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‘‘अनाघ्रातम पुष्पम, असूर्यंपश्या से रमणेषु रम्भा तक’’

संध्या सिंह

विभागाध्यक्ष ‘हिन्दी’
डी0ए0वी0पी0जी0 कालेज
लखनऊ. संपर्क :sandhyasinghdr1@gmail.com

इस लेख में कोशिश की गई है  स्त्रीलेखन के बहाने मानव सभ्यता के सबसे पुराने विवाद से साक्षात्कार की । आॅखें मूंदने से काम नहीं चलने वाला। शुतरमुर्ग को रेत से सर निकालना ही है क्योंकि आॅंधी तो आ चुकी है। क्या है यह विवाद जिसे पितृसत्ता, धर्म और बर्चस्व – दासता के गणित ने सदियों से एक आवरण से ढक रखा है।|

विवाद इस मान्यता का है कि पुरूष प्राकृतिक रूप से बहुगमन (पाॅलीगेमी) के लिये बना है और स्त्री एकनिष्ठता(मोनोगेमी)  में ही सुख-दुःख पाती है। – कि यह प्रवृत्ति देश-काल -परिस्थिति जन्य नहीं प्राकृतिक है। पड़ताल के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं कि प्रेम को देह से पृथक कैसे करेंगे! और देह से मानव को पृथक कैसे करेंगे! और प्रेम और मानव से साहित्य को पृथक कैसे करेंगे सम्भव नहीं है। साथ ही सामाजिक संरचना और विधि निषेध का इतिहास तो है ही पृष्ठ भूमि में। तमाम उतार-चढ़ाव और पड़ावों से गुजर कर हमारा साहित्य आज जिस मुकाम पर है, उसके फलक पर एक तरफ है पुरातन संस्कृति के प्रति रूमानी आदर्श दृष्टि, दूसरी तरफ अतीत के विधि निषेधों से असहमत होने के लिये तत्परता से सहमत समूह और उनके बीच खड़ी स्त्री की वास्तविक व्यावहारिक समस्याएं-सपने। आज स्त्री प्रश्न इन तीनों बिन्दुओं से टकरा रहा है। वर्तमान परिदृश्य पर अकादमिक बहसों की निरर्थकता भी है (अपवाद भी है) बौद्धिक वाग्जाल भी है और निजी संस्थाओं के सार्थक निर्रथक प्रयास भी हैं। कुछ नहीं बदला या यह विमर्श कुछ खंगाल नहीं पाया  यह तो कहा ही नहीं जा सकता पर आज मानव सभ्यता जिस मुहाने पर आ खड़ी हुई है,  उसकी आधी दुनिया अपनी यात्रा के जिस पड़ाव पर है,  वहाँ से आगे भी रास्तों का एक जाल है जैसा पीछे था। ज्ञात अतीत से दोनों तरफ के उद्धरणों की फेहरिस्त दी जाती रही है। अपने विश्वासों, सुविधाओं , मनोभावों के अनुरूप, उन्हें पुष्ट करते हुए एक तरफ स्त्री के महिमामण्डन की और दूसरी तरफ उसके प्राकृतिक रूप से दोयम दर्जे का होने की। पुराण, कुरान, हदीस, मनुस्मृति, रामायण आदि के उद्धरणों की यहाँ आवश्यकता नहीं है। जिस तरह आजका पढ़ा – लिखा समुदाय पश्चिम के नारीवादी आन्दोलन के प्रमुख सोपान, हिन्दुस्तानी स्त्री मुक्ति आन्दोलन पर उसका प्रभाव, कमोबेस जानता ही है वैसे ही इतिहास के-सुविधाजनक प्रसंगों की भी उसे जानकारी है ही!

बात स्त्री की जैविकता – देह से गुजरते हुए उसके अस्तित्व और अस्मिता पर आ टिकने की है। स्त्री अस्मिता के प्रश्नों की पड़ताल का एक प्रमुख धरातल स्त्री लेखन में प्रतिबिम्बित स्वप्न और यथार्थ हैं। जो पैमाने और जो मापदण्ड बने बनाए हैं, उनके आधार पर अधिकांश स्त्री लेखन के स्वप्न अधिक रूमानी (अमूर्त) और यथार्थ अधिक कठोर (पतनशील) है। वे मापदण्ड इसका ठीकरा पश्चिमी तर्ज के नारीवाद के भारतीय महिला लेखन पर गहरे प्रभाव के सर पर फोड़ते हैं। पिछले दो दशक का महिला लेखन आग और पानी साथ लेकर चल रहा है, पर यह परिणाम है। कारण पीछे है। ज्ञात अतीत के आखिरी छोर पर कहीं न कहीं इसका बीज है। जब मानव सभ्यता के इतिहास में स्त्री मानव होने की गरिमा से वंचित कर दी गई। यह गहरे शोध का विषय है कि वह कौन सा प्रस्थान बिन्दु था जब धर्म ने स्त्री की यौन शुचिता को परिभाषित और नियंत्रित किया और उसका वस्तुकरण कर दिया। दूसरी तरफ 1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के बाद 1792 में मेरी बुलैस्टन क्राफ्ट की कृति ‘‘द विंडिकेशन आॅफ द राइट्स आॅफ वीमेन’’ को नारीवाद की पहली लहर माना जाता है। उत्तर मार्क्सवादी  नारीवाद, उग्र नारीवाद है। राधा कुमार की ‘‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’’ भारत में सन 1800 से 1990 तक के नारीवादी आन्दोलनों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है और इस भ्रम पर जबरदस्त प्रहार करती है कि ‘‘भारत में नारीवाद एक अप्रासंगिक पश्चिमी – आयात है जो प्रथभ्रष्ट भारतीय स्त्रियों द्वारा किया गया है।’’1 पुस्तक के ‘उन्नीसवीं सदी’ वाले अध्याय में सती प्रथा और विधवा विवाह के प्रसंगों 2 से गुजरते हुए अनायास अज्ञात हिन्दू महिला (सीमंतनी उपदेश ) और दुखिनी बाला (सरला: एक विधवा की आत्म जीवनी) की रचनायें बीज के बाद भ्रूण की तरह सामने आती हैं। रोहिणी अग्रवाल मानती हैं कि ‘‘मीराबाई के बाद अज्ञात हिन्दू महिला हिन्दी की दूसरी स्त्री विमर्शकार है जो पातिव्रत्य धर्म की चुधियाती रोशनी के पीछे छिपे जानलेवा अंधेरों को साफ-साफ देख सकी है। उनकी दृष्टि में विघटित सम्बन्ध का कारण है पुरूष का व्यभिचारी स्वभाव विवाह का अर्थ यदि पति की लातें खाकर उन चरणों को पूजना है तो अज्ञात हिन्दू महिला डट कर इस विवाह संस्था का विरोध करती है.3 उनका कड़वा सच तत्कालीन स्त्रियों को आगाह करता है ‘पंडित लोग स्त्रियों को पतिव्रत महात्म्य सुनाकर दबाते हैं और पुरूषों को कोकशास्त्र और नायिका भेद की रसीली चर्चाएं सुना कर बेबस – अवश स्त्रियों को बाजार में बैठा कर व्यभिचार कराते हैं।’’ (सीमंतनी उपदेश पृ0 112) 4 बहरहाल, भड़काऊ अंदाज में कड़वा सच बोल- लिख कर स्त्रियों को उकसाने (चेतन करने) के अपराध में अज्ञात हिन्दू महिला ने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी साहित्य से निर्वासन का दण्ड तो भोगा ही।’’5 अज्ञात हिन्दू महिला का सर्वसमावेशी आवेश और दुखिनीः बाला का प्रशांत गाम्र्भीर्य हिन्दू धर्म और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन की मांग करते हैं।’’6 रोहिणी प्रश्न उठाती हैं ‘‘स्त्री की सामाजिक स्थिति में सुधार के लिये कानूनी अधिकार मांगता नवजागरण कालीन हिन्दी समाज स्त्री स्वरों से इतना भयभीत क्यों हो गया कि उनके साहित्यिक अवदान के साथ-साथ उनके नाम को भी ‘‘खा’’ गया । ऐसी कौन सी वर्जनाएं और दबाव बनाए कि उन्हें नाम से नहीं, वरन बंग महिला, अज्ञात हिन्दू महिला, दुखिनी बाला सरीखै विशेषणों के साथ जाना गया ? ….. नव जागरण कालीन पुरूष मानसिकता भले ही अपने युग की स्त्रियों के अधिकारों की सीमा तय करने के विवाद में अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पा रही थी लेकिन क्या हमारा अपना युग उनकी संकीर्ण द्वन्दों पूर्वग्रहों और तिरस्कार उपहास सही-सही व्यापक पाठक समाज के समक्ष ला रहा है।’’7

कुमार संतोष की चित्र  श्रृंखला ‘ युग्म’ से

मृणाल पाण्डे नारी-लेखन के सन्दर्भ में 
लिखती हैं – ‘‘ पाठक – समीक्षक प्रायः नारी आन्दोलन को या तो सम्पन्न सवर्ण लेखिकाओं का पीड़ा – विलास या दलित और वर्णाश्रम  विरोधी आन्दोलनों का ही एक नन्हा अनुपूरक साबित करने की हड़बड़ी में दिखाई देते हैं।8 जबकि निकट अतीत का बाहरी और आन्तरिक दुनिया का आलोड़न स्त्री लेखन को लगातार प्रयोगधर्मी बनाता रहा है।’’ समाज की गहराई में पैठ कर भी भटकन और असंपृक्ति महिला – लेखन की ही नहीं पूरे आधुनिक लेखन की समस्या है।’’9 इस भटकन और असंपृक्ति से परे अपने गहरे शोधपरक लेख में राहिणी अग्रवाल स्त्री देह और उसके उपभोग पर उसके अपने स्वामित्व पर उठती आपत्ति (मुझे चाॅद चाहिये की वर्षा वासिष्ठ के सन्दर्भ में ) पर ध्यान आकृष्ट करती है। ‘‘वस्तु से व्यक्ति और व्यक्ति से व्यक्तित्व- संधान का लोमहर्षक संघर्ष यदि किसी प्रायोजित साजिश के तहत पुनः वस्तु में तब्दील कर दिये जाने का लुभावना उपक्रम बन कर रह जाये, तो अनापत्ति होगी ही।’’10 इस प्रायोजित साजिश के अन्दरूनी घटक क्या हैं- भूमंडलीकरण , बाजार (पूंजी) मीडिया, स्वतंत्रता का छद्म चारा (उग्र नारीवाद  इसे पुराने परिवार, विवाह, धर्म यानि पितृसत्ता के नए बदले रूप में देख रहा है) . रोहिणी लिखती है ‘‘अनादि काल से साहित्य (लोक परम्परा सहित ) मीडिया का सशक्त रूप रहा है, इसने स्त्रियों की जिन छवियों को रचा है, उन्हें बीसवी शताब्दी की शिक्षा और समानाधिकार की लहर तथा इक्कीसवीं शताब्दी की सनसनीखेज तकनीकी क्रान्ति भी नहीं बदल पाई है।’’11 मीडिया ने ‘‘सर्वगुण सम्पन्न’’ ‘‘षड्गुणवती’’ का जो तिलस्म रचा है, उसे आज महिला लेखन तोड़ रहा है। अनामिका जिजीविषा (फ्राॅयड जिसे लिबिडो कहते हैं) के अतिरेक को सृजनात्मकता का मूल मानते हुए कहती हैं कि हर कलाकार के पास एक वैकल्पिक दृष्टि होती है जो उसे व्यवस्था विरोध तक खींच ही लाती है।’’ ‘‘और व्यवस्था – विरोध की यही बदमाशी जब स्त्रियां करती हंै तो उनकी मिट्टी पलीद करना और भी आसान हो जाता है।‘‘12

2004 सितम्बर के हंस में विख्यात-कुख्यात राजेन्द्र यादव प्रेम चन्द के नाम से जुडे़ कहानी पुरस्कार ( जो अन्ततः दिया नहीं गया) के सन्दर्भ में ‘‘लिखते हैं – मगर ये पांचों कहानियां आश्चर्यजनक रूप से उसी कथ्य को लेती हैं जिसे आज ‘स्त्री विमर्श’ कहते हैं, इतना ही नहीं स्त्री- देह इनके केन्द्र में है। इनमें तीन स्त्रियों की लिखी हैं।’’ ‘‘पुरूष द्वारा नियंत्रित उसकी देह और अनिवार्य रूप से जुड़ी यौनिकता को पुर्नपरिभाषित करने की मांग स्वयं स्त्री की ओर से उठाई जा रही है।’’ 13 इसके बरक्स सूरज पालीवाल इसे भूमण्डलीकरण के प्रभाव के रूप में देखते हैं। ‘‘मुझे चाॅद चाहिये’’ ‘‘आवां और ‘चाक’ के कथानकों के सन्दर्भ में वे लिखते हैं ‘‘ऐसी गलतियाँ हम जानबूझ कर करते हैं, जिससे उन शक्तियों को ताकत मिले जो स्त्री लड़ाई को यौन मुक्ति तक ही सीमित रखना चाहते हैं। बहुत सारी लेखिकाओं के नाम गिनाने की यहाॅ आवश्यकता नहीं है, लेकिन क्या वजह है कि वे सब यौन सम्बन्धों की स्वतन्त्रता को ही स्त्री स्वतंत्रता मानती हैं।‘‘14

जाहिर है समय का अन्तराल आपसी संवाद की पुरजोर वकालत करता है, क्या है आज का जटिल ‘सच’ जो लेखन और स्त्री लेखन को भी ऐसा धरातल दे रहा है जहाॅ भोक्ता और साक्षी को पृथक करना सम्भव नहीं।’’ तेजी से फलांगते वक्त में आज एक साथ कई युग और संस्कृतियाँ जी रहे हैं हम। इक्कीसवीं सदी की ग्लोबल लेस्वियन और गे कल्चर के बरक्स है प्रेमी युगल की हत्या करता बर्बर कबीलाई अभिमान, सनसनी, रोमांच और ग्लैमर की चंुधियाती रोशनी के बरक्स है जहालत, अज्ञान और पिछड़ापन1’’15 इन्हीं के बीच, इन्हीं के साथ रचनाधर्मिता के नए चुनौती देते आयाम विकसित हो रहे हैं।

देह पर स्वामित्व, उसका उपभोग सम्बन्धों की नई जमीन गढ़ रहा है और जाहिर है यह समाज के परम्परागत विधि निषेधों को तब और चुनौती दे रहा है जब उसके साथ ‘बेवफाई’ जुड़ जा रही है। मन्नू भंडारी की ‘‘एक कहानी यह भी’’ की समीक्षा के अन्त में मैनेजर पांडे मन्नू जी से एक पात्र के लिये परानुभूति या समानुभूति से न सोच पाने का गिला करते हैं। जाहिर है वह पात्र है मन्नू के पति राजेन्द्र यादव की प्रेयसी ‘मीता’। सुधा अरोड़ा प्रश्न पूछती हैं – क्या पति अपने रकीब को सहानुभूति देंगे? ‘अन्या से अनन्या’ के सन्दर्भ में ‘जन्नत की हकीकत’ जानने वाले कलकत्ता के साहित्यकारों से भी सुधा अरोड़ा पूछती हैं कि ‘अन्याओं’ से सम्बन्ध रखने वाले अधिकांश लेखक की बीबियों की पीड़ा अनकहीं क्यों है? ‘‘लेकिन इसका क्या किया जाए कि हिन्दी साहित्य में आलोचना क्षेत्र के अधिपतियों की आस्वाद ग्रन्थि में जादुई यथार्थ (मैजिकल रियलिजम) के बदले आभासी यथार्थ (वचर््युअल रियलिज्म) का चस्का लग गया है। ……….. ताकि बौद्धिक लंपटई का साहित्यीकरण कर सकें।16 बात फिर वहीं आती है। विभूति नारायण राय नया ज्ञानोदय में साक्षात्कार में  बिना नाम लिए विभूति ‘‘नमो अन्धकारम’’ के नायक (!) के लिए कहते हैं ‘‘लेखक ऐसे पुरूष का प्रतिनिधि चरित्र है जिसके लिये स्त्री कमतर और शरीर से अधिक कुछ नहीं है।’’17 आगे विभूति कहते हैं – ‘‘महिला लेखिकाओं द्वारा बडे़ पैमाने पर अपनी यौन स्वतंत्रता को स्वीकारना पावर डिसर्कोस का भाग बनने की इच्छा है। आप ध्यान से देखें – ये सभी लेखिकाएं उस उच्च मध्य वर्ग या उच्च वर्ग से आती हैं जहाॅ उनकी पुरूषों पर आर्थिक निर्भरता अपेक्षाकृत कम है।’’18  क्या यह अधूरा सच है? भविष्य उत्तर देगा परन्तु एक ही व्याकरण नहीं हो सकता भिन्न धरातल की स्त्रियों को समझाने का, और ना ही एक ही औजार से सभी मृत परम्पराओं का ‘‘पोस्टमार्टम’’ सम्भव है। याद रहे कि वो कसौटियां भी हमारे इतिहास ने ही दी हैं स्त्री को मापने की, जिसे बदले रूप में आज का बाजार भुना रहा है।

सन्दर्भ:-

1. स्त्री संघर्ष का इतिहास – राधा कुमार – पृ0 374 वाणी प्रकाशन
2. वही – पृ0 48
3. बहुवचन अक्टूबर – दिसम्बर 09 नव जागरण: स्त्री-प्रश्न और हिन्दी साहित्य – रोहिणी अग्रवाल पृ0 200
4. वही – पृ-208
5. वही – पृ-201
6. वही – पृ-208
7. वही – पृ-209
8. हंस 8 मार्च 2001 – अन्दर के पानियों का सपना – मृणाल पाण्डे – पृ-70
9. वही  – पृ-71
10. वही-आकाश चाहने वाली लड़की के सवाल – रोहिणी अग्रवाल – पृ-172
11. वही – पृ-170
12. हंस – नवम्बर 2000 परख अनामिका पृ-93
13. हॅस – सितम्बर – 2004 – मेरी-तेरी उसकी बात पृ-8
14. अन्यथा अप्रैल 2005-पृ-107
15. कथाक्रम – जुलाई-सितम्बर-2008 – रोहिणी अग्रवाल-पृ-160
16. हंस-अगस्त 110-कठघरे में – पृ-131
17. नया ज्ञानोदय – अगस्त-10-पृ-32
18. वही – पृ-33

पत्नी कुमकुम की नजर में उदय प्रकाश

उदय प्रकाश के बारे में उनकी पत्नी कुमकुम से सुधा उपाध्याय की बातचीत पर आधारित 


जैसे यादों का कोई सिलसिला नहीं होता, वो कभी भूत भविष्य और वर्तमान देखकर नहीं आतीं…वैसे ही मैं जब उदय प्रकाश जी की पत्नी कुमकुम जी से मिलने गई और उन्हें कुरेदने की कोशिश की तो जैसे यादों का सैलाब सा आ गया….जो तकरीबन दो से ढाई घंटे चलता रहा….इस सैलाब में जब जो कुछ बेहद औपचारिक तरीके से मैंने शीतलवाणी में उदय प्रकाश पर निकलने वाले विशेषांक के लिए कुमकुम जी से उदय प्रकाश: घर और बाहर दोनों को करीब से जानने की कोशिश की तो धीरे-धीरे मुझे ढेर सारा खजाना मिलता गया….वैसे तो कुमकुम जी बेहद संयत, संयमित और संतुलित लगीं पर वो भावुक होने के नाते जितनी बार डूबती उतराती रहीं मैंने उनका पूरा साथ निबाहा….
कुल जमा पूंजी के रूप में मुझे इस जोड़े की सबसे बड़ी खूबी जो व्यक्तिगत तौर पर पसंद आई वह थी सामंजस्य और सहधर्मिता की भावना…जिसके कारण उदय प्रकाश एक बहुमूखी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व हैं जो कई कोणों को एक साथ जीते हुए निरंतर सर्जना में रत एक सफल मुकाम पर हैं….आइए आपसे उसी बातचीत का अंश साझा करती हूं…इस बेहद अनौपचारिक बातचीत में कई जरूरी पहलुओं पर बात होगी….
उदय प्रकाश और कुमकुम जी की पहली मुलाकात/ उनका विवाह/विवाह में आने वाली अड़चनें/ उससे जुड़ी कुछ रोचक घटनाएं/ गांव परिजन बच्चे/ उदय प्रकाश का लेखन और फिल्म निर्माण/ बढ़ता परिवार और बढ़ती जिम्मेदारियां/ कुमकुम जी की पसंदीदा कहानियां/ पुत्र-पुत्रवधू, पोते-पोतियों से भरा पूरा परिवार/ जो कुछ अबतक उदय प्रकाश पर अप्रकाशित रह गया है उन सब पर खुलकर बातचीत का हिस्सा…
                                                                                                                                सुधा उपाध्याय 

उदय प्रकाश ,कुमकुम

उदय प्रकाश की पत्नी के रूप में जब मैं बीते हुए कल का आकलन करती हूं तो सारी सुधियां ताजी हो जाती हैं….आप सब जानते हैं उदय प्रकाश की सबसे बड़ी ताकत है उनकी स्मृतियां….वे अपने जीवन से जुड़े गांव, घर, परिजन, चीजें, चरित्र और उन सबसे जुड़ी बातों को कभी भूला नहीं पाते….ठीक वैसे ही उदय प्रकाश जी से पहली बार मिलन की यादें आज भी मेरे जेहन में ताजा हैं….आज भी रह रहकर याद आते हैं वो ओपन एयर थियेटर, क्लासेज के बाद बैडमिंटन खेलना, छोटे-बड़े स्टेज शो, समूह में बैठकर गाना, पेंटिंग्स, छत्तीसगढ़ी गानों का प्रस्तुतिकरण…खुद उदय प्रकाश जी का टेबल बजाकर गाने का वह दृश्य जैसे कल ही की बात हो…. उदय प्रकाश जी को स्पेनिश लिटरेचर से बहुत लगाव था…धीरे-धीरे वही बहाना खींचकर मेरे पास ला रहा था….मुझे म्यूजिक का शौक भी उदय प्रकाश जी के कारण हुआ…जब इन्होंने स्टेज शो के लिए छत्तीसगढ़ी गाने सिखाए….उनका वह शादी के लिए प्रस्ताव देना और मेरा उन्हें केवल मित्र के रूप में स्वीकार करना उन्हें अखर गया और वे गांव चले गए…. उदय प्रकाश के गांव जाने पर पहली बार मुझे खालीपन लगा….मैंन छोटा सा शंख उन्हें पोस्ट किया…पता नहीं उसका उदय प्रकाश पर क्या असर हुआ….पर वह जब गांव से लौटकर आए तो धीरे-धीरे मेरा साहस भी बढ़ा….

बात विवाह तक पहुंची….चूंकि हम तीनों यानी मेरे पापा श्री भटनागर, स्वयं उदय प्रकाश और मैं उन दिनों जेएनयू(जवाहर लाल यूनिवर्सिटी) में ही थे….इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छुपते…मित्रों और शत्रुओं की तादाद बढ़ती गई…मेरे विवाह को लेकर पापा के मन में तीन तरह का डर मौजूद था…क्योंकि इधर उधर से फिजाओं में उदय प्रकाश से जोड़कर मेरी बातें हो रही थीं…पापा आधुनिक विचारों के थे… उदय प्रकाश जी को पसंद भी करते थे….पर व्यक्तिगत तौर पर उनके विषय में बहुत कुछ नहीं जानते थे….पहली चिंता जाति को लेकर थी, जिसे वे जीवन भर नकारते रहे…और कहते थे मैं कोई ऑर्थोडॉक्स नहीं…मुझे कास्ट की कोई परवाह नहीं…पर यह मेरे घर से ही क्यों शुरू हो…दूसरी वाजिब चिंता थी लड़का अभी कुछ करता ही नहीं….यानी लोगों की कहासुनी से यह साफ था कि क्या खिलाएगा, कैसे रखेगा…..और तीसरी चिंता यह भी थी कि कहीं गांव में ही इसका विवाह न हो गया हो….क्योंकि कानूनी पहले विवाह को ही स्वीकारोक्ति देता है….

सम्बन्धों को लेकर उदय प्रकाश जी हमेशा पारदर्शी रहे...प्रेम विवाह को सफल करने का बीड़ा उठा चुके थे….सो कोर्ट मैरिज की तारीख निकलवाई….चूंकि कानून का यह नियम होता है—एक महीने का समय तिथि से पहले दिया जाता है…हमारे निकटतम मित्रों में से किसी ने पापा को जाकर यह बात कह दी….और तिथि उनके दिमाग में कौंधती रही….अब याद आता है तो हंसी आती है…कोर्ट मैरिज के दिन परिवार के सभी लोग सतर्क बैठे थे…मुझे जेएनयू भी जाने नहीं दिया गया… उदय प्रकाश जी अपने कुछ दोस्तों को लेकर रजिस्ट्रार ऑफिस पहुंच चुके थे….यहां मुझपर गहरा पहरा था…उस समय न मोबाइल न लैंडलाइन…पड़ोसी के घर जाने की भी इजाजत नहीं थी…तभी किसी फिल्मी पटकथा की तरह मेरी एक मित्र को उदय प्रकाश जी ने मेरे घर भेजा….उसके हाथ में एक किताब थी…किताब में चिंता वाला एक पत्र…कहां हो कबतक आओगी, हम सब वेट कर रहे हैं….मुझे अच्छे से याद है मेरी सहेली से मुझे मिलने भी नहीं दिया गया….मेरे मामा मामी घर पहुंच चुके थे…मेरे विवाह में उन लोगों की अहम भूमिका थी….उन्हीं दिनों उदय प्रकाश से जुड़े मेरे हाथ के लिखे पन्ने घर में मिले, उन्हें बड़ी संजीदगी से पढ़ा गया और मेरे परिवार ने तब समझा कि इधर भी मामला गंभीर है…मेरे दोनों मामा उदय प्रकाश जी से मिलने गए…जब लौट कर आए तो पापा को यह कहकर समझाया कि आंख मूंदकर सम्बन्ध बना लीजिए….अपनी कास्ट में ऐसा लड़का ढूंढने से भी नहीं मिलेगा….चूंकि यूनिवर्सिटी पंद्रह जुलाई से खुलती है इसलिए हम तीनों ने यह विचार बनाया कि नौ जुलाई को विवाह फिक्स हो जाए….ताकि भीड़ से बचा जा सके… उदय प्रकाश जी से जब परिवार ने पूछा—बारात की तरफ से कुल कितने लोग आएंगे, तो इन्होंने कहा सात से दस…जबकि विवाह में पूरा जेएनयू शामिल था…पापा का सर्किल उदय प्रकाश का और मेरा….बुलाया कि नहीं बुलाया सब आए…उन दिनों उदय प्रकाश जी इलेक्शन में लड़े थे इसलिए वीसी से लेकर चपरासी तक सब बारात में शामिल थे….

धीरे-धीरे समय गुजरता गया…मैंने घर की समस्याओं को उदय प्रकाश जी से अलग ही रखा…उनकी अतिव्यस्ततम दिनचर्या में एडजस्ट करती रही…उनको कभी घर गृहस्थी से उलझने की टोका टाकी नहीं की….सन 77 में हमारा विवाह हुआ, तब से 2007 तक लगातार मैं अलग-अलग जॉब में रही…क्योंकि मैं खुद को व्यस्त रखना चाहती थी…मैं महत्वाकांक्षी बिलकुल नहीं पर घर परिवार की जरूरतों को ध्यान में रखकर नौकरी करती रही…..एंबेसी में 32 वर्ष तक काम किया….पेरु, मैक्सिको विदेशी भाषाओं का अनुवाद किया, जेएनयू से फ्रेंच की पढ़ाई की…लगभग सोलह वर्ष एनएचपीसी पब्लिक रिलेशन में काम करती रही….इधर उदय प्रकाश लिखने के साथ-साथ फिल्में और डॉक्यूमेंटरी बनाने में लगे रहे….मेरे दो बेटे हैं—सिद्धार्थ और शांतनु…. उदय प्रकाश जी को अपने बच्चों से उम्मीद थी कि वे इस क्रिएटिव टीम में शामिल हो जाएं पर बच्चों को कभी फोर्स नहीं किया…उनकी इसी उम्मीद को ध्यान में रखकर मैंने मैनेजमेंट का सारा कार्यभार संभाल लिया….हालांकि उदय प्रकाश के पास एक बड़ी टीम थी पर मैं जब भी उन्हें अकेला पाती थी उनसे जुड़ी रहना चाहती थी…फिल्में, साहित्य और पब्लिक रिलेशन में मेरी रुचि उदय प्रकाश जी के कारण ही आई…मैं उदय प्रकाश जी को लेकर काफी पजेसिव हूं….बस सबकुछ ठीक चलता रहे, उन्हें उनके किसी काम में डिस्टर्वेंस न हों, इसलिए कभी कोई असंतोष या सवाल नहीं करती….करीब आने वाले लोगों को देखने का जो नजरिया उदय प्रकाश, मैं भी उसी नजर से देखने लगती हूं….

कुमकुम

शुरू में फानेंसियली बहुत सी दिक्कतें रहीं….पर मेरी संतुष्टि इसी में है कि उन्होंने मेरे साथ, सहयोग और साहचर्य को स्वीकारा…मैंने घर में उदय प्रकाश को संभाला है बाहर तो इनके प्रशंसक ही इन्हें संभालते हैं क्योंकि उनकी सारी चाहत, उम्मीद, इच्छा, आकांक्षा सब पाठकों से ही जुड़ी है… उदय प्रकाश जी को जितना समझी हूं उनके लिए उनके पाठक और दोस्त सबसे ज्यादा मायने रखते हैं….मुझे उदय प्रकाश जी के किसी अफेयर से असुरक्षा नहीं लगती….बस वे सुरक्षित रहें, स्वस्थ रहें और आसपास रहें….

मुझे से कई बार पूछा जाता है मुझे इतनी भाषाओं का ज्ञान है..स्पेनिश, पुर्तगीज, इंडोनेशियन, फ्रेंच इन भाषाओं में मैने उदय प्रकाश जी की कहानियों का अनुवाद क्यों नहीं किया….तो मैं हंसकर यही जवाब देती हूं कि क्योंकि उदय प्रकाश ने मुझे खुद नहीं कहा…. उदय प्रकाश में एक जिम्मेदार पति टूटकर प्यार करने वाला पिता, अपने व्यस्ततम दिनचर्या के बावजूद हमारी जरूरतों का ध्यान रखने वाला मुखिया, घर की मांग, पत्नी की मांग, बच्चों की मांग कहने से पहले पूरी हो जाती है…विवाह के एक वर्ष बाद ही इनके गांव परिवार से हमें बुलावा आया….भले ही मेरा जन्म दिल्ली में हुआ हो, पिता जेएनयू में और मां स्कूल में टीचर थीं, पर मुझे ससुराल में जो इज्जत लाड दुलार मिला कि मैं अपनी पहचान मध्य प्रदेश में ही ढूंढती हूं और वहां का कहलाने में फक्र महसूस करती हूं…

उदय प्रकाश जी की लगभग सब कहानियां लिखने के दौरान और लिखने के बाद आधी-अधूरी ही सही चोरी चुपके ही सही, मैंने पढ़ी हैं….पर मुझमें धैर्य और सहनशीलता नहीं क्योंकि इनकी कहानियां बेहद लंबी होती हैं….कई बैठकों में पढ़ने वाली….मुझे इनकी छोटी-छोटी कहानी, जैसे—डिबिया, नेलकटर, अपराध बेहद पसंद है…इसका कारण है, इन कहानियों में अपने परिवार के ही लोग झलकते हैं….परिवार से जुड़ी कहानियों में पिता भाई, बहन मां सभी इनके करीबी चीन्हे पहचाने, सच्ची घटनाओं और सच्चे चरित्रों पर आधारित….इनकी तस्वीरें देखती हूं और कहानी के पात्रों से तारतम्य बनाती हूं तो सम्बन्धों को पहचानने लगती हूं….मैंने उदय प्रकाश के मां-पिता को तो नहीं देखा….क्योंकि वे मेरे आने से पहले ही जा चुके थे…दुर्भाग्यवश दोनों का देहांत कैंसर की बीमारी से हुआ….ना मालूम क्या बात है इनके जितने करीबी लोग हैं उनमें या उनके परिवार में किसी न किसी को कैंसर की बीमारी रही…बाबा, बुआ(दादी) और मां….सबका देहांत कैंसर से ही हुआ….हम समझते हैं मध्य प्रदेश में जो तंबाकू खाने का जो चलन है हो न हो वही कारण हो….

मां के देहांत के बाद ग्यारह वर्ष के उदय प्रकाश अकेले और असुरक्षित शैडोल (मध्य प्रदेश) आकर बस गए….पिता, भाई, बहन सबसे दूर वहां मोहन श्रीवास्तव जी जो एक स्कूल टीचर थे उनकी सहायता और संरक्षण में इन्होंने लिखने पढ़ने का काम आगे बढ़ाया…अपने व्यवहार में जो मैं ये एडजस्टिंग नेचर पाती हूं, शायद इसी कारण क्योंकि वह ग्यारह वर्ष का बालक मां से महरूम, पिता भाई बहनों से दूर जीवन भर प्यार और सुरक्षा की तलाश में रहा….अपने सहयोग और साहचर्य से यह सामंजस्य बिठाने में मैं कहां तक सफल रही यह उदय प्रकाश पर छोड़ती हूं…परिवार में बेटी न होने का अहसास उदय प्रकाश जी को खलता रहा…पर पोती के आ जाने पर वे बेहद खुश हुए….और परिवार भरा पूरा हुआ….

उदय प्रकाश जी से मैं केवल यही पूछना चाहती हूं कि उनकी कहानियों का फलक इतना बड़ा है...विविध रंग रूप के चरित्र पात्र हैं…सभी तरह के सम्बन्धों के शेडस हैं…मां-पिता, भाई-बहन, मित्र-यार परिजन…सबकुछ देखने को मिलते हैं….पर इन कहानियों में पत्नी पर आधारित न विषय बनाकर, न चरित्र के रूप में कोई कहानी देखने को क्यों नहीं मिलती?  भविष्य में उम्मीद करती हूं उदय प्रकाश जी की कलम से और बहुत सी मानवीय संवेदना की गहराईयों को छूती हुई कहानियां निकलेंगी….जिनमें उनकी सहचर्या, सहधर्मिनी पत्नी भी मौजूद होगी.

आपहुदरी का लोकार्पण

हिन्दी की प्रसिद्ध लेखिका रमणिका गुप्ता की आत्मकथा का दूसरा खंड ‘आपहुदरी’ का आज शाम 5.30 बजे साहित्य अकादेमी के सभागार में लोकार्पण किया गया। आत्मकथा का लोकार्पण हिंदी के प्रख्यात आलोचक मैनेजर पांडे और प्रसिद्ध कवि-आलोचक और भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई ने किया। कार्यक्रम का आयोजन रमणिका फाउंडेशन और सामयिक प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए मैनेजर पांडे ने कहा, ” आपहुदरी एक दिलचस्प और दिलकस आत्मकथा है। आत्मकथा में पंजाबी भाषा का भरपूर प्रयोग किया गया है। यह एक स्त्री की आत्मकथा है। इसमें समय का इतिहास दर्ज है। इसमें विभाजन के समय दंगे दर्ज हैं। इसमें बिहार राजनेताओं के चेहरे के असलियत को दिखाती है। इसमें संवादधार्मिता और नाटकीयता दोनों है। इसमें पारदर्शी भाषा का भी प्रयोग किया गया है। यह आत्मकथा इसलिए भी विशिष्ट है कि रमणिका जी ने जैसा जीवन जीया जैसा महसूस किया है वैसा उन्होंने लिखा है। अमूमन जैसा हम सोचते हैं, जैसा महशूस करते है वैसा हम नहीं लिखते। इसमें स्त्री की गुलामी और यातना को बार-बार दर्ज किया गया है। इसमें लगभग हरेक जगह पर सामंतवाद पर चोट हैं। मैनेजर पांडे ने कहा कि मैं रमणिका गुप्ता की तीसरी आत्मकथा का इन्तजार कर रहा हूं जिसमें राजनेताओं के साथ-साथ साहित्यकारों के आचरण की कथा होगी।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर बोलते हुए लीलाधर मंडलोई ने कहा, एक पाठक के तौर पर मैं इस आत्मकथा को एक स्त्री की मुक्ति या आजादी के तौर पर नही देखता। यह स्त्री वैचारिकी भी नहीं है। आत्मकथा में अद्भूत अपूर्व स्मृतियां हैं। इस आत्मकथा के माध्यम से एक जिद्दी लड़की का निर्माण होता है।  रमणिका गुप्ता ने इस आत्मकथा के माध्यम से अपने साहस की कथा कही है। आपहुदरी आत्मकथा के रूप में एक नया मोड़ भी है।

कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए अर्चना वर्मा ने कहा रमना आपबीती के इस बयान में ऐसा है क्या जो मुझ स्तब्ध कर रहा है-नैतिक निर्णयों को को इसका ठेंगा, इसका तथाकथित पारिवारिक पवित्रता के ढकोसलों का उद्दघाटन , इसकी बेबाकबयानी, इसकी निस्संकोच डिरता, सच बोलने का इसका आग्रह और साहस, अपने बचाव-पक्ष के प्रति इसकी लापरवाही, अपनी जिद को आखिरी हद तक ले जाने की हिम्मत, जिद को संकल्प में बदलने का इसका हौसला, निहायत निज अटकावों/भटकावों/विद्रोहों का बृहतर सामाजिक राजनीतिक लक्ष्य में बदलना। लेकिन वह सब आप सीधे ही किताब में पढें .

विशिष्ट वक्ता के तौर पर बोलते हुए प्रसिद्ध पत्रकार अनिल चमडि़या ने कहा ये एक रमणिका गुप्ता की कहानी नहीं बल्कि रोज-ब-रोज कई-कई रमणिकाओं की दांस्तान है। एक ऐसे ढांचे की क्रूरताओं की असलियत है, जिसमें हर तरह की गुलामियत अपना आधार बनाए हुए है। स्त्री जाति की मुक्ति की एक जिद्दी कार्यकर्ता, जितने खुले रूप में जो व्यक्त कर सकती है वो इसमें दर्ज है। हम जो शहरी और मध्यवर्गीय समाज निर्मित कर रहे हैं, उसके नीचे लाशें और चीखे़ं है-ग्रामीण सामंती ढांचे से भी  क्रूर-हर जगह और हर कमरे में एक सामंती चेहरा उग आता है जहां एक लड़की तन्हा दिख जाती है वह भी कई नामों और रिश्तों की याद लेकर किसी संवेदनशील पाठक के लिए ऐसे रूक-रूक कर पढ़ना-पढ़ता है। कहानियों की दासतां विचलित कराती है।

स्त्रीकाल में रमणिका जी की आत्मकथा के अंश पढ़ने  के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें :

1. आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा -पहली किस्त 
2. आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : दूसरी किस्त 
3.आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : तीसरी किस्त 
4.आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : चौथी क़िस्त
5.आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : आख़िरी किस्त 

गीताश्री ने कहा मैं इसे साहसिक आत्मकथा ही कहूंगी , जहां कोई पहरेदारी नहीं है। जैसा जीवन जीया  गया वैसा यहां लिख दिया गाय। कोई पाखंड नहीं। लेखिका ने स्पष्ट स्वीकार है कि असली मुक्ति स्वछंदता में है, स्वतंत्रता तो पाखंड है, नारा है, ओट है। उसमें पारदर्शिता नहीं है। मुक्ति भी सर्शत है।

अजय नावरिया ने कहा भारतीय परिवारों की ये संरचनाएं या प्रशिक्षण केन्द्र स्त्रियों के जीवन को तहस-नहस कर देते हैं। इन प्रशिक्षण केन्द्रों के नियमों और अनुशासन से जो स्त्रियां बगावत कर देती हैं वे आपहुदरी घोषित कर दी जाती हैं। हम ऐसी स्त्रियों को कलंकित करते हैं और सामाजिक स्थितियों को बेदाग और बेगुनाह मानकर छोड़ देते हैं, जो स्थितियां उन्हें ऐसा बनने पर मजबूर करती हैं।

‘आपहुदरी’ की लेखिका रमणिका गुप्ता ने कहा, आपहुदरी मेरे जन्म से लेकर धनबाद तक की कथा है। आपहुदरी की कथा यह है कि स्त्री को स्त्री के रूप में नहीं बल्कि व्यक्ति के रूप में देखा जाए। मुझे जब भी स्त्री बनाने की कोशिश की गई मैंने उसका विरोध किया और मैंने जीवन में जो कुछ भी किया एक स्त्री के रूप मं नहीं बल्कि एक व्यक्ति के रूप में किया। इसीलिए मैं कहना चाहूंगी कि मेरे विरोधियों ने  ही मुझ ताकतवर बनाया।

कार्यक्रम का संचालन विवेक मिश्र ने किया। स्वागत भाषण सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सिसिल खाका (को-आर्डिनेटरः अखिल भारतीय साहित्यिक मंच) ने किया।

प्रस्तुति: पंकज चैधरी

स्त्रीवादी क़ानूनविद ( वकील साहब ) का ट्रायल

स्त्रीवादी क़ानूनविद  और आलोचक अरविंद  जैन से मनीषा कुमारी की बातचीत 

स्त्रीवादी कानून सिद्धांत ( Feminist Jurispudence ) पर हिन्दी में काम का ख्याल कैसे आया . आपके सामने ऐसे किसी काम के उदाहरण थे क्या ? 


मैंने थोड़ी-बहुत हिंदी स्कूल में ही पढ़ी थी. स्कूल-कॉलेज के दिनों (1966-1977) में छात्र आन्दोलन से लेकर आपातकाल तक की तमाम बहसों में शामिल रहा हूँ. बाद में वाणिज्य और कानून का विद्यार्थी रहा, सो हिंदी में लिखना कठिन काम था. शुरुआती दौर से लेख, अंग्रेजी में ही लिखता रहा हूँ. 1978-79 में मेरा एक लेख ‘मेनस्ट्रीम’ में छपा था “डोनेशन टू पार्टी इन पॉवर” और कुछ लेख ‘फाइनेंसियल एक्सप्रेस’ और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं. कुछ एक के अनुवाद हिंदी और अन्य भाषाओँ में भी.

1980-81 के आसपास मैंने हिंदी में भी लिखना शुरू किया. इसलिए कि आम पाठक कानूनी पेचिद्गिओं को अपनी भाषा में जान-समझ सके. कानून-संविधान और अदालती फैसलों की ‘जलेबीनुमा’ भाषा-परिभाषा पढ़ते-समझते हुए, यह अहसास निरंतर गहरा होता चला गया कि ‘कोख से लेकर कब्र’ तक सारे कानून मूलतः “स्त्री विरोधी” हैं…..“दलित विरोधी” हैं. महादेवी, सावित्री बाई फुले, रमाबाई पंडिता, रुकमाबाई, रेगिना गुहा और अन्य महिलाओं की संघर्ष गाथाएं पढ़ते हुए धारणाएँ और ठोस हुई. उन दिन आई फ़िल्मों  ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘भूमिका’ की नायिकाओं ने भी इस दिशा में सोचने-समझने में महत्वपूर्ण दिशा संकेत दिए.

घर-परिवार-समाज में भी स्त्री और विशेष कर दलित स्त्री या बच्चों के प्रति हिंसा, यौन हिंसा, घरेलु हिंसा, हत्या, दहेज़ हत्या, दमन, उत्पीड़न, शोषण, अत्याचार और बर्बरता भी लगातार बढती ही जा रही थी. ‘मथुरा’ बलात्कार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने तो भीतर तक झुलस दिया था. रही सही कसर “सुधा गोयल दहेज़ हत्या काण्ड” से लेकर “रूपकंवर सती काण्ड” तक में अदालती फैसलों ने पूरी कर दी. पुलिस, समाज, संसद, न्यायपालिका और मीडिया की भूमिका अपने नग्नतम और हत्यारे अर्थों में आमने-सामने थी. परिणाम स्वरुप मेरी चिंता या चिंतन, दलित और स्त्री केन्द्रित होती चली गई.

अरविंद जैन

‘औरत होने की सजा’ आपका प्रतिनिधि काम  साबित हुआ और आप टाइप्ड हो जाने की हद तक इस काम से जाने जाते हैं.
समय-समय पर महिलायों और बच्चों सम्बन्धी कानूनों पर लेख लिखता रहा, जो देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए….होते रहे. हाँ! अपने जीवन की तरह ही, इन लेखों को लिखने की भी कोई विशेष ‘योजना’ नहीं थी. आधार सामग्री के रूप में कोई किताब उपलभ्द्ध थी ही नहीं. ईमानदारी से कहूँ तो हिंसा-यौन हिंसा के खिलाफ आये, गुस्से और घृणा का परिणाम हैं ये लेख. संक्षेप में अन्याय, शोषण और दमन के सामने, हैरान-परेशान और असहाय दिल-दिमाग-कलम का कोई ‘संकल्प’ रहा होगा. अब कभी ये लेख पढता हूँ, तो खुद ही विश्वास नहीं होता कि मैंने ही लिखा था…..पता नहीं कब, किसने और क्यों लिख दिया!
अगर कथाकार मित्र अरुण प्रकाश, लेख कांट-छांट कर पांडुलिपि ना बनाते, तो शायद “औरत होने की सजा” (1994) कभी छपती ही नहीं. हाँ! छपने के बाद जब मैंने पुस्तक देखी, तो सचमुच बहुत दिनों तक गहरे अवसाद (खुद से नाराज़ और शर्मिंदा) में रहा कि यह क्या “बकवास-आधा-अधूरा” सा काम छपवा दिया. शायद इस अवसाद से निकलने के चक्कर में ही, “औरत, अस्तित्व और अस्मिता” के लेख लिखे गए होंगे. (हालांकि छपते ही बहुत समीक्षाएं प्रकाशित हुई और हिंदी में एक घटना की तरह लिया गया. बाद में अनेक संस्करण आये और पंजाबी में अनुवाद भी हुई. ‘उत्तराधिकार या पुत्त्राधिकार’ दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. कोर्स में पढाया जाता है और ‘यौन हिंसा और न्याय की भाषा’ कई विश्वविद्यालयों के एम.ए. के छात्रों के लिए संस्तुत हुआ.

दोस्तों, वकीलों और न्यायधीशों की क्या प्रतिक्रिया रही?
यह सब लिखने की वजह से अधिकाँश सम्बन्धियों, दोस्तों, वकीलों और न्यायधीशों की ‘आँख में किरकरी’ या असहमति के विद्रोही स्वर सा ही रडकता रहा हूँ. ‘शीतयुद्ध’ सी उपेक्षा और तिरस्कार ने आहत बहुत किया, मगर शुक्र है कि कभी दिशाभ्रमित नहीं कर पाए. धीरे-धीरे सबसे दूर और इस विचार से मुठभेड़ करते-करते, अकेला रहने की आदत सी हो गई. मुख्यधारा के विरुद्ध जाने पर स्त्री को ही नहीं, पुरुषों को भी एकांत या अज्ञातवास झेलना पड़ता है. कुछ ही मित्र ऐसे हैं, जो ‘वाद’-विवाद-संवाद के माध्यम से मुझे हमेशा, इस दिशा में सोचने-समझने-लिखने की हिम्मत देते रहे. अपने और बकीलसा’ब के बीच, ‘मुक्केबाजी’ (लहूलुहान होने की हद तक) अभी भी होती ही रहती है.

आपकी किताब लिखने के समय से अब तक क्या न्यायपालिका की भाषा और मानसिकता बदली है ? ऐसा मैं  इसलिए पूछ रहा हूं कि लोकतंत्र के लगातार मजबूत होने से फर्क पडा हो शायद ?
साफ़ बात तो यह है कि ज्यादातर न्यायमूर्ति या न्यायधीश, हिंदी की किताबें पढ़ते ही नहीं. जो पढ़ते भी हैं, उनकी अपनी सोच-समझ की सीमायें हैं. भाषा थोड़ी जरूर बदली है, पर भाव अभी भी परम्परा के इर्द-गिर्द वहीं-कहीं घूम-घुमा रहा है. इस शिक्षित-शहरी और साधन संपन्न ‘वर्ग विशेष’ की मानसिक बनावट-बुनावट में, बदलाव आने-होने में अभी और समय लगेगा. कहना कठिन है, कितना समय और लग सकता है. इस ‘वर्ग विशेष’ में ‘स्त्री’ और ‘दलित’ के प्रवेश पर ही इतने प्रतिबंध हैं, कि बराबरी का रिश्ता-सम्बन्ध या संवाद संभव नहीं. भीतर कितनी ‘दमघोटू घुटन’ और ‘वर्ग घृणा’ है, वही जानते-महसूसते हैं- जो भीतर तक पहुंचे हैं. अनुमान लगाया जा सकता है कि स्थितियों-परिस्थितियों ने किस कद्र, आत्मा तक पर खामोशी के ताले जड़ रखे हैं.

 न्यायापालिका अपने समय में तय कानूनों से चलती है , उससे किसी ऐक्टिविजम से तो दूर ही रहना पडेगा न , मेरा कहने का आशय है कि यदि संसद किसी सुधार के लिए तैयार नहीं है और न्यायपालिका की चेतना संसद की गति से अधिक आधुनिक होती जाती है , किसी उत्पीडित अस्मिता के प्रति टकराव ही तो बढेगा ? 
मेरा स्पष्ट तौर पर मानना है कि मौजूदा समाज व्यवस्था में किसी भी “सुधार” का सपना या कल्पना, मौजूदा ढाँचे (पितृसत्तात्मक, सामन्ती और पूंजीवादी) में ही ‘फेर-बदल’ तक सीमित हो सकती है. कोई आमूल-चूल परिवर्तन तो होने से रहा. हाँ! कभी-कभार, उदारवादी-सुधारवादी मेक-अप (‘कॉस्मेटिक सर्जरी’/‘विंडो ड्रेसिंग’) होता रहता है. ‘न्यायिक सक्रियता’ के दौर में ‘सफाई अभियान’ के अंतर्गत, विवादस्पद विषयों पर ‘राष्ट्रीय बहस’ की ‘नाटक-नौटंकी’ करवाना भी विवशता है. वर्ग-हितों की रक्षा-सुरक्षा करते हुए, दोनों ही अपनी-अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ खूब अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं.

‘न्यायपालिका की चेतना संसद की गति से अधिक आधुनिक’ हो भी जाये तो क्या? किसी भी ‘तनाव-दबाव’ में, संसद को विवश तो नहीं ही किया जा सकता. आखिर, ‘सत्ता’ का स्थाई निवास तो संसद ही है और निसंदेह ‘अंतिम शब्द’ की घोषणा भी वहीँ से होगी. न्यायपालिका सुनाती रहे ‘आदेश-उपदेश’, संसद रातों-रात ‘अध्यादेश’ जारी कर सकती है.  ‘उत्पीडित अस्मिता के प्रति’ अभी तक, ना कभी कोई टकराव हुआ है और ना निकट भविष्य में होने की कोई ‘सम्भावना’ नज़र आ रही है.

मनीषा कुमारी

‘औरत होने की सजा’ आपका प्रतिनिधि काम  साबित हुआ और आप टाइप्ड हो जाने की हद तक इस काम से जाने जाने लगे, जबकि उससे कम मह्त्वपूर्ण आपके द्वारा हिन्दी साहित्य की गई समाज शास्त्रीय आलोचना नहीं थी, “औरत: अस्तित्व और अस्मिता” भी हिन्दी मे पह्ले  मुक्कमल स्त्रीवादी आलोचनाओं मे से एक है, लेकिन आपका यह काम उतना ख्यात नहीं हो सका. क्या हिन्दी आलोचना इसके लिए तैयार नही थी , आपको बाहरी मानती रही  या उसके तय मापदंड से आप बाहर थे ? 
शायद मैं ‘पुरुष’ होने के कारण भी ‘बाहरी व्यक्ति’ था और किसी विश्वविद्यालय का ‘प्रोफेसर’ ना होने कि वजह से भी. आलोचना का क्षेत्र, मेरे लिए पूर्ण रूप से ‘वर्जित क्षेत्र’ था. यह काम करते समय या कभी बाद में, मेरी मंशा ‘आलोचना क्षेत्र’ में, किसी भी तरह प्रवेश पाने या ख्याति जुटाने की थी ही नहीं. मुझे एक पाठक की हैसियत से पढने-समझने या टिप्पणी करने के अधिकार से तो वंचित नहीं ही किया सकता. सो मैंने, उतना ही किया.
निश्चित रूप से कुछ सिद्ध-प्रसिद्ध-वृद्ध संपादकों, बौद्धिकों, धनाड्य लेखिकाओं और स्थापित मठाधीशों ने, इसे अपनी ‘घोर अवमानना’ माना-समझा. मगर मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि मेरी जिज्ञाषा, सिर्फ और सिर्फ महिला-पुरुष रचनाकारों कि कलम के माध्यम से, साहित्य में स्त्री और दलित या वंचित समाज को देखना-समझना भर था.

पढ़ा-सुना था कि ‘साहित्य समाज का दर्पण’ होता है. बिना पढ़े कैसे पता लगता कि साहित्य के दर्पण में, समाज की सदियों पुरानी तस्वीरें- ‘उलटी-कुलटी’ क्यों दिखती हैं……दिख रही हैं. तरह तरह के मोतियाबिंदों से पीड़ित बौद्धिकों को, दलित/स्त्री की पीड़ा ‘प्रामाणिक’ और विचारणीय क्यों नहीं लग रही. ‘बचपन से बलात्कार’ की चीखों की बजाय, सम्भोग के कामोतेज़क ‘बेडरूम सीन’ ही क्यों दिखाई दे रहे हैं. बेशक, निरंतर बदलते समय और समाज में, अगर दशकों पूर्व ‘तय मापदंड’ नहीं बदलते, तो इतिहास के कूड़ेदान में फैंक दिए जाते हैं.

आपके द्वारा की गई आलोचनायें , एक समय  में रची गई  साहित्यिक कृतियों का तत्कालीन समय के सापेक्ष मूल्यांकन करती हैं , ऐसा करते हुए कई बार आप प्रेस्कृटिव हो जाते हैं. यद्यपि महिला रचनाकारों की कृतियों का स्त्रीवाद के पैमाने पर की गई वे बेहतरीन आलोचनायें हैं. 
क्षमा करें, मैं इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा.

आप तो अपनी आलोचना में रचनाकारों को बाजब्ता कानून का ज्ञान देने लगते हैं , तो क्या लेखक को कानून की किताबें पढकर लिखना होगा ? हालांकि जिन सवालों को ये रचनाकार अपने लिए विषय बना रही थीं , महिला आन्दोलन उन्हीं सवालों के साथ स्थापित कानून से टकरा रहा था , यानी इन रचनाकारों को तो कानून का ज्ञान होना ही चाहिए था. क्या यह समाज से रचनाकारों के कटे होने का परिणाम है ? 
“रचनाकारों को बाजब्ता कानून का ज्ञान” नहीं, बल्कि पाठकों को सामान्य कानून की जानकारी देने का ‘दुस्साहस’ अवश्य किया. कानून की जानकारी के बिना, कानूनी समस्याओं पर लिखना क्या जरूरी है? आपके सवाल में ही, जवाब मौजूद है….खैर, अखबारी कतरनों के आधार पर, अपने सजे-धजे ‘ड्राइंग रूम’ में बैठ कर किसी अर्थपूर्ण ‘रचना’ को जन्म नहीं दिया जा सकता. समाज से संवाद, लगाव और गहरे सरोकारों के बिना, साहित्य की ‘बंजर जमीन’ पर गुलाब की खेती नामुमकिन है. प्रायोजित लोकार्पणों, समीक्षाओं और सिफारिशों के आधार पर, सरकारी या गैर-सरकारी पुरुस्कार, सम्मान, अवार्ड तो बटोरे जा सकते हैं, लेकिन सच मानिए ऐसी किताबें का ‘प्रथम संस्करण’ भी प्रकाशक के गोदाम में पड़ा-पड़ा सड़ जाता है. इन तमाम स्त्री रचनाकारों ने अपने समय और समाज की स्त्री की व्यथा-कथा को, सार्थक अभिव्यक्ति देने का जोखिम उठाया गया है. शेष-अशेष तो भविष्य का पाठक तय करेगा, आलोचक नहीं. आलोचना को हमेशा  ससम्मान असहमति ही माना-समझा जाना चाहिए, बशर्ते कि वो ‘व्यक्तिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह’ से ना लिखे गए हों.

आपको नहीं लगता कि ये जिस समय की रचनायें हैं, उसके परिवेश के अंतरद्व्न्द्व इनमें व्यक्त होते हैं , क्योंकि ये लेखिकायें खुद अपने पुराने परिवेश से जुडकर बदली स्त्री की कथा कह रही थीं ? 
ऐसा ना होता तो मैं इन पर अपना समय, श्रम और पूँजी क्यों लगाता. सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिवेश के अन्तर्द्वन्द और विसंगतियों के बिना, किसी भी समाज या  समय की स्त्री को रेखांकित करना संभव नहीं.
मैंने ‘बेघर’ पर उपन्यास छपने के २५ साल बाद लिखा था और ममता कालिया जी से कभी नहीं मिला था. बाद में यह लेख ममता जी ने ‘बेघर’ की ‘भूमिका’ के तौर पर इस्तेमाल किया. मेरे लिए यह, दुनिया का सबसे बड़ा ‘सम्मान’ है. परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि अधिकांश लेखकों को, आलोचना के नाम पर सिर्फ तारीफ़ चाहिए…तारीफ़. बहुत से ‘महान’ तो अब, मुझसे इतने नाराज़ हैं कि क्या कहूँ!

यह पुरानी पीढ़ी का ही अमूल्य योगदान है, कि पिछले कुछ सालों में साहित्य में भारतीय स्त्री/दलित की स्थिति, छवि, अवधारणा, स्वप्न, आकांक्षाएं, विचार और अभिव्यक्ति के तेवर, काफी हद तक सकारात्मक रूप में बदले हैं….बदल रहे हैं….बदलेंगे.
मेरा मानना है कि किसी भी पसंदीदा रचना के लेखक से, कभी नहीं मिलना चाहिए और रचना का मूल्यांकन, रचनाकार के नैतिक-अनैतिक जीवन से प्रभावित नहीं होना चाहिए.

 कुछ व्यक्तिगत सवाल , जिसके मायने सामाजिक हैं, आपने ‘हंस’ क्यों छोडा ? आप क्या हिन्दी पट्टी में स्त्री और दलित के प्रति सम्वेदनशीता पैदा करने में ‘हंस’ की भूमिका नहीं देखते हैं. 
इस ‘व्यक्तिगत सवाल’ का जवाब मैं जरूर देता, अगर यादव जी हमारे बीच होते. फिर भी इतना ही कह सकता हूँ कि ‘हंस’ छोड़ने का कारण ‘व्यक्तिगत’ नहीं, बल्कि स्त्री-विमर्श को देह-विमर्श की ओर धकेलने पर गंभीर सैधान्तिक मतभेद ही थे.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शुरुआती दौर में ‘हंस’ ने, ‘स्त्री’ और ‘दलित’ विषय पर बेहद उल्लेखनीय बहस को उद्वेलित किया. लेकिन बाद में (विशेषकर ‘हासिल’ काण्ड और ‘होना-सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ प्रकरण) पूर्ण रूप से ‘दिशाभ्रमित’ भी किया.
अफ़सोस कि एक अच्छा-ख़ासा ‘आन्दोलन’ जिसमें समाज की वैचारिक दिशा-दशा’ बदलने की ‘संभावनाएं’ थी, कुछ विचारहीन अति-उत्साही, मदहोश महत्वाकांक्षी और ‘लम्पट क्रन्तिकारी’ स्त्रियों-पुरुषों के व्यक्तिगत स्वार्थों की वजह से, बेहद अराजक और यौन-हिंसक भीड़ में बदल गया.
असहाय ‘नायक’ समय रहते समुचित ‘निर्णय’ नहीं ले पाने के कारण, अपराधबोध और कुंठाओं के अंतहीन अँधेरे में विलीन हो गया. उसी दौरान मैंने ‘सावधान- आगे खतरा है’ भांपते हुए लिखा था “डार्क रूम में बंद आदमी की निगाह में औरत” (‘उदभावना’, जनवरी,2005).
शायद ‘यहाँ तक’ पहुँचने के बाद ‘राजन’ ने, किसी की भी बात सुनना बंद कर दिया था.

क्या लिख रहे हैं आज कल, या आपने अपना सर्वोत्त्म दे दिया है ?
अभी उल्लेखनीय कुछ नहीं….मगर ‘अनलिखे’ को लिखने की, चिंतन-प्रक्रिया में अवश्य हूँ.   मेरे लिए लिखना, रोज़ किसी समुद्र किनारे रेत का नया घरोंदा बनाने जैसा है. ‘निर्णायक फैसले’ की आशा और उम्मीद में, बकीलसा’ब रोज़ एक बरसों पुराने मुकदमें में, सुबह से शाम तक अंत-हीन बहस करते रहते हैं. असलियत तो यह है कि मेरे पास देने के लिए, कुछ भी (सर्वोत्तम, विशेष या असाधारण) था ही नहीं. अपने समय और समाज में, असहमति या विरोध का ‘एक स्वर’ या ‘प्रयास’ कह सकते हैं. अक्सर कहता हूँ ‘जो लिखा व्यर्थ था, जो नहीं लिखा अनर्थ है’. फिर भी, ‘भविष्य की स्त्री’ से संवाद जारी है…..रहेगा.

अब तक जिए जीवन के बारे में कैसा लगता है?
स्कूल-कॉलेज के दिनों में भाषण या वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में बोलने की तैयारी के लिए, रात को मैं अक्सर घर के पास बने सुनसान स्टेडियम में चला जाता था. स्टेडियम में चारों तरफ घुप्प अँधेरा और सन्नाटा होता था. स्टेडियम में बनी स्टेज पर खड़ा हो कर, बोलने का अभ्यास करता था. एक-दो-तीन बार….कभी-कभी दस बार.
लगता है कि मैं आज भी उसी स्टेडियम की स्टेज पर खड़ा होकर, बोलने की कोशिश कर रहा हूँ…..रोज़ कर रहा हूँ. अदालत में हूँ या किसी स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय के हॉल में……हाँ! इतना अंतर जरूर आया है कि ‘घुप्प अँधेरे’ की जगह, आँखे चुन्धयाति रौशनी है और ‘सन्नाटे’ की जगह ‘बेहद शोर’. स्टेडियम तब एकदम सुनसान होता था, अब दर्शकों-श्रोताओं-प्रति-द्वंदियों और ‘न्यायमूर्तियों’ से भरा है. तब बोल-बाल कर चुपचाप घर लौट आता था, अब बोलना बंद करता हूँ तो हाल, कभी तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगता है और कभी पीठ पर घातक तीरों की बौछार होने लगती है. बिना किसी किन्तु….परन्तु…..लेकिन….गिले-शिकवे या शिकायत के…….मैं अभी भी उसी सुनसान स्टेडियम के घुप्प अँधेरे और सन्नाटे में, बोलने-जीने की जिद्दो-ज़हद कर रहा हूँ. मैं अपनी कडूआहट के लिए ‘क्षमाप्रार्थी’ हूँ, मगर भावी नस्लों के लिए बेहद खुशहाल और इंसाफ़-पसंद घर-परिवार-समाज-देश और दुनिया की मंगल कामना करता हूँ.

सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि महिलाएं दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ कर रही हैं. आप क्या सोचते हैं.शायद आपका संकेत 2 जुलाई, 2014 को सर्वोच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद और पिनाकी चन्द्र घोष की खंड पीठ) द्वारा अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य  ( क्लिक करे) के मामले में सुनाये फैसले की तरफ है. मीडिया इसे “दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ रोकने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था” मानता है. मेरा मानना है कि दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून की मूल विडंबना है कि यह स्त्रियों को सुरक्षा कम देता है, आतंकित और भयभीत ज्यादा करता है. आज तक .सका लाभ, वास्तविक पीड़िताओं को कम ही मिल पाया है ईमानदारी से कहूँ तो साफ़ तौर पर कारण यह है कि कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं है, दहेज़ हत्या ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं, दहेज़ उत्पीड़न ‘मृत्यु से ठीक पहले’ होना सिद्ध करो और अब दहेज़ अपराधियों की गिरफ्तारी पर भी रोक या अंकुश. नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर घंटे एक महिला दहेज हत्या का शिकार हो रही है लेकिन दहेज प्रताड़ना के अधिकाँश मामले तो दर्ज ही नहीं होते. कानूनी जाल-जंजाल या समाज में बदनामी के भय से, उत्पीड़ित महिलाएं सामने नहीं आतीं और घुट-घुटकर जीती-मरती रहती हैं. इस सब के बावजूद देश की सब से बड़ी अदालत का कहना है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ ढाल की बजाय, हथियार के तरह कर रही हैं. सच यह है कि इस देश में बहुत से कानून हैं, मगर महिलाओं के लिए कोई कानून नहीं है और जो हैं वो अंततः स्त्री विरोधी हैं.

दहेज अपराधों में सजा की दर बेहद कम है. क्या कारण हो सकता है?हम क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि दहेज अपराध में सजा की दर इसलिए भी बेहद कम है कि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होते हैं, जिनके पर्याप्त सबूत नहीं होते या हो नहीं सकते. कौन देगा ‘बहू’ के पक्ष में गवाही? ऊपर से कानून में इतने गहरे गढ्ढे हैं, कानून के रखवाले भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं, साधन-संपन वर्ग में दहेज के चलन का पहले से अधिक बढ़ा है. कानून ऊपरी तौर पर बेहद ‘प्रगतिशील’ दिखते हैं, पर दरअसल बेजान और ‘नख-दन्त विहीन’ हैं. इस संदर्भ में मैंने विस्तार से एक लेख स्त्री-काल के लिए लिखा था-“न्यायपालिका में दहेज़ का नासूर”

क्या आप मह्सूस करते हैं कि बलात्कार के लिए, भारतीय समाज की संस्कृति ही तर्क और संरक्षण मुहैय्या कराती है?यह जान कर आश्चर्यजनक लगेगा आपको कि २०१४ के मौजूदा कानून के अनुसार भी विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए मगर 18 से कम होने पर भी विवाह “गैरकानूनी” नहीं माना-समझा जाता और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अनुसार ‘सहमती की उम्र’ 18 साल है पर इसी कानून के अपवाद अनुसार “15 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध, किसी भी स्थिति में बलात्कार नहीं है”। क्यों?
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 1860 में सहमती की उम्र सिर्फ 10 साल थी जो 1891 में 12 साल, 1925 में 14 साल और 1949 में 16 साल की गई थी। 1949 के बाद इस पर, कभी कोई विचार ही नहीं किया गया। अध्यादेश (3.2.2013) और बाद में नए अधिनियम (२०१३) में इसे 16 से बढ़ा कर 18 किया गया।
वर्तमान कानून के अनुसार विवाह का लिए लड़के की उम्र २१ साल और लड़की की उम्र १८ साल होनी चाहिए पर यदि कोई १८ साल से कम उम्र का लड़का,१८ साल से कम उम्र कि लड़की से विवाह करे, तो ना कोई कानूनी जुर्म है और ना कोई सजा. १८ साल से कम उम्र की लड़की से विवाह दंडनीय अपराध है और सहमती की उम्र भी १८ साल है, मगर १५ साल से बड़ी उम्र की अपनी पत्नी से जबरदस्ती यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं.

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (संयुक्त राष्ट्र) की एक रिपोर्ट के अनुसार “दुनिया की ९८ प्रतिशत पूँजी पर पुरुषों का कब्जा है. पुरुषों के बराबर आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पाने में औरतों को अभी हज़ार वर्ष और लगेंगे.” पितृसत्तात्मक समाजों के अब तक यह पूँजी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों को पुत्राधिकार में मिलती रही है, आगे भी मिलती रहेगी. आश्चर्यजनक है कि श्रम के अतिरिक्त मूल्य को ही पूँजी माना जाता है, मगर श्रम की परिभाषा मे घरेलू श्रम या कृषि श्रम शामिल नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप आधी दुनिया के श्रम का अतिरिक्त मूल्य यानी पूँजी को बिना हिसाब-किताब के ही परिवार का मुखिया या पुरुष हड़प कर जाते हैं.
सारी दुनिया की धरती और (स्त्री) देह यानी उत्पादन और उत्पत्ति के सभी साधनों पर पुरुषों का     ’सर्वाधिकार सुरक्षि” है. उत्पादन के साधनों पर कब्जे के लिये उत्तराधिकार कानून और उत्पत्ति यानी स्त्री देह पर स्वामित्व के लिये विवाह संस्था की स्थापना (षड्‌यन्त्र) बहुत सोच-समझकर की गयी है.

दरअसल भारतीय विधि-व्यवस्था में भी उत्तराधिकार के लिए वैध संतान और वैध संतान के लिए वैध विवाह होना अनिवार्य है. न्याय की नज़र में, वैध संतान सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की होती है. वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (माँ) होती है। विवाह संस्था की स्थापना से बाहर पैदा हुए बच्चे ‘नाजायज’, ‘अवैध’, ‘हरामी’ और ‘बास्टर्ड’ कहे-माने जाते हैं. इसलिए पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते. हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे. ‘वैध-अवैध’ बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विश्व-भर में ‘विवाह संस्था’ को, अभी तक बनाए-बचाए हुए है.

वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए यौन-शुचिता, पवित्रता, सतीत्व, नैतिकता, मर्यादा और इसके लिए स्त्री देह पर ‘पूर्ण स्वामित्व’ तथा नियंत्रण बनाए रखना पुरुष का ‘परम धर्म’ घोषित किया गया है. मतलब जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध है या गैरकानूनी है, वो स्त्री का. जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसा ही है हमारा कानून। ईमानदारी से बोलूँ तो मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है.

आपने तो न्यायालयों की भाषा पर भी काम किया है, क्या न्यायलयों की मर्द्वादी भाषा इसी संस्कृति से पोषित नहीं है?
उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से पूँजी और पूँजी के आधार पर राजसत्ता, संसद, समाज, सम्पत्ति, शिक्षा और क़ानून-व्यवस्था- सब पर मर्दों का कब्जा है. नियम, कायदे-क़ानून, परम्परा, नैतिकता-आदर्श और न्याय सिद्धांत- सब पुरुषों ने ही बनाए हैं और वे ही उन्हें समय-समय पर परिभाषित और परिवर्तित करते रहते हैं. हमेशा अपने वर्ग-हितों की रक्षा करते हुए. ‘भ्रूण हत्या’ से लेकर ‘सती’ बनाए जाने तक, प्रायः सभी क़ानून, महिला कल्याण के नाम पर सिर्फ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेकअप’ ही दिखाई देता है. मौजूदा विधान-संविधान-क़ानून महिलाओं को कानूनी सुरक्षा कम देते हैं, आतंकित, भयभीत और पीड़ित अधिक करते हैं. निःसंदेह औरत को उत्पीडित करने की सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया में पूँजीवादी समाज क़ानून को हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है. इसलिए ‘लॉ’ का असली अर्थ ही है-‘लॉ अगेंस्ट वूमैन’. समता की परिभाषा (बकौल सुप्रीम कोर्ट) है- सामान लोगों में समानता.
नारी सम्बन्धी अधिकांश फैसलों के लिए आधारभूमि तो धर्मशास्त्र ही हैं जो मर्दों के लिए ‘अफीम’ मगर औरतों के लिए ज़हर से भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुए हैं. तमाम न्यायाशास्त्रों के सिद्धांत पुरुष हितों को ही ध्यान में रखकर गढ़े-गढ़ाए गए हैं. मथुरा से लेकर भंवरी बाई और सुधा गोयल से लेकर रूप कंवर सती कांड तक की न्याय- यात्रा में हजारों-हजार ऐसे मुकदमे, आंकड़े, तर्क-कुतर्क, जाल-जंजाल और सुलगते सवाल समाज के सामने आज भी मुंह बाए खड़े हैं। अन्याय, शोषण और हिंसा की शिकार स्त्रियों के लिए घर-परिवार की दहलीज से अदालत के दरवाजे के बीच बहुत लम्बी-चौड़ी गहरी खाई है, जिसे पार कर पाना बेहद दुसाध्य काम है। न्यायलयों की मर्द्वादी भाषा इसी महान सभ्यता और संस्कृति की दें है.

कानून की भाषा ही नहीं, परिभाषा भी घोर ‘मर्दवादी’ और पुरुष हितों को पोषित करने वाली लगती है. “औरत होने की सजा” के “यौन हिंसा और न्याय की भाषा” नामक लेख में, मैंने इस पर विस्तार से चर्चा की है. कानूनी भाषा ही नहीं, व्यवहार में भी पुरुष वर्चस्व साफ़ झलकता है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीशों पर यौन शोषण के आरोप, वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर यौन शोषण-उत्पीड़न के आरोप और आए दिन महिला अधिवक्ताओं के साथ होने वाले यौन शोषण-अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद, समाज-मीडिया-न्यायपालिका की रहस्यमयी ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या यह सब होने-देखने के लिए ही औरतें अभिशप्त हैं? आखिर कब तक? दूर-दूर तक विरोध-प्रतिरोध  या प्रतिशोध की चिंगारी तक दिखाई नहीं दे रही. संभावनाओं का गर्भ में ही, गला घोंटा जा रहा है.  अक्सर महसूस होता है कि औरतों को अपनी आत्मरक्षा के लिए, कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल हथियारों की तरह और हथियारों का इस्तेमाल कानूनी अधिकारों की तरह करना होगा.

बलात्कार के खिलाफ मानस बनाने के लिए जहां समाज, न्यायालय और संस्कृति के प्लेटफार्म पर काम करने की जरूरत है, वहीं क्या आप यह देखते हैं कि परिवार न सिर्फ इसके लिए अपने ‘पवित्र डोमेन’ में तर्क बनाता है, बल्कि बलात्कारियों को सांस्कृतिक संरक्षण भी देता है? विवाह के भीतर बलात्कार के लिए क्या यही संस्कृति और परिवार का ‘पवित्र डोमेन’ जिम्मेवार नहीं है?
इन दोनों सवालों के जवाब में सच कहूँ तो भारतीय समाज दोहरी चरित्र(हीन) नैतिकता में जीने वाला समाज है. भारत में वैवाहिक पार्टनर के बीच यौन संबंध ही ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’. हालांकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है. विवाह-पूर्व वयस्क स्त्री-पुरुष द्वारा सहमति से यौन संबंध (या परस्पर सहवास) ‘अनैतिक’ माने-समझे जाते हैं मगर कोई कानूनन अपराध नहीं.
बाल विवाह की ‘सामजिक कुप्रथा’ अभी भी जिन्दा है. समाज ही नहीं, बाकायदा कानून-विधि-विधान में फल-फूल रही है. भारतीय कानून-विधान-संविधान पत्नी से ‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस या अधिकार’ और समाज ‘बलात्कार की संस्कृति’ को बढ़ावा देता है. स्त्री देह शोषण के लिए विवाह और वेश्यावृति की जड़ें तो भारतीय समाज की महान सभ्यता और संस्कृति का स्वर्णिम अध्याय कहा जाता है. विवाह संस्था में स्त्री, पति की निजी संपत्ति है और वेश्यावृति के प्राचीनतम धंधे में स्त्री. सार्वजनिक संपत्ति. देवदासी से लेकर आधुनिकतम ‘एस्कॉर्ट्स’ तक, मर्दों का ‘आनंद बाज़ार’ ही नहीं ‘व्यवसाय भी है.  हालांकि वेश्या या ‘काल-गर्ल’ से यौन सम्बन्ध बनाना, भले ही ‘अनैतिक’ बताया जाता है मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं. पकड़ी गई तो वेश्या को ही जेल जाना होगा.
ऐसे आधे-अधूरे और गड्ढे भरे कानूनों से ना तो ‘बाल विवाह’, ‘बाल तस्करी’, ‘बाल वेश्यव्रती’ को रोका जा सकता है और ना ही स्त्री विरोधी हिंसा-यौन हिंसा को. वैधानिक प्रावधानों में अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण ‘सुधारवादी मेकअप’ से, स्त्री के विरुद्ध हिंसा-यौन हिंसा, कम होने की बजाये बढ़ी है, बढती रही है और बढती रहेगी।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में अतिथि के द्वारा पत्नी की कामना करने पर उसे अतिथि को पेश करना स्वर्ग के लिए जरूरी बताया गया, क्या ऐसे तर्क मानस का निर्माण नहीं करते हैं, विवाह के भीतर बलात्कार के लिए.
प्राचीन भारत से लेकर अब तक, पति के लिए पत्नी उसकी अपनी ‘निजी संपत्ति’ है, जिसे वह अपने हितों को पूरा करने के लिए ‘उपयोग-दुरूपयोग’ की इज़ाज़त दे सकता है. वैवाहिक जीवन में बलात्कार की छूट के कारण भारतीय शादीशुदा महिलाओं की स्थिति ‘सेक्सवर्कर’ और घरेलू दासियों से भी बदतर है। ‘सेक्स वर्कर’ को ना कहने का अधिकार तो है , शादीशुदामहिला को वो भी नहीं है।अपने लाभ या राज्य-विस्तार के लिए, साधन-संपन्न अतिथि को पत्नी पेश करने से लेकर अपनी बेटियों के डोले तक भेजे जाते रहे हैं. काशीनाथ विश्वनाथ राजवाड़े ने “भारत में विवाह संस्था का इतिहास” में प्रामाणिक दस्तावेज सहित विस्तार से विवेचना की है. स्त्री देह को पाने-हथियाने और बलात्कार करने के, सैंकड़ों उदाहरण हिन्दू धर्मशास्त्रों और मिथकों में मौजूद हैं. जब घर में स्त्री देह का जबरन भोग-उपभोग, हिंसा-यौन हिंसा या उत्पीड़न मान्य है, तो घर से बाहर भी अधिकार मानने- समझने की ‘मानसिकता’ भी स्वाभाविक रूप से बनेगी ही. क्या कागजी विकल्प, मौलिक अधिकारों की बराबरी कर सकते हैं ? परंपरा , संस्कृति , संस्कार , रीति – रिवाजों और रूढि़वादियों व धर्मशास्त्रियों द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर वैवाहिक बलात्कार को जायज नहीं ठहराया जा सकता। कोई भी ‘असली धर्म’ इसका समर्थन नहीं करता परन्तु धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने सब ‘धर्मभ्रष्ट’ किया हुआ है.

‘व्यभिचार’ का कानून भी तो विबाह के भीतर पति की इच्छा से दूसरे पुरुष के साथ यौन संबंध का तर्क देता है, यानी एक हद तक बलात्कार के लिए स्पेस बनाता है?
व्यभिचार’ (धारा-497 आई.पी.सी.) सम्बन्धी कानून के अनुसार पुरुष (भले ही विवाहित हो) किसी भी अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा स्त्री (स्त्रियों) के साथ सहमती से यौन रिश्ते (आप कहते रहें ‘अनैतिक’) बना सकता है। दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन संबंध ‘व्यभिचार’ है (अगर उसके पति की सहमति या मिलीभगत नहीं है) लेकिन यदि पति (मालिक) भी सहमत हो तो, यह कोई अपराध नहीं। यानि आपस में पति-पत्नियाँ बदलना विधान-सम्मत है. ‘व्यभिचार’ एक मायने में स्वेच्छा से ‘सहमती’ नहीं, मानसिक अनुकूलन के बाद ‘बलात्कार’ ही है. समलैंगिक संबंधों को भी अपराध-मुक्त करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक बहस जारी है. कभी भी ‘अध्यादेश’ जारी हो सकता है. कानूनी जाल-जंजाल में, ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं मगर उन पर फिर कभी…..

भारत में विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ कनून बनने के मार्ग में क्या -क्या बाधायें हैं.सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर, पुरुषों का कब्जा है. संसद में मर्दों का बहुमत है, सो ऐसा कोई कानून नहीं बनायेंगे, जो पित्रसत्ता की जड़ों में मट्ठा डालने का काम करे. ‘महिला आरक्षण विधेयक’- अभी नहीं, कभी नहीं. सारे कानून मर्दों के हितों और वर्चस्व को बनाये-बचाये रखने वाले ही बने-बनाये गए हैं. हालांकि उपरी तौर पर ढिंढोरा यह पीटा जाता है कि ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के लिए, संसद ने ना जाने कौन-कौन से विधेयक पारित किये है. वास्तविकता यह है कि दांपत्य में यौन संबंधों के बारे में सदियों पुरानी सामंती सोच और सीलन भरे संस्कारों में, कोई बदलाव नहीं हो पा रहा। मालूम नहीं इस सवाल पर सबने, क्यों ‘मौनव्रत’ धारण कर लिया है।
देश में अपराधियों का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण इतना बढ़ गया है कि
वर्तमान दहशतज़दा माहौल में यौन हिंसा की शिकार औरत की चीख, आखिर कौन और कब सुनेगा ? मेरे विचार से स्त्री के दमन, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ़ कानून बनने-बनाने में सबसे बड़ी बाधा है- राजनीति और सत्ता में ‘मर्दवादी’ नेताओं की षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और अपने अधिकारों के प्रति स्त्री आन्दोलन के दिशाहीन भटकाव.

दुख तो यह भी है कि महिला प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, गवर्नर, सुप्रीम और हाईकोर्ट की न्यायमूर्तियां और अन्य सांसद, मंत्री, अफसर वगैरह के होने के बावजूद, आम औरतों के हालात बद से बदतर होते गये हैं। कुर्सी मिलते ही औरत, औरत नहीं रहती, सत्ता के इशारे पर नाचने वाली ‘गुड़िया’ बन जाती है, गुड़िया।

अफसोस कि तमाम प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी बेटे-बेटियां, जो सचमुच स्वाधीनता संघर्ष के दौरान बुने सपनों को साकार कर सकते थे या जिनमें देश की नियति बदलने की सारी संभावनाएं मौजूद थीं, सत्ता संस्थानों ने खरीद लिए, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आवारा पूंजी की गुलामी करने लगे या पेशेवर दलाल हो गये। कुछ ने सपनों के स्वर्ग अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड या कहीं और जाकर ‘आत्महत्या’ कर ली। जिनके बस का दलाल होना नहीं था, वो ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारे गये या फिर अराजक जीवन की दारु पीते-पीते एक दिन, खून की उल्टियां करते बरामद हुए। ऐसी विश्वासघाती और आत्मघाती होनहार पीढ़ियों को या राष्ट्र कर्णधारों को क्या कहे?

जाति और धर्म संस्थानों को स्त्री के प्रति यौन हिंसा के बडे  उत्प्रेरक के तौर पर माना जाता है, इन्हें कानूनों से किस हद तक ठीक किया जा सकता है ? 
धार्मिक पाखंड, कर्मकांड, अन्धविश्वास और तर्कहीन आस्थाओं के शिकार, मर्द और स्त्रियाँ दोनों ही हैं. धर्म मर्दों के लिए अनाथालय सिद्ध हुआ है, मगर स्त्रियों के लिए ‘वेश्यालय’. स्त्रियों की शस्त्रों से अधिक हत्या तो, धार्मिक शास्त्रों ने की है.

मर्दों की आँखों में फिट जाती और धर्म  के ‘टेलीलेंस’ का फोकस, हर स्त्री देह पर एक जैसा ही होता है। स्त्री को देखते ही ‘टेलीलेंस’ की लार टपकने लगती है और दिमाग में हिंसक घोड़े हिनहिनाने लगते हैं। स्त्री फ़िल्मी हिरोइन (सीता, पार्वती, द्रोपदी, तुलसी, आनंदी या किसी भी भूमिका में हो) हो या टेनिस-हाकी-क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता हो या समाजसेविका, पुलिस अफसर-डॉक्टर- वकील- इंजिनियर हो या एयर होस्टेस- नर्स-स्टेनो, अध्यापक हो या छात्रा, शिक्षित हो या अनपढ़, अमीर हो या गरीब, सवर्ण हो या दलित, शहरी हो या ग्रामीण, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई हो या नास्तिक। गंगा-यमुना में नहा रही हो या पांच सितारा स्विमिंग पूल में, सड़क किनारे या गांव के तालाब पर- कैमरा क्लिक,क्लिक करने लगता है। मीलों की दूरी से फिल्म शूट होने लगती है और स्त्री को पता तक नहीं चलता कि कब सीडी या एम् एम् एस, पितृसत्ता के ‘आनंद बाज़ार’ में छप गया।
दरअसल पुरुषों को घर में घूंघट या बुर्केवाली औरत (सती-सावित्री) चाहिए और अपने धंधा चलाने या ब्रांड बेचने के लिए बिकनीवाली। सो स्त्रियों को सहमती के लिए लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार या सोने का लालच (विश्व सुन्दरी के ईनाम और प्रतिष्ठा) और जो सहमत नहीं उनके साथ जबरदस्ती यानी हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न, शोषण के तमाम हथकंडे।

स्वयं सहमत हुई या की गई (नायिकाओं) स्त्रियों का तर्क होता है कि “हम देह नहीं सिर्फ देह की (कामुक-उतेजक) छवि बेच रही हैं, जो सचमुच देह बेचने या गुजारे के लिए विवाह बंधन में बंधने से कहीं ज्यादा फायदेमंद और सम्मानजनक है। देखो हत्या, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न और शोषण की शिकार ब्याही-अनब्याही आम स्त्रियाँ घुटघुट कर दम तोड़ रही हैं या सालों से इन्साफ के मंदिरों के चक्कर काटती घूम रही हैं।“ आपके ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों में भी लिखा है ‘सलज्जा गणिका नष्टा, निर्लज्श्च कुलांगना’। समझ नहीं आ रहा कि  (अ)न्यायशास्त्रों में घुस कर बैठे, आदिकालीन धर्मशास्त्रों की भरीआखिर हम कब तक ढोते रहेंग -भरकम गठ े?

दिक्कत यही है कि अधिकांश कानूनों की बहुमंजिला ईमारत, ऐसे ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों, परम्पराओं और रीति-रिवाजों के नीवं पर बनी-बनाई गई है. शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं, बदल रही हैं मगर भारतीय पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. उसके लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का दबाव-तनाव बढ़ता है तो कुछ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेक-अप’ या ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं.

आपका जन्म कब और कहाँ हुआ? परिवार के बारे में भी कुछ बताएं?
मुझे तो यही बताया गया है कि मेरा जन्म 7 दिसम्बर, 1953 को अविभक्त पंजाब के जिला हिसार के पास उकलाना मंडी में हुआ था. जन्म के समय या काफी बाद तक परिवार, एक ‘संयुक्त परिवार’ ही था. व्यापारिक घराना जो अभी भी पड़-दादा के नाम से जाना जाता है. संयुक्त परिवार का रुई-लकड़ी-तेल का कारखाना था, मंडी में नीचे कमीशन-एजेंट की तीन दुकानें थी और ऊपर रिहायस. पास के गाँव सिंयाना में पुरानी हवेली और खेत भी थे. कहते हैं 1929 में लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध जुलूस में दादा जी (अपने वकील) लाला लाजपत राय के साथ थे और पुलिस की लाठियों की मार के कारण उनका एक हाथ काटना पड़ा था. शायद यही वजह थी कि वो ‘होली-दिवाली’ ही नहाते थे. मंडी में सब उन्हें भी ‘टुंडा लाट’ बोलते थे. उन्हें ‘सांग’ देखने, रागनियाँ सुनने का शौक था और खुद बहुत अच्छे किस्सा-गो थे. बचपन में हमने उनकी जुबानी ‘जानी चोर’, नरसिंह का भात’ और अन्य किस्से सुने हैं. व्यापार के सिलसिले में वो देशभर में घूमे रहते थे. सूरज छिपने के बाद कुछ नहीं खाते थे.

मेरे पिता अध्यापक थे. मंडी में सब उन्हें अभी तक ‘मास्टर जी’ कहते थे. दो चाचा और दो बुआ थी. होश संभाला तो दोनों बुआओं की शादी (व्यापारिक घरानों में) हो चुकी थी.

आपके पिता अध्यापक थे. कहाँ-क्या पढाते थे?
पिता जी शुरू में उकलाना मंडी के ‘जैन हाई स्कूल’ और ‘जनता हाई स्कूल’ में ही अध्यापन करते रहे. मुझे याद है 1963-1964 में उन्हें हांसी के सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई थी मगर चुनाव लड़ने के चक्कर में उन्होंने, कुछ ही समय बाद इस्तीफ़ा दे दिया था. चुनाव हारने के बाद उन्होंने थोड़े समय ‘अरविन्द हाई स्कूल’ चलाया, परन्तु 1966 में दादी जी की बीमारी के कारण वापिस उकलाना चले गए. उकलाना से वो अग्रवाल हाई स्कूल, बल्लभगढ़ चले गए और फिर (1967) जैन हाई स्कूल, रोहतक में पढाने लगे. 1970 में उन्होंने राजनीति शास्त्र में भी एम.ए. किया और 1970-1994 तक वो वैश्य कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक रहे. रिटायर होने के बाद वो फिर से उकलाना जा बसे और लम्बी बीमारी के बाद अगस्त 2006 में उनका देहांत हो गया.

आपके पिता ‘मास्टर जी’ या राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक थे. उनका आप पर क्या-कितना प्रभाव पड़ा?इसका जवाब देने से पहले यह बताना जरूरी है कि व्यापारिक घराने के ‘संयुक्त परिवार’ में वो अकेले ‘शिक्षित’ व्यक्ति थे, जिनकी व्यापार की बजाय राजनीति, समाज और साहित्य में गहरी रूचि थी. बहुत अच्छे वक्ता और लेखक थे. देखने में पंडित नेहरु की कार्बन-कॉपी- खद्दर का चूड़ीदार पायजामा-कुरता और अचकन. पूर्णरूप से शाकाहारी, चाय कभी नहीं पीते थे और चमड़े की कोई वस्तु, इस्तेमाल नहीं करते थे. दहेज़ लेने-देने के सख्त विरोधी. दहेज़ लेने-देने  वालों की शादी में नहीं जाते थे. उनके यहाँ से आई मिठाई आदि भी नहीं खाते थे. इसे वो बच्चों की ‘खरीद-फ़रोख्त’ मानते थे. पैसे के लिए उन्होंने कभी किसी को, ट्यूशन नहीं पढाया. कुल मिला कर एक आदर्शवादी, समाज सुधारक, प्रजातान्त्रिक और ईमानदार व्यक्ति और व्यक्तित्व.

निश्चित रूप से उनका प्रभाव, मुझ पर पढ़ना ही था. मैंने शुरुआती दौर में पढना-लिखना-बोलना, उन्ही से सीखा. ना जाने क्यों, मुझे लगता है कि वो मेरे पिता नहीं, ‘मास्टर जी’ थे और उम्र-भर ‘मास्टर जी’ ही बने भी रहे. किसी लावारिस-अनाथ बच्चे सा मैं, उन्हें कहीं मिल गया हूँगा और वो मुझे अपने ‘गुरुकुल’ में ले आये होंगे. अन्य बच्चों की तरह, मुझे भी पढाया-सिखाया और शिक्षित-दीक्षित होने के बाद, ‘गुरुकुल’ से विदा कर दिया. अन्य बच्चे ‘गुरु-भाई’ या ‘गुरु-बहन’ बन गए. मैं अक्सर सोचता और महसूस करता हूँ कि उनके और मेरे बीच, बाप-बेटे का नहीं, बल्कि ‘गुरु-शिष्य’ का अमर रिश्ता है. मेरे पास तो ‘गुरु-दक्षिणा’ में देने के लिए, कभी कुछ था ही नहीं….सो चिर-ऋणी हूँ….रहूँगा.

क्या ‘माँ’ के बारे में कुछ नहीं बताएंगे ? 
बताता हूँ….उनके बारे में भी बताता हूँ. मेरा ननिहाल भी उकलाना मंडी में ही था. उनके पिता यानि मेरे नाना जी की मृत्यु, कम उम्र में ही हो गई थी. विधवा नानी जी और उनकी तीन बेटियों के पास, उनके एक भाई (राम भगत) ने रहना शुरू कर दिया था जो  आजीवन अविवाहित ही रहे.  माँ का छोटी उम्र में ही विवाह हो गया, सो शिक्षा अधूरी रह गई. भारतीय स्त्रियों की तरह ही उनका जीवन भी, एक कुशल गृहणी सा ही रहा मगर वो एक बेहद साहसी और विवेकशील महिला हैं.

कानून पढने और वकील बनने का सपना कब देखा?
उस समय पिता जी को शायद 700-800 रूपये महीना वेतन मिलता था. माँ-बाप के अलावा हम तीन भाई और दो बहिनें थी. (एक बहन ‘अपराजिता’ कि 1979 में ‘ब्लड कैंसर’ से मौत हो गई थी.) पिता जी को लगता था कि इतनी तन्खाह में, मुझे दिल्ली से पढ़ना संभव नहीं होगा. इसलिए पिता चाहते थे ‘अर्थ-शास्त्र’ में एम.ए. करके, वहीँ-कहीं लेक्चरर लग जाऊं, पर मुझे ‘संविधान’ पढने की धुन सवार थी, सो कानून पढने राजधानी आ गया. दिन में नौकरी और शाम को कानून की पढाई ने, पिता जी की आर्थिक विवशता हल कर दी थी.
6. ‘संविधान’ पढने की धुन सवार होने की कोई खास वजह?

कोई ठोस वजह तो समझ नहीं आ रही. ‘महाभियोग’ में वारेन हसिंग्स पर चले मुकदमें के दौरान, एडमंड बर्क के भाषणों और जे. एस. मिल की पुस्तक ‘लिबर्टी’ ने वकालत का रास्ता दिखाया-सुझाया था. उन्ही दिनों वीरेंद्र सिंधु की किताब “भगत सिंह और मृतुन्जय पुरखे” पढ़ते हुए, बड़ी सिद्दत से महसूस हुआ था कि ‘क्रांतिकारी पैरवी’ के लिए, समर्पित और सरोकारी वकील होना अपरिहार्य है. संभव है कहीं बहुत भीतर तक यही अहसास हो रहा था, कि मुझे पढने-लिखने-सोचने और बोलने के अलावा कुछ नहीं आता.

न्यायव्यवस्था में लूट की सम्पूर्ण संरचना और सुनियोजित षड्यंत्र को, सूक्ष्मता से जानने-पहचानने और रेखांकित करने के प्रयास में ही मैं समझ पाया कि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं और काफी दूर-दूर तक फैली है. न्याय मंदिरों के प्रांगण में भी ‘भ्रष्टाचार के विषवृक्ष’, निरंतर फल-फूल रहे हैं.

मासिक पत्रिका जनपथ  से साभार 

सामूहिक बलात्कारः स्त्री-चेतना और अस्मिता को हतोत्साहित करने का षड्यंत्रकारी आयोजन

शंभु गुप्त

 हिन्दी विश्वविद्यालय  में स्त्री अध्ययन  विभाग में  प्रोफ़ेसर.  सम्पर्क : ई  मेल- shambhugupt@gmail.com, मोबाइल:  8600552663

स्त्रियों और बच्चियों पर हिंसा इधर काफ़ी बढ़ गई है। हिंसा की शिकार पीड़िताओं  में हर जाति और वर्ग की लड़कियाँ शामिल हैं। इनमें शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों की लड़कियाँ हैं। यह हिंसा मुख्यतः यौनमूलक है, जो बलात्कार के रूप में सामने आ रही है। इस हिंसा की प्रकृति थोड़ी भिन्न है। यह भिन्न इस रूप में है कि यह सामूहिक रूप में की जा रही है। सामूहिक बलात्कार के मामले इधर तेज़ी से बढ़े हैं। इनकी आख्या परम्परागत सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक कारणों से अलग नई स्थितियों के मद्देनज़र करनी होगी।

पिछले बीस-पच्चीस सालों में भूमंडलीकरण की ताज़ा हवाओं, स्त्री-संगठनों के आन्दोलनों और संघर्षों  के दबावों, पितृसत्ता  की जकड़बन्दियों के थोड़ा ढीला होने या कहें कि स्त्रियों द्वारा पितृसत्ता  के अनेकानेक प्रावधानों और प्रथाओं को अमान्य और अस्वीकार्य घोषित करने, अपनी स्वतन्त्रता, स्वायत्तता  और अस्मिता के आयामों को निरन्तर व्यापक और विकसित करते चलने, अपने व्यक्तित्व के प्रति सचेत, सावधान और निर्णयात्मक होने; इत्यादि-इत्यादि के परिणामस्वरूप स्त्रियों को उपलब्ध अवसरों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। एक तरफ़ वे शिक्षा,  तो दूसरी तरफ़ रोज़गार, एक तरफ़ घर तो दूसरी तरफ़ समाज और राजनीति, एक तरफ़ अकादमिक तो दूसरी तरफ़ प्रशासन, एक तरफ़ प्रबन्धन तो दूसरी तरफ़ पुलिस और सशस्त्र बल; राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य का  लोहा मनवाने में सफल हुई हैं। पिछले बीस-पच्चीस वर्ष भारत में स्त्री-अस्मिता के लगभग हर क्षेत्र में गहरी और व्यापक जड़ें जमाने के वर्ष कहे जा सकते हैं।

इन वर्षों में पुरुष-वर्चस्व और पितृसत्ता को जैसी और जितनी चुनौतियाँ मिली हैं, वे इससे पहले कभी नहीं मिली थीं। हालाँकि इन वर्षों में तत्ववाद, धर्म और साम्प्रदायिकता ने स्त्रियों के लिए एक नए कि़स्म का मकड़जाल बुनने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। विभिन्न धार्मिक समुदायों पर उनका पर्याप्त प्रभाव भी बराबर देखा गया है। नए कि़स्म के धर्मवाद और साम्प्रदायिकता ने एक बड़े स्त्री-वर्ग में अपनी घुसपैठ करनी शुरू की। साम्प्रदायिक दंगों में पहली बार लगभग सभी सामाजिक वर्गों की स्त्रियों और विशेषतः सवर्णेतर स्त्रियों को भागीदारी करते देखा गया। यह एक स्थापित तथ्य है कि भूमंडलीकरण के दौर-दौरे में स्त्री के लिए आज़ादी के साथ बहुत सारी ऐसी अलामतें भी प्रकाश में आईं, जिनके बारे में कहा गया बल्कि दुष्प्रचार किया गया कि इन्हें औरतों ने ख़ुद चुना है। अपनी देह पर अपने स्वयं के अधिकार की उद्घोषणा न जाने किस प्रक्रिया से ‘देहवाद’ में रिड्यूस कर दी गई! हिन्दी-साहित्य का अधिकांश स्त्री-विमर्श देह-विमर्श में तब्दील होता गया। विज्ञापनों में स्त्री-देह की नुमाइश, बम्बइया हिन्दी फिल्मों और हिन्दी टीवी चैनलों के बहुत से कथित सामाजिक धारावाहिकों में प्रस्तुत की गई स्त्री की पितृसत्ता को मज़बूत करती और आगे बढ़ाती छवि, देहाती इलाक़ों में खाप पंचायतों का पुनरोदय, जातिवादी संगठनों की भरमार; ये कुछ ऐसी सांघातिक स्थितियाँ थीं, जिन्होंने या तो स्त्री को उपलब्ध अवसरों को कम किया या इससे भी ज़्यादा यह कि उन्हें कुछ ख़ास दिशाओं की तरफ़ मोड़ दिया। ये दिशाएँ निश्चय ही पुरुषवर्चस्व एवं पितृसता मूलक  थीं या उसके इर्द-गिर्द थीं। यानी कि स्त्री जितनी चाहे उड़ान भरे, जितनी चाहे तरक़्क़ी करे, अन्ततः रहना तो उसे इसी शामियाने में है! यानी कि इस दौर में स्त्रियों ने जितना संघर्ष किया, जितने वैकल्पिक रास्ते निकाले, जितना सशक्त और संगठित वे हुईं, इस सब को बराबर करने के लिए ठीक इसके समानान्तर इनकी काट निकाली जाती रही। पुरुषवर्चस्ववादी और पितृसत्तावादी एजेंसियाँ लगातार सक्रिय रहीं और राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक  सत्ता-केन्द्रों द्वारा उन्हें शह दी जाती रही।

मेरा विचार है कि सामूहिक बलात्कार भी पुरुषवर्चस्ववाद और  पितृसत्तावाद  का स्त्री को सबक़ सिखाने का एक ऐसा ही उपक्रम है। सामूहिक बलात्कार यौन-हिंसा का क्रूरतम रूप है,  जो एक स्त्री को देह एवं मन दोनों स्तरों पर नेस्तनाबूत करता है। पिछले कुछ सालों में लगभग देश के हर कोने में सामूहिक बलात्कार की घटी घटनाओं ने स्त्रियों, विशेषतः लड़कियों के लिए असुरक्षा और अनिश्चितता का एक ऐसा आतंकी माहौल बनाया है कि अच्छे-अच्छे हिम्मती लोग भी घबरा उठे हैं। मेरा मानना है कि यह माहौल अचानक और आकस्मिक नहीं है बल्कि एक व्यूह-रचना के तहत पैदा किया गया है। हो सकता है कि कोई एक व्यक्ति इसके लिए दोषी न हो, लेकिन इतना तय है कि व्यवस्था इससे परेशान नहीं है। परेशान होती तो 16 दिसम्बर 2012 की सामूहिक बलात्कार की अब तक की सबसे क्रूर घटना के अपराधियों पर कार्रवाई के लिए इतना लम्बा और व्यापक संघर्ष नहीं करना पड़ता। इस संघर्ष के दौरान व्यवस्था और विभिन्न सत्ता -केन्द्रों में बैठे शक्ति-सम्पन्न व्यक्तियों के तरह-तरह के जो बयान आए थे, उनकी यदि तात्विक और भाषा-संरचनागत व्याख्या की जाए तो इस देश के व्यवस्थागत पुरुषवादी और पितृसत्तावादी  चरित्र को बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। जो हो। यह सब एक तरफ़ था , लेकिन दूसरी तरफ़ हम उस संघर्ष-चेतना और प्रतिरोधी कार्यक्रमों की नई पैदा हुई लहर पर अपना ध्यान केन्द्रित करें,  जिसके तहत पूरे के पूरे देश में हर जगह प्रदर्शन, धरना, मशाल जुलूस, कैंडिल मार्च, वैचारिक बहस इत्यादि की एक बाढ़-सी पैदा हो गई थी। यह शायद इसी व्यापक प्रतिरोधी और संघर्ष-चेतना का नतीज़ा था कि जस्टिस वर्मा कमेटी ने हिंसा-विरोधी क़ानून को सख़्त बनाने और उसमें संशोधन और नए रोधी प्रावधान शामिल करने की प्रक्रिया के तहत जब देश के विभिन्न महिला संगठनों, कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवी संगठनों, स्वतन्त्र बुद्धिजीवियों, विद्यार्थी-संगठनों, अकादमीशियनों आदि-आदि से सुझाव आमन्त्रित किए तो लगभग 80000 पत्र उसे मिले। इतनी बड़ी संख्या में सुझावों का प्राप्त होना ही इस बात की सूचना देता है कि हमारे यहाँ स्त्रियों पर यौन-हिंसा के खि़लाफ़ लोगों में किस क़दर गु़स्सा और प्रतिरोधी-चेतना घर किए हुए है। ऊपर पुरुषवाद और पितृसत्ता की जिस शर्मनाक व्यूह-रचना का , संरचना का उल्लेख हमने किया था, यह गु़स्सा और प्रतिरोधी-चेतना दरअसल उसी की असल काट है। यह गु़स्सा और प्रतिरोधी-चेतना लगातर बनी रहेगी, ऐसी पूरी-पूरी संभावना है क्योंकि स्त्री-अस्मिता के विकास और विस्तार का जो कारवां शुरू है, वह अब कहीं अधबीच ठहरने वाला नहीं है।

निष्कर्ष रूप में मुझे यही कहना है कि सामूहिक बलात्कार स्त्रियों के व्यक्तित्व-विकास और व्यापक से व्यापकतर होती, राष्ट्रीय जीवन के हर आसंग में दखल देने और अपना वाजि़ब हक़ माँगने को तत्पर स्त्री-चेतना और अस्मिता को हतोत्साहित करने और कुचलने की एक व्यवस्थित षड्यन्त्रकारी आयोजना के तहत है। यह ठीक वैसा है, जैसे एक ज़माने में आमने-सामने के युद्ध से पहले शत्रु-सेना और शत्रु-राष्ट्र की जनता की हिम्मत तोड़ने के लिए खड़ी फसल को रोंदने, बस्तियाँ उजाड़ने, औरतों-बूढ़ों-बच्चों इत्यादि को निशाना बनाने के हथकण्डे काम में लाए जाते थे और कोशिश की जाती थी कि शत्रु बिना लड़े ही हार मान ले और हथियार डालकर हमारा आधिपत्य स्वीकार कर ले। निरन्तर आगे बढ़ने को तत्पर स्त्री के साथ लगभग ऐसा ही रवैया अखि़्तयार किया जा रहा है, जो कि अब कम से कम सफलीभूत हो जाने वाला नहीं है। जागी हुई स्त्री अब हर लड़ाई और मोर्चे पर काफी़-कुछ पूर्व-तैयारियों के साथ सन्नद्ध है। उसे हराना और पीछे लौटाना अब आसान नहीं।

‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’

अनुपम सिंह

अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com

बजरंग बिहारी तिवारी की पुस्तक ‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’ का 13 ॰09 ॰2015 को नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में लोकार्पण हुआ । बजरंग बिहारी तिवारी की यह किताब ‘नवारुण’ प्रकाशन की पहली पुस्तक है। इसके विमोचन में साहित्य की अलग –अलग विधाओं के लोग शामिल हुये, जिसमें जलेस के महसचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह , उपन्यासकार अब्दुल बिस्मिल्लाह, दलित विमर्श के हीरालाल राजस्थानी, दलित स्त्री विमर्शकार  हेमलता महीश्वर, दलित चिन्तक अनिता भारती, आलोचक आशुतोष कुमार, कथाकार और आलोचक संजीव कुमार, ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक और ‘नवारुण’ प्रकाशन के संस्थापक संजय जोशी तथा वरिष्ठ चित्रकार व कथाकार अशोक भौमिक. कार्यक्रम का संचालन करते हुये रामनरेश राम ने इस पुस्तक की प्रकृति के विषय में संकेत किया कि यह पुस्तक तीन खण्डों में बंटी हुयी है – कविता, कहानी और आत्मकथन। यह दलित साहित्य के उद्भव विकास को लेकर दलित साहित्य की प्रस्थापनाओं से बहस करती हुयी, समर्थन करती हुयी उसमे कुछ जोड़ने के लिए प्रस्तावित करती है ।

उड़ीसा में हो रही संसाधनों की लूट पर लिखी किताब को कोई नहीं छापता – संजय जोशी

चूंकि ‘दलित साहित्य :एक अन्तर्यात्रा” नवारुण प्रकाशन की पहली पुस्तक है , इसलिए इसके संस्थापक संजय जोशी ने पुस्तक पर परिचर्चा होने से पहले ही अपने प्रकाशन की स्थापना के विषय में अपने विचार और आगे की कुछ योजनाओं को सबके साथ साझा किया । उनका कहना था कि ‘यदि नवारुण प्रकाशन दस साल तक काम करता है तो फिर गांधी शांति प्रतिष्ठान में पुस्तक के लोकार्पण की जरुरत नहीं पड़ेगी उन्होंने कहा कि कविता, कहानी उपन्यास तो सभी छाप रहे हैं परंतु उड़ीसा में हो रही संसाधनों की लूट पर लिखी किताब को कोई नहीं छापता। बच्चों के लिए अच्छी किताबें बहुत ही कम हैं, जो उनमें वैज्ञानिक चेतना को विकसित करें। उन्होंने आगे कहा कहा प्रकाशन का मैं मालिक नहीं हूँ और न ही बनने की इच्छा हैं। यह एक साझा प्रयास है जो आप सबके साझे सहयोग से ही सफल होगा । संजय जोशी ने कहा कि इस पुस्तक में जो कुछ भी सुंदर दिख रहा है उसका योगदान अशोक भौमिक को जाता है । इसके लिए मैं उन्हें शुक्रिया अदा करता हूँ । इस पुस्तक के डिजाइनर हरी कृष्ण का भी शुक्रिया अदा करता हूँ’।

बजरंग बिहारी तिवारी ने दलित साहित्य के लिए सेतु का काम किया है – हीरालाल राजस्थानी

पुस्तक पर बातचीत की शुरुआत करते हुए हीरालाल राजस्थानी ने कहा कि दलित साहित्य मे आलोचक बहुत ही कम हैं, बजरंग बिहारी तिवारी ने दलित साहित्य के लिए सेतु का काम किया है। यह काम जो बजरंग जी ने किया है हममें से किसी को करना चाहिए था । इन्होने दलित साहित्य के लिय उत्साह पैदा किया है । मैं इन्हें इस काम के लिए बधाई देना चाहता हूँ । साथ ही साथ नवारुण प्रकाशन के संजय जोशी जी को भी बधाई देना चाहता हूँ की उन्होने अपने प्रकाशन की शुरुआत दलित विमर्श से संबन्धित पुस्तक छापकर की । कमियाँ हर जगह होती है इस पुस्तक में भी कुछ रह गयी है । बजरंग जी से कुछ नाम छूट गए । क्यों छूट गए हैं इसको बजरंग जी की हो सकता है उन छूटे हुये नामों को लेकर आगे कोई योजना हो.’ उन्होने कहा कि दलित लेखन में हर तरफ से आवाज आ रही थी की दलित का लिखा ही दलित साहित्य होगा । यह सही भी है, परंतु जो गैर दलित लिख रहे हैं उनका भी स्वागत होना चाहिए । सभी तरफ से चीजें बदलनी चाहिए । गैर दलितों के लिखने से दलित साहित्य की स्वीकारोक्ति बढ़ेगी’ ।

यह किताब पूरे दलित समाज की यात्रा को दिखाती है – अनिता भारती

अनिता भारती  का कहना था कि ‘इस बहुत ही खूबसूरत पुस्तक के लिए संजय जोशी जी को बधाई । बजरंग जी की पुस्तक पूरे दलित समाज की यात्रा को दिखाती है । यह दलित साहित्य के लिए इतिहास की किताब जैसी है । यदि मैं यह कहूँ कि यह पुस्तक दलित समाज के हर पहलू को छूते हुये चलती है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । लेखन के लिए अध्ययन से अधिक दृष्टि का महत्त्व होता है और बजरंग जी के पास वह दृष्टि है। बजरंग जी पर दलित- विमर्श पर काम करने के लिए तरह –तरह के सवाल उठाए गए लेकिन आज के समय मे इनके काम की महत्ता है. आलोचक जब किसी कविता को अपने दायरे मे लाता है तब वह उसे राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश से जोड़ता है, बजरंग जी सूरजपाल चौहान और ओमप्रकाश बाल्मिकी की कविता को बहुत ही सही ढंग से कोट करते हैं । दलित साहित्य एक ऐसे समाज को रचना चाहता है जहां भेदभाव न हो, लोकतान्त्रिक मूल्य हो । बजरंग विहारी तिवारी जी  दलित साहित्य को स्थापित करने वालों में ,उसका पक्ष रखने वाले हमारे साथी हैं। हम उन्हें अपना आलोचक मानते हैं। हीरालाल राजस्थानी की बात पर उन्होने कहा कि इतिहासकार और आलोचक मे फर्क होता है, इतिहास मे विवरण होता है और आलोचना मे एक दृष्टि काम करती है जिससे कुछ चीजें छूट ही जाती हैं ।‘

जरंग बिहारी तिवारी जी हमारी दलित चेतना के पैरोकार है – प्रो हेमलता महीश्वर

प्रो हेमलता महीश्वर ने कहा कि ‘निश्चित ही बजरंग जी का यह काम महत्त्वपूर्ण है । दलित साहित्य जो स्वरूप ग्रहण किए हुये है वह किन पड़ावों को पार करता हुआ यहाँ तक पंहुचा है इसकी पड़ताल बजरंग जी ने की है । और यह यात्रा शुरू होती है बाबा साहब अंबेडकर से । उन्होने जब देखा हिन्दू धर्म मे हमारा सम्मान नहीं है तब बौद्ध धम्म की तरफ गए उसकी 22 प्रतिज्ञायेँ स्वीकार कीं । उन प्रतिज्ञाओं मे कोई जड़ता नहीं है । दलित विमर्श में दलित पैंथर आंदोलन का योगदान है। हेमलता जी ने स्वतन्त्रता के पहले और उसके बाद के अनेक आंकड़े बताए जिसमे दलितों का स्थान नगण्य था । यही कारण है की मराठी के नामदेव ढसाल, कांबले आदि चिंतक अपनी जगह तलाशते हुये आए’ ।  उनका कहना था कि ‘दलित विमर्श में तो कोई भी शामिल हो सकता है,  लेकिन दलित चेतना में वही शामिल हो सकता है जो अंबेडकर की तरह ही उन 22 प्रतिज्ञाओं को मानता हो । बजरंग बिहारी तिवारी जी हमारी दलित चेतना के पैरोकार है । मैं बजरग जी ,नवारुण प्रकाशन के संजय जी को तथा आवरण चित्र के लिए सावी सावरकर जी को बधाई और धन्यवाद दोनों देती हूँ’ ।

ओमप्रकाश बाल्मिकी की कविता सूत्र है पूरे दलित आंदोलन को समझने के लिए – आशुतोष कुमार

युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ‘नवारुण प्रकाशन का शुरू होना आज के समय में बहुत प्रासंगिक है । नबारुण भट्टाचार्य की कविता ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’ आज हमारे कानों में गूंज रहा है’ । उनका कहना था कि ‘यह जो मृत्यु-उपत्यका जैसा दिखाई दे रहा है वह मेरे सपनों का देश नहीं हो सकता । लोग मारे जा रहे हैं, दलित मारे जा रहे हैं, आदिवासी मारे जा रहे है, घरों से बेघर किए जा रहे हैं, लेकिन यह राष्ट्रीय एजेंडा का सवाल नही बन पा रहा है उत्तर से लेकर सुदूर दक्षिण , पूर्वोतर, झारखंड सब जगह कानूनी हत्याएं हो रही हैं । आवाजों को दबाया जा रहा है। यह सिर्फ मीडिया पर एकाधिकार के चलते नहीं हो रहा है बल्कि शिक्षा, संस्कृति को भीतर से नष्ट करने की कोशिश हो रही है । इससे लड़ने के लिए जरूरी है कि बहस की जगहों को बचाया जाय । ऐसे माहौल मे बहस को कैसे तेज किया जाय यह उन लोंगों की ज़िम्मेदारी है जो अपने साधनों से लड़ रहे हैं । ओमप्रकाश बाल्मिकी की कविता सूत्र है पूरे दलित आंदोलन को समझने के लिए कि ‘चूहड़े या डोम की आत्मा ब्रह्म का अंश क्यों नहीं है’ । अब तक यह सवाल नहीं पूछा गया लेकिन नवारुण या शब्दारंभ का होना यह साबित करेगा कि यह सवाल भी पूछा जाएगा । बजरंग जी दस सालों से काम कर रहे हैं दलित साहित्य के अखिल परिदृश्य को हिन्दी के पाठकों तक पहुंचाया , भाषाएँ सीखी ,दलित साहित्य के स्रोतों तक गए । जहां तक सवाल है गैर दलित होने का तो दलित साहित्य के लिए यह जरूरी है कि भीतर की आलोचना के साथ बाहर से भी उसे देखा जाय । बजरंग जी गहराई से उन सारे सवालों को देख रहे है जो रचना प्रक्रिया के लिए जरूरी हैं । बजरंग जी गैर दलित होते हुये भी इससे जानबूझकर टकराते हैं । कोई उनकी आलोचना करे, सराहना करे लेकिन उनका नाम काटकर दलित विमर्श को नहीं देख सकता।‘

बजरंग के यहाँ चीजें बहुत विवरणात्मक ढंग से आई हैं और कहीं बहुत गहराई के साथ – संजीव कुमार

आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि ‘आशुतोष ने बहुत महत्वपूर्ण बाते कही है, मैं संजय को बधाई देता हूँ । बजरंग को तो लगातार बोलना, लिखना है। लेकिन संजय ने जिस तरह सिनेमा के साथ किया उसी तरह नवारुण के साथ भी होगा। दलित लेखन पर बजरंग लगातार लिखते रहे हैं। कई सारी चीजें हैं जो पत्र-पत्रिकाओं में आई हैं पर तमाम चीजें हैं जिन्हें अभी मुकम्मल किताब रूप में आना है। फिर आपने देखा है कि बजरंग में कितना विस्तार और गहराई है। मैं विस्तार और गहराई को जानबूझ कर चुन रहा हूँ। क्योंकि बजरंग के यहाँ चीजें बहुत विवरणात्मक ढंग से आई हैं और कहीं बहुत गहराई के साथ। यद्यपि आशुतोष ने कहा कि यह लेखों का संकलन है लेकिन प्रबंधात्मक स्वरूप में। निबंधात्मक और प्रबंधात्मक प्रविधि का जो रहस्य होता है वह इस पुस्तक में है। दलित प्रश्न में अस्मिता नहीं बल्कि मुक्ति की कोशिश महत्त्वपूर्ण होती है, यही इनकी चिंता भी है। यही इनकी मार्क्सवादी समझ है। दलित रचनाशीलता के लिए शिल्प महत्त्वपूर्ण नहीं बल्कि कथ्य है, बजरंग यहाँ सरलीकरण करते हैं। शिल्प और कथ्य को अलग-अलग देखना ही सवाल का सरलीकरण है। इसी तरह जब दलित लेखक लिख रहे होते हैं कि ‘उनका कथ्य ही महत्त्वपूर्ण है’। यहाँ उनसे हम अभिजन सौंदर्य कि मांग नहीं करते, लेकिन जो बात कही जा रही है वह अपनी पूरी शक्ति के साथ आयी है कि नहीं कैसे पता चलेगा । कोई तो पैमाना होगा जिससे हम इसको कहानी या कविता कहें । इस बात को उन्होने कुछ उदाहरणों के साथ रखा । जैसे –खेत ठाकुर का ,बैल ठाकुर का ….. । यह सिर्फ कविता इसलिए नहीं है कि कवि कह रहा है बल्कि इसलिए भी है कि इसमे कविता के आवश्यक आस्वाद ,ध्वनि इसमे मौजूद है । यह एक ऐसा प्रसंग है जो बजरंग से छूटा है’ ।

पुस्तक बहुत ही महत्वपूर्ण और गवेषणात्मक- अब्दुल बिस्मिल्लाह

उपन्यासकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कहा कि यह पुस्तक बहुत ही महत्वपूर्ण और गवेषणात्मक है । इस किताब कि शुरुआत आदिकाल से हुयी है ,सरहपा से हुयी है । बजरंग विमर्श कि शुरुआत वहाँ से करते है फिर संत तक आते है’।

मैं मूलत कार्यकर्ता था लेकिन अब धीरे –धीरे लेखक बन गया हूँ – बजरंग बिहारी तिवारी

अध्यक्षीय वक्तव्य के पहले बजरंग जी ने इस पुस्तक के संदर्भ में अपनी बात संक्षेप में रखी । अपनी दलित विमर्श कि रचना प्रक्रिया के विषय में भी बताया है । बजरंग जी ने कहा कि ‘वे मूलत कार्यकर्ता था लेकिन धीरे –धीरे लेखक बन गया । अब भी कार्यकर्ता ही हूँ । जो चीजें इसमे छूट गयी है वे अगली योजनाओं का हिस्सा हैं’ ।

यह दलित साहित्य पर मुकम्मल किताब की दिशा में पहला ठोस कदम- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि ‘यह दलित साहित्य पर मुकम्मल किताब की दिशा में पहला ठोस कदम है । मैं संजय जोशी को भी बधाई देता हूँ कि उन्होने पहली ही ऐसी पुस्तक छापी जिसकी बहुत जरूरत थी । यह पुस्तक 21 अध्यायों में विभक्त है जिसमे 4 वैचरिकी से संबन्धित है तथा शेष कविता कहानी ,आत्मकथा और दलित विमर्श से संबन्धित है ।  दलित विमर्श पर मुख्य धारा के साहित्य का दृष्टिकोण बहुत ही संकीर्ण है इसलिए इस पुस्तक का ऐतिहासिक महत्त्व है’ ।

कार्यक्रम मे आए हुये सभी लोगों और वक्ताओं का औपचारिक धन्यवाद अशोक भौमिक ने किया।

‘अर्थ स्वातंत्र्य ’ स्त्री मुक्ति की पूर्व शर्त

सुनीता

आम्बेडकर विश्वविद्यालय,दिल्ली के हिन्दी विभाग में शोधरत , संपर्क : sunitas988 gmail.com

भारतीय संस्कृति स्त्री  विरोधी  है और यहाँ स्त्री  की छवि परम्परागत मलबे से ही बनी है। इसके भौतिक कारण भी देखे जा सकते है। जैसे ‘ज्ञान’ और ‘संपत्ति’ इन दोनो से ही भारतीय पितृसत्ता के मनीषियों ने स्त्री  को वंचित रखा। वो तो यहाँ तक चले गए कि संपत्ति को संपत्ति की क्या जरूरत, अर्थात स्त्री  तो स्वयं किसी की संपत्ति है। पहले पिता की, फिर  पति की और अंत में बेटों की। रही ‘ज्ञान’ की बात, अगर ज्ञान नही होगा तो कोई बहस या तर्क नही करेगी। वर्जीनिया वुल्फ बताती है कि स्त्रियों को पुस्तकालय में  प्रवेश की अनुमति नहीं  थी। पर स्त्री  मुक्ति का आह्वान करते हुए लेखिका लिखती है कि ‘‘आप चाहें तो अपने पुस्तकालयों में भले ही ताला लगा दीजिए, लेकिन मेरी दिमागी आजादी को रोकने वाला कोई दरवाजा, कोई ताला कोई नट-बोल्ट नही बना।’’1

महादेवी वर्मा किसी भी समाज के विकास का मापदंड उस समाज में स्त्री  की स्थिति और हैसियत को मानती है। ‘‘नितांत बर्बर समाज में स्त्री  पर पुरुष वैसा ही अधिकार रखता है, जैसे वह अपनी अन्य स्थावर संपत्ति पर रखने को स्वतंत्र है। उसके विपरीत पूर्ण विकसित समाज में स्त्री -पुरुष की सहयोगिनी तथा समाज का आवश्यक अंग मानी जाकर माता तथा पत्नी के महिमामय आसन पर आसीन रहती हैै।’’2  महादेवी आर्थिक प्रश्न पर समूचे ऐतिहासिक विकास क्रम को कटघरे में खड़ा करती है। पुत्र पिता की समस्त सम्पत्ति का आधिकारी  होता था, परन्तु कन्या को विवाह के अवसर पर प्राप्त होने वाले यौतुक के अतिरिक्त और कुछ देने की आवश्यकता ही नही समझी गई। ‘‘स्त्री  को इस प्रकार पिता की संपत्ति से वंचित करने में क्या उद्देश्य रहा, यह कहना कठिन है। यह भी संभव है कि स्त्री  के निकट वैवाहिक जीवन को अनिवार्य रखने के लिए ऐसी व्यवस्था की गयी हो।’’3 भारतीय पुरुष ने स्त्री  को या तो सुख के साधन  के रूप में पाया या भार रूप में फलतः वह उसे सहयोगी का आदर न दे सका।

मनुस्मृति के अनुसार पैतृक जायदाद का माता-पिता की मृत्यु के बाद सभी पुत्रो में समान रूप से बँटवारा किया जाना चाहिए किन्तु ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी  था। स्त्रियाँ इस पैतृक संसाधन  में हिस्सेदारी की मांग नही कर सकती थीं । किंतु विवाह के समय मिले उपहांरो पर स्त्रियों का स्वामित्व माना जाता था और इसे स्त्री धन  की संज्ञा दी जाती थी। स्त्री  और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भिन्नता संसाधनॉन  पर उनके नियंत्रण की भिन्नता की वजह से अधिक  प्रखर हुई। मनुस्मृति में पुरुष के धन  अर्जन के सात तरीके बताए गए हैं – खोज , विरासत, खरीद, विजित करके, निवेश, कार्य द्वारा तथा भेंट। वही स्त्रियों के लिए प्रियजनों (परिवार ) द्वारा दिए गए उपहार मात्र। मैत्रोयी पुष्पा इसे उपहार नहीं बल्कि ‘रिश्वत’ के रूप में देखती हैं जिसके बदले स्त्री  से यह अपेक्षा की जाती है कि वह संपत्ति में अपने अधिकार  की मांग न करे।

एंगेल्स ने ‘स्त्री  की अधीनस्थ  स्थिति को ताम्र ओर लोह-औजारो के विनियोजन से उपजी माना।’ युग्म-विवाह और समूह -विवाह जैसी व्यवस्थाओं  में सगे पिता का निश्चयपूर्वक पता लगाना असम्भव होने के कारण मात्र सगी माँ को मान्यता प्राप्त थी। जिसके कारण घर के भीतर नारी की प्रधानता  होती थी। इसी को इतिहासकारो ने आदिकालीन मातृसत्ता से जोड़ा हैं। लेकिन जब इन व्यवस्थाओ ने विकास किया, ‘कृषि युग’ और ‘ताम्र युग’ संदर्भ में आए तो बाहरी क्षेत्र ने घरेलू क्षेत्र पर अपना वर्चस्व प्राप्त कर लिया। जो पहले से ही पुरुष के अधिकार  क्षेत्र में था। संपत्ति के निर्माण ने संपत्ति के वैध् वारिस की अवधरणा को जन्म दिया जिसके चलते स्त्री  भी पुरुष की अधीनस्थता  में आ गयी। इस तरह ‘एकल विवाह’ व्यवस्था के साथ पितृसत्ता अस्तित्व में आयी।

महादेवी भारतीय पत्नीत्व को एक विडम्बना ही मानती है। समाज स्त्रिायों के विवाह की चिंता इसलिए नही करता कि देश या जाति में सुयोग्य माताओ और पत्नियों का अभाव हो जायेगा, वरन, इसलिए कि उनकी अजीविका का हम कोई और सुलभ साध्न नही सोच पाते। किसी स्त्री  के विध्वा होते ही प्रश्न उठता है कि उसका भरण-पोषण और उसकी रक्षा कौन करेगा? महादेवी इस तथ्य पर भी प्रकाश डालती है कि क्यों हमारे समाज ने सदियो से स्त्रियों की आर्थिक परतंत्रता को जारी रखा है। समाज की यह धरणा रही है कि स्वावंलम्बन के साधनों से युक्त स्त्री  गृहिणी के कर्तव्य  को हेय समझेगी, अतः गृह में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी। जो कि पूर्णतः भ्रान्तिमूलक  है। महादेवी लिखती हैं  कि ‘‘हमारे यहाँ आज भी श्रमजीवियों की स्त्रियाँ तथा किसानों  की सहधर्मिणियाँ घर संभालती और जीविका के उपार्जन में पुरुष की सहायता भी करती है। इस चिंता से कहीं पुरुष के अधिकार  के बाहर न चली जावे, उन्हें पुरुष मनोरंजनी विद्या के अतिरिक्त और कुछ न सिखाना उनके लिए भी घातक है और समाज के लिए भी, क्योंकि वे सच्ची सामाजिक प्राणी और नागरिक कभी बन ही नही पाती।’’4

समय के बदलते परिदृश्य और बढ़ते आर्थिक दबाबो के कारण धन  कमाने के लिए बाहर निकलती स्त्री  आज परिवार की बेज्जती का नही बल्कि इज्जत और जरूरत का सबव बन गयी है। परतु स्त्री  से जुड़े सामंती मूल्य आज भी सांस ले रहे है। स्त्री  पर बैठाए गए तमाम पहरों   ने स्त्री  संघर्ष के तनाव को और अधिक  बढ़ाया है। ‘वर्ग-संघर्ष’ और ‘यौन-संघर्ष’ के बीच कौन-से एकसमान सूत्र है? यह शोध् का विषय रहा है। इस पूंजीवादी व्यवस्था में क्या स्त्री  भी एक वर्ग ही है? ऐसे में नारीवादियों की ‘सिस्टर हुड’ वाली विचारधरा कहाँ तक साबित होती है? यह सभी अपने आप में बड़े सवाल है जो नारी-विमर्श ने उठाए है।

मार्क्सवादी स्त्री  को यह आशवासान दिलाते हैं  कि जब सर्वहारा वर्ग की जीत हो जाएगी और साम्यवादी शासन प्रणाली लागू होगी तो स्त्रियाँ स्वयं मुक्त हो जायेंगी । इसलिए स्त्री , अपनी मुक्ति की स्वतंत्र लड़ाई को महत्व देने के स्थान पर वर्ग-संघर्ष में अपना सहयोग दे। जबकि महादेवी स्त्री -मुक्ति के लिए किसी आदर्शवादी व्यवस्था का इंतजार नही करना चाहती,  उल्टा उनका दृढ़ विश्वास है कि जिस समाज में स्त्री  अपनी पूर्णता में मुक्त होगी वही सभ्य और आदर्श समाज होगा। मार्क्सवादी , स्त्री  तथा पुरुष में  भेद-भाव का बड़ा करण उनके बीच श्रम-विभाजन को मानते है। तथा नारी को सार्वजानिक उद्यम में ले आने को उसकी मुक्ति के रूप में देखते है। परंतु ध्यान देने योग्य है कि सामजवादी व्यवस्था में स्त्रियों  को आर्थिक आजादी मिलने पर भी क्या यौनिक स्वतंत्रता मिल पायी? नही। महादेवी स्त्री  की आर्थिक पराधीनता  का कारण स्त्री  की एक ‘स्त्री ’ के रूप में पहचान न होने के बदले पुत्री , पत्नी, माता के रूप में उसकी छवि बनाना भी मानती है। वह लिखती है कि ‘‘भारतीय स्त्री  के संबंध् में पुरुष का ‘भर्ता’ नाम जितना सार्थक है उतना सम्भवतः और कोई नाम नही। स्त्री  पुत्री , पत्नी, माता आदि सभी रूपों में आर्थिक दृष्टि से कितनी परमुखापेक्षी रहती है, यह कौन नही जानता।’’5 मार्क्सवादियों  द्वारा एक दलील यह भी दी जाती है कि क्रांति तात्कालिक रूप में भौतिक स्तर को परिवर्तित करती है जबकि मानसिक परिवर्तन में समय लगता है जो सांस्कृतिक पुननिर्मिति पर निर्भर करता है। यह निर्विवाद सत्य है कि स्त्री  की अध्ीनस्थता का घनिष्ठ सम्बन्ध् संस्कृति से है। सीमोन लिखती ही है ‘‘स्त्री  पैदा नही होती गढ़ी जाती है।’’6

महादेवी ने मजदूर व निम्न वर्गीय स्त्रियों के मर्म को भी बड़ी बेबाकी से छुआ है। वह लिखती है कि ‘‘उत्तराधिकार  मिल जाने पर भी हमारी मजदूर स्त्रियाँ निर्धन पिता व दरिद्र पति से दरिद्रता के अतिरिक्त और क्या पा सकेंगी।’’7 यहाँ समाजवादी नारीवाद की वह सीमा पुष्ट हो रही है,  जिसमें पिता, पति, पुत्र द्वारा स्त्रियों को घरेलू कार्य के लिए वेतन देने की मांग की जाती है। क्योंकि महिलाआं के घरेलू कामकाज का वेतन की शक्ल में कोई आकलन नही किया जाता। केवल पारिवारिक बदलावो से स्त्री  की स्थिति में विशेष परिवर्तन नही आएगा बल्कि राज्य को संसाधनों  का सही वितरण स्त्री  के हक में करना होगा। महिला का घरेलू श्रम जिसे उत्पादक या अनुत्पादक श्रम कहा गया। वह महज शोषण नही स्त्री  की अधीनस्थता  है। प्रगातिशील महिला संगठन ( पी .ओ.डब्लू) के अनुसार स्त्रियों के शोषण के दो बुनियादी ढाँचे थे-लैंगिक आधार पर श्रम का विभाजन तथा संस्कृति जिसने इसे प्रतिपादित किया। श्रम विभाजन में भेदभाव के पीछे मंशा यह थी कि स्त्रियों को आर्थिक रूप से पुरुषों पर आश्रित रखा जाए। स्वदेशी आंदोलन की तर्ज पर स्त्रियों के लिए रोजगार सृजन के जो प्रयास किए गए वे पुरुषों की आमदनी में  महिलाओ की ओर से कुछ पूरक सहायता के मद्देनजर किए गए न कि जीवन यापन के लिए धन  कमाने के उद्देश्य से। ‘‘यह कार्य प्रशिक्षित स्त्रियों द्वारा अर्थोपार्जन के बजाय समाजसेविका के रूप में किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि स्त्रियों की दक्षता को मात्र सेविका, सफाई, भोजन बनाने या पढ़ाने जैसे ‘पोषक’ कार्यो तक या उन्हें गृहस्थी के परम्परागत कार्यो जैसे खाद्य प्रसंस्करण तथा हस्तशिल्प तक सीमित कर दिया गया।’’8

घरेलू श्रम के लिए वेतन की जो माँग उठायी गयी, सिमोन दी बोउआ ने उसका विरोध किया। उनका मानना है कि ‘‘एक छोटी अवधि में  बहुत संभव है कि घरेलू पत्नियाँ, जिनके पास दूसरा विकल्प नही है, वेतन पाकर खुश होगी। इसमें कोई शक नही। लेकिन एक लम्बे दौर में घरेलू कामों के लिए वेतन औरतों  को यह मानने के लिए प्रेरित करेगा कि घरेलू पत्नी होना भी एक तरह का काम है। इस तरह स्त्री  फिर  घरेलू परिसीमाओ के भीतर निर्वासित-सी जिंदगी जीने के लिए मजबूर रहेगी।’’9 असल चीज़ है घरेलू श्रम की परिस्थितियों में बदलाव वरना घरेलू कामों का महत्व तो बढ़ जाएगा, लेकिन उससे जुड़ी औरत के अलगाव और एकाकीपन की परिस्थितियाँ वैसी ही बनी रहेगी। वह जीवन और ज्ञान के तमाम स्रोतों  से कटकर घरेलू श्रम की चार दीवारी में ही कैद हो जाएगी।

भारतीय स्त्री  शोषण की चैतरफा मार झेलती है। उसके प्रति न तो शास्त्रो ने रहम दिखाया न ही राज्य ने अपनी कोई जिम्मेदारी निभाई और तो और वह परिवार तथा पति, जिसकी सेवा में उसने अपना संपूर्ण जीवन और स्वत्त्व होम कर दिया। वहाँ भी वह उपेक्षित ही रही। महादेवी के इन शब्दो में स्पष्ट नजर आता है कि भारतीय स्त्री  का जीवन क्या है ‘‘श्रमजीवी श्रेणी की स्त्री  को गृह का कार्य और संतान का पालन करके भी बाहर के कामों में पति का हाथ बटाना पड़ता है। सबेरे  6 बजे, गोद में छोटे बालक को तथा भोजन के लिए एक मोटी काली रोटी लेकर मजदूरी के लिए निकली हुई स्त्री  जब 7 बजे संध्या समय घर लौटती है तो संसार भर का आहत मातृत्व मानो उसके शुष्क ओठो में कराह उठता है। उसे श्रान्त शिथिल शरीर से पिफर घर का आवश्यक कार्य करते और उस पर कभी-कभी मद्यप पति को निष्ठुर प्रहारों को सहते देखकर करूणा को भी करूणा आये बिना नही रहती।10

 हमारे देश में कृषक तथा अन्य श्रमजीवी स्त्रियों की इतनी अध्कि संख्या है कि उनकी मुक्ति के बिना भारत में स्त्री -विमर्श अर्थहीन ही रहेगा। एक स्त्री  अगर शैक्षिक और व्यवसायिक स्तर पर  पुरुष की बराबरी करती भी है तो भी समाज उसके साथ लिंगभेद करता है। जर्मेन ग्रीयर लिखती है कि ‘‘चिकित्साशास्त्र का अध्ययन करने वाली लड़की अगर खासी मेहनत करेगी तो डाॅक्टरी की परीक्षा पास कर लेगी। लेकिन यह सच है कि स्त्री  रोगी पुरुष डाॅक्टरो को प्राथमिकता देती है और पुरुष रोगी भी। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और रेडियो संचालन सीखने वाली लड़कियों के रोजगार न पा सकने के अनेको प्रमाण मौजूद है।’’11

वही महादेवी का स्त्री -विर्मश इतना अधिक  निराशावादी नहीं है। शंभू गुप्त का मानना है कि ‘महादेवी की नारी दृष्टि, यथार्थ के सकारात्मक और सम्भावनात्मक पहलुओं पर सबसे पहले और सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित करती है। लेखिका केवल स्त्री दृष्टिकोण से ही नही, बल्कि समाज के सामूहिक विकास के लिए भी यह आवश्यक मानती है कि स्त्री  घर की सीमा के बाहर भी अपना विशेष  कार्यक्षेत्र चुनने को स्वतंत्र हो। अपने ‘घर और बाहर’ लेख में महादेवी ने स्त्री  के लिए विभिन्न व्यवासिक विकल्पों की बात की है। जिसके माध्यम से स्त्रियाँ भारतीय संस्कृति और समाज को उन्नत और गतिशील बनाने के साथ-साथ स्वयं भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सुदृढ़ होगी।

चिकित्सा के समान कानून का क्षेत्र भी स्त्रियों के लिए उपेक्षणीय नही कहा जा सकता। साहित्य यदि स्त्री  के सहयोग से शून्य हो तो उसे आधी  मानव-जाति के प्रतिनिधित्व  से शून्य समझना चाहिए। महादेवी लिखती है कि ‘‘पुरुष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक  आदर्श बन सकता है, परन्तु अध्कि सत्य नही, विकृति के अधिक निकट  पहुँच सकता है, परन्तु यथार्थ के अध्कि समीप नही। पुरुष के लिए नारीत्व अनुवाद है, परन्तु नारी के लिए अनुभव। अतः अपने जीवन का जैसा सजीव चित्र वह हमें दे सकेगी वैसा पुरुष बहुत साधना  के उपरांत भी शायद ही दे सके।’’12 यहाँ महादेवी का अभिप्राय यह नही है कि स्त्री  के विषय में चिंतन या शोध् पर केवल स्त्री  का ही अधिकार हो, पुरुष का नही। परंतु लेखिका यह दावा जरूर करती है कि विस्तृत क्षेत्र में स्त्री  की सक्रियता के बिना उसकी पराधीनता  की बेड़िया टूटना असंभव है।

वर्जीनिया वुल्फ वैचारिक और आर्थिक स्वंतत्रता को स्त्री  के लिए बहुत ही जरूरी मानती है। वह लिखती है कि ‘‘अगर स्त्री  आर्थिक रूप से सबल और समर्थ हो जाती है,  तो उसे किसी मर्द से नफरत करने की जरूरत नहीऋ वह उसे चोट नही पहुँचा सकता। और उसे किसी मर्द की चापलूसी भी करने की जरूरत नहीं,  क्योंकि वह उसे कुछ नही दे सकता।’’13 स्त्री  को चाहिए चीजों पर अपने आप में विचार करने की आजादी उदाहरण के लिए उस इमारत को मैं पंसद करती हूँ अथवा नही? वह तस्वीर सुंदर  है या नही? वह किताब मेरी राय में अच्छी है या बुरी? चेखव अपनी कहानी ‘डार्लिग’ में नायिका की पुरुषों पर निर्भरता और परमुखापेक्षिता दिखाते हुए नारी मात्र से यह अपेक्षा करते है कि वह तटस्थ दृष्टि और स्वंतत्र विचार रखे।

महादेवी स्त्री  को सबल और सक्षम बनाने का हल इसमें खोजती है कि माता-पिता को बाध्य होना चाहिए कि वे अपनी कन्याओ को उनकी रूचि तथा शक्ति के अनुसार कला, व्यवसाय आदि की ऐसी शिक्षा पाने दे,  जिसमें वे आर्थिक रूप में आत्मनिर्भर हो सके। ‘‘राष्ट्र की सुयोग्य संतान की माता बनना उनका कर्तव्य हो सकता है, परन्तु केवल उसी पर उनके नागरिकता के सारे अधिकारों का निर्भर रहना अन्याय ही कहा जायेगा।’’14 यहाँ महादेवी मातृत्व की अनिवार्यता पर प्रश्न उठाती है। भारत में अधिकाँश  स्त्रियाँ (चाहे वे अकेली हो, तलाक शुदा, भागी हुई या विधवा  हो ) जब पुरुष सुरक्षा से वंचित हो जाती है,  तो उनके उत्पीड़न की संभावना और अधिक  बढ़ जाती है। जिसका सबसे बड़ा कारण है,  उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होना। आश्चर्यजनक रूप से ऐसी स्त्रियाँ  समाज के बजाय, अपने परिजनो के हाथों  उत्पीड़ित होना ज्यादा पंसद करती है।

सन् 2013 में संसद में तलाक संबंधी  कानून में बदलाव के लिए यह प्रस्ताव पेश किया गया कि स्त्रियों को तलाक के बाद अपने पति की उस संपत्ति में भी हिस्सा दिया जाए जिसे ‘मिल्कियत’ कहा जाता है। इससे पहले उसे पति द्वारा खर्चा भत्ता दिये जाने का प्रावधान  था। परंतु इस विधेयक  पर जेंडर बायसिस होने के आरोप लग रहे है। केवल स्त्री  को ही पति की संपत्ति में अधिकार क्यों हो, पति के लिए पत्नी की संपत्ति में ऐसे किसी अअधिकार  प्रावधन क्यों नही है। उन्हें संदेह है कि स्त्रियाँ इस कानून का दुरूपयोग  कर सकती है,  परंतु लोग इस जेंडर विभेद की जड़ में जाकर नही देखना चाहते कि क्यों आज स्त्री को ऐसे कानूनी अधिकार  मुहैया कराने की आवश्यकता पड़ती है।

भारतीय स्त्री  की गुलामी की परम्परा इसका सबसे बड़ा कारण है। भारतीय स्त्रियों का प्रतिनिधित्व  कौन करता है? वे घरेलू श्रमिक और ग्रामीण महिलाएँ जिनके पास आज भी अपनी कोई संपत्ति या अधिकार  नही है। और वह अपनी संपूर्ण ऊर्जा और कुशलता को ताउम्र पति और उसके परिवार की सेवा में झोक देती है। उनके अस्तित्व की कोई पहचान नही है,  जिसका सबसे बड़ा कारण है महिलाओ की आर्थिक परतंत्रता। विरासत से ही उन्हे ऐसे अधिकारों  से वंचित रखा गया। तब आज अचानक बराबरी की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे आरक्षण लागू करने  के कारणो और आवश्यकताओं को न समझते हुए कई लोग उसका विरोध करते है। वे स्त्री  और दलित शोषण के इतिहास को भुला देना चाहते है। ‘सीमांतनी उपदेश’ में लेखिका ने औरतों की तत्कालीन आर्थिक स्थिति के बारे में  लिखा है कि ‘‘बाप के माल में से लड़कियों को कौड़ी भी नही मिलती। खाविंद की दौलत में कुछ अखत्यार नही। बेटे पर दावा चल ही नही सकता। और जो कोई दोलतमंद विधवा  होती है, बिरादरी के सब मिल के भाई या देवर का या फिर किसी और रिश्तेदार का लड़का गोद में बिठा देते है। उसके सब माल असबाव का मालिक बना देते है।’’15

भारतीय स्त्री  की आर्थिक स्वतंत्रता को लेकर सबसे विवादित मुद्दा रहा है ‘हिन्दू कोड बिल’। विवाह संस्था की दमनकारी संरचना स्त्री  को आर्थिक सुरक्षा देने से इन्कार करती है,  क्योंकि यही आर्थिक अधीनता  स्त्री  की पितृसत्ता पर निर्भरता सुनिश्चित करती है। विवाह संस्था के दमनकारी क्रूर पंजों से स्त्री  को आजादी दिलाने के उद्देश्य से डाॅ. अम्बेड़कर ‘हिन्दू कोड बिल’ लाए थे। डा. अम्बेडकर ने अपनी उच्च शिक्षा लंदन स्कूल आॅफ इक्नाॅमिक्स’ से ली थी। वहाँ जाकर उन्होंने आर्थिक पहलुओं पर रिसर्च की और अपने अनुभव से यह पाया कि पश्चिमी अर्थव्यवस्था के इतना मजबूत और समाज के विकसित होने का प्रमुख कारण है वहाँ की आधी  आबादी, यानि स्त्रियों का इसमें बराबर सक्रिय होना। भारतीय स्त्रियों की अधीनस्थता  को बाबा साहेब ने भारत के विकास में बहुत बड़ी बाध माना और उसका विरोध् भी किया।

डाॅ. अम्बेडकर ने महिलाओ को समान कार्य के लिए समान वेतन, मातृत्व लाभ, प्रसूति अधिकार अधिनियम ,विवाह-विच्छेद, अतंरजातीय विवाह, शिक्षा, संपत्ति में अधिकार  जैसे कई अधिकार  दिए जाने की बात रखी। परंतु रूढ़िवादी नेताओ के विरोध के  कारण यह बिल पास नही हो सका। उन्होंने इसे हिन्दू कानून की वैदिक, एवं शास्त्रीय जड़ों पर प्रहार करने वाला बिल बताया। बाबा साहेब ने स्त्री  के संपत्ति संबंधी  अधिकार  की मांग 1950 में की थी। पर उसके 55 वर्षो बाद सन् 2005 में  उत्तराधिकार संबंधी  विधेयक पास   हुआ, जिसमें संयुक्त हिन्दू परिवार में पुत्री  को भी पुत्र के समान संपत्ति का अधिकारी  माना गया। हालाकि व्यवहारिक तौर पर उसकी सामाजिक स्वीकृति आज भी बाकी है।

महादेवी हिन्दू कानून की, स्त्री  को संपत्ति के अध्किार से वंचित रखने की मंशा को इस रूप में रेखांकित करती है ‘‘संभव है स्त्री  के निकट वैवाहिक जीवन को अनिवार्य रखने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई हो। दूसरा कभी युवतियाँ स्वयंवरा होती थी और कभी विवाह के लिए बलात छीनी भी जा सकती थी। ऐसी दशा में पैतृक संपत्ति में उनके उत्तराधिकारी  होने पर अन्य परिवारो के व्यक्तियों का प्रवेश भी वंश-परम्परा को अव्यवस्थित कर सकता था। चाहे जिस कारण से भी हो परंतुु इस विधान  ने पिता के गृह में कन्या की स्थिति को बहुत गिरा दिया।’’16 ऐसा नहीं  है कि स्त्री  के नाम पर सम्पत्तियाँ नही है या वे खरीदी व बेची नहीं जाती। परंतु ऐसा तभी किया जाता है जब पति या पिता को किसी तरह की बेईमानी या कर की चोरी करनी होती है।

मजदूर आदिवासी एवं दलित स्त्रियाँ,  एक ऐसा तबका है, जो स्त्रियों में  भी सबसे ज्यादा विषम परिस्थितियों और शोषण का शिकार होता  है। क्या यह वास्तविकता नही है कि अधिकाँश  मजदूर महिलाये आदिवासी और दलित होती हैं ? ।समाज का अधिकाँश  श्रम ये महिलाये ही करती है और बदले में सबसे कम पाती है। चाहे वह संपत्ति हो, आय हो, स्वास्थ्य, भोजन या फिर  सम्मान। कई स्थानो पर विशेषकर निर्माण कार्य में काम पूरे परिवार के आधर पर मिलता है। वहाँ मजदूरी परिवार के मुखिया (पुरुष) को ही दी जाती है और श्रम करने के बावजूद परिवार की महिलाओ के हाथ में कोई आय नही आ पाती। खेतो में कार्य करने वाली स्त्रियाँ पति के रोजगार में सहायक मानी जाती है,  श्रमिक नही। हमारे पास ‘फैकट्री  एक्ट 1948’ है, कि महिलाओं और पुरुषों को समान कार्य के लिए लिए समान वेतन दिया जाए पंरतु व्यवहार में इसका पालन नही किया जाता।

स्त्रियों की मुक्ति स्वयं स्त्रियों  पर निर्भर करती है। उन्हें सबसे पहले इस दमनकारी व्यवस्था के विभिन्न घटको का असहयोग करना चाहिए। जर्मेन ग्रीयर का मानना है कि ‘‘स्त्रियों को पूंजीवादी राज्य में प्रमुख उपभोक्त की अपनी भूमिका को भी ठुकरा देना चाहिए।’’17 बजारवाद स्त्रियों को घरो से बाहर तो ले आया। परंतु पुरुष के वर्चस्व और स्त्री  की अधीनस्थता की  स्थिति में सेंध्नही लगा पाया। और फिर उसकी ऐसी कोई कोशिश थी भी नही। बाजारवाद तो एक मुनाफा खोर संस्कृति है। पूंजीववाद ने भी स्त्री  का शोषण ही किया, फिर चाहे उसके उपभोक्तावादी रूप को पल्लवित करना हो या सस्ते श्रम के रूप में उसकी उपलब्धि !
प्रोद्यौगिकी और विकास के क्षेत्र में स्त्री  मुक्त हो रही है या फिर सकी गुलामी की जड़े और पुख्ता हो रही है? यह एक बड़ा सवाल है। जर्मेन ग्रीयर का मानना है कि मशीनीकरण के आगमन से स्त्रियों को घरेलू कार्यो से कुछ निजात तो मिली है ताकि वे अपने बारे में सोचने और संघर्ष करने का कुछ समय पा सके। वही दूसरी तरफ यह उपभोक्तावादी संस्कृति स्त्री  की परम्परागत इमेज को ही मजबूत और स्थापित करती है। जैसे डिटर्जेंट हो वा कपडे़ धेने की मशीन और बच्चो के डाॅयपर अक्सर औरते ही ऐसे विज्ञापन करती दिखेगी। अर्थात् यह उन्ही के कार्यक्षेत्र  का दायरा हो।

फैक्ट्ररियों और फर्म यानि उत्पादन के क्षेत्र में प्रोद्योगिकी आते ही स्त्री  श्रमिकों की छटनी शुरू हो जाती है। प्रोद्यौगिकी से जुडे़ शिक्षा व व्यवसाय के क्षेत्र में भी स्त्रियों का अनुपात पुरुषों की तुलना में ना मात्र ही होता है जैसे आई.टी. इंजीनियर, टैक्नोक्रेट आदि। मार्क्स इसका एक दूसरा ही पहलू सामने रखते है कि मशीनीकरण के बाद स्त्रियों और बच्चों की सस्ते मजदूर के रूप में पूंजीपतियों को सबसे पहले तलाश होती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मानना है कि स्त्री  श्रम का उपयोग आर्थिक दृष्टि से बड़ा लाभकारी है, स्त्रियाँ शिकायते नही करती, टेªड यूनियन नही बनाती, पुरुष की तुलना में कम पगार लेती है। साथ ही कभी भी निकाली जा सकती है। इसी के चलते पिछले दो दशको में श्रमशक्ति का स्त्री करण तेजी से हुआ है। विडम्बना यह है कि पूर्णरूप में भारतीय स्त्री  आज भी अपने आर्थिक अधिकारों  से वंचित ही है।

कोलनताई की राय थी कि स्त्रियों की कुछ खास समस्याएँ समाजवाद में ही हल हो सकती है। मसलन बच्चो की देखभाल, मातृत्व, घरेलू काम-काज आदि। समाजवाद ने बड़े ही कौशल से इस अंतर्विरोध् को हल किया। सामूहिक  रसोईघरो, मातृत्व के कारण विशेष छुट्यिाँ एवं पूरी  पगार, बच्चो की देखभाल के सरकारी प्रबंध् किए गए। समाजवादी सोवियत संघ में स्त्रियाँ कानूनी तौर पर स्वतंत्र थीं , पुरुषों के समान थीं । सामाजिक जीवन में उत्पीड़ित-दमित नही थीं । इसके बावजूद स्त्री -पुरुष के बीच मौजूद अंतर्विरोध् एवं पुरुष का वर्चस्व बना रहा। इससे स्त्री  के प्रति बुनियादी रवैये एवं मूल्य संरचना में मूलगामी बदलाव नही आया।

पुरुष वर्चस्व को खत्म करने के लिए ही महादेवी, स्त्रियों को स्वयं भी कुशल और सक्रिय होने की सलाह देती है। ताकि स्त्रियाँ पुरुषों के अनुपात में ही भौतिक उत्पादन के साथ-साथ बौद्धिक  उत्पादन पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर सकें। क्योकि केवल राज्य की सेवा या सुविधओ पर निर्भर होकर स्त्री , पुरुष के वर्चस्व को कभी खत्म नही कर पाएगी।

संदर्भ
1.  वुल्फ, वर्जीनिया, अपना कमरा ;अनु. गोपाल प्रधनद्ध, पृ. 34
2.  वर्मा महादेवी,  शृंखला की कड़िया, पृ. 23
3.  वही, पृ. 87
4.  वही, पृ. 73
5.  वही, पृ. 87
6.    बोआ, सीमोन दी, स्त्री -उपेक्षिता (अनु. प्रभा खेतान), पृ. 26
7.    वर्मा, महादेवी,  शंृखला की कड़ियाँ, पृ. 25
8.   कुमार, राध, स्त्री  संघर्ष का इतिहास 1800-1900, पृ. 139
9.    बोउआ, सीमोन दी, स्त्री  के पास खोने के लिए कुछ नही है ;अनु. मनीषा पांडेयद्ध, पृ. 52
10.  वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 24
11.  ग्रीयर, जर्मेन, बढ़िया  स्त्री  (अनु. मधू बी. जोशी), पृ. 123
12. वर्मा, महादेवी,  शंृखला की कड़ियाँ, पृ. 63
13.  वुल्फ, वर्जीनिया, अपना कमरा (अनु. गोपाल प्रधान ) , पृ. 77
14.  वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 69
15.  महिला, अज्ञात हिंदू, सीमांतनी उपदेश, पृ. 96
16. वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 88
17.  ग्रीयर, जर्मेन, बध्यिा स्त्री  (अनु. मधु  बी. जोशी), पृ. 294

मेरे ख़्वाबों के दूल्हे बनाम शहनाइयां जो बज न सकीं

असीमा भट्ट

रंगमंच की कलाकार,सिनेमा और धारवाहिकों में अभिनय, लेखिका संपर्क : asimabhatt@gmail.com

( रंगकर्मी, अभिनेत्री और लेखिका असीमा भट्ट शादी को लेकर अपने ख़्वाबों , फंतासियों की कहानी कह रही हैं. एक लड़की की कहानी , हर लडकी की कहानी . असीमा के ख़्वाबों में शहनाइयां कई बार बजीं , एक आई ए एस से लेकर पायलट , मछुआरे , रंगरेज और बुनकर तक दूल्हों की कई -कई डोलियाँ उतरीं ख़्वाबों में … हकीकत में एक बार बजी हिन्दी के एक बड़े कवि के साथ ! रोचक और सामाजिक हकीकत को बयान करती  एक दिलचस्प दास्तान !! ) 


शादी को लेकर हर लड़की के बड़े अरमान होते हैं.  इससे शादी करुँगी. उससे करुँगी. ऐसा होगा…. वैसा होगा….मेरे भी थे. मैं तो और भी फ़िल्मी हूँ क्योंकि मेरे दादा और पिता जी का सिनेमा हॉल था. वहीँ बड़ी हुई. सिनेमा में ही खेलती थी और और वहीँ खेलते -खेलते सो जाती थी. कई बार तो मुझे सिनेमा हॉल बंद होने के बाद देर रात हॉल खोलकर टोर्च जला – जला कर ढूंढा गया. क्योंकि मैं सिनेमा देखते -देखते वहीं हॉल की कुर्सी पर सो जाती थी,  फिर नींद में गिर जाती थी और वहीं कहीं कुर्सी के नीचे लुढ़की पड़ी रहती थी.  घर वाले दादा-दादी और माँ आदि समझते  कि सिनेमा हॉल में होगी पापा के पास  क्योंकि कई बार पापा मुझे अपनी केबिन में सुला देते थे.  पापा और सिनेमा के स्टाफ समझते थे कि घर चली गयी होगी. लेकिन देर रात जब माँ पूछती कि मैं कहाँ हूँ , तब पूरे घर में हडकंप मच जाता और घर से लेकर सिनेमा हॉल तक में खोज जारी हो जाती.. तो सिनेमा के जरिये  प्यार को लेकर जो फंतासियाँ मुझमें थे वे  सब अभी तक मुझमें हैं.

वैसे मेरी शादी को लेकर पहला च्वाइस  आई ए एस ( भारतीय प्रशासनिक सेवा से ) था,  क्योंकि मुझे लगता था इनके पास बहुत पावर होता है. वे मुझे गुंडे- बदमाशो से ब चा लेंगे. शहर के आई ए एस की  लाल बत्ती वाली अम्बेसडर गाड़ी जब -जब सिनेमा हॉल में मेरे दरवाज़े पर आती तो मैं बहुत खुश होती और लगता मेरा पति ऐसे ही एक लाल बत्ती वाली कार से निकलेगा. और हुआ भी कुछ यूं कि मैं जिस कालेज में पढ़ती थी वहां के सांस्कृतिक प्रोग्राम में एक बिलकुल नया IAS था,  जिसकी पहली पोस्टिंग ही मेरे शहर में हुई थी.  वह जब मेरे कालेज के प्रोग्राम में आया  और उसने अपने हाथों से मुस्कुराते हुए प्राइज़ दिया तो मुझे लगा कि मुझे प्यार हो गया.

फिर उसके बाद मैं  ही अपने शहर को छोड़ कर पटना आ गयी और वह  बात वहीँ दफन हो गयी.पटना से फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली आ गयी. वो भी पूरा हो गया. एक दिन इंडिया हैबिटाट में मेरा शो था और वहां वे नाटक देखने आये थे , जबकि उन्हें यह पता भी नहीं था कि मैं वहीँ लड़की हूँ, जो नवादा के कालेज में उनसे मिली थी. क्योंकि मैं तब क्रांति से असीमा हो चुकी थी यानी नाम बदल लिया था. नाटक के बाद वे मिले और हिचकिचाते हुए  कुछ पूछते इससे पहले  मैंने ही  पहचान लिया और  ख़ुशी से चौंकते हुए बोली, ‘  आप ?

” हाँ, मैं और तुम यहाँ कैसे…!”
“मैं तो यहीं रहती हूँ. एन एस डी किया फिर यहीं नाटक करती हूँ.”

हम एक दिन कॉफ़ी पे मिले तो उन्होंने बताया कि उन्हें कालेज में नाटक का शौक था और वे  एन एस डी ज्व़ाइन करना चाहते थे. लेकिन उनके पिता जी चाहते थे कि वे आई ए एस बनें  . फिर मैंने शरमाते हुए बताया कि उन्हें कालेज में जब पहली बार देखा था तो उन्हें पसंद करने लगी थी और शादी करना चाहती थी.
उन्होंने कहा ,  ” तो पहले क्यों नहीं  बताया ?  ”
” मौक़ा ही नहीं मिला , मैं अचानक पटना आ गयी.  और अगर बताती तो क्या आप मुझसे शादी कर लेते ! ”
” यह बाद की बात है लेकिन खुश ज़रूर होता. ”
” पर आपने पूछा नहीं मैं क्यों आई ए एस  से शादी करना चाहती थी ? ”
” क्यों?”
” क्योंकि बचपन से ही फिल्मों में देखा में था कि आई ए एस शहर का सबसे बड़ा आफिसर होता है और उसके पास बहुत पावर होता. वे मेरी रक्षा करेगा… ”
वे हँसते हुए बोले ,  ‘काहे का पॉवर ?  हम आई ए एस तो मिनिस्टर के गुलाम होते हैं, जो उनके इशारे पर नाचते हैं.’
और मैंने उनके मुंह पर ही कह दिया , ‘ फिर तो अच्छा हुआ मैंने आपसे शादी नही की. ‘

उसके बाद मेरा दूसरा च्वाइस  था पायलट . मझे लगता था कितना अच्छा होता है. दिन रात हवा में घूमते रहते हैं. जब जहाँ जाना चाहें जा सकते हैं. एक मिनट में दुनिया के किसी भी कोने में. आज यहाँ , तो कल कहाँ …
और शिमला में दो रिटायर पायलट से मिली. मि. मितवा और बी जी भल्ला . भल्ला को मैं बी जी ही बुलाती हूँ.  पंजाबी  में ‘बीजी’ का मतलब ‘माँ’ होता है. और बी जी  मुझे एक  पुरुष होते हुए भी माँ की तरह ही प्यार करते हैं. और मैं हैरत में रह जाती हूँ कि एक पुरुष के दिल में माँ का दिल कैसे है !
एक शाम हम लकडियाँ जला कर  आग सेक रहे थे कि अचानक मितवा ने कहा – ‘तू पहले मिली होती तो मैं तेरी शादी पायलट से कराता.’
मैंने तुरंत चहकते हुए कहा , ‘ और हाँ जब मैं छोटी थी तो पायलट से शादी करना चाहती थी.
“क्यों “,  बी जी ने पूछा
मैंने वहीँ फंटेसी बताया कि रोज़ मैं उसके साथ पूरी दुनिया में घूमती. आज यहाँ उडती तो कल कहीं और ….
बी जी  जोर से हँसे और बोले “मिट्ठी (बीजी मुझे इसी नाम से बुलाते हैं), ऐसा नहीं होता. हम अपनी मर्जी से कहीं नहीं जा सकते. हमें जो रूट पर फ्लाई करने का परमिट होता सिर्फ उसी पर फ्लाई कर सकते हैं. और अपनी पत्नियों और प्रेमिकाओं को रोज़ थोड़े न साथ ले जा सकते हैं. हमारी ड्यूटी बहुत स्ट्रिक्ट होती है.’
पायलट भी कैसिल.

फ़िर चूँकि मुझे समन्दर बहुत आकर्षित करता रहा है तो सोचा मर्चेंट नेवी वालों से शादी करुँगी तो शिप में समन्दर में रहूँगी.  नीचे नीला  नीला पानी समन्दर का ऊपर नीला नीला आकाश. और  बीच में मैं जलपरी की तरह … पर  मेरी  दोस्त निवेदिता जिसका पति संदीप नेवी में हैं ने  खीझते  हुए  जब अपना  अनुभव  सुनाया – ‘असीमा सब फेंटेसी  हैं  चारों तरफ पानी ही पानी  में जब  रहना  पड़ता है  तो कूद  कर कहीं  भाग जाने का मन करता  और भागोगे  भी  कहाँ क्योंकि चारों  तरफ  पानी ही पानी.  कूदोगे तो  डूब  कर मर जाओगे और जब समुद्री तूफ़ान आता है तो  कुछ मत पूछो.’  तो यह इरादा  भी  टाल दिया.

उसके बाद चूँकि मुझे मछली खाना बहुत पसंद हैं. तो मैंने सोचा कि मछुआरे से शादी करूंगी . वह रोज़ समुद्र  से मेरे लिए ताज़ी मछलियाँ पकड़ कर लायेगा और रोज़ मैं उसके लिए अपने हाथों से मछली पकाऊंगी और साथ में मिलकर खायेगे…लेकिन  केरल के मशहूर लेखक तकषी शंकर पिल्लै की  ‘मछुआरे’ पढ़ी.  उसमें मछुआरों के जीवन के बारे में पढ़ा कि कैसे समंदर में अपनी नाव और जाल लेकर दिन भर भटकने के बाद भी उन्हें एक भी मछली नहीं मिलती,  तो मछुआरे से शादी का ख्याल भी मन से निकल गया.

उसके बाद मुझे रंगरेज़ बहुत पसंद थे. कि वे लोग बहुत खूबसूरत रंगों में साड़ी और दुपट्टे रंगते हैं. इनसे शादी करुँगी और रोज़ अपनी मनपसंद का कपड़े रंगवाउंगी …’ऐसी रंग दे मेरी चुनिरिया रंग न छूटे सारी उमरिया’
फिर लखनऊ के रंगरेज़ो से मिली और उनकी हालत देख तरस के अलावा मेरी आँखों में आंसूं थे … कपड़ों में जो रंग और केमिकल, एसिड का इस्तेमाल करते हैं,  उनसे उनके हाथों और पैरों की उँगलियाँ बुरी तरह गल गयी थी  और जिनके लिए वे काम करते हैं,  उन व्यापारियों को उनके इस हाल से कुछ लेना- देना नहीं.उनके छोटे- छोटे बच्चे भी इस काम में लगे हैं और उनके हाथों की उँगलियों में फंगस लगे हुए थे. चमडियाँ उघड रही थीं…

फिर मैंने सोचा कि मुझे साड़ियों का बहुत शौक है और मेरी सारी कमाई साड़ी खरीदने में ही चली जाती है. तो क्यो न  साड़ी बुनने वाले बुनकरो (जुलाहे) से शादी कर लिया जाये. उनसे मैं अपनी मनपसंद की साड़ियाँ बुनबाउंगी.  अपनी पसंद के रंग, अपनी पसंद से साड़ी का आंचल .. और वो प्यार से जैसा कहूँगी वैसी साड़ी बुन देगा.  मैंने प्रियदर्शन द्वारा निर्देशित एक फिल्म देखी ‘कांजीवरम’ जो बुनकरों का हाल बयां करती है. बुनकर महीनों, सालों में एक एक साड़ी तैयार करते हैं,  एक तो उन्हें उनके उचित पैसे नहीं मिलते और दूसरे वो जिंदगी भर बस दूसरों के लिए साड़ियाँ बुनते रह जाते हैं जबकि उनकी पत्नी और बेटी के लिए उनके ही द्वारा बुनी साड़ियाँ पहननी नसीब नहीं होता.

अंततः एक कवि से शादी की. सोचा था कवि बड़े रूमानी होते हैं. मेरे लिए रोज़ प्रेम कवितायेँ लिखेगा पर ‘यह न थी हमारी किस्मत….

वैचारिक और घरेलू पत्रिकाओं में स्त्री मानसिकता का निर्माण

प्रियंका सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत।  तदर्थ प्रवक्ता,हिन्दी विभाग,दौलत राम महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय । संपर्क : singh.priyanka135@gmail.com

संदर्भ: स्त्री-काल, आजकल,अहा ! जिंदगी, गृहशोभा, सरिता

( राजनीति विज्ञान विभाग, दौलतराम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय  और भारतीय जन संचार संघ के द्वारा  संयुक्त रूप से आयोजित ‘ प्रिंट मीडिया और महिलाएं’  विषय  पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रियंका सिंह ने  स्त्री-काल, आजकल, अहा ! जिंदगी, गृहशोभा और सरिता को केंद्र में रखकर अपना शोध -पत्र  प्रस्तुत किया.  ) 


आजकी हमारी दुनिया पूरी तरह से एक आभासी दुनिया बन चुकी है.इस आभासी दुनिया में प्रतिदिन विकसित होने वाली तकनीकों से हमारे जीवनकी संवेदना तेजी से प्रभावित हो रही है. बेहद ही काल्पनिक और फैंटेसीयुक्त अनुभवों से गुजरना आम बात हो गई है. जिस तरह जीवन में हम सचमुच के सुख, दुःख, क्रोध, पीड़ा और उपलब्धियों को अनुभव करते हैं वैसे ही इस दुनिया में भी करने लगे हैं. विशेषज्ञों ने इसे ‘आभासी यथार्थ’ या Virtual Realityका नाम दियाहै. यह यथार्थ जीवन के विशुद्ध अनुभवों को हाशिए पर ले जा रहा है. ‘टाइम’ पत्रिका के नवीनतम अंक में ज़ोएल स्टीन ने इस आभासी दुनिया का विश्लेषण करते हुए इसे“Redical new form of expression” कहा है.(1)अभिव्यक्ति की ऐसी आभासी प्रविधियों ने प्रिंट मीडिया के प्रभाव को काफी कम कर दिया है. यह सही है कि आज अधिकांश पत्र-पत्रिकाएँ अपना ऑनलाइन संस्करण निकाल रही हैं , लेकिन पत्रिकाओं का ऑनलाइन किया जाना ही एक तरह से आभासी दुनिया के प्रभाव का स्वीकार है.दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया एक प्रकार से प्रिंट मीडिया को निर्देशित कर रही है.प्रभाव और निर्देशन के बीच प्रिंट माध्यम की अपनी मूल प्रकृतिबदल रही है,उनका स्वतंत्र अस्तित्व एक नया रूप लेता जा रहा है.इसलिए प्रिंट मीडिया से जुड़े किसी भी मुद्दे पर बात करते हुए हमेंसबसे पहले इस समस्या पर सोचना चाहिए.यह एक प्रश्न भी हो सकता है और एक प्रस्थान-बिन्दु भी कि क्या अपनी मूल प्रकृति और स्वरूप केबदलते हुए दौर में ये माध्यम एक व्यापक पाठक वर्ग के लिए निर्धारित अपने लक्ष्यों मेंकोई गुणात्मक परिवर्तन कर रहे हैं?

हम इसे प्रस्थान-बिन्दु के रूप में लेते हुए अपने विषय से जोड़ते हैं.आभासी दुनिया की तुलना में प्रिंट माध्यमों में परिवर्तन अपेक्षाकृत धीमा होता है और  लक्षितपाठक वर्ग के व्यक्तित्व के विकास पर भी इसका प्रभाव पड़ता है. यदि एक व्यापक पाठक वर्ग के रूप में स्त्रियों की कल्पना करें तो उनकेमानसिकता-निर्माण में पत्र-पत्रिकाओं की अहम् भूमिका रही है. यहाँ स्त्रियों के बौद्धिक विकास में पत्रिकाओं की भूमिका और पत्रिकाओं की प्रस्तुति में स्त्रियों की भूमिका कासमानांतर अध्ययन ही हमारा अभीष्ट है. हमने वैचारिक और घरेलू या मनोरंजन-प्रधान पत्रिकाओं का चयन किया है. मुख्यतः मानसिकता निर्माण के इन दो पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है : पत्रिकाओं के प्रबंधन से जुड़े विभिन्न पदों पर स्त्रियों के कार्य और इन पत्रिकाओं में एक विषय या मुद्दे के रूप में स्त्री या स्त्री-संबंधी सामयिक विचार. घरेलू या मनोरंजन से जुडी पत्रिकाओं में हम स्त्री के प्रबंधन और उसकी छवि-निर्माण का एक अलग पैटर्न पाते हैं जबकि वैचारिक पत्रिकाओं में यह पैटर्न बदल जाता है. इस आलेख में दोनों की प्रक्रिया, प्रासंगिकताऔर प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है. अध्ययन का रुखबदलते हुए पैटर्नकी ओररखा गया है. पूरे आलेख कीप्रस्तुति इस रूप में है कि विषय केवल स्त्री के मुद्दों तक ही सीमित न रहे,बल्कि समाज और संस्कृति के व्यापक सरोकारोंकी एक अनिवार्य चिंता के रूप में उभरे. हमने अपनी बातों को पाँच विचार-बिन्दुओं के अंतर्गत रखा है.

पत्रिकाओं की स्त्री-केंद्रित अवधारणाएँ(WOMEN ORIENTED CONCEPT OF THE MAGAZINES) :

स्त्री-केंद्रित अवधारणा का सामान्य अर्थ है एक पाठक के रूप में स्त्री को सोचते हुए उसके अनुकूल सामग्री की प्रस्तुति. हालाँकि इस संदर्भ में कुछ संपादकों ने विशेष रुख अपनाया है. ‘स्त्रीकाल’ घोषित रूप से स्त्रीवादी पत्रिका है.अपने उद्द्येशों को रेखांकित करते हुए संपादक संजीव चंदन ने लिखा है, “हमारा प्रयास होगा कि किसी भी प्रकार के जैविक विभेद से परे लेखकों की सामग्रियों, बहसों, विमर्शों को जगह दी जाये और उसकी स्थितियों को स्त्रीवादी आदर्शों से ही परखा जाये. वैसे बहस के लिए खुला मंच देना भी हमारा प्रयोजन होगा.”(2) यह पत्रिका जैविक विभेद को नकारती हुई स्त्रीवाद के पक्ष में जाती है. और स्त्रीवादी लेखन के लिए स्त्री होना जरूरी नहीं है. पत्रिका के विभिन्न अंकों में प्रकाशित सामग्री को देखने से पता चलता है कि पुरुषों के लेखन को उसमें निहित स्त्रीवादी व्याख्या के कारण ही शामिल किया गया है. ज़ाहिर है कि अपने लेखकों के चयन में इस पत्रिका का दृष्टिकोण समन्वयात्मक है जबकि इसमें लेखन की प्रस्तुति एक ख़ास दृष्टिकोण के तहत की जाती है.दूसरी ओर यदि दिल्ली प्रेस की ‘गृहशोभा’ जैसी पत्रिका को देखें तो इसकीअवधारणा पूरी तरह से गृहिणियों से संबंधित है. इस पत्रिका केविज्ञापन में ये पंक्तियाँ लिखी रहती हैं—
“आपकी सच्ची मार्गदर्शिका यही शोभा
मैं स्वतंत्र हूँ, चट्टान हूँ विश्वास की
मैं आईना हूँ, गरिमा हूँ
मैं प्रतिशोध का हथियार हूँ
मैं तैयार हूँ हर कल के लिए”(3)

गृहशोभा’ जैसी पत्रिकाओं में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि उनके पाठकप्रायः स्त्रियाँ होती हैं. घरलू कामकाज के बाद फुर्सत के क्षणों में जागरूक महिलाएँ ऐसी पत्रिकाएँ पढ़ती हैं. अधिकांश महिलाएँ टेलीविजन धारावाहिक देखने की ही तरह पढने के ऐसे अनुभवों को मनोरंजन का ही एक रूप मानती हैं.‘गृहशोभा’ की पूरी प्रस्तुति गृहिणियों को आकर्षित करती है. यह विज्ञापन पत्रिका के पाठकों के रूप में स्वाभिमानी स्त्रियों का ही संकेत नहीं करता, उसकी भविष्योन्मुखी तैयारी को भी बतलाता है.‘गृहशोभा’ के अलावा दिल्ली प्रेस की ‘मुक्ता’ और‘वनिता’ तथा एचटी मीडिया की‘कादम्बिनी’ जैसी पत्रिकाओं ने महिलाओं के मनोरंजन के मनोविज्ञान को समझते हुए अपने कंटेंट और प्रस्तुति को लगातार संवारने की कोशिश की है.फिलहाल बिक्री और प्रचार-प्रसार की बात न करें तो निश्चित तौर पर इन पत्रिकाओं की मूल योजना केवल स्त्री पाठकों पर ही केंद्रित है. वैचारिकपत्रिकाओं के साथ ऐसा नहीं है, हालाँकि वे कम लोकप्रिय हैं. लोकप्रियता और स्तरीयता दो बातें हैं.स्त्री मानसिकता के विकास की दृष्टि से कहें तो अपनी थीम के कारण घरेलू पत्रिकाएँ स्त्रियों को भौतिक सुख सुविधा और समृद्धि के प्रति जागरूक रखती हैं जबकि वैचारिक पत्रिकाएँ उन्हें मानसिक संतुष्टि देती हैं, सोचने-समझने के उनके दायरे का विकास करती हैं. यह कहना भी जरूरी है कि घरेलू पत्रिकाओं की अवधारणा पाठक-केंद्रित होती है जबकि वैचारिक पत्रिकाओं की विचारधारा-केंद्रित.

पत्रिकाओं में महिलाओं द्वारा प्रबंधन(MANAGEMENT BY WOMEN IN MAGAZINES):



महिलाओं द्वारा किए जाने वाले प्रबंधन को हम दो रूपों में देख सकते हैं— संपादकीय टीम में महिलाओं की भूमिका और कंटेंट निर्माण में उसका योगदान. सूचना और प्रसारण मंत्रालय की पत्रिका ‘आजकल’ की संपादक फ़रहत परवीन यों तो एक महिला के संपादक होने को बहुत ख़ास नहीं मानती हैं लेकिन संपादन को बहुत जिम्मेदारी का कार्य मानती हैं. वे कहती हैं कि “गुणवत्तापूर्ण सामग्री का चयन और सीमित समय में पूरी रूपरेखा तैयार करके अंक को प्रकाशित करने तक की प्रक्रिया काफी लंबी होती है और यह टीम वर्क के कारण ही सम्भव हो पाता है.”(4)‘अहा जिंदगी’ के संपादकीय टीम में अनुपमा ऋतु और गीता यादव की मुख्य भूमिका है. ये समय समय पर थीम लेखन भी करती हैं.इसी तरह ‘स्त्रीकाल’ में डॉ० अनुपमा गुप्ता प्रबंधन के साथ साथ महत्त्वपूर्ण अनुवाद भी करती रहती हैं. निवेदिता संपादन में सहयोगी हैं. घरेलू पत्रिकाओं का प्रबंधन संस्थागत है. हाँ, उनमें कंटेंट निर्माण में लेखिकाओं की अच्छी संख्या है. प्रबंधन के दोनों रूपों पर ध्यान देने से हम पाते हैं कि संपादन के अलावा स्त्रियाँ प्रचार-प्रसार और पाठकीय रीति-नीति से जुड़े अहम मुद्दों का भी समाधान करती हैं.पत्रिका के स्थायी लेखकों के रूप में ये केवल स्त्री मुद्दों पर लिखती ही नहीं, पत्रिका के स्त्री-पक्ष को काफी हद तक भविष्योन्मुखी दृष्टिकोणभी प्रदान करती हैं.पत्रिकाओं का प्रबंधन प्रिंट माध्यम में स्त्रियों के छवि-निर्माण से ही नहीं बल्कि उनके लेखकीय प्रस्तुति से भी जुड़ा है. इन लेखिकाओं के कंटेंट लेखन में भी हम एक व्यवस्था पाते हैं. स्त्री के बारे में लिखते हुए अनुपमा ऋतु प्रश्नोत्तर शैली में बिन्दुवार विश्लेषण करती हैं. एक उपशीर्षक ‘येफ़ेमिनिज्म क्या है भाई?’ के अंतर्गत वे लिखती हैं, “नारीवाद के इस मरे हुए प्रेत को तथाकथित साहित्यिक, बौद्धिक और अभिजन वर्ग सबसे ज़्यादा फैलाता रहा है. वक़्त बिताने के लिए रसहीन, अर्थहीन शब्दों की चुइंगम चबाने वाला यह वर्ग मंहगे कॉफ़ी हाउसेज़ में बैठकर स्लमविच की दशा को दिशा दिखाने की बात करता है, लेकिन स्त्री के मनोविज्ञान से सबसे ज़्यादा खिलवार भी यही वर्ग कर रहा है, क्योंकि हमारे समाज में उस स्त्री का बाहुल्य है जिसकी अपनी कोई सोच ही नहीं.”(5) ऋतु की बातों पर गौर करने से उसकी भाषा और समझ पर भी गौर करना पड़ता है. यहाँ सहमति-असहमति की बजाय यह देखना चाहिए कि यदि इसके लेखन में कोई व्यवस्था है तो क्या इसका संबंध उसके संपादकीय अनुभवों से है? क्या उसकी भाषा विषय के अनुकूल है या आज के पाठकों के लिए प्रासंगिक है? इन प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ’ में देने से किसी को शायद कोई एतराज नहीं होगा. विस्तार भय के कारण दूसरे उदहारण नहीं लिए गए हैं लेकिन इतना स्पष्ट है कि दोनों तरह के प्रबंधन स्त्रियों के वैचारिक व्यक्तित्व को विकसित करने में सहयोगी हैं.

स्त्रियों से जुड़े विषय-वस्तु(CONTENT RELATED TO WOMEN) :

स्त्रियों से संबंधित सामग्री का प्रकाशन पत्रिका की मूल अवधारणा के अनुकूल किया जाता है. घरेलू और वैचारिक दोनों पत्रिकाओं में स्त्रियों के निजी, पारिवारिकऔर सामाजिक विषयों से जुड़ी सामग्रियाँ प्रस्तुत की जाती हैं. घरेलू पत्रिकाओं में निजी या पारिवारिक मुद्दोंकोसर्वेक्षण से प्राप्त अलग अलग तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है.इसके अलावा जरूरत और अवसर के अनुकूलप्रेम, विवाह,शारीरिक शिक्षा, रिश्ते-नाते, खानपान, पहनावे और पर्व-त्यौहार जैसे विषयों पर विशेष सामाग्री का प्रकाशन होता है या विशेषांक आदि निकाले जाते हैं. ‘गृहशोभा’ के वर्ष 2015 में  प्रकाशित अबतक के अंक बचत, दाम्पत्य, रिश्तेदारी, मेक अप, शिशु-पोषण और मानसून फैशन पर केंद्रित हैं.‘गृहशोभा’ की तरह ‘सरिता’ पूरी तरह स्त्री-केंद्रित पत्रिका नहीं है. लेकिन दोनों पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों के विषय मिलते-जुलते होते हैं. प्रत्येक अंक में पति-पत्नी, माँ-बेटी, पिता-पुत्र, सास-ससुर-बहूऔर भाई-बहन के रिश्ते की कहानियाँ छपती रहती हैं.पति-पत्नी संबंधों की कहानियाँ सबसे अधिक छपती हैं.  ‘सरिता’ की कहानियों और अन्य सामग्रियों का स्वर अंधविश्वास, पाखंड और भ्रष्टाचार के विरोध का होता है. दिल्ली प्रेस के एक विज्ञापन में ‘सरिता’ के बारे में यह लिखा है— “सरितापत्रिका नहीं, एक आंदोलन है. हिंदी पत्रकारिता में इसने एक नया इतिहास रचा है और स्वस्थ मनोरंजन के साथसाथ समाज का मनोरंजन किया है.”(6) सामाजिक मनोरंजन के बहाने जहाँ ‘सरिता’ स्त्रियोंकी राजनीतिक जानकारी बढ़ाती है और उनमें सामाजिक संस्कृति का विकास करती है वहीं‘स्त्रीकाल’ बौद्धिक संस्कृति का विकास करती है. प्रिंटफॉरमेट में यह पत्रिका शोध-लेखों को प्रमुखता से छापती है.  ऑनलाइन एडिशन में साहित्य (50%), शोध (30%) और समसामयिक मुद्दों (20%) से संबंधित सामग्री का प्रकाशन किया जाता है.(7)इसका लक्ष्य स्त्री-संबंधी शोधपरक अध्ययन को प्रमुखता देना है.विषय-वस्तु के आधार पर दो बातें स्पष्ट हैं. घरेलू पत्रिकाएँ स्त्रियोंमें पारिवारिक और सामाजिक चेतना का विकास करती हैं जबकि वैचारिक पत्रिकाएँ आलोचनात्मक और शोध-क्षमता का. लेकिन स्त्री-संवेदना दोनों में कॉमन है और कंटेंट के प्रभाव को निर्धारित भी करती है. इसका एक मतलब यह भी है कि जिस प्रकार बौद्धिक चेतना से रहित मनोरंजन अर्थहीन है उसी प्रकार स्त्री-संवेदना से रहित तथाकथित बौद्धिकता भी उथली होगी.

सापेक्षिक मानसिकता का विकास(DEVELOPMENT OF RELATIVE MENTALITY) :
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि साहित्य और पत्रकारिता में अभी भी पुरुष वर्चस्व की स्थिति है. सापेक्षित मानसिकता के विकास का पहला चरण इस वर्चस्व को समझना है.संदर्भित पत्रिकाओं का अध्ययन करते हुए यह महसूस किया गया है कि स्त्रियों में पुरुषों के सापेक्ष एक उच्च कोटि की बौद्धिकता के विकास की दरकार है.  इस पहलू पर सोचते हुए न तो किसी प्रतियोगी भावना की जरूरत है और न ही स्त्री या पुरुष में से किसी को कम या अधिक आंकनेकी. समन्वयात्मक दृष्टिकोण चाहिए. अनुपमाऋतु के लेख ‘सत्य के दूसरे छोर पर स्त्री’ का मूल स्वर भी यही है, “परंपराएँ  कभी भी ख़ुद नहीं बदलतीं. उनका बदलना हमारे बदलने पर निर्भर करता है. हमें एक बात बहुत ईमानदारी से स्वीकारनी है कि ग़लत रास्तों पर चलकर कभी सही नहीं हुआ जा सकता. पुरुष क्या कर रहा है, क्या करता रहा है, उसे कहने से हम अपने दोषों को जस्टिफाई नहीं कर सकते.ईमानदार स्वीकारोक्ति और पड़ताल के बिना हमारी दुनिया में न कोई क्रांति संभव है,  न प्रतिक्रांति.”(8) सापेक्षिक मानसिकता की दृष्टि से ‘स्त्रीकाल’बहुत अच्छा उदाहरण है. संपादकीय टीम और कंटेंट प्रस्तुति में भी यह बात है.अंक-7 के एक लेख में कुसुम त्रिपाठी लिखती हैं— “शोषणहीन समाज की स्थापना ही स्त्रीवादी सपना है.”(9)वे‘सत्ता’ शब्द से ही अपना विरोध दर्ज करती हैं.  क्योंकि इससे यह पता चलता है कि “हम अपना वर्चस्व चाहते हैं और जब हम वर्चस्व चाहेंगे तो उसे पाने के लिए हमें दूसरे वर्ग कोदबाना पडेगा.”(10 ) स्त्रियों की ओर से इस तरह की सोच स्वागत योग्य है.कट्टर स्त्रीवादी हो जाने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा. भारतीय परंपरा में जिस अर्धनारीश्वर की परिकल्पना की गई है उसे आज के संदर्भ में एक नया रूप देने की जरूरत है और अनुपमा ऋतु या कुसुम त्रिपाठी जैसी विचारशील स्त्रियों के लेखन से यह नया रूप दिया ज सकता है. कोई भी पत्रिका या लेखक बड़ा या छोटा नहीं होता, बड़े या छोटे होते हैं उसके विचार और उद्देश्य. ये विचार स्त्री या पुरुष में से किसी के भी हो सकते हैं. इन पत्रिकाओं में इस तरह के सहलेखन और सहचिन्तन को बढ़ावा देना चाहिए. सापेक्षिक मानसिकता का विकास सहभागिताकी इस भावना के बिना नहीं हो सकता.इनलक्ष्यों को पूरा करने के लिए वैचारिक और घरेलू  पत्रिकाओं के प्लेटफ़ॉर्म परकुछ गोष्ठियों या कार्यशालाओं का आयोजन भी किया जा सकता है जिनमें स्त्री और पुरुष लेखक परस्पर विचार-विनिमय कर सकते हैं और मानसिकता निर्माण के लिए एक ‘कॉमन प्रोग्राम’ की रूपरेखा बना सकते हैं.

पुस्तक संस्कृति की ओर(TOWARDS BOOK/ READING CULTURE) :
‘वर्चुअल रियलिटी’ पुस्तक-संस्कृति या पढ़ने-लिखने की परंपरा को तेजी से क्षीण कररही है. वह पाठक को एक उपभोक्ता बनाकर उसे अपनी गिरफ्त में ले लेती है. पत्रिकाएँ गिरफ्त में नहीं लेतीं या शायद ले ही नहीं पातीं.प्रतियोगिताओं का आयोजन कर कुछ पत्रिकाएँअपने पाठकों को पुरस्कार स्वरूप पुस्तक या घरेलू उपकरण देते हैं. लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या केवल इतने से पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सकता है.कुछ हद तक पत्रिकाओं की कीमत भी इसे प्रभावित करती है. ‘अहा जिंदगी’ एक अपवाद है तो केवल अपनी रचनात्मक प्रस्तुति के कारण. इसी कारण वह न तो पूर्णतः घरेलू पत्रिका है और न ही विशुद्ध वैचारिक.उसकी पूरी प्रस्तुति में परंपरा और आधुनिकता का समन्वय मिलता है.वास्तव में परंपरा को पूरी तरह नकारकर और आधुनिकता के फैशन में आकंठ डूबकर हम कभी अपनी लक्षित मानसिकता को प्राप्त नहीं कर सकते. दोनों के उपयोगी तत्त्वों को लेकर उनके बीच से ही रास्ता बनाना होगा.

बातें बहुत सी हैं. लेकिन संक्षेप में यह कहना चाहिए कि घरेलू और वैचारिक पत्रिकाओं को एक प्लेटफ़ॉर्म की तरह बरतते हुए स्त्री -मानसिकता के निर्माण का हमारा लक्ष्य स्त्री को एक प्रबुद्ध नागरिक के रूप में निर्मित करने का है. पाठक की भूमिका से उसकी शुरूआत होती हैऔर प्रबंधन की भूमिकाओं से होते हुए वह बौद्धिक नेतृत्व की एक दहलीज पर पहुँचती है.

संदर्भ (References) :

1. Joel Stein का लेख Inside the Box;TIME (23-08-2015); Page-39.
2. संजीव चंदन द्वारा लिखित संपादकीय; स्त्रीकाल(अंक-6, अप्रैल 2009); पृ० 05.
3. गृहशोभा(जूनII,2015) में प्रकाशित विज्ञापन, पृ० 08.
4. ‘आजकल’ के संपादक फ़रहत परवीन से बातचीत; 11-08-2015.
5. अनुपमा ऋतु का लेख ‘सत्य के दूसरे छोर पर स्त्री’, अहा जिंदगी (जुलाई 2015); पृ० 19.
6. दिल्ली प्रेस द्वारा जारी सूचना पुस्तिका में ‘सरिता’ का परिचय
7. ‘स्त्रीकाल’ के संपादक संजीव चंदन से बातचीत; 10-08-2015.
8. अनुपमा ऋतु का लेख ‘सत्य के दूसरे छोर पर स्त्री’, अहा जिंदगी (जुलाई 2015); पृ० 12.
9. कुसुम त्रिपाठी का लेख ‘शोषणहीन समाज की स्थापना ही स्त्रीवादी सपना है’, स्त्रीकाल(अंक-7, अप्रैल 2010); पृ० 140.
10. वही; पृ० 140.

पत्रिकाएँ (Magezines) :
स्त्रीकाल(अंक 6, 7, 8, 9) तथा ऑनलाइन संस्करण.
आजकल(मार्च, सितम्बर और नवंबर 2014 तथा जनवरी, मार्च, जुलाई, अगस्त 2015)
अहा जिंदगी(जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल, जून, जुलाई, अगस्त 2015)
गृहशोभा ( मार्च I, अप्रैल I, मईII, जूनI, II, जुलाई  I, 2015)
सरिता(मई I, जूनII, जुलाईI, II और अगस्तI, 2015)

बीज-शब्द (KEY WORDS) :
स्त्री मानसिकता (WOMEN PSHYCE), आभासी दुनिया (VIRTUAL WORLD)
इलेक्ट्रोनिक मीडिया (ELECTRONIC MEDIA), प्रिंट मीडिया (PRINT MEDIA)
मनोरंजन का मनोविज्ञान (PSYCHOLOGY OF ENTERTAINMENT)
सांस्कृतिक विकास (CULTURAL DEVELOPMENT)
सापेक्षिक मानसिकता (RELATIVE MENTALITY)
पुस्तक संस्कृति(BOOK CULTURE)

पेंडुलम

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सिनीवाली शर्मा

स्नातकोत्तर मनोविज्ञान से, पत्र-पत्रिकाओं में लेख, व्यंग्य एवं कहानियाँ प्रकाशित, संप्रति स्वतंत्र लेखन, संपर्क : siniwalis@gmail.com

ये शाम धुंधली है मेरी जिंदगी की तरह, सोचती हूँ अगर जिंदगी मुझसे कभी ये सवाल कर बैठे कि मैंने उसे दिया क्या, तो—–! तो मैं क्या जवाब दूँगी। इसी जवाब को खोजती तो मैं कब से चल रही हूँ पर हर कदम हर कोशिश के साथ जिंदगी  उलझती ही चली जाती है। सब कुछ पा लेना चाहती थी, पर क्या मिला है अबतक। न चाहते हुए भी मैं अपने आप में उलझती जा रही हूँ और इधर मेरा घर  कुछ दिनों से देख रही हूँ भव्या का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है, चुप सी रहती है। कई बार उससे पूछा, स्कूल में कुछ हुआ है, कोई दिक्कत तो नहीं है। कुछ नहीं बताती। थोड़ी देर खाली-खाली आँखों से मुझे देखती है और कभी कभी मुझे कसकर पकड़ लेती है। मैंने उसके दोस्तों से भी बात की पर कोई कारण समझ में नहीं आया। शायद हार्मोनल चेंज भी इसका कारण हो सकता है या फिर—–। शिशिर से इस बारे में बात करुं पर वो तो टूर पर गया है। उसे अभी दो-तीन दिन और लग जाएंगे। दो-तीन दिन लगे या दो-तीन हफ्ते, कोई विशेष फर्क तो नहीं पड़ता मुझे, हाँ और शांति ही लगती है। ये घर और भव्या उसका इंतजार करते हों और मैं—–पता नहीं !

सोचती हूँ, पता नहीं कहना मेरे लिए अब आसान हो गया है पर इसे आसान बनने में कितना समय लगा है, वो मैं ही थी जो  किसी पार्क में किसी मंदिर में घूरती आँखों के बीच घंटों शिशिर का इंतजार किया करती थी। उन आँखों के बीच शिशिर की आँखें ढूंढा करती। उसे देखते ही मैं भूल जाती कि मेरे आसपास कितने लोग हैं। मैं दौड़ कर उससे लिपट जाती। मेरे लिए उसकी आँखों में चमकीली रौशनी होती, होठों पर मिठास और साथ में उसकी ढेर सारी कविताएँ। वो मुझे सुनाता जाता, अपलक मैं उसे देखती रहती। कई बार वो पत्रिका भी साथ लाता जिसमें उसकी कविताएँ छपी होतीं। पर मैं उसका नाम बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में देखना चाहती और वो उदास होते  हुए कहता, वहाँ तक पहुँचना आसान नहीं होता—–गॅाडफादर चाहिए, माथे पर किसी का हाथ चाहिए। कविता कितनी भी अच्छी क्यों न हो, लिखने से अधिक छपाना मुश्किल काम होता है। मैं उसकी आँखों में कई बार उदासी तैरते देखती। ” अगर लेखन में दम हो तो आज नहीं तो कल लोग उसे खोज कर पढ़ेंगे, पत्रिकाएं हाथोंहाथ लेंगी “, मैं बोलती रहती वो चुपचाप मुझे देखता रहता।

” काश कि ऐसा हो—–”
” होगा जरूर होगा ‘
” और काश कि तुम यूं ही उस समय मेरे साथ रहो ”
” पर तब तक—–?”

उसने मेरी हथेली अपनी हथेली में लेते हुए कहा, ” अगर मैं ये कहूं-—-मैं ऐसे ही लिखता रहूँ और तुम जीवन भर यूं ही मेरे साथ रहो, मेरी पहली पाठक, मेरी गाईड या यूं कहूँ मेरी सबकुछ बनकर——! ” उसकी आवाज हवा में तैरती रही और मेरी शाम सिंदूरी होती रही और वो सिंदूर बिखरता रहा मुझपर—–सपनों का सच होना मैं देख रही थी।डोर बेल बजा। घड़ी की ओर नजर गई, देखा दो बज गए। लगता है भव्या स्कूल से आ गई। मैं अपनी यादों और आधी लिखी कहानी को समेटने लगी कि अधूरी कहानी ने पूछा, ” मुझे कब पूरा करोगी ?”
” अब शायद रात में ही—–!”

भव्या को तो फिर भी समझा कर समय निकाल सकती हूँ पर कितनी जिम्मेदारियों को समझाया जाए। आज शाम कुछ लोग घर पर आ रहे हैं। समय तो देना ही होगा। कल सुबह-सुबह शिशिर भी आ जाएगा फिर कहाँ मिल पाएगा वक्त। अधूरी कहानी मुझे देखती रहेगी और मैं जिम्मेदारियों की चक्की में पीसती उसे। शिशिर मेरे जीवन में आया तो मेरी जिंदगी ही बदल गई। सब कुछ खिला-खिला, खुशबू में भींगा-भींगा था। हर वक्त मैं, वो और उसकी कविता होती। कभी-कभी उसकी अधूरी लाइन मैं भी पूरा कर देती। मैं जीवन का संगीत सुन रही थी। महसूस करने लगी थी वो मुझपर आश्रित रहने लगा है और अपनी खुशियों के लिए मैं उस पर। पर—–अब मेरे जीवन में उसका होना किसी तूफान से कम नहीं और हर वक्त किसी सूखे पत्ते की तरह मैं काँपती रहती हूँ।
मेरे जीवन से सुगंध उड़ चुका है और सूखे फूल की तरह मैं बिखर रही हूँ—–ओह फिर मन कहाँ भागने लगा। भव्या स्कूल से थकी आई है और मैं——।

भव्या चुपचाप टीवी देख रही है। अपनी उम्र से ये कुछ अधिक बड़ी हो गई है, शरारतें नहीं करती, इस उम्र की नादानियाँ नहीं दिखती, चुप होती जा रही है दिन-ब-दिन। जब भी मेरे और शिशिर के बीच झड़प होती है कभी कभी वो भी सामने होती है। हालांकि हरबार मैं चाहती हूँ कि हम ऐसा कुछ भी उसके सामने नहीं करें जिससे उसपर कुछ गलत असर हो। पर सिर्फ मेरे चाहने से तो सब कुछ नहीं होता—–। पर आगे से बिल्कुल नहीं—–मैं ही चुप रह  जाऊंगी। बहुत कुछ सहना पड़ता है, ऐसे ही घर की छत और उसके नीचे संसार नहीं बसता। ओह—–फिर दूध उबल कर गिर गया, मेरी ही तरह। रात के नौ बज गए। गेस्ट अभी अभी गए हैं। सुबह स्कूल की तैयारी भी करनी है और भव्या को भी थोड़ा समय देना है-क्वालिटी टाइम चाहिए बच्चों को। सही है बच्चे शोपीस तो नहीं हैं कि बस खिला पिला दो और झाड़ पोछ कर घर में सजा दो। उसकी भी भावनाएं हैं, अपनी उलझनें हैं। मैं नहीं समझूंगी, टाइम नहीं दूंगी तो और घर में कौन—–! शिशिर को तो गोष्ठियों से टाइम ही नहीं मिलता, घर आता है थकान उतारता है फिर अगली मंजिल की तरफ बढ़ जाता है। घर में उनके साथ कौन कौन रहता है, शायद उसे पता हो या ना हो, परिवार की आर्थिक जरूरतों के अलावा भावनात्मक जरूरतें भी तो होती हैं, कवि है पर भावना नहीं समझ पाता।

भव्या के पिछले टेस्ट का जो रिजल्ट आया था, संयोग से वो घर पर ही था और उसकी नजर पड़ गई थी रिपोर्ट कार्ड पर। भव्या पर कम पर मुझपर तो बरस ही पड़ा—–” क्या करती हो दिनभर—–घर और बेटी संभल नहीं रही पर साहित्यकार बनने से तुम्हें फुरसत कहाँ है—–।” लगा जैसे तीर कलेजे में आकर चुभ गया-साहित्यकार शब्द मेरे लिए नहीं तुम्हारे लिए बना है मैं तो——! वो रिपोर्ट कार्ड फेंक कर चिल्ला उठा, ” तुम ने कोई कसर तो छोड़ी नहीं—–उस दिन हँस-हँस कर जो उस  से बात कर रही थी—–उसके कुछ दिन बाद ही तो तुम से उसने फोन करके कहानी माँगी थी—–मैं क्या नहीं समझता तुम औरत होकर अपना उपयोग करना अच्छी तरह जानती हो।”

” तुम जैसों के लिए ये कहना बड़ी बात नहीं है कि औरत के लिए आगे बढ़ना आसान होता है—— औरत के लिए औरत होना उसकी सबसे बड़ी समस्या भी तो है ये क्यों नहीं दिखता—— आदमी जो देखना चाहता है उसे वही दिखता है।” पर मैं जवाब देकर बात बढ़ाना नहीं चाहती थी, बस इतना ही कहा,
” क्या तुम संपादक से नहीं मिलते—–?”
” तुममें और मुझमें अंतर है ”
” क्या अंतर है ?”
” तुम सज संवर कर जाती हो !”
ओह, कितनी गिरी हुई सोच है इसकी। जवाब तो था मेरे पास पर झगड़ा और बढ़ जाता अगर मेरी नजर पर्दे के पीछे खड़ी भव्या पर नहीं पड़ती। उसका डरा सहमा चेहरा देख मैं चुप हो गई और वहाँ से आँसू पोछते हुए हट गई।

रात के ग्यारह बज गए। भव्या सो गई। मैं इतनी थक गई कि अब कहानी पूरी करने की हिम्मत नहीं बची। फिर अधूरी कहानी मुझे देख रही थी। कल तक मुझे उसे भेजना है। कई बार मैं वक्त ले चुकी पर कहानी पूरी ही नहीं हो पाती। अगर अभी पूरी नहीं हुई तो कल सुबह-दोपहर-शाम-रात तक समय नहीं मिल पाएगा क्योंकि कल सुबह ही शिशिर आ जाएगा। फिर दो चार दिन सफर की थकान उतारता रहेगा और घर के खाने का स्वाद लेता रहेगा। कहानी पर काम करते देखकर तो उस समय शायद चुप भी रह जाए पर रात होते होते कोई न कोई बहाना लेकर मुझपर बरस जाता है। महीनों से उसका ये व्यवहार मैं देख रही हूँ। अब तो आँख बंद करके भी ये जान जाती हूँ कि मेरे किस व्यवहार पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, सब कुछ कैलकुलेटेड सा हो गया है। ये दर्द क्यों—–ओह ये तो उस दिन शिशिर ने गुस्से में गरम पानी डाला था। उसके बाद हाथ में फफोले पड़े थे। अभी तक पूरा सूखा नहीं है। दो-चार दिन दवाई लगाई फिर काम में दवाई लगाने का ध्यान ही नहीं रहा। कहाँ रह पाता है अपना ध्यान और वो कहता है मुझे सजने संवरने से फुरसत ही नहीं है।

क समय था कि मेरा सजना संवरना उसे पसंद था। खासकर जब किसी गोष्ठी सम्मेलन में जाना होता या किसी संपादक, समीक्षक मित्र से मिलना होता। उस दिन वो चाहता मैं उसके हिसाब से तैयार होऊँ। मुझे भी उसके हिसाब से सजना संवरना अच्छा लगता। सच कहूं तो कभी कभी मुझे अपने आप से रश्क होने लगता, कि दुनिया जिसकी दीवानी है वो मेरा—–। उसके साथ मुझे चलते गर्व होता कि मैं इतने बड़े कवि की पत्नी हूँ।  सभा संगोष्ठियों में उसके साथ आते जाते धीरे – धीरे मैं महसूस करने लगी कि सुंदरता के अलावा मैं उसकी नजर में और कुछ नहीं रही। मेरी भावना, मेरी खुशी, मेरी जरुरत धीरे धीरे शिशिर के आगे बढ़ने के जूनून में सब खोता चला गया।  इस बीच कुछ ऐसे साहित्यकारों से मिली जिन्हें मुझमें मेरी सुंदरता के अलावा भी कुछ दिखा, वो थी मेरी लिखने की प्रतिभा। शिशिर की कविता सुनते सुनते न जाने मुझमें लिखने की क्षमता कहाँ छुपी थी वो बाहर आ गई। जब उनलोगों ने मुझपर भरोसा जताया तो मैं भी लिखने लगी, ” कहानी “। मेरी कहानी छपने लगी और धीरे धीरे बड़ी बड़ी पत्रिकाओं में भी। मुझे लगता शायद ऊपर वाले ने हमारी जोड़ी इसीलिए बनाई थी कि हमदोनों एक ही राह के राही बनेंगे। जब मंजिल एक हो तो साथ चलना आसान हो जाता है।

घर संसार से मैं समय चुरा कर लिखने लगी, कहानियाँ। पाठकों के पत्र और फोन आने लगे। पहले शिशिर के कहने पर जाती थी अब मेरे लिए भी निमंत्रण आने लगे। पर अब वो मुझे अपने साथ ले जाना नहीं चाहता। कभी कभी शिशिर तय समय से पहले ही मुझे बिना बताये निकल जाता और मैं इंतजार करती ही रह जाती। भव्या के जन्म के बाद औरत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी घर और बच्चे को संभालना होता है, ये मुझे  शिशिर समझाने लगा। उसकी परवरिश में कहीं कोई कमी न रह जाए। इससे जुड़ी किताबें ला लाकर देने लगा। मैं कुछ और पढ़ना चाहती वो मुझे कुछ और पढ़ाता। फिर भी किसी तरह मैंने अपने सपने को बचाये रखा। एक हफ्ते पहले ही की तो बात है उस दिन शिशिर घर पर था। भव्या की छुट्टी थी स्कूल में। मैं तैयार होने लगी संपादक से मिलने जाना था। शिशिर से कहा, ” भव्या का ध्यान रखना—–मुझे लौटने में तीन चार घंटे लग जाएंगे।”
” कहाँ जा रही हो——?”
” संपादक एक कार्यक्रम करवाना चाहते हैं, इसी शहर में। वो चाहते हैं कि मैं भी हिस्सा लूँ। इसी सिलसिले में कुछ——”
” अच्छा तभी ये सिल्क की साड़ी और लिपस्टिक लगाकर जा रही हो, मैं सब समझता हूँ—–कहानी कैसे छपती है और कार्यक्रम कैसे होते हैं।”
मैंने आवाज नीची रखी क्योंकि आजकल भव्या की गहरी होती उदासी मेरी आँखों में थी। “क्या कहना चाहते हो तुम कि मैं—–?”
” तुम सब समझ रही हो। उस दिन जब तुम मेरे साथ गई थी तो वो तुम्हें अपने केबिन में लेकर क्यों गया था—–क्या मेरे सामने बात नहीं हो सकती थी !”
” मेरी नहीं तो कम से कम उनकी उम्र का तो लिहाज करो।”
” मुझे बेवकूफ बनाती है—–मैं खूब समझता हूँ तुम्हें भी और—–!”

गैस पर पानी खौल रहा था हमारी ही तरह। मुझे अंदाजा नहीं था वो इस हद तक भी जा सकता है। उसने खौलता हुआ पानी मुझपर फेंक दिया। ओह, सिर्फ शरीर ही नहीं जला आत्मा भी जल गई। मेरे भीतर शिशिर नाम जलने लगा, दुर्गंध आने लगी। साड़ी थी पूरा शरीर तो नहीं जला पर हाथों पर फफोले पड़ गए मेरी ही जिंदगी की तरह। वो अगले ही दिन देश के प्रख्यात कवि संगोष्ठी में शामिल होने के लिए चला गया। बहुत रात बीत गई। अधूरी कहानी फड़फड़ाती रही मेरे सामने। मैं भव्या को, उस अधूरी कहानी को और घड़ी के पेंडुलम को देखती रही।