आख़िर हम भी तो इंसान ही हैं, हमें भी दर्द होता है : रवीना बरीहा

( थर्ड जेंडर, ट्रांस जेंडर, तृतीय लिंग, किन्नर आदि नामों से जाना जाने वाला यह समुदाय भारतीय समाज के सबसे उपेक्षित तबकों में से एक है। आज राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से इसकी शिनाख़्त सबसे उत्पीड़ित तबकों के रूप में की जा रही है। वर्षों से दुत्कार, प्रताड़ना और अपमान झेलने वाला यह तबका अब धीरे-धीरे अंगड़ाई लेने लगा है। मसला शिक्षा का हो, संगठन बनाने-सामाजिक काम करने का हो या फिर राजनीति में सक्रिय भागीदारी का, इस समुदाय की छटपटाहट खुल कर सामने आने लगी है। इन्हीं में से एक हैं छत्तीसगढ़ की रवीना बरीहा, जो रायपुर में ‘मितवा’ नाम की स्वयं सेवी संस्था के जरिये सामाजिक चेतना जगा रही और थर्ड जेंडर के हक-अधिकार के लिए भी प्रयत्नशील है। स्त्रीकाल के पाठकों के लिए डा.  मुकेश कुमार व डिसेन्ट कुमार साहू की उनसे लंबी बातचीत के प्रमुख अंश. स्त्रीकाल में थर्ड जेंडर से संबंधित अन्य आलेख पढने के लिए क्लिक करें  ) :
किन्नर अब थर्ड जेंडर की तरह पहचाने जायेंगे : स्वतंत्र मिश्र 
कब तक नचवाते और तालियां बजवाते रहेंगे हम : धर्मवीर सिंह 

रवीना बरीहा से बात करते डा. मुकेश 


आप अपने जीवन-संघर्षों के बारे में बताएं।
इस मामले में मैं थोड़ा भाग्यशाली रही, हमारे समाज में थर्ड जेंडर को जितनी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, उतनी मुझे नहीं झेलनी पड़ी। सामाजिक उपेक्षा और बहिष्कार की जितनी पीड़ा हमारे समुदाय के अन्य लोगों को झेलनी पड़ती है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। लेकिन मुझे यह सब कम झेलना पड़ा। छठी कक्षा की पढ़ाई मैंने अपने घर पर ही रह कर की। उस समय तक घर वालों को समझ ही नहीं आया कि मैं 'किन्नर' हूँ। उसके बाद रायपुर के रामकृष्ण मिशन स्कूल में मेरा चयन हो गया, जहां रहकर मैंने बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। इस आश्रम में मेरी सही ढंग से परवरिश हुई, मुझे कहीं से भी यह एहसास नहीं होने दिया गया कि मैं ‘किन्नर’ हूँ। मानव के व्यक्तित्व के विकास के लिए शिक्षा, भोजन-वस्त्र आदि जिन बुनियादी चीजों की आवश्यकता होती है, सारी चीजें मुझे वहाँ उपलब्ध हुईं। जीव-विज्ञान से 12वीं कक्षा पास करने के बाद मैंने रायपुर के दुर्गा महाविद्यालय से कला (दर्शन, हिन्दी साहित्य, राजनीति विज्ञान) में स्नातक किया। तदुपरांत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संबद्ध एक संस्थान से मैंने रायपुर में ही एक वर्ष का फिल्म मेकिंग (पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा इन डिजिटल विडियोग्राफी) कोर्स किया। इसी दौरान मैंने रायपुर के दैनिक अखबार ‘हरीभूमि’ में काम किया। वहाँ मैं प्रूफ-रीडर और संपादकीय में प्रांतीय डेस्क देखती थी। मैंने तीन वर्षों तक वहां काम किया। वर्ष 2009 में हमलोगों ने खुद का एक संगठन बनाने के बारे में सोचा। और हमलोगों ने अन्य चार-पाँच किन्नर साथियों के साथ मिलकर ‘मितवा’ नामक संस्था बनाई।

तब तक आपकी पहचान किन्नर के तौर पर समाज के सामने आ गई थी?
हाँ, बारहवीं की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद मैं खुलकर अपनी जेंडर पहचान के साथ सामने आ गई थी।

बारहवीं के बाद तक भी आपका अपने घरवालों से रिश्ता बना रहा?
बारहवीं के बाद भी मैं आश्रम में ही रही। अपनी पहचान स्पष्ट कर देने के बाद मुझको घर जाना नहीं पड़ा। पढ़ाई करते हुए मैंने टायपिंग भी सीख ली थी। इसी कारण मुझे अखबार में नौकरी मिल गई। प्रारंभ में मैंने देशबंधु अखबार में काम किया। इन पड़ावों से गुजरते हुए मुझे समझ में आया कि थर्ड जेंडर के प्रति समाज की धारणा कैसी है! तब से मेरे मन में एक बीज डल गया कि, मैं अपने लिंग- तृतीय लिंग के लोगों के लिए काम करूंगी। खासकर इन्हें सामाजिक समानता हासिल हो, इसके लिए काम करने का जज़्बा मेरे भीतर पैदा हुआ। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमने ‘मितवा’ संस्था बनाई।


‘मितवा’ अत्यंत ही प्यारा नाम रखा आप लोगों ने अपनी संस्था का। इसके पीछे भावना क्या थी? 
तृतीय लिंग समुदाय के हक-अधिकार पर काम करने के लिए हम लोगों ने यह संस्था बनाई। हम यह बताना चाहते हैं कि, हम न कोई दैवीय रूप हैं और न ही उपेक्षा के पात्र। हम ‘मित्र’ हैं। उपनिषदों के ‘एक साथ चलें, एक साथ मिलकर उपभोग करें, एक साथ तेजस्वी बनें’ वाक्य के मद्देनजर हम लोगों ने मित्रता को ‘इष्ट’ और श्रेष्ठ सदगुण समझा। इसी मित्रता के भाव को मितवा का नाम दिया गया। इस संस्था के जरिये हम लोग समाज की मुख्यधारा से थर्ड जेंडर को जोड़ने हेतु तरह-तरह की गतिविधियां चलाते हैं। हर वर्ष नवरात्रि के दिन हमलोग नर्सों का सम्मान करते हैं। उसी प्रकार ट्रैफिक पुलिस को अंबेडकर जयंती के दिन सम्मानित किया जाता है और रक्षा-बंधन के दिन पेड़-पौधों को हमलोग राखी बांधते हैं। रामनवमी में हमलोग गरीबों को भोजन कराते हैं। अस्पताल जाकर हम मरीजों को फल आदि वितरित करते हैं। इन गतिविधियों के जरिये हम समाज की मुख्यधारा से जुडने का लगातार प्रयास चला रहे हैं।

‘मितवा’ के लिए शुरुआती दिनों में आपलोगों ने फंड जेनरेट कैसे किया?
‘मितवा’ के सारे सदस्य कहीं न कहीं काम कर रहे थे, मैं खुद पत्रकारिता में थी, और अन्य सदस्य में से एक वहीं के किसी होटल में वरिष्ठ कुक थे, एक का बहुत अच्छा ब्यूटी-पार्लर था, एक-दो लोग बधाई मांगने का काम करते थे। इन सबके साझे आर्थिक सहयोग से संस्था का काम शुरू किया गया। संस्था को आज भारत सरकार के स्वास्थ मंत्रालय की ओर से लक्ष्यगत हस्तक्षेप परियोजना के अंतर्गत एक प्रोजेक्ट मिला हुआ है। एचआईवी-एड्स और टीबी पर जागरूकता के लिए इस प्रोजेक्ट के तहत संस्था के द्वारा पूरे रायपुर जिले में कार्य किया जा रहा है। इसके तहत जगह-जगह शिविर लगाकर खून की जांच करायी जाती है। स्वास्थ्य जागरूकता के लिए नुक्कड़-नाटक, कार्यशाला-सेमिनार आदि भी आयोजित किए जाते हैं। संस्था में आज 52 वेतनभोगी स्टाफ हैं, जिसमें से सत्तर फीसदी थर्ड जेंडर हैं। संस्था ने यौन-रोग, एचआईवी आदि से संबंधित निःशुल्क जानकारी देने के लिए एक सहायता केंद्र भी खोला था, जहां ऐसे मरीजों को जरूरी जानकारी व काउंसलिंग की जाती थी।

भारतीय समाज में ‘थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाते हैं? 
यदि हम भारतीय समाज को धार्मिक व व्यावहारिक दोनों दृष्टि से देखें तो जहां धार्मिक दृष्टि से थर्ड जेंडर- किन्नरों को पवित्र और ऊंचा स्थान दिया गया है। लेकिन व्यवहार में थर्ड जेंडर को अत्यंत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को हासिये पर रखा गया है। वस्तुतः थर्ड जेंडर आज न्यूनतम मानवाधिकारों से भी वंचित है।  

थर्ड जेंडर को लेकर भारतीय व पाश्चात्य अवधारणा में क्या भिन्नताएँ हैं?
भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को सामाजिक मान्यता और जेंडर की भूमिका में देखा जाता है। जबकि पश्चिम में केवल यौनिकता ही इसका मूलआधार रहा है। हमारी यौन प्रवृत्ति, यौन-व्यवहार या यौनिकता के आधार पर इस जेंडर को अलग रखा गया है। पर भारतीय समाज में सामाजिक मान्यता और सामाजिक जेंडर के हिसाब से थर्ड जेंडर को देखा जाता है। यूं कहें कि जहां पश्चिम में हमारी बुनियाद ‘यौनिकता’ है वहीं भारत में हमारी बुनियाद ‘जेंडर’ है।

भारत में थर्ड जेंडर को कैसे वर्गीकृत किया गया है? 
भारत में वर्गीकरण सामाजिक और पारंपरिक आधार पर किया गया है। जबकि पश्चिम में सेक्सुअलिटी के आधार पर। वहाँ कई ट्रांस जेंडर बाइ-सेक्सुअल, होमो-सेक्सुअल होते हैं। पश्चिम में आठ प्रकार की यौनिकता के आधार पर वर्गीकरण किया गया है। जबकि भारत में यौनिकता के बजाय परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति के आधार पर यह वर्गीकरण हुआ है। थर्ड जेंडर में जो भिक्षावृत्ति के पेशे में शामिल हैं उन्हें ‘हिजड़ा’ कहा गया, घरों में रहकर सामान्य लोगों की भांति जीवन-यापन करने वालों को ‘ट्रांस-जेंडर’, जो शर्ट-पेंट में रहते हैं उन्हें ‘कोती’ कहा जाता है। कुछ थर्ड जेंडर जो धार्मिक-आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैं, उसे ‘जोगप्पा’ कहा जाता है। यहां मैं यह भी कहना चाहूंगी कि, थर्ड जेंडर के वर्गीकरण की भारतीय और पश्चिमी दोनों अवधारणा अपने आप में एकांगी है। यौनिकता और सामाजिक-सांस्कृतिक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर ही हमारे साथ वास्तविक न्याय किया जा सकता है और इसी से हमारा समुचित विकास भी होगा।




आपकी नज़र में सेक्स , सेक्सुअलिटी और जेंडर के बीच क्या फर्क है?

सेक्स तीन हैं- एक पुरूष, दूसरा स्त्री  और तीसरा जिनके सेक्स अंगों का सही विकास नहीं हो पाया। ये तीन ही सेक्स मानते हैं हम लोग। जबकि सेक्सुअलिटी कई प्रकार की होती है। हो सकता है किसी को होमो-सेक्सुअलिटी पसंद आये, कोई विषम लैंगिक हो, कोई ट्रांस-जेंडर के साथ सेक्से करना पसंद करें, तो कुछ लोग ऐसे होंगे जो स्त्रीी-पुरूष दोनों के साथ समान रूप से सेक्सुअल संबंध बनाना पंसद करेंगे। इसके और भी बहुत सारे प्रकार हो सकते हैं। हम मानते हैं कि सेक्सप प्रकृति-प्रदत्त अवस्थाएं हैं। जबकि यौनिकता मनुष्य का यौन-व्यवहार है। यह प्रवाहमान होता है और बदल भी सकता है। आज का विषम-लैंगिक कल समलैंगिक हो जा सकते हैं, आदि-आदि। कहने का अभिप्राय यह कि, यौनिकता परिवर्तनशील धारणा है। वहीं ‘जेंडर’ समाज प्रदत्त है, सामाजिक निर्मिति है। इसके जरिये समाज आपकी स्थिति को निरूपित करता है।  

आमतौर पर थर्ड जेंडर के प्रति समाज का नजरिया कैसा रहता है? यानी समाज आपके साथ कैसा बर्ताव करता है?
थर्ड जेंडर के प्रति हम लोग समाज की मिलीजुली प्रतिक्रिया देखते हैं। समाज के जिन लोगों का थर्ड जेंडर-किन्नरों के साथ पहले कभी अथवा लगातार मेल-जोल रहा है, वे बहुत जल्दी हमलोगों को एक्सेप्ट (स्वीकार) करते हैं। हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं। कई बार तो हमलोगों को एक दैवीय रूप में देखा जाता है। लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा है, जो अपने कुछ पूर्वाग्रहों के कारण हमसे दूर भागता है। शायद थर्ड जेंडर का समाज से पर्याप्त मेल-जोल नहीं होने से वे एक झिझक के कारण हमें कबूल नहीं करते। इस प्रकार हम लोग समाज से दो भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं देखते हैं – एक बहुत साकारात्मक तो दूसरा अत्यंत ही नाकारात्मक-उपेक्षात्मक है।

इसका मतलब यह हुआ कि थर्ड जेंडर को समाज ‘मनुष्य’ के तौर पर कबूल नहीं करता? या तो उसमें ‘देवत्व’ ढूंढा जाता है या फिर उसे हंसी-व्यंग्य और अपमान का पात्र समझा जाता है!
आपने सही कहा, हमारे प्रति ये दोनों नजरिया समाज का रहता है। हमें या तो ‘दैवीय शक्ति’ के तौर पर देखा जाता अथवा उपेक्षा व उत्पीड़न का पात्र समझा जाता है। और समाज का ये दोनों ही अतिवादी नजरिया हमारे विकास के लिए सही नहीं है, बल्कि सच कहें तो बाधक है। क्योंकि हम समाज में यदि बहुत ऊंचे, पूजनीय रूप में माने जायेंगे तो भी हम समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पायेंगे। और यदि हम उपेक्षित हैं, तो वह हमारे लिए कष्टदायक है ही। इसलिए हम चाहते हैं कि हमारे साथ भी बाकी लोगों जैसा समानता का बर्ताव हो। हमें भी समानता, न्याय व अवसर की मुकम्मल गारंटी मिले। तभी थर्ड जेंडर का समुचित विकास हो सकेगा और हम समाज की मुख्यधारा से जुड़कर समाज के समुचित-संतुलित बदलाव-विकास में योगदान कर सकेंगे।

आमतौर पर थर्ड जेंडर के साथ पुलिस-प्रशासन का व्यवहार कैसा रहता है ?        
हमारे प्रति पुलिस का व्युवहार नकारात्म क ज्यांदा है। कई बार गंभीर मामलों में भी पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं करती। यहां तक कि एफआईआर दर्ज कराने जाने पर पुलिस स्टेआशन से हमें भगा दिया जाता है। खासकर रेलवे स्टेकशन में तो मारा-पीटा तक जाता है। कई बार 'असली' हो या 'नकली' कह कर पुलिस हमारे समुदाय के लोगों से कपड़े तक उतरवाती है। सोचिये महज़ एफआईआर लिखाने के पहले कितनी प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। पीड़ित को पुलिस द्वारा दोबारा उत्पींड़ित किया जाता है। जबकि एफआईआर तो कोई भी लिखा सकता है। चाहे वह स्त्री  – पुरूष या थर्ड जेंडर ही क्यों न हो। इस स्थिति को देखते हुए हमने रायपुर में पुलिस के साथ वर्कशॉप किया था, वहां थोड़ी स्थिति बदली है। लेकिन ज्यादातर जगहों पर पुलिस का हमारे प्रति अमानवीय व्यीवहार ही रहता है। पुलिस को हमारे प्रति अपना व्यवहार नकारात्मक नहीं रखना चाहिए। आख़िर हम भी तो इंसान ही हैं, हमें भी दर्द होता है इससे।                              
 
जाहिर है कि थर्ड जेंडर मूलतः एक उत्पीड़ित सामाजिक वर्ग है। भारतीय समाज में दलित-आदिवासी और महिला आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं। इस मायने में अन्य उत्पीड़ित समूहों से थर्ड जेंडर कैसे अलग है? 
थर्ड जेंडर से इतर जिन समूहों के बारे में आप कह रहे हैं, वे सचमुच उत्पीड़ित हैं। किंतु कहीं न कहीं इन समूहों को कानून व राज्य का संरक्षण प्राप्त है। अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए कई कानूनी प्रावधान और आयोग बने हुए हैं, स्त्रियों के लिए भी इसी प्रकार की व्यवस्था है। यहाँ तक कि बच्चों, पशु-पक्षियों व पेड़-पौधों के संरक्षण-विकास की व्यवस्था है। पर हमारा दुर्भाग्य है कि किन्नरों के लिए कुछ भी नहीं है। वर्ष 2014 में हमें सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से पहचान मिला। जबकि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुगलकाल और उससे पहले थर्ड जेंडर को बराबर या समानांतर दर्जा प्राप्त था। हमलोगों ने अपने अध्ययन में पाया कि औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने किन्नरों को दुरावस्था की स्थिति तक पहुंचाया। अंग्रेजों ने ऐसे-ऐसे कानून बनाये, जो किन्नरों को अपराधी ठहराता था। इसी काल में धारा-377 भी बना। आज हम इन काले क़ानूनों को बदलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार से हमलोगों का इस मसले पर संवाद चल रहा है। हमें उम्मीद है कि इन काले क़ानूनों को जल्द ही बदला जा सकेगा। इसलिए इस मायने में हमारी उपेक्षा अन्य सामाजिक वर्गों से भिन्न प्रकार की है।

आपकी बातचीत से लगता है कि थर्ड जेंडर की स्थिति में साकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। इन बदलावों की आप क्या वजहें मानती हैं?
इस बदलाव के दो-तीन कारण हैं। पिछले दो दशकों में मानवाधिकारों को लेकर देश में आयी जागरूकता एक बड़ी वजह है। पहले इस दिशा में लोग बात तक करने के लिए तैयार नहीं थे। दूसरा कारण, देश के साकारात्मक सोच रखने वाले, जो हमारे प्रति संकीर्ण-नाकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखते, उनलोगों की भूमिका रही है। ऐसे लोगों ने हमारा साथ दिया है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने भी इस सूरत-ए-हाल को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

थर्ड जेंडर की संस्कृति पर कुछ प्रकाश डालिए...  
भारतीय वर्गीकरण, जिसकी चर्चा मैंने आपसे की, जिन सामाजिक-सांस्कृतिक आधारों पर किया गया है, वही उनकी संस्कृति है। हिजड़ा समुदाय, जो भिक्षावृत्ति करता है, उसमें गुरू-शिष्य की परंपरा होती है। उसी प्रकार जो आध्यात्मिक-धार्मिक परंपरा से संबद्ध होते हैं, उनके पहनावे भिन्न होते हैं। वे जाप, भजन-कीर्तन आदि करते हैं। जो लोग घरों में रहते हैं, वे सामान्य लोगों की ही तरह जीते-रहते हैं।

पर्व-त्योहारों में भी इनमें आपस में भिन्नता रहती है क्या? 
हां, पर्व-त्योहार भी इसी वर्गीकरण के आधार पर है। हिजड़ों के पर्व-त्योहार अलग हैं। ये ‘गौचरा माता’ को मानते हैं। गुजरात में इनका तीर्थ-स्थल है। अंतिम संस्कार का भी इनका विधि-विधान अलग है। घरों में रहने वाले अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा के मुताबिक होली-दीवाली, ईद मनाते हैं। मंदिरों में रहने वाले मंदिरों की मान्य सांस्कृतिक परंपरा को मानते हैं। इस प्रकार थर्ड जेंडर की कोई सर्वमान्य विशेष परंपरा नहीं है।दुर्भाग्यवश समाज हिजड़ों की संस्कृति को देखकर पूरे थर्ड जेंडर की एक ही संस्कृति मान लेता है, जबकि ऐसा है नहीं।

कुछ लोगों को लगता है कि हिजड़ा समुदाय को बगैर मेहनत के काफी पैसे मिल जाते हैं। एक प्रकार से इन्हें मुफ्तखोर के बतौर देखा जाता है। आपकी प्रतिक्रिया...
हां, भिक्षावृत्ति के द्वारा कुछ लोग आजीविका प्राप्त करते हैं। लेकिन हमलोगों ने जब इस पर सर्वेक्षण किया तो यह बात सामने आयी कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। गांव-कसबों  में रह रहे थर्ड जेंडर के ज़्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय है। ये अत्यंत ही कम मजदूरी की दर पर अपना पेट पालते, इनके पास वोटर-कार्ड तक नहीं है। ये जहां श्रम करते, कार्य-स्थल पर भी भेदभाव के शिकार बनते हैं। कुछ-कुछ जगह है, जहां किन्नर समुदाय के लोगों ने संगठित तौर पर भिक्षावृत्ति जैसी चीज को बढ़ावा दिया है। लेकिन इनकी संख्या बहुत अधिक नहीं। आज अगर पूरे भारतवर्ष में थर्ड जेंडर की स्थिति का अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि इनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत ही निम्न है। चूंकि समाज में भिक्षावृत्ति करने वाले दीख जाते हैं, इसलिए लोगों को ऐसा लग सकता है। किंतु थर्ड जेंडर के इससे कई गुना ज़्यादा लोग हैं, जो मेहनत-मजदूरी करके बड़ी कठिनाई से अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।

हिजड़ों के बारे में समाज में कई तरह की भ्रांत धारणा है। अक्सर यह कहा जाता है कि इनके जो गुरू होते हैं, वे पूरे रुतबे और भोग-विलास की जिंदगी जीते हैं ! इस पर आपकी टिप्पणी...

यह सही है कि मठाधीशों के पास जब बहुत पैसा आ जाता है तो वे विलासिता का जीवन जीने लग जाते हैं। इनमें से कुछ लोग बहुत संपन्न हो भी गये हैं। आज दिल्ली, इंदौर, जबलपुर, रायपुर आदि कुछ शहरों में उनके अपने बड़े-बड़े फ्लैट हैं। रायपुर में तो लगभग आधे किलोमीटर का उनका कॉम्प्लेक्स है, जिसमें बड़ी-बड़ी दुकानें चलती हैं। यह जो उनकी संपत्ति और विलासिता है उसके पीछे समाज का वह नजरिया, कि लोगों ने उन्हें देवत्व के तौर पर माना है। लोगों ने उन्हें पैसा देना शुरू कर दिया। इसी कारण वे लोग भी अपने इसी दैवीय रूप को बरकरार रखना चाहते हैं। उन लोगों ने अपना अलग-अलग ‘घराना’ बना लिया है। एक-एक घराने में कई शिष्य होते हैं, जिन्हें गुरू का निर्देश रहता है कि बाहर के लोगों से एक सीमा के बाद दूरी बनाए रखें। अपने बारे में ज्यादा जानकारी न दें और न ही लोगों से घुलें-मिलें। अगर कोई बात भी करना चाहे तो उनसे उन्हें गाली-गलौज करने की शिक्षा दी जाती है। इस तरीके से उनको ऐसे नियमों में बांधा जाता है। इन घरानों में कायदे-कानून इतने सख्त हैं जिसके चलते थर्ड जेंडर के सभी लोग वहां नहीं जा सकते। उन्हें जानवरों की तरह रखा जाता है। यह एक बहुत बड़ा सामाजिक दोष है। उनकी स्थिति को बदलकर ही इस समस्या को दूर किया जा सकता है।
इस सबके बावजूद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस समय बच्चे को ‘तीसरा लिंग’ का होने के कारण उनके मां-बाप द्वारा परिवार-समाज से निकाल दिया जाता है, ये गुरू-मठाधीश ही उन्हें संरक्षण देते हैं। उनका भरण-पोषण करते हैं, उन्हें ठौर देते हैं। इन दोनों पहलुओं को हमें देखना चाहिए। क्योंकि जब इनके पास खाने को नहीं था, फुटपाथ पर रात बिताते थे, आए दिन कुछ न कुछ अप्रिय घटनाएँ घटती थीं, तब उन्होंने ही सहारा दिया।

आज की तारीख में देशभर में किन्नरों पर काम करने वाले कितने संगठन सक्रिय हैं?
2009 तक तो केवल 5 संगठन ही सक्रिय थे। 2011 में अखिल भारतीय स्तर पर काम करने के लिए एक नेटवर्क – ‘हमसफर’ का निर्माण किया गया। यह हर राज्य में जाकर वहाँ के किन्नरों को संगठित करने के साथ संगठन को एक संस्था का रूप देता है। आज भारत में उत्तर-पूर्व के राज्यों को छोड़कर, क्योंकि वहाँ किन्नर शेष भारत की तुलना में पहले से ही बेहतर स्थिति में हैं, हर राज्य की राजधानी में एक संस्था का गठन किया जा चुका है। ये संस्थाएं किन्नरों के हितों की ‘एडवोकेसी’ करते हैं और उन्हें संगठित भी।

थर्ड जेंडर को लेकर भारत में अब तक क्या-क्या कानूनी प्रावधान किये गए हैं? 
अभी सर्वोच्च न्यायालय ने थर्ड जेंडर को मान्यता दी है। सामाजिक न्याय मंत्रालय की एक टीम ने कुछ-कुछ बिन्दुओं पर राज्य सरकारों को निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय और मंत्रालय द्वारा दिये गये निर्देशों पर अमल करने का दायित्व राज्य सरकारों का है। जिन राज्य सरकारों ने इन सुझावों पर अमल किया वहां थर्ड जेंडर को सुविधाएं मिलनी शुरू हुई है। जैसे तमिलनाडू में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बहुत पहले से ही थर्ड जेंडर के लिए अलग से अधिनियम है। वहां 2002 में ही इसके लिए बोर्ड का गठन हो चुका है। राजस्थान में भी कुछ-कुछ कानून आया है। छत्तीसगढ़ में अभी हाल ही में अलग बोर्ड का गठन किया गया है। किन्नरों के हितों के मद्देनजर देश के सभी राज्यों की सरकारों को चाहिए कि इस दिशा में त्वरित कदम उठायेँ। इस हेतु हमलोग विभिन्न राज्य की सरकारों से संवाद भी चला रहे हैं।

थर्ड जेंडर के सशक्तीकरण के लिए आप लोगों की प्रमुख मांगें क्या हैं?  
हमलोगों ने दो-तीन चीजें निर्धारित की हैं। पहला तो शिक्षा है। आजीविका है। न्याय के समक्ष समानता है। आर्थिक अवसरों में उन्नति की समानता है। कुछ अधिनियम हैं, जिन्हें सभी राज्यों में लाया जाना चाहिए। सभी राज्यों में बोर्ड का गठन होना चाहिए। केंद्र स्तर पर भी अनुसूचित जाति-जनजाति, महिला आयोग आदि की भांति थर्ड जेंडर के लिए भी स्वतंत्र आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इन मांगों को लेकर शासन से हमलोग लगातार बात कर रहे हैं। तीन राज्यों- छतीसगढ़, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की सरकार ने अपने यहां बोर्ड का गठन किया भी है। मध्यप्रदेश और बिहार में यह प्रक्रियाधीन है। यदि हमारी इन मांगों पर राज्य सरकारें समुचित ध्यान दें तो किन्नरों की दशा-दिशा बदल सकती है।

थर्ड जेंडर के शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिए सरकार को क्‍या कदम उठाने चाहिए? जिस प्रकार सरकार द्वारा बोर्डिंग स्कूहल, नवोदय विद्यालय, सैनिक स्कूरल और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए अलग आवासीय विद्यालय चलाये जा रहे हैं, क्याच किन्नजरों के लिए भी उसी प्रकार की अलग से व्येवस्था  होनी चाहिए?
यह जरूरी है कि हमलोगों के लिए अलग से आवासीय विद्यालय की व्यजवस्था् हो। हर राज्यस में थर्ड जेंडर के लिए कम से कम एक आवासीय विद्यालय हो तो तत्काल हमारी शिक्षा की जरूरतें पूरी हो सकती है। इस दिशा में केन्द्रय और राज्यी सरकार को यथाशीघ्र कदम उठाना चाहिए। थर्ड जेंडर के लिए ब्यूटीशियन, टेलरिंग, बागवानी आदि के प्रशिक्षण की भी व्यकवस्थाय सरकार को करनी चाहिए। ताकि इनके स्वरोजगार का रास्ता खुल सके।

देश में अब तक किन-किन प्रांतों में थर्ड जेंडर को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा दी गयी है?
अभी आरक्षण केवल तमिलनाडू राज्यश में ही मिल पाया है। बाकि राज्योंि में यह प्रक्रियाधीन है। केन्द्रं सरकार ओबीसी कोटे के भीतर थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की बात कर रही है। लेकिन हम लोग कह रहे हैं कि जो अनुसूचित जाति-जनजाति से आये किन्निर हैं, उन्हेंं उसी कोटे से आरक्षण दिया जाना चाहिए। हालांकि अभी यह विचाराधीन है, इस पर अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।

पिछड़े-दलितों के कोटे से थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की स्थिति में इनसे टकराहट की स्थिति भी पैदा हो सकती है। आपको क्या लगता है? 

मुमकीन है कि टकराहटें हों। हमें इसका डर भी है। इसी कारण हम लोग यह मांग कर रहे हैं कि हमें अल्प संख्यडकों की भांति संरक्षण प्रदान किये जायें। जातिगत दायरे में हमारे लिए आरक्षण की व्यसवस्थाी होने से राजनीतिक समीकरण प्रभावित होंगे, जिससे तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। हमलोग दीर्घकाल तक आरक्षण के बजाय मात्र 10-20 वर्षों तक संरक्षण देने की मांग कर रहे हैं। बीस वर्ष बाद सरकार हमारी स्थिति का अध्य यन करा ले और जरूरी समझे तो उसे समाप्त् कर दे।

देश में व्याप्त बेरोजगारी, गरीबी, विषमता, भ्रष्टाचार, मंहगाई और यौन-हिंसा जैसी गंभीर समस्याओं को आप बतौर ट्रांस-जेंडर किस रूप में देखती हैं?
हमारी लड़ाई इसी समाज में जाने की है। इसलिए हमारी प्राथमिकता है कि यह समाज हमें अपना माने। यही वजह है कि अभी हमलोग इन सवालों पर बहुत सोच नहीं पा रहे हैं। हमारी पहली कोशिश सामाजिक समानता लाने की है। पर हम इतना जरूर चाहते हैं कि जो अशिक्षा, गरीबी, भ्रष्टाचार, यौन हिंसा आदि समस्याएँ हैं, वे दूर हों। क्योंकि ये समस्याएँ ऐसी हैं जो पूरे समाज को प्रभावित करने वाली हैं और निश्चित रूप से हमें भी। इन समस्याओं को लेकर हम केंद्र-राज्य की सरकारों से मांग करते हैं कि वे इसका सार्थक समाधान निकालें। सरकार अपने काम-काज में पारदर्शिता लाये। मानवाधिकारों की गारंटी हो। हम चाहते हैं कि सरकार वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए इन सवालों का समाधान करे। ये समस्याएँ खत्म होंगी तो हमारे हालात भी बदलेंगे।
आपकी सद-इच्छाएं वाजिब हैं। किन्तु सरकारें बनाने-चलाने वाली पार्टियों की खास विचारधारा व खास समूहों के प्रति प्रतिबद्धताएं होती हैं, सत्ता में रहते हुए इनके नीति-व्यापार सबके सब इसी बिना पर निर्धारित होते हैं।

मुख्यधारा की इन पार्टियों का अपना एजेंडा रहता है, जिसपर ये पार्टियां काम करती हैं। इन पार्टियों के एजेंडे में ‘थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाती हैं?
इस बार लोकसभा चुनाव के पहले हमलोगों ने मुख्यधारा की पार्टियों के ‘मेनिफेस्टो’ में अपने सवालों को शामिल कराने का प्रयास किया था। दक्षिण भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों, पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी ने हमारे सवाल को अपने चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल किया भी था। हमारे संपर्क के पूर्व भाजपा का घोषणा-पत्र छप चुका था, इसलिए उसमें यह शामिल नहीं हो पाया। शेष राजनीतिक पार्टियों से हमलोग समय से संपर्क नहीं कर पाये इसलिए उनके घोषणा-पत्र में हमारी बात शामिल नहीं हो पाई। लेकिन मैं यहाँ एक बात कहना चाहूंगी कि जब हम लोगों ने इन पार्टियों का घोषणा-पत्र देखा तो हमें नहीं लगा कि उनमें बहुत अंतर है। सभी विकास, सुशासन, शिक्षा, गरीबी पर बात करते हैं। इसलिए हमलोगों ने तय किया कि हम किसी पार्टी विशेष का पक्ष नहीं लेंगे। इसलिए हमलोग किसी दल को ‘फॉलो’ करने अथवा उनपर टिप्पणी करने से बचते हैं। बावजूद इसके यह बात तो है कि, हमारी कोशिश रहनी चाहिए कि सभी दलों तक हम अपनी बात पहुंचाएं। इस बार हमलोग यह पूरे तौर पर नहीं कर पाये, क्योंकि किन्नर समाज में पढ़े-लिखे लोगों का काफी अभाव है और संगठन में सक्रिय लोगों की संख्या भी अभी पर्याप्त नहीं है। लेकिन आगे हम इसकी कोशिश जरूर करेंगे। जो राजनैतिक दल हमारे लिए काम करेंगे हम उनके साथ हैं।

इन आदर्शवादी अपेक्षाओं के बावजूद इतना तो मानना पड़ेगा कि व्यवहारतः मुख्यधारा की ये पार्टियां /गठबंधन – एनडीए-यूपीए अंतिम तौर पर समाज में यथास्थितावाद बहाल रखने के लिए ही प्रयत्नशील हैं। ऐसी स्थिति में उत्पीड़ित समूह, चाहे वह दलित-आदिवासी व महिला हो या फिर ट्रांस-जेंडर, इनके हक-अधिकार की मुकम्मल गारंटी तब तक संभव नहीं हो सकती जब तक इस यथास्थितिवाद को पलटते हुए पूरे समाज का क्रांतिकारी-समता आधारित मूल्यों के आधार पर पुनर्संगठन न किया जाय। इसी रास्ते उत्पीड़ित समूहों को ‘मनुष्य’ का दर्ज़ा भी हासिल हो सकेगा। क्या कहना चाहेंगी आप? 

इस बात को हमलोगों ने भी महसूस किया। अगर कोई राजनीतिक पार्टी है तो वह बहुत सारे लोगों का जिस चीज पर दबदबा है, उसी को साथ लेकर चलती है। जिनकी संख्या कम है, वे हमेशा उपेक्षित रह जाते हैं। हम इस बात को मानते हैं कि पार्टी वोट बैंक से चलती है, जिस सामाजिक समूह से ज्यादा वोट हासिल होता है, उसी को वे देखती हैं। यह चलता आ रहा है और शायद आगे भी बहुत दिनों तक चलेगा। इसलिए हमलोग दो दिशाओं में काम कर रहे हैं – राजनीतिक पार्टियों से भी संपर्क-संवाद कर रहे हैं और न्यायपालिका का भी दरवाजा खटखटा रहे हैं। वर्तमान में हम देख रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई बड़े मामले पर हस्तक्षेप किया है और सरकारों को भी फटकार तक लगाई है। इसे देखते हुए हमलोगों ने महसूस किया कि हम केवल राजनीतिक पार्टियों के भरोसे नहीं रहेंगे बल्कि न्यायपालिका की भी मदद लेंगे। हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। इसलिए हमलोगों ने तय किया है कि, कानूनी लड़ाई भी लड़ेंगे और लगातार विधायिका-कार्यपालिका के समक्ष अपनी मांगें भी रखेंगे।
                         
संपर्क : 
डॉ. मुकेश कुमार, पोस्ट डॉक्टोरल फ़ेलो, आईसीएसएसआर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा - 442005, महाराष्ट्र.; मो.: 09431690824; ई-मेल: drmukeshkumar.bgp@gmail.com 

डिसेन्ट कुमार साहू, जूनियर रिसर्च फ़ेलो, यूजीसी, समाज-कार्य, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा - 442005, महाराष्ट्र.; मो.: 08855868445 ; ई-मेल: dksahu171@gmail.com 
   

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