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नाबालिग पत्नी से, बलात्कार का कानूनी अधिकार (हथियार): अरविंद जैन
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सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.
आज अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में समान रूप से समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने का निर्णय पांच / चार के बहुमत से दिया है . आज भी इस मसले पर विरोध की यह स्थिति है कि अमरीका जैसे लोकतांत्रिक समाज में इस निर्णय के विरोध में नौ में से चार जजों ने नोट ऑफ़ डिसेंट लिखा. अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए स्त्रीकाल के पाठको के लिए सुधा आरोड़ा का यह आलेख , जो उन्होंने कुछ समय पहले लिखा था .
प्रकृति सबसे बड़ी सर्जक और निर्माता है। यह प्रकृति हमें बेहद खूबसूरत फल और फूल, पक्षी और पशु , नदी और झरने, समुद्र और पहाड़ देती है और इसकी सबसे अनोखी रचना है-मनुष्य । एक से एक अद्वितीय अंग हैं हमारे पास। आंखों से हम प्रकृति की सुंदरता देखते हैं, कानों से झरने का गुंजार सुनते हैं, पेड़ों पर लगे फल और सब्जियों का स्वाद चखते हैं। हैरत कि बात यह कि जो कुछ हम खाते हैं, वह अलग अलग प्रत्यंगों से होता हुआ स्वयं खून और शक्ति में तब्दील हो जाता है। स्त्रियों में प्रजनन की अद्भुत क्षमता है और अपने ही रक्त, मांस से वह एक और शिशु को जन्म देती है पर यह भी प्रकृति की ही देन है कि कई बार उस शिशु के अंगों में कुछ ऐसे मिश्रण हो जाते हैं कि उसका सिर ज़रूरत से ज्यादा बड़ा हो जाता है, कभी पेट के अंगों का स्थान बदल जाता है, किसी भी अंग में कोई विकृति आ जाती है, कई बार वह नर या मादा न रहकर कुछ और ही हो जाता है और इसका पता भी 12-13 साल की उम्र में बहुत देर से चलता है, जब उसमें लिंगगत विभिन्नताएं उभरने लगती हैं। इस विषमता या विकृति का जि़म्मेदार ज़ाहिर है, वह बच्चा नहीं है और न ही उसकी मां है। यह प्रकृति की ही विडम्बना है लेकिन समाज उस असामान्य अंग को लेकर पैदा हुए बच्चे को ताउम्र इस विकृति की सज़ा देता है।
सच तो यह है कि प्रकृति की थोड़ी सी भिन्न संरचना को हमने कभी स्वीकृति नहीं दी । अगर यह पता चल जाता कि फलाने घर में असामान्य बच्चा पैदा हुआ है तो बजाय उसके प्रति एक सहानुभूति के हम उसे तिरस्कार या उपेक्षा की नज़रों से ही देखते रहे। यही वजह है कि किन्नर को हमने ताली पीटने वाले और बच्चे के जन्म और शादी पर नाचने गाने वाले हिजड़े मानकर उन्हें कभी बराबरी का हकदार नहीं समझा और उनके प्रति सामान्य आचरण नहीं रखा। प्रकृति का हर सामान्य व्यक्ति खुद को इन भिन्न अंग वाले लोगों से श्रेष्ठ और इन्हें कमतर मानता रहा।
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किन्नर अब ‘थर्ड जेंडर’ की तरह पहचाने जाएंगे
समाज में यह प्रवृत्ति शताब्दियों से है। अरसे तक मानसिक रोगियों को विक्षिप्त की श्रेणी में शुमार किया जाता था। मानसिक अस्वस्थता को पागलपन कहकर उसका मखौल उड़ाया जाता था। पोलियोग्रस्त या अंगविच्छेद से क्षतिग्रस्त व्यक्ति को अपाहिज कहने में कोई संकोच नहीं बरता जाता था और विकलांगों को डिसएबल्ड कहा जाता था। अब उन्हें डिफरेंटली एबल्ड कहा जाता है। आज समय बदला है और एक मानवीय दृश्टि पनप रही है। धीरे धीरे हमने यह समझा कि मानसिक अस्वस्थता के रोगी को शारीरिक रोगों से कहीं ज्यादा गंभीरता और संवेदनशीलता से हैंडल करने की जरूरत है। मानसिक रोग को अब दबाया छिपाया नहीं जाता, उनके लिये बाकायदा अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धति है।
हमारी इसी मानसिकता का शिकार ऐसे मनुष्य हैं, जिन्हें प्रकृति ने न पूरी तरह स्त्री बनाया और न पुरुष। क्या हमारे सामान्य समाज में उन्हें जीने का हक नहीं । अपने अधिकारों के लिये एक लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार 15 अप्रैल 2014 को एक ऐतिहासिक फैसला आया, जिसने किन्नर समाज को स्वीकृति दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि सरकारी दस्तावेजों में अब महिला और पुरुष के साथ-साथ एक कॉलम थर्ड जेंडर या किन्नर का भी हो। किन्नरों को सामाजिक और शिक्षा के स्तर पर पिछड़े हुए वर्ग की तरह सारी सुविधायें मुहैया करवाई जाएं। कोर्ट ने अपने फैसले में किन्नरों को उन सभी न्यायिक और संवैधानिक अधिकार देने की बात कही जो देश के आम नागरिकों को मिले हुए हैं। किन्नर समाज इस फैसले को लेकर उत्साहित है। ऐसा पहली बार हुआ है कि उन्हें शादी करने, तलाक देने, बच्चा गोद लेने सहित केंद्र और राज्यों की ओर से चलाई जाने वाली सभी स्वास्थ्य व कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान में वर्णित अनुच्छेद 19 के तहत उन्हें वैयक्तिक स्वतंत्रता के सभी अधिकार हासिल होंगे और केंद्र और राज्य सरकार का यह दायित्व होगा कि उनके अधिकारों की रक्षा की व्यवस्था की जा सके।
अब समलैंगिकता के मसले पर आयें।
समलैंगिक होना भी अपराध नहीं, एक प्रवृति है, जिसे समाज से हमेशा छिपाया जाता है। यह भी प्रकृतिगत एक संरचना है, जिसमें मादा अंग लेकर पैदा हुआ एक बच्चा जब बड़ा होता है तो अपने में स्त्रियोचित गुण न पाकर अपने को पुरुष की बनावट और मानसिकता में देखता है और पुरुष अंग लेकर पैदा हुआ एक बच्चा अपनी युवावस्था में आने पर अपनी आवाज़ में तब्दीली महसूस नहीं करता है और अपने को लड़कियों की मानसिकता में पाता है और पुरुषों की ओर आकर्षित होता है। यहां भावना का स्थान दैहिकता से कम नहीं है। समलैंगिकता के खिलाफ भारतीय संविधान की धारा 377 हटाने की जब बात की गई तो कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने अपनी असहमति जताई। कई मंचों से इसके खिलाफ कहा गया कि यह अप्राकृतिक आचरण है, इसलिये इसे कानूनी सहमति नहीं दी जानी चाहिये। लेकिन ये लोग नहीं जानते कि विवाह जैसे कानून सम्मत और वैध माने जाने वाले प्राकृतिक सम्बन्धों में भी कितने अप्राकृतिक आचरण किये जाते हैं , जहां पत्नियां कुछ बोल भी नहीं पातीं और आजीवन एक असुरक्षित और दहशतज़दा जिन्दगी जीती हैं।
न्यूयाॅर्क के एलबर्ट आइंस्टाइन काॅलेज आॅफ मेडिसिन के प्रोफसर डाॅ. चार्ल्स सकाराइड्स ने कई दशक पहले कहा था कि यौन -उद्यगों से जुड़े कुछ तेज-तर्रार शातिरों की यह एक धूर्त वैचारिकी है, जो समलैंगिकों को पैथालाॅजिकल बताती है. इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता. अमेरिकी समाज में समलैंगिकता की समस्या के ख्यात अध्येता डाॅ. चार्ल्स अपनी पुस्तक ‘ होमोसेक्सुअल्टी: फ्रीडम टू फाॅर’ में अपना वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं- ‘‘ अमेरिकी समाज में यह तथाकथित समलैंगिक क्रांति’ बस यूँ ही हवा में नहीं गूँजने लगी , बल्कि यह कुछ मुट्ठी भर शातिर बौद्धिकों की ‘मानववाद’ के नाम पर शुरू की गई वकालत का परिणाम था, जिनमें से अधिकांश स्वयं भी समलैंगिक ही थे । ये लोग ‘ट्राय एनीथिंग सेक्सुअल’ के नाम पर शुरू की गई यौनिक -अराजकता को , नारी स्वातंत्र्य के विरुद्ध दिए जा रहे एक मुँहतोड़ उत्तर की शक्ल में पेश कर रहे थे । पश्चिम में , जब पुरुष की बराबरी के मुहिम के तहत स्त्री ‘मर्दाना बनने के नाम पर , अपने कार्य-व्यवहार और रहन-सहन में भी इतनी अधिक ‘पुरुषवत या ‘पौरुषेय ’ होने लगी कि जिसके चलते उसका समूचा वस्त्र विन्यास भी पुरुषों की तरह होने लगा । नतीजा , स्त्री की जो ‘स्त्रैण-छवि’ पुरुषों को यौनिक उत्तेजना देती थी , उसका लोप होने लगा । वेशभूषा की भिन्नता के जरिए , किशोररवय में लड़के और लड़की के बीच, जो प्रकट फर्क दिखाई देता था, वह धूमिल हो गया । इस स्थिति ने लड़के और लड़के के बीच यौन -निकटता बढ़ाने में इमदाद की, जिसने अंततः उन्हें ‘समलैंगिकता की ओर हाँक दिया । ’’
डाॅ. चार्ल्स की यह स्थापना तीसेक साल पहले की है. जहां वह इसे रोग की संज्ञा देते हैं . आज इन्हें रोगियों की तरह नहीं देखा जाता . न ही इन समलैंगिकों के भीतर इस प्रवृत्ति को लेकर कोई अपराध बोध है।
भारत में आज भी इसे एक ग्रंथि, एक टैबू के रूप में देखा जाता है। यह कितना बड़ा पाखंड है कि माता-पिता यह जानते हुए भी कि उनका बेटा समलैंगिक है,उसके जीवन की यह सच्चाई छिपाते हुए, उसके लिये आर्थिक रूप से अपने से नीची हैसियत वाले परिवार की बेटी को बहू बनाकर ले आते हैं और वह लड़की भी ताउम्र इस राज़ को अपने भीतर दफन कर पतिव्रता स्त्री का रोल निभाती चली जाती है। इसके पीछे सामाजिक स्वीकृति का न होना ही एक प्रमुख कारण है। कभी यह राज खुल जाता है और मां-बाप को इसके लिये जब दोषी ठहराया जाता है तो वे कहते हैं कि हमने तो यह सोचा था कि हमारा बेटा शादी के बाद ‘सुधर’ जाएगा। दूसरे घर से आयी बेटियों को वे इत्मीनान से ‘सुधार-गृह’ समझ लेते हैं। कभी उनमें अपराधबोध नहीं जागता कि वे एक कम साधन संपन्न, दबे हुए परिवार की बेटी को भौतिक सुख सुविधायें देकर उसकी कितनी बड़ी कीमत वसूल रहे हैं और एक लडकी को मंगलसूत्र पहनाकर उससे एक सामान्य जि़ंदगी जीने का अधिकार छीन रहे हैं!
समलैंगिक संबंधों को ग्रंथि बना देने के कारण हमारे समाज में ऐसे संबंधों के दुश्चक्र में पिसने वाली सैकड़ों महिलायें अपनी तकलीफ़ बयान नहीं कर पातीं . काउंसिलिंग के दौरान का अपना एक अनुभव शेयर करना चाहती हूं । एक उच्चमध्यवर्ग की महिला , जिसके पति एक मल्टी नेशनल कंपनी के चेअरमैन थे , अपनी प्रताड़ना का मामला लेकर सामने आई. उसने बताया कि जब-तब उसे घर से बाहर धकेल दिया जाता है. उसने अपने घर की सीढि़यों पर बैठकर सारी रात काटी है . एक बार उसके पति ने उसपर पेपरवेट उठाकर फेंका, निशाना चूक गया वर्ना उसका सिर फट जाता . अपने जीवन के ये अनुभव उसने कई दिनों के सेशन के बाद साझा किये. पहले तो वह धुआंधार रोती ही रही . उसकी बात सुनने के बाद हमने उसके पति से संपर्क किया कि आप आकर अपना पक्ष रखना चाहें तो हमें अच्छा लगेगा . उसके अफसर पति आये . बेहद शालीन और संभ्रांत . आमतौर पर प्रताड़ना से जूझ रही महिलाओं के पति लाख बुलाने पर भी न आते हैं , न फोन पर बात करने को तैयार होते हैं . उनका हमारे संगठन तक आना ही हमें इंप्रेस करने के लिये काफी था . कहने लगे – देखिये , सारा दिन मैं अपने दफ्तर में व्यस्त रहता हूं . घर लौटकर बस एक खिला हुआ चेहरा , अच्छा खाना और कभी कभार रात को पत्नी का साथ तो चाहूंगा ही , वह भी अगर यह न दे पाये तो मैं वेश्याओं के पास तो नहीं जाना चाहता कि एड्स लेकर लौटूं . उनकी बेबाकी और साफगोई ज़ाहिर थी . बातें और भी कई मुद्दों पर हुईं पर दूसरी बार जब हमने उनकी पत्नी से सवाल पूछे तो दोबारा उसका धुंआधार रोना शुरु हो गया . उसके आंसुओं से हम आजिज़ आ गये . हमारे कई बार उकसाने पर उसने बताया कि उसके पति उससे हमेशा अप्राकृतिक सेक्स ही चाहते हैं . वे शुरुआत ही खजुराहो की मुद्रा से करते हैं और वह अपनी उबकाई रोक नहीं पातीं . रात आने से पहले ही उनके पूरे जिस्म पर दहश तारी हो जाती है और वह कांपने लगती हैं . उन्होंने कभी सेक्स को एक सुख की तरह नहीं भोगा . हमने उनसे पूछा कि क्या अपनी यह आपत्ति पति के सामने उन्होंने दर्ज की ? उन्होंने कहा – इतना साहस मुझमें नहीं रहा कभी , मैं कभी उनसे किसी भी बात पर असहमति नहीं जता सकती, वे आगबबूला हो जाते हैं. बहरहाल , वह उस पीढ़ी की थीं जो आज आॅब्सोलीट हो गई है. आज की लड़कियां शायद इतना लंबा अरसा ऐसी दहशत बर्दाश्त न करें !
कई स्त्रियां यह भी कहती पाई जाती हैं कि जब उन्हें वैवाहिक संबंधों में एक पुरुष से अप्राकृतिक सेक्स और भावनाविहीन पशुवत बलात्कार ही झेलना है तो वह क्यों न अपनी मित्र के साथ एक प्रेम के रिश्ते में रहे . अगर एक पुरुष पति अपनी पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक सेक्स करता है तो दो स्त्रियों के भावनात्मक और तथाकथित अप्राकृतिक दैहिक संबंधों से किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ? लेस्बियन होना प्राकृतिक और जन्मना प्रवृत्ति भी है और अपने माहौल की निर्मिति भी .
आज के बदले हुए माहौल में विपरीत सेक्स वाले दो व्यक्ति ही विवाह के बंधन में बंध सकते हैं , यह अवधारणा दम तोड़ रही है क्योंकि विवाह अंततः बंधन ही बनकर रह जाता है और भावना विहीन बंधन बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकता । पूरी तरह टूट कर भी घिसटता रहे तो बात अलग है और यही होता भी है। भारत में अधिकांश वैवाहिक रिश्ते अपना आकर्षण खोकर , एक आदत और पारिवारिक सामाजिक दबाव के तहत , एक मुखौटा लगाकर , एक छत के नीचे रहते चले जाने का अभ्यास बनकर रह जाते हैं ।
अमेरिका में मैंने एक बीच पर हज़ारों की संख्या में ‘गे’ पुरुषों का जमावड़ा देखा . वे ठहाके लगा रहे थे , गाना गा रहे थे , एक दूसरे को गोद में उठा रहे थे , गले मिल रहे थे , पीठ पर प्यार से मुक्के जमा रहे थे गरज यह कि सामाजिक स्वीकृति के कारण वे बेहद सहज और बेपरवाह थे .शिकागो में एक शाम हम घूमने निकले तो देखा, कुछ दूरी पर हर लैम्पपोस्ट पर इंद्रधनुषी रंग वाले झंडे सड़क के दोनों ओर लटक रहे हैं। मैंने अपने दामाद से पूछा – यह किस देश का फ्लैग है और यहां क्यों डिस्प्ले किया जा रहा है। मेरे दामाद ने बताया कि यह इलाका बॉएज टाउन कहलाता है – गे और लेस्बियन फ्रेंडली इलाका! रेनबो फ्लैग उनका साइन है! हम जहां रहते हैं, वहां भी आप बगल वाली बिल्डिंग में छत पर यह रेनबो फ्रलैग देख सकते हैं। मैंने कहा – यह तो एक तरह से उन्हें आउट कास्ट कर देना हुआ, जैसे भारत में दलितों के लिये शहर से बाहर बस्तियां बसाई जाती थीं। उसने समझाया – ऐसा नहीं है। अब भी एक आम अमरीकी नागरिक समलैंगिकों को नीची निगाह से ही देखता है। कानून बेशक बन गया हो पर सामाजिक स्वीकृति बहुत स्वाभाविक न होकर एक दबाव की वज़ह से है। हर व्यक्ति अपने रोज़मर्रा के जीवन में एक स्वाभाविक आज़ादी तो चाहता ही है। गे या लेस्बियन ऐसी जगहों में रहकर महसूस करते हैं कि वे अपने कम्फर्ट जोन में हैं।
इन स्थितियों को देखते हुए समलैंगिकों और किन्नरों को समाज की सहानुभूति से ज्यादा सहमति और स्वीकृति की जरूरत है, उपेक्षा या उपहास की नहीं। यह कोई समस्या नहीं है पर समाज में इसे एक अप्राकृतिक संबंध मानकर और दबा छिपा कर समस्या बना दिया गया है । किन्नरों के प्रति अगर हमारा समाज सहानुभूति रख सकता है तो समलैंगिकों के प्रति क्यों नहीं ? कानून या समाज को यह हक उनसे छीनने का कोई कारण नहीं है। उन्हें भी एक आम नागरिक की तरह जीने का अधिकार है।
पुनश्च
समलैंगिक संबंधों को अब अमेरिका के कई राज्यों में कानूनी स्वीकृति मिल चुकी है. सहजीवन बिताने वाली दो स्त्रियों को एक साथ एक परिवार की तरह देखा जाता है और उन्हें कानूनन बच्चे गोद लेकर परिवार बनाने का भी हक मिला है . पश्चिम की एक कवियित्री एलेन बास अपने को घोषित रूप से लेस्बियन कहती हैं। एक साक्षात्कार में उसने कहा – ‘‘ साहित्य ने मुझे औरतों के बीच रहने की इच्छा जगाई ! मेरी दिलचस्पी वह सब सुनने में थी जो इन लेखिकाओं ने औरतों की जिंदगी के बारे में वह कहा , जिसे पहले कभी कहा नहीं गया .’’
एक अन्य चर्चित कवियित्री म्यूरिअल रुकेस ने कहा – ‘‘ सोचो , क्या होगा अगर एक औरत अपनी जिंदगी का सच बयान करने लगे , पूरी दुनिया में हड़कंप मच जाएगा ! यह दुनिया खुल कर बिखर जाएगी ! द वर्ल्ड वुड स्प्ल्टि ओपन ! ’’
एलेन बास की एक चर्चित प्रशंसित कविता का अनुवाद प्रस्तुत है –
‘‘ जिन्दगी तो प्यार मांगती है तब भी
जब आपके पास देने को कुछ बचा न हो
जो कुछ था , वह जले कागज की तरह
भुरभुराकर गिर जाए उंगलियों से
उसके धुंए से आपका गला रुंध जाए
और तपन से हवा भारी हो गई हो
दुख घना होकर भीतर पसरा हो
और उस दुख का वजन
आपके अपने वजन से ज्यादा हो
आप सोचने पर मजबूर हो जाएं
कि अब इसे उठायें तो कैसे……
तब आप अपनी कमजोर हथेलियों में
अपने फीके मुरझाये चेहरे की तरह
थाम लेते हैं जिन्दगी को
चेहरे पर मुस्कान और आंखों में चमक भले न हो ,
पर आप कहते हैं – आओ मेरे पास
हां, जिन्दगी ! मैं फिर से तुम्हें प्यार करूं ! ’’ ’
” but to love life, to love it even
when you have no stomach for it
and everything you’ve held dear
crumbles like burnt paper in your hands,
your throat filled with the silt of it.
When grief sits with you,
its tropical heat thickening the air,
heavy as water
more fit for gills than lungs;
when grief weights you like your own flesh
only more of it, an obesity of grief,
you think, How can a body withstand this?
Then you hold life like a face
between your palms, a plain face,
no charming smile, no violet eyes,
and you say, yes, I will take you
I will love you, again.”
― Ellen Bass

युवा आलोचक रवींद्र कुमार पाठक जी. एल .ए कॉलेज , डाल्टेनगंज (झारखंड )के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. संपर्क :09801091682
( आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बहुपठित उपन्यास ‘ बाणभट्ट की आत्मकथा’ का स्त्रीवादी पुनर्पाठ कर रहे हैं रवींद्र कुमार पाठक )
द्विवेदी जी का प्रथम और यशस्वी उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ उनके बहुविध द्वंद्वों का भी प्रमाण है और अक्सर पुरानी मूल्य-व्यवस्था की ओर ढरक जाने का परिणाम भी (खासकर स्त्री के संदर्भ में)। यह बात शत-प्रतिशत सही है कि ‘सारी कथा में स्त्री-महिमा का बड़ा तर्कपूर्ण और जोरदार समर्थन है’ परंतु यह बात भूलने की नहीं है कि ‘महिमा’ का अभियान दर्शन के भाववाद से निकलता और उसी में अवसित होता है, जबकि स्त्री की समस्याएँ ठोस हैं, ज्वलंत हैं; जो यथार्थ अनुभूति की माँग करती हैं। उपन्यास में प्रतिष्ठित होनेवाली नारी ‘तत्त्व नारी’ है, न कि वास्तविक हाड़-मांस की इंसान। नारी-शरीर को देवमंदिर की तरह पवित्र मानने वाला, नारी-महिमा का जानकार बाणभट्ट नारी-सामान्य की कुछ समस्याओं व पीड़ाओं का साक्षी रहकर भी अक्सर कविता की दुनिया में बहक जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानवतावादी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को भी इस समाज-संरचना या स्त्री के प्रति व्यक्तिगत या सामाजिक व्यवहारों में निहित बदसूरती, अनीति या क्रूरता दिखलाई ही नहीं पड़ती , जो आज तक एक स्वतंत्र, स्वस्थ और खशहाल इन्सान के रूप में किसी स्त्री का जीना मुहाल किये रही है ।
सच है कि उनके लिए घर में बहुविध पीड़ित, घुटती नारी और बाहर अपहृत होती, बिकती यौन हिंसा की भेंट चढ़ती सामंतों की भोग्या बनती या मंदिरों में धर्म के नाम पर यौन-बलि चढ़ती (देवदासी) अथवा वेश्या बनी देह-दलन कराने को मजबूर स्त्री कोई ज्वलंत समस्या है ही नहीं। पुरुष के बहुपत्नीवाद की शिकार बनी, बाल/अनमेल विवाह के कसाईघर में ठेली गई, यौनशोषण को झेलती, अवांछित गर्भ ढोने को विवश नारी, भुखमरी की शिकार या परजीवी बनी नारी, विधवा बताई/बनाई गई नारी का भीषण एकांत, आम स्त्री की अशिक्षा आदि कोई समस्या ही नहीं है उनके रचनाकार के लिए। इससे भी बड़ी सच्चाई है कि सामास ढंग से वे स्त्री-प्रश्नों, स्त्री-समस्याओं को उठाते ही नहीं – इसी का प्रमाण है कि विचारक के रूप में (निबंधों में) उन्होंने कहीं इन सवालों को छुआ तक नहीं। जो कुछ छुआ या उनसे उठा – वह उनके रचनात्मक (उपन्यास) साहित्य में, संस्कृति-दर्शन-अध्यात्म या कवित्व की सूक्ष्म जीवन पर। कथा साहित्य में स्त्री या समस्याग्रस्त स्त्री का आ जाना तो लेखक के लिए अनिवार्य विवशता हो सकती है, क्योंकि जीवन-कथा बिना औरत (या मर्द) के संभव ही कहाँ है ? पर, विचारक के रूप में उन्होंने आम स्त्री के दर्द, पराधीनता आदि को तनिक भी महसूस न किया, उलटे उन्हें ध्यान आया कि स्त्री को सच्चरित्र होना चाहिए, ताकि परिवार बचे, सुंदर बने। ‘धार्मिक एवं सच्चरित्र नारी कुटुंब की शोभा है’ शीर्षक अपने सम्भवत: एकमात्र नारी-विषयक निबंध में द्विवेदी जी पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं का बोझ स्त्री के कंधों और सिर पर डालने को बेताब दिखते हैं। उनका स्पष्ट विचार है कि स्त्री यदि धर्म द्वारा प्रतिपादित आदर्शों या मर्यादा से बाहर चली जाए तो परिवार छिन्न-विच्छिन्न हो जाएगा। धर्म, मर्यादा या चरित्र से उनका आशय, किसी आधुनिक लोकतांत्रिक विवेक के सापेक्ष नहीं, बल्कि मनु, कालिदास, तुलसी या महाभारत के जरिये छनकर आ रही पुरानी मूल्य-संरचना के तहत है, जिसमें स्त्री को अच्छी गृहिणी, व्रतोपवास करनेवाली, पतिव्रता आदि बनने की एकमुखी सीख दी गई है । लेख को पूरा करते-करते द्विवेदी जी ने यह पुनीत इच्छा भी जाहिर कर दी कि ऐसी गृहलक्ष्मियों को संभव बनाने के लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।
स्त्री के योद्धा बनने पर अघोषित प्रतिबन्ध बनाम ‘चरित्र’ के प्रतीकीकरण की राह :
‘आत्मकथा’ में सभ्यता में अशांति पर महामाया के दार्शनिक प्रवचन के बीच भट्टिनी का तर्कसंगत व्यवधान आया – ‘तो माता, क्या स्त्रियाँ सेना में भरती होने लगे या राजगद्दी पाने लगे, तो यह अशांति दूर हो जाएगी?’ (ग्यारहवाँ उच्छ्वास) – भट्टिनी के इस सही सवाल पर द्विवेदी जी की तरफ से महामाया ने उसे गुमराह करना चाहा, यह कहकर ‘‘सरला है तू, मैं दूसरी बात कह रही थी। मैं पिंड नारी को कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु नहीं मानती।’’ जहाँ सीधा जवाब ‘हाँ’ में होना चाहिए था, वहाँ महामाया गोल-मटोल जवाब दे रही हैं, इसलिए क्योंकि ‘आजाद हिंद फौज में स्त्री के सैनिक बनने’ के युग में भी ये पंक्तियाँ लिख रहे आचार्य द्विवेदी के अंदर यह साहस शायद न था कि स्त्री को सैनिक या शासक रूप में स्वीकारें। महामाया स्त्री के सैनिक बनने के सवाल पर पिंड नारी को कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु न मानने की बात कहती है, परंतु कान्यकुब्ज की प्रजा के नाम उनका वीरोचित आह्वान – जो पर्याप्त जनतांत्रिक व सामंतवाद-विरोधी था – वह किसे था ? पिंड नरों को ही। अमृत के पुत्रों को था संबोधन। वे उन्हें कह रही थीं न्याय, सत्य, धर्म की रक्षा करने के लिए। उसके लिए बलिदान माँग रही थीं वे। किसका ? पुत्रों का। उनका कहना था कि धर्म के लिए प्राण देना किसी जाति का पेशा नहीं है, मनुष्य मात्र का उत्तम लक्ष्य है। पर, उनका ध्यान अपने ही इस वक्तव्य में निहित इस विसंगति की ओर न गया कि ‘मनुष्य’ के अर्थ में वे स्त्री को नहीं समेट पा रही हैं, क्योंकि संबोधन ‘अमृत पुत्रों’ को है । धर्म की रक्षा करना किसी जाति-विशेष का पेशा न मानकर भी महामाया उसे पुरुष जाति का पेशा बना दे रही हैं। आह्वान को और जोशीला बनाने के लिए वे जो भाषा की लाक्षणिकता तलाशती हैं, वह मर्दानगी का घिसा-पिटा टोन है – ‘‘उत्तरापथ के लाख-लाख नौजवानों ने क्या कंकण-वलय धारण किया है ?’’ – यह स्त्री जाति पर दुहरा अन्याय है। एक तरफ कंकण-वलय या चूड़ियाँ पहना कर निस्पंद कर देना; ऊपर से उस स्थिति में भी स्त्री जाति को चैन से न रहने देना – उनकी बनाई गई स्थिति का गाली के रूप में इस्तेमाल करके यानी ‘नालायकी’ का प्रतीक चूड़ी पहनने को बना के। ‘अष्टादश’ उच्छ्वास में महामाया की शिष्याएँ उनकी भावना का और भी विस्तार करती हैं। वे भी अमृत के पुत्रों, तरुणों का आह्वान करती हैं सैनिक बनने का, ताकि कुलवधुओं का सुहाग बचे, बालिकाओं की लाज बचे, बहनों का लाज बचे। बचाने का काम करना है मर्दों को और औरतों का काम है सिर्फ कुलवधू बनकर वीरमर्दों की ओर आँसू भरे नैनों से ताकना, माता बनकर ताकना ।
महामाया के जरिये, द्विवेदी जी स्त्री को आत्मरक्षा के लिए भी जगाने की जरूरत नहीं महसूस कर पा रहे हैं। स्त्री स्वयं अपना बचाव करे – ‘कुलवधुता’, ‘सुहाग’ या ‘लाज’ जैसे थोपे गए मर्द-मूल्यों के लिए नहीं लड़े, वरन् इन्हें झटककर फेंक दे और लड़े अपनी जान के लिए, अपने को यौन-हिंसा से बचाने के लिए, अपने व्यक्तिगत सम्मान के लिए। लड़े अपनी गरदन बचाने को, न कि किसी पुरुष की नाक बचाने को। पर, किसी उद्देश्य से भी उसे लड़ने की जगह सिर्फ वीर पुरुषों की ओर टुकुर-टुकुर ताकने को उसे विवश करने के कारण ही लेखक की स्त्री-दृष्टि आधुनिकता से काफी पीछे है। द्विवेदी जी महिलाओं को पुरुषों के रहमोकरम पर ही छोड़ना चाहते हैं, यह भूलकर कि इंसान को सुरक्षित नहीं किया जा सकता, बल्कि उसे स्वरक्षित होना पड़ता है। पुरुषों की पुलिस-व्यवस्था पर अखंड विश्वासी लेखक मानो महिला थाना को गैर-जरूरी मानते हैं। काश! वे सोच पाते कि पुरुषमय पुलिस व सेना ने अब तक महिलाओं की कैसी रक्षा की है, उन्हें यौनग्रास बनाने में कब परहेज किया है ? क्या यह आलोच्य काल का सच न रहा होगा ? स्त्री के आत्मरक्षार्थ परजीवी बनने की जो लक्ष्मणरेखा द्विवेदी जी ने अपने पहले ही उपन्यास में खींच दी थी, उसी पर लगभग अंत तक कायम रहे। मौलिक अन्वेषक होकर भी इतिहास के कई दौरों को वे भूल गए, अपना समकालीन यथार्थ भी ‘आजाद हिंद फौज’ वाला। लगता है कि उनके लिए इतिहास महत्त्वपूर्ण भी कहाँ है? महत्त्वपूर्ण तो है मिथक, जिसकी रचना अपनी रुचि के घालमेल से वे करते हैं।
द्विवेदी जी की नायिकाएँ निजताहीन स्त्रियाँ होती हैं; चाहे भट्टिनी हो या चंद्रलेखा, मृणाल। यदि शुरु से वे ऐसी न हों तो आगे चलकर लेखक उनका ऐसा रूपांतरण कर डालता है कि वे इंसान नहीं, प्रतीक यानी गढ़े गए आदर्शों की प्रतिमूर्ति भर रह जाती हैं। फिर वे आदर्श भी विसंगत मूल्य दृष्टि की देन होते हैं – स्त्री को दोयम दर्जे पर रखकर गढ़े गए आदर्श । यही कारण है कि वे निउनिया जैसी जीवंत, गतिशील व विद्रोही-ऊर्जावती स्त्री को अपने उपन्यास में नायिका का पद नहीं देते; फिर धीरे-धीरे उसके विद्रोह को उसकी अधीरता और उसके सत्य दर्शन को प्रलाप सा ठहराते-ठहराते उसे कमजोर करते जाते हैं। उपन्यास के अंत में उसे बलि ही चढ़ा डालते हैं।
निउनिया : त्रिकाल-भेदी अनुत्तरित प्रश्न
निउनिया ने जो दो दाहक सवाल किए हैं – (1) क्या स्त्री होना ही मेरे सारे अनर्थों की जड़ नहीं है? (2) क्या छोटा सत्य बड़े सत्य का विरोधी होता है ? – ये दोनों उसके व्यक्तिगत सवाल भर नहीं हैं, हर्षयुग के युगप्रश्न हैं। निउनिया की हृदयाग्नि से निकले ये प्रश्न उससे भी आगे बढ़कर त्रिकालभेदी हैं – युग-युग से पूछे गए, युग-युग के प्रश्न। पर, अनुत्तरित। छोटा सत्य अक्सर इस विसंगतिपूर्ण व्यवस्था में बड़े सत्य का विरोधी बनाकर पेश किया जाता है। समाज-संस्कृति या राष्ट्र की रक्षा के नाम पर अक्सर स्त्री-पीड़ा/घरेलू हिंसा के सवालों को चुप करा दिया जाता है – स्त्री-मुक्ति की माँग अक्सर राष्ट्रीय स्वाधीनता की लड़ाई दिखाकर स्थगित कर दी जाती है। यह सोचा तक नहीं जाता कि पचास प्रतिशत जनसंख्या के योगक्षेम को, उसकी पीड़ा/गुलामी को नजरअंदाज कर जो राष्ट्र खड़ा होगा/हुआ है, वह किसका है, किसके हित में ? ऐसी संस्कृति की चिंदी उड़ा डालना चाहती है निउनिया जो आधी आबादी के खून से रंगोली रच रही हो स्त्री के प्रति अन्यायकारी भारतीय समाज राजव्यवस्था को विनष्ट होने का शाप वह देती है – ‘‘किस अपराध पर कान्यकुब्ज का लंपट शरण्य राजा मुझे फाँसी देना चाहता है?…मेरी जैसी असहाय अबलाओं को दंड देने वाला उसका कठोर भुजदंड क्या म्लेच्छवाहिनी से अपनी प्रजाओं को नहीं बचा सकता?…आर्यावर्त्त के समाज के मूल में घुन लगा गया है, उसे महानाश से कोई नहीं बचा सकता।’’ (‘षोडश उच्द्वास’)। पर, उसकी उत्तेजना को लगाम बाँधने को व्याकुल बाण व भट्टिनी के वार्तालाप में आ रहा पितृसत्तावादी दर्शन निर्णायक हो उठता है – ‘‘बंधन ही सौंदर्य है, आत्म-दमन ही सुरुचि है, बाधाएँ ही माधुर्य हैं। नहीं तो यह जीवन व्यर्थ का बोझ हो जाता। वास्तविकताएँ नग्न रूप में प्रकट होकर कुत्सित बन जाती हैं।…भारतीय समाज ने बंधन को सत्य मानकर संसार को बहुत बड़ी चीज दी है।’’ (‘अष्टादश उच्छ्वास’) पर, इसके समानांतर यह सवाल न खड़ा किया गया कि किस पर बंधन ? सिर्फ स्त्री के सहजाधिकार पर ? या उस लंपट मर्दानगी पर भी जिन्हें द्विवेदी जी ‘प्राचीन भारत के रईस’ का खिताब देते हैं।
(पुनश्च’ संग्रह में ‘प्राचीन भारत के रईस’ शीर्षक से ह.प्र. द्विवेदी का एक निबंध भी है) । उनकी लंपट-शरण्यता पर भी कोई बंधन है, जो स्त्री की शारीरिक-आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर अथवा उन्हें शारीरिक-आर्थिक रूप से मजबूर कर, अपहरण/क्रय या ब्याह द्वारा परिचारिकाओं (यौनदासी) या रानियों की शक्ल में, बहुरंगी तितलियों के रूप में अपने चारों ओर दिन-रात मँडराने एवं भीनी-भीनी खुशबू बिखेरने को नियुक्त करते हैं। उनकी इस अमानवीयता को उनके शौक के रूप में तथा नारियों के उक्त यातनाघर को कमनीय स्वर्ग के रूप में ढालकर द्विवेदी जी जब ‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’ लिखने लगते हैं, तब उससे बड़ी विसंगति क्या होगी ?
नारी-सौंदर्य बनाम स्त्री को ‘सुंदर देह’ रूप में ढाल देने का प्रोजेक्ट :
आचार्य द्विवेदी ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ सहित अपने विशाल लेखन में स्त्री के सौंदर्य का इतना और इस कदर बखान करते हैं कि लगता है, ‘सौंदर्य’ को वे स्त्री के लिए एक मूल्य की तरह प्रतिष्ठित कर रहे हैं। केवल वर्णन या व्यंजना की बात नहीं, बल्कि उनकी मुखर घोषणा है (बाण के जरिये) कि ‘‘मैं नारी-सौंदर्य को संसार की सबसे अधिक प्रभावोत्पादिनी शक्ति मानता रहा हूँ।’’ (सप्तम उच्छ्वास) ऐसी कोई घोषणा पुरुष के बारे में उनकी नहीं है, न ही पुरुष के सौंदर्य-वर्णन में उनकी मनोवृत्ति इतनी रमती है, जितनी नारी के सौंदर्य-वर्णन में। यद्यपि इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे मानसिक सौंदर्य की सत्ता भी स्वीकारते हैं और एकाधिक निबन्धों में उनका यह विश्वास भी प्रकट हुआ है कि मानसिक सुंदरता या सौमनस्य ही, दैहिक सौंदर्य के रूप में प्रकट होता है; तथापि उनके द्वारा कृत स्त्री के सौंदर्य-वर्णन में उसका शारीरिक धरातल सर्वाधिक मुखर है। स्त्री में सौंदर्य देखने की बीमारी ने उन्हें इस बुरी तरह जकड़ रखा है कि चाहे किसी स्तर, उम्र या किसी भी स्थिति में पड़ी स्त्री हो, उसमें सौंदर्य जरूर खोजते हैं। रानी से नौकरानी तक, कुलवधू से वारवधू तक, माँ से बच्ची तक, गृहिणी से संन्यासिनी तक कोई उनकी सौंदर्यग्रासी दृष्टि से बच न पाई है। वे मानो अवसर खोजते रहते हैं कि कब स्त्री की सुंदरता बखानने को मिले। उसकी प्रसन्नता ही नहीं, दुख में भी उनकी लेखनी अकुलाती रहती है – रोग-शोक में भी वह वही खोजती है। विश्व-सर्जिका चेतना का भी वे भुवनमोहिनी त्रिपुरसुंदरी रूप में साक्षात्कार करते हैं। प्राकृतिक चित्रण को भी स्त्री-सौंदर्य की भाषा में ढालना उनकी प्रिय शैली है। दिशाएँ उन्हें वधुएँ लगती हैं तो सरोवर का पानी इतना सुगंधित कि वनदेवियों के उसमें स्नान से उनके पुष्पराग घुलने की कल्पना कर बैठते हैं।
स्त्री और पुरुष से जुड़े वर्णनों में क्रमशः गुणों व भाषा की कोमलता व कठोरता का इस्तेमाल उनका तरीका रहा है। स्त्री के देहगत सौंदर्य में वे रूप के साथ स्वर को भी महत्त्व देते हैं। ‘अष्टादश उच्छ्वास’ में महामाया की शिष्याओं के आह्वानमय गान के शक्तिशाली, अद्भुत प्रभाव के कारण रूप में वे नारी-कंठ को पाते हैं, जिससे उन्हें लगता है कि अब आर्यावर्त सुरक्षित हो गया। द्विवेदी जी को बाणभट्ट के मुँह से जब ‘त्रयोदश उच्छ्वास’ में यह बोलते सुनते हैं – ‘‘नारी-देह वह स्पर्शमणि है, जो प्रत्येक ईंट-पत्थर को सोना बना देती है’’ – तो समझना मुश्किल नहीं रह जाता कि स्त्री की दैहिकता को हाईलाइट करने में वे कितने आगे हैं।
पुरुषों की इस दुनिया के मनोरंजन, हित-चिंतन की देन हैं ये, जो स्त्री को सुंदर मानकर, उसे दैहिक-क्षमता, प्रतिभा-विकास से जबरन विलग कर, उसे एकमात्र ‘सुंदर’ बनने को मजबूर कर अपना उल्लू सीधा करती है। ‘नारी-सौंदर्य’ का यह सारा बखेड़ा पुरुषों के सुख के लिए, पुरुषों के द्वारा पुरुषों का है, ताकि देह की परिधि से बाहर निकलकर वह व्यक्ति न बन जाए – वह इस पुरुष-सभ्यता में उत्प्रेरक या साधन बनकर रहे, कहीं कर्ता न बन जाए। इस प्रकार से नारी को साधन बनाना, इस प्रकार से उसका उपयोग बाण व द्विवेदी जी को कितना ही स्पृहणीय हो, पर यह स्त्री के प्रति घोर अन्यायी और सबके लिए अस्वास्थ्यकर है। चारुस्मिता व विद्युदपांगा की नृत्यकला का उपयोग, जिस प्रकार (बकौल धावक) कान्यकुब्ज की विद्रोही जनता को मदिरा पिलाने के अर्थ हो रहा था, उसी का दूसरा परिष्कृत रूप है उक्त उपयोग। नारी का उपयोग चाहे हर्षयुगीन सामंतों द्वारा रीतिकालीन विलास-वीथियाँ सजाने में से अथवा पूँजीवादी बाजार की मॉडलिंग या सौंदर्य-प्रतियोगिताओं या एयरहोस्टेस, सेल्सगर्ल, रिशेप्शनिस्ट आदि रूपों में हो; देवदासी या तंत्र-साधना का उपकरण बनाने में हो, ऋषियों की तपस्या भंग करने में हो अथवा बहुत पुनीत रूप में गृहलक्ष्मी/माँ भर में उसे सिमटा देने के रूप में – सबके सब स्त्री को व्यक्ति न मानने और सहज नैसर्गिक जीवन जीने के उसके अधिकार से वंचित कर उसे ‘सुंदर देह’ रूप में जबरन ढाल देने के प्रोजेक्ट के ही अलग-अलग रूप हैं। ये सब स्त्री-देह को कच्चे चबा डालने को आतुर यौन हिंसकों या यौन ग्रासकों द्वारा उसे वासना-वेदी पर बलिदान करने (वेश्या बनाने) के ही कुछ परिष्कृत चेहरे हैं। ‘स्त्री-सौंदर्य’ के कल्पक द्विवेदी जी इस तथ्य को समझना ही नहीं चाहते कि स्त्री को ‘सुंदर’ देखने का उनका सर्वव्यापी आग्रह कितना स्त्रीघातक है – एक दीर्घकालीन सांस्कृतिक अत्याचार, जो स्त्री पर वाल्मीकि-व्यास-कालिदास-युग से लगातार होते आ रहा है, उसी का हिस्सा है वह। सौंदर्य के ये प्रतिमान, जिनमें वे नारी को कैद करते हैं, उसकी सहजेच्छा या आत्मनिर्भरता के प्रयत्नों (योग-कसरत, खेलकूद, बॉक्सिंग-फाइटिंग आदि शरीर पुष्टिकारी क्रियाओं एवं शिक्षा नौकरी, प्रतिभा के अनंत क्षेत्रों) से उसे बचाकर, विशेष चाल-ढाल-अदा-मुस्कान, दैहिक तराश (क्षीण कटि, नाजुक, छरहरी आदि रूपों में) के साथ बोझिल वस्त्राभरणों से उसे सन्त्रस्त कर, नारकीय यातनाओं में उसे डाल कर पुरुषों का स्वर्ग रचा जाता रहा है।
बाणभट्ट अपने छुटपन से ही स्त्री का जो सम्मान करता है, उस पर की गई अननुकूल टीकाओं को सहन नहीं कर सकता – वह थोथा मनुवादी सम्मान है, जो स्त्री को देवीत्व मातृत्व आदि की हवा से फुला कर उसके यथार्थ की दारुण धरती से उड़ा देता है – सम्मान या महिमागान के सम्मोहन में उसे विषम विवाह, पातिव्रत्य या घरेलूपन का सीकड़ पहना देता है तथा उसकी कड़ियों की झनझनाहट में जीवन-संगीत का भ्रम पैदा करता है।
पितृसत्ता के साथ स्वर्गाभियान और काव्यवाणी का उपयोग :
पितृसत्तात्मक समाज के ‘पौरुष दर्प’ (लेखक ने ठीक शब्द चुना) में नारी-देह की छीना-झपटी, अपहरण, बिक्री, उपहार, दान (जैसे-कन्यादान) के बहुविध कांड चलते रहे हैं। म्लेच्छों के समाज की समता, जिसका गुणगान भट्टिनी करती है, वहाँ भी नर-नारी समता नहीं है, बल्कि सारे नर आपस में समान हैं और सारी नारियाँ आपस में समान हैं, पर नर-नारी आपस में समान नहीं है, अन्यथा कुलवधुओं और बालिकाओं का घर्षण ही उनका विलास न होता। अतएव, वह समत्व अपूर्ण है – ‘पुरुषवादी समता’ इसे कह सकते हैं। (यही समता लोरिकदेव के आभीरों में भी है।) वह समता अधूरी है, पर है तो। भारतीय समाज में तो वह भी नहीं है। इसी से बाणभट्ट का यह सोचना बिलकुल ठीक है, म्लेच्छों के समाज में स्वर्ग बनाना आसान है, पर भारतीय समाज में स्वर्ग बनाना कठिन है। वहाँ स्वर्ग बनाने के लिए थोड़ा-सा सुधार करना होगा, क्योंकि बाकी पूर्व तैयारी हो चुकी है, पर भारतीय समाज में क्या है शास्त्रीय बड़बोलेपन के सिवा, साधनात्मक विसंगतियों के सिवा? आध्यात्मिक समता के पाखंड के सिवा ? इसी पाखंड की छाया में हजारों-हजार जातियाँ तथा स्त्रियों को एक ही साथ कुलवधू और वेश्या बनाने का प्रोग्राम बाखूबी चलते रहता है; दोनों रूपों में नारी दलित ही होती है। इस पर न महामाया ने कुछ सोचा, न उन्हें अधूरी कहने वाली भट्टिनी ने। एक को म्लेच्छ और आर्य के भेद से फुरसत नहीं, जिसमें (भयंकर सामाजिक विषमता से बने) इस देश को बचाने के लिए म्लेच्छों को एकमुश्त मिटा देने का जोश है, दूसरी में ‘ऊँची भारतीय साधना’ के झूठ का सम्मोहन। महामाया का तरीका तो अधूरा सच होकर भी सार्थक है, क्योंकि कम से कम सामंतवादी भेदभावमूलक व्यवस्था और उसके स्त्री-घाती भीषण चेहरे का पर्दाफाश करता है । पर, ऊँची भारतीय साधना उन तथाकथित म्लेच्छों तक पहुँचाने और निकृष्ट सामाजिक जटिलता भारतीय समाज से हटाने का भट्टिनी का प्रस्तावित तरीका तो उससे भी आधी समझ पर आधारित होने के साथ और भी अव्यावहारिक है।
उपन्यास की लगभग समाप्ति पर वह बाण के साथ अपने इस प्रयोग के लिए तैयार दिख रही है। स्वर्ग बनाने की इस परियोजना की कल्पना करते द्विवेदी जी यदि ‘क्या कभी यह भी संभव है कि मानव-समाज में राज्य न हों, सैन्य-संगठन न हों, संपत्ति-मोह न हो ?’ (‘अष्टम उच्छ्वास’) जैसी चिंता करने की बजाय यह चिंता करते कि ‘कैसे संभव हो कि इंसानी समाज में पितृसत्ता न हो ?’ तो पूरी संभावना होती कि ऐसा सचमुच का स्वर्ग बनता, जिसमें बूढ़े इंद्रों के लिए अप्सराएँ न होतीं – नर-नारी बिलकुल समान होते। जब तक अप्सरा-विहीन यह स्वर्ग न बनेगा, तब तक निउनिया का पूछा त्रिकाल-त्रिलोकभेदी यह प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा – ‘क्या स्त्री होना ही मेरे सारे अनर्थों की जड़ नहीं है ?’ यह प्रश्न तब तक अनुत्तरित रहेगा, जब तक कुमार कृष्णवर्धन के घर सिर्फ पुत्र-जन्मोत्सव मनता रहेगा और उसमें नारियाँ सिर्फ जुलूस की शोभा के लिए पुरुषों से भी अधिक संख्या में होती रहेंगी। या, प्रत्यंत दस्युओं के आने की खबर पत्रा से सिर्फ ‘भाइयों’ को देते भर्वुशर्मा इस धरा पर होते रहेंगे। या, पुरुष शास्त्रों व इतिहास को तपस्या/धर्म की व्यवस्थाओं के लिए नारियाँ विघ्नस्वरूप प्रतीत होती रहेंगी। यह प्रश्न तब तक भी अनुत्तरित रहेगा जब तक (स्त्रियों को मर्दों की भोग-कारा में कैद किये रखने वाले ) ‘कंचुकी धर्म’ का पवित्र निष्ठा से पालन करने वाले वाभ्रव्य जैसे वृद्ध भद्रपुरुष रहेंगे। साथ ही तब तक अनुत्तरित रहेगा यह प्रश्न, जब तक पुरुष का सत्य और होगा, स्त्री का सत्य कुछ और।
पुरुष का सत्य और , स्त्री का सत्य और ?
‘पुरुष का सत्य और है, स्त्री का सत्य और’ – इस आशय का महामाया का प्रतिपादन साधना-क्षेत्र में होकर भी, बृहत्तर सांस्कृतिक आशयों का मूल है। इसी दृष्टिकोण ने सच मे नारीवाद या स्त्री-विमर्श को खड़ा किया है। अब तक ज्ञान के, समाज-रचना या व्यवस्था के तमाम क्षेत्र पुरुष के सत्य से खड़े किए गए हैं। चूँकि स्त्री का सत्य और कुछ है – इसी से स्पष्ट हुआ कि अब तक का तमाम ज्ञान या सभ्यता- विकास/संरचना सिर्फ आधी दृष्टि के अनुकूल है, कारण आधी आबादी (स्त्री) का उसमें सहयोग नहीं। स्त्री-दृष्टि से विश्व दृष्टि अलग होगी, इसलिए ‘स्त्री विमर्श’ खड़ा होना निहायत जरूरी है। फिर, स्त्री-विमर्श का कार्य है – ‘पुरुष-सत्य और स्त्री-सत्य और’ – की भेदकारी जेंडरवादी संरचना की छानबीन करना, जिसके तहत स्त्री को हर बात में, हर जीवन-क्षेत्र में, हर अधिकार-कर्तव्य, सिद्धि या कर्म क्षेत्र में, यहाँ तक कि शारीरिक व्यवहार व वस्त्रादि-चयन (सौंदर्य बोध) तक में पुरुष से भिन्न बना रखा है। स्त्री को दोयम दर्जे का शिकार बनाने में ‘पुरुष का सत्य और, स्त्री का सत्य और’ की महामायावी समझ ने ही योगदान दिया है। यही पितृसत्ता का मूल सूत्र है। इसी ने नारीत्व, नारी-मनोविज्ञान जैसे मिथकों को बढ़ाने के साथ नारी को इंसानियत से बहिष्कृत कर रखा है – उसे कुछ खास बनाकर – विलक्षण या कुलक्षण ठहरा कर। इसके रहते निउनिया का पूर्वोक्त प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा। सच कहें तो यह अनुत्तरण तब तक कायम रहेगा जब ‘कथामुख’ की दीदी को आधुनिक (यूरोपीय) स्त्री वर्ग की प्रवक्त्री बनाकर यह कहलाया जाता रहेगा कि स्त्रियाँ चाहें भी तो आलस्यहीन होकर काम नहीं कर सकतीं, क्योंकि समाज की पराधीनता चाहे कम हो जाए, पर प्रकृति की पराधीनता तो हटाई नहीं जा सकती। स्पष्ट होना चाहिए कि प्राकृतिक पराधीनता का आशय लज्जादि भाव हैं तो उनकी प्राकृतिकता पीछे खंडित हो चुकी है ओर यदि उसका आशय स्त्री के मासिक चक्र-गर्भधारण बाध्यता आदि है, तो विज्ञान के बढ़ते हाथ इस प्राकृतिक पराधीनता से स्त्री को अधिकाधिक मुक्त करने जा रहे हैं।
लेखक द्वारा ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ के एकमात्र स्पंदनशील पूर्ण नारी-चरित्र निउनिया का, प्रायोजित तरीके से आत्मदान के पर्दे के पीछे, अंत कर दिया जाता है। भेदभावमय निर्घृण समाज राज्य व धर्म व्यवस्था का वह सर्वाधिक अनुभवी ‘नारी-चरित्र’ है, जो लोक व शासन के किसी दबाव से मुक्त रहकर निर्णय लेने की अपार क्षमता व कर्मठता से युक्त आत्मनिर्भर इंसान है। वह इस व्यवस्था के क्रूर दाहक संजाल की निदारुण भट्ठी में आजीवन जलती रही है, जिसे समझना नायक बाण या लेखक के वश या रुचि की बात नहीं। वह अपने विडंबित, संघर्षशील जीवन के जरिये नारी-जाति का प्रतिनिधित्व करती है और उसके खड़े किए गए सवाल थोड़ा सा भी सोचते ही पूरा ढाँचा हिला देने की ताकत रखते हैं। अपने अनुत्तरित सवालों को लिए ही वह मर या मार डाली जाती है। उसकी मौत भी एक भीषण सवाल बनकर आ खड़ी होती है, मानो सबसे चिल्ला-चिल्लाकर वह पूछ रही है कि स्त्री इस प्रकार समस्याग्रस्त क्यों है, जिसका एकमात्र समाधान मृत्यु है ? इस सन्दर्भ में सुदर्शन प्रियदर्शिनी की काव्य-पंक्ति स्मरणीय है – ‘‘जब भी किसी औरत को मरते देखती हूँ तो मुक्ति का आभास होता है।’
द्विवेदी जी के रचना-संसार में स्त्री-संबंधी जो भी दहकते यथार्थपरक प्रश्न जगे हैं, वे अनायास से आ गए हैं, अन्यथा वे पूरे होशो-हवास में पितृसत्तात्मक संरचना के स्त्री घातक स्वरूप को बहुत ही कम प्रश्नांकित कर सके हैं; ज्यादा तात्त्विक स्त्री-प्रश्नों को ही वे उठाते हैं ? निउनिया के द्वारा अवश्य उन्होंने बेधक सवाल उठा दिए हैं, पर उनके साथ शेष पात्रों की कथा-संरचना कितनी सहयोगी बन पाई? महामाया के बागी आह्वान का लक्ष्मीभूत प्रजा-संगठन स्त्री का नहीं है, बल्कि ‘पिंजरे की मिठबोली मैना बनी रहे स्त्री और पुरुष उसे बचाते रहे’, ऐसा ही कुछ भाव है उनका। पिंजरा तोड़ने का आह्वान तो बिलकुल नहीं है। यह पिंजरा है घर का, विवाह व पातिव्रत्य का तथा स्त्री पर डाले गए ‘सौंदर्य’ का।
फिर भी, यह कहना उचित न होगा कि द्विवेदी जी जड़ पंडित मात्र हैं। वे युग और उससे ज्यादा अपनी परिस्थितियों के लिहाज से उस संक्रमणशील दोराहे पर खड़े थे, जहाँ नयी दृष्टि जुड़ रही थी, पर पुराने का मोह भी गया न था। उनमें द्वंद्वात्मक प्रक्रिया चल रही थी, भले घोषित तौर पर वे ‘द्वंद्वात्मकता’ या ‘विकासवाद’ में आस्थावान न रहे हों। उनके बाणभट्ट में रोमांतिक कवि और जीवन-योद्धा का तनाव सतत चला है। शास्त्र के प्रति मोह के साथ शास्त्र पर संशय भी उनमें बराबर रहा है। वे अपनी ही कृति में अपने ‘पंडित’ व्यक्तित्व के साथ उसके किसी प्रतिपक्ष की रचना अवश्य करते हैं, जो जड़शास्त्रीयता या वर्णभेदी-पितृ संरचना पर कहीं चिंतन करता है, कहीं उसका उपहास करता है तो कहीं उससे दो-दो हाथ करता है। अघोरभैरव, महामाया, निउनिया ही नहीं, किसी सीमा तक बाणभट्ट में भी उसी का विलोम है, क्योंकि वह उचितानुचित-विवेक की सामान्य धारा से हटकर चलता है। इसी स्थिति में उनके उपन्यासों में जीवन-दर्शन बन सकनेवाली सूक्तियाँ फूट पड़ती हैं। जैसे- ‘(सत्य के लिए) किसी से न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ (‘षष्ठ उच्छ्वास’) इसके साथ अघोरभैरव की ही यह उक्ति मिला लें, ‘तेरे शास्त्र तुझे धोखा देते हैं। जो तेरे भीतर का सत्य है, उसे दबाने को कहते हैं; जो तेरे भीतर का मोहन है, उसे भूलने को कहते हैं; जिसे तू पूजता है, उसे छोड़ने को कहते हैं’ – तो असमानांतर साहसी सत्यशोधक दृष्टि मिल जाती है। आचार्य द्विवेदी का विचारक रूप (निबंधों या साहित्येतिहास में) शास्त्रीयता की सीमा रेखांकित कर उसकी अमानवीयता का उद्घाटन भी करता है (विशेषतः वर्ण-मजहब आदि के संदर्भ में); परंतु लिंगभेद (जेंडरवाद) के संदर्भ में (स्त्री प्रति तमाम सहानुभूति रखकर भी) वे पुरानेपन से स्वयं को बचा न पाए हैं। यही कारण है कि ‘पुनर्नवा’ में व्यवस्थाओं के निरंतर परिमार्जन व संस्करण द्वारा उनके नवीनीकरण को निहायत जरूरी बतलाकर भी, स्त्री के संदर्भ में उसमें शायद ही सुधार वे चाहते हों। इसी से उनका साहित्य अपनी तमाम सांस्कृतिक उच्चता, रचनाशीलता व अलौकिकता तथा मनुष्य की जययात्रा में विश्वास के बावजूद पितृसत्तात्मकता की प्रतिसंस्कृति न रच सका। इसी से पुरुष व प्रकृति अथवा ‘स्त्रीत्व’ व ‘पुंसत्व’ नामक दो कोटियों में विश्वासी उनके दार्शनिक भारतीय मानस में स्त्री व पुरुष को इंसानियत के सहज साथी (लाइफ पार्टनर) रूप में देखने की तमन्ना लगभग अनुपस्थित है। उसकी जगह देवता व दासी का द्वंद्व उनमें मिलता है, जिसे देवी-महिमा और नारी-सौंदर्य की विद्युत-कौंध व बरसात से भी भरमाया गया है। इसी से अघोरभैरव के मुख से वे यह भले कहला लें कि ‘‘जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, आसक्त हो’’(‘षष्ठ उच्छ्वास’), लेकिन उनका साहित्य इस भेदभाव की दीवारों का रंग-रोगन करने में ज्यादा निरत है, उन्हें धक्का देने में बहुत कम ।
आज जब महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे पर हर राजनैतिक विचारधारा का विमर्श हमारे समक्ष मौजूद है हम माहवारी या मासिक धर्म के मुद्दे पर मुंह बंद किये बैठे हैं | माहवारी या मासिक धर्म एक ऐसा मुद्दा है, जिसपर परंपरावादियों से लेकर प्रगतिशील तक , किसी प्रकार के कदम या आन्दोलन करने से बचते हैं | सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि माहवारी पर पुरुषों का ये रवैया केवल भारत में ही नहीं कनाडा , जर्मनी जैसे देशों में भी उठता है और उसे चुपचाप दबा भी दिया जाता है |गत 28 मई को ‘Menstrual Hygiene day पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया | ये कार्यशाला तीन गैर सरकारी संगठन ‘जागो गाँव’, ’स्ट्रगल फॉर जस्टिस’ तथा ‘परमार्थ चिंतन फाउंडेशन’ द्वारा आयोजित की गई थी , जिसके अंतर्गत माहवारी या मासिक धर्म से जुडी सामाजिक समस्याएं, मिथ, मासिक धर्म के चिकित्सीय पहलुओं आदि पर अलग अलग क्षेत्रों से आमन्त्रित वक्ताओं द्वारा अपने विचार प्रकट किये गए.|
प्रथम वक्ता प्रज्ञा थीं जिन्होंने दर्शकों को दो समूहों में विभाजित कर उनसे अलग अलग प्रश्नों पर उनकी प्रतिक्रियाएं मांगी … माहवारी सुनते ही उनके मन में उठने वाला पहला शब्द कौन सा है जिसके जवाब में प्राकृतिक प्रक्रिया ,मौन ,जैविकीय प्रक्रिया जैसे शब्द सामने आये| इसके पश्चात उन्होंने दोनों समूहों से स्त्री की शारीरिक संरचना को रेखांकित कर उनके अंग विशेष को नाम देने को कहा| इसके पश्चात उन्होंने दोनों समूह द्वारा बनाये गए रेखाचित्रों की तुलना करते हुए दर्शकों को समझाया कि पुरुष स्त्री अंगों पर खुल कर बात करने में झिझकते हैं. ऐसे में समाज में पुरुषों को आगे बढ़ कर स्त्री की शारीरिक संरचना, उसकी माहवारी और अन्य अंगों सम्बन्धी विषयों पर बात करनी ही होगी, जिससे समाज में व्याप्त फुसफुसाहट का दौर ख़त्म हो और वैचारिक गांठे खुलें.
गुंजन कुमारी जो एक फिजियोथेरेपिस्ट हैं, ने माहवारी के मेडिकल आयाम प्रस्तुत करते हुए दर्शकों को माहवारी से जुड़े रोगों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी. गुंजन ने संतोष मेडिकल कॉलेज गाज़ियाबाद की 25 वर्ष से कम आयु की 200 छात्राओं के साथ एक केस स्टडी की जिसके अंतर्गत डिस्मेनरी से पीड़ित लड़कियों से सम्बंधित डाटा प्रस्तुत किया गया था | डिस्मेनरी के अंतर्गत लड़की को अत्यधिक पीड़ा होती है कार्यशाला में इससे बचने के उपाय आदि पर चर्चा की गई |
जागो री की दिल्ली शाखा से जुडी प्रसिद्ध महिला एक्टिविस्ट शांति ने इस कार्यक्रम में अपने क्रांतिकारी विचारों से सबको अवगत कराया |शांति ने कोई डिग्री नहीं पाई लेकिन उनके अनुभव जिंदगी की सच्चाइयों से उपजे थे |उनका बीटा और वह माहवारी पर एक साथ कार्यशालाओं में जाते हैं और महिलाओं को इस विषय पर जागरूक करते हैं | शांति ने कहा कि जिस माहवारी के रक्त से पुरुष घिन करते हैं उनका जीवन माहवारी के इसी रक्त पर आधारित होता है| शांति ने ये भी बताया कि वे अनेक क्षेत्रों में कार्य कर चुकी हैं जैसे कॉर्पोरेट ,सरकारी क्षेत्र आदि लेकिन माहवारी के विषय पर अधिकतर पुरुष पिछड़ी या रूढीवादी मानसिकता के ही मिले हैं | अभी हाल ही में माहवारी शीर्षक की अपनी कविता से चर्चा में आई कवियत्री दामिनी यादव ने भी कार्यशाला अपनी इस कविता का पाठ किया |
“आज मेरी माहवारी का
दूसरा दिन है।
पैरों में चलने की ताक़त नहीं है,
जांघों में जैसे पत्थर की सिल भरी है।
पेट की अंतड़ियां
दर्द से खिंची हुई हैं।
इस दर्द से उठती रूलाई
जबड़ों की सख़्ती में भिंची हुई है,,….
एक अन्य वक्ता परी सैकिया ने भी अपनी बात रखी … परी एक मीडिया कर्मी हैं जो पूर्वोत्तर राज्य की निवासी हैं | उन्होंने बताया कि हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों में मासिक धर्म के आरंभ में एक उत्सव मनाया जाता है |किन्तु इसके बाद वही रुढ़िवादी और परंपरागत माहौल पैदा हो जाता है | ये बहुत कुछ ऐसा है जैसे हम किसी ख़ास दिन को मनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और बाद की समस्याओं से अपनी आँखें मूँद लेते हैं | परी ने बताया कि उनके घर में उनके पिता और भाई आरम्भ से उनके लिए सेनेटरी नैपकिन लाते रहे हैं जिस कारण उन्हें अपने घर में माहवारी पर बात करना असहज नहीं लगा |
नितीश के सिंह ने पुरुषों के योगदान और संचार के माध्यमों के बेहतर इस्तेमाल के ज़रिये माहवारी पर संकोच हटाने पर जोर दिया और माहवारी में प्रयोग किये जाने वाले सेनेटरी नैपकिन के अलावा टैम्पोंस और मेंसट्रुअल कप्स जैसे गैर पारंपरिक साधनों पर जानकारी दी. माहवारी में आम तौर पर सेनेटरी नैपकिन की जगह पुराना कपड़ा या कॉटन गौज जैसी चीज़ों का इस्तेमाल होता है लेकिन मोटे तौर पर देखें तो इनमें नैपकिन इस अवस्था में इस्तेमाल होने वाली सबसे प्रचलित वस्तु है, और इससे वजह से इससे होने वाली बीमारियाँ भी सबसे अधिक. सेनेटरी नैपकिन का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव होता है गीलेपन से होने वाला संक्रमण. ये संक्रमण आगे चल कर तमाम अन्य बीमारियों को दावत देता है. हालाँकि बाजारवाद ने सेनेटरी नैपकिन्स के प्रचार द्वारा एक जागरूकता सी फैलाई ज़रूर है लेकिन ये नाकाफी लगती है. आज बाज़ार में माहवारी के दौरान इस्तेमाल होने वाले कई अन्य साधन उपलब्ध हैं जिनमें टैम्पोन और मेनस्ट्रुअल कप प्रमुख हैं. इनमें संक्रमण का खतरा सेनेटरी नैपकिन की अपेक्षा कहीं कम होता है. भारतीय बाज़ार में माहवारी से जुड़े स्वच्छता उपायों के प्रचार और प्रसार में सप्लाई और डिमांड का नियम तो काम करता ही है, साथ ही इन साधनों की कीमत में फर्क भी असर डालता है.
एक ऐसे समाज में माहवारी को नितांत गुप्त माना जाता है वहां इससे जुडी चीज़ें भी इसकी तरह बेकार मानी जाती हैं. ऐसे में बेहतर विकल्पों के प्रति जागरूकता ज़रूरी है. जहां अच्छे नैपकिन की कीमत 100 से 200 रूपए प्रति दस नग होती हैं, वहीँ साधारण क्वालिटी वाले टैम्पोन भी इसी कीमत में मिल जाते हैं. मेनस्ट्रुअल कप हालाँकि थोड़े महंगे ज़रूर होते हैं और 700 से 2500 रूपए के आस पास प्रति नग मिलते हैं लेकिन सबसे असरदार और री-यूज़ेबल होते हैं , जिसकी वजह से ये सबसे सस्ते साबित होते हैं. इनको अमूमन तीन से पांच साल तक प्रयोग किया जा सकता है, जिससे पैसे की बचत भी बहुत होती. इन मेनस्ट्रुअल कप की सबसे ख़ास बात ये है कि ये टैम्पोन और नैपकिन की अपेक्षा संक्रमण से बचाने में सबसे कारगर होते हैं.
अंत में प्रो सी पी सिंह और प्रो मोहंती ने अपनी बात रखी | प्रो सी पी सिंह ने अपने एक देशज मुहावरे से अपनी बात आरम्भ की | जो जितना पढुआ, ओ उतना भडुआ ……उनके अनुसार आप जितना अधिक अकादमिक ज्ञान प्राप्त करते है व्यावहारिक ज्ञान से उतना ही दूर होते जाते हैं | प्रो मोहंती ने माहवारी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कार्यशाला आयोजित करने पर आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि स्त्री सशक्तिकरण के इस महत्वपूर्ण दौर में ऐसे विषयों पर खुल कर बात करना बहुत जरूरी है जिससे आने वाली पीढ़ी एक नए और जेंडर मुक्त समाज का निर्माण कर सके |
कार्यक्रम में महिलाओं और पुरुषों के साथ बच्चों की सहभागिता खास रही लेकिन इससे भी अधिक ख़ास था माता पिता के साथ बच्चों का कार्यक्रम और वक्ताओं के बारे में बातचीत करना. ये अपने आप में एक बहुत सकारात्मक बदलाव दिखा कि अभिभावक बच्चों को लाये और उनके साथ माहवारी के विषय पर बात करने में सहज दिखे. कई बच्चियां अपनी माँओं के साथ आई हुई थी उन्होंने पूरे समय तक रूककर वक्ताओं के विचारों को सुने . अगर आज की पीढ़ी इन विचारों को सुनेगी और समझेगी तो उम्मीद की किरण कायम रहेगी .. इस कार्यशाला में लाने के लिए उनके अभिभावकों को साधुवाद देना ही होगा .. यहाँ लाने का निर्णय उनकी खुली मानसिकता को दर्शाती है .स्पष्ट हैं कि वे अपने बच्चों से इस विषय पर बात करते होंगे और इस कार्यशाला के माध्यम से वे उनकी समझ और मानसिकता को और परिपक्व बनाना चाहते हैं | इस कार्यशाला के माध्यम से माहवारी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सारगर्भित विचार सामने आये | आगे आने वाले समय में इस तरह की कार्यशालाओं से इस मुद्दे पर एक सकरात्मक माहौल अवश्य बनेगा
अलौली खगडिया जिला का छोटा सा गांव है। जिस गांव के हर आदमी की जुबान पर उन तीन स्त्रीयों के नाम है , जिसकी हत्या कर दी गयी। उन्हीं में से थीं भागो देवी । लोगों ने बताया कि भागों देवी की मां ने उसका नाम भागो रखा था। बचपन में वो खेत,जंगल, नदी व पहाड़ छानती रहती थी। उसके कदमों में इतनी ताकत थी कि नंगे पांव कोसो मील भाग जाती थी। लोग कहते थे ये लड़की हवा से बातें करती है। हवा से बातें करने वाली लड़की ने एक दिन जाना कि इस देश में दलित होने का क्या मतलब है। फिर वह लड़की आग उगलने लगी। जल ,जंगल, जमीन पर हक जताने लगी। जाने कौन सी तारीख में उसे पता चला कि इस लडाई में जो साथ दे रहे हैं वे उन्हीें जैसे लोग हैं। गांव वाले कहते हैं कि वे कम्युनिस्ट है। गरीबों की पार्टी है। भागों इस पार्टी में शामिल हो गयी। एक शाम जब पूरा गांव जमीन के हक को लेकर बैठक कर रहा था अपराधियों ने गोली मारकर भागों देवी की हत्या कर दी। खगडिया जिला के अलौली प्रखंड में पिछले पांच माह में सात दलितों की हत्या हुई जिसमें तीन महिलाएं हैं।यह वही राज्य है जहां की सरकारें पिछड़ों और दलितों की राजनीति करती रही है। भागों देवी जैसी हमारे देश में हजारों महिलाएं हैं जो जिन्दगी के लिए लड़तीं हैं। और मारी जाती हैं। पर ये खबर नहीं है। किसी दलित महिला की मौत खबर नहीं हो सकती है।
पुलिस फाईल में ये महज तीन औरतें हैं जिनकी हत्या हुई। कौन हैं ये तीन औरतें। क्यों इनकी हत्या की गयी? ये जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। रुणा देवी, सोनी कुमारी और भागो देवी। सोनी की उम्र 16 वर्ष है। सोनी ने अभी बोर्ड परीक्षा दी थी। एक दलित लड़की ने उंचे सपने देखे। वो पढ़ना चाहती थी। इसलिए दूसरों की जमीन पर काम करने वाले मजदूर मां,बाप ने सोनी को मास्टर रख कर पढ़ाया। मास्टर खुद पिछड़ी जाति का है- पर इस पृतिसत्तामक सोच के साथ है कि हर दलित स्त्री की देह उनकी संपत्ति है। उस दिन घर में कोई नहीं था। सोनी को अकेला पाकर उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की गयी। सोनी ने अपनी पूरी ताकत से विरोध किया। अन्तिम समय तक लड़ती रही। और मारी गयी। सोनी का मामला थाने में है। सोनी की हत्या की चश्मदीद गवाह सोनी की 6 साल की भतीजी है । जो इस हादसे से सकते में है। वह रो रोकर कहती है मास्टर जी ने दीदी को मार डाला। पर पुलिस को इतनी फुरसत नहीं की वह नन्हीं बच्ची की गवाही ले। पूरा परिवार दहशत में है। हम सब जानते हैं कि हमारा इतिहास दलितों के खून से रंगा है।
सामन्तवादी अवशेष अब भी बचे हुए हैं। इस आजाद मुल्क में अब नयी ब्याही गयी कोई दलित स्त्री भले ही किसी जमींदार के पास परोसी नहीं जाती हो पर किसी भी समय वह दबोच ली जाती है। भागो देवी और रुणा देवी के साथ क्या हुआ? अलौली प्रखंड में दलितों की बड़ी आबादी है। ये इलाका राजनीतिक रुप से सजग है। बिहार में अभी भी कुछ जगह बची हुई है जहां कम्युनिस्ट पार्टी जिदां है। खगडिया में कम्यूनिस्ट पार्टी के सात लोगों की हत्या हो चुकी है भूमि आंदोलन को लेकर। भागो देवी और रुणा देवी जमीन की लड़ाई लड़ रही थीं। मारे गए कामरेड की चश्मदीद गवाह थीं। उस इलाके के लोग जानते हैं उस स्त्री को जो जिन्दगी भर सच के साथ खड़ी रही। जिसने स्त्रियों को बताया कि एक दलित स्त्री किस तरह सम्मान के साथ जी सकती है। जिस दिन हत्यारों ने गोली मारी भागो देवी अपने गांव के लोगों के साथ जमीन के मुद्दे पर बैठक कर रही थी। सूरज आग उगल रहा था, पेड़ों की टहनियों में से गर्मी छनकर आ रही थी। एक सफेद धुन्द तेजी से सुबह के आकाश में फैल रही थी जिससे हवा में और ज्यादा दम घुटने लगा था। फिर भी लोग जमे हुए थे। उसी समय हत्यारे आए और भागो देवी पर गोलियां चलायी। जब तक लोगों को समझ में आता भागो देवी ने दम तोड़ दिया।
हजारों लोगों ने अपनी कामरेड को विदा किया। चिताओं से उठने वाली लाल रौशनी , मशालों से चारों दिशाओं में छिटकती हुई चिनगारियां उपर से झांकते हुए आसमान की ओर लहक रहा था।

युवा कवयित्री संजू शब्दिता जीवाजी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत हैं. संपर्क : sanjushabdita@gmail.com
1
वो मेरी रूह मसल देता है
साँस भी लूँ तो दखल देता है
इससे पहले कि मैं कुछ कह पाऊँ
खुद के अल्फ़ाज़ बदल देता है
राज़ की बात उसे मत कहना
वो सरेआम उगल देता है
मैं तो देती हूँ दुवायें उसको
एक वो है कि अज़ल देता है
उसको मालूम नहीं, गम में भी
वो मुझे रोज़ ग़ज़ल देता है
2
हमारी बात उन्हें इतनी नागवार लगी
गुलों की बात छिड़ी और उनको खार लगी
बहुत संभाल के हमने रखे थे पाँव मगर
जहां थे जख्म वहीं चोट बार-बार लगी
कदम कदम पे हिदायत मिली सफर में हमें
कदम कदम पे हमें ज़िंदगी उधार लगी
नहीं थी कद्र कभी मेरी हसरतों की उसे
ये और बात कि अब वो भी बेकरार लगी
मदद का हाथ नहीं एक भी उठा था मगर
अजीब दौर कि बस भीड़ बेशुमार लगी
3
चाँद तारे ख़्वाब में आते नहीं
हम भी छत पे रात में जाते नही
वो ज़माना था कि बातें थी गुज़र
आज हम भी वैसे बतियाते नहीं
वो पुरानी धुन अभी तक याद है
पर हुआ है यूँ कि अब गाते नहीं
ढूंढते हैं मिल भी जाता है मगर
चाहिए जो बस वही पाते नहीं
जाने क्या मंज़र दिखाया आपने
अब नज़ारे कोई बहलाते नहीं
4
मुझे बेजान सा पुतला बनाना चाहता है
किसी शोकेस में रखकर सजाना चाहता है
मेरे जज्बात सब उसको खिलौने जान पड़ते
जिन्हें वो खुद की चाभी से चलाना चाहता है
कुतर डाले मेरे जब हौंसलों के पंख उसने
बुलंदी आसमां की अब दिखाना चाहता है
मेरे किरदार में सख्ती नहीं उसको गंवारा
बिना हड्डी का कर मुझको पचाना चाहता है
दिवारें चार मेरी हो गईं हैं कब्रगाहें
मुझे जिन्दा ही वो मुर्दा बनाना चाहता है
5
सिर्फ कानों सुना नहीं जाता
लब से सब कुछ कहा नहीं जाता
दर्द कि इन्तहां हुई यारों
मुझसे अब यूँ सहा नहीं जाता
चुन के मारो सभी दरिन्दों को
माफ इनको किया नहीं जाता
है भला क्या तेरी परेशानी
बावफ़ा जो हुआ नहीं जाता
कैसे वादा निभाऊ जीने का
तेरे बिन अब जिया नहीं जाता
6
हँसते मौसम यूँ ही आते जाते रहे
गम के मौसम में हम मुस्कुराते रहे
यादें परछाइयाँ बन गयीं आजकल
हमसफ़र हम उन्हें ही बताते रहे
कल तेरा नाम आया था होंठों पे यूँ
जैसे हम गैर पर हक़ जताते रहे
दिल के ज़ख्मों को वो सिल तो देता मगर
हम ही थे जो उसे आजमाते रहे
तल्ख़ बातें ही अब बन गयीं रहनुमाँ
मीठे किस्से हमें बस रुलाते रहे
चल दिये हैं सफ़र में अकेले ही हम
साथ अपने ग़मों को बुलाते रहे
रूठ कर तुम गये सारा जग ले गये
चाँद तारे भी हमको चिढ़ाते रहे
7
इंसानियत का पता मांगता है
नादान है वो ये क्या मांगता है
वो बेअदब है या मैं बेअसर हूँ
मुझसे वो मेरी अना मांगता है
हद हो गई है हिक़ारत की अब वो
रब से दुआ में फ़ना मांगता है
बरकत ख़ुदाया मेरे घर भी कर दे
बच्चा खिलौना नया मांगता है
किस्मत में मेरे नहीं था वो लेकिन
दिल है कि फिर भी दुआ मांगता है
8
दिल में इक दर्द है जो ज़िन्दगी सी लगती है
जाने क्यों फिर ये कभी दिल्लगी सी लगती है
जाओ छेड़ो न अभी गम में हमें रहने दो
गम का एहसास हमें बन्दगी सी लगती है
हम भी बदनाम हुए थे कभी इस दुनिया में
अब तो हर बज़्म ही रुसवा हुई सी लगती है
ऐसे लोगों से बचाना हमें तू या मौला
जिनसे मिलते ही हमें बेकली सी लगती है
उसकी बातों में करिश्मा है कोई क़ुदरत का
जब भी सुनते हैं उसे बेखुदी सी लगती है
सच की आदत जो पड़ी है हमारी बचपन से
बोल दें हम तो उन्हें खलबली सी लगती है

पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.
एंड दे लिव्ड हैप्पिली एवर आफ्टर ‘ की तर्ज पर दाम्पत्य के सुखांत से रसानुभूति पैदा करने वाली रोमांटिक फिल्मों का दौर अब फीका पड़ता नज़र आ रहा है और उसके स्थान पर विवाह की पपम्परागत संस्था को नकारकर उन्मुक्ताकाश में अपने स्व को तलाशती नायिकाओं वाली फिल्मों ने दर्शकों की कलात्मक रुचि का परिष्कार करना आरंभ कर दिया है । क्वीन , डॉली की डोली , पीकू और अब तनु वेड्स मनु रिटर्न्स : स्त्री विमर्श वाली समझदार फिल्मों की पूरी फेहरिस्त बनती जा रही है । यह स्त्री विमर्श अपनी सामग्री ही नहीं पेशकश में भी जीनियस किस्म का है । पत्नी , मां , बहन , बेटी , बहू नहीं , स्त्री की पहचान है उसकी आजाद शख्सियत ; जिसे जीता , लुभाया , भरमाया , बहलाया नहीं जा सकता । इन सबमें स्त्री पुरुष की सत्ता से आज़ाद होती स्त्री अपनी दुनिया की क्वीन है । क्वीन जिसके अपने सपने हैं , अपना हौसला है , रास्ते बनाने की तड़प है । जहां नायिका एक कोई अच्छे से नायक के प्रेम में पडकर , एक अच्छे घराने की वधू बनकर सुखी वैवाहिक जीवन की अपेक्षित नियति का शिकार होकर जीना स्वीकार नहीं करती ।
तनु वेड्स मनु रिटर्न्स को बेहद कलात्मक और मनोरंजक पैकेज के बावजूद स्त्री विमर्श की एक बेहतरीन फिल्म माना जा सकता है । तनु सामंती व्यवस्था के भीतर अपनी मनमाफिक और आजादी के लिए प्रपंच करने वाली स्त्री समाज की प्रतिनिधि है । तनु जितनी आधुनिक दिखती है, उससे कहीं अधिक वह पुरातन सोच की है .वह पत्नी नहीं जोंक है, जिसको एक बार पत्नी की पोस्ट हासिल हो जाए तो वह जीवन भर निठल्ले रहकर पति का सामाजिक – मानसिक शोषण करती रह सकती है । उसके दुख उसके अभाव सब उसके खालीपन की उपज हैं । रस उसके जीवन में इसलिए नहीं क्योंकि वह एक कर्महीन प्राणी है |. जिन पत्नी अधिकारों की बात वह करती है वह सब हास्यास्पद हैं क्योंकि उसको खुद किसी कर्तव्य का अहसास तक नहीं है |. उसके आंसू दर्द नहीं जगाते क्योंकि उनका कारण धोर स्वार्थी नजरिया है | दुनिया में अनगिनत पत्नियां हैं वह भी एक है जिसके जीवन की कोई सामाजिक उपादेयता नहीं | कुल मिलाकर यह कि तनु और उस जैसी अन्यों में ऐसा क्या है कि उन्हें ज़रा देर भी चाहा जा सके | ये पत्नी बनने के लिए पैदा हुई और पत्नी के गुमनाम ओहदे पर पैरासाइट की तरह जीते रहने को खुदा की नेयमत मानने वाली फूहड़ प्रजाति है |
इसके ठीक विपरीत दत्तो जैसी आधुनिक , संधर्षशील , आत्मनिर्भर ,सुलझी हुई , स्पष्टवादी और स्वाभिमानी लड़की के चरित्र में बहुत सी संभावनाओं की मजबूत झलक दिखाई गई है । दत्तो की बेहद पारंपरिक पृष्ठभूमि के कॉंनट्रास्ट में उसका समूचा चरित्र बहुत यथार्थवादी तरीके से पेश किया गया है . उसे अपने खिलाड़ी होने , अपने बल पर अपना जीवन जीने की जिद पर आत्माभिमान है । दत्तो के इस दिपदिपाते चरित्र के आगे ‘अपने अंडरवियर तक के लिए’ परनिर्भर रहने वाली तनु जैसी औरतों के बेमानी हकों की हाय हाय हास्यास्पद लगने लगती है । दत्तो एक अत्यंत बंद समाज से आने वाली कम आयु की हौसलों और उम्मीदों से सपनों से भरी लड़की है । एक आम भारतीय लड़की जिसके सपनों की दहलीज पर जो भी पहला समर्पित नायक द्वार खट्खटाता है ,वह उसे ही दिल दे बैठती है । पर वह प्रेम और समझौते में फर्क समझती है । चूंकि वह खैरात नहीं लेती स्वाभिमानी है , खिलाड़ी है , तो गिरकर उठना भी जानती है और हार को जज़्बे के साथ वैसे ही स्वीकार करना जानती है जैसे जीत को । उसके लिए तनु की तरह ग़मों को पालने की सहूलियत है न ही समय और न ही आवश्यकता । इसलिए वह ‘ ऎसे शिव से गिरिजा विवाह करने की मुझको नहीं चाह ‘ जैसे औदात्यपूर्ण फैसले से न केवल खुद को हमेशा के लिए आजाद कर लेती है वरन तनु और मनु जैसे विवाहित जोड़ों को उनकी
परम्परागत दाम्पत्य की स्वाभाविक नितयि को भोगने के लिए सहज स्पेस दे देती है । एक आम लड़की की सी भावनात्मक कमजोरी से तुरंत निकलकर समारोह में शराब पीकर शोर मचाने वाले को अपना करारा कराटॆ चाप देते दिखाकर और तनु और मनु को टाई से उपजे इमोश्नल मैलोड्रामात्मक प्रेम विवाद में पड़ता दिखाकर निर्देशक ने फिल्म के अपने पात्रों से पूरा पूरा न्याय किया है । अवस्थी जी को जूस पिलाने वाले अंतिम दृश्य में प्रेम की अनंत संभावनाओं वाले आकाश में उड़ने और एक्स्प्लोर करने वाली संघर्षशील लड़की के रूप में कुसुम का चरित्र और भी अधिक प्रामाणिक लगने लगता है । यदि निर्देशक ने इस संबंध के बनने और टूटने को दत्तो के लिए एक सबक की तरह दिखाया होता और दर्शक को आगे के जीवन के लिए मात्र शुष्क लक्ष्यों के लिए कटिबद्ध दत्तो दिखाई होती तो यह स्वतंत्र स्त्री का एकांगी प्रस्तुतिकरण कहलाता । भावात्मक , आर्थिक , सामाजिक वैचारिक स्वतंत्रता से लबरेज दत्तो का चरित्र दर्शक के परंपरागत माइंडसेट् से दखलंदाज़ी कर उसे दत्तो से साधारणीकृत होने पर विवश कर देता है । लगता है कि तनु जीत गई पर साफ महसूस किया जा सकता है तनु हार गई । उसे मिला लिजलिजे दाम्पत्य प्रेम से लूटे गए आजीवन अधिकारों के आराम से भरी एक बंद दुनिया । जहां रहेगा आधारहीन उद्देश्यहीन और वास्तविक उल्लास से हीन जीवन । जबकि दत्तो ने अपने लिए अनंत आकाश की संभावनाओं भरी जिंदगी को वापिस जीत लिया ।
पूरी फिल्म में मनु के प्रति दयनीय पात्र के प्रति सहानुभूति पैदा होती है । जिम्मेदार , कमाऊ , सिंसियर हस्बेंड बनकर अपने सामाजिक पारिवारिक दायित्व को ही दाम्पत्य प्रेम का नाम दे देना उसकी नियति है । वह इसी प्रेम को तलाशता फिरने वाला पति नामक जीव है और पहले असफल वैवाहिक जीवन के दुखांत के तुरंत बाद एक नये प्रेम संबंध के भ्रम में पड़कर फिर से ” एक अच्छा हस्बेंड बनकर दिखाउंगा ” की अंतहीन अपेक्षाओं के रास्ते पर होम होने चल देता है । फिल्मकार यदि मनु शर्मा के इस नये संबंध का आधार तनु और दत्तो की रूपसाम्यता न दिखाता तो हस्बेंड प्रजाति की इस नियति के दंश को नहीं उभार पाता । एक तरह के संबंध की दुखांत स्थिति के बावजूद चालीस की उम्र में मनु शर्मा उसी पुराने संबंध को नई पत्नी में तलाशने की अपरिपक्वता दिखाता है । फिल्म के दूसरे पुरुष पात्रों को भी ‘ कंधे ‘ की तरह इस्तेमाल होने के लिए उत्कट दिखाकर फिल्मकार ने परंम्परागत स्त्री पुरुष संबंध को बेहतरीन तरीके से संतुलित किया है ।
इस पूरी फिल्म की कलात्मक प्रस्तुति में स्त्री विमर्श एक अंडरकरंट के तौर पर लगातार मौजूद रहा है । फिल्म की कलात्मक प्रस्तुति में हर तरह के दर्शक के आअनंद के लिए स्कोप दिखाई देता है । शुद्ध मनोरंजनात्मक नजरिये से देखने वाले दर्शक का दिल भी अनजाने में दत्तो ही जीत ले जाती है और यही इस फिल्म की सारी ताकत है । दर्शकों की कलात्मक अभिरुचि का संस्कार करने वाली इस तरह के विमर्शों वाली फिल्मों का स्वागत किया जाना चाहिए ।
( पेरिया परसिया , सेतारह या पेरि, हिन्दी में जिसे ‘परी’ नाम दिया गया, की कवितायें . एक कवि के प्यार में पड़ी ईरानी कवयित्री परी की कवितायें . अनुवाद चर्चित कवयित्री रति सक्सेना ने किया है. )
एक खत पागलखाने से
1
वे कहते हैं कि
वे हाथ बाँध देंगे मेरे
पलंग के सिरहाने से
यदि मैंने दीवारों पर
सिर पटका
उन्हें प्यार है दीवारों से
मैं बन्द हूँ
पांच दीवारों वाले
एक सफेद ठण्डे कमरे में
जहाँ कोई खिड़की नहीं
हवा के लिए
उन्हे नफरत है खिड़कियों से
मैं अकेली पत्ती, पितलाई हरी
पत्तियों की तरह, मुझे दरकरार होती है
ताजी हवा की, यदि विश्वास नहीं उन्हें
मेरे क्लोरोफिल पर तो
इतना याद रखें कि
एक पागल औरत को भी जरूरत है
हवा की, जो उसके बालों को सहला दे
वे परागकणो से युक्त हवा को प्रदूषित कहते हैं
कमरे की पाँचवी दीवार मेरी छत है
यह दीवार सरकाई जा सकती है
इसका बोझ मेरे कंधों पर टिका है
जिससे मेरे दिल और इसकी दूरी
हर क्षण कम होती जा रही है
यह हर क्षण नीचे झुकती जा रही है
किन्तु कभी ढहती नहीं
वे खुद चमकदार आसमान के नीचे रहते हैं
वे कहते हैं कि मुझे एक सिगरेट देंगे
यदि मैं कसम खाऊँ कि मैं अच्छी बच्ची बनूँगी
पलंग के नीचे घुस कर अपनी नसें नहीं चबाऊँगी
लेकिन वे एक ट्रे लेकर आते हैं, शाक थेरोपी से पहले, हर बार
वे मुझे मार डालने के आदी हो गए हैं।
उन्होंने मेरे दीमाग से संगीत मिटा दिया
उन्होंने मेरी देह से नृत्य मिटा दिया
लेकिन वे दिल से नहीं मिटा पाए
तुम्हारे प्यार को, तुम्हारी यादों को, मेरी चाहत को
तुम्हारी कविताओं का अपनी जबान में तर्जुमा करने को
वे मुझे मार डालने के आदी हो गए हैं।
2
मुझे नहीं चाहिए सिगरेट
नहीं चाहिए सूरज की रोशनी
नहीं चाहिए मुझे आजादी
बस कह दो उन्हे कि
दें दे मुझे कागज और कलम
जिससे मैं बात कर सकूँ अपने आप से
यहाँ सारे कि सारे डाक्टरों और नर्सों
के सिर गायब हैं
मैं कभी नहीं माँगूंगी उनसे चाभी
जिससे इस दरवाजे को बन्द कर
महसूस कर सकूं आजादी अकेलेपन की
कभी भी नहीं माँगूगी उनसे धर्मग्रन्थ
पापों के प्रायश्चित के लिए
जिससे महसूस कर सकें वे अपने को मजबूत
ईश्वर भी उतना अकेला नहीं होगा आसमान में
जितना की एक पागल औरत है अकेली
इस कमरे में जो बन्द नहीं होता
कह दो उनसे कि वे दे दें मुझे बस एक कागज और कलम
जिससे मैं बुन सकूँ एक खूबसूरत प्रेम कविता
मेरे प्यार की आत्मा के लिए, सर्दियाँ करीब आ रहीं है।
सर्दियाँ करीब आ रहीं है।
3
ये दीवारें इतनी खाली क्यों हैं?
न कोई दर्पण, ना चित्र, ना ही धब्बे
बच्चों के हाथों के निशान तक नहीं
केवल डरावनी सफेदी
केवल डरावनी सफेदी
दीवार घड़ी कहाँ छिपी है?
मेरे सीने में? मेरी बिल्ली कहाँ है?
कहाँ है मेरा वैक्यूम क्लीनर?
कहाँ हैं बिना धुले कपड़ों और
झूठे बर्तनों का ढेर?
यह डरावनी सफेदी
क्या यह इत्तिला है दुनिया के अन्त की?
यहाँ हर दिन बीता हुआ कल है
कोई आने वाला कल नहीं, दर्पण नहीं, घड़ी की सुइयाँ नहीं
बस दीवार पर मंडराती एक औरत की परछाई
मरी मोमबत्ती की तरह
कोई है इस दुनिया में जो
मरी मोमबत्ती को याद रखता हो ?
4
आराम के लिए वक्त नहीं है
यहाँ तक कि पागल औरत के लिए भी
आधी रात को
एक बिना सिर वाला आदमी
सफेद चोगे में
आता है कमरे में
बोलता है सफेद आवाज में..
” तुम अभी भी खूबसूरत हो”
मेरे इंकार करने पर कहता है..
“मै तुम्हारा पति हूँ”
वह झूठ बोल रहा है, मैं जानती हूँ
लेकिन वह मेरे पति जैसा लगता जरूर है
वह शुरु होता है बिना चुम्बन के
बिल्कुल मेरे पति जैसे ही
उसे अन्तर मालूम नहीं हैं
प्यार और यौन सम्बन्ध में
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
सुबह वह फिर आता है
खूबसूरत जवान नर्स के साथ
” हमारे बच्चे कैसे है” मैं पूछती हूँ
वह अपने बालों वाले हाथ हिला हिला कर हँसता है, हँसते हुए कहता है
” मुझे नहीं मालूम, मैं तुम्हारा पति नहीं हूँ, “फिर पूछता है–
” आज कैसा लग रहा है, कल रात को कोई बुरा सपना तो नहीं देखा?”
5
क्यों हूँ मैं यहाँ?
क्यों कि मैंने एक आदमी से प्यार किया
जिससे मैं कभी मिली तक नहीं?
क्यों कि मेरे और प्यार के बीच ऐसा कोई पुल नहीं
जो दिखाई दे, सिवाय कविता के?
क्या इसलिए कि मैं पक्की व्यभिचारिणी हूँ
स्वप्न युक्त सपनों को बुनती हुई?
कोई भी विश्वास नहीं करता मुझ पर
सिवाय इस गुलाबी गोली के
जो उनके कानून और धर्म के अनुरूप
मेरे दिल की क्रूर धड़कनों को वश में रखती है
मैं यहाँ क्यों हूँ?
मेरी आँखों में आँसू का एक कतरा भी नहीं?
सिवाय भूतों के कोई मुझसे मिलने आता भी नहीं
क्यों नहीं मुझे लोगों से मिलने दिया जाता?
अपने परिवार से, बच्चों से?
” कोई अपनी बेटी से शादी नहीं करेगा
क्यों कि उसकी माँ पागलखाने में है”
मेरे पति ने कहा था गुस्से में, जब वह
आखिरी बार मिलने आया था
उम्दा लफ्ज, उम्दा काम, उम्दा सोच
तभी तो मैंने अपने पति को मार डालने के लिए वार किया
किसी ओर के लिए नहीं, सिर्फ खुदा के लिए
6
अब मैं किससे अपना अकेलापन बाटूँगी
यह चींटी भी मर गई?
नर्स गुस्सा कर रही है
“शर्म आनी चाहिए तुम्हे!
तुम एक चींटी के मरने पर रो रही हो
जब कि पूरी दुनिया में लाखों करोड़ों निरपराध
मारे जा रहे हैं, बमबारी की बरसात में”
मैं दूसरों के बारे में सोचने की कोशिश कर कर के थक गई
वे मर गए हैं
बस मेरे अकेलेपन को तकलीफ देने के लिए
वे वास्तब में हैं या फिर
मर गए वास्तब में?
मैं अब इस वास्तब पर विश्वास नहीं करती
यहाँ तक कि जंग मेरे अपने बेटे की मौत की बात पर भी नहीं
मुझे तो यह बात कविताई झूठ लगती है
बम क्या खाक बच्चों को मारेंगे
वे तो दुश्मनों के लिए बने हैं
मैं इस वक्त बस मरी चींटी के बारे में सोच रही हूँ
सारे मीडिया वाले इस बात पर खामोश हैं
यह चींटी अमेरिका की प्रेसीडेंट जो नहीं थी
न ही कोई धार्मिक गुरु
दुनिया की आखिरी चींटी भी नहीं
उसकी जिन्दगी और मौत कोई खास मायने नहीं रखती
यहाँ तक की कविता पत्रिका का चीफ एडिटर
जो सताई गई औरतों की कविता छापता है
उसके लिए भी वह केवल एक चींटी थी, और कुछ नहीं
उसे तो नर्स के कदमों मे कुचल कर मरना ही था
अब जब नर्स चली गई तो मैं अपने आप से पूछ रहीं हूँ
इस चींटी की मौत के लिए यह पागलखाना ही क्यों चुना गया
क्या खुदा कोई संदेश दे रहा है?
दवाइयों की गोलियों और शीशी की जगह
यदि वे मुझे एक गमला दे दें
मैं उसमे चींटी का मरी देह को दफना दूँगी उसमें
तो उसका रहस्य लाल पंखुड़ियों में खिल उठेगा
7
मैंने भूल के गिद्ध के सामने अपना दिल खोल दिया
जिससे वे खा ले तुम्हारी यादें, और बैठ जाए तुम्हारी जगह
लेकिन तुम बच गए
मैंने पागलपन के अथाह रेगिस्तान में पनाह ली
जिससे एक दुनिया मिले जहाँ तुम नहीं हो
लेकिन पहले भी ज्यादा चालाक शब्दों ने , मेरे दीमाग में पनाह ले ली
यह याद दिलाने के लिए, यह स्वीकार करने के लिए
तुम्हारे सिवाय, और कोई भी जगह नहीं ले सकता है
मेरे दीमाग में, मन में
वे लगातार मेरे लिए दवा और गोलियाँ ला रहे हैं
इस ठंडे सफेद कमरे में
जहाँ मैं दुनिया की आखिरी चील की मानिंद रह रही हूँ
यह याद रखते हुए की खो गया है मेरा प्यार का आसमान
8
मेरी माँ किसी और मर्द के बारे में क्यों नहीं सोचा करती थी
अपने शौहर के साथ सोते वक्त
या आलू छीलते वक्त ?
मेरी सोच हरदम देह को धोखा देती रही
क्यों मेरी माँ के लिए पागलखाना बस
पागलों के रहने की जगह है? क्यों मैं अपने अनन्त सवालों को
भूल जाती हूँ, ज्यों ही अपनी ओंर आते देखती हूँ सिरकटी देहों को
9
पागलखाने के इस कमरे की सफेदी और ठंडक
गवाह है, प्रिय! कि मैंने तुमसे कुछ नहीं चाहा
न धन दौलत, न अंगूठी, यहाँ तक कि कबूतर की परछाई तक नहीं
मेरी एक मात्र इच्छा थी कि तम्हें सुन सकूँ
मेरी आँखे चाहती थीं तुम्हें देखना
” झूठी और धोखेबाज” तुमने कहा, और छोड़ कर चले गए
सफेदी और ठंडापन जो इस कमरे में छाया है
साफ- साफ बयान करता है कि मै झूठ बोल ही नहीं सकती
हालाँकि कोई मेरे हौंठों से सच सुनना पसन्द करता ही नहीं है
सच जिससे मैं नफरत करती हूँ वह है ” मौत”
10
जब मैं तुम्हारे प्यार में पड़ी तब
मेरे पास एक अच्छा शौहर था, जिसने मेरे लिए
चार कमरों का बंगला बनवा रखा था
जब मैं तुम्हारे प्यार में पड़ी तो
मेरे पास एक बेटा था , गबरू जवान
और एक प्यारी खूबसूरत बेटी
जब मैं तुम्हारे प्यार में पड़ी तो
मुझे कुछ नहीं चाहिए था
अलावा एक आत्मा के, मेरी देह के लिए
तुमने मेरे दिल को अपने प्यार भरे गीतों से भर दिया
तुमने जता दिया कि — “बस मुझे मानो
मैं ही प्यार का आखिरी मसीहा हूँ इस दुनिया में”
तुमने मेरे खाबिन्द को लिखा
उसे धमकाया ” उसे आजाद कर दो! ओ नीच आदमी!”
प्यार के उस विशाल आसमान में
जब मैं तुम्हारी बाहों में बँधी , कल्पना में ही
आँखे बन्द किए , बिना परों के उड़ रही थी
तुमने शासित कियाः- खुदा को चुन, बस खुदा को
मैने अपनी बीबी से वायदा किया है कि तुम्हे खत नहीं लिखूँगा!
मैं अब से अपने बेटे के लिए अच्छा पिता बनूंगा!
तुम्हारे प्यार में पड़ने से पहले
सभी घड़ियों की दो सुइयाँ हुआ करती थीं
और पागलखाना मेरा घर नहीं हुआ करता था।
11
खुदा!
तूने दूसरों के लिए जिन्दगी बनाई
मेरे भाग्य मे कविता बदी थी
और अकेलापन
और पागलपन
दूसरों के पास चार मौसम हैं
और दो पाँव चलने के लिए
जबकि दुनिया मेरे बर्फीले पंखो पर टिकी है
अपनी खंदको, यतीमखानों और मरघटों के साथ
दूसरों को तो बस मौत के दिन मरना पड़ता है
लेकिन मैं जिन्दगी के हर रोज में मर रही हूँ
मैं जब नौ बरस की रही हूँगी
दिव्य दृष्टि के लिए चुनी गई थी
लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया
सिवाय बेकार के लफ्जो के
इन्ही लफ्जों ने मुझे मसीहा बना दिया
बिना खुदा के, बिना बन्दों के
अपने पंखों से छूट कर असली दुनिया के
पिंजरे में दुबारा आने के लिए
क्यूपिड की तरह, जिसने अपने पैरों के लिए
जूतों को पंखों से बदल लिया
12
मेरे बिस्तरे तक, मेरे दिल तक
पानी चला आ रहा है
पाँचवी दीवार तक
किसी को आश्चर्य तक नहीं
ऐसा लगता है कि सारे कि सारे डाक्टर और नर्सें
जन्मजात मछलियाँ और सीप घोंघें हैं
और कोई नहीं तो पानी ही
पागल औरत के बाल सहला देता है
और कोई नहीं , बस पानी ही
पौंछ देता है आँसुओं को, पगली औरत के
कहाँ हैं मेरा प्यार?
कहाँ हो तुम?
अब तुम चले ही गए तो
मैं नहीं चाहती हूँ कि वापिस लौटो
मुझे बचाने के लिए
बस मेरे हाथ छोड़ दो
और समाने दो मुझे समन्दर की तलहटी में
वहाँ, मुझे जरूर मिलेगा एक मरा हुआ शार्क
तुम्हारे दिल की गंध लिए , स्याह
हर बार जब मैं उसके बन्द होंठों को चूमूंगी तो
मुझे लफ्ज ब लफ्ज तुम्हारी प्रेम कविताओं का स्वाद मिलेगा
13
तुम्हारी आँखों में
मैं केवल एक औरत हूँ, बस एक औरत
एक दिन तुमने प्यार किया बस “उससे”
दूसरे दिन तुम भुला बैठे उसको
तुमने मेरे भीतर छिपे कवि को नहीं देखा
जो तुम्हारी कविताओं को पाने की आदी हो गई थी, हर दिन
तुमने मेरे भीतर की चिड़िया को भी नहीं देखा
जो आदी हो गई थी तुम्हारे स्नेह की, हर दिन
तभी तो धूल के बादलों की तरह
तुम्हारे लफ्ज आसमान में टंगे रहे
” मैं तुम्हे दूंगा प्यार और आजादी और आदर
जबकि दूसरे आदमी चाहते हैं बस तुम्हारी देह, और सेवा”
मेरी निगाहों में ,
तुम आदमी थे, इंसान थे, कवि थे
मैंने तुमसे बाँटा, अपनी सोच, अपना पिंजरा और कविताएँ
तभी तो तुम अभी तक जिन्दा हो, किसी और औरत से मुहब्बत करने के लिए
जबकि मैं अभी तक तुम्हारी कविताएँ
उतार रही हूँ अपनी जबान में, अपने घर वापिस लौटने में
असमर्थ, जहाँ मेरा शोहर और बच्चे इंतजार में हैं मेरी वापिसी के
जी रही हूँ इस पागलखाने में
तुम अभी तक अपनी पत्रिका के मुख्य संपादक हो
14. डेथ सर्टीफिकेट
जब वह भुला बैठा उसे
वह याद नहीं रख पाई अपने को , और अधिक
इसीलिए अपनी बन्द पलकों पर एक नीन्द लिए
वह मर गई
नहीं , यह मत सोचना कि उसने आत्महत्या की
वह तो बस मर गई
जैसे कि एक फूल मरता है
बिना पानी के
आत्म कथ्य
मैंने मानव आकृतियों को आधार मानकर अनेक प्रकार के संयोजन किये है ! जिसमें सामूहिक व एकल आकृतियों के संयोजन सम्मिलित रहे है ! लेकिन पोर्ट्रेट में मेरी खास अभिरुचि रही है ! पोर्ट्रेट मायने ऐसे जैसे कि किसी की आत्मकथा लिख रहें हों । यही आभास जगता है पोर्ट्रेट बनाते समय ।!
मैंने मनुष्य की भावनाओं , विचारों , तकलीफों और कल्पनाओं को ‘पोर्ट्रेट’ के माध्यम से दर्शाने की कोशिश की है ! सदियों से दबे – कुचले मनुष्यों के उत्पीडन और शोषण को पोर्ट्रेट में जुबान देने की कोशिश करता रहा हूँ ! इस दोरान मुझे लगता रहा जैसे ये मूक चेहरे सांकेतिक भाषा में मुझसे संवाद करने की कोशिश कर रहे हों ! इसके अलावा मेरे काम में मानवता की खोज निरंतर सक्रिय है !
अपने कलाकर्म में मैंने तकनीकी रूप से वाटर-कलर की भांति ताज़ा टेक्सचर देने का प्रयास किया है !
‘हीरालाल राजस्थानी

रेखा सेठी हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.
‘‘दौ सौ साल के बाद जब अंग्रेज़ मालामाल होकर वापस अपने वतन इंग्लैण्ड लौटेंगे तब भी इंडिया में उनके जैसे ही नेटिवों का राज होगा।… उनके कपड़े, विचार, स्वप्न और आकांक्षाएँ अंग्रेज़ होेंगी।’’
यह पंक्तियाँँ उदय प्रकाश की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँँड’ से हैं। उत्तर औपनिवेशिक मानसिकता से पूर्ण समय और समाज आलोचनात्मक विमर्श उदयप्रकाश की कहानियों का प्राण है। अपनी अलग-अलग कहानियों में उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से भारत के औपनिवेशिक इतिहास और भूमंडलीकरण से पैदा होती नव साम्राज्यवादी हकीकत के अमानवीय पहलुओं पर तीखा प्रहार किया है। ‘वारेन हेंस्टिंग्स का साँँड’,‘पाॅलगोमरा का स्कूटर’ जैसी कहानियाँँ तो सीधे इन मुद्दों को उठाती हैं। ‘पीली छतरी वाली लड़की’,‘मोहनदास’ ‘मैंगोसिल’,‘दिल्ली की दीवार’ सभी कहानियों में उत्तर औपनिवेशिक इतिहास, बाज़ारवाद, मानवीय अस्तित्व का संकट और नैतिक दिवालिएपन के अनेक संदर्भ मौजूद हैं। अपनी लगभग हर कहानी में लेखक सत्ताकामी, ताकतवर वर्गो के वर्चस्व से दबी-कुचली असंख्य मानवीय जातियों के संघर्ष की अमिट दास्तान सुनाता है। अस्तित्व के संकट और मनुष्य की जुझारु जीजिविषा के द्वन्द्व से उपजता लेखक का दृष्टिबोध मानवीयता के पक्ष की पुकार है। अपनी कहानियों के इस कथ्य को संपे्रषित करने के लिए उदय अपने लेखन में एक लीला रचते हैं जहाँ इतिहास अतीत से निकलकर सतत निवर्तमान बन जाता है। इस दृष्टि से ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँँड’ एक विलक्षण कहानी है।
1997 में जब यह कहानी अपने सबसे पहले रूप में इंडिया टुडे के साहित्य वार्षिकी विशेषांक में छपी थी तो साहित्य की दुनिया में हड़कंप मच गया। समय और स्पेस की सीमाओं का अतिक्रमण कर इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य का जैसा ग्राफ बन रहा था, उससे उसकी तरह-तरह की व्याख्याएँ और कठोर आलोचनाएँ हुई। किसी ने इसका संबंध हिन्दू पुनर्जागरण से जोड़ा तो किसी ने उसे औसत रचना कहकर खारिज कर दिया लेकिन आज लगभग पंद्रह साल बीत जाने पर भी यह कहानी उत्तर औपनिवेशिक समय और समाज का ऐतिहासिक पुनर्पाठ प्रस्तुत करती है। वर्तमान सामाजिक ढाँचे की चरमराहट ढाई सौ साल पुराने इतिहास की अनुगूँज बनकर उभरती है। 1757 में पलासी युद्ध के उपरांत लाॅर्ड क्लाइव की टिप्पणी-
‘‘मै सिर्फ यह कहूंगा कि अराजकता का ऐसा दृश्य, ऐसा भ्रम, ऐसी घूसखोरी और बेईमानी, ऐसा भ्रष्टाचार और ऐसी लूट-खसोट जैसी हमारे राज में आज दिखाई दे रही है, वैसी किसी और देश में न कभी सुनी गई, न कभी देखी गई। अचानक धनाढ्यों बेइंतहा दौलतपरस्ती ने विलासिता और भोग के भीषण रूप को चारों तरपफ पैदा कर दिया है। इस बुराई से हर डिपार्टमेंट का हर सदस्य प्रभावित है। हर छोटा मुलाजिम ज्यादा से ज्यादा ध्न हड़पकर बड़े मुलाजिम या अधिकारी के बराबर हो जाना चाहता है। क्योंकि वह यह जानता है कि सम्पत्ति और ताकत ही उसे बड़ा बना रही है। …. कोई ताज्जुब नहीं कि दौलत की इस हवस को पूरा करनेवाले साधन इन लोगों के वे ‘अधिकार ’ हैं, जो इन्हें उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से प्रशासन चलाने के लिए दिए गए हैं। विडंबना है कि ये ‘साधन ’ सिर्फ रिश्वतखोरी जैसे भ्रष्ट आचरण के लिए ही नहीं, लूट-खसोट और ठगी -जालसाजी के लिए भी इस्तेमाल हो रहे हैं। इसकी मिसालें उपर के पदों पर बैठे लोगों ने कायम की हैं, तो भला नीचे के लोग उसका अनुसरण करने में नाकामयाब क्यों रहें?
यह रोग सर्वव्यापी है। यह नागरिक प्रशासन, पुलिस और फौज ही नहीं लेखकों, कलमनवीसों और व्यापारियों तक को अपनी चपेट में ले चुका है।’’यदि इन पंक्तियों का संदर्भ अदृश्य कर दिया जाए तो यह विवरण स्वातंत्रयोत्तर भारतीय समाज का आईना बना जाता है। लेखक ने टिप्पणी की है-‘और यही है वह बिंदु जहाँ ढाई सौ साल पहले की कहानी आज की कहानी बनती है।’ अर्थात् कहानी का उद्देश्य अतीत का उत्खनन न होकर वर्तमान की पहचान है। लेखक अपने समय की उत्तर औपनिवेशिक सच्चइयों को उपनिवेशवाद के इतिहास से गुज़रकर परखना चाहता है। अतीत और वर्तमान एक दूसरे का संदर्भ बनकर नए दृष्टिबोध् को जन्म देते है। इस आलेख का उद्देश्य कहानी के इस ढाँचे को स्पष्ट करना है जहाँ उदय प्रकाश यथार्थ की अनेक सतहों पर एक साथ तथ्य और कथा का संश्लेषण कर महाख्यानात्मक रचना करते हैं। यद्यपि कहानी के आरंभ में ही लेखक ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘इस कहानी में इतिहास उतना ही है जितना दाल में नमक होता है।’ फिर भी यह देखना रोचक होगा कि उस नमक-यात्रा इतिहास को लेखक ने कहानी में कैसे पिरोया है।
वारेन हेस्टिंग्स और उपनिवेशवाद का उदय
इतिहास के पन्नों में वारेन हेस्टिंग्स उस व्यक्ति की तरह दर्ज है, जो हिंदुस्तान का पहला गवर्नर जनरल बना। लार्ड क्लाइव के बाद उसने ही ईस्ट इंडिया कम्पनी की बागडोर संभाली। उसकी प्रशासनिक नीतियों के इतने व्यापक प्रभाव पड़े कि आने वाले दौ-सौ वर्षों के लिए भारत अंग्रेज़ों का उपनिवेश बन गया। इस कहानी में वारेन हेस्टिंग्स को मुख्य पात्र बनाकर औपनिवेशिक प्रक्रिया को साकार किया गया है। वह मात्र व्यक्ति नहीं सत्ता का प्रतिनिधि है । वह हिंदुस्तान और यहाँँ की संस्कृति से अभिभूत भी है और आतंकित भी। जैसे एंलिस इन वंडरलैंड’ में सबकुछ एक अजूबा है उसी तरह वारेन हेस्टिंग्स के लिए हिंदुस्तान रहस्य-रोमांच भरी दुनिया है। उसके लिए कुम्हारिन, मालिन, नटनी जैसे औरतें आश्चर्यजनक ढंग से रहस्यपूर्ण हैं, जिन्हें देखकर उसके मन में दो ख्याल लगभग एक साथ ही जन्म लेते हैं-‘‘ओह जीसस, व्हेयर द हेल आय एम।’’ और दूसरा -‘‘मुकाबला कठिन है। हमें इनको ही गुलाम बनाना है।’’
कहानी में यह सारा चित्रण हमें उपनिवेशवाद की प्रक्रिया को गहरी अंतदृष्टि से परखने का मौका देता है। वारेन हेस्टिंग्स अपने आस-पास की हर चीज़ को विदेशी निगाह से देखने की कोशिश कर रहा है। यहाँँ के हवा-पानी, मिट्टी या लोगों से उसका कोई संबंध नहीं । उसके मन में अनजाने परिवेश का भय तो है ही, साथ ही यह उद्देश्य भी साफ है कि उसे इन्हीं लोगों को गुलाम बनाना है। मुगल-शासकों की तरह इस मिट्टी में एक रंग होकर धुल जाना उसका लक्ष्य नहीं है लेकिन पिफर भी कुछ ऐसा अवश्य है जो उसे सम्मोहित करता है।
महीन कल्पना से रचे गए कहानी के ताने-बाने में वारेन, भारत की वाचिक परंपराओं से पूर्णतः सम्मोहित दिखाई पड़ता है। जयदेव, राध-कृष्ण से जुड़ी दंतकथाएँ, संगीत, कलाएँ, मिथ और स्मृतियाँँ सब उसे अभिभूत किए दे रहे हैं। वह यहाँ की वासंती हवा के खुमार को अनुभव करता है। बुन्तू , अब्दुल कादिर और चोखी उसके मीत हैं लेखक ने चोखी के रूप में वारेन की नेटिव प्रेयसी की कल्पना सी है जिसके साथ वह कृष्ण बनकर रास रचाता है। इस प्रेम-कथा में वह उन्माद और मुक्ति की जिस पींग पर सवार हिंदुस्तान को एक अलग रूप में पहचान रहा था लेकिन उसका असली एजेंडा उसकी आँखों से ओझल नहीं होता। वह शेक्सपियर की माप़र्फत याद करता है ‘‘इफ यू हैव टु डिफीट देम, यू हैव टु किल देयर मेमोरीज़। यू हैव टु डिस्ट्राॅय देयर पास्ट। यू हैव टु शूट देयर स्टोरीज़।’’
आश्चर्य, सम्मोहन और औपनिवेशिक एजेंडा – इस कहानी में वारेन हेस्टिंग्स का व्यक्तित्व इन सभी विन्दुओं का समाहार है। एडवर्ड सईद ने उत्तर औपनिवेशिक अध्ययन दृष्टि जो नई दिशा दी, उसकी छाया कहानी में अनेक स्थलों पर प्रतिघ्वनित होती है। वारेन जिस नज़र से हिन्दुस्तान को देख रहा है। उसमें पाश्चात्य पूर्वाग्रह स्पष्ट लक्षित हैं। उस रोमानी धुंधलके में यथार्थ स्थितियाँँ गायब कर दी गई हैं, जिससे औपनिवेशिक एजेंडे को सही ठहराया जा सके। अंग्रेज़ों का सम्मोहन उपनिवेशवादी प्रक्रियाओं का उदय है। वारेन हेस्टिंग्ज़ ने भारतीय भाषाएँ सीखीं, गीता का अनुवाद कराया और भारत का पहला नक्शा बनाया। यह सब धीरे -धीरे उपनिवेशवादी जड़ो को पुख़्ता करने की साजि़श भर था। वारेन हेस्टिंग्स ने भारतीय ग्रंथों के अनुवादों से भारतीय मानसिकता की सब जानकारियाँ अंग्रेज़ो को सुलभ कराई। देश का नक्शा बनाकर औपनिवेशिक व्यवस्था का विस्तार किया, स्थाई भूमि बंदोबदस्त और राजस्व के नए नियम लागू किए। उनके माघ्यम से आने वाले लगभग दौ-सौ सालों के लिए अंग्रेज़ी शासन की ऐसी सुदृढ़ नींव रखी जिसमें शोषण और बर्बरता का इतिहास बार-बार दोहराया जाता रहा।
संस्कृतियों की टकराहट
इस कहानी का एक अन्य आयाम दंतकथाओं, मिथकों, विश्वासों पर टिकी भारतीय संस्कृति को रेनेसां और एज आॅपफ रीज़न से उदित पाश्चात्य संस्कृति के बरक्स रखकर देखने और आँकने का भी है। एक ओर भारतीय संस्कृति का एक रूप है, जहाँ एक-एक आकृति की भी अनेक जीवित कथाएँ हैं। जिस समय वारेन हेस्टिंग्स हिंदुस्तान के इस अलिखित इतिहास पर विस्मित हो रहा था उस समय इंग्लैंड में ‘एज आॅफ रीज़न’ का उदय हो चुका था -‘वहाँ तो महान रोम और इटली के प्रभाव और प्रेरणा से रेनेसां आ चुका था। चाउसर (सास्यूर) , दांते, शेक्सपीयर, होमर की वाणी वहाँ गूँज रही थी। इसका न्यूटन, गैलीलियो से लेकर अरस्तू, प्लेटो ही नहीं प्रफांसिस बेकन, वोल्तेयर, दिदेरो और मैकियावेली के विचारों से ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में नई उथल-पुथल मची हुई थी।’ इस एज आॅफ रीज़न में करुणाशून्य औद्योगिक समाज की स्थापना हुई जिसने पूँजी, माल और मुनाफे के लिए धरती और समुद्र में अधिकार की लड़ाइयों को जन्म दिया। पश्चिम में विचार की इस रोशनी ने पूर्व के तथाकथित अविकसित समाजों में दमन और शोषण के स्याह-अँधेरे अघ्यायों की रचना की। भारत पर शासन करने के लिए जिन लोगों को इंग्लैंड से नियुक्त कर यहाँ भेजा गया वे वहाँ के सामाजिक जीवन के लिए सिरदर्द थे। वारेन हेस्टिंग्स स्वयं सोचता है- ‘वे बर्बर, मूर्ख, असभ्य और बेहद लालची थे। दौलत कमाने की उनकी भूख, संपत्ति जमा रकने की उनकी हवस कल्पनातीत थी। वे इस देश को लूटने आए थे।’ इन संस्कृतियों की टकराहट के बीच लेखक यह स्थापित करने की कोशिश करता है कि किंवदंतियों के प्रमाण ढूँढने वाली संस्कृति में मनुष्य और प्रकृति की साझेदारी थी। मानवीय प्रेम और करुणा के स्रोत सूखे नहीं थे जबकि तर्क और विचार आश्रित पश्चिमी समाज आधुनिकता की दुहाई देता हुआ व्यक्ति केन्द्रित हो रहा था। वह नृशंस और स्वार्थी था और इसी प्रक्रिया में उपनिवेशवाद का उत्स छिपा था।
अंग्रेज़ों के साथ-साथ कुछ स्वार्थ-प्रेरित हिंदुस्तानी भी थे ,जिन्होंने इस शोषण-चक्र को पूरा किया। हिंदुस्तान में सत्ताखोरों-व्यापारियों का ऐसा तबका भी था जो अंग्रेज़ों के खैरख्वाह बने हुए थे। वे उनमें अपना भविष्य देख रहे थे। अंग्रेज़ों को खुश करने, उनका विश्वास हासिल करने को वे कुछ भी कर सकते थे। य हाँ तक कि व्यापारिक ठेके हासिल करने के लिए वे अपने परिवार की स्त्रियों को पेश करने से न चूकते। वे हिंदुसतान की लूट में अंग्रेज़ों के भागीदार थे। लेखक ने संकेत किया है कि ये लोग अधिकतर उच्च जाति के हिंदू थे, जो अपने रहन-सहन, खान-पान, पहनावे और भाषा, सभी में अंग्रेज़ होने की कोशिश कर रहे थे। अंग्रेज़ों के लौट जाने के बाद भारत में इन जैसे नेटिवों का शासन इन्हीं सत्ताकामी, चापलूसों का शासन है। इनके स्वप्न और आकांक्षाएं अंग्रेज़ हैं।
कहानी के सबसे विवादास्पद सांस्कृतिक प्रतीक हैं – ‘गाय और साँँड’ जिनके कारण इस कहानी का संबंध हिंदु पुनरुत्थान से जोड़ा गया। वारेन हेस्टिंग्स ने इंग्लैंड में अपने मित्र मिस्टर इमहाॅफ को एक पत्र लिखकरं बताया कि यूरोप में जिन गाय-बैलों को ‘कैटल’ कहा जाता है, यहाँँ उनकी पूजा होती है। उनके नाम होते हैं और वे जानवर नहीं गूँँगे मुनष्य हैं। इंग्लैंड जैसे औद्योगिक समाज के लिए जो मात्र पशु थे, भारतीय समाज में वे परिवार के जीवन का आधर थे। एक ओर, औद्योगीकरण पश्चिम के मानवीय समाज को अमानवीय बना रहा था और दूसरी ओर ये गाय-बैल थे जो गैर-मानवीय होते हुए भी मानवीय करुणा से संपन्न थे। वारेन हेस्टिंग्स हिन्दुस्तान में रहते हुए उनकी सहानुभूति और क्षमता को पहचान रहा था। कहानी के अनुसार जब उस पर महाभियोग लगाकर उसे वापस इंग्लैंड भेज दिया गया तो वह अपने साथ पाँँच ब्राह्मणी गाय और एक साँँड ले गया। कहानी का अंतिम हिस्सा इन्हीं गायों के एक-एक कर मर जाने या मार दिए जाने की कथा है। साँँड उन गायों की मौत का साक्षी है। वह मौन रहकर भी अंग्रेज़ी षड्यंत्र को पहचान रहा था। इसलिए जब महाभियोग के मुकदमे में हेस्टिंग्स को भारत की एक तिहाई आबादी के मौत के उत्तररदायित्व से मुक्त कर दिया जाता है तब वह उन्मत्त साँड हेस्टिंग्स के विरुद्ध खड़ा होता है। वह साँँड भारतीय आक्रोश और विद्रोह का प्रतीक बन अंग्रेजी साम्राज्यवाद की प्रतीक बग्घी पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त कर देता है। लेखक उस साँँड के इस जुनूनी आवेश और साम्राज्यवादी प्रतीकों के ध्वंस की अनेक व्याख्याएँ करते हुए एक बूढ़े लामा से कहलवाता है कि वह साँँड अभी मरा नहीं है। साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध मानवीय करुणा का विद्रोह कभी खत्म नहीं होता।
कहानी के रुपक और बहुस्तरीय यथार्थ की परतें
इस कहानी पर बातचीत तब तक अधूरी रहेगी जब तक कहानी के विभिन्न रुपकों को डिकोड न किया जाए। अपनी अन्य कहानियों की तरह यहाँँ भी उदय प्रकाश यथार्थ के अनेक वृत्त एक साथ समेटने की कोशिश कर रहे हैं। कहानी का गठन वर्णनात्मक और किस्सागोई के अद्भुत तनाव से निर्मित है। कथाकार कुशल किस्सागो की तरह अतीत का वह पृष्ठ खेलता है जो वर्तमान यथार्थ की परतें उधेड़ने का उत्प्रेरक बनता है और फिर उसे छोटे-छोटे असंख्य ब्यौरों से भर देता है जिसमें अनेक रुपक अपनी अर्थ छवियों की अगिनत संभावनाओं के साथ बिखरे पड़े हैं। लेखक ने स्वयं लिखा -‘असल में जब इतिहास में स्वप्न, यथार्थ में कल्पना, तथ्य में फैंटेसी और अतीत में भविष्य को मिलाया जाता है, जो आख्यान में लीला शुरु होती है और एक ऐसी माया का जन्म होता हैै जिसका साक्षात्कार सत्य की खोज की ओर की एक यात्रा है।’
कहानी का विन्यास आख्यानपरक है। इतिहास, कल्पना, यथार्थ मिथक सब उसके हिससे हैं। एक थ्री-डी अनुभव की तरह पाठक स्वयं को उसके बीच महसूस करता है। इतिहास के पृष्ठों में अंकित गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की छवि यहाँँ अनेक रुपांतरणों से गुज़रती है। लेखक ने विक्टोरिया मेमोरियल में रखे एक चित्र का विवरण दिया है, जिसमें वारेन उसकी पत्नी और एक नेटिव लड़की दिखाई पड़ती है। उदय कहानी में इस चित्रा का प्रतीकात्मक प्रयोग करते हैं। वारेन की पत्नी परंपरावादी विक्टोरियन समाज का प्रतिनिध्त्वि करती है। इसीलिए कहानी में वह बार-बार पति को समझाती है- ‘कि तुम जिस जाति और जिस देश के हो, वह एक विजेता देश है।’ नेटिव लड़की की संकल्पना चोखी के रूप में की गई है जो एक तरफ तो भारत की गुलाम जनता की प्रतीक है दूसरी ओर वह वारेन की लीला का अंग है। वारेन हेस्टिंग्स इन दोनों ध्रुवों के बीच स्वयं को उलझा हुआ पाता है कभी ऐसा लगता है कि वह भारतीय संस्कृति से अभिभूत है तो कभी उसके भीतर का औपनिवेशिक गवर्नर जाग जाता है। कहानी के अनेक पाठ बनते हैं जो उपनिवेशवाद की अन्तक्रिया को समझने में मदद करते हैं। अपने एक इंटरव्यू में उदय प्रकाश ने यह स्वीकार किया है – ‘‘वारेन हेंस्टिंग्स 1772 में गवर्नर बना था और जो रिकार्डेड हिस्ट्री में है, वह बिल्कुल वैसा नहीं है, क्योंकि वारेन कभी पागल नहीं हुआ, वह कभी गाय के पीछे नहीं भागा, कभी उसने कृष्ण का रूप धरकर बाँँसुरी नहीं बजाई, कभी चरवाहा नहीं बन, कभी वह वृंदावन नहीं गया।… तो वह सबकुछ कल्पना और स्वप्न था।… एक मिथ क्रिएट किया कोलोनियलाइज़ेशन का, जिससे हमारे देश के उपनिवेशीकरण की जो अंतक्रिया है, उसको हम समझ सकें… उसको थोड़ा जान सकें। इसमें युक्ति कहां से आई…? अब हर लेखक के समाने वह गुत्थी होती है, जिसको वह अपनी तरह से सुलझाता है।’’
उदय प्रकाश उपनिवेशवाद की गुत्थी को सुलझाने के लिए कथा में कई प्रकार के खेल रचते हैं। औपनिवेशिकता जितना बड़ा सच है उससे मुक्ति की आकांक्षा भी उतना ही बड़ा सच है। प्लासी की लड़ाई में नवाब सिराजुद्दौला की हार मीर जाफर और राय दुर्लभ जैसे लोगों की गद्दारी के कारण हुई लेकिन लेखक ने उसी समय में एक जांबाज़ वफादार सिपहसालार की कल्पना की है और चोखी को उसकी बेटी बताया गया है। चोखी वारेन के रंग के रंगी जाकर भी उसके औपनिवेशिक इरादों को पहली चुनौती देती है। ऐसी ही एक और प्रतीकात्मकता इंपीरियल बग्घी उड़ा देने वाले साँँड़ और 1857 की क्रांति के बीच दिखाई गई है। 1795 में जिस दिन वारेन हेस्टिंग्स को महाभियोग के मुकद्दमे से बरी किया गया उसी दिन उस साँँड ने उन्मत्त होकर वारेन हेस्टिंग्स और शाही बग्घी को हवा में उछाल दिया। उस उन्मत्त साँँड़ पर आर्मी ने हमला कर उसे गोली मार दी। बाद में, उसी साँँड की चर्बी का प्रयोग उस कारतूस में हुआ जिससे मंगल पांडे ने अंग्रेज़ एडजुटेंट को गोली मारी। वह स्वतंत्रता की क्रांति का सूत्रापात था जिसके तार वारेन हेस्टिंग्स को चुनौती देने वाले साँँड से जुड़े थे। विद्रोह की यह संकल्पनात्मक चेतना अविरत है। वही इतिहास, वर्तमान और भविष्य को इस बिंदु पर केन्द्रित करती है।
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कहानी में इस निरंतरता को सिद्ध करने के लिए उदयप्रकाश देश काल के विविध मुखी वृत्त रचते हैं। कहानी का केन्द्रीय पात्रा वारेन हेस्टिंग्स होने के कारण कहानी का अपना विशिष्ट कालखंड है। उसका परिवेश एवं स्थितियँँा ऐतिहासिक तथ्यों और अकड़ों से परिभाषित होती हैं। उस समय की शासन प्रणालियों, अंग्रेज़ नियुक्तियों अमीर हिंदुस्तानियों के व्यवहार आदि के जो वितरण दिए गए हैं वे उस समय के सरकारी रिकाॅर्ड से पुष्ट किए जा सकते हैं। भारतीय इतिहास की स्मृतियाँँ और परंपराएँ स्वयं में देश-काल के छोटे-बड़े वृत्त बनाती हैं। इन सबके साथ कहानी का उद्देश्य उसे उस ध्रातल तक ले जाता है जहाँँ उत्तर-औपनिवेशिक समय और समाज की आलोचनात्मक पहचान उभरने लगती है।
उदय प्रकाश की कहानी तकनीक की एक खास अदा है कि कहानी में जब भी चरमोत्कर्ष के ऐसे तनाव शिखर रचे जाते हैं वहाँँ वे लेखकीय हस्तक्षेप से उसे तोड़कर पुनः अपने समय-समाज की ओर लौटा लाते हैं। यहाँँ भी लेखक यह बताना नहीं भूलता कि यह वह समय था जब फ्रांसीसी कंपनी और इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच यूरोप, अमेरिका और एशिया के समुद्रों, बाज़ारो और प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने के लिए लड़ाई चल रही थी और ढाई सौ साल पहले भी फ्रांस की सार्वजनिक कंपनी इंग्लैंड की प्राइवेट कंपनी से हार रही थी। उत्तर औपनिवेशिक दौर में भी दौलत की हवस से प्रेरित प्राइवेट कंपनियाँँ हर सार्वजानिक ढाँँचे को घ्वस्त कर स्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने में कामयाब रही हैं। तमाम घोटाले और सेंसेक्स का संवेदी सूचकांक इन प्राइवेट कंपनियों की इशारे पर ही करवट लेता है।
उत्तर औपनिवेशिक मानसिकता के स्रोत औपनिवेशिक इतिहास के अन्य संदर्भो में भी तलाशे जा सकते हैं जिन्हें यह कहानी संभव बनाती है। ऐसा ही एक प्रश्न भाषा का है जो केवल भाषा तक सीमित न होकर सामाजिक न्याय का प्रश्न बन जाता है। कहानी में चित्रित सत्ताकामी चापलूसों का शासन आज़ाद हिंदुस्तान आज भी ढ़ो रहा है। यह उन जैसे नेटिवों का राज है जिनके स्वप्न और आकांक्षाएँ ही अंग्रेज़ नहीं उनकी भाषा भी अंग्रेज़ी है। आज़ादी के बाद अंग्रेज़ी जानने वाले ही सत्ता और समाज पर कब्ज़ा करके बैठ गए। आज तो स्थिति और भी गंभीर हो गई है, जहाँ निचले-से निचले तबके का आदमी यह मानने लगा है कि अंग्रेज़ी ही ज्ञान की कुंजी और सपफलता की सीढ़ी है। एक भाषा का वर्चस्व हमसे हमारी कथाएँ और विश्वास छीनकर हमें निपट यथार्थवादी बना रहा है। यह दिमागी सरहदों की गुलामी है। औपनिवेशिक इतिहास की निरंतरता !