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अरुणा शानबाग सिर्फ बलात्कार पीडिता ही नहीं थी




अरुणा शानबाग सिर्फ बलात्कार पीडिता ही नहीं थी . पिछले 42  सालों में वह समाज के सामने एक सवाल थी, एक आईना थी. बलात्कार और औरत होने की पीड़ा में जीती मुम्बई की वह नर्स आज भी चीख -चीख कर पूछ रही है कि मेरे बाद भी क्यों नहीं थमा सिलसिला  ! उस पर बलात्कार , अप्राकृतिक यौन हमला और कुत्ते की चेन से उसकी ह्त्या के प्रयास के बाद वह कोमा में चली गई थी. 42 सालों तक कोमा में रहने के बाद वह आज सुबह हमें , हमारी जलील दुनिया, जहां औरत औरत होने की सजा पाती है , को अलविदा कहकर चली गई. 
त्रासदी यह कि उसपर बलात्कार करने वाले को मात्र 7 साल की सजा मिली . सवाल यहाँ भी हमारी मानसिकता का है – उसपर हुई इस क्रूर यौन हिंसा के बाद उसकी तथाकथित बदनामी के भय से आरोपी के खिलाफ ह्त्या की कोशिश और डकैती का मामला दर्ज किया / करवाया गया , बलात्कार और अप्राकृतिक यौन हमला का मामला दर्ज नहीं हुआ .  यौन हिंसा की शिकार स्त्री पर यह आरोपित बदनामी आज भी उसकी 42 सालों की यातना के  बाद यथावत है . हम एक ऐसी क्रूर व्यवस्था हैं कि हमारे न्यायालय ने उसे ‘ मर्सी किलिंग’ की अनुमति भी नहीं दी. 

अरुणा की त्रासदी की कहानी प्रभात खबर से साभार : 
अंतत: अरुणा शानबाग की आज मौत हो गयी. पिछले 42 वर्षों से कोमा में रहने के बाद अरुणा को अंतत: मौत नसीब हुई. अरुणा का निधन आज सुबह लगभग 10 बजे केईएम अस्पताल में हुआ. वह 67 वर्ष की थीं. वह पिछले 42 वर्षों से इसी अस्पताल में जिंदगी से जूझ रहीं थीं. पिछले दिनों उन्हें निमोनिया हो गया था और फेफड़े में भी संक्रमण था. किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) अस्पताल के सूत्रों ने बताया कि 66 वर्षीय अरुणा को निमोनिया का संक्रमण हो गया था और वह जीवनरक्षक प्रणाली पर थीं.

वह मुंबई के परेल इलाके में स्थित इस अस्पताल के आईसीयू में थीं. पिछले चार दशक से अरुणा अस्पताल के वार्ड नंबर चार से लगे एक छोटे से कक्ष में थी. मंगलवार को अरुणा की देखरेख कर रही नर्सों ने देखा कि उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। तब उन्होंने उसे कक्ष से बाहर निकाला और आईसीयू ले गयीं जहां उसे एंटीबायोटिक दवाएं दी गयीं.

के ईएम अस्पताल के डीन डॉ अविनाश सुपे ने बताया कि हाल ही में उसे निमोनिया होने का पता चला था और उसे जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया था. जांच में पता चला कि अरुणा को फेफड़ों में संक्रमण था। उसे नलियों की मदद से भोजन दिया जाता था.  अरुणा केईएम अस्पताल में जूनियर नर्स के तौर पर काम करती थी। 27 नवंबर 1973 को वार्ड ब्वॉय सोहनलाल भरथा वाल्मीकि ने अरुणा पर यौन हमला किया और कुत्ते के गले में बांधने वाली चेन से अरुणा का गला घोंटने की कोशिश की जिससे अरुणा के मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो गई. हमले के बाद से अरुणा निष्क्रिय अवस्था में आ गई.

जब इस हालत में पडे पडे अरुणा को 38 साल हो गए तब 24 जनवरी 2011 को उच्चतम न्यायालय ने अरुणा की मित्र पत्रकार पिंकी विरानी की एक अपील पर अरुणा की जांच के लिए एक स्वास्थ्य दल गठित किया. पिंकी ने अरुणा के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की थी. अदालत ने सात मार्च 2011 को इच्छा मृत्यु संबंधी याचिका खारिज कर दी. पिंकी ने उत्तर प्रदेश के हल्दीपुर की रहने वाली अरुणा की कहानी वर्ष 1998 में अपनी नॉन फिक्शन किताब अरुणा स्टोरी में बताई. अरुणा पर दत्तकुमार देसाई ने 1994….95 में मराठी नाटक कथा अरुणाची लिखा जिसका वर्ष 2002 में विनय आप्टे के निर्देशन में मंचन किया गया.

इस बीच, स्थानीय निकाय अधिकारियों ने अरुणा के रिश्तेदारों से अस्पताल के कर्मचारियों से संपर्क करने को कहा है. अरुणा की आखिरी ज्ञात संबंधी एक बहन थी जिसका कुछ साल पहले निधन हो चुका है.

कौन थीं अरुणा शानबाग
अरुणा शानबाग केईएम अस्पताल मुंबई में काम करने वाली एक नर्स थीं. जिनके साथ 27 नवंबर 1973 में अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय ने बलात्कार किया था. उस वार्ड ब्वॉय ने यौन शोषण के दौरान अरुणा के गले में एक जंजीर बांध दी थी. उसी जंजीर के दबाव से अरुणा उस घटना के बाद कोमा में चली गयीं और फिर कभी सामान्य नहीं हो सकीं. उस घटना के बाद पिछले 42 वर्षों से अरुणा शानबाग कोमा में थीं. अरुणा की स्थिति को देखते हुए उनके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करते हुए एक याचिका भी दायर की गयी थी, लेकिन कोर्ट ने इच्छामृत्यु की मांग को ठुकरा दिया था. अरुणा की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले दरिंदे का नाम सोहनलाल था. जिसे कोर्ट ने सजा तो दी, लेकिन वह अरुणा के साथ किये गये अपराध के मुकाबले काफी कम था.

अरुणा के साथ हुए अन्याय की नहीं की गयी थी सही शिकायत

अरुणा के साथ जब सोहनलाल ने दरिंदगी की, उसके पहले अरुणा शादी का निश्चय कर चुकी थी और जल्दी ही उसकी शादी होने वाली थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. सोहनलाल अरुणा की जिंदगी में काल बनकर आया और सबकुछ तहस-नहस कर गया, लेकिन अरुणा के साथ हुए यौन शोषण के मामले को कुछ और ही रूप दिया गया था. अस्पताल के डीन डॉक्टर देशपांडे ने डकैती और लूटपाट का केस दर्ज कराया, अरुणा की बदनामी ना हो, इसलिए यौन शोषण के केस को दबाया गया, जिसके कारण सोहनलाल को सिर्फ सात साल की सजा हुई और उसके बाद वह आजाद हो गया, जबकि अरुणा 42 वर्षों तक उसके कुकर्म की सजा भोगती रही.

स्त्री आत्मकथा – अस्मिता संघर्ष तथा आत्मनिर्भर स्त्री

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

संदर्भ-प्रभा खेतान और मैत्रेयी पुष्पा 


हिंदी जगत में प्रभा खेतान एक ऐसा नाम है जो अपनी पहचान कई स्तर पर दर्ज कर चुका है। स्त्री सशक्तिकरण तथा स्त्री अस्मिता की लड़ाई लड़ने वाली लेखिका के रुप में हिंदी जगत उन्हें जानता है साथ ही एक सफल उद्योगपति महिला के रुप में उन्होंने देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज की। डा0 प्रभा खेतान ने समकालीन कथा-साहित्य में यदि अपनी पहचान कथा-लेखन तथा स्त्री विमर्श के क्षेत्र में बनाई तो दूसरी तरफ सीमोन द बोउवार की प्रसिद्ध पुस्तक ‘द सेकेण्ड सेक्स’ के अनुवाद के साथ सात्र्र और कामू के जीवन दर्शन पर चिंतन से। प्रभा खेतान का अधिकांश लेखन आत्मकथात्मक है, मारवाड़ी समाज की दकियानूसी पारंपरिक संकीर्णता के बीच उनका नारी मन जिस तरह विद्रोह करता है, अपनी अस्मिता और आजादी की लड़ाई लड़ता है हिंदी जगत में विलक्षण है।

इनकी आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ सन् 2007 में प्रकाशित हुई। हंस में धारावाहिक रुप में प्रकाशित इस आत्मकथा को जहां एक तरफ अकुंठ प्रशंसाएँ मिली वहीं दूसरी तरफ अपने साहस या यूँ कहे अपने दुस्साहस के कारण पितृसत्तात्मक मारवाड़ी समाज की घोर निंदा भी सहनी पड़ी। पूरी आत्मकथा के दौरान हमने देखा कि इस महिला में एक जिद्द थी, जो साधारणतः बहुत कम देखने को मिलती है, जिसके कारण ये न सिर्फ मारवाड़ी पुरुषों की दुनिया में कदम रखती हैं बल्कि कलकत्ता चेम्बर आॅफ कामर्स की अध्यक्ष भी बनती हैं। इस आत्मकथा में एक सफल उद्योगपति बनने की कथा-यात्रा में एक ऐसी बोल्ड स्त्री सामने आती है, जो न केवल परिवार बल्कि पूरे समाज को चुनौती देते हुए अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ती है। लेखिका कहती हैं ‘‘मैं अपनी पहचान चाहती थी, एक ऐसा जीवन जो स्थानीयता के साथ वैश्विक हो। जीवन, रोमांस, सेक्स, सम्बन्ध सबके अलग-अलग कोड होते हैं। इन चिन्हों के अर्थ अलग होते हैं। बंगाली और पंजाबी समाज से हमारा मारवाड़ी समाज भिन्न था। प्रगतिशीलता के सन्दर्भ में मैं किसी समाज को कम ज्यादा कहकर नहीं तौलना चाहती। लेकिन यही सोचती हूँ कि आखिर कौन इन्हें निर्मित करता है? व्यक्ति ही ना। इनमें से बहुतेरे कोड हैं,  जिन्हें तर्क के सरौते से मैं काटना चाहती हूँ। बादाम की गिरी जैसी इनकी भी कोई अलग गिरी होगी और कैसा होगा उसका स्वाद? किन्तु यह भी जानती हूँ कि इसे इतनी आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता। बड़ा सख्त है इनका छिलका।’’1  इन पंक्तियों के माध्यम से लेखिका यह बताना चाहती हैं कि इस तरह की जिंदगी की शुरुआत करना आसान नहीं था क्योंकि दिन भर की मेहनत, संघर्श जोखिम और जिम्मेदारी का रास्ता बिल्कुल अलग और नया था बावजूद इसके प्रभा खेतान इस संघर्ष को स्वीकार करती हैं और फिर शुरु होता है एक और सफर। पहले एक लेखिका के रुप में और फिर एक स्वतंत्र उद्यमी के रुप में। दोनों ही स्तर पर वे सफल रहीं। बतौर लेखिका वे हिंदी की चर्चित उपन्यासकार और कई वैचारिक पुस्तकों की लेखिका रहीं और बतौर उद्यमी उन्होंने निर्यात के व्यवसाय में अपनी जगह बनाई। इसलिए यह आत्मकथा एक स्तर पर प्रेम की अवसादमय गाथा है और साथ-साथ एक औरत के व्यक्तित्व के रुपांतरण और संघर्ष की कहानी भी।

आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रभा खेतान के जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। निर्यात व्यापार की आर्थिक सलता ने उनके व्यक्तित्व को ऊँचाई प्रदान की। डाॅ0 सर्राफ के परिवार में वे ‘अन्या’ थीं, वे कहती भी हैं ‘‘मैं वह अन्य थी जिसे निरन्तर निर्मित किया जा रहा था। क्योंकि महज मेरा होना पत्नीत्व नामक संस्था को चुनौती दे रहा था। सहमति की खोज में मैं बुरी तरह थकने लगी थी। मैं बस पति-पत्नी के बीच ‘एक वह’ थी। एक बाहरी तत्व, अनचाही स्वीकृति।’’2 लेकिन सुदृढ़ आर्थिक आधार ने धीरे-धीरे उन्हें अनन्या बना दिया जो मारवाड़ी समाज उन्हें मंचासीन नहीं देखना चाहता था और कहता था ‘‘इस औरत को हम मंच पर कैसे बैठाएँ? माना कि पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर स्त्री है पर ऐसी स्त्री समाज की नाक नहीं हो सकती।’’3  उसीने उन्हें कलकत्ता चेम्बर आॅफ कामर्स की प्रथम महिला अध्यक्षा का पद प्रदान किया।

स्त्री मुक्ति की पहली शर्त आर्थिक आजादी है। प्रभा खेतान ने अपने निजी जीवन में इस सच को शिद्दत से महसूस किया। आर्थिक आजादी को महत्व देते हुए उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा भी है ‘‘औरत समाज में दोयम स्तर पर है, मैं खुद एक दोयम दर्जे की जिंदगी जी रही थी, जिससे निकलने को छटपटा भी रही थी और सीमोन के इस कथन को आत्मसात कर लिया-फ्रीडम स्टार्टस फ्राॅम पर्स ,  मुक्ति की पहली शर्त है कि स्त्री आर्थिक रुप से स्वावलंबी हो। यदि इस एक शर्त को कोई औरत पूरा कर ले तो वह अपनी जिंदगी की आधी से अधिक लड़ाई जीत लेगी।’’4 प्रभा खेतान मानती हैं कि विवाह, पति, बच्चे आदि से परे भी औरत का अस्तित्व है औरत की जिन्दगी सिर्फ पुरुष की तलाश नहीं उसकी अपनी सार्थकता भी है। इसीलिए पितृसत्तात्मक समाज द्वारा स्त्रियों की तय नियति को वे स्वीकार नहीं करती। क्योंकि इस समाज ने सारे अधिकार पुरुषों को दिए हैं वे कहती भी हैं ‘‘पितृसतात्मक परंपरा ने निश्चित कर रखा है कि अधिक से अधिक शिक्षा पुरुष को मिलनी चाहिए, क्योंकि उसे कमाना है। उसे पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए क्यांेकि उसके श्रम की कीमत है। पुरुष को इसलिए राजनीतिक चुनाव का अधिकार दिया गया है क्योंकि भेद-भाव करने और दूसरों का शोषण करने के मामले में वह ज्यादा ताकतवर साबित होता है साथ ही वह से भिन्न को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखता है। यहाँ तक कि विरोध और विद्रोह की उपेक्षा भी पुरुष से अधिक की जाती है।’’5  अतः हम कह सकते हैं कि पहचान का आत्मसंघर्ष हर नारीवादी लेखिका में दिखता है लेकिन स्त्री नियति तथा पितृसत्ता के दुष्प्रभाव  पर इतनी बारीकी दृष्टि प्रभा खेतान के पास ही है,  इनकी आत्मकथा हो या वैचारिक पुस्तकें, अपने-अपने स्तर स्त्री नियति तथा आत्मसंघर्ष का नया पाठ पढ़ाते हैं।

निस्संदेह  ‘अन्या से अनन्या’ डा0 सर्राफ के जिंदगी में अनन्या न बन पाई प्रभा जी की पीड़ा को व्यक्त करता है साथ ही इस विवाहेतर संबंध को स्वीकार करने का साहस तथा पितृसत्तात्मक समाज की चुनौतियों को स्वीकारते हुए अपनी पहचान दर्ज करने वाली महिला का अदम्य तथा असाधारण रुप भी व्यक्त करता है। प्रभा जी कहती हैं ‘‘हम औरतें प्रेम के जितनी गंभीरता से लेती हैं उतनी ही गंभीरता से यदि अपना काम लेती तो अच्छा रहता जितने आंसू डाक्टर साहब के लिए गिरते हैं उससे बहुत कम पसीनों भी यदि बहा सकूं तो पूरी दुनिया जीत लूंगी।’’6 अतः प्रभा खेतान यह जानती थी कि प्रेम उनके जीवन का अहम हिस्सा है डा0 सर्राफ से अलग जीवन की कल्पना भी वे नहीं कर सकती,  लेकिन सम्मान प्राप्त करने के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना जरुरी है तथा एक सफल उद्योगपति बनने में अपनी सारी उर्जा झोंक देती हैं वे कहती हैं ‘‘कुछ लोगों की नजर में यह एक छोटी विजय है, मेरी दृष्टि में यह आजादी की लड़ाई से कम नहीं। नियति उद्योग कितनी शहादत और कितनी कुर्बानियाँ माँगता है इसे हर निर्यातक जानता है। चार डाॅलर बचाने के लिए भूखे पेट बक्सा उठाए न जाने कहाँ-कहाँ फिरती रहती हूँ।’’7  उद्योग जगत में अपनी पहचान बनाने के लिए लेखिका को बहुत संघर्ष का सामना करना पड़ा। पितृसत्तात्मक समाज एक औरत को आगे बढ़ते नहीं देखना चाहता लेकिन प्रभा खेतान की जिद्द ऐसी थी जिसके कारण वे न सिर्फ मारवाड़ी पुरुषों की दुनिया में घुसपैठ करती हैं बल्कि अपनी अस्मिता की नींव भी रखती हैं वे कहती हैं ‘‘औरतपने का हीनभाव पुरुषों की दुनिया में बार-बार अपना औचित्य स्थापित करना चाहता रहा है। क्या मैं औरत हूँ इसलिए यह काम नहीं करुँगी? करके दिखा दूंगी। दिखाया भी पर देखा भी कम नहीं।’’8 अतः औरतपने की हीन भावना से निकलना तथा अपने को स्थापित करने का जज्बा ही प्रभा खेतान को प्रसिद्धि और सफलता प्रदान करता है। सात्र्र तथा सीमोन के जीवन से प्रभावित प्रभा खेतान पूरी भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करती हुई तथा पितृसत्तात्मक चुनौतियों को स्वीकारते हुए अपने जीवन को नई दृष्टि प्रदान करती हैं।

अर्थ जीवन की बुनियादी जरुरत है जिसकी ओर महादेवी वर्मा ने भी इशारा किया है ‘‘अर्थ सामाजिक प्राणी के जीवन में कितना महत्व रखता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं। इसकी उच्श्रृंखला बहुलता में कितने दोष हैं वे अस्वीकार नहीं किए जा सकते, परंतु इसके नितांत अभाव में जो अभिशाप है वे भी उपेक्षणीय नहीं। विवश आर्थिक पराधीनता अज्ञात रुप से व्यक्ति के मानसिक तथा अन्य विकास पर ऐसा प्रभाव डालती रहती है, जो सूक्ष्म होने पर भी व्यापक तथा परिणामतः आत्मविश्वास के लिए विष के समान है। दीर्घकाल का दासत्व जैसे जीवन की स्फूर्तिमती स्वच्छन्दता नष्ट करके उसे बोझिल बना देता है, निरंतर आर्थिक परवशता भी जीवन में उसी प्रकार प्रेरणा शून्यता उत्पन्न कर देती है। किसी भी सामाजिक प्राणी के लिए ऐसी स्थिति अभिशाप है,  जिसमें वह स्वावलंबन का भाव भूलने लगे,  क्योंकि इसके अभाव में वह अपने सामाजिक व्यक्तित्व की रक्षा नहीं कर सकता।’’9 मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा के दोनों खंड महादेवी वर्मा की इन बातों को पूरी तरह चरितार्थ करते हैं। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ में कस्तूरी स्त्रियों पर थोपी नियति को अस्वीकार कर अपनी नियति खुद गढ़ती है।

‘‘माँ का मानना है कि संसार में औरत के मुकाबले कोई सख्तजान नहीं। बेटों को रोग-धोग व्यापे, इसे कभी छींक तक न आई। अरे… गाय मरे अभागे की, बेटी मरे सुभागे की। मगर बेटी मरे तो सही।’’10 अतः कस्तूरी एक ऐसे समाज में जन्मी थी जहाँ बेटी को अभिशाप माना जाता है लेकिन कस्तूरी इस समाज की मान्यता को तोड़ना चाहती है कलम, खडि़या, तख्ती और पोथी की फिराक में वह दिन-भर घूमा करती है, जिसके कारण माँ और भाई के कोप का भाजन उसे बनना पड़ता है। इस तरह के समाज में लड़कियों का पढ़ना-लिखना मान्य नहीं है इसलिए मैत्रेयी कहती हैं ‘‘पढाई के कलम-खडि़या जैसे साधन प्राप्त करना कस्तूरी जैसी लड़की के न भाग्य में है, न बस में।’’11 अतः हम कह सकते हैं कि कस्तूरी जिस ग्राम-समाज में है वहां बिकने वाली चीजों में गाय, बैल, भैंस, अनाज और लड़कियाँ हैं। लगान के रुपये जूटाने के लिए भाई बहन को बेचता है। रुग्ण बेटे को ब्याहने के बदले में माँ अपनी बेटी को बूढ़े से ब्याहने का सौदा करती है। आठ सौ चाँदी के सिक्कों में बिककर पति के घरवालों द्वारा ‘खरीदी हुई घोड़ी’ का दर्जा दिए जाने के बाद स्वयं कस्तूरी को असमय वैधव्य की यातना से गुजरना पड़ता है। विवाह संस्था के इस दंश को झेलती कस्तूरी पारंपरिक विधवा की भूमिका का परित्याग कर नौकरीपेशा स्वावलंबी स्त्री की भूमिका में उपस्थित होती हैं। वह गांव की विधवा की परंपरागत छवि को तोड़कर अपनी नई पहचान बनाने का निश्चय करती है। परदे को त्यागकर वह अपने ससुर को आश्वस्त करते हुए कहती है ‘‘मेरा भरोसा करो दादाजी। मैं अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर बड़ा करुँगी कि मेरे तुम्हारे बाद वह अपने दुश्मनों का मुकाबला करें।’’12 अतः गांव का विरोध कर वह मैत्रेयी को शिक्षा प्रदान कराने के लिए तत्पर हो जाती है और खुद भी अपने अस्तित्व के राह पर निकल पड़ती है इसलिए उसे समाज के ताने सुनने पड़ते हैं ‘‘यह रांड क्या सांड हो गई। न छोरी पर ममता, न बूढ़े ससुर का रहम। ‘पढ़ाई-लिखाई’ का भजन करती हुई दोनों को रौंद रही है। अरे तू डाॅव-डाॅव डोलेगी तो बच्चा की ऐसी ही गत बनेगी। बनी है महात्मा गाँधी की चेली।’’13 अतः गांव की वे स्त्रियाँ, जो अपने जीवन में कुछ नहीं कर पाई वे ही कस्तूरी पर इस तरह का व्यंग्य करती है। कस्तूरी पारंपरिक विधवा विवाह की भूमिका का परित्याग कर नौकरी पेशा स्वावलंबी स्त्री के रुप में उपस्थिति होती है। वह अपनी बेटी मैत्रेयी को भी इसी भूमिका में ढालना चाहती है। पुरुष वर्चस्व का विरोध कर वह अपनी नियति खुद गढ़ना चाहती है, अपने स्तर पर इस तरह के विद्रोह की शुरुआत भी करती है। अपने अस्तित्व तथा होने वाली बच्ची के भविश्य के लिए वह पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ खड़ी होती है तथा यह संकल्प लेती है ‘‘अब मेरी बेटी का मामला है मेरी कोख में जन्म लेने वाली मैत्रेयी का। मैं इसको उस खड्ड में नहीं गिरने दूंगी, जिसमें गिरकर औरत जीवन-भर निकलने को छटपटाती रहती है और एक दिन खत्म हो जाती है।’’14 अपनी कोख पर हाथ रखकर लिया गया यह निर्णय कस्तूरी को गहरी सोंच, उसके साहस और अस्तित्व का ही सूचक है। कस्तूरी अपनी अस्मिता के लिए पूरे पितृसत्तात्मक समाज का सामना करने को तैयार है। वह सिर्फ अपने विषय में नहीं सोचती बल्कि एक समाज सेविका बनकर पूरे गांव की औरतों का कल्याण करना चाहती है तथा पारंपरिक, रुढ़ और जर्जर सोंच से गांव की औरतों को मुक्त करना चाहती है।

‘गुडि़या भीतर गुडि़या’ मैत्रेयी की आत्मकथा का दूसरा खंड है,  जिसका रहस्य इस बात में है कि ऊपर से आम जिन्दगी जीने वाली औरत के मन में क्या बात थी जिसने उसे हिंदी जगत की सर्वोपरि लेखिका सिद्ध कर दिया। मैत्रेयी विवाह करना चाहती थी , आम औरत की तरह उसके मन ने भी चूड़ी, सिन्दूर, बिन्दी से सजे गृहणी के सपने देखे ये। पति को ही अपना सुहाग भाग मानने वाली मैत्रेयी एक वक्त के बाद अपनी अस्मिता के लिए इतनी सजग हो जाती है कि पति से तलाक लेना चाहती है . वह कहती है ‘‘मैं इस आदमी से अलग ही है? जाऊँ…। विवाह का गठबंधन चाहत का गला घोंट रहा है, छुड़ाने वाला यहाँ कोई नहीं,… मैं इस आदमी को छोड़ ही दूँ… मेरे भीतर हूक उठी।’’15 अतः कहने का तात्पर्य यह है कि पहले तो मैत्रेयी माँ के सपनों को रौंदती हुई वैवाहिक जीवन चुनकर खुद उनसे अलग हुई थी। उनकी तो बस यही आकांक्षा थी कि पुरुष साथी मिलने से मेरे रात दिन सुरक्षित हो जाएँगे। आखिर ऐसी क्या बात थी कि विवाह को ही अपनी मुक्ति मानने वाली मैत्रेयी इस संबंध से अलग हो जाना चाहती थी। वह उसका स्वाभिमान, स्त्री का स्वाभिमान जो हर पल पुरुष सत्ता के अधीन समर्पित होने से इनकार कर रहा था। पति द्वारा मैत्रेयी पर थोपी गई आधुनिकता के खिलाफ उनका स्त्री मन विद्रोह करता है.  डा0 सिद्धार्थ उन्हें दीक्षंत समारोह में नहीं ले जाते घर पर आए यू.पी.एस. के चेयरमैन से पत्नी को अभिवादन करने का भी अवसर नहीं दिया गया, रसोई में सिकुड़े रहने को कहा गया। हिंदी में एम.ए. उपाधि प्राप्त कर मैत्रेयी ने पी.एच.डी. करने की सोची। इस चक्कर में उन्होंने बहुत कुछ सहा तथा अपनी रचनात्मक विकसित करने में अपने को झोंक दिया। घर गृहस्थी के बंधे दायरे को तोड़कर अपनी रचनात्मकता (साहित्य लंखन) को विकसित करती हैं। मैत्रेयी ने साहस पूर्वक पुरुषद्वारा निर्धारित नियमों का उल्ंलघन किया तभी साहित्य जगत में अपनी पहचान दर्ज कर पाईं। वे लिखती भी हैं ‘‘यदि मैंने अपने भीतर सुकुमारता को तोड़ न दिया होता तो सचमुच मैं आज मन-मोहिनी गुडि़या का अनुपम रुप होती… लेकिन मैं सोचकर आश्वस्त होती हूँ कि गुडि़या की छवि तोड़ डालने से ज्यादा मुझे कहीं मुक्ति नहीं।’’16 अतः यह स्पष्ट है कि अपने अंदर बैठी पारंपरिक स्त्री की छवि को तोड़कर ही मैत्रेयी अपनी पहचान हासिल करती हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हिंदी की स्त्री आत्मकथाएँ सिर्फ व्यथा कथाएँ नहीं हैं बल्कि तमाम तरह की पितृसत्तात्मक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए स्त्री के बनने की कथाएँ हैं। इस बनने के क्रम में बहुत कुछ जर्जर मान्यताएँ टूटती हैं लेकिन जो बनती है उसे या उसके अस्तित्व को पूरी दुनिया स्वीकार करती है। प्रभा खेतान तथा मैत्रेयी का जीवन कुछ इसी तरह की स्त्री अस्मिता की कथा है।

संदर्भ सूची
1. खेतान प्रभा: अन्या से अनन्या, पहला संस्करण-2007ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0, नई दिल्ली-110002ए प्र0 सं0 210
2.  वही … पृ0 सं0-175
3.  वही … पृ0 सं0-98
4.  खेतान प्रभा – साधना अग्रवाल द्वारा प्रभा खेतान का लिया गया साक्शात्कार, वागर्य, सित्मबर – 2003 भारतीय भाशा परिशद, कोलकाता-700017ए पृ0 सं0-37
5.  खेतान प्रभा – उपनिवेश में स्त्री, पहला संस्करण-2003ए तीसरी आवृत्ति-2010ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0 नई दिल्ली-110002ए पृ0 सं0-14.15
6.  खेतान प्रभा – अन्या से अनन्या, पहला संस्करण-2007ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0, नई दिल्ली-110002ए प्र0 सं0 15
7.  वही … पृ0 सं0-226
8.  वही … पृ0 सं0-226
9.  वर्मा महादेवी – श्रृंखला की कडि़याँ, चतुर्थ लोकभारती संस्करण-2004ए लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1 पृ0 सं0-102.103
10. पुष्पा मैत्रेयी – कस्तूरी कुंडल बसै, पहला संस्करण-2009ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0 नई दिल्ली-110002,  पृ0 सं0-13
11.  वही … पृ0 सं0-12
12.  वही … पृ0 सं0-29
13.    वही … पृ0 सं0-42
14.  वही … पृ0 सं0-62
15.  पुष्पा मैत्रेयी – गुडि़या भीतर गुडि़या, पहला संस्करण-2009ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0 नई दिल्ली-110002,  पृ0 सं0-293.294
16.  वही … पृ0 सं0-246

नाबालिग पत्नी से, बलात्कार का कानूनी अधिकार (हथियार): अरविंद जैन

  ( इन दिनों ‘ वैवाहिक बलात्कार ‘ को लेकर काफी मुखरता बनी है – जो स्वागत योग्य है,  तो विरोध के भी स्वर हैं . स्त्रीकाल ने इसके कानूनी और सामाजिक पहलुओं पर बात की वरिष्ठ स्त्रीवादी चिंतक और अधिवक्ता अरविंद जैन से.  व्यक्त की जा रही शंकाओं के प्रसंग में भी बातें की गई हैं . अरविंद जैन कहते हैं कि वयस्कों से वैवाहिक बलात्कार का मामला गंभीर है ही लेकिन कानूनी पेचदगियों के कारण 15 से बडी और 18 से कम उम्र की लडकियों से बलात्कार का वैध स्वरूप ज्यादा खतरनाक है , कम से कम उसे दुरुस्त कराने की जरूरत है . ‌) 
बलात्कार और ‘वैवाहिक बलात्कार’ कानून को आप कैसे परिभाषित करते है?

आज के दिन 18 साल से बड़ी (बालिग़) लड़की अपनी मर्जी से विवाह कर सकती है, बिना विवाह के यौन सम्बन्ध बना सकती है, ‘सहजीवन’ में किसी के भी साथ रह सकती है, बच्चा गोद ले सकती है, स्वयं बच्चा कर सकती है, artificial insemination का रास्ता अपना सकती है- मतलब बालिग़ लड़की अपने ‘कानूनी अधिकारो’ का उपयोग कर सकती है।

लड़की के बालिग़ होने या विवाह योग्य उम्र 18 साल थी/है, मगर 1949 से 2013 (संशोधन से पहले) तक तो 16 साल से बड़ी उम्र की (नाबालिग) लड़की, अपनी मर्ज़ी से किसी के भी साथ यौन सम्बन्ध बना सकती थी।16 साल से बड़ी उम्र की (नाबालिग) लड़की की सहमति  को भी,सहमति  माना जाता रहा है।नाबालिग लड़की-विवाह-योग्य नहीं थी, पर अपनी मर्ज़ी से यौन सम्बन्ध बना सकती थी। 16 साल की लड़की का विवाह करना भले ही ‘अपराध’ है/था,परन्तु बिना विवाह के भी यौन सम्बन्धों की भरपूर आजादी थी। शायद बेटियों को कहीं जरूरत से ज्यादा ही आज़ादी दे रखी थी, इसलिए 2013 में ‘सहमति से सम्भोग’ की उम्र, 16 साल से बढ़ा कर 18 साल करनी पड़ी। बहुत साफ़ है कि ‘देश की बेटियों’ को ‘यौन हिंसा’ से भी बचाना था और ‘कानूनी विसंगतियो और अंतर्विरोधों’ को भी समाप्त करना था।आपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 में सहमति से सम्भोग की उम्र 16 साल से बढ़ा कर 18 साल कर दी गई, मगर 15 साल से बड़ी उम्र की (नाबालिग) अपनी पत्नी से सहवास को अभी भी बलात्कार नहीं माना। अपनी ‘बेटियों’ को तो यौन सम्बंधों से सुरक्षित रखना है,पर नाबालिग पत्नी (बहुओं) से सहवास (बलात्कार) करने का कानूनी अधिकार (हथियार), बनाये-बचाये रखना है।वरना विवाह संस्था या परिवार चलेगा कैसे! 

अगर ऐसा है तो फिर परेशानी या विवशता क्या है?
 मुझे लगता है कि सरकार की असली मजबूरी यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद बाल विवाहों को रोकना असंभव है, इसलिए बाल विवाह दंडनीय अपराध घोषित करने के बावजूद, ‘अवैध’ नहीं, ‘अवैध होने योग्य’ ही हैं। वो कहते हैं कि हम क्या करें! अधिकांश ग्रामीण जनता गरीब..अनपढ़..अन्ध-विश्वासी है और विवाह के ‘अटूट बंधन’ को ‘पवित्र संस्कार’ मानती-समझती है।‘वोट बैंक की राजनीति’-जिंदाबाद..जिंदाबाद। तभी तो सरकार ने नहीं मानी विधि आयोग की 205वी रिपोर्ट की सिफारिश और जे. एस. वर्मा आयोग की राय क़ि “भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद को खत्म कर दिया जाना चाहिए”। संक्षेप में यही है भारतीय समाज (संसद से अदालत तक) का दोहरा चरित्र(हीन) और असली चेहरा। अब आप ही बताएं कि 15 साल की नाबालिग पत्नी से बलात् यौन हिंसा की ‘शर्मनाक’ कानूनी छूट को, कैसे न्यायपूर्ण माना-समझा जा सकता है? सत्र-न्यायाधीश से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक के न्यायमूर्ति, ना अपील सुनने को राज़ी हैं ना दलील। ‘बलात्कार की संस्कृति’ को पोषित करते और बढ़ावा देते इन अर्थहीन, विसंगतिपूर्ण और अंतर्विरोधी कानूनों से, ना बाल विवाह रोके जा सकते हैं और ना ही बाल वेश्यावृति.

इन कानूनों की समवैधानिक वैधता को चुनौती देने की बात कैसे आई?
दरअसल दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन (अब सुप्रीम कोर्ट में) और वी.के.शाली ने  बाल विवाह पर अदालत के अनेकों अंतर्विरोधी निर्णयों को देखते हुए, मामला दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्ण खंडपीठ को भेजा था। बाद में पूर्ण खंडपीठ (न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन, संजीव खन्ना और वी.के.शाली) के समक्ष 2008 में बाल विवाह की वैधता  को लेकर, लज्जा देवी बनाम सरकार, महादेव बनाम सरकार और ऐसे ही कुछ और मुकदमें विचाराधीन थे। मैं महादेव का वकील था, जिसकी साढ़े पंद्रह साल की बेटी ने किसी लड़के के साथ भागकर शादी कर ली थी। पुलिस में मामला दर्ज हुआ और जब वह मिली, तो वह गर्भवती थी। मजिस्ट्रेट ने उसे नारी-निकेतन भेज दिया,जहाँ  वह बालिग़ होने तक रही। उसकी डिलीवरी भी नारी निकेतन में ही हुई थी। पूर्णपीठ के समक्ष बाल विवाह की वैधता को लेकर बहुत से विरोधाभासी सवाल थे। इस विषय पर सालों से लिखता-बोलता रहा हूँ। मुझे लगा कि इस मामले में मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) पर बहस शुरू की जा सकती है।बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के मुताबिक, किसी भी लड़की की शादी के लिए  उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 होनी अनिवार्य है. 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी 21 साल से कम उम्र के लड़के के साथ कराना दंडनीय अपराध है और दो साल का सश्रम कारावास या एक लाख रूपये तक का आर्थिक दण्ड या फिर दोनों हो सकते हैं. मगर ना तो विवाह ‘अवैध’ माना जाता है और ना ही शादी के वक़्त यदि लड़के की उम्र 18 साल से कम है, तो इसे अपराध नहीं माना जाता है।  महादेव का वकील होने के नाते मैंने दिल्ली हाई कोर्ट में एक और याचिका दायर की, जिसमें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अपवाद (15 साल से बड़ी पत्नी के साथ सेक्स को बलात्कार नहीं माना गया है) की समवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 में उस वक्त यह प्रावधान किया गया था कि 12-15 साल तक की बीवी के साथ संबंध बनाने पर, पति को दो साल की कैद या जुर्माना हो सकती है। यह जमानत योग्य अपराध था और जिसमें अधिकारिक रूप से जमानत मिल सकती थी. इस प्रावधान की समवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई. सीआर.पी.सी की धारा 198 (6) में यह प्रावधान किया गया था कि कोई भी कोर्ट ‘मैरिटल रेप’ के मामले को संज्ञान में नहीं लेगा। इसका मतलब यह हुआ कि आप अपने ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ अदालत भी नहीं जा सकते हैं। इसमें पत्नी की उम्र का भी कोई जिक्र नहीं किया गया था, मतलब पत्नी किसी भी उम्र की हो सकती है।15 साल से कम उम्र की नाबालिग पत्नी के साथ बलात्कार के मामला में भी पुलिस कोई भी करवाई नहीं कर सकती थी। ऐसे मामलों में गरीब नाबालिग लड़की को खुद ही कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता और जटिल कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। यही नहीं, हिन्दू अल्पवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा में 6 (सी) के तहत एक और विचित्र प्रावधान है कि अगर पति और पत्नी नाबालिग हों तो पति पत्नी का अभिवावक होगा। कानून के इन सभी प्रावधानों की समवैधानिक वैधता को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।लम्बी सुनवाई के बाद पूर्णपीठ का ऐतिहासिक फैसला (लज्जा देवी बनाम सरकार)2012 में आ पाया, मगर ‘वैवाहिक बलात्कार’ वाली याचिका पूर्ण पीठ ने खंडपीठ (न्यायमूर्ति रविन्द्र भट्ट और एस.पी.गर्ग) के पास भेज दी।  दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ (न्यायमूर्ति रविन्द्र भट्ट और एस.पी.गर्ग) में मामले पर बहस चलती रही।सरकारी वकीलों ने लगातार यह कर तारीख ली कि सरकार कानून में उचित संशोधन कर रही है। आपराधिक संशोधन विधेयक 2010, 2011 और 2012 के प्रारूप अदालत में पेश किये गए थे। सात दिसम्बर 2012 को आपराधिक संशोधन विधेयक पर बहस चल ही रही थी, कि 16 दिसम्बर 2012 को ‘निर्भया बलात्कार कांड’ आ खड़ा हुआ। देशभर में जोरदार आंदोलन हुए जिसके दबाव-तनाव में सरकार ने अध्यादेश जारी किया। वर्मा कमीशन की रिपोर्ट भी आई और अंततः 3 फ़रवरी 2013 से आपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 लागू हुआ। महादेव केस के तमाम मुद्दे ‘निर्भय कांड’ के पीछे कहीं दब-छुप गए.

‘निर्भया काण्ड’ के बाद हुए आमूल-चूल संशोधन 2013 से कानून में क्या बदलाव हुए? 
हाँ! यह समझ लेना भी ज़रूरी होगाया है कि अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 से पूर्व और संशोधन के बाद कानून के प्रावधानों में क्या फर्क आया। एक ही महत्वपूर्ण बदलाव हुआ कि अब 15 साल से कम उम्र की पत्नी से बलात्कार के मामले में, सजा में कोई ‘विशेष छूट’ नहीं मिलेगी। संशोधन के बाद इस प्रावधान को भारतीय दण्ड संहिता से हटा लिया गया। मगर मुझे लगता है कि कुल मिला कर स्त्री अधिकारों के सम्बन्ध में स्थिति, पहले से ज्यादा खराब और विष्फोटक हुई है।
अपराधिक संशोधन अधिनियम 2013 में बलात्कार को अब ‘यौन हिंसा’ मान लिया गया है। इसमें सहमति से सम्भोग की उम्र 16 साल से बढाकर 18 साल कर दी गयी है जबकि धारा 375 के अपवाद में पत्नी की उम्र 15 साल ही है। अपराधिक संशोधन अधिनियम 2013 से पहले पति को सिर्फ ‘सहवास’ करने की छूट थी, मगर संशोधन के बाद तो ‘अन्य यौन क्रीडाओं’ का भी अधिकार दे दिया गया है. यह किसी भी सभ्य समाज में उचित, न्यायपूर्ण नहीं माना-समझा जा सकता। कानून अभी भी पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की नाबालिग पत्नी के साथ बलात्कार करने का ‘कानूनी लाइसेंस’ देता है, जो निश्चित रूप से नाबालिग बच्चियों के साथ मनमाना और विवाहित महिला के साथ कानूनी भेदभावपूर्ण रवैया है. यह भेदभावपूर्ण कानूनी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद -14 और 21 में दिए गए मौलिक अधिकार का हनन तो करता ही है और यह मानवाधिकार का भी हनन है।

 स्त्री चाहे तो घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन मुकदमा कर सकती है या तलाक भी तो ले सकती है? अधिकांश का तो कहना है कि स्त्रियाँ इस कानून का दुरूपयोग कर सकती हैं? 
हाँ! बहुत सही कह रहे हो मगर  यह है कि शादीशुदा महिलाओं के पास चुपचाप यौन हिंसा सहन करने, बलात्कार की शिकार बने रहने या फिर मानसिक यातना के आधार पर पति से तलाक लेने या घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन मुकदमा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा जाता है, जो नाकाफी है। पति को नाबालिग पत्नी तक के साथ बलात्कार करने का कानूनी लाइसेंस और पत्नी को कोर्ट-कचहरी करने का विकल्प? वाह! क्या बंटवारा है-कानून और बराबरी के अधिकारों का!

भारतीय समाज में अब काफी विविधता है, जाति, वर्ग आदि की, क्या इस क़ानून के लिए इन विविधताओं के असर का ख्याल नहीं रखना होगा ? खासकर तब, जब शुद्धि और अग्नि परीक्षा के मामले आज भी आते हैं ? 

विविधता जाति, धर्म,वर्ग,क्षेत्र,परम्परा,संस्कार का कानूनी अधिकारों पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। यह सब ध्यान में रखेंगे तो बदलाव की सभी संभावनाओं की  ‘ हत्या’ ही करनी होगी  पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की पत्नी के साथ ‘बलात्कार करने का कानूनी लाइसेंस’ देना, ‘बलात्कार कि संस्कृति’ को बढ़ावा ही देता है। स्त्री को कब तक धार्मिक आस्थाओं-अनास्थाओं की बलि चढाते रहेंगे? क्या हर बार परिवर्तन के लिए किसी एक ‘फुलमनी’ को सुहाग सेज पर अंतिम साँस लेनी पड़ेगी? 2015 में भारतीय शादी-शुदा महिलाओं की स्थिति ‘सेक्सवर्कर’ और ‘घरेलू दासियों’ से भी बदतर है। ‘सेक्स वर्कर’ को ना कहने का अधिकार तो है, शादीशुदा महिला को वो भी नहीं है। पुरुष के लिए कानून ‘उपयोग’ और स्त्री के लिए हो तो ‘दुरूपयोग’-यह कहाँ का न्याय हुआ?

 दुनिया के अन्य देशों में क्या और कैसे कानून हैं?

लगभग 76 मुल्कों में वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। नेपाल जैसे छोटे से मुल्क में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना गया है। नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा था- ‘पत्नी की सहमति के बिना सम्भोग बलात्कार के दायरे में आएगा. धार्मिक ग्रंथों में भी पुरुषों को द्वारा पत्नी के बलात्कार की अनदेखी नहीं की है। हिन्दू धर्म में पति और पत्नी की आपसी समझ पर जोर दिया गया गया है’



अदालतों का इस पर क्या नजरिया रहा है?
देश में प्रजातंत्र और ‘कानून का राज’ है, मगर घर में पितृसत्ता कि तानाशाही. अदालतों का तो यहाँ तक कहना है कि “संविधान को परिवार में लागू करना, सांड को ‘चाइना शॉप’ में घुसाने जैसा होगा”। इसका अर्थ-अनर्थ है ‘संविधान की मर्दवादी व्याख्या’। यह ‘नाबालिग पत्नी’ के साथ मनमाना और विवाहित महिला के साथ अन्यायपूर्ण ‘कानूनी भेदभाव’ है। यह कानूनी प्रावधान दमनकारी, असंवैधानिक, संविधान के अनुच्छेद-14, 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का भी हनन है।

एक बात और यह कि आखिर दाम्पत्य में बलात्कार कानून से पुरुष समाज क्यों डरा हुआ है? परिवार को तो हमेशा से निजी और पवित्र दायरा मानते रहे हैं, सो हस्तक्षेप के लिए गुंजायश कहाँ है? 
इस कानून को न बनाये जाने वाले यह तर्क देते हैं कि वैवाहिक बलात्कार कानून बन जाने से विवाह और परिवार जैसी पवित्र संस्था को खतरा पहुँच सकता है. मैं जवाहर लाल नेहरु जी के शब्दों को याद करके इसका जवाब देना चाहूँगा- ‘हम हर भारतीय स्त्री से सीता होने की अपेक्षा करते हैं, लेकिन पुरुषों से मर्यादा पुरुषोतम राम होने की नहीं.’ मेरा मानना है कि कानूनानुसार लड़की के बालिग़ होने, शादी और सहमति से यौन सम्बन्ध बनाने की उम्र 18 साल है, मगर देश में 15-18 साल उम्र की लाखों नाबालिग विवाहित स्त्रियों और नाबालिग सेक्स वर्कर्स’ के साथ रोज़ बलात्कार हो रहा है। एक रिपोर्ट तक दर्ज़ नहीं होती। लगता है कि इस मुद्दे पर कानून चुप, संसद खामोश, समाज मौन, अदालतें तटस्थ और बाकी अधिकाँश लोग ‘षड्यंत्र’ में शामिल हैं। अंत में इतना ही कहना काफी होगा कि कानूनों में अंतर्विरोधी, विसंगतिपूर्ण या ‘सुधारवादी-उदारवादी मेकअप’ से, राष्ट्र का बहुमुखी विकास असंभव है। राष्ट्र को आज नहीं तो कल, इस पर गंभीरता से विचार करना होगा….पहले ही बहुत देर हो चुकी है।

 मान लो कानूनी छूट खत्म हो जाए तो विवाह के भीतर बलात्कार के अभियुक्तों को सजा दिलवाना क्या और टेढी खीर नहीं होगी?
अरविन्द जैन- क्या मौजूदा किसी भी भी कानून में सजा दिलवाना बहुत सस्ता-सुंदर और निश्चित न्याय मार्ग है? कानून अपना काम करेगा या नहीं, वो एक अलग बहस का मुद्दा है। इस डर से क्या कोई कानून ही ना बनेगा?  

हव्वा की बेटी: उपन्यास अंश

जयश्री रॉय

जयश्री रॉय कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण नाम हैं. चार  कहानी संग्रह , तीन उपन्यास और एक कविता संग्रह प्रकाशित हैं . गोवा में रहती हैं. संपर्क: jaishreeroy@ymail.com

( अफ्रीकी  महादेश के सत्ताईस से ज्यादा देशों में महिलाओं के सुन्ना की प्रथा आज भी जारी है। ‘सुन्ना’ महज एक प्रथा नहीं बल्कि वहां की औरतों की ज़िन्दगी की त्रासदी का सबसे बड़ा कारण है। माहरा की कहानी के बहाने जयश्री रॉय ने अपने चौथे और नवीनतम उपन्यास ‘हव्वा की बेटी’ में स्त्री जीवन के उसी कसैले यथार्थ को उद्घाटित किया है। माहरा और उसकी जैसी औरतें नस्ल, मज़हब, जुबान और रंग से परे वस्तुत: एक स्त्री होती हैं. आंसुओं का खारापन, दर्द का स्वाद, काली त्वचा के नीचे बहने वाले लहू का रंग… इनका सब कुछ दुनिया के हर कोने में बसने वाली औरतों के समान ही है. इन औरतों का औरत होना दुख में होना है, बददुआ में होना है, अज़ाब में होना है… अफ्रीका के जंगलों और धू-धू करते रेगिस्तानों की स्याह-शुष्क दुनिया के चप्पे-चप्पे में माहरा जैसी लाखों बदनसीब औरतों की दर्द भरी कहानी धूल, बवंडर और आंधी के साथ रात दिन उसांसें लेती रहती हैं. यह उपन्यास उसी दुःख और उससे मुक्त होने की चाहत में लड़ती स्त्रियों की संघर्ष गाथा है। 


मदर्स डे पर स्त्रीकाल के पाठकों के लिए  ख़ास प्रस्तुति के रूप में यह उपन्यास-अंश .. कहानी के इस भाग में मां  है , जो स्नेह और परम्परा के बोझ के बीच द्वैध में फंसी अपनी बेटी के  लिए क्रूर होने को मजबूर है- पीढी -दर पीढी दासता और अनुकूलन को ट्रांसफर करती है , बेटी स्नेह और परंपरा के बोझ तले बिखर जाती है . स्त्रीकाल ने अफ्रीकी देशों की इस अमानवीय परंपरा की दर्दनाक तस्वीर छापी थी इसके सम्पादन मंडल की सदस्य निवेदिता की एक रिपोर्ट के रूप में , आज यह कथात्मक दास्तान …. ! लेखिका यद्यपि उस परिवेश से नहीं हैं  , लेकिन कथा की विश्वसनीयता उनके लेखकीय कौशल और संवेदना के कारण संभव हो पायी है .  )  

माहरा… ए माहरा… मां ने बिल्कुल फुसफुसा कर मुझे पुकारा था, मगर ना जाने क्यों कच्ची नींद में ही उनकी किसी खंडहर से गुज़रती हवा की तरह सिसकारी भरती आवाज़ सुनकर मेरा गला अनायास सूख आया था. उस समय हमारी झोंपड़ी के बाहर फीके होते आकाश की पृष्टभूमि में ठीक ताड़ के बूढ़े पेड़ के माथे पर सुबह का तारा बहुत उजला हो आया था. मैंने बिस्तर से उठते हुये बगल में निश्चिंत सोती हुयी अपनी छोटी बहन मासा को देखा था. चेहरे पर बिखरे हुये घुंघराले बाल और भरे हुये अधखुले होंठ… ना जाने क्यों उस पल मेरा जी चाहा था, उससे लिपट जाऊं! मुझे उनींदी, चुपचाप बैठी देख मां ने इस बार कुछ अस्थिर होकर मुझे झिंझोरा था- “माहरा…!”

मैंने अब जल्दी से बिस्तर छोड़ा था और मां के पीछे अपने एक कमरे की उस छोटी-सी झोंपड़ी से बाहर निकल आई थी. कितनी तेज़ चल रही थी मां! दो-चार क़दमों में ही मवेशियों के बाड़े के पार! उनके साथ बने रहने के लिये मुझे लगभग दौड़ना पड़ रहा था. कुछ ही पलों में हम आठ-दस झोंपड़ियों की अपनी उस छोटी-सी बस्ती को पार कर कैक्टस के बौने और बेतरतीव जंगल में आ गये थे. सितंबर की यह एक मीठी और गुनगुनी ठंड की भोर थी. हवा में कुछ रेशम-सा मुलायम और सुखद घुला था. पूरब के क्षितिज में अब तक केसर के कुछ सुर्ख रेशे चमकने लगे थे. दूर कहीं सुतूरमूर्ग बोला था और इसके साथ ही पास की घनी झाड़ियों से निकलकर एक मटमैला सियार हड़बड़ा कर भागा था. यह सब देखते हुये शायद मेरे क़दम कुछ धीमे पड़ गये थे. मां ने मुड़कर दबी आवाज़ में फिर मुझे पुकारा था और मैंने दौड़ना शुरु कर दिया था.

एक बेडौल, काले पत्थरों के टीले के पास आकर मां रुकी थी और इधर-उधर देखा था. शायद उन्हें किसी का इंतज़ार था. मैं उनकी कमर से लगी सर उठाकर उन्हीं को देख रही थी. हिज़ाब में लिपटा मां का गहरा स्याह आधा चेहरा और नाक की नोंक पर चमकती ओस की एक छोटी-सी बूंद- उजली होती भोर की हल्की उजास समेटे! कितनी रहस्मयी दिख रही थी वो इस समय! इन्हीं अनगढ़ पत्थरों की तरह ठोस और निर्विकार, मगर सांस लेती हुई, धड़कती हुई, जीवित… जाने क्यों उन्हें देखते हुये उस समय मुझे अनायास रोना-सा आ रहा था…

दो-चार दिन पहले ही मैंने मां को नीची आवाज़ में अब्बू से बात करते हुये सुना था. बात करते हुये वे मेरी तरफ मुड़-मुड़कर देख रहे थे. ’बंजारन’, ’पैसे’, ’बहुत जल्द’ जैसे कुछ अस्पष्ट शब्द मेरे कानों में पड़े थे. दीदी को पूछते ही उसने मुझे डपट दिया था- “बड़ों की बातें छिपकर नहीं सुना करते…!” मुझे अचानक अजाने डर ने घेर लिया था. स्मृतियों में कुछ धुंधली-सी परछाइयां उभरी थीं- जंगल में घास-फुस की एक छोटी झोंपड़ी में पड़ी हुई दीदी… खून से लिथड़ी और बेतरह गोंगियाती हुई! मां जब उसे खाना पहुंचाने जाती थीं, मैं उनके पीछे चुपके से हो लेती थी. कई बार उन्होनें अपने पीछे आते देख मुझे वहां से डांटकर भगाया भी! मुझे चटाई में रस्सियों से बंधी पड़ी दीदी की कातर आंखें अक़्सर याद आती हैं! ठीक जैसे जिबह होती किसी मवेशी की आंखें- कोटर में उबली हुई, लाल और पनीली… ओह! उन्हें याद कर कितना डर लगता था मुझे रातों को! अक़्सर अपने बगल में सोई हुई मासा से लिपट जाती थी. पसलियों में दिल धरकता रहता था देर तक!जाने क्यों आज यहां, इस जंगल में मां के साथ खड़ी होकर मुझे दीदी की वही खून चढ़ी आंखों की रह-रहकर याद आ रही थी…

कल रात मां ने खाना परोसते हुये मेरी थाल में ऊंट का मांस, रोटी और खीर सबसे ज़्यादा परोसी थी. ऊंट की पीठ का गुमड़वाला यह हिस्सा मुझे हमेशा बहुत स्वादिष्ट लगता था. चर्बी से ठसाठस भरा हुआ! मासा ने मेरी चोटी खींची तो मां ने उसे मारा भी. बड़े भैया तारिक से कहा कि वह मुझे तंग ना करे और कोठरी के एकमात्र लकड़ी के साफ़ चादर वाले बिस्तर पर सोने दे. मुझे यह सब अच्छा तो लग रहा था, मगर जाने क्यों कहीं एक डर-सा भी बना हुआ था जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी. अब्बू ने शाम को मवेशियों को उनके कांटेदार बाड़े में डालते हुये बहुत नर्म आवाज़ में मुझसे कहा था, गांव की औरतें मुझे कल के बाद तरह-तरह के उपहार देनेवाली हैं. मां ने आंखों में चमक भरकर कहा था- अब तू भी ख़ास बन जायेगी, औरत का दर्ज़ा पायेर्गी… औरत का दर्ज़ा! ख़ास हो जायेगी! मां की कही ये चंद बातें मेरे जेहन में देर रात तक उमड़ती-गुमड़ती रही थीं. सीने के अंदर दिल की धड़कने भी साथ बढ़ती-घटती रही थी. ये ख़ास होना क्या होता है!

जब से होश सम्हाला है, हाथ में लकड़ी लेकर गाय-बकरियों को रेत के सूखे, कंटीले जंगलों में हांकती-चराती रही हूं… तेज़ धूप और बारिश में, अंधड़-पानी में. इस मैदान से उस मैदान, ढलान और पहाड़ियां… कभी लकड़बघ्घे के पीछे शोर मचाते हुये भागना तो कभी किसी सियार के मुंह से मेमना छीन लाना! एक पल लापरवाह हुये नहीं कि कोई ना कोइ जानवर आपकी मवेशी उठा ले जायेगा. साथ ही अपनी जान की भी चिंता! पूरा ईलाका शेर, तेंदुओं से भरा हुआ है! मां कहती थीं, शेर सामने पड़ जाये तो भागना मत. चुप खड़ी होकर उसकी आंखों में देखती रहना. एक पलक झपकी तुम्हारी कि शेर तुमपर टूट पड़ेगा! रोज़ हमें जंगलों में भेजते हुये मां जानती थीं कि वे हमें मौत के मुंह में भेज रही हैं. मगर भेजती थीं. ज़िंदगी कुछ इतना ही मजबूर कर देती है हमें! जीने के लिये ही हम जैसे लोगों को रोज़-रोज़ मरना पड़ता है! हर दिन मौत के मुंह से हम ज़िंदगी का एक कौर छीन लाते थे! शायद तभी हमारे जीवन में बिना अतिरिक्त चीनी, नमक के इतना स्वाद होता था… भूख हर चीज़ को ज़ायकेदार बना देती है और हमारी ज़मीन से भूख का तो एक बहुत पुराना संबंध है! मैं शायद अपने जन्म से इस स्वाद, इस संबंध को जानती-जीती आई हूं!

सोचते हुये मैं अपनी चादर को अपने इर्द-गिर्द लपेटकर ज़मीन पर बैठ गई थी और जाने कब सो भी गई थी. नींद में मेरी सोच अजीब-अजीब-सी शक़्लों में बदल गई थी! रेत के सुनहरे टीले, धूप की सफ़ेद आग़ में झुलसते पेड़ और कैक्टस के गुलाबी, पीले, बैंजनी फूल- दूर-दूरतक! और आकाश में वह बड़ी चील… उसके विशाल, काले डैने… तेज़ टिंहकारी… उसके पंखों के पीछे सूरज छिप गया है… हर तरफ अंधेरा फैल रहा है… मैं डर कर उठ बैठी थी और अपने चेहरे पर उस चील के काले, भीषण डैनों को छाये हुआ पाया था. ओह! कितनी ज़ोर से चीख कर खड़ी हो गई थी मै! उस स्याह गिद्ध के बगल में ही मां खड़ी थी. एकदम शांत और निर्लिप्त! मेरी चीख को उन्होंने जैसे सुना भी नहीं था.

उस समय तक काफी रोशनी फैल चुकी थी. ताड़ के इक्के-दुक्के पेड़ों पर जंगली सुग्गे कलरव कर रहे थे. पूरब का आकाश गहरा सुनहरा हो उठा था. मैंने मां के पीछे छिप कर उस गिद्ध जैसी शक़्ल वाली बंजारा औरत को अब ध्यान से देखा था. ओह! यह एक गेद्दा थी लड़कियों की सुन्ना करवाने वाली! गेद्दा मिडगान सम्प्रदाय की होती हैं- एक बार मां ने ही कहा था. छींटदार लहंगे के ऊपर काली, मोटी, खुरदरी चादर से उसने अपना माथा और आधा चेहरा ढंक रखा था. रंग-बिरंगे मोती, चटक रंग पछियों के पर, जानवरों की हड्डी, शेर के दांत और नाखून… जाने उसने क्या-क्या गले में डाल रखे थे! साथ में चोंच जैसी नाक में पीतल का चौकोर नथ, कलाइयों में शंख, गिलट और पत्थर के कड़े, पांव में कांसे के झांझर और सिक्कों की खन-खन बजती लड़ियां… गोदने से उसकी खुली बांहें एकदम काली पड़ी हुई थीं. सबसे अजीब थीं उसकी आंखें- गंदले सफ़ेद में भुरी-पीली पुतलियां और उनपर इंद्रधनुष-सी खींची जुड़वां भौंहें- मटमैली! जले उपले-से झुरझुरे, धंसे गाल और पोटली-से सिकुड़े काले-बैंजनी होंठ! बलगम से भरी घरघराती आवाज़ में मां से कह रही थी कि पड़ोस के गांव से एक शादी की दावत खाकर आते हुये इतनी देर हो गई. वह अपने कालीन के मुलायम और रंग-बिरंगे टुकड़ों से बने झोले से जाने क्या-क्या बाहर निकाल रही थी- पत्थर के नुकीले टुकड़े, भोंथरा चाकू, हैंडल टूटी कैंची, ब्लेड का टुकड़ा… देखते हुये मेरे भीतर का सोया हुआ डर एकबार फिर जाग उठा था. क्या है यह सब, किसके लिये है!

चीज़ों को ज़मीन पर फैलाकर उसने एकबार बड़ी हिकारत से मुझे देखा था और फिर मां को आदेश दिया था- “अब पकड़ो इसे… देर हो रही है!”उसकी बात पर मां मेरी ओर मुड़ी थी- “माहरा! मेरी अच्छी बेटी… आज वह ख़ास मौका आ गया है जिसका इंतज़ार इस देश के हर नेक मुसलमान औरत को होता है! पाकीजा और ख़ास होने का अवसर! औरत होने, निकाह के और मां होने के काबिल होने का कीमती मौका! तुम्हें हिम्मत और सव्र रखना है और बस, सबकुछ आसान और जल्द हो जायेगा. अल्ला तुम्हारा निगहेबान है!” कहते हुये वे मेरी तरफ धीरे-धीरे बढ़ रही थी और जाने क्यों मैं धीरे-धीरे पीछे की ओर सरक रही थी. मुझे उस पल अपनी मां से डर लग रहा था. उनकी शांत, ठंडी आंखें, ठहरी हुई आवाज़, भींचा हुआ जबड़ा… सबकुछ मुझे दहशत में डाल रहा था. जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे खिलाफ कोई बड़ी साजिश रची जा रही है और मां भी उस में शामिल है!
पहले अपने हर डर, दुविधा के क्षण मैं जिस गोद में अपना आश्रय ढूंढ़ती थी, आज मुझे वह किसी शेर की मांद की तरह भयावह लग रही थी. कितना दुर्भाग्यपूर्ण था यह! मुझे पास आते ना देख मां एकदम से अस्थिर हो उठी थीं और अपने दोनों हाथ फैला कर मेरी ओर लपकी थीं- “माहरा! पास आओ बच्ची!” उनकी एक पल को धधक उठीं आंखें, सख़्त हुआ जबड़ा और चील की झपट-सी बांहें देख जाने मुझ में क्या घटा था, मैं अचानक मुड़कर भाग खड़ी हुई थी. मां चीखती हुई मेरे पीछे भाग रही थीं, मगर मुझे पकड़ पाना उनके वश की बात नहीं थी. दस साल में सात बच्चे पैदा कर मां छीज गयी थीं. घर के काम, मवेशियों की देख-रेख, ऊपर से कई नामालूम-सी बिमारियां… कभी-कभी दिनों तक बिस्तर से उठ नहीं पाती थीं. और इधर मैं- तेरह साल की उमर! ऊंट का पौष्टिक दूध, खजूर और मधु से बनी सेहत! रोज़ अपने ढोर-डंगर के साथ मीलों रेत की ढूंहों और कांटों-कैक्टस के जंगलों में सुबह से शाम तक भटकती फिरती हूं. कभी जंगली कुत्तों के झुंड के पीछे भागना पड़ता है तो कभी शेर, चीते से अपनी जान बचानी पड़ती है. दौड़-दौड़कर मैं हिरण ही बन गई हूं. एक सांस में रेत के कई टीले पार कर सकती हूं. बिना पानी पीये गुस्सैल सूरज को सर पर उठा कर मीलों चल सकती हूं.

तो मां के बार-बार पुकारने के बावजूद मैं रुकी नहीं थी और लगातार भागते हुये रेत के कई टीले एक साथ पार कर गई थी. दिन के चढ़ने के साथ हवा गर्म हो गई थी, पांव के नीचे बालू तपने लगा था. बीच में रुक कर मैंने कुछ मोटे पत्तों वाले रेगिस्तानी पौधों के पत्ते निचोड़ कर उनका रस पिया था, जंगली फूलों का मधु चुसा था. कुछ कच्ची-पक्की बेरियां भी खाई थी. शाम घिरने तक मैं थक कर चूर हो गयी थी. एक सायेदार पेड़ के नीचे खड़ी होकर मैंने दूर-दूर तक नज़रें दौड़ाई थी. शाम की मुलायम धूप में रेत के टीले ठंडी, सुनहरी आग़ में नहाये हुये थे. हल्की चलती हवा से बालू के गर्म, बादामी आंचल में लहरें और भंवर-से पड़ रहे थे. मुझे घर की याद आई थी, मां और मासा की भी. तीन साल की मासा मेरे सबसे क़रीब थी. एकदम गुड़िया! मुझे ज़ोर से रोना आया था- मां… मासा… और वही बैठकर रोते हुये जाने मुझे कब नींद आ गई थी.

जब आंख खुली थी, सामने अब्बू और बड़े भैया तारिक को खड़े पाया था. रेत पर मेरे पांव के निशान ढूंढ़ते हुये वे आख़िर मुझ तक पहुंच ही गये थे. मैं एकदम हड़बड़ा कर उठी थी और फफकने लगी थी. उस समय मुझे बहुत डर लग रहा था. उस वीरान जगह में अपने भाई और अब्बू को देखकर जहां एक तरफ मुझे राहत का अहसास हुआ था, वही घर से भाग आने की ग्लानि ने मुझे सहमा भी दिया था. लगा था, अब वे मुझे डांटेंगे, मारेंगे… मगर अब्बू ने कुछ भी नहीं कहा था. बड़े भैया ने बस साधारण ढंग से कहा था- घर चलो! उनके पीछे सिसकते हुये मैं सर झुका कर चल पड़ी थी. उस समय रात का जाने क्या बजा था. बिना चांद के गहरे काले आकाश में लाखों-करोड़ों सितारे टिमक रहे थे. पूरब की ओर हवा में रेत के कण उड़ रहे थे शायद. बारिश की-सी झर-झर आवाज़ आ रही थी. भैया और अब्बू ने रेत के उड़ते कणों से बचने के लिये साफ़े से अपना चेहरा ढंक लिया था. मगर मैं नंगे सर चलती रही थी. मेरे पूरे जिस्म में रेत के महीन रेज़े सूई की नोंक की तरह चुभ रहे थे मगर उस समय मुझे किसी बात का होश नहीं था. छीली हुई देह और मन से उनके पीछे बदहवाश चलती रही थी!

समकालीन हिंदी आलोचना का स्त्री स्वर

कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

इक्कीसवीं सदी संक्रमण के दौर से गुजर रही है. भारतीय समाज में पहले आधुनिकता और फिर उत्तर आधुनिकता को लेकर काफी बहस मुबाहिसा हो चुका है. विमर्शों का जन्म कहीं इसी कोख से हुआ है.विमर्श चाहे वह किसी भी तरह का हो अब लगातार अपनी धुरी प्राप्त कर रहा है. समय का सातत्य यह है कि चाहे साहित्य हो अथवा समाज चारो तरफ उथल पुथल मच रही है. यही कारण है कि आधुनिक भारतीय समाज अब ज्यादा प्रजातान्त्रिक और लोक उन्मुख हुआ है. सबको अपना हक मिल पा रहा है और लोग बिना झिझक के खुद सबके सामने ला पा रहे हैं. ‘सिगमण्ड फ्रायड का यह बयान मशहूर है कि मनोविश्लेषण के क्षेत्र में इतने वर्ष काम करने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाया कि स्त्री आखिर चाहती क्या है?’  शायद इसीलिए स्त्री को ‘अंतिम उपनिवेश’ कहा गया है. स्त्री के लिए जो भी जगह छोड़ी गई है उसका वृतांत निश्चय ही कारुणिक है. लेकिन यह वृतांत हमेशा डराने वाला नहीं होना चाहिए. नहीं तो स्त्री अपनी वाजिब जगह ढूंढने से हमेशा खौफ खाती रहेंगी.’
साहित्य के बिना समाज और समाज के बिना साहित्य की कल्पना असंभव है. समाज एक सामूहिक इकाई है और साहित्य भी बहुत सारी इकाइयों से मिलकर बनता है. यह तथ्य सृजन के हर क्षेत्र में लागू होता है. हिंदी साहित्य का अपना सात-आठ सौ वर्षों का इतिहास है. लेखन की एक बड़ी संख्या में इसमें आमद रही है. साहित्य की बहुत सी विधाओं का अब तक जन्म हो चुका है और कुछ काल के गाल में खुद को समाहित करने से नहीं रोक पायी हैं. प्रतिरोध के इस साहित्य ने वैसे अनेक मुकाम हासिल किये हैं पर साथ की एक जाति विशेष की कृपा के कारण इस का समुचित विकास नहीं हो पाया. साहित्य उन अर्थों में प्रजातान्त्रिक नहीं हो पायी जहाँ उसे समाज के अन्य वर्गों का भी समुचित योगदान प्राप्त होता. अपनी पुस्तक ‘आलोचना और विचारधारा’ में डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं कि आलोचना की दुनिया विचारों की दुनिया है. और विचार के लिए चाहे गुरु-शिष्य परंपरा हो या विदग्ध लोगों का समुदाय, उनके बीच बातचीत और शास्त्रार्थ जरुरी है. बहस के जरिये एक पीढ़ी में जो सवाल उठते हैं उनके जबाब अगली पीढ़ी को देने होते हैं . यह सच है कि हिंदी आलोचना का विकास पश्चिम की तरह नहीं हुआ. यहाँ आलोचना का विकास

कुछ आलोचों के द्वारा नहीं वरन संस्थाओं के द्वारा हुआ है. वह संस्था चाहे कोई पत्र, पत्रिका, प्रतिष्ठान के रूप में हो चाहे शिक्षणसंसथान के रूप में. साहित्य और समाज का रिश्ता द्वंदात्मक है.

बात आलोचना की है. यह कला की वह कसौटी है जिसपर साहित्य का ढांचा जांचा परखा जाता है. आलोचना साहित्य के सौन्दर्य को निखारने का कार्य करती है. शब्द अर्थ के निहितार्थों से अलग यह विधा साहित्य के उन तत्वों की बात करती है जो साहित्य सौन्दर्य के कारक हैं. आलोचना की यह परम्परा मनुष्य को सीखने सिखाने पर नहीं अपितु जीवन निर्माण करने की प्रक्रिया स्वरूप प्राप्त हुई. आलोचना के क्षेत्र में जब हम हिंदी पट्टी की स्त्री आलोचकों पर बात करते हैं तो एक शून्य स्थिति दिखाई देती है. आज भी स्त्री आलोचकों की संख्या अँगुलियों पर गिनाने लायक है. स्त्री सैधान्तिकी के लिए आज भी हिंदी जगत कोई ऐसी समीक्षक, आलोचक नहीं पैदा कर पाया जिसको तथाकथित मुख्यधारा बेझिझक उल्लेख कर सके. छिटपुट प्रसंगों को छोड़ दें तो एक खालीपन नजर आता है. यह खालीपन बहुत गहरा है और इसकी लतरें बहुत सारे प्रश्नों को जन्म देती है. क्या कारण है की जहाँ रचनात्मक साहित्य में स्त्री रचनाकारों का बोलबाला है वहीँ वे अपने रचनात्मक साहित्य का मूल्यांकन स्वयं नहीं कर पायीं. आज भी वे नामवरों, नामचीनों के द्वारा पददलित हैं. हिंदी की आलोचना आज भी कहने पर केवल पुरुष का ही नाम सामने आता है. क्या पुरुष आलोचकों ने उन्हें हासिये पर नहीं धकेल दिया.

क्या यह सच नहीं है कि जिन्होंने कुछ काम किया वे भी पुरुष के संरक्षण के बदौलत ही. क्या यही कारण नहीं है उनकी रचनाधारा का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया. भारत में स्त्रीविमर्श लगभग अपने चौथे दशक में है इसपर भी इतिहास में उनका नाम कहीं हासिये पर चला गया. हिंदी के इतिहास ग्रंथों में उनके लिए मात्र कुछ पन्ने लिखे गए. आधी आबादी वहां एक सिरे से गायब नहीं तो दबाई अवश्य गई है.

कुछ काम हुआ है पर उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता. क्योंकि पुरुष रचनाकारों का ही प्रभुत्व चारो तरफ रहा है अतः आलोचना भी इससे अछूती नहीं रही है. यहाँ उन पुरुषों के योगदान को कमतर आंकने का आशय नहीं है अपितु उनकी सदाशयता को बार बार प्रणाम है. पुरुषों ने भी स्त्री आलोचना को काफी आगे बढ़ाया है. स्त्री आलोचना के विकास में समकालीन पत्रिकाओं का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है. पत्र-पत्रिकाओं, महिला-लेखन विशेषांक निकाल कर पुनर्जीवन देती रही हैं. विमेन्स स्टडीज विश्वविद्यालयों का एक अलग विषय बन गया है. जगह-जगह विद्यार्थी महिला रचनाकारों के कृतित्व पर शोधकर्ता में संलग्न है. यह हक और दर्जा पाने के लिए महिला रचनाकारों ने अथक परिश्रम और निरंतर साधना की है. महिला लेखन की जमीन तैयार होने में लाखों अनाम स्त्री रचनाकारों की मेधा लगी है. जिनमें बहुत बड़ी संख्या उनकी भी है जिन्होंने लिख-लिखकर अपना साहित्य कॉपियों में दबा दिया, खुद भी कभी दुबारा निकालकर नहीं देखा कि शब्द की यह मौन सम्पदा उनसे छिन न जाए.

प्रजातान्त्रिक मूल्यों में लगातार स्त्री की सहभागिता बढ़ रही है. आज भारतीय राजनीति में स्त्रियों को केवल प्रतीक रूप में ही नहीं वाकई उनकी यथार्थ सहभागिता है. स्त्रियों ने लगभग उन क्षेत्रों में प्रवेश पा लिया है जो आज तक उनके लिए प्रतिबंधित था. अब वह केवल आत्मकथा, संस्मरण या कविता तक ही सीमित नहीं है अपितु वाब साहित्य के हर क्षेत्र में उसकी धमक महसूसी जा सकती है. समकालीन हिंदी आलोचना में स्त्री

आलोचना के उभार को कुछ इन्हीं विन्दुओं के माध्यम से जाना परखा जा सकता है. आजकल की आलोचना की तरह खुद को पुरुष के आईने में देखे कि वह अच्छी दिखाई दे रही है की नहीं, उसे कोई देखेगा कि नहीं. पुरुष ने अपने स्वार्थ के लिए कैसे प्रकृति या स्त्री के दोहन की शब्दावली रची है. वह गाय से दूध निकाल कर ही रहेगा. माँ के शोषण के लिए बस उसपर कोमलतम कवितायें ही लिखता रहेगा उसका शोषण रोकने के लिए उसे अपने संपत्ति में भागीदार नहीं बनाएगा. जैसा कि हम ‘इकोफेमिनिज्म’ में देखते हैं. यहाँ मुझे गोदान में प्रेमचंद की वह पंक्तियाँ याद आती हैं जहाँ पुरुष समाज के प्रतिनिधि के रूप में प्रेमचंद स्वयं को प्रस्तुत करते हैं ‘जब पुरुष में स्त्री के गुण आ जाते हैं तब वह देवता बन जाता है और जब स्त्रियों में पुरुषों का गुण आ जाता है तो वे कुलटा हो जाती हैं. यह कैसी पुरुष विडम्बना है. वह कैसे अपने स्वार्थ के लिए स्त्री के मन का अनुकूलन करता है. आज हम इसे साहित्य का गोपी भाव कह सकते हैं. पुरुष जैसे चाहे उसे नचाये, घुमाये और जब काम निपट जाए तो वह उसे योग मार्ग की शिक्षा दे या सन्यासी का चोला पहना कर उसके मन में यह भाव भर दे कि ‘मेरो को गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’. यह मनःस्थिति रखते हुए स्त्री आलोचना का विकास कदापि संभव नहीं है. उसे अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व में महादेवी का अक्स दे दिया जाय जो ‘मैं नीर भरी दुःख की बदरी’ की करुना जनित पीड़ा से बाहर न निकल पाए. बस जिन्दगी भर वह केवल स्यापा ही रोती रहे. ‘हूम-हूम करे’ का आपाद मस्तक भजन कीर्तन करती रहे. क्या यह सच नहीं है कि पुरुष वादी आलोचना और स्त्री मस्तिष्क में घुसी हुई वही पुरुषवादी आलोचना है.

अन्तराष्ट्रीय महिला-वर्ष के बीस बरस से अधिक बीत जाने के बावजूद भी भारत में अभी तक कोई ऐसा मुखर स्त्री विमर्श नहीं आया जिसे हम भारतीय स्त्री विमर्श मान सकें. जो कुछ उपलब्ध है उसे केवल प्रॉक्सी द्वारा ही हिंदी का अपना विमर्श कहा जा सकता है. बकौल अर्चना वर्मा ‘’हिंदी के अपने स्त्रीविमर्श का अर्थ क्या हो सकता है इसकी कोई साफ़ तस्वीर भी हमारे पास नहीं थी और इस सन्दर्भ में शुद्ध हिन्दीनुमा किसी वैचारिक साम्पदायिकवाद या बौद्धिकजातीयतावाद जैसा कोई खास दुराग्रह भी नहीं था’’ . अब प्रश्न पैदा होता है जब स्त्रीवाद को लेकर ही बहुत गहरे प्रश्न हैं तो वहां स्त्री आलोचना को ढूढ़ पाना थोड़ा कठिन कार्य अवश्य है. यह देखा जाना यहाँ लाजिमी है की आज हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं में स्त्री रचनाकारों की संख्या संतोषजनक है. वह कविता कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, जीवनी आदि का काम तो प्रचुर मात्रा में कर रही है पर आलोचना जो वैचारिकी को स्थापित करने का मुख्य और सशक्त विन्दु है वह वहां पिछड़ रही है. यह स्त्री आलोचना की महज एक पंक्ति है. माया एन्जेलों कि उन पंक्तियों को संबोधित करती हुई जिसमें वह कहती हैं ‘मैं रोज उदित होती हूँ’.हिंदी ने पचास वर्षों ने पचास से भी अधिक महत्वपूर्ण महिला रचनाकार दीं. जिनमें महादेवी वर्मा, सुमद्राकुमारी चौहान, चंद्र किरण सोनरिक्सा, कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी, उषा प्रियंबदा, मंजुला भगत, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, मृणाल पाण्डेय, नमिता सिंह, नासिरा शर्मा, अलका सरावगी, मधु काँकरिया, अनामिका, अनीता भारती, रजतरानी मीनू, गीतांजलि श्री, पद्मा सचदेव, मीराकांत, चन्द्रकांता राजा सेठ, सूर्यबाला और सुधा अरोड़ा, ने अपनी स्वतंत्र छवि बनाई है. इनकी मौलिकता पर कोई शंका नहीं की जा सकती. कुछ लेखिकाओं ने तो इस विषय पर बहुत बार और निरंतरता में लिखा है.

स्त्री स्वाभाविक आलोचक होती है और प्रकृति ने उसे स्वभावतः जो गुण दिया है वह उसमें ही कहीं पीछे दिखाई देती है. उसका रचनात्मक फैलाव बहुत विशाल है पर जब उसके साहित्य की परिधि का निर्माण करना होता है तो वह कहीं बहुत पीछे रह जाती है. यह सब जानबूझ कर और साजिसन किया गया है क्योंकि इससे पुरुष आलोचकों का एकाधिकार टूटेगा. अनेक खेमों में बंटा हुआ आज का हिंदी आलोचक ग्यारह वर्षों के लम्बें अंतराल में कुछ ऐसी स्त्री आलोचकों को नहीं पैदा कर पाया जिसे मुख्यधारा गर्व से धारित करती हो. आज भी भारतीय पुरुष समाज उतना ही बर्बर और क्रूर है जितना सामंती युग में था. स्त्री का लेखन उसे दोयम दर्जे का लगता है, उसकी आलोचना भी पुरुष को सुहाती नहीं है. यही कारण है कि जब हम हिंदी आलोचन की बात करने चलते हैं तो वहां से स्त्री पक्ष गायब मिलता है. कुछ नाम हम अपनी अँगुलियों पर रखने के सिवा कोई विकल्प नहीं ढूढ पाते. वह हजारो वर्षों से पुरुष की कृपा पर जीती आ रही है. जब पुरुष की इच्छा होती है तब वह रोटी डाल देता है नहीं तो सन्नाटा ही सन्नाटा दिखाई देता है. देश के और भागों में अमूमन स्त्री की दशा-दिशा भले अच्छी हो पर आज जिसे हम हिंदी पट्टी कहते हैं वहां की स्थितियां बहुत ही ख़राब हैं. समाज और साहित्य दोनों में वह आज भी बर्बरता ही झेल रही है. उन्हीं की कृपा है जो स्त्री विमर्श आज विमर्श की जगह अपनी मनोग्रंथियो को सहलाने का उपक्रम भर हो गया है.

मृणाल पांडे की ‘स्त्री लंबा सफर’ अनामिका की ‘स्त्री विमर्श की उत्तर-गाथा’ चारू गुप्ता की ‘स्त्रीत्व से हिंदुत्व तक’ तथा ‘मौसम बदलने की आहट’ तथा सुधीरचन्द्र की ‘रमाबाई: स्त्री अधिकार और कानून’देह की राजनीति से देश की राजनीति तक -मृणाल पांडे, दुर्ग द्वार पर दस्तक – कात्यायनी, स्त्रीत्व का मानचित्र – अनामिका, उपनिवेश में स्त्री – प्रभा खेतान, औरत के लिए औरत-नासिरा शर्मा, स्वागत है बेटी – विभा देवसरे, स्त्री पुरुष कुछ पुनर्विचार – राजकिशोर, स्त्री के लिए जगह – सं. राजकिशोर, स्त्रीत्ववादी विमर्श समाज और साहित्य – क्षमा शर्मा, स्त्री : मुक्ति का सपना – सं. प्रो. कमला प्रसाद, राजेन्द्र शर्मा, अतिथि सं. अरविन्द जैन व लीलाधर मंडलोई, स्त्री उपेक्षिता – सीमोन द बुआ, विद्रोही स्त्री – जर्मन ग्रेयर, स्त्री अधिकारों का औचित्य साधन – मेरी, वोल्स्टनक्राफ्ट, औरत की कहानी – सं. सुधा अरोड़ा’ अपना कमरा – वर्जीनिया वुल्फ, एक स्त्री की ज़िंदगी के चौबीस घंटे – स्टीफन ज्विग इस संदर्भ में पठनीय पुस्तकें है. आज वैचारिक परिपक्वता की भी कमी नहीं है.

आज जहाँ पश्चिम के विषद साहित्य ने भारतीय मानस को झकझोरा है वहीँ पर भारतीय भाषाओँ में कैद ज्ञान भी एक दूसरे के बहुत निकट आया है. दरवाजे अब लोग अपने पड़ोसियों के लिए खोल रहे हैं. फिर भारतीय साहित्य और हिंदी का पूरा परिक्षेत्र भी इससे कैसे अछूता रह सकता है. यदि हम हिंदी आलोचना के प्रथम पुरुषों पर ध्यान दें तो हम पायेंगे कि हिंदी में आलोचना के पुरस्कर्ता  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आरम्भ के सवा सौ पृष्ठों में एक जगह स्त्री प्रसंग की चर्चा की है कि सास-ननद के लाख समझाने के बाद भी स्त्रियाँ कापालिकों के प्रति उसी तरह से आकर्षित होती थीं जैसे कृष्ण के प्रति गोपियाँ. आचार्य के इस मत से कम से कम तीन तथ्यों पर बात होने की गुंजाइश बनती है – स्त्रियों का कापालिकों के प्रति आकर्षण एक समस्या थी. कृष्ण के प्रति गोपियों का प्रेम इस कापालिक प्रेम के विकल्प के रूप में प्रस्तावित किया गया. आकर्षण के बाद इन स्त्रियों का क्या हुआ? सिद्धों की सूची में लगभग सभी प्रमुख इतिहासकारों ने कुछ योगिनियों के नाम दिए हैं. मजेदार बात है कि ये सिद्ध अधिकतर कवि हैं और कोई भी योगिनी कविता करना नहीं जानती. किसी की भी एक पंक्ति उदाहरण के रूप में आज तक सामने क्यों नहीं आई?मूल्यांकन का मसला आरक्षण के मसले की तरह ठंडे बस्ते में ही पड़ा हुआ है. दरअसल हिंदी के पेशेवर आलोचक की रणनीति और राजनीति महिला लेखन को मुख्यधारा का अविभाज्य अंग मानने से सशंकित हो उठती है. स्त्री रचनाकारों की रचनाओं ने अपनी सहजता, सरसता और शालीनता से एक विशाल पाठक-वर्ग तैयार किया है. यह कोई कम बड़ा योगदान नहीं है.

बड़ी बात यह नहीं है कि आज भी हिंदी पट्टी में स्त्री आलोचना का अभाव है. इधर के कुछ वर्षों में कुछ नई स्त्री आलोचकों का आगमन तेजी से हुआ है या यह कहें कि अमूमन आजकल की आलोचिकाएं मुख्यतः रचनाकार हैं और प्रकरांतर से आलोचना के कार्य में प्रवृत्त हुई हैं. अपितु बड़ी बात यह है की बहुत सारी स्त्री आलोचना पुरुषवादी आलोचना का विस्तार भी है. कथादेश का जून, 2012 का अंक ‘औरत के नजरिये से’स्तंभ में ‘व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि’नामक लेख में शालिनी माथुर ने पवन करण की कविता ‘स्तन’ और अनामिका की ‘ब्रेस्ट कैंसर’ को सटीक विश्लेमषण के ऑपरेशन थिएटर में बुद्धि की मेज पर रख अपने अचूक तर्कों के पैने औजारों की मदद से दोनों कविताओं के रोगग्रस्त अंग/अंगों – उपमानों/रूपकों – की सफल शल्यक्रिया कर दी है. इस आलेख ने मानो हिंदी आलोचना में स्वयं तहलका मचा दिया. उन्हीं का ‘तहलका’ में प्रकाशित एक अन्य आलेख ‘मर्दों के खेला में औरत का नाच’ ने भी बहुत सनसनी फैलाई और साथ में समकालीन स्त्री आलोचकों को आगाह भी किया. आलेख कहता है कि स्त्री आज भी सच्चे अर्थों में पुरुष की चेरी मात्र है. हालाँकि यह लेख स्वयं भी विशुद्धतावादी और स्त्री की छवि को एक विशेष घेरे में खड़ा करने वाला ताब पर साथ ही इस आलेख ने पुरुषवादी स्त्रीआलोचना पर जमकर प्रहार किया. इसमें उन स्त्रियों की भी खोज खबर ली गई है जो आज भी पुरुषवादी आलोचना से बाहर नहीं निकल पायीं.अर्चना वर्मा आज की हिंदी आलोचना में एक बड़ा समादृत नाम है. आलोचना और तीखी आलोचना करने वाली अर्चना वैसे तो समग्रतः रचनाकार हैं पर आलोचना में भी उनका कोई सानी नहीं है. उन्होंने राजेंद्र यादव के साथ मिलकर स्त्री की एक अलग दुनिया की स्थापना की है. ‘हंस’ में 1986 से लेकर 2008 तक निरंतर संपादन सहयोग रहा है. उनके रचनात्मक साहित्य में कविता संग्रह : कुछ दूर तक, लौटा है विजेता, कहानी संग्रह : स्थगित, राजपाट तथा अन्य कहानियाँ, आलोचना : निराला के सृजन सीमांत : विहग और मीन, अस्मिता विमर्श का स्त्री-विचार आदमी की निगाह में औरत – राजेन्द्र यादव, अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य – अर्चना वर्मा, औरत उत्तरकथा – राजेन्द्र यादव के साथ मिलकर उन्होंने बड़ा काम किया है. आज के भी रचना जगत में वे इस फलक को और मजबूत ही कर रही हैं.

व्यक्तिगत तौर पर मेरा यह मानना है कि स्त्री स्वयं में आलोचकीय प्रतिभा से युक्त होती है. जितना सही और सटीक मूल्यांकन वह कर सकती है वैसा कहीं संभव नहीं है. हिंदी के तथाकथित बड़े विचारक यह मानते हैं हैं कि हिंदी भाषा और साहित्य को हम लिंग, जाति, समूह में बांटकर नहीं देख सकते. ‘आलोचना और विचारधारा’ सम्पादित डॉ. आशीष त्रिपाठी के माध्यम से नामवर सिंह एक बड़ा प्रश्न उभरते हैं. वे कहते हैं कि ‘ साहित्य में मुख्यधारा जैसी कोई चीज नहीं होती, धाराएँ होती हैं. काशी में मिश्रबंधुओं ने नवरत्नों में कबीर को शामिल नहीं किया था तो क्या हो गया? जिस समय साहित्य में जिस सौंदर्यशास्त्र और आलोचना सिद्धांत का वर्चस्व होता है, वह अपने से अलग साहित्य को हासिये पर डाल देता है.’’ स्त्री ने स्वयं को इतना आबद्ध पाया है कि वह पुरुष के बिना अपना अस्तित्व स्वीकार ही नहीं पाती है. आलोचना करने वालों में रोहिणी हैं, अच्छी आलोचना करती हैं. निर्मला जैन, सुनीता जैन, राजी सेठ हैं, इनकी आलोचना भी आती है. मगर ये मात्र आलोचक नहीं हैं, रचनाकार भी हैं. हिन्दी में किसी रचना की आलोचना उसे खांचों में बांट कर किया जा रहा है. स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श ये और वो, इन्हीं खांचों में रचनाओं को देखा जाता है. दूसरी बात जब महिला रचनाकारों की लेखनी को ही स्वीकृति नहीं मिली तो फिर वे आलोचना के क्षेत्र में कैसे जातीं. उनकी रचनाओं का न तो ढंग से मूल्यांकन होता, न जिक्र होता, न ही किसी तरह का पुरस्कार दे कर प्रोत्साहित किया जाता, तो उनमें आत्मविश्वास कैसे आएगा. अपने लेखन पर उन्हें कैसे विश्वास होगा.

स्त्री अपनी दुर्गति के लिए स्वयं जिम्मेदार है. आज भी हमें ऐसी स्त्रियाँ मिल जायेंगी जो स्वयं को पुरुष से अलगाकर नहीं देखतीं. जैसे वे दो स्वतंत्र नहीं एक शरीर हों. हिंदी के प्रतिष्ठित विद्वान राजेन्द्र यादव लिखते हैं कि ‘ इधर महिला लेखिकाओं की ओर से यह आग्रह बार-बार किया जा रहा है कि उनके लेखन को जनाना या मर्दाना कहकर न अलगाया जाय. लेखक सिर्फ लेखक होता है. उसके साथ महिला विशेषण लगते ही हम उसे ऐसे वर्ग में आरक्षित कर देते हैं जहाँ उसका लेखन ‘ कुछ ऐसा ही’ सा हो जाता है और लिहाज या प्रोत्साहन से देखे जाने वाली वस्तु की गंध देने लगता है…..यानि यह विभाजन एक षड़यंत्र है.’ कहते हैं समय अपने आलोचक स्वयं पैदा करता है. समकालीन रचना विमर्श में यदि रोहिणी अग्रवाल का नाम न लिया जाय तो सब कुछ अधूरा सा रहेगा. रोहिणी अग्रवाल समकालीन हिंदी आलोचना में उभरता हुआ एक दूसरा बड़ा नाम है. खासकर विमर्श और समकालीन हिंदी उपन्यासों पर उनके आलेख बहुत रोचक और ग्रहणीय हैं. वे अपनी बात बहुत अलग ढंग से रखने वाली आलोचक है. कहानी संग्रह : घने बरगद तले, आओ माँ हम परी हो जाएँ. आलोचना : स्त्री लेखन : स्वप्न और संकल्प, हिंदी उपन्यास में कामकाजी महिला, एक नजर कृष्णा सोबती पर, इतिवृत्त की सरंचना और संरूप (पंद्रह वर्ष के प्रतिमानक उपन्यास), समकालीन कथा साहित्य : सरहदें और सरोकार ‘साहित्य की ज़मीन और स्त्री-मन के उच्छवास’संपादन : प्रतिनिधि कहानियाँ (मुक्तिबोध) आदि. इधर के कुछ वर्षों में रचनाशीलता और व्यावहारिक आलोचना का एक बड़ा नाम है सुधा अरोड़ा. एक औरत की नोटबुक, जिस हिंसा के निशान दिखाई नहीं देते, स्त्री-शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल, आदि कृतियों ने लगातार स्त्री होने के अस्तित्व को चेताया है. अनामिका भी स्त्री विषयों को लगातार अपनी रचनाओं में उठा रही हैं. वे एक कवि ह्रदय के साथ एक समर्थ आलोचिका भी हैं. इधर आई उनकी पुस्तक स्त्रीत्व का मानचित्र – अनामिका ने काफी ख्याति अर्जित की है. हाँ कभी कभी वे अपनी आलोचना में उस पुरुष वादी परंपरा का नकार नहीं कर पातीं.डॉ. सुमन राजे लिखती हैं कि ‘समकालीन समीक्षा में डॉ. निर्मला जैन का नाम उल्लेखनीय है. यद्यपि ‘रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र’ उनकी डीलिट की थीसिस है, परन्तु तुलनात्मक सैद्धांतिक समीक्षा की एक दुर्लभ कृति है. आगे चलकर लेखिका ने मुख्यरूप से नयी समीक्षा को अपना कार्यक्षेत्र बनाया. नाट्य समीक्षा के सन्दर्भ में डॉ. गिरीश रस्तोगी का नाम महत्वपूर्ण है. उन्होंने एक सीमित क्षेत्र का चयन करके उसपर जमकर लिखा है.’’  इस क्षेत्र में स्वयं सुमन राजे का काम बहुत ही महत्वपूर्ण है. उनकी पुस्तक ‘ हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’  ने स्वयं एक इतिहास की रचना की. उन्होंने अपने पुस्तक में स्त्री इतिहास के उन पन्नों को उजागर किया जो आजतक कहीं दबकर रह गए थे.

इक्कीसवीं सदी के आगमन के साथ हिंदी आलोचना में दलित आदिवासी आलोचकों की आमद बढ़ी है. वे विमर्श के सरोकारों को तो उठा ही रही हैं साथ ही हिंदी आलोचना के प्रतिमानों को नकार कर नए प्रतिमानों का गठन भी कर रही हैं. आदिवासी साहित्य की नामचीन रचनाकार रोज केरकेट्टा कहती हैं ‘स्त्री को स्कूल के दिनों में ही हमें संक्षेपण करना सिखाया जाता है. स्त्रियों के बारे में समाज भी हमें ऐसा नजरिया देता है. हम जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों का संक्षेपण करते हैं. हमारा लेखन ऐसे संक्षेपण के खिलाफ है’. उनकी नई किताब ‘स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति’इसी स्थापना का विश्लेषण है.अभी हाल ही में ‘स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति’ का लोकार्पण झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा द्वारा रांची के सूचना भवन सभागार में आयोजित किया गया था. पुस्तक का लोकार्पण झारखंड के तीन पीढ़ी की प्रमुख स्त्री लेखिकाओं ने सामूहिक रूप से किया. समारोह में झारखंड के बौद्धिक समुदाय सहित युवाओं ने अच्छी-खासी भागीदारी थी. ‘पुरुष जगत में बराबरी का दर्जा मांगती स्त्री-लेखिकाएं और अधिकांश नामवर समीक्षक मासूम विनोभाई वक्तव्य देकर तालियाँ बटोरते हैं कि लेखन में स्त्री पुरुष विभेद गलत है: रचना सिर्फ रचना है. ईमानदारी से कहा जाय तो यह समानता बारीक पुरुष साजिस है.’

भारतीय भाषाओं में दलित स्त्री लेखन को रूपाकार लिए हुए दो दशक से ज्यादा गुजर चुके हैं. यह पूरा दौर दलित स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं, रचनाकारों के लिए कठिन संघर्षों का रहा है.दलित स्त्रीवादी आन्दोलन का जन्म भले ही अस्मितावाद की जमीन पर हुआ मगर जल्दी ही इस आन्दोलन ने अपने को अस्मितावाद की अनुदार चौहद्दी से मुक्त कर लिया.अब यहाँ दलित स्त्रीवाद की आलोचना का भी जन्म हो रहा है.गंभीर अध्येता और चिंतक अनीता भारती की रचनाएँ उनके वैचारिक संघर्ष का ही हथियार है. यहाँ वही जद्दोजेहद और उत्पीडक सामाजिक संस्थाओं के खिलाफ वही क्रोध से भरा, लेकिन तार्किक प्रतिरोध है जो उनके गद्य में दिखता है. अभी हाल ही में दलित स्त्रीवाद पर अनीता भारती की महत्वपूर्ण पुस्तक ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध” पुस्तक आई है., स्त्रीकाल पत्रिका का “दलित स्त्रीवाद” पर विशेषांक ने भी स्त्री आलोचना को नया आयाम दिया है.‘स्त्रीकाल’ पत्रिका और उसके संपादक लगातार स्त्री आलोचकों को एक प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध करा रहे हैं. हां जहाँ अभी तक शून्य पसरा हुआ था वहीँ पर सैकड़ो स्त्री रचनाकार अपनी रचनाओं, विमर्शों और आलोचना से हिंदी साहित्य को अनवरत समृद्ध कर रही है.

आये तुम इस धरती पर बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय !

  प्रो. परिमळा. अंबेकर


( कर्नाटक के गुलबर्गा में १० दिनों तक के एक कला शिविर में महात्मा बुद्ध की विभिन्न भंगिमाओं को उकेरा कलाकारों ने , प्रो. परिमळा अंबेकर की रिपोर्ट ) 



बुद्ध  के चरित्र की अनेक भंगिमाओं को पत्थरों में उकेरना , मूर्तिकार की कला के लिए वह कसौटी है जहाॅं उसका हथोडा और छेनी प्रस्थरों के गीत गाने लगते हैं । मूर्तिकार की कलासाधना की मेहक उसके दैहिक परिश्रम के स्वेद से मिलकर कठिन पत्थरों में जीवन और राग भरने लगती है । ऐसी एक प्रायोगिक चुनौती को रक्खा था युवामूर्तिकारों के सम्मुख,कर्नाटक मूर्तिकला अकादमी बेंगलूर ने,गुलबर्गा के सिद्धार्थ ट्रस्ट के साथ मिलकर ।

गुलबर्गा बुद्ध विहार के विशाल प्रांगण में आयोजित ‘‘शिला शिल्पकला शिविर‘‘ (14 मार्च से लेकर 28 मार्च

2015 तक )  में कर्नाटक राज्य के विविध भागों से लगभग दस से भी अधिक शिल्पकारों ने अपनी छेनी और हथोडे की कलात्मक गरिमा को, कला के प्रति के अपनी समर्पणबोध को इन सबसे बढकर , महाबोधी, गौतमबुद्ध के प्रति की अपनी सृजनात्मक अनन्यता को, अमिताभ के अद्वितीय निर्वेद्यबोध के प्रति मूर्तिकार की प्रामाणिक सजगता को दर्शाया । हेग्गडदेवनकोटे, बागलकोट आदि कर्नाटक के प्रस्थरी भागों में उपलब्ध कृष्णशिला ( ब्लैक स्टोन )  में, गौतमबुद्ध की निर्वेद्य बोध की विविध भंगिमा, तपश्चर्या की मुद्रायें और महानिद्रा की भव्य अनुभाव को इन कलाकारों ने उकेरा ।

इन मूर्तिकारों के सम्मुख फैले प्रस्थर के बडेबडे खंड, उनपर बडीही शालीनतासे चलते इनके हथोडे और अत्यंत
ही सधी हुई  छेनी की बारीक कटाव ,और… धीरे…धीरे….उन पत्थरों से उभरता हुआ अमिताभ का रूपाकार !! तल्लीनता से झुके कलाकरों की आॅंखें ,मुंडियाॅं, झुके बालों से टपकती श्रमस्वेद की बूॅंदे, छेनी हथोडा धरे हथेली के छालों से रिसते रक्त के थक्के, और… और…. उन कृष्णशिलाओं पर उभरता महाबोधी का मंदहास, एक विलक्षण ही कथा बयान कर रहे थे ।
अज्ञेय की पंक्तियाॅं , बुद्ध विहार के उस पवित्र प्रांगण में जैसे गूॅंजने लगीं-

वहीं-वहीं प्रत्येक भरे प्याला जीवन का,
वहीं-वहीं नैवेद्य चढा
अपने सुन्दर आनन्द-निमिषका,
तेरा हो ,हे विगतागत के वर्तमान के, पद्मकोश!
हे महाबद्ध !

कर्नाटक शिल्पकला अकादमी बेंगलूरू के अध्यक्ष श्री महादेवप्पा.शंभुलिंगप्पा. शिल्पी  , गुलबर्गा बुद्ध विहार के

विशाल बाह्य आवरण में आयोजित प्रस्तुत शिल्पकला शिबिर के निर्देशक शिल्पी श्री एस्.पी.जयण्णाचार एवं शिबिर के सदस्य संचालक श्री महेशकुमार.डी. तळवार, पंद्रह दिन के इस क्यांप में प्रस्थरों में गौतम बृद्ध की प्रतिमाओं को खिलाने में ,जो लगन और निष्ठा दिखायी वह विशिष्ठ रही !!

दस से भी अधिक युवा मूर्तिकार अपने सहायक साथियों के साथ अपने हाथों की अद्भुत प्रतिभा, हथोडा और छेनी की तिलिस्मभरी कला से गौतमबृद्ध की अलौकिक साधना को यथा संभव साकार रूप देने में निमग्न रहे । शिल्पि श्री कांतराज.आर ;बेंगलूरूद्ध , शिल्पि श्री शशिधरआचार्य ;दक्षिणकन्नडजिल्लाद्ध , शिल्पि श्री महेशकुमार.एम्.एस् ;मंड्या जिलाद्ध, शिल्पि श्री होन्नेश्वर.बडिगेर ;हावेरीजिलाद्ध, शिल्पि श्री शांतगौडर्.एस्.तिम्मगौडर् ;गदगजिलाद्ध,  शिल्पि श्री नागराज.एम्.एस ;चिक्कमंगळूरू जिलाद्ध, शिल्पि श्री लक्षमणराॅव जादव ;मैसूरजिलाद्ध, शिल्पि श्री गोपाल.वी.पांचाळ ;गुलबर्गाजिलाद्ध, शिल्पि श्री मौनेशकम्मार ;रायचूरजिलाद्ध, शिल्पि श्री राजेश.के.बी ;शिवमोग्गाजिलाद्ध आदि युवामूर्तिकारों ने कर्नाटक के विविध जिलों का प्रतिनिधित्व किया ।

सिद्धार्थ की महानिर्वाण की यात्रा महाबोधी के निर्वेद्य ,विकास और शांति का महामंत्र इस भरतभूमि का शाश्वत सत्य है । यह वह इतिहास है जो सार्वकालिक है । बहुजन हिताय  है !! बहुजन सुखाय है !! जो हर कला शिबिरों में खिलते आ रहा है और खिलते ही रहेगा ! जैसे प्रस्थरों में खिला हुआ पद्मकोश !! अंत में  ‘महादेवी वर्मा‘ को कोट करते हुए

तुमसे ही घोषित हुआ सत्य
हिंसा न कभी हिंसा उपाय !
आये तुम इस धरती पर
बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय !

प्रो. परिमळाअंबेकर,अध्यक्ष,हिन्दीविभाग ,गुलबर्गाविश्वविद्यालय,गुलबर्गा-06 कर्नाटक.
सं/ 09480226677. ई-मेल : parimalaambekar@gug.ac.in

शर्म

हरि भटनागर

लघु जीवन के रचनाकार हरि भटनागर के चार कथा संग्रह और एक
उपन्यास प्रकाशित है
रूस के पुश्किन सम्मान सहित कई सम्मान से सम्मानित. सम्पर्क : मो॰ 09424418567

(  हरि भटनागर  निम्न मध्यम वर्ग और हाशिये के जीवन , संघर्ष और पीड़ा के रचनाकार हैं.  यह कहानी इसकी बानगी है.  यह कहानी नया ज्ञानोदय और फॉरवर्डप्रेस में प्रकाशित हो चुकी है ) 

कीचड़ भरा रास्ता किसी तरह पार करता जब मैं उस औरत के झोपड़े के सामने पहुँचा तो वह झोपड़े के बाहर पटे पर बैठी, छोटे-से पत्थर पर बर्तन घिस रही थी। हाथ उसके राख से रँजे थे। धोती घुटने के ऊपर चढ़ी थी और दोनों पाँव हवा भरे साइकिल के ट्यूब की तरह चिकने और चमकदार लग रहे थे। हल्के सुनहरे बारीक बाल घुटनों के नीचे से शुरू होकर पायल के घेरे तक चले गये थे। पटे पर वह एड़ी चढ़ाए बैठी थी, इसलिए दबाव की वजह से पाँवों की माँसपेशियाँ रह-रह और भी चमक उठती थीं जिन्हें कुछ क्षण पहले देखकर वह ख़ुश भी हुई थी क्योंकि गुर्जर ने पिछली दफा की मुलाक़ात में उसके पाँवों की भारी तारीफ़ की थी कि ‘क्या मछली माफिक गोड़ हैं, आँखें जुड़ा जाती हैं। बीहड़ में कहीं टिकती नहीं, यहाँ सुकून पाती हैं…’‘हट’ कहकर वह मुस्कुरा दी थी। इस वक़्त भी वह मुस्कुरा दी और पाँवों को ग़ौर से देखने लगी। आसमानी रंग की काले किनार की वह धोती पहने थी जिसका पल्लू सिर से सरककर पीठ पर था। बाल हल्का तेल डालकर कसके ओंछे गए थे, चोटी की शक्ल में जो ऐंठे हुए उसकी गोद में दबे थे। घुटनों का दबाव स्तनों पर था जिसे पीले ब्लाउज़ के घेरे से ऊपर साफ़ देखा जा सकता था। गले में चमकते मोतियों की माला थी। हाथों में सुनहरी चूडि़याँ जिन्हें अभी दो दिन पहले उसने मनिहार से पहनी थीं। पाँवों में गोजर जैसी पायलें थीं। नई हवाई चप्पल, माथे पर छोटी-सी लाल बिंदी और माँग में माथे पर ज़रा-सा ईंगुर…

कुल मिलाकर अपनी धज में वह निहायत सुंदर लग रही थी। एक पल को मैं उसे देखता ही रह गया। या यों कहें कि पुलिस मुख्यालय के दबाव से मैं बेहाल था। बीहड़ के थाने का यही रोना है। मुझे गुर्जर डाकू जिंदा या मुर्दा किसी भी हाल में चाहिए था। ऐसा न होने पर नौकरी के जाने का ख़तरा था, ऊपर से बचाव के आरोप में मुक़दमा चलाए जाने की धमकी थी। ऐसे में आप सोच सकते हैं कोई व्यक्ति सुकून से कैसे बैठ सकता है! मेरा उठना-बैठना, सोना, खाना-पीना सब तर्क था। कुछ सूझता न था। दिल-दिमाग़ और आँखें मुँद-सी गई थीं। कोई सनसनी शेष न थी।लेकिन इस वक़्त, इस औरत को देखा तो लगा जैसे सोते से जागा… कोई ख़ूबसूरत चीज़ है जो आँखों के रास्ते होती हुई दिल में हलचल मचा रही है…

मुझे देखते ही वह सचेत हुई। काम करते उसके हाथ रुक गए। जैसे कोई आँख उसे भेद रही हो, इस एहसास के चलते राख सनी चुटकी से पहले उसने सिर पर आँचल खींचा, फिर हथेलियों से घुटनों के नीचे धोती सरकाने लगी। यह सब करते उसके माथे पर बल था मानों कह रही हो, खाँस के आना चाहिए, ये क्या कि दबे पाँव सिर पर आ खड़े हुए… उसने होंठ सिकोड़कर मन ही मन में गालियाँ दीं कि हट यहाँ से, दूर हो कमीन!
और जब मैं आ खड़ा हुआ तो बिना तहकीकात के पीछे हटने वाला न था। जीप सड़क पर थी। राइफलधारी हवलदार भी वहीं रोक दिए थे। कीचड़ के बीच जमंे ईंटों पर किसी तरह लाल जूते टिकाता यहाँ आ भी गया था। काँख में कैप थी। दाएँ हाथ में रूल।

औरत को सचेत होता देख मैंने उस पर से नज़रें हटाईं और झोपड़े को देखने लगा जिसमें यह औरत रहती होगी। झोपड़ा खपरैलों का था, ऊपर बीच में धँसा-सा। जैसे शहतीर बैठ गई हो। खपरैल काई से भरे थे, बीच-बीच में उखड़े और टूटे। झोपड़े के ऊपर आगे की ओर एक नया सूप था जिसमें सूखने के लिये धनियाँ रखा था। दरवाज़ा यानी टटरा बाँस की खपच्चियों का था तारों और सुतलियों से बँधा, बाहर की तरफ़ ओलार। रोक के लिये ज़मीन में खूँटा गड़ा था जिसके सहारे वह ठहरा था।झोपड़े के बाएँ हाथ पर नीम का विशाल पेड़ था।झोपड़ा ऊँचाई पर था यानी टीले पर जिसके गिर्द गहरी ढलान थी जहाँ से खेतों का सिलसिला शुरू होता था। खेत ऐसे कि लगता था उनमें वर्षों से हल नहीं चले हैं, बंजर हो गए थे। ज़ाहिर था, गुर्जर जब पैसे बरसा रहा है, तो खेती क्यों की जाए! ख़ैर, खेत में इस वक़्त जंगली घास-फूस या कहें गाजर घास जमे थे।झोपड़े के ऊपर कोने पर एक बड़ा-सा सफे़द, पीली चोंच का गिद्ध बैठा था, बड़ा डैना फैलाए जैसे झोपड़े को किसी भी विपदा से बचाने वाला हो।
खेतों के पार जहाँ थोड़ी ऊँचाई दीखती थी, किसानों की आठ-दस झोपडि़याँ थीं। सामने नीम-पीपल के घने पेड़ थे जिनके नीचे गाय-भैसें बँधी थीं।इस झोपड़े के पीछे शायद बकरियाँ बँधी थीं जिनकी मिमियाने की आवाजें़ आ रही थीं।

यकायक खाँसकर मैंने औरत का ध्यान अपनी ओर खींचा। उससे आँखें मिलते ही, मैं मुद्दे पर आने को था, तभी पैतरा बदल दिया। जैसे मैं किसी तहकीकात के लिये नहीं आया, बस यूँ ही चला आया। लेकिन यह औरत मेरा मंतव्य ताड़ गई, उसने मुँह बनाकर बग़ल में थूका। जब मैंने जेब से पाँच-पाँच सौ की गड्डी निकाली और एक-एक कर उन्हें गिनने लगा तो उसने और भी बुरा मुँह बनाया-कमीन नोट दिखला रहा है! और इतनी नाटक-नौटंकी काहे की! आया है गुर्जर की खोज ख़बर लेने और दिखा रहा है पैसे, जैसे मैं बिछ जाऊँगी! थू है तुझ पर, कितना भी पैसा दिखा, तेरा भरोसा नहीं, तू बदमाशों का सिरका है जिसके तार ऊपर तक जुड़े हैं जिनका काम ग़रीबों को सताना, उनका खून पीना है, और वह गुर्जर? वह डाकू ज़रूर है लेकिन मुझे सच्चे दिल से प्यार करता है, मैं भी उसे प्यार करती हूँ, इसके लिये गाँव के लोग जलते हैं तो जलें, इसकी मुझे रत्ती भर परवाह नहीं! और आदमी, तंगी से इतना आजिज़ आ गया है कि कुछ बोलने से रहा…

यकायक खाँसकर मैंने कुछ नोट ज़मीन पर गिरा दिए जो हवा में उड़ने लगे। यह सोचकर कि उड़ते नोट औरत उठा लेगी लेकिन यह दुष्ट, नाकिस है कि उठाना तो दूर, उसने नोटों की तरफ़ नज़र न डाली। उल्टे बर्तनों को और भी लगन से और जो़र-ज़ोर से घिसने लगी जैसे जतला रही हो कि नोटों की तुलना में बर्तन घिसना अच्छा है।लेकिन मैंने हार न मानी। यही भाव दर्शाता रहा कि मैं कोई ग़लत आदमी नहीं हूँ, तेरी ख़ूबसूरती का दीवाना हो गया हूँ, तू चाहे कितना भी सताए, मैं उफ करने वाला नहीं।नोट बीन कर मैं बहुत देर तक उसके सामने खड़ा रहा लेकिन उसने न मेरी ओर देखा और न ही मेरे दिल में उठ रही भावना को इज़्ज़त दी, ऐसे में आप समझ सकते हैं, अच्छे-अच्छों का दिमाग़ फिर जाए, फिर मैं क्या हूँ! वर्दी का गुरूर अलग अपना रंग दिखाने लगा। उसी के बहाव में मैंने कहा, बड़ा घमंड है तुझे?
इस बार उसने मुझे सवालिया निगाह से देखा, जैसे पूछ रही हो किस चीज़ का घमण्ड है?
गर्जुर का! मैंने दृढ़ता से कहा।
कौन गुर्जर? वह अनजान बनी।
अच्छा! कौन गुर्जर? अब कौन गुर्जर हो गया वह? मैंने आँखें मटकाकर कहा, ऐसई होता है…
क्या ऐसई होता है? वह और गहरे उतरी।
मैंने कहा, जिसके हाथ रंगरेलियाँ मनती हैं, उसके साथ ऐसई होता है!
ढंग से बात कर! उसने राख सने हाथ बाल्टी में डाले और पानी में तूफान-सा उठाया,  जैसे उस तूफान में मुझे डूबो देगी।
ढंग से ही बात कर रहा हूँ! गुर्जर तेरे पास आता है… रात-बिरात… पूरा गाँव कह रहा है!!!
चोप्प हरामी! वह ज़ोरों से चीखी, मूड़ीकाटा, कुछ भी बकबका रहा है! पुलिस है तो कुछ भी बोलेगा…
मैंने ऐलान-सा किया, बिल्कुल, कुछ भी बोलूँगा, गुर्जर का पता दे, नहीं, थाने चल!
यकायक उसने एक नाटक खड़ा कर दिया। वह ज़ोरों से चीखी और हन-हन के छाती पीटने लगी, ज़मीन पर बैठकर और रोने लगी चिल्ला-चिल्लाकर जैसे किसी ने उसके साथ गड़बड़ कर दी हो।

मुझे लगा कि अभी पलभर में गाँव का हुजूम इकट्ठा हो जाएगा और यह सबके सामने अपनी इज्ज़त की दुहाई देकर ज़मीन पर चीख-चीख के सिर पटकेगी कि इस नाकिस ने मेरी आबरू लूटी। मारो! पकड़ो! बचाओ! और लोग मुझे शक़ की निगाह से देखेंगे। थानेदार हूँ तो क्या? ऐसे नाटक में कुछ भी संभव है। मैंने ऐसा सोचा और पलभर के लिये सकते में आ गया लेकिन दूसरे पल देखा, उसके दुबले-पतले, मरियल से आदमी के सिवा कोई दौड़ा नहीं आया। आदमी झोपड़े के पीछे बकरियों को पत्तियाँ खिला रहा था। वह सफे़द, पीली चोंच का गिद्ध भी चुपचाप उड़ गया जो झोपड़े पर पंख पसारे बैठा था। दो-चार किसान ज़रूर अपने झोपड़े के बाहर दिखे, मगर वे भी वहीं, दूर खड़े रहे, उल्टे आड़ में आ गए; शायद यह सोचकर कि कसबिन के चक्कर में कौन पड़े। जैसा करती है, वैसा भरेगी, पुलिस नहीं आएगी तो भला कौन आएगा। अब मज़ा आएगा, ख़ूब गर्रा रही थी गुर्जर के नाम पर, अब भुगत…

यकायक उसका आदमी, धीरे-धीरे डुगरता-सा मेरे सामने आ खड़ा हुआ। आदमी मरा-मरा सा था। हडि़यल। लम्बी गर्दन। मुँह पिचका। काला। सूखा। चेहरे पर बिररी खिचड़ी दाढ़ी-मूँछें। दाँत ऐसे कि सुपारी के इंतहा सेवन से ऊपर से घिस गए हों। सिर पर वह गंदा-सा मटमैला गमछा बाँधे था। बदन पर गंदी, चीकट बनियान थी। नीचे लम्बा-ढीला, तेल के धब्बों से भरा पायजामा था। नंगे पाँव था। वह बीमार लग रहा था मानों लंघन से उठा हो।
जब वह औरत के चीखने-चिल्लाने पर पत्तियाँ फेंकता दौड़ा आया, उसका चेहरा उस वक़्त बुझा और आँखें राख-सी ठण्डी थीं। मानों दौड़े आने का उसे अफ़सोस हो। गर्दन उसकी झुकी थी और आँखें नीचे किए था। गोया आँखें मिलाने से बच रहा है। ऐसा लगता था, औरत के गुर्जर के खुले रिश्ते की वजह से गर्दन शर्म से मुकम्मल तौर पर झुक गई हो और जो कभी सीधी नहीं हो सकती। इसका असर आँखों पर भी था जिन्हें हर वक़्त वह नीचे किए रहता, किसी से मिलाता नहीं था।

मुझे देखते ही उसमें एक हौल तैर गया जैसे सोच रहा है कि यह राँड़ तो मरेगी ही, मैं भी बचने वाला नहीं। उसने गहरी साँस ली। यकायक अपने को सँभाला, अनजान-सा बनता, नीचे देखता मुझसे बोला-क्या बात है हुजूर?फिर चीखती, सिर पीटती औरत से मुख़ातिब हुआ जैसे आँखों से बरजता कह रहा हो कि तूने तो मुझे कहीं का न रखा, अब और गत क्या करवाना चाहती है! पिट्टस क्यों डाले हैं? चुप हो जा। फालतू बखेड़ा न खड़ा कर! फिर भैराया-सा उसी अंदाज़ में झुकी गर्दन और नीची आँख किए मुझसे बोला, बैठो हुजूर! खाट कहाँ है? खाट के लिये वह इधर-उधर निगाहें दौड़ाने लगा।
इस बीच औरत रोते हुए चीखी, खाट दे रहा है हरामखोर! ठठरी दे!
आदमी ने उसकी ओर कड़ी निगाह से देखा।
औरत चीख़ी, आँख न दिखा, नहीं निकलवा लूँगी। समझता क्या है अपने को, कौरहा कहीं का! नीच!
आदमी पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया। खिसिया गया।
यकायक औरत रोती, चिल्लाती, पैर पटकती झोपड़े के अंदर चली गई। अंदर जाते-जाते उसने टटरा बंद करना चाहा, उसे खींचा, लेकिन तुरंत छोड़ दिया जो खूँटे से जा टकराया।

तुम इसके आदमी हो? गहरी साँस छोड़ते हुए मैंने पूछा तो उसने झुकी गर्दन, नीची आँखों गहरे अफ़सोस में ‘हाँ, हुजूर’ कहा और हँड़ीली छाती पर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। जैसे औरत की नादानी को माफ़ करने के लिये विनती कर रहा हो। मुझे कुछ न सूझा तो उसे अपने पीछे आने का हुक्म दिया और सपाटे से, कूद-सी लगाता जीप के पास आ गया। वह लस्त-सा आगे बढ़ा कि पीछे से उसकी औरत की चीख़ उभरीµकहाँ जाता है, लौट पीछे! औरत झोपड़े के बाहर खड़ी चिल्ला उठी थी।आदमी के पाँव रुक गए। मुमकिन है, औरत की धमकी से डर गया हो, लेकिन जब मेरी कड़क आवाज़ सुनी तो वह मेरी ओर बढ़ने लगा। गोया अपनी निर्दोषता के चलते ऐसा करने लगा। जो भी हो, औरत चीखती चिल्लाती और उसे धमकाती रही और वह बुरा-सा मुँह बनाता, बड़बड़ाता-सा जैसे अपने आप को कोस रहा हो, मेरी ओर बढ़ा।  जीप में बैठालकर मैं उसे गाँव से काफ़ी दूर, एकांत में बँसवारी के बीच ले आया जहाँ लचकते बाँस और चिटकारी मारती गिलहरियों के अलावा दूरµदूर तक कोई दिखलाई नहीं पड़ता था। बीहड़ में यह बीहड़ एकांत था। राइफलधारी मेरे पीछे खड़े थे।

तेज़ गर्मी थी और हवा में उमस और चिपचिपापन था। चारों तरफ़ काली मक्खियाँ मँडरा रही थीं जो शायद गर्मी से परेशान होकर हम लोगों को बेतरह काट रही थीं। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि किसी से कोई बात उगलवा लेने या उसे सज़ा देने के लिए यह काफ़ी उपयुक्त जगह है। इसी का नतीजा था कि यह आदमी चार-छै रूल पर ही हाय-हाय करने लगा, लेकिन आश्चर्य था कि वह कोई सुराग देने के लिए मुँह नहीं खोल रहा था।
कब आता है गुर्जर?
वह चुप।
जब आता है, तू कहाँ रहता है?
वह निष्कंप, पुतले जैसा।
भेद देने पर एक लाख नकद दूँगा और काई आँच तुझ पर नहीं आएगी, भरोसा रख।
ऐसे बहुत सारे सवाल मैंने उससे किए और जवाब न देने पर मैंने वो सुताई उसकी की जिसके लिए पुलिस को बदनाम माना जाता है, लेकिन वह भी गज़ब के जिगरे का आदमी कि उसने मुँह नहीं खोला तो नहीं खोला, सिवा चीख-चिल्लाहट के!

तभी हुआ यह कि जब यह आदमी किसी तरह गुर्जर का सुराग़ नहीं दे रहा था, मदद के लिए मिनक नहीं रहा था, मंैने उसे हाथ-पैर बाँधकर पेड़ से उल्टा देने का आदेश हवलदारों को दिया। सज़ा का पुराना तरीका, नीचे आग जलाई जाए और उस पर मिर्च डाली जाए…हवलदार हाथ-पैर बाँधने को उद्यत हुए कि इस आदमी ने इतना भर क़बूल किया कि मालिक, गुर्जर उसकी घरवाली के पास आता है, मगर उसे ख्ुाद पता नहीं चलता कि कब आता है… घण्टों तंग करके, चुप्पी के बाद सिर्फ़ इतना बोलने पर, जिसका कोई ख़ास मतलब नहीं था, पता नहीं क्यों मुझे इस क़दर गुस्सा आया कि मैंने उसे कसकर एक झन्नाता थप्पड़ मारा और कहा तेरी औरत के साथ पराया मर्द सोता है और तुझे पता ही नहीं चलता!  मुझे हँसी-सी आई, फिर थोड़ा रुककर अफ़सोस में बोलाµहद है! और इस पर तुझे ज़रा भी शर्म नहीं आती!थप्पड़ इतना करारा था कि आदमी चैंधिया गया और जमीन पर लोट गया, कटे पेड़µसा। एक पल को लगा, निपट गया, लेकिन निपटा नहीं था। हाथों में उसके कंपन हो रहा था जिन्हें वह चोट खाई जगह पर रह-रह फिराने लगा।कनपटी पर मार की झनक जैसे आँखों और दाँतों में उतर आई हो- इसका एहसास-सा करता वह सहसा कराहा, फिर इतने लम्बे वक़्त में पहली बार उसने गर्दन उठाई। और सूनी आँखों से मुझे देखा फिर मेरी बात का जवाब देने से जैसे अपने को वह रोक नहीं पाया, फटी-फटी-सी मुर्दार आवाज़ में बोला, हुजूर, मेरी जगह पर आप होते तो शरम तो आपको भी नहीं आती, फिर मैं तो आपका गुलाम हूँ सरकार!

उसने अपनी जगह मुझे रखकर मेरी फजीहत-सी कर डाली थी। एक क्षण को मैं सन्न-सा रह गया। खिसिया गया- ऐसे में एक चारा था कि उसकी ख़ूब कुटम्मस की जाए। लात-घूसों से उसकी ख़ूब ख़बर ली। गुर्जर का पता तो नहीं चला, मगर पिटाई से जी हल्का क्या होता, हाँ, उसका कहा मेरे कलेजे में ज़ंग लगी कील की तरह ठुक गया जिसे मैं शायद ही कभी भुला पाऊँगा।

स्त्री देह का मर्दवादी विमर्श

पूनम सिंह

कथाकार , कवि और आलोचक पूनम सिंह की कहानी , कविता और आलोचाना की कई किताबें प्रकाशित हैं . सम्पर्क : मो॰ 9431281949

समकालीन कविता की प्रगतिशील धारा को कुछ लोग धूमिल की धारदार विद्रोही कविता और 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से जोड़ कर देखते हैं लेकिन गंभीर पड़ताल करने के बाद प्रगतिशील धारा और विद्रोही कविता के बीच एक विभाजक रेखा साफ दिखाई देती है । प्रगतिशील धारा यथार्थोन्मुख और संवेदनशील होती है । इसमें जनता और उसका नेतृत्व प्रमुख होता है । इसमें जीवन के विराट चित्र , मानव के परस्पर संलग्न दुःख और स्वप्न तथा आधुनिक भावबोध की वैचारिक चेतना होती है । दूसरी ओर विद्रोही कविता और अकविता अमानवीय तंत्र के विरूद्ध भीषण दबाब से फूटा एक विस्फोट है जिसमें लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति एक नकार का भाव है । विद्रोही कविता और अकविता दोनों साठोत्तरी मानसिकता की उपज हैं ।

हिन्दी साहित्य के साठोत्तरी दौर में भारतीय समाज में पूंजीवादी सामंतवाद की  स्थापना के साथ शोषक और शोषित के बीच एक बड़ी खाई बन गई थी । जनवादी लोकतंत्र की स्थापना का स्वप्न खंडित हो चुका था । भारतीय व्यवस्था इजारेदारों के हाथ के रिमोट से संचालित हो रही थी । स्वतंत्र देश के जनगण की त्रासदी का वह एक नया दौर था । शोषण व्यवस्था के द्वारा उत्पन्न किए गये विविध संकट और त्रासदी से इस दशक के रचनाकारों का मानस उद्वेलित हो रहा था । प्रगतिशील आंदोलन विघटित हो चुका था और उससे जुड़े अधिकतर लेखक आधुनिकतावादी साहित्य के गहरे दबाब में आ चुके थे । विचारधारात्मक नेतृत्व के बिखर जाने के कारण साहित्य में एक अराजकता की स्थिति पनपने लगी थी । दिशाहीन होकर कविता साम्राज्यवादी संस्कृति की ओर उन्मुख हो गई । इसी समय पाश्चात्य काव्य शैली ‘बीटनिक’ से प्रभावित रचनाकार यौनमुक्ति और देह की राजनीति में अपनी सर्जना को होम करने लगे । यह नई कविता से अकविता तक का एक अराजक और द्वन्द्वात्मक रचनात्मकता का दौर था जो समय के विकर्षण से उत्पन्न हुआ था । कई युवा रचनाकार विक्षोभ और आक्रोश के कारण विकल्पहीन विद्रोह और सर्वनिषेधवाद की ओर उन्मुख हो  गये थे ।धूमिल नई कविता और अकविता के बीच से निकले स्वतंत्रचेता रचनाकार थे ,जिनके भीतर वाम और जनवादी तत्व थे किन्तु मानसिकता में निषेधवाद का स्वर ही प्रबल था । उनका निषेधवाद जितना व्यवस्था के विरूद्ध था उतना ही स्त्री के विरूद्ध भी ।

एक क्रांतिचेता मानस का स्त्री विरोधी होना उसकी संपूर्ण सर्जना को कहीं बहुत कमजोर और झूठा साबित करता है । दूसरी तरफ हमारे आस्वादन प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है ।‘संसद से सड़क तक’ जैसी रचना के क्रांतिकारी निहितार्थों के बीच धूमिल की स्त्री दृष्टि का पाठ एक भिन्न प्रकार की अवधारणा को जन्म देता है , ठीक मध्यकाल के विद्रोही कवि कबीर की स्त्री दृष्टि की तरह । कबीर मध्यकाल की प्रगतिशील  चेतना के सबसे महत्त्वपूर्ण कवि है । उनका स्त्री विरोध उनकी काव्य प्रकृति से सर्वथा भिन्न है । कबीर के पदों में सामाजिक सांस्कृतिक और वैचारिक संघर्ष के प्रखर स्वर हैं परन्तु स्त्री के विरूद्ध हर जगह नकार का भाव है । उन्होंने नारी को विष का खान और नरक का कुण्ड कहा है । नारी के सानिध्य में बुद्धि विवेक भ्रष्ट हो जाती है । किसी कार्य की सिद्धि नहीं होती । रूढि़गत मान्यताओं की धज्जियाँ उड़ाने वाला कबीर स्त्री को लेकर इतना रूढि़ग्रस्त और संकीर्णतावादी कैसे है – यह प्रश्न जिस तरह मन को झकझोरता है उसी तरह धूमिल के विद्रोही स्वर की सीमा उनकी स्त्री दृष्टि की संकीर्णता से परिभाषित होती है ।

वैसे तो हर युग के समय और समाज में दलितों और स्त्रियों के प्रति घोर उपेक्षा का भाव रहा है परन्तु ं  मध्यकाल के कवियों ने दलितों के पक्ष में अपनी भूमिका तय की है यद्धपिे स्त्री को लेकर उनकी सोच में कोई बदलाव नहीं दिखलाई देता । भक्तिकाल में स्त्री का विरह पुरूषों की काव्य चेतना का वण्र्य विषय बना लेकिन उसकी सामाजिक स्थिति और नियति पर किसी कवि की दृष्टि नहीं गई । भक्तिकाल में कबीर , तुलसी सब ने स्त्री की उपेक्षा की है । श्रृंगार काल में वह केवल दैहिक काया बन कर रह गई । उस काल के नख शिख  वर्णन में स्त्री के अंग प्रत्यंग विवेचित हुए । हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में नवयुग की चेतना के प्रसार के साथ स्त्री स्वातंत्र एवं समानता की भावना का विकास हुआ । अयोध्या सिंह उपाध्याय के काव्य में पहली बार स्त्री देश प्रेमिका , जाति प्रेमिका , लोक सेविका के नवीन रूपों की उद्भावना के साथ चित्रित हुई । प्रिय प्रवास की नायिका राधा लोकहित के लिए प्रिय के सापीप्य का त्याग करती है – ‘‘प्यारे जीवें जगहित करें / गेह चाहे न आवें ’’। मैथिलीशरण गुप्त की उर्मिला , यशोधरा , द्वापर की  विधुता आदि ऐसी ही नारी हैं जो नवयुग की चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं । छायावाद में स्त्री प्रेम और सौंदर्य की प्रतिमान बनी तो प्रगतिवाद में ‘तोड़ती पत्थर’ के रूप में श्रमसौंदर्य का एक नया दृष्टांत । लेकिन ‘जीभ और जाँघ’ के बीच स्त्री अकविता के दौर में ही दिखाई देती है ।

धूमिल सातवें दशक की प्रतिरोधी चेतना के एक महत्वपूर्ण कवि हैं जहाँ से जनवादी कविता की एक नई परम्परा की शुरूआत होती है । सन 1967 से 74 के बीच की जो युवा आक्रोश वाली कविता है जिसे लोग नक्सल प्रभावित कविता कहते हैं उसके केन्द्र में धूमिल हैं । धूमिल का कवि एक दुर्घर्ष व्यक्तित्व लेकर अराजक समय पर वार करता है । लेकिन यह कैसी विडम्बना है कि उसके  भीतर का विक्षोभ , असंतोष , तनाव और विद्रोह स्त्री के गर्भाधान की क्रिया से गुजर कर कविता के पाठ तक पहुँचता है – ‘‘एक संपूर्ण स्त्री होने के पहले ही / गर्भाधान की क्रिया से गुजरते हुए / उसने जाना कि प्यार / घनी आबादी वाली बस्तियों में मकान की तलाश है / उसने जाना कि हर लड़की / तीसरे गर्भपात के बाद / धर्मशाला हो जाती है और कविता / हर तीसरे पाठ के बाद —’’
अपने समय की बर्बरता और लंपटता को धूमिल स्त्री के रूपक द्वारा जिस तरह कविता में विवेचित करते हैं , वह एक जटिल मनःस्थिति है परन्तु स्त्री अस्मिता के संदर्भ में अनुभूति और संवेदना की एक कुत्सित दृष्टि  । धूमिल की कविता में स्त्री अनेक अशुभ और वीभत्स रूपों में बिम्ब और प्रतीकों में ढ़लकर आकार पाती है ।
धूमिल के कवि ने अपने कथ्य को विस्फोटक ढ़ंग से प्रस्तुत करने के लिए अभिव्यक्ति की निजता में स्त्री देह को शर्मसार किया है ।

कवि को पता है कि सत्ता की गुलामी पालतू बन कर ही की जा सकती हैं इसलिए वह खानाबदोश औरत की जाँघों में घुस कर खुद को पालतू होने से बचा लेता है । धूमिल की कविता ‘मकान’ की पंक्तियाँ हैं – ‘‘यह सन 1960 की बात है /जब मैं अपनी कविताओं की हद फाँद रहा था / अचानक मुझे इस बात का पता चल गया / और मैंने उस खानाबदोश औरत की जाँघों में घुस कर / खुद को पालतू हाने से बचा लिया ।’’ इस कविता में एक तीर से दो निशाने किये गये हैं – एक निशाना बर्चस्वशाली पुरूष सत्ता की ओर है तो दूसरा स्त्री की ओर । कवि यहाँ मकान के प्रतीक के रूप में दो भिन्न स्त्रियों की छवि को सचेतता से चिन्हित करता है । ‘‘मकानों की आड़ में छिपे होते हैं मकान’’ यहाँ एक मकान धंधा करने वाली एक स्त्री का प्रतीक है जो पुरूष की स्वतंत्रता को आबाद रखता है जिसकी जाँघों के बीच घुस कर पुरूष पालतू होने से बच जाता है । दूसरा मकान घर के भीतर रहने वाली घरेलू  स्त्री का प्रतीक है जो पुरूष को पहले पालतू बनाता है फिर उसके भीतर के सारे नमक को चाट कर उसके दिमाग की सबसे समझदार नस को मुर्दा बना डालता है । यहाँ यौनमुक्ति की तरफदारी करता हुआ कवि स्त्री को मुक्ति का द्वार भी कहता है और गर्दन में पट्टा डालकर पालतू बनाने वाली अराजक सत्ता के प्रतिरूप में भी देखता है ।
साहित्य में स्त्री देह को सदैव कल्पना सुख और विलास के लिए अनूठे उपमानों प्रतीकों से सजाया गया है लेकिन पुरूष की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति में अगर यह प्रवृति स्थायी भाव ग्रहण कर ले तो बड़ा कवि भी अपनी रचना के प्रति नाकारात्मक अहसास कराता है । इन उद्धरणों में धूमिल की स्त्री दृष्टि यौन कुण्ठा से आक्रांत दीखती है ।

फ्रायड प्रतीक में काम वासना (लिबिडो) की उपस्थिति अनिवार्य मानते हैं । उनके अनुसार प्रतीक यौन कुण्ठाओं में उत्थित होते हैं । ये मन के गुपित रहस्यों का वहन करते हैं और कला साहित्य में अपने उत्सर्जन का मार्ग प्रशस्त करते हैं ।  स्त्री के प्रति धूमिल का यह नजरिया फ्रायड के काम सिद्धान्त का पोषक है  जो  धूमिल के क्रांतिचेता मानस पर प्रश्न चिन्ह लगाता है । धूमिल की स्त्री दृष्टि की पड़ताल करने के लिए उस दौर के साहित्यिक सांस्कृतिक परिदृश्य को समझना जरूरी है । अकविता के उस दौर में रचनाकारों के मानस में पश्चिम की भोगवादी संस्कृति और भारतीय वर्जनाओं से पैदा हुई यौन कुण्ठाओं का ऐसा द्वन्द्व था जो उन्हें अनियंत्रित वैयक्तिकता की ओर ले जा रहा था । उस समय अमेरिकी ‘बीटनिक काव्य शैली’ का प्रभाव अकविता के विद्रोही कवियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पड़ा । इस प्रभाव को फैशनपरस्त स्वीकार के रूप में शमशेर बहादुर सिंह ,राजकमल चैधरी जगदीश चतुर्वेदी , श्याम परमार से लेकर क्रांतिचेता कवि धूमिल तक सभी ने ग्रहण किया था ।  प्रभाकर  माचवे के शब्दों में बीट कविता – ‘‘अति लक्ष्मी , अति विज्ञान , अति विलास , अति यौन स्वातंत्रय से एक तरह की उब और क्लांति है —।’’ (बीटनिक हिन्दी के संदर्भ में – अभिव्यक्ति 1 पृ॰ 136)

उस समय नई कविता से अकविता के दौर में पुरूष रचनाकारों की दृष्टि आधुनिकतावादी साहित्य के प्रभाव में मैनेरिज्म को तोड़ने के क्रम में अति यथार्थवादी हो गई थी । गैर रोमांटिक होने के लिए कवियों ने स्त्री देह के लिए विद्रूप और अश्लील प्रतीकों का एक ऐसा अतिवाद गढ़ा जो कहीं से भी स्वस्थ मानस की रचना यातना का उद्धरण नहीं कहा जा सकता । उस समय धूमिल का कवि दो विरोधी तत्वों ‘क्रांति’ और ‘स्त्री’ को अपने भीतर घुलाकर एक नया रसायन तैयार करता है और यथास्थिति के विरूद्ध तीब्र और आक्रामक विद्रोह दर्ज करता है । आधुनिक काल के सातवें दशक में धूमिल की चेतना में स्त्री समय के विचलन और क्षरण के बीच काम और क्रांति की धधकती ज्वाला बनकर उतरती है । काम और क्रांति की अग्नि से निर्मित स्त्री को जब वह अपनी बगल में लेकर सोता है तो व्यवस्था के नंगापन के खिलाफ आग उगलता हुआ वह सब कुछ कह सकता है जो लिबास पहन कर नहीं कह सकता – ‘‘मैंने पहली बार महसूस किया / कि नंगापन / अंधा होने के खिलाफ एक सख्त कारवाई है —-उस औरत की बगल में लेटकर / मुझे लगा कि नफरत / और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार / साबित हो चुकी हैं और / पिघले हुए शब्दों की परछाईं / किसी खौफनाक जानवर के चेहरे में  बदल गई हैं / मेरी कविताएँ / अंधेरा और कीचड़ और गोश्त की खुराक पर जिंदा हैं ’’यूं तो ‘उस औरत की बगल में लेट कर’ कविता अपने निहितार्थ में सत्ता और व्यवस्था से असहमति और अस्वीकार का एक बड़ा साहस है पर जब कवि कहता है कि उसकी कविताएँ सीलन भरी कोठरी के अंधकार और कीचड़ में स्त्री देह की खुराक पर जिंदा है तो प्रश्न लाजिमी है कि क्या उसके भीतर रचनात्मक आग पैदा करने वाली स्त्री उसके लिए महज गोश्त का एक टुकड़ा भर है ?

इसी तरह ‘‘तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला होती लड़की और तीसरे पाठ के बाद निरर्थक होती कविता’’ को अपनी अनुभूति में एक साथ जीता हुआ कवि जब अपने बगल से गुजरते हुए आदमी से कहता है कि – ‘‘लो ,यह रहा तुम्हारा चेहरा / यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था — ’’ तो एक बार गौर से उसकी ओर देखना पड़ता है कि यह कोई क्रांतिकारी है या लड़की को धर्मशाला बनाने वाला व्यभिचारी ? क्या धूमिल की ऐसी कविताएँ स्त्री देह का भोगवादी अनुष्ठान नहीं है ? ‘एकांत कथा’ का कवि विक्षिप्त अर्द्धचेतना में आत्मालाप करता हुआ ईमानदारी से स्वीकार करता है कि – ‘‘बलात्कार के बाद की आत्मीयता / मुझे शोक से भर गई है / मेरी शालीनता मेरी जरूरत है / जो अक्सर मुझे नंगा कर गई है ’’ आगे वह कहता है —‘‘भट्ठियाँ सब जगह हैं / सभी जगह लोग सेकते हैं शील ’’ पुरूष के भोगवादी चरित्र की यह आत्मपरक अनुभूति एक ओर समय की कुरूपता और विद्रुपता को दर्शाती है दूसरी ओर स्त्री देह को सरेआम उघाड़ती है । स्त्री देह में भोक्ता की तरह प्रवीष्ट होकर समय के विघटन को द्रष्टा की तरह देखना धूमिल की रचना प्रक्रिया का एक अजीबोगरीब मिजाज है । ‘अकालदर्शन’ में कवि सत्ता के प्रजातांत्रिक नुस्खों को आत्मचेतस होकर देखने और दिखाने का काम करता है । आजादी और गाँधी के नाम पर जनता के हित में चल रहे अभियानों को देखने के क्रम में उसके सामने फिर वह स्त्री व्यवस्था की तीसरी आँख बन कर आ ही जाती है –
‘— वह कौन सा प्रजातांत्रिक नुस्खा है / कि जिस उम्र में / मेरी माँ का चेहरा / झुर्रियों की झोली बन गया / उसी उम्र की मेरे पड़ोस की महिला /  के चेहरे पर / मेरी प्रेमिका के चेहरे सा लोच है ’’ शासक और शोषित के दो चेहरे इस तरह भी देखे और दिखाये जा सकते हैं – यह धूमिल की स्त्री दृष्टि ने संभव किया है ।

धूमिल की कविताओं में स्त्री को देखना स्त्री देह का मर्सिया पाठ करना है । राजकमल चैधरी की मृत्यु पर लिखी धूमिल की कविता में यह मर्सिया पाठ अपने चरम पर है – ‘‘कहीं कुछ भी नहीं है सिर्फ / उसका मरना है , इस भ्रम के साथ साथ / जिसे मैंने अपनी कविता का गवाह कर लिया है ’’ और गवाह के रूप में कवि जिन औरतों को सामने लाता है वे -‘‘औरतें योनि की सफलता के बाद / गंगा का गीत गा रही हैं ––’’ राजकमल चैधरी स्त्री देह की कब्र में शब्द साधना करने वाले अपने समय के सबसे बड़े साधक थे । यह कविता राजकमल की स्त्री दृष्टि की जटिल प्रक्रिया की पड़ताल है जिसमें धूमिल का कवि एक रचनाकार को समग्रता में समझने और उसकी रचनात्मकता के हर परत में मौजूद समय और रचना के अंतर्सबंद्ध को देखने की कोशिश करता है परन्तु यह देखना स्त्री की ‘योनि’ से शुरू होकर राजकमल की हर उस ‘आदत’ तक जाती है जो ‘दुनिया के व्याकरण के खिलाफ थी’ ।

अपने मित्र राजकमल को कवि इस रूप में चित्रित करता है – ‘‘अपनी वासनाओं के अंधेरे में / वह खोया हुआ देश था ’’ कविता की संरचना के स्तर पर इसे अप्रतिम प्रयोग कहा जा सकता है परन्तु लिंग
आधारित कवि की दृष्टि यहाँ पुरूष सत्ता के अनुकूलन द्वारा ही निर्मित है । धूमिल का कवि एक ओर तो अपने समय के जटिल और भीषण प्रश्नों से टकराता है दूसरी ओर  ‘‘सहुवाईन की जाँध पर अपनी जुबान भूल आता है ’’। काम और क्रांति का यह कैसा घालमेल है ?

धूमिल की एक महत्वपूर्ण कविता है ‘पटकथा’ । जनतंत्र की पटकथा लिखने के क्रम में कवि जिस तरह व्यवस्था की चीर फाड़ करता है , वह यथास्थिति के विरूद्ध विद्रोह का पंचम स्वर है  परन्तु इस स्वर के नीचे स्त्री हर जगह कुंठित और अपमानित हुई है । यहाँ कवि ‘शब्द और स्वाद के बीच / अपनी भूख को जिन्दा रखने के लिए / स्त्री को कभी ‘जीभ और जाँघ’ के भूगोल से बाहर नहीं निकाल पाता ।

धूमिल का कवि देश के लोकतंत्र का चेहरा तलाश करने के क्रम में हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक भटकता है । इस तलाश में उसे हर जगह हताश और निराश जनता ‘कथा केलि’ की एक अमूत्र्त मुद्रा में दिखाई देती है । कवि इस वीभत्स और कुत्सित लोकतंत्र के विरोध में प्रतिरोध की आवाज को एकजुट करने के लिए हरेक को आवाज देता है , हरेक का दरवाजा खटखटाता है मगर सब व्यर्थ —। तब धूमिल का कवि इस जड़ समय की निष्क्रियता और तटस्तता को स्त्री देह से परिभाषित करता हुआ कहता है – ‘‘मैंने जिसकी पूँछ उठायी है / उसको मादा पाया है ’’ । इस कथन में स्त्री अस्मिता को पूरी तरह नकार देने का भाव है ।  यह समग्र पितृसत्तात्मक व्यवस्था का एक अहंकारी चेहरा दर्शाता है । स्त्री को उसकी दैहिकता में कैद करके पुरूष सत्ता ने हमेशा उसको अपने द्वारा आरोपित भूमिकाओं में जीवन जीने को विवश किया है । केवल परिवार और समाज ही नहीं राज्य व्यवस्था भी अपने दृष्टिकोण में पुरूष प्रधान ही है इसलिए लोकतंत्र की पटकथा में स्त्री एक स्वतंत्र इकाई नहीं , महज मादा भर है ।  धूमिल का यह वाक्य वेद वेदांत से लेकर माक्र्स तक की पुरूष दृष्टि को उजागर करता है ।

स्त्री अस्मिता के संदर्भ में धूमिल का कवि कर्म हर जगह पुरूष सत्ता के रूप में खड़ा है । मादा काया पर खड़ी धूमिल की रचनात्मकता भाषा की सांस्कृतिक सीमाओं को तोड़कर कवि की अपरिहार्य इच्छा और दमित आकांक्षा का एक नया स्त्री पाठ गढ़ती है । कामशास्त्रीय और भाषाशास्त्रीय दोनों ही प्रकार के अध्ययनों के लिए यह एक जरूरी विमर्श है कि इस तरह की कविताओ का पाठ किस तरह किया जाय ?  कविता में स्त्री देह का उत्सव मनाते हुए क्रांति की बातें करना और भोग में आकंठ डूब कर योग की बातें करना – क्या ये दोनों परस्पर विरोधी प्रवृतियाँ एक साथ एक ही समय में  घटित हो सकती हैं ? स्त्री अस्मिता के परिप्रेक्ष्य में धूमिल का कवि कर्म हर जगह पुरूष सत्ता के रूप में खड़ा दीखता है । उनकी कविताओं में स्त्री पाठ स्त्री देह का मर्दवादी विमर्श है । धूमिल के रचनात्मक मानस की बिडम्बना को इस दृष्टि से समझने की जरूरत है ।

( फॉरवर्ड प्रेस और संजीव चंदन द्वारा संपादित पुस्तक ‘ चौखट पर स्त्री’ से साभार ) 

सुजाता पारमिता की दो लघु कथायें: अल्लादीन का चिराग और विक्रमादित्य का सिंहासन



अल्लादीन का चिराग

इक्कीसवीं सदी में अल्लादीन का खोया हुआ चिराग रसिक लाल के हाथ लग गया। जिसे बीती रात ही मातादीन मोची अपनी बीमार माँ के इलाज के लिए घर के बचे-खुचे बर्तनों के साथ बदरू कबाड़ी को बेच गया था। अगली सुबह जनेऊ कान पर लपेटे मुँह में नीम की डंडी दबाये और हाथ में लोटा लिए रसिक भाई जब बदरू की दुकान के सामने से गुजर रहे थे अचानक उनकी नज़र चिराग पर पड़ी, जो कोने में पडे भंगार के बीच में से झांक रहा था। उनकी पारखी आँखों ने वह भाँप लिया, जो मातादीन मोची और बदरू कबाड़ी की समझ से भी परे था।

जंगल से लौटते रसिक भाई ने बदरू से मोल-भाव कर कुल चालीस रूपये में उस चिराग को खरीद लिया। अब तो रसिक भाई की पांचों अंगुलियां घी में तो सर कढ़ाई में। चैबीसों घंटे चिराग को सीने से लगाए रखते। किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद में रात -दिन सपने देखते . एक दिन भरी दुपहरिया में गांव के छोर पर जहां से जंगल शुरू होता रसिक भाई एक घने पेड़ की छाया तले आराम से सो रहे थे। बाजू में चिराग भी रखा हुआ था। बड़ी भयंकर गर्मी पड़ रही थी। अचानक कुछ आवाजें सुनकर वे उठ बैठे। सामने से दो लोग उनकी तरफ भागते हुए आते दिखे। पास आने पर देखा तो वे एक युवा लड़का-लड़की थे। उम्र मुश्कील से 18-20 साल की होगी दोनों एकदम रसिक भाई के पैरों के पास आकर धप्प से बैठ गए। दोनों बुरी तरह से हांफ रहे थे। शरीर पर पसीने से गीले कपड़े चिपक गए थे।

‘हमारी मदद करिए’ लड़के ने दोनों हाथ जोड़कर रसिक भाई से कहा। उसके हाथ कांप रहे थे। उसकी आंखों में दया भरी उम्मीद देखकर रसिक भाई का दिल भर आया।
पण….मैं क्या कर सकता हूँ परेशान रसिक भाई बोले। अचानक लड़की की नजर पास रखे चिराग पर पड़ी। उस लड़की ने आश्चर्य से चिराग को देखते हुए इशारा किया।
जादुई चिराग!
हाँ।
वह जिन्न वाला!
हाँ।
दोनों के चेहरों पर आशा की लहर चमक उठी।
तब तो…

तभी पीछे से लोेगों की आती हुई भारी भीड़ का शोर सुनकर दोनों ने मुड़कर देखा। 50-60 लोगों का हुज्जूम हाथों में डडे तलवारें और त्रिशूल लिए उनकी तरफ भागता हुआ आता दिखा। दोनों के चेहरों पर कंपन साफ दिखने लगा। कुछ तो करिए नहीं तो वे हमें मार डालेंगे। लड़के ने रसिक भाई के घुटने जोर से हिलाए। ‘क्यों ऐसा क्या किया है तुम लोगों ने।’
‘‘ प्यार। दोनों एक साथ बोले ‘‘
‘‘ पर ! प्यार करना कोई जुर्म तो नहीं ‘‘
‘‘ लेकिन हमारा है ‘‘
‘‘ क्यों? ‘‘
क्यों कि मैं ब्राह्मण हूँ और यह दलित, लडकी ने लडके की तरफ इशारा करते हुए कहा।
‘‘ क्या? आश्चर्य से रसिक भाई का मुँह खुला का खुला रह गया।
‘‘ तब तो मैं भी कुछ नहीं कर सकता ‘‘
‘‘ नहीं, नहीं ! ऐसा मत कहिए। पास आती भीड़ को देखकर दोनों ने हाथ जोड़कर जल्दी-जल्दी कहा।
आपके पास तो चिराग हैं।

‘‘चिराग में जिन्न है, वो तो कुछ भी कर सकता है। उससे कहिए कि हमें यहां से उठाकर कहीं दूर किसी भी शहर में छोड़ दे ताकि हम इन लोगों हाथ न लग सकें। नहीं तो वो हमारे टुकड़े-टुकड़े कर देंगे। जिंदा जला देंगे।”
भीड़ काफी पास आ चुकी थी, दोनों ने रसिक भाई के पांव पकड़ लिए, ‘ कुछ तो करिए हम पर दया कीजिए।’
“लेकिन मैं क्या करूं।”
‘‘बापू, लडकी गिरगिडाई, मेहरबानी कीजिए अपने जिन्न को जल्दी से बुलाइए ना।
“मैं मजबूर हूँ तुम्हारी मदद नहीं कर सकता। जाति और धर्म के मामले में तो मेरा जिन्न भी मेरी बात नहीं मानता।”

विक्रमादित्य का सिंहासन

पंडित रामअवतार तिवारी गांव के प्राइमरी स्कूल के हेड मास्टर थे। गांव भर के लोग इज्जत से उन्हें मास्टरजी कहते।  मास्टरजी हनुमानजी के परम भक्त थे। गांव में मीडिल स्कूल तो बनवा नहीं पाये, अलबता एक अखाड़ा जरूर बना लिया। और फरमान जारी करा दिया कि स्कूल एक घंटा लेट लगेगा। गांव भर के सभी बच्चे पहले अखाड़े जाएंगे। लंगोट पहन, तेल लगाकर कसरत करेंगे, फिर स्कूल जाएंगे।

मास्टरजी खुद भी अपने तीनों बेटे को लेकर रोज सबेरे पहले अखाड़े जाते, कसरत करते फिर अपने मित्र और अखाड़े के गुरु  चै0 झंडूसिंह पहलवान के साथ बैठकर लोटा भर घी डाला गर्म-गर्म दूध पीते, फिर दोनों

पालिटिक्स और देश की गिरती हुई अर्थव्यवस्था पर बात करते। मास्टरजी के सबसे छोटे बेटे बल्लुजी उर्फ राधेश्याम तिवारी की कसरत में तो कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन अखाड़े के बाईं तरफ गांव के एक मात्र कुएं पर रोज सबेरे गांव भर की लुगाईयां जब टखने तक ऊँची धोतीकर भांडे-लत्ते धोती तो बल्लूजी कसरत भूल, आंखें तिरछी कर उन्हें ताड़ते रहते। जब कोई जवान औरत नहाती तो  बल्लूजी के कानों से गर्म-गर्म भाप निकलने लगती। बल्लूजी को तो बस दो ही चीजों का शौक था। एक पाॅलिटिक्स और दूसरा औरतों का, पर मास्टरजी ने भरी जवानी में उनकी लुटिया डूबो दी उन्हें बह्मचर्य की दीक्षा दिलाकर। बल्लूजी का दिल चूर-चूर हो गया, पर मास्टरजी ने समझाया अरे तू तो लंबी रेस का घोड़ा है,

 ‘ ाॅब्रहमचारी सब्र कर , वक्त जरूर लगेगा पर  देखना एक दिन तो  तू टाॅप पर  पहुंचा ही पहुंचा । जैसे-तैसे मन को समझाते बल्लूजी कभी कभी चोरी छुपे घर के पिछवाड़े बने स्टोररूम में, जहां बरसों से घर की पुरानी बेकार पड़ी चीजें रखी थी, कुछ रंगीन पत्रिकाएं मजे ले-लेकर देखते। घर में किसी को शक-सुबहा होता नहीं, कह देते कि ध्यान लगाने जा रहे हैं एकांत में।एक दिन स्टोर में बल्लूजी की नजर एक सिंहासननुमा कुर्सी पर पड़ी, जिस पर अम्मा ने एक बड़ा-सा कनस्तर रख दिया था। उन्होंने कनस्तर उतारा, ‘‘अरे बड़े आराम की है यह कुर्सी, अच्छी तरह से झाड़-पोंछ कर किताब ले लेकर बैठे ही थे कि अचानक से कुछ चमका, पूरे शरीर में गजब की फूर्ती आ गई , दिल छपपटाने लगा। गर्मी से शरीर पसीना-पसीना हो गया। फिर धीरे-धीरे आंखें लाल होने लगी। कुछ अजीब-सी आवाजें सुनाई देने लगी। सर में कभी घंटिया बजती तो कभी बिजली चमकती। आंखें बंद कर टेक लगाकर बल्लू जी कुछ देर तक बैठे रहे। दिमाग में कुछ सिगनल से मिलने लगे। जैसे कुछ दिशा निर्देश हो। कुछ देर तक ध्यान लगाया तो सब कुछ साफ दिखाई देने लगा। रात भर करवटें बदलते रहे बल्लू जी, पर नींद नहीं आई, रह-रहकर कुर्सी बुला रही थी। बड़ी मुश्किल से रात काटी, सवेरे अखाड़े जाकर जल्दी से लौट आए और सीधे स्टोर रूम में जाकर दरवाजा बंद कर कुर्सी पर बैठ गए, ऐसा अब रोज-रोज होने लगा। देर तक स्टोर रूम में ही बंद रहते। घर वाले बड़े खुश! कि लड़का ब्रह्मचर्य के साथ-साथ ध्यान भी लगा रहा है, लेकिन यह तो बैठनेवाले को ही पता था कि कुर्सी क्या गुल खिला रही है । उनमें एक अजीब-सा बदलाव आ जाता, कुर्सी पर बैठने के बाद, उनका पूरा चरित्र ही बदल जाता। आंखों से अंगारे निकलते तो जबान आग उगलती।

एक-एक करके, अपने सभी दोस्तों को स्टोर में ले जाने लगे बल्लू जी और उनका जलवा सभी को दिखने भी लगा। एक दिन कुर्सी पर बैठने के बाद उन्होंने ऐलान कर दिया। ‘‘साथ वाले गांव की मसजिद तोड़ डालो‘‘ और जो भी मुल्ला मिले काट डालो। आदेश देकर खुद तो सो गए, चेले चपाटो ने वाकई ‘‘मसजिद तोड़ डाली, फसाद बढ़ गया। 6-7 मुसलमान मारे गए। दोपहर तक पुलिस पहुंची चेलों को जब जमकर डंडे पड़े तो सच उगल दिया। पुलिस बल्लू जी के घर पहुंची और उन्हें थाने ले गई। सारी रात उनसे पूछताछ करने के बाद भी पुलिस को कुछ हाथ न लगा, उल्टा पुलिस को ही विश्वास हो गया कि बल्लू जी एक अहिंसावादी और सेक्युलर व्यक्ति हैं । जिसे इस घटना का बड़ा अफ़सोस है। दूसरे दिन सबेरे खुद ही पुलिस वाले पूरे सम्मान के साथ बल्लू जी को घर छोड़ गए। अब तो बल्लू जी पूरे गांव के नेता बन गए। अबकी कुर्सी पर बैठे तो आदेश दिया, ”  गांव के छोर पर भंगी, चमारों की बस्ती में आग लगा दो और उनकी औरतों को उठा लो।”  चेलों ने वही किया जिसका आदेश मिला था।

पुलिस घटना के तीन दिन बाद पहुंची उस वक्त बल्लू जी खुद बस्ती में अपने चेलों के साथ राहत कार्य में जुटे हुए थे। इस बार भी पुलिस ढ़ूंढ़ती ही रह गई, कोई सुराग हाथ न लगा। अलबत्ता बल्लू जी का क़द और ऊंचा हो गया। पूरे राज्य के नेता बन गए। रात को कुर्सी पर बैठे बल्लू जी सोच रहे थे काश! आज पिताजी जिंदा होते?

( सुजाता पारमिता थियेटर और आर्ट क्रिटिक तथा साहित्यकार हैं . संपर्क : sujataparmita@yahoo.com )

सरस्वती मिश्रा की कवितायें

सरस्वती मिश्रा 

युवा कवयित्री सरस्वती  मिश्रा  दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय’ के ‘भारतीय भाषा केंद्र’ में लोक साहित्य पर शोधरत हैं. संपर्क : sarswatimishra@cub.ac.in

“तुम नहीं सीख पाए”

ज्यों अनार की मिठास
क़ैद रहती है दाने-दर-दाने
तुम्हारा प्रेम भी बसता है
मेरे भीतर-दर-भीतर
पर तुम नहीं सीख पाए
सावधानी से अनार छीलने की कला
तुम्हारे चाकू की गलत दिशा
काट गई कई दाने
व्यर्थ हो गया बहता हुआ रस
तुम्हारे लापरवाह हाथों से
छिटक गए बहुत से दाने..इधर…उधर..
कुछ दाने कुचले गए तुम्हारे ही पैरों तले
कुछ चींटियों का ग्रास बने
और वे दाने जो तुम्हारी प्लेट में थे
उन्हें खाना चाहा तुमने अपने अनुसार
कभी नमक तो कभी मसालों के साथ
तुमने ध्यान न दिया
पर अनार के दाने बदल चुके थे
रंग के साथ ही स्वाद भी ………….

“बदलाव”

स्वतः नहीं होता बदलाव
गतिमान समय की वक्र गति
शनैः शनैः लाती है बदलाव
पकते हैं विचार भी
सिर के बालों की तरह
और, बदलता है शरीर भी
बदलते समय के साथ
परन्तु

14 वर्ष की आयु में बालों का पकना
संकेत है पोषण की किसी विसंगति का
शरीर की असमय झुर्रियां भी
अनुभवी नहीं बनाती बल्कि,
इशारा होती हैं असंतुलन का
विचारों में अचानक आया नकारात्मक बदलाव
दर्शाता है वैचारिक कुपोषण
अचानक नहीं बदलता व्यक्ति
बदलाव लाते हैं कुछ सतत कारण

और व्यक्ति के बदलाव में भी
अहम् भूमिका होती है “दृष्टि” की
वह “दृष्टि” जो निरंतर खोजती है “बदलाव”

हैलो 

चिटक उठी वह
भाड़ में पड़े,
ज्वार के दाने की तरह.
उमड़ आया क्रोध,
और सिमट आई चेहरे पर,
ज़माने भर की घृणा.
रग़ों में बहता रक्त भी,
लावा बन गया अचानक,
और, वह गर्म लावा,
झुलसाता चला गया,
तन से मन तक.
गोरा चेहरा…..
गुड़हल सा दहक उठा.
अपमान की पीड़ा,
छलक उठी रक्तिम आँखों में,
कर उठी प्रतिरोध,
वाणी से….पुनः तन से भी.
परंतु…,
समक्ष थे वहशी भेड़िए.
संख्या में तो चार….
किंतु, एक-एक के भीतर,
उसे फाड़ खने को आतुर,
पूरी भेड़िया जाति….
सहम उठी वह,
प्रतिरोध हल्का पड़ गया.
उतर आई आंखों में याचना,
अंततः…हार गई वह

अन्य प्रेम कवितायेँ : 


एक:
उम्र पकती है और,
पकते हैं अनुभव भी.
पर नही पकती इच्छाएँ
तोड़ लिए जाते हैं डाल पर पके फल,
परंतु,
नहीँ खत्म होती आस
मन मचलता है,
और पके फ़ल तलाशने को
जो, शायद..
अधिक मीठा हो पिछले फ़ल से
अनुभव भी..मीठे हों या कड़वे
ले जाते हैं हमेशा,
एक नये अनुभव की ओर
चाह’ भी पकती है
और,
पकती हैं भावनाएँ भी
पर हर बार का पकना उन्हे,
और भी कच्चा बना जाता है
भावनाएँ मांगती हैं सही आंच
स्नेह की, प्रेम की
और, थोड़े अपनत्व की
और, मांगती हैं,
एक बड़ा बर्तन हृदय का
“पकने” के लिये समाना भी तो होता है ना..?

दो :

मैं रणक्षेत्र की तरह ही
कभी विस्तृत होती हूँ और कभी सीमित
ह्रदय और मस्तिष्क का युद्ध
समाप्त नहीं होता..चलता है अनवरत
ख़त्म नहीं होते तर्कों के शस्त्र
ख़त्म नहीं होते उलाहनों के अस्त्र भी.
करते हैं मर्मस्थल पर प्रहार
मैं ढक लेती हूँ हथेलियों से कान
बढ़ा देना चाहती हूँ हथेलियों का दबाव
पर चरम पर पहुँच कर
अचानक थम जाता है शोर
एक बार फिर अनिर्णीत रहा युद्ध
युद्ध-विराम के संकेत के साथ ही
जा बैठे हैं दोनों योद्धा
अपने-अपने शिविर में
और धूल के गुबार में घिरी मैं
पुनः प्रतीक्षारत हूँ…..
उस युद्ध के इंतज़ार में
जो एक निश्चित निर्णय के साथ समाप्त होगा….
रेखांकन : लाल रत्नाकर