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पूरन सिंह की लघु कथायें

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डा. पूरन सिंह

चर्चित साहित्यकार पूरन सिंह कृषि भवन में सहायक निदेशक हैं. संपर्क : drpuransingh64@gmail.com>

भूत

बाबा बहुत मेहनत करते थे लेकिन जमींदार बेगार तो करवाता था, पैसे नहीं देता था। कभी-कभार दे दिए तो ठीक नहीं तो नहीं। उन्हीं पैसों से किसी तरह गुजर होती थी।

क दिन दोपहर को मैंने मां से कहा,‘‘बहुत भूख लगी है।’’
मां कुछ नहीं बोली उसने मिट्टी के बरतन उलट कर दिखा दिए थे।
मेरी भूख और तेज हो गई थी। भूख के तेज होते ही मस्तिष्क भी तेज हो गया था। पास ही श्मशान घाट था जहां बड़े .बडे लोग अपने बच्चों को भूत-पे्रत से बचाने के लिए नारियल, सूखा गोला पूरी-खीर कई बार मिष्ठान भी रख आते थे। यह सब काम दोपहर में होता था या फिर आधी रात को।

मैं श्मशान घाट चल दिया था। संयोग से वहां खीर पूरी और सूखा गोला रखा था। गोले पर सिंदूर और रोली लगी थी। मैंने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मैंने जल्दी-जल्दी आधी खीर पूरी खा ली थी और गोला झाड़ पोंछकर अपनी जेब में रख लिया। आधी खीर पूरी लेकर मैं घर आया था। मेरा चेहरा चमक रहा था।
चमकते चेहरे को देखकर मां ने पूछा, ‘भूख से भी चेहरा चमकता है क्या­। तू इतना खुश क्यों हैं?
मैंने बची हुई आधी खीर-पूरी मां के आगे कर दी थी। मां सब कुछ समझ गई थी। मां की आंखें छलक गई थी और उसने मुझे अपने आंचल में छिपा लिया था मानो भूत से बचा रही हो कि उसके होंठ फड़फड़ाने लगे थे, ‘भूत, भूख से बड़ा थोड़े ही होता है।’

मैं कुछ नहीं समझा था। मैं मां के आंचल में और छिपता चला गया था।

ब्लैकमेल 

मैं और परमानंद चैबे साथ -साथ स्कूल जाते ,साथ -साथ खेलते और साथ -साथ पढ़ते थे । इतना ही नहीे साथ -साथ खाते भी थे । परमानंद अच्छी – अच्छी सब्जी रोज लाता  और मैं भी रोज नई – नई सब्जियां लाता,फर्क सिर्फ इतना होता कि परमानंद की सब्जी रोज ताजा  होती और मेरी बासी,  क्योंकि मेरी मां जिन लोगों के  घरेां में पाखाने साफ किया करती वही लोग बासी या रखी हुई सब्जी मेरी मां को दे देते थे और मां वही सब्जी मेरे टिफिन में रख देती थी । परमानंद मेरी सब्जी खाते समय हमेशा यही कहता , यार मलघोटा, मैं तेरी सब्जी खाता हूं ,तूं यह बात मेरी मां से कभी मत कहना, नहीं तो वह मुझे बहुत मारेगी ।

मैंने सब्जी वाली बात उसकी मां से कभी नहीं कही।तभी एक दिन , हम दोनों में किसी बात पर लड़ाई हो गई । परमानंद शरीर से हृष्ट-पुष्ट था सो उसने मुझे खूब उधेड़ा । मैं बिलबिलाता रहा । अचाानक मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया , साले मार ले ,आज तेरी अम्मा से कहूंगा कि तूं रोज मेरी सब्जी खाता है फिर देखना………… हां।
बस फिर क्या था , परमानंद चैबे पीठ खेाले मेरे सामने खड़ा था ।

सुराही

फूलपुर का मवेशियों का मेला पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है । गाय , भैंस से लेकर उुंट ,भेड तक की खरीद -फरोख्त होती है । मेले में खेतिहर किसान से लेकर जमींदार तक आते हैं । अब  जब सभी लोग इसमे आते हैं तो उनके मनोरंजन का भी ध्यान रखा जाता है । इस बार मुन्नी बेडि़न की नौटंकी आई है । पूरे क्षे़त्र में हंगामा हो गया। कुछ लोग सिर्फ उसकी नौटंकी देखने ही मेले में जाते हैं ।

मुन्नी  में बला की सुंदरता है तो गजब की अदा भी। नाचने से लेकर कोई किरदार हो वह जान डाल देती है । पंडित रघुनंदन उसकी अदाओं के दीवाने हैं । वे जब नौटंकी देखने जाते हैं तो बहुत से लोग उनकी छत्रछाया मेें उनके साथ ही रहते हैं । बड़े धर्मी -कर्मी हैं पण्डित जी । पूजा- पाठ में पूरी आस्था है तो विश्वास भी है लेकिन मनोरंजन तो मनोरंजन ठहरा उसका पूजा- पाठ से क्या सम्बन्ध ।

एक दिन तो गजब ही हो गया जब मुन्नी ने कूल्हे मटका – मटकाकर छाती उघाड़ -उघाड़कर नाच दिखाया तो पंडितजी मानेा पागल हो गए हों । बस , फिर क्या था बुला लिया मुन्नी के कंपनी मैनेजर को ।

केदार , मुझे मुन्नी अच्छी लगती है । दिल आ गया है मेरा उस पर । बस एक बार के लिए ……………। पंडित जी ने अपना हुक्म सुना दिया था । पहले तो कंपनी के मैनेजर ने नानुकुर की लेकिन जब पंडितजी ने धमकाया तो मैनेजरका पाजामा गीला हो गया था ।

मुन्नी रात में नौटंकी में काम करती और दिन में आराम करती थी लेकिन जब से पंडितजी का दिल उस पर आया है वह दिन में सो नहीं पाती ।

उस दिन पंडितजी उसके साथ रति क्रिया में डूबे हुए थे । बहुत खुश थे । वे कभी मुन्नी के तलवे चाटते तो कभी नाभि से होते हुए होठों तक पहुंच जाते थे ।  बड़ी देर तक चाटने-चूमने के बाद पंडितजी थक गए थे जिससे उन्हें प्यास लग आई थी । उनके पास ही उनकी पानी से भरी सुराही रखी थी जिसे वह कहीं भी जाते अपने साथ ही ले जाते थे । ………पानी…… इतना ही कह पाए थे वह।

मुन्नी उठी और अपनेे लिए रखे पानी के घड़े से पानी निकालकर देने लगी  थी ।

 नहीं मुन्नी…नहीं ……… इतना भी नहीं …..। हम ब्राह्मण हैं …….वर्णश्रेष्ठ …… हम तुम्हारे हाथ से तुम्हारा पानी कैसे पी सकते हैं …….. हम पानी तो अपनी सुराही से ही पिएंगे ……..और पंडितजी ने स्वयं उठकर अपनी पीतल की सुराही से पानी पी लिया   था ।

किसान महिलाओं को विशेष अवसर दिये जायें

भारत  के असमान विभाजनों में एक विभाजन है -शहर और ग्रामीण का विभाजन ।
ग्रामीण महिलाओं की  जीवन प्रणाली के संदर्भ में बात की जाए तो बात और गंभीर हो जाती है। गाँवों मे रहने वाली महिलायें  खेती और खेती संबंधित रोजगार मेें जुड़ी हुई है- शायद इसलिए बेतहाशा कष्टमय जीवन ही उनके हिस्से में आया है। चूल्हा और चौका ही उनके  उसके जीवन की परिसीमायें हैं . महिलाओं का दर्जा निम्न  है। इसकी वजह दारिद्र्य , शिक्षा की व्वयस्था  का अभाव, धर्म-जाति का मानसिक प्रभाव, कम उम्र मे विवाह, स्वास्थ्य संबंधी  जागरूकता और सुविधा की कमीं , आर्थिक निर्णयों मे असहभाग आदि कारणों की वजह से हमारी 50% जनसंख्या आज भी पिछडी है।

ग्रामीण महिलाओं का साक्षरता दर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि अधिकतम संख्या में 39 से 69 तक की उम्र की महिलाओं को बेसिक शिक्षा की सुविधा ही प्राप्त हुई नही है। आज की नयी लडकियां शिक्षा ले रही है, लेकिन  गाँव में जितनी कक्षा तक स्कूल है, उसमें से अधिकांश की  उतनी ही पढ़ाई होती है।

हमारे देश में अभी 2011 में जातिगत जनगणना हुई , लेकिन सरकार इसे सार्वजनिक नही कर रही है। इस जनगणना से पता चलता है यहाँ दो भारत बसते हैं । शहरी भारत और ग्रामीण भारत। बडे उद्योगपतियों को पानी, बिजली, जमीन, टॅक्स, में सहूलियत देना शुरू है और किसान और अनुसुचित जाति और जन जाति के लिए निर्धारित सब्सिडी में कटौती की जा रही है.  24.39 करोड परिवार भारत में रहते है। उनमें से  17.91 करोड परिवार ग्रामीण भारत में रहते है। 2.36 करोड यानी  13.25 प्रतिशत लोग  ग्रामीण भारत में एक कमरे में रहते है। उनके  घर का छत और दिवार पक्का नहीं  है।   68.96 लाख परिवार में परिवार प्रमुख महिलायें हैं ।  इनमें से सिर्फ 16 लाख परिवार ही ऐसे हैं जहा महिला मुखिया 10 हजार रूपया  महीना से ज्यादा कमा रही है। 5.36 करोड़  यानी  29.97 प्रतिशत परिवार भूमीहीन हैं। वे  सिर्फ शारिरीक श्रम और मजदूरी करके जीते हैं।

इन दिनों  हमारे देश में आर्थिक विकास का खूब शोर है.   लेकिन महिलाओं की स्थिति, भारतीय अर्थव्यवस्था में दयनीय है। खासकर के ग्रामीण परिवारों  में महिलायें उपेक्षित जीवन जी रही हैं । 2011 में United Nations Gender Inequality index (GII) , जो कि श्रमिक  महिलाओ के  स्वास्थ्य और शिक्षा पर आधारित था, में भारत का 187 देशों मे 134 वा स्थान  है।  भारत की महिलाओं  के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण उनके  श्रम को अप्रशिक्षित  (Unskilled) माना जाना है । इसलिए उसे लगभग 85 रू प्रति  दिन की मजदूरी ($1.58 डाॅलर) मिलती  है।

ग्रामीण मजदूर महिलायें सामाजिक सांस्कृतिक परंपराओं में दबी हुई है। परिवार में पति का शराब, जुआ, मारपीट, गालौच, परिवार नियोजन के बारें मे उचित मार्गदर्शन का अभाव, स्वास्थ्य संबंधि मार्गदर्शन न मिलना – इन अव्यवस्थाओं के साथ वह जी रही है .  लड़की हुई तो उसकी हालत बहुत ही बुरी हो जाती है। सबसे ज्यादा मात्रा में श्रम करने वाली  महिलायें पूरी  दुनिया में आधी जनसंख्या है । वह हमारे उत्पादन क्षेत्रों में 2/3 काम करती है। दुनिया में वह जितना उत्पादित करती है, उसके हिसाब से सम्पत्ति में उसका हिस्सा नगण्य है , लगभग 1%.

उनका श्रम, अप्रशिक्षित  गिना जाता है, और उनके नाम से कही भी जमीन का टुकडा नही रहता । फिर भी सबसे कष्टदायक काम – जैसे कमर झुकाकर करनेवाले काम, सभी किसान पुरूषों ने महिलाओं को दे रखे हैं. जैसे कि जब कपास चुनना है तो  वह काम सारा दिन कमर से झुककर करना पड़ता है ।  मिनीस्टरी आॅफ ह्यूमन रिसोर्स के अनुसार कुल कामों में महिलाओं के प्रतिशत हैं :
प्रायमरी सेक्टर – 93%
सेकंडरी सेक्टर – 69%
पोस्टप्रायमरी सेक्टर (क्षेत्र) – 25%

प्रायमरी सेक्टर में खेती, पशुपालन, जंगल का काम आता है।  महिलाओं को पुरूषों की तुलना में ज्यादा काम और कष्टदायक काम, जैसे की कमर  झुकाकर पानी में धान लगाना, बीज बोना, कपास चूनना , आदि करना पडता है , लेकिन उसकी कीमंत नही दी जाती । वह सम्मान की भी  मोहताज होती है.  पुरूषों के श्रम की मात्रा कम होती है , कम  कष्टदायक काम करके भी महिलाओं के श्रम की कीमत से ज्यादा कीमत उनके श्रम को  है। कृषि  क्षेत्र में पुरूषों का काम ज्यादा ताकतवर माना जाता है । वे  हल चलाने  स्प्रे  डालना, सिंचाई करने जैसे काम करते है। इसके  कारण की चर्चा एक किसान से की  तो उसके मुताबिक किसान महिलाओं की लंबाई 5.2 फिट तक रहने के कारण कमर झुकाकर काम वहसुविधा से कर सकती है। लेकिन किसान का शरीर लंबा चौडा होने के कारण उसके लिए झुककर काम करना संभव नही । इससे वह बीमारी का शिकार हो जाऐगा । यही युक्ति है , जिसके कारण  पुरूष प्रधान खेती व्यवस्था महिलाओं की मजदूरी  में लिंग भेद करती है। महिला परिवार का चुल्हा -चौका,  बच्चों का काम , पति की सेवा, सब काम निपटा कर, खेती का भी काम दिन भर करती है। लेकिन उसकी सांपत्तिक स्थिती का या आर्थिक स्थिती का जायचां लें,  तो उसे पति की  प्राॅपर्टी का हिस्सा पति के मर्जी के अनुसार मिलता है । महाराष्ट्र में  घर की टॅक्स रसीद , या खेती के 7/12 पर पत्नी का नाम लिखना अनिवार्य किया गया है,  लेकिन अनपढ महिलाओं का इसका पता रहे तभी इसका अनुपालन संभव होगा .

महिलाओं को परिवार की सम्पत्ति में अपना हिस्सा  प्राप्त करने का कानून है। उसे इसका लाभ भी पूरी तरह से मिलता नही । हिंदू सक्सेशन अॅक्ट – 1956 के अनुसार उसे परिवार की संपत्ति में  हिस्सा सुनिश्चित है ,  लेकिन 2005 तक  कानून में दुरूस्ती नही कि गई, इससे परिवार के लडकी के लिए या बहनों को संपत्ती नही दी जाती थी। यह कानून मुस्लीम, ख्रिश्चन, पारसी महिलाओं को लागू नही है। बहुत से राज्यों में यह कानून उनके अलग अलग  परंपराओं के अनुसार लागू  है । लेकिन 2001 की  जनगणना के तहत एक  दुखद बात सामने आई की सिर्फ 11 प्रतिशत महिलायें खेती की मालिक है ।  महिला किसान के  श्रम की विडंबना  है कि वह सिर्फ खेती- मजदूरी करती है। काम करती रहती है, लेकिन उसे खेती का उत्पाद बेचनें का अधिकार नहीं  है। कभी वह गाड़ी में खेत का उत्पाद लेकर  बाजार  में बेचने नही जाती है। बाजार से उसका  संबंध कही भी नही आता, वह सिर्फ श्रमिक  है जिसकी  अत्यंत  कम मजदूरी मिलती  है- पुरूषो से आधा या एक तिहाई ! मायक्रो फायनान्स और सेल्फ हेल्प ग्रुप स्कीम  से उसे पैसे जमा करने की, कर्ज उठाने की सुविधा प्राप्त हुई,  लेकिन उसी कम मजदूरी के भरोसे यह चलाया जाता है। यदि  वह आत्मविश्वास से अनाज का नियोजन करती या उत्पादन को बेचती तभी सक्षम होती .

सरकार के Gender budget cell  मार्च 25,2013 के अनुसार संसाधन नियोजन में महिलाओं को 30%
अवसर दिया गया है। सरकार की 11 वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के अनुसार Gender Audit किया जाने वाला है । युनेस्को इसकी व्याख्या करता है-gender audit as management & planing tool.(जेन्डर आॅडीट नियोजन का साधन और व्यवस्था है) । Gender Audit स्त्री सशक्तिकरण और स्त्री पुरूष समानता लाने का प्रयास करेगा। इससे पता चलेगा कि हमारे देश में महिलाओं की स्थिति कैसी है। इसके तहत भाषा, स्त्री पुरूष का स्थान, रोजगार में स्थिति, काम का क्षेत्र, स्त्री अत्याचार का प्रमाण आदि विषयों का जायजा लिया जाता है। लकिन ग्रामीण मजदूर महिलाओं की स्थिति का Gender Audit अलग से नही किया गया है। सभी महिलायें एक साथ ली गई हैं । लेकिन हमारे देश में ग्रामीण शहरी विभाजन की जरूरत है। गाव में सब तरफ सुखा है। शहरों ने सब लूट लिया है।

खेत मजदूर  महिलाओं के जीवन पर गेट और डंकेल प्रस्तावों का भी असर पडा है.  इसका सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिणाम नकारा नही जा सकता. खुली अर्थव्यवस्था और पूजीवांदी व्यवस्था का परिणाम खेत ओर खेती पर आधारित जीने वालों  पर पडा है ।  2008 में  4.25 करोड किसानों को  साठ हजार करोड की कर्जमाफी दी गई और कार्पोरेट क्षेत्र का हिसाब देखें  तो उनका 1 लाख करोड का  बकाया कर्जा, सभी सार्वजनिक बैंकों  ने अपने अपने बहीखातो से हटा दिया , मतलब कर्जा माफ किया गया और उन्हे 494, 836 करोड का नया कर्जा दे दिया गया.  साठ हजार करोड का कर्जा किसानो को माफ किये जाने की घोषणा में सिर्फ 10 प्रतिशत किसानो को फायदा हुआ, क्योंकि वो उस कर्जमाफी के नियमों मे बैठते नही थे।  किसानो की हालत दिन ब दिन बदत्तर होती जा रही है, किसान सरकार के नजरों में कही भी नही है,  वह इस व्यवस्था के आर्थिक अन्याय का  शिकार है । म. जोतिबा फुले, ने  महाराष्ट्र के किसानो के लिए ‘किसानो का कोडा’ में लिखा कि अशिक्षित किसान  जाति, धर्म, बिरादरी में बंटा है,  अंधश्रद्धाओं पर विश्वास रखता है ,  महिलाओं के बारे में भेदभाव रखता है इसलिए उसका सारा परिवार, वह खुद और उसकी पत्नी  इस विषमतापूर्ण व्यवस्था का  शिकार हो जाता  है। डाॅ. बाबासाहब ने किसान के बच्चे पढे़ इसलिए आरक्षण का प्रावधान किया। नहरों में पानी  संचय का, सिंचाई का, नदी जोडने का मार्ग बताया, साहुकार से कर्जा न ले इसलिए बँको का राष्ट्रीयकरण की बात की ।

किसान महिलाओं के प्रति उत्तरदायित्व न शासन दिखाता है ना पुरुष किसान खुद। इसलिए 2008 में जब मंदी का दौर आया  तो उसका सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को हुआ.  2013 में ‘प्लान  इंटरनेशनल और ओव्हरसीज डेव्हलपमेंट इन्सीट्यूट , की रिपोर्ट के अनुसार  मंदी के कारण बालमृत्यु का प्रमाण सबसे ज्यादा बढ़ गया । किसान महिलाओ को गरीबी के कारण पौष्टिक अनाज मिलना बंद हो गया. माताओं और बच्चों में कुपोषण बढ़ा , लड़कियों का  मृत्युदर बढ़ गया. वर्ल्ड  बैंक के मुताबिक जब दुनिया का उत्पादन 1 प्रतिशत कम होता है तो हर 1000 लडकियों में से 7  का  और  हर 1000 लड़कों में से 1 लडके की मृत्यु होती  है।

किसानों के उत्पादन को कम कीमत मिलने के कारण महिलायें परिवार और खेती में ज्यादा समय काम करती हैं , परिणामतः उनकी सेहत खराब होती है- गर्भधारण के समय इसका असर पड़ता है , नवजात शिशु  पर इसका असर होता है. बच्चो को घर में छोडकर वह खेत में रहती है उसका असर बच्चों के जीवन पर होता है। बच्चियां अपने से छोटे बच्चों को घर पर संभालती हैं , तो उनका  स्कूल छूट जाता . इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद महिलाऐं कभी पुरुषों  जैसी आत्महत्यायें नही करती हैं । डटकर परिस्थिति  का सामना करती हैं । दरअसल  खेत में काम करनेवाली महिला सबसे ज्यादा पीड़ित  महिला है। इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन देगा कौन ?

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कृषि प्रधान देश में महिला खेतिहर की दैन्य वास्तविकता

मंजू शर्मा

सोशल मीडिया में सक्रिय मंजू शर्मा साहित्य लेखन की ओर प्रवृत्त हैं .संपर्क : ई मेल- manjubksc@yahoo.co.in

आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

रोप गये साजन,
सजीव हुआ आँगन;
जीवन के बिरवा मीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

पी की निशानी
को देते पानी
नयनों के घट गए रीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

फिर-फिर सावन
बिन मनभावन;
सारी उमर गई बीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

तू अब सूखा,
सब दिन रूखा,
दुखा गले का गीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

अंतिम शय्या
हो तेरी छैंयाँ,
दैया निभा दे प्रीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

बच्चन जी के बिरवा का गीत केवल बिरवा का गीत नहीं भारत जैसे देश में जीवन का गीत है। लगभग 70 से 75% लोग ग्रामीण भारत में रहते हैं। भारत किसानों का देश है,  हमें बचपन-से ही किताबों में पढ़ाया जाता रहा है और अमूमन किसान कहते ही आँखों के आगे एक पुरूष,  जिसकी काँधों पर हल होता है, की छवि सामने आ जाती है। शायद ही कोई किताब ऐसी छपी हो जिसमें महिलाओं को भी खेत में श्रम करते हुए कहीं दिखाया गया हो। यही विडंबना है कि कृषि में उसकी भागीदारी लगभग 80% होती है लेकिन किसान के रूप में उसका कहीं नाम तक दर्ज नहीं होता , क्या सचमुच स्त्रियों की भागीदारी कृषि में नगण्य है या उनकी अहम् भूमिका को हमारे सामंतवादी सोच से परिपोषित समाज ने मान्यता नहीं प्रदान की है उसे? अपने ही आस-पास चंद किलोमीटर ताक-झाँक करते ही स्त्री की वो सारी भूमिकाएँ स्पष्ट होने लगती है, जिन्हें हमारा समाज जानबूझकर उपेक्षित करने की भरपूर कोशिश करता आया है।

अबतक हमसब किसान उसे ही कहते हैं,  जिसकी अपनी ज़मीन होती है या जो हल जोतता है। देश में 80% महिला कृषक ही खेती-बारी से संबंधित लगभग सारे कामकाज निपटाती हैं। सावन माह में मानसून की वर्षा के बाद धान के फसलों की बुआई शुरू हो जाती है और कुछ दिनों की अच्छी वर्षा के बाद खेतों में बिरवा (धान के छोटे-छोटे पौधे) उग आते हैं और उसके बाद इन महिला किसानों की कठिन दिनचर्या शुरू हो जाती है।

प्रात: जागकर परिवार के लोगों के लिए खाना-पीना बनाकर अर्थात् अपने घरेलू  कामकाज से निवृत्त होकर अपने लिए खाने की पोटली साथ बाँधे चल देती हैं उन खेतों की ओर जहाँ इनको दिन की रोपाई का काम खत्म करना है। और यहीं से शुरू होता है उनका घंटों पानी में घुटनों तक रहना,  जहाँ वे धान की छोटी-छोटी बिरवा को उखाड़ती हैं क्योंकि फिर इन्हीं खेतिहर महिलाओं द्वारा बिरवा के छोटे-छोटे गुच्छे तैयार किए जाते हैं और इन गुच्छों में से अलग-अलग करके इसे तय किए हुए दूसरे खेत में इन्हीं जुझारू खेतिहरों को पुन: रोपाई भी करना होता है। देश में आप और हम,  भले कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक,  किसी कोने में देख लें महिला खेतिहर ही रोपाई का काम करते हुए नज़र आएँगी।

बस एक बात इस रोपाई के समय अच्छी कही जा सकती है कि रोपाई के काम को सामूहिक रूप से खेतिहर महिलाएं  संपन्न करती हैं।और इस कठिन काज को निपटाते हुए रोपनी करती महिलाएँ गीत भी गाते जाती हैं। इन श्रम-सुंदरियों के जितने तेजी-से हाथ चलते हैं उतना ही अद्भुत लय इनके गायन में भी होता है,  जिसके अनुगूँज को दूर-दूर तक प्रकृति में हम सुन सकते है,जिसके छंद कुछ इस प्रकार होते हैं-
हाथ के लेल गे रेशमा
बाँस के बहंगिया गे
चल गेल कोईरिया फुलवरिया
एक कोस गेलें गे रेशमा दुई कोस गेलें गे।
पहिन लेंले गे रेशमा
धानी रंग के चुनरिया गे
चल गेंले तू कोईरी फुलवरिया गे।

क्यारियों से गुजरते राहगीरों के कानों तक भी कई बार इनके समवेत स्वर में गाते हुए स्वर सूरज को भी चुनौती देते हुए-से लगते हैं,क्योंकि रोपाई का समय ही ऐसा होता है,  जब सूरज की किरणें हमारे सिर पर सीधी गिरती हैं -ऐसे में इनका गीत गाना जान पड़ता है कि प्रकृति भी इन्हें जादुई और करिश्माई व्यक्तित्व की स्वामिनी बनाने को आतुर है-

नींबू पतइया गिरी जाला अँगनवा,
कैसे बहारूँ गे?
मोरे अँगनवा ससुर जी के डेरा
लगल हे हमरा झँपोलवा बहिनियाँ
कैसे बहारूँ गे?
मोरे अँगनवा भैंसुर जी के डेरा
ठेंक जतई हमरा से देहिया बहिनियाँ
कैसे बहारूँ गे?
मोरे अँगनवा पिया जी के डेरा
जल्दी-से जयबयी बहारवई अँगनवा,
नींबू पतइया गिरी जाला अँगनवा,
कैसे बहारूँ गे?

रोपाई (धान की रोपाई) से लेकर फसल के घर आने तक महिलाएँ,  जो खेतिहर हैं,  उनका काम समाप्त नहीं होता है ।पाँव कई बार घंटों तक पानी में खड़े होने से फूल जाते हैं फिर भी अगले दिन ये  पुन: सूर्योदय के बाद क्यारियों पर एक रिद्म में निरपेक्ष भाव से अपने गंतव्य पहुँच ही जाती है। सावन-भादो महीने में धान की रोपाई शुरू हो जाती है पर कभी भी किसी पुरूष को धान की रोपाई करते नहीं देखा गया है। वज़ह शायद यह भी रहती होगी कि महिला कृषक ‘वेस्ट एट रिपेईंग’ भी होती हैं क्योंकि भारत की पुरूष प्रधान व्यवस्था का एक अकाट्य सत्य यही है कि महिलाओं की दिहाड़ी पुरूषों के वनिस्पत हरेक क्षेत्रों में,  जहाँ दिहाड़ी निर्धारित होती है, कम होती है।

चेहरे पर बगैर किसी शिकन के कड़ी धूप में प्रकृति,भूख,दैन्य और जिंदा रहने की जंग लड़ते हुए भी ये श्रमिक –महिलायें जिस तन्मयता से अपने काम करती है , बदले में शायद ही कभी सही पारिश्रमिक भी दिया गया हो इनके खेत-मालिकों के द्वारा। गाँठ और निशान पड़े हुए खुरदरे हाथों को जब ये शाम को अपने मालिकों के सामने फैलाती हैं, तो शायद ही वह दिन कभी आया हो,  जब इन्हें इनकी कमाई का हिस्सा, इनकी हथेली को देख किसी खेत-मालिक ने पसीजकर पूरा-पूरा दिया हो। एक ही कहानी जिंदगी की इन खेतिहर महिलाओं की समूचे भारत में होती है। सारी मलाई एक तरफ़ और सारे अभाव,रिरियाहट,वंचना और यातना-तकलीफ़ एक तरफ़। कई बार तो इन स्त्रियों को मज़दूरी के बदले उनके मालिकों से मिलती है केवल भद्दी-भद्दी गालियाँ और पुन: लाचार स्त्रियाँ नमी को समेटती हुई कुछ अपनी पलकों की कोरों में तो कुछ मटमैले,चिप्पे लगे हुए और पहले-से गीले साड़ियों की आँचल में ,अपनी मड़ैये की ओर वापस चल देती हैं।

‘परमाणु ऊर्जा का नकार’ स्त्रियों के लिये इतना मह्त्वपूर्ण क्यों है ?

 भार्गवी दिलीप कुमार

शीतयुद्ध के दौरान शान्ति और परमाणु विरोधी आंदोलन स्त्री-अधिकार समूहों ने शुरू किए थे। सैद्धांतिक तौर पर युद्ध और ‘मर्दानगी’ के ताने-बाने पर चोट करना एवं व्यवहार में यद्ध तथा परमाणु बम/ऊर्जा के औरतों पर पड़ने वाले विशिष्ट दुष्प्रभावों को मुद्दा बनाना एक बेहतर और समतामूलक दुनिया के लिए ज़रूरी है। ये सिर्फ संयोग नहीं है कि फुकुशिमा से लेकर कूडनकुलम और जैतापुर तक औरतें परमाणु-विरोधी आंदोलन की अगली कतारों में हैं। स्त्रीवाद और परमाणु ऊर्जा  के मुद्दों  को व्य्ख्यायित  करता  यह  लेख
          कुमार सुंदरम 

विश्व की  भयंकरतम त्रासदियों में से एक,  यानि फुकुशिमा दाइची परमाणु सयंत्र दुर्घटना और उसके  बाद अन्य देशों के नागरिकों में परमाणु ऊर्जा को लेकर ब‌ढ़ते डर के मद्देनजर हमारे सीखने को कई सबक हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम कुछ सीखने की  पर्याप्त कोशिश कर रहे हैं ?

फुकुशिमा त्रासदी ने भारत के तमिलनाडु राज्य के एक सुदूर समुद्र-तटीय गांव ‘इन्दिंथकरई’ के निवासियों में अभूतपूर्व भय का बीज डाल दिया. त्रासदी के समय टेलीविजन पर दिखाई जा रही फुटेज में वहां के लोगों को मास्क पहने हुए,  सफ़ेद वस्त्रों में ,  एक जगह से दूसरी जगह भागते हुए,संदूकों में बंद होकर अकेले जीने  की कोशिश करते  हुए , विकिरण के खतरे को मापने वाली कई जांचों से गुजरते हुए और अपने रिहाइशी इलाकों को हमेशा के लिए छोड़ते हुए दिखाया गया था. इन खबरों ने तमिलनाड़ु के इस गांव के निवासियों पर इतना गहरा असर इसलिए डाला कि गांव की एक दीवार परमाणु संयंत्र से लगी  है वहीँ दूसरी ओर  समुद्र उसकी सीमा बनाता है. 2004 में आई सुनामी के बाद राज्य सरकार द्वारा बसाई गई सुनामी पुनर्वास कॉलोनी के रहवासी हर सुबह जागते ही कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विशाल गुंबदों को देखकर नई आशंकाओं से भर जाते हैं. आगे कुंआं पीछे खाई के बीच फंसे होने का खतरा ही वह शक्तिशाली उत्प्रेरक है , जो ‘इंदिन्थकर’  के लोगों के जमीनी संघर्ष को अब तक गतिशील रखे हुए है, वरना इस आंदोलन को कुचलने की कई कोशिशें, दायर किये गये हजारों झूठ मामले, पुलिस की गोलीबारी, तट-रक्षकों के छापे, गांव में बम रखने की कोशिशें, संघर्षरत दलों को पैसों से खरीदकर उन्हें बाँटने की की चालें, मुख्य नेताओं की गिरफ्तारियाँ और कई अमानवीय यातनाएं इस आंदोलन को कभी का ख़त्म कर देतीं .

हम अक्सर परमाणु ऊर्जा के विरोध में चले  इन आंदोलनों  के बारे में पढ़ते हैं, इन्हें कोसते हैं या कभी-कभार इनके समर्थन में कुछ कह देते हैं. लेकिन यह सच है कि परमाणु ऊर्जा के विरोध में चल रहे आंदोलनों और अन्य सामाजिक आंदोलनों के बीच एक बड़ा फासला है, संवाद की  कमी दिखाई देती है. 8 नवमबर, 2013  को ‘कोलिशन फॉर न्यूक्लियर डिसआर्मामेंट एंड पीस’ तथा पाकिस्तान-इंडिया पीपुल्स फोरम द्वारा संयुक्त रूप से दिल्ली में आयोजित ‘परमाणु शस्त्रों का खात्मा’ विषय पर हुए चर्चा सत्र में सुश्री अरुणा रॉय ने कहा , “परमाणु उर्जा के विरोध में हो रहे आंदोलनों को अपनी नीतियों में पुनर्विचार की जरूरत है. इसके  संवाद की भाषा व तेवर में भी बदलाव आना चाहिए. इस मुद्दे पर व्यापक जनचर्चा व बहस हो, जिससे सामान्य जन का पक्ष उभरकर सामने आ सके. इससे दूसरे सामाजिक आंदोलनों को भी यह भान  हो सकेगा कि ‘परमाणु ऊर्जा-करण किस तरह उनके आंदोलनों से जुड़ा है.’ या भूमि-अधिकारों, सूचना व स्त्री-अधिकारों के लिए चल रहे आन्दोलनों के लिए यह मुद्दा अपना क्यों नहीं बना सका है ? परमाण्विक मुद्दों से जुड़े जेंडर सम्बन्धी मामलों पर भी चर्चा व बहस की जरूरत है.”

जेंडर-अधिकार आंदोलनों में परमाण्विक मुद्दों के महत्व का बोध न होना एक मुद्दा हो सकता है, पितृसत्तात्मक परमाणु लॉबी के जेंडर के प्रति समस्यापूर्ण रवैये से निपटने में इन आंदोलनों की असफलता भी मुद्दा है. और परमाणु-विरोधी आंदोलनों द्वारा जेंडर-अधिकारों को अपने संघर्ष के मुद्दों में शामिल न किये जाने की गलती भी इस संवादहीनता का एक और भी पहलू है.असल में यह संकेत है कि हम मुद्दों को समग्र रूप  में नहीं देख पा  रहे हैं. इस मामले में जेंडर भिन्नताओं और लैंगिक भूमिकाओं का गहराई से अध्ययन करना जरूरी है ताकि ‘परमाणु ऊर्जा विभाग’ जैसी धुर तानाशाह , पूंजीवादी उपनिवेशी संस्था से लोहा लिया जा सके. होमी भाभा (1948-1966) से रतन कुमार सिन्हा (2012  से वर्तमान ) तक पिछले 66 वर्षों में इस विभाग के प्रमुखों की सूची पर नजर डालें तो मूल प्रश्न यही उभर कर आता है कि यह पद अभी तक किसी महिला को नहीं मिला. क्या  यह एक सोची-समझी योजना का हिस्सा नहीं लगता ?

1987  में किये गए एक अध्ययन ‘परमाणु मुक्त व निशस्त्रीकरण के प्रति नजरिये में जेंडर की वजह से भिन्नता’ से इस अनुमान की पुष्टि होती है. अध्ययन के परिणाम साफ तौर पर बताते हैं “पिछले 30 वर्षों में पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ सैन्य अभियानों व सेना पर खर्च के ज्यादा खिलाफ थीं तथा शांति व समता की बड़ी समर्थक. वहीँ पुरुष सामान्यतः बल प्रयोग, मृत्युदंड व सैनिक अभियानों के पक्ष में थे और उन्हें बंदूकों व युद्धों पर नियंत्रण से सख्त ऐतराज था. अधिकांश स्त्रीवादी सिद्धांत भी इस धारणा पर बल देते हैं. जैसे कि सामाजिक स्त्रीवादी सिद्धांत यह दावा करता है कि “स्त्रियों की कमजोर आर्थिक स्थिति उन्हें विश्व को पुरुषों से भिन्न नजरिये से देखने के लिए प्रेरित करती है” और अधिक निश्चितता वाला जैविक सिद्धांत कहता है कि “स्त्रियाँ अपनी जैविक क्षमता के कारण मानव जाति के धरती पर बने रह्ने में एक अलग तरह की भूमिका निभाती हैं और इसलिए दुनिया को देखने का उनका नजरिया मूलभूत रूप से ही  अलग होता है”
परमाणु ऊर्जा-करण का जेंडर मुद्दों से सीधा संबंध है, इस सचाई को देखने की या तो कोशिश ही नहीं की जाती या फिर सावधानी से इस तथ्य को नजरअंदाज किया जाता है. युद्ध के परिप्रेक्ष्य में ‘स्त्रियों का जीवन’ सिर्फ हाशिये की चीज होता है, केंद्रीय कभी नहीं.

पिछले कई वर्षों का हमरा अनुभव कहता है कि अधिकांश सामाजिक आन्दोलन जमीनी स्तर पर स्त्रीवादी नजरिया अपनाने से सुदृढ़ व सफल हुए हैं और अपना अस्तित्व बनाये रख पाये हैं. यह साफ है कि ‘परमाणु अस्त्रीकरण या परमाणु ऊर्जाकरण के सामाजिक प्रभावों’ का मुद्दा स्त्रियों द्वारा ही सफलतापूर्वक उठाया जा सकता है, क्योंकि एक ऐसे देश में जहाँ आवास , भोजन, पानी, बिजली, स्वास्थ्य व शिक्षण जैसी मूलभूत आवश्यकतायें भी अब तक पूरी आबादी तक न पहुँच पाई हों, वहां संसाधनों की कमी स्त्रियों पर ही सबसे बड़ी आपदा बनकर टूटती है क्योंकि इन संसाधनों का बहुत छोटा हिस्सा ही उन तक पहुँचता है. बहुत छोटी लगने वाली चीजें जैसे पानी की कमी का मतलब एक स्त्री के लिए मेहनत में अतिरिक्त बढ़ावा है क्योंकि अब उसे अधिक दूर से पानी लाने  में ज्यादा समय व ऊर्जा व्यय करनी होगी और वह भी दिन के असुविधाजनक समय में. यह तो मात्र पानी की कमी की बात हुई, परमाणु आपदा के स्त्री पर अन्य अनगिन प्रभावों के बारे में विचार किया जाये तो ? जेंडर अधिकारों तथा और अन्य मुद्दों पर जमीनी लड़ाई लड़ रहे आंदोलनों को एक मंच पर लाने के इस विचार के पीछे मंशा यही है की परमाणु नीति पर एक सहमति बनाई  जा सके और परमाणु-विरोध को सबका सार्थान  मिल सके. साथ ही परमाण्विक संस्थानों के घोर पितृसत्तात्मक रवैये को स्त्रीवादी पक्ष की  चुनौती मिल सके. भारतीय परमाणु-नीति के इस अजीबोगरीब चरित्र या लापरवाही को ध्यान से देखें तो पायेंगे कि सारी  नीतियाँ न सिर्फ नैतिक प्रश्नों को दरकिनार करती चलतीं हैं बल्कि उनका जेंडरीकरण करके समस्या और बढ़ा देती हैं. यह कुलीन तबका अपने आपको तार्किक, वैज्ञानिक, आधुनिक और हाँ, सबल भी सिद्ध करना चाहता है; जबकि समाज व पर्यावरण की बलि चढ़ाकर नैतिक प्रश्न विकास-विरोधी, अनाधुनिक व थोथे भावात्मक कह कर परे ढकेल दिए गये हैं. सोच विचार का यह मार्ग सुझाता है कि मानवजीवन और कल्याण के प्रश्न, न जाने क्यों, न तो आधुनिक हैं और न ही पर्याप्त सफलता के सूचक. दरअसल यही सिद्ध हो रहा है कि चाहे मनुष्य में शांति व नैतिकता लाने की न तो कूवत हो और न उसे इनकी परवाह हो लेकिन वह पुरुष-स्त्रियों दोनों के लिए भयंकर परिणाम वाले निर्णय लेने की स्वतंत्रता जरूर चाहता है.

इन चौखटों को तोड़ना आज के वक़्त की जरूरत है और इदिन्थकरई या भोपाल की स्त्रियों के अकेले नेतृत्व सँभालने मात्र से यह लक्ष्य नहीं पाया जा सकेगा. बल्कि हम सबको साथ मिलकर अपनी-अपनी भूमिकायें तय करनी होंगी और परमाणु ऊर्जा पर बहसों को स्त्रीवादी नजरिये से देखना शुरू करना पड़ेगा. इदिन्थकरई की स्त्रियों ने अपने संघर्ष को मात्र अपनी जिंदगी से जुड़ा एक छोटा मुद्दा नहीं बनाया बल्कि उसे पृथ्वी माँ को बचाने जैसे व्यापक लक्ष्य से जोड़ लिया है और इस तरह एक अच्छा उदहारण हमारे सामने पेश किया है. इस जमीनी संघर्ष का अध्ययन गहराई से व जल्द ही होना चाहिये.
1980 के दशक में विश्व भर  में हुए परमाणु-विरोधी आंदोलनों में स्त्रियों ने महती भूमिका निभायी थी. यहाँ तक की उन्होंने एक वीमेंस फोरम की स्थापना थी, जिसका लक्ष्य परमाणु-अस्त्रों  से मानव जाति को मुक्त करना था. और जिसने यूरोप, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व जापान की स्त्रियों की अगुवाई में सेना की छावनियों  में कैंप किये थे. इसकी गतिविधियों से यह स्पष्ट हो गया था कि परमाणु-संस्थानों से संघर्ष में स्त्रीवादी तरीकों का क्या महत्व है. वक़्त आ गया है कि सच्चाई  को हम विश्व के इस भारतीय भूभाग में भी अनुभव करें.

भार्गवी ‘प्रोग्राम फॉर सोशल एक्शन’ से जुड़ी हुई हैं, सम्पर्क :bhargavi.dilipkumar@gmail.com
अनुवाद- आकांक्षा, पीएच.डी. शोधार्थी, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली.

अथ (साहित्य: पाठ और प्रसंग)

अनुपमा शर्मा


दिल्ली विश्वविद्यालय की शोधार्थी। कविताएं, समीक्षाएं, आलेख-पाठ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।सम्पर्क : anupamasharma89@gmail.com

पिछले दिनों आलोचक राजीव रंजन गिरि की पुस्तक ‘अथ (साहित्य : पाठ और प्रसंग)’ प्रकाशित हुई. देखा जाए तो यह पुस्तक भिन्न भिन्न अवसरों पर लिखे गए साहित्यिक लेखों का संकलन है,  जिनमें भरपूर वैविध्य मौज़ूद है कुछ शोध आलेखों के रूप में हैं, कुछ समीक्षात्मक ढंग में तो कुछ टिप्पणी की तर्ज़ पर लिखे गए लेख हैं. इन आलेखों के बहाने लेखक ने हिंदी साहित्य के अतीत और वर्तमान को पहचानने और विश्लेषित करने का प्रयास किया है. भले ही ये आलेख अलग अलग स्थितियों और समय में लिखे गए हों,  किन्तु हिंदी साहित्य के समय क्रम को एकसूत्रता में आगे बढ़ाते हुए ये लेख भक्ति काल से प्रारम्भ होकर आधुनिक काल, प्रेमचंद, जैनेन्द्र से होकर गुज़रते हुए अज्ञेय, नामवर सिंह तथा वर्तमान साहित्यिक विमर्शों तक की यात्रा तय करते हैं. लेखक ने इन आलेखों की अन्विति को बनाए रखने के लिए इन्हें नौ खण्डों में विभाजित किया है. जिनमें भक्ति आंदोलन का अवसान और अर्थवत्ता, आधुनिकता की तलाश, साम्प्रदायिकता सत्ता और साहित्य, प्रेमचंद, जैनेन्द्र का रचना संसार, अज्ञेय, भाषा साहित्य और शिक्षण पर बहुत ही वाजिब ढंग से विचार किया गया है. इन आलेखों को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित इस तरह संयोजित किया गया है कि पूरे वर्तमान हिंदी साहित्य की एक मुकम्मल तस्वीर उभर पाए.

पहला खंड ‘सार सार को गही रखे’
के केंद्र में मूलतः भक्ति काल के अंतिम पर्व को इस कालखंड की रचनाओं के आलोक में समझने की कोशिश की गई है, इसी कड़ी में तुलसीदास, राधा एवं कबीरदास पर हुए अध्ययनों पर लेखक राजीव रंजन गिरि ने सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषणात्मक ढंग से अपने विचार प्रस्तुत किए हैं. भक्ति आन्दोलन का उदय अपने समय के गहरे तनाव, संघर्षों एवं अंतर्द्वंद्वों का परिणाम था. ‘भक्ति आन्दोलन का अवसान और अर्थवत्ता’ लेख में भक्ति काल को भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण परिघटना के रूप में देखा गया है तथा इसके अवसान और उसकी वर्तमान अर्थवत्ता की अब तक हुए साहित्यिक अध्ययनों एवं शोधों के आधार पर विचार रखते हुए गहरी पड़ताल की गई है. यहाँ प्रश्न यह भी उठाया गया है कि जहाँ से भक्ति काल के पराभव को चिह्नित किया जाता है, वहां से परिस्थितियाँ असल में किस रूप में परिवर्तित हुई. यह भी शिनाख्त करने की कोशिश की गई है कि क्या भक्ति आन्दोलन के अवसान के पश्चात भक्ति साहित्य की रचना बंद हो गई. लेखक राजीव रंजन गिरि के शब्दों में “कला-संसार के भीतर की परिघटना के मद्देनज़र, यह कहना बेहतर होगा कि सांस्कृतिक इतिहास के एक ख़ास क्षण में, उस तरह की रचना का जो महत्व होता है, बाद में नहीं रह पाता,.. मनुष्य की चेतना के निर्माण में उसका वह महत्व नहीं रह जाता, जो तब था.” लेखक ने भक्ति काल के साहित्य पर अब तक हुए अध्ययनों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, रांगेय राघव और मैनेज़र पाण्डेय की भिन्न भिन्न समय पर दी गई मान्यताओं को भी तथ्यों एवं तर्कों की कसौटी पर विचारा है. लेखक की चिंता के दायरे में यह ज़रूरी सवाल भी मौज़ूद है कि जिस कैनननाइजेशन की परम्परा के चलते, भक्ति काल के सभी कवियों को एक कवि के लिए निर्मित प्रतिमान एवं प्रविधियों के चश्मे से देखा गया. ऐसे में क्या एक कवि विशेष के लिए निर्मित आलोचना प्राविधि अन्य कवियों के साथ न्याय कर सकती है. भक्ति काल के इन अंतर्विरोधों की पड़ताल करते हुए ही समीक्षात्मक लेख ‘अंधश्रद्धा भाव से आधुनिकता की पड़ताल’ में तुलसीदास को लेकर चले आ रहे पूर्वग्रहों से असम्पृक्त कर श्रीभगवान सिंह की पुस्तक ‘आधुनिकता और तुलसीदास’ के आलोक में तुलसीदास को लेकर चली आ रही परम्परागत मान्यताओं पर विचार किया गया है जिसमें तुलसी साहित्य के सामंती मूल्यों के रक्षक होने जैसी धारणाओं को खारिज़ कर मध्यकालीन परिवेश की सीमाओं के बीच तुलसीदास के साहित्य के सकारात्मक पहलुओं का भी विश्लेषण किया गया है. यह पुस्तक आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में एक संतुलित एवं तार्किक दृष्टि से तुलसी साहित्य को परखते हुए तुलसी को न केवल बढ़-चढ़कर ‘सामंत विरोधी’ मानती है अपितु मध्यकालीन बोध की सारी सीमाओं को नज़रंदाज़ कर तुलसीदास को अत्यंत आधुनिक घोषित करती है.

इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसका एक पूरा खंड हिंदी उर्दू के अमर कथाकार प्रेमचंद पर केन्द्रित है जिसमें  नौ आलेख हैं. प्रेमचंद के माध्यम से हिंदी साहित्य में जिस प्रगतिशील आन्दोलन का सूत्रपात माना गया, यह खंड उसी के आलोक में प्रेमचंद की रचनाओं के जरिए उस दौर की देशकाल परिस्थितियों को समझने एवं व्याख्यायित करने का प्रयास करता है. प्रेमचंद जिस समय में साहित्य को जीवन की आलोचना के रूप में देख रहे थे, वे स्पष्ट तौर पर बदलते समय को बारीकी से देख व समझ रहे थे यही कारण है कि उनकी रचनाओं में उठाए गए मुद्दे आगे चलकर साहित्यिक विमर्शों की दुनिया का हिस्सा बनते है. प्रेमचंद अपने साहित्य में दलितों, पीड़ितों एवं वंचितों की समस्याओं को बयान करते हुए भी एक साहित्यकार की प्रतिबद्धताओं को बखूबी समझते है तभी वे साहित्यकार को समाज की आगे चलकर मशाल दिखाती सच्चाई के रूप में देखते हैं. उन्होंने साहित्यकार को स्वभावतः प्रगतिशील माना. लेखक राजीव रंजन गिरि ने प्रेमचंद की रचनाओं के माध्यम से प्रेमचंद की अपने समय के प्रति, उसके सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धताओं की पड़ताल की है. प्रेमचंद की दलित जीवन पर लिखी कहानियों को केंद्र में रखकर लिखा गया लेख ‘दलित जीवन पर दृष्टि’ भी प्रेमचंद की कहानियों के माध्यम से दलित सवालों से संवाद करता लेख है जहाँ प्रेमचंद की कहानियाँ शुरू से आखिर तक दलित एवं स्त्री जीवन की समस्याओं को अपने चिंतन के दायरे में रखती हैं. एक ओर जब देश अंग्रेजों के विरुद्ध गुलामी से मुक्ति के लिए लड़ रहा है वहीँ दूसरी ओर भारतीय समाज एक दूसरे किस्म की गुलामी एवं प्रताड़ना की नींव रख रहा था. लेखक ने प्रेमचंद की कहानियों के माध्यम से ही सही पर पॉवर स्ट्रक्चर पर एक ज़रूरी और बुनियादी सवाल उठाया कि दलित जीवन की कहानियों के पात्रों की आर्थिक और सामाजिक बदहाली ही ऐसे अमानवीय जीवन एवं शोषण का तानाबाना बुनती है, इस आर्थिक और सामाजिक बदहाली में एक अनिवार्य रिश्ता है जो इस संक्रमित समाज और व्यवस्था की उपज है, प्रेमचंद के पात्र इन दोनों प्रकार के शोषण के शिकार हैं किन्तु प्रेमचंद वैचारिकी के स्तर पर अपने दलित पात्रों को आगे ले जाते हैं तथा उन्हें विकसित करते है , जिसमें यदि वे शोषण को सहन करने वाले पात्र दिखाते हैं तो वे इस व्यवस्था के प्रति प्रतिरोधी स्वर दर्ज़ कराने वाले पात्रों को भी सामने लाते हैं. मंदिर, कफ़न, सद्गति, ठाकुर का कुआँ इत्यादि प्रेमचंद की ऐसी ही कहानियाँ हैं जिन्हें लेखक ने प्रेमचंद की दलित जीवन पर दृष्टि बिम्बित करने का आधार बनाया है. इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण लेख ‘प्रेमचंद का बाल साहित्य’ है जो इस पुस्तक को विशेष रूप से संग्रहणीय बनाता है. प्रेमचंद के साहित्यिक विमर्शों से जुड़े साहित्यिक सृजन पर भरपूर ध्यान दिया गया जिसके चलते प्रेमचंद का बच्चों के लिए रचा गया साहित्य अपेक्षाकृत कम चर्चित हुआ. लेखक ने बहुत ही ज़रूरी ढंग से इस साहित्य की ओर ध्यान आकर्षित करने वाला लेख लिखा है. प्रेमचंद का बाल साहित्य कर्तव्य परायणता, ईमानदारी, सदाचार, सच्चाई, निर्भीकता, आपसी प्रेम सौहार्द और निज विवेक के विकास की शिक्षा देता है. यह भी ध्यातव्य है कि प्रेमचंद ने अपनी साहित्यिक समझ के बीच बच्चों के लिए साहित्य रचने को हिक़ारत के भाव से न देखकर दायित्व के रूप में लिया जिसका उद्देश्य भारतीय बालकों को चेतना संपन्न बनाना था.

इस पुस्तक का विशेष महत्व इसलिए भी दृष्टिगोचर होता है
कि लेखक ने विभिन्न स्थितियों, मनःस्थितियों एवं समय की माँग के अनुरूप ये आलेख लिखे हैं जिसमें यदि भक्तिकाल पर, भारतेंदु पर तथा प्रेमचंद पर विचार रखे गए हैं तो इसमें वर्तमान साहित्य को भी समाहित किया गया है. ‘हीरा भोजपुरी का हेराया बाज़ार में’ लेख कथाकार संजीव के उपन्यास ‘सूत्रधार’ पर केन्द्रित है. यह उपन्यास भोजपुरी भाषा के लोक कलाका भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित है. लेखक ने इस आलेख को दो भागों में लिखा है, पहले हिस्से में बजरिये ‘सूत्रधार’ कथाकार संजीव अपने कथा नायक भिखारी ठाकुर के जीवन और उस जमाने को जिस रूप में दिखाना चाहते हैं, उसे ज़ाहिर किया गया है. यह हिस्सा संजीव के पक्ष की व्याख्या है. दूसरे हिस्से में, संजीव के देखन और दिखावन का विश्लेषण करते हुए, उसमें निहित समस्याओं की तरफ इशारा किया गया है, ताकि कथाकार के पक्ष की जांच-पड़ताल हो सके. लेखक राजीव रंजन गिरि ने यह लेख भारतीय समाज की जटिलताओं के बीच ‘सूत्रधार’ को रखकर लिखा है जिसमें बेहद तर्कसंगत ढंग से उन्होंने इसकी समीक्षा की है.

गत वर्षों में साहित्यिक जगत में जिन विमर्शों ने जोर पकड़ा उनमें स्त्री  अस्मिता को लेकर बहुत ही ज़रूरी आवाज़ उठाई गई. लेखक ने अपने लेख ‘कविता में स्त्री’ में कहा भी है कि “वैचारिक विमर्श में स्त्री को एक कोटि के तौर पर स्थापित करने के लिए स्त्री अस्मिता का अतिरिक्त रेखांकन आवश्यक है. स्त्री ही क्यों किसी भी अस्मिता की पहचान के लिए यह पहल ज़रूरी है.” लेखक ने इस लेख में हिंदी स्त्री कविता में अनामिका के अवदान का विश्लेषणात्मक विवेचन किया है. यह लेख अनामिका के बहाने ही सही, अपनी वैचारिक समझ को प्रगतिशील रखने वाले लोगों से प्रछन्न रूप में ही सही स्त्री को वर्ग के वृत्त से बाहर रखने का आग्रह भी करता है. यह लेख कई सवाल भी उठाता है जिसमें अनामिका तथा इस दौर के अन्य रचनाकार, उनकी रचनाधर्मिता को कठघरे में खड़ा करता है जहाँ आत्मचिंतन की आवश्यकता शिद्दत से महसूस हो रही है कि क्या इस पीढ़ी का रचनाकार कविता के नाम पर केवल विचार को उगल रहा है चूँकि यदि विचारों को कविता के रूप में तरलता से संपादित न किया जाए तो यह कविता विचार के स्तर पर कितनी कारगर होगी यह सोचना लाज़िमी हो जाता है. एक कमज़ोर कविता किसी महत्वपूर्ण विचार को भी क्षीण कर देती है. इस लेख के द्वारा अनामिका का कविता के ज़रिए स्त्री-विमर्श में कलात्मक हस्तक्षेप प्रकट होता है.

प्रेमचंद ने वर्षों पहले कहा था कि कोई भी समाज तब तक विकास या प्रगति नहीं कर सकता जब तक उस
समाज के किसानों, दलितों एवं स्त्रियों की दशा नहीं सुधरती। उन्हें मनुष्य नहीं माना जाता, प्रेमचंद के इस कहन की जबकि हम हीरक जयंती मना चुके हैं तब भी स्थिति यह है कि हाशिए की पट्टी निरन्तर चौड़ी होती जा रही है. मुक्ति की चाह लिए हुए समाज का यह हिस्सा आज भी शोषण-अन्याय से पीड़ित है. जब पंछी धरती के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध अपनी पहली उड़ान भरता है तब जिस ऊर्जा से वह संचालित होता है, वह होती है – मुक्ति की चाह और उड़ान की अकुलाहट. समाज के इस हिस्से की आँखों में आज भी मुक्ति का स्वप्न और उन्मुक्त आकाश में उड़ पाने की अकुलाहट बनी हुई है. छठा खंड है-  ‘उड़ान की अकुलाहट’ यह मुख्यतः स्त्री-दलित विमर्श पर केंद्रित खंड है। जिसमें आठ लेखों के माध्यम से पितृसत्तात्मक संरचना के बीच में गढ़ती नई स्त्री छवि का बारीक़ी से विश्लेषण करने के साथ-साथ दलित अस्मिताओं पर भी विचार किया गया है. महादेवी वर्मा, पंचतंत्र, बेबी हालदार पर आधारित आलेखों के अलावा अरूण कमल की कविता पर आधारित आलेख लेखक की स्त्री विमर्श पर गहरी पकड़ को दर्शाते हैं. ‘मुक्ति-आकांक्षा की रचनाकार’ लेख जिसमें महादेवी वर्मा की रचनाओं की बाबत कई अनसुलझे सवालों पर गौर किया गया है. एक लम्बे इतिहास की पैठ में महादेवी को जिस स्टीरियो में क़ैद कर दिया गया तथा “मैं नीर भरी दुःख  की बदली” तक ही सीमित कर दिया गया, जबकि वे अपने विचारों में स्त्री पराधीनता को, उनके मुक्ति के स्वप्न को चरम पर रखती हैं. ऐसे में महादेवी को पढ़ने की एक नई दृष्टि प्रस्तावित करना काबिलेगौर है. महादेवी को स्त्री अधिकारों के पक्षधर के रूप में इस आलोक में देखने की  कोशिश करना कि जिस समय वे ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ लिख रही थीं उस समय कालांतर में स्त्री मुक्ति का बिगुल बजाने वाली सिमोन द बोउवार महज़ बच्ची थीं, भी महादेवी के विचारों के विश्लेषण, अंतर्विरोधों एवं सीमाओं को जानने-समझने का प्रस्थान बिंदु हो सकता है. लेखक अपने इन लेखों में उन सभी पशोपेशों से गुज़रता नज़र आता है जिनसे होकर एक स्त्रीत्व गुज़रता है. ‘सौंदर्य का मिथक निर्माण’ लेख में स्त्री छवि से लेकर सेक्स और जेंडर की तमाम तरह की बहसें समाहित  हैं जो स्त्री को कभी बायोलॉजिकल कन्स्ट्रक्ट मानती है तो कभी सोशियोलॉजिकल. ग़ौर करने पर दिखता है  कि पितृसत्ता ने जेंडर को भी प्राकृतिक, स्वाभाविक गुण के रूप में प्रचारित किया है असल  मायने में स्त्री विमर्श की सबसे बड़ी चुनौती स्त्री मुक्ति के लिए इसी ‘जेंडर’ से मुक्ति है.

बकौल लेखक ‘‘पितृसत्तात्मक संरचना अपने को नये रूप में ढ़ालकर स्त्री-देह का वस्तुकरण कर रही है। संभव है इसके पक्ष में ऊ परी तौर पर स्त्री की मर्जी भी दिखे। पर सोचने की बात है कि इस ‘मर्जी’ को कौन सी सत्ता परिचालित कर रही है, नियंत्रित कर रही है? लिहाजा पितृसत्ता की दहलीज को खुद लॉंघने के बावजूद स्त्री-देह किसके नियंत्रण में है, कौन सी ताकत इस दिशा में ठेल रही है, यह पहलू नजरअंदाज करके स्त्री-मुक्ति का न तो यथार्थ समझा जा सकता है और न ही यूटोपिया की रचना हो सकती है’’ स्त्री मुक्ति पर ही लिखा हुआ लेख स्वप्न भी एक शुरुआत है’ भी अरुण कमल की कविता ‘स्वप्न’ को आधार बनाकर कविता जगत में स्त्रीवादी दृष्टिकोण एवं स्त्री मुक्ति के विषय पर हस्तक्षेप करता एवं साथ ही ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ की धारणाओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को प्रकट करता लेख है. जहाँ पितृसत्तात्मक समाज के बीच स्त्री की जद्दोजेहद प्रकट होती है.  अरुण कमल की कविता में एक स्त्री है जो बार-बार ससुराल से मार खाकर भागती है और फिर अँधेरा होने पर उसी जगह लौट आती है और फिर मार खाती है.  इस लेख में मुक्ति का स्वप्न है, जिसमें स्त्री जीवन से मृत्यु की ओर नहीं अपितु मृत्यु से जीवन की ओर भाग रही है. इसकी पंक्तियाँ भी हैं- “मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न.” इस कविता में स्त्री के पास कहीं कोई रास्ता नहीं है और कहीं कोई अंतिम विकल्प के रूप में आसरा भी नही. ज़ाहिर है उसे अपना रास्ता खुद बनाना होगा, विकल्पहीनता में खुद विकल्प बनकर  उभरना होगा.  भले ही आज वह यूटोपिया लगे पर इस
उम्मीद के साथ कि कल यह हकीक़त होगा. इस लेख के अंत में वेणु गोपाल की एक कविता उदधृत है- “न हो कुछ भी/ सिर्फ सपना हो/ तो भी हो सकती है शुरुआत/ और यह एक शुरुआत ही तो है/ कि वहां एक सपना है.”

‘उड़ान की अकुलाहट’ में स्त्री विषयक एवं दलित विमर्श से जुड़े लेख हैं
‘अबकी जाना बहुरि नहीं आना’ शीर्षक अध्याय दलित और स्त्री आत्मकथाओं पर केंद्रित है जिसमें बेबी हालदार के रोज़नामचे के रूप में लिखी आत्मकथा के बहाने परिवार के भीतर पनपने वाली उपनिवेशवादी मानसिकता को बेबाक़ी से उघाड़ा गया है. ‘यातना का यथार्थ और मुक्ति का स्वप्न’लेख भी दलित आत्मकथाओं पर केंद्रित लेख है.  कुल मिलाकर राजीव रंजन गिरी के लिखे ये सभी स्त्री एवं दलित विषयक लेख यातना और दंश के कटु यथार्थ और इससे मुक्ति के स्वप्न को चित्रित करते हैं. ये लेख जिस उम्मीद से लिखे गए हैं वो है इन्सान को इन्सान समझे जाने की उम्मीद, शोषण से मुक्त समाज का स्वप्न लिए हुए जहाँ सभी के लिए समान रूप से उड़ान के लिए अथाह एवं उन्मुक्त आकाश हो, हाशिया बनाने के लिए जगह न हो.

इस पुस्तक की एक बड़ी उपलब्धि इसका आठवां खंड ‘भाषा बहता नीर’ है
. राजीव रंजन गिरि ने भाषा पर कई ज़रूरी बात रखी है. उनका मानना है कि जहाँ एक ओर हम हिंदी के प्रचार प्रसार विस्तार पर अभिमान करते देखे जाते हैं तो अगले ही क्षण हम ही हिंदी की बिगडती शैली, प्रकृति का मर्सिया पढ़ते दिखाई देते हैं. लेखक ने इसके कारणों की पड़ताल करते हुए इस पर प्रकाश डाला है कि हिंदी की बढती व्याप्ति का एक बड़ा कारक बाज़ार, मीडिया और फिल्म उद्योग है तथा इनकी माँग के अनुसार ही भाषा में समय समय पर परिवर्तन भी हुए किन्तु यह आत्मप्रलाप का विषय बना लेना उचित नहीं है. लेखक ने ‘आओ, हिंदी हिंदी खेलें’ लेख में यही विचार रखे
है- “मौजूदा दौर में हिंदी एकवचन न रहकर बहुवचन का रूप धारण कर चुकी है. यानी अब हिंदी की नहीं हिन्दियों की बात करनी होगी.” लेखक की यह माँग गौरतलब है चूँकि जबतक किसी ख़ास माध्यम की हिंदी को ही निर्धारक मानकर शेष हिन्दियों को परखा जाएगा तो निश्चित तौर पर नतीज़ा गलत ही निकलेगा. लेखक ने भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी की आवश्यकता और उसके बदलाव और उसके बदलाव की ज़रूरत को चिह्नित किया है. लेखक का एक ज़रूरी लेख ‘आठवीं अनुसूची: भोजपुरी का हक’ में हिंदी के बरक्स लोक भाषाओं की अस्मिता का प्रश्न उठाया है जिसमें आठवीं अनुसूची में जगह बनाने वाली भाषाओं के लिए कोई निश्चित मानदण्ड एवं पात्रता का अभाव तो नज़र आता ही है साथ ही इस अनुसूची में स्थान बनाने की ज़द्दोज़हद करती भाषाओं में एक प्रकार का भाषाई तनाव भी प्रकट होता है जो निश्चित तौर से इस अनुसूची को, इसकी धारणा को ही समस्याग्रस्त एवं विवादास्पद प्रतिबिम्बित करता है.

यह आलोचना पुस्तक अपनी वैविध्यपूर्ण सामग्री एवं विविध विषयों पर लिखे इन विचारपूर्ण लेखों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण, पठनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक है. जो भिन्न भिन्न समयों को देखती, उनसे बात करती, सवाल उठाती, जिरह करती एवं संवाद स्थापित करती शोध प्रविधियों से लैस  तथ्यपरक पुस्तक है.

पुस्तक: ‘अथ (साहित्य : पाठ और प्रसंग).
लेखक: राजीव रंजन गिरि
प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली
मूल्य: 750/-

आरक्षण के समर्थन में महिलाओं के नेतृत्व में प्रदर्शन

6 सितम्बर 2015 को जन्तर मंतर (नई दिल्‍ली ) पर  यूथ वॉयस, आरडीएमए, दलित लेखक संघ, महिला मैत्री, एचमसी व अन्‍य संगठनों की ओर से एक प्रदर्शन किया गया. प्रदर्शन की खासियत थी महिलाओं का नेतृत्व और उनकी भागीदारी . प्रदर्शन में आये कार्यकर्ताओं के बीच आरक्षण के मुद्दों और उसके खिलाफ साजिशों पर कविता कुमारी ( एचमसी), सुमेधा बौद्ध ( नैकडोर यूथ), पुष्पा विवेक ( राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन ), संजीव चंदन ( संपादक , स्त्रीकाल), आर पी भाटिया ( अखिल भारतीय एस सी एंड एस टी एम्पलाइज वेलफेयर दिल्ली) , एच एल दुसाध ( डायवर्सिटी मिशन ),  रजनी तिलक ( राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन ) ने अपनी बात  रखी.

जारी अपील 


( आरक्षण के समर्थन में इस प्रदर्शन के प्रसंग से भागीदारी के फर्क पर कार्यक्रम के बाद  फॉरवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन ने बातचीत में कहा कि भागीदारी के असर का एक फर्क अपील में आये महापुरुषों के नाम में भी दिखता है. रजनी तिलक के होने से और हस्तक्षेप से आज जारी अपील में सावित्री बाई फुले का नाम जुड़ सका अन्यथा पहली ड्राफ्टिंग में महात्मा फुले और डा.आम्बेडकर का ही नाम रखा गया था. ) 

पिछले कुछ वर्षों से समाज के विभिन्‍न समूहों में सरकारी नौकरियों में सुविधिाओं और भागीदारी को लेकर एक आकर्षण विकसित हुआ है। इसके फलस्‍वरूप समय–समय पर विभिन्‍न जाति समुदायों ने अपने आंदोलन विकसित किये हैं। कभी बिहार और उत्‍तर प्रदेश में कुछेक सवर्ण और द्विज जातियां तो कभी पश्चिमी राज्‍यों के जाट–गुर्जर इस तरह की मांग उठाते रहे हैं। फिलहाल पाटीदारों का आंदोलन चर्चा में है और इसे लेकर समाज में अनेक तरह के विचार विकसित हो रहे हैं।

जैसा कि सब जानते हैं कि पाटीदार गुजरात की किसान जाति है, जो सामाजिक श्रेणी में तो शायद अद्विज है, लेकिन उनकी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्‍कृतिक स्थिति ऐसी है, जिसे पिछडा वर्ग में नहीं रखा जा सकता। वहां के कॉरपोरेट सेक्‍टर में उनकी अच्‍छी–खासी उपस्थिति है। हीरा और होटल उद्येाग पर उनका प्रभावशाली अधिकार है। पाटीदारों की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि यह है कि वे स्‍वतंत्र भारत में लगातार दलितों और पिछडों के आरक्षण का विरोध करते रहे हैं। अब जाकर उनके तरूण नेता हा‍र्दिक पटेल को खुद को ओबीसी सूची में शामिल करने और पाटीदारों को आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं।

क लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में अपने समुदाय के लिए विभिन्‍न प्रकार की सहूलियतें मांगने का हक सभी को है। लेकिन पाटीदार समुदाय के नेता हार्दिक पटेल जिस भाषा और तर्क के साथ आरक्षण की मांग कर रहे हैं, उसकी धूर्तता पर दलित–पिछडा–अल्‍पसंख्‍यक समाज के लोगों को कडी नजर रखनी चाहिए। उनका जोर अपने समुदाय को आरक्षण के दायरे में लाने से ज्‍यादा आरक्षण की मौजूदा व्‍यवस्‍था को निर्मूल करने तथा हिंसक हिंदूवादी–सामंतवादी मूल्‍यों का प्रसार करने में हैं। इस पूरे मामले पर एक विहंगम दृष्टि डालें।

गत 25 अगस्‍त, 2015 को अहमदाबाद में एक बडी रैली आयोजित कर पाटीदारों ने ओबीसी समुदाय को मिल रहे 27 फीसीदी आरक्षण में पाटीदार समुदाय को भी शामिल करने की मांग की। रैली में बडी संख्‍या में ऐसे लोग शामिल थे, जिनके हाथों में आरक्षण को खत्‍म करने की मांग वाली तख्तियां थीं। इनके नेता भी अपने भाषणों और साक्षात्‍कारों में कह रहे हैं कि सरकार या तो पाटीदार समुदाय को आरक्षण दे, या फिर आरक्षण की व्‍यवस्‍था ही समाप्‍त कर दे। उनका यह भी कहना है कि आरक्षण देश के लिए भारी नुकसानदायक सिद्ध हुआ है तथा इससे देश 35 साल पीछे चला गया है। जाहिर है, उनकी यह बातें न सिर्फ तथ्‍यों के विपरीत हैं बल्कि इससे यह भी स्‍पष्‍ट तौर से पता चलता है कि वे पाटीदारों लिए आरक्षण की मांग की आड में आरक्षण की व्‍यवस्‍था को खत्‍म करने का ही माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
दरअसल, हार्दिक पटेल ने भी अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत एक आरक्षण विरोधी छात्र नेता के रूप में की थी। उन्‍होंने विभिन्‍न टेलीविजन चैनलों को दिये गये इंटरव्‍यू में स्‍वयं को हिंदुओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध बताया है । जाहिर है, उनका आशय हिंदू धर्म में शामिल दलित–पिछडी आबादी से नहीं है। उनके ऐसे अन्‍य अनेक बयान भी हमारे सामाने हैं, जिसमें उन्‍होंने आंतकवाद के बहाने पूरे मुसलमान समुदाय की देशभक्ति पर सवाल उठाए हैं। इसलिए यह अनायास नहीं हैं कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ, विश्‍व हिंदू परिषद और शिव सेना जैसे संगठन उनके साथ खडे हैं। ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं कि गुजरात का यह कथित पाटीदार आंदोलन आरक्षण विरोधी हिंदुत्‍ववादी शक्तियों की शह पर शुरू किया गया है।

पाटीदारों का कहना है कि उन्‍हें आरक्षण के दायरे में ओबीसी के लिए निर्धारित 27 फीसदी के अंतर्गत ही लाया जाए। वे चाहते तो अपने समुदाय के लिए अलग से विशेष आरक्षण की मांग कर आरक्षण की मौजूदा 50 फीसदी की सीलिंग को बढाने के लिए दबाव बना सकते थे। ऐसा कर वे बहुजन समुदाय की इस पुरानी मांग के साथ सहयोगी की भूमिका में आ सकते थे। लेकिन इसकी जगह वे दलित–पिछडे समुदायों के प्रतिभाशाली युवाओं के सामान्‍य वर्ग की सीटों पर चुने का जाने का विरोध कर रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि वे देश की 85 फीसदी शूद्र– अतिशूद्र– अद्विज आबादी (स्‍वयं पाटीदार भी जिसका हिस्‍सा हैं) को 50 फीसदी आरक्षण के बाडे ही रखे जाने की वकालत कर रहे हैं।

इस आंदोलन के बहाने न सिर्फ खुले तौर पर आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू करने को लेकर बहस चलाने की कोशिश की जा रही है बल्कि बहुजन (दलित–ओबीसी व अल्‍पसंख्‍यक) एकता को भी खंडित करने की कोशिश की जा रही है। आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल और उनसे जुडी हिंदूत्‍ववादी शक्तियों के निम्‍नांकित मुख्‍य उद्देश्‍य प्रतीत होते हैं :

ओबीसी आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू करवाना
मूल ओबीसी में शा‍मिल जा‍तियों को एक–दूसरे विरूद्ध खडा करना
पाटीदार आरक्षण के नाम पर संपन्‍न जाटों और मराठाओं के द्वारा की जा रही आरक्षण की मांग को बढावा देना
अनूसूचित जा‍ति–जनजाति को मिल रहे आरक्षण में भी क्रिमी लेयर को लागू करवाना
बहुजन तबकों में अल्‍पसंख्‍यक, विशेषकर मुसलमानों के लिए विद्वेष को बढाना

इन कारणों से हम दलित–पिछडे और अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के समाजिक कायकर्ता अपने राजनेता और आम जनता से अपील करते हैं कि :

अनुसूचित जाति–जनजाति की बढी हुई आबादी के अनुपात में आरक्षण का प्रतिशत बढाने के लिए सरकार पर दवाब बनाएं ।
जाति जनगणना के आंकडे शीघ्र जारी कर ओबीसी को भी आबादी के अनुसार आरक्षण देने की मांग तेज करें।
पाटीदार आंदोलन के बहाने सामाजिक न्‍याय की समतामूलक अवधारणा को नष्‍ट करने को कोशिश करने वाली ताकतों पर कडी नजर रखें
ऐसे किसी भी संगठन, राजनीतिक दल अथवा विचार को समर्थन न दें जो आरक्षण के मूल सिद्धतों पर कुठाराघात करता हो
दलित–ओबीसी और अल्‍पसंख्‍यक एकता को बनाए रखें तथा समाज विरोधी श‍क्तियों का मुकबला करने के लिए महात्‍मा जोतिबा फूले, सावित्री बाई फूले– डॉ. बाबा सा‍हब आम्‍बेडर द्वारा बताये गये रास्‍ते का अनुसरण करें।

संपर्क : 08826669024 (रजनी तिलक)
रिपोर्ट : अरुण कुमार प्रियम

विद्रोह की मशाल है सावित्रीबाई फुले की कविताएं

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अनिता भारती


अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

5 सितम्बर को , शिक्षक दिवस के अवसर पर हर देश के शासनाधीशों में बच्चों को पढाने की होड लगी है. देश को कृतज्ञ होना चाहिए स्त्रियों की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले का. यूं तो हम सावित्री बाई फुले की जयंती, 3 जनवरी, को शिक्षक दिवस मनाते हैं , फिर भी सरकारी शिक्षक दिवस पर स्त्रीकाल के पाठकों के लिए अनिता भारती का यह लेख . बहुत कम लोग जानते हैं कि सावित्रीबाई फुले एक अच्छी कवयित्री भी हैं-सरोकार -समृद्ध उत्कृष्ट कवयित्री.  मराठी की उनकी कविताओं का हिंदी में सम्पादन किया है अनिता जी ने, जो कुछ ही दिन में स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित होने वाली है. यह आलेख उसी किताब की भूमिका है. 

यह जानकर गहरा आश्चर्य होता है कि 18 वीं शताब्दी में भारत की पहली
अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रखर, निर्भीक, चेतना सम्पन्न, तर्कशील, दार्शनिक, स्त्रीवादी ख्याति प्राप्त लोकप्रिय कवयित्री अपनी पूरी प्रतिभा और ताकत के साथ उपस्थित होती है और किसी की उन पर निगाह भी नहीं जाती या फिर दूसरे शब्दों में कहूं तो उनके योगदान पर मौन धारण कर लिया जाता है। सवाल है इस मौन धारण का, अवहेलना और  उपेक्षा करने का क्या कारण है?  क्या इसका एकमात्र कारण उनका शूद्र तबके में जन्म लेना और दूसरे स्त्री होना माना जाए ? सावित्रीबाई फुले का पूरा जीवन समाज के वंचित तबकों खासकर स्त्री और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष और सहयोग में बीता । ज्योतिबा संग सावित्रीबाई फुले ने जब क्रूर ब्राह्मणी पेशवाराज का विरोध करते हुए, लड़कियों के लिए स्कूल खोलने से लेकर तात्कालीन समाज में व्याप्त तमाम दलित-शूद्र-स्त्री विरोधी सामाजिक, नैतिक और धार्मिक रूढ़ियों-आडंबरों अंधविश्वास के खिलाफ मजबूती से बढ-चढकर डंके की चोट पर जंग लडने की ठानी तब इस जंग में दुश्मन के खिलाफ लडाई का एक मजबूत हथियार बना उनका स्वयं रचित साहित्य जिसका उन्होंने प्रतिक्रियावादी ताकतों को कड़ा जबाब देने के लिए बहुत खूबसूरती से इस्तेमाल किया। सावित्रीबाई फुले के साहित्य में उनकी कविताएं, पत्र, भाषण, लेख, पुस्तकें आदि शामिल है।

कवयित्री सावित्रीबाई बाई फुले ने अपने जीवन काल में दो काव्य पुस्तकों की रचना की जिनमें उनका पहला काव्य-फुले 1854 में तब छपा जब वे मात्र तेईस वर्ष की ही थीं। दूसरा उनका काव्य-संग्रह बावनकशी सुबोधरत्नाकर 1891 में आया, जिसको सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवनसाथी ज्योतिबा फुले की परिनिर्वाण प्राप्ति के बाद उनकी जीवनी रूप में लिखा था।

अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में ब्राह्मणवाद का कट्टरतम रूप अपने चरमोत्कर्ष पर था।  उस समय सवर्ण हिन्दू समाज और उसके ठेकेदारों द्वारा शूद्र, दलितों और स्त्रियों पर किए जा रहे अत्याचार-उत्पीडन-शोषण की कोई सीमा नहीं थी। बाबा साहेब ने उस समय की हालत का वर्णन अपनी पुस्तक ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में करते हुए कहा है- ‘पेशेवाओं के शासनकाल में, महाराष्ट्र में, इन अछूतों को उस सड़क पर चलने की आज्ञा नही थी जिस पर कोई सवर्ण हिन्दू चल रहा हो। इनके लिए आदेश था कि अपनी कलाई में या गले में काला धागा बांधे, ताकि हिन्दू इन्हें भूल से ना छू लें। पेशवाओं की राजधानी पूना में तो इन अछूतों के लिए यह आदेश था कि ये कमर में झाडू बाँधकर चलें, ताकि इनके पैरों के चिन्ह झाडू से मिट जाएं और कोई हिन्दू इनके पद चिन्हों पर पैर रखकर अपवित्र न हो जाएं, अछूत अपने गले में हांडी बाँधकर चले और जब थूकना हो तो उसी में थूकें, भूमि पर पड़ें हुए अछूत के थूक पर किसी हिन्दू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र हो जाएगा’।

ऐसी विपरित परिस्थितियों में सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1931 को महाराष्ट्र के सतारा जिला के एक छोटे से ग्राम नायगांव में हुआ। मात्र नौ साल की उम्र में ग्यारह साल के ज्योतिबा संग ब्याह दी गई। केवल सत्रह वर्ष की उम्र में ही सावित्रीबाई ने बच्चियों के एक स्कूल की अध्यापिका और प्रधानाचार्या दोनों की भूमिका को सवर्ण समाज के द्वारा उत्पन्न अड़चनों से लड़ते हुए बडी ही लगन, विश्वास और सहजता से निभाया। समता, बंधुता, मैत्री और न्याय पूर्ण समाज की ल़डाई के लिए, समाजिक क्रांति को आगे बढाने के लिए सावित्राबाई फुले ने साहित्य की रचना की। आज भी यह बात बहुत कम लोग जानते है कि वे एक सजग, तर्कशील, भावप्राण, जुझारू क्रांतिकारी कवयित्री थी। मात्र 23 साल की उम्र में उनका पहला काव्य संग्रह काव्य फुले आ गया था, जिसमें उन्होंने धर्म, धर्मशास्त्र, धार्मिक पाखंड़ो और  कुरीतियों के खिलाफ जम कर लिखा। औरतों का सामाजिक स्थिति पर कविताएँ लिखी। और उनकी बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार धर्म, जाति, ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता पर कड़ा पर प्रहार किया। सावित्रीबाई फुले अपनी एक कविता में वे दलितों औऱ बहुजनों को समाज में बैठी-अज्ञानता को पहचान कर उसे पकड़कर कुचल- कुचल कर मारने के लिए कहती है क्योंकि यह अज्ञानता यानी अशिक्षा ही दलित बहुजन और स्त्री समाज की दुश्मन है जिसे जानबूझकर सोची समझी साजिश के तहत वंचित समूह को उसे दूर रखा गया है ।

उसका नाम है अज्ञान
उसे धर दबोचो, मजबूत पकड़कर पीटो
और उसे जीवन से भगा दो  

इस अशिक्षा रूपी अज्ञानता के कारण ही पूरा बहुजन समाज सवर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना है। इनके पाखंड और कूटनीति के हथियार ज्योतिष, पंचाग, हस्तरेखा आदि पर व्यंग्य करती हुई सावित्री बाई फुले कहती है –

ज्योतिष पंचाग हस्तरेखा में पड़े मूर्ख
स्वर्ग नरक की कल्पना में रूचि
पशु जीवन में भी
ऐसे भ्रम के लिए कोई स्थान नहीं
पत्नी बेचारी काम करती रहे
मुफ्तखोर बेशर्म खाता रहे
पशुओं में भी ऐसा अजूबा नहीं
उसे कैसे इन्सान कहे?         (पेज-2)

सावित्रीबाई फुले जानती है कि शूद्र और दलितों की गरीबी का कारण क्या है। लोग समझते है कि ब्राह्मणवाद केवल मन की एक मानसिकता ही नही बरन एक पूरी व्यवस्था है जिससे धर्म और ब्राह्मणवाद के पोषक तत्व देव-देवता, रीति-रिवाज, पूजा-अर्चना आदि गरीब दलित दमित जनता को अपने में नियंत्रण में रखकर उनकी उन्नति के सारे रास्ते बंद कर उन्हें गरीबी, तंगी, बदहाली भरे जीवन में धकेलते आए हैं।

शूद्र और अति शूद्र
अज्ञान की वजह से पिछड़े
देव धर्म, रीति रिवाज़, अर्चना के कारण
अभावों से गिरकर में कंगाल हुए-
                                     (पेज- 6)

वे शूद्रों के दुख को, जाति के आधार पर प्रताड़ना के दुख को दो हजार साल से भी पुराना बताती है। सावित्रीबाई फुले इसका कारण मानती है कि इस धरती पर ब्राम्हणों ने अपने आप को स्वयं घोषित देवता बना लिया है और उसके माध्यम से यह स्वयं घोषित ब्राह्मण देवता अपनी मक्कारी और झूठ फरेब का जाल बिछाकर, उन्हें डरा-धमका कर रात-दिन अपनी सेवा करवाते है।

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए आवेदन / संस्तुतियां  आमंत्रित  ( क्लिक करें )

दो हजार साल पुराना
शूद्रों से जुड़ा है एक दुख
ब्राह्मणों की सेवा की आज्ञा देकर
झूठे मक्कार स्वयं घोषित
भू देवताओं ने पछाड़ा है। –   पेज 14

सावित्रीबाई फुले ब्राह्मणों के ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ को दलित, शूद्र और स्त्री की दुर्दशा की जिम्मेदार है इसलिए वे मनुस्मृति के रचयिता मनु को इस बात के आड़े हाथ लेती है जिसमें यह कहा गया है कि जो हल चलाता है, जो खेती करता है वह मूर्ख है। दरअसल सावित्रीबाई फुले इस बात के पीछे छिपे षडयंत्र को जानती है. वे जानती है कि यदि शुद्र और दलित खेती करेगे तो सम्पन्न होंगे। यदि वे सम्पन्न होंगे तो खुशहाली भरा जीवन जीयेगे जिससे वे ब्राह्मणों की धर्मज्ञा मानना बंद कर देंगे। इसलिए मनुस्मृति रचयिता को खरी खरी सुनाते हुए वे कहती हैं –

हल जो चलावे, खेती जी करे
वे मूर्ख होते है, कहे मनु ।
मत करो खेती कहे मनुस्मृति
धर्माज्ञा की करे घोषणा, ब्राह्मणों की।

शूद्र और दलित यहाँ के मूलनिवासी यानी ‘नेटिव’ है। आक्रामक आर्य बाहर से आए थे और उन्होने अपनी चलाकी और धूर्तता से, अन्य सत्ताधारी शासकों से मिलकर यहां के भोले -भाले मूलनिवासियों को पद दलित कर दिया। लेकिन यहाँ के नेटिव मूलनिवासी अपने शौर्य दयालुता और प्रेम आदि जीवन मूल्यों में विश्वास रखते आए है। इन शूरवीर जननायकों में छत्रपति शिवाजी, महारानी ताराबाई, अंबाबाई आदि जिन्होने समतामूलक समाज बनाने के लिए अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लडाई लडी सावित्रीबाई फुले इन शूरवीरों के समक्ष अपना सिर झुकाती है। महान शूरवीर यौद्धा बलिराजा के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हुए और अपने तथा अपने वंचित समाज को उनका वंशज मानतीं है और कहती है –

शूद्र शब्द का
सही अर्थ है-नेटिव
आक्रामक शासकों ने
शुद्र का ढप्पा लगाया।


पराजित शूद्र हुए गुलाम
इरानी  ब्राह्मणों के
और ब्राह्मण अंग्रेजों के
बने उग्र शूद्र ।


असल में शूद्र ही
स्वामी इंडिया के
नाम उनका था इंडियन


थे शूर पराक्रमी हमारे पुरखे
उन्ही प्रतापी यौद्धाओं के
हम सब वंशज हैं।

शूद्र राजा बलिराजा के राज में समृद्धि है, जनता के पास काम है। वह मेहनती है। खुश है। सुखी है और खुशहाल है। एक वंचित वर्ग के शासक बलिराजा को सिर पर ताज की उपाधि देते हुए सावित्री बाई फुले कहती है-

बलिराज में जनता सुखी-संतोषी


दान में पाएं याचक स्वर्ण घन कंचन
सिर पर ताज रत्नों का बलिराज
और जनता के विशाल मन

छत्रपति शिवाजी बडे शूरवीर योद्धा और जननायक है। वंचित तबके की शूद्र अतिशूद्र जनता उन्हें अपना हमदर्द मानकर सुबह सवेरे रोज याद करती है और उनके शौर्य गान गाती है-

छत्र पति शिवाजी को
सुबह- सवेरे याद करना चाहिए
शूद्र- अतिशुद्र के हमदर्द
उनका गुणगान करे पूरी भावना से।

आगे वे इसी कविता में कहती है कि राजा नल द्रौपदी युधिष्ठिर आदि का गान तो केवल शास्त्र पुराणों तक ही सीमित है जबकि शिवाजी की शौर्य गाथाएं इतिहास में दर्ज हो गई है और हमेशा रहेगी।

नल राजा युधिष्ठिर, द्रोपदी
आदि
नामी गिरामी शास्त्र-पुराणों के
पन्नों तक ही सीमित
किन्तु छत्रपति शिवाजी की शौर्य गाथा
है इतिहास में दर्ज।         

शूद्र अतिशूद्र और आदिवासी समाज में स्त्रियाँ बहुत बहादुर और जुझारू होती है। वह किसी भी कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हार नही मानती हैं। मुसीबत आने पर भी किसी भी मोर्चे अपने समाज के साथ खडी होकर अपने बच्चों को साथ ले, बराबरी से डटकर मुकाबला करती है।. महारानी छत्रपति ताराबाई ऐसी ही एक बहादुर योद्धा थी। उनकी लडाकू वीरांगना की पदवी देते हुए सावित्रीबाई फुले उन्हें शत्रु मर्दिनी, शेर की तरह दड़ाडने वाली, बिजली से भी अधिक फुर्तीली बताती है और उनको अपना प्रेरणास्त्रोत मानते है।

महारानी ताराबाई लड़ाकू वीरागंना
रणभूमि में रण चंडिका तूफानी
युद्ध भूमि में युद्ध की प्रेरणास्त्रोत
आदर से सिर झुक जाता
उसे प्रणाम करना मुझे सुहाता     

सावित्रीबाई फुले अपनी तमाम उम्र दलित वंचित शूद्र व स्त्री तबके के लिए जिस अधिकार के लिए लडती रही वह अधिकार था शिक्षा का। इस पूरे वर्ग को जानबूझकर शिक्षा रहित करके उसी ताकत योग्यता और उसके श्रम का शोषण किया गया। उसके वो तमाम रास्ते जो उसे आगे ले जा सकते थे, जो उसे अन्याय के खिलाफ प्रतिकार करने की ताकत देते थे, जो उसे शोषण और अत्याचार से लडना सिखाते थे, सब के सब शिक्षा के अधिकार के बिना अधूरे रह गए। सावित्रीबाई फुले ने सवर्णों के इस कुचाल को समझा कि यह सवर्ण समाज कभी दलितों वंचितों और शूद्रों को पढने लिखने नही देगा इसलिए सावित्रीबाई ने सबसे ज्यादा अपनी कविताओं के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की अलख जगाई। उन्हें अपने सामाजिक कार्यों द्वारा अनुभव हो चुका था कि शिक्षा के बिना, खासकर अंग्रेजी शिक्षा के बिना शूद्र अतिशूद्र तथाकथित मुख्यधारा के विकास में शामिल नहीं हो सकते अत: वह शूद्र अति शूद्रों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है और अपनी कविता अंग्रेजी भैया मे कहती है-

“अंग्रेजी मैय्या, अंग्रेजी वाणई
शूद्रों को उत्कर्ष करने वाली
पूरे स्नेह से।


अंग्रेजी मैया, अब नहीं है मुगलाई
और नहीं बची है अब
पेशवाई, मूर्खशाही।


अंग्रेजी मैया, देती सच्चा ज्ञान
शूद्रों को देती है जीवन
वह तो प्रेम से।


अंग्रेजी मैया, शूद्रों को पिलाती है दूध
पालती पोसती है
माँ की ममता से।




अंग्रेजी मैया, तूने तोड़ डाली
जंजीर पशुता की
और दी है मानवता की भेंट 
सारे शूद्र लोक को।

इसी तरह अपनी दूसरी कविता ‘अंग्रेजी पढ़ों’ में शूद्रो अतिशूद्रों को अपनी जीवन शिक्षा से सुधारने के लिए कहती है-

स्वाबलंबन का हो उद्यम, प्रवृत्ति
  ज्ञान-धन का संचय करो
  मेहनत करके।


  बिना विद्या जीवन व्यर्थ पशु जैसा
  निठल्ले ना बैठे रहो
   करो विद्या ग्रहण।


   शूद्र-अतिशूद्रों के दुख दूर करने के लिए
   मिला है कीमती अवसर
   अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का।


   अंग्रेजी पढ़कर जातिभेद की
   दीवारें तोड़ डालो
    फेक दो भट-ब्राह्मणों के
    षड्यंत्री शास्त्र-पुराणों को।

धार्मिक रूढियों, अँधविश्वास और आडंबर की पोल खोलकर उनका मजाक बनाते हुए, उसपर व्यंग्य करती हुई सावित्रीबाई अपनी मन्नत कविता में कहती है-

पत्थर को सिंदूर लगाकर
और तेल में डुबोकर
जिसे समझा जाता है देवता
वह असल में होता है पत्थर।

आगे वह इसी कविता में पत्थर से मन्नत माँगकर पुत्र प्राप्त करने की अवैज्ञानिकता का मखौल उड़ाते हुए कहती है-

यदि पत्थर पूजने से होते बच्चे
तो फिर नाहक
नर-नारी शादी क्यों रचाते?   

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जिस समय सावित्रीबाई का प्रथम कविता संग्रह काव्य फुले आया उस समय सावित्रीबाई फुले शूद्र-अतिशूद्र लड़कियों को पढा रही थीं। ज्योतिबा सावित्री ने पहला स्कूल 13 मई 1848 में पहला स्कूल खोला था और काव्यफुले 1852 में आया। जब वे पहले पहल स्कूल में पढ़ाने के लिए निकली तो वे खुद उस समय बच्ची ही थी। उनके कंधे पर ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल तक लाना तथा उन्हें स्कूल में बना बनाए रखने की भी बात होगी। सावित्रीबाई फुले ने बहुत ही सुंदर बालगीत भी लिखे है जिसमें उन्होने खेल खेल में गाते गाते बच्चों को साफ सुथरा रहना, विद्यालय आकर पढाई करने के लिए प्रेरित करना व पढाई का महत्व बताना आदि है।    बच्चों के विद्यालय आने पर वे जिस तरह स्वागत करती है वह उनकी शिक्षा देने की लगन को दर्शाता है –

सुनहरे दिन का उदय हुआ
आओ प्यारे बच्चो
आज हर्ष उल्लास से
तुम्हारा स्वागत करती हूँ आज       


वह विद्या को श्रेष्ठ धन बताते हुए कहती है –


विद्या ही सच्चा धन है
सभी धन-दौलत से बढ़कर
जिसके पास है ज्ञान का भंडार
है वह सच्चा ज्ञानी लोगों की नज़रो में


अपने एक अन्य बालगीत में बच्चों को समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते हुए कहती है-


 करना है जो काम आज
 उसे करो तुम तत्काल


 जो करना है दोपहर में
उसे कर लो तुम अभी 


पलभर के बाद का काम
 पूरा कर लो इसी वक़्त 


 काम पूरा हुआ कि नहीं ?
  न कभी भी पूछती मृत्यु कारण।

सावित्रीबाई फुले का  एक बालगीत ‘समूह’ एक लघुनाटिका के समान लगता है। इस कविता में वे पांच समझदार पाठशाला जाकर पढने वाली शिक्षित बच्चियों से पाठशाला न जाने वाली अशिक्षित बच्चियों की आपस में बातचीत व तर्क द्वारा उन्हें पाठशाला आकर पढ़ने के लिए कहती हैं तो निरक्षर बच्चियाँ जवाब देती है-

अरे, क्या धरा है पाठशाला में
  क्या हमारा सिर फिर गया है ?
  पाठशाला जाने से तो अच्छा है खेलना
   चलो चलो, जाकर खेलें।…..

उन्हीं में से कुछ बच्चियां कहती है –

  रूको जरा, जाकर माँ से पूछते हैं
     खेल-कूद, घरकाम या पाठशाला ?
     चलो, सारी सखियाँ,
     उसकी सलाह लेते हैं।…..

लेकिन सभी अशिक्षित बच्चियाँ जब अपनी- अपनी माँ के पास पहुंची और उन्हें पढाई के लिए हुए सारे वाद-विवाद बताएँ तब उन अशिक्षित बच्चियों की माँ भी इन बच्चियों को शिक्षा का महत्व समझाते हुए कहती है-
स्वाभिमान से जीने के लिए
        पढ़ाई करो पाठशाला की 
        इन्सानों का सच्चा गहना शिक्षा है
        चलो, पाठशाला जाओ।….. 

सावित्रीबाई फुले जिन स्वतंत्र विचारों की थी, उसकी झलक उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से मिलती है। वे लड़कियों के घर में काम करने, चौका बर्तन करने की अपेक्षा उनकी पढाई-लिखाई  को बेहद जरूरी मानती थी। कविताओं की इन पंक्तियों से पता चल जाता है कि सावित्रीबाई फुले स्त्री अधिकार चेतना सम्पन्न स्त्रीवादी कवयित्री थी.

पहला कार्य पढ़ाई, फिर वक्त मिले तो खेल-कूद
        पढ़ाई से फुर्सत मिले तभी करो घर की साफ-सफाई
        चलो, अब पाठशाला जाओ।…..

इस लघु नाटिका जैसे गीत के अंत में पाँचों बच्चियों को शिक्षा का महत्व समझ में आ जाता है और वे पढने के लिए उत्सुक होते हुए कहती है-

  चलो, चलें पाठशाला हमें है पढ़ना, नहीं अब वक्त गँवाना
        ज्ञान-विद्या प्राप्त करें, चलो हम संकल्प करें
        अज्ञानता और गरीबी की गुलामीगिरी चलो, तोड़ डालें
        सदियों का लाचारी भरा जीवन चलो, फेंक दें।


        हमें ना हो इच्छा कभी आराम की
        ध्येय साध्य करें पढ़कर शिक्षा का
        अच्छे अवसर का आज ही सदुपयोग करें
        समय की सहयोग हमें प्राप्त हुआ हैं।

सावित्रीबाई फुले बेहद प्रकृति प्रेमी थी। काव्यफुले में उनकी कई सारी कविताएं प्रकृति, प्रकृति के उपहार पुष्प और प्रकृति का मनुष्य को दान आदि विषयों पर लिखी गई है। तरह-तरह के फूल, तितलियाँ, भँवरे, आदि का जिक्र वे जीवन दर्शन के साथ जोड़कर करती है। प्रकृति के अनोखे उपहार हमारे चारों ओर खिल रहे तरह-तरह के पुष्प जिनका कवयित्री सावित्रीबाई फुले अपनी कल्पना के सहारे उनकी सुंदरता, मादकता और मोहकता का वर्णन करती है वह सच में बहुत प्रभावित करने वाला है। पीली चम्पा (चाफा) पुष्प के बारे में लिखते हुए वह कहती है-

पीला चम्पा
हल्दी रंगा का
बाग में खिला,
ह्रदय के भीतर तक बस गया

ऐसे ही एक अन्य कविता है ‘गुलाब का फूल’। इस कविता में सावित्रीबाई फुले गुलाब और करेन के फूल की तुलना आम आदमी और राजकुमार से करके अपनी कल्पना के जरिए सबको विस्मित कर देती है –

गुलाब का फूल और फूल करेन का
रंग- रूप दोनो का एक- सा
एक आम आदमी, दूसरा राजकुमार
गुलाब की रौनक, देसी फूलो से उसकी उपमा कैसी?

तितली और फूलों की कलियाँ कविता में सावित्री बाई फुले की दार्शनिक दृष्टि को विस्तार दिखता है। जिस तरह से समाज के सारे रिश्ते नाते स्वार्थ की दहलीज पर खडे होकर अपना स्वार्थ साधते है इस भाव को अभी तक अन्य कवियों ने अपनी कविताओं में फूल और भँवरे के माध्यम से बताया है पर सावित्रीबाई फुले ने इस स्वार्थपरता की भावना को तितली के जरिए स्पष्ट किया है  –

तितलियाँ रंग-बिरंगी
        बहुत ही सुंदर
        उनकी आँखे चमकदार, सतरंगी
        उनकी हंसी बातुनी
        पंख रेशमी उनकी देह पर
        छोटे-बड़े, पीले रंग के 
        पंख मुड़े हुए, किन्तु भरे उड़ान आकाश में
        उनका रूप-रंग मनोहर।


        तितलियाँ देख-देख मैं खो गयी
        बिसर गई अपने आप को


        फूलों की कलियाँ
        कोमल, अति सुन्दर
        आतुर होकर तितलियों को
        पास बुलाती
        राह देखती उनकी
        आ जाओ दौड़-दौड़ कर तितली
        कहती मन ही मन फूलों की कलियाँ।


        उड़कर आ पहुँची तितलियाँ
        फूलों के पास
        इकट्ठा कर शहद पी लिया
        मुरझा गयी सारी कलियाँ।


        फूलों की कलियों का रस चखकर
        ढूँढा कहीं और ठिकाना।


        रीत है यही दुनियाँ की
        स्वार्थ और पलभर के हैं रिश्ते
        देख दुनियाँ की रीत
        हो जाती हूँ मैं चकित। 

प्रकृति का सार्वभौमिक सत्य है जीओ और जीने दो । इन्सान और प्रकृति कविता में वह इसी तथ्य को प्रतिपादित करते हुए कहती हैं

मानव जीवन को करे समृद्ध
        भय चिंता सभी छोड़कर आओ,
        खुद जीएं और औरों को जीने दें।


        मानव-प्राणी, निसर्ग-सृष्टि 
        एक ही सिक्के के दो पहलू
        एक जानकर सारी जीवसृष्टि को
        प्रकृति के अमूल्य निधि मानव की
        चलो, कद्र करें।

 सावित्रीबाई फुले अपने दाम्पत्य जीवन में, अपनी आजादी में, अपने आनंद में और अपने सामाजिक काम में ज्योतिबा फुले के प्यार, स्नेह और सहयोग को हमेशा दिल में जगाएं रखती थी। पचास साल के अपने दाम्पत्य जीवन में वे ज्योतिबा के साथ हर पल, हर समय उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही तथा ज्योतिबा को अपने मन के भीतर संजोकर रखा। ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले जैसा प्यार, आपसी समझदारी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा और समाज के लिए मिसाल है। सामाजिक काम की प्रेरणा के साथ वे अपने काव्य सृजन की प्रेरणा भी ज्योतिबा फुले को ही मानती। ज्योतिबा से मिले ज्ञान के बोध को वे मन की पोटली में बांधकर रखती है-

“ऐसा बोध प्राप्त होता है
ज्योतिबा के सम्पर्क में
मन के भीतर सहेजकर रखती हूं,
मैं सावित्री ज्योतिबा की।


‘संसार का रास्ता’ कविता में संसार के रास्ते से अलग चलते हुए वे कहती है-


मेरे जीवन में ज्योतिबा स्वांनद समग्र आंनद
जिस तरह होता है शहद
फूलों, कलियों में।

X  X   X  X   X   X   X   X   X
ज्योतिबा को सलाम
ह्रदय से करते हैं
ज्ञान का अमृत हमें वे देते हैं,
और जैसे हम
पुनर्जीवित होत जाते हैं


महान ज्योतिबा,
दीन दलित, शूद्र- अतिशुद्र
तुम्हें पुकारते हें

ज्योतिबा सावित्री संवाद कविता सावित्रीबाई फुले ने अपने और ज्योतिबा फुले के बीच के प्रातकालीन भ्रमण के समय सुबह की प्राकृतिक सुषमा का वर्णन किया है। सावित्रीबाई फुले इस कविता में सुबह की प्राकृतिक सुषमा के मनोहारी दृश्य के वर्णन के बीच सामाजिक मुददों पर बहस छिड जाती है, इसका बेहद खूबसूरत से चित्रमय संवाद दिखाया है। ज्योतिबा सावित्रीबाई से  सुबह होने पर रात के दुखी होने की बात करते है। इस बात का सावित्रीबाई फुले जवाब देते हुए कहती है कि क्या रात यदि यह इच्छा करती है कि प्रकृति सूर्य बिन रहे तो उसकी इच्छा उल्लू के सामान है जो सूरज को गाली गलौज और श्राप देने की कामना करता है.

बातें ज्योतिबा की सुन कहे सावित्री
करे इच्छा रात-रजनी
रहे प्रकृति सूरज बिन
रहे अंधियारे में हमेशा-हमेशा
उल्लुओं की इच्छा होती है ऐसी
करे सूरज को, गाली गलौच और दे शाप

सावित्री का तर्क सम्मत जवाब सुन ज्योतिबा कहते है तुम ठीक कहती हो सावित्री शिक्षा के कारण अंधकार छट गया है और शूद्र, महार जाग गये है। उल्लूओं की हमेशा इच्छा होती है कि शूद्र और महार दीन दलित अज्ञानियों की तरह जीवन जिए। मुर्गा को टोकरी से ढकने पर भी वह बांग देना नही छोडता। अत कोई कितना कोशिश करे एक दिन शूद्र महार जनता अपना शिक्षा का अधिकार पाकर ही रहेगी –

सच कहती हो तुम, छट गया अंधकार
शूद्रादि महार जाग गए हैं।


दीन दलित अज्ञानी रहकर दुख सहे
पशु भांति जीते रहे
यह थी उल्लुओं की इच्छा ।


टोकरी से ढका रखने पर भी
मुर्गा देता है बांग
और लोगों को देता है, सुबह होने की खबर।

कविता के अन्त में सावित्री घोषणा करती है-


शूद्र लोगों के क्षितिज के पर,
ज्योतिबा है सूरज
तेज से पूर्ण, अपूर्व, उदय हुआ है।

XXXXXXXXXXX   XXXXXXXXXXXXXXXX

सावित्रीबाई फुले का दूसरा काव्य संग्रह ‘बाबन्नकशी सुबोधरत्नाकर’ ज्योतिबा फुले की याद में लिखा गया है। यह काव्य संग्रह ज्योतिबा फुले की प्रमाणिक जीवनी के रूप में उनके परिनिर्वाण के एक साल बाद 1891 में उनको सादर समर्पण के रूप में प्रकाशित हुआ। बाबनकशी या बावन तोले यानी बावन पद, जिसमें प्रत्येक पद पाँच- छह पंक्तियों का है। इन बाबन पदों में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के जीवन संघर्ष, जीवन दर्शन, और उनके सामाजिक कार्यों द्वारा उस समय शूद्रों महारो स्त्रियों की स्थिति में आए क्रांतिकारी बदलावों का बहुत सच्चाई, प्रेम और सम्मान के साथ वर्णन हुआ है। एक एक पद में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के प्रति अपने ह्रदय के सच्चे उद्गार प्रस्तुत किए है । बाबनकशी सुबोधरत्नाकर सावित्रीबाई फुले के पहले काव्य संग्रह काव्यफुले के पूरे उन्तालीस साल के अंतराल के बाद आया था, जिसमें कुल मिलाकर बाबन पदों को छह भागों में क्रमश: उपोद्घात, सिद्धांत, पेशवाई, आंग्लाई, ज्योतिबा और अंत में उपसंहार शीर्षक से बांटा गया है। बावनकशी सुबोधरत्नाकर में कवयित्री सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं के माध्यम से उस समय के इतिहास, स्थिति, परिस्थिति, और उसमें ज्योतिबा फुले के योगदान को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। बाबनकशी सुबोधरत्नाकर के आरंभ में ही कवयित्री सावित्री बाई फुले अपना काव्य संग्रह अपने जीवन साथी ज्योतिबा फुले को समर्पित करते हुए कहती है कि अब वह इस दुनिया में ही है पर मेरे चिंतन और मन में बसे हुए है-

सहज काव्य रचना करती हूँ
        भुजंग प्रयात छंद में
        मन के भीतर रचती हूँ पंक्तियाँ
        फिर उतारती हूँ कागज़ पर गीत 
        पति जोतिबा को
        वो सारे गीत अर्पण करती हूँ
        आदर के साथ
        अब वे यहाँ नहीं हैं इस जगत में
        किन्तु हमेशा रहते हैं मेरे चिंतन में॥2॥

सावित्री ज्योतिबा फुले के बारे में सोचती हुई कहती है ज्योतिबा उनके जीवन साथी तो है ही लेकिन वे इससे ज्यादा बढकर दलित और शूद्र समाज के अंधकारों को दूर करने वाले क्रांतिसूर्य भी है। वे अपनी कविता लिखने का उद्देश्य बताती है कि वे हमेशा वंचित शोषित समाज के लिए कविता लिखना चाहती है.  “प्रणाम करती हूं मैं सभी शूद्रों को मैं सावित्री मनोभाव से, हमेशा सृजन करूं मैं कविताएं उनकी उन्नति के लिए।” कहना न होगा की क्रांतिकारी सामाजिक नेत्री कवयित्री सावित्री बाई फुले के लेखकीय सरोकार बहुत बड़े है। इस समाजिक सरोकार में लिखना भी शामिल है। सावित्रीबाई फुले अपने लेखन से सामजिक कार्य और उस सामाजिक कार्य से शुद्र दलितों की पीड़ा उजागर करते हुए उनके खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है।

प्रसिद्ध लेखक एम. जी. माली के अनुसार ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले की सबसे पहली प्रमाणिक, उपलब्ध जीवनी है, जिसे सावित्रीबाई फुले ने बावन पदों में काव्यात्मक शैली मं लिखा है’। दूसरे शब्दों में कहे तो बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले पर लिखा गया सक्षिप्त महाकाव्य है जो देखने में छोटा पर अपने उद्देश्य में अत्यन्त विशाल और अति महत्वपूर्ण है। बावन कशी में सावित्री बाई फुले उस समय के धार्मिक पाखंड से पूर्ण समाज और उसके ठेकेदारों चेले चेलिओं का वर्णन करते हुए कहती है-

  परिक्रमा करे चेलियाँ मेले में शंकराचार्य की
        प्रचार करे रूढ़ियों का मूर्खता से
        रीति-रिवाज का करो सब अनुशासन से पालन॥9॥

सावित्रीबाई फुले के अनुसार मनुस्मृति को शूद्र समाज की दुर्दशा का कारण है। इस मनुस्मति के कारण ही चार वर्णों का जहरीला निर्माण हुआ है. इसी के कारण समाज में दलित शूद्रों की स्थिति और जीवन भयानक मानसिक और सामाजिक गुलामी में बीता है। यही पुस्तक सारे विनाश की जड़ है।

मनुस्मृति की कर रचना मनु ने
        किया चातुर्वर्ण का विषैला निर्माण 
        उसकी अनाचारी परम्परा हमेशा चुभती रही
        स्त्री और सारे शूद्र गुलामी की गुफा में हुए बन्द
        पशु की भाँति शूद्र बसते आए दड़बों में ॥13॥

पेशवा राज में शूद्र और दलितों की स्थिति किसी काल्पनिक नरक की अवधारणा से भी ज्यादा भयंकर थी तथा उस असहनीय यातना घर की तरह थी जिसमें शुद्र और दलितों को एकदम पद दलित की स्थिति पर खड़ा कर दिया। जिसमें उनकी स्थिति पशुओं से भी बदतर हो गई थी.

पेशवा ने पाँव पसारे
        उन्होंने सत्ता, राजपाट संभाला
        और अनाचार, शोषण अत्याचार होता देखकर
        शूद्र हो गए भयभीत
        थूक करे जमा
        गले में बँधे मटके में
        और रास्तों पर चलने की पाबंदी
        चले धूल भरी पगडंडी पर,
        कमर पर बँधे झाडू से मिटाते
        पैरों के निशान॥17॥

सावित्रीबाई फुले अपने काव्य के माध्यम से पेशवाराज के जुल्मों का वर्णन करते हुए बताती है कि पेशवाराज  मे शूद्रो अतिशूद्रों के साथ उच्च वर्ग की स्त्रियों के हालात भी इतने बदत्तर थे कि पेशवा के बुलाने पर उसी की ऊंच जाति का निर्लज्ज पति अपनी पत्नी को यह करते हुए कि “चलो हवेली, एक सुनहरा मौका आ खड़ा हुआ है’ कहकर रावबाजी पेशवा के यहाँ छोड़ आया करता था।

पेशवा राज के बाद अग्रेंजों के आगमन पर जब शुद्र और दलित वर्ग शिक्षा की ओर थोडा सा अग्रसर हुआ तो भट-ब्राह्मण दलित और शुद्रों का मज़ाक बनाते थे। उनकी इस अभद्रता के खिलाफ बोलते हुए सावित्री कहती है-

ज्ञानी बनता देख भट लोग बरगलाते 
        देखो, कैसे हाँके ईसा भेड़-बकरियों को
        झूठे बढ़ा-चढ़ाकर॥27॥

बावन्नकशी में वे ज्योतिबा के जन्म से लेकर पालन-पोषण, शिक्षण और उनके सामाजक कार्यों का बेहद सरल और रोचक शैली में वर्णन करती है।  जब ज्योतिबा केवल नौ ही महीने के थे तब उनकी माँ चल बसी और ज्योतिबा की मौसेरी बहन सगुणाबाई क्षीरसागर ने उनका पालन पोषण किया। ज्योतिबा ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी बड़ी बहन सगुणाबाई और अपनी जीवन साथी सावित्रीबाई को भी पढ़ाया। वे कहती है-

मुझे और आऊ को उन्होंने ही
        पढ़ना-लिखना सिखाया
        नारी शिक्षा की भव्य घटना की
        रखी नींव जोतिबा ने॥38॥

*************

घर के कुँए से प्यासे अतिशूद्रों के लिए
        पानी पिलाने और भरने की
        अनोखी हुई शुरूआत
        इन्सानों को दिखाया जोतिबा ने सदमार्ग
        पढ़ाया दलितों को
        अपने अधिकारो का पाठ
        जोतिबा थे युगचेतना के आविष्कारक॥41॥

ज्योतिबा युग चेतना के अविष्कारक हीं नहीं थे अपितु वे युगदृष्टा भी थे। ज्योतिबा ने एक बच्चे को गोद लिया तथा उसे पढ़ाया लिखाया डॉक्टर बनाया और उसको भी अपने साथ सामाजिक कार्य में जोड़ा। सावित्री बाई फुले ज्योतिबा की तुलना संत तुकोबा से करते हुए कहती है – “जैसे संत तुकोबा वैसे संत ज्योतिबा । क्रांतिसूर्य ज्योतिबा का सबसे बड़ा योगदान उनका शूद्र दलित जनता को लगातार शिक्षा की ओर प्रेरित करते हुए बाह्मणवाद के अस्त्र-शस्त्र के पाखंड से निपटने का रास्ता दिखाना भी है।

करते रहे बयान जोतिबा सच्चाई
        कि अंग्रजी माँ का दूध पीकर
        बलवान बनो
        और पूरे संकल्प से करते रहे प्रयास
        लगातार शूद्रों की शिक्षा-प्राप्ति के
        शूद्रों के संसार में
        सुख-शांति समाधान के लिए॥46॥

* * *
पढ़ा इतिहास
सत्य असत्य ढूँढकर सच्चाई
का बोध ले

ज्योतिबा ने दुखी-जन, स्त्रियों, शुद्रों और दलितों की तरक्की, उनकी इंसानी गरिमा को बरकरार रखने, उनके ऊपर हो रहे जुल्मो सितम के खिलाफ खडे होने, उनको सशक्त बनाने के लिए अनथक कार्य किए। यहीं कारण था और है कि दलित जनता उन्हें अपना सच्चा हितैषी मानती थी-

यधपि जोतिबा का जन्म हुआ वहाँ
        जिन्हें शूद्र माली के नाम से
        पुकारा जाता था
        सभी दलित-शोषित उन्हें माली जाति के नहीं
        अपना मुक्तिदाता मानते थे
        महान जोतिबा अमर हो गए
        प्रणाम करती हूँ ऐसे जोतिबा को॥50॥

बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर काव्य-संग्रह के अंत में सावित्री अपने लेखन की कसौटी अपनी दलित शूद्र जनता को ही बनाते हुए कहती है कि-

  मेरी कविता को पढ़-सुनकर
        यदि थोड़ा भी ज्ञान हो जाये प्राप्त
        मैं समझूंगी मेरा परिश्रम सार्थक हो गया
        मुझे बताओ सत्य निडर होकर
        कि कैसी हैं मेरी कविताएं
        ज्ञानपरक, यथार्थ, मनभावन या अद्भुत
        तुम ही बताओ॥52॥

वर्ण-व्यवस्था के पूर्वाग्रह से ग्रसित ब्राह्मणवादी जातीय समाज के कर्ता– धर्ताओं ने सच्ची  क्रांतिकारी, महान क्रांति सूर्या सावित्रीबाई फुले के इतने कार्यों के बाद भी उनके अमूल्य योगदान का आंकलन कभी ठीक से किया ही नही परंतु वह दिन अब दूर नही जब उनके सम्पूर्ण योगदान के पन्नों को एक एक करके खोल लिया जायेगा। यह हिन्दी में अनुवादित काव्य संग्रह उसी किताब का एक ढका पन्ना है जिसे हमने खोलकर पाठकों के समाने रख देने की कोशिशि की है।

कंडोम , सनी लियोन और अतुल अंजान की मर्दवादी चिंता

दरवाजे पर धीमे बदलावों की थाप                                              
                                        संजीव चंदन
 
यह अतुल अंजान ने नहीं कहा होता तो ज्यादा चिंताजनक कथन नहीं होता. कुछ दिनों पहले अपने सेक्सिस्ट बयानों के लिए चर्चित रहे मुलायम सिंह यादव ने गैंग रेप को असंभव बताने की दलीलें दीं तो वह मेरे लिए  अपने पितृसत्तात्मक समाज की प्रतिनिधि सोच का एक और उदाहरण भर था. नेता , सामाजिक सांस्कृतिक –धार्मिक प्रवक्ता आदि आये दिन अपनी और हमारे समाज की सोच का परिचय देते रहते हैं. लेकिन एक मार्क्सवादी राजनीतिज्ञ का यह बयान सचमुच चिंताजनक है , वह भी 2015 में जब स्त्रीवाद की एक मुक्कमल धारा है , मार्क्सवादी स्त्रीवाद. तथा स्त्रीवाद के नवीनतम बहसों को जानने वाला एक संगठन है अंजान की पार्टी से जुड़ा.
अंजान यदि विज्ञापनों के माध्यम से बाजार के द्वारा स्त्रियों के वस्तुकरण ( कमोडिफिकेशन) का मुद्दा उठाना चाह रहे थे , तो उनका चुनाव यह बताता है कि पार्टी के भीतर उन्हें जेंडर ट्रेनिंग की जरूरत है . आप चुनते क्या हैं , यह आपकी राजनीति और राजनीतिक समझ से तय होता है . टी वी पर आने वाले कई विज्ञापन ऐसे होते हैं , जो स्त्रियों का न सिर्फ वस्तुकरण करते हैं, बल्कि उनके खिलाफ यौन हिंसा को बढ़ावा देते हैं . डियोज के विज्ञापन हों या कार –बाइक के कई विज्ञापन. स्त्रीकाल में ही हमने सलमान खान के द्वारा एक सरिया के विज्ञापन में स्त्री के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने का मुदा उठाते हुए एक लेख लगाया था.
बदलाव 90 के बाद

सनी लिओन के द्वारा कंडोम के जिस विज्ञापन को वे रेप के लिए उकसाने वाला बता रहे हैं, वह विज्ञापन अश्लील क्यों कहा जाना चाहिए. कंडोमों के विज्ञापन हमेशा बोल्ड होते रहे हैं , फर्क सिर्फ इतना बढ़ा है कि 90 के दशक के बाद से कंडोमों के विज्ञापनों में स्त्रियों की मुखरता भी बढी है, वे अब ऑब्जेक्ट पोजीशन में नहीं हैं. पिछले कई सालों  तक तो कंडोम एड्स और अन्य बीमारियों के भय के साथ ही बेचे जा रहे थे. कंडोमों के पुराने विज्ञापन पुरुषों के यौन आनंद तक ही केन्द्रित होते थे. तब के कई आपत्ति जनक विज्ञापन दिख जायेंगे, जो पुरुषों के हिंसक यौन –स्वभाव को बढ़ाते हुए प्रस्तुत होते थे. बलात्कार/ यौन हिंसा सनी लियोन के विज्ञापनों से नहीं होते हैं , स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा का वातावरण हमसब के परवरिश से ही शुरू हो जाता  है, जब बच्चे के पौरुष को पोसा जाता है और स्त्रियों की देह –अस्तित्व को ही नकारात्मक मान लिया जाता है. जाति, राष्ट्र , सैन्यकरण, मर्दाना दंभ आदि अनेक कारण हैं स्त्री के खिलाफ हिंसा का – सनी लिओन नहीं. अपने बचपन को दो उदाहरणों से अंजान साहब को समझाना चाहूंगा, जो शायद उन्हें अपने बचपन के दिनों के उदाहरण सरीखे भी दिखें. ८वें दशक में हमारे लिए ‘ निरोध’ ब्रांड के कंडोमों का मतलब था, बैलून – हम उसे पानी से धोकर , उसकी चिकनाई ख़त्म कर बैलून की तरह इस्तेमाल करते थे –बड़ा गुब्बारा बनता था –कंडोमों के विषय में हमें नकारात्मक नहीं बताया गया था.

५वें -६ठे दशक के विज्ञापन , जिनमें पुरुष की एजेंसी प्रधान थी

एक दूसरा उदहारण है हम सब के घरों में टंगे रहने वाले रूपा के कैलेंडरों का. उस पर तस्वीरें ‘ देवताओं’ की होती थीं,  लेकिन नीचे लिखा होता था , ‘गंजी, जांघिया, बनियान और पैन्टीज.’ एक बच्चे की सहज जिज्ञासा बस मैंने अपने किसी बड़े से पूछा था कि पैन्टीज क्या होता है. इसका सहज जवाब की जगह वे ‘ बड़े’ महोदय झेंप से गये थे , बल्कि हंस कर टाल गये थे. वह हंसी मेरी जिज्ञासा को और बढ़ा गई थी – तब हमारे घरों में अन्तःवस्त्र छिपा कर रखे जाते थे- व्यक्ति की सोच के निर्माण में कंडिशनिंग बहुत मायने रखती है.

आज बाजार ने एक तरफ स्त्री का वस्तुकरण किया है, उसके प्रति पुरुषवादी सोच का इस्तेमाल किया है , उसे नये आक्रामक तर्क दिए हैं , तो दूसरी ओर स्त्री की  एजेंसी , उसके कर्ता भाव को भी पुष्ट करने की कोशिश की है –विकल्प आपके सामने है कि आप किसे समाज के लिए घातक मानते हैं . अब कंडोमों के नाम ‘ निरोध’ के नकारात्मक सन्देश को पीछे छोड़ चुके हैं और उसकी बिक्री एवं –विज्ञापन का प्रसंग भी बदल चुका है – गर्भ –निरोध या बीमारियों से बचाव की जगह यौन आनंद के प्रसंग में , जिसमें स्त्री का यौन –आनंद भी शामिल है. आज स्त्रीकाल में हम एक आलेख इन बदलावों की पहचान और उसके मायने के साथ अतुल अंजान को समर्पित कर रहे हैं – कंडोमों के बदलते विज्ञापनों के चित्रों के साथ ( उनमें लिखे डायलोग और मेसेज पढ़ना चाहिए उन्हें) . यह आलेख मैंने सनी लियोन के ‘ बिग बॉस ‘ में आने के समय लिखा था.

दरवाजे पर धीमे बदलावों की थाप 

ठीक उसी समय जब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायतें हमें समय से पीछे खींच रही हैं, बाजार अपनी दोहरी भूमिकाओं में एक ओर तो परंपरा के नाम पर विकृत अस्मिताओं को बढ़ावा देता है तो समानांतरतः परम्परा पर धीमा प्रहार भी करता है. सुप्रसिद्द लेखिका और पत्रकार मृणाल पांडे ने लिखा था कि ‘ प्रेशर कुकर के आविष्कार ने जितना औरतों की आजादी ‘सुनिश्चित किया है , उतना किसी और कारण ने नहीं .’  बाजार के प्रमुख घटक सोप ओपेरा, फ़िल्में, रिअलिटी शोज आदि एक ओर तो परम्परा के दोहन में लगे हैं, मध्यकालीन स्त्री की छवि बना रहे हैं, तो दूसरी ओर हमारी देहली पर बदलावों की थाप भी दे रहे हैं – जेंडर आधारित सामाजिक सरचना पर क्रमिक कुठाराघात कर रहे हैं.

यह भी था विज्ञापन

मै श्लीलता और अश्लीलता के विवादों में से अलग इन माध्यमों के असरकारी प्रभावों पर बात कर रहा हूँ, क्योंकि श्लीलता और अश्लीलता एक सापेक्ष विषय है, देश-काल और संस्कृति सापेक्ष . पिछले दिनों रीलिज ‘ डर्टी पिक्चर’ और रिअलिटी शो ‘बिग बॉस’ के सन्दर्भ में मैं अपनी बात कर रहा हूँ, विजुअल मीडिया के ये दोनों आयोजन एक ओर तो बदलते सामजिक सोच और प्राथमिकताओं के उत्पाद हैं, तो दूसरी ओर एक ‘ प्रेसक्राइबिंग टेक्स्ट’ भी, बदलावों के दस्तक भी.

हालाँकि ‘बिग बॉस’ जैसे रिअलिटी शो और ‘डर्टी पिक्चर’ जैसे फिल्म दर्शकों के लिए ‘ दर्शनरति सुख ’ ( Voyeurism) के सिद्धांत पर ही बनते हैं. विद्या बालन अपनी फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ में घोषित करती है कि ‘ हम दिखाते वही हैं, जो लोग देखना चाहते हैं.’ यद्यपि यह फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हर उन कलाकारों  का बचाव होता है, जो तय  सामाजिक पैमाने से अलग भूमिकाएं करते हैं, या दर्शकों के ‘ दर्शनरति सुख ’  को उकसाते हैं. लेकिन अपनी फिल्म में ‘ सिल्क’ बनी विद्या का यह डायलॉग’ सामजिक आचरण के तहखानों का सत्य उदघाटित करता डायलॉग है. जो आँखें इन कार्यक्रमों को देखती हैं, उसके सन्दर्भ में ब्रिटिश स्त्रीवादी ‘ लाउरा मलवे’ ( Laura Mulvey)  ने ‘ मेल गेज’ का स्त्रीवादी सिद्धांत प्रस्तुत किया है, जिसके अनुसार ‘ दृष्टि’ पितृसत्तात्मक संरचना में निर्मित होती है, और फिल्मो (उनका अध्ययन फिल्म पर है अथवा रिअलिटी शो भी ) में तीन स्तर पर  काम करती यह दृष्टि ‘ पुरुष दृष्टि’  ( male gaze ) होती है. एक तो कैमरे की दृष्टि, दूसरा दर्शक की दृष्टि ( पुरुष या स्त्री दर्शक ) और तीसरा इसके चरित्रों में आपस की दृष्टि, महिला पात्र की दृष्टि भी,  वह मेल गेज आत्मसात कर चुकी होती है.

‘बिग बॉस’ ‘ रिअलिटी शोज’ का दर्शक इस शो में शामिल चरित्रों का दैनंदिन देख कर ‘ दर्शनरति सुख’ का ही आनंद प्राप्त करता है. वह प्रतिभागियों के चौबीस घंटे की गतिविधियों के चुनिन्दा अंश – सुबह अलसाई आँखों से व्यस्त कपड़ों में डांस, स्विमिंग पूल में डांस , प्रतिभागियों के इंटेंस रोमांस ( जैसे बिग बॉस सीजन चार में पाकिस्तानी अदाकार ‘बीना मलिक और इश्मत पटेल का रोमांस ) में दर्शनरति का आनन्द लेता है. कैमरा, जिसकी खुद की दृष्टि ‘पुरुष- दृष्टि’ होती है, और वह अपने दर्शकों, पुरुष या स्त्री , की ‘पुरुष दृष्टि’ के लिए ही काम करता है, ‘ दर्शन रति के वैसे अवसरों को चुराता रहता है, कैद करता रहता है, जो उसके दर्शकों को ‘ दर्शनरति सुख’ दे सके.

ज़रा डिकोड करें

यह सच है कि ‘बिग बॉस’ जैसे कार्यक्रम विभिन्न उपलब्धियों के कारण सेलिब्रेटी बनी हस्तियों के साथ  विवादास्पद चरित्रों को अपना प्रतिभागी  बनाते  है, जिसमें डान से संबंधों के कारण चर्चा में आई , ‘ मोनिका बेदी हो,’ तडीपार ‘राजा चौधरी’ हो , ड्रग्स लेने के आरोपों में घिरा ‘ राहुल महाजन’ हो, आइटम गर्ल ‘राखी सावंत’ हो, या शिवसेना से करियर की शुरुआत के बाद ‘बिहारी अस्मिता’ हासिल करते कांग्रेसी नेता संजय निरुपम हों, लेकिन इस कार्यक्रम के माध्यम से अपने विवादों पर सफाई के मसले पर जनता उन्हें नकार देती है. खैर, यहाँ मैं  ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से होते बदलाव के समाजशास्त्र पर बात करना चाह रहा हूँ.

चौबीस घंटे अनेक कैमरों के सामने समय बिताते प्रतिभागी यद्यपि कैमरों की उपस्थिति को लेकर सचेत होते हैं, अपनी छवि के लिए या छवि की टी. आर.पी के लिए सचेत होते हैं, परन्तु क्या बिना टी.वी., बिना अखबार, बिना टेलीफोन के बाहरी दुनिया से कट कर ९० दिनों तक के लिए एक नितांत बंद जगह में रह रहे प्रतिभागी चौबीस घंटे एक्टिंग कर सकते हैं ! कुछ तो स्वाभाविक होता होगा उनके व्यवहार में, उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया में, इसी आंशिक स्वाभाविकता के समाज शास्त्र की  बात मैं कर रहा हूँ में.

क्या संवाद है यह और क्या सन्देश !

ऐसे कार्यकर्मों का दर्शक माध्यम वर्ग है. क्या एक विशाल मध्यमवर्ग के दर्शकों की सोच –प्रणाली पर ऐसे कार्यक्रम दस्तक नहीं दे रहे हैं ? ‘ बिग बॉस’ में साथ- साथ रह रहे महिला और पुरुष प्रतिभागी, बिना स्त्री –पुरुष के भेद के एक ही कमरे में सार्वजनिक रूप से रहते-खाते, उठते –बैठते, जागते –सोते नहीं हैं ? क्या ‘जेंडर समाज’ के दरवाजे पर यह बदलाव का चोट करता दृश्य नहीं है ! क्या यहाँ बद्लाव के स्तर पर मृणाल जी के ‘ प्रेशर कुकर’ का प्रसंग नहीं  बनता है!! इस कार्यक्रम ने लक्ष्मी नारायण के रूप में एक ट्रांसजेंडर और सनी लिओन के रूप में पोर्न स्टार को सामान्य रूप से रहते, जीते, लड़ते -झगड़ते देखकर समाज की ‘ सेक्सुअलिटी’ संबंधी धारणाएं क्या नहीं बदलती हैं !!! यद्यपि ट्रांसजेंडर लोगों को जनता ने विभिन्न निकायों में चुन कर भेजा है, लेकिन उनकी सेक्सुअलिटी को सामान्य मानस में स्वकृति दिलाने की भूमिका ऐसे कार्यक्रम निभाते हैं- लक्ष्मी  हमारे बीच की सामान्य सदस्य सी दिखने लगती है.

पोर्न स्टार सनी लिओन की  सादगी, उसका इनोसेंट व्यवहार हमारी धारणाओं को झकझोरती है, लगता है कि अरे यह तो हमारे पड़ोस की लड़की सी है, इसे छुप कर देखने के अलावा, प्यार भी किया जा सकता है, बहन, प्रेमिका, दोस्त, कुछ भी हो सकती है. मानवशास्त्र की एक प्रोफेसर , जेनेट एंजल,जिन्होंने पश्चिमी देशों में खुद भी यौनकर्मी के रूप में तीन सालों तक काम किया, अपनी किताब ‘काल गर्ल’ में कहती हैं, ‘ और कृपया’ रंडी कहने की जल्दवाजी मत करो, हमारे अस्तित्वा को निरस्त करने या हम पर कोई निर्णय देने की तत्परता मत दिखाओ , हम तुम्हारी माँ हो सकती हैं! तुम्हारी बहन, तुम्हारी दोस्त, तुम्हारी बेटी! हां, तुम्हारी प्रोफेसर भी.’ चौबीस घंटे कैमरों के सामने सचेत होते हुए भी बिग बॉस में सनी को देखकर उसका दर्शक मध्यम वर्ग जाने –अनजाने स्त्री –यौनिकता के स्त्रीवादी नजरिये से जुड जाता है, बल्कि ‘यौनकर्म’ को काम मानने  की मुहीम का हिस्सा हो जाता है.

विद्या बालन का  ‘डर्टी पिक्चर’ भी  समग्रता में ‘ स्त्री -यौनिकता ‘ पर विमर्श आमंत्रित करती है. व्यक्ति के रूप में ‘ शील’ ( विद्याबालन ) की संरचना कॉम्प्लेक्स है,वह प्रतीक के रूप में -स्त्री -यौनिकता का विस्फोट है, स्वीकृति है, उत्सव है, और जब सामाजिक दायरों में सोच-मग्न होती है , तो स्त्री-यौनिकता के भारतीय द्वैध में घुटती स्त्री हो जाती है, आत्महत्या करती है. डर्टी पिक्चर के ‘विद्या बालन’ को देखकर, सनी के बिग बॉस के चौबीस घंटे देखकर, जेनेट एंजल की किताब पढकर  डर्टी पिक्चर’ का संवाद मौजू हो जाता है कि , ‘ हर कोई कमर में हाथ डालना चाहता था, किसी ने सर पर हाथ क्यों नहीं रखा?’ हालांकि तीनों चरोत्रों में एक समानता है कि उन्हें अपने व्यक्तित्व से कोई रिग्रेट नहीं है. सनी बिग बॉस में मेहमान होकर आये ‘ महेश भट्ट’ से सनी कहती है कि उसे अपने निर्णय, करिअर के चुनाव पर कोई पश्चाताप नहीं है . जीनेट एक काल  गर्ल के अनुभव से वैसे लोगों के बारे में टिपण्णी करती हैं, जो उनके प्रति दयाभाव में होते हैं, उन्हें मुक्त कराना चाहते हैं , और कहती हैं कि ऐसे लोगो को ‘प्लेग’ की तरह दूर रखना चाहिए. विद्याबालन का चरित्र भी, जो सिनेमा की दीवानगी में जीती है, अपनी यौनिकता पर गर्व करती है, उसपर अपने नियंत्रण से अपना व्यक्तित्व खड़ा करती है और जब इमरान हाशमी, जो प्रारंभ में उससे नफरत करता है, लगभग उसकी यौनिकता की सत्ता को स्वीकार कर बाद में उससे प्रेम करने लगता है, तो आत्महत्या कर लेती है. बालन के चरित्र की आत्महत्या का कारण  वह  सामाजिक दायरा भी है, जहां उसका परवरिश हुआ है , वह जब उस दायरे में  में सोच-मग्न होती है , तो स्त्री-यौनिकता के भारतीय द्वैध में घुटती स्त्री हो जाती है, आत्महत्या करती है.

और यह भी

यही वह द्वैध है, जिसे मीडिया के ये माध्यम अपने रिअलिटी शो से या फिल्म से, समाप्त करना चाह रहे हैं, इन्होने मध्यम वर्ग को एक ऐसे सक्रमण के दौर में खड़ा किया है, जहां से उसकी संस्कृति एक नई करवट ले रही है. ‘ दर्शनरति के  सुख लेते दर्शकों के अवचेतन  पर ऐसे टेक्स्ट, कार्यक्रम उनके अनजाने में ही उनपर बदलाव के दस्तक दे रहे होते हैं, भले ही कोई अदालत अश्लीलता फ़ैलाने के नाम पर विद्याबालन को नोटिस भेज रही हो, जबकि सेंसर बोर्ड की भूमिका लेती अदालतों को द्विअर्थी संवादों और देह के भौंडे प्रदर्शनों से भरी फ़िल्में नहीं दिखती हैं.

संवेदनशील नेतृत्वगुण : यही मेरा सत्व और स्वत्व

लीना बनसोड
महाराष्ट्र सरकार की अधिकारी लीना बंसोड से मेरी मुलाक़ात वर्धा में हुई थी, जिले में पत्रकारिता के दिनों में. कुशल नेतृत्व के गुणों से संपन्न , बेहद मिलनसार लीना अपने काम के प्रति समर्पित अधिकारी रही हैं.  जिले में स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के साथ मिलकर उन्होंने ‘ वर्धिनी’ नामक ब्रांड शुरू किया , जो ग्रामीण महिलाओं के द्वारा बनाये गये खाद्य उत्पादों , टेराकोटा जूलरी  और अन्य हस्तशिल्प उत्पादों का ब्रांड है. 


लीना इन दिनों  मुम्बई में नेशनल रूरल लाइवलीहुड्स मिशन की एडिशनल एम डी ( महाराष्ट्र सरकार ) के रूप में कार्यरत हैं.  स्त्रीकाल के पाठकों के लिए लीना बंसोड के ही शब्दों में उनकी शख्सियत की कथा 
                                                                                                                                         संजीव चंदन

मै मूलतः नागपुर की हूँ। मेरे पापा, चाचा और घर के अन्य रिश्तेदार प्रशासकीय सेवा में कार्यरत थे। इस कारण मेरे घर के वातावरण, होनेवाली चर्चाओं के कारण प्रशासकीय सेवा एवं उसमें अवसर और चुनौतियों  से संबन्धित एहसास मुझे बचपन से ही जाने-अनजाने  होता रहा है। साधारणतः दसवी बारहवी तक की शिक्षा लेते समय ही मुझे यह एहसास हो गया था कि मुझे प्रशासकीय सेवा में अपना करियर बनाना है । मेरे बड़े भाई संजय ने मेरा व्यक्तित्व और रुचि देखकर मुझे प्रशासकीय सेवा में जाने के लिए अधिक प्रोत्साहित किया। प्रतियोगी स्पर्धा परीक्षा की पढ़ाई करने के लिए वह हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते रहे, इस दृष्टि से उन्होंने मुझे तैयार किया,  यह कहना जरा भी अनुचित नहीं होगा। प्रशासकीय सेवा में कार्यरत मेरे घर के अन्य सदस्यों से जाने-अनजाने में मिले हुए संस्कारों को मेरे भाई के रूप में एक मजबूत दिशा/राह मिल गई। बारहवीं के बाद मुझे इंजीनियरिंग  में प्रवेश मिलने के बावजूद  मैंने बी. एस. सी. में प्रवेश लिया। जानबूझकर लिए हुए इस निर्णय के पीछे मेरा यह विचार था कि यदि मैं इंजीनियर हो गई तो मुझे इसी के अनुसार कार्य करना पड़ता, जिसके कारण मेरे अंदर के नेतृत्वगुण और क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए मुझ पर कुछ सीमाएं आ सकती थी। विज्ञान शाखा में पढ़ने के कारण कार्यकारणभाव, तर्कशुद्ध विचार, विश्लेषण आदि कौशल का विकास हुआ जिसका उपयोग आज भी मेरे काम को आसान बनाता है, जीवन को भी.



उम्र के 22-23 साल में ( सन 1996-97 में ) महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग की ओर से ‘विकास प्रशासन’ विभाग में नियुक्ति हुई। इसी समय में ग्रामीण भाग एवं ग्राम विकास विभाग का नजदीक से परिचय हुआ। ग्रामीण भागों की विशेषतः,  ग्रामीण महिलाओं के प्रश्नों का नजदीक से परिचय हुआ,   उनके ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता  एवं  जटिलता का भी अनुभव हुआ।

सन 2000 गोंदिया में समूह विकास अधिकारी के रूप में
कार्य करते समय ध्यान में आया कि वहां के स्कूली विद्यार्थियों के  लेखन, पठन, अंकगणित आदि की मुलभूत  क्षमता बढ़ाने का  प्रयास करना जरुरी है। बड़ी मात्रा में प्रशासकीय तन्त्र , कर्मचारी, सहकारी साथ में थे,  जिनके अंदर की संवेदनशीलता को प्रोत्साहन देकर शिक्षण विषयक विविध उपाय -योजनाओं पर अंमल करना शुरू किया। स्कूल की चार दिवारों के भीतर मिलने वाली शिक्षा, चार दिवारों के बाहर की शिक्षा, विद्यार्थियों का स्वास्थ, अभिभावक -बैठक, शिक्षकों का सहभाग बढ़ाना ऐसे अनेक स्तरों पर कार्य किए गए,  जिसका उत्तम परिणाम कम समय  में ही दिखने लगा।

इस अनुभव से अहसास हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर आतंरिक उर्जा रहती है कि हम अच्छे कार्यों का भाग बनें, हमें समाज की प्रगति, विकास हेतु योगदान करने का मौका मिले,  जिसके लिए सिर्फ जरुरी होता है कि कोई सामने/आगे आकर, नेतृत्व करके आतंरिक उर्जा को दिशा दे।  प्रशासकीय तन्त्र  में कार्य  करते हुए आवश्यक रहनेवाला दबाव, कठोरता, व्यवस्थापकीय कौशल और विकास- कार्यकर्ताओं में अपेक्षित संवेदनशीलता, निष्ठा एवं तड़प  का संयोग  मेरे व्यक्तित्व में होने का अहसास मुझे कार्य करने के दौरान हुआ। मुझे लगता है कि इसी आत्म विश्वास के कारण ही आगे की कार्यप्रणाली को मैंने अधिक सक्षम बनाया।

वर्धा जिला  में ‘जिला  ग्रामीण विकास विभाग ’ के प्रकल्प संचालिका के रूप में कार्य करते समय  मुहीम चलाई कि स्वयं सहायता समूहों  की महिलाओं को अंगनवाडियों में खिचड़ी पकाने का काम दिया जाना चाहिए । समूहों  की महिलाओं  , बड़े व्यापारी, स्थानीय दुकानदार,  इन सबके साथ समन्वय रखकर केवल तीन महीनों में वर्धा जिले में,  जिन-जिन गांव में स्वयं-सहायता समूह  कार्यरत थे,  उन सभी गांवों की अंगनवाडियों में,  खिचड़ी पकाने का काम स्वयं-सहायता समूहों  को मिला। यह एक बड़ी उपलब्धि  थी, जिसके कारण गावं की महिलाओं को एक स्तर पर प्रगति करने का अनुभव मिला , जो उनके आगे के जीवन-यात्रा में काम आया।

इस अनुभव से,  विविध पदों पर काम करते हुए,  अलग-अलग स्तर पर मिले हुए दायित्व को सँभालते हुए,  यह महसूस किया  कि हमें दिए गए कार्यक्षेत्र और कार्यकक्षा में भी बहुत अच्छा बदलाव हमें करना आता है। सहकर्मियों के अच्छे गुण पहचानकर उनके गुणों को और विकसित करने के लिए उन्हें अवसर  देना, उनके साथ होना, यह नेतृत्व करनेवाले व्यक्ति में विशेष गुण होता है। एक महिला के रूप में आतंरिक संवेदनशीलता के कारण मैं यह कर सकी,  जिसका अच्छा परिणाम सभीं की कार्यक्षमता बढ़ने में हुआ। इसमें एक और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें कोई भी गैर क़ानूनी काम या नियमबाह्य कार्य नहीं किया गया,  जिसके कारण किसी के भी दबाव में न रहकर कार्य किया गया। इसी तरह किसी दूसरी जगह मेरी नियुक्ति हो ऐसी मेरी प्राथमिकता नहीं थी। पारदर्शी, स्वच्छ प्रशासन और सातत्यपूर्ण/निरंतर कार्यक्षमता के कारण मेरी अपने आप ही एक अलग पहचान निर्माण हुई। अर्थात यह यात्रा सामान्य एवं सरल नहीं थी। कुछ निर्णयों का विरोध भी हुआ, कुछ बातों को अंमल करने के लिए अपेक्षा के अनुरूप ज्यादा समय भी लगा,  परंतु समय-समय पर लिए गए निर्णयों के परिणामों का साहस के साथ सामना करने के कारण आत्म विशवास बढ़ा । विचारों की बैठक और उसकी स्थिरता बढ़ने में मदद हुई।

 इन सभी सफलताओं  में महिला के रूप में होनेवाली संवेदनशीलता, विवरणों की छोटी-छोटी चीजों की तरफ ध्यान देने की आदत, संयम या सहनशीलता आदि  गुणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही । मुझे लगता है कि यह गुण स्त्री-पुरुष दोनों में कम या अधिक मात्रा में रहते है , किंतु महिलाओं में एक समग्र विचार करने की वृत्ति रहती है,  साथ ही एक अलग स्तर पर संवेदनशीलता और समझ रहती है। महिला के रूप में जीते समय, बढ़ते समय जो खतरा (व्हलनरेबिलिटी) तथा अनुभव होते है,  या जो दिखाई देते हैं ,  इसके कारण यह विशिष्ट समझ महिलाओं में विकसित होती होगी।        

सन 2007 वर्धा में  ‘जिला ग्रामीण विकास विभाग ’ की प्रकल्प संचालिका के रूप में कार्य करते हुए ‘  स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना’  को अंमल करते समय मेरे कार्यों और सामाजिक विकास के प्रति समझ और दृष्टिकोण को और एक अलग आयाम मिला। वह आयाम था,  व्यापक स्तर पर अंमल करने का और स्थानीय महिला कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षक के रूप में तैयार करके उनके माध्यम से ग्राम विकास के कार्यों को समाज में उतारने का। गाँव की, वहां की समस्याओं की और महिलाओं का समाज में स्थान आदि की मुझे पूरी समझ हो गई थी। ‘ स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना’  को अंमल करने की जिम्मेदारी महिला स्वयं सहायता समूहों पर थी। स्वयं सहायता संकल्पना पर मैंने जब गहराई से विचार किया तब मुझे अनुभव हुआ कि इन संघटनाओं की ताकत क्या है। जब महिलाएं अपनी  जीविका के प्रश्नों को लेकर एकत्रित होती हैं,  तब उनके भीतर उपस्थित सामूहिक शक्ति और एकत्रित हो जाती है। वर्धा की स्थानीय महिलाएं जिन्हें , ‘संघटिका’ कहा गया है,  उनका इस योजना को यशस्वी करने में सफल बनाने में,  महत्त्वपूर्ण योगदान रहा. कुछ ही समय में  संघटिका का संस्थात्मक स्वरूप ही नहीं टिक पाया,  बल्कि ‘वर्धिनी’ के रूप में इसकी वृद्धि भी हुई। सन 2007 में लोकसहभाग  का महत्त्व पहचानकर ग्रामीण महिलाओं के सर्वांगीन विकास के लिए उन्हीं के गाँव में रहनेवाली महिला कार्यकर्ता प्रशिक्षकों,  जो उनके साथ सहज संपर्क बना सकती थीं  , की टीम बनाने का प्रयोग,  राज्य में ही नहीं अपितु देश में प्रथम बार किया गया। संघटिकाओं को विविध प्रकार का प्रशिक्षण देकर उनकी टीम बनाने का सोचा-समझा प्रयास किया गया। ग्रामीण महिलाओं के सक्रिय सहभाग से ही सामूहिक स्तर तक का विस्तार गाँव – गाँव में  हुआ। सशक्तिकरण का प्रारूप, जो सरकारी तन्त्र  के द्वारा खड़ा किया गया,  इसी में इसका अलगाव निहित है । बचत, कर्ज एवं व्यवसाय , इस परिधि से बाहर न जा सकने वाले बचत समूह की महिलाओं की वैयक्तिक, सामूहिक, सामाजिक सशक्तिकरण इस कारण घटित हुआ। स्वयं स्फूर्ति से, जी जान लगाकर काम करने की मेरी पद्धति ने और गाँव- खेड़ों की महिलाओं के प्रश्नों के साथ, उनके रोज के जीवन संघर्षो से एक महिला होने के नाते वैचारिक एवं भावनिक रिश्ता जुड़ने के कारण ही मैं यह सब कर सकी।

वर्धा जिला के जिला परिषद की अध्यक्ष महिला थी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी महिला थी, और मै भी, ऐसी हमारी महिलाओं की अच्छी टीम,  ऊँचे स्तर की निर्णय प्रक्रिया में सहभागी थी। ग्रामीण महिलाओं का विश्वास एवं आधार देना इस मॉडल के सफलता की गुरुकिल्ली थी। एक महिला होने के नाते मैं उसे अच्छे प्रकार से समझ सकी और उनका नेतृत्व निभा सकी। अपने  स्वास्थ के प्रश्न, बच्चों की शिक्षा, पारिवारिक नाते-संबंध, गाँव के प्रश्न,  इन सभी के सन्दर्भ में महिला अधिक खुलकर बोलनी लगी। आत्मसम्मान  के लिए उनकी लड़ाई को आर्थिक स्वावलंबन की, नैतिक सहयोग एवं सामूहिक शक्ति की सहायता मिलने कारण अनेक महिला एवं पर्यायी रूप से उनके परिवार स्थिर हो गए और उनका विकास हो सका। वर्धा के इस काम की, संघटिका मॉडल की राष्ट्रीय स्तर पर दखल ली गई।

संघटिकाओं की टीम स्थापित होने के बाद दूसरा भाग था ‘वर्धिनी’ ब्रांड  निर्माण करने का। जीविका, आरोग्य/स्वास्थ, शिक्षण, आदि मुलभूत त आवश्यकताओं की पूर्ति का यशस्वी रूप से निराकरण करने के पश्चात यही महिला अब ‘उद्योजक’ बन गई। ‘वर्धिनी’ ब्रांड  द्वारा विविध स्वयंसहायता समूहों  के उत्पादन को एक छत के नीचे लाकर सामूहिक वितरण  व्यवस्था स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया गया। इस ब्रांड के अंतर्गत अठारह प्रकार के खाद्यपदार्थ, खादी एवं जूट  से निर्माण किये गये बैग  एवं अन्य वस्तु और विशेष रूप से विशिष्ट प्रकार की मिट्टी पर प्रक्रिया कर निर्माण किए गए गहने (टेराकोटा ज्वेलरी),  इन सब का ‘वर्धिनी’ नाम से ब्रांडिंग की गई। इस ब्रांड  के लिए ‘लोगो’  बनाना, उसकी टैगलाईन, सूचनापत्र के एवं इतर प्रसार साहित्य आदि के  निर्माण के लिए इस क्षेत्र से संबंधित विद्वान व्यक्तियों की मदद  ली गई। ग्रामीण महिलाओं के  बनाये हुए उत्पाद शहरी ग्राहकों को भी पसंद आये,  इसके लिए जो कार्य किया गया वह प्रसिद्ध  हुआ। शहरी बाजार में यह उत्पादन प्रसिद्ध  हुआ ,  बल्कि उनकी विशिष्ट पहचान भी बनी। वर्धा एवं विदर्भ में भी इसके पहले इतने वैचारिक रूप से, नियमबद्ध पद्धति से और व्यावसायिक दृष्टि से यशस्वी होनेवाली इस प्रकार की योजना किसीने भी नहीं बनाई थी । आज वर्धा में अनेक महिलायें ‘वर्धिनी’  उत्पादन बनाती हैं  और उपलब्ध रहनेवाली विक्रीव्यवस्था का उपयोग करती हैं । एक ‘वर्धिनी’ आउटलेट वर्धा में भी है। ‘वर्धिनी सेवा संघ’ के रूप में बैकवर्ड लिंकेज और वर्धिनी ब्रांड  के रूप से फ़ॉरवर्ड लिंकेज – अनोखा मेल जम गया है। संघटिका एवं वर्धिनी योजना का यह कार्य करते समय मेरे अंदर के नेतृत्वगुण एवं स्फूर्ति के साथ किसी भी काम में झोंककर काम करने की प्रवृत्ति दिखी । विशेषतः मेरे व्यक्तित्व में समाहित ‘अनुभवी प्रशासक’ और ‘विकास कार्यक्रम की जानकार’ दोनों रूपों का मैं उपयोग कर सकी । इस कारण मेरे लिए यह संपूर्ण अनुभव केवल यश प्राप्ति तक सीमित नहीं था,  बल्कि अनेक आवश्यक परिवारों के जीवन में होनेवाले बदलाव में अपना योगदान देते हुए स्वयः समृद्ध होने का था। महिला सक्षमीकरणों की विविध छटा  मैं दूसरी महिलाओं में भी देख रही थी और स्वयं में होनेवाले परिवर्तन की तरफ भी साक्षी भाव से देखते हुए मैं वैचारिक दृष्टि से समृद्ध होती रही।

शायद मेरे अब तक के किए गए कार्यों की रसीद के रूप  एक अनोखा अवसर मेरे सामने आया जो ’ नेशनल रूरल लाइवलीहुड्स मिशन  ( महाराष्ट्र )  का था। इस मुहीम  का नामकरण ‘उमेद’ के नाम से किया गया। ‘उमेद’ नेशनल रूरल लाइवलीहुड्स मिशन  को  महाराष्ट्र राज्य के लिए अंमल करने वाला विभाग है । ग्रामीण गरीबों के जीवनोन्नती के लिए ‘उमेद’  कटिबद्ध है, जिसका आधार महिला स्वयं सहायता समूह का संस्थात्मक स्वरूप है। फिर से एक बार बड़े स्तर पर विकास कार्यक्रम पर अंमल करने के लिए मैं प्रतिबद्ध  हूँ। बढ़े हुए अहसास और विविध प्रकार के अनुभव के आधार पर मेरी यह यात्रा शुरू है। महाराष्ट्र राज्य के सभी जिलों में जिसका विस्तार होनेवाला है,  ऐसी मोहिम के लिए मेरी नियुक्ति चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर पद पर होकर अभी ढाई साल बीत चुका  है। ग्रामीण गरीबों की संस्था बना कर उनका सर्व समावेशक विकास करना ही  उमेद का उद्देश्य है। इसके लिए समाज को प्रेरित करना, वित्तीय  एवं आर्थिक समावेशन, शास्वत उपजीविकाओं ( Livelihoods) का अवसर एवं मार्ग की उपलब्धता,  आदि विविध साधनों के मेल के ‘  उमेद’ में अवसर है।  गरीब व्यक्ति विकास योजनाओं का  केवल लाभार्थी न होकर,  सक्रिय  भागीदार हो , यह  भूमिका ही ‘ उमेद’  का और एक महत्त्वपूर्ण वैशिष्ट्य है।’ उमेद’  ने  सोसाईटी फॉर एलिमिनेशन ऑफ़ रूरल पावर्टी  (सर्प-आंध्रप्रदेश), कुडुंबश्री (केरल), महिला आर्थिक विकास महामंडल (माविम),  टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल सायन्सेस आदि  प्रतिष्ठित संस्थाओं के साथ भागीदारी की है। इतनी जटिल (Complex) , इतने बड़े स्तर पर चलने वाली और ग्रामीण उपजीविका के सन्दर्भ में अलग-अलग पहलुओं को ध्यान में रखकर उस पर अंमल करने वाली उमेद मुहीम की  सफलता में मानव संसाधन  की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण  है,  जिसकी ओर मेरा ध्यान शुरुआत से ही रहा है.

अच्छे विचारों से प्रेरित, कार्यक्षम और जिनके पूर्व अनुभव का लाभ ‘उमेद’ को होगा , ऐसे प्रतिभाशाली  व्यक्तियों को,  उनकी क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए  वातावरण का निर्माण करते हुए  हमने ‘ उमेद’ से जोड़ा.  कार्यों के परिणाम हेतु, कर्मचारी, सहकारियों की मानसिकता बनाए रखने के लिए जो सुख सुविधा आवश्यक है,  उसकी तरफ तत्परता से ध्यान दिया जाए। वैसी ही कार्य संस्कृति अपनाई जा रही है। सभी सहकारियों को अलग-अलग प्रशिक्षण दिया जा रहा है। लिंग – समभाव या समानता के विचारों को उनकें मन में स्थापित करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। जो बदलाव हमारे समाज में होने चाहिए,  ऐसा जिनको लगता है,  क्या सबसे पहले हमारे अंदर आ सकते है,  इस विषय पर हम सब मिलकर सोचते है। अलग-अलग सामाजिक विषय,  इसमें आनेवाली चुनौतियों , चुनौतियों  का हल निकलने के लिए पहले किए गए  प्रयत्न इस संबंध में परस्पर समझते है।नियमित बैठक, नियमित बचत, अंतर्गत कर्ज, नियमित वापसी एवं समूहों  के अहवाल रखना इन पांच सूत्र के सामने ‘उमेद’  ने और पांच सूत्र जोड़ दिए। शिक्षण-साक्षरता, आरोग्य/स्वास्थय, सरकारी योजनाओं का लाभ, पंचायती राज व्यवस्था में सक्रीय सहभाग और शाश्वत उपजीविका  पांच सूत्र हैं ।   

महिलाओं में  निर्णय-क्षमता  स्वतंत्र रूप से बढ़े, उनकी आवाज और मजबूत हो , इसके लिए मैं प्रयत्नशील रही  परंतु यह सब करते समय मैं उक्ति एवं कृति में  लिंग समभाव के मूल्य का पालन करते आ रही हूँ। महिला होने का फायदा मैं नहीं लेती या वैसी अपेक्षा भी नहीं रखती। कार्यालय में देर तक रुकने की जरुरत होने पर मै रूकती हूँ और ग्रामीण इलाकों में नियमित रूप से दौरे करती हूँ। महिला-पुरुष इन दोनों के समान सहभाग के माध्यम से, एक-दूसरे के प्रति सम्मान , आदर रखकर और महिलाओं को समान अवसर देकर ग्रामीण जीवनोन्नति का यह उद्देश्य सफल होगा,  ऐसा मेरा विश्वास है।

शब्दांकन : श्रीनिवास महाबल
अनुवाद : प्रफुल्ल भगवान मेश्राम,  शोध छात्र – पी.एच-डी हिंदी (भाषा प्रौद्योगिकी) महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र, संपर्क : pmeshram87@gmail.com, मोबाईल : 9922694337

इतिहास के आईने में महिला आंदोलन

निवेदिता


मूलतः पत्रकार निवेदिता सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ प्रकाशित . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

 नारीवादी सिथिंया एनलो ने भूमंडलीकरण के समर्थकों से पूछा था कि तुम्हारी व्यवस्था में ‘औरतें कहां हैं’? इस छोटे से सवाल का उस समय लंबा जबाब दिया गया था कि औरतें कहां नहीं हैं, किस मोर्चे पर  नहीं है? पर सच तो यह है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में औरतें जितनी सबल दिखतीं हैं उतनी ही वह हारी हुई दिखती है। बाजार के जाल में फंसी हुई । आजादी की कीमत चुकाती हुई। हाफतीं हुई ,लडती -भिड़ती हुई। सामाजिक स्थितियां राजनीतिक घटनाक्रमों की रफ्तार से नहीं बदलती। वर्गो और विभिन्न सामाजिक श्रेणियों में बंटे समाज में स्त्री की हालत इसलिए भी बुरी है कि वह इन विभेदों के साथ़-साथ पितृसत्तात्मक समाज को भी झेल रही है।

आजादी के बाद  देश में जो समाजिक, आर्थिक व राजनीतिक बदलाव हुए उस बदलाव में स्त्रियों की साझेदारी रही है। साझेदारी से ज्यादा उसने घर और बाहर के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई लड़ी। पर ये लड़ाईयां इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हुई। जो कुछ नाम दर्ज हैं वे इसलिए कि इन नामों के बिना इतिहास लिखा नहीं जा सकता था वर्जीनिया वुत्फ ने एक जगह लिखा है ‘इतिहास में जो कुछ अनाम है वह औरतों के नाम है’। इतिहास में औरतों की भूमिका हमेशा  से अदृश्य रही है। उसकी एक वजह है कि हम इतिहास चेतन नहीं रहे। इतिहासकारों ने प्रतीकों, लोक गाथाओं, गीतों व अन्य स्त्रोतों को कभी समेटने की कोशिश नहीं की। हम जानते हैं कि व्यवस्थित रुप से इतिहास रचने की मंजिल पर पहुंचने से पहले ऐसे सभी समुदाय पहले चरण में आत्मगत ब्योरों का इस्तेमाल करते हैं ताकि उनकी बुनियाद पर इतिहास लिखने की इमारत खड़ी की जा सके। आशा रानी वोरा  ने जब महिलाएं और स्वराज किताब लिखना शुरु किया तो उन्हें तथ्य जुटाने में 12 वर्ष लगे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि आजादी आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर लिखने के लिए जब सामग्री जुटाने लगी तो गहरी निराशा हुई।

माना जाता है कि उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में अनेक महिला आंदोलन हुए। पर उन आंदोलनों का कोई इतिहास नहीं मिलता। यही वह क्षण है , जब स्त्री आंदोलन व देश  में हुए आंदोलन का पुर्नमूल्याकंन जरुरी है ताकि मुक्ति की सामाजिक परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ा जा सके। जब देश  में आजादी के आंदोलन की लहर थी तो बिहार भी उस आग में लहक रहा था। औपनिवेशिक काल में बिहार में बंगालियों,कायस्थों और मुसलमानों का अभिजात तबका काबिज था,जमींदारी मुख्यतः भूमिहारों,राजपूतों,बा्रह्मणों,मुसलमसनों और कायस्थों के हाथ में थी। 1920 के असहयोग आंदोलन 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में राजपूत और भूमिहार जाति ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। और यह समुदाय राजनीति में अपना प्रभाव बनाने लगा। उसी दौर में महिलाएं वोट देने के अधिकार को लेकर आंदोलन कर रही थीं। यह त्रासदी है कि जिस आंदोलन की शुरुआत महिलाओं ने बींसवीं सदी के आरंभ में की थी, आज उसी तरह का आंदोलन राजनीति में 33 प्रतिशत हिस्सेदारी को लेकर है। आजाद मुल्क में भी महिलाओं को उसके हिस्से का हक लेने के लिए लड़ना पड़ रहा है।

राजनीतिक रुप से बिहार हमेशा  से चेतनशील रहा है। 1917 में महात्मा गांधी के आगमन के बाद पर्दा प्रथा,बाल विवाह, सती प्रथा, शिक्षा जैसे सवालों के साथ-साथ असहयोग, स्वदेशी  खिलाफत और खादी के आंदोलन में महिलाओं ने जमकर हिस्सा लिया। 1912 में पटना में राममोहन राय सेमिनरी में महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। श्रीमती मधोलकर ने इसकी अध्यक्षता की। और बाल-विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। 1928 में महिलाओं ने साइमन कमिशन का जबरदस्त विरोध किया। बिहार में लेजिस्लेटिव कौंसिल में महिलाओं को वोट देने के अधिकार व लेंगिक भेदभाव को लेकर नवम्बर,1921 को एक प्रस्ताव पेश किया गया। 1919 के एक्ट के अनुसार वे वोट नहीं दे सकती थीं। कौंसिल में इस मसले पर जमकर बहस हुई। और यह प्रस्ताव 10 वोटों से गिर गया। और कोलकाता में पेश महिलाओं के मताधिकार देने संबंधित प्रस्ताव भी भारी मतों से पराजित हो गया। पर महिलाएं हिम्मत नहीं हारीं। उनके संघर्ष जारी रहे। लंबी लड़ाई के बाद बिहार और उड़़ीसा में 1929 में यह अधिकार महिलाओं को मिला।

अतीत में हुए संघर्ष को देखते हुए हम ये कह सकते हैं स्त्री के भीतर आजादी की आग है। और उसकी पहली लड़ाई है वर्चस्व विहीन समाज की स्थापना। यही वजह है कि आज स्त्रियाँ  परिवार में श्रम के विभाजन,पारवरिक संबंधों में उसकी उपस्थिति और सत्ता में उसकी जगह को लेकर आंदोलित हैं । महत्वपूर्ण बात यह है कि स्त्रियों का आंदोलन एकालाप में नहीं चलता।  समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका का भले ही आंकलन नहीं हुआ हो सच तो यह है कि सभी आंदोलनों में उसकी भागीदारी रही है। देश में 70 के दशक में जयप्रकाश  नारायण के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन हुआ। जिस आंदोलन ने सत्ता  की नींव हिला दी। उसमें बड़ी संख्या में स्त्रियों ने हिस्सा लिया। काॅलेज स्कूलों से निकल कर निरंकुश सत्ता के खिलाफ वे सड़कों पर थीं। स्त्री जब भी किसी आंदोलन का हिस्सा होती हैं,  तो वह एक साथ कई वर्जनाओं को तोड़ती है।
स्त्री आंदोलन को महत्वपूर्ण आयाम देने वाली सिमोन द बोवुआर कहतीं हैं ‘ मात्र वर्ग संघर्ष के द्वारा ही स्त्री-मुक्ति के महान लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता है….चाहे साम्यवादी हों,माओवादी हों,या ट्रस्टवादी औरत हर जगह हर खेमें में अधीनस्थ की स्थिति में है,सबसे निचले पायदान पर खड़ी है।’  जब देश  में 74 का आंदोलन हो रहा था उसी दौर में देश  के कई हिस्सों में स्त्री हिंसा के वीभत्स मामले सामने आ रहे थे। यह वहीं दौर था जब रुप कंवर को सती के नाम पर जबरन जला दिया गया। इस अमानवीय घटना के विरुद्ध  महिलाओं ने जबरदस्त आंदोलन किए। 92 आते -आते देश को हिला देने वाली घटना हुई- भवंरी बाई के ऊपर बलात्कार की घटना ।

आजादी के बाद 80 का दशक भारत में स्त्री आंदोलन का दशक माना जाता है। महिलाएं एक तरफ स्त्री के मसले पर लड़ रही थीं दूसरी तरफ देष में चले सभी प्रमुख आंदोलन में उसकी हिस्सेदारी रही। राजनीति में अपनी हिस्सेदारी से लेकर वह जल,जंगलऔर जमीन की लड़ाई में लगी रही। बिहार में जमीन की लड़ाई में मूल रुप से वामपंथी पार्टियों का असर रहा है। 80 के दशक में नक्सल आंदोलन का विस्तार हुआ। राजनीतिक शक्तियों के रुप में खुद को स्थापित करते के लिए उन्होंने संसदीय राजनीति का रास्ता चुना।1985 में उनका मुख्य हिस्सा चुनावी संघर्षो में शामिल हो गया। 74 के जनआंदोलन से वे अलग.-थलग ही रहे।  जन आंदोलन और चुनावों में भागाीदारी के जरिए दलित और अति पिछड़ी जातियों के गरीब तबको के बीच खासकर मध्य बिहार में भाकपा माले का व्यापक विस्तार हुआ। इस तबके के बीच जनता दल आदि पार्टियों का भी गहरा असर था। दलित और पिछड़ों के सामाजिक व राजनीतिक विस्तार को देखते बड़े भूस्वामियों और उच्य वर्ग के किसान जातीय राजनीति के नाम पर गोलबंद होना शुरु हुए। बिहार में कई जातीय नरसंहार हुए। जिसमें सबसे ज्यादा दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं व बच्चे निशाना बने। दरअसल 72से 85 के बीच तानाशाही बनाम लोकशाही, केन्द्र में जनता प्रयोग की विफलता और विपक्षी शक्तियों का बिखराव और 80 में इंदिरा गांधी की हत्या और राष्ट्रीय एकता जैसे सवाल ने दलितों व पिछड़ों के मुद्दे  को पीछे ढकेल दिया।

 90 के दशक आते आते यह एक बड़ा मुद्दा  बना। फिर आया मंडल का दौर।  पिछड़ों व दलितों की भागीदारी जैसे सवाल अब राजनीतिक सवाल था, जिससे कोई पार्टी बच नहीं सकती थी। पिछले 22-25 सालों में निश्चय ही सामाजिक परिवर्तन के लिहाज से यादगार काल है, जिसने परंपरागत राजनैतिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया। वंचित समुदायों में नई राजनीतिक चेतना आई। राजनीतिक परिवर्तन के काल में इसे चिन्हित किया गया। इसी काल में लोगों को आवाज मिली और इसी दौर में अति पिछड़ों को पंचायतों में आरक्षण मिला। महिलाओं को आरक्षण मिला।

पर बात यहीं खत्म नहीं होती। जैसे-जैसे स्त्री अपने अधिकार के प्रति सजग हुई उसपर हमले तेज हुए। इस सदी मेें भी निर्भया बलात्कार जैसे जधन्य मामले सामने आए। जिसने देश को आंदोलित किया। उसी आंदोलन का नतीजा है कि बलात्कार के विरुद्ध कड़े कानून बने। स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गो एवं वर्णो तथा जातियों के बीच नए-नए समीकरणों से चाहे कुछ भी नहीं मिला हो पर वह लड़ रही है। अपनी क्षमता और कौशल को और अधिक तराश  रही है। वह इस अमानवीय परंपरा के विरुद्ध खड़ी है। पूंजीवादी पितृसत्ता उपर से चाहे जिनती उदार और सरल लगे भीतर से बड़ी जटिल है। प्रभा खेतान कहती हैं कि ‘ दोष इसकी संरचना में ही है।’   हमें इस संरचना से ही अलग होना होगा। इसके लिए स्त्री समूह की जरुरत है। उसे हर मोर्चे पर लड़ना होगा। दुनिया की आधी आबादी स्त्रियों की है, दुनिया में दो तिहाई काम औरतें करतीं हैं लेकिन दुनिया की सबसे गरीब कौम औरत ही है।

ये औरत कौन है,  जो लड़ रही है,  जो जीने का हक मांग रही है,  जो जानती है अपमान सहती हुई शोषणग्रस्त आधी आबादी जब विद्रोह करेगी तो उसमें सच्ची आग और तड़प होगी। वह फूटती-लरजती जहां-जहां बहेगी वही से इतिहास का नया अध्याय लिखा जायेगा। जो नारा कार्ल मार्क्स  ने दुनिया के मजदूरों के लिए दिया था वह नारा उसके लिए है। वह कह रही है दुनिया कि स्त्रियां एक हो तुम्हारे  पास खोने के लिए कुछ नहीं है।

सन्दर्भ स्रोत :
महिला और राजनीति -लेखक -श्रीकांत
प्रभा खेतान का आलेख-‘हंस’ की नारीवादी उड़ान
बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम-श्रीकांत/प्रसन्न चैधरी