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डोंट यू नो, हंसना इज़ एन इन्वीटेशन टू रेप?

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियां और हिंदी कथा साहित्य: आख़िरी  क़िस्त 

( रोहिणी अग्रवाल का शोध -आलेख .  हिन्दी साहित्य में ‘ बलात्कृत स्त्री की पीड़ा ‘ की अभिव्यक्ति का उन्होंने ‘ स्त्रीवादी’ पाठ किया है . ) 

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कहना न होगा कि महिला कथाकारों का बलात्कार सम्बन्धी लेखन स्त्री के अंतर्मन की खदबदाहटों का महाख्यान है। आत्मदया की आत्महंता ग्रंथि से उबर कर आत्मोपलब्धि की जिस कठिन सकारात्मक यात्रा की शुरुआत कृष्णा सोबती ने ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ में की, उसे क्षैतिजिक विस्तार देते हुए लेखिकाओं ने पीड़िता से परे जाकर पीड़क को उसके सामाजिक-सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक संदर्भों में पकड़ने की कोशिश की है। उल्लेखनीय है कि इस प्रक्रिया में ‘मानवाधिकारों की लडाई को समर्पित’ न्याय और पत्रकारिता जैसी संस्थाएं प्रायः सत्तासीनों वर्चस्ववादियों के आगे दुम हिलाती नजर आई हैं। केट मिलेट की मान्यता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बल प्रयोग जैसी टुच्ची हरकत से मुक्त कराने का मिथक इस सावधानी से गढ़ा/प्रचारित किया गया है कि सती प्रथा(भारत), पर्दा प्रथा (भारत एवं एशियाई ऐश), अनैतिक सम्बन्ध  के लिए पत्थर मार-मार कर स्त्री को मार देने की प्रथा (मुस्लिम देश) आदि को आदिम समाज की परंपराएं घाषित कर ‘रूढ़ि’ का दर्जा दिया जाता है और स्त्री को उसकी कमनीयता का अहसास दिला कर उसे निष्कवच कर दिया जाता है। अपने आप में इसे ही बल-प्रयोग का अनूठा उदाहरण कहा जा सकता है, लेकिन बकौल केट मिलेट पितृक समाज अपनी क्रूरता/प्रतिशोध की अभिव्यक्ति उद्धत यौन आक्रमण के रूप में करता है क्योंकि यही अपने सत्त्व रूप में ‘दुष्ट सत्ता’ का प्रतीक है। यही वह मूल पुरुष ग्रंथि है जो एक ओर उसे स्त्रीविरोधी साहित्य रचना  के लिए प्रेरित करती है तो दूसरी ओर स्त्री की खिल्ली उडाने के लिए व्यंग्य और उपहास जैसी कुत्सित युक्तियों की ओर आकृष्ट करती है।  (पत्नी प्रताड़ित पतियों की बेचारगी और स्त्री के जननांगों से जुड़े चुटकुले इसके उदाहरण हैं।) ”औरतों का तो काम है इधर से उधर लबर-लबर करना”  तथा ”मर्द से आठ गुना ज्यादा होती है उसकी कामवासना। जी कभी भरता थोड़े ही है। उसके नाक न हो तो गू खाय”  जैसी उक्तियां दो विपरीत ध्रुवांतों पर टिकी स्त्री अस्मिता के प्रति पुरुष की घृणा के विस्तार की सूचक हैं। शिवमूर्ति ‘अकालदंड’ तथा ‘तिरिया चरित्तर’ में वांछित स्त्री से ‘खेल’ न पाने की पुरुष-कुंठा से उपजी यौन आक्रामकता के बल-छल से जुड़े सारे दांव-पेंचें को विश्वसनीय ढंग से खोलते हैं। ”सेवा का व्रत धारन कर लो। रानी बन जाओगी”  जैसे अनुनयपरक प्रलोभनों के बाद घुप्प अंधेरे का लाभ उठा कर बलात्कार की असफल कोशिशजन्य पीड़ा के संताप को कम करने के लिए ‘सिकरेटरी’ द्वारा सुरजी को बदनाम करना और ‘विषधर’ बिसराम द्वारा अपनी ही पतोहू बिमली को ‘पाने’ के लिए पंचसूत्री योजना बनाना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ”मेला देखेगी? जलेबी खाएगी? गंगा असनान करेगी?’ पहली अवस्था यानी प्रलोभनों का जाल! ”डरेवरवा की दारू महकाती है और मेरी गंधाती है?” दूसरी अवस्था यानी लोकापवाद की सूचना देकर डराने की युक्ति! ”मुझसे बोलने में भी पाप लग रहा है? तिरिया चरित्तर फैलाने से जान बचेगी? साली! कातिक की कुतिया!” तीसरी अवस्था यानी अपमान, आवेश और तिरस्कार के घालमेल से तैयार प्रतिशोधात्मक मानसिकता का ‘प्रबोधन’ जो तिरिया चरित्तर में निहित व्यंजनाओं को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रेरणा देता है। ”किसुनवा ओझा ने गांजे में कोई बूटी मिला कर पिला दिया था। मति भरिष्ठ कर देने वाली बूटी। उसी से हफ्ते भर सिर पर पाप सवार था। . . . मैं तो लक्ष्मी ही कह कर पुकारूँगा अब तुझे बहू। मना मत करना।” चौथी अवस्था यानी छल-छंद की महीन व्यूह रचना जिस कारण ‘चरनामरित’ के नाम पर अफीम का घोल पिला कर बेसुध विमली के साथ व्यभिचार करना बेहद आसान हो जाता है। ”खाली हाथ नहीं, उसकी मेहरारू का गहना-गीठी भी खोद कर ले गई है” – पांचवी अवस्था जहाँ प्राणरक्षा के उद्योग में भागी विमली पर चोरी और चरित्रहीनता के दोष साबित करना आसान हो जाता है।

जाहिर है पुरुष का यौन बल-प्रयोग (बलात्कार) सिर्फ शारीरिक हिंसा नहीं, अनवरत चलती रहने वाली मानसिक विकलांगता अधिक है। इसे अपनी कहानी ‘एक औरत और चार लड़के’ का केन्द्रीय विषय बना कर लता शर्मा ने केस स्टडी पद्धति का परिचय देते हुए पुरुष की घृणा और प्रतिशोध के तल में दबी मनोगं्रथियों को अद्भुत कौशल के साथ खोला है। चार अलग-अलग पृष्ठभूमि के शिक्षित सम्पन्न लम्पट युवक! दोस्त का ‘हैप्पी बर्थडे’ मनाने के लिए बतौर तोहफा किसी युवती का अपहरण कर सामूहिक बलात्कार की योजना! . . . पहला केस है सुमीत। तिरेपन की उम्र में तैंतीस की लगने की कामना और अविवाहित जीवन की दायित्वहीन उन्मुक्तता का आस्वाद करते रहने की उत्कंठा में मां की बजाय मेपल नाम से संबोधित करने का आग्रह सुमीत को सम्बन्धों की गरिमा, आत्मीयता एवं मनुष्यता के प्रति अनास्थावान बना देता है। मां के रूप में गृहीत स्त्री-छवि के एक उदाहरण को पूरी स्त्री जाति पर लागू करते हुए बलात्कार के जरिए वह अपनी क्रूर विलासिता को प्रकट नहीं करता, बल्कि दिशाहीन पीढ़ी के नैतिक स्खलन एवं विवेकहीन प्रतिशोध के भयावह सच को रेखांकित करता है जिसके मूल में परिवार की आत्मकेन्द्रित दोषी भूमिका परिलक्षित की जा सकती है। दूसरा केस है डॉक्टर जो निम्नवर्गीय पृष्ठभूमि के बावजूद बहन के प्रयासों से जमा कराई ढाई लाख कैपीटेशन फीस की बदौलत डॉक्टर बन कर पाता है कि बहन त्याग और निःस्वार्थ सेवा के बदले उसे अपदस्थ कर ‘राजा बेटे’ के लिए आरक्षित सिंहासन पर स्वयं चढ़ बैठी है। फलतः दरक कर चूर-चूर होती सामंतवादी अहम्मन्यता को संजोने के प्रयास में बहन के बहाने संपूर्ण स्त्री जाति से प्रतिशोध। तीसरा केस बाल्यावस्था में पिता और उसके मित्रों के यौन शोषण के शिकार ‘हीरो’ का है जिसके लिए यौन सम्बन्ध स्त्री-पुरुष के रागात्मक मिलन का नाम नहीं, आतंक और असुरक्षा का पर्याय है। इसलिए अकारण नहीं कि वह न केवल अप्राकृतिक मिथुन कर यौन सम्बन्धों के प्रति गहरी वितृष्णा व्यक्त करता है बल्कि स्त्री की जांघों को सिगरेट से दाग कर अपने अंदर के भयभीत क्षुब्ध शिशु को सांत्वना देने के प्रयास करता है। चौथ केस अजय का है – गरीब किंतु ऐयाश अमीर दोस्तों की संगत में आकाशकुसुम तोड़ने को लालायित। थोड़ी सी संवेदना और ज़रा सी मनुष्यता अभी शेष है उसमें। लेकिन उससे कहीं ज्यादा परिमाण में है हीनता ग्रंथि जो संवेदना को ‘कमजोरी’ समझने का अहसास पाते ही विषदंतों से उसकी मनुष्यता को दंशित करने लगती है। ये चारों युवक एक ओर आत्मपीड़ा और आत्मदया के शिकार हैं तो दूसरी ओर उपभोक्तावादी संस्कृति की उपज जिसने सही-गलत, नैतिक-अनैतिक जैसी मूल्यधर्मी मान्यताओं को गड्डमड्ड कर दिया है।

लता शर्मा के विश्लेषण को ‘कमीज पहन रहा है जैक द रिपर’ कहानी में क्षमा शर्मा ने फैंटेसी के जरिए विद्रूप और मारक रूप में प्रस्तुत किया है। ऐसे पुरुष को वे मि0 एग्ज़ीमा कहती हैं क्यांेकि ”जब आदमी हमेशा दूसरों से चिढ़े तो न्यूरोटिक हो जाता है।”(हंस, अगस्त 1997 पृ046) यह पुरुष ‘मनुवादी मर्दों का उत्कर्ष संगठन’, ‘मनु महाराज की जै संगठन’, ‘बलात्कार विशेषज्ञ संगठन’, ‘रिपर  ज़िंदाबाद संगठन’ बना कर पश्चिम से कम से कम सौ बलात्कारी क्लोनों का आयात करना चाहता है जो निर्लज्ज स्त्री की देह से नहीं, आत्मा से बलात्कार करें और दूसरे, आज की तरह हर घड़ी, हर जगह -रेल, कार, दफ्तर, पार्क, छत – बलात्कार अवश्य करते रहें पर पकडे न जाएं। अपराध बोध एवं लाज से बरी हो गई स्त्री को मनुवादी व्यवस्था का पालन करते हुए ‘रास्ते’ पर ले आएं। उस स्त्री को जो नौकरीपेशा है यानी ”बाजार में बैठी है। बस, दिमाग कलम कर देने की देर है कि जिस्म बचेगा। लता शर्मा और क्षमा शर्मा के विश्लेषण को सामाजिक संस्थाओं के संदर्भ में अनूदित करते हुए शिवमूर्ति  समस्या की सूक्ष्म गहराइयों और व्यंजनाओं में छिपी मासूमियतों को देखने की बजाय सतह पर उभरी ‘शैतानियों’ को खंगालने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। वे व्यक्ति से बाहर तंत्र में सन्निहित उन कारणों पर फोकस करते हैं जो व्यक्ति को भेड़िया और नर-पशु बनाते हैं। समस्या का ठीक वही कोण जिसे केन्द्र में रख कर अधिकांश स्त्री लेखन अपनी चिंता को व्यथा और समाधान का रूप देता रहा है। शिवमूर्ति की उपलब्धि है कि स्त्री विरोधी साहित्य रचना में  संलिप्त पुरुष मानसिकता का विस्तार वे समाज की प्रमुख संस्थाओं – धर्म, न्याय, मीडिया – तक करते हैं। जैसे ‘तिरिया चरित्तर’ में वे पुरुष के पाखंड और उसकी ‘हमदम’ पंचायत के जरिए न्यायपालिका के उस बर्बर ‘चरित्तर’ को बेलाग ढंग से उजागर करते हैं जहाँ न्याय का पलड़ा हर हाल में पुरुष के पक्ष में ही झुकता है। स्त्री (विमली) को अपराधिनी सिद्ध करने के लिए साक्ष्य जुटाना कौन कठिन काम है? आखिर इसी मनोदृष्टि के कारण उच्चतम न्यायालय बलात्कारियों को बाइज्जत बरी करता आया है  या सवर्णों द्वारा दलित स्त्रियों के यौन शोषण की संभावना को पुरजोर नकारता रहा है। (भंवरीबाई केस) आश्चर्य है कि न्याय के हंता के रूप में न्यायपालिका की कुत्सित भूमिका को हिंदी कथा लेखन गहराईपूर्वक बेबाकी से उघाड़ नहीं सका है। अपवादस्वरूप कमला चमोला की कहानी ‘अंधेरी सुरंग का मुहाना’ का उल्लेख किया जा सकता है जहाँ बेपर्दानुमा खुली अदालती जिरह बलात्कृता को सरेआम नंगा होने की अनुभूति से बींधती है तो तिथि पर तिथि देकर केस लटकाते चले जाने के लटके-झटके किसी के भी धीरज और मनोबल को तोड़ने को पर्याप्त हैं। तिस पर केस को नई रंगत देने की कोशिश में फरियादी की चरित्रहीनता की कलंकित कथाएं गढ़ कर सच का विरूपीकरण करने की साजिशें! सिर्फ इसलिए कि जो स्त्री दुश्चरित्र है, उस पर बलात्कार करने वाले को दोषी नहीं कहा जा सकता? यदि ऐसा है तो क्या एक बार फिर बलात्कार की पुनर्परिभाषा अनिवार्य नहीं? साथ ही अभियुक्त के रूप में पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का मानसिक उपचार भी?

रघुवीर सहाय राजनीतिक पतनशीलता को देश के नैतिक चरित्र के स्खलन का महत्वपूर्ण मोड़ मानते हैं। उनके अनुसार सत्ता और समृद्धि के सुख में रची-पगी उपभोक्तावादी संस्कृति की नई पीढ़ी अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए जिस प्रकार उत्तरोत्तर सामंतवादी होती गई है, वह धर्म एवं आर्ष ग्रंथों के संरक्षण तले अपनी प्रभुता बनाए रखने वाले वर्णवादियों की रणनीति से पूरी तरह मेल खाती है। पत्रकारिता दोनों वर्गों के हित साधन की आधारभूमि है जहाँ स्त्री को आधुनिकता तथा परंपरा के नाम पर ‘पालतू’ बनाए रखने का विज्ञापन-प्रवचन चौबीसों घंटे जारी रहता है। जाहिर है बलात्कार की सनसनीखेज रिपोर्टिंग के पीछे मुख्य मंशा अपराधी को दंड दिलाना नहीं, ‘औरत के इस्तेमाल का बाज़ार’  मजबूत करना है। मीडिया की इस दायित्वहीन भूमिका पर हिंदी कहानी में खासा रोष है। विशेष उल्ल्ेखनीय है कैलाश बनवासी की कहानी ‘एक कॉलम की खबर’ जहाँ कवरेज और रिपोर्टिंग के बीच आ बैठने वाले घटकों – राजनीतिक-आर्थिक दबाव, ढुलमुल अखबारी नीति और स्वार्थपरता – की चौकस पड़ताल की गई है। ”ये कोई पोलिटिकल स्टंट नहीं है . . . मुझे ग्लैमराइज करने की जरूरत नहीं . . . प्लीज़! आप लोग मेरा साथ दीजिए सिर्फ – न्याय के लिए। क्या आप लोग नहीं चाहते उसे सजा मिले? आप लोग यह तो नहीं चाहेंगे कि आपकी मां-बहनों या बीवियों के साथ ये राक्षस इसी तरह पेश आएं?”  – टेपरिर्काडर में कैद नीता जायसवाल की अपील को अपदस्थ कर जिला चिकित्सा संघ के ध्यानाकर्षण विज्ञापन को विस्तारपूर्वक मुख्यपृष्ठ पर छापना (जिसमें कतिपय असामाजिक, प्रगतिविरोधी तत्वों द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचारों से बचे रहने तथा पूर्ण विश्वास और सहयोग बनाए रखने का आग्रह किया गया है) और मुख्य मुद्दे को रोष भरे प्रदर्शन की सरसरी खबर के रूप में परोसना लोकतंत्र के प्रहरी मीडिया की आचार-संहिता के प्रति कुछ सवाल उठाता है कि मीडिया का दायित्व क्या सिर्फ घटना की ‘खबर’ देना है, उसमें सन्निहित खतरों और चेतावनियों को सूंघ कर जनता को आगाह करना नहीं? कि खबर के ‘फॉलो अप’ का पीछा करते हुए उसे सही परिप्रेक्ष्य और शब्दों में उभारना क्या उसका नैतिक कर्त्तव्य नहीं ताकि अपराधी को दिए जाने वाले कड़े दंड की खबर छाप कर वह विकृत मानसिकता के अपराधियों के हौसले तोड़ सके? क्या कलम की शक्ति का इस्तेमाल कर ज्वलंत समस्याओं और मुद्दों पर जनमत बनाना और पारंपरिक दृष्टिकोण में क्रमिक परिवर्तन की रचनात्मक भूमिका अदा करना उसका लक्ष्य नहीं? यह स्थिति का विद्रूप नहीं तो और क्या है कि बलात्कारी के मानसिक उपचार को सामाजिक जरूरत का रूप देने की बजाय बलात्कृता के ‘पुनर्स्थापन’ पर बल दिया जाता है। यानी फोकस में आ रही बलात्कारी की पहचान को पूरी ताकत लगा कर बेचेहरा-बेनाम कर देने की साजिश। प्रासंगिक न होते हुए भी क्या यहाँ जार्ज फर्नांडीज़ का वक्तव्य उद्धृत करना अनुचित होगा जहाँ गुजरात दंगों के दौरान बलात्कार के बढ़ते आंकड़ों से शर्मसार होने की बजाय वे इसे एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया मानते हैं?

 बेशक स्त्रियों के हित रक्षण में विविध महिला संगठनों की भूमिका काफी मुस्तैद और सकारात्मक रही है, लेकिन हिंदी कहानी में इनकी भूमिका को लेकर कहीं मोहभंग की स्थिति भी साफ दिखाई पड़ती है। हैबरमास जिसे ‘वाम फासीवाद’ की संज्ञा देते हैं और मृदुला गर्ग जिसे ‘कोमा’ में चले जाने की नाजुक स्थिति, जहाँ कमज़ोर वर्ग की स्त्रियों का इस्तेमाल कर वे रोबोट की तरह यांत्रिक हरकतें करके अपना दैनिक कामकाज तो पूरा कर सकती हैं, पर महसूस कुछ नहीं कर पातीं,  उसी के विरोध में रची गई है सुमति अय्यर की कहानी ‘एक पूरी ज़मीन’। ”मैंने तो सिर्फ मुद्दा बनने से इंकार किया था। वे मुझे एक मुद्दे के रूप में ले जाना चाहते थे। आशा (नायिका का नाम) बना कर नहीं। मैं आशा बन कर जाना चाहती थी।”(कथादेश, दिसंबर, 1997 पृ0 58) आशा को ढेरों शिकायतें हैं महिला संगठनों से और ढेरों सवाल कि ”तब कहाँ थे आप लोग जब अर्थी (पुलिस हिंसा में मृत जयंत) को कंधा देने के लिए कमज़ोर महिलाओं के कंधे ही रह गए थे?” (वही, पृ0 60) सही समय पर सकारात्मक संभावनाओं को संरक्षण देने की बजाय बैनरों और जलूसों के जरिए खबरें बनाने वाले महिला संगठन क्या सिर्फ अपने अस्तित्व और महत्व की रक्षा के लिए ही तो चिंतित नहीं? ”फुसफुसी जमीन पर टिकी’ इन संस्थाओं के चरित्र को पढ़ कर कमला चमोला इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि ”संस्था अपने आप में कुछ नहीं होती। होता है बस व्यक्ति।”

‘खेती करते हैं, नेतागिरी भी और लोगों के हिसाब से गुंडागर्दी भी’ 

मात्र स्त्री सुलभ जिंस नहीं, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक दृष्टि से कमजोर पुरुष भी समर्थ वर्ग के वर्चस्व प्रक्षेपण का शिकार रहा है। अल्मा कबूतरी को भगाने के अपराध में धीरज पर धधकते क्रोध की अभिव्यक्ति हेतु किराए के चार-पांच गुंडों द्वारा ‘बलात्कार’ के जरिए उसे ‘नाथने’ की युक्ति  में यौन उत्पीड़न की वही ग्रंथि विद्यमान है जो समलिंगी पुरुष द्वारा बलात्कार तथा ‘स्त्री’ की भूमिका में ढाल दिए जाने की दोहरी लज्जा एवं अपमान से उपजी है। उर्मिला शिरीष ‘किसका चेहरा’ कहानी में इन ‘पालतू गुंडों’ के इतिहास को खंगाल लेना चाहती हैं जहाँ  निस्सहाय और दिग्भ्रांत अवस्था में वे भविष्यहीनता की ओर ढकेल दिए जाते हैं। ट्रेन चलते ही आरक्षित डिब्बे में हड़बड़ा कर झुंड के झुंड घुसते लड़के जिस प्रकार बैठ भर पाने के लिए कॉलेज टुअर पर जा रही लड़कियों को बर्थ से खदेड़ते हैं और उनके विरोधपरक भिनभिनाते शोर से त्रस्त चाकू निकाल लेते हैं (निर्वासन, पृ026), उससे आसन्न बलात्कार के भय से मिमियाती लड़कियांे और हत्बुद्धि प्राध्यापिका की भयभीत मनोदशा का प्रामाणिक चित्रण ‘किसका चेहरा’ का कथ्य नहीं। कथावाचिका से साथ तादात्मीकृत होकर लेखिका स्वयं दृश्यपटल पर उपस्थित हो जाती हैं। क्षणिक उत्तेजना से जन्मे आतंक एवं घृणा जैसे मानवीय भावों पर नियंत्रण पा जब स्थिति पर विचार करने लगती हैं तो लड़के अमूर्त न रह कर सुनिश्चित पारिवारिक पृष्ठभूमि/मजबूरियों में बंधे भाई-बेटे-मनुष्य लगने लगते हैं। ”पतली लकड़ी सा हाथ!” करुणा से भर कर वे उन्हें मानवीय दृष्टि से देखती हैं तो वे ”वहशी नहीं, कच्ची उम्र के अनुशासनहीन और पथभ्रष्ट लड़के नज़र आते हैं जिन पर ज़िंदगी जीने की त्रासदी एक अभिशाप की तरह थोप दी गई है। संवेदना का विस्तार करती यह मानवीय अनुभूति जिस तरह शनैः शनैः बलात्कार/यौन उत्पीड़न के भय को कम कर लड़कियों को सहज करती है, वह समस्या को विकराल बना देने वाले तत्वों का मनोवैज्ञानिक/भावनात्मक उपचार किए बिना सामाजिक विकृतियों के समाधान की किसी भी संभावना को निर्मूल करती है।  ”डंडे फ्री . . .मौत फ्री . .” – अपनी खौफनाक परिणति से पूरी तरह परिचित कॉलेज के ये लड़के भूख-प्यास, बेरोज़गारी, भौतिक प्रलोभनों या महत्वाकांक्षाओं की सूली पर चढ़ कर राजनेताओं और उनके दलालों के हाथ में खेलने वाले मुहरे भर बन जाते हैं। रैलियों में भीड़ जुटानी हो, प्रदर्शन-धरना-जुलूस हो, दंगा-फसाद करवाना हो – ‘दिहाड़ी’ पर खरीद कर इन अनुशासनहीन युवकों को हांक दिया जाता है आतंक फैलाने के लिए, घृणा पाने के लिए। ”नरकंकालों की सबसे आखिरी पंक्तियों में बैठाए’ जाने वाले भूखे-प्यासे, नींद से त्रस्त, दुरदुराए इन पथभ्रष्ट नवयुवकों को देख कर लेखिका बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं कि ”क्या ये राष्ट्र की सम्पत्ति  – बेजान चीज़ों से भी गए गुज़रे हो गए . . । इनके लिए कुछ नहीं है हमारे पास?”(वही, पृ0 30) संवाद स्थापित करने की मानवीय कोशिश में यदि वे वास्तविक ‘आपराधिक तत्वों’ पर उंगली उठाते हैं (”इसमें हमारा दोष भी नहीं है। आप जैसों का है जो सिखाने की बजाय गन्ने की तरह चूस कर फेंक देते हैं हमें”) तो खिसियाने और गरजने की मुद्राएं क्यों?

संतुलित एवं परिपक्व दृष्टि से बलात्कार की समस्या पर विचार करते हुए विष्णु प्रभाकर ‘अर्धनारीश्वर’ उपन्यास में बलात्कारियों के मनोविज्ञान और बलात्कार के कारणों की जांच-पड़ताल करते हैं तो व्यक्ति की अपेक्षा समूचे तंत्र को कटघरे में खड़ा पाते हैं। शरत्चंद्र के जीवनी लेखक के रूप में विष्णु प्रभाकर की विशेषता है स्त्री समस्याओं को लेकर अनायास अतिरिक्त रूप से संवेदनशील हो उठना जहाँ पूर्वग्रहमुक्त उन्मुक्त क्षितिज पर विचरण करना उनके लिए संभव हो जाता है। समस्या की ऊपरी परत को छू-छील कर वक्त की पूरी तस्वीर देने का दावा करने की बजाय वे पीड़िता सुमिता के साथ बलात्कार के दंश, अपमान की ज्वाला, दरकते वैवाहिक सम्बन्ध की वेदना भोग का निरंतर अंतर्मुखी होते चलते हैं – ‘मैं’ से उबर कर भीतर स्थित ‘व्यक्ति’ का साक्षात्कार कर अपनी सहानुभूति और संवेदना का निरंतर विस्तार करते हुए। इस क्रम में पीड़ा (अनुभूति) को अनुभव और अनुभव को विश्लेषण में ढाल कर वे जिन निष्कर्षों पर पहुंचते हैं, वहाँ बलात्कारी ‘अपराधी’ नहीं, सफेदपोश अपराध तंत्र का शिकार बन कर पीड़क-पीड़ित की विभाजक रेखा को बेमानी कर देता है। यही वह बिंदु है जो सुमिता को बलात्कार जैसी वैयक्तिक दुर्घटना को निजी न मान कर सामाजिक दुर्घटना मानने को प्रेरित करता है। बलात्कार जैसे अमानवीय हादसे के प्रति वितृष्णा होते हुए भी उसे बलात्कारियों से घृणा नहीं क्योंकि अर्ध-मूचर््िछतावस्था में सुने उनके शब्द सारी घटना को एक नया संदर्भ दे डालते हैं – ”कैसी बीभत्स-विकृत थी वह हंसी और उसी के बीच उतने ही बीभत्स उसके साथी के ये शब्द,”मैं इसे मार कर शहीद बना दूँ! नहीं, नहीं, यह ज़िंदा रहेगी और तड़पेगी गरम रेत पर मछली की तरह। मुझे इंतकाम लेना है उन सफेदपोशों से . . .।”  . . .उसने जो कहा था, वह  वर्जनाओं और बंधनों के बीच जीने वाला ही कह सकता है। . . . .मैं जो कहना चाह रही हूँ तुमसे वह यही है कि मैं उन्हें अपने मानस-पटल पर देख कर डरी नहीं, अपने से घृणा भी नहीं की। मुझे लगा अजित कि जो कुछ उन्होंने किया, वह केवल वासना का खेल नहीं था। वासना तो निमित्त मात्र थी बदला लेने की। हाँ, मूल में इस जघन्य कृत्य के पीछे इंतकाम लेने की कामना थी, सम्पन्न और सत्ताभोगी वर्ग से इंतकाम लेने की भावना।”(अर्धनारीश्वर, पृ0146) यहीं से विष्णु प्रभाकर एक प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या संसार का इतिहास इसी नाना रूप सत्ता भोगी वर्ग द्वारा सत्ताहीन वर्ग की नारियों पर किए जाने वाले पाशविक और लौहमर्षक अत्याचारों की मर्मांतक कहानियों से नहीं भरा पड़ा है? असल में यह प्रश्न नहीं, लज्जा के रूप में उभरी स्वीकारोक्ति है जिसे इसी उपन्यास में नाना उद्धरणों/घटनाओं का समावेश कर वे पुष्ट करते रहे हैं। धार्मिक शुचिता की रक्षा का सवाल हो या सत्ता पक्ष द्वारा निरंकुश शक्ति प्रदर्शन की मुहिम, बार-बार रौंदी जाती है स्त्री की अस्मिता जो तमाम सूक्तियों/आप्तवचनों के बावजूद निर्मूल्य है। लेखक ने स्थिति की विडंबना को पराकाष्ठा पर ले जाकर उस समय छुआ है जब ‘सामाजिक समता के समर्थक’ रूस का वामपंथी तानाशाह बलात्कार को ‘भूखे’ सैनिकों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया कहता है – ”हमारे सैनिक अरसे से घर से दूर थे और स्त्री सुख के लिए तरसे हुए थे। इसलिए उन्होंने जो किया, वह स्वाभाविक था।” (पृ0 356)

आवेश को थिरा कर वैचारिकता और संवेदना की गहराइयों को थहाना आसान हो जाता है जहाँ सतह पर दीखती विकृतियां अपने ‘विकृत’ रूप में होने के कारणों और कारकों के साथ विश्वसनीय रूप में विद्यमान रहती हैं। यही वजह है कि वृद्धों द्वारा बालिकाओं के बलात्कार की नृशंस घटनाओं पर थू-थू करने की बजाय विष्णु प्रभाकर पाठक से उन मानसिक सच्चाइयों का साक्षात्कार कर लेने का आह्नान करते हैं जहाँ बुढ़ापा वीतरागी होने के तमाम विशेषणों-नसीहतों को झटक कर जीवन को पूरी ऊर्जा और ऊष्मा के साथ जी लेने का हठ पालने लगता है। निस्संदेह इसी कारण रसना रस के साथ-साथ जीवन के समस्त रस ग्रंथियों, तृष्णाओं, प्रलोभनों के रूप में उसे जब-तब डसते रहते हैं। कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों, कामेन्द्रियों के शिथिल पड़ जाने का अर्थ जीवन से विरत होना नहीं, जीवन में अपने जिए ‘जगह’ बनाने की चुनौती बन जाया करता है। इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए विष्णु प्रभाकर सत्तर वर्षीय बलात्कारी वृद्ध की आत्मस्वीकृति में आरोपित मान्यताओं और उच्चतर अपेक्षाओं के बीच निरंतर द्वंद्व एवं दुविधा में अपनी ही धुरी से उखड़ कर वृद्ध जीवन को अभिशाप बनाती वास्तविकताओं को परत दर परत खोलते हैं – ”काम हर व्यक्ति के भीतर है। वही तो जीवन को गति देने वाली ऊर्जा है। शरीर और मन दोनों को सहेजे रहती है। बुढ़ापे में शरीर छूटता जाता है लेकिन मन पर उसकी जकड़ बनी रहती है। . . . बहुत प्रयत्न किया अपने को सम्हालने का पर हर प्रयत्न के बाद होता था यह कि  रात को जब लौटता तो कोई न कोई अर्धनग्न युवतियों वाली या आधी रात के किस्सों वाली पत्रिका ले आता। . . .लोगों की दृष्टि में मैं तप कर रहा था इस आयु में अकेले रह कर, पर भीतर आकांक्षा का तूफानी समंदर बाट जोहता रहता कि स्वर्ग से कोई उर्वशी या मेनका उतरे मेरा तप भंग करने को।” (वही, पृ0 48-49) विष्णु प्रभाकर उपन्यास में आद्योपांत विशेष सजग रहे हैं कि स्त्री या पुरुष किसी भी पक्ष के प्रवक्ता के रूप में न उभर कर वे समस्या का सटीक विश्लेषण करें। लेखकीय चिंता को निर्लिप्तता में बदल कर असंलग्न भाव से पात्रों को ‘मनुष्य’ रूप में बारीकियों के साथ समझना जटिल ही नहीं, जोखिम भरा कार्य भी होता है जहाँ अक्सर लेखकीय पक्षधरता/सरोकार संतुलन भंग की स्थिति पैदा कर देते हैं। लेकिन विष्णु प्रभाकर स्त्री और पुरुष, बलात्कृता और बलात्कारी दोनों के अंतर्मन में निहित कुंठाओं और लज्जाजन्य अपराधबोध को पूर्व परंपरा एवं परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में पहचान पाए हैं और उनकी ‘निर-अपराधिता’ को इस सहज मानवीय ढंग से चित्रित करते हैं कि वह किसी के भी बचाव का उपक्रम न लग कर अपराध/ग्लानि तक पहुँचाने वाली राह को खोजने का प्रयास बन जाता है ताकि कल का मनुष्य ठोकर खाकर चेतने से पहले आत्मानुशसन एवं मानवीय गरिमा से सम्पन्न हो कर दूसरे की ‘मनुष्यता’ का सम्मान करना सीख सके।

स्पष्ट है कि बलात्कार सामंती दंभ और विकृत कामलिप्सा द्वारा पोषित मनोवृत्ति मात्र नहीं, आर्थिक-राजनीतिक कुचक्रों की अनिवार्य स्थिति भी है। अतः युवा शक्ति को एक स्वस्थ-सकारात्मक ज़िंदगी से बेदखल कर आतंकवाद और माफिया जैसे रसातलों की ओर ढकेलने वाले तत्वों की शिनाख्त अहम हो जाती है। उल्लेखनीय है कि विश्लेषणात्मक वैचारिक गहराइयों का संस्पर्श कर दूसरी अवस्था का कथा लेखन यहाँ बलात्कार की अर्थ-व्याप्तियों को दूर तक ले जाकर हिंदी कथा साहित्य में पुष्टतर होती समाजशास्त्रीय अनुगूंजों को सुनने को बाध् य करता है।

‘आखिर क्यों मुस्करा रही है मोनालिसा?’
” बलात्कारी एक डरा हुआ आदमी है। उसे तुम्हारी शर्म पर भरोसा है। बेशर्म बनो”   – दूसरी अवस्था के कथा लेखन का केन्द्रीय स्वर है यह उद्गार। अतः बलात्कार को महज एक ‘दुर्घटना’ का नाम दे जहाँ स्त्री को अपराध बोध से मुक्त करने और यौन शुचिता की पारंपरिक मान्यताओं पर कुठाराघात करने में वह पहल करता है, वहीं एक नई जुझारू और आत्मसजग स्त्री की छवि भी गढ़ना चाहता है। ”तो क्या कहीं से कोई और धरती आने वाली है औरतों की दुनिया के लिए?’   -वह प्रश्न नहीं उठाता, अपनी मुट्ठी में बंद विकल्पों और संभावनाओं को तोल लेना चाहता है। भय मुक्ति – पहला संकल्प! ”संस्कार भय पैदा करते हैं और भय की दीवारों के बाच पनपती है अंधी आस्था। उसी आस्था का कवच पहन कर प्रहार करते हैं सामाजिक महारथी।”  अतः शत्रु को पराभूत करने के लिए डाकिनी-पिशाचिनी की तंत्र विद्याा से तैयार कराए आटे के पुतले में नपुंसक प्रतिशोध से उपजी बेचारगी को केन्द्रीकृत करने की बजाय वह अपनी लड़ाई आप अपने हथियारों से लड़ने को तत्पर हो जाती है – पुतले (भय) को जोकर (उपहास) बना कर। ”हमने औरत को यह क्यों नहीं सिखाया कि वह बलात्कार को अपने पर राजनीतिक आक्रमण समझे और यह भी समझे कि अपनी जान गंवा देने का प्रमाण देने में सतीत्व की प्रतिष्ठा नहीं, बलात्कारी की जान ले लेने में हो सकती है।”  रघुवीर सहाय की कामना को मैत्रेयी पुष्पा जब अपने दो उपन्यासों ‘इदन्नमम’ तथा ‘अल्मा कबूतरी’ में मूर्त रूप देती हैं तो समस्या और समाधन के अंतः संश्लिष्ट सूत्रों को क्रमिक रूप में उघाड़ती हैं। व्यभिचारी अभिलाख की हत्या के बाद आत्मदहन कर अपनी बेबसी की पुष्टि करने वाली सुगना के बरक्स वे मंदा को खड़ा करती हैं जो हत्या बनाम आत्मरक्षा के माामले की कानूनी जांच के लिए अडिग है। चूंकि नेताओं और पुलिस के गठबंधन से अपराध जगत् पर अपनी पकड़ मजबूत करते पूंजीपतियों के लिए मंदा सबसे बड़ी बाधा है, अतः हत्या के पीछे मंदा के ‘हाथ’ को ‘कल्पित’ कर हथकड़ियां पहनाने की पुख्ता तैयारी प्रशासन द्वारा कर ली जाती है। ‘अल्मा कबूतरी’ तक आते-आते मैत्रेयी समझ गई हैं कि जान देने की तरह जान लेना भी आवेशमयी बचकानी मुद्रा है जिसके चलते न जीवन जिया जा सकता है, न लक्ष्य संधान। बार-बार अनादृत होकर अल्मा ने जाना है अस्मत की रक्षा के लिए उसकी हर आक्रामक भंगिमा पुरुष की नज़र में ”आनंद बढ़ाने का नुस्खा” बन जाती है; कि ”नंगापन पहली बार लगता है, बार-बार नहीं”। भय और लज्जा से मुक्त स्थिति का ठंडा दो टूक विश्लेषण! इसलिए न विद्रोह, न समर्पण; न ऊष्मा, न स्पंदन – मंत्री श्रीराम शास्त्री की सेवा में प्रस्तुत निरी निष्प्राण-निस्पंद देह! अलबत्ता मानस में दूर तक जड़ें पकड़ता गहरा संकल्प कि ”आपको उखाड़े बिना नहीं मरूँगी।” मैत्रेयी की विशेषता है कि प्रतिशोध को आक्रोश के परनाले में बहा कर उन्होंने अल्मा को रीता नहीं किया, बल्कि श्रीराम शास्त्री के साथ संवाद और संवेदना की झिर्रियां खोल हवा, गंध, पानी की तरह अल्मा को उसके लिए अपरिहार्य बना दिया है। उसका प्रतिशोध एक ‘व्यक्ति’ से नहीं, पूरी व्यवस्था से है, इसलिए सत्ता पर काबिज हो वह प्रभुता और वर्चस्व के जरिए व्यवस्था का अहम हिस्सा बनने को लालायित है। राणा की परिणीता की मानसिकता में श्रीराम शास्त्री की विधवा के रूप में सत्ता हथियाने का निश्चय उसकी इसी मानसिकता का परिचायक है। यहाँ एक सवाल उतनी ही तीव्रता से सिर भी उठाता है कि सत्ता में स्त्रियों की भागीदारी का अद्यतन इतिहास क्यों पुरुष वर्चस्व से मुक्ति नहीं पा सका है?

इसी सवाल से उभरता है दूसरा संकल्प – बैसाखियों के बिना आत्मनिर्भरता! ग्रासरूट तक स्त्री अस्मिता की संवेदना का प्रसार! शब्दों से ताकत मिलती है, लेकिन ज़मीन से जुड़ कर मिलती है नमी और शांति, आँखों में क्रोध ज्वालामुखी बन कर संचित होता रहता है – किसी एक प्रताड़ित जन का नहीं, पूरी ज़मीन का, रौंद दी गई अस्मिताओं का। सुमति अय्यर की ‘एक पूरी जमीन में शंकर-सिंधु के बरक्स आशा जिस निरुद्वेग भाव से अपनी लड़ाई लड़ने को लालायित है, वहाँ उसके ‘अ-ज्ञान’ में ही भावी रणनीति की बारीकियां छुपी हैं – ”पानी में लड़ना है तो चप्पू से बेहतर हथियार नहीं हो सकता। यह लड़ाई उनके तरीकों से नहीं लड़ी जा सकती, इतना जानती हूँ, पर कैसे लड़ी जाएगी, यह नहीं जानती।”  इस प्रश्न का जवाब विष्णु प्रभाकर के उपन्यास ‘अर्धनारीश्वर’ में निहित है। ”इच्छाओं से मुक्ति नहीं, इच्छाओं की दासता से मुक्ति; पुरुष के बल के आकर्षण से मुक्ति नहीं, बल के पशुत्व के आकर्षण से मुक्ति; निर्भरता से नहीं, निर्भरता की अनिवार्यता से मुक्ति”  को किसी भी महाभियान की पहली सीढ़ी मान कर विष्णु प्रभाकर स्त्री के हाथ यह बीज मंत्र थमा देना चाहते हैं कि ”अकेला आदमी सबसे शक्तिशाली होता है।” सुमिता के वैचारिक-भावनात्मक आलोड़न को प्रमिला वर्मा, राजकली, मार्था, किरण, शालिनी जैसी अनेकानेक बलात्कृता स्त्रियों की मनोग्रंथियों के बीच पुनर्जीवन के लिए ललकती जिजीविषा के साथ जोड़ वे विभा के रूप में एक ऐसी लौह-स्त्री गढ़ते हैं जो जान की बाजी लगा कर भी पूरी व्यवस्था से उलझने और पलटने को तैयार है। बेशक विभा अंत तक आते-आते शरत्चंद्र के उपन्यास ‘शेष प्रश्न’ की कमल के समान अतिबौद्धिक एवं अविश्वसनीय अधिक लगने लगती है और उसका प्रस्ताव यूटोपिया की शक्ल लेने लगता है, लेकिन यूटोपिया हमेशा अग्राह्य और उपहासास्पद ही क्यों समझा जाए? वह अपने मूल रूप में सुनहरे भविष्य का ब्लू प्रिंट भी होता है।

”नारी को बस नारी बनना है, सुंदरी और कामिनी नहीं”  – तीसरा संकल्प, विभा के यूटोपिया (‘नई स्मृति’ के निर्माण की रूपरेखा) के रूप में उभरता हुआ। युगों पुरानी ‘स्मृतियां’ जब बदलते वक्त में हमारी सहायता नहीं कर सकतीं तो क्यों न युगीन आवश्यकताओं के अनुरूप एक नई व्यापक ‘स्मृति’ (आचार-संहिता) का निर्माण किया जाए? – विभा का प्रश्न! ऐसी स्मृति जिसमें धर्म, राजनीति और व्यक्ति के निजत्व के विचार के साथ-साथ समाज में दोहरे मूल्यों-मानदंडों की कोई गुंजाइश न हो; नारी की स्वतंत्र सत्ता हो लेकिन ध्यान रखा जाए कि ‘स्वतंत्र सत्ता का अर्थ नारी की सैक्स इमेज से न जुड़े, बल्कि उसका अर्थ हो ”समान अधिकार, समान दायित्व, एक स्वस्थ समाज के निर्माण में स्त्री-पुरुष दोनों की समान भागीदारी। अर्धनारीश्वर की परिकल्पना जहाँ वे एक-दूसरे में विसर्जित नहीं, एक-दूसरे से स्वतंत्र, फिर भी जुड़े हुए” हों। आत्मनिर्भरता और निर्भीकता के पायदान पर खड़ी लता शर्मा की कहानी ‘मर्दाना कमज़ोरी’ की कथावाचिका तीसरे संकल्प की प्रतिमूर्ति होते हुए भी विभा की अर्धनारीश्वर की संकल्पना से सहमत नहीं। एक तो पुरुष का ‘ऊँटभाव’ (आत्मस्थ, आत्मतुष्ट, अहम्मन्य भाव) , तिस पर ‘ताकत की दवाइयों के प्रति मर्दाना कमजोरी . . . तिरस्कार से मुस्कराए न स्त्री (मोनालिसा) तो क्या करे? गायक डेविड के हाथ में गुलेल देख कर करुणा और क्षमा बरसाती मुस्कान न फेंके तो कुटिल विद्रूप को सहने की शक्ति कहाँ से पाए? पौरुष का शिरस्त्राण थाम कर ध्वस्त होते जेरुसलम को देखते जैरेमिया की कायरता पर व्यंग्य की बांकी मुस्कान न फेंके तो पगला न जाए? ”आखिर क्यों मुस्करा रही है मोनालिसा? . . . सब कुछ देख रही है वह। दीवारों पर लिखे बेढंगे-बेहूदे विज्ञापन . . .स्त्री का विश्लेषण करते मनीषी . . .झुंझलाता, खिझलाता फ्रायड . . .”आखिर औरत चाहती क्या है?” ”औरत की बात छोड़ो, तुम्हें मालूम है तुम क्या चाहते हो?” मुस्करा रही है मोनालिसा . . .”विकृति या दुर्बलता, जो कुछ भी है, कानों के बीच में है, टांगों के बीच में नहीं। इसी तथ्य को रेखांकित कर रही है मोनालिसा।”

 निस्संदेह दूसरी अवस्था का हिंदी लेखन आत्माभिमान से दीप्त वर्जनामुक्त स्त्री की जिस छवि को प्रतिष्ठित करता है, वह सीधे-सीधे यौन शुचिता (यानी पुरुष अधिकार का ट्रेड मार्क) को अंगूठा दिखा कर अपने लिए स्पेस और स्वत्व दोनों को एक साथ पाने की दोहरी लड़ाई है। उल्लेखनीय यह है कि ‘पाने’ की उत्सवधर्मी उत्कंठा में चेतावनी के तौर पर निकट भविष्य में स्थित दो संकटों की ओर संकेत करना भी वह नहीं भूलती। पहली संकटापन्न स्थिति है रागात्मकता से शून्य संवेदनहीन युवतर स्त्री पीढ़ी जिसकी अनथक ऊर्जा और उत्साह के नीचे छिपी पुरुष घृणा को सूंघ कर स्वयं लेखिका अर्चना वर्मा (जोकर) स्तब्ध और भयाक्रांत हैं। ”कितना अच्छा हुआ न अम्मू कि पापा पहले ही मर गए। और हमारे घर में दूसरा भी कोई मर्द है ही नहीं। आई थिंक आई एम लकी। रियली लकी।”  – पंद्रह वर्षीया कंकु का उद्गार जिसके लिए पुरुष का अर्थ है घृणित वासना और विकृत मानसिकता का पुंजीभूत रूप! ऐसी स्त्री देह और मन का एकाग्र संगीत सुन पाएगी कभी? पराए अनुभवों की कंटीली झाड़ियों में उलझ कर जान पाएगी प्यार का अर्थ जो जीवन को गति और संतुलन देता है? अस्मिता की लड़ाई दूसरे को निर्मूल करने में नहीं, परस्पर अनुकूलन और सह-अस्तित्व में है। लेकिन इसे समझने के लिए जरूरी है निरुद्वेग कर्मठता, उदार सकारात्मकता और पूर्वग्रहरहित लक्ष्यपरकता। प्रतिक्रिया, प्रतिहिंसा, प्रतिशोध के खदबदाते माहौल में इन्हें पाना इतना सरल भी तो नहीं। ये विविध साधनाएं हैं जिन्हें अपने भीतर से अर्जित करना पड़ता है – अकूत धीरज और संयम के साथ। सृष्टि का ठेका बेशक स्त्री ने नहीं लिया, लेकिन सृजन का दायित्व तो उसी का है न! ‘सृजन’ को जैव वैज्ञानिक संघटना न कह कर प्रतीक रूप में विस्तारित करें तो हर संवेदनशील जिम्मेदार नागरिक का दायित्व जो बड़बोलेपन से नहीं, मूक-एकनिष्ठ भाव से ज्योत से ज्योत जला देता है, बस!

दूसरी समस्यामूलक स्थिति है संवेदनहीन पुरुष के अकेले, असुरक्षित और न्यूरोटिक हो जाने की जिसकी ओर संकेत किया है कमला चमोला ने कहानी ‘औरतनामा’ में। बात-बात पर स्त्री को नंगा कर गांव भर में घुमाना सवर्ण/सबल पुरुष के प्रतिशोध का कारगर तरीका हो सकता है जो फौरी तौर पर बेशक उसके अहं, दर्प और शक्ति में बढ़ावा करता हो, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव उसकी रागात्मकता को ठीक कंकु की तरह बंजर और वीरान कर देते हैं।  बुद्धि और हृदय, मन और प्राण, भावना और संवेदना से हीन नंगी औरतों की परेड देख-देख कर बड़े हुए युवा के लिए स्त्री का अर्थ है – जुगुप्सा, घृणा, अपमान और ग्लानि जैसी ‘अमानवीय’ अनुभूतियां जगाने वाली वीभत्स देह। इस देह के पार मादक सुगंधियों के जीवंत स्रोतों की रचना करते स्त्री-पुरुष सम्बन्ध सृष्टि की जीवंतता के लिए कितने अनिवार्य हैं, इसे जानने की सहज उत्कंठा से शून्य युवक! कहीं मोनालिसा की मुस्कान में बंजर होने का अभिशाप ढोती भावी पीढ़ी की निस्सहाय निरर्थता के प्रति खिसियाहट तो नहीं?

कहना न होगा कि नौवें-दसवें दशक के हिंदी कथा-लेखन की वैचारिक परिपक्वता उसे बलात्कार जैसी जघन्य समस्या के समस्त आयामों को हार्दिकता एवं विश्लेषणपरकता के साथ देखने की निर्भीकता देती है। इस प्रक्रिया में ‘अबला’ पीड़िता के आंसुओं और इज्जत जैसे चालू मिथों का तर्कपूर्ण ढंग से मजाक उड़ा कर वह सीधे ‘सबल’ किंतु अदृश्यमान पीड़क (बलात्कारी) को फोकस में लाता है, उसे एक चेहरा देकर उसमें पिता-पति, भाई-पुत्र जैसे अंतरंग सम्बन्धों को देखने को बाध्य करता है। अमूर्त अपराधी की पहचान को मूर्त और सुस्पष्ट करना हिंदी कथा-लेखन की महती उपलब्धि है जिसके साथ-साथ पुरुष नहीं, पुरुषवादी व्यवस्था और संस्थाओं के चेहरे भी स्वतः बेनकाब होते चलते हैं। जेंडर सेंसिटाइजेशन, बलात्कार सम्बन्धी मुकद्दमों की त्वरित न्यायिक प्रक्रिया, मौजूदा कानूनों को अधिक मानवीय बनाने और उन्हें लागू करने तथा इन मुकद्दमों की सुनवाई हेतु बैंच में एक स्त्री जज की अनिवार्यता पर बल देने की अपेक्षा फांसी बनाम कड़ी सजा के विवाद को हवा देना असली समस्या से मुँह चुराना है। यह सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा की उसी कुटिल वासना का विस्तार है जो न केवल मानसपुत्री सरस्वती के कौमार्य का हंता बन जाता है, बल्कि अपनी शर्म और अपराध छिपाने के लिए उसे तमाम लौकिक सुख-सुविधाओं से वंचित कर निर्वासन का कड़ा दंड देना भी नहीं भूलता। अपने विवेक, स्वाध्याय और श्रम से बौद्धिक क्षमताओं का विस्तार कर सरस्वती (स्त्री) अपना विलक्षण व्यक्तित्व सर्जित कर भी ले तो विष्णुप्रिया लक्ष्मी के रुतबे की ओट में उसका तिरस्कार करने से नहीं चूकता। यानी पुनर्सृजन की जिम्मेदारी एक बार फिर स्त्री के कंधों पर ही क्योंकि बकौल मीरा ”घायल की गति घायल जानै या जिन लागै होई।’

सरला माहेश्वरी की कविताएँ

सरला माहेश्वरी

पूर्व सांसद सरला माहेश्वरी की प्रकाशित पुस्तकें – ‘नारी प्रश्न’, ‘समान नागरिक संहिता’, ‘भगत सिंह’, ‘अग्निबीज डिरोजियो’, ‘हवाला कांड’, ‘शेयर घोटाला’, ‘महिलाओं की स्थिति’, ‘नई आर्थिक नीति, महँगाई और उपभोक्ता संरक्षण’ ‘ज्योति बसु’ (संपादित), बांग्ला से कई पुस्तकों का अनुवाद ।

1.

दुआ करो
प्रतिशोध और प्रतिहिंसा में उठे हाथ
काँप-काँप जाए

दुआ करो
अंहकारी अट्टहास का बादल फटने से पहले
मासूम मुस्कान की धूप खिल-खिल जाए

दुआ करो
द्वेष की दीवार उठने से पहले
दरक-दरक जाए

दुआ करो
नफ़रत की आग भड़कने से पहले
इंसानियत बरस-बरस जाए !

2.

सेवया की औरतें

कलकलाती,छलछलाती,खिलखिलाती
स्वछंद झरनों की तरह बहतीं
अकेली,दुकेली,झुंड की झुंड औरतें

नाचतीं,गुनगुनाती औरतें
मर्दों के साथ, मर्दों के बिना औरतें
बच्चों के साथ,बच्चों के बिना औरतें

दुकानों में, बार-रेस्तरां और होटलों में औरतें
बस-रेलवे स्टेशनों,हर जगह पर
दौड़-दौड़ कर काम करतीं औरतें

फ़ुरसत में मौज-मस्ती करती औरतें
जाम बनाती,पीती और पिलाती औरतें
दिन में,रात में,बे-ख़ौफ़,बे-लोस
मुक्त हवा की तरह साँस लेती औरतें

स्वशासित एंडुलेशिया की स्वशासित औरतें
मन को हुलसा गयी सेवया की ये औरतें।

3.

माँ

बचपन में
माँ का साथ
जैसे सर पर
ख़ुदा का हाथ
हाथों में ले वो हाथ
भय के भूतों को देते मात

माँ के करिश्माई हाथ
जैसे कोई जादुई चराग
कितने-कितने काम
करते सब एक साथ

सूरज उगता था
माँ के साथ
दिन खिलता था
माँ के साथ
चूल्हा हँसता था
माँ के साथ
जीवन धड़कता था
माँ के साथ।

सुबह सुबह
घड़ी के अलार्म जैसी
बज उठती माँ की आवाज़
उठो लालजी भोर भयो रे …
गाते-गाते रसोई  में जुट जाती माँ
गरमा- गरम पंराठे और अचार
टिफ़िन में भर देती माँ

यायावर पिता टिकते
नहीं थे एक ठोर
चिंताओं की गठरी लादे
घूमते रहते एकछोर से
दूसरे छोर
हमारी धरती
घूमती थी
माँ के चारों ओर

जीवन की ऊँची-नीची
पथरीली राहों पर
रगड़ें खाती एकाकी माँ
जाने कैसे झरने की तरह
खुशियों सी झरती रहती

कभी-कभी हिल सी जाती
मां की बुनियाद
जब जाते लेकर
फ़ीस की फ़रियाद
कभी चूड़ी तो कभी चेन पर
फिरते रहते माँ के हाथ
स्कूल जाने से पहले माँ
रख देती पैसे हमारे हाथ
बची रहती इसी तरह
बड़ी हवेली की पोल
माँ के मोल।

4.

इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ ?

हमारा दिल दहल जाता है
दिल उनका बहल जाता है

पहाड़ टूटता है हम पर
उन्हें मज़ाक़ सूझता है

जान पे बन आती है हमारे
उन्हें इसमें कोई बात नजर नहीं आती

हम बेमौत ही मरते जाते हैं
बस यूँ ही आते-जाते हैं

हमारे जीवन का क्या है मानी
सब तो है उनकी मेहरबानी

इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ
बेदाम की ये ज़िंदगी उन पे वार दूँ ।

5.

डिजिटल संस्कृत का महिमा-गान

सुनो ! सुनो ! सुनो देशवासियों
सुनो ! सुनो ! सुनो विश्ववासियों

अभी-अभी आकाशवाणी से हुई है उद्घोषणा !

देवताओं ने कर दी है मुक्त
देवभाषा संस्कृत की सरस्वती की
लुप्त वेद धारा
बहेगी फिर दूध और घी की अमृत-धारा
होगा धन्य-धन्य जीवन हमारा

जो भी करेगा इसका स्मरण
पूजेगा इसके चरण
होगा उसके सारे पापों का हरण

इस धारा की महिमा अपरम्पार
छूते ही डिजिटल का चमत्कार

ऑतंकवाद हो या सभ्यताओं का टकराव
बढ़ता हुआ तापमान
भूख-ग़रीबी या अकाल
पल भर में होगा सबका इंतकाल

उठो ! उठो ! हे पुण्यात्माओं
बजाओ विश्व-गुरु बाबा का डंका

भर लो कमंडलों में पवित्र जल
गाओ मस्त अविरल
मंगल मंगल मंगल

6.

बार्सीलोना का टैक्सी ड्राईवर

स्पेन का ख़ूबसूरत शहर बार्सीलोना
पर्यटकों को लगता बेहद मनमोहना

हाथों में हो जैसे हवा से भरा
रंग-रंगीला,चमकता,दमकता,इठलाता
ग़ुब्बारा कोई सलोना सा

अभी आप उसके रंगो को
प्यार से निहारना शुरू ही करते हैं
मस्ती में हवा में थोड़ा सा उछालते हैं
कि अचानक फट की आवाज के साथ
जैसे कोई विस्फोट हो जाता है
और आपके हाथों में बचा रहता है
बदसूरत,झुर्रियों से भरा,दाग़दार
लिजलिजा,चिपचिपा सा रबर

हाँ बिल्कुल वैसे ही फट पड़ा था
बार्सीलोना का वह टैक्सी ड्राइवर
जैसे हमारी किसी भूल से
खुल गये थे उसके मन के बंद कपाट
उबल पड़ा था भीतर का सारा आक्रोश

कुछ क्षणों में ही उसने
पंचर कर दी उस चमचमाते शहर की
शान-शौक़त की हवाई सूरत

स्पेनिश -भाषी ड्राईवर था वह
अंग्रेज़ी में नहीं लगता था उसकी गाड़ी का गीयर
दो-चार कदम चलकर ही अटक जाती थी उसकी गाड़ी
पर भाषा से कँहा अटकती है जीवन की गाड़ी

जैसे प्रेम और व्यथा के ढाई अक्षर
परिभाषित कर देते जीवन की कथा
मात्र चंद शब्दों में ही
बाँच दी उसने बार्सीलोना की पूरी पटकथा

बिग इंडस्ट्री,रिच मैन,पोलिटिशियन वैरी हैपी
करप्शन,कमीशन,कॉमन मैन,प्रोब्लम्स एंड प्रोब्लम्स
लाइफ़ वैरी डिफिकल्ट

जीवन का यह सूत्रधार
चंद सूत्रों में ही समझा गया
अपना ही नहीं, विषमता के संसार का पूरा सार।

7.

कार्ल मार्क्स के 198वें जन्मदिवस पर

जन्मदिन का उपहार

नहीं देना चाहती
तुम्हें कोई संबोधन
तुम हर बोधन से बड़े हो

तुम्हारा नाम ही सबसे प्रिय है मुझे

इसलिये हे मार्क्स !
आज तुम्हारे जन्मदिवस पर
देना चाहती हूँ
ख़बरों के दो उपहार

पहली खबर है स्वीडन से
शोषितों में भी शोषित
दुनिया की पहली शोषिता स्त्री के बारे में

वेश्यावृति अब मान ली गयी है वहाँ
औरतों और बच्चों के खिलाफ सामाजिक हिंसा
मजबूरी में देह बेचनेवाली औरत नहीं
देह ख़रीदने वाला पुरूष और समाज भी है अपराधी

सरकार ने ही मान ली है इसे
अपनी ज़िम्मेदारी
और देखो !
देखते ही देखते ये असाध्य सा रोग
अब लगने लगा है एक साध्य बीमारी

और,
दूसरी खबर है तुर्की से

आने वाले चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी की
सभी पाँच सौ उम्मीदवार बनी हैं महिलाएँ

नहीं यह किसी महिला अस्मिता
या किसी सामाजिक संतुलन की बात
शोषक समाज के विरुद्ध
सोच-समझ कर लिया गया निर्णय है

कहना है वहाँ की पार्टी का
महिलाएँ ही रहीं थीं सबसे आगे
उलट दिये थे उन्होंने अपने नाम लिखे सारे पुराने संबोधन
नहीं डरी थी वे आँसू गैस से
नहीं डरी थी पुलिस की गोली और डंडे की मार से
हिला दी थी उन्होंने ही शासन की चूलें
वे ही तो हैं दैनन्दिन शोषिता
सबसे शोषक, निर्मम निज़ाम की

इसीलिये
उन्हें ही, सिर्फ उन्हें ही बनाया है उम्मीदवार

है न खबर ज़ोरदार !

आज तुम्हारे जन्मदिवस पर
स्वीकार करो हमारा यह उपहार ।

8. 

तसलीमा नसरीन की आत्मकथा ‘दिव्खंडित’ को पढ़ते हुए  :

( 21 जुलाई 2015 पर इस्मत आपा को उनके सौवें जन्मदिन पर समर्पित)

सुनो आपा

तुम व्यभिचारिणी !
तुम पापाचारिणी !
तुम देशद्रोही। !
तुम विधर्मी !

तुम कुलटा, तुम कुलांगार
पहनाकर मारक अभियोगों के
सारे अंलकार
सजाकर तुम्हें शैतान
गुनहगार !
वधस्थल पर कर रहे
तुम्हारा इंतज़ार

तुम तो नहीं दोहरा सकती मसीहा का कथन
“ये नादान अपने करमों से हैं अनजान”
तुम तो बहुत अच्छी तरह गयी हो इन्हें पहचान

कि
धर्म और मज़हब के ये ठेकेदार
सदियों से चला रहे यही ख़ूनी कारोबार

कि
लोभ-लालच, झूठ-फ़रेब का इनका ये धंधा
अक़्ल और आँख को बनाए रखता है अँधा

कि
धर्म और मज़हब का नक़ाब पहने ये व्यवसाई
कैसे बन जाते हैं इंसानियत के कसाई

कि
कैसे एक इंसान सुरंजन बना दिया जाता है हिन्दू
कैसे एक इंसान हैदर बना दिया जाता है मुसलमान

देश और समाज की इस लज्जा को तुम करो उजागर
नहीं कर सकते स्वीकार, ये चतुर-चालाक सौदागर

जानती हो तुम
धर्म और मज़हब के पिंजरे
औरत की आज़ादी के हैं मक़बरे

फिर भी तुमने लिखी कविता ‘गोल्लाछूट ‘
अपने बचपन में ख़ूब खेलती थीं ये खेल लड़कियाँ
किन्तु हज़ार बंदिशों में बंदी जवान लड़कियाँ
चाह कर भी कभी खेल नहीं पाती ये खेल
पर आता है उन्हें याद बहुत यह खेल
तुम्हें भी आयी थी इसकी याद
और लिख डाली थी ये प्यारी सी कविता…
“मेरा मन होता है…
दुनिया की तमाम जवान-ज़हीन लड़कियाँ
लगा दें, गोल्लाछूट दौड़”

लिखी थी तुमने कविता ‘विपरीत खेल’
रमना पार्क की मासूम ग़रीब लड़कियों पर
मजबूरी में जो बेच रहीं थी खुद को
महज़ पाँच, दस और पन्द्रह टाका में
कभी तो बस मिलते थे मार-पीट और जूते
तुम्हारे ये पूछने पर कि मारते क्यों हैं ?
सुना था ना तुमने उनका जवाब –
‘शोक भया, मारे लगे, दिल भया, पीट दिया’।
उन सूजी हुई आँखों वाली
चोटों के निशान छिपाती
पाउडर और लिपस्टिक लगाती लड़कियों पर
ग़ुस्से और आँसुओं से लिखी थी
तुमने ये कविता…
“मेरा अब मन करता है,
पाँच-दस टाका में ख़रीद लूँ कोई छोकरा!
छोकरा ख़रीदकर, उसकी छाती-पीठ पर
ज़बर्दस्त लात जमाकर कहूँ – जा स्साला !”

फ़रवरी का पुस्तक मेला
तुम्हारे मन को देने लगता झूला
बाँग्ला भाषा और लेखकों का लगता था रेला
उस बार का मेला भी दिखा रहा था कई कमाल
तुम्हारी पुस्तकों ने मचा रखा था धमाल
विक्रेता हो रहे थे मालामाल
पाठकों का असीम प्यार
बड़े जतन से रही थी तुम संभाल

और फिर !
देखते ही देखते
सब बदल गया
जैसे कोई क़यामत आ गयी हो
अचानक ही जलने लगी तुम्हारी किताबों की होली
पाठकों की जय-जयकार के बदले
हवा में गूँजने लगी उपद्रवियों की हाय-हाय

बाँग्ला अकादमी का अध्यक्ष
हिक़ारत भरी निगाहों से दाग रहा था सवाल…
“औरत होकर मर्दों की तरह क्यों लिखती हैं ?
कोई नहीं लिखता आपकी तरह
कितना अश्लील और फूहड़ है यह सब
किसी लेखक के खिलाफ जुलूस नहीं निकलता
देखा था तुमने वहाँ !”
सभी मौजूद लेखक उसके समर्थन में गर्दन हिला रहे थे

और वो तसलीमा नसरीन पेषण कमेटी !
उसका वो छात्र नेता
कैसे धमका रहा था तुम्हें
“आप हमारी माँ-बहनों का सर्वनाश कर रही हैं
उन्हें घर-द्वार छोड़ कर निकलने को कह रही हैं
क्या है ये ‘गोल्लाछूट’ कविता
क्या है ये ‘जय-बांगला’ कविता
मैं जय-बांग्ला को नहीं मानता
यह तो अवामी लीग का नारा है”

तुमने उन्हें समझाया था
जय-बांगला सिर्फ अवामी लीग का नहीं है
जय-बाँग्ला का मतलब है आजाद बाँग्ला

घृणा से हँसने लगा था वो नेता
“ख़बरदार ! आगे से ये सब नहीं चलेगा”

तुम्हारा नाम, तुम्हारा सम्मान
जैसे सब हो गया म्लान
घोषित दुश्मनों के काफिले में अब
जुड़ गये थे तुमसे मन ही मन जलने वाले
तुम्हारे घोषित साथी भी

जानती हो ना तुम
संकट कभी अकेले नहीं आता
पूरी बारात साथ लाता है
घर वाले भी तोड़ देते हैं नाता
पितृ-सत्ता की लगाम थामे पिता को
नहीं सुहाती थी तुम्हारी यह स्वायत्तता
बेबस माँ ही किसी तरह निभाती तुम्हारा साथ
पर उस पर भी सब लगाये हुए थे घात
पीर कोठी का पीर माँ को दे रहा था धमकी
‘तुम्हारी बेटी काफ़िर है, तोड़ना होगा उससे हर नाता’

क्या जानती थी तुम ?
संगठित होकर पवित्र, पाक मूल्यों के सभी लठैत
बताकर तुम्हें निर्लज्ज, बेईमान, खानगी
देंगे तुम्हारी गर्दन मरोड़

और तो और
जिस अपनी जमात की ख़ातिर
क़लम को बनाया था हथियार
उसी जमात के लिये लड़ने का दावा करने वाले भी
नहीं थे तुम्हारे साथ खड़े होने को तैयार
तुम जैसी कुचर्चित, विवादित
लेखिका नहीं थी उन्हें स्वीकार

जानती हो ना तुम
अँध-भक्त रोबोट ही होते हैं
धर्म और शासन के प्राणाधार
तुम जैसे काफ़िर तो जहन्नुम के हक़दार

प्रतिवाद का नहीं तुम्हें कोई अधिकार
दोज़ख़ की आग ही तुम्हारा पुरस्कार !

पर सीमाओं और सरकारों के पहरेदार
देखकर हो रहे हैरान
बिना पासपोर्ट और विसा के भी
विचार कर जाते हैं सीमा पार

देखो ! कई लोग खड़े हैं तुम्हारी पाँत में
तुम जैसे और  भी कितने अभियोगी
सत्य, न्याय और संकल्पों के हठयोगी !
बताने को अपनी इंसानी जात !

तसलीमा नसरीन ! बनैला गुलाब !
कम नहीं होती ख़ुशबू की ताप !
ख़त्म  नहीं होती कभी
सत्य की आँच

सुन रही हो ना आपा !
अनगिनत क़दमों की थाप !
नहीं चलेगी फ़तवों की खाप
अपनी ही आग में जलकर
हो जायेगी राख।

9.

स्टिंग

यहाँ-वहाँ हर जगह
घूर रही है
कैमरे की आँखे मुझे

घूरती है
आतंकवादी की
चीते सी आँखे
और बंदूक़

उसके निशाने पे है
मेरी एक-एक हरकत
मेरी हर साँस

सावधान की मुद्रा में खड़े -खड़े
थक गयी हूँ मैं
उसके डर से कठपुतली की तरह
अभिनय करते-करते
क्या से क्या हो गयी हूँ मैं
जैसे मैं कोई इंसान नहीं
बंदरिया हूँ
नहीं, बंदरिया भी नहीं
क्योंकि उसे भी तो ग़ुस्सा आता है
वह भी विद्रोह करना जानती है

क्या इन घूरती आँखों ने
भूखे भेड़िये सी ललचायी आँखों ने
छीन लिया है
मुझसे मेरा वजूद
तार-तार कर दी है
मेरी चेतना
पी लिया है मेरा सारा गर्म लहू

क्या अब ज़िंदा नहीं हूँ मैं ?

डर से  रोने लगी हूँ मैं
रोते-रोते हँसने लगी हूँ मैं
ये क्या हो रहा है मुझे
कहीं पगला तो नहीं गयी हूँ
क्या हर पल की नजरदारी
काफी है किसी भी इंसान
को पागल बनाने के लिये
खुद से ही डरने लगी हूँ
सच कहूँ तो हर किसी से डरने लगी हूँ

भागना चाहती हूँ मैं
दूर, बहुत दूर
इन ख़ुफ़िया आँखों से
इस आतंकी पहरे से
जहाँ कोई भी मुझे इस तरह न देखे
जहाँ सिर्फ मैं हूँ
मेरी तन्हाई है
मुक्त हवा है, मुक्त मन है, मुक्त प्राण है।

10.
एक अकेली औरत का होना

एक अकेली औरत का होना
ख़तरे की सारी संभावनाओं के
योग का संभव होना

एक अकेली औरत का जीना
उसका
खाना-पीना और सजना
हंसना-रोना और गाना
चिरस्थायी आपातकाल के
सेंसरशिप के सांचों में ढलना

एक अकेली औरत का
सन्नाटे के कर्फ़्यू को तोड़कर निकलना
सारे अँधेरों को उनकी
औक़ात बताकर चिढ़ाना
रोशनी की तरह खिलखिलाना है
मीरा की तरह मर्ज़ी से गुनगुनाना है
एक अकेली औरत का इस्पात में ढलना है
बदलते हुए तेवर का नया इंसान बनना है।

11

लेसली उडविन

मैं भारत की बेटी निर्भया
तुम्हें सलाम करती हूँ

बेटियाँ चाहे इंडिया की हो या इंग्लैंड की
अमरीका की हो या अफ़्रीका की
या फिर पृथ्वी के और किसी भू-भाग की
सबकी पीड़ा की भाषा एक होती है

यह पीड़ा ही थी
जिसने मिटा दी थी सारी दूरियाँ
भूला दिये थे सारे भेद
भेद में क्या है अभेद
मन-मस्तिष्क में कैसे कैसे छेद

तुम्हारे कैमरे की आँखे
खोल रही थी सारे बंद दरवाज़े
बलात्कारियों के दिमाग़ के पुर्ज़े-पुर्जे
ओह! कितना मवाद भरा है यहाँ
कितनी बदबू, कितनी सड़ांध है यहाँ
कितना विभत्स दृश्य है यहाँ
हर औरत बस एक शिकार है यहाँ

कैसा नग्न सत्य है यह
ना क़ाबिले बर्दाश्त है यह

बंद करो !बंद करो ! बंद करो !
चिल्ला रहे हैं वे
सच्चाई से भाग रहे हैं वे
खुद से ही डर रहे हैं वे
धर्म और परंपरा के ठेकेदार हैं वे।

आओ उडविन !
मेरे हाथों में अपना कैमरा दो
देखो ! कैमरा अब भी वही देख रहा है

सत्य कहाँ बदलता है
है अगर यह कोई साज़िश
तो औरत के खिलाफ है यह साज़िश
आधी मानवता के खिलाफ है यह साज़िश
आओ! सब मिलकर करें बेपर्द इसे ।

12.

बदनसीब हम

हम बदनसीब हैं
और आप खुशनसीब हैं

हम बेहाल हैं
और आप ख़ुशहाल हैं

हम खस्ताहाल हैं
और आप मालामाल हैं

हम तो आम जन हैं
और आप महा-जन हैं

हम तो लोक हैं
और आप इसके तंत्र है

सारे भेद का
यही तो बस मंत्र है।

कमबख्त इज्जत का एड्रेस नहीं बदला अब तक

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियां और हिंदी कथा साहित्य: दूसरी  क़िस्त 
( रोहिणी अग्रवाल का शोध -आलेख .  हिन्दी साहित्य में ‘ बलात्कृत स्त्री की पीड़ा ‘ की अभिव्यक्ति का उन्होंने ‘ स्त्रीवादी’ पाठ किया है . ) 

पहली क़िस्त के लिए क्लिक करें : देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियां और हिंदी कथा साहित्य: पहली  क़िस्त 

बलात्कार सम्बन्धी स्त्री लेखन को विश्लेषित करते हुए दो अवस्थायें लक्षित की जा सकती हैं। पहली अवस्था में पीड़िता के मानसिक आघातजन्य अनुभवों को केन्द्र में रख कर परिवार तथा समाज के साथ उत्तरोत्तर असामान्य होते चलते सम्बन्धों का आकलन करते हुए स्थिति के उस विद्रूप को विशेष रूप से उभारा गया है,  जहाँ निरपराध पीड़िता मानसिक-भावनात्मक सम्बल पाने की बजाय कलंकिनी एवं अपराधिनी के रूप में सामाजिक दंड विधान की क्रूरता झेलने को बाध्य होती है। यह स्थिति अपनी सूक्ष्म व्यंजना में शब्दों से परे अहसास के स्तर पर एक सवाल भी उठाती है कि असल बलात्कारी कौन है – पुरुष विशेष या उसे अभयदान देता समाज? उल्लेखनीय है कि पहली अवस्था की इन रचनाओं में बलात्कारी जितना अमूर्त और अशरीरी है, दूसरी अवस्था की रचनाओं में विकृति का पुंजीभूत रूप बन कर वह उतना ही तिरस्कृत और विश्लेषित हुआ है। विशेष रूप से दसवें दशक में पनपी दूसरी अवस्था का लेखन आंसू और हाहाकार से भरसक पल्ला छुड़ाते हुए समस्या के सामाजिक-सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक-राजनीतिक कारणों के तटस्थ विश्लेषण में अधिक रमा है। जाहिर है जाने-अनजाने उस पर ब्राउन और जोन्स की उन पूर्वोक्त मांगों का प्रभाव पड़ा है जो किसी भी मानवीय समस्या को अद्भुत युद्ध-कौशल के साथ निपटाने और अपनी परिधि का विस्तार करने की ललक को अपने होने की पहली शर्त मानती हैं। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि उपन्यास की अपेक्षा कहानी के संक्षिप्त कलेवर में लेखिकाओं ने अपनी-अपनी तरह से समस्या का सांगोपांग चित्रण करते हुए इसकी विभीषिका को पैने ढंग से उजागर करने का प्रयास किया है, हालांकि यह तथ्य भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता कि बलात्कार को पहली बार ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ उपन्यास में एक सम्पूर्ण समस्या (घटना/स्थिति नहीं) का दर्जा देकर विस्तृत फलक पर विश्लेषित किया गया था।

निस्संदेह हिंदी कथा साहित्य में ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ पहली कथा-रचना है, जिसने निषिद्ध क्षेत्र में प्रवेश करते हुए स्त्री के अंतस्तल के उन आतंक भरे अंधेरों को चीन्हने का प्रयास किया है,  जिन्हें गहराने का संस्कार प्रत्येक व्यक्ति ( बेशक इसमें उदार एवं संवेदनशील व्यक्ति भी अपनी गूंगी निष्क्रिय निष्प्राण चुप्पी के साथ शामिल हैं) विरासत में पाता रहा है। ”आतंक का एक अपना एकांत होता है। एकांत की एक अपनी लिपि। भय का एक अपना सन्नाटा।”  रत्ती के अंतर्मन में रत्ती के साथ प्रविष्ट होकर कृष्णा सोबती उन निगूढ़ अंधेरों में घिर कर पाती हैं कि ”अंधेरे की प्रतिश्रुति मानवीय मन की जटिलता की खोज है। जोखिम भरी” जहाँ ”आड़ी खड़ी चट्टान की तरह पथरीली अहल्या ”है ; ”अपनी ही सड़क का डैड एंड ‘होने” और ”धुंआती गीली लकड़ी होने का तल्ख अहसास है’; हर बार अपराजेय भाव से हार जाने वाली लड़ाई लड़ने की नियति है ,लेकिन वीरानगियों के जंगल में पलते अंधेरे सूरजमुखी के बीज को कुचल डालने की क्षमता नहीं रखते। सूरजमुखी के बीज हैं, इसलिए उन्हें पुष्पाने के लिए सूरज को उगना होगा – हताशा और जिजीविषा के बीच छिड़े दुर्धर्ष संग्राम की अनिवार्य परिणति। इसलिए ‘आत्मावहेलना से पीड़ित’ रत्ती यदि उद्धत है – ”किसी से कुछ कहती नहीं हूँ, पर याद रखना अब छेड़खानी की तो छोडूँगी नहीं” तो स्वतंत्र अस्मिता से भासमान वयस्क परिपक्व स्त्री भी जो मन की देहरी को रौंद कर देह की अभ्यर्थना में नतशिर पुरुष को अपनी-अपनी सीमाओं का बोध कराना भी जानती है – ”सिर्फ अपने चाहने से दूसरे को पा नहीं लिया जाता। . . . पाने के लिए दोनों को एक-दूसरे को चाहना होता है।” सैक्सुअल फ्रिजिडिटी की शिकार रत्ती न ‘सैक्स के कुदरती बहाव से उदित सगे सम्बन्ध स्थापित कर’ पाती है, न ‘सम्बन्धों की ज़मीन पर सुरक्षा के तंबू गाड़’  सकती है, लेकिन फिर भी किसी के प्रति आक्रोश या प्रतिशोध नहीं। जीवन के प्रति रागात्मक आसक्ति ने उसकी जिजीविषा को जितना जिलाया है, उतना ही उसकी सोच को उदार और लचीला बनाया है। बेशक ‘बीमार बातें’   रत्ती के मैनरिज़्म का एक हिस्सा हैं और खुद अपने से लड़ी जाने वाली लड़ाई का एक अस्त्र भी, लेकिन ‘चील’ बन कर किसी के सुख पर झपट्टा मारना उसका अभिप्रेत नहीं। ‘कुमु बेटा! कितना मीठा!” – अपने ही मांस-मज्जा से बना अपना प्रतिरूप पाना यदि उसका स्वप्न है तो ”यहाँ उगेगा गाछ” – सृजन का भरपूर आत्मविश्वास भी है। बस, जरूरत है अनन्यता से अधिक पारस्परिकता के भाव से देह-मन एक-दूसरे को देने-पाने की समर्पित उत्कंठा की। रत्ती बलात्कार के निषेधात्मक प्रभावों तले दम तोड़ती स्त्री को बचाए रखने की बेचैन लड़ाई का प्रतीक है, जो अर्थभरी चुप्पियों और लम्बे-लम्बे डगों के साथ संदेही संकीर्ण समाज में अपनी सार्थकता और सम्मान को लौटा लाना चाहती है।



गौरतलब है कि जिस ठंडे सुलझे ढंग से रत्ती की मनोग्रंथियों को खोलते हुए उसकी पीड़ा भरी चीत्कारों के आवेग को कृष्णा सोबती ने गहन-गझिन जिजीविषा के बिंदु पर बांध लिया है, वह परवर्ती स्त्री लेखन में प्रायः आंसुओं की उफनती नदी में घिर कर आक्रोश और आत्मदया में घिर गया है। बेशक इस तथ्य को रेखांकित करना भी उतना ही जरूरी है कि आक्रोश और आत्मदया ने उन्हें व्यवस्था से लड़ने और आत्मबल संचित करने में भरपूर ताकत भी दी है। ‘कठगुलाब’ की स्मिता, ‘इदन्नमम’ की मंदा और ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया को एक कोष्ठक में रखते हुए भी उन भिन्नताओं की ओर संकेत करना अनुचित न होगा जो बड़े भाई के यौन अतिचार की शिकार प्रिया (छिन्नमस्ता) के बचपन को रौंद कर उसे असुरक्षा एवं अकेलेपन से धीरज और सामर्थ्य जुटाने की प्रेरणा देती हैं, जीजा के पाशविक बलात्कार से अनेक मनोग्रंथियों की शिकार स्मिता (कठगुलाब) को पलायन और हताशा की निरर्थकता से गुजार कर जीवन से सीधे जुड़ने का बल देती हैं तो परित्यक्ता कुसुमा भाभी की परिपक्व सोच सही एवं सामयिक नसीहत के माध्यम से बिरगवां गांव के कैलाश मास्टर के बलात्कार से क्षत-विक्षत बालिका मंदा (इदन्नमम) को दूरगामी मानसिक-सामाजिक परिणामों के बारे मेें सोचने का अवकाश ही नहीं देती – ”इतनी बड़ी ज़िंदगी में अच्छा-बुरा घट जाता है बिटिया, उसके कारन मन में गांठ लगाने से क्या फायदा। जो तुमने किया ही नहीं, उसके लिए अपने को दोसी क्यों मानना?  . . .अरे, उसकी जात हुई मैली जो हम पर धोखे से करती है हमला। . . .अपनी जिंदगानी के सही-गलत का निरनय तो हमें ही लेना हे बिन्नू। काट फेंको जीवन से इस कुघड़ी को। तुम अच्छत हो मंदा।”(इदन्नमम,पृ0 94-95) शायद यही वजह है कि अवचेतन में पड़ी खरोंच और ग्रंथि में उलझने की बजाय मंदा एक नई ताज़गी-स्फूर्ति-मिशन के साथ ज़िंदगी को चुनौती के रूप में लेती है, जिसके बारे में आन गांव में प्रसिद्ध है कि ”किसी भी लरका-बिटिया के संग जोर-जुलम नहीं होने देगी मंदा।” (वही, पृ0 333)

बलात्कार के साथ जुड़ा सामाजिक कलंक का भाव सीधे-सीधे यौन शुचिता की उस परंपरापोषित मान्यता का परिणाम है जो पुरुष/कबीले/समाज/धर्म/जाति को अचल जमीन और पशु संपदा की तरह स्त्री को हस्तगत करने का अलिखित अधिकार देेता है। इसलिए शत्रु को नीचा दिखाने के लिए उसकी चल-अचल सम्पत्ति छीनने की तरह उस समुदाय की स्त्री पर बलात्कार को महज एक रणनीति की तरह देखने का चलन रहा है। अपने अधिकारों के लिए सिर उठाते दलितों को मज़ा चखाने के लिए सवर्णों द्वारा दलित स्त्रियों से बलात्कार की वारदात हो या पाकिस्तान में ‘ऑनर किलिंग’ की बढ़ती संख्या, देह की कीमत पर स्त्री को पुरुष/जाति/धर्म की आपसी रंजिशों का खामियाजा भुगतना पड़ता है। ‘नष्ट लड़की नष्ट गद्य’ में ‘फायर गर्ल’ तसलीमा नसरीन का वक्तव्य कि ”चरित्र की कालिमा पुरुष तो चार इंच के कपड़े से ही पोंछ सकता है . . . और स्त्रियों के चरित्र की कालिमा बारह हाथ के कपड़े से ढंक कर भी नहीं छिपाई जा सकती”(पृ0 127) स्थिति के विद्रूप को नहीं उभारता, बल्कि समाज की जड़ सोच पर कुठाराघात करता है। ”लड़की की इज्ज्त तो कांच होती है . . . बाल बराबर तरेड़ पड़ी कि . . .” – सच घिनौना नहीं होता, सच को किसी एक खास दिशा में सर्जित और मजबूत करने वाली परिस्थितियां घिनौनी होती हैं जिनमें जरा सी खरोंच लगते ही हाहाकार करते आम आदमी की पुरजोर सहमति और सक्रियता ज्यादा मुखर होती है। व्यवहार और सिद्धांत – निरंतर दो स्तरों पर जीता है व्यक्ति, अपने आप से अपने को ‘डस’ सकने वाले सच से छिपाते हुए। इसी दुराव-छिपाव के बीच वर्जना बन कर आतंक पैदा करने की ताकत पाती हैं कमजोरियां और खोखली होती चलती हैं मूल्यधर्मी अंदरूनी ताकतें। कांच के साथ लड़की की इज्जत के मिथक को केन्द्र में रख कर लवलीन ‘सुरंग पार की रोशनी’ कहानी में आसन्न बलात्कार के भय से खौफजदा स्त्री की मनोव्यथा प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि उन कड़वी प्रतीतियों को ठोस रूप में उभारती हैं, जहाँ स्वतंत्र व्यक्तित्व सम्पन्न बुद्धिजीवी-समाजसेवी निर्भीक स्त्री स्वयं को ‘मादा’ समझने के अपमानजनक अनुभव से गुज़रने को बाध्य होती है। ”यही मेरी सार्वजनिक पहचान थी। मन, बुद्धि, प्राण, आत्मा से अलग महज एक शरीर – शरीर भी नहीं, महज एक सूराख।”  स्थिति तब और भयावह होती है जब बुद्धि, चेतना और संगठन के बल पर स्वयं को ‘विशिष्ट’ समझने का दंभ पालने वाली यह स्त्री एक ओर अपने को भंवरीबाई की तरह ‘तख्ती और नारे में बदलते हुए देख रही थी’ तो दूसरी ओर ‘मूढ़’ स्त्रियों के प्रति किए गए विश्लेषण को अपने पर राई-रत्ती लागू होते देख शर्मसार – ”उन्हें अपनी अस्मिता (अस्मत नही) के लिए अड़ना और लड़ना नहीं आता क्योंकि समाज की तरफ से उन्हें कोई सपोर्ट स्ट्रक्चर प्राप्त नहीं है। स्त्री अपने आप में अपूर्ण घटक है, कमजोर निर्बल फिनामिना है। स्त्री समाज के दबाव और शोषण के विरुद्ध प्रतिकार और विरोध भी दर्ज नहीं करा पाती।” (वही, पृ0 75) जब अस्मिता की लड़ाई से कहीं बड़ी हो जाती है अस्मत को बचाने की हड़बड़ी और लुटी अस्मत को सौ-सौ तालों में छुपाने की चौकसी, तब शेष रहती है एक ही नसीहत – ”जहर का घूंट पी ले बेटी, तभी सबको जीवन दान मिलेगा”  या मर्मांतक कटूक्तियां -”तू न मरी उन डेढ़ सौ सवारियों के साथ कुलच्छन।”  बेशक इस पलायनवादी पारंपरिक दृष्टिकोण को धता बता कर नई पीढ़ी की नवयुवती अदालत का द्वार खटखटाने लगी है, लेकिन सुपरिचित आत्मीय सम्बन्धों में सेंध लगा कर घुस आती अपरिचित अनात्मीयता से मुक्ति नहीं पा सकी है। चित्रा मुद्गल ने ‘प्रेतयोनि’  तथा उर्मिला शिरीष ने ‘चीख’ कहानी में जिस मुखर भाव से पारिवारिक सदस्यों – मां, पिता, भाई, बहन – की अपने-अपने तईं अतिरिक्त चिंता, असहज सांत्वना, और सामाजिक कलंक की आशंका से अपने ही खोल में दुबक जाने की निर्मम सजगता को बलात्कृता किशोरी के इर्द-गिर्द बुना है, वे उसकी पीड़ा को ग्लानि, ग्लानि को अपराध बोध तथा अपराध बोध को जीवन के प्रति वितृष्णा तक ले जाने वाले क्रमिक मानसिक व्यूहों की रचना करते हैं।

बलात्कार केवल पुरुष का स्वछंद यौनाचार या प्रतिशोधपरक वासना का विकृत रूप नहीं, वरन् स्त्री और उसके पूरे परिवार को धुरीविहीन कर डालने वाला जलजला है जिसकी भयावह धमक सब कुछ शेष हो जाने के बाद भी सभी दिशाओं में देर तक प्रतिगुंजित रहती है। ”बस, इतना ही है स्त्री का चरम गोपन रहस्य – छलात्कार या बलात्कार’ – अर्चना वर्मा की ‘जोकर’ कहानी में अनायास एक ही छत के नीचे जुट आई तीन स्त्रियां हंस-हंस कर तीन निर्द्वंद्व-स्वछंद ज़िंदगियां जीती दिखाई पड़ती हैं, लेकिन वे बेहतर जानती हैं कि ” यह हंसी रोने की बजाय हंस पड़ने के फैसले से निकली हुई हंसी है। इसलिए कमबख्त हर समय आती रहती है।”(हंस, अगस्त 1995, पृ0 44) कुशल फाइनेंस कंट्रोलर के रूप में प्राइवेट कम्पनी में कार्यरत चपला सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र में बलात्कार की शिकार होकर पुरुष मात्र से इस कदर भयभीत है कि साल छः महीने में एकाध बार घृणा, अपमान और आत्मधिक्कार के मर्मांतक दौर से गुजरने को बाध्य हो जाती है। पांच वर्ष की अवस्था में अपने ही चाचा की नियमित कामवासना का सुलभ पात्र बन जाने की मजबूरी ने विज्ञापन दुनिया की साम्राज्ञी सुपर मॉडल सुगंधा को ब्लैकमेलिंग के साथ-साथ देह को हथियार बना कर पुरुषों को नचाने की कला में माहिर अवश्य कर दिया है, लेकिन असल में ‘मातृका’ जैसी समाजसेवी संस्था से जुड़ कर प्रताड़ित स्त्रियों के जख्मों पर फाहा रखने के प्रयास में वह अपने भीतर की अंधेरी अरक्षित दुनिया के बीहड़ों को कम कर लेना चाहती है। और कथावाचिका मिसेज प्रतिभाकांत? भले ही ‘मातृका’ के संस्थापक और उत्साही समाजसेवी पति के सान्निध्य में पकी परिपक्व सोच के कारण  सूनी दोपहरी की निर्जनता का लाभ उठा कर बलात्कार के असफल प्रयास में अपने पर ही लज्जित हो उठने वाले ”अधगंजे, अधबूढे . . ज़िंदगी से बेजार, कंकाला बीवी या दुष्टा बहू के सताए हुए से दीखते आदमी”(वही, पृ0 50) की किसी अनाम कुंठा पर ठठा कर हंस पड़ती है (और बाद में बलात्कार नहीं, ग्लानिजन्य हिंसा का शिकार बनती है), लेकिन यह घटना शशिकांत के भीतर छिपे ‘निखालिस’ पति को आहत करने को पर्याप्त है। पति – जिसके पास है अकूत वर्चस्व, वैधानिक स्वामित्व, क्षमा-संरक्षण का पुख्ता अधिकार। लेकिन इन सबसे बेखबर पत्नी इन्हें ले ही न, तो? बलात्कारी के कुंठित प्रयास पर हंस दे और ‘यूं ही आए गए’ भाव से घटना का बयान कर रोजमर्रा के जीवन में जुट जाए, तो? सच कहा है ‘स्त्रिश्चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम् देवो न जानाति कुतो मनुष्याः’। संदेह और वितृष्णा, हिंसा और आतंक – इन हथियारों से ही तो साधना पड़ेगा न उसे पत्नी को। ”उनके यूं टूट पड़ने, नोचने-खसोटने, पटकने से मुझे फिर उसी फोटोग्राफर की शक्ल दिखाई दी। मानो उनके लिए यही असली तृप्ति थी, यही हिंसा। इसके पहले जो हम नितांत निजी एकांत में देह और मन का एकाग्र संगीत रचा करते थे, वह दरअसल किसी असली चीज़ की फीकी, बेरंग धूमिल सी अनुकृति भर थी। . . . फिर मेरे लिए उसमें न कुछ निजी रहता, न एकांत। तब जो नहीं हुई थी अपनी देह से, वह घिन अब होने लगी। लाख नहाने पर भी न छूटती। फिर वही घिन शशिकांत से भी होने लगी। उनका देहांत मेरे लिए छुटकारे की सांस थी। उनके लिए भी। मतलब सांस नहीं, छुटकारा।” (वही, पृ0 51)
यहीं वह नरक है जो सम्बन्धों में छिपी सड़ांध को झेलने और जिलाए रखने को बाध्य करता है, भले ही बलात्कारी खुद पिता ही क्यों न हो और उस नर-पिशाच की दैहिक-भौतिक भूख की तृप्ति हेतु उसे वेश्यावृत्ति क्यों न करनी पड़े। समाजशास्त्रीय आंकड़े इस तथ्य की गहरी पुष्टि करते हैं कि बलात्कार की शिकार स्त्रियां वेश्यावृत्ति के लिए प्रवृत्त कर दी जाती हैं या आरोपी सम्बन्धी और परिवार की स्त्रियों की जुबान सी कर रखने की नसीहत तले एक बड़ा झूठ सलीब की तरह ढोने के लिए विवश कर दी जाती हैं। यहाँ दूर्वा सहाय की कहानी ‘जिरह’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है जहाँ बलात्कार के आरोपी प्रभात की मां की मनोवेदना और मंथन को केन्द्र में रख कर लेखिका उसके अतीत को बलात्कृत बारह वर्षीया लड़की के वर्तमान के साथ जोड़ कर एक अनाम से सखीभाव का अंकुरण करती है। बलात्कारी बेटे की मां के रूप में उसकी पीड़ा को जिस प्रकार बलात्कार/यौन छेड़छाड़ से भरपूर बचपन की कंटीली स्मृतियां तार-तार कर फरियादी के निकट ला खड़ा करती हैं, वह सामाजिक न्याय के लिए गुहार लगाती स्त्री की अंतश्चेतना की पहली स्प्ष्ट एवं निर्भीक अभिव्यक्ति है। एक ऐसी मानवीय स्थिति जहाँ सम्बन्धों के दबाव और ‘इज्जत’ के छल तिरोहित होकर स्त्री की रौंदी गई मानवीय गरिमा को न्याय दिला सके।

स्त्री देह के साथ जुड़ी पुरुष जाति की ‘इज्जत’ ने अपना पता बदला हो या न हो, स्त्रियां अब इन छद्म आवरणों को उतार फेंकने को व्यग्र हैं। बेशक ”काश् ऐसा होता कि मस्तिष्क की कोई नस काट कर फेंक दी जाती ताकि हम बेजान हो जाते . . . क्यों नहीं मेरी स्मृतियों पर विक्षिप्तता छा जाती? मैं मर जाती”  – उस चोट की मर्मांतक प्रतिध्वनियां हैं जिसके चिन्ह आत्मा की गहराइयों तक खुद गए हैं, लेकिन एक वक्त का हाहाकार पूरे जीवन का सत्य नहीं बन सकता। मनुष्य के मानस की जटिल संरचना में महीन तंतु की तरह लिपटी जिजीविषा ऐसी संजीवनी बूटी है जो सिर्फ रोग का उपचार नहीं करती, रोग के उन्मूलन में जुट जाती है। इसलिए अपने चारों ओर बुने जा रहे डर से उबर कर यह स्त्री पहले अपने आप से ही पूछ लेना चाहती है कि उसे ”देह को लेकर तड़पते रहना है या आत्मा की आवाज पर चलना है।”(वही, पृ0 143) यकीनन आत्मा की आवाज़ पर क्योंकि जिजीविषा और अंतरात्मा में जैसा सघन-आत्मीय संवाद होता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। ”उस भेड़िए को मैं कभी माफ नहीं कर सकती, चाहे मेरी अपनी ज़िंदगी गर्क हो जाए।”  परिवार की जानलेवा नफरत और बलात्कारी नरेश के प्रतिष्ठित-सम्पन्न माता-पिता की ओर से विवाह प्रस्ताव (मामले को रफा-दफा करने का प्रलोभन मात्र) – दोनों को समान निर्लिप्त संकल्पबद्धता से ठुकरा कर लम्बी अपमानित कर देने वाली अदालती कार्यवाही से गुज़र कर अपराधी को आठ साल का दंड दिला देने के बाद ही सहज हो पाती है कथावाचिका की फरियादी बहन। बेशक ‘इज्जत’ तो उसने खो दी है। खबर फैलते ही मंगनी टूटना, खामोश भाव से अपनी चरित्रहीनता की कल्पित कहानियां सुनना और पिता द्वारा सपरिवार ‘इज्जत’ बचाने के प्रयास में जमी जमाई घर-गृहस्थी-व्यापार उखाड़ कर दूसरे शहर में स्थानांतरित हो जाना – इज्जत के नाम पर पीड़िता का मनोबल तोड़ने के प्रयास तो हैं ही, साथ ही निर्दोष होते हुए भी अपराधी की नाईं ज़िंदगी गुजारने की घुट्टी भी। लेकिन कोई भी नई परिभाषा गढ़ने के लिए पुरानी कसौटियों और लकीरों को त्यागना तो होता है न! ”यहाँ जैसे चींटे हैं, मच्छर हैं, खटमल हैं, वैसे ही मर्द भी हैं। क्या जरूरी है कि शेर, भेड़िया, भालू ही कहो? उपमान ही तो हैं, बदल दो।”  कसक से संकल्प में पर्यवसित होता स्त्री लेखन ‘बीइंग’ से ‘बिकमिंग’ तक की प्रत्यक्ष ऊर्ध्व यात्रा ही तो है, साथ ही समाज से अपनी मानवीय गरिमा छीन लेने की प्रत्यक्ष घोषणा भी।

‘विवाह का अर्थ है बलात्कार महोत्सव’
स्त्रीवाद के उग्रतर होते चलने के साथ ही विवाह संस्था को वेश्यावृत्ति तथा बलात्कार के साथ जोड़ने का चलन अकारण या जबरन नहीं है, रति सम्बन्धों में स्त्री को निष्क्रिय (पैसिव) पार्टनर मान उसकी योनिकता पर पुरुष अंकुश के सामंती दंभ का विरोध है। ”औरत की देह औरत का देश है”  कह कर रघुवीर सहाय जैसे उदारवादी लेखक-विचारक स्त्री की मानवीय अस्मिता के संरक्षण को उसका मौलिक अधिकार मानते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि कानून के मर्दवादी दृष्टिकोण के चलते क्या ऐसे ‘मौलिक अधिकार’ का ग्रासरूट तक संक्रमण संभव है? अरविंद जैन ‘औरत होने की सजा’ में पेच-दर-पेच जटिलताओं का पिरामिड खड़ा करते कानून की आंतरिक संरचना के अंतर्विरोधों और दुर्बलताओं (लूपहोल्स) को खोलते हुए बताते हैं कि जहाँ भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 375 (6) के अनुसार किसी भी पुरुष द्वारा सोलह वर्ष से कम आयु की स्त्री की सहमति/असहमति से उसके साथ संभोग करना बलात्कार है, वहीं ”अपनी ही पत्नी जिसकी उम्र पंद्रह साल से कम न हो, के साथ सहवास करना बलात्कार नहीं है।” (वही, पृ0 55) विचित्र विडम्बना है कि यह वही कानून है जो 18 वर्ष से कम आयु की लड़की के विवाह को ‘बालविवाह’ का नाम देकर गैरकानूनी मानता है। दूसरे, ‘मनुष्य’ होने की तमाम संवेदनाओं से परे सहवास हेतु पत्नी की सहमति/असहमति जैसे सवाल पर विचार करने की जरूरत नहीं समझता। हालांकि हिंदी कथा लेखन में वैवाहिक बलात्कार की यंत्रणा झेलती स्त्री की मानसिक व्यथा का उद्घाटन अपेक्षाकृत कम हुआ है,  किंतु मृदुला गर्ग ‘चितकोबरा’ उपन्यास तथा ‘तुक’ कहानी में स्त्री के अंतरंग को दो भिन्न दृष्टियों से प्रस्तुत करती हैं। व्यंग्य की नुकीली धार के साथ कथानायिका मीरा (तुक) के वक्तव्य के जरिए पहले वे ‘व्यवसाय’ के रूप में स्त्री का दैहिक-मानसिक, बौद्धिक-भावनात्मक शोषण करने वाली विवाह संस्था के बर्बर रूप को उद्घाटित करती हैं  , फिर वेश्यावृत्ति और बलात्कार में अंतर्लीन होते इसके डगमगाते असंतुलित स्वरूप को। पति को लौकिक आकर्षणों (क्लब और ब्रिज के खेल) से दूर कर समग्रतः पाने के प्रयास में वह अनायास अपने को ‘वेश्या’ रूप में पाती है  तो उसके मूड के अनुरूप (ब्रिज में हार और जीत) सहवास के नाम पर उग्रता  और अनुकंपा  को बलात्कार के रूप में। ”अपनी हार का मुआवजा वह मेरे बदन के सिवा वसूल करता भी कहाँ से? तभी मेरी समझ में आ गया कि उसके लिए ताश का खेल भी बैंक में नौकरी की तरह एक व्यवसाय है और मैं वह फुटकर कैश जिसका प्रयोग वह व्यवसाय में हुए नुकसान को भरने के लिए या लाभ पर खुशी मनाने के लिए करता है।” (तुक, पृ0 116) हालांकि पति के प्यार में डूबी स्त्री छवि के मिथक में बांध कर निरंतर अपराध बोध से अपने आपको निहारने वाली इस कथानायिका की नियति की ओर लेखिका ने कोई स्पष्ट संकेत नहीं किया है, किंतु इस कहानी के पूरक पाठ के रूप में ‘वितृष्णा’ कहानी उन त्रासद परिणतियों की ओर अवश्य संकेत करती है जहाँ बलात्कार और वेश्यावृत्ति के बीच अपनी मानवीय इयत्ता खो डालने की संवेदनशून्यता से उपजी यांत्रिकता सम्बन्धों की रागात्मकता को लील चुकने के बाद सामाजिक संस्थाओं की उपयोगिता पर बड़ा सा सवाल खड़ा करती है।

दूसरी दृष्टि ‘चितकोबरा’ उपन्यास में स्त्री के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को देह और दिमाग दो खंडों में विखंडित कर देने के उद्योग में जुटी विवाह संस्था की चूलों पर कुठाराघात करती है जहाँ बार-बार किए जाने वाला बलात्कार आदत में शुमार होकर मनोभूमि को बेहद बंजर बना देता है। ”आज रात महेश मुझे प्यार करेगा” – चेतना के द्वार पर पत्नी-कर्त्तव्य की दस्तक और मनु का ‘आपरेशन से पहले मरीज की सफाई करती नर्स की तरह’ पूरी तरह शरीर में तब्दील हो जाना – न, ‘बलात्कार’ की कानूनी परिभाषा के मुताबिक असहमति या वितृष्णा का एक भी बिंदु नहीं यहाँ। लेकिन रतिक्रिया के दौरान शरीर पर खेले जा रहे एक-एक दांव-पेंच से वाकिफ उनकी क्रमिक प्रतीक्षा में ‘एक लम्बी सीत्कार के साथ जड़’ हो जाने तक के यवनिका पात का दृश्य देह और मन के एकाग्र संगीत की उस अनिवार्य स्थिति का विलोम है जिसकी अनुपस्थिति में स्त्री के लिए पति ठीक उसी तर्क और अनुपात में बलात्कारी हो जाता है जिस तर्क और अनुपात में पुरुष के लिए अंधेरे की चादर में दुबकी हर बिल्ली काली और हर स्त्री काली बिल्ली।

विवाह संस्था के स्वरूप की गहरी पड़ताल करते हुए मृदुला गर्ग हिंसा के पाशविक प्रदर्शन से अछूती उस स्थिति में भी बलात्कार की क्रूरता को देख पाती हैं, जहाँ अतिरिक्त दुलार-पुचकार को हथियार बना पति अपनी पत्नी का मानसिक-भावनात्मक शोषण कर उसकी स्वतंत्रता और इयत्ता को चकनाचूर कर देता है। अंततः बलात्कार अति गूढ़ व्यंजना में स्त्री की पुष्ट अस्मिता को छिन्न-भिन्न करने का पौरुषयुक्त षड्यंत्र ही तो है। ”हम अपना बच्चा बनाएंगे, फ्लैश ऑव अवर फ्लैश” – मातृत्व पाने के लिए तड़पती मारियान को बहका-फुसला कर उसके मानस उपन्यास ‘वुमैन ऑव द अर्थ’ को हड़प कर अपने नाम से प्रकाशित करवा डालना एक ओर जेल्डा फिटजेराल्ड की त्रासदी का विस्तार है ै, तो दूसरी ओर वैवाहिक बलात्कार के इस शातिर-सूक्ष्म स्वरूप को चीन्हने की जरूरत का आह्नान भी। सवाल उठता है कि बलात्कार की परिभाषा और कोटि का निर्धारण पुराने वक्तों की (अधिकांश कानून मूलतः 1860 के हैं जिनमें समय-समय पर पैबंद लगाने और रफू-मुरम्मत करने के अंदाज में छोटे-मोटे संशोधन-परिवर्धन हुए है।) पुरुष दृष्टि से ही क्यों? घूंट-घूंट वेदना पीती स्त्री दृष्टि और न्याय से क्यों नहीं?

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए आवेदन / संस्तुतियां आमंत्रित

स्त्रीकाल के द्वारा द्वितीय  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए आवेदन / संस्तुतियां  30 नवम्बर 2015 तक आमंत्रित हैं.

पिछले वर्ष (2014) से प्रारंभ यह सम्मान हिन्दी की  मूल या भारतीय भाषाओं से हिन्दी  में  अनुदित स्त्रीवादी वैचारिकी  की किसी एक किताब के लिए उसके लेखक ( स्त्री या पुरुष ) को दिया जाने वाला है . प्रथम  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ शर्मिला रेगे को दिया गया था . सम्मानित लेखिका /  लेखक को 12 हजार रुपये की राशि प्रदान की जायेगी . द्वितीय ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए  2009 से 2014 तक  छपी किताबें शामिल की  जायेंगी .

आवेदन या संस्तुतियां  भेजने की अंतिम तिथि : 30 नवम्बर 2015 

निम्नांकित पते पर आवेदन और संस्तुतियां भेजें  :
अनिता सिंह , द्वारा नरेश शर्मा Wz43c , पोसंगीपुर , जनकपुरी , नई दिल्ली -110058

किताबों की  दो प्रतियां अपेक्षित हैं . 5  सदस्यों की सदस्यता वाला एक  निर्णायक मन्डल  सम्मान की जाने वाली  एक किताब को संस्तुतित / चयनित करेगा . 

इस संदर्भ में किसी भी विशेष जानकारी या स्पष्टता के लिए   ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के  समन्वयकों से सम्पर्क करें:
निवेदिता : niveditashakeel@gmail.com, 09835029152
राजीव सुमन rajeevsuman@gmail.com,  09650164016
धर्मवीर सिंह : singhdharmveer85@yahoo.in, 8800671615

देह के द्वार पर अनादृत स्त्रियां और हिंदी कथा साहित्य: पहली क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

( रोहिणी अग्रवाल का शोध -आलेख .  हिन्दी साहित्य में ‘ बलात्कृत स्त्री की पीड़ा ‘ की अभिव्यक्ति का उन्होंने ‘ स्त्रीवादी’ पाठ किया है . ) 


एक साथ बहुत सी बातें कह देना चाहती हूँ-कुछ सनसनीखेज मारक तथ्य,  कुछ दहशतभरी अमानवीय खबरें, मूक क्रंदन में छिपे प्रतिशोध को उभारती कुछ मार्मिक कविताएं। एक सी प्राथमिकता और गंभीरता के साथ। तथ्यों को सिलसिलेवार संजोने का प्रयास करती हूँ , तो निर्जीव गणितीय आंकड़े एक ओर आधी दुनिया की यातना के इतिहास का खुलासा करने लगते हैं
कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 54 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार होता है, 
कि पुलिस के मुताबिक 80 फीसदी बलात्कार नियोजित होते हैं,
कि बलात्कार के सोलह फीसदी मामले ही पुलिस थाने में दर्ज हो पाते हैं,  जबकि करीब 84 प्रतिशत महिलाएं तरह-तरह के दबावों के अधीन एफ. आई . आर तक  दर्ज नहीं करा पातीं, 
कि सौ में से बमुश्किल चार बलात्कारियों को ही अदालत से दंड मिल पाता है। शेष समाज में सरेआम सीना तान कर सम्भ्रांत अभिजन की ज़िंदगी जीते हैं, 
कि 2001,  यानी महिला सशक्तीकरण वर्ष के प्रारंभिक महीनों में दिल्ली में हुए एक सर्वेक्षण के जरिए सामने आए बलात्कार के 366 मामलों में 321 आरोपी परिवार के ही सदस्य थे, 
कि छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की 80 प्रतिशत घटनाओं में अभिभावकों का हाथ होता है,  

तो दूसरी ओर दूसरी आधी दुनिया ( पुरुष समाज) की सामंती मानसिकता का उद्घाटन करते हैं : 

कि चंडीगढ़ के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलेपमेंट एंड कम्यूनिकेशन की महिला उत्पीड़न विषयक वर्ष 2000 के सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार 52 फीसदी पुरुष पीड़ित महिला के ‘ अनुचित पहनावे,  व्यवहार और चाल- चलन को बलात्कार-छेड़खानी  का मूल कारण मानते हैं , तो 54 फीसदी लोग बलात्कार के लिए पुरुषों के दुराचार की जगह शराब के नशे को जिम्मेदार ठहराते हैं,
कि दिल्ली पुलिस के आयुक्त आर. एस . गुप्ता  का कहना है कि महिलाएं पहनावे में सावधानी बरतें,  अपनी सीमाएं पहचानें और असुरक्षित व्यवहार न करें तो उनके खिलाफ अपराध 50 फीसदी तक घट जाएं।’ 

आंकड़ों के बाद आंकड़ों की पुष्टि करती कुछ  ‘ खबरें ‘  जो यकीनन अखबारी कॉलम से बाहर निकल कर सत्ता और व्यवस्था,  व्यक्ति और समाज सबको अपने-अपने गिरेबान में झांक लेने का आग्रह करती हैं 
कि नशे में धुत सलीम खान ने मुम्बई के चर्च गेट और बोरीवली के बीच उपनगरीय ट्रेन में मानसिक रूप से विक्षिप्त एक बारह वर्षीया लड़की के साथ बलात्कार किया। इस अमानुषिक घटना के साक्षी सात मध्यवर्गीय शिक्षित यात्री थे,  जो अपनी सुविधाजन्य कायरता (स्वार्थपरकता या असंलग्नता)  के कारण इस अमानुषिक कांड के मूक दर्शक बने रहे। 
कि एक साल से पुंछ जेल में कैद पाकिस्तानी महिला परवीन अख्तर उर्फ शहनाज ने 1996 में जेल के हैड वार्डन मुहम्म्द दीन के बलात्कार का शिकार हो मोबिन नामक कन्या को जन्म दिया जिसे मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप ने भारतीय नागरिकता अवश्य दिलवाई, लेकिन शहनाज की नागरिकता,  यौन शोषण और न्याय जैसे जटिल अंतर्सम्बद्ध मुद्दों पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई। उसका पूरा भविष्य पुंछ जेल के हैड वार्डन की ‘ सदाशयता ‘  पर टिका है,  जो चाहे तो उसे अपनी बीवी कबूल कर जिल्ल्त से छुटकारा दिला सकता है, अन्यथा उसका क्या है। पुरुष है,  पुलिसकर्मी है,  बलात्कार का मुकद्दमा वर्षों घसीटने और बेदाग छूटने की बारीकियां जानता है। 



तो क्या सचमुच ‘ योनि’ ही  है नारी? बकौल अमृता प्रीतम पुरुष के तन, मन और जेहन के नाप की बनी जरूरतों,  संस्कारों और जेहनियत की वरदी पहनने को अभिशप्त ?   उसकी सारी शारीरिक,  मानसिक,  नैतिक विकृतियों-दरिंदगियों को गर्भ में पाकर अनचाहे मातृत्व को सहेजने को विवश?
‘ माँ एक जुल्म को कोख में उठाती रही, और उसे अपनी कोख से एक सड़ांध आती रही,
कौन जान सकता है, एक जुल्म को पेट में उठाना,     हाड़- मांस को जलाना।’

‘ तुम लोग हमसे इतनी घृणा क्यों करते हो ?’ 


बलात्कार स्त्री के निजत्व पर गहरी चोट है। जर्मेन ग्रीयर इसे “ पुरुष  की स्त्री के प्रति अदम्य कामना या जबर्दस्त आकर्षण के बाध्यकर प्रत्युत्तर की अभिव्यक्ति”  मानने की बजाय ” आत्मवितृष्णा से जन्मा,  घृणा के पात्र पर किया गया हत्यारी आक्रामकता से भरा कृत्य” ( विद्रोही स्त्री,  पृ0 229)  मानती हैं। वे जानती हैं कि स्त्री के प्रति ” अपनी घृणा की गहराई खुद पुरुष भी नहीं जानते”  और चकित हैं कि पुरुष की हर अमानुषिकता को अपनी नियति स्वीकार करने वाली स्त्री ने कभी पलट कर उससे यह क्यों नहीं पूछा कि “तुम लोग हमसे इतनी घृणा क्यों करते हो? ”  बेशक समूची विश्व संस्कृति नारी को पूज्या,  श्रद्धा,  देवी कह कर महिमामंडित करती रही है,  लेकिन उसके पीछे छिपी पाखंडपूर्ण कुटिलता और हीनता ग्रंथि को क्या इतनी सरलता से नज़रअंदाज किया जा सकता है ?  जर्मेन ग्रीयर जे मैकग्रिगॅर एलेन के वक्तव्य को उद्धृत कर पुरुष के घृणा- मनोविज्ञान को एक तथ्य की तरह प्रस्तुत करती हैं – “मैं  जानता हूँ कि नैतिक श्रेष्ठता की यह स्वीकृति जिसे साधारण पुरुष स्त्रियों को अर्पित करने को इतने तत्पर रहते हैं,  उन बहुत सी सुविधाओं से वंचित किए जाने की रिश्वत है,  जो उन्हें पुरुषों के बराबर स्तर पर पहुँचा देतीं। मुझे ऐसा खासतौर पर इसलिए भी लगता है क्योंकि व्यक्तिगत रूप से स्त्रियों के प्रति बहुत विनम्र,  उन्हें फरिश्ता वगैरह कहने वाले लोगों के मन में असल में उनके लिए गहरी अवमानना का भाव रहता है।” ( वही पृ0 233)  महादेवी वर्मा पुरुष की घृणा ग्रंथि को हीनता ग्रंथि का नाम देकर इसे घनीभूत करने वाले कारकों -भय,  असुरक्षा,  एकाकीपन – को रेखांकित करना नहीं भूलतीं , जो स्त्री की स्वभावगत स्निग्धता,  सम्पूर्णता और संतान को जन्म देकर सक्षम बनाने में संलिप्त एकनिष्ठ दायित्वशीलता के बरक्स उसे बेहद बौना,  कुंठित और संहारक बना देते हैं। घृणा का आक्रामक विस्फोट जहाँ आत्मदया से त्रस्त पुरुष का अपने को एसर्ट करने का लाचार हथियार है,  वहीं स्त्री-गुणों को दुर्बलता में पुनर्व्याख्यायित करने के सचेष्ट सामूहिक प्रयास शारीरिक संपुष्टता के आधार पर अपनी वर्चस्व-प्रतिष्ठा की खिसियानी प्रतिक्रियाएं हैं।

जर्मेन ग्रीयर

यही वह पुरुष मनोवृत्ति है जो पहले स्त्री, फिर उसके मादा  अंग के प्रति सम्मान न रखने की सार्वभौमिक  घटनाओं की अनवरत श्रृंखला के जरिए स्त्रियों के आत्मसम्मान को न्यूनतर करते हुए इस सीमा तक शून्य कर देती है कि वह पुरुष के लिए ‘ अपने शुक्राणु उंडेल’  सकने लायक ‘ एक बर्तन’ , ‘ एक तरह के मानवीय पीकदान’  में तब्दील हो जाती है तो दूसरी ओर अपनी शारीरिक संरचना,  प्रकृति और ‘ जनाना मानसिकता’  से भयातुर होकर उसे बदल डालने को लालायित रहती है।  निस्संदेह पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के सुदृढ़ स्तम्भों के नीचे अहेरी पुरुष की मनोवृत्तियों को चीन्हना ज़रा भी कठिन नहीं। जर्मेन ग्रीयर बलात्कार के कारणों को विश्लेषित करते हुए उसके पीछे सक्रिय दो उत्प्रेरक घटकों पर विशेष बल देती हैं। एक,  समूचे दिक-काल  में सैक्स के साथ जुड़ा घृणा एवं वर्जना का भाव जिस कारण पुरुष न अपनी लैंगिकता से तालमेल बैठा पाता है,  न स्त्री को लैंगिक प्राणी से इतर किसी ‘पूर्ण’  रूप में देख पाता है। चूंकि उसे ‘काम’  को घृणित मानना सिखाया गया है, लेकिन काम का उत्ताप उसे उन्मत्त बना डालता है,  इसलिए कामतृप्ति के उन्माद में ‘वितृष्णा  के दलदल में गिर जाने के बाद तमाम शर्म और बाध्यता को अपनी भागीदार के मत्थे मढ़ कर’ ( वही,  पृ0 231)   वह अपनी छवि सदैव धो-पोछ कर निष्कलुष रखना चाहता है। भारतीय पौराणिक और मिथकीय साहित्य में ऋषि-मुनियों के तप भंग के लिए मेनका-उर्वशी आदि अप्सराओं को ‘ नरक का द्वार’  तथा  ‘ ठगिनी’  कह कर ‘  बेचारे ब्रह्मचारी’  ऋषि-मुनियों को ‘क्लीन चिट’  देने के उदाहरण प्रभूत मात्रा में उपलब्ध हैं। पुरुष मानसिकता की गहरी चीरफाड़ करती वे कहती हैं कि पुरुषों के लिए यदि अनुपलब्ध (संभ्रांत)  स्त्रियां ‘कुतियाएं’  हैं तो उपलब्ध लडकियां ( वेश्याएं एवं कॉलगर्ल्स )  ‘ कचरा’,  जिनके पास  से गुजरते हुए अश्लील बातें फुसफुसाना और उनकी लज्जा और बड़बड़ाहट को उस पाशविक कामना ( सैक्स में रुचि )  के अपराध का प्रमाण मान कर स्वयं को निष्कलुष सिद्ध करना आत्मप्रवंचना का प्रमाण नहीं तो और क्या है। यहाँ पुनः उन आंकड़ों की ओर संकेत करना अकारण नहीं होगा जो बलात्कार के लिए स्त्री के चाल-चलन और उत्तेजक परिधान को उत्तरदायी मानते हैं। जर्मेन ग्रीयर की दृष्टि में दूसरा कारण पुरुष की हीनता ग्रंथि में निहित है, जो स्त्री के साथ सहज दैनंदिन सम्बन्धों में भी उसे आशंकित और भयाक्रांत रखता है।  लेकिन स्थिति विडंबनात्मक स्वरूप तब ग्रहण कर लेती है, जब पुरुषों का पथानुगमन करते हुए स्त्रियां पुरुषों से नहीं,  खुद अपने प्रति वितृष्णा का अनुभव करने लगती हैं। अतः जरूरी हो जाता है कि स्त्री के यौन शोषण और उत्पीड़न के लिए पुरुष मनोविज्ञान की जटिल संरचना को समझते हुए स्त्रियां रूढ़ छवियों से मुक्ति पाकर पहले अपने अस्तित्व और अस्मिता को दृढ़तर मानवीय संदर्भों में देखें और फिर अपनी लड़ाई के लिए एक सुविचारित रणनीति तैयार करें। जोन्स और ब्राउन ने अपने ऐतिहासिक ‘ टूवर्ड्स ए वीमेंस लिबरेशन मूवमेंट’  में कुछ मांगें प्रस्तुत की हैं, जिन्हें अनदेखा करके नई स्त्री छवि गढ़ना संभव नहीं। इनमें से कुछ उल्लेखनीय मांगे हैं:
स्त्रियों को अपना खुद का इतिहास जानना चाहिए क्योंकि उनका एक स्पृहणीय इतिहास है,  एक ऐसा इतिहास जो उनकी बेटियों में गौरव का भाव भरेगा….  हमारी सुधरी हुई स्थिति कई साहसी स्त्रियों के उद्यम से संभव हुई है। उन्हें छोड़ देने के बजाय हमें उनसे सीखना चाहिए और एक बार फिर लक्ष्य प्राप्ति के अभियान में उन्हें जुटने देना चाहिए। स्त्रीवादी साहित्य,  स्त्रीवादी इतिहास की बाजार में मांग है। हमें उसे उपलब्ध कराना चाहिए।

 जब तक स्त्रियों और पुरुषों के बीच सम्बन्धों का पुनर्गठन नहीं हो जाता ,  तब तक इस समाज का पुनर्गठन भी नहीं हो पाएगा। घर के अंदर मौजूद असमतावादी सम्बन्ध ही शायद सब बुराइयों की जड़ हैं । पुरुष कोई भी भयानक कर्म करके या कायरतापूर्वक अपनी आत्मा का हनन करवा कर आदर,  सम्मान और यहाँ तक कि प्रेम तक पाने के लिए घर लौट सकता है। इस स्थिति में  पुरुष कभी अपनी वास्तविक पहचान या समस्याओं से रू-ब-रू नहीं होंगे,  और हम भी नहीं होंगी। चूंकि स्त्रियां शारीरिक बल के भय से बहुत ही आक्रांत रहती हैं,  अतः उन्हें अपनी रक्षा करना सीखना होगा।  स्त्रियों को अपने अनुभव आपस में बांटने चाहिए। हमें  संचार माध्यमों को मजबूर करना होगा कि वे वास्तविकता को प्रतिबिंबित करें।

यानी स्त्री मुक्ति की पैरोकार खरी- खांटी स्त्रीवादी दृष्टि! लेकिन स्त्री के साथ-साथ पुरुष यानी मानव-मुक्ति के उदात्त लक्ष्य को सुलभ कर लेने को लालायित! ठीक इस स्थल पर मुड़ कर पिछले पचास साल के हिंदी कथा साहित्य पर दृष्टि डालने पर एक तथ्य उथर कर सामने आता है कि स्त्रियों और दलितों की समस्याओं से जूझता-टकराता एक नए बेहतर समाज की रचना का स्वप्न देखता हिंदी कथा साहित्य बलात्कार जैसी अमानवीय सामाजिक विकृति को लेकर चुप है। अपवादस्वरूप उग्र को छोड़ दें तो प्रेमचंद से लेकर अब तक मूर्धन्य पुरुष रचनाकारों ने इसे मानवीय समस्या के रूप में कोई तवज्जो नहीं दी है। छिटपुट जहाँ कहीं भी इसका चित्रण हुआ है,  केवल एक स्थिति के रूप में ताकि घटनाओं के संघात को पुष्ट किया जा सके ( कर्मभूमि की मुन्नी )  स्त्री शोषण के एक और आयाम को प्रस्तुत कर धर्म के कुत्सित रूप को प्रकट किया जा सके ( मैला आंचल में  कोठारिन लछमी का मठ के तमाम महंतों द्वारा जरखरीद दासी के रूप में यौन शोषण )  दंगों में अनावृत्त स्त्री देह के मार्मिक चित्रण के जरिए देशविभाजन जैसी राजनीतिक परिणतियों के दुष्प्रभावों का अंकन किया जा सके (  झू ठा सच  में तारा जैसी एकाकी,  असहाय स्त्रियां ) ,  गाहेबगाहे पुलिस,  ब्यूरोक्रेसी और असामाजिक तत्वों की हवस का शिकार होने की अपेक्षा डाकुओं जैसे सत्ता के नए गढ़ों से सांठगांठ कर अस्तित्व रक्षण करती स्त्री की धूर्त निरीहता व्यंजित की जा सके ( संजीव का उपन्यास ‘ जंगल जहाँ शुरु होता है’  की मलारी ) ,  अपराध को छुपाने के लिए राजनीतिक ताकत अर्जित करने के हथकंडों को बखान करते- करते राजनीति के आपराधिक चेहरे को उजागर किया जा सके ( वीरेन्द्र जैन का उपन्यास ‘ डूब’,   जहाँ बामन महाराज ‘  कपूत बलात्कारी कैलाश को बचाने के लिए सरपंच का चुनाव लड़ते हैं )  या बलात्कार के बहाने इत्मीनान से पूरे तंत्र की ‘ खबर’ ली  जा सके ( शिवमूर्ति की कहानी ति रिया चरित्तर,  ‘ अकाल दंड’,  और लघु उपन्यास ‘ त र्पण ) । उल्लेखनीय है कि इन रचनाओं में बलात्कृत स्त्री एक अदद नाम,  पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठभूमि तथा अंधकारमय भविष्य के बावजूद हाड़-मांस की जीवंत स्त्री के रूप में दिखाई नहीं देती। न अपमान की बीहड़ यंत्रणा,  न निजत्व को रौंदे जाने का मर्मांतक आघात,  न भीषण मानसिक उद्वेलन, न देह-प्राण के प्रति प्रतिशोध भरा निर्मम विरक्ति भाव! केवल सपाट स्थितियां – सूचनापरक! स्त्री के अंतरंग और बहिरंग से अछूती! बेशक महंथ सेवादास के यौन शोषण का प्रतिकार न कर पाने के कारण रात के खामोश प्रहर में लछमी ( मैला आंचल)  के आंसुओं की अविरल धार तथा उसकी मृत्योपरांत गद्दीनशीन महंथ रामदास को कड़ी फटकार  उसे लेखक द्वारा स्त्री  के रूप में चित्रित किए जाने के प्रमाण हैं,  जिन्हें बालदेव के साथ गृहस्थी बसा कर पत्नीत्व पाने  के सपने में स्पष्ट-सघन रूप में देखा जा सकता है, लेकिन फिर भी अंत तक परिपुष्ट स्त्री व्यक्तित्व उसे नहीं ही मिल पाता। सारा जीवन सत्संग करके बिताने वाली लछमी निर्दोष भाव से बिदियारथीजी के संग सत्संग करने के अपराध में जब लोकापवाद से क्रोधोन्मत्त बालदेव जी की घुड़कियां खाती है तब पत्नी बनाम गृहदासी की रूढ़ छवि का अनुसरण कर वह जार- जार रोती बस इतना ही कह पाती है,  ” छमा  प्रभू! दासी का अपराध’  ( वही,  पृ0 292) – क्या इसलिए कि रेणु की दृष्टि मूलतः शरच्चंद्रीय दृष्टि है,  अतः तीस बीघा जमीन और कलमी आमों के बाग की मालकिन होने के बावजूद राजलक्ष्मी ( श्रीकांत)  होना उसकी नियति है ?  आत्मनिर्भर,  दृढ़ किंतु समर्पित।  समर्पण माने आत्मसम्मानपूर्वक सामंजस्यपूर्ण संवाद नहीं,  पुरुष- पति में अपने अस्तित्व का पूर्ण लय। इस पुरुषवादी दृष्टि के चलते जाहिर है रेणु न बलात्कार को एक जघन्य समस्या के रूप में संदर्भ दे पाए,  न धर्मस्थलों के भीतर पनप कर समाज की नींव खोखली कर देने वाली विकृतियों के खिलाफ जनाधार बना पाए। अपनी ओर से अंचल को दूषित करते काल का भले ही उन्होंने प्रामाणिक चित्रण किया हो,  लेकिन समस्याओं को उभार कर सही परिप्रेक्ष्य में न रख पाना एक ऐसी लेखकीय दुर्बलता है,  जो लेखक की चुप्पी को अनाचार के समर्थन में अनूदित करने का दुस्साहस भी कर सकती है। ठीक यही बात 1991 में रचे वीरेन्द्र जैन के उपन्यास ‘ डूब’ को  लेकर भी कही जा सकती है। बामन महाराज और कैलाश के पक्ष को छोड़ भी दें ( जिन्हें लेखक ने आग्रहपूर्वक खल पात्रों के रूप में चित्रित किया है)  तो माते ( जिन्हें उतने ही आग्रहपूर्वक महानायक की पदवी दी गई है)  के नीर- क्षीर विवेक के प्रति लेखक की अतिरिक्त श्रद्धा कुछ शंकाओं- आपत्तियों को जन्म देती है कि चंद्रभान अहीर की बलात्कृता बेटी अक्क्ल की लोेकलाज की रक्षा के प्रयास में  माते ने अनजाने ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था के हाथ मजबूत किए हैं या पुरुष दृष्टि के कारण तमाम सदिच्छा के बावजूद वे बलात्कार को पुरुष की तात्कालिक कामुकता के क्षणिक विस्फोट से ज्यादा अहमियत नहीं दे पाए हैं ?  वरना क्या वजह है कि वे कैलाश के अवैध पुत्र रामदुलारे और उसकी धाय मां के पालन-पोषण का दायित्व मंदिर ( बामन महाराज)  पर डालते हैं और अट्टू साव तथा गोराबाई के प्रेम-प्रसंग को कलंक कथा के रूप में फैलते देख कर भी चुप हैं ? क्या  माते की व्यवस्था और चुप्पी स्त्री के अनेकविध शोषण के द्वारों को खुला छोड़ कर अपराधियों के पक्ष में नहीं जा खड़ी होती ?  दूसरे,  निर्भीक,  सत्यवादी,  महात्मा माते की पुत्रवधू के रूप में अक्क्ल जिस तरह असंलग्न रागात्मकता के साथ गोराबाई की गोद में पलते अपने पुत्र को देख कर टीस और असमंजस की गड्डमड्ड स्थिति की शिकार कठपुतली की तरह चित्रित की गई है,  वह भी बलात्कार जैसी समस्या के प्रति लेखक के अ-गंभीर रवैये की साक्षी है। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक का लक्ष्य ‘ ब्राह्मण  के वीर्य से जनमे’  रामदुलारे के रूप में दलितों-वंचितों-पीड़ितों के एक ऐसे मसीहा को प्रतिष्ठित करना है,  जिसे अहरीन ने सेया, लुहारिन ने दूध पिलाया,  बनिया ने परवरिश की और ठकुराइन ने अपना ठाकुर चुना। ( डूब,  पृ0 266 )  फलतः अक्कल और गोराबाई,  उनके निकट,  जीवंत स्त्रियां न होकर यज्ञ में डाली जाने वाली आहुतियां ही बनी रहीं।

दरअसल महत्व दृष्टि का नहीं,  संवेदना का है जो लिंग,  वर्ग,  पृष्ठभूमि जैसी विभाजक रेखाओं का अतिक्रमण कर लेखक को विषय के साथ एकीकृत करते हुए उसके जीवन,  संघर्षों और स्वप्नों के साथ अभिन्न रूप से जीने को मजबूर करती है। अद्वैत के इस बिंदु पर तमाम लौकिक मूल्य और नियंत्रण चूंकि निरर्थक हो जाते हैं,  अतः प्रमुख रहती है पीड़ा और पीड़ा के कुहासे को चीर कर नई उषा का आह्नान करती अरुणिमा को बटोर लाने की व्यग्रता। प्राणों की बाजी भी लगानी पड़े तो कम है,  क्योंकि मूल्यवान व्यक्ति नहीं,  ‘ मनुष्यता का स्वास्थ्य और भविष्य है। इस दृष्टि से पांडेय बेचन शर्मा उग्र एकमात्र लेखक हैं, जिन्होंने स्त्री को सूक्तियों,  सुभाषितों और परंपरागत फ्रेमों से मुक्त कर देदीप्यमान मानवीय अस्मिता के रूप में देखा। उनके यहाँ स्त्री पुरुष की अनुचरी-सहचरी नहीं,  पहले स्वयं एक ‘ मनुष्य’  है . अपने जीवन और प्रतिष्ठा को अपनी शर्तों पर जीने वाली स्वाभिमानिनी आत्मनिर्भर स्त्री। उग्र अपने स्त्री पात्रों में मनुष्योचित जिन दो गुणों – स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता , की प्रतिष्ठा करते हैं,  उसके लिए वे उच्च शिक्षा,  अभिजात पृष्ठभूमि या पुख्ता पारिवारिक-सामाजिक संरक्षण जैसी बैसाखियों की तलाश नहीं करते। चेतना के स्तर पर वे सिर्फ एक ही मांग करते हैं – आत्मदैन्य के आत्मघाती भाव से मुक्ति। 1927 में रचित कहानी ‘बलात्कार’  इसका प्रमाण है, जहाँ एक ओर निरापद रैन बसेरे की तलाश में खंडहर में डेरा डालने वाली भिखारिन गंगा उर्फ  ‘ दर्शनीय चिड़िया’  को रूप की हाट में बैठा कर अपनी भोगलिप्सा की निर्लज्ज अभिव्यक्ति करते   ‘हिज  हाइनैस’  और उनके चमचों की खिंचाई की गई है तो दूसरी ओर गंगा की मानसिक दृढ़ता को रेखांकित किया गया है, जो बलात्कार  का शिकार होकर भी पुलिस और तमाशबीनों की भीड़ में बलात्कारी के खिलाफ लगाए गए आरोप से साफ मुकर जाती है। वह स्तब्ध और विमूढ़ है न्याय की गुहार लगाते उत्तेजित समाज को देख कर जो भीड़ बन कर दूसरे को उसी अपराध के लिए दंडित होते देख सुख पाता है, जिसे भीतर की अंधेरी खंदकों में गिर कर नितांत अकेले भय और प्रलोभन के सहारे अंजाम दे डालना चाहता है। फिर ‘ सफेदपोश अपराधियों’  से न्याय क्यों पाए वह ?  पुरुष की स्त्री विरोधी मानसिकता तथा समूची समाज व्यवस्था के प्रति प्रतिशोध एवं अनास्था का निदर्शन करते हुए जिस प्रकार वह अ-सतर्क सिपाही के हाथ से भाला छीन कर अब्दुल गफूर पर जानलेवा हमला करती है और फिर गरज कर दारोगा से अपना बयान लिखने को कहती है,  वह स्त्री सशक्तीकरण के दावों की धमक से बहुत दूर स्त्री को उसके मनोभावों,  मनोवृत्तियों,  मनस्तापों और मनोरथों के साथ समझ कर उसकी मानवीय गरिमा को अक्षुण्ण रखने का आह्नान करता है – ‘ लीखिए मेरा नाम गंगा है। जात औरत ही है। भीख मांगा करती हूँ। इस पापी पुरुष ने मेरा अपमान किया है। मैंने इसके खून से अपने अपमान का बदला लिया है।”

लेकिन रक्तरंजित प्रतिशोध क्या प्रत्येक अनाचार- अपराध के समूल नाश का एकमात्र उपाय है ?  बल्कि सवाल तो यह है कि क्या प्रतिशोध अंततः अपराध की ज्वाला को धधकाने की उत्प्रेरणा नहीं बन जाता?  कृष्णा सोबती मानती हैं कि बलात्कार केवल कानून की दफा नहीं, न मात्र रसभंग है ,  बल्कि ” अमंगल लहर की वह टूटी आसंग स्थिति है जिसे अपने चाहने से स्रोत तक लौटा लाना जन्म- जन्मांतरों सा ही अनिश्चित है।”   यह वं चित’  हो जाने की उस सपाट स्थिति का निर्मम सामाजिक बोध है , जहाँ ज़िंदगी कीे अंतरंग रागात्मकता की चाह नैसर्गिक मानवीय वृत्ति न रह कर लोगों की आंखों में छलकती घृणा और तिरस्कार से सार्वजनिक ‘ त माशा’  बन जाती है। यानी बलात्कार केवल मात्र स्त्री पर पुरुष के लैंगिक आक्रमण की समस्या नहीं,  बल्कि इसकी व्याप्ति और व्यंजनाएं कहीं अधिक अनेकविध और गहरी हैं। समाज के मनोविज्ञान के साथ-साथ यह समस्या उन रूढ़-गलित सांस्कृतिक-नैतिक मान्यताओं के पुनरीक्षण की मांग करती हैंं,  जिन्हें गौरवमयी संस्कृति का अभिन्न अंग मानते हुए दूने जोश से महिमामंडित करने का सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है। बलात्कार जैसी घटनाओं का होना चूंकि मानवीय अस्मिता पर कठोर पदाघात के साथ-साथ लोकतंत्र की बुनियादी आस्था पर भी प्रहार है, अतः उन परिस्थितियों,  प्रवृत्तियों,  कारकों का विश्लेषण भी जरूरी हो जाता है जो घर-बाहर और जनमानस – हर कहीं लोकतंत्र को अपदस्थ कर सामंतवाद की प्रतिष्ठा करने में जुट जाते हैं। जाहिर है,  बलात्कार इकहरी समस्या न होकर खासी संश्लिष्ट एवं जटिल समस्या है, जिसके उलझे सूत्र व्यवस्था की जड़ों में रच-बस कर कड़े और समरूपी हो गए हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि हिंदी कथा लेखिकाओं ने जितनी व्यग्र उत्कंठा,  प्रतिबद्ध वैचारिकता और संवेदनपरक समग्रता के साथ इस समस्या को परत दर परत विश्लेषित किया है,  वह साहित्य में लिंगपरक विभाजन के विवादों को बेमानी मानते हुए भी नारीवादी दृष्टि और सरोकारों की अहमियत पर पुनर्विचार करने की मांग अवश्य करता है।
क्रमशः 

दो स्वीडिश कवयित्रियों की कवितायें

स्वीडिश कविता की दो प्रमुख कवयित्रियों , कारिन बुवेए और  एल्सा ग्रावे की कविताओं का अनुवाद स्त्रीकाल के पाठकों के लिए अनुपमा पाठक प्रस्तुत कर रही हैं. मूल रूप से जमशेदपुर की रहने वाली अनुपमा वर्तमान मे स्वीडन प्रवास कर रहीं हैं  स्वीडिश भाषा की कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं का उन्होंने अनुवाद किया है.

कारिन बुवेए की एक कवितायें


1. शाम की प्रार्थना: 
कोई पल इस तरह का नहीं होता,
जैसा कि शाम के अंतिम कुछ मौन घंटे.
कोई भी दुःख अब और नहीं जलता,
कोई भी हिस्सा नहीं होता और छिछला.

अभी अपने हाथों से पकड़ लो समय
उस दिन को जो बीत चुका है.
यकीनन मुझे पता है: तुम उसे सर्वोत्तम में दोगे बदल
जिसे मैंने या तो बस रखा हुआ है या तोड़ दिया है.

दर्द सोचती हूँ मैं, दर्द ही खरीदती हूँ मैं,
मगर तुम सारे घाव भर देते हो और हर लेते हो हर पीड़ा.
मेरे दिन ऐसे बदल देते हो तुम
जैसे की कंकड़ को बदल दिया गया हो बहुमूल्य पत्थर में.

तुम आह्लादित कर सकते हो, तुम कर सकते हो वहन,
मैं तो बस सबकुछ छोड़ सकती हूँ तुमपर.
मुझे ले लो शरण में, राह दिखाओ मुझे, मिले सान्निध्य तुम्हारा!
ले चलो फिर, जो लगता है ठीक तुम्हें, उस प्रयोजन की ओर!

2. छोटी सी बात

क्या आप एक और कदम नहीं चल सकते,
उठा नहीं सकते क्या अपना मस्तक एकबार,
कराहते हों जब आप थके हारे निराशाजनक धुंधलेपन में —
तब हो संतुष्ट, आभार मानिए सामान्य सी, छोटी चीज़ों का,
जो है धीरज देने वालीं व बाल-सुलभ.
आपके पास जेब में है एक सेब,
घर पर परियों की कहानियों की है एक क़िताब —
छोटी छोटी तुच्छ चीज़ें, जो रहीं तिरस्कृत
जीवन के उन्मुक्त, जीवंत समय में,
उन्होंने ही थामे रखा मृत्यु की सी नीरवता के अन्धकार में.

3. सर्वोत्तम

हमारे पास जो सर्वोत्तम है,
उसे दिया नहीं जा सकता,
उसे कहा नहीं जा सकता,
और न ही उसे लिखा जा सकता है.

कारिन बुवेए

आपके मन की सर्वोत्तम बात
अपवित्र नहीं की जा सकती.
वह चमकती है गहरे वहां भीतर
आपके लिए और केवल ईश्वर के लिए.

यह हमारी समृद्धता का ताज है
कि जिस तक कोई और नहीं पहुँच सकता.
यह हमारी विपन्नता का दर्द है
कि जो किसी और को नहीं मिल सकता.

एल्सा ग्रावे की एक कवितायें


1. मैं मौन हूँ
मैं मौन हूँ
उस मीन का जो तैरती है
गहरे में समुद्री फूलों के मार्ग पर
समुद्री शैवाल कुञ्जों के बीच से.

मैं चुप्पी हूँ अंडे की
जिसमें बढ़ता है पक्षी
नीले कवच के तहत
और रक्त के घूमते जालक्रम में.
मैं वह मौन हूँ
जो मूक फूल महसूसते हैं
जब पेड़ गाते हैं अपने तूफानों का गीत,
मैं वो हूँ जो है स्थित
पृथ्वी के श्वेत हृदय में.

मैं नहीं हूँ भावशून्यता, न ही क्षयता
और कठोरता,
मैं पत्थर का मौन हूँ
वह कठोर पत्थर
मेरी भयानक चीख है.

2. आँसू 

मेरे आँसू
नहीं बुझाते कोई आग,
और मेरी आग
नहीं सुखाती कोई आँसू.

कभी नहीं सूखते मेरे आँसू,
वे बहते हैं,
वे बहते ही जाते हैं,
नहरों, नदियों और महासागरों तक,
और तब भी होते हैं
बेहतर नहीं.
फिर भी मैं एक साथ रो सकती हूँ एक विशाल सागर!
लाल आँखें
पीले पड़ गए गाल
रात और दिन आँसुओं से –

क्या दे रहे हैं संकेत कि
दुनिया का सारा पानी
सकल बारिश आकाश की
है सबके विरुद्ध जिस लिए इंसान अक्सर रोता है और रोता जाता है?

एलसा ग्रावे

3. सागर इतना गहरा है 

सागर इतना गहरा है
पर्याप्त गहरा कि उससे सब कर सकते हैं प्यार,
वे सभी जो करते हैं प्यार डूबते सूरज से,
ओझल होती हुई नाव से
और उस स्वप्न से जो डूब गया
गहरे दिन के प्रकाश में

सागर इतना बड़ा है
पर्याप्त बड़ा कि उससे सब कर सकते हैं प्यार,
वे सभी जो करते हैं प्यार दूरस्थ, अजनबी सागर से
एक गरजते तूफ़ान से
और उस श्वेत पंछी से जो उड़ गया था
मगर वापस लौटा रक्ताभ पंखों के साथ,

सागर इतना बड़ा है
इतना बड़ा
कि दो लोग जो प्यार करते हों
एक ही सागर से
भूल सकते हैं एक दूसरे को.

4. रात के साथ अकेले

अब क्यूँ नहीं बोलते हैं घर
गाती नहीं सड़कें अब?
कुछ है नहीं अब कहने के लिए
गाने के लिए?
रात के दमघोंटू मौन कदम,
एक कंपकंपी है बनी हुई.
मूक मुड़ती है यंत्रणा झेलती, कुचली सड़क
आसपास हर कोने से

मैं जा रही हूँ एक पीड़ादायक
और दिन भर की थकी हारी सड़क से,
जब मैं जाना बंद करूंगी,
खोलूंगी मैं एक सख़्त द्वार
एक मौन आवास में

वहाँ रहूंगी मैं
रात के साथ अकेले

अनुपमा पाठक

5. हृदय और मस्तिष्क

हृदय और मस्तिष्क
वे इतने करीब रहते हैं संग,
सामान्य तौर पर एक ही किराये के मकान में.
कभी कभी घरों में
जहाँ हो उद्यान
और ग्रीष्म गृह एवं हरित गृह
और कलात्मक जालीयुक्त फाटक.
वे इतने करीब रहते हैं संग,
निकटतम पड़ोसी हैं वे.
लेकिन ऊँचा है उनके बीच का फाटक
और झाड़ियाँ है बिन कटी हुईं
और कांटेदार –
और पड़ोसियों में नहीं है कोई मेल-जोल,
उनका एक दूसरे के साथ तो बिलकुल नहीं.
कभी कभी – पतझड़ में
हृदय के उद्यान से गिरते हैं पत्ते
मस्तिष्क की सोच में

कई लाली लिए हुए पत्ते
और सुनहरे
गिरते हैं और फंस जाते हैं नागफनी की झाड़ियों में
जब आता है तूफ़ान
तब उठा ली जाती है पड़ोसी के घर की छत !

आलोचना के समानान्तर

सुनीता गुप्ता 


सृजन के समानांतर आलोचना का संसार विकसित होता है। हाल के वर्षों में अस्मिता विमर्शों ने आलोचना के ठीक बगल में उपस्थित होकर अपनी धमाकेदार पहल से सबका ध्यान आकृष्ट किया हैै। विमर्श अंग्रेजी के डिस्कोर्स शब्द का अनुवाद होते हुए भी अपने वर्तमान स्वरूप में उससे बिल्कुल अलग है। डिस्कोर्स का एक अर्थ एकतरफा संवाद भी होता है। पर भाषा विज्ञान गवाह है कि कई बार शब्द अपने मूल उद्गम से इतनी दूर चले जाते हैं कि उनका अर्थ ही बिल्कुल उल्टा हो जाता है। विमर्शों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। आलोचना का स्वर निर्णयात्मक होता है। पर आलोचना के निर्णयात्मक तेवर के विपरीत विमर्श में संवाद की स्थिति होती है। यह संवादधर्मिता स्त्री भाषा की भी मुख्य पहचान है। स्पष्ट है कि आलोचना में उस पुरूष दृष्टि की प्रधानता है , जो दूसरों की नहीं सुनना चाहता।

जहां तक स्त्री और आलोचना का सवाल है, तो दोनों का संबंध छत्तीस के आंकड़े के समान है। लम्बे समय तक स्त्री ने आलोचना में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करायी। आलोचना ने भी स्त्री को कम नजरअंदाज नहीं किया। सवाल यह है कि यदि आलोचना से स्त्री छूटी रही और स्त्री से आलोचना तो इसकी वजह क्या है? साहित्य में स्त्री की उपस्थिति को पुरुष रचनाकारों द्वारा नकारा जाता रहा। यह सब अनायास नहीं हुआ। एक छद्म आम सहमति के तहत स्त्री की उपेक्षा की जाती रही। स्त्री के लिखे हुए को इस योग्य समझा ही नहीं गया  कि उसपर  विचार किया जा सके। परिणाम यह हुआ कि स्त्री रचनाकारों का लिखा बहुत सा बहुमूल्य रचनाएं उपेक्षित होती चली गयीं। यह इतिहास में स्त्री की उपेक्षा का परिणाम था। डाॅ. सुमन राजे अपने ‘हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास’ में इसी ओर इंगित करती हुई लिखती हैं – ‘‘ज्यों ज्यों आधे इतिहास का लेखन गति पकड़ता गया, यह धारणा पुख्ता होती चली गयी कि पुरुष इतिहासकारों ने महिला रचनाकारों के साथ बहुत अन्याय किया है। यह अन्याय उदासीनता के चलते हुआ हो, ऐसी बात नहीं, यह अन्याय विमुख रहकर किया गया है।’’ स्त्री को बाहरी जगत से बेदखल करने में पुरुष समर्थ हुआ,  जिसका नतीजा यह हुआ कि इतिहास के अक्षर भी उसी के हिस्से पड़े। इतिहास में स्त्री की दस्तक उपेक्षित होती चली गयी। दिनकर ने बड़े गर्व से ‘उर्वशी’ में लिखा – ‘‘इसीलिए, इतिहास पहुंचता जभी निकट नारी के/ हो रहता वह अचल या कि फिर कविता बन जाता है।’’ बिना यह सोचे कि इतिहास की इस उपेक्षा का कितना बड़ा दंश स्त्री को भुगतना पड़ा। इतिहास के साथ साथ वह जीवन से भी उपेक्षित होती चली गयी। उसकी इस उपेक्षा के पीछे कहीं तो इतिहास के निर्माण में स्वयं उसकी अल्पसंख्यक उपस्थिति रही किंतु जहां वह उपस्थित थी भी, वहां उसकी इस उपस्थिति केा दर्ज ही नहीं किया गया। रोहिणी अग्रवाल जब लिखती हैं -‘‘अपने समय और साहित्य में मौजूद रहने पर भी उपस्थिति का साक्ष्य इतिहास में दर्ज होकर ही मिलता है, और सच यह भी है कि सबसे अधिक छल स्त्रियों के साथ इतिहास में  ही किया गया है। … हम अपने अनुभव से जानते हैं कि उपेक्षा से मारक कोई अस्त्र नहीं होता।’’ – तो इसके पीछे यही दंश का भाव है।

यह तो पूर्व आधुनिक काल व स्वतंत्रता के पूर्व की स्थिति हुई। स्त्री के विरुद्ध जारी यह षड्यंत्र आज भी किसी न किसी रूप में जारी है। आज भी यह परम्परा विद्वानों द्वारा पोषित होती चली आ रही है कभी स्त्री विमर्श को पश्चिम से आयातित मानकर – मानो हिन्दी साहित्य या भारतीय समाज में सबकुछ यहीं का रहा हो- और कभी ब्रा ब्रनिंग जैसी छिटपुट घटनाओं को ही स्त्रीवाद का पर्याय मानकर। ब्रा बर्निंग की घटना आज बहुत पीछे छूट चुकी है। इसके मूल मकसद को समझे बिना, इसीको स्त्रीवाद का पर्याय मानना अधूरी समझ व अधूरे अध्ययन का द्योतक ही माना जा सकता है और कोई भी विद्वान कितना ही बड़ा क्यों न हो, क्या सिर्फ इसी आधार पर कि वह पुरुष है, अधूरी समझ के आधार पर फतवा जारी करने का अधिकार उसे दिया जा सकता है? स्त्री साहित्य की उपेक्षा के कुछ ताजे उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं। हिन्दी के चर्चित आलोचक डा0 परमानंद श्रीवास्तव के संपादन में ‘समकालीन हिन्दी कविता’ का प्रकाशन सन् 1990 में हुआ। यह वह समय है जब स्त्री रचनाकार कविता जगत में बड़ी सशक्तता तथा आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थीं। किंतु संग्रह में केवल एक  स्त्री रचनाकार को शामिल किया गया है। हाल के वर्षों में डा0 नंदकिशोर नवल के संपादन में प्रकाशित काव्य संकलन ‘संधि युग’ में विगत सदी के अंत व नयी सदी के प्रारंभ में अपनी पहचान बना रहे कवियों को शामिल किया गया है। यहां भी केवल एक स्त्री रचनाकार को लिया गया है वह भी इस स्वीकृति के साथ कि इसमें स्त्री का स्वर स्त्री की तरह नहीं है। तो क्या यह मान लिया जाय कि समकालीन काव्य परिदृश्य पर स्त्री स्वर की कोई स्पष्ट दस्तक नहीं है?  इतनी बड़ी संख्या में कविता में स्त्री की उपस्थिति को निश्चय ही दरकिनार नहीं किया जा सकता। तो क्या इन आलोचकों की दृष्टि में स्त्री लेखन एक प्रलाप भर है?

अस्मिता विमर्श को साहित्य से पृथक मानकर खारिज किये जाने का प्रयास पुराना है। साहित्यकारों का एक वर्ग  है, जिसका मानना है कि अस्मिता विमर्श साहित्य के विषय नहीं है , ये समाज शास्त्र की परिधि में आते हैं । सवाल यहां यह है कि साहित्य का भी कोई नियत विषय है क्या? क्या साहित्य को समाज से अलगाया जा सकता है? जो समाज का है, क्या वह सब साहित्य का नहीं है? साहित्य का समाज से सीधा सम्बंध है तो समाज का कोई भी विषय साहित्य के लिए अस्पृश्य कैसे हो सकता है? और मानव जीवन की परिधि में आनेवाला कोई भी विषय चाहे वह मानविकी हो या विज्ञान, तकनीक, धर्म, अर्थ, राजनीति – साहित्य  के लिए त्याज्य कैसे हो सकता है क्या? यदि अस्तित्तववाद जैसा दर्शन का विषय साहित्य में प्रवेश पा सकता है, फ्रायड का मनोविश्लेषणवाद साहित्य द्वारा अपनाया जा सकता है, मार्क्सवाद  की राजनीतिक विचारधारा साहित्य की विषय वस्तु बन सकती है तो फिर स्त्री विमर्श से ही साहित्य को परहेज क्यों? नवजागरण का एजेंडा भी सामाजिक राजनीतिक एजेंडा था, पर साहित्य पर पड़ने वाले इसके प्रभावों को क्या आज नकारा जा सकता है? बल्कि सच तो यह है कि नवजागरण की शुरुआत ही स्त्री विमर्श जैसे विषयों के साथ हुई थी। तो फिर कहीं यह  स्त्री लेखन को बहिष्कृत करने का उपक्रम तो नहीं? या फिर स्त्री की मुक्ति उन्हें भयभीत कर रही है, ठीक वैसे ही जैसे मजदूरों की मुक्ति से पूंजीपति वर्ग भयभीत होता रहा है या दलितों की मुक्ति से उंची जाातियां। व्यवस्था विरोध का जो स्वर माक्र्सवाद का मुख्य स्वर है, वही स्त्रीवादी विमर्श की भी प्रमुख पहचान है जिसकी सबसे बड़ी चोट विवाह व्यवस्था, परंपरा व धर्म है।  दरअसल पुरुष समुदाय घबड़ाया हुआ है, अपने पांवों के नीचे की धसकती जमीन से। स्त्री को घर से बांधकर, परिवार की संरचना को और उसके सारे दायित्व स्त्री पर डालकर वह स्वयं स्वछंद हो गया। अब जब परिवार की पक्षपातपूर्ण संरचना पर चोट पर रही है तो वह बौखलाया हुआ है। परिवार समाज की एक ऐसी अनिवार्यता है जिसके लिए पुरुष को स्त्री पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए स्त्री मुक्ति का कोई भी कदम उसे सशंकित कर जाता है। परिवार महत्वपूर्ण है स्त्री के लिए भी , बल्कि पुरुष से कहीं अधिक वह इसके लिए मरती खपती है – पर वह कभी परिवार को लेकर सशंकित नहीं होती क्योंकि वह परिवार की संरचना का सार संभाल करती है। वह परिवार कि लिए ही जीती और मरती है उसके इसी जीने और मरने के कारण पुरुष निश्ंिचंत रहता है। स्त्री के पारिवारिक दायित्वों को उसके बंधन के तौर पर व्याख्यायित किया जाता है किंतु उनके विकल्प की बात नहीं होती। स्त्री उन दायित्वों तले अपना वजूद मिटाने को विवश है क्योंकि कोई और उसे उठाने को प्रस्तुत नहीं है। बच्चों का अभिभावकत्व तो पिता को दिया गया जबकि दायित्व स्त्री के हिस्से आया – कोख में निर्माण की प्रक्रिया से लेकर मनुष्य बनाने की प्रक्रिया तक । पुरुष के हिस्से के दायित्वों को वहन करते हुए स्त्री घुटटकर रह गयी। परिवार का वजूद स्त्री के कारण है और इसीलिए आज जब स्त्री इसपर सवाल उठाने लगी है तो वह घबड़ाया हुआ है कि कहीं परिवार का मूलभूत ढांचा ही छिन्न- भिन्न न हो जाय। स्त्री मुक्ति में उसे अपने पांवों की बेड़ी का स्वर सुनायी पड़ने लगता है।

वर्गभेद के आधार पर साहित्य की दृष्टि निर्मित करने वाले विचारक जब समाजशास्त्र का विषय मानकर अस्मिता विमर्श को खारिज करते हैं तो पूछने की इच्छा होती है कि उनका समतामूलक समाज का नारा छद्म है या फिर अस्मिता विमर्श का नकार? अस्मिता विमर्श मानव मानव के बीच किये जा रहे भेदभाव के विरुद्ध प्रतिकार का स्वर है। कला जीवन के लिए मानने वाले लोगों के लिए साहित्य जीवन निरपेक्ष कैसे हो सकता है?
अस्मिता विमर्शों की यात्रा बहुत लम्बी तो नहीं है, पर इसने अपनी सशक्त पहचान अवश्य दर्ज करायी है। खड़ीबोली हिन्दी को लड़खड़ाकर चलने से लेकर छायावादी सूक्ष्म अभिव्यक्ति हासिल करने में लगभग पचास वर्षों तक का समय लगा था। उससे बहुत कम समय में ही अस्मिता विमर्श, खासकर स्त्री विमर्श के साहित्य ने बड़ी तेजी से अपनी सशक्त पहचान दर्ज कर ली है जो संवेदना से लेकर अभिव्यंजना तक किसी भी स्तर पर कमतर नहीें आंकी जा सकती। चर्चित कवयित्री अनामिका लिखती हैं – ‘‘ … यह आधारभूत तथ्य है कि अस्मिता लिंग -अस्मिता हो, जातीय, राष्ट्रीय या क्षेत्रीय अस्मिता या फिर वर्ग-वर्ण-नस्लगत, शोषण के सतत घूर्णण से स्फुलिंग की तरह उपजी राजनीतिकि अस्मिता – उसे अकेली, अलबेली, कटी-फटी इयत्ता समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए।’’ वे स्त्री और दलित आंदोलनों से पहले उपनिवेश के खिलाफ चले स्वाधीनता, रंगभेद तथा अश्वेत आंदोलनों को भी अस्मिता आंदोलनों में परिगणित करती हुई घोषित करती हैं कि ‘‘ये सब अस्मिता आंदोलन इस बात का प्रमाण हैं कि जो जहां उपेक्षित और प्रताडि़त है, आज उसमें पचखियां फूट पड़े हैं। चट्टान की छाती दरक गई है और संचित आवेग वहां से झरने की तरह फूट पड़े हैं।’’ आगे वे लिखती हैं – ‘‘जो जहां भी उत्पीडि़त और साधन-विपन्न हैं, उन्हीं के कंधे है दुनिया बदलने की जिम्मेदारी। … स्त्रियों से ज्यादा अच्छी तरह भला कौन समझता है कि अलग अलग कमरे साफ करना घर की सफाई का  ही दूसरा नाम है। रंग-रोगन और घर की आधारभूत टूट-फूट सुधरने का, समूची रिमाॅडेलिंग साधने का वक्त भी आएगा, फिलहाल अपने कमरों के जाने तो झाड़ें। अस्मिता-आंदोलन यही कर रहे हैं।’’

यह ठीक है कि रचना और आलोचना दोनों की रचना प्रक्रिया अलग होती है। रचना जीवन से सीधे साक्षात्कार है,  जबकि आलोचना रचना के माध्यम से जीवन से साक्षात्कार। इन अर्थों मेें आलोचना को समाज की समीक्षा कहा जा सकता है क्योंकि साहित्य यदि जीवन की समीक्षा है तो आलोचना साहित्य की। विमर्श साहित्यालोचन की एक नयी शब्दावली है जिसका संबंध  साहित्यिक की उस धारा से है जो खंडित अस्मिता के पक्ष में उठ खड़ी हुई है। आलोचना से यह इन अर्थों में भिन्न है कि इसमें आलोचना की स्थापना के विपरीत संवाद की स्थिति होती है। इसका सीधा संबंध मुक्ति की चेतना और संघर्ष के साथ जोड़ा जा सकता है। इन अर्थोें में यह सीधे जीवन से जुड़ता है। जहां तक स्त्री विमर्श का सवाल है, तो इसका संबंध स्त्री मुक्ति की चेतना से है। स्त्री मुक्ति संघर्ष के कई रूप हैं – एक का संबंध आंदोेलनों से है, दूसरे का लेखन से। निश्चय ही दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता – दोनों की पारस्परिकता निर्विवाद है। स्त्री लेखन में भी एक विचारात्मक लेखन है जिसे काफी हद तक समाजशास्त्रीय कहा जा सकता है पर इसके महत्व को इसलिए नजरअंदाज नहीें किया जा सकता क्योंकि यह साहित्यिक आलोचना के लिए औजार उपलब्ध कराता है और सृजनात्मक लेखन के लिए सामग्री।  डाॅ0 सुमन राजे लिखती हैं – ‘‘  स्त्री के मुक्ति संघर्ष का एक समृद्ध शास्त्र विकसित हुआ है, जिसे समग्र रूप से स्त्री विमर्श कह दिया जाता है।’’

एक समय था जब आलोचना – काव्य शास्त्र – की जीवन से निरपेक्ष अपनी स्वायत्त सत्ता हुआ करती थी। काव्य शास्त्र के विभिन्न सम्प्रदाय में कविता की जो समीक्षा मिलती है, वहां कविता का विश्लेषण विशुद्ध कला के रूप में हुआ है। आलोचना के क्रमिक विकास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि आलोचना की यात्रा क्रमशः समाजोन्मुख होने की है। छंद, अलंकार, गुण, रस आदि की सारहीन विवेचना के लिए आज आलोचना में कोई जगह नहीं बची हैे। इसकी जगह आज समाज सापेक्षता ने ले ली है। ऐसे में छंद, अलंकार  वगैरह अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। क्या आश्चर्य कि भविष्य में आलोचना का स्थान विमर्श न ले ले। आलोचना का स्वरूप गतिशील रहा है। जो आलोचना परम्परागत मानदंडों पर टिकी होती है, वहां जीवन की उपेक्षा होती है। जीवन में आ रहे बदलाव के साथ तालमेल बैठाना आलोचना के लिए अनिवार्य है, अन्यथा वह पिछड़ जाती है। यही कारण है कि आलोचना का स्वरूप बदलता रहा है और सर्वमान्य आलोचना जैसे किसी मानक की बात करना जड़ता ही कही जा सकती है।  डाॅ0 शंभुनाथ लिखते हैं -‘‘आज की आलोचना सबसे पहले एक संवाद है। उसका महत्व इससे नहीं है कि वह क्या सैद्धांतिक दावे करती है, बल्कि इससे है कि उसके सिद्धांत का व्यवहार रूप क्या है। ’’

आलोचना का इतिहास काव्य शास्त्र या सैद्धांतिकी से निरंतर मुक्ति का रहा है। आलोचना का वर्तमान स्वरूप उसके सैद्धांतिकता से प्र्रस्थान की ओर उन्मुख है। वस्तु पक्ष आलोचना के लिए सदैव महत्वपूर्ण रहा है चाहे वह महावीर प्रसाद द्विवेदी का उपयोगितावाद हो या शुक्लजी का लोकमंगल या हजारी प्रसाद द्विवेदी का मानववाद, रामविलास शर्मा की समाज सापेक्षता, नामवरजी की मूल्यपरकता, शंभुनाथजी का संस्कृति निर्माण के खतरों का संधान – समय साक्षी है  कि आलोचना के सामने एक बेहतर समाज के निर्माण की चुनौती हमेशा रही है। रचना का शिल्प वहां वस्तु के अनिवार्य घटक के तौर पर ही है। विमर्श के वर्तमान अर्थ में देखा जाय तो माक्र्सवाद का स्वर भी एक तरह से विमर्श का ही स्वर है। डाॅ0 शंभुनाथ लिखते हैं -‘‘मेरी नजर में विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जैसी कोई चीज न पहले कभी थी और न आज हो सकती है। मेरे जैसे लोगों के सामने साहित्यिक विमर्श के लिए सदा से सांस्कृतिक निर्माणों की एक विस्तृत दुनिया रही है, सभ्यता का विकास रहा है।’’ हिन्दी की आलोचना की वर्तमान अवस्था पर उनकी यह टिप्पणी गौर करने योग्य है – ‘‘हिंदी की विडंबना यही है कि अधिक बहस मुख्य मुददों पर न होकर एसे ही फतवों पर होती है। जाहिर है, ऐसी आलोचना में वस्तुपरकता की कमी समाज  में मानवीय तत्वों की कमी का ही नतीजा है। ऐसी आलोचना की खुद अपनी दृष्टि ही एक सीमा के बाद अंधता का काम करने लगती है।’’

आलोचना के क्षेत्र में आ रहे इस बदलाव के प्रति समकालीन पीढी सजग हो रही है। यह पीढ़ी इन बदलावों के प्रति न केवल संवेदनशील है, बल्कि आलोचना के क्षेत्र में आयी जड़ता को तोड़कर उसे विकासोन्मुखी बनाने के लिए प्रयत्नशील है। बदलते समय के साथ जीवन और उसके साथ साहित्य में आ रही नवीन दृष्टियों को यह उपेक्षा से नहीं देखती। यही कारण है कि वह साहित्य के नये सौन्दर्य शास्त्र की मांग कर रही है और नये साहित्यिक विमर्शों को आदर से स्थान दे रही है। युवा आलोचक देवेन्द्र चैबे अपनी चर्चित पुस्तक ‘आलोचना का जनतंत्र’ में इसी ओर इंगित करते हुए लिखते हैं – ‘‘साहित्य के अनुभव क्षेत्र का दायरा विस्तृत हुआ। परिणामस्वरूप उसकी व्याख्या और विश्लेषण की नयी आलोचनात्मक और वैचारिक पद्धतियां आईं। इस दौरान महत्वपूर्ण बात यह हुई कि साहित्य और समाज विज्ञान के क्षेत्र में कार्य कर रहे आलोचकों ने इस नए साहित्य के मूल्यांकन के लिए नई नई विचार पद्धतियों को आजमाया एवं नए आंदोलनों से निर्मित साहित्य की रचनात्मक धारणाओं को पहचाना, उसकी व्याख्या की तथा उसके आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन करते हुए इस नए साहित्य को स्थापित करने का प्रयास किया।’’ आगे वे लिखते हैं – ‘‘इसलिए साहित्य और समाज विज्ञान का नया सौंदर्यशास्त्र संघर्षरत समाज के उन मुददों और संदर्भों को केंद्र में  ला रहा है जिसे अब तक हाशिये पर रखा गया था; अगर बहस की भी गई तो उसी पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र के ढ़ांचे में जिसे धर्म या कानून मान्यता देता है।’’

यह सच है कि हिंदी के स्त्री विमर्श का प्रारंभिक स्वर समाज की आलोचना का स्वर है। इस स्वर की साहित्यिकता पर तो सवाल उठाया जा सकता है पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसने साहित्य को वे औजार उपलब्ध कराये जो आगे चलकर स्त्री विमर्श के साहित्य व आलोचना का आधार बनीं। कोई भी विचार जब साहित्य में आता है तो उसकी सैद्धांतिकी निर्मित होने में समय लगता है। पाश्चात्य स्त्री विमर्श में स्त्रीवादी आलोचना के माानदंडों का स्वरूप स्पष्ट हो चला है। सुखद स्थिति यह है कि हिंदी में भी स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी आकार ग्रहण करने लगी है और इस दिशा में गंभीर काम हो रहे हैं। सुमन राजे का ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ तथा ‘इतिहास में स्त्री’, अनामिका का ‘स्त्रीत्व का मानचित्र’, प्रभा खेतान का ‘स्त्रीः बाजार के बीच बाजार के खिलाफ’ और ‘उपनिवेश में स्त्री’, जगदीश्वर चतुर्वेदी का ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’, रोहिणी अग्रवाल का ‘स्त्री लेखन: स्वप्न और संकल्प’,, रेखा कास्तवार का ‘स्त्री चिंतन की चुनौतियां’ आदि इसी दिशा में किये गये प्रयास हैं। अर्चना वर्मा, अनामिका, रोहिणी अग्रवाल, शालिनी माथुर, रेखा कस्तवार, सविता सिंह आदि इस क्षेत्र में कुछ ऐसे नाम हैं जो किसी पहचान के मुहताज नहीं। एक ऐसे समय में जब आलोचना किसी प्रबल स्वर और मानदंड से शून्य है, यह स्त्री दृष्टि ही है जो आलोचना के नये मानदंड के साथ उपस्थित हो रही है। स्त्री विमर्श का यह स्वर अपने वैविध्य में ध्यान आकृष्ट कर रहा है।

पुरुष की एकरस गंभीर भाषा के विपरीत स्त्री विमर्श की भाषा नये रचनात्मक तेवर के साथ उपंिस्थत हो रही है। इस भाषा में कभी आलोचना को कविता के साथ गलबांहियां डाले देखा जा सकता है तो कभी संवाद करते और कभी विधाओं की सीमा को तोड़ते। रोहिणी अग्रवाल ने पात्रों के साथ संवाद के माध्यम से स्त्री विमर्श की जो आलोचकीय पद्धति विकसित है, वह तो अपनी प्रभान्विति में अदभुत है। कहना उचित होगा कि स्त्री विमर्श सर्जनात्मकता आलोचना को एक नयी भूमि प्रदान कर रही है। निरंतर जड़ व शून्य हो रही आलोचना के बीच यह स्त्री आलोचना ही है जो नये सर्जनात्मक तेवर व शिल्प के नये प्रयोग कर रही है और विधाओं की सीमा रेखा का उल्लंघन करती हुई आलोचना के नये स्वरूप गढ़ रही है। स्त्री विमर्श भाषा के साथ एक नया ट्रीटमेंट कर रही है जो अनुभवों की गझिन परतों को खोलने में समर्थ हो रही है। रचनाओं का पुनर्पाठ जीवन और जगत को समझने की एक नयी समझ दे रहा है जिसके आलोक में मानवीयता पर पड़ी खरोंचों का स्वरूप स्पष्ट हो रहा है।

इस आवाज को नकारना इतिहास के साथ छल है। स्त्री की भाषा का सर्जनात्मक तेवर, पारम्परिेक गांठों को खोलती उसकी सजग स्त्री दृष्टि, विधाओं की सीमाओं को तोड़ती उसकी धमाकेदार पहल – ये सब और कुछ नहीं, आलोचना के क्षेत्र में पैदा होते एक नये प्रतिमान की आहट है,  जिसकी उपेक्षा इसबार संभव नहीं है , क्योंकि अब वह सन्नद्ध है कि उसकी आवाज इतिहास द्वारा नकारी न जा सके।

युवा आलोचक सुनीता गुप्ता बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में हिन्दी पढाती हैं. संपर्क : 
306, साईं कारनेशन अपार्टमेंट
लोहियानगर पोस्ट आॅफिस
बहादुरपुर फ्लाई ओवर के निकट
कंकड़बाग, पटना 20
मो0 09473242999

मातृत्व और पितृसत्ता

सर्वेश पांडेय


सर्वेश पांडेय ने स्त्री अध्ययन में शोध किया है , अभी महिला आयोग में कार्यरत हैं . संपर्क : मोबाइल न.- 08756754651

( यह शोध -लेख शास्त्र और लोक दोनो ही माध्यमों से ‘ बेटों’ के प्रति ‘अनुकूलित आग्रह’ और बेटियों के लिए ‘ दुरग्रह’ की व्याख्या कर रहा है- पठनीय . ) 


ब्राह्मणवादी पितृसत्तामक व्यवस्था ने अपनी मजबूती हेतु तमाम तरह के नीति व नियम बना रखे हैं। इस व्यवस्था ने कई तरह की सामाजिक, धार्मिक मान्यताओं को समाज में इस कदर पैबस्त कर रखा है कि जिनके पूरे न होने पर व्यक्ति अपने जीवन को निकृष्ट समझता है, जैसे- पुत्र-प्राप्ति। संपूर्ण हिंदू धार्मिक ग्रंथों में पुत्र प्राप्ति की इच्छायें पुत्र की महत्ता आदि सहस्त्रमुख से वर्णित है, लेकिन पुत्री की कामना कहीं नहीं दिखती। हिंदू विवाह संस्कार का मूल उद्देश्य ही पुत्र-प्राप्ति है। पुत्र से ही वंश-परंपरा आगे बढ़ती है,  इसलिए पुत्र को ‘ वंशकर’   कहा जाता है।  पुत्र ही पिण्डदान देकर तर्पण आदि करके पितृऋण चुका पाता है इसलिए पुत्र ही इच्छित है, पुत्री नहीं। ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्रोत्पत्ति को ही मनुष्य का परम धर्म कहा गया है. ‘ पुत्र  ब्राह्मण! इच्छध्वं सवै लोकऽवदावदः।’

पुत्र ही पिता के धार्मिक कार्य का उत्तराधिकारी बनता है। पितृयज्ञ का वास्तविक अर्थ श्राद्ध है और पुत्र ही इस यज्ञ को सम्पन्न कर सकता है। पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति ही समाज में इस लिंग – विभेद की असाधारणता को सूचित करती है. ‘ जो  पितरों को पवित्र कर दे अथवा पुत नामक नरक से बचा ले, वह  पुत्र है।  पुत्रहीन व्यक्ति के पितर पिण्डदान के भविष्यत् अभाव को सोचकर रोया करते हैं।’  पुत्र से पिण्ड और जल के तर्पण पाकर पितरों की आत्माएं सुखी व संतुष्ट रहती हैं। पिण्डदान केवल पुत्र कर सकता है, पुत्री नहीं। सभी आशीर्वादों में पुत्र-प्राप्ति सर्वाधिक लालचपूर्ण है, जिसके लिए हिंदू लालायित रहते हैं, ऐसा इसलिए है कि क्योंकि परिवार में पुत्र का जन्म पिता को मुक्ति दिलाता है।’  मनुस्मृति में पितृवंशात्मक वंशावली के द्वारा व्यक्ति के स्वर्ग-प्राप्ति से इतर भी कई प्रलोभन वर्ण्य हैं। जैसा कि उल्लेखनीय है पिता पुत्र से स्वर्ग आदि उत्तम लोकों को प्राप्त करता है,  पौत्र से उन लोकों में अनंतकाल तक निवास करता है और प्रपोतों से सूर्यलोक को प्राप्त करता है। संतानोपत्ति पूर्व से ही विभिन्न संस्कारों का मूल प्रयोज्य पुत्र प्राप्ति होता है। विवाह संस्कार द्वारा गृहस्थाश्रम में प्रवेशकर पुत्र-प्राप्ति एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है,  वहां उपस्थित जन वधु को ‘अष्टपुत्रा सौभाग्यवती भव’  कह कर पुत्र होने का आशीर्वाद देते है, पुत्री होने का नहीं। गर्भाधान संस्कार के मंत्र में पुत्र गर्भ की प्रार्थना है। एक अनोखा उत्सव जिसे ष्संस्कारष् की पदवी से नवाजा जाता हैए अर्थात् पुंसवन संस्कार। इस संस्कार में गर्भवती माँ जिसे तीन माह का गर्भ धारण हो चुका है,  उसके भ्रूण को लड़के में बदलने के उद्देश्य से गर्भवती स्त्री के लिए कर्मकांड किए जाते हैं।

हिंदू.परिवारों में पुत्र जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों को सोहर करते हैं। सोहर का प्रचलन संपूर्ण भोजपुरी क्षेत्र के सभी जातियों में  है। सोहर के गीत अपनी सरसता और सौन्दर्य-व्यंजना के लिए प्रसिद्ध हैं। पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत नारी जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि पुत्र-प्राप्ति है, यही उसकी सार्थकता भी मानी जाती है। पुरुष-प्रधान परिवार को उसका उत्तराधिकारी प्राप्त होने पर पूरे परिवार व निकटस्थ सम्बन्धीजनों में हर्षातिरेक फैल जाता है। सोहर गीतों में हर्ष उल्लास का वातावरण, दान, ननद का नेग आदि वर्ण्य विषय होते हैं।

शास्त्र-सम्मत गर्भाधान, पुंसवन संस्कार से इतर महिलाओं के अपने व्रत-पूजा-अनुष्ठान हैं,  जोकि मनोकांक्षा प्राप्ति हेतु किए जाते हैं। वैदिक कर्मकाण्ड व स्मृतिकारों के संस्कारिक विधानों से अलहदा महिलाओं ने अपने अनुष्ठान रचे हैं। एकादशी व्रत,  गंगा-स्नान,  तुलसीपूजा, रविवार व्रत इत्यादि पुत्र-प्राप्ति हेतु महिलाओं द्वारा किये जाने वाले धर्म-कर्म हैं। जैसा कि एक सोहर में सूर्य की आराधना का महत्व वर्णित है। कौशल्या को कोई संतान नहीं है। उनकी उम्र बीती जा रही है और वे दुःखी हैं। अपनी सास से वे पुत्र-प्राप्ति का उपाय पूछती हैं। उनसे सूर्य भगवान की आराधना का महत्व सुनकर वह विधिपूर्वक सूर्य की आराधना करती हैंए परिणामस्वरूप उन्हें राम जैसे पुत्र की प्राप्ति होती है।  इसी प्रकार निम्नलिखित सोहर में एकादशी व्रत, सूर्य की आराधना, ब्राह्मण-भोजन, माघ-स्नान आदि का महत्व वर्णित है.

ओहि रे अजोधेया में राम जनमलें,  अजोधा आनंदले हो।
ललना, अजोधा में बाजेला बधावा,  महल उठे सोहर हो
ए बहिनी, कवन वरत तुहूँ कइलू,  त रमइया बड़ा सुन्नर हो।
कातिक कइली एकादसी, दोआदसी के पारन हो।
ललना, अगहन कइली अतवार त रामफल पइली हो।
माघहि मास नेहइली एअगिन नाहिं तपलीं हो।
बहिनी, बइसाख मास बेनिया ना डोलइली त रामफल पइली हो।
बहिनी, भूखल बाभन जेवइली,  त राम फल पइली हो।


उपरोक्त व्रत-अनुष्ठान महिलाओं के वैकल्पिक कर्मकाण्डों को रेखांकित करते हैं, जहाँ वे प्रमुख भूमिका में हैं न कि शोभा की वस्तु के मानिंद। यद्यपि इनका भी मूल प्रयोज्य पितृवंशात्मक वारिस तक ही सिमट जाता है। स्पष्टतया स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक मान्यताओं से अनुकूलित ही नहीं बल्कि उसके संवाहक के रूप में परिलक्षित होती हैं। पितृसत्तात्मक परिवार में हैसियत,  मान- सम्मानए सुख- सुविधाओं का निर्धारक स्त्री का पुत्रवती होना माना जाता है। पुत्रवती हुए बिना स्त्री दमन-यातना-उलाहना का ही शिकार मात्र नहीं होती बल्कि निरवंशिया व अपशकुनी से होते हुए डायन बनाने तक की पितृसत्तात्मक सामाजिक धारणाएं स्त्री-जीवन की नियंता बन बैठती हैं। इसलिए जिन स्त्रियों के पुत्र नहीं होते,  उनकी दशा समाज में बहुत उपेक्षित होती। वह बांझ कही जाती हैं। सोहर में ‘बाँझ’  स्त्री की मनोव्यथा भी बड़े स्तर पर मुखरित है। निर्धनता और पुत्रहीनता लोक.जीवन में एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं। पुत्र का जन्मना या पुत्र-प्राप्ति सम्पन्नता का द्योतक माना जाता है। अथर्ववेद में निरपत्यता के बारे में कहा गया है कि यह दुःख दुश्मनों को भी न भोगना पड़े।  शास्त्रों ने नारी जीवन की मात्र तीन उपलब्धियों को ही अधिकाधिक महत्व दिया है-संतानोत्पादन,  धर्म का पालन और रतिफल देना। शतपथ ब्राह्मण संतानहीन स्त्री को महादुखों से जकड़ी हुई कहता है।

पितृसत्तात्मक व्यवस्था में मातृत्व के द्वारा ही स्त्री अपना अभीष्ट पद व प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकती है। वे महिलाएँ जो संतान पैदा करने में अक्षम होती हैं,  उनकी यह अक्षमता यातना और दुःख का कारण बन जाती है। पितृसत्तात्मक धार्मिक आचार-संहिताएं हर स्त्री से माँ बनने की अपेक्षा करती हैं,  साथ ही मातृत्व को औरत के जीवन की महान अनिवार्यता के तौर पर महिमामंडित करती हैं। अतः अनुकूलीकरण की प्रक्रिया द्वारा स्त्री में मातृत्व-भाव को स्थापित किया जाता है। मातृत्वविहीन स्त्री अपने जीवन को व्यर्थ व अधूरा समझने लगती है। रेडिकल नारीवाद मातृत्व के महिमामंडन, प्रजनन,  यौनता पर पुरूषों की नियंत्रणकारी भूमिका को स्त्री-अधीनस्थता का मूल कारण मानती है। वह मातृत्व के पुरुषोचित संस्थाबद्धता को स्त्री उत्पीड़न का आधार मानती है। रेडिकल नारीवाद की अग्रणी ‘ शुलामिथ फायरस्टोन’ ऐतिहासिक संदर्भ में मातृत्व अथवा प्रजननक्षमता को ही महिलाओं की अधीनता के जड़ रूप में चिन्हित् करती हैं। गर्भधारण,  प्रजनन व पालन- पोषण की समस्याएँ महिलाओं को प्राकृतिक रूप से कमजोर समझने को विवश करती हैं। शुलामिथ लिखती है, ‘  इन्हीं समस्याओं के फलस्वरूप उन्हें पुरूषों पर आश्रित होना पड़ा,  जिस आश्रय-निर्भरता का लाभ लेते हुए स्त्री अधीनीकरण का सार्वभौम ढांचा निर्मित कर दिया गया है,  यद्यपि इस निर्भरता के मूल में निहित जीववैज्ञानिक कारण बीत चुके हैं।’  शुलामिथ ने नारीवाद को मातृत्व से मुक्ति की नई प्रस्थापना दी। रेडिकल नारीवाद स्त्री को आरोपित मातृत्व व यौन गुलाम के शिकार के तौर पर विश्लेषित करता है और इसे नारीवाद के आधार व प्रस्थान बिंदु के तौर पर स्थापित करने का उपक्रम करता है। मातृत्व का धर्मशास्त्रीय व सांस्कृतिक महिमामंडन,  बच्चों  के पालन-पोषण का संपूर्ण दायित्व स्त्री के कंधे पर डाला जाना स्त्री की अधीनस्थ स्थिति का मुख्य कारण रहा हैं। ऐन ओकली के अनुसार पितृसत्तात्मक समाज के प्रसार में तीन मिथक बेहद प्रभावी रूप में दिखते हैं. (1 ) सभी  स्त्रियों हेतु मातृत्व आवश्यक है। (2)  सभी स्त्रियों के लिए उनकी अपनी संतान आवश्यक है। (3 )  सभी बच्चों के लिए उनकी अपनी माँ आवश्यक हैं।

हर स्त्री हेतु मातृत्व आवश्यक है,  इस धारणा को लड़कियों के समाजीकरण और प्रचलित मनोविश्लेषक सिद्धांत द्वारा प्रदत्त किया जाता है। माता-पिता द्वारा लड़कियों को गुडि़या (खिलौना )  देकर उनमें मातृत्व-भाव उद्भुत किया जाता है। विद्यालय धर्म-संस्थाएं,  ग्रन्थ एंव जनसंचार माध्यमों द्वारा मातृत्व का महिमामंडन किया जाता है। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक व चिकित्साविदों द्वारा मातृत्व के अभाव को एबनार्मल माना जाता है। अतः इनके द्वारा मातृत्व को आरोपित कर स्त्री को ‘वस्तु ‘  में तब्दील करने का उपक्रम किया जाता हैं। इस प्रकार स्त्री अपनी मूल्यवत्ता मातृत्व में ही देखने लगती है। पितृसत्तात्मक तंत्र द्वारा स्त्री को मातृत्व हेतु सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से अनुकूलित किया जाता है। इसी तरह दूसरा मिथ हर  स्त्री को अपने संतान की आवश्यकता होती है- मातृत्व ग्रंथि की धारणा पर केंद्रित है। जिसकी पूर्ति न होने पर स्त्री एकाकीपन व अवसाद में चली जाती है। ऐन ओकली ने एक सौ पचास प्रथमतः माँ बनी स्त्रियों पर अपने अध्ययन द्वारा यह प्रस्थापना दी कि मातृत्व की ग्रंथि भी सांस्कृतिक तौर पर निर्मित होती है। माँ की योग्यताएं भी स्वतः नहीं बल्कि अपने परिवेश से सीखी हुई अथवा समाज द्वारा सिखाई जाती हैं। इसी प्रकार वह यह निष्कर्ष देती है कि ‘ माँ पैदा नहीं होती बल्कि पैदा की जाती है।’

जैविक मातृत्व मिथ की तीसरी धारणा-  बच्चे को उसकी अपनी माँ ही आवश्यक है,  यह पहले से कहीं ज्यादा दमनकारी पहलू है। इस धारणा के तीन अंतर्निहित बिंदु है  (1)  बच्चे को सामाजिक माँ नहीं बल्कि जैविक माँ की जरूरत होती है। (2 )  नवजात शिशु की देखभाल पिता की अपेक्षा माँ अच्छे से कर सकती हैं।  (3 ). बच्चे को अनेक नहीं मात्र एक पालक-पोषक  ( जैविक माँ की वरीयता )  की जरूरत होती है।  ऐन ओकली दत्तक संतानों के अध्ययनों से यह सिद्ध करती हैं कि सामाजिक माँ भी जैविक माँ जितना ही प्रभावकारी होती हैं। दूसरी धारणा कि माँ पिता की अपेक्षा बेहतर देखभाल करती है,  को बेबुनियादी ठहराते हुए ऐन ओकली लिखती हैं कि ‘ आत्मीय,   पारस्परिक व पालन-पोषण का रिश्ता ही बच्चे की पिता अथवा माता से जरूरत का निर्धारक बनता है।’  और तीसरी धारणा कि बच्चे को एक पोषिका की जरूरत होती है। एक उदाहरण से ऐन ओकली इसे गैर जरूरी सिद्ध करती हुई सामूहिक समाजीकरण और बहुविकल्पी मातृत्व की महत्ता को रेखांकित करती हैं।
इस तरह ऐन ओकली अपने अध्ययन व तर्कों के आधार पर जैविक मातृत्व को स्त्री की प्राकृतिक आवश्यकता माने जाने को खारिज करती है। इसे वह दमनकारी उद्देश्य से रचित एक मिथ के तौर पर चिन्हित करती हैं। ऐन ओकली की भांति शुलामिथ फायरस्टोन भी जैविक मातृत्व के स्त्री  नियंत्रणकारी पक्ष पर लिखती हैं,  ‘ एक  पुरुष के लिए उसका संतान उसके नाम, संपत्ति,  वर्ग,  जाति,  पहचान का माध्यम होता है। इसके उलट स्त्री के लिए वहीं संतान घर के भीतर सीमित अस्तित्व का माध्यम बन जाता है।’   इस प्रकार रेडिकल नारीवाद जैविक मातृत्व के पूरे सोच को औरत के दमन का आधार मानता है। इसी सोच के कारण नारीत्व और पुरुषत्व के दो रूप निर्मित किए जाते हैं। जिनका अलग-अलग दोहरा खांका – पुरुषसम्मत व स्त्रीसम्मत गुण हैं  । यह लैंगिक आघार पर घरेलू व बाहरी क्षेत्रों का विभाजन  करके पितृसत्तात्मक व्यवस्था हेतु कारगर उपकरण की भाँति कार्य करता है। जो घर की चौहद्दी एवं घरेलू जटिल व अनार्थिक मूल्य के कार्यों हेतु औरत को पीढी दर पीढी निर्धारित व आजीवन समर्पित कर देता है।

जैविक मातृत्व के मिथक से संचालित स्त्री की अभिव्यक्ति सोहर में बहुतायत मात्रा में मौजूद है। बांझ होने पर सामाजिक उपेक्षा का दंश झेलती स्त्री की वेदना और जैविक मातृत्व की प्राप्ति हेतु विभिन्न व्रत-अनुष्ठानों की महत्ता  सोहर गीतों में वर्ण्य है। जिनका अनुपालन कर बांझ स्त्री भी गर्भवती हो जाती हैं। ये व्रत-अनुष्ठान स्त्री-निर्मित अनुष्ठानिक परंपरा को रेखांकित करते हैं, परंतु इनका प्रयोजन मातृत्व के अभिष्ट लक्ष्य की पूर्ति हेतु ही साधन-रूप भर  वर्ण्य है। सोहर में गर्भस्थ शिशु से मां का एकात्म रिश्ता, शिशु का पालन-पोषण व हंसना-खेलना इत्यादि प्रसंग प्राप्य हैं। पितृसत्तात्मक उद्देश्यों से इतर मातृत्व की स्वाभाविक व सुखद अनुभूति और शिशु से माँ का भावनात्मक रिश्ता भी सोहर गीतों में वर्ण्य है। इसी प्रसंग के क्रम में कई ऐसे भी संदर्भ हैं,  जिनसे प्रसव-पीड़ा से व्याकुल स्त्री पति को इस पीड़ा में भी साझीदार होने को कहती है और पति उसे संतान प्राप्ति हेतु इतनी तकलीफ सहने का ढांढ़स बंधाता हुए प्रसव-वेदना सहने के लिए सान्त्वना देता है। ये गीत मातृत्व के सामाजिक व सांस्कृतिक मिथकों से प्रयाण करते हुए प्रजनन प्रक्रिया के जैविकीय धरातल पर स्त्री के समझ व सजगता को निरूपित करते हैं। जो संतान व शिशु के प्रति स्त्री के एकतरफा दायित्व-बोध  को विस्तृत तौर पर इंगित करते हुए पुरुष साझेदार की भूमिका निर्वाहन को संबोधन है।

हिन्दू शास्त्रों व धर्मग्रन्थों में पुरुष को बीज और स्त्री को धरती के रूपक में व्याख्यायित किया गया है। सन्तति सृष्टि की प्रक्रिया में पुरुष श्रेष्ठता ही प्रतिपादित की गई है। प्राचीनकालीन एवं कालांतर के संस्कृत ग्रन्थों में,  जो विधि,  समाज और संस्कार से संबंधित हैं –  स्त्री के खेत में पुरुष का बीज गिरने की अवधारणा स्पष्टतया उल्लेखित है। अथर्ववेद के एक श्लोक में कहा गया है, ‘ वास्तव  में पुरुष में बीज का विकास होता है। उसे स्त्री के भीतर डाल दिया जाता है। वही पुत्र प्राप्ति है।’  इसी प्रकार नारद स्मृति में उल्लेखित है- ‘स्त्रियाँ  सन्तानोत्पत्ति के लिए बनाई गई हैं, जो खेत है और पुरुष बीज का मालिक।’   ‘ बीज’  पिता के योगदान का और ‘ धरती ‘  माँ की भूमिका के प्रतीक रूप में शास्त्रों व संस्कारों में वर्ण्य है। पुरुष बीज के दृारा संतान की रचना का सत्व प्रदान करता है। इसलिए जहाँ तक कुल निर्धारण का सवाल है, बच्चे की पहचान उसके पिता द्वारा होती है। माँ की भूमिका गर्भ में आये तत्व की वृद्धि करना है। वह अपने रक्त के माध्यम से ऊष्मा और भोजन प्रदान कर उसके विकास में सहायता करती है। यह प्रक्रिया लंबी है और प्रसव के साथ समाप्त नहीं हो जाती। माँ अपने दूध से बच्चे का पोषण करती है। उसकी भूमिका पोषिका की है। विभिन्न ग्रन्थों में स्त्री पुरुष के संतान प्राप्ति की मात्र वाहिका रूप में वर्णित है। महाभारत का एक प्रसंग उल्लेखनीय है,  जिसमें राजा दुश्यंत शकुंतला का तिरस्कार करते हुए उसे अपना पुत्र ले जाने को कहते हैं। इस पर शकुंतला तर्क देती है, पत्नी के गर्भ में प्रवेश करने वाला पुरुष पुत्र के रूप में स्वयं बाहर आ जाता है। उसी समय आकाशवाणी होती है,  ‘ माँ तो मांस का आवरण है,  पिता से उत्पन्न होने वाला पुत्र वास्तव में स्वयं पिता का ही रूप है’  ( महाभारत के आदिपर्व के चौदहवें खंड में) ।

प्राचीन काल से भारत में मानव प्रजनन प्रक्रिया को स्त्री-खेत में पुरुष-बीज के अंकुरण के संदर्भ में समझा और अभिव्यक्त किया गया है। हिंदू वैवाहिक कर्मकांडों में बीज और खेत के प्रतीक बार-बार आते हैं। वैवाहिक कर्मकांडों के अनेक धार्मिक कृत्यों में पति ( बीज देने वाला )  के प्रति पत्नी के समर्पण,  निष्ठा,  दृढ़ता आदि मूल्यों पर जोर दिया जाता है। वैवाहिक कर्मकांड के दौरान विविध अवसरों पर उच्चारित श्लोकों में अंतर्निहित आशीर्वादोंए कामनाओं और अपेक्षाओं में पुत्र.जन्म का महत्व स्पष्ट हो जाता है। वर के द्वारा कहे जाने वाले ऐसे दो श्लोक निम्नवत् हैं ।
‘ इसे इच्छानुसार वैभव,  (दीर्घ आयु, समृद्धि और दस पुत्रों का शुभ और गौरवपूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो। हे इन्द्र,  हे सवितृ,  वह गौरव, जो इस पुत्रहीनता की स्थिति समाप्त करे,  शीघ्र इसे दो। ( वैखानस गृह्यसूत्र,  3-4)
‘ तुम्हारे  गर्भ में पुरुष भ्रूण उसी तरह प्रवेश करे जैसे तरकश में तीर,  एक पुत्र दस माह बाद जन्म ले और इस तरह अनेक पुरुष उत्पन्न हों।’  ( सांख्यायन गृह्यसूत्र, 1-19-6)

खेत-बीज रूपक एवं पुत्र-प्राप्ति कामना को वैवाहिक अनुष्ठान तथा अन्य महत्वपूर्ण अवसर पर उच्चारित मंत्रों-पाठों में सुना जा सकता है। समाज में संतान को जन्मदात्री माँ के नाम से न जाकरए पिता के नाम से जाना जाता है। इस परंपरा से दुःखी स्त्री कहती है:

पीर हमनें खायी 
सइयाँ के लाल कैसे कहाई
आओ सास रानी बैठो पलंग चढ़
हमरा झगड़ा छुड़ाओ सइयाँ के लाल
कितनो बहू लड़बू कितनो झगड़बू
बेटवा बापे के कहाई
तोहार लाल कैसे कहाई।

प्रचलित सामाजिक संरचना की यह अनिवार्य परिणति है, जहाँ गर्भाधान में पुरुष के नाम का महत्व होता है। गर्भाधान संस्कार के समय होने वाले अनुष्ठानों व कर्मकाण्डों में पुरुष का शिशु पर अधिकार स्पष्टतया ध्वनित होता है। आदिम समाज में गर्भाधान में पुरुष की विशिष्ट भूमिका नहीं मानी जाती थी। पितृसत्तात्मक संस्थाओं के विकास के साथ पुरुष अपनी संतति पर  अधिकार का दावा करने लगा और स्त्री की भूमिका मात्र पालिका-पोषिका तक सीमित कर दी गई । अपनी विशिष्ट जैविक स्थिति के कारण पुरुष गर्भ की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। शुलामिथ फायरस्टोन जैसे रेडिकल नारीवादी गर्भधारण को जंगली प्रवृत्ति कहते हुए शुक्राणु व डिम्ब से जन्में शिशु हेतु अंधप्रेम को सामाजिक न्याय की दृष्टि से बाधक मानती हैं।  इसी प्रकार गर्भाधान को नाटक करार देते हुए सिमोन द बोउवार लिखती हैं , ‘ गर्भाधान एक प्रकार का नाटक है,  जो स्त्री के शरीर के भीतर ही खेला जाता है। स्त्री को एक साथ सम्पन्नता और आहत का अनुभव होता है। भ्रूण उसके शरीर का एक अंश होता है। भ्रूण एक परजीवी जीव है, जो स्त्री से अपना पोषण प्राप्त करता है। वह संतान को अपने वश में रखती है और स्वयं संतान द्वारा अधिकृत कर ली जाती है। संतान द्वारा भविष्य में अपने प्रतिनिधित्व की आशा से गर्भधारण करके स्त्री अपनी सांसारिक महानता का अनुभव करती है। महानता का यह अनुभव ही स्त्री का विनाश कर देता है। उसे नगण्यता का अनुभव होता है। अपने गर्भ से बाहर आकर पृथक अस्तित्व ग्रहण करने वाले जीव पर गर्व करने के बावजूद स्त्री अनुभव करती है कि कोई उसे उसके स्थान से भगा रहा है। ऐसा लगता है कि वह अदृश्य शक्तियों के हाथों का खिलौना हो गई है। यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि ठीक उसी समय जबकि गर्भवती स्त्री सर्वोपरि हो उठती हैए वह अपने को विश्वव्यापी रूप में देखती है। वह अपने लिए अपना अस्तित्व नहीं रखती।ष्  अतः रेडिकल नारीवाद स्त्री उत्पीड़न के मूल में उसकी प्रजननकारी भूमिका को देखता व समझता रहा हैं। शुलामिथ फायरस्टोन स्त्री उत्पीड़नकारी व्यवस्था के खात्मे हेतु प्रजनन को स्त्री द्वारा त्याग करने का प्रस्ताव रखती है। उनका कहना है कि तकनीकी क्रांति से ग्लास के डिबों में गर्भधारण व गर्भावस्था की पूरी प्रक्रिया की जा सकती है। तकनीकी प्रणाली से जैविक मातृत्व की पितृसत्तात्मक संरचना व मिथक को प्रायः समाप्त किया जा सकता है।  यद्यपि बाद की रेडिकल नारीवादी इन अतिरेकों से प्रयाण करते हुए इस प्रस्थापना बिंदु पर पहुँची कि स्त्री के गर्भधारणा की क्षमता उसके विकास में बाधक नहींए अपितु प्रजनन व शिशु.संरक्षण पर पुरूषों का सीधा नियंत्रण बाधक है। इसी आधार पर एजिजा.एल.हिबरी शुलामिथ फायरस्टोन की आलोचना करते हुए लिखती हैं कि. ष्महिलाओं के अपने प्रजननकारी भूमिका को त्याज्य कर देने परए वह एक मुख्य तत्व छोड़ देगीए जिसके लिए पुरुष उन पर निर्भर है।ष्  स्त्री की शारीरिक रचना जीवन के नैरन्तर्य को बनाए रखने की दृष्टि से हुई हैए अतः पुरुष उन पर पूर्णतयाः निर्भर है। अतः इसे कमजोरी के तौर पर नहीं अपितु ताकत व हथियार के रूप में स्त्रियों द्वारा उपयोग करने की जरूरत है। स्त्रियों के गर्भधारणए प्रजनन व मातृत्वए शिशु के पालन.पोषण के संदर्भ में अपने निर्णय व अधिकार होने चाहिए न कि पुरुष तय करें कि उसे कब और कितने बच्चे चाहिएए उनकी परवरिश कैसे व किस तरह होघ् यह समूचा क्षेत्र महिलाओं के निर्णय व स्वेच्छा पर आधारित होना चाहिए। पुरुष.प्रधान व्यवस्था अपने नियंत्रणकारी निर्देशों के बल पर मातृत्व को एक अजनबीपन अनुभव में तब्दील कर देता है। समाजवादी नारीवादी एलीसन जैगर समकालीन समय में महिलाओं के अलगावध्पार्थक्यकारी स्थिति को विश्लेषित करते हुए लिखती हैं कि ‘महिलाएं  पुरुष के नियंत्रणकारी आदेशों व निर्देशों के कारण जहाँ पुनरूत्पादन श्रम से पार्थक्य स्थिति में रहीं है, वहीं नई पुनरूत्पादन तकनीकी भी प्रजनन.प्रक्रिया से उनका पार्थक्य सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रसर है। शुलमिथ फायरस्टोन  के अतिरेकपूर्ण मंतव्य अंततः जैविक निर्धारणवाद विचार प्रणाली के ही शिकार हो जाते हैं। जैविक निर्धारणवाद के आधार पर ही पुरुष प्रधान व्यवस्था अपने वर्चस्व को प्राकृतिक व स्वाभाविक सिद्ध करता रहा है। जैविक मातृत्व के अंतनिहित पुरुष वर्चस्वशाली उद्देश्यों से विलग होकर इसे स्त्री द्वारा अलग स्वरुप से गढा जाना चाहिए। पुनरूत्पादन एंव संतति के पालन-पोषण पर स्त्री का अधिकार व उसके रीति.नियम होने चाहिएए जो किसी भी पितृसत्तात्मक सामाजिक प्रभावों से मुक्त हो। ऐड्रिन रिच जैविक मातृत्व के पितृप्रधान संस्थानिक स्वरूप की आलोचना करती है। वह गर्भावस्था व संतति पालन.पोषण के आनुभविक आधार पर जैविक मातृत्व को प्रतिष्ठित करती हैंए बशर्ते स्त्री को पुनरूत्पादन व संतति पालन -पर स्वयं का अधिकार हासिल हो। जिससे वह बच्चों का नारीवादी मूल्यों के आधार पर पालन-पोषण कर सकें।
समाज में स्त्री का पुत्रवती होना गर्व का विषय समझा जाता हैं। पुत्र.जन्म पर परिवार में हर्षोल्लास का वातावरण होता है और सोहर गाये जाते हैं। पुत्र ही पितृवंशात्मक उत्तराधिकारी होता है। निजी संपत्ति का वारिस होने के कारण उसकी निर्विवाद महत्ता है। जो पुत्री की अपेक्षा उसकी श्रेष्ठ स्थिति को दर्शाता है। वहीं सांस्कृतिक व धार्मिक मान्यता के अनुसार पुत्र ही मां.बाप के श्राद्ध.तर्पण का अधिकारी होता हैं। पुत्र द्वारा श्राद्ध.तर्पण करने पर ही मां.बाप की आत्माएं मुक्त होती हैं। पितरों की आत्माएं पुत्रों से ही पिण्ड व जल ग्रहण कर सुखी और संतुष्ट होती हैं। अतः पुत्र की प्रबल.कामना सोहर गीतों में वर्ण्य है। जबकि पुत्री.जन्म पर दुःख व विशाद का वातावरण होने के कारण सोहर नहीं गाया जाता। पुत्री जन्म पर प्रसूता की उपेक्षित स्थिति निम्नवत् वर्ण्य है:

जइसन दहे में के पुरइनि दहे बिचे काँपेले रे।
ए ललना ओइसन कॉपेले हमरो हरि जीए घिया कारे जनमु रे।
कुस ओढ़न कुस डासनए बन फल भोजन रे।
ए ललना खुखुड़ी के जरेला पसगिया निनरियौ ना आवेला रे।।
( जिस प्रकार तालाब के बीच में स्थित पुरैन का पत्ता कांपता रहता है,  उसी प्रकार से मेरा पति पुत्री का जन्म होने से कांपता रहता है अर्थात् डरता है। दुर्भाग्य से यदि लड़की पैदा हो जाती है तो वह कुश ओढ़ने और कुश ही बिछाने को देता है। वन के फूल भोजन करने को देता है। बुरी लकड़ी जलाने के लिए देता है, जिससे मुझे नींद नहीं आती। )
लोक में ऐसी मान्यता है कि लड़की के पैदा होते ही पृथ्वी तीन हाथ नीचे दब जाती है। जिस स्त्री को लड़की पैदा होती है,  वह प्रसव-पूर्व के दैवीय ‘  पदवी से पदच्युत करके उपेक्षित व बहिष्कृत कोटि में खड़ी कर दी जाती है। उसको वस्त्र, भोजन भी बदतर दिया जाता है। सास-ससुर, ननद व पति द्वारा उपेक्षापूर्ण व्यवहार व यातना दी जाती है। कन्या जन्म पर ससुराल वालों का कठोर व्यवहार निम्नवत् गीत में उदाहरणार्थ प्रस्तुत है:
बिटिया के भइल ससुरा सुनले।।
हथवन से छूट गइल लठीया।
बिटिया के भइल जेठवा सुनले।।
हथवन से छूट गइल घडि़या।
आज बहूरानी के हो गइल बिटिया।।

देश के कई क्षेत्रों में पुत्री के जन्म लेते ही मार डालने की परंपरा रही है। कन्या शिशु हत्या की यह परंपरा उच्च वर्णों,  खासकर क्षत्रियों में प्रचलित रही है। जिसका जिक्र ललिता पाणिग्रही ने अपनी पुस्तक ‘  ब्रिटिश सोशल पॉलिसी एंड फीमेल इनफैटिसाइड इन इण्डिया. में विस्तार से किया है। आधुनिकयुगीन अल्ट्रासाउण्ड परीक्षणों के अभाव में पंडितों व ज्योतिषियों की बड़ी पूछ होती थी, जो पुत्र या पुत्री जन्म की भविष्यवाणियां किया करते थे। पुत्री-जन्म से व्यथित स्त्री एक सोहर में कहती है कि ‘ यदि  मुझे पूर्व में पता होता तो मैं झरार काली मिर्च खाकर गर्भावस्था में तुम्हारा जीवन खत्म कर देती।’   भ्रूण लिंग-परीक्षण कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होने के बावजूद हालिया दशक में कन्या भ्रूण हत्या की कुप्रथा शहर व गांव में तेजी से विस्तारित हुई है। उच्चवर्ग के साथ-साथ निम्न मध्यवर्ग भी इस जघन्य अपराधिक कृत्य में शरीक हो चुका हैं। कन्या को परिवार हेतु एक बड़ा आर्थिक बोझ समझा जाता है। इसी आर्थिक बोझ,  यानि दहेज से मुक्ति , का रास्ता कन्या भ्रूण हत्या , शिशु  हत्या माना जाता रहा है। उदाहरणार्थ. एक सोहर का हिन्दी भावार्थ हैं. ‘ ऐ बेटी जिस दिन से तुम्हारा जन्म हुआ है उस दिन से मुझे भादव की रात ही दिखाई पड़ती है। सास व ननद सूतिका गृह में दीपक भी नहीं जलातीं और पति भी कुबोल बोलता है। जब तुम्हारा विवाह होगा, तुम्हारी माँग में सिन्दूर पड़ेगा और दूल्हा नव लाख रूपये दहेज में मांगेगा,  तो मैं (गरीब होने के कारण) घर के सारे बर्तन उसे देने के लिए आंगन में पटक दूंगी। शत्रु को भी कभी लड़की न पैदा हो। यदि मैं जानती कि लड़की पैदा होगी तो मैं काली-मिर्च पीसकर पी जाती, उस मिर्च की गरमी से तुम मर जाती और मेरा पुत्री-जन्म से उत्पन्न बड़ा दुःख छूट जाता।’

पितृसत्तात्मक व्यवस्था में प्रचलित दहेज की लैंगिक विभेदी परिपाटी के कारण पुत्री परिवार में बोझ सदृश्य हो जाती है। पुत्र जन्म पर जहाँ परिवार में हर्षोल्लास व पुत्रवती की देखभाल व पूछ होती हैं। वहीं पुत्री का जन्म परिवार की चिन्ता व विषाद का कारण बन जाता हैं और पुत्रवती स्वयं को संकटग्रस्त समझने लगती है। दहेज प्रथा के कारण पुत्री जन्म अभिशाप का रूप घारण कर चुका है। नारी जीवन की यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि मातृत्व को लालायित स्त्री पुत्रीजन्म को ही स्वयं एवं परिवार पर सबसे बड़ा अभिशाप व आपदा मान बैठती है।

उन पत्रकारों के नाम जो मारे गए

निवेदिता


मूलतः पत्रकार निवेदिता सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ प्रकाशित . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

निवेदिता

1.
जब कोई दरवाजे पर देता  है दस्तक
माँ भागती  है
किवाड़ खुलते
ही  उसकी चाल धीमी
हो जाती है
जानती है अब वह लौट कर कभी नहीं  आएगा
सब कुछ वही है
उसका कमरा
टेबुल पर पड़ा लैम्प
मुड़े –मुड़े कागजों का ढेर
कैमरा , माईक
पेंसिल, जिसे वह अक्सर अपनी उंगलियों में दबाकर
लिखता हुआ नज़र आता था
माँ धीमे कदमों  से आकर उसके पास खड़ी हो जाती थी
रे इतनी देर तक क्या लिखता रहता है
वह मुस्कुराता और माँ को भर लेता बाँहों में
तू चिंता क्यों करती है
माँ जानती है
रात उतर आती है कागजों पर
कागज से बड़े -बड़े दैत्य निकल आते हैं
टी वी पर शब्द उछलते
एक और घोटाला
आकाश विदीर्ण हो रहा है
सूर्य दहक  रहा है
पृथ्वी गहरे सुरंगो में ढल गयी है
हवा ने देश के चिथेड़े –चिथड़े किये
माँ ने देखा उसके लिखे शब्द
बह रहे हैं
बहती रहो नदियां
उसकी आवाज की नमी ख़त्म न हो
अनन्त पानियों की जगह वह लौट आएगा
सब कुछ के विरुध्य
दुनिया की तमाम स्याही

के साथ
वह फिर
लिखेगा
कागज पर
फिर कागज जलाये जायेंगे
उसी चौक पर जहाँ
उसे जला दिया गया
माँ ने हवा में उड़ते  चिंगारियों को दामन में समेट लिया
उसके आंचल लहरा रहें  हैं
आसमान तक  फूंट रहीं हैं
लाल लाल लपकती आग

२.
तुम जानते थे कि
सच की खोज जोखिम भरा है
तुम जानते थे धरती सपनो के साथ जीवित है
तुम मिट्टी में तारीख दर्ज  करने की कोशिश में लगे थे
परत-परत खुलता गया
और खून से दामन भींगते गए
माँ जो अक्सर डर जाती थी
रात –रात आकर तुम्हारे सिराहने बैठी रहती
आसमान पर अपने आंचल की तम्बू टांग देती
जाने कितने जतन
किये
पर रोक नहीं पाई हत्यारे की लपलपाती जीभ
उसने अपने आंसू पोछ  लिए
और वह लड़ रही है,
जहाँ बच्चे खेलते हैं
जहाँ अँधेरी गलियों में जीवन सरकता है
जहाँ रात की पाली से लौटते है कामगार
वह तुम्हारे लिखे कागज पर लिख रही है
शब्द
एक पुराने ग्रह की भाषा
संघर्ष


नहीं हम नहीं भूलेंगे
हत्यारे की आखें
हम नहीं भूलेंगे उनकी शांत चीख
हमारे लोगों के कडवे आंसू
हम नहीं भूलेंगे इस
असंवेदनशील समय को
मुझे याद है
तुम्हारी हंसी
तुम्हारा प्यार
याद है तपती गर्मी में बिना बादलों के
मारे – मारे  फिरना
जहाँ घुली बर्फो पर सूरज की पीली रौशनी पसरती है
पलाश और गुलमोहर
बरस पड़ते थे
पेड़ो की  शाखों पर फिसलते पानी की तहरीर
नीला समंदर
और रात की गोद , हमारा डूब जाना
तुम्हारी यादें
हमें यकीं दिला रहीं हैं
अभी सब ख़त्म नहीं हुआ है
अभी प्यार जिन्दा है
जिन्दा हैं  सपने
अभी लड़ना बांकी है
बांकी है  जिन्दगी  के राग ….

प्रतिभा गोटीवाले की कवितायें

प्रतिभ गोटीवाले


युवा कवयित्री प्रतिभा गोटीवाले की रचनायें विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं संपर्क : minalini@gmail.com

अलविदा

आज तुम्हे जाते हुए
देखकर जाना
कि जाते हुए कदम
रोकते हैं बहुत
देखो ना  …
जाने  के बाद
पता चला
कि तुम्हारे साथ
चला गया हैं
एक रुमाल मेरा
जिसकी गांठ में बाँध ली थी
कुछ छोटी छोटी सी
बातें तुम्हारी
और रह गया हैं
पास मेरे
एक झोला
अनकही बातों का
जो रख देना था
तुम्हारे सामान के साथ ही
तुम्हारे लिए,
आज तुम्हे जाते हुए
देखकर जाना
कि जाती हुई आँखे
एक क्षण में कह जाती हैं
वह सब
जो एक जीवन में
न कह पाए
और जाना
कि जाती हुई आँखों की
अनकही बातें
कितनी जल्दी
सुन लेता हैं मन
जिसे सुनने को
तरसते है  कान ताउम्र,
जाना  कि जाने वाले
और पीछे छूट जाने वाले
बने रहते हैं एक दूसरे के साथ
बिछड़ने के बाद भी …………. ।

जाने के ठीक पहले

जाने के ठीक पहले नहीं भूलूँगी
रखना एक बोसा
तुम्हारे जलते माथे पर
और हर ले जाना ताप तुम्हारा
नहीं भूलूँगी सहलाकर हटाना
तुम्हारे मासूम चेहरे पर बिखरे बाल
कि चाँद देख सके अपलक तुम्हें
और सपनो को भटकना न पड़े
तुम्हारी आँखों की तलाश में
नहीं भूलूंगी  …
कि करीने से जमा दू
मेरी जगह मेरी यादे
किचन में ,अलमारियों में
ठीक उस उस जगह
जहाँ तुम्हे तकलीफ़ होती हैं
सामान ढूँढ़ने में
नहीं भूलूँगी छोड़ना कुछ कतरे आवाज़
जो बता सके तुम्हे
कि कितना प्रेम था मुझे तुमसे
जाने के ठीक पहले
याद आएगा मुझे
की सुनना था तुमसे
मत जाओ !
मुझे ज़रूरत हैं तुम्हारी    !

(कितने काम याद आते हैं   …जाने के ठीक पहले  …. )

 टाइमपास 

कशीदा काढ़ते हुए
उसकी आँखों पर
नज़र गई है कभी तुम्हारी ?
एक चमकीली मुस्कराहट
भरी होती हैं उनमें
मानों सुई के कानों में
वो कहती हैं कुछ
और सुई ,धागे में पिरोकर
करीने से छुपा देती हैं
उसकी बातें
रुमाल के सीने में ,
मन की अनकही
ढेर सी बातें
धागों में उतारती चलती हैं वह
कोई पढ़े
कोई सुलझाये
तो जीवन के
सारे समीकरण
उतरे दिखते हैं रुमाल पर
तुम जिसे बडी आसानी  से
कह लेते हो न टाइमपास !
दरअसल वही
रंगीन धागों से कढ़े हुए
छोटे-छोटे से सपने
उसके अपने हैं
बाकी तो उसकी सारी दिनचर्या
महज़ तुम्हारी ज़रूरते है.……

 ऐसे भी आओ

कितने दिन हो गए है
तुमसे मिले हुए
कभी आओ ना यूँ
जैसे अलसुबह उनींदी आँखों पर
खिड़की के रास्ते चली आई हो धूप  ….

चुप का होना ही उसका होना था 

मेरी शिनाख्तगी से पहचानी गई
उसकी लाश
उसे जानती थी बचपन से
वो ऐसी ही थी
हमेशा चुप
या दरअसल चुप का होना ही
उसका होना था
लेकिन आश्चर्य हुआ
जब लोगों ने बताया
कि अपने अंतिम दिनों में
ख़ूब बोलने लगी थी,
ज्यादा हँसने लगी थी
बेवजह घूमती थी यहाँ-वहां
पर हमेशा बाहों में थामे रहती थी
अपनी मरियल सी ख़ामोशी
शब्दों की ढ़ेर सी तहों में छुपाकर
किसी को छूने नहीं देती थी
बिलकुल ऐसे जैसे
सर्दियों में माँ अपने शिशु को
ठण्ड से बचाने के लिए
लपेटे रहती है गर्म कपड़ों के बंडल में
उसके मरने के बाद जब खोली गई तहें
वहां एक कंकाल था बस
बहुत पहले दम तोड़ चुकी ख़ामोशियों का

एक रात झील के साथ

झील के सोते ही
शैतानियों पर
उतर आती हैं
नन्ही- नन्ही
मछलियों सी लहरें
किनारे पर लगे
बिजली के लट्टुओं से
खींचकर
रोशनियों के धागे
ले भागती हैं
दूर दूर तक,
और बनाती हैं झील के
आँचल पर
सुनहरी धागों से
कांजीवरम और पोचमपल्ली
की रूपरेखाएँ,
उतार लाती हैं
किनारों की
पूरी रौनक
झील की गोद में
और ज़री की साड़ी में सिमटी झील
चाँद का टीका लगाकर
रात के कांधे पर
सर टिकाये
मुस्कुराकर देखती है
लहरों की
मासूम सी अठखेलियाँ
भिन्सारे जब थक कर सो जायेंगी लहरे
झील अपना श्रृंगार उतार
काम पर लौट आएगी ।