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एफ जी एम / सी यानि योनि पर पहरा

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

नाइजीरिया ने प्रतिबंध क़ानून पारित किया 


पिछले 29 मई को नाईजीरिया ने क़ानून बना कर अपने यहाँ  महिलाओं के  होने वाले  खतना ( एफ जी एम / सी – फीमेल जेनिटल म्युटीलेशन / कटिंग  )  पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया . इस अमानवीय प्रथा को हमारे ही विश्व के एक भाग की महिलायें झेल रही थीं. यह एक बड़ी पहल है. हममें से बहुत कम को पता है कि ऐसी कुप्रथा भारत में भी कहीं न कहीं मौजूद रही है .  इस क़ानून के लागू होने के परिप्रेक्ष्य में नीलिमा चौहान का लेख 


सनी लियोन जैसे पॉर्न  स्टार के स्टाडम को मनाते इसी देश में वे स्त्रियां भी रहती हैं जिनकी योनि के बाहरी वजूद को काटकर देह से अलग कर देने जैसे अमानवीय  कृत्य के प्रति एक सामाजिक अनभिज्ञता और असंवेदना दिखाई देती है ।  हमारे समाज में स्त्री की यौनिकता के सवाल समाज के लिए बहुत असुविधाजनक हैं ।  जिस समाज में स्त्री की यौनिकता का अर्थ  केवल पुरुषकेन्द्रित माना जाता है  उस समाज के पास  स्त्री की यौन शुचिता और  यौन नियंत्रण को बनाए रखने के कई तरीके हैं  । इन्हीं में से एक तरीका FGM / C  भी है यानि स्त्री की योनि के बाहर उभरा हुआ अंग  देह से अलग कर दिया जाना ।  स्त्री का सेक्सुअल आनंद दुनिया को कितना डराता है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है इस समय दुनिया के 29 देशों में करीबन 130 मिलियन बच्चियां / औरतें FGM / C की शिकार  हैं । इन ताज़ा आंकड़ों में दुनिया के कुछ विकसित देशों का भी नाम शामिल है । हाल ही में एक पीड़ित भारतीय महिला द्वारा  एक विदेशी स्वयंसेवी संस्था के नाम लिखे गए खत से इस बात का खुलासा पूरे विश्व को हुआ कि भारत में भी एक वर्ग के स्त्री सदस्यों के यौनांगों को आंशिक या पूर्ण रूप से काट दिए जाने की  पुरानी प्रथा आज भी जारी है ।  हैरानी है कि धर्म संस्कृति या सामाजिक अभ्यासों के नाम पर होने वाले इस जधन्य आपराधिक कृत्य को स्त्री के मानवाधिकार के हनन के रूप में देखे जाने लायक संज्ञान अभी लिया नहीं गया है ।

एफ जी एम की भयावहता को व्यक्त करते वीडियो देखने के लिए क्लिक करें :

Female Genital Mutilation Video 

FGM के कई प्रकार प्रचलित हैं जिनमें भग शिश्न को आधा या पूरा काटने से लेकर उसको महीनता से सिल दिये जाने का प्रकार भी प्रचलित है । योनि पर तालाबंदी  से स्त्री को गुलाम बनाने की जघन्यता के अलावा क्लीटोरिअस लगभग पूरी तरह सिल कर योनि द्वार को बंद कर दिया जाता है ।  इस सिलाई को संभोग के अवसर पर खोले जाने के अलावा यौन प्रक्रिया और प्रसव की जरूरतों के मुताबिक अनेक बार सिला और खोला जाता है । इन प्रक्रियाओं  की शिकार होने वाली स्त्री अनेक यौन रोगों और असहनीय पीड़ा से ही नहीं गुजरती वरन मानसिक त्रासदी के साये के तले अपना पूरा जीवन बिताने के लिए विवश होती है । स्त्री के कौमार्य का संरक्षण तथा पुरुष केन्द्रित यौनानंद को सुनिश्चित करने वाली इस प्रक्रिया से विश्व की असंख्य स्त्रियां सदियों से चुपचाप गुजरती आ रही हैं  ।

स्त्री को यौन उत्तेजना और स्खलन  के आनंद से वंचित रखने की यह साजिश  इतनी अमानवीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठनों , जैसे यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन आदि ने इस प्रचलन को समाप्त करने के लिए विविध प्रकार के कदम उठाए हैं ।  दिसम्बर 12 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक आम सभा कर एक प्रस्ताव पारित किया था,  जिसके तहत विश्व भर में इस अमानवीय प्रक्रिया को समूल खत्म करने की दिशा में पहल की गई थी । कुछ  देशों में नए कानून बनाकर और कुछ देशों ने पुराने कानूनों की नई व्याख्या में इसपर प्रतिबंध को घोषित कर दिया है । नाइजीरिया में 29 मई को ऎतिहासिक कदम उठाते हुए FGM को कानूनी रूप से प्रतिबंधित कर दिया है । परंतु फिर भी ताज़ा हालात यह हैं कि विश्व के कई अन्य देशों में इस प्रक्रिया के जरिए असंख्य स्त्रियों को उनके मानवाधिकार से वंचित किया जा रहा है । भारतीय समाज में भी  एक ओपन सीक्रेट के रूप में इस अमानवीय कृत्य की मौजूदगी है  जिसकी चर्चा या विरोध करने योग्य जागरूकता का अभाव है ।

इसी दुनिया के कुछ हिस्सों में  स्त्री के सी स्पॉट व जी स्पॉट के यौनानंद की प्रक्रिया में महत्त्व  के प्रति जागरूकता का माहौल दिखाई देता है । जिस दुनिया में स्त्री के हस्तमैथुन करने को पुरुष के हस्तमैथुन के समान ही सामाजिक मान्यता दिए जाने योग्य जागरूकता बन रही हो ; उसी दुनिया में स्त्रियों की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा  अपने यौनांग़ों को अपनी देह से अलग किए जाने की त्रासदी का शिकार है । स्वीडन में स्त्री के क्लिटोरिअस के यौनानंद की प्रक्रिया में महत्त्व को  स्थापित करते हुए “क्लिटरा” जैसी शब्दाभिव्यक्तियां बनाई गई हैं वहीं दूसरी ओर यूनीसेफ के द्वारा जारी किए आंकड़े  ‘ यौनानंद की उत्पत्ति की स्थली : क्लीटोरिअस ‘ को स्त्री की देह से अलग करने वाले इस नृशंस कृत्य  की मौजूदगी का अहसास करा रहे हैं ।
इस विषय पर जयश्री राय के प्रकाश्य उपन्यास पढ़ें , क्लिक करें :  हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश 
स्त्री  के बाहरी यौनांग यानि भग्नासा को स्त्री देह के एक गैरजरूरी , मेस्क्यूलिन और बदसूरत अंग के रूप में देखने की बीमार मानसिकता  का असल यह है कि पितृसत्ता को इस अंग से सीधा खतरा है । इस अंग के माध्यम से महसूस किया गया यौनानंद स्त्री को उन्मुक्त यौनाचरण के लिए प्रेरित कर सकता है जिससे समाज के स्थायित्व को एक बड़ा खतरा  होता  है  । नैतिकता और यौनाचरण को बनाए रखने में ही सामाजिक संरचनाओं का स्थायित्व व उपलब्धि  है । यह स्त्री की देह के प्रति उपनिवेशवादी नजरिया है जिसका सीधा मंतव्य यह भी है स्त्री केवल प्रजनन के लिए है अत: उसका गर्भाशय तो वांछित है  किंतु  वह यौनानंद प्राप्त करने की हकदार नहीं है इसलिए उसके बाह्य यौनानंग अवांछित हैं । इस तरह से स्त्री की समस्त देह पुरुष के आनंद के लिए और सम्पत्ति के  उत्तराधिकारी को जन्म देकर पितृसत्ता को पुखता करने के लिए काम आती है ।  उसकी देह का केवल वही हिस्सा पितृसत्ता को अखरता है जिससे पितृसत्ता को कोई लाभ नहीं वरन हानि ही हानि है । स्त्री के यौनिक आनंद को गैरजरूरी और असंभव बनाने के इरादे भर से संवेदन तंत्रियों से भरे उस अंग को देह से विलग करने के पीछे दंभी पितृसत्ता को बनाए रखने की सोची समझी पुरानी साजिश है । इस साजिश को तरह तरह के आवरणों में सजाकर स्त्री को इस प्रक्रिया से गुजरने के लिए विवश किया जाता है ।

स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता का एक बहुत जरूरी अर्थ स्त्री की दैहिक व यौनिक आजादी से है । दरअसल हमारे समाज में स्त्री स्वातंत्रय और स्त्री की सेक्सुएलिटी को एकदम दो अलग बातें मान लिया गया है ! पुरुष की सेक्सुएलिटी हमारे यहां हमेशा से मान्य अवधारणा रही है ! चूंकि पुरुष सत्तात्मक समाज है इसलिए स्त्री की सेक्सुएलिटी को सिरे से खारिज करने का भी अधिकार पुरुषों पास है और और अगर उसे पुरुष शासित समाज मान्यता देता भी है तो उसको अपने तरीके से अपने ही लिए एप्रोप्रिएट कर लेता है ! जिस दैहिक पवित्रता के कोकून में स्त्री को बांधा गया है वह पुरुष शासित समाज की ही तो साजिश है ! यह पूरी साजिश एक ओर पुरुष को खुली यौनिक आजादी देती है तो दूसरी ओर स्त्री को मर्यादा और नैतिकता के बंधनों में बांधकर हमारे समाज के ढांचे का संतुलन कायम रखती है ! स्त्री दोहरे अन्याय का शिकार है- पहला अन्याय प्राकृतिक है तो दूसरा मानव निर्मित ! ! कोई भी सामाजिक संरचना उसके फेवर में नहीं है क्योंकि सभी संरचनाओं पर पुरुष काबिज है !  दरअसल  स्त्री के अस्तित्व की लड़ाई तो अभी बहुत बेसिक और मानवीय हकों के लिए है  । सेक्सुअल आइसेंटिटी और उसको एक्स्प्रेस करने की लड़ाई तो उसकी कल्पना तक में भी नहीं आई है ! अपनी देह और उसकी आजादी की लड़ाई के जोखिम उठाने के लिए पहले इसकी जरूरत और इसकी रियलाइजेशन तो आए ! हमारा स्त्री-समाज तो इस नजर से अभी बहुत पुरातन है ! स्त्री के सेक्सुअल सेल्फ की पाश्चात्य अवधारणा अभी तो आंदोलनों के जरिए वहां भी निर्मिति के दौर में ही है, हमारा देश तो अभी अक्षत योनि को कुंवारी देवी बनाकर पूजने में लगा है ! एसे में शेफाली जरीवाला अपनी कमर में पोर्न पत्रिका खोंसे उन्मुक्त यौन व्यवहार की उद्दाम इच्छा का संकेत देती ब्वाय प्रेंड के साथ डेटिंग करती दिखती है तो इससे हमारे पुरुष समाज का आनंद दुगना होता है उसे स्त्री की यौन अधिकारों और यौन अस्मिता की मांग के रूप में थोड़े ही देखा जाता है । लेकिन पर्दे की काल्पनिक दुनिया के बाहर का सामाजिक यथार्थ में स्त्री के लिए न केवल आनंद के सारे द्वार बंद हैं बल्कि स्त्री की देह के सामाजिक नियंत्रण और शोषण के तमाम विकृतियां बदस्तूर जारी हैं ।

स्त्री समाज की आबादी के एक बड़े हिस्से को यौन दासी के रूप में बदल देने वाली अन्य परम्पराओं के साथ साथ स्त्री  यौनांगों के खतना जैसी  अतिचारी अमानवीय प्रक्रिया को जल्द से जल्द समाप्त किए जाने की आवश्यकता है । इस तरह की कबीलाई मानसिकता की वाहक प्रथाओं की जड़ में स्त्री के प्रति उपेक्षा गैरबराबरी  और गैरइंसानी रवैये को मिलती रहने वाली सामाजिक स्वीकृति है । स्त्री की यौनिकता के सवालों से बचकर भागते समाज को शीध्र ही स्त्री के मानवाधिकारों में उसकी दैहिक – यौनिक उपस्थिति को ससम्मान तरजीह देने का उपक्रम शुरू कर देना चाहिए । उम्मीद है कि नाइजीरिया  के द्वारा लिए गए इस ताज़ा वैधानिक फैसले के प्रकाश में दुनिया के दूसरे देशों में भी स्त्री के मौलिक अधिकारों के प्रति चेतना आएगी ।

भावना की गजलें

भावना कुमारी

युवा कवयित्री भावना कुमारी की एक गजल की किताब और एक कविता -पुस्तक प्रकाशित है .   संपर्क : bhavna.201120@gmail.com


चुप -चुप  सी है  आज चहकने वाली वह
चिड़ियों -सी  हर वक़्त फुदकने वाली  वह
दिल  में  रखकर  दर्द  का बहता इक दरिया
कहती है कुछ बात सिसकने वाली  वह
पानी  को छूने अब क्यों डरती है
शोलों को हाथों से लपकने वाली वह
आँखों को नीचे करके ही चलती है
भीतर  से हर वक़्त दहकने वाली  वह
हथकड़ियों  के साँचों में क्यों ढल बैठी
चूड़ी जैसी रोज़ खनकने  वाली वह


युद्धरत इस दौड़ में वह सारथी -सी  हो  गयी
छोड़ दी जब मन का सुनना कीमती सी हो गयी
दर्द कुछ ऐसे बढ़ा है बढ़ गयी बेचैनियाँ
तब ग़ज़ल पूरी हुई  औ बंदगी -सी  हो गयी
जबसे नारी -अस्मिता के पक्ष में बातें हुई
औरत अपने घर की भी अब आदमी -सी हो गयी
हो गया अहसास जैसे उसको मेरे प्यार का
साँझ भी ढलने से पहले सुरमयी -सी  हो गयी
इस तरह से एक मूरत मन में आ रहने लगी
झिलमिलाये दीप मन में आरती -सी  हो गयी




नदी में  कपड़े सुखा रही हूँ
हवा को कितना चिढ़ा रही  हूँ
किसी के इज्ज़त पे आ पड़ी है
तो सच  पे पर्दा गिरा रही हूँ
जो पारदर्शी हुआ है जीवन
तो खुद को दर्पण बना रही  हूँ
लिखा है खुशबू पे नाम किसका

बहस का मुद्दा बना रही  हूँ
सफ़र में अक्सर मैं ग़मज़दा -सी
ग़मो की फ़ितरत बता रही  हूँ


माँ को देखा तो इबादत हो  गई
इस तरह अपनी हिफाज़त हो  गई
शांत था चौपाल का मंज़र मगर
जाने कैसे ये बग़ावत हो गयी
बुत बनी बैठी है अपनी दामिनी
आबरू पर भी सियासत हो गयी
चैन मिलता ही नहीं क्योँ रात भर
दिल पे अब किसकी हुकूमत हो गयी
ज़िंदगी की धूप में चलते हुए
धूप को सहने की आदत हो गयी


खिज़ा के साये से डर गए हैं
तभी ये  पत्ते बिखर गये हैं
किसी ने दिल से पुकारा है यूँ
वो चलते चलते  ठहर गए हैं
संजोये बैठे हैं जिन पलों को
वो लम्हे कब के गुजर गए हैं
असर किसी का नहीं है अब तो
वो करके ऐसा असर गए हैं
उदास आँखों में उतरी पारियां
तो इनके मोती संवर गए हैं

हेमलता यादव की कवितायें

हेमलता यादव

युवा कवयित्री इंदिरा गांधी ओपन विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :hemlatayadav2005@gmail.com

हे अहल्या

हे अहल्या
आस्था के मनके बुनती समाधिस्थ
मत करों इंतजार राम का
पैर के स्पर्श मात्र से मुक्त
व्यर्थ भ्रम है नाम का,
संदेह से बुद्धि  भ्रष्ट साधु की हुई
सदियों तक शिला पर तुम बन गई
बिन अपराध, अपराधिन सी तुम
जड़वत करती इंतजार राम का
पैर के स्पर्श मात्र से मुक्त
व्यर्थ भ्रम है नाम का,
हे देवी
सत्य कहो क्या राम आये
क्या स्पर्श से तुम मुक्त हुई
मुझे तो पाषाण सी लाखों अहल्याएं
उम्मीद के कंकड़ किरकिराती
अथाह बंधनों की
अंसख्य गांठे गिनती
नजर आती है आज भी
करती इंतजार राम का
पैर के स्पर्श मात्र से मुक्त
व्यर्थ भ्रम है नाम का.

खूंटा 

बांधने के लिए
प्रत्येक आंगन में
एक खूंटा
गाड़ दिया,
खुली न रहे

एक खूंटे  से दूसरा  खूंटा
ढूंढ  लिया
पिता कि बाड़े
से पति के बाड़े में
झोंक दिया

 सूरजमुखी

सूरजमुखी ने
रोंप दी सलाखें
कमरे के भीतर
घर की जेल में
बना लिया कंक्रीट दीवारों का
अपना सुरक्षित कारावास
जहां
छोटे झरोखें से झांकती
थोड़ी सी धुप  पी
खिलती रहती
सूरजमुखी
बिना भुले रोज करती
नींव पुख्ता
कि कहीं आ न जाए
बदहवास माली
जो तोड़ लाया था
खुले आकाश के नीचे
हवा से बतियाती
सूरजमुखी
घर महकाने को
मन बहलाने को
सुंदर कोंपलों की
क्यारियां बनाने को
खुले आकाश का संताप
सह मुरझाई नहीं
फिर से जमी
फिर से खिली
सूरजमुखी
रंग बिखेरती रही चाहे
धीरे धीरे
उसकी कोमल पत्तियों सी आस
वो मसलता रहा
रफतः रफतः
सिलसिला यही चलता रहा
ओह !
सारी पत्तियां कहां झरीं ?
सूरजमुखी
सोचती रही
पिंजर सा
घेरा पहचानती रही
कैसा था आस्तित्व ?
याद करने की
चेष्टा करती रही
कहां गई पीली आभा
की खिलखिलाती लहक
कहां गए पत्तियों पर लुढ़कते
ठहरते, चमकते ओसकण
कहां गया अपनी चाल
से बावरा बनाता सूर्य अटल
सूरजमुखी सब
भूल गई
सूरजमुखी अब
सूरजमुखी न रही
किंतु
कुछ तो बचा था
चिथड़ो सा
क्या?
पता नहीं
माली वही था
अभी भी नोचने को आतुर
पर सूरजमुखी
अब सूरजमुखी
न थी
अपनी टहनियों को भींच बना ली सलाखें
कैद में हो गई आजाद
निःशेष मर्म समेट
जी भर लहकती है कि
माली उसे छू  नहीं सकता
स्वनिर्मित बाड़े में फैलती है कि
माली उसे रौंद नहीं सकता
स्वयं  से बातें कर दोहरे
होने का विश्वास दिलाती
सूरजमुखी
अपने मौन की
बातुनी सुगंध
छिटका रही है
बेबस माली

चाह कर भी हाथ
नहीं बढ़ा सकता
वह अभिशप्त एक
मटमैले स्वपन की
तरह भोर  तक
जा अटकेगा
उसी झरोखे पर
जहाँ से थोड़ी सी
धूप छनती है
सूरजमुखी पर।

 गर्भवती

बदल गई है
जब से तुम आए हो
निखर गई है
जब से तुम आए हो
रसोई में खड़ी मुस्कराती है
मन ही मन बातुनी बतियाती है
दर्पण देख अल्हड़ सी शरमाती है
क्षणिक हलचल पर सिहर जाती है
छुपाती है तुम्हें नजरों से
ढकती है अपना शरीर
कर नहीं सकती मस्तक
पर काजल टीका तो
ईश्वर से दबी दुआयें मनाती है
कभी आवेग में बह तुम दोनो के
बीच आने की कोशिश करता हूँ तो
लड़ती है मुझसे दूर  जाती है
मेरी जद्दोजहद  पर
आंसू भी बहाती है
मुझसे उपर
उठ रही है तुम्हारी माँ
सचमुच
कतरा कतरा माँ बन रही है
तुम्हारी माँ।

हिंदी उपन्यास और थर्ड जेंडर

भावना मासीवाल

भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :bhawnasakura@gmail.com;

हमारा पूरा समाज दो स्तम्भों पर खड़ा है पुरुष और स्त्री । आदिम सभ्यता से ही दोनों का काम आपसी सहयोग से बच्चे पैदा करना और मानवजाति को आगे बढ़ाना रहा है । लेकिन हमारे समाज में इन दो लिंगों के अलावा भी एक अन्य प्रजाति का अस्तित्व मौजूद है । ‘जो न पुरुष है न स्त्री । वह न संबंध बना सकता है और न ही गर्भ धारण कर सकता है । समाज में इन्हें हिजड़ा, खोजा, किन्नर, नपुंसक आदि कई उपनामों से संबोधित किया जाता है’। इनका असली नाम, हिजड़ा यौनिक पहचान के साथ ही समाज द्वारा मिटा दिया जाता है । इस समुदाय के रिवाजों में नाम परिवर्तन इसी यौनिक पहचान का एक हिस्सा है । संविधान में इन्हें इंटरसेक्स, ट्रांससेक्सुअल और ट्रांसजेंडर के रूप में पहचाना गया और इनकी पहचान को थर्ड जेंडर में ट्रांसजेंडर श्रेणी में रखा गया ।

थर्ड जेंडर जेंडर के भीतर एक पहचान है । यह पहचान ऐसे लोगों से जुड़ी है जो न स्त्री है और न पुरुष। यह समाज द्वारा निर्धारित जैविक सेक्स के सामाजिक सृजन को नहीं मानता है । यह सेक्स के भीतर थर्ड सेक्स को नहीं मानता है । यह उसे समाज द्वारा निर्मित मानता है । थर्ड जेंडर थर्ड सेक्स का समानार्थी नहीं है,  बल्कि इसका मानना है कि जेंडर का संदर्भ हमारे मस्तिष्क से है, यदि कोई बच्चा लड़की पैदा होती है और लड़को की तरह व्यवहार करती है तो यह उसका यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) कहा जाएगा । थर्ड जेंडर एक तरह से न्यूट्रल है जो अन्य जेंडर के भीतर नहीं है । इसमें सभी यौनिकताओं का समावेश संभव है । यौनिकता का आशय यहाँ यौन क्रिया और यौन संबन्धों तक सीमित नहीं है बल्कि यौनिकता से अभिप्राय प्रवृतियों और व्यवहारों से है । ‘यौनिकता हमारी भावनात्मक यानी हम कौन व क्या हैं व समाज से हमारे रिश्ते से होती है । यह न सिर्फ यौनिक पहचान से जुड़ी है बल्कि इसमें यौनिक मानदंड, व्यवहार, बर्ताव, चाहत, अनुभव, यौनिक ज्ञान और कल्पना भी शामिल होती है,  जो विषमलिंगी व समलैंगिक संबंधों के अंतर्गत गढ़ी जाती है’। यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति यौनिकता को एक ही तरह से अनुभव और अभिव्यक्त करे । आमतौर पर जेंडर से यह निर्धारित होता है कि हम अपनी यौनिकता को किस तरह व्यक्त करते हैं । और थर्ड जेंडर के न्यूट्रल स्वभाव के कारण हिजड़ा समुदाय जो थर्ड सेक्स या उभयलिंगी के रूप में जाना जाता है, स्वयं को थर्ड जेंडर के भीतर ट्रांसजेंडर कहलवाना पसंद करता है ।

उपन्यास साहित्य में हिजड़ा समुदाय को केन्द्रित करते हुए चार उपन्यास यमदीप, तीसरी ताली, किन्नर कथा और गुलाम मंडी को विश्लेषण का आधार बनाया गया है । यह आधार इनकी कथावस्तु को ध्यान में रखकर बनाया गया । यह चारों उपन्यास हिजड़ा समुदाय पर केन्द्रित हैं और उनकी जैविक संरचना से लेकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक संरचना के भिन्न-भिन्न पहलुओं को सामने लाने का प्रयास करते हैं । हिजड़ा समुदाय जिसके बारे में पौराणिक आख्यानों में रामायण, महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र, कामसूत्रम् उसके बाद मुग़ल इतिहास में बहुत सी घटनाएँ मौजूद हैं । आज जब हम इस समाज को देखते हैं तो पहला सवाल उठता है कि ये ऐसे क्यों हैं ? क्या ईश्वर ने इन्हें ऐसा बनाया है ? या यह भी हमारे समाज की ही जेंडर आधारित निर्मिति का एक रूप हैं । जिस तरह समाज में स्त्री और पुरुष दो संरचनाएं मौजूद हैं और उनके अनुरूप उनका व्यवहार, क्रियाएं और प्रतिक्रियाएं हैं । ठीक उसी तरह समाज में इनके प्रति भी पूर्व धारणाएं मौजूद हैं और यह सभी धारणाएं सृजित हैं । क्योंकि इतिहास और पौराणिक आख्यानों में कहीं भी इन्हें अनुपयोगी नहीं माना गया है, न ही पुनरउत्पादन की प्रक्रिया में इनकी निष्क्रियता को इनके मनुष्य होने पर ही चिंहित किया गया है,  जैसा कि समाज में होता है । सामाजिक धारणाओं और पौराणिक कथाओं से भिन्न साहित्य में इनकी एक अलग छवि गढ़ी गई है । इस छवि की पड़ताल अनेक संदर्भों के साथ करने की जरुरत है । साथ ही साहित्य की अंतर्दृष्टि  थर्ड जेंडर को कैसे देखती है यह समझना व देखना भी आवश्यक होगा ।

इन सभी उपन्यासों की कथावस्तु इस समुदाय के सामाजिक अस्तित्व को स्थापित करती हैं । कहीं पौराणिक आख्यानों में रामायण के अयोध्या कांड में राम द्वारा स्त्री-पुरुष दोनों को लौट जाना कहने का संदेश- जथा जोगु करि विनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा ।। नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपा निधि फेरे ।। हिजड़ों के लिए यहां कुछ नहीं कहा जाता । चौदह वर्ष बाद राम का लौटना और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान देना ‘जब कलयुग आएगा, तब तुम लोग राज करोगे’ । रामायण जैसा प्रसिद्ध आख्यान उनके अस्तित्व की प्रमाणिकता को सुनिश्चित करता है । इसी तरह पौराणिक आख्यान महाभारत की कथा में शिखंडी और अर्जुन का बृहन्नला रूप आदर्श माना गया है । यमदीप उपन्यास में नीरजा माधव मानवी और आनंद कुमार के माध्यम से इनके इतिहास की गहराई में जाती हैं ‘अंग्रेजी में इनके लिए ‘हरमोफ्रोडाइट्स’ स्त्री-पुरुष लक्षणों वाला और ग्रीक में इन्हीं लक्षणों से युक्त हरमोफ्रोडाइट्स’ की मूर्ति को स्त्री-पुरुष प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक बताती हैं । मिस्र, बेबीलोन और मोहनजोदड़ो की सभ्यता में इनका प्रमाण मिलता है । संस्कृत नाटकों में इनका जिक्र है कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि राजा को हिजड़ों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए  । इसी प्रकार गुलाम मंडी में सामाजिक हैसियत के अलावा उनकी राजनैतिक भूमिका को बताया गया। ‘राजाओं के राज में हिजड़े बहादुर योद्धाओं के दल में शामिल किए जाते थे । स्त्री और पुरुष कुछ भी बन सकने की उनकी क्षमता उन्हें राजकीय जासूसों के पद भी दिलवाती थी । दरबार हो या मंदिर, वे अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन करके वाह-वाही भी लूट सकते थे । इनाम-इकराम भी कमाते थे । बादशाहों के हरम में सुरक्षाकर्मी होते थे, औरतों के साथ सेक्स न करना उनकी कमी नहीं, खूबी थी । हिजड़ों का तिरस्कार तो अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ’ । चारों उपन्यास की कथावस्तु हिजड़ा समुदाय के मनुष्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है और समाज में उनकी निर्धारित भूमिकाओं की आलोचना करती है । जहाँ माना गया कि यह परिवार, समाज और राजनीति में उपयोगी भूमिका नहीं निभा सकता है ।

यमदीप उपन्यास की लेखिका इस समाज में इनकी उपयोगी भूमिका की तरफ ध्यान केन्द्रित करती हैं ‘जैसे मुंबई में एक कंपनी में बकाया धन की वसूली के लिए इनकी नियुक्ति हुई और परिणाम यह हुआ है कि जिस ऋण की वसूली वर्षों से नहीं हो पा रही थी, उसे चुटकी बजाकर ये लोग वसूल कर लेते हैं’ । आर्थिक स्तर पर इनके लिए रोजगार उपलब्ध कराने की बात यहाँ लेखिका करती हैं ताकि यह समाज अपनी पारम्परिक भूमिका से बाहर आ सके और स्वतंत्र रूप से जीवनयापन कर सके । इसी तरह नाजबीबी का कहना अगर सरकार हमें भी हथियार दे दे । मैं तो लडूंगी । लड़ते-लड़ते हिंदुस्तान के पीछे अपनी जान दे दूंगी’ । उपन्यास के अंत में नाजबीबी का यही संकल्प चुनाव में उनके खड़े होने की भूमिका तय करता है और वह कहती हैं , जरूरत पड़ी तो भ्रष्ट लोगों के खिलाफ हथियार भी उठाऊँगी । हर गंदगी को जड़ से साफ कर दूंगी । दुनिया में शांति रहे, और क्या चाहिए किसी को  ? नाजबीबी का यह कथन शबनम मौसी, कमला जान, आशा देवी, कमला किन्नर और रायगढ़ की मेयर मधु किन्नर  की याद दिलाता है जिसका कहना था कि वह ताली नहीं बजाना चाहती वह कुछ करना चाहती हैं । इसी तरह ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी  ट्रांसजेंडर समुदाय के रोजगार के विकल्प में महिलाओं की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उन्हें देने और उससे संबंधित ट्रेनिंग की बात करती हैं। राजनीति यहाँ एक विकल्प के तौर पर इस समुदाय में उभर कर आती है । क्योंकि सत्ता,  सत्ता की बात को सुनती और समझती है । इसका सबसे बड़ा उदाहरण वह सभी लोग रहे जिन्होंने लंबे विरोध के बाद अपने लिए राजनीति में अलग पहचान बनाई और अपने समुदाय के लिए काम किया ।

उत्पादन और उपयोगिता की राजनीति का प्रश्न उपन्यासों का केंद्रीय प्रश्न है , जहाँ जैविक और यौनिक भिन्नता समाज में इनके अस्तित्व को अस्वीकार्य बना देती है । तीसरी ताली उपन्यास में प्रदीप सौरभ लिखते हैं घर में ऐसे बच्चे का पैदा होना उसकी पैदाइश के साथ ही उसकी उपयोगिता को खत्म कर देता है । ‘घर में बेटा जरूर हुआ था, लेकिन कुछ दिनों के अंदर ही परिवार को पता चल गया कि वह किसी काम का नहीं है । बढ़ने के साथ उसका पुरुषांग विकसित नहीं हुआ ।  उपयोगिता का यह प्रश्न सामाजिक व राजनैतिक उपयोगिता को दर्शाता है । जहाँ जैविक रूप से शरीर के किसी अंग का अविकसित होना विशेष तौर पर जननागों, उसके पूरे व्यक्तित्व को ही प्रश्न के घेरे में ला देता है । इसी कारण किन्नर कथा उपन्यास में राजशाही में पली बड़ी सोना को चंदा के रूप में इस समुदाय में पाला जाता है । क्योंकि ऐसे बच्चों को समाज व परिवार के डर से माँ-बाप छोड़ देते हैं । समाज के साथ-साथ राज्य भी इनके प्रति अपने उत्तरदायित्व को नहीं स्वीकारता । महताब गुरू कहते हैं ‘कोई कुछ नहीं करता है । समाज भी नहीं, सरकार तो अपना वोट मांगने के लिए उन्हीं के सामने चारा फैकेगी न, जो रोज मुर्गियों की तरह अंडे देकर आबादी बढ़ाएगी । हम कौन से अंडे देने वाले हैं । अल्लाह मिया ने तो हमें वह नेमत दी ही नहीं’ । हिजड़ा समुदाय का यह जैविक यथार्थ है । इसी आधार पर समाज ने मुख्य धारा से इन्हें बाहर किया । यहाँ व्यक्ति की उपयोगिता को समाज उसके एक अविकसित अंग से ही क्यों सुनिश्चित करना चाहता है विचारणीय प्रश्न  है ?

यह समाज केवल जैविक असमानता को ही नहीं झेलता है वरन सामाजिक जेंडर आधारित असमानता का भी सामना करता है । समाज में स्त्री-पुरुष निर्धारित खांचों से बाहर इनकी यौनिक पहचान और अस्तित्व बार-बार इस असमानता को झेलने के लिए मजबूर होती है । यमदीप उपन्यास की नंदरानी अपने स्कूली शिक्षा के दौरान आए शारीरिक बदलाव को महसूस करने लगी थी । ‘क्या नंदरानी, तुम कैसे चलती हो ? हम लोगों की तरह चलो ।.. कहीं हिजड़े देख लेंगे तो तुम्हें भी वही समझ बैठेगे’। यहाँ समझ का मसला सामाजिक संरचना में इनकी स्थिति से है जिसे समाज द्वारा अपमान जनक बनाया गया है ।हमारे समाज में जेंडर की सामाजीकरण की प्रक्रिया के तहत स्त्री और पुरुष व्यवहार व स्वभाव को ही समाज में स्वीकृति दी जाती है । ऐसे में इस समुदाय का व्यवहार समाज में स्वतः ही अव्यवाहारिक माना लिया जाता है । क्योंकि जेंडर निर्मिति में हमें इनके यौन व्यवहार की शिक्षा दी ही नहीं जाती बल्कि इनके यौन व्यवहार को क़ानूनी अपराध माना जाता है । ऐसे में इस प्रकार के बच्चों का प्राकृतिक यौन व्यवहार उन्हें स्वयं से नफरत और आत्महत्या को मजबूर करता है । तीसरी ताली उपन्यास की निकिता की माँ सामाजिक मजबूरी के कारण अपनी बेटी को हिजड़ा समुदाय को सौप देती है और निकिता परिवार से दूर अपनी इस नई परिस्थिति को समझने और खुद की पहचान व भविष्य के प्रति आशंकित महसूस करती है । ‘अपने को किसी से कम न समझने वाली निकिता के अंदर अपने आधे-अधूरे होने का हीन भाव घर करने लगा । उसके दिमाग की खिड़की अभी इतनी बड़ी नहीं थी कि वह ऐसे लोगों से प्रेरित हो पाती जो उसकी तरह ही थे ..उसे यह बात सबसे ज्यादा डराती कि थोड़े दिनों के बाद नीलम उसे चुनरी पहनाकर मुकम्मल हिजड़ा बना देगी’ । वह इस समाज में खुद के अस्तित्व का आंकलन नहीं कर पाती है और आत्महत्या कर लेती है । दूसरी ओर नंदरानी बार-बार महसूस करती है ‘कि उसके शरीर का विज्ञान ही नंदिनी दीदी के विवाह में बाधक बनता है। कभी-कभी अपने ही हाव-भाव या चाल पर कुढ़ कर रह जाती’। समाज कभी इनकी जैविक भिन्नता को तो कभी यौनिक भिन्नता को मुख्य धारा से अलग होने का कारण मानता है । सवाल उठता है कि आखिर मनुष्यता का तकाजा क्या इनके अस्तित्व और पहचान के लिए काफी नहीं है ?

परिवार के जो सदस्य इन्हें अपने पास रखना भी चाहते है । समाज उन्हें मजबूर कर देता है कि वह उस बच्चे को उसी समाज को सौप दे । तीसरी ताली उपन्यास में आनंदी आंटी की बेटी निकिता एक ऐसा ही उदाहरण है । उपन्यास की पात्र आनंदी आंटी बिना समाज की परवाह किये  अपनी बेटी को पढ़ाना चाहती है,  वह उसके लिए प्रयास करती है । मगर हर जगह निराशा हाथ लगती है,  फिर चाहे लडकियों का स्कूल हो या लड़कों का । दोनों जगह से एक ही जवाब मिला कि जेंडर स्पष्ट न होने के कारण हम दाखिला नहीं दे सकते हैं.. । यह स्कूल सामान्य बच्चों के लिए है, बीच वाले बच्चों को दाखिला देने से स्कूल का माहौल खराब हो जाता है’ । ऐसे में सवाल उठता है यदि परिवार बच्चे को पालना चाहता है तो क्यों समाज और राज्य उसमें रूकावट उत्पन्न करते हैं? यही सवाल यमदीप उपन्यास में नीरजा माधव नंदरानी अर्थात नाजबीबी के माध्यम से सामने लाती हैं । नंदरानी के माता-पिता भी नंदरानी को अपने पास रखना चाहते हैं । नंदरानी की मम्मी का कहना था कि वह उसे पढ़ा-लिखाकर अपने पैर पर खड़ा कराएगी । किसी के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा उसे । मगर फिर एक सवाल महताब गुरू उठाते हैं कि ‘माता जी किसी स्कूल में आज तक किसी हिजड़ा को पढ़ते-लिखते देखा है ? किसी कुर्सी पर हिजड़ा बैठा है ? पुलिस में मास्टरी में, कलेक्टरी में …किसी में भी ?…अरे इसकी दुनिया यही है, माताजी …कोई आगे नहीं आएगा कि हिजड़ों को पढाओ, लिखाओ नौकरी दो..जैसे कुछ जातियों के लिए सरकार कर रही है.. ’। महताब गुरु के माध्यम से लेखिका ने समाज में इनके प्रति अपनाएं गए सत्ता के सामाजिक चरित्र को उघारा है । बच्चे में जहाँ शारीरिक अक्षमता तो समाज स्वीकार कर लेता है जैसा महताब गुरु कहते हैं कि- लूली-लगड़ी होती यह, कानी-कोतर होती, तो भी आप इसे अपने साथ रख सकते थे । यही बात गुलाम मंडी उपन्यास में लेखिका अंगूरी के माध्यम से कहती हैं–लगड़े-लूले को तो कोई नहीं दुतकारता, अन्धे काने से तो कोई नफरत नहीं करता वैसे ही हमको खुदा ने बनाया,…. । महताब गुरू और अंगूरी दोनों ही समाज में हिजड़ों के प्रति उपेक्षा के भाव के कारणों को सामने लाते हैं । जहाँ शारीरिक विकलांगता से अधिक पुनरूत्पादन की राजनीति कारगर है । भले ही समाज में ऐसे बच्चों को शारीरिक व मासिक रूप से विकलांग व बीमार के रूप में संबोधित किया जाता हो ।

यह समुदाय केवल मुख्यधारा से बाहर ही नहीं किया गया बल्कि समाज में इनके प्रति डर और अफवाहों को भी लोगों में भरा गया । ताकि लोग इनके प्रति नकारात्मक रवैया अपनाए और यह समाज मुख्यधारा में आने का प्रयास न कर सके । साथ ही अलगाव की जिंदगी जीने को मजबूर बना रहे । इस बात का जिक्र यमदीप उपन्यास की पत्रकार मानवी करती है ‘ऐसा सुना जाता है कि आप लोग युवकों को बहला-फुसलाकर जबरन उनका ऑपरेशन करके हिजड़ा बना देते हैं’। महताब गुरु इन अफवाहों को नकारते हैं और कहते हैं ‘हमारी बस्ती में जल्दी कोई इंसान का पूत घुसता है ..कि किसी के आते ही हम उसे तुरंत आपरेशन कर देंगे पकड़कर ? डाक्टरी खोले बैठे हैं इसी कोठरिया में क्या ? यह देखो हमारा अंग, कोई काटा है कि अल्ला-रसूले वैसे भेजा है ? ’ मानवी का यह प्रश्न मुख्य धारा के समाज का प्रश्न था । यही कारण है कि समाज ने इन्हें इंसान की जगह शैतान समझा और उसी के अनुरूप निजी और सार्वजनिक जगहों में व्यवहार किया गया । सार्वजनिक जगहों पर लोग इनसे बात करना इनके साथ खड़े होने तक में अपमान महसूस करते हैं । समाज की मानवता इनकी यौनिक पहचान के सामने आते ही खत्म हो जाती है । जब वह जान जाते है कि वह व्यक्ति एक हिजड़ा है ।
यह समुदाय अस्पष्ट जेंडर और यौनिक पहचान के कारण अपने नागरिक अधिकारों से वंचित रहने को भी मजबूर किया जाता रहा है क्योंकि राज्य की सत्ता दो जेंडर भूमिकाओं पर कार्यरत है । तीसरे की भूमिका को वह स्वीकारता ही नहीं है । इसी कारण शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे बच्चों को एक ओर सामाजिक कारणों से अपमानित किया जाता है तो दूसरी ओर राज्य की कोई स्पष्ट नीति नहीं होने के कारण, परिवार द्वारा मजबूर होकर ट्रांसजेंडर समुदाय में शामिल कर दिया जाता है । यहाँ रोजगार की विकल्पहीनता इन्हें परंपरागत पेशा नाच-गाना, बधाई, नेक के लिए मजबूर करती है । इस समुदाय के अधिकांश लोगों के समक्ष जब भी यह समस्या आई उन्होंने यही पेशा अपनाया । क्योंकि समाज में उनके लिए यही पूर्व निर्धारित है और जब भी परम्परागत छवि से बाहर जाकर शिक्षा पाकर कुछ करना चाहा तो अपमानित होना पड़ा । गुलाम मंडी उपन्यास में अंगूरी कहती है ‘कोई भरती करता क्या पाठशाला में, पहले पूछते मेल कि फिमेल । अपनी वो शर्मिला है न, छोरा बन के भरती हुए थी, तो बहनजी ने एक दिन चड्डी उतरवा ली थी उसकी और जूते मारकर के स्कूल से निकालवा दिया था उसको । उमराव गुरु के कुनबे ने शरण दी उसको वरना भूखी मर जाती तो वो भी.. ’। आर्थिक स्थितियां यहाँ अधिक घातक है ।

हिजड़ा समाज में कुछ लोग ही जैविक रूप से इस समाज के हिस्सा होते है, अधिकांश अपनी यौनिक पहचान की अस्पष्टता के कारण इस समाज में शामिल हो जाते हैं । यौनिकता की अस्पष्टता से तात्पर्य स्त्री और पुरुष समाजीकृत संरचना में जेंडर आधारित व्यवहार को नहीं अपनाने से है । एक पुरुष का स्त्रियों की भांति नृत्य और संगीत में रूचि उसके व्यवहार को स्त्रैण बनाता है और समाज में वह बच्चा एक अलग श्रेणी में देखा जाने लगता है । गुलाम मंडी उपन्यास का राजा जो शारीरिक रूप से पूरी तरह पुरुष है मगर अपने स्वभाव में स्त्रियोचित गुणों से परिपूर्ण है । वह ऑपरेशन के जरिए अपना लिंग परिवर्तित करवाना चाहता है । समाज में उसकी यौनिकता को उसी रूप में नहीं स्वीकारा गया बल्कि उसके साथ मुख्यधारा द्वारा ही शोषण के उपरांत उसके लिंग को काट दिया जाता है और बाद में इस समुदाय में बेच दिया जाता है । रानी तो अपने स्त्रियोचित गुणों के कारण इस समाज में लाई गई मगर तीसरी ताली उपन्यास की रानी और ज्योति दोनों ही पूर्ण पुरुष थे । वह समाज की कुत्सित प्रथाओं, रिवाजों और आर्थिक कारणों से इस स्थिति में पहुँचते हैं ।

तीसरी ताली उपन्यास में ज्योति का प्रकरण पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार के एबीसीडी यानी आरा, छपरा के सफ़ेदपोशों के घृणित और कुत्सित शौकों से परिचित कराता है । लौंडों के रूप में जिसमें खुबसूरत किशोरों को पहले तो शौकिया तौर पर पनाह दी जाती है और बाद में निकाल बाहर कर दिया जाता है । ऐसे में यह किशोर आर्थिक बदहाली यौन शोषण और समाज द्वारा अपमान से बचने के लिए हिजड़ा समूह में प्रवेश करते हैं । हिजड़ा समुदाय का यह उसूल है कि वह किसी भी पूर्ण स्त्री और पुरुष को अपने समूह में शामिल नहीं कर सकते हैं । सोनम ज्योति को समझाते हुए कहती है ‘मैं तुम्हें हिजड़ा नहीं बना सकती । भगवान ने तुम्हें पूरा आदमी बनाया है । वैसे भी हम भगवान से डरते हैं । किसी सही आदमी को हिजड़ा बनाना हमारे समाज में कुफ्र है’ ।  ऐसे में ज्योति का आगे बढ़कर कर स्वयं को हिजड़ा बनाने का प्रस्ताव -“माना मैं मर्द हूँ, लेकिन ये समाज मुझसे मर्द का काम लेने के लिये राजी नहीं है । मुझे इस समाज ने मादा की तरह भोग की चीज में तब्दील कर दिया है । मैं मर्द रहूँ, औरत रहूँ या फ़िर हिजड़ा बन जाऊँ, इससे किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा । पेट की आग तो बड़ों-बड़ों को न जाने क्या से क्या बना देती है’. …बिना हिजड़े के भी तो हिजड़ा बना हुआ हूँ। जो अपने को मर्द कहते हैं, वे कौन से हिजड़ों से कम हैं ! गरीब का बेटा हूँ तो पूरे गाँव की भौजाई बन गया हूँ’ । ज्योति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति समाज के तथाकथित वर्ग बाबू श्यामसुन्दर सिंह जैसों की उपभोगी प्रवृति और शौकिया रिवाजों पर घृणा करने को मजबूर कर देती है । ज्योति का दिल्ली आकर नीलम के डेरे में हिजड़ा बनना इन्हीं परिस्थितियों और शौकिया रिवाजों का परिणाम था । एक मुकम्मल पुरुष ज्योति के हिजड़ा बनने की रस्म और प्रक्रिया हमारे अन्दर एक ओर वितृष्णा भरती है तो दूसरी ओर एक प्रश्न भी हमारे आत्ममंथन के लिए छोड़ देती है कि आखिर इस समुदाय का अस्तित्व हमारे समाज में क्या है ? इसी प्रकरण में गाँवों में स्वांग मंडली में नाच गा कर कमाने वाले लोगों की स्थिति ज्योति के समान ही देखी जाती है । काम हो जाने के बाद जिन्हें समाज द्वारा स्वांग वाला, खसुआ, जनखा, हिजड़ा कहकर टरका दिया जाता है। उनके काम को उनकी जेंडर पहचान से जोड़ कर उन्हें ताने मारे जाते हैं । उन्हें समाज में उपेक्षित बना दिया जाता है । इसी कारण ज्योति, रहमान जैसे गरीब परिवार के पुरुष जो समाज द्वारा रोजगार के नाम पर उपेक्षा का शिकार होते हैं । वह सभी दो वक्त की रोटी के लिए नकली हिजड़ों के रूप में यौन कर्म को अपनाते हैं और परिवार का भरण पोषण करते है । क्योंकि उनका मानना है इस लाइन में अच्छी कमाई होती है । पेट की यही आग तो हिजड़ों को नाचने गाने के साथ समाज की उपेक्षा और उपहास के दंश से बचने के लिये, वैश्यावृति में घुसने और रईसजादों के लौण्डेबाजी के शौक को पूरा करने के लिये मजबूर करती है ।

हिजड़ा समाज के अपने कुछ नियम-कायदे होते हैं । अक्सर जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं और उन पर आरोप लगाते हैं । पहला इस समाज में पूर्ण स्त्री और पुरुष के साथ संबंध रखना व उन्हें अपने समाज में शामिल करना। दूसरा समलैंगिक संबंधों को विषमलिंगी विवाह की मान्यताओं से बाहर स्थापित करना । तीसरा इस समुदाय के लोगों का सिग्नल, रेलवे स्टेशन अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगना और चौथा वैश्यावृति में सक्रिय होना । पांचवा हिंसा और चोरी करना । यह सभी इस समाज में अपराध माना गया है । इस समुदाय के भीख मांगने और वैश्यावृति को पेशे के रूप में अपनाने वाले लोगों को दंड दिया जाता है,‘क्योंकि उनके समुदाय में भीख मांगना चोरी-हिंसा करना भयंकर पाप माना जाता है’ । यह समाज अपनी इस योनि में पैदाइश से डरता है । इसी कारण वह किसी का भी दिल दुखाने व जीव हत्या को पाप मानता है । यमदीप उपन्यास में महताब गुरु कहते हैं ‘ अरे, हम तो खुद ही डरते हैं कि कहीं हमसे किसी का दिल न दुःख जाए । एक चींटी भी पैर के नीचे पड़ जाती तो सोचते हैं कि इसके अंडे होंगे… ’ यह समाज धर्म से गहराई से जुड़ा है इसी कारण किसी तरह की हिंसा को यह अपराध मानता है । यहाँ धर्म का आश्य मुख्य धारा के धार्मिक संदर्भों से नहीं है यहाँ धर्म इनका अपना समुदाय है । इस समाज में सभी लोग बुचरा देवी को मानते हैं और मृत्यु होने पर मार-मार कर दफनाए जाते हैं । ताकि दुबारा इस योनि में जन्म लेकर वापस न आ सके । ‘सुना है, रात में कब्र में गाड़ देते हैं, वह भी अपनी ही बस्ती में । और उस पर ..जूते-चप्पल से पीटते हैं, थूकते हैं और इस योनि में दोबारा जन्म न लेने की बात करते हैं’ । सभी उपन्यासों के कथानकों में इनका संदर्भ मौजूद है ।

आर्थिक असमर्थता बेरोजगारी, शिक्षा का अभाव, तकनीकी अकुशलता और सबसे बड़ी समस्या परंपरागत पेशे का अज्ञान इन्हें वैश्यावृति को पेशा बनाने पर मजबूर करता है । लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी अपने साक्षात्कार में इस समुदाय की आर्थिक सामाजिक स्थिति के संदर्भ में कहती हैं कि ‘हिजड़ों के पास बुद्धि नहीं होती ? उनके पास प्रतिभा नहीं होती ? बल नहीं होता ? वह राजनीति में नहीं जा सकते? फौज में नहीं जा सकते ? इन बातों को किन तर्कों के आधार पर तय किया ? आप ने कलाकारों, प्रतिभावानों को मजबूर कर दिया पचास-पचास रुपए में देह बेचने को, ताली बजाने को’ । इस समुदाय की कमला देवी जो पेशे से यौन कर्मी हिजड़ा हैं कहती हैं ‘यहाँ जो नए लोग आते हैं वह दो तरह की कमाने की प्रक्रिया से होकर गुजरते हैं पहला परम्परागत नेक, बधाई, ताली और नाच-गाने से है और जिनके पास यह गुण नहीं होता वह मजबूर होते हैं वैश्यावृति की ओर’ । यमदीप उपन्यास में महताब गुरु के माध्यम से लेखिका इस समाज की आर्थिक स्थितियों पर लिखती हैं ‘पेट पालने की इसी विवशता में कितने तो छिपे-मुद्दे तौर पर इसे वैश्यावृति की तरह अपना चुके थे । क्योंकि एक तो गिरिया कम लोग बनते थे और दूसरे केवल गिरिया द्वारा दी गई सीमित धनराशि में इनका खर्च चलना मुश्किल हो जाता था’ । बावजूद इसके आर्थिक मजबूरियों के साथ-साथ समाज का अमानवीय व्यवहार भी इन्हें यौनकर्म की ओर धकेलता है । रेखा चितकबरी जैसे इस समाज के लोग वैश्यावृति को आसानी से पैसा कमाने का जरिया बना लेते हैं और किशोरवय हिजड़ों को बाज़ार के अनुरूप तैयार करते हैं क्योंकि बाजार में ग्राहक लड़कियों की जगह लौंडे मांग रहे थे । लौंडे लड़कियों की तुलना में सस्ते में भी उपलब्ध थे । विदेशी ग्राहक तो कमसिन लौंडों की मुँहमाँगी कीमत दे रहे थे’ । यह प्रक्रिया एक तरह से मानवतस्करी है । आज इसका वैश्विक बाज़ार बढ़ा है और इसका सबसे बड़ा कारण आर्थिक बेरोजगारी है । तीसरी ताली और गुलाम मंडी उपन्यासों में इनका संदर्भ दिया गया है ।

आर्थिक स्थितियां मनुष्य को जितना मजबूर बनाती हैं उससे कई अधिक प्रशासनिक गतिविधियाँ । प्रशासन भी अपने चरित्र में पितृसत्तात्मक होता है । लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी कहती हैं घायल हिजड़ो, बीमार हिजड़ों के साथ हॉस्पिटल में भेदभाव किया जाता है । पुलिस चौकी में उनके साथ हुई दुर्घटना को दर्ज नहीं किया जाता । स्वयं उनके साथ दो बार बलात्कार करने की कोशिश की गई  । प्रशासन भी मौका पड़ने पर मदद की अपेक्षा शोषण की प्रवृति को अपनाता है । गुलाम मंडी उपन्यास की पात्र रानी जिसका जन्म तो पुरुष शरीर में हुआ था मगर उसकी यौनिकता स्त्री स्वभाव की थी । इसी कारण उसे परिवार में पिता के हाथों मार तक खानी पड़ी और समाज में भी अपमानित होना पड़ा । उसके अपमान का एक कारण उसकी यौनिकता थी तो दूसरी गरीबी । वह कहती है ‘मुझ एक को छोड़ सब पूरे थे । मेरी दाढ़ी-मूंछ नहीं निकले । आवाज छोरियों जैसी रह गई तो सब मेरे को मारते-चिढाते-खिजाते थे । बाप भी जब देखो, तब हाथ छोड़ देता था । लोगों के घर बर्तन मांजने गई तो बोले, हिजड़े से बर्तन मंजवाएंगे क्या ? मैंने कह दिया, ‘….से बर्तन थोड़ी मांजते हैं, मांजते तो हाथ से ही हैं न । तो घराती ने थाने में रिपोर्ट कर दी कि हिजड़ाघर औरतों को छेड़ रहा है । अश्लील बाते कर रहा है । पुलिस मुझे पकड़कर ले गई । मारा भी और रेप भी किया । अब पूछो कानून के रखवालों से, भला हिजड़ों को पुरुष थाने में क्यों भेजते हैं। नहीं तो बनाए तीसरा थाना’ । शारीरिक शोषण केवल महिलाओं के साथ ही नहीं होता बल्कि यह समाज भी इससे प्रताड़ित है । अंतर केवल इतना है कि महिलाओं के साथ हुए शोषण को संविधान में बलात्कार के अंतर्गत परिभाषित कर दिया गया है । मगर इस समुदाय के साथ किया गया यौन शोषण संविधान की किसी भी परिभाषा में दर्ज नहीं हो सका है ।

समाज ने इंसानियत के जिस तकाजे पर इस समुदाय को मनुष्यता के सामाजिक पैमाने से बाहर किया । वही मनुष्यता मुख्य धारा से अधिक इनमें दिखती है । वह चाहे सड़क पर पड़ी गर्भवती पगली के जन्मजात शिशु को उसी समाज द्वारा उपेक्षित किए जाने पर यमदीप उपन्यास की पात्र नाजबीबी द्वारा पालना हो या उसी समाज के लोगों द्वारा महिला से बलात्कार के प्रयास को असफल कर उसकी रक्षा करना हो, किन्नर कथा की पात्र ‘मातिन’ इसी का एक उदाहरण है । ‘मातिन हिजड़ा नहीं है, वह संपूर्ण स्त्री, किंतु विधवा है’ । उसका अपना जेठ उसके पति की मृत्यु के तुरंत बाद जमीन के लालच में उसका बलात्कार और बाद में मारने का प्रयास करता है । सत्ता शोषण का कोई भी  रास्ता अपनाने से कभी पीछे नहीं हटती है । यमदीप उपन्यास में मानवी द्वारा नारी सुधार गृह के सफेदपोश चेहरे को बेनकाब करने के प्रयास में उसमें शामिल नेताओं का चरित्र भी सामने आने लगता है और यही जनता के रक्षक अपनी भक्षक भूमिका में आकर मानवी पर हमला करते हैं । नाजबीबी उस समय मानवी की रक्षा करती है । प्रश्न उठता है जिस मनुष्यता व मानवता की बात मुख्यधारा का समाज करता है क्या वह यही मानवता है कि अपने से कमजोर का शोषण व बलात्कार करे ? नाजबीबी कहती हैं ‘सोच रही हूँ, मेम साहब, कि भगवान ने मुझे हिजड़ा बनाकर ठीक ही किया । अगर यह न बनाता तो जरूर मुझे औरत बनाता और तब ये सारे अत्याचार मुझे भी झेलने पड़ते’ । मुख्यधारा के लोगों को भी सोचने को मजबूर कर देता कि उनकी मानवता कितनी कमजोर और स्वार्थी है उनसे अच्छे तो यही लोग हैं । जो वक्त पड़ने पर मनुष्यता और उसके मूल्यों  की रक्षा करते हैं ।
( यह आलेख भावना मासीवाल के शोध आलेख का हिस्सा है , पूरा शोध लेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन में  शीघ्र प्रकाश्य ) 

जशोदाबेन की चिट्ठी

प्रातःस्मरणीय प्रभु जी ,

समझ नहीं पा रही , बात कहाँ से शुरू करूं और अपनी भावनाओं को किन शब्दों में उतारूं . तुम भारतवर्ष के प्रधानमंत्री हो -भारत भाग्य विधाता – और मैं अपने मायके में पड़ी वह भाग्यवती जशोदाबेन , जिसका नाम तुमने अपने चुनाव उद्घोषणा में जीवनसाथी वाले कॉलम में दर्ज कर दिया. तुम्हारी वाह-वाही हुई और मेरी चर्चा. मुझसे सवाल पूछे जाने लगे , तस्वीरें ली जाने लगीं . सिपाही –संतरी आगे –पीछे हो लिए .

मेरे प्रशांत जीवन में हलचल की लकीरें उठने लगी और फिर मिल –मिलाकर एक कोलाहल से मैं घिर गई. मेरी प्रशांतता, अकेलापन रौंद डाला गया; और सच कहूं , अब तो उसकी भी स्मृतियाँ ही शेष हैं. बहुत विवश होकर, गहरे अवसाद में , आज मैंने कलम उठाई है और जब लिख रही हूँ, तब यह संकोच भी है कि कहीं मेरा यह पत्र तुम्हारे महान दायित्वों में कुछ खलल तो नहीं डाल जायेगा, जो मैं बिलकुल नहीं चाहती.
लेकिन ऐसे ही मन में एक विचार उमड़ा….. कि मैं भारत की एक नागरिक भी तो हूँ . और न सही किसी विशिष्ट अधिकार से , अपनी साधारणता के अधिकार से भी मुल्क के आका को , एक पत्र तो लिख ही सकती हूँ . तुम चाहे जिस रूप में इसे स्वीकारो – न स्वीकारो , अब शायद लिखे बिना मैं नहीं रह सकती.
मेरे प्रभु , तुम शायद जानना चाहोगे कि मैं कैसी हूँ . मैं कैसे कहूं कि सुख से हूँ और फिर अपने को दुःखी भी कैसे कहूं . क्या मेरा दुःख सचमुच दुःख जैसा है ? और जो मैं जी रही हूँ उसे सुख कहा जाना चाहिए ? कहा न ! मन बहुत चंचल है और तय नहीं कर पा रही हूँ, सबकुछ किस अनुक्रम में रखूँ .

आज जब मॉनसून के बादलों ने दस्तक दी , तब मेरी बूढ़ी काया में किशोरवय की स्मृतियाँ कौंधीं. इन स्मृतियों के साथ तुम भी सकुचाये-से आये. कुछ क्षण के लिए मैं सचमुच दुल्हन बन गई. गड्ड-मड्ड स्मृतियों के बीच तुम एक अल्हड किशोर के रूप में अब भी बैठे हो –इन स्मृतियों को मैंने अपने  मन के खूंट में बाँध लिया है- कोई अपराध तो नहीं किया है न प्रभु ! चलो, यदि जो अपराध भी किया है , और करती हूँ तो इतने भर की इजाजत कृपा कर मुझे दे दो . देते हो न !

एक चीज पूछूं ? मैंने हजार बार इसपर सोचा है . हर सोच पर सिहर कर रह जाती रही हूँ. सच कहना, तुम जब चुनाव कागजातों में मेरा नाम दर्ज कर रहे थे , तब अक्षरों के साथ तेरे मन में मेरी कोई तस्वीर भी खिची थी ? मैंने पहले टी वी चैनलों, और फिर अखबारों में तुम्हारे हस्तलेख में अपना नाम देखा-जशोदाबेन . मैं फूट कर रोई . रुलाई की हिचकियाँ रुक ही नहीं रही थीं. वह शायद सुख की रुलाई थी , आंसू भी सुख के थे . समझते हो न, सुख के आंसुओं के अर्थ ! पास होते तो बतला सकती थी , इन सब का मर्म . लेकिन तुम तो दूर दिल्ली के ‘ राजमहल’ में पता नहीं किन –किन चीजों के संधान में जुटे हो और मैं यहाँ अकेली , केवल तेरी स्मृतियों में डूबी हूँ.

मुझे आज भी याद है, तुम्हारा संवाद , जिसे तुमने एक अल्हड दुल्हन को सुनाया था – ‘ मैं देश के लिए , समाज के लिए बना हूँ . और कि तुम पढ़ो.’ मैंने अपनी पढाई जारी राखी . मिहनत करके शिक्षिका बनी और अध्यापन को ही व्यसन बनाया. तुम देश गढ़ते रहे , मैं समाज . मुझे हमेशा प्रतीत हुआ तुम्हारे भीतर एक बुद्ध , एक गांधी बैठा है . तुम व्याकुल भारत हो . मैंने तुम पर गुमान किया . तुम्हारे राह का रोड़ा नहीं बनूँ, ऐसा तय किया. सोचती थी , एक दिन तुम सारे भारत पर छा जाओगे . मेरा सपना साकार हुआ. तुम सचमुच सारे भारत पर छा गये और छाने के साथ जब पहली दफा अपने कर कमलों से मेरा नाम लिख सके तो मुझे यकीन हो सका कि मेरी तपस्या व्यर्थ नहीं गई . तुम सचमुच बुद्ध बन गये, गांधी बन गये.

मैंने अंतरमन से तुम्हें आशीष दिया , तुम्हारी सफलता के लिए मनौतियाँ की. नंगे पाँव तीरथ-तप किये , जो भी मुझसे संभव हुआ , किया. और तभी मेरे मन में यशोधरा और कस्तूरबा का ध्यान आया. पढ़ा था कि बुद्धत्व प्राप्ति के बाद बुद्ध कपिलवस्तु गये- यशोधरा से वहां जाकर मिले , जहां उसे छोड़ गये थे . मैं दिन गिनती रही कि तुम एक रोज मुझसे मिलने आओगे और शायद अब उस तरह रहने का प्रस्ताव दोगे, जैसे बापू के साथ बा रहती थीं… लेकिन तुम क्यों आने जाओ. न तुम से बुद्ध बनना संभव हुआ , न गांधी. तुम पता नहीं क्या के क्या बन गये. मैं हताश होकर रह गई. यही समझा कि तुम बोलते चाहे जो हो , हम स्त्रियों को नरक का खान के अलावे कुछ नहीं समझते. तुम्हारी शिक्षा और दीक्षा यही बताती रही है कि स्त्री का पवित्रतम रूप माँ का रूप है . अपनी माँ के प्रति तुम्हारे प्यार की मैं सराहना करती हूँ . लेकिन मेरे प्रभु तुम हम स्त्रियों को क्या सन्देश देना चाहते हो ? एक माँ, पहले पत्नी होती है और उसके भी पहले एक पुत्री . लेकिन तुमने मुझे अहल्या की तरह स्थिर कर दिया , पत्थर बना दिया. मैं जान ही न सकी कि मेरा अपराध क्या था .

प्रभु !  मैंने भी संस्कृति का थोड़ा अध्ययन किया है . हमारे यहाँ स्त्रियाँ उर्वरता और संपन्नता की प्रतीक मानी गई हैं . हमारे मनीषियों ने भारत वर्ष को जब भारत माता बनाया, जिसके जय करने में तुम्हारे दोनो हाथ बड़ी फूर्ती से उठते हैं और तुम भावनाओं से भर जाते हो , तब उस समय भारत माता को महाउर्वरा शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा –महाजननी  के रूप में देखा , लेकिन तुमने मुझे अवरोध के अलावे कभी कुछ नहीं समझा. अब भी यही समझते हो .

सुना था , या कहीं पढ़ा था, उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा संकुचित विचारों का उद्धारक होता है . लेकिन तुमने उतरदायित्व से कुछ नहीं सीखा. हठी बने रहे. सुना है ऐसे हठी लोगों को जनता पसंद करती है और तेरा वोट बढ़ता  है . यदि अपने वोट के लिए तूने मेरा इस्तेमाल किया है तो भी मैं , खुश होना चाहूंगी. तुम्हारे कुछ काम आ सकी , यह मेरे लिए गर्व की बात होगी. क्या सचमुच ऐसा है ? इस बात की तस्दीक कर सको , तो मुझे अच्छा लगेगा.

मेरे प्रभु, मेरा मन वाकई अभी बहुत व्याकुल है और जैसे केले के हर पात के पीछे एक पात होता है , वैसे ही मेरी हर बात के पीछे के एक बात है . कितनी चीजों को लिखूं . बातें उलझ –पुलझ जा रही हैं . तारतम्य में रखना संभव नहीं हो पा रहा है … अब जैसे तो – जब टी वी पर तुझे झाडू चलाते देखा तब सोचा काश , तुम्हारे साथ होती और राधा जैसे कान्हा के कान उमेठती थीं , तेरे कान उमेठ कर ठीक से झाडू पकड़ने का पाठ देती. लेकिन यह सब मेरा सपना है प्रभु ! तुम बुद्ध नहीं हो , तुम कृष्ण नहीं हो, गांधी नहीं हो , तुम केवल तुम हो और इससे  तुम तनिक सा भी इधर या उधर नहीं होना चाहते.

लेकिन यदि इसे ही स्थितप्रज्ञ होना समझते हो , तब जोड़ देकर कहना चाहूंगी, तुम गलती पर हो . स्थितप्रज्ञता जड़ता नहीं है प्रभु, वहां सातत्य है , नैरन्तर्य है , प्रवणता यानी नित –नवीनता है –जैसे नर्मदा के प्रवाह में गति है , वैसी गति है . स्थितप्रज्ञता हमें आगे ले जाती है , पीछे नहीं ले जाती. तुम तो स्वयं बड़े जानकार हो , तुम्हें क्या बतलाना. लेकिन तुम तो जानते हो , जिन्दगी भर अध्यापकी की है , तो नसीहत देने की एक आदत बन गई है . इसका बुरा नहीं मानना .

तुम्हारे भाषणों को टी वी पर ही सही , गौर से सुनाती हूँ . तो यही समझा है कि भारत को संपन्न बनाना चाहते हो. सोने का –स्वर्णिम भारत बनाना चाहते हो . लेकिन अपनी पौराणिकता से क्या कुछ भी नहीं समझना चाहोगे प्रभु ! पौराणिक लंका सोने की थी – स्वर्णिम लंका. और तुझे कैसे समझाऊं कि ऐसी लंकायें उत्कर्ष का नहीं , अपकर्ष का प्रतीक बनाती हैं . यह विकास का तुम्हारा अपना राग हो सकता है , तुम्हारी अपनी व्याख्या हो सकती है , लेकिन हमारी संस्कृति ने अनुमोदन नहीं किया है . पूरा पश्चिमी जगत, आज भौतिक उपलब्धियों से भरा है और  वास्तविक रूप में सबसे दुःखी हुई.  वर्चस्व और संपन्नता हमारे गर्व- गुमान और विलासिता तो बढ़ा सकता है , हमें सुखी नहीं रख सकता. सुख के कुछ मन्त्रों का सृजन मैंने भी किया है . प्रभु, कभी पूछा मुझसे, जो बताऊँ ? तुम तो कस्तूरी मृग की भांति वन –वन दौड़ रहे हो. कस्तूरी तो तुम्हारे पास है.
चलो सबकुछ एक ही पत्र में उड़ेल देना अच्छी बात नहीं . तुमने पत्र की पावती यदि भेजी तब फिर लिखूँगी. लेकिन चलते –चलते एक चीज पर और ध्यान दिलाना चाहूंगी. वह यह कि हो सके तो अपने धज पर थोड़ा ध्यान देना. तुम तो इतने सादगी पसंद थे . तुम्हारे उस अधकट्टे कुरते की क्या शान थी ! लेकिन इधर तो तुमने पता नहीं कहाँ –कहाँ का ड्रेस डिजाइन धारण कर लिया है . ऐसे डिजाइनदार पोशाकों में एक जादूगर की-सी शक्ल बनती है तुम्हारी. तनिक भी अच्छा नहीं लगता मुझे. टी वी वालों की वाह –वाही पर मत जाओ . वे सब मिल –मिलाकर तुम्हारा मजाक बना रहे हैं. खुद तय करो कि तुझे क्या करना है, क्या खाना है , क्या पहनना है.
तुम्हारे ख़त का इन्तजार करूंगी . ट्विटर मेसेज मत करना. मैं पुरानी दुनिया की प्राणी हूँ . तुम्हारी तरह हाई –टेक नहीं !
तुम्हारी
ज …..
नोट : यह एक काल्पनिक पत्र है .

(लेखक प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं.)

धरती ( भूदेवी ) जहाँ होती हैं रजस्वला !

मंजू शर्मा

सोशल मीडिया में सक्रिय मंजू शर्मा साहित्य लेखन की ओर प्रवृत्त हैं .संपर्क : ई मेल- manjubksc@yahoo.co.in

ओडिशा में धरती ( ‘भूदेवी’ ) भी तीन दिनों के लिए रज:स्वला होती है और इन तीन दिनों के दौरान इस राज्य में कृषि-संबंधित सभी कामकाज को पूर्णत: निषिद्ध कर दिया जाता है। यहाँ की पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देव ‘विष्णु(जगन्नाथ)’ की पत्नी ‘भूदेवी’ आषाढ के महीने में तीन दिनों के लिए जब रज:स्वला होती है , उस दौरान ही यह त्योहार ‘रज’, ओडिया भाषा में जिसे ‘रजो’ उच्चारित किया जाता है,बहुत-ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

‘रज’ शब्द ही ‘रजस्वला’ अर्थात् मासिक-धर्म से लिया गया है,इस दौरान विशेषकर ओडिशा के तटीय क्षेत्रों , पुरी ,कटक,बालासोर और ब्रह्मपुर आदि में  ‘रजपर्व’ मनाया जाता है। विशेष बात यह है कि आषाढ़ में यह त्योहार ‘रजो’ लड़कियों और महिलाओं के बीच  विशेष उल्लास-से मनाया जाता है।  एक अच्छी बात इस दौरान स्थानीय लोगों के बीच दिखाई देती है कि  तीन दिवसीय ‘रजो’ के दौरान घर की स्त्रियों और लड़कियों को घरेलू कामकाज-से पूरी तरह-से स्वतंत्र कर दिया जाता है। कुँवारी लड़कियाँ पैरों में आलता डालकर , नए कपड़े और नए आभूषणों से सज-धजकर घरों-से बाहर निकलती हैं और पेड़ों की मज़बूत डालियों-से झूले बाँधकर खूब झूला झूलती हैं,लूडो खेलती हैं या ताश खेलती हैं। अर्थात् स्थानीय लोगों के लिए सभी तरह की मस्ती का नाम है यह ‘रजोपर्व’। स्त्रियों को लगता है कि चलो इस त्योहार के बहाने ही तीन दिनों के लिए, हर दिन के घर के कामकाज से आज़ादी तो  मिली  , क्योंकि इस दौरान घर को संभालने की जिम्मेदारी  घर के पुरूषों पर होती है,भले ही रसोई हो या साफ़-सफ़ाई,सबकुछ पुरूष ही संभालते हैं। इस ‘रजपर्व’ के दौरान धरती पर नंगे पैर चलने से सख्त मनाही होती है,  क्योंकि भूदेवी इस समय मासिकधर्म की पीड़ा झेल रही होती हैं। कुल मिलाकर पूरे पाँच दिनों तक ‘रजो’ की धूम रहती है,’रजो’ के आरंभ होने के पहले ‘सोजा-बोजा’(साज-बाज) होता है , अर्थात् जिसमें तैयारी के लिए सजावट का  खासा ध्यान रखा जाता है।

पहले दिन को ‘पहिली रजो’ के नाम से जाना जाता है,  जिसमें यह माना जाता है कि यह धरा के मासिक धर्म का पहला दिन है,इस दौरान कुँवारी लड़कियों को  अपने नंगे पाँव धरती पर नहीं रखना होता है। इस ‘पहिली रजो’ के बाद दूसरा  दिन,  ‘भूदेवी’ के रज:स्वला का दूसरा दिन , मिथुन संक्राति/रजो संक्रांति (वास्तविक रजो) कहलाता है। और अंत में तीसरे दिन मनाया जाता है,शेष रजो/भू दहा/बासी रजो। लगभग सोजा-बोजा से ही चल रहे इस त्योहार का अंत होता है.  वासुमति गाधुआ अर्थात् धरा/भूदेवी का स्नान। इस समय घरों में पहले से ही तैयारी के दौरान तरह- तरह के (पीठा ) पकवान तैयार किए जाते हैं,जिनमें प्रमुखता से शामिल होता है,पोडापीठा और चाकुली पीठा,जो चावल के पाउडर और इन तटीय क्षेत्रों में बाहुल्यता से उपलब्ध नारियल से बनाया जाता है।  इस दौरान  डोली ( अमूमन हम जिसे चरखे के रूप में जानते हैं)  में बैठकर खेला जाता  है .  ‘रजो उत्सव’  के दौरान ही ‘राम डोली’,’चरखी डोली’,पता डोली और ‘डंडी डोली’ का भी लोग मज़ा लूटते हैं,  इसपर बैठकर घूमते हैं और तब रजो’ के विभिन्न प्रचलित लोकगीत भी महिलाएँ और छोटी-छोटी बच्चियाँ गाती  हैं।

धरती  प्रकृति की ओर से स्त्री जाति का ही प्रतिनिधित्व करती है और शायद यही वज़ह है कि ‘भूदेवी’ के भी आषाढ़ माह में रजस्वला होने की मान्यता बनी है । और ऐसा है , तो फिर स्त्री के रजस्वला होने से जुडी पवित्रता -अपवित्रता की मान्यता इस पर्व से भी स्पष्ट होता है. यहाँ धरती और स्त्री एकाकार हो जाती है . अपनी भाषा में भी हम उत्पत्ति -अक्षम स्त्री और धरती को वन्ध्या और सक्षम को उर्वरा कहते हैं . हम  उत्पत्ति ( संतान और फसल ) में अक्षम धरती और स्त्री दोनो को ही उपेक्षित कर देते हैं . कोशिश की जाती है कि किसी उपाय से धरती और स्त्री ‘ फलवती’ हों , यानी स्त्री संतान पैदा करे और धरती फसल. और यदि शादी के बाद पति संतानोत्पत्ति में अक्षम हो या नपुंसक हो, तब भी लडकी पर ही दवाब होता है संतानोत्पत्ति का,  या यह सिद्ध करने का कि वह ‘ वन्ध्या’   नहीं है . मेरे अपनी ही परिचय की एक लड़की को विवाह के पश्चात् जब यह ज्ञात हुआ कि उसका पति ‘ यौन – अक्षम’  है तो उसने विरोध करना चाहा.  उस लड़की के साथ उसी के घर में रह रहे देवर ने ही उससे शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव  बनाया . इसमें  उसके पति सहित घरवालों की सहमति थी.  साफ़ है कि स्त्री हो या धरा , उसका अस्तित्व केवल उसके बच्चे जनने से ही है .

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‘भूदेवी’ के रज:स्वला होने के पश्चात् मानसून की बारिश होते ही  धरती में फसल/बीज बोए जाते हैं .  ‘भूदेवी’ के रज:स्वला होने के बाद ‘भू’ रूपी मादा को भी किसान रूपी उस नर का इंतज़ार होता है,  जिसके बीजारोपण किए बगैर उसके गर्भ-से फसल ले पाना असंभव है , और इस ‘रजपर्व’ के बाद मान लिया जाता है कि अब यह भूदेवी पूर्णत: सक्षम है , अथवा तैयार है कि किसान चाहे तो अपनी फसल इस धरा से ले सकता है।   हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भी महिला रजस्वला होती है,  उसके  पाँचवे दिन बालों को धोकर नहाने के पश्चात् ही पूरी तरह से सभी घरेलू कामों और पूजापाठ के लिए उसे शुद्ध,पवित्र और योग्य माना जाता  है और रसोईघर के सभी कामों के लिए उसे पुन: मान्यता मिल जाती है। ठीक उसी तरह-से इस ‘रजपर्व’ को आषाढ़ माह में मनाए जाने के पीछे भी यह तथ्य साफ़ नज़र आता है कि आषाढ़ के महीने में बारिश होती है और इसी मानसून के बारिश के पश्चात् रज:स्वला स्त्रियों की तरह अच्छे-से ‘धरा/भूदेवी’ की भी शुद्धिकरण की प्रक्रिया हो जाती है,साथ ही इसी महीने-से हलों को भी धरती में उतारकर  कृषि की प्रक्रिया का आरंभ भी हो जाता है .

इससे साबित है कि यह ‘रजपर्व’ स्त्रियों की  शुचिता  की अवधारणा को  एक कील की तरह हमारी स्थावर मान्यताओं की दीवार में ठोककर और मज़बूती-से स्थापित करने में सहायक ही सिद्ध होता है .

नागौर, राजस्थान में दलित दमन

बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की खासियत भी है। सम्पर्क  .९८६८२६१८९५

(बजरंग बिहारी तिवारी जनवादी लेखक संघ की उस जांच दल में शामिल थे , जो राजस्थान के नागौर जिले में हुए दलित उत्पीडन की घटना की जांच के लिए गया था. उनकी रिपोर्ट . ) 
दलितों के उत्पीड़न के मामले में हरियाणा इतना बदनाम है कि पड़ोसी राज्य राजस्थान को अक्सर शांत इलाका मान लिया जाता है. गाहे-बगाहे वहां से जातिवादी हिंसा की जो खबरें आती हैं वे हरियाणा की भीषण वारदातों के समक्ष उपेक्षित-सी रह जाती हैं. लेकिन, मई 2015में वहां ऐसी बीभत्स घटना हुई कि उसने क्रूरता की सभी हदें पार कर दीं| इस घटना की तहकीकात करने पर मालूम हुआ कि वहां जाति आधारित हिंसा की एक सतत धारा बह रही है. नई सरकार की ताजपोशी ने इस धारा को उत्प्लावित कर दिया है. इसी का नतीजा डांगावास का दलित नरसंहार है. नागौर जाट बहुल जिला है. इसे जाटलैंड भी कहते हैं. इस जिले के मेड़ता थाने के अंतर्गत एक गाँव है डांगावास. ‘डांग’ जाटों का एक गोत्र नाम है, इसी के आधार पर गाँव का नाम पड़ा है. डांगावास राष्ट्रीय राजमार्ग से सटकर बसा है. देखने से पुराना गाँव लगता है. इस गाँव में जाटों के 1500 घरहैं. इसके बाद संख्या में दलित मेघवाल का स्थान आता है. इनके सवा सौ परिवार हैं. रैगर के 50-60, वाल्मीकि के 100, कुम्हारों के 50 और ब्राह्मणों के 20 घर हैं. बनिया, सुनार, लुहार जैसी जातियां भी गाँव में हैं. संख्या बल के कारण और उससे ज्यादा भूस्वामी वर्ग होने के कारण गाँव में जाट दबंग हैं. जातिगत(जिसमें वर्गगत आधार समाहित है और असल में वही प्रमुख है) हिंसाकी तमाम वारदातें इसी जाति से जुड़े लोगों द्वारा अंजाम दी जाती हैं. 14 मई 2015 की घटना में भी यही जाति थी. इस घटना की सूचना लगातार यात्रा पर होने के कारण मुझे देर से मिली. फिर, इंटरनेट पत्रिका ‘हस्तक्षेप’ में भंवर मेघवंशी की विस्तृत रपट ने पूरी घटना से अवगत कराया. जनवादी लेखक संघ (जलेस) के कार्यकारी मंडल कीदिल्ली में 23 मई को हुई बैठकमें मैं भी शामिल था. इसमें यह तय किया गया कि जलेस की एक टीम राजस्थान के साथी राजेंद्र साईवाल के नेतृत्व में घटनास्थल का दौरा करे और वस्तुस्थिति से अवगत कराए. दिल्ली से टीम ले जाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई. अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों के चलते मैं वहां 6 जून को निकल सका.टीमके अन्य साथियों में शंभु यादव, राम नरेश राम और अतुल थे. राजेंद्र साईवाल को जयपुर से ज्वाइन करना था मगर उस दिन वे उदयपुर में थे तब उनकी जगह जयपुर के कामरेड कामेश्वर त्रिपाठी हमारे साथ रहे. हम लोगों ने पहले अजमेर जाकर जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय में भर्ती घायलों से मुलाकात की फिर वहां से किराए की टैक्सी लेकर नागौर के डांगावास गाँव गए.मुख्यतः पीड़ितों से, भंवर मेघवंशी की रपट से और थोड़ा-बहुत पुलिस वालों से बात करके 14 मई वालीघटना की जो तस्वीर उभरी वह यों है-

रतनाराम मेघवाल को आशंका थी कि गाँव के जाट हमला कर सकते हैं. इसी के चलते उन्होंने 11 मई को मेड़ता थाने जाकर तहरीर दी थी और पुलिस से अपने परिवार की जान-माल की सुरक्षा की मांग की थी. पुलिस को अपने कर्तव्य से ज्यादा अपनी जात-बिरादरी की चिंता थी इसलिए उसने मेघवाल परिवार के गुहार पर कोई कार्यवाही नहीं की. 14 मई की सुबह भूस्वामी जाट डांगावास में इकट्ठे हुए और एक निर्णय लेकर मेघवाल परिवार पर हमला कर दिया. इस हमले में गृहस्वामी रतनाराम को बेहद क्रूरता से मार डाला गया और उन्हीं के साथ पोखरराम तथा पांचाराम को भी मौत के घाट उतार दिया गया. खेमाराम की अजमेर अस्पताल में मृत्यु हो गई. इस हत्याकांड में एक ऐसा व्यक्ति भी मारा गया जिसका इस वाकए से कोई लेना-देना नहीं था. इस व्यक्ति का नाम रामपाल गोसाईं था. इसकी मौत का आरोप मेघवालों पर लगा. मगर, कुछ बुनियादी प्रश्न अब तक अनुत्तरित हैं. यह कि रामपाल गोसाईं यहाँ क्यों आया?उसकीमृत्यु गोली लगने से हुई मगर मेघवालों के पास बन्दूक ही नहीं है तो गोली चलाई किसने?रामपाल की हत्या का मुख्य आरोपी गोविंद मेघवाल को बनाया गया जबकि उस समय वहवहां पर था ही नहीं! रामपाल की लाश पुलिस ने कहाँ से बरामद की? उसकीपोस्टमार्टम रिपोर्ट क्या कहती है? एक क्षण के लिए आप यह मान भी लें कि गोसाईं को मेघवालों ने मारा तब सवाल इस हत्या के मकसद का है! गोसाईं को मारकर मेघवालों को क्या मिल सकता था? उससे कोई जाती दुश्मनी भी नहीं थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि रामपाल गोसाईं को मारकर दबंगों ने दलितों को हत्याकांड में फंसाने की साजिश रची हो और इसमें पुलिस की भरपूर मिलीभगत हो? आखिर कुछ तो वजह होगी कि अधिकतम 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थाने के सिपाही मौका-ए-वारदात पर तब पहुंचते हैं जब समूचा हत्याकांड हो चुका होता है. महिलाओं के साथ घोर बदसलूकी होती है और सभी 11 दलितों के हाथ-पाँव तोड़कर उन्हें जिंदगीभर के लिए अपंग बना दिया जाता है. मोबाईल फोन के इस जमाने में पुलिस-प्रशासन को पल-पल की खबर न मिल रही हो, ऐसा कैसे हो सकता है! मृतक रतनाराम ने आसन्न संकट की सूचना लगातार दी, ऐसा परिवार के लोग कह रहे थे. फिर, इस हत्याकांड में पुलिस को एक पक्ष में शामिल क्यों न माना जाए? मेड़ताथाने के स्टाफ का मात्र ट्रांसफर करना क्या न्याय का मखौल उड़ाना नहीं है? यहप्रशासनिक मशीनरी की चूक नहीं है बल्कि उसकी हत्याकांड में स्पष्ट भागीदारी है. अगर इस हत्याकांड के सभी मुख्य अभियुक्त अभी भी गिरफ्तार नहीं किए जा सके हैं तो यह उसी पटकथा का हिस्सा है जिसे पुलिस की मदद से पहले ही लिख लिया गया था! हम लोगों को यह जानकर खासा अचरज हुआ कि अभी जो पुलिस मेघवाल मोहल्ले में तैनात है उसमें सबके सब पुलिसकर्मी मेघवाल जाति के हैं! यह कैम्प हत्याकांड के अगले दिन ही लग गया था. यही नहीं, अजमेर के सरकारी चिकित्सालय में भर्ती घायलों की सुरक्षा में भी इसी जाति के पुलिसकर्मियों को लगाया गया है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यह जातिवादी व्यवस्था है. बिहार के रणबीर सेना की तर्ज़ पर. अब हर जाति की सुरक्षा के लिए उसी जाति के पुलिसकर्मियों की व्यवस्था की जाएगी! इस व्यवस्था के निहितार्थों पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है. मान लीजिए हमला किसी ऐसी जाति पर होता हैजिस जाति के पुलिसकर्मी पुलिस विभाग में हैं ही नहीं तब उस स्थिति में सरकार क्या करेगी? हो सकता है कि डांगावास के पीड़ितदलितों की ऐसी जाति आधारित पुलिस व्यवस्था से पूरी सहमति हो और उन्होंने ही मांग की हो कि उनकी जाति के पुलिसकर्मियों को उनकी सुरक्षा में लगाया जाए. सरकारया प्रशासन का ऐसी मांग मान लेना ही यह साबित करता है कि उसका पुलिसतंत्र भारतीय संविधान से नहीं, जाति के नियमों से संचालित होता है.

घटना की पृष्ठभूमि


इस घटना के बीज आधी सदी पहले पड़ गए थे. 1963 में दोलाराम मेघवाल के बेटे बस्तारामकी 23 बीघे 5 बिस्वा जमीन चिमनाराम जाट के कब्जे में चली गयी थी.इसका जो कारण ज्ञात हुआ वह यह कि बस्ताराम ने 1963 में चिमनाराम से डेढ़ हज़ार रूपया क़र्ज़ लिया था. जब मैंने इस परिवार के एक सदस्य गोविंद से इस क़र्ज़ की वजह पूछी तो उन्होंने (क़र्ज़ लेने के तात्कालिक कारण से) अनभिज्ञता जताई. इस क़र्ज़ के बदले बस्ताराम ने अपनी जमीन चिमनाराम के सुपुर्द कर दी. बस्ताराम को कोई औलाद नहीं थी तो उन्होंने अपने दो भाइयों- मीसाराम और शंकरराम के लड़कों में से शंकरराम के बड़े बेटे रतनाराम को गोद ले लिया.बस्ताराम अब नहीं हैं. 16-17 साल पहले जब वे बीमार पड़े थे तब उन्होंने चिमनाराम से अपनी जमीन वापस मांगी थी. चिमनाराम ने रेहन पर राखी जमीन वापस करने से इंकार कर दिया. रतनाराम ने दीवानी का मुकदमा दायर किया. 1997 में अदालत से इस बावत पहली नोटिस जारी हुई. मेघवाल मोहल्ले के बड़े बुजुर्गों ने बताया कि चिमनाराम जाट ने कभी दावा नहीं किया कि जमीन उनकी है.चिमनाराम के दो बेटे हैं- कानाराम और ओमाराम. ओमाराम को कोई संतान नहीं है जबकि कानाराम को एक बेटा है कालूराम. दीवानी का केस चल ही रहा था और साक्ष्यों को देखते हुए इसकी पूरी संभावना थी कि केस में फैसला रतनाराम के पक्ष में होगा. इससे जमीन पर काबिज जाट परिवार में बेचैनी फ़ैल गई. भंवर मेघवंशी की रपट के अनुसार अभी हाल में न्यायालय का निर्णय रतनाराम के हक में आया. रतनाराम ने तब उस जमीन पर एक पक्का और एक कच्चा मकान बनवा लिया और वहीं रहने भी लगे. यह खेत गाँव से थोड़ी दूर पर है. इस बीच अप्रैल 2015 में कानाराम ने उस जमीन पर अपना कब्ज़ा साबित करने के लिए जेसीबी मशीन से तालाब खुदवाना शुरू कर दिया. खेत के कुछ हरे पेड़ (खेझड़ी)भी कटवा लिए. चिंतित रतनाराम ने इसकी मेड़ता थाने में लिखित शिकायत की. जैसी आशंका थी, पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की. तब पीड़ित पुलिस अधीक्षक, अजमेर के पास पहुंचे. उनकी दखल से 1 मई को एफआइआर दर्जहुई. तालाब का खुदना रुक गया. 10 मई को जाट समुदाय के लोग गाँव में इकट्ठे हुए. इस पंचायतसे मेघवाल मोहल्ले में दहशत का माहौल बन गया. रतनाराम का परिवार खासतौर पर घबराया हुआ था. पंचायत के दिन रतनाराम किसी दूसरे गाँव गए हुए थे. तब चौधरी लोग किसनाराम, मुन्नाराम को ले गए. ‘पंचों’ने इन्हें यह कहते हुए वापस कर दिया कि वे अभी नासमझ हैं. पंचायत में सिर्फ बड़े ही आ सकते हैं. गाँव लौटने पर अगले दिन रतनाराम सरपंच के घर मिलने गए. गाँव के सरपंच का नाम रामकरण कमेड़िया (जाट) है. लोगों ने बताया कि कागज पर सरपंच के रूप में वैसे तो उनकी पुत्रबधू सुनीता का नाम है लेकिन सरपंची रामकरण करते हैं. सुनीता ओमप्रकाश की पत्नी हैं. रामकरण ने रतनाराम को बताया कि जो फैसला होना था हो चुका. पंचायत अब नहीं होगी. गांववालों से मेघवाल परिवार को खबर मिली कि पंचायत ने सात दिनों का समय दिया है. अगर रतनाराम ने जमीन नहीं खाली की तो दोबारा पंचायत बैठेगी. 11 मई को ही गाँव के जाट इकट्ठे होकर एसडीएम, डिप्टी एसपी, कलक्टर के पास गए. वहां उन्होंने क्या किया या कहा यह किसी को नहीं मालूम. 14 मई की सुबह दबंग अचानक गाँव में इकट्ठा हुए. यह पंचायत नहीं थी बल्कि हमले की योजना के लिए बुलाई गई बैठक थी. मेघवाल मोहल्ले में हमें बताया गया कि गाँव के दलितों की तकरीबन एक हज़ार बीघे जमीन इसी तरह जाटों के कब्जे में है. अपनी रपट में भंवर ने टिप्पणी की है कि रतनाराम परिवार को नष्ट करने का मतलब था कि शेष दलित समझ जाएं और अपनी जमीन वापस लेने का ख्वाब देखना बंद करें.

14 मई का घटना-क्रम


 राजस्थान में मई की झुलसा देने वाली गर्मी सुबह से ही शुरू हो जाती है. रतनाराम का परिवार यों तो आशंकाग्रस्त था और इस संदर्भ में औपचारिकता के लिए सही, प्रशासन को अवगत भी करा दिया था, (सूचनानुसार उस 14 मई की सुबह एसडीएम को हमले की आशंका की खबरदे दी गई थी) मगर आज की इस तरह की आसन्न आपदा काउन्हें अनुमान नहीं था. पंचायत की सात-आठ दिन वाली मोहलत की उड़ती अफवाह नेएक भिन्न मनःस्थिति भी बना दी थी. सुबह की अचानक बटोर के बाद जो तय हुआ उसके अनुरूप गाँव से 300-350 लोगों की भीड़ हमले के लिए तैयार होकर चल पड़ी. इस भीड़ में गाँव के जाट तो थे ही, उनके रिश्तेदार और कुछ दूसरे लोग भी शामिल हो गये थे. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि हमलावरों के पास 4-5 ट्रैक्टर, 4-5 पिक-अप गाड़ियाँ, 2-3 बोलेरो, 30-40 मोटरसाइकिलेंथीं. उनके पास धारदार हथियार,कुल्हाड़ी, फर्शी, सरिया, लोहे की पाइप और बंदूक भी थी. जब हमलावर खेत पर पहुंचे उस समय वहां 16 लोग थे. खेत गाँव से दो किमी की दूरी पर है.गृहस्वामी रतनाराम मेघवाल (उम्र65 वर्ष) पर हमलावरों का गुस्सा सर्वाधिक था. इस गुस्से के शिकार पोखरराम भी बने. रतनाराम के दिवंगत बेटे नौरतराम के साले पोखरराम(45 वर्ष) अपने छोटे भाई गणपतराम (35 वर्ष) के साथ बेवाबहन पप्पूड़ीदेवी (32 वर्ष) से मिलने आए हुए थे. भंवर ने इन्हें मजदूर नेता बताया है. मेघवाल मोहल्ले में इस बावत पूछा तो लोगों ने अनभिज्ञता प्रकट की. ये दोनों भाई पुरोहितवासनी पाटुकला गाँव के हैं.रतनाराम पर पहलेकुल्हाड़ीसे वार किया गया फिर आँखों में जलती लकड़ियाँडाल दी गईं. पोखरराम के ऊपर पहले तो ट्रैक्टर चलाया गया फिर उनकी आँखों में अंगारे डाल दिए गए. इनदोनो की मौके पर ही मौत हो गई. पांचाराम मेघवाल (55) को भी ट्रैक्टर से कुचला गया. फिर धारदार हथियार से उनका सिर फाड़ दिया गया. इनकी मौत अजमेर के अस्पताल में हुई. पोखरराम के भाई गणपतराम की आँखों में आक का दूध डाला गया. फिर उसे निर्ममता से कुचला गया. जान फिर भी बची रही. पहले मेड़ता फिर अजमेर के अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझते गणपतराम ने 23 मई को आखिरी सांस ली. भंवर की रिपोर्ट के अनुसार गणपतराम की लाश को लावारिस बता कर गुपचुप पोस्टमार्टम कर दिया गया. गणेशराम (21) की मौत 28 मई को अजमेर के अस्पताल में हुई. रामपालगोसाई को भी जोड़ लें तो अब तक 6 लोग इस हत्याकांड की भेंट चढ़ चुके हैं. हमलावरों ने महिलाओं के साथ बहुत घिनौना सुलूक किया. ज्यादातर महिलाओं के हाथ-पाँव तोड़ दिए गए. उनके गहने लूट लिए गए और कुछ महिलाओं के गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गईं.घर पर रखी 4 मोटरसाइकिलें जला दी गईं. ट्रैक्टर उठा ले गए औरट्राली को आग के हवाले कर दिया. हमलावरोंने खेत में बने दोनों नवनिर्मित कच्चे और पक्के मकान गिरा दिए. अब यह खेत पुलिस ने कुर्क कर लिया है. हमले के सबूत, घटनास्थल पर बिखरे हुए अवशेष और ढहाए गए मकान का मलबा पुलिस जाने कहाँ उठा ले गई है! ऐसी तत्परता शक के दायरे में आती है. फोरेंसिक साक्ष्य जितने कम होंगे, हमलावरों के बच निकलने की उतनी ही गुंजाइश रहेगी. राज्य पुलिस को अंदाज तो रहा ही होगा कि मामला देर-सबेर सीबीआई को सौंपा जा सकता है. प्राप्त सूचनानुसार मेड़ता थाने का लगभग पूरा स्टाफ, थानेदार (पूनाराम रूड़ी), सीआइ (नंगाराम चौधरी), पुलिस उपाधीक्षक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सब हमलावरों की जाति के हैं. इसी बिरादरीवाद के बल पर हमलावरों ने पुलिस की मौजूदगी में मेड़ता अस्पताल में भर्ती घायलों पर 14 मई को ही फिर से हमला करदिया. पुलिस मूकदर्शक की भूमिका में रही. हस्तक्षेप.कॉम पर उपलब्ध भंवर मेघवंशी की रपट बताती है कि दलितों की ओर से जो एफ़आइआर दर्ज हुई वह बहुत लचर है और उसमें महिलाओं से बदसलूकी की बात शामिल ही नहीं की गई है, न ही रतनाराम, पोखरराम आदि की वीभत्स तरीके से की गई हत्या का विवरण है. दूसरी तरफ रामपाल गोस्वामी की मौत का पूरा इल्जाम दलितों पर डालते हुए सशक्त एफआइआर लिखी गई है. इसमें घायलों सहित कुल 16 लोगों को नामजद किया गया है. भुक्तभोगियों को सबक सिखाने का इससे अधिक अचूक तरीका और क्या हो सकता है? सीबीआइ के रास्ते आसान नहीं हैं. न्याय की आशा धुंधलके में कैद कर दी गई है.

घायल क्या कहते है?


अजमेर के जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय में भर्ती घायलों ने बताया कि जब हमें मेड़ता अस्पताल से 14 मई को यहाँ लाया गया तो उसी रात डाक्टरों ने पांच घायलों को डिस्चार्ज कर वापस घर जाने को कह दिया. अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पी.एल.पुनिया के हस्तक्षेप से उन्हें पुनः एडमिट किया गया. अस्पताल में भर्तीघायलों के नाम इस प्रकार हैं- 1.खेमाराम(43) पुत्र शंकरराम, 2.मुन्नाराम (30) पुत्र रतनाराम, 3.अर्जुनराम (27) पुत्र रतनाराम, 4.पप्पूड़ी देवी (32) पत्नी नौरतराम, 5.बीदामी (60) पत्नी रतनाराम, 6.सोनकी देवी (55) पत्नीपांचाराम, 7.किसनाराम (23) पुत्र पांचाराम, 8.श्रवणराम (32) पुत्र रतनाराम (ये रतनाराम दूसरे हैं, खाड़की गाँव के), 9.जसोदा (30) पत्नी श्रवणराम, 10.भंवरी (27) पत्नी मुन्नाराम, और, 11.शोभादेवी (25) पत्नी गोविंदराम.

हमारी टीम जब अजमेर अस्पताल घायलों से मिलने पहुंची तो उनकी सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी हमें दिल्ली से आया जानकर संभ्रम में उठ खड़े हुए. मामला क्योंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया गया है इसलिए शायद ऐसी प्रतिक्रिया हुई होगी. यह जानकर कि हम एक लेखक संगठन की तरफ से आए हैं, उन्होंने पूछताछ के उपरांतवापस चलते वक्त रजिस्टर में हमारा नाम-पता लिखवाया. हमारी बात मुख्य रूप से खेमाराम से हुई. खेमाराम पर भी ट्रैक्टर चलाया गया था.उनके दोनों पैर टूटे हुए है. पाँव के अंदर स्टील राड डालकर प्लास्टर किया हुआ है. बातचीत के क्रम में खेमाराम ने हमें बताया कि कल (5 मई) अस्पताल ने हम सबको डिस्चार्ज कर दिया है और गाँव जाने को बोल दिया है. हम अभी नहीं जा रहे क्योंकि हमें वहां खतरा है. निर्देश के बावजूद हम अस्पताल में हैं. हमारी मानसिक हालत समझी जानी चाहिए. “रामपाल गोसाईं की हत्या का आरोप हम पर लग रहा है मगर यह बताइए कि हम ऐसे व्यक्ति को क्यों मारेंगे जिससे न तो हमारी कोई अदावत है और न जिसके मरने से हमें किसी तरह का कोईफायदा पहुंचेगा. पुलिस हमें बताए कि गोसाईं की लाश उसे कहाँ मिली? जिस बंदूक से उसे मारा गया है वह कहाँ है? हम लोगों के पास तो कोई गोली-बंदूक है नहीं! जिसका इस केस से कोई ताल्लुक नहीं, वह थर्ड पार्टी घटनास्थल पर कैसे थी?” पीड़ितों में एक व्यक्ति ने अपना दुख साझा करते हुए कहा कि पुलिस प्रशासन तो उन्हीं का है फिर हमारी कौन सुनेगा. मेड़ता अस्पताल में जब हमपर हमला हुआ तो पुलिस वहीं पर होने के बावजूद खामोश क्यों रही? उसने क्यों नहीं हमलावरों को वहीं पर गिरफ्तार कर लिया?“हमले वाले दिन भी हमने सुबह पुलिस को सूचित कर दिया था तब हमारी रक्षा में वह क्यों नहीं आई? वह चाहती तो हमले के वक्त ही जाटों को गिरफ्तार कर लेती. मगर 10-15 मिनट का रास्ता इतना लंबा कैसे हो गया?” एक अन्य भुक्तभोगी ने बताया कि थाने से पुलिस समय पर निकली मगर उसने सीधे आने की बजाए दूर का चक्कर काटकर आना उचित समझा. घायल महिलाओं में हमने पप्पूड़ीदेवी सेबात की. उन्होंने बताया कि उनका पाँव लाठी से तोड़ा गया. “बहुत गलियाँ दीं. बदतमीजी की. धमकाया कि यहाँ से भग जाओ नहीं तो सबको मार डालेंगे. उन्होंने मेरे पेट के अंदर लकड़ियाँ डाल दीं. फिरमैं बेहोश हो गई. उसके बाद क्या हुआ पता नहीं.” बगल वाले बेड पर भंवरी हैं. उनके दोनों हाथ तोड़ दिए गए हैं. सिर पर घाव है. बायां पैर जख्मी है.“उन्होंने हमारे साथ जोर-जबरदस्ती की”, भंवरी ने बताया. सभी महिलाएं घूंघट में हैं. पर्दा प्रथा राजस्थान की पहचान बन गई है. शोभा का बेड भंवरी और पप्पूड़ी के बीच में है. शोभा का दाहिना हाथ और दाहिना पाँव लाठी से तोड़ा गया है. “मैं बेहोश हो गई थी”, भाव-शून्य आवाज में शोभा ने बताया. जसोदा के दोनों हाथ टूटे हुए हैं. गाँव की मारवाड़ी बोली में जसोदा ने कहा, “उन्होंने मेरे पैरों में मारा. कपड़े फाड़ दिए. जांघ में डंडा चलाया.” बुजुर्ग बादामी अपने बिस्तर पर. हिलना-डुलना मुश्किल. लाठी से उनके दोनों हाथ तोड़ दिए गए हैं. “वे गलियाँ बोल रहे थे.” “कैसी गलियाँ?” –शंभू यादव पूछते हैं. बादामी गिरी आवाज में गालियाँ गिनाते हुए कहती हैं- “साड़ी (साली), कुत्ती, रांडा (रांड़, बेवा), नीच, बेड़नियाँ, बामनी.” आखिरी छोर पर सोनकी का बेड है. सोनकी की पीठ में दो टाँके लगे हैं. दाहिना पाँव तोड़ दिया गया है. दोनों हाथ चोटिल. “मारते हुए वे लगातार गाली दे रहे थे.” –सोनकी बोलती हैं. “आपने हमलावरों में किसी को पहचाना?” “हम हमेशा पर्दा करते हैं. गाँव में किसी (आदमी) को नहीं पहचानते. फिर, बेहोश भी हो गए थे.” हमारे साथ खड़े महेश मेघवाल चाहते हैं कि उनके वाट्सएप्प पर आए संदेश देख लूँ. जाहिरा तौर पर यह संदेश दबंगों की ओर से जारी हुआ है. कई लंबे-लंबे धमकाऊ टेक्स्ट हैं. कुछ पंक्तियाँ बानगी के लिए- “एससी एक्ट का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है.”, “हमने उन्हें रगड़-रगड़ कर मारा.”, “27 वीर जाटपुत्र नामजद हुए हैं.”, “आखिर ऊँट आ ही गया जाट के नीचे.”, “सरकार इन्हें कानूनी सरंक्षण देना बंद करे.”, “हमसे जो टकराएगा वह ऐसे ही मिट जाएगा.” “कहीं ऐसा न हो कि ये भी गुर्जरों की तरह विलुप्त प्रजाति बन जाए.” “जाट से भिड़ने का अंजाम मुजफ्फरनगर में दिखा था, अब डांगावास मेंदिखाई पड़ रहा है.” इन संदेशों की भाषा बीच-बीच में ठेठ स्थानीय है. महेश और दूसरे लोग उसका अर्थ समझाते हैं. शंभू को लगता है कि वर्चस्व का ताना-बाना समझने में इन संदेशों की भाषा से सहायता मिल सकती है. राम नरेश के पास रिकार्डर है और कैमरा भी. वे अपने काम मेंलगे हैं और पीड़ितों को ध्यान से सुनते हुए बड़े सटीक प्रश्न पूछते हैं. अतुल मेरी तरह नोटबुक में सबकी बातें लिख रहे हैं. कामरेड कामेश्वर के चेहरे पर लगातार गुस्सा है. राजस्थान में घोर सामंतवाद की मौजूदगी का वे बार-बार जिक्र करते हैं.

हमले का राजनीतिक आयाम पीड़ित ही खोलते हैं. “हम लोग कांग्रेस के वोटर हैं. हमला करने वाले सब बीजेपी के थे. पास के गाँव नेतड़ियाँ का ही विधायक है सुक्खाराम. हमारी ही जाति का है, मेघवाल. वह गाँव के सरपंच का साथ दे रहा है. एक बार भी मिलने, हाल जानने नहीं आया.” पुलिस ने उस खेत की कुर्की कर दी जिसमें हमारा मकान बना था, “मगर जिन्होंने हम पर हमला किया और फरार हैं उनके मकानों की कुर्की नहीं हुई.” “कायदे से तो उन्हीं फरार अभियुक्तों के घर की कुर्की होनी चाहिए थी”, डांगावास में हमारे साथ मोहल्ले के तमाम लोगों के बीच में बैठा राजस्थान पुलिस का एक वरिष्ठ सदस्य कहता है. वहीं गबरूराम मेघवाल भी बैठे हैं. इनके बेटे मदनलाल को 9-10 महीने पहले जाट लड़कों ने निशाना बनाया था. “रात तीन बजे वे आए और हॉकी से मदन के पैर तोड़ दिए.” “क्यों मारा?” मेरा प्रश्न है. “वजह कुछ नहीं थी.पिछली रात जाट लड़के शराब पीकर हल्ला कर रहे थे. मदन ने बस इतना कहा कि हल्ला न करो. यह बात उन्हें लग गई.” “आपने पुलिस में रिपोर्ट किया?” “हाँ, नामजद रिपोर्ट लिखाई. पप्पूराम खदाव, दीपूराम डांगा के नाम थे.” “पुलिस ने क्या कार्यवाही की?” गबरूराम थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले- “कुछ नहीं किया. उलटे हमें डरा-धमका कर गांववालों ने सुलह समझौता करवा दिया. कोईमददगार नहीं हमारा.”

हमलोग कोर कमेटी के सदस्यों से मिलना चाहते थे. यह कमेटी डांगावास के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए बनी है. कोर कमेटी में चार सदस्य हैं- रेणु मेघवंशी, डॉ.अशोक मेघवाल, गोपालदास वाल्मीकि और क्षेत्रमणि टेपण (खटीक समाज के अध्यक्ष). कमेटी के सदस्य अजमेर में रहते हैं. हम रात हुए डांगावास से लौटे. मिलने या फोन करने का वक्त नहीं था. मैंने दिल्ली आकर रिपोर्ट तैयार करने से पहले कोर कमेटी की सर्वाधिक सक्रिय मेंबर रेणु को फोन किया. विस्तार से बात हुई. रेणु ने बताया कि कमेटी ने 18 सूत्री मांग पेश की है. जो मुआवजा दिया गया है वह सामान्य परिस्थितियों का है. “डांगावास के मृतक जहर खाकर नहीं मरे. उन्होंने अपने हाथ-पाँव खुद नहीं तोड़े. उन पर ट्रैक्टर चलाकर मारा गया है. मृतकों के आश्रितों को जो पांच लाख बासठ हज़ार और पांच सौ का चेक दिया गया है, हम मांग कर रहे हैं कि उन्हें कम से कम पचीस लाख का मुआवजा मिले. इसके साथ एक आश्रित को नौकरी दी जाए. जो जमीन अभी दबंगों के कब्जे में है उसे वास्तविकहकदारों के अधिकार में लाया जाए.दलितों की जान-माल की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाए…”

 रतनाराम का परिवार तो अब शायद ही कभी संभल सके. लेकिन क्या इस परिवार को न्याय मिल पाएगा? क्या अपराधी दंडविधान के दायरे में लाए जाएंगे? क्या नागौर में दलितों का उत्पीड़न रुकेगा? क्या देश में संविधान का शासन चलेगा?

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: ‘चिड़िया भी तुम्हारी, पिंजरा भी तुम्हारा’

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

( पिछले दिनों हमने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का स्त्रीवादी पुनर्पाठ करते हुए रवींद्र कुमार पाठक का एक आलेख अपने यहाँ प्रकाशित किया था , आलोचक रोहिणी अग्रवाल ने भी  वाणभट्ट की आत्मकथा के सन्दर्भ से द्विवेदी जी की ‘स्त्रीदृष्टि’ पर लिखा है . उनके लम्बे आलेख का एक छोटा अंश ) 


चार उपन्यासों के अतिरिक्त अन्य गद्य विधाओं में प्रभूत सृजन करने वाले आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के विषय में एक तथ्य अनायास उभर कर सामने आता है कि उपन्यासकार के रूप में अपनी चौहद्दियों का निर्माण उन्होंने स्वयं अपने पहले उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में 1946 में कर लिया था। शेष उपन्यास उन चौहद्दियों पर सतर्क पहरेदार बैठाने के उपक्रम मात्र हैं, उन चौहद्दियों का अतिक्रमण करते हुए संवेदना एवं अंतर्दृष्टि के फलक का विस्तार करने के सर्जनात्मक प्रयास नहीं। यही कारण है कि आज भी वे ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ के प्रणेता के रूप में याद किए जाते हैं और ‘चारु चंद्रलेख’, ‘पुनर्नवा’ तथा ‘अनामदास का पोथा’ उनके कृतित्व में शामिल भर कर लिए जाते हैं। जाहिर है इससे अनायास यह प्रतीति होती है कि ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ उनकी ही नहीं, समूचे हिंदी साहित्य की अमूल्य कृति है,  जिसमें अपने युग के सामने उपस्थित जटिलताओं से जूझने हेतु उन्होंने ज्वलंत प्रश्नों को भविष्यद्रष्टा दार्शनिक की गहन अंतर्दृष्टि के साथ उठाया होगा। लेकिन हजारीप्रसाद द्विवेदी सघन-सायास ढंग से सामाजिक समस्याओं को नहीं उठाते, ऐतिहासिकता के कलेवर में वर्तमान को छुपा कर मनुष्य एवं दर्शन से जुड़े चिरंतन एवं सूक्ष्म प्रश्नों पर संस्कृति एवं अध्यात्म की जमीन पर खड़ेे होकर विचार करते हैं। बेशक इससे वर्तमान परिवेश प्रखर एवं ठोस ढंग से उभर नहीं पाता, लेकिन कुछ बुनियादी सवालों को व्यापक गहराई एवं विस्तार के साथ विश्लेषित करने की संभावना अवश्य बलवती होे जाती है कि सृष्टि, जीवन, मनुष्यता और संस्कृति के प्रवाह को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए व्यक्ति व्यक्ति का, व्यक्ति और सम्बन्ध का, सम्बन्ध और व्यवस्था का स्वरूप एवं अंतर्सम्बन्ध कैसा होना चाहिए; कि स्त्री एवं पुरुष, सवर्ण एवं दलित के विषमतामूलक त्रासद विभाजन को खारिज कर आदर्श मनुष्य एवं व्यवस्था में किन उदात्त विचारबिंदुओं को जोड़ना होगा। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने समूचे साहित्य में निरंतर इन्हीं प्रश्नों का संधान किया है, किंतु दुर्भाग्यवश वे शास्त्रीय दृष्टि एवं ब्राह्यणवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए हैं। परिणामस्वरूप वर्णाश्रम व्यवस्था के संवर्धन में लिप्त उनका समूचा चिंतन अस्मिता विमर्श की नुकीली पड़ताल के संदर्भ में बगले झांकने लगता है। शास्त्रीय दृष्टि से ‘श्रेष्ठ’ रच देने का अर्थ यह कदापि नहीं होता कि वह अनिवार्यतः जमीनी सच्चाइयों से जुड़ा साहित्य भी है। फलतः द्विवेदी जी की स्त्री दृष्टि वैचारिक औदात्य के घटाटोप में छिपी मानसिक जड़ता को उकेरने में जरा भी देरी नहीं करती।

रवींद्र कुमार पाठक के आलेख के लिए क्लिक करें : ज्वलंत स्त्री-समस्या पर कविताई 

स्त्री को लेकर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी बेहद गंभीर हैं। समूचे साहित्य में स्त्री की गरिमा के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं। सर्वत्र देवी, भगवती, महामाया, त्रिपुरभैरवी जैसे विशेषणों से अलंकृत वह एक दिव्याकृति है, जो ‘हिमालय से भी अधिक महीयसी और समुद्र से भी अधिक गंभीर है’। ब्रह्म  को लेकर नहीं, वरन् स्त्री को लेकर ‘नेति नेति’ की सी स्थिति, पहले ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में बाण के संग कि ”मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूं” और फिर राजा सातवाहन के साथ बाकायदा हलफनामा कि ”मैं नारी जाति का सम्मान करना जानता हूं। उसकी महिमा और मर्यादा का जानकार हूं। मुझे यह भी मालूम है कि मेरे कुल का कोई भी बालक नारी लम्पट नहीं होता।” (चारु चंद्रलेख, पृ0 18) . लेकिन नारीवादी चिंतक हैं कि इन्हीं मुखर घोषणाओं के चलते उद्घोषक के व्यत्क्तित्व और नीयत दोनों को शक के घेरे में ले आते हैं।

”नारी का जन्म पाकर केवल लांछन पाना सार नहीं है”  बनाम ”औरों की शांति के लिए अशांत होना ही सच्ची साधना है”
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि उनकी अभिजात मनोवृत्ति सामाजिक व्यवस्था की क्रूरता से संत्रस्त सामान्य स्त्री पात्रों की नियति पर विचार करना नहीं चाहती। दरअसल व्यवस्था की क्रूरता उन्हें दिखाई ही नहीं पड़ती। बेशक वे जानते हैं कि शहर में गणिकाएं हैं, मंदिरों में देवदासियां हैं, राह चलती बालाओं को अपहृत करते दस्यु हैं, यौन हिंसा से सभी वर्गों की कन्याओं में भय फैलाते लम्पट अभिजन हैं, जहां-तहां शार्विलक के अड्डे हैं, जिनमें दिनदहाड़े कन्याओं की खरीद-फरोख्त होती है और घरों में एक अलग तरह का उत्पीड़न झेलती विधवाएं हैं,  जिन्हें घर की तुलना में सड़कंे अधिक निरापद जान पड़ती हैं। लेकिन तथ्यों को जानना स्थिति को स्वीकारना नहीं होता। पहली अवस्था में जानकारी बेजान सूचना भर है और दूसरी अवस्था में चेतना के द्वार खटखटा कर कुछ बेहतर कर डालने का बीड़ा बन जाती है। व्यक्ति को सूचना बना डालना उस अमानवीय व्यवस्था की कूटनीति है जो अपने से इतर किसी अन्य की जीवंत सत्ता नहीं स्वीकारती। इसी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी। यही कारण है कि मंदिरों के गर्भगृह में कामलोलुप महंतों के यौन शोषण की शिकार देवदासियों की घुटी चीत्कारें उनके कानों तक नहीं पहुंच पाती,  क्योंकि शास्त्रों के अनुसार देवदासियां वे सौभाग्यवती कन्याएं हैं,   जिन्हें उनके धर्मपरायण माता-पिता धर्म की रक्षा हेतु मंदिर के प्रांगण में देवता को अर्पित कर जाते हैं  । गृहस्थी के ससीम बंधन में बंधने की अपेक्षा देवाराधन का असीम व्योम पा जाना क्या सौभाग्य का लक्षण नहीं? ठीक इसी प्रकार पुरुषों के प्रसादन हेतु अपनी देह एवं कला को बेचती गणिकाएं भी उनके समक्ष एक प्रश्नचिन्ह बन कर नहीं उभरतीं जिनसे समाज व्यवस्था ने एक नैसर्गिक जीवन जीने का अधिकार छीना है। न ही वे इस प्रश्न की पड़ताल करना चाहते हैं कि क्या गणिकाएं या देवदासियां स्वेच्छा से इन व्यवसायों को अपनाती हैं? उन्हें दूर से सुखी, सम्पन्न और प्रतिष्ठित दिखा कर मानो वे हर जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेना चाहते हैं। लेकिन स्थान एवं प्रतिनिधित्व न दिए जाने की हर चौकस चेष्टा के बावजूद जहां-जहां ये सामान्य स्त्रियां पात्र रूप मे कथा में प्रविष्ट हुई हैं, वहां-वहां अपनी व्यथा एवं समाज व्यवस्था के षड्यंत्रों को उन्होंने तीखी अभिव्यक्ति दी है। ‘पुनर्नवा’ की गणिका मंजुला समृद्धि, प्रतिष्ठा एवं प्रशंसकों की भीड़ के बावजूद कितनी रंक, एकाकी एवं अपमानिता है इसका अनुमान उस मनोद्गार से लगाया जा सकता है जिसे वह जीते जी व्यक्त भी नहीं कर सकी। बस, लिपिबद्ध कर दिया, भविष्य की किसी सहृदय घड़ी/पीढ़ी के पाठ के लिए जो शायद उसके उत्पीड़न और उत्पीड़क दोनों को भलीभांति समझ कर उस जैसी गणिकाओं को रौरव नरक की असहनीय यातनाओं से मुक्ति दिला सके। मंजुला के पत्र का एक-एक शब्द अमानुषिक व्यवस्था और उसके रक्षकों के चरित्र को चीन्ह-खोज कर निदान की मांग करता है – ”यहां मिट्टी के गाहक आते हैं। अपना सर्वस्व उलीच कर, पाप खरीद कर लौट जाते हैं। पुरुषत्व के वे कलंक हैं, स्त्रीत्व के अपमानकारी। वे रसिकम्मन्य होते हैं, रसिक नहीं। इस विटों, विदूषकों और बंधुलों के स्वर्ग में केवल नरक यातना के अधिकारी ही आते हैं। यहां कामुकता को पुरुषार्थ, भोंडेपन को सरसता, मूर्खता को विदग्धता, स्त्रैण भाव को पौरुष माना जाता है। ” (‘पुनर्नवा’ पृ0 55) यानी लेखक व्यवस्था का अभिशाप ढोती मंजुला की पीड़ा का साक्षी है   – बाणभट्ट की तरह, जो तिरस्कृता-लांछिता सहचरी निपुणिका की दुर्दशा देख कर बौखला गया है – ”स्त्री के दुख इतने गंभीर होते हैं कि उसके शब्द उसके दशमांश भी नहीं बता सकते। . . . क्या स्त्री होना ही अनर्थों की जड़ नहीं है? . . . निपुणिका में इतने गुण हैं कि वह समाज और परिवार की पूजा का पात्र हो सकती थी, पर हुई नहीं। . . . वह हंसमुख है, कृतज्ञ है, मोहिनी है, लीलावती है – ये क्या दोष हैं? मेरा चित्त कहता है कि दोष किसी और वस्तु में है,  जो इन सारे सद्गुणों को दुर्गुण कह कर व्याख्या करा देती है। वह वस्तु क्या है? निश्चय ही कोई बड़ा असत्य समाज में सत्य के नाम पर घर बना बैठा है।” (‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, पृ0 255) बाण दो बातें भलीभांति जानता है कि ‘सहानुभूति द्वारा ही पीड़िताओं की मर्मवेदना का किंचित आभास पाया जा सकता है” और दूसरे, ”मनुष्य के सामाजिक सम्बन्धों की जड़ में ही कहीं बहुत बड़ा दोष रह गया है।” (‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, पृ0 254) लेकिन उसके पास दोनों ही बातों के लिए अवकाश नहीं। चूंकि स्त्री देव-मंदिर में प्रतिष्ठित देवमूर्ति है, उसकी ‘मर्मवेदना’ के प्रति’सहानुभूति’ का निदर्शन उसे बेहद क्षुद्र लगता है। वह मनोयोगपूर्वक उसके देवत्व का संधान कर उसकी लौकिक पीड़ा पर दिव्य लेप कर देना चाहता है – ”तुम जिस पाप जीवन की बात कह रही हो, वह मनुष्य की बनाई हुई विकृत सामाजिक व्यवस्था की देन है। चिंता न करो देवि, इससे उद्धार हो सकता है। तुम्हारा देवता तुम्हारे भीतर बैठा हुआ अवसर की प्रतीक्षा कर रहा है। कोई बाहरी शक्ति किसी का उद्धार नहीं करती। यह अंतर्यामी देवता ही उद्धार कर सकता है। . . . देवता न बड़ा होता है, न छोटा, न शक्तिशाली होता है, न अशक्त। वह उतना ही बड़ा होता है, जितना बड़ा उपासक उसे बनाना चाहता है। तुम्हारा देवता भी तुम्हारे मन की विशालता और उज्ज्वलता के अनुपात में विशाल और उज्ज्वल होगा।” (‘पुनर्नवा’,पृ0 22)

आध्यात्मिक कुहासे की सृष्टि कर प्रचंड लौकिक प्रश्नों को धुंधला देना परंपरावादियों की कारगर युक्ति रही है जिसका भरपूर उपयोग आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनेे नायकों के बचाव के लिए किया है। देवरात-मंजुला प्रकरण में आत्मसाक्षात्कार की कठिन प्रक्रिया से गुजरते हुए मंजुला जिस बिंदु पर उत्तरोत्तर अहं का विसर्जन कर ‘स्व’ को पा लेती है, ठीक वहीं गणिकावृत्ति से मोक्ष दिलाने के लिए कथा में आचार्य देवरात के सबल-संपुष्ट हस्तक्षेप की नियोजना की जाने लगती है। ”सदा प्रसन्न, सदा श्रद्धापरायण, सदा निर्लोभ” जैसे विशेषणों से अलंकृत वीतरागी देवरात ही मंजुला के गुरु हैं जिन्होंने उसे सिखाया है कि ”अपने को खोकर ही अपने को पाया जा सकता है” (पृ0 18)। यह वही हैं जिन्होंने लोक के विरुद्ध चल कर गणिका को न केवल ”नारायण की स्मित रेखा के समान पवित्र और मनोहर” बताया है बल्कि उसमें ”भावविह्वला भक्तिमती लीलारूप” (पृ0 63) भी देखा है। पाठक इन्हीं देवरात को वेश्यावृत्ति जैसी घृणित व्यवस्था के उन्मूलन में निःशेष भाव से समर्पित देखना चाहता है। पुरुषार्थी के लिए इससे बड़ी तपोभूमि और क्या होगी भला? लेकिन किन्हीं महीयस उद्देश्यों की संपुष्टि में रत लेखक को ऐसीे किसी समानांतर कार्य-योजना में रुचि नहीं। परिणामतः देवरात अपने शिष्यों के अध्यापन कार्य में और भी निष्ठा से डूब जाते हैं; मृत पत्नी का शोक हरहराती नदी बन उनकी चेतना को अपने उच्छ्ल आवेग में जकड़ लेता है; और किसी आकस्मिक महामारी की मूक चपेट मंजुला को उदरस्थ कर लेती है। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। प्रकरण समाप्त होने पर निष्कृति का आश्वस्तिपरक उच्छ्वास! जरूरी नहीं होता कि लेखक का हर करतब पाठक को अभिभूत ही कर दे। असहमति और आक्रोश में दूर छिटकने को वह स्वतंत्र रहता है। इसलिए स्वप्न बन कर मंजुला नहीं, वरन् पाठकीय क्षोभ देवरात जैसे कट्टरवादियों की खबर लेने लगता है कि ”अपनी शांति के लिए तपस्या करना सबसे बड़ा स्वार्थ है। वह सबसे बड़ी छलना भी है। औरों की शांति के लिए अशांत होना ही सच्ची साधना है।”

मंजुला की व्यथा का मानवीय विस्तार है ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ की एकमात्र स्मरणीय एवं गतिशील पात्र निपुणिका। अभाव ने उसे रचा है, सामाजिक रूढ़ियों ने उसे दिशा दी है और संघर्ष ने उसे संवारा है। कांदविक वैश्य (जो भड़भूजे से सेठ बना था) की पत्नी के रूप में एक वर्ष का दाम्पत्य जीवन जीने वाली निपुणिका ने वैधव्य के अभिशाप को शारीरिक-मानसिक स्तर पर बहुत गहरे झेला है। पूर्णतया अरक्षित इस बालिका को आत्मरक्षा के उद्योग में घर से भाग कर अकेले इधर-उधर भटकना पड़ा है। जीवन उसके लिए कांटों भरी डगर रहा है। समतल तब हुआ जब सोलह वर्ष की अबोध आयु में अपना परिचय और दीनता छुपाती हुई वह बाणभट्ट की नट-मंडली में बतौर अभिनेत्री शामिल हुई। अभिनय उसके लिए कठिन कार्य था भी नहीं क्योंकि नारी-विग्रह लेकर परिवार-समाज में कदम-कदम पर अभिनय ही तो करना पड़ता है स्त्री को – ”जो वास्तव है उसको दबाने और जो अवास्तव है उसका आचरण करना – यही तो अभिनय है। सारे जीवन यही अभिनय किया। एक दिन रंगमंच पर उतर जाने से क्या बन या बिगड़ जाएगा।” (‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, पृ0 281) समूचे दिक्-काल का अतिक्रमण कर निपुणिका विशुद्ध स्त्री है और व्यथामूलक नियति के आधार पर समूची स्त्री जाति को एकीकृत कर देने वाला घटक। उसकी व्यथा धर्मशास्त्रीय मान्यताओं से जन्मी और सामाजिक रूढ़ियों से पोषित है जिन्हें पुरुष और सत्ता का अहं अंतिम सत्य मान उसकी मानवीय इयत्ता को सूक्तियों और आप्तवचनों में रिड्यूस कर डालना चाहता है। इसलिए निपुणिका पूरे उपन्यास में मनुष्य के रूप में एक जीवंत इकाई नहीं दीखती, कुछ छवियों, कुछ पूर्वग्रहों, कुछ अपेक्षाओं के मिश्रण से तैयार अबला नारी का प्रतीक है। पुरुष वेश में शार्विलक के अड्डे पर एक दिन नौकरी करती निपुणिका उन तमाम संकटों और विद्रूप सत्यों की ओर उंगली उठाती है जो स्त्री जीवन को आए दिन घेरे रहते हैं। स्त्री वेश में वह निर्द्वंद्व नहीं घूम सकती क्योंकि अपहरण या यौन शोषण का भय हर दम सिर पर मंडराता रहता है। शार्विलक के अड्डे पर ऐसी ही अपहृता कन्याओं के क्रय-विक्रय के घृणित व्यापार को वह देख चुकी है और दासी अथवा गणिका के रूप में उन कन्याओं के लाचार जीवन को भी। स्वयं सम्मानजनक जीवन की आकांक्षा में वह पान की दुकान चलाती है लेकिन पाती है कि पान से ज्यादा मुस्कान बेच कर उसे अपना पेट भरना पड़ता है। स्त्री शरीर को देवमंदिर के समान पवित्र और रमणीय मानने वाले बाणभट्ट से उसे ढेरों अपेक्षाएं हैं लेकिन आकाश-कुसुम के लिए भटकता भट्ट जमीनी सच्चाइयों से रू-ब-रू होना ही नहीं चाहता। निपुणिका शब्द-शब्द अपनी यातना उसे बताती है – ”मेरा कौन सा ऐसा पाप चरित्र है जिसके कारण मैं निदारुण दुख की भट्टी में आजीवन जलती रही? क्या स्त्री होना ही मेरे सारे अनर्थों की जड़ नहीं है? तुम इस छोटे से सत्य के साथ राष्ट्र जीवन के बड़े सत्य को अविरोधी पा रहे हो?  क्.या बृहत्तर सत्य के नाम पर मिथ्या का तांडव नहीं चल रहा है?” (पृ0 245) भट्ट अक्षर-अक्षर पिघलता चलता है लेकिन बकौल निपुणिका वह ‘जड़ पाषाण पिंड मात्र है’ जिसके भीतर न देवता ह,ै न पशु। है तो एक अडिग जड़ता। उद्बोधन और निवेदन, आक्रोश और संकल्प के बीच झूलती निपुणिका लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मात्र एक करावलम्ब चाहती है – ”मेरी इच्छा है कि एक बार तुम सम्राटों की भृकुटियों की उपेक्षा करके इस महासत्य को ऊँचे सिंहासनों तक पहंचा दो। . . .बड़ा दुख है आर्य, इसी विराट दैन्य के अंतःस्पंदनहीन ढूह पर साम्राज्य की नयनहारी रथयात्रा चली जा रही है। मैं इस ढूह की एक नगण्य कणिका मात्र हूं। मुझे इस योग्य बना दो कि आप अपनी अग्नि से धधक कर समूचे जंजाल को भस्म कर दूं। मैं तुम्हारा करावलम्ब चाहती हूं . . . मुझे तेज की चिनगारी दो आर्य।” (पृ0 245) बेचारा भट्ट! उसके पास न तेज ह,ै न आधार। वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था का साया है। इसलिए निपुणिका का उद्बोधन परिवर्तनकामी संघर्ष की टंकार बन कर नहीं उभरता, ‘प्रलाप’ बन कर रह जाता है। हालांकि मन के किसी कोने में यह ‘प्रलाप’ उसे ‘सत्यपूर्ण’ भी लगता है लेकिन तुरंत इसे स्नायु दुर्बलता का प्रभाव कह वह उपेक्ष्य मान बैठता है। साया न सोचने को स्वतंत्र है न अपनी ओर से कोई पहलकदमी करने को। वह कठपुतलियों की तरह सिर्फ संकेत पर हाथ-पैर हिला सकता है। भट्ट में बस यही नैपुण्य है।

निपुणिका की निर्णय लेने की क्षमता और कर्मठता (जो भट्ट को नर-बलि से बचाने के प्रकरण में वज्रतीर्थ श्मशान में प्रचंड नृत्य बन कर उभरी है) उपन्यासकार को ज्यादा रास नहीं आती। इसलिए हर दोराहे-चौराहे पर ठिठके भट्ट को सही मार्ग पर ले जाने वाली और अपनी आंखों में आंसुओं की जगह अग्नि स्फुलिंग भर कर व्यवस्था से टकराने का माद्दा रखने वाली निपुणिका को लेखक हतबल कर देता है। अब वह बार-बार परकटे पक्षी की भांति ‘संज्ञाहीन अवस्था में’ पहुंचने लगती है। संज्ञा होने पर आत्मधिक्कार से ग्रस्त –  ”मैं बड़ी पापिनी हूं आर्य. . . मैं सेवा धर्म में भी असफल हूं . . . .हाय, अगर तुम मेरी पाप ज्वाला देख सकते?” ( पृ0 262) ऐसी ‘दुखिया’ स्त्री का उद्धार करने में लेखक को कोई परेशानी नहीं। बल्कि पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को कंधे पर ढोते नायक का यह सौभाग्य है कि निपुणिका के निजी जीवन के दृष्टांत से वह स्त्रीत्व की मर्यादा स्थापित कर सके। तब शुरु होता है निपुणिका के दुखी जीवन के सामाजिक-पारिवारिक आधार को दृष्टिओझल करने का सिलसिला जिसकी अंतिम परिणति भट्टिनी-भट्ट-निपुणिका प्रेम त्रिकोण की प्रतिष्ठा में होती है। भट्ट-भट्टिनी के परस्पर निवेदित प्रेम के बीच वह अवांछित है, लेकिन प्रेम को ‘काम’ से अलगा कर उसमें आध्यात्मिक अर्थच्छायां एवं सात्विक लक्ष्य का रंग भरने वाली।  जाहिर है अब वह न लोक में व्याप्त है न समय-समाज में स्थित; वह न एक पृथक् इकाई है न स्त्री; है तो एक माध्यम – प्रेम को समर्पण, सेवा और आत्मोत्सर्ग की भावना में विलीन कर देने की निमित्त मात्र! ”दो विरोधी दिशाओं में जाने वाले प्रेम को एकसूत्र कर देने वाली” वासवदत्ता! बेशक लेखक उसके बलिदान को सफल नारी जीवन के उत्कर्ष की संज्ञा देकर गणिका चारुस्मिता से असत्य भाषण का स्पर्श करती अतिरेकपूर्ण प्रशंसा कराते हैं- ”निपुणिका स्त्री जाति का श्रृंगार थी, सतीत्व की मर्यादा थी, हमारी जैसी उन्मार्गगामिनी नारियों की मार्गदर्शिका थी” (पृ0 300) लेकिन सत्य यह है कि निपुणिका मूलतः और अंततः सामाजिक-धार्मिक विकृतियों का शिकार थी। उसकी मृत्यु (बलिदान नहीं) अमानवीयता के गहरा जाने का प्रमाण है। उपन्यास में चारुस्मिता का एक और वाक्य है-”दुनिया केवल प्रस्तर प्रतिमाओं पर जान देती है।” इस वाक्य के दो श्रोता थे – धावक और बाणभट्ट। धावक बुद्धिहीन है और बाणभट्ट चाह कर भी इसके आशय को नहीं समझ पाता। क्या इसलिए कि निपुणिका की मृत्यु जर्जर समाज व्यवस्था की पुनर्संरचना का बृहद् आह्वान है जिसके मूल में है व्यक्ति-वर्ग और वर्ण के आपसी सम्बन्धों के ढांचे को आमूल बदलने की आकांक्षा? कहना न होगा कि प्रेम और समर्पण की प्रतिमूर्ति के रूप में निपुणिका का मुखर जय-निनाद सत्य से आंख चुराती लेखकीय मनोवृत्ति को ढांपने का प्रयास है।

सामाजिक समस्याओं से किनारा करने की लेखकीय प्रवृत्ति ‘चारु चंद्रलेख’ में भी द्रष्टव्य है जहां चंद्रलेखा की भांति कुमारी-पूजन को सामाजिक विकृति समझने के बावजूद (”स्त्री पूजा के इस विकृत रूप को मैं एकदम नहीं समझ पाती. . . .सच्चा होकर भी आदमी गलत आचरण कर सकता है”, पृ0 112) वे इसे तंत्र-साधना के लिए अनिवार्य सोपान मानते हैं। किसी भी समस्या का आलोचनात्मक विश्लेषण और उसके विरुद्ध जनमत तैयार करना उसके भौतिक संज्ञान के बिना संभव नहीं। आचार्य द्विवेदी की पारलौकिक दृष्टि भौतिक यथार्थ का निषेध करती हुई सिद्धि, साधना और दर्शन की जटिल गुत्थियां खोल डालना चाहती है। अतः वे तत्परतापूर्वक कुमारी-साधना का विस्तृत परिचय अनिवार्य पृष्ठभूमि के साथ देते हैं  ; कुमारी साधना के लिए अपनी कन्याओं को समर्पित करने वाले माता-पिता के अप्रतिम बलिदान की मुक्त कंठ से सराहना करते हैं  तथा किसी भी प्रकार की साधना के लिए लड़कियों की कमनीय काया की अनिवार्यता को रेखांकित कर गद्गद भाव से स्त्री को महिमामंडित करते हैं। तब इस प्रक्रिया में अनायास भूल जाते हैं कि विशुद्ध ब्राह्मणवादी मनोवृत्ति का परिचय देते हुए तथा विषमतामूलक समाज व्यवस्था की अभ्यर्थना करते हुए वे स्वयं कितनी कुत्सित एवं रुग्ण मान्यताओं का अनुमोदन कर रहे हैं – ”प्रकृति के जड़ पिंडों का जितना सुंदर और सामंजस्यपूर्ण संघात मानव देह है उतना और कुछ भी नहीं है। मानव देह में भी किशोरावस्था का शरीर सर्वोत्तम है। . . .उसमें सब कुछ विकसित हो गया होता है और क्षयोन्मुख कुछ भी नहीं होता। . . . जिस मनुष्य को जितना ही नीच समझा जाता है, उसके मन और बुद्धि को विकसित होने से उतना ही वंचित किया जाता है। इसलिए नीच कही जाने वाली जातियों में मन और बुद्धि का बाहर प्रस्फोट नहीं हो पाता। वह शरीर के भीतर ही भीतर जड़ पिंड को उत्तेजना देते रहते हैं। इसलिए देवि, नीच समझी जाने वाली जातियों का शरीर साधना का सर्वोत्तम साधन है, उसमें भी स्त्री शरीर अधिक श्रेष्ठ है तथापि किशोरावस्था दुर्लभ है।” (चारु चंद्रलेख, पृ0 109) बेशक तुरंत अपनी भूल का परिमार्जन करते हुए वे मनुष्य जीवन में तंत्र-मंत्र की उपयोगिता को खारिज करने में जुट जाते हैं  लेकिन अंत तक न तो स्त्री और दलित के संदर्भ में वर्णाश्रम धर्म की महत्ता एवं उपयोगिता स्थापित कर पाते हैं, और न ही अपनी इस कसौटी पर उसे खरा सिद्ध कर पाते हैं कि ”केवल परदुखकातरता, अपार करुणा, कठोर आत्मदमन और अनाविल सत्यनिष्ठा, यही क्या मनुष्यता की विशेषता नहीं है?” कहना न होगा कि आचार्य के ब्राह्मणवादी संस्कार उन्हें सदैव आत्मनिरीक्षण से निरस्त करते रहे हैं। अन्यथा क्या वजह है कि स्त्री एवं नीच कही जाने वाली जातियों के मन, बुद्धि और तन का आखेट करती कर्मकांडी व्यवस्था के अहम्मन्य स्वार्थपरक शोषक रूप को नहीं देख पाते , जो महाराज की उपाधि धारण करने पर भी हरिश्चंद्र को ‘डोम’ मानने का अहंकार मन में पाले हैं,  क्योंकि ”यह विधान मनुष्य के बदलने से थोड़े ही बदल जाएगा। वह तो विधाता का विधान है।” (चारु चंद्रलेख, पृ0 250) यह वही व्यवस्था है , जो कुमारी पूजन के जरिए स्त्री की आराधना करने के छद्म में हर मंगल-अमंगल का अभिषेक-निदान करने हेतु कन्या बलि की परंपरा का सूत्रपात करती आई है। उल्लेखनीय है कि जहां आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी संदर्भ होते हुए भी विषय से कतरा कर निकल गए हैं, वहीं संदर्भ न होते हुए भी तस्लीमा नसरीन स्वतंत्र लेख के जरिए ‘नष्ट लड़की नष्ट गद्य’ में कन्या पूजन/बलि की अमानवीयता की पड़ताल करती हैं। कहना न होगा कि विश्लेषणशील संदेही दृष्टि से विच्छिन्न कर्मकांडी शास्त्रीय मेधा अंततः आचार्य की परंपरावादी रुग्ण स्त्री दृष्टि का ही निदर्शन करती है।

सोजर्नर ट्रूथ: साहस और विवेक की मूर्ति

विजय शर्मा

अनुवादक और आलोचक विजय शर्मा की पांचवी किताब ‘अफ्रो-अमरीकन साहित्य : स्त्री स्वर’ हाल में प्रकाशित हुई है . संपर्क :vijshain@gmail.com .

19 वीं  शताब्दी  में  ब्लैक  स्त्रीवादी  सोजर्नर भी  वैसे  ही  तिहरे स्तर पर  संघर्ष करती  रही  हैं , जिन स्तरों पर  आज  दलित  स्त्रीवादी  स्त्रियों  को जूझना  पड़ता  है . सोजर्नर ट्रूथ की  कहानी आलोचक  विजय  शर्मा  की  नई  पुस्तक  ‘अफ्रो-अमरीकन साहित्य : स्त्री स्वर’ से . 


अश्वेत पुरुषों के अपने अधिकार पाने का खूब शोर है, लेकिन अश्वेत स्त्री के लिए एक शब्द नहीं; और अगर अश्वेत आदमी अपने अधिकार पा गए, और अश्वेत स्त्री अपने नहीं पाती है तो आप देखेंगे कि अश्वेत आदमी औरतों के मालिक बन जाएँगे, और यह बुरा होगा। –   सोजर्नर ट्रूथ, हिस्ट्री ऑफ़ वूमन सफ़रेज

बौद्धिक अकादमीय प्रशिक्षित व्यक्ति शक्ति समूहों के फ़ायदे की बात प्रस्तुत करते हैं। इसके विपरीत सहज (ऑर्गैनिक) बौद्धिकता सामान्य ज्ञान (कॉमन सेंस) पर निर्भर करती है और उनके अपने समूह के हित का प्रतिनिधित्व करती है। सोजर्नर ट्रूथ इसी प्रकार की सहज बौद्धिकता संपन्न स्त्री थी। उसकी बौद्धिकता अपने अनुभवों से विकसित हुई थी। उसके समय के लोग उसे खारिज करना चाहते थे, उसकी बौद्धिकता को मानने का अर्थ था, सामाजिक ऑर्डर को चुनौती देना स्वीकार करना। इसलिए जब वह बोलने खड़ी हुई तो बहुत लोगों को आपत्ति थी। न केवल पुरुषों को आपत्ति थी बल्कि स्त्रियाँ, स्त्री के अधिकारों की बात करने वाली स्त्रियाँ भी नहीं चाहती थीं कि वह उनके मंच को साझा करे। नस्ल को लिंग के ऊपर प्राथमिकता से इंकार करके ट्रूथ ने एक बहुत विद्रोही विचार को जन्म दिया, उसने स्त्री को एक नई परिभाषा दी। आज की स्त्री विशेषकर अश्वेत स्त्री अस्मिता के बीज डाले।

एंटोनिओ ग्राम्सी के अनुसार प्रत्येक सामाजिक समूह बौद्धिकों का एक या एक से अधिक स्तर उत्पन्न करता है, जो समरूपता देते हैं और अपने कार्यों को जागरुकता प्रदान करते हैं, न केवल आर्थिक मामलों में वरन सामाजिक और राजनैतिक मामलों में भी। सोजर्नर ट्रूथ एक ऐसी ही बौद्धिक स्त्री थी,  जिसने न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक और राजनैतिक मामलों को नया मोड़ दिया और स्त्री-पुरुष समानता की बात की, वरन उसके लिए संघर्ष भी किया। सोजर्नर ट्रूथ का जन्म का नाम इसाबेला था। उसका जन्म कब हुआ ठीक पता नहीं, पर स्वीकारा गया है कि वह १७९७ में पैदा हुई थी। न्यू यॉर्क के अल्सटर काउन्टी में एक गुलाम परिवार में उसका जन्म हुआ था। उसके पिता का नाम जेम्स और माता का नाम एलीज़ाबेथ बोम्फ़्री था। उसका परिवार डच भाषा-भाषी था। बाद में थॉमस नामक एक गुलाम से उसका संबंध हुआ, जिसके पहले से चार या पाँच बच्चे थे। वह सदा तेरह बच्चों की बात करती थी। कदाचित बलात्कार और दूसरे लोगों के द्वारा किए गए अत्याचार को वह इस रूप में बताती थी।

सोजर्नर का सारा जीवन संघर्ष और साहस की कहानी है। १८२६ में वह गुलामी से भाग निकली। संयोग से इसके एक साल बाद न्यू यॉर्क में गुलामी प्रथा समाप्त हो गई और इस तरह १८२७ में वह पूरी तरह स्वतंत्र हो गई। गुलामी प्रथा कानूनन समाप्त हो गई थी , मगर गैरकानूनी तरीके से गुलामों की खरीद-फ़रोख्त जारी थी। सोजर्नर के बेटे पीटर को इसी तरह बेच दिया गया। वह चुप बैठने वाली नहीं थी, उसके ‘सोसाइटी ऑफ़ फ़्रेंड्स’ (क्वेकर्स) की सहायता से दावा ठोंक दिया। उस समय यह बहुत हिम्मत वाला काम था।

१८२९ में वह रहने के लिए न्यू यॉर्क चली आई। यहाँ उसने कुक, नौकरानी और धोबन का काम किया। वह मेथोडिस्ट और एपिस्कोपल ज़िओन दोनों चर्च में जाती थी। १८४३ में उसने एक और अभूतपूर्व काम किया, खुद अपना नाम बदल कर सोजर्नर ट्रूथ कर लिया। इसके साथ वह प्रवचन देने लगी। उसने दासता विरोधी आंदोलन में जोश के साथ काम करना शुरु किया। वह बोलने में कुशल थी, सीधी-सादी भाषा में अपनी बात कहती थी, उसके बातें अनुभवजन्य होतीं अत: लोगों के दिल पर असर करतीं। कुछ सालों तक वह देश में घूम-घूम कर दासता विरोधी भाषण देती रही। उसकी बात सुनने लोग बड़ी संख्या में जमा होते। वह पढ़ी-लिखी न हो कर भी असाधारण थी। वह खुद लिख नहीं सकती थी, पर उसने ऑलिव गिल्बर्ट को बोल कर १८४० में अपनी आत्मकथा ‘नरेटिव ऑफ़ सोजर्नर ट्रूथ’ लिखवाई। १८५० से उसने स्त्री अधिकारों के लिए संघर्ष को अपना मिशन बना लिया। अमेरिकी गृह युद्ध के समय उसके किए गए कार्यों से खुश हो कर राष्ट्रपति एब्राहम लिंकन ने उसे १८६४ में व्हाइट हाउस में बुला कर सम्मानित किया। युद्ध के बाद वह स्वतंत्र गुलामों को काम खोजने में सहायता देने लगी। इतना ही नहीं उसने सरकार को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह पश्चिम में पहले गुलाम रहे लोगों को भूमि आवंटित करेगी।

सोजर्नर ट्रूथ ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। लेकिन उसकी ख्याति एक खास घटना के कारण है। आज से डेढ़ सौ साल पहले एक दिन इंडियाना की गुलामी विरोधी एक सभा में श्वेत स्त्री-पुरुषों के सामने सोजोर्नर ट्रूथ ने अपनी छाती खोल कर सिद्ध किया कि वह एक औरत है। जो स्त्री गुलामी से स्वतंत्रता की लंबी यात्रा कर  के आई थी उसके लिए अपनी छाती खोल कर दिखाना एक सामान्य बात थी। उसे दर्शकों से कोई भय या शर्म नहीं थी। उसे इस बात का गर्व था कि वह अश्वेत है और एक स्त्री के रूप में जन्मी है। लोगों का पूर्वाग्रह बहुत प्रबल होता है। उस समय अमेरिका में अधिकाँश श्वेत लोगों के मन में अश्वेत स्त्री के प्रति घृणा और अनादर का भाव था। उनकी निगाह में अश्वेत स्त्री मात्र पशु थी, केवल एक जिंस थी। जब वह बोलने खड़ी हुई तो कुछ श्वेत पुरुष चाहते थे कि उसे अलग ले जा कर पहले जाँच लिया जाए कि वह एक स्त्री है। सोजर्नर ट्रूथ ने कहा कि उसने उनके बच्चों को अपनी इसी छाती का दूध पिलाया है और वे जानना चाहते हैं क्या वह एक स्त्री है? छाती खोल कर दिखाने के बावजूद श्वेत पुरुष चीख-चिल्ला रहे थे। वे चीख-चीख कर कह रहे थे कि उन्हें विश्वास नहीं है कि वह वास्तव में एक औरत है।

श्वेत पुरुष ही नहीं श्वेत स्त्रियाँ भी अश्वेत स्त्री के प्रति मन में कोई अच्छा भाव नहीं रखती थीं। इसे वे बिना किसी शर्म और झिझक के कहती थीं। जब ओहाओ के एक्रोन नामक स्थान में १८५२ में स्त्री अधिकारों के आंदोलन के द्वितीय सालाना जलसे में बोलने के लिए सोजर्नर ट्रूथ खड़ी हुई तो श्वेत स्त्रियों को यह अपना अपमान लगा। वे एक अश्वेत स्त्री को सुनना नहीं चाहती थीं और वे बार-बार चिल्लाने लगीं, ‘उसे मत बोलने दो! उसे मत बोलने दो!’ ट्रूथ ने उनके विरोध की परवाह नहीं की और अपनी बात कहती गई। वह पहली नारीवादी है जिसने लोगों का ध्यान अश्वेत स्त्री की ओर खींचा और बताया कि परिस्थितियों से मजबूर हो कर अश्वेत स्त्री ने बहुत सहा है और वह अश्वेत पुरुष के जितनी मेहनत करती है और स्त्री को पुरुष के बराबर का अधिकार मिलना चाहिए।

यह संयोग था कि सोजर्नर के बोलने से ठीक पहले जो वक्ता मंच पर था। उसने दावा किया था कि स्त्री शारीरिक रूप से आदमी से कमजोर होती है, अत: वह उससे हीन है और उसे बराबरी का दर्जा नहीं मिलना चाहिए। उसे सदैव पुरुष की सहायता की जरूरत पड़ती है। बग्घी में चढ़ना-उतरना हो अथवा चहबच्चा पार करना हो, उसे पुरुष की सहायता चाहिए होती है। ट्रूथ ने उसकी बातों का मुँहतोड़ जवाब देते हुए जो कहा वह आज इतिहास में दर्ज है।

ट्रूथ ने कहा कि वह आदमी ने कह रहा कि औरतों को बग्घी में चढ़ने-उतरने में सहायता चाहिए होती है, गड्ढ़ों-चहबच्चों को पार करवाना होता है। मुझे किसी ने बग्घी में चढ़ने में हाथ बढ़ा कर सहायता नहीं दी, किसी ने हाथ पकड़ कर गड्ढ़े-चहबच्चे पार नहीं करवाए। मुझे किसी ने सम्मानजनक स्थान पर नहीं बिठाया। क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? मेरी ओर देखो! मेरी बाहों को देखो!… मैंने हल चलाया है, खेती की है, फ़सल इकट्ठा करके खलिहान में पहुँचाई है। कोई पुरुष मुझसे अधिक काम नहीं कर सकता है और क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? मौका मिलने पर मैं आदमी के बराबर काम कर सकती हूँ, उतने ही कोड़े खा सकती हूँ। क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? मैंने पाँच बच्चे पैदा किए और अपनी आँखों के सामने उन्हें गुलाम के रूप में बिकते देखा और जब माँ के दु:ख से रोती हूँ तो केवल जीसेस सुनता है – क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? अंत में जो बात ट्रूथ ने कही वह बात सोचना और उसे कहना उसकी बुद्धि और साहस का परिचायक है। उसने कहा कि जब जीसेस पैदा हुए तो स्त्री और ईश्वर था, उसमें आदमी कहाँ था? उसने कहा यदि ईश्वर की बनाई प्रथम स्त्री इतनी मजबूत थी कि उसने अकेले दुनिया ऊपर से नीचे कर दी, उल्टी कर दी तो आज ये सारी औरतें मिल कर उसे वापस सीधा कर सकती हैं।


सोजर्नर ट्रूथ शारीरिक बनावट में एक मजबूत स्त्री थी, उसकी कद-काठी खासी थी। वह पाँच फ़ुट ग्यारह इंच लम्बी थी। जो लोग स्त्री को नाजुक और कमजोर मानते थे उनके सामने एक प्रत्यक्ष विपरीत तस्वीर के रूप में वह उपस्थित थी। जो लोग सोचते थे कि स्त्री अपने निर्णय लेने में समर्थ नहीं है उनके लिए ट्रूथ एक मजबूत स्तम्भ के रूप में खड़ी थी। उसने अपने काम, कोड़ों की मार का हवाला दे कर तथा अपने बच्चों और उनके गुलाम के रूप में बिकने की बात कह कर लोगों को स्त्री की सहनशक्ति पर सोचने के लिए मजबूर किया। उसने नई अश्वेत स्त्री को मूर्तिमान किया। अगले दिन ओहिओ के अखबार एंटी-स्लेवरी बिगुल ने इसकी रिपोर्टिंग की। सोजर्नर ट्रूथ के बोलने का उसके दर्शकों पर जो प्रभाव पड़ा उसके बारे में लिखा।

नारी अधिकारों की बात करने वाली कोई श्वेत स्त्री ऐसे निजी अनुभव नहीं रखती थी। किसी के पास ऐसी खरी बातें कहने का न तो मुँह था और न ही साहस। अमेरिकन इतिहासकारों ने नस्ल और लिंग को ऐसे प्रस्तुत किया हुआ था कि काफ़ी समय तक अमेरिकन अश्वेत स्त्री के प्रयासों और योगदान को स्त्री अधिकारों के आंदोलन में शामिल नहीं किया जाता था। आज स्थिति बदल चुकी है। उनके योगदान को अनदेखा करके नारी अधिकारों की बात नहीं की जा सकती है। इस स्थिति के लिए सोजोर्नर ट्रूथ जैसी अश्वेत स्त्रियाँ जिम्मेदार हैं। स्त्री अधिकारों के आंदोलन में इनके शामिल होने की बात सबसे पहले एलीनॉर फ़्लेक्सनर की १९५९ में आई किताब में दिखाई देती है। ट्रूथ अपने अनुभवों के आधार पर बोलती थी। उन्होंने शारीरिक अपमान, शोषण, क्रूरता, बलात्कार सहा था।  वे न केवल बची रहीं वरन विजयी हो कर निकली तथा दूसरों की मुक्ति में सहायक बनीं। वह एक माँ, एक गुलाम के रूप में मिले अपने अनुभव साझा करती थीं। सामाजिक विरोध की परवाह न करते हुए उनके बोलने से अन्य कई स्त्रियों को बोलने का साहस, प्रेरणा और उत्साह मिला।

जब आंदोलन चल रहा था तो उसमें अश्वेत पुरुष आगे-आगे थे। अश्वेत पुरुष खुद लीडर बने हुए थे और  अपनी स्त्रियों को पीछे ढ़केला हुआ था। उन्हें सेक्रेटरी, चाय-पानी बनाने-देने का काम सौंप रखा था। जन-सभाओं, रैलियों, लंच-डिनर के समय ये पुरुष बड़ी-बड़ी बातें करते लेकिन पुरुष वर्चस्व को पूरी तरह कायम रखते। कभी खुल कर स्त्री के प्रति भेदभाव के विषय में नहीं बोलते। उनके यहाँ पितृसत्तात्मकता का पूरा बोलबाला था। सोजोर्नर ट्रूथ जैसी स्त्रियों ने इस सिस्टम को चुनौती दी। कहने को १९ वीं सदी में स्त्री कार्यकर्ता श्वेत-अश्वेत स्त्रियों की एकता की बात करतीं, आंदोलन में सोजर्नर ट्रूथ जैसी स्त्रियों की उपस्थिति को रेखांकित करतीं, दिखाती कि वे नस्लवाद के खिलाफ़ हैं। लेकिन जब भी ट्रूथ बोलने खड़ी होती वे उसका विरोध करतीं। जब जनरल फ़ेडरेशन ऑफ़ वीमेन्स क्लब के सामने रंग का प्रश्न उठा तो जॉर्जिया वीमेन्स प्रेस क्लब की सदस्यों का कहना था यदि अश्वेत लोगों को सदस्य बनाया गया तो वे फ़ेडरेशन से हट जाएँगी।

ट्रूथ के विषय में हमें दूसरों के द्वारा लिखे से ज्ञात होता है। उसके प्रसिद्ध भाषण “अयंट आई अ वूमन” को उस घटना के बाद एक फ़ेमिनिस्ट एबोलिसनिस्ट ने रिपोर्ट के रूप में लिखा था। असल में उसने क्या कहा था आज हमें मालूम नहीं। इसके बावजूद यह तय है कि उसने स्त्री की नई परिभाषा गढ़ी। भले ही वह अनपढ़ थी पर उसने जो तर्क दिए वे किसी बौद्धिक तर्क से कम नहीं थे। वह अपने समय से आगे की स्त्री थी। उसने अश्वेत पुरुष की चालाकी को पकड़ लिया था। वह वोट देने के बराबरी के अधिकार की हिमायत कर रही थी। वह श्वेत-अश्वेत, स्त्री-पुरुष सबको आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक बराबरी देने की बात कर रही थी। वह शोषण के खिलाफ़ आवाज बुलंद कर रही थी।

बाद में सोजर्नर ट्रूथ की बात बता कर अन्य आंदोलनकारी खुद प्रेरणा पाते और दूसरे लोगों को आंदोलन में भागीदारी करने के लिए तैयार करते। करीब सौ साल बाद जब माया एंजेलो लोगों को उसकी बात बताती तो लोग मंत्रमुग्ध हो कर सुनते। १८८३ में गुजरने वाली इस अश्वेत स्त्री पर अश्वेत स्त्रियों को गर्व है। ऐसी साहसी और निर्भीक स्त्री पर न केवल अश्वेत स्त्री बल्कि समस्त स्त्री जाति को इतना ही नहीं समूची मानवता को गर्व होना चाहिए।

स्त्री-विमर्श के ‘महोत्सव’

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : mamushu46@gmail.com .

पांच सालों बाद फेसबुक पर एक बार फिर स्त्री की आजादी के सवाल पर बहस छिड़ी है . बहस का केंद्र जरूर बदला है . पांच साल पहले सत्तावान पुरुष लेखक ने आजाद औरतों को ‘ छिनाल’ और ‘ निम्फोमैनिक कुतिया’ कहा था. तब लेखिकाओं ने मुखरता से विरोध किया था. इन पांच सालों में बहुत कुछ बदला . विरोध में आई कई लेखिकायें अब या तो ‘ सत्तावान पुरुष’ की प्रशस्ति में शब्द खर्च कर रही हैं या उससे अपनी प्रशस्ति लिखवा रही हैं . उधर उसके खिलाफ सबसे मुखर आवाज ने अपने चिंतन को लगभग वहीं खड़े करते हुए लिखा , ‘ कौन कहता है कि औरत को आज़ादी नहीं दी हमारे पुरुषों ने ,बेशक आज़ाद किया है उसे ,खाने कमाने , प्रेम और सैक्स करने को , किया है मगर तवायफ़ बना के .’ जरूरी था कि हंगामा बरपे , बरपा भी फेसबुक पर लोगों ने इस कथन का प्रतिवाद किया. लेखिका और आलोचक अर्चना वर्मा ने पांच साल पहले  ‘ सत्तावान पुरुष’ के लम्पट वक्तव्य के प्रसंग में एक लेख लिखा था , कथादेश में . यह अब भी प्रासंगिक हो गया है . संपादक


तकरीबन आठ दस साल पहले की बात होगी। ‘कथाक्रम’ के नवम्बरी सालाना आयोजन का विषय उस बार स्त्री-विमर्श था। दो दिन के कार्यक्रम के बीच किसी अवकाश में मुझसे एक युवा पत्रकार ने साक्षात्कार में इस आशय का एक सवाल पूछा था कि क्या वाकई बुज़ुर्गों की इस आशंका के सच होने का समय आ गया है कि समाज रसातल को जा रहा है? बुज़ुर्गों के बहाने वह अपनी आशंका को आवाज़ दे रहा हो तो कोई ताज्जुब नहीं। फ़र्क यहाँ वृद्ध और युवा का उतना नहीं है जितना स्त्री-विमर्श के विरुद्ध शेष समाज का है जिसमें केवल पितृसत्ताक् मानसिकता से संचालित पुरुष ही नहीं, एक हद, बड़ी हद तक स्त्रियाँ भी शामिल हैं। शरीफजात मध्यवर्गीय हिन्दीभाषी समाज में, साहित्य और साहित्येतर दोनो, जहाँ से अधिकांश लेखक और पाठक वर्ग आता है, स्त्री-विमर्श को अभी तक आशंका, अविश्वा स, अवमानना, शायद भय और निश्चिड़त आक्रामकता के साथ देखा जाता रहा है। यहाँ आज भी स्त्री की हैसियत से उसका जीवन स्त्री-देह के द्वारा परिभाषित होता है और वर्चस्व, दमन व शोषण के जो भी अतिरिक्त पैमाने उस पर आयद होते हैं, उनका परिणाम स्त्रीदेह की सन्दिग्धता, दुर्बलता व आक्रमण-योग्यता का आदर्शीकरण है। इसकी वजह से आज भी बड़े पैमाने पर उसके लिये अपने अस्तित्व का मतलब निरन्तर एक हमलावर दुनिया में असुरक्षित, भयभीत, आशंकित मनःस्थिति में जीना है, जहाँ दैहिक पवित्रता जैसी सहज भंगुर वस्तु की रक्षा की जिम्मेदारी उसके सिर पर लाद तो दी गयी है लेकिन जहाँ उसके अपने अपर्याप्त बूते के अलावा मानो बाकी हर किसी ने उसे खण्डित करने की ही कसम खाई हुई है। अस्तित्व की इन्हीं सीमाओं के विरुद्ध उसका विद्रोह है और इसी विद्रोह के विरुद्ध बुज़ुर्गों की तथाकथित आशंका है कि समाज के रसातल को जाने का समय आ गया है। मानो रसातल को जाने का एकमात्र यही कारण हो और समाज को बचाने की जिम्मेदारी अकेले स्त्री की हो और मानो इस तरह से समाज का बचना संभव ही हो।

स्त्री-विमर्श अभी भी हमारे समाज के लिये आत्म-परीक्षण और आत्मालोचन को उकसाने का समुचित कारण नहीं बन सका है। इसी मानसिकता का नवीनतम जलवा नया ज्ञानोदय के बेवफ़ाई सुपर-विशेषांक के मशहूर साक्षात्कार के और भी मशहूर उद्धरण में धधक रहा है – ” कह सकते हैं कि यह (स्त्री) विमर्श बेवफ़ाई के विराट उत्सव की तरह है।लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिये कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है।”
विराट शब्द तो बहुत बड़ा है, लेकिन हिन्दी का स्त्री-विमर्श चाहे कितना भी विकलांग, अधूरा, एकतरफ़ा, और अपर्याप्त क्यों न कहा जाता हो, इतनी चेतना तो उसने जगाई ही है कि इस पुरुषवादी मानसिकता की अभिव्यक्ति के विरुद्ध ऐसा न्यायाधिकार-परायण एकजुट आवेश और प्रतिरोध, एकमत आक्रोश और अभियान संभव हुआ है। निश्चबय ही यह स्त्री-विमर्श के लिये महोत्सव का एक कारण है।

नाम सिर्फ़ एक नाम नहीं. यह उद्धरण यहाँ अपने वक्ता के नाम के बिना ही ही पेश किया जा रहा है। इसकी वजह सिर्फ़ इतनी भर नहीं कि मामला अगर मशहूर और सुर्खि़यों में मौजूद है तो आश्व स्त हुआ जा सकता है कि पाठक नाम के बिना भी जान ही गये होंगे, बल्कि यह है कि बात सिर्फ़ एक नाम की नहीं, एक पूरे साँचे की है जिसमें से यह मानसिकता ढल कर निकलती है। लेकिन, बेशक नाम की अपनी एक बेहद ज़रूरी अहमियत है, क्योंकि अमूर्त के ख़िलाफ़ अमूर्त को यथार्थ के मैदान में उतारने के लिये मुद्दों का एक मूर्त ठोस आकार लेना ज़रूरी है। अन्यथा मानसिकता और उसको ढालने वाले साँचे के ख़िलाफ़ कोई भी लड़ाई दरअसल  कोई ठोस और असली लड़ाई नहीं बन पाती, युद्ध के लिये प्रयाण का भ्रम पाले रख कर, हवा में अनन्तकाल तक एक हवाई तलवार भाँजते हुए मैदान के आदि से अन्त तक आना जाना निष्फल निर्बाध चलता रह सकता है।हिन्दीभाषी समाज में स्त्री-विमर्श अभी अपनी प्राथमिक परिभाषा के आस-पास ही ठिठका हुआ है, अभी भी वह स्त्री के
प्रति सामाजिक अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ाई है। सशक्तीकरण की शुरुआत सजग चेतना के उदय से होती है, व्यक्तिगत स्तरों पर थोड़ा बहुत हुई भी है लेकिन बड़े पैमाने पर वह शुरुआत होनी अभी बाकी है।
सामाजिक साँचों और अलिखित अनुबन्धों के ख़िलाफ़ लड़ाई के दो पक्ष हुआ करते हैं – तात्कालिक और दीर्घकालीन। अभी उपस्थित छिनाल-प्रसंग ‘तात्कालिक’ का एक उदाहरण है, सहसा उठ खड़ी एक ऐसी घटना जिसके इर्द-गिर्द एक कोलाहल जमा होकर मुद्दे में बदल गया है। फ़िलहाल यह घटना एक व्यक्तिवाची संज्ञा है, एक नाम। जातिवाची संज्ञाओं के जरिये चलने वाले अमूर्त वैचारिक विमर्श में व्यक्तिवाची संज्ञाएँ एक ऊर्जा-तरंग जोड़ देती हैँ। टकराहट से पैदा होने वाला क्षोभ और उद्वेग एक वैचारिक व्यग्रता और पर्युत्सुकता को जन्म देता है लेकिन केवल वैयक्तिक उठापटक तक सीमित और गाली गलौज में विघटित होकर रह जाने की संभाव्य नियति को भी। अखबारी सुर्खियों से मिलने वाला विस्तार अगर इस विघटन के पैमाने का विस्तार बनकर ही रह जाए, व्यग्रता को वैचारिक पर्युत्सुकता में न बदल पाए, तो यह अखाड़े से उठी धूल से अधिक कुछ नहीं जो थोड़ी देर में बैठ जाएगी।

यह मानने से इंकार नहीं कि हिन्दी के साहित्यिक स्त्री-विमर्श की अपनी न्यूनताएँ और अपर्याप्तताएँ हैं, उसमें वैचारिक क्षमता और मननशीलता अभी उतनी प्रौढ़ और पुष्ट नहीं जितनी कि भाव-प्रबलता, अनुभव-लिप्तता, और उद्गाढ़र-प्रवणता। अक्सर वह विमर्श से अधिक हाहाकार जैसा सुनाई पड़ता है। लेकिन भाव, अनुभव, उद्गा र, हाहाकार सबकुछ विश्लेहषण की सामग्री है, सत्यों और तथ्यों का ऐसा आगार जिससे वैचारिक आन्दोलन की आधारशिला खड़ी होती है। इंकार यह मानने से भी नहीं कि उल्लिखित साक्षात्कार के जिस अनुच्छेद से यह उद्धरण लिया गया है उसके अतिरिक्त शेष पूरा वक्तव्य स्त्रीवाद का स्टॉक-विमर्श है और उसमें ऐसी बहुत सी बातें हैं जो ऐसे प्रसंगों में स्त्री-पक्ष से कही जाती हैं। कहा गया है कि बेवफ़ाई को समझने के लिये धर्म, वर्चस्व और पितृ-सत्ता जैसी अवधारणाओं को समझना होगा, धर्मों ने स्त्री की यौनिकता को परिभाषित किया है, स्त्री के शरीर की वर्चस्ववादी व्याख्या की है, जैसे जैसे स्त्रियाँ व्यक्तिगत सम्पत्ति और क्रयशक्ति की मालकिन होती जा रही हैँ धर्म द्वारा प्रतिपादित वर्जनाएँ टूट रही हैं, एंगेल्स को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि जब तक सम्पत्ति और उत्पादन के स्रोतों पर स्त्री-पुरुष का समान अधिकार नहीं होगा पुरुष इस स्थिति फ़ायदा स्त्री के भावनात्मक शोषण के लिये लेगा, बेवफ़ाई एक पॉवर डिस्कोर्स है इत्यादि, इत्यादि। वे सभी बातें यहाँ कह दी गयी हैं और कुछ एक साहित्यिक सहकर्मियों पर वे आक्रमण भी कर दिये गये हैं जिनमें शामिल होकर अपनी न्यायप्रिय मंशा और सद्भा वना का प्रमाणपत्र पाया जा सकता है।

वस्तुतः किसी भी समय का जो प्रचलित विमर्श होता है उसका वाग्जाल पकड़ लेना और वक्त – मौके पर उसके तर्क पेश कर देना जितनी सहजता से संभव है उतना ही सहज रूप से संभव और ज़रूरी यह प्रायः और शायद नहीं होता कि यह वाग्जाल और ये तर्क वस्तुतः कहने वाले की असली मंशा और मनोभावना को अभिव्यक्त करते हों। कम से कम स्त्री-विमर्श के लिये वे सहज-विश्वहसनीय तो वे नहीं हो सकते। पितृसत्तात्मक सामाजिक साँचे में ढली जिस मानसिकता की बात पहले कही गयी है, वह इस सैद्धान्तिक वाग्जाल और तर्कविन्यास के परत-दर-परत लपेटे में सत्तर पर्दों के भीतर औचित्य के आडम्बर में छिपी बैठी रहती है। वह तो कहीं किसी असावधान क्षण में अचेतन अपनी पर्दाफाड़ अभिव्यक्ति से असलियत को उजागर कर देता है वरना हमारा बौद्धिक समुदाय इतना चतुर तो है ही कि ज्ञानी गुनी उदारता का दिखावटी तामझाम फैलाकर अपनी पुरुषवादी मानसिकता का पता न पड़ने दे।

एक अवान्तर प्रसंग की तरह यह मसला यथा-तथा न्याय की किंचित स्मितिजनक मिसाल है। बरबस याद हो आता है कि ‘हंस’ के दूसरे स्त्री-विशेषांक का संपादन करते समय मैने राजेन्द्र जी के ‘होना सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ नामके आलेख का प्रकाशन आगामी मास में विशेषांक की अतिरिक्त सामग्री के साथ छापने के आशय से स्थगित किया था। स्थगित करने की वजह यह आशंका थी कि उसकी ‘दिल-फ़रेब’ कथन-शैली मुख्य अंक की अपेक्षाकृत गंभीर बातचीत से ध्यान भटका कर बहस को पटरी से उतार देगी अन्यथा वह आलेख सोद्देश्यि पितृसत्तात्मक सामाजिक साँचे में ढली पुरुष मानसिकता ( अकेले राजेन्द्र यादव की नहीं) को उजागर करते हुए लिखा गया था और मेरा इरादा एक संक्षिप्त टिप्पणी के साथ उसे स्त्री-विमर्श के पूर्वपक्ष की तरह प्रस्तुत करने का था। यह बात अलग रही कि राजेन्द्र जी से अगले अंक तक का भी धैर्य नहीं रखा गया था और उन्होंने इस आलेख को विशेषांक के साथ साथ बाज़ार में लाने के लिये संपादक श्री विभूतिनारायण राय को ‘वर्तमान साहित्य’ में छापने के लिये के लिये सौंप दिया था। आलेख के साथ संपादिका के स्त्रीसुलभ निरंकुश अत्याचार से पीड़ित पुरुष संपादक के चीत्कार समेत एक संक्षिप्त आमुख भी था। संपादक जी को बिन माँगे मुराद मिली। किया उन्होंने यह कि लेख उस अंक में नहीं छापा गया, उसके बाद साल भर तक भी किसी अंक में नहीं छापा गया, इस बीच बार बार वापस माँगने के बावजूद वापस भी नहीं किया गया। साल भर बाद जब छापा गया तब उसके पास न स्त्री-विशेषांक का संदर्भ था जिसका उसे पूर्व-पक्ष होना था, न राजेन्द्र जी का अपना आमुख था जो उसके रचे जाने को कोई सन्दर्भ दे सकता था और पराई पत्रिका में संपादिका की परिचयात्मक टिप्पणी की तो कोई संभावना ही नहीं थी। संपादक श्री विभूतिनारायण राय की अपनी टिप्पणी ज़रूर थी जो पाठक को पुकार कर राजेन्द्र यादव की रुग्ण और विकृत मानसिकता के दर्शन का निमन्त्रण देती थी। स्वाभाविक ही था कि श्री राय के निमन्त्रण के उत्तर में उस आलेख की व्यंजना को अभिधा की तरह पढ़ा गया और अगले कई साल कई दसियों अखबारों और पत्रिकाओं के कई हज़ार पन्ने राजेन्द्र यादव की ‘उस’ मानसिकता को कोसने और सरापने में खर्च किये गये जो दर अस्ल उनकी (शायद) नहीं, उनके समाज के बहुसंख्य पुरुष समुदाय की थी और जिसे उन्होंने स्वेच्छा से सोद्देश्य  उजागर करने का ख़तरा उठाया था।
पुरुषवादी मानसिकता से शुरू कर यहाँ तक आने – पहुँचने में शायद उन्होंने एक लम्बी और बीहड़ यात्रा तय की होगी। उन पर हमला करने वालों में स्त्रियों से कई गुना अधिक गिनती में पुरुष थे – हमारे ऐसे ही सद्गृंहस्थ सज्जन सामाजिक बौद्धिक जन जो अनुकूल विमर्श के लपेटे में अनुकूल तर्कों का जाल बिछाते हुए चौकन्ने रहते और अपनी असलियत का पता नहीं पड़ने देते, जब तक कि यथा-तथा न्याय के ऐसे उदाहरणों में असलियत खुद प्रकट नहीं हो जाती।

तो राजेन्द्र हों या राय, यथाप्रसंग ये उदाहरणार्थ नाम हुआ करते हैं, जो स्त्री-विमर्श (या किसी भी अमूर्त लड़ाई) को आक्रमण के लिये निशाना और जूझने के लिये जोश प्रदान करके मूर्त बनाते हैं। तात्कालिक प्रसंग के आवेग और उत्तेजना में व्यक्ति के साथ कभी कभी कुछ ज़्यादती भी शायद हो जाती हो लेकिन निस्संदेह वह उसकी स्वयं-आहूत हुआ करती है। वक्त के साथ ये व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ झाँसी की रानी, जयचंद, विभीषण, दुर्वासा, नारद वगैरह की तर्ज़ पर, और इधर हाल के वर्षों (विमर्शों) में मथुरा, शाहबानो वगैरह जैसी जातिवाचक/ गुणवाचक अभिव्यक्तियाँ बन कर विमर्श के शब्दकोश में एक सन्दर्भ बन जाया करती हैँ। कौन जाने, ‘रायबहादुर’ इस सन्दर्भ-कोश की आगामी वृद्धि- समृद्धि हो, और अगली पीढ़ी को समझाने में संदर्भ की तरह काम आए।

लेकिन नाम केवल नाम ही नहीं हुआ करते, और लड़ाई किसी एक नाम के माफ़ीनामे या पद से बर्खास्तगी की माँग में सिमट कर रह जाए तो उसकी उपलब्धि व्यक्तिगत प्रतिशोध की तृप्ति और सन्तोष भले हो, लड़ाई का एक मुकाम नहीं मानी जा सकती। उस नाम के जरिये जो मनोवृत्ति उजागर होती है उसके साथ लड़ाई एक लम्बी, धीमी और तकलीफ़देह प्रक्रिया है। संस्कार और परम्परा के नाम पर जो औचित्य वह पाती है उसके साथ मुकाबले का एक ही तरीका है, अपने भीतर और आस-पास लगातार शंका और प्रश्ना का माहौल बनाए रखना और धैर्य को, धीर विलम्बित आक्रोश को न छोड़ना, आपसी समझ को कायम रखते हुए और ज़रूरी समझौते करते हुए भी समझौतावादी न होना। पीढ़ियों तक चलने वाली लम्बी लड़ाइयाँ, अपने घर आँगन में लड़ी जाने वाली लड़ाइयाँ, अपने आपे के साथ भी लड़ी जाने वाली लम्बी लगातार लड़ाइयाँ समय-समय के पड़ावों पर ज़रूरी समझौतों के बिना अनन्त काल तक चलाई नहीं जा सकतीं और अगली पीढ़ी को निरन्तर हस्तान्तरित करते चलने की जागरूकता के सिवाय और किसी भी तरह से गन्तव्य तक पहुँचाई नहीं जा सकतीं।
एक व्यक्ति की हैसियत से एक झटके से इस परम्परा को अलग कर देना, स्वयं को उससे तोड़ कर उसके दायरे के बाहर आ जाना वैयक्तिक सशक्तीकरण हो सकता है, लेकिन उपस्थित तात्कालिक प्रसंग की तरह परम्परा बार बार  लौट कर घेरती है। व्यक्तिगत स्तर पर सही, इस सशक्तीकरण की गिनती का बढ़ते जाना, उसको बढ़ाते जाने में योग को अपना दायित्व समझना ‘क्रमशःआन्दोलन’ का एक रास्ता और ‘पर्सनल इज़ पॉलिटिकल’ की एक नयी व्याख्या भी कही जा सकती है। और वह एक झटके से होने वाला काम नहीं है।

बेवफ़ा कहें या बावफ़ा कहें. आत्मकथा अस्मिताविमर्शों की अपनी साहित्यविधा बन कर उभरी है। ‘विमर्श’ अस्मिता की राजनीति की वैचारिक प्रस्तावना और साहित्यिक अभिव्यक्ति कहे जा सकते है। आत्मकथा लेखन प्रकारान्तर से एक राजनैतिक कर्म है। वह एक उद्घाहटन है, एक ऐसा उद्घाकटन जो गोपन को गोपन नहीं रहने देता। गोपन के रहने की जगह तहखानों में है, समाज के निचले पेटे का सच, जिसका उद्घाोटन ख़तरनाक है। लेकिन आत्मकथा को, स्त्री की आत्मकथा को खासतौर से, हम प्रायः लेखिका के व्यक्तिगत चरित्र की छानबीन और मूल्यांकन की तरह, और अक्सर तो चरित्र-हनन के एक अवसर की तरह पढ़ते हैं, समाज की गोपन सच्चाइयों के उद्घारटन की तरह नहीं।

सदियों से मौजूद चरित्र के मूल्यांकन की कुछ बनी बनाई कसौटियाँ, बाकी दुनिया में ‘ चेस्टिटी बेल्ट’ और ऐसे अन्य मध्यकालीन औजारों का ज़माना मध्यकाल के साथ व्यतीत हो जाने के बाद भी हमारे हिन्दीभाषी समाज में आज भी स्त्री के सन्दर्भ में ‘ सच्चरित्र ‘ का कुल मतलब दैहिक पवित्रता की पर्यायवाचिता, घुट्टी मे पिलाया गया लज्जा और मर्यादा का पाठ, चुप रहने का वादा, घर की बात घर के भीतर रखने का इरादा उसके जीवन के बुनियादी सामाजिक अनुबन्ध हैं। गोपन को गोपन बनाए रखने की जिम्मेदारी स्त्री की है। इसीमें उसकी ‘इज्ज़त’ सुरक्षित है और इज़्ज़त उसका प्राणपण है। प्राणपण उसका कारागार है।फिर ऐसा क्यों होता है कि जैसे ही औरत अपनी ‘इज्ज़त’ की चिन्ता छोड़ती और कारागार से बाहर निकलती है, वैसे ही पुरुष(सत्ता) को अपनी इज़्ज़त पर बन आती दिखती है। कहानी तो आखिर वह अपनी ही सुनाती है, प्राणपण चुकाती है, इज़्ज़त ‘ लुटाती’ है तो क्यों स्त्री को अकारण दण्डित करके भी पुरुष को अपनी इज़्ज़त बचाने की पड़ जाती है, चाहे वह किसी भी रंगत की या पहलू की विचारधारा का पुरुष क्यों न हो? स्त्री के इस उद्घायटन के बिना भले ही वह ख़ुद अपने आप इन तमग़ों की फ़ेहरिस्त बनाता, विजय पताकाएँ लहराता, अभियान गाथाएँ सुनाता घूमता हो। तस्लीमा नसरीन की आत्मकथा इसी सन्दर्भ में व्यक्तिगत के राजनीतिक हो जाने का एक बड़ा उदाहरण है और हमारे इस तत्काल-प्रसंग में भी आत्मकथाओं को दिया गया बेवफ़ाई के विराट उत्सव का ख़िताब उस पैमाने का न सही, उसी नमूने का एक उदाहरण ज़रूर है।

कहानी वास्तव मेँ कभी अकेले की नहीं होती। आत्मकथा तो और भी नहीं, और वह लेखिका के अपने समय के सचमुच के लोगों के बारे में होती है। उसे कथा मात्र में बदलने में एकाध पीढ़ियाँ अभी खर्च होने को बाकी हैं। ‘सचमुच के लोग’ और उनके पद-प्रतिष्ठा-यश-अधिकार ( अगर कहीं राजनीतिक हुए तो और भी अधिक) और पुरुष होने के साथ सारा झगड़ा अधिकतर जुड़ा होता है, प्रेमी हो या पति, पिता हो या पुत्र। पितृसत्तात्मक साँचे में ढली मानसिकता की स्त्रियाँ भी शामिल दिख सकती हैं लेकिन अगली पीढ़ी के साथ दूसरे पक्ष का संख्याबल भी धीमी लेकिन निश्चिपत गति से बढ़ रहा है। वफ़ा का अर्थ वास्तव में है क्या? व्यक्तिगत सम्बन्धों में वफ़ा का एकतरफ़ा अनुबन्ध असल में वफ़ादारी को मालिक और कुत्ते के सम्बन्ध में बदलता है, स्वत्वहीन समर्पण बनाता है, सिर्फ़ दुम हिलाने की इजाज़त देता है। ऐसा नहीं कि अगर आत्मकथाएँ नहीं होतीं तो दुनिया में सिर्फ़ वफ़ा ही हुई होती, बेवफ़ाई का कहीं नाम भी न होता। ऐसा भी नहीं कि ” शहरीकरण, औद्योगीकरण, शिक्षा के बढ़ते अवसर या मूल्यों के स्तर पर हो रही उथल पुथल ने स्त्री पुरुषों को ज़्यादा घुलने मिलने के अवसर प्रदान” (उद्धरण उल्लिखित साक्षात्कार से) करने वाली दुनिया के पहले बेवफ़ाई नहीं थी। आखिर जो पदक और पताकाएँ और अभियान-गाथाएँ पुरुष के हाथों संकलित और प्रदर्शित होती रही होंगी, उनमे कोई भागीदार संगी या संगिनी भी होती ही होगी। बेवफ़ाई की शुरुआत तो उसी दिन हो गयी होगी जिस दिन

नैसर्गिक युग्म-भावना को वैवाहिक संस्था का निश्चितत, वैधानिक, औपचारिक स्थायित्व प्रदान किया गया होगा और सन्तान व सम्पत्ति के उत्तराधिकार के सिलसिले में स्त्री से एकरफ़ा वफ़ादारी की माँग का सूत्रपात हुआ होगा। प्रेम और विवाह और वफ़ा और बेवफ़ाई – सब थे। सिर्फ़ स्त्रियों की आत्मकथाएँ नहीं थीं। स्त्री-पक्ष नदारद था। जो था वह था तो सही, लेकिन अनकहा था और अकथनीय था। लज्जा और मर्यादा और हया और शर्म के नाम पर चुप्पी की जिस साज़िश में वह स्वयं अपने विरुद्ध शामिल थी उस सामाजिक अनुबन्ध को उसने तोड़ दिया है। और क्या नहीं था जो चुप्पियों की इस फ़ेहरिस्त में शामिल न हो। एक ओर अपने स्त्री समुदाय मेँ बैठ कर आँगन मेँ गाने बजाने के लिये लोकगीतों की उद्दाम शृंगारिक ऊर्जा और दूसरी ओर चुप्पियों की इस फ़ेहरिस्त में खुद अपने स्त्री-अंगों, रजोस्राव, रजोनिवृत्ति, गर्भ और प्रसव, स्त्री-रोग, अन्तर्वस्त्रों और अन्य दैनिक अस्तित्व की विशिष्ट स्त्रियोचित ज़रूरतों तक के और अपने साथ बलात्कार और छलात्कार जैसे अन्यायों के भी वर्जित नामोच्चार के विरोधाभासों के बीच जीती स्त्री ने अपनी आत्मकथाओं में इतर प्रेम-प्रसंगों या बेवफ़ाई की चर्चा तक पहुँचने में एक जन्म में कितने जन्मान्तर पार किये हैँ इसकी कल्पना भी मुश्कि ल है। इस अनुबन्ध के टूटने का मतलब स्त्री के अन्तःकरण की मुक्ति है, खुद अपने भीतर की जकड़न से भी और पुरुष के वर्चस्व से भी। सामाजिक, पारिवारिक प्रतिष्ठा और सुरक्षा, आर्थिक निर्भरता आदि बन्धनों के भी पहले सशक्तीकरण का पहला कदम अंतःकरण की यही मुक्ति है। इस मुक्ति का मतलब स्वयं को पुरुष द्वारा ब्लैकमेल की ताकत से मुक्त कर लेना है। आत्म कथा लिखने के निर्णय तक जो पहुँच पाती है उसके लिये यह बेवफ़ाई नहीं, वफ़ा के पात्र को बदल देना है। इसका अर्थ बेवफ़ाई की शाश्वेत परिभाषा के अनुसार प्रेमी और पति की अदलाबदली से नहीं। उसके लिये अब यह सच के प्रति वफ़ादारी का पर्याय है, वफ़ा की अपनी व्यक्ति-सापेक्ष भावना को मूल्य-सापेक्ष सत्य बना लेना है।

पुरुष की कल्पना के भी शायद परे हो कि जि़न्दगी के भीतर-बाहर में कितनी जद्दोजहद के बाद वहाँ तक पहुँचा जाता है जहाँ आत्मकथा का सच केवल बोलने की हिम्मत और हिमाकत नहीं, अपने स्वावलम्बी अन्तःकरण की निडर अभिव्यक्ति और सत्य के साथ प्रतिबद्धता का प्रश्ऩ बन जाता है। फिर एक बार कहूँ, कितना भी अपर्याप्त और दुर्बल क्यों न हो हमारा स्त्री-विमर्श, और कितनी भी गिनी चुनी क्यों न हों ये आत्मकथाएँ, निस्संदेह उनसे टूटने वाली चुप्पियाँ हमारे स्त्री-विमर्श के अगले महोत्सव का कारण हैँ। छिनाल : बात एक शब्द की नहींइस बहस में घुसने का कोई प्रयोजन नहीं कि छिनाल का मतलब वेश्यान है या व्यभिचारिणी। मंशा तो स्पष्ट ही है – अपमानजनक।

हिन्दीभाषी समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता के पास स्त्री-पुरुष सम्बन्ध की पहचान का एक ही मैदान है – बिस्तर।वह एक बड़ी और बुनियादी भौतिक असलियत है, लेकिन यह रिश्ता् तीन बाई छः या बहुत हुआ तो छः बाई छः के इस बाड़े से बहुत बड़ा हो चुका है। इसमें बौद्धिक, वैचारिक, अकादमिक, व्यावसायिक, रचनात्मक आदि तरह तरह की अनेकपरतीय साझेदारियाँ और प्रतिद्वन्द्विताएँ शामिल हो चुकी हैँ। स्वाभाविक है कि इन उलझती सुलझती परतों में साथी,सहयोगी, सहकर्मी,सखा जैसे सम्बन्धों की कुछ भावात्मक, कुछ भावनात्मक परतें भी खुलने खिलने लगती हैं। लेकिन भावनात्मक लगाव का भी एकमात्र अर्थ अब दैहिक आकर्षण और एकमात्र गन्तव्य बिस्तर नहीं है। स्त्री-मुक्ति के पिछले सौ सालों ने स्त्री के व्यक्तित्व को जो अनेकमुखी विकास दिया है उसकी बुनियादी ज़रूरतों में दोस्ताना सम्बन्ध शामिल हैं जो बहुविध बहुसंख्य हो सकते हैं। स्त्री के लिये भी वृत्ति और व्यवसाय उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितने पुरुष के लिये, केवल आजीविका के अर्जन के लिये नहीं बल्कि तृप्ति और सन्तोष की अनुभूति के लिये भी। इन वृत्तियों में लेखन भी शामिल है। कामकाजी व्यस्तताओं के बीच- कॉफ़ी के प्यालों के साथ अखबार की सुर्खि़यो और कार्यस्थल की ताज़ा ख़बर से लेकर नॉन-वेज किस्म के चुटकुलों, एक दूसरे की टाँगखिँचाई, ठहाकों, घरेलू संकटों और समाधानों तक की साझेदारी चलती है और एक पारस्परिक-अवलम्ब-व्यवस्था विकसित हो जाती है।

राजधानी के एक प्रमुख स्त्री-शिक्षा-संस्थान में अध्यापिका की हैसियत से ज़िन्दग़ी का दो तिहाई हिस्सा बिताते हुए मैंने इस नयी स्त्री को बहुत करीब से देखा है। स्त्री-विमर्श इस नयी स्त्री का विमर्श है। प्रेम और दाम्पत्त्य की एकाधिकार-वांछा उसके लिये दमघोट है और उसकी दैनिकचर्या – बिस्तर समेत – एकरस ऊबाऊ और थकाऊ है। कार्यस्थल की चुनौतियाँ, बौद्धिक उत्तेजनाप्रद वार्तालाप, भावात्मक उत्तेजनाप्रद हास-परिहास इस नीरसता में प्राणसंचार का साधन है। सम्बन्धों की परिभाषाएँ उसके लिये एकाधिकार- वांछा से बदल कर साथ-संगत और दोस्ताने की हो गयी हैं लेकिन पुरुष मानसिकता की हद अभी कुल इतनी है कि खुले से खुले दिमाग़ का दम भरने वाला, कवि और लेखक नामी प्राणी भी दूसरे लेखक साथियों की रुग्ण और विकृत मानसिकता को रुद्र हुंकारों में सरापते, गरियाते भी दर-अस्ल ख़ुद उस मानसिकता के पार नहीं झाँक पाएगा, हद से हद होगा इतना कि इस दोस्ताने को छिनाल न कहेगा तो बड़ी इनायत फ़रमाते हुए प्रेमिका कह देगा, इस बात से बाखबर कि हिन्दी संसार मेँ प्रेमिका का मतलब भी छिनाल ही है और जिसे यह ख़िताब अता फ़रमाया जा रहा है उसकी एक छवि भी प्रस्तावित की जा रही है।

लेखन की दुनिया में कई पीढ़ियाँ एक साथ सक्रिय होती हैं और उम्र में दो चार दशकों का आगा-पीछा भी दर अस्ल पीढ़यों का अन्तराल नहीं बनता। कृष्णा सोबती- मन्नू भण्डारी- उषा प्रियम्वदा,-राजी सेठ; ज्योत्स्ना मिलन-मृणाल पाण्डे-सुधा अरोड़ा, मैत्रेयी पुष्पा, चित्रा मुद्ग्ल; अनामिका-जया जादवानी- पंखुरी राय-प्रत्यक्षा-कविता-सोनी सिंह सब एक विचित्र अर्थ में समकालीन है। सब की सब स्त्री-विमर्शवादी भले न हों, पितृसत्तात्मक समाज की जड़ताओं पर स्वयं स्वतंत्र-व्यक्तित्व होने के सबब से साकार कुठाराघात हैं और स्त्री-विमर्श का लक्ष्य सिद्ध करने में सहायक हैँ। अगर साहित्य समाज के लिये अग्रिम-चेतावनी-व्यवस्था है तो कृष्णा सोबती को सोनी सिंह की अग्रिम चेतावनी कहा जा सकता है।

अपने एक वृद्ध और अब दिवंगत परिवारी की एक पैंतालीस साल पुरानी टिप्पणी को अगर उद्धरणचिह्नों में कहूं तो ” व्यक्तित्व तो सिर्फ़ आवारा औरतों का होता है।” इस टिप्पणी को उकसाने वाला सन्दर्भ कुल इतना था कि उनकी पुत्रवधू ने अपनी पढ़ी लिखी प्रतिभाशालिनी ननद से उनके विवाह के कुछ वर्ष बाद मिलने पर अफ़सोस करते हुए कहा था कि उनकी तो पर्सनैलिटी ही ख़त्म हो गयी है। ससुर जी अपनी बेटी के इस व्यक्तित्व – विनाश पर गर्वित तो थे ही, पुत्रवधू के सामने उसे आदर्श की तरह भी रख रहे थे जो तब तक भी आखिरी कगारों पर जूझ रही थी। मेरे वे परिवारी आज होते तो शायद छिनाल के अनेक प्रस्तावित अर्थों में एक इजाफ़ा ‘आवारा’ यानी व्यक्तित्व संपन्न औरत का भी हो गया होता। लगता नहीं है कि पैंतालीस सालों में कोई खास प्रगति हमने की है। स्थिति आज भी यही है कि स्त्री को अपने अशक्तीकरण में आदर्श घोषित करके सशक्तीकरण की संभावनाओं को खारिज कर दिया जाता है और आवारा छिनाल जैसे विशेषण इसका साधन होते हैं।

अठारह सौ सत्तावन के गदर में लाल किला जब खाली करवाया गया तो शाही खानदान की स्त्रियों में से अनेक चाँदनी चौक और दूसरी जगहों के गली कूचों में शरण खोजने और प्राचीनतम पेशा अपनाने को मज़बूर हुईं। उन्हें रण्डी कहा जाता था क्योंकि तब इसका अर्थ प्रतिष्ठित सम्मानित खानदानी महिला हुआ करता था। तबका कुलीनता सूचक आगे चल कर धन्धासूचक बन गया। रण्डी का मतलब पता नहीं छिनाल हुआ या नहीं क्योंकि रण्डी तो निश्चबय ही वेश्या  का अर्थ देने लगा लेकिन छिनाल का यह अर्थ शब्दकोश- सम्मत होने के बावजूद प्रसिद्ध प्रयोक्ताओं द्वारा अभी विवादित है।कहने का मकसद यह है कि यहाँ, इस सन्दर्भ मेँ छिनाल अथवा वेश्या के प्रयोग को अपमानजनक मान लेना और प्रतिरोध के कोलाहल को महोत्सव का दर्जा देना अपनी जगह पर सही है क्योंकि प्रयोक्ता की मंशा अपमानजनक है। लेकिन ज़रा ठहर कर सोचें। शायद आसानी से हमारे गले न उतरे लेकिन वस्तुतः किसी भी आजीविका की तरह यह भी एक आजीविका है, किसी भी व्यवसाय की तरह केवल एक व्यवसाय। और किसी भी समाज के लिये इतना ज़रूरी कि हर समाज में मौजूद है और बावजूद तरह तरह के कानूनी प्रतिबन्धों और प्रावधानों के, रोके से रुकने की कौन कहे, दिन पर दिन नये नये छद्मों में बढ़ता ही जाता है। छिनाल की गैरकानूनी हैसियत उसे शोषित और असुरक्षित रखती है और सामाजिक मान्यताएँ अपमानित। स्त्री-विमर्श पर, शोषण और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ लड़ाई पर पहला दावा उसका है, और शुरुआत उसके नाम को गाली की तरह नहीं सम्मान की तरह ग्रहण करने से हो सकती है।
हम सब जानते हैँ कि ये गालियाँ पुरुष के पास स्त्री को बाँधने और रोकने के, उसे अशक्त बनाने के सबसे आसान और कारगर हथियार हैं। यही उसकी मानसिकता की अभिव्यक्ति भी है। उसे ये नाम उचारने में सोच-विचार का क्षण भर भी नहीं लगता, हिचकिचाहट का रंचमात्र अहसास भी नहीं जगता, शायद उसे आभास भी नहीं होता कि उसका कहा कितना घातक है लेकिन औरत का पूरा वजूद हिल जाता है।

आत्म-सशक्तीकरण के संकल्प से लैस होकर भी, उसके सजग सचेत कार्यक्रम का हिस्सा बन कर भी, लेखन के जरिये चुप्पियों को तोड़ने का बीड़ा उठाकर भी, वर्जनाओं को चुनौती देकर भी कहीं अपने ही अवचेतन की गहराई में अवशिष्ट उसी पुरुषसत्तात्मक मानसिकता की कसौटियाँ हमें नापने लगती हैँ। मानो अनजानते ही आज भी लज्जा, मर्यादा, चुप्पी, वफ़ा वगैरह स्त्री के लिये बुनियादी पैमाने का सामाजिक अनुबन्ध है जो उसके अस्तित्व का बेड़ी-डण्डा-हथकड़ी समेत कारागार है लेकिन पुरुष के लिये महज़ एक हल्का फुल्का मज़ाक, भाषा का थोड़ा रंगीन इस्तेमाल, एक सहज अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति। वक्त मौके पर जता देना ज़रूरी है कि यह असहनीय है। प्रयोक्ता अगर अपनी अभिव्यक्ति को आधिकारिक बना देने की हैसियत का पदाधिकार रखता हो तो और भी ज़्यादा। लेकिन स्वयं-शक्ति के अर्जन की दिशा में अपने कवच को और पोढ़ा, और अवेध्य बनाना और भी ज़्यादा जरूरी है।कोलाहल ज़रूरी है।कोलाहल से ज़्यादा ज़रूरी है इन हथियारों को भोथरा और
नाकाम करना। रण्डी और छिनाल और आवारा औरत को उसकी प्रतिष्ठा, मर्यादा और सम्मान लौटाना ज़रूरी है क्योंकि वह बहुत हिम्मतवर, व्यक्तित्वसंपन्न और निर्णयक्षम औरत है। क्योंकि हम जानते हैं कि वह इसकी अधिकारिणी है।क्योंकि हम यह भी जानते हैँ कि इन गालियों के ज़रिये हमारे वजूद को हिला देने वाले लोग वक्त मौके पर माफ़ीनामा भले दाखिल कर दें, बाज़ आने वाले नहीं हैं। वे चुप भले हो जाएँ, अपनी सोच में जारी रहेंगे और हमें पता भी नहीं चलेगा कि पितृसत्ता फ़िलहाल क्या सोच रही है। क्योंकि वे अपने इन हथियारों की ताकत से परिचित हैं, और हमारे अवचेत अशक्त आदर्शीकरण से भी इसलिये हमें ही इन गालियों का गालीपन छीन लेना होगा।

एक दिन होगा जब सुनूँगी, आवारा, छिनाल, रण्डी या शायद प्रेमिका ही। पर्यायवाची हैँ सभी। क्रोध से कहूँगी, ‘माँ को याद कर रहे हैँ, या बहन को।’ पहचानूँगी अपनी अवशिष्ट पुरुषसत्तात्मक मानसिकता को। उसकी माँ बहने भी तो स्त्रियाँ है। बेहतर, हँस दूँगी। और भी बेहतर, मुड़ कर कहूँगी, ‘ थैंक्यू फॉर द कॉम्प्लीमेण्ट।’ एक दिन होगा। प्रतीक्षा है। उस दिन स्त्री-विमर्श का तीसरा महोत्सव होगा।