ज्वलंत स्त्री-समस्या पर कविताई

रवींद्र कुमार पाठक
युवा आलोचक रवींद्र कुमार पाठक जी. एल .ए कॉलेज , डाल्टेनगंज (झारखंड )के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. संपर्क :09801091682 
( आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के  बहुपठित उपन्यास  ' बाणभट्ट की आत्मकथा' का स्त्रीवादी पुनर्पाठ कर रहे हैं रवींद्र कुमार पाठक ) 
द्विवेदी जी का प्रथम और यशस्वी  उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ उनके बहुविध द्वंद्वों का भी प्रमाण है और अक्सर पुरानी मूल्य-व्यवस्था की ओर ढरक जाने का परिणाम भी (खासकर स्त्री के संदर्भ में)। यह बात शत-प्रतिशत सही है कि ‘सारी कथा में स्त्री-महिमा का बड़ा तर्कपूर्ण और जोरदार समर्थन है’ परंतु यह बात भूलने की नहीं है कि ‘महिमा’ का अभियान दर्शन के भाववाद से निकलता और उसी में अवसित होता है, जबकि स्त्री की समस्याएँ ठोस हैं, ज्वलंत हैं; जो यथार्थ अनुभूति की माँग करती हैं। उपन्यास में प्रतिष्ठित होनेवाली नारी ‘तत्त्व नारी’ है, न कि वास्तविक हाड़-मांस की इंसान। नारी-शरीर को देवमंदिर की तरह पवित्र मानने वाला, नारी-महिमा का जानकार बाणभट्ट नारी-सामान्य की कुछ समस्याओं व पीड़ाओं का साक्षी रहकर भी अक्सर कविता की दुनिया में बहक जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानवतावादी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को भी इस समाज-संरचना या स्त्री के प्रति व्यक्तिगत या सामाजिक व्यवहारों में निहित बदसूरती, अनीति या क्रूरता दिखलाई ही नहीं पड़ती , जो आज तक एक स्वतंत्र, स्वस्थ और खशहाल इन्सान के रूप में किसी स्त्री का जीना मुहाल किये रही है ।

 सच है कि उनके लिए घर में बहुविध पीड़ित, घुटती नारी और बाहर अपहृत होती, बिकती यौन हिंसा की भेंट चढ़ती सामंतों की भोग्या बनती या मंदिरों में धर्म के नाम पर यौन-बलि चढ़ती (देवदासी) अथवा वेश्या बनी देह-दलन कराने को मजबूर स्त्री कोई ज्वलंत समस्या है ही नहीं। पुरुष के बहुपत्नीवाद की शिकार बनी, बाल/अनमेल विवाह के कसाईघर में ठेली गई, यौनशोषण को झेलती, अवांछित गर्भ ढोने को विवश नारी, भुखमरी की शिकार या परजीवी बनी नारी, विधवा बताई/बनाई गई नारी का भीषण एकांत, आम स्त्री की अशिक्षा आदि कोई समस्या ही नहीं है उनके रचनाकार के लिए। इससे भी बड़ी सच्चाई है कि सामास ढंग से वे स्त्री-प्रश्नों, स्त्री-समस्याओं को उठाते ही नहीं - इसी का प्रमाण है कि विचारक के रूप में (निबंधों में) उन्होंने कहीं इन सवालों को छुआ तक नहीं। जो कुछ छुआ या उनसे उठा - वह उनके रचनात्मक (उपन्यास) साहित्य में, संस्कृति-दर्शन-अध्यात्म या कवित्व की सूक्ष्म जीवन पर। कथा साहित्य में स्त्री या समस्याग्रस्त स्त्री का आ जाना तो लेखक के लिए अनिवार्य विवशता हो सकती है, क्योंकि जीवन-कथा बिना औरत (या मर्द) के संभव ही कहाँ है ? पर, विचारक के रूप में उन्होंने आम स्त्री के दर्द, पराधीनता आदि को तनिक भी महसूस न किया, उलटे उन्हें ध्यान आया कि स्त्री को सच्चरित्र होना चाहिए, ताकि परिवार बचे, सुंदर बने। ‘धार्मिक एवं सच्चरित्र नारी कुटुंब की शोभा है’ शीर्षक अपने सम्भवत: एकमात्र नारी-विषयक निबंध में द्विवेदी जी पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं का बोझ स्त्री के कंधों और सिर पर डालने को बेताब दिखते हैं। उनका स्पष्ट विचार है कि स्त्री यदि धर्म द्वारा प्रतिपादित आदर्शों या मर्यादा से बाहर चली जाए तो परिवार छिन्न-विच्छिन्न हो जाएगा। धर्म, मर्यादा या चरित्र से उनका आशय, किसी आधुनिक लोकतांत्रिक विवेक के सापेक्ष नहीं, बल्कि मनु, कालिदास, तुलसी या महाभारत के जरिये छनकर आ रही पुरानी मूल्य-संरचना के तहत है, जिसमें स्त्री को अच्छी गृहिणी, व्रतोपवास करनेवाली, पतिव्रता आदि बनने की एकमुखी सीख दी गई है । लेख को पूरा करते-करते द्विवेदी जी ने यह पुनीत इच्छा भी जाहिर कर दी कि ऐसी गृहलक्ष्मियों को संभव बनाने के लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।

स्त्री के योद्धा बनने पर अघोषित प्रतिबन्ध बनाम ‘चरित्र’ के प्रतीकीकरण की राह :

‘आत्मकथा’ में सभ्यता में अशांति पर महामाया के दार्शनिक प्रवचन के बीच भट्टिनी का तर्कसंगत व्यवधान आया - ‘तो माता, क्या स्त्रियाँ सेना में भरती होने लगे या राजगद्दी पाने लगे, तो यह अशांति दूर हो जाएगी?’ (ग्यारहवाँ उच्छ्वास) - भट्टिनी के इस सही सवाल पर द्विवेदी जी की तरफ से महामाया ने उसे गुमराह करना चाहा, यह कहकर ‘‘सरला है तू, मैं दूसरी बात कह रही थी। मैं पिंड नारी को कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु नहीं मानती।’’ जहाँ सीधा जवाब ‘हाँ’ में होना चाहिए था, वहाँ महामाया गोल-मटोल जवाब दे रही हैं, इसलिए क्योंकि ‘आजाद हिंद फौज में स्त्री के सैनिक बनने’ के युग में भी ये पंक्तियाँ लिख रहे आचार्य द्विवेदी के अंदर यह साहस शायद न था कि स्त्री को सैनिक या शासक रूप में स्वीकारें। महामाया स्त्री के सैनिक बनने के सवाल पर पिंड नारी को कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु न मानने की बात कहती है, परंतु कान्यकुब्ज की प्रजा के नाम उनका वीरोचित आह्वान - जो पर्याप्त जनतांत्रिक व सामंतवाद-विरोधी था - वह किसे था ? पिंड नरों को ही। अमृत के पुत्रों को था संबोधन। वे उन्हें कह रही थीं न्याय, सत्य, धर्म की रक्षा करने के लिए। उसके लिए बलिदान माँग रही थीं वे। किसका ? पुत्रों का। उनका कहना था कि धर्म के लिए प्राण देना किसी जाति का पेशा नहीं है, मनुष्य मात्र का उत्तम लक्ष्य है। पर, उनका ध्यान अपने ही इस वक्तव्य में निहित इस विसंगति की ओर न गया कि ‘मनुष्य’ के अर्थ में वे स्त्री को नहीं समेट पा रही हैं, क्योंकि संबोधन ‘अमृत पुत्रों’ को है । धर्म की रक्षा करना किसी जाति-विशेष का पेशा न मानकर भी महामाया उसे पुरुष जाति का पेशा बना दे रही हैं। आह्वान को और जोशीला बनाने के लिए वे जो भाषा की लाक्षणिकता तलाशती हैं, वह मर्दानगी का घिसा-पिटा टोन है - ‘‘उत्तरापथ के लाख-लाख नौजवानों ने क्या कंकण-वलय धारण किया है ?’’ - यह स्त्री जाति पर दुहरा अन्याय है। एक तरफ कंकण-वलय या चूड़ियाँ पहना कर निस्पंद कर देना; ऊपर से उस स्थिति में भी स्त्री जाति को चैन से न रहने देना - उनकी बनाई गई स्थिति का गाली के रूप में इस्तेमाल करके यानी ‘नालायकी’ का प्रतीक चूड़ी पहनने को बना के। ‘अष्टादश’ उच्छ्वास में महामाया की शिष्याएँ उनकी भावना का और भी विस्तार करती हैं। वे भी अमृत के पुत्रों, तरुणों का आह्वान करती हैं सैनिक बनने का, ताकि कुलवधुओं का सुहाग बचे, बालिकाओं की लाज बचे, बहनों का लाज बचे। बचाने का काम करना है मर्दों को और औरतों का काम है सिर्फ कुलवधू बनकर वीरमर्दों की ओर आँसू भरे नैनों से ताकना, माता बनकर ताकना ।

महामाया के जरिये, द्विवेदी जी स्त्री को आत्मरक्षा के लिए भी जगाने की जरूरत नहीं महसूस कर पा रहे हैं। स्त्री स्वयं अपना बचाव करे - ‘कुलवधुता’, ‘सुहाग’ या ‘लाज’ जैसे थोपे गए मर्द-मूल्यों के लिए नहीं लड़े, वरन् इन्हें झटककर फेंक दे और लड़े अपनी जान के लिए, अपने को यौन-हिंसा से बचाने के लिए, अपने व्यक्तिगत सम्मान के लिए। लड़े अपनी गरदन बचाने को, न कि किसी पुरुष की नाक बचाने को। पर, किसी उद्देश्य से भी उसे लड़ने की जगह सिर्फ वीर पुरुषों की ओर टुकुर-टुकुर ताकने को उसे विवश करने के कारण ही लेखक की स्त्री-दृष्टि आधुनिकता से काफी पीछे है। द्विवेदी जी महिलाओं को पुरुषों के रहमोकरम पर ही छोड़ना चाहते हैं, यह भूलकर कि इंसान को सुरक्षित नहीं किया जा सकता, बल्कि उसे स्वरक्षित होना पड़ता है। पुरुषों की पुलिस-व्यवस्था पर अखंड विश्वासी लेखक मानो महिला थाना को गैर-जरूरी मानते हैं। काश! वे सोच पाते कि पुरुषमय पुलिस व सेना ने अब तक महिलाओं की कैसी रक्षा की है, उन्हें यौनग्रास बनाने में कब परहेज किया है ? क्या यह आलोच्य काल का सच न रहा होगा ? स्त्री के आत्मरक्षार्थ परजीवी बनने की जो लक्ष्मणरेखा द्विवेदी जी ने अपने पहले ही उपन्यास में खींच दी थी, उसी पर लगभग अंत तक कायम रहे। मौलिक अन्वेषक होकर भी इतिहास के कई दौरों को वे भूल गए, अपना समकालीन यथार्थ भी ‘आजाद हिंद फौज’ वाला। लगता है कि उनके लिए इतिहास महत्त्वपूर्ण भी कहाँ है? महत्त्वपूर्ण तो है मिथक, जिसकी रचना अपनी रुचि के घालमेल से वे करते हैं।
द्विवेदी जी की नायिकाएँ निजताहीन स्त्रियाँ होती हैं; चाहे भट्टिनी हो या चंद्रलेखा, मृणाल। यदि शुरु से वे ऐसी न हों तो आगे चलकर लेखक उनका ऐसा रूपांतरण कर डालता है कि वे इंसान नहीं, प्रतीक यानी गढ़े गए आदर्शों की प्रतिमूर्ति भर रह जाती हैं। फिर वे आदर्श भी विसंगत मूल्य दृष्टि की देन होते हैं - स्त्री को दोयम दर्जे पर रखकर गढ़े गए आदर्श । यही कारण है कि वे निउनिया जैसी जीवंत, गतिशील व विद्रोही-ऊर्जावती स्त्री को अपने उपन्यास में नायिका का पद नहीं देते; फिर धीरे-धीरे उसके विद्रोह को उसकी अधीरता और उसके सत्य दर्शन को प्रलाप सा ठहराते-ठहराते उसे कमजोर करते जाते हैं। उपन्यास के अंत में उसे बलि ही चढ़ा डालते हैं।

निउनिया :  त्रिकाल-भेदी अनुत्तरित प्रश्न
निउनिया ने जो दो दाहक सवाल किए हैं - (1) क्या स्त्री होना ही मेरे सारे अनर्थों की जड़ नहीं है? (2) क्या छोटा सत्य बड़े सत्य का विरोधी होता है ? - ये दोनों उसके व्यक्तिगत सवाल भर नहीं हैं, हर्षयुग के युगप्रश्न हैं। निउनिया की हृदयाग्नि से निकले ये प्रश्न उससे भी आगे बढ़कर त्रिकालभेदी हैं - युग-युग से पूछे गए, युग-युग के प्रश्न। पर, अनुत्तरित। छोटा सत्य अक्सर इस विसंगतिपूर्ण व्यवस्था में बड़े सत्य का विरोधी बनाकर पेश किया जाता है। समाज-संस्कृति या राष्ट्र की रक्षा के नाम पर अक्सर स्त्री-पीड़ा/घरेलू हिंसा के सवालों को चुप करा दिया जाता है - स्त्री-मुक्ति की माँग अक्सर राष्ट्रीय स्वाधीनता की लड़ाई दिखाकर स्थगित कर दी जाती है। यह सोचा तक नहीं जाता कि पचास प्रतिशत जनसंख्या के योगक्षेम को, उसकी पीड़ा/गुलामी को नजरअंदाज कर जो राष्ट्र खड़ा होगा/हुआ है, वह किसका है, किसके हित में ? ऐसी संस्कृति की चिंदी उड़ा डालना चाहती है निउनिया जो आधी आबादी के खून से रंगोली रच रही हो स्त्री के प्रति अन्यायकारी भारतीय समाज राजव्यवस्था को विनष्ट होने का शाप वह देती है -  ‘‘किस अपराध पर कान्यकुब्ज का लंपट शरण्य राजा मुझे फाँसी देना चाहता है?...मेरी जैसी असहाय अबलाओं को दंड देने वाला उसका कठोर भुजदंड क्या म्लेच्छवाहिनी से अपनी प्रजाओं को नहीं बचा सकता?...आर्यावर्त्त के समाज के मूल में घुन लगा गया है, उसे महानाश से कोई नहीं बचा सकता।’’ (‘षोडश उच्द्वास’)। पर, उसकी उत्तेजना को लगाम बाँधने को व्याकुल बाण व भट्टिनी के वार्तालाप में आ रहा पितृसत्तावादी दर्शन निर्णायक हो उठता है - ‘‘बंधन ही सौंदर्य है, आत्म-दमन ही सुरुचि है, बाधाएँ ही माधुर्य हैं। नहीं तो यह जीवन व्यर्थ का बोझ हो जाता। वास्तविकताएँ नग्न रूप में प्रकट होकर कुत्सित बन जाती हैं।...भारतीय समाज ने बंधन को सत्य मानकर संसार को बहुत बड़ी चीज दी है।’’ (‘अष्टादश उच्छ्वास’)  पर, इसके समानांतर यह सवाल न खड़ा किया गया कि किस पर बंधन ? सिर्फ स्त्री के सहजाधिकार पर ? या उस लंपट मर्दानगी पर भी जिन्हें द्विवेदी जी ‘प्राचीन भारत के रईस’ का खिताब देते हैं।

(पुनश्च’ संग्रह में ‘प्राचीन भारत के रईस’ शीर्षक से ह.प्र. द्विवेदी का एक निबंध भी है) । उनकी लंपट-शरण्यता पर भी कोई बंधन है, जो स्त्री की शारीरिक-आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर अथवा उन्हें शारीरिक-आर्थिक रूप से मजबूर कर, अपहरण/क्रय या ब्याह द्वारा परिचारिकाओं (यौनदासी) या रानियों की शक्ल में, बहुरंगी तितलियों के रूप में अपने चारों ओर दिन-रात मँडराने एवं भीनी-भीनी खुशबू बिखेरने को नियुक्त करते हैं। उनकी इस अमानवीयता को उनके शौक के रूप में तथा नारियों के उक्त यातनाघर को कमनीय स्वर्ग के रूप में ढालकर द्विवेदी जी जब ‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’ लिखने लगते हैं, तब उससे बड़ी विसंगति क्या होगी ?
नारी-सौंदर्य बनाम स्त्री को ‘सुंदर देह’ रूप में ढाल देने का प्रोजेक्ट :
आचार्य द्विवेदी ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ सहित अपने विशाल लेखन में स्त्री के सौंदर्य का इतना और इस कदर बखान करते हैं कि लगता है, ‘सौंदर्य’ को वे स्त्री के लिए एक मूल्य की तरह प्रतिष्ठित कर रहे हैं। केवल वर्णन या व्यंजना की बात नहीं, बल्कि उनकी मुखर घोषणा है (बाण के जरिये) कि ‘‘मैं नारी-सौंदर्य को संसार की सबसे अधिक प्रभावोत्पादिनी शक्ति मानता रहा हूँ।’’ (सप्तम उच्छ्वास) ऐसी कोई घोषणा पुरुष के बारे में उनकी नहीं है, न ही पुरुष के सौंदर्य-वर्णन में उनकी मनोवृत्ति इतनी रमती है, जितनी नारी के सौंदर्य-वर्णन में। यद्यपि इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे मानसिक सौंदर्य की सत्ता भी स्वीकारते हैं और एकाधिक निबन्धों में उनका यह विश्वास भी प्रकट हुआ है कि मानसिक सुंदरता या सौमनस्य ही, दैहिक सौंदर्य के रूप में प्रकट होता है; तथापि उनके द्वारा कृत स्त्री के सौंदर्य-वर्णन में उसका शारीरिक धरातल सर्वाधिक मुखर है। स्त्री में सौंदर्य देखने की बीमारी ने उन्हें इस बुरी तरह जकड़ रखा है कि चाहे किसी स्तर, उम्र या किसी भी स्थिति में पड़ी स्त्री हो, उसमें सौंदर्य जरूर खोजते हैं। रानी से नौकरानी तक, कुलवधू से वारवधू तक, माँ से बच्ची तक, गृहिणी से संन्यासिनी तक कोई उनकी सौंदर्यग्रासी दृष्टि से बच न पाई है। वे मानो अवसर खोजते रहते हैं कि कब स्त्री की सुंदरता बखानने को मिले। उसकी प्रसन्नता ही नहीं, दुख में भी उनकी लेखनी अकुलाती रहती है - रोग-शोक में भी वह वही खोजती है। विश्व-सर्जिका चेतना का भी वे भुवनमोहिनी त्रिपुरसुंदरी रूप में साक्षात्कार करते हैं। प्राकृतिक चित्रण को भी स्त्री-सौंदर्य की भाषा में ढालना उनकी प्रिय शैली है। दिशाएँ उन्हें वधुएँ लगती हैं तो सरोवर का पानी इतना सुगंधित कि वनदेवियों के उसमें स्नान से उनके पुष्पराग घुलने की कल्पना कर बैठते हैं।

 स्त्री और पुरुष से जुड़े वर्णनों में क्रमशः गुणों व भाषा की कोमलता व कठोरता का इस्तेमाल उनका तरीका रहा है। स्त्री के देहगत सौंदर्य में वे रूप के साथ स्वर को भी महत्त्व देते हैं। ‘अष्टादश उच्छ्वास’ में महामाया की शिष्याओं के आह्वानमय गान के शक्तिशाली, अद्भुत प्रभाव के कारण रूप में वे नारी-कंठ को पाते हैं, जिससे उन्हें लगता है कि अब आर्यावर्त सुरक्षित हो गया। द्विवेदी जी को बाणभट्ट के मुँह से जब ‘त्रयोदश उच्छ्वास’ में यह बोलते सुनते हैं - ‘‘नारी-देह वह स्पर्शमणि है, जो प्रत्येक ईंट-पत्थर को सोना बना देती है’’ - तो समझना मुश्किल नहीं रह जाता कि स्त्री की दैहिकता को हाईलाइट करने में वे कितने आगे हैं।


पुरुषों की इस दुनिया के मनोरंजन, हित-चिंतन की देन हैं ये, जो स्त्री को सुंदर मानकर, उसे दैहिक-क्षमता, प्रतिभा-विकास से जबरन विलग कर, उसे एकमात्र ‘सुंदर’ बनने को मजबूर कर अपना उल्लू सीधा करती है। ‘नारी-सौंदर्य’ का यह सारा बखेड़ा पुरुषों के सुख के लिए, पुरुषों के द्वारा पुरुषों का है, ताकि देह की परिधि से बाहर निकलकर वह व्यक्ति न बन जाए - वह इस पुरुष-सभ्यता में उत्प्रेरक या साधन बनकर रहे, कहीं कर्ता न बन जाए। इस प्रकार से नारी को साधन बनाना, इस प्रकार से उसका उपयोग बाण व द्विवेदी जी को कितना ही स्पृहणीय हो, पर यह स्त्री के प्रति घोर अन्यायी और सबके लिए अस्वास्थ्यकर है। चारुस्मिता व विद्युदपांगा की नृत्यकला का उपयोग, जिस प्रकार (बकौल धावक) कान्यकुब्ज की विद्रोही जनता को मदिरा पिलाने के अर्थ हो रहा था, उसी का दूसरा परिष्कृत रूप है उक्त उपयोग। नारी का उपयोग चाहे हर्षयुगीन सामंतों द्वारा रीतिकालीन विलास-वीथियाँ सजाने में से अथवा पूँजीवादी बाजार की मॉडलिंग या सौंदर्य-प्रतियोगिताओं या एयरहोस्टेस, सेल्सगर्ल, रिशेप्शनिस्ट आदि रूपों में हो; देवदासी या तंत्र-साधना का उपकरण बनाने में हो, ऋषियों की तपस्या भंग करने में हो अथवा बहुत पुनीत रूप में गृहलक्ष्मी/माँ भर में उसे सिमटा देने के रूप में - सबके सब स्त्री को व्यक्ति न मानने और सहज नैसर्गिक जीवन जीने के उसके अधिकार से वंचित कर उसे ‘सुंदर देह’ रूप में जबरन ढाल देने के प्रोजेक्ट के ही अलग-अलग रूप हैं। ये सब स्त्री-देह को कच्चे चबा डालने को आतुर यौन हिंसकों या यौन ग्रासकों द्वारा उसे वासना-वेदी पर बलिदान करने (वेश्या बनाने) के ही कुछ परिष्कृत चेहरे हैं। ‘स्त्री-सौंदर्य’ के कल्पक द्विवेदी जी इस तथ्य को समझना ही नहीं चाहते कि स्त्री को ‘सुंदर’ देखने का उनका सर्वव्यापी आग्रह कितना स्त्रीघातक है - एक दीर्घकालीन सांस्कृतिक अत्याचार, जो स्त्री पर वाल्मीकि-व्यास-कालिदास-युग से लगातार होते आ रहा है, उसी का हिस्सा है वह। सौंदर्य के ये प्रतिमान, जिनमें वे नारी को कैद करते हैं, उसकी सहजेच्छा या आत्मनिर्भरता के प्रयत्नों (योग-कसरत, खेलकूद, बॉक्सिंग-फाइटिंग आदि शरीर पुष्टिकारी क्रियाओं एवं शिक्षा नौकरी, प्रतिभा के अनंत क्षेत्रों) से उसे बचाकर, विशेष चाल-ढाल-अदा-मुस्कान, दैहिक तराश (क्षीण कटि, नाजुक, छरहरी आदि रूपों में) के साथ बोझिल वस्त्राभरणों से उसे सन्त्रस्त कर, नारकीय यातनाओं में उसे डाल कर पुरुषों का स्वर्ग रचा जाता रहा है।
बाणभट्ट अपने छुटपन से ही स्त्री का जो सम्मान करता है, उस पर की गई अननुकूल टीकाओं को सहन नहीं कर सकता - वह थोथा मनुवादी सम्मान है, जो स्त्री को देवीत्व मातृत्व आदि की हवा से फुला कर उसके यथार्थ की दारुण धरती से उड़ा देता है - सम्मान या महिमागान के सम्मोहन में उसे विषम विवाह, पातिव्रत्य या घरेलूपन का सीकड़ पहना देता है तथा उसकी कड़ियों की झनझनाहट में जीवन-संगीत का भ्रम पैदा करता है।

पितृसत्ता के साथ स्वर्गाभियान और काव्यवाणी का उपयोग :
पितृसत्तात्मक समाज के ‘पौरुष दर्प’ (लेखक ने ठीक शब्द चुना) में नारी-देह की छीना-झपटी, अपहरण, बिक्री, उपहार, दान (जैसे-कन्यादान) के बहुविध कांड चलते रहे हैं। म्लेच्छों के समाज की समता, जिसका गुणगान भट्टिनी करती है, वहाँ भी नर-नारी समता नहीं है, बल्कि सारे नर आपस में समान हैं और सारी नारियाँ आपस में समान हैं, पर नर-नारी आपस में समान नहीं है, अन्यथा कुलवधुओं और बालिकाओं का घर्षण ही उनका विलास न होता। अतएव, वह समत्व अपूर्ण है - ‘पुरुषवादी समता’ इसे कह सकते हैं। (यही समता लोरिकदेव के आभीरों में भी है।) वह समता अधूरी है, पर है तो। भारतीय समाज में तो वह भी नहीं है। इसी से बाणभट्ट का यह सोचना बिलकुल ठीक है, म्लेच्छों के समाज में स्वर्ग बनाना आसान है, पर भारतीय समाज में स्वर्ग बनाना कठिन है। वहाँ स्वर्ग बनाने के लिए थोड़ा-सा सुधार करना होगा, क्योंकि बाकी पूर्व तैयारी हो चुकी है, पर भारतीय समाज में क्या है शास्त्रीय बड़बोलेपन के सिवा, साधनात्मक विसंगतियों के सिवा? आध्यात्मिक समता के पाखंड के सिवा ? इसी पाखंड की छाया में हजारों-हजार जातियाँ तथा स्त्रियों को एक ही साथ कुलवधू और वेश्या बनाने का प्रोग्राम बाखूबी चलते रहता है; दोनों रूपों में नारी दलित ही होती है। इस पर न महामाया ने कुछ सोचा, न उन्हें अधूरी कहने वाली भट्टिनी ने। एक को म्लेच्छ और आर्य के भेद से फुरसत नहीं, जिसमें (भयंकर सामाजिक विषमता से बने) इस देश को बचाने के लिए म्लेच्छों को एकमुश्त मिटा देने का जोश है, दूसरी में ‘ऊँची भारतीय साधना’ के झूठ का सम्मोहन। महामाया का तरीका तो अधूरा सच होकर भी सार्थक है, क्योंकि कम से कम सामंतवादी भेदभावमूलक व्यवस्था और उसके स्त्री-घाती भीषण चेहरे का पर्दाफाश करता है । पर, ऊँची भारतीय साधना उन तथाकथित म्लेच्छों तक पहुँचाने और निकृष्ट सामाजिक जटिलता भारतीय समाज से हटाने का भट्टिनी का प्रस्तावित तरीका तो उससे भी आधी समझ पर आधारित होने के साथ और भी अव्यावहारिक है।
उपन्यास की लगभग समाप्ति पर वह बाण के साथ अपने इस प्रयोग के लिए तैयार दिख रही है।  स्वर्ग बनाने की इस परियोजना की कल्पना करते द्विवेदी जी यदि ‘क्या कभी यह भी संभव है कि मानव-समाज में राज्य न हों, सैन्य-संगठन न हों, संपत्ति-मोह न हो ?’ (‘अष्टम उच्छ्वास’) जैसी चिंता करने की बजाय यह चिंता करते कि ‘कैसे संभव हो कि इंसानी समाज में पितृसत्ता न हो ?’ तो पूरी संभावना होती कि ऐसा सचमुच का स्वर्ग बनता, जिसमें बूढ़े इंद्रों के लिए अप्सराएँ न होतीं - नर-नारी बिलकुल समान होते। जब तक अप्सरा-विहीन यह स्वर्ग न बनेगा, तब तक निउनिया का पूछा त्रिकाल-त्रिलोकभेदी यह  प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा - ‘क्या स्त्री होना ही मेरे सारे अनर्थों की जड़ नहीं है ?’ यह प्रश्न तब तक अनुत्तरित रहेगा, जब तक कुमार कृष्णवर्धन के घर सिर्फ पुत्र-जन्मोत्सव मनता रहेगा और उसमें नारियाँ सिर्फ जुलूस की शोभा के लिए पुरुषों से भी अधिक संख्या में होती रहेंगी। या, प्रत्यंत दस्युओं के आने की खबर पत्रा से सिर्फ ‘भाइयों’ को देते भर्वुशर्मा इस धरा पर होते रहेंगे। या, पुरुष शास्त्रों व इतिहास को तपस्या/धर्म की व्यवस्थाओं के लिए नारियाँ विघ्नस्वरूप प्रतीत होती रहेंगी। यह प्रश्न तब तक भी अनुत्तरित रहेगा जब तक (स्त्रियों को मर्दों की भोग-कारा में कैद किये रखने वाले ) ‘कंचुकी धर्म’ का पवित्र निष्ठा से पालन करने वाले वाभ्रव्य जैसे वृद्ध भद्रपुरुष रहेंगे। साथ ही तब तक अनुत्तरित रहेगा यह प्रश्न, जब तक पुरुष का सत्य और होगा, स्त्री का सत्य कुछ और।
पुरुष का सत्य और , स्त्री का सत्य और ?
‘पुरुष का सत्य और है, स्त्री का सत्य और’ - इस आशय का महामाया का प्रतिपादन साधना-क्षेत्र में होकर भी, बृहत्तर सांस्कृतिक आशयों का मूल है। इसी दृष्टिकोण ने सच मे नारीवाद या स्त्री-विमर्श को खड़ा किया है। अब तक ज्ञान के, समाज-रचना या व्यवस्था के तमाम क्षेत्र पुरुष के सत्य से खड़े किए गए हैं। चूँकि स्त्री का सत्य और कुछ है - इसी से स्पष्ट हुआ कि अब तक का तमाम ज्ञान या सभ्यता- विकास/संरचना सिर्फ आधी दृष्टि के अनुकूल है, कारण आधी आबादी (स्त्री) का उसमें सहयोग नहीं। स्त्री-दृष्टि से विश्व दृष्टि अलग होगी, इसलिए ‘स्त्री विमर्श’ खड़ा होना निहायत जरूरी है। फिर, स्त्री-विमर्श का कार्य है - ‘पुरुष-सत्य और स्त्री-सत्य और’ -  की भेदकारी जेंडरवादी संरचना की छानबीन करना, जिसके तहत स्त्री को हर बात में, हर जीवन-क्षेत्र में, हर अधिकार-कर्तव्य, सिद्धि या कर्म क्षेत्र में, यहाँ तक कि शारीरिक व्यवहार व वस्त्रादि-चयन (सौंदर्य बोध) तक में पुरुष से भिन्न बना रखा है। स्त्री को दोयम दर्जे का शिकार बनाने में ‘पुरुष का सत्य और, स्त्री का सत्य और’ की महामायावी समझ ने ही योगदान दिया है। यही पितृसत्ता का मूल सूत्र है। इसी ने नारीत्व, नारी-मनोविज्ञान जैसे मिथकों को बढ़ाने के साथ नारी को इंसानियत से बहिष्कृत कर रखा है - उसे कुछ खास बनाकर - विलक्षण या कुलक्षण ठहरा कर। इसके रहते निउनिया का पूर्वोक्त प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा। सच कहें तो यह अनुत्तरण तब तक कायम रहेगा जब ‘कथामुख’ की दीदी को आधुनिक (यूरोपीय) स्त्री वर्ग की प्रवक्त्री बनाकर यह कहलाया जाता रहेगा कि स्त्रियाँ चाहें भी तो आलस्यहीन होकर काम नहीं कर सकतीं, क्योंकि समाज की पराधीनता चाहे कम हो जाए, पर प्रकृति की पराधीनता तो हटाई नहीं जा सकती। स्पष्ट होना चाहिए कि प्राकृतिक पराधीनता का आशय लज्जादि भाव हैं तो उनकी प्राकृतिकता पीछे खंडित हो चुकी है ओर यदि उसका आशय स्त्री के मासिक चक्र-गर्भधारण बाध्यता आदि है, तो विज्ञान के बढ़ते हाथ इस प्राकृतिक पराधीनता से स्त्री को अधिकाधिक मुक्त करने जा रहे हैं।

लेखक द्वारा ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ के एकमात्र स्पंदनशील पूर्ण नारी-चरित्र निउनिया का, प्रायोजित तरीके से आत्मदान के पर्दे के पीछे, अंत कर दिया जाता है। भेदभावमय निर्घृण समाज राज्य व धर्म व्यवस्था का वह सर्वाधिक अनुभवी ‘नारी-चरित्र’ है, जो लोक व शासन के किसी दबाव से मुक्त रहकर निर्णय लेने की अपार क्षमता व कर्मठता से युक्त आत्मनिर्भर इंसान है। वह इस व्यवस्था के क्रूर दाहक संजाल की निदारुण भट्ठी में आजीवन जलती रही है, जिसे समझना नायक बाण या लेखक के वश या रुचि की बात नहीं। वह अपने विडंबित, संघर्षशील जीवन के जरिये नारी-जाति का प्रतिनिधित्व करती है और उसके खड़े किए गए सवाल थोड़ा सा भी सोचते ही पूरा ढाँचा हिला देने की ताकत रखते हैं। अपने अनुत्तरित सवालों को लिए ही वह मर या मार डाली जाती है। उसकी मौत भी एक भीषण सवाल बनकर आ खड़ी होती है, मानो सबसे चिल्ला-चिल्लाकर वह पूछ रही है कि स्त्री इस प्रकार समस्याग्रस्त क्यों है, जिसका एकमात्र समाधान मृत्यु है ? इस सन्दर्भ में सुदर्शन प्रियदर्शिनी की काव्य-पंक्ति स्मरणीय है -  ‘‘जब भी किसी औरत को मरते देखती हूँ तो मुक्ति का आभास होता है।’

द्विवेदी जी के रचना-संसार में स्त्री-संबंधी जो भी दहकते यथार्थपरक प्रश्न जगे हैं, वे अनायास से आ गए हैं, अन्यथा वे पूरे होशो-हवास में पितृसत्तात्मक संरचना के स्त्री घातक स्वरूप को बहुत ही कम प्रश्नांकित कर सके हैं; ज्यादा तात्त्विक स्त्री-प्रश्नों को ही वे उठाते हैं ? निउनिया के द्वारा अवश्य उन्होंने बेधक सवाल उठा दिए हैं, पर उनके साथ शेष पात्रों की कथा-संरचना कितनी सहयोगी बन पाई? महामाया के बागी आह्वान का लक्ष्मीभूत प्रजा-संगठन स्त्री का नहीं है, बल्कि ‘पिंजरे की मिठबोली मैना बनी रहे स्त्री और पुरुष उसे बचाते रहे’, ऐसा ही कुछ भाव है उनका। पिंजरा तोड़ने का आह्वान तो बिलकुल नहीं है। यह पिंजरा है घर का, विवाह व पातिव्रत्य का तथा स्त्री पर डाले गए ‘सौंदर्य’ का।

 फिर भी, यह कहना उचित न होगा कि द्विवेदी जी जड़ पंडित मात्र हैं। वे युग और उससे ज्यादा अपनी परिस्थितियों के लिहाज से उस संक्रमणशील दोराहे पर खड़े थे, जहाँ नयी दृष्टि जुड़ रही थी, पर पुराने का मोह भी गया न था। उनमें द्वंद्वात्मक प्रक्रिया चल रही थी, भले घोषित तौर पर वे ‘द्वंद्वात्मकता’ या ‘विकासवाद’ में आस्थावान न रहे हों। उनके बाणभट्ट में रोमांतिक कवि और जीवन-योद्धा का तनाव सतत चला है। शास्त्र के प्रति मोह के साथ शास्त्र पर संशय भी उनमें बराबर रहा है। वे अपनी ही कृति में अपने ‘पंडित’ व्यक्तित्व के साथ उसके किसी प्रतिपक्ष की रचना अवश्य करते हैं, जो जड़शास्त्रीयता या वर्णभेदी-पितृ संरचना पर कहीं चिंतन करता है, कहीं उसका उपहास करता है तो कहीं उससे दो-दो हाथ करता है। अघोरभैरव, महामाया, निउनिया ही नहीं, किसी सीमा तक बाणभट्ट में भी उसी का विलोम है, क्योंकि वह उचितानुचित-विवेक की सामान्य धारा से हटकर चलता है। इसी स्थिति में उनके उपन्यासों में जीवन-दर्शन बन सकनेवाली सूक्तियाँ फूट पड़ती हैं। जैसे- ‘(सत्य के लिए) किसी से न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ (‘षष्ठ उच्छ्वास’)  इसके साथ अघोरभैरव की ही यह उक्ति मिला लें, ‘तेरे शास्त्र तुझे धोखा देते हैं। जो तेरे भीतर का सत्य है, उसे दबाने को कहते हैं; जो तेरे भीतर का मोहन है, उसे भूलने को कहते हैं; जिसे तू पूजता है, उसे छोड़ने को कहते हैं’ - तो असमानांतर साहसी सत्यशोधक दृष्टि मिल जाती है। आचार्य द्विवेदी का विचारक रूप (निबंधों या साहित्येतिहास में) शास्त्रीयता की सीमा रेखांकित कर उसकी अमानवीयता का उद्घाटन भी करता है (विशेषतः वर्ण-मजहब आदि के संदर्भ में); परंतु लिंगभेद (जेंडरवाद) के संदर्भ में (स्त्री प्रति तमाम सहानुभूति रखकर भी) वे पुरानेपन से स्वयं को बचा न पाए हैं। यही कारण है कि ‘पुनर्नवा’ में व्यवस्थाओं के निरंतर परिमार्जन व संस्करण द्वारा उनके नवीनीकरण को निहायत जरूरी बतलाकर भी, स्त्री के संदर्भ में उसमें शायद ही सुधार वे चाहते हों। इसी से उनका साहित्य अपनी तमाम सांस्कृतिक उच्चता, रचनाशीलता व अलौकिकता तथा मनुष्य की जययात्रा में विश्वास के बावजूद पितृसत्तात्मकता की प्रतिसंस्कृति न रच सका। इसी से पुरुष व प्रकृति अथवा ‘स्त्रीत्व’ व ‘पुंसत्व’ नामक दो कोटियों में विश्वासी उनके दार्शनिक भारतीय मानस में स्त्री व पुरुष को इंसानियत के सहज साथी (लाइफ पार्टनर) रूप में देखने की तमन्ना लगभग अनुपस्थित है। उसकी जगह देवता व दासी का द्वंद्व उनमें मिलता है, जिसे देवी-महिमा और नारी-सौंदर्य की विद्युत-कौंध व बरसात से भी भरमाया गया है। इसी से अघोरभैरव के मुख से वे यह भले कहला लें कि  ‘‘जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, आसक्त हो’’(‘षष्ठ उच्छ्वास’), लेकिन उनका साहित्य इस भेदभाव की दीवारों का रंग-रोगन करने में ज्यादा निरत है, उन्हें धक्का देने में बहुत कम ।
फारवर्ड प्रेस के बहुजन साहित्य वार्षिकी से साभार 
चित्रांकन लाल रत्नाकर 
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