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क्यों मारी जा रही हैं दलित महिलायें

निवेदिता
सूरज ने आसमान पर कब्जा जमा लिया था। घरों के उपर झुलसती हुई गरमी छा गयी थी। दिन भर के तेज और तपती हुई लू में हम अलौली गांव पहुंचे। पूरा गांव हमारे इंतजार में था। यह वही जगह थी जहां दलित महिला की हत्या हुई थी। पिछले पांच माह में तीन दलित महिलाओं की हत्या हो गयी। लोग गुस्से में हैं। खून के गहरेे निशान मिट्टी पर अब भी मौजूद हैं, जैसे खून की धारा फूट पड़ी हो। दलितों के लिए मातम करने वाले इन एकाकी लोगों पर कौन घ्यान देगा। वे जानते हैं गरीबों की मौत पर कोई मातम नहीं मनाता। यह बड़ी भयंकर और क्रूर हिंसा थी। उन्होंने कभी इतनी देर तक किसी मासूम स्त्री को मौत की यंत्रणा से छटपटाते नहीं देखा था। हत्या के  मूल में विद्रोह था। व्यवस्था के प्रति विद्रोह, दलित स्त्री की देह पर की गयी हिंसा का विद्रोह, अन्याय के खिलाफ विद्रोह ।

अलौली खगडिया जिला का छोटा सा गांव है। जिस गांव के हर आदमी की जुबान पर उन तीन स्त्रीयों के नाम है , जिसकी हत्या कर दी गयी। उन्हीं में से थीं भागो देवी । लोगों ने बताया कि भागों देवी की मां ने उसका नाम भागो रखा था। बचपन में वो खेत,जंगल, नदी व पहाड़ छानती रहती थी। उसके कदमों में इतनी ताकत थी कि नंगे पांव कोसो मील भाग जाती थी। लोग कहते थे ये लड़की हवा से बातें करती है। हवा से बातें करने वाली लड़की ने एक दिन जाना कि इस देश में दलित होने का क्या मतलब है। फिर वह लड़की आग उगलने लगी। जल ,जंगल, जमीन पर हक जताने लगी। जाने कौन सी तारीख में उसे पता चला कि इस लडाई में जो साथ दे रहे हैं वे उन्हीें जैसे लोग हैं। गांव वाले कहते हैं कि वे कम्युनिस्ट है। गरीबों की पार्टी है। भागों इस पार्टी में शामिल हो गयी। एक शाम जब पूरा गांव जमीन के हक को लेकर बैठक कर रहा था अपराधियों ने गोली मारकर भागों देवी की हत्या कर दी। खगडिया जिला के अलौली प्रखंड में पिछले पांच  माह में सात दलितों की हत्या हुई जिसमें तीन महिलाएं हैं।यह वही राज्य है जहां की सरकारें पिछड़ों और दलितों की राजनीति करती रही है। भागों देवी जैसी हमारे देश में हजारों महिलाएं हैं जो जिन्दगी के लिए लड़तीं हैं। और मारी जाती हैं। पर  ये खबर नहीं है। किसी दलित महिला की मौत खबर नहीं हो सकती है।

 पुलिस फाईल में ये महज तीन औरतें हैं जिनकी हत्या हुई। कौन हैं ये तीन औरतें। क्यों इनकी हत्या की गयी? ये जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। रुणा देवी, सोनी कुमारी और भागो देवी।  सोनी की उम्र 16 वर्ष है। सोनी ने अभी बोर्ड परीक्षा दी थी। एक दलित लड़की ने उंचे सपने देखे। वो पढ़ना चाहती थी। इसलिए दूसरों की जमीन पर काम करने वाले मजदूर मां,बाप ने सोनी को मास्टर रख कर पढ़ाया। मास्टर खुद  पिछड़ी जाति का है- पर इस पृतिसत्तामक सोच के साथ है कि हर दलित स्त्री की देह उनकी संपत्ति  है। उस दिन घर में कोई नहीं था। सोनी को अकेला पाकर उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की गयी। सोनी ने अपनी पूरी ताकत से विरोध किया। अन्तिम समय तक लड़ती रही। और मारी गयी। सोनी का मामला थाने में है। सोनी की हत्या की चश्मदीद गवाह सोनी की 6 साल की भतीजी है । जो इस हादसे से सकते में है। वह रो रोकर कहती है मास्टर जी ने दीदी को मार डाला। पर पुलिस को इतनी फुरसत नहीं की वह नन्हीं बच्ची की गवाही ले। पूरा परिवार दहशत में है। हम सब जानते हैं कि हमारा इतिहास दलितों के खून से रंगा है।

 सामन्तवादी अवशेष अब भी बचे हुए हैं। इस आजाद मुल्क में अब नयी ब्याही गयी कोई दलित स्त्री भले ही किसी जमींदार के पास परोसी नहीं जाती हो पर किसी भी समय वह दबोच ली जाती है। भागो देवी और रुणा देवी के साथ क्या हुआ? अलौली प्रखंड में दलितों की बड़ी आबादी है। ये इलाका राजनीतिक रुप से सजग है। बिहार में अभी भी कुछ जगह बची हुई है जहां कम्युनिस्ट पार्टी जिदां है। खगडिया में कम्यूनिस्ट पार्टी के सात लोगों की हत्या हो चुकी है भूमि आंदोलन को लेकर। भागो देवी और रुणा देवी जमीन की लड़ाई लड़ रही थीं। मारे गए कामरेड की चश्मदीद गवाह थीं। उस इलाके के लोग जानते हैं उस स्त्री को जो जिन्दगी भर सच के साथ खड़ी रही। जिसने स्त्रियों को बताया कि एक दलित स्त्री किस तरह सम्मान के साथ जी सकती है। जिस दिन हत्यारों ने गोली मारी भागो देवी अपने गांव के लोगों के साथ जमीन के मुद्दे पर बैठक कर रही थी। सूरज आग उगल रहा था, पेड़ों की टहनियों में से गर्मी छनकर आ रही थी। एक सफेद धुन्द तेजी से सुबह के आकाश में फैल रही थी जिससे हवा में और ज्यादा दम घुटने लगा था। फिर भी लोग जमे  हुए थे। उसी समय हत्यारे आए और भागो देवी पर गोलियां चलायी।  जब तक  लोगों को समझ में आता भागो देवी ने दम तोड़ दिया।
हजारों लोगों ने अपनी कामरेड को विदा किया। चिताओं से उठने वाली लाल रौशनी , मशालों से चारों दिशाओं में छिटकती हुई चिनगारियां उपर से झांकते हुए आसमान की ओर लहक रहा था।

संजू शब्दिता की गजलें

संजू शब्दिता


युवा कवयित्री संजू शब्दिता जीवाजी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत हैं. संपर्क : sanjushabdita@gmail.com

1

वो मेरी रूह मसल देता है
साँस भी लूँ तो दखल देता है

इससे पहले कि मैं कुछ कह पाऊँ
खुद के अल्फ़ाज़ बदल देता है

राज़ की बात उसे मत कहना
वो सरेआम उगल देता है

मैं तो देती हूँ दुवायें उसको
एक वो है कि अज़ल देता है

उसको मालूम नहीं, गम में भी
वो मुझे रोज़ ग़ज़ल देता है

2

हमारी बात उन्हें इतनी नागवार लगी
गुलों की बात छिड़ी और उनको खार लगी

बहुत संभाल के हमने रखे थे पाँव मगर
जहां थे जख्म वहीं चोट बार-बार लगी

कदम कदम पे हिदायत मिली सफर में हमें
कदम कदम पे हमें ज़िंदगी उधार लगी

नहीं थी कद्र कभी मेरी हसरतों की उसे
ये और बात कि अब वो भी बेकरार लगी

मदद का हाथ नहीं एक भी उठा था मगर
अजीब दौर कि बस भीड़ बेशुमार लगी

3

चाँद तारे ख़्वाब में आते नहीं
हम भी छत पे रात में जाते नही

वो ज़माना था कि बातें थी गुज़र
आज हम भी वैसे बतियाते नहीं

वो पुरानी धुन अभी तक याद है
पर हुआ है यूँ कि अब गाते नहीं

ढूंढते हैं मिल भी जाता है मगर
चाहिए जो बस वही पाते नहीं

जाने क्या मंज़र दिखाया आपने
अब नज़ारे कोई बहलाते नहीं

4

मुझे बेजान सा पुतला बनाना चाहता है
किसी शोकेस में रखकर सजाना चाहता है

मेरे जज्बात सब उसको खिलौने जान पड़ते
जिन्हें वो खुद की चाभी से चलाना चाहता है

कुतर डाले मेरे जब हौंसलों के पंख उसने
बुलंदी आसमां की अब दिखाना चाहता है

मेरे किरदार में सख्ती नहीं उसको गंवारा
बिना हड्डी का कर मुझको पचाना चाहता है

दिवारें चार मेरी हो गईं हैं कब्रगाहें
मुझे जिन्दा ही वो मुर्दा बनाना चाहता है

5

सिर्फ कानों सुना नहीं जाता
लब से सब कुछ कहा नहीं जाता

दर्द कि इन्तहां हुई यारों
मुझसे अब यूँ सहा नहीं जाता

चुन के मारो सभी  दरिन्दों को
माफ इनको किया नहीं जाता

है भला क्या तेरी परेशानी
बावफ़ा जो हुआ नहीं जाता

कैसे वादा निभाऊ जीने का
तेरे बिन अब जिया नहीं जाता

6

हँसते मौसम यूँ ही आते जाते रहे
गम के मौसम में हम मुस्कुराते रहे

यादें परछाइयाँ बन गयीं आजकल
हमसफ़र हम उन्हें ही बताते रहे

कल तेरा नाम आया था होंठों पे यूँ
जैसे हम गैर पर हक़ जताते रहे

दिल के ज़ख्मों को वो सिल तो देता मगर
हम ही थे जो उसे आजमाते रहे

तल्ख़ बातें ही अब बन गयीं रहनुमाँ
मीठे किस्से हमें बस रुलाते रहे

चल दिये हैं सफ़र में अकेले ही हम
साथ अपने ग़मों को बुलाते रहे

रूठ कर तुम गये सारा जग ले गये
चाँद तारे भी हमको चिढ़ाते रहे

7

इंसानियत का पता मांगता है
नादान है वो ये क्या मांगता है

वो बेअदब है या मैं बेअसर हूँ
मुझसे वो मेरी अना मांगता है

हद हो गई है हिक़ारत की अब वो
रब से दुआ में फ़ना मांगता है

बरकत ख़ुदाया मेरे घर भी कर दे
बच्चा खिलौना नया मांगता है

किस्मत में मेरे नहीं था वो लेकिन
दिल है कि फिर भी दुआ मांगता है

8

दिल में इक दर्द है जो ज़िन्दगी सी लगती है
जाने क्यों फिर ये कभी दिल्लगी सी लगती है

जाओ छेड़ो न अभी गम में हमें रहने दो
गम का एहसास हमें बन्दगी सी लगती है

हम भी बदनाम हुए थे कभी इस दुनिया में
अब तो हर बज़्म ही रुसवा हुई सी लगती है

ऐसे लोगों से बचाना हमें तू या मौला
जिनसे मिलते ही हमें बेकली सी लगती है

उसकी बातों में करिश्मा है कोई क़ुदरत का
जब भी सुनते हैं उसे बेखुदी सी लगती है

सच की आदत जो पड़ी है हमारी बचपन से
बोल दें हम तो उन्हें खलबली सी लगती है

उम्मीदों के उन्मुक्ताकाश की क्वीन

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

एंड दे लिव्ड हैप्पिली एवर आफ्टर ‘ की तर्ज पर  दाम्पत्य के सुखांत से रसानुभूति पैदा करने वाली  रोमांटिक फिल्मों का दौर अब फीका पड़ता नज़र आ रहा है और उसके स्थान पर विवाह की पपम्परागत संस्था को नकारकर उन्मुक्ताकाश में अपने स्व को तलाशती नायिकाओं वाली फिल्मों ने दर्शकों की कलात्मक रुचि का परिष्कार करना आरंभ कर दिया है । क्वीन , डॉली की डोली , पीकू और अब तनु वेड्स मनु रिटर्न्स : स्त्री विमर्श वाली समझदार फिल्मों की पूरी फेहरिस्त बनती जा रही है ।  यह स्त्री विमर्श अपनी सामग्री ही नहीं पेशकश में भी जीनियस किस्म का है । पत्नी , मां , बहन , बेटी , बहू नहीं , स्त्री  की पहचान है उसकी आजाद शख्सियत ;  जिसे जीता , लुभाया , भरमाया , बहलाया नहीं जा सकता । इन सबमें स्त्री पुरुष की सत्ता से आज़ाद होती  स्त्री अपनी दुनिया की क्वीन है । क्वीन जिसके अपने सपने हैं , अपना हौसला है , रास्ते बनाने की तड़प है । जहां नायिका  एक कोई अच्छे से नायक के प्रेम में पडकर , एक अच्छे घराने की वधू बनकर सुखी वैवाहिक जीवन की अपेक्षित नियति का शिकार होकर जीना स्वीकार नहीं करती ।

तनु वेड्स मनु रिटर्न्स को  बेहद कलात्मक और मनोरंजक पैकेज के बावजूद  स्त्री विमर्श की  एक बेहतरीन फिल्म माना जा सकता है । तनु सामंती व्यवस्था के भीतर अपनी मनमाफिक और आजादी के लिए प्रपंच करने वाली स्त्री समाज की प्रतिनिधि है । तनु जितनी आधुनिक दिखती है,  उससे कहीं अधिक वह पुरातन सोच की है .वह पत्नी नहीं जोंक है,  जिसको एक बार पत्नी की पोस्ट हासिल हो जाए तो वह जीवन भर निठल्ले रहकर पति का सामाजिक – मानसिक शोषण करती रह सकती है । उसके दुख उसके अभाव सब उसके खालीपन की उपज हैं । रस उसके जीवन में इसलिए नहीं क्योंकि वह एक कर्महीन प्राणी है |. जिन पत्नी अधिकारों की बात वह करती है वह सब हास्यास्पद हैं क्योंकि उसको खुद किसी कर्तव्य का अहसास तक नहीं है |. उसके आंसू दर्द नहीं जगाते क्योंकि उनका कारण धोर स्वार्थी नजरिया है | दुनिया में अनगिनत पत्नियां हैं वह भी एक है जिसके जीवन की कोई सामाजिक उपादेयता नहीं | कुल मिलाकर यह कि तनु और उस जैसी अन्यों में ऐसा क्या है कि उन्हें ज़रा देर भी चाहा जा सके | ये पत्नी बनने के लिए पैदा हुई और पत्नी के गुमनाम ओहदे पर पैरासाइट की तरह जीते रहने को खुदा की नेयमत मानने वाली फूहड़ प्रजाति है |

इसके ठीक विपरीत दत्तो जैसी आधुनिक , संधर्षशील , आत्मनिर्भर ,सुलझी हुई , स्पष्टवादी और स्वाभिमानी लड़की के चरित्र में बहुत सी संभावनाओं की मजबूत झलक दिखाई गई है । दत्तो की बेहद पारंपरिक पृष्ठभूमि के कॉंनट्रास्ट में उसका  समूचा चरित्र बहुत यथार्थवादी तरीके से पेश किया गया है . उसे अपने खिलाड़ी होने , अपने बल पर अपना जीवन जीने की जिद पर आत्माभिमान है । दत्तो के इस दिपदिपाते चरित्र के आगे  ‘अपने अंडरवियर तक के लिए’  परनिर्भर रहने वाली तनु जैसी औरतों के  बेमानी हकों की हाय हाय हास्यास्पद लगने लगती है  । दत्तो  एक अत्यंत बंद समाज से आने वाली  कम आयु की हौसलों और उम्मीदों से सपनों से भरी लड़की है । एक आम भारतीय लड़की जिसके सपनों की दहलीज पर जो भी पहला समर्पित नायक द्वार खट्खटाता है ,वह उसे ही दिल दे बैठती है । पर वह प्रेम और समझौते में फर्क समझती है । चूंकि वह खैरात नहीं लेती स्वाभिमानी है , खिलाड़ी है , तो गिरकर उठना भी जानती है और हार को जज़्बे के साथ वैसे ही स्वीकार  करना जानती है जैसे जीत को । उसके लिए तनु की तरह ग़मों को पालने की सहूलियत है न ही समय और न ही आवश्यकता । इसलिए वह ‘ ऎसे शिव से गिरिजा विवाह करने की मुझको नहीं चाह ‘ जैसे औदात्यपूर्ण फैसले से न केवल खुद को हमेशा के लिए आजाद कर लेती है वरन तनु और मनु जैसे विवाहित जोड़ों को उनकी

परम्परागत दाम्पत्य की स्वाभाविक नितयि को भोगने के लिए सहज स्पेस  दे देती है । एक आम लड़की की सी भावनात्मक कमजोरी से तुरंत निकलकर समारोह में शराब पीकर शोर मचाने वाले को अपना करारा कराटॆ चाप देते दिखाकर और तनु और मनु को टाई से उपजे इमोश्नल मैलोड्रामात्मक प्रेम विवाद में पड़ता दिखाकर  निर्देशक ने फिल्म के अपने पात्रों से पूरा पूरा न्याय किया है । अवस्थी जी को जूस पिलाने वाले अंतिम दृश्य में प्रेम की अनंत संभावनाओं वाले आकाश में उड़ने और एक्स्प्लोर करने वाली संघर्षशील लड़की के रूप में कुसुम का चरित्र और भी अधिक प्रामाणिक लगने लगता है । यदि निर्देशक ने इस संबंध के बनने और टूटने को दत्तो के लिए एक सबक की तरह दिखाया होता और दर्शक को आगे के जीवन के लिए मात्र शुष्क लक्ष्यों के लिए कटिबद्ध दत्तो दिखाई होती तो यह स्वतंत्र स्त्री का एकांगी प्रस्तुतिकरण कहलाता । भावात्मक , आर्थिक , सामाजिक वैचारिक  स्वतंत्रता से लबरेज दत्तो का चरित्र दर्शक के परंपरागत माइंडसेट् से दखलंदाज़ी कर उसे दत्तो से साधारणीकृत होने पर विवश कर देता है । लगता है कि तनु जीत गई पर साफ महसूस किया जा सकता है तनु हार गई । उसे मिला लिजलिजे दाम्पत्य प्रेम से लूटे गए आजीवन अधिकारों के आराम से भरी एक बंद दुनिया । जहां रहेगा आधारहीन उद्देश्यहीन और  वास्तविक उल्लास से हीन जीवन । जबकि दत्तो ने अपने लिए अनंत आकाश की संभावनाओं भरी जिंदगी को वापिस जीत लिया ।

पूरी फिल्म में मनु के प्रति दयनीय पात्र के प्रति सहानुभूति पैदा होती है । जिम्मेदार , कमाऊ , सिंसियर हस्बेंड बनकर अपने सामाजिक पारिवारिक दायित्व को ही दाम्पत्य प्रेम का नाम दे देना उसकी नियति है । वह इसी प्रेम को  तलाशता फिरने वाला पति नामक जीव है और पहले असफल वैवाहिक जीवन के दुखांत के तुरंत बाद एक नये प्रेम संबंध  के भ्रम में पड़कर फिर से ” एक अच्छा हस्बेंड बनकर दिखाउंगा ” की अंतहीन अपेक्षाओं के रास्ते पर  होम होने चल देता है । फिल्मकार यदि मनु शर्मा के इस नये संबंध का आधार तनु और दत्तो की रूपसाम्यता न दिखाता तो हस्बेंड प्रजाति की इस नियति के दंश को नहीं उभार पाता । एक तरह के संबंध की दुखांत स्थिति के बावजूद चालीस की उम्र में मनु शर्मा उसी पुराने संबंध को नई पत्नी में तलाशने की अपरिपक्वता दिखाता है । फिल्म के दूसरे पुरुष पात्रों को भी ‘ कंधे ‘ की तरह इस्तेमाल होने के लिए उत्कट  दिखाकर  फिल्मकार ने परंम्परागत स्त्री पुरुष संबंध को बेहतरीन तरीके से संतुलित  किया है ।
इस पूरी फिल्म की कलात्मक प्रस्तुति में स्त्री विमर्श एक अंडरकरंट  के तौर पर लगातार मौजूद रहा है । फिल्म की कलात्मक प्रस्तुति में हर तरह के दर्शक के आअनंद के लिए स्कोप दिखाई देता है । शुद्ध मनोरंजनात्मक नजरिये से देखने वाले दर्शक का दिल  भी अनजाने में  दत्तो ही जीत ले जाती है और यही इस फिल्म की सारी ताकत है  ।    दर्शकों की कलात्मक अभिरुचि का संस्कार करने वाली इस तरह के विमर्शों वाली फिल्मों का स्वागत किया जाना चाहिए ।

एक खत‍ पागलखाने से और अन्य कवितायें

 परी

( पेरिया परसिया , सेतारह या पेरि, हिन्दी में जिसे ‘परी’ नाम दिया गया, की कवितायें . एक कवि के प्यार में पड़ी ईरानी कवयित्री परी की कवितायें  . अनुवाद चर्चित कवयित्री रति सक्सेना ने किया है.  )

एक खत‍  पागलखाने से

1

वे कहते हैं कि
वे हाथ बाँध देंगे मेरे
पलंग के सिरहाने से
यदि मैंने दीवारों पर
सिर पटका

उन्हें प्यार है दीवारों से

मैं बन्द हूँ
पांच दीवारों वाले
एक सफेद ठण्डे कमरे में
जहाँ कोई खिड़की नहीं
हवा के लिए

उन्हे नफरत है खिड़कियों से

मैं अकेली पत्ती, पितलाई हरी
पत्तियों की तरह, मुझे दरकरार होती है
ताजी हवा की, यदि विश्वास नहीं उन्हें
मेरे क्लोरोफिल पर तो
इतना याद रखें कि
एक पागल औरत को भी जरूरत है
हवा की,  जो उसके बालों को सहला दे

वे परागकणो से युक्त  हवा को प्रदूषित कहते हैं

कमरे की पाँचवी दीवार मेरी छत है
यह दीवार सरकाई जा सकती है
इसका बोझ मेरे कंधों पर टिका है
जिससे मेरे दिल और इसकी दूरी
हर क्षण कम होती जा रही है
यह  हर क्षण  नीचे झुकती जा रही है
किन्तु कभी ढहती नहीं

वे खुद चमकदार आसमान के नीचे रहते हैं

वे कहते हैं कि मुझे एक सिगरेट देंगे
यदि मैं कसम खाऊँ कि मैं अच्छी बच्ची बनूँगी
पलंग के नीचे घुस कर अपनी नसें नहीं चबाऊँगी
लेकिन वे एक ट्रे लेकर आते हैं, शाक थेरोपी से पहले, हर बार

वे मुझे मार डालने के आदी हो गए हैं।

उन्होंने मेरे दीमाग से संगीत मिटा दिया
उन्होंने मेरी देह से नृत्य मिटा दिया
लेकिन वे दिल से नहीं मिटा पाए
तुम्हारे प्यार को, तुम्हारी यादों को, मेरी चाहत को
तुम्हारी कविताओं का अपनी जबान में तर्जुमा करने को

वे मुझे मार डालने के आदी हो गए हैं।

2

मुझे नहीं चाहिए सिगरेट
नहीं चाहिए सूरज की रोशनी
नहीं चाहिए मुझे आजादी

बस कह दो उन्हे कि
दें दे मुझे कागज और कलम
जिससे मैं बात कर सकूँ अपने आप से

यहाँ सारे कि सारे डाक्टरों ‌और नर्सों
के सिर गायब हैं

मैं कभी नहीं माँगूंगी उनसे चाभी
जिससे इस दरवाजे को बन्द कर
महसूस कर सकूं आजादी अकेलेपन की

कभी भी नहीं माँगूगी उनसे धर्मग्रन्थ
पापों के प्रायश्चित के लिए
जिससे महसूस कर सकें वे अपने को मजबूत

ईश्वर भी उतना अकेला नहीं होगा आसमान में
जितना की एक पागल औरत है अकेली
इस कमरे में जो बन्द नहीं होता

कह दो उनसे कि वे दे दें मुझे बस एक कागज और कलम
जिससे मैं बुन सकूँ एक खूबसूरत प्रेम कविता
मेरे प्यार की आत्मा के लिए, सर्दियाँ करीब आ रहीं है।

सर्दियाँ करीब आ रहीं है।

3

ये दीवारें इतनी खाली क्यों हैं?
न कोई दर्पण, ना चित्र,  ना ही धब्बे
बच्चों के हाथों के निशान तक नहीं
केवल डरावनी सफेदी
केवल डरावनी सफेदी

दीवार घड़ी कहाँ छिपी है?
मेरे सीने में? मेरी बिल्ली कहाँ है?
कहाँ है मेरा वैक्यूम क्लीनर?
कहाँ हैं बिना धुले कपड़ों और
झूठे बर्तनों का ढेर?

यह डरावनी सफेदी
क्या यह इत्तिला है दुनिया के अन्त की?
यहाँ हर दिन बीता हुआ कल है
कोई आने वाला कल नहीं, दर्पण नहीं, घड़ी की सुइयाँ नहीं
बस दीवार पर मंडराती एक औरत की परछाई

मरी मोमबत्ती की तरह

कोई है इस दुनिया में जो

मरी मोमबत्ती को याद रखता हो ?

4
आराम के लिए वक्त नहीं है
यहाँ तक कि पागल औरत के लिए भी

आधी रात को
एक बिना सिर वाला आदमी
सफेद चोगे में
आता है कमरे में
बोलता है सफेद आवाज में..
” तुम अभी भी खूबसूरत हो”
मेरे इंकार करने पर कहता है..
“मै तुम्हारा पति हूँ”

वह झूठ बोल रहा है, मैं जानती हूँ
लेकिन वह मेरे पति जैसा लगता जरूर है
वह शुरु होता है बिना चुम्बन के
बिल्कुल मेरे पति जैसे ही
उसे अन्तर मालूम नहीं हैं
प्यार और यौन सम्बन्ध में

शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है

सुबह वह फिर आता है
खूबसूरत जवान नर्स के साथ
” हमारे बच्चे कैसे है” मैं पूछती हूँ
वह अपने बालों वाले हाथ हिला हिला कर हँसता है, हँसते हुए कहता है
” मुझे नहीं मालूम, मैं तुम्हारा पति नहीं हूँ, “फिर पूछता है–
” आज कैसा लग रहा है, कल रात को कोई बुरा सपना तो नहीं देखा?”

5

क्यों हूँ मैं यहाँ?

क्यों कि मैंने एक आदमी से प्यार किया
जिससे मैं कभी मिली तक नहीं?

क्यों कि मेरे और प्यार के बीच ऐसा कोई पुल नहीं
जो दिखाई दे, सिवाय कविता के?

क्या इसलिए कि मैं पक्की व्यभिचारिणी हूँ
स्वप्न युक्त सपनों को बुनती हुई?

कोई भी विश्वास नहीं करता मुझ पर
सिवाय इस गुलाबी गोली के

जो उनके कानून और धर्म के अनुरूप
मेरे दिल की क्रूर धड़कनों को वश में रखती है

मैं यहाँ क्यों हूँ?

मेरी आँखों में आँसू का एक कतरा भी नहीं?
सिवाय भूतों के कोई मुझसे मिलने आता भी नहीं

क्यों नहीं मुझे लोगों से मिलने दिया जाता?
अपने परिवार से, बच्चों से?

” कोई अपनी बेटी से शादी नहीं करेगा
क्यों कि उसकी माँ पागलखाने में है”

मेरे पति ने कहा था गुस्से में, जब वह
आखिरी बार मिलने आया था

उम्दा लफ्ज, उम्दा काम, उम्दा सोच

तभी तो मैंने अपने पति को मार डालने के लिए वार किया
किसी ओर के लिए नहीं, सिर्फ खुदा के लिए

6

अब मैं किससे अपना अकेलापन बाटूँगी
यह चींटी भी मर गई?

नर्स गुस्सा कर रही है
“शर्म आनी चाहिए तुम्हे!
तुम एक चींटी के मरने पर रो रही हो
जब कि पूरी दुनिया में लाखों करोड़ों निरपराध
मारे जा रहे हैं, बमबारी की बरसात में”

मैं दूसरों के बारे में सोचने की कोशिश कर कर के थक गई
वे मर गए हैं
बस मेरे अकेलेपन को तकलीफ देने के लिए
वे वास्तब में हैं या फिर
मर गए वास्तब में?

मैं अब इस वास्तब पर विश्वास नहीं करती
यहाँ तक कि जंग मेरे अपने बेटे की मौत की बात पर भी नहीं
मुझे तो यह बात कविताई झूठ लगती है
बम क्या खाक बच्चों को मारेंगे
वे तो दुश्मनों के लिए बने हैं

मैं इस वक्त बस मरी चींटी के बारे में सोच रही हूँ
सारे मीडिया वाले इस बात पर खामोश हैं
यह चींटी अमेरिका की प्रेसीडेंट जो नहीं थी
न ही कोई धार्मिक गुरु
दुनिया की आखिरी चींटी भी नहीं
उसकी जिन्दगी और मौत कोई खास मायने नहीं रखती
यहाँ तक की कविता पत्रिका का चीफ एडिटर
जो सताई गई औरतों की कविता छापता है
उसके लिए भी वह केवल एक चींटी थी, और कुछ नहीं
उसे तो नर्स के कदमों मे कुचल कर मरना ही था

अब जब नर्स चली गई तो मैं अपने आप से पूछ रहीं हूँ
इस चींटी की मौत के लिए यह पागलखाना ही क्यों चुना गया
क्या खुदा कोई संदेश दे रहा है?

दवाइयों की गोलियों और शीशी की जगह
यदि वे मुझे एक गमला दे दें
मैं उसमे चींटी का मरी देह को दफना दूँगी उसमें
तो उसका रहस्य लाल पंखुड़ियों में खिल उठेगा

7
मैंने भूल के गिद्ध के सामने अपना दिल खोल दिया
जिससे वे खा ले तुम्हारी यादें, और बैठ जाए तुम्हारी जगह
लेकिन तुम बच गए

मैंने पागलपन के अथाह रेगिस्तान में पनाह ली
जिससे एक दुनिया मिले जहाँ तुम नहीं हो
लेकिन पहले भी ज्यादा चालाक शब्दों ने , मेरे दीमाग में पनाह ले ली
यह याद दिलाने के लिए, यह स्वीकार करने के लिए
तुम्हारे सिवाय, और कोई भी जगह नहीं ले सकता है
मेरे दीमाग में, मन में

वे लगातार मेरे लिए दवा ‌और गोलियाँ ला रहे हैं
इस ठंडे सफेद कमरे में
जहाँ मैं दुनिया की आखिरी चील की मानिंद रह रही हूँ
यह याद रखते हुए की खो गया है मेरा प्यार का आसमान

8

मेरी माँ किसी और मर्द के बारे में क्यों नहीं सोचा करती थी
अपने शौहर के साथ सोते वक्त
या आलू छीलते वक्त ?

मेरी सोच हरदम देह को धोखा देती रही

क्यों मेरी माँ के लिए पागलखाना बस
पागलों के रहने की जगह है? क्यों मैं अपने अनन्त सवालों को
भूल जाती हूँ, ज्यों ही अपनी ओंर आते देखती हूँ सिरकटी देहों को

9

पागलखाने के इस कमरे की सफेदी और ठंडक
गवाह है, प्रिय! कि मैंने तुमसे कुछ नहीं चाहा
न धन दौलत, न अंगूठी, यहाँ तक कि कबूतर की परछाई तक नहीं
मेरी एक मात्र इच्छा थी कि तम्हें सुन सकूँ
मेरी आँखे चाहती थीं तुम्हें देखना
” झूठी और धोखेबाज” तुमने कहा, और छोड़ कर चले गए
सफेदी और ठंडापन जो इस कमरे में छाया है
साफ- साफ बयान करता है कि मै झूठ बोल ही नहीं सकती
हालाँकि कोई मेरे हौंठों से सच सुनना पसन्द करता ही नहीं है
सच जिससे मैं नफरत करती हूँ वह है ” मौत”

10

जब मैं तुम्हारे प्यार में पड़ी तब
मेरे पास एक अच्छा शौहर था, जिसने मेरे लिए
चार कमरों का बंगला बनवा रखा था

जब मैं तुम्हारे प्यार में पड़ी तो
मेरे पास एक बेटा था , गबरू जवान
और एक प्यारी खूबसूरत बेटी

जब मैं तुम्हारे प्यार में पड़ी तो
मुझे कुछ नहीं चाहिए था
अलावा एक आत्मा के, मेरी देह के लिए

तुमने मेरे दिल को अपने प्यार भरे गीतों से भर दिया
तुमने जता दिया कि — “बस मुझे मानो
मैं ही प्यार का आखिरी मसीहा हूँ इस दुनिया में”

तुमने मेरे खाबिन्द को लिखा
उसे धमकाया ” उसे आजाद कर दो! ओ नीच आदमी!”

प्यार के उस विशाल आसमान में
जब मैं तुम्हारी बाहों में बँधी , कल्पना में ही
आँखे बन्द किए , बिना परों के उड़ रही थी

तुमने शासित कियाः- खुदा को चुन, बस खुदा को
मैने अपनी बीबी से वायदा किया है कि तुम्हे खत नहीं लिखूँगा!
मैं अब से अपने बेटे के लिए अच्छा पिता बनूंगा!

तुम्हारे प्यार में पड़ने से पहले
सभी घड़ियों की दो सुइयाँ हुआ करती थीं
और पागलखाना मेरा घर नहीं हुआ करता था।

11

खुदा!
तूने दूसरों के लिए जिन्दगी बनाई
मेरे भाग्य मे कविता बदी थी
और अकेलापन
और पागलपन
दूसरों के पास चार मौसम हैं
और दो पाँव चलने के लिए
जबकि दुनिया मेरे बर्फीले पंखो पर टिकी है
अपनी खंदको, यतीमखानों और मरघटों के साथ

दूसरों को तो बस मौत के दिन मरना पड़ता है
लेकिन मैं जिन्दगी के हर रोज में मर रही हूँ

मैं जब नौ बरस की रही हूँगी
दिव्य दृष्टि के लिए चुनी गई थी
लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया
सिवाय बेकार के लफ्जो के

इन्ही लफ्जों ने मुझे मसीहा बना दिया
बिना खुदा के, बिना बन्दों के
अपने पंखों से छूट कर असली दुनिया के
पिंजरे में दुबारा आने के लिए

क्यूपिड की तरह, जिसने अपने पैरों के लिए
जूतों को पंखों से बदल लिया

12

मेरे बिस्तरे तक, मेरे दिल तक
पानी चला आ रहा है
पाँचवी दीवार तक
किसी को आश्चर्य तक नहीं
ऐसा लगता है कि सारे कि सारे डाक्टर और नर्सें
जन्मजात मछलियाँ और सीप घोंघें हैं

और कोई नहीं तो पानी ही
पागल औरत के बाल सहला देता है
और कोई नहीं , बस पानी ही
पौंछ देता है आँसुओं को, पगली औरत के

कहाँ हैं मेरा प्यार?
कहाँ हो तुम?
अब तुम चले ही गए तो
मैं नहीं चाहती हूँ कि वापिस लौटो
मुझे बचाने के लिए
बस मेरे हाथ छोड़ दो
और समाने दो मुझे समन्दर की तलहटी में
वहाँ, मुझे जरूर मिलेगा एक मरा हुआ शार्क
तुम्हारे दिल की गंध लिए , स्याह
हर बार जब मैं उसके बन्द होंठों को चूमूंगी तो
मुझे लफ्ज ब लफ्ज तुम्हारी प्रेम कविताओं का स्वाद मिलेगा

13
तुम्हारी आँखों में
मैं केवल एक औरत हूँ, बस एक औरत
एक दिन तुमने प्यार किया बस “उससे”
दूसरे दिन तुम भुला बैठे उसको

तुमने मेरे भीतर छिपे कवि को नहीं देखा
जो तुम्हारी कविताओं को पाने की आदी हो गई थी, हर दिन
तुमने मेरे भीतर की चिड़िया को भी नहीं देखा
जो आदी हो गई थी तुम्हारे स्नेह की, हर दिन

तभी तो धूल के बादलों की तरह
तुम्हारे लफ्ज आसमान में टंगे रहे
” मैं तुम्हे दूंगा प्यार और आजादी और आदर
जबकि दूसरे आदमी चाहते हैं बस तुम्हारी देह, और सेवा”

मेरी निगाहों में ,
तुम आदमी थे, इंसान थे, कवि थे
मैंने तुमसे बाँटा, अपनी सोच, अपना पिंजरा और कविताएँ
तभी तो तुम अभी तक जिन्दा हो, किसी और औरत से मुहब्बत करने के लिए

जबकि मैं अभी तक तुम्हारी कविताएँ
उतार रही हूँ अपनी जबान में, अपने घर वापिस लौटने में
असमर्थ, जहाँ मेरा शोहर और बच्चे इंतजार में हैं मेरी वापिसी के
जी रही हूँ इस पागलखाने में

तुम अभी तक अपनी पत्रिका के मुख्य संपादक हो

14. डेथ सर्टीफिकेट

जब वह भुला बैठा उसे
वह याद नहीं रख पाई अपने को , और अधिक
इसीलिए अपनी बन्द पलकों पर एक नीन्द लिए
वह मर गई

नहीं , यह मत सोचना कि उसने आत्महत्या की
वह तो बस मर गई
जैसे कि एक फूल मरता है
बिना पानी के

(जनविकल्प से साभार )

स्त्री मन , जीवन और भाव की कलाकृतियाँ

दलित लेखक संघ के महासचिव हीरालाल  राजस्थानी बेहद महत्वपूर्ण कलाकार हैं . उनके द्वारा बनाई गई मूर्तियाँ उनकी सजीव कला का प्रमाण हैं . हीरालाल अच्छे कवि और संवेदनशील कलाकार हैं . स्त्रीकाल में आज उनके द्वारा बनाई गई  मूर्तियों/ पोट्रेट में स्त्री मन , जीवन और भाव की बानगी .  ( कुल  12 कलाकृतियाँ )


आत्म कथ्य 
मैंने मानव आकृतियों को आधार मानकर अनेक प्रकार के संयोजन किये है ! जिसमें  सामूहिक  व  एकल आकृतियों के संयोजन सम्मिलित रहे है ! लेकिन पोर्ट्रेट में मेरी खास अभिरुचि रही है ! पोर्ट्रेट मायने ऐसे जैसे कि  किसी की आत्मकथा लिख रहें हों । यही आभास जगता है पोर्ट्रेट बनाते समय ।!
मैंने मनुष्य की  भावनाओं  , विचारों , तकलीफों और कल्पनाओं को ‘पोर्ट्रेट’ के माध्यम से दर्शाने की कोशिश की है ! सदियों से दबे – कुचले  मनुष्यों के उत्पीडन और शोषण  को  पोर्ट्रेट में जुबान   देने  की  कोशिश  करता रहा हूँ ! इस दोरान मुझे लगता रहा जैसे ये मूक चेहरे सांकेतिक भाषा में  मुझसे  संवाद  करने  की  कोशिश  कर रहे हों ! इसके अलावा  मेरे काम में मानवता की खोज निरंतर सक्रिय है !
अपने कलाकर्म में मैंने तकनीकी  रूप से वाटर-कलर की भांति ताज़ा टेक्सचर देने का प्रयास किया है !
‘हीरालाल राजस्थानी

हीरालाल राजस्थानी डा . बाबा साहब आम्बेडकर की मूर्ति तराशते हुए

परिचय 
जन्म :             9 जून सन -1968, प्रसाद नगर ,दिल्ली
शिक्षा :             बी. ऍफ़ं ए. मूर्तिकला (फस्ट क्लास फस्ट)- सन -1996 जामिया मिल्लिया                                                      इस्लामिया,नई दिल्ली-25
व्यवसाय :             कलाध्यापक, दिल्ली प्रशासन
राष्ट्रीय प्रदर्शनी :    54 वी- सन -2012, ललित कला अकादमी दिल्ली, भारत सरकार
                       :             मुम्बई आर्ट फेयर, सन -2012, महाराष्ट्र
पुरस्कार :      ऑल इण्डिया आर्ट बैनाले इन स्कल्पचर, ललित कला अकादमी, जयपुर, राजस्थान सन -1997
             :       बेस्ट परफॉर्मेंस इन स्कल्पचर अवार्ड, जामिया मिल्लिया इस्लामिया,नई दिल्ली- सन -1993
             :       ब्रोंज प्लाक ,  अवंतिका आल इंडिया आर्ट एंड सिल्वर प्लाक, स्वतंत्रता की 50 वीं वर्षगाँठ पर                           अवंतिका आर्ट कॉम्पिटिशन 1996-97.
             :       युवा महोत्सव पुरस्कार, साहित्य कला परिषद् , दिल्ली सन -1993,1994
             :       अन्तर्राष्ट्रीय मूर्तिकला सिम्पोजियम I.P.C.L. महाराष्ट्र सन- 1995
             :       राष्ट्रीय कला मेला दिल्ली सन- 1993
              :      युवा महोत्सव, साहित्य कला परिषद् , दिल्ली सन – 1993,1994
 कविता संग्रह : मैं साधू नहीं
 संपर्क : ई मेल  : hiralal2000168@gmail.com,    मोबाईल : 09910522436

वारेन हेस्टिंग्स का साँँड: उत्तर औपनिवेशिक समय का ऐतिहासिक पाठ

रेखा सेठी


रेखा सेठी हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.

‘‘दौ सौ साल के बाद जब अंग्रेज़ मालामाल होकर वापस अपने वतन इंग्लैण्ड लौटेंगे तब भी इंडिया में उनके जैसे ही नेटिवों का राज होगा।… उनके कपड़े, विचार, स्वप्न और आकांक्षाएँ अंग्रेज़ होेंगी।’’ 


यह पंक्तियाँँ उदय प्रकाश की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँँड’ से हैं। उत्तर औपनिवेशिक मानसिकता से पूर्ण समय और समाज आलोचनात्मक विमर्श उदयप्रकाश की कहानियों का प्राण है। अपनी अलग-अलग कहानियों में उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से भारत के औपनिवेशिक इतिहास और भूमंडलीकरण से पैदा होती नव साम्राज्यवादी हकीकत के अमानवीय पहलुओं पर तीखा प्रहार किया है। ‘वारेन हेंस्टिंग्स का साँँड’,‘पाॅलगोमरा का स्कूटर’ जैसी कहानियाँँ तो सीधे  इन मुद्दों को उठाती हैं। ‘पीली छतरी वाली लड़की’,‘मोहनदास’ ‘मैंगोसिल’,‘दिल्ली की दीवार’ सभी कहानियों में उत्तर औपनिवेशिक इतिहास, बाज़ारवाद, मानवीय अस्तित्व का संकट और नैतिक दिवालिएपन के अनेक संदर्भ मौजूद हैं। अपनी लगभग हर कहानी में लेखक सत्ताकामी, ताकतवर वर्गो के वर्चस्व से दबी-कुचली असंख्य मानवीय जातियों के संघर्ष की अमिट दास्तान सुनाता है। अस्तित्व के संकट और मनुष्य की जुझारु जीजिविषा के द्वन्द्व से उपजता लेखक का दृष्टिबोध मानवीयता के पक्ष की पुकार है। अपनी कहानियों के इस कथ्य को संपे्रषित करने के लिए उदय अपने लेखन में एक लीला रचते हैं जहाँ  इतिहास अतीत से निकलकर सतत निवर्तमान बन जाता है। इस दृष्टि से ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँँड’ एक विलक्षण कहानी है।

1997 में जब यह कहानी अपने सबसे पहले रूप में इंडिया टुडे के साहित्य वार्षिकी विशेषांक में छपी थी तो साहित्य की दुनिया में हड़कंप मच गया। समय और स्पेस की सीमाओं का अतिक्रमण कर इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य का जैसा ग्राफ बन रहा था,  उससे उसकी तरह-तरह की व्याख्याएँ और कठोर आलोचनाएँ हुई। किसी ने इसका संबंध हिन्दू पुनर्जागरण से जोड़ा तो किसी ने उसे औसत रचना कहकर खारिज कर दिया लेकिन आज लगभग पंद्रह साल बीत जाने पर भी यह कहानी उत्तर औपनिवेशिक समय और समाज का ऐतिहासिक पुनर्पाठ प्रस्तुत करती है। वर्तमान सामाजिक ढाँचे की चरमराहट ढाई सौ साल पुराने इतिहास की अनुगूँज  बनकर उभरती है। 1757 में पलासी युद्ध  के उपरांत लाॅर्ड क्लाइव की टिप्पणी-

‘‘मै सिर्फ यह कहूंगा  कि अराजकता का ऐसा दृश्य, ऐसा भ्रम, ऐसी घूसखोरी और बेईमानी, ऐसा भ्रष्टाचार और ऐसी लूट-खसोट जैसी हमारे राज में आज दिखाई दे रही है, वैसी किसी और देश में न कभी सुनी गई, न कभी देखी गई। अचानक धनाढ्यों  बेइंतहा दौलतपरस्ती ने विलासिता और भोग के भीषण रूप को चारों तरपफ पैदा कर दिया है। इस बुराई से हर डिपार्टमेंट का हर सदस्य प्रभावित है। हर छोटा मुलाजिम ज्यादा से ज्यादा ध्न हड़पकर बड़े मुलाजिम या अधिकारी  के बराबर हो जाना चाहता है। क्योंकि वह यह जानता है कि सम्पत्ति और ताकत ही उसे बड़ा बना रही है। …. कोई ताज्जुब नहीं  कि दौलत की इस हवस को पूरा करनेवाले साधन  इन लोगों के वे ‘अधिकार ’ हैं, जो इन्हें उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से प्रशासन चलाने के लिए दिए गए हैं। विडंबना है कि ये ‘साधन ’ सिर्फ रिश्वतखोरी जैसे भ्रष्ट आचरण के लिए ही नहीं, लूट-खसोट और ठगी -जालसाजी के लिए भी इस्तेमाल हो रहे हैं। इसकी मिसालें उपर के पदों पर बैठे लोगों ने कायम की हैं, तो भला नीचे के लोग उसका अनुसरण करने में नाकामयाब क्यों रहें?

यह रोग सर्वव्यापी है। यह नागरिक प्रशासन, पुलिस और फौज ही नहीं लेखकों, कलमनवीसों और व्यापारियों तक को अपनी चपेट में ले चुका है।’’यदि इन पंक्तियों का संदर्भ अदृश्य कर दिया जाए तो यह विवरण स्वातंत्रयोत्तर भारतीय समाज का आईना बना जाता है। लेखक ने टिप्पणी की है-‘और यही है वह बिंदु जहाँ ढाई सौ साल पहले की कहानी आज की कहानी बनती है।’ अर्थात् कहानी का उद्देश्य अतीत का उत्खनन न होकर वर्तमान की पहचान है। लेखक अपने समय की उत्तर औपनिवेशिक सच्चइयों को उपनिवेशवाद के इतिहास से गुज़रकर परखना चाहता है। अतीत और वर्तमान एक दूसरे का संदर्भ बनकर नए दृष्टिबोध् को जन्म देते है। इस आलेख का उद्देश्य कहानी के इस ढाँचे को स्पष्ट करना है जहाँ उदय प्रकाश यथार्थ की अनेक सतहों पर एक साथ तथ्य और कथा का संश्लेषण कर महाख्यानात्मक रचना करते हैं। यद्यपि कहानी के आरंभ में ही लेखक ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘इस कहानी में इतिहास उतना ही है जितना दाल में नमक होता है।’ फिर भी यह देखना रोचक होगा कि उस नमक-यात्रा  इतिहास को लेखक ने कहानी में कैसे पिरोया है।

वारेन हेस्टिंग्स  और उपनिवेशवाद का उदय 

इतिहास के पन्नों में वारेन हेस्टिंग्स उस व्यक्ति की तरह दर्ज है,  जो हिंदुस्तान का पहला गवर्नर जनरल बना। लार्ड क्लाइव के बाद उसने ही ईस्ट इंडिया कम्पनी की बागडोर संभाली। उसकी प्रशासनिक नीतियों के इतने व्यापक प्रभाव पड़े कि आने वाले दौ-सौ वर्षों के लिए भारत अंग्रेज़ों का उपनिवेश बन गया। इस कहानी में वारेन हेस्टिंग्स को मुख्य पात्र बनाकर औपनिवेशिक प्रक्रिया को साकार किया गया है। वह मात्र व्यक्ति नहीं सत्ता का प्रतिनिधि है । वह हिंदुस्तान और यहाँँ की संस्कृति से अभिभूत भी है और आतंकित भी। जैसे एंलिस इन वंडरलैंड’ में सबकुछ एक अजूबा है उसी तरह वारेन हेस्टिंग्स के लिए हिंदुस्तान रहस्य-रोमांच भरी दुनिया है। उसके लिए कुम्हारिन, मालिन, नटनी जैसे औरतें आश्चर्यजनक ढंग से रहस्यपूर्ण हैं, जिन्हें देखकर उसके मन में दो ख्याल लगभग एक साथ ही जन्म लेते हैं-‘‘ओह जीसस, व्हेयर द हेल आय एम।’’ और दूसरा -‘‘मुकाबला कठिन है। हमें इनको ही गुलाम बनाना है।’’

कहानी में यह सारा चित्रण हमें उपनिवेशवाद की प्रक्रिया को गहरी अंतदृष्टि से परखने का मौका देता है। वारेन हेस्टिंग्स अपने आस-पास की हर चीज़ को विदेशी निगाह से देखने की कोशिश कर रहा है। यहाँँ के हवा-पानी, मिट्टी या लोगों से उसका कोई संबंध नहीं । उसके मन में अनजाने परिवेश का भय तो है ही, साथ ही यह उद्देश्य भी साफ है कि उसे इन्हीं लोगों को गुलाम बनाना है। मुगल-शासकों की तरह इस मिट्टी में एक रंग होकर धुल  जाना उसका लक्ष्य नहीं है लेकिन पिफर भी कुछ ऐसा अवश्य है जो उसे सम्मोहित करता है।
महीन कल्पना से रचे गए कहानी के ताने-बाने में वारेन, भारत की वाचिक परंपराओं से पूर्णतः सम्मोहित दिखाई पड़ता है। जयदेव, राध-कृष्ण से जुड़ी दंतकथाएँ, संगीत, कलाएँ, मिथ और स्मृतियाँँ सब उसे अभिभूत किए दे रहे हैं। वह यहाँ की वासंती हवा के खुमार को अनुभव करता है। बुन्तू , अब्दुल कादिर और चोखी उसके मीत हैं लेखक ने चोखी के रूप में वारेन की नेटिव प्रेयसी की कल्पना सी है जिसके साथ वह कृष्ण बनकर रास रचाता है। इस प्रेम-कथा में वह उन्माद और मुक्ति की जिस पींग पर सवार हिंदुस्तान को एक अलग रूप में पहचान रहा था लेकिन उसका असली एजेंडा उसकी आँखों से ओझल नहीं होता। वह शेक्सपियर की माप़र्फत याद करता है ‘‘इफ यू हैव टु डिफीट देम, यू हैव टु किल देयर मेमोरीज़। यू हैव टु डिस्ट्राॅय देयर पास्ट। यू हैव टु शूट देयर स्टोरीज़।’’

आश्चर्य, सम्मोहन और औपनिवेशिक एजेंडा – इस कहानी में वारेन हेस्टिंग्स का व्यक्तित्व  इन सभी विन्दुओं का समाहार है। एडवर्ड सईद ने उत्तर औपनिवेशिक अध्ययन दृष्टि जो नई दिशा दी, उसकी छाया कहानी में अनेक स्थलों पर प्रतिघ्वनित होती है। वारेन जिस नज़र से हिन्दुस्तान को देख रहा है। उसमें पाश्चात्य पूर्वाग्रह स्पष्ट लक्षित हैं। उस रोमानी धुंधलके  में यथार्थ स्थितियाँँ गायब कर दी गई हैं,  जिससे औपनिवेशिक एजेंडे को सही ठहराया जा सके। अंग्रेज़ों का सम्मोहन उपनिवेशवादी प्रक्रियाओं का उदय है। वारेन हेस्टिंग्ज़ ने भारतीय भाषाएँ सीखीं, गीता का अनुवाद कराया और भारत का पहला नक्शा बनाया। यह सब धीरे -धीरे  उपनिवेशवादी जड़ो को पुख़्ता करने की साजि़श भर था। वारेन हेस्टिंग्स ने भारतीय ग्रंथों के अनुवादों से भारतीय मानसिकता की सब जानकारियाँ अंग्रेज़ो को सुलभ कराई। देश का नक्शा बनाकर औपनिवेशिक व्यवस्था का विस्तार किया, स्थाई भूमि बंदोबदस्त और राजस्व के नए नियम लागू किए। उनके माघ्यम से आने वाले लगभग दौ-सौ सालों के लिए अंग्रेज़ी शासन की ऐसी सुदृढ़ नींव रखी जिसमें शोषण और बर्बरता का इतिहास बार-बार दोहराया जाता रहा।

संस्कृतियों की टकराहट


इस कहानी का एक अन्य आयाम दंतकथाओं, मिथकों, विश्वासों पर टिकी भारतीय संस्कृति को रेनेसां और एज आॅपफ रीज़न से उदित पाश्चात्य संस्कृति के बरक्स रखकर देखने और आँकने का भी है। एक ओर भारतीय संस्कृति का एक रूप है, जहाँ एक-एक आकृति की भी अनेक जीवित कथाएँ हैं। जिस समय वारेन हेस्टिंग्स हिंदुस्तान के इस अलिखित इतिहास पर विस्मित हो रहा था उस समय इंग्लैंड में ‘एज आॅफ रीज़न’ का उदय हो चुका था -‘वहाँ तो महान रोम और इटली के प्रभाव और प्रेरणा से रेनेसां आ चुका था। चाउसर (सास्यूर) , दांते, शेक्सपीयर, होमर की वाणी वहाँ गूँज रही थी। इसका न्यूटन, गैलीलियो से लेकर अरस्तू, प्लेटो ही नहीं प्रफांसिस बेकन, वोल्तेयर, दिदेरो और मैकियावेली के विचारों से ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में नई उथल-पुथल मची हुई थी।’ इस एज आॅफ रीज़न में करुणाशून्य औद्योगिक समाज की स्थापना हुई जिसने पूँजी, माल और मुनाफे के लिए धरती और समुद्र में अधिकार  की लड़ाइयों को जन्म दिया। पश्चिम में विचार की इस रोशनी ने पूर्व के तथाकथित अविकसित समाजों में दमन और शोषण के स्याह-अँधेरे  अघ्यायों की रचना की। भारत पर शासन करने के लिए जिन लोगों को इंग्लैंड से नियुक्त कर यहाँ भेजा गया वे वहाँ के सामाजिक जीवन के लिए सिरदर्द थे। वारेन हेस्टिंग्स स्वयं सोचता है- ‘वे बर्बर, मूर्ख, असभ्य और बेहद लालची थे। दौलत कमाने की उनकी भूख, संपत्ति जमा रकने की उनकी हवस कल्पनातीत थी। वे इस देश को लूटने आए थे।’ इन संस्कृतियों की टकराहट के बीच लेखक यह स्थापित करने की कोशिश करता है कि किंवदंतियों के प्रमाण ढूँढने वाली संस्कृति में मनुष्य और प्रकृति की साझेदारी थी। मानवीय प्रेम और करुणा के स्रोत सूखे नहीं थे जबकि तर्क और विचार आश्रित पश्चिमी समाज आधुनिकता  की दुहाई देता हुआ व्यक्ति केन्द्रित हो रहा था। वह नृशंस और स्वार्थी था और इसी प्रक्रिया में उपनिवेशवाद का उत्स छिपा था।

अंग्रेज़ों के साथ-साथ कुछ स्वार्थ-प्रेरित हिंदुस्तानी भी थे ,जिन्होंने इस शोषण-चक्र को पूरा किया। हिंदुस्तान में सत्ताखोरों-व्यापारियों का ऐसा तबका भी था जो अंग्रेज़ों के खैरख्वाह बने हुए थे। वे उनमें अपना भविष्य देख रहे थे। अंग्रेज़ों को खुश करने, उनका विश्वास हासिल करने को वे कुछ भी कर सकते थे। य हाँ तक कि व्यापारिक ठेके हासिल करने के लिए वे अपने परिवार की स्त्रियों को पेश करने से न चूकते। वे हिंदुसतान की लूट में अंग्रेज़ों के भागीदार थे। लेखक ने संकेत किया है कि ये लोग अधिकतर  उच्च जाति के हिंदू थे, जो अपने रहन-सहन, खान-पान, पहनावे और भाषा, सभी में अंग्रेज़ होने की कोशिश कर रहे थे। अंग्रेज़ों के लौट जाने के बाद भारत में इन जैसे नेटिवों का शासन इन्हीं सत्ताकामी, चापलूसों का शासन है। इनके स्वप्न और आकांक्षाएं अंग्रेज़ हैं।

कहानी के सबसे विवादास्पद सांस्कृतिक प्रतीक हैं – ‘गाय और साँँड’ जिनके कारण इस कहानी का संबंध हिंदु पुनरुत्थान  से जोड़ा गया। वारेन हेस्टिंग्स ने इंग्लैंड में अपने मित्र मिस्टर इमहाॅफ को एक पत्र लिखकरं बताया कि यूरोप में जिन गाय-बैलों को ‘कैटल’ कहा जाता है, यहाँँ उनकी पूजा होती है। उनके नाम होते हैं और वे जानवर नहीं गूँँगे मुनष्य हैं। इंग्लैंड जैसे औद्योगिक समाज के लिए जो मात्र पशु थे, भारतीय समाज में वे परिवार के जीवन का आधर थे। एक ओर, औद्योगीकरण पश्चिम के मानवीय समाज को अमानवीय बना रहा था और दूसरी ओर ये गाय-बैल थे जो गैर-मानवीय होते हुए भी मानवीय करुणा से संपन्न थे। वारेन हेस्टिंग्स हिन्दुस्तान में रहते हुए उनकी सहानुभूति और क्षमता को पहचान रहा था। कहानी के अनुसार जब उस पर महाभियोग लगाकर उसे वापस इंग्लैंड भेज दिया गया तो वह अपने साथ पाँँच ब्राह्मणी गाय और एक साँँड ले गया। कहानी का अंतिम हिस्सा इन्हीं गायों के एक-एक कर मर जाने या मार दिए जाने की कथा है। साँँड उन गायों की मौत का साक्षी है। वह मौन रहकर भी अंग्रेज़ी षड्यंत्र को पहचान रहा था। इसलिए जब महाभियोग के मुकदमे में हेस्टिंग्स को भारत की एक तिहाई आबादी के मौत के उत्तररदायित्व से मुक्त कर दिया जाता है तब वह उन्मत्त साँड हेस्टिंग्स के विरुद्ध  खड़ा होता है। वह साँँड भारतीय आक्रोश और विद्रोह का प्रतीक बन अंग्रेजी साम्राज्यवाद की प्रतीक   बग्घी पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त कर देता है। लेखक उस साँँड के इस जुनूनी आवेश और साम्राज्यवादी प्रतीकों के ध्वंस की अनेक व्याख्याएँ करते हुए एक बूढ़े लामा से कहलवाता है कि वह साँँड अभी मरा नहीं है। साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध  मानवीय करुणा का विद्रोह कभी खत्म नहीं होता।

कहानी के रुपक और बहुस्तरीय यथार्थ की परतें 


इस कहानी पर बातचीत तब तक अधूरी  रहेगी जब तक कहानी के विभिन्न रुपकों को डिकोड न किया जाए। अपनी अन्य कहानियों की तरह यहाँँ भी उदय प्रकाश यथार्थ के अनेक वृत्त एक साथ समेटने की कोशिश कर रहे हैं। कहानी का गठन वर्णनात्मक और किस्सागोई के अद्भुत तनाव से निर्मित है। कथाकार कुशल किस्सागो की तरह अतीत का वह पृष्ठ खेलता है जो वर्तमान यथार्थ की परतें उधेड़ने का उत्प्रेरक बनता है और फिर  उसे छोटे-छोटे असंख्य ब्यौरों से भर देता है जिसमें अनेक रुपक अपनी अर्थ छवियों की अगिनत संभावनाओं के साथ बिखरे पड़े हैं। लेखक ने स्वयं लिखा -‘असल में जब इतिहास में स्वप्न, यथार्थ में कल्पना, तथ्य में फैंटेसी और अतीत में भविष्य को मिलाया जाता है, जो आख्यान में लीला शुरु होती है और एक ऐसी माया का जन्म होता हैै जिसका साक्षात्कार सत्य की खोज की ओर की एक यात्रा है।’

कहानी का विन्यास आख्यानपरक है। इतिहास, कल्पना, यथार्थ मिथक सब उसके हिससे हैं। एक थ्री-डी अनुभव की तरह पाठक स्वयं को उसके बीच महसूस करता है। इतिहास के पृष्ठों में अंकित गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की छवि यहाँँ अनेक रुपांतरणों से गुज़रती है। लेखक ने विक्टोरिया मेमोरियल में रखे एक चित्र का विवरण दिया है,  जिसमें वारेन उसकी पत्नी और एक नेटिव लड़की दिखाई पड़ती है। उदय कहानी में इस चित्रा का प्रतीकात्मक प्रयोग करते हैं। वारेन की पत्नी परंपरावादी विक्टोरियन समाज का प्रतिनिध्त्वि करती है। इसीलिए कहानी में वह बार-बार पति को समझाती है- ‘कि तुम जिस जाति और जिस देश के हो, वह एक विजेता देश है।’ नेटिव लड़की की संकल्पना चोखी के रूप में की गई है जो एक तरफ तो भारत की गुलाम जनता की प्रतीक है दूसरी ओर वह वारेन की लीला का अंग है। वारेन हेस्टिंग्स इन दोनों ध्रुवों  के बीच स्वयं को उलझा हुआ पाता है कभी ऐसा लगता है कि वह भारतीय संस्कृति से अभिभूत है तो कभी उसके भीतर का औपनिवेशिक गवर्नर जाग जाता है। कहानी के अनेक पाठ बनते हैं जो उपनिवेशवाद की अन्तक्रिया को समझने में मदद करते हैं। अपने एक इंटरव्यू में उदय प्रकाश ने यह स्वीकार किया है – ‘‘वारेन हेंस्टिंग्स 1772 में गवर्नर बना था और जो रिकार्डेड हिस्ट्री में है, वह बिल्कुल वैसा नहीं है,  क्योंकि वारेन कभी पागल नहीं हुआ, वह कभी गाय के पीछे नहीं भागा, कभी उसने कृष्ण का रूप धरकर  बाँँसुरी नहीं बजाई, कभी चरवाहा नहीं बन, कभी वह वृंदावन नहीं गया।… तो वह सबकुछ कल्पना और स्वप्न था।… एक मिथ क्रिएट किया कोलोनियलाइज़ेशन का, जिससे हमारे देश के उपनिवेशीकरण की जो अंतक्रिया  है, उसको हम समझ सकें… उसको थोड़ा जान सकें। इसमें युक्ति कहां से आई…? अब हर लेखक के समाने वह गुत्थी होती है, जिसको वह अपनी तरह से सुलझाता है।’’

उदय प्रकाश उपनिवेशवाद की गुत्थी को सुलझाने के लिए कथा में कई प्रकार के खेल रचते हैं। औपनिवेशिकता जितना बड़ा सच है उससे मुक्ति की आकांक्षा भी उतना ही बड़ा सच है। प्लासी की लड़ाई में नवाब सिराजुद्दौला की हार मीर जाफर और राय दुर्लभ जैसे लोगों की गद्दारी के कारण हुई लेकिन लेखक ने उसी समय में एक जांबाज़ वफादार सिपहसालार की कल्पना की है और चोखी को उसकी बेटी बताया गया है। चोखी वारेन के रंग के रंगी जाकर भी उसके औपनिवेशिक इरादों को पहली चुनौती देती है। ऐसी ही एक और प्रतीकात्मकता इंपीरियल बग्घी  उड़ा देने वाले साँँड़ और 1857 की क्रांति के बीच दिखाई गई है। 1795 में जिस दिन वारेन हेस्टिंग्स को महाभियोग के मुकद्दमे से बरी किया गया उसी दिन उस साँँड ने उन्मत्त  होकर वारेन हेस्टिंग्स और शाही बग्घी  को हवा में उछाल दिया। उस उन्मत्त  साँँड़ पर आर्मी ने हमला कर उसे गोली मार दी। बाद में, उसी साँँड की चर्बी का प्रयोग उस कारतूस में हुआ जिससे मंगल पांडे ने अंग्रेज़ एडजुटेंट को गोली मारी। वह स्वतंत्रता की क्रांति का सूत्रापात था जिसके तार वारेन हेस्टिंग्स को चुनौती देने वाले साँँड से जुड़े थे। विद्रोह की यह संकल्पनात्मक चेतना अविरत है। वही इतिहास, वर्तमान और भविष्य को इस बिंदु  पर केन्द्रित करती है।

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कहानी में इस निरंतरता को सिद्ध करने के लिए उदयप्रकाश देश काल के विविध मुखी  वृत्त रचते हैं। कहानी का केन्द्रीय पात्रा वारेन हेस्टिंग्स होने के कारण कहानी का अपना विशिष्ट कालखंड है। उसका परिवेश एवं स्थितियँँा ऐतिहासिक तथ्यों और अकड़ों से परिभाषित होती हैं। उस समय की शासन प्रणालियों, अंग्रेज़ नियुक्तियों अमीर हिंदुस्तानियों के व्यवहार आदि के जो वितरण दिए गए हैं वे उस समय के सरकारी रिकाॅर्ड से पुष्ट किए जा सकते हैं। भारतीय इतिहास की स्मृतियाँँ और परंपराएँ स्वयं में देश-काल के छोटे-बड़े वृत्त बनाती हैं। इन सबके साथ कहानी का उद्देश्य उसे उस ध्रातल तक ले जाता है जहाँँ उत्तर-औपनिवेशिक समय और समाज की आलोचनात्मक पहचान उभरने लगती है।

उदय प्रकाश की कहानी तकनीक की एक खास अदा है कि कहानी में जब भी चरमोत्कर्ष के ऐसे तनाव शिखर रचे जाते हैं वहाँँ वे लेखकीय हस्तक्षेप से उसे तोड़कर पुनः अपने समय-समाज की ओर लौटा लाते हैं। यहाँँ भी लेखक यह बताना नहीं भूलता कि यह वह समय था जब फ्रांसीसी  कंपनी और इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच यूरोप, अमेरिका और एशिया के समुद्रों, बाज़ारो और प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने के लिए लड़ाई चल रही थी और ढाई सौ साल पहले भी फ्रांस  की सार्वजनिक कंपनी इंग्लैंड की प्राइवेट कंपनी से हार रही थी। उत्तर औपनिवेशिक दौर में भी दौलत की हवस से प्रेरित प्राइवेट कंपनियाँँ हर सार्वजानिक ढाँँचे को घ्वस्त कर स्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने में कामयाब रही हैं। तमाम घोटाले और सेंसेक्स का संवेदी सूचकांक इन प्राइवेट कंपनियों की इशारे पर ही करवट लेता है।

उत्तर औपनिवेशिक मानसिकता के स्रोत औपनिवेशिक इतिहास के अन्य संदर्भो में भी तलाशे जा सकते हैं जिन्हें यह कहानी संभव बनाती है। ऐसा ही एक प्रश्न भाषा का  है जो केवल भाषा तक सीमित न होकर सामाजिक न्याय का प्रश्न बन जाता है। कहानी में चित्रित सत्ताकामी चापलूसों का शासन आज़ाद हिंदुस्तान आज भी ढ़ो रहा है। यह उन जैसे नेटिवों का राज है जिनके स्वप्न और आकांक्षाएँ ही अंग्रेज़ नहीं उनकी भाषा भी अंग्रेज़ी है। आज़ादी के बाद अंग्रेज़ी जानने वाले ही सत्ता और समाज पर कब्ज़ा करके बैठ गए। आज तो स्थिति और भी गंभीर हो गई है, जहाँ निचले-से निचले तबके का आदमी यह मानने लगा है कि अंग्रेज़ी ही ज्ञान की कुंजी  और सपफलता की सीढ़ी है। एक भाषा का वर्चस्व हमसे हमारी कथाएँ और विश्वास छीनकर हमें निपट यथार्थवादी बना रहा है। यह दिमागी सरहदों की गुलामी है। औपनिवेशिक इतिहास की निरंतरता !

मालिनी अवस्थी का गीत और मोतीझील का किस्सा

प्रभात रंजन


कथाकार प्रभात रंजन ज़ाकिर हुसैन कॉलेज, दिल्ली , में हिन्दी के प्राध्यापक हैं. संपर्क : मोबाइल न.- 09891363062



( वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य  प्रभात रंजन की ‘कोठागोई’ से एक अंश . यह पुस्तक मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान की गुमनाम गायिकाओं के किस्सों का दस्तावेज़ है . उनकी महान परम्परा के प्रति सम्मान का एक रूप)

प्रसिद्ध गायिका मालिनी अवस्थी जी का गाया हुआ एक गीत है, जब भी सुनता हूँ एक किस्सा याद आ जाता है :  ‘पिया मेहदी लिया द मो
मोतीझील से/ 
जा के साइकिल से न’ 
जबकि दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं है. मालिनी अवस्थी ने इस गाने में आगे बताया कि वह जिस मोतीझील का वर्णन कर रही थी वह बनारस में था या है.

मोतीझील शहर मुजफ्फरपुर का सबसे बड़ा बाजार है, हर बड़ी चीज उसके आसपास है, बड़े सेठों के ठिकाने, बाबूसाहबों की पुरानी बसाहतें- पुराने सिनेमा हॉल, नए मॉल, मॉडर्न कुल्फी हाउस, जीवनज्योज्योति- सब उसके आस, उसके पास हैं. सब उसके आस-पड़ोस हैं. वह एक बाजार था जो बढ़कर और बाजार बनता गया है. दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं, नहीं दिखता.

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लेकिन यह किस्सा याद आ जाता है. कम से कम 12 साल या अधिक से अधिक तेरह साल पुरानी यह बात है. उस्ताद वजन खान के यहाँ चतुर्भुज स्थान, आबिदा हाई स्कूल के सामने उनके उस बनते से मकान में गया था, जिसमें दीवारें, छत, कुछ कमरेनुमा बन गए थे, बाद में जब -जब गया वे तो बनते नहीं, पहले से कुछ और बदरंग से हुए दिखाई दिए.

बहरहाल, उस दिन बहुत से लोग आये थे उनके घर, मैं उनसे चतुर्भुज स्थान के अतीत के बारे में बातें करने के इरादे से गया था. दिल्ली से जब भी घर जाता था छुट्टियों में तो उनसे मिलने जरूर जाता था, जाता तो जानकी वल्लभ शास्त्री जी से मिलने जाता था. लेकिन इन दो बातों का भी आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है. तो, मैं यह कह रहा था कि उन्हीं लोगों ने एक किस्सा सुनाया था. किसने सुनाया था, यह बात ठीक से याद नहीं रह गई लेकिन अब लगता है कि हो न हो बनारस से आये साजिंदों में से किसी ने सुनाया था.

बनारस वालों ने ही सुनाया होगा. चतुर्भुज स्थान की कीर्ति को धूमिल करने के लिए कितने किस्से चलाये थे तब- बड़ी मजबूत थी इसकी बुनियाद. गिरते -गिरते भी हिली नहीं है.  सच या झूठ का क्या है, अब जो शहर मुजफ्फरपुर कहलाता है वह सचमुच में वही पुराना शहर है क्या-स्मृतिहीन शहर !  शहर स्मृतिहीन होते जा रहे थे, कौन है याद करने वाला कि जिसे मोतीझील कहते हैं, उसकी मोती कौन थी, झील कहाँ है?

बात यहाँ से शुरू हुई थी कि मोतीझील से कपड़े मँगवाने की तो उसने तुरंत कहा था कि मेहदी भी वहीं से मंगवाना. मेहदी और मोतीझील का यह तुक, जब सबको बेतान लगा तो उसने यह किस्सा सुनाया-
‘कहते हैं जब मोतीझील बाजार नहीं बना था तब , वहां नृत्य और संगीत का पेशा करने वाले लोग रहते थे, जिसे कम से कम 125 साल से चतुर्भुज स्थान के नाम से जाना गया. कहते हैं वहीं पश्चिम से आये एक जमींदार ने मोती बाई के लिए झेल के किनारे हवेली बनवाई थी. समय के साथ शहर की फ़सीलें बढती है, शहर का हिसार बढ़ता गया… चतुर्भुज स्थान बनता गया.

मोती बाई क्या थी? गायिका? गाने और बजाने वालों का ही रहा है यह शहर. यही परम्परा यहाँ से फली-फूली- बनारस वाले कुछ भी कहें- वह इसके इतिहास के मजबूत हाशिये की तरह मौजूद रही हैं, हमेशा से.
मोती बाई का किस्सा बड़ा मशहूर था कि आसपास के गाँवों-कस्बों में उसकी महफ़िल करवाने की हसरत हर जमींदार रखता था. उसने बताया था कि बाबू लोग अपने यहाँ मनाये जाने वाले जलसों की तारीख़ उसकी तारीखों से मिलान करके तय करते थे. कि कहते हैं कि सीमा पार नेपाल के एक जमींदार से शिवहर के सेठ की ऐसी ठनी कि उसने भादो की भरी बारिश में उसके घर आधी रात को डाका डलवा दिया था. डाकू रातोरात उस भरी बरसात में जब न कुछ दिखाई दे रहे था, न कुछ सुनाई,  तो  न जाने वे किस बड़ी सी गाड़ी से आये थे -सर्र से निकल लिए थे. जो पैसा वे मोती पर लुटाते थे डाकू सारा लूट ले गए थे. कहते हैं उस सेठ ने नेपाल के उस बाबू के एकलौते बेटे की शादी के दिन अपनी बेटी की शादी तय कर दी थी और मोती बाई को उस दिन अपने यहाँ आने के लिए मुंहमांगा ईनाम देने का लोभ दिखा रहे थे. जमींदार साहब को यह बात लग गई और मोती ने भी वफादारी दिखाते हुए यह बात जमींदार साहब को बता दी थी. बाद में उसी जमींदार ने उसके लिए झील के किनारे हवेली बनवा दी थी. बारिश के दिनों में वहीं रहता था. तब मोती बाई घर से बाहर नहीं निकलती थी- सावन-भादो घर में अपने उस प्रिय के साथ बिताती थी, पहचान के लिए जिसे बनारसी बाबू ने पछिमाहा जमींदार कहा था.

कुछ साल तक वह जमींदार साल भर नेपाल में अपने विशाल खेत-खलिहान के हिसाब-किताब में लगा रहता था सावन भादो के महीने मोती केपास जाकर बिताता, उसका घर भी चलता रहा, बार भी. कि हादसा हो गया. नेपाल से आते हुए बारिश घनघोर हो रही थी. उसका घोड़ा लेकिन मजबूती से चल रहा था. नदी-नाले पार करता हुआ बढ़ रहा था. जब लखनदेई नदी पार कर रहा था घोडा सहित ऐसा गायब हुआ कि उसका कुछ पता नहीं चला, आज तक. कहते पनडुब्बा ले गया था. सच में किसी को विश्वास नहीं हो रहा था. लखनदेई नदी में उस समय पानी नहीं होता था, भादो के आखिर में जाकर वह उफनाता था, सावन शुरू होते ही इतना कैसे भर गया कि राजा और घोडा दोनों डूब गए पता ही न चला.

जब खबर मोती बाई तक पहुँची तो उसने उसी दिन गाना छोड़ दिया-कहते हैं सुहागन के वेश में रहने लगी थी. जब तक जमींदार साहब थे तब तक किसी की कुछ नहीं थी, उनके जाते ही उनकी वियोगन बन गई मोती. कहते हैं एक महीना भी नहीं बीता कि उसी शोक में चल बसी. बात यहीं ख़त्म हो गई होती तो किस्सा आगे बढ़ता ही नहीं. कहते हैं उस वीरान पड़े बंगले के सामने झील के झाड-झंखाड़ में मेहदी की झाडी उग गई. पास की एक लड़की एक दिन आई, मेहदी के पत्ते तोड़ के ले गई, पीस कर लगा लिया. कहते हैं उसको जल्द ही अच्छा वर मिल गया और वह भी बिना दहेज़ के-बात फ़ैल गई कि वहां की मेहदी सुहाग की मेहदी है.

समय के साथ सब गया- मोती गई, झील गया, हवेली गई, देखते-देखते बाजार बन गया. जो कभी मोती बाई से गुलजार था बाजार बन गया. मेहदी जाने कहाँ गई, यही किस्सा रह गया. हाँ, जरूर बनारस वाले ने सुनाया होगा. क्या पता वहीं के मोतीझील का किस्सा रहा हो? क्या पता?  अब कौन पूछे, उस्ताद के साजिन्दे के परिवार ने कौल निभाते हुए अपने बेटे का निकाह उनकी बेटी के साथ किया था. दिन में शादी हुई, शाम तक सब चले गए थे.
और यह किस्सा?  मालिनी अवस्थी के गाये गीत को जब सुनता हूँ- याद आ जाता है-
‘पिया मेहदी लिया द मो
मोतीझील से/
जा के साइकिल से न’

किस्सा नहीं बस एक प्रसंग भर है!

मनुस्मृतिः जेंडर हिंसा का कानूनी ग्रंथ

सर्वेश पांडेय


सर्वेश पांडेय ने स्त्री अध्ययन में शोध किया है , अभी महिला आयोग में कार्यरत हैं . संपर्क : मोबाइल न.- 08756754651

भारतीय जनमानस को नियंत्रित करने में धर्म की भूमिका काफी महत्वपूर्ण व केन्द्रीय  रही है। भारतीय समाज, खासकर हिंदू समाज स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों  बाद भी धार्मिक रीतियों-नियमों व धर्मग्रंथों से ही निर्देशित होता है। हिंदू जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कारों में बँधा रहता है। ये संस्कार यह दर्शाते हैं कि हिंदू जीवन व हिंदू मानस पर धर्म का प्रभाव कितना गहरा है। कहने को तो आज हमारे पास संविधान है, जिसने सभी को समान रूप  से सामाजिक व राजनीतिक अधिकार दे रखे हैं, किंतु सामाजिक संरचना में यह जमीनी हकीकत पर क्रियान्वित अगर नहीं हो पा रहा  है , तो उसका एक बड़ा कारण सामाजिक संरचना पर धर्म का प्रभाव व उसके धर्मग्रंथों में उल्लेखित नियमों द्वारा निर्देशित होना है। हिंदू धर्म को निर्देशित करने वाले ग्रंथों में ‘ मनुस्मृति’ भूमिका सबसे प्रमुख है। यह ग्रंथ भारत का पहला लिखित संविधान माना जाता है। इस ग्रंथ की सामाजिक व्याप्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय वर्णाश्रम पद्धति को बरकरार रखने में इसकी केन्द्रिय भूमिका है। ब्राह्मणों को श्रेष्ठ स्थिति प्रदान करने से लेकर शूद्रों को मानसिक व भौतिक स्तर पर गुलाम बनाये रखने में इसके नियमों-कायदों का बहुत बड़ा हाथ है।

भारतीय समाज वर्ण व्यवस्था में विभाजित समाज है। वर्णो की उत्पत्ति के विविध सिद्धांत है किंतु समाज में सर्वाधिक मान्य व प्रभावी सिद्धांत ‘ दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत’- ब्राहमण मुखमासिदत  है, जो यह बताता है कि ‘विराट पुरूष’ के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य एंव पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। इसी आधार पर चारो वर्णों की सामाजिक स्थिति व व्यवसाय भी तय किये गये। वर्तमान समय में जाति-व्यवस्था आज जिस दृढ़ता से निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, यह इस बात का प्रमाण है कि वर्णव्यवस्था के पुरोधा अपने इस दुष्कार्य में कितना सफल रहे।

ब्राह्मणवादी ग्रंथों से ही प्राचीनकालीन समाजिक, आर्थिक एंव राजनीतिक स्थिति की समझ बनायी जाती रही है। इतिहास लेखन ने इन ग्रंथों को बतौर राजनैतिक शस्त्र प्रयोग करते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ताना-बाना तैयार कर दिया। राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने वैदिककालीन समाज को समतामूलक रूप  में प्रस्तुत कर उसे भारत का स्वर्णिम काल घोषित कर दिया अर्थात वर्ण व जेंडर विभेद की चर्चा न करके वैदिककालीन समाज को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वैचारिकी के अनुरूप गढ़ दिया गया। वैदिक ग्रंथों से अतीत की समझ बनाने में पहली समस्या यह है कि वह उपदेशात्मक शैली में लिखित है और दूसरी कि यह वर्चस्वशाली तबके के सत्तात्मक तंत्र को चिरस्थायी बनाये रखने के अंर्तनिहित उद्देश्य से लिखित है।  ‘ मनुस्मृति’ ( रचनाकाल दूसरी सदी ई. पू.  से दूसरी सदी ई.  तक) ‘अर्थशास्त्र’ (चौथी सदी ई.पू ) व कामशास्त्र (दूसरी सदी ई. पू  से चैथी सदी ई.  तक)  जैसे प्राचीनकालीन ग्रंथ हैं ,  जिन्हें उच्चवर्णीय पुरुषों के वर्चस्व को निर्मित व कायम रखने के उद्देश्य से रचा गया था। वस्तुतः ये ग्रंथ धर्म,  अर्थ , राजव्यवस्था,  काम के विचार को आदर्श बनाने में सहायक हुए।
मनुस्मृति विगत दशकों से वाद-विवाद का केन्द्र रहा है, साथ ही साथ सामान्य जनमानस में इतिहास की समझ पैदा करने में इसकी अहम भूमिका रही है। इतिहासकारों की मान्यता है कि भारतीय मानस में अतीत की समझ लोकप्रिय मान्यताओं, मिथकों, वीरगाथाओं तथा लोकगाथाओं के माध्यम से बनती है। औपचारिक इतिहास का ज्ञान भी अधिकांश मानस को लोकप्रिय पत्रिकाओं के लेखों, बहसों तथा अन्य चर्चाओं के माध्यम से होता है।  मनुस्मृति को लेकर बहसों का तीखापन स्वतंत्र्योत्तर भारत में अधिक बढ़ता गया तथा इसके जलाने आदि के प्रतीकात्मक उपक्रम भी किये गये। परंतु भारतीय नवजागरण के काल में जब राष्ट्रवाद अपना स्वरूप ले रहा थाए मनुस्मृति ने भद्रलोक के इतिहास व समाज संबंधी मानस निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय समाज-सुधारकों का एक तबका इसकी तीव्र आलोचना भी करता रहा, खासकर दलितों व स्त्रियों को लेकर किये गये नियमन के संदर्भ में।

मनुस्मृतिः ऐतिहासिक व सामाजिक विश्लेषण
मनुस्मृति के रचनाकाल को लेकर विभिन्न विद्वानों में बहस होती रही है। स्वीकृत मान्यता के अनुसार इसका रचनाकाल 200 ई.पू  से 200 ई.  के बीच है। प्रसिद्ध विचारक काणे ने ” हिस्ट्री  ऑफ धर्मशास्त्र’  में मनुस्मृति का रचनाकाल 200 ई. पू  से 200 ई.  के मध्य बताया है।  मनुस्मृति बौद्ध व जैन धर्म के बरक्स हिंदू धर्म व ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को दृढ़ता से कायम करने व व्यापक विस्तार दिये जाने के निहित उद्देश्य से लिपिबद्ध की गई। मनुस्मृति का रचनाकाल ब्राह्मणों के शासन व पुनर्निर्माण का युग था। उस समय शुंग तथा उनके परवर्ती काण्वायन ब्राह्मण राजा थे। फलतः ब्राह्मणों को सामाजिक व सांस्कृतिक विशेषाधिकार प्राप्त हो गया। जबकि शुंगकाल के पूर्ववर्ती मौर्यशासन में ब्राह्मण अत्यंत असंतुष्ट थे,  जैसा कि बी.आर. आम्बेडकर लिखते हैं कि ‘ अशोक द्वारा बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित करना निश्चय ही ब्राह्मणवाद के लिए बहुत बड़ा आघात था। इससे ब्राह्मणों को राज्य का संरक्षण मिलना बंद हो गया। अशोक साम्राज्य में उन्हें गौण या अधीनस्थों का दर्जा दिया जाने लगा और उनकी उपेक्षा की जाने लगी। निश्चय ही कहा जा सकता है कि यह दमन इस छोटे से कारण से हुआ था कि अशोक ने सभी प्रकार के पशुओं की बलि पर रोक लगा दी थी, जो ब्राह्मणवाद का मूल आधार था। ब्राह्मणों को न केवल राज्य का संरक्षण मिलना बंद हुआ बल्कि उनका व्यवसाय भी छिन गया। यह व्यवसाय था. यज्ञ कर्म, जोकि उनकी जीविका का मुख्य स्रोत था। मौर्य साम्राज्य की समाप्ति के साथ ही ब्राह्मण उत्कर्ष तेजी से जोर पकड़ता चला गया। नष्टप्रायः यज्ञ संस्था और विस्मृतप्रायः वेदों को पुनर्जीवन  मिला। दरअसल पुश्यमित्र शुंग का मौर्य साम्राज्य से विद्रोह व सत्तासीन होना सामान्य राजविद्रोह औैर सत्ता.परिवर्तन नहीं रहा। यह ब्राह्मणवादी शक्तियों का सुनियोजित षड़यंत्र रहा, जिससे कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था को पुर्नस्थापित किया जा सके। पुष्यमित्र  ने जो राज-हत्याएं की,  उनका उद्देश्य राजधर्म के रूप में बौद्ध धर्म को नष्ट करना और ब्राह्मणों को भारत का सर्वोच्च शासक बनाना था, जिससे राजा की राजनैतिक सत्ता से बौद्ध धर्म पर ब्राह्मण धर्म की विजय हो सके।  ‘मनुस्मृति’ की रचना शुंग युग की देन है।

मनुस्मृति में उल्लिखित  वर्ण व्यवस्थाए कर्म, संस्कार, दण्ड-विधान आदि पर दैवीय शक्ति व धर्म का मुलम्मा चढ़ा दिया गया, जिससे ब्राह्मणों का सामाजिक व सांस्कृतिक वर्चस्व जनमानस पर काबिज किया जा सके जो कि बौद्ध व जैन धर्म के प्रभाव के कारण नष्टप्रायः हो चुका था।संपूर्ण मनुस्मृति में ब्राह्मणों  का प्रभाव दिखाई पड़ता है। ब्राहमणों  श्रेश्ठ सिद्ध करने के लिए कई ऐसे विधान निर्मित किए गए। ब्राह्मण को सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी   उल्लेखित करते हुए कहा गया कि ‘ ब्राहमण’  अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है और अपना ही दान करता है जबकि दूसरे व्यक्ति ब्राह्मण की दया से इन सबका भोग करते हैं।’

संपूर्ण ग्रंथ का केंद्रीय तत्व समाज में जातिगत अनुक्रमण को बनाये रखना- ब्राह्मणों की श्रेष्ठता,  शूद्र की दासत्व स्थिति और समाज को वर्ण-संकरता से बचाना , आदि ही है। अध्ययन-अध्यापन, संस्कार, विवाह, दण्ड-विधान आदि समग्र सामाजिक व धार्मिक क्षेत्रों में स्पष्टतया ब्राह्मण विशेषाधिकार सम्पन्न दिखते हैं। मनुस्मृति  (९ /313 )  के अनुसार ब्राह्मण इतना अधिक पूज्य है कि उसे राजा भी क्रोधित न करें क्योंकि ब्राह्मण अपने शाप द्वारा उसे नष्ट कर सकता है। जाति-व्यवस्था में रिचुअल पावर सेक्युलर पावर से ऊँचा होता है। राजा (क्षत्रिय)  सेक्युलर पावर से जबकि ब्राह्मण रिचुअल पावर से संबद्ध होने के कारण क्षत्रिय से उच्च अवस्थिति पर होता है। ड्यूमा ब्राह्मण व क्षत्रिय की इन दोनों शक्तियों में विरोधाभास को रेखांकित करते हैं। इसका कारण सत्ता राजा (क्षत्रिय)  केन्द्रित होने के बावजूद उसका रिचुअल पावर से नीचा समझा जाना है।
वस्तुतः ब्राह्मण व क्षत्रिय जान-बूझकर एक दूसरे से स्वयं को उच्च-निम्न घोषित कर समाज में प्रभुत्वशाली बन गए थे तथा अपने विरोधाभास के बावजूद एक साथ रहकर समाज पर शासन करते थे। जैसा कि मनुस्मृति के एक श्लोक ( 9/322) में उल्लेखित है,  ब्राह्मण के बिना क्षत्रिय तथा क्षत्रिय के बिना ब्राह्मण समृद्धि नहीं पा सकते, किन्तु परस्पर सहयोग के द्वारा दोनों ही इस लोक तथा पर लोक में पर्याप्त समृद्धि प्राप्त करते हैं। जिस आधार पर रिचुअल पावर अपने को शुद्ध बताने के लिए  मांस खाना , हिंसा करना जैसे कृत्य को अशुद्ध परिभाषित करता है। ये कृत्य  क्षत्रियों के लिए  मान्य है,  क्योंकि ब्राह्मण इन्हें ‘राजसी ‘ कृत्य के तौर पर व्याख्यायित कर देता है। वही कृत्य निचली जातियों में प्रचलित होने पर उसे ‘तामसिक’  कोटि में व्याख्यायित कर इन जातियों को सामाजिक पदानुक्रम में निम्न अवस्थिति पर रख दिया जाता है। वस्तुतः पवित्रता और अपवित्रता के बीच भी संबंध परिस्थितिजन्य है,  न कि सामाजिक तौर पर अंर्तनिहित है।

शूद्रों को जन्मतः अशुद्ध माना जाता है,  इसी आधार पर उनके खान-पान– रीति-रिवाज भी अशुद्ध होते हैं। शूद्रों को उपनयन संस्कार की भी इजाजत नहीं दी गई है। मनुस्मृति की रचना के पहले उपनयन गुरुकुल में होते थे, जहां बालक के शिक्षण व प्रशिक्षणोपरांत गुरु उनके वर्ण का निर्धारण करता था। बी. आर.  आम्बेडकर के अनुसार ‘उपनयन के मामले में ब्राह्मणवाद ने जो मुख्य परिवर्तन किया,  वह था उपनयन करने का अधिकार गुरु से लेकर पिता को देना। इसका परिणाम यह हुआ कि चूंकि पिता को अपने पुत्र के उपनयन का अधिकार था,  इसीलिए अपने बालक को अपना वर्ण देने लगा। इस प्रकार उसे वंशानुगत बना दिया। इस प्रकार वर्ण निर्धारण का अधिकार गुरु से छीनकर उसे पिता को सौंप कर ब्राह्मणवाद ने वर्ण को जाति में बदल दिया।’
मनुस्मृति में उपनयन संस्कार की इजाजत ऊपरी तीन वर्णों ‘ब्राह्मण,  क्षत्रिय व वैश्य को दी गई,  जिसके द्वारा वह द्विजता (दुबारा जन्म अर्थात आध्यात्मिक जन्म)  की स्थिति प्राप्त करता है। ब्राह्मणवादी ग्रंथों में शारीरिक जन्म को अशुद्धता के रूप  में देखा जाता रहा है। शूद्रों का उपनयन संस्कार न होने के कारण उन्हे स्थायी तौर पर अपवित्र कोटि में रखा गया है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री लुईस ड्यूमा जाति व्यवस्था के श्रेणीकरण को शुद्धता-अशुद्धता संबंधी सिद्धांत से उत्पन्न मानते हैं। जिसमें उच्चतम श्रेणी पर सदैव ब्राह्मणों  होते है। ये ही पवित्रतम होते हैं और अधिकांश कर्मकाण्ड का संचालन करते हैं।  क्लाउड मेलासॉक्स (Claude Mellasoxus) का मंतव्य है कि शुद्धता-अशुद्धता के हथियार द्वारा वर्गीय संरचना को जाति-संरचना में तब्दील कर दिया जाता है। उसे चिरस्थायी बनाने के अंतर्निहित उद्देश्य से ही संचालित किया जाता है।
मनुस्मृति स्त्री को घर की चौहद्दी में रहने तथा शूद्र को द्विज सेवाकर्म से आदेशित.निर्देशित करके ब्राह्मणवाद का मजबूत ढांचा खड़ा करता हुआ दिखता है। मनुस्मृति शूद्र को वेद अध्ययन का अधिकार नहीं देता। यह विशेषाधिकार केवल द्विज को देता है। वह शूद्र को अध्ययन से वंचित ही नहीं करताए बल्कि उन व्यक्तियों के विरुद्ध दंड की व्यवस्था भी करता हैए जो शूद्र को वेद अध्ययन करने में मददगार होते हैं। मनुस्मृति में शूद्र की उपस्थित में वेद अध्ययन पर निषेध , शूद्र स्त्री को शिक्षा एवं जिसका शिष्य शूद्र हो उसे श्राद्ध में निमंत्रित करने हेतु अयोग्य बताया गया है।

मनुस्मृति में राज्य अपने दंड और न्याय व्यवस्था द्वारा ब्राह्मणवादी पुरुषवादी मूल्यों के संरक्षक की भूमिका में ही परिलक्षित होता है। द्विज ;ब्राह्मण तथा क्षत्रियद्ध को दारुण वचन से आक्षेप करने वाले शूद्र को उसकी जीभ काटकर दण्डित करना चाहिएए क्योंकि वह नीच से उत्पन्न है।  राज्य वर्णवादी व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाने पर शूद्रों को दण्डित करता है।  इस प्रकार सामाजिक और आर्थिक सत्ता के साथ ही राजनैतिक सत्ता भी दलितों पर शोषण और उत्पीड़न कर रही है। राज्य के दण्ड विधान का नियमन जाति पदानुक्रम द्वारा ही किया गया है। जहाँ ब्राह्मणों के प्रति दण्डविधान काफी उदार हैं, वहीं दूसरी ओर शूद्रों के प्रति अत्यंत क्रूर हैं। इसी प्रकार अंतरजातीय यौन संबंधों की नियमावली में भी उच्चवर्णीय पुरुष का निम्नवर्णीय स्त्री के साथ संबंध होने पर किसी भी प्रकार के दण्ड की व्यवस्था नहीं हैए वहीं निम्नवर्णीय पुरुष का उच्चवर्णीय स्त्री के साथ संबंध स्थापित करने पर उसे परस्त्रीगमन और बलात्कार दोनों के लिए कठोर दंड दिया जाता था।

मनुस्मृति सामाजिक नियमों का शास्त्र है। इसके निर्देशों  में हम तत्कालीन पारिवारिक-व्यवस्था को एक संगठित सामाजिक इकाई रूप में निर्मिति के उपक्रम को देख सकते हैं। भारतीय सामाजिक व्यवस्था का आधार रक्तशुद्धता और जाति-व्यवस्था है। इसी संश्लिष्ट जाति-संरचना को बनाये रखने के लिए वैवाहिक आदर्शों का निर्माण आवश्यक माना गया। मनुस्मृति के अनुसार ब्रह्म,  दैव, आर्य, प्रजापत्य, आसुर, गांधर्व, राक्षस और पैशाच आठ प्रकार के विवाह प्रचलित थे। जिसमे प्रथम चार प्रकार के विवाहों की सामाजिक स्वीकृति ज्यादा रही होगी। वहीं राक्षस और पैशाच विवाह को स्त्री के साथ बलात् आचरण को मान्यता देने की व्यवस्था के अंतर्गत माना जा सकता है। गांधर्व विवाह भी प्रचलित और प्रायः स्वीकृत विवाह थे। परंतु प्रेम में दोनो सहभागियों का अलग-अलग इकाई के रूप में स्वतंत्रता की कोई धारणा नहीं थी। मनुस्मृति अंतरजातीय विवाह हेतु प्रदूषक’  का विधान करने के बावजूद अनुलोम विवाहों को स्वीकार्यता देता है।
शूदैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विषः स्मृते।
ते च स्वा चैव राज्ञश्र ताश्र स्वा चाग्रजन्मनः।

( शूद्र पुरुष की शूद्रा,  वैश्य पुरुष की वैश्य और शूद्रा- क्षत्रिय पुरुष की क्षत्रिय,  वैश्य और शुद्रा ,  ब्राह्मण पुरुष की ब्राह्मण, क्षत्रियए वैश्य और शूद्र वर्णों से उत्पन्न स्त्रियों से विवाह हो सकता है। )

अनुलोम विवाह के विपरीत क्रमिक वैवाहिक प्रणाली प्रतिलोम विवाह कहलाती है। मनुस्मृति में अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह श्रृंखला ही नहीं अपितु ऐसे विवाह से उत्पन्न संतानों की श्रृंखला भी उल्लेखित है। ‘अनुलोम विवाह के ब्राह्मण पुरुष और वैश्य स्त्री से उत्पन्न संतान ‘अम्बष्ट ‘ कहलाता है। क्षत्रिय पुरुष व शूद्र स्त्री से उत्पन्न संतान ‘उग्र’ नामक  होता है, जो कुकर्मा व क्रूर चेष्टा वाला होता है। प्रतिलोम विवाह के क्षत्रिय पुरुष व ब्राह्मण कन्या से उत्पन्न पुत्र ‘सूत’  वैश्य से क्षत्रिय कन्या से उत्पन्न पुत्र ‘ मागध’  और ब्राह्मण वर्ण की कन्या से उत्पन्न पुत्र ‘ वैदेह’  होता है। शूद्र  से वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण कन्या से उत्पन्न पुत्र क्रमशः ‘आयोगव’, ‘क्षता’  और मनुष्यों में नीचतम ‘ चांडाल’  होता है। मनुस्मृति में उपरोक्त विवाहों में केवल प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न चांडाल ही स्पर्श के अयोग्य कहा गया है। शेष  सभी संतानों को स्पर्श किया जा सकता है। शूद्र से प्रतिलोम क्रम में विवाह से उत्पन्न आयोगव, क्षत्ता तथा चांडाल शूद्रों की अपेक्षा हीन तथा मनुश्यों में अधम कहे  गये हैं .’ मनुस्मृति का प्रतिलोम विवाह व उससे उत्पन्न संतान के प्रति कठोर विधान जाति रक्त-शुद्धता तथा जाति विभेद व अलगाव का पूरा ढांचा निर्मित करता है। मनुस्मृति ने जीवन का कोई ऐसा पक्ष नहीं जहां वर्णीय पदानुक्रमिक सिद्धांत को आधार न बनाया हो।

ब्राह्मणवाद के साथ-साथ पितृसत्तामक व्यवस्था को कायम करना व उसे चिरस्थायी रखना मनुस्मृति का मूल प्रयोज्य रहा,  जिनमें शूद्रों के  साथ-साथ स्त्री पर भी अधीनस्थता व विभेद संबंधी अगणित श्लोक उल्लेखित हैं। मनृस्मृति स्त्री को पति की अधीनता में रहते हुए पति-सेवा का निर्देश  देता है। यह शास्त्र स्त्री को पतिपरायणता और गृहस्थ-जीवन की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को आदेशित -निर्देशित करता है।  इससे यह परिलक्षित होता है कि तत्कालीन समाज में स्त्री पर आरोपित यौन-वर्जनाएं टूटने लगीं थीं। अतः मनुस्मृति की मूल चिंता स्त्री यौनिकता को लेकर ही है। इस कारण ब्राह्मणवादी पुरुषवादी दृष्टि से लिखित यह शास्त्र स्त्री-यौनता को नियंत्रित करने के उद्देश्यवश ही पतिव्रता का कर्तव्यपाठ कई अध्यायों में वर्णित करता है। मनुस्मृति स्त्री की  भूमिका को पब्लिक डोमेन में लगभग निषेधित सा करके उसे प्राइवेट डोमेन में ही सीमित कर देता है,  जिससे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दोहरे हित पूरे होते- पहला स्त्री यौनता पर नियंत्रण,  दूसरा घरेलू दायरे में संलग्न होने पर स्त्री आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो सकेगी। चूंकि घरेलू कार्य को आर्थिक कार्य के तौर पर चिह्नित ही नहीं किया जाता है। इस वजह से स्त्री की पुरुष पर आर्थिक निर्भरता,  अंततः उसे पुरुषवादी व्यवस्था में अपनी सहमति देने को विवश भी कर देता है।’

विभिन्न वर्णों हेतु निर्धारित अलग-अलग प्रशस्त्र विवाह  के आलोक में देंखे तो ब्राह्मणों में कन्या दान की वस्तु,  क्षत्रियों में शक्ति द्वारा विजित्,  वहीं वैश्यों और शूद्रों में खरीदी गई वस्तु है। इस प्रकार स्त्री के श्रम और पुनरुत्पादन पर पति के अधिकार को वैधता शास्त्रों के इन्हीं विधानों से मिलती है। विवाह के लिए स्त्री की उपयुक्तता का मापदण्ड उसके शारीरिक सौन्दर्य से ही निर्धारित किया गया है।
अव्याड्डी सौम्यनाम्नी हंसवारणगामिनीम्
तनुलोमकेशदशनां मृदडमीमुदहेत्स्सियम्।।
(जो किसी अंग से हीन नही,  सुंदर नामोवाली हो,  हंस या गजगामिनी हो,  सूक्ष्म रोम तथा पतले-पतले दांतों वाली हो और सुकुमार शरीर वाली हो,  ऐसी कन्या से विवाह करें।)

पति की आज्ञा का उल्लंघन करने वाली स्त्री को इस जन्म
और अगले जन्म में भी कठोर दंड का विभाजन है। निर्धारित किये गये निर्देशों की अवहेलना करने पर राजा द्वारा स्त्री को दण्डित करने का भी उल्लेख है।  इससे यह तथ्य उजागर होता है कि तत्कालीन लैंगिक-विभेदकारी व्यवस्था के मुखर प्रतिरोध में कुछ स्त्रियां गई होंगी। जिससे उच्चवर्णीय पुरुषों को अपना वर्चस्व ध्वस्त होता नजर आने लगा हो। इसी कारण मनुस्मृति स्त्रियों द्वारा पितृसत्तात्मक मूल्यों के प्रतिरोध में जाने पर उसे प्राप्त सुविधाएं और विशेषाधिकारों को समाप्त करने का निर्देश देने के साथ ही साथ दण्ड भी निर्धारित करता है। जिस भय से स्त्रियां इन मूल्यों के प्रतिरोध में न जाकर अपितु उसे अपनी सहमति देते हुए उसके शोषण और उत्पीड़न में सहभागी हो जाएं।

पुनर्विवाह के सम्बन्ध में भी पितृसत्ता की वर्चस्वपरकता स्पष्टतया उजागर हो जाती है। सामान्य तौर पर एक पत्नीव्रत को ही प्रतिष्ठित किया गया है। परंतु कई परिस्थितियों में पुरुष हेतु पुनर्विवाह का निर्देश भी दिया गया है। (मद्यपान करने वालीए, दुराचार वाली,  प्रतिकूल रहने वाली, रोगी, दास-दासी आदि को सदा मारने वाली और अधिक धन व्यय करने वाली स्त्री हो,  तो पति उसके जीवित रहने पर भी दूसरा विवाह कर ले)।
पुर्नविवाह की जो परिस्थितियाँ वर्णित हैं, वे भी इस शास्त्र की पुरुषवादी दृष्टि को ही प्रतिबिंबित करती हैं। पत्नी के चरित्र को अपने हित और सुविधानुसार परिभाषित करते हुए पुरुष हेतु पुनर्विवाह का रास्ता भी मनुस्मृति बना देता है। पुनर्विवाह हेतु निर्धारित परिस्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में बहुपत्नीत्व की स्वीकार्यता रही होगी.
वन्ध्याष्टमेऽधिनेघाब्दे दशमे तृ मृतप्रजा।
एकादशे स्त्रीजननी सघस्वत्वप्रियवादिनी।।

पितृवंशात्मक समाज में वंशवाहक पुरुष होने के कारण इस सामाजिक.व्यवस्था में पुत्र को महत्व दिया जाता है। विवाह संस्था का उद्देश्य हमारे शास्त्रों में पुत्र प्राप्ति ही माना गया है। पुत्र ही पितृऋण से उऋण करता है। मनुस्मृति प्रथम विवाह द्वारा पुत्र प्राप्ति न होने की स्थिति में पुरुष को दूसरा विवाह करने का निर्देश देता है। वहीं दूसरी ओर विधवा-विवाह और स्त्रियों के पुनर्विवाह का निषेध इस मान्यता के आधार पर करता है कि स्त्री (संपत्ति )  एक बार दान किये जाने के पश्चात पुनः दान नहीं किया जा सकता। पतिव्रता स्त्री के लिए दूसरे विवाह का विधान भी नहीं है। यह शास्त्र स्त्री के प्रति अन्य की धारणा को लिये हुए है। वहीं कुछ श्लोकों में स्त्री को गृहलक्ष्मी, अद्धार्गिनी आदि संबोधन भी दिये गये हैं। लेकिन यह संबोधन पुरस्कार स्वरूप उन्हीं स्त्रियों के लिए रहा होगा जो पुरुषवादी व्यवस्था के खांचें में समायोजित हो जाती होंगी। स्त्री और पुरुष की तुलना खेत और बीज से की गई है। खेत पर बीज की श्रेष्ठता स्थापित है।  खेत (स्त्री) पर खेत के मालिक (पति) का वैधानिक अधिकार होता है भले ही खेत पर खेत के मालिक का बीज न होकर किसी अन्य का बीज हो। यह धारणा संतान पर स्त्री के पति को ही सर्वाधिकार देता है।

पैतृक संपत्ति पर उत्तराधिकार संबंधी नियमों में पुत्र को ही उत्तराधिकारी बताया गया है। जबकि स्त्रीधन (माता का धन)  पर पुत्रों, पुत्रियों और पुत्रियों के अविवाहित पुत्रियों के उत्तराधिकार का विधान है। उपहारस्वरूप  विविध अवसरों पर पिता, पति, माता और भाई द्वारा मिला हुआ छः प्रकार का धन तत्कालीन समाज में स्त्रीधन माना जाता था।  स्त्री-धन पर स्त्री के संतानों का ही अधिकार था न कि उसके पति का। ब्रह्म, दैव, आर्य, प्रजापत्य तथा गांधर्व विवाहों के फलस्वरूप  संतान होना स्त्री के स्त्रीधन का अधिकारी पति होता है, वहीं असुर, राक्षस और पैशाच विवाहों में स्त्री के माता-पिता अधिकारी होते हैं। इस प्रकार मनुस्मृति स्त्री के आर्थिक-अधिकारों को बहुत ही सीमित रखता है, ताकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बिना किसी चुनौती या विरोध के चिरस्थायी तौर पर कायम रखा जा सके।

इस प्रकार तमाम विभेदमूलकताओं की उपस्थिति के बावजूद स्त्रियों की सम्मान-रक्षा और शांतिपूर्ण समाज की स्थापना के माध्यम से मनुस्मृति एक प्रकार की निष्पक्षता का स्वांग भी रचती है। परंतु सामाजिक स्तरीकरण का स्पष्ट प्रतिबिंबन इसमें दिखाई पड़ता है, जो पितृसत्तात्मक हितों से संचालित है। शास्त्रीय  परंपरा इसके बावजूद कि विभिन्नताओं को समाप्त करती दिखती है और सब कुछ सपाट, समान करने का प्रयास करती है,  ऐसी स्थितियों को भी दर्शाती है,  जहाँ पितृसत्तात्मक और गैरपितृसत्तात्मक संभावनाएं एक साथ बनती है। इतिहासकार सामान्यतः इनके द्वारा सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं को समझ सकते हैं और खासकर जेंडर आधारित संबंधों कोए जो प्राचीन भारत में विद्यमान थे।
जाहिर सी बात है मनुस्मृति जैसे ग्रंथ, जो एक समय हिन्दू धर्म व हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के लिए संवैधानिक नियम कायदों के स्रोत का कार्य करते थे, अपनी समस्त संरचना में स्त्री विरोधी होने के साथ दलित विरोधी भी है। यह उन शर्मनाक स्थितियों को जन्म देता है, जो एक व्यवस्था व धर्म के रुप में हिन्दू धर्म को उच्च स्थान पर स्थापित करने का प्रयास करता है। इस विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री अधिकारों में सर्वाधिक बाधक तत्व धर्म है। सीधे शब्दों में कहें तो धर्म ही स्त्री अधिकारों के बीच सबसे बड़ा अंतर्विरोध हैं। धर्मिक बाध्यतायें ही दलितों को भी उनके अधिकार से वंचित करती है.

दलित स्त्रियाँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास

हेमलता


हेमलता ने ‘दलित अस्मिता और शिक्षा’ पर शोध किया है.सम्पर्क :hmdehrwal@gmail.com

अनिता भारती आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अपने तीखे और सटीक शब्दों से उन्होंने दलित स्त्री विमर्श को अलग मुकाम दिया है।‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ पुस्तक भी कुछ ऐसे ही तल्ख़ प्रश्नों को लेकर खड़ी है, जिसके निशाने पर आधुनिक नारीवाद के साथ-साथ कई आत्ममुग्ध दलित लेखक भी आ जाते हैं।

अनिता भारती अपनी भूमिका ही प्रश्नों से शुरु करती हैं; मसलन दलित नारीवाद क्या है? यह सवर्ण नारीवाद से कैसे भिन्न है? किन मुद्दों पर ये दोनों अलग ध्रुवों पर खड़े दिखाई देते हैं आदि। कुल मिलाकर यह  पुस्तक दलित स्त्री  को केंद्र में रखते हुए उसे किसी भी तरह की चालाकी से बचने के लिये सावधान करती है। इस संदर्भ में वर्ग और जाति के अंतर को भी बखूबी स्पष्ट करती हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि “सभी औरतें एक मुकम्मल वर्ग के रूप में नहीं हैं, बल्कि वे जातियों में बँटी हैं। इसलिये उनकी समस्याएँ और मुद्दे भी अलग-अलग हैं।” उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थितियां अलग हैं। यह पुस्तक ऐसे ही कई सवालों और विमर्शों को लेकर आगे बढ़ती है। साथ ही उन सवालों के उत्तर खोजने, उन पर बात करने और उनसे जूझने की कोशिश करती है।

इस पुस्तक में सात शीर्षकों के अंतर्गत 36 अलग-अलग विषयों पर चर्चा की गई है। जिसमें ‘संघर्ष के विविध आयामों’ के साथ-साथ ‘दलित लेखिकाओं के स्त्रीवादी स्वर’ व आत्म-विश्लेषण भी सम्मिलित हैं। ‘खुद से गुजरते हुए’, ‘कुछ छूटे पन्नों’ के साथ ही वे आज की बदली पितृसत्ता को चुनौती भी देती हैं। पुस्तक का पहला खंड दलित लेखिकाओं के स्त्रीवादी स्वर को उभारता है। जिसमें कौशल्या बैसंत्री, दया पवार, सुशीला टाकभौरे, बेबी ताई कांबले, कावेरी, रजतरानीमीनू, कुसुम मेघवाल आदि दलित लेखिकाओं की आत्मकथाओं अथवा अन्य रचनाओं के माध्यम से उन्हें समझा गया है। यह खंड अपने साथ यह निष्कर्ष जरूर लाता है कि इन लेखिकाओं का मुख्य स्वर समता, स्वतंत्रता और न्याय है। जो समाज में हो रहे किसी भी तरह के अन्याय, उत्पीड़न, दमन को स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं। अनिता जी का इन रचनाओं के संदर्भ में किया गया विश्लेषण या पड़ताल निश्चित ही एक तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है।

अनिता भारती की यह पड़ताल केवल अन्य दलित लेखिकाओं तक सीमित नहीं रह जाती बल्कि अगले खंड में वे इसे खुद पर भी लागू करती हैं। ‘खुद से गुजरते हुए’ अध्याय में उनके अपने जीवन की संक्षिप्त झलकियाँ देखी जा सकती है। चार भिन्न शीर्षकों के दायरे में वे अपने निजी जीवन के कुछ खट्टे-मीठे अनुभवों को बांधती हैं। जीवन की कुछ कड़वी सच्चाईयों को भी वे बिना किसी झिझक के पेश करती हैं जहाँ उन्हें अत्याचार व अपमान का कड़वा घूंट पीना पड़ा था। मानसिक विक्षिप्तता की अवस्था में भी माँ के सुरक्षा आवरण व प्रेम को किसी भी प्रकार से वे भूल नहीं पाती हैं। इस प्रकार ‘अपने कमरे’ से लेकर ‘त्यौहार मनाने की उहापोह’ तक के सामाजिक दबाव को वे एक अंतरद्वंद के साथ पेश करती हैं। कुल मिलाकर यह खंड उनकी भावी आत्मकथा का एक संक्षिप्त अंश माना जा सकता है।

साहित्य में हिंदी दलित लेखन हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। अपने अलग दर्शन, सिद्धांत, विचारधारा, अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों को रखते हुए यह साहित्य को नई चेतना भी देता रहा है। इसी संदर्भ में इस पुस्तक का यह प्रसंग भी महत्वपूर्ण हो उठता है कि प्रेमचन्द की इस (दलित) लेखन में क्या प्रासंगिकता है। प्रेमचन्द क्या किसी खास समुदाय/जाति/वर्ग के नुमाइंदे थे या इससे इतर वे समता व समान न्याय के पक्षधर थे। आज दलित लेखन में इस पक्षधरता को लेकर अलग-अलग खेमे देखे जा सकते हैं। अनिता जी की यह पुस्तक प्रेमचन्द पर उठे ऐसे ही प्रश्नों का तार्किक जवाब प्रस्तुत करती है। लेखिका प्रेमचन्द की पक्षधरता को लेकर कहीं भी आशंकित नहीं दिखतीं। इस संदर्भ में उनका स्पष्ट मानना है कि “प्रेमचन्द जाति व्यवस्था तोड़ने का हल निकालते हैं और समाधान वही है जो डॉ. अम्बेडकर ने सुझाया था” (पृ. 107)। ‘साहित्यकार प्रेमचन्द और दलित स्त्री-विमर्श’ खंड अपने तीन अध्यायों में प्रेमचन्द के संदर्भ में उठी ऐसी ही बहसों का तार्किक जवाब खोजने का प्रयास है। इस संदर्भ में अनिता भारती कई दलित पुरुष लेखकों को भी नहीं बख्शतीं। ‘रंगभूमि दहन’ को भी वे महज एक ‘स्टंटबाजी’ के अतिरिक्त और कोई संज्ञा नहीं देतीं। वे लिखतीं हैं कि “प्रेमचन्द के विचारों और साहित्य का मूल्यांकन समय काल के दायरे में किया जाना चाहिये।… प्रेमचन्द अछूत समस्या का हल ऐसा खोजना चाहते थे जिससे राष्ट्र न टूटे।… कुछ दलितों द्वारा उनकी रंगभूमि जला देने से उनका महत्व न कम हुआ है और न ही होगा। प्रेमचन्द की दॄष्टि सवर्ण पात्रों की क्रूरता के प्रति विद्रोह करती है, उनका धर्म छोड़कर संघर्ष की ओर अग्रसर होती है।” कुछ ऐसी पंक्तियों के साथ यह पुस्तक प्रेमचन्द को दलित संवेदना के बीच लाकर खड़ा कर देती है।

अनिता भारती की यह पुस्तक साहित्यिक सर्वेक्षणों के साथ-साथ जमीनी सर्वेक्षणों को भी लेकर चलती है। सामाजिक सर्वेक्षण की तर्ज पर यह पुस्तक ‘दलित महिलाओं के खिलाफ हिंसा’ का तारीख और क्षेत्रवार विवरण प्रस्तुत करती है। राजधानी दिल्ली से लेकर सुदूर गाँवों तक हो रहे जातिगत और पेशेगत उत्पीड़न, खेतिहर मजदूरी और पुलिसिया जुल्म का पूरा आँकड़ेवार लेखा-जोखा पुस्तक के तीसरे खंड में दर्ज है। यहीं एक अन्य अध्याय दलित स्त्री को लेकर मीडिया द्वारा गढ़ी छवि को भी कटघरे में खड़ा करता है। अनिता भारती का मानना है कि मीडिया ने कभी दलितों की सशक्त छवि नहीं गढ़ी। वह छवि गढ़ने के लिये प्रतीकों को गढ़ता है और उसे अपने मन मुताबिक इस्तेमाल करता है। दरअसल यह अध्याय मीडिया द्वारा दलित, आदिवासियों की एक परंपरागत छवि को पेश करने का विरोध करता है। इन छवियों में उन्हें फूहड़, गंदा, काला, अपंग आदि रूपो में ही पेश किया जाता है। उन्हें असभ्य और हास्यास्पद छवि ही पसंद आती है, जबकि इस वर्ग में कई प्रभावशाली और प्रसिद्ध चरित्रों को लगातार नजरंदाज किया जाता रहा है। यह हाल इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट मीडिया और फिल्मों तक में बदस्तूर जारी है।

सामाजिक अनदेखी की इस प्रक्रिया को पूरी तरह से धता बताते हुए अनिता भारती कहती हैं कि ‘दलिताएँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास’। यहाँ अनिता भारती दलित स्त्रियों के लिये ‘दलिताएँ’ शब्द गढ़ती हैं। वे साथ ही उन इतिहास पुस्तकों का भी जिक्र करती हैं जिनमें दलित स्त्री लेखिकाओं को लगातार उपेक्षित रखा गया। इसी संदर्भ में राधा कुमार की पुस्तक “स्त्री संघर्ष का इतिहास 1800-1990” का जिक्र करते हुए अनिता भारती लिखती हैं कि “राधा कुमार जी ने स्त्री आंदोलन में दलित स्त्रियों के आंदोलन के साथ न्याय नहीं किया है।… मेरे आश्चर्य और दु:ख की सीमा ना रही जब मैंने राधा कुमार जी की पुस्तक में दलित महिला आंदोलन की रीढ़ ही नहीं, अपितु संपूर्ण भारतीय महिला आंदोलन की जनक सावित्रीबाई फुले का नाम पूरी तरह से उपेक्षित पाया।” इसी प्रकार दीप्ति प्रिया महरोत्रा की पुस्तक ‘भारतीय महिला आँदोलन’ में दलिताओं के कई सक्रिय और जुझारू आंदोलनों का जिक्र तक नहीं है। दरअसल यह पुस्तक उन तमाम स्वयंसिद्ध लेखकों के समक्ष एक आईना है जो दलित मुखौटों में आज भी पितृसत्तात्मक बने हुए हैं।

कुछ ऐसा ही आईना वे डॉ. धर्मवीर को भी दिखाती हैं जिनकी नजर में अंतरजातीय विवाह  किसी दलित स्त्री के लिये वेश्यावृत्ति से कम नहीं है। दलित स्त्रियों के इस अपमान का अनिता भारती तीखा विरोध करती हैं। पुस्तक के छठे भाग में ‘पितृसत्ता को चुनौती’ देते हुए वे इस मानसिकता के तमाम दलित लेखकों को लगभग चेतावनी देती हुई दिखती हैं। इस भाग में मुख्य रूप से डॉ. धर्मवीर से उनका मतांतर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। जब वे स्पष्ट रूप से लिखती हैं कि “1995 से लेकर 2005 तक इन दस वर्षों में वे अपनी सार्वजनिक बेईज्जती भूलकर लगातार निर्लज्जता से दलित/ गैर दलित स्त्रियों के खिलाफ अश्लील व अपमानजनक सस्ता लेखन कर रहे हैं। कथादेश में चली बहस इसकी गवाह है” तो यह विषय और भी गंभीर हो जाता है। दरअसल वर्चस्व की राजनीति और असमानता की साजिश पितृसत्तात्मक समाज का मूल चरित्र रही है फिर चाहे बात किसी भी वर्ग की हो, जाति की हो या समाज की। स्त्रियों के अर्थ, चरित्र, श्रम, आंदोलनों आदि का अंतिम श्रेय अंतत: पुरुष अपने ही हाथों में रखता आया है। यही कार्य तथाकथित आधुनिक सभ्य समाज भी कर रह है। कुल मिलाकर पुस्तक का यह अंश तथ्यात्मक उद्धरणों पर आधारित है जो स्त्रियों को चुप्पी की संस्कृति से बाहर लाता है, उनकी आवाज को और बुलंद करता है।

पुस्तक का अंतिम भाग ‘डॉ. अम्बेडकर और दलित साहित्य’ है। इस भाग में भी अनिता भारती ने डॉ. अम्बेडकर के स्त्री चिंतन पर ही जोर दिया है। इस अध्याय में तमाम दलित महिला आंदोलनों, सम्मेलनों के साथ-साथ उनके सामान्य जीवन की छवियाँ भी रखी गईँ हैं। दरअसल अम्बेडकर की ही तरह भारती जी भी दलित महिलाओं के बीच एक समाज सुधारक की तरह उतरती हैं। वे उनके प्रति गढ़ी गई छवियों को लगातार बदलने का प्रयास करती हैं। इस संदर्भ में डॉ. अम्बेडकर को उद्धृगत करती हैं कि “तुम खुद को अस्पृश्य मत मानो। घर में स्वच्छता रखो। धोती चाहे फटी ही क्यों न हो पर स्वच्छ होनी चाहिये।… दारूबाज पति, भाइयों और बहनों को भोजन मत दो। लड़कियों को शिक्षा दिलवाओ। ज्ञान और विद्या दोनों महिलाओं के लिये आवश्यक है।” इस प्रकार अनिता भारती डॉ. अम्बेडकर के जनतंत्र व समतावादी भारत की कल्पना निर्मित करती हैं।
दरअसल यह पुस्तक दलित स्त्री लेखन को एक नई उर्जा के साथ पेश करती है। पुस्तक लगातार उन छवियों को तोड़ती है जो उस पर समाज ने थोप रखे हैं। यह पुस्तक उन तमाम पुरानी अर्जियों को खुद खारिज करते हुए किसी भी नई अर्जी से इंकार करती है। यहाँ अर्ज़ियाँ नहीं फैसले हैं जो दलित स्त्रियों ने खुद अपने लिये चुने हैं। तभी तो अनिता भारती यह घोषणा भी करती हैं कि “दलिताएँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास”। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस पुस्तक का हासिल अपनी परंपरा से कहीं ज्यादा अलग और कहीं ज्यादा गाढ़ा है।

पुस्तक का विवरण :
समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध
लेखक : अनिता भारती
प्रकाशन: स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रथम संस्करण -2013
मूल्य: 650 रुपये

हिन्दी साहित्य में महिलाओं को अब तक समानता नहीं मिली है : उषा किरण खान

( हाल  के दिनों  में  कथाकार  उषा  किरण  खान  को  ‘पद्मश्री ‘  से  नवाजा  गया . युवा  पत्रकार  इति शरण  ने  उनसे  स्त्रीकाल  के लिए  बातचीत  की  .  स्त्रीविमर्श , स्त्री -लेखन , भाषा , स्वानुभूति -सहानुभूति  बहस , महिलाओं  को  रॉयलिटी, पटना  में कथा – सम्मलेन -विवाद  तथा  अपने लेखन  पर  उषा  किरण  खान  ने   बेबाक  बातचीत  की . ) 

उषा किरण खान





हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श का एक लंबा इतिहास रहा है। साहित्य के विभिन्न चरणों के साथ स्त्री विमर्श के स्वरूपों में भी परिवर्तन आता रहा। महिलाओं की लेखनी में अपनी पहचान बनाने के बाद स्त्री विमर्श का एक सशक्त रूप सामने आया। पद्म श्री उषा किरण खान इस परिवर्तन को एक लंबा संघर्ष मानती है। उनका मानना हैं कि उन संघर्षों के बाद आज युवा स्त्रियां बेबाकी से अपनी बातें लिख पा रही हैं । 
                                                                                                                                                (इति शरण) 
स्त्री -लेखन को आप किस रूप में देखती हैं ?
लेखनी के क्षेत्र में महिलाओें ने हमेशा अपनी भूमिका निभाई है। मगर आज कहानी और उपन्यास के साथ-साथ महिलाएं वैचारिक लेखनी भी कर रही हैं। वह साहस के साथ अपनी जीवनी लिख रही है। इसके लिए उन्हेें कई आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है, मगर वे उन आलोचनाओं से पीछे नहीं हट रही।
स्त्रियों का यह सफर इतना आसान नहीं था। इसके लिए हमने एक लम्बा रास्ता तय किया हैं। महादेवी वर्मा, आशापूर्णा देवी, सुभद्रा कुमारी चैहान, यह सभी घरेलू महिलाएं थी। अपनी लेखनी के लिए उन्होनें बहुत संघर्ष किया है। आज स्त्रियों की अभिव्यक्ति का कारण शिक्षा का प्रचार-प्रसार और अपने अधिकारों के प्रति उनकी चेतना ही है।

इति शरण

क्या आप खुद को स्त्रीवादी लेखिका कहलवाना पसंद करेगी ?
हां, मैं खुद को स्त्रीपक्षी मानती हूं, हाँ  मैैं स्त्रीवादी हूं। मगर ऐसा नहीं कि बिना सोचे समझे किसी मुद्दों पर स्त्रियों की पक्षधर हो जाऊंगी। समाज अगर किसी स्त्री को गलत कह रहा है तो यह जानने की कोशिश करूंगी कि वह गलत है या सही। उसका सीधे समर्थन या विरोध नहीं करूंगी। मान लिजीए किसी स्त्री के ऊपर खून का आरोप लगता है तो मैं जानने की कोशिश करूंगी कि उसने खून किया क्यों ? उसके तह तक जाऊंगी। क्योंकि स्त्रियां प्रायः भावुक होती है। वे एक मां होती हैं। वे आसानी से खूून नहीं कर सकती।

महादेवी वर्मा का मानना था कि एक स्त्री अपने जीवन का जितना सजीव चित्रण कर सकती है, एक पुरुष स्त्री जीवन का वैसा चित्रण नहीं कर सकता। स्त्री का अपना खुद का अनुभव होता है। आपको क्या लगता हैं किसी वर्ग विशेष पर बात करने के लिए उस वर्ग का होना जरुरी हैं ? 
हां, यह बात बिलकुल सही है कि एक स्त्री अपने आपको पुरूषों की तुलना में ज्यादा बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर सकती है। इन दिनों मुझे एक बात समझ आई है, “मैनें आज तक दलितों के बारे में जो कुछ भी लिखा है, मुझे लगता है एक दलित उन चीजों को मुझसे बेहतर लिख सकता है।“ दूसरी बात जो मेरी समझ में आई वह यह कि अभी स्त्रियां अपनी आत्मकथाओं  में जो बाते लिख रही है वैसी बातें प्रेमचंद्र, शरतचंद्र जैसे पुरूष लेखक नहीं लिख पाए। इस तरह मुझे लगता है कि स्त्री मुद्दों पर महिलाएं ज्यादा अच्छा लिख सकती हैं। लेकिन मैं पुरूषों को खारिज भी नहीं करती।

 अंग्रेजी साहित्य में भी 19 के दशक तक महिला लेखिकाओं को कुछ खास तवज्जों नहीं मिली, लेकिन धीरे-धीरे वहां स्थिति में सुधार आया और महिला लेखिकाओं के लेखन को भी पुरुष लेखकों के बराबर का महत्त्व मिलना शुरू हुआ । आपको क्या लगता हैं हिंदी साहित्य में महिलाओं को अब तक समानता मिल पाई हैं ?
हिन्दी साहित्य में महिलाओं को अब तक समानता नहीं मिली है। आज भी उनपर आरोप लगाया जाता है कि उनकी रचना मौलिक नहीं होती। महुआ मांझी पर भी कुछ ऐसा ही आरोप लगाया गया। जबकि यह सामान्य सी बात है कि 500 पन्नों का उपन्यास कोई दूसरे के लिए क्यों लिखेगा। दरअसल, यह सारी बातें महिलाओं को कमतर दिखाने के लिए कही जाती है।

उषा किरण खान और बाबा नागार्जुन

 फिल्मों की भी अगर बात करें तो वहां भी पुरुष अभिनेताओं की तुलना में स्त्री अभिनेत्रियों को कम पैसे मिलते हैं । अभी करीना, कंगना, दीपिका, प्रियंका जैसी कुछ अभिनेत्रियों ने इस मुद्दे को उठाया भी था। साहित्य हो या फिल्म जगत स्त्रियों के साथ होने वाले इस दोयम दर्जे में सुधार कैसे लाया जा सकता है ?
मैं फिल्मों के बारे में तो ज्यादा कुछ नहीं बोल सकती क्योंकि उस क्षेत्र का मुझे उतना ज्ञान नहीं है। मगर साहित्य की एक बिलकुल सामान्य बात मैं आपको बताती हूं। किसी किताब की राॅयेलटी का जो दस्तख़त करवाया जाता है, उसका फाॅर्म स्त्री और पुरूष दोनों के लिए समान होता है। लेकिन जब बात पैसों की आती हैं तो स्त्रियां वहां पुरूषों से पीछे रह जाती हैं। स्त्रियां पैसों के लिए दवाब नहीं डाल पाती। उनके अंदर एक संकोच भी होता है। मगर पुरूष आसानी से दवाब बना लेते हैं। अगर महिलाएं संकोच से बाहर निकलकर दवाब बनाने की कोशिश भी करती हैं तो उनका यह कहकर मज़ाक उड़ाया जाता है कि देखो कैसी औरत है, पैसों की चर्चा कर रही है। इन स्थितियों से बाहर निकलने के लिए स्त्रियों को संगठित होने की जरूरत हैं।

एक स्त्री लेखिका होने के क्रम में आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?
वैसे तो मुझे बहुत ज्यादा परेशानी नहीं हुई। एक पढ़े-लिखे परिवार में आपको ज्यादा परेशानियों  का सामना नहीं करना पड़ता है। हां, ज्वाइंट फैमिली होने के कारण खुद ही परिवार में थोड़ी उलझी रही। बच्चे बड़े हो रहे थे उनकी देखभाल पढ़ाई-लिखाई और फिर आर्थिक उन्नयन के लिए नौकरी करना, बस इन्हीं चीजों में थोड़ी उलझ गई थी। लेखनी कोई परफाॅमेंस तो है नहीं कि उसके लिए आपको कही बाहर जाना होता है। घर बैठे लिखा जा सकता है। इसलिए ज्यादा कोई बाधा नहीं आती है। शायद मैं ड्रामा की बात करती तो कुछ सीमाओं का सामना करना पड़ सकता था। जीवन भर बिहार में रहने से जरूर कुछ बाधाएं आई। एक तो मैं स्त्री, ऊपर से बिहारी। हालांकि बिहार के लोगों के बिना कोई किताब छपती भी नहीं हैं। मगर हमारे क्षेत्र के लोगों को अभी भी कमतर आंका जाता है। एक और बाधा यह रही कि मैं अपनी रचनाओं का बहुत प्रचार नहीं करती। इसलिए इनकी समीक्षाएं भी बहुत नहीं आती। मगर आज भी कई युवा लेखक मुझसे कहते हैं कि मैने आपकी रचनाओं को पढ़ा हैं। मेरे लिए बस उतना ही काफी हैं। पाठकों तक मेरी रचना पहुंच रही है, मेरे लिए यही खुशी की बात हैं। इसलिए मैं इन बाधाओं को बाधा मानती भी नहीं हूं।

स्त्रीकाल के गया सेमिनार में बोलती हुई उषा किरण खान

आपकी रचनाओं में ज्यादातर चरित्र और परिवेश आपके ग्रामीण क्षेत्र के ही होते हैं, आपने अपने लेखन के क्रम में अपने गांव में महिलाओं की स्थिति में कितना बदलाव देखा हैं ?
जब मैनें लिखना शुरू किया था तो वे सचमुच भोल-भाले ग्रामीण थे। फिर पंचायती व्यवस्था शुरू हुई, उसके बाद पंचायतों में महिलाओं को पहले 30 प्रतिशत और फिर 50 प्रतिशत आरक्षण मिला। जिन स्त्रियों को मोहरा बनाकर पेश किया जाता था अब वही स्त्रियां खुलकर सामने आने लगी। मगर आज भी वहां जातिगत भेदभाव की स्थिति बनी हुई हैं। दलितों और पिछड़े वर्गों के आपसी वर्गीकरण से ही अब तक लोग प्रभावित है। इससे सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभावित होती है।

 वर्तमान साहित्य में स्त्री विमर्श को किस रूप में देखती हैं ? क्या पहले की तुलना में अब स्त्री विमर्श पर ज्यादा खुल कर बात हो रही है ?
पहले स्त्री मुद्दों पर इतनी खुलकर बाते नहीं होती थी जितनी आज हो रही है। पहले कही ना कही महिलाओं को हाशिये पर रखा जाता था। मगर आज इसपर बड़े स्तर पर बाते हो रही। रवीन्द्रनाथ ने स्त्रियों की भूमिका को घर से बाहर लाने की कोशिश की। उनका एक उपन्यास है “गोरा“। जिसमें स्त्री पात्र का पति ही उसे बाहर जाने और अपनी पहचान बनानी की स्वतंत्रता देता है, लेकिन बाद में उसके पति को ही उससे काॅम्पलेक्शन होने लगता है। यहां रविन्द्रनाथ उस महिला पात्र का पक्ष लेते हुए दिखते हैै। वही उनके दूसरे उपन्यास “घर-बाहर“ में भी उन्होनें महिला पात्र का ही पक्ष लिया, जिसमें स्त्री अपने पति के दोस्त के विचारों से प्रभावित हो जाती है और कई बार अपने पति को भी उसकी बातों के आगे चुप करा देती है। इस तरह कई कथाकारों ने धीरे-धीरे अपने लेखन में महिला पात्र को घर की चार दिवारी से बाहर निकाला। उसके बाद मनु भंडारी, कृष्णा सोबती जैसी  लेखिकाओं ने बेबाकी से स्त्री मुद्दों पर लिखना शुरू किया।

अभी एक फिल्म आई “पीकू“ जिसमें महिला की एक सशक्त छवि को दिखाया गया । इस फिल्म पर खूब चर्चाए हुई । लेकिन जब इन्हीं मुद्दों पर साहित्य में बातें होती है तब इतने बड़े स्तर पर चर्चा नहीं होती। इसका क्या कारण हैं ?
साहित्य हमेशा से अल्पसंख्यक विषय रहा है। इसे बहुत ज्यादा कोई नहीं पढ़ता । इसलिए हमें इसकी क्वान्टिटी पर ना जाकर क्वालिटी पर जाना चाहिए।

 आप अपनी मैथिली की रचनाओं को ज्यादा करीबी मानती हैं या हिंदी रचनाओं को ?
हिन्दी मेरी स्वाभाविक भाषा है और मैथिली मातृभाषा है। मेरी शिक्षा दीक्षा हिन्दी में हुई इसलिए उसमें खुद को ज्यादा सहज महसूस करती हूं। दूसरी बात मैं अपनी रचनाओं के जरीए अपने क्षेत्र की कोशी की सच्चाई दुनिया के सामने लाना चाहती थी। इस विषय पर अभी तक लिखा नहीं गया था। फणीनश्वर नाथ रेणु जी ने कोशी का जो वर्णन किया वो ग्लैैमराइज था। उनके क्षेत्र में स्थिति हमारे जैसी विषम नहीं थी। हमारे यहां आज भी हमें बैलगाड़ी और नाव से घर जाना पड़ता है। इन सभी सच्चाईयों से लोगों को वाकि़फ कराने के लिए मैंने  हिन्दी भाषा का चुनाव किया। मैथिली की रचना की कुछ सीमाएं होती है । उसकी पहुँच  एक सीमित क्षेत्र तक ही रह जाती है।

जैसा कि आपने कहा “क्षेत्रीय भाषा की रचनाओं के पाठक सीमित होते हैं।“ इसकी सीमाओं का कारण किसे मानती हैं ?
हमारी मैथली भाषा बहुत विकसित  है। इसके बावजूद इस भाषा के साहित्य के प्रकाशन के लिए कोई प्रकाशक नहीं मिलते हैं। ऐसी ही स्थिति भोजपुरी की भी है। अगर आप इन भाषाओं में कुछ लिख रहे हैं तो आपको अपनी किताब खुद ही प्रकाशित करनी पड़ती है। उसके बाद वितरण की समस्या। किताब प्रकाशित होने के बाद भी उसका वितरण नहीं हो पाता। दरभंगा तक में एक भी मैथिली भाषा के साहित्य की दुकान नहीं है। इन सभी परिस्थितयों में एक स्त्री के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में लिखना और भी मुश्किल हो जाता है।मुझे भी शौक था कि मैं भी प्रतिमा राय बन जाऊं। जैसे वह उड़ीया में लिखती हैं मैं भी सिर्फ मैथिली में ही लिखूं । मगर उड़िया या बांग्ला भाषा के साहित्य को जितनी तवज्जों मिलती है, हमारी भाषाओं की रचनाओं को नहीं मिल पाती है। उन भाषाओं की किताबों के अनुवाद भी तुरंत हो जाते हैं मगर हमारे यहां प्रकाशक तक नहीं मिलते। मेरे दिल के करीब मैथिली है। लेकिन उसकी सीमाओं के कारण मुझे हिन्दी में लिखना पड़ता है।
युवाओं को हिंदी या क्षेत्रीय भाषा की रचनाओं से जोड़ने की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए ?
यह एक संकट का विषय है। मैं अपने ही घर में अपने नाती पोतो को बोलती हूं “अगर तुम लोग मैथिली में नहीं बोलोगे तो मेरे मैथिली में लिखाने का क्या मतलब।” आज की पीढ़ी का क्षेत्रीय भाषा से संबंध बिलकुल टूटता जा रहा है। इसके लिए जरूरी है कि मैिथली, भोजपुरी जैसी क्षेत्रीय अकादमी सामने आए। क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मेलन होना चाहिए। अगर हम प्रयास करे तो युवा इससे जुड़ सकते हैं। इस साल मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल की ही बात की जाए तो वहां बड़ी संख्या में युवाओं ने भागीदारी निभाई थी।हमें अपनी मातृभाषा से हमेशा जुड़ कर रहना चाहिए। मैं युवाओं को हमेशा यही कहूंगी “आप आकाश में जरूर जाइए, मगर जड़ मत छोडि़ए. ”

अभी कुछ किताबों के रिलीज़ से पहले उनके प्रोमो तैयार किये जा रहे हैं। लेखनी में इस तरह की मार्केटिंग से स्त्री लेखिकाओं को कितना खतरा हो सकता हैं ?
अगर ऐसा हो रहा है तो इसके लिए आज की स्त्रियों को तैयार होना चाहिए। हमारे समय की स्त्रियां तो यह सब जानती भी नहीं। मुझे भी इसकी जानकारी नहीं है। लेकिन अब स्त्रियों को प्रतियोगिता में भी आगे आना चाहिए। आज की युवा स्त्रियां आगे आ भी रही है।

.आपने अभी पटना में कथा -पाठ  का एक भव्य आयोजन करवाया था। जो काफी सराहनीय था। मगर उसको लेकर कुछ अलोचनाएं भी हुई थी कि आपने उसमें सिर्फ अपने करीबी लोगों को ही बुलाया था। इस मुद्दे पर आपका क्या कहना है ?
वहां एक नाटक के मंचन के लिए मैनें अपनी बेटी कणु प्रिया को बुलाया था। वह एक रंगकर्मी है। मैनें उसे एक अभिनेत्री के रूप में  बुलाया था। वह भी लोगों ने डिमांड पर। मेरी एक प्रसिद्व रचना है “दूबधान“। मेरी बेटी उसका बहुत अच्छा मंचन करती है। अभी तक इत्तेफाक से पटना में उसने इसका एक भी मंचन नहीं किया था। कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि आप इस समारोह में कणु प्रिया को “दूबधान“ के मंचन के लिए क्यों नहीं बुला रही है। लोगों की डिमांड पर मैनें उसे नाटक के मंचन के लिए बुलाया था। उस कार्यक्रम में कणु प्रिया ने “दूबधान“ और विभा रानी ने विख्यात कथाकार संजीव जी के नाटक नवरंगी नटनी की प्रस्तुति दी थी।मेरी एक बेटी दिल्ली में दूरदर्शन की प्रभारी है। वह भी वहां आई थी उस कार्यक्रम को कवर करने के लिए। अब अगर मेरी बेटियां इस काबिल हैं तो वे आई। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कह रहा है। जिन लोगों का आरोप हैं कि मैनें कुछ खास लोगों को ही बुलाया था तो उन्हें समझना चाहिए कि वहां सारे लोग मेरे अपने नहीं थे। जहां तक बात रही सीमित लोगों को आमंत्रित करने की तो वह एक सरकारी कार्यक्रम था। सरकार की तरफ से सिर्फ 27 लोगों की ही संख्या निर्धारित की गई थी। जिसमें 20 लेखक और 7 समीक्षक थे। हमलोग 27 से 28 नहीं कर सकते थे। हांलाकि मैं चाह रही थी लोगों को 25 हजार की जगह 15-15 हजार ही देकर लोगों की संख्या बढ़ा दी जाए। मगर इसे माना नहीं गया। वैसे मुझे लगता है, अगर इस बात को मान भी लिया जाता और लोगों की संख्या बढ़ाकर 30 भी कर दी जाती तब भी  31वां इंसान नाराज ही रहता। आपको बता दूं कि कुछ लोगों ने इस बात की भी हवा फैलाई कि नाटक के मंचन के लिए मेरी बेटी को एक लाख रूपये दिए गए है। अब इसपर मैं क्या बोलूंगी।