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जशोदाबेन की चिट्ठी

प्रातःस्मरणीय प्रभु जी ,

समझ नहीं पा रही , बात कहाँ से शुरू करूं और अपनी भावनाओं को किन शब्दों में उतारूं . तुम भारतवर्ष के प्रधानमंत्री हो -भारत भाग्य विधाता – और मैं अपने मायके में पड़ी वह भाग्यवती जशोदाबेन , जिसका नाम तुमने अपने चुनाव उद्घोषणा में जीवनसाथी वाले कॉलम में दर्ज कर दिया. तुम्हारी वाह-वाही हुई और मेरी चर्चा. मुझसे सवाल पूछे जाने लगे , तस्वीरें ली जाने लगीं . सिपाही –संतरी आगे –पीछे हो लिए .

मेरे प्रशांत जीवन में हलचल की लकीरें उठने लगी और फिर मिल –मिलाकर एक कोलाहल से मैं घिर गई. मेरी प्रशांतता, अकेलापन रौंद डाला गया; और सच कहूं , अब तो उसकी भी स्मृतियाँ ही शेष हैं. बहुत विवश होकर, गहरे अवसाद में , आज मैंने कलम उठाई है और जब लिख रही हूँ, तब यह संकोच भी है कि कहीं मेरा यह पत्र तुम्हारे महान दायित्वों में कुछ खलल तो नहीं डाल जायेगा, जो मैं बिलकुल नहीं चाहती.
लेकिन ऐसे ही मन में एक विचार उमड़ा….. कि मैं भारत की एक नागरिक भी तो हूँ . और न सही किसी विशिष्ट अधिकार से , अपनी साधारणता के अधिकार से भी मुल्क के आका को , एक पत्र तो लिख ही सकती हूँ . तुम चाहे जिस रूप में इसे स्वीकारो – न स्वीकारो , अब शायद लिखे बिना मैं नहीं रह सकती.
मेरे प्रभु , तुम शायद जानना चाहोगे कि मैं कैसी हूँ . मैं कैसे कहूं कि सुख से हूँ और फिर अपने को दुःखी भी कैसे कहूं . क्या मेरा दुःख सचमुच दुःख जैसा है ? और जो मैं जी रही हूँ उसे सुख कहा जाना चाहिए ? कहा न ! मन बहुत चंचल है और तय नहीं कर पा रही हूँ, सबकुछ किस अनुक्रम में रखूँ .

आज जब मॉनसून के बादलों ने दस्तक दी , तब मेरी बूढ़ी काया में किशोरवय की स्मृतियाँ कौंधीं. इन स्मृतियों के साथ तुम भी सकुचाये-से आये. कुछ क्षण के लिए मैं सचमुच दुल्हन बन गई. गड्ड-मड्ड स्मृतियों के बीच तुम एक अल्हड किशोर के रूप में अब भी बैठे हो –इन स्मृतियों को मैंने अपने  मन के खूंट में बाँध लिया है- कोई अपराध तो नहीं किया है न प्रभु ! चलो, यदि जो अपराध भी किया है , और करती हूँ तो इतने भर की इजाजत कृपा कर मुझे दे दो . देते हो न !

एक चीज पूछूं ? मैंने हजार बार इसपर सोचा है . हर सोच पर सिहर कर रह जाती रही हूँ. सच कहना, तुम जब चुनाव कागजातों में मेरा नाम दर्ज कर रहे थे , तब अक्षरों के साथ तेरे मन में मेरी कोई तस्वीर भी खिची थी ? मैंने पहले टी वी चैनलों, और फिर अखबारों में तुम्हारे हस्तलेख में अपना नाम देखा-जशोदाबेन . मैं फूट कर रोई . रुलाई की हिचकियाँ रुक ही नहीं रही थीं. वह शायद सुख की रुलाई थी , आंसू भी सुख के थे . समझते हो न, सुख के आंसुओं के अर्थ ! पास होते तो बतला सकती थी , इन सब का मर्म . लेकिन तुम तो दूर दिल्ली के ‘ राजमहल’ में पता नहीं किन –किन चीजों के संधान में जुटे हो और मैं यहाँ अकेली , केवल तेरी स्मृतियों में डूबी हूँ.

मुझे आज भी याद है, तुम्हारा संवाद , जिसे तुमने एक अल्हड दुल्हन को सुनाया था – ‘ मैं देश के लिए , समाज के लिए बना हूँ . और कि तुम पढ़ो.’ मैंने अपनी पढाई जारी राखी . मिहनत करके शिक्षिका बनी और अध्यापन को ही व्यसन बनाया. तुम देश गढ़ते रहे , मैं समाज . मुझे हमेशा प्रतीत हुआ तुम्हारे भीतर एक बुद्ध , एक गांधी बैठा है . तुम व्याकुल भारत हो . मैंने तुम पर गुमान किया . तुम्हारे राह का रोड़ा नहीं बनूँ, ऐसा तय किया. सोचती थी , एक दिन तुम सारे भारत पर छा जाओगे . मेरा सपना साकार हुआ. तुम सचमुच सारे भारत पर छा गये और छाने के साथ जब पहली दफा अपने कर कमलों से मेरा नाम लिख सके तो मुझे यकीन हो सका कि मेरी तपस्या व्यर्थ नहीं गई . तुम सचमुच बुद्ध बन गये, गांधी बन गये.

मैंने अंतरमन से तुम्हें आशीष दिया , तुम्हारी सफलता के लिए मनौतियाँ की. नंगे पाँव तीरथ-तप किये , जो भी मुझसे संभव हुआ , किया. और तभी मेरे मन में यशोधरा और कस्तूरबा का ध्यान आया. पढ़ा था कि बुद्धत्व प्राप्ति के बाद बुद्ध कपिलवस्तु गये- यशोधरा से वहां जाकर मिले , जहां उसे छोड़ गये थे . मैं दिन गिनती रही कि तुम एक रोज मुझसे मिलने आओगे और शायद अब उस तरह रहने का प्रस्ताव दोगे, जैसे बापू के साथ बा रहती थीं… लेकिन तुम क्यों आने जाओ. न तुम से बुद्ध बनना संभव हुआ , न गांधी. तुम पता नहीं क्या के क्या बन गये. मैं हताश होकर रह गई. यही समझा कि तुम बोलते चाहे जो हो , हम स्त्रियों को नरक का खान के अलावे कुछ नहीं समझते. तुम्हारी शिक्षा और दीक्षा यही बताती रही है कि स्त्री का पवित्रतम रूप माँ का रूप है . अपनी माँ के प्रति तुम्हारे प्यार की मैं सराहना करती हूँ . लेकिन मेरे प्रभु तुम हम स्त्रियों को क्या सन्देश देना चाहते हो ? एक माँ, पहले पत्नी होती है और उसके भी पहले एक पुत्री . लेकिन तुमने मुझे अहल्या की तरह स्थिर कर दिया , पत्थर बना दिया. मैं जान ही न सकी कि मेरा अपराध क्या था .

प्रभु !  मैंने भी संस्कृति का थोड़ा अध्ययन किया है . हमारे यहाँ स्त्रियाँ उर्वरता और संपन्नता की प्रतीक मानी गई हैं . हमारे मनीषियों ने भारत वर्ष को जब भारत माता बनाया, जिसके जय करने में तुम्हारे दोनो हाथ बड़ी फूर्ती से उठते हैं और तुम भावनाओं से भर जाते हो , तब उस समय भारत माता को महाउर्वरा शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा –महाजननी  के रूप में देखा , लेकिन तुमने मुझे अवरोध के अलावे कभी कुछ नहीं समझा. अब भी यही समझते हो .

सुना था , या कहीं पढ़ा था, उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा संकुचित विचारों का उद्धारक होता है . लेकिन तुमने उतरदायित्व से कुछ नहीं सीखा. हठी बने रहे. सुना है ऐसे हठी लोगों को जनता पसंद करती है और तेरा वोट बढ़ता  है . यदि अपने वोट के लिए तूने मेरा इस्तेमाल किया है तो भी मैं , खुश होना चाहूंगी. तुम्हारे कुछ काम आ सकी , यह मेरे लिए गर्व की बात होगी. क्या सचमुच ऐसा है ? इस बात की तस्दीक कर सको , तो मुझे अच्छा लगेगा.

मेरे प्रभु, मेरा मन वाकई अभी बहुत व्याकुल है और जैसे केले के हर पात के पीछे एक पात होता है , वैसे ही मेरी हर बात के पीछे के एक बात है . कितनी चीजों को लिखूं . बातें उलझ –पुलझ जा रही हैं . तारतम्य में रखना संभव नहीं हो पा रहा है … अब जैसे तो – जब टी वी पर तुझे झाडू चलाते देखा तब सोचा काश , तुम्हारे साथ होती और राधा जैसे कान्हा के कान उमेठती थीं , तेरे कान उमेठ कर ठीक से झाडू पकड़ने का पाठ देती. लेकिन यह सब मेरा सपना है प्रभु ! तुम बुद्ध नहीं हो , तुम कृष्ण नहीं हो, गांधी नहीं हो , तुम केवल तुम हो और इससे  तुम तनिक सा भी इधर या उधर नहीं होना चाहते.

लेकिन यदि इसे ही स्थितप्रज्ञ होना समझते हो , तब जोड़ देकर कहना चाहूंगी, तुम गलती पर हो . स्थितप्रज्ञता जड़ता नहीं है प्रभु, वहां सातत्य है , नैरन्तर्य है , प्रवणता यानी नित –नवीनता है –जैसे नर्मदा के प्रवाह में गति है , वैसी गति है . स्थितप्रज्ञता हमें आगे ले जाती है , पीछे नहीं ले जाती. तुम तो स्वयं बड़े जानकार हो , तुम्हें क्या बतलाना. लेकिन तुम तो जानते हो , जिन्दगी भर अध्यापकी की है , तो नसीहत देने की एक आदत बन गई है . इसका बुरा नहीं मानना .

तुम्हारे भाषणों को टी वी पर ही सही , गौर से सुनाती हूँ . तो यही समझा है कि भारत को संपन्न बनाना चाहते हो. सोने का –स्वर्णिम भारत बनाना चाहते हो . लेकिन अपनी पौराणिकता से क्या कुछ भी नहीं समझना चाहोगे प्रभु ! पौराणिक लंका सोने की थी – स्वर्णिम लंका. और तुझे कैसे समझाऊं कि ऐसी लंकायें उत्कर्ष का नहीं , अपकर्ष का प्रतीक बनाती हैं . यह विकास का तुम्हारा अपना राग हो सकता है , तुम्हारी अपनी व्याख्या हो सकती है , लेकिन हमारी संस्कृति ने अनुमोदन नहीं किया है . पूरा पश्चिमी जगत, आज भौतिक उपलब्धियों से भरा है और  वास्तविक रूप में सबसे दुःखी हुई.  वर्चस्व और संपन्नता हमारे गर्व- गुमान और विलासिता तो बढ़ा सकता है , हमें सुखी नहीं रख सकता. सुख के कुछ मन्त्रों का सृजन मैंने भी किया है . प्रभु, कभी पूछा मुझसे, जो बताऊँ ? तुम तो कस्तूरी मृग की भांति वन –वन दौड़ रहे हो. कस्तूरी तो तुम्हारे पास है.
चलो सबकुछ एक ही पत्र में उड़ेल देना अच्छी बात नहीं . तुमने पत्र की पावती यदि भेजी तब फिर लिखूँगी. लेकिन चलते –चलते एक चीज पर और ध्यान दिलाना चाहूंगी. वह यह कि हो सके तो अपने धज पर थोड़ा ध्यान देना. तुम तो इतने सादगी पसंद थे . तुम्हारे उस अधकट्टे कुरते की क्या शान थी ! लेकिन इधर तो तुमने पता नहीं कहाँ –कहाँ का ड्रेस डिजाइन धारण कर लिया है . ऐसे डिजाइनदार पोशाकों में एक जादूगर की-सी शक्ल बनती है तुम्हारी. तनिक भी अच्छा नहीं लगता मुझे. टी वी वालों की वाह –वाही पर मत जाओ . वे सब मिल –मिलाकर तुम्हारा मजाक बना रहे हैं. खुद तय करो कि तुझे क्या करना है, क्या खाना है , क्या पहनना है.
तुम्हारे ख़त का इन्तजार करूंगी . ट्विटर मेसेज मत करना. मैं पुरानी दुनिया की प्राणी हूँ . तुम्हारी तरह हाई –टेक नहीं !
तुम्हारी
ज …..
नोट : यह एक काल्पनिक पत्र है .

(लेखक प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं.)

धरती ( भूदेवी ) जहाँ होती हैं रजस्वला !

मंजू शर्मा

सोशल मीडिया में सक्रिय मंजू शर्मा साहित्य लेखन की ओर प्रवृत्त हैं .संपर्क : ई मेल- manjubksc@yahoo.co.in

ओडिशा में धरती ( ‘भूदेवी’ ) भी तीन दिनों के लिए रज:स्वला होती है और इन तीन दिनों के दौरान इस राज्य में कृषि-संबंधित सभी कामकाज को पूर्णत: निषिद्ध कर दिया जाता है। यहाँ की पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देव ‘विष्णु(जगन्नाथ)’ की पत्नी ‘भूदेवी’ आषाढ के महीने में तीन दिनों के लिए जब रज:स्वला होती है , उस दौरान ही यह त्योहार ‘रज’, ओडिया भाषा में जिसे ‘रजो’ उच्चारित किया जाता है,बहुत-ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

‘रज’ शब्द ही ‘रजस्वला’ अर्थात् मासिक-धर्म से लिया गया है,इस दौरान विशेषकर ओडिशा के तटीय क्षेत्रों , पुरी ,कटक,बालासोर और ब्रह्मपुर आदि में  ‘रजपर्व’ मनाया जाता है। विशेष बात यह है कि आषाढ़ में यह त्योहार ‘रजो’ लड़कियों और महिलाओं के बीच  विशेष उल्लास-से मनाया जाता है।  एक अच्छी बात इस दौरान स्थानीय लोगों के बीच दिखाई देती है कि  तीन दिवसीय ‘रजो’ के दौरान घर की स्त्रियों और लड़कियों को घरेलू कामकाज-से पूरी तरह-से स्वतंत्र कर दिया जाता है। कुँवारी लड़कियाँ पैरों में आलता डालकर , नए कपड़े और नए आभूषणों से सज-धजकर घरों-से बाहर निकलती हैं और पेड़ों की मज़बूत डालियों-से झूले बाँधकर खूब झूला झूलती हैं,लूडो खेलती हैं या ताश खेलती हैं। अर्थात् स्थानीय लोगों के लिए सभी तरह की मस्ती का नाम है यह ‘रजोपर्व’। स्त्रियों को लगता है कि चलो इस त्योहार के बहाने ही तीन दिनों के लिए, हर दिन के घर के कामकाज से आज़ादी तो  मिली  , क्योंकि इस दौरान घर को संभालने की जिम्मेदारी  घर के पुरूषों पर होती है,भले ही रसोई हो या साफ़-सफ़ाई,सबकुछ पुरूष ही संभालते हैं। इस ‘रजपर्व’ के दौरान धरती पर नंगे पैर चलने से सख्त मनाही होती है,  क्योंकि भूदेवी इस समय मासिकधर्म की पीड़ा झेल रही होती हैं। कुल मिलाकर पूरे पाँच दिनों तक ‘रजो’ की धूम रहती है,’रजो’ के आरंभ होने के पहले ‘सोजा-बोजा’(साज-बाज) होता है , अर्थात् जिसमें तैयारी के लिए सजावट का  खासा ध्यान रखा जाता है।

पहले दिन को ‘पहिली रजो’ के नाम से जाना जाता है,  जिसमें यह माना जाता है कि यह धरा के मासिक धर्म का पहला दिन है,इस दौरान कुँवारी लड़कियों को  अपने नंगे पाँव धरती पर नहीं रखना होता है। इस ‘पहिली रजो’ के बाद दूसरा  दिन,  ‘भूदेवी’ के रज:स्वला का दूसरा दिन , मिथुन संक्राति/रजो संक्रांति (वास्तविक रजो) कहलाता है। और अंत में तीसरे दिन मनाया जाता है,शेष रजो/भू दहा/बासी रजो। लगभग सोजा-बोजा से ही चल रहे इस त्योहार का अंत होता है.  वासुमति गाधुआ अर्थात् धरा/भूदेवी का स्नान। इस समय घरों में पहले से ही तैयारी के दौरान तरह- तरह के (पीठा ) पकवान तैयार किए जाते हैं,जिनमें प्रमुखता से शामिल होता है,पोडापीठा और चाकुली पीठा,जो चावल के पाउडर और इन तटीय क्षेत्रों में बाहुल्यता से उपलब्ध नारियल से बनाया जाता है।  इस दौरान  डोली ( अमूमन हम जिसे चरखे के रूप में जानते हैं)  में बैठकर खेला जाता  है .  ‘रजो उत्सव’  के दौरान ही ‘राम डोली’,’चरखी डोली’,पता डोली और ‘डंडी डोली’ का भी लोग मज़ा लूटते हैं,  इसपर बैठकर घूमते हैं और तब रजो’ के विभिन्न प्रचलित लोकगीत भी महिलाएँ और छोटी-छोटी बच्चियाँ गाती  हैं।

धरती  प्रकृति की ओर से स्त्री जाति का ही प्रतिनिधित्व करती है और शायद यही वज़ह है कि ‘भूदेवी’ के भी आषाढ़ माह में रजस्वला होने की मान्यता बनी है । और ऐसा है , तो फिर स्त्री के रजस्वला होने से जुडी पवित्रता -अपवित्रता की मान्यता इस पर्व से भी स्पष्ट होता है. यहाँ धरती और स्त्री एकाकार हो जाती है . अपनी भाषा में भी हम उत्पत्ति -अक्षम स्त्री और धरती को वन्ध्या और सक्षम को उर्वरा कहते हैं . हम  उत्पत्ति ( संतान और फसल ) में अक्षम धरती और स्त्री दोनो को ही उपेक्षित कर देते हैं . कोशिश की जाती है कि किसी उपाय से धरती और स्त्री ‘ फलवती’ हों , यानी स्त्री संतान पैदा करे और धरती फसल. और यदि शादी के बाद पति संतानोत्पत्ति में अक्षम हो या नपुंसक हो, तब भी लडकी पर ही दवाब होता है संतानोत्पत्ति का,  या यह सिद्ध करने का कि वह ‘ वन्ध्या’   नहीं है . मेरे अपनी ही परिचय की एक लड़की को विवाह के पश्चात् जब यह ज्ञात हुआ कि उसका पति ‘ यौन – अक्षम’  है तो उसने विरोध करना चाहा.  उस लड़की के साथ उसी के घर में रह रहे देवर ने ही उससे शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव  बनाया . इसमें  उसके पति सहित घरवालों की सहमति थी.  साफ़ है कि स्त्री हो या धरा , उसका अस्तित्व केवल उसके बच्चे जनने से ही है .

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‘भूदेवी’ के रज:स्वला होने के पश्चात् मानसून की बारिश होते ही  धरती में फसल/बीज बोए जाते हैं .  ‘भूदेवी’ के रज:स्वला होने के बाद ‘भू’ रूपी मादा को भी किसान रूपी उस नर का इंतज़ार होता है,  जिसके बीजारोपण किए बगैर उसके गर्भ-से फसल ले पाना असंभव है , और इस ‘रजपर्व’ के बाद मान लिया जाता है कि अब यह भूदेवी पूर्णत: सक्षम है , अथवा तैयार है कि किसान चाहे तो अपनी फसल इस धरा से ले सकता है।   हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भी महिला रजस्वला होती है,  उसके  पाँचवे दिन बालों को धोकर नहाने के पश्चात् ही पूरी तरह से सभी घरेलू कामों और पूजापाठ के लिए उसे शुद्ध,पवित्र और योग्य माना जाता  है और रसोईघर के सभी कामों के लिए उसे पुन: मान्यता मिल जाती है। ठीक उसी तरह-से इस ‘रजपर्व’ को आषाढ़ माह में मनाए जाने के पीछे भी यह तथ्य साफ़ नज़र आता है कि आषाढ़ के महीने में बारिश होती है और इसी मानसून के बारिश के पश्चात् रज:स्वला स्त्रियों की तरह अच्छे-से ‘धरा/भूदेवी’ की भी शुद्धिकरण की प्रक्रिया हो जाती है,साथ ही इसी महीने-से हलों को भी धरती में उतारकर  कृषि की प्रक्रिया का आरंभ भी हो जाता है .

इससे साबित है कि यह ‘रजपर्व’ स्त्रियों की  शुचिता  की अवधारणा को  एक कील की तरह हमारी स्थावर मान्यताओं की दीवार में ठोककर और मज़बूती-से स्थापित करने में सहायक ही सिद्ध होता है .

नागौर, राजस्थान में दलित दमन

बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की खासियत भी है। सम्पर्क  .९८६८२६१८९५

(बजरंग बिहारी तिवारी जनवादी लेखक संघ की उस जांच दल में शामिल थे , जो राजस्थान के नागौर जिले में हुए दलित उत्पीडन की घटना की जांच के लिए गया था. उनकी रिपोर्ट . ) 
दलितों के उत्पीड़न के मामले में हरियाणा इतना बदनाम है कि पड़ोसी राज्य राजस्थान को अक्सर शांत इलाका मान लिया जाता है. गाहे-बगाहे वहां से जातिवादी हिंसा की जो खबरें आती हैं वे हरियाणा की भीषण वारदातों के समक्ष उपेक्षित-सी रह जाती हैं. लेकिन, मई 2015में वहां ऐसी बीभत्स घटना हुई कि उसने क्रूरता की सभी हदें पार कर दीं| इस घटना की तहकीकात करने पर मालूम हुआ कि वहां जाति आधारित हिंसा की एक सतत धारा बह रही है. नई सरकार की ताजपोशी ने इस धारा को उत्प्लावित कर दिया है. इसी का नतीजा डांगावास का दलित नरसंहार है. नागौर जाट बहुल जिला है. इसे जाटलैंड भी कहते हैं. इस जिले के मेड़ता थाने के अंतर्गत एक गाँव है डांगावास. ‘डांग’ जाटों का एक गोत्र नाम है, इसी के आधार पर गाँव का नाम पड़ा है. डांगावास राष्ट्रीय राजमार्ग से सटकर बसा है. देखने से पुराना गाँव लगता है. इस गाँव में जाटों के 1500 घरहैं. इसके बाद संख्या में दलित मेघवाल का स्थान आता है. इनके सवा सौ परिवार हैं. रैगर के 50-60, वाल्मीकि के 100, कुम्हारों के 50 और ब्राह्मणों के 20 घर हैं. बनिया, सुनार, लुहार जैसी जातियां भी गाँव में हैं. संख्या बल के कारण और उससे ज्यादा भूस्वामी वर्ग होने के कारण गाँव में जाट दबंग हैं. जातिगत(जिसमें वर्गगत आधार समाहित है और असल में वही प्रमुख है) हिंसाकी तमाम वारदातें इसी जाति से जुड़े लोगों द्वारा अंजाम दी जाती हैं. 14 मई 2015 की घटना में भी यही जाति थी. इस घटना की सूचना लगातार यात्रा पर होने के कारण मुझे देर से मिली. फिर, इंटरनेट पत्रिका ‘हस्तक्षेप’ में भंवर मेघवंशी की विस्तृत रपट ने पूरी घटना से अवगत कराया. जनवादी लेखक संघ (जलेस) के कार्यकारी मंडल कीदिल्ली में 23 मई को हुई बैठकमें मैं भी शामिल था. इसमें यह तय किया गया कि जलेस की एक टीम राजस्थान के साथी राजेंद्र साईवाल के नेतृत्व में घटनास्थल का दौरा करे और वस्तुस्थिति से अवगत कराए. दिल्ली से टीम ले जाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई. अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों के चलते मैं वहां 6 जून को निकल सका.टीमके अन्य साथियों में शंभु यादव, राम नरेश राम और अतुल थे. राजेंद्र साईवाल को जयपुर से ज्वाइन करना था मगर उस दिन वे उदयपुर में थे तब उनकी जगह जयपुर के कामरेड कामेश्वर त्रिपाठी हमारे साथ रहे. हम लोगों ने पहले अजमेर जाकर जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय में भर्ती घायलों से मुलाकात की फिर वहां से किराए की टैक्सी लेकर नागौर के डांगावास गाँव गए.मुख्यतः पीड़ितों से, भंवर मेघवंशी की रपट से और थोड़ा-बहुत पुलिस वालों से बात करके 14 मई वालीघटना की जो तस्वीर उभरी वह यों है-

रतनाराम मेघवाल को आशंका थी कि गाँव के जाट हमला कर सकते हैं. इसी के चलते उन्होंने 11 मई को मेड़ता थाने जाकर तहरीर दी थी और पुलिस से अपने परिवार की जान-माल की सुरक्षा की मांग की थी. पुलिस को अपने कर्तव्य से ज्यादा अपनी जात-बिरादरी की चिंता थी इसलिए उसने मेघवाल परिवार के गुहार पर कोई कार्यवाही नहीं की. 14 मई की सुबह भूस्वामी जाट डांगावास में इकट्ठे हुए और एक निर्णय लेकर मेघवाल परिवार पर हमला कर दिया. इस हमले में गृहस्वामी रतनाराम को बेहद क्रूरता से मार डाला गया और उन्हीं के साथ पोखरराम तथा पांचाराम को भी मौत के घाट उतार दिया गया. खेमाराम की अजमेर अस्पताल में मृत्यु हो गई. इस हत्याकांड में एक ऐसा व्यक्ति भी मारा गया जिसका इस वाकए से कोई लेना-देना नहीं था. इस व्यक्ति का नाम रामपाल गोसाईं था. इसकी मौत का आरोप मेघवालों पर लगा. मगर, कुछ बुनियादी प्रश्न अब तक अनुत्तरित हैं. यह कि रामपाल गोसाईं यहाँ क्यों आया?उसकीमृत्यु गोली लगने से हुई मगर मेघवालों के पास बन्दूक ही नहीं है तो गोली चलाई किसने?रामपाल की हत्या का मुख्य आरोपी गोविंद मेघवाल को बनाया गया जबकि उस समय वहवहां पर था ही नहीं! रामपाल की लाश पुलिस ने कहाँ से बरामद की? उसकीपोस्टमार्टम रिपोर्ट क्या कहती है? एक क्षण के लिए आप यह मान भी लें कि गोसाईं को मेघवालों ने मारा तब सवाल इस हत्या के मकसद का है! गोसाईं को मारकर मेघवालों को क्या मिल सकता था? उससे कोई जाती दुश्मनी भी नहीं थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि रामपाल गोसाईं को मारकर दबंगों ने दलितों को हत्याकांड में फंसाने की साजिश रची हो और इसमें पुलिस की भरपूर मिलीभगत हो? आखिर कुछ तो वजह होगी कि अधिकतम 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थाने के सिपाही मौका-ए-वारदात पर तब पहुंचते हैं जब समूचा हत्याकांड हो चुका होता है. महिलाओं के साथ घोर बदसलूकी होती है और सभी 11 दलितों के हाथ-पाँव तोड़कर उन्हें जिंदगीभर के लिए अपंग बना दिया जाता है. मोबाईल फोन के इस जमाने में पुलिस-प्रशासन को पल-पल की खबर न मिल रही हो, ऐसा कैसे हो सकता है! मृतक रतनाराम ने आसन्न संकट की सूचना लगातार दी, ऐसा परिवार के लोग कह रहे थे. फिर, इस हत्याकांड में पुलिस को एक पक्ष में शामिल क्यों न माना जाए? मेड़ताथाने के स्टाफ का मात्र ट्रांसफर करना क्या न्याय का मखौल उड़ाना नहीं है? यहप्रशासनिक मशीनरी की चूक नहीं है बल्कि उसकी हत्याकांड में स्पष्ट भागीदारी है. अगर इस हत्याकांड के सभी मुख्य अभियुक्त अभी भी गिरफ्तार नहीं किए जा सके हैं तो यह उसी पटकथा का हिस्सा है जिसे पुलिस की मदद से पहले ही लिख लिया गया था! हम लोगों को यह जानकर खासा अचरज हुआ कि अभी जो पुलिस मेघवाल मोहल्ले में तैनात है उसमें सबके सब पुलिसकर्मी मेघवाल जाति के हैं! यह कैम्प हत्याकांड के अगले दिन ही लग गया था. यही नहीं, अजमेर के सरकारी चिकित्सालय में भर्ती घायलों की सुरक्षा में भी इसी जाति के पुलिसकर्मियों को लगाया गया है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यह जातिवादी व्यवस्था है. बिहार के रणबीर सेना की तर्ज़ पर. अब हर जाति की सुरक्षा के लिए उसी जाति के पुलिसकर्मियों की व्यवस्था की जाएगी! इस व्यवस्था के निहितार्थों पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है. मान लीजिए हमला किसी ऐसी जाति पर होता हैजिस जाति के पुलिसकर्मी पुलिस विभाग में हैं ही नहीं तब उस स्थिति में सरकार क्या करेगी? हो सकता है कि डांगावास के पीड़ितदलितों की ऐसी जाति आधारित पुलिस व्यवस्था से पूरी सहमति हो और उन्होंने ही मांग की हो कि उनकी जाति के पुलिसकर्मियों को उनकी सुरक्षा में लगाया जाए. सरकारया प्रशासन का ऐसी मांग मान लेना ही यह साबित करता है कि उसका पुलिसतंत्र भारतीय संविधान से नहीं, जाति के नियमों से संचालित होता है.

घटना की पृष्ठभूमि


इस घटना के बीज आधी सदी पहले पड़ गए थे. 1963 में दोलाराम मेघवाल के बेटे बस्तारामकी 23 बीघे 5 बिस्वा जमीन चिमनाराम जाट के कब्जे में चली गयी थी.इसका जो कारण ज्ञात हुआ वह यह कि बस्ताराम ने 1963 में चिमनाराम से डेढ़ हज़ार रूपया क़र्ज़ लिया था. जब मैंने इस परिवार के एक सदस्य गोविंद से इस क़र्ज़ की वजह पूछी तो उन्होंने (क़र्ज़ लेने के तात्कालिक कारण से) अनभिज्ञता जताई. इस क़र्ज़ के बदले बस्ताराम ने अपनी जमीन चिमनाराम के सुपुर्द कर दी. बस्ताराम को कोई औलाद नहीं थी तो उन्होंने अपने दो भाइयों- मीसाराम और शंकरराम के लड़कों में से शंकरराम के बड़े बेटे रतनाराम को गोद ले लिया.बस्ताराम अब नहीं हैं. 16-17 साल पहले जब वे बीमार पड़े थे तब उन्होंने चिमनाराम से अपनी जमीन वापस मांगी थी. चिमनाराम ने रेहन पर राखी जमीन वापस करने से इंकार कर दिया. रतनाराम ने दीवानी का मुकदमा दायर किया. 1997 में अदालत से इस बावत पहली नोटिस जारी हुई. मेघवाल मोहल्ले के बड़े बुजुर्गों ने बताया कि चिमनाराम जाट ने कभी दावा नहीं किया कि जमीन उनकी है.चिमनाराम के दो बेटे हैं- कानाराम और ओमाराम. ओमाराम को कोई संतान नहीं है जबकि कानाराम को एक बेटा है कालूराम. दीवानी का केस चल ही रहा था और साक्ष्यों को देखते हुए इसकी पूरी संभावना थी कि केस में फैसला रतनाराम के पक्ष में होगा. इससे जमीन पर काबिज जाट परिवार में बेचैनी फ़ैल गई. भंवर मेघवंशी की रपट के अनुसार अभी हाल में न्यायालय का निर्णय रतनाराम के हक में आया. रतनाराम ने तब उस जमीन पर एक पक्का और एक कच्चा मकान बनवा लिया और वहीं रहने भी लगे. यह खेत गाँव से थोड़ी दूर पर है. इस बीच अप्रैल 2015 में कानाराम ने उस जमीन पर अपना कब्ज़ा साबित करने के लिए जेसीबी मशीन से तालाब खुदवाना शुरू कर दिया. खेत के कुछ हरे पेड़ (खेझड़ी)भी कटवा लिए. चिंतित रतनाराम ने इसकी मेड़ता थाने में लिखित शिकायत की. जैसी आशंका थी, पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की. तब पीड़ित पुलिस अधीक्षक, अजमेर के पास पहुंचे. उनकी दखल से 1 मई को एफआइआर दर्जहुई. तालाब का खुदना रुक गया. 10 मई को जाट समुदाय के लोग गाँव में इकट्ठे हुए. इस पंचायतसे मेघवाल मोहल्ले में दहशत का माहौल बन गया. रतनाराम का परिवार खासतौर पर घबराया हुआ था. पंचायत के दिन रतनाराम किसी दूसरे गाँव गए हुए थे. तब चौधरी लोग किसनाराम, मुन्नाराम को ले गए. ‘पंचों’ने इन्हें यह कहते हुए वापस कर दिया कि वे अभी नासमझ हैं. पंचायत में सिर्फ बड़े ही आ सकते हैं. गाँव लौटने पर अगले दिन रतनाराम सरपंच के घर मिलने गए. गाँव के सरपंच का नाम रामकरण कमेड़िया (जाट) है. लोगों ने बताया कि कागज पर सरपंच के रूप में वैसे तो उनकी पुत्रबधू सुनीता का नाम है लेकिन सरपंची रामकरण करते हैं. सुनीता ओमप्रकाश की पत्नी हैं. रामकरण ने रतनाराम को बताया कि जो फैसला होना था हो चुका. पंचायत अब नहीं होगी. गांववालों से मेघवाल परिवार को खबर मिली कि पंचायत ने सात दिनों का समय दिया है. अगर रतनाराम ने जमीन नहीं खाली की तो दोबारा पंचायत बैठेगी. 11 मई को ही गाँव के जाट इकट्ठे होकर एसडीएम, डिप्टी एसपी, कलक्टर के पास गए. वहां उन्होंने क्या किया या कहा यह किसी को नहीं मालूम. 14 मई की सुबह दबंग अचानक गाँव में इकट्ठा हुए. यह पंचायत नहीं थी बल्कि हमले की योजना के लिए बुलाई गई बैठक थी. मेघवाल मोहल्ले में हमें बताया गया कि गाँव के दलितों की तकरीबन एक हज़ार बीघे जमीन इसी तरह जाटों के कब्जे में है. अपनी रपट में भंवर ने टिप्पणी की है कि रतनाराम परिवार को नष्ट करने का मतलब था कि शेष दलित समझ जाएं और अपनी जमीन वापस लेने का ख्वाब देखना बंद करें.

14 मई का घटना-क्रम


 राजस्थान में मई की झुलसा देने वाली गर्मी सुबह से ही शुरू हो जाती है. रतनाराम का परिवार यों तो आशंकाग्रस्त था और इस संदर्भ में औपचारिकता के लिए सही, प्रशासन को अवगत भी करा दिया था, (सूचनानुसार उस 14 मई की सुबह एसडीएम को हमले की आशंका की खबरदे दी गई थी) मगर आज की इस तरह की आसन्न आपदा काउन्हें अनुमान नहीं था. पंचायत की सात-आठ दिन वाली मोहलत की उड़ती अफवाह नेएक भिन्न मनःस्थिति भी बना दी थी. सुबह की अचानक बटोर के बाद जो तय हुआ उसके अनुरूप गाँव से 300-350 लोगों की भीड़ हमले के लिए तैयार होकर चल पड़ी. इस भीड़ में गाँव के जाट तो थे ही, उनके रिश्तेदार और कुछ दूसरे लोग भी शामिल हो गये थे. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि हमलावरों के पास 4-5 ट्रैक्टर, 4-5 पिक-अप गाड़ियाँ, 2-3 बोलेरो, 30-40 मोटरसाइकिलेंथीं. उनके पास धारदार हथियार,कुल्हाड़ी, फर्शी, सरिया, लोहे की पाइप और बंदूक भी थी. जब हमलावर खेत पर पहुंचे उस समय वहां 16 लोग थे. खेत गाँव से दो किमी की दूरी पर है.गृहस्वामी रतनाराम मेघवाल (उम्र65 वर्ष) पर हमलावरों का गुस्सा सर्वाधिक था. इस गुस्से के शिकार पोखरराम भी बने. रतनाराम के दिवंगत बेटे नौरतराम के साले पोखरराम(45 वर्ष) अपने छोटे भाई गणपतराम (35 वर्ष) के साथ बेवाबहन पप्पूड़ीदेवी (32 वर्ष) से मिलने आए हुए थे. भंवर ने इन्हें मजदूर नेता बताया है. मेघवाल मोहल्ले में इस बावत पूछा तो लोगों ने अनभिज्ञता प्रकट की. ये दोनों भाई पुरोहितवासनी पाटुकला गाँव के हैं.रतनाराम पर पहलेकुल्हाड़ीसे वार किया गया फिर आँखों में जलती लकड़ियाँडाल दी गईं. पोखरराम के ऊपर पहले तो ट्रैक्टर चलाया गया फिर उनकी आँखों में अंगारे डाल दिए गए. इनदोनो की मौके पर ही मौत हो गई. पांचाराम मेघवाल (55) को भी ट्रैक्टर से कुचला गया. फिर धारदार हथियार से उनका सिर फाड़ दिया गया. इनकी मौत अजमेर के अस्पताल में हुई. पोखरराम के भाई गणपतराम की आँखों में आक का दूध डाला गया. फिर उसे निर्ममता से कुचला गया. जान फिर भी बची रही. पहले मेड़ता फिर अजमेर के अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझते गणपतराम ने 23 मई को आखिरी सांस ली. भंवर की रिपोर्ट के अनुसार गणपतराम की लाश को लावारिस बता कर गुपचुप पोस्टमार्टम कर दिया गया. गणेशराम (21) की मौत 28 मई को अजमेर के अस्पताल में हुई. रामपालगोसाई को भी जोड़ लें तो अब तक 6 लोग इस हत्याकांड की भेंट चढ़ चुके हैं. हमलावरों ने महिलाओं के साथ बहुत घिनौना सुलूक किया. ज्यादातर महिलाओं के हाथ-पाँव तोड़ दिए गए. उनके गहने लूट लिए गए और कुछ महिलाओं के गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गईं.घर पर रखी 4 मोटरसाइकिलें जला दी गईं. ट्रैक्टर उठा ले गए औरट्राली को आग के हवाले कर दिया. हमलावरोंने खेत में बने दोनों नवनिर्मित कच्चे और पक्के मकान गिरा दिए. अब यह खेत पुलिस ने कुर्क कर लिया है. हमले के सबूत, घटनास्थल पर बिखरे हुए अवशेष और ढहाए गए मकान का मलबा पुलिस जाने कहाँ उठा ले गई है! ऐसी तत्परता शक के दायरे में आती है. फोरेंसिक साक्ष्य जितने कम होंगे, हमलावरों के बच निकलने की उतनी ही गुंजाइश रहेगी. राज्य पुलिस को अंदाज तो रहा ही होगा कि मामला देर-सबेर सीबीआई को सौंपा जा सकता है. प्राप्त सूचनानुसार मेड़ता थाने का लगभग पूरा स्टाफ, थानेदार (पूनाराम रूड़ी), सीआइ (नंगाराम चौधरी), पुलिस उपाधीक्षक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सब हमलावरों की जाति के हैं. इसी बिरादरीवाद के बल पर हमलावरों ने पुलिस की मौजूदगी में मेड़ता अस्पताल में भर्ती घायलों पर 14 मई को ही फिर से हमला करदिया. पुलिस मूकदर्शक की भूमिका में रही. हस्तक्षेप.कॉम पर उपलब्ध भंवर मेघवंशी की रपट बताती है कि दलितों की ओर से जो एफ़आइआर दर्ज हुई वह बहुत लचर है और उसमें महिलाओं से बदसलूकी की बात शामिल ही नहीं की गई है, न ही रतनाराम, पोखरराम आदि की वीभत्स तरीके से की गई हत्या का विवरण है. दूसरी तरफ रामपाल गोस्वामी की मौत का पूरा इल्जाम दलितों पर डालते हुए सशक्त एफआइआर लिखी गई है. इसमें घायलों सहित कुल 16 लोगों को नामजद किया गया है. भुक्तभोगियों को सबक सिखाने का इससे अधिक अचूक तरीका और क्या हो सकता है? सीबीआइ के रास्ते आसान नहीं हैं. न्याय की आशा धुंधलके में कैद कर दी गई है.

घायल क्या कहते है?


अजमेर के जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय में भर्ती घायलों ने बताया कि जब हमें मेड़ता अस्पताल से 14 मई को यहाँ लाया गया तो उसी रात डाक्टरों ने पांच घायलों को डिस्चार्ज कर वापस घर जाने को कह दिया. अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पी.एल.पुनिया के हस्तक्षेप से उन्हें पुनः एडमिट किया गया. अस्पताल में भर्तीघायलों के नाम इस प्रकार हैं- 1.खेमाराम(43) पुत्र शंकरराम, 2.मुन्नाराम (30) पुत्र रतनाराम, 3.अर्जुनराम (27) पुत्र रतनाराम, 4.पप्पूड़ी देवी (32) पत्नी नौरतराम, 5.बीदामी (60) पत्नी रतनाराम, 6.सोनकी देवी (55) पत्नीपांचाराम, 7.किसनाराम (23) पुत्र पांचाराम, 8.श्रवणराम (32) पुत्र रतनाराम (ये रतनाराम दूसरे हैं, खाड़की गाँव के), 9.जसोदा (30) पत्नी श्रवणराम, 10.भंवरी (27) पत्नी मुन्नाराम, और, 11.शोभादेवी (25) पत्नी गोविंदराम.

हमारी टीम जब अजमेर अस्पताल घायलों से मिलने पहुंची तो उनकी सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी हमें दिल्ली से आया जानकर संभ्रम में उठ खड़े हुए. मामला क्योंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया गया है इसलिए शायद ऐसी प्रतिक्रिया हुई होगी. यह जानकर कि हम एक लेखक संगठन की तरफ से आए हैं, उन्होंने पूछताछ के उपरांतवापस चलते वक्त रजिस्टर में हमारा नाम-पता लिखवाया. हमारी बात मुख्य रूप से खेमाराम से हुई. खेमाराम पर भी ट्रैक्टर चलाया गया था.उनके दोनों पैर टूटे हुए है. पाँव के अंदर स्टील राड डालकर प्लास्टर किया हुआ है. बातचीत के क्रम में खेमाराम ने हमें बताया कि कल (5 मई) अस्पताल ने हम सबको डिस्चार्ज कर दिया है और गाँव जाने को बोल दिया है. हम अभी नहीं जा रहे क्योंकि हमें वहां खतरा है. निर्देश के बावजूद हम अस्पताल में हैं. हमारी मानसिक हालत समझी जानी चाहिए. “रामपाल गोसाईं की हत्या का आरोप हम पर लग रहा है मगर यह बताइए कि हम ऐसे व्यक्ति को क्यों मारेंगे जिससे न तो हमारी कोई अदावत है और न जिसके मरने से हमें किसी तरह का कोईफायदा पहुंचेगा. पुलिस हमें बताए कि गोसाईं की लाश उसे कहाँ मिली? जिस बंदूक से उसे मारा गया है वह कहाँ है? हम लोगों के पास तो कोई गोली-बंदूक है नहीं! जिसका इस केस से कोई ताल्लुक नहीं, वह थर्ड पार्टी घटनास्थल पर कैसे थी?” पीड़ितों में एक व्यक्ति ने अपना दुख साझा करते हुए कहा कि पुलिस प्रशासन तो उन्हीं का है फिर हमारी कौन सुनेगा. मेड़ता अस्पताल में जब हमपर हमला हुआ तो पुलिस वहीं पर होने के बावजूद खामोश क्यों रही? उसने क्यों नहीं हमलावरों को वहीं पर गिरफ्तार कर लिया?“हमले वाले दिन भी हमने सुबह पुलिस को सूचित कर दिया था तब हमारी रक्षा में वह क्यों नहीं आई? वह चाहती तो हमले के वक्त ही जाटों को गिरफ्तार कर लेती. मगर 10-15 मिनट का रास्ता इतना लंबा कैसे हो गया?” एक अन्य भुक्तभोगी ने बताया कि थाने से पुलिस समय पर निकली मगर उसने सीधे आने की बजाए दूर का चक्कर काटकर आना उचित समझा. घायल महिलाओं में हमने पप्पूड़ीदेवी सेबात की. उन्होंने बताया कि उनका पाँव लाठी से तोड़ा गया. “बहुत गलियाँ दीं. बदतमीजी की. धमकाया कि यहाँ से भग जाओ नहीं तो सबको मार डालेंगे. उन्होंने मेरे पेट के अंदर लकड़ियाँ डाल दीं. फिरमैं बेहोश हो गई. उसके बाद क्या हुआ पता नहीं.” बगल वाले बेड पर भंवरी हैं. उनके दोनों हाथ तोड़ दिए गए हैं. सिर पर घाव है. बायां पैर जख्मी है.“उन्होंने हमारे साथ जोर-जबरदस्ती की”, भंवरी ने बताया. सभी महिलाएं घूंघट में हैं. पर्दा प्रथा राजस्थान की पहचान बन गई है. शोभा का बेड भंवरी और पप्पूड़ी के बीच में है. शोभा का दाहिना हाथ और दाहिना पाँव लाठी से तोड़ा गया है. “मैं बेहोश हो गई थी”, भाव-शून्य आवाज में शोभा ने बताया. जसोदा के दोनों हाथ टूटे हुए हैं. गाँव की मारवाड़ी बोली में जसोदा ने कहा, “उन्होंने मेरे पैरों में मारा. कपड़े फाड़ दिए. जांघ में डंडा चलाया.” बुजुर्ग बादामी अपने बिस्तर पर. हिलना-डुलना मुश्किल. लाठी से उनके दोनों हाथ तोड़ दिए गए हैं. “वे गलियाँ बोल रहे थे.” “कैसी गलियाँ?” –शंभू यादव पूछते हैं. बादामी गिरी आवाज में गालियाँ गिनाते हुए कहती हैं- “साड़ी (साली), कुत्ती, रांडा (रांड़, बेवा), नीच, बेड़नियाँ, बामनी.” आखिरी छोर पर सोनकी का बेड है. सोनकी की पीठ में दो टाँके लगे हैं. दाहिना पाँव तोड़ दिया गया है. दोनों हाथ चोटिल. “मारते हुए वे लगातार गाली दे रहे थे.” –सोनकी बोलती हैं. “आपने हमलावरों में किसी को पहचाना?” “हम हमेशा पर्दा करते हैं. गाँव में किसी (आदमी) को नहीं पहचानते. फिर, बेहोश भी हो गए थे.” हमारे साथ खड़े महेश मेघवाल चाहते हैं कि उनके वाट्सएप्प पर आए संदेश देख लूँ. जाहिरा तौर पर यह संदेश दबंगों की ओर से जारी हुआ है. कई लंबे-लंबे धमकाऊ टेक्स्ट हैं. कुछ पंक्तियाँ बानगी के लिए- “एससी एक्ट का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है.”, “हमने उन्हें रगड़-रगड़ कर मारा.”, “27 वीर जाटपुत्र नामजद हुए हैं.”, “आखिर ऊँट आ ही गया जाट के नीचे.”, “सरकार इन्हें कानूनी सरंक्षण देना बंद करे.”, “हमसे जो टकराएगा वह ऐसे ही मिट जाएगा.” “कहीं ऐसा न हो कि ये भी गुर्जरों की तरह विलुप्त प्रजाति बन जाए.” “जाट से भिड़ने का अंजाम मुजफ्फरनगर में दिखा था, अब डांगावास मेंदिखाई पड़ रहा है.” इन संदेशों की भाषा बीच-बीच में ठेठ स्थानीय है. महेश और दूसरे लोग उसका अर्थ समझाते हैं. शंभू को लगता है कि वर्चस्व का ताना-बाना समझने में इन संदेशों की भाषा से सहायता मिल सकती है. राम नरेश के पास रिकार्डर है और कैमरा भी. वे अपने काम मेंलगे हैं और पीड़ितों को ध्यान से सुनते हुए बड़े सटीक प्रश्न पूछते हैं. अतुल मेरी तरह नोटबुक में सबकी बातें लिख रहे हैं. कामरेड कामेश्वर के चेहरे पर लगातार गुस्सा है. राजस्थान में घोर सामंतवाद की मौजूदगी का वे बार-बार जिक्र करते हैं.

हमले का राजनीतिक आयाम पीड़ित ही खोलते हैं. “हम लोग कांग्रेस के वोटर हैं. हमला करने वाले सब बीजेपी के थे. पास के गाँव नेतड़ियाँ का ही विधायक है सुक्खाराम. हमारी ही जाति का है, मेघवाल. वह गाँव के सरपंच का साथ दे रहा है. एक बार भी मिलने, हाल जानने नहीं आया.” पुलिस ने उस खेत की कुर्की कर दी जिसमें हमारा मकान बना था, “मगर जिन्होंने हम पर हमला किया और फरार हैं उनके मकानों की कुर्की नहीं हुई.” “कायदे से तो उन्हीं फरार अभियुक्तों के घर की कुर्की होनी चाहिए थी”, डांगावास में हमारे साथ मोहल्ले के तमाम लोगों के बीच में बैठा राजस्थान पुलिस का एक वरिष्ठ सदस्य कहता है. वहीं गबरूराम मेघवाल भी बैठे हैं. इनके बेटे मदनलाल को 9-10 महीने पहले जाट लड़कों ने निशाना बनाया था. “रात तीन बजे वे आए और हॉकी से मदन के पैर तोड़ दिए.” “क्यों मारा?” मेरा प्रश्न है. “वजह कुछ नहीं थी.पिछली रात जाट लड़के शराब पीकर हल्ला कर रहे थे. मदन ने बस इतना कहा कि हल्ला न करो. यह बात उन्हें लग गई.” “आपने पुलिस में रिपोर्ट किया?” “हाँ, नामजद रिपोर्ट लिखाई. पप्पूराम खदाव, दीपूराम डांगा के नाम थे.” “पुलिस ने क्या कार्यवाही की?” गबरूराम थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले- “कुछ नहीं किया. उलटे हमें डरा-धमका कर गांववालों ने सुलह समझौता करवा दिया. कोईमददगार नहीं हमारा.”

हमलोग कोर कमेटी के सदस्यों से मिलना चाहते थे. यह कमेटी डांगावास के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए बनी है. कोर कमेटी में चार सदस्य हैं- रेणु मेघवंशी, डॉ.अशोक मेघवाल, गोपालदास वाल्मीकि और क्षेत्रमणि टेपण (खटीक समाज के अध्यक्ष). कमेटी के सदस्य अजमेर में रहते हैं. हम रात हुए डांगावास से लौटे. मिलने या फोन करने का वक्त नहीं था. मैंने दिल्ली आकर रिपोर्ट तैयार करने से पहले कोर कमेटी की सर्वाधिक सक्रिय मेंबर रेणु को फोन किया. विस्तार से बात हुई. रेणु ने बताया कि कमेटी ने 18 सूत्री मांग पेश की है. जो मुआवजा दिया गया है वह सामान्य परिस्थितियों का है. “डांगावास के मृतक जहर खाकर नहीं मरे. उन्होंने अपने हाथ-पाँव खुद नहीं तोड़े. उन पर ट्रैक्टर चलाकर मारा गया है. मृतकों के आश्रितों को जो पांच लाख बासठ हज़ार और पांच सौ का चेक दिया गया है, हम मांग कर रहे हैं कि उन्हें कम से कम पचीस लाख का मुआवजा मिले. इसके साथ एक आश्रित को नौकरी दी जाए. जो जमीन अभी दबंगों के कब्जे में है उसे वास्तविकहकदारों के अधिकार में लाया जाए.दलितों की जान-माल की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाए…”

 रतनाराम का परिवार तो अब शायद ही कभी संभल सके. लेकिन क्या इस परिवार को न्याय मिल पाएगा? क्या अपराधी दंडविधान के दायरे में लाए जाएंगे? क्या नागौर में दलितों का उत्पीड़न रुकेगा? क्या देश में संविधान का शासन चलेगा?

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: ‘चिड़िया भी तुम्हारी, पिंजरा भी तुम्हारा’

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

( पिछले दिनों हमने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का स्त्रीवादी पुनर्पाठ करते हुए रवींद्र कुमार पाठक का एक आलेख अपने यहाँ प्रकाशित किया था , आलोचक रोहिणी अग्रवाल ने भी  वाणभट्ट की आत्मकथा के सन्दर्भ से द्विवेदी जी की ‘स्त्रीदृष्टि’ पर लिखा है . उनके लम्बे आलेख का एक छोटा अंश ) 


चार उपन्यासों के अतिरिक्त अन्य गद्य विधाओं में प्रभूत सृजन करने वाले आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के विषय में एक तथ्य अनायास उभर कर सामने आता है कि उपन्यासकार के रूप में अपनी चौहद्दियों का निर्माण उन्होंने स्वयं अपने पहले उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में 1946 में कर लिया था। शेष उपन्यास उन चौहद्दियों पर सतर्क पहरेदार बैठाने के उपक्रम मात्र हैं, उन चौहद्दियों का अतिक्रमण करते हुए संवेदना एवं अंतर्दृष्टि के फलक का विस्तार करने के सर्जनात्मक प्रयास नहीं। यही कारण है कि आज भी वे ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ के प्रणेता के रूप में याद किए जाते हैं और ‘चारु चंद्रलेख’, ‘पुनर्नवा’ तथा ‘अनामदास का पोथा’ उनके कृतित्व में शामिल भर कर लिए जाते हैं। जाहिर है इससे अनायास यह प्रतीति होती है कि ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ उनकी ही नहीं, समूचे हिंदी साहित्य की अमूल्य कृति है,  जिसमें अपने युग के सामने उपस्थित जटिलताओं से जूझने हेतु उन्होंने ज्वलंत प्रश्नों को भविष्यद्रष्टा दार्शनिक की गहन अंतर्दृष्टि के साथ उठाया होगा। लेकिन हजारीप्रसाद द्विवेदी सघन-सायास ढंग से सामाजिक समस्याओं को नहीं उठाते, ऐतिहासिकता के कलेवर में वर्तमान को छुपा कर मनुष्य एवं दर्शन से जुड़े चिरंतन एवं सूक्ष्म प्रश्नों पर संस्कृति एवं अध्यात्म की जमीन पर खड़ेे होकर विचार करते हैं। बेशक इससे वर्तमान परिवेश प्रखर एवं ठोस ढंग से उभर नहीं पाता, लेकिन कुछ बुनियादी सवालों को व्यापक गहराई एवं विस्तार के साथ विश्लेषित करने की संभावना अवश्य बलवती होे जाती है कि सृष्टि, जीवन, मनुष्यता और संस्कृति के प्रवाह को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए व्यक्ति व्यक्ति का, व्यक्ति और सम्बन्ध का, सम्बन्ध और व्यवस्था का स्वरूप एवं अंतर्सम्बन्ध कैसा होना चाहिए; कि स्त्री एवं पुरुष, सवर्ण एवं दलित के विषमतामूलक त्रासद विभाजन को खारिज कर आदर्श मनुष्य एवं व्यवस्था में किन उदात्त विचारबिंदुओं को जोड़ना होगा। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने समूचे साहित्य में निरंतर इन्हीं प्रश्नों का संधान किया है, किंतु दुर्भाग्यवश वे शास्त्रीय दृष्टि एवं ब्राह्यणवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए हैं। परिणामस्वरूप वर्णाश्रम व्यवस्था के संवर्धन में लिप्त उनका समूचा चिंतन अस्मिता विमर्श की नुकीली पड़ताल के संदर्भ में बगले झांकने लगता है। शास्त्रीय दृष्टि से ‘श्रेष्ठ’ रच देने का अर्थ यह कदापि नहीं होता कि वह अनिवार्यतः जमीनी सच्चाइयों से जुड़ा साहित्य भी है। फलतः द्विवेदी जी की स्त्री दृष्टि वैचारिक औदात्य के घटाटोप में छिपी मानसिक जड़ता को उकेरने में जरा भी देरी नहीं करती।

रवींद्र कुमार पाठक के आलेख के लिए क्लिक करें : ज्वलंत स्त्री-समस्या पर कविताई 

स्त्री को लेकर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी बेहद गंभीर हैं। समूचे साहित्य में स्त्री की गरिमा के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं। सर्वत्र देवी, भगवती, महामाया, त्रिपुरभैरवी जैसे विशेषणों से अलंकृत वह एक दिव्याकृति है, जो ‘हिमालय से भी अधिक महीयसी और समुद्र से भी अधिक गंभीर है’। ब्रह्म  को लेकर नहीं, वरन् स्त्री को लेकर ‘नेति नेति’ की सी स्थिति, पहले ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में बाण के संग कि ”मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूं” और फिर राजा सातवाहन के साथ बाकायदा हलफनामा कि ”मैं नारी जाति का सम्मान करना जानता हूं। उसकी महिमा और मर्यादा का जानकार हूं। मुझे यह भी मालूम है कि मेरे कुल का कोई भी बालक नारी लम्पट नहीं होता।” (चारु चंद्रलेख, पृ0 18) . लेकिन नारीवादी चिंतक हैं कि इन्हीं मुखर घोषणाओं के चलते उद्घोषक के व्यत्क्तित्व और नीयत दोनों को शक के घेरे में ले आते हैं।

”नारी का जन्म पाकर केवल लांछन पाना सार नहीं है”  बनाम ”औरों की शांति के लिए अशांत होना ही सच्ची साधना है”
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि उनकी अभिजात मनोवृत्ति सामाजिक व्यवस्था की क्रूरता से संत्रस्त सामान्य स्त्री पात्रों की नियति पर विचार करना नहीं चाहती। दरअसल व्यवस्था की क्रूरता उन्हें दिखाई ही नहीं पड़ती। बेशक वे जानते हैं कि शहर में गणिकाएं हैं, मंदिरों में देवदासियां हैं, राह चलती बालाओं को अपहृत करते दस्यु हैं, यौन हिंसा से सभी वर्गों की कन्याओं में भय फैलाते लम्पट अभिजन हैं, जहां-तहां शार्विलक के अड्डे हैं, जिनमें दिनदहाड़े कन्याओं की खरीद-फरोख्त होती है और घरों में एक अलग तरह का उत्पीड़न झेलती विधवाएं हैं,  जिन्हें घर की तुलना में सड़कंे अधिक निरापद जान पड़ती हैं। लेकिन तथ्यों को जानना स्थिति को स्वीकारना नहीं होता। पहली अवस्था में जानकारी बेजान सूचना भर है और दूसरी अवस्था में चेतना के द्वार खटखटा कर कुछ बेहतर कर डालने का बीड़ा बन जाती है। व्यक्ति को सूचना बना डालना उस अमानवीय व्यवस्था की कूटनीति है जो अपने से इतर किसी अन्य की जीवंत सत्ता नहीं स्वीकारती। इसी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी। यही कारण है कि मंदिरों के गर्भगृह में कामलोलुप महंतों के यौन शोषण की शिकार देवदासियों की घुटी चीत्कारें उनके कानों तक नहीं पहुंच पाती,  क्योंकि शास्त्रों के अनुसार देवदासियां वे सौभाग्यवती कन्याएं हैं,   जिन्हें उनके धर्मपरायण माता-पिता धर्म की रक्षा हेतु मंदिर के प्रांगण में देवता को अर्पित कर जाते हैं  । गृहस्थी के ससीम बंधन में बंधने की अपेक्षा देवाराधन का असीम व्योम पा जाना क्या सौभाग्य का लक्षण नहीं? ठीक इसी प्रकार पुरुषों के प्रसादन हेतु अपनी देह एवं कला को बेचती गणिकाएं भी उनके समक्ष एक प्रश्नचिन्ह बन कर नहीं उभरतीं जिनसे समाज व्यवस्था ने एक नैसर्गिक जीवन जीने का अधिकार छीना है। न ही वे इस प्रश्न की पड़ताल करना चाहते हैं कि क्या गणिकाएं या देवदासियां स्वेच्छा से इन व्यवसायों को अपनाती हैं? उन्हें दूर से सुखी, सम्पन्न और प्रतिष्ठित दिखा कर मानो वे हर जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेना चाहते हैं। लेकिन स्थान एवं प्रतिनिधित्व न दिए जाने की हर चौकस चेष्टा के बावजूद जहां-जहां ये सामान्य स्त्रियां पात्र रूप मे कथा में प्रविष्ट हुई हैं, वहां-वहां अपनी व्यथा एवं समाज व्यवस्था के षड्यंत्रों को उन्होंने तीखी अभिव्यक्ति दी है। ‘पुनर्नवा’ की गणिका मंजुला समृद्धि, प्रतिष्ठा एवं प्रशंसकों की भीड़ के बावजूद कितनी रंक, एकाकी एवं अपमानिता है इसका अनुमान उस मनोद्गार से लगाया जा सकता है जिसे वह जीते जी व्यक्त भी नहीं कर सकी। बस, लिपिबद्ध कर दिया, भविष्य की किसी सहृदय घड़ी/पीढ़ी के पाठ के लिए जो शायद उसके उत्पीड़न और उत्पीड़क दोनों को भलीभांति समझ कर उस जैसी गणिकाओं को रौरव नरक की असहनीय यातनाओं से मुक्ति दिला सके। मंजुला के पत्र का एक-एक शब्द अमानुषिक व्यवस्था और उसके रक्षकों के चरित्र को चीन्ह-खोज कर निदान की मांग करता है – ”यहां मिट्टी के गाहक आते हैं। अपना सर्वस्व उलीच कर, पाप खरीद कर लौट जाते हैं। पुरुषत्व के वे कलंक हैं, स्त्रीत्व के अपमानकारी। वे रसिकम्मन्य होते हैं, रसिक नहीं। इस विटों, विदूषकों और बंधुलों के स्वर्ग में केवल नरक यातना के अधिकारी ही आते हैं। यहां कामुकता को पुरुषार्थ, भोंडेपन को सरसता, मूर्खता को विदग्धता, स्त्रैण भाव को पौरुष माना जाता है। ” (‘पुनर्नवा’ पृ0 55) यानी लेखक व्यवस्था का अभिशाप ढोती मंजुला की पीड़ा का साक्षी है   – बाणभट्ट की तरह, जो तिरस्कृता-लांछिता सहचरी निपुणिका की दुर्दशा देख कर बौखला गया है – ”स्त्री के दुख इतने गंभीर होते हैं कि उसके शब्द उसके दशमांश भी नहीं बता सकते। . . . क्या स्त्री होना ही अनर्थों की जड़ नहीं है? . . . निपुणिका में इतने गुण हैं कि वह समाज और परिवार की पूजा का पात्र हो सकती थी, पर हुई नहीं। . . . वह हंसमुख है, कृतज्ञ है, मोहिनी है, लीलावती है – ये क्या दोष हैं? मेरा चित्त कहता है कि दोष किसी और वस्तु में है,  जो इन सारे सद्गुणों को दुर्गुण कह कर व्याख्या करा देती है। वह वस्तु क्या है? निश्चय ही कोई बड़ा असत्य समाज में सत्य के नाम पर घर बना बैठा है।” (‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, पृ0 255) बाण दो बातें भलीभांति जानता है कि ‘सहानुभूति द्वारा ही पीड़िताओं की मर्मवेदना का किंचित आभास पाया जा सकता है” और दूसरे, ”मनुष्य के सामाजिक सम्बन्धों की जड़ में ही कहीं बहुत बड़ा दोष रह गया है।” (‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, पृ0 254) लेकिन उसके पास दोनों ही बातों के लिए अवकाश नहीं। चूंकि स्त्री देव-मंदिर में प्रतिष्ठित देवमूर्ति है, उसकी ‘मर्मवेदना’ के प्रति’सहानुभूति’ का निदर्शन उसे बेहद क्षुद्र लगता है। वह मनोयोगपूर्वक उसके देवत्व का संधान कर उसकी लौकिक पीड़ा पर दिव्य लेप कर देना चाहता है – ”तुम जिस पाप जीवन की बात कह रही हो, वह मनुष्य की बनाई हुई विकृत सामाजिक व्यवस्था की देन है। चिंता न करो देवि, इससे उद्धार हो सकता है। तुम्हारा देवता तुम्हारे भीतर बैठा हुआ अवसर की प्रतीक्षा कर रहा है। कोई बाहरी शक्ति किसी का उद्धार नहीं करती। यह अंतर्यामी देवता ही उद्धार कर सकता है। . . . देवता न बड़ा होता है, न छोटा, न शक्तिशाली होता है, न अशक्त। वह उतना ही बड़ा होता है, जितना बड़ा उपासक उसे बनाना चाहता है। तुम्हारा देवता भी तुम्हारे मन की विशालता और उज्ज्वलता के अनुपात में विशाल और उज्ज्वल होगा।” (‘पुनर्नवा’,पृ0 22)

आध्यात्मिक कुहासे की सृष्टि कर प्रचंड लौकिक प्रश्नों को धुंधला देना परंपरावादियों की कारगर युक्ति रही है जिसका भरपूर उपयोग आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनेे नायकों के बचाव के लिए किया है। देवरात-मंजुला प्रकरण में आत्मसाक्षात्कार की कठिन प्रक्रिया से गुजरते हुए मंजुला जिस बिंदु पर उत्तरोत्तर अहं का विसर्जन कर ‘स्व’ को पा लेती है, ठीक वहीं गणिकावृत्ति से मोक्ष दिलाने के लिए कथा में आचार्य देवरात के सबल-संपुष्ट हस्तक्षेप की नियोजना की जाने लगती है। ”सदा प्रसन्न, सदा श्रद्धापरायण, सदा निर्लोभ” जैसे विशेषणों से अलंकृत वीतरागी देवरात ही मंजुला के गुरु हैं जिन्होंने उसे सिखाया है कि ”अपने को खोकर ही अपने को पाया जा सकता है” (पृ0 18)। यह वही हैं जिन्होंने लोक के विरुद्ध चल कर गणिका को न केवल ”नारायण की स्मित रेखा के समान पवित्र और मनोहर” बताया है बल्कि उसमें ”भावविह्वला भक्तिमती लीलारूप” (पृ0 63) भी देखा है। पाठक इन्हीं देवरात को वेश्यावृत्ति जैसी घृणित व्यवस्था के उन्मूलन में निःशेष भाव से समर्पित देखना चाहता है। पुरुषार्थी के लिए इससे बड़ी तपोभूमि और क्या होगी भला? लेकिन किन्हीं महीयस उद्देश्यों की संपुष्टि में रत लेखक को ऐसीे किसी समानांतर कार्य-योजना में रुचि नहीं। परिणामतः देवरात अपने शिष्यों के अध्यापन कार्य में और भी निष्ठा से डूब जाते हैं; मृत पत्नी का शोक हरहराती नदी बन उनकी चेतना को अपने उच्छ्ल आवेग में जकड़ लेता है; और किसी आकस्मिक महामारी की मूक चपेट मंजुला को उदरस्थ कर लेती है। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। प्रकरण समाप्त होने पर निष्कृति का आश्वस्तिपरक उच्छ्वास! जरूरी नहीं होता कि लेखक का हर करतब पाठक को अभिभूत ही कर दे। असहमति और आक्रोश में दूर छिटकने को वह स्वतंत्र रहता है। इसलिए स्वप्न बन कर मंजुला नहीं, वरन् पाठकीय क्षोभ देवरात जैसे कट्टरवादियों की खबर लेने लगता है कि ”अपनी शांति के लिए तपस्या करना सबसे बड़ा स्वार्थ है। वह सबसे बड़ी छलना भी है। औरों की शांति के लिए अशांत होना ही सच्ची साधना है।”

मंजुला की व्यथा का मानवीय विस्तार है ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ की एकमात्र स्मरणीय एवं गतिशील पात्र निपुणिका। अभाव ने उसे रचा है, सामाजिक रूढ़ियों ने उसे दिशा दी है और संघर्ष ने उसे संवारा है। कांदविक वैश्य (जो भड़भूजे से सेठ बना था) की पत्नी के रूप में एक वर्ष का दाम्पत्य जीवन जीने वाली निपुणिका ने वैधव्य के अभिशाप को शारीरिक-मानसिक स्तर पर बहुत गहरे झेला है। पूर्णतया अरक्षित इस बालिका को आत्मरक्षा के उद्योग में घर से भाग कर अकेले इधर-उधर भटकना पड़ा है। जीवन उसके लिए कांटों भरी डगर रहा है। समतल तब हुआ जब सोलह वर्ष की अबोध आयु में अपना परिचय और दीनता छुपाती हुई वह बाणभट्ट की नट-मंडली में बतौर अभिनेत्री शामिल हुई। अभिनय उसके लिए कठिन कार्य था भी नहीं क्योंकि नारी-विग्रह लेकर परिवार-समाज में कदम-कदम पर अभिनय ही तो करना पड़ता है स्त्री को – ”जो वास्तव है उसको दबाने और जो अवास्तव है उसका आचरण करना – यही तो अभिनय है। सारे जीवन यही अभिनय किया। एक दिन रंगमंच पर उतर जाने से क्या बन या बिगड़ जाएगा।” (‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, पृ0 281) समूचे दिक्-काल का अतिक्रमण कर निपुणिका विशुद्ध स्त्री है और व्यथामूलक नियति के आधार पर समूची स्त्री जाति को एकीकृत कर देने वाला घटक। उसकी व्यथा धर्मशास्त्रीय मान्यताओं से जन्मी और सामाजिक रूढ़ियों से पोषित है जिन्हें पुरुष और सत्ता का अहं अंतिम सत्य मान उसकी मानवीय इयत्ता को सूक्तियों और आप्तवचनों में रिड्यूस कर डालना चाहता है। इसलिए निपुणिका पूरे उपन्यास में मनुष्य के रूप में एक जीवंत इकाई नहीं दीखती, कुछ छवियों, कुछ पूर्वग्रहों, कुछ अपेक्षाओं के मिश्रण से तैयार अबला नारी का प्रतीक है। पुरुष वेश में शार्विलक के अड्डे पर एक दिन नौकरी करती निपुणिका उन तमाम संकटों और विद्रूप सत्यों की ओर उंगली उठाती है जो स्त्री जीवन को आए दिन घेरे रहते हैं। स्त्री वेश में वह निर्द्वंद्व नहीं घूम सकती क्योंकि अपहरण या यौन शोषण का भय हर दम सिर पर मंडराता रहता है। शार्विलक के अड्डे पर ऐसी ही अपहृता कन्याओं के क्रय-विक्रय के घृणित व्यापार को वह देख चुकी है और दासी अथवा गणिका के रूप में उन कन्याओं के लाचार जीवन को भी। स्वयं सम्मानजनक जीवन की आकांक्षा में वह पान की दुकान चलाती है लेकिन पाती है कि पान से ज्यादा मुस्कान बेच कर उसे अपना पेट भरना पड़ता है। स्त्री शरीर को देवमंदिर के समान पवित्र और रमणीय मानने वाले बाणभट्ट से उसे ढेरों अपेक्षाएं हैं लेकिन आकाश-कुसुम के लिए भटकता भट्ट जमीनी सच्चाइयों से रू-ब-रू होना ही नहीं चाहता। निपुणिका शब्द-शब्द अपनी यातना उसे बताती है – ”मेरा कौन सा ऐसा पाप चरित्र है जिसके कारण मैं निदारुण दुख की भट्टी में आजीवन जलती रही? क्या स्त्री होना ही मेरे सारे अनर्थों की जड़ नहीं है? तुम इस छोटे से सत्य के साथ राष्ट्र जीवन के बड़े सत्य को अविरोधी पा रहे हो?  क्.या बृहत्तर सत्य के नाम पर मिथ्या का तांडव नहीं चल रहा है?” (पृ0 245) भट्ट अक्षर-अक्षर पिघलता चलता है लेकिन बकौल निपुणिका वह ‘जड़ पाषाण पिंड मात्र है’ जिसके भीतर न देवता ह,ै न पशु। है तो एक अडिग जड़ता। उद्बोधन और निवेदन, आक्रोश और संकल्प के बीच झूलती निपुणिका लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मात्र एक करावलम्ब चाहती है – ”मेरी इच्छा है कि एक बार तुम सम्राटों की भृकुटियों की उपेक्षा करके इस महासत्य को ऊँचे सिंहासनों तक पहंचा दो। . . .बड़ा दुख है आर्य, इसी विराट दैन्य के अंतःस्पंदनहीन ढूह पर साम्राज्य की नयनहारी रथयात्रा चली जा रही है। मैं इस ढूह की एक नगण्य कणिका मात्र हूं। मुझे इस योग्य बना दो कि आप अपनी अग्नि से धधक कर समूचे जंजाल को भस्म कर दूं। मैं तुम्हारा करावलम्ब चाहती हूं . . . मुझे तेज की चिनगारी दो आर्य।” (पृ0 245) बेचारा भट्ट! उसके पास न तेज ह,ै न आधार। वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था का साया है। इसलिए निपुणिका का उद्बोधन परिवर्तनकामी संघर्ष की टंकार बन कर नहीं उभरता, ‘प्रलाप’ बन कर रह जाता है। हालांकि मन के किसी कोने में यह ‘प्रलाप’ उसे ‘सत्यपूर्ण’ भी लगता है लेकिन तुरंत इसे स्नायु दुर्बलता का प्रभाव कह वह उपेक्ष्य मान बैठता है। साया न सोचने को स्वतंत्र है न अपनी ओर से कोई पहलकदमी करने को। वह कठपुतलियों की तरह सिर्फ संकेत पर हाथ-पैर हिला सकता है। भट्ट में बस यही नैपुण्य है।

निपुणिका की निर्णय लेने की क्षमता और कर्मठता (जो भट्ट को नर-बलि से बचाने के प्रकरण में वज्रतीर्थ श्मशान में प्रचंड नृत्य बन कर उभरी है) उपन्यासकार को ज्यादा रास नहीं आती। इसलिए हर दोराहे-चौराहे पर ठिठके भट्ट को सही मार्ग पर ले जाने वाली और अपनी आंखों में आंसुओं की जगह अग्नि स्फुलिंग भर कर व्यवस्था से टकराने का माद्दा रखने वाली निपुणिका को लेखक हतबल कर देता है। अब वह बार-बार परकटे पक्षी की भांति ‘संज्ञाहीन अवस्था में’ पहुंचने लगती है। संज्ञा होने पर आत्मधिक्कार से ग्रस्त –  ”मैं बड़ी पापिनी हूं आर्य. . . मैं सेवा धर्म में भी असफल हूं . . . .हाय, अगर तुम मेरी पाप ज्वाला देख सकते?” ( पृ0 262) ऐसी ‘दुखिया’ स्त्री का उद्धार करने में लेखक को कोई परेशानी नहीं। बल्कि पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को कंधे पर ढोते नायक का यह सौभाग्य है कि निपुणिका के निजी जीवन के दृष्टांत से वह स्त्रीत्व की मर्यादा स्थापित कर सके। तब शुरु होता है निपुणिका के दुखी जीवन के सामाजिक-पारिवारिक आधार को दृष्टिओझल करने का सिलसिला जिसकी अंतिम परिणति भट्टिनी-भट्ट-निपुणिका प्रेम त्रिकोण की प्रतिष्ठा में होती है। भट्ट-भट्टिनी के परस्पर निवेदित प्रेम के बीच वह अवांछित है, लेकिन प्रेम को ‘काम’ से अलगा कर उसमें आध्यात्मिक अर्थच्छायां एवं सात्विक लक्ष्य का रंग भरने वाली।  जाहिर है अब वह न लोक में व्याप्त है न समय-समाज में स्थित; वह न एक पृथक् इकाई है न स्त्री; है तो एक माध्यम – प्रेम को समर्पण, सेवा और आत्मोत्सर्ग की भावना में विलीन कर देने की निमित्त मात्र! ”दो विरोधी दिशाओं में जाने वाले प्रेम को एकसूत्र कर देने वाली” वासवदत्ता! बेशक लेखक उसके बलिदान को सफल नारी जीवन के उत्कर्ष की संज्ञा देकर गणिका चारुस्मिता से असत्य भाषण का स्पर्श करती अतिरेकपूर्ण प्रशंसा कराते हैं- ”निपुणिका स्त्री जाति का श्रृंगार थी, सतीत्व की मर्यादा थी, हमारी जैसी उन्मार्गगामिनी नारियों की मार्गदर्शिका थी” (पृ0 300) लेकिन सत्य यह है कि निपुणिका मूलतः और अंततः सामाजिक-धार्मिक विकृतियों का शिकार थी। उसकी मृत्यु (बलिदान नहीं) अमानवीयता के गहरा जाने का प्रमाण है। उपन्यास में चारुस्मिता का एक और वाक्य है-”दुनिया केवल प्रस्तर प्रतिमाओं पर जान देती है।” इस वाक्य के दो श्रोता थे – धावक और बाणभट्ट। धावक बुद्धिहीन है और बाणभट्ट चाह कर भी इसके आशय को नहीं समझ पाता। क्या इसलिए कि निपुणिका की मृत्यु जर्जर समाज व्यवस्था की पुनर्संरचना का बृहद् आह्वान है जिसके मूल में है व्यक्ति-वर्ग और वर्ण के आपसी सम्बन्धों के ढांचे को आमूल बदलने की आकांक्षा? कहना न होगा कि प्रेम और समर्पण की प्रतिमूर्ति के रूप में निपुणिका का मुखर जय-निनाद सत्य से आंख चुराती लेखकीय मनोवृत्ति को ढांपने का प्रयास है।

सामाजिक समस्याओं से किनारा करने की लेखकीय प्रवृत्ति ‘चारु चंद्रलेख’ में भी द्रष्टव्य है जहां चंद्रलेखा की भांति कुमारी-पूजन को सामाजिक विकृति समझने के बावजूद (”स्त्री पूजा के इस विकृत रूप को मैं एकदम नहीं समझ पाती. . . .सच्चा होकर भी आदमी गलत आचरण कर सकता है”, पृ0 112) वे इसे तंत्र-साधना के लिए अनिवार्य सोपान मानते हैं। किसी भी समस्या का आलोचनात्मक विश्लेषण और उसके विरुद्ध जनमत तैयार करना उसके भौतिक संज्ञान के बिना संभव नहीं। आचार्य द्विवेदी की पारलौकिक दृष्टि भौतिक यथार्थ का निषेध करती हुई सिद्धि, साधना और दर्शन की जटिल गुत्थियां खोल डालना चाहती है। अतः वे तत्परतापूर्वक कुमारी-साधना का विस्तृत परिचय अनिवार्य पृष्ठभूमि के साथ देते हैं  ; कुमारी साधना के लिए अपनी कन्याओं को समर्पित करने वाले माता-पिता के अप्रतिम बलिदान की मुक्त कंठ से सराहना करते हैं  तथा किसी भी प्रकार की साधना के लिए लड़कियों की कमनीय काया की अनिवार्यता को रेखांकित कर गद्गद भाव से स्त्री को महिमामंडित करते हैं। तब इस प्रक्रिया में अनायास भूल जाते हैं कि विशुद्ध ब्राह्मणवादी मनोवृत्ति का परिचय देते हुए तथा विषमतामूलक समाज व्यवस्था की अभ्यर्थना करते हुए वे स्वयं कितनी कुत्सित एवं रुग्ण मान्यताओं का अनुमोदन कर रहे हैं – ”प्रकृति के जड़ पिंडों का जितना सुंदर और सामंजस्यपूर्ण संघात मानव देह है उतना और कुछ भी नहीं है। मानव देह में भी किशोरावस्था का शरीर सर्वोत्तम है। . . .उसमें सब कुछ विकसित हो गया होता है और क्षयोन्मुख कुछ भी नहीं होता। . . . जिस मनुष्य को जितना ही नीच समझा जाता है, उसके मन और बुद्धि को विकसित होने से उतना ही वंचित किया जाता है। इसलिए नीच कही जाने वाली जातियों में मन और बुद्धि का बाहर प्रस्फोट नहीं हो पाता। वह शरीर के भीतर ही भीतर जड़ पिंड को उत्तेजना देते रहते हैं। इसलिए देवि, नीच समझी जाने वाली जातियों का शरीर साधना का सर्वोत्तम साधन है, उसमें भी स्त्री शरीर अधिक श्रेष्ठ है तथापि किशोरावस्था दुर्लभ है।” (चारु चंद्रलेख, पृ0 109) बेशक तुरंत अपनी भूल का परिमार्जन करते हुए वे मनुष्य जीवन में तंत्र-मंत्र की उपयोगिता को खारिज करने में जुट जाते हैं  लेकिन अंत तक न तो स्त्री और दलित के संदर्भ में वर्णाश्रम धर्म की महत्ता एवं उपयोगिता स्थापित कर पाते हैं, और न ही अपनी इस कसौटी पर उसे खरा सिद्ध कर पाते हैं कि ”केवल परदुखकातरता, अपार करुणा, कठोर आत्मदमन और अनाविल सत्यनिष्ठा, यही क्या मनुष्यता की विशेषता नहीं है?” कहना न होगा कि आचार्य के ब्राह्मणवादी संस्कार उन्हें सदैव आत्मनिरीक्षण से निरस्त करते रहे हैं। अन्यथा क्या वजह है कि स्त्री एवं नीच कही जाने वाली जातियों के मन, बुद्धि और तन का आखेट करती कर्मकांडी व्यवस्था के अहम्मन्य स्वार्थपरक शोषक रूप को नहीं देख पाते , जो महाराज की उपाधि धारण करने पर भी हरिश्चंद्र को ‘डोम’ मानने का अहंकार मन में पाले हैं,  क्योंकि ”यह विधान मनुष्य के बदलने से थोड़े ही बदल जाएगा। वह तो विधाता का विधान है।” (चारु चंद्रलेख, पृ0 250) यह वही व्यवस्था है , जो कुमारी पूजन के जरिए स्त्री की आराधना करने के छद्म में हर मंगल-अमंगल का अभिषेक-निदान करने हेतु कन्या बलि की परंपरा का सूत्रपात करती आई है। उल्लेखनीय है कि जहां आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी संदर्भ होते हुए भी विषय से कतरा कर निकल गए हैं, वहीं संदर्भ न होते हुए भी तस्लीमा नसरीन स्वतंत्र लेख के जरिए ‘नष्ट लड़की नष्ट गद्य’ में कन्या पूजन/बलि की अमानवीयता की पड़ताल करती हैं। कहना न होगा कि विश्लेषणशील संदेही दृष्टि से विच्छिन्न कर्मकांडी शास्त्रीय मेधा अंततः आचार्य की परंपरावादी रुग्ण स्त्री दृष्टि का ही निदर्शन करती है।

सोजर्नर ट्रूथ: साहस और विवेक की मूर्ति

विजय शर्मा

अनुवादक और आलोचक विजय शर्मा की पांचवी किताब ‘अफ्रो-अमरीकन साहित्य : स्त्री स्वर’ हाल में प्रकाशित हुई है . संपर्क :vijshain@gmail.com .

19 वीं  शताब्दी  में  ब्लैक  स्त्रीवादी  सोजर्नर भी  वैसे  ही  तिहरे स्तर पर  संघर्ष करती  रही  हैं , जिन स्तरों पर  आज  दलित  स्त्रीवादी  स्त्रियों  को जूझना  पड़ता  है . सोजर्नर ट्रूथ की  कहानी आलोचक  विजय  शर्मा  की  नई  पुस्तक  ‘अफ्रो-अमरीकन साहित्य : स्त्री स्वर’ से . 


अश्वेत पुरुषों के अपने अधिकार पाने का खूब शोर है, लेकिन अश्वेत स्त्री के लिए एक शब्द नहीं; और अगर अश्वेत आदमी अपने अधिकार पा गए, और अश्वेत स्त्री अपने नहीं पाती है तो आप देखेंगे कि अश्वेत आदमी औरतों के मालिक बन जाएँगे, और यह बुरा होगा। –   सोजर्नर ट्रूथ, हिस्ट्री ऑफ़ वूमन सफ़रेज

बौद्धिक अकादमीय प्रशिक्षित व्यक्ति शक्ति समूहों के फ़ायदे की बात प्रस्तुत करते हैं। इसके विपरीत सहज (ऑर्गैनिक) बौद्धिकता सामान्य ज्ञान (कॉमन सेंस) पर निर्भर करती है और उनके अपने समूह के हित का प्रतिनिधित्व करती है। सोजर्नर ट्रूथ इसी प्रकार की सहज बौद्धिकता संपन्न स्त्री थी। उसकी बौद्धिकता अपने अनुभवों से विकसित हुई थी। उसके समय के लोग उसे खारिज करना चाहते थे, उसकी बौद्धिकता को मानने का अर्थ था, सामाजिक ऑर्डर को चुनौती देना स्वीकार करना। इसलिए जब वह बोलने खड़ी हुई तो बहुत लोगों को आपत्ति थी। न केवल पुरुषों को आपत्ति थी बल्कि स्त्रियाँ, स्त्री के अधिकारों की बात करने वाली स्त्रियाँ भी नहीं चाहती थीं कि वह उनके मंच को साझा करे। नस्ल को लिंग के ऊपर प्राथमिकता से इंकार करके ट्रूथ ने एक बहुत विद्रोही विचार को जन्म दिया, उसने स्त्री को एक नई परिभाषा दी। आज की स्त्री विशेषकर अश्वेत स्त्री अस्मिता के बीज डाले।

एंटोनिओ ग्राम्सी के अनुसार प्रत्येक सामाजिक समूह बौद्धिकों का एक या एक से अधिक स्तर उत्पन्न करता है, जो समरूपता देते हैं और अपने कार्यों को जागरुकता प्रदान करते हैं, न केवल आर्थिक मामलों में वरन सामाजिक और राजनैतिक मामलों में भी। सोजर्नर ट्रूथ एक ऐसी ही बौद्धिक स्त्री थी,  जिसने न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक और राजनैतिक मामलों को नया मोड़ दिया और स्त्री-पुरुष समानता की बात की, वरन उसके लिए संघर्ष भी किया। सोजर्नर ट्रूथ का जन्म का नाम इसाबेला था। उसका जन्म कब हुआ ठीक पता नहीं, पर स्वीकारा गया है कि वह १७९७ में पैदा हुई थी। न्यू यॉर्क के अल्सटर काउन्टी में एक गुलाम परिवार में उसका जन्म हुआ था। उसके पिता का नाम जेम्स और माता का नाम एलीज़ाबेथ बोम्फ़्री था। उसका परिवार डच भाषा-भाषी था। बाद में थॉमस नामक एक गुलाम से उसका संबंध हुआ, जिसके पहले से चार या पाँच बच्चे थे। वह सदा तेरह बच्चों की बात करती थी। कदाचित बलात्कार और दूसरे लोगों के द्वारा किए गए अत्याचार को वह इस रूप में बताती थी।

सोजर्नर का सारा जीवन संघर्ष और साहस की कहानी है। १८२६ में वह गुलामी से भाग निकली। संयोग से इसके एक साल बाद न्यू यॉर्क में गुलामी प्रथा समाप्त हो गई और इस तरह १८२७ में वह पूरी तरह स्वतंत्र हो गई। गुलामी प्रथा कानूनन समाप्त हो गई थी , मगर गैरकानूनी तरीके से गुलामों की खरीद-फ़रोख्त जारी थी। सोजर्नर के बेटे पीटर को इसी तरह बेच दिया गया। वह चुप बैठने वाली नहीं थी, उसके ‘सोसाइटी ऑफ़ फ़्रेंड्स’ (क्वेकर्स) की सहायता से दावा ठोंक दिया। उस समय यह बहुत हिम्मत वाला काम था।

१८२९ में वह रहने के लिए न्यू यॉर्क चली आई। यहाँ उसने कुक, नौकरानी और धोबन का काम किया। वह मेथोडिस्ट और एपिस्कोपल ज़िओन दोनों चर्च में जाती थी। १८४३ में उसने एक और अभूतपूर्व काम किया, खुद अपना नाम बदल कर सोजर्नर ट्रूथ कर लिया। इसके साथ वह प्रवचन देने लगी। उसने दासता विरोधी आंदोलन में जोश के साथ काम करना शुरु किया। वह बोलने में कुशल थी, सीधी-सादी भाषा में अपनी बात कहती थी, उसके बातें अनुभवजन्य होतीं अत: लोगों के दिल पर असर करतीं। कुछ सालों तक वह देश में घूम-घूम कर दासता विरोधी भाषण देती रही। उसकी बात सुनने लोग बड़ी संख्या में जमा होते। वह पढ़ी-लिखी न हो कर भी असाधारण थी। वह खुद लिख नहीं सकती थी, पर उसने ऑलिव गिल्बर्ट को बोल कर १८४० में अपनी आत्मकथा ‘नरेटिव ऑफ़ सोजर्नर ट्रूथ’ लिखवाई। १८५० से उसने स्त्री अधिकारों के लिए संघर्ष को अपना मिशन बना लिया। अमेरिकी गृह युद्ध के समय उसके किए गए कार्यों से खुश हो कर राष्ट्रपति एब्राहम लिंकन ने उसे १८६४ में व्हाइट हाउस में बुला कर सम्मानित किया। युद्ध के बाद वह स्वतंत्र गुलामों को काम खोजने में सहायता देने लगी। इतना ही नहीं उसने सरकार को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह पश्चिम में पहले गुलाम रहे लोगों को भूमि आवंटित करेगी।

सोजर्नर ट्रूथ ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। लेकिन उसकी ख्याति एक खास घटना के कारण है। आज से डेढ़ सौ साल पहले एक दिन इंडियाना की गुलामी विरोधी एक सभा में श्वेत स्त्री-पुरुषों के सामने सोजोर्नर ट्रूथ ने अपनी छाती खोल कर सिद्ध किया कि वह एक औरत है। जो स्त्री गुलामी से स्वतंत्रता की लंबी यात्रा कर  के आई थी उसके लिए अपनी छाती खोल कर दिखाना एक सामान्य बात थी। उसे दर्शकों से कोई भय या शर्म नहीं थी। उसे इस बात का गर्व था कि वह अश्वेत है और एक स्त्री के रूप में जन्मी है। लोगों का पूर्वाग्रह बहुत प्रबल होता है। उस समय अमेरिका में अधिकाँश श्वेत लोगों के मन में अश्वेत स्त्री के प्रति घृणा और अनादर का भाव था। उनकी निगाह में अश्वेत स्त्री मात्र पशु थी, केवल एक जिंस थी। जब वह बोलने खड़ी हुई तो कुछ श्वेत पुरुष चाहते थे कि उसे अलग ले जा कर पहले जाँच लिया जाए कि वह एक स्त्री है। सोजर्नर ट्रूथ ने कहा कि उसने उनके बच्चों को अपनी इसी छाती का दूध पिलाया है और वे जानना चाहते हैं क्या वह एक स्त्री है? छाती खोल कर दिखाने के बावजूद श्वेत पुरुष चीख-चिल्ला रहे थे। वे चीख-चीख कर कह रहे थे कि उन्हें विश्वास नहीं है कि वह वास्तव में एक औरत है।

श्वेत पुरुष ही नहीं श्वेत स्त्रियाँ भी अश्वेत स्त्री के प्रति मन में कोई अच्छा भाव नहीं रखती थीं। इसे वे बिना किसी शर्म और झिझक के कहती थीं। जब ओहाओ के एक्रोन नामक स्थान में १८५२ में स्त्री अधिकारों के आंदोलन के द्वितीय सालाना जलसे में बोलने के लिए सोजर्नर ट्रूथ खड़ी हुई तो श्वेत स्त्रियों को यह अपना अपमान लगा। वे एक अश्वेत स्त्री को सुनना नहीं चाहती थीं और वे बार-बार चिल्लाने लगीं, ‘उसे मत बोलने दो! उसे मत बोलने दो!’ ट्रूथ ने उनके विरोध की परवाह नहीं की और अपनी बात कहती गई। वह पहली नारीवादी है जिसने लोगों का ध्यान अश्वेत स्त्री की ओर खींचा और बताया कि परिस्थितियों से मजबूर हो कर अश्वेत स्त्री ने बहुत सहा है और वह अश्वेत पुरुष के जितनी मेहनत करती है और स्त्री को पुरुष के बराबर का अधिकार मिलना चाहिए।

यह संयोग था कि सोजर्नर के बोलने से ठीक पहले जो वक्ता मंच पर था। उसने दावा किया था कि स्त्री शारीरिक रूप से आदमी से कमजोर होती है, अत: वह उससे हीन है और उसे बराबरी का दर्जा नहीं मिलना चाहिए। उसे सदैव पुरुष की सहायता की जरूरत पड़ती है। बग्घी में चढ़ना-उतरना हो अथवा चहबच्चा पार करना हो, उसे पुरुष की सहायता चाहिए होती है। ट्रूथ ने उसकी बातों का मुँहतोड़ जवाब देते हुए जो कहा वह आज इतिहास में दर्ज है।

ट्रूथ ने कहा कि वह आदमी ने कह रहा कि औरतों को बग्घी में चढ़ने-उतरने में सहायता चाहिए होती है, गड्ढ़ों-चहबच्चों को पार करवाना होता है। मुझे किसी ने बग्घी में चढ़ने में हाथ बढ़ा कर सहायता नहीं दी, किसी ने हाथ पकड़ कर गड्ढ़े-चहबच्चे पार नहीं करवाए। मुझे किसी ने सम्मानजनक स्थान पर नहीं बिठाया। क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? मेरी ओर देखो! मेरी बाहों को देखो!… मैंने हल चलाया है, खेती की है, फ़सल इकट्ठा करके खलिहान में पहुँचाई है। कोई पुरुष मुझसे अधिक काम नहीं कर सकता है और क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? मौका मिलने पर मैं आदमी के बराबर काम कर सकती हूँ, उतने ही कोड़े खा सकती हूँ। क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? मैंने पाँच बच्चे पैदा किए और अपनी आँखों के सामने उन्हें गुलाम के रूप में बिकते देखा और जब माँ के दु:ख से रोती हूँ तो केवल जीसेस सुनता है – क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? अंत में जो बात ट्रूथ ने कही वह बात सोचना और उसे कहना उसकी बुद्धि और साहस का परिचायक है। उसने कहा कि जब जीसेस पैदा हुए तो स्त्री और ईश्वर था, उसमें आदमी कहाँ था? उसने कहा यदि ईश्वर की बनाई प्रथम स्त्री इतनी मजबूत थी कि उसने अकेले दुनिया ऊपर से नीचे कर दी, उल्टी कर दी तो आज ये सारी औरतें मिल कर उसे वापस सीधा कर सकती हैं।


सोजर्नर ट्रूथ शारीरिक बनावट में एक मजबूत स्त्री थी, उसकी कद-काठी खासी थी। वह पाँच फ़ुट ग्यारह इंच लम्बी थी। जो लोग स्त्री को नाजुक और कमजोर मानते थे उनके सामने एक प्रत्यक्ष विपरीत तस्वीर के रूप में वह उपस्थित थी। जो लोग सोचते थे कि स्त्री अपने निर्णय लेने में समर्थ नहीं है उनके लिए ट्रूथ एक मजबूत स्तम्भ के रूप में खड़ी थी। उसने अपने काम, कोड़ों की मार का हवाला दे कर तथा अपने बच्चों और उनके गुलाम के रूप में बिकने की बात कह कर लोगों को स्त्री की सहनशक्ति पर सोचने के लिए मजबूर किया। उसने नई अश्वेत स्त्री को मूर्तिमान किया। अगले दिन ओहिओ के अखबार एंटी-स्लेवरी बिगुल ने इसकी रिपोर्टिंग की। सोजर्नर ट्रूथ के बोलने का उसके दर्शकों पर जो प्रभाव पड़ा उसके बारे में लिखा।

नारी अधिकारों की बात करने वाली कोई श्वेत स्त्री ऐसे निजी अनुभव नहीं रखती थी। किसी के पास ऐसी खरी बातें कहने का न तो मुँह था और न ही साहस। अमेरिकन इतिहासकारों ने नस्ल और लिंग को ऐसे प्रस्तुत किया हुआ था कि काफ़ी समय तक अमेरिकन अश्वेत स्त्री के प्रयासों और योगदान को स्त्री अधिकारों के आंदोलन में शामिल नहीं किया जाता था। आज स्थिति बदल चुकी है। उनके योगदान को अनदेखा करके नारी अधिकारों की बात नहीं की जा सकती है। इस स्थिति के लिए सोजोर्नर ट्रूथ जैसी अश्वेत स्त्रियाँ जिम्मेदार हैं। स्त्री अधिकारों के आंदोलन में इनके शामिल होने की बात सबसे पहले एलीनॉर फ़्लेक्सनर की १९५९ में आई किताब में दिखाई देती है। ट्रूथ अपने अनुभवों के आधार पर बोलती थी। उन्होंने शारीरिक अपमान, शोषण, क्रूरता, बलात्कार सहा था।  वे न केवल बची रहीं वरन विजयी हो कर निकली तथा दूसरों की मुक्ति में सहायक बनीं। वह एक माँ, एक गुलाम के रूप में मिले अपने अनुभव साझा करती थीं। सामाजिक विरोध की परवाह न करते हुए उनके बोलने से अन्य कई स्त्रियों को बोलने का साहस, प्रेरणा और उत्साह मिला।

जब आंदोलन चल रहा था तो उसमें अश्वेत पुरुष आगे-आगे थे। अश्वेत पुरुष खुद लीडर बने हुए थे और  अपनी स्त्रियों को पीछे ढ़केला हुआ था। उन्हें सेक्रेटरी, चाय-पानी बनाने-देने का काम सौंप रखा था। जन-सभाओं, रैलियों, लंच-डिनर के समय ये पुरुष बड़ी-बड़ी बातें करते लेकिन पुरुष वर्चस्व को पूरी तरह कायम रखते। कभी खुल कर स्त्री के प्रति भेदभाव के विषय में नहीं बोलते। उनके यहाँ पितृसत्तात्मकता का पूरा बोलबाला था। सोजोर्नर ट्रूथ जैसी स्त्रियों ने इस सिस्टम को चुनौती दी। कहने को १९ वीं सदी में स्त्री कार्यकर्ता श्वेत-अश्वेत स्त्रियों की एकता की बात करतीं, आंदोलन में सोजर्नर ट्रूथ जैसी स्त्रियों की उपस्थिति को रेखांकित करतीं, दिखाती कि वे नस्लवाद के खिलाफ़ हैं। लेकिन जब भी ट्रूथ बोलने खड़ी होती वे उसका विरोध करतीं। जब जनरल फ़ेडरेशन ऑफ़ वीमेन्स क्लब के सामने रंग का प्रश्न उठा तो जॉर्जिया वीमेन्स प्रेस क्लब की सदस्यों का कहना था यदि अश्वेत लोगों को सदस्य बनाया गया तो वे फ़ेडरेशन से हट जाएँगी।

ट्रूथ के विषय में हमें दूसरों के द्वारा लिखे से ज्ञात होता है। उसके प्रसिद्ध भाषण “अयंट आई अ वूमन” को उस घटना के बाद एक फ़ेमिनिस्ट एबोलिसनिस्ट ने रिपोर्ट के रूप में लिखा था। असल में उसने क्या कहा था आज हमें मालूम नहीं। इसके बावजूद यह तय है कि उसने स्त्री की नई परिभाषा गढ़ी। भले ही वह अनपढ़ थी पर उसने जो तर्क दिए वे किसी बौद्धिक तर्क से कम नहीं थे। वह अपने समय से आगे की स्त्री थी। उसने अश्वेत पुरुष की चालाकी को पकड़ लिया था। वह वोट देने के बराबरी के अधिकार की हिमायत कर रही थी। वह श्वेत-अश्वेत, स्त्री-पुरुष सबको आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक बराबरी देने की बात कर रही थी। वह शोषण के खिलाफ़ आवाज बुलंद कर रही थी।

बाद में सोजर्नर ट्रूथ की बात बता कर अन्य आंदोलनकारी खुद प्रेरणा पाते और दूसरे लोगों को आंदोलन में भागीदारी करने के लिए तैयार करते। करीब सौ साल बाद जब माया एंजेलो लोगों को उसकी बात बताती तो लोग मंत्रमुग्ध हो कर सुनते। १८८३ में गुजरने वाली इस अश्वेत स्त्री पर अश्वेत स्त्रियों को गर्व है। ऐसी साहसी और निर्भीक स्त्री पर न केवल अश्वेत स्त्री बल्कि समस्त स्त्री जाति को इतना ही नहीं समूची मानवता को गर्व होना चाहिए।

स्त्री-विमर्श के ‘महोत्सव’

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : mamushu46@gmail.com .

पांच सालों बाद फेसबुक पर एक बार फिर स्त्री की आजादी के सवाल पर बहस छिड़ी है . बहस का केंद्र जरूर बदला है . पांच साल पहले सत्तावान पुरुष लेखक ने आजाद औरतों को ‘ छिनाल’ और ‘ निम्फोमैनिक कुतिया’ कहा था. तब लेखिकाओं ने मुखरता से विरोध किया था. इन पांच सालों में बहुत कुछ बदला . विरोध में आई कई लेखिकायें अब या तो ‘ सत्तावान पुरुष’ की प्रशस्ति में शब्द खर्च कर रही हैं या उससे अपनी प्रशस्ति लिखवा रही हैं . उधर उसके खिलाफ सबसे मुखर आवाज ने अपने चिंतन को लगभग वहीं खड़े करते हुए लिखा , ‘ कौन कहता है कि औरत को आज़ादी नहीं दी हमारे पुरुषों ने ,बेशक आज़ाद किया है उसे ,खाने कमाने , प्रेम और सैक्स करने को , किया है मगर तवायफ़ बना के .’ जरूरी था कि हंगामा बरपे , बरपा भी फेसबुक पर लोगों ने इस कथन का प्रतिवाद किया. लेखिका और आलोचक अर्चना वर्मा ने पांच साल पहले  ‘ सत्तावान पुरुष’ के लम्पट वक्तव्य के प्रसंग में एक लेख लिखा था , कथादेश में . यह अब भी प्रासंगिक हो गया है . संपादक


तकरीबन आठ दस साल पहले की बात होगी। ‘कथाक्रम’ के नवम्बरी सालाना आयोजन का विषय उस बार स्त्री-विमर्श था। दो दिन के कार्यक्रम के बीच किसी अवकाश में मुझसे एक युवा पत्रकार ने साक्षात्कार में इस आशय का एक सवाल पूछा था कि क्या वाकई बुज़ुर्गों की इस आशंका के सच होने का समय आ गया है कि समाज रसातल को जा रहा है? बुज़ुर्गों के बहाने वह अपनी आशंका को आवाज़ दे रहा हो तो कोई ताज्जुब नहीं। फ़र्क यहाँ वृद्ध और युवा का उतना नहीं है जितना स्त्री-विमर्श के विरुद्ध शेष समाज का है जिसमें केवल पितृसत्ताक् मानसिकता से संचालित पुरुष ही नहीं, एक हद, बड़ी हद तक स्त्रियाँ भी शामिल हैं। शरीफजात मध्यवर्गीय हिन्दीभाषी समाज में, साहित्य और साहित्येतर दोनो, जहाँ से अधिकांश लेखक और पाठक वर्ग आता है, स्त्री-विमर्श को अभी तक आशंका, अविश्वा स, अवमानना, शायद भय और निश्चिड़त आक्रामकता के साथ देखा जाता रहा है। यहाँ आज भी स्त्री की हैसियत से उसका जीवन स्त्री-देह के द्वारा परिभाषित होता है और वर्चस्व, दमन व शोषण के जो भी अतिरिक्त पैमाने उस पर आयद होते हैं, उनका परिणाम स्त्रीदेह की सन्दिग्धता, दुर्बलता व आक्रमण-योग्यता का आदर्शीकरण है। इसकी वजह से आज भी बड़े पैमाने पर उसके लिये अपने अस्तित्व का मतलब निरन्तर एक हमलावर दुनिया में असुरक्षित, भयभीत, आशंकित मनःस्थिति में जीना है, जहाँ दैहिक पवित्रता जैसी सहज भंगुर वस्तु की रक्षा की जिम्मेदारी उसके सिर पर लाद तो दी गयी है लेकिन जहाँ उसके अपने अपर्याप्त बूते के अलावा मानो बाकी हर किसी ने उसे खण्डित करने की ही कसम खाई हुई है। अस्तित्व की इन्हीं सीमाओं के विरुद्ध उसका विद्रोह है और इसी विद्रोह के विरुद्ध बुज़ुर्गों की तथाकथित आशंका है कि समाज के रसातल को जाने का समय आ गया है। मानो रसातल को जाने का एकमात्र यही कारण हो और समाज को बचाने की जिम्मेदारी अकेले स्त्री की हो और मानो इस तरह से समाज का बचना संभव ही हो।

स्त्री-विमर्श अभी भी हमारे समाज के लिये आत्म-परीक्षण और आत्मालोचन को उकसाने का समुचित कारण नहीं बन सका है। इसी मानसिकता का नवीनतम जलवा नया ज्ञानोदय के बेवफ़ाई सुपर-विशेषांक के मशहूर साक्षात्कार के और भी मशहूर उद्धरण में धधक रहा है – ” कह सकते हैं कि यह (स्त्री) विमर्श बेवफ़ाई के विराट उत्सव की तरह है।लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिये कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है।”
विराट शब्द तो बहुत बड़ा है, लेकिन हिन्दी का स्त्री-विमर्श चाहे कितना भी विकलांग, अधूरा, एकतरफ़ा, और अपर्याप्त क्यों न कहा जाता हो, इतनी चेतना तो उसने जगाई ही है कि इस पुरुषवादी मानसिकता की अभिव्यक्ति के विरुद्ध ऐसा न्यायाधिकार-परायण एकजुट आवेश और प्रतिरोध, एकमत आक्रोश और अभियान संभव हुआ है। निश्चबय ही यह स्त्री-विमर्श के लिये महोत्सव का एक कारण है।

नाम सिर्फ़ एक नाम नहीं. यह उद्धरण यहाँ अपने वक्ता के नाम के बिना ही ही पेश किया जा रहा है। इसकी वजह सिर्फ़ इतनी भर नहीं कि मामला अगर मशहूर और सुर्खि़यों में मौजूद है तो आश्व स्त हुआ जा सकता है कि पाठक नाम के बिना भी जान ही गये होंगे, बल्कि यह है कि बात सिर्फ़ एक नाम की नहीं, एक पूरे साँचे की है जिसमें से यह मानसिकता ढल कर निकलती है। लेकिन, बेशक नाम की अपनी एक बेहद ज़रूरी अहमियत है, क्योंकि अमूर्त के ख़िलाफ़ अमूर्त को यथार्थ के मैदान में उतारने के लिये मुद्दों का एक मूर्त ठोस आकार लेना ज़रूरी है। अन्यथा मानसिकता और उसको ढालने वाले साँचे के ख़िलाफ़ कोई भी लड़ाई दरअसल  कोई ठोस और असली लड़ाई नहीं बन पाती, युद्ध के लिये प्रयाण का भ्रम पाले रख कर, हवा में अनन्तकाल तक एक हवाई तलवार भाँजते हुए मैदान के आदि से अन्त तक आना जाना निष्फल निर्बाध चलता रह सकता है।हिन्दीभाषी समाज में स्त्री-विमर्श अभी अपनी प्राथमिक परिभाषा के आस-पास ही ठिठका हुआ है, अभी भी वह स्त्री के
प्रति सामाजिक अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ाई है। सशक्तीकरण की शुरुआत सजग चेतना के उदय से होती है, व्यक्तिगत स्तरों पर थोड़ा बहुत हुई भी है लेकिन बड़े पैमाने पर वह शुरुआत होनी अभी बाकी है।
सामाजिक साँचों और अलिखित अनुबन्धों के ख़िलाफ़ लड़ाई के दो पक्ष हुआ करते हैं – तात्कालिक और दीर्घकालीन। अभी उपस्थित छिनाल-प्रसंग ‘तात्कालिक’ का एक उदाहरण है, सहसा उठ खड़ी एक ऐसी घटना जिसके इर्द-गिर्द एक कोलाहल जमा होकर मुद्दे में बदल गया है। फ़िलहाल यह घटना एक व्यक्तिवाची संज्ञा है, एक नाम। जातिवाची संज्ञाओं के जरिये चलने वाले अमूर्त वैचारिक विमर्श में व्यक्तिवाची संज्ञाएँ एक ऊर्जा-तरंग जोड़ देती हैँ। टकराहट से पैदा होने वाला क्षोभ और उद्वेग एक वैचारिक व्यग्रता और पर्युत्सुकता को जन्म देता है लेकिन केवल वैयक्तिक उठापटक तक सीमित और गाली गलौज में विघटित होकर रह जाने की संभाव्य नियति को भी। अखबारी सुर्खियों से मिलने वाला विस्तार अगर इस विघटन के पैमाने का विस्तार बनकर ही रह जाए, व्यग्रता को वैचारिक पर्युत्सुकता में न बदल पाए, तो यह अखाड़े से उठी धूल से अधिक कुछ नहीं जो थोड़ी देर में बैठ जाएगी।

यह मानने से इंकार नहीं कि हिन्दी के साहित्यिक स्त्री-विमर्श की अपनी न्यूनताएँ और अपर्याप्तताएँ हैं, उसमें वैचारिक क्षमता और मननशीलता अभी उतनी प्रौढ़ और पुष्ट नहीं जितनी कि भाव-प्रबलता, अनुभव-लिप्तता, और उद्गाढ़र-प्रवणता। अक्सर वह विमर्श से अधिक हाहाकार जैसा सुनाई पड़ता है। लेकिन भाव, अनुभव, उद्गा र, हाहाकार सबकुछ विश्लेहषण की सामग्री है, सत्यों और तथ्यों का ऐसा आगार जिससे वैचारिक आन्दोलन की आधारशिला खड़ी होती है। इंकार यह मानने से भी नहीं कि उल्लिखित साक्षात्कार के जिस अनुच्छेद से यह उद्धरण लिया गया है उसके अतिरिक्त शेष पूरा वक्तव्य स्त्रीवाद का स्टॉक-विमर्श है और उसमें ऐसी बहुत सी बातें हैं जो ऐसे प्रसंगों में स्त्री-पक्ष से कही जाती हैं। कहा गया है कि बेवफ़ाई को समझने के लिये धर्म, वर्चस्व और पितृ-सत्ता जैसी अवधारणाओं को समझना होगा, धर्मों ने स्त्री की यौनिकता को परिभाषित किया है, स्त्री के शरीर की वर्चस्ववादी व्याख्या की है, जैसे जैसे स्त्रियाँ व्यक्तिगत सम्पत्ति और क्रयशक्ति की मालकिन होती जा रही हैँ धर्म द्वारा प्रतिपादित वर्जनाएँ टूट रही हैं, एंगेल्स को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि जब तक सम्पत्ति और उत्पादन के स्रोतों पर स्त्री-पुरुष का समान अधिकार नहीं होगा पुरुष इस स्थिति फ़ायदा स्त्री के भावनात्मक शोषण के लिये लेगा, बेवफ़ाई एक पॉवर डिस्कोर्स है इत्यादि, इत्यादि। वे सभी बातें यहाँ कह दी गयी हैं और कुछ एक साहित्यिक सहकर्मियों पर वे आक्रमण भी कर दिये गये हैं जिनमें शामिल होकर अपनी न्यायप्रिय मंशा और सद्भा वना का प्रमाणपत्र पाया जा सकता है।

वस्तुतः किसी भी समय का जो प्रचलित विमर्श होता है उसका वाग्जाल पकड़ लेना और वक्त – मौके पर उसके तर्क पेश कर देना जितनी सहजता से संभव है उतना ही सहज रूप से संभव और ज़रूरी यह प्रायः और शायद नहीं होता कि यह वाग्जाल और ये तर्क वस्तुतः कहने वाले की असली मंशा और मनोभावना को अभिव्यक्त करते हों। कम से कम स्त्री-विमर्श के लिये वे सहज-विश्वहसनीय तो वे नहीं हो सकते। पितृसत्तात्मक सामाजिक साँचे में ढली जिस मानसिकता की बात पहले कही गयी है, वह इस सैद्धान्तिक वाग्जाल और तर्कविन्यास के परत-दर-परत लपेटे में सत्तर पर्दों के भीतर औचित्य के आडम्बर में छिपी बैठी रहती है। वह तो कहीं किसी असावधान क्षण में अचेतन अपनी पर्दाफाड़ अभिव्यक्ति से असलियत को उजागर कर देता है वरना हमारा बौद्धिक समुदाय इतना चतुर तो है ही कि ज्ञानी गुनी उदारता का दिखावटी तामझाम फैलाकर अपनी पुरुषवादी मानसिकता का पता न पड़ने दे।

एक अवान्तर प्रसंग की तरह यह मसला यथा-तथा न्याय की किंचित स्मितिजनक मिसाल है। बरबस याद हो आता है कि ‘हंस’ के दूसरे स्त्री-विशेषांक का संपादन करते समय मैने राजेन्द्र जी के ‘होना सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ नामके आलेख का प्रकाशन आगामी मास में विशेषांक की अतिरिक्त सामग्री के साथ छापने के आशय से स्थगित किया था। स्थगित करने की वजह यह आशंका थी कि उसकी ‘दिल-फ़रेब’ कथन-शैली मुख्य अंक की अपेक्षाकृत गंभीर बातचीत से ध्यान भटका कर बहस को पटरी से उतार देगी अन्यथा वह आलेख सोद्देश्यि पितृसत्तात्मक सामाजिक साँचे में ढली पुरुष मानसिकता ( अकेले राजेन्द्र यादव की नहीं) को उजागर करते हुए लिखा गया था और मेरा इरादा एक संक्षिप्त टिप्पणी के साथ उसे स्त्री-विमर्श के पूर्वपक्ष की तरह प्रस्तुत करने का था। यह बात अलग रही कि राजेन्द्र जी से अगले अंक तक का भी धैर्य नहीं रखा गया था और उन्होंने इस आलेख को विशेषांक के साथ साथ बाज़ार में लाने के लिये संपादक श्री विभूतिनारायण राय को ‘वर्तमान साहित्य’ में छापने के लिये के लिये सौंप दिया था। आलेख के साथ संपादिका के स्त्रीसुलभ निरंकुश अत्याचार से पीड़ित पुरुष संपादक के चीत्कार समेत एक संक्षिप्त आमुख भी था। संपादक जी को बिन माँगे मुराद मिली। किया उन्होंने यह कि लेख उस अंक में नहीं छापा गया, उसके बाद साल भर तक भी किसी अंक में नहीं छापा गया, इस बीच बार बार वापस माँगने के बावजूद वापस भी नहीं किया गया। साल भर बाद जब छापा गया तब उसके पास न स्त्री-विशेषांक का संदर्भ था जिसका उसे पूर्व-पक्ष होना था, न राजेन्द्र जी का अपना आमुख था जो उसके रचे जाने को कोई सन्दर्भ दे सकता था और पराई पत्रिका में संपादिका की परिचयात्मक टिप्पणी की तो कोई संभावना ही नहीं थी। संपादक श्री विभूतिनारायण राय की अपनी टिप्पणी ज़रूर थी जो पाठक को पुकार कर राजेन्द्र यादव की रुग्ण और विकृत मानसिकता के दर्शन का निमन्त्रण देती थी। स्वाभाविक ही था कि श्री राय के निमन्त्रण के उत्तर में उस आलेख की व्यंजना को अभिधा की तरह पढ़ा गया और अगले कई साल कई दसियों अखबारों और पत्रिकाओं के कई हज़ार पन्ने राजेन्द्र यादव की ‘उस’ मानसिकता को कोसने और सरापने में खर्च किये गये जो दर अस्ल उनकी (शायद) नहीं, उनके समाज के बहुसंख्य पुरुष समुदाय की थी और जिसे उन्होंने स्वेच्छा से सोद्देश्य  उजागर करने का ख़तरा उठाया था।
पुरुषवादी मानसिकता से शुरू कर यहाँ तक आने – पहुँचने में शायद उन्होंने एक लम्बी और बीहड़ यात्रा तय की होगी। उन पर हमला करने वालों में स्त्रियों से कई गुना अधिक गिनती में पुरुष थे – हमारे ऐसे ही सद्गृंहस्थ सज्जन सामाजिक बौद्धिक जन जो अनुकूल विमर्श के लपेटे में अनुकूल तर्कों का जाल बिछाते हुए चौकन्ने रहते और अपनी असलियत का पता नहीं पड़ने देते, जब तक कि यथा-तथा न्याय के ऐसे उदाहरणों में असलियत खुद प्रकट नहीं हो जाती।

तो राजेन्द्र हों या राय, यथाप्रसंग ये उदाहरणार्थ नाम हुआ करते हैं, जो स्त्री-विमर्श (या किसी भी अमूर्त लड़ाई) को आक्रमण के लिये निशाना और जूझने के लिये जोश प्रदान करके मूर्त बनाते हैं। तात्कालिक प्रसंग के आवेग और उत्तेजना में व्यक्ति के साथ कभी कभी कुछ ज़्यादती भी शायद हो जाती हो लेकिन निस्संदेह वह उसकी स्वयं-आहूत हुआ करती है। वक्त के साथ ये व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ झाँसी की रानी, जयचंद, विभीषण, दुर्वासा, नारद वगैरह की तर्ज़ पर, और इधर हाल के वर्षों (विमर्शों) में मथुरा, शाहबानो वगैरह जैसी जातिवाचक/ गुणवाचक अभिव्यक्तियाँ बन कर विमर्श के शब्दकोश में एक सन्दर्भ बन जाया करती हैँ। कौन जाने, ‘रायबहादुर’ इस सन्दर्भ-कोश की आगामी वृद्धि- समृद्धि हो, और अगली पीढ़ी को समझाने में संदर्भ की तरह काम आए।

लेकिन नाम केवल नाम ही नहीं हुआ करते, और लड़ाई किसी एक नाम के माफ़ीनामे या पद से बर्खास्तगी की माँग में सिमट कर रह जाए तो उसकी उपलब्धि व्यक्तिगत प्रतिशोध की तृप्ति और सन्तोष भले हो, लड़ाई का एक मुकाम नहीं मानी जा सकती। उस नाम के जरिये जो मनोवृत्ति उजागर होती है उसके साथ लड़ाई एक लम्बी, धीमी और तकलीफ़देह प्रक्रिया है। संस्कार और परम्परा के नाम पर जो औचित्य वह पाती है उसके साथ मुकाबले का एक ही तरीका है, अपने भीतर और आस-पास लगातार शंका और प्रश्ना का माहौल बनाए रखना और धैर्य को, धीर विलम्बित आक्रोश को न छोड़ना, आपसी समझ को कायम रखते हुए और ज़रूरी समझौते करते हुए भी समझौतावादी न होना। पीढ़ियों तक चलने वाली लम्बी लड़ाइयाँ, अपने घर आँगन में लड़ी जाने वाली लड़ाइयाँ, अपने आपे के साथ भी लड़ी जाने वाली लम्बी लगातार लड़ाइयाँ समय-समय के पड़ावों पर ज़रूरी समझौतों के बिना अनन्त काल तक चलाई नहीं जा सकतीं और अगली पीढ़ी को निरन्तर हस्तान्तरित करते चलने की जागरूकता के सिवाय और किसी भी तरह से गन्तव्य तक पहुँचाई नहीं जा सकतीं।
एक व्यक्ति की हैसियत से एक झटके से इस परम्परा को अलग कर देना, स्वयं को उससे तोड़ कर उसके दायरे के बाहर आ जाना वैयक्तिक सशक्तीकरण हो सकता है, लेकिन उपस्थित तात्कालिक प्रसंग की तरह परम्परा बार बार  लौट कर घेरती है। व्यक्तिगत स्तर पर सही, इस सशक्तीकरण की गिनती का बढ़ते जाना, उसको बढ़ाते जाने में योग को अपना दायित्व समझना ‘क्रमशःआन्दोलन’ का एक रास्ता और ‘पर्सनल इज़ पॉलिटिकल’ की एक नयी व्याख्या भी कही जा सकती है। और वह एक झटके से होने वाला काम नहीं है।

बेवफ़ा कहें या बावफ़ा कहें. आत्मकथा अस्मिताविमर्शों की अपनी साहित्यविधा बन कर उभरी है। ‘विमर्श’ अस्मिता की राजनीति की वैचारिक प्रस्तावना और साहित्यिक अभिव्यक्ति कहे जा सकते है। आत्मकथा लेखन प्रकारान्तर से एक राजनैतिक कर्म है। वह एक उद्घाहटन है, एक ऐसा उद्घाकटन जो गोपन को गोपन नहीं रहने देता। गोपन के रहने की जगह तहखानों में है, समाज के निचले पेटे का सच, जिसका उद्घाोटन ख़तरनाक है। लेकिन आत्मकथा को, स्त्री की आत्मकथा को खासतौर से, हम प्रायः लेखिका के व्यक्तिगत चरित्र की छानबीन और मूल्यांकन की तरह, और अक्सर तो चरित्र-हनन के एक अवसर की तरह पढ़ते हैं, समाज की गोपन सच्चाइयों के उद्घारटन की तरह नहीं।

सदियों से मौजूद चरित्र के मूल्यांकन की कुछ बनी बनाई कसौटियाँ, बाकी दुनिया में ‘ चेस्टिटी बेल्ट’ और ऐसे अन्य मध्यकालीन औजारों का ज़माना मध्यकाल के साथ व्यतीत हो जाने के बाद भी हमारे हिन्दीभाषी समाज में आज भी स्त्री के सन्दर्भ में ‘ सच्चरित्र ‘ का कुल मतलब दैहिक पवित्रता की पर्यायवाचिता, घुट्टी मे पिलाया गया लज्जा और मर्यादा का पाठ, चुप रहने का वादा, घर की बात घर के भीतर रखने का इरादा उसके जीवन के बुनियादी सामाजिक अनुबन्ध हैं। गोपन को गोपन बनाए रखने की जिम्मेदारी स्त्री की है। इसीमें उसकी ‘इज्ज़त’ सुरक्षित है और इज़्ज़त उसका प्राणपण है। प्राणपण उसका कारागार है।फिर ऐसा क्यों होता है कि जैसे ही औरत अपनी ‘इज्ज़त’ की चिन्ता छोड़ती और कारागार से बाहर निकलती है, वैसे ही पुरुष(सत्ता) को अपनी इज़्ज़त पर बन आती दिखती है। कहानी तो आखिर वह अपनी ही सुनाती है, प्राणपण चुकाती है, इज़्ज़त ‘ लुटाती’ है तो क्यों स्त्री को अकारण दण्डित करके भी पुरुष को अपनी इज़्ज़त बचाने की पड़ जाती है, चाहे वह किसी भी रंगत की या पहलू की विचारधारा का पुरुष क्यों न हो? स्त्री के इस उद्घायटन के बिना भले ही वह ख़ुद अपने आप इन तमग़ों की फ़ेहरिस्त बनाता, विजय पताकाएँ लहराता, अभियान गाथाएँ सुनाता घूमता हो। तस्लीमा नसरीन की आत्मकथा इसी सन्दर्भ में व्यक्तिगत के राजनीतिक हो जाने का एक बड़ा उदाहरण है और हमारे इस तत्काल-प्रसंग में भी आत्मकथाओं को दिया गया बेवफ़ाई के विराट उत्सव का ख़िताब उस पैमाने का न सही, उसी नमूने का एक उदाहरण ज़रूर है।

कहानी वास्तव मेँ कभी अकेले की नहीं होती। आत्मकथा तो और भी नहीं, और वह लेखिका के अपने समय के सचमुच के लोगों के बारे में होती है। उसे कथा मात्र में बदलने में एकाध पीढ़ियाँ अभी खर्च होने को बाकी हैं। ‘सचमुच के लोग’ और उनके पद-प्रतिष्ठा-यश-अधिकार ( अगर कहीं राजनीतिक हुए तो और भी अधिक) और पुरुष होने के साथ सारा झगड़ा अधिकतर जुड़ा होता है, प्रेमी हो या पति, पिता हो या पुत्र। पितृसत्तात्मक साँचे में ढली मानसिकता की स्त्रियाँ भी शामिल दिख सकती हैं लेकिन अगली पीढ़ी के साथ दूसरे पक्ष का संख्याबल भी धीमी लेकिन निश्चिपत गति से बढ़ रहा है। वफ़ा का अर्थ वास्तव में है क्या? व्यक्तिगत सम्बन्धों में वफ़ा का एकतरफ़ा अनुबन्ध असल में वफ़ादारी को मालिक और कुत्ते के सम्बन्ध में बदलता है, स्वत्वहीन समर्पण बनाता है, सिर्फ़ दुम हिलाने की इजाज़त देता है। ऐसा नहीं कि अगर आत्मकथाएँ नहीं होतीं तो दुनिया में सिर्फ़ वफ़ा ही हुई होती, बेवफ़ाई का कहीं नाम भी न होता। ऐसा भी नहीं कि ” शहरीकरण, औद्योगीकरण, शिक्षा के बढ़ते अवसर या मूल्यों के स्तर पर हो रही उथल पुथल ने स्त्री पुरुषों को ज़्यादा घुलने मिलने के अवसर प्रदान” (उद्धरण उल्लिखित साक्षात्कार से) करने वाली दुनिया के पहले बेवफ़ाई नहीं थी। आखिर जो पदक और पताकाएँ और अभियान-गाथाएँ पुरुष के हाथों संकलित और प्रदर्शित होती रही होंगी, उनमे कोई भागीदार संगी या संगिनी भी होती ही होगी। बेवफ़ाई की शुरुआत तो उसी दिन हो गयी होगी जिस दिन

नैसर्गिक युग्म-भावना को वैवाहिक संस्था का निश्चितत, वैधानिक, औपचारिक स्थायित्व प्रदान किया गया होगा और सन्तान व सम्पत्ति के उत्तराधिकार के सिलसिले में स्त्री से एकरफ़ा वफ़ादारी की माँग का सूत्रपात हुआ होगा। प्रेम और विवाह और वफ़ा और बेवफ़ाई – सब थे। सिर्फ़ स्त्रियों की आत्मकथाएँ नहीं थीं। स्त्री-पक्ष नदारद था। जो था वह था तो सही, लेकिन अनकहा था और अकथनीय था। लज्जा और मर्यादा और हया और शर्म के नाम पर चुप्पी की जिस साज़िश में वह स्वयं अपने विरुद्ध शामिल थी उस सामाजिक अनुबन्ध को उसने तोड़ दिया है। और क्या नहीं था जो चुप्पियों की इस फ़ेहरिस्त में शामिल न हो। एक ओर अपने स्त्री समुदाय मेँ बैठ कर आँगन मेँ गाने बजाने के लिये लोकगीतों की उद्दाम शृंगारिक ऊर्जा और दूसरी ओर चुप्पियों की इस फ़ेहरिस्त में खुद अपने स्त्री-अंगों, रजोस्राव, रजोनिवृत्ति, गर्भ और प्रसव, स्त्री-रोग, अन्तर्वस्त्रों और अन्य दैनिक अस्तित्व की विशिष्ट स्त्रियोचित ज़रूरतों तक के और अपने साथ बलात्कार और छलात्कार जैसे अन्यायों के भी वर्जित नामोच्चार के विरोधाभासों के बीच जीती स्त्री ने अपनी आत्मकथाओं में इतर प्रेम-प्रसंगों या बेवफ़ाई की चर्चा तक पहुँचने में एक जन्म में कितने जन्मान्तर पार किये हैँ इसकी कल्पना भी मुश्कि ल है। इस अनुबन्ध के टूटने का मतलब स्त्री के अन्तःकरण की मुक्ति है, खुद अपने भीतर की जकड़न से भी और पुरुष के वर्चस्व से भी। सामाजिक, पारिवारिक प्रतिष्ठा और सुरक्षा, आर्थिक निर्भरता आदि बन्धनों के भी पहले सशक्तीकरण का पहला कदम अंतःकरण की यही मुक्ति है। इस मुक्ति का मतलब स्वयं को पुरुष द्वारा ब्लैकमेल की ताकत से मुक्त कर लेना है। आत्म कथा लिखने के निर्णय तक जो पहुँच पाती है उसके लिये यह बेवफ़ाई नहीं, वफ़ा के पात्र को बदल देना है। इसका अर्थ बेवफ़ाई की शाश्वेत परिभाषा के अनुसार प्रेमी और पति की अदलाबदली से नहीं। उसके लिये अब यह सच के प्रति वफ़ादारी का पर्याय है, वफ़ा की अपनी व्यक्ति-सापेक्ष भावना को मूल्य-सापेक्ष सत्य बना लेना है।

पुरुष की कल्पना के भी शायद परे हो कि जि़न्दगी के भीतर-बाहर में कितनी जद्दोजहद के बाद वहाँ तक पहुँचा जाता है जहाँ आत्मकथा का सच केवल बोलने की हिम्मत और हिमाकत नहीं, अपने स्वावलम्बी अन्तःकरण की निडर अभिव्यक्ति और सत्य के साथ प्रतिबद्धता का प्रश्ऩ बन जाता है। फिर एक बार कहूँ, कितना भी अपर्याप्त और दुर्बल क्यों न हो हमारा स्त्री-विमर्श, और कितनी भी गिनी चुनी क्यों न हों ये आत्मकथाएँ, निस्संदेह उनसे टूटने वाली चुप्पियाँ हमारे स्त्री-विमर्श के अगले महोत्सव का कारण हैँ। छिनाल : बात एक शब्द की नहींइस बहस में घुसने का कोई प्रयोजन नहीं कि छिनाल का मतलब वेश्यान है या व्यभिचारिणी। मंशा तो स्पष्ट ही है – अपमानजनक।

हिन्दीभाषी समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता के पास स्त्री-पुरुष सम्बन्ध की पहचान का एक ही मैदान है – बिस्तर।वह एक बड़ी और बुनियादी भौतिक असलियत है, लेकिन यह रिश्ता् तीन बाई छः या बहुत हुआ तो छः बाई छः के इस बाड़े से बहुत बड़ा हो चुका है। इसमें बौद्धिक, वैचारिक, अकादमिक, व्यावसायिक, रचनात्मक आदि तरह तरह की अनेकपरतीय साझेदारियाँ और प्रतिद्वन्द्विताएँ शामिल हो चुकी हैँ। स्वाभाविक है कि इन उलझती सुलझती परतों में साथी,सहयोगी, सहकर्मी,सखा जैसे सम्बन्धों की कुछ भावात्मक, कुछ भावनात्मक परतें भी खुलने खिलने लगती हैं। लेकिन भावनात्मक लगाव का भी एकमात्र अर्थ अब दैहिक आकर्षण और एकमात्र गन्तव्य बिस्तर नहीं है। स्त्री-मुक्ति के पिछले सौ सालों ने स्त्री के व्यक्तित्व को जो अनेकमुखी विकास दिया है उसकी बुनियादी ज़रूरतों में दोस्ताना सम्बन्ध शामिल हैं जो बहुविध बहुसंख्य हो सकते हैं। स्त्री के लिये भी वृत्ति और व्यवसाय उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितने पुरुष के लिये, केवल आजीविका के अर्जन के लिये नहीं बल्कि तृप्ति और सन्तोष की अनुभूति के लिये भी। इन वृत्तियों में लेखन भी शामिल है। कामकाजी व्यस्तताओं के बीच- कॉफ़ी के प्यालों के साथ अखबार की सुर्खि़यो और कार्यस्थल की ताज़ा ख़बर से लेकर नॉन-वेज किस्म के चुटकुलों, एक दूसरे की टाँगखिँचाई, ठहाकों, घरेलू संकटों और समाधानों तक की साझेदारी चलती है और एक पारस्परिक-अवलम्ब-व्यवस्था विकसित हो जाती है।

राजधानी के एक प्रमुख स्त्री-शिक्षा-संस्थान में अध्यापिका की हैसियत से ज़िन्दग़ी का दो तिहाई हिस्सा बिताते हुए मैंने इस नयी स्त्री को बहुत करीब से देखा है। स्त्री-विमर्श इस नयी स्त्री का विमर्श है। प्रेम और दाम्पत्त्य की एकाधिकार-वांछा उसके लिये दमघोट है और उसकी दैनिकचर्या – बिस्तर समेत – एकरस ऊबाऊ और थकाऊ है। कार्यस्थल की चुनौतियाँ, बौद्धिक उत्तेजनाप्रद वार्तालाप, भावात्मक उत्तेजनाप्रद हास-परिहास इस नीरसता में प्राणसंचार का साधन है। सम्बन्धों की परिभाषाएँ उसके लिये एकाधिकार- वांछा से बदल कर साथ-संगत और दोस्ताने की हो गयी हैं लेकिन पुरुष मानसिकता की हद अभी कुल इतनी है कि खुले से खुले दिमाग़ का दम भरने वाला, कवि और लेखक नामी प्राणी भी दूसरे लेखक साथियों की रुग्ण और विकृत मानसिकता को रुद्र हुंकारों में सरापते, गरियाते भी दर-अस्ल ख़ुद उस मानसिकता के पार नहीं झाँक पाएगा, हद से हद होगा इतना कि इस दोस्ताने को छिनाल न कहेगा तो बड़ी इनायत फ़रमाते हुए प्रेमिका कह देगा, इस बात से बाखबर कि हिन्दी संसार मेँ प्रेमिका का मतलब भी छिनाल ही है और जिसे यह ख़िताब अता फ़रमाया जा रहा है उसकी एक छवि भी प्रस्तावित की जा रही है।

लेखन की दुनिया में कई पीढ़ियाँ एक साथ सक्रिय होती हैं और उम्र में दो चार दशकों का आगा-पीछा भी दर अस्ल पीढ़यों का अन्तराल नहीं बनता। कृष्णा सोबती- मन्नू भण्डारी- उषा प्रियम्वदा,-राजी सेठ; ज्योत्स्ना मिलन-मृणाल पाण्डे-सुधा अरोड़ा, मैत्रेयी पुष्पा, चित्रा मुद्ग्ल; अनामिका-जया जादवानी- पंखुरी राय-प्रत्यक्षा-कविता-सोनी सिंह सब एक विचित्र अर्थ में समकालीन है। सब की सब स्त्री-विमर्शवादी भले न हों, पितृसत्तात्मक समाज की जड़ताओं पर स्वयं स्वतंत्र-व्यक्तित्व होने के सबब से साकार कुठाराघात हैं और स्त्री-विमर्श का लक्ष्य सिद्ध करने में सहायक हैँ। अगर साहित्य समाज के लिये अग्रिम-चेतावनी-व्यवस्था है तो कृष्णा सोबती को सोनी सिंह की अग्रिम चेतावनी कहा जा सकता है।

अपने एक वृद्ध और अब दिवंगत परिवारी की एक पैंतालीस साल पुरानी टिप्पणी को अगर उद्धरणचिह्नों में कहूं तो ” व्यक्तित्व तो सिर्फ़ आवारा औरतों का होता है।” इस टिप्पणी को उकसाने वाला सन्दर्भ कुल इतना था कि उनकी पुत्रवधू ने अपनी पढ़ी लिखी प्रतिभाशालिनी ननद से उनके विवाह के कुछ वर्ष बाद मिलने पर अफ़सोस करते हुए कहा था कि उनकी तो पर्सनैलिटी ही ख़त्म हो गयी है। ससुर जी अपनी बेटी के इस व्यक्तित्व – विनाश पर गर्वित तो थे ही, पुत्रवधू के सामने उसे आदर्श की तरह भी रख रहे थे जो तब तक भी आखिरी कगारों पर जूझ रही थी। मेरे वे परिवारी आज होते तो शायद छिनाल के अनेक प्रस्तावित अर्थों में एक इजाफ़ा ‘आवारा’ यानी व्यक्तित्व संपन्न औरत का भी हो गया होता। लगता नहीं है कि पैंतालीस सालों में कोई खास प्रगति हमने की है। स्थिति आज भी यही है कि स्त्री को अपने अशक्तीकरण में आदर्श घोषित करके सशक्तीकरण की संभावनाओं को खारिज कर दिया जाता है और आवारा छिनाल जैसे विशेषण इसका साधन होते हैं।

अठारह सौ सत्तावन के गदर में लाल किला जब खाली करवाया गया तो शाही खानदान की स्त्रियों में से अनेक चाँदनी चौक और दूसरी जगहों के गली कूचों में शरण खोजने और प्राचीनतम पेशा अपनाने को मज़बूर हुईं। उन्हें रण्डी कहा जाता था क्योंकि तब इसका अर्थ प्रतिष्ठित सम्मानित खानदानी महिला हुआ करता था। तबका कुलीनता सूचक आगे चल कर धन्धासूचक बन गया। रण्डी का मतलब पता नहीं छिनाल हुआ या नहीं क्योंकि रण्डी तो निश्चबय ही वेश्या  का अर्थ देने लगा लेकिन छिनाल का यह अर्थ शब्दकोश- सम्मत होने के बावजूद प्रसिद्ध प्रयोक्ताओं द्वारा अभी विवादित है।कहने का मकसद यह है कि यहाँ, इस सन्दर्भ मेँ छिनाल अथवा वेश्या के प्रयोग को अपमानजनक मान लेना और प्रतिरोध के कोलाहल को महोत्सव का दर्जा देना अपनी जगह पर सही है क्योंकि प्रयोक्ता की मंशा अपमानजनक है। लेकिन ज़रा ठहर कर सोचें। शायद आसानी से हमारे गले न उतरे लेकिन वस्तुतः किसी भी आजीविका की तरह यह भी एक आजीविका है, किसी भी व्यवसाय की तरह केवल एक व्यवसाय। और किसी भी समाज के लिये इतना ज़रूरी कि हर समाज में मौजूद है और बावजूद तरह तरह के कानूनी प्रतिबन्धों और प्रावधानों के, रोके से रुकने की कौन कहे, दिन पर दिन नये नये छद्मों में बढ़ता ही जाता है। छिनाल की गैरकानूनी हैसियत उसे शोषित और असुरक्षित रखती है और सामाजिक मान्यताएँ अपमानित। स्त्री-विमर्श पर, शोषण और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ लड़ाई पर पहला दावा उसका है, और शुरुआत उसके नाम को गाली की तरह नहीं सम्मान की तरह ग्रहण करने से हो सकती है।
हम सब जानते हैँ कि ये गालियाँ पुरुष के पास स्त्री को बाँधने और रोकने के, उसे अशक्त बनाने के सबसे आसान और कारगर हथियार हैं। यही उसकी मानसिकता की अभिव्यक्ति भी है। उसे ये नाम उचारने में सोच-विचार का क्षण भर भी नहीं लगता, हिचकिचाहट का रंचमात्र अहसास भी नहीं जगता, शायद उसे आभास भी नहीं होता कि उसका कहा कितना घातक है लेकिन औरत का पूरा वजूद हिल जाता है।

आत्म-सशक्तीकरण के संकल्प से लैस होकर भी, उसके सजग सचेत कार्यक्रम का हिस्सा बन कर भी, लेखन के जरिये चुप्पियों को तोड़ने का बीड़ा उठाकर भी, वर्जनाओं को चुनौती देकर भी कहीं अपने ही अवचेतन की गहराई में अवशिष्ट उसी पुरुषसत्तात्मक मानसिकता की कसौटियाँ हमें नापने लगती हैँ। मानो अनजानते ही आज भी लज्जा, मर्यादा, चुप्पी, वफ़ा वगैरह स्त्री के लिये बुनियादी पैमाने का सामाजिक अनुबन्ध है जो उसके अस्तित्व का बेड़ी-डण्डा-हथकड़ी समेत कारागार है लेकिन पुरुष के लिये महज़ एक हल्का फुल्का मज़ाक, भाषा का थोड़ा रंगीन इस्तेमाल, एक सहज अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति। वक्त मौके पर जता देना ज़रूरी है कि यह असहनीय है। प्रयोक्ता अगर अपनी अभिव्यक्ति को आधिकारिक बना देने की हैसियत का पदाधिकार रखता हो तो और भी ज़्यादा। लेकिन स्वयं-शक्ति के अर्जन की दिशा में अपने कवच को और पोढ़ा, और अवेध्य बनाना और भी ज़्यादा जरूरी है।कोलाहल ज़रूरी है।कोलाहल से ज़्यादा ज़रूरी है इन हथियारों को भोथरा और
नाकाम करना। रण्डी और छिनाल और आवारा औरत को उसकी प्रतिष्ठा, मर्यादा और सम्मान लौटाना ज़रूरी है क्योंकि वह बहुत हिम्मतवर, व्यक्तित्वसंपन्न और निर्णयक्षम औरत है। क्योंकि हम जानते हैं कि वह इसकी अधिकारिणी है।क्योंकि हम यह भी जानते हैँ कि इन गालियों के ज़रिये हमारे वजूद को हिला देने वाले लोग वक्त मौके पर माफ़ीनामा भले दाखिल कर दें, बाज़ आने वाले नहीं हैं। वे चुप भले हो जाएँ, अपनी सोच में जारी रहेंगे और हमें पता भी नहीं चलेगा कि पितृसत्ता फ़िलहाल क्या सोच रही है। क्योंकि वे अपने इन हथियारों की ताकत से परिचित हैं, और हमारे अवचेत अशक्त आदर्शीकरण से भी इसलिये हमें ही इन गालियों का गालीपन छीन लेना होगा।

एक दिन होगा जब सुनूँगी, आवारा, छिनाल, रण्डी या शायद प्रेमिका ही। पर्यायवाची हैँ सभी। क्रोध से कहूँगी, ‘माँ को याद कर रहे हैँ, या बहन को।’ पहचानूँगी अपनी अवशिष्ट पुरुषसत्तात्मक मानसिकता को। उसकी माँ बहने भी तो स्त्रियाँ है। बेहतर, हँस दूँगी। और भी बेहतर, मुड़ कर कहूँगी, ‘ थैंक्यू फॉर द कॉम्प्लीमेण्ट।’ एक दिन होगा। प्रतीक्षा है। उस दिन स्त्री-विमर्श का तीसरा महोत्सव होगा।

चित्र श्रृंखला से समझें ‘ यौन सहमति’ का महत्व

यह चित्र श्रृंखला रूटीन में शामिल हमारे क्रिया -कलापों से समझा रही है कि ‘ सहमति’ की क्या अहमियत होती है . यौन -संबंधों के लिए भी हाँ -और ना का आदर जरूरी है . ‘ सहमति-असहमति ‘ के प्रति यदि सचेत आदर हो तो न सिर्फ  बलात्कार की पीडिताओं के खिलाफ सामाजिक सोच बदलेगी , बल्कि विवाह के भीतर बलात्कार को भी संवेदनशीलता के साथ समझा जा सकेगा. हम ज्यादा सभ्य आचरण के लिए प्रेरित होंगे. ‘ एवरी डे फेमिनिज्म’ से साभार 

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समलैंगिक और थर्ड जेंडर:  सहानुभूति के साथ स्वीकृति की जरूरत 

समलैंगिक और थर्ड जेंडर: सहानुभूति के साथ स्वीकृति की जरूरत

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

आज अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में समान रूप से समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने का निर्णय पांच / चार के बहुमत से दिया है .  आज भी इस मसले पर विरोध की यह स्थिति है कि अमरीका जैसे लोकतांत्रिक समाज में इस निर्णय के विरोध में नौ में से चार जजों ने नोट ऑफ़ डिसेंट लिखा. अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए स्त्रीकाल के पाठको के लिए सुधा आरोड़ा का यह आलेख , जो उन्होंने कुछ  समय  पहले लिखा था . 


प्रकृति सबसे बड़ी सर्जक और निर्माता है। यह प्रकृति हमें बेहद खूबसूरत फल और फूल, पक्षी और पशु , नदी और झरने, समुद्र और पहाड़ देती है और इसकी सबसे अनोखी रचना है-मनुष्य  । एक से एक अद्वितीय अंग हैं हमारे पास। आंखों से हम प्रकृति की सुंदरता देखते हैं, कानों से झरने का गुंजार सुनते हैं, पेड़ों पर लगे फल और सब्जियों का स्वाद चखते हैं। हैरत कि बात यह कि जो कुछ हम खाते हैं, वह अलग अलग प्रत्यंगों से होता हुआ स्वयं खून और शक्ति में तब्दील हो जाता है। स्त्रियों में प्रजनन की अद्भुत क्षमता है और अपने ही रक्त, मांस से वह एक और शिशु  को जन्म देती है पर यह भी प्रकृति की ही देन है कि कई बार उस शिशु के अंगों में कुछ ऐसे मिश्रण हो जाते हैं कि उसका सिर ज़रूरत से ज्यादा बड़ा हो जाता है, कभी पेट के अंगों का स्थान बदल जाता है, किसी भी अंग में कोई विकृति आ जाती है, कई बार वह नर या मादा न रहकर कुछ और ही हो जाता है और इसका पता भी 12-13 साल की उम्र में बहुत देर से चलता है, जब उसमें लिंगगत विभिन्नताएं उभरने लगती हैं। इस विषमता  या विकृति का जि़म्मेदार ज़ाहिर है, वह बच्चा नहीं है और न ही उसकी मां है। यह प्रकृति की ही विडम्बना है लेकिन समाज उस असामान्य अंग को  लेकर पैदा हुए बच्चे को ताउम्र इस विकृति की सज़ा देता है।

सच तो यह है कि प्रकृति की थोड़ी सी भिन्न संरचना को हमने कभी स्वीकृति नहीं दी । अगर यह पता चल जाता कि फलाने घर में असामान्य बच्चा पैदा हुआ है तो बजाय उसके प्रति एक सहानुभूति के हम उसे तिरस्कार या उपेक्षा की नज़रों से ही देखते रहे। यही वजह है कि किन्नर को हमने ताली पीटने वाले और बच्चे के जन्म और शादी पर नाचने गाने वाले हिजड़े मानकर उन्हें कभी बराबरी का हकदार नहीं समझा और उनके प्रति सामान्य आचरण नहीं रखा। प्रकृति का हर सामान्य व्यक्ति खुद को इन भिन्न अंग वाले लोगों से श्रेष्ठ  और इन्हें कमतर मानता रहा।

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आख़िर हम भी तो इंसान ही हैं, हमें भी दर्द होता है : रवीना बरीहा

कब तक नचवाते और तालियाँ बजवाते रहेंगे हम !

किन्नर अब ‘थर्ड जेंडर’ की तरह पहचाने जाएंगे

समाज में यह प्रवृत्ति शताब्दियों से है। अरसे तक मानसिक रोगियों को विक्षिप्त की श्रेणी में शुमार किया जाता था। मानसिक अस्वस्थता को पागलपन कहकर उसका मखौल उड़ाया जाता था। पोलियोग्रस्त या अंगविच्छेद से क्षतिग्रस्त व्यक्ति को अपाहिज कहने में कोई संकोच नहीं बरता जाता था और विकलांगों को डिसएबल्ड कहा जाता था। अब उन्हें डिफरेंटली एबल्ड कहा जाता है। आज समय बदला है और एक मानवीय दृश्टि पनप रही है। धीरे धीरे हमने यह समझा कि मानसिक अस्वस्थता के रोगी को शारीरिक रोगों से कहीं ज्यादा गंभीरता और संवेदनशीलता से हैंडल करने की जरूरत है। मानसिक रोग को अब दबाया छिपाया नहीं जाता, उनके लिये बाकायदा अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धति है।

हमारी इसी मानसिकता का शिकार ऐसे मनुष्य हैं, जिन्हें  प्रकृति ने न पूरी तरह स्त्री बनाया और न पुरुष। क्या हमारे सामान्य समाज में उन्हें जीने का हक नहीं । अपने अधिकारों के लिये एक लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार 15 अप्रैल 2014 को एक ऐतिहासिक फैसला आया, जिसने किन्नर समाज को स्वीकृति दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि सरकारी दस्तावेजों में अब महिला और पुरुष के साथ-साथ एक कॉलम थर्ड जेंडर या किन्नर का भी हो। किन्नरों को सामाजिक और शिक्षा के स्तर पर पिछड़े हुए वर्ग की तरह सारी सुविधायें मुहैया करवाई जाएं। कोर्ट ने अपने फैसले में किन्नरों को उन सभी न्यायिक और संवैधानिक अधिकार देने की बात कही जो देश के आम नागरिकों को मिले हुए हैं। किन्नर समाज इस फैसले को लेकर उत्साहित है। ऐसा पहली बार हुआ है कि उन्हें शादी करने, तलाक देने, बच्चा गोद लेने सहित केंद्र और राज्यों की ओर से चलाई जाने वाली सभी स्वास्थ्य व कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान में वर्णित अनुच्छेद 19 के तहत उन्हें वैयक्तिक स्वतंत्रता के सभी अधिकार हासिल होंगे और केंद्र और राज्य सरकार का यह दायित्व होगा कि उनके अधिकारों की रक्षा की व्यवस्था की जा सके।

अब समलैंगिकता के मसले पर आयें। 
समलैंगिक होना भी अपराध नहीं, एक प्रवृति है, जिसे समाज से हमेशा छिपाया जाता है। यह भी प्रकृतिगत एक संरचना है, जिसमें मादा अंग लेकर पैदा हुआ एक बच्चा जब बड़ा होता है तो अपने में स्त्रियोचित गुण न पाकर अपने को पुरुष की बनावट और मानसिकता में देखता है और पुरुष अंग लेकर पैदा हुआ एक बच्चा अपनी युवावस्था में आने पर अपनी आवाज़ में तब्दीली महसूस नहीं करता है और अपने को लड़कियों की मानसिकता में पाता है और पुरुषों की ओर आकर्षित  होता है। यहां भावना का स्थान दैहिकता से कम नहीं है। समलैंगिकता के खिलाफ भारतीय संविधान की धारा 377 हटाने की जब बात की गई तो कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने अपनी असहमति जताई। कई मंचों से इसके खिलाफ कहा गया कि यह अप्राकृतिक आचरण है, इसलिये इसे कानूनी सहमति नहीं दी जानी चाहिये। लेकिन ये लोग नहीं जानते कि विवाह जैसे कानून सम्मत और वैध माने जाने वाले प्राकृतिक सम्बन्धों में भी कितने अप्राकृतिक आचरण किये जाते हैं , जहां पत्नियां कुछ बोल भी नहीं पातीं और आजीवन एक असुरक्षित और दहशतज़दा जिन्दगी जीती हैं।

न्यूयाॅर्क के एलबर्ट आइंस्टाइन काॅलेज आॅफ मेडिसिन के प्रोफसर  डाॅ. चार्ल्स  सकाराइड्स ने कई दशक पहले कहा था कि यौन -उद्यगों से जुड़े कुछ तेज-तर्रार शातिरों की यह एक धूर्त वैचारिकी है,  जो समलैंगिकों को पैथालाॅजिकल बताती है. इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता. अमेरिकी समाज में समलैंगिकता की समस्या के ख्यात अध्येता डाॅ. चार्ल्स  अपनी पुस्तक ‘ होमोसेक्सुअल्टी: फ्रीडम टू फाॅर’ में अपना वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं- ‘‘ अमेरिकी समाज में यह तथाकथित समलैंगिक क्रांति’  बस यूँ ही हवा में नहीं गूँजने लगी , बल्कि यह कुछ मुट्ठी भर शातिर बौद्धिकों की ‘मानववाद’ के नाम पर शुरू की गई वकालत का परिणाम था, जिनमें से अधिकांश स्वयं भी समलैंगिक ही थे । ये लोग  ‘ट्राय एनीथिंग सेक्सुअल’ के नाम पर शुरू की गई यौनिक -अराजकता को  , नारी स्वातंत्र्य के विरुद्ध दिए जा रहे एक मुँहतोड़ उत्तर की शक्ल में पेश कर रहे थे । पश्चिम में , जब पुरुष की बराबरी के  मुहिम के तहत स्त्री ‘मर्दाना बनने के नाम पर , अपने कार्य-व्यवहार और रहन-सहन में भी इतनी अधिक ‘पुरुषवत या ‘पौरुषेय ’ होने लगी कि जिसके चलते उसका समूचा वस्त्र विन्यास भी पुरुषों की तरह होने  लगा । नतीजा , स्त्री की जो  ‘स्त्रैण-छवि’ पुरुषों को यौनिक  उत्तेजना देती थी , उसका लोप  होने  लगा । वेशभूषा की भिन्नता के जरिए , किशोररवय में लड़के और लड़की के बीच, जो प्रकट फर्क दिखाई देता था, वह धूमिल हो गया ।  इस स्थिति ने लड़के और लड़के के बीच यौन -निकटता बढ़ाने में इमदाद की, जिसने अंततः उन्हें ‘समलैंगिकता की ओर हाँक दिया । ’’

डाॅ. चार्ल्स  की यह स्थापना तीसेक साल पहले की है.  जहां वह इसे रोग की संज्ञा देते हैं . आज इन्हें रोगियों की तरह नहीं देखा जाता . न ही इन समलैंगिकों के भीतर इस प्रवृत्ति को लेकर कोई अपराध बोध है।
भारत में आज भी इसे एक ग्रंथि, एक टैबू के रूप में देखा जाता है। यह कितना बड़ा पाखंड है कि माता-पिता यह जानते हुए भी कि उनका बेटा समलैंगिक है,उसके जीवन की यह सच्चाई छिपाते हुए, उसके लिये आर्थिक रूप से अपने से नीची हैसियत वाले परिवार की बेटी को बहू बनाकर ले आते हैं और वह लड़की भी ताउम्र इस राज़ को अपने भीतर दफन कर पतिव्रता स्त्री का रोल निभाती चली जाती है। इसके पीछे सामाजिक स्वीकृति का न होना ही एक प्रमुख कारण है। कभी यह राज खुल जाता है और मां-बाप को इसके लिये जब दोषी ठहराया जाता है तो वे कहते हैं कि हमने तो यह सोचा था कि हमारा बेटा शादी  के बाद ‘सुधर’ जाएगा। दूसरे घर से आयी बेटियों को वे इत्मीनान से ‘सुधार-गृह’ समझ लेते हैं। कभी उनमें अपराधबोध नहीं जागता कि वे एक कम साधन संपन्न, दबे हुए परिवार की बेटी को भौतिक सुख सुविधायें देकर उसकी कितनी बड़ी कीमत वसूल रहे हैं और एक लडकी को मंगलसूत्र पहनाकर उससे एक सामान्य जि़ंदगी जीने का अधिकार छीन रहे हैं!

समलैंगिक संबंधों को ग्रंथि बना देने के कारण हमारे समाज में ऐसे संबंधों के दुश्चक्र में पिसने वाली सैकड़ों महिलायें अपनी तकलीफ़ बयान नहीं कर पातीं . काउंसिलिंग के दौरान का अपना एक अनुभव शेयर करना चाहती हूं । एक उच्चमध्यवर्ग की महिला , जिसके पति एक मल्टी नेशनल कंपनी के चेअरमैन थे , अपनी प्रताड़ना का मामला लेकर सामने आई. उसने बताया कि जब-तब उसे घर से बाहर धकेल दिया जाता है. उसने अपने घर की सीढि़यों पर बैठकर सारी रात काटी है . एक बार उसके पति ने उसपर पेपरवेट उठाकर फेंका, निशाना चूक गया वर्ना उसका सिर फट जाता . अपने जीवन के ये अनुभव उसने कई दिनों के सेशन के बाद साझा किये. पहले तो वह धुआंधार रोती ही रही . उसकी बात सुनने के बाद हमने उसके पति से संपर्क किया कि आप आकर अपना पक्ष रखना चाहें तो हमें अच्छा लगेगा . उसके अफसर पति आये . बेहद शालीन और संभ्रांत . आमतौर पर प्रताड़ना से जूझ रही महिलाओं के पति लाख बुलाने पर भी न आते हैं , न फोन पर बात करने को तैयार होते हैं . उनका हमारे संगठन तक आना ही हमें इंप्रेस करने के लिये काफी था . कहने लगे – देखिये , सारा दिन मैं अपने दफ्तर में व्यस्त रहता हूं . घर लौटकर बस एक खिला हुआ चेहरा , अच्छा खाना और कभी कभार रात को पत्नी का साथ तो चाहूंगा ही , वह भी अगर यह न दे पाये तो मैं वेश्याओं  के पास तो नहीं जाना चाहता कि एड्स लेकर लौटूं . उनकी बेबाकी और साफगोई ज़ाहिर थी . बातें और भी कई मुद्दों पर हुईं पर दूसरी बार जब हमने उनकी पत्नी से सवाल पूछे तो दोबारा उसका धुंआधार रोना शुरु हो गया . उसके आंसुओं से हम आजिज़ आ गये . हमारे कई बार उकसाने पर उसने बताया कि उसके पति उससे हमेशा अप्राकृतिक सेक्स ही चाहते हैं . वे शुरुआत ही खजुराहो की मुद्रा से करते हैं और वह अपनी उबकाई रोक नहीं पातीं . रात आने से पहले ही उनके पूरे जिस्म पर दहश तारी हो जाती है और वह कांपने लगती हैं . उन्होंने कभी सेक्स को एक सुख की तरह नहीं भोगा . हमने उनसे पूछा कि क्या अपनी यह आपत्ति पति के सामने उन्होंने दर्ज की ? उन्होंने कहा – इतना साहस मुझमें नहीं रहा कभी , मैं कभी उनसे किसी भी बात पर असहमति नहीं जता सकती, वे आगबबूला हो जाते हैं.   बहरहाल , वह उस पीढ़ी की थीं जो आज आॅब्सोलीट हो गई है. आज की लड़कियां शायद इतना लंबा अरसा ऐसी दहशत बर्दाश्त न करें !

कई स्त्रियां यह भी कहती पाई जाती हैं कि जब उन्हें वैवाहिक संबंधों में एक पुरुष  से अप्राकृतिक सेक्स और भावनाविहीन पशुवत बलात्कार ही झेलना है तो वह क्यों न अपनी मित्र के साथ एक प्रेम के रिश्ते  में रहे . अगर एक पुरुष  पति अपनी पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक सेक्स करता है तो दो स्त्रियों के भावनात्मक और तथाकथित अप्राकृतिक दैहिक संबंधों से किसी को क्या आपत्ति  हो सकती है ? लेस्बियन होना प्राकृतिक और जन्मना प्रवृत्ति भी  है और अपने माहौल की निर्मिति भी .

आज के बदले हुए माहौल में विपरीत सेक्स वाले दो व्यक्ति ही विवाह के बंधन में बंध सकते हैं , यह अवधारणा दम तोड़ रही है क्योंकि विवाह अंततः बंधन ही बनकर रह जाता है और भावना विहीन बंधन बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकता । पूरी तरह टूट कर भी घिसटता रहे तो बात अलग है और यही होता भी है। भारत में अधिकांश  वैवाहिक रिश्ते  अपना आकर्षण  खोकर , एक आदत और पारिवारिक सामाजिक दबाव के तहत , एक मुखौटा लगाकर , एक छत के नीचे रहते चले जाने का अभ्यास बनकर रह जाते हैं ।

अमेरिका में मैंने एक बीच पर हज़ारों की संख्या में ‘गे’ पुरुषों का जमावड़ा देखा . वे ठहाके लगा रहे थे , गाना गा रहे थे , एक दूसरे को गोद में उठा रहे थे , गले मिल रहे थे , पीठ पर प्यार से मुक्के जमा रहे थे गरज यह कि सामाजिक स्वीकृति के कारण वे बेहद सहज और बेपरवाह थे .शिकागो में एक शाम हम घूमने निकले तो देखा, कुछ दूरी पर हर लैम्पपोस्ट पर इंद्रधनुषी रंग वाले झंडे सड़क के दोनों ओर लटक रहे हैं। मैंने अपने दामाद से पूछा – यह किस देश का फ्लैग है और यहां क्यों डिस्प्ले किया जा रहा है। मेरे दामाद ने बताया कि  यह इलाका बॉएज टाउन कहलाता है – गे और लेस्बियन फ्रेंडली इलाका!  रेनबो फ्लैग उनका साइन है! हम जहां रहते हैं, वहां भी आप बगल वाली बिल्डिंग में छत पर यह रेनबो फ्रलैग देख सकते हैं। मैंने कहा – यह तो एक तरह से उन्हें आउट कास्ट कर देना हुआ,  जैसे भारत में दलितों के लिये शहर से बाहर बस्तियां बसाई जाती थीं। उसने समझाया – ऐसा नहीं है। अब भी एक आम अमरीकी नागरिक समलैंगिकों को नीची निगाह से ही देखता है। कानून बेशक बन गया हो पर सामाजिक स्वीकृति बहुत स्वाभाविक न होकर एक दबाव की वज़ह से है। हर व्यक्ति अपने रोज़मर्रा के जीवन में एक स्वाभाविक आज़ादी तो चाहता ही है। गे या लेस्बियन ऐसी जगहों में रहकर महसूस करते हैं कि वे अपने कम्फर्ट जोन में हैं।

इन स्थितियों को देखते हुए समलैंगिकों और किन्नरों को समाज की सहानुभूति से ज्यादा सहमति और स्वीकृति की जरूरत है, उपेक्षा या उपहास की नहीं। यह कोई समस्या नहीं है पर समाज में इसे एक अप्राकृतिक संबंध मानकर और दबा छिपा कर समस्या बना दिया गया है । किन्नरों के प्रति अगर हमारा समाज सहानुभूति रख सकता है तो समलैंगिकों के प्रति क्यों नहीं ? कानून या समाज को यह हक उनसे छीनने का कोई कारण नहीं है। उन्हें भी एक आम नागरिक की तरह जीने का अधिकार है।

पुनश्च 


समलैंगिक संबंधों को अब अमेरिका के कई राज्यों में कानूनी स्वीकृति मिल चुकी है. सहजीवन बिताने वाली दो स्त्रियों को एक साथ एक परिवार की तरह देखा जाता है और उन्हें कानूनन बच्चे गोद लेकर परिवार बनाने का भी हक मिला है . पश्चिम  की एक कवियित्री एलेन बास अपने को घोषित  रूप से लेस्बियन कहती हैं। एक साक्षात्कार में उसने कहा – ‘‘ साहित्य ने मुझे औरतों के बीच रहने की इच्छा जगाई ! मेरी दिलचस्पी वह सब सुनने में थी जो इन लेखिकाओं ने औरतों की जिंदगी के बारे में वह कहा , जिसे पहले कभी कहा नहीं गया .’’
एक अन्य चर्चित कवियित्री म्यूरिअल रुकेस ने कहा – ‘‘ सोचो , क्या होगा अगर एक औरत अपनी जिंदगी का सच बयान करने लगे , पूरी दुनिया में हड़कंप मच जाएगा ! यह दुनिया खुल कर बिखर जाएगी ! द वर्ल्ड  वुड स्प्ल्टि ओपन ! ’’
एलेन बास की एक चर्चित प्रशंसित  कविता का अनुवाद प्रस्तुत है –

‘‘ जिन्दगी तो प्यार मांगती है तब भी
जब आपके पास देने को कुछ बचा न हो
जो कुछ था , वह जले कागज की तरह
भुरभुराकर गिर जाए उंगलियों से 
उसके धुंए से आपका गला रुंध जाए
और तपन से हवा भारी हो गई हो
दुख घना होकर भीतर पसरा हो
और उस दुख का वजन 
आपके अपने वजन से ज्यादा हो 
आप सोचने पर मजबूर हो जाएं
कि अब इसे उठायें तो कैसे……
तब आप अपनी कमजोर हथेलियों में
अपने फीके मुरझाये चेहरे की तरह 
थाम लेते हैं जिन्दगी को 
चेहरे पर मुस्कान और आंखों में चमक भले न हो ,
पर आप कहते हैं – आओ मेरे पास
हां, जिन्दगी ! मैं फिर से तुम्हें प्यार करूं ! ’’ ’    

” but to love life, to love it even
when you have no stomach for it
and everything you’ve held dear
crumbles like burnt paper in your hands,
your throat filled with the silt of it.
When grief sits with you, 
its tropical heat thickening the air, 
heavy as water
more fit for gills than lungs;
when grief weights you like your own flesh
only more of it, an obesity of grief,
you think, How can a body withstand this?
Then you hold life like a face
between your palms, a plain face,
no charming smile, no violet eyes,
and you say, yes, I will take you
I will love you, again.” 
                                                   ― Ellen Bass

ज्वलंत स्त्री-समस्या पर कविताई

रवींद्र कुमार पाठक


युवा आलोचक रवींद्र कुमार पाठक जी. एल .ए कॉलेज , डाल्टेनगंज (झारखंड )के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. संपर्क :09801091682

( आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के  बहुपठित उपन्यास  ‘ बाणभट्ट की आत्मकथा’ का स्त्रीवादी पुनर्पाठ कर रहे हैं रवींद्र कुमार पाठक ) 
द्विवेदी जी का प्रथम और यशस्वी  उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ उनके बहुविध द्वंद्वों का भी प्रमाण है और अक्सर पुरानी मूल्य-व्यवस्था की ओर ढरक जाने का परिणाम भी (खासकर स्त्री के संदर्भ में)। यह बात शत-प्रतिशत सही है कि ‘सारी कथा में स्त्री-महिमा का बड़ा तर्कपूर्ण और जोरदार समर्थन है’ परंतु यह बात भूलने की नहीं है कि ‘महिमा’ का अभियान दर्शन के भाववाद से निकलता और उसी में अवसित होता है, जबकि स्त्री की समस्याएँ ठोस हैं, ज्वलंत हैं; जो यथार्थ अनुभूति की माँग करती हैं। उपन्यास में प्रतिष्ठित होनेवाली नारी ‘तत्त्व नारी’ है, न कि वास्तविक हाड़-मांस की इंसान। नारी-शरीर को देवमंदिर की तरह पवित्र मानने वाला, नारी-महिमा का जानकार बाणभट्ट नारी-सामान्य की कुछ समस्याओं व पीड़ाओं का साक्षी रहकर भी अक्सर कविता की दुनिया में बहक जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानवतावादी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को भी इस समाज-संरचना या स्त्री के प्रति व्यक्तिगत या सामाजिक व्यवहारों में निहित बदसूरती, अनीति या क्रूरता दिखलाई ही नहीं पड़ती , जो आज तक एक स्वतंत्र, स्वस्थ और खशहाल इन्सान के रूप में किसी स्त्री का जीना मुहाल किये रही है ।

 सच है कि उनके लिए घर में बहुविध पीड़ित, घुटती नारी और बाहर अपहृत होती, बिकती यौन हिंसा की भेंट चढ़ती सामंतों की भोग्या बनती या मंदिरों में धर्म के नाम पर यौन-बलि चढ़ती (देवदासी) अथवा वेश्या बनी देह-दलन कराने को मजबूर स्त्री कोई ज्वलंत समस्या है ही नहीं। पुरुष के बहुपत्नीवाद की शिकार बनी, बाल/अनमेल विवाह के कसाईघर में ठेली गई, यौनशोषण को झेलती, अवांछित गर्भ ढोने को विवश नारी, भुखमरी की शिकार या परजीवी बनी नारी, विधवा बताई/बनाई गई नारी का भीषण एकांत, आम स्त्री की अशिक्षा आदि कोई समस्या ही नहीं है उनके रचनाकार के लिए। इससे भी बड़ी सच्चाई है कि सामास ढंग से वे स्त्री-प्रश्नों, स्त्री-समस्याओं को उठाते ही नहीं – इसी का प्रमाण है कि विचारक के रूप में (निबंधों में) उन्होंने कहीं इन सवालों को छुआ तक नहीं। जो कुछ छुआ या उनसे उठा – वह उनके रचनात्मक (उपन्यास) साहित्य में, संस्कृति-दर्शन-अध्यात्म या कवित्व की सूक्ष्म जीवन पर। कथा साहित्य में स्त्री या समस्याग्रस्त स्त्री का आ जाना तो लेखक के लिए अनिवार्य विवशता हो सकती है, क्योंकि जीवन-कथा बिना औरत (या मर्द) के संभव ही कहाँ है ? पर, विचारक के रूप में उन्होंने आम स्त्री के दर्द, पराधीनता आदि को तनिक भी महसूस न किया, उलटे उन्हें ध्यान आया कि स्त्री को सच्चरित्र होना चाहिए, ताकि परिवार बचे, सुंदर बने। ‘धार्मिक एवं सच्चरित्र नारी कुटुंब की शोभा है’ शीर्षक अपने सम्भवत: एकमात्र नारी-विषयक निबंध में द्विवेदी जी पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं का बोझ स्त्री के कंधों और सिर पर डालने को बेताब दिखते हैं। उनका स्पष्ट विचार है कि स्त्री यदि धर्म द्वारा प्रतिपादित आदर्शों या मर्यादा से बाहर चली जाए तो परिवार छिन्न-विच्छिन्न हो जाएगा। धर्म, मर्यादा या चरित्र से उनका आशय, किसी आधुनिक लोकतांत्रिक विवेक के सापेक्ष नहीं, बल्कि मनु, कालिदास, तुलसी या महाभारत के जरिये छनकर आ रही पुरानी मूल्य-संरचना के तहत है, जिसमें स्त्री को अच्छी गृहिणी, व्रतोपवास करनेवाली, पतिव्रता आदि बनने की एकमुखी सीख दी गई है । लेख को पूरा करते-करते द्विवेदी जी ने यह पुनीत इच्छा भी जाहिर कर दी कि ऐसी गृहलक्ष्मियों को संभव बनाने के लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।

स्त्री के योद्धा बनने पर अघोषित प्रतिबन्ध बनाम ‘चरित्र’ के प्रतीकीकरण की राह :


‘आत्मकथा’ में सभ्यता में अशांति पर महामाया के दार्शनिक प्रवचन के बीच भट्टिनी का तर्कसंगत व्यवधान आया – ‘तो माता, क्या स्त्रियाँ सेना में भरती होने लगे या राजगद्दी पाने लगे, तो यह अशांति दूर हो जाएगी?’ (ग्यारहवाँ उच्छ्वास) – भट्टिनी के इस सही सवाल पर द्विवेदी जी की तरफ से महामाया ने उसे गुमराह करना चाहा, यह कहकर ‘‘सरला है तू, मैं दूसरी बात कह रही थी। मैं पिंड नारी को कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु नहीं मानती।’’ जहाँ सीधा जवाब ‘हाँ’ में होना चाहिए था, वहाँ महामाया गोल-मटोल जवाब दे रही हैं, इसलिए क्योंकि ‘आजाद हिंद फौज में स्त्री के सैनिक बनने’ के युग में भी ये पंक्तियाँ लिख रहे आचार्य द्विवेदी के अंदर यह साहस शायद न था कि स्त्री को सैनिक या शासक रूप में स्वीकारें। महामाया स्त्री के सैनिक बनने के सवाल पर पिंड नारी को कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु न मानने की बात कहती है, परंतु कान्यकुब्ज की प्रजा के नाम उनका वीरोचित आह्वान – जो पर्याप्त जनतांत्रिक व सामंतवाद-विरोधी था – वह किसे था ? पिंड नरों को ही। अमृत के पुत्रों को था संबोधन। वे उन्हें कह रही थीं न्याय, सत्य, धर्म की रक्षा करने के लिए। उसके लिए बलिदान माँग रही थीं वे। किसका ? पुत्रों का। उनका कहना था कि धर्म के लिए प्राण देना किसी जाति का पेशा नहीं है, मनुष्य मात्र का उत्तम लक्ष्य है। पर, उनका ध्यान अपने ही इस वक्तव्य में निहित इस विसंगति की ओर न गया कि ‘मनुष्य’ के अर्थ में वे स्त्री को नहीं समेट पा रही हैं, क्योंकि संबोधन ‘अमृत पुत्रों’ को है । धर्म की रक्षा करना किसी जाति-विशेष का पेशा न मानकर भी महामाया उसे पुरुष जाति का पेशा बना दे रही हैं। आह्वान को और जोशीला बनाने के लिए वे जो भाषा की लाक्षणिकता तलाशती हैं, वह मर्दानगी का घिसा-पिटा टोन है – ‘‘उत्तरापथ के लाख-लाख नौजवानों ने क्या कंकण-वलय धारण किया है ?’’ – यह स्त्री जाति पर दुहरा अन्याय है। एक तरफ कंकण-वलय या चूड़ियाँ पहना कर निस्पंद कर देना; ऊपर से उस स्थिति में भी स्त्री जाति को चैन से न रहने देना – उनकी बनाई गई स्थिति का गाली के रूप में इस्तेमाल करके यानी ‘नालायकी’ का प्रतीक चूड़ी पहनने को बना के। ‘अष्टादश’ उच्छ्वास में महामाया की शिष्याएँ उनकी भावना का और भी विस्तार करती हैं। वे भी अमृत के पुत्रों, तरुणों का आह्वान करती हैं सैनिक बनने का, ताकि कुलवधुओं का सुहाग बचे, बालिकाओं की लाज बचे, बहनों का लाज बचे। बचाने का काम करना है मर्दों को और औरतों का काम है सिर्फ कुलवधू बनकर वीरमर्दों की ओर आँसू भरे नैनों से ताकना, माता बनकर ताकना ।

महामाया के जरिये, द्विवेदी जी स्त्री को आत्मरक्षा के लिए भी जगाने की जरूरत नहीं महसूस कर पा रहे हैं। स्त्री स्वयं अपना बचाव करे – ‘कुलवधुता’, ‘सुहाग’ या ‘लाज’ जैसे थोपे गए मर्द-मूल्यों के लिए नहीं लड़े, वरन् इन्हें झटककर फेंक दे और लड़े अपनी जान के लिए, अपने को यौन-हिंसा से बचाने के लिए, अपने व्यक्तिगत सम्मान के लिए। लड़े अपनी गरदन बचाने को, न कि किसी पुरुष की नाक बचाने को। पर, किसी उद्देश्य से भी उसे लड़ने की जगह सिर्फ वीर पुरुषों की ओर टुकुर-टुकुर ताकने को उसे विवश करने के कारण ही लेखक की स्त्री-दृष्टि आधुनिकता से काफी पीछे है। द्विवेदी जी महिलाओं को पुरुषों के रहमोकरम पर ही छोड़ना चाहते हैं, यह भूलकर कि इंसान को सुरक्षित नहीं किया जा सकता, बल्कि उसे स्वरक्षित होना पड़ता है। पुरुषों की पुलिस-व्यवस्था पर अखंड विश्वासी लेखक मानो महिला थाना को गैर-जरूरी मानते हैं। काश! वे सोच पाते कि पुरुषमय पुलिस व सेना ने अब तक महिलाओं की कैसी रक्षा की है, उन्हें यौनग्रास बनाने में कब परहेज किया है ? क्या यह आलोच्य काल का सच न रहा होगा ? स्त्री के आत्मरक्षार्थ परजीवी बनने की जो लक्ष्मणरेखा द्विवेदी जी ने अपने पहले ही उपन्यास में खींच दी थी, उसी पर लगभग अंत तक कायम रहे। मौलिक अन्वेषक होकर भी इतिहास के कई दौरों को वे भूल गए, अपना समकालीन यथार्थ भी ‘आजाद हिंद फौज’ वाला। लगता है कि उनके लिए इतिहास महत्त्वपूर्ण भी कहाँ है? महत्त्वपूर्ण तो है मिथक, जिसकी रचना अपनी रुचि के घालमेल से वे करते हैं।

द्विवेदी जी की नायिकाएँ निजताहीन स्त्रियाँ होती हैं; चाहे भट्टिनी हो या चंद्रलेखा, मृणाल। यदि शुरु से वे ऐसी न हों तो आगे चलकर लेखक उनका ऐसा रूपांतरण कर डालता है कि वे इंसान नहीं, प्रतीक यानी गढ़े गए आदर्शों की प्रतिमूर्ति भर रह जाती हैं। फिर वे आदर्श भी विसंगत मूल्य दृष्टि की देन होते हैं – स्त्री को दोयम दर्जे पर रखकर गढ़े गए आदर्श । यही कारण है कि वे निउनिया जैसी जीवंत, गतिशील व विद्रोही-ऊर्जावती स्त्री को अपने उपन्यास में नायिका का पद नहीं देते; फिर धीरे-धीरे उसके विद्रोह को उसकी अधीरता और उसके सत्य दर्शन को प्रलाप सा ठहराते-ठहराते उसे कमजोर करते जाते हैं। उपन्यास के अंत में उसे बलि ही चढ़ा डालते हैं।

निउनिया :  त्रिकाल-भेदी अनुत्तरित प्रश्न
निउनिया ने जो दो दाहक सवाल किए हैं – (1) क्या स्त्री होना ही मेरे सारे अनर्थों की जड़ नहीं है? (2) क्या छोटा सत्य बड़े सत्य का विरोधी होता है ? – ये दोनों उसके व्यक्तिगत सवाल भर नहीं हैं, हर्षयुग के युगप्रश्न हैं। निउनिया की हृदयाग्नि से निकले ये प्रश्न उससे भी आगे बढ़कर त्रिकालभेदी हैं – युग-युग से पूछे गए, युग-युग के प्रश्न। पर, अनुत्तरित। छोटा सत्य अक्सर इस विसंगतिपूर्ण व्यवस्था में बड़े सत्य का विरोधी बनाकर पेश किया जाता है। समाज-संस्कृति या राष्ट्र की रक्षा के नाम पर अक्सर स्त्री-पीड़ा/घरेलू हिंसा के सवालों को चुप करा दिया जाता है – स्त्री-मुक्ति की माँग अक्सर राष्ट्रीय स्वाधीनता की लड़ाई दिखाकर स्थगित कर दी जाती है। यह सोचा तक नहीं जाता कि पचास प्रतिशत जनसंख्या के योगक्षेम को, उसकी पीड़ा/गुलामी को नजरअंदाज कर जो राष्ट्र खड़ा होगा/हुआ है, वह किसका है, किसके हित में ? ऐसी संस्कृति की चिंदी उड़ा डालना चाहती है निउनिया जो आधी आबादी के खून से रंगोली रच रही हो स्त्री के प्रति अन्यायकारी भारतीय समाज राजव्यवस्था को विनष्ट होने का शाप वह देती है –  ‘‘किस अपराध पर कान्यकुब्ज का लंपट शरण्य राजा मुझे फाँसी देना चाहता है?…मेरी जैसी असहाय अबलाओं को दंड देने वाला उसका कठोर भुजदंड क्या म्लेच्छवाहिनी से अपनी प्रजाओं को नहीं बचा सकता?…आर्यावर्त्त के समाज के मूल में घुन लगा गया है, उसे महानाश से कोई नहीं बचा सकता।’’ (‘षोडश उच्द्वास’)। पर, उसकी उत्तेजना को लगाम बाँधने को व्याकुल बाण व भट्टिनी के वार्तालाप में आ रहा पितृसत्तावादी दर्शन निर्णायक हो उठता है – ‘‘बंधन ही सौंदर्य है, आत्म-दमन ही सुरुचि है, बाधाएँ ही माधुर्य हैं। नहीं तो यह जीवन व्यर्थ का बोझ हो जाता। वास्तविकताएँ नग्न रूप में प्रकट होकर कुत्सित बन जाती हैं।…भारतीय समाज ने बंधन को सत्य मानकर संसार को बहुत बड़ी चीज दी है।’’ (‘अष्टादश उच्छ्वास’)  पर, इसके समानांतर यह सवाल न खड़ा किया गया कि किस पर बंधन ? सिर्फ स्त्री के सहजाधिकार पर ? या उस लंपट मर्दानगी पर भी जिन्हें द्विवेदी जी ‘प्राचीन भारत के रईस’ का खिताब देते हैं।

(पुनश्च’ संग्रह में ‘प्राचीन भारत के रईस’ शीर्षक से ह.प्र. द्विवेदी का एक निबंध भी है) । उनकी लंपट-शरण्यता पर भी कोई बंधन है, जो स्त्री की शारीरिक-आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर अथवा उन्हें शारीरिक-आर्थिक रूप से मजबूर कर, अपहरण/क्रय या ब्याह द्वारा परिचारिकाओं (यौनदासी) या रानियों की शक्ल में, बहुरंगी तितलियों के रूप में अपने चारों ओर दिन-रात मँडराने एवं भीनी-भीनी खुशबू बिखेरने को नियुक्त करते हैं। उनकी इस अमानवीयता को उनके शौक के रूप में तथा नारियों के उक्त यातनाघर को कमनीय स्वर्ग के रूप में ढालकर द्विवेदी जी जब ‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’ लिखने लगते हैं, तब उससे बड़ी विसंगति क्या होगी ?
नारी-सौंदर्य बनाम स्त्री को ‘सुंदर देह’ रूप में ढाल देने का प्रोजेक्ट :
आचार्य द्विवेदी ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ सहित अपने विशाल लेखन में स्त्री के सौंदर्य का इतना और इस कदर बखान करते हैं कि लगता है, ‘सौंदर्य’ को वे स्त्री के लिए एक मूल्य की तरह प्रतिष्ठित कर रहे हैं। केवल वर्णन या व्यंजना की बात नहीं, बल्कि उनकी मुखर घोषणा है (बाण के जरिये) कि ‘‘मैं नारी-सौंदर्य को संसार की सबसे अधिक प्रभावोत्पादिनी शक्ति मानता रहा हूँ।’’ (सप्तम उच्छ्वास) ऐसी कोई घोषणा पुरुष के बारे में उनकी नहीं है, न ही पुरुष के सौंदर्य-वर्णन में उनकी मनोवृत्ति इतनी रमती है, जितनी नारी के सौंदर्य-वर्णन में। यद्यपि इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे मानसिक सौंदर्य की सत्ता भी स्वीकारते हैं और एकाधिक निबन्धों में उनका यह विश्वास भी प्रकट हुआ है कि मानसिक सुंदरता या सौमनस्य ही, दैहिक सौंदर्य के रूप में प्रकट होता है; तथापि उनके द्वारा कृत स्त्री के सौंदर्य-वर्णन में उसका शारीरिक धरातल सर्वाधिक मुखर है। स्त्री में सौंदर्य देखने की बीमारी ने उन्हें इस बुरी तरह जकड़ रखा है कि चाहे किसी स्तर, उम्र या किसी भी स्थिति में पड़ी स्त्री हो, उसमें सौंदर्य जरूर खोजते हैं। रानी से नौकरानी तक, कुलवधू से वारवधू तक, माँ से बच्ची तक, गृहिणी से संन्यासिनी तक कोई उनकी सौंदर्यग्रासी दृष्टि से बच न पाई है। वे मानो अवसर खोजते रहते हैं कि कब स्त्री की सुंदरता बखानने को मिले। उसकी प्रसन्नता ही नहीं, दुख में भी उनकी लेखनी अकुलाती रहती है – रोग-शोक में भी वह वही खोजती है। विश्व-सर्जिका चेतना का भी वे भुवनमोहिनी त्रिपुरसुंदरी रूप में साक्षात्कार करते हैं। प्राकृतिक चित्रण को भी स्त्री-सौंदर्य की भाषा में ढालना उनकी प्रिय शैली है। दिशाएँ उन्हें वधुएँ लगती हैं तो सरोवर का पानी इतना सुगंधित कि वनदेवियों के उसमें स्नान से उनके पुष्पराग घुलने की कल्पना कर बैठते हैं।

 स्त्री और पुरुष से जुड़े वर्णनों में क्रमशः गुणों व भाषा की कोमलता व कठोरता का इस्तेमाल उनका तरीका रहा है। स्त्री के देहगत सौंदर्य में वे रूप के साथ स्वर को भी महत्त्व देते हैं। ‘अष्टादश उच्छ्वास’ में महामाया की शिष्याओं के आह्वानमय गान के शक्तिशाली, अद्भुत प्रभाव के कारण रूप में वे नारी-कंठ को पाते हैं, जिससे उन्हें लगता है कि अब आर्यावर्त सुरक्षित हो गया। द्विवेदी जी को बाणभट्ट के मुँह से जब ‘त्रयोदश उच्छ्वास’ में यह बोलते सुनते हैं – ‘‘नारी-देह वह स्पर्शमणि है, जो प्रत्येक ईंट-पत्थर को सोना बना देती है’’ – तो समझना मुश्किल नहीं रह जाता कि स्त्री की दैहिकता को हाईलाइट करने में वे कितने आगे हैं।

पुरुषों की इस दुनिया के मनोरंजन, हित-चिंतन की देन हैं ये, जो स्त्री को सुंदर मानकर, उसे दैहिक-क्षमता, प्रतिभा-विकास से जबरन विलग कर, उसे एकमात्र ‘सुंदर’ बनने को मजबूर कर अपना उल्लू सीधा करती है। ‘नारी-सौंदर्य’ का यह सारा बखेड़ा पुरुषों के सुख के लिए, पुरुषों के द्वारा पुरुषों का है, ताकि देह की परिधि से बाहर निकलकर वह व्यक्ति न बन जाए – वह इस पुरुष-सभ्यता में उत्प्रेरक या साधन बनकर रहे, कहीं कर्ता न बन जाए। इस प्रकार से नारी को साधन बनाना, इस प्रकार से उसका उपयोग बाण व द्विवेदी जी को कितना ही स्पृहणीय हो, पर यह स्त्री के प्रति घोर अन्यायी और सबके लिए अस्वास्थ्यकर है। चारुस्मिता व विद्युदपांगा की नृत्यकला का उपयोग, जिस प्रकार (बकौल धावक) कान्यकुब्ज की विद्रोही जनता को मदिरा पिलाने के अर्थ हो रहा था, उसी का दूसरा परिष्कृत रूप है उक्त उपयोग। नारी का उपयोग चाहे हर्षयुगीन सामंतों द्वारा रीतिकालीन विलास-वीथियाँ सजाने में से अथवा पूँजीवादी बाजार की मॉडलिंग या सौंदर्य-प्रतियोगिताओं या एयरहोस्टेस, सेल्सगर्ल, रिशेप्शनिस्ट आदि रूपों में हो; देवदासी या तंत्र-साधना का उपकरण बनाने में हो, ऋषियों की तपस्या भंग करने में हो अथवा बहुत पुनीत रूप में गृहलक्ष्मी/माँ भर में उसे सिमटा देने के रूप में – सबके सब स्त्री को व्यक्ति न मानने और सहज नैसर्गिक जीवन जीने के उसके अधिकार से वंचित कर उसे ‘सुंदर देह’ रूप में जबरन ढाल देने के प्रोजेक्ट के ही अलग-अलग रूप हैं। ये सब स्त्री-देह को कच्चे चबा डालने को आतुर यौन हिंसकों या यौन ग्रासकों द्वारा उसे वासना-वेदी पर बलिदान करने (वेश्या बनाने) के ही कुछ परिष्कृत चेहरे हैं। ‘स्त्री-सौंदर्य’ के कल्पक द्विवेदी जी इस तथ्य को समझना ही नहीं चाहते कि स्त्री को ‘सुंदर’ देखने का उनका सर्वव्यापी आग्रह कितना स्त्रीघातक है – एक दीर्घकालीन सांस्कृतिक अत्याचार, जो स्त्री पर वाल्मीकि-व्यास-कालिदास-युग से लगातार होते आ रहा है, उसी का हिस्सा है वह। सौंदर्य के ये प्रतिमान, जिनमें वे नारी को कैद करते हैं, उसकी सहजेच्छा या आत्मनिर्भरता के प्रयत्नों (योग-कसरत, खेलकूद, बॉक्सिंग-फाइटिंग आदि शरीर पुष्टिकारी क्रियाओं एवं शिक्षा नौकरी, प्रतिभा के अनंत क्षेत्रों) से उसे बचाकर, विशेष चाल-ढाल-अदा-मुस्कान, दैहिक तराश (क्षीण कटि, नाजुक, छरहरी आदि रूपों में) के साथ बोझिल वस्त्राभरणों से उसे सन्त्रस्त कर, नारकीय यातनाओं में उसे डाल कर पुरुषों का स्वर्ग रचा जाता रहा है।
बाणभट्ट अपने छुटपन से ही स्त्री का जो सम्मान करता है, उस पर की गई अननुकूल टीकाओं को सहन नहीं कर सकता – वह थोथा मनुवादी सम्मान है, जो स्त्री को देवीत्व मातृत्व आदि की हवा से फुला कर उसके यथार्थ की दारुण धरती से उड़ा देता है – सम्मान या महिमागान के सम्मोहन में उसे विषम विवाह, पातिव्रत्य या घरेलूपन का सीकड़ पहना देता है तथा उसकी कड़ियों की झनझनाहट में जीवन-संगीत का भ्रम पैदा करता है।

पितृसत्ता के साथ स्वर्गाभियान और काव्यवाणी का उपयोग :
पितृसत्तात्मक समाज के ‘पौरुष दर्प’ (लेखक ने ठीक शब्द चुना) में नारी-देह की छीना-झपटी, अपहरण, बिक्री, उपहार, दान (जैसे-कन्यादान) के बहुविध कांड चलते रहे हैं। म्लेच्छों के समाज की समता, जिसका गुणगान भट्टिनी करती है, वहाँ भी नर-नारी समता नहीं है, बल्कि सारे नर आपस में समान हैं और सारी नारियाँ आपस में समान हैं, पर नर-नारी आपस में समान नहीं है, अन्यथा कुलवधुओं और बालिकाओं का घर्षण ही उनका विलास न होता। अतएव, वह समत्व अपूर्ण है – ‘पुरुषवादी समता’ इसे कह सकते हैं। (यही समता लोरिकदेव के आभीरों में भी है।) वह समता अधूरी है, पर है तो। भारतीय समाज में तो वह भी नहीं है। इसी से बाणभट्ट का यह सोचना बिलकुल ठीक है, म्लेच्छों के समाज में स्वर्ग बनाना आसान है, पर भारतीय समाज में स्वर्ग बनाना कठिन है। वहाँ स्वर्ग बनाने के लिए थोड़ा-सा सुधार करना होगा, क्योंकि बाकी पूर्व तैयारी हो चुकी है, पर भारतीय समाज में क्या है शास्त्रीय बड़बोलेपन के सिवा, साधनात्मक विसंगतियों के सिवा? आध्यात्मिक समता के पाखंड के सिवा ? इसी पाखंड की छाया में हजारों-हजार जातियाँ तथा स्त्रियों को एक ही साथ कुलवधू और वेश्या बनाने का प्रोग्राम बाखूबी चलते रहता है; दोनों रूपों में नारी दलित ही होती है। इस पर न महामाया ने कुछ सोचा, न उन्हें अधूरी कहने वाली भट्टिनी ने। एक को म्लेच्छ और आर्य के भेद से फुरसत नहीं, जिसमें (भयंकर सामाजिक विषमता से बने) इस देश को बचाने के लिए म्लेच्छों को एकमुश्त मिटा देने का जोश है, दूसरी में ‘ऊँची भारतीय साधना’ के झूठ का सम्मोहन। महामाया का तरीका तो अधूरा सच होकर भी सार्थक है, क्योंकि कम से कम सामंतवादी भेदभावमूलक व्यवस्था और उसके स्त्री-घाती भीषण चेहरे का पर्दाफाश करता है । पर, ऊँची भारतीय साधना उन तथाकथित म्लेच्छों तक पहुँचाने और निकृष्ट सामाजिक जटिलता भारतीय समाज से हटाने का भट्टिनी का प्रस्तावित तरीका तो उससे भी आधी समझ पर आधारित होने के साथ और भी अव्यावहारिक है।

उपन्यास की लगभग समाप्ति पर वह बाण के साथ अपने इस प्रयोग के लिए तैयार दिख रही है।  स्वर्ग बनाने की इस परियोजना की कल्पना करते द्विवेदी जी यदि ‘क्या कभी यह भी संभव है कि मानव-समाज में राज्य न हों, सैन्य-संगठन न हों, संपत्ति-मोह न हो ?’ (‘अष्टम उच्छ्वास’) जैसी चिंता करने की बजाय यह चिंता करते कि ‘कैसे संभव हो कि इंसानी समाज में पितृसत्ता न हो ?’ तो पूरी संभावना होती कि ऐसा सचमुच का स्वर्ग बनता, जिसमें बूढ़े इंद्रों के लिए अप्सराएँ न होतीं – नर-नारी बिलकुल समान होते। जब तक अप्सरा-विहीन यह स्वर्ग न बनेगा, तब तक निउनिया का पूछा त्रिकाल-त्रिलोकभेदी यह  प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा – ‘क्या स्त्री होना ही मेरे सारे अनर्थों की जड़ नहीं है ?’ यह प्रश्न तब तक अनुत्तरित रहेगा, जब तक कुमार कृष्णवर्धन के घर सिर्फ पुत्र-जन्मोत्सव मनता रहेगा और उसमें नारियाँ सिर्फ जुलूस की शोभा के लिए पुरुषों से भी अधिक संख्या में होती रहेंगी। या, प्रत्यंत दस्युओं के आने की खबर पत्रा से सिर्फ ‘भाइयों’ को देते भर्वुशर्मा इस धरा पर होते रहेंगे। या, पुरुष शास्त्रों व इतिहास को तपस्या/धर्म की व्यवस्थाओं के लिए नारियाँ विघ्नस्वरूप प्रतीत होती रहेंगी। यह प्रश्न तब तक भी अनुत्तरित रहेगा जब तक (स्त्रियों को मर्दों की भोग-कारा में कैद किये रखने वाले ) ‘कंचुकी धर्म’ का पवित्र निष्ठा से पालन करने वाले वाभ्रव्य जैसे वृद्ध भद्रपुरुष रहेंगे। साथ ही तब तक अनुत्तरित रहेगा यह प्रश्न, जब तक पुरुष का सत्य और होगा, स्त्री का सत्य कुछ और।
पुरुष का सत्य और , स्त्री का सत्य और ?
‘पुरुष का सत्य और है, स्त्री का सत्य और’ – इस आशय का महामाया का प्रतिपादन साधना-क्षेत्र में होकर भी, बृहत्तर सांस्कृतिक आशयों का मूल है। इसी दृष्टिकोण ने सच मे नारीवाद या स्त्री-विमर्श को खड़ा किया है। अब तक ज्ञान के, समाज-रचना या व्यवस्था के तमाम क्षेत्र पुरुष के सत्य से खड़े किए गए हैं। चूँकि स्त्री का सत्य और कुछ है – इसी से स्पष्ट हुआ कि अब तक का तमाम ज्ञान या सभ्यता- विकास/संरचना सिर्फ आधी दृष्टि के अनुकूल है, कारण आधी आबादी (स्त्री) का उसमें सहयोग नहीं। स्त्री-दृष्टि से विश्व दृष्टि अलग होगी, इसलिए ‘स्त्री विमर्श’ खड़ा होना निहायत जरूरी है। फिर, स्त्री-विमर्श का कार्य है – ‘पुरुष-सत्य और स्त्री-सत्य और’ –  की भेदकारी जेंडरवादी संरचना की छानबीन करना, जिसके तहत स्त्री को हर बात में, हर जीवन-क्षेत्र में, हर अधिकार-कर्तव्य, सिद्धि या कर्म क्षेत्र में, यहाँ तक कि शारीरिक व्यवहार व वस्त्रादि-चयन (सौंदर्य बोध) तक में पुरुष से भिन्न बना रखा है। स्त्री को दोयम दर्जे का शिकार बनाने में ‘पुरुष का सत्य और, स्त्री का सत्य और’ की महामायावी समझ ने ही योगदान दिया है। यही पितृसत्ता का मूल सूत्र है। इसी ने नारीत्व, नारी-मनोविज्ञान जैसे मिथकों को बढ़ाने के साथ नारी को इंसानियत से बहिष्कृत कर रखा है – उसे कुछ खास बनाकर – विलक्षण या कुलक्षण ठहरा कर। इसके रहते निउनिया का पूर्वोक्त प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा। सच कहें तो यह अनुत्तरण तब तक कायम रहेगा जब ‘कथामुख’ की दीदी को आधुनिक (यूरोपीय) स्त्री वर्ग की प्रवक्त्री बनाकर यह कहलाया जाता रहेगा कि स्त्रियाँ चाहें भी तो आलस्यहीन होकर काम नहीं कर सकतीं, क्योंकि समाज की पराधीनता चाहे कम हो जाए, पर प्रकृति की पराधीनता तो हटाई नहीं जा सकती। स्पष्ट होना चाहिए कि प्राकृतिक पराधीनता का आशय लज्जादि भाव हैं तो उनकी प्राकृतिकता पीछे खंडित हो चुकी है ओर यदि उसका आशय स्त्री के मासिक चक्र-गर्भधारण बाध्यता आदि है, तो विज्ञान के बढ़ते हाथ इस प्राकृतिक पराधीनता से स्त्री को अधिकाधिक मुक्त करने जा रहे हैं।

लेखक द्वारा ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ के एकमात्र स्पंदनशील पूर्ण नारी-चरित्र निउनिया का, प्रायोजित तरीके से आत्मदान के पर्दे के पीछे, अंत कर दिया जाता है। भेदभावमय निर्घृण समाज राज्य व धर्म व्यवस्था का वह सर्वाधिक अनुभवी ‘नारी-चरित्र’ है, जो लोक व शासन के किसी दबाव से मुक्त रहकर निर्णय लेने की अपार क्षमता व कर्मठता से युक्त आत्मनिर्भर इंसान है। वह इस व्यवस्था के क्रूर दाहक संजाल की निदारुण भट्ठी में आजीवन जलती रही है, जिसे समझना नायक बाण या लेखक के वश या रुचि की बात नहीं। वह अपने विडंबित, संघर्षशील जीवन के जरिये नारी-जाति का प्रतिनिधित्व करती है और उसके खड़े किए गए सवाल थोड़ा सा भी सोचते ही पूरा ढाँचा हिला देने की ताकत रखते हैं। अपने अनुत्तरित सवालों को लिए ही वह मर या मार डाली जाती है। उसकी मौत भी एक भीषण सवाल बनकर आ खड़ी होती है, मानो सबसे चिल्ला-चिल्लाकर वह पूछ रही है कि स्त्री इस प्रकार समस्याग्रस्त क्यों है, जिसका एकमात्र समाधान मृत्यु है ? इस सन्दर्भ में सुदर्शन प्रियदर्शिनी की काव्य-पंक्ति स्मरणीय है –  ‘‘जब भी किसी औरत को मरते देखती हूँ तो मुक्ति का आभास होता है।’

द्विवेदी जी के रचना-संसार में स्त्री-संबंधी जो भी दहकते यथार्थपरक प्रश्न जगे हैं, वे अनायास से आ गए हैं, अन्यथा वे पूरे होशो-हवास में पितृसत्तात्मक संरचना के स्त्री घातक स्वरूप को बहुत ही कम प्रश्नांकित कर सके हैं; ज्यादा तात्त्विक स्त्री-प्रश्नों को ही वे उठाते हैं ? निउनिया के द्वारा अवश्य उन्होंने बेधक सवाल उठा दिए हैं, पर उनके साथ शेष पात्रों की कथा-संरचना कितनी सहयोगी बन पाई? महामाया के बागी आह्वान का लक्ष्मीभूत प्रजा-संगठन स्त्री का नहीं है, बल्कि ‘पिंजरे की मिठबोली मैना बनी रहे स्त्री और पुरुष उसे बचाते रहे’, ऐसा ही कुछ भाव है उनका। पिंजरा तोड़ने का आह्वान तो बिलकुल नहीं है। यह पिंजरा है घर का, विवाह व पातिव्रत्य का तथा स्त्री पर डाले गए ‘सौंदर्य’ का।

फिर भी, यह कहना उचित न होगा कि द्विवेदी जी जड़ पंडित मात्र हैं। वे युग और उससे ज्यादा अपनी परिस्थितियों के लिहाज से उस संक्रमणशील दोराहे पर खड़े थे, जहाँ नयी दृष्टि जुड़ रही थी, पर पुराने का मोह भी गया न था। उनमें द्वंद्वात्मक प्रक्रिया चल रही थी, भले घोषित तौर पर वे ‘द्वंद्वात्मकता’ या ‘विकासवाद’ में आस्थावान न रहे हों। उनके बाणभट्ट में रोमांतिक कवि और जीवन-योद्धा का तनाव सतत चला है। शास्त्र के प्रति मोह के साथ शास्त्र पर संशय भी उनमें बराबर रहा है। वे अपनी ही कृति में अपने ‘पंडित’ व्यक्तित्व के साथ उसके किसी प्रतिपक्ष की रचना अवश्य करते हैं, जो जड़शास्त्रीयता या वर्णभेदी-पितृ संरचना पर कहीं चिंतन करता है, कहीं उसका उपहास करता है तो कहीं उससे दो-दो हाथ करता है। अघोरभैरव, महामाया, निउनिया ही नहीं, किसी सीमा तक बाणभट्ट में भी उसी का विलोम है, क्योंकि वह उचितानुचित-विवेक की सामान्य धारा से हटकर चलता है। इसी स्थिति में उनके उपन्यासों में जीवन-दर्शन बन सकनेवाली सूक्तियाँ फूट पड़ती हैं। जैसे- ‘(सत्य के लिए) किसी से न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ (‘षष्ठ उच्छ्वास’)  इसके साथ अघोरभैरव की ही यह उक्ति मिला लें, ‘तेरे शास्त्र तुझे धोखा देते हैं। जो तेरे भीतर का सत्य है, उसे दबाने को कहते हैं; जो तेरे भीतर का मोहन है, उसे भूलने को कहते हैं; जिसे तू पूजता है, उसे छोड़ने को कहते हैं’ – तो असमानांतर साहसी सत्यशोधक दृष्टि मिल जाती है। आचार्य द्विवेदी का विचारक रूप (निबंधों या साहित्येतिहास में) शास्त्रीयता की सीमा रेखांकित कर उसकी अमानवीयता का उद्घाटन भी करता है (विशेषतः वर्ण-मजहब आदि के संदर्भ में); परंतु लिंगभेद (जेंडरवाद) के संदर्भ में (स्त्री प्रति तमाम सहानुभूति रखकर भी) वे पुरानेपन से स्वयं को बचा न पाए हैं। यही कारण है कि ‘पुनर्नवा’ में व्यवस्थाओं के निरंतर परिमार्जन व संस्करण द्वारा उनके नवीनीकरण को निहायत जरूरी बतलाकर भी, स्त्री के संदर्भ में उसमें शायद ही सुधार वे चाहते हों। इसी से उनका साहित्य अपनी तमाम सांस्कृतिक उच्चता, रचनाशीलता व अलौकिकता तथा मनुष्य की जययात्रा में विश्वास के बावजूद पितृसत्तात्मकता की प्रतिसंस्कृति न रच सका। इसी से पुरुष व प्रकृति अथवा ‘स्त्रीत्व’ व ‘पुंसत्व’ नामक दो कोटियों में विश्वासी उनके दार्शनिक भारतीय मानस में स्त्री व पुरुष को इंसानियत के सहज साथी (लाइफ पार्टनर) रूप में देखने की तमन्ना लगभग अनुपस्थित है। उसकी जगह देवता व दासी का द्वंद्व उनमें मिलता है, जिसे देवी-महिमा और नारी-सौंदर्य की विद्युत-कौंध व बरसात से भी भरमाया गया है। इसी से अघोरभैरव के मुख से वे यह भले कहला लें कि  ‘‘जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, आसक्त हो’’(‘षष्ठ उच्छ्वास’), लेकिन उनका साहित्य इस भेदभाव की दीवारों का रंग-रोगन करने में ज्यादा निरत है, उन्हें धक्का देने में बहुत कम ।

फारवर्ड प्रेस के बहुजन साहित्य वार्षिकी से साभार 
चित्रांकन लाल रत्नाकर 

माहवारी पर बात की झिझक हुई ख़त्म

नूतन यादव 



आज जब महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे पर हर राजनैतिक विचारधारा का विमर्श हमारे समक्ष मौजूद है हम माहवारी या मासिक धर्म के मुद्दे पर मुंह बंद किये बैठे हैं | माहवारी या मासिक धर्म एक ऐसा मुद्दा है, जिसपर परंपरावादियों से लेकर प्रगतिशील तक ,  किसी प्रकार के कदम या आन्दोलन करने से बचते हैं | सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि माहवारी पर पुरुषों का ये रवैया केवल भारत में ही नहीं कनाडा , जर्मनी जैसे देशों में भी उठता है और उसे चुपचाप दबा भी दिया जाता है |गत 28 मई को ‘Menstrual Hygiene day पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया | ये कार्यशाला  तीन गैर सरकारी संगठन ‘जागो गाँव’, ’स्ट्रगल फॉर जस्टिस’ तथा ‘परमार्थ चिंतन फाउंडेशन’ द्वारा आयोजित की गई थी , जिसके अंतर्गत माहवारी या मासिक धर्म से जुडी सामाजिक समस्याएं, मिथ, मासिक धर्म के चिकित्सीय पहलुओं आदि पर अलग अलग क्षेत्रों से आमन्त्रित वक्ताओं द्वारा अपने विचार प्रकट किये गए.|

प्रथम वक्ता प्रज्ञा थीं जिन्होंने दर्शकों को दो समूहों में विभाजित कर उनसे अलग अलग प्रश्नों  पर उनकी प्रतिक्रियाएं मांगी … माहवारी सुनते ही उनके मन में उठने वाला पहला शब्द कौन सा है जिसके जवाब में प्राकृतिक प्रक्रिया ,मौन ,जैविकीय प्रक्रिया जैसे शब्द सामने आये| इसके पश्चात उन्होंने दोनों समूहों से स्त्री की शारीरिक संरचना को रेखांकित कर उनके अंग विशेष को नाम देने को  कहा|  इसके पश्चात उन्होंने दोनों समूह द्वारा बनाये गए रेखाचित्रों की तुलना करते हुए दर्शकों को समझाया कि पुरुष स्त्री अंगों पर खुल कर बात करने में झिझकते हैं. ऐसे में समाज में पुरुषों को आगे बढ़ कर स्त्री की शारीरिक संरचना, उसकी माहवारी और अन्य अंगों सम्बन्धी विषयों पर बात करनी ही होगी, जिससे समाज में व्याप्त फुसफुसाहट का दौर ख़त्म हो और वैचारिक गांठे खुलें.

गुंजन कुमारी जो एक फिजियोथेरेपिस्ट हैं, ने माहवारी के मेडिकल आयाम प्रस्तुत करते हुए दर्शकों को माहवारी से जुड़े रोगों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी. गुंजन ने संतोष मेडिकल कॉलेज गाज़ियाबाद की 25 वर्ष से कम आयु की 200 छात्राओं के साथ एक केस स्टडी की  जिसके अंतर्गत  डिस्मेनरी  से पीड़ित लड़कियों से सम्बंधित डाटा प्रस्तुत किया गया था | डिस्मेनरी के अंतर्गत लड़की को अत्यधिक पीड़ा होती है कार्यशाला में इससे बचने के उपाय आदि पर चर्चा की गई |

जागो री की दिल्ली शाखा से जुडी प्रसिद्ध महिला एक्टिविस्ट शांति ने इस कार्यक्रम में अपने क्रांतिकारी विचारों से सबको अवगत कराया |शांति ने कोई डिग्री नहीं पाई लेकिन उनके अनुभव जिंदगी की सच्चाइयों से उपजे थे |उनका बीटा और वह माहवारी पर एक साथ कार्यशालाओं में जाते हैं और महिलाओं को इस विषय पर जागरूक करते हैं | शांति ने कहा कि जिस माहवारी के रक्त से पुरुष घिन करते हैं उनका जीवन माहवारी के इसी रक्त पर आधारित होता है| शांति ने ये भी बताया कि वे अनेक क्षेत्रों में कार्य कर चुकी हैं जैसे कॉर्पोरेट ,सरकारी क्षेत्र आदि लेकिन माहवारी के विषय पर अधिकतर पुरुष पिछड़ी या रूढीवादी मानसिकता के ही मिले हैं |    अभी हाल ही में माहवारी शीर्षक की अपनी कविता  से चर्चा में आई कवियत्री दामिनी यादव ने भी कार्यशाला अपनी इस कविता का पाठ किया |

“आज मेरी माहवारी का
दूसरा दिन है।
पैरों में चलने की ताक़त नहीं है,
जांघों में जैसे पत्थर की सिल भरी है।
पेट की अंतड़ियां
दर्द से खिंची हुई हैं।
इस दर्द से उठती रूलाई
जबड़ों की सख़्ती में भिंची हुई है,,….

एक अन्य वक्ता परी सैकिया ने भी अपनी बात रखी … परी एक मीडिया कर्मी हैं जो पूर्वोत्तर राज्य की निवासी हैं | उन्होंने बताया कि हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों में मासिक धर्म के आरंभ में एक उत्सव मनाया जाता है |किन्तु इसके बाद वही रुढ़िवादी और परंपरागत माहौल पैदा हो जाता है | ये बहुत कुछ ऐसा है जैसे हम किसी ख़ास दिन को मनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और बाद की समस्याओं से अपनी आँखें मूँद लेते हैं | परी ने बताया कि उनके घर में उनके पिता और भाई आरम्भ से उनके लिए सेनेटरी नैपकिन लाते रहे हैं जिस कारण उन्हें अपने घर में माहवारी पर बात करना असहज नहीं लगा |

नितीश के सिंह ने पुरुषों के योगदान और संचार के माध्यमों के बेहतर इस्तेमाल के ज़रिये माहवारी पर संकोच हटाने पर जोर दिया और माहवारी में प्रयोग किये जाने वाले सेनेटरी नैपकिन के अलावा टैम्पोंस और मेंसट्रुअल कप्स जैसे गैर पारंपरिक साधनों पर जानकारी दी. माहवारी में आम तौर पर सेनेटरी नैपकिन की जगह पुराना कपड़ा या कॉटन गौज जैसी चीज़ों का इस्तेमाल होता है लेकिन मोटे तौर पर देखें तो इनमें नैपकिन इस अवस्था में इस्तेमाल होने वाली सबसे प्रचलित वस्तु है, और इससे  वजह से इससे होने वाली बीमारियाँ भी सबसे अधिक. सेनेटरी नैपकिन का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव होता है गीलेपन से होने वाला संक्रमण. ये संक्रमण आगे चल कर तमाम अन्य बीमारियों को दावत देता है. हालाँकि बाजारवाद ने सेनेटरी नैपकिन्स के प्रचार द्वारा एक जागरूकता सी फैलाई ज़रूर है लेकिन ये नाकाफी लगती है. आज बाज़ार में माहवारी के दौरान इस्तेमाल होने वाले कई अन्य साधन उपलब्ध हैं जिनमें टैम्पोन और मेनस्ट्रुअल कप प्रमुख हैं. इनमें संक्रमण का खतरा सेनेटरी नैपकिन की अपेक्षा कहीं कम होता है. भारतीय बाज़ार में माहवारी से जुड़े स्वच्छता उपायों के प्रचार और प्रसार में सप्लाई और डिमांड का नियम तो काम करता ही है, साथ ही इन साधनों की कीमत में फर्क भी असर डालता है.

एक ऐसे समाज में माहवारी को नितांत गुप्त माना जाता है वहां इससे जुडी चीज़ें भी इसकी तरह बेकार मानी जाती हैं. ऐसे में बेहतर विकल्पों के प्रति जागरूकता ज़रूरी है. जहां अच्छे नैपकिन की कीमत 100 से 200 रूपए प्रति दस नग होती हैं, वहीँ साधारण क्वालिटी वाले टैम्पोन भी इसी कीमत में मिल जाते हैं. मेनस्ट्रुअल कप हालाँकि थोड़े महंगे ज़रूर होते हैं और 700 से 2500 रूपए के आस पास प्रति नग मिलते हैं लेकिन सबसे असरदार और री-यूज़ेबल होते हैं , जिसकी वजह से ये सबसे सस्ते साबित होते हैं. इनको अमूमन तीन से पांच साल तक प्रयोग किया जा सकता है, जिससे पैसे की बचत भी बहुत होती. इन मेनस्ट्रुअल कप की सबसे ख़ास बात ये है कि ये टैम्पोन और नैपकिन की अपेक्षा संक्रमण से बचाने में सबसे कारगर होते हैं.

अंत में प्रो सी पी सिंह और प्रो मोहंती ने  अपनी बात रखी  |  प्रो सी पी सिंह ने अपने एक  देशज मुहावरे से अपनी बात आरम्भ की | जो जितना पढुआ, ओ उतना भडुआ ……उनके अनुसार आप जितना अधिक अकादमिक ज्ञान प्राप्त करते है व्यावहारिक ज्ञान से उतना ही दूर होते  जाते हैं | प्रो मोहंती ने माहवारी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कार्यशाला आयोजित करने पर आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि स्त्री सशक्तिकरण के इस महत्वपूर्ण दौर में ऐसे विषयों पर खुल कर बात करना बहुत जरूरी है जिससे आने वाली पीढ़ी एक नए और जेंडर मुक्त समाज का निर्माण कर सके |

कार्यक्रम में महिलाओं और पुरुषों के साथ बच्चों की सहभागिता खास रही लेकिन इससे भी अधिक ख़ास  था माता पिता के साथ बच्चों का कार्यक्रम और वक्ताओं के बारे में बातचीत करना. ये अपने आप में  एक बहुत सकारात्मक बदलाव दिखा कि अभिभावक बच्चों को लाये और उनके साथ माहवारी के विषय पर बात करने में सहज दिखे. कई बच्चियां अपनी माँओं के साथ आई हुई थी उन्होंने पूरे समय तक रूककर वक्ताओं के विचारों को सुने . अगर आज की पीढ़ी इन विचारों को सुनेगी और समझेगी तो उम्मीद की किरण कायम रहेगी .. इस कार्यशाला में लाने के लिए उनके अभिभावकों को साधुवाद देना ही होगा .. यहाँ लाने का निर्णय उनकी खुली मानसिकता को दर्शाती है .स्पष्ट हैं कि वे अपने बच्चों से इस विषय पर बात करते होंगे और इस कार्यशाला के माध्यम से वे उनकी समझ और मानसिकता को और परिपक्व बनाना चाहते हैं | इस कार्यशाला के माध्यम से माहवारी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सारगर्भित  विचार सामने आये | आगे आने वाले समय में इस तरह की कार्यशालाओं से  इस मुद्दे पर एक  सकरात्मक माहौल अवश्य बनेगा