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मालिनी अवस्थी का गीत और मोतीझील का किस्सा

प्रभात रंजन


कथाकार प्रभात रंजन ज़ाकिर हुसैन कॉलेज, दिल्ली , में हिन्दी के प्राध्यापक हैं. संपर्क : मोबाइल न.- 09891363062



( वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य  प्रभात रंजन की ‘कोठागोई’ से एक अंश . यह पुस्तक मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान की गुमनाम गायिकाओं के किस्सों का दस्तावेज़ है . उनकी महान परम्परा के प्रति सम्मान का एक रूप)

प्रसिद्ध गायिका मालिनी अवस्थी जी का गाया हुआ एक गीत है, जब भी सुनता हूँ एक किस्सा याद आ जाता है :  ‘पिया मेहदी लिया द मो
मोतीझील से/ 
जा के साइकिल से न’ 
जबकि दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं है. मालिनी अवस्थी ने इस गाने में आगे बताया कि वह जिस मोतीझील का वर्णन कर रही थी वह बनारस में था या है.

मोतीझील शहर मुजफ्फरपुर का सबसे बड़ा बाजार है, हर बड़ी चीज उसके आसपास है, बड़े सेठों के ठिकाने, बाबूसाहबों की पुरानी बसाहतें- पुराने सिनेमा हॉल, नए मॉल, मॉडर्न कुल्फी हाउस, जीवनज्योज्योति- सब उसके आस, उसके पास हैं. सब उसके आस-पड़ोस हैं. वह एक बाजार था जो बढ़कर और बाजार बनता गया है. दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं, नहीं दिखता.

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लेकिन यह किस्सा याद आ जाता है. कम से कम 12 साल या अधिक से अधिक तेरह साल पुरानी यह बात है. उस्ताद वजन खान के यहाँ चतुर्भुज स्थान, आबिदा हाई स्कूल के सामने उनके उस बनते से मकान में गया था, जिसमें दीवारें, छत, कुछ कमरेनुमा बन गए थे, बाद में जब -जब गया वे तो बनते नहीं, पहले से कुछ और बदरंग से हुए दिखाई दिए.

बहरहाल, उस दिन बहुत से लोग आये थे उनके घर, मैं उनसे चतुर्भुज स्थान के अतीत के बारे में बातें करने के इरादे से गया था. दिल्ली से जब भी घर जाता था छुट्टियों में तो उनसे मिलने जरूर जाता था, जाता तो जानकी वल्लभ शास्त्री जी से मिलने जाता था. लेकिन इन दो बातों का भी आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है. तो, मैं यह कह रहा था कि उन्हीं लोगों ने एक किस्सा सुनाया था. किसने सुनाया था, यह बात ठीक से याद नहीं रह गई लेकिन अब लगता है कि हो न हो बनारस से आये साजिंदों में से किसी ने सुनाया था.

बनारस वालों ने ही सुनाया होगा. चतुर्भुज स्थान की कीर्ति को धूमिल करने के लिए कितने किस्से चलाये थे तब- बड़ी मजबूत थी इसकी बुनियाद. गिरते -गिरते भी हिली नहीं है.  सच या झूठ का क्या है, अब जो शहर मुजफ्फरपुर कहलाता है वह सचमुच में वही पुराना शहर है क्या-स्मृतिहीन शहर !  शहर स्मृतिहीन होते जा रहे थे, कौन है याद करने वाला कि जिसे मोतीझील कहते हैं, उसकी मोती कौन थी, झील कहाँ है?

बात यहाँ से शुरू हुई थी कि मोतीझील से कपड़े मँगवाने की तो उसने तुरंत कहा था कि मेहदी भी वहीं से मंगवाना. मेहदी और मोतीझील का यह तुक, जब सबको बेतान लगा तो उसने यह किस्सा सुनाया-
‘कहते हैं जब मोतीझील बाजार नहीं बना था तब , वहां नृत्य और संगीत का पेशा करने वाले लोग रहते थे, जिसे कम से कम 125 साल से चतुर्भुज स्थान के नाम से जाना गया. कहते हैं वहीं पश्चिम से आये एक जमींदार ने मोती बाई के लिए झेल के किनारे हवेली बनवाई थी. समय के साथ शहर की फ़सीलें बढती है, शहर का हिसार बढ़ता गया… चतुर्भुज स्थान बनता गया.

मोती बाई क्या थी? गायिका? गाने और बजाने वालों का ही रहा है यह शहर. यही परम्परा यहाँ से फली-फूली- बनारस वाले कुछ भी कहें- वह इसके इतिहास के मजबूत हाशिये की तरह मौजूद रही हैं, हमेशा से.
मोती बाई का किस्सा बड़ा मशहूर था कि आसपास के गाँवों-कस्बों में उसकी महफ़िल करवाने की हसरत हर जमींदार रखता था. उसने बताया था कि बाबू लोग अपने यहाँ मनाये जाने वाले जलसों की तारीख़ उसकी तारीखों से मिलान करके तय करते थे. कि कहते हैं कि सीमा पार नेपाल के एक जमींदार से शिवहर के सेठ की ऐसी ठनी कि उसने भादो की भरी बारिश में उसके घर आधी रात को डाका डलवा दिया था. डाकू रातोरात उस भरी बरसात में जब न कुछ दिखाई दे रहे था, न कुछ सुनाई,  तो  न जाने वे किस बड़ी सी गाड़ी से आये थे -सर्र से निकल लिए थे. जो पैसा वे मोती पर लुटाते थे डाकू सारा लूट ले गए थे. कहते हैं उस सेठ ने नेपाल के उस बाबू के एकलौते बेटे की शादी के दिन अपनी बेटी की शादी तय कर दी थी और मोती बाई को उस दिन अपने यहाँ आने के लिए मुंहमांगा ईनाम देने का लोभ दिखा रहे थे. जमींदार साहब को यह बात लग गई और मोती ने भी वफादारी दिखाते हुए यह बात जमींदार साहब को बता दी थी. बाद में उसी जमींदार ने उसके लिए झील के किनारे हवेली बनवा दी थी. बारिश के दिनों में वहीं रहता था. तब मोती बाई घर से बाहर नहीं निकलती थी- सावन-भादो घर में अपने उस प्रिय के साथ बिताती थी, पहचान के लिए जिसे बनारसी बाबू ने पछिमाहा जमींदार कहा था.

कुछ साल तक वह जमींदार साल भर नेपाल में अपने विशाल खेत-खलिहान के हिसाब-किताब में लगा रहता था सावन भादो के महीने मोती केपास जाकर बिताता, उसका घर भी चलता रहा, बार भी. कि हादसा हो गया. नेपाल से आते हुए बारिश घनघोर हो रही थी. उसका घोड़ा लेकिन मजबूती से चल रहा था. नदी-नाले पार करता हुआ बढ़ रहा था. जब लखनदेई नदी पार कर रहा था घोडा सहित ऐसा गायब हुआ कि उसका कुछ पता नहीं चला, आज तक. कहते पनडुब्बा ले गया था. सच में किसी को विश्वास नहीं हो रहा था. लखनदेई नदी में उस समय पानी नहीं होता था, भादो के आखिर में जाकर वह उफनाता था, सावन शुरू होते ही इतना कैसे भर गया कि राजा और घोडा दोनों डूब गए पता ही न चला.

जब खबर मोती बाई तक पहुँची तो उसने उसी दिन गाना छोड़ दिया-कहते हैं सुहागन के वेश में रहने लगी थी. जब तक जमींदार साहब थे तब तक किसी की कुछ नहीं थी, उनके जाते ही उनकी वियोगन बन गई मोती. कहते हैं एक महीना भी नहीं बीता कि उसी शोक में चल बसी. बात यहीं ख़त्म हो गई होती तो किस्सा आगे बढ़ता ही नहीं. कहते हैं उस वीरान पड़े बंगले के सामने झील के झाड-झंखाड़ में मेहदी की झाडी उग गई. पास की एक लड़की एक दिन आई, मेहदी के पत्ते तोड़ के ले गई, पीस कर लगा लिया. कहते हैं उसको जल्द ही अच्छा वर मिल गया और वह भी बिना दहेज़ के-बात फ़ैल गई कि वहां की मेहदी सुहाग की मेहदी है.

समय के साथ सब गया- मोती गई, झील गया, हवेली गई, देखते-देखते बाजार बन गया. जो कभी मोती बाई से गुलजार था बाजार बन गया. मेहदी जाने कहाँ गई, यही किस्सा रह गया. हाँ, जरूर बनारस वाले ने सुनाया होगा. क्या पता वहीं के मोतीझील का किस्सा रहा हो? क्या पता?  अब कौन पूछे, उस्ताद के साजिन्दे के परिवार ने कौल निभाते हुए अपने बेटे का निकाह उनकी बेटी के साथ किया था. दिन में शादी हुई, शाम तक सब चले गए थे.
और यह किस्सा?  मालिनी अवस्थी के गाये गीत को जब सुनता हूँ- याद आ जाता है-
‘पिया मेहदी लिया द मो
मोतीझील से/
जा के साइकिल से न’

किस्सा नहीं बस एक प्रसंग भर है!

मनुस्मृतिः जेंडर हिंसा का कानूनी ग्रंथ

सर्वेश पांडेय


सर्वेश पांडेय ने स्त्री अध्ययन में शोध किया है , अभी महिला आयोग में कार्यरत हैं . संपर्क : मोबाइल न.- 08756754651

भारतीय जनमानस को नियंत्रित करने में धर्म की भूमिका काफी महत्वपूर्ण व केन्द्रीय  रही है। भारतीय समाज, खासकर हिंदू समाज स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों  बाद भी धार्मिक रीतियों-नियमों व धर्मग्रंथों से ही निर्देशित होता है। हिंदू जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कारों में बँधा रहता है। ये संस्कार यह दर्शाते हैं कि हिंदू जीवन व हिंदू मानस पर धर्म का प्रभाव कितना गहरा है। कहने को तो आज हमारे पास संविधान है, जिसने सभी को समान रूप  से सामाजिक व राजनीतिक अधिकार दे रखे हैं, किंतु सामाजिक संरचना में यह जमीनी हकीकत पर क्रियान्वित अगर नहीं हो पा रहा  है , तो उसका एक बड़ा कारण सामाजिक संरचना पर धर्म का प्रभाव व उसके धर्मग्रंथों में उल्लेखित नियमों द्वारा निर्देशित होना है। हिंदू धर्म को निर्देशित करने वाले ग्रंथों में ‘ मनुस्मृति’ भूमिका सबसे प्रमुख है। यह ग्रंथ भारत का पहला लिखित संविधान माना जाता है। इस ग्रंथ की सामाजिक व्याप्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय वर्णाश्रम पद्धति को बरकरार रखने में इसकी केन्द्रिय भूमिका है। ब्राह्मणों को श्रेष्ठ स्थिति प्रदान करने से लेकर शूद्रों को मानसिक व भौतिक स्तर पर गुलाम बनाये रखने में इसके नियमों-कायदों का बहुत बड़ा हाथ है।

भारतीय समाज वर्ण व्यवस्था में विभाजित समाज है। वर्णो की उत्पत्ति के विविध सिद्धांत है किंतु समाज में सर्वाधिक मान्य व प्रभावी सिद्धांत ‘ दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत’- ब्राहमण मुखमासिदत  है, जो यह बताता है कि ‘विराट पुरूष’ के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य एंव पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। इसी आधार पर चारो वर्णों की सामाजिक स्थिति व व्यवसाय भी तय किये गये। वर्तमान समय में जाति-व्यवस्था आज जिस दृढ़ता से निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, यह इस बात का प्रमाण है कि वर्णव्यवस्था के पुरोधा अपने इस दुष्कार्य में कितना सफल रहे।

ब्राह्मणवादी ग्रंथों से ही प्राचीनकालीन समाजिक, आर्थिक एंव राजनीतिक स्थिति की समझ बनायी जाती रही है। इतिहास लेखन ने इन ग्रंथों को बतौर राजनैतिक शस्त्र प्रयोग करते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ताना-बाना तैयार कर दिया। राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने वैदिककालीन समाज को समतामूलक रूप  में प्रस्तुत कर उसे भारत का स्वर्णिम काल घोषित कर दिया अर्थात वर्ण व जेंडर विभेद की चर्चा न करके वैदिककालीन समाज को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वैचारिकी के अनुरूप गढ़ दिया गया। वैदिक ग्रंथों से अतीत की समझ बनाने में पहली समस्या यह है कि वह उपदेशात्मक शैली में लिखित है और दूसरी कि यह वर्चस्वशाली तबके के सत्तात्मक तंत्र को चिरस्थायी बनाये रखने के अंर्तनिहित उद्देश्य से लिखित है।  ‘ मनुस्मृति’ ( रचनाकाल दूसरी सदी ई. पू.  से दूसरी सदी ई.  तक) ‘अर्थशास्त्र’ (चौथी सदी ई.पू ) व कामशास्त्र (दूसरी सदी ई. पू  से चैथी सदी ई.  तक)  जैसे प्राचीनकालीन ग्रंथ हैं ,  जिन्हें उच्चवर्णीय पुरुषों के वर्चस्व को निर्मित व कायम रखने के उद्देश्य से रचा गया था। वस्तुतः ये ग्रंथ धर्म,  अर्थ , राजव्यवस्था,  काम के विचार को आदर्श बनाने में सहायक हुए।
मनुस्मृति विगत दशकों से वाद-विवाद का केन्द्र रहा है, साथ ही साथ सामान्य जनमानस में इतिहास की समझ पैदा करने में इसकी अहम भूमिका रही है। इतिहासकारों की मान्यता है कि भारतीय मानस में अतीत की समझ लोकप्रिय मान्यताओं, मिथकों, वीरगाथाओं तथा लोकगाथाओं के माध्यम से बनती है। औपचारिक इतिहास का ज्ञान भी अधिकांश मानस को लोकप्रिय पत्रिकाओं के लेखों, बहसों तथा अन्य चर्चाओं के माध्यम से होता है।  मनुस्मृति को लेकर बहसों का तीखापन स्वतंत्र्योत्तर भारत में अधिक बढ़ता गया तथा इसके जलाने आदि के प्रतीकात्मक उपक्रम भी किये गये। परंतु भारतीय नवजागरण के काल में जब राष्ट्रवाद अपना स्वरूप ले रहा थाए मनुस्मृति ने भद्रलोक के इतिहास व समाज संबंधी मानस निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय समाज-सुधारकों का एक तबका इसकी तीव्र आलोचना भी करता रहा, खासकर दलितों व स्त्रियों को लेकर किये गये नियमन के संदर्भ में।

मनुस्मृतिः ऐतिहासिक व सामाजिक विश्लेषण
मनुस्मृति के रचनाकाल को लेकर विभिन्न विद्वानों में बहस होती रही है। स्वीकृत मान्यता के अनुसार इसका रचनाकाल 200 ई.पू  से 200 ई.  के बीच है। प्रसिद्ध विचारक काणे ने ” हिस्ट्री  ऑफ धर्मशास्त्र’  में मनुस्मृति का रचनाकाल 200 ई. पू  से 200 ई.  के मध्य बताया है।  मनुस्मृति बौद्ध व जैन धर्म के बरक्स हिंदू धर्म व ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को दृढ़ता से कायम करने व व्यापक विस्तार दिये जाने के निहित उद्देश्य से लिपिबद्ध की गई। मनुस्मृति का रचनाकाल ब्राह्मणों के शासन व पुनर्निर्माण का युग था। उस समय शुंग तथा उनके परवर्ती काण्वायन ब्राह्मण राजा थे। फलतः ब्राह्मणों को सामाजिक व सांस्कृतिक विशेषाधिकार प्राप्त हो गया। जबकि शुंगकाल के पूर्ववर्ती मौर्यशासन में ब्राह्मण अत्यंत असंतुष्ट थे,  जैसा कि बी.आर. आम्बेडकर लिखते हैं कि ‘ अशोक द्वारा बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित करना निश्चय ही ब्राह्मणवाद के लिए बहुत बड़ा आघात था। इससे ब्राह्मणों को राज्य का संरक्षण मिलना बंद हो गया। अशोक साम्राज्य में उन्हें गौण या अधीनस्थों का दर्जा दिया जाने लगा और उनकी उपेक्षा की जाने लगी। निश्चय ही कहा जा सकता है कि यह दमन इस छोटे से कारण से हुआ था कि अशोक ने सभी प्रकार के पशुओं की बलि पर रोक लगा दी थी, जो ब्राह्मणवाद का मूल आधार था। ब्राह्मणों को न केवल राज्य का संरक्षण मिलना बंद हुआ बल्कि उनका व्यवसाय भी छिन गया। यह व्यवसाय था. यज्ञ कर्म, जोकि उनकी जीविका का मुख्य स्रोत था। मौर्य साम्राज्य की समाप्ति के साथ ही ब्राह्मण उत्कर्ष तेजी से जोर पकड़ता चला गया। नष्टप्रायः यज्ञ संस्था और विस्मृतप्रायः वेदों को पुनर्जीवन  मिला। दरअसल पुश्यमित्र शुंग का मौर्य साम्राज्य से विद्रोह व सत्तासीन होना सामान्य राजविद्रोह औैर सत्ता.परिवर्तन नहीं रहा। यह ब्राह्मणवादी शक्तियों का सुनियोजित षड़यंत्र रहा, जिससे कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था को पुर्नस्थापित किया जा सके। पुष्यमित्र  ने जो राज-हत्याएं की,  उनका उद्देश्य राजधर्म के रूप में बौद्ध धर्म को नष्ट करना और ब्राह्मणों को भारत का सर्वोच्च शासक बनाना था, जिससे राजा की राजनैतिक सत्ता से बौद्ध धर्म पर ब्राह्मण धर्म की विजय हो सके।  ‘मनुस्मृति’ की रचना शुंग युग की देन है।

मनुस्मृति में उल्लिखित  वर्ण व्यवस्थाए कर्म, संस्कार, दण्ड-विधान आदि पर दैवीय शक्ति व धर्म का मुलम्मा चढ़ा दिया गया, जिससे ब्राह्मणों का सामाजिक व सांस्कृतिक वर्चस्व जनमानस पर काबिज किया जा सके जो कि बौद्ध व जैन धर्म के प्रभाव के कारण नष्टप्रायः हो चुका था।संपूर्ण मनुस्मृति में ब्राह्मणों  का प्रभाव दिखाई पड़ता है। ब्राहमणों  श्रेश्ठ सिद्ध करने के लिए कई ऐसे विधान निर्मित किए गए। ब्राह्मण को सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी   उल्लेखित करते हुए कहा गया कि ‘ ब्राहमण’  अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है और अपना ही दान करता है जबकि दूसरे व्यक्ति ब्राह्मण की दया से इन सबका भोग करते हैं।’

संपूर्ण ग्रंथ का केंद्रीय तत्व समाज में जातिगत अनुक्रमण को बनाये रखना- ब्राह्मणों की श्रेष्ठता,  शूद्र की दासत्व स्थिति और समाज को वर्ण-संकरता से बचाना , आदि ही है। अध्ययन-अध्यापन, संस्कार, विवाह, दण्ड-विधान आदि समग्र सामाजिक व धार्मिक क्षेत्रों में स्पष्टतया ब्राह्मण विशेषाधिकार सम्पन्न दिखते हैं। मनुस्मृति  (९ /313 )  के अनुसार ब्राह्मण इतना अधिक पूज्य है कि उसे राजा भी क्रोधित न करें क्योंकि ब्राह्मण अपने शाप द्वारा उसे नष्ट कर सकता है। जाति-व्यवस्था में रिचुअल पावर सेक्युलर पावर से ऊँचा होता है। राजा (क्षत्रिय)  सेक्युलर पावर से जबकि ब्राह्मण रिचुअल पावर से संबद्ध होने के कारण क्षत्रिय से उच्च अवस्थिति पर होता है। ड्यूमा ब्राह्मण व क्षत्रिय की इन दोनों शक्तियों में विरोधाभास को रेखांकित करते हैं। इसका कारण सत्ता राजा (क्षत्रिय)  केन्द्रित होने के बावजूद उसका रिचुअल पावर से नीचा समझा जाना है।
वस्तुतः ब्राह्मण व क्षत्रिय जान-बूझकर एक दूसरे से स्वयं को उच्च-निम्न घोषित कर समाज में प्रभुत्वशाली बन गए थे तथा अपने विरोधाभास के बावजूद एक साथ रहकर समाज पर शासन करते थे। जैसा कि मनुस्मृति के एक श्लोक ( 9/322) में उल्लेखित है,  ब्राह्मण के बिना क्षत्रिय तथा क्षत्रिय के बिना ब्राह्मण समृद्धि नहीं पा सकते, किन्तु परस्पर सहयोग के द्वारा दोनों ही इस लोक तथा पर लोक में पर्याप्त समृद्धि प्राप्त करते हैं। जिस आधार पर रिचुअल पावर अपने को शुद्ध बताने के लिए  मांस खाना , हिंसा करना जैसे कृत्य को अशुद्ध परिभाषित करता है। ये कृत्य  क्षत्रियों के लिए  मान्य है,  क्योंकि ब्राह्मण इन्हें ‘राजसी ‘ कृत्य के तौर पर व्याख्यायित कर देता है। वही कृत्य निचली जातियों में प्रचलित होने पर उसे ‘तामसिक’  कोटि में व्याख्यायित कर इन जातियों को सामाजिक पदानुक्रम में निम्न अवस्थिति पर रख दिया जाता है। वस्तुतः पवित्रता और अपवित्रता के बीच भी संबंध परिस्थितिजन्य है,  न कि सामाजिक तौर पर अंर्तनिहित है।

शूद्रों को जन्मतः अशुद्ध माना जाता है,  इसी आधार पर उनके खान-पान– रीति-रिवाज भी अशुद्ध होते हैं। शूद्रों को उपनयन संस्कार की भी इजाजत नहीं दी गई है। मनुस्मृति की रचना के पहले उपनयन गुरुकुल में होते थे, जहां बालक के शिक्षण व प्रशिक्षणोपरांत गुरु उनके वर्ण का निर्धारण करता था। बी. आर.  आम्बेडकर के अनुसार ‘उपनयन के मामले में ब्राह्मणवाद ने जो मुख्य परिवर्तन किया,  वह था उपनयन करने का अधिकार गुरु से लेकर पिता को देना। इसका परिणाम यह हुआ कि चूंकि पिता को अपने पुत्र के उपनयन का अधिकार था,  इसीलिए अपने बालक को अपना वर्ण देने लगा। इस प्रकार उसे वंशानुगत बना दिया। इस प्रकार वर्ण निर्धारण का अधिकार गुरु से छीनकर उसे पिता को सौंप कर ब्राह्मणवाद ने वर्ण को जाति में बदल दिया।’
मनुस्मृति में उपनयन संस्कार की इजाजत ऊपरी तीन वर्णों ‘ब्राह्मण,  क्षत्रिय व वैश्य को दी गई,  जिसके द्वारा वह द्विजता (दुबारा जन्म अर्थात आध्यात्मिक जन्म)  की स्थिति प्राप्त करता है। ब्राह्मणवादी ग्रंथों में शारीरिक जन्म को अशुद्धता के रूप  में देखा जाता रहा है। शूद्रों का उपनयन संस्कार न होने के कारण उन्हे स्थायी तौर पर अपवित्र कोटि में रखा गया है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री लुईस ड्यूमा जाति व्यवस्था के श्रेणीकरण को शुद्धता-अशुद्धता संबंधी सिद्धांत से उत्पन्न मानते हैं। जिसमें उच्चतम श्रेणी पर सदैव ब्राह्मणों  होते है। ये ही पवित्रतम होते हैं और अधिकांश कर्मकाण्ड का संचालन करते हैं।  क्लाउड मेलासॉक्स (Claude Mellasoxus) का मंतव्य है कि शुद्धता-अशुद्धता के हथियार द्वारा वर्गीय संरचना को जाति-संरचना में तब्दील कर दिया जाता है। उसे चिरस्थायी बनाने के अंतर्निहित उद्देश्य से ही संचालित किया जाता है।
मनुस्मृति स्त्री को घर की चौहद्दी में रहने तथा शूद्र को द्विज सेवाकर्म से आदेशित.निर्देशित करके ब्राह्मणवाद का मजबूत ढांचा खड़ा करता हुआ दिखता है। मनुस्मृति शूद्र को वेद अध्ययन का अधिकार नहीं देता। यह विशेषाधिकार केवल द्विज को देता है। वह शूद्र को अध्ययन से वंचित ही नहीं करताए बल्कि उन व्यक्तियों के विरुद्ध दंड की व्यवस्था भी करता हैए जो शूद्र को वेद अध्ययन करने में मददगार होते हैं। मनुस्मृति में शूद्र की उपस्थित में वेद अध्ययन पर निषेध , शूद्र स्त्री को शिक्षा एवं जिसका शिष्य शूद्र हो उसे श्राद्ध में निमंत्रित करने हेतु अयोग्य बताया गया है।

मनुस्मृति में राज्य अपने दंड और न्याय व्यवस्था द्वारा ब्राह्मणवादी पुरुषवादी मूल्यों के संरक्षक की भूमिका में ही परिलक्षित होता है। द्विज ;ब्राह्मण तथा क्षत्रियद्ध को दारुण वचन से आक्षेप करने वाले शूद्र को उसकी जीभ काटकर दण्डित करना चाहिएए क्योंकि वह नीच से उत्पन्न है।  राज्य वर्णवादी व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाने पर शूद्रों को दण्डित करता है।  इस प्रकार सामाजिक और आर्थिक सत्ता के साथ ही राजनैतिक सत्ता भी दलितों पर शोषण और उत्पीड़न कर रही है। राज्य के दण्ड विधान का नियमन जाति पदानुक्रम द्वारा ही किया गया है। जहाँ ब्राह्मणों के प्रति दण्डविधान काफी उदार हैं, वहीं दूसरी ओर शूद्रों के प्रति अत्यंत क्रूर हैं। इसी प्रकार अंतरजातीय यौन संबंधों की नियमावली में भी उच्चवर्णीय पुरुष का निम्नवर्णीय स्त्री के साथ संबंध होने पर किसी भी प्रकार के दण्ड की व्यवस्था नहीं हैए वहीं निम्नवर्णीय पुरुष का उच्चवर्णीय स्त्री के साथ संबंध स्थापित करने पर उसे परस्त्रीगमन और बलात्कार दोनों के लिए कठोर दंड दिया जाता था।

मनुस्मृति सामाजिक नियमों का शास्त्र है। इसके निर्देशों  में हम तत्कालीन पारिवारिक-व्यवस्था को एक संगठित सामाजिक इकाई रूप में निर्मिति के उपक्रम को देख सकते हैं। भारतीय सामाजिक व्यवस्था का आधार रक्तशुद्धता और जाति-व्यवस्था है। इसी संश्लिष्ट जाति-संरचना को बनाये रखने के लिए वैवाहिक आदर्शों का निर्माण आवश्यक माना गया। मनुस्मृति के अनुसार ब्रह्म,  दैव, आर्य, प्रजापत्य, आसुर, गांधर्व, राक्षस और पैशाच आठ प्रकार के विवाह प्रचलित थे। जिसमे प्रथम चार प्रकार के विवाहों की सामाजिक स्वीकृति ज्यादा रही होगी। वहीं राक्षस और पैशाच विवाह को स्त्री के साथ बलात् आचरण को मान्यता देने की व्यवस्था के अंतर्गत माना जा सकता है। गांधर्व विवाह भी प्रचलित और प्रायः स्वीकृत विवाह थे। परंतु प्रेम में दोनो सहभागियों का अलग-अलग इकाई के रूप में स्वतंत्रता की कोई धारणा नहीं थी। मनुस्मृति अंतरजातीय विवाह हेतु प्रदूषक’  का विधान करने के बावजूद अनुलोम विवाहों को स्वीकार्यता देता है।
शूदैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विषः स्मृते।
ते च स्वा चैव राज्ञश्र ताश्र स्वा चाग्रजन्मनः।

( शूद्र पुरुष की शूद्रा,  वैश्य पुरुष की वैश्य और शूद्रा- क्षत्रिय पुरुष की क्षत्रिय,  वैश्य और शुद्रा ,  ब्राह्मण पुरुष की ब्राह्मण, क्षत्रियए वैश्य और शूद्र वर्णों से उत्पन्न स्त्रियों से विवाह हो सकता है। )

अनुलोम विवाह के विपरीत क्रमिक वैवाहिक प्रणाली प्रतिलोम विवाह कहलाती है। मनुस्मृति में अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह श्रृंखला ही नहीं अपितु ऐसे विवाह से उत्पन्न संतानों की श्रृंखला भी उल्लेखित है। ‘अनुलोम विवाह के ब्राह्मण पुरुष और वैश्य स्त्री से उत्पन्न संतान ‘अम्बष्ट ‘ कहलाता है। क्षत्रिय पुरुष व शूद्र स्त्री से उत्पन्न संतान ‘उग्र’ नामक  होता है, जो कुकर्मा व क्रूर चेष्टा वाला होता है। प्रतिलोम विवाह के क्षत्रिय पुरुष व ब्राह्मण कन्या से उत्पन्न पुत्र ‘सूत’  वैश्य से क्षत्रिय कन्या से उत्पन्न पुत्र ‘ मागध’  और ब्राह्मण वर्ण की कन्या से उत्पन्न पुत्र ‘ वैदेह’  होता है। शूद्र  से वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण कन्या से उत्पन्न पुत्र क्रमशः ‘आयोगव’, ‘क्षता’  और मनुष्यों में नीचतम ‘ चांडाल’  होता है। मनुस्मृति में उपरोक्त विवाहों में केवल प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न चांडाल ही स्पर्श के अयोग्य कहा गया है। शेष  सभी संतानों को स्पर्श किया जा सकता है। शूद्र से प्रतिलोम क्रम में विवाह से उत्पन्न आयोगव, क्षत्ता तथा चांडाल शूद्रों की अपेक्षा हीन तथा मनुश्यों में अधम कहे  गये हैं .’ मनुस्मृति का प्रतिलोम विवाह व उससे उत्पन्न संतान के प्रति कठोर विधान जाति रक्त-शुद्धता तथा जाति विभेद व अलगाव का पूरा ढांचा निर्मित करता है। मनुस्मृति ने जीवन का कोई ऐसा पक्ष नहीं जहां वर्णीय पदानुक्रमिक सिद्धांत को आधार न बनाया हो।

ब्राह्मणवाद के साथ-साथ पितृसत्तामक व्यवस्था को कायम करना व उसे चिरस्थायी रखना मनुस्मृति का मूल प्रयोज्य रहा,  जिनमें शूद्रों के  साथ-साथ स्त्री पर भी अधीनस्थता व विभेद संबंधी अगणित श्लोक उल्लेखित हैं। मनृस्मृति स्त्री को पति की अधीनता में रहते हुए पति-सेवा का निर्देश  देता है। यह शास्त्र स्त्री को पतिपरायणता और गृहस्थ-जीवन की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को आदेशित -निर्देशित करता है।  इससे यह परिलक्षित होता है कि तत्कालीन समाज में स्त्री पर आरोपित यौन-वर्जनाएं टूटने लगीं थीं। अतः मनुस्मृति की मूल चिंता स्त्री यौनिकता को लेकर ही है। इस कारण ब्राह्मणवादी पुरुषवादी दृष्टि से लिखित यह शास्त्र स्त्री-यौनता को नियंत्रित करने के उद्देश्यवश ही पतिव्रता का कर्तव्यपाठ कई अध्यायों में वर्णित करता है। मनुस्मृति स्त्री की  भूमिका को पब्लिक डोमेन में लगभग निषेधित सा करके उसे प्राइवेट डोमेन में ही सीमित कर देता है,  जिससे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दोहरे हित पूरे होते- पहला स्त्री यौनता पर नियंत्रण,  दूसरा घरेलू दायरे में संलग्न होने पर स्त्री आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो सकेगी। चूंकि घरेलू कार्य को आर्थिक कार्य के तौर पर चिह्नित ही नहीं किया जाता है। इस वजह से स्त्री की पुरुष पर आर्थिक निर्भरता,  अंततः उसे पुरुषवादी व्यवस्था में अपनी सहमति देने को विवश भी कर देता है।’

विभिन्न वर्णों हेतु निर्धारित अलग-अलग प्रशस्त्र विवाह  के आलोक में देंखे तो ब्राह्मणों में कन्या दान की वस्तु,  क्षत्रियों में शक्ति द्वारा विजित्,  वहीं वैश्यों और शूद्रों में खरीदी गई वस्तु है। इस प्रकार स्त्री के श्रम और पुनरुत्पादन पर पति के अधिकार को वैधता शास्त्रों के इन्हीं विधानों से मिलती है। विवाह के लिए स्त्री की उपयुक्तता का मापदण्ड उसके शारीरिक सौन्दर्य से ही निर्धारित किया गया है।
अव्याड्डी सौम्यनाम्नी हंसवारणगामिनीम्
तनुलोमकेशदशनां मृदडमीमुदहेत्स्सियम्।।
(जो किसी अंग से हीन नही,  सुंदर नामोवाली हो,  हंस या गजगामिनी हो,  सूक्ष्म रोम तथा पतले-पतले दांतों वाली हो और सुकुमार शरीर वाली हो,  ऐसी कन्या से विवाह करें।)

पति की आज्ञा का उल्लंघन करने वाली स्त्री को इस जन्म
और अगले जन्म में भी कठोर दंड का विभाजन है। निर्धारित किये गये निर्देशों की अवहेलना करने पर राजा द्वारा स्त्री को दण्डित करने का भी उल्लेख है।  इससे यह तथ्य उजागर होता है कि तत्कालीन लैंगिक-विभेदकारी व्यवस्था के मुखर प्रतिरोध में कुछ स्त्रियां गई होंगी। जिससे उच्चवर्णीय पुरुषों को अपना वर्चस्व ध्वस्त होता नजर आने लगा हो। इसी कारण मनुस्मृति स्त्रियों द्वारा पितृसत्तात्मक मूल्यों के प्रतिरोध में जाने पर उसे प्राप्त सुविधाएं और विशेषाधिकारों को समाप्त करने का निर्देश देने के साथ ही साथ दण्ड भी निर्धारित करता है। जिस भय से स्त्रियां इन मूल्यों के प्रतिरोध में न जाकर अपितु उसे अपनी सहमति देते हुए उसके शोषण और उत्पीड़न में सहभागी हो जाएं।

पुनर्विवाह के सम्बन्ध में भी पितृसत्ता की वर्चस्वपरकता स्पष्टतया उजागर हो जाती है। सामान्य तौर पर एक पत्नीव्रत को ही प्रतिष्ठित किया गया है। परंतु कई परिस्थितियों में पुरुष हेतु पुनर्विवाह का निर्देश भी दिया गया है। (मद्यपान करने वालीए, दुराचार वाली,  प्रतिकूल रहने वाली, रोगी, दास-दासी आदि को सदा मारने वाली और अधिक धन व्यय करने वाली स्त्री हो,  तो पति उसके जीवित रहने पर भी दूसरा विवाह कर ले)।
पुर्नविवाह की जो परिस्थितियाँ वर्णित हैं, वे भी इस शास्त्र की पुरुषवादी दृष्टि को ही प्रतिबिंबित करती हैं। पत्नी के चरित्र को अपने हित और सुविधानुसार परिभाषित करते हुए पुरुष हेतु पुनर्विवाह का रास्ता भी मनुस्मृति बना देता है। पुनर्विवाह हेतु निर्धारित परिस्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में बहुपत्नीत्व की स्वीकार्यता रही होगी.
वन्ध्याष्टमेऽधिनेघाब्दे दशमे तृ मृतप्रजा।
एकादशे स्त्रीजननी सघस्वत्वप्रियवादिनी।।

पितृवंशात्मक समाज में वंशवाहक पुरुष होने के कारण इस सामाजिक.व्यवस्था में पुत्र को महत्व दिया जाता है। विवाह संस्था का उद्देश्य हमारे शास्त्रों में पुत्र प्राप्ति ही माना गया है। पुत्र ही पितृऋण से उऋण करता है। मनुस्मृति प्रथम विवाह द्वारा पुत्र प्राप्ति न होने की स्थिति में पुरुष को दूसरा विवाह करने का निर्देश देता है। वहीं दूसरी ओर विधवा-विवाह और स्त्रियों के पुनर्विवाह का निषेध इस मान्यता के आधार पर करता है कि स्त्री (संपत्ति )  एक बार दान किये जाने के पश्चात पुनः दान नहीं किया जा सकता। पतिव्रता स्त्री के लिए दूसरे विवाह का विधान भी नहीं है। यह शास्त्र स्त्री के प्रति अन्य की धारणा को लिये हुए है। वहीं कुछ श्लोकों में स्त्री को गृहलक्ष्मी, अद्धार्गिनी आदि संबोधन भी दिये गये हैं। लेकिन यह संबोधन पुरस्कार स्वरूप उन्हीं स्त्रियों के लिए रहा होगा जो पुरुषवादी व्यवस्था के खांचें में समायोजित हो जाती होंगी। स्त्री और पुरुष की तुलना खेत और बीज से की गई है। खेत पर बीज की श्रेष्ठता स्थापित है।  खेत (स्त्री) पर खेत के मालिक (पति) का वैधानिक अधिकार होता है भले ही खेत पर खेत के मालिक का बीज न होकर किसी अन्य का बीज हो। यह धारणा संतान पर स्त्री के पति को ही सर्वाधिकार देता है।

पैतृक संपत्ति पर उत्तराधिकार संबंधी नियमों में पुत्र को ही उत्तराधिकारी बताया गया है। जबकि स्त्रीधन (माता का धन)  पर पुत्रों, पुत्रियों और पुत्रियों के अविवाहित पुत्रियों के उत्तराधिकार का विधान है। उपहारस्वरूप  विविध अवसरों पर पिता, पति, माता और भाई द्वारा मिला हुआ छः प्रकार का धन तत्कालीन समाज में स्त्रीधन माना जाता था।  स्त्री-धन पर स्त्री के संतानों का ही अधिकार था न कि उसके पति का। ब्रह्म, दैव, आर्य, प्रजापत्य तथा गांधर्व विवाहों के फलस्वरूप  संतान होना स्त्री के स्त्रीधन का अधिकारी पति होता है, वहीं असुर, राक्षस और पैशाच विवाहों में स्त्री के माता-पिता अधिकारी होते हैं। इस प्रकार मनुस्मृति स्त्री के आर्थिक-अधिकारों को बहुत ही सीमित रखता है, ताकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बिना किसी चुनौती या विरोध के चिरस्थायी तौर पर कायम रखा जा सके।

इस प्रकार तमाम विभेदमूलकताओं की उपस्थिति के बावजूद स्त्रियों की सम्मान-रक्षा और शांतिपूर्ण समाज की स्थापना के माध्यम से मनुस्मृति एक प्रकार की निष्पक्षता का स्वांग भी रचती है। परंतु सामाजिक स्तरीकरण का स्पष्ट प्रतिबिंबन इसमें दिखाई पड़ता है, जो पितृसत्तात्मक हितों से संचालित है। शास्त्रीय  परंपरा इसके बावजूद कि विभिन्नताओं को समाप्त करती दिखती है और सब कुछ सपाट, समान करने का प्रयास करती है,  ऐसी स्थितियों को भी दर्शाती है,  जहाँ पितृसत्तात्मक और गैरपितृसत्तात्मक संभावनाएं एक साथ बनती है। इतिहासकार सामान्यतः इनके द्वारा सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं को समझ सकते हैं और खासकर जेंडर आधारित संबंधों कोए जो प्राचीन भारत में विद्यमान थे।
जाहिर सी बात है मनुस्मृति जैसे ग्रंथ, जो एक समय हिन्दू धर्म व हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के लिए संवैधानिक नियम कायदों के स्रोत का कार्य करते थे, अपनी समस्त संरचना में स्त्री विरोधी होने के साथ दलित विरोधी भी है। यह उन शर्मनाक स्थितियों को जन्म देता है, जो एक व्यवस्था व धर्म के रुप में हिन्दू धर्म को उच्च स्थान पर स्थापित करने का प्रयास करता है। इस विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री अधिकारों में सर्वाधिक बाधक तत्व धर्म है। सीधे शब्दों में कहें तो धर्म ही स्त्री अधिकारों के बीच सबसे बड़ा अंतर्विरोध हैं। धर्मिक बाध्यतायें ही दलितों को भी उनके अधिकार से वंचित करती है.

दलित स्त्रियाँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास

हेमलता


हेमलता ने ‘दलित अस्मिता और शिक्षा’ पर शोध किया है.सम्पर्क :hmdehrwal@gmail.com

अनिता भारती आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अपने तीखे और सटीक शब्दों से उन्होंने दलित स्त्री विमर्श को अलग मुकाम दिया है।‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ पुस्तक भी कुछ ऐसे ही तल्ख़ प्रश्नों को लेकर खड़ी है, जिसके निशाने पर आधुनिक नारीवाद के साथ-साथ कई आत्ममुग्ध दलित लेखक भी आ जाते हैं।

अनिता भारती अपनी भूमिका ही प्रश्नों से शुरु करती हैं; मसलन दलित नारीवाद क्या है? यह सवर्ण नारीवाद से कैसे भिन्न है? किन मुद्दों पर ये दोनों अलग ध्रुवों पर खड़े दिखाई देते हैं आदि। कुल मिलाकर यह  पुस्तक दलित स्त्री  को केंद्र में रखते हुए उसे किसी भी तरह की चालाकी से बचने के लिये सावधान करती है। इस संदर्भ में वर्ग और जाति के अंतर को भी बखूबी स्पष्ट करती हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि “सभी औरतें एक मुकम्मल वर्ग के रूप में नहीं हैं, बल्कि वे जातियों में बँटी हैं। इसलिये उनकी समस्याएँ और मुद्दे भी अलग-अलग हैं।” उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थितियां अलग हैं। यह पुस्तक ऐसे ही कई सवालों और विमर्शों को लेकर आगे बढ़ती है। साथ ही उन सवालों के उत्तर खोजने, उन पर बात करने और उनसे जूझने की कोशिश करती है।

इस पुस्तक में सात शीर्षकों के अंतर्गत 36 अलग-अलग विषयों पर चर्चा की गई है। जिसमें ‘संघर्ष के विविध आयामों’ के साथ-साथ ‘दलित लेखिकाओं के स्त्रीवादी स्वर’ व आत्म-विश्लेषण भी सम्मिलित हैं। ‘खुद से गुजरते हुए’, ‘कुछ छूटे पन्नों’ के साथ ही वे आज की बदली पितृसत्ता को चुनौती भी देती हैं। पुस्तक का पहला खंड दलित लेखिकाओं के स्त्रीवादी स्वर को उभारता है। जिसमें कौशल्या बैसंत्री, दया पवार, सुशीला टाकभौरे, बेबी ताई कांबले, कावेरी, रजतरानीमीनू, कुसुम मेघवाल आदि दलित लेखिकाओं की आत्मकथाओं अथवा अन्य रचनाओं के माध्यम से उन्हें समझा गया है। यह खंड अपने साथ यह निष्कर्ष जरूर लाता है कि इन लेखिकाओं का मुख्य स्वर समता, स्वतंत्रता और न्याय है। जो समाज में हो रहे किसी भी तरह के अन्याय, उत्पीड़न, दमन को स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं। अनिता जी का इन रचनाओं के संदर्भ में किया गया विश्लेषण या पड़ताल निश्चित ही एक तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है।

अनिता भारती की यह पड़ताल केवल अन्य दलित लेखिकाओं तक सीमित नहीं रह जाती बल्कि अगले खंड में वे इसे खुद पर भी लागू करती हैं। ‘खुद से गुजरते हुए’ अध्याय में उनके अपने जीवन की संक्षिप्त झलकियाँ देखी जा सकती है। चार भिन्न शीर्षकों के दायरे में वे अपने निजी जीवन के कुछ खट्टे-मीठे अनुभवों को बांधती हैं। जीवन की कुछ कड़वी सच्चाईयों को भी वे बिना किसी झिझक के पेश करती हैं जहाँ उन्हें अत्याचार व अपमान का कड़वा घूंट पीना पड़ा था। मानसिक विक्षिप्तता की अवस्था में भी माँ के सुरक्षा आवरण व प्रेम को किसी भी प्रकार से वे भूल नहीं पाती हैं। इस प्रकार ‘अपने कमरे’ से लेकर ‘त्यौहार मनाने की उहापोह’ तक के सामाजिक दबाव को वे एक अंतरद्वंद के साथ पेश करती हैं। कुल मिलाकर यह खंड उनकी भावी आत्मकथा का एक संक्षिप्त अंश माना जा सकता है।

साहित्य में हिंदी दलित लेखन हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। अपने अलग दर्शन, सिद्धांत, विचारधारा, अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों को रखते हुए यह साहित्य को नई चेतना भी देता रहा है। इसी संदर्भ में इस पुस्तक का यह प्रसंग भी महत्वपूर्ण हो उठता है कि प्रेमचन्द की इस (दलित) लेखन में क्या प्रासंगिकता है। प्रेमचन्द क्या किसी खास समुदाय/जाति/वर्ग के नुमाइंदे थे या इससे इतर वे समता व समान न्याय के पक्षधर थे। आज दलित लेखन में इस पक्षधरता को लेकर अलग-अलग खेमे देखे जा सकते हैं। अनिता जी की यह पुस्तक प्रेमचन्द पर उठे ऐसे ही प्रश्नों का तार्किक जवाब प्रस्तुत करती है। लेखिका प्रेमचन्द की पक्षधरता को लेकर कहीं भी आशंकित नहीं दिखतीं। इस संदर्भ में उनका स्पष्ट मानना है कि “प्रेमचन्द जाति व्यवस्था तोड़ने का हल निकालते हैं और समाधान वही है जो डॉ. अम्बेडकर ने सुझाया था” (पृ. 107)। ‘साहित्यकार प्रेमचन्द और दलित स्त्री-विमर्श’ खंड अपने तीन अध्यायों में प्रेमचन्द के संदर्भ में उठी ऐसी ही बहसों का तार्किक जवाब खोजने का प्रयास है। इस संदर्भ में अनिता भारती कई दलित पुरुष लेखकों को भी नहीं बख्शतीं। ‘रंगभूमि दहन’ को भी वे महज एक ‘स्टंटबाजी’ के अतिरिक्त और कोई संज्ञा नहीं देतीं। वे लिखतीं हैं कि “प्रेमचन्द के विचारों और साहित्य का मूल्यांकन समय काल के दायरे में किया जाना चाहिये।… प्रेमचन्द अछूत समस्या का हल ऐसा खोजना चाहते थे जिससे राष्ट्र न टूटे।… कुछ दलितों द्वारा उनकी रंगभूमि जला देने से उनका महत्व न कम हुआ है और न ही होगा। प्रेमचन्द की दॄष्टि सवर्ण पात्रों की क्रूरता के प्रति विद्रोह करती है, उनका धर्म छोड़कर संघर्ष की ओर अग्रसर होती है।” कुछ ऐसी पंक्तियों के साथ यह पुस्तक प्रेमचन्द को दलित संवेदना के बीच लाकर खड़ा कर देती है।

अनिता भारती की यह पुस्तक साहित्यिक सर्वेक्षणों के साथ-साथ जमीनी सर्वेक्षणों को भी लेकर चलती है। सामाजिक सर्वेक्षण की तर्ज पर यह पुस्तक ‘दलित महिलाओं के खिलाफ हिंसा’ का तारीख और क्षेत्रवार विवरण प्रस्तुत करती है। राजधानी दिल्ली से लेकर सुदूर गाँवों तक हो रहे जातिगत और पेशेगत उत्पीड़न, खेतिहर मजदूरी और पुलिसिया जुल्म का पूरा आँकड़ेवार लेखा-जोखा पुस्तक के तीसरे खंड में दर्ज है। यहीं एक अन्य अध्याय दलित स्त्री को लेकर मीडिया द्वारा गढ़ी छवि को भी कटघरे में खड़ा करता है। अनिता भारती का मानना है कि मीडिया ने कभी दलितों की सशक्त छवि नहीं गढ़ी। वह छवि गढ़ने के लिये प्रतीकों को गढ़ता है और उसे अपने मन मुताबिक इस्तेमाल करता है। दरअसल यह अध्याय मीडिया द्वारा दलित, आदिवासियों की एक परंपरागत छवि को पेश करने का विरोध करता है। इन छवियों में उन्हें फूहड़, गंदा, काला, अपंग आदि रूपो में ही पेश किया जाता है। उन्हें असभ्य और हास्यास्पद छवि ही पसंद आती है, जबकि इस वर्ग में कई प्रभावशाली और प्रसिद्ध चरित्रों को लगातार नजरंदाज किया जाता रहा है। यह हाल इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट मीडिया और फिल्मों तक में बदस्तूर जारी है।

सामाजिक अनदेखी की इस प्रक्रिया को पूरी तरह से धता बताते हुए अनिता भारती कहती हैं कि ‘दलिताएँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास’। यहाँ अनिता भारती दलित स्त्रियों के लिये ‘दलिताएँ’ शब्द गढ़ती हैं। वे साथ ही उन इतिहास पुस्तकों का भी जिक्र करती हैं जिनमें दलित स्त्री लेखिकाओं को लगातार उपेक्षित रखा गया। इसी संदर्भ में राधा कुमार की पुस्तक “स्त्री संघर्ष का इतिहास 1800-1990” का जिक्र करते हुए अनिता भारती लिखती हैं कि “राधा कुमार जी ने स्त्री आंदोलन में दलित स्त्रियों के आंदोलन के साथ न्याय नहीं किया है।… मेरे आश्चर्य और दु:ख की सीमा ना रही जब मैंने राधा कुमार जी की पुस्तक में दलित महिला आंदोलन की रीढ़ ही नहीं, अपितु संपूर्ण भारतीय महिला आंदोलन की जनक सावित्रीबाई फुले का नाम पूरी तरह से उपेक्षित पाया।” इसी प्रकार दीप्ति प्रिया महरोत्रा की पुस्तक ‘भारतीय महिला आँदोलन’ में दलिताओं के कई सक्रिय और जुझारू आंदोलनों का जिक्र तक नहीं है। दरअसल यह पुस्तक उन तमाम स्वयंसिद्ध लेखकों के समक्ष एक आईना है जो दलित मुखौटों में आज भी पितृसत्तात्मक बने हुए हैं।

कुछ ऐसा ही आईना वे डॉ. धर्मवीर को भी दिखाती हैं जिनकी नजर में अंतरजातीय विवाह  किसी दलित स्त्री के लिये वेश्यावृत्ति से कम नहीं है। दलित स्त्रियों के इस अपमान का अनिता भारती तीखा विरोध करती हैं। पुस्तक के छठे भाग में ‘पितृसत्ता को चुनौती’ देते हुए वे इस मानसिकता के तमाम दलित लेखकों को लगभग चेतावनी देती हुई दिखती हैं। इस भाग में मुख्य रूप से डॉ. धर्मवीर से उनका मतांतर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। जब वे स्पष्ट रूप से लिखती हैं कि “1995 से लेकर 2005 तक इन दस वर्षों में वे अपनी सार्वजनिक बेईज्जती भूलकर लगातार निर्लज्जता से दलित/ गैर दलित स्त्रियों के खिलाफ अश्लील व अपमानजनक सस्ता लेखन कर रहे हैं। कथादेश में चली बहस इसकी गवाह है” तो यह विषय और भी गंभीर हो जाता है। दरअसल वर्चस्व की राजनीति और असमानता की साजिश पितृसत्तात्मक समाज का मूल चरित्र रही है फिर चाहे बात किसी भी वर्ग की हो, जाति की हो या समाज की। स्त्रियों के अर्थ, चरित्र, श्रम, आंदोलनों आदि का अंतिम श्रेय अंतत: पुरुष अपने ही हाथों में रखता आया है। यही कार्य तथाकथित आधुनिक सभ्य समाज भी कर रह है। कुल मिलाकर पुस्तक का यह अंश तथ्यात्मक उद्धरणों पर आधारित है जो स्त्रियों को चुप्पी की संस्कृति से बाहर लाता है, उनकी आवाज को और बुलंद करता है।

पुस्तक का अंतिम भाग ‘डॉ. अम्बेडकर और दलित साहित्य’ है। इस भाग में भी अनिता भारती ने डॉ. अम्बेडकर के स्त्री चिंतन पर ही जोर दिया है। इस अध्याय में तमाम दलित महिला आंदोलनों, सम्मेलनों के साथ-साथ उनके सामान्य जीवन की छवियाँ भी रखी गईँ हैं। दरअसल अम्बेडकर की ही तरह भारती जी भी दलित महिलाओं के बीच एक समाज सुधारक की तरह उतरती हैं। वे उनके प्रति गढ़ी गई छवियों को लगातार बदलने का प्रयास करती हैं। इस संदर्भ में डॉ. अम्बेडकर को उद्धृगत करती हैं कि “तुम खुद को अस्पृश्य मत मानो। घर में स्वच्छता रखो। धोती चाहे फटी ही क्यों न हो पर स्वच्छ होनी चाहिये।… दारूबाज पति, भाइयों और बहनों को भोजन मत दो। लड़कियों को शिक्षा दिलवाओ। ज्ञान और विद्या दोनों महिलाओं के लिये आवश्यक है।” इस प्रकार अनिता भारती डॉ. अम्बेडकर के जनतंत्र व समतावादी भारत की कल्पना निर्मित करती हैं।
दरअसल यह पुस्तक दलित स्त्री लेखन को एक नई उर्जा के साथ पेश करती है। पुस्तक लगातार उन छवियों को तोड़ती है जो उस पर समाज ने थोप रखे हैं। यह पुस्तक उन तमाम पुरानी अर्जियों को खुद खारिज करते हुए किसी भी नई अर्जी से इंकार करती है। यहाँ अर्ज़ियाँ नहीं फैसले हैं जो दलित स्त्रियों ने खुद अपने लिये चुने हैं। तभी तो अनिता भारती यह घोषणा भी करती हैं कि “दलिताएँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास”। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस पुस्तक का हासिल अपनी परंपरा से कहीं ज्यादा अलग और कहीं ज्यादा गाढ़ा है।

पुस्तक का विवरण :
समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध
लेखक : अनिता भारती
प्रकाशन: स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रथम संस्करण -2013
मूल्य: 650 रुपये

हिन्दी साहित्य में महिलाओं को अब तक समानता नहीं मिली है : उषा किरण खान

( हाल  के दिनों  में  कथाकार  उषा  किरण  खान  को  ‘पद्मश्री ‘  से  नवाजा  गया . युवा  पत्रकार  इति शरण  ने  उनसे  स्त्रीकाल  के लिए  बातचीत  की  .  स्त्रीविमर्श , स्त्री -लेखन , भाषा , स्वानुभूति -सहानुभूति  बहस , महिलाओं  को  रॉयलिटी, पटना  में कथा – सम्मलेन -विवाद  तथा  अपने लेखन  पर  उषा  किरण  खान  ने   बेबाक  बातचीत  की . ) 

उषा किरण खान





हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श का एक लंबा इतिहास रहा है। साहित्य के विभिन्न चरणों के साथ स्त्री विमर्श के स्वरूपों में भी परिवर्तन आता रहा। महिलाओं की लेखनी में अपनी पहचान बनाने के बाद स्त्री विमर्श का एक सशक्त रूप सामने आया। पद्म श्री उषा किरण खान इस परिवर्तन को एक लंबा संघर्ष मानती है। उनका मानना हैं कि उन संघर्षों के बाद आज युवा स्त्रियां बेबाकी से अपनी बातें लिख पा रही हैं । 
                                                                                                                                                (इति शरण) 
स्त्री -लेखन को आप किस रूप में देखती हैं ?
लेखनी के क्षेत्र में महिलाओें ने हमेशा अपनी भूमिका निभाई है। मगर आज कहानी और उपन्यास के साथ-साथ महिलाएं वैचारिक लेखनी भी कर रही हैं। वह साहस के साथ अपनी जीवनी लिख रही है। इसके लिए उन्हेें कई आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है, मगर वे उन आलोचनाओं से पीछे नहीं हट रही।
स्त्रियों का यह सफर इतना आसान नहीं था। इसके लिए हमने एक लम्बा रास्ता तय किया हैं। महादेवी वर्मा, आशापूर्णा देवी, सुभद्रा कुमारी चैहान, यह सभी घरेलू महिलाएं थी। अपनी लेखनी के लिए उन्होनें बहुत संघर्ष किया है। आज स्त्रियों की अभिव्यक्ति का कारण शिक्षा का प्रचार-प्रसार और अपने अधिकारों के प्रति उनकी चेतना ही है।

इति शरण

क्या आप खुद को स्त्रीवादी लेखिका कहलवाना पसंद करेगी ?
हां, मैं खुद को स्त्रीपक्षी मानती हूं, हाँ  मैैं स्त्रीवादी हूं। मगर ऐसा नहीं कि बिना सोचे समझे किसी मुद्दों पर स्त्रियों की पक्षधर हो जाऊंगी। समाज अगर किसी स्त्री को गलत कह रहा है तो यह जानने की कोशिश करूंगी कि वह गलत है या सही। उसका सीधे समर्थन या विरोध नहीं करूंगी। मान लिजीए किसी स्त्री के ऊपर खून का आरोप लगता है तो मैं जानने की कोशिश करूंगी कि उसने खून किया क्यों ? उसके तह तक जाऊंगी। क्योंकि स्त्रियां प्रायः भावुक होती है। वे एक मां होती हैं। वे आसानी से खूून नहीं कर सकती।

महादेवी वर्मा का मानना था कि एक स्त्री अपने जीवन का जितना सजीव चित्रण कर सकती है, एक पुरुष स्त्री जीवन का वैसा चित्रण नहीं कर सकता। स्त्री का अपना खुद का अनुभव होता है। आपको क्या लगता हैं किसी वर्ग विशेष पर बात करने के लिए उस वर्ग का होना जरुरी हैं ? 
हां, यह बात बिलकुल सही है कि एक स्त्री अपने आपको पुरूषों की तुलना में ज्यादा बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर सकती है। इन दिनों मुझे एक बात समझ आई है, “मैनें आज तक दलितों के बारे में जो कुछ भी लिखा है, मुझे लगता है एक दलित उन चीजों को मुझसे बेहतर लिख सकता है।“ दूसरी बात जो मेरी समझ में आई वह यह कि अभी स्त्रियां अपनी आत्मकथाओं  में जो बाते लिख रही है वैसी बातें प्रेमचंद्र, शरतचंद्र जैसे पुरूष लेखक नहीं लिख पाए। इस तरह मुझे लगता है कि स्त्री मुद्दों पर महिलाएं ज्यादा अच्छा लिख सकती हैं। लेकिन मैं पुरूषों को खारिज भी नहीं करती।

 अंग्रेजी साहित्य में भी 19 के दशक तक महिला लेखिकाओं को कुछ खास तवज्जों नहीं मिली, लेकिन धीरे-धीरे वहां स्थिति में सुधार आया और महिला लेखिकाओं के लेखन को भी पुरुष लेखकों के बराबर का महत्त्व मिलना शुरू हुआ । आपको क्या लगता हैं हिंदी साहित्य में महिलाओं को अब तक समानता मिल पाई हैं ?
हिन्दी साहित्य में महिलाओं को अब तक समानता नहीं मिली है। आज भी उनपर आरोप लगाया जाता है कि उनकी रचना मौलिक नहीं होती। महुआ मांझी पर भी कुछ ऐसा ही आरोप लगाया गया। जबकि यह सामान्य सी बात है कि 500 पन्नों का उपन्यास कोई दूसरे के लिए क्यों लिखेगा। दरअसल, यह सारी बातें महिलाओं को कमतर दिखाने के लिए कही जाती है।

उषा किरण खान और बाबा नागार्जुन

 फिल्मों की भी अगर बात करें तो वहां भी पुरुष अभिनेताओं की तुलना में स्त्री अभिनेत्रियों को कम पैसे मिलते हैं । अभी करीना, कंगना, दीपिका, प्रियंका जैसी कुछ अभिनेत्रियों ने इस मुद्दे को उठाया भी था। साहित्य हो या फिल्म जगत स्त्रियों के साथ होने वाले इस दोयम दर्जे में सुधार कैसे लाया जा सकता है ?
मैं फिल्मों के बारे में तो ज्यादा कुछ नहीं बोल सकती क्योंकि उस क्षेत्र का मुझे उतना ज्ञान नहीं है। मगर साहित्य की एक बिलकुल सामान्य बात मैं आपको बताती हूं। किसी किताब की राॅयेलटी का जो दस्तख़त करवाया जाता है, उसका फाॅर्म स्त्री और पुरूष दोनों के लिए समान होता है। लेकिन जब बात पैसों की आती हैं तो स्त्रियां वहां पुरूषों से पीछे रह जाती हैं। स्त्रियां पैसों के लिए दवाब नहीं डाल पाती। उनके अंदर एक संकोच भी होता है। मगर पुरूष आसानी से दवाब बना लेते हैं। अगर महिलाएं संकोच से बाहर निकलकर दवाब बनाने की कोशिश भी करती हैं तो उनका यह कहकर मज़ाक उड़ाया जाता है कि देखो कैसी औरत है, पैसों की चर्चा कर रही है। इन स्थितियों से बाहर निकलने के लिए स्त्रियों को संगठित होने की जरूरत हैं।

एक स्त्री लेखिका होने के क्रम में आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?
वैसे तो मुझे बहुत ज्यादा परेशानी नहीं हुई। एक पढ़े-लिखे परिवार में आपको ज्यादा परेशानियों  का सामना नहीं करना पड़ता है। हां, ज्वाइंट फैमिली होने के कारण खुद ही परिवार में थोड़ी उलझी रही। बच्चे बड़े हो रहे थे उनकी देखभाल पढ़ाई-लिखाई और फिर आर्थिक उन्नयन के लिए नौकरी करना, बस इन्हीं चीजों में थोड़ी उलझ गई थी। लेखनी कोई परफाॅमेंस तो है नहीं कि उसके लिए आपको कही बाहर जाना होता है। घर बैठे लिखा जा सकता है। इसलिए ज्यादा कोई बाधा नहीं आती है। शायद मैं ड्रामा की बात करती तो कुछ सीमाओं का सामना करना पड़ सकता था। जीवन भर बिहार में रहने से जरूर कुछ बाधाएं आई। एक तो मैं स्त्री, ऊपर से बिहारी। हालांकि बिहार के लोगों के बिना कोई किताब छपती भी नहीं हैं। मगर हमारे क्षेत्र के लोगों को अभी भी कमतर आंका जाता है। एक और बाधा यह रही कि मैं अपनी रचनाओं का बहुत प्रचार नहीं करती। इसलिए इनकी समीक्षाएं भी बहुत नहीं आती। मगर आज भी कई युवा लेखक मुझसे कहते हैं कि मैने आपकी रचनाओं को पढ़ा हैं। मेरे लिए बस उतना ही काफी हैं। पाठकों तक मेरी रचना पहुंच रही है, मेरे लिए यही खुशी की बात हैं। इसलिए मैं इन बाधाओं को बाधा मानती भी नहीं हूं।

स्त्रीकाल के गया सेमिनार में बोलती हुई उषा किरण खान

आपकी रचनाओं में ज्यादातर चरित्र और परिवेश आपके ग्रामीण क्षेत्र के ही होते हैं, आपने अपने लेखन के क्रम में अपने गांव में महिलाओं की स्थिति में कितना बदलाव देखा हैं ?
जब मैनें लिखना शुरू किया था तो वे सचमुच भोल-भाले ग्रामीण थे। फिर पंचायती व्यवस्था शुरू हुई, उसके बाद पंचायतों में महिलाओं को पहले 30 प्रतिशत और फिर 50 प्रतिशत आरक्षण मिला। जिन स्त्रियों को मोहरा बनाकर पेश किया जाता था अब वही स्त्रियां खुलकर सामने आने लगी। मगर आज भी वहां जातिगत भेदभाव की स्थिति बनी हुई हैं। दलितों और पिछड़े वर्गों के आपसी वर्गीकरण से ही अब तक लोग प्रभावित है। इससे सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभावित होती है।

 वर्तमान साहित्य में स्त्री विमर्श को किस रूप में देखती हैं ? क्या पहले की तुलना में अब स्त्री विमर्श पर ज्यादा खुल कर बात हो रही है ?
पहले स्त्री मुद्दों पर इतनी खुलकर बाते नहीं होती थी जितनी आज हो रही है। पहले कही ना कही महिलाओं को हाशिये पर रखा जाता था। मगर आज इसपर बड़े स्तर पर बाते हो रही। रवीन्द्रनाथ ने स्त्रियों की भूमिका को घर से बाहर लाने की कोशिश की। उनका एक उपन्यास है “गोरा“। जिसमें स्त्री पात्र का पति ही उसे बाहर जाने और अपनी पहचान बनानी की स्वतंत्रता देता है, लेकिन बाद में उसके पति को ही उससे काॅम्पलेक्शन होने लगता है। यहां रविन्द्रनाथ उस महिला पात्र का पक्ष लेते हुए दिखते हैै। वही उनके दूसरे उपन्यास “घर-बाहर“ में भी उन्होनें महिला पात्र का ही पक्ष लिया, जिसमें स्त्री अपने पति के दोस्त के विचारों से प्रभावित हो जाती है और कई बार अपने पति को भी उसकी बातों के आगे चुप करा देती है। इस तरह कई कथाकारों ने धीरे-धीरे अपने लेखन में महिला पात्र को घर की चार दिवारी से बाहर निकाला। उसके बाद मनु भंडारी, कृष्णा सोबती जैसी  लेखिकाओं ने बेबाकी से स्त्री मुद्दों पर लिखना शुरू किया।

अभी एक फिल्म आई “पीकू“ जिसमें महिला की एक सशक्त छवि को दिखाया गया । इस फिल्म पर खूब चर्चाए हुई । लेकिन जब इन्हीं मुद्दों पर साहित्य में बातें होती है तब इतने बड़े स्तर पर चर्चा नहीं होती। इसका क्या कारण हैं ?
साहित्य हमेशा से अल्पसंख्यक विषय रहा है। इसे बहुत ज्यादा कोई नहीं पढ़ता । इसलिए हमें इसकी क्वान्टिटी पर ना जाकर क्वालिटी पर जाना चाहिए।

 आप अपनी मैथिली की रचनाओं को ज्यादा करीबी मानती हैं या हिंदी रचनाओं को ?
हिन्दी मेरी स्वाभाविक भाषा है और मैथिली मातृभाषा है। मेरी शिक्षा दीक्षा हिन्दी में हुई इसलिए उसमें खुद को ज्यादा सहज महसूस करती हूं। दूसरी बात मैं अपनी रचनाओं के जरीए अपने क्षेत्र की कोशी की सच्चाई दुनिया के सामने लाना चाहती थी। इस विषय पर अभी तक लिखा नहीं गया था। फणीनश्वर नाथ रेणु जी ने कोशी का जो वर्णन किया वो ग्लैैमराइज था। उनके क्षेत्र में स्थिति हमारे जैसी विषम नहीं थी। हमारे यहां आज भी हमें बैलगाड़ी और नाव से घर जाना पड़ता है। इन सभी सच्चाईयों से लोगों को वाकि़फ कराने के लिए मैंने  हिन्दी भाषा का चुनाव किया। मैथिली की रचना की कुछ सीमाएं होती है । उसकी पहुँच  एक सीमित क्षेत्र तक ही रह जाती है।

जैसा कि आपने कहा “क्षेत्रीय भाषा की रचनाओं के पाठक सीमित होते हैं।“ इसकी सीमाओं का कारण किसे मानती हैं ?
हमारी मैथली भाषा बहुत विकसित  है। इसके बावजूद इस भाषा के साहित्य के प्रकाशन के लिए कोई प्रकाशक नहीं मिलते हैं। ऐसी ही स्थिति भोजपुरी की भी है। अगर आप इन भाषाओं में कुछ लिख रहे हैं तो आपको अपनी किताब खुद ही प्रकाशित करनी पड़ती है। उसके बाद वितरण की समस्या। किताब प्रकाशित होने के बाद भी उसका वितरण नहीं हो पाता। दरभंगा तक में एक भी मैथिली भाषा के साहित्य की दुकान नहीं है। इन सभी परिस्थितयों में एक स्त्री के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में लिखना और भी मुश्किल हो जाता है।मुझे भी शौक था कि मैं भी प्रतिमा राय बन जाऊं। जैसे वह उड़ीया में लिखती हैं मैं भी सिर्फ मैथिली में ही लिखूं । मगर उड़िया या बांग्ला भाषा के साहित्य को जितनी तवज्जों मिलती है, हमारी भाषाओं की रचनाओं को नहीं मिल पाती है। उन भाषाओं की किताबों के अनुवाद भी तुरंत हो जाते हैं मगर हमारे यहां प्रकाशक तक नहीं मिलते। मेरे दिल के करीब मैथिली है। लेकिन उसकी सीमाओं के कारण मुझे हिन्दी में लिखना पड़ता है।
युवाओं को हिंदी या क्षेत्रीय भाषा की रचनाओं से जोड़ने की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए ?
यह एक संकट का विषय है। मैं अपने ही घर में अपने नाती पोतो को बोलती हूं “अगर तुम लोग मैथिली में नहीं बोलोगे तो मेरे मैथिली में लिखाने का क्या मतलब।” आज की पीढ़ी का क्षेत्रीय भाषा से संबंध बिलकुल टूटता जा रहा है। इसके लिए जरूरी है कि मैिथली, भोजपुरी जैसी क्षेत्रीय अकादमी सामने आए। क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मेलन होना चाहिए। अगर हम प्रयास करे तो युवा इससे जुड़ सकते हैं। इस साल मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल की ही बात की जाए तो वहां बड़ी संख्या में युवाओं ने भागीदारी निभाई थी।हमें अपनी मातृभाषा से हमेशा जुड़ कर रहना चाहिए। मैं युवाओं को हमेशा यही कहूंगी “आप आकाश में जरूर जाइए, मगर जड़ मत छोडि़ए. ”

अभी कुछ किताबों के रिलीज़ से पहले उनके प्रोमो तैयार किये जा रहे हैं। लेखनी में इस तरह की मार्केटिंग से स्त्री लेखिकाओं को कितना खतरा हो सकता हैं ?
अगर ऐसा हो रहा है तो इसके लिए आज की स्त्रियों को तैयार होना चाहिए। हमारे समय की स्त्रियां तो यह सब जानती भी नहीं। मुझे भी इसकी जानकारी नहीं है। लेकिन अब स्त्रियों को प्रतियोगिता में भी आगे आना चाहिए। आज की युवा स्त्रियां आगे आ भी रही है।

.आपने अभी पटना में कथा -पाठ  का एक भव्य आयोजन करवाया था। जो काफी सराहनीय था। मगर उसको लेकर कुछ अलोचनाएं भी हुई थी कि आपने उसमें सिर्फ अपने करीबी लोगों को ही बुलाया था। इस मुद्दे पर आपका क्या कहना है ?
वहां एक नाटक के मंचन के लिए मैनें अपनी बेटी कणु प्रिया को बुलाया था। वह एक रंगकर्मी है। मैनें उसे एक अभिनेत्री के रूप में  बुलाया था। वह भी लोगों ने डिमांड पर। मेरी एक प्रसिद्व रचना है “दूबधान“। मेरी बेटी उसका बहुत अच्छा मंचन करती है। अभी तक इत्तेफाक से पटना में उसने इसका एक भी मंचन नहीं किया था। कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि आप इस समारोह में कणु प्रिया को “दूबधान“ के मंचन के लिए क्यों नहीं बुला रही है। लोगों की डिमांड पर मैनें उसे नाटक के मंचन के लिए बुलाया था। उस कार्यक्रम में कणु प्रिया ने “दूबधान“ और विभा रानी ने विख्यात कथाकार संजीव जी के नाटक नवरंगी नटनी की प्रस्तुति दी थी।मेरी एक बेटी दिल्ली में दूरदर्शन की प्रभारी है। वह भी वहां आई थी उस कार्यक्रम को कवर करने के लिए। अब अगर मेरी बेटियां इस काबिल हैं तो वे आई। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कह रहा है। जिन लोगों का आरोप हैं कि मैनें कुछ खास लोगों को ही बुलाया था तो उन्हें समझना चाहिए कि वहां सारे लोग मेरे अपने नहीं थे। जहां तक बात रही सीमित लोगों को आमंत्रित करने की तो वह एक सरकारी कार्यक्रम था। सरकार की तरफ से सिर्फ 27 लोगों की ही संख्या निर्धारित की गई थी। जिसमें 20 लेखक और 7 समीक्षक थे। हमलोग 27 से 28 नहीं कर सकते थे। हांलाकि मैं चाह रही थी लोगों को 25 हजार की जगह 15-15 हजार ही देकर लोगों की संख्या बढ़ा दी जाए। मगर इसे माना नहीं गया। वैसे मुझे लगता है, अगर इस बात को मान भी लिया जाता और लोगों की संख्या बढ़ाकर 30 भी कर दी जाती तब भी  31वां इंसान नाराज ही रहता। आपको बता दूं कि कुछ लोगों ने इस बात की भी हवा फैलाई कि नाटक के मंचन के लिए मेरी बेटी को एक लाख रूपये दिए गए है। अब इसपर मैं क्या बोलूंगी।

जेंडर और जाति के कुंडलों को तोडता लेखन और सत्ता की कुर्सी

( पिछले दिनों हिन्दी अकादमी,  दिल्ली की अध्यक्ष के रूप में मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति के सन्दर्भ से पुष्पा के लेखन की राजनीति और राजनीति तथा सत्ता में स्त्री की पहचान की कोशिश कर रही हैं प्रो परिमळा अंबेकर.स्त्रीकाल की ओर से भी मैत्रेयी को बहुत -बहुत बधाई !  )

पुरुषवादी मानसिकता  ने स्त्री को राजनीति के क्षेत्र में अमूमन सरपंच के रूप में स्वीकार करने की आम रवैय्या  तो बना  लिया है,  लेकिन सामाजिक या अकादमिक स्थानों या संस्थानों में स्त्री के प्रशासन की छडी के तले काम करने की स्वीकृति मर्दवादी  भारतीय संवेदना को अब भी अखरती जरूर है । इसीलिए सरकारी या गैर सरकारी संघ संस्थानों के अध्यक्षता या उपाध्यक्षता के पद, योग्यता और कर्मठता के बावजूद भी स्त्रियों को प्रदान करने की कोई  प्रामाणिक प्रयत्न होता हुआ हम कम ही देखते हैं । लेकिन हाल में हिन्दी अकादमी दिल्ली के उपाध्यक्ष पदपर मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति , इन मानित या सहज स्वीकृत मर्दवादी मानसिकता को तोडती हुई  ऐसी प्रक्रिया है , जिससे  विश्वास  पाकर स्त्रीवर्ग की प्रामाणिक निष्ठा,  मानवीय सरोकारों की कुप्पी और भी प्रतबद्धता से जलेगी निस्संदेह ।

 मैत्रेयी की रचनाएॅं स्त्रीमुक्ति के सवालों का, देह या सेक्स के धरातलपर उसकी जैविक सहज आवश्यकताओं की भूमिका में हर संभव उत्तर देने का सृजनात्मक प्रयत्न हैं। मर्दवादी  समाज में स्त्री की अपनी जगह  पाने की लडाई , मैत्रेयी के अनुसार स्त्रीयत्व के नकार की या देह से मुक्त होकर, मुक्त तन-मन की आध्यात्मिक अयथार्थ की लडायी नहीं है । अपितु, देह की जैविक स्त्री एवं पुरूष सहज इच्छाओं को साथ लिये लिये, मानवीय संबंधों के सुंदर रूपों को उकेरने का कमिटमेंट है । यह लेखन कमिटमेंट, मैत्रेयी के पात्रों में है, जिससे कहीं भी, मानवीय व्यवस्था की आंतरिक और बाहरी कुलाबें टूटती नहीं हैं, बिखरती नहीं है,  वरन उनकी अस्मिता में एक अजीब रंग और राग की निखार तारी होते जाती है… !

‘अल्मा कूबतरी‘, ‘इदन्न्मम‘, ‘झूलानट‘, ‘बेतवा बहती रही‘, ‘कहे ईसुरीफाग‘, ‘कस्तूरी कुडल बसै‘, ‘ललमनिया‘ॅं, ‘गोमा हॅंसती ह‘ै, ‘खुली खिडकियाॅं‘, ‘सुनो मालिक सुनो‘ आदि उपन्यास कहानी आत्मचरित और विमर्श ग्रंथों के साथ मैत्रेयी ने अपने लेखन की जो चटायी सजायी है ,  वह  मैत्रेयी को  अपनी स्त्री लेखक बिरादरी से बहुत अलग करती है ,  उसकी लेखन की सजी चटायी अपने विरासत में प्राप्त ग्रामांचलीय मिट्टी की गंध से सरोबार है । प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणू, नागार्जुन की सजी सजायी कथासेट को मैत्रेयी स्त्रीगत कलात्मक सोच और स्त्रीसुलभ महीन कशीदेकारी से ऐसे सजा रही है , जो ग्रामीण जीवन के छंद को प्रासबद्ध करके, फाग ईसुरी भैरव आदि रागों में ढाल रही है । प्रेमचंद, नागार्जुन, रेणु आदि की दालानी बैठक में अपना अदीन हस्तक्षेप कर रही है,  ताकि इन मर्दानी बैठकों में स्त्रियों को भी जगह मिले… उसकी भी आवाज सुनायी पडे ..!

‘‘ लडकी यादव की होती, जाटों की होती तो भी कोई बात थी । ब्राह्मण परिवार के उपाध्याय गोत्र की सनाढ्य लडकी, वह भी खिली-सिकुर्रा जैसे पिछले क्षेत्र में पली बढी, वह ऐसी हिम्मत करेगी सोचा भी नहीं जा सकता ‘‘ । ‘कस्तुरी कुडल बसै‘ आत्मचरित्र से मैत्रेयी ने सदियों के जाति और जेंडरगत कंुडलों को उखाडकर, परंपरागत स्थिर , भद्र मार्यादित बंदरों में बंधे पानी में कंकड फेंककर उसे जब हिला दिया था तब समीक्षक ‘कांतीकुमार जैन‘ द्वारा उठा यह उद्गार और श्लाघन वास्तविक है । पिता की मौत के बाद , अपनी सुरक्षा के किले में बांधेरखकर,  बेटी के भविष्य के लिये चिंतित विधवा माॅं , जिस पुरूष समाज को दूर रखकर विरोध करते हुए,  एक प्रकार की जैविक वितृष्णा को ओढकर सुरक्षित जीवन जीने के लिए  मैत्रेयी को विवश करती है वही बेटी उसी आग की ओर अपना देह बढाते जाती है, जो आग उसे बचपन से रौंदते आया है ! कामना और इच्छाओं को अपने तहत जीने की, सेक्स और संभोग को वस्तुगत नहीं अपितु शुद्ध व्यक्तिगत धरातल पर  भोगने की इच्छा जाहिर करती है । अपने देहगत और मन सुलभ इच्छाओं की तृप्ति के लिये र्निद्वंद्व उठखडी होती है । जीवन के इन संघर्षों को, इच्छा काम और नीति नियमों के मर्यादाओं के बंधनों को,  मैत्रेयी एक ही मूल से तोडते जाती है । और तो और, अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाकर, अपने मन को , मन की बातों को उलीचते जाती है… ! ‘ प्यार करोगी  और छिपाओगी भी ?’  शरारत  भरी आँखों वाले लड़के यह  तुमने मुझ किशोरी से कहा था !!
मैंने उस प्यार को किताबों से लेकर मीडिया तक में उलीच दिया !! देखो तुम्हारे एक वाक्य ने कितनी- कितनी प्रेमिकाओं को मेरी ज़मीन पर उतार दिया !! ( लेखिका के फेसबुक टाइम लाइन पर )

बलात्कार और संभोग की देह परिभाषा को नये सिरे से गढनेवाली मैत्रेयी, देहसंबंधों के मूल मेें गुंथी हुई  नीति मार्यादा और परंपरा को नयी व्याख्या भी देती है । यह व्याख्या व्यक्ति की  देह और अस्मिता की आवाज को सुनती भी है और सुनाती भी है । एक विस्फोट की तरह! वह विस्फोट जो चादर के सात परतों के तले फूटता हो !! परंपरा की मार्यादाओं को मैत्रेयी, पीढी दर पीढी के अतृप्त अनजिये मानसिकता की वितृष्णा के रूप में देखकर, संबंधों की स्वछंदता और खुली व्यवस्था का वकालत करती है, सृजनात्मक निर्णय देती है -जिन निर्णयों के मूल में मनुष्य की आत्मा की पुकार घुली हुई  है, मानवीयता की मर्यादा के बंधन बंधे हुये हैं । मैत्रेयी के अनुसार ‘संभवतया, सामाजिक व्यवस्था का हर हिस्सा, हर रिवाज, हर आदर्श हर संबंधों के आचरण की अनिवार्यता और आग्रह के पीछे शायद पीढी दर पीढी चली आ रही अनिवार्यता की कुंठा होगी फ्रस्टरेशन होगा जो हर नये पीढी के पैरों में बेडी बनकर खनखनाती है । ‘  जिन्हे तोडकर भागने की चेतना अपनी उदात्ता और मार्मिकता के बावजूद भी एक अजीब प्रकार के दंश का, पापबोध का अनुभव करती है । लेकिन इस दंशबोध के बावजूद भी , अपराधबोध के टीस के होनेपर भी, हर नये कदम की अनिवार्यता और मानवीयता को पहचानकर, विकास और मूल्यान्वेषण के यज्ञ को सामाजिकता का जामा पहनाना आधुनिकीकरण का मानवीय पक्ष है । मैंत्रेयी का रचनालोक इसी मानवीय पक्ष का जीवंत दस्तावेज है ।

मैत्रेयी की लेखनी समाज की उस गुप्त और गुमनाम लडाई  को चेहरा और आवाज प्रदान करती है, जिसके दंश को नाूसर की तरह श्रेणीकृत व्यव्स्था में कंडीशनड भारतीय समाज झेलते आ रहा है और झेलने के लिए विवश भी है । मुख्यधारा के  समाज की अपनी अभिजातीय मर्यादाएॅं, आर्थिक स्वायत्तताएॅं, हाशियाकृत समाज की तमाम अव्यवस्थाओं के लिए कारण बनकर असामाजिकता के न्याय निर्णयों में बंधने के लिए विवश कर देती है । पुष्पा का कथा संसार, इस असामाजिक परंपरागत मर्यादाओं को अपनी ही चेतनादृष्टि  से परिभाषित करता है ।

इंटर काॅलेज मोठ से सन् 1960 में इंटर पास करके बुंदेलखंड  काॅलेज झांसी से 1962 में बी.ए की डिग्री पाती है मैत्रेयी, जो उत्तर प्रदेश के अलीगढ जिले के सिर्कुरा गाॅव में सन् 1944 में जन्मी थी । उसी काॅलेज से एम.ए पास करके दिल्ली आकर जामिया मिलिया के स्टेट रिसोर्स सेंटर में कुछ महीने रहती हैं । यूॅं तो लिखने का सुरूर काॅलेज के दिनों से ही था मैत्रेयी में , लेकिन साप्ताहिक हिन्दुस्तान  में सन् 1990 में छपी कहानी ‘आक्षेप‘, के बतौर पुष्पाजी, वैवाहिक और सामाजिक आक्षेपों के सारे रोडों को उखाड फेंकती है ,और सृजनात्मक कथावितान का ताना बाना बुनती है ।  उन्हें लेखन के लिए  हिन्दी अकादमी का साहित्यिक कृति सम्मान, उत्तरप्रदेश का साहित्य सम्मान, साहित्य परिषद का वीरसिंहदेव पुरस्कार, सार्क साहित्य पुरस्कार ,आगरा विश्वविद्यालय का गौरव श्री पुरस्कार और नंजनगूडू तिरूमलांबा पुरस्कार आदि  भी मिला । कन्नड की प्रथम महिला कथाकार के रूप में स्थापित अपने समय की दबंग लेखिका तिरूमलांबा के नाम का पुरस्कार पाना, मैत्रेयी पुष्पा के लिये विशेष भी है ।

बंुदेलखंड की भाषा की रसवत्तता को बोलचाल के लय की ठसक को और शैली एवं संवादों की प्रांतीय थापों को कथा कथन का माध्यम बनाकर, एक ऐसे वस्तु परिवेश को रचती हैं  मैत्रेयी, जिसके सिलन की बुनावट की कलात्मकता और महीनता ही उसे समाकालीन सारे रचनाकारों से अलग पहचान दिलाती है । कथा में ग्रामांचलीयबोध की जीवंतता, भाषाप्रयोग की सहजता एवं आत्मीयता समाजजीवन की गतिविधियों को आइना  पकडवाती है.  कन्नड में लगभग ऐसी ही कथात्मक संवेदना और अभिव्यक्तिगत कलात्मकता को लेकर हाजिर होती है उत्तर कर्नाटक प्रदेश की  अंचलीयताबेाध से सरोबोर, सजग सचेत और अत्यंत आत्मीयभावबोध से सरोकृत लेखिका गीता नागभूषण ।

मैत्रेयी के रचनासंसार के पात्र कुसुमा भाभी, डबलबब्बा, अल्मा, मंदाकिनी, मैत्रेयी, कस्तूरी, उर्वशी इत्यादि जीवन के खमीर की उस खटायी को लेकर रचे बसे हंै । अस्तु…… हिन्दी अकादमी दिल्ली के उपाध्यक्ष पदपर मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति, सचमुच, श्लाधनीय है । उनकी यह नियुक्ति निस्संदेह , समीचीन व्यवहार और निर्णय लेकर आयेगा !! आशा है , उनके कार्यकाल में, आकादमी का कार्यक्षेत्र का विस्तार, हिन्दीतर दक्षिण प्रदेशों में भी विशेषतया बनी रहे । उनके प्रति विशेष अभिवादन के साथ।

प्रो परिमळा अंबेकर, अध्यक्ष,हिन्दी विभाग ,गुलबर्गा विश्वविद्यालय, कलबुर्गि -06 कर्नाटक.
सं/ 09480226677. parimalaambekar@gug.ac.in

स्वयं में असाधारण स्त्री : माया एंजलो

गरिमा श्रीवास्तव


गरिमा श्रीवास्तव हिन्दी विभाग,हैदराबाद केन्द्रीय विश्विद्यालय, में प्रोफ़ेसर हैं. सम्पर्क : drsgarima@gmail.com

सन् 2014 के मई महीने का अंत होने में तीन दिन शेष हैं और वेक फ़ारेस्ट विश्वविद्यालय, विंस्टन-सालेम, उत्तरी कैरीलोना के फैकल्टी क्वार्टर की पीली दीवारों पर सुबह के सूरज की किरणें चमकने लगी हैं । घने पेड़ों के झुरमुट को बेधकर किरणें मई के महीने में जल्दी ही धरती पर आ जाती हैं-पेड़ों की हरियाली पत्तियाँ सूरज की धूप से पीली-सुनहली दीखने लगी हैं । पीले घर के भीतर थोड़ी हलचल है,यह माया एंजेलो की काया-संघर्ष, मेहनत, दुख, रोग-शोक,मान-अपमान,उपेक्षा, थकान को छियासी बरस से सहती चली आई काया की विदा का क्षण है ।माया एंजेलो जो बचपन में थी मार्गरीटा जानसन, प्यारे भाई बेली ने जिसे नाम दिया माया-  कमरा पचास से अधिक मानद उपाधियों, ढेरों राष्ट्रीय -अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सजा हुआ है,जीवन के उत्तरार्ध में अत्यंत लोकप्रिय अध्यापिका के रूप में विख्यात होकर भी अपनी ‘निजता’ में बिल्कुल अकेली ही हमेशा के लिए मौन हो गई थी । ऊपर से सबसे हंसने-बोलने, बतियाने वाली माया कब अकेली और भीतर से चुप नहीं थी । तब भी तो चुप्पी ही उसका आवरण बनी थी जब सौतेले पिता फ्रीमैन  ने उसका यौन शोषण किया था। सन् 1928 में चार अप्रैल को जन्मी मार्गरीटाने तीन वर्ष की उम्र  में माता-पिता का सम्बन्ध-विच्छेद देखा फ्रीमैन के दुर्व्यवहार  के बारे में मामाओं को बताने का नतीजा निकला-माँ के प्रेमी की ह्त्या जिसके  लिए वह स्वयं को ही दोषी मानती रही, बड़ी होने पर भी हमेशा सोचती –न वह मुंह खोलती ,न फ्रीमैन मरता| बेली और मार्गरिटा के पालन–पोषण की जिम्मेदारी आन पड़ी दादी श्रीमती हेंडरसनपर, जो पेट पालने के लिए परचून की दुकान चलाती और श्वेत प्रभुओं के घर इन मासूम बच्चों से सामान भिजवाया करती। काली, दुबली, कमजोर मार्गरीटा ने यहीं पर ‘ओ छोकरी, ‘काली लड़की’ के उपेक्षापूर्ण सम्बोधन सुने । सात वर्ष की भोली मासूस लड़की जानने लगी कि अश्वेत और काली लड़की होने के अर्थ क्या हैं और इससे भी ज्यादा कि निर्धन होना कितना दुर्भाग्यपूर्ण होता है ? इन अपमानजनक संबोधनों पर प्रतिक्रिया देने का अर्थ था-दादी से मार खाना । दरअसल से ये सम्बोधन उसके ‘ब्लैक’ होने की नियति से जुड़े थे,जिसे स्वीकार करना विवशता थी –

जब मैं अपने बारे में सोचती हूँ
तो अपने आप पर हँसते-हँसते लगभग मर ही जाती हूँ
एक बड़ा मज़ाक है मेरी जिंदगी
नृत्य की तरह जिसमें सिर्फ कदमताल ही की गई
या कोई गीत जिसे सपाटता से बोला गया हो
मैं  खुद को लेकर, इतना अधिक हँसती हूँ
कि साँसें रूकने लगती हैं मेरी
जब सोचती हूँ अपने बारे में
लोगों  के इस संसार में साठ साल
जिसके लिए मैं काम करती हूँ
वे मुझे बच्ची कहकर पुकारती हैं
और मैं अपनी नौकरी के लिए उसे
‘जी मैम- ‘जी मैम कहती हूँ
इतनी स्वाभिमानी हूँ कि झुकना मुश्किल
इतनी गरीब हूँ कि टूटना मुश्किल
हँसते-हँसते पेट में बल पड़जाते हैं मेरे
जब सोचतीहूँ अपने बारे में

अपने ऊपर हंस सकने की क्षमता हासिल करने का साहस माया को बचपन में ही जुटाना पड़ा|बच्ची माया की शिकायत की सुनवाई के लिए कोई न्यायालय था न कोई वकील,बस में यात्रा करती माया को दूसरे अश्वेतों की तरह हमेशा पिछली सीट मिलती ,जहाँ कंडक्टर पास आ सट कर खड़ा होता ताकि अपने कड़े अंग से माया को छू सके ,कसमसाती माया अपने आप में सिमट जाया करती ,सुनेगा कौन काली लड़की की कभी ख़त्म न होने वाली पीड़ाएं ।  उधर  अपमान और उपेक्षा सहकर भी दादी का श्वेत ख़रीदारों के प्रति विनम्रता प्रदर्शन और सबसे बढ़कर बूढ़ी दादी की अनथकमेहनत करने की प्रवृत्ति ने माया को आने वाले समय और कठिन भविष्य के लिए पहले से ही समझा-बुझाकर ज्यों तैयार कर दिया । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की आर्थिक तंगी के हालात ने उसे न सिर्फ व्यावहारिक बनाया बल्कि सिखाया कि कोई भी व्यक्ति अपनी नियति को अपने नियंत्रण में कैसे ले सकता है और यह भी कि तमाम दबावों और विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान कैसे बनाए रखा जा सकता है । ‘स्टिलआई राइज़’ शीर्षक कविता में उसने कहा-
तुम मुझे अपने तीखे और विकृत झूठों के साथ
इतिहास में शामिल कर सकते हो
अपनी चाल से मुझे गंदगी में धकेल सकते हो
लेकिन फिर भी मैं धूल की तरह उड़ती आऊँगी ।

माया ने जीवन में ढेरों भूमिकाएँ निभाई। कभी ये भूमिका ऐच्छिक  थी तो कभी अनैच्छिक  लेकिन हंसी का कवच ऐसा था-जिसे बेधकर भीतर का सच पहचान पाना कठिन था। किशोरी माया को काले श्रमिक विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति मिली, सपना था कि नृत्य-संगीत की रुचि को कैरियर बनाएगी, लेकिन प्रेम और अविवाहित मातृत्व ने उसे आर्थिक बोझ तले दबा दिया ।किशोर प्रेम के  आवेग की जगह दुनिया –धंधे ने ले ली| गोद में नवजात शिशु और खाली ज़ेब लिए माया ने एक दूसरी दुनिया में कदम रखा ,जहाँ नैतिकता –अनैतिकता के सवाल बेमानी थे |जीना महत्वपूर्ण था ,और इसके लिए किसी काम को उच्छिष्ट समझने का अर्थ था भूख और लाचारी | बेटे को पालने, अपना खर्च चलाने के लिए पढ़ाई अधूरी छोड़ दी, करने लगी कभी काम कभी वेट्रेस का, तो कभी नर्तकी का । पेट का सवाल था, बड़े सपनों की कोई अहमियत ही नहीं थी ।अलस्सुबह थकी हुई घर लौटती ,दूध दवाएं,घर का किराया ,बसों के धक्के- सबने उसे और कठोर बनाया.दोस्तों ने विवाह, जन्मदिन, नएवर्ष की पार्टियों में बुलाना, पूछना छोड़ दिया, माया के पास उन्हें  उपहार देने को था ही क्या?क्रिसमस की पार्टी में एक ही बार इतना खा लेने को मन करता कि फिर कभी ज़रूरत ही न पड़े,साटन की फ्राक में पैबंद लगने लगे,टूटे जूते मरम्मत में आनाकानी करने लगे|शोषण के बगैर तो नौकरी भी कहीं नहीं ,अधूरी संगीत शिक्षा और रंगभेद का दर्द सीने में लिए माया के लिए एक वक्त वह भी आया जब आजीविका के लिए देह-व्यापार किया|दुकान, रेस्टोरेंट में काम के अनियमित घंटों और देह –शोषण से बेहतर समझा चकला चलाना.जो काम उसने दो औरतों के साथ मिलकर किया ।पुलिस प्रतारणा ,अबोध बच्चियों का व्यापार ,रोग –अशिक्षा और बेबसी की दुनिया , माया के सामने  नग्न रूप में  थी और वह  उससे खेलना सीख रही थी-
अपने यौवन में मैं
देखा करती थी ओट से
सड़क पर आते जाते बूढ़े पियक्कड़ों
जवान, सरसों की तरह तेज पुरुषोंको

मैं उन्हें  हमेशा कहीं न कहीं जाते हुये ही देखती
वे जानते थे कि मैं वहां हूँ
पंद्रह साल की आयु में उनके लिए बेताब
वे मेरी खिड़की के पास आकर रुकते
युवा लड़कियों के वक्ष की तरह उन्नत उनके कंधे
पीछे आने वालों को लपेटती उन पुरुषों की जाकेट

किसी दिन वे तुम्हें अपनी हथेलियों में
आहिस्ता से दबा लेते हैं, जैसे तुम
इस संसार का अंतिम कच्चा अंडा हो
फिर वे अपनी जकड़ को मजबूत करने लगते हैं
थोड़ी सी मजबूत ….बस थोड़ी सी….।

माया अपनी सही भूमिका खोज रही है-जीवन के व्यापक परिदृश्य पर वह अपनी उपस्थिति आजमाने की प्रक्रिया में है-अब उसे अपने देखने को और अधिक व्यापक और गहरा बनाना है-समझना है शोषक और शोषित का संबंध, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की रणनीति, काले-गोरे का  बहुआयामी समीकरण| समझ चुकी है वह है कि रात्रि क्लबों में नाच-गा कर, ग्राहकों को अपनी लंबी, सुडौल काया से रिझाकर आजीविका तो कमाई जा सकती है, ‘खुद’ को साबित नहीं किया जा सकता । वह निरंतर खेलती है-जिंदगी से, संघर्ष करती है, थकती है, गिरती है, फिर धूल झाड़कर उठ खड़ी होती है । चोटें और ख़राशे अनगिनत हैं-कहे किससे- इसलिए उन्हें भुला देना ही बेहतर है-हंसी का आवरण अब ओढ़ा नहीं लगता वह आत्मा तक पैबस्त होता चला जा रहा है-यह स्वयं को ढूँढने और पाने की प्रक्रिया है । सांसारिक बुद्धि कहती है विवाह कर घर बसाओ, मन डांवाडोल है। 1951 में ग्रीक इलेक्ट्रीशियन और उभरते हुए संगीतकार तोष एंजेलो से विवाह कर डालती है, अब मार्गरीटा जॉन्सन  माया एंजेलो है, जो एल्विन एली और रूथ बैकफोर्ड जैसे नृत्य निर्देशकों के साथ मिलकर ‘अल एंड रीटा’ मंडली बनाती है । कई अश्वेत संस्थाएं इस मंडली को बुलाती हैं, पर प्रदर्शन कुछ खास प्रभावित नहीं कर पाते मंडली का खर्च चलना दूभर है और निजी जीवन में विवाह की नौका डांवाडोल है-तोष एंजेलो का स्वभाव और बर्ताव माया को ‘सूट’ नहीं करता । नई-नकोर गृहस्थी टूट बिखर जाती है । रोजी-रोटी के लिए माया फिर से रात्रिक्लबों के भरोसे है । तीन वर्ष बाद उसे ‘पोर्जी एंड बेस’ ओपेरा के निर्माण और प्रदर्शन के सिलसिले में यूरोप के अनेक देशों की यात्रा का अवसर मिला है । माया देश-देश घूमती है-उसे अब से पहले यह पता ही नहीं था कि भाषा सीखने की प्रतिभा उसमें अद्भुत है । माया गीत गाती है-अफ्रीकी लोक धुनों और जैज़ का मिश्रण उसके गीतों को सीधे दिल की राह देता है-गीत संकलन ‘मिस कैलिप्सो’ लोकप्रिय होता है ।जिसका प्रकाशन सन् 1996 में काम्पेक्ट डिस्क में भी हुआ । ‘कैलिप्सो हीट वेव’ नामक फिल्म में माया संगीत देती है और अश्वेतों के संघर्ष का इतिहास, जीवन की आशा से भरपूर गीत, ज़िंदादिल आवाज़ उसे धन और यश देते हैं। माया जाने क्यों संतुष्ट नहीं है-विभिन्न भाषाएँ सीखकर वह अपना पुस्तकालय समृद्ध करने की प्रक्रिया में है। बचपन में श्वेत प्रभुओं के घरों से दानस्वरूप मिली फटी-चिथड़ीपुरानी किताबों की स्मृति अबतक ताजा है-उसकी जगह ताजी गोंद और बांस की लुगदी की गंध से भरी जिल्द चढ़ी लाल-नीली किताबों से उसका कमरा नितसमृद्ध हो रहा है । उसने कुछ मित्रों के सुझाव पर ‘हार्लेम लेखक संघ’ की सदस्यता ले ली है । संघ के कई महत्वपूर्ण लेखकों से सन् 1959 में उसकी मुलाक़ात होती है जिनमें जान हेनरिक क्लार्क’ रोसा गॅाय,पाल मार्शल, जूलियन मेफील्ड हैं । ये सब प्रबुद्ध लेखक हैं । माया इनसे प्रभावित है सन् 1960 में अश्वेत आंदोलन को नेतृत्व देनेवाले मार्टिन लूथर किंग से उसका मिलना जीवन को एक नयी दिशा दे देता है, अब वह ‘सदर्न  क्रिश्चियन लीडरशिप कांफ्रेंस की उत्तरी संयोजक बन गयी है । रात्रिक्लबों में गीत-प्रस्तुति के लिए  जागने वाली माया अब रात-भर जगकर पढ़ती है-लिखती है । कभी ‘द अरबआब्जर्वर’ का सम्पादन, कभी‘द अफ्रीकन रिव्यू में फीचर लिखने का काम तो कभी कभी घाना विश्वविद्यालय के ‘स्कूल आफ म्यूजिक एंड ड्रामा’ में पढ़ाने का काम उसे अकादमिक गतिविधियों की ओर ले जा रहा है । सन् 1964 में वह मेलकॅाम एक्स से मिली और अफ्रो-अमेरिकन संगठन के लिए अमेरिका लौट आई ।मेलकॅाम एक्स के लिए मन में गहरा सम्मान है और  मेलकॅाम की अचानक हुई हत्या से माया को  सदमा लगता है । सदमे से उबरने में उसे मार्टिन लूथर किंग जूनियर मदद करते हैं । वह अश्वेत अधिकार आंदोलन से भीतर  तक जुड़ जाती है लेकिन नियति उसे मित्रहीन करने के लिए कटिबद्ध है,कभी की अकेली माया फिर अकेली है । 1968 में मार्टिन लूथर किंग की हत्या माया के जन्मदिन पर ही होती है। वह वर्षों तक अपना जन्मदिन मनाती नहीं ही और उस दिन से सन् 2006 तक किंग की विधवा कोरेटा स्कॉटकिंग को स्मृति-गुच्छ भेजती रही | ऐसे समय में उपन्यासकार जेम्स बाल्डविन मित्र और भाई की भूमिका में माया के निकट हैं -माया के हृदय में बरसों से संचित अनुभव बाल्डविन के सामने निर्द्वंद्व भाव से बह निकलते हैं – शोक, हर्ष, आँसू, दुख-सबकुछ । बचपन तो कब का बीत चुका है पर स्मृतियों के दंश अब तक ताज़ा हैं । बाल्डविन समझाते हैं-लेखन उदात्त बनाता है-लिखो माया, लिख डालो अपना बचपन, लहुलूहान कैशोर्य, अभाव, तनाव, द्वंद्व, संघर्ष सबकुछ -जानने दो दुनिया को कि काले लोगों का जीना कैसा होता है-नस्ल और रंगभेद की कैद में जकड़ा समाज आनंदित हो ही नहीं सकता । और माया उसे…..तो जैसे राह मिल जाती है ।आत्मकथ्य लिख डालती है । ‘आय नो व्हाय द केज्ड बर्ड सिंग्स’ जो 1970 में प्रकाशित होते ही किसी भी अफ्रो-अमेरिकी द्वारा लिखा पहला ‘बेस्ट सेलर’ बन जाता है । यह माया की बदली हुई भूमिका है-वह यथास्थिति को कभी स्वीकार नहीं करती। यातना को कभी अंतिम नहीं मानती, हर परिस्थिति में अपनी भूमिका ढूंढ निकालती है-जीवन से भी बड़ा है विश्वास-  ऐसी दुनिया की खोज में निरंतर लगी रहती है जो अश्वेतों को, स्त्रियों को, असहाय और बेबस बच्चों को उनका सही ‘स्पेस’,उचित हक दे सके । तृषा नालाए को दिये साक्षात्कार में वह कहती है-“जितने भी मूल्य हैं, साहस उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, साहस के बिना किसी और मूल्य की रक्षा आप नहीं कर सकते । आप सच्चे दयालु, आत्मविश्वासी, आत्मीय कुछ भी हो सकते हैं…..लेकिन ऐसा बनने के लिए आपको हर समय साहस की आवश्यकता होती है, और इसका मतलब युद्धभूमि में खड़े होना नहीं है, साहस से मेरा तात्पर्य आपके भीतर का साहस, जो आपके आत्म को दूसरे मनुष्यों को दिखाने में मदद करता है ।”

यह साहस ही था जिसके बल पर सन् 1963 में मार्टिन लूथर किंग के नेतृत्व में राजधानी वाशिंगटन में दो लाख अश्वेतों के जुलूस में माया शामिल हुई । यह जुलूस अश्वेत मानस की इच्छाओंऔर समानता के अधिकार की आकांक्षा से प्रेरित था, जिसने आगे के बीस वर्षों में इतिहास बदल डाला । समूचे विश्व में अश्वेत संस्कृति अपने संगीत, कला, साहित्य से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने लगी , उसमें माया अपने संगीत और साहित्य के साथ शिरकत कर रही थी । 1960 से 1975 के दौरान बड़े पैमाने पर अश्वेत आत्मकथ्य लिखे गए जिनमें सामाजिक-अधिकार आंदोलन के विविध पक्षों की अभिव्यक्ति हो रही थी। इरीना रातूशिन्स्क्या का ‘ग्रे इज द कलर आफ होप, रिजोर्बेता मेंच्यू का ‘आई’ और ’एन इंडियन वूमन  इन गुवाटेमाला ,मेरी किंग का ‘ फ्रीडम सांग’ एंजेलो डेविस का ‘ एन ऑटोबायोग्राफी’ इलेन ब्राडन का ‘ ए टेस्ट आफ़ पावर’: ए ब्लैकवूमन स्टोरी’, ग्वेंडीलाइन ब्रुक्स की ‘रिपोर्ट फ्राम पार्ट वन’ हैरिसन जैक्सन की ‘ देयर इज नथिंग आई ओन दैट आई वांट’ आसी गफ़ी की ‘द ऑटोबायोग्राफी आफ़ ए वूमन’ मेरी ब्रूक्टर की ‘हेयर आय एम:टेक माइ हैण्ड’; महालिया जैक्सन की ‘ मूविंग ऑन अप’ पर्ल बेली की ‘द रॅा पर्ल’ रोज बटलर ब्राउन की ‘आय लव माइ चिल्ड्रेन’  अन्ना हेजमैन की ‘द ट्रम्पेट साउंड्स’ असाता शकूर की ‘असाता’ के साथ-साथ माया एंजेलो ‘आई नो व्हाई  द केज्ड बर्ड सिंग्स’ और आगे चलकर आत्मकथ्य के अन्य छह खंडों के साथ उपस्थित हुई, जिनमें  अश्वेत स्त्रियों द्वारा नस्लभेद, रंगभेद, एवं यौनिकता के मुद्दे उठाए गए  । क्रांतिधर्मी दौर के ये आत्मकथ्य स्वतंत्रता और शिक्षा का अनन्यसंबंध दिखाते हैं । शिक्षा ने ही अश्वेत रचनाकारों को सामुदायिक चेतना राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक विमर्शो में प्रखर भागीदारी के रास्ते दिखाये । माया एंजेलो जैसी अश्वेत रचनाकारों की एक  नयी पीढ़ी अपनी कविताओं और आत्मकथ्यों द्वारा ऐसे टेक्स्ट सामने लाने लगी जो अपने ‘टेक्स्ट’ और बहुआयामिता के साथ ही बहुरंगभेदी बहुनस्लवादी पाठकों की चेतना का हिस्सा बनने लगी  । अब रंगभेद का मुद्दा बहुआयामी हो गया कभी पूरी तरह राजनीतिक, कभी सामाजिक, तो कभी निजी । माया एंजेलो ने आत्मख्यान लिखकर दोहरा जोखिम उठाया जिसे ब्लैकबर्न के शब्दों में कहा जाये तो- “अश्वेत स्त्रियाँ आत्मकथ्य लिखकर अपने जीवन को दोहरे जोखिम में डालती हैं वे एक ओर अमेरिकी समाज में व्याप्त रंगभेद की राजनीति का पर्दाफाश करती हैं तो दूसरी ओर अपने समुदाय के पुरुषों के यौन अत्याचारों को भी खुलकर अभिव्यक्त करती हैं।”(रेजीना ब्लैकबर्न- इनसर्चआफ़दब्लैक फीमेल सेल्फ:अफ्रीकन-अमेरिकनवूमंस ऑटोबायोग्राफी एंड एथनिसिटी’ ब्लूमिंगटन; इंडियाना यूपी’ 1980: पृ. 134)

माया एंजेलो ने आत्मख्यान के तौर पर काव्य विधा को भी अपनाया । ब्रिटानिका ऑनलाइन (9/17/1998)में माया की कविताओं को उसके ‘निजी इतिहास की अभिव्यक्ति’ कहा गया है क्योंकि उसकी कविताओं का कथ्य कई अश्वेत अमेरिकी जीवनानुभवों  से मिलकर बुना गया है । लायन ब्लूम ने इन कविताओं पर टिप्पणी करते हुए कहा कि – इनमें नस्लभेद, भेदभाव, शोषण की पीड़ा और अपने वर्ग के लिए शुभेच्छा है ।

माया एंजेलो ने कई अन्य कविताएँ भी सामाजिक मुद्दों और अश्वेत विशेषकर स्त्रियों के मुद्दों को केंद्र बनाकर लिखी; जिनमें ‘बॅार्न दैटवे’ यौन शोषण और वेश्यावृत्ति पर और ‘फेनोमेनल वूमन; ‘वूमन वर्क’ और ‘सेवेन वूमन्स ब्लेस्डएस्योरेंस’ जैसी कविताएँ स्त्री विषयक हैं । घरेलू हिंसा पर ‘ए काइंड आफ़ लव सम से’ बाल श्रम और शोषण पर ‘टू बीट द चाइल्ड वाज़ बैड एनफ़’ इसके अतिरिक्त दास-प्रथा पर ‘द मेमोरी; ‘मिस स्कारलेट,’ ‘मी. रेट’ ‘एंड अदर लैटर सेंट्स’ ‘ वी सा बीआंड आवर सीमिंग’शीर्षक कविताएँ हैं । नशाखोरी, अश्वेत अस्मिता पर भी एंजेलो की अनेक कविताएँ हैं। अधिकतर कविताएँ लंबी नहीं हैं, बल्कि तीन-चार बंद में ही समाप्त हो जाती हैं । लयात्मकता उनका अपूर्व वैशिष्ट्य है । किंग जेम्स बाइबल, अमेरिकी रचनाकारों, एडगर एलेन पो, शेक्सपियर,अश्वेत रचनाकारों जैसे लैंगस्टन ह्यूज्स चर्चों की प्रार्थनाएँ, बाल्यगीत और लोक संगीत के प्रभाव को इन कविताओं में देखा जा सकता है । ‘माडर्न अमेरिकन वूमन राइटर्स’ में जान ब्रैक्सटन ने माया की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि – उनके पाठक काव्यलय, गीतात्मकता , कल्पना और यथार्थवाद के कायल हैं । ये कविताएँ जैज की धुनों पर आधारित हैं जो सीधे पाठक के हृदय में उतर जाती हैं ।
माया एंजेलो की कविता सिर्फ यथार्थ और कल्पना तक ही सीमित नहीं है वह स्त्री यौनिकता का उत्सव मनाने वाली कविता है । माया का निजी जीवन बहुत से घात-प्रतिघातों की कहानी है । रात्रि क्लबों में नाच, वेश्यावृत्ति को पेशे के रूप में अपनाना किसी स्वाभिमानी स्त्री के लिए सरल- सहज नहीं हो सकता, न होता है । वह स्वयं लिखती है कि जीवन के बहुत कम ही ऐसे वर्ष रहे  जब उसे अपने खर्चे निकालने, बिजली के बिल भरने की चिंता नहीं रही । जैज़ की धुनों पर नाचती माया को देखकर यह अंदाज़ा लगाना कठिन है कि यह वही माया है जो बचपन में यौन शोषण, कई पुरुषों के दुर्व्यवहार-अपमान, कुछ असफल प्रेम-प्रसंगों  से गुजरने के बावजूद स्वयं को विशिष्ट और असाधारण कहती है-
पुरुष खुद चकित हैं
कि उन्होंने मुझमें ऐसा क्या देखा
उन्होंने बहुत कोशिश की
लेकिन वो छू नहीं पाते
मेरे अन्तः रहस्य को
जब मैंने उन्हें  दिखाना चाहा
वो बोले- वो उसे अभी भी नहीं देख पा रहे
मैंने कहा
यह मेरी कमर का कटाव
मेरी मुस्कान का सूर्य
मेरे उभारों का उठान
और यह मेरे अंदाज़ का लावण्य है
कि मैं कुछ भिन्न महिला हूँ
स्वयं में एक असाधारण औरत,

अब आप समझ ही गए होंगे
कि मेरा सिर क्यों नहीं झुकता
क्यों नहीं मैं चीखती-चिल्लाती
कूदती-फाँदती
अपनी बात रखने के लिए मैं
क्यों शोर नहीं मचाती
जब आप मुझे चलता हुआ देखेंगे
तब आप गर्व से भर उठेंगे

मैंने कहा ना
यह मेरे जूतों की एड़ी की चटख है
मेरी जुल्फों के गुलझट
हाथों की कलाईयाँ
सब मेरी अपनी देखभाल का नतीजा है
मैं सबसे अलग औरत हूँ
स्वयं में असाधारण स्त्री l
(असाधारण स्त्री )

जीवन के लगभग पांच दशकों तक रचनारत रहने वाली माया एंजेलो ने समय-समय पर दिए साक्षात्कार में अपनी रचना प्रक्रिया पर टिप्पणी की l उसका मानना है कि अश्वेत लेखक होना विशिष्ट होता है – अश्वेत लेखक श्वेत लेखक से बिल्कुल अलग होता है – अक्सर कोई भी ब्लैक लेखक अपने परिवार या समुदाय में पहला लेखक होता है और उसकी बहुत-सी ऊर्जा तो अपने मित्रों सम्बन्धियों को यही समझाने में चली जाती है कि उसका लिखना किस तरह महत्वपूर्ण है l माया ने एक के बाद एक आत्मकथाओं के सात खण्ड लिखे  हैं l ‘वहाई द केज्ड बर्ड सिंग्स’ में उसने बचपन और किशोरावस्था के दिनों का जिक्र किया है l ‘गैदर ,टुगेदर इन माई नेम’ उसकी सर्वाधिक प्रिय कृति है जिसमें वह बताती है कि आजीविका पालन के लिए की गई वेश्या- वृत्ति से वह कतई शर्मसार नहीं है ,न  अपने लिए सहानुभूति पाने की कोशिश की न ही उसे अतिरिक्त महिमामंडित किया,जीवन के एक समृद्ध अनुभव के तौर पर उसने वे साल ग्रहण किये lइन्हीं वर्षों में वह तरह तरह के रोगों से जूझती और किसी भी सरकारी सहायता से वंचित उपेक्षित स्त्रियों ,बच्चियों और मासूम बच्चों के लिए ,उनकी स्थिति में परिवर्तन और सुधार की ज़रुरत को समझ पायी | वह समाज के ढांचे में परिवर्तन की बात करती है और स्त्रियों को एकजुट होकर वैश्विक सखी  भाव से रहने की प्रेरणा देती है – “सामुदायिक चेतना का होना बहुत जरूरी है l मुझे उन स्त्रियों पर दया आती है, जिन्हें मैं यह कहते हुए सुनती हूँ कि स्त्रियों की अपेक्षा मेरे पुरुष मित्र अधिक हैं – मुझे लगता है यह मूर्खतापूर्ण है l अपने जैसियों का पक्ष लेना, उनकी वकालत करना बहुत महत्वपूर्ण है, और अनिवार्य भी l मैं चाहती हूँ कि औरत को यह पता चले कि मैं उनके पक्ष में हूँ l उन्हें भी अपने पक्ष में खड़ा होना चाहिए, विरोध में नहीं l इसका मतलब ये नहीं कि मैं पुरुषों के विपक्ष में खड़ी हूँ l लेकिन मैं जानती हूँ कि पूरी दुनिया में पुरुषों के स्वास्थ्य और देखभाल के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा धन निवेश किया जाता  है, उनके स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर शोध भी अधिक होते हैं, इसलिए मैं पहले स्त्रियों के पक्ष में हूँ l मैं स्त्रियों को अस्पताल जाने के लिए प्रेरित करती हूँ, वे नियमित जाँच करवाएं और अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा न करें …यदि आप अपनी देखभाल स्वयं नहीं करते तो दूसरे से कैसे अपेक्षा रख सकते हैं कि वह आपकी देखभाल करे ?”

माया एंजेलो ने यह वक्तव्य 1 जून 2012 को उत्तरी कैलीफोर्निया में ‘माया एंजेलो सेंटर फार हेल्थ एंड वेलनेस’ के उद्घाटन के अवसर पर दिया. माया स्वयं भी लम्बी चौड़ी छह फ़ुटी कद-काठी वाली स्वस्थ स्त्री है, जो कथा -कविता, नाटक के अतिरिक्त पौष्टिक भोजन पर भी पुस्तक लिखती है l उसका मानना है कि जो काम आपको करना अच्छा लगता हो उसे जरूर कर डालना  चाहिए l  आत्मकथा के सातों खण्डों  – आई नो व्हाय द केज्ड बर्ड सिंग्स (1969 )जिसमें जन्म से 1944 की स्मृतियाँ हैं l गेदर टुगेदर इन माई नेम (1974 ) जिसमें 1944 से 1948, सिंगिंग एंड स्विंगिग एंड गेटिंग मैरी लाइक क्रिसमस (1976 ) जिसमें 1949-1955 द हर्ट आफ ए वूमन (1981) जिसमें 1957-1962, ‘आल गॅाड्स चिल्ड्रन नीड ट्रैवेलिंग शूज (1986) जिसमें 1962-1965, ए सांग फ्लंग अप टू हेवेन (2002 ) जिसमें 1965 -1968 तक  और मॅाम एंड मी एंड मॅाम (2013) में सन् 2013 तक के संस्मरण और जीवन यात्रा के पड़ाव समाहित हैं l  आत्मकथाओं के बारे में उसका कहना है कि इनमें उसने जीवन के सारे पड़ावों का जिक्र किया है “पूरा जीवन मैंने अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए अनथक श्रम किया l घर साफ करना, भोजन पकाना और घर के बाहर काम करना मेरी दिनचर्या का अनिवार्य अंग थे l मैं घर के काम हमेशा करती आई  l दुर्भाग्यवश हमारे देश में हमसे जबरन काम करवाने का इतिहास रहा है, इसलिए यहाँ दूसरों की सेवा को दासत्व से जोड़कर देखा गया, जबकि अफ्रीका में किसी की सेवा करना बहुत ही सम्मान और गौरव की बात है l यूरोप में ऐसा नहीं है l मैं छह फीट की स्वस्थ स्त्री हूँ और यदि मैं किसी की सेवा ह्रदय से करती हूँ तो उसे दासत्व से जोड़कर देखने की आवश्कता नहीं l”निजी जीवन की श्रम प्रवृत्ति माया एंजेलो के लेखन में भी दीखती है l अपनी दिनचर्या के बारे में वह ‘सिंगिंग एंड स्विंगिग एंड गेटिंग मैरी लाइक क्रिसमस’ में पाठक को विस्तृत ब्यौरे देती है l

माया बताती है कि लिखने के लिए उसने कैसे होटल का एक छोटा कमरा बुक कर रखा था, वह लिखती है – “किसी आलोचक ने कहा था कि मैं प्रकृति से ही लेखिका हूँ, लेकिन मुझे अपने बारे में वही कहना है जो अलेक्जेंडर पोप  ने कहा था कि आसान लेखन को पढ़ना बहुत मुश्किल होता है और ठीक इसके   विपरीत बात भी सही है कि जो आसानी से पढ़ा जाए उसे लिखना बहुत कठिन होता है l लिखने के लिए कभी-कभी मैं दो-दो दिन होटल के कमरे में रहती हूँ कि कम से कम दो वाक्य तो अपने प्रवाह में लिख सकूँ कभी-कभी बिना एक वाक्य लिखे ही होटल के सात बाई दस के छोटे कमरे से घर वापस लौट आती हूँ और कभी इसमें मैं सुबह 6.30 बजे से दो बजे तक काम करती हूँ l यह कमरा मैंने दो सालों से किराए पर ले रखा है – इसके परदे, बिस्तर कभी बदले नहीं गए l मैं इसमें कभी सोई नहीं एक बिस्तर और छोटे वाश बेसिन के अलावा कमरे में कुछ नहीं l विचारों को शब्दों का प्रवाह मिल जाए तो मैं कभी-कभी तीन बजे तक लगातार काम करती हूँ, फिर घर लौटकर नहाती हूँ, घर-रसोई की व्यवस्था देखती हूँ ताकि शाम 5.30 बजे,  जब पॅाल आए तो उसे थोड़ा समय दे सकूँ, हालांकि मेरा दिलोदिमाग मेरे लेखन के इर्दगिर्द ही घूमता रहता है, फिर भी मैं एक ईमानदार जीवन जीने का प्रयास करती हूँ l ऐसे सब लोग जो कलाकार या रचनाकार होने का दावा करते हैं, और दूसरों को हर समय बताते हैं कि वे काम के दबाव से आक्रांत हैं -मेरी नजर में वह सब बकवास है l अंत में, जो काम आप लोगों के सामने लाते हैं – वही सच है – बाकी सब बनावट है, जिसका कोई अर्थ नहीं है l जब कभी विचारों की तारतम्यता न बन पा रही हो, लेखनी साथ न दे रही हो तो टेबल से उठकर, तरोताजा होकर नए ढंग से सोचना चाहिए l एक सामान्य और व्यवस्थित जीवन जीना लेखक के लिए जरूरी होता है l”

अश्वेत होने के साथ-साथ स्त्री होना माया एंजेलो के लिए चुनौतीपूर्ण रहा होगा, क्योंकि अश्वेत रचनाकार दोहरे दबाव से जूझता है – रंगभेद और निरंतर मशीनी होते चले जा रहे भौतिकतावादी समाज का दबाव दोनों उसे खुलकर बोलने और लिखने से रोकते हैं l लेकिन माया एंजेलो इन सीमाओं को अपने लेखन की संभावनाओं में तब्दील करती दीखती है l मसलन अश्वेत वेश्या जीवन वृत्ति उसे देह व्यापार के अपराधीकरण, नशाखोरी, विपन्नता, स्त्री अशिक्षा के मुद्दों पर सोचने और लिखने का रास्ता देती है l ‘गेदर टुगेदर इन माई नेम’ में वह अपने वेश्या जीवन पर कतई शर्मिंदा नहीं दीखती न ही वह इसे ग्लैमराइज करती है बल्कि वह पाठक को अपने अनुभवों के माध्यम से सभ्य समाज की उच्छिष्ट तंग गलियों जहाँ कम उम्र की लड़कियों के अपहरण, बलात्कार, बाल श्रम,स्त्रियों के सांस्थानिक शोषण के वाकये जो हवा में तिरते हैं, उनसे रू-ब रू करवाती है l यही वजह है कि  वह हेलेन सिक्सू  उस की तरह स्त्रियों के बोलने पर बल देती है – “मैं स्त्रियों से कहूंगी कि वे पढ़े और जोर-जोर से पढ़े l तुम्हें इतने जोर से पढ़ना होगा कि तुम भाषा की ध्वनियाँ सुन सको l अपने कानों से सुनो अपनी भाषा की लय, माधुर्य और उसका संगीत l मैं स्त्रियों से कहूंगी कि वे उन्नीसवीं शताब्दी की  स्त्री कविता पढ़े जो अफ्रीकी, अमेरिकी. श्वेत, अश्वेत, स्पेनी, एशियाई स्त्रियों द्वारा रची गयी है l वे कविता पढ़े अपनी पुत्रियों को सुनाएँ, अपनी भतीजियों को सुनाएँ तभी देख पाएंगी कि कोई मुझसे पहले भी यहाँ थी, किसी ने मुझ-सा ही अनुभव पहले भी किया था l कोई मुझ सी अकेली यहाँ पहले भी थी l”

माया एंजेलो स्वानुभूति को सबसे महत्वपूर्ण मानती है, इसी के बल पर वह निरंतर रचनारत रही है और आत्मनिर्भर भी l तृषा नालाए के साथ बातचीत में वह कहती है – “मैंने अपने जीवन से यह सीखा है कि लोग तुम्हारा कहा हुआ विस्मृत कर देंगे, तुमने किसी के लिए क्या किया, लोग इसे भी भूल जाएंगे पर तुमने किसी को क्या अनुभव कराया इसे वे कभी नहीं भूलेंगे l साथ ही मेरा दृढ़ विश्वास है कि स्वयं के किए बिना कोई कार्य पूरा नहीं होता l”जीवन हमेशा माया को चुनौती देता रहा, वह उन चुनौतियों को स्वीकारती रही l जीवन के अंतिम दिनों में घातक ह्रदय रोग से शरीर लड़ता रहा, माया पुस्तक लिखती रही l चिकित्सक काया की देख-देख करते और माया 2014 के अप्रैल सेमेस्टर में पढ़ाने के लिए ‘रेस कल्चर एंड जेंडर इन द साऊथएंड बिआँड’ जैसे पाठ्यक्रम की योजना बनाती रहती l इस दौर के बौद्धिकों कार्यकर्ताओं, विचारकों मसलन इकबाल अहमद एडवर्ड सईद, जॅाक देरिदा के साथ माया एंजेलो का नाम भी जुड़ गया है. जिसके देहावसान की खबर फैलते ही लाखों की संख्या में स्त्रियाँ छात्र, कार्यकर्त्ता द्रवित और विचलित हो उठे हैं l घाना में रहने वाले अश्वेत अमरीकी जिनकी घर वापसी की कथा माया ने अभी तो कहनी शुरू की थी – वे निष्प्रभ हैं l आनंद जिसे वह  ‘जॅाय’ कहा करती – वही उसकी मुक्ति बना है l उसने कहा था – ‘ जो व्यक्ति आनंदित है वही अपने कृत्यों का उत्तरदायित्व ले सकता है l दरअसल आनन्द बांटने की चीज है, इसे जितना बाँटोगे यह तुम्हारे पास उतना ही बढ़ता जाएगा l’

माया एंजेलो की विदाई का क्षण आ गया है l पीले मकान की दीवारें सूर्य के आलोक से जगमगा रही हैं – सुनहरी किरणें खिड़की के रास्ते उस सर्वदा हँसते रहने वाले काले चेहरे पर पड़ रही हैं – तांबई रंगत वाली आँखे गिरजे की प्रार्थना में अधमुंदी सी दीख रही हैं l मोटे होंठ हँसते-हँसते ज्यों बीच में स्तब्ध हो गए हैं कभी की छह फुटी सुगठित काया ढल-सिकुड़कर नन्हीं सी हो गयी है l वार्ड रोब की पुरानी ड्रेसेज अब ढीली और लम्बी मालूम देती हैं ,विश्वास नहीं होता कि ये कभी माया पर सजती होंगी l फैली हुई नाक किसी नए अनुभव की गंध की तलाश में थोड़ी सिकुड़ी सी दीख रही है, जंगली पत्तियों की हरी गंध उनके भीतर ठहर-सी गई है l घुंघराले सफेद बाल जिनका तंज अब खत्म हो गया, उनके बीच से एकाध काला बाल दीख रहा है l यौवन में पहने डैंगल्स का वजन अब कान की लवें उठा पाने में असमर्थ हो गई हैं – टॅाप्स और बालियों से सजी रहने वाली लवों के छेद इतने बड़े होकर झूल गए हैं, जिनमें एक उंगली आसानी  से घुस सकती है l ठोड़ी के नीचे गर्दन के पास झुर्रियों का गुंजलक है और सीना सिकुड़नों – सलवटों से भरा हुआ l ये वक्त से संघर्ष की सलवटें हैं l कभी के उन्नत और पुष्ट स्तन अश्वेतों की करुणा और वंचितों की आर्द्रता के बोझ से ढल गए हैं – अब उनमें कोई कटाव, उठान नहीं उनके भीतर रहे दिल की धुकपुकी थम चुकी है l बांहों की मांसपेशियां हड्डियों का साथ लगभग छोड़ चली हैं और गहरी सांवली रंगत की त्वचा कोहनियों के पास ढलक गई है दोनों हाथ सीने पर रखवा दिए गए हैं –  हाथों  के पंजे स्कूली किताब के पन्नों के भीतर संभाल छोड़े पीपल के किसी पुराने पत्ते- से अपनी सारी मज्जाओं, नसों, रक्त वाहिकाओं के साथ बिल्कुल पारदर्शी हो चुके हैं l दाहिनी तर्जनी थोड़ी टेढ़ी-सी अंगूठे के पास झुकी है, लगता है अभी कलम पकड़ लेगी और लिखने लगेगी मनुष्य से मनुष्य के भेदभाव का इतिहास, लैंगिक विभेद की प्रताड़ना और भी बहुत कुछ जो लिखना अधूरा रह गया होगा l छात्रों के लिए नोट्स बनाने का काम भी तो छूट गया होगा ‘जो काम पसंद हो उसे कर लेना चाहिए’ लेकिन अब काया साथ नहीं दे रही l दस नंबर की बैलेरीना पहनने वाले पांवों की हड्डियाँ घिसकर आठ नंबर माप के जूतों में आ गई हैं – कभी जैज और कैलिप्सो की धुनों पर थिरकती, नृत्य से सैकड़ों दिलों को मोहती एड़ियों की हड्डियों ने जवाब दे दिया है l ताबूत में लिटाने के लिए अब बहुत से मजबूत हाथों की जरूरत नहीं अब ये जर्जर, वृद्धा काया मात्र है माया की जिसे भौतिक रूप में अंतिम बार देखने आए छात्र मित्र, प्रशंसक, पाठक सब वेक फारेस्ट में चारों ओर बिखरी, उड़ती सूखी पत्तियों पर हौले-हौले पांव रख रहे हैं, पीले घर की खिड़कियों से उझक कर हौले  से उस आनंदमय चेहरे की झलक ले लेते हैं l आए हुए लोग धीमे-धीमे फुसफुसा कर बातें कर रहें हैं – कहीं माया एंजेलो नींद से जग न जाए और… और -और कहीं ऐसा न हो कि नई पुस्तक लिखती हुए माया की तन्द्रा भंग हो जाए l लेट्स नॅाट  डिस्टर्ब हर !धीरे बोलो यहाँ माया एंजेलो सोती हैl  अपनी कविताओं, अपने गीतों के साथ-
जब मैं एक बड़ी यहूदी बस्ती में मर जाऊं तो
मुझे आकाश में न भेजें
तेंदुए जैसे चूहे, बिल्ली को खा रहे हैं
और जहाँ रविवार को ब्रंच में
जई के आटे का बकवास भोजन मिलता है
उपदेश देने वालों
कृपया मुझसे
सोने की सड़कों
मुफ्त के दूध का वादा मत करो
मैंने चार साल की उम्र से दूध नहीं पिया है
और एक बार मर जाने के बाद मुझे स्वर्ण की जरूरत नहीं पड़ेगी l
मैं उस जगह का आह्वान करती हूँ जहाँ
शुद्ध स्वर्ग है
जहाँ वफादार परिवार हैं
जहाँ अच्छे अजनबी हैं
जहाँ जैज संगीत है
और जहाँ मौसम नम है
मुझे ऐसा वचन दो
या कुछ भी न दो l
(‘धर्माधिकारी’)
*माया एंजेलो की कविताओं का अनुवाद
विपिन चौधरी से साभार

यह आलेख  मासिक हिन्दी पत्रिका पाखी में प्रकाशित हो चुका  है

बदरूहें हवा में चिरागों की तरह उड़ रही हैं

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में  सक्रिय .  स्त्रीकाल की संपादक मंडल सदस्य . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

जिन्दगी ने दुनिया के कुछ मुल्कों के कुछ शहरों को देखने का मौका दिया . मैं हैरान थी . इतने सारे रंगों को देखकर .जब कनाडा के एक प्यारे शहर मिसीसागा पहुंची तो लगा ही नहीं की ये शहर अंजान है . सारे अपने बाहें फैलाये इंतजार में थे .शांत ,संजीदा शहर . शाखों पर पत्ते नहीं पर बारिश की नन्हीं बूंदे मोतियों की तरह लटके हुए थे .बारीक़ शीशे की दीवार पर जो  जगह खाली थी वहां ठंडी हवा कभी तीर सी कभी माशूक सी बदन पर लिपट जाती .दिन की रौशनी में आसमान कभी सिंदूरी , कभी जाफरानी कभी पीलापन लिए हुए था . लगभग एक हफ्ते कनाडा की खूबसूरती में भीगती रही . नियागरा फौल देखकर लगा रवींद्र नाथ  की कविता की पंक्ति  गुनगुनाऊ .इ सुन्दोरे भुवने आमी मोरते चाई ना.. एक विशाल झील , नीले  और हरे रंगों में झिलमिलाता हुआ .जब सूरज की किरणें पानी में पैवस्त होकर ऊपर उभारना चाहतीं तो झील का रंग गहरे हरे रंग में बदल जाता . जाने कितनी देर तक हम झील के नीलमी हीरे जैसे रंगों के जादू में खोये रहे .जब चले तो पानी के चश्में जगह- जगह हमारे साथ चलते रहे .मुझे फारसी के मशहूर शायर  उर्फी की पंक्ति याद आगयी जो उन्होंने कभी कश्मीर के बारे में कहा था …कि वहां जली-भुनी चिड़िया भी पहुँच जाये  तो उसके पंख और पर निकल आते हैं . पर ये बात मैं नियागारा फौल के  बारे में कहना चाहती हूँ .    जिसके  जादुई असर  से  हम
निकल नहीं पाएं.

वैसे कनाडा बहुत हद तक हिंदुस्तान का हिस्सा ही लगता है . हिदुस्तानी , पाकिस्तानी और बंग्लादेशियों से भरा है मुल्क .सरदारों की तादाद सबसे ज्यादा है ..सड़क के दोनों जानिब एक जैसे खूबसूरत इमारतें .जिनकी मेहराबो के नीचे कुछ बूढ़े लोग टहलते मिल जाते थे .बड़ी अजीब उदास ,नर्म धीमी –धीमी तहजीब थी .कहीं कोई शोर नहीं … मेरा मन घबराने लगा .कितनी अजीब बात है अपने देश में शोर से जी घबराता है यहाँ ख़ामोशी से . कनाडा से हम जर्मनी , फ्रांस और नीदरलैंड  गए . इन तीनों देश को टुकड़ों में देखा .पूरा रास्ता घनी और धारदार लंबी पत्तियों वाले दरख्तों से भरा पड़ा था .जब हम फ़्रांस के कांव शहर पहुंचे साँझ फूट रही थी .आसमान तक सर उठाये रहस्यमयी काले देवदार खड़े थे . पास कोई नदी बह रही थी धीमें धीमें . दूसरे दिन हम पेरिस पहुंचे .पेरिस वो जगह है जहाँ कला अपने विशाल रूप में मिलती है .हम आर्ट म्यूजियम में थे .एक विशाल महलनुमा ईमारत .जिसके फर्श के ज्यादातर हिस्सा कीमती कालीनों से ढका हुआ था .लोगों का हुजूम दुनिया की बेहतरीन कला में डूब रही थी .दरख्तों के साये ,बादल के रंग .औरतें जिसके बदन का हर हिस्सा जैसे बोल रहा हो .मुझे लगा ये सारीविशिष्ट कलाएं इंसानी वजूद हैं , जो सात सुर सात रंग और हजारों करोड़ों समय से देख रही हैं  हमें .मैं रंगों का तराना सुन रही थी , महसूस कर रही थी.

हम देख पाए मोनालिसा की पेंटिंग को .हमारी नजर ठहर गयी .जिस मुस्कुराहट पर दुनिया जान देती है उस मुस्कुराहट का रहस्य क्या है कौन जान पाया ?हल्की सी मुस्कुराहट की सुर्खी , लबों पर तिरछी होकर कुछ कह रही हो .नाजुक सी ठोड़ी. दूध में जैसे गुलाबी रंग घुल गया हो .हम देखते रह गए . .दो दिन वहां रहने के बाद हम जर्मनी के लिए निकल पड़े .रास्ता हरे हरे दरख्तों से घिरा था . इतना हरा शहर हमने देखा  नहीं अबतक . आखें हरी हो गयी .उंचे उंचे दरख्तों के घने झुंड.बल खाते रास्तो के किनारे झील .झील पर मुकम्मल ख़ामोशी तारी थी ..आसमान सुर्ख था .अब सूरज डूब रहा था .चंद लम्हों में यह सुर्खी रात में ढल गयी. …… जर्मनी को अपने खूबसूरत होने का दर्प है तो अपने इतिहास पर शर्मिदा है .हिटलर ने दुनिया के साथ जो कुछ किया उस दाग को वे धोना चाहतें हैं .इसलिए अगर किसी भी देश के शरणार्थी जर्मनी पहुँच जाये तो वहां की सरकार उनकी जिम्मेदारी लेती है.ऐश्वर्य  में डूबे उस देश में भी गरीबी है . सडकों के किनारे पूरा का पूरा परिवार भीख मांगता नजर आया . ये पूंजीवाद का चेहरा है  जो जर्मनी की भव्यता में छिप गया है .  क्लोन . फ्रेंकफर्ट, जेनट्राम और ग्लैडबैक की खूबसूरती का रंग एक सा है .

आप यूरोप का कोई शहर घूम लें उसमें गजब की एकरूपता है . हमारे देश की तरह विविधता नहीं है, इसलिए मन थोड़ी देर में उब जाता है .जर्मनी से विदा होकर हम नीदर लैंड की और चले .जर्मनी की ऊँची नम हवाओं की गोद से निकलकर  हम नीले गहरे पानी में थे . शहर के बीचो -बीच बड़ा सा केनाल है  .जो झील की तरह  है .जहाँ की गुलाबी ठंड जवान लडकियों के गालों को और सुर्ख कर रही थी ..  उसके चारों तरफ बादामी जर्द , सुर्ख
और सफेद  रंग के फूल लगे हुए थे .सामने खूबसूरत इमारतें जिसके मेहराब बादलों को छू रहे थे . हमने मोटर वोट लिया और चल पड़े . मोटर वोट का चालक शहर के बारे में बता रहा था ..उसकी आवाज गहरी थी हम डूब रहे थे आवाज केसाये में .वो कह रहा था …सारी दुनिया , सारी कायनात रंगों के सिवा कुछ नहीं है .

मैं हैरान थी इतनी खूबसूरत दुनिया का एक स्याह रंग था वहां का रेड लाइट एरिया . जहाँ की बड़ी-बड़ी खिडकियों के शीशे में लड़कियां खड़ी थी . पूरी नग्न . राहगीर खिड़की के शीशे के पास रुकते और देह को खरीदने का व्यापार चलता . सेक्स के बाजार का इतना भयावह रूप नहीं देखा था .पूंजीवाद का चरम रूप . जहाँ सबकुछ बिकता है . पूरी दुनिया के खरीददार आते हैं.  ये दूसरी ही दुनिया थी . कोई भी राहगीर शीशे में  बंद लडकियों की नग्न देह देख सकता है . वह खुले आम इंटरकोर्स करते हुए देख सकता है .मुझे सदमा लगा . कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था .जैसे किसी ने ढेर सारी कालिख मेरे मुंह पर पोत दी हो . मुझे लगा वे कह रही हैं निकालो मुझे यहाँ से . नंगी -नंगी औरतें – बदरूहें हवा में चिरागों की तरह उड़ रही हैं और दुनिया की सारी कौम कब्रिस्तान में तब्दील हो गयी है .
( यह यात्रा वृतांत आज जनसत्ता मे ‘ सफर के रंग’ शीर्षक से छपा है. )

बहुत खूब कंगना राणावत, सलमान खान कुछ सीखो

मनीषा कुमारी 

कंगना राणावत ने गोरा बनाने के क्रीम को नस्लभेदी दायरे में रखते हुए ऐसे विज्ञापन करने से मना कर दिया. इस निर्णय से कंगना को लाखों का नुकसान जरूर हुआ, लेकिन विज्ञापन के गोरखधंधे में लगे फ़िल्मी हस्तियों के सामने कंगना ने एक सवाल तो जरूर उछाल दिया. जान अब्राहम , ऐश्वर्या राय , शाहिद कपूर , दीपिका पादुकोण , शाहरूख खान जैसे कितने फिल्म अभिनेता हैं , जो गोरा रंग बनाने के गोरखधंधे के विज्ञापन में उतर चुके हैं. जनता के नायक बने इन फ़िल्मी हस्तियों की जन सरोकारों से दूरी जगजाहिर है . अभी हाल में स्त्रीकाल में सलमान खान के द्वारा महिलाओं के खिलाफ हिंसक विज्ञापन किये जाने का मुद्दा उठाया था मनीषा कुमारी ने . आज फिर से स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . 


सलमान की सजा , जमानत और अश्लील विज्ञापनों के बहाने 



सलमान खान को सजा हुई , जमानत मिल गई . सजा और जमानत के बीच फिल्म दुनिया और सोशल मीडिया में  सलमान की सजा के खिलाफ विलाप करने वालों की कोई कमी नहीं है . गायक अभिजित के बयान इस मायालोक की बदमिजाजी का एक नमूना भर है , जिसके लिए हर व्यक्ति , हर वस्तु हर भावना एक उत्पाद मात्र है , जो उन्हें अकूत संपत्ति बनाने के माध्यम भर हैं .

हमारा इरादा सलमान की सजा और मिली जमानत पर यहाँ गुण दोष की विवेचना का नहीं है , बल्कि भगवान बनाये जाने वाले इन महानुभावों के उस असर पर ध्यान दिलाने का है , जो हमारे आस- पास पुरुषवादी और वर्चस्ववादी दुनिया के निर्माण में मदद करता है , स्त्री को एक वस्तु –यौन आनंद की वस्तु बनाने में सहायक होता है . बिग बॉस जैसे रियलिटी शो के दौरान सलमान के अश्लील वक्तव्यों को यदि हम खुलेपन का एक अंग मान भी लें तो भी दूरदर्शन और अन्य चैनलों पर चलने वाले एस्ट्राल  पाइप के विज्ञापन को स्त्री के खिलाफ यौन हिंसा को उकसाने वाला विज्ञापन न मानें तो क्या मानें !

क्या सलमान खान जैसे लोग , जिन्हें एक बड़ा वर्ग भगवान् की तरह पूजता है , जिनका युवा पीढी का अधिकाँश अनुकरण करना चाहता है , इतने निर्दोष होते हैं कि जिन बातों को वे अपनी फिल्मों , छोटी फिल्मों या विज्ञापन से कहना चाहते हैं , जिनके लिए वे एक ख़ास भाव भंगिमा तैयार करते हैं , उनके प्रभावों से मुक्त होते हैं !एस्ट्राल पाइप का विज्ञापन एक हिंसक इरादे को मजाकिया अंदाज में कहते हुए स्पष्ट सन्देश देता है , जिसे देखते हुए कोई भी लडकी असहज हो जायेगी , लेकिन विज्ञापन की लडकी सलमान के इशारों और द्विअर्थी संवाद पर मुस्कुराती है – सब समझ लेने और उसे आनंद और लज्जा के मिश्रित रेस्पोंस देने के भाव में . निर्भया काण्ड में वीभत्स हमलों को हम सब ने जाना सुना है , जिसकी कल्पना मात्र से हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं , लेकिन सलमान और विज्ञापन के निर्माताओं को इन वीभत्स कारनामों के भीतर एक रोमांच सा अनुभव होता है . वे पाइप के विज्ञापन में एक युवा लडकी को क्या सन्देश देना चाहते हैं , उसे आप देखकर खुद समझ  सकते हैं . यौन हिंसा के द्विअर्थी संवादों और इशारों के लिए क्यों नहीं इस विज्ञापन से जुड़े लोगों के खिलाफ एक एफ आई आर की जानी चाहिए और इस विज्ञापन को बंद कर देना चाहिए ?

एस्ट्राल पाइप के विज्ञापन का लिंक :  यहाँ क्लिक करें 

विज्ञापनों में अक्सर स्त्री की प्रस्तुति यौन आनंद की वस्तु, पुरुष की सुख –सुविधा के लिए त्याग और समर्पण की देवी अथवा बिना दिमाग और सोच –समझ के कामांध के रूप में होती है. सारे डीयोड्रेन्ट के विज्ञापन ऐसी  ही कामांध स्त्रियों की छवि पेश करते हैं , जो एक कृत्रिम गंध के आकर्षण में अपना दिमागी संतुलन खोकर भी खुद को एक पुरुष के लिए सौप देती हैं .

एक्स का विज्ञापन लिंक : यहाँ क्लिक करें 

एयरटेल का एक विज्ञापन कई मायनों में स्त्रीविरोधी सन्देश देता है , पहला तो यह कि ऑफिस और घर में दोहरी भूमिका के कारण औरत ऑफिस में मर्दों की तुलना में कम काम करती है, दूसरा कामकाजी पुरुष-स्त्री के बीच घर के काम की जिम्मेवारी औरत की ही है , चाहे वह ऑफिस में अपने पति का बॉस ही क्यों न हो ! और बढिया खाना बनाकर औरत अपने पति को अपने लिए हासिल कर सकती है .

एयरटेल का विज्ञापन लिंक : यहाँ क्लिक करें 

‘ विज्ञापनों में स्त्री की छवि’  एक मुकम्मल शोध की मांग करती है और ऐसे शोध हो भी रहे हैं. अभी तो मैं सलमान की सजा से मायूसी और आक्रामकता के भाव से भरे लोगों के दृश्यों पर दुखी हूँ . भारतीय जेलों में लाखो लोग बिना दोषी सिद्ध हुए सड़ रहे हैं , उनमें ज्यादातार गरीब , दलित और अल्पसंख्यक हैं. कई तो जमानत राशि या जमानतदार की व्यवस्था न कर पाने के कारण जेलों में बंद रहने को विवश है. और हम हैं कि एक फर्जी मसीहा की सजा से दुखी हुए जा रहे हैं. पिछले कई दिनों से जब –जब मैं एस्ट्राल का विज्ञापन देखती थी तो इस कुंठा से भर जाती थी कि क्यों मैं सलमान की फ़िल्में देखकर अपने किशोर होते उम्र में एक भावुकता से भर जाती थी , यह तो सिर्फ और सिर्फ अकूत संपत्ति और शोहरत हासिल करने का सनकी व्यक्तित्व भर है , जिसके लिए एक स्त्री के अस्तित्व की कोई कीमत नहीं है .

स्त्री के खिलाफ यौन हिंसा के  संकेत से भर देने वाले इस विज्ञापन के लिए भी सलमान और पूरी टीम को सजा होनी चाहिए. लेकिन वोट बैंक लुभाने के लिए सलमान के साथ ‘पतंगबाजी’  का आंनद लेने वाले राजनीतिक चरित्रों में क्या यह साहस हो सकता है कि कडी कारवाईयों से वह एक स्पष्ट सन्देश ऐसे धंधेबाजों को दे , जिनमें इस माया लोंक के अधिकांश नायक शामिल हैं , हाँ सदी के महानायक भी….. !

मनीषा मनोविज्ञान की अध्येता हैं , सम्पर्क : manishamishra559@gmail.com

पुंसवादी आलोचना के खतरे और महादेवी वर्मा

सुधा सिंह

आलोचक सुधा सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं.  ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ , स्त्री अस्मिता साहित्य और विचारधारा, आदि कई किताबें (अपनी और संपादित) .प्रकाशित संपर्क : singhsudha.singh66@gmail.com9

( इस आलेख में सुधा सिंह महादेवी वर्मा के बहाने हिन्दी साहित्य में ‘ मर्दवादी आलोचना’ की पड़ताल कर रही  हैं , हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक नामवर सिंह की आलोचना में ‘ मर्दवादी स्त्रीदृष्टि’ की पड़ताल . इस आलेख में स्त्रीवादी आलोचना के बिंदु भी स्पष्ट होते हैं ) 


महादेवी पर पिछले चार-पाँच वर्षों में हिन्दी में नए सिरे से लिखने और पढ़ने की कोशिशें हो रही हैं। छायावाद के अंतर्गत विवेचना की जो नई संभावनाएं बन रही हैं वे सबसे ज्यादा महादेवी के लेखन के संदर्भ में बन रही हैं। प्रत्येक सामाजिक विमर्श अपना दबाव पैदा करता है कि पुराने या नए साहित्यिक पाठ को उसके आलोक में पढ़ा जाए और विमर्श के अनुकूल पाठ की तलाश की जाए।

 हिंदी में नब्बे के दशक के बाद के स्त्रीवादी विमर्श ने यह स्थिति पैदा की कि पाठ को खासकर स्त्री-पाठ को स्त्रीवाद के संदर्भ में रखकर देखा जाए और यह तय हो कि यह स्त्रीपाठ है या नहीं। यह एक गंभीर जरूरत थी क्योंकि परंपरित हिंदी आलोचना साहित्य को सिर्फ और सिर्फ साहित्य (वह भी हिंदी साहित्य) की हद में ही रखकर देखने की वकालत करती रही है। यह सब होता है साहित्य में समग्रता के नाम पर। सबसे ज्यादा परेशानी उन्हें साहित्य के बँटवारे को लेकर है कि साहित्य में स्त्री और पुरुष लेखन जैसा कोई बँटवारा क्यों हो? साहित्य तो साहित्य है। और जब साहित्य कह या लिख रहे होते हैं तो केवल हिंदी साहित्य ही उनकी चिंता के केन्द्र में होता है! साहित्य के बँटवारे की यह चिंता हिंदी के मठाधीशों को केवल अस्मितामूलक पाठों के संदर्भ में ही जोरों से सताती है। बँटवारे के अन्य सभी आधारों को वे बड़ी सहजता से स्वीकार कर लेते हैं पर यहाँ उनका विरोध देखते बनता है। देश-कालगत, भाषागत, क्षेत्रगत, बोली के आधार पर, विभिन्न राजनीतिक परिवर्तनों के आधार पर, सामाजिक आंदोलनों के आधार पर साहित्य का बँटवारा वे बहुत पहले बिना किसी ना-नुकच के स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन स्त्री-पाठ का स्वीकार मानो उनकी साहित्यिक मर्दवादिता को चुनौती लगता है। कहीं-न-कहीं यह भावना भी काम कर रही होती है कि स्त्री-पाठ का स्वीकार, साहित्य में जेंडर का स्वीकार है। इससे वे डरे हुए हैं। अन्य अस्मितामूलक विमर्श जहाँ अस्मिता को केन्द्र में करके अपनी शर्तें सामाजिक-राजनीतिक-संवैधानिक कारणों से मनवा चुके हैं, वहीं स्त्री के संदर्भ में सत्ता-विमर्श के इन सभी केन्द्रों के साथ-साथ साहित्य में भी मामले को जब-तब संशयमूलक बनाने की कोशिशें की जाती हैं।

उनके अनुसार (हिंदी) साहित्य में स्त्री-लेखन जैसी कोई चीज नहीं होती। यह बड़ा सपाट वक्तव्य है और पिछले एक दशक की हिंदी-आलोचना को देखें तो पाएंगे कि साहित्य में स्त्री-लेखन जैसी चीज कितनी विभाजनकारी है और यह कितनी व्यर्थ की कोटि है- इस विषय पर खूब लिखा गया है। पराकाष्ठा वहाँ दिखाई देती है जहाँ कई स्त्री-आलोचक और लेखिकाएं इस जमात में शामिल हो जाती हैं और वैसी ही सपाटबयानी करती हैं कि स्त्री-लेखन जैसी चीज को नहीं मानतीं, वे स्त्रीवादी नहीं हैं और साहित्य में यह कोटि विभाजनकारी है!
इन लोगों की मुश्किल यहाँ है कि जैसे ही साहित्य में स्त्री-लेखन को स्वीकार करेंगे, पुरुष-लेखन की बात आएगी, यह इसका विपरीतार्थक है। विपरीतार्थकों में ही दुनिया को समझने की दृष्टि तैयार की गई है। यह पूछा ही जाएगा कि क्या पुरुष लेखन जैसी कोई चीज होती है? अगर हाँ, तो किन विशेषताओं के आधार पर उन्हें चिह्नांकित करेंगे? और सच मानिए, आश्चर्य होगा यदि अब तक के हिंदी साहित्य के मुख्यधारा के लेखन से इतर कोई अन्य विशेषताएं गिनवा पाएँ! तो ख़तरा स्त्री-लेखन जैसी कोटि के स्वीकार किए जाने से नहीं पैदा हो रहा बल्कि इसकी रौशनी में उजागर हो जानेवाली पुंस-मानसिकता वाले लेखन और आलोचना से पैदा हो रहा है!
इन आलोचकों से पूछा जाना चाहिए कि रचना, रचना है, मूल्यांकन का आधार रचना ही होनी चाहिए। इसे

महादेवी वर्मा

(कलावादियों और रूपवादियों को छोड़कर) जब खारिज करते हैं और रचना को उसके सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में खोलते हैं तो क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए कि रचना कौन लिख रहा है? किन उद्देश्यों से लिख रहा है? उसका सामाजिक परिवेश क्या है? स्त्री अगर रचना करती है और रचनात्मकता के उन्हीं टूल्स का इस्तेमाल करती है जो पुंसवादी लेखन के टूल्स रहे हैं तो इसका अर्थ क्या हो सकता है? जो तैयार पाठ है, उसे केवल संदर्भ बदलकर स्त्री के कोण से पढ़ना शुरु करें तो क्या अर्थ होगा? यह ठीक है कि लेखक और रचना की अवस्थिति साहित्यिक-ऐतिहासिक संदर्भों में होती है लेकिन उसकी अपनी विशिष्टताओं को खारिज करके या चालाकी से समाहित करके या गौण बनाकर नहीं।

महादेवी के साथ ये आलोचक जो वर्षों की कुंभकर्णी नींद त्यागकर इस विषय पर और पल्ला झाड़ने की गुंजाइश न देखते हुए, जागे हैं, कुछ ऐसा ही सलूक कर रहे हैं। इसका एक नमूना है- 7-8 मई 2007 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दिया गया हिन्दी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह का वक्तव्य।
नामवर जी अपने वक्तव्य का आरंभ ही इस बात से करते हैं कि महादेवी की प्रसिद्धि और इतिहास में उनकी अवस्थिति का आधार ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ पुस्तक नहीं हैं। वे एक चालाक सवाल उछालते हैं, “कल्पना कीजिए कि उन्होंने केवल ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ पुस्तक ही लिखी होती; नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा, अग्निरेखा, सप्तवर्णा जैसे ग्रंथ न लिखे होते, स्मृति की रेखाएँ, अतीत के चलचित्र न लिखी होती तो हिन्दी साहित्य के इतिहास में अथवा भारतीय साहित्य के इतिहास में उनका स्थान क्या होता, कितना होता? पाद टिप्पणी के रूप में होता या अनुक्रम में कहीं होता या पूरा का पूरा अध्याय होता। सोचिए। महादेवी को केवल स्त्री के रूप में निःशेष करना क्या ठीक है? सिर्फ इसलिए कि उन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना की और इसलिए कि उन्होंने महिला शिक्षा में काम किया”।[i]

नामवरजी, सही सवाल उठाने और सही नाम से पुकारने की वकालत करते हैं। हिंदी आलोचना में अन्य क्षेत्रों में उन्होंने यह किया भी है। लेकिन यहाँ वे अपनी पहले से स्थिर धारणा को पुष्ट करने के लिए केवल तर्क जुटा रहे हैं। इस सवाल को जरा पलटकर पूछिए और वक्तव्य के छपे हुए अंशों को पढ़ते हुए आगे बढ़िए, आपको हिंदी के इस मूर्धन्य आलोचक की स्थिर और अचल आलोचना-दृष्टि के दर्शन होंगे। जैसे, “कल्पना कीजिए कि महादेवी ने ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ नहीं लिखी है; नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा, अग्निरेखा, सप्तवर्णा जैसे ग्रंथ ही लिखे हैं, स्मृति की रेखाएँ और अतीत के चलचित्र ही लिखा है तो हिंदी साहित्य के इतिहास में या भारतीय साहित्य के इतिहास में उनको क्या स्थान प्राप्त है, कितना है? पाद टिप्पणी के रूप में है या अनुक्रम में कहीं है या पूरा का पूरा अध्याय है? सोचिए”। अब यहाँ से इस प्रश्न को खोलिए। यह उल्टी कवायद है, पर करिए। तभी आप नामवर जी से भी यह पूछ पाएंगे कि उन्होंने अब तक छायावाद पर लिखी अपनी दो रचनाओं – ‘छायावाद’ और ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ में कितनी जगह महादेवी को दी है? अलग से अध्याय दिया है, विवेचना में केन्द्रित करके बात की है? पाद-टिप्पणी या अनुक्रम में जगह दी है? किसी अन्य रचनाकार को ध्यान में रखकर मुद्दा निर्मित  करके बात करते हुए आनुषंगिक रूप से महादेवी का जिक्र ले आए हैं या ग़ाह-ब-ग़ाह उनकी भी पंक्तियाँ संदर्भ से काटकर पेश कर दी है, अधिकांश जगहों पर बिना नाम तक लिए? यह सवाल नामवरजी से अकेले नहीं समूची हिंदी की तथाकथित मुख्यधारा की आलोचना से पूछा जाना चाहिए। नामवरजी अकेले नहीं हैं, आलोचकों की पूरी जमात है जिनसे यह सवाल किया जाना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि हिंदी आलोचना की इस ʻजग-मग करती आकाशगंगाʼ में बड़े और छुटभैय्ये सितारों में कितनी दूरी है और वैचारिक-सामाजिक संबंध कैसे हैं?

नामवर सिंह

यह आलोचना-दृष्टि पुराने पाठ को पुरानी पड़ चुकी दृष्टि के संदर्भ में ही पढ़ रही है। समय की विवशता है कि आधुनिक नवीनतम दृष्टि से, नए विचारों के संदर्भ में पुराने पाठ को भी खोला जाए। इस प्रसंग में पुराना भी, अगर उसमें क्षमता हो तो नवीन बनता है। उसकी प्रासंगिकता बनती है। इस मुद्रित वक्तव्य में नामवर जी ने कुछ ऐसा नहीं कहा जो  पहले नहीं कह चुके हों। बल्कि अद्भुत विसंगति है कि जगह-जगह ऐसे वाक्य हैं जिनमें स्त्री-आंदोलन, विमर्श और रचना-कर्म को हेय बताने की कोशिश है!  एक शिष्ट आलोचक की विषय के प्रति घृणा बड़े ही प्रकट तरीक़े से व्यक्त हुई है। वे नामवरजी जो अपने व्यवहार में हर एक से सम्मानपूर्वक बात करने के लिए जाने जाते हैं, ‘स्त्री’, ‘स्त्री-पाठ’, ‘स्त्री-संदर्भ’ और ‘विमर्श’ और इन मूल्यों को जीवन में उतारनेवाली प्रबुद्ध स्त्रियों से कितनी चिढ़ रखते हैं कि भाषा की शालीनता विस्मृत कर जाते हैं! एक-आध नमूना देखिए- “फिर भी मैं कहूँगा कि हमलोग कहीं उनको (महादेवी को) सिमोन द बउवार न बना दें, और आज के वातावरण में यह खतरा है।” सिमोन द बुवा का नाम कोई गाली नहीं है, इसे इस रूप में इस्तेमाल किया जाना भाषा में अशालीनता है। आगे देखिए- “उनके (महादेवी के) नाम पर कोई स्त्रीवादी आंदोलन चलाना चाहे तो वो किसी और के नाम पर चला ले, इन्दिरा गाँधी के नाम पर चला ले, मायावती के नाम पर चला ले, लेकिन कम-से-कम बख्शिए महादेवी को।”[ii]

 महादेवी को परंपरा में रखकर देखिए पर उनकी विशिष्टता मत भूलिए।  वह परंपरा कौन-सी है कि महादेवी की तमाम प्रशंसा के बावजूद भी जब स्थान निर्धारण का सवाल आता है तो पहले प्रसाद, निराला ही नज़र आते हैं, इस पर जरूर विचार किया जाना चाहिए।महादेवी के स्त्री संबंधी चिंतन में आधुनिक स्त्री की चेतना के साथ परंपरित स्त्री की चेतना का जो अंतर्द्वंद्व है, उसे देखा जाना चाहिए। भारतेन्दु और उनके युग के लेखकों के अंतर्द्वंद्वों की व्याख्या कर उन्हें आधुनिक युग का निर्माता मानने में संकोच नहीं करते पर महादेवी के  लेखन में पाश्चात्य स्त्री के साथ भारतीय स्त्री की तुलना और भारतीय स्त्री की भिन्न स्थिति के बयान से तत्काल महादेवी की स्त्री संबंधी मूलगामी चिंता को केवल राष्ट्रवाद और छायावाद के दायरे में क़ैद करना और यह कहना कि वे स्त्रीवादी चिंतक नहीं थीं; उनका स्त्रीवाद से लेना-देना नहीं था; उन्हें स्त्रीवादी मत बनाइए- इसे कूढ़मगज़ी ही कहेंगे।

नामवरजी महादेवी के संदर्भ में भाषा और चेतना के स्तर पर जिस तरह की आलोचकीय भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वह वही सांस्कारिक भाषा है जिसका प्रयोग समाज में स्त्री के संदर्भों में होता है। महादेवी  स्त्री की अस्मिता के लिए लड़ीं, अकेलेपन को प्यार किया, इस बात को सिद्ध किया कि स्त्री की दुनिया बड़ी होती है, उसके साथ पूरा संसार चलता है। बड़ी से बड़ी अस्मिता को स्त्री के सत्याग्रह और हठीले प्राण के आगे अपना अहंकार त्यागना होता है, उसके कंपनों का भिखारी बनकर समता की धरातल पर उतरना होता है। स्त्री का संसार महादेवी ने इतना बड़ा बनाया कि ‘मानवी’ स्त्री के लिए प्रचलित सारी व्याख्याएं अपर्याप्त हो गईं। ऐसी उदार, विस्तृत, भावुक लेकिन दृढ़, निर्माण उन्मत्त, स्त्री-छवि महादेवी के यहाँ है जो किसी को भी उदात्तता के दर्शन करा सकती है। और नामवर जी के लिए स्त्री-छवि कैसी है, स्त्री के संदर्भ से संसार को देखने को वे कैसा मानते हैं- यह उनके ही शब्दों में देखिए। वे कहते हैं, “महादेवी को केवल स्त्री के रूप में निःशेष करना क्या ठीक है?”[iii] इसमें दो तरह की अंतर्ध्वनियाँ हैं- एक कि स्त्री के रूप में देखना दुनिया को छोटा करके देखना है और दूसरी कि स्त्रीवादी दृष्टि से केवल स्त्री ही दिखाई देती है। या यह दृष्टि केवल स्त्री से जुड़ी समस्याओं को ही देखती है, उन्हें संसार नहीं दिखाई देता!

दोनों ही पूर्वाग्रह हैं और ग़लत हैं। स्त्री के रूप में देखना न तो दुनिया को छोटा करके देखना है न ही स्त्रीवादी दृष्टि से केवल स्त्री ही दिखाई देती है! यह दुनिया को देखने की एक मुकम्मल दृष्टि है जिसमें स्त्री भी शामिल है। आप सामाजिक विकास की किसी भी अवस्था में ऐसी किसी दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते जिसमें स्त्री शामिल न हो! यह हो सकता है कि कभी कोई पेशा विकासक्रम में लुप्त हो जाए, वर्ग नए उभरें या लुप्त हो जाएं, सामाजिक संरचना में आज के वंचित कल ताक़तवर हों पर स्त्री के बग़ैर कोई समाज बना रहे इसकी कल्पना भी मुश्किल है। स्त्री-पुरुष दोनों इस सामाजिक संरचना के अहम् हिस्से हैं। यह कैसे संभव है कि स्त्री के बिना कलाओं और साहित्य का सृजन होता रहे, भाषा की संरचनाएं विकसित की जाती रहें, समाजिक विभेद की स्थितियों को और मजबूती प्रदान की जाती रहे और उन्हें देखने-बताने पर उसे स्त्री की तरह देखना कहा जाए, स्त्री में निःशेष कर देना कहा जाए! हमारे आलोचक आलोचना में स्त्री की ʻविराट्ʼ छवि, ʻदेवि, माँ, सहचरि, प्राणʼ को महिमामंडित कर सकते हैं लेकिन निजी-व्यवहार और सोच में कहीं फाँक रह जाता है जो स्त्री होने मात्र को हीन मानकर, संकुचित मानकर व्याख्या करता है। नामवरजी के लिए स्त्री का अर्थ है संकुचन जो महादेवी के यहाँ चित्रित स्त्री की छवि से मेल नहीं खाता। वहाँ स्त्री विस्तार है, संकुचन नहीं।

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

नामवरजी के इस भोले प्रश्न पर सिर धुनने का ही मन करेगा कि “महादेवी नारी थीं, लेकिन इसमें उनकी क्या विशेषता थी?” नहीं, कोई विशेषता नहीं थी और अगर “इस विशिष्टता से उनका संपूर्ण काव्य एक तरह से प्रभावित हुआ है”[iv] तो बस इतना ही कि उन्होंने बात कहने के लिए रहस्यवाद की आड़ ली है! यह रहस्यवाद क्या है? जिसका इस्तेमाल रामचंद्र शुक्ल ने सामान्य संदर्भ में और नामवर जी ने स्त्री के विशेष संदर्भ में किया है। यह दरअसल साहित्य में पर्दाप्रथा है जिसका ये लोग महिमामंडन कर रहे हैं कि ये रहस्य की ओट में स्त्री-सुलभ सहज लज्जा है! वास्तविकता यह है कि महादेवी ने स्त्री की बात कहने के लिए किसी आड़ या रहस्य का सहारा लिया ही नहीं है। कविता में विशिष्ट शैली में और विचार तथा संस्मरण साहित्य में स्पष्ट पक्ष रखते हुए स्त्री और उससे जुड़े समाज की आलोचना की है।

रहस्यवाद की बात जिस समय शुक्ल जी ने महादेवी के संदर्भ में उठाई तब उनकी बहुत कम रचनाएं खासकर कविताएं ही ज्यादा प्रकाशित थीं। लेकिन जिस समय नामवरजी कह रहे हैं तो उनके सामने महादेवी की सारी रचनाएं प्रकाशित हैं। महादेवी यथार्थवादी लेखिका हैं, वे लेखन में रहस्यवादी उपकरणों का इस्तेमाल करती हैं लेकिन उनकी अंतर्वस्तु यथार्थवादी है। उनके भाषिक प्रयोग उनकी काव्य-शैली का हिस्सा हैं। वह उनकी अंतर्वस्तु का हिस्सा नहीं है। महादेवी ने स्वयं रहस्यवाद को काव्य विशेषकर गीत की शैली के रूप में ही व्याख्यायित किया है। अपने विचारात्मक निबंध ʻगीति-काव्यʼ में वे लिखती हैं, “छायावाद के गीतों का यथार्थ कभी भाव की छाया में चलता है और कभी दर्शनात्मक आत्मबोध की।

भाव की छाया मनुष्य और प्रकृति दोनों की यथार्थ रेखाओं को एक रहस्यमयता दे देती है”।[v]
जब आलोचना के पास नए संदर्भों की आलोचकीय भाषा न हो तो आलोचना कैसे लड़खड़ाती है, इसका एक   उदाहरण देखिए। “जिस कविता को आप पिघली हुई मोम समझते हैं, उस कविता से प्रकट होता है कि वे कितनी अभिमानिनी थीं? कितनी हठीली थीं? जीने की कितनी चाह थी उनमें? वे लिखती हैं-
कंटकों की सेज जिसकी आँसुओं का ताज
        सुभग हँस उठ खुश प्रफुल्ल गुलाब ही सा
कंटकों की सेज के साथ यह प्रफुल्ल गुलाब जैसी चीज देखना स्त्रीत्व का उदाहरण है। महादेवी के स्त्रीत्व का सबसे बड़ा उदाहरण है उनकी अधिकांश कविताओं में मिलनेवाली श्रृंगारप्रियता। स्त्री सचमुच यदि स्त्री है तो श्रृंगारप्रियता होगी, श्रृंगार रस नहीं कह रहा हूँ, साज-श्रृंगार के अर्थ में कह रहा हूँ”।[vi]

महादेवी अभिमानिनी भी थीं, हठीली भी थीं, जीने की चाह भी थी उनमें; मरना थोड़े ही चाहती थीं! गीतात्मक भावुकता के अतिरेकी क्षणों में भी कहीं उन्होंने सांसारिक कष्टों से ऊबकर आत्महत्या की इच्छा प्रकट नहीं की है! स्त्री तो छोडिए, कौन-सा सामान्य इंद्रिय-बोध वाला मनुष्य अधम होगा जो अभिमानी, हठीला और जीने की चाह से भरा न होगा! नामवरजी महादेवी के स्त्रीत्व के उदाहरण के तौर पर जिन गुणों को रख रहे हैं वे वही परंपरित गुण हैं जिसकी मांग हिंदी भाषी समाज की मध्यवर्गीय आधुनिक परंपरागत मर्द मानसिकता करती रही है। जिसकी एक छवि ʻगोदानʼ में मेहता के माध्यम से प्रेमचंद पेश करते हैं। जिसमें वह स्त्री को क्षमा, त्याग, दया, करुणा, सहनशीलता की देवी मानता है और अपने लिए वैसी ही स्त्री पाना चाहता है।
सहनशीलता और श्रृंगारप्रियता कोई स्त्री के निजी गुण नहीं होते। एकतरफा सहनशीलता कोई गुण नहीं हो सकती। यह तो जीने के लिए परिस्थितियों से समझौता है, क्या नामवरजी इसे नहीं जानते?  निन्यानबे फीसद स्त्रियाँ सहनशीलता के गुण का प्रदर्शन इसलिए करती हैं कि वे जीना चाहती हैं! सहनशीलता के कई रूप होते हैं। केवल गोल-मोल शब्द ʻदुखʼ के प्रति ही नहीं, कायिक-वाचिक हर तरह की हिंसा के प्रति सहनशीलता, विपरीत सभा-समूह में बने रहने के लिए आचारजनित सहनशीलता, अस्तित्व को येन-केन-प्रकारेण बचाए रखने के लिए अतिरिक्त श्रमजनित सहनशीलता – न जाने इस तरह सहनशीलता के कितने प्रकार होंगे जिनका व्यवहार स्त्रियां रोजाना करती हैं। यहाँ तक कि समाज की संवेदनाओं और संवैधानिक स्थितियों के बदलने की प्रतीक्षा में अपनी सहनशीलता को रचनात्मक बनाए रखने की प्रक्रिया भी एक भिन्न किस्म की हठी संवेदनशीलता की मांग करती है! स्त्री के इन गुणों की प्रशंसा, बिना समुचित संदर्भ में रखे करना, इस सहनशीलता की सही व्याख्या नहीं हो सकती। समुचित संदर्भ स्त्री का संदर्भ ही होगा, यह कहने में परहेज नहीं है।

 “स्त्री सचमुच यदि स्त्री है तो श्रृंगारप्रियता होगी, श्रृंगार रस नहीं कह रहा हूँ, साज-श्रृंगार के अर्थ में कह रहा हूँ”। और “इस दुनिया में फूलों से, रंगों से भरे इस जगत में इसके बिना इस सौन्दर्य के बिना वे सूखी काठ कठोरी, किसी आर्यसमाजी महिला के समान दिखने लगेंगी। लोगों ने उनकी (महादेवी) की ऐसी छवि बनाई है जैसे वे किसी आर्यसमाजी अनाथालय की महिला हों या गाँधी आश्रम में सूत कातने वाली हों”।[vii] यहाँ फिर आलोचकीय दृष्टि का झोल नज़र आता है। नामवर जी यह तो ठीक कह रहे हैं कि छवि बनाई जाती है लेकिन वह यह भूल रहे हैं कि जिस साज-श्रृंगार को स्त्री से जोड़ रहे हैं और सजी हुई स्त्री की बात कर रहे हैं, वह भी एक बनाई हुई छवि है, सहज नहीं है! इसमें स्त्री को सदियों क़ैद रखा गया है। स्त्री माने सुंदरता, स्त्री माने कोमलता, स्त्री माने कलात्मकता, स्त्री माने कमनीयता, स्त्री माने रमणीयता – यह सारी धारणाएं क्या समाज के द्वारा स्त्रीत्व की पैमाइश के रूप में गढ़ी हुईं नहीं हैं? ʻसुंदरʼ (कमनीय) स्त्री जितनी आकर्षक लग सकती है, सुंदर (कमनीय) पुरुष भी उतना ही आकर्षक लग सकता है। यह दैहिक सौंदर्य है जिसकी नामवर सिंह स्त्री के संदर्भ में चर्चा कर रहे हैं और स्त्रीत्व का गुण बता रहे हैं। सूत कातने वाली, सादा साड़ी पहननेवाली, सादगी से रहनेवाली स्त्री असुंदर हो जाती है, ऐसा मान लें तो कहना पड़ेगा कि हमारी आलोचना, आलोचकीय भाषा और चेतना के स्तर को एक और प्रेमचंद की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी जो यह कह सके कि खेत की मेंड़ पर पसीना बहानेवाली स्त्री भी सुंदर है!

ध्यान रखना चाहिए कि नामवर जी यह सब महादेवी की रचना में आए किसी पात्र के लिए नहीं बल्कि स्वयं महादेवी के लिए, एक पढ़ी-लिखी, प्रबुद्ध, संवेदनशील और व्यावहारिक स्त्री के लिए कह रहे हैं!  आलोचकीय व्याख्या के इस पिछड़ेपन का संबंध पिछड़ी सामाजिक चेतना से है, जो आलोचक की दुनिया है। जो भाषा में सुंदर और भदेस सौंदर्य की खोज स्त्री के संदर्भ में पिछड़ी सामाजिक चेतना के स्तर से कर रहा है। जो यह मानकर चलता है कि सुंदरता स्त्री के स्त्रीत्व को तय करती है और जिसका संबंध साज-श्रृंगार से है! इसके पीछे कहीं अकेली बौद्धिक स्त्री की रूढ़ सामाजिक छवि भी काम कर रही है। जो यह मानती है कि अकेली, पति से अलग रहने वाली, मातृत्व से वंचित, स्व-निर्भर बौद्धिक स्त्री के व्यक्तित्व से सारी कोमलताएं, सारा आकर्षण खत्म हो जाता है। वह खड़ूस और शुष्क क़िस्म की महिला बन जाती है! हमारा आलोचक बताना चाहता है कि महादेवी शुष्क और खड़ूस नहीं थीं। उन्हें रंगों से प्यार था, वे रंगीली थीं!  क्या इस तरह से महादेवी के व्यक्तित्व और उनकी कविता में आए रंगों की व्याख्या हो सकती है? महादेवी स्वयं सौंदर्य के तमाम बाहरी उपकरणों का निषेध एक नहीं अनेक जगह करती हैं। झूठ और दिखावे से उन्हें नफरत है। सौंदर्य- प्रज्ञा, व्यवहार, विचार के स्तर से तय होगा न कि साज-सिंगार से? स्त्री साज-श्रृंगार के बिना हो ही नहीं सकती, इस तरह का वक्तव्य सामाजिक फैक्टरी में स्त्री के निर्माण की विशेष अर्हताओं को तय करता है! साथ ही यह स्त्री-पाठ को पढ़ने में हिंदी की परंपरित आलोचना दृष्टि की दरिद्रता को भी खोलता है। जरा महादेवी के शब्दों को भी ध्यान में रखें, जो वह पश्चिम की आर्थिक रूप से निर्भर लेकिन प्रसाधन प्रिय स्त्री के लिए कह रही हैं- “स्त्री वहाँ आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र हो चुकी है, अतः सारे सामाजिक बंधनों पर उसका अपेक्षाकृत अधिक प्रभुत्व कहा जा सकता है। उसे पुरुष के मनोविनोद की वस्तु बने रहने की आवश्यकता नहीं है, अतः वह चाहे तो परंपरागत रमणीत्व को तिलांजलि देकर सुखी हो सकती है। परन्तु उसकी स्थिति क्या प्रमाणित कर सकेगी कि वह आदिम नारी की दुर्बलता[viii] से रहित है? संभवतः नहीं। श्रृंगार के इतने संख्यातीत उपकरण, रूप को स्थिर रखने के इतने कृत्रिम साधन, आकर्षित करने के उपहास-योग्य प्रयास आदि क्या इस विषय में कोई संदेह का स्थान रहने देते हैं? यदि पुरुष को उन्मत्त कर देनेवाले रूप की इच्छा नहीं मिटी, उसे बाँध रखनेवाले आकर्षण की खोज नहीं गई तो फिर नारीत्व की ही उपेक्षा क्यों की गई, यह कहना कठिन है”।[ix]
“….आज उसे अपने रूप, अपने शरीर और अपने आकर्षण का जितना ध्यान है, उसे देखते हुए कोई भी विचारशील, स्त्री को स्वतंत्र नहीं कह सकेगा”।[x]

महादेवी के लेखन में स्त्री-संबंधी चिंतन के दो छोर मिलते हैं। उन्होंने अपने चिंतन का विकास निजी और सामाजिक अनुभवों के आधार पर किया है। सामाजिक विकास का गंभीर अध्ययन इसमें शामिल है। सामाजिक परंपरा का विवेचन करना और परंपरा के भीतर स्त्री को रखकर देखना और उसकी दुर्दशा की व्याख्या करते हुए समाज की सत्ता-संरचानाओं को चुनौती देना, उनकी आँख में उँगली डालकर दिखाना कि देखो तुमने क्या किया है, महादेवी के स्त्री-चिंतन की विशेषता है। लेकिन इसका एक और पक्ष है जो दुर्बल है। वह है इन्हीं परंपराओं में स्त्री की मुक्ति की तलाश करना।

जयशंकर प्रसाद

महादेवी की स्त्री-संबंधी विवेचना का सार यह है कि स्त्री के पास जो है उसे खोकर अपनी हीन दशा से ऊपर उठने और समाज में सम्मान पाने की स्पर्द्धा में पुरुषों की तरह सारी प्रकृतिजनित कोमल भावों का त्याग कर अपने को असंवेदनशील और कठोर बनाना; स्त्री की मुक्ति का रास्ता नहीं हो सकता। पश्चिम की स्त्रियों ने शिक्षा आदि को पहले प्राप्त कर अपनी दीन दशा से मुक्ति के प्रयास में ऐसा किया है और प्रकृति से विकृति की ओर गई हैं। उनसे सीखना चाहिए। जो है उसे, जो नहीं है उसे पाने के लिए खो देना और पुनः खोए हुए को पाने की कोशिश करना; अपार ऊर्जा को नष्ट करनेवाला है।

जिसे हमारे आलोचक भारतीय स्त्रीवाद की परंपरा कह रहे हैं और पूरब-पश्चिम की श्रेष्ठ-हीन युग्मों में रखकर देखने की कोशिश कर रहे हैं उनसे यह पूछा ही जाना चाहिए कि महादेवी के स्त्री-संबंधी चिंतन में वे किन विशेषताओं को ढूँढ़कर उन्हें पश्चिम से अलग और श्रेष्ठ भारतीय परंपरा में बता रहे हैं? महादेवी की स्त्री-संबंधी चिंता से यह कहीं नहीं ध्वनित होता कि वे पिछड़ी हुई औरत को जो रमणी, परनिर्भर, साज-श्रृंगारवाली है, पसंद करती हैं! वे कोमल और श्रेष्ठ को जो स्त्री के पास पहले से है, बचा लेने की बात करती हैं। आज के समय में यह अकेले स्त्री का दायित्व हो सकता है, ऐसा भी महादेवी का मानना नहीं है। यह एक सामाजिक-राष्ट्रीय दायित्व है। यह समाज का दायित्व है कि वह स्त्री के कोमल और श्रेष्ठ का सम्मान करे; उसे नीचा न दिखाए; कमजोर और दुर्बल कहकर उसकी उपेक्षा न करे। अपनी समस्त कोमलता और श्रेष्ठता के साथ यदि स्त्री को बराबर सामाजिक भागीदारी और सम्मान मिलता है, उसके सार्वजनिक स्पेस को कम नहीं किया जाता; उसकी बुद्धि और मेधा पर पाबंदियाँ नहीं बिठाई जाती तो समाज की स्वस्थ उन्नति को कोई रोक नहीं सकता। महादेवी का जोर है कि प्रकृति ने स्त्री को विशिष्ट जैविक क्षमता दी है उसके कारण उसमें कुछ श्रेष्ठ मानवीय गुणों का तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा स्वाभाविक विकास हुआ है। पुरुष की बराबरी और अपने को साबित करने की स्पर्द्धा में स्त्री को इन गुणों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। इस संदर्भ में अपनी बात स्पष्ट करने के लिए वे बार-बार पश्चिम की स्त्रियों का उदाहरण देती हैं। पश्चिम की स्त्री-मुक्ति का संदर्भ उनके लिए गाली नहीं है ना ही महादेवी की यह समझ है कि भारतीय स्त्री की मुक्ति का दुनिया से विरला, कोई रास्ता होगा!

महादेवी के स्त्री-संबंधी चिंतन पर ग़ौर करें तो पाएंगे कि वैश्विक परिदृश्य में रखकर ही वे भारतीय स्त्री की मुक्ति की बात कर रही हैं। उनकी कविताओं से लेकर लेखों और स्मृतिचित्रों तक, स्त्री-मुक्ति का एक ही वितान बनता है। उनकी कविताओं के अंदर आए शब्दों को, भावों को, विचार-बिंदुओं को तब तक नहीं समझ सकते जब तक कि उनके लेखों की विचार-सरणियों से परिचित न हों। महादेवी बार-बार स्त्री के उदात्त मानवीय गुणों को बनाए रखने पर बल दे रही हैं। लेकिन इसे स्त्री की हीनावस्था की एवज में बनाए रखने नहीं कह रहीं। भारतीय स्त्री से उनकी मांग है कि वह सामाजिक परिस्थितियों को समझे, अपनी हीन अवस्था से ऊपर आने के लिए संघर्ष करे, लेकिन संघर्ष को ही लक्ष्य न बना ले। दो बड़ी ही महत्वपूर्ण चीजों की माँग समस्त स्त्री जाति और विशेषकर भारतीय स्त्री से महादेवी करती हैं। पहली है, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की और दूसरी है, पुरुष की स्वार्थपरता के विस्मरण की! यह आह्वान उनका जागृत स्त्रियों से है जिन्हें अपनी अवस्था का ज्ञान नहीं है, उन स्त्रियों को वे इससे दूर रखती हैं। यह दोनों अवधारणाएं विश्व के स्त्रीवाद को भारतीय स्त्री-मनीषा की देन है। यह स्त्रीवाद की पश्चिमी अवधारणाओं से भिन्न अवधारणा है। स्त्री-चेतना को भी रूढ़ जकड़बंदियों से निकालने की जरूरत है। महादेवी ने यह काम अपने स्त्री-चिंतन के जरिए किया है।

नामवर जी महादेवी का मूल्यांकन करने के लिए लोक-जागरण, राष्ट्रीय जागरण से लेकर नवजागरण तक की परंपरा को टटोलते हैं। लोकजागरण की परंपरा में जैसे कबीर, जायसी, सूर, तुलसी और मीरा हैं, उसी तरह छायावाद में प्रसाद, निराला, महादेवी, पंत हैं। सवाल है कि इस नवजागरण का कोई स्त्री-संदर्भ बनता है कि नहीं? स्त्री-लेखिका का स्त्री की परंपरा में रखकर मूल्यांकन होना चाहिए। लेकिन नामवर जी ऐसा नहीं करते। नामवरजी महादेवी के लेखन और विचारों का महत्व न समझते हों या जानबूझकर छिपा रहे हों ऐसा नहीं है, लेकिन परंपरा के मूल्यांकन की जो पद्धति चुनते हैं, उनमें महादेवी के लेखकीय सरोकार कमतर नज़र आते हैं, उनका विस्तार छोटा नज़र आता है।

नामवर जी महादेवी की परंपरा ‘हमारी पूरी परंपरा में’[xii] तलाश रहे हैं! सवाल है कि जिस परंपरा की बात कर रहे हैं, क्या वह समावेशी है? इस परंपरा के अंदर और बाहर रखे जाने के पैमाने क्या रहे हैं? क्या इसमें स्त्री सामान्य रूप से शामिल है, या अपवादस्वरूप कहीं कहीं नज़र आती है। समूचे हिंदी साहित्य में आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिककाल के आरंभिक डेढ़ सौ सालों में कितनी स्त्री रचनाकार ‘हमारी पूरी परंपरा में’ शामिल हैं? नामवर जी भी परंपरा के विवेचन के क्रम में भक्तिकाल के चार सौ साल बाद की यात्रा करके आधुनिक काल और छायावाद फिर महादेवी तक पहुँचे! जिस परंपरा में इतना अंतराल और झोल हो उस पर संदेह होता है। किसी रचनाकार का मूल्यांकन परंपरा में रखकर करना परंपरा की भी पड़ताल करना हो सकता है, इस पर सोचने की जरूरत है।
महादेवी को परंपरा में रखकर विश्लेषित करने के लिए नामवर जी सारे ऐसे संदर्भों का इस्तेमाल करते हैं जो महादेवी से सीधे नहीं जुड़ते। मूल चीज यह है कि महादेवी पितृसत्ता विरोधी दृष्टि से देखती हैं और नामवर जी के यहाँ यह शब्द पाद-टिप्पणी में भी नहीं आया है। महादेवी की या छायावाद के किसी भी रचनाकार की आलोचना के क्रम में वे पितृसत्ता का नाम तक नहीं लेते! दूसरी बात कि नामवर जी ने इस वक्तव्य में परंपरा की पड़ताल और महादेवी की उसमें अवस्थिति को देखने के लिए विवादित मुद्दों की तरफ देखा ही नहीं। वे छायावाद के फॉरमेट पर बात कर रहे हैं उसकी अंतर्वस्तु पर बात ही नहीं कर रहे। अंतर्वस्तु पर अगर विस्तृत चर्चा करते तो यह बताना पड़ता कि महादेवी को जब वे प्रगतिशील, अग्रसोची और क्रांतिकारी कह रहे हैं तो किन अर्थों में? कहाँ उनकी क्रांतिकारिता दिखाई देती है और क्यों?

नामवर जी महादेवी के विशिष्ट अवदान को रेखांकित करने की बात कहते हैं। उनकी प्रगतिशील विचारों को भी नोटिस लेते हैं, ‘जहाँ तक जीवनदृष्टि का सवाल है, जीवनदृष्टि में अपने विचारों में महादेवी प्रगतिशील थीं।….वे बहुत अग्रसोची थीं, क्रांतिकारी थीं। निराला से भी अधिक’।[xiii] लेकिन बिना यह स्पष्ट किए कि वे स्थल कौन से हैं, वह दृष्टि कौन-सी है जो महादेवी को इस चेतना से संपन्न बनाती है;  वे साहित्यिक परंपरा में श्रेष्ठता की कसौटी गढ़ने लगते हैं। महादेवी के बारे में मूल्यांकन के तमाम  सकारात्मक वाक्यों के बाद भी वे जब स्थान तय करने की बात आती है तो वे प्रसाद को पहला, निराला को दूसरा तथा महादेवी को तीसरा स्थान देते हैं! इसके लिए कई अजीब तर्क देते हैं। लेखन और उम्र का सह-संबंध, लेखकीय उम्र और भौतिक उम्र, परिमाणमूलक और गुणवत्तामूलक लेखन, प्रकाशन में सचेत चयन आदि की बात करते हैं। ये सब चित्र-विचित्र पैमाने वे रचते हैं सिर्फ अपने प्रिय लेखक प्रसाद, निराला को बड़ा बताने के लिए! सोचने की बात है कि आज का संदर्भ प्रसाद-निराला से बन रहा है या महादेवी से! महादेवी की सीमा और अंतर्विरोधों को देखने के साथ-साथ इन रचनाकारों की सीमाओं और अंतर्विरोधों को भी देखा जाना चाहिए।

1955 में लिखी गई पुस्तक ‘छायावाद’ के विभिन्न अध्यायों में महादेवी की आनुषंगिक चर्चा है। यहाँ तक कि ‘छायावाद’[xiv] में स्त्री और प्रेम के रूपायन पर लिखा गया पूरा का पूरा अध्याय महादेवी के यहाँ व्यक्त स्त्री और प्रेम के स्वरूप की चर्चा से रहित है। पूरे अध्याय में युगीन परिस्थितयों का जिक्र है, स्त्री की पहले से भिन्न स्थिति का जिक्र है, प्रेम के चित्रण के संदर्भ में प्रसाद, निराला और पंत का जिक्र है, लेकिन महादेवी कहीं नहीं हैं! यह चौंकानेवाली बात नहीं लगती कि जिस महादेवी ने प्रेम के संबंध को ही अपनी कविता का आधार बनाया हो, उसके विभिन्न भावों के चित्रण के सहारे स्त्री मन की कथा कही हो, स्त्री की तत्कालीन सामाजिक अवस्था का इतना प्रतीकात्मक और शानदार काव्य-चित्र खींचा हो और यदि किसी को संदेह हो तो स्पष्टता के लिए सन् 1931 से लेकर 1937 तक विभिन्न समय में ‘चांद’ के संपादकीय के रूप में लेख लिखा हो जो बाद में 1942 में ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ नाम से प्रकाशित हुए हों ; वह आलोचक की निगाह से स्त्री की अवस्था और प्रेम पर लिखते हुए ओझल रहती है! यह स्पष्टता से कहे  जाने की जरूरत है कि महादेवी के स्त्री-संबंधी लेखों का समय छायावाद का काल ही है, उससे बाहर नहीं। नामवर जी छायावाद के अंदर आए बदलाव को, स्त्री की स्थिति में परिवर्तन को भिन्न दृष्टि से देख रहे हैं और यह भी कि सिर्फ परिवर्तन को ही देख रहे हैं! जबकि महादेवी परिवर्तन और स्त्री की सामाजिक स्थिति की पड़ताल अपने लेखों में करती हैं और उसीके काव्यात्मक भाव और स्वरूप का चित्रण अपनी कविता में कर रही हैं। उनकी कविता में चित्रित प्रेम और स्त्री चरित्र के प्रसंग में आए बहुत से ‘क्यों’ का जवाब उनके लेखों में मिल जाएगा। जबकि नामवरजी पुंसवादी दृष्टि से स्त्री की सामाजिक हैसियत और काव्यात्मक चित्रण को देख रहे हैं। नामवरजी छायावाद में स्त्री की बदली हुई, पहले से ज्यादा मुक्त स्थिति को देख रहे हैं पर स्त्री को क्या उतना ही चाहिए था कि द्वेदी युगीन दयाभाव से आगे थोड़ी सी मेल-जोल की स्वतंत्रता मिल जाए? क्या इतने भर से किसी को उस समाज में स्त्री की दशा पर संतोष हो सकता था? छायावाद में स्त्री-पुरुष का स्वच्छंद मेल और चित्रित प्रेम के निजी और अनुभूतिपरक होने का कारण तो इस तर्क से ढूँढ़ा जा सकता है लेकिन इसके बाद क्या? क्या स्त्री बस इतने पर निःशेष हो जाती है? उसके आंतरिक और बाह्य द्वंन्द्व क्या है? सामाजिक असमान स्थितियों में क्या वह अपनी इतनी भर भूमिका से संतुष्ट है? प्रसाद, पंत, निराला की कविताओं में इन बातों का जवाब नहीं मिलेगा। इनका जवाब केवल महादेवी की कविता में है। महादेवी बहुत साफ कहती हैं, “समाज में व्यक्ति का सहयोग और विकास की दिशा में उसका उपयोग ही उसके अधिकार निश्चित करता रहता है और इस प्रकार, हमारे अधिकार, हमारी शक्ति और विवेक के सापेक्ष रहेंगे”।[xv]

स्त्री की शक्ति को जागृत करके परिस्थितियों में साम्य लाने वाली सफलता संभव करना महादेवी का काम्य है जबकि जागृत स्त्री की कामना छायावाद के कवियों में नदारद है। हमारा आलोचक तो जागृत स्त्री की वाणी को रहस्यवाद की उलझी-अटपटी वाणी ही बना डालना चाहता है। महादेवी की कविता की सीमा बताते हुए पूरे डेढ़ पन्ने खर्च कर, उन्हें और उनकी कविता दोनों को बहुत सीमित करके नामवर जी ने देखा है। काव्य की सीमा बतलाते हुए भी वह नारी को न्यून (कमतर) अर्थ में ही घटित करके देखते हैं। अपने महादेवी संबंधी अद्यतन वक्तव्य में जहाँ वे महादेवी को स्त्री के रूप में निःशेष कर देने से आगाह करते हैं, वहाँ भी और इस उद्धरण में भी, स्त्री का अर्थ न्यून और नकारात्मक ही है, “ महादेवी की प्रतिक्रिया एक नारी की तरह घर की सीमा में ही हुई। परंतु उनकी भी आरंभिक रचनाओं में जो भावुक असंतोष और तीव्र पीड़ा मिलती है, वह अंत तक जाते-जाते बौद्धिक परितोष में शमित होने लगी।”[xvi]

छायावाद पुस्तक का जो अध्याय-विभाजन है, वह अद्भुत रूप से बहिष्कारमूलक है! पहले अध्याय से लेकर ग्यारहवें अध्याय के पहले  तक कहीं भी महादेवी के लेखन पर एकाग्रता से न्यूनतम ही लिखा गया है। छायावादी निजता की बात हो, प्रकृति की बात हो, प्रेम और स्त्री की बात हो, जागरण की बात हो, कल्पना की बात हो- महादेवी की काव्य-विशेषता का जिक्र नहीं किया गया है। निजता, प्रकृति, प्रेम, स्त्री की सामाजिक स्थिति आदि स्वयं स्त्री के लिए क्या अर्थ रखते हैं, इस पर ध्यान नहीं दिया गया है। महादेवी का जिक्र पूरी पुस्तक में जहाँ आया है, वे तीन महत्वपूर्ण स्थल हैं। रहस्यवाद के संदर्भ में महादेवी का जिक्र रामचंद्र शुक्ल पहले ही कर गए थे, नामवर जी ने भी किया है और महादेवी के रहस्यमय असीम को आत्म-विस्तार की इच्छा से जोड़ा है।[xvii] दूसरा स्थल है रूप-विन्यास के संदर्भ में महादेवी की कविता में चित्रमयता की चर्चा का।[xviii] तीसरा, जहाँ सबसे ज्यादा विस्तार से महादेवी की कविता का विश्लेषण किया गया है, वह स्थल है छायावादी कविता की सीमा और उसका पराभव बताने वाला। दिलचस्प यह है कि नामवर जी की इस विवेचना में महादेवी के लिए कहे गए उनके दो-चार सकारात्मक वाक्य भी नकारात्मक अर्थ ले लेते हैं। मसलन, वे कहते हैं कि महादेवी की कविता में आया असीम आत्म-विस्तार का द्योतक है। अन्यत्र कहते हैं कि महादेवी की कविता घर की सीमा में ही बंद है। “जो दीप पत्थर की कठोर दीवारों से बने हुए मंदिर में घिरा हो, उसका जीवन सांसों की समाधि न हो जाए तो क्या हो?”[xix]

आश्चर्य यह है कि नामवर सिंह की कौन सी सीमा है जिसके कारण आज तक वे महादेवी की कविता के सशक्त पक्षों को देखकर भी नहीं देख पा रहे हैं? महादेवी की कविता में यथार्थ का आग्रह है। यहाँ तक कि रहस्यवाद भी; असीम-अनंत का जिक्र भी; यथार्थ है। नामवर जी ने स्वयं इस चीज को लक्षित किया है और कहा है कि “महादेवी के अंतिम गीत भी यथार्थ का गहरा पुट लिए हुए हैं। प्रसाद और पंत की तरह उनमें आदर्श अथवा सुखद लोक में पलायन करने की भावना नहीं है। भारतीय नारी आखिर भागकर जा ही कहाँ सकती है?”[xx] यह वाक्य और यह दृष्टि, कितनी सहज लग रही है! कविता घर की चारदिवारी में लिखी, क्योंकि भारतीय नारी थीं! रहस्य के आवरण में यथार्थ का चित्रण किया क्योंकि उपाय न था, भारतीय नारी थीं! और जीवन में दुख, वेदना, अवसाद के बाद भी पलायन नहीं कर सकीं, क्योंकि भागकर जाती कहाँ, भारतीय नारी थीं! यह अद्भुत आलोचना है एक ‘भारतीय मर्द’ आलोचक की!

 आप ज़रा ध्यान कीजिए, छायावाद के अंतर्विरोधों की और उसकी कमियों की तरफ। सहज रूप में जो तीन-चार बातें तत्काल ध्यान में आएंगी- छायावाद का अतीत-प्रेम जिसका अंत पुनरूत्थानवाद में होता है; छायावाद के अंदर रहस्यवाद की भावना और छायावाद का पलायनवादी स्वर। इन सारी कोटियों पर महादेवी की कविता को कसकर देखिए, अन्य कवियों को भी रखिए और फिर बताइए कि महादेवी कहाँ ठहरती हैं और बाकि के कवि कहाँ! विस्तार से व्याख्या में न जाते हुए, मोटे तौर पर देखिए तो महादेवी के यहाँ अतीत का आग्रह नहीं है। उनके रहस्य के आवरण में यथार्थ का सबसे परिचित चेहरा व्यक्त हुआ है। महादेवी के यहाँ दुख है, वेदना है, पीड़ा का संसार है, अवसाद है लेकिन अक्षत संकल्प भी है। संकल्प और जीजिविषा की ऐसी गहरी टेक किसी अन्य छायावादी कवि में नहीं है। इन सारी चीजों को पहचानकर भी इन पर बात न करना; अन्य कवियों के यहाँ जो चीज ग़ायब है, उस पर पर्दा डालना, ओझल करना और फिर परंपरा में स्थान तय करना अपने आप में विडंबनापूर्ण है।

[i] सिंह, नामवर, महादेवीः प्रगतिशील और क्रांतिकारी, शाही, सदानंद (सं), साखी, महादेवी वर्मा अंक, वाराणसी, अंक 24, मार्च 2014, पृ 17

[ii] वही, पृ. 17 और 21

[iii] वही, पृ. 17

[iv] वही, पृ.17

[v] महादेवीः प्रतिनिधि गद्य-रचनाएँ, गीति-काव्य शीर्षक निबंध, पांडेय, रामजी पांडेय (संकलन-संपादन), भारतीय ज्ञानपीठ, सातवाँ संस्करण,2008, पृ. 138

[vi] सिंह, नामवर, 24 मार्च, 2014, पृ. 19

[vii]  सिंह, नामवर, 24 मार्च, 2014, पृ. 19-20

[viii] वह आदिम नारी जिसने अपने समर्पण, आत्मनिवेदन और आकर्षण में बाँधकर पुरुष को पराभूत कर डाला था। देखिए, महादेवी, युद्ध और नारी शीर्षक निबंध,2008, पृ.236

[ix] महादेवी, आधुनिक नारी, 2008, पृ. 247

[x] उपरोक्त, पृ.248

[xi] आधुनिक नारी, महादेवी, 2008, पृ. 249

[xii] सिंह नामवर, 24 मार्च 2014, प. 21

[xiii] उपरोक्त, पृ.25

[xiv] सिंह, नामवर, देवि माँ सहचरि प्राण, छायावाद(1955), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1990

[xv]  महादेवी, श्रृंखला की कड़ियाँ (1942), भूमिका, लोकभारती पेपरबैक्स, 2012

[xvi] सिंह, नामवर, जिसके आगे राह नहीं, छायावाद, 1990, पृ 146

[xvii] देखिए, सिंह, नामवर, एक कर दे पृथ्वी-आकाश, छायावाद, 1990, पृ 30

[xviii] वही, पृ.101

[xix] वही, पृ. 146

[xx] वही, पृ.147
(यह आलेख ज्ञानरंजन जी के संपादकत्व में निकलने वाली पत्रिका ‘पहल’-99 में छपा है।)

कैफी आज़मी इप्टा सांस्कृतिक केंद्र ,पटना का उदघाटन किया शबाना आज़मी ने

निवेदिता 


एक लंबे समय के बाद आखिरकार कलाकरों के पास एक ऐसी जगह हुई जहां वे अपनी कला का विस्तार कर सकते हैं।’ कैफी आज़मी इप्टा सांस्कृतिक केन्द्र’ का बनना संस्कृति के सामुहिक चेतना का विस्तार है। आज के काले दौर में इसकी जरुरत इसलिए भी है कि कलाकार सृजन कर सके। कैफी आजमी को इस बात का गिला हमेशा रहता था कि इप्टा के पास अपनी कोई जगह नहीं है। यह त्रासदी है कि आजादी के पहले जिस सांस्कृतिक संगठन ने जन्म लिया  और देश में सांस्कृतिक आंदोलन को दिशा दी आज उस संगठन के पास अपनी कोई जगह नहीं थी.  पटना का यह  ‘कैफी आज़मी’ सांस्कृतिक केन्द्र वाहिद जगह है जो इप्टा की है,  जो  संघर्ष,गुलामी  और उससे मुक्ति का सर्जक ही नहीं बल्कि वह उस संस्कृति का वाहक है , जहां वे यह कहते हैं ‘इप्टा की असली नायक जनता है’।

मशहूर अभीनेत्री शबाना आज़मी का यहां आना इप्टा के सांस्कृतिक केन्द्र का उद्घाटन करना भी मायने रखता है। शबाना आज़मी कहती हैं, ‘  ऐसी जगह की अहमियत इसलिए भी है हम सामाजिक बदलाव के लिए इसका इस्तेमाल कर सकें।  हम दुनिया कोे अपनी तारीख के बारे में बता सकें। हम बताएं की हमारी जड़ें कहां है! हम प्रकृति हैं, अतीत हैं,हम परंपरा हैं।’  यह मौका था जब एक अभिनेत्री के साथ लोग रु-बरु थे। जहां बाॅलीवुडके स्टारडम से अलग शबाना  यह बता रही थीं की ‘ कोई भी कला एकांत में नहीं पनपती। एक महान कला को लोगों से जुड़ना ही होगा। अगर मैं किसी लक्ष्मी का किरदार कर रही हूं तो मुझे जानना होगा कि लक्ष्मी किस तरह जीती है? इप्टा ने यही सिखाया। कला जीवन के लिए। मैं छुटपन से ही इप्टा से जुड़ी थी। सिनेमा में आने के बाद भी मैंने रंगमंच को जीवन से अलग नहीं किया। इप्टा में शामिल होने के लिए काफी मेहनत की। उन दिनों एम. एस सथ्यू इप्टा में थे। हम उनके साथ नाटक में जुड़ना चाहते थे। जब हमने कहा कि मुझे इप्टा में शामिल कर लें तो उन्होंने कहा तुम फिल्म करती हो। क्या भरोसा कि तुम्हें किसी नाटक में लें और किसी फिल्म का आॅफर मिले तो तुम भाग जाओ। उन्होंने कहा अगर तुम लगातार 15 दिनों तक सुबह 6 बजे आओ तो हम विचार कर सकते हैं। मैं लगातार 15 दिनों तक 6 बजे सुबह इप्टा आॅफिस जाती रही , फिर मुझे मौका मिला इप्टा सदस्य बनने का।’

 शबाना  ने बताया कि  इप्टा उनकी जिन्दगी में क्या मायने रखता है। उन्होंने कहा , ” इप्टा सिर्फ रंगमंच नहीं है विचार है। ऐसा विचार जो कला के माघ्यम से दुनिया को बदलना चाहती है। इसलिए यह जरुरी है कि दुनिया की महान कलाओं के साथ खड़े रहने के लिए हम जानें दुनिया में क्या कुछ बदल रहा है। मैंने अब्बा से एक बात जाना -वे कहा करते थे तुम जो काम कर रही हो उसपर यकीन होना चाहिए। यह जरुरी नहीं है कि तुम्हारे जीवन में ही बदलाव दिखे। पर यह यकीन करना की जो काम कर रही हो उससे दुनिया के हालात जरुर बदलेंगे। शायद यही वजह थी कि अब्बा अपने अंतिम दिनों में अपने गांव चले गए। जबकि फालिज के असर के कारण वे चल नहीं पाते थे। ” शबाना कैफी को याद कर रही थीं और अतीत जैसे हमसब के सामने साबूत खड़ा था। जैसे कैफी कह रहे हों, ‘ उठ मेरी जान !

सच तो यह है जब अछूत,शोषणग्रस्त जाति कला रचती है, तो उसमें सच्ची आग,क्रांति और तड़प होती है,इसकी जिंदा मिसाल इप्टा का वह दौर है , जब कला अपने चरम पर थी।  इप्टा  संभ्रांतों के संवेदना से अलग अपनी करुणा, विद्रोह और विचार से कला को आंदोलित कर रहा था। आज फिर से कला को उस उंचाई पर ले जाने की जरुरत है । कला एक निरंतर खोज है। खोज के खतरे हैं,पर इन खतरों के साथ ही कला आगे बढ़ती है।