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जेंडर और जाति के कुंडलों को तोडता लेखन और सत्ता की कुर्सी

( पिछले दिनों हिन्दी अकादमी,  दिल्ली की अध्यक्ष के रूप में मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति के सन्दर्भ से पुष्पा के लेखन की राजनीति और राजनीति तथा सत्ता में स्त्री की पहचान की कोशिश कर रही हैं प्रो परिमळा अंबेकर.स्त्रीकाल की ओर से भी मैत्रेयी को बहुत -बहुत बधाई !  )

पुरुषवादी मानसिकता  ने स्त्री को राजनीति के क्षेत्र में अमूमन सरपंच के रूप में स्वीकार करने की आम रवैय्या  तो बना  लिया है,  लेकिन सामाजिक या अकादमिक स्थानों या संस्थानों में स्त्री के प्रशासन की छडी के तले काम करने की स्वीकृति मर्दवादी  भारतीय संवेदना को अब भी अखरती जरूर है । इसीलिए सरकारी या गैर सरकारी संघ संस्थानों के अध्यक्षता या उपाध्यक्षता के पद, योग्यता और कर्मठता के बावजूद भी स्त्रियों को प्रदान करने की कोई  प्रामाणिक प्रयत्न होता हुआ हम कम ही देखते हैं । लेकिन हाल में हिन्दी अकादमी दिल्ली के उपाध्यक्ष पदपर मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति , इन मानित या सहज स्वीकृत मर्दवादी मानसिकता को तोडती हुई  ऐसी प्रक्रिया है , जिससे  विश्वास  पाकर स्त्रीवर्ग की प्रामाणिक निष्ठा,  मानवीय सरोकारों की कुप्पी और भी प्रतबद्धता से जलेगी निस्संदेह ।

 मैत्रेयी की रचनाएॅं स्त्रीमुक्ति के सवालों का, देह या सेक्स के धरातलपर उसकी जैविक सहज आवश्यकताओं की भूमिका में हर संभव उत्तर देने का सृजनात्मक प्रयत्न हैं। मर्दवादी  समाज में स्त्री की अपनी जगह  पाने की लडाई , मैत्रेयी के अनुसार स्त्रीयत्व के नकार की या देह से मुक्त होकर, मुक्त तन-मन की आध्यात्मिक अयथार्थ की लडायी नहीं है । अपितु, देह की जैविक स्त्री एवं पुरूष सहज इच्छाओं को साथ लिये लिये, मानवीय संबंधों के सुंदर रूपों को उकेरने का कमिटमेंट है । यह लेखन कमिटमेंट, मैत्रेयी के पात्रों में है, जिससे कहीं भी, मानवीय व्यवस्था की आंतरिक और बाहरी कुलाबें टूटती नहीं हैं, बिखरती नहीं है,  वरन उनकी अस्मिता में एक अजीब रंग और राग की निखार तारी होते जाती है… !

‘अल्मा कूबतरी‘, ‘इदन्न्मम‘, ‘झूलानट‘, ‘बेतवा बहती रही‘, ‘कहे ईसुरीफाग‘, ‘कस्तूरी कुडल बसै‘, ‘ललमनिया‘ॅं, ‘गोमा हॅंसती ह‘ै, ‘खुली खिडकियाॅं‘, ‘सुनो मालिक सुनो‘ आदि उपन्यास कहानी आत्मचरित और विमर्श ग्रंथों के साथ मैत्रेयी ने अपने लेखन की जो चटायी सजायी है ,  वह  मैत्रेयी को  अपनी स्त्री लेखक बिरादरी से बहुत अलग करती है ,  उसकी लेखन की सजी चटायी अपने विरासत में प्राप्त ग्रामांचलीय मिट्टी की गंध से सरोबार है । प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणू, नागार्जुन की सजी सजायी कथासेट को मैत्रेयी स्त्रीगत कलात्मक सोच और स्त्रीसुलभ महीन कशीदेकारी से ऐसे सजा रही है , जो ग्रामीण जीवन के छंद को प्रासबद्ध करके, फाग ईसुरी भैरव आदि रागों में ढाल रही है । प्रेमचंद, नागार्जुन, रेणु आदि की दालानी बैठक में अपना अदीन हस्तक्षेप कर रही है,  ताकि इन मर्दानी बैठकों में स्त्रियों को भी जगह मिले… उसकी भी आवाज सुनायी पडे ..!

‘‘ लडकी यादव की होती, जाटों की होती तो भी कोई बात थी । ब्राह्मण परिवार के उपाध्याय गोत्र की सनाढ्य लडकी, वह भी खिली-सिकुर्रा जैसे पिछले क्षेत्र में पली बढी, वह ऐसी हिम्मत करेगी सोचा भी नहीं जा सकता ‘‘ । ‘कस्तुरी कुडल बसै‘ आत्मचरित्र से मैत्रेयी ने सदियों के जाति और जेंडरगत कंुडलों को उखाडकर, परंपरागत स्थिर , भद्र मार्यादित बंदरों में बंधे पानी में कंकड फेंककर उसे जब हिला दिया था तब समीक्षक ‘कांतीकुमार जैन‘ द्वारा उठा यह उद्गार और श्लाघन वास्तविक है । पिता की मौत के बाद , अपनी सुरक्षा के किले में बांधेरखकर,  बेटी के भविष्य के लिये चिंतित विधवा माॅं , जिस पुरूष समाज को दूर रखकर विरोध करते हुए,  एक प्रकार की जैविक वितृष्णा को ओढकर सुरक्षित जीवन जीने के लिए  मैत्रेयी को विवश करती है वही बेटी उसी आग की ओर अपना देह बढाते जाती है, जो आग उसे बचपन से रौंदते आया है ! कामना और इच्छाओं को अपने तहत जीने की, सेक्स और संभोग को वस्तुगत नहीं अपितु शुद्ध व्यक्तिगत धरातल पर  भोगने की इच्छा जाहिर करती है । अपने देहगत और मन सुलभ इच्छाओं की तृप्ति के लिये र्निद्वंद्व उठखडी होती है । जीवन के इन संघर्षों को, इच्छा काम और नीति नियमों के मर्यादाओं के बंधनों को,  मैत्रेयी एक ही मूल से तोडते जाती है । और तो और, अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाकर, अपने मन को , मन की बातों को उलीचते जाती है… ! ‘ प्यार करोगी  और छिपाओगी भी ?’  शरारत  भरी आँखों वाले लड़के यह  तुमने मुझ किशोरी से कहा था !!
मैंने उस प्यार को किताबों से लेकर मीडिया तक में उलीच दिया !! देखो तुम्हारे एक वाक्य ने कितनी- कितनी प्रेमिकाओं को मेरी ज़मीन पर उतार दिया !! ( लेखिका के फेसबुक टाइम लाइन पर )

बलात्कार और संभोग की देह परिभाषा को नये सिरे से गढनेवाली मैत्रेयी, देहसंबंधों के मूल मेें गुंथी हुई  नीति मार्यादा और परंपरा को नयी व्याख्या भी देती है । यह व्याख्या व्यक्ति की  देह और अस्मिता की आवाज को सुनती भी है और सुनाती भी है । एक विस्फोट की तरह! वह विस्फोट जो चादर के सात परतों के तले फूटता हो !! परंपरा की मार्यादाओं को मैत्रेयी, पीढी दर पीढी के अतृप्त अनजिये मानसिकता की वितृष्णा के रूप में देखकर, संबंधों की स्वछंदता और खुली व्यवस्था का वकालत करती है, सृजनात्मक निर्णय देती है -जिन निर्णयों के मूल में मनुष्य की आत्मा की पुकार घुली हुई  है, मानवीयता की मर्यादा के बंधन बंधे हुये हैं । मैत्रेयी के अनुसार ‘संभवतया, सामाजिक व्यवस्था का हर हिस्सा, हर रिवाज, हर आदर्श हर संबंधों के आचरण की अनिवार्यता और आग्रह के पीछे शायद पीढी दर पीढी चली आ रही अनिवार्यता की कुंठा होगी फ्रस्टरेशन होगा जो हर नये पीढी के पैरों में बेडी बनकर खनखनाती है । ‘  जिन्हे तोडकर भागने की चेतना अपनी उदात्ता और मार्मिकता के बावजूद भी एक अजीब प्रकार के दंश का, पापबोध का अनुभव करती है । लेकिन इस दंशबोध के बावजूद भी , अपराधबोध के टीस के होनेपर भी, हर नये कदम की अनिवार्यता और मानवीयता को पहचानकर, विकास और मूल्यान्वेषण के यज्ञ को सामाजिकता का जामा पहनाना आधुनिकीकरण का मानवीय पक्ष है । मैंत्रेयी का रचनालोक इसी मानवीय पक्ष का जीवंत दस्तावेज है ।

मैत्रेयी की लेखनी समाज की उस गुप्त और गुमनाम लडाई  को चेहरा और आवाज प्रदान करती है, जिसके दंश को नाूसर की तरह श्रेणीकृत व्यव्स्था में कंडीशनड भारतीय समाज झेलते आ रहा है और झेलने के लिए विवश भी है । मुख्यधारा के  समाज की अपनी अभिजातीय मर्यादाएॅं, आर्थिक स्वायत्तताएॅं, हाशियाकृत समाज की तमाम अव्यवस्थाओं के लिए कारण बनकर असामाजिकता के न्याय निर्णयों में बंधने के लिए विवश कर देती है । पुष्पा का कथा संसार, इस असामाजिक परंपरागत मर्यादाओं को अपनी ही चेतनादृष्टि  से परिभाषित करता है ।

इंटर काॅलेज मोठ से सन् 1960 में इंटर पास करके बुंदेलखंड  काॅलेज झांसी से 1962 में बी.ए की डिग्री पाती है मैत्रेयी, जो उत्तर प्रदेश के अलीगढ जिले के सिर्कुरा गाॅव में सन् 1944 में जन्मी थी । उसी काॅलेज से एम.ए पास करके दिल्ली आकर जामिया मिलिया के स्टेट रिसोर्स सेंटर में कुछ महीने रहती हैं । यूॅं तो लिखने का सुरूर काॅलेज के दिनों से ही था मैत्रेयी में , लेकिन साप्ताहिक हिन्दुस्तान  में सन् 1990 में छपी कहानी ‘आक्षेप‘, के बतौर पुष्पाजी, वैवाहिक और सामाजिक आक्षेपों के सारे रोडों को उखाड फेंकती है ,और सृजनात्मक कथावितान का ताना बाना बुनती है ।  उन्हें लेखन के लिए  हिन्दी अकादमी का साहित्यिक कृति सम्मान, उत्तरप्रदेश का साहित्य सम्मान, साहित्य परिषद का वीरसिंहदेव पुरस्कार, सार्क साहित्य पुरस्कार ,आगरा विश्वविद्यालय का गौरव श्री पुरस्कार और नंजनगूडू तिरूमलांबा पुरस्कार आदि  भी मिला । कन्नड की प्रथम महिला कथाकार के रूप में स्थापित अपने समय की दबंग लेखिका तिरूमलांबा के नाम का पुरस्कार पाना, मैत्रेयी पुष्पा के लिये विशेष भी है ।

बंुदेलखंड की भाषा की रसवत्तता को बोलचाल के लय की ठसक को और शैली एवं संवादों की प्रांतीय थापों को कथा कथन का माध्यम बनाकर, एक ऐसे वस्तु परिवेश को रचती हैं  मैत्रेयी, जिसके सिलन की बुनावट की कलात्मकता और महीनता ही उसे समाकालीन सारे रचनाकारों से अलग पहचान दिलाती है । कथा में ग्रामांचलीयबोध की जीवंतता, भाषाप्रयोग की सहजता एवं आत्मीयता समाजजीवन की गतिविधियों को आइना  पकडवाती है.  कन्नड में लगभग ऐसी ही कथात्मक संवेदना और अभिव्यक्तिगत कलात्मकता को लेकर हाजिर होती है उत्तर कर्नाटक प्रदेश की  अंचलीयताबेाध से सरोबोर, सजग सचेत और अत्यंत आत्मीयभावबोध से सरोकृत लेखिका गीता नागभूषण ।

मैत्रेयी के रचनासंसार के पात्र कुसुमा भाभी, डबलबब्बा, अल्मा, मंदाकिनी, मैत्रेयी, कस्तूरी, उर्वशी इत्यादि जीवन के खमीर की उस खटायी को लेकर रचे बसे हंै । अस्तु…… हिन्दी अकादमी दिल्ली के उपाध्यक्ष पदपर मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति, सचमुच, श्लाधनीय है । उनकी यह नियुक्ति निस्संदेह , समीचीन व्यवहार और निर्णय लेकर आयेगा !! आशा है , उनके कार्यकाल में, आकादमी का कार्यक्षेत्र का विस्तार, हिन्दीतर दक्षिण प्रदेशों में भी विशेषतया बनी रहे । उनके प्रति विशेष अभिवादन के साथ।

प्रो परिमळा अंबेकर, अध्यक्ष,हिन्दी विभाग ,गुलबर्गा विश्वविद्यालय, कलबुर्गि -06 कर्नाटक.
सं/ 09480226677. parimalaambekar@gug.ac.in

स्वयं में असाधारण स्त्री : माया एंजलो

गरिमा श्रीवास्तव


गरिमा श्रीवास्तव हिन्दी विभाग,हैदराबाद केन्द्रीय विश्विद्यालय, में प्रोफ़ेसर हैं. सम्पर्क : drsgarima@gmail.com

सन् 2014 के मई महीने का अंत होने में तीन दिन शेष हैं और वेक फ़ारेस्ट विश्वविद्यालय, विंस्टन-सालेम, उत्तरी कैरीलोना के फैकल्टी क्वार्टर की पीली दीवारों पर सुबह के सूरज की किरणें चमकने लगी हैं । घने पेड़ों के झुरमुट को बेधकर किरणें मई के महीने में जल्दी ही धरती पर आ जाती हैं-पेड़ों की हरियाली पत्तियाँ सूरज की धूप से पीली-सुनहली दीखने लगी हैं । पीले घर के भीतर थोड़ी हलचल है,यह माया एंजेलो की काया-संघर्ष, मेहनत, दुख, रोग-शोक,मान-अपमान,उपेक्षा, थकान को छियासी बरस से सहती चली आई काया की विदा का क्षण है ।माया एंजेलो जो बचपन में थी मार्गरीटा जानसन, प्यारे भाई बेली ने जिसे नाम दिया माया-  कमरा पचास से अधिक मानद उपाधियों, ढेरों राष्ट्रीय -अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सजा हुआ है,जीवन के उत्तरार्ध में अत्यंत लोकप्रिय अध्यापिका के रूप में विख्यात होकर भी अपनी ‘निजता’ में बिल्कुल अकेली ही हमेशा के लिए मौन हो गई थी । ऊपर से सबसे हंसने-बोलने, बतियाने वाली माया कब अकेली और भीतर से चुप नहीं थी । तब भी तो चुप्पी ही उसका आवरण बनी थी जब सौतेले पिता फ्रीमैन  ने उसका यौन शोषण किया था। सन् 1928 में चार अप्रैल को जन्मी मार्गरीटाने तीन वर्ष की उम्र  में माता-पिता का सम्बन्ध-विच्छेद देखा फ्रीमैन के दुर्व्यवहार  के बारे में मामाओं को बताने का नतीजा निकला-माँ के प्रेमी की ह्त्या जिसके  लिए वह स्वयं को ही दोषी मानती रही, बड़ी होने पर भी हमेशा सोचती –न वह मुंह खोलती ,न फ्रीमैन मरता| बेली और मार्गरिटा के पालन–पोषण की जिम्मेदारी आन पड़ी दादी श्रीमती हेंडरसनपर, जो पेट पालने के लिए परचून की दुकान चलाती और श्वेत प्रभुओं के घर इन मासूम बच्चों से सामान भिजवाया करती। काली, दुबली, कमजोर मार्गरीटा ने यहीं पर ‘ओ छोकरी, ‘काली लड़की’ के उपेक्षापूर्ण सम्बोधन सुने । सात वर्ष की भोली मासूस लड़की जानने लगी कि अश्वेत और काली लड़की होने के अर्थ क्या हैं और इससे भी ज्यादा कि निर्धन होना कितना दुर्भाग्यपूर्ण होता है ? इन अपमानजनक संबोधनों पर प्रतिक्रिया देने का अर्थ था-दादी से मार खाना । दरअसल से ये सम्बोधन उसके ‘ब्लैक’ होने की नियति से जुड़े थे,जिसे स्वीकार करना विवशता थी –

जब मैं अपने बारे में सोचती हूँ
तो अपने आप पर हँसते-हँसते लगभग मर ही जाती हूँ
एक बड़ा मज़ाक है मेरी जिंदगी
नृत्य की तरह जिसमें सिर्फ कदमताल ही की गई
या कोई गीत जिसे सपाटता से बोला गया हो
मैं  खुद को लेकर, इतना अधिक हँसती हूँ
कि साँसें रूकने लगती हैं मेरी
जब सोचती हूँ अपने बारे में
लोगों  के इस संसार में साठ साल
जिसके लिए मैं काम करती हूँ
वे मुझे बच्ची कहकर पुकारती हैं
और मैं अपनी नौकरी के लिए उसे
‘जी मैम- ‘जी मैम कहती हूँ
इतनी स्वाभिमानी हूँ कि झुकना मुश्किल
इतनी गरीब हूँ कि टूटना मुश्किल
हँसते-हँसते पेट में बल पड़जाते हैं मेरे
जब सोचतीहूँ अपने बारे में

अपने ऊपर हंस सकने की क्षमता हासिल करने का साहस माया को बचपन में ही जुटाना पड़ा|बच्ची माया की शिकायत की सुनवाई के लिए कोई न्यायालय था न कोई वकील,बस में यात्रा करती माया को दूसरे अश्वेतों की तरह हमेशा पिछली सीट मिलती ,जहाँ कंडक्टर पास आ सट कर खड़ा होता ताकि अपने कड़े अंग से माया को छू सके ,कसमसाती माया अपने आप में सिमट जाया करती ,सुनेगा कौन काली लड़की की कभी ख़त्म न होने वाली पीड़ाएं ।  उधर  अपमान और उपेक्षा सहकर भी दादी का श्वेत ख़रीदारों के प्रति विनम्रता प्रदर्शन और सबसे बढ़कर बूढ़ी दादी की अनथकमेहनत करने की प्रवृत्ति ने माया को आने वाले समय और कठिन भविष्य के लिए पहले से ही समझा-बुझाकर ज्यों तैयार कर दिया । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की आर्थिक तंगी के हालात ने उसे न सिर्फ व्यावहारिक बनाया बल्कि सिखाया कि कोई भी व्यक्ति अपनी नियति को अपने नियंत्रण में कैसे ले सकता है और यह भी कि तमाम दबावों और विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान कैसे बनाए रखा जा सकता है । ‘स्टिलआई राइज़’ शीर्षक कविता में उसने कहा-
तुम मुझे अपने तीखे और विकृत झूठों के साथ
इतिहास में शामिल कर सकते हो
अपनी चाल से मुझे गंदगी में धकेल सकते हो
लेकिन फिर भी मैं धूल की तरह उड़ती आऊँगी ।

माया ने जीवन में ढेरों भूमिकाएँ निभाई। कभी ये भूमिका ऐच्छिक  थी तो कभी अनैच्छिक  लेकिन हंसी का कवच ऐसा था-जिसे बेधकर भीतर का सच पहचान पाना कठिन था। किशोरी माया को काले श्रमिक विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति मिली, सपना था कि नृत्य-संगीत की रुचि को कैरियर बनाएगी, लेकिन प्रेम और अविवाहित मातृत्व ने उसे आर्थिक बोझ तले दबा दिया ।किशोर प्रेम के  आवेग की जगह दुनिया –धंधे ने ले ली| गोद में नवजात शिशु और खाली ज़ेब लिए माया ने एक दूसरी दुनिया में कदम रखा ,जहाँ नैतिकता –अनैतिकता के सवाल बेमानी थे |जीना महत्वपूर्ण था ,और इसके लिए किसी काम को उच्छिष्ट समझने का अर्थ था भूख और लाचारी | बेटे को पालने, अपना खर्च चलाने के लिए पढ़ाई अधूरी छोड़ दी, करने लगी कभी काम कभी वेट्रेस का, तो कभी नर्तकी का । पेट का सवाल था, बड़े सपनों की कोई अहमियत ही नहीं थी ।अलस्सुबह थकी हुई घर लौटती ,दूध दवाएं,घर का किराया ,बसों के धक्के- सबने उसे और कठोर बनाया.दोस्तों ने विवाह, जन्मदिन, नएवर्ष की पार्टियों में बुलाना, पूछना छोड़ दिया, माया के पास उन्हें  उपहार देने को था ही क्या?क्रिसमस की पार्टी में एक ही बार इतना खा लेने को मन करता कि फिर कभी ज़रूरत ही न पड़े,साटन की फ्राक में पैबंद लगने लगे,टूटे जूते मरम्मत में आनाकानी करने लगे|शोषण के बगैर तो नौकरी भी कहीं नहीं ,अधूरी संगीत शिक्षा और रंगभेद का दर्द सीने में लिए माया के लिए एक वक्त वह भी आया जब आजीविका के लिए देह-व्यापार किया|दुकान, रेस्टोरेंट में काम के अनियमित घंटों और देह –शोषण से बेहतर समझा चकला चलाना.जो काम उसने दो औरतों के साथ मिलकर किया ।पुलिस प्रतारणा ,अबोध बच्चियों का व्यापार ,रोग –अशिक्षा और बेबसी की दुनिया , माया के सामने  नग्न रूप में  थी और वह  उससे खेलना सीख रही थी-
अपने यौवन में मैं
देखा करती थी ओट से
सड़क पर आते जाते बूढ़े पियक्कड़ों
जवान, सरसों की तरह तेज पुरुषोंको

मैं उन्हें  हमेशा कहीं न कहीं जाते हुये ही देखती
वे जानते थे कि मैं वहां हूँ
पंद्रह साल की आयु में उनके लिए बेताब
वे मेरी खिड़की के पास आकर रुकते
युवा लड़कियों के वक्ष की तरह उन्नत उनके कंधे
पीछे आने वालों को लपेटती उन पुरुषों की जाकेट

किसी दिन वे तुम्हें अपनी हथेलियों में
आहिस्ता से दबा लेते हैं, जैसे तुम
इस संसार का अंतिम कच्चा अंडा हो
फिर वे अपनी जकड़ को मजबूत करने लगते हैं
थोड़ी सी मजबूत ….बस थोड़ी सी….।

माया अपनी सही भूमिका खोज रही है-जीवन के व्यापक परिदृश्य पर वह अपनी उपस्थिति आजमाने की प्रक्रिया में है-अब उसे अपने देखने को और अधिक व्यापक और गहरा बनाना है-समझना है शोषक और शोषित का संबंध, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की रणनीति, काले-गोरे का  बहुआयामी समीकरण| समझ चुकी है वह है कि रात्रि क्लबों में नाच-गा कर, ग्राहकों को अपनी लंबी, सुडौल काया से रिझाकर आजीविका तो कमाई जा सकती है, ‘खुद’ को साबित नहीं किया जा सकता । वह निरंतर खेलती है-जिंदगी से, संघर्ष करती है, थकती है, गिरती है, फिर धूल झाड़कर उठ खड़ी होती है । चोटें और ख़राशे अनगिनत हैं-कहे किससे- इसलिए उन्हें भुला देना ही बेहतर है-हंसी का आवरण अब ओढ़ा नहीं लगता वह आत्मा तक पैबस्त होता चला जा रहा है-यह स्वयं को ढूँढने और पाने की प्रक्रिया है । सांसारिक बुद्धि कहती है विवाह कर घर बसाओ, मन डांवाडोल है। 1951 में ग्रीक इलेक्ट्रीशियन और उभरते हुए संगीतकार तोष एंजेलो से विवाह कर डालती है, अब मार्गरीटा जॉन्सन  माया एंजेलो है, जो एल्विन एली और रूथ बैकफोर्ड जैसे नृत्य निर्देशकों के साथ मिलकर ‘अल एंड रीटा’ मंडली बनाती है । कई अश्वेत संस्थाएं इस मंडली को बुलाती हैं, पर प्रदर्शन कुछ खास प्रभावित नहीं कर पाते मंडली का खर्च चलना दूभर है और निजी जीवन में विवाह की नौका डांवाडोल है-तोष एंजेलो का स्वभाव और बर्ताव माया को ‘सूट’ नहीं करता । नई-नकोर गृहस्थी टूट बिखर जाती है । रोजी-रोटी के लिए माया फिर से रात्रिक्लबों के भरोसे है । तीन वर्ष बाद उसे ‘पोर्जी एंड बेस’ ओपेरा के निर्माण और प्रदर्शन के सिलसिले में यूरोप के अनेक देशों की यात्रा का अवसर मिला है । माया देश-देश घूमती है-उसे अब से पहले यह पता ही नहीं था कि भाषा सीखने की प्रतिभा उसमें अद्भुत है । माया गीत गाती है-अफ्रीकी लोक धुनों और जैज़ का मिश्रण उसके गीतों को सीधे दिल की राह देता है-गीत संकलन ‘मिस कैलिप्सो’ लोकप्रिय होता है ।जिसका प्रकाशन सन् 1996 में काम्पेक्ट डिस्क में भी हुआ । ‘कैलिप्सो हीट वेव’ नामक फिल्म में माया संगीत देती है और अश्वेतों के संघर्ष का इतिहास, जीवन की आशा से भरपूर गीत, ज़िंदादिल आवाज़ उसे धन और यश देते हैं। माया जाने क्यों संतुष्ट नहीं है-विभिन्न भाषाएँ सीखकर वह अपना पुस्तकालय समृद्ध करने की प्रक्रिया में है। बचपन में श्वेत प्रभुओं के घरों से दानस्वरूप मिली फटी-चिथड़ीपुरानी किताबों की स्मृति अबतक ताजा है-उसकी जगह ताजी गोंद और बांस की लुगदी की गंध से भरी जिल्द चढ़ी लाल-नीली किताबों से उसका कमरा नितसमृद्ध हो रहा है । उसने कुछ मित्रों के सुझाव पर ‘हार्लेम लेखक संघ’ की सदस्यता ले ली है । संघ के कई महत्वपूर्ण लेखकों से सन् 1959 में उसकी मुलाक़ात होती है जिनमें जान हेनरिक क्लार्क’ रोसा गॅाय,पाल मार्शल, जूलियन मेफील्ड हैं । ये सब प्रबुद्ध लेखक हैं । माया इनसे प्रभावित है सन् 1960 में अश्वेत आंदोलन को नेतृत्व देनेवाले मार्टिन लूथर किंग से उसका मिलना जीवन को एक नयी दिशा दे देता है, अब वह ‘सदर्न  क्रिश्चियन लीडरशिप कांफ्रेंस की उत्तरी संयोजक बन गयी है । रात्रिक्लबों में गीत-प्रस्तुति के लिए  जागने वाली माया अब रात-भर जगकर पढ़ती है-लिखती है । कभी ‘द अरबआब्जर्वर’ का सम्पादन, कभी‘द अफ्रीकन रिव्यू में फीचर लिखने का काम तो कभी कभी घाना विश्वविद्यालय के ‘स्कूल आफ म्यूजिक एंड ड्रामा’ में पढ़ाने का काम उसे अकादमिक गतिविधियों की ओर ले जा रहा है । सन् 1964 में वह मेलकॅाम एक्स से मिली और अफ्रो-अमेरिकन संगठन के लिए अमेरिका लौट आई ।मेलकॅाम एक्स के लिए मन में गहरा सम्मान है और  मेलकॅाम की अचानक हुई हत्या से माया को  सदमा लगता है । सदमे से उबरने में उसे मार्टिन लूथर किंग जूनियर मदद करते हैं । वह अश्वेत अधिकार आंदोलन से भीतर  तक जुड़ जाती है लेकिन नियति उसे मित्रहीन करने के लिए कटिबद्ध है,कभी की अकेली माया फिर अकेली है । 1968 में मार्टिन लूथर किंग की हत्या माया के जन्मदिन पर ही होती है। वह वर्षों तक अपना जन्मदिन मनाती नहीं ही और उस दिन से सन् 2006 तक किंग की विधवा कोरेटा स्कॉटकिंग को स्मृति-गुच्छ भेजती रही | ऐसे समय में उपन्यासकार जेम्स बाल्डविन मित्र और भाई की भूमिका में माया के निकट हैं -माया के हृदय में बरसों से संचित अनुभव बाल्डविन के सामने निर्द्वंद्व भाव से बह निकलते हैं – शोक, हर्ष, आँसू, दुख-सबकुछ । बचपन तो कब का बीत चुका है पर स्मृतियों के दंश अब तक ताज़ा हैं । बाल्डविन समझाते हैं-लेखन उदात्त बनाता है-लिखो माया, लिख डालो अपना बचपन, लहुलूहान कैशोर्य, अभाव, तनाव, द्वंद्व, संघर्ष सबकुछ -जानने दो दुनिया को कि काले लोगों का जीना कैसा होता है-नस्ल और रंगभेद की कैद में जकड़ा समाज आनंदित हो ही नहीं सकता । और माया उसे…..तो जैसे राह मिल जाती है ।आत्मकथ्य लिख डालती है । ‘आय नो व्हाय द केज्ड बर्ड सिंग्स’ जो 1970 में प्रकाशित होते ही किसी भी अफ्रो-अमेरिकी द्वारा लिखा पहला ‘बेस्ट सेलर’ बन जाता है । यह माया की बदली हुई भूमिका है-वह यथास्थिति को कभी स्वीकार नहीं करती। यातना को कभी अंतिम नहीं मानती, हर परिस्थिति में अपनी भूमिका ढूंढ निकालती है-जीवन से भी बड़ा है विश्वास-  ऐसी दुनिया की खोज में निरंतर लगी रहती है जो अश्वेतों को, स्त्रियों को, असहाय और बेबस बच्चों को उनका सही ‘स्पेस’,उचित हक दे सके । तृषा नालाए को दिये साक्षात्कार में वह कहती है-“जितने भी मूल्य हैं, साहस उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, साहस के बिना किसी और मूल्य की रक्षा आप नहीं कर सकते । आप सच्चे दयालु, आत्मविश्वासी, आत्मीय कुछ भी हो सकते हैं…..लेकिन ऐसा बनने के लिए आपको हर समय साहस की आवश्यकता होती है, और इसका मतलब युद्धभूमि में खड़े होना नहीं है, साहस से मेरा तात्पर्य आपके भीतर का साहस, जो आपके आत्म को दूसरे मनुष्यों को दिखाने में मदद करता है ।”

यह साहस ही था जिसके बल पर सन् 1963 में मार्टिन लूथर किंग के नेतृत्व में राजधानी वाशिंगटन में दो लाख अश्वेतों के जुलूस में माया शामिल हुई । यह जुलूस अश्वेत मानस की इच्छाओंऔर समानता के अधिकार की आकांक्षा से प्रेरित था, जिसने आगे के बीस वर्षों में इतिहास बदल डाला । समूचे विश्व में अश्वेत संस्कृति अपने संगीत, कला, साहित्य से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने लगी , उसमें माया अपने संगीत और साहित्य के साथ शिरकत कर रही थी । 1960 से 1975 के दौरान बड़े पैमाने पर अश्वेत आत्मकथ्य लिखे गए जिनमें सामाजिक-अधिकार आंदोलन के विविध पक्षों की अभिव्यक्ति हो रही थी। इरीना रातूशिन्स्क्या का ‘ग्रे इज द कलर आफ होप, रिजोर्बेता मेंच्यू का ‘आई’ और ’एन इंडियन वूमन  इन गुवाटेमाला ,मेरी किंग का ‘ फ्रीडम सांग’ एंजेलो डेविस का ‘ एन ऑटोबायोग्राफी’ इलेन ब्राडन का ‘ ए टेस्ट आफ़ पावर’: ए ब्लैकवूमन स्टोरी’, ग्वेंडीलाइन ब्रुक्स की ‘रिपोर्ट फ्राम पार्ट वन’ हैरिसन जैक्सन की ‘ देयर इज नथिंग आई ओन दैट आई वांट’ आसी गफ़ी की ‘द ऑटोबायोग्राफी आफ़ ए वूमन’ मेरी ब्रूक्टर की ‘हेयर आय एम:टेक माइ हैण्ड’; महालिया जैक्सन की ‘ मूविंग ऑन अप’ पर्ल बेली की ‘द रॅा पर्ल’ रोज बटलर ब्राउन की ‘आय लव माइ चिल्ड्रेन’  अन्ना हेजमैन की ‘द ट्रम्पेट साउंड्स’ असाता शकूर की ‘असाता’ के साथ-साथ माया एंजेलो ‘आई नो व्हाई  द केज्ड बर्ड सिंग्स’ और आगे चलकर आत्मकथ्य के अन्य छह खंडों के साथ उपस्थित हुई, जिनमें  अश्वेत स्त्रियों द्वारा नस्लभेद, रंगभेद, एवं यौनिकता के मुद्दे उठाए गए  । क्रांतिधर्मी दौर के ये आत्मकथ्य स्वतंत्रता और शिक्षा का अनन्यसंबंध दिखाते हैं । शिक्षा ने ही अश्वेत रचनाकारों को सामुदायिक चेतना राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक विमर्शो में प्रखर भागीदारी के रास्ते दिखाये । माया एंजेलो जैसी अश्वेत रचनाकारों की एक  नयी पीढ़ी अपनी कविताओं और आत्मकथ्यों द्वारा ऐसे टेक्स्ट सामने लाने लगी जो अपने ‘टेक्स्ट’ और बहुआयामिता के साथ ही बहुरंगभेदी बहुनस्लवादी पाठकों की चेतना का हिस्सा बनने लगी  । अब रंगभेद का मुद्दा बहुआयामी हो गया कभी पूरी तरह राजनीतिक, कभी सामाजिक, तो कभी निजी । माया एंजेलो ने आत्मख्यान लिखकर दोहरा जोखिम उठाया जिसे ब्लैकबर्न के शब्दों में कहा जाये तो- “अश्वेत स्त्रियाँ आत्मकथ्य लिखकर अपने जीवन को दोहरे जोखिम में डालती हैं वे एक ओर अमेरिकी समाज में व्याप्त रंगभेद की राजनीति का पर्दाफाश करती हैं तो दूसरी ओर अपने समुदाय के पुरुषों के यौन अत्याचारों को भी खुलकर अभिव्यक्त करती हैं।”(रेजीना ब्लैकबर्न- इनसर्चआफ़दब्लैक फीमेल सेल्फ:अफ्रीकन-अमेरिकनवूमंस ऑटोबायोग्राफी एंड एथनिसिटी’ ब्लूमिंगटन; इंडियाना यूपी’ 1980: पृ. 134)

माया एंजेलो ने आत्मख्यान के तौर पर काव्य विधा को भी अपनाया । ब्रिटानिका ऑनलाइन (9/17/1998)में माया की कविताओं को उसके ‘निजी इतिहास की अभिव्यक्ति’ कहा गया है क्योंकि उसकी कविताओं का कथ्य कई अश्वेत अमेरिकी जीवनानुभवों  से मिलकर बुना गया है । लायन ब्लूम ने इन कविताओं पर टिप्पणी करते हुए कहा कि – इनमें नस्लभेद, भेदभाव, शोषण की पीड़ा और अपने वर्ग के लिए शुभेच्छा है ।

माया एंजेलो ने कई अन्य कविताएँ भी सामाजिक मुद्दों और अश्वेत विशेषकर स्त्रियों के मुद्दों को केंद्र बनाकर लिखी; जिनमें ‘बॅार्न दैटवे’ यौन शोषण और वेश्यावृत्ति पर और ‘फेनोमेनल वूमन; ‘वूमन वर्क’ और ‘सेवेन वूमन्स ब्लेस्डएस्योरेंस’ जैसी कविताएँ स्त्री विषयक हैं । घरेलू हिंसा पर ‘ए काइंड आफ़ लव सम से’ बाल श्रम और शोषण पर ‘टू बीट द चाइल्ड वाज़ बैड एनफ़’ इसके अतिरिक्त दास-प्रथा पर ‘द मेमोरी; ‘मिस स्कारलेट,’ ‘मी. रेट’ ‘एंड अदर लैटर सेंट्स’ ‘ वी सा बीआंड आवर सीमिंग’शीर्षक कविताएँ हैं । नशाखोरी, अश्वेत अस्मिता पर भी एंजेलो की अनेक कविताएँ हैं। अधिकतर कविताएँ लंबी नहीं हैं, बल्कि तीन-चार बंद में ही समाप्त हो जाती हैं । लयात्मकता उनका अपूर्व वैशिष्ट्य है । किंग जेम्स बाइबल, अमेरिकी रचनाकारों, एडगर एलेन पो, शेक्सपियर,अश्वेत रचनाकारों जैसे लैंगस्टन ह्यूज्स चर्चों की प्रार्थनाएँ, बाल्यगीत और लोक संगीत के प्रभाव को इन कविताओं में देखा जा सकता है । ‘माडर्न अमेरिकन वूमन राइटर्स’ में जान ब्रैक्सटन ने माया की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि – उनके पाठक काव्यलय, गीतात्मकता , कल्पना और यथार्थवाद के कायल हैं । ये कविताएँ जैज की धुनों पर आधारित हैं जो सीधे पाठक के हृदय में उतर जाती हैं ।
माया एंजेलो की कविता सिर्फ यथार्थ और कल्पना तक ही सीमित नहीं है वह स्त्री यौनिकता का उत्सव मनाने वाली कविता है । माया का निजी जीवन बहुत से घात-प्रतिघातों की कहानी है । रात्रि क्लबों में नाच, वेश्यावृत्ति को पेशे के रूप में अपनाना किसी स्वाभिमानी स्त्री के लिए सरल- सहज नहीं हो सकता, न होता है । वह स्वयं लिखती है कि जीवन के बहुत कम ही ऐसे वर्ष रहे  जब उसे अपने खर्चे निकालने, बिजली के बिल भरने की चिंता नहीं रही । जैज़ की धुनों पर नाचती माया को देखकर यह अंदाज़ा लगाना कठिन है कि यह वही माया है जो बचपन में यौन शोषण, कई पुरुषों के दुर्व्यवहार-अपमान, कुछ असफल प्रेम-प्रसंगों  से गुजरने के बावजूद स्वयं को विशिष्ट और असाधारण कहती है-
पुरुष खुद चकित हैं
कि उन्होंने मुझमें ऐसा क्या देखा
उन्होंने बहुत कोशिश की
लेकिन वो छू नहीं पाते
मेरे अन्तः रहस्य को
जब मैंने उन्हें  दिखाना चाहा
वो बोले- वो उसे अभी भी नहीं देख पा रहे
मैंने कहा
यह मेरी कमर का कटाव
मेरी मुस्कान का सूर्य
मेरे उभारों का उठान
और यह मेरे अंदाज़ का लावण्य है
कि मैं कुछ भिन्न महिला हूँ
स्वयं में एक असाधारण औरत,

अब आप समझ ही गए होंगे
कि मेरा सिर क्यों नहीं झुकता
क्यों नहीं मैं चीखती-चिल्लाती
कूदती-फाँदती
अपनी बात रखने के लिए मैं
क्यों शोर नहीं मचाती
जब आप मुझे चलता हुआ देखेंगे
तब आप गर्व से भर उठेंगे

मैंने कहा ना
यह मेरे जूतों की एड़ी की चटख है
मेरी जुल्फों के गुलझट
हाथों की कलाईयाँ
सब मेरी अपनी देखभाल का नतीजा है
मैं सबसे अलग औरत हूँ
स्वयं में असाधारण स्त्री l
(असाधारण स्त्री )

जीवन के लगभग पांच दशकों तक रचनारत रहने वाली माया एंजेलो ने समय-समय पर दिए साक्षात्कार में अपनी रचना प्रक्रिया पर टिप्पणी की l उसका मानना है कि अश्वेत लेखक होना विशिष्ट होता है – अश्वेत लेखक श्वेत लेखक से बिल्कुल अलग होता है – अक्सर कोई भी ब्लैक लेखक अपने परिवार या समुदाय में पहला लेखक होता है और उसकी बहुत-सी ऊर्जा तो अपने मित्रों सम्बन्धियों को यही समझाने में चली जाती है कि उसका लिखना किस तरह महत्वपूर्ण है l माया ने एक के बाद एक आत्मकथाओं के सात खण्ड लिखे  हैं l ‘वहाई द केज्ड बर्ड सिंग्स’ में उसने बचपन और किशोरावस्था के दिनों का जिक्र किया है l ‘गैदर ,टुगेदर इन माई नेम’ उसकी सर्वाधिक प्रिय कृति है जिसमें वह बताती है कि आजीविका पालन के लिए की गई वेश्या- वृत्ति से वह कतई शर्मसार नहीं है ,न  अपने लिए सहानुभूति पाने की कोशिश की न ही उसे अतिरिक्त महिमामंडित किया,जीवन के एक समृद्ध अनुभव के तौर पर उसने वे साल ग्रहण किये lइन्हीं वर्षों में वह तरह तरह के रोगों से जूझती और किसी भी सरकारी सहायता से वंचित उपेक्षित स्त्रियों ,बच्चियों और मासूम बच्चों के लिए ,उनकी स्थिति में परिवर्तन और सुधार की ज़रुरत को समझ पायी | वह समाज के ढांचे में परिवर्तन की बात करती है और स्त्रियों को एकजुट होकर वैश्विक सखी  भाव से रहने की प्रेरणा देती है – “सामुदायिक चेतना का होना बहुत जरूरी है l मुझे उन स्त्रियों पर दया आती है, जिन्हें मैं यह कहते हुए सुनती हूँ कि स्त्रियों की अपेक्षा मेरे पुरुष मित्र अधिक हैं – मुझे लगता है यह मूर्खतापूर्ण है l अपने जैसियों का पक्ष लेना, उनकी वकालत करना बहुत महत्वपूर्ण है, और अनिवार्य भी l मैं चाहती हूँ कि औरत को यह पता चले कि मैं उनके पक्ष में हूँ l उन्हें भी अपने पक्ष में खड़ा होना चाहिए, विरोध में नहीं l इसका मतलब ये नहीं कि मैं पुरुषों के विपक्ष में खड़ी हूँ l लेकिन मैं जानती हूँ कि पूरी दुनिया में पुरुषों के स्वास्थ्य और देखभाल के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा धन निवेश किया जाता  है, उनके स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर शोध भी अधिक होते हैं, इसलिए मैं पहले स्त्रियों के पक्ष में हूँ l मैं स्त्रियों को अस्पताल जाने के लिए प्रेरित करती हूँ, वे नियमित जाँच करवाएं और अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा न करें …यदि आप अपनी देखभाल स्वयं नहीं करते तो दूसरे से कैसे अपेक्षा रख सकते हैं कि वह आपकी देखभाल करे ?”

माया एंजेलो ने यह वक्तव्य 1 जून 2012 को उत्तरी कैलीफोर्निया में ‘माया एंजेलो सेंटर फार हेल्थ एंड वेलनेस’ के उद्घाटन के अवसर पर दिया. माया स्वयं भी लम्बी चौड़ी छह फ़ुटी कद-काठी वाली स्वस्थ स्त्री है, जो कथा -कविता, नाटक के अतिरिक्त पौष्टिक भोजन पर भी पुस्तक लिखती है l उसका मानना है कि जो काम आपको करना अच्छा लगता हो उसे जरूर कर डालना  चाहिए l  आत्मकथा के सातों खण्डों  – आई नो व्हाय द केज्ड बर्ड सिंग्स (1969 )जिसमें जन्म से 1944 की स्मृतियाँ हैं l गेदर टुगेदर इन माई नेम (1974 ) जिसमें 1944 से 1948, सिंगिंग एंड स्विंगिग एंड गेटिंग मैरी लाइक क्रिसमस (1976 ) जिसमें 1949-1955 द हर्ट आफ ए वूमन (1981) जिसमें 1957-1962, ‘आल गॅाड्स चिल्ड्रन नीड ट्रैवेलिंग शूज (1986) जिसमें 1962-1965, ए सांग फ्लंग अप टू हेवेन (2002 ) जिसमें 1965 -1968 तक  और मॅाम एंड मी एंड मॅाम (2013) में सन् 2013 तक के संस्मरण और जीवन यात्रा के पड़ाव समाहित हैं l  आत्मकथाओं के बारे में उसका कहना है कि इनमें उसने जीवन के सारे पड़ावों का जिक्र किया है “पूरा जीवन मैंने अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए अनथक श्रम किया l घर साफ करना, भोजन पकाना और घर के बाहर काम करना मेरी दिनचर्या का अनिवार्य अंग थे l मैं घर के काम हमेशा करती आई  l दुर्भाग्यवश हमारे देश में हमसे जबरन काम करवाने का इतिहास रहा है, इसलिए यहाँ दूसरों की सेवा को दासत्व से जोड़कर देखा गया, जबकि अफ्रीका में किसी की सेवा करना बहुत ही सम्मान और गौरव की बात है l यूरोप में ऐसा नहीं है l मैं छह फीट की स्वस्थ स्त्री हूँ और यदि मैं किसी की सेवा ह्रदय से करती हूँ तो उसे दासत्व से जोड़कर देखने की आवश्कता नहीं l”निजी जीवन की श्रम प्रवृत्ति माया एंजेलो के लेखन में भी दीखती है l अपनी दिनचर्या के बारे में वह ‘सिंगिंग एंड स्विंगिग एंड गेटिंग मैरी लाइक क्रिसमस’ में पाठक को विस्तृत ब्यौरे देती है l

माया बताती है कि लिखने के लिए उसने कैसे होटल का एक छोटा कमरा बुक कर रखा था, वह लिखती है – “किसी आलोचक ने कहा था कि मैं प्रकृति से ही लेखिका हूँ, लेकिन मुझे अपने बारे में वही कहना है जो अलेक्जेंडर पोप  ने कहा था कि आसान लेखन को पढ़ना बहुत मुश्किल होता है और ठीक इसके   विपरीत बात भी सही है कि जो आसानी से पढ़ा जाए उसे लिखना बहुत कठिन होता है l लिखने के लिए कभी-कभी मैं दो-दो दिन होटल के कमरे में रहती हूँ कि कम से कम दो वाक्य तो अपने प्रवाह में लिख सकूँ कभी-कभी बिना एक वाक्य लिखे ही होटल के सात बाई दस के छोटे कमरे से घर वापस लौट आती हूँ और कभी इसमें मैं सुबह 6.30 बजे से दो बजे तक काम करती हूँ l यह कमरा मैंने दो सालों से किराए पर ले रखा है – इसके परदे, बिस्तर कभी बदले नहीं गए l मैं इसमें कभी सोई नहीं एक बिस्तर और छोटे वाश बेसिन के अलावा कमरे में कुछ नहीं l विचारों को शब्दों का प्रवाह मिल जाए तो मैं कभी-कभी तीन बजे तक लगातार काम करती हूँ, फिर घर लौटकर नहाती हूँ, घर-रसोई की व्यवस्था देखती हूँ ताकि शाम 5.30 बजे,  जब पॅाल आए तो उसे थोड़ा समय दे सकूँ, हालांकि मेरा दिलोदिमाग मेरे लेखन के इर्दगिर्द ही घूमता रहता है, फिर भी मैं एक ईमानदार जीवन जीने का प्रयास करती हूँ l ऐसे सब लोग जो कलाकार या रचनाकार होने का दावा करते हैं, और दूसरों को हर समय बताते हैं कि वे काम के दबाव से आक्रांत हैं -मेरी नजर में वह सब बकवास है l अंत में, जो काम आप लोगों के सामने लाते हैं – वही सच है – बाकी सब बनावट है, जिसका कोई अर्थ नहीं है l जब कभी विचारों की तारतम्यता न बन पा रही हो, लेखनी साथ न दे रही हो तो टेबल से उठकर, तरोताजा होकर नए ढंग से सोचना चाहिए l एक सामान्य और व्यवस्थित जीवन जीना लेखक के लिए जरूरी होता है l”

अश्वेत होने के साथ-साथ स्त्री होना माया एंजेलो के लिए चुनौतीपूर्ण रहा होगा, क्योंकि अश्वेत रचनाकार दोहरे दबाव से जूझता है – रंगभेद और निरंतर मशीनी होते चले जा रहे भौतिकतावादी समाज का दबाव दोनों उसे खुलकर बोलने और लिखने से रोकते हैं l लेकिन माया एंजेलो इन सीमाओं को अपने लेखन की संभावनाओं में तब्दील करती दीखती है l मसलन अश्वेत वेश्या जीवन वृत्ति उसे देह व्यापार के अपराधीकरण, नशाखोरी, विपन्नता, स्त्री अशिक्षा के मुद्दों पर सोचने और लिखने का रास्ता देती है l ‘गेदर टुगेदर इन माई नेम’ में वह अपने वेश्या जीवन पर कतई शर्मिंदा नहीं दीखती न ही वह इसे ग्लैमराइज करती है बल्कि वह पाठक को अपने अनुभवों के माध्यम से सभ्य समाज की उच्छिष्ट तंग गलियों जहाँ कम उम्र की लड़कियों के अपहरण, बलात्कार, बाल श्रम,स्त्रियों के सांस्थानिक शोषण के वाकये जो हवा में तिरते हैं, उनसे रू-ब रू करवाती है l यही वजह है कि  वह हेलेन सिक्सू  उस की तरह स्त्रियों के बोलने पर बल देती है – “मैं स्त्रियों से कहूंगी कि वे पढ़े और जोर-जोर से पढ़े l तुम्हें इतने जोर से पढ़ना होगा कि तुम भाषा की ध्वनियाँ सुन सको l अपने कानों से सुनो अपनी भाषा की लय, माधुर्य और उसका संगीत l मैं स्त्रियों से कहूंगी कि वे उन्नीसवीं शताब्दी की  स्त्री कविता पढ़े जो अफ्रीकी, अमेरिकी. श्वेत, अश्वेत, स्पेनी, एशियाई स्त्रियों द्वारा रची गयी है l वे कविता पढ़े अपनी पुत्रियों को सुनाएँ, अपनी भतीजियों को सुनाएँ तभी देख पाएंगी कि कोई मुझसे पहले भी यहाँ थी, किसी ने मुझ-सा ही अनुभव पहले भी किया था l कोई मुझ सी अकेली यहाँ पहले भी थी l”

माया एंजेलो स्वानुभूति को सबसे महत्वपूर्ण मानती है, इसी के बल पर वह निरंतर रचनारत रही है और आत्मनिर्भर भी l तृषा नालाए के साथ बातचीत में वह कहती है – “मैंने अपने जीवन से यह सीखा है कि लोग तुम्हारा कहा हुआ विस्मृत कर देंगे, तुमने किसी के लिए क्या किया, लोग इसे भी भूल जाएंगे पर तुमने किसी को क्या अनुभव कराया इसे वे कभी नहीं भूलेंगे l साथ ही मेरा दृढ़ विश्वास है कि स्वयं के किए बिना कोई कार्य पूरा नहीं होता l”जीवन हमेशा माया को चुनौती देता रहा, वह उन चुनौतियों को स्वीकारती रही l जीवन के अंतिम दिनों में घातक ह्रदय रोग से शरीर लड़ता रहा, माया पुस्तक लिखती रही l चिकित्सक काया की देख-देख करते और माया 2014 के अप्रैल सेमेस्टर में पढ़ाने के लिए ‘रेस कल्चर एंड जेंडर इन द साऊथएंड बिआँड’ जैसे पाठ्यक्रम की योजना बनाती रहती l इस दौर के बौद्धिकों कार्यकर्ताओं, विचारकों मसलन इकबाल अहमद एडवर्ड सईद, जॅाक देरिदा के साथ माया एंजेलो का नाम भी जुड़ गया है. जिसके देहावसान की खबर फैलते ही लाखों की संख्या में स्त्रियाँ छात्र, कार्यकर्त्ता द्रवित और विचलित हो उठे हैं l घाना में रहने वाले अश्वेत अमरीकी जिनकी घर वापसी की कथा माया ने अभी तो कहनी शुरू की थी – वे निष्प्रभ हैं l आनंद जिसे वह  ‘जॅाय’ कहा करती – वही उसकी मुक्ति बना है l उसने कहा था – ‘ जो व्यक्ति आनंदित है वही अपने कृत्यों का उत्तरदायित्व ले सकता है l दरअसल आनन्द बांटने की चीज है, इसे जितना बाँटोगे यह तुम्हारे पास उतना ही बढ़ता जाएगा l’

माया एंजेलो की विदाई का क्षण आ गया है l पीले मकान की दीवारें सूर्य के आलोक से जगमगा रही हैं – सुनहरी किरणें खिड़की के रास्ते उस सर्वदा हँसते रहने वाले काले चेहरे पर पड़ रही हैं – तांबई रंगत वाली आँखे गिरजे की प्रार्थना में अधमुंदी सी दीख रही हैं l मोटे होंठ हँसते-हँसते ज्यों बीच में स्तब्ध हो गए हैं कभी की छह फुटी सुगठित काया ढल-सिकुड़कर नन्हीं सी हो गयी है l वार्ड रोब की पुरानी ड्रेसेज अब ढीली और लम्बी मालूम देती हैं ,विश्वास नहीं होता कि ये कभी माया पर सजती होंगी l फैली हुई नाक किसी नए अनुभव की गंध की तलाश में थोड़ी सिकुड़ी सी दीख रही है, जंगली पत्तियों की हरी गंध उनके भीतर ठहर-सी गई है l घुंघराले सफेद बाल जिनका तंज अब खत्म हो गया, उनके बीच से एकाध काला बाल दीख रहा है l यौवन में पहने डैंगल्स का वजन अब कान की लवें उठा पाने में असमर्थ हो गई हैं – टॅाप्स और बालियों से सजी रहने वाली लवों के छेद इतने बड़े होकर झूल गए हैं, जिनमें एक उंगली आसानी  से घुस सकती है l ठोड़ी के नीचे गर्दन के पास झुर्रियों का गुंजलक है और सीना सिकुड़नों – सलवटों से भरा हुआ l ये वक्त से संघर्ष की सलवटें हैं l कभी के उन्नत और पुष्ट स्तन अश्वेतों की करुणा और वंचितों की आर्द्रता के बोझ से ढल गए हैं – अब उनमें कोई कटाव, उठान नहीं उनके भीतर रहे दिल की धुकपुकी थम चुकी है l बांहों की मांसपेशियां हड्डियों का साथ लगभग छोड़ चली हैं और गहरी सांवली रंगत की त्वचा कोहनियों के पास ढलक गई है दोनों हाथ सीने पर रखवा दिए गए हैं –  हाथों  के पंजे स्कूली किताब के पन्नों के भीतर संभाल छोड़े पीपल के किसी पुराने पत्ते- से अपनी सारी मज्जाओं, नसों, रक्त वाहिकाओं के साथ बिल्कुल पारदर्शी हो चुके हैं l दाहिनी तर्जनी थोड़ी टेढ़ी-सी अंगूठे के पास झुकी है, लगता है अभी कलम पकड़ लेगी और लिखने लगेगी मनुष्य से मनुष्य के भेदभाव का इतिहास, लैंगिक विभेद की प्रताड़ना और भी बहुत कुछ जो लिखना अधूरा रह गया होगा l छात्रों के लिए नोट्स बनाने का काम भी तो छूट गया होगा ‘जो काम पसंद हो उसे कर लेना चाहिए’ लेकिन अब काया साथ नहीं दे रही l दस नंबर की बैलेरीना पहनने वाले पांवों की हड्डियाँ घिसकर आठ नंबर माप के जूतों में आ गई हैं – कभी जैज और कैलिप्सो की धुनों पर थिरकती, नृत्य से सैकड़ों दिलों को मोहती एड़ियों की हड्डियों ने जवाब दे दिया है l ताबूत में लिटाने के लिए अब बहुत से मजबूत हाथों की जरूरत नहीं अब ये जर्जर, वृद्धा काया मात्र है माया की जिसे भौतिक रूप में अंतिम बार देखने आए छात्र मित्र, प्रशंसक, पाठक सब वेक फारेस्ट में चारों ओर बिखरी, उड़ती सूखी पत्तियों पर हौले-हौले पांव रख रहे हैं, पीले घर की खिड़कियों से उझक कर हौले  से उस आनंदमय चेहरे की झलक ले लेते हैं l आए हुए लोग धीमे-धीमे फुसफुसा कर बातें कर रहें हैं – कहीं माया एंजेलो नींद से जग न जाए और… और -और कहीं ऐसा न हो कि नई पुस्तक लिखती हुए माया की तन्द्रा भंग हो जाए l लेट्स नॅाट  डिस्टर्ब हर !धीरे बोलो यहाँ माया एंजेलो सोती हैl  अपनी कविताओं, अपने गीतों के साथ-
जब मैं एक बड़ी यहूदी बस्ती में मर जाऊं तो
मुझे आकाश में न भेजें
तेंदुए जैसे चूहे, बिल्ली को खा रहे हैं
और जहाँ रविवार को ब्रंच में
जई के आटे का बकवास भोजन मिलता है
उपदेश देने वालों
कृपया मुझसे
सोने की सड़कों
मुफ्त के दूध का वादा मत करो
मैंने चार साल की उम्र से दूध नहीं पिया है
और एक बार मर जाने के बाद मुझे स्वर्ण की जरूरत नहीं पड़ेगी l
मैं उस जगह का आह्वान करती हूँ जहाँ
शुद्ध स्वर्ग है
जहाँ वफादार परिवार हैं
जहाँ अच्छे अजनबी हैं
जहाँ जैज संगीत है
और जहाँ मौसम नम है
मुझे ऐसा वचन दो
या कुछ भी न दो l
(‘धर्माधिकारी’)
*माया एंजेलो की कविताओं का अनुवाद
विपिन चौधरी से साभार

यह आलेख  मासिक हिन्दी पत्रिका पाखी में प्रकाशित हो चुका  है

बदरूहें हवा में चिरागों की तरह उड़ रही हैं

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में  सक्रिय .  स्त्रीकाल की संपादक मंडल सदस्य . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

जिन्दगी ने दुनिया के कुछ मुल्कों के कुछ शहरों को देखने का मौका दिया . मैं हैरान थी . इतने सारे रंगों को देखकर .जब कनाडा के एक प्यारे शहर मिसीसागा पहुंची तो लगा ही नहीं की ये शहर अंजान है . सारे अपने बाहें फैलाये इंतजार में थे .शांत ,संजीदा शहर . शाखों पर पत्ते नहीं पर बारिश की नन्हीं बूंदे मोतियों की तरह लटके हुए थे .बारीक़ शीशे की दीवार पर जो  जगह खाली थी वहां ठंडी हवा कभी तीर सी कभी माशूक सी बदन पर लिपट जाती .दिन की रौशनी में आसमान कभी सिंदूरी , कभी जाफरानी कभी पीलापन लिए हुए था . लगभग एक हफ्ते कनाडा की खूबसूरती में भीगती रही . नियागरा फौल देखकर लगा रवींद्र नाथ  की कविता की पंक्ति  गुनगुनाऊ .इ सुन्दोरे भुवने आमी मोरते चाई ना.. एक विशाल झील , नीले  और हरे रंगों में झिलमिलाता हुआ .जब सूरज की किरणें पानी में पैवस्त होकर ऊपर उभारना चाहतीं तो झील का रंग गहरे हरे रंग में बदल जाता . जाने कितनी देर तक हम झील के नीलमी हीरे जैसे रंगों के जादू में खोये रहे .जब चले तो पानी के चश्में जगह- जगह हमारे साथ चलते रहे .मुझे फारसी के मशहूर शायर  उर्फी की पंक्ति याद आगयी जो उन्होंने कभी कश्मीर के बारे में कहा था …कि वहां जली-भुनी चिड़िया भी पहुँच जाये  तो उसके पंख और पर निकल आते हैं . पर ये बात मैं नियागारा फौल के  बारे में कहना चाहती हूँ .    जिसके  जादुई असर  से  हम
निकल नहीं पाएं.

वैसे कनाडा बहुत हद तक हिंदुस्तान का हिस्सा ही लगता है . हिदुस्तानी , पाकिस्तानी और बंग्लादेशियों से भरा है मुल्क .सरदारों की तादाद सबसे ज्यादा है ..सड़क के दोनों जानिब एक जैसे खूबसूरत इमारतें .जिनकी मेहराबो के नीचे कुछ बूढ़े लोग टहलते मिल जाते थे .बड़ी अजीब उदास ,नर्म धीमी –धीमी तहजीब थी .कहीं कोई शोर नहीं … मेरा मन घबराने लगा .कितनी अजीब बात है अपने देश में शोर से जी घबराता है यहाँ ख़ामोशी से . कनाडा से हम जर्मनी , फ्रांस और नीदरलैंड  गए . इन तीनों देश को टुकड़ों में देखा .पूरा रास्ता घनी और धारदार लंबी पत्तियों वाले दरख्तों से भरा पड़ा था .जब हम फ़्रांस के कांव शहर पहुंचे साँझ फूट रही थी .आसमान तक सर उठाये रहस्यमयी काले देवदार खड़े थे . पास कोई नदी बह रही थी धीमें धीमें . दूसरे दिन हम पेरिस पहुंचे .पेरिस वो जगह है जहाँ कला अपने विशाल रूप में मिलती है .हम आर्ट म्यूजियम में थे .एक विशाल महलनुमा ईमारत .जिसके फर्श के ज्यादातर हिस्सा कीमती कालीनों से ढका हुआ था .लोगों का हुजूम दुनिया की बेहतरीन कला में डूब रही थी .दरख्तों के साये ,बादल के रंग .औरतें जिसके बदन का हर हिस्सा जैसे बोल रहा हो .मुझे लगा ये सारीविशिष्ट कलाएं इंसानी वजूद हैं , जो सात सुर सात रंग और हजारों करोड़ों समय से देख रही हैं  हमें .मैं रंगों का तराना सुन रही थी , महसूस कर रही थी.

हम देख पाए मोनालिसा की पेंटिंग को .हमारी नजर ठहर गयी .जिस मुस्कुराहट पर दुनिया जान देती है उस मुस्कुराहट का रहस्य क्या है कौन जान पाया ?हल्की सी मुस्कुराहट की सुर्खी , लबों पर तिरछी होकर कुछ कह रही हो .नाजुक सी ठोड़ी. दूध में जैसे गुलाबी रंग घुल गया हो .हम देखते रह गए . .दो दिन वहां रहने के बाद हम जर्मनी के लिए निकल पड़े .रास्ता हरे हरे दरख्तों से घिरा था . इतना हरा शहर हमने देखा  नहीं अबतक . आखें हरी हो गयी .उंचे उंचे दरख्तों के घने झुंड.बल खाते रास्तो के किनारे झील .झील पर मुकम्मल ख़ामोशी तारी थी ..आसमान सुर्ख था .अब सूरज डूब रहा था .चंद लम्हों में यह सुर्खी रात में ढल गयी. …… जर्मनी को अपने खूबसूरत होने का दर्प है तो अपने इतिहास पर शर्मिदा है .हिटलर ने दुनिया के साथ जो कुछ किया उस दाग को वे धोना चाहतें हैं .इसलिए अगर किसी भी देश के शरणार्थी जर्मनी पहुँच जाये तो वहां की सरकार उनकी जिम्मेदारी लेती है.ऐश्वर्य  में डूबे उस देश में भी गरीबी है . सडकों के किनारे पूरा का पूरा परिवार भीख मांगता नजर आया . ये पूंजीवाद का चेहरा है  जो जर्मनी की भव्यता में छिप गया है .  क्लोन . फ्रेंकफर्ट, जेनट्राम और ग्लैडबैक की खूबसूरती का रंग एक सा है .

आप यूरोप का कोई शहर घूम लें उसमें गजब की एकरूपता है . हमारे देश की तरह विविधता नहीं है, इसलिए मन थोड़ी देर में उब जाता है .जर्मनी से विदा होकर हम नीदर लैंड की और चले .जर्मनी की ऊँची नम हवाओं की गोद से निकलकर  हम नीले गहरे पानी में थे . शहर के बीचो -बीच बड़ा सा केनाल है  .जो झील की तरह  है .जहाँ की गुलाबी ठंड जवान लडकियों के गालों को और सुर्ख कर रही थी ..  उसके चारों तरफ बादामी जर्द , सुर्ख
और सफेद  रंग के फूल लगे हुए थे .सामने खूबसूरत इमारतें जिसके मेहराब बादलों को छू रहे थे . हमने मोटर वोट लिया और चल पड़े . मोटर वोट का चालक शहर के बारे में बता रहा था ..उसकी आवाज गहरी थी हम डूब रहे थे आवाज केसाये में .वो कह रहा था …सारी दुनिया , सारी कायनात रंगों के सिवा कुछ नहीं है .

मैं हैरान थी इतनी खूबसूरत दुनिया का एक स्याह रंग था वहां का रेड लाइट एरिया . जहाँ की बड़ी-बड़ी खिडकियों के शीशे में लड़कियां खड़ी थी . पूरी नग्न . राहगीर खिड़की के शीशे के पास रुकते और देह को खरीदने का व्यापार चलता . सेक्स के बाजार का इतना भयावह रूप नहीं देखा था .पूंजीवाद का चरम रूप . जहाँ सबकुछ बिकता है . पूरी दुनिया के खरीददार आते हैं.  ये दूसरी ही दुनिया थी . कोई भी राहगीर शीशे में  बंद लडकियों की नग्न देह देख सकता है . वह खुले आम इंटरकोर्स करते हुए देख सकता है .मुझे सदमा लगा . कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था .जैसे किसी ने ढेर सारी कालिख मेरे मुंह पर पोत दी हो . मुझे लगा वे कह रही हैं निकालो मुझे यहाँ से . नंगी -नंगी औरतें – बदरूहें हवा में चिरागों की तरह उड़ रही हैं और दुनिया की सारी कौम कब्रिस्तान में तब्दील हो गयी है .
( यह यात्रा वृतांत आज जनसत्ता मे ‘ सफर के रंग’ शीर्षक से छपा है. )

बहुत खूब कंगना राणावत, सलमान खान कुछ सीखो

मनीषा कुमारी 

कंगना राणावत ने गोरा बनाने के क्रीम को नस्लभेदी दायरे में रखते हुए ऐसे विज्ञापन करने से मना कर दिया. इस निर्णय से कंगना को लाखों का नुकसान जरूर हुआ, लेकिन विज्ञापन के गोरखधंधे में लगे फ़िल्मी हस्तियों के सामने कंगना ने एक सवाल तो जरूर उछाल दिया. जान अब्राहम , ऐश्वर्या राय , शाहिद कपूर , दीपिका पादुकोण , शाहरूख खान जैसे कितने फिल्म अभिनेता हैं , जो गोरा रंग बनाने के गोरखधंधे के विज्ञापन में उतर चुके हैं. जनता के नायक बने इन फ़िल्मी हस्तियों की जन सरोकारों से दूरी जगजाहिर है . अभी हाल में स्त्रीकाल में सलमान खान के द्वारा महिलाओं के खिलाफ हिंसक विज्ञापन किये जाने का मुद्दा उठाया था मनीषा कुमारी ने . आज फिर से स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . 


सलमान की सजा , जमानत और अश्लील विज्ञापनों के बहाने 



सलमान खान को सजा हुई , जमानत मिल गई . सजा और जमानत के बीच फिल्म दुनिया और सोशल मीडिया में  सलमान की सजा के खिलाफ विलाप करने वालों की कोई कमी नहीं है . गायक अभिजित के बयान इस मायालोक की बदमिजाजी का एक नमूना भर है , जिसके लिए हर व्यक्ति , हर वस्तु हर भावना एक उत्पाद मात्र है , जो उन्हें अकूत संपत्ति बनाने के माध्यम भर हैं .

हमारा इरादा सलमान की सजा और मिली जमानत पर यहाँ गुण दोष की विवेचना का नहीं है , बल्कि भगवान बनाये जाने वाले इन महानुभावों के उस असर पर ध्यान दिलाने का है , जो हमारे आस- पास पुरुषवादी और वर्चस्ववादी दुनिया के निर्माण में मदद करता है , स्त्री को एक वस्तु –यौन आनंद की वस्तु बनाने में सहायक होता है . बिग बॉस जैसे रियलिटी शो के दौरान सलमान के अश्लील वक्तव्यों को यदि हम खुलेपन का एक अंग मान भी लें तो भी दूरदर्शन और अन्य चैनलों पर चलने वाले एस्ट्राल  पाइप के विज्ञापन को स्त्री के खिलाफ यौन हिंसा को उकसाने वाला विज्ञापन न मानें तो क्या मानें !

क्या सलमान खान जैसे लोग , जिन्हें एक बड़ा वर्ग भगवान् की तरह पूजता है , जिनका युवा पीढी का अधिकाँश अनुकरण करना चाहता है , इतने निर्दोष होते हैं कि जिन बातों को वे अपनी फिल्मों , छोटी फिल्मों या विज्ञापन से कहना चाहते हैं , जिनके लिए वे एक ख़ास भाव भंगिमा तैयार करते हैं , उनके प्रभावों से मुक्त होते हैं !एस्ट्राल पाइप का विज्ञापन एक हिंसक इरादे को मजाकिया अंदाज में कहते हुए स्पष्ट सन्देश देता है , जिसे देखते हुए कोई भी लडकी असहज हो जायेगी , लेकिन विज्ञापन की लडकी सलमान के इशारों और द्विअर्थी संवाद पर मुस्कुराती है – सब समझ लेने और उसे आनंद और लज्जा के मिश्रित रेस्पोंस देने के भाव में . निर्भया काण्ड में वीभत्स हमलों को हम सब ने जाना सुना है , जिसकी कल्पना मात्र से हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं , लेकिन सलमान और विज्ञापन के निर्माताओं को इन वीभत्स कारनामों के भीतर एक रोमांच सा अनुभव होता है . वे पाइप के विज्ञापन में एक युवा लडकी को क्या सन्देश देना चाहते हैं , उसे आप देखकर खुद समझ  सकते हैं . यौन हिंसा के द्विअर्थी संवादों और इशारों के लिए क्यों नहीं इस विज्ञापन से जुड़े लोगों के खिलाफ एक एफ आई आर की जानी चाहिए और इस विज्ञापन को बंद कर देना चाहिए ?

एस्ट्राल पाइप के विज्ञापन का लिंक :  यहाँ क्लिक करें 

विज्ञापनों में अक्सर स्त्री की प्रस्तुति यौन आनंद की वस्तु, पुरुष की सुख –सुविधा के लिए त्याग और समर्पण की देवी अथवा बिना दिमाग और सोच –समझ के कामांध के रूप में होती है. सारे डीयोड्रेन्ट के विज्ञापन ऐसी  ही कामांध स्त्रियों की छवि पेश करते हैं , जो एक कृत्रिम गंध के आकर्षण में अपना दिमागी संतुलन खोकर भी खुद को एक पुरुष के लिए सौप देती हैं .

एक्स का विज्ञापन लिंक : यहाँ क्लिक करें 

एयरटेल का एक विज्ञापन कई मायनों में स्त्रीविरोधी सन्देश देता है , पहला तो यह कि ऑफिस और घर में दोहरी भूमिका के कारण औरत ऑफिस में मर्दों की तुलना में कम काम करती है, दूसरा कामकाजी पुरुष-स्त्री के बीच घर के काम की जिम्मेवारी औरत की ही है , चाहे वह ऑफिस में अपने पति का बॉस ही क्यों न हो ! और बढिया खाना बनाकर औरत अपने पति को अपने लिए हासिल कर सकती है .

एयरटेल का विज्ञापन लिंक : यहाँ क्लिक करें 

‘ विज्ञापनों में स्त्री की छवि’  एक मुकम्मल शोध की मांग करती है और ऐसे शोध हो भी रहे हैं. अभी तो मैं सलमान की सजा से मायूसी और आक्रामकता के भाव से भरे लोगों के दृश्यों पर दुखी हूँ . भारतीय जेलों में लाखो लोग बिना दोषी सिद्ध हुए सड़ रहे हैं , उनमें ज्यादातार गरीब , दलित और अल्पसंख्यक हैं. कई तो जमानत राशि या जमानतदार की व्यवस्था न कर पाने के कारण जेलों में बंद रहने को विवश है. और हम हैं कि एक फर्जी मसीहा की सजा से दुखी हुए जा रहे हैं. पिछले कई दिनों से जब –जब मैं एस्ट्राल का विज्ञापन देखती थी तो इस कुंठा से भर जाती थी कि क्यों मैं सलमान की फ़िल्में देखकर अपने किशोर होते उम्र में एक भावुकता से भर जाती थी , यह तो सिर्फ और सिर्फ अकूत संपत्ति और शोहरत हासिल करने का सनकी व्यक्तित्व भर है , जिसके लिए एक स्त्री के अस्तित्व की कोई कीमत नहीं है .

स्त्री के खिलाफ यौन हिंसा के  संकेत से भर देने वाले इस विज्ञापन के लिए भी सलमान और पूरी टीम को सजा होनी चाहिए. लेकिन वोट बैंक लुभाने के लिए सलमान के साथ ‘पतंगबाजी’  का आंनद लेने वाले राजनीतिक चरित्रों में क्या यह साहस हो सकता है कि कडी कारवाईयों से वह एक स्पष्ट सन्देश ऐसे धंधेबाजों को दे , जिनमें इस माया लोंक के अधिकांश नायक शामिल हैं , हाँ सदी के महानायक भी….. !

मनीषा मनोविज्ञान की अध्येता हैं , सम्पर्क : manishamishra559@gmail.com

पुंसवादी आलोचना के खतरे और महादेवी वर्मा

सुधा सिंह

आलोचक सुधा सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं.  ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ , स्त्री अस्मिता साहित्य और विचारधारा, आदि कई किताबें (अपनी और संपादित) .प्रकाशित संपर्क : singhsudha.singh66@gmail.com9

( इस आलेख में सुधा सिंह महादेवी वर्मा के बहाने हिन्दी साहित्य में ‘ मर्दवादी आलोचना’ की पड़ताल कर रही  हैं , हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक नामवर सिंह की आलोचना में ‘ मर्दवादी स्त्रीदृष्टि’ की पड़ताल . इस आलेख में स्त्रीवादी आलोचना के बिंदु भी स्पष्ट होते हैं ) 


महादेवी पर पिछले चार-पाँच वर्षों में हिन्दी में नए सिरे से लिखने और पढ़ने की कोशिशें हो रही हैं। छायावाद के अंतर्गत विवेचना की जो नई संभावनाएं बन रही हैं वे सबसे ज्यादा महादेवी के लेखन के संदर्भ में बन रही हैं। प्रत्येक सामाजिक विमर्श अपना दबाव पैदा करता है कि पुराने या नए साहित्यिक पाठ को उसके आलोक में पढ़ा जाए और विमर्श के अनुकूल पाठ की तलाश की जाए।

 हिंदी में नब्बे के दशक के बाद के स्त्रीवादी विमर्श ने यह स्थिति पैदा की कि पाठ को खासकर स्त्री-पाठ को स्त्रीवाद के संदर्भ में रखकर देखा जाए और यह तय हो कि यह स्त्रीपाठ है या नहीं। यह एक गंभीर जरूरत थी क्योंकि परंपरित हिंदी आलोचना साहित्य को सिर्फ और सिर्फ साहित्य (वह भी हिंदी साहित्य) की हद में ही रखकर देखने की वकालत करती रही है। यह सब होता है साहित्य में समग्रता के नाम पर। सबसे ज्यादा परेशानी उन्हें साहित्य के बँटवारे को लेकर है कि साहित्य में स्त्री और पुरुष लेखन जैसा कोई बँटवारा क्यों हो? साहित्य तो साहित्य है। और जब साहित्य कह या लिख रहे होते हैं तो केवल हिंदी साहित्य ही उनकी चिंता के केन्द्र में होता है! साहित्य के बँटवारे की यह चिंता हिंदी के मठाधीशों को केवल अस्मितामूलक पाठों के संदर्भ में ही जोरों से सताती है। बँटवारे के अन्य सभी आधारों को वे बड़ी सहजता से स्वीकार कर लेते हैं पर यहाँ उनका विरोध देखते बनता है। देश-कालगत, भाषागत, क्षेत्रगत, बोली के आधार पर, विभिन्न राजनीतिक परिवर्तनों के आधार पर, सामाजिक आंदोलनों के आधार पर साहित्य का बँटवारा वे बहुत पहले बिना किसी ना-नुकच के स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन स्त्री-पाठ का स्वीकार मानो उनकी साहित्यिक मर्दवादिता को चुनौती लगता है। कहीं-न-कहीं यह भावना भी काम कर रही होती है कि स्त्री-पाठ का स्वीकार, साहित्य में जेंडर का स्वीकार है। इससे वे डरे हुए हैं। अन्य अस्मितामूलक विमर्श जहाँ अस्मिता को केन्द्र में करके अपनी शर्तें सामाजिक-राजनीतिक-संवैधानिक कारणों से मनवा चुके हैं, वहीं स्त्री के संदर्भ में सत्ता-विमर्श के इन सभी केन्द्रों के साथ-साथ साहित्य में भी मामले को जब-तब संशयमूलक बनाने की कोशिशें की जाती हैं।

उनके अनुसार (हिंदी) साहित्य में स्त्री-लेखन जैसी कोई चीज नहीं होती। यह बड़ा सपाट वक्तव्य है और पिछले एक दशक की हिंदी-आलोचना को देखें तो पाएंगे कि साहित्य में स्त्री-लेखन जैसी चीज कितनी विभाजनकारी है और यह कितनी व्यर्थ की कोटि है- इस विषय पर खूब लिखा गया है। पराकाष्ठा वहाँ दिखाई देती है जहाँ कई स्त्री-आलोचक और लेखिकाएं इस जमात में शामिल हो जाती हैं और वैसी ही सपाटबयानी करती हैं कि स्त्री-लेखन जैसी चीज को नहीं मानतीं, वे स्त्रीवादी नहीं हैं और साहित्य में यह कोटि विभाजनकारी है!
इन लोगों की मुश्किल यहाँ है कि जैसे ही साहित्य में स्त्री-लेखन को स्वीकार करेंगे, पुरुष-लेखन की बात आएगी, यह इसका विपरीतार्थक है। विपरीतार्थकों में ही दुनिया को समझने की दृष्टि तैयार की गई है। यह पूछा ही जाएगा कि क्या पुरुष लेखन जैसी कोई चीज होती है? अगर हाँ, तो किन विशेषताओं के आधार पर उन्हें चिह्नांकित करेंगे? और सच मानिए, आश्चर्य होगा यदि अब तक के हिंदी साहित्य के मुख्यधारा के लेखन से इतर कोई अन्य विशेषताएं गिनवा पाएँ! तो ख़तरा स्त्री-लेखन जैसी कोटि के स्वीकार किए जाने से नहीं पैदा हो रहा बल्कि इसकी रौशनी में उजागर हो जानेवाली पुंस-मानसिकता वाले लेखन और आलोचना से पैदा हो रहा है!
इन आलोचकों से पूछा जाना चाहिए कि रचना, रचना है, मूल्यांकन का आधार रचना ही होनी चाहिए। इसे

महादेवी वर्मा

(कलावादियों और रूपवादियों को छोड़कर) जब खारिज करते हैं और रचना को उसके सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में खोलते हैं तो क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए कि रचना कौन लिख रहा है? किन उद्देश्यों से लिख रहा है? उसका सामाजिक परिवेश क्या है? स्त्री अगर रचना करती है और रचनात्मकता के उन्हीं टूल्स का इस्तेमाल करती है जो पुंसवादी लेखन के टूल्स रहे हैं तो इसका अर्थ क्या हो सकता है? जो तैयार पाठ है, उसे केवल संदर्भ बदलकर स्त्री के कोण से पढ़ना शुरु करें तो क्या अर्थ होगा? यह ठीक है कि लेखक और रचना की अवस्थिति साहित्यिक-ऐतिहासिक संदर्भों में होती है लेकिन उसकी अपनी विशिष्टताओं को खारिज करके या चालाकी से समाहित करके या गौण बनाकर नहीं।

महादेवी के साथ ये आलोचक जो वर्षों की कुंभकर्णी नींद त्यागकर इस विषय पर और पल्ला झाड़ने की गुंजाइश न देखते हुए, जागे हैं, कुछ ऐसा ही सलूक कर रहे हैं। इसका एक नमूना है- 7-8 मई 2007 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दिया गया हिन्दी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह का वक्तव्य।
नामवर जी अपने वक्तव्य का आरंभ ही इस बात से करते हैं कि महादेवी की प्रसिद्धि और इतिहास में उनकी अवस्थिति का आधार ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ पुस्तक नहीं हैं। वे एक चालाक सवाल उछालते हैं, “कल्पना कीजिए कि उन्होंने केवल ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ पुस्तक ही लिखी होती; नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा, अग्निरेखा, सप्तवर्णा जैसे ग्रंथ न लिखे होते, स्मृति की रेखाएँ, अतीत के चलचित्र न लिखी होती तो हिन्दी साहित्य के इतिहास में अथवा भारतीय साहित्य के इतिहास में उनका स्थान क्या होता, कितना होता? पाद टिप्पणी के रूप में होता या अनुक्रम में कहीं होता या पूरा का पूरा अध्याय होता। सोचिए। महादेवी को केवल स्त्री के रूप में निःशेष करना क्या ठीक है? सिर्फ इसलिए कि उन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना की और इसलिए कि उन्होंने महिला शिक्षा में काम किया”।[i]

नामवरजी, सही सवाल उठाने और सही नाम से पुकारने की वकालत करते हैं। हिंदी आलोचना में अन्य क्षेत्रों में उन्होंने यह किया भी है। लेकिन यहाँ वे अपनी पहले से स्थिर धारणा को पुष्ट करने के लिए केवल तर्क जुटा रहे हैं। इस सवाल को जरा पलटकर पूछिए और वक्तव्य के छपे हुए अंशों को पढ़ते हुए आगे बढ़िए, आपको हिंदी के इस मूर्धन्य आलोचक की स्थिर और अचल आलोचना-दृष्टि के दर्शन होंगे। जैसे, “कल्पना कीजिए कि महादेवी ने ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ नहीं लिखी है; नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा, अग्निरेखा, सप्तवर्णा जैसे ग्रंथ ही लिखे हैं, स्मृति की रेखाएँ और अतीत के चलचित्र ही लिखा है तो हिंदी साहित्य के इतिहास में या भारतीय साहित्य के इतिहास में उनको क्या स्थान प्राप्त है, कितना है? पाद टिप्पणी के रूप में है या अनुक्रम में कहीं है या पूरा का पूरा अध्याय है? सोचिए”। अब यहाँ से इस प्रश्न को खोलिए। यह उल्टी कवायद है, पर करिए। तभी आप नामवर जी से भी यह पूछ पाएंगे कि उन्होंने अब तक छायावाद पर लिखी अपनी दो रचनाओं – ‘छायावाद’ और ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ में कितनी जगह महादेवी को दी है? अलग से अध्याय दिया है, विवेचना में केन्द्रित करके बात की है? पाद-टिप्पणी या अनुक्रम में जगह दी है? किसी अन्य रचनाकार को ध्यान में रखकर मुद्दा निर्मित  करके बात करते हुए आनुषंगिक रूप से महादेवी का जिक्र ले आए हैं या ग़ाह-ब-ग़ाह उनकी भी पंक्तियाँ संदर्भ से काटकर पेश कर दी है, अधिकांश जगहों पर बिना नाम तक लिए? यह सवाल नामवरजी से अकेले नहीं समूची हिंदी की तथाकथित मुख्यधारा की आलोचना से पूछा जाना चाहिए। नामवरजी अकेले नहीं हैं, आलोचकों की पूरी जमात है जिनसे यह सवाल किया जाना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि हिंदी आलोचना की इस ʻजग-मग करती आकाशगंगाʼ में बड़े और छुटभैय्ये सितारों में कितनी दूरी है और वैचारिक-सामाजिक संबंध कैसे हैं?

नामवर सिंह

यह आलोचना-दृष्टि पुराने पाठ को पुरानी पड़ चुकी दृष्टि के संदर्भ में ही पढ़ रही है। समय की विवशता है कि आधुनिक नवीनतम दृष्टि से, नए विचारों के संदर्भ में पुराने पाठ को भी खोला जाए। इस प्रसंग में पुराना भी, अगर उसमें क्षमता हो तो नवीन बनता है। उसकी प्रासंगिकता बनती है। इस मुद्रित वक्तव्य में नामवर जी ने कुछ ऐसा नहीं कहा जो  पहले नहीं कह चुके हों। बल्कि अद्भुत विसंगति है कि जगह-जगह ऐसे वाक्य हैं जिनमें स्त्री-आंदोलन, विमर्श और रचना-कर्म को हेय बताने की कोशिश है!  एक शिष्ट आलोचक की विषय के प्रति घृणा बड़े ही प्रकट तरीक़े से व्यक्त हुई है। वे नामवरजी जो अपने व्यवहार में हर एक से सम्मानपूर्वक बात करने के लिए जाने जाते हैं, ‘स्त्री’, ‘स्त्री-पाठ’, ‘स्त्री-संदर्भ’ और ‘विमर्श’ और इन मूल्यों को जीवन में उतारनेवाली प्रबुद्ध स्त्रियों से कितनी चिढ़ रखते हैं कि भाषा की शालीनता विस्मृत कर जाते हैं! एक-आध नमूना देखिए- “फिर भी मैं कहूँगा कि हमलोग कहीं उनको (महादेवी को) सिमोन द बउवार न बना दें, और आज के वातावरण में यह खतरा है।” सिमोन द बुवा का नाम कोई गाली नहीं है, इसे इस रूप में इस्तेमाल किया जाना भाषा में अशालीनता है। आगे देखिए- “उनके (महादेवी के) नाम पर कोई स्त्रीवादी आंदोलन चलाना चाहे तो वो किसी और के नाम पर चला ले, इन्दिरा गाँधी के नाम पर चला ले, मायावती के नाम पर चला ले, लेकिन कम-से-कम बख्शिए महादेवी को।”[ii]

 महादेवी को परंपरा में रखकर देखिए पर उनकी विशिष्टता मत भूलिए।  वह परंपरा कौन-सी है कि महादेवी की तमाम प्रशंसा के बावजूद भी जब स्थान निर्धारण का सवाल आता है तो पहले प्रसाद, निराला ही नज़र आते हैं, इस पर जरूर विचार किया जाना चाहिए।महादेवी के स्त्री संबंधी चिंतन में आधुनिक स्त्री की चेतना के साथ परंपरित स्त्री की चेतना का जो अंतर्द्वंद्व है, उसे देखा जाना चाहिए। भारतेन्दु और उनके युग के लेखकों के अंतर्द्वंद्वों की व्याख्या कर उन्हें आधुनिक युग का निर्माता मानने में संकोच नहीं करते पर महादेवी के  लेखन में पाश्चात्य स्त्री के साथ भारतीय स्त्री की तुलना और भारतीय स्त्री की भिन्न स्थिति के बयान से तत्काल महादेवी की स्त्री संबंधी मूलगामी चिंता को केवल राष्ट्रवाद और छायावाद के दायरे में क़ैद करना और यह कहना कि वे स्त्रीवादी चिंतक नहीं थीं; उनका स्त्रीवाद से लेना-देना नहीं था; उन्हें स्त्रीवादी मत बनाइए- इसे कूढ़मगज़ी ही कहेंगे।

नामवरजी महादेवी के संदर्भ में भाषा और चेतना के स्तर पर जिस तरह की आलोचकीय भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वह वही सांस्कारिक भाषा है जिसका प्रयोग समाज में स्त्री के संदर्भों में होता है। महादेवी  स्त्री की अस्मिता के लिए लड़ीं, अकेलेपन को प्यार किया, इस बात को सिद्ध किया कि स्त्री की दुनिया बड़ी होती है, उसके साथ पूरा संसार चलता है। बड़ी से बड़ी अस्मिता को स्त्री के सत्याग्रह और हठीले प्राण के आगे अपना अहंकार त्यागना होता है, उसके कंपनों का भिखारी बनकर समता की धरातल पर उतरना होता है। स्त्री का संसार महादेवी ने इतना बड़ा बनाया कि ‘मानवी’ स्त्री के लिए प्रचलित सारी व्याख्याएं अपर्याप्त हो गईं। ऐसी उदार, विस्तृत, भावुक लेकिन दृढ़, निर्माण उन्मत्त, स्त्री-छवि महादेवी के यहाँ है जो किसी को भी उदात्तता के दर्शन करा सकती है। और नामवर जी के लिए स्त्री-छवि कैसी है, स्त्री के संदर्भ से संसार को देखने को वे कैसा मानते हैं- यह उनके ही शब्दों में देखिए। वे कहते हैं, “महादेवी को केवल स्त्री के रूप में निःशेष करना क्या ठीक है?”[iii] इसमें दो तरह की अंतर्ध्वनियाँ हैं- एक कि स्त्री के रूप में देखना दुनिया को छोटा करके देखना है और दूसरी कि स्त्रीवादी दृष्टि से केवल स्त्री ही दिखाई देती है। या यह दृष्टि केवल स्त्री से जुड़ी समस्याओं को ही देखती है, उन्हें संसार नहीं दिखाई देता!

दोनों ही पूर्वाग्रह हैं और ग़लत हैं। स्त्री के रूप में देखना न तो दुनिया को छोटा करके देखना है न ही स्त्रीवादी दृष्टि से केवल स्त्री ही दिखाई देती है! यह दुनिया को देखने की एक मुकम्मल दृष्टि है जिसमें स्त्री भी शामिल है। आप सामाजिक विकास की किसी भी अवस्था में ऐसी किसी दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते जिसमें स्त्री शामिल न हो! यह हो सकता है कि कभी कोई पेशा विकासक्रम में लुप्त हो जाए, वर्ग नए उभरें या लुप्त हो जाएं, सामाजिक संरचना में आज के वंचित कल ताक़तवर हों पर स्त्री के बग़ैर कोई समाज बना रहे इसकी कल्पना भी मुश्किल है। स्त्री-पुरुष दोनों इस सामाजिक संरचना के अहम् हिस्से हैं। यह कैसे संभव है कि स्त्री के बिना कलाओं और साहित्य का सृजन होता रहे, भाषा की संरचनाएं विकसित की जाती रहें, समाजिक विभेद की स्थितियों को और मजबूती प्रदान की जाती रहे और उन्हें देखने-बताने पर उसे स्त्री की तरह देखना कहा जाए, स्त्री में निःशेष कर देना कहा जाए! हमारे आलोचक आलोचना में स्त्री की ʻविराट्ʼ छवि, ʻदेवि, माँ, सहचरि, प्राणʼ को महिमामंडित कर सकते हैं लेकिन निजी-व्यवहार और सोच में कहीं फाँक रह जाता है जो स्त्री होने मात्र को हीन मानकर, संकुचित मानकर व्याख्या करता है। नामवरजी के लिए स्त्री का अर्थ है संकुचन जो महादेवी के यहाँ चित्रित स्त्री की छवि से मेल नहीं खाता। वहाँ स्त्री विस्तार है, संकुचन नहीं।

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

नामवरजी के इस भोले प्रश्न पर सिर धुनने का ही मन करेगा कि “महादेवी नारी थीं, लेकिन इसमें उनकी क्या विशेषता थी?” नहीं, कोई विशेषता नहीं थी और अगर “इस विशिष्टता से उनका संपूर्ण काव्य एक तरह से प्रभावित हुआ है”[iv] तो बस इतना ही कि उन्होंने बात कहने के लिए रहस्यवाद की आड़ ली है! यह रहस्यवाद क्या है? जिसका इस्तेमाल रामचंद्र शुक्ल ने सामान्य संदर्भ में और नामवर जी ने स्त्री के विशेष संदर्भ में किया है। यह दरअसल साहित्य में पर्दाप्रथा है जिसका ये लोग महिमामंडन कर रहे हैं कि ये रहस्य की ओट में स्त्री-सुलभ सहज लज्जा है! वास्तविकता यह है कि महादेवी ने स्त्री की बात कहने के लिए किसी आड़ या रहस्य का सहारा लिया ही नहीं है। कविता में विशिष्ट शैली में और विचार तथा संस्मरण साहित्य में स्पष्ट पक्ष रखते हुए स्त्री और उससे जुड़े समाज की आलोचना की है।

रहस्यवाद की बात जिस समय शुक्ल जी ने महादेवी के संदर्भ में उठाई तब उनकी बहुत कम रचनाएं खासकर कविताएं ही ज्यादा प्रकाशित थीं। लेकिन जिस समय नामवरजी कह रहे हैं तो उनके सामने महादेवी की सारी रचनाएं प्रकाशित हैं। महादेवी यथार्थवादी लेखिका हैं, वे लेखन में रहस्यवादी उपकरणों का इस्तेमाल करती हैं लेकिन उनकी अंतर्वस्तु यथार्थवादी है। उनके भाषिक प्रयोग उनकी काव्य-शैली का हिस्सा हैं। वह उनकी अंतर्वस्तु का हिस्सा नहीं है। महादेवी ने स्वयं रहस्यवाद को काव्य विशेषकर गीत की शैली के रूप में ही व्याख्यायित किया है। अपने विचारात्मक निबंध ʻगीति-काव्यʼ में वे लिखती हैं, “छायावाद के गीतों का यथार्थ कभी भाव की छाया में चलता है और कभी दर्शनात्मक आत्मबोध की।

भाव की छाया मनुष्य और प्रकृति दोनों की यथार्थ रेखाओं को एक रहस्यमयता दे देती है”।[v]
जब आलोचना के पास नए संदर्भों की आलोचकीय भाषा न हो तो आलोचना कैसे लड़खड़ाती है, इसका एक   उदाहरण देखिए। “जिस कविता को आप पिघली हुई मोम समझते हैं, उस कविता से प्रकट होता है कि वे कितनी अभिमानिनी थीं? कितनी हठीली थीं? जीने की कितनी चाह थी उनमें? वे लिखती हैं-
कंटकों की सेज जिसकी आँसुओं का ताज
        सुभग हँस उठ खुश प्रफुल्ल गुलाब ही सा
कंटकों की सेज के साथ यह प्रफुल्ल गुलाब जैसी चीज देखना स्त्रीत्व का उदाहरण है। महादेवी के स्त्रीत्व का सबसे बड़ा उदाहरण है उनकी अधिकांश कविताओं में मिलनेवाली श्रृंगारप्रियता। स्त्री सचमुच यदि स्त्री है तो श्रृंगारप्रियता होगी, श्रृंगार रस नहीं कह रहा हूँ, साज-श्रृंगार के अर्थ में कह रहा हूँ”।[vi]

महादेवी अभिमानिनी भी थीं, हठीली भी थीं, जीने की चाह भी थी उनमें; मरना थोड़े ही चाहती थीं! गीतात्मक भावुकता के अतिरेकी क्षणों में भी कहीं उन्होंने सांसारिक कष्टों से ऊबकर आत्महत्या की इच्छा प्रकट नहीं की है! स्त्री तो छोडिए, कौन-सा सामान्य इंद्रिय-बोध वाला मनुष्य अधम होगा जो अभिमानी, हठीला और जीने की चाह से भरा न होगा! नामवरजी महादेवी के स्त्रीत्व के उदाहरण के तौर पर जिन गुणों को रख रहे हैं वे वही परंपरित गुण हैं जिसकी मांग हिंदी भाषी समाज की मध्यवर्गीय आधुनिक परंपरागत मर्द मानसिकता करती रही है। जिसकी एक छवि ʻगोदानʼ में मेहता के माध्यम से प्रेमचंद पेश करते हैं। जिसमें वह स्त्री को क्षमा, त्याग, दया, करुणा, सहनशीलता की देवी मानता है और अपने लिए वैसी ही स्त्री पाना चाहता है।
सहनशीलता और श्रृंगारप्रियता कोई स्त्री के निजी गुण नहीं होते। एकतरफा सहनशीलता कोई गुण नहीं हो सकती। यह तो जीने के लिए परिस्थितियों से समझौता है, क्या नामवरजी इसे नहीं जानते?  निन्यानबे फीसद स्त्रियाँ सहनशीलता के गुण का प्रदर्शन इसलिए करती हैं कि वे जीना चाहती हैं! सहनशीलता के कई रूप होते हैं। केवल गोल-मोल शब्द ʻदुखʼ के प्रति ही नहीं, कायिक-वाचिक हर तरह की हिंसा के प्रति सहनशीलता, विपरीत सभा-समूह में बने रहने के लिए आचारजनित सहनशीलता, अस्तित्व को येन-केन-प्रकारेण बचाए रखने के लिए अतिरिक्त श्रमजनित सहनशीलता – न जाने इस तरह सहनशीलता के कितने प्रकार होंगे जिनका व्यवहार स्त्रियां रोजाना करती हैं। यहाँ तक कि समाज की संवेदनाओं और संवैधानिक स्थितियों के बदलने की प्रतीक्षा में अपनी सहनशीलता को रचनात्मक बनाए रखने की प्रक्रिया भी एक भिन्न किस्म की हठी संवेदनशीलता की मांग करती है! स्त्री के इन गुणों की प्रशंसा, बिना समुचित संदर्भ में रखे करना, इस सहनशीलता की सही व्याख्या नहीं हो सकती। समुचित संदर्भ स्त्री का संदर्भ ही होगा, यह कहने में परहेज नहीं है।

 “स्त्री सचमुच यदि स्त्री है तो श्रृंगारप्रियता होगी, श्रृंगार रस नहीं कह रहा हूँ, साज-श्रृंगार के अर्थ में कह रहा हूँ”। और “इस दुनिया में फूलों से, रंगों से भरे इस जगत में इसके बिना इस सौन्दर्य के बिना वे सूखी काठ कठोरी, किसी आर्यसमाजी महिला के समान दिखने लगेंगी। लोगों ने उनकी (महादेवी) की ऐसी छवि बनाई है जैसे वे किसी आर्यसमाजी अनाथालय की महिला हों या गाँधी आश्रम में सूत कातने वाली हों”।[vii] यहाँ फिर आलोचकीय दृष्टि का झोल नज़र आता है। नामवर जी यह तो ठीक कह रहे हैं कि छवि बनाई जाती है लेकिन वह यह भूल रहे हैं कि जिस साज-श्रृंगार को स्त्री से जोड़ रहे हैं और सजी हुई स्त्री की बात कर रहे हैं, वह भी एक बनाई हुई छवि है, सहज नहीं है! इसमें स्त्री को सदियों क़ैद रखा गया है। स्त्री माने सुंदरता, स्त्री माने कोमलता, स्त्री माने कलात्मकता, स्त्री माने कमनीयता, स्त्री माने रमणीयता – यह सारी धारणाएं क्या समाज के द्वारा स्त्रीत्व की पैमाइश के रूप में गढ़ी हुईं नहीं हैं? ʻसुंदरʼ (कमनीय) स्त्री जितनी आकर्षक लग सकती है, सुंदर (कमनीय) पुरुष भी उतना ही आकर्षक लग सकता है। यह दैहिक सौंदर्य है जिसकी नामवर सिंह स्त्री के संदर्भ में चर्चा कर रहे हैं और स्त्रीत्व का गुण बता रहे हैं। सूत कातने वाली, सादा साड़ी पहननेवाली, सादगी से रहनेवाली स्त्री असुंदर हो जाती है, ऐसा मान लें तो कहना पड़ेगा कि हमारी आलोचना, आलोचकीय भाषा और चेतना के स्तर को एक और प्रेमचंद की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी जो यह कह सके कि खेत की मेंड़ पर पसीना बहानेवाली स्त्री भी सुंदर है!

ध्यान रखना चाहिए कि नामवर जी यह सब महादेवी की रचना में आए किसी पात्र के लिए नहीं बल्कि स्वयं महादेवी के लिए, एक पढ़ी-लिखी, प्रबुद्ध, संवेदनशील और व्यावहारिक स्त्री के लिए कह रहे हैं!  आलोचकीय व्याख्या के इस पिछड़ेपन का संबंध पिछड़ी सामाजिक चेतना से है, जो आलोचक की दुनिया है। जो भाषा में सुंदर और भदेस सौंदर्य की खोज स्त्री के संदर्भ में पिछड़ी सामाजिक चेतना के स्तर से कर रहा है। जो यह मानकर चलता है कि सुंदरता स्त्री के स्त्रीत्व को तय करती है और जिसका संबंध साज-श्रृंगार से है! इसके पीछे कहीं अकेली बौद्धिक स्त्री की रूढ़ सामाजिक छवि भी काम कर रही है। जो यह मानती है कि अकेली, पति से अलग रहने वाली, मातृत्व से वंचित, स्व-निर्भर बौद्धिक स्त्री के व्यक्तित्व से सारी कोमलताएं, सारा आकर्षण खत्म हो जाता है। वह खड़ूस और शुष्क क़िस्म की महिला बन जाती है! हमारा आलोचक बताना चाहता है कि महादेवी शुष्क और खड़ूस नहीं थीं। उन्हें रंगों से प्यार था, वे रंगीली थीं!  क्या इस तरह से महादेवी के व्यक्तित्व और उनकी कविता में आए रंगों की व्याख्या हो सकती है? महादेवी स्वयं सौंदर्य के तमाम बाहरी उपकरणों का निषेध एक नहीं अनेक जगह करती हैं। झूठ और दिखावे से उन्हें नफरत है। सौंदर्य- प्रज्ञा, व्यवहार, विचार के स्तर से तय होगा न कि साज-सिंगार से? स्त्री साज-श्रृंगार के बिना हो ही नहीं सकती, इस तरह का वक्तव्य सामाजिक फैक्टरी में स्त्री के निर्माण की विशेष अर्हताओं को तय करता है! साथ ही यह स्त्री-पाठ को पढ़ने में हिंदी की परंपरित आलोचना दृष्टि की दरिद्रता को भी खोलता है। जरा महादेवी के शब्दों को भी ध्यान में रखें, जो वह पश्चिम की आर्थिक रूप से निर्भर लेकिन प्रसाधन प्रिय स्त्री के लिए कह रही हैं- “स्त्री वहाँ आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र हो चुकी है, अतः सारे सामाजिक बंधनों पर उसका अपेक्षाकृत अधिक प्रभुत्व कहा जा सकता है। उसे पुरुष के मनोविनोद की वस्तु बने रहने की आवश्यकता नहीं है, अतः वह चाहे तो परंपरागत रमणीत्व को तिलांजलि देकर सुखी हो सकती है। परन्तु उसकी स्थिति क्या प्रमाणित कर सकेगी कि वह आदिम नारी की दुर्बलता[viii] से रहित है? संभवतः नहीं। श्रृंगार के इतने संख्यातीत उपकरण, रूप को स्थिर रखने के इतने कृत्रिम साधन, आकर्षित करने के उपहास-योग्य प्रयास आदि क्या इस विषय में कोई संदेह का स्थान रहने देते हैं? यदि पुरुष को उन्मत्त कर देनेवाले रूप की इच्छा नहीं मिटी, उसे बाँध रखनेवाले आकर्षण की खोज नहीं गई तो फिर नारीत्व की ही उपेक्षा क्यों की गई, यह कहना कठिन है”।[ix]
“….आज उसे अपने रूप, अपने शरीर और अपने आकर्षण का जितना ध्यान है, उसे देखते हुए कोई भी विचारशील, स्त्री को स्वतंत्र नहीं कह सकेगा”।[x]

महादेवी के लेखन में स्त्री-संबंधी चिंतन के दो छोर मिलते हैं। उन्होंने अपने चिंतन का विकास निजी और सामाजिक अनुभवों के आधार पर किया है। सामाजिक विकास का गंभीर अध्ययन इसमें शामिल है। सामाजिक परंपरा का विवेचन करना और परंपरा के भीतर स्त्री को रखकर देखना और उसकी दुर्दशा की व्याख्या करते हुए समाज की सत्ता-संरचानाओं को चुनौती देना, उनकी आँख में उँगली डालकर दिखाना कि देखो तुमने क्या किया है, महादेवी के स्त्री-चिंतन की विशेषता है। लेकिन इसका एक और पक्ष है जो दुर्बल है। वह है इन्हीं परंपराओं में स्त्री की मुक्ति की तलाश करना।

जयशंकर प्रसाद

महादेवी की स्त्री-संबंधी विवेचना का सार यह है कि स्त्री के पास जो है उसे खोकर अपनी हीन दशा से ऊपर उठने और समाज में सम्मान पाने की स्पर्द्धा में पुरुषों की तरह सारी प्रकृतिजनित कोमल भावों का त्याग कर अपने को असंवेदनशील और कठोर बनाना; स्त्री की मुक्ति का रास्ता नहीं हो सकता। पश्चिम की स्त्रियों ने शिक्षा आदि को पहले प्राप्त कर अपनी दीन दशा से मुक्ति के प्रयास में ऐसा किया है और प्रकृति से विकृति की ओर गई हैं। उनसे सीखना चाहिए। जो है उसे, जो नहीं है उसे पाने के लिए खो देना और पुनः खोए हुए को पाने की कोशिश करना; अपार ऊर्जा को नष्ट करनेवाला है।

जिसे हमारे आलोचक भारतीय स्त्रीवाद की परंपरा कह रहे हैं और पूरब-पश्चिम की श्रेष्ठ-हीन युग्मों में रखकर देखने की कोशिश कर रहे हैं उनसे यह पूछा ही जाना चाहिए कि महादेवी के स्त्री-संबंधी चिंतन में वे किन विशेषताओं को ढूँढ़कर उन्हें पश्चिम से अलग और श्रेष्ठ भारतीय परंपरा में बता रहे हैं? महादेवी की स्त्री-संबंधी चिंता से यह कहीं नहीं ध्वनित होता कि वे पिछड़ी हुई औरत को जो रमणी, परनिर्भर, साज-श्रृंगारवाली है, पसंद करती हैं! वे कोमल और श्रेष्ठ को जो स्त्री के पास पहले से है, बचा लेने की बात करती हैं। आज के समय में यह अकेले स्त्री का दायित्व हो सकता है, ऐसा भी महादेवी का मानना नहीं है। यह एक सामाजिक-राष्ट्रीय दायित्व है। यह समाज का दायित्व है कि वह स्त्री के कोमल और श्रेष्ठ का सम्मान करे; उसे नीचा न दिखाए; कमजोर और दुर्बल कहकर उसकी उपेक्षा न करे। अपनी समस्त कोमलता और श्रेष्ठता के साथ यदि स्त्री को बराबर सामाजिक भागीदारी और सम्मान मिलता है, उसके सार्वजनिक स्पेस को कम नहीं किया जाता; उसकी बुद्धि और मेधा पर पाबंदियाँ नहीं बिठाई जाती तो समाज की स्वस्थ उन्नति को कोई रोक नहीं सकता। महादेवी का जोर है कि प्रकृति ने स्त्री को विशिष्ट जैविक क्षमता दी है उसके कारण उसमें कुछ श्रेष्ठ मानवीय गुणों का तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा स्वाभाविक विकास हुआ है। पुरुष की बराबरी और अपने को साबित करने की स्पर्द्धा में स्त्री को इन गुणों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। इस संदर्भ में अपनी बात स्पष्ट करने के लिए वे बार-बार पश्चिम की स्त्रियों का उदाहरण देती हैं। पश्चिम की स्त्री-मुक्ति का संदर्भ उनके लिए गाली नहीं है ना ही महादेवी की यह समझ है कि भारतीय स्त्री की मुक्ति का दुनिया से विरला, कोई रास्ता होगा!

महादेवी के स्त्री-संबंधी चिंतन पर ग़ौर करें तो पाएंगे कि वैश्विक परिदृश्य में रखकर ही वे भारतीय स्त्री की मुक्ति की बात कर रही हैं। उनकी कविताओं से लेकर लेखों और स्मृतिचित्रों तक, स्त्री-मुक्ति का एक ही वितान बनता है। उनकी कविताओं के अंदर आए शब्दों को, भावों को, विचार-बिंदुओं को तब तक नहीं समझ सकते जब तक कि उनके लेखों की विचार-सरणियों से परिचित न हों। महादेवी बार-बार स्त्री के उदात्त मानवीय गुणों को बनाए रखने पर बल दे रही हैं। लेकिन इसे स्त्री की हीनावस्था की एवज में बनाए रखने नहीं कह रहीं। भारतीय स्त्री से उनकी मांग है कि वह सामाजिक परिस्थितियों को समझे, अपनी हीन अवस्था से ऊपर आने के लिए संघर्ष करे, लेकिन संघर्ष को ही लक्ष्य न बना ले। दो बड़ी ही महत्वपूर्ण चीजों की माँग समस्त स्त्री जाति और विशेषकर भारतीय स्त्री से महादेवी करती हैं। पहली है, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की और दूसरी है, पुरुष की स्वार्थपरता के विस्मरण की! यह आह्वान उनका जागृत स्त्रियों से है जिन्हें अपनी अवस्था का ज्ञान नहीं है, उन स्त्रियों को वे इससे दूर रखती हैं। यह दोनों अवधारणाएं विश्व के स्त्रीवाद को भारतीय स्त्री-मनीषा की देन है। यह स्त्रीवाद की पश्चिमी अवधारणाओं से भिन्न अवधारणा है। स्त्री-चेतना को भी रूढ़ जकड़बंदियों से निकालने की जरूरत है। महादेवी ने यह काम अपने स्त्री-चिंतन के जरिए किया है।

नामवर जी महादेवी का मूल्यांकन करने के लिए लोक-जागरण, राष्ट्रीय जागरण से लेकर नवजागरण तक की परंपरा को टटोलते हैं। लोकजागरण की परंपरा में जैसे कबीर, जायसी, सूर, तुलसी और मीरा हैं, उसी तरह छायावाद में प्रसाद, निराला, महादेवी, पंत हैं। सवाल है कि इस नवजागरण का कोई स्त्री-संदर्भ बनता है कि नहीं? स्त्री-लेखिका का स्त्री की परंपरा में रखकर मूल्यांकन होना चाहिए। लेकिन नामवर जी ऐसा नहीं करते। नामवरजी महादेवी के लेखन और विचारों का महत्व न समझते हों या जानबूझकर छिपा रहे हों ऐसा नहीं है, लेकिन परंपरा के मूल्यांकन की जो पद्धति चुनते हैं, उनमें महादेवी के लेखकीय सरोकार कमतर नज़र आते हैं, उनका विस्तार छोटा नज़र आता है।

नामवर जी महादेवी की परंपरा ‘हमारी पूरी परंपरा में’[xii] तलाश रहे हैं! सवाल है कि जिस परंपरा की बात कर रहे हैं, क्या वह समावेशी है? इस परंपरा के अंदर और बाहर रखे जाने के पैमाने क्या रहे हैं? क्या इसमें स्त्री सामान्य रूप से शामिल है, या अपवादस्वरूप कहीं कहीं नज़र आती है। समूचे हिंदी साहित्य में आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिककाल के आरंभिक डेढ़ सौ सालों में कितनी स्त्री रचनाकार ‘हमारी पूरी परंपरा में’ शामिल हैं? नामवर जी भी परंपरा के विवेचन के क्रम में भक्तिकाल के चार सौ साल बाद की यात्रा करके आधुनिक काल और छायावाद फिर महादेवी तक पहुँचे! जिस परंपरा में इतना अंतराल और झोल हो उस पर संदेह होता है। किसी रचनाकार का मूल्यांकन परंपरा में रखकर करना परंपरा की भी पड़ताल करना हो सकता है, इस पर सोचने की जरूरत है।
महादेवी को परंपरा में रखकर विश्लेषित करने के लिए नामवर जी सारे ऐसे संदर्भों का इस्तेमाल करते हैं जो महादेवी से सीधे नहीं जुड़ते। मूल चीज यह है कि महादेवी पितृसत्ता विरोधी दृष्टि से देखती हैं और नामवर जी के यहाँ यह शब्द पाद-टिप्पणी में भी नहीं आया है। महादेवी की या छायावाद के किसी भी रचनाकार की आलोचना के क्रम में वे पितृसत्ता का नाम तक नहीं लेते! दूसरी बात कि नामवर जी ने इस वक्तव्य में परंपरा की पड़ताल और महादेवी की उसमें अवस्थिति को देखने के लिए विवादित मुद्दों की तरफ देखा ही नहीं। वे छायावाद के फॉरमेट पर बात कर रहे हैं उसकी अंतर्वस्तु पर बात ही नहीं कर रहे। अंतर्वस्तु पर अगर विस्तृत चर्चा करते तो यह बताना पड़ता कि महादेवी को जब वे प्रगतिशील, अग्रसोची और क्रांतिकारी कह रहे हैं तो किन अर्थों में? कहाँ उनकी क्रांतिकारिता दिखाई देती है और क्यों?

नामवर जी महादेवी के विशिष्ट अवदान को रेखांकित करने की बात कहते हैं। उनकी प्रगतिशील विचारों को भी नोटिस लेते हैं, ‘जहाँ तक जीवनदृष्टि का सवाल है, जीवनदृष्टि में अपने विचारों में महादेवी प्रगतिशील थीं।….वे बहुत अग्रसोची थीं, क्रांतिकारी थीं। निराला से भी अधिक’।[xiii] लेकिन बिना यह स्पष्ट किए कि वे स्थल कौन से हैं, वह दृष्टि कौन-सी है जो महादेवी को इस चेतना से संपन्न बनाती है;  वे साहित्यिक परंपरा में श्रेष्ठता की कसौटी गढ़ने लगते हैं। महादेवी के बारे में मूल्यांकन के तमाम  सकारात्मक वाक्यों के बाद भी वे जब स्थान तय करने की बात आती है तो वे प्रसाद को पहला, निराला को दूसरा तथा महादेवी को तीसरा स्थान देते हैं! इसके लिए कई अजीब तर्क देते हैं। लेखन और उम्र का सह-संबंध, लेखकीय उम्र और भौतिक उम्र, परिमाणमूलक और गुणवत्तामूलक लेखन, प्रकाशन में सचेत चयन आदि की बात करते हैं। ये सब चित्र-विचित्र पैमाने वे रचते हैं सिर्फ अपने प्रिय लेखक प्रसाद, निराला को बड़ा बताने के लिए! सोचने की बात है कि आज का संदर्भ प्रसाद-निराला से बन रहा है या महादेवी से! महादेवी की सीमा और अंतर्विरोधों को देखने के साथ-साथ इन रचनाकारों की सीमाओं और अंतर्विरोधों को भी देखा जाना चाहिए।

1955 में लिखी गई पुस्तक ‘छायावाद’ के विभिन्न अध्यायों में महादेवी की आनुषंगिक चर्चा है। यहाँ तक कि ‘छायावाद’[xiv] में स्त्री और प्रेम के रूपायन पर लिखा गया पूरा का पूरा अध्याय महादेवी के यहाँ व्यक्त स्त्री और प्रेम के स्वरूप की चर्चा से रहित है। पूरे अध्याय में युगीन परिस्थितयों का जिक्र है, स्त्री की पहले से भिन्न स्थिति का जिक्र है, प्रेम के चित्रण के संदर्भ में प्रसाद, निराला और पंत का जिक्र है, लेकिन महादेवी कहीं नहीं हैं! यह चौंकानेवाली बात नहीं लगती कि जिस महादेवी ने प्रेम के संबंध को ही अपनी कविता का आधार बनाया हो, उसके विभिन्न भावों के चित्रण के सहारे स्त्री मन की कथा कही हो, स्त्री की तत्कालीन सामाजिक अवस्था का इतना प्रतीकात्मक और शानदार काव्य-चित्र खींचा हो और यदि किसी को संदेह हो तो स्पष्टता के लिए सन् 1931 से लेकर 1937 तक विभिन्न समय में ‘चांद’ के संपादकीय के रूप में लेख लिखा हो जो बाद में 1942 में ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ नाम से प्रकाशित हुए हों ; वह आलोचक की निगाह से स्त्री की अवस्था और प्रेम पर लिखते हुए ओझल रहती है! यह स्पष्टता से कहे  जाने की जरूरत है कि महादेवी के स्त्री-संबंधी लेखों का समय छायावाद का काल ही है, उससे बाहर नहीं। नामवर जी छायावाद के अंदर आए बदलाव को, स्त्री की स्थिति में परिवर्तन को भिन्न दृष्टि से देख रहे हैं और यह भी कि सिर्फ परिवर्तन को ही देख रहे हैं! जबकि महादेवी परिवर्तन और स्त्री की सामाजिक स्थिति की पड़ताल अपने लेखों में करती हैं और उसीके काव्यात्मक भाव और स्वरूप का चित्रण अपनी कविता में कर रही हैं। उनकी कविता में चित्रित प्रेम और स्त्री चरित्र के प्रसंग में आए बहुत से ‘क्यों’ का जवाब उनके लेखों में मिल जाएगा। जबकि नामवरजी पुंसवादी दृष्टि से स्त्री की सामाजिक हैसियत और काव्यात्मक चित्रण को देख रहे हैं। नामवरजी छायावाद में स्त्री की बदली हुई, पहले से ज्यादा मुक्त स्थिति को देख रहे हैं पर स्त्री को क्या उतना ही चाहिए था कि द्वेदी युगीन दयाभाव से आगे थोड़ी सी मेल-जोल की स्वतंत्रता मिल जाए? क्या इतने भर से किसी को उस समाज में स्त्री की दशा पर संतोष हो सकता था? छायावाद में स्त्री-पुरुष का स्वच्छंद मेल और चित्रित प्रेम के निजी और अनुभूतिपरक होने का कारण तो इस तर्क से ढूँढ़ा जा सकता है लेकिन इसके बाद क्या? क्या स्त्री बस इतने पर निःशेष हो जाती है? उसके आंतरिक और बाह्य द्वंन्द्व क्या है? सामाजिक असमान स्थितियों में क्या वह अपनी इतनी भर भूमिका से संतुष्ट है? प्रसाद, पंत, निराला की कविताओं में इन बातों का जवाब नहीं मिलेगा। इनका जवाब केवल महादेवी की कविता में है। महादेवी बहुत साफ कहती हैं, “समाज में व्यक्ति का सहयोग और विकास की दिशा में उसका उपयोग ही उसके अधिकार निश्चित करता रहता है और इस प्रकार, हमारे अधिकार, हमारी शक्ति और विवेक के सापेक्ष रहेंगे”।[xv]

स्त्री की शक्ति को जागृत करके परिस्थितियों में साम्य लाने वाली सफलता संभव करना महादेवी का काम्य है जबकि जागृत स्त्री की कामना छायावाद के कवियों में नदारद है। हमारा आलोचक तो जागृत स्त्री की वाणी को रहस्यवाद की उलझी-अटपटी वाणी ही बना डालना चाहता है। महादेवी की कविता की सीमा बताते हुए पूरे डेढ़ पन्ने खर्च कर, उन्हें और उनकी कविता दोनों को बहुत सीमित करके नामवर जी ने देखा है। काव्य की सीमा बतलाते हुए भी वह नारी को न्यून (कमतर) अर्थ में ही घटित करके देखते हैं। अपने महादेवी संबंधी अद्यतन वक्तव्य में जहाँ वे महादेवी को स्त्री के रूप में निःशेष कर देने से आगाह करते हैं, वहाँ भी और इस उद्धरण में भी, स्त्री का अर्थ न्यून और नकारात्मक ही है, “ महादेवी की प्रतिक्रिया एक नारी की तरह घर की सीमा में ही हुई। परंतु उनकी भी आरंभिक रचनाओं में जो भावुक असंतोष और तीव्र पीड़ा मिलती है, वह अंत तक जाते-जाते बौद्धिक परितोष में शमित होने लगी।”[xvi]

छायावाद पुस्तक का जो अध्याय-विभाजन है, वह अद्भुत रूप से बहिष्कारमूलक है! पहले अध्याय से लेकर ग्यारहवें अध्याय के पहले  तक कहीं भी महादेवी के लेखन पर एकाग्रता से न्यूनतम ही लिखा गया है। छायावादी निजता की बात हो, प्रकृति की बात हो, प्रेम और स्त्री की बात हो, जागरण की बात हो, कल्पना की बात हो- महादेवी की काव्य-विशेषता का जिक्र नहीं किया गया है। निजता, प्रकृति, प्रेम, स्त्री की सामाजिक स्थिति आदि स्वयं स्त्री के लिए क्या अर्थ रखते हैं, इस पर ध्यान नहीं दिया गया है। महादेवी का जिक्र पूरी पुस्तक में जहाँ आया है, वे तीन महत्वपूर्ण स्थल हैं। रहस्यवाद के संदर्भ में महादेवी का जिक्र रामचंद्र शुक्ल पहले ही कर गए थे, नामवर जी ने भी किया है और महादेवी के रहस्यमय असीम को आत्म-विस्तार की इच्छा से जोड़ा है।[xvii] दूसरा स्थल है रूप-विन्यास के संदर्भ में महादेवी की कविता में चित्रमयता की चर्चा का।[xviii] तीसरा, जहाँ सबसे ज्यादा विस्तार से महादेवी की कविता का विश्लेषण किया गया है, वह स्थल है छायावादी कविता की सीमा और उसका पराभव बताने वाला। दिलचस्प यह है कि नामवर जी की इस विवेचना में महादेवी के लिए कहे गए उनके दो-चार सकारात्मक वाक्य भी नकारात्मक अर्थ ले लेते हैं। मसलन, वे कहते हैं कि महादेवी की कविता में आया असीम आत्म-विस्तार का द्योतक है। अन्यत्र कहते हैं कि महादेवी की कविता घर की सीमा में ही बंद है। “जो दीप पत्थर की कठोर दीवारों से बने हुए मंदिर में घिरा हो, उसका जीवन सांसों की समाधि न हो जाए तो क्या हो?”[xix]

आश्चर्य यह है कि नामवर सिंह की कौन सी सीमा है जिसके कारण आज तक वे महादेवी की कविता के सशक्त पक्षों को देखकर भी नहीं देख पा रहे हैं? महादेवी की कविता में यथार्थ का आग्रह है। यहाँ तक कि रहस्यवाद भी; असीम-अनंत का जिक्र भी; यथार्थ है। नामवर जी ने स्वयं इस चीज को लक्षित किया है और कहा है कि “महादेवी के अंतिम गीत भी यथार्थ का गहरा पुट लिए हुए हैं। प्रसाद और पंत की तरह उनमें आदर्श अथवा सुखद लोक में पलायन करने की भावना नहीं है। भारतीय नारी आखिर भागकर जा ही कहाँ सकती है?”[xx] यह वाक्य और यह दृष्टि, कितनी सहज लग रही है! कविता घर की चारदिवारी में लिखी, क्योंकि भारतीय नारी थीं! रहस्य के आवरण में यथार्थ का चित्रण किया क्योंकि उपाय न था, भारतीय नारी थीं! और जीवन में दुख, वेदना, अवसाद के बाद भी पलायन नहीं कर सकीं, क्योंकि भागकर जाती कहाँ, भारतीय नारी थीं! यह अद्भुत आलोचना है एक ‘भारतीय मर्द’ आलोचक की!

 आप ज़रा ध्यान कीजिए, छायावाद के अंतर्विरोधों की और उसकी कमियों की तरफ। सहज रूप में जो तीन-चार बातें तत्काल ध्यान में आएंगी- छायावाद का अतीत-प्रेम जिसका अंत पुनरूत्थानवाद में होता है; छायावाद के अंदर रहस्यवाद की भावना और छायावाद का पलायनवादी स्वर। इन सारी कोटियों पर महादेवी की कविता को कसकर देखिए, अन्य कवियों को भी रखिए और फिर बताइए कि महादेवी कहाँ ठहरती हैं और बाकि के कवि कहाँ! विस्तार से व्याख्या में न जाते हुए, मोटे तौर पर देखिए तो महादेवी के यहाँ अतीत का आग्रह नहीं है। उनके रहस्य के आवरण में यथार्थ का सबसे परिचित चेहरा व्यक्त हुआ है। महादेवी के यहाँ दुख है, वेदना है, पीड़ा का संसार है, अवसाद है लेकिन अक्षत संकल्प भी है। संकल्प और जीजिविषा की ऐसी गहरी टेक किसी अन्य छायावादी कवि में नहीं है। इन सारी चीजों को पहचानकर भी इन पर बात न करना; अन्य कवियों के यहाँ जो चीज ग़ायब है, उस पर पर्दा डालना, ओझल करना और फिर परंपरा में स्थान तय करना अपने आप में विडंबनापूर्ण है।

[i] सिंह, नामवर, महादेवीः प्रगतिशील और क्रांतिकारी, शाही, सदानंद (सं), साखी, महादेवी वर्मा अंक, वाराणसी, अंक 24, मार्च 2014, पृ 17

[ii] वही, पृ. 17 और 21

[iii] वही, पृ. 17

[iv] वही, पृ.17

[v] महादेवीः प्रतिनिधि गद्य-रचनाएँ, गीति-काव्य शीर्षक निबंध, पांडेय, रामजी पांडेय (संकलन-संपादन), भारतीय ज्ञानपीठ, सातवाँ संस्करण,2008, पृ. 138

[vi] सिंह, नामवर, 24 मार्च, 2014, पृ. 19

[vii]  सिंह, नामवर, 24 मार्च, 2014, पृ. 19-20

[viii] वह आदिम नारी जिसने अपने समर्पण, आत्मनिवेदन और आकर्षण में बाँधकर पुरुष को पराभूत कर डाला था। देखिए, महादेवी, युद्ध और नारी शीर्षक निबंध,2008, पृ.236

[ix] महादेवी, आधुनिक नारी, 2008, पृ. 247

[x] उपरोक्त, पृ.248

[xi] आधुनिक नारी, महादेवी, 2008, पृ. 249

[xii] सिंह नामवर, 24 मार्च 2014, प. 21

[xiii] उपरोक्त, पृ.25

[xiv] सिंह, नामवर, देवि माँ सहचरि प्राण, छायावाद(1955), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1990

[xv]  महादेवी, श्रृंखला की कड़ियाँ (1942), भूमिका, लोकभारती पेपरबैक्स, 2012

[xvi] सिंह, नामवर, जिसके आगे राह नहीं, छायावाद, 1990, पृ 146

[xvii] देखिए, सिंह, नामवर, एक कर दे पृथ्वी-आकाश, छायावाद, 1990, पृ 30

[xviii] वही, पृ.101

[xix] वही, पृ. 146

[xx] वही, पृ.147
(यह आलेख ज्ञानरंजन जी के संपादकत्व में निकलने वाली पत्रिका ‘पहल’-99 में छपा है।)

कैफी आज़मी इप्टा सांस्कृतिक केंद्र ,पटना का उदघाटन किया शबाना आज़मी ने

निवेदिता 


एक लंबे समय के बाद आखिरकार कलाकरों के पास एक ऐसी जगह हुई जहां वे अपनी कला का विस्तार कर सकते हैं।’ कैफी आज़मी इप्टा सांस्कृतिक केन्द्र’ का बनना संस्कृति के सामुहिक चेतना का विस्तार है। आज के काले दौर में इसकी जरुरत इसलिए भी है कि कलाकार सृजन कर सके। कैफी आजमी को इस बात का गिला हमेशा रहता था कि इप्टा के पास अपनी कोई जगह नहीं है। यह त्रासदी है कि आजादी के पहले जिस सांस्कृतिक संगठन ने जन्म लिया  और देश में सांस्कृतिक आंदोलन को दिशा दी आज उस संगठन के पास अपनी कोई जगह नहीं थी.  पटना का यह  ‘कैफी आज़मी’ सांस्कृतिक केन्द्र वाहिद जगह है जो इप्टा की है,  जो  संघर्ष,गुलामी  और उससे मुक्ति का सर्जक ही नहीं बल्कि वह उस संस्कृति का वाहक है , जहां वे यह कहते हैं ‘इप्टा की असली नायक जनता है’।

मशहूर अभीनेत्री शबाना आज़मी का यहां आना इप्टा के सांस्कृतिक केन्द्र का उद्घाटन करना भी मायने रखता है। शबाना आज़मी कहती हैं, ‘  ऐसी जगह की अहमियत इसलिए भी है हम सामाजिक बदलाव के लिए इसका इस्तेमाल कर सकें।  हम दुनिया कोे अपनी तारीख के बारे में बता सकें। हम बताएं की हमारी जड़ें कहां है! हम प्रकृति हैं, अतीत हैं,हम परंपरा हैं।’  यह मौका था जब एक अभिनेत्री के साथ लोग रु-बरु थे। जहां बाॅलीवुडके स्टारडम से अलग शबाना  यह बता रही थीं की ‘ कोई भी कला एकांत में नहीं पनपती। एक महान कला को लोगों से जुड़ना ही होगा। अगर मैं किसी लक्ष्मी का किरदार कर रही हूं तो मुझे जानना होगा कि लक्ष्मी किस तरह जीती है? इप्टा ने यही सिखाया। कला जीवन के लिए। मैं छुटपन से ही इप्टा से जुड़ी थी। सिनेमा में आने के बाद भी मैंने रंगमंच को जीवन से अलग नहीं किया। इप्टा में शामिल होने के लिए काफी मेहनत की। उन दिनों एम. एस सथ्यू इप्टा में थे। हम उनके साथ नाटक में जुड़ना चाहते थे। जब हमने कहा कि मुझे इप्टा में शामिल कर लें तो उन्होंने कहा तुम फिल्म करती हो। क्या भरोसा कि तुम्हें किसी नाटक में लें और किसी फिल्म का आॅफर मिले तो तुम भाग जाओ। उन्होंने कहा अगर तुम लगातार 15 दिनों तक सुबह 6 बजे आओ तो हम विचार कर सकते हैं। मैं लगातार 15 दिनों तक 6 बजे सुबह इप्टा आॅफिस जाती रही , फिर मुझे मौका मिला इप्टा सदस्य बनने का।’

 शबाना  ने बताया कि  इप्टा उनकी जिन्दगी में क्या मायने रखता है। उन्होंने कहा , ” इप्टा सिर्फ रंगमंच नहीं है विचार है। ऐसा विचार जो कला के माघ्यम से दुनिया को बदलना चाहती है। इसलिए यह जरुरी है कि दुनिया की महान कलाओं के साथ खड़े रहने के लिए हम जानें दुनिया में क्या कुछ बदल रहा है। मैंने अब्बा से एक बात जाना -वे कहा करते थे तुम जो काम कर रही हो उसपर यकीन होना चाहिए। यह जरुरी नहीं है कि तुम्हारे जीवन में ही बदलाव दिखे। पर यह यकीन करना की जो काम कर रही हो उससे दुनिया के हालात जरुर बदलेंगे। शायद यही वजह थी कि अब्बा अपने अंतिम दिनों में अपने गांव चले गए। जबकि फालिज के असर के कारण वे चल नहीं पाते थे। ” शबाना कैफी को याद कर रही थीं और अतीत जैसे हमसब के सामने साबूत खड़ा था। जैसे कैफी कह रहे हों, ‘ उठ मेरी जान !

सच तो यह है जब अछूत,शोषणग्रस्त जाति कला रचती है, तो उसमें सच्ची आग,क्रांति और तड़प होती है,इसकी जिंदा मिसाल इप्टा का वह दौर है , जब कला अपने चरम पर थी।  इप्टा  संभ्रांतों के संवेदना से अलग अपनी करुणा, विद्रोह और विचार से कला को आंदोलित कर रहा था। आज फिर से कला को उस उंचाई पर ले जाने की जरुरत है । कला एक निरंतर खोज है। खोज के खतरे हैं,पर इन खतरों के साथ ही कला आगे बढ़ती है।

हिन्दी पाठ्यपुस्तकों में स्त्री छवि

कमलानंद झा

कमलानंद झा केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिहार में हिन्दी अध्ययन के विभागाध्यक्ष हैं. इन्होने पाठ्यक्रमों की सामाजिकी पर शोध किया है : मोबाइल : 08521912909

( कमलानंद झा इस आलेख में एन सी आर टी की पुस्तकों के हवाले से यह पड़ताल कर रहे हैं कि किस प्रकार हमारे बच्चों को बचपन से ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लिए अनुकूलित किया जाता है .) 
अन्य अनुशासनों में शोध और अनुसंधान की स्थिति और गति क्या है, मैं नहीं जानता। किन्तु हिंदी में शोध की गुणवत्ता से हम सभी परिचित हैं। समकालीन दौर में जो विमर्श चर्चा के केन्द्र में  है उनमें स्त्री और दलित विमर्श सर्वाधिक महत्वूपर्ण है। हम सभी लोग इस बात को लेकर खूब दुखी  हो ले सकते हैं कि आखिर आज के इस अति वैज्ञानिक युग में भी स्त्रियों के प्रति हमारी धारणा घोर पारंपरिक और प्रतिक्रियावादी क्यों है? और दुख से उबरने के लिए हम इन विषयों को केंद्र में रखकर गुरू गंभीर शोध करते और करवाते हैं। मोटी-मोटी पुस्तकें लिखते हैं। पत्रिकाओं के विशेषांक निकालते हैं, सेमिनार गोष्ठियाँ करते हैं और न जाने क्या-क्या करते हैं? लेकिन हम इस विषय पर अपेक्षाकृत बहुत कम सोच पाते हैं कि जिस उम्र में बच्चों और किशोर-किशोरियों में  विचार की निर्मिति होती है, उस समय में हम उदासीन रह जाते हैं। वही वह उम्र होती है जब सभी तरह के पारंपरिक सोच उनमें पुख्ता रूप धारण कर लेती है। तात्पर्य यह कि स्कूली पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों और बाल साहित्य के प्रति हमारी घोर उपेक्षा और उदासीनता पितृसत्ता पैरोकारों  को खुला चारागाह मुहैय्या करा देता है। जब वे अपनी फसल लहलहा लेते हैं तो हमें सिर धुनने और पछताने के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता।

हम सभी जानते है कि विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों में एनसीईआरटी सर्वाधिक गुणवत्तात्मक पुस्तकें प्रकाशित करती रही हैं। देश के सर्वाधिक विद्यार्थी इसे पढ़ते-गुनते है। अधिकांश निजी प्रकाशक इन्हीं पाठ्यपुस्तकों को अपना आदर्श मानकर पुस्तकें प्रकाशित करते है। लेकिन आप चकित और दुखी एक साथ होंगे जब बिगत दस-बीस वर्षों से प्रकाशित होने वाली पाठ्यपुस्तकों से गुजरेंगे। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के अंतर्गत जो पाठ्यपुस्तकें प्रकाशित हुई है उन्हें अगर हम थोड़ी देर के लिए छोड़ दें तो घोर निराशा होगी। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें अगर सतीप्रथा का घोर महिमामंडन करे तो चिंतित होना स्वाभाविक है। सातवीं कक्षा के बच्चों को कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर सतीप्रथा को एक आदर्श प्रथा के रूप में  स्वीकार करने की वकालत करते है। ‘लाल अंगारों की मुस्कान’ नामक पाठ में रणथंभौर के राणा हमीर के जब सभी सैनिक खिलजी से युद्ध में मारे जाते हैं, तो लेखक महोदय बच्चों को बताते हैं कि ‘‘स्त्रियों ने फैसला किया कि हम किले के द्वार खुलने से पहले जौहर करेंगी। अब वे निश्चिंत थे। जैसे उन्हें जो करना था, वह कर चुके थे। रात को वे सब सो रहे थे सुबह जल्दी उठने के लिए और सुबह उनको जल्दी उठना था हमेशा को सोने के लिए। ऐसी जीवंत नींद रात के सितारों ने फिर नहीं देखी। यह वे आपस में अब भी कहा करते है।’’1

स्त्रियों द्वारा अपने आपको सती कर लेना-ऐतिहासिक सत्य हो सकता है लेकिन लेखक ने जिस उत्साह से इस दृश्य का वर्णन किया है वह सिर्फ ऐतिहासिक तथ्य भर नहीं है। लेखक के ही शब्दों में ‘‘पौ फटी तो सब जागे और पुरूषों ने नित्य कर्म से निवृत्त हो सबसे पहले एक चिता सजाई। स्त्रियों ने पूजन किया, कीर्तन किया अपने पतियों से मिल। पतियों ने उन्हेें प्यार से थपथपाया। उन्होंने उनके पैर छुए। आज वे अपने सर्वश्रेष्ठ श्रृंगार में  थी, जैसे जीवन की सर्वाेत्तम यात्रा पर उन्हें जाना था और यों वे दर्पदीप्त गति से चिता की ओर चली, जैसे स्वयंवर के बाद दुल्हनें अपने रथ की ओर बढ़ रही हों।2 जिस तरह से लेखक ने उपमादि अलंकारो के माध्यम से इस दृश्य का जीवंत वर्णन किया है, उनके निहितार्थ को आसानी से समझा जा सकता है। आगे की पंक्तियों में तो लखक ने इस राक्षसी प्रथा पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाकर एनसीईआरटी की नीतियों की धज्जियाँ उड़ा दी, ‘‘क्या आत्मा की अमरता का ऐसा विशाल और मृत्यु का इतना मनोरम विवरण इतिहास के किसी और पृष्ठ में  भी इतने प्रदीप्त रूप में  लिखा गया है?’’3 यह पाठ्यपुस्तक 1987 का संस्करण है। घोर आश्चर्य का विषय है कि एक दशक बाद सन् 1997 में सरस भारती, भाग-2 के नाम से प्रकाशित पुस्तक में  भी इस पाठ को हटाया नहीं गया। बल्कि इसके विपरीत शातिर चतुराई यह की गई कि ‘लाल अंगारों की मुस्कान’ जो प्रतीकात्मक अर्थ भी ध्वनित करता था बदलकर ‘शरणागत की रक्षा’ सदृश मानवतावादी नामकरण कर दिया गया और कुछ ‘मनोरम वर्णन’ को संपादित कर दिया गया।

ध्यान देने की बात यह है कि इन पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशन से बहुत पहले यानि सन् 1975 में ही एनसीईआरटी की राष्ट्रीय परिसंवाद आधारित पुस्तक ‘स्टेटस आॅफ वीमेन’ में  बहुत सिद्दत से महसूस किया गया था कि ‘‘समाज में  औरतों के संबंध में दुष्प्रचारित मिथकों, प्रतीकों, लोकोक्तियों और कहावतों का समूल बहिष्कार किया जाना चाहिए।’’4 किन्तु कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर सरीखे विद्वानों के लिए इन पुस्तकों का कोई मूल्य-महत्त्व नहीं। सौतेली माँ का मिथ स्त्री उपेक्षा, चरित्र-हनन और स्त्री शोषण का सबसे कारगर हथियार है। कदाचित आज तक ऐसा कोई सर्वे या अनुसंधान नहीं हुआ है जो सौतेली माँ को खलनायिका प्रमाणित करे। किन्तु शायद ही हिन्दी की कोई पाठ्यपुस्तक होगी जिसमें सौतेली माँ के बहाने स्त्री को जलील न किया जाता हो। मैंने अपने शोध के दरम्यान सिर्फ 25 सौतेली माताओं से मिला तो उसका नतीजा आश्चर्यजनक था। सौतेली मां की हृदय विदारक पीड़ा यह थी कि उनके लिए ‘दूध-माछ’ दोनों हानिकारक था। उन्होंने कहा कि यदि मैं अपेन सौतेले बेटे को कुछ नहीं कहती हूँ और अगर वह शरारत करता है तो लोग कहते हैं कि सौतेली माँ है न? हमारे पड़ोस की महिला अपनी संतान को खूब मारती-पिटती है किन्तु उसे कोई कुछ नहीं कहता।

एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक भी इस मिथ का शिकार रही है। हिन्दी के परमादरणीय विद्वान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का एक निबंध नौवी कक्षा की पाठ्यपुस्तक पराग भाग-एक में संकालित है। 1989 में प्रकाशित ‘आत्मनिर्भरता’ नामक पाठ का आरंभ ही इन पंक्तियों से होता है, ‘‘नम्रता ही स्वतंत्रता की धात्री व माता है। लोग भ्रमवश अहंकार वृत्ति को उसकी माता समझ बैठते हैं, पर वह उनकी सौतेली माता है जो उनका सत्यानाश करती है।’’5 आचार्य शुल्क ने सौतेली माता को बच्चों का सत्यानाश करने वाली माना हैं। गनीमत है कि आगे उन्होंने इस सूत्र वाक्य को विस्तार नहीं दिया है। अभ्यास प्रश्न बनाने वालों को मानो इन दो पंक्तियों में ज्ञान की कुंजी मिल गई। सिर्फ इन दो पंक्तियों के आधार पर दो-दो सवाल पुस्तक में पूछे गए है: सवान नं.-1 ‘‘अहंकार वृत्ति सौतेली माता कैसे है?’’6 पाठ्यपुस्तक मंे इस प्रश्न के उत्तर का संकेत कहीं नहीं है। दावे के साथ कहा जा सकता है कि इस प्रश्न का उत्तर प्रश्न बनाने वाला भी नहीं कर सकता है?

सवाल नं.-2 ‘‘सौतेली माता अपने सौतेले पुत्रों को कैसे हानि पहुँचाती है?’’7 सवाल में इस उत्तर का स्पेस ही नहीं छोड़ा गया कि बच्चे यह लिखें कि कई सौतेली माताएँ ऐसी भी होती हैं जो कभी भी अपनी संतान को हानि पहुँचाती है। अभ्यास में पूछे गए प्रश्न के आधार पर ऐसे बच्चों की दुर्दशा की कल्पना की जा सकती है जिनकी सौतेली माँ बहुत अच्छी होंगी। ऐसे पाठों की संख्या भी कम नहीं है जो स्त्रियों को पति को परमेश्वर मानने की सीख देता है। यह मात्र संयोग नहीं है कि प्रो. कृष्ण कुमार को एक बच्ची का काँपी में लिखे प्रश्नोत्तर आज भी याद है जिसमें लिखा हुआ था – ‘‘सावित्री को आदर्श स्त्री क्यों कहा जाता है?’’8 उत्तर में  बच्ची ने लिखा था – ‘‘क्योंकि वह पतिव्रता नारी थी।’’9 उस बच्ची के लिए एक स्त्री का आदर्श सिर्फ और सिर्फ पतिव्रता होना है।

पाठ्यपुस्तकों में स्त्रियों और दलितों की अनुपस्थिति और हशिये पर उनकी दयनीय उपस्थिति का गहरा राजनीतिक सरोकार है। पुरुष वर्चस्व और सवर्ण वर्चस्व का सत्ता के साथ साँठ-गाँठ सर्वविदित तथ्य है। सीधे-सीधे राजनीति पर निम्न जातियों और दलितों का उभार तो वोट का समीकरण है। इस तरह की मानसिकता वाले रचनाकारों का सीधा प्रयास यह होता है कि भारत की संस्कृति को एक तथाकथित पुरुष-सवर्ण हिंदू संस्कृति के रूप में तब्दील कर दिया जाय। इसके लिए पाठ्यपुस्तक में हर प्रकार के गैर ब्राह्मणवादी और स्त्रियों के योगदान को झुठलाने की कोशिश की जाती है।

इसका पक्का प्रमाण पाठ्यपुस्तकों में विन्यस्त जीवन-चरित परक पाठ है। राम, कृष्ण, आदि खास तरह के मिथकीय चरित्रों से पाठ्यपुस्तक भरी होती है। उसमें गैर हिंदू, गैर-सवर्ण और गैर स्त्री चरित्र हाशिये पर भी शायद ही दिखें। जबकि दलितों और स्त्रियों मंे चरित नायकों की कमी नहीं है। देश के विभिन्न अंचलों में प्रचालित लोक गाथाओं के लगभग सभी चरित्र दलित वर्ग से आते है। जैसे सलहेस, दुलरादयाल, दीनाभ्रदी, सती मंजरी आदि। लेकिन ये पाठ्यपुस्तक में  नहीं आ सकते। देश की अधिकांश जनता जिन लोक गाथाओं और लोक संस्कृतियों में जीती है, उन्हें पाठ्यपुस्तकों में  फटकने न देना एक खास तरह की राष्ट्रीयता की अवरधारणा को सर्वानुमति प्रदान कराने का चालाक तरीका है। शिक्षाविद कृष्ण कुमार ने इसका तीखा विरोध करते हुए लिखा है, ‘‘अपनी सांस्कृतिक विरासत के सांचे में  डालने, अपने अतीत के गौरव में जीने और उसे जिलाने तथा अपने मिथकीय आख्यानों पर राष्ट्रीयता का मुलम्मा चढ़ाने की चेष्टाएँ एक भाग्यवादी मानसिकता से ही उत्पन्न होती है। राम, कृष्ण दुष्यंत कितने ही महान क्यों न रहे हों अंततः वे उस व्यवस्था के अंग के जिसमें राजा के जीवन, जन्म, विवाह और मरण उनक अतिविशिष्ट सामाजिक स्थिति के परिचायक होते थे।10

ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि एनसीईआरटी के इन पाठ्यपुस्तकों में स्त्रियों की ऐसी ही घिसी-पिटी स्टीरियो  टाइप छवि से हमारा साक्षात्कार होता है बल्कि कई स्थानों पर स्त्रियों की छवि काफी प्रभावशाली भी दिखती है। किंतु कठिनाई यह है कि इन पाठ्यपुस्तकों में  दलितों और स्त्रियों के व्यक्तित्व विश्लेषण में  वैचारिक सुसम्बद्धता और परिपक्वता की घोर कमी है। सुखद तथ्य यह है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के अन्तर्गत प्रकाशित होने वाली पाठ्यपुस्तकों में इन कमियों को बहुत हद तक दूर करने की सफल चेष्टा की गई है। इन पाठ्यपुस्तकों में  सर्वाधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि पाठों के चयन में रचनाकार की ‘महानता’ को शर्त नहीं माना गया है। पाठों के चयन में शुचिता से अधिक संवेदना की सच्चाई और गहराई पर ध्यान दिया गया है। पाठ्यक्रम में  दो टूक कहा गया है कि ‘‘स्त्रियों की आवाज को अपनी दमक ऐश्वर्य एवं विविधता के साथ हमारी पाठ्यपुस्तकों तथा शिक्षण पद्धतियों में महत्वपूर्ण स्थान देने की आवश्यकता है।12 यही कारण है की जहाँ
सातवीं की पुरानी पाठ्यपुस्तक औरतों के सती होने से उल्लसित थी वहीं नयी पाठ्यपुस्तक क्षितिज की चपला देवी 1857 के महासंग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ देती है और अंग्रेज उसे जला डालते हैं। वह पति की मृत्युपरांत यौन शुचिता हेतु यहाँ जौहर नहीं करती बल्कि देश की आजादी हेतु मरना स्वीकार करती है। यह फर्क है दोनों पाठ्यपुस्तकों में। एक पाठ्यपुस्तक में वह अबला है, निरीह है तो दूसरी में वह अंग्रेजों से लड़ने के लिए कमर कसती है।

ग्यारहवीं की नयी आधार पाठ्यपुस्तक आरोह तथा अंतरा पुरानी पाठ्यपुस्तकों को  धता बताते हुए उभरते हुए किशोर-किशारियों को दलित और स्त्री विमर्श से साक्षात्कार कराती है। जड़ परंपरा और खास तरह की शुद्धतावादी-पवित्रतावादी अवधारणा के बरक्स सिक्के के दूसरे पहलू से कदाचित पहली बार विद्यार्थियों को रू-ब-रू कराने की कोशिश् की गई है। ऐसे दलित  और स्त्री विमर्श के पाठों को पढ़ाने में सर्वाधिक कठिनाई शिक्षकों को होगी। इन पाठों को पढ़ाते हुए शिक्षकों को सर्वप्रथम अपने-आप से जूझना होगा। आज तक वे जिस सांचे में सोच-विचार रहे थे, थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ वही पढ़ा भी रहे थे। उन्हें पहली बार इन पंक्तियों को पढ़ाना पड़ेगा कि, ‘‘सच का सवेरा होते ही वेद डूब गए, विद्या शूद्रों के घर चली गई। भू देव ब्राह्मण शरमा गए।’’13 जिस वेद का यशोगान करते-करते उनकी जिह्वा थकती नहीं थी उन्हें ज्योतिबा फुले  के बारे में पढ़ाना पड़ेगा और जब उन्हें  ज्योतिबा फुले  सरीखे अद्भुत व्यक्ति की जीवनी पढ़ानी पड़ेगी तो उन्हें यह भी पढ़ाना पड़ेगा कि कैसे समाज सुधारकों की सूची से तथाकथित सम्भ्रान्त उच्च वर्ण के समीक्षकों/विद्वानों ने महात्मा फूले का नाम गायब कर दिया। पाठ्यपुस्तक के अनुसार, ‘‘यह ब्राह्ममणी मानसिकता की असिलयत का पर्दाफाश करता है। (अंतरा भाग-1) इस पाठ में ज्योतिबा फुले  के शब्दों में ‘‘यदि आधुनिक शिक्षा का लाभ सिर्फ उच्च वर्ण को मिलता है तो उसमें शूद्रों का क्या स्थान रहेगा? गरीबों से कर जमा करना और उसे उच्च वर्णाें के बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना किसे चाहिए ऐसी शिक्षा?14

पहले की पाठ्यपुस्तकों में भी प्रेमचंद की कहानिायाँ संकलित होती रही है किन्तु कबीर और प्रेमचंद की रचना संकलन में संपादक अतिरिक्त सावधानी बरते रहे हैं। पंच परमेश्वर, ईदगाह तथा दो बैलों की कथा ही बच्चों को पढ़ने लायक समझा जाता रहा। ‘आरोह’ में प्रेमचंद की कहानी ‘दूध का दाम’ जाति प्रथा की अमानवीयता को
तार-तार करती निकलती है। अंतरा भाग-एक में सुप्रसिद्ध हिन्दी दलित कथाकार ओमप्रकाश बाल्मीकि की कहानी ‘खानाबदोश’ मजदूर वर्ग के शोषण, यातना और जाति विभेद की समस्या का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करती है। दलित साहित्य के नाम से ही बिदकने वाले हिन्दी के अति शुचितावादी साहित्यकारों और शिक्षकों को ऐसी कहानियों को पढ़ाने में काफी परेशानी होगी। अपने को वर्गच्युत किए वगैर इन रचनाओं को पढ़ा पाना संभव नहीं है। अंतरा में ही श्रीकांत वर्मा की कविता ‘हस्तक्षेप’ केवल राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करती कविता नहीं है बल्कि हिन्दी पाठ्यपुस्तक में हस्तक्षेप करती कविता है। वास्तव में प्रो. कृष्ण कुमार के निर्देशन मंे यह ऐसा हस्तक्षेप है जो बकोल श्रीकांत वर्मा ‘एक बार शुरू होने पर कहीं नहीं रूकता हस्तक्षेप’। और इसी हस्तक्षेप की अगली कड़ी है धूमिल की कविता ‘मोचीराम’ जिसकी नजर में
न कोई छोटा है, न कोई बड़ा
मेरे लिए, हर आदमी एक जोडी जूता है
जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है।15

इस दृष्टि से रहा-सहा कसर पांडेय वेचन शर्मा उग्र की आत्मकथा ‘अपनी खबर’ पूरा कर देती है। इस आत्मकथा के मार्फत ब्राह्मणवाद की सारी कुलीनता श्रेष्ठता पछाड़ खाकर गिर पड़ती है। यही वजह है कि इन पाठों के विरोध में कुछ खास तरह के लोगों ने जोरदार विरोध किया। इस विरोध के कारण एनसीईआरटी को तत्काल कुछ पाठों को संकलन से हटाना पड़ा।सारे विरोध के बावजूद इन पाठ्यपुस्तकों में  दलित और स्त्री उपस्थिति उम्मीद जगाती है। हम सभी जानते है कि अगर दुनिया सुंदर है, सुविधापूर्ण है तो उसमें दलितों का सर्वाधिक योगदान है। लेकिन पूर्व के पाठ्यपुस्तकों में उनके इस महत्वूपर्ण योगदान को रेखांकित नहीं  किया गया था। आठवीं की नयी पाठ्यपुस्तक वसंत-भाग-तीन में सुभाष गताडे का एक पाठ है-‘पहाड़ से ऊँचा आदमी’। गया जिले के गेलौर गाँव में 1934 ई. में एक ऐसे सख्श का जन्म हुआ, जिसके कारनामे चकित ही नहीं दंग भी करते है। घोर दलित दशरथ मांझी ने 360 फीट लंबा और 30 फीट चैड़ा पहाड़ काट कर रास्ता बनाने का ऐतिहासिक काम किया। गेलौर गाँव से अस्पताल 80 किलोमीर दूर था। दशरथ मांझी ने बुलंद हौसले के बदौलत 30 वर्षाें में उस रास्ते को घटाकर महज 13 किलोमीटर मंे तब्दील कर दिया। दूरी की वजह से देर से अस्पताल पहुंचने के कारण दशरथ मांझी की पत्नी उस पहाड़ी रास्ते मंे दम तोड़ दी थी। उसी दिन उसने तय किया कि अब कोई दूरी की वजह से नहीं मरेगा ‘नया दौर’ फिल्म मंे साहिर लुधियानवी के गीत –
फौलादी है सीने अपने फौलादी हैं बाहें
हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें।
को दशरथ माँझी ने सच साबित कर दिया। कदाचित इसीलिए पाठ्यपुस्तक में इस फिल्मी गीत को भी संकलित किय गया है। आज जब हम लड़कियों को साइकिल चलाते देखते हैं तो वह सामान्य-सी बात लगती है, किन्तु लड़कियों में आत्मविश्वास और साहस का संचार करने में  साइकलिंग की भूमिका अत्यंत महत्वूपर्ण है। इसी पाठ्यपुसतक में ‘जहाँ पहिया है’ नाम से एक ऐसा पाठ संकलित है जो तमिलनाडु के पडुकोट्टई गाँव में  साइकिल के माध्यम से हुए सामाजिक आंदोलन की रोचक और रोमांचक घटना को रेखांकित करता है। बारहवीं की पाठ्यपुस्तक वितान भाग-2 में ऐन फ्रैंक के डायरी अंश ‘द डायरी आॅफ ए गर्ल’ तथा इसी कक्षा की पूरक पाठ्यपुस्तक वितान, भाग-एक में बेबी हालदार का ‘आलो आंधारि’ (अंधेरे का उजाला) का अंश स्त्री विमर्श पर छात्र-छात्राओं को नयी रौशनी प्रदान करेगी। कक्षा नौ की पाठ्यपुस्तक में सर्वप्रथम एवरेस्ट पर चढ़ने वाली महिला बचेंद्रीपाल पर आधारित पाठ लड़कियों में यह विश्वास दिलाने में सफल होगा कि दुनिया का कोई भी काम स्त्रियों के लिए असंभव नहीं है। ज्योतिबा फूले सन् 1840 के आस-पास इस बात को समझ रहे थे कि स्त्री पराधीनता के बीज तत्व विवाह और वैवाहिक मंत्रों में निहित हैं। इसलिए उन्होंने विवाह के नये मंत्र बनाने शुरू किए। ज्योतिबा फूले की जीवनी पर आधारित पाठ में उनके द्वारा निर्मित कुछ मंत्रों का उल्लेख किया गया है। उसमें एक मंत्र  इस प्रकार है, ‘‘स्वतंत्रता का अनुभव हम स्त्रियों में है ही नहीं। इस बात की आज हम शपथ लें कि स्त्री को उसका अधिकार देंगे और उसे अपनी स्वतंत्रता   का अनुभव करने देंगे।’’

ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या-2005 के अंतर्गत प्रकाशित सभी पाठ्यपुस्तकें बिल्कुल ठीक और चुस्त-दुरूस्त है, उसमें भी अपेक्षित सुधार की आवश्यकता है। बच्चों की पाठ्य सामग्री अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। हम सबों को इन सामग्रियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। अगर हमें बच्चों का बचपना, बचाकर रखना है, उन्हें स्वस्थ लोकतांत्रिक नागरिक बनाना है तो इसके लिए हम सबों को सामूहिक प्रयास करना होगा।’’ ‘अरोह’ पाठ्यपुस्तक में संकलित निर्मला पुतुल के शब्दों में –
इस अविश्वास भरे दौर में
थोड़ा – सा विश्वास
थोड़ी सी उम्मीद
थोड़े से सपने
आओ मिलकर बचाएँ
कि इस दौर में भी बचाने को
बहुत कुछ बचा है,
अब भी हमारे पास।17

संदर्भ स्रोत:
1. किशोर भारती, भाग-2, एनसीईआरटी 1987, पृ. 120
2. उपर्युक्त, पृ. 120.
3. उपर्युक्त,
4. इमेज आॅफ वूमेन एंड कैरिकुलम इन मदर टंग-एनसीईआरटी 1991, पृ. 17.
5. पराग भाग-एक, एनसीईआरटी 1989, पृ. 17.
6. उपर्युक्त.
7. उपर्युक्त.
8. राज, समजा और शिक्षा कृष्ण, कुमार, राजकमल प्रकाशन, 1999, पृ. 91-92.
9. उपर्युक्त
10. परिप्रेक्ष्य, नीपा, वर्ष-1, अंक-1, पृ. 21.
11. भाषाओं को पढ़ाने के लिए पाठ्यक्रम, मई 2005, हिन्दी, एनसीईआरटी पृ.8
12. अंतरा, भाग-एक, एनसीईआरटी, 2006, पृ. 56
13. उपर्युक्त, पृ. 57.
14. उपर्युक्त, पृ. 173.
15. उपयुक्त, पृ. 58.
16. आरोह, एनसीईआरटी, 2006 पृ. 181.

अरूणा शानबाग – आखिर कब तक???

ज्योति गुप्ता

अरूणा शानबाग का निधन हमारी खोखली व्यवस्था पर कई सवाल उठाता है। यातना में बिताए उसके हर वो पल पूछ रहे हैं कि कब होगा इस अमानवीय मनोवृत्ति का अंत , कब लड़कियाँ निकल पाएंगी बिना किसी भय के बाहर , कब आयेगा वह दिन जब हम स्त्री और स्त्री शरीर से नहीं मनुश्य के स्तर पर जाने जाएंगे , उसकी
मौत चीख रही है , चिल्ला रही है , बलात्कारियों के खिलाफ आवाज़ उठा रही है। हमारी न्याय व्यवस्था से पूछ रही है कि कब होगा इस अमानवीय सिलसिला का अंत।

औरत बलात्कार तथा यौन-शोषण की आड़ में सिर्फ शरीर है जिस पर आदमी के मन में बैठा राक्षस कभी भी टूट पड़ता है। अरूणा शानबाग पिछले 42 सालों से जिस जिंदगी को जी रही थी या यूं  कहें कि जिसे जीने के लिए वह अभिशप्त थीं , उसकी जवाबदेही कौन है। पीडि़ता के अपराधी को सात साल की सजा़ हुई लेकिन जो कष्ट अरूणा ने झेला उसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

 सदियों से स्त्री के आंसू बहते आ रहे हैं। युग बदला , समय बदला , औरत की स्थिति  नहीं बदली। अरूणा की कल्पना करते दिल दहल उठता है , वितृष्णा होती है हमारी न्याय व्यवस्था के प्रति क्योंकि अपराधी सात साल की सज़ा काटकर छूट जाता है लेकिन पीडि़ता बयालिस साल तक लाश बनकर जीती रही। केईएम के वार्ड नं0 चार से लगे एक छोटे से कक्ष में बयालिस वर्षों  से जिंदगी से जूझ रही थी। इस पीडि़ता ने आदमी की मार तो झेली साथ ही प्रकृति तथा हमारी कानून व्यवस्था की मार भी झेली , जिसमें उसे इच्छा मृत्यु भी नसीब न हुई।

 मौत से बदतर जिंदगी उसने क्यों जिया , कानून ने उसे इच्छा मृत्यु क्यों नहीं दी , बलात्कार के बाद लड़की समाज की नज़र में उपेक्षित क्यों हो जाती है,  ऐसे न जाने कितने प्रश्न हैं जिसका जवाब अरूणा की मौत मांगती है। छिन्नमस्ता की प्रिया,सोना चैधरी, इमराना ,कोलकाता की नन या निर्भया इत्यादि न जाने कितनी पीडि़ता हैं जो चीख-चीखकर पूछ रही हैं कि आखिर कब तक हमें सिर्फ शरीर के रूप में देखा जाएगा , कब थमेगा यह सिलसिला। निर्भया की मौत हमारी न्याय व्यवस्था का कौन सा रूप दिखा रही है , जहाँ आरोपी से की गई पूछताछ में वह निर्भया को ही दोषी ठहराता है। लड़की के साथ हुए बलात्कार के बाद बचाव पक्ष की जो दलील  आती है,  उसमें लड़की को दोषी ठहराते हुए यह कहा जाता है कि उसने भड़काउ कपड़े पहने थे,लड़कियों           को देर रात घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए इत्यादि- इत्यादि। यहां एक प्रश्न उठता है कि क्या दो या पांच साल की बच्ची के साथ जो रेप होते हैं, उसके लिए भी उनके कपड़े जिम्मेदार हैं। हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका प्रभा खेतान अपनी उपन्यास छिन्नमस्ता में इसका जवाब मांगती हुई कहती हैं ‘‘कब और कहां मुझ पर आक्रमण नहीं हुआ? वह कैसा बचपन था? क्या पुरूश की कामुक हवश का शिकार होने से मासूम लड़कियां बच पाती हैं? क्या मेरा बचपन न केवल भाई ने बल्कि एक दिन एक नौकर ने भी मुझे अपने गोद में बिठाया था। बहुत छोटी थी , पाॅच साल की।’’1 प्रभा खेतान का यह सवाल पूरी पुरूष जाति से है , पूरी व्यवस्था से है ,जो अपनी  क्रूरता तले हर लड़की को रौंदना चाहता है।

अरूणा शानबाग के साथ एक विडम्बना और जुड़ी है जो संभवतः हर औरत के साथ है – वह है औरत की इज्जत और मान-मर्यादा, जिसकी दुहाई देते हुए औरत को इस अमानवीयता को बर्दाश्त करने के लिए बाध्य किया जाता है। अरूणा पर बलात्कार , अप्राकृतिक यौन हमला और कुत्ते की चेन से उसकी हत्या के प्रयास के बाद भी उसकी तथाकथित बदनामी के भय से आरोपी के खिलाफ हत्या की कोशिश और डकैती का मामला दर्ज किया गया। यह इस क्रूर व्यवस्था का ही कुप्रभाव है , जिसकी शिकार हर स्तर पर औरत है। नमिता सिंह ने अपने आलेख ‘कुचला जाता हर रोज आंचल’ में लिखा है ‘‘दो-दो साल की बच्ची से लेकर प्रौढा तक। कैसा राक्षस छिपा बैठा है आदमी के मन में। वह कुछ नहीं देखता,कुछ नहीं सोचता। कोई संवेदना…जरा सी भी कोमल भावना … स्नेह की  गर्माहट…शेष  नहीं रहती। सब कुछ सिर्फ औरत-मर्द के आदिम रिश्तों तक सीमित हो जाता है। यह एक ऐसा छिपा हुआ राक्षस है जो दिखाई नहीं देता। जिसके दंश औरत जात को कब लहु लूहान कर दे, कोई पता नहीं। यहां सिर्फ चित्कार है, विस्फोट है जिसकी गंूज बाहर नहीं जाती। घुट कर रह जाती हैं कभी अपने अंदर और कभी चहारदिवारी के भीतर। रोना मना है… बोलना, कुछ भी कहना मना है। घर की इज्जत , घर की मान-मर्यादा। पता नहीं क्यों हमारे समाज में ईंट -गारे -मिट्टी से बने घर की मर्यादा होती है लेकिन जीती जागती …हाड़-मांस की बनी औरत की इज्जत और मर्यादा की बात कोई नहीं करता।’’2 अतः हमें इस सोंच से निकलना होगा। ये तमाम पीडि़ता अपनी मौत के बाद भी हमारी व्यवस्था के सामने एक प्रश्न बनी रहेंगी। प्रभा खेतान ने भी बड़े दुख के साथ छिन्नमस्ता में कहा ‘‘औरत कहां नहीं रोती? सड़क पर झााड़ू लगाते हुए , खेतों में काम करते हुए , एयरपोर्ट पर बाथरूम साफ करते हुए या फिर सारे भोग- ऐश्वर्य के बावजूद मेरी सासूजी की तरह पलंग पर रात-रातभर अकेले करवट बदलते हुए। हाड़-मांस की बनी ये औरतें …अपने-अपने तरीके से जिंदगी जीने की कोशिश में छटपटाती ये औरतें। हजारों सालों से इनके आंसू बहते आ रहे हैं।3 अतः हम कह सकते हैं कि औरत को औरत होने की सज़ा मिलती है। बाहर निकली, अपनी इच्छा से जीने वाली हर स्त्री को पल-पल यह डर बना रहता है कि उसके साथ कुछ गलत न हो जाए , घर में रहने वाली औरत तमाम तरह के घरेलू हिंसा सहने के लिए बाध्य है।

औरत घर में भी बलात्कार तथा यौन शोषण का शिकार होती है। व्यभिचार तथा संभोग में स्त्री की सहमति हाती है लेकिन बलात्कार उसकी इच्छा के विरूद्ध एक अमानवीय अत्याचार है। इसके उपरांत समाज लड़कियों को हीन नज़र से देखता है, हमें इस मनोवृत्ति को बदलना चाहिए तथा किसकी शीलता भंग हुई , किसकी नहीं , यह सोचे बिना पीडि़ता आत्म निर्भर जिंदगी जी सके , इस दिशा में उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए।

संदर्भ-सूची

1. खेतान प्रभा – छिन्नमस्ता, पहला संस्करण-1993,दूसरी आवृत्ति-2004, राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0,नई दिल्ली-110002,पृ0 सं0-119

2.सिंह नमिता – ‘कुचला जाता हर रोज आंचल’,संपादक-महेंद्र मोहन गुप्ता,दैनिक जागरण कसौटी अंक-2 सितम्बर,2005,जमशेदपुर,पृ0 सं0-1

3.खेतान प्रभा – छिन्नमस्ता, पहला संस्करण-1993,दूसरी आवृत्ति-2004, राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0,नई दिल्ली-110002,पृ0 सं0-220

संपर्क : jyotigupta1999@rediffmail.com

अरुणा , मथुरा , माया , प्रियंका , निर्भया , इमराना : क्या आप इन्हें जानते हैं !



कल अरुणा शानबाग ने आख़िरी सांस ली . कल फिर उसके साथ हुए वीभत्स अत्याचार की कहानी मीडिया और सोशल मीडिया में ताजा हो गई. हम जिस समाज में रहते हैं , वहां स्त्री न सिर्फ एक देह है, बल्कि पुरुष की कुंठा , उसके बदले की भावना , जातीय अहम के लिए एक प्राइम साइट की तरह हैं . आज अरुणा के बहाने स्त्रीकाल के पाठकों को हम बलात्कार की कुछ ऐसी घटनाओं की याद दिला रहे हैं , जिनका समाज पर न सिर्फ व्यापक असर हुआ  बल्कि  स्त्री के पक्ष में कानूनी बदलाव के कारण बने वे. ये वैसी घटनायें हैं , जो स्त्री को कम कपड़े और मर्यादा में रहने की हिदायत देने वाली जमात को जवाब दे सकें , क्योंकि इन घटनाओं में स्त्री पर यौन हिंसा , जातीय घृणा , मर्दवादी अकड़, ताकत और शौर्य के प्रदर्शन , बदले की भावना  के कारण हुए  है , जिसके पीछे धार्मिक नियमों का वहशीपन भी उजागर हुआ है . 

1. मथुरा

महाराष्ट्र के चन्द्रपुर जिले के नवरगाँव में रहने वाली आदिवासी महिला मथुरा वह पीडिता थी , जो भारत में बलात्कार के क़ानून में बदलाव के लिए हुए पहले आन्दोलन का कारण बनी . इस केस के बाद ८० के दशक में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के विरोध में और महिलाओं के पक्ष में सम्मानजनक क़ानून बनवाने के लिए देशव्यापी आन्दोलन हुए तथा १९८३ में भारत सरकार बलात्कार संबंधी क़ानून को लेकर महिलाओं के पक्ष में एक कदम और आगे बढ़ी. १९८३ में क़ानून में बदलाव के बाद भारतीय दंड संहिता ( IPC) में बलात्कार की धारा ३७६ में चार उपधाराएं ए, बी ,सी और डी  जोड़कर हिरासत में बलात्कार के लिए सजा का प्रावधान किया गया . बलात्कार पीडिता से ‘बर्डन ऑफ़ प्रूफ’ हटाकर आरोपी पर डाला गया , यानी अपने ऊपर बलात्कार होने को सिद्ध करने के लिए पीडिता को जिस जहालत और अपमान से गुजरना पड़ता था , उससे उसे मुक्ति मिली और अब आरोपी के ऊपर खुद को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेवारी आ गई. भरी अदालत में अपमानजनक प्रक्रिया से गुजरना भी ख़त्म हुआ और ऑन कैमरा सुनवाई की व्यवस्था हुई .

१९७२ में महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले  के देसाईगंज  थाने में अपने दोस्त अशोक के खिलाफ अपने भाई के द्वारा दर्ज मामले में बयान के लिए आई १६ वर्ष की मथुरा मडावी के साथ थाने के दो पुलिस कांस्टेबल गणपत और तुकाराम ने थाना परिसर में ही बलात्कार किया था. मथुरा के भाई ने मथुरा के दोस्त पर उसे बहलाने और अपहरण करने की कोशिश का आरोप लगाया था. इस घटना के विरोध में स्थानीय लोगों के हंगामे के बाद थाने में केस तो दर्ज हुआ लेकिन १९७४ में निचली अदालत  ने दोनो आरोपियों को इस बिना पर छोड़ दिया कि मथुरा ‘सेक्स की आदि’ थी और उसपर चोट के कोई निशान नहीं थे , तथा उसने विरोध  या हंगामा नहीं किया था . बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर बेंच ने  निचली अदालत के निर्णय को इस आधार पर खारिज कर दिया कि थाना परिसर में पुलिस के कांस्टेबल के द्वारा डरा कर किया गया बलात्कार सहमति के साथ संबंध नहीं हो सकता. १९७९ में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को फिर से बहाल कर दिया और आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया. आरोपियों की ओर से वकील थे प्रसिद्द एडवोकेट राम जेठमलानी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ क़ानून के प्राध्यापकों , उपेन्द्र बक्सी , रघुनाथ केलकर , लोतिका सरकार और वसुधा धागम्वार ने सुप्रीम कोर्ट को एक खुला पत्र लिखा. इसके बाद देशव्यापी महिला -आन्दोलन शुरू हुए और १९८३ में भारत सरकार को बलात्कार क़ानून को और संवेदनशील बनाना पडा .

2. अरुणा शानबाग़ 


अरुणा शानबाग केईएम अस्पताल मुंबई में काम करने वाली एक नर्स थीं. जिनके साथ 27 नवंबर 1973 में अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय ने बलात्कार किया था. उस वार्ड ब्वॉय ने यौन शोषण के दौरान अरुणा के गले में एक जंजीर बांध दी थी. उसी जंजीर के दबाव से अरुणा उस घटना के बाद कोमा में चली गयीं और फिर कभी सामान्य नहीं हो सकीं. उस घटना के बाद पिछले 42 वर्षों से अरुणा शानबाग कोमा में थीं. अरुणा की स्थिति को देखते हुए उनके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करते हुए एक याचिका भी दायर की गयी थी, लेकिन कोर्ट ने इच्छामृत्यु की मांग को ठुकरा दिया था.  हालांकि इस मामले की सुनवाई करते हुए मौत और जिन्दगी के बीच जूझ रहे लोगों के लिए क्रमिक इच्छामृत्यु का प्रावधान कोर्ट ने कर दिया . यानी परिवार के चाहने पर ऐसे व्यक्ति को जीवन रक्षक उपायों से धीरे -धीरे मुक्त करते हुए मरने की अनुमति दे दी . अरुणा की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले दरिंदे का नाम सोहनलाल था. जिसे कोर्ट ने सजा तो दी, लेकिन वह अरुणा के साथ किये गये अपराध के मुकाबले काफी कम था.

पढ़ें  :  ( अरुणा शानबाग सिर्फ बलात्कार पीडिता ही नहीं थी .)


3. माया त्यागी  : 

गाजियाबाद निवासी ईश्वर त्यागी अपने दो साथियों और पत्‍‌नी माया त्यागी के साथ 18 जून 1980 को बागपत के पास एक शादी में शरीक होने आ रहे थे। बागपत में उनकी कार पंचर हो गई। कार ठीक करने के दौरान बागपत में तैनात एक एसआई नरेंद्र सिंह के साथ ईश्वर त्यागी और उनके साथियों की कहासुनी हो गई। नरेंद्र सिंह उस समय तो वहां से चला गया और कुछ ही देर बाद अपने कुछ साथी पुलिसकर्मियों के साथ वापस लौटा। नरेंद्र सिंह ने ईश्वर त्यागी और उनके दोनों साथियों की गोली मारकर हत्या कर दी और ईश्वर की पत्‍‌नी माया त्यागी को पूरे बाजार में निर्वस्त्र घुमाया। बाद में उनके खिलाफ कई मुकदमें दर्ज कर दिए।

आरोप था कि पुलिसकर्मियों ने माया के साथ दुष्कर्म भी किया। इस प्रकरण के बाद महिला आन्दोलन का गुस्सा फूटा , जनांदोलन तेज हुआ  । सरकार को न्यायिक जांच और सीबीसीआईडी जांच का आदेश देना पड़ा जिसमें 11 पुलिसकर्मियों को दोषी पाया गया। कोर्ट ने इनमें से 6 पुलिसकर्मियों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। मुख्य आरोपी नरेंद्र सिंह की घटना के कुछ ही दिन बाद हत्या हो गई थी, जिसके आरोप में माया त्यागी के देवर विनोद त्यागी जो उत्तरप्रदेश पुलिस में कांस्टेबल था उसे फंसा दिया गया। हालांकि वर्ष 2009 में विनोद त्यागी को नरेंद्र सिंह की हत्या के आरोप से कोर्ट ने बरी कर दिया था।

4. प्रियंका 

महाराष्ट्र के भंडारा के खैरलांजी में  सन् 2006 सिंतबर में करीब 50 लोगों ने दलित किसान भैयालाल भोतमांगे की पत्नी और उनके तीन बच्चों की गला काट कर निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी। ह्त्या के पूर्व भैया लाल की बेटी ‘ प्रियंका पर यौन हिंसा भी की गई थी . उसके गुप्तांगों में रॉड डालने का आरोप भी है .  इसके बाद दलितों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किया था। राज्य सरकार ने मामला तूल पकड़ता देख पूरे मामले की छानबीन सीबीआई से कराने का आदेश दिया था।सीबीआई ने 11 लोगों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र रचने, हत्या, महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ करने और सबूत मिटाने की कोशिश करने का आरोप दाखिल किया था।  समूचे महाराष्ट्र को हिला देनेवाले खैरलांजी हत्याकांड में दोषी 8 लोगों में से 6 को फांसी की सजा और 2 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. यह घटना जातीय हिंसा और बदले का उदहारण है .

5. इमराना 

उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर की इमराना के साथ उसके 69 वर्षीय ससुर ने बलात्कार किया था. इसके बाद धार्मिक पंचायत ने उसके पति को उसका बेटा करार दिया. और पति के साथ उसके निकाह को अवैध घोषित कर दिया. दारूल उलूम देवबंद ने भी धार्मिक पंचायत के फैसले को जायज ठहराया , जबकि बाद में देवबंद ने ऐसा कोई फतवा घोषित करने से इनकार कर दिया. हंगामे के बाद अभियुक्त मोहम्मद अली गिरफ्तार हुआ.

6. निर्भया 


दिल्ली में अपने पुरुष मित्र के साथ बस में सफर कर रही निर्भया के साथ 16 दिसम्बर 2012 की रात में बस के ड्राईवर , कंडक्टर  व उसके अन्य साथियों द्वारा पहले भद्दी-भद्दी फब्तियाँ कसी गयीं और जब उन दोनों ने इसका विरोध किया तो उन्हें बुरी तरह पीटा गया। जब उसका पुरुष दोस्त बेहोश हो गया तो उस युवती के साथ उन बहशियों ने बलात्कार करने की कोशिश की। उस बहादुर युवती ने उनका डटकर विरोध किया परन्तु जब वह संघर्ष करते-करते थक गयी तो उन्होंने पहले तो उससे बेहोशी की हालत में बलात्कार करने की कोशिश की परन्तु सफल न होने पर उसके यौनांग में व्हील जैक की रॉड घुसाकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया। बाद में वे सभी वहशी दरिंदे उन दोनों को एक निर्जन स्थान पर बस से नीचे फेंककर भाग गये। किसी तरह उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। वहाँ बलात्कृत युवती की शल्य चिकित्सा की गयी। परन्तु हालत में कोई सुधार न होता देख उसे 26 दिसम्बर 2012 को सिंगापुर के माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया , जहां जहाँ उसने अंतिम सांस ली .  30 दिसम्बर 2012 को दिल्ली लाकर पुलिस की सुरक्षा में उसके शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस घटना के बाद देशव्यापी आन्दोलन छिड़ा और भारत में यौन हिंसा के क़ानून में और सुधार हुए .

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हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

जयश्री रॉय

जयश्री रॉय कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण नाम हैं. चार  कहानी संग्रह , तीन उपन्यास और एक कविता संग्रह प्रकाशित हैं . गोवा में रहती हैं. संपर्क: jaishreeroy@ymail.com

हिंदी साहित्य की वर्तमान सक्रिय पीढी के एक सशकत हस्ताक्षर जयश्री रॉय का आज जन्मदिन है. पिछले 10 मई को स्त्रीकाल के पाठकों ने  उनके आगामी उपन्यास ‘ हव्वा की बेटी’  का एक अंश पढा था. किसी रचनाकार के जन्मदिन पर उसकी रचना का पाठ उसके पाठकों की ओर से उसे दी गई सबसे महत्वपूर्ण शुभकामना है . जयश्री को शुभकामनाओं के साथ  उनके उपन्यास का एक और अंश.  हव्वा की बेटी का स्त्रीकाल में प्रकाशित पहला अंश पढने के लिए नीचे लिंक पर किल्क करें : 


हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश

( उपन्यास के बारे में : अफ्रीकी  महादेश के सत्ताईस से ज्यादा देशों में महिलाओं के सुन्ना की प्रथा आज भी जारी है। ‘सुन्ना’ महज एक प्रथा नहीं बल्कि वहां की औरतों की ज़िन्दगी की त्रासदी का सबसे बड़ा कारण है। माहरा की कहानी के बहाने जयश्री रॉय ने अपने चौथे और नवीनतम उपन्यास ‘हव्वा की बेटी’ में स्त्री जीवन के उसी कसैले यथार्थ को उद्घाटित किया है। माहरा और उसकी जैसी औरतें नस्ल, मज़हब, जुबान और रंग से परे वस्तुत: एक स्त्री होती हैं. आंसुओं का खारापन, दर्द का स्वाद, काली त्वचा के नीचे बहने वाले लहू का रंग… इनका सब कुछ दुनिया के हर कोने में बसने वाली औरतों के समान ही है. इन औरतों का औरत होना दुख में होना है, बददुआ में होना है, अज़ाब में होना है… अफ्रीका के जंगलों और धू-धू करते रेगिस्तानों की स्याह-शुष्क दुनिया के चप्पे-चप्पे में माहरा जैसी लाखों बदनसीब औरतों की दर्द भरी कहानी धूल, बवंडर और आंधी के साथ रात दिन उसांसें लेती रहती हैं. यह उपन्यास उसी दुःख और उससे मुक्त होने की चाहत में लड़ती स्त्रियों की संघर्ष गाथा है। )

दूसरा भाग : 

दूसरे दिन रात के अंतिम पहर मैं एक बार फिर अनगढ़ पत्थरों के
उस स्याह टीले के पास अपनी मां के साथ खड़ी थी और वह कुरुप और डरावनी बंजारन अपनी कालीन के टुकड़ों की पैबंद लगी झोली से तरह-तरह के औज़ार और भोंथरे-नुकीले हथियार निकाल-निकालकर ज़मीन पर तरतीव से रख रही थी. आज हमारे साथ पड़ोस की सामोआ आपा भी थीं. आपा और मां ने मेरे दोनो हाथ दो तरफ से पकड़ रखे थे और मेरे घुटनों में धीरे-धीरे कंपन हो रहा था. पेट के नीचले हिस्से में कुछ घुलाता हुआ. मैं बड़ी मुश्क़िल से सीधी खड़ी रह पा रही थी.

तेज़ी से फैलती रोशनी में मैंने चाकुओं और दूसरे हथियारों पर जमे हुये काले खून के धब्बों को देखा था जिन्हें वह बंजारन औरत जिसे मां जाबरा कहकर सम्बोधित कर रही थीं, अपनी थूक से गीला कर लहंगे से पोंछ रही थी. उसके दोनों हाथ की बड़ी और बीचवाली उंगलियों के नाखून बहुत लंबे थे, मुर्गे के चंगुल की तरह आगे से झुके हुये. उन्हें देखकर मेरे पूरे शरीर में बार-बार झुरझुरी-सी दौड़ जा रही थी.

एक समय के बाद जाबरा ने अपना चेहरा उठा कर मां की ओर अजीब ढंग से देखा था, जैसे कुछ आंखों ही आंखों में कह रही हो और इससे पहले की मैं कुछ समझती या करती, मां और आपा ने मुझे जबरन खींच कर ज़मीन पर लिटा दिया था. मां ने बैठ कर मेरे सर को अपने सीने से लगा लिया था तथा आपा ने मेरे पैरों को दोनों तरफ फैला कर उनपर मां के पैर चढ़ा दिये थे. मां ने भी झट पूरी ताक़त से मेरे पांव अपनी हड़ियल जांघों से चांप दिये थे. इस बीच आपा ने पीठ की तरफ से मेरी दोनों बांहों को मोड़ कर सख़्ती से पीछे की तरफ से पकड़ लिया था. अब मां ने फिर कल जैसी ठंडी आवाज़ में कहा था- “माहरा! ज़रा बर्दास्त करना, सब जल्दी हो जायेगा!”

मैं बिना कुछ कहे अपनी विस्फारित आंखों से जाबरा को देखती रही थी जो मेरे फैली हुयी टांगों के बीच बैठी ठंडी आंखों से मेरा मुआयना कर रही थी. फिर मैंने देखा था उसके हाथ में ब्लेड का वह टुकड़ा जो दूसरे ही पल मेरी नर्म त्वचा में जाने कहां तक उतर गई थी. मेरी आंखों के आगे अचानक बिजली के नीले-पीले फूल-सा कुछ कौंधा था और मैं हलक फाड़ कर चिल्लाती चली गई थी! दर्द का ऐसा भीषण अनुभव मुझे पहले कभी नहीं हुआ था. मैं ईद-बकरीद के मौकों पर जानवरों को हलाल होते हुये देखती आई थी. अब्बू या कोई और जानवरों के मुंह काबा की तरफ करके उनके गले में ढाई दफा चाकू रेत कर छोड़ देते. उसके बाद वे जानवर देर तक तड़प-तड़प कर अपनी जान देते. उनकी उबली हुई आंखें, खुला हुआ मुंह, गले से भल-भल बहता खून, उनकी छटपटाह्ट के साथ चारों तरफ उड़ते खून के छींटे…. यह सब आमतौर पर हमारे लिये मनोरंजन के दृश्य हुआ करते थे, मगर आज एक तरह से मुझे भी ज़िन्दा ही जिबह किया जा रहा था. जाबरा के उठते-गिरते हाथ के साथ मेरे शरीर में तेज़ पीड़ा की लहरें उठ रही थीं, बिस्फोट-से हो रहे थे. कभी जाबरा के हाथ में चाकू होता, कभी पत्थर के टुकड़े तो कभी ब्लेड… भय, पीड़ा से अवश होते हुये मैंने देखा था, उसने अपने दोनों गंदे हाथों के लम्बे नाखूनों को मेरे भीतर खुबा दिये थे. दर्द के अथाह समुद्र में डूबते हुये मैंने महसूस किया था, वह अपने नाखूनों से मुझे नोंच-खसोट रही है, चीर-फाड़ रही है, कुतर रही है! उस समय आग़ की सलाइयां-सी मेरे जांघों के बीच चल रही थी. लग रहा था, ढेर सारी जंगली, विषैली चिंटियां मेरे अंदर घुस गई हैं और मुझे खोद-खोद कर खा रही हैं! या फिर कोई बिच्छु लगातर डंक मार रहा है. तेज़ जलन हो रही है. मेरे दोनों पैर बुरी तरह थरथरा रहे हैं, पूरा शरीर पसीने से भीग गया है. चिल्ला-चिल्ला कर गला फट गया है. मां का चेहरा मुझ पर झुका हुआ है और उन्होंने मुझे बुरी तरह जकड़ रखा है. उनकी आंखों में इस समय अजीब-सी चमक और मुग्धता हैं! जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान देखते हुये लोगों की आंखों में अक़्सर होती है. मेरे मुड़े हुये हाथ शायद टूट गये हैं और कमर से नीचे का शरीर शून्य पड़ गया है. मुझ से और चिल्लाया नहीं जाता… मेरे गले से घुटी-घुटी आवाज़ें निकल रही हैं. एक समय के बाद खून के बहाव को रोकने के लिये जाबरा मेरे जख़्म पर जानवरों की लीद और मिट्टी डालने लगती है. ऊपर आकाश फटकर धीरे-धीरे सफ़ेद पड़ रहा है… पास ही कहीं सियार हुंक रहा है, ताड़ के नंगे माथे पर एक गिद्ध बैठा है. उसकी नंगी, रोमहीन गर्दन, खून में डूबी पलकहीन आंखें, विशाल डैनों की झपट… सब धीरे-धीरे आपस में गडमड हो जाता है और फिर वह काली, बड़ी चादर आकाश के जिस्म से खिसक कर जाने कब मेरे ईर्द-गिर्द फैल जाती है और मैं उसके तरल, सुखद अंधकार में डूब जाती हूं… आह! मृत्यु… यह इस जघन्य पीड़ा, इस नरक से कहीं बेहतर है. उस क्षण मैं सचमुच मर जाना चाहती थी. यह एक बेहतर विकल्प था. उस ठंडी, काली, निविड़ शून्यता को मैंने किस आवेग से स्वयं में निर्बाध उतरने दिया था…

ना जाने कितनी देर बाद मेरी आंखें खुली थीं. मैं मरी नहीं थी, जिन्दा थी… ओह! यह प्रतीति कितनी भयावह थी मेरे लिये! जीवन यानी पीड़ा और… पीड़ा! मेरे कमर से नीचे का हिस्सा नरक बन गया है. एक धधकता हुआ कुंड! ऐसे जल रहा है कि जैसे किसी ने ताज़े ज़ख़्म पर नमक छिड़क दिया है. अंदर कुछ धप-धप कर रहा है. सारी शिरायें सुलग रही हैं. एक चीरता हुआ दर्द बिच्छु के डंक की तरह रह-रह्कर लहर उठता है…
मेरा चेहरा सूखे हुये आंसुओं से चिटचिटा रहा है, होंठों पर पपड़ियां जम गयी हैं. किसी तरह सर उठा कर मैं अपने आसपास देखने की क़ोशिश करती हूं. मां हाथ में एक सूखी लकड़ी लेकर आस पास झपटते हुये गिद्धों को भगाने की क़ोशिश कर रही हैं. गिद्ध हड़बड़ा कर थोड़ा उड़ते हैं, फिर वापस लौट आते हैं. चारों तरफ अजीब-सी बदबू है. दूर सूखे नाले के पास दो लकड़बग्घे अपनी लम्बी जीभ निकालकर हांफ रहे हैं… गिद्धों की कर्कश चीख, डैनों की झपट, साथ लकड़बग्घों की डरावनी आवाज़- जैसे कई चुड़ैलें नकिया कर एक साथ हंस रही हों!
मैंने सिहर कर उस तरफ से अपनी आंखें फेर ली थी और दायीं तरफ देखा था. सामने पत्थरों और झाडियों में मेरे शरीर के छोटे-छोटे टुकड़े-