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हमारी पार्टी गरीबों की पार्टी है : दीपंकर भट्टाचार्य

बिहार चुनाव का तीसरा फेज 28 को है. छोटे -बड़े दलों के नेता हवाई मार्ग ( हेलीकॉप्टरों) से राज्य के खेत -खलिहानों में उतर रहे हैं-उबड़ -खाबड़ सड़कों की हकीकत से दूर. वही  खेत -खलिहानों में हमेशा संघर्षरत एक पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव उबड़ -खाबड़ सड़कों , पगडंडियों पर हिचकोले खाते  एक दिन में 5 से 6 सभायें कर रहे हैं.  भाकपा ( माले ) के राष्ट्रीय महासचिव, दीपंकर भट्टाचार्य  अपने ताजा वामपंथी गठबंधन के उन नेताओं में एक हैं , जो इस दो ध्रुवीय चुनाव की कुछ अलग तस्वीर बनाने में जी -जान से जुटे हुए हैं. उनके साथ स्त्रीकाल के लिए युवा पत्रकार इति शरण और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने  दूसरे फेज के चुनाव के पूर्व एक पूरा दिन उनके चुनाव -प्रचार को देखते हुए बिताया. इस दौरान दीपंकर से इति और संजीव ने बिहार चुनाव, राजनीति में महिला और जाति-प्रतिनधित्व, जाति और वर्ग के सवाल, मीडिया  की  चयनात्मक  भूमिका , वामराजनीति  आदि  विषयों पर बात की . पाठकों के लिए बातचीत का एक अंश.
                                                                                                                    संपादक
कामरेड अभी आप क्या देख पा रहे है बिहार चुनाव में.  हमें  लग रहा है कि बिहार का यह  चुनाव मुद्दाविहीन है ? 
मुद्दाविहीन बनाने की कोशिश है , मुद्दाविहीन तो बिल्कुल नहीं है,  अगर आप गाँव की बात करें,  निश्चित तौर पर उनके पास मुद्दे और सवाल हैं , लेकिन अगर आप दिल्ली और पटना की राजनीतिक परिदृश्य को देखे तो उनके पास सिर्फ एक “कुर्सी”का मुद्दा है.निश्चित तौर यह कुर्सी बचाने की लड़ाई है,मोदी जी के पास कुर्सी पर कब्जा करने का मुद्दा है और उनलोंगो को इससे ज्यादा कोई मुद्दा भी नहीं चाहिये.अगर लोंगो को इन दोनों से निराशा भी यहीं है की इन दोनों गठबंधनों के पास कोई मुद्दा है ही नहीं और इससे ज्यादा उनलोगों को
कोई मुद्दा भी नहीं चाहिए.

 जनता के राजनीतिक प्रशिक्षण का काम आपकी पार्टी करती है लगातार . सही मायने में  अगर बिहार में कोई विपक्ष है , तो वह आपकी पार्टी ही है. इसके बावजूद  आपकी पार्टी के प्रति समर्थन वोट में नहीं बदल पाता पाता है ?
देखिये,  वोट में बदलता है . अलग-अलग परिस्थितियों में जो कोर वोट है, वह हमें मिलता है या थोडा सिकुड़ता है.,इसबार लोगों का उत्साह है वोट हमें मिलेगा और बढेगा.
लेकिन लोकसभा चुनाव में जो वोट प्रतिशत रहा ….
 अगर आप पुराने चुनाव से इस चुनाव की तुलना करते हैं,  तो नीतीश जी के लिए 2010 और मोदी जी की लिए 2014 जैसी स्थितियां नहीं हैं और  लालू जी के लिए तो कतई ये 1995  वाला चुनाव नहीं है. अभी जो सवाल खड़े हो रहे हैं, वे  बहुत ही वाजिब सवाल उठ रहे है वैसे तो यह बिहार का ही चुनाव है.  लेकिन मोदीजी ने अभी इसे देश का भी चुनाव बना दिया है.इस तरह से कोई प्रधानमंत्री आकर मोर्चा संभाल ले और 40-40  रैलियाँ करने लग जाये तो यह  एक राज्य से ज्यादा देश का संदर्भ ले लेता है. वैसे भी बिहार चुनाव का अपना ही राष्ट्रीय संदर्भ हो जाता है. जब मोदीजी का सीधा इन्वाल्वमेंट है  तो यह चुनाव केंद्र सरकार के १८ महीने के कार्यकाल की भी समीक्षा करेगा. .वैसे तो 10 साल और 25 साल का एक चक्र पूरा हुआ है, उसके अन्दर से जो सवाल खड़े हुए हैं-अगर सामाजिक न्याय की बात करें तो  सामाजिक न्याय के अन्दर से  सवाल खड़े हुए हैं, विकास की  बात करें तो  विकास के अंतर्विरोध ,  विसंगति सामने आये हैं. ये सारी बातें  इस चुनाव में सामने हैं,  जिनका क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संदर्भ में मायने बनाते हैं.

एक विश्लेषण के अनुसार सिर्फ बिहार ही नहीं 243 बिहार में चुनाव है , यानी हर सीट अपने कैलकुलेशन के हिसाब से काम कर रहा है … 


यह बात  भी है, लेकिन यह फार्मूलेशन ही अंतिम नहीं है. यह  बिहार का चुनाव है, इसलिए हम कह रहे हैं कि इसका संदर्भ देख लीजिये.इसका राष्ट्रीय सन्दर्भ  होगा. दूसरी ओर राज्य स्तर पर  ध्रुवीकरण  भी है. जहाँ तक सरकार बनाने की बात है तो , सही मायने में दो गठबंधन  के बीच ही लड़ाई है. वामपंथी गठबन्ध जरूर हुआ है,  लेकिन अभी तक एक विकल्प के रूप में नहीं  खड़ा हो पा रहा है . यह भी सच है,  एक  हद तक,  कि हरएक सीट की अपनी कहानी है.  अभी जो सी एस डी एस ने सर्वे जारी  किया हैं,  उसने भी इस बात को रेखांकित किया  है हालांकि यह सर्वे  कैंडिडेट तय होने से पहले का है.कैंडिडेट तय होने के बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल ,टिकट को लेकर   बगावत , खरीद फरोख्त,  फिर बहुत सारे निर्दलीय उम्मीदवार का होना ,  निश्चित तौर पर कोई सीटों पर स्थानीय परिदृश्य बदल देगा.

लेकिन आपको नहीं लगता है कि …. 
हाँ , मैं यह भी नहीं मानता कि बिहार का चुनाव 243 सीटों के समीकरणों का सम टोटल है. 243 अलग-अलग चुनाव  जरूर हैं,  लेकिन सेण्टर में बिहार का चुनाव है, देश का  मामला है.  मैं मानता हूँ कि बीजेपी के सन्दर्भ में  सिर्फ 18 महीने का मामला नहीं है,  पिछले 2005 से लेकर जून 2013 तक जो ८ साल तक वे वर्तमान सरकार के  साथ रहे , वह भी एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर में आयेगा.  बीजेपी के लिए सत्ता विरोधी प्रसंग भी करीब-करीब 10 साल का  बनता है. चाहे स्टेट हो  या सेण्टर दोनों को जोड़ करके इनके लिए एंटी इनकम्बेंसी  बनता है.

लेकिन आप तो ये मानते हैं  न कि जो वाम का गढ़बंधन अभी बना,  अगर ये थोडा पहले बनता तो ज्यादा असरकारी होता.  
देखिये , यह  ठीक है.  लेकिन मेरा अपना मानना है हर चीज के बनने अपनी एक प्रक्रिया है.  एक लेवल पर वामपंथ का  साझा आन्दोलन पहले से चल रहा है. गठबंधन की बात तय होने में जो समय लगा, चुनाव तक  सब साथ आ गये . बात पहले भी थी लेकिन लोकसभा चुनाव में हमलोग साथ नहीं रह पाए थे,  सीपीआई  का अलग रास्ता था.    

  

  अभी भी सीपीआई  के  कई उम्मीदवार  गठबंधन से अलग भी चुनाव लड़ रहे हैं . 
 यह अलग बात है, यह पोलिटिकल मामला नहीं है, लोकल स्तर  पर कुछ लोग कई जगहों पर एकदम चुनाव लड़ने पर आमदा है, यह एक अपवाद है,  इस तरह के अपवाद सब जगह मौजूद हैं.

गठबंधन  के लिए यह  ठीक नहीं है …. 
लेकिन अब क्या कर सकते हैं ,  मान लें कि  243 में से 10-15 सीट ऐसा है.

एक बात हम नोटिस कर रहे हैं कि टीवी पर चलने वाले राजनीतिक चौपालों में आपको कहीं नहीं बुलाया गया, जबकि  आप मेजर विपक्ष हैं.
मीडिया उस हिसाब से चलता है क्या?हमलोग मेजर विपक्ष हैं सड़क के और सदन में इस समय हमारे  कोई प्रतीनिधि ही नहीं है .  सत्ता की राजनीति जो है , उसमें  हमलोग फिट ही नहीं बैठते,  तो जाहिर सी बात है कि मिडिया वाले चुनाव से पहले …..

औवीसी को मीडिया वाले चौपाल में बुलाते है तो फिर आपको क्यों नही ?
मीडिया का अपना इंटरेस्ट है,  एक पोलिटिकल इंटरेस्ट भी है ,हमलोग ये सारी बातें  जानते हैं  आम समय में मीडिया में जो जगह हमलोगों को मिलाती है , वह  चुनाव के समय पर  गायब हो जाती है. चुनाव परिणाम के बाद फिर हम वापस आ जाते हैं.

मीडिया कोई काल्पनिक इकाई  तो है नहीं,  वहां जो पार्टिसिपेंट हैं,  कम से कम हिंदी मीडिया में , थोड़ा अंग्रेज़ी मीडिया में  भी , उनका एक सरोकार है . तो इस लिहाज से  सामान्य दिनों आपके साथ-साथ तालमेल भी दिखता है .  मुझे लगता है पुण्य प्रसून वाजपयी या रवीश जैसे एंकर को अपने राजनीतिक चौपालों में माले को याद करना चाहिए.
मीडिया को तय करना है उनका टर्म ऑफ़ डिस्कोर्स क्या है

आपका आकलन क्या है लेफ्ट के लिए,  कितने सीटें आयेंगी  ? 
हम तो मानाते हैं कि लेफ्ट की वापसी का समय है,  लेफ्ट का एक रिसर्जेन्स बिहार में दिखेगा.  सीटों का आकलन लगाना थोडा मुश्किल है,  लेकिन ठीक-ठाक  संख्या आ जायेगी.

आकंड़ो के लिहाज से बताना मुश्किल है.. 
कोई तो बोल रहा है कि दोनों गठबंधन 243 सीट बाँट लेंगें.  कई और देखने सुनने वाले बता रहे हैं  कि 15-20 सीट दूसरे लोग ले पायेंगे.  हमलोगों को उम्मीद है. बड़ा कठिन समय है.  5-5 चरणों में मतदान  हो रहा है, बीच में त्यौहार  भी है-दशहरा, मुहर्रम. अभी जो बकरीद के समय पर हुआ , कोशिश किया जा रहा है यू पी  और झारखण्ड में,  उसका भी असर होगा.  इसलिए अभी  कहना थोड़ा मुश्किल है. अभी बहुत कुछ होना शेष है,  फिर भी हम समझते है लेफ्ट का प्रदर्शन काफी अच्छा रहेगा.

खैर कामरेड,  महिलाओं के प्रतिनिधित्व के हिसाब से  भी इस बार आपलोग चूक गये… 
हाँ यह  जरुर कह सकते हैं. उम्मीदवारों का जो लिस्ट है,  उसमें हमारा सबसे कमजोर पक्ष है  महिला उम्मीदवार की  संख्या.  कुछ संख्या बढ़ी है , लेकिन हम यह मानते हैं कि उम्मीदवार का जो लिस्ट है,  उसमें सबसे कमजोर बिंदु यहीं है.

हमें लगता है कि यदि इरादतन भी आपलोगों ने किया होता तो कुछ बेहतर स्थिति होती. कई सीटों को हम जानते हैं , जहां पति और पत्नी , दोनो आपके मजबूत कार्यकर्ता है. पंचायत में पत्नी चुनी भी गई हैं. हमें  लगता है वहां से पुरुष उम्मीदवार की जगह,  यानी जो टिकट आपने पति को दिया है पत्नी को दिया जा सकता था. 
देखिये चुनाव में यह जरुर है कि जहाँ –जहाँ बहुत नेचुरल तरीके से महिला साथियों का नाम आया,  हमलोगों ने प्रयास किया.  अब जहाँ महिला नेत्री हैं उनकी चुनाव प्रचार में,  चुनाव संचालन में  महत्वपूर्ण भूमिका है.  अगर हम उन्हें चुनावी उम्मीदवार बनाते तो उनकी भूमिका सिर्फ उस सीट तक सिमट जाती .महिलाओं की भूमिका को सिर्फ उम्मीदवार के रूप में परिभाषित करना  हम समझते है कि ठीक नहीं है.  निश्चित तौर पर वह एक प्रमुख पहलू है और इसमें हमारी संख्या बहुत कम है.

क्या स्वीकार करते हैं कि चूक हुई है ? 
चूक नहीं कहेंगे.  हम समझते हैं लेकिन हर पहलू को हमेशा संतुलित करना संभव भी नहीं हो पाता है. कुल मिलाकर महिलाओं की चुनाव में भागीदारी ,सक्रियता को समग्रता में आप उसे देखेंगे तो फर्क दिखेगा. जैसे महिलाओं के मुद्दे . वे  बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं.   हमारे पूरे  चुनाव अभियान में कार्यकर्ता से लेकर नेतृत्व स्तर तक महिलाओं की भागीदारी बढी है पहले से , लेकिन उम्मीदवार लिस्ट में हमारा यह कमजोर पहलू है.

जाति प्रतिनिधित्व  को कैसे देखते हैं ? 
जाति को लेकर  हमलोग बहुत सोचते नहीं हैं,  लेकिन बहुत नैचुरल तरीके से , हमारी पार्टी की जो स्थिति है,  बिहारी समाज की जो संरचना है यह प्रतिनिधित्व बन जाता है.   हमने पार्टी के जो जगह-जगह आन्दोलन के चेहरे और नेता हैं उसी हिसाब से हमने टिकट दिया है. हमारी पार्टी  गरीबों की पार्टी है तो स्वाभाविक है कि उस हिसाब से जाति का भी अनुपात होगा,  तो हमने अलग से उस पर सोचा भी नहीं.

 इस देश में प्रतिनिधित्व की लड़ाई है तो पार्टी के स्तर  पर इसको एक एजेंडे के फॉर्म में…
नहीं देखिये,  पार्टी के लेवल पर  सामजिक उत्पीडन हमारे लिए जरुर बड़ा मुद्दा है.  सामाजिक उत्पीडन और जाति व्यवस्था का खात्मा हो देश में ,  इस लड़ाई को हमने  बढ़ाये जरुर हैं.  राजनीतिक चुनाव में सामजिक उत्पीडन और जाति उन्मूलन की जो बात कर रहे है वे सामाजिक न्याय के संदर्भ में  नहीं करते कर रहे. उनका सन्दर्भ सिर्फ चुनावी  है. बिहार में हमारी खासियत यह रही है कि हम जब भी जहाँ जीते हैं वहां सामाजिक न्याय की लड़ाई एक महत्वपूर्ण कारक रही है.  जैसे रामेश्वर जी १९८९ में जब आरा से जीते थे तो  यह अकल्पनीय बात थी कि नोनिया जाति का नेता (अगर हम जाति के संदर्भ में देखें तो ) भूमिहीन गरीब, चुनाव जीत जाये.  यह हमलोगों का इतिहास ही रहा है.  इस पृष्ठभूमि का नेता आरा जैसे सीट से जीत जाय ऐसा अकल्पनीय था तब.  हमलोगों का इतिहास ऐसा ही रहा है .ऐसे  उम्मीदवार को वरीयता देना .इसलिए जो स्थापित जाति की परिभाषा है,  जो समझ है,  जो समीकरणों को लेकर हिसाब -किताब है  उस आधार पर तो हम चलते भी नहीं है.

उस समीकरण के लिहाज से हम सवाल कर भी नहीं रहे हैं. यह सवाल प्रतिनिधित्व का है. आप  संघर्ष के कारण  आरा में तब चुनाव जीते थे और उस संघर्ष में जो हरावल दस्ता था वह जीतकर आ गया.  लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो एक बड़ा मुद्दा है. जैसे कि महिलाओं के लिए  आप मानते है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.  उससे उनके व्यासेज भी बनते है,  तो वैसे  ही जाति का प्रश्न है .. अगर आप हमारा लिस्ट देखेंगे तो महिलाओं की संख्या कम है , बाकी हमें नहीं लगता की और लिहाज से कम प्रतिनिधित्व  है किसी तबके का.

नीतिगत स्तर पर  आप आइडेंटिटी डिस्कोर्स को .. 
आइडेंटिटी डिस्कोर्स का भी अपना आधार है.  उसे हम कोई इमेजिनरी सवाल  नहीं मानते

वाम लोकेशन से एक हद तक आप लिबरल  भी हैं आंबेडकर को लेकर और कई चीजें आ भी रही है आपके यहाँ से..  
देखिये लिबरल का मामला का नहीं है.  हमलोगों का शुरू से ही आम्बेडकर के बारे में  मानना है कि देश की आजादी में और भारत के जो ठोस सामाजिक अंतविरोध हैं उसको संबोधित करने के मामले में , तथा विचारों के स्तर पर सबसे रैडिकल नेता वही हैं .भगत सिंह एक अलग जगह पर हैं.  लेकिन हम कह रहे हैं कि  उसके बाद जितने भी हमारे नेता रहे हैं – गांधी,नेहरू,आंबेडकर, उनमें हम समझते हैं की सबसे दूर तक जाने वला व्यक्ति ,दूर तक जानेवाला विचार अम्बेडकर का ही है. यह कोई लिबरल समझ नहीं है आंबेडकर को लेकर हम समझते हैं कि मार्क्सिस्ट लोग हमेशा अपने इतिहास का, अपने समाज का  सोशल एनालिसिस भी करते हैं आइडिया  के  स्तर पर. जो लोग क्लास को इकोनोमिक कैटगरी समझते है, वे गलत हैं.  हम समझते हैं कि क्लास कोई इकनोमिक कैटगरी है नहीं . अगर आप  कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो देखें तो देखिएगा कि समाज जो है वह शुरू से  दो वर्गों में बंटा है.  इसका मतलब है कि हम जिस  रूप में class को समझते है जो उसमें इकोनॉमिक एक्सप्लॉइटेशन है,  सोशल ओप्रेसन है . जेंडर का सवाल है वह  भी class के अन्दर आता हैं और अगर कहीं race है तो वो भी class के अन्दर आता है .

 हिन्दुस्तान में जाति के हिसाब से  mode of production पर अधिकार  तय होता रहा है , डिस्ट्रीब्यूशन भी जाति आधारित है.  .
हम कह रहे है कि पूरे देश में जाति को देखने का अलग-अलग नजरिया है.  जाति कोई fixed कैटगरी नहीं है.  अगर उसको हम मानते है की कोई livingचीज है,  तो इसका मतलब उसके अन्दर गतिशीलता है ,बदलाव है.  पहले जो caste और classको लगभग एक तरह से देखते थे,  हम मानते है कि इतना सीधा समीकरण नहीं चलेगा . सामाजिक उत्पीड़न बहुत बड़ा सवाल है देश में और उस हिसाब से जो दलित ,पिछड़ी जातियों की जो लड़ाई है,  उसका हम समर्थन करते हैं, उसके प्रति हमदर्दी है सहानभूति है.  लेकिन आप वैचारिक फ्रेम में देखे तो आप पायेंगे की तमाम जातियों के अन्दर से अलग-अलग विचार, एक तरह से अलग-अलग आइडेंटिटी  इमर्ज कर रही है. जीतनराम मांझी आर एस एस के साथ उसके गोद में बैठ जाते हैं,  उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! .रामविलास जी जैसी  राजनीति करते हैं उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! मायावतीजी खुद कई बार भाजपा के साथ चली जाती हैं .  खुद अपनी पार्टी के अन्दर जहाँ से मायावती जी चली थीं वहां से आगे उन्होंने भाईचारा का विचार जो उन्होंने दिया उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे !  आइडेंटिटी डिस्कोर्स को ये जो पूरा डायनेमिक्स उसकी व्याख्या नहीं कर सकते हैं. आइडेंटिटी डिस्कोर्स अपनी जगह पर है , उसकी प्रासंगिता भी है,  हमारे समाज की जो बुनावट,  जैसा हमारे देश का जो इतिहास रहा है, उसके हिसाब से.
यह  सवाल कई बार आपसे पूछा गया होगा. इसके बावजूद भी हम दोहराना चाहते हैं कि प्राय बिहार के संदर्भ में वामपंथी पार्टियों ने ही दलित-पिछड़ों की लड़ाई खडी की है,  दलितों की तो सबसे ज्यादा, लेकिन 1990 के बाद उसकी जो फसल खड़ी थी,  उसको उनलोगों ने काट लिया , जो  सीधे-सीधे जाति को संबोधित कर रहे थे ?
मैं नहीं समझता कि हमारे जो आन्दोलन केकोर बेस हैं  उसमें ज्यादा बदलाव हुआ है.  अगर आप 80-90 के दशक में हुए चुनावों को देखेंगे तो  मध्यम तबका का अच्छा-खासा हिस्सा हमारे साथ आया.लेकिन विशेषतः  90 के बाद जब लालूजी का उभार हुआ तो हमने यह भी देखा कि हमारे चार-चार विधायक उनके साथ चले गए,  वोट का एक बड़ा हिस्सा चला गया और फिर लोग जैसे-जैसे लालूजी को समझ पाए,  उनकी राजनीति को समझ पाए , उसके वर्ग –चरित्र को समझे तो लोग वापस  भी आये .नये-नये लोग भी हमारे साथ जुड़े.इसी तरह नीतीश  जी भी जब एक नया डिस्कोर्स लेकर आये,  महादलित और अत्यंत पिछडी जाति का डिस्कोर्स. हम समझते हैं कि हमने उस समय जो सवाल उठाये सामाजिक न्याय के संदर्भ में  वह था न्याय और उसके साथ सामाजिक परिवर्तन. समाज की बुनियाद को बदलना होगा,  अर्थव्यवस्था के पूरे चरित्र को बदलना होगा . लोकतंत्र के जो सवाल हैं उसे समाज से लेकर घर-घर तक पहुंचा देना होगा. एक बड़े  परिप्रेक्ष्य  में हमने सामाजिक परिवर्तन और न्याय को रखा है.  हमारा सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन जाति के संदर्भ में नहीं है, पूरे परिवर्तन के सन्दर्भ में है. लोगों को  तात्कालिकता से आगे सोचना होगा . दूरगामी देखना है और दूरगामी बात करनी  है.  पूंजीवादी देशों में लोगों को लगता है कि पूंजीवाद शाश्वत है, स्वाभाविक है, वही  चलेगा . ऐसे में  हर एक कम्युनिष्ट को बदलाव और एक भविष्य की दृष्टि  रखना पड़ता है.  कयुनिस्ट मैनिफेस्टो में कहा गया है, ‘  representing the interest and movement of tomorrow in today. आज की लड़ाई में हम कल की लड़ाई और कल के  सवालों का प्रतिनिधित्व करते हैं. तो यह हमेशा रहेगा- एक तात्कालिकता का दबाव हमेशा रहेगा, तमाम तरह के सुधारों का दबाव रहेगा और हम समझते हैं कि  इसी तरह से आन्दोलन का विकास होता है.

हमारी पार्टी गरीबों की पार्टी है : दीपंकर भट्टाचार्य

बिहार चुनाव का तीसरा फेज 28 को है. छोटे -बड़े दलों के नेता हवाई मार्ग ( हेलीकॉप्टरों) से राज्य के खेत -खलिहानों में उतर रहे हैं-उबड़ -खाबड़ सड़कों की हकीकत से दूर. वही  खेत -खलिहानों में हमेशा संघर्षरत एक पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव उबड़ -खाबड़ सड़कों , पगडंडियों पर हिचकोले खाते  एक दिन में 5 से 6 सभायें कर रहे हैं.  भाकपा ( माले ) के राष्ट्रीय महासचिव, दीपंकर भट्टाचार्य  अपने ताजा वामपंथी गठबंधन के उन नेताओं में एक हैं , जो इस दो ध्रुवीय चुनाव की कुछ अलग तस्वीर बनाने में जी -जान से जुटे हुए हैं. उनके साथ स्त्रीकाल के लिए युवा पत्रकार इति शरण और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने  दूसरे फेज के चुनाव के पूर्व एक पूरा दिन उनके चुनाव -प्रचार को देखते हुए बिताया. इस दौरान दीपंकर से इति और संजीव ने बिहार चुनाव, राजनीति में महिला और जाति-प्रतिनधित्व, जाति और वर्ग के सवाल, मीडिया  की  चयनात्मक  भूमिका , वामराजनीति  आदि  विषयों पर बात की . पाठकों के लिए बातचीत का एक अंश.
                                                                                                                    संपादक
कामरेड अभी आप क्या देख पा रहे है बिहार चुनाव में.   हमें  लग रहा है कि बिहार का यह  चुनाव मुद्दाविहीन है ? 
मुद्दाविहीन बनाने की कोशिश है , मुद्दाविहीन तो बिल्कुल नहीं है,  अगर आप गाँव की बात करें,  निश्चित तौर पर उनके पास मुद्दे और सवाल हैं , लेकिन अगर आप दिल्ली और पटना की राजनीतिक परिदृश्य को देखे तो उनके पास सिर्फ एक “कुर्सी”का मुद्दा है.निश्चित तौर यह कुर्सी बचाने की लड़ाई है,मोदी जी के पास कुर्सी पर कब्जा करने का मुद्दा है और उनलोंगो को इससे ज्यादा कोई मुद्दा भी नहीं चाहिये.अगर लोंगो को इन दोनों से निराशा भी यहीं है की इन दोनों गठबंधनों के पास कोई मुद्दा है ही नहीं और इससे ज्यादा उनलोगों को
कोई मुद्दा भी नहीं चाहिए.

 जनता के राजनीतिक प्रशिक्षण का काम आपकी पार्टी करती है लगातार . सही मायने में  अगर बिहार में कोई विपक्ष है , तो वह आपकी पार्टी ही है. इसके बावजूद  आपकी पार्टी के प्रति समर्थन वोट में नहीं बदल पाता पाता है ?
देखिये,  वोट में बदलता है . अलग-अलग परिस्थितियों में जो कोर वोट है, वह हमें मिलता है या थोडा सिकुड़ता है.,इसबार लोगों का उत्साह है वोट हमें मिलेगा और बढेगा.
लेकिन लोकसभा चुनाव में जो वोट प्रतिशत रहा ….
अगर आप पुराने चुनाव से इस चुनाव की तुलना करते हैं,  तो नीतीश जी के लिए 2010 और मोदी जी की लिए 2014 जैसी स्थितियां नहीं हैं और  लालू जी के लिए तो कतई ये 1995  वाला चुनाव नहीं है. अभी जो सवाल खड़े हो रहे हैं, वे  बहुत ही वाजिब सवाल उठ रहे है वैसे तो यह बिहार का ही चुनाव है.  लेकिन मोदीजी ने अभी इसे देश का भी चुनाव बना दिया है.इस तरह से कोई प्रधानमंत्री आकर मोर्चा संभाल ले और 40-40  रैलियाँ करने लग जाये तो यह  एक राज्य से ज्यादा देश का संदर्भ ले लेता है. वैसे भी बिहार चुनाव का अपना ही राष्ट्रीय संदर्भ हो जाता है. जब मोदीजी का सीधा इन्वाल्वमेंट है  तो यह चुनाव केंद्र सरकार के १८ महीने के कार्यकाल की भी समीक्षा करेगा. .वैसे तो 10 साल और 25 साल का एक चक्र पूरा हुआ है, उसके अन्दर से जो सवाल खड़े हुए हैं-अगर सामाजिक न्याय की बात करें तो  सामाजिक न्याय के अन्दर से  सवाल खड़े हुए हैं, विकास की  बात करें तो  विकास के अंतर्विरोध ,  विसंगति सामने आये हैं. ये सारी बातें  इस चुनाव में सामने हैं,  जिनका क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संदर्भ में मायने बनाते हैं.

एक विश्लेषण के अनुसार सिर्फ बिहार ही नहीं 243 बिहार में चुनाव है , यानी हर सीट अपने कैलकुलेशन के हिसाब से काम कर रहा है … 


यह बात  भी है, लेकिन यह फार्मूलेशन ही अंतिम नहीं है. यह  बिहार का चुनाव है, इसलिए हम कह रहे हैं कि इसका संदर्भ देख लीजिये.इसका राष्ट्रीय सन्दर्भ  होगा. दूसरी ओर राज्य स्तर पर  ध्रुवीकरण  भी है. जहाँ तक सरकार बनाने की बात है तो , सही मायने में दो गठबंधन  के बीच ही लड़ाई है. वामपंथी गठबन्ध जरूर हुआ है,  लेकिन अभी तक एक विकल्प के रूप में नहीं  खड़ा हो पा रहा है . यह भी सच है,  एक  हद तक,  कि हरएक सीट की अपनी कहानी है.  अभी जो सी एस डी एस ने सर्वे जारी  किया हैं,  उसने भी इस बात को रेखांकित किया  है हालांकि यह सर्वे  कैंडिडेट तय होने से पहले का है.कैंडिडेट तय होने के बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल ,टिकट को लेकर   बगावत , खरीद फरोख्त,  फिर बहुत सारे निर्दलीय उम्मीदवार का होना ,  निश्चित तौर पर कोई सीटों पर स्थानीय परिदृश्य बदल देगा.

 आपको नहीं लगता है कि …. 
हाँ , मैं यह भी नहीं मानता कि बिहार का चुनाव 243 सीटों के समीकरणों का सम टोटल है. 243 अलग-अलग चुनाव  जरूर हैं,  लेकिन सेण्टर में बिहार का चुनाव है, देश का  मामला है.  मैं मानता हूँ कि बीजेपी के सन्दर्भ में  सिर्फ 18 महीने का मामला नहीं है,  पिछले 2005 से लेकर जून 2013 तक जो ८ साल तक वे वर्तमान सरकार के  साथ रहे , वह भी एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर में आयेगा.  बीजेपी के लिए सत्ता विरोधी प्रसंग भी करीब-करीब 10 साल का  बनता है. चाहे स्टेट हो  या सेण्टर दोनों को जोड़ करके इनके लिए एंटी इनकम्बेंसी  बनता है.

लेकिन आप तो ये मानते हैं  न कि जो वाम का गढ़बंधन अभी बना,  अगर ये थोडा पहले बनता तो ज्यादा असरकारी होता.  
देखिये , यह  ठीक है.  लेकिन मेरा अपना मानना है हर चीज के बनने अपनी एक प्रक्रिया है.  एक लेवल पर वामपंथ का  साझा आन्दोलन पहले से चल रहा है. गठबंधन की बात तय होने में जो समय लगा, चुनाव तक  सब साथ आ गये . बात पहले भी थी लेकिन लोकसभा चुनाव में हमलोग साथ नहीं रह पाए थे,  सीपीआई  का अलग रास्ता था.

अभी भी सीपीआई  के  कई उम्मीदवार  गठबंधन से अलग भी चुनाव लड़ रहे हैं . 
यह अलग बात है, यह पोलिटिकल मामला नहीं है, लोकल स्तर  पर कुछ लोग कई जगहों पर एकदम चुनाव लड़ने पर आमदा है, यह एक अपवाद है,  इस तरह के अपवाद सब जगह मौजूद हैं.

 गठबंधन  के लिए यह  ठीक नहीं है …. 
लेकिन अब क्या कर सकते हैं ,  मान लें कि  243 में से 10-15 सीट ऐसा है.

एक बात हम नोटिस कर रहे हैं कि टीवी पर चलने वाले राजनीतिक चौपालों में आपको कहीं नहीं बुलाया गया, जबकि  आप मेजर विपक्ष हैं.
मीडिया उस हिसाब से चलता है क्या?हमलोग मेजर विपक्ष हैं सड़क के और सदन में इस समय हमारे  कोई प्रतीनिधि ही नहीं है .  सत्ता की राजनीति जो है , उसमें  हमलोग फिट ही नहीं बैठते,  तो जाहिर सी बात है कि मिडिया वाले चुनाव से पहले …..

औवीसी को मीडिया वाले चौपाल में बुलाते है तो फिर आपको क्यों नही ?
मीडिया का अपना इंटरेस्ट है,  एक पोलिटिकल इंटरेस्ट भी है ,हमलोग ये सारी बातें  जानते हैं  आम समय में मीडिया में जो जगह हमलोगों को मिलती है , वह  चुनाव के समय पर  गायब हो जाती है. चुनाव परिणाम के बाद फिर हम वापस आ जाते हैं.

मीडिया कोई काल्पनिक इकाई  तो है नहीं,  वहां जो पार्टिसिपेंट हैं,  कम से कम हिंदी मीडिया में , थोड़ा अंग्रेज़ी मीडिया में  भी , उनका एक सरोकार है . तो इस लिहाज से  सामान्य दिनों आपके साथ-साथ तालमेल भी दिखता है .  मुझे लगता है पुण्य प्रसून वाजपयी या रवीश जैसे एंकर को अपने राजनीतिक चौपालों में माले को याद करना चाहिए.
मीडिया को तय करना है उनका टर्म ऑफ़ डिस्कोर्स क्या है

आपका आकलन क्या है लेफ्ट के लिए,  कितने सीटें आयेंगी  ? 
हम तो मानाने हैं कि लेफ्ट की वापसी का समय है,  लेफ्ट का एक रिसर्जेन्स बिहार में दिखेगा.  सीटों का आकलन लगाना थोडा मुश्किल है,  लेकिन ठीक-ठाक  संख्या आ जायेगी.

आकंड़ो के लिहाज से बताना मुश्किल है.. 
कोई तो बोल रहा है कि दोनों गठबंधन 243 सीट बाँट लेंगें.  कई और देखने सुनने वाले बता रहे हैं  कि 15-20 सीट दूसरे लोग ले पायेंगे.  हमलोगों को उम्मीद है. बड़ा कठिन समय है.  5-5 चरणों में मतदान  हो रहा है, बीच में त्यौहार  भी है-दशहरा, मुहर्रम. अभी जो बकरीद के समय पर हुआ , कोशिश किया जा रहा है यू पी  और झारखण्ड में,  उसका भी असर होगा.  इसलिए अभी  कहना थोड़ा मुश्किल है. अभी बहुत कुछ होना शेष है,  फिर भी हम समझते है लेफ्ट का प्रदर्शन काफी अच्छा रहेगा.

खैर कामरेड,  महिलाओं के प्रतिनिधित्व के हिसाब से  भी इस बार आपलोग चूक गये… 
हाँ यह  जरुर कह सकते हैं. उम्मीदवारों का जो लिस्ट है,  उसमें हमारा सबसे कमजोर पक्ष है  महिला उम्मीदवार की  संख्या.  कुछ संख्या बढ़ी है , लेकिन हम यह मानते हैं कि उम्मीदवार का जो लिस्ट है,  उसमें सबसे कमजोर बिंदु यहीं है.

हमें लगता है कि यदि इरादतन भी आपलोगों ने किया होता तो कुछ बेहतर स्थिति होती. कई सीटों को हम जानते हैं , जहां पति और पत्नी , दोनो आपके मजबूत कार्यकर्ता है. पंचायत में पत्नी चुनी भी गई हैं. हमें  लगता है वहां से पुरुष उम्मीदवार की जगह,  यानी जो टिकट आपने पति को दिया है पत्नी को दिया जा सकता था. 
देखिये चुनाव में यह जरुर है कि जहाँ –जहाँ बहुत नेचुरल तरीके से महिला साथियों का नाम आया,  हमलोगों ने प्रयास किया.  अब जहाँ महिला नेत्री हैं उनकी चुनाव प्रचार में,  चुनाव संचालन में  महत्वपूर्ण भूमिका है.  अगर हम उन्हें चुनावी उम्मीदवार बनाते तो उनकी भूमिका सिर्फ उस सीट तक सिमट जाती .महिलाओं की भूमिका को सिर्फ उम्मीदवार के रूप में परिभाषित करना  हम समझते है कि ठीक नहीं है.  निश्चित तौर पर वह एक प्रमुख पहलू है और इसमें हमारी संख्या बहुत कम है.

क्या स्वीकार करते हैं कि चूक हुई है ? 
चूक नहीं कहेंगे.  हम समझते हैं लेकिन हर पहलू को हमेशा संतुलित करना संभव भी नहीं हो पाता है. कुल मिलाकर महिलाओं की चुनाव में भागीदारी ,सक्रियता को समग्रता में आप उसे देखेंगे तो फर्क दिखेगा. जैसे महिलाओं के मुद्दे . वे  बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं.   हमारे पूरे  चुनाव अभियान में कार्यकर्ता से लेकर नेतृत्व स्तर तक महिलाओं की भागीदारी बढी है पहले से , लेकिन उम्मीदवार लिस्ट में हमारा यह कमजोर पहलू है.

जाति प्रतिनिधित्व  को कैसे देखते हैं ? 
जाति को लेकर  हमलोग बहुत सोचते नहीं हैं,  लेकिन बहुत नैचुरल तरीके से , हमारी पार्टी की जो स्थिति है,  बिहारी समाज की जो संरचना है यह प्रतिनिधित्व बन जाता है.   हमने पार्टी के जो जगह-जगह आन्दोलन के चेहरे और नेता हैं उसी हिसाब से हमने टिकट दिया है. हमारी पार्टी  गरीबों की पार्टी है तो स्वाभाविक है कि उस हिसाब से जाति का भी अनुपात होगा,  तो हमने अलग से उस पर सोचा भी नहीं.

इस देश में प्रतिनिधित्व की लड़ाई है तो पार्टी के स्तर  पर इसको एक एजेंडे के फॉर्म में…
नहीं देखिये,  पार्टी के लेवल पर  सामजिक उत्पीडन हमारे लिए जरुर बड़ा मुद्दा है.  सामाजिक उत्पीडन और जाति व्यवस्था का खात्मा हो देश में ,  इस लड़ाई को हमने  बढ़ाये जरुर हैं.  राजनीतिक चुनाव में सामजिक उत्पीडन और जाति उन्मूलन की जो बात कर रहे है वे सामाजिक न्याय के संदर्भ में  नहीं करते कर रहे. उनका सन्दर्भ सिर्फ चुनावी  है. बिहार में हमारी खासियत यह रही है कि हम जब भी जहाँ जीते हैं वहां सामाजिक न्याय की लड़ाई एक महत्वपूर्ण कारक रही है.  जैसे रामेश्वर जी १९८९ में जब आरा से जीते थे तो  यह अकल्पनीय बात थी कि नोनिया जाति का नेता (अगर हम जाति के संदर्भ में देखें तो ) भूमिहीन गरीब, चुनाव जीत जाये.  यह हमलोगों का इतिहास ही रहा है.  इस पृष्ठभूमि का नेता आरा जैसे सीट से जीत जाय ऐसा अकल्पनीय था तब.  हमलोगों का इतिहास ऐसा ही रहा है .ऐसे  उम्मीदवार को वरीयता देना .इसलिए जो स्थापित जाति की परिभाषा है,  जो समझ है,  जो समीकरणों को लेकर हिसाब -किताब है  उस आधार पर तो हम चलते भी नहीं है.

उस समीकरण के लिहाज से हम सवाल कर भी नहीं रहे हैं. यह सवाल प्रतिनिधित्व का है. आप  संघर्ष के कारण  आरा में तब चुनाव जीते थे और उस संघर्ष में जो हरावल दस्ता था वह जीतकर आ गया.  लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो एक बड़ा मुद्दा है. जैसे कि महिलाओं के लिए  आप मानते है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.  उससे उनके व्यासेज भी बनते है,  तो वैसे  ही जाति का प्रश्न है .. अगर आप हमारा लिस्ट देखेंगे तो महिलाओं की संख्या कम है , बाकी हमें नहीं लगता की और लिहाज से कम प्रतिनिधित्व  है किसी तबके का.

नीतिगत स्तर पर  आप आइडेंटिटी डिस्कोर्स को .. 
आइडेंटिटी डिस्कोर्स का भी अपना आधार है.  उसे हम कोई इमेजिनरी सवाल  नहीं मानते

वाम लोकेशन से एक हद तक आप लिबरल  भी हैं आंबेडकर को लेकर और कई चीजें आ भी रही है आपके यहाँ से..  
देखिये लिबरल का मामला का नहीं है.  हमलोगों का शुरू से ही आम्बेडकर के बारे में  मानना है कि देश की आजादी में और भारत के जो ठोस सामाजिक अंतविरोध हैं उसको संबोधित करने के मामले में , तथा विचारों के स्तर पर सबसे रैडिकल नेता वही हैं .भगत सिंह एक अलग जगह पर हैं.  लेकिन हम कह रहे हैं कि  उसके बाद जितने भी हमारे नेता रहे हैं – गांधी,नेहरू,आंबेडकर, उनमें हम समझते हैं की सबसे दूर तक जाने वला व्यक्ति ,दूर तक जानेवाला विचार अम्बेडकर का ही है. यह कोई लिबरल समझ नहीं है आंबेडकर को लेकर हम समझते हैं कि मार्क्सिस्ट लोग हमेशा अपने इतिहास का, अपने समाज का  सोशल एनालिसिस भी करते हैं आइडिया  के  स्तर पर. जो लोग क्लास को इकोनोमिक कैटगरी समझते है, वे गलत हैं.  हम समझते हैं कि क्लास कोई इकनोमिक कैटगरी है नहीं . अगर आप  कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो देखें तो देखिएगा कि समाज जो है वह शुरू से  दो वर्गों में बंटा है.  इसका मतलब है कि हम जिस  रूप में class को समझते है जो उसमें इकोनॉमिक एक्सप्लॉइटेशन है,  सोशल ओप्रेसन है . जेंडर का सवाल है वह  भी class के अन्दर आता हैं और अगर कहीं race है तो वो भी class के अन्दर आता है .

हिन्दुस्तान में जाति के हिसाब से  mode of production पर अधिकार  तय होता रहा है , डिस्ट्रीब्यूशन भी जाति आधारित है.  .
हम कह रहे है कि पूरे देश में जाति को देखने का अलग-अलग नजरिया है.  जाति कोई fixed कैटगरी नहीं है.  अगर उसको हम मानते है की कोई livingचीज है,  तो इसका मतलब उसके अन्दर गतिशीलता है ,बदलाव है.  पहले जो caste और classको लगभग एक तरह से देखते थे,  हम मानते है कि इतना सीधा समीकरण नहीं चलेगा . सामाजिक उत्पीड़न बहुत बड़ा सवाल है देश में और उस हिसाब से जो दलित ,पिछड़ी जातियों की जो लड़ाई है,  उसका हम समर्थन करते हैं, उसके प्रति हमदर्दी है सहानभूति है.  लेकिन आप वैचारिक फ्रेम में देखे तो आप पायेंगे की तमाम जातियों के अन्दर से अलग-अलग विचार, एक तरह से अलग-अलग आइडेंटिटी  इमर्ज कर रही है. जीतनराम मांझी आर एस एस के साथ उसके गोद में बैठ जाते हैं,  उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! .रामविलास जी जैसी  राजनीति करते हैं उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! मायावतीजी खुद कई बार भाजपा के साथ चली जाती हैं .  खुद अपनी पार्टी के अन्दर जहाँ से मायावती जी चली थीं वहां से आगे उन्होंने भाईचारा का विचार जो उन्होंने दिया उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे !  आइडेंटिटी डिस्कोर्स को ये जो पूरा डायनेमिक्स उसकी व्याख्या नहीं कर सकते हैं. आइडेंटिटी डिस्कोर्स अपनी जगह पर है , उसकी प्रासंगिता भी है,  हमारे समाज की जो बुनावट,  जैसा हमारे देश का जो इतिहास रहा है, उसके हिसाब से.
यह  सवाल कई बार आपसे पूछा गया होगा. इसके बावजूद भी हम दोहराना चाहते हैं कि प्राय बिहार के संदर्भ में वामपंथी पार्टियों ने ही दलित-पिछड़ों की लड़ाई खडी की है,  दलितों की तो सबसे ज्यादा, लेकिन 1990 के बाद उसकी जो फसल खड़ी थी,  उसको उनलोगों ने काट लिया , जो  सीधे-सीधे जाति को संबोधित कर रहे थे ?
मैं नहीं समझता कि हमारे जो आन्दोलन केकोर बेस हैं  उसमें ज्यादा बदलाव हुआ है.  अगर आप 80-90 के दशक में हुए चुनावों को देखेंगे तो  मध्यम तबका का अच्छा-खासा हिस्सा हमारे साथ आया.लेकिन विशेषतः  90 के बाद जब लालूजी का उभार हुआ तो हमने यह भी देखा कि हमारे चार-चार विधायक उनके साथ चले गए,  वोट का एक बड़ा हिस्सा चला गया और फिर लोग जैसे-जैसे लालूजी को समझ पाए,  उनकी राजनीति को समझ पाए , उसके वर्ग –चरित्र को समझे तो लोग वापस  भी आये .नये-नये लोग भी हमारे साथ जुड़े.इसी तरह नीतीश  जी भी जब एक नया डिस्कोर्स लेकर आये,  महादलित और अत्यंत पिछडी जाति का डिस्कोर्स. हम समझते हैं कि हमने उस समय जो सवाल उठाये सामाजिक न्याय के संदर्भ में  वह था न्याय और उसके साथ सामाजिक परिवर्तन. समाज की बुनियाद को बदलना होगा,  अर्थव्यवस्था के पूरे चरित्र को बदलना होगा . लोकतंत्र के जो सवाल हैं उसे समाज से लेकर घर-घर तक पहुंचा देना होगा. एक बड़े  परिप्रेक्ष्य  में हमने सामाजिक परिवर्तन और न्याय को रखा है.  हमारा सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन जाति के संदर्भ में नहीं है, पूरे परिवर्तन के सन्दर्भ में है. लोगों को  तात्कालिकता से आगे सोचना होगा . दूरगामी देखना है और दूरगामी बात करनी  है.  पूंजीवादी देशों में लोगों को लगता है कि पूंजीवाद शाश्वत है, स्वाभाविक है, वही  चलेगा . ऐसे में  हर एक कम्युनिष्ट को बदलाव और एक भविष्य की दृष्टि  रखना पड़ता है.  कयुनिस्ट मैनिफेस्टो में कहा गया है, ‘  representing the interest and movement of tomorrow in today. आज की लड़ाई में हम कल की लड़ाई और कल के  सवालों का प्रतिनिधित्व करते हैं. तो यह हमेशा रहेगा- एक तात्कालिकता का दबाव हमेशा रहेगा, तमाम तरह के सुधारों का दबाव रहेगा और हम समझते हैं कि  इसी तरह से आन्दोलन का विकास होता है.

पितृसत्ता पुरुषों का अमानवीयकरण करती है : कमला भसीन

कमला भसीन दक्षिण एशियाई देशों में जेंडर ट्रेनिंग के लिए ख्यात हैं. स्त्री -पुरुष समानता की अलख जगाती कमला भसीन के साथ स्त्रीकाल के लिए संजीव चंदन ने बातचीत की है . इत्मीनान से पढ़ें यह बातचीत , यकीनन आपके भीतर का ‘मर्द’ कुछ तो पिघलेगा . 


इन दिनों क्या कर रहीं हैं?
इन दिनों मैं ‘जागोरी’ में स्थित ‘संगत’ नाम की संस्था को  पिछले बारह साल से को-आर्डिनेट कर रहीहूँ. साउथ एशिया में जो स्त्री और  पुरुष स्त्रीवादी सोच के साथ काम  कर रहे हैं, उनके साथ कम करती  हूँ.उसमें दो तरह के काम हैं. एक है- क्षमता वर्धक (कपैसिटी बिल्डिंग). जो नई-नई सोच आती है, उसको उन तक पहुँचाना और दूसरा है-ट्रेनिंग. ट्रेनिंग बहुत सुन्दर माध्यम है एक संजाल बनाने का. अब जैसे अगले सप्ताह नेपाल में एक ट्रेनिंग है. ये सारे  काम हम दूसरी संस्थाओं के साथ मिलकर करते हैं. नेपाली में इसे होस्ट करने वाली नेपाली संस्था है. हम केवल सबको इक्कठा करते हैं. करीब 37-38  महिलाएं 9  देशों से आ रही हैं, जो स्त्रीवादी काम कर रही हैं- पुरुषों के साथ, गरीबों के साथ, माईनारटीज के साथ. एक महीना वे एक-दूसरे के साथ रहती हैं. इसी तरह हम हिंदी में ट्रेनिंग करते हैं, बंगला में करते हैं.

आपका कोई अकादमिक बैकग्राउंड रहा है? स्त्रीवाद के लिए ट्रेनर की शुरुआत आपने कैसे की ?
एम.ए. की डिग्री तो है पर कोई अकादमिक काम नहीं किया है.

 स्त्रीवाद के लिए कैसे कम करना शुरू किया ?
सबसे पहले मैंने गरीबों के साथ, दलितों के साथ 1972 में कम करना शुरू किया. जर्मनी में नौकरी करती थी, वहां से रिजाइन देकर हिंदुस्तान वापस आ गई.

जर्मनी में आप कहाँ थीं ?
जर्मनी में पहले तो मैंने म्युन्स्टर में पढाई की.पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने वहां २ साल ‘सोशियोलॉजी ऑफ़ डेवलपमेंट’ पढ़ा. उसके बाद मैंने जर्मन एक्सपर्ट, जो यहाँ आकार हमें पढाया करते थे, उनकी ट्रेनिंग की.परमानेंट सरकारी नौकरी से ग्यारह महीने बाद रिजाइन करके मैं हिंदुस्तान आ गई और मैंने ‘सेवा मंदिर’ उदयपुर में कम करना शुरू किया.चार साल मैंने वहां काम  किया. मैं में पढ़ी हूँ. मेरी पूरी पढाई, दसवीं तक राजस्थान के गांवों-कस्बों में हुई है.
 फैमिली बैकग्राउंड क्या था ?
पिताजी सरकारी डाक्टर थे. हम लोग पंजाबी हैं. मेरा जन्म वेस्ट पंजाब में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है. 1946 में मैं पैदा हुई-तब मेरी माँ वहां एक शादी में गई थीं.

तब आप माइग्रेट हुई थीं? 
नहीं, हम लोग माइग्रेट करके नहीं आये.उसके पहले ही पिताजी की नौकरी राजस्थान में थी-कोई 1939-40 में.गांवों में मैंने दसवीं सरकारी स्कूलों से की. राजस्थान यूनिवर्सिटी मैंने एम.ए. किया. चूंकि मैं राजस्थान में पढ़ी-बढ़ी इसलिए सोचा कुछ करूँ. गाँधी के समय में पैदाइश हुई थी,  तो ये नहीं था कि मैं सिर्फ पैसा कमाऊं. इसलिए जर्मनी की नौकरी छोड़कर आ गई और ‘सेवा मंदिर’ में काम शुरू किया. ये मोहन सिन्हा मेहता का संगठन था. उन पर सबका प्रभाव था. वो अम्बेसडर रह चुके थे और राजस्थान युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे. उनके बेटे जगत मेहता, विदेश मंत्रालय में सेक्रेटरी थे. उन्होंने ‘सेवा मंदिर’, ‘विद्या भवन’ आदि संस्थाएं राजस्थान में शुरू कीं. चार साल मैंने वहां काम किया इसके बाद मुझे यू.एन. ने कहा कि मैं एन.जी.ओ की ट्रेनिंग का काम शुरू करूँ. तो 27 साल तक मैंने यू.एन. के कहने पर एशिया और दक्षिण एशिया के स्तर पर ट्रेनिंग शुरू की. वह सिर्फ जेंडर की ट्रेनिंग नहीं थी, क्योंकि मैं जेंडर को अलग नहीं मानती. जेंडर कास्ट के साथ जुड़ा है, जेंडर क्लास के साथ जुड़ा है, डेमोक्रेसी के साथ जुड़ा है. तो  इन सब चीजों की ट्रेनिंग. क्योंकि डेमोक्रेसी नहीं होगी तो फिर वीमेन राइट की तो बात ही नहीं हो सकती. हम जानते हैं किदलित औरत के साथ जो होता है,  वह सिर्फ जेंडर नहीं होता, वहां कास्ट भी होती है.

लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि शुरुआती दौर में स्त्रीवादी आन्दोलनों में जाति क्वेशचन नहीं बन पायी थी?
पता नहीं आप किसकी बात कर रहे हैं?  आप दिल्ली के आंदोलन को ही स्त्रीवादी आन्दोलन मानते हैं, जो कि मैं नहीं मानती. मैं समझती हूँ कि महाराष्ट्र में सालों पहले सावित्रीबाई फुले ने काम किया.तमिलनाडु में जो बातचीत हुई, वहां कास्ट थी. हम लोगों ने भी, जैसे मैंने भी गरीबों के साथ कम शुरू किया तो कास्ट और क्लास दोनों सवाल थे .

 उधर थोड़ा  बाद में आयेंगे. अभी आपकी किताब आई है ‘मर्द मर्दानगी और मर्दवाद’ ये अंग्रेजी में भी है. 
कमला भसीन- हाँ, पांच-छः साल पहले ये किताब आई. ये 15-20 अन्य भाषाओँ में भी है. मेरी सभी किताबें 15-20 भाषाओँ में हैं.

यह विषय क्यों चुना आपने- ‘मर्द-मर्दानगी-मर्दवाद ?’
पता नहीं क्यों, शायद महिला आन्दोलन की कमी रही हो या या समाज की कमी रही हो,ये समझा गया की जो जेंडर का काम है वो महिलाओं का काम है. इसलिए सारा फोकस महिलाओं पर हो गया. पुरुषों की बातें नहीं की गईं. पितृसत्ता पर महिलाएं 100-150-200 या 300 साल या जबसे पितृसत्ता शुरू हुई , पितृसत्ता पर बोलती रहीं हैं.अपने ऐक्सन्स में विरोध करती रहीं हैं. मीराबाई ने स्त्रीवाद की कोई किताब नहीं पढ़ी थी. हाँ, लेकिन जिंदगी थी. मैं समझती हूँ की जिस दिन पितृसत्ता की शुरुआत हुई, उसी दिन से स्त्रीवादी सोच शुरू हुई. मुझे लगता है महिला सशक्तिकरण या स्त्री पुरुष समानता में दो पहलू हैं- स्त्री और पुरुष. जब तक दोनों नहीं बदलेंगे, जब तक दोनों मिलकर इस पर जद्दोजहद नहीं करेंगे, तब तक समानता नहीं हो सकती है. मुझे लगता है शुरू से स्त्री-पुरुष समानता की लड़ाई स्त्री और पुरुष के बीच की लड़ाई नहीं है. ये दो मान्यताओं के बीच की लड़ाई है. एक मान्यता कहती है कि पितृसत्ता बेहतर है और दूसरी कहती है- नहीं, समानता बेहतर होगी.

इसमें कहीं यह  आइडिया तो नहीं काम कर रहा था कि स्त्री के प्रति जो हिंसा या असमानता है,  उसमें मर्द एजेंसी के तौर पर तो है ही,  लेकिन वो विक्टिमाइज्ड भी है. मतलब वो भी पितृसत्ता के द्वारा गढ़ा जाता है?
वह  तो है ही, आप देखिये मर्दों ने खुद अपने बारे में कभी नहीं सोचा,  क्योंकि उनको सत्ता मिलती है. भई हमें तो वो जूता काट रहा था. इसलिए हमने कहा कि ये पितृसत्ता का जूता हटाओ. वे इस जूते को बहुत सुपरफिसियली देखते हैं. वे  समझतें हैं कि इस जूते  में हमें मजा आ रहा है.हमार साइज बढ़ रहा है.हम देवता भी कहला रहे हैं. हमें पति परमेश्वर भी कहा जा रहा है.सिर्फ हम ही अंतिम संस्कार करते हैं, हम ही कन्यादान करते हैं. उन्होंने ये नहीं देखा की किस प्रकार से पितृसत्ता लड़कों को रोने नहीं देती है. उन्हें अपनी कमजोरियां बयान नहीं करने देती. उनको संवेदनशील नहीं बनने देती. उनको बच्चों के साथ नहीं समय बिताने देती. किस प्रकार उनको मर्दानगी के नाम पर हिंसात्मक बनाया जाता है. उनको कहा जाता है की तुम लोगों को दबा के रखोगे, नहीं तो तुम असली मर्द नहीं हो. रोओगे नहीं. तो उससे उनका अमानवीयकरण हो जाता है. मैं ये मानती हूँ कि एक बलात्कारी मानव नहीं है, जो मानव के गुण होने चाहिए वह बलात्कारी के अंदर खत्म हो गए हैं. 50-60% प्रतिशत भारतीय पति,  जो अपनी पत्नियों के ऊपर हिंसा करते हैं, उनका कहीं न कहीं अमानवीयकरण (डीह्युमनाइजेसन) हो गया है. ब्रुटलाइजेसन हो गया है. वरना आप कैसे अपने जीवनसाथी पर हाथ उठा सकते हैं ! इसके साथ मेरा यह भी मानना है कि पुरुष शारीरिक तौर पर बलात्कारी नहीं है. अगर ऐसा होता तो बुद्ध भी बलात्कार करते.गांधी भी बलात्कारी होते, जीसस भी बलात्कारी होते. हमारी जिंदगी में ६० प्रतिशत पुरुष पत्नियों पर हाथ उठाते हैं , तो ४० प्रतिशत तो नहीं उठाते हैं  न ? इसका मतलब ये है कि ये कोई शारीरिक देन नहीं है.ये प्रकृति कि देन नहीं है. ये मानसिकता पैदा की गयी है. आप महिलाओं को भी देख सकते हैं. वो भी पीट सकती हैं अपने बच्चों को, जिनके ऊपर चलती है उनकी शक्ति.

इस तरह जैसे महिला बनाई जाती है वैसे पुरुष भी बनाया जाता है?
हाँ, पुरुष भी बनाया जाता है, मगर दुःख की बात है कि महिलाओं ने इस पर सोचा है.  पुरुष अब तक नहीं सोच पाये. और चूकि मैं एन.जी. ओ के साथ काम करती थी, वहां सारे के सारे पुरुष हेड हुआकरते थे. मुझे लगा कि उनको बदलने कि जरूरत है.उनको भी यह समझने कि जरूरत है कि ये महिलाओं का मुद्दा नहीं है. ये स्त्री-पुरुष के बीच की लड़ाई नहीं है. ये दो मानसिकताओं के बीच की लड़ाई है. मैं आपको बुद्ध के जीवन से कहानियां सुना सकती हूँ. वो मेरी किताबों में भी लिखी हुई हैं कि कैसे बुद्ध ने, जो हिन्दू धर्म में पैदा हुए और जब महिलाएं उनके पास आयीं,  एक पिटीशन लेकर कि भई आप संघ में सिर्फ पुरुषों को ले रहे हो, हमको भी लो ! तो बुद्ध ने मन कर दिया. ढाई हजार साल पहले ये डिबेट चली. बुद्ध ने मौसी से ये डिबेट किया. उनकी मौसी आनंद के पास गयीं, जो डिप्टी डायरेक्टर थे. तब आनंद फिर वापस गए बुद्ध के पास. ढाई हजार साल पहले यह हुआ  कि महिलाओं को संघ में लिया जायगा.  क्या यह जेंडर  डिबेट नहीं था ? क्या यह महिला अधिकारों का डिबेट नहीं था? कोई किताब नहीं पढ़ी थी उन्होंने. कोई ‘सीडॉ’ नहीं था. कोई रेप बिल नहीं था.मगर औरत को बताना नहीं पड़ता कि उनके अधिकार छिन रहे हैं. उनको लगा कि हम भी तो बुद्ध बन सकते हैं. जो लोग कहते हैं कि जेंडर वेस्टर्न कांसेप्ट है, स्त्रीवाद वेस्टर्न कांसेप्ट है वे बतायें कि क्या बुद्ध  की मौसी स्त्रीवादी नहीं थी, जो बुद्ध के पास आयीं और कहा, ऐ मिस्टर ! मैं भी आना चाहती हूँ . मुझे क्यों रोक रहे हो? इसके अलावा अगर आप प्रॉफेट मोहम्मद की बात करें, जिन्होंने 1400-1500 साल पहले कितनी चीजें औरतों के लिए बदलीं.

थोड़ी कमी इधर भी है . एन.एफ़. आई. डब्लयू. ने अपनी स्थापना का सिक्सटीज़ मनाया. वहां एक भी तस्वीर सावित्रीबाई फुले की नहीं थी. ताराबाई शिंदे की नहीं थी. हमें तो डॉ. अम्बेडकर को भी लोकेट करना होगा अपने साथ.  
 एक्जैक्टली. वही बात है कि हमारी ताकत कितनी रही है.हम क्या सोच रहे हैं. उनके लिए क्लास मेन फैक्टर रहा करता था. मेरा यह मानना है कि बुद्ध अधिकार सबको दिलाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने दलितों  को लेकर कहा कि बुद्धिज़्म में कास्ट सिस्टम नहीं होगा. महिलाओं को उन्होंने लिया,  लेकिन आठ ऐसे कानून बनाये जिसमें भिक्खुनी हर तरह से भिक्खु के नीचे रहेगी. अब आप इसमें कहोगे कि उन्होंने अधिकार पूरे नहीं दिए. मैं  कहूँगी कि ढाई हजार साल पहले अगर वो जीरो से ६०-७० पर ले आये तो क्या वह एक क्रन्तिकारी कदम नहीं था ? मैं उसको क्रांतिकारी कदम मानती हूँ.  प्रॉफेट मोहम्मद ने 1500 साल महिलाओं को  अधिकार दिए, ये कहा कि पुरुषों को संपत्ति ज्यादा मिलेगी लेकिन ये  कब कहा ? ये तब कहा जब महिलाओं को जीरो संपत्ति मिलती थी. उन्होंने कहा कि पुरुष चार शादियां कर सकते  हैं, मगर  ये-ये-ये शर्तें होंगी. ये कब कहा ? ये तब कहा जब पुरुष ५० शादियां कर रहा था. तो भई 50 या 100 से चार पर ले आओ, उसके बाद जो आने वाले हैं, उनकी जिम्मेदारी बनती है कि चार से एक पर लाएं.पर वो तो चार पर ही आकर फंस गए. क्योंकि वो प्रॉफेट नहीं थे, वो प्रॉफेट के चमचे थे. उन्होंने अंदर से रियलाइजेसन नहीं किया.  इन सब चीजों के कारण लगा कि मर्दानगी पर, मर्दवाद पर  सोचना आवश्यक है. इसमें यह भी लिखा है कि किस प्रकार से केवल धर्मों ने, परम्पराओं ने ये चीजें नहीं फैलाईं. आज कैपिटलिस्ट पैट्रीआर्की पूरी तरह से मर्दवाद फैला रही है. पूरी तरह से महिलाओं को नीचे दिखा रही है. पोर्नोग्राफी बिलियन डॉलर इंडस्ट्री है.कॉस्मेटिक्स, जो कहती है कि महिला जब तक इस शेप की नहीं है, इस कलर की नहीं है,  वहबेकार है. बाजार में उसकी कोई कीमत नहीं है. खिलौनों की इंडस्ट्री में लड़कों के लिए बंदूकें, स्पाइडर मैन और लड़कियों के लिए बार्बी डॉल्स. हर बार वही चीज दोहराई जाती है- मर्द. आजकल एक विज्ञापन रेडियो में आता है- दिल्ली  का कड़क लौंडा. अब ‘कड़क लौंडा’ शब्द आप भी जानते हैं. मैं भी जानती हूँ कि वो किस चीज की बात कर रहे हैं. वो कड़क पेनिस कि बात कर रहे हैं.क्या काम है उसका रेडियो पर ? वह लोगों को बेहूदा फोन करके बेहूदा बातें  करता है. इसी प्रकार रणधीर कपूर के कितने सारे ऐड्स देख लें. पेप्सी और आई.पी.एल. के ऐड्स आते थे- ‘आई.पी.एल. शराफत से देखा जाता है न कि शराफत से खेला जाता है’. जो फिल्में हैं उनमें- बद्तमीज दिल बद्तमीज दिल माने न माने न माने न. हमेशा वही पुरुषों कि बद्तमीजी. फिर मैंने इस पुस्तक में कहा है कि हाँ पितृसत्ता में पुरुषों को अधिकार बहुत मिलते हैं, लेकिन पुरुष शांत दिमाग से जरा यह भी सोच लें कि अधिकारों के साथ- साथ, पुरुष केवल 50 प्रतिशत हैं, लेकिन 99 प्रतिशत टेररिस्ट पुरुष हैं. 99 प्रतिशत क्रिमिनल्स पुरुष हैं. 99 प्रतिशत ट्रेफिक आफेंडर पुरुष हैं. अमेरिका में हर दो महीने में 17-18-19 साल का एक लड़का एक बंदूक उठाकर एक स्कूल में 10-20 लड़कों को मारकर घर आता है. कभी औरत ने ऐसा किया ?तो ये हो रहा है. आज भी ‘हिन्दू’ अख़बार में है कि पुरुषों की आत्महत्याएं महिलाओं की आत्महत्याओं से कहीं अधिक हैं.

 एक राइट-अप हमने अपने यहाँ (स्त्रीकाल में ) भी लगाया था- ‘किसान महिलाएं आत्महत्या नहीं करतीं हैं.’ बल्कि  ज्यादा कष्ट झेलतीं  हैं. 
वही बात है की भई हमें तो कष्ट झेलने की आदत पड़ जाती है. पुरुष दो कारणों से मरता है. मैंने इस किताब में लिखा है. एक कारण है- गरीबी. दूसरा कारण है-पितृसत्ता. वह सोचता है मैं कैसा मर्द हूँ कि अपने परिवार का पालन नहीं कर  सकता. उसके अंदर अपनी एक इमेज है. इस तरह आप देखेंगे जब थाईलैंड में, कोरिया में इकोनॉमिक रिप्रेसन आया तो बहुत पुरुषों ने आत्महत्याएं कीं, स्त्रियों ने नहीं कीं. क्योंकि उनकी मर्दानगी को भी चोट पहुँच रही है की भई कैसा मर्द हूँ. गरीबी तो है ही. औरत भी गरीब है पर वह औरत को छोड़कर कहाँ जाएगी.

इधर जो बढ़ते हुए केसेज़ हैं स्त्री के खिलाफ हिंसा के, बलात्कार भी उनमें शामिल है, उसको आप कैसे देखतीं हैं? मेरा मानना है कि रिपोर्टिंग बढ़ रही है. यह एक तरह से एम्पावरमेंट भी है.
मेरा मानना है, दोनों चीजें हैं. रिपोर्टिंग तो बढ़ ही रही है. ब्रूटलिटी पूरे समाज में हर स्तर में बढ़ रही है.ये सिर्फ स्त्री-पुरुष के खिलाफ नहीं है. आप दूसरे तबकों, मायनार्टिज के खिलाफ देख लीजिये.ये काफी हद तक रिसोर्सेज़ की लड़ाई है. किसी कालोनी में जाएँ. पार्किंग के लिए लोग एक-दूसरे को मार रहे हैं. सड़क में कार से जल्दी आगे निकलने के लिए लोग एक-दूसरे को मार रहे हैं. आगे पहुंचना है, क्योंकि इनसिक्यॉरिटी इतनी बढ़ रही है इस पैराडाइम में. ये जो कार्पोरेट वाला नियोलिबरल पैराडाइम है, इसमें हिंसात्मक कम्पटीशन बढ़ रहा है,  मूल्यों का हनन हो रहा है. हमारे बड़े-बड़े एक्टर्स, जो करोड़पति है, शराब के विज्ञापन निकालते हैं, जोकि गैरकानूनी है. शराब को वो सोडा या म्यूजिक कहके बेचते हैं. टेलीविजन पर रोज आते हैं- लार्ज…लार्ज…स्मालर.. स्मालर.. बिगर दैन लाइफ. कौन हैं ये? ये करोड़पति लोग हैं,  जो गैरकानूनी तरीके से शराब बेच रहे हैं ये खाते-पीते डाक्टर भ्रूणहत्याएं कर रहे हैं. इसके कारण ३६ मिलियन औरतें कम हैं इस देश में पुरुषों से. छत्तीस मिलियन ! दो मायनार्टिज के मर जाते हैं तो हड़तालें हो जातीं हैं. २० दलित मर जाते हैं तो भी हड़तालें हो जातीं हैं. यहाँ ३६ मिलियन औरतों को मर के गिरा दिया गया, क्या कभी पार्लियामेंट बंद हुई आधे दिन के लिए कि कहाँ जा रहीं हैं ये ? सेक्स रेशियो क्यों गिरता जा रहा है ? अगर कोई आकर छाती पीटतीं हैं , तो महिला संस्थाएं आकर पीटतीं हैं. क्यों ट्रेड यूनियंस आकर इस पर बात नहीं करतीं? क्यों पॉलिटिकल पार्टी आकर इस पर बात नहीं करतीं ? क्या महिलाओं का मरना सिर्फ महिलाओं कि जिम्मेदारी है? ये जो स्त्री-पुरुष के मुद्दे हैं, ये स्त्री-पुरुष दोनों के मुद्दे हैं. इसमें मैंने ये भी समझाने की कोशिश की है कि जब तक औरत आजाद नहीं होगी, पुरुष आजाद नहीं हो सकता. अगर अपनी बेटी को आपको प्रोटेक्ट करके रखना है तो पूरी उमर आप प्रोटेक्ट करते रहोगे. पहले आप, आपके मरने के बाद आपका बेटा और उसका पति. अगर आपकी बेटी काबिल है,  बेटा नालायक निकल गया या डिसएबल पैदा हो गया या मेन्टल इलनेस हो गयी तो आपकी बेटी आपका काम संभाल लेगी. ‘स्त्रीकाल’ निकाल लेगी. कहेगी, पापा ! मैं हूँ न. आपके पास सारे साधन हैं. अपनी पत्नी को आपने कहीं बाहर नहीं निकलने दिया. आपका एक्सीडेंट हो जाता है और आप मरते रहते हो कि मेरी पत्नी का क्या होगा. मेरे परिवार का क्या  होगा. अगर पत्नी भी उतनी ही क़ाबिल होगी तो कहेगी- पार्टनर! डोंट वरी. मैं हूँ न ! मैं तो यही मानती हूँ, चूँकि स्त्री-पुरुष दोनों एक ही परिवार में रहते हैं, बराबरी होगी तो शांति होगी बराबरी होगी तो आगे बढ़ पाएंगे. गैरबराबरी होगी तो, घर में चार लोग हैं, जिनमें दो मुरझाये हुए हैं और दो पनप  रहे हैं. मैं हमेशा कहती हूँ कि मैंने आज तक कोई किसान नहीं देखा है, जिसके पास चार एकड़ जमीन है, वो दो एकड़ सड़ने दे और दो एकड़ में फलें-फूलें चीजें. लेकिन लड़के और लड़कियों के साथ हम यही करते हैं. चलो हमको पहले नहीं मालूम था, औरतें क्या-क्या कर सकतीं हैं. कितनी काबिल बन सकतीं हैं. पर अब तो औरतों ने पिछले 100 सालों में दिखा दिया कि दुनिया का कोई क्षेत्र नहीं, जिसमें वह काबिलियत नहीं रखतीं.

आप एन.जी.ओ. ट्रेनिंग ही करती रही हैं या ट्रेनर की मास ट्रेनिंग करती रहीं हैं ?
कमला भसीन-एन.जी.ओ(ज़) में मई उन लोगों की ट्रेनिंग करती रहीं हूँ , जो गांवों में जाकर काम करते हैं. कालेज और यूनिवर्सिटीज ने भी मुझे कई बार बुलाया है. जैसे अब अगले हफ्ते लेडी इरविन कालेज ने. गार्गी कालेज और लेडी इरविन कालेज ने हमेशा से मुझे बुलाया है. फिर मैंने एक और संस्था शुरू की थी, उसका नाम है- ‘अंकुर’, अल्टरनेटिव इन एजुकेशन. ये स्कूलों में काम कर रही है. इस प्रकार हर जगह थोड़ा- थोड़ा काम किया है.

आप तो जेंडर समानता के गीत भी लिखती हैं? गीतों के संग्रह नहीं आये?
बिल्कुल, मेरा मुख्य  काम वही है. मेरे गीतों की किताबें हैं. सी.डी. हैं. पिछले 3 साल में तो 3 नए   सी.डी.(ज़) निकाले हैं. गीतों का मेरा खास काम है,  जिसकी वजह से मैं जानी जाती हूँ. मेरे गीत हैं, पोस्टर्स हैं, बैनर्स हैं.पिछले 15-20 साल से हम कपड़ों में बड़े-बड़े स्लोगन्स, चूँकि मेरा ये मानना है कि कुछ राज्यों में 50-60 प्रतिशत महिलाएं पढ़-लिख  नहीं सकतीं, वहां पर जो गीत का माध्यम है, बहुत सशक्त माध्यम है.

‘परचम बना लेती’, वो आपका ही गीत है? यह तो किसी और की  लाइन है.
ये लाइन किसी और की है, लेकिन गीत मेरा है. शायद मख़दूम साहब हैं. मैंने उसमे लिखा है-‘तू इस आँचल का परचम बना लेती तो अच्छा था, तू सहना छोड़कर कहना शुरू करती तो अच्छा था.’ ये लाइनें मेरी हैं, लेकिन वहां से प्रेरित हैं.

अभी बात हो रही थी कास्ट को लेकर के, आप कास्ट क़्वेश्चन को कैसे देख रहीं हैं? महिला रिजर्वेशन के प्रसंग में अपनी बात कहेंगी कि उसमें ‘रिजर्वेशन-विदइन-रिजर्वेशन’ के कारण तो दिक्कत नहीं हैं? यदि ऐसा है तो क्यों नहीं उस पर ओपन हुआ जाये? 
हिंदुस्तान में अगर हम पितृसत्ता कि बात करें,  तो जिन लोगों ने पितृसत्ता पढ़ा हैं वे जानते हैं, लगभग जब पितृसत्ता चालू हुई , तो जाति-व्यवस्था भी लगभग उसी टाइम चालू हुई. ये दोनों सिस्टम सत्ता रिलेटेड हैं.एक में पुरुष सत्ता है और दूसरे में जाति सत्ता है. दोनों शोषण पर आधारित हैं. ठीक इसी प्रकार से क्लास, अगर आप कार्ल मार्क्स कि बात करें तो उन्होंने यही कहा कि जब तक प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं आई थी पितृसत्ता नहीं थी. मैं इस बात को मानती हूँ कि प्राइवेट प्रॉपर्टी ही कारण थी, जिसके कारण पितृसत्ता लानी पड़ी. प्राइवेट प्रॉपर्टी के बाद ही जितनी गैरबराबरियां  आईं  हैं. क्योंकि उसके पहले सब कहते थे, पीते थे, मरते थे. जैसे प्राइवेट प्रॉपर्टी डेवलप हुई, तो हुआ  कि ये अब कौन संभालेगा ? तय हुआ पुरुष, ब्राह्मण और अपर क्लास. तो ये तीनों सिस्टम लगभग इकठ्ठे आये. औरत सिर्फ औरत नहीं होती. औरत की कास्ट भी होती है. औरत की क्लास भी होती है. औरत की रेस भी होती है.

महिला रिजर्वेसन पर आपका  सैद्धांतिक स्टैंड क्या है ?
मैं यह मानती हूँ कि इन सब चीजों पर काम करना जरूरी है. कोई भी इंसान हर चीज पर काम नहीं कर सकता. ये जरूरी है कि हम नेटवर्किंग करें. कोऑर्डिनेट करें. एन.ऍफ़ .आई.डब्लू के साथ, एपवा के साथ, नारीवादियों के साथ काम करें. रिजर्वेशन पर मैं मानती हूँ कि यह  ज़रूरी है.

 ट्रेनिंग के दौरान के अपने अनुभव बताएंगी? लड़कियां कितनी जल्दी रेस्पॉन्ड करती हैं? कितनी जल्दी लड़कियां समझतीं हैं जेंडर के इश्यूज़ को और लड़के कितनी जल्दी ?
मेरी ज्यादातर जो ट्रेनिंग्स हैं वो महिलाओं के साथ होती हैं, लड़कियों के साथ नहीं.मैं १४ साल से काम उम्र को लड़की समझती  हूँ और १४ साल से ऊपर को औरत. चूँकि मैं ज्यादातर ट्रेनिंग्स औरतों के साथ काम करने वालों के साथ करती हूँ.ट्रेनर हों, एक्टिविस्ट हों, एन.जी.ओ. हेड्ज़ हों, पार्लिआमेंटेरियन्स हों, पोलिस आफिसर्स हों- इन सबके साथ मैं ट्रेनिंग कर चुकी हूँ. जब से मेरे बाल सफ़ेद हुए हैं,  जोकि २० साल हो गए हैं, तो मैं ज्यादा शक्तिशाली पुरुषों के साथ काम करती हूँ. क्योंकि वे किसी जूनियर ट्रेनर की बात सुनने को तैयार नहीं हैं. क्योंकि मैं यू.एन. में थी. मैं फलानी थी. मैं ढिकानी थी. तो वहां पर तजुर्बे की आवश्यकता होती है. जैसे मालदीव में मैंने मिनिस्टर्स, ब्यूरोक्रेट्स के साथ ट्रेनिंग्स की है. पुरुष और महिला पार्लिआमेंटेरियन्स के साथ ट्रेनिंग की है. पाकिस्तान, बांग्लादेश के एन. जी. ओ(ज) के पूरे-पूरे स्टाफ के साथ ट्रेनिंग की है. बांग्लादेश में छोटी वर्कशॉप्स टी. वी.चैनल्स के पत्रकारों के साथ की. नेपाल में पत्रकारों के साथ ४ दिन की ट्रेनिंग की. वहां पर एक संचारिका समूह है वीमेन मीडया पर्सन्स का, उनके साथ ट्रेनिंग की. हिन्दुस्तान की पुलिस और ब्यूरोक्रेट्स के साथ काम किया. लेकिन हिंदुस्तान के पार्लिआमेंटेरियन्स  के साथ नहीं. उनके पास टाइम कहाँ है? उनको कहाँ शर्म है,  जो उनके मुंह से रोज जुमले निकलते हैं महिलाओं के खिलाफ. पहली बार बात हो रही थी.  ‘आप’ वाले आये थे, बातचीत कर रहे थे. आप के साथ बातचीत चल रही है.वे करवाना चाहते हैं ट्रेनिंग. मगर कब किसी को टाइम मिलेगा, ये भी देखना होगा. वे पूरे एक दिन अपने तमाम लेजिस्लेचर्स के साथ बैठना चाहते हैं. कई दफा आ चुके हैं. अब जो आपका प्रश्न था कि महिलाएं जल्दी समझ जातीं हैं, तो ये लाजिमी है. अगर आप दलितों के साथ जातिवाद पर ट्रेनिंग करेंगे तो दलित जल्दी कहेंगे, हाँ ठीक है, ऐसा होता है. क्योंकि वो जूता दलित को काट रहा है. अब मैं स्त्रीवादी हूँ, आप मुझसे दलित की बात करोगे तो मैं हिचकिचाऊंगी,  क्योंकि मैं औरत के हक़ की तो बात कर रही हूँ लेकिन क्या मैं क्लास पर उसी शिद्दत से बात कर रही हूँ.? क्या मैं कास्ट पर उसी शिद्दत से बात कर रही हूँ? क्या मैं अपनी जिंदगी में उसको जी रही हूँ? नहीं जी रही हूँ. इटेलेक्चुअली समझती हूँ. दूसरी बात ये है संजीव कि सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते हैं. जिन पुरुषों के साथ मैं काम करती हूँ, जो एन. जी.ओ. वाले हैं, वे बहुत काम कर चुके होते हैं इन चीजों पर. कुछ सेन्सिटाइज़ होते हैं. मगर फिर भी पुरषों में अधिक रेजिस्टेंस होती है. बार-बार उन सवालों के साथ आते हैं. इसलिए मैं हमेशा ये कहती हूँ उनको कि भई मेरे साथ अगर बैठना है तो समय लेकर बैठ सकते हैं. मैं २ घंटे, तीन घंटे की ट्रेनिंग्स नहीं करती. कोई मतलब नहीं है. उसमें कुछ नहीं हो सकता. मैं तीन दिन कम-से- कम उनके साथ बैठती हूँ.

अभी जागोरी के साथ आपका असोसिएशन कैसा है?
‘संगत’ का काम है. वो ‘जागोरी’ का प्रोजेक्ट है. मैं वहां बैठती हूँ. लेकिन जो हमारा नेटवर्क है उस पर काम करती हूँ.एक बहुत बड़ा कैम्पेन ‘जागोरी’ और ‘संगत’ मिलकर कर रहे हैं. ये पूरी दुनिया में चल रहा है. हिंदी में हम उसको कहते हैं ‘उमड़ते सौ करोड़’. अंग्रेजी में उसका नाम है ‘वन बिलियन राइज़िंग’.मैं इसकी दक्षिण एशिया की कोआर्डिनेटर हूँ.एक और संस्था है ‘पीस वीमेन एक्रॉस द वर्ल्ड. मैं उसकी ग्लोबल को-चेयर हूँ.इसमें दो चेयर्स हैं. ‘ वन बिलियन राइजिंग’ का आ इडिया ई. वेंसनर ने दिया था मगर हमने कभी उसके नाम से इसको नहीं चलाया है.क्योंकि हम लोग भी महिलाओं पर होने वाली हिंसा पर 40 साल से काम कर रहे हैं. हमें लगा कि ये सबसे अच्छा मौका है दुनिया में सबके साथ मिलकर काम करने का.250 देशों में ये पिछले 3 साल में चला.क्या मतलब है इसका ? 100 करोड़  या वन बिलियन राइज़िंग का?  पूरे विश्व में 7 बिलियन से ज्यादा लोग हैं. आधी महिलाएं हैं -साढ़े तीन बिलियन.संयुक्त राष्ट्र संघ का कहना है कि 3 में से 1 औरत मार खाती है. उसके ऊपर हिंसा होती है. तो इस तरह एक बिलियन औरतों पर मार पड़ती है. यह एक बिलियन कांसेप्ट वहां से आया.अगर एक बिलियन मार खा रही हैं तो जब तक एक बिलियन स्त्री-पुरुष और बच्चे उठकर ये नहीं कहेंगे कि ये खतम हो, तब तक बात नहीं बनेगी.  अगर एक बिलियन पर हिंसा हो रही है तो हम एक बिलियन को इस हिंसा के खिलाफ खड़ा करेंगे.ये 250 देशों में चल रहा है क्योंकि पहले से लोग इस पर काम कर रहे थे. लेकिन मैं जब अपने स्तर पर, जागोरी के स्तर पर, संगत के स्तर काम करती हूँ तो एहसास होता है कि मैं एक बूँद हूँ.  जब मैं वन बिलियन का हिस्सा बन जाती हूँ, जब मैं इंटरनेशनल वीमेंस डे का हिस्सा बन जाती हूँ तो मुझे लगता है मैं बूंद से समंदर हूँ. समंदर बनने के लिए इस तरह के अंतरराष्ट्रीय अभियानों से हम जुड़ते हैं, जुड़कर काम करते हैं लेकिन काम अपने स्तर पर होता है.

अंतिम सवाल एक . आपको नहीं लगता कि डॉ. आंबेडकर स्त्रीवाद के लिए एक आइकॉन होने चाहिए थे, उन्होंने जितना काम किया था हिंदुस्तान में महिलाओं के लिए अलग टॉयलेट्स से लेकर हिन्दू कोड बिल तक, उतना आधुनिक भारत में किसी ने नहीं किया. 
बिलकुल मैं मानती हूँ कि उन्होंने बहुत काम किया. कुछः लोगों के लिए वे हैं आइकॉन. सिर्फ स्त्रीवाद के ही नहीं वे डेमोक्रेसी के आइकॉन हैं, वे सेकुलरिज़म के आइकॉन हैं, वे बराबरी के आइकॉन हैं. इसी तरह महत्मा फुले , शाहू जी महाराज आदि बहुत लोगों ने काम किया है. हम उनके ही कन्धों पर खड़े हैं. आज अगर भारत का ये संविधान न होता तो किस बिना पर ये लड़ाइयां लड़ते हम.मैं तो कहती हूँ कि भैया मैं तो भारत के संविधान के लिए लड़ रही हूँ. आप लिख दो  भारत के संविधान में किस्त्री-पुरुष बराबर नहीं हैं, तो हम चुप होकर बैठ जायेंगे. या यह करो या फिर संविधान के अनुसार बराबरी दो. मैं कहती हूँ भारत आजाद हुआ 1947 में औरत को अभी आजाद होना है. मैं बिना डर के नहीं घूम सकती हूँ तो मेरी आजादी का मतलब क्या है?

इस मामले तो क्लास खतम हो जाता है. यदि प्रियंका गांधी चली जायें कहीं बिना गांधी के टैग के तो फिर वे औरत हो जातीं हैं.
हाँ, खतम. और असली चीज एक सांस्कृतिक क्रांति कि जरूरत है. क़ानून बहुत आ गए . दहेज़ का क़ानून  बने कितने साल हो गए. रेप का क़ानून बने कितने साल हो गए. भ्रूण हत्या के खिलाफ क़ानून बने कितने साल हो गए लेकिन क्या वे  हमारी हकीकत बने  ?नहीं बने. क्योंकि लॉ बदलना आसान है.

काउंटर अटैक भी बहुत हुआ है. पिछले २०-३० सालों में जो लॉ वाली उपलब्धियां हासिल की हैं या एक स्पेस की भी उपलब्धि है हमारी लेकिन प्रतिआक्रमण  जबरदस्त हुआ है. मुझे लगता है कि इस अनुपात में हम लोग उसके बाद तैयार नहीं हैं. 
जैसा मैंने आपसे कहा हमारे खिलाफ पूरा कार्पोरेट वर्ल्ड है. पोर्नोग्राफी की बिलियन डॉलर इंडस्ट्री है. जो रोज कहते हैं कि औरत को  इस-इस प्रकार से पीड़ित करना है. पूरा टेलीविजन, जो अपने सीरियल्स दिखाता है, क्या औरत की हालत बना रखी है इन लोगों ने !  और ये जो गाने हैं- ‘मैं तंदूरी मुर्गी हूँ मुझे ह्विस्की से गटका ले, शीला की जवानी.’ कमला भसीन गीत लिखतीं है, ज्यादा से ज्यादा मैं लगा लूँ तो तो एक मिलियन लोग देख लेंगे मेरे गीत. फिल्म ‘दबंग’, ‘ लौंडिया पटायेंगे मिस्ड कॉल से’- इसको हमने १०० करोड़ का बिजनेस दिया. तो मैं बनाने वालों को क्या दोष दूँ,  जब १०० करोड़ के बिजनेस वाले आप और हम लोग बैठे हैं ? जब हर पंजाबी शादी पर 4-4 साल की लड़कियां इस गाने पर नाचती हैं कि ‘मैं तंदूरी मुर्गी हूँ,  मुझे ह्विस्की से गटका ले’. तो क्या इसका कोई असर नहीं पड़ता है लोगों पर? हमारे खिलाफ जो ताकते हैं, दलितों के खिलाफ जो ताकतें हैं, अगर आप समझते हैं कि कोई दलित आंदोलन या महिला आंदोलन उसको जीत पायेगा, तो आप गलत समझते हैं. इसको जीतने के लिए सबको लड़ना पड़ेगा.

लेकिन दलित आंदोलन फिर भी ऐक्टिव है. रजिस्टेंस है वहां. स्त्रीवादी 80-90 के बाद से एक्टिव नहीं हैं. उस दौर में जो स्त्रीवादियों का दबाव बना, अब नहीं है.  
मैं बिलकुल नहीं मानती. आप लोग  तो शहरों में रहकर ये सारी बातें करते हैं. कोई गांव है जहाँ पर महिलाओं का कोई समूह नहीं है? जहाँ पर लड़कियां पढ़ने के लिए लड़ नहीं रही हैं ? आप तो महिला आंदोलन उसको मानते हो जहाँ पर कोई नेता हो , मेरी जैसी. मतलब जिस तरीके से ये पहुंचा है गांव-गांव तक,  जिस तरीके से यह सब कुछ हुआ है, यह कोई आसान बात नहीं है. गांवों से भी जो लिखते हो आप लोग, फलानी दलित औरत का बलात्कार  हो गया! कहाँ से न्यूज़ आई आपके पास? उस लड़की ने क्यों रिपोर्ट किया इसको? बिना स्त्रीवाद के उसकी रिपोर्ट हो गई ?बिना महिलाओं के काम करने के उसकी रिपोर्ट हो गई ? कहीं न कहीं से ये बात उसके दिमाग में पहुंची होगी कि औरत होने के नाते उस पर शोषण नहीं हो सकता. यह कांसस्नेस उसके पास कहाँ से आई? इन्हीं चीजों से पहुंची.

ये तो मैंने पहले ही कहा कि रिपोर्टिंग बढ़ी है.
लेकिन रिपोर्टिंग क्यों बढ़ी उस पर भी तो जाइए न. रिपोर्ट तो औरत ही करती है, मीडिया तो नहीं करता. तो औरत के अंदर वो चेतना कहाँ से आई ? वो चेतना आई होगी, कहीं किसी छोटे से एन. जी.ओ. ने कहा होगा कि देख तेरे साथ ये नहीं हो सकता, ये गलत है. इसके ऊपर कानून है. तू रिपोर्ट कर सकती है. तू पुलिस थाने जा सकती है , ये पचास साल पहले उसको नहीं मालूम था. रजिस्टेंस है. हम तो यही मानते हैं.
लिप्यान्तरण : अरुण कुमार प्रियम    

औरत , विज्ञापन और बाजार

अदिति शर्मा

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, बैंगलोर पीठ में हिंदी अनुवादक संपर्क-ई-मेल : aditisharmamystery@gmail.com

अदिति शर्मा
स्त्री  मुक्ति चेतना व स्त्रीवादी दृष्टिकोण पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और बहुत कुछ लिखा जा रहा है, किन्तु बुनियादी सवाल अभी तक क़ायम हैं। सूक्ष्म रेशे से अटके इन सवालों की सामाजिक सन्दर्भों में बारीकी से की गयी जाँच-पड़ताल ही नारी अस्मिता की खोज कर सकती है। वर्तमान समय में जब स्त्रियाँ घरों की चारदीवारी से बाहर निकलकर संघर्षरत हैं, नियमों, मर्यादाओं और वर्जनाओं से अपने स्त्रीत्व  व अस्मिता की टकराहट को अपने अनुभवों से महसूस रही हैं तब ये अनुभव उन्हें झकझोरते हैं और एहसास कराते हैं उस जकड़नावस्था का जिसमें वे फँसी हैं। जहाँ उनके चुनाव और निर्णय लेने के अधिकार को हिक़ारत की नज़र से देखा जाता है। यदि स्त्री को मनुष्य ही ना समझा जा रहा हो तो उसके वरण की स्वतंत्रता का सम्मान भी संभव नहीं। यहीं से समानता की अवधारणा का प्रारम्भ होता है और यहीं से उन सभी प्रश्नों के उत्तर ढूँढने का प्रयास शुरू होता है जो इस समाज ने खड़े किये हैं।

बीसवीं सदी तक आते-आते स्त्रियों ने अपने कदम उन क्षेत्रों की ओर बढ़ा दिए थे जहाँ अभी तक केवल पुरुषों का एकाधिकार था। स्त्रियाँ स्वयं को सक्षम सिद्ध कर रही थी किन्तु उपभोक्तावादी संस्कृति तथा विज्ञापन-व्यवसाय ने उसे एक अलग ही छवि में प्रस्तुत करना चाहा। विज्ञापनों में अधिकांशतः स्त्रियों की दो तरह की छवियाँ परोसी जाती है, पहली में सुबह से दौड़ती-भागती पति को ऑफिस और बच्चों को स्कूल भेजती स्त्री जो 5 रुपये के साबुन से बर्तन चमकाती है 3 रुपये सस्ते डिटर्जेंट से पति की पीली पड़ गयी कमीज़ को चकाचक सफ़ेद कर देती है और कमर दर्द होने पर शिकायत भी नहीं करती (वो तो भला हो उस ‘महापुरुष’का जो ‘मूव’ या ‘आयोडेक्स’ लगाकर उसे दर्दमुक्त कर देता है) फिर श्रृंगार कर ‘आशीर्वाद आटा’ ‘बासमती चावल’ और ‘एम डी एच मसालों’ से पति का मनपसंद खाना बनाकर शाम को उसका इंतज़ार करती है। दूसरी छवि एकदम भिन्न है जहाँ स्त्री मोटर बाइक पर सवार या डीयोड्रेट लगाते यहाँ तक कि टूथपेस्ट करते और दाढ़ी बनाते पुरुष को देखकर भी कामुक हो जाती है।

तस्वीर सौजन्य : गूगल से साभार

अब विचारणीय यह है कि जिस स्त्री को ये मीडिया प्रस्तुत कर रहा है वह वास्तव में उपभोक्ता है या उपभोग्य ! अपने स्त्रीत्व  और अस्मिता से जुड़े सवालों से हर दिन जूझती स्त्री  को लम्बे संघर्ष के बाद जो थोड़ी सी आज़ादी मिली है उसके प्रति और भी सतर्क होने की जरूरत है। इस पूरी बाज़ारवादी संस्कृति को संचालित करने वाली षड्यंत्रकारी पुरुषसत्ता के इरादों को समझना होगा।  यह भी ध्यातव्य है कि यह वही पुरुषवादी मानसिकता है जिसने सदियों तक स्त्रियों को ‘पर्दे’ में रखा और अपनी सुविधा के लिए ‘पर्दे’पर ले आई। स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुषों द्वारा निभाई जाती थी क्योंकि उस समय स्त्रियों के लिए अभिनय, संगीत, नृत्य व कला से जुड़ना लज्जा का विषय था। फिर क्या कारण रहे कि उसी स्त्री को ‘प्रोडक्ट’ की तरह पेश करते हुए विचार नहीं किया गया। संभवतः यहाँ सारा खेल धन और बाज़ार की ताक़त का है।

विज्ञापन संस्कृति में पुरुष मानसिकता और स्त्री की बदलती मानसिकता के विषय में प्रभा खेतान लिखती है, ‘…..पृष्ठभूमि में व्यापक स्तर पर स्त्री-देह का, उसके कपडों एवं सौंदर्य प्रसाधन का विज्ञापन इस पूर्वानुमति तथ्य पर आधारित है कि वास्तव जगत् की स्त्री देह में ही कोई कमी है, इसलिए इन प्रसाधनों, कपडों एवं डाइटिंग से इसे भोग के अनुकूल बनाया जाना चाहिए।

चूंकि दुनिया और समाज में , पुरुष की नजरों में वह सुन्दर लगे, यह जरूरी माना जाता है। यहां स्त्री व्यक्ति के रूप में भी बार-बार अदृश्य पितृ-सत्तात्मकता के प्रभाव में दूसरे व्यक्ति के संदर्भ में स्वयं को प्रस्तुत करती है। इसमें शायद कुछ सच्चाई और तथ्य भी है, कारण, स्त्री जानती है कि आधी लडाई, वह अपनी देह के स्तर पर जीत ही जाएगी….।’ (उपनिवेश में स्त्री)
नई व आधुनिक स्त्री की जो परिभाषा मीडिया गढ़ रहा है वह वास्तव में भ्रमित करती है,उसी का परिणाम है कि आज स्त्रीविषयक समस्याएँ तो बढती जा रही हैं किन्तु उनका सुनिश्चित समाधान नहीं मिल पा रहा है। मीडिया वर्तमान में एक ऐसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरकर सामने आया है जो युवा पीढ़ी में जीवन मूल्यों, आदर्शों एवं नैतिक गुणों को गहराई से प्रभावित कर रहा है। उसके पास ऐसी ताकत है जो समाज में व्याप्त बुराइयों और कुरीतियों को नकारात्मक परिणाम के साथ प्रस्तुत कर सजगता बनाए रख सकता है। किन्तु स्थिति यह है कि मीडिया ख़ालिस बाज़ारवाद के रंग में रंगा हुआ है और यह समझ पाना कठिन हो गया है कि यदि मीडिया बाज़ार है तो विचारणीय है कि बेचा क्या जा रहा है।

मीडिया व स्त्री-समाज दोनों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी। सतर्क होना होगा कि यदि स्त्री इस चमक-दमक व उपभोक्तावादी संस्कृति में खो गई तो नारी-मुक्ति स्वप्न अधूरा ही रह जाएगा। उसे तय करना होगा कि वह वस्तु या उत्पाद बने रहना चाहती है या सृजनशील मनुष्य ! यही निर्णय उसका भविष्य तय करेगा।

अपने ही पराभव का जश्न मनाती है स्त्रियाँ ! ( दुर्गा पूजा का पुनर्पाठ )

नौ दिनों में दुर्गा की पूजा के बाद 10 वें दिन रावण की ह्त्या और विजयादशमी का उत्सव मनाना शाक्त परम्परा पर वैष्णव साम्राज्यावाद से ही संभव हुआ होगा , जो तथाकथित समन्वय के रूप में ‘हिन्दू धर्म’ की ताकत के रूप में प्रचारित हुआ है. यह ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व का  भी आख्यान है . ब्राह्मणवादी मिथों ने ‘गणनायिकाओं’ को अपमानित करते हुए उन्हें उनके अपने ही लोगों , मसलन महिसासुर आदि से टकराते हुए दिखाकर  ‘देवियों’ का स्वरुप दे दिया -क्रूर और वीभत्स.  आज स्त्रीकाल में चर्चित मराठी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता नूतनमालवी का यह लेख विशेष पठनीय है. इस लेख में  राम के विजय-अभियान में स्त्रीगणों, शूर्पनखा , ताडका आदि की ह्त्या का पुनर्पाठ संभव है. समझना होगा कि भारत की बहुसंख्य आबादी ( दलित -बहुजन -स्त्री ) कैसे अपने ही पराभव का उत्सव मनाता है , यह सांस्कृतिक अनुकूलन है. स्त्रीकाल की ओर से धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस की शुभकामनायें ! 
                                                                                                         संपादक

दशहरे के पहले नवरात्रि का उत्सव- दुर्गा देवी का उत्सव, एक देशव्यापी उत्सव है. ब्राह्मण मिथों और इतिहासबोध से संचालित मीडिया और अन्य स्रोत आम मानस में नवरात्रि के ब्राह्मणवादी इतिहास/ मिथकीय इतिहास को प्रचारित –प्रसारित करती रहते हैं, हालांकि यह इतिहास का विकृतिकरण है। दुर्गा महिषासुर को मार रही है- शेर पर बैठकर, उसके गले में मुंडकों की हार है,  लेकिन मुद्रा शांत-बड़ी शांति से महिषासुर को मार रही है। यह प्रतिमा क्या दिखाती है? शांत चेहरा, और काम मारने का !

देवियों की हमारी गणपरंपरायें है । लेकिन उसे ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व के कारण एक दूसरा ही रूप दे दिया गया है.  ‘लोकप्रभा’ नामक प्रसिद्ध मराठी पत्रिका और ‘आजकल’ नामक पत्रिका नवरात्रि स्पेशल इशू लेकर आई है । दोनो में बड़ी रोचक कहानियाँ मिलीं। ‘आजकल’ मे महाराष्ट्र के देवीयों की  ‘पीठ’ का उल्लेख है। लिखा है – देवी भागवत के अनुसार आदिशक्ति  के रूप के देवियों की 51 पीठें  (स्थान, धर्मपीठ, धार्मिक स्थल) हैं, उन्हें  कहा शक्तिपीठ कहा जाता है. उनमें 1 पाकिस्तान में, 1 बांगलादेश में, 1 श्रीलंका में, 1 तिब्बत में, 2 नेपाल में और 42 शक्तिपीठ भारत में हैं. बचे हुए 3 शक्तिपीठो के बारे मे जानकारी नहीं। कोल्हापुर या करवीर की महालक्ष्मी के  विदर्भ में माहुर की रेणुकामाता के , तुळजापूर की तुळजाभवानी और विदर्भ में चंद्रपूर के पास के वणी गाँव की – महिषासुर मर्दिनी, सप्तशृंगी देवी आदि के दूसरे नामकरण किये गये हैं . इन तीनो पीठों के साथ नाशिक की सप्तशृंगी देवी को ब्रम्हस्वरूपपीठी कहा जाने लगा है । इन देवियों के अनेक नाम रखे गये हैं – जैसे त्रिगुणात्मक महाकाली, महालक्ष्मी , महासरस्वती, जगदंबा, अंबा आदि फिर इन देवियों के मिथकीय आख्यान रचे गये । देवी को अठारह भुजावाली, सिन्दूर से भरी हुई, रक्तवर्ण, की आठ फुट की मूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. बताया गया की इस देवी को सभी देवों ने (भगवानो ने) मिलकर शस्त्र दिये – ताकि वह महिषासुर से लडे। लेकिन यह ब्राह्मणों का रचा मिथकीय आख्यान है।

प्रा. नीरज सालुंखे (लोकायत प्रकाशन, संस्करण, दिसंबर 2002)  देवियों को गणनायिकों के रूप में व्याख्यायित करते हुए कहते हैं,  ‘भारतीय इतिहास में पुरातन साधनों का बड़ा महत्व है, उसके आकलन के लिए भारतीय साहित्य और मिथकों की ¼Myths½ तरफ जाना पड़ता है। मूलनिवासी एशियाई जनों का कर्मकांड (Rituals) खुद को आवश्यक लगे वैसे स्वीकार करके आक्रामक आर्यो ने अर्थर्ववेद लिखा। मूलतः भटके आर्य एक प्रगत संस्कृति की तरफ आये थे। इस प्रगत हडप्पा संस्कृति के नियमों की, जीवन पद्धति की समझ उन्हें नहीं थी। इसलिऐ उन्होने अपनी प्रथा-परंपरायें रचित करते वक्त हडप्पा संस्कृति की बहुत सी बातें उधार ले ली। इन प्रतीकों को उन्होंने नई परंपराओं  में अपमान, तुच्छता पूर्वक रखा.  उनके प्रति क्रूरता की भावना, बेतुकी कहानियाँ, द्वेष निर्माण करनेवाली बातें रखी। ऐसे ही वेद की रचना की है।’’ लेकिन नकल की लिखी हुई बातें और मूल बातें अस्पष्ट रूप से तो अपनी मूल कहानियाँ बताती ही हैं ……।

‘‘निर्ऋती नामक गणनायिका के बारें में भी आर्यो ने ऐसा ही किया है, यह बात इससे साबित होती है। निऋति , एक कृषिदेवता मानी जाती है, वैदिकों ने इसे बहुत घृणा से देखा है। अमरकोष निर्ऋति को नरक देवता मानता है। विंध्य प्रदेश के दक्षिण के प्रदेश को तिरस्कार से पाताल, या नरक माना जाता था। इस अर्थ से दक्षिणात्य लोक नरक में रहते है।’’ का. शरद पाटील नरक का अर्थ ‘नर गण’ के अपत्य (संतान ) के रूप में करते हैं. इसका मतलब मूळनिवासी भारतीय ‘नर’  नाम से जाने जाते थे, बाद में नरक शब्द का अर्थ ‘पापियों का मृत्युलोक’ ऐसा कर दिया गया ।

निर्ऋति का पिशाचों से नजदीक का संबंध है । महाराष्ट्र के सातवाहन वंश के दौरान की भाषा पैशाची थी। उस वक्त महाराष्ट्र के लोग पिशाच नाम से पहचाने जाते थे और प्रथम भूत, यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि नाम से भी. वैदिक ब्राह्मण निर्ऋति का द्वेष करते थे, साथ मे उसका दहशत, डर भी रखते थे। निर्ऋति के साथ यम का उल्लेख आता है, क्योंकि यमराज नरक का प्रमुख है, निर्ऋति, यम, रेडा, उल्लु, वराह इन सबकी प्रतिष्ठा- हनन की गई है। रेडा मतलब महिष। इस प्राणी का खूब तिरस्कार किया गया है। डी.डी कौसंबी भी निर्ऋति को मृत्युदेवता मानते है। जैन कल्पसूत्र बताता है कि महावीर का निर्वाण त्रिर्ऋती अमावस के दिन हुआ, वह उनके लिए सबसे पवित्र है। हडप्पा संस्कृति के अब्राह्मण मूल निवासी जैनों ने निर्ऋति का महत्व रखा है, वह अब्राह्मण की देवता लक्ष्मी है। निर्ऋती का खेती से धनिष्ठ संबंध है, उसे काली माँ, भूमिदेवता माना जाता है, उसके साक्ष्य मिलते है। वह वनस्पति सृष्टि -निर्मात्री थी। इसलिए उसका रूप पृथ्वी का है- शतपथ ब्राहमण में यह लिखा है।

निर्ऋति की पूजा एक आकारहीन पत्थर के रूप में होती थी। उसको सुफलता की देवी (Harvest Goddess)  भी माना जाता था। उसका खेती के साथ का संबंध वैदिक छिपा नहीं सके। ‘क्षत्रीय’ शब्द  क्षेत्र, मतलब ‘हल’ से बना है , यह स्थापना प्रो. निरज साळुंखे की है. काॅ. शरद पाटिल, ‘अब्राह्मण साहित्य का सौदर्य शास्त्र’ में लिखते है,  ‘‘सच तो ऐसा है कि अथर्ववेद को ‘क्षत्रवेद’ या ‘स्त्रीवेद’ कहना और वेदोत्तर वाङ्मय को ब्राह्मण कहना, इसमें ही भारत के दो युग दिखाई पड़ते है। उपनिषदीय अध्यात्मवाद के निर्माता क्षत्रिय राजर्षि उनके परतत्व को वैश्वानर, और विज्ञानमय पुरूष कहते थे, ‘ब्रह्म नही’. पंचाल का दार्शनिक राजर्षि प्रवाहन जैवालि , उद्यालक आरूणी इस महाश्रोत्रिय ब्राह्मण  को निःसंदिग्धता से बताता है कि सारे लोगों में आदिम शासन क्षेत्रों का, मतलब स्त्रियों का था। , (पृष्ठ 104)

इसका मतलब निर्ऋति,  दुर्गा या अंबा (निर्ऋति नतिनी)  नामक स्त्री शासकों का स्वतंत्र राज्य था। यह वैदिकों को स्वीकार्य नहीं था। दुर्गा का स्थान आज हमे यह बताता है कि स्त्री-सत्ताक व्यवस्था थी। इसका निर्देश हमे आज के नये ग्रंथ ‘‘दासशुद्रोंकी गुलामगिरी’’ काॅ. शरद् पाटील, ‘रामायण महाभारत का वर्ण संघर्ष’ – काॅ. शरद् पाटिल, ‘^ Myths & Reality *’ डी.डी.कौसंबी, ‘आर्टीकल आफ तुळजाभवानी’ – राजकुमार घोगरे, प्रा. नीरज सालुंके का – ‘दैत्य बली और कुंतल देश महाराष्ट्र’, डाॅ. आ. ह. सालुंखे  के ‘बलिराज्य’ और ‘‘गुढी और शिव पार्वती’ आदि में दिखाई देता है।

प्रारंभिक दिनों में स्त्रीप्रधान राज्य थे। सिंधु नदी के आसपास गणनायिका निर्ऋति का ( दुर्गा जिसकी नतिनी थी ) , यमुना नदी के पास उर्वशी का, नर्मदा नदी के पास ताटिका (ताड़का)  का, गोदावरी नदी के पास शुर्पनखा का (रावण की बहन), पंचगंगा नदी के पास अंबा का, तेरणा मांजरे नदी के पास में तुळजा का राज था। निर्ऋति ने खेती की खोज की, उसने पानी के बाँध की योजना बनाई. क्योंकि उस वक्त खेती और पशुपालन ही मुख्य निर्वाह का साधन था, देव राजा इंद्र उसे परेशान करके बांधों को तोड़ डालता था। हाथों की ऊँगलियों से अनाज साफ करने वाली किसान रानी शुर्पनखा नाशिक की आज की सप्तशृंगी देवी मानी जाती है। मावलाई ( देवी) से मावला शब्द आया, जो शिवाजी राजा के सैनिक ‘मावले’ थे । – तुला यानी गिनना। अपने राज्य में समभाव से सब को गिनने वाली तुळजा-भवानी, जो राजा शिवाजी की प्रेरणास्थान रही हैं, ये सब गणनायिकायें थीं- पराक्रमी महिलायें थी। उन को वैदिकों ने तुच्छतापूर्वक दिखाया है, क्योंकि उस वक्त स्त्री का राज था, स्वैर संभोग था, सब जगह स्त्री का अधिकार चलता था।

‘महाकाव्यकालीन (इसवी पूर्व 1000 से 800 तक) गणराज्यों में अपत्य (संतान) का वर्ण पिता पर नहीं,  माता पर निर्भर था। (क्षत्र )  (6-4.171) यह नियम तत्कालीन भाषा का था।’ (पुस्तक – अब्राह्मण साहित्य का सौदर्यशास्त्र का. शरद पाटील पृ. 105 ). बाद में महाभारतोत्तर गणराज्य में अपत्य का वर्ण पिता से जुड़ना शुरू हो गया। फिर स्थित्यंन्तर के कारण ‘ब्राह्मोजातो ’ (6.4.179) नियम उस वक्त के भाषा का है।‘ का. पाटील, ‘समग्र स्वातत्र्य व समता’,  में स्त्रीसत्ता केस्वातंत्र्य के बारे में कहते है, ‘खेती की खोज स्त्रियों ने की । यही कारण है कि दुनियाभर के आद्य कृषक समाज स्त्रीसत्ताक थे। और गणसमाज का प्रारंभ भी स्त्रीसत्ताक व्यवस्था से हुआ। (का. शरद् पाटील, स्त्री राज्य, नवभारत, सितम्बर –अक्टूबर , 75, दासशुद्रोंकी  गुलामगिरी, भाग 1, पृ. 135- 179) अब राबर्ट ब्रिफा, डब्ल्यू. राबर्टसन स्मिथ, जार्ज थामसन आदि ने यह सिद्ध किया है कि’ स्त्रीसत्ताक गणसमाज में स्त्रीवर्ण उत्पादक, शासक और पुरोहित था इसलिए वह स्वतंत्र था। (यहाँ मुक्त संभोग था, जिसपर सम्राट अशोक ने पाबंदी लगाई). लेकिन पुरूषवर्ण अनुत्पादक – अशासक – अपुरोहित था, इसलिए राजकीय दृष्टीकोण से परतंत्र था। लेकिन यह समाज अतिरिक्त उत्पादन न कर सकने के कारण, खेती या शिकार या युद्ध आदि से से मिले हुऐ ‘गणधन ’ को कुल के ज्ञाती माता या गणराज्ञी स्त्री पुरूषों में समान बॅटवारा करती थी । इस तरह आर्थिक समता तो थी , लेकिन स्त्रीवर्ण का स्वातंत्र्य और पुरूषवर्ण का पारंतत्र्य का द्वैत भी बनता गया. इसी द्वैत से स्त्रीसत्ताक पद्धति का अभ्युदय हुआ . स्त्रियो की गणराज्ञी का रूप सामने आता है – निर्ऋति, दुर्गा, रोहिणी, उषा, उर्वशी, सात जलदेवता (सातीआसरा) आदि भूदेवता /कृषकमाया/आदिमाया हमे हमारी परंपराओं में दिखती हैं।

Excavations at Harappa M.S. Vats, Seal 25 के अनुसार हडप्पा की खोज मे सात स्त्रीमूर्तियाँ एक साथ दिखती है, वेरूळ  ¼Ellora Dist. Aurangabad½ में भी दिखती हैं। इन्हें  कृतिका नक्षत्र के रूप में ‘साती आसरा’ (सप्त जलदेवता),  सप्तकृतिका या स्कंदमाता भी कहा जाता है। इन सप्तमूर्तियों की ग्रामीण स्त्रियाँ आज भी पूजा करती हैं . इनके बारे में महात्मा फुले ने भी बताया है। घटस्थापना, जो दुर्गा पूजा के वक्त होती हे, उसका संबंध स्त्री के गर्भ के साथ जुडा हुआ है। जब स्त्रीसत्तात्मक समाज में  मुक्त स्त्री- पुरूष संबंध थे,  तो स्त्री का गर्भाधारण होना महत्वपूर्ण माना जाता था। प्रजनन के कारण स्त्री को अलौकिक, प्राकृतिक शक्ति वाली महानदेवी माना जाता था, आगे चलकर स्त्रियों की इस शक्ति की पूजा होने लगी। स्त्री कि इस नैसर्गिकता का गण समाज ने सम्मान किया था उसे श्रेष्ठपद देकर गणनायिका, मुख्य रानी के स्थान पर रख दिया। यह परम्परा  में स्त्री –गर्भ की पूजा के साथ निरंतरता में बनी हुई है. भूमि में बीज डालने पर जो बीज अंकुरते हैं , उसे गणसमाज नैसर्गिक शक्ति मानता था, जिसे वे स्त्री के गर्भधान से जोड़कर देखने लगे और इस तरह भूमि और स्त्री के सम्मान की परंपरा रूढ हो गयी, स्त्री शासक उत्पादक, पुरोहित बनती गयी। आज हमने इसका स्वरूप सिर्फ कर्मंकांड तक रखा. लेकिन गणसमाज -असुर, पिशाच, राक्षस गण स्त्री को वास्तविक सम्मान देता था.  इस प्रकार देवियों का उद्भव हुआ । डाॅ. आ. ह. सालूंखे ने ‘गुढी और शंकर पार्वती’ में लिखा है कि ‘‘पार्वती का संबंध दुर्गा से है । इसके लिए उन्होने अनेक कथाओं का, पुराणों का संदर्भ दिया है – ‘देवी भागवत’ में (संपादक पं. श्री रामतेज पाण्डेय प्रकाशन चैखाबा विद्या भवन चौक वाराणसी 221001 (अध्याय 14-25) मे देवी के नवरात्र के बारे मे आयी हुई कथा ध्वजोत्सव के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।  देवी पुराण में चैत्र, अमावस और प्रतिपदा का दिन देवी के नवरात्र उत्सव का बताया गया है। दक्षिण भारत में फाल्गुन अमावस में देवी व्रत करते हैं, उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास के दूसरा दिन , चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को चैत्र नवरात्र शुरू करते है। डा. सालुंखे  महाराष्ट्र मे मनाये जाने वाले गुढीपाड़वा नामक त्योहार में गुढी के रूप में पूजी जाने वाली देवी को देवी पार्वती मानते हैं । वे दुर्गादेवी को भी पार्वती मानते है। हमारे समाज में शंकर (शिव) पार्वती को सृष्टिकर्ता और जगन्माता माना जाता है। gSA Dr. Ambedkar, ‘Riddles in Hinduism’ में लिखते हैं , ^Let as take the case of shiva. That shiva was originally an Anti-vedic god it is abundantly clear.* There can be no better evidence to prove that shiva was an Anti-Vedic god than his distruction of Daksha’s Yajna  ( पेज 85)
प्रसिद्ध मराठी लेखक डाॅ. रा.चि. ढेरे ने ‘लज्जागौरी’ (श्री विद्या प्रकाशन, पुणे प्रथमावृत्ति  जून 1908 पृ. 19) में देवी के बारे में लिखा है, ‘ शक्त्यु उपासना का (शक्ती उपासना का इतिहास), मानव के इतिहास मे अत्यंत प्राचीन है। मानव के प्रथम देव की कल्पना की, फिर उसे पूजा, वह स्त्रीरूप में था। उनकी स्त्री यह सर्जनवादी , गहन गूढ शक्ति धारण की हुई देवी रूप में थी। वह मानवइतिहास की आद्य शक्ति है, उसे मानव ने स्थान दिया अलग रूपों में देखा। अलग नामों में डाला, उसकी अलग अलग प्रकारो से भक्ति की। अलग- अलग शक्ति उपासना का इतिहास खोजनेवाले को अलग- अलग दृष्टि  इसकी खोज करनी चाहिए। मानवी जीवन के अलग अलग प्रवाह रास्ते – झुकाव पडाव खोजने  चाहिए। शाक्तपंथ का इतिहास सब जगह खुला है। शाक्त सिर्फ तांत्रिक पंथो तक नहीं, भारतीयों के जीवन में व्याप्त है। अपने साहित्य के ऋग्वेद आदिति से आज दरवाजे की चैखट पर लिखे गीत- गान में भवानी, रेणुका आदि शक्तियों की महानता का वर्णन मिलता है. सिंधु नदी के पास मिली मातृमूर्तियाँ आज भी गावों में प्रभावशाली ग्रामदेवता मानकर पूजी जाती हैं।’’

अनेक विद्वानों ने अलग –अलग समय पर नवरात्र और देवियों के प्रति श्रद्धा पर लिखा है.महात्मा  जोतीबा फुले ने सत्यशोधक विवाह पद्धति में आशीर्वाद की यह व्यवस्था दी है .
वर कन्या हैं ये इन्हे भव्य शक्ति देने
समर्थ है वह दुनिया को बनाया जिसने।।
सुबुद्धि ज्ञान बल और वैभव मिलता ।
दया सब उसी के कृपा से होता ।।
मन में स्वकर्ता का सही स्मरण करो।
बली कुलस्वामी का ध्यान करो।।
वैसे ही विंध्यावली स्वामिनी को
स्मरण करो अपने काल भैरव को।
खंडेराव चाहिऐ तुम्हारी याद मे।
श्रद्धा अर्पित करो महिषासुर में।
न्यायकर्ता था जो नौखंडो का।।
सुखका कारण है स्मरण उसका
म. फुलेने तर सत्यशोधक विवाह पद्धति म. फुलेरचनावली खंड 2 पृ. 84)
इस प्रकार फुले का आशीर्वाद भी महिषासुर और दुर्गा में श्रद्धा अर्पित करने लिए कहता  है।

फुले कहते हैं कि वधु- वर को शक्ति देने के लिए – बळीराजा, विंध्यावली स्वामिनी यानी दुर्गा, कालभैरव, खंडेराव और महिषासुर को याद करो, वह नौखंडो के न्यायकर्ता हैं।

डा. साळुंखे यह मानते हैं कि चैत्र मास मे शुरू हुआ यह उत्सव,  जिसे गुढ़ीपाडवा, नवरात्र या शिवर्पावती का विवाह मिलन आदी अन्य परंपराओ में देखा जाता है,  बहुत  प्राचीन है। यह अब्राह्मण  संस्कृति  से आया है . फिर रावण जलाना या महिषासुर को मारते हुए देवी को दिखाना विकृति है. यह विकृतिकरण ब्राह्मण मानसिकता से हुआ है, यह स्पष्ट है.

त्योहारों के बहुजन सन्दर्भ

नूतन मालवी 

त्योहारों का सांस्कृतिक महत्व है.  वे भाईचारे, प्रेम व एकता के प्रतीक माने जाते हैं.   इनमें से कई सिन्धु घाटी की सभ्यता के काल के, बौद्धकालीन व  अब्राह्मण  परंपरायें हैं. इन त्योहारों में हम प्रकृति,  पशुओं, वृक्ष आदि के प्रति अपनी कृतज्ञता  व्यक्त करते हैं। लेकिन आर्यों व ब्राह्मणों ने इन त्योहारों पर वैदिकता थोप दी. इतिहास में जाकर  खोज की जाए  तो उसके अवशेष हमें मिलते हैं, जो धीरे-धीरे ब्राह्मण अपसंस्कृति के शिकार हुए.  इस लेख में हम दोनों तरह से तीन त्योहारों की चर्चा कर रहे हैं,  उनकी जो बहुजनों के त्योहार हैं और उनकी भी जो बहुजनों के खिलाफ मनाये जाते हैं.  उनसे जुडी मान्यताओं के बहुजन पाठ भी शामिल किये गये हैं.

नागपंचमी : सावन महीने  में आनेवाला नागपंचमी सापों,  नागों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का त्योहार है   इसलिए उस दिन कागज पर नाग की प्रतिमा बनाकर उसे पूजा जाता है और सपेरे नागों का खेल दिखाते है, उन्हे दूध पिलाते हैं. नाग नाम की असुर परंपरा भी है.  यह त्योहार भी उनका है.  इसमें हम पांच नाग के चित्र  बनाते हैं. नाग ‘टोटेम’ रखनेवाले पांच पराक्रमी  नाग राजाओं से संबंधित चलन है यह। उनकी गणतांत्रिक राज्यव्यवस्था थी। अनंत नामक सबसे बड़े नाग राजा का राज्य कश्मीर में था, अनंतनाग नामक शहर उनकी याद दिलाता है।  दूसरा,  वासुधी नामक नागराजा  कैलाश मानसरोवर क्षेत्र का प्रमुख था.  तीसरा नाग राजा  तक्षक था, जिसकी  स्मृति  में (पाकिस्तान में)  तक्षशिला है। चौथा  था नागराज करकोटक और पाचवाँ ऐरावत,  जो रावी नदी के किनारे का राजा था.  इन पाँच नाग राज्यों के गणराज्य एक दूसरे के पडोस मे थे। इनकी याद में यह उत्सव है.  यज्ञवादी लेखकों ने इसे बदलकर सिर्फ साॅंपो की पूजा का  त्यौहार बना दिया।

रक्षाबंधन:  रक्षाबंधन वैदिक संस्कृति और ब्राह्मणों  का त्यौहार है।  पौराणिक  काल में ब्राह्मण , क्षत्रियों को नीले रंग का धागा बांधते थे और ब्राह्मणों की रक्षा का उनसे वचन लेते थे।
येन बद्धो बळी राजा,
दान्वेंद्र्म  महाबली,
तेन त्वां  अहम बद्धामि ,
माचल, माचल माचल …!
बहुजनों के राजा बली का अपमान है यह, जो कहता है कि जिस प्रकार बली राजा को बांधा गया,  वैसे ही तुम्हें बाँध रहे हैं.  यह कब भाई -बहन का त्योहार बना,  इसका कोई पता नहीं है. सन  १९६० के दशक में  एक फिल्म आयी थी,  शायद इसका श्रेय उस सिनेमा को जाता है.

दशहरा: ईसा पूर्व 150 से 100 के कालखंड में रामायण की रचना बताई जाती है। इसकी रचना मौर्य राजघराने की क्रांति के विरोध में प्रतिक्रान्ति का प्रयत्न है.  मौर्य वंश में चंद्रगुप्त, बिन्दुसार, अशोक, कुणाल, सम्प्रति दशरथ, शाली थूक, देववर्म,  शातधना, बृहद्रथ आदि कुल 10 सम्राटो ने बहुजनों की  कल्याणकारी राजव्यवस्था चलायी.  पुष्यमित्र शुंग नामक  कपटी ब्राह्मण  सेनापति ने मौर्य राजघराने के सम्राट बृहद्रथ की ईसा पूर्व 185 में ह्त्या कर दी.  दस मुंह का आदमी – रावण, इन दस मौर्य बौद्धवादी राजाओं का प्रतीक है। दशहरा मतलब दस मुख वाला, हरा मतलब हारा हुआ.  इस प्रकार मौर्य साम्राज्य को नष्ट करने वाले पुष्यमित्र शुंग को राम का किरदार बनाया गया और दशमुखी रावण मतलब इन 10 राजाओं को जलाने की प्रतीकात्मकता खड़ी की गई.

दूसरी ओर आदिवासी समाज में रावण को नायक माना गया है। रायपुर  (छत्तीसगढ़), असम  के मेलघाट में रावण को गोंड राजा मानकर प्रेरणादायी समझा जाता है।  इस पर्व से जुडी विचित्र मान्यतायें भी बहुजनों  के विरोध में बनी हैं, जैसे दशहरा में दशमी के दिन सीमा पार नहीं जाने की मान्यता.  दरअसलए मौर्य राजाओं ने ब्राह्मणों के सीमा-उल्लंघन निषेध को न मानते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार समुद्र के पार तक किया और दशहरा उनकी पराजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है,  इसलिए दशमी के दिन सीमा उल्लंघन निषिद्ध किया गया है.

आज इस मौके पर ‘सेना’  लूटा जाता है। शमी या आपटा नामक वृक्ष की पत्तियाँ प्रतीकत्मक रूप से सोना समझकर एक-दूसरे को दी जाती हैं.  यह वृक्ष औषधि युक्त है। बहुत से रोगों में यह वृक्ष उपयोगी है। अथर्ववेद (7.11.1) में इसके बारे में लिखा गया है कि ‘वैदिक यज्ञ में मंथन करके इससे अग्नि  उत्पन्न की जाती  थी।’लेकिन दशहरे के दिन इस की सारी पत्तियाँ तोड कर पर्यावरण को हानि पहुचाई जाती हैं.

महात्मा जोतिबा फुल नेे, ‘गुलामगिरी’  में इसके बारे में लिखा है। बली को वामन ने (वैदिक ब्राम्हण) ने युद्ध में हरा डाला. इससे वामन मदमस्त हो गया.  फिर बळी की मुख्य राजधानी में कोई भी पुरुष बचा नहीं.  यह देखकर आश्विन शुक्ल दशमी के दिन प्रातःकाल में शहर में घुस कर सब के घरों का सोना लूट लिया गया.  इसे शिलंगणा का सोना लुटना’ कहा गया। जब वह शहर में आया, तो जो एक महिला ने आटे से बनाया हुआ एक बलीराजा दरवाजे के चैखट पर रख दिया और बोली कि ‘देखो हमारा पराक्रमी बलीराजा फिर से आपसे युद्ध करने आ गया है.’  तो उसे पैर से लात मार कर वामन उसके घर में घुस आया. तभी से आज तक ब्राह्मणों के घरों में आटे का या चावल का बळी बनाकर उसपर दायां पैर रखकर  शमी के वृक्ष की टहनी से उसका पेट काटते हैं । फिर घर में घुसते है।

बहुजन महिलायें बळीराजा बनाकर ‘ईडा पिडा यानी द्विजों का (ब्राह्मणो का)) अधिकार जाये और बळी का राज आये का आवाहन करती हैं.  ‘इडा पिडा टले जाऐ और बळी राज आवे’ बोला जाता है.

फॉरवर्ड प्रेस से साभार 
संपर्क : nootan.malvi@gmail.com

रक्तरंजित कहानी महिला प्रतिनिधित्व की

उपेन्द्र कश्यप 


(आज बिहार विधान सभा के लिए चुनाव का प्रथम चरण शुरू हुआ है. इस अवसर 2001 में मारी गई महिला मुखिया की कहानी बता रहे हैं युवा पत्रकार उपेन्द्र कश्यप. यह कहानी महिलाओं की  राजनीतिक भागीदारी के  खिलाफ पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा पैदा की जाने वाले बाधाओं की है , उसकी घबराहट की भी है कि सत्ता में यह भागीदारी उसके अभेद्य किले को ध्वस्त कर देगी. यह कहानी महिला मुखिया के संघर्ष के साथ -साथ सत्ता पर हाशिये के लोगों की दावेदारी की भी बानगी है.  )

चन्दन की उम्र अब करीब 23 साल हो गयी है। उस दिन की याद अब भी उसे रुला देती है,  जब उसकी मां ‘चिंता देवी’ की रणबीर सेना के कथित समर्थकों ने 16 मई 2001 को गोली मार कर हत्या कर दी थी। यह हत्या की मात्र एक घटना भर नहीं थी। इसके पीछे के विचार महत्वपूर्ण है। यह अब तक की एकलौती घटना इस मामले में है कि वह बिहार की पहली ऐसी महिला थीं, जो मुखिया बनने की औपचारिक घोषणा सुनने जा रही थी, और उनकी हत्या सामंती सोच के कारण भूपतियों ने कर दी थी। पिछडी जाति (कुर्मी) की ‘चिंता देवी’ अपने घर ओबरा के चंदा गांव से सज धज कर पूर्वाहन को औरंगाबाद जिला समाहरणालय जा रही थीं । गांव से कुछ ही दूरी पर बधार में हत्यारों ने गोलियों से उन्हें भून  दिया। इन्हें सही अनुमान था कि भूमिहार जाति के पिसाय निवासी सत्येन्द्र पांडेय की पत्नी प्रतिमा देवी का चुनाव हारना तय है। हुआ भी ऐसा ही, किंतु जीत की खबर सुनने से पहले ही चिंता की हत्या कर दी गयी। तब बिहार में त्रीस्तरीय पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू नहीं था। यह व्यव्स्था एनडीए के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2006 के पंचायत चुनाव से लागू की थी – देश में पहली  बार किसी राज्य में स्थानीय इकाइयों में महिलाओं को आरक्षण मिला. इसके पहले बिहार में किसी महिला का मुखिया प्रत्याशी होना आश्चर्य हुआ करता था।

चन्दन को आज भी यह खटकता है कि उसके पंचायत की मुखिया उसकी मां शपथ ग्रहण तक नहीं कर सकी और पिता राम चंद्र सिंह उप चुनाव में मुखिया बनने के बाद 2006 के चुनाव में हार गये और फिर उनकी भी हत्या कर दी गयी। हालांकि इस बात का उसे ही नहीं तमाम पिछडा, अति पिछडा, दलित और महादलितवाद की राजनीति करने वालों को संतोष भी है कि इस पंचायत से कभी सवर्ण मुखिया नहीं बन सका। चिंता की हत्या विशुद्ध तौर पर अगडे बनाम पिछडे की लडाई का परिणाम थी। भूमिहार नहीं चाहते कि इस पंचायत का मुखिया पिछडा बनें और पिछडे नहीं चाहते कि सवर्ण बने। चिंता की हत्या के बाद इस संवाददाता से रामचन्द्र ने तब साफ कहा था कि मेरे जीते जी भूपति अपनी जाति का मुखिया नहीं बना सकते। खुद रामचन्द्र एमसीसी के जोनल कमांडर थे। भूपतियों से होने वाले संघर्ष के कारण ही उन्होंने हथियार उठाया था। उन्होंने तब कहा था कि -“इस क्षेत्र के पिछडे, दलितों एवं हरिजनों का कोई कद्र नहीं रह गया है। पहले पिसाय पुलिस पिकेट (अब नहीं) के सहयोग से हरिजनों, दलितों को वोट नहीं देने दिया गया, फिर उसी के सहयोग से चिंता की हत्या कर दी गयी।“ पिसाय के ही सुशील पांडेय को रणबीर सेना का सरगना कहा जाता था। इस गांव पर भी एमसीसी ने अगडा बनाम पिछडा की लडाई के कारण किया था। इनकी हत्या भी पिछडों ने ही किया। हत्या के बाद पहुंचे केन्द्र में मंत्री गिरिनाथ सिंह ने उसे शांतिवादी कहा था। इस पंचायत में अगडा बनाम पिछडा की लडाई जबरदस्त चलती है। आज भी स्थिति बदली नहीं है। रामचन्द्र सिंह को उन्हीं के गुट का माने जाने वाला रामनगर निवासी रंजीत राजवंशी ने 2006 के चुनाव में हराया और फिर 2011 में भी वही मुखिया बना। अपने भाई की हत्या के मामले में वह गत कई महीने से जेल में है। इलाके के लोग आज भी यह तय मानते हैं कि इस लडाई में कभी भी अगडा को इस पंचायत का मुखिया नहीं बनने दिया जायेगा, भले ही कम पसन्द पिछडे दलित किसी व्यक्ति को ही क्यों न मुखिया बनाना पडे।

बिहार में जून 2012 में पटना जिला की गोरखारी की मुखिया बेबी देवी की हत्या की गयी थी। उसे पद छोडने की धमकी उसी से पराजित संगीता देवी के पति , अपराधी से राजनीतिक मुनाफाखोर बने रणविजय प्रताप उर्फ बबलू ,  ने दी थी। मारे जाने के डर से ही अपने पंचायत से 28 किलोमीटर दूर कुरथौल में वह रह रही थी किंतु तब भी जीवन नहीं बचा सकीं। 15 दिसंबर 2013 की रात को भोजपुर जिले के उदवंतनगर थाना क्षेत्र में अज्ञात अपराधियों ने महिला मुखिया चंपा देवी की गला दबाकर हत्या कर दी। राज्य में अभी तक कुल 33 मुखिया की हत्या की गयी है। राज्य में 2011 के अनुसार कुल 8,463 ग्राम पंचायतों में से 3,784 ग्राम पंचायतों में मुखिया का पद महिलाओं के लिए आरक्षित है। अगले साल 2016 में फिर चुनाव होन है तब भी यह संघर्ष चलेगा किंतु स्तर क्या होगा, तनाव कितना  होगा, यह देखना दिलचस्प हो सकता है।

संपर्क : 09931852301

बहन के नाम राजनीतिक पत्र

संजीव चंदन


प्रिय बहन, 
मुझे याद है कि तुम कितनी खुश थी जब उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय के हॉस्टल में तुम्हें प्रवेश मिला था. 21वीं सदी के दूसरे दशक तक भी तुम्हारे खिलाफ कितना विपरीत माहौल था, कितने अकाट्य से दिखते तर्क थे तुम्हारे हॉस्टल में न जाने के. पिता और मां तुम्हारी सुरक्षा के तर्कों के साथ चिंतित थे और तुम्हारे भविष्य के खिलाफ चिंतित अभिभावक की सहज मुद्रा में चट्टान से खड़े थे. बड़ी मुश्किल से वे माने और तुम घर से पहली बार अपनी स्वतन्त्रता और अपने चुनावों के साथ बाहर निकल सकी. तुम्हारी आँखों में चमक देखकर मैं प्रसन्न था, तुम्हारे भीतर अचानक आत्मविश्वास की आभा दिखी , अब तुम कुछ निश्चित दायरे में ही सही लेकिन स्वतंत्र जीवन के प्रति आश्वस्त थी.

बहन, इसके पहले भी तुम कितनी खुश थी, जब सायकल पर चढ़ कर सहेलियों के साथ अपने स्कूल के लिए निकली थी. तुम्हारे किशोर होती आकांक्षाओं को सायकिल के पहिये के आकार के पर लग गये थे. बाहर का समाज इस दृश्य के लिए तैयार नहीं था- मिश्रित प्रतिक्रियाओं ने तुम्हारा स्वागत किया था बाहर- कुछ को लगा ‘घोर कलियुग’ आ गया है तो कुछ मन बनाने लगे थे तुम्हारी शिक्षा के अधिकार के प्रति सहज होने के लिए , कुछ प्रसन्न थे कि अब बेटियाँ गहरे आत्मविश्वास से भरकर स्कूलों में जा रही हैं. बड़ी मुश्किल डगर रही है तुम्हारी शिक्षा की. तुमने सावित्री बाई फुले के बारे में पढ़ा ही होगा. पहली बार तुम्हारे लिए पाठशाला खोलने में उन्हें कितनी कठिनाइयों का सामना करना पडा था- स्कूल के लिए जाते वक्त उन पर गोबर और कीचड फेके जाते थे- 1848 से 2015 तक समाज बहुत कुछ बदला है,  तो बहुत बदला भी नहीं है – यह तुमसे बेहतर कौन जानता होगा.

बहन, आजकल चिंता से भर गया हूँ और मुझे लगता है तुम भी चिंतित होगी.  बहुत कुछ बदल रहा है न बहन तुम्हारे आस –पास. मैं समझता हूँ कि तुम भी चिंतित हुई होगी नरेंद्र दाभोलकर , गोविंद पंसारे और एम.एम कलबुर्गी की हत्याओं की खबर से. मैं जानता हूँ कि तुम बहुत परेशान हुई होगी दादरी में मारे गये अख़लाक़ के बारे में जानकर कि कैसे पास –पड़ोस के लोग एक हिंसक भीड़ में बदल गए,  उसके खिलाफ- गोरक्षा के भावनात्मक आवेश से भरी भीड़ में. तुम तो चीटियों को भी मारने पर चिल्लाती रही हो न बहन ! विषाक्त होता माहौल तुम्हारे खिलाफ भी एक षडयंत्र सा है, क्योंकि सुरक्षा की चिंता से भरा समाज सबसे पहले अपनी स्त्रियों की स्वतंत्रता को ही ख़त्म करता है. तुम कितना डर गई होगी , जब देश के संस्कृति मंत्री ने अख़लाक़ की ह्त्या के दोषी भीड़ के चरित्र को प्रमाणित करने के लिए यह वक्तव्य दिया कि ‘ भीड़ ने उसके घर में मौजूद 17 साल की लडकी को कुछ नहीं किया.’ मैं समझता हूँ कि तुम्हारा रोम –रोम काँप गया होगा, तुम भयभीत हुई होगी, उस दिन से भी ज्यादा, जब दिल्ली और मुम्बई में सामूहिक बलात्कार की घटनाओं की खबर तुमने पढी होगी , टी वी पर देखा होगा.

बहन, बड़ी मुश्किल से मिली आजादी को खोने का डर समझा जा सकता है. अभी ही तो तुम हॉस्टल में आई थी और अभी ही तुम्हें देश का संस्कृति मंत्री ड्रेस कोड बता रहा है , ‘नाईट आउट’ का बेहूदा विमर्श कर रहा है. कितना अपमान जनक लगता होगा तुम्हें , जब कोई कैमरा तुम जैसी लड़कियों की इजाजत के बिना तुम्हारी तस्वीरें ले रहा होता है ताकि तुम लड़कियों को यह बताया जा सके कि कौन सा कपड़ा भारतीय संस्कृति के अनुरूप है और कौन सा खिलाफ.

बहन, तुम खूब समझती होगी कि वह कौन सी राजनीतिक जमात है , जो तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारे अस्तित्व के खिलाफ सामाजिक –सांस्कृतिक दर्शन को बढ़ावा देती है. अभी –अभी तो तुम हॉस्टल में रहने आई हो , और अभी ही तुम्हारी सुरक्षा के नाम पर कैम्पस में सी सी टी वी कैमरे लगाये जा रहे हैं. ये सी सी टी वी कैमरे नहीं ये वे दृश्य आँखें हैं , जो यह मानती हैं कि तुम स्वस्थ निर्णय नहीं ले सकती , इसलिए कि तुम लडकी हो, इसलिए कि उनकी किताबों में ‘त्रिया चरित्र’ के बकवास को दार्शनिक और मिथकीय आधार दिया गया है. तुम इस फर्क को तो समझती ही होगी कि कैसे दो सालों के भीतर ही विश्वविद्यालय कैम्पस में ‘ जेंडर संवेदित’ माहौल बनाने के प्रयास को लड़कियों के ऊपर पहरेदारी में बदल दिया जाता है. तुम खूब समझती हो कि लड़कियों को सुरक्षित वातावरण देने के लिए 2013 में यू जी सी के द्वारा विश्वविद्यालयों को जारी निर्देश 2015 में किन राजनीतिक समझदारियों से लड़कियों को सुरक्षित करने यानी पहरेदारी में रखने , या जेल जैसी व्यवस्था में घेर देने के निर्देश में तब्दील हो जाता है. तुम देख ही रही हो देश भर में तुम्हारी सहेलियां किस तरह इस निर्देश का विरोध कर रही हैं. तुम्हारे विश्वविद्यालय से ऐसे किसी विरोध की खबर नहीं आई है , यह थोड़ा चिंतित करता है.

बहन,  यह अराजनीतिक होने का समय नहीं है. यह समय है यह समझने का कि कौन सी जमातें तुन्हें फिर से उन्हीं घरों में कैद करना चाहती हैं , जहां से तुम निकलने के प्रयास में हो, अपना जीवन जीने के लिए तैयार हो रही हो. समाज में जब तर्क –विवेक का गला घोटा जाता है , माहौल में तनाव और अशांति का वातावरण बनता है तो उसका सबसे बड़ा असर महिलाओं पर ही होता है. तुम देख रही होगी कि ‘ नार्यस्तु यत्र पूज्यन्ते’ का जाप करने वाली जमात ही फिर से एक बार तुम्हारे खिलाफ उद्धत है.

बहन,  अभी जो कुछ हो रहा है , जो वातावरण बनाया जा रहा है , उसका सबसे बड़ा नुकसान तुम्हें ही उठाना होगा. अभी तुम्हारे लिए अपने राज्य में ही 35% आरक्षण की पहल हुई है , इस दिशा में की गई पहलों को अभी कुछ ही साल बीते हैं. तुम्हारे लिये नौकरियों में 50% के आरक्षण की पहल ने असर दिखाना शुरू ही किया है कि तुम्हारे खिलाफ एक राजनीतिक षड्यंत्र शुरू हो गया है. अभी तो 33% आरक्षण की लड़ाई बाकी है , लेकिन आरक्षण विरोधी वातावरण बनाने लगी है एक जमात. अभी न पढ पाने वाली लड़कियों की जमात पढ़कर आगे आने ही लगी है और आरक्षण के समतावादी सिद्धांत और व्यवस्था का लाभ लेने की स्थिति में पहुँच ही रही है कि आरक्षण के खिलास अलग –अलग सुर बनाये जाने लगे हैं. बहन तुम्हारा क्षद्म सामाजिक पोजीशन कुछ ऐसा है कि आरक्षण के खिलाफ तर्क तुम्हें आसानी से झांसे में ले लेते होंगे , लेकिन अपने लिए हो रहे आरक्षण प्रावधानों के फायदे के नजरिये से देखोगी तो तुम्हें आरक्षण के खिलाफ बनाये जा रहे माहौल के पीछे का षड्यंत्र भी दिखेगा. तुम देख सकोगी कि तुम्हारी स्वतंत्रता के खिलाफ लगी जमातें, तुम्हारे लिए ड्रेस कोड बनाती जमातें, तुम्हें विश्वविद्यालय कैम्पसों में भी कैदखाने में रहने को मजबूर करने वाली जमातें और आरक्षण विरोधी जमातें कैसे एक ही चेहरे वाली हैं , एक ही राजनीतिक स्कूल से प्रशिक्षित हैं.

बहन , एक वाकया बताऊँ अपने विद्यार्थी दिनों की. तब भी यह राजनीतिक सोच केंद्र की सत्ता में थी. तब एक विश्वविद्यालय में कुलपति ने लड़कियों की ‘ माहवारी’ के रिकार्ड रखने की शुरुआत की. होस्टलों में रहने वाली लड़कियों पर यह विचित्र सांस्कृतिक पहरेदारी थी, स्वाभाविक था हम सब ने , हमारी सहपाठी लड़कियों ने इसका विरोध किया.

बहन,  यह समय राजनीतिक पहल लेने का समय है. आराजनीतिक होने का दंश हम सब को पीढ़ी-दर –पीढी झेलना पडेगा. मताधिकार के प्रयोग तो करना ही करना लेकिन व्यापक प्रतिरोध के प्रति भी सचेत भाव से जरूर जुड़ना. हाँ, ख्याल रखना तुम्हारा एक वोट तुम्हारे खिलाफ ही षड्यंत्र कर रही राजनीतिक जमातों को और भी मजबूत कर सकता है. यह सुनिश्चित करना तुम्हारा काम है कि कोई अख़लाक़ या कोई इशरत जहां विषाक्त सामाजिक –सांस्कृतिक माहौल की शिकार न हो और आजादी की ओर बढे तुम्हारे कदम फिर से वापस लौटने को मजबूर न कर दिए जायें इसकी गारंटी भी तुम्हें खुद ही लेनी होगी !

तुम्हारा भाई 
संजीव 

प्यार पर न चढाओ हैवानियत की चादर

इति शरण 


“मैं तुमसे प्यार करता हूँ, यह तुम्हारी सज़ा हैं। तुमने मुझसे प्यार नहीं किया यह तुम्हारी गलती हैं। तुम्हें मेरी होना होगा वरना मैं तुम्हें बर्बाद कर दूंगा।”

एक तरफ़ा प्यार में पड़े सिरफिरे आशिक की यही सोच आज कई लड़कियों की ज़िन्दगी बर्बाद कर रहा हैं। पटना के पीएमसीएच अस्पताल में ऐसे ही सिरफिरे आशिक की हैवानियत की शिकार 15 वर्षीय सोनी अपनी ज़िन्दगी और मौत की लड़ाई लड़ रही हैं। मनचले मोहम्मद एहसान के प्यार को इनकार करने की सज़ा के रूप में उस आशिक ने सोनी पर तेज़ाब का हमला कर दिया। सोनी का चेहरा पूरी तरह जल चुका है। उसकी आँखों की रौशनी भी लगभग जा चुकी हैं। इस हमले के बाद उसे मिले शारीरिक कष्ट की तो शायद ही हम कभी कल्पना कर सकते हैं, इसके साथ ही उसके अस्तित्व और उसकी पहचान पर हुए हमले के दर्द को भी शायद ही बयां किया जा सकता हैं। इस घटना में सोनी की बहन की जांघ पर तेज़ाब का कुछ हिस्सा गिरने से वह भी ज़ख़्मी हो गई हैं।





2012 में बिहार में ही सोनी जैसी ही एक और घटना को अंजाम दिया गया था। बिहार की चंचल को भी एकतरफा प्यार का शिकार होना पड़ा था। मनचले आशिक की दरिंदगी को चंचल और उसकी बहन आज तक झेल रही हैं। उस घटना के बाद चंचल और उसकी बहन का जीवन किसी संघर्ष से कम नहीं रह गया हैं।

इन घटनाओं से एक सवाल तो जरूर उठता हैं। क्या हमला करने वाला व्यक्ति सच में उस लड़की से प्यार करता था ? प्यार में तो कहा जाता हैं कि लोग अपने प्यार के लिए जान देने को तैयार रहते हैं, मगर यहाँ प्यार में जान लेने से भी ज्यादा बड़ी दरिंदगी को अंजाम दिया जा रहा हैं। चंचल का कहना भी हैं कि वह मुझसे प्यार नहीं करता था, अगर प्यार करता तो मेरे साथ ऐसा नहीं करता।

दरअसल ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाला व्यक्ति प्यार में नहीं होता बल्कि एक मानसिक परिस्थिति से गुज़र रहा होता हैं। जिसे “डील्यूशन आॅफ लव” भी कहा जा सकता हैं। डिल्यूशन आॅफ लव एक ऐसी मानसिक परिस्थति होती है, जिसमें व्यक्ति को यह विश्वास हो जाता है कि वह सामने वाले को जिस रूप में प्यार करता है सामने वाला भी उसे उसी रूप में प्यार कर रहा है। जबकि सच्चाई बिलकुल भिन्न होती है। वह एकतरफा प्यार में डूबा रहता है।

डिल्यूशन आॅफ लव की परिस्थिति में इंसान सामने वाले के लिए इस हद तक अपने को बंधा हुआ पाता है कि उसके अलावा उसके मन में और कोई बात होती ही नहीं है। लेकिन जब उसे सामने वाले से कोई अनुकूल संकेत या इज़हार नहीं मिलता तो वह बौखला उठता हैं। फिर तो वह उसके अस्तित्व, उसकी पहचान तक मिटा देने की हैवानीयत पर उतर आता है। “साइकोपैथीक डीसआर्डर“ भी इसका एक कारण माना जा सकता है। इसके अनुसार व्यक्ति के भीतर कई स्तर की नकरात्मक सोच अपना घर बना लेती हैं। किसी भी गलत काम को अंजाम देने से लेकर सामने वाले के अस्तित्व तक को मिटा देने के एक अमानवीय भाव से भर उठना उसके व्यक्तिव में शामिल हो जाता है।  मगर किसी भी तरह की मानसिक परिस्थिति कहीं न कहीं सामाजिक परिस्थिति की ही अभिव्यक्ति होती है। स्वभावतः इन घटनाओं में सामाजिक परिस्थिति का एक बहुत बड़ा हाथ होता है। शिक्षा का स्तर, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश, आस-पास का वातावरण ही किसी व्यक्ति की मानसिकता के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है।

इन सबसे अलग एक और पहलू भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में एसिड अटैक की घटना के कारण बनते है। वो है हमारा पाॅपुलर सिनेमा। दरअसल हमारे भारतीय सिनेमा में अक्सर यह दिखाया जाता है कि एक लड़का किसी लड़की को पटाने की बहुत कोशिश करता है। पहले तो लड़की थोड़े नख़रे दिखाती हैं मगर लड़के के लाख कोशिशों और मिन्नतों के बाद लड़की अंत में मान जाती है। एक हैप्पी एंडिग। यानि लड़की तो अंत में पटनी ही है। यह है हमारे हिन्दी सिनेमा का निहितार्थ। हालांकि अब फिल्मों में कुछ बदलाव आए हैं मगर 90 के दशकों में बनी अधिकांश फिल्मों में इस तरह की छाप ज्यादा देेखने को मिलती थी। हमारे समाज में युवाओं को अगर सबसे ज्यादा कोई माध्यम प्रभावित करता हैं तो वह है हमारा फिल्म जगत। फिल्म को देखकर युवाओं के दिमाग में यह  बात पैठ जाती है कि अंत में लड़की को उसे तो हां कहनी ही है। मगर वह  फिल्मी दुनिया और वास्तविक दुनिया के बीच के अंतर को भूल जाता है।

और अंत में आती है मर्दो के वर्चस्व वाली इस समाज की बनावट। सैकड़ो साल से चली आ रही इस समाज की पुरूषवादी सोच की जड़ें काफी गहरी हैं। समाज का अधिकांश पुरूष प्रछन्न रूप से प्रायः इसी अंहकारी सोच से लैश रहता है। और प्यार के व्यापार में तो यह प्रायः अपनी पूरी आक्रामकता के साथ प्रकट हो जाती है। प्यार में डूबा कई पुरुष  यह कतई बर्दाश्त नहीं  कर पाता कि उसकी प्रेमिका उसके प्यार की तौहीनी करने की जुर्रत करे। और जब ऐसा होता है तो उसे सीधे अपनी मर्दानगी पर चोट पहुंचने सा लगता हैं। फिर क्या, उसके प्यार की सारी कोमल भावनाओं पर मर्दानगी का अमानवीय अंहकार हावी हो जाता है। वो क्रूरता की सारी हदें तोड़ देने पर अमादा हो जाता है। ‘जब मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं’ इस सोच के तहत वह प्रेमिका के वजूद को ही मिटा देने की खातिर कुचक्र में लग जाता हैं।

एसिड अटैक उनमें से सबसे विकृत कारवाई है। कई बार यह सोच अपनी प्रेमिका की हत्या भी करने के लिए प्रेरित कर बैठती है। इस तरह के अपराध को रोकने के लिए जरुरी हैं कि क़ानूनी कार्यवाही के साथ ही समाजिक और मानसिक बदलाव की भी। तभी शायद प्यार जैसे अनमोल शब्द को हैवानियत की चादर से बचाया जा सकेगा।

फिलहाल हम सभी को सोनी के इलाज़ के लिए आगे आने की जरूरत हैं।  एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने के कारण उसके इलाज़ में पैसा रोड़ा बन रहा हैं। स्टॉप एसिड अटैक कैम्पेनर्स की कोशिश से सोनी को बिहार सरकार से 3 लाख मुआवज़ा मिलने की बात हुई हैं। मगर मुआवज़े की रकम मिलने में अभी कुछ समय लग सकता हैं। इसलिए कैम्पेनर्स आम जनता से उसके लिए मदद माग रहे हैं ।

युवा पत्रकार और रंगकर्मी इति शरण से संपर्क: itisharan@gmail.com

भिखारी की विरासत की गायिका

नवल किशोर कुमार

मूल रुप से असम की रहने वाली कल्पना पटोवारी, बिहार और उत्तरप्रदेश के लोगों के दिलों में वर्ष २००० में अपना जगह बना चुकी थीं। उन दिनों भोजपुरी फ़िल्म उद्योग जीर्णोद्धार के दौर से गुजर रहा था। नवउदारवादी नीतियों के कारण भोजपुरी फिल्म उद्योग के प्रति कारपोरेट कंपनियों का आकर्षण बढ़ रहा था। उन्हें इसमें अकूत धन कमाने की संभावनाएं नज़र आ रहीं थीं। लेकिन अनुकूल साहित्यिक हस्तक्षेप न होने के कारण, भोजपुरी फिल्मों का स्तर गिर रहा था और द्विअर्थी गीतों की भरमार थी लेकिन फिर भी भोजपुरी इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री नित नये रिकार्ड बना रही थी।

कल्पना ने उसी दौर में भोजपुरी फिल्म उद्योग में प्रवेश किया। कल्पना बताती हैं कि जब वे असम छोड़कर संगीत के क्षेत्र में करियर बनाने मुंबई आयीं, तब उनके पास सिवाय उनकी आवाज के कुछ भी नहीं था। यहां तक कि उन्हें अंग्रेजी और असमिया के अलावा कोई और भाषा भी नहीं आती थी। अपने पहले भोजपुरी गीत का जिक्र करते हुए वे बताती हैं कि उस गीत के बोल थे – “डाल, डाल ए राजा…अपन पिचकारी से हमरा रंग डाल”। “यह पन्द्रह साल पहले की बात है। जब मैं इस गीत की रिकार्डिंग कर रही थी तब मुझे लगा कि पिचकारी, होली पर रंग खेलने के लिये इस्तेमाल की जाती है। लेकिन बाद में, जब भोजपुरी समझना शुरू किया तब पता चला कि इस गीत में पिचकारी का एक और (अश्लील) अर्थ   है।

भूपेन हजारिका और भिखारी ठाकुर 

कल्पना बताती हैं कि उन्होंने भूपेन हजारिका को सुनकर संगीत की शिक्षा ली। हजारिका एक विद्रोही कलाकार थे। उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी कोई समझौता नहीं किया। सामाजिक बुराइयों को मिटने के लिये उन्होंने संगीत को माध्यम बनाया। भिखारी ठाकुर ने भी बिहार में अपनी लेखनी के जरिये यही किया था। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया। यह  भूपेन हजारिका और भिखारी ठाकुर में सबसे बड़ी समानता थी। कल्पना कहती हैं कि कुछ साल पहले, जब उनके एलबम  “लीगेसी ऑफ़ भिखारी ठाकुर” को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लांच किया किया गया था,  उस समय गूगल के पास भिखारी ठाकुर के संबंध में बहुत सीमित जानकारियां थीं। लेकिन अब भिखारी ठाकुर गूगल करने पर, सर्च इंजन ढेर सारी लिंक बता देता है। कल्पना बताती हैं कि कैसे उन्होंने भिखारी ठाकुर और उनकी रचनाओं को बिहार के सामाजिक और जातिगत पूर्वाग्रहों से बाहर निकाला। उनके मुताबिक, जब वे भिखारी ठाकुर पर शोध कर रही थीं तब उनके पास कई लोग आये, जिनका कहना था कि भिखारी ठाकुर बहुत स्तरहीन लेखक थे। कईयों ने विद्यापति और महेंद्र मिश्र पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही। लेकिन तब ‘’मैं बिहार के सामाजिक जीवन की सच्चाई समझ चुकी थी। मुझे यह समझ में आ गया था कि भिखारी ठाकुर की उपेक्षा किन वजहों से की गयी। मैंने अपना ध्यान भिखारी ठाकुर पर केंद्रित रखा। मेरे लिये उनका संघर्ष भूपेन हजारिका के संघर्ष जैसा था। मसलन, “गंगा तू बहती है क्यों…” गीत में भूपेन हजारिका गंगा के बहाने समाज से सवाल करते हैं। वे केवल गंगा के प्रदूषण की बात नहीं करते बल्कि नवउदारवादी पूंजीवाद के खतरों, सामाजिक तानेबाने और राजनीति पर भी सवाल उठाते हैं। यही प्रयोग भिखारी ठाकुर ने अपने नाटक गंगा स्नान में किया था। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक बुराइयों पर निर्भयतापूर्वक करारा प्रहार  किया था। भिखारी ठाकुर ने अपनी हर रचना में समाज को संदेश देने का प्रयास किया। मसलन, गबरघिचोर नाटक में उन्होंने स्त्री अस्मिता और उसके अधिकारों की बात कही – जो उस समय तो छोड़िये, आज भी महिलाओं को उपलब्ध नहीं हैं। वहीं विदेसिया में भिखारी ठाकुर ने पलायन के दर्द को उकेरा। यह उनकी रचनाओं का सिर्फ़ केवल पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि भिखारी टाकुर ने परंपरागत गीत-संगीत, जिस पर भद्रजनों का कब्जा था, को नकारते हुए अपनी शैली विकसित की। उनके इस प्रयास को तब के भद्रजनों ने “’लौंड़ा नाच’” कहा। इससे भी भिखारी ठाकुर के सामाजिक संघर्ष को समझा जा सकता है।‘’

ग्लोबल हुई परम्परा

कल्पना ने बताया कि उनका उद्देश्य भिखारी ठाकुर के उन ख्वाबों को पूरा करना है, जो उन्होंने भोजपुरी-भाषियों के समग्र कल्याण के वास्ते देखे थे। संगीत को उन्होंने अपना माध्यम बनाया था। वे कहती हैं कि, ‘भोजपुरी ने मुझे पहचान दी, इस कारण भी  भोजपुरी को समृद्ध करना मेरी जिम्मेवारी है।’  । हाल में एमटीवी के एक कार्यक्रम में बिरहा को आधुनिक संगीत के साथ जोड़कर की गयी प्रस्तुति के बाद दक्षिण अफ़्रीका के एक म्यूजिकल ग्रुप ने उनसे संपर्क किया है।  कल्पना ने बताया कि दक्षिण अफ़्रीका में गिरमिटिया मजदूर के रुप में गये भारतीय मूल के लोगों ने अपने जड़ों की पहचान के लिये बिरहा को अपनाया है। गुयाना में भी भिखारी ठाकुर की रचनायें अब किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। कल्पना ने बताया कि अभी हाल ही में उन्हें एस-एच 97 बकार्डी म्यूजिकल कार्यक्रम में शिरकत करने का आफ़र मिला है, जिसमें वे एआर रहमान और विश्वस्तरीय म्यूजिकल ग्रुप यामी के साथ मिलकर बिरहा और भिखारी ठाकुर के लौंडा नाच को पूरे देश में पेश करेंगी।

कल्पना का मानना है कि भिखारी ठाकुर को केवल हज्जाम (पिछड़ा वर्ग) होने का अभिशाप झेलना पड़ा। यह सोच का विषय है कि क्या किसी कलाकार की कला को उसकी जाति और धर्म आदि के तराजू पर तौलकर देखा जाना चाहिए। कल्पना कहती हैं कि भूपेन हजारिका और भिखारी ठाकुर जैसे कलाकार अपने वक्त से बहुत आगे  थे। अपनी एक रचना में भिखारी ठाकुर स्वयं कहते हैं कि सौ साल बाद लोग फ़िर से उन्हें जानेंगे और मानेंगे। उनका कहा आज सच हो रहा है।

फॉरवर्ड प्रेस से साभार