Home Blog Page 145

अनीता चौधरी की कविताएँ

0
अनीता चौधरी

साहित्यकार अनीता चौधरी हमरंग.कॉम का संपादन करती हैं . संपर्क : ई-मेल : anitachy04@gmail.com

   अन्धकार
चारों तरफ धुएं से घिरे बादल
और घने और घने होते
ये बादल
अब और भी स्याह लगने लगे है
इनमें स्वयं को खो जाने का डर
मुहँ से निकलती चीख़ पुकारें
जा टकराती है उस अंधकार से
हो जाती है विलय उसमें
कभी न लौटने के लिए
रह जाती है निरर्थक साँसे।
सिर्फ चलने के लिए।

   माँ
भोर की पहली किरण के साथ ही
शुरू हो जाती है उसकी दिनचर्या
नई स्फूर्ति,जोश और उमंग के साथ
फूंस के गठ्ठर को हाथ में पकड़े
फटकारती है घर के हर एक कोने को
चाय का प्याला लिए हाथ में
प्यार भरे स्पर्श से जगाती है हमें
और जुट जाती है अपने घर के
अति व्यस्त कार्यों में
सहेजती है घर की
हर एक चीज को
अपने पूर्ण समर्पण के साथ
रखती है ख्याल सबकी
पसंद   नापसंद का
सबकी खुशियों का
ताक पर रखकर अपने सुखों को
भूल जाती है स्वयं को
देखकर उनके मुस्कराते हुए चेहरे
तड़प उठती है वो जब
देखती है हमें किसी भी
दर्द में छटपटाते हुए
बिता देती है कई कई रातें
बैठकर हमारे सिरहाने।
वो करती है रात दिन यहीं दुआएं
लग जाये इनकी सारी बलाएं
इसी सुख और दुःख के चक्र में
वो गुजार देती है अपनी ताउम्र
कभी रामदीन की बेटी बनकर
राजू की बहिन, सुखिया की पत्नी
गोलू की मम्मी तो कभी
चिंटू की दादी बनकर
बिना किसी नाम व् अपने
ठोस वजूद के साथ ।
खोकर अपना सम्पूर्ण अस्तित्व
खड़ा करती है हमें वह
पूरे विश्वास के साथ
ऐसी होती है प्यारी माँ।

  वृक्ष
पिछले तीन दशकों से
तुम्हारे हर सुख और दुःख
हार और जीत,यश या अपयश का
एक मात्र साथी रहा हूँ
बिना विचलित हुए
तटस्थ खड़ा होकर
अपनी बाहें फैलाकर
तुमको धूप ताप से बचाता रहा
नींद आने पर शीतल भरी छाँव में
थप्पी देकर सुलाता रहा।
वक्त आने पर अपने तन से
चिथड़े उतार कर
चारों तरफ फैली पल्लवित होती
छोटी छोटी बाहें कटवाकर
करता रहा पूरी जरूरतें।
फिर भी तुमने एक क्षण न सोचा
मुझे अपने से अलग
काटकर फेंक दिया
घर के बाहर एक गड्ढे में
मिटा दिया
मेरे होने का नामोनिशां
और उसी जगह बना दिया
एक आलीशान महल।

   स्पंदन
कल्पित, पल्लवित अधखिली सी कली
तरुणाई में लेती हुई अंगडाई
इस मायामयी दुनिया से बेखबर
खुद को समेटे सुनहले स्वप्नों में
किसी आसमां के चाँद की तलाश में
जो ले जाएगा उसे
मीलों लंबा सफ़र तय करके
उस नीले पहाड़ के पीछे
अपने जादुई रंग महल में
समेटे हुए अपने आगोश में
अदृश्य से स्पंदन के साथ
शिख से नख तक
रोएँ को स्पर्श करती
उसकी गहराती तपिश
बढ़ाती है नैनों में खुमार
लालिमामई होठों की फाड़फड़ाहट
कर देती है व्याकुल
शनै-शनै उसके हाथों की छुअन
बर्फ की चोटियों से टकराती
समतल व मरुस्थलों से गुजरती हुई
जा टकराती है उस झील के तट से
जिसकी तपन बढ़ा देती है
उस झील का वेग
जिसके मध्य से निकलती है
एक नदी की  धार
और समाहित हो जाती है
उस अंतहीन सागर में
एक असीम सुख के साथ |

नताशा की कविताएँ

0
नताशा

विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित , शिक्षिका और दूरदर्शन कार्यक्रम संचालिका . संपर्क : ई-मेल : vatsasnehal@gmail.coom

1. 

तय हुआ था बिछड़ते वक्त
हम मिला करेंगे मौसमों के मार्फत
अपने अपने शहर से
मैं भेजूंगी
दिन भर की जद्दोजहद के बाद
निढाल सी बेंच पर पडी हुई शाम
और सूखे पीले पत्तों पर राहगीरों की चहलकदमी
वह कानों को बेचैन करने वाला संगीत
भेजूंगी हवा के मार्फत
तुम भेजना
सुबह की बेदाग किरण
जिसपर लोग धब्बे लगाकर
स्याह कर डालते हैं
और मार डालते हैं रात में
तुम भेजना
उस हर रोज जन्म लेने वाली
अपराजित किरणों को
यही तय हुआ था बिछड़ते वक्त
हम दोनों के बीच
बस यही…

हम ज़ार ज़ार रोये बिछड़ते वक्त
बेबस और निर्दोष होने के अभिनय में माहिर
विकल्पों की संभावनाओं ने हमें ढीठ कर दिया था
त्याग और समर्पण का नया अध्याय लिखने के लिए उद्धत
इन सबसे बढ़कर रोना सुकूनदेह था
हम दुख में थे
मगर दुख असह्य नहीं था
हमारे बीच वादा था
एक पक्का वादा.

काफी दिन बीते इस वादे को
अब रोना भी नहीं आता तुमको याद कर
इस सूखे का कारण
सावन भादो का सूख जाना है
या उधर बादल फटने की घटनाओं में
बह गया है मेरी आंखों का पूरा जल
रद्द हुआ कब ये वादा
कुछ ठीक ठीक नहीं बता सकते हम तुम
कितने मौसम बदले
तुम्हारी भेजी हुई चांद की चूड़ियां
मेरे शहर की आंधी में बिखरी पड़ी हैं
मैंने पिछले कई वसंत भी नहीं भेजे तुमको
अब चैत की उदास दुपहरी
उम्र की ढलान से फिसलती ही नहीं
तुम्हारे शहर की चिट्ठियां
कर्फ्यू की खबरों में तब्दील हो गई हैं
कोई चेहरा, कोई नाम तुमसे मेल न खा जाए
मन्नत के धागों का ढीला पड़ना
यह डर पैदा करता है
मैं नहीं भेजना चाहती थी
मेरे शहर का मातम
लेकिन बहुत तेज रास्तों से
पहुंचती ही होगी खबर तुम तक भी
मैं भेजना चाहती थी चुप्पी
तुम तक शोर पहुंच जाती है

शहर बदल गया
पते बदल गये
हम बदल गये
खबर बहुत जल्द आती है
बस मौसम बहुत देर से बदलता है!!

कुमार संतोष की पेंटिंग

2.
तुम्हारी आंखो में सागर है
जिस दिन कहा तुमने
सूखा नहीं पानी उस दिन से
नमकीन, गमगीन
मेरी आंचल में हवा का झोंका है
कहा जिस दिन तुमने
उघड़ने लगे धागे बेतरतीब
मेरे सीने के पर्वत पर
जो उचांइया हासिल की तुमने
वहीं से ढही मैं निढाल
तुमने जिस दिन कहा
मैं पृथ्वी हूं
मेरा अधर में रहना निश्चित था!

3.
वह मथ रहा था क्षीर समुंदर
मैं गिन रही थी आसमान में तारे
वह चीरता हुआ
निकल जाना चाहता था
लहरों के प्रवाह को
और मैं चुन रही थी
मोगरे के झरते हुए फूलों को
रोक लेना चाहती थी
उसे लहरों के बीच
वह पार होना चाहता था
खिल रहे वनफूलों के
कुम्हला जाने तक
वह कांटे चुभा रहा था
उसके पा लेने की आतुरता में
मुझे खोने का भय था
उसे खेलने की आदत थी
ओैर जीतने की जिद
एक खाली आसमान
मुझ पर औंधा पड़ा था.

4.
तब कितना भयानक होगा
जब एक अंगुली
दूसरी की पहचान कर दे खारिज
और मुट्ठी बांधने के मुद्दे से हो जाए लापरवाह
उससे भी भयानक शायद तब
जब एक आंख
तय करे अपनी अलग दिशा
और छो़ड दे साथ दूसरे का
आपको क्या नहीं लगता
कि यह भी एक भयानक स्थिति होगी
की जीभ के चारों तरफ के दांत
चबाना समझ लें फिज़ूल काम
और उदर की पूर्ति के लिए
निगल जाना  ही बेहतर समझे
क्या कहा आपने
एक हाथ दूसरे से अलग भी रहे
तो फर्क नहीं पड़ता
पर सोचा जा सकता है
कि सबसे जरूरी वक्त में
सुख को समेटना
और दुख में थामना अपनों को
क्या संभव हो पाएगा
चलिए
यह सब होना भयानक तो होगा
लेकिन मुझे लगता है
तब शायद उससे भी भयानक होगा यह
जब पीठ से टिकी रहे पीठ
और ओंठ से लिपटे रहें ओंठ
दूसरी तरफ
आंखे सुदूर अलग अलग दिशाओं में
टंगी रहे तृष्णा में,
फिर शायद नहीं रह जाएगी जरूरत
उंगलियों को उंगलियों की
न बाहों को बांहों की
तब जीभ भी भूल चुके होंगे स्वाद
और हो सकता है
दांतों का प्रहार बढ जाए इतना
कि लहूलुहान हो जाए
इस बावत
बचानी है हर पहचान
यह जरूरी है
उतना ही जरूरी
जितना हमारा अस्तित्व!

और शहर का किताब हो जाना इश्क़ में…

सुजाता तेवतिया

सुजाता तेवतिया चोखेरवाली ब्लॉग का संचालन करती हैं और दिल्ली वि वि के श्यामलाल कॉलेज में पढ़ाती हैं . संपर्क : ई-मेल : sujatatewatia@gmail.com

नई सड़क – उस ब्लॉग का पता जिसे, हमने ‘क़स्बा’ नाम से जाना और जाना रवीश कुमार को   एक  ब्लॉगर की तरह पह्ले और फिर एक बेहतर पत्रकार और फिर एक सिलेब्रिटी (जो उन्होंने कभी खुद  को  नही माना ) की तरह बहुत बाद में। उनके ब्लॉग पर फोटोग्राफ्स देखे तो लगा यह शख्स जब देखता है तो अलग देखता है ,प्राइम टाइम पर सुना तो लगा अलग सोचता है और जब  बोलता है तो अलग दिखता है, जब “इश्क़ में शहर होना” पढा तो लगा जब लिखा तो नई विधा ही खड़ी कर दी- लप्रेक! लघु प्रेम कथाएँ !

माइक्रोब्लॉगिंग कम्युनिटी के बीच जन्मी  फेसबुक स्टेट्स सी इन कथाओं को पढते लगता है शहर को गांव की नज़र से देखना क्या होता है। शहर से प्यार करने के लिए शहर को शहर की तरह जानना पड़ता है और भटकना पड़ता है, जिसे शहर में शहर के लिए होना सीखना कहते हैं रवीश। जो शहर में गाँव तलाशता है वह हमेशा अजनबी रह जाता है।  जहाँ प्रेम के लघु क्षण ट्रैफिक में शुरु होकर ट्रैफिक में गुम हो जाते हैं सच है कि शहरों ने, वह भी दिल्ली जैसे शहर ने इश्क़ के मायने बदले हैं , तरीके बदले हैं, पात्र, भाषा और सम्वाद भी बदले हैं। यहाँ खेत नही है गन्ने और मक्का के , न पनघट , न घर से मुश्किल से निकल पाने वाली लड़कियाँ ।सड़कें हैं, गार्डन, पार्क , मेट्रो ट्रेन के स्टेशन ,मेट्रो लाइन के खम्भे, फ्लाई ओवरों की छाया और मॉल की सीढियाँ और यहाँ प्रेम एक फुल टाइम काम नही है।‘करीम’ के यहाँ खाकर जामा  मस्जिद की मीनार चढते हुए हाथ थाम लेने का  रोमांच है। औरत का बदलना और गाँव की जगह शहर  का  स्पेस उन्हे बहुत मायनों में आज़ाद करता है। इश्क़ का सलीका बदल  जाने में  यह  बात बड़ा रोल अदा करती है। लड़कियाँ अपेक्षाकृत आज़ाद हैं, पढने और नौकरी के निकलती है, अकेली भी रहती हैं, उनके हाथों में स्मार्ट फोन है ,करियरकी चिंता भी करती हैं , बहुत हद तक हमारी पीढी के मुकाबले उनके बैगेज बहुत कम हैं। फिर भी 360 गाँवो से घिरी दिल्ली के गाँवों की खाप से बचना मुश्किल काम है और ‘धौलाकुँआ पह्ले ही खतरनाक हो चुका है’। दिल्ली की ज्यॉग्रफी और दिल्ली की डेमोग्राफी उसे एक खास तरह की पह्चान देते हैं। जहाँ सड़के जितनी आज़ाद  हैं उतनी ही  खतरनाक भी। बाहर से देखने में लगता ही है कि शहर फुलटाइम प्रेम के मौके बहुत कम देता है। समय पर अपने गंतव्य पर पहुंचना शहर में एक  चुनौती है। लम्बे जाम और शोर भी प्रेमियो के लिए मौका बन जाते हैं और ऑटो प्यार के इज़हार के लिए एकांत दे देते है या कार के अंदर प्रेमियो के लिए झगड़े का टाइम भी निकल आता है। जहाँ ‘प्रेम के फ्लाईओवर से उतरते ही जाम मे फंसने का भय हो’ वहाँ प्रेम एक फुलटाइम काम हो भी कैसे सकता है। इन कथाओं में टिपिकल प्रेमी जोड़े नही हैं , वे रूमानी  हैं ,फिर भी एक हद तक व्याव्हारिक हैं।

“जंतर मंतर पर नारे लगाते हुए दोनों करीब होने लगे। लगा कि प्रेम को ज़िंदगी का मक़सद मिल गया।अपने माँ –बाप  के आतंक से त्रस्त दोनों झूमने लगे। तीन दिनों बाद जब उस भीड़ में अपने मिडील क्लास माँ-बाप को देखा तो दोनो भाग लिए। वह अब अन्ना को गरियाने लगी। इण्डिया गेट पर आईसक्रीम खाते ही कंट्री चेंज करने का फितूर जल्दी घर पहुँचने की रणनीति में बदल गया। “

सभी लप्रेक भाषा के दृष्टि से बहुत रोचक हैं। टेक्नॉलजी और भाषा का यह निराला मेल है।  प्रेम करने वाली इस नई किस्म की पीढी के लिए फेसबुक एक अड्डा है। वैसे भी प्रेम करने वालों को किसी तरह एक दीवार की ओट मिल ही जाती है । यहाँ ‘जस्ट फ्रेंडशिप’ है ।कहीं उपमाएँ एकदम  शहरी हो गई है – “ मैं आज स्मालटाउन सा फील कर रहा हूँ
और मैं मेट्रो सी “
तो अक्सर एक काव्यात्मक लय है वाक्यों में –“चार कदमों से दो  लोग आगे बढते जा  रहे  है।  दो  हाथ बंधे हैं और दो हाथ खुले ।पांव के नीचे की सड़क चल रही है और आसमान गुज़र रहा है।“ और इसमें अचानक से फ्रूटी के टेट्रा पैक का धप्प से आ गिरना मानो नींद तोड़ देता है। या “जान पह्चान की जगह से अनजान जगहों में जाना ही इश्क़ में शहर होना है” प्रेम का एक अपना कोना तलाशते शहरी प्रेमियों के लिए बहुत बडा संकट है। हर जगह सी सी टी वी कैमरे हैं …लोगों की निगाहें ऐसी के उनके कोने को भी चौराहे में तब्दील कर दें।इसलिए प्यार के मुहावरे भी बदलते हुए दिखते हैं- “नाटक के इस अंत से कॉलेज में हंगामा हो गया। हंगामे के बहाने दोनों पर्दे के पीछे चले गए और लिपट गए। चूमने के लिए हंगामे से बेहतर कोई वक़्त नही होता…” या “ऑटो शोर नहीं करता तो  भीतर का एकांत महफूज़ न होता” यह शहरी ही जानता है बल्कि शहरी प्रेमी कि  ऑटो भी उसे कितना स्पेस देता है। बस में सबसे पीछे की सीट मिल जाना भी इनके लिए नेमत है और लड़की कहती है कम से कम बैग के नीचे से हाथ तो थामे रह सकते थे।  बुज़दिल ! हिंदी मीडियम के राजकुमारों की  त्रासदी यही  होती है कि वे इंग्लिश मीडियम की राजकुमारी के साथ सहज नही हो पाते और कोई प्रेमचंद को पढने वाली ढूंढनी पड़ती है। एक एक्स्ट्रा मोमो खिलाने वाली नोर्थईस्ट की लडकी को नोर्थ इण्डिया के लड़के का एक दिन भावुक होकर ठेकुआ देना प्रेम कहानी का अंत कर देता है। ये शहर के अलबम की प्रेम के कैमरे से खिंची अलग अलग तस्वीरें हैं।

‘हर आदमी मे होते हैं दस  बीस आदमी  ‘ ऐसे ही एक शहर में कई शहर बसते हैं उसे देखना होताहै कई कई बार। शहर का टाइम और स्पेस भी वर्गीय आधारों पर बंट जाता है। उन सबके बीच  जिनका सपना है जोर बाग में घर होना,या  साउथ दिल्ली में बसना , औकात की लड़ाई का हथियार अंग्रेज़ी को बना लेना , या ब्रांडेड टीशर्ट और जींस खरीद कर खुश होने वाले या जो बस मे बैठ कर स्कॉडा का सपना देख रहे हैं सोचते हुए कि “कुछ तो ड्रीम कर यारss …” वहाँ शहर में प्रेम का वर्गीय चरित्र उभरता है। प्रेम कुछेक प्रतीकों में परिभाषित होकर रह  जाता है। आप ढिन चैक म्यूज़िक वाली  कार मे हाईवे पर उड़ेंगे या 620 नम्बर की बस में, जो सीधी चलती है तो भी ऐसे लहराती  है  मानो कोई  मोड़  मुड़  रही  हो, और प्रेमी पीछे की सीट पर कंधों से  कंधों के टकराने में खुश हो लेंगे।

प्रेम कहाँ पोलिटिक्स से भी एकदम परे है !  इसी दुनिया की चीज़ है प्रेम और इसी दुनिया के आर्थिक संबंधों , राजनीति और जातीय समीकरणों से प्रभावित भी होती है। एक प्रेमिका पूछती है – कितना पोलिटिक्स पॉलिटिक्स करते हो , हम प्रेम में हैं या पॉलिटिक्स में? तो  एक  अन्य  कथा में  प्रेमिका सियासत और इश्क़ के इम्तिहान में  सियासत को चुन लेती है बावजूद इसके कि –क्या चाहती हूँ ?प्यार या  पॉलिटिक्स ? की दुविधा में वह फंसी ही  दिखती है। वहीं एक युगल अम्बेडकर की किताब के साथ एक जातिविहीन समाज का स्वप्न देखता है। जहाँ इतनी खाप हैं कि जामुन भी गिरता है तो प्रेमियों को लगता है गोली चली है वहाँ आम्बेडकर की किताब से, डेमोक्रेसी से इन्हें उम्मीद है कि इनके स्वप्न पूरे होंगे।

“यह नीले कोटवाला किताब को छाती से लगाए क्यों खड़ा है? इश्क़ के लाजवाब क्षणों में ऐसे सवालों में उलझ जाना उसकी फितरत रही है। इसलिए वह चुप रहा। उसके बालों में उंगलियों को उलझाने लगा।बेचैन होती साँसें जातिविहीन समाज बनाने की अम्बेडकर की बातों से  गुज़रने लगीन – देखना यही किताब हमें हमेशा के लिए मिला देगी। ”


जो दिल्ली इन लघु प्रेम कथाओं में बन रही है
वह एक बारगी दही चूड़ा खाने वाले को डराती हैरान ज़रूर करती है। इससे उबरने के लिए ज़रूरी है वह करना जो रवीश ने किया है – भटकना ! भजनपुरा में फैक्टरी में ब्रा बनते हुए देखने से लेकर कनॉट प्लेस के चायनीज़ रेस्त्राँ में बैठने तक। वे लिखते हैं- “किशोर उम्र के बहुत से लोग कपड़े में जिस्म देखा करते थे। कपड़े को कपड़ा समझने के  लिए उसका बनते देखना ज़रूरी है।”

यह दिल्ली इतिहासकारों की दिल्ली नही है, कवि की भी नही। यह शहर के स्पेस में अपना स्पेस रचते लोगों की है। ‘चीड़ों पर चांदनी ‘में निर्मल वर्मा ने लिखा था – हर शहर का अपना आत्मसम्मान होता है। आप उसे यू ही छूकर गुज़रना चाहोगे तो वह कभी नही अपनाएगा। उसके करीब जाकर उसे प्यार करना होता है। यह इश्क़ में शहर हो जाना ही तो है कि लेखक जब देखता है शहर तो फेसबुक भी एक शहर हो जाता है और प्रेम के लिए दिल्ली में स्पेस ढूँढते लोगों बीच उन्हीं के शहर को  खोजता  है और ऐसे बन गया है शहर एक किताब ।

खुद रवीश के शब्दों में -यह दो लोगों की किताब है । विक्रम नायक ,चित्रकार और कार्टूनिस्ट ,ने रवीश के साथ साथ अपनी पेंसिल से अपना शहर चित्रित किया है।किताब के बनने से पहले दोनो के बीच कोई मुलाकात नही हुई और शहर को न सिर्फ शब्दों मे बल्कि रेखाओं मे भी पढा जा सकता है।विक्रम का  काम बेहद अर्थपूर्ण बना देता है इन लघु प्रेम कथाओं को। सच है विक्रम के काम के बिना किताब वह नही हो पाती जो वह अब है।यहाँ तकनीक भी है, भाषा भी, शहर भी है और कला भी। प्रिंट में आना लप्रेक जैसी विधा के लिए गौण है। वे फेसबुक स्टेट्स के रूप में भी पूर्ण विधा हैं।

अंतर्वेदना के दंश

0
उमराव सिंह जाटव

सुप्रसिद्ध साहित्यकार . चर्चित उपन्यास :        ‘ थमेगा नहीं विद्रोह’, कहानी संग्रह :’आधे दलित का दुःख’ संपर्क :jatavumraosinghwetelo@gmail.com

गांव के रिश्ते में वह मेरी भाभी लगती थीं. नौकरी के सिलसिले में जो मैंने गांव छोड़ा था तो बस विदेशी हो कर रह गया था. कुछ तो नौकरी की परिस्थितिजन्य मजबूरियां थीं तथा बाकी शहरी बने मन और तन की. संतू की खबर जब मुझे दिल्ली में मिली तब अपने आपको रोक न पाया था. संतू और मैं एक ही गांव और मुहल्ले के सहवासी थे. मैंने नौकरी के चलते गांव छोड़ा था और संतू ने अन्य एक निजी कारण से गांव छोड़ दिया था बल्कि वह गांव जानेवाली स्थिति में ही न था. उसके साथ मित्रता भी न थी,खत-ओ-किताबत भी न थी. गांव के ही एक सहवासी ने फोन करके बताया था कि दिल्ली में रह रहा संतू बीमार था तथा हालत गंभीर थी और उसके बचने की कोई आशा न थी. लंबे समय से गांव न गया था सो बस पकड़ कर गांव पहुंच गया. संतू लेकिन मुझसे भी पहले वहां पहुंच गया था.

गांव में हालात ऐसे बने कि बिरादरीवालों ने भाभी रामरती को,जो संतू की पत्नी थीं, समझाने के लिए मुझे उनके पास भेज दिया था क्योंकि वे किसी की भी बात सुन न रही थीं. समझाने गया था लेकिन उन्होंने मुझे समझाना शुरू कर दिया था. सोचा रामरती भाभी ने यदि मेरी क्लास लेनी ही है तो क्यों न उनके जीवन में झांका जाय,उन परिस्थितियों में झांका जाय जिनके कारण विद्रोही बनी रामरती आज किसी की सुनने को तैयार नहीं है. हाथ जोड़ कर उन्हें बताया कि किस प्रकार मैंने कहानियां लिखने का शौक भी पाल रखा है. उन्होंने ने तनिक सी भी ना-नुकर न की. सहज भाव से अपने जीवन को खुली किताब के समान मेरे सामने वर्क-दर-वर्क रख दिया.
इस प्रकार उस दिन रामरती भाभी की कोठरी में टीन के खाली कनस्तर पर बैठा उनकी कहानी सुनने का उद्यम कर रहा था तब उन्होंने यह कह कर चैंका दिया-‘‘ वह कहूंगी जो अनकहा रह गया बाकी तो मेरी जिंदगी खुली और कटी-फटी किताब के समान है,कहीं पृश्ठ गायब हैं तो कहीं इबारत नदारद है. जिसे सब जानते हैं उसे जान कर करोगे भी क्या इस लिए वह सुनो जो अनकहा रह गया. जिसे कहने की हिम्मत न जुटा पाई थी. आज वह अवसर आ गया है. जिससे से कहना है उससे आज भी न कह पाई तो आगे कभी अवसर न आएगा. संतू भी उसे सुनने के लिए फिर न आएगा. संशय केवल इतना है कि क्या वह उसे सुन पाएगा जो उससे कहना चाहती हूं ! कौन सा छोर पकड़ूं इस किस्सा-ए-जिंदगानी का  कि उस छोर तक पहुंच पाऊं जो अनकहा रहा.’’

‘खैर,मैं धनवन्ती,धनकौर,धनवती,रामरती हूं लेकिन और भी न जाने कितने नामों से पुकारते हैं गांववासी मुझे.  उम्र पचपन से ऊपर को खिसकती हुई,रंग-बेरंग है जो खूब गोरा हुआ करता था कभी.  काया- कृश,जर्जर और अपने अन्त की बाट जोहती.  आंखें मोतियाबिंद से धुंधलाई हुई तथा कोटरों में धंसी हुई. गाँव ,मुहल्ले की सबसे दीन-हीन,दयनीय एक बुढिया हूं. आज पचपन की बुढ़िया हूं लेकिन गांववासी जानते हैं और मैं तो सशरीर साक्शी ही हूं कि जब कोई तीसेक बरस की थी तभी से बूढ़ी हूं. जल्दी बूढ़ी हो जाना मेरी लाचारगी भी थी, आवश्यकता  भी थी. जल्दी बूढ़ी न होती तो आज जो गांव की सम्मानित बूढ़ी का खिताब पा कर जीवन के अंतिम दिन सम्मान के साथ जी रही हूं, न जी पाती. जवानी में जवान बनी रहती तो गांव-समाज में व्याप्त वासना के गिद्ध मुझे नोच कर खा जाते. इस प्रकार बुढ़ापे रूपी उस सुरक्षा  के किले में मैं जवानी में ही दौड़ कर घुस गई थी.

लेकिन ऐसा भी एक समय था जब  लालसा,कामनाएं,इच्छाएं,उम्मीदें,चाह,वासनाएं,मनोरथ,अभिलाषाएं हिलोरें मारती थीं तन-मन में और संयम के तटबंध टूट-टूट जाने को हो जाते थे.  तब सब कुछ था जीवन में.  युवा मन और तन में कामनाओं की हिलोरें वैसी ही उठती थीं जैसी हर युवती के मन और तन में उठनी चाहिएं,लेकिन कुछ तो समाज ने,कुछ धर्म के झूठे और अनर्गल दर्शन  ने तथा बाकी संतू ने मुझे वह बना दिया जो आज मैं हूं. ठेठ अनपढ़,काला आखर भैंस बराबर तथा अंगूठाटेक हो कर भी मैं धर्म के झूठे मुलम्मे को अब खूब समझती हूं जिसके पीछे उसका वह अरूचिकर चेहरा छिपा है जिसने सदियों इंसान को हैवानियत के लिए उकसाया है. लेकिन मेरे समझने से कुछ भी अंतर नहीं पड़ने वाला है इसे भी खूब जानती हूं और यह कि यह धर्म और धर्मशास्त्रों की दहशत तले  समाज यूं ही शुतुरमुर्ग सा रेत में मुंह गड़ाये अवशता के पर फड़फड़ाता अनर्गल फलसफे गढ़ता रहेगा. बूढ़ी हूं,कृश-काय हूं,अशक्त हूं,निर्धन हूं तथा अवांछित और बोझ हूं इस मुहल्ले पर. ना कोई आगे है ना कोई पीछे. ना ससुराल में कोई है अपना कहने को और ना ही है मायके में. माता-पिता कब के मर-खप गए,बाकी न कोई भाई न बहन. धन-संपत्ति,माल-असबाब,दौलत ऐश्वर्य ,खजाने के नाम पर एक झोपड़ी है मेरे पास जिसमें झटोला हुई एक खाट है,एक अलगनी है जिसपर यदि गर्मी का मौसम हो तो फटे-पुराने कपड़ों के साबुत बचे रह गए टुकड़ों को जोड़-जोड़ कर सिली गई-आकार दी गई एक कथरी है जो जाड़ों में सर्दी की कंपकंपाहट को दूर करने का केवल भ्रम पैदा करती है,कोने में चाखी है जिस पर हर रोज सेर भर आटा मैं पीस लेती हूं.  पुराना और जंग लगा हुआ टिन का कनस्तर है जिसमें एक जोड़ी लहंगा-ओढ़नी और अंगिया गुड़ी-मुड़ी रखे हैं.  एक खुरपी,एक दरांती,एक सिलौटीया मिर्च-मसाले पीसने के लिए जो अधिकांशतः तो  मिर्च और लहसुन पीसने के काम ही आती है-मिर्च मसाले के नाम पर बस लहसुन की चटनी तक ही मेरी सामर्थ्य  है. चाखी भी जो वैसे तो गांव-मुहल्ले से कब की विदा हो गई है मशीनी चक्की के चलते लेकिन मैंने अपने कुछ पुराने दिनों और स्मृतियों को सहेज रखने के लिए उसे झोपड़ी के एक कोने में पड़ी रहने के लिए बख्श दिया है. एक कोने में ओखल भी है और उसके मूसल से रात में आवारा जानवरों-डंगरों-कुत्तों से बचाव के लिए झोपड़ी का दरवाजा बंद रखती हूं. रात में अवारा घूमते मर्दों से मुझे डर नहीं है,पचपन बरस की बुढ़िया हूं इसलिए. जब संतू ने मुझे मेरी इस हालत को पहुंचाया था तब सब से अधिक इन दिन-रात आवारा घूमते मर्दों से ही भय  लगता था. यही वह कारण था कि मैं जितना जल्दी हो सका बुढ़ापे के सुरक्षित  और अभेद्य दुर्ग में दौड़ कर जवानी में ही प्रवेश कर गई थी. सुरकशा  का अन्य कोई रास्ता न था. इसलिए उम्र के लगभग तीसवे वर्ष  से ही मैं इतनी ही बूढ़ी हूं जितनी आज. मेहनत मजदूरी कर के किसी प्रकार हाड़-मंास के इस पिंजर को जीवन के साथ जोड़े रखे हूं. मरना चाहती हूं लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाई. जीना मजबूरी बन गया है क्योंकि मर नहीं पाई.’’

‘‘मेरी कहानी जानना चाहते हो !  अब,ऐसे एक जीव की क्या कहानी हो सकती है जिसका आगा-पीछा सब नदारद ! लेकिन इस गांव और मुहल्ले तथा तुमको भी आज मेरी याद आई यह मेरे लिए सुखद भी है अविश्वसनीय भी है और दुःखद भी. किस्से कहानियों  में राजकुमार-राजकुमारीयों, शहज़ादे-शहज़ादियों के महलों सुख-सुविधाओं,उन की एैशपरस्तियों , उन के अश्लील-नाजायज़,अनैतिक सम्बन्धों के किस्से तो खूब सुने हैं,  लेकिन  मोतीयाबिन्द से धुंधलाई आंखों तथा अपने चीथड़े हो चुके वस्त्रों के साथ मजदूरी करके पेट पालती एक स्त्री की कहानी तो कभी नहीं सुनी ! जब छोटी बच्ची थी तब मां कहानी सुनाया करती थी,बहुत सी कहानियां-ढ़ेरों कहानियां लेकिन उन सब में तो सुंदर-सुंदर राजकुमारियां होती थीं जो बहुत सुंदर गहने-कपड़े पहनती थीं,रोज सातों प्रकार के पकवान खाती थीं,महलों में रहती थीं तथा उनसे भी सुंदर कोई राजकुमार घोड़े पर सवार हो कर आता और उनको ब्याह ले जाता था और कहानी यहां आ कर समाप्त हो जाती थीं. लेकिन एक अभागी,बदकिस्मत बुढ़िया की कहानी !

जब एक छोटी बच्ची थी तब से जो मजदूरी करना प्रारम्भ किया था अब तक कर रही हूं.   माता पिता के घर में जब होश संभाला वह याद है कि कैसे,जब वे खेतों में,घरों में मजदूरी में खटते थे,तब उन के साथ खेलती रहती पूरा-पूरा दिन काट देती थी.  बारह एक बरस की होते न होते मैं स्वयं भी माता-पिता के साथ मजदूरी करने जाने लगी थी और ब्याह कर जब इस गांव में आई तो सास ने बस कोई चार-पांच  दिन के लिए बख्शा था मजदूरी से. लेकिन आज जो इस गाँव  में घट गया है वह कुछ ऐसा है कि अवश  हो इस मुहल्ले को, इस गाँव  को मेरी भी  सुध आई है.  मुख्यतः तो इस लिए कि इन हालात में जो अभी-अभी अनायास उपजे हैं,क्या किया जाय.  इसी क्रम में पूरा मुहल्ला इस सोच में डूबा है कि इस नये उपजे हालात में मैं क्या करूंगी. मैं स्वयं भी इस सोच में हूं कि इस अप्रत्याशित उपजी स्थिति में अब मैं क्या करूं ?  हास्यास्पद ही है कि क्या मैं कुछ करने की स्थिति में हूं ? जो सारा जीवन बेशर्मी से इस निकृश्ट जीवन को लंबा खींचने की जुगत में जिए जा रही हूं ,न किसी को मार पाई न स्वयं मर पाई. लेकिन उससे भी पूर्व उसे भी जानना आवश्यक है जो आज की मेरी दुर्गति का कारक है. यह धर्म,यह समाज,अधम संतू,मेरे माता-पिता और स्वयं मैं !  लेकिन मुझ अनपढ़ की सोच को जान कर तुम चाहे तो हंसो चाहे उपहास करो तुम्हारी मर्जी लेकिन मेरे ऊपर तरस-रहम-दया का दिखावा कतई न करना.
मेरे पिता और माता कंठीधारी कबीरपंथी थे. पिता नित नेम करते हुए प्रायः ही कबीरवाणी भजते हुए इस दोगले समाज और इसके सैकड़ों देवी-देवताओं की आलोचना तो करते ही थे,  आलोचना करने में वे अपने सतगुरू कबीर तक को भी नहीं बख्शते थे. अशिक्षित  हो कर भी उन्हें कबीर के अनगिनत दोहे-उलटबांसियां और भजन याद थे. उनके बहुत सारगर्भित अर्थ करके वे सुनाते थे. मेरी मां को लेकिन इन पदों,उलटबांसियों में कोई रूचि न थी. पति कबीरपंथी था सो मन मार कर वह भी कंठीधारी हो गई थी लेकिन मेरे पिता मुझे प्रायः ही कबीरपंथ,समाज के दोगलेपन,मुलम्मे के पीछे छुपे इस दोगले समाज के कुत्सित चेहरे के बारे में,शास्त्रों में लिखे और भरे-पड़े अनर्गल और वाहियात फलसफे के बारे में समझाया करते थे. तब तो समझ में कुछ न आता था लेकिन अब जमाने और समाज के खोखलेपन को स्वयं भुगत कर कुछ-कुछ समझ पाई हूं. मेरा ब्याह हुआ तब लगभग अठारह वर्ष की  थी. तब तक पिता के विद्रोही विचारों को सुना करती थी. जो अपने सतगुरू कबीर तक की आलोचना करने में गुरेज नहीं करते थे उसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके विद्रोही तेवरों की धार कैसी चीर देनेवाली होती होगी. जाटवों में उन दिनों माता-पिता अपनी बेटियों को जब पति रूपी खूंटे के साथ उम्र-भर के लिए बांधते थे तब इतना-भर देखते थे कि मजदूरी करने लायक स्वस्थ और साबुत हाथ-पैर हों उसके लेकिन मेरे लिए उन्होंने ठोक बजा कर शिक्षित  लड़का खोजा था.

‘ वृक्ष  एक अधर में जामा,जड़ ऊपर पलई तरका
जल ऊपर लोहा उतराने,लौकी बूड़ गई तरका
बामन  वेद भेद नहिं पावत,बातों में रहता अटका’ 
सतगुरू कबीर के इस पद को गा कर पिता बताया करते थे कि यह दुनिया न केवल औंधी है इसकी सोच भी औंधी ही है. जब तक इसके साथ तुम भी औंधे बने चलते रहे बस तब तक ही ठीक है. तर्क-वितर्क करने बैठे कि धक्का दे कर अपने पाले से बाहर कर देगा समाज. या कबीर जैसा कलेजा,सोच और हिम्मत लेकर जनमो. पिता बताया करते थे कि कैसे दुर्योग,संयोग और दैवयोग जैसे शब्द मन को बहलाने-भर के उपाय हैं. मन और मस्तिष्क  इसे भली भंाति समझते बूझते हैं. मृग मरीचिका के इस मोहभ्रम को खूब जानता है मन. कुयोग और सुयोग जैसे शब्दों के भंवर जाल में अपने आप को,स्वयं अपने से ही डाल कर और संात्वना के थोथे इंदरजाल को गढ़ कर मनुष्य  कई बार स्वयं अपने आप को ही न केवल ठगता है,बल्कि अपने लिए कई सारे दुख-दर्दो को भी सायास सहेज लेता है! क्यों सहेज लेता है,क्यों अपने आप को ठगता है,क्यों उस में सप्रयास विश्वास  करता है जो नहीं है? कोई आगमज्ञानी जाने तो जाने. लेकिन क्या उस जानने को भी जानना कहेंगे,जिसमें बेतुके,अनर्गल और विरोधाभासों से भरे दर्शन में वह स्वयं आगे बढ कर विश्वास  करता है! विचित्र विरोधाभासों का पुलंदा यह मनुष्य  कभी तो निराकार की बात करता है,कभी साकार की,कभी सगुण की बात करता है कभी निर्गुण की,कभी एकेश्वर -अद्वैत की बात करता है कभी द्वैत की ! और सभी को सही ठहराने के अथक प्रयत्नों में जीवन गंवाता है. निर्गण,सगुण,साकार,निराकार की व्यर्थ की विवेचना में जीवन खपाने वाले भी अन्ततः उसी माटी में खप जाते हैं, जिसमें बिना व्यर्थ की विवेचनाओं में सिर खपाने वाले खपते हैं. हां,इस व्यर्थ के प्रयासों में अपना जीवन तो अकारथ व्यय करते ही हैं मानव समाज का भी तनिक सा भी भला किये बगैर उठ लेते हैं. विरोधाभासों का पुलिंदा यह मनुष्य  विवाह बंधन में बंधते समय पचासों अनुष्ठानों  को पूरा करता हुआ कभी तो सात जन्मों तक न बिछुड़ने और जन्म-जन्मान्तरों  तक एक दूसरे को ही पाने की बात करता है,यह समाज,यह धर्म तो दूसरी ओर जन्म-जन्मजन्मान्तरों  के जंजाल से छूटने के लिए जप तप,पूजा-अर्चना,दान,नैवेद्य का जुगाड़ करता है कि और जन्म न लेना पड़े ! इस विरोधाभास को समझने के लिए ज्ञानी-ध्यानी होने की आवश्यकता  नहीं है. एक ओर तो अगले सात जन्मों तक जीने की कामना करता है विवाह बन्धनों में बंधते समय कि अगले सात जन्मों तक दोनों का  साथ बना रहे वहीं अगले ही पल जन्म-जन्मांतरों के जंजाल से छुटकारा पाने को ही मनुष्य   जीवन का अंतिम ध्येय मान कर हजारों-लाखों पुण्य कमाने में जीवन खपाता है कि और जन्म न लेना पड़े !   शास्त्रों  के अनुसार इस जन्म में पुण्य एकत्रित न करने,बुरे कर्मो में रत रहने से जन्म-जन्म जन्मान्तरों के जंजाल से मुक्ति नहीं मिलती है और बार-बार जन्म लेना पड़ता है लेकिन वही मूढ़ अगले सात जन्मों का प्रबंध तो अग्नि के फेरे लगा कर  विवाह के समय पहले ही कर चुका है होता है या कर चुकी होती है! इस अजब मूढता की बात को निपट गंवार भी आसानी से समझ सकता है: पति-पत्नी अग्नि के सात फेरे लगा कर वचन भरते हैं कि अगले सातों जन्मों में भी वही एक दूसरे के पति-पत्नी रहें ! लीजिये, विचित्र विरोधाभास प्रस्तुत है, जन्म-जन्मजन्मान्तरों  के जंजाल से मुक्ति ही मनुश्य का प्रथम और अंतिम उद्देश्य  शास्त्रों के अनुसार यदि है तब पहले से ही अगले और छः जन्मों की बात करना क्या अभिशाप  नहीं है ! विचित्र विरोधाभास लेकिन अभी समाप्त कहाँ  हुआ है ! अब यदि  अगले और छः जन्मों के अनुबंध के उपरांत भी पति-पत्नी  दोनों में से कोई एक इस जन्म में कुकर्म करके अगले एक और जन्म की तैयारी कर ही लेता है,तब इस सात जन्मों के सिद्धांत  के अनुसार पत्नी उस अगले जन्म में सुकर्म भी यदि करे तो क्या?  पति के बुरे कर्मों के कारण, उसे अगले सात जन्मों के अनुबंध के कारण उस के साथ फिर से जन्म लेना होगा और उसी कुकर्मी के साथ परिणय के बंधनों में बंधना होगा,और अगले जन्म में जब विवाह करने के अनुष्ठान  में अग्नि  के सात फेरे लगाएगी तब पुनः और अगले सात जन्मों के अनुबंध का वचन भरना होगा.  और निश्चित  जानिये कि यह भी निश्चित नहीं है कि पति के कुकर्मों के कारण इस अगले अवांछित  जन्म में पति के संग खिचड़ रही पत्नी पति के अगले जन्मों में न पड़ने के प्रयासों को अपनी गलतियों के कारण व्यर्थ न कर देगी! आखिर तो इंसान गलतियों का पुतला है. और इस प्रकार और अगले सात जनमों का एक और अनुबंध ! इस निपट मूढ़ता और पागलपन का कोई अन्त नहीं है. कोई कितने सुकर्म करेगा ! ऐसा प्रतीत होता है कि अन्ततः अधिकाँश  को जन्म- जन्मजन्मान्तरों  से कभी भी छुटकारा न मिलेगा. तब इस पुण्य की गठरी को लादे-लादे वैतरणी को तर जाने की व्यर्थ लालसा क्यों? इस जन्म- जन्मजन्मान्तरों के ताबूत में अंतिम कील ठोकने के लिए इतना-भर कहना पर्याप्त होगा कि जन्म होते ही क्यों नहीं माता पिता संतान का गला घोंट कर बच्चे को सीधे ही इस जन्म से छुटकारा देते हैं. न रहेगा जीवन,न कुकर्म करने का अवसर मिलेगा उसे और न अगले कई जन्मों में भ्रमण का दण्ड भुगतेगा. आखिर कुकर्म तो तब करेगा जब जीवन होगा. माता पिता का तो जो हुआ सो हुआ,उन के अपने माता पिता के अज्ञान के कारण शापवत यह जीवन उन्हें जीना पड़ रहा है ,जनमते ही टेंटुआ दबा देते तो सुकर्म करने के झंझट में तो न फंसते. शास्त्रों के अनुसार चैरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात जीव को मानुश जून माने कि मानव योनि मिलती है.  समझ गए ! नहीं ? तो फिर से समझें. गिनती में चैरासी के आगे पंाच शून्य और लगाएं,उतने जीवों का नर्कमय जीवन भोग कर मिलता है

मानुष जन्म ! कहने की आवश्यक्ता  नहीं कि मानुष जन्म अनमोल है शास्त्रों में यही लिखा भी है इन महाज्ञानियों ने. तब यह नैसर्गिक ही तो है कि उस अनमोल को बार-बार प्राप्त करने की इच्छा की जाय,उस की पुनः-पुनः प्राप्ति  के लिए अथक श्रम,कर्म,सुकर्म,कुकर्म किये जायं.  सुकर्म कर के इस अनमोल मानुष जन्म को जन्म-जन्मान्तरों के जंजाल से छुटकारे की कामना क्या विरोधाभासी नहीं है ? अनमोल के खोने की भी कोई कामना करता है भला? क्या कोई इस पर चर्चा करेगा कि जो अनमोल है उसे अपने स्वयं के प्रयत्नों से सुकर्म अथवा कुकर्म कर के क्यों खोने में जीवन को खर्च किया जाय ?

मेरे पिता ने ठोक बजा कर पढ़ा-लिखा वर मेरे लिए खोजा था. दसवीं कक्षा  में तीन बार फेल हो चुका था संतू तब तक जब मेरे पिता ने मुझे उसके साथ बांधने का निर्णय लिया था. दिल्ली सरकार के मलेरिया उन्मूलन विभाग में गली-मुहल्ले-कालोनियों में मच्छरमार दवा डी.डी.टी छिड़कने की चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की सरकारी नौकरी भी करता था. गांव के जाटव मुहल्ले में उस नौकरी के चलते संतू का मान-सम्मान किसी थानेदार से कम न था. पढ़े-लिखे संतू उर्फ संतलाल उर्फ संत प्रकाश ने या तो शास्त्रों के इस झोल को समझ कर उस का लाभ उठाया था अथवा उस के इस पापी तन की अदम्य और अतृप्त इच्छाओं ने ही उस से ऐसा कराया. खैर, जो भी हुआ हो, उस के इस सात जन्मों के अनुबंध से बंध कर और उस की सत्यता में किंचित भी अविश्वास  न कर मैंने अपने लिए जीवन-भर के नर्क भोग की नींव मेरे कबीरपंथी पिता ने मेरे लिए गैरइरादतन रख दी थी. और उस पढ़े-लिखे संतू ने जो माता-पिता का अकेला बेटा था……….’’

भाभी रामरती की कहानी सुनने जब बैठा था तब सोचा था कि ज्यों का त्यों उसके कहे को शब्दों में पिरो कर कागज़ पर उकेर दूंगा. लेकिन उसकी कहानी के विस्तार को जान कर अब सूत्रधार बनने के अलावा अन्य कोई सरल राह मुझे नहीं दिख रही है. इस प्रकार-

जाटवों में पुनर्विवाह कभी भी वर्जित और निषिद्ध  न तो पूर्व में रहे और न अब हैं,तब रामरती इस संतू के नाम पर ही क्यों बैठी रही,विचित्र है. सात जनमों के अनुबंध भी जाटवों के विवाह में नहीं कराए जाते हैं-बचे रह जाते हैं केवल इतने-भर से कि अभी कुछ ही समय पूर्व तक जाटवों के विवाहों में आने के लिए बामणों के पास न तो समय था और न कोई आग्रह. बाकी हिंदुओं के विवाह समारोहों की देखादेखी वे भी ‘मंढा’ नाम के एक स्तंभ के चारों ओर सात फेरे लगा कर मानते रहे हैं कि हो गई  शादी. सात फेरे भी अग्नी के चारों ओर न लगाए जाते थे. उस मंढ़े के,जो लकड़ी का कुंदा होता था, के चारों ओर वर-वधू को घुमा दिया जाता था तब स्त्रियों  का झुंड गीत गाता था-‘ पहला-पहला फेरा री….. दूजा-दूजा फेरा री….’ सातवें फेरे तक यही मंत्र ‘…..वां फेरा री’.  इधर मंढ़े के सात चक्कर वर-वधू ने लगाए उधर विवाह कार्य संपूर्ण.  बिना बामण,बिना मंत्रों के इस अनुष्ठान  के बावजूद भी विवाह कार्य पूर्ण होते ही माता-पिता,नाते-रिश्तेदार आशीर्वाद देते हुए कहते -‘‘ अगले सात जन्मों के बंधनों में बंधे हो अब तुम दोनों.’’

रामरती का विवाह भी इसी प्रकार हुआ था. सब कुछ बंधेबंधाए रिवाजों के साथ ही हुआ. रामरती के मामा ने बिचैलिया बन,11 रूपया संतू के हाथ पर रख कर कहा ‘ लड़का हमें ‘परसंद’ है जी’ और रोक की रस्म पूरी की,गांव के ‘ बुजुर्गों ’ने सहमति प्रकट कर दी. रामरती के पिता ने सगाई में लड़केवाले के परिवार के लिए,लड़के के लिए ‘टूक’ जिसमें सात गज कपड़ा,घर के बच्चों के लिए कपड़े,छोटा-मोटा जेवर, दस सेर चावल-दाल,घर में बनाए गए सेव,लड्डू भेंट में दिए. संतू के परिवार की स्त्रियों  के लिए ‘तीहल’ जिस में धोती-ओढ़नी  और 21 रूपया.  शर्माते हुए लेकिन मन में हुलसते हुए रामरती ने भावी पति के लिए ‘बीजना’ ;हाथ का पंखाद्ध बुनना शुरू कर दिया. बान-तेल हुए,बारात आई,मंढ़े के चारों ओर सात फेरों की भांवरें पड़ीं और विदा हो कर रामरती ससुराल पहुंच गई. बिदाई से पूर्व टीके की रस्म पूरी करते हुए रामरती की मां और पिता ने संतू और रामरती को आमने-सामने बैठा कर समझाया -‘‘ अब तुम दोनों अगले सात जन्मों के बंधन में बंध गए हो. दुःख में भी सुख में भी एक-दूसरे का साथ निभाना. तुम दोनों का सुख और दुःख आज से सांझा हुआ.’’  रामरती की मां ने दोनों की बलाएं ली,आशीर्वाद दिया. बेटी को समझाया-‘‘ बेटी,पति के सुख में ही अपना सुख मानना. दुःख भी दे तो सुख समझ कर धारण कर लेना. पति की आज्ञा से कभी बाहर न जाना.’’

संतू को देखा तो रामरती मानो निहाल हो गई. कद छोटा लेकिन खूब गोरे रंग का,तीन वर्षों तक  दसवीं में फेल होनेवाला शिक्षित  ,सरकारी नौकरी पर तैनात ! निहाल होना उचित ही था क्योंकि कहां तो पूरे जाटव मुहल्ले में 99 प्रतिशत मजदूर,गिनती के दसेक शिक्शित  लड़के,गिनती के चार सरकारी नौकरी में और यहां संतू शिक्शित भी,सरकारी नौकर भी और सुंदर और गोरा भी, बस कद तनिक छोटा था. वह पांच फुट दो इंच का हो कर भी अपने कद की कमी को बन-ठन कर रहने से पूरा कर लेता था. लाइफबॉय  साबुन का नया-नया अवतरण गांव-देहात में तब हुआ था तथा वह भी हरेक की सामर्थ्य में न था. जो पैसेवाले थे वे लक्स साबुन का भी प्रयोग करते थे लेकिन लक्स सर्वसाधारण की पहुंच से पूर्णतः बाहर था. मुहल्ले में जो लाइफबॉय से नहाने की सामर्थ्य रखते थे उनमें संतू ही अकेला था लेकिन संतू उससे भी आगे बढ़ कर लक्स का प्रयोग करता था. संतू के प्रेम और उसके तन में रची बसी उस लक्स की सुगंध से आनंद-सम्मोहिता रामरती बौराई सी रहती थी. फिल्म देखने का मानो जुनून था संतू को. हिंदी फिल्मों के पचासों गाने उसे याद थे जिन्हें वह दिन-भर गुनगुनाता रहता था. नाचने में भी उसका कोई सानी न था. रामरती को अकेला पाते ही वह देवानंद की किसी फिल्म का गाना एक हाथ अपने कान पर रख कर दूसरा रामरती के कंधे पर टिका कर ‘ इक बुत बनाऊंगा तेरा और पूजा करूंगा…… अरे मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा’ को कूल्हे मटका-मटका कर,नाच कर सुनाता. सुन कर,देख कर अभिभूत रामरती के गाल लज्जा से लाल हो जाते,नजरें जमीन चूमने लगतीं. संतू तब उसे छाती में समेट कर जोरों से भींच लेता. लजाती हुई रामरती पूछती-‘‘ कब तक?’’

‘‘ अगले सात जन्मों तक. क्या भूल गई, सात जन्मों तक साथ रहने का वचन दिया है तूने मुझे.’’ रामरती के गालों पर चुंबन की मुहर लगाते हुए वह कहता.

‘‘ अकेले मैंने ही थोड़े न अगले सात जन्मों के साथ का वचन दिया है तुम ने भी तो दिया है.’’ लाज से पुनः दोहरी होती हुई रामरती ने कहा.

‘‘ बिल्कुल दिया है,भूल ही नहीं सकता. भूलने का प्रयत्न भी करूंगा तो तुम्हारी यह अप्रतिम सुंदरता मुझे भूलने ही न देगी. तुम्हारे पल्लू में बंधा अगले सात जन्म तक यही गाता रहूंगा.’’

मच्छरों के ऊपर दवा छिड़कने की अपनी नौकरी से प्रति रविवार को जब वह छुटृी पाता तब रामरती को भी अपने माता-पिता,भाई-बंदों से छुपाता हुआ 15 किलोमीटर दूर गाजियाबाद फिल्म दिखाने ले जाता. दिल्ली से गांव लौटते हुए रास्ते में कस्बे के बाजार से सेर-भर ‘मिल्क-केक’खोया से बनी मिठाई लेकर ही घर में घुसता, लेकिन रात होने तक तथा रामरती के साथ अकेला होने तक घर में माता-पिता से उसे यहां-वहां  छुपाता फिरता. रात में रामरती के साथ निबछरा ;एकांतद पाते ही अपने हाथों से रामरती को अपने हाथ से, बड़े ही बाजारू लहजे के संवादों में लपेट कर,मिल्क-केक खिलाता-‘‘ मेरी जान…. तेरे कुर्बान…. पहले मिल्क-केक खा…. उसके बाद  देता हूं पान.’’ यह किसी फिल्म का संवाद था जो उसने हाल ही में देखी होती. ना-नुकर करती रामरती को तब वह अपने हाथों से मिल्क-केक खिला देता. उन दिनों देहरा गांव के निकटस्थ सिनेमाहाल या तो 15 किलोमीटर पश्चिम में गाजियाबाद में था अथवा पूर्व में भी लगभग उतनी ही दूरी पर सिकंदराबाद में. उन दिनों समाज में मर्दों तक का फिल्म देखना वर्जना से कम न था, लौंडे-लपाड़े छुप-छुपा कर वर्श में एकाध बार देख आते थे. संतू ने लेकिन उससे एक कदम आगे बढ़ कर रामरती को भी चार-छः फिल्में दिखा दी थीं. लड़कियों में साधनाकट बालों के स्टाइल की धूम थी सो संतू ने भी रामरती के हजार आपत्तियों के बावजूद स्वयं ही कैंची से उसके माथे पर लहराती-लटकती जुल्फों को कतर कर साधनाकट बना दिया था. बेचारी रामरती उन्हें छुपाने के प्रयत्नों में मारे शर्म के अपने हाथ-भर के घूंघट को दो हाथ का किए फिरती रही. लेकिन उसकी वे साधनाकट जुल्फें छुपी न रह सकीं और देवर-जेठ उसे ‘पर कटी’ कह कर छेड़-छाड़ करते रहे. संतू भी पत्नी-भक्त के नाम से नवाजा गया. गांव-मुहल्ले में लोग लेकिन कहते -‘ पति-पत्नी में प्रेम हो तो संतू-रामरती जैसा,मानो सारस की जोड़ी हो’.
सुख-भरे वे दिन लेकिन बस दस वर्श ही निजस्र रह पाए. उसकी गोद इन दस वर्शों में हरी न हुई. गांव की दाई के टोटके और दवाओं का भी कोई नतीजा न निकला. भगताई करने वाले काले भगत की झाड़-फूंक भी कुछ न कर पाई. पहले सास ने ताने देने शुरू किए उसके बाद ससुर ने भी. संतू की तीन विवाहित बहनें भी समय निकाल कर यही बताने के लिए जब-तब आ जातीं कि बंजर धरती में जितना चाहे खाद-पानी दो घास का तिनका तक नहीं उगता है. संतू ने भी वही कहना जल्दी ही सीख लिया. अब न फिल्में रहीं और न मिल्क-केक,रह गए सास-ससुर,ननदों और संतू के ताने.. रविवार की छुटृी में वह आता तब तोते की तरह यही याद दिलाने के लिए कि बंजर धरती में बीज बोने से कुछ नहीं होने वाला है. जब ब्याह कर आई थी तब भी संतू की मां तपेदिक की रोगी थी,इन पांच वर्षों  में पोते की आस में खाट से लग गई. उन दिनों वैसे भी तपेदिक का कोई निदान न था. तपेदिक का अर्थ ही था तिल-तिल कर निकट भविश्य में अवश्यंभावी मृत्यु. सो उसकी सास तिल-तिल कर तो मरी लेकिन खाट से लगी रह कर भी एक दिन अचानक ही. रोना-धोना हुआ. तीनों ननदें भी आईं और मां के लिए थोड़ा-बहुत रो-धो कर रामरती के पीछे पड़ गईं-‘‘ ऐसी जोंक के समान हमारे ‘बीरन’ के साथ चिपटी है कि न मरने का नाम लेती है न टरने का. अरी बंाझ! तूने हमारी मां को तो खा लिया अब और किस की बलि लेगी? अपने घर तक में तो किसी को छोड़ा नहीं तूने. वहां भी मां-बाप को खा गई इन दस  वर्शों में. अरी ! पड़ोस के पांच घर तो डायन भी छोड़ देती है. हमारे भाई को बख्श क्यों नहीं देती तू !’’

रामरती सुन कर जड़ हो गई. रात में संतू ने कहा-‘‘ अब से मैं हर रविवार को घर नहीं आऊंगा, मैंने वहीं दिल्ली में कोठरी किराए पर ले ली है,वहीं रहूंगा. तुम चाहो तो अपने पीहर चली जाओ.’’
‘‘ पीहर किसके पास जाऊं,माता-पिता तो रहे नहीं. भाई भी मेरा कोई नहीं है,क्या इसी लिए ताने मार रहे हो?’’
सुनते ही संतू ने बिफर कर कहा-‘‘ तो फिर सड़ती रह यहीं लेकिन मैं अब गांव न आऊंगा. सब ताने मारते हैं कि मेरी मर्दानगी में कुछ कमी है इसी लिए औलाद नहीं हुई. बर्दाश्त की भी एक सीमा होती है आदमी के लिए. गांव-भर के ये ताने अब मैं और नहीं सुन सकता.’’
‘‘ तुम्हारी मर्दानगी में कमी कैसे हो सकती है,तुम्हारी बहनें सारे गांव को सुना कर गई हैं कि उनकी भाभी बंजर धरती है जिसमें घास-फूस उगने के भी कोई आसार नहीं हैं. तुम भी वही बता दिया करो.’’
‘‘ तुम जो चाहे समझो.’’ कह कर संतू करवट बदल कर सो गया.

दूसरे दिन सवेरे जब दिल्ली जाने के लिए वह घर से निकलने लगा तब रामरती ने खुशामद भरे शब्दों में कहा-‘‘ मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी. वहां अकेले कैसे रहोगे,कैसे खाना बनाओगे. मैंने सुना है वहां बहुत बड़े-बड़े अस्पताल हैं जहां बांझों का भी इलाज हो जाता है,मुझे भी दिखा देना.’’
वांग्य  का भरपूर पुट अपने शब्दों में दे कर संतू ने उत्तर दिया ‘‘ रामरती,कल्लर भूमि में कभी कुछ नहीं उगता है. औलाद तुम्हारे ‘भाग’ में नहीं है बावली. ‘भाग’ ही ओछे ले कर आई हो तो अस्पताल भी कुछ नहीं कर सकता है.’’
‘‘ मैं यहां अकेली कैसे रहूंगी,यह सोचा है?’’ सीधे संतू की आंखों में झांकते हुए रामरती ने प्रतिप्रश्न किया.
‘‘ अकेली कहां हो,पूरा मुहल्ला है,गांव है.’’
‘‘ ठीक है,मेरा इलाज मत कराना लेकिन साथ तो रख सकते हो.’’ संतू का हाथ थाम कर रामरती ने गिडगिड़ाते हुए कहा.
झुंझलाते हुए संतू ने अपना हाथ छुड़ा लिया, कहा-‘‘ रामरती,तब  जो सच बात है वह भी सुन ले. बंजर धरती को जोतते-जोतते मैं थक गया हूं. मर्द में ताकत हो तो दूसरी जमीन भी तो जोती-बोई जा सकती है.’’
रामरती सुन कर सन्न रह गई. अंदेशों की झंझाएं उसके कानों में सांय-सांय करने लगीं. तो क्या……  तो क्या… संतू के किसी अन्य स्त्री से संबंध बनाने की बात कर रहा है.
उसकी मनोदशा का तनिक सा भी खयाल न करते हुए संतू ने आगे कहा-‘‘ अब और छुपाने से कुछ लाभ नहीं है. मैं पिछले साल-भर से तुम्हें बताने की सोच रहा था लेिकन…..  रामरती, मैंने दूसरा ब्याह कर लिया है और वह दिल्ली में  मेरी उस किराए की कोठरी में ही रह रही है. मैं उम्र-भर औलाद के लिए प्रतीक्षा  नहीं कर सकता था. अब तू अपने लिए कोई इंतजाम कर ले.’’ कह कर वह दरवाजे की ओर मुड़ा.
रामरती ने लेकिन कस कर उसका हाथ पकड़ लिया. उसकी आंखों में आंखें डाल कर कहा-‘‘ और वह मेरे साथ सात जन्मों का बंधन?’’
‘‘ रामरती,ये सब कहने-सुनने की बातें हैं बस. इस जन्म का साथ ही निभ जाय …..’’
‘‘ अब मैं किसके सहारे जिंदा रहूंगी?’’
‘‘ यह मैं क्या जानूं,तुम्हारा जीवन है तुम जानो.’’ कह कर वह जाने के लिए मुड़ा.

रामरती ने पहले से भी सख्ती के साथ संतू का हाथ पकड़ कर झटके से अपनी ओर खींचते हुए कहा-‘‘ तब तो तेरी जुबान कहते न थकती थी- ‘सात जन्मों तक साथ रहने का वचन दिया है. तेरे पल्लू से बंधा हर जन्म में तेरा साथ निभाऊंगा.’ अरे,तू तो इस जनम के दस बरस भी न निभा पाया. लेकिन अब मैं तेरी खुशामद करके और अपना अपमान न कराऊंगी क्योंकि तू तो ‘मौड़’ सेहरा बांध कर,ब्याह करके,दूसरी औरत को किराए की कोठरी में बैठा कर तब मुझे बताने आया है. तू तो अब तक केवल बताने के लिए अवसर की तलाश में था. ‘ इक बुत बनाऊंगा तेरा और पूजा करूंगा…… अरे मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा’. इसे अब उस के साथ गाता होगा हुलस-हुलस कर. सात जन्मों का वचन भूलते समय तूने एक बार भी न सोचा कि मेरा क्या होगा. कैसे मेरा जीवन कटेगा ! मेरे पेट में दो वक्त की रोटी डालने का क्या इंतजाम किया है तूने?’’
‘‘ रामरती, वह तुझे अपने साथ कतई बर्दाश्त न करेगी अन्यथा तो मैं तुझे भी अपने साथ ही रखता.’’ लाचारगी दर्शाते हुए संतू ने कहा.
रामरती ने संतू का गला पकड़ लिया. कहा-‘‘ और तू समझता है कि मैं उसके साथ रह लूंगी जिसने यह भी न सोचा कि दूसरी एक स्त्री का घर उजाड़ कर अपना घर बसाने जा रही है. कभी नहीं. ’’

संतू बार-बार जाने का उद्यम करने लगा. हर बार रामरती उसे खींच कर घर की देहरी के भीतर कर लेती. अंततः संतू भी अपनी सी पर उतर आया. रामरती को जोर का एक धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया और बाहर जाने लगा. जैसे स्प्रिंग खींचने पर क्शणांश में दोगुने वेग से पलटती है,रामरती बिल्कुल वैसे ही उछल कर खड़ी हो गई. तब तक संतू चार कदम जा भी चुका था. उसने भाग कर संतू को पकड़ लिया. यह लड़ाई अब दबी-छुपी न रही थी,पड़ोस के दसियों लोग-लुगाई आंखे फाड़े इस तमाशे को देख रहे थे. जो मजा उन्हें इसे देखने में आ रहा था उसे ज़ाया न होनेे देने के लिए कोई भी मध्यस्तता के लिए आगे न आ रहा था. लेकिन संतू के दूसरे ब्याह की बात सुन कर वे भी अचंभित थे. रामरती ने घूंघट बेशक किया हुआ था लेकिन उसने जाते हुए संतू को खींच कर उसका मुंह अपनी ओर करते हुए चिल्ला कर कहा कि तमाशा देख रहे लोग भी सुन लें-‘‘ जब तूने सात जन्मों के बंधन को तोड़ ही दिया है तो मैं ही क्यों उन बंधनों के नाम पर तुझे बर्दाश्त करूं. देख, मैं तुझे क्या दिखाती हूं.’’ कह कर उसने कोठरी की दीवार पर अपनी कलाईयों को पटक दिया. छनाक की आवाज के साथ हाथ की सारी चूड़ियां टूट कर धरती पर बिखर गईं. गहरे हरे रंग  की चूड़ियां,जिन्हें गांवों में सुहागिनें अक्सर  सुहाग और सौभाग्य की निशानी के तौर पर पहनती हैं,टूट कर कटी फसल सी धरती पर बिछ गई. आंखें फाड़े संतू भी और पूरा मुहल्ला उस अनहोनी को देख रहा था. गांव-देहात के स्त्री-मानस में सुहाग चूड़ियों के प्रति परायणता इतनी है कि काम-धंधा करते हुए अथवा अन्य कारणों से चूड़ी यदि टूट जाय तो सुहागिनें  ‘टूट गई’ शब्द न प्रयोग कर ‘मौल गई’ शब्द का प्रयोग करते हुए बताएंगी-‘ मेरी चूड़ी मौल गई.’  पुरानी हो गई चूड़ियों को बदलने के लिए, तीज-त्योहारों के अवसर पर अथवा  शादी-ब्याह के अवसर पर जब मनिहार से नई चूड़ियां पहनती हैं तब मनिहार कलाई में नई एक चूड़ी पहनाता जाता है और उसके बदले पुरानी एक चूड़ी तोड़ता जाता है और अंत में पुरानी एक चूड़ी भी नई पहनाई गई चूड़ियों के साथ कलाई में ही छोड़ देता है कि चूड़ियां अक्शत ही रहें. विधवाएं सुहाग लुट जाने पर अपनी चूड़ियां तोड़ देती हैं और यहां तो संतू जीता-जागता उसके सामने खड़ा था. ऐसी अनहोनी किसी ने आज तक घटते न देखी न सुनी थी. संतू स्तब्ध था,चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं जैसे अपनी ही लाश देख रहा हो.  अविश्वास के साथ वह फटी आंखों से धरती पर टूटी पड़ी चूड़ियों को देख रहा था.
क्लासिकल और परंपरागत कथा कहने की पद्धति में तो रामरती के द्वारा चूड़ी तोड़ देने पर एक अच्छा चरमोत्कर्ष उत्पन्न हो चुका था लेकिन एक तो यह मेरे गांव में पहुंचने से पूर्व ही घट चुका था तथा दूसरे जो इसके पश्चात रामरती ने किया वह भी चरमोत्कर्ष  की दूसरी लहर थी,जैसे समुद्र में लहर के पीछे-पीछे उससे भी बड़ी लहर. उस दूसरी लहर का साक्षी  ही मुझे बनना था. लेकिन वह दूसरी लहर भी यह न थी जो तत्क्षण  घट रही थी.

पूरा मुहल्ला तब तक एकत्रित हो गया था. जो भी सुनता,सुन कर हत्प्रभ हो रहा था, धरती पर टूटी पड़ी चूड़ियों को अविश्वास के साथ देख रहा था और रामरती को भी जो हाथ-भर का घूंघट निकाले खड़ी थी. मुहल्ले के कई चैधरी अपनी पगड़ियां संभालते,खांसते-खंखारते रामरती की लानत-मलामत करने लगे-‘‘ अरी बिच्चो.., यू तैने कहा करौ? संतू तो तेरे सामने ही जिंदौ खड्यो है.’’ मुहल्ले-भर की बुढ़ियाएं भी रामरती के ‘अगले-पिछलों’ की खबर लेने लगीं. उसके पश्चात मुहल्ले के बड़े-बूढ़ों ने संतू की खबर ली-‘‘ रै कमस्सल (कमअस्ल) पहली के होते हुए तैने दूसरी कैसे करली रे. कहां की है?  किस की बेटी है?’’

तब तक लाठी के सहारे संतू का वृद्ध पिता,जो जंगल-पानी के लिए गांव से बाहर गया हुआ था,भी आ गया. सुनते ही उसे मानो काठ मार गया. संतू की करतूत का उसे भी ज्ञान न था. बांझ रामरती पर वह ताने तो अवश्य कसता था लेकिन संतू दूसरी औरत घर में रख लेगा यह तो उसने भी न सोचा था. हरदयाल संतू का पिता,संतू की कमर में लाठी का टहोका देते हुए चिल्लाया-‘‘ तू कमस्सल ही है. गांव के बड़े ‘बुजुर्गों ’ की बात सोलह आने सच है. अरे कमस्सल,कमीन तैने तो मुंह  दिखाने लायक भी ना छोडौ मैं. ’’ उसके बाद रामरती को संबोधित कर कहा-‘‘ अरी लाली ! यू हरामी तो पागल हो ही गयौ है,का तेरी भी ‘मत’ मारी गई है? अरी, घरवाले के जिंदा रहते हुए ही तैने चूड़ी फोड़ लीं. बता बेटी,अब इस अनर्थ से निस्तार कैसे होवै? अरी बावली, इस हरामी की करतूत के बिसै में मोहे तो बताती,यू सब करनै सू पहलै.’’

ससुर की डांट सुन कर रामरती अपनी करनी पर पछताती हुई सिर झुकाए कुछ क्षण  तो चुप खड़ी रही उसके बाद घूंघट के भीतर से ही सहमी लेकिन दृढ़ आवाज में बोली-‘‘ बाबा,पिछले साल-भर से दूसरी औरत के साथ रह रहा है आज तो बस बताने का अवसर पा गया है. समझाने की,बताने की बात तो तब उठे जब कुछ कर गुजरने की सोच रहा हो. यह तो सब कुछ कर गुजरने के बाद बताने आया था.’’ लगभग गिड़गिड़ाते हुए हरदयाल ने बहू से कहा-‘‘ बेटी,मुहल्ले के सुरजन ने भी तो दो औरत घर में डाल रखी हैं,तू भी निभा लेती. अरी, किस्से-कहानियों में तो पत्नी ने कोढ़ी,लंपट,चरित्रहीन पति तक का साथ निभाया है,सौत के साथ निभाया है लेकिन पतिव्रता धर्म नहीं त्यागा. राजा-महाराजाओं की तो दस-दस रानीयां होती थीं, ‘दसरथ’ महाराज की, जो राजा रामचंदर के पिता थे, तीन रानियां थीं. सती-सावित्रियों की कथा तेरे मां-बाप ने क्या कभी नहीं बताई तुझे?’’

‘‘ बाबा,वे कहानी की बातें हैं. सचमुच के जीवन में घटती त्रासदी  की नहीं. कहानियों की वे सती-सावित्रियां राजाओं की रानियां थीं दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करती मजदूर औरतें नहीं थीं. मैं  अब अपना जीवनयापन कैसे करूंगी क्या यह सोचा इस आदमी ने यह कुकर्म करने से पहले.’’लेकिन एकत्रित हो गए मुहल्ले के बुजर्गों ने बीच में पड़ते हुए कहा-‘‘ हरदयाल, ये बातें तो बाद में भी हो जाएंगी. यह सोचो अब क्या करना है.’’ आगे संतू से कहा-‘‘ बोल संतू अब क्या करें?’’

संतू अब सिर झुकाए खड़ा था. उसके मुंह से बोल न फूट रहे थे. दिल्ली में ब्याह भी उसने गोपनीय रख कर किया था. जैसे वह दुहेजवां था उसकी उस दूसरी पत्नी का भी दूसरा ब्याह था बल्कि उसे ब्याह कहना ही गलत था क्योंकि पहले पति को छोड़ कर वह संतू के घर में बैठ गई थी. ब्याह ही क्या कराव (जाटवों में प्रचलित पुनर्विवाह का एक प्रकार जिसमें ब्याह जैसा कोई अनुश्ठान नहीं होता है बल्कि दोनों ओर के चार-छः संबंधी साथ बैठ कर तय कर देते हैं कि दोनों पति-पत्नी हो गए हैं) तक भी न हुआ था. संतू का उसके भाई के साथ हमप्याला-हमनिवाला संबंध था,उसी के विभाग में वह भी मच्छरों पर दवा छिड़कने की नौकरी करता था. अक्सर ही वह अपनी बहन के बारे में बताता रहता था कि कैसे अपने पति के साथ वह सुखी नहीं थी. संतू ने भी संतान न होने का अपना दुःख उसके सामने प्रकट कर दिया था. उस हमप्याला-हमनिवाला मित्र के घर में ही वह रहती थी अपने पति को छोड़ कर. मित्र की पत्नी इस जबरन गले आ पड़ी ननद से जल्द से जल्द छुटकारा चाहती थी. दो-चार बार जब संतू उस मित्र के घर गया तब मित्र की बहन बन-ठन कर उसकी खूब खातिरदारी करती. अगली चार-छः खातिरदारियों में ही बात यहां तक बनी कि एक पोटली में अपने कपड़े-लत्ते उठाए वह संतू के पास पहुंच गई. उसके भाई ने ही तुरत-फुरत किराए की कोठरी का प्रबंध भी कर दिया. और इस प्रकार संतू बिना ब्याह किए ही उसके साथ घर बसा कर किराए की कोठरी में बस गया. कभी ऐसी स्थिति आएगी इस विशय में उसने सिर न खपाया था. सोचा था रो-धो कर और नियति की करनी मान कर जो हुआ उसे स्वीकार कर लेगी. लेकिन……    उसने सिर नीचे किए ही उत्तर दिया-‘‘ जो आप ठीक समझें वही करूंगा.’’

मुहल्ले के ‘बुजुर्गों ’ में खुसर-फुसर हुई उसके बाद उन्होंने कहा-‘‘ जो हुआ सो हुआ,अब अपनी घरवाली को अपने साथ ले कर जा.’’ घूंघट में सिर झुकाए खड़ी रामरती से मानो पुचकारते हुए कहा-‘‘ लाली, इस प्रकार अपना घर नहीं बिगाड़ा करते हैं. मुहल्ले के रामेत मनिहार को बुलाए देते हैं,तू उससे चूड़ी पहन ले.’’
गांव के तथाकथित सवर्णों के साथ हुए तनाव में मजदूरी से बहिष्कृत  करने के प्रसंग में जब उन्होंनेे जाटवों का खेतों में-घरों में मजदूरी से बहिष्कार  कर दिया था तब असहाय जाटवों ने पचासों अन्य व्यवसायों में हाथ आजमाना सीख लिया था. मसलन रामेत मनिहार बना तो मोहरसिंह और जगसेन ने पीतल की टूटियां बनानी सीख ली थीं. तिलकू ने गंगादास के साथ मिलकर साझे में तांबे के तारों से ट्यूबवैल में काम आने वाली जाली बुनना सीख लिया तो डल्लू और हरबंसा ने चांदी के वर्क बनाना. बाबू ने ईटों का भटृा लगाना सीखा तो सुमरता ने बगल के कस्बे दादरी में परचून की दुकान खोल ली जो यद्यपि कस्बे के बनियों ने चलने नहीं दी और उस बेचारे का हजारों का नुकसान हुआ लेकिन तथाकथित सवर्णों की गुलामी से से छूटने के लिए गांव के जाटव कितने आकुल थे वह स्पष्ट  लक्षित  था.  गूजरों और तथाकथित सवर्णों के मध्य चला वह युद्ध कब का समाप्त भी हो गया था और तथाकथित सवर्णों खुशामद सी करते जाटव मुहल्ले में मजदूरों की तलाश में भटकने लगे थे लेकिन नये व्यवसायों को अपना चुके जाटवों की अब मजदूरी करने में कोई रूचि न रह गई थी. मनिहार रामेत का घर जाटव मुहल्ले के धुर पश्चिम में था. मुहल्ले के बुजुर्गों ने जब किसी को उसे बुला लाने के लिए पठाने का उद्यम किया तब रामरती ने इस बार घूंघट के भीतर से ही लेकिन स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में कहा-‘‘ ना.’’
‘‘ अरी रामरती,ना क्यों? चूड़ियों के टूटने की चिंता तू न कर,हम कौनसे बामण-बनिया हैं जो संस्कार और अनुश्ठानों के बंधनों में बंधे हों. क्रोध में जो तेरे मन में आया तूने किया, नासमझी में जो ठीक समझा उसे संतू कर गुजरा. मनिहार से चूड़ी पहन और अपना घर संभाल.’’ पगड़ियों और मूछों पर हाथ फिराते हुए बुजुर्गों ने कहा.
‘‘ कौन सा घर? जिसमें दूसरी औरत के साथ मेरा घरवाला रह रहा है या यह घर जहां मुझ अकेली को छोड़ कर यह भाग रहा है.’’ घूंघट के भीतर से रामरती ने प्रतिप्रश्न किया.
संतूू को संबोधित करते हुए बुजुर्गों ने कहा-‘‘ अब बोल संतू,रामरती को साथ लेकर जाएगा?’’
‘‘ नहीं यह संभव नहीं है. ना रामरती उसके साथ रहने को तैयार है और न वह इसे साथ रखने को. मेरा व्यर्थ ही मरन हो रहा है दोनों के मध्य.’’
रामरती ने घूंघट को तनिक सा उठाते हुए और सीधे बुजुर्गों की आंखों में झांकते हुए कहा-‘‘ आपने सुन लिया?’’
संतू इसे सुनते ही क्रोध और हताशा में पांव पटकता हुआ दिल्ली भाग गया. मुहल्लावासी संतू और रामरती की लानत-मलामत करते हुए तथा यह भविष्वाणी करते हुए अपने घरों को चले गए कि प्रलय आने में अब देर नहीं है. रह गए रामरती  और उसका ससुर हरदयाल. हरदयाल लंबे क्षणों  तक अपना सिर पकड़े धरती में नजरे गड़ाए सोचता रहा कि क्या अब आगे और कुछ देखना बाकी है. रामरती भाग कर अपनी कोठरी में पड़ गई और हिलकियों के साथ रोने लगी. हरदयाल ने अंततः एक लंबी उसांस छोड़ते हुए रामरती के लिए हांक लगाई-‘‘ रामरती बेटा,बाहर आजा. जो होना था सो हो गया. तूने भी जो कुछ बचपना करना था सो कर दिया लेकिन इसमें तेरी कोई गलती नहीं है. तू चिंता कतई मत करना,जब तक मैं जीवित हूं अपनी बेटी के समान तेरा भरण-पोषण  और रक्षा करूंगा . मेहनत-मजदूरी तो हम किस्मत में ही लिखा कर लाए है सो कुछ तू कर कुछ मैं करूंगा. हम दो जनों का गुजारा उससे हो जाएगा.’’
रामरती घूंघट निकाले बाहर आकर खड़ी हो गई.

संतू इसके पश्चात फिर कभी गांव न लौटा. हरदयाल ने भी उसके पास दो टूक खबर भिजवा दी कि ‘खबरदार,अपना काला मुंह अब गांव में मत दिखाना. मेरे लिए संतू मर गया.’ रामरती का ससुर अगले पांच वर्ष  तक और जिया और दो दिन के बुखार में तप कर चल बसा. यदा-कदा समाचार आते रहे संतू के बारे में,उसके दो बेटों और तीन बेटियों के बारे में,उसकी उस बिनब्याही पत्नी के बारे में. जब तक ससुर जिंदा रहा ढ़ाल के समान उसकी सुरक्षा  में तैनात रहा था. रात में घर के सामने से भी कोई गुजर जाता तो गहरी नींद से भी चिहुंक कर चिल्ला पड़ता-‘‘ कौन जाता है?’’ इतना होते भी मुहल्ले के चार-छः लंपटों ने रामरती के घर के चक्कर लगाने बंद न किए. राह-बाट में,खेतों में,कुंआ पर रामरती से मिलते तो फुसफुसा कर कहते-‘‘ भाभी,क्यों अपनी जवानी को गला रही हो? चार दिन की चांदनी है सो उसका मजा लूटो. हम आपके ताबेदार हैं जब आज्ञा करोगी हाजिर हो जाएंगे.’’ एकआध ने हरदयाल की आंख बचा कर घुप्प अंधेरी रातों में उसकी कोठरी का दरवाजा तक खटखटा दिया. कईयों को पकड़ कर रामरती ने गाली-गुफ्तार भी की लेकिन कामुक पशुओं पर इसका कुछ भी असर न हुआ,तब रामरती ने एक तो उनके ऊपर बाजरा कूटनेवाले मूसल का प्रयोग कर दिया और दूसरे पहले से भी अधिक फटे-पुराने कपड़ों में रहने लगी,तेल-फुलेल और कंघी से विरत बालों को चिड़िया के घोंसले जैसा बना लिया,नहाने-धोने को मासिक आयोजन बना लिया. मुहल्ले की अन्य स्त्रियां कहतीं-‘‘ अरी !रामरती तेरे तन से दुर्गंध आती है,कपड़ों से दुर्गंध आती है.’’
निपृह वह कहती-‘‘ आने दो.’’
लेकिन ससुर के मरते ही कामुक पशु पुनः  इशारे करने लगे. अपनी कोठरी को मूसल से बंद करके रामरती ने बाकी दिन भी गुजार ही दिए.
और आज संतू की मृत देह दरियापुर गांव में लाई गई है.

संतू जब बीमार पड़ा और हालत गंभीर हो गई तब उसके बच्चों ने गांव में सूचना भिजवा दी. भाई-बंद भागे-भागे गए. जिस दिन संतू की मृत्यु हुई थी और अंतिम संस्कार की तैयारी प्रारंभ हुई तब उसका चचेरा भाई बलराम इस एक बात पर अड़ गया कि संतू का अंतिम संस्कार उसके पैतृक गांव में ही किया जाय. उधर संतू के बेटे इस बात पर अड़ गए कि उनके पिता का अंतिम संस्कार वहीं दिल्ली में ही किया जाय.
भड़क कर बलराम ने संतू के लड़के से कहा-‘‘ तेरी मां के साथ संतू का ब्याह कब हुआ था रे,बताना. कहां हुआ था? किन पंचों की उपस्थिति में हुआ था,बताना.’’
कोठरी में संतू की लाश पर उसकी बिनब्याही पत्नी विलाप कर रही थी,सुन कर झपटती हुई बाहर आई. संतू के भाई-बंदों को सुना कर लेकिन अपने बेटे से,जो बीस-बाईस बरस का था, कहा-‘‘ ले जाने दे. मेरे सिर का ताज तो गया इस दुनियां से उसका अंतिम संस्कार यहां करने से भी वापस नहीं आएगा. लेकिन इनसे यह तो पूछे कोई कि पिछले बीस बरस से हम अकेले यहां पड़े हैं तब तो किसी भाई-बंद को हमारी याद नहीं आई. आज अचानक इतने सारे भाई उत्पन्न हो गए संतू के !’’

पहले से भी अधिक भड़क कर बलराम ने भी तथा साथ आए बाकी भाई-बंदों ने भी गाली देते हुए कहा-‘‘ स्साली….. हरामजादी… दूसरी औरत की घर-गृहस्थी उजाड़ कर जो तू यहां पड़ी है उसके बारे में कभी सोचा है तूने? और गांव में संतू के पास है क्या जिसके लोभ में हम आए हैं ! हम आए हैं इस लिए कि संतू पर जिसका अधिकार है उसी को उसकी मिटृी का अंतिम संस्कार करने का अधिकार है. सारी उम्र जो उसके नाम पर बैठी रही उसी का उस पर अधिकार है,तेरी तरह खसम के होते हुए दूसरे के घर में नहीं बैठी वह. आज भी संतू की ब्याहता है वह. हम चाहते हैं कि जहां की माटी है उसी माटी में जाकर वह मिले जिससे से संतू की आत्मा को शांति मिले.’’
सुन कर संतू की वह बिनब्याही पत्नी सन्न रह गई. कुछ क्षण  सोच-विचार के बाद उसने अपने बेटों से कहा-‘‘ चलो हम भी दरियापुर चलेंगे.’’
सुन कर सारे भाई बंद भड़क गए , उसके लड़कों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा-‘‘ बेटा,ध्यान से सुन लो और कान खोल कर सुन लो कि तुम लोग और तुम्हारी यह मां यदि संतू की लाश के साथ गांव गई तो खून-खराबा हो जाएगा. पुलिस,कोर्ट-कचहरी करने से भी गुरेज न करेंगे हम अब. तुम्हारी यह मां कानूनी तौर पर संतू की पत्नी नहीं है.’’
संतू की पत्नी और बेटे बात की गंभीरता को समझ गए. टैंपो में लाद कर संतू की लाश को जब ले जाने लगे तब वह ‘ मेरे राज….मेरे राज…मुझे छोड़ कर कहां जा रहे हो….. किस के सहारे जिऊंगी अब..’ इत्यादि का विलाप करने लगी. अंततः संतू के भाई-बंद लाश ले कर गांव आ गए.

इस प्रकार दोपहर के एक बजे के लगभग संतू की लाश जब दरियापुर गांव में पहुंची तब अचानक वह विचित्र समस्या उठ खड़ी हुई जिसके चलते मुझे गाववालों को अपना दूत बना कर भाभी रामरती के पास उसे समझाने के लिए भेजना पड़ा. संतू पुनः रामरती के दरवाजे पर लौट आया था,पूरे बाईस वर्शों के बाद. संतू की परित्यक्ता पत्नी यहां गांव में है जो बाईस वर्श पूर्व उसके जीते-जी उसके नाम की पहनी चूड़ियां तोड़ चुकी थी और जिसने उसके नाम की चूड़ियां पहन रखी हैं उसे संतू के भाई-बंदों ने बहिष्कृत   कर दिया है. रात होने से पहले संतू की ‘अंजल-मंजल’ करनी अनिवार्य है. मृत शरीर को सूरज छिपने से पूर्व ही अंतिम संस्कार कर पंच तत्वों में विलीन करना ही होगा,ऐसा ही विधान है.

लाकर रामरती की कोठरी के सामने धरती पर कांस बिछा कर लिटा दिया संतू को.  मुहल्ले के बड़े-बूढ़े बांस चीर-फाड़ कर अरथी बांधने लगे. यूं अचानक उस संतू को,जिसके साथ सात फेरे लिए थे,अपनी कोठरी के सामने मृत पड़े देख रामरती जड़ हो गई. क्रोध में फुफकारते हुए कोठरी की दीवार पर मार कर चूड़ियां फोड़ देना एक बात है और उस आदमी की मृत देह को देखना और बात है जिसके साथ पूरा जीवन न सही जीवन के कुछ आनददायक वर्ष  भोगे थे. चाहे झूठे ही सही ‘एक बुत बनाऊंगा तेरा…..’ गीत उसके लिए गाए थे. जिसकी सुंदरता को देखते ही भावाभिभूत हो गई थी पहले ही दिन. चूड़ियां फोड़ कर जिसे जीवन से निकाल बाहर करने का भ्रम पाले हुए थी वही सशरीर उसकी कोठरी के सामने धरती पर पड़ा अरथी पर चढ़ने को प्रतीक्षित  था. उसकी आंखों में आंसू भर आए. दिल बैठने लगा. लेकिन कुछ ही क्षणों  में उसने अपने आपको संभाल लिया.  तब तक मुहल्ले-भर की स्त्रियां उसकी कोठरी के सामने एकत्रित होकर बैन करने लगीं. चार-छः उसकी कोठरी में घुस कर उसे समझाने का प्रयत्न करने लगी-‘‘ न रो भैन…. न रो. सबको कभी न कभी बिछुड़ना ही पड़ता है. हाय…. कैसा गबरू ‘जुवान’ हुआ करता था संतू. तुम दोनों की जोड़ी कैसी सारस की जैसी थी. लेकिन सबर कर भैन…. सबर कर…..’’ लेकिन यह देख कर कि रामरती न तो रो रही थी और ना ही वह बैन कर रही थी सांत्वना देनेवाली अकबका कर चुप होगई. आश्चर्य से वे रामरती को देखने लगी. रामरती ने तब भी उन पर ध्यान न दिया. हैरतभरी निगाहों से रामरती को देखते हुए उन्होंने और एक प्रयत्न किया-‘‘ हाय…हाय… बिचारी रामरती. अपने जोड़ीदार के दुःख में पत्थर हो गई है.’’ उसके पश्चात रामरती को कंधों से पकड़ कर झकझोरते हुए कहा-‘‘ अरी रामरती…. तेरा जोड़ीदार चला गया भैन…… रो,विलाप कर,बैन कर,चूड़ियां तोड़ दे भैन. अब तेरे भाग में सुहाग नहीं रहा. तू रांड हो गई रामरती… तू रांड हो गई.’’
सुन कर रामरती ने निस्पृहभाव से उन्हें अपनी बिना चूड़ियों की कलाईयां दिखा दीं.
‘‘ ना भैन ना… संतू तेरा जोड़ीदार था,तेरे माथे का ‘ताज’ था,तेरा सुहाग था. चूड़ियां तोड़ … चूड़ियां तोड़.. चूड़ियां तोड़… रामरती.’’
रामरती ने दुखी स्वर में कहा-‘‘ मैं तो बाईस बरस पहले ही रांड हो गई थी.  तुम क्या जानती नहीं हो यह?’’
भड़क कर एक बूढ़ी ने कहा-‘‘ अरी ! पागल हो गई है क्या? तेरे कह देने से ही तू रांड हो गई? समाज ने इसे कब स्वीकार किया था? तू रांड हो गई थी तो किस के नाम पर अब तक बैठी रही थी? संतू के नाम पर ही ना? बोल !’’
‘‘ मैं उसके नाम पर कभी नहीं बैठी रही थी. बाईस बरस पहले ही संतू के नाम की पहनी चूड़ियां तोड़ कर रांड बन गई थी. वह मेरा अब कुछ नहीं है. उसके साथ जो कुछ तुम्हें करना है सो करो या उसकी जोड़ीदार करे.’’
बड़ी-बूढ़ियां बैन-फैन करना भूल कर रामरती को गालियां निकालने लगीं-‘‘ मरद के जीवित रहते स्त्री रांड हो सकती है क्या? तुझे संतू के साथ नहीं रहना था तो तू उससे रिश्ता तोड़ कर किसी और के घर में बैठ जाती,किसने रोका था तुझे. पति की मृत देह घर के आंगन में पड़ी है और यह सती-सावित्री कह रही है कि वह तो रांड है.’’ और एक स्त्री ने जोर-जबरदस्ती पर उतरते हुए कहा-‘‘ ऐसे ना मानेगी यह करमजली,जबरन रांड बनाओ इसे अब.’’ कह कर उसने रामरती के दोनों हाथ पकड़ कर फर्श पर मार दिए लेकिन हाथों में चूड़ियां तो थी ही नहीं. विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई थी. विधवा कह रही थी कि वह तो बाईस वर्ष  पूर्व ही पति के जीते जी विधवा हो गई थी और मुहल्ले की स्त्रियां उसे आज और अभी ताजा-ताजा विधवा बनाना  चाहती थीं. लाचार बड़ी-बूढ़ियों ने बाहर अरथी तैयार करते पुरुषों  तक बात पहुंचा दी. मुहल्ले के कई सम्मानित बुजुर्गों ने भी आ कर रामरती को समझाया लेकिन वह अपनी बात पर अडिग रही. अंततः बुजुर्गों ने विधान का एक अंतिम और अमोघ अस्त्र चल कर देखा. सख्त शब्दों में रामरती से कहा-‘‘ रामरती,विधान के अनुसार तू अब भी संतू की पत्नी है क्योंकि विवाह संबंध-विच्छेद के लिए दोनों जोड़ीदारों में से किसी एक को तो विधिवत बिरादरी के सामने संबंध तोड़ना ही पडत़ा है. तू बूढ़ी बेशक हो गई है लेकिन तूने कभी भी संतू से संबंध नहीं तोड़ा है. तेरे द्वारा क्रोध में चूड़ियां तोड़ देने से तू विधवा नहीं हो गई थी इसे याद रख.’’

गांवों में ब्याह कर आते ही जो नई बहू दो हाथ का घूंघट तानती है वह बढ़ती उम्र के साथ छोटा होते-होते माथे तक आ जाता है. पचपन की उम्र पार कर चुकी रामरती ने भी इस प्रकार घूंघट से छुटकारा पा लिया था. बेहद दुखी रामरती घिसटते कदमों से अपनी कोठरी से बाहर आकर संतू की मृत देह के एक दम समीप उसके सिरहाने आकर खड़ी हो गई. बुजुर्गों और बड़ी-बूढ़ियों ने राहत की सांस लेते हुए,कि अंततः रामरती मान ही गई,उसके मुंह की ओर इस प्रत्याशा में देखा कि वह विलाप करना शुरू करेगी. रामरती कई लंबे कक्षणों  तक संतू की मृत देह को निहारती रही. नीचे बैठ कर उसने संतू के मुंह से ओढ़ाई गई चादर हटा दी. उसकी आंखों से आंसू झरने लगे. हिचकियों से गला रूंध गया. दर्शकों की आंखें भी आंसूओं से भर गईं. स्त्रियों का झुंड विलाप में बैन करने लगा. रोआंराट मच गया. तब रामरती धीरे से अपने घुटनों पर हाथ रख कर कराहती सी उठ खड़ी हुई. उसने झुक कर धरती पर पड़ा कांस का एक तिनका उठाया और उसे पूरे मुहल्ले को दिखाया उसके पश्चात मृत संतू के मुख को दिखाया और दोनों हाथों की चुटकियों में पकड़ कर बीच से तोड़ दिया.

देख कर दर्शक सन्नाटे में आ गए. बैन करती हुई स्त्रियों का मुंह बैन करना छोड़ खुला का खुला रह गया. बिरादरी के सामने और बिरादरी द्वारा अनुमोदित विधान के अनुसार रामरती ने मृत संतू से संबंधविच्छेद कर दिया था. यह उन दिनों की बात है जब जाटवों में तलाक कोर्ट-कचहरी में न होते थे. दोनों पक्षों  में से कोई भी इस प्रकार संबंध विच्छेद कर सकता था यदि वह बिरादरी के पंचों के सामने किया गया हो. इसके पश्चात दोनों ही पक्श अन्य एक और विवाह करने अथवा न करने के लिए स्वतंत्र हो जाते थे.

भौंचक मुहल्ले को सन्नाटे में छोड़ रामरती अपनी कोठरी में घुस गई. भीतर से सांकल  चढ़ा कर वह धरती पर जा पड़ी. बाहर धरती पर मृत पड़े संतू की सोच कर उसकी हिचकियां बंध गईं जिसने कभी उसके लिए-‘…अरे ! मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा’ गाया था. बेआवाज,निश्शब्द हिचकियां धरती को गीली करने लगीं. हिचकियों की एक के बाद एक आती हिचकियों से उसका सर्वांग झकोरे खाने लगा.

यही वह अंक था इस नाटक का जब मुझे गांव के बुजुर्गों ने रामरती को समझाने के लिए उसकी कोठरी में भेजा था और मैं उसके सामने बैठा अपढ़ रामरती के तर्कों से सहमत होता हुआ अपने आपको बौना महसूस कर रहा था. रामरती के तर्कों की कोई काट न मेरे पास थी,न बाहर प्रतीक्षा  कर रहे बुजुर्गों के पास और ना ही बाहर-भीतर से खोखले शास्त्रों के पास. ढ़कोसलों  का लबादा ओढ़े शास्त्रों और समाज को दर्पण दिखाने का साहस कबीर और रामरती जैसे मनुष्य  कर सकते हैं लेकिन ऐसे मनुष्य  इस समाज में जन्मते कितने हैं?

अनपढ़ रामरती भी और उसका अनपढ़ कबीरपंथी पिता भी ठीक ही कहता था कि कि एक ओर तो अमोल मानुष जीवन और दूसरी ओर उसी अमोल को खोने की हजारों युक्तियों का वर्णन शास्त्रों में ! उसी अमूल्य  को खोने में जीवन गारत करने के लिए आदेश हैं शास्त्रों में कि पुनः जन्म न लेना पड़े ! और विवाह बंधन में बंधते हुए शास्त्रानुसार ही अगले सात जन्मों तक जीवित रह कर बार-बार पति-पत्नी बनने के वचन ले कर-दे कर पुनः जन्म लेने की तैयारियां करता मनुष्य  ! रामरती और उसका पिता शास्त्रों के अन्य एक अनर्गल पोल को कदाचित जानता ही न था कि इन्हीं शास्त्रों और शास्त्रमर्मज्ञों के अनुसार मृत्यु का भय यदि हो तो-‘‘ऊॅं त्रयम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम ।  उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्शीय मामृतात।।’’ नाम के महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से मृत्यु दूर भाग जाती है. क्यों भई ,मानुष जून से छुटकारा दिलाने के लिए जब मृत्यु आ ही रही है तो उसका स्वागत करना शास्त्रसम्मत है. इस जन्म से जितना शीघ्र छुटकारा मिले उतना ही उत्तम है,यही इस मानुष जीवन का पृथम और अंतिम उद्देश्य है शास्त्रों के अनुसार. अधर्मी ही इस जीवनकाल को लंबा बढ़ाने की मूर्खता कर सकते हैं. संतू कदाचित शास्त्रों पर तनिक सा भी विश्वास न करके सात जन्मों के वाहियात फलसफे को धता बता कर रामरती से छुटकारा पा गया था लेकिन इस ‘महामृत्युंजय मंत्र’ को न जानने की भूल वह भी कर ही बैठा था,जानता होता तो ‘ महामृत्युंजय मंत्र ’ का जाप करा कर कुछ दिन और रामरती के मानस पर दाल दल सकता था.

बाहर बुजुर्ग प्रतीक्षा  रहे थे और दिन ढ़लने को था. वे अब और प्रतीक्षा  न कर सकते थे. सूरज डूबने से पूर्व ही मृत शरीर का अंतिमसंस्कार करने का विधान है शास्त्रों में. मैंने भी और भाभी रामरती ने भी कुछ ही क्शणों में बाहर से आती बुजुर्गों की आवाज सुनी  -‘‘ अच्छा होता दिल्ली में ही संतू का अंतिमसंस्कार हो जाने देते. चलो भाईयो, अब इस अभागे की ‘अंजल-मंजल’ तो करनी ही होगी.’’

सुन कर और एक बार रामरती की आंखों से आंसू ढ़लक कर उसके सूखे गालों पर बहने लगे. संतू अंततः जा ही  रहा था रामरती को छोड़ कर लेकिन इस बार कभी न लौटने के लिए. मैं स्तब्ध था. भाभी रामरती के सामने बैठा हिम्मत भी न जुटा पा रहा था कि बाहर जा कर उनसे कुछ कहूं जो संतू को ले जा रहे थे. पथराई आंखों से रामरती उस बंद दरवाजे को देख रही थी जिसके पार संतू को ले जाने की तैयारियां लोग कर रहे थे. बाहर सुगबुगाहट बढ़ गई थी. और फिर ‘राम नाम सत्त है….. सत्त बोलो गत्त है….. राम नाम सत्त है….’ सुनते ही रामरती धरती पर गिर कर हिचकियां ले कर रोने लगी. उसने कुछ क्षण प्रतीक्षा  की कि संतू चला जाय. आवाजें जब दूर जा कर बिल्कुल क्षीण  हो गई तब वह दरवाजा खोल कर वहां जा खड़ी हुई जहां संतू की मृत देह रखी गई थी. धरती पर बैठ कर उस धरती को हाथों से टटोलने लगी जहां संतू की मृत देह रखी गई थी. इस बार जोरों से रोना शुरू कर दिया उसने. लेकिन वह किसी विधवा का विलाप न था. बस,रोदन था एक.

विधान -अनुसार स्त्रियां शमशान में अंतिम संस्कार के समय नहीं जा सकतीं सो घरों से बाहर निकल कर स्त्रियां उसके विलाप को सुन और देख कर हैरत भरी निगाहों से उसे देखने लगीं.

‘‘अनाघ्रातम पुष्पम, असूर्यंपश्या से रमणेषु रम्भा तक’’

संध्या सिंह

विभागाध्यक्ष ‘हिन्दी’
डी0ए0वी0पी0जी0 कालेज
लखनऊ. संपर्क :sandhyasinghdr1@gmail.com

इस लेख में कोशिश की गई है  स्त्रीलेखन के बहाने मानव सभ्यता के सबसे पुराने विवाद से साक्षात्कार की । आॅखें मूंदने से काम नहीं चलने वाला। शुतरमुर्ग को रेत से सर निकालना ही है क्योंकि आॅंधी तो आ चुकी है। क्या है यह विवाद जिसे पितृसत्ता, धर्म और बर्चस्व – दासता के गणित ने सदियों से एक आवरण से ढक रखा है।|

विवाद इस मान्यता का है कि पुरूष प्राकृतिक रूप से बहुगमन (पाॅलीगेमी) के लिये बना है और स्त्री एकनिष्ठता(मोनोगेमी)  में ही सुख-दुःख पाती है। – कि यह प्रवृत्ति देश-काल -परिस्थिति जन्य नहीं प्राकृतिक है। पड़ताल के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं कि प्रेम को देह से पृथक कैसे करेंगे! और देह से मानव को पृथक कैसे करेंगे! और प्रेम और मानव से साहित्य को पृथक कैसे करेंगे सम्भव नहीं है। साथ ही सामाजिक संरचना और विधि निषेध का इतिहास तो है ही पृष्ठ भूमि में। तमाम उतार-चढ़ाव और पड़ावों से गुजर कर हमारा साहित्य आज जिस मुकाम पर है, उसके फलक पर एक तरफ है पुरातन संस्कृति के प्रति रूमानी आदर्श दृष्टि, दूसरी तरफ अतीत के विधि निषेधों से असहमत होने के लिये तत्परता से सहमत समूह और उनके बीच खड़ी स्त्री की वास्तविक व्यावहारिक समस्याएं-सपने। आज स्त्री प्रश्न इन तीनों बिन्दुओं से टकरा रहा है। वर्तमान परिदृश्य पर अकादमिक बहसों की निरर्थकता भी है (अपवाद भी है) बौद्धिक वाग्जाल भी है और निजी संस्थाओं के सार्थक निर्रथक प्रयास भी हैं। कुछ नहीं बदला या यह विमर्श कुछ खंगाल नहीं पाया  यह तो कहा ही नहीं जा सकता पर आज मानव सभ्यता जिस मुहाने पर आ खड़ी हुई है,  उसकी आधी दुनिया अपनी यात्रा के जिस पड़ाव पर है,  वहाँ से आगे भी रास्तों का एक जाल है जैसा पीछे था। ज्ञात अतीत से दोनों तरफ के उद्धरणों की फेहरिस्त दी जाती रही है। अपने विश्वासों, सुविधाओं , मनोभावों के अनुरूप, उन्हें पुष्ट करते हुए एक तरफ स्त्री के महिमामण्डन की और दूसरी तरफ उसके प्राकृतिक रूप से दोयम दर्जे का होने की। पुराण, कुरान, हदीस, मनुस्मृति, रामायण आदि के उद्धरणों की यहाँ आवश्यकता नहीं है। जिस तरह आजका पढ़ा – लिखा समुदाय पश्चिम के नारीवादी आन्दोलन के प्रमुख सोपान, हिन्दुस्तानी स्त्री मुक्ति आन्दोलन पर उसका प्रभाव, कमोबेस जानता ही है वैसे ही इतिहास के-सुविधाजनक प्रसंगों की भी उसे जानकारी है ही!

बात स्त्री की जैविकता – देह से गुजरते हुए उसके अस्तित्व और अस्मिता पर आ टिकने की है। स्त्री अस्मिता के प्रश्नों की पड़ताल का एक प्रमुख धरातल स्त्री लेखन में प्रतिबिम्बित स्वप्न और यथार्थ हैं। जो पैमाने और जो मापदण्ड बने बनाए हैं, उनके आधार पर अधिकांश स्त्री लेखन के स्वप्न अधिक रूमानी (अमूर्त) और यथार्थ अधिक कठोर (पतनशील) है। वे मापदण्ड इसका ठीकरा पश्चिमी तर्ज के नारीवाद के भारतीय महिला लेखन पर गहरे प्रभाव के सर पर फोड़ते हैं। पिछले दो दशक का महिला लेखन आग और पानी साथ लेकर चल रहा है, पर यह परिणाम है। कारण पीछे है। ज्ञात अतीत के आखिरी छोर पर कहीं न कहीं इसका बीज है। जब मानव सभ्यता के इतिहास में स्त्री मानव होने की गरिमा से वंचित कर दी गई। यह गहरे शोध का विषय है कि वह कौन सा प्रस्थान बिन्दु था जब धर्म ने स्त्री की यौन शुचिता को परिभाषित और नियंत्रित किया और उसका वस्तुकरण कर दिया। दूसरी तरफ 1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के बाद 1792 में मेरी बुलैस्टन क्राफ्ट की कृति ‘‘द विंडिकेशन आॅफ द राइट्स आॅफ वीमेन’’ को नारीवाद की पहली लहर माना जाता है। उत्तर मार्क्सवादी  नारीवाद, उग्र नारीवाद है। राधा कुमार की ‘‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’’ भारत में सन 1800 से 1990 तक के नारीवादी आन्दोलनों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है और इस भ्रम पर जबरदस्त प्रहार करती है कि ‘‘भारत में नारीवाद एक अप्रासंगिक पश्चिमी – आयात है जो प्रथभ्रष्ट भारतीय स्त्रियों द्वारा किया गया है।’’1 पुस्तक के ‘उन्नीसवीं सदी’ वाले अध्याय में सती प्रथा और विधवा विवाह के प्रसंगों 2 से गुजरते हुए अनायास अज्ञात हिन्दू महिला (सीमंतनी उपदेश ) और दुखिनी बाला (सरला: एक विधवा की आत्म जीवनी) की रचनायें बीज के बाद भ्रूण की तरह सामने आती हैं। रोहिणी अग्रवाल मानती हैं कि ‘‘मीराबाई के बाद अज्ञात हिन्दू महिला हिन्दी की दूसरी स्त्री विमर्शकार है जो पातिव्रत्य धर्म की चुधियाती रोशनी के पीछे छिपे जानलेवा अंधेरों को साफ-साफ देख सकी है। उनकी दृष्टि में विघटित सम्बन्ध का कारण है पुरूष का व्यभिचारी स्वभाव विवाह का अर्थ यदि पति की लातें खाकर उन चरणों को पूजना है तो अज्ञात हिन्दू महिला डट कर इस विवाह संस्था का विरोध करती है.3 उनका कड़वा सच तत्कालीन स्त्रियों को आगाह करता है ‘पंडित लोग स्त्रियों को पतिव्रत महात्म्य सुनाकर दबाते हैं और पुरूषों को कोकशास्त्र और नायिका भेद की रसीली चर्चाएं सुना कर बेबस – अवश स्त्रियों को बाजार में बैठा कर व्यभिचार कराते हैं।’’ (सीमंतनी उपदेश पृ0 112) 4 बहरहाल, भड़काऊ अंदाज में कड़वा सच बोल- लिख कर स्त्रियों को उकसाने (चेतन करने) के अपराध में अज्ञात हिन्दू महिला ने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी साहित्य से निर्वासन का दण्ड तो भोगा ही।’’5 अज्ञात हिन्दू महिला का सर्वसमावेशी आवेश और दुखिनीः बाला का प्रशांत गाम्र्भीर्य हिन्दू धर्म और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन की मांग करते हैं।’’6 रोहिणी प्रश्न उठाती हैं ‘‘स्त्री की सामाजिक स्थिति में सुधार के लिये कानूनी अधिकार मांगता नवजागरण कालीन हिन्दी समाज स्त्री स्वरों से इतना भयभीत क्यों हो गया कि उनके साहित्यिक अवदान के साथ-साथ उनके नाम को भी ‘‘खा’’ गया । ऐसी कौन सी वर्जनाएं और दबाव बनाए कि उन्हें नाम से नहीं, वरन बंग महिला, अज्ञात हिन्दू महिला, दुखिनी बाला सरीखै विशेषणों के साथ जाना गया ? ….. नव जागरण कालीन पुरूष मानसिकता भले ही अपने युग की स्त्रियों के अधिकारों की सीमा तय करने के विवाद में अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पा रही थी लेकिन क्या हमारा अपना युग उनकी संकीर्ण द्वन्दों पूर्वग्रहों और तिरस्कार उपहास सही-सही व्यापक पाठक समाज के समक्ष ला रहा है।’’7

कुमार संतोष की चित्र  श्रृंखला ‘ युग्म’ से

मृणाल पाण्डे नारी-लेखन के सन्दर्भ में 
लिखती हैं – ‘‘ पाठक – समीक्षक प्रायः नारी आन्दोलन को या तो सम्पन्न सवर्ण लेखिकाओं का पीड़ा – विलास या दलित और वर्णाश्रम  विरोधी आन्दोलनों का ही एक नन्हा अनुपूरक साबित करने की हड़बड़ी में दिखाई देते हैं।8 जबकि निकट अतीत का बाहरी और आन्तरिक दुनिया का आलोड़न स्त्री लेखन को लगातार प्रयोगधर्मी बनाता रहा है।’’ समाज की गहराई में पैठ कर भी भटकन और असंपृक्ति महिला – लेखन की ही नहीं पूरे आधुनिक लेखन की समस्या है।’’9 इस भटकन और असंपृक्ति से परे अपने गहरे शोधपरक लेख में राहिणी अग्रवाल स्त्री देह और उसके उपभोग पर उसके अपने स्वामित्व पर उठती आपत्ति (मुझे चाॅद चाहिये की वर्षा वासिष्ठ के सन्दर्भ में ) पर ध्यान आकृष्ट करती है। ‘‘वस्तु से व्यक्ति और व्यक्ति से व्यक्तित्व- संधान का लोमहर्षक संघर्ष यदि किसी प्रायोजित साजिश के तहत पुनः वस्तु में तब्दील कर दिये जाने का लुभावना उपक्रम बन कर रह जाये, तो अनापत्ति होगी ही।’’10 इस प्रायोजित साजिश के अन्दरूनी घटक क्या हैं- भूमंडलीकरण , बाजार (पूंजी) मीडिया, स्वतंत्रता का छद्म चारा (उग्र नारीवाद  इसे पुराने परिवार, विवाह, धर्म यानि पितृसत्ता के नए बदले रूप में देख रहा है) . रोहिणी लिखती है ‘‘अनादि काल से साहित्य (लोक परम्परा सहित ) मीडिया का सशक्त रूप रहा है, इसने स्त्रियों की जिन छवियों को रचा है, उन्हें बीसवी शताब्दी की शिक्षा और समानाधिकार की लहर तथा इक्कीसवीं शताब्दी की सनसनीखेज तकनीकी क्रान्ति भी नहीं बदल पाई है।’’11 मीडिया ने ‘‘सर्वगुण सम्पन्न’’ ‘‘षड्गुणवती’’ का जो तिलस्म रचा है, उसे आज महिला लेखन तोड़ रहा है। अनामिका जिजीविषा (फ्राॅयड जिसे लिबिडो कहते हैं) के अतिरेक को सृजनात्मकता का मूल मानते हुए कहती हैं कि हर कलाकार के पास एक वैकल्पिक दृष्टि होती है जो उसे व्यवस्था विरोध तक खींच ही लाती है।’’ ‘‘और व्यवस्था – विरोध की यही बदमाशी जब स्त्रियां करती हंै तो उनकी मिट्टी पलीद करना और भी आसान हो जाता है।‘‘12

2004 सितम्बर के हंस में विख्यात-कुख्यात राजेन्द्र यादव प्रेम चन्द के नाम से जुडे़ कहानी पुरस्कार ( जो अन्ततः दिया नहीं गया) के सन्दर्भ में ‘‘लिखते हैं – मगर ये पांचों कहानियां आश्चर्यजनक रूप से उसी कथ्य को लेती हैं जिसे आज ‘स्त्री विमर्श’ कहते हैं, इतना ही नहीं स्त्री- देह इनके केन्द्र में है। इनमें तीन स्त्रियों की लिखी हैं।’’ ‘‘पुरूष द्वारा नियंत्रित उसकी देह और अनिवार्य रूप से जुड़ी यौनिकता को पुर्नपरिभाषित करने की मांग स्वयं स्त्री की ओर से उठाई जा रही है।’’ 13 इसके बरक्स सूरज पालीवाल इसे भूमण्डलीकरण के प्रभाव के रूप में देखते हैं। ‘‘मुझे चाॅद चाहिये’’ ‘‘आवां और ‘चाक’ के कथानकों के सन्दर्भ में वे लिखते हैं ‘‘ऐसी गलतियाँ हम जानबूझ कर करते हैं, जिससे उन शक्तियों को ताकत मिले जो स्त्री लड़ाई को यौन मुक्ति तक ही सीमित रखना चाहते हैं। बहुत सारी लेखिकाओं के नाम गिनाने की यहाॅ आवश्यकता नहीं है, लेकिन क्या वजह है कि वे सब यौन सम्बन्धों की स्वतन्त्रता को ही स्त्री स्वतंत्रता मानती हैं।‘‘14

जाहिर है समय का अन्तराल आपसी संवाद की पुरजोर वकालत करता है, क्या है आज का जटिल ‘सच’ जो लेखन और स्त्री लेखन को भी ऐसा धरातल दे रहा है जहाॅ भोक्ता और साक्षी को पृथक करना सम्भव नहीं।’’ तेजी से फलांगते वक्त में आज एक साथ कई युग और संस्कृतियाँ जी रहे हैं हम। इक्कीसवीं सदी की ग्लोबल लेस्वियन और गे कल्चर के बरक्स है प्रेमी युगल की हत्या करता बर्बर कबीलाई अभिमान, सनसनी, रोमांच और ग्लैमर की चंुधियाती रोशनी के बरक्स है जहालत, अज्ञान और पिछड़ापन1’’15 इन्हीं के बीच, इन्हीं के साथ रचनाधर्मिता के नए चुनौती देते आयाम विकसित हो रहे हैं।

देह पर स्वामित्व, उसका उपभोग सम्बन्धों की नई जमीन गढ़ रहा है और जाहिर है यह समाज के परम्परागत विधि निषेधों को तब और चुनौती दे रहा है जब उसके साथ ‘बेवफाई’ जुड़ जा रही है। मन्नू भंडारी की ‘‘एक कहानी यह भी’’ की समीक्षा के अन्त में मैनेजर पांडे मन्नू जी से एक पात्र के लिये परानुभूति या समानुभूति से न सोच पाने का गिला करते हैं। जाहिर है वह पात्र है मन्नू के पति राजेन्द्र यादव की प्रेयसी ‘मीता’। सुधा अरोड़ा प्रश्न पूछती हैं – क्या पति अपने रकीब को सहानुभूति देंगे? ‘अन्या से अनन्या’ के सन्दर्भ में ‘जन्नत की हकीकत’ जानने वाले कलकत्ता के साहित्यकारों से भी सुधा अरोड़ा पूछती हैं कि ‘अन्याओं’ से सम्बन्ध रखने वाले अधिकांश लेखक की बीबियों की पीड़ा अनकहीं क्यों है? ‘‘लेकिन इसका क्या किया जाए कि हिन्दी साहित्य में आलोचना क्षेत्र के अधिपतियों की आस्वाद ग्रन्थि में जादुई यथार्थ (मैजिकल रियलिजम) के बदले आभासी यथार्थ (वचर््युअल रियलिज्म) का चस्का लग गया है। ……….. ताकि बौद्धिक लंपटई का साहित्यीकरण कर सकें।16 बात फिर वहीं आती है। विभूति नारायण राय नया ज्ञानोदय में साक्षात्कार में  बिना नाम लिए विभूति ‘‘नमो अन्धकारम’’ के नायक (!) के लिए कहते हैं ‘‘लेखक ऐसे पुरूष का प्रतिनिधि चरित्र है जिसके लिये स्त्री कमतर और शरीर से अधिक कुछ नहीं है।’’17 आगे विभूति कहते हैं – ‘‘महिला लेखिकाओं द्वारा बडे़ पैमाने पर अपनी यौन स्वतंत्रता को स्वीकारना पावर डिसर्कोस का भाग बनने की इच्छा है। आप ध्यान से देखें – ये सभी लेखिकाएं उस उच्च मध्य वर्ग या उच्च वर्ग से आती हैं जहाॅ उनकी पुरूषों पर आर्थिक निर्भरता अपेक्षाकृत कम है।’’18  क्या यह अधूरा सच है? भविष्य उत्तर देगा परन्तु एक ही व्याकरण नहीं हो सकता भिन्न धरातल की स्त्रियों को समझाने का, और ना ही एक ही औजार से सभी मृत परम्पराओं का ‘‘पोस्टमार्टम’’ सम्भव है। याद रहे कि वो कसौटियां भी हमारे इतिहास ने ही दी हैं स्त्री को मापने की, जिसे बदले रूप में आज का बाजार भुना रहा है।

सन्दर्भ:-

1. स्त्री संघर्ष का इतिहास – राधा कुमार – पृ0 374 वाणी प्रकाशन
2. वही – पृ0 48
3. बहुवचन अक्टूबर – दिसम्बर 09 नव जागरण: स्त्री-प्रश्न और हिन्दी साहित्य – रोहिणी अग्रवाल पृ0 200
4. वही – पृ-208
5. वही – पृ-201
6. वही – पृ-208
7. वही – पृ-209
8. हंस 8 मार्च 2001 – अन्दर के पानियों का सपना – मृणाल पाण्डे – पृ-70
9. वही  – पृ-71
10. वही-आकाश चाहने वाली लड़की के सवाल – रोहिणी अग्रवाल – पृ-172
11. वही – पृ-170
12. हंस – नवम्बर 2000 परख अनामिका पृ-93
13. हॅस – सितम्बर – 2004 – मेरी-तेरी उसकी बात पृ-8
14. अन्यथा अप्रैल 2005-पृ-107
15. कथाक्रम – जुलाई-सितम्बर-2008 – रोहिणी अग्रवाल-पृ-160
16. हंस-अगस्त 110-कठघरे में – पृ-131
17. नया ज्ञानोदय – अगस्त-10-पृ-32
18. वही – पृ-33

पत्नी कुमकुम की नजर में उदय प्रकाश

उदय प्रकाश के बारे में उनकी पत्नी कुमकुम से सुधा उपाध्याय की बातचीत पर आधारित 


जैसे यादों का कोई सिलसिला नहीं होता, वो कभी भूत भविष्य और वर्तमान देखकर नहीं आतीं…वैसे ही मैं जब उदय प्रकाश जी की पत्नी कुमकुम जी से मिलने गई और उन्हें कुरेदने की कोशिश की तो जैसे यादों का सैलाब सा आ गया….जो तकरीबन दो से ढाई घंटे चलता रहा….इस सैलाब में जब जो कुछ बेहद औपचारिक तरीके से मैंने शीतलवाणी में उदय प्रकाश पर निकलने वाले विशेषांक के लिए कुमकुम जी से उदय प्रकाश: घर और बाहर दोनों को करीब से जानने की कोशिश की तो धीरे-धीरे मुझे ढेर सारा खजाना मिलता गया….वैसे तो कुमकुम जी बेहद संयत, संयमित और संतुलित लगीं पर वो भावुक होने के नाते जितनी बार डूबती उतराती रहीं मैंने उनका पूरा साथ निबाहा….
कुल जमा पूंजी के रूप में मुझे इस जोड़े की सबसे बड़ी खूबी जो व्यक्तिगत तौर पर पसंद आई वह थी सामंजस्य और सहधर्मिता की भावना…जिसके कारण उदय प्रकाश एक बहुमूखी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व हैं जो कई कोणों को एक साथ जीते हुए निरंतर सर्जना में रत एक सफल मुकाम पर हैं….आइए आपसे उसी बातचीत का अंश साझा करती हूं…इस बेहद अनौपचारिक बातचीत में कई जरूरी पहलुओं पर बात होगी….
उदय प्रकाश और कुमकुम जी की पहली मुलाकात/ उनका विवाह/विवाह में आने वाली अड़चनें/ उससे जुड़ी कुछ रोचक घटनाएं/ गांव परिजन बच्चे/ उदय प्रकाश का लेखन और फिल्म निर्माण/ बढ़ता परिवार और बढ़ती जिम्मेदारियां/ कुमकुम जी की पसंदीदा कहानियां/ पुत्र-पुत्रवधू, पोते-पोतियों से भरा पूरा परिवार/ जो कुछ अबतक उदय प्रकाश पर अप्रकाशित रह गया है उन सब पर खुलकर बातचीत का हिस्सा…
                                                                                                                                सुधा उपाध्याय 

उदय प्रकाश ,कुमकुम

उदय प्रकाश की पत्नी के रूप में जब मैं बीते हुए कल का आकलन करती हूं तो सारी सुधियां ताजी हो जाती हैं….आप सब जानते हैं उदय प्रकाश की सबसे बड़ी ताकत है उनकी स्मृतियां….वे अपने जीवन से जुड़े गांव, घर, परिजन, चीजें, चरित्र और उन सबसे जुड़ी बातों को कभी भूला नहीं पाते….ठीक वैसे ही उदय प्रकाश जी से पहली बार मिलन की यादें आज भी मेरे जेहन में ताजा हैं….आज भी रह रहकर याद आते हैं वो ओपन एयर थियेटर, क्लासेज के बाद बैडमिंटन खेलना, छोटे-बड़े स्टेज शो, समूह में बैठकर गाना, पेंटिंग्स, छत्तीसगढ़ी गानों का प्रस्तुतिकरण…खुद उदय प्रकाश जी का टेबल बजाकर गाने का वह दृश्य जैसे कल ही की बात हो…. उदय प्रकाश जी को स्पेनिश लिटरेचर से बहुत लगाव था…धीरे-धीरे वही बहाना खींचकर मेरे पास ला रहा था….मुझे म्यूजिक का शौक भी उदय प्रकाश जी के कारण हुआ…जब इन्होंने स्टेज शो के लिए छत्तीसगढ़ी गाने सिखाए….उनका वह शादी के लिए प्रस्ताव देना और मेरा उन्हें केवल मित्र के रूप में स्वीकार करना उन्हें अखर गया और वे गांव चले गए…. उदय प्रकाश के गांव जाने पर पहली बार मुझे खालीपन लगा….मैंन छोटा सा शंख उन्हें पोस्ट किया…पता नहीं उसका उदय प्रकाश पर क्या असर हुआ….पर वह जब गांव से लौटकर आए तो धीरे-धीरे मेरा साहस भी बढ़ा….

बात विवाह तक पहुंची….चूंकि हम तीनों यानी मेरे पापा श्री भटनागर, स्वयं उदय प्रकाश और मैं उन दिनों जेएनयू(जवाहर लाल यूनिवर्सिटी) में ही थे….इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छुपते…मित्रों और शत्रुओं की तादाद बढ़ती गई…मेरे विवाह को लेकर पापा के मन में तीन तरह का डर मौजूद था…क्योंकि इधर उधर से फिजाओं में उदय प्रकाश से जोड़कर मेरी बातें हो रही थीं…पापा आधुनिक विचारों के थे… उदय प्रकाश जी को पसंद भी करते थे….पर व्यक्तिगत तौर पर उनके विषय में बहुत कुछ नहीं जानते थे….पहली चिंता जाति को लेकर थी, जिसे वे जीवन भर नकारते रहे…और कहते थे मैं कोई ऑर्थोडॉक्स नहीं…मुझे कास्ट की कोई परवाह नहीं…पर यह मेरे घर से ही क्यों शुरू हो…दूसरी वाजिब चिंता थी लड़का अभी कुछ करता ही नहीं….यानी लोगों की कहासुनी से यह साफ था कि क्या खिलाएगा, कैसे रखेगा…..और तीसरी चिंता यह भी थी कि कहीं गांव में ही इसका विवाह न हो गया हो….क्योंकि कानूनी पहले विवाह को ही स्वीकारोक्ति देता है….

सम्बन्धों को लेकर उदय प्रकाश जी हमेशा पारदर्शी रहे...प्रेम विवाह को सफल करने का बीड़ा उठा चुके थे….सो कोर्ट मैरिज की तारीख निकलवाई….चूंकि कानून का यह नियम होता है—एक महीने का समय तिथि से पहले दिया जाता है…हमारे निकटतम मित्रों में से किसी ने पापा को जाकर यह बात कह दी….और तिथि उनके दिमाग में कौंधती रही….अब याद आता है तो हंसी आती है…कोर्ट मैरिज के दिन परिवार के सभी लोग सतर्क बैठे थे…मुझे जेएनयू भी जाने नहीं दिया गया… उदय प्रकाश जी अपने कुछ दोस्तों को लेकर रजिस्ट्रार ऑफिस पहुंच चुके थे….यहां मुझपर गहरा पहरा था…उस समय न मोबाइल न लैंडलाइन…पड़ोसी के घर जाने की भी इजाजत नहीं थी…तभी किसी फिल्मी पटकथा की तरह मेरी एक मित्र को उदय प्रकाश जी ने मेरे घर भेजा….उसके हाथ में एक किताब थी…किताब में चिंता वाला एक पत्र…कहां हो कबतक आओगी, हम सब वेट कर रहे हैं….मुझे अच्छे से याद है मेरी सहेली से मुझे मिलने भी नहीं दिया गया….मेरे मामा मामी घर पहुंच चुके थे…मेरे विवाह में उन लोगों की अहम भूमिका थी….उन्हीं दिनों उदय प्रकाश से जुड़े मेरे हाथ के लिखे पन्ने घर में मिले, उन्हें बड़ी संजीदगी से पढ़ा गया और मेरे परिवार ने तब समझा कि इधर भी मामला गंभीर है…मेरे दोनों मामा उदय प्रकाश जी से मिलने गए…जब लौट कर आए तो पापा को यह कहकर समझाया कि आंख मूंदकर सम्बन्ध बना लीजिए….अपनी कास्ट में ऐसा लड़का ढूंढने से भी नहीं मिलेगा….चूंकि यूनिवर्सिटी पंद्रह जुलाई से खुलती है इसलिए हम तीनों ने यह विचार बनाया कि नौ जुलाई को विवाह फिक्स हो जाए….ताकि भीड़ से बचा जा सके… उदय प्रकाश जी से जब परिवार ने पूछा—बारात की तरफ से कुल कितने लोग आएंगे, तो इन्होंने कहा सात से दस…जबकि विवाह में पूरा जेएनयू शामिल था…पापा का सर्किल उदय प्रकाश का और मेरा….बुलाया कि नहीं बुलाया सब आए…उन दिनों उदय प्रकाश जी इलेक्शन में लड़े थे इसलिए वीसी से लेकर चपरासी तक सब बारात में शामिल थे….

धीरे-धीरे समय गुजरता गया…मैंने घर की समस्याओं को उदय प्रकाश जी से अलग ही रखा…उनकी अतिव्यस्ततम दिनचर्या में एडजस्ट करती रही…उनको कभी घर गृहस्थी से उलझने की टोका टाकी नहीं की….सन 77 में हमारा विवाह हुआ, तब से 2007 तक लगातार मैं अलग-अलग जॉब में रही…क्योंकि मैं खुद को व्यस्त रखना चाहती थी…मैं महत्वाकांक्षी बिलकुल नहीं पर घर परिवार की जरूरतों को ध्यान में रखकर नौकरी करती रही…..एंबेसी में 32 वर्ष तक काम किया….पेरु, मैक्सिको विदेशी भाषाओं का अनुवाद किया, जेएनयू से फ्रेंच की पढ़ाई की…लगभग सोलह वर्ष एनएचपीसी पब्लिक रिलेशन में काम करती रही….इधर उदय प्रकाश लिखने के साथ-साथ फिल्में और डॉक्यूमेंटरी बनाने में लगे रहे….मेरे दो बेटे हैं—सिद्धार्थ और शांतनु…. उदय प्रकाश जी को अपने बच्चों से उम्मीद थी कि वे इस क्रिएटिव टीम में शामिल हो जाएं पर बच्चों को कभी फोर्स नहीं किया…उनकी इसी उम्मीद को ध्यान में रखकर मैंने मैनेजमेंट का सारा कार्यभार संभाल लिया….हालांकि उदय प्रकाश के पास एक बड़ी टीम थी पर मैं जब भी उन्हें अकेला पाती थी उनसे जुड़ी रहना चाहती थी…फिल्में, साहित्य और पब्लिक रिलेशन में मेरी रुचि उदय प्रकाश जी के कारण ही आई…मैं उदय प्रकाश जी को लेकर काफी पजेसिव हूं….बस सबकुछ ठीक चलता रहे, उन्हें उनके किसी काम में डिस्टर्वेंस न हों, इसलिए कभी कोई असंतोष या सवाल नहीं करती….करीब आने वाले लोगों को देखने का जो नजरिया उदय प्रकाश, मैं भी उसी नजर से देखने लगती हूं….

कुमकुम

शुरू में फानेंसियली बहुत सी दिक्कतें रहीं….पर मेरी संतुष्टि इसी में है कि उन्होंने मेरे साथ, सहयोग और साहचर्य को स्वीकारा…मैंने घर में उदय प्रकाश को संभाला है बाहर तो इनके प्रशंसक ही इन्हें संभालते हैं क्योंकि उनकी सारी चाहत, उम्मीद, इच्छा, आकांक्षा सब पाठकों से ही जुड़ी है… उदय प्रकाश जी को जितना समझी हूं उनके लिए उनके पाठक और दोस्त सबसे ज्यादा मायने रखते हैं….मुझे उदय प्रकाश जी के किसी अफेयर से असुरक्षा नहीं लगती….बस वे सुरक्षित रहें, स्वस्थ रहें और आसपास रहें….

मुझे से कई बार पूछा जाता है मुझे इतनी भाषाओं का ज्ञान है..स्पेनिश, पुर्तगीज, इंडोनेशियन, फ्रेंच इन भाषाओं में मैने उदय प्रकाश जी की कहानियों का अनुवाद क्यों नहीं किया….तो मैं हंसकर यही जवाब देती हूं कि क्योंकि उदय प्रकाश ने मुझे खुद नहीं कहा…. उदय प्रकाश में एक जिम्मेदार पति टूटकर प्यार करने वाला पिता, अपने व्यस्ततम दिनचर्या के बावजूद हमारी जरूरतों का ध्यान रखने वाला मुखिया, घर की मांग, पत्नी की मांग, बच्चों की मांग कहने से पहले पूरी हो जाती है…विवाह के एक वर्ष बाद ही इनके गांव परिवार से हमें बुलावा आया….भले ही मेरा जन्म दिल्ली में हुआ हो, पिता जेएनयू में और मां स्कूल में टीचर थीं, पर मुझे ससुराल में जो इज्जत लाड दुलार मिला कि मैं अपनी पहचान मध्य प्रदेश में ही ढूंढती हूं और वहां का कहलाने में फक्र महसूस करती हूं…

उदय प्रकाश जी की लगभग सब कहानियां लिखने के दौरान और लिखने के बाद आधी-अधूरी ही सही चोरी चुपके ही सही, मैंने पढ़ी हैं….पर मुझमें धैर्य और सहनशीलता नहीं क्योंकि इनकी कहानियां बेहद लंबी होती हैं….कई बैठकों में पढ़ने वाली….मुझे इनकी छोटी-छोटी कहानी, जैसे—डिबिया, नेलकटर, अपराध बेहद पसंद है…इसका कारण है, इन कहानियों में अपने परिवार के ही लोग झलकते हैं….परिवार से जुड़ी कहानियों में पिता भाई, बहन मां सभी इनके करीबी चीन्हे पहचाने, सच्ची घटनाओं और सच्चे चरित्रों पर आधारित….इनकी तस्वीरें देखती हूं और कहानी के पात्रों से तारतम्य बनाती हूं तो सम्बन्धों को पहचानने लगती हूं….मैंने उदय प्रकाश के मां-पिता को तो नहीं देखा….क्योंकि वे मेरे आने से पहले ही जा चुके थे…दुर्भाग्यवश दोनों का देहांत कैंसर की बीमारी से हुआ….ना मालूम क्या बात है इनके जितने करीबी लोग हैं उनमें या उनके परिवार में किसी न किसी को कैंसर की बीमारी रही…बाबा, बुआ(दादी) और मां….सबका देहांत कैंसर से ही हुआ….हम समझते हैं मध्य प्रदेश में जो तंबाकू खाने का जो चलन है हो न हो वही कारण हो….

मां के देहांत के बाद ग्यारह वर्ष के उदय प्रकाश अकेले और असुरक्षित शैडोल (मध्य प्रदेश) आकर बस गए….पिता, भाई, बहन सबसे दूर वहां मोहन श्रीवास्तव जी जो एक स्कूल टीचर थे उनकी सहायता और संरक्षण में इन्होंने लिखने पढ़ने का काम आगे बढ़ाया…अपने व्यवहार में जो मैं ये एडजस्टिंग नेचर पाती हूं, शायद इसी कारण क्योंकि वह ग्यारह वर्ष का बालक मां से महरूम, पिता भाई बहनों से दूर जीवन भर प्यार और सुरक्षा की तलाश में रहा….अपने सहयोग और साहचर्य से यह सामंजस्य बिठाने में मैं कहां तक सफल रही यह उदय प्रकाश पर छोड़ती हूं…परिवार में बेटी न होने का अहसास उदय प्रकाश जी को खलता रहा…पर पोती के आ जाने पर वे बेहद खुश हुए….और परिवार भरा पूरा हुआ….

उदय प्रकाश जी से मैं केवल यही पूछना चाहती हूं कि उनकी कहानियों का फलक इतना बड़ा है...विविध रंग रूप के चरित्र पात्र हैं…सभी तरह के सम्बन्धों के शेडस हैं…मां-पिता, भाई-बहन, मित्र-यार परिजन…सबकुछ देखने को मिलते हैं….पर इन कहानियों में पत्नी पर आधारित न विषय बनाकर, न चरित्र के रूप में कोई कहानी देखने को क्यों नहीं मिलती?  भविष्य में उम्मीद करती हूं उदय प्रकाश जी की कलम से और बहुत सी मानवीय संवेदना की गहराईयों को छूती हुई कहानियां निकलेंगी….जिनमें उनकी सहचर्या, सहधर्मिनी पत्नी भी मौजूद होगी.

आपहुदरी का लोकार्पण

हिन्दी की प्रसिद्ध लेखिका रमणिका गुप्ता की आत्मकथा का दूसरा खंड ‘आपहुदरी’ का आज शाम 5.30 बजे साहित्य अकादेमी के सभागार में लोकार्पण किया गया। आत्मकथा का लोकार्पण हिंदी के प्रख्यात आलोचक मैनेजर पांडे और प्रसिद्ध कवि-आलोचक और भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई ने किया। कार्यक्रम का आयोजन रमणिका फाउंडेशन और सामयिक प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए मैनेजर पांडे ने कहा, ” आपहुदरी एक दिलचस्प और दिलकस आत्मकथा है। आत्मकथा में पंजाबी भाषा का भरपूर प्रयोग किया गया है। यह एक स्त्री की आत्मकथा है। इसमें समय का इतिहास दर्ज है। इसमें विभाजन के समय दंगे दर्ज हैं। इसमें बिहार राजनेताओं के चेहरे के असलियत को दिखाती है। इसमें संवादधार्मिता और नाटकीयता दोनों है। इसमें पारदर्शी भाषा का भी प्रयोग किया गया है। यह आत्मकथा इसलिए भी विशिष्ट है कि रमणिका जी ने जैसा जीवन जीया जैसा महसूस किया है वैसा उन्होंने लिखा है। अमूमन जैसा हम सोचते हैं, जैसा महशूस करते है वैसा हम नहीं लिखते। इसमें स्त्री की गुलामी और यातना को बार-बार दर्ज किया गया है। इसमें लगभग हरेक जगह पर सामंतवाद पर चोट हैं। मैनेजर पांडे ने कहा कि मैं रमणिका गुप्ता की तीसरी आत्मकथा का इन्तजार कर रहा हूं जिसमें राजनेताओं के साथ-साथ साहित्यकारों के आचरण की कथा होगी।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर बोलते हुए लीलाधर मंडलोई ने कहा, एक पाठक के तौर पर मैं इस आत्मकथा को एक स्त्री की मुक्ति या आजादी के तौर पर नही देखता। यह स्त्री वैचारिकी भी नहीं है। आत्मकथा में अद्भूत अपूर्व स्मृतियां हैं। इस आत्मकथा के माध्यम से एक जिद्दी लड़की का निर्माण होता है।  रमणिका गुप्ता ने इस आत्मकथा के माध्यम से अपने साहस की कथा कही है। आपहुदरी आत्मकथा के रूप में एक नया मोड़ भी है।

कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए अर्चना वर्मा ने कहा रमना आपबीती के इस बयान में ऐसा है क्या जो मुझ स्तब्ध कर रहा है-नैतिक निर्णयों को को इसका ठेंगा, इसका तथाकथित पारिवारिक पवित्रता के ढकोसलों का उद्दघाटन , इसकी बेबाकबयानी, इसकी निस्संकोच डिरता, सच बोलने का इसका आग्रह और साहस, अपने बचाव-पक्ष के प्रति इसकी लापरवाही, अपनी जिद को आखिरी हद तक ले जाने की हिम्मत, जिद को संकल्प में बदलने का इसका हौसला, निहायत निज अटकावों/भटकावों/विद्रोहों का बृहतर सामाजिक राजनीतिक लक्ष्य में बदलना। लेकिन वह सब आप सीधे ही किताब में पढें .

विशिष्ट वक्ता के तौर पर बोलते हुए प्रसिद्ध पत्रकार अनिल चमडि़या ने कहा ये एक रमणिका गुप्ता की कहानी नहीं बल्कि रोज-ब-रोज कई-कई रमणिकाओं की दांस्तान है। एक ऐसे ढांचे की क्रूरताओं की असलियत है, जिसमें हर तरह की गुलामियत अपना आधार बनाए हुए है। स्त्री जाति की मुक्ति की एक जिद्दी कार्यकर्ता, जितने खुले रूप में जो व्यक्त कर सकती है वो इसमें दर्ज है। हम जो शहरी और मध्यवर्गीय समाज निर्मित कर रहे हैं, उसके नीचे लाशें और चीखे़ं है-ग्रामीण सामंती ढांचे से भी  क्रूर-हर जगह और हर कमरे में एक सामंती चेहरा उग आता है जहां एक लड़की तन्हा दिख जाती है वह भी कई नामों और रिश्तों की याद लेकर किसी संवेदनशील पाठक के लिए ऐसे रूक-रूक कर पढ़ना-पढ़ता है। कहानियों की दासतां विचलित कराती है।

स्त्रीकाल में रमणिका जी की आत्मकथा के अंश पढ़ने  के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें :

1. आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा -पहली किस्त 
2. आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : दूसरी किस्त 
3.आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : तीसरी किस्त 
4.आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : चौथी क़िस्त
5.आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : आख़िरी किस्त 

गीताश्री ने कहा मैं इसे साहसिक आत्मकथा ही कहूंगी , जहां कोई पहरेदारी नहीं है। जैसा जीवन जीया  गया वैसा यहां लिख दिया गाय। कोई पाखंड नहीं। लेखिका ने स्पष्ट स्वीकार है कि असली मुक्ति स्वछंदता में है, स्वतंत्रता तो पाखंड है, नारा है, ओट है। उसमें पारदर्शिता नहीं है। मुक्ति भी सर्शत है।

अजय नावरिया ने कहा भारतीय परिवारों की ये संरचनाएं या प्रशिक्षण केन्द्र स्त्रियों के जीवन को तहस-नहस कर देते हैं। इन प्रशिक्षण केन्द्रों के नियमों और अनुशासन से जो स्त्रियां बगावत कर देती हैं वे आपहुदरी घोषित कर दी जाती हैं। हम ऐसी स्त्रियों को कलंकित करते हैं और सामाजिक स्थितियों को बेदाग और बेगुनाह मानकर छोड़ देते हैं, जो स्थितियां उन्हें ऐसा बनने पर मजबूर करती हैं।

‘आपहुदरी’ की लेखिका रमणिका गुप्ता ने कहा, आपहुदरी मेरे जन्म से लेकर धनबाद तक की कथा है। आपहुदरी की कथा यह है कि स्त्री को स्त्री के रूप में नहीं बल्कि व्यक्ति के रूप में देखा जाए। मुझे जब भी स्त्री बनाने की कोशिश की गई मैंने उसका विरोध किया और मैंने जीवन में जो कुछ भी किया एक स्त्री के रूप मं नहीं बल्कि एक व्यक्ति के रूप में किया। इसीलिए मैं कहना चाहूंगी कि मेरे विरोधियों ने  ही मुझ ताकतवर बनाया।

कार्यक्रम का संचालन विवेक मिश्र ने किया। स्वागत भाषण सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सिसिल खाका (को-आर्डिनेटरः अखिल भारतीय साहित्यिक मंच) ने किया।

प्रस्तुति: पंकज चैधरी

स्त्रीवादी क़ानूनविद ( वकील साहब ) का ट्रायल

स्त्रीवादी क़ानूनविद  और आलोचक अरविंद  जैन से मनीषा कुमारी की बातचीत 

स्त्रीवादी कानून सिद्धांत ( Feminist Jurispudence ) पर हिन्दी में काम का ख्याल कैसे आया . आपके सामने ऐसे किसी काम के उदाहरण थे क्या ? 


मैंने थोड़ी-बहुत हिंदी स्कूल में ही पढ़ी थी. स्कूल-कॉलेज के दिनों (1966-1977) में छात्र आन्दोलन से लेकर आपातकाल तक की तमाम बहसों में शामिल रहा हूँ. बाद में वाणिज्य और कानून का विद्यार्थी रहा, सो हिंदी में लिखना कठिन काम था. शुरुआती दौर से लेख, अंग्रेजी में ही लिखता रहा हूँ. 1978-79 में मेरा एक लेख ‘मेनस्ट्रीम’ में छपा था “डोनेशन टू पार्टी इन पॉवर” और कुछ लेख ‘फाइनेंसियल एक्सप्रेस’ और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं. कुछ एक के अनुवाद हिंदी और अन्य भाषाओँ में भी.

1980-81 के आसपास मैंने हिंदी में भी लिखना शुरू किया. इसलिए कि आम पाठक कानूनी पेचिद्गिओं को अपनी भाषा में जान-समझ सके. कानून-संविधान और अदालती फैसलों की ‘जलेबीनुमा’ भाषा-परिभाषा पढ़ते-समझते हुए, यह अहसास निरंतर गहरा होता चला गया कि ‘कोख से लेकर कब्र’ तक सारे कानून मूलतः “स्त्री विरोधी” हैं…..“दलित विरोधी” हैं. महादेवी, सावित्री बाई फुले, रमाबाई पंडिता, रुकमाबाई, रेगिना गुहा और अन्य महिलाओं की संघर्ष गाथाएं पढ़ते हुए धारणाएँ और ठोस हुई. उन दिन आई फ़िल्मों  ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘भूमिका’ की नायिकाओं ने भी इस दिशा में सोचने-समझने में महत्वपूर्ण दिशा संकेत दिए.

घर-परिवार-समाज में भी स्त्री और विशेष कर दलित स्त्री या बच्चों के प्रति हिंसा, यौन हिंसा, घरेलु हिंसा, हत्या, दहेज़ हत्या, दमन, उत्पीड़न, शोषण, अत्याचार और बर्बरता भी लगातार बढती ही जा रही थी. ‘मथुरा’ बलात्कार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने तो भीतर तक झुलस दिया था. रही सही कसर “सुधा गोयल दहेज़ हत्या काण्ड” से लेकर “रूपकंवर सती काण्ड” तक में अदालती फैसलों ने पूरी कर दी. पुलिस, समाज, संसद, न्यायपालिका और मीडिया की भूमिका अपने नग्नतम और हत्यारे अर्थों में आमने-सामने थी. परिणाम स्वरुप मेरी चिंता या चिंतन, दलित और स्त्री केन्द्रित होती चली गई.

अरविंद जैन

‘औरत होने की सजा’ आपका प्रतिनिधि काम  साबित हुआ और आप टाइप्ड हो जाने की हद तक इस काम से जाने जाते हैं.
समय-समय पर महिलायों और बच्चों सम्बन्धी कानूनों पर लेख लिखता रहा, जो देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए….होते रहे. हाँ! अपने जीवन की तरह ही, इन लेखों को लिखने की भी कोई विशेष ‘योजना’ नहीं थी. आधार सामग्री के रूप में कोई किताब उपलभ्द्ध थी ही नहीं. ईमानदारी से कहूँ तो हिंसा-यौन हिंसा के खिलाफ आये, गुस्से और घृणा का परिणाम हैं ये लेख. संक्षेप में अन्याय, शोषण और दमन के सामने, हैरान-परेशान और असहाय दिल-दिमाग-कलम का कोई ‘संकल्प’ रहा होगा. अब कभी ये लेख पढता हूँ, तो खुद ही विश्वास नहीं होता कि मैंने ही लिखा था…..पता नहीं कब, किसने और क्यों लिख दिया!
अगर कथाकार मित्र अरुण प्रकाश, लेख कांट-छांट कर पांडुलिपि ना बनाते, तो शायद “औरत होने की सजा” (1994) कभी छपती ही नहीं. हाँ! छपने के बाद जब मैंने पुस्तक देखी, तो सचमुच बहुत दिनों तक गहरे अवसाद (खुद से नाराज़ और शर्मिंदा) में रहा कि यह क्या “बकवास-आधा-अधूरा” सा काम छपवा दिया. शायद इस अवसाद से निकलने के चक्कर में ही, “औरत, अस्तित्व और अस्मिता” के लेख लिखे गए होंगे. (हालांकि छपते ही बहुत समीक्षाएं प्रकाशित हुई और हिंदी में एक घटना की तरह लिया गया. बाद में अनेक संस्करण आये और पंजाबी में अनुवाद भी हुई. ‘उत्तराधिकार या पुत्त्राधिकार’ दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. कोर्स में पढाया जाता है और ‘यौन हिंसा और न्याय की भाषा’ कई विश्वविद्यालयों के एम.ए. के छात्रों के लिए संस्तुत हुआ.

दोस्तों, वकीलों और न्यायधीशों की क्या प्रतिक्रिया रही?
यह सब लिखने की वजह से अधिकाँश सम्बन्धियों, दोस्तों, वकीलों और न्यायधीशों की ‘आँख में किरकरी’ या असहमति के विद्रोही स्वर सा ही रडकता रहा हूँ. ‘शीतयुद्ध’ सी उपेक्षा और तिरस्कार ने आहत बहुत किया, मगर शुक्र है कि कभी दिशाभ्रमित नहीं कर पाए. धीरे-धीरे सबसे दूर और इस विचार से मुठभेड़ करते-करते, अकेला रहने की आदत सी हो गई. मुख्यधारा के विरुद्ध जाने पर स्त्री को ही नहीं, पुरुषों को भी एकांत या अज्ञातवास झेलना पड़ता है. कुछ ही मित्र ऐसे हैं, जो ‘वाद’-विवाद-संवाद के माध्यम से मुझे हमेशा, इस दिशा में सोचने-समझने-लिखने की हिम्मत देते रहे. अपने और बकीलसा’ब के बीच, ‘मुक्केबाजी’ (लहूलुहान होने की हद तक) अभी भी होती ही रहती है.

आपकी किताब लिखने के समय से अब तक क्या न्यायपालिका की भाषा और मानसिकता बदली है ? ऐसा मैं  इसलिए पूछ रहा हूं कि लोकतंत्र के लगातार मजबूत होने से फर्क पडा हो शायद ?
साफ़ बात तो यह है कि ज्यादातर न्यायमूर्ति या न्यायधीश, हिंदी की किताबें पढ़ते ही नहीं. जो पढ़ते भी हैं, उनकी अपनी सोच-समझ की सीमायें हैं. भाषा थोड़ी जरूर बदली है, पर भाव अभी भी परम्परा के इर्द-गिर्द वहीं-कहीं घूम-घुमा रहा है. इस शिक्षित-शहरी और साधन संपन्न ‘वर्ग विशेष’ की मानसिक बनावट-बुनावट में, बदलाव आने-होने में अभी और समय लगेगा. कहना कठिन है, कितना समय और लग सकता है. इस ‘वर्ग विशेष’ में ‘स्त्री’ और ‘दलित’ के प्रवेश पर ही इतने प्रतिबंध हैं, कि बराबरी का रिश्ता-सम्बन्ध या संवाद संभव नहीं. भीतर कितनी ‘दमघोटू घुटन’ और ‘वर्ग घृणा’ है, वही जानते-महसूसते हैं- जो भीतर तक पहुंचे हैं. अनुमान लगाया जा सकता है कि स्थितियों-परिस्थितियों ने किस कद्र, आत्मा तक पर खामोशी के ताले जड़ रखे हैं.

 न्यायापालिका अपने समय में तय कानूनों से चलती है , उससे किसी ऐक्टिविजम से तो दूर ही रहना पडेगा न , मेरा कहने का आशय है कि यदि संसद किसी सुधार के लिए तैयार नहीं है और न्यायपालिका की चेतना संसद की गति से अधिक आधुनिक होती जाती है , किसी उत्पीडित अस्मिता के प्रति टकराव ही तो बढेगा ? 
मेरा स्पष्ट तौर पर मानना है कि मौजूदा समाज व्यवस्था में किसी भी “सुधार” का सपना या कल्पना, मौजूदा ढाँचे (पितृसत्तात्मक, सामन्ती और पूंजीवादी) में ही ‘फेर-बदल’ तक सीमित हो सकती है. कोई आमूल-चूल परिवर्तन तो होने से रहा. हाँ! कभी-कभार, उदारवादी-सुधारवादी मेक-अप (‘कॉस्मेटिक सर्जरी’/‘विंडो ड्रेसिंग’) होता रहता है. ‘न्यायिक सक्रियता’ के दौर में ‘सफाई अभियान’ के अंतर्गत, विवादस्पद विषयों पर ‘राष्ट्रीय बहस’ की ‘नाटक-नौटंकी’ करवाना भी विवशता है. वर्ग-हितों की रक्षा-सुरक्षा करते हुए, दोनों ही अपनी-अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ खूब अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं.

‘न्यायपालिका की चेतना संसद की गति से अधिक आधुनिक’ हो भी जाये तो क्या? किसी भी ‘तनाव-दबाव’ में, संसद को विवश तो नहीं ही किया जा सकता. आखिर, ‘सत्ता’ का स्थाई निवास तो संसद ही है और निसंदेह ‘अंतिम शब्द’ की घोषणा भी वहीँ से होगी. न्यायपालिका सुनाती रहे ‘आदेश-उपदेश’, संसद रातों-रात ‘अध्यादेश’ जारी कर सकती है.  ‘उत्पीडित अस्मिता के प्रति’ अभी तक, ना कभी कोई टकराव हुआ है और ना निकट भविष्य में होने की कोई ‘सम्भावना’ नज़र आ रही है.

मनीषा कुमारी

‘औरत होने की सजा’ आपका प्रतिनिधि काम  साबित हुआ और आप टाइप्ड हो जाने की हद तक इस काम से जाने जाने लगे, जबकि उससे कम मह्त्वपूर्ण आपके द्वारा हिन्दी साहित्य की गई समाज शास्त्रीय आलोचना नहीं थी, “औरत: अस्तित्व और अस्मिता” भी हिन्दी मे पह्ले  मुक्कमल स्त्रीवादी आलोचनाओं मे से एक है, लेकिन आपका यह काम उतना ख्यात नहीं हो सका. क्या हिन्दी आलोचना इसके लिए तैयार नही थी , आपको बाहरी मानती रही  या उसके तय मापदंड से आप बाहर थे ? 
शायद मैं ‘पुरुष’ होने के कारण भी ‘बाहरी व्यक्ति’ था और किसी विश्वविद्यालय का ‘प्रोफेसर’ ना होने कि वजह से भी. आलोचना का क्षेत्र, मेरे लिए पूर्ण रूप से ‘वर्जित क्षेत्र’ था. यह काम करते समय या कभी बाद में, मेरी मंशा ‘आलोचना क्षेत्र’ में, किसी भी तरह प्रवेश पाने या ख्याति जुटाने की थी ही नहीं. मुझे एक पाठक की हैसियत से पढने-समझने या टिप्पणी करने के अधिकार से तो वंचित नहीं ही किया सकता. सो मैंने, उतना ही किया.
निश्चित रूप से कुछ सिद्ध-प्रसिद्ध-वृद्ध संपादकों, बौद्धिकों, धनाड्य लेखिकाओं और स्थापित मठाधीशों ने, इसे अपनी ‘घोर अवमानना’ माना-समझा. मगर मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि मेरी जिज्ञाषा, सिर्फ और सिर्फ महिला-पुरुष रचनाकारों कि कलम के माध्यम से, साहित्य में स्त्री और दलित या वंचित समाज को देखना-समझना भर था.

पढ़ा-सुना था कि ‘साहित्य समाज का दर्पण’ होता है. बिना पढ़े कैसे पता लगता कि साहित्य के दर्पण में, समाज की सदियों पुरानी तस्वीरें- ‘उलटी-कुलटी’ क्यों दिखती हैं……दिख रही हैं. तरह तरह के मोतियाबिंदों से पीड़ित बौद्धिकों को, दलित/स्त्री की पीड़ा ‘प्रामाणिक’ और विचारणीय क्यों नहीं लग रही. ‘बचपन से बलात्कार’ की चीखों की बजाय, सम्भोग के कामोतेज़क ‘बेडरूम सीन’ ही क्यों दिखाई दे रहे हैं. बेशक, निरंतर बदलते समय और समाज में, अगर दशकों पूर्व ‘तय मापदंड’ नहीं बदलते, तो इतिहास के कूड़ेदान में फैंक दिए जाते हैं.

आपके द्वारा की गई आलोचनायें , एक समय  में रची गई  साहित्यिक कृतियों का तत्कालीन समय के सापेक्ष मूल्यांकन करती हैं , ऐसा करते हुए कई बार आप प्रेस्कृटिव हो जाते हैं. यद्यपि महिला रचनाकारों की कृतियों का स्त्रीवाद के पैमाने पर की गई वे बेहतरीन आलोचनायें हैं. 
क्षमा करें, मैं इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा.

आप तो अपनी आलोचना में रचनाकारों को बाजब्ता कानून का ज्ञान देने लगते हैं , तो क्या लेखक को कानून की किताबें पढकर लिखना होगा ? हालांकि जिन सवालों को ये रचनाकार अपने लिए विषय बना रही थीं , महिला आन्दोलन उन्हीं सवालों के साथ स्थापित कानून से टकरा रहा था , यानी इन रचनाकारों को तो कानून का ज्ञान होना ही चाहिए था. क्या यह समाज से रचनाकारों के कटे होने का परिणाम है ? 
“रचनाकारों को बाजब्ता कानून का ज्ञान” नहीं, बल्कि पाठकों को सामान्य कानून की जानकारी देने का ‘दुस्साहस’ अवश्य किया. कानून की जानकारी के बिना, कानूनी समस्याओं पर लिखना क्या जरूरी है? आपके सवाल में ही, जवाब मौजूद है….खैर, अखबारी कतरनों के आधार पर, अपने सजे-धजे ‘ड्राइंग रूम’ में बैठ कर किसी अर्थपूर्ण ‘रचना’ को जन्म नहीं दिया जा सकता. समाज से संवाद, लगाव और गहरे सरोकारों के बिना, साहित्य की ‘बंजर जमीन’ पर गुलाब की खेती नामुमकिन है. प्रायोजित लोकार्पणों, समीक्षाओं और सिफारिशों के आधार पर, सरकारी या गैर-सरकारी पुरुस्कार, सम्मान, अवार्ड तो बटोरे जा सकते हैं, लेकिन सच मानिए ऐसी किताबें का ‘प्रथम संस्करण’ भी प्रकाशक के गोदाम में पड़ा-पड़ा सड़ जाता है. इन तमाम स्त्री रचनाकारों ने अपने समय और समाज की स्त्री की व्यथा-कथा को, सार्थक अभिव्यक्ति देने का जोखिम उठाया गया है. शेष-अशेष तो भविष्य का पाठक तय करेगा, आलोचक नहीं. आलोचना को हमेशा  ससम्मान असहमति ही माना-समझा जाना चाहिए, बशर्ते कि वो ‘व्यक्तिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह’ से ना लिखे गए हों.

आपको नहीं लगता कि ये जिस समय की रचनायें हैं, उसके परिवेश के अंतरद्व्न्द्व इनमें व्यक्त होते हैं , क्योंकि ये लेखिकायें खुद अपने पुराने परिवेश से जुडकर बदली स्त्री की कथा कह रही थीं ? 
ऐसा ना होता तो मैं इन पर अपना समय, श्रम और पूँजी क्यों लगाता. सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिवेश के अन्तर्द्वन्द और विसंगतियों के बिना, किसी भी समाज या  समय की स्त्री को रेखांकित करना संभव नहीं.
मैंने ‘बेघर’ पर उपन्यास छपने के २५ साल बाद लिखा था और ममता कालिया जी से कभी नहीं मिला था. बाद में यह लेख ममता जी ने ‘बेघर’ की ‘भूमिका’ के तौर पर इस्तेमाल किया. मेरे लिए यह, दुनिया का सबसे बड़ा ‘सम्मान’ है. परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि अधिकांश लेखकों को, आलोचना के नाम पर सिर्फ तारीफ़ चाहिए…तारीफ़. बहुत से ‘महान’ तो अब, मुझसे इतने नाराज़ हैं कि क्या कहूँ!

यह पुरानी पीढ़ी का ही अमूल्य योगदान है, कि पिछले कुछ सालों में साहित्य में भारतीय स्त्री/दलित की स्थिति, छवि, अवधारणा, स्वप्न, आकांक्षाएं, विचार और अभिव्यक्ति के तेवर, काफी हद तक सकारात्मक रूप में बदले हैं….बदल रहे हैं….बदलेंगे.
मेरा मानना है कि किसी भी पसंदीदा रचना के लेखक से, कभी नहीं मिलना चाहिए और रचना का मूल्यांकन, रचनाकार के नैतिक-अनैतिक जीवन से प्रभावित नहीं होना चाहिए.

 कुछ व्यक्तिगत सवाल , जिसके मायने सामाजिक हैं, आपने ‘हंस’ क्यों छोडा ? आप क्या हिन्दी पट्टी में स्त्री और दलित के प्रति सम्वेदनशीता पैदा करने में ‘हंस’ की भूमिका नहीं देखते हैं. 
इस ‘व्यक्तिगत सवाल’ का जवाब मैं जरूर देता, अगर यादव जी हमारे बीच होते. फिर भी इतना ही कह सकता हूँ कि ‘हंस’ छोड़ने का कारण ‘व्यक्तिगत’ नहीं, बल्कि स्त्री-विमर्श को देह-विमर्श की ओर धकेलने पर गंभीर सैधान्तिक मतभेद ही थे.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शुरुआती दौर में ‘हंस’ ने, ‘स्त्री’ और ‘दलित’ विषय पर बेहद उल्लेखनीय बहस को उद्वेलित किया. लेकिन बाद में (विशेषकर ‘हासिल’ काण्ड और ‘होना-सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ प्रकरण) पूर्ण रूप से ‘दिशाभ्रमित’ भी किया.
अफ़सोस कि एक अच्छा-ख़ासा ‘आन्दोलन’ जिसमें समाज की वैचारिक दिशा-दशा’ बदलने की ‘संभावनाएं’ थी, कुछ विचारहीन अति-उत्साही, मदहोश महत्वाकांक्षी और ‘लम्पट क्रन्तिकारी’ स्त्रियों-पुरुषों के व्यक्तिगत स्वार्थों की वजह से, बेहद अराजक और यौन-हिंसक भीड़ में बदल गया.
असहाय ‘नायक’ समय रहते समुचित ‘निर्णय’ नहीं ले पाने के कारण, अपराधबोध और कुंठाओं के अंतहीन अँधेरे में विलीन हो गया. उसी दौरान मैंने ‘सावधान- आगे खतरा है’ भांपते हुए लिखा था “डार्क रूम में बंद आदमी की निगाह में औरत” (‘उदभावना’, जनवरी,2005).
शायद ‘यहाँ तक’ पहुँचने के बाद ‘राजन’ ने, किसी की भी बात सुनना बंद कर दिया था.

क्या लिख रहे हैं आज कल, या आपने अपना सर्वोत्त्म दे दिया है ?
अभी उल्लेखनीय कुछ नहीं….मगर ‘अनलिखे’ को लिखने की, चिंतन-प्रक्रिया में अवश्य हूँ.   मेरे लिए लिखना, रोज़ किसी समुद्र किनारे रेत का नया घरोंदा बनाने जैसा है. ‘निर्णायक फैसले’ की आशा और उम्मीद में, बकीलसा’ब रोज़ एक बरसों पुराने मुकदमें में, सुबह से शाम तक अंत-हीन बहस करते रहते हैं. असलियत तो यह है कि मेरे पास देने के लिए, कुछ भी (सर्वोत्तम, विशेष या असाधारण) था ही नहीं. अपने समय और समाज में, असहमति या विरोध का ‘एक स्वर’ या ‘प्रयास’ कह सकते हैं. अक्सर कहता हूँ ‘जो लिखा व्यर्थ था, जो नहीं लिखा अनर्थ है’. फिर भी, ‘भविष्य की स्त्री’ से संवाद जारी है…..रहेगा.

अब तक जिए जीवन के बारे में कैसा लगता है?
स्कूल-कॉलेज के दिनों में भाषण या वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में बोलने की तैयारी के लिए, रात को मैं अक्सर घर के पास बने सुनसान स्टेडियम में चला जाता था. स्टेडियम में चारों तरफ घुप्प अँधेरा और सन्नाटा होता था. स्टेडियम में बनी स्टेज पर खड़ा हो कर, बोलने का अभ्यास करता था. एक-दो-तीन बार….कभी-कभी दस बार.
लगता है कि मैं आज भी उसी स्टेडियम की स्टेज पर खड़ा होकर, बोलने की कोशिश कर रहा हूँ…..रोज़ कर रहा हूँ. अदालत में हूँ या किसी स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय के हॉल में……हाँ! इतना अंतर जरूर आया है कि ‘घुप्प अँधेरे’ की जगह, आँखे चुन्धयाति रौशनी है और ‘सन्नाटे’ की जगह ‘बेहद शोर’. स्टेडियम तब एकदम सुनसान होता था, अब दर्शकों-श्रोताओं-प्रति-द्वंदियों और ‘न्यायमूर्तियों’ से भरा है. तब बोल-बाल कर चुपचाप घर लौट आता था, अब बोलना बंद करता हूँ तो हाल, कभी तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगता है और कभी पीठ पर घातक तीरों की बौछार होने लगती है. बिना किसी किन्तु….परन्तु…..लेकिन….गिले-शिकवे या शिकायत के…….मैं अभी भी उसी सुनसान स्टेडियम के घुप्प अँधेरे और सन्नाटे में, बोलने-जीने की जिद्दो-ज़हद कर रहा हूँ. मैं अपनी कडूआहट के लिए ‘क्षमाप्रार्थी’ हूँ, मगर भावी नस्लों के लिए बेहद खुशहाल और इंसाफ़-पसंद घर-परिवार-समाज-देश और दुनिया की मंगल कामना करता हूँ.

सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि महिलाएं दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ कर रही हैं. आप क्या सोचते हैं.शायद आपका संकेत 2 जुलाई, 2014 को सर्वोच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद और पिनाकी चन्द्र घोष की खंड पीठ) द्वारा अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य  ( क्लिक करे) के मामले में सुनाये फैसले की तरफ है. मीडिया इसे “दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ रोकने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था” मानता है. मेरा मानना है कि दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून की मूल विडंबना है कि यह स्त्रियों को सुरक्षा कम देता है, आतंकित और भयभीत ज्यादा करता है. आज तक .सका लाभ, वास्तविक पीड़िताओं को कम ही मिल पाया है ईमानदारी से कहूँ तो साफ़ तौर पर कारण यह है कि कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं है, दहेज़ हत्या ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं, दहेज़ उत्पीड़न ‘मृत्यु से ठीक पहले’ होना सिद्ध करो और अब दहेज़ अपराधियों की गिरफ्तारी पर भी रोक या अंकुश. नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर घंटे एक महिला दहेज हत्या का शिकार हो रही है लेकिन दहेज प्रताड़ना के अधिकाँश मामले तो दर्ज ही नहीं होते. कानूनी जाल-जंजाल या समाज में बदनामी के भय से, उत्पीड़ित महिलाएं सामने नहीं आतीं और घुट-घुटकर जीती-मरती रहती हैं. इस सब के बावजूद देश की सब से बड़ी अदालत का कहना है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ ढाल की बजाय, हथियार के तरह कर रही हैं. सच यह है कि इस देश में बहुत से कानून हैं, मगर महिलाओं के लिए कोई कानून नहीं है और जो हैं वो अंततः स्त्री विरोधी हैं.

दहेज अपराधों में सजा की दर बेहद कम है. क्या कारण हो सकता है?हम क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि दहेज अपराध में सजा की दर इसलिए भी बेहद कम है कि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होते हैं, जिनके पर्याप्त सबूत नहीं होते या हो नहीं सकते. कौन देगा ‘बहू’ के पक्ष में गवाही? ऊपर से कानून में इतने गहरे गढ्ढे हैं, कानून के रखवाले भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं, साधन-संपन वर्ग में दहेज के चलन का पहले से अधिक बढ़ा है. कानून ऊपरी तौर पर बेहद ‘प्रगतिशील’ दिखते हैं, पर दरअसल बेजान और ‘नख-दन्त विहीन’ हैं. इस संदर्भ में मैंने विस्तार से एक लेख स्त्री-काल के लिए लिखा था-“न्यायपालिका में दहेज़ का नासूर”

क्या आप मह्सूस करते हैं कि बलात्कार के लिए, भारतीय समाज की संस्कृति ही तर्क और संरक्षण मुहैय्या कराती है?यह जान कर आश्चर्यजनक लगेगा आपको कि २०१४ के मौजूदा कानून के अनुसार भी विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए मगर 18 से कम होने पर भी विवाह “गैरकानूनी” नहीं माना-समझा जाता और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अनुसार ‘सहमती की उम्र’ 18 साल है पर इसी कानून के अपवाद अनुसार “15 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध, किसी भी स्थिति में बलात्कार नहीं है”। क्यों?
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 1860 में सहमती की उम्र सिर्फ 10 साल थी जो 1891 में 12 साल, 1925 में 14 साल और 1949 में 16 साल की गई थी। 1949 के बाद इस पर, कभी कोई विचार ही नहीं किया गया। अध्यादेश (3.2.2013) और बाद में नए अधिनियम (२०१३) में इसे 16 से बढ़ा कर 18 किया गया।
वर्तमान कानून के अनुसार विवाह का लिए लड़के की उम्र २१ साल और लड़की की उम्र १८ साल होनी चाहिए पर यदि कोई १८ साल से कम उम्र का लड़का,१८ साल से कम उम्र कि लड़की से विवाह करे, तो ना कोई कानूनी जुर्म है और ना कोई सजा. १८ साल से कम उम्र की लड़की से विवाह दंडनीय अपराध है और सहमती की उम्र भी १८ साल है, मगर १५ साल से बड़ी उम्र की अपनी पत्नी से जबरदस्ती यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं.

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (संयुक्त राष्ट्र) की एक रिपोर्ट के अनुसार “दुनिया की ९८ प्रतिशत पूँजी पर पुरुषों का कब्जा है. पुरुषों के बराबर आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पाने में औरतों को अभी हज़ार वर्ष और लगेंगे.” पितृसत्तात्मक समाजों के अब तक यह पूँजी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों को पुत्राधिकार में मिलती रही है, आगे भी मिलती रहेगी. आश्चर्यजनक है कि श्रम के अतिरिक्त मूल्य को ही पूँजी माना जाता है, मगर श्रम की परिभाषा मे घरेलू श्रम या कृषि श्रम शामिल नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप आधी दुनिया के श्रम का अतिरिक्त मूल्य यानी पूँजी को बिना हिसाब-किताब के ही परिवार का मुखिया या पुरुष हड़प कर जाते हैं.
सारी दुनिया की धरती और (स्त्री) देह यानी उत्पादन और उत्पत्ति के सभी साधनों पर पुरुषों का     ’सर्वाधिकार सुरक्षि” है. उत्पादन के साधनों पर कब्जे के लिये उत्तराधिकार कानून और उत्पत्ति यानी स्त्री देह पर स्वामित्व के लिये विवाह संस्था की स्थापना (षड्‌यन्त्र) बहुत सोच-समझकर की गयी है.

दरअसल भारतीय विधि-व्यवस्था में भी उत्तराधिकार के लिए वैध संतान और वैध संतान के लिए वैध विवाह होना अनिवार्य है. न्याय की नज़र में, वैध संतान सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की होती है. वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (माँ) होती है। विवाह संस्था की स्थापना से बाहर पैदा हुए बच्चे ‘नाजायज’, ‘अवैध’, ‘हरामी’ और ‘बास्टर्ड’ कहे-माने जाते हैं. इसलिए पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते. हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे. ‘वैध-अवैध’ बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विश्व-भर में ‘विवाह संस्था’ को, अभी तक बनाए-बचाए हुए है.

वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए यौन-शुचिता, पवित्रता, सतीत्व, नैतिकता, मर्यादा और इसके लिए स्त्री देह पर ‘पूर्ण स्वामित्व’ तथा नियंत्रण बनाए रखना पुरुष का ‘परम धर्म’ घोषित किया गया है. मतलब जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध है या गैरकानूनी है, वो स्त्री का. जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसा ही है हमारा कानून। ईमानदारी से बोलूँ तो मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है.

आपने तो न्यायालयों की भाषा पर भी काम किया है, क्या न्यायलयों की मर्द्वादी भाषा इसी संस्कृति से पोषित नहीं है?
उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से पूँजी और पूँजी के आधार पर राजसत्ता, संसद, समाज, सम्पत्ति, शिक्षा और क़ानून-व्यवस्था- सब पर मर्दों का कब्जा है. नियम, कायदे-क़ानून, परम्परा, नैतिकता-आदर्श और न्याय सिद्धांत- सब पुरुषों ने ही बनाए हैं और वे ही उन्हें समय-समय पर परिभाषित और परिवर्तित करते रहते हैं. हमेशा अपने वर्ग-हितों की रक्षा करते हुए. ‘भ्रूण हत्या’ से लेकर ‘सती’ बनाए जाने तक, प्रायः सभी क़ानून, महिला कल्याण के नाम पर सिर्फ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेकअप’ ही दिखाई देता है. मौजूदा विधान-संविधान-क़ानून महिलाओं को कानूनी सुरक्षा कम देते हैं, आतंकित, भयभीत और पीड़ित अधिक करते हैं. निःसंदेह औरत को उत्पीडित करने की सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया में पूँजीवादी समाज क़ानून को हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है. इसलिए ‘लॉ’ का असली अर्थ ही है-‘लॉ अगेंस्ट वूमैन’. समता की परिभाषा (बकौल सुप्रीम कोर्ट) है- सामान लोगों में समानता.
नारी सम्बन्धी अधिकांश फैसलों के लिए आधारभूमि तो धर्मशास्त्र ही हैं जो मर्दों के लिए ‘अफीम’ मगर औरतों के लिए ज़हर से भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुए हैं. तमाम न्यायाशास्त्रों के सिद्धांत पुरुष हितों को ही ध्यान में रखकर गढ़े-गढ़ाए गए हैं. मथुरा से लेकर भंवरी बाई और सुधा गोयल से लेकर रूप कंवर सती कांड तक की न्याय- यात्रा में हजारों-हजार ऐसे मुकदमे, आंकड़े, तर्क-कुतर्क, जाल-जंजाल और सुलगते सवाल समाज के सामने आज भी मुंह बाए खड़े हैं। अन्याय, शोषण और हिंसा की शिकार स्त्रियों के लिए घर-परिवार की दहलीज से अदालत के दरवाजे के बीच बहुत लम्बी-चौड़ी गहरी खाई है, जिसे पार कर पाना बेहद दुसाध्य काम है। न्यायलयों की मर्द्वादी भाषा इसी महान सभ्यता और संस्कृति की दें है.

कानून की भाषा ही नहीं, परिभाषा भी घोर ‘मर्दवादी’ और पुरुष हितों को पोषित करने वाली लगती है. “औरत होने की सजा” के “यौन हिंसा और न्याय की भाषा” नामक लेख में, मैंने इस पर विस्तार से चर्चा की है. कानूनी भाषा ही नहीं, व्यवहार में भी पुरुष वर्चस्व साफ़ झलकता है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीशों पर यौन शोषण के आरोप, वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर यौन शोषण-उत्पीड़न के आरोप और आए दिन महिला अधिवक्ताओं के साथ होने वाले यौन शोषण-अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद, समाज-मीडिया-न्यायपालिका की रहस्यमयी ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या यह सब होने-देखने के लिए ही औरतें अभिशप्त हैं? आखिर कब तक? दूर-दूर तक विरोध-प्रतिरोध  या प्रतिशोध की चिंगारी तक दिखाई नहीं दे रही. संभावनाओं का गर्भ में ही, गला घोंटा जा रहा है.  अक्सर महसूस होता है कि औरतों को अपनी आत्मरक्षा के लिए, कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल हथियारों की तरह और हथियारों का इस्तेमाल कानूनी अधिकारों की तरह करना होगा.

बलात्कार के खिलाफ मानस बनाने के लिए जहां समाज, न्यायालय और संस्कृति के प्लेटफार्म पर काम करने की जरूरत है, वहीं क्या आप यह देखते हैं कि परिवार न सिर्फ इसके लिए अपने ‘पवित्र डोमेन’ में तर्क बनाता है, बल्कि बलात्कारियों को सांस्कृतिक संरक्षण भी देता है? विवाह के भीतर बलात्कार के लिए क्या यही संस्कृति और परिवार का ‘पवित्र डोमेन’ जिम्मेवार नहीं है?
इन दोनों सवालों के जवाब में सच कहूँ तो भारतीय समाज दोहरी चरित्र(हीन) नैतिकता में जीने वाला समाज है. भारत में वैवाहिक पार्टनर के बीच यौन संबंध ही ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’. हालांकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है. विवाह-पूर्व वयस्क स्त्री-पुरुष द्वारा सहमति से यौन संबंध (या परस्पर सहवास) ‘अनैतिक’ माने-समझे जाते हैं मगर कोई कानूनन अपराध नहीं.
बाल विवाह की ‘सामजिक कुप्रथा’ अभी भी जिन्दा है. समाज ही नहीं, बाकायदा कानून-विधि-विधान में फल-फूल रही है. भारतीय कानून-विधान-संविधान पत्नी से ‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस या अधिकार’ और समाज ‘बलात्कार की संस्कृति’ को बढ़ावा देता है. स्त्री देह शोषण के लिए विवाह और वेश्यावृति की जड़ें तो भारतीय समाज की महान सभ्यता और संस्कृति का स्वर्णिम अध्याय कहा जाता है. विवाह संस्था में स्त्री, पति की निजी संपत्ति है और वेश्यावृति के प्राचीनतम धंधे में स्त्री. सार्वजनिक संपत्ति. देवदासी से लेकर आधुनिकतम ‘एस्कॉर्ट्स’ तक, मर्दों का ‘आनंद बाज़ार’ ही नहीं ‘व्यवसाय भी है.  हालांकि वेश्या या ‘काल-गर्ल’ से यौन सम्बन्ध बनाना, भले ही ‘अनैतिक’ बताया जाता है मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं. पकड़ी गई तो वेश्या को ही जेल जाना होगा.
ऐसे आधे-अधूरे और गड्ढे भरे कानूनों से ना तो ‘बाल विवाह’, ‘बाल तस्करी’, ‘बाल वेश्यव्रती’ को रोका जा सकता है और ना ही स्त्री विरोधी हिंसा-यौन हिंसा को. वैधानिक प्रावधानों में अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण ‘सुधारवादी मेकअप’ से, स्त्री के विरुद्ध हिंसा-यौन हिंसा, कम होने की बजाये बढ़ी है, बढती रही है और बढती रहेगी।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में अतिथि के द्वारा पत्नी की कामना करने पर उसे अतिथि को पेश करना स्वर्ग के लिए जरूरी बताया गया, क्या ऐसे तर्क मानस का निर्माण नहीं करते हैं, विवाह के भीतर बलात्कार के लिए.
प्राचीन भारत से लेकर अब तक, पति के लिए पत्नी उसकी अपनी ‘निजी संपत्ति’ है, जिसे वह अपने हितों को पूरा करने के लिए ‘उपयोग-दुरूपयोग’ की इज़ाज़त दे सकता है. वैवाहिक जीवन में बलात्कार की छूट के कारण भारतीय शादीशुदा महिलाओं की स्थिति ‘सेक्सवर्कर’ और घरेलू दासियों से भी बदतर है। ‘सेक्स वर्कर’ को ना कहने का अधिकार तो है , शादीशुदामहिला को वो भी नहीं है।अपने लाभ या राज्य-विस्तार के लिए, साधन-संपन्न अतिथि को पत्नी पेश करने से लेकर अपनी बेटियों के डोले तक भेजे जाते रहे हैं. काशीनाथ विश्वनाथ राजवाड़े ने “भारत में विवाह संस्था का इतिहास” में प्रामाणिक दस्तावेज सहित विस्तार से विवेचना की है. स्त्री देह को पाने-हथियाने और बलात्कार करने के, सैंकड़ों उदाहरण हिन्दू धर्मशास्त्रों और मिथकों में मौजूद हैं. जब घर में स्त्री देह का जबरन भोग-उपभोग, हिंसा-यौन हिंसा या उत्पीड़न मान्य है, तो घर से बाहर भी अधिकार मानने- समझने की ‘मानसिकता’ भी स्वाभाविक रूप से बनेगी ही. क्या कागजी विकल्प, मौलिक अधिकारों की बराबरी कर सकते हैं ? परंपरा , संस्कृति , संस्कार , रीति – रिवाजों और रूढि़वादियों व धर्मशास्त्रियों द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर वैवाहिक बलात्कार को जायज नहीं ठहराया जा सकता। कोई भी ‘असली धर्म’ इसका समर्थन नहीं करता परन्तु धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने सब ‘धर्मभ्रष्ट’ किया हुआ है.

‘व्यभिचार’ का कानून भी तो विबाह के भीतर पति की इच्छा से दूसरे पुरुष के साथ यौन संबंध का तर्क देता है, यानी एक हद तक बलात्कार के लिए स्पेस बनाता है?
व्यभिचार’ (धारा-497 आई.पी.सी.) सम्बन्धी कानून के अनुसार पुरुष (भले ही विवाहित हो) किसी भी अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा स्त्री (स्त्रियों) के साथ सहमती से यौन रिश्ते (आप कहते रहें ‘अनैतिक’) बना सकता है। दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन संबंध ‘व्यभिचार’ है (अगर उसके पति की सहमति या मिलीभगत नहीं है) लेकिन यदि पति (मालिक) भी सहमत हो तो, यह कोई अपराध नहीं। यानि आपस में पति-पत्नियाँ बदलना विधान-सम्मत है. ‘व्यभिचार’ एक मायने में स्वेच्छा से ‘सहमती’ नहीं, मानसिक अनुकूलन के बाद ‘बलात्कार’ ही है. समलैंगिक संबंधों को भी अपराध-मुक्त करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक बहस जारी है. कभी भी ‘अध्यादेश’ जारी हो सकता है. कानूनी जाल-जंजाल में, ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं मगर उन पर फिर कभी…..

भारत में विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ कनून बनने के मार्ग में क्या -क्या बाधायें हैं.सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर, पुरुषों का कब्जा है. संसद में मर्दों का बहुमत है, सो ऐसा कोई कानून नहीं बनायेंगे, जो पित्रसत्ता की जड़ों में मट्ठा डालने का काम करे. ‘महिला आरक्षण विधेयक’- अभी नहीं, कभी नहीं. सारे कानून मर्दों के हितों और वर्चस्व को बनाये-बचाये रखने वाले ही बने-बनाये गए हैं. हालांकि उपरी तौर पर ढिंढोरा यह पीटा जाता है कि ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के लिए, संसद ने ना जाने कौन-कौन से विधेयक पारित किये है. वास्तविकता यह है कि दांपत्य में यौन संबंधों के बारे में सदियों पुरानी सामंती सोच और सीलन भरे संस्कारों में, कोई बदलाव नहीं हो पा रहा। मालूम नहीं इस सवाल पर सबने, क्यों ‘मौनव्रत’ धारण कर लिया है।
देश में अपराधियों का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण इतना बढ़ गया है कि
वर्तमान दहशतज़दा माहौल में यौन हिंसा की शिकार औरत की चीख, आखिर कौन और कब सुनेगा ? मेरे विचार से स्त्री के दमन, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ़ कानून बनने-बनाने में सबसे बड़ी बाधा है- राजनीति और सत्ता में ‘मर्दवादी’ नेताओं की षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और अपने अधिकारों के प्रति स्त्री आन्दोलन के दिशाहीन भटकाव.

दुख तो यह भी है कि महिला प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, गवर्नर, सुप्रीम और हाईकोर्ट की न्यायमूर्तियां और अन्य सांसद, मंत्री, अफसर वगैरह के होने के बावजूद, आम औरतों के हालात बद से बदतर होते गये हैं। कुर्सी मिलते ही औरत, औरत नहीं रहती, सत्ता के इशारे पर नाचने वाली ‘गुड़िया’ बन जाती है, गुड़िया।

अफसोस कि तमाम प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी बेटे-बेटियां, जो सचमुच स्वाधीनता संघर्ष के दौरान बुने सपनों को साकार कर सकते थे या जिनमें देश की नियति बदलने की सारी संभावनाएं मौजूद थीं, सत्ता संस्थानों ने खरीद लिए, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आवारा पूंजी की गुलामी करने लगे या पेशेवर दलाल हो गये। कुछ ने सपनों के स्वर्ग अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड या कहीं और जाकर ‘आत्महत्या’ कर ली। जिनके बस का दलाल होना नहीं था, वो ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारे गये या फिर अराजक जीवन की दारु पीते-पीते एक दिन, खून की उल्टियां करते बरामद हुए। ऐसी विश्वासघाती और आत्मघाती होनहार पीढ़ियों को या राष्ट्र कर्णधारों को क्या कहे?

जाति और धर्म संस्थानों को स्त्री के प्रति यौन हिंसा के बडे  उत्प्रेरक के तौर पर माना जाता है, इन्हें कानूनों से किस हद तक ठीक किया जा सकता है ? 
धार्मिक पाखंड, कर्मकांड, अन्धविश्वास और तर्कहीन आस्थाओं के शिकार, मर्द और स्त्रियाँ दोनों ही हैं. धर्म मर्दों के लिए अनाथालय सिद्ध हुआ है, मगर स्त्रियों के लिए ‘वेश्यालय’. स्त्रियों की शस्त्रों से अधिक हत्या तो, धार्मिक शास्त्रों ने की है.

मर्दों की आँखों में फिट जाती और धर्म  के ‘टेलीलेंस’ का फोकस, हर स्त्री देह पर एक जैसा ही होता है। स्त्री को देखते ही ‘टेलीलेंस’ की लार टपकने लगती है और दिमाग में हिंसक घोड़े हिनहिनाने लगते हैं। स्त्री फ़िल्मी हिरोइन (सीता, पार्वती, द्रोपदी, तुलसी, आनंदी या किसी भी भूमिका में हो) हो या टेनिस-हाकी-क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता हो या समाजसेविका, पुलिस अफसर-डॉक्टर- वकील- इंजिनियर हो या एयर होस्टेस- नर्स-स्टेनो, अध्यापक हो या छात्रा, शिक्षित हो या अनपढ़, अमीर हो या गरीब, सवर्ण हो या दलित, शहरी हो या ग्रामीण, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई हो या नास्तिक। गंगा-यमुना में नहा रही हो या पांच सितारा स्विमिंग पूल में, सड़क किनारे या गांव के तालाब पर- कैमरा क्लिक,क्लिक करने लगता है। मीलों की दूरी से फिल्म शूट होने लगती है और स्त्री को पता तक नहीं चलता कि कब सीडी या एम् एम् एस, पितृसत्ता के ‘आनंद बाज़ार’ में छप गया।
दरअसल पुरुषों को घर में घूंघट या बुर्केवाली औरत (सती-सावित्री) चाहिए और अपने धंधा चलाने या ब्रांड बेचने के लिए बिकनीवाली। सो स्त्रियों को सहमती के लिए लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार या सोने का लालच (विश्व सुन्दरी के ईनाम और प्रतिष्ठा) और जो सहमत नहीं उनके साथ जबरदस्ती यानी हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न, शोषण के तमाम हथकंडे।

स्वयं सहमत हुई या की गई (नायिकाओं) स्त्रियों का तर्क होता है कि “हम देह नहीं सिर्फ देह की (कामुक-उतेजक) छवि बेच रही हैं, जो सचमुच देह बेचने या गुजारे के लिए विवाह बंधन में बंधने से कहीं ज्यादा फायदेमंद और सम्मानजनक है। देखो हत्या, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न और शोषण की शिकार ब्याही-अनब्याही आम स्त्रियाँ घुटघुट कर दम तोड़ रही हैं या सालों से इन्साफ के मंदिरों के चक्कर काटती घूम रही हैं।“ आपके ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों में भी लिखा है ‘सलज्जा गणिका नष्टा, निर्लज्श्च कुलांगना’। समझ नहीं आ रहा कि  (अ)न्यायशास्त्रों में घुस कर बैठे, आदिकालीन धर्मशास्त्रों की भरीआखिर हम कब तक ढोते रहेंग -भरकम गठ े?

दिक्कत यही है कि अधिकांश कानूनों की बहुमंजिला ईमारत, ऐसे ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों, परम्पराओं और रीति-रिवाजों के नीवं पर बनी-बनाई गई है. शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं, बदल रही हैं मगर भारतीय पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. उसके लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का दबाव-तनाव बढ़ता है तो कुछ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेक-अप’ या ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं.

आपका जन्म कब और कहाँ हुआ? परिवार के बारे में भी कुछ बताएं?
मुझे तो यही बताया गया है कि मेरा जन्म 7 दिसम्बर, 1953 को अविभक्त पंजाब के जिला हिसार के पास उकलाना मंडी में हुआ था. जन्म के समय या काफी बाद तक परिवार, एक ‘संयुक्त परिवार’ ही था. व्यापारिक घराना जो अभी भी पड़-दादा के नाम से जाना जाता है. संयुक्त परिवार का रुई-लकड़ी-तेल का कारखाना था, मंडी में नीचे कमीशन-एजेंट की तीन दुकानें थी और ऊपर रिहायस. पास के गाँव सिंयाना में पुरानी हवेली और खेत भी थे. कहते हैं 1929 में लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध जुलूस में दादा जी (अपने वकील) लाला लाजपत राय के साथ थे और पुलिस की लाठियों की मार के कारण उनका एक हाथ काटना पड़ा था. शायद यही वजह थी कि वो ‘होली-दिवाली’ ही नहाते थे. मंडी में सब उन्हें भी ‘टुंडा लाट’ बोलते थे. उन्हें ‘सांग’ देखने, रागनियाँ सुनने का शौक था और खुद बहुत अच्छे किस्सा-गो थे. बचपन में हमने उनकी जुबानी ‘जानी चोर’, नरसिंह का भात’ और अन्य किस्से सुने हैं. व्यापार के सिलसिले में वो देशभर में घूमे रहते थे. सूरज छिपने के बाद कुछ नहीं खाते थे.

मेरे पिता अध्यापक थे. मंडी में सब उन्हें अभी तक ‘मास्टर जी’ कहते थे. दो चाचा और दो बुआ थी. होश संभाला तो दोनों बुआओं की शादी (व्यापारिक घरानों में) हो चुकी थी.

आपके पिता अध्यापक थे. कहाँ-क्या पढाते थे?
पिता जी शुरू में उकलाना मंडी के ‘जैन हाई स्कूल’ और ‘जनता हाई स्कूल’ में ही अध्यापन करते रहे. मुझे याद है 1963-1964 में उन्हें हांसी के सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई थी मगर चुनाव लड़ने के चक्कर में उन्होंने, कुछ ही समय बाद इस्तीफ़ा दे दिया था. चुनाव हारने के बाद उन्होंने थोड़े समय ‘अरविन्द हाई स्कूल’ चलाया, परन्तु 1966 में दादी जी की बीमारी के कारण वापिस उकलाना चले गए. उकलाना से वो अग्रवाल हाई स्कूल, बल्लभगढ़ चले गए और फिर (1967) जैन हाई स्कूल, रोहतक में पढाने लगे. 1970 में उन्होंने राजनीति शास्त्र में भी एम.ए. किया और 1970-1994 तक वो वैश्य कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक रहे. रिटायर होने के बाद वो फिर से उकलाना जा बसे और लम्बी बीमारी के बाद अगस्त 2006 में उनका देहांत हो गया.

आपके पिता ‘मास्टर जी’ या राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक थे. उनका आप पर क्या-कितना प्रभाव पड़ा?इसका जवाब देने से पहले यह बताना जरूरी है कि व्यापारिक घराने के ‘संयुक्त परिवार’ में वो अकेले ‘शिक्षित’ व्यक्ति थे, जिनकी व्यापार की बजाय राजनीति, समाज और साहित्य में गहरी रूचि थी. बहुत अच्छे वक्ता और लेखक थे. देखने में पंडित नेहरु की कार्बन-कॉपी- खद्दर का चूड़ीदार पायजामा-कुरता और अचकन. पूर्णरूप से शाकाहारी, चाय कभी नहीं पीते थे और चमड़े की कोई वस्तु, इस्तेमाल नहीं करते थे. दहेज़ लेने-देने के सख्त विरोधी. दहेज़ लेने-देने  वालों की शादी में नहीं जाते थे. उनके यहाँ से आई मिठाई आदि भी नहीं खाते थे. इसे वो बच्चों की ‘खरीद-फ़रोख्त’ मानते थे. पैसे के लिए उन्होंने कभी किसी को, ट्यूशन नहीं पढाया. कुल मिला कर एक आदर्शवादी, समाज सुधारक, प्रजातान्त्रिक और ईमानदार व्यक्ति और व्यक्तित्व.

निश्चित रूप से उनका प्रभाव, मुझ पर पढ़ना ही था. मैंने शुरुआती दौर में पढना-लिखना-बोलना, उन्ही से सीखा. ना जाने क्यों, मुझे लगता है कि वो मेरे पिता नहीं, ‘मास्टर जी’ थे और उम्र-भर ‘मास्टर जी’ ही बने भी रहे. किसी लावारिस-अनाथ बच्चे सा मैं, उन्हें कहीं मिल गया हूँगा और वो मुझे अपने ‘गुरुकुल’ में ले आये होंगे. अन्य बच्चों की तरह, मुझे भी पढाया-सिखाया और शिक्षित-दीक्षित होने के बाद, ‘गुरुकुल’ से विदा कर दिया. अन्य बच्चे ‘गुरु-भाई’ या ‘गुरु-बहन’ बन गए. मैं अक्सर सोचता और महसूस करता हूँ कि उनके और मेरे बीच, बाप-बेटे का नहीं, बल्कि ‘गुरु-शिष्य’ का अमर रिश्ता है. मेरे पास तो ‘गुरु-दक्षिणा’ में देने के लिए, कभी कुछ था ही नहीं….सो चिर-ऋणी हूँ….रहूँगा.

क्या ‘माँ’ के बारे में कुछ नहीं बताएंगे ? 
बताता हूँ….उनके बारे में भी बताता हूँ. मेरा ननिहाल भी उकलाना मंडी में ही था. उनके पिता यानि मेरे नाना जी की मृत्यु, कम उम्र में ही हो गई थी. विधवा नानी जी और उनकी तीन बेटियों के पास, उनके एक भाई (राम भगत) ने रहना शुरू कर दिया था जो  आजीवन अविवाहित ही रहे.  माँ का छोटी उम्र में ही विवाह हो गया, सो शिक्षा अधूरी रह गई. भारतीय स्त्रियों की तरह ही उनका जीवन भी, एक कुशल गृहणी सा ही रहा मगर वो एक बेहद साहसी और विवेकशील महिला हैं.

कानून पढने और वकील बनने का सपना कब देखा?
उस समय पिता जी को शायद 700-800 रूपये महीना वेतन मिलता था. माँ-बाप के अलावा हम तीन भाई और दो बहिनें थी. (एक बहन ‘अपराजिता’ कि 1979 में ‘ब्लड कैंसर’ से मौत हो गई थी.) पिता जी को लगता था कि इतनी तन्खाह में, मुझे दिल्ली से पढ़ना संभव नहीं होगा. इसलिए पिता चाहते थे ‘अर्थ-शास्त्र’ में एम.ए. करके, वहीँ-कहीं लेक्चरर लग जाऊं, पर मुझे ‘संविधान’ पढने की धुन सवार थी, सो कानून पढने राजधानी आ गया. दिन में नौकरी और शाम को कानून की पढाई ने, पिता जी की आर्थिक विवशता हल कर दी थी.
6. ‘संविधान’ पढने की धुन सवार होने की कोई खास वजह?

कोई ठोस वजह तो समझ नहीं आ रही. ‘महाभियोग’ में वारेन हसिंग्स पर चले मुकदमें के दौरान, एडमंड बर्क के भाषणों और जे. एस. मिल की पुस्तक ‘लिबर्टी’ ने वकालत का रास्ता दिखाया-सुझाया था. उन्ही दिनों वीरेंद्र सिंधु की किताब “भगत सिंह और मृतुन्जय पुरखे” पढ़ते हुए, बड़ी सिद्दत से महसूस हुआ था कि ‘क्रांतिकारी पैरवी’ के लिए, समर्पित और सरोकारी वकील होना अपरिहार्य है. संभव है कहीं बहुत भीतर तक यही अहसास हो रहा था, कि मुझे पढने-लिखने-सोचने और बोलने के अलावा कुछ नहीं आता.

न्यायव्यवस्था में लूट की सम्पूर्ण संरचना और सुनियोजित षड्यंत्र को, सूक्ष्मता से जानने-पहचानने और रेखांकित करने के प्रयास में ही मैं समझ पाया कि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं और काफी दूर-दूर तक फैली है. न्याय मंदिरों के प्रांगण में भी ‘भ्रष्टाचार के विषवृक्ष’, निरंतर फल-फूल रहे हैं.

मासिक पत्रिका जनपथ  से साभार 

सामूहिक बलात्कारः स्त्री-चेतना और अस्मिता को हतोत्साहित करने का षड्यंत्रकारी आयोजन

शंभु गुप्त

 हिन्दी विश्वविद्यालय  में स्त्री अध्ययन  विभाग में  प्रोफ़ेसर.  सम्पर्क : ई  मेल- shambhugupt@gmail.com, मोबाइल:  8600552663

स्त्रियों और बच्चियों पर हिंसा इधर काफ़ी बढ़ गई है। हिंसा की शिकार पीड़िताओं  में हर जाति और वर्ग की लड़कियाँ शामिल हैं। इनमें शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों की लड़कियाँ हैं। यह हिंसा मुख्यतः यौनमूलक है, जो बलात्कार के रूप में सामने आ रही है। इस हिंसा की प्रकृति थोड़ी भिन्न है। यह भिन्न इस रूप में है कि यह सामूहिक रूप में की जा रही है। सामूहिक बलात्कार के मामले इधर तेज़ी से बढ़े हैं। इनकी आख्या परम्परागत सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक कारणों से अलग नई स्थितियों के मद्देनज़र करनी होगी।

पिछले बीस-पच्चीस सालों में भूमंडलीकरण की ताज़ा हवाओं, स्त्री-संगठनों के आन्दोलनों और संघर्षों  के दबावों, पितृसत्ता  की जकड़बन्दियों के थोड़ा ढीला होने या कहें कि स्त्रियों द्वारा पितृसत्ता  के अनेकानेक प्रावधानों और प्रथाओं को अमान्य और अस्वीकार्य घोषित करने, अपनी स्वतन्त्रता, स्वायत्तता  और अस्मिता के आयामों को निरन्तर व्यापक और विकसित करते चलने, अपने व्यक्तित्व के प्रति सचेत, सावधान और निर्णयात्मक होने; इत्यादि-इत्यादि के परिणामस्वरूप स्त्रियों को उपलब्ध अवसरों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। एक तरफ़ वे शिक्षा,  तो दूसरी तरफ़ रोज़गार, एक तरफ़ घर तो दूसरी तरफ़ समाज और राजनीति, एक तरफ़ अकादमिक तो दूसरी तरफ़ प्रशासन, एक तरफ़ प्रबन्धन तो दूसरी तरफ़ पुलिस और सशस्त्र बल; राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य का  लोहा मनवाने में सफल हुई हैं। पिछले बीस-पच्चीस वर्ष भारत में स्त्री-अस्मिता के लगभग हर क्षेत्र में गहरी और व्यापक जड़ें जमाने के वर्ष कहे जा सकते हैं।

इन वर्षों में पुरुष-वर्चस्व और पितृसत्ता को जैसी और जितनी चुनौतियाँ मिली हैं, वे इससे पहले कभी नहीं मिली थीं। हालाँकि इन वर्षों में तत्ववाद, धर्म और साम्प्रदायिकता ने स्त्रियों के लिए एक नए कि़स्म का मकड़जाल बुनने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। विभिन्न धार्मिक समुदायों पर उनका पर्याप्त प्रभाव भी बराबर देखा गया है। नए कि़स्म के धर्मवाद और साम्प्रदायिकता ने एक बड़े स्त्री-वर्ग में अपनी घुसपैठ करनी शुरू की। साम्प्रदायिक दंगों में पहली बार लगभग सभी सामाजिक वर्गों की स्त्रियों और विशेषतः सवर्णेतर स्त्रियों को भागीदारी करते देखा गया। यह एक स्थापित तथ्य है कि भूमंडलीकरण के दौर-दौरे में स्त्री के लिए आज़ादी के साथ बहुत सारी ऐसी अलामतें भी प्रकाश में आईं, जिनके बारे में कहा गया बल्कि दुष्प्रचार किया गया कि इन्हें औरतों ने ख़ुद चुना है। अपनी देह पर अपने स्वयं के अधिकार की उद्घोषणा न जाने किस प्रक्रिया से ‘देहवाद’ में रिड्यूस कर दी गई! हिन्दी-साहित्य का अधिकांश स्त्री-विमर्श देह-विमर्श में तब्दील होता गया। विज्ञापनों में स्त्री-देह की नुमाइश, बम्बइया हिन्दी फिल्मों और हिन्दी टीवी चैनलों के बहुत से कथित सामाजिक धारावाहिकों में प्रस्तुत की गई स्त्री की पितृसत्ता को मज़बूत करती और आगे बढ़ाती छवि, देहाती इलाक़ों में खाप पंचायतों का पुनरोदय, जातिवादी संगठनों की भरमार; ये कुछ ऐसी सांघातिक स्थितियाँ थीं, जिन्होंने या तो स्त्री को उपलब्ध अवसरों को कम किया या इससे भी ज़्यादा यह कि उन्हें कुछ ख़ास दिशाओं की तरफ़ मोड़ दिया। ये दिशाएँ निश्चय ही पुरुषवर्चस्व एवं पितृसता मूलक  थीं या उसके इर्द-गिर्द थीं। यानी कि स्त्री जितनी चाहे उड़ान भरे, जितनी चाहे तरक़्क़ी करे, अन्ततः रहना तो उसे इसी शामियाने में है! यानी कि इस दौर में स्त्रियों ने जितना संघर्ष किया, जितने वैकल्पिक रास्ते निकाले, जितना सशक्त और संगठित वे हुईं, इस सब को बराबर करने के लिए ठीक इसके समानान्तर इनकी काट निकाली जाती रही। पुरुषवर्चस्ववादी और पितृसत्तावादी एजेंसियाँ लगातार सक्रिय रहीं और राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक  सत्ता-केन्द्रों द्वारा उन्हें शह दी जाती रही।

मेरा विचार है कि सामूहिक बलात्कार भी पुरुषवर्चस्ववाद और  पितृसत्तावाद  का स्त्री को सबक़ सिखाने का एक ऐसा ही उपक्रम है। सामूहिक बलात्कार यौन-हिंसा का क्रूरतम रूप है,  जो एक स्त्री को देह एवं मन दोनों स्तरों पर नेस्तनाबूत करता है। पिछले कुछ सालों में लगभग देश के हर कोने में सामूहिक बलात्कार की घटी घटनाओं ने स्त्रियों, विशेषतः लड़कियों के लिए असुरक्षा और अनिश्चितता का एक ऐसा आतंकी माहौल बनाया है कि अच्छे-अच्छे हिम्मती लोग भी घबरा उठे हैं। मेरा मानना है कि यह माहौल अचानक और आकस्मिक नहीं है बल्कि एक व्यूह-रचना के तहत पैदा किया गया है। हो सकता है कि कोई एक व्यक्ति इसके लिए दोषी न हो, लेकिन इतना तय है कि व्यवस्था इससे परेशान नहीं है। परेशान होती तो 16 दिसम्बर 2012 की सामूहिक बलात्कार की अब तक की सबसे क्रूर घटना के अपराधियों पर कार्रवाई के लिए इतना लम्बा और व्यापक संघर्ष नहीं करना पड़ता। इस संघर्ष के दौरान व्यवस्था और विभिन्न सत्ता -केन्द्रों में बैठे शक्ति-सम्पन्न व्यक्तियों के तरह-तरह के जो बयान आए थे, उनकी यदि तात्विक और भाषा-संरचनागत व्याख्या की जाए तो इस देश के व्यवस्थागत पुरुषवादी और पितृसत्तावादी  चरित्र को बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। जो हो। यह सब एक तरफ़ था , लेकिन दूसरी तरफ़ हम उस संघर्ष-चेतना और प्रतिरोधी कार्यक्रमों की नई पैदा हुई लहर पर अपना ध्यान केन्द्रित करें,  जिसके तहत पूरे के पूरे देश में हर जगह प्रदर्शन, धरना, मशाल जुलूस, कैंडिल मार्च, वैचारिक बहस इत्यादि की एक बाढ़-सी पैदा हो गई थी। यह शायद इसी व्यापक प्रतिरोधी और संघर्ष-चेतना का नतीज़ा था कि जस्टिस वर्मा कमेटी ने हिंसा-विरोधी क़ानून को सख़्त बनाने और उसमें संशोधन और नए रोधी प्रावधान शामिल करने की प्रक्रिया के तहत जब देश के विभिन्न महिला संगठनों, कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवी संगठनों, स्वतन्त्र बुद्धिजीवियों, विद्यार्थी-संगठनों, अकादमीशियनों आदि-आदि से सुझाव आमन्त्रित किए तो लगभग 80000 पत्र उसे मिले। इतनी बड़ी संख्या में सुझावों का प्राप्त होना ही इस बात की सूचना देता है कि हमारे यहाँ स्त्रियों पर यौन-हिंसा के खि़लाफ़ लोगों में किस क़दर गु़स्सा और प्रतिरोधी-चेतना घर किए हुए है। ऊपर पुरुषवाद और पितृसत्ता की जिस शर्मनाक व्यूह-रचना का , संरचना का उल्लेख हमने किया था, यह गु़स्सा और प्रतिरोधी-चेतना दरअसल उसी की असल काट है। यह गु़स्सा और प्रतिरोधी-चेतना लगातर बनी रहेगी, ऐसी पूरी-पूरी संभावना है क्योंकि स्त्री-अस्मिता के विकास और विस्तार का जो कारवां शुरू है, वह अब कहीं अधबीच ठहरने वाला नहीं है।

निष्कर्ष रूप में मुझे यही कहना है कि सामूहिक बलात्कार स्त्रियों के व्यक्तित्व-विकास और व्यापक से व्यापकतर होती, राष्ट्रीय जीवन के हर आसंग में दखल देने और अपना वाजि़ब हक़ माँगने को तत्पर स्त्री-चेतना और अस्मिता को हतोत्साहित करने और कुचलने की एक व्यवस्थित षड्यन्त्रकारी आयोजना के तहत है। यह ठीक वैसा है, जैसे एक ज़माने में आमने-सामने के युद्ध से पहले शत्रु-सेना और शत्रु-राष्ट्र की जनता की हिम्मत तोड़ने के लिए खड़ी फसल को रोंदने, बस्तियाँ उजाड़ने, औरतों-बूढ़ों-बच्चों इत्यादि को निशाना बनाने के हथकण्डे काम में लाए जाते थे और कोशिश की जाती थी कि शत्रु बिना लड़े ही हार मान ले और हथियार डालकर हमारा आधिपत्य स्वीकार कर ले। निरन्तर आगे बढ़ने को तत्पर स्त्री के साथ लगभग ऐसा ही रवैया अखि़्तयार किया जा रहा है, जो कि अब कम से कम सफलीभूत हो जाने वाला नहीं है। जागी हुई स्त्री अब हर लड़ाई और मोर्चे पर काफी़-कुछ पूर्व-तैयारियों के साथ सन्नद्ध है। उसे हराना और पीछे लौटाना अब आसान नहीं।

‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’

अनुपम सिंह

अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com

बजरंग बिहारी तिवारी की पुस्तक ‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’ का 13 ॰09 ॰2015 को नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में लोकार्पण हुआ । बजरंग बिहारी तिवारी की यह किताब ‘नवारुण’ प्रकाशन की पहली पुस्तक है। इसके विमोचन में साहित्य की अलग –अलग विधाओं के लोग शामिल हुये, जिसमें जलेस के महसचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह , उपन्यासकार अब्दुल बिस्मिल्लाह, दलित विमर्श के हीरालाल राजस्थानी, दलित स्त्री विमर्शकार  हेमलता महीश्वर, दलित चिन्तक अनिता भारती, आलोचक आशुतोष कुमार, कथाकार और आलोचक संजीव कुमार, ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक और ‘नवारुण’ प्रकाशन के संस्थापक संजय जोशी तथा वरिष्ठ चित्रकार व कथाकार अशोक भौमिक. कार्यक्रम का संचालन करते हुये रामनरेश राम ने इस पुस्तक की प्रकृति के विषय में संकेत किया कि यह पुस्तक तीन खण्डों में बंटी हुयी है – कविता, कहानी और आत्मकथन। यह दलित साहित्य के उद्भव विकास को लेकर दलित साहित्य की प्रस्थापनाओं से बहस करती हुयी, समर्थन करती हुयी उसमे कुछ जोड़ने के लिए प्रस्तावित करती है ।

उड़ीसा में हो रही संसाधनों की लूट पर लिखी किताब को कोई नहीं छापता – संजय जोशी

चूंकि ‘दलित साहित्य :एक अन्तर्यात्रा” नवारुण प्रकाशन की पहली पुस्तक है , इसलिए इसके संस्थापक संजय जोशी ने पुस्तक पर परिचर्चा होने से पहले ही अपने प्रकाशन की स्थापना के विषय में अपने विचार और आगे की कुछ योजनाओं को सबके साथ साझा किया । उनका कहना था कि ‘यदि नवारुण प्रकाशन दस साल तक काम करता है तो फिर गांधी शांति प्रतिष्ठान में पुस्तक के लोकार्पण की जरुरत नहीं पड़ेगी उन्होंने कहा कि कविता, कहानी उपन्यास तो सभी छाप रहे हैं परंतु उड़ीसा में हो रही संसाधनों की लूट पर लिखी किताब को कोई नहीं छापता। बच्चों के लिए अच्छी किताबें बहुत ही कम हैं, जो उनमें वैज्ञानिक चेतना को विकसित करें। उन्होंने आगे कहा कहा प्रकाशन का मैं मालिक नहीं हूँ और न ही बनने की इच्छा हैं। यह एक साझा प्रयास है जो आप सबके साझे सहयोग से ही सफल होगा । संजय जोशी ने कहा कि इस पुस्तक में जो कुछ भी सुंदर दिख रहा है उसका योगदान अशोक भौमिक को जाता है । इसके लिए मैं उन्हें शुक्रिया अदा करता हूँ । इस पुस्तक के डिजाइनर हरी कृष्ण का भी शुक्रिया अदा करता हूँ’।

बजरंग बिहारी तिवारी ने दलित साहित्य के लिए सेतु का काम किया है – हीरालाल राजस्थानी

पुस्तक पर बातचीत की शुरुआत करते हुए हीरालाल राजस्थानी ने कहा कि दलित साहित्य मे आलोचक बहुत ही कम हैं, बजरंग बिहारी तिवारी ने दलित साहित्य के लिए सेतु का काम किया है। यह काम जो बजरंग जी ने किया है हममें से किसी को करना चाहिए था । इन्होने दलित साहित्य के लिय उत्साह पैदा किया है । मैं इन्हें इस काम के लिए बधाई देना चाहता हूँ । साथ ही साथ नवारुण प्रकाशन के संजय जोशी जी को भी बधाई देना चाहता हूँ की उन्होने अपने प्रकाशन की शुरुआत दलित विमर्श से संबन्धित पुस्तक छापकर की । कमियाँ हर जगह होती है इस पुस्तक में भी कुछ रह गयी है । बजरंग जी से कुछ नाम छूट गए । क्यों छूट गए हैं इसको बजरंग जी की हो सकता है उन छूटे हुये नामों को लेकर आगे कोई योजना हो.’ उन्होने कहा कि दलित लेखन में हर तरफ से आवाज आ रही थी की दलित का लिखा ही दलित साहित्य होगा । यह सही भी है, परंतु जो गैर दलित लिख रहे हैं उनका भी स्वागत होना चाहिए । सभी तरफ से चीजें बदलनी चाहिए । गैर दलितों के लिखने से दलित साहित्य की स्वीकारोक्ति बढ़ेगी’ ।

यह किताब पूरे दलित समाज की यात्रा को दिखाती है – अनिता भारती

अनिता भारती  का कहना था कि ‘इस बहुत ही खूबसूरत पुस्तक के लिए संजय जोशी जी को बधाई । बजरंग जी की पुस्तक पूरे दलित समाज की यात्रा को दिखाती है । यह दलित साहित्य के लिए इतिहास की किताब जैसी है । यदि मैं यह कहूँ कि यह पुस्तक दलित समाज के हर पहलू को छूते हुये चलती है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । लेखन के लिए अध्ययन से अधिक दृष्टि का महत्त्व होता है और बजरंग जी के पास वह दृष्टि है। बजरंग जी पर दलित- विमर्श पर काम करने के लिए तरह –तरह के सवाल उठाए गए लेकिन आज के समय मे इनके काम की महत्ता है. आलोचक जब किसी कविता को अपने दायरे मे लाता है तब वह उसे राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश से जोड़ता है, बजरंग जी सूरजपाल चौहान और ओमप्रकाश बाल्मिकी की कविता को बहुत ही सही ढंग से कोट करते हैं । दलित साहित्य एक ऐसे समाज को रचना चाहता है जहां भेदभाव न हो, लोकतान्त्रिक मूल्य हो । बजरंग विहारी तिवारी जी  दलित साहित्य को स्थापित करने वालों में ,उसका पक्ष रखने वाले हमारे साथी हैं। हम उन्हें अपना आलोचक मानते हैं। हीरालाल राजस्थानी की बात पर उन्होने कहा कि इतिहासकार और आलोचक मे फर्क होता है, इतिहास मे विवरण होता है और आलोचना मे एक दृष्टि काम करती है जिससे कुछ चीजें छूट ही जाती हैं ।‘

जरंग बिहारी तिवारी जी हमारी दलित चेतना के पैरोकार है – प्रो हेमलता महीश्वर

प्रो हेमलता महीश्वर ने कहा कि ‘निश्चित ही बजरंग जी का यह काम महत्त्वपूर्ण है । दलित साहित्य जो स्वरूप ग्रहण किए हुये है वह किन पड़ावों को पार करता हुआ यहाँ तक पंहुचा है इसकी पड़ताल बजरंग जी ने की है । और यह यात्रा शुरू होती है बाबा साहब अंबेडकर से । उन्होने जब देखा हिन्दू धर्म मे हमारा सम्मान नहीं है तब बौद्ध धम्म की तरफ गए उसकी 22 प्रतिज्ञायेँ स्वीकार कीं । उन प्रतिज्ञाओं मे कोई जड़ता नहीं है । दलित विमर्श में दलित पैंथर आंदोलन का योगदान है। हेमलता जी ने स्वतन्त्रता के पहले और उसके बाद के अनेक आंकड़े बताए जिसमे दलितों का स्थान नगण्य था । यही कारण है की मराठी के नामदेव ढसाल, कांबले आदि चिंतक अपनी जगह तलाशते हुये आए’ ।  उनका कहना था कि ‘दलित विमर्श में तो कोई भी शामिल हो सकता है,  लेकिन दलित चेतना में वही शामिल हो सकता है जो अंबेडकर की तरह ही उन 22 प्रतिज्ञाओं को मानता हो । बजरंग बिहारी तिवारी जी हमारी दलित चेतना के पैरोकार है । मैं बजरग जी ,नवारुण प्रकाशन के संजय जी को तथा आवरण चित्र के लिए सावी सावरकर जी को बधाई और धन्यवाद दोनों देती हूँ’ ।

ओमप्रकाश बाल्मिकी की कविता सूत्र है पूरे दलित आंदोलन को समझने के लिए – आशुतोष कुमार

युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ‘नवारुण प्रकाशन का शुरू होना आज के समय में बहुत प्रासंगिक है । नबारुण भट्टाचार्य की कविता ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’ आज हमारे कानों में गूंज रहा है’ । उनका कहना था कि ‘यह जो मृत्यु-उपत्यका जैसा दिखाई दे रहा है वह मेरे सपनों का देश नहीं हो सकता । लोग मारे जा रहे हैं, दलित मारे जा रहे हैं, आदिवासी मारे जा रहे है, घरों से बेघर किए जा रहे हैं, लेकिन यह राष्ट्रीय एजेंडा का सवाल नही बन पा रहा है उत्तर से लेकर सुदूर दक्षिण , पूर्वोतर, झारखंड सब जगह कानूनी हत्याएं हो रही हैं । आवाजों को दबाया जा रहा है। यह सिर्फ मीडिया पर एकाधिकार के चलते नहीं हो रहा है बल्कि शिक्षा, संस्कृति को भीतर से नष्ट करने की कोशिश हो रही है । इससे लड़ने के लिए जरूरी है कि बहस की जगहों को बचाया जाय । ऐसे माहौल मे बहस को कैसे तेज किया जाय यह उन लोंगों की ज़िम्मेदारी है जो अपने साधनों से लड़ रहे हैं । ओमप्रकाश बाल्मिकी की कविता सूत्र है पूरे दलित आंदोलन को समझने के लिए कि ‘चूहड़े या डोम की आत्मा ब्रह्म का अंश क्यों नहीं है’ । अब तक यह सवाल नहीं पूछा गया लेकिन नवारुण या शब्दारंभ का होना यह साबित करेगा कि यह सवाल भी पूछा जाएगा । बजरंग जी दस सालों से काम कर रहे हैं दलित साहित्य के अखिल परिदृश्य को हिन्दी के पाठकों तक पहुंचाया , भाषाएँ सीखी ,दलित साहित्य के स्रोतों तक गए । जहां तक सवाल है गैर दलित होने का तो दलित साहित्य के लिए यह जरूरी है कि भीतर की आलोचना के साथ बाहर से भी उसे देखा जाय । बजरंग जी गहराई से उन सारे सवालों को देख रहे है जो रचना प्रक्रिया के लिए जरूरी हैं । बजरंग जी गैर दलित होते हुये भी इससे जानबूझकर टकराते हैं । कोई उनकी आलोचना करे, सराहना करे लेकिन उनका नाम काटकर दलित विमर्श को नहीं देख सकता।‘

बजरंग के यहाँ चीजें बहुत विवरणात्मक ढंग से आई हैं और कहीं बहुत गहराई के साथ – संजीव कुमार

आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि ‘आशुतोष ने बहुत महत्वपूर्ण बाते कही है, मैं संजय को बधाई देता हूँ । बजरंग को तो लगातार बोलना, लिखना है। लेकिन संजय ने जिस तरह सिनेमा के साथ किया उसी तरह नवारुण के साथ भी होगा। दलित लेखन पर बजरंग लगातार लिखते रहे हैं। कई सारी चीजें हैं जो पत्र-पत्रिकाओं में आई हैं पर तमाम चीजें हैं जिन्हें अभी मुकम्मल किताब रूप में आना है। फिर आपने देखा है कि बजरंग में कितना विस्तार और गहराई है। मैं विस्तार और गहराई को जानबूझ कर चुन रहा हूँ। क्योंकि बजरंग के यहाँ चीजें बहुत विवरणात्मक ढंग से आई हैं और कहीं बहुत गहराई के साथ। यद्यपि आशुतोष ने कहा कि यह लेखों का संकलन है लेकिन प्रबंधात्मक स्वरूप में। निबंधात्मक और प्रबंधात्मक प्रविधि का जो रहस्य होता है वह इस पुस्तक में है। दलित प्रश्न में अस्मिता नहीं बल्कि मुक्ति की कोशिश महत्त्वपूर्ण होती है, यही इनकी चिंता भी है। यही इनकी मार्क्सवादी समझ है। दलित रचनाशीलता के लिए शिल्प महत्त्वपूर्ण नहीं बल्कि कथ्य है, बजरंग यहाँ सरलीकरण करते हैं। शिल्प और कथ्य को अलग-अलग देखना ही सवाल का सरलीकरण है। इसी तरह जब दलित लेखक लिख रहे होते हैं कि ‘उनका कथ्य ही महत्त्वपूर्ण है’। यहाँ उनसे हम अभिजन सौंदर्य कि मांग नहीं करते, लेकिन जो बात कही जा रही है वह अपनी पूरी शक्ति के साथ आयी है कि नहीं कैसे पता चलेगा । कोई तो पैमाना होगा जिससे हम इसको कहानी या कविता कहें । इस बात को उन्होने कुछ उदाहरणों के साथ रखा । जैसे –खेत ठाकुर का ,बैल ठाकुर का ….. । यह सिर्फ कविता इसलिए नहीं है कि कवि कह रहा है बल्कि इसलिए भी है कि इसमे कविता के आवश्यक आस्वाद ,ध्वनि इसमे मौजूद है । यह एक ऐसा प्रसंग है जो बजरंग से छूटा है’ ।

पुस्तक बहुत ही महत्वपूर्ण और गवेषणात्मक- अब्दुल बिस्मिल्लाह

उपन्यासकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कहा कि यह पुस्तक बहुत ही महत्वपूर्ण और गवेषणात्मक है । इस किताब कि शुरुआत आदिकाल से हुयी है ,सरहपा से हुयी है । बजरंग विमर्श कि शुरुआत वहाँ से करते है फिर संत तक आते है’।

मैं मूलत कार्यकर्ता था लेकिन अब धीरे –धीरे लेखक बन गया हूँ – बजरंग बिहारी तिवारी

अध्यक्षीय वक्तव्य के पहले बजरंग जी ने इस पुस्तक के संदर्भ में अपनी बात संक्षेप में रखी । अपनी दलित विमर्श कि रचना प्रक्रिया के विषय में भी बताया है । बजरंग जी ने कहा कि ‘वे मूलत कार्यकर्ता था लेकिन धीरे –धीरे लेखक बन गया । अब भी कार्यकर्ता ही हूँ । जो चीजें इसमे छूट गयी है वे अगली योजनाओं का हिस्सा हैं’ ।

यह दलित साहित्य पर मुकम्मल किताब की दिशा में पहला ठोस कदम- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि ‘यह दलित साहित्य पर मुकम्मल किताब की दिशा में पहला ठोस कदम है । मैं संजय जोशी को भी बधाई देता हूँ कि उन्होने पहली ही ऐसी पुस्तक छापी जिसकी बहुत जरूरत थी । यह पुस्तक 21 अध्यायों में विभक्त है जिसमे 4 वैचरिकी से संबन्धित है तथा शेष कविता कहानी ,आत्मकथा और दलित विमर्श से संबन्धित है ।  दलित विमर्श पर मुख्य धारा के साहित्य का दृष्टिकोण बहुत ही संकीर्ण है इसलिए इस पुस्तक का ऐतिहासिक महत्त्व है’ ।

कार्यक्रम मे आए हुये सभी लोगों और वक्ताओं का औपचारिक धन्यवाद अशोक भौमिक ने किया।