह दो जुड़वां बेटियों की मां बनीं। दो साल तक, शिकार के शौकीन अपने रईस शराबी पति से लगातार पिटने के बाद सिर्फ़ अठारह साल की उम्र में, 1958 में ही, वह ओबेराय खानदान से अलग हो गई। उसके बाद उन्होंने कुछ फिल्में की, जिसमें अनुराधा, द हाउसहोल्डर काफी सराही गईं। बलराज साहनी के साथ अभिनीत फिल्म अनुराधा में लीला नायडू को राष्ट्रीय  पुरस्कार भी मिला।

ग्यारह साल बाद, 29 साल की उम्र में, 1969 में उन्होंने अंग्रेजी के सुप्रतिष्ठित कवि डाॅम माॅरेस से प्रेम विवाह किया और उनकी तीसरी पत्नी बनी। दांपत्य जीवन के सत्ताइस साल साथ रहने के बाद डाॅम माॅरेस अपने से आधी उम्र की पत्रकार सरयू आहुजा के प्रेम में पड़ कर लीला नायडू से अलग हो गए।

यह कहानी न तो नई है, न अविश्वसनीय।

लीला नायडू, कमला दास या मल्लिका अमरशेख जैसी लेखिका नहीं हैं जो अपनी तकलीफ को शब्दजाल में लपेटकर शुगर कोटेड कुनैन की तरह ’माय स्टोरी‘ या ’मला उध्वस्त व्हायचंय‘ जैसी कहानी प्रस्तुत करने की कला में माहिर हों। आत्मदया के बगैर उन्होंने अपनी जिंदगी की आधी सदी की दास्तान बिना किसी लाग-लपेट के तटस्थ नजरिए से बयान की है।

उनके इस बयान का रस लेते हुए हिंदी के एक वरिष्ठ पत्रकार-कवि ने (नूतन सवेरा-12 जनवरी 1997, पृष्ठ  49-50) अपने साप्ताहिक स्तंभ ज़रिया-नज़रिया में ’शादी और बरबादी के बाद का नजारा‘ लिखकर सवाल पर सवाल उठाए हैं – ’’जिसे आप समाज के सामने गधा सिद्ध करना चाहती हैं , उसी के साथ सत्ताइस साल हम बिस्तर रहीं ?…….. इतने साल साथ रहने के बाद ’मोहतरमा‘ को यह तथ्य समझ में आया ? ……….यह समझने के लिए ’मैडम‘ को दो-दो पतियों और साल-दर-साल घुटने रहने की जरूरत पड़ी, यही हैरत है।……..‘‘

बोलना ही इंसान को इंसान बनाता है पर यही ’बोलना‘ एक औरत को इंसान के दरजे से गिराकर ’मैडम‘ और ’मोहतरमा‘ बना देता है। मैं यह नहीं कहती कि मैडम और मोहतरमा गालियां हैं  ,पर जिस अंदाज़ में इन संबोधनों का इस्तेमाल किया गया है ,वह मुंह खोलनेवाली औरत के प्रति लेखक का नजरिया स्पष्ट करता है जो मुझे खासा आपत्तिजनक लगा ।

यूं भी औरत को भारतीय संस्कृति में इंसान का दर्जा दिया कब गया ? वह तो देवी है , श्रद्धा की मूर्ति है , पूजनीय-वंदनीय है और देवियां बोला नहीं करतीं। वे तो पूजा के पंडाल में सजी – धजी , मूक-बधिर ही अच्छी लगती हैं।

अपनी इस फितरत से हटकर जब वह बोलती है तो एक प्रबुद्ध पत्रकार उसे राय देते हैं – ’’आपको देर से ही सही ,अपनी-अपनी औकात का पता चल गया है तो उसको चैराहे पर चड्ढी  की तरह फींचने से कौन सा राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाएगा ?‘‘ (क्या आपने यह ’ चड्ढी  फींचना‘ मुहावरा सुना है ? मैंने तो नहीं सुना। वैसे यह अंग्रेजी के ’वाॅशिंग डर्टी लिनेन इन पब्लिक‘ का ’मौलिक‘ हिंदी रूपांतर है। कोई शराबी पति अगर पत्नी के बालों को पकड़कर उसे घसीटता हुआ कार तक ले जाता है तो ’बालों‘ का अनुवाद ’झोंटे‘ हो जाता है, यह भी मुझे इसी टिप्पणी से मालूम हुआ। )दिक्कत यह है कि अगर एक पुरुष अपनी आत्मकथा में अपने या अपनी पत्नी के इतर संबंधों को उजागर करता है तो उसकी आत्मकथा का खुली बांहों से स्वागत किया जाता है, उसे बोल्ड लेखन का खिताब मिलता है, पर अगर महिला अपने शादीशुदा जीवन की परतें खोलना चाहे या अपनी तकलीफ बयान करे तो उसे चैराहे पर चड्ढी  की तरह फींचने की संज्ञा दी जाती है । 

बहरहाल, पंद्रह पृष्ठों में बिखरी एक अभिनेत्री की दिल दहला देने वाली और गंभीरता से कुछ सोचने पर मजबूर करने वाली इस यातनाकथा को ’शादी और बरबादी के बाद का नजारा‘ के रूप में एक तमाशबीन की तरह दूर से देखने, मजा ले-लेकर पढ़ने और तथ्यों को अपने अनुरूप तोड़-मरोड़ कर उस पर गैर-जिम्मेदार, उथली और सतही टिप्पणियां करने वाले प्रबुद्ध पत्रकार कब अपने सामंती गिरेबान में झांकने के लिए, अपनी गर्दन को भी थोड़ा सा नीचे झुकाएंगे ?

(जनसत्ता, मुंबई, शुक्रवार 17 जनवरी 1997 से साभार )

स्त्री के प्रेम की अभिव्यक्ति – ‘अन्या से अनन्या’

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

( इस आलेख मे प्रेम और खासकर स्त्री के प्रेम की व्याख्या के प्रति  स्त्रीवादी दृष्टि से कई सवाल हो सकते हैं , लेकिन प्रभा खेतान के प्रेम को समझने का एक स्त्री शोधकर्ता का यह भी एक नजरिया हो सकता है . स्त्रीकाल में हम अन्या से अनन्या तक की आलोचना करते हुए स्त्रीवादी व्याख्यायें किंगसन पटेल और भावना इशिता के आलेखों  में पढ चुके हैं.)
प्रेम के संबंध में बायरन ने लिखा है- ‘‘पुरुष का प्रेम पुरुष के जीवन का एक हिस्सा भर होता है। लेकिन स्त्री का तो यह सम्पूर्ण अस्तित्व ही होता है।’’ इसका अर्थ यही है कि स्त्री जब किसी से प्रेम करती है तो वह सिर्फ ईमानदार ही नहीं होती बल्कि उसमें समर्पण का भाव भी होता है। इस भावना के कारण ही वह भविष्य  का सुनहरा सपना देखती है। ऐसा ही प्रेम प्रभा खेतान ने किया। उन्होंने कहा ‘‘प्रेम कोई योजना नहीं हुआ करता और न ही यह सोच समझकर किया जाने वाला प्रयास है। इसे मैं नियति भी मानूँगी क्योंकि इसके साथ आदमी की पूरी परिस्थिति जुड़ी होती है।’’ अतः सोच समझकर लाभ-हानि देखकर प्यार नहीं होता और न ही अकेलेपन को भरने के लिए। प्रभा खेतान का प्यार भी जीवन के खालीपन को भरने का माध्यम नहीं था बल्कि उनका सम्पूर्ण अस्तित्व था, जिसकी ओर बायरन ने इशारा किया है।

बाइस साल की उम्र में प्रभा खेतान का पेशे  से चिकित्सक और उम्र में अठारह साल बड़े डाॅक्टर सर्राफ से जो रिश्ता  बना, उसे ‘प्रेम’ कहते हैं। निस्वार्थ, निश्छल  प्रेम। जिन रूढ़ परम्परावादियों को इस आत्मकथा में वासना और व्यभिचार नज़र आता है उन्हें ‘प्रेम’ और ‘व्यभिचार’ शब्द का अर्थ समझ लेना चाहिए। मैत्रेयी पुष्पा  ने लिखा है ‘‘मेरी दृष्टि  में ‘प्रेम’ शब्द और ‘व्यभिचार’ शब्द को अलग-अलग देखा जाय तो दोनों एक-दूसरे के विपरीत आचरण में दिखते हैं। प्रेम जहाँ निश्छलता, विश्वास  और ईमानदारी भरा लगाव है वहीं व्यभिचार कपट चोरी और बेईमानी है। लेकिन सामाजिक विडम्बना यह है कि अक्सर ही प्रेम  को व्यभिचार से जोड़ दिया जाता है।’’ प्रभा खेतान के प्रेम को भी व्यभिचार का नाम दिया गया जिसकी अच्छी-बुरी प्रतिक्रिया समय-समय पर देखने को मिली। व्यभिचार देह से जुड़ा मामला है और प्रेम मन से। इसे व्यक्त करते हुए प्रभा खेतान ने कहा है- ‘‘प्रेम के कई रूप हैं और प्रेम की उम्र बहुत लंबी होती है, जिसकी तुलना में देह की उम्र छोटी। कामना का सुख तो हार्मोन पर आधारित होता है और यह बड़े सीमित समय के लिए मनुष्य को उपलब्ध होता है लेकिन प्रेम तो उसे हर समय उपलब्ध है। यह आपके व्यक्तित्व पर निर्भर है कि आप देह से परे जा सकें और प्रेम को अपने जीवन में महसूस कर सकें।’’ अतः यह कह सकते हैं कि देह की अपेक्षा प्रेम की उम्र बहुत लम्बी होती है। जिसके अन्दर यह अहसास जीवित  है वह इंसान भी जीवित  है, जिसने इस एहसास को महसूस किया ही नहीं उसे तो हर जगह वासना और व्यभिचार ही नज़र आयेगा।

किसी भी रिश्ते  को निभाने का भाव स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों  में कमजोर होता है। अधिकांश  आत्मकथा और हिंदी कथा साहित्य में ऐसे अनेको उदाहरण हैं जो इस तथ्य की प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं। चूँकि स्त्रियाँ ज्यादातर संवेदनशील होती हैं इसलिए इस तरह के संबंध की प्रतिक्रिया से ज्यादा आहत भी होती हैं।प्रभा  खेतान के इस प्रेम-संबंध में कहीं भी चालाकी नहीं है, वह समझदारी या यूँ कहे कि वह दुनियादारी भरी समझ नहीं है जिसकी वजह से उनपर ऊँगलियाँ उठती रहीं। एक नज़र के आकर्शण से उत्पन्न प्रेम को आत्मसात कर जिंदगी भर का जोखि़म उठाने वाली स्त्री चालाक तो नहीं हो सकती। हाँ ! निश्छलता और मासूमियत की प्रतिमूर्ति जरूर थी। उन्होंने लिखा ‘‘जिस राह पर मैं चल पड़ी हूँ वह गलत-सही जो भी हो पर वहाँ से वापस मुड़ना संभव नहीं। इसे ही प्रेम कहते है।’’ अतः निर्णय पर कायम रहना और संबंध को निभाने का जज्बा होना चाहिए तभी प्रेम किया जा सकता है।

डाॅ0 सर्राफ ने प्रभा खेतान से कभी पे्रम किया ही नहीं उनके लिए यह क्षणों का आकर्षण  था, जिसे उन्होंने स्वयं स्वीकारा भी लेकिन प्रभा खेतान के लिए उनका प्रेम उनका पूरा बजूद था, उनका अस्तित्व था जिसे वे पीड़ा सहकर भी अंत तक कायम रखती हैं। उनका कथन इस बात का प्रमाण है-
‘‘वेदना की कड़ी धूप में
खड़ी हो जाती हूँ क्यों
बार-बार ?
प्यार का सावन लहलहा जाता है मुझे
किसने सिखाया मुझे यह खेल
जलो !जलते रहो
लेकिन प्रेम करो और जीवित रहो’’

यातना की भट्टी में जलकर, सारी उपेक्षा सहकर, प्रेम करने और अन्त तक अपने निर्णय पर कायम रहने का साहस प्रभा खेतान ने ही दिखाया। इनके प्रेम में कहीं भी सयानापन नहीं, कपट नहीं, निश्छल मन से सबकुछ देने का भाव दिखता है और अपनी आत्मकथा में सबकुछ स्वीकार कर लेने का साहस भी। चूँकि बात प्रेम की हो रही है तो एक प्रेमिका की आकांक्षा को जानना जरूरी है ,जो खलील जिब्रान की महबूबा ने अपने महबूत कवि के लिए की थी ‘‘मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे उस तरह प्यार करो जैसे एक कवि अपने ग़मग़ीन ख्यालात को करता है। मैं चाहती हूँ, तुम मुझे उस मुसाफिर की याद की तरह याद रखो जिसकी सोंच में पानी से भरा तालाब है, जिसका पानी पीते हुए उसने अपनी छवि उस पानी में देखी हो। मेरी इच्छा है, तुम उस माँ की तरह मुझे याद रखो, जिसका बच्चा दिन की रौशनी देखने से पहले मौत के अंधेरे में डूब गया हो। मेरी आरजू है कि तुम मुझे उसे रहमदलि बादशाह की तरह याद करो जिसकी क्षमा घोशणा से पहले कै़दी मर गया हो।’’ प्रभा खेतान ने कभी ऐसे ही प्रेम की कल्पना की थी। लेकिन अफसोस, डाॅ0 सर्राफ से ऐसा प्यार उन्हें नहीं मिला। समय के साथ उन्हें ये  आभाष होने लगा था कि मैंने और डाॅ0 साहब ने जिस चाँद को साथ-साथ देखा था वह नकली चाँद था। प्यार को निभाने का जो उत्साह प्रभा खेतान में था वह डाॅ0 सर्राफ में दिखा ही नहीं। निष्कपटता , निश्छलता प्रेम की कसौटी है। इसमें लेने का नहीं, देने का भाव होना चाहिए। लेखिका ने तो अपना हर कर्तव्य निभाया लेकिन डाॅ0 सर्राफ ने इस रिश्ते  के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई। घनानंद के शब्दों में कहें तो-
‘‘तुम कौन धौं पाटी पढ़े हो लला
मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं।’’

पूरी आत्मकथा में एक निष्ठा आस्था व्यक्त हुई है जिसके कारण उन्हें पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर बहुत कुछ झेलना पड़ा। उनका अन्तर्मन उनसे पूछता है ‘‘आखिर मैं क्यों नहीं अपने लिए जीती ? मैं क्यों एक परजीवी की तरह जी रही हूँ। किसलिए ? हिसाब लगाऊँ तो एक महीने में चैबीस घंटे से अधिक  समय मैं और डाॅ0 साहब साथ नहीं रहते फिर भी उनके प्रति यह कैसा दुर्निवार आकर्षण  है जो खत्म नहीं हो रहा ? डाॅ0 साहब को मेरी पीड़ा का अहसास क्यों नहीं होता ?’’ साधारणतः किसी भी संबंध में जब इतने तनाव हो तो उन्हें खत्म करना ही उचित है लेकिन ये संबंध ऐसा था जो न पूरी तरह से जुड़ा और न टूट ही पाया। क्योंकि लेखिका अपने निर्णय को खारिज नहीं करना चाहती थीं। उन्हें भले ही प्यार नहीं मिला लेकिन जितनी शिद्दत  से उन्होंने निभाया वह अद्भुत है। तू नहीं और सही, और नहीं और सही वाला भाव यदि इनमें होता तो शायद सफल उद्योगपति के साथ आदर्श  महिला भी होती क्योंकि मरे हुए संबंध को विवाह के नाम पर निभाना हमारे समाज को स्वीकार है, लेकिन आजीवन किसी से निश्छल प्रेम करना, महापाप। ये निर्णय तो पाठकों का है कि वे इस प्रेम-संबंध को किस तरह देखना चाहते हैं।

प्रेम एक ऐसा अहसास है,  जिसे करने वाला ही जानता है। हिन्दी की प्रतिष्ठित  लेखिका कुसुम अंसल ने लिखा है – ‘‘प्रेम एक इच्छा है, एक इच्छा जो विशेष इच्छा के रुप में प्रत्येक हृदय में बहती तरंगित होती है। यह इच्छा मात्र स्त्री-पुरुष  ही नहीं वृक्ष की जड़ और फूलों में भी होती है, श्वास  और वायु में भी होती है। प्रेम स्त्री-पुरष के मध्य घटित होता है जिसे शायद शरीर के पाँच तत्व भी चाहें तो ढूँढ नहीं पाते। प्रेम को हवा की तरह ओढ़ा जा सकता है, समुद्र सा लपेटा जा सकता है और पर्वतों की तरह बाहों के बंधन में आलिंगित किया जा सकता है। प्रेम हमारा वायदा है अपने आपसे से किया हुआ जिसे हमें निभाना होता है। मुझे लगता था प्रेम कोई प्रक्रिया या प्रोसेस नहीं है ,जिसमें शरीरों का जुड़ना या बिछुड़ना शामिल होता है, प्रेम तो बीज की तरह अंकुरित होता है, और फूल सा खिलता है। यह मनुष्य  के भीतर सूक्ष्म सी मानवीय चेतना है जो ऊपर उठकर अजन्मा शाश्वत  में बदल जाती है।’’ अतः प्रभा खेतान का प्रेम एक ऐसा ही सूक्ष्म  अहसास है जो वाद-विवाद, नैतिकता-अनैकिता की परवाह किये बिना सिर्फ मन की आवाज सुनता है।

जख्म हरे हैं आज भी

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निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

( भागलपुर दंगों के 25 साल पूरे हो गए , स्वतंत्र भारत का एक ऐसा दंगा , जो पिछले दंगों से इस मायने में अलग था कि इसकी लपटें गाँव -गाँव तक फ़ैली , महीनो चली . शोधकर्ताओं ने बाद में उद्घाटित किया कि लोगों को मारकर लाश छिपाने के लिए गोवी के फूल उगा दिये गये थे. इस दंगे की दुःखद स्मृतियों को याद कर रही हैं निवेदिता. यह आलेख पिछले दिनों जनसत्ता में भी प्रकाशित हुआ था. )
25 साल पहले एक शहर जख्मों से भर गया था, आज फिर उसके जख्म हरे हो गए। वर्षो से जमा मवाद बाहर आ गया। फोड़े की तरह,जो न दबता है, न फूटकर बाहर आता है। स्मृति भी किस अंधेरे में अपना राज खोलती है। मुद्दत पहले गुजरी घटनाएं ऐसे याद आ रही हैं जैसे आज की बात हो। भागलपुर दहक रहा था। दंगे की आग में झुलसे घरों की लपटें मंद पड़ने लगी थीं, पर धुएं की तीखी गंध हवा में वर्षो तैरती रही थी।

मुझे याद है कि भैया की कांपती आवाज फोन पर देर तक हम सुनते रहे थे। वे दहशत में थे। हम उन्हें रीयाज भाई बुलाते हैं। मेरे पति के बड़े भाई। नाथनगर ब्लाॅक के पास उनका घर था। भाभी सरकारी मुलाजिम हैं। उन्हें क्वार्टर मिला हुआ था। भाभी बच्चों के साथ अपने मायके गयीं हुई थी। उसी दौरान शहर में तनाव बढ़ा। वे लोग वहीं रुक गए। भैया घर की ओर निकले। दूर से ही देखा की उनके घर में दंगाईयों ने आग लगा दी है। आग की लपटें कई किलोमीटर दूर से दिखायी दे रही थीं। एक ठंडी सी झुरझुरी पूरे बदन में भर गयी। वे रो रहे थे । आंखों के सामने सबकुछ जल कर खाक हो गया। वर्षो से तिनका-तिनका जोड़ कर जो घर बनाया था, वह पलक झपकते ही मलवे के ढ़ेर में तब्दील हो गया। वे भागे थे। दहशत और ड़र पीछा कर रहे थे । उनके पास स्कूटर  था । अभी अपना मुहल्ला पार भी नहीं किया कि लोग हथियारों से लैस खड़े दिखे। उन्हें लगा अब बच पाना मुमकिन नहीं है। अपनी पूरी ताकत लगा कर वे भागे। जब तक दंगाई समझते की कौन आ रहा है वे पार कर गए। भैया ने फोन पर सब बताया था।  हम बुत बने खड़े थे। कुछ भी नहीं बचा था। बच्चों के कपड़े तक जला दिये गए। जो बचा वे पड़ोसी लूट कर ले गए। इस से भयावह क्या होगा जिनलोगों के साथ सालों जीवन गुजरा, दुख-सुख साझा किया वे ही कातिल थे। उन्होंने कहा था अगर हो सके तो कुछ कपड़े और कुछ जरुरी सामान भिजवा दो। मैंने दूध के डब्बे, बरतन,साड़ी बच्चों के कपड़े भेजे थे। जब कोई दंगा होता है तो सिर्फ लाश  ही नहीं गिरती, मनुष्यता भी हारती है।

भागलपुर दंगा के 25 साल पूरे हुए। दंगा ने जो जख्म दिए  उसे पाटने में जाने कितनी सदियां बीतेंगी । भैया कहते हैं उन हादसों को हम याद नहीं करना चाहते। दुख बीत जाता है पर डर ठहरा रहता है। एक ऐसे देश  में, जिसके संविधान में देश  के सभी नागरिकों को जीने का अधिकार है। उस देश  में कोई इसलिए नफरत का शिकार होता है कि वह एक दूसरे घर्म को मानता है। उनकी स्मृतियों में 24 अक्टूबर 1989 का दिन आज भी ताजा हैं।  1989 में 24 अक्तूबर को भागलपुर  शहर में दंगा भड़का था. इस दंगे में सरकारी आंकड़ों के अनुसार ग्यारह सौ से ज्यादा लोग मारे गये थे.  दंगे ने धीरे-धीरे शहर के साथ-साथ तत्कालीन भागलपुर जिले के अठारह प्रखंडों के 194 गांवों को अपने चपेट में ले लिया था.

यह दंगा इस मायने में भी अलग है कि दंगे के 25 सालों बाद भी पीडि़तों के दावों की जांच-पड़ताल के बाद मुआवजा राशि का भुगतान किया गया है. लेकिन अब भी बड़ी संख्या में पीडि़त अलग-अलग आधार पर मुआवजे की मांग कर रहे हैं. जिस दंगे में हजारों लोग मरे, लापता हुए, वहां सरकार ने मृत व लापता व्यक्तियों के 861 मामले ही स्वीकार किये हैं. उनके परिजनों को अब तक प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से दस हजार, बिहार सरकार से एक लाख और फिर सिख दंगों के तर्ज पर साढ़े तीन लाख रुपये की सहायता राशि मिली है. लेकिन जिनके दावे स्वीकार नहीं किये गये हैं वे हर तरह की सहायता राशि  से अब तक वंचित हैं. दिल्ली स्थित संस्था सेंटर फाॅर इक्विटी स्टडीज ने दंगा पीडि़तों की हालात जानने और उनके उनकी मदद के लिये पिछले तीन सालों के दौरान 50 दंगा प्रभावित गांवों के दो हजार पीडि़त परिवारों से संपर्क किया.

संस्था के अनुसार इस दौरान उसे 50 से अधिक ऐसे परिवार मिले जिनके यहां दंगे के दौरान लोग मारे तो गये लेकिन उन्हें अब तक कोई सहायता राशि नहीं मिली है. सरकार की मुआवजा नीति के तहत ऐसे परिवार हकदार तो हैं लेकिन उस नीति के तहत अपने दावे के समर्थन में साक्ष्य नहीं जुटा पा रहे हैं. ऐसे परिवार दंगे के दौरान या उसके कुछ दिनों बाद अगर किसी भी कारण से एफआईआर दर्ज नहीं करवा सके तो उनका दावा प्रशासन स्वीकार नहीं करता है.हालांकि ऐसे दावों के सत्यापन के लिये भी मुआवजा नीति में व्यवस्था है. लेकिन सरकारी अधिकारियों के सत्यापन के सहारे पूरी होने वाली यह लंबी प्रक्रिया शायद ही किसी परिवार की मददगार साबित हुई हो.

मैं नहीं जानती 25 साल बाद मिले इन मुआवजा से जख्म भरेंगे या नहीं पर एकबार भी हम अपने लहुलुहान अतीत से सबक ले सकते हैं। सबक वो पार्टियां भी ले सकती हैं जिसने ऐसी हिंसा की जमीन बनायी। हम सबक ले सकते हैं देश में फिर से पैदा किये जा रहे साम्प्रदायिक तनाव के खिलाफ। याद कर सकते हैं उन बुरे वक्त को जिसमें भाजपा द्वारा राम मंदिर अंदोलन चलाना और बाबरी मस्जिद का ध्वंस शामिल है.

अवनीश गौतम की कवितायें : सफाई कार्यक्रम और अन्य

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अवनीश गौतम


दिल्ली की एक एड एजेंसी में क्रियेटिव डायरेक्टर अवनीश गौतम की कवितायें हंस, दलित साहित्य वार्षिकी, नया ज्ञानोदय आदि में प्रकाशित हुई हैं . सम्पर्क: 9891570925

१. सफाई कार्यक्रम 

जिन्हे जलाया जा रहा है
उन्हे बताया जा रहा हैं कि
सफाई है सबसे ज़रूरी
जैसे वे बने ही नहीं हैं हाड़ मांस से
बस थोड़ा हंसिया खुरपी चलाई
थोड़ा तेल तीली डाली और बस्स देखो कैसा
भह-भह के जले हैं होलिका की तरह

दुनिया भर के अखबारों और
टीवी चैनलों से बाहर
बिखरी पड़ी हैं लाशें
उत्तर से दक्षिण तक
पूरब से पश्चिम  तक
अंग- भंग, लथ – पथ,
जली -अधजली
जवान मर्दों की
औरतों की, बच्चों की लाशें

सफाई कार्यक्रम जोरों पर है
और ये कोई आज की बात नही
यह तो सांस्कृतिक कार्यक्रम है
जो चलता रहता है
धार्मिक अनुष्ठानो के साथ साथ

अब तो हत्यारो ने
नए तंत्रो,
नए यंत्रों
नए मंत्रों से
वधस्थलों का ऐसा आधुनिकीकरण कर दिया हैं
कि लाशें भी शामिल होती जा रही हैं
अपनी मृत्यु के उत्सव मे

२. वे सबसे पवित्र कहलाते हैं 

वे मुर्गा नही खाते
वे मच्छी नहीं खाते
वे दारू नहीं पीते
वे अगरबत्तियों की भीनी भीनी खुशबू  मे
हमारी औरतों की छातियाँ सहलाते हैं
फिर उन्हे काटते है और नोच नोच कर
हवा मे उड़ाते हैं

वे ठीक उसी जगह से हमारा सीना फाड़ते हैं
जहाँ बमुश्किल हम प्रेम की जगह बना रहे होते हैं
उनके लिए भी

हम भूख से लड़ कर अपने
सम्मान की तलाश मे निकल रहे होते हैं
वे शोहदों की तरह पकडते हैं हमारे गिरहबान
बिना किसी की नज़र मे आए
वे आज भी भरते है हमारे कानों में पिघला सीसा
हमारे समय के सबसे सभ्य सबसे सुसंस्कृत लोग
हमारी अस्थियों पे अपनी विजय पताका फहराते हैं
हमारी अंतड़िया निकाल कर खाते हैं
फिर भी सांस्कृतिक डियोडरेंट लगाने के कारण
सबसे पवित्र कहलाते हैं

3. मैं आता हूँ 

आपको गुस्सा अच्छा नही लगता
लेकिन आपको गुस्सा आता है
आपको घिन अच्छी नहीं लगती
लेकिन आपको घिन आती है
मैं आता हूँ तो आपको गुस्सा आता है
मैं आता हूँ तो आपको घिन आती है
वैसे आती है तो आए मेरी बला से
मैं तो अब आता हूँ
आपका एक एक दरवाजा
आपका एक एक ताला तोड़ते हुए
मैं तो अब आता हूँ
ये घर मेरा है और
अब मैं इसमे रहने आता हूँ
कब्जेदारों!
जो तुमने जला रखे हैं अपनी महान
संस्कृति के हवन कुंड
ए पवित्र देवताओ उन्ही में तुम्हारी हुंडियाँ
जलाने आता हूँ
ये जो तुमने चमका रखी हैं
अपनी झूठी और विशाल छवियों को प्रक्षेपित
करती विशाल काँच की दीवारें
उनको अपनी चीत्कारों से गिराने आता हूँ
ड्योढ़ी से ले कर गुसलखाने तक
अपना दावा जताने आता हूँ
अपने घर को मैं अपना बनाने आता हूँ
क्या करूँ
मुझे भी गुस्सा अच्छा नही लगता
लेकिन मुझे भी गुस्सा आता है

4. आपके जैसा
आप कहते हैं
मैं प्यार की बात नहीं करता
आप पर भरोसा नही करता
तो आप ही बताएँ
आप पर भरोसा कैसे किया जाए
आपने प्यार से मुझे शक्कर कहा
और अपने दूध में घोल कर मुझे गायब कर दिया
गायब क्या कर दिया आप तो मुझे पी ही गये
फिर आपने मुझे नमक कहा और
अपनी दाल में डाल कर मुझे गायब कर दिया
गायब क्या कर दिया आप तो मुझे खा ही गये
आपको धोखा पसंद नहीं
लेकिन आपको धोखा देना आता है
मुझे भी धोखा देना पसंद नहीं
लेकिन मैं भी सीख लूँगा
सब्र कीजिए एक दिन
आपको वैसा ही प्यार करूँगा
जैसे आपने मुझको किया

कलाकार के सौ गुनाह माफ हैं ।

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सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

ऑस्कर वाइल्ड से लेकर वॉल्टेयर तक ने कलाकार के असाधारण तरीके से जीवन जीने की हिमायत की है। उनका कहना है कि सामान्य ढर्रे में बंधा हुआ जीवन किसी भी कलाकार को स्थितियों का गुलाम बना देता है, जरूरी है कि वह जीने के सामान्य ढांचे को ध्वस्त करे ! यह भी कहा गया है कि कलाकार में लुम्पेन तत्व होना ही चाहिए। अगर वह थोड़ा आवारा नहीं है, अगर उसमें आधी रात को खुली सड़क पर नंगे निकल जाने का हौसला नहीं है,  अगर खूबसूरत औरत देखकर उसके साथ की इच्छा उसमें नहीं जागती तो वह सही मायने में कलाकार नहीं है। हमारे अपने जैनेन्द्र कुमार इसी बात को ज्यादा सीधे ढंग से कहते हैं कि रचनाकार को प्रेरणा के लिए पत्नी के साथ एक प्रेयसी की भी जरूरत है और राजेन्द्र यादव तो इस तरह की टिप्पणियों के लिए कुख्यात हैं, जब वह कहते हैं कि सात्विक किस्म का भला सा आदमी कथाकार कैसे बन सकता है! लफंगई ही किसी व्यक्ति को साहित्यकार बनाती है,  शराफत तो उसे विष्णुकांत शास्त्री बना देती है।

इन्हीं उक्तियों की ओट लेकर हमारे देशी-विदेशी रचनाकार सीना ठोंककर, डंके की चोट पर अपने अनैतिक सम्बन्धों का खुलासा करते रहे हैं और इस खुलासे से उनकी रचनात्मक ईमानदारी में बढ़ोत्तरी होती रही है (कमलेश्‍वर की आत्मकथा या राजेन्द्र यादव की मुड़ मुड़ के देखता हूं इसकी गवाह है) यानी कला का जरदोजी वाला जामा पहनने के बाद, लफ़्ज़ों के कीमखाबी लिहाफ के भीतर उसके सारे कुकृत्य माफ होते हैं। कलाकार के व्यक्तिगत जीवन की नंगई और चरित्रहीनता के प्रसंगों की फेहरिस्त से उसके प्रभामंडल की आभा क्षीण नहीं होती।

कला में अभिव्यक्ति की आजादी के साथ-साथ कलाकार को अपना जीवन चुनने और अपनी तरह से जीवन जीने की छूट कहां तक दी जानी चाहिए?  जहां एक की आजादी दूसरे की गुलामी न बन जाये! जहां एक का वर्जनाहीन दुस्साहस दूसरे के शोषण का बायस न बने! पर वास्तविकता इससे अलग है। कलाकार होने के नाम पर उसके सौ गुनाह माफ हैं। एक कलाकार की रचनात्मकता के शिखर तले उसके कितने गुनाह सिसक रहे हैं , उसकी चौंधियाती कृतियों की इमारतें कितनी प्रताड़नाओं की बुनियाद पर खड़ी हैं, इसका लेखा-जोखा करना साहित्य की चौहद्दी में नहीं आता।

कला और लम्पटता,  कलाकार और आक्रामकता, रचना और नंगई में कैसा इक्वेशन होता है, इस पर चर्चा की जानी चाहिए। कलाकार पुरुष के निजी जीवन की तमाम बदकारियों और बेइमानियों का असर उसकी कृतियों के मूल्यांकन पर नहीं होता। अपनी पत्नी या बच्चों के प्रति आक्रामकता, अवहेलना या हिंसा, विवाहेतर संबंधों से एक आत्ममुग्ध रचनाकार की रचनात्मक गरिमा पर कोई आंच नहीं आती। रचना का प्रकाश वृत्त इतना बड़ा होता है कि रचनाकार के जीवन की छोटी बड़ी सब बदकारियों का अंधकार उसके आलोक में छिप जाता है!

कला के विभिन्न क्षेत्रों के शिखर पुरुषों के उदाहरण हमारे सामने हैं! उस्ताद अलाउद्दीन खां की जहीन बेटी अन्नपूर्णा को मंचीय सितारवादन से परे, एक बन्द कमरे में कुछ शागिर्दो को सितारवादन की कला में पारंगत करने की उम्र कैद देकर, भारत-रत्न पंडित रविशंकर अपनी कला साधना के झंडे दिक् दिगन्त में गाड़ते रहेंगे! यशोदा पाडगांवकर की ‘ कुणास्तव कुणीतरी’ में एक प्रतिष्ठ‍ित कवि की पत्नी की यातना को एक ओर धकेलकर मंगेश पडगांवकर अपनी ऊंचाई से नीचे नहीं गिरेंगे। मल्लिका अमरशेख कितना भी ’मळा उध्वस्त व्हायचय’ लिख लें, नामदेव ढसाल की काव्य प्रतिभा के चर्चे होते रहेंगे और अन्ततः मल्लिका अमरशेख ’ शित्जोफ्रेनिया’ की कगार पर धकेल दी जायेंगी। कान्ता भारती की ’रेत की मछली’ जैसे आत्मकथात्मक उपन्यास के एक-एक प्रसंग के त्रासद सच की भयावहता को दरकिनार कर डॉ. धर्मवीर भारती के चहेते पाठकगण उनकी दूसरी पत्नी-प्रेयसी को लिखे प्रेम पत्रों में प्रेम की दिव्य और ओजस्वी छवि के दर्शन कर अलौकिक रस से सराबोर होते रहेंगे। मन्नू भंडारी अपने अकेलेपन से ग्रस्त और शारीरिक-मानसिक यंत्रणा से संत्रस्त होकर डाक्टरों-अस्पतालों के चक्कर लगाती रहें,  उनके प्रतिष्ठित लेखक-पति राजेन्द्र यादव के जन्मदिन के शाही आयोजनों में कोई कमी नहीं आयेगी । सोफिया टॉलस्टॉय की आत्मकथा में ऐसे प्रसंग आते रहेंगे, जब अपने पुत्र की अंत्येष्टि से लौटकर सोफिया दीवार से सर टकरा-टकरा कर रोती है और उनसे सांत्वना का एक शब्द कहे बगैर लियो टॉलस्टॉय धुले सफेद कपड़े पहन बाहर टहलने निकल जाते हैं।

अन्नपूर्णा और पंडित रविशंकर

सोफिया की आत्मकथा हो या दलित रचनाकार कौशल्या बैसंत्री की – कलात्मकता के अभाव में सपाटबयानी अपने नंगे सच के बावजूद हाशिये पर धकेल दी जाएगी। स्त्रियों पर बेहद कोमल और संवेदनशील कवितायें लिखने वाले कवि अपनी पत्नी को एक कोने में बिलखता छोड़कर घर से निकल जायेंगे क्योंकि अपनी पत्नी के आंसू उनमें कोई संवेदना नहीं जगा पाते और गाहे-बगाहे अपनी दब्बू और डेढ़ हड्डी की पत्नी को पीटने से भी उन्हें कोई परहेज नहीं होगा। सवाल उठाए जाने पर वे शहीदाना अंदाज़ में अपनी पत्नी को मानसिक रोगी और अपने को ही पत्नी द्वारा प्रताडि़त घोषित कर देंगे और पुरुषप्रधान समाज के एक बड़े हिस्से की सहानुभूति भी बटोर लेंगे। हिन्दी फिल्मों की दुनिया में बीना राय और परवीन बाबी से लेकर राहुल देव बर्मन की पत्नी तक की एक लंबी कतार है! यही है सच हमारे समाज का जहाँ स्त्री हर हाल में कटघरे में हैं, उसके साथ खड़े होने में स्त्रियां भी हिचकती नज़र आती है!

संवेदनशील कहलाये जाने वाले इन सर्जकों की निजी दुनिया इतनी क्रूर और अमानवीय क्यों है, और ये सवाल साहित्य के दायरे से, विश्‍वासघातों के स्त्री विमर्श से बाहर क्यों हैं ?  इन सवालों को समाजषास्त्रीय अध्ययन के लिए छोड़ दिया जायेगा और समूचा साहित्यिक समाजशास्त्र  ’’ नत्थिंग सक्सीड्स लाइक सक्सेस’’ (Nothing succeeds like success ) के बैनर तले धूल फांकता नजर आता हैं।

ऐसे में स्त्री विमर्श के हमारे प्रबल पैरोकार बड़े उदारमना होकर सवाल उठाते हैं कि प्रताडि़त पत्नियां अपनी आत्मकथाएं क्यों नहीं लिखतीं ? अधिकांश स्त्रियां तो चुप रहना ही श्रेयस्कर समझती हैं, लेकिन जो सच बोलने का साहस दिखाती हैं, उन्हें मित्रों-परिचितों-पाठकों द्वारा हमेशा  कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। ’सैवी‘ में अंग्रेजी के प्रख्यात कवि डॉम मोरेस की पत्नी लीला नायडू के विस्तृत साक्षात्कार के साथ यही हुआ। प्रख्यात फिल्म निर्माता निर्देशक बासु भट्टाचार्य की पत्नी रिंकी भट्टाचार्य को भी 1984 में ’ मानुषी ‘ को एक लम्बा साक्षात्कार  देने के एवज में खरी-खोटी सुनाई गयी । आखिर घर की ‘गोपनीय’ बातों को बाहर उजागर करने में कैसी शान है ? ‘वॉशिंग डर्टी लिनेन इन पब्लिक’ का एक पत्रकार द्वारा मौलिक हिन्दी अनुवाद किया गया – ”चौराहे पर चडढी फींचना” इस दुस्साहस को लज्जाजनक बताया गया। आखिर लौह महिला-सी दिखने वाली रिंकी अपने पति से लगातार बारह लम्बे बरसों तक कैसे पिटती रह सकती हैं। इसे अविश्‍वसनीय ही माना गया जबकि सच्चाई यही है कि इस बयान में से रिंकी का नाम हटा दें तो यह बहुत-से जाने माने, प्रतिष्ठित और नामी कलाकारों की पत्नियों की गाथा है!

निम्नमध्यवर्गीय तबके से आयी कार्यकर्ता सुगन्धि की कहानी से लेकर उच्च मध्यवर्गीय तबके की रिंकी भट्टाचार्य की कहानी में समानता के कई कोण सहज ही तलाशे जा सकते हैं। रिंकी की केस हिस्ट्री को सोशल साइंसेज के संस्थानों में घरेलू हिंसा के तहत विश्लेषण का आधार बनाया जा रहा है पर साहित्य की हदों से इसे बाहर ही रखा जाता है। सच्चाई के सपाट बयान में कलात्मक सौन्दर्य के लिए ज्यादा जगह नहीं होती । बेबी कांबले (जीवन हमारा), कौसल्या बेसंत्री (दोहरा अभिशाप) और बेबी हालदार (आलो आंधारी) का बयान साहित्य में कारगर हस्तक्षेप है और इसलिए स्वागत योग्य है। इनमें सिद्धहस्त रचनाकारों की तरह शब्दों के लागलपेट में झूठ को सच और गलत को सही बनाने और बुनने का कौशल नहीं है और यही इन आत्मकथाओं की सबसे बड़ी
खूबी है।

कई बार आत्मकथा लिखने वाली इन लेखिकाओं पर मानसिक अस्वस्थता का आरोप भी लगाया जाता रहा है। दरअसल, पागलखाने या मानसिक अस्पतालों की चहारदीवारी के भीतर भी घोषित रूप से पागल औरतों के अपने संसर्ग में आये पुरुषों के बारे में दिल दहला देने वाले बयान एक भयावह सच होते हैं,  बजाय उन सदगृहस्थिनों के जो अपने पूरे होशोहवास में अपने पति की प्रतिष्ठ‍ित इमेज को खंडित होने से बचाये रखने के लिए उसकी बदकारियों के सामने हमेशा अपने ढाल कवच के साथ पति की सुरक्षा में हाथ फैलाकर खड़ी हो जाती हैं। जो नहीं खड़ी होतीं,  वे रिंकी की तरह पुरुष समाज के ढेले और पत्थरों का शिकार होती हैं।

चुनाव हर महिला का अपना है, वे सदगृहस्थिनों की एक अंतहीन जमात में बिला जाएं या जनमघुट्टी में घोल कर पिला दी गई चुप्पी को तोड़कर बगावत पर आमादा हो जाएं !!
(कथादेश : मार्च 2006 से साभार)

‘डार्क रूम में बंद आदमी’ की निगाह में औरत : आखिरी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

 
( पेशे से वकील और  प्रतिबद्धता से स्त्रीवादी आलोचक अरविंद जैन ने अपने
समय में एक कल्ट  बन गये राजेन्द्र यादव के  आलेखों , सम्पादकीयों  से
उद्धरण लेते हुए  उन्हें स्त्री विरोधी  चिंतक  सिद्ध किया है  .
न्यायालीय  जिरह की शैली  में  लिखा यह आलेख पहली बार उद्भावाना ( 2005 )
में छपा था , हम इसे दो किस्तों में  रख रहे हैं , आख़िरी क़िस्त  बहस को आगे बढाते हुए
लेखों का स्वागत होगा . ) 

पहली क़िस्त : ( क्लिक करें ) : ‘डार्क रूम में बंद आदमी’ की निगाह में औरत : पहली   क़िस्त

स्त्री देह: हथियार या अधिकार 

यादव जी ने एक सम्पादकीय में लिखा था:”पिछले दो दिनों (६ और ८ जून १९९३)से मैं दूरदर्शन पर दो प्रोग्राम देख रहा हूं: ‘फेमिना’ पत्रिका द्वारा ‘मिस इंडिया’और जे.के.टायर द्वारा ‘मिस यूनिवर्स ‘का चुनाव ! अद्भूत  ऐन्द्रजालिक दृश्य, भव्य चकाचौंध वाले सेट्स,रोशनियाँ,जादुई स्टेज –सेटिंग और थोक में सुंदरियों के झुण्ड,हंसती खिलखिलाती जवानियाँ –फिर एक-एक सुन्दरी  का आकर अपने अंगों को प्रदशिर्त करना,घूम- घूमकर अपना आगा-पीछा दिखाना ,निर्णायकों दुवारा नंबर दिए जाना- पहले छह,फिर तीन और अंत में एक सर्वश्रेष्ठ का चुनाव-यानी कूल्हे,कमर,छातियों, टांगों और चेहरों के इंची टेप से नाप-जोख,चलने,खड़े होने और दिखने में उनका आनुपातिक उपयोग….कमबख्त कौन ठूंठ होगा, जो इस दृश्य से अपनी आँखों को सार्थक  न करे……सुन्दरी तो तस्वीर में भी शोला होती है,फिर ये तो जीती –जागती देवियाँ  थी-हैं,जो सचमुच वहां बैठे तालियाँ बजा रहे रहे थे! उनकी किस्म्मत का तो कहना ही क्या?हरामजादे अकेले ही सारे  मजे लूट रहे थे…”
‘सुन्दरी तो तस्वीर में भी शोला होती है’,तभी तो उनके ‘कुल्हे,कमर छातियों और टांगों’को देखते ही कब्र में पाँव लटकाए बूढों  तक की लार टपकने लगती है!दुनिया  भर में ‘पोर्नोग्राफिक’ पत्र –पत्रिका में ,फिल्म ,वीडियो,सी..डी., इन्टरनेट.अलबम,फोन –सेक्स,फ्रेंडशिप क्लब और टी.वी. चैनल,इसी बूते  पर तो अरबों-खरबों डॉलर पौंड और रुपये कमा रहे है!इस प्रक्रिया में लाखों स्त्रियाँ, युवतियां और अबोध बच्चियाँ यौन हिंसा की शिकार होती रही है!हो रही है! सम्पादकीय –पाठकीय प्रतिक्रियाओं से लेकर सामूहिक बलात्कार तक! ‘पोर्नोग्राफी ’ के विरुद्ध विरोध के नाम पर भी,वही नग्न –अर्धनग्न  स्त्री छवियाँ छापने (और नोट कमाने )का नाटक –नौटंकी की जाती (रही) है! मर्दों के द्वारा ,मर्दों के मनोरंजन में स्त्रियों या स्त्री देह का ऐसा घिनौना,अपमानजनक और हिंसक व्यवसाय,सचमुच पितृसत्ता की पूंजी का (पूंजीवादी के हित में) भयंकर दुरूयोग ही कहा  जाएगा !भले ही उसका ‘प्रोपगेंडा’मंत्री इसे स्त्री की सम्पूर्ण सहमति से, सार्वजनिक हित का उपक्रम माने या प्रचारित करता रहे!कोई और सम्मानजनक विकल्प न होने के कारण,फिलहाल औरतों का यह तर्क भो सही है कि हम अपनी देह नहीं,सिर्फ देह की छवि बेच रही है !पूंजी के नाम पर, हमारे पास सिर्फ अपनी देह ही तो हो!हम क्या करे?कहाँ जाए?भीख मांगने से वेश्यावृति बेहतर है और वेश्यावृति से बेहतर है देह की छवि (कामोत्तेजक,नग्न और बिकाऊ)बेचना !विश्व बाजार में पूंजी  का खेल,पूँजी से ही खेलना पडेगा! आज आपकी शर्तो पर खेल रही है कल अपनी शर्तो पर भी खेलेगी!  चित्रपट पर नंग स्त्री देखते-देखते आपके लाडले पागल हो जायेंगे औए हम सबकी पहुँच से परे ! तब क्या करोगे ?

सुनी है ’ख्वाहिश’ की नायिका मल्लिका सहरावत की मनोकामना “अगर फिल्म में मेरी भूमिका सशक्त है और अंग प्रदर्शन की माँग  है तो मैं बेहिचक अंग-प्रदर्शन करूंगी! मैं यहाँ सती-सावित्री बनाने नहीं आई!”इसी का परिणाम है फिल्म ‘जिस्म’, ‘ख्वाहिश’, ‘हवश’, ‘हुस्न’, ’धूम’, और ‘उप्स’,!सुन्दर स्त्री पूंजी की बाजारी चकाचौंध में अपने लिए बन रही ,ऐसी आकर्षण और ‘ग्लैमरस स्पेस’ को पाने का यथासंभव प्रयास करेगी, कर  रही है! वह अपनी देह की पूंजी  को, पूंजी बाजार में निवेश कर  दरअसल अपने होने का अर्थ भी तलाश-तराश रही होती है, बावजूद तमाम दबावों –तनावों के !उसके दिमाग में बहुत-बहुत साफ़ (सपना!) है कि वह ऐसा करते हुए अपनी देह नहीं, सिर्फ देह की छवि पर लगा रही है ! हालाकिं इस प्रक्रिया में उसे  बहुत से, जाने अनजाने खतरों से भी ‘खेलना’पड़ता (रहता) है!मगर यादव जी ने ऐसी स्त्रियों के बारे में लिखा है “उसके भी सत्ता में हिस्सा चाहिए था! और उसके पास हथियार के रूप में सिर्फ उसकी देह है! इसलिए वह उसका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र थे-वह फिल्मों में,राजनीति  में,उद्योग में,सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में देह कीमत वसूल रही थी- वह पुरुषों के खेल में अपनी राजी से शामिल हो गई थी और उनके नियमों के हिसाब से खेल रही थी!”
क्या ‘सत्ता (अर्थसत्ता या राजसत्ता)में हिस्सा पाने के लिए वह अपनी ‘देह’ का ;इस्तेमाल’,’हथियार’के रूप में कर रही थी(है)या ‘अधिकार’ के रूप में?अगर ‘देह उसके थी’और ‘वह उसका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र थी’, तो वह अपने ‘अधिकार’ का इस्तेमाल कर रही है,ना की ‘हथियार’ के रूप में अपनी देह का! वह अपनी ‘देह की  कीमत वसूल ‘नहीं कर रही, बल्कि सिर्फ ‘देह’ की छवि बेच रही है- निर्धारित मजदूरी के बदले में! इस खेल में शामिल होना उसकी ‘सहमति’नहीं,बल्कि विवशता है या विकल्पहीनता  है.  शुरू में शायद वह ‘उनके नियमों के हिसाब’ से खेलती है ,मगर बाद में खुद अपने नियम भी बनाती- बदलती रहती है!फिल्म ‘सनम हम आपके है’में रोल कर रही नायिका शिवानंद साक्षी ने एक साक्षात्कार में कहा ‘इस फिल्म से जुड़े लोग हमारे सामने घटिया प्रस्ताव रख रहे थे !मैं फिल्म पाने के लिए, किसी के बिस्तर पर नहीं बिछ सकती!स्त्रियाँ अब आपके ‘बेडरूम’ से होकर नहीं ,बल्कि सीधे ‘बोर्डरूम’ जाने का निर्णय ले रही है!बहुत बुरा लग रहा है ना!
दरअसल ‘अंधा शिल्पी और आँखों वाली राजकुमारी ‘से लेकर ‘ सिंहवाहिनी’,कुतिया’,’पिल्ले’,’प्रतीक्षा’,’अपने पार’,’हनीमून और ‘फ्रेंच’ लैदर’ से होते हुए ,सारा स्त्री विमर्श ;हासिल ’और मैं वहीं नहीं हूँ तक भटकता –भटकाता रहा है!सारे तर्कों (कुतर्कों )और स्प्ष्टीकरणों के बाबजूद,अर्थ (अनर्थ)समझना-समझाना कठिन है!स्त्री और दलित विमर्श की आड़ में यादव जी और ‘हंस’ की भूमिका ’बलात्कार विशेषांक’ से लेकर ‘विश्वासघातों’ तक फल- फूल चुकी है! सावधान! आगे खतरा है! सेक्स और जनवाद’जिंदाबाद!जिंदावाद !!

बलात्कारी सपने और साहित्य के शंकराचार्य

कानून का विद्धार्थी होने की वजह से,बेटी या ‘बचपन से बलात्कार’ के सैकड़ों मुकदमें विस्तार से पढ़े है- एक से एक घृणित, पाश्विक,बर्बर और विकृत यौन मानसिकता की अकल्पनीय नजीर !सुसन ब्राउन मिलर की विश्वविख्यात पुस्तक ‘अगेंस्ट ऑवर विल’ तो खैर न जाने कितनी बार संदर्भ ग्रंथ की तरह देखती-पढनी पड़ती है! कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘सूरजमुखी’ अंधरे के’(प्रथम संस्करण १९७२),काशीनाथ की ‘एक बूढ़े की कहानी’(१९६८)छपने के कई साल बाद आया है! बलात्कार संबंधी जो कहानियाँ मैं  याद कर पा रहा हूँ , जैसे मंटों की ‘खोल दो’चित्रा मुद्गल की ‘प्रेत योनी’,कमला चमोला की ‘अंधेरी सुरंग का मुहाना’, और विभांशु दिव्वाल की कहानी ‘गंडासा’-किसी में भी बलात्कारी पिता नहीं है! इधर ‘हंस’ के ‘बलात्कार विशेषांक (सितम्बर२००४)’में ‘जाँघों के बीच’ (अस्वीकार), ‘इट्स माई लाइफ’, ‘जिन दिन देखे वे कुसुम’, ढाई आखर’, ‘देह दंश’, और ‘गैंगरेप’, प्रकाशित हुई है! इनमें से दो कहानियाँ ‘ढाई आखर’( अजय नावरिया) और ‘देह दंश’ (कविता) में, बाप द्वारा  बेटी से बलात्कार दर्शाया गया है! अजय नावरिया ने नायिका के पिता का नाम ब्रम्हदेव शर्मा रखकर, सरस्वती के मिथ को भी जगाने का प्रयास किया है और “कविता की ‘देह दंश’ उन प्रेमिकाओं के मानसिक- प्रलय से गुजरने”की कहानी है, जहाँ बलात्कारी पिता ही है और बेटी ‘माली’,पेड़,फल’ वाले रूपक में ही उलझी रहती है! अंततः नायिका (प्रेमी से)कहती है “पत्थर के अंग  पिघल उठे ,.थे ……धीमे-धीरे तुम्हारी बाँहों में मैं नदी-सी बह रही थी…फुल सी खिल रही थी! तुमने …. हां तुमने, तुम्हारे स्पर्श ने मेरे बदन से पौछ दिए थे नख-दन्त चिन्ह वाले घावों की स्मृति ! देह की गांठे- धीरे –धीरे खुली थी, मैं सुख की नदी में नहा उठी थी.. देह नशा होता है तभी समझ में आया!” यहाँ दोनों  ही कहानियों में नायिका ‘बच्ची’ नहीं है! राजेंन्द्र यादव ने सालों पहले ‘ उखाड़े हुए लोग’ में (पृ.३८०) ‘माली’ पेड़,फल, वाला रूपक विस्तार से लिखा था! इधर उन्होंने यहाँ तक लिख दिया है”दुनिया की हर खूबसूरत  लड़की चाहती है कि उसके साथ रेप हो….”विश्व भर की अश्लीलतम  ,प्रतिबंधित और कामोत्तोजक पुस्तको ,वीडियो,सी.डी. फिल्म वगैरह  का गंभीर अध्ययन ,किसी भी विचारक का इस सीमा तक ‘ब्रेनवाश’ करने के लिए काफी है! वृद्धावस्था में ‘पोर्नोग्राफी’ की बैसाखियों के सहारे ही जीवन को रंगमय- रसमय बनाये   रखा जा सकता है!

साहित्य के दर्पण में विवस्त्र स्त्री

अगर काशीनाथ सिंह  की ‘एक बूढ़े की कहानी’ के ‘जवान’ ज़िंदा हों तो अपनी यौन कामनाएँ ‘हंस’ का ‘बलात्कार विशेषांक’ पढ़ कर पूरी कर सकते हैं! प्राय: हर कहानी  में लडकी, शीशे के सामने निर्वस्त्र होती (दिखाई गई) है तमाम लेखक –लेखिकाओं ने ‘पाठकों की पसंद’ का पूरा ध्यान रखा है! ‘बदलते समय के साथ ….कहानियाँ बदली हैं ’ और ‘कहानियों  का मिजाज ‘ भी ! इस महत्त्वपूर्ण ‘ऐतिहासिक’ बदलाव के लिए भावी पीढियां ,’हंस’ के यशस्वी सम्पादक की चिरऋणी रहेंगी!‘जांघों के बीच’ ( नाम बदलकर ‘अस्वीकार’ कर दिया गया) की नायिका का नाम ही है ‘आनंदिता’,जो बलात्कार की शिकार होती (की जाती) है! कहानी में एक जगह ३४ “उसने शीशे के सामने अपने अंत:वस्त्र उतार दिए……अपनी नग्न देह को देखती रही …..उसके जबड़े भींचने लगे……उसने यौनांग  पर अपना हाथ लेकर उस दर्द को फिर महसूस किया जो उस दिन से उसके साथ है! दर्द की टीस ने उसकी जबान खोल दी –“सालों –हरामजादों के बीज..” दर्द की टीस’ महसूस करने के लिए, ऐसी स्त्री को किसी शीशे के सामने विवस्त्र होने की जरुरत नहीं! उसके मन में-दिमाग में ७० एम एम का दर्पण लगा है!

निर्वस्त्र नायिका की देह का जो वर्णन उधर ‘छूट ’ गया है, उसे ‘जिन दिन देखे वे कुसुम….’(लता शर्मा)में पढ़ लें “वो पलंग से उतरी और धीरे-धीरे कपडे उतारने लगी…..पहले कुरते को तहाकर पलंग पर रखा,फिर अंगिया को !अब सलवार !वो भी तहाकर रख दी… उसने बाल खोल डाले|हाथ ऊपर कर जोर से अंगडाई’ ली… कहीं कोई तेज-तेज साँसे भर रहा है! वो धीरे –धीरे कमरे में टहलने लगी…कमर पर हाथ रख कर चारों ओर घूमी ,आगे पीछे झुकी! उंगलियाँ आपस में फंसा,सिर के पीछे रख, यही मुद्राएँ दोहराई!’उनके घने-लंबे,हलके से घुंघराले काले बाल कमर तक छितराए हुए थे! बगलों के बाल हल्के भूरे से थे और योनि के बाल गहरे काले –घुंघराले……साफ रंग,बड़ी –बड़ी आँखे और नन्हें-नन्हें स्तन !”३५ ‘नन्हे-नन्हे स्तन ‘देख कर मन न भरा हो,तो पढ़े “मेरी छाती ऐसी उभरी हुई थी कि अगर मैं टी-शर्टपहनती तो उन्हें किसी भी तरह चलते लोगों की निगाह रोकने से रोक न पाती!इतना ही नहीं कुछ लोग जब रूककर देखने लगते तब मैं मारे खुशी के और पैर पटककर चलती! वे खूब हिलते !मेरी सुडौल जाँघों में कसी जींस मेरी सुन्दरता को और बढा  देती थी! होस्टल का रूम बंद करके मैं पूरे कपडे खोलकर शीशे में चारों तरफ से खुद को देखती….यह मेरे जवान होने की शुरुआत थी !”३६ और अंत में सिर्फ इतना ही”एक बार (हर बार) तो उन्माद इतना बढा कि एकांत कमरे में विवस्त्र होकर आदमकद शीशे के सामने खड़ी हो गई और  पगली जैसी बहकने लगी-‘इतने लोग झूठे कैसे हो सकते है?शायद वही भूल गई है! और किसी बेसुधी के आलम में इस स्थिति से गुज़री हो! यदि ऐसा है तो वह ‘गैंगरेप’उसके शरीर पर दिखना चाहिए….लेकिन कहां है…?कहां…..३७(पाठकों की ) अदालत वक्ष,नितम्बों,जाँघों और योनि पर नख-दन्त चिन्हों को भी तो देखना चाहती है!बिना देखे कैसे फैसला हो!

यह सब मनगढंत,काल्पनिक, अविश्वसनीय लग रहा हो, तो तसलीमा नसरीन के ‘बचपन के दिन’ ३८ पढ़ सकते हैं!”अब तुझे वह मजे की चीज दिखाऊं”….!मुझे नंगा क्यों कर रहे हो?”…….शराफ मामा ने दुबारा मेरा हाफपैंट खीचं कर अपने हाफपैंट से अपनी धुन्नी बाहर निकाल कर मेरे बदन से सटा दिया….मैं जोर से बोली ,’यह क्या कर रहे हो ?शराफ मामा हट जाओ,हटो’……”तुझे जो मजे की चीज दिखाना चाहता था,यह वही चीज है”……”पता है,इसे क्या कहते हैं! दुनिया  में सभी इसे करते है!तेरे अम्मा-अब्बू भी करते है,मेरे भी”………शराफ मामा अपनी इन्द्रीय  को बड़ी ताकत से ठेल रहे थे !मुझे बहुत खराब लग रहा था! शर्म से अपनी आँखों पर मैंने अपना हाथ रख लिया…”यह बात से कहना नहीं,कहोगी तो सर्वनाश हो जाएगा !”किसका ?स्त्री का ही ना! सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में ‘बलात्कार स्त्रियों के लिए मृत्युजनक शर्म है’! और मर्दों के लिए ?पौरुष का प्रतीक,नारी देह पर विजय, (लिंग) वर्चस्व के सांस्कृतिक धर्म ध्वज !

पोर्नोग्राफिक मीडिया और अश्लील साहित्य के ही परिणाम हैं – छोटे-बड़े शहरों जलगांव,जयपुर,अजमेर,जालंधर,चंडीगढ़,चित्रदुर्ग,दिल्ली,जोधपुर,भोपाल)में हुए सेक्स-स्केंडल,नयना साहनी,शालीनी भटनागर,जेसिका लाल  से लेकर मधुमिता हत्याकांड और सिनेमा से साहित्य और बाजार तक फ़ैली यौन फैंटेसिया, नग्न-अर्धनग्न स्त्री देह की कामुक छवियां !सेक्स सबसे अधिक मुनाफे का व्यापार है और हिंसा (हत्या-बलात्कार)पुरुष वर्चस्व बनाए- बचाए रखने का षड्यंत्र ! राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय पूंजी और उपभोक्ता संस्कृति,स्त्री को सिर्फ आनंद या मनोरंजन की ‘सेक्सी डॉल’,सेक्स बम’, वस्तु या साधन के रूप में प्रस्थापित करती जा रही है! इस ‘बाढ़’ की भयावहता, यादव जी की समझ से बाहर है!

 विश्वासघाती हाजिर हो! 

जाने- अनजाने उन्होंने एक पूरी पीढी को दिशा भ्रमित करने का काम किया है! आत्म शान्ति के लिए या आत्म संतुष्टि के लिए? एक सवाल ‘किस हेतु आपने ‘हंस’ का सम्पादन करना शुरू  किया ? का जवाब देते हुए राजेंद्र यादव ने कहा था “अपने समकालीन लेखकों को सामने लाने तथा अन्य नए लेखकों को प्रकाश में लाने हेतु मैंने यह कार्य आरम्भ किया है!मुझे इसमें शान्ति मिलती है!जैसे कुश्ती लड़ने वाला बड़ा पहलवान छोटे-छोटे पहलवानों की कुश्तियां देखकर संतुष्ट होता है!!३९ ‘मेरे विश्वासघाती’ (रामशरण जोशी) की पृष्ठभूमि में, ‘छोटे-छोटे पहलवानों की कुश्तियां’ और ‘बड़े पहलवान’ या ‘बुजुर्ग लेखक’ की सद्भावना समझी जा सकती है !कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ‘आदमी,बैल और सपने’ लेखक वाले क्रांतिकारी, कामरेड, समाजशास्त्री, लेखक, विचारक द्वारा  स्त्रियों के ‘शिकार’ की ‘गौरवगाथा’ भी पढनी पड़ेगी!किसी संवेदनशील पत्रकार की कलम, स्त्री की अस्मिता को इस तरह और अपमानित करेगी!व्यक्तिगत पापों (अपराधों)का प्रायश्चित भले ही संभव हो, मगर सार्वजनिक पापों का कोई भी प्रायश्चित असंभव है! ‘आधी दुनिया’ऐसे (क्रांतिकारी) नायकों को, न ‘वायदा माफ़ गवाह’ या ‘मुखबिर’ मान सकती है और न ‘संदेह का लाभ’ देकर ‘बाइज्जत बरी’ कर सकती है!औरतों (दलित,आदिवासी,देसी –विदेशी)का आरोप है कि उन्हें सार्वजानिक रूप से नंगा करके घुमाया गया, सामुदायिक बलात्कार किया गया और सरेआम हत्या कर दी गई या आत्महत्या के लिए विवश किया गया !इस सुनियोजित षड्यंत्र में एक प्रतिष्ठित पत्रकार,सुप्रसिद्ध सम्पादक और एक राष्ट्रीय पत्रिका का प्रकाशक (और अन्य अनाम सहयोगी)भी शामिल है!मामला’जनअदालत’ में विचाराधीन है! देखो कब क्या फैसला होता है! फिलहाल कुछ ‘अभियुक्त’ जमानत पर रिहा है और कुछ फरार !

मुख्य अभियुक्त का कहना है “रोटी रोमासं और रिवाल्यूशन ! अरे भाई ! यह अब नही चलेगा !इसमें से एक ‘आर’ का सफाया करना होगा,और वह आर होगा रिवाल्यूशन “!….मुझे याद करना चाहिए माधुरी दीक्षित  ,काजोल ,जूही चावला,शिल्पा शेट्टी और ऐसी ही अनेक परियों को! ऐसी परियों को जो छैया- छैया करती आयें  पलक झपकते कंचन की नगरी में मुझे उडा कर ले चलें ! कंचन काया हो !कंचन नगरी हो! सब कुछ कंचन ही कंचन हो! ४०सहअभियुक्त (सम्पादक)के अनुसार वे जानता – समझते थे कियह “लगभग आत्महत्या करने जैसा दुस्साहस है” आप इसे कुएं में जहर डालना कहें या कुछ और मगर मैं क्या कर सकता था (हूँ) ? मुझे तो ‘हंस’ घर-घर पहुंचानी है ! पहुंचा रहा  हूँ कि नहीं ?

संदर्भ
१.    मेरे साक्षात्कार: राजेन्द्र यादव,पृष्ठ.१३८
२.    मेरे साक्षात्कार: राजेंद्र यादव ,पृ.२०२
३.    राजेंद्र यादव के बारे में उनकी धर्मपत्नी मन्नू भंडारी,औरों के बहाने पृ.१४८ नोट; यह लेख अक्टूबर १९६४ में प्रकाशित हुआ था !
४.    मेरे साक्षात्कार,१९९४,किताब घर न.दी.पृ.१४६
५.    अठारह उपन्यास (१९८१)पृ.१९५ नोट; यह लेख ज्ञानोदय, सितम्बर १९५९ में
६. हासिल , हंस , अगस्त -सितम्बर , १९९७
७ . साहित्य का उत्तरकाण्ड , १९९८ , प्रवीण प्रकाशन , नई दिल्ली ( पृ १७९ -१८० )
८ . होना /सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ , आदमी की निगाह में औरत , पृ. ९९ .
९ १८ उपन्यास , पृ . २३ ९
१० . कांटे की बात खंड ३ , पृ . १५६
११. मेरे साक्षात्कार , पृ. १३२
१२. कांटे की बात खंड ३ , पृ . १४०
१३. होना /सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ , आदमी की निगाह में औरत , पृ.९८.
१४. हंस , अगस्त -सितम्बर १९९७
१५ . हंस , अगस्त -सितम्बर १९९७
१६. वहाँ तक पहुँचने की दौड़ ,पृ.११२
१७. वसुधा , अंक५०- ६०, पृ. ४५३ -४५४
१८. वही , पृ..४५४
१९ . आदमी की निगाह में औरत ,२००१ ,  पृ.९६ -१०७ .
२०. मैं वहाँ नहीं हूँ , राजेन्द्र यादव, आकार , मार्च , २००१ पृ.. ८६
२१ . होना /सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ , आदमी की निगाह में औरत , पृ.१०६
२२. हंस सम्पादकीय , सितम्बर २००४ , पृ ८
२३. हंस , जनवरी २००३,  पृ.२४ .
२४. हंस , नवम्बर -दिसंबर  १९९४ ,  पृ.२८
२५. वहाँ तक पहुँचने की दौड़ ,पृ.११६
२६ . कथाकार राजेन्द्र यादव से ओम निश्चल की बातचीत , साक्षात्कार , दिसंबर २००४ पृ. ९
२७. समय माजरा , २७ , दिसंबर २००४ , राजेन्द्र यादव से अजेय कुमार से बातचीत
२८ . आउटलुक पृ. ५०
२९. आउटलुक पृ. २५
३०. आउटलुक पृ.५०
३२ . आउटलुक पृ.५१
३१. आउटलुक पृ.९६
३३. हंस जुलाई ,१९९३
३५ वही , पृ ४४
३६ . ढाई आखर , पृ . ५९
३७. गैंग रेप , उषा यादव , पृ. ८५
३८.वही पृ ८०
३९. राजेन्द्र यादव के उपन्यासों में मध्य वर्गीय जीवन , डा. अर्जुन चौहान , पृ. २५५
४०. मेरे विश्वासघात से बहुत पहले तीन जनवरी १९९९ कू दैनिक नवज्योति पकाशित श्री जोशी का लेख , खुद से पलायन को जी चाहता है

‘डार्क रूम में बंद आदमी’ की निगाह में औरत : पहली क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( पेशे से वकील और  प्रतिबद्धता से स्त्रीवादी आलोचक अरविंद जैन ने अपने समय में एक कल्ट  बन गये राजेन्द्र यादव के  आलेखों , सम्पादकीयों  से उद्धरण लेते हुए  उन्हें स्त्री विरोधी  चिंतक  सिद्ध किया है  . न्यायालीय  जिरह की शैली  में  लिखा यह आलेख पहली बार उद्भावाना ( 2005 )  में छपा था , हम इसे दो किस्तों में  रख रहे हैं , बहस को आगे बढाते हुए लेखों का स्वागत होगा . )

” धीरेंद्र स्थाना : आपकी बात से यह निष्कर्ष निकला कि पत्नी को एक तरह से नर्स जैसा होना चाहिए ? 
राजेन्द्र यादव : देखो , मेरे जवाब से भाई लोग बिदक जायेंगे और कहेंगे और कहेंगे यह सामंतवादी मानसिकता है, पर होना तो यही चाहिए , जो रेणु को मिला रेणु की पत्नी भी तो नर्स थी और लेखक की पत्नी के लिए नर्स होना बहुत जरूरी है ” . १ 
” सुधीश पचौरी : मन्नू जी आपको सामंती संस्कार  वाला कहती हैं , एकदम फ्यूडल?
राजेन्द्र यादव: नहीं कहतीं
सुधीश पचौरी : कहती हैं , आप कैसे कह सकते हैं कि नहीं कहती ?
राजेन्द्र यादव : वे जेनरली कहती हैं कि मैं कमलेश्वर , राकेश आदि उस पीढी के लोग मिजाज से फ्यूडल हैं , एटीटयूड फ्यूडल है. अभी कल ही कमलेश्वर थे तो वे कल ही गालियाँ दे रही थीं कि चार -चार शादियाँ चाहते हैं , स्त्रियों के प्रति यह सामंती दृष्टि है .’

” यों हर मामले में निहायत अनकन्वेंशनल  ,प्रेम विवाह-परिवार-सेक्स सबके मामले में अत्याधुनिकता के पोषक ,हर प्रकार की अनैतिकता के समर्थक ……..पर अपने हर अनकन्वेंशनल और अनैतिक काम को झूठ और रहस्य का जाम  पहनाने को मजबूर! हाँ,अपनी हर गैर जिम्मेवार हरकत को जस्टिफाई करने के लिए दुनियाभर के फलसफे गढ़ते है,महान कलाकारों के उदहारण देते है ,पर आज तक अपने इस अनगढ़ जीवन दर्शन का एक भी समर्थन नहीं जुटा पाए !’’३

“अभी तक अपने ऊपर मैंने एक भी समीक्षा ऐसी नहीं देखी ,जहां लगे कि गहराई में जाकर बात की हैं !शायद मैं ऐसा लेखक हूँ , जिस पर चलते -चलते कुछ भी नहीं लिखा जा सकता ,या जो एक विशेष क्षमता की मांग करता है !”४

सिद्ध –प्रसिद्ध कथाकार –सम्पादक राजेंद्र यादव ने नाबोकोब के उपन्यास ‘लोलिता’की विवेचना करते हुए लिखा है “वस्तुत:चाहे नबोकोव दुवारा प्रौढ़ पुरुष को किशोरी कन्या के प्रति आसक्ति का चित्रण हो या फ्रेन्स्वा सगा  दुवारा दिखाई गई षोडशी की प्रौढ़ पुरुष के प्रति मुग्ध अनुरक्ति ,दोनों ही आज के एक विकट मानसिक और आध्यात्मिक संकट की ओर इशारा करते है! बूढ़े किशोरियों   से प्रेम करें और किशोरियां बूढों की वासना शांत करें ,दूसरी तरफ युवक आपस में अप्राकृतिक सम्बन्ध रखें ,मौके ,बेमौके छूरे और पिस्तौलें लेकर टूट पड़ें ,क्या ‘फ्री वर्ल्ड की यहीं नैतिकता रह गई हैं ?लुप्त –मूल्यों और विघटित समाज के मानस का प्रतिबिम्ब ‘लोलिता ‘सभ्य और सुरुचि के लिए एक चुनौती और प्रश्नचिन्ह दोनों है !

ठीक ३८ साल बाद उन्होंने लिखा “नारी क्या हैं ?सिर्फ  एक बहता हुआ सोता !उसे तो बहना ही हैं !अगर आप कुछ मिनट उसके किनारे अपनी –अपनी थकान मिटा लेते हैं ,दो घूंट पानी पीकर ,अगली लम्बी यात्राओं पर निकल पड़ने के लिए तरोताजा हो जाते हैं ,तो इसमें बुरे क्या क्या हैं ?नहीं ,न इसमे कुछ गलत है,न अनैंतिक…..भाड़  में गई नैतिक मर्यादाएं और शील सच्चरित्रता !यह  हमारा सारा लेखन इन्ही बंधनों के खिलाफ ही तो विद्रोह हैं! “६

सुधीश पचौरी के शब्दों में “यह नयी कहानी के एक नायक नवल का गहन चिंतन क्षण हैं ! इस ‘खेलन ‘ में नयी कहानी के लेखन का सांग रूपक सक्रिय हैं! नारी सोता हैं !थकान मिटाना उसके साथ सोना हैं! ‘लम्बी यात्राएं ‘ महान कृति की रचना की साधना हैं! रूपक को आसान कर लें तो एकदम ‘मानो ‘सूत्र चमकता हैं:नयी कहानी लिखने के लिए हर बार एक नयी स्त्री के साथ सोना जरुरी है …..नयी महान कहानी के लिए एक अदद लड़की चाहिए !एकदम स्वप्ना जैसी !कारण,कला की अवधारणा हैं, ‘नारी प्रकृति की श्रेष्ठ  कृति है और जब कलाकार उधर आकर्षित होता है, तो इस कलाकृति को एप्रीशिएट करता है !मगर यह सम्बन्ध  सामाजिक मर्यादाओ में ऐसा ही अनुशासित होता तो क्यों ब्रह्मा  अपनी ही पुत्री सरस्वती के प्रति इस तरह आसक्त होते? क्यों कलाएँ नारी केन्द्रित होती हैं ?’…….. रचना का रूपक यूं   पूरा होता है: ब्रहम  यानि नवल,सरस्वती यानि स्वप्ना यानी कहानी “७

नहीं सुधीश जी नहीं !नारी यहाँ सार्वजनिक सोता हैं –वेश्या ,रखैल,रंडी और कॉलगर्ल  !असली अर्थ हैं ;”अच्छा तुम कहती हो की जब हमने तुम्हें वेश्या बनाया ,नगरवधू का दर्जा दिया ,कोठो पर बैठाया ,कॉलगर्ल के पेशे में डाला अपराध और कुफ्र की दुनिया का हिस्सा बनाया तो सामूहिक उपयोग और उपयोग के लिए सुरक्षित कर लिया !जैसे आज जन-सुविधाओं की जरुरत हैं,वैसे ही हमें तुम्हारी सार्वजनिक सेवाओ की जरुरत हैं ताकि घर-बार से थका –मांदा आदमी घडी –दो घडी तरोताजा होकर अगली यात्राओ  पर निकल सके या घे-बार से भागकर चैन-शांति पा सके !”८

घर-बार से दूर (भागा)आदमी ,बहुत थका-मांदा है !
’थकान’ मिटाने या ‘चैन-शांति’ पाने या ‘तारोताजा’ होने/सोने के बाद ,अगली यात्राओं या ‘शिकार’ पर निकलना चाहता है. स्त्री भी ‘विद्रोह’कर सकती हैं ,यह यादव जी के चिंतन का विषय कभी नहीं रहा ! राजेंद्र यादव मानते है “वह (स्त्री) सुन्दर हो या असुंदर,दोनों ही सिथितियें में शरीर को लेकर अत्यधिक परेशान हैं !बहुत सुन्दर शरीर पाया हैं,तो दुनिया(मर्दों)को कुछ नही  समझती है और असुन्दर तो अपने आप को कुछ भी नहीं समझती है !९ और’’वह (स्त्री)एक ऐसी ‘दृश्यवस्तु’ हैं जिसे अपनी साथर्कता पुरुष की निगाह में सुन्दर और उपयोगी लगाने में ही पानी है… पुरुष वह शीशा है ,जिसके सामने वह हर समय अपने को निहारती हैं—चाहे वह एकांत की ड्रोंसिंग टेबिल हो या बिस्तर ,बाजार हो या घर का लॉन !”१० क्योंकि  “उसे हमेशा यह लगता है ,जो भी आदमी मेरे पास आया हैं,वह मेरी खूबसूरती के लिए आया हैं, मेरे लिए नही आया !जिस दिन मैं खुबसूरत (और उपयोगी) नहीं रहूँगी ,वह मुझसे विमुख हो जाएगा!”११

खुबसूरत  दुश्मन और मकड़ीजाल

राजेंद्र यादव बार-बार दोहराते हैं “नारी प्रकृति है ,जीवन को निरंतरता देने का माध्यम है,माँ है,इसलिए वह(ही)अपने सौन्दर्य  और यौवन से हमें मोहकर प्रजनन और संरक्षण—दोनों में हमारा उपयोग करती है !हमें इस्तेमाल करती है !वह अमरबेल की तरह हमारे ऊपर छा  जाती हैं,हमारा सारा सत्व और रस चूस कर हमें व्यर्थ कर देती हैं !निर्भर और कमजोर होने का भ्रम देकर वह हमें  बांधती हैं !हमारे बीच औए हमारे साथ ही वह ऐसा  खुबसूरत दुश्मन है, जिसके मकड़ीजाल में बंधकर हम समाप्त होते हैं !”१२


‘प्रकृति’ या ‘प्रजनन’ के साधन का ‘उपयोग’या ‘इस्तेमाल’
जैसी भाषा या शब्दों पर बहस की जा सकती हैं लेकिन निम्नलिखित वाक्यो की ‘अमिधा’ ‘व्यंग्य’या ‘व्यजना’ क्यों हैं?’ग्रीन रूप’में नायक,नंगा हो चिल्ला रहा हैं “सच बात तो यह है की हम जिन्दगी –भर तुमसे ही इस्तेमाल होते रहे हैं !सिर्फ इसलिए की तुम्हारे पास ‘कंट’हैं और कभी-कभी उसकी जरूरत  के लिए पागल हो जाते है !मगर खुद ही सोचो,कितनी बड़ी कीमत वसूलती हो तुम अपने शरीर के उस उस हिस्से की?उसकी सारी जिन्दगी चूस डालती हो ………….और भाव ऐसा ,मनो हम ही तुम्हारे जिन्दगी पीसे  डाले रहे हैं !”१३ हर ‘सभ्य’ सुसंस्कृत’व्यक्ति के लिए अश्लीलतम साहित्य (फिल्म ,विडियो इंटरनेट वगैरा)पढ़ना अनिवार्य है!लिखना  भले ही बस की बात नही हो!

राजेंद्र यादव कहते-मानते रहे है कि स्त्री”हमारे बीच और हमारे  साथ ही वह ऐसा खूबसूरत दुश्मन है,जिसके मकड़ीजाल में बंधकर हम समाप्त होते रहे है”मगर उनकी कहानी ‘हासिल’के नायक नवल (या वे स्वयं) का इकबालिया बयान दिया है “वह (एक)मकड़ा है और चारों ओर मुलायम रेशम का खूबसूरत ,तरतीबवार जाल फैलाकर बीच में चौकन्ना चुस्त इधर –उधर देख रहा है (हूँ ) की कब मक्खी हमले की सीमा के भीतर आती हैं !”१४

लाड टेन्नीसन के शब्दों में, इस ‘मकडजाल’ को आसानी से समझा जा सकता है “man is a hunter,women is his game, The sleek and shining creature of the chase,we hunt them for the beauty of their skin”.
नायक (लेखक) के मन में कोई अपराध बोध नहीं क्योंकि”साहित्य, कला,साधना का इस्तेमाल अगर उसने इस निरीह लड़की को फंसाने के लिए किया था, तो उसने भी अपनी असहायता ,लाचारी,और अनाथ होने को यहाँ तक पहुँचने की सीढ़ी बनाया था!१५ ऐसी लड़कियां’कहानियाँ’और कविताओं के क्षेत्र में पाव जमाने के लिए कहीं भी बिछ जाने वाली नवोदिताएं ……..”हैं १६ और वे महान लेखक ,रचनाकार ,कलाकार, विचारक ,चिन्तक और कथाकार –संपादक!तृप्ति की तलाश में भटकती स्त्री ‘कुलटा’है!काम कुंठित,यौन  विकृतियो की शिकार ,समलेंगिक या व्यभिचारिणी है! यौन मुक्ति की आकांक्षा में देह और नैतिकता से मुक्त !

स्त्री मुक्ति बनाम मुक्त स्त्री

‘मुक्त स्त्री’और मर्दवादी मानसिकता के सन्दर्भ में सुधीश पचौरी का मनना हैं “मुक्तिकामी औरत आजाद है और आजाद औरत आसानी से उपलब्ध होती है!कल तक घोर सामंती परिवेश में दमित रहता आया  हिंदी का लेखक जो अब नए ग्लोबल समय में स्त्री के नए स्पेश बनते देखता है तो अचानक पाता है की उसकी बीबी जो उसके बचपन में गावों कस्बे में उसके पल्ले बांध दी गई थी अब पुरानी हो चली है!उसे साथ सभा सोसायटी में जाने लायक औरत चाहिए !सामन्ती मानसिकता वाले समाज में हिंदी लेखक की सामन्ती मानसिकता की इस यात्रा में शहरी लंफगाई स्त्री के ‘आजादी’के मुहंमांगे विचार से ठीक नजदीक बैठ जाती है –आजादी के बाद उभरे हिंदी के कवि कथाकारों का एक बड़ा टोला अपनी पत्नियों  को छोड़ दूसरी –तीसरी वाला लेखक यों ही नहीं बन गया !उसके सामन्ती से लंफगई के संक्रमणकाल को उसकी रचना यात्रा में पढ़ा जा सकता है !नई कहानी के लगभग सारे महारथी (विशेषकर राजेंद्र यादव) अपने जीवन को जब भी याद करने बैठते है ,वे अपनी लड़कियों और प्रेमिकाओं की याद करने लगते है और इस सबमें वे अपनी मर्दवाद को अपने हिरोइज्म को सेलीब्रेट करते दीखते है!नई कहानी ले लेखक या नए कवि का प्रोफाइल मूलतःएक दमित सेक्स वाल्व आदमी का प्रोफाइल ही हैं! स्त्रीत्वाद के इन दिनों में उन्हें लगता है कि स्त्री मुक्ति का एजेंडा सीधे आजाद स्त्री का एजेंडा है और मजेदार है…………..जहां कोई राजनीति-अर्थगत नहीं है!१७


सुधीश ने सही लिखा है “सच .समाज में चलने वाले स्त्री अधिकार संबंधी
आन्दोलन का ताप अभी साहित्य तक नही आया है वरना ‘आजाद’छवि को लार टपका टपका कर कहने वाले .सेलीब्रेट करने वाले लेखक ‘अपने लम्पटत्व को सेलीब्रेट नहीं कर पाते !१८”

नारी’ नदी’हो.’प्रकृति’ हो या ‘दृश्यवस्तु’ उसकी ‘सार्थकता’ सिर्फ ‘सुन्दर’  और उपयोगी’  होने में ही है !इसलिये वह अपने ‘सौंदर्य’और यौवन में हमें ‘मोह’ लेती है,इस्तेमाल करती है ,खुद ही हमारे ‘ऊपर’(आ)छा जाती है, सारा ‘सत्त्व और रस चूस’ कर हमें ‘व्यर्थ’ करने के लिए ‘मकडजाल’में फंसा लेती है!वह सचमुच एक ‘खुबसूरत दुसमन’ है,जिसके साथ ‘होना/सोना’ हमारी ‘विवशता’ है,विश्वास न हो तो पढ़ कर  देख ले –‘होना/सोना एक खुबसूरत दुश्मन के साथ’!१९

खुबसूरत दुश्मन और बलात्कार

क्या दुनिया की हर खूबसूरत  स्त्री,पुरुष की दुश्मन है और दुश्मन के साथ ‘बलात्कार’ का अधिकार है मर्दों का?राजेंद्र यादव इसे सहमति से सम्भोग में बदलने के लिए ‘सिद्धांत’गढ़ते हैं (दरसल नैन्सी फ्राई डे से चुराते हैं ) –“दुनिया की हर खुबसूरत लड़की चाहती है की उसके साथ रेप हो ….रेप का आधा मजा तो वह लोगों की भूखी निगाहों और तारीफों में लेती ही है! डरती वह उस घटना से नहीं  है, बल्कि उसके तो सपने देखती है ! वह डरती है उस घटना  को दूर खड़े होकर देखने वाली आँखों से, तमाशबीनों से…”२०

दुनिया की हर खूबसूरत (या बदसूरत) लड़की रेप (या फक) होना चाहती हो या नहीं, मगर मर्द जरुर ऐसा सोचता-समझता और मानता हैं कि वह्सिर्फ़ देह,वस्तु,भोग्या और आनदं का साधन है!”बलात्कार जैसी साधारण –सी बात पर ऐसा आसमान सिर पर उठा रही हो !जैसे प्रलय हो गई हो !इच्छा -अनिच्छा को मारो गोली ,बलात्कार का अर्थ सम्भोग ही तो हुआ न ? बताओ मर्द अगर औरत के साथ सम्भोग नहीं करेगा तो कहाँ करेंगा कोई तो करेगा आखिर ,फिर क्या फर्क पड़ता है कि वह कौन है! दिन-भर में  जाने कितना कुछ घटता है जो हमारी –तुम्हारी इच्छा के अनुकूल नहीं होता!इसके लिए न ह्त्या की जाती है न आत्महत्या ….तुम्हें देख कर  हमारे भीतर वासना जगती है यो पूरा करने क्या भगवान उतरेगा? हर बात में तुम्हारे इच्छा –अनिच्छा ही बनी रहेगी तो हम क्या अपनी ऐसी –तैसी करवाएंगे!”२१अगर’बलात्कार ‘और ‘सम्भोग’ में ही कोई फर्क नजर न आता हो तो ऐसे ‘परम पुरुष’के बारे में क्या कहा जा सकता है ?स्त्री विमर्श की यह कैसी भाषा –परिभाषा है?

जब वे  तीस वर्ष के युवा थे ,तो यह बर्दाश्त करना मुश्किल था कि ‘बूढ़े किशोरियों से प्रेम करें और किशोरियों बूढों की वासना शांत करें !’मगर जब खुद बूढ़े हो गए ,तो कहने लगे “न इसमें कुछ गलत है ,न अनैतिक …भाड में गई नैतिक मर्यादाएं और शील सच्चरित्रता !”सच पूछो तो उन्हें लगता है ‘स्त्री देह पर काबू पाने का सबसे बड़ा हथियार है बलात्कार’ और मुझे ‘सलमान रुश्दी’ की यह बात कहीं सही लगती है कि ‘हर सभ्य समाज के लिए अश्लील साहित्य अनिवार्य है ,’क्योंकि वह नैतिक किलेबंदी का प्रतिरोध और प्रतिपक्ष है!२२ इससे पहले वे कह चुके हैं कि “अश्लीलता सिर्फ औरत के शरीर में ही नही होती है !”२३ ‘शी इज आब्सीन’ का इससे बेहतर अनुवाद,वे कर  भी नही सकते !यहाँ “सिर्फ”और ‘ही’ बहुत सोच-समझ कर  लिखे शब्द हैं,जिनका अर्थ (अनर्थ)बेहद पारदर्शी ही नहीं बल्कि अत्यंत घातक भी है !एक अनाम (महिला)लेखिका के शब्दों में ‘ही इज नॉट ओनली आब्सीन बट पर्वट टू!’कहने की जरुरत नहीं की अश्लीलता  व्यक्ति के दिमाग या दृष्टि में ही होती है! मैनेजर पांडे के अनुसार “अश्ल्लीता एक अर्थ में पुरुषवादी वर्चस्व को कायम रखने का माध्यम है! अश्लीलता की परिभाषा पितृसत्तात्मक  समाज अपनी जरूरतों के हिसाब से रचता- गढ़ता है!”२४

क्या खूबसूरत स्त्री( स्त्रियों  )के साथ होने?सोने के बाबजूद ,कुछ ‘हासिल’ नहीं हुआ तो उन्हें दुनिया की हर खूबसूरत स्त्री,’दुश्मन’और स्त्री देह अश्लील नजर आने लगी है?या समझ में नही आ रहा कि नारी  क्या है , पुरुष की शक्ति या कमजोरी ,उसकी क्षमताओं को धार देने वाली  या उसे ले डूबने वाला पत्थर …..सहभागिनी  या रहनुमा?२५

उन्हें यह भी “ समझ में नहीं आता कि चौबीसों घंटे चलने  वाले पचासों चैनलों में स्त्री की देह से लेकर रतिक्रिया की कौन सी मुद्रा है ,जो हम माँ –बहनों के साथ बैठ कर  नहीं देखते ?मगर उसके शतांश को लिखते ही ‘देहवाद’कह कर छाती-माथा कूटने लगते है !स्त्री की देह में अब बचा क्या है, जिसका सहारा लेकर ट्रेक्टर –सूट  और और मोटर –गाड़ियां न बेचीं जाती हों!मुझे इस तरह के छदमों और आडम्बरों से चिढ़ होती है !किस संस्कृति और शील की बात हम इस ‘गलोब्लाइजेशन’ और ‘बाजारवाद’ के जमाने में दूसरों को समझाना चाहते हैं!”२६

यह ‘ग्लोबलाइजेशन’ और ‘बाजारवाद’ का समर्थन है या विरोध ? पूंजीवादी प्रचार तंत्र में स्त्रीदेह और सेक्स के माध्यम से आम जनता की कमजोरी का फ़ायदा उठाते हुए आर्थिक शोषण करते राष्ट्रीय  –बहुराष्ट्रीय   निगमों की तर्ज पर क्या साहित्यक !पत्रकारिता में भी वही खुली छुट लेने –पाने के तर्क (कुतर्क) नहीं है? साहित्य में  भी स्त्री का वैसा ही शील (हरण ) हो,यह कौन से (कैसी?)प्रतिरोध की संस्कृति है? ‘पोर्नोग्राफी’ पूंजीवादी व्यवस्था में स्त्री के शोषण और दमन का सबसे बड़ा हथियार है और अधिकतम मुनाफा कमाने का ‘शर्तिया इलाज’!स्त्री देह का सहारा ‘लेकर’ ट्रैक्टर-सूटऔर मोटर-गाड़ियां’ही नहीं ‘इंडियाटुडे’’आउटलुक ‘और ‘हंस’ जैसी पत्रिकाएँ भी बेची जाती रही है! अपने धंधे के प्रचार -प्रसार के पक्ष में .व्यापारी (पितृसत्ता) न जाने कब से इस प्रकार की बौद्धिक वेश्यावृति या व्यभिचार के पीठ थपथपाते रहे है !साहित्य में भी ‘रूपर्ट’ मार्डोक की कमी नहीं! पोर्नोर्गाफ़ी के विरोधियोंको ‘विक्टोरियन’ ’आर्यसमाजी’ ‘शुतुरमुर्गो की औलाद’ ‘ढोगी’ ‘पाखंडी’ ‘धार्मिक कठमुल्ले’ ‘संकीर्ण कट्टरपंथी’और न जाने कैसी-कैसी ‘उपाधियों’से पुकारा जाता है!जा रहा है!

कम्प्यूटर से ‘हैंग अप’ बुद्धिजीवी कुतर्क करने लगता है “बहु बेटियों का नाश तो नंगी   पत्रकारिता और टी.वी. पहले ही किए बैठे है!जहाँ स्त्री के शरीर का कोई भी हिस्सा छिपा नहीं है! लेकिन साहित्य में हम वहीँ  अड़े है!रतिक्रिया की कौन से मुद्रा है ,जो मीडिया में बेशर्मी से दिखाई नहीं जाती रही,मगर हमारा ढोंग कि लेखन में वह सब नही आना चाहिए !वस्तुत:साहित्य में हम ,वही विक्टोरियन या आर्यसमाजी दुनिया में पड़े सड़ रहे है! इस जगह हम शुतुरमुर्गों कि औलाद हैं”२७ पर्नोर्ग्राफ़ी के विरुद्ध बोलने की बजाय, उपयोग के समर्थन में, बिपाशा बसु (‘जिस्म ‘की नायिका )की तरह कहती है”पता नहीं लोगों ने मुझे कपडे उतारू अभिनेत्री क्यों समझ लिया है जबकि औरों के मुकाबले मैंने कम ही कपडे उतारे है! आखिर टांगों और जाँघों में ऐसा क्या है,जिसे छिपाना जरुरी है”अगर छिपाना नहीं (रहा),तो साहित्य में छापना जरुरी है!

स्त्री मुक्ति का पहला चरण देह-मुक्ति

हिंदी के ‘आउटलुक’ २२ सितम्बर ,२००३ की ‘आवरण-कथा’(हिंदी लेखन विशेषांक) है ‘औरत मर्द के रिश्ते’ ,जिसमे प्रख्यात लेखकों की आठ कहानियाँ ,दो उपन्यास अंश ,कविताएं,विचारोत्तेजक इन्टरव्यू,दिल दिमाग छूने वाले संस्मरण और पैने आलेख’ भी शामिल है!आवरण पर प्रकाशित छाया चित्र में एक स्त्री ,किसी पुरुष से( या एक दू सरे से ) छेड़छाड़  कर रही है!दोनों के पाँव ,एक  दूसरे को ‘छूने’  के प्रक्रिया में व्यस्त (मस्त) है!आवरण कथा’लव –वव  सेक्स वेक्स –हमारे यहाँ नहीं चला जी’ (मनोहरश्याम जोशी )का सार संक्षेप यह है कि”हिंदी समाज और साहित्य ,दोनों अर्धसामंती दृष्टि  और अति नैतिकता के मारे हुए है!” अपने बेबाक साक्षात्कार में  राजेंदर यादव का कहाना है “स्त्री की मुक्ति देह से हे प्रारंभ होगी! स्त्रीमुक्ति का पहला चरण देह-मुक्ति है!”
राजेंदर यादव के अनुसार “स्त्री हमारे लिए आज भी देह पहले है,कुछ और बाद में! हम उसके शरीर के आधार पर उसका पहला मूल्यांकन करते है!उसके अंगों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते है!संस्कृत शब्दावली देखें :पीन पयोधरा, विम्बाधारी,क्षीण-कटी,बिल्वस्तनी, सुभागा,भगवती आदि-आदि !”२८  मनोहर श्याम जोशी का तर्क (प्रमाण सहित)है”हिंदी के मठाधीश लेखक तो स्त्री के संदर्भ में कुल मिलाकर वही ‘संरक्षक’ दृष्टि रखते है,जो हिंदी समाज के तमाम अन्य अर्धसामंती नेतागण …….राजेंदर यादव आज भी यह जरुरी समझते हैं कि लेखक –नायक द्वारा  किसी और नगर से मिलने आई प्रशंसिका को शराब पिलाकर पटाने की कहानी (हासिल)के अंत में यह दर्शाये  कि जब वह हमबिस्तर होने को राजी हो गई(और नायक खल्लास)तब लेखक-नायक को सहसा अपनी बेटी याद आ गई”२९

‘होना/सोना एक खुबसूरत दुश्मन के साथ’नामक अपने विवादास्पद (बदनाम,’अशालीन’)लेख के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए राजेंदर यादव उपरोक्त साक्षात्कार में कहते (स्वीकारते) हैं ” जब तक वह (स्त्री)मेरी संपत्ति  है,तभी तक वह मेरी प्रिय है,जैसे ही वह मुझसे स्वतंत्र होकर खडी होती है,वह मेरी सत्ता को चुनौती देती है! मेरी सत्ता से छूटी स्त्री मेरे लिए चुनौती है! दुश्मन है!३० यहाँ’हम’ऐसा सोचते हैं ,समझते हैं वाले तर्कों को उन्होंनेखुद ही ‘मैं’और ‘मेरी’में बदल दिया है!कहानी ,लेख या व्यंग्य की भाषा(तर्क,सिद्धांत)लगभग एक जैसी है!रचनात्मक लेखन में जो पर्दा है,वह होना/सोना तार-तार हो गया है!

खैर …………….’आदमी की निगाह में औरत’(राजकमल प्रकाशन,२००१) में संकलित उपरोक्त लेख की भूमिका में राजेंदर यादव ने लिखा है “महिला विशेषांक (दो खंडो में) के लिए प्रस्तुत मेरे इस लेख को ‘हंस’की शिष्ट और विशिष्ट सम्पादिका (अर्चना वर्मा)ने अस्वीकृत कर दिया !मैं इसे औरताना असहिष्णुता और सम्पादकीय धांधली मानता हूँ जहाँ  दूसरे पक्ष की सच्ची तकलीफ सामने ही न आने दी जाए ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार और लोकतान्त्रिक संविधान की प्रतिज्ञाओं का यह निर्लज्ज हनन है!”३१ स्पष्ट है कि ‘दूसरे पक्ष (पुरुष सम्पादक)की सच्ची तकलीफ है-‘होना/सोना एक  खुबसूरत दुश्मन के साथ!’ स्वतंत्र स्त्री(संपादिका)दुवारा पुरुष सम्पादक की ‘सत्ता को चुनौती’!अपना -अपना पक्ष प्रकाशित कर दिया ,’दू सरे पक्ष की सच्ची तकलीफ सामने ही नहीं आने दे रही !क्या इसी ‘औरताना असहिष्णुता और सम्पादकीय धांधली’ से आहात-अपमानित होकर,उन्होंने यह लेख ‘वर्त्तमान साहित्य’ में छपवाया था?और बाद में ‘अतीत होती सदी  और स्त्री का भविष्य’(राजकमल प्रकाशन२००१) के खुद भी सम्पादक बन गए!पुस्तक के आवरण पृष्ठ तीन पर सिर्फ उनका ही चित्र और जीवन परिचय छपा है,अर्चना वर्मा का क्या हुआ ?…कौन अर्चना वर्मा !

पुस्तक की भूमिका ‘स्त्री-दर्शन:स्त्री छवि’ में उन्होंने  लिखा है “अतीत होती सड़ी  और स्त्री का भविष्य ‘हंस के जनवरी-फरवरी ,मार्च महीने के दो विशेषांक के रूप में प्रकाशित रचनाओं से किया गया चुनाव है! यह आयोजन इतना स्वायत था कि संपादकों ने स्वयं मेरा लेख ‘होना/सोना एक  खू बसूरत के साथ’छापने से इनकार कर दिया- मेरे लाख तर्कों और आग्रहों के बाबजूद वह ‘हंस’ में नहीं आया ! हार कर उसे अपनी पुस्तक ‘आदमी की निगाह में औरत’में देना पडा!इसलिए प्रस्तुत संकलन का सारा श्रेय संपादकों को ही है”देखो मैं ‘प्रजातांत्रिक’ और ‘उदार मालिक’ ही नही महान सम्पादक भी हूँ !

हम स्त्री के किसी स्वतंत्र सोच को बर्दाश्त नहीं  कर सकते! स्त्री हमारी कॉलोनी या उपनिवेश है!कॉलोनी को जिस तरह शासित किया है ,उसी तरह हम स्त्री को शासित करते है…३२ स्वायत्त  या स्वतंत्र स्त्री सम्पादक की इतनी हिम्मत कि’स्वयं  मेरा लेख …छापने से इन्कार कर दे ’? ‘स्वयं मेरा ‘जो पत्रिका का सम्पादक है! मालिक है!’हमारा’ कुछ नहीं होता…सब कुछ मैं हूं और सारी संपत्ति (स्त्री सहित)  मेरी है….!’मेरी सत्ता से छूटी स्त्री मेरे लिए चुनौती है!दुश्मन है.

दरअसल यादव जी हमेशा कडवी-से कडवी बात मजाक,चुटकुले या व्यंग्य के रूप में कहते हैं! तर्क के आड़े –तिरछे रास्तों से भाग निकलते है! बाहर’मसखरे का मुखौटा’लगाए रखते है, मगर भीतर ‘नितांत अकेले और असुरक्षित महसूस करते है! वो हम सबसे ही नहीं ,खुद से भी नाराज हैं!छोटी से छोटी बात भूल नहीं पाते (गाँठ बाँध याद रखते है)और नाटक यह की मेरी यादाश्त बहुत कमजोर है! सार्वजनिक स्थल पर भी अश्लीलतम भाषा का प्रयोग करने में भी संकोच नहीं!जानबू झ कर चर्चा का विषय बने रहने के प्रयास में ,विवादास्पद बोलते –लिखते रहे है!
क्रमशः
( उद्भावना से साभार )

सोनी पांडेय की कवितायें

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सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com

अब मैँ यकीन कर लेना चाहती हूँ

अब मैँ यकीन कर लेना चाहती हूँ
कि सूरज दहकता है और
उसकी किरणेँ गाती हैँ
सतरंगी क्रान्ति गीत
दहकता है मलय पवन
शोला बन
गंगा की लहरेँ उफनतीँ हैँ
लावे की तरह
चूल्हे की चिन्गारी लिख सकती है
उत्थान पतन
हाँ बस करना होगा यकीँ
कि यहीँ लिखी जाती है
इबारत उन सभ्यताओँ की
जिनके अवशेष बताते हैँ
उस युग के क्रान्ति का आख्यान
और हम लेते हैँ सबक
नव क्रान्ति का
क्रान्ति होती रही है
क्रान्ति होती रहेगी
जब जब टकराऐँगीँ अहंवादी ताकतेँ
जीवन .जमीन .जंगल .
पहाड और पानी से
तब तब सूरज दहकता हुआ लाल रंग उगलेगा
और फिजा मेँ फैलाऐगा
सूर्ख लाल रंग
मेरी हथेलियोँ की मेँहदी
हाथ की चूडियाँ
माँग का सिन्दूर
और रसोँई की दीवार तक
फैलाऐगा लाल रंग
हाँ मुझे यकीन होने लगा है

मुझसे मत पूछना पता

सुनो !
मुझसे मत पूछना पता
काबे और काशी का
मत कहना जलाने को
दीया आस्था का
क्योँ कि मेरी जंग जारी है
अंधेरोँ के खिलाफ
मैँ साक्षी हूँ
इस सत्य का कि
अंधेरोँ की सत्ता कायम
आज भी
सुनो !
तुम्हारे आस्था के केन्द्र पर
मेरी माँ रखती थी
अपने विश्वास का कलश
पूजती थी
गाँव के डीह .ब्रह्म .शीतला को
निकालती थी अंगुवा पुरोहित को
देती थी दान .भूखे .नंगोँ . भिखमंगोँ को
कडकडाती ठंड मेँ नहाती थी कतकी
जलाती थी दीपक
तुलसी के चौरे पर आस्था का
रखती थी विश्वास कि
ये सारे जप .तप . होम .व्रत
की अटल दीवार
उसके परिवार को
बेटियोँ को
रखेगा सहेज कर
होगा चतुर्दिक मंगल
किन्तु नहीँ रोक पायी

शहीद होने से अपनी कोख के प्रथम अंश को
दहेज की बलिबेदी पर
वह आज भी चित्कारती है
पकड कर पेट को
नहीँ रोक पाये तुम्हारे काबे काशी
वेद पुराण
उसके कोख को छिलने से
इस लिऐ मुझसे मत पूछना पता
किसी काबे काशी का
मेरी जंग अंधेरोँ के खिलाफ जारी है ।

मैँ और मेरा अस्तित्व
जब भी तलाशने निकलती हूँ
अपना मैँ
वह दरवाजे पर
खूँटे से बँधी
गाय के गले मेँ लटक रही
मजबूत रस्सी मेँ अटक जाता है ।  हाँ , उस वक्त मैँ दुधार गाय सी लगती हूँ ।

कभी
दरवाजे पर टँगे पर्दे सा लगता है
मेरा मैँ
जो इस लिए टांगा जाता है
कि , अन्दर की बात अन्दर ही रहे
और छुपा रहे घर का रहस्य ।

हाँ , मैँने देखा है अपनी माँ को
रसोई में
लड़ते हुए अभावों , मंहगाई और असहमतियों से
हर बार हार जाता है मेरा मैं
रसोई में
केवल शेष बचता है माँ का अस्तित्व
और खत्म हो जाती है
उसी क्षण मैं की तलाश
शेष बचता है केवल और केवल
एक बन्धन माँ का
जानते हो पुरुष !
तुम इसी लिए जयी रहे सदा
क्योंकि कि तुमने जिन्दा रखा
मेरे मैं  में  समाहित
माँ का विराट अस्तित्व ।

 ये जो पर्दा है . . .

ये जो पर्दा है
मेरी सीमा रेखा से सटा , खडा
संस्कारोँ के सख्त चादर से बना है
इस्पाती ।

इसके एक -एक ताने -बाने मेँ
सैकड़ोँ नियम हैँ
जप, तप , होम , व्रत आदि . आदि ।

नैतिकता के साँचे मेँ
संस्कारोँ की सूई से
सिली गयी चादर
और धर्म , कर्म . पाखण्ड के
सैकड़ोँ बूटे टांके गये
मेरी सीमा रेखा से सटे परदे मेँ ।
इस पर्दे के बाहर पाँव रखते ही
मैँ घोषित कर दी जाऊँगी
बे – पर्दा औरत
रोक दिया जायेगा
आस – पास की औरतोँ को
मेरे निकट आने से
क्योँ कि सामाजिक नियमोँ के साँचे मेँ ढली औरत
मेरे निकट आते ही
तोड़ सकती है, इनके बनाये हुये
संस्कारोँ के तटबन्ध को
बह सकती है
अविरल , उन्मुक्त
परम्पराओँ की डयोढी उलांघ
बुन सकती है
एक नया पर्दा
जिसे सदियोँ से अपनी विजय पताका बना
लहराता रहा पुरुष
कहो पुरुष!
तुम क्योँ नहीं रखते कल्याण कामना के लिये
असंख्य निर्जला व्रत ?
क्या ये सारे ठेके
केवल मेरे हिस्से है ?

सीमा रेखा

एक बड़ी महीन रेखा
खीँची गयी
मेरे और तुम्हारे मध्य
उस दिन
जब मैँ तुम्हेँ जन्म दे रही थी ।

मैँ जन्म देकर धरती होगयी
और तुम मेरा अंश होकर आकाश ।

तुम्हारे आकाश मेँ
टंके थे
नवग्रह , सप्त ऋषि ,सूर्य . अन्द्र , तारे
तुम दिन मेँ दमकते
और रात को चमकते रहे ।

मैँने उगाया अपने गर्भ में
नदी , पहाड़ . झरने
जंगल और जीवन
अपना लहू पिला
साटे रही छाती से
फिर क्यों  रौँदी गयी?
कहो पुरुष !

हाँ मैँ एक प्रश्न चिह्न हूँ . तुम सदियोँ से लगाते रहे हो
एक आरोप
कि , तुम्हारे देवता भी
मुझे समझने मेँ असमर्थ रहे हैँ।
तुम नहीँ पढ सकते नारी चरित्र
तुम्हारा ज्ञान और विज्ञान
असमर्थ है
मन का विज्ञान भी पानी मांगता है ।
कितना निर्थक है
हे देव पुरुष !
तुम्हारा अनर्गल आरोप
मुझे पढने के लिए
ब्रह्मांड की किसी पोथी की नहीँ
केवल दृष्टि चाहिए
मेरी
बन सको तो बनो
किसी की अनचाही संतान
किसी के प्रेम को समेट लो
मन की पिटारी मेँ
अपने अस्तित्व को समेट लो
घर के चौखट मेँ।
सहला सको उन घावोँ को
जिन्हेँ स ऊरी मेँ जीती रही
बेटी की भाँ ।
जीओ मुझे मेरे वजूद के साथ
देखना मैँ हल हो जाऊँगी
उसी क्षण
हट जाऐगा प्रश्न चिह्न ।

एक नई ‘दस्तक’

 अनंत विजय पालीवाल
 ( अरुण कुमार प्रियम की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘ पितृसत्ता और साहित्’  की समीक्षा कर रहे हैं डा. आम्बॆडकर विश्वविद्यालय के शोधार्थी अनंत विजय पालीवाल )

पितृसत्ता और साहित्य अरुण कुमार प्रियम की पहली पुस्तक है। पहली उपलब्धि अनुभव के पायदान पर प्रथम प्रयास होता है, जिसका उन्होंने बखूबी निर्वहन किया है। पितृसत्ता और समाज में उसके अलग-अलग चेहरों की पहचान करते हुए अरुण इसे जाति और वर्गों की परिधि तक ले जाते हैं। समाज, साहित्य से लेकर परिवार जैसी छोटी इकाई तक में इसके स्तरीकरण पर चर्चा को वे गंभीरता से उठाते हैं। सामाजिक संस्थाएँ पितृसत्ता का पाठ कैसे पढ़ाती हैं; पितृसत्ता के अभिकर्त्ता कौन-कौन है; परिवार में इसकी घुसपैठ या बुनियाद कैसे गढ़ी जाती है? आदि पर संक्षिप्त किन्तु असरदार बहस को उठाने का प्रयास यह पुस्तक करती है। पुस्तक की भूमिका ‘धूमिल’ और ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ जैसे शीर्षस्थ साहित्यकारों के परंपरावादी नजरिए की आलोचना से आरंभ होती है। अरुण ने इन रचनाकारों की जिन पंक्तियों को उठाया है व समय के साथ उनका जो  तुलनात्मक विश्लेषण किया वह उचित है। लेकिन यहाँ यह कहना कि “साहित्य इसका अनुकूलन करता है, जिससे यह मूल्य आगे भी इसी रूप में आने वाले समाज को दिया जाता रहा” (पृ. 11), पूरे ‘साहित्य’ पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है। डॉ. अंबेडकर के समय से ही साहित्य के विभिन्न रूप सामने आने लगे थे। दलित आंदोलन, स्त्री आंदोलन व इसी प्रकार के अन्य आंदोलनों ने साहित्य को और इससे संदर्भित साहित्य ने इन आंदोलनों को आगे बढ़ाने में महती भूमिका निभाई थी। आज स्त्री-साहित्य, दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य व उनसे संबन्धित पत्र-पत्रिकाओं का साहित्य जगत में एक अलग स्थान है। इस तरह उपरोक्त वक्तव्य सम्पूर्ण साहित्य को एक साथ कटघरे में खड़ा नहीं कर सकता।

अरुण की इस पुस्तक का आधा भाग सीधे-सीधे पितृसत्ता जैसे सामाजिक विमर्श पर केन्द्रित है और आधा भाग पितृसत्ता के नजरिए से साहित्य की पड़ताल करता है। ‘पितृसत्ता की सार्वभौमिकता’ अध्याय में परिवार, धर्म, समाज, संस्था, संविधान, विवाह, मीडिया, शिक्षा प्रणाली, आर्थिक क्षेत्र और यौनिक नियंत्रण जैसे मुद्दों पर खुली बहस को प्रस्तुत किया गया है। शायद सभी मुद्दों को एक साथ उठाने के कारण इस बहस में कई पक्ष अवश्य छूट गए हैं, फिर भी इनसे एक संक्षिप्त समझ जरूर पैदा होती है। उदाहरण स्वरूप अगर हम यहाँ ‘मीडिया’ पक्ष को ही लें तो अरुण धारावाहिकों में ‘अच्छी औरत’, ‘बुरी औरत’ और मीडिया संस्थानों में उनके ‘पद’ तक ही बहस को सीमित कर आगे बढ़ जाते हैं। जबकि यह पितृसत्ता का केवल प्रत्यक्ष पक्ष है। दरअसल यहाँ मार्केटिंग की उन परोक्ष नीतियों को भी उठाना चाहिए था जो बड़ी बारीकी से पितृसत्ता को स्थापित करती हैं। जैसे विज्ञापनों को ही लें यहाँ विज्ञापन चाहे मेंस-डियो-परफ्यूम का हो या बाइक का; पुरुष के पीछे आकर्षित होती या उसकी पिछली सीट पर चिपके औरत होती है। बाइक के विज्ञापन में ड्राईविंग सीट उसे शायद ही कभी नसीब हुई हो लेकिन वॉशिंग पाउडर से लेकर स्कॉच ब्राईट तक के विज्ञापनों में वह जरूर कपड़े धोते मिल जाएगी। टॉयलेट क्लीनर बेचने वाला सेल्स मैन भले ही पुरुष हो लेकिन इसे इस्तेमाल करने वाली महिला ही दिखाई जाती है। इस तरह यह सोच कि विज्ञापनों के जरिये स्त्रियों को रोजगार मिल रहा है, उनकी भागीदारी बढ़ रही है; दरअसल एक धोखा है। जिसका मूल्य और प्रस्तुतीकरण दोनों पितृसत्तात्मक है।

यहाँ यह कहना भी उचित है की पितृसत्ता एक विचार है; एक मानसिकता है जो किसी भी जाति और धर्म में समान रूप से घुसी हुई है। चूंकि धर्म पुरुष प्रणीत है और पुरुष प्रभुत्व वाला है अत: यह संस्थाएँ महिलाओं को नियंत्रित करने का एक पारंपरिक हथियार है जिनकी वैधता को चुनौती देना आसान नहीं है। यहाँ अरुण यह कहने में बिल्कुल नहीं झिझकते की “सभी धर्म पितृसत्तात्मक हैं। धर्म अपने चरित्र में ही स्त्री विरोधी है और पुरुष प्रभुत्व को सर्वोपरि मानता है” (पृ. 27)। इस संदर्भ में वे धर्मों से तथ्यात्मक उदाहरण भी पेश करते हैं। कुछ ऐसे ही संदर्भ वे जातियों से भी उठाते हैं जहाँ एक ही जाति व्यवस्था में होने के बावजूद भी पितृसत्ता हावी रहती है। यहाँ वर्ग व्यवस्था का वाहक पितृसत्ता बनती है। आर्थिक वर्गीकरण में निचले पायदान के लोग भी इसका शिकार होते हैं। “सल्लन की पत्नी खुद एक दलित स्त्री है, लेकिन वह प्रमिला, जयवंती और नीलम के वर्ग की स्त्री नहीं है। वह आर्थिक रूप से ऊँचे दर्जे की स्त्री है। जयवंती, प्रमिला और नीलम आर्थिक रूप से निचले और कामगार वर्गों की स्त्रियाँ हैं। इसलिए सल्लन की पत्नी का वर्चस्व उन पर बना रहता है”। वह पितृसत्ता के वर्गीय चरित्र की वाहक है। इस प्रकार अरुण ने पितृसत्ता के वर्गीय भेद को भी कई उदाहरणों द्वारा सिद्ध किया है।

पुस्तक के द्वितीय भाग ‘पाठ-अंतर्पाठ’ में कुछ स्त्रीवादी कविताओं की समीक्षा व ‘मीरा’ और ‘सुभद्रकुमारी चौहान’ जैसे भिन्न युग की कवियित्रियों की रचनाओं का विश्लेषण है। स्त्रीवादी कविताओं में ‘रंजना जायसवाल’ और ‘शायक आलोक’ की कविताओं की जो समीक्षा अरुण ने प्रस्तुत की है मैं उससे पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ। कविता के शब्दार्थ, भावार्थ और व्यंग्यार्थ भिन्न होते हैं। दरअसल ‘सेक्स रैकेट की लड़कियाँ’ कविता पितृसत्ता पर व्यंग्य है न कि उसका समर्थन जैसे यह पंक्ति ‘चेहरा यूं ढाँपे खड़ी हैं / मानो रही ही न हों / मुँह दिखाने के काबिल / या फिर चेहरा विहीन / सिर्फ देह ही हैं’। अरुण ने यहाँ चेहरे का आशय ‘दिमाग’ से लगाया है। उनका आशय है कि “लड़कियों के पास दिमाग नहीं है सिर्फ दिमाग विहीन (चेहरा विहीन) शरीर है” जबकि पंक्तियों में कवियित्री का तीखा व्यंग्य है कि सेक्स रैकेट की इन लड़कियों का चेहरा इनकी पहचान नहीं होती है बल्कि समाज द्वारा केवल एक सिंबल (प्रतीक) ‘वेश्या’ ही इनकी अस्मिता के लिए गढ़ा जाता है। इसके लिए दलालों द्वारा कोई नाम, नंबर या वस्तुओं के नाम तक की कोडिंग इनके लिए की जाती है। अत: समाज इन्हे केवल देह मात्र तक सीमित कर देता है। इस प्रकार इनका चेहरा (अस्मिता) केवल ‘सेक्स रैकेट की लड़कियों’ तक सीमित रह जाता है। इसी तरह के कई अन्य पक्ष इस कविता और शायक आलोक की कविताओं में भी हैं जहाँ मैं खुद को इस समीक्षा से सहमत नहीं पाता हूँ। खैर समीक्षा में अरुण का अपना अलग नजरिया हो सकता है जिसे उन्होने बिना झिझके रखा भी है।

पितृसत्ता और साहित्य, अरुण कुमार प्रियम (लेखक  )
प्रथम संस्करण -2013, आरोही प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 100 रुपये

‘मीरा और आधुनिक साहित्य’ में अरुण ने स्त्रीवादी नजरिए से मीरा के व्यक्तित्व और उनके काव्य को जांचा-परखा है। मध्ययुगीन समाज में पितृसत्ता के सभी बंधनो को तोड़ने वाली मीरा को उन्होने पुन: प्रतिष्ठित किया है। साहित्य में मीरा केवल ‘भक्तिकाल’ की गढ़ी-गढ़ाई छवि में पेश की जाती रही हैं। सूर, तुलसी, मीरा केवल सगुण (ईश्वरपरक) भक्ति धारा के एक कवि के रूप में याद किए जाते हैं। इनके सामाजिक संदर्भों पर हुए शोध भी ज़्यादातर भक्ति तक ही सीमित हैं। लेकिन वहाँ भी नजरिया स्त्रीविरोधी और पितृसत्तात्मक रहा है। मीरा पर एक संक्षिप्त लेकिन मुकम्मल नजरिया रखते हुए अरुण ने इस बहस को आगे बढ़ाया है। उनका यह प्रयास सराहनीय माना जाएगा।इसी तरह सुभद्रा कुमारी चौहान को केंद्र में रखते हुए अन्य समकालीन रचनाकारों के साथ एक तुलनात्मक विश्लेषण यह पुस्तक प्रस्तुत करती है। इसके लिए उन्होने कविता, कहानी दोनों विधाओं का चयन किया है। अरुण की दृष्टि इस संदर्भ में पक्षपात रहित कही जा सकती है, जहाँ शुरू में उन्होने सुभद्रा कुमारी चौहान के ‘मर्दानी’ शब्द पर आपत्ति जताई थी वहीं उनकी अन्य रचनाओं और व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न पक्षों के स्त्रीवादी संघर्ष को सराहा भी। बाद में वे इन समकालीन महिला साहित्यकारों के पितृसत्ता के विरोध में स्त्रीवादी नजरिए पर मुकम्मल शोध किए जाने की जरूरत पर भी ध्यान दिलाते हैं। जिससे इस संदर्भ में उनकी जिजीविषा और गंभीरता को पहचाना जा सकता है।


कुलमिलाकर यह पुस्तक पितृसत्ता के विरुद्ध एक स्पष्ट और मुकम्मल
बयान दर्ज करती है। यहाँ यह जरूर है कि पुस्तक के संक्षिप्त कलेवर के कारण कई महत्वपूर्ण विषयों को विस्तार नहीं दिया जा सका है; लेकिन यह भी सही है कि पितृसत्ता के विषय में यह पुस्तक एक जरूरी समझ विकसित करती है। शायद यही अरुण और इस पुस्तक का पहला ‘हासिल’ भी है। आगाज़ के तौर पर लेखनी में अरुण ने धीमी लेकिन ‘असरदार’ दस्तक दी है। यह देखना और भी कौतूहलपूर्ण होगा कि उनकी अगली दस्तक ‘कब’ और कितनी ‘तेज़’ आती है।