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‘अर्थ स्वातंत्र्य ’ स्त्री मुक्ति की पूर्व शर्त

सुनीता

आम्बेडकर विश्वविद्यालय,दिल्ली के हिन्दी विभाग में शोधरत , संपर्क : sunitas988 gmail.com

भारतीय संस्कृति स्त्री  विरोधी  है और यहाँ स्त्री  की छवि परम्परागत मलबे से ही बनी है। इसके भौतिक कारण भी देखे जा सकते है। जैसे ‘ज्ञान’ और ‘संपत्ति’ इन दोनो से ही भारतीय पितृसत्ता के मनीषियों ने स्त्री  को वंचित रखा। वो तो यहाँ तक चले गए कि संपत्ति को संपत्ति की क्या जरूरत, अर्थात स्त्री  तो स्वयं किसी की संपत्ति है। पहले पिता की, फिर  पति की और अंत में बेटों की। रही ‘ज्ञान’ की बात, अगर ज्ञान नही होगा तो कोई बहस या तर्क नही करेगी। वर्जीनिया वुल्फ बताती है कि स्त्रियों को पुस्तकालय में  प्रवेश की अनुमति नहीं  थी। पर स्त्री  मुक्ति का आह्वान करते हुए लेखिका लिखती है कि ‘‘आप चाहें तो अपने पुस्तकालयों में भले ही ताला लगा दीजिए, लेकिन मेरी दिमागी आजादी को रोकने वाला कोई दरवाजा, कोई ताला कोई नट-बोल्ट नही बना।’’1

महादेवी वर्मा किसी भी समाज के विकास का मापदंड उस समाज में स्त्री  की स्थिति और हैसियत को मानती है। ‘‘नितांत बर्बर समाज में स्त्री  पर पुरुष वैसा ही अधिकार रखता है, जैसे वह अपनी अन्य स्थावर संपत्ति पर रखने को स्वतंत्र है। उसके विपरीत पूर्ण विकसित समाज में स्त्री -पुरुष की सहयोगिनी तथा समाज का आवश्यक अंग मानी जाकर माता तथा पत्नी के महिमामय आसन पर आसीन रहती हैै।’’2  महादेवी आर्थिक प्रश्न पर समूचे ऐतिहासिक विकास क्रम को कटघरे में खड़ा करती है। पुत्र पिता की समस्त सम्पत्ति का आधिकारी  होता था, परन्तु कन्या को विवाह के अवसर पर प्राप्त होने वाले यौतुक के अतिरिक्त और कुछ देने की आवश्यकता ही नही समझी गई। ‘‘स्त्री  को इस प्रकार पिता की संपत्ति से वंचित करने में क्या उद्देश्य रहा, यह कहना कठिन है। यह भी संभव है कि स्त्री  के निकट वैवाहिक जीवन को अनिवार्य रखने के लिए ऐसी व्यवस्था की गयी हो।’’3 भारतीय पुरुष ने स्त्री  को या तो सुख के साधन  के रूप में पाया या भार रूप में फलतः वह उसे सहयोगी का आदर न दे सका।

मनुस्मृति के अनुसार पैतृक जायदाद का माता-पिता की मृत्यु के बाद सभी पुत्रो में समान रूप से बँटवारा किया जाना चाहिए किन्तु ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी  था। स्त्रियाँ इस पैतृक संसाधन  में हिस्सेदारी की मांग नही कर सकती थीं । किंतु विवाह के समय मिले उपहांरो पर स्त्रियों का स्वामित्व माना जाता था और इसे स्त्री धन  की संज्ञा दी जाती थी। स्त्री  और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भिन्नता संसाधनॉन  पर उनके नियंत्रण की भिन्नता की वजह से अधिक  प्रखर हुई। मनुस्मृति में पुरुष के धन  अर्जन के सात तरीके बताए गए हैं – खोज , विरासत, खरीद, विजित करके, निवेश, कार्य द्वारा तथा भेंट। वही स्त्रियों के लिए प्रियजनों (परिवार ) द्वारा दिए गए उपहार मात्र। मैत्रोयी पुष्पा इसे उपहार नहीं बल्कि ‘रिश्वत’ के रूप में देखती हैं जिसके बदले स्त्री  से यह अपेक्षा की जाती है कि वह संपत्ति में अपने अधिकार  की मांग न करे।

एंगेल्स ने ‘स्त्री  की अधीनस्थ  स्थिति को ताम्र ओर लोह-औजारो के विनियोजन से उपजी माना।’ युग्म-विवाह और समूह -विवाह जैसी व्यवस्थाओं  में सगे पिता का निश्चयपूर्वक पता लगाना असम्भव होने के कारण मात्र सगी माँ को मान्यता प्राप्त थी। जिसके कारण घर के भीतर नारी की प्रधानता  होती थी। इसी को इतिहासकारो ने आदिकालीन मातृसत्ता से जोड़ा हैं। लेकिन जब इन व्यवस्थाओ ने विकास किया, ‘कृषि युग’ और ‘ताम्र युग’ संदर्भ में आए तो बाहरी क्षेत्र ने घरेलू क्षेत्र पर अपना वर्चस्व प्राप्त कर लिया। जो पहले से ही पुरुष के अधिकार  क्षेत्र में था। संपत्ति के निर्माण ने संपत्ति के वैध् वारिस की अवधरणा को जन्म दिया जिसके चलते स्त्री  भी पुरुष की अधीनस्थता  में आ गयी। इस तरह ‘एकल विवाह’ व्यवस्था के साथ पितृसत्ता अस्तित्व में आयी।

महादेवी भारतीय पत्नीत्व को एक विडम्बना ही मानती है। समाज स्त्रिायों के विवाह की चिंता इसलिए नही करता कि देश या जाति में सुयोग्य माताओ और पत्नियों का अभाव हो जायेगा, वरन, इसलिए कि उनकी अजीविका का हम कोई और सुलभ साध्न नही सोच पाते। किसी स्त्री  के विध्वा होते ही प्रश्न उठता है कि उसका भरण-पोषण और उसकी रक्षा कौन करेगा? महादेवी इस तथ्य पर भी प्रकाश डालती है कि क्यों हमारे समाज ने सदियो से स्त्रियों की आर्थिक परतंत्रता को जारी रखा है। समाज की यह धरणा रही है कि स्वावंलम्बन के साधनों से युक्त स्त्री  गृहिणी के कर्तव्य  को हेय समझेगी, अतः गृह में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी। जो कि पूर्णतः भ्रान्तिमूलक  है। महादेवी लिखती हैं  कि ‘‘हमारे यहाँ आज भी श्रमजीवियों की स्त्रियाँ तथा किसानों  की सहधर्मिणियाँ घर संभालती और जीविका के उपार्जन में पुरुष की सहायता भी करती है। इस चिंता से कहीं पुरुष के अधिकार  के बाहर न चली जावे, उन्हें पुरुष मनोरंजनी विद्या के अतिरिक्त और कुछ न सिखाना उनके लिए भी घातक है और समाज के लिए भी, क्योंकि वे सच्ची सामाजिक प्राणी और नागरिक कभी बन ही नही पाती।’’4

समय के बदलते परिदृश्य और बढ़ते आर्थिक दबाबो के कारण धन  कमाने के लिए बाहर निकलती स्त्री  आज परिवार की बेज्जती का नही बल्कि इज्जत और जरूरत का सबव बन गयी है। परतु स्त्री  से जुड़े सामंती मूल्य आज भी सांस ले रहे है। स्त्री  पर बैठाए गए तमाम पहरों   ने स्त्री  संघर्ष के तनाव को और अधिक  बढ़ाया है। ‘वर्ग-संघर्ष’ और ‘यौन-संघर्ष’ के बीच कौन-से एकसमान सूत्र है? यह शोध् का विषय रहा है। इस पूंजीवादी व्यवस्था में क्या स्त्री  भी एक वर्ग ही है? ऐसे में नारीवादियों की ‘सिस्टर हुड’ वाली विचारधरा कहाँ तक साबित होती है? यह सभी अपने आप में बड़े सवाल है जो नारी-विमर्श ने उठाए है।

मार्क्सवादी स्त्री  को यह आशवासान दिलाते हैं  कि जब सर्वहारा वर्ग की जीत हो जाएगी और साम्यवादी शासन प्रणाली लागू होगी तो स्त्रियाँ स्वयं मुक्त हो जायेंगी । इसलिए स्त्री , अपनी मुक्ति की स्वतंत्र लड़ाई को महत्व देने के स्थान पर वर्ग-संघर्ष में अपना सहयोग दे। जबकि महादेवी स्त्री -मुक्ति के लिए किसी आदर्शवादी व्यवस्था का इंतजार नही करना चाहती,  उल्टा उनका दृढ़ विश्वास है कि जिस समाज में स्त्री  अपनी पूर्णता में मुक्त होगी वही सभ्य और आदर्श समाज होगा। मार्क्सवादी , स्त्री  तथा पुरुष में  भेद-भाव का बड़ा करण उनके बीच श्रम-विभाजन को मानते है। तथा नारी को सार्वजानिक उद्यम में ले आने को उसकी मुक्ति के रूप में देखते है। परंतु ध्यान देने योग्य है कि सामजवादी व्यवस्था में स्त्रियों  को आर्थिक आजादी मिलने पर भी क्या यौनिक स्वतंत्रता मिल पायी? नही। महादेवी स्त्री  की आर्थिक पराधीनता  का कारण स्त्री  की एक ‘स्त्री ’ के रूप में पहचान न होने के बदले पुत्री , पत्नी, माता के रूप में उसकी छवि बनाना भी मानती है। वह लिखती है कि ‘‘भारतीय स्त्री  के संबंध् में पुरुष का ‘भर्ता’ नाम जितना सार्थक है उतना सम्भवतः और कोई नाम नही। स्त्री  पुत्री , पत्नी, माता आदि सभी रूपों में आर्थिक दृष्टि से कितनी परमुखापेक्षी रहती है, यह कौन नही जानता।’’5 मार्क्सवादियों  द्वारा एक दलील यह भी दी जाती है कि क्रांति तात्कालिक रूप में भौतिक स्तर को परिवर्तित करती है जबकि मानसिक परिवर्तन में समय लगता है जो सांस्कृतिक पुननिर्मिति पर निर्भर करता है। यह निर्विवाद सत्य है कि स्त्री  की अध्ीनस्थता का घनिष्ठ सम्बन्ध् संस्कृति से है। सीमोन लिखती ही है ‘‘स्त्री  पैदा नही होती गढ़ी जाती है।’’6

महादेवी ने मजदूर व निम्न वर्गीय स्त्रियों के मर्म को भी बड़ी बेबाकी से छुआ है। वह लिखती है कि ‘‘उत्तराधिकार  मिल जाने पर भी हमारी मजदूर स्त्रियाँ निर्धन पिता व दरिद्र पति से दरिद्रता के अतिरिक्त और क्या पा सकेंगी।’’7 यहाँ समाजवादी नारीवाद की वह सीमा पुष्ट हो रही है,  जिसमें पिता, पति, पुत्र द्वारा स्त्रियों को घरेलू कार्य के लिए वेतन देने की मांग की जाती है। क्योंकि महिलाआं के घरेलू कामकाज का वेतन की शक्ल में कोई आकलन नही किया जाता। केवल पारिवारिक बदलावो से स्त्री  की स्थिति में विशेष परिवर्तन नही आएगा बल्कि राज्य को संसाधनों  का सही वितरण स्त्री  के हक में करना होगा। महिला का घरेलू श्रम जिसे उत्पादक या अनुत्पादक श्रम कहा गया। वह महज शोषण नही स्त्री  की अधीनस्थता  है। प्रगातिशील महिला संगठन ( पी .ओ.डब्लू) के अनुसार स्त्रियों के शोषण के दो बुनियादी ढाँचे थे-लैंगिक आधार पर श्रम का विभाजन तथा संस्कृति जिसने इसे प्रतिपादित किया। श्रम विभाजन में भेदभाव के पीछे मंशा यह थी कि स्त्रियों को आर्थिक रूप से पुरुषों पर आश्रित रखा जाए। स्वदेशी आंदोलन की तर्ज पर स्त्रियों के लिए रोजगार सृजन के जो प्रयास किए गए वे पुरुषों की आमदनी में  महिलाओ की ओर से कुछ पूरक सहायता के मद्देनजर किए गए न कि जीवन यापन के लिए धन  कमाने के उद्देश्य से। ‘‘यह कार्य प्रशिक्षित स्त्रियों द्वारा अर्थोपार्जन के बजाय समाजसेविका के रूप में किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि स्त्रियों की दक्षता को मात्र सेविका, सफाई, भोजन बनाने या पढ़ाने जैसे ‘पोषक’ कार्यो तक या उन्हें गृहस्थी के परम्परागत कार्यो जैसे खाद्य प्रसंस्करण तथा हस्तशिल्प तक सीमित कर दिया गया।’’8

घरेलू श्रम के लिए वेतन की जो माँग उठायी गयी, सिमोन दी बोउआ ने उसका विरोध किया। उनका मानना है कि ‘‘एक छोटी अवधि में  बहुत संभव है कि घरेलू पत्नियाँ, जिनके पास दूसरा विकल्प नही है, वेतन पाकर खुश होगी। इसमें कोई शक नही। लेकिन एक लम्बे दौर में घरेलू कामों के लिए वेतन औरतों  को यह मानने के लिए प्रेरित करेगा कि घरेलू पत्नी होना भी एक तरह का काम है। इस तरह स्त्री  फिर  घरेलू परिसीमाओ के भीतर निर्वासित-सी जिंदगी जीने के लिए मजबूर रहेगी।’’9 असल चीज़ है घरेलू श्रम की परिस्थितियों में बदलाव वरना घरेलू कामों का महत्व तो बढ़ जाएगा, लेकिन उससे जुड़ी औरत के अलगाव और एकाकीपन की परिस्थितियाँ वैसी ही बनी रहेगी। वह जीवन और ज्ञान के तमाम स्रोतों  से कटकर घरेलू श्रम की चार दीवारी में ही कैद हो जाएगी।

भारतीय स्त्री  शोषण की चैतरफा मार झेलती है। उसके प्रति न तो शास्त्रो ने रहम दिखाया न ही राज्य ने अपनी कोई जिम्मेदारी निभाई और तो और वह परिवार तथा पति, जिसकी सेवा में उसने अपना संपूर्ण जीवन और स्वत्त्व होम कर दिया। वहाँ भी वह उपेक्षित ही रही। महादेवी के इन शब्दो में स्पष्ट नजर आता है कि भारतीय स्त्री  का जीवन क्या है ‘‘श्रमजीवी श्रेणी की स्त्री  को गृह का कार्य और संतान का पालन करके भी बाहर के कामों में पति का हाथ बटाना पड़ता है। सबेरे  6 बजे, गोद में छोटे बालक को तथा भोजन के लिए एक मोटी काली रोटी लेकर मजदूरी के लिए निकली हुई स्त्री  जब 7 बजे संध्या समय घर लौटती है तो संसार भर का आहत मातृत्व मानो उसके शुष्क ओठो में कराह उठता है। उसे श्रान्त शिथिल शरीर से पिफर घर का आवश्यक कार्य करते और उस पर कभी-कभी मद्यप पति को निष्ठुर प्रहारों को सहते देखकर करूणा को भी करूणा आये बिना नही रहती।10

 हमारे देश में कृषक तथा अन्य श्रमजीवी स्त्रियों की इतनी अध्कि संख्या है कि उनकी मुक्ति के बिना भारत में स्त्री -विमर्श अर्थहीन ही रहेगा। एक स्त्री  अगर शैक्षिक और व्यवसायिक स्तर पर  पुरुष की बराबरी करती भी है तो भी समाज उसके साथ लिंगभेद करता है। जर्मेन ग्रीयर लिखती है कि ‘‘चिकित्साशास्त्र का अध्ययन करने वाली लड़की अगर खासी मेहनत करेगी तो डाॅक्टरी की परीक्षा पास कर लेगी। लेकिन यह सच है कि स्त्री  रोगी पुरुष डाॅक्टरो को प्राथमिकता देती है और पुरुष रोगी भी। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और रेडियो संचालन सीखने वाली लड़कियों के रोजगार न पा सकने के अनेको प्रमाण मौजूद है।’’11

वही महादेवी का स्त्री -विर्मश इतना अधिक  निराशावादी नहीं है। शंभू गुप्त का मानना है कि ‘महादेवी की नारी दृष्टि, यथार्थ के सकारात्मक और सम्भावनात्मक पहलुओं पर सबसे पहले और सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित करती है। लेखिका केवल स्त्री दृष्टिकोण से ही नही, बल्कि समाज के सामूहिक विकास के लिए भी यह आवश्यक मानती है कि स्त्री  घर की सीमा के बाहर भी अपना विशेष  कार्यक्षेत्र चुनने को स्वतंत्र हो। अपने ‘घर और बाहर’ लेख में महादेवी ने स्त्री  के लिए विभिन्न व्यवासिक विकल्पों की बात की है। जिसके माध्यम से स्त्रियाँ भारतीय संस्कृति और समाज को उन्नत और गतिशील बनाने के साथ-साथ स्वयं भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सुदृढ़ होगी।

चिकित्सा के समान कानून का क्षेत्र भी स्त्रियों के लिए उपेक्षणीय नही कहा जा सकता। साहित्य यदि स्त्री  के सहयोग से शून्य हो तो उसे आधी  मानव-जाति के प्रतिनिधित्व  से शून्य समझना चाहिए। महादेवी लिखती है कि ‘‘पुरुष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक  आदर्श बन सकता है, परन्तु अध्कि सत्य नही, विकृति के अधिक निकट  पहुँच सकता है, परन्तु यथार्थ के अध्कि समीप नही। पुरुष के लिए नारीत्व अनुवाद है, परन्तु नारी के लिए अनुभव। अतः अपने जीवन का जैसा सजीव चित्र वह हमें दे सकेगी वैसा पुरुष बहुत साधना  के उपरांत भी शायद ही दे सके।’’12 यहाँ महादेवी का अभिप्राय यह नही है कि स्त्री  के विषय में चिंतन या शोध् पर केवल स्त्री  का ही अधिकार हो, पुरुष का नही। परंतु लेखिका यह दावा जरूर करती है कि विस्तृत क्षेत्र में स्त्री  की सक्रियता के बिना उसकी पराधीनता  की बेड़िया टूटना असंभव है।

वर्जीनिया वुल्फ वैचारिक और आर्थिक स्वंतत्रता को स्त्री  के लिए बहुत ही जरूरी मानती है। वह लिखती है कि ‘‘अगर स्त्री  आर्थिक रूप से सबल और समर्थ हो जाती है,  तो उसे किसी मर्द से नफरत करने की जरूरत नहीऋ वह उसे चोट नही पहुँचा सकता। और उसे किसी मर्द की चापलूसी भी करने की जरूरत नहीं,  क्योंकि वह उसे कुछ नही दे सकता।’’13 स्त्री  को चाहिए चीजों पर अपने आप में विचार करने की आजादी उदाहरण के लिए उस इमारत को मैं पंसद करती हूँ अथवा नही? वह तस्वीर सुंदर  है या नही? वह किताब मेरी राय में अच्छी है या बुरी? चेखव अपनी कहानी ‘डार्लिग’ में नायिका की पुरुषों पर निर्भरता और परमुखापेक्षिता दिखाते हुए नारी मात्र से यह अपेक्षा करते है कि वह तटस्थ दृष्टि और स्वंतत्र विचार रखे।

महादेवी स्त्री  को सबल और सक्षम बनाने का हल इसमें खोजती है कि माता-पिता को बाध्य होना चाहिए कि वे अपनी कन्याओ को उनकी रूचि तथा शक्ति के अनुसार कला, व्यवसाय आदि की ऐसी शिक्षा पाने दे,  जिसमें वे आर्थिक रूप में आत्मनिर्भर हो सके। ‘‘राष्ट्र की सुयोग्य संतान की माता बनना उनका कर्तव्य हो सकता है, परन्तु केवल उसी पर उनके नागरिकता के सारे अधिकारों का निर्भर रहना अन्याय ही कहा जायेगा।’’14 यहाँ महादेवी मातृत्व की अनिवार्यता पर प्रश्न उठाती है। भारत में अधिकाँश  स्त्रियाँ (चाहे वे अकेली हो, तलाक शुदा, भागी हुई या विधवा  हो ) जब पुरुष सुरक्षा से वंचित हो जाती है,  तो उनके उत्पीड़न की संभावना और अधिक  बढ़ जाती है। जिसका सबसे बड़ा कारण है,  उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होना। आश्चर्यजनक रूप से ऐसी स्त्रियाँ  समाज के बजाय, अपने परिजनो के हाथों  उत्पीड़ित होना ज्यादा पंसद करती है।

सन् 2013 में संसद में तलाक संबंधी  कानून में बदलाव के लिए यह प्रस्ताव पेश किया गया कि स्त्रियों को तलाक के बाद अपने पति की उस संपत्ति में भी हिस्सा दिया जाए जिसे ‘मिल्कियत’ कहा जाता है। इससे पहले उसे पति द्वारा खर्चा भत्ता दिये जाने का प्रावधान  था। परंतु इस विधेयक  पर जेंडर बायसिस होने के आरोप लग रहे है। केवल स्त्री  को ही पति की संपत्ति में अधिकार क्यों हो, पति के लिए पत्नी की संपत्ति में ऐसे किसी अअधिकार  प्रावधन क्यों नही है। उन्हें संदेह है कि स्त्रियाँ इस कानून का दुरूपयोग  कर सकती है,  परंतु लोग इस जेंडर विभेद की जड़ में जाकर नही देखना चाहते कि क्यों आज स्त्री को ऐसे कानूनी अधिकार  मुहैया कराने की आवश्यकता पड़ती है।

भारतीय स्त्री  की गुलामी की परम्परा इसका सबसे बड़ा कारण है। भारतीय स्त्रियों का प्रतिनिधित्व  कौन करता है? वे घरेलू श्रमिक और ग्रामीण महिलाएँ जिनके पास आज भी अपनी कोई संपत्ति या अधिकार  नही है। और वह अपनी संपूर्ण ऊर्जा और कुशलता को ताउम्र पति और उसके परिवार की सेवा में झोक देती है। उनके अस्तित्व की कोई पहचान नही है,  जिसका सबसे बड़ा कारण है महिलाओ की आर्थिक परतंत्रता। विरासत से ही उन्हे ऐसे अधिकारों  से वंचित रखा गया। तब आज अचानक बराबरी की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे आरक्षण लागू करने  के कारणो और आवश्यकताओं को न समझते हुए कई लोग उसका विरोध करते है। वे स्त्री  और दलित शोषण के इतिहास को भुला देना चाहते है। ‘सीमांतनी उपदेश’ में लेखिका ने औरतों की तत्कालीन आर्थिक स्थिति के बारे में  लिखा है कि ‘‘बाप के माल में से लड़कियों को कौड़ी भी नही मिलती। खाविंद की दौलत में कुछ अखत्यार नही। बेटे पर दावा चल ही नही सकता। और जो कोई दोलतमंद विधवा  होती है, बिरादरी के सब मिल के भाई या देवर का या फिर किसी और रिश्तेदार का लड़का गोद में बिठा देते है। उसके सब माल असबाव का मालिक बना देते है।’’15

भारतीय स्त्री  की आर्थिक स्वतंत्रता को लेकर सबसे विवादित मुद्दा रहा है ‘हिन्दू कोड बिल’। विवाह संस्था की दमनकारी संरचना स्त्री  को आर्थिक सुरक्षा देने से इन्कार करती है,  क्योंकि यही आर्थिक अधीनता  स्त्री  की पितृसत्ता पर निर्भरता सुनिश्चित करती है। विवाह संस्था के दमनकारी क्रूर पंजों से स्त्री  को आजादी दिलाने के उद्देश्य से डाॅ. अम्बेड़कर ‘हिन्दू कोड बिल’ लाए थे। डा. अम्बेडकर ने अपनी उच्च शिक्षा लंदन स्कूल आॅफ इक्नाॅमिक्स’ से ली थी। वहाँ जाकर उन्होंने आर्थिक पहलुओं पर रिसर्च की और अपने अनुभव से यह पाया कि पश्चिमी अर्थव्यवस्था के इतना मजबूत और समाज के विकसित होने का प्रमुख कारण है वहाँ की आधी  आबादी, यानि स्त्रियों का इसमें बराबर सक्रिय होना। भारतीय स्त्रियों की अधीनस्थता  को बाबा साहेब ने भारत के विकास में बहुत बड़ी बाध माना और उसका विरोध् भी किया।

डाॅ. अम्बेडकर ने महिलाओ को समान कार्य के लिए समान वेतन, मातृत्व लाभ, प्रसूति अधिकार अधिनियम ,विवाह-विच्छेद, अतंरजातीय विवाह, शिक्षा, संपत्ति में अधिकार  जैसे कई अधिकार  दिए जाने की बात रखी। परंतु रूढ़िवादी नेताओ के विरोध के  कारण यह बिल पास नही हो सका। उन्होंने इसे हिन्दू कानून की वैदिक, एवं शास्त्रीय जड़ों पर प्रहार करने वाला बिल बताया। बाबा साहेब ने स्त्री  के संपत्ति संबंधी  अधिकार  की मांग 1950 में की थी। पर उसके 55 वर्षो बाद सन् 2005 में  उत्तराधिकार संबंधी  विधेयक पास   हुआ, जिसमें संयुक्त हिन्दू परिवार में पुत्री  को भी पुत्र के समान संपत्ति का अधिकारी  माना गया। हालाकि व्यवहारिक तौर पर उसकी सामाजिक स्वीकृति आज भी बाकी है।

महादेवी हिन्दू कानून की, स्त्री  को संपत्ति के अध्किार से वंचित रखने की मंशा को इस रूप में रेखांकित करती है ‘‘संभव है स्त्री  के निकट वैवाहिक जीवन को अनिवार्य रखने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई हो। दूसरा कभी युवतियाँ स्वयंवरा होती थी और कभी विवाह के लिए बलात छीनी भी जा सकती थी। ऐसी दशा में पैतृक संपत्ति में उनके उत्तराधिकारी  होने पर अन्य परिवारो के व्यक्तियों का प्रवेश भी वंश-परम्परा को अव्यवस्थित कर सकता था। चाहे जिस कारण से भी हो परंतुु इस विधान  ने पिता के गृह में कन्या की स्थिति को बहुत गिरा दिया।’’16 ऐसा नहीं  है कि स्त्री  के नाम पर सम्पत्तियाँ नही है या वे खरीदी व बेची नहीं जाती। परंतु ऐसा तभी किया जाता है जब पति या पिता को किसी तरह की बेईमानी या कर की चोरी करनी होती है।

मजदूर आदिवासी एवं दलित स्त्रियाँ,  एक ऐसा तबका है, जो स्त्रियों में  भी सबसे ज्यादा विषम परिस्थितियों और शोषण का शिकार होता  है। क्या यह वास्तविकता नही है कि अधिकाँश  मजदूर महिलाये आदिवासी और दलित होती हैं ? ।समाज का अधिकाँश  श्रम ये महिलाये ही करती है और बदले में सबसे कम पाती है। चाहे वह संपत्ति हो, आय हो, स्वास्थ्य, भोजन या फिर  सम्मान। कई स्थानो पर विशेषकर निर्माण कार्य में काम पूरे परिवार के आधर पर मिलता है। वहाँ मजदूरी परिवार के मुखिया (पुरुष) को ही दी जाती है और श्रम करने के बावजूद परिवार की महिलाओ के हाथ में कोई आय नही आ पाती। खेतो में कार्य करने वाली स्त्रियाँ पति के रोजगार में सहायक मानी जाती है,  श्रमिक नही। हमारे पास ‘फैकट्री  एक्ट 1948’ है, कि महिलाओं और पुरुषों को समान कार्य के लिए लिए समान वेतन दिया जाए पंरतु व्यवहार में इसका पालन नही किया जाता।

स्त्रियों की मुक्ति स्वयं स्त्रियों  पर निर्भर करती है। उन्हें सबसे पहले इस दमनकारी व्यवस्था के विभिन्न घटको का असहयोग करना चाहिए। जर्मेन ग्रीयर का मानना है कि ‘‘स्त्रियों को पूंजीवादी राज्य में प्रमुख उपभोक्त की अपनी भूमिका को भी ठुकरा देना चाहिए।’’17 बजारवाद स्त्रियों को घरो से बाहर तो ले आया। परंतु पुरुष के वर्चस्व और स्त्री  की अधीनस्थता की  स्थिति में सेंध्नही लगा पाया। और फिर उसकी ऐसी कोई कोशिश थी भी नही। बाजारवाद तो एक मुनाफा खोर संस्कृति है। पूंजीववाद ने भी स्त्री  का शोषण ही किया, फिर चाहे उसके उपभोक्तावादी रूप को पल्लवित करना हो या सस्ते श्रम के रूप में उसकी उपलब्धि !
प्रोद्यौगिकी और विकास के क्षेत्र में स्त्री  मुक्त हो रही है या फिर सकी गुलामी की जड़े और पुख्ता हो रही है? यह एक बड़ा सवाल है। जर्मेन ग्रीयर का मानना है कि मशीनीकरण के आगमन से स्त्रियों को घरेलू कार्यो से कुछ निजात तो मिली है ताकि वे अपने बारे में सोचने और संघर्ष करने का कुछ समय पा सके। वही दूसरी तरफ यह उपभोक्तावादी संस्कृति स्त्री  की परम्परागत इमेज को ही मजबूत और स्थापित करती है। जैसे डिटर्जेंट हो वा कपडे़ धेने की मशीन और बच्चो के डाॅयपर अक्सर औरते ही ऐसे विज्ञापन करती दिखेगी। अर्थात् यह उन्ही के कार्यक्षेत्र  का दायरा हो।

फैक्ट्ररियों और फर्म यानि उत्पादन के क्षेत्र में प्रोद्योगिकी आते ही स्त्री  श्रमिकों की छटनी शुरू हो जाती है। प्रोद्यौगिकी से जुडे़ शिक्षा व व्यवसाय के क्षेत्र में भी स्त्रियों का अनुपात पुरुषों की तुलना में ना मात्र ही होता है जैसे आई.टी. इंजीनियर, टैक्नोक्रेट आदि। मार्क्स इसका एक दूसरा ही पहलू सामने रखते है कि मशीनीकरण के बाद स्त्रियों और बच्चों की सस्ते मजदूर के रूप में पूंजीपतियों को सबसे पहले तलाश होती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मानना है कि स्त्री  श्रम का उपयोग आर्थिक दृष्टि से बड़ा लाभकारी है, स्त्रियाँ शिकायते नही करती, टेªड यूनियन नही बनाती, पुरुष की तुलना में कम पगार लेती है। साथ ही कभी भी निकाली जा सकती है। इसी के चलते पिछले दो दशको में श्रमशक्ति का स्त्री करण तेजी से हुआ है। विडम्बना यह है कि पूर्णरूप में भारतीय स्त्री  आज भी अपने आर्थिक अधिकारों  से वंचित ही है।

कोलनताई की राय थी कि स्त्रियों की कुछ खास समस्याएँ समाजवाद में ही हल हो सकती है। मसलन बच्चो की देखभाल, मातृत्व, घरेलू काम-काज आदि। समाजवाद ने बड़े ही कौशल से इस अंतर्विरोध् को हल किया। सामूहिक  रसोईघरो, मातृत्व के कारण विशेष छुट्यिाँ एवं पूरी  पगार, बच्चो की देखभाल के सरकारी प्रबंध् किए गए। समाजवादी सोवियत संघ में स्त्रियाँ कानूनी तौर पर स्वतंत्र थीं , पुरुषों के समान थीं । सामाजिक जीवन में उत्पीड़ित-दमित नही थीं । इसके बावजूद स्त्री -पुरुष के बीच मौजूद अंतर्विरोध् एवं पुरुष का वर्चस्व बना रहा। इससे स्त्री  के प्रति बुनियादी रवैये एवं मूल्य संरचना में मूलगामी बदलाव नही आया।

पुरुष वर्चस्व को खत्म करने के लिए ही महादेवी, स्त्रियों को स्वयं भी कुशल और सक्रिय होने की सलाह देती है। ताकि स्त्रियाँ पुरुषों के अनुपात में ही भौतिक उत्पादन के साथ-साथ बौद्धिक  उत्पादन पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर सकें। क्योकि केवल राज्य की सेवा या सुविधओ पर निर्भर होकर स्त्री , पुरुष के वर्चस्व को कभी खत्म नही कर पाएगी।

संदर्भ
1.  वुल्फ, वर्जीनिया, अपना कमरा ;अनु. गोपाल प्रधनद्ध, पृ. 34
2.  वर्मा महादेवी,  शृंखला की कड़िया, पृ. 23
3.  वही, पृ. 87
4.  वही, पृ. 73
5.  वही, पृ. 87
6.    बोआ, सीमोन दी, स्त्री -उपेक्षिता (अनु. प्रभा खेतान), पृ. 26
7.    वर्मा, महादेवी,  शंृखला की कड़ियाँ, पृ. 25
8.   कुमार, राध, स्त्री  संघर्ष का इतिहास 1800-1900, पृ. 139
9.    बोउआ, सीमोन दी, स्त्री  के पास खोने के लिए कुछ नही है ;अनु. मनीषा पांडेयद्ध, पृ. 52
10.  वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 24
11.  ग्रीयर, जर्मेन, बढ़िया  स्त्री  (अनु. मधू बी. जोशी), पृ. 123
12. वर्मा, महादेवी,  शंृखला की कड़ियाँ, पृ. 63
13.  वुल्फ, वर्जीनिया, अपना कमरा (अनु. गोपाल प्रधान ) , पृ. 77
14.  वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 69
15.  महिला, अज्ञात हिंदू, सीमांतनी उपदेश, पृ. 96
16. वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 88
17.  ग्रीयर, जर्मेन, बध्यिा स्त्री  (अनु. मधु  बी. जोशी), पृ. 294

मेरे ख़्वाबों के दूल्हे बनाम शहनाइयां जो बज न सकीं

असीमा भट्ट

रंगमंच की कलाकार,सिनेमा और धारवाहिकों में अभिनय, लेखिका संपर्क : asimabhatt@gmail.com

( रंगकर्मी, अभिनेत्री और लेखिका असीमा भट्ट शादी को लेकर अपने ख़्वाबों , फंतासियों की कहानी कह रही हैं. एक लड़की की कहानी , हर लडकी की कहानी . असीमा के ख़्वाबों में शहनाइयां कई बार बजीं , एक आई ए एस से लेकर पायलट , मछुआरे , रंगरेज और बुनकर तक दूल्हों की कई -कई डोलियाँ उतरीं ख़्वाबों में … हकीकत में एक बार बजी हिन्दी के एक बड़े कवि के साथ ! रोचक और सामाजिक हकीकत को बयान करती  एक दिलचस्प दास्तान !! ) 


शादी को लेकर हर लड़की के बड़े अरमान होते हैं.  इससे शादी करुँगी. उससे करुँगी. ऐसा होगा…. वैसा होगा….मेरे भी थे. मैं तो और भी फ़िल्मी हूँ क्योंकि मेरे दादा और पिता जी का सिनेमा हॉल था. वहीँ बड़ी हुई. सिनेमा में ही खेलती थी और और वहीँ खेलते -खेलते सो जाती थी. कई बार तो मुझे सिनेमा हॉल बंद होने के बाद देर रात हॉल खोलकर टोर्च जला – जला कर ढूंढा गया. क्योंकि मैं सिनेमा देखते -देखते वहीं हॉल की कुर्सी पर सो जाती थी,  फिर नींद में गिर जाती थी और वहीं कहीं कुर्सी के नीचे लुढ़की पड़ी रहती थी.  घर वाले दादा-दादी और माँ आदि समझते  कि सिनेमा हॉल में होगी पापा के पास  क्योंकि कई बार पापा मुझे अपनी केबिन में सुला देते थे.  पापा और सिनेमा के स्टाफ समझते थे कि घर चली गयी होगी. लेकिन देर रात जब माँ पूछती कि मैं कहाँ हूँ , तब पूरे घर में हडकंप मच जाता और घर से लेकर सिनेमा हॉल तक में खोज जारी हो जाती.. तो सिनेमा के जरिये  प्यार को लेकर जो फंतासियाँ मुझमें थे वे  सब अभी तक मुझमें हैं.

वैसे मेरी शादी को लेकर पहला च्वाइस  आई ए एस ( भारतीय प्रशासनिक सेवा से ) था,  क्योंकि मुझे लगता था इनके पास बहुत पावर होता है. वे मुझे गुंडे- बदमाशो से ब चा लेंगे. शहर के आई ए एस की  लाल बत्ती वाली अम्बेसडर गाड़ी जब -जब सिनेमा हॉल में मेरे दरवाज़े पर आती तो मैं बहुत खुश होती और लगता मेरा पति ऐसे ही एक लाल बत्ती वाली कार से निकलेगा. और हुआ भी कुछ यूं कि मैं जिस कालेज में पढ़ती थी वहां के सांस्कृतिक प्रोग्राम में एक बिलकुल नया IAS था,  जिसकी पहली पोस्टिंग ही मेरे शहर में हुई थी.  वह जब मेरे कालेज के प्रोग्राम में आया  और उसने अपने हाथों से मुस्कुराते हुए प्राइज़ दिया तो मुझे लगा कि मुझे प्यार हो गया.

फिर उसके बाद मैं  ही अपने शहर को छोड़ कर पटना आ गयी और वह  बात वहीँ दफन हो गयी.पटना से फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली आ गयी. वो भी पूरा हो गया. एक दिन इंडिया हैबिटाट में मेरा शो था और वहां वे नाटक देखने आये थे , जबकि उन्हें यह पता भी नहीं था कि मैं वहीँ लड़की हूँ, जो नवादा के कालेज में उनसे मिली थी. क्योंकि मैं तब क्रांति से असीमा हो चुकी थी यानी नाम बदल लिया था. नाटक के बाद वे मिले और हिचकिचाते हुए  कुछ पूछते इससे पहले  मैंने ही  पहचान लिया और  ख़ुशी से चौंकते हुए बोली, ‘  आप ?

” हाँ, मैं और तुम यहाँ कैसे…!”
“मैं तो यहीं रहती हूँ. एन एस डी किया फिर यहीं नाटक करती हूँ.”

हम एक दिन कॉफ़ी पे मिले तो उन्होंने बताया कि उन्हें कालेज में नाटक का शौक था और वे  एन एस डी ज्व़ाइन करना चाहते थे. लेकिन उनके पिता जी चाहते थे कि वे आई ए एस बनें  . फिर मैंने शरमाते हुए बताया कि उन्हें कालेज में जब पहली बार देखा था तो उन्हें पसंद करने लगी थी और शादी करना चाहती थी.
उन्होंने कहा ,  ” तो पहले क्यों नहीं  बताया ?  ”
” मौक़ा ही नहीं मिला , मैं अचानक पटना आ गयी.  और अगर बताती तो क्या आप मुझसे शादी कर लेते ! ”
” यह बाद की बात है लेकिन खुश ज़रूर होता. ”
” पर आपने पूछा नहीं मैं क्यों आई ए एस  से शादी करना चाहती थी ? ”
” क्यों?”
” क्योंकि बचपन से ही फिल्मों में देखा में था कि आई ए एस शहर का सबसे बड़ा आफिसर होता है और उसके पास बहुत पावर होता. वे मेरी रक्षा करेगा… ”
वे हँसते हुए बोले ,  ‘काहे का पॉवर ?  हम आई ए एस तो मिनिस्टर के गुलाम होते हैं, जो उनके इशारे पर नाचते हैं.’
और मैंने उनके मुंह पर ही कह दिया , ‘ फिर तो अच्छा हुआ मैंने आपसे शादी नही की. ‘

उसके बाद मेरा दूसरा च्वाइस  था पायलट . मझे लगता था कितना अच्छा होता है. दिन रात हवा में घूमते रहते हैं. जब जहाँ जाना चाहें जा सकते हैं. एक मिनट में दुनिया के किसी भी कोने में. आज यहाँ , तो कल कहाँ …
और शिमला में दो रिटायर पायलट से मिली. मि. मितवा और बी जी भल्ला . भल्ला को मैं बी जी ही बुलाती हूँ.  पंजाबी  में ‘बीजी’ का मतलब ‘माँ’ होता है. और बी जी  मुझे एक  पुरुष होते हुए भी माँ की तरह ही प्यार करते हैं. और मैं हैरत में रह जाती हूँ कि एक पुरुष के दिल में माँ का दिल कैसे है !
एक शाम हम लकडियाँ जला कर  आग सेक रहे थे कि अचानक मितवा ने कहा – ‘तू पहले मिली होती तो मैं तेरी शादी पायलट से कराता.’
मैंने तुरंत चहकते हुए कहा , ‘ और हाँ जब मैं छोटी थी तो पायलट से शादी करना चाहती थी.
“क्यों “,  बी जी ने पूछा
मैंने वहीँ फंटेसी बताया कि रोज़ मैं उसके साथ पूरी दुनिया में घूमती. आज यहाँ उडती तो कल कहीं और ….
बी जी  जोर से हँसे और बोले “मिट्ठी (बीजी मुझे इसी नाम से बुलाते हैं), ऐसा नहीं होता. हम अपनी मर्जी से कहीं नहीं जा सकते. हमें जो रूट पर फ्लाई करने का परमिट होता सिर्फ उसी पर फ्लाई कर सकते हैं. और अपनी पत्नियों और प्रेमिकाओं को रोज़ थोड़े न साथ ले जा सकते हैं. हमारी ड्यूटी बहुत स्ट्रिक्ट होती है.’
पायलट भी कैसिल.

फ़िर चूँकि मुझे समन्दर बहुत आकर्षित करता रहा है तो सोचा मर्चेंट नेवी वालों से शादी करुँगी तो शिप में समन्दर में रहूँगी.  नीचे नीला  नीला पानी समन्दर का ऊपर नीला नीला आकाश. और  बीच में मैं जलपरी की तरह … पर  मेरी  दोस्त निवेदिता जिसका पति संदीप नेवी में हैं ने  खीझते  हुए  जब अपना  अनुभव  सुनाया – ‘असीमा सब फेंटेसी  हैं  चारों तरफ पानी ही पानी  में जब  रहना  पड़ता है  तो कूद  कर कहीं  भाग जाने का मन करता  और भागोगे  भी  कहाँ क्योंकि चारों  तरफ  पानी ही पानी.  कूदोगे तो  डूब  कर मर जाओगे और जब समुद्री तूफ़ान आता है तो  कुछ मत पूछो.’  तो यह इरादा  भी  टाल दिया.

उसके बाद चूँकि मुझे मछली खाना बहुत पसंद हैं. तो मैंने सोचा कि मछुआरे से शादी करूंगी . वह रोज़ समुद्र  से मेरे लिए ताज़ी मछलियाँ पकड़ कर लायेगा और रोज़ मैं उसके लिए अपने हाथों से मछली पकाऊंगी और साथ में मिलकर खायेगे…लेकिन  केरल के मशहूर लेखक तकषी शंकर पिल्लै की  ‘मछुआरे’ पढ़ी.  उसमें मछुआरों के जीवन के बारे में पढ़ा कि कैसे समंदर में अपनी नाव और जाल लेकर दिन भर भटकने के बाद भी उन्हें एक भी मछली नहीं मिलती,  तो मछुआरे से शादी का ख्याल भी मन से निकल गया.

उसके बाद मुझे रंगरेज़ बहुत पसंद थे. कि वे लोग बहुत खूबसूरत रंगों में साड़ी और दुपट्टे रंगते हैं. इनसे शादी करुँगी और रोज़ अपनी मनपसंद का कपड़े रंगवाउंगी …’ऐसी रंग दे मेरी चुनिरिया रंग न छूटे सारी उमरिया’
फिर लखनऊ के रंगरेज़ो से मिली और उनकी हालत देख तरस के अलावा मेरी आँखों में आंसूं थे … कपड़ों में जो रंग और केमिकल, एसिड का इस्तेमाल करते हैं,  उनसे उनके हाथों और पैरों की उँगलियाँ बुरी तरह गल गयी थी  और जिनके लिए वे काम करते हैं,  उन व्यापारियों को उनके इस हाल से कुछ लेना- देना नहीं.उनके छोटे- छोटे बच्चे भी इस काम में लगे हैं और उनके हाथों की उँगलियों में फंगस लगे हुए थे. चमडियाँ उघड रही थीं…

फिर मैंने सोचा कि मुझे साड़ियों का बहुत शौक है और मेरी सारी कमाई साड़ी खरीदने में ही चली जाती है. तो क्यो न  साड़ी बुनने वाले बुनकरो (जुलाहे) से शादी कर लिया जाये. उनसे मैं अपनी मनपसंद की साड़ियाँ बुनबाउंगी.  अपनी पसंद के रंग, अपनी पसंद से साड़ी का आंचल .. और वो प्यार से जैसा कहूँगी वैसी साड़ी बुन देगा.  मैंने प्रियदर्शन द्वारा निर्देशित एक फिल्म देखी ‘कांजीवरम’ जो बुनकरों का हाल बयां करती है. बुनकर महीनों, सालों में एक एक साड़ी तैयार करते हैं,  एक तो उन्हें उनके उचित पैसे नहीं मिलते और दूसरे वो जिंदगी भर बस दूसरों के लिए साड़ियाँ बुनते रह जाते हैं जबकि उनकी पत्नी और बेटी के लिए उनके ही द्वारा बुनी साड़ियाँ पहननी नसीब नहीं होता.

अंततः एक कवि से शादी की. सोचा था कवि बड़े रूमानी होते हैं. मेरे लिए रोज़ प्रेम कवितायेँ लिखेगा पर ‘यह न थी हमारी किस्मत….

वैचारिक और घरेलू पत्रिकाओं में स्त्री मानसिकता का निर्माण

प्रियंका सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत।  तदर्थ प्रवक्ता,हिन्दी विभाग,दौलत राम महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय । संपर्क : singh.priyanka135@gmail.com

संदर्भ: स्त्री-काल, आजकल,अहा ! जिंदगी, गृहशोभा, सरिता

( राजनीति विज्ञान विभाग, दौलतराम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय  और भारतीय जन संचार संघ के द्वारा  संयुक्त रूप से आयोजित ‘ प्रिंट मीडिया और महिलाएं’  विषय  पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रियंका सिंह ने  स्त्री-काल, आजकल, अहा ! जिंदगी, गृहशोभा और सरिता को केंद्र में रखकर अपना शोध -पत्र  प्रस्तुत किया.  ) 


आजकी हमारी दुनिया पूरी तरह से एक आभासी दुनिया बन चुकी है.इस आभासी दुनिया में प्रतिदिन विकसित होने वाली तकनीकों से हमारे जीवनकी संवेदना तेजी से प्रभावित हो रही है. बेहद ही काल्पनिक और फैंटेसीयुक्त अनुभवों से गुजरना आम बात हो गई है. जिस तरह जीवन में हम सचमुच के सुख, दुःख, क्रोध, पीड़ा और उपलब्धियों को अनुभव करते हैं वैसे ही इस दुनिया में भी करने लगे हैं. विशेषज्ञों ने इसे ‘आभासी यथार्थ’ या Virtual Realityका नाम दियाहै. यह यथार्थ जीवन के विशुद्ध अनुभवों को हाशिए पर ले जा रहा है. ‘टाइम’ पत्रिका के नवीनतम अंक में ज़ोएल स्टीन ने इस आभासी दुनिया का विश्लेषण करते हुए इसे“Redical new form of expression” कहा है.(1)अभिव्यक्ति की ऐसी आभासी प्रविधियों ने प्रिंट मीडिया के प्रभाव को काफी कम कर दिया है. यह सही है कि आज अधिकांश पत्र-पत्रिकाएँ अपना ऑनलाइन संस्करण निकाल रही हैं , लेकिन पत्रिकाओं का ऑनलाइन किया जाना ही एक तरह से आभासी दुनिया के प्रभाव का स्वीकार है.दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया एक प्रकार से प्रिंट मीडिया को निर्देशित कर रही है.प्रभाव और निर्देशन के बीच प्रिंट माध्यम की अपनी मूल प्रकृतिबदल रही है,उनका स्वतंत्र अस्तित्व एक नया रूप लेता जा रहा है.इसलिए प्रिंट मीडिया से जुड़े किसी भी मुद्दे पर बात करते हुए हमेंसबसे पहले इस समस्या पर सोचना चाहिए.यह एक प्रश्न भी हो सकता है और एक प्रस्थान-बिन्दु भी कि क्या अपनी मूल प्रकृति और स्वरूप केबदलते हुए दौर में ये माध्यम एक व्यापक पाठक वर्ग के लिए निर्धारित अपने लक्ष्यों मेंकोई गुणात्मक परिवर्तन कर रहे हैं?

हम इसे प्रस्थान-बिन्दु के रूप में लेते हुए अपने विषय से जोड़ते हैं.आभासी दुनिया की तुलना में प्रिंट माध्यमों में परिवर्तन अपेक्षाकृत धीमा होता है और  लक्षितपाठक वर्ग के व्यक्तित्व के विकास पर भी इसका प्रभाव पड़ता है. यदि एक व्यापक पाठक वर्ग के रूप में स्त्रियों की कल्पना करें तो उनकेमानसिकता-निर्माण में पत्र-पत्रिकाओं की अहम् भूमिका रही है. यहाँ स्त्रियों के बौद्धिक विकास में पत्रिकाओं की भूमिका और पत्रिकाओं की प्रस्तुति में स्त्रियों की भूमिका कासमानांतर अध्ययन ही हमारा अभीष्ट है. हमने वैचारिक और घरेलू या मनोरंजन-प्रधान पत्रिकाओं का चयन किया है. मुख्यतः मानसिकता निर्माण के इन दो पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है : पत्रिकाओं के प्रबंधन से जुड़े विभिन्न पदों पर स्त्रियों के कार्य और इन पत्रिकाओं में एक विषय या मुद्दे के रूप में स्त्री या स्त्री-संबंधी सामयिक विचार. घरेलू या मनोरंजन से जुडी पत्रिकाओं में हम स्त्री के प्रबंधन और उसकी छवि-निर्माण का एक अलग पैटर्न पाते हैं जबकि वैचारिक पत्रिकाओं में यह पैटर्न बदल जाता है. इस आलेख में दोनों की प्रक्रिया, प्रासंगिकताऔर प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है. अध्ययन का रुखबदलते हुए पैटर्नकी ओररखा गया है. पूरे आलेख कीप्रस्तुति इस रूप में है कि विषय केवल स्त्री के मुद्दों तक ही सीमित न रहे,बल्कि समाज और संस्कृति के व्यापक सरोकारोंकी एक अनिवार्य चिंता के रूप में उभरे. हमने अपनी बातों को पाँच विचार-बिन्दुओं के अंतर्गत रखा है.

पत्रिकाओं की स्त्री-केंद्रित अवधारणाएँ(WOMEN ORIENTED CONCEPT OF THE MAGAZINES) :

स्त्री-केंद्रित अवधारणा का सामान्य अर्थ है एक पाठक के रूप में स्त्री को सोचते हुए उसके अनुकूल सामग्री की प्रस्तुति. हालाँकि इस संदर्भ में कुछ संपादकों ने विशेष रुख अपनाया है. ‘स्त्रीकाल’ घोषित रूप से स्त्रीवादी पत्रिका है.अपने उद्द्येशों को रेखांकित करते हुए संपादक संजीव चंदन ने लिखा है, “हमारा प्रयास होगा कि किसी भी प्रकार के जैविक विभेद से परे लेखकों की सामग्रियों, बहसों, विमर्शों को जगह दी जाये और उसकी स्थितियों को स्त्रीवादी आदर्शों से ही परखा जाये. वैसे बहस के लिए खुला मंच देना भी हमारा प्रयोजन होगा.”(2) यह पत्रिका जैविक विभेद को नकारती हुई स्त्रीवाद के पक्ष में जाती है. और स्त्रीवादी लेखन के लिए स्त्री होना जरूरी नहीं है. पत्रिका के विभिन्न अंकों में प्रकाशित सामग्री को देखने से पता चलता है कि पुरुषों के लेखन को उसमें निहित स्त्रीवादी व्याख्या के कारण ही शामिल किया गया है. ज़ाहिर है कि अपने लेखकों के चयन में इस पत्रिका का दृष्टिकोण समन्वयात्मक है जबकि इसमें लेखन की प्रस्तुति एक ख़ास दृष्टिकोण के तहत की जाती है.दूसरी ओर यदि दिल्ली प्रेस की ‘गृहशोभा’ जैसी पत्रिका को देखें तो इसकीअवधारणा पूरी तरह से गृहिणियों से संबंधित है. इस पत्रिका केविज्ञापन में ये पंक्तियाँ लिखी रहती हैं—
“आपकी सच्ची मार्गदर्शिका यही शोभा
मैं स्वतंत्र हूँ, चट्टान हूँ विश्वास की
मैं आईना हूँ, गरिमा हूँ
मैं प्रतिशोध का हथियार हूँ
मैं तैयार हूँ हर कल के लिए”(3)

गृहशोभा’ जैसी पत्रिकाओं में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि उनके पाठकप्रायः स्त्रियाँ होती हैं. घरलू कामकाज के बाद फुर्सत के क्षणों में जागरूक महिलाएँ ऐसी पत्रिकाएँ पढ़ती हैं. अधिकांश महिलाएँ टेलीविजन धारावाहिक देखने की ही तरह पढने के ऐसे अनुभवों को मनोरंजन का ही एक रूप मानती हैं.‘गृहशोभा’ की पूरी प्रस्तुति गृहिणियों को आकर्षित करती है. यह विज्ञापन पत्रिका के पाठकों के रूप में स्वाभिमानी स्त्रियों का ही संकेत नहीं करता, उसकी भविष्योन्मुखी तैयारी को भी बतलाता है.‘गृहशोभा’ के अलावा दिल्ली प्रेस की ‘मुक्ता’ और‘वनिता’ तथा एचटी मीडिया की‘कादम्बिनी’ जैसी पत्रिकाओं ने महिलाओं के मनोरंजन के मनोविज्ञान को समझते हुए अपने कंटेंट और प्रस्तुति को लगातार संवारने की कोशिश की है.फिलहाल बिक्री और प्रचार-प्रसार की बात न करें तो निश्चित तौर पर इन पत्रिकाओं की मूल योजना केवल स्त्री पाठकों पर ही केंद्रित है. वैचारिकपत्रिकाओं के साथ ऐसा नहीं है, हालाँकि वे कम लोकप्रिय हैं. लोकप्रियता और स्तरीयता दो बातें हैं.स्त्री मानसिकता के विकास की दृष्टि से कहें तो अपनी थीम के कारण घरेलू पत्रिकाएँ स्त्रियों को भौतिक सुख सुविधा और समृद्धि के प्रति जागरूक रखती हैं जबकि वैचारिक पत्रिकाएँ उन्हें मानसिक संतुष्टि देती हैं, सोचने-समझने के उनके दायरे का विकास करती हैं. यह कहना भी जरूरी है कि घरेलू पत्रिकाओं की अवधारणा पाठक-केंद्रित होती है जबकि वैचारिक पत्रिकाओं की विचारधारा-केंद्रित.

पत्रिकाओं में महिलाओं द्वारा प्रबंधन(MANAGEMENT BY WOMEN IN MAGAZINES):



महिलाओं द्वारा किए जाने वाले प्रबंधन को हम दो रूपों में देख सकते हैं— संपादकीय टीम में महिलाओं की भूमिका और कंटेंट निर्माण में उसका योगदान. सूचना और प्रसारण मंत्रालय की पत्रिका ‘आजकल’ की संपादक फ़रहत परवीन यों तो एक महिला के संपादक होने को बहुत ख़ास नहीं मानती हैं लेकिन संपादन को बहुत जिम्मेदारी का कार्य मानती हैं. वे कहती हैं कि “गुणवत्तापूर्ण सामग्री का चयन और सीमित समय में पूरी रूपरेखा तैयार करके अंक को प्रकाशित करने तक की प्रक्रिया काफी लंबी होती है और यह टीम वर्क के कारण ही सम्भव हो पाता है.”(4)‘अहा जिंदगी’ के संपादकीय टीम में अनुपमा ऋतु और गीता यादव की मुख्य भूमिका है. ये समय समय पर थीम लेखन भी करती हैं.इसी तरह ‘स्त्रीकाल’ में डॉ० अनुपमा गुप्ता प्रबंधन के साथ साथ महत्त्वपूर्ण अनुवाद भी करती रहती हैं. निवेदिता संपादन में सहयोगी हैं. घरेलू पत्रिकाओं का प्रबंधन संस्थागत है. हाँ, उनमें कंटेंट निर्माण में लेखिकाओं की अच्छी संख्या है. प्रबंधन के दोनों रूपों पर ध्यान देने से हम पाते हैं कि संपादन के अलावा स्त्रियाँ प्रचार-प्रसार और पाठकीय रीति-नीति से जुड़े अहम मुद्दों का भी समाधान करती हैं.पत्रिका के स्थायी लेखकों के रूप में ये केवल स्त्री मुद्दों पर लिखती ही नहीं, पत्रिका के स्त्री-पक्ष को काफी हद तक भविष्योन्मुखी दृष्टिकोणभी प्रदान करती हैं.पत्रिकाओं का प्रबंधन प्रिंट माध्यम में स्त्रियों के छवि-निर्माण से ही नहीं बल्कि उनके लेखकीय प्रस्तुति से भी जुड़ा है. इन लेखिकाओं के कंटेंट लेखन में भी हम एक व्यवस्था पाते हैं. स्त्री के बारे में लिखते हुए अनुपमा ऋतु प्रश्नोत्तर शैली में बिन्दुवार विश्लेषण करती हैं. एक उपशीर्षक ‘येफ़ेमिनिज्म क्या है भाई?’ के अंतर्गत वे लिखती हैं, “नारीवाद के इस मरे हुए प्रेत को तथाकथित साहित्यिक, बौद्धिक और अभिजन वर्ग सबसे ज़्यादा फैलाता रहा है. वक़्त बिताने के लिए रसहीन, अर्थहीन शब्दों की चुइंगम चबाने वाला यह वर्ग मंहगे कॉफ़ी हाउसेज़ में बैठकर स्लमविच की दशा को दिशा दिखाने की बात करता है, लेकिन स्त्री के मनोविज्ञान से सबसे ज़्यादा खिलवार भी यही वर्ग कर रहा है, क्योंकि हमारे समाज में उस स्त्री का बाहुल्य है जिसकी अपनी कोई सोच ही नहीं.”(5) ऋतु की बातों पर गौर करने से उसकी भाषा और समझ पर भी गौर करना पड़ता है. यहाँ सहमति-असहमति की बजाय यह देखना चाहिए कि यदि इसके लेखन में कोई व्यवस्था है तो क्या इसका संबंध उसके संपादकीय अनुभवों से है? क्या उसकी भाषा विषय के अनुकूल है या आज के पाठकों के लिए प्रासंगिक है? इन प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ’ में देने से किसी को शायद कोई एतराज नहीं होगा. विस्तार भय के कारण दूसरे उदहारण नहीं लिए गए हैं लेकिन इतना स्पष्ट है कि दोनों तरह के प्रबंधन स्त्रियों के वैचारिक व्यक्तित्व को विकसित करने में सहयोगी हैं.

स्त्रियों से जुड़े विषय-वस्तु(CONTENT RELATED TO WOMEN) :

स्त्रियों से संबंधित सामग्री का प्रकाशन पत्रिका की मूल अवधारणा के अनुकूल किया जाता है. घरेलू और वैचारिक दोनों पत्रिकाओं में स्त्रियों के निजी, पारिवारिकऔर सामाजिक विषयों से जुड़ी सामग्रियाँ प्रस्तुत की जाती हैं. घरेलू पत्रिकाओं में निजी या पारिवारिक मुद्दोंकोसर्वेक्षण से प्राप्त अलग अलग तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है.इसके अलावा जरूरत और अवसर के अनुकूलप्रेम, विवाह,शारीरिक शिक्षा, रिश्ते-नाते, खानपान, पहनावे और पर्व-त्यौहार जैसे विषयों पर विशेष सामाग्री का प्रकाशन होता है या विशेषांक आदि निकाले जाते हैं. ‘गृहशोभा’ के वर्ष 2015 में  प्रकाशित अबतक के अंक बचत, दाम्पत्य, रिश्तेदारी, मेक अप, शिशु-पोषण और मानसून फैशन पर केंद्रित हैं.‘गृहशोभा’ की तरह ‘सरिता’ पूरी तरह स्त्री-केंद्रित पत्रिका नहीं है. लेकिन दोनों पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों के विषय मिलते-जुलते होते हैं. प्रत्येक अंक में पति-पत्नी, माँ-बेटी, पिता-पुत्र, सास-ससुर-बहूऔर भाई-बहन के रिश्ते की कहानियाँ छपती रहती हैं.पति-पत्नी संबंधों की कहानियाँ सबसे अधिक छपती हैं.  ‘सरिता’ की कहानियों और अन्य सामग्रियों का स्वर अंधविश्वास, पाखंड और भ्रष्टाचार के विरोध का होता है. दिल्ली प्रेस के एक विज्ञापन में ‘सरिता’ के बारे में यह लिखा है— “सरितापत्रिका नहीं, एक आंदोलन है. हिंदी पत्रकारिता में इसने एक नया इतिहास रचा है और स्वस्थ मनोरंजन के साथसाथ समाज का मनोरंजन किया है.”(6) सामाजिक मनोरंजन के बहाने जहाँ ‘सरिता’ स्त्रियोंकी राजनीतिक जानकारी बढ़ाती है और उनमें सामाजिक संस्कृति का विकास करती है वहीं‘स्त्रीकाल’ बौद्धिक संस्कृति का विकास करती है. प्रिंटफॉरमेट में यह पत्रिका शोध-लेखों को प्रमुखता से छापती है.  ऑनलाइन एडिशन में साहित्य (50%), शोध (30%) और समसामयिक मुद्दों (20%) से संबंधित सामग्री का प्रकाशन किया जाता है.(7)इसका लक्ष्य स्त्री-संबंधी शोधपरक अध्ययन को प्रमुखता देना है.विषय-वस्तु के आधार पर दो बातें स्पष्ट हैं. घरेलू पत्रिकाएँ स्त्रियोंमें पारिवारिक और सामाजिक चेतना का विकास करती हैं जबकि वैचारिक पत्रिकाएँ आलोचनात्मक और शोध-क्षमता का. लेकिन स्त्री-संवेदना दोनों में कॉमन है और कंटेंट के प्रभाव को निर्धारित भी करती है. इसका एक मतलब यह भी है कि जिस प्रकार बौद्धिक चेतना से रहित मनोरंजन अर्थहीन है उसी प्रकार स्त्री-संवेदना से रहित तथाकथित बौद्धिकता भी उथली होगी.

सापेक्षिक मानसिकता का विकास(DEVELOPMENT OF RELATIVE MENTALITY) :
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि साहित्य और पत्रकारिता में अभी भी पुरुष वर्चस्व की स्थिति है. सापेक्षित मानसिकता के विकास का पहला चरण इस वर्चस्व को समझना है.संदर्भित पत्रिकाओं का अध्ययन करते हुए यह महसूस किया गया है कि स्त्रियों में पुरुषों के सापेक्ष एक उच्च कोटि की बौद्धिकता के विकास की दरकार है.  इस पहलू पर सोचते हुए न तो किसी प्रतियोगी भावना की जरूरत है और न ही स्त्री या पुरुष में से किसी को कम या अधिक आंकनेकी. समन्वयात्मक दृष्टिकोण चाहिए. अनुपमाऋतु के लेख ‘सत्य के दूसरे छोर पर स्त्री’ का मूल स्वर भी यही है, “परंपराएँ  कभी भी ख़ुद नहीं बदलतीं. उनका बदलना हमारे बदलने पर निर्भर करता है. हमें एक बात बहुत ईमानदारी से स्वीकारनी है कि ग़लत रास्तों पर चलकर कभी सही नहीं हुआ जा सकता. पुरुष क्या कर रहा है, क्या करता रहा है, उसे कहने से हम अपने दोषों को जस्टिफाई नहीं कर सकते.ईमानदार स्वीकारोक्ति और पड़ताल के बिना हमारी दुनिया में न कोई क्रांति संभव है,  न प्रतिक्रांति.”(8) सापेक्षिक मानसिकता की दृष्टि से ‘स्त्रीकाल’बहुत अच्छा उदाहरण है. संपादकीय टीम और कंटेंट प्रस्तुति में भी यह बात है.अंक-7 के एक लेख में कुसुम त्रिपाठी लिखती हैं— “शोषणहीन समाज की स्थापना ही स्त्रीवादी सपना है.”(9)वे‘सत्ता’ शब्द से ही अपना विरोध दर्ज करती हैं.  क्योंकि इससे यह पता चलता है कि “हम अपना वर्चस्व चाहते हैं और जब हम वर्चस्व चाहेंगे तो उसे पाने के लिए हमें दूसरे वर्ग कोदबाना पडेगा.”(10 ) स्त्रियों की ओर से इस तरह की सोच स्वागत योग्य है.कट्टर स्त्रीवादी हो जाने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा. भारतीय परंपरा में जिस अर्धनारीश्वर की परिकल्पना की गई है उसे आज के संदर्भ में एक नया रूप देने की जरूरत है और अनुपमा ऋतु या कुसुम त्रिपाठी जैसी विचारशील स्त्रियों के लेखन से यह नया रूप दिया ज सकता है. कोई भी पत्रिका या लेखक बड़ा या छोटा नहीं होता, बड़े या छोटे होते हैं उसके विचार और उद्देश्य. ये विचार स्त्री या पुरुष में से किसी के भी हो सकते हैं. इन पत्रिकाओं में इस तरह के सहलेखन और सहचिन्तन को बढ़ावा देना चाहिए. सापेक्षिक मानसिकता का विकास सहभागिताकी इस भावना के बिना नहीं हो सकता.इनलक्ष्यों को पूरा करने के लिए वैचारिक और घरेलू  पत्रिकाओं के प्लेटफ़ॉर्म परकुछ गोष्ठियों या कार्यशालाओं का आयोजन भी किया जा सकता है जिनमें स्त्री और पुरुष लेखक परस्पर विचार-विनिमय कर सकते हैं और मानसिकता निर्माण के लिए एक ‘कॉमन प्रोग्राम’ की रूपरेखा बना सकते हैं.

पुस्तक संस्कृति की ओर(TOWARDS BOOK/ READING CULTURE) :
‘वर्चुअल रियलिटी’ पुस्तक-संस्कृति या पढ़ने-लिखने की परंपरा को तेजी से क्षीण कररही है. वह पाठक को एक उपभोक्ता बनाकर उसे अपनी गिरफ्त में ले लेती है. पत्रिकाएँ गिरफ्त में नहीं लेतीं या शायद ले ही नहीं पातीं.प्रतियोगिताओं का आयोजन कर कुछ पत्रिकाएँअपने पाठकों को पुरस्कार स्वरूप पुस्तक या घरेलू उपकरण देते हैं. लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या केवल इतने से पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सकता है.कुछ हद तक पत्रिकाओं की कीमत भी इसे प्रभावित करती है. ‘अहा जिंदगी’ एक अपवाद है तो केवल अपनी रचनात्मक प्रस्तुति के कारण. इसी कारण वह न तो पूर्णतः घरेलू पत्रिका है और न ही विशुद्ध वैचारिक.उसकी पूरी प्रस्तुति में परंपरा और आधुनिकता का समन्वय मिलता है.वास्तव में परंपरा को पूरी तरह नकारकर और आधुनिकता के फैशन में आकंठ डूबकर हम कभी अपनी लक्षित मानसिकता को प्राप्त नहीं कर सकते. दोनों के उपयोगी तत्त्वों को लेकर उनके बीच से ही रास्ता बनाना होगा.

बातें बहुत सी हैं. लेकिन संक्षेप में यह कहना चाहिए कि घरेलू और वैचारिक पत्रिकाओं को एक प्लेटफ़ॉर्म की तरह बरतते हुए स्त्री -मानसिकता के निर्माण का हमारा लक्ष्य स्त्री को एक प्रबुद्ध नागरिक के रूप में निर्मित करने का है. पाठक की भूमिका से उसकी शुरूआत होती हैऔर प्रबंधन की भूमिकाओं से होते हुए वह बौद्धिक नेतृत्व की एक दहलीज पर पहुँचती है.

संदर्भ (References) :

1. Joel Stein का लेख Inside the Box;TIME (23-08-2015); Page-39.
2. संजीव चंदन द्वारा लिखित संपादकीय; स्त्रीकाल(अंक-6, अप्रैल 2009); पृ० 05.
3. गृहशोभा(जूनII,2015) में प्रकाशित विज्ञापन, पृ० 08.
4. ‘आजकल’ के संपादक फ़रहत परवीन से बातचीत; 11-08-2015.
5. अनुपमा ऋतु का लेख ‘सत्य के दूसरे छोर पर स्त्री’, अहा जिंदगी (जुलाई 2015); पृ० 19.
6. दिल्ली प्रेस द्वारा जारी सूचना पुस्तिका में ‘सरिता’ का परिचय
7. ‘स्त्रीकाल’ के संपादक संजीव चंदन से बातचीत; 10-08-2015.
8. अनुपमा ऋतु का लेख ‘सत्य के दूसरे छोर पर स्त्री’, अहा जिंदगी (जुलाई 2015); पृ० 12.
9. कुसुम त्रिपाठी का लेख ‘शोषणहीन समाज की स्थापना ही स्त्रीवादी सपना है’, स्त्रीकाल(अंक-7, अप्रैल 2010); पृ० 140.
10. वही; पृ० 140.

पत्रिकाएँ (Magezines) :
स्त्रीकाल(अंक 6, 7, 8, 9) तथा ऑनलाइन संस्करण.
आजकल(मार्च, सितम्बर और नवंबर 2014 तथा जनवरी, मार्च, जुलाई, अगस्त 2015)
अहा जिंदगी(जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल, जून, जुलाई, अगस्त 2015)
गृहशोभा ( मार्च I, अप्रैल I, मईII, जूनI, II, जुलाई  I, 2015)
सरिता(मई I, जूनII, जुलाईI, II और अगस्तI, 2015)

बीज-शब्द (KEY WORDS) :
स्त्री मानसिकता (WOMEN PSHYCE), आभासी दुनिया (VIRTUAL WORLD)
इलेक्ट्रोनिक मीडिया (ELECTRONIC MEDIA), प्रिंट मीडिया (PRINT MEDIA)
मनोरंजन का मनोविज्ञान (PSYCHOLOGY OF ENTERTAINMENT)
सांस्कृतिक विकास (CULTURAL DEVELOPMENT)
सापेक्षिक मानसिकता (RELATIVE MENTALITY)
पुस्तक संस्कृति(BOOK CULTURE)

पेंडुलम

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सिनीवाली शर्मा

स्नातकोत्तर मनोविज्ञान से, पत्र-पत्रिकाओं में लेख, व्यंग्य एवं कहानियाँ प्रकाशित, संप्रति स्वतंत्र लेखन, संपर्क : siniwalis@gmail.com

ये शाम धुंधली है मेरी जिंदगी की तरह, सोचती हूँ अगर जिंदगी मुझसे कभी ये सवाल कर बैठे कि मैंने उसे दिया क्या, तो—–! तो मैं क्या जवाब दूँगी। इसी जवाब को खोजती तो मैं कब से चल रही हूँ पर हर कदम हर कोशिश के साथ जिंदगी  उलझती ही चली जाती है। सब कुछ पा लेना चाहती थी, पर क्या मिला है अबतक। न चाहते हुए भी मैं अपने आप में उलझती जा रही हूँ और इधर मेरा घर  कुछ दिनों से देख रही हूँ भव्या का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है, चुप सी रहती है। कई बार उससे पूछा, स्कूल में कुछ हुआ है, कोई दिक्कत तो नहीं है। कुछ नहीं बताती। थोड़ी देर खाली-खाली आँखों से मुझे देखती है और कभी कभी मुझे कसकर पकड़ लेती है। मैंने उसके दोस्तों से भी बात की पर कोई कारण समझ में नहीं आया। शायद हार्मोनल चेंज भी इसका कारण हो सकता है या फिर—–। शिशिर से इस बारे में बात करुं पर वो तो टूर पर गया है। उसे अभी दो-तीन दिन और लग जाएंगे। दो-तीन दिन लगे या दो-तीन हफ्ते, कोई विशेष फर्क तो नहीं पड़ता मुझे, हाँ और शांति ही लगती है। ये घर और भव्या उसका इंतजार करते हों और मैं—–पता नहीं !

सोचती हूँ, पता नहीं कहना मेरे लिए अब आसान हो गया है पर इसे आसान बनने में कितना समय लगा है, वो मैं ही थी जो  किसी पार्क में किसी मंदिर में घूरती आँखों के बीच घंटों शिशिर का इंतजार किया करती थी। उन आँखों के बीच शिशिर की आँखें ढूंढा करती। उसे देखते ही मैं भूल जाती कि मेरे आसपास कितने लोग हैं। मैं दौड़ कर उससे लिपट जाती। मेरे लिए उसकी आँखों में चमकीली रौशनी होती, होठों पर मिठास और साथ में उसकी ढेर सारी कविताएँ। वो मुझे सुनाता जाता, अपलक मैं उसे देखती रहती। कई बार वो पत्रिका भी साथ लाता जिसमें उसकी कविताएँ छपी होतीं। पर मैं उसका नाम बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में देखना चाहती और वो उदास होते  हुए कहता, वहाँ तक पहुँचना आसान नहीं होता—–गॅाडफादर चाहिए, माथे पर किसी का हाथ चाहिए। कविता कितनी भी अच्छी क्यों न हो, लिखने से अधिक छपाना मुश्किल काम होता है। मैं उसकी आँखों में कई बार उदासी तैरते देखती। ” अगर लेखन में दम हो तो आज नहीं तो कल लोग उसे खोज कर पढ़ेंगे, पत्रिकाएं हाथोंहाथ लेंगी “, मैं बोलती रहती वो चुपचाप मुझे देखता रहता।

” काश कि ऐसा हो—–”
” होगा जरूर होगा ‘
” और काश कि तुम यूं ही उस समय मेरे साथ रहो ”
” पर तब तक—–?”

उसने मेरी हथेली अपनी हथेली में लेते हुए कहा, ” अगर मैं ये कहूं-—-मैं ऐसे ही लिखता रहूँ और तुम जीवन भर यूं ही मेरे साथ रहो, मेरी पहली पाठक, मेरी गाईड या यूं कहूँ मेरी सबकुछ बनकर——! ” उसकी आवाज हवा में तैरती रही और मेरी शाम सिंदूरी होती रही और वो सिंदूर बिखरता रहा मुझपर—–सपनों का सच होना मैं देख रही थी।डोर बेल बजा। घड़ी की ओर नजर गई, देखा दो बज गए। लगता है भव्या स्कूल से आ गई। मैं अपनी यादों और आधी लिखी कहानी को समेटने लगी कि अधूरी कहानी ने पूछा, ” मुझे कब पूरा करोगी ?”
” अब शायद रात में ही—–!”

भव्या को तो फिर भी समझा कर समय निकाल सकती हूँ पर कितनी जिम्मेदारियों को समझाया जाए। आज शाम कुछ लोग घर पर आ रहे हैं। समय तो देना ही होगा। कल सुबह-सुबह शिशिर भी आ जाएगा फिर कहाँ मिल पाएगा वक्त। अधूरी कहानी मुझे देखती रहेगी और मैं जिम्मेदारियों की चक्की में पीसती उसे। शिशिर मेरे जीवन में आया तो मेरी जिंदगी ही बदल गई। सब कुछ खिला-खिला, खुशबू में भींगा-भींगा था। हर वक्त मैं, वो और उसकी कविता होती। कभी-कभी उसकी अधूरी लाइन मैं भी पूरा कर देती। मैं जीवन का संगीत सुन रही थी। महसूस करने लगी थी वो मुझपर आश्रित रहने लगा है और अपनी खुशियों के लिए मैं उस पर। पर—–अब मेरे जीवन में उसका होना किसी तूफान से कम नहीं और हर वक्त किसी सूखे पत्ते की तरह मैं काँपती रहती हूँ।
मेरे जीवन से सुगंध उड़ चुका है और सूखे फूल की तरह मैं बिखर रही हूँ—–ओह फिर मन कहाँ भागने लगा। भव्या स्कूल से थकी आई है और मैं——।

भव्या चुपचाप टीवी देख रही है। अपनी उम्र से ये कुछ अधिक बड़ी हो गई है, शरारतें नहीं करती, इस उम्र की नादानियाँ नहीं दिखती, चुप होती जा रही है दिन-ब-दिन। जब भी मेरे और शिशिर के बीच झड़प होती है कभी कभी वो भी सामने होती है। हालांकि हरबार मैं चाहती हूँ कि हम ऐसा कुछ भी उसके सामने नहीं करें जिससे उसपर कुछ गलत असर हो। पर सिर्फ मेरे चाहने से तो सब कुछ नहीं होता—–। पर आगे से बिल्कुल नहीं—–मैं ही चुप रह  जाऊंगी। बहुत कुछ सहना पड़ता है, ऐसे ही घर की छत और उसके नीचे संसार नहीं बसता। ओह—–फिर दूध उबल कर गिर गया, मेरी ही तरह। रात के नौ बज गए। गेस्ट अभी अभी गए हैं। सुबह स्कूल की तैयारी भी करनी है और भव्या को भी थोड़ा समय देना है-क्वालिटी टाइम चाहिए बच्चों को। सही है बच्चे शोपीस तो नहीं हैं कि बस खिला पिला दो और झाड़ पोछ कर घर में सजा दो। उसकी भी भावनाएं हैं, अपनी उलझनें हैं। मैं नहीं समझूंगी, टाइम नहीं दूंगी तो और घर में कौन—–! शिशिर को तो गोष्ठियों से टाइम ही नहीं मिलता, घर आता है थकान उतारता है फिर अगली मंजिल की तरफ बढ़ जाता है। घर में उनके साथ कौन कौन रहता है, शायद उसे पता हो या ना हो, परिवार की आर्थिक जरूरतों के अलावा भावनात्मक जरूरतें भी तो होती हैं, कवि है पर भावना नहीं समझ पाता।

भव्या के पिछले टेस्ट का जो रिजल्ट आया था, संयोग से वो घर पर ही था और उसकी नजर पड़ गई थी रिपोर्ट कार्ड पर। भव्या पर कम पर मुझपर तो बरस ही पड़ा—–” क्या करती हो दिनभर—–घर और बेटी संभल नहीं रही पर साहित्यकार बनने से तुम्हें फुरसत कहाँ है—–।” लगा जैसे तीर कलेजे में आकर चुभ गया-साहित्यकार शब्द मेरे लिए नहीं तुम्हारे लिए बना है मैं तो——! वो रिपोर्ट कार्ड फेंक कर चिल्ला उठा, ” तुम ने कोई कसर तो छोड़ी नहीं—–उस दिन हँस-हँस कर जो उस  से बात कर रही थी—–उसके कुछ दिन बाद ही तो तुम से उसने फोन करके कहानी माँगी थी—–मैं क्या नहीं समझता तुम औरत होकर अपना उपयोग करना अच्छी तरह जानती हो।”

” तुम जैसों के लिए ये कहना बड़ी बात नहीं है कि औरत के लिए आगे बढ़ना आसान होता है—— औरत के लिए औरत होना उसकी सबसे बड़ी समस्या भी तो है ये क्यों नहीं दिखता—— आदमी जो देखना चाहता है उसे वही दिखता है।” पर मैं जवाब देकर बात बढ़ाना नहीं चाहती थी, बस इतना ही कहा,
” क्या तुम संपादक से नहीं मिलते—–?”
” तुममें और मुझमें अंतर है ”
” क्या अंतर है ?”
” तुम सज संवर कर जाती हो !”
ओह, कितनी गिरी हुई सोच है इसकी। जवाब तो था मेरे पास पर झगड़ा और बढ़ जाता अगर मेरी नजर पर्दे के पीछे खड़ी भव्या पर नहीं पड़ती। उसका डरा सहमा चेहरा देख मैं चुप हो गई और वहाँ से आँसू पोछते हुए हट गई।

रात के ग्यारह बज गए। भव्या सो गई। मैं इतनी थक गई कि अब कहानी पूरी करने की हिम्मत नहीं बची। फिर अधूरी कहानी मुझे देख रही थी। कल तक मुझे उसे भेजना है। कई बार मैं वक्त ले चुकी पर कहानी पूरी ही नहीं हो पाती। अगर अभी पूरी नहीं हुई तो कल सुबह-दोपहर-शाम-रात तक समय नहीं मिल पाएगा क्योंकि कल सुबह ही शिशिर आ जाएगा। फिर दो चार दिन सफर की थकान उतारता रहेगा और घर के खाने का स्वाद लेता रहेगा। कहानी पर काम करते देखकर तो उस समय शायद चुप भी रह जाए पर रात होते होते कोई न कोई बहाना लेकर मुझपर बरस जाता है। महीनों से उसका ये व्यवहार मैं देख रही हूँ। अब तो आँख बंद करके भी ये जान जाती हूँ कि मेरे किस व्यवहार पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, सब कुछ कैलकुलेटेड सा हो गया है। ये दर्द क्यों—–ओह ये तो उस दिन शिशिर ने गुस्से में गरम पानी डाला था। उसके बाद हाथ में फफोले पड़े थे। अभी तक पूरा सूखा नहीं है। दो-चार दिन दवाई लगाई फिर काम में दवाई लगाने का ध्यान ही नहीं रहा। कहाँ रह पाता है अपना ध्यान और वो कहता है मुझे सजने संवरने से फुरसत ही नहीं है।

क समय था कि मेरा सजना संवरना उसे पसंद था। खासकर जब किसी गोष्ठी सम्मेलन में जाना होता या किसी संपादक, समीक्षक मित्र से मिलना होता। उस दिन वो चाहता मैं उसके हिसाब से तैयार होऊँ। मुझे भी उसके हिसाब से सजना संवरना अच्छा लगता। सच कहूं तो कभी कभी मुझे अपने आप से रश्क होने लगता, कि दुनिया जिसकी दीवानी है वो मेरा—–। उसके साथ मुझे चलते गर्व होता कि मैं इतने बड़े कवि की पत्नी हूँ।  सभा संगोष्ठियों में उसके साथ आते जाते धीरे – धीरे मैं महसूस करने लगी कि सुंदरता के अलावा मैं उसकी नजर में और कुछ नहीं रही। मेरी भावना, मेरी खुशी, मेरी जरुरत धीरे धीरे शिशिर के आगे बढ़ने के जूनून में सब खोता चला गया।  इस बीच कुछ ऐसे साहित्यकारों से मिली जिन्हें मुझमें मेरी सुंदरता के अलावा भी कुछ दिखा, वो थी मेरी लिखने की प्रतिभा। शिशिर की कविता सुनते सुनते न जाने मुझमें लिखने की क्षमता कहाँ छुपी थी वो बाहर आ गई। जब उनलोगों ने मुझपर भरोसा जताया तो मैं भी लिखने लगी, ” कहानी “। मेरी कहानी छपने लगी और धीरे धीरे बड़ी बड़ी पत्रिकाओं में भी। मुझे लगता शायद ऊपर वाले ने हमारी जोड़ी इसीलिए बनाई थी कि हमदोनों एक ही राह के राही बनेंगे। जब मंजिल एक हो तो साथ चलना आसान हो जाता है।

घर संसार से मैं समय चुरा कर लिखने लगी, कहानियाँ। पाठकों के पत्र और फोन आने लगे। पहले शिशिर के कहने पर जाती थी अब मेरे लिए भी निमंत्रण आने लगे। पर अब वो मुझे अपने साथ ले जाना नहीं चाहता। कभी कभी शिशिर तय समय से पहले ही मुझे बिना बताये निकल जाता और मैं इंतजार करती ही रह जाती। भव्या के जन्म के बाद औरत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी घर और बच्चे को संभालना होता है, ये मुझे  शिशिर समझाने लगा। उसकी परवरिश में कहीं कोई कमी न रह जाए। इससे जुड़ी किताबें ला लाकर देने लगा। मैं कुछ और पढ़ना चाहती वो मुझे कुछ और पढ़ाता। फिर भी किसी तरह मैंने अपने सपने को बचाये रखा। एक हफ्ते पहले ही की तो बात है उस दिन शिशिर घर पर था। भव्या की छुट्टी थी स्कूल में। मैं तैयार होने लगी संपादक से मिलने जाना था। शिशिर से कहा, ” भव्या का ध्यान रखना—–मुझे लौटने में तीन चार घंटे लग जाएंगे।”
” कहाँ जा रही हो——?”
” संपादक एक कार्यक्रम करवाना चाहते हैं, इसी शहर में। वो चाहते हैं कि मैं भी हिस्सा लूँ। इसी सिलसिले में कुछ——”
” अच्छा तभी ये सिल्क की साड़ी और लिपस्टिक लगाकर जा रही हो, मैं सब समझता हूँ—–कहानी कैसे छपती है और कार्यक्रम कैसे होते हैं।”
मैंने आवाज नीची रखी क्योंकि आजकल भव्या की गहरी होती उदासी मेरी आँखों में थी। “क्या कहना चाहते हो तुम कि मैं—–?”
” तुम सब समझ रही हो। उस दिन जब तुम मेरे साथ गई थी तो वो तुम्हें अपने केबिन में लेकर क्यों गया था—–क्या मेरे सामने बात नहीं हो सकती थी !”
” मेरी नहीं तो कम से कम उनकी उम्र का तो लिहाज करो।”
” मुझे बेवकूफ बनाती है—–मैं खूब समझता हूँ तुम्हें भी और—–!”

गैस पर पानी खौल रहा था हमारी ही तरह। मुझे अंदाजा नहीं था वो इस हद तक भी जा सकता है। उसने खौलता हुआ पानी मुझपर फेंक दिया। ओह, सिर्फ शरीर ही नहीं जला आत्मा भी जल गई। मेरे भीतर शिशिर नाम जलने लगा, दुर्गंध आने लगी। साड़ी थी पूरा शरीर तो नहीं जला पर हाथों पर फफोले पड़ गए मेरी ही जिंदगी की तरह। वो अगले ही दिन देश के प्रख्यात कवि संगोष्ठी में शामिल होने के लिए चला गया। बहुत रात बीत गई। अधूरी कहानी फड़फड़ाती रही मेरे सामने। मैं भव्या को, उस अधूरी कहानी को और घड़ी के पेंडुलम को देखती रही।

पूरन सिंह की लघु कथायें

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डा. पूरन सिंह

चर्चित साहित्यकार पूरन सिंह कृषि भवन में सहायक निदेशक हैं. संपर्क : drpuransingh64@gmail.com>

भूत

बाबा बहुत मेहनत करते थे लेकिन जमींदार बेगार तो करवाता था, पैसे नहीं देता था। कभी-कभार दे दिए तो ठीक नहीं तो नहीं। उन्हीं पैसों से किसी तरह गुजर होती थी।

क दिन दोपहर को मैंने मां से कहा,‘‘बहुत भूख लगी है।’’
मां कुछ नहीं बोली उसने मिट्टी के बरतन उलट कर दिखा दिए थे।
मेरी भूख और तेज हो गई थी। भूख के तेज होते ही मस्तिष्क भी तेज हो गया था। पास ही श्मशान घाट था जहां बड़े .बडे लोग अपने बच्चों को भूत-पे्रत से बचाने के लिए नारियल, सूखा गोला पूरी-खीर कई बार मिष्ठान भी रख आते थे। यह सब काम दोपहर में होता था या फिर आधी रात को।

मैं श्मशान घाट चल दिया था। संयोग से वहां खीर पूरी और सूखा गोला रखा था। गोले पर सिंदूर और रोली लगी थी। मैंने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मैंने जल्दी-जल्दी आधी खीर पूरी खा ली थी और गोला झाड़ पोंछकर अपनी जेब में रख लिया। आधी खीर पूरी लेकर मैं घर आया था। मेरा चेहरा चमक रहा था।
चमकते चेहरे को देखकर मां ने पूछा, ‘भूख से भी चेहरा चमकता है क्या­। तू इतना खुश क्यों हैं?
मैंने बची हुई आधी खीर-पूरी मां के आगे कर दी थी। मां सब कुछ समझ गई थी। मां की आंखें छलक गई थी और उसने मुझे अपने आंचल में छिपा लिया था मानो भूत से बचा रही हो कि उसके होंठ फड़फड़ाने लगे थे, ‘भूत, भूख से बड़ा थोड़े ही होता है।’

मैं कुछ नहीं समझा था। मैं मां के आंचल में और छिपता चला गया था।

ब्लैकमेल 

मैं और परमानंद चैबे साथ -साथ स्कूल जाते ,साथ -साथ खेलते और साथ -साथ पढ़ते थे । इतना ही नहीे साथ -साथ खाते भी थे । परमानंद अच्छी – अच्छी सब्जी रोज लाता  और मैं भी रोज नई – नई सब्जियां लाता,फर्क सिर्फ इतना होता कि परमानंद की सब्जी रोज ताजा  होती और मेरी बासी,  क्योंकि मेरी मां जिन लोगों के  घरेां में पाखाने साफ किया करती वही लोग बासी या रखी हुई सब्जी मेरी मां को दे देते थे और मां वही सब्जी मेरे टिफिन में रख देती थी । परमानंद मेरी सब्जी खाते समय हमेशा यही कहता , यार मलघोटा, मैं तेरी सब्जी खाता हूं ,तूं यह बात मेरी मां से कभी मत कहना, नहीं तो वह मुझे बहुत मारेगी ।

मैंने सब्जी वाली बात उसकी मां से कभी नहीं कही।तभी एक दिन , हम दोनों में किसी बात पर लड़ाई हो गई । परमानंद शरीर से हृष्ट-पुष्ट था सो उसने मुझे खूब उधेड़ा । मैं बिलबिलाता रहा । अचाानक मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया , साले मार ले ,आज तेरी अम्मा से कहूंगा कि तूं रोज मेरी सब्जी खाता है फिर देखना………… हां।
बस फिर क्या था , परमानंद चैबे पीठ खेाले मेरे सामने खड़ा था ।

सुराही

फूलपुर का मवेशियों का मेला पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है । गाय , भैंस से लेकर उुंट ,भेड तक की खरीद -फरोख्त होती है । मेले में खेतिहर किसान से लेकर जमींदार तक आते हैं । अब  जब सभी लोग इसमे आते हैं तो उनके मनोरंजन का भी ध्यान रखा जाता है । इस बार मुन्नी बेडि़न की नौटंकी आई है । पूरे क्षे़त्र में हंगामा हो गया। कुछ लोग सिर्फ उसकी नौटंकी देखने ही मेले में जाते हैं ।

मुन्नी  में बला की सुंदरता है तो गजब की अदा भी। नाचने से लेकर कोई किरदार हो वह जान डाल देती है । पंडित रघुनंदन उसकी अदाओं के दीवाने हैं । वे जब नौटंकी देखने जाते हैं तो बहुत से लोग उनकी छत्रछाया मेें उनके साथ ही रहते हैं । बड़े धर्मी -कर्मी हैं पण्डित जी । पूजा- पाठ में पूरी आस्था है तो विश्वास भी है लेकिन मनोरंजन तो मनोरंजन ठहरा उसका पूजा- पाठ से क्या सम्बन्ध ।

एक दिन तो गजब ही हो गया जब मुन्नी ने कूल्हे मटका – मटकाकर छाती उघाड़ -उघाड़कर नाच दिखाया तो पंडितजी मानेा पागल हो गए हों । बस , फिर क्या था बुला लिया मुन्नी के कंपनी मैनेजर को ।

केदार , मुझे मुन्नी अच्छी लगती है । दिल आ गया है मेरा उस पर । बस एक बार के लिए ……………। पंडित जी ने अपना हुक्म सुना दिया था । पहले तो कंपनी के मैनेजर ने नानुकुर की लेकिन जब पंडितजी ने धमकाया तो मैनेजरका पाजामा गीला हो गया था ।

मुन्नी रात में नौटंकी में काम करती और दिन में आराम करती थी लेकिन जब से पंडितजी का दिल उस पर आया है वह दिन में सो नहीं पाती ।

उस दिन पंडितजी उसके साथ रति क्रिया में डूबे हुए थे । बहुत खुश थे । वे कभी मुन्नी के तलवे चाटते तो कभी नाभि से होते हुए होठों तक पहुंच जाते थे ।  बड़ी देर तक चाटने-चूमने के बाद पंडितजी थक गए थे जिससे उन्हें प्यास लग आई थी । उनके पास ही उनकी पानी से भरी सुराही रखी थी जिसे वह कहीं भी जाते अपने साथ ही ले जाते थे । ………पानी…… इतना ही कह पाए थे वह।

मुन्नी उठी और अपनेे लिए रखे पानी के घड़े से पानी निकालकर देने लगी  थी ।

 नहीं मुन्नी…नहीं ……… इतना भी नहीं …..। हम ब्राह्मण हैं …….वर्णश्रेष्ठ …… हम तुम्हारे हाथ से तुम्हारा पानी कैसे पी सकते हैं …….. हम पानी तो अपनी सुराही से ही पिएंगे ……..और पंडितजी ने स्वयं उठकर अपनी पीतल की सुराही से पानी पी लिया   था ।

किसान महिलाओं को विशेष अवसर दिये जायें

भारत  के असमान विभाजनों में एक विभाजन है -शहर और ग्रामीण का विभाजन ।
ग्रामीण महिलाओं की  जीवन प्रणाली के संदर्भ में बात की जाए तो बात और गंभीर हो जाती है। गाँवों मे रहने वाली महिलायें  खेती और खेती संबंधित रोजगार मेें जुड़ी हुई है- शायद इसलिए बेतहाशा कष्टमय जीवन ही उनके हिस्से में आया है। चूल्हा और चौका ही उनके  उसके जीवन की परिसीमायें हैं . महिलाओं का दर्जा निम्न  है। इसकी वजह दारिद्र्य , शिक्षा की व्वयस्था  का अभाव, धर्म-जाति का मानसिक प्रभाव, कम उम्र मे विवाह, स्वास्थ्य संबंधी  जागरूकता और सुविधा की कमीं , आर्थिक निर्णयों मे असहभाग आदि कारणों की वजह से हमारी 50% जनसंख्या आज भी पिछडी है।

ग्रामीण महिलाओं का साक्षरता दर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि अधिकतम संख्या में 39 से 69 तक की उम्र की महिलाओं को बेसिक शिक्षा की सुविधा ही प्राप्त हुई नही है। आज की नयी लडकियां शिक्षा ले रही है, लेकिन  गाँव में जितनी कक्षा तक स्कूल है, उसमें से अधिकांश की  उतनी ही पढ़ाई होती है।

हमारे देश में अभी 2011 में जातिगत जनगणना हुई , लेकिन सरकार इसे सार्वजनिक नही कर रही है। इस जनगणना से पता चलता है यहाँ दो भारत बसते हैं । शहरी भारत और ग्रामीण भारत। बडे उद्योगपतियों को पानी, बिजली, जमीन, टॅक्स, में सहूलियत देना शुरू है और किसान और अनुसुचित जाति और जन जाति के लिए निर्धारित सब्सिडी में कटौती की जा रही है.  24.39 करोड परिवार भारत में रहते है। उनमें से  17.91 करोड परिवार ग्रामीण भारत में रहते है। 2.36 करोड यानी  13.25 प्रतिशत लोग  ग्रामीण भारत में एक कमरे में रहते है। उनके  घर का छत और दिवार पक्का नहीं  है।   68.96 लाख परिवार में परिवार प्रमुख महिलायें हैं ।  इनमें से सिर्फ 16 लाख परिवार ही ऐसे हैं जहा महिला मुखिया 10 हजार रूपया  महीना से ज्यादा कमा रही है। 5.36 करोड़  यानी  29.97 प्रतिशत परिवार भूमीहीन हैं। वे  सिर्फ शारिरीक श्रम और मजदूरी करके जीते हैं।

इन दिनों  हमारे देश में आर्थिक विकास का खूब शोर है.   लेकिन महिलाओं की स्थिति, भारतीय अर्थव्यवस्था में दयनीय है। खासकर के ग्रामीण परिवारों  में महिलायें उपेक्षित जीवन जी रही हैं । 2011 में United Nations Gender Inequality index (GII) , जो कि श्रमिक  महिलाओ के  स्वास्थ्य और शिक्षा पर आधारित था, में भारत का 187 देशों मे 134 वा स्थान  है।  भारत की महिलाओं  के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण उनके  श्रम को अप्रशिक्षित  (Unskilled) माना जाना है । इसलिए उसे लगभग 85 रू प्रति  दिन की मजदूरी ($1.58 डाॅलर) मिलती  है।

ग्रामीण मजदूर महिलायें सामाजिक सांस्कृतिक परंपराओं में दबी हुई है। परिवार में पति का शराब, जुआ, मारपीट, गालौच, परिवार नियोजन के बारें मे उचित मार्गदर्शन का अभाव, स्वास्थ्य संबंधि मार्गदर्शन न मिलना – इन अव्यवस्थाओं के साथ वह जी रही है .  लड़की हुई तो उसकी हालत बहुत ही बुरी हो जाती है। सबसे ज्यादा मात्रा में श्रम करने वाली  महिलायें पूरी  दुनिया में आधी जनसंख्या है । वह हमारे उत्पादन क्षेत्रों में 2/3 काम करती है। दुनिया में वह जितना उत्पादित करती है, उसके हिसाब से सम्पत्ति में उसका हिस्सा नगण्य है , लगभग 1%.

उनका श्रम, अप्रशिक्षित  गिना जाता है, और उनके नाम से कही भी जमीन का टुकडा नही रहता । फिर भी सबसे कष्टदायक काम – जैसे कमर झुकाकर करनेवाले काम, सभी किसान पुरूषों ने महिलाओं को दे रखे हैं. जैसे कि जब कपास चुनना है तो  वह काम सारा दिन कमर से झुककर करना पड़ता है ।  मिनीस्टरी आॅफ ह्यूमन रिसोर्स के अनुसार कुल कामों में महिलाओं के प्रतिशत हैं :
प्रायमरी सेक्टर – 93%
सेकंडरी सेक्टर – 69%
पोस्टप्रायमरी सेक्टर (क्षेत्र) – 25%

प्रायमरी सेक्टर में खेती, पशुपालन, जंगल का काम आता है।  महिलाओं को पुरूषों की तुलना में ज्यादा काम और कष्टदायक काम, जैसे की कमर  झुकाकर पानी में धान लगाना, बीज बोना, कपास चूनना , आदि करना पडता है , लेकिन उसकी कीमंत नही दी जाती । वह सम्मान की भी  मोहताज होती है.  पुरूषों के श्रम की मात्रा कम होती है , कम  कष्टदायक काम करके भी महिलाओं के श्रम की कीमत से ज्यादा कीमत उनके श्रम को  है। कृषि  क्षेत्र में पुरूषों का काम ज्यादा ताकतवर माना जाता है । वे  हल चलाने  स्प्रे  डालना, सिंचाई करने जैसे काम करते है। इसके  कारण की चर्चा एक किसान से की  तो उसके मुताबिक किसान महिलाओं की लंबाई 5.2 फिट तक रहने के कारण कमर झुकाकर काम वहसुविधा से कर सकती है। लेकिन किसान का शरीर लंबा चौडा होने के कारण उसके लिए झुककर काम करना संभव नही । इससे वह बीमारी का शिकार हो जाऐगा । यही युक्ति है , जिसके कारण  पुरूष प्रधान खेती व्यवस्था महिलाओं की मजदूरी  में लिंग भेद करती है। महिला परिवार का चुल्हा -चौका,  बच्चों का काम , पति की सेवा, सब काम निपटा कर, खेती का भी काम दिन भर करती है। लेकिन उसकी सांपत्तिक स्थिती का या आर्थिक स्थिती का जायचां लें,  तो उसे पति की  प्राॅपर्टी का हिस्सा पति के मर्जी के अनुसार मिलता है । महाराष्ट्र में  घर की टॅक्स रसीद , या खेती के 7/12 पर पत्नी का नाम लिखना अनिवार्य किया गया है,  लेकिन अनपढ महिलाओं का इसका पता रहे तभी इसका अनुपालन संभव होगा .

महिलाओं को परिवार की सम्पत्ति में अपना हिस्सा  प्राप्त करने का कानून है। उसे इसका लाभ भी पूरी तरह से मिलता नही । हिंदू सक्सेशन अॅक्ट – 1956 के अनुसार उसे परिवार की संपत्ति में  हिस्सा सुनिश्चित है ,  लेकिन 2005 तक  कानून में दुरूस्ती नही कि गई, इससे परिवार के लडकी के लिए या बहनों को संपत्ती नही दी जाती थी। यह कानून मुस्लीम, ख्रिश्चन, पारसी महिलाओं को लागू नही है। बहुत से राज्यों में यह कानून उनके अलग अलग  परंपराओं के अनुसार लागू  है । लेकिन 2001 की  जनगणना के तहत एक  दुखद बात सामने आई की सिर्फ 11 प्रतिशत महिलायें खेती की मालिक है ।  महिला किसान के  श्रम की विडंबना  है कि वह सिर्फ खेती- मजदूरी करती है। काम करती रहती है, लेकिन उसे खेती का उत्पाद बेचनें का अधिकार नहीं  है। कभी वह गाड़ी में खेत का उत्पाद लेकर  बाजार  में बेचने नही जाती है। बाजार से उसका  संबंध कही भी नही आता, वह सिर्फ श्रमिक  है जिसकी  अत्यंत  कम मजदूरी मिलती  है- पुरूषो से आधा या एक तिहाई ! मायक्रो फायनान्स और सेल्फ हेल्प ग्रुप स्कीम  से उसे पैसे जमा करने की, कर्ज उठाने की सुविधा प्राप्त हुई,  लेकिन उसी कम मजदूरी के भरोसे यह चलाया जाता है। यदि  वह आत्मविश्वास से अनाज का नियोजन करती या उत्पादन को बेचती तभी सक्षम होती .

सरकार के Gender budget cell  मार्च 25,2013 के अनुसार संसाधन नियोजन में महिलाओं को 30%
अवसर दिया गया है। सरकार की 11 वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के अनुसार Gender Audit किया जाने वाला है । युनेस्को इसकी व्याख्या करता है-gender audit as management & planing tool.(जेन्डर आॅडीट नियोजन का साधन और व्यवस्था है) । Gender Audit स्त्री सशक्तिकरण और स्त्री पुरूष समानता लाने का प्रयास करेगा। इससे पता चलेगा कि हमारे देश में महिलाओं की स्थिति कैसी है। इसके तहत भाषा, स्त्री पुरूष का स्थान, रोजगार में स्थिति, काम का क्षेत्र, स्त्री अत्याचार का प्रमाण आदि विषयों का जायजा लिया जाता है। लकिन ग्रामीण मजदूर महिलाओं की स्थिति का Gender Audit अलग से नही किया गया है। सभी महिलायें एक साथ ली गई हैं । लेकिन हमारे देश में ग्रामीण शहरी विभाजन की जरूरत है। गाव में सब तरफ सुखा है। शहरों ने सब लूट लिया है।

खेत मजदूर  महिलाओं के जीवन पर गेट और डंकेल प्रस्तावों का भी असर पडा है.  इसका सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिणाम नकारा नही जा सकता. खुली अर्थव्यवस्था और पूजीवांदी व्यवस्था का परिणाम खेत ओर खेती पर आधारित जीने वालों  पर पडा है ।  2008 में  4.25 करोड किसानों को  साठ हजार करोड की कर्जमाफी दी गई और कार्पोरेट क्षेत्र का हिसाब देखें  तो उनका 1 लाख करोड का  बकाया कर्जा, सभी सार्वजनिक बैंकों  ने अपने अपने बहीखातो से हटा दिया , मतलब कर्जा माफ किया गया और उन्हे 494, 836 करोड का नया कर्जा दे दिया गया.  साठ हजार करोड का कर्जा किसानो को माफ किये जाने की घोषणा में सिर्फ 10 प्रतिशत किसानो को फायदा हुआ, क्योंकि वो उस कर्जमाफी के नियमों मे बैठते नही थे।  किसानो की हालत दिन ब दिन बदत्तर होती जा रही है, किसान सरकार के नजरों में कही भी नही है,  वह इस व्यवस्था के आर्थिक अन्याय का  शिकार है । म. जोतिबा फुले, ने  महाराष्ट्र के किसानो के लिए ‘किसानो का कोडा’ में लिखा कि अशिक्षित किसान  जाति, धर्म, बिरादरी में बंटा है,  अंधश्रद्धाओं पर विश्वास रखता है ,  महिलाओं के बारे में भेदभाव रखता है इसलिए उसका सारा परिवार, वह खुद और उसकी पत्नी  इस विषमतापूर्ण व्यवस्था का  शिकार हो जाता  है। डाॅ. बाबासाहब ने किसान के बच्चे पढे़ इसलिए आरक्षण का प्रावधान किया। नहरों में पानी  संचय का, सिंचाई का, नदी जोडने का मार्ग बताया, साहुकार से कर्जा न ले इसलिए बँको का राष्ट्रीयकरण की बात की ।

किसान महिलाओं के प्रति उत्तरदायित्व न शासन दिखाता है ना पुरुष किसान खुद। इसलिए 2008 में जब मंदी का दौर आया  तो उसका सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को हुआ.  2013 में ‘प्लान  इंटरनेशनल और ओव्हरसीज डेव्हलपमेंट इन्सीट्यूट , की रिपोर्ट के अनुसार  मंदी के कारण बालमृत्यु का प्रमाण सबसे ज्यादा बढ़ गया । किसान महिलाओ को गरीबी के कारण पौष्टिक अनाज मिलना बंद हो गया. माताओं और बच्चों में कुपोषण बढ़ा , लड़कियों का  मृत्युदर बढ़ गया. वर्ल्ड  बैंक के मुताबिक जब दुनिया का उत्पादन 1 प्रतिशत कम होता है तो हर 1000 लडकियों में से 7  का  और  हर 1000 लड़कों में से 1 लडके की मृत्यु होती  है।

किसानों के उत्पादन को कम कीमत मिलने के कारण महिलायें परिवार और खेती में ज्यादा समय काम करती हैं , परिणामतः उनकी सेहत खराब होती है- गर्भधारण के समय इसका असर पड़ता है , नवजात शिशु  पर इसका असर होता है. बच्चो को घर में छोडकर वह खेत में रहती है उसका असर बच्चों के जीवन पर होता है। बच्चियां अपने से छोटे बच्चों को घर पर संभालती हैं , तो उनका  स्कूल छूट जाता . इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद महिलाऐं कभी पुरुषों  जैसी आत्महत्यायें नही करती हैं । डटकर परिस्थिति  का सामना करती हैं । दरअसल  खेत में काम करनेवाली महिला सबसे ज्यादा पीड़ित  महिला है। इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन देगा कौन ?

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कृषि प्रधान देश में महिला खेतिहर की दैन्य वास्तविकता

मंजू शर्मा

सोशल मीडिया में सक्रिय मंजू शर्मा साहित्य लेखन की ओर प्रवृत्त हैं .संपर्क : ई मेल- manjubksc@yahoo.co.in

आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

रोप गये साजन,
सजीव हुआ आँगन;
जीवन के बिरवा मीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

पी की निशानी
को देते पानी
नयनों के घट गए रीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

फिर-फिर सावन
बिन मनभावन;
सारी उमर गई बीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

तू अब सूखा,
सब दिन रूखा,
दुखा गले का गीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

अंतिम शय्या
हो तेरी छैंयाँ,
दैया निभा दे प्रीत रे!
आंगन के,
आंगन के बिरवा मीत रे,
आंगन के!

बच्चन जी के बिरवा का गीत केवल बिरवा का गीत नहीं भारत जैसे देश में जीवन का गीत है। लगभग 70 से 75% लोग ग्रामीण भारत में रहते हैं। भारत किसानों का देश है,  हमें बचपन-से ही किताबों में पढ़ाया जाता रहा है और अमूमन किसान कहते ही आँखों के आगे एक पुरूष,  जिसकी काँधों पर हल होता है, की छवि सामने आ जाती है। शायद ही कोई किताब ऐसी छपी हो जिसमें महिलाओं को भी खेत में श्रम करते हुए कहीं दिखाया गया हो। यही विडंबना है कि कृषि में उसकी भागीदारी लगभग 80% होती है लेकिन किसान के रूप में उसका कहीं नाम तक दर्ज नहीं होता , क्या सचमुच स्त्रियों की भागीदारी कृषि में नगण्य है या उनकी अहम् भूमिका को हमारे सामंतवादी सोच से परिपोषित समाज ने मान्यता नहीं प्रदान की है उसे? अपने ही आस-पास चंद किलोमीटर ताक-झाँक करते ही स्त्री की वो सारी भूमिकाएँ स्पष्ट होने लगती है, जिन्हें हमारा समाज जानबूझकर उपेक्षित करने की भरपूर कोशिश करता आया है।

अबतक हमसब किसान उसे ही कहते हैं,  जिसकी अपनी ज़मीन होती है या जो हल जोतता है। देश में 80% महिला कृषक ही खेती-बारी से संबंधित लगभग सारे कामकाज निपटाती हैं। सावन माह में मानसून की वर्षा के बाद धान के फसलों की बुआई शुरू हो जाती है और कुछ दिनों की अच्छी वर्षा के बाद खेतों में बिरवा (धान के छोटे-छोटे पौधे) उग आते हैं और उसके बाद इन महिला किसानों की कठिन दिनचर्या शुरू हो जाती है।

प्रात: जागकर परिवार के लोगों के लिए खाना-पीना बनाकर अर्थात् अपने घरेलू  कामकाज से निवृत्त होकर अपने लिए खाने की पोटली साथ बाँधे चल देती हैं उन खेतों की ओर जहाँ इनको दिन की रोपाई का काम खत्म करना है। और यहीं से शुरू होता है उनका घंटों पानी में घुटनों तक रहना,  जहाँ वे धान की छोटी-छोटी बिरवा को उखाड़ती हैं क्योंकि फिर इन्हीं खेतिहर महिलाओं द्वारा बिरवा के छोटे-छोटे गुच्छे तैयार किए जाते हैं और इन गुच्छों में से अलग-अलग करके इसे तय किए हुए दूसरे खेत में इन्हीं जुझारू खेतिहरों को पुन: रोपाई भी करना होता है। देश में आप और हम,  भले कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक,  किसी कोने में देख लें महिला खेतिहर ही रोपाई का काम करते हुए नज़र आएँगी।

बस एक बात इस रोपाई के समय अच्छी कही जा सकती है कि रोपाई के काम को सामूहिक रूप से खेतिहर महिलाएं  संपन्न करती हैं।और इस कठिन काज को निपटाते हुए रोपनी करती महिलाएँ गीत भी गाते जाती हैं। इन श्रम-सुंदरियों के जितने तेजी-से हाथ चलते हैं उतना ही अद्भुत लय इनके गायन में भी होता है,  जिसके अनुगूँज को दूर-दूर तक प्रकृति में हम सुन सकते है,जिसके छंद कुछ इस प्रकार होते हैं-
हाथ के लेल गे रेशमा
बाँस के बहंगिया गे
चल गेल कोईरिया फुलवरिया
एक कोस गेलें गे रेशमा दुई कोस गेलें गे।
पहिन लेंले गे रेशमा
धानी रंग के चुनरिया गे
चल गेंले तू कोईरी फुलवरिया गे।

क्यारियों से गुजरते राहगीरों के कानों तक भी कई बार इनके समवेत स्वर में गाते हुए स्वर सूरज को भी चुनौती देते हुए-से लगते हैं,क्योंकि रोपाई का समय ही ऐसा होता है,  जब सूरज की किरणें हमारे सिर पर सीधी गिरती हैं -ऐसे में इनका गीत गाना जान पड़ता है कि प्रकृति भी इन्हें जादुई और करिश्माई व्यक्तित्व की स्वामिनी बनाने को आतुर है-

नींबू पतइया गिरी जाला अँगनवा,
कैसे बहारूँ गे?
मोरे अँगनवा ससुर जी के डेरा
लगल हे हमरा झँपोलवा बहिनियाँ
कैसे बहारूँ गे?
मोरे अँगनवा भैंसुर जी के डेरा
ठेंक जतई हमरा से देहिया बहिनियाँ
कैसे बहारूँ गे?
मोरे अँगनवा पिया जी के डेरा
जल्दी-से जयबयी बहारवई अँगनवा,
नींबू पतइया गिरी जाला अँगनवा,
कैसे बहारूँ गे?

रोपाई (धान की रोपाई) से लेकर फसल के घर आने तक महिलाएँ,  जो खेतिहर हैं,  उनका काम समाप्त नहीं होता है ।पाँव कई बार घंटों तक पानी में खड़े होने से फूल जाते हैं फिर भी अगले दिन ये  पुन: सूर्योदय के बाद क्यारियों पर एक रिद्म में निरपेक्ष भाव से अपने गंतव्य पहुँच ही जाती है। सावन-भादो महीने में धान की रोपाई शुरू हो जाती है पर कभी भी किसी पुरूष को धान की रोपाई करते नहीं देखा गया है। वज़ह शायद यह भी रहती होगी कि महिला कृषक ‘वेस्ट एट रिपेईंग’ भी होती हैं क्योंकि भारत की पुरूष प्रधान व्यवस्था का एक अकाट्य सत्य यही है कि महिलाओं की दिहाड़ी पुरूषों के वनिस्पत हरेक क्षेत्रों में,  जहाँ दिहाड़ी निर्धारित होती है, कम होती है।

चेहरे पर बगैर किसी शिकन के कड़ी धूप में प्रकृति,भूख,दैन्य और जिंदा रहने की जंग लड़ते हुए भी ये श्रमिक –महिलायें जिस तन्मयता से अपने काम करती है , बदले में शायद ही कभी सही पारिश्रमिक भी दिया गया हो इनके खेत-मालिकों के द्वारा। गाँठ और निशान पड़े हुए खुरदरे हाथों को जब ये शाम को अपने मालिकों के सामने फैलाती हैं, तो शायद ही वह दिन कभी आया हो,  जब इन्हें इनकी कमाई का हिस्सा, इनकी हथेली को देख किसी खेत-मालिक ने पसीजकर पूरा-पूरा दिया हो। एक ही कहानी जिंदगी की इन खेतिहर महिलाओं की समूचे भारत में होती है। सारी मलाई एक तरफ़ और सारे अभाव,रिरियाहट,वंचना और यातना-तकलीफ़ एक तरफ़। कई बार तो इन स्त्रियों को मज़दूरी के बदले उनके मालिकों से मिलती है केवल भद्दी-भद्दी गालियाँ और पुन: लाचार स्त्रियाँ नमी को समेटती हुई कुछ अपनी पलकों की कोरों में तो कुछ मटमैले,चिप्पे लगे हुए और पहले-से गीले साड़ियों की आँचल में ,अपनी मड़ैये की ओर वापस चल देती हैं।

‘परमाणु ऊर्जा का नकार’ स्त्रियों के लिये इतना मह्त्वपूर्ण क्यों है ?

 भार्गवी दिलीप कुमार

शीतयुद्ध के दौरान शान्ति और परमाणु विरोधी आंदोलन स्त्री-अधिकार समूहों ने शुरू किए थे। सैद्धांतिक तौर पर युद्ध और ‘मर्दानगी’ के ताने-बाने पर चोट करना एवं व्यवहार में यद्ध तथा परमाणु बम/ऊर्जा के औरतों पर पड़ने वाले विशिष्ट दुष्प्रभावों को मुद्दा बनाना एक बेहतर और समतामूलक दुनिया के लिए ज़रूरी है। ये सिर्फ संयोग नहीं है कि फुकुशिमा से लेकर कूडनकुलम और जैतापुर तक औरतें परमाणु-विरोधी आंदोलन की अगली कतारों में हैं। स्त्रीवाद और परमाणु ऊर्जा  के मुद्दों  को व्य्ख्यायित  करता  यह  लेख
          कुमार सुंदरम 

विश्व की  भयंकरतम त्रासदियों में से एक,  यानि फुकुशिमा दाइची परमाणु सयंत्र दुर्घटना और उसके  बाद अन्य देशों के नागरिकों में परमाणु ऊर्जा को लेकर ब‌ढ़ते डर के मद्देनजर हमारे सीखने को कई सबक हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम कुछ सीखने की  पर्याप्त कोशिश कर रहे हैं ?

फुकुशिमा त्रासदी ने भारत के तमिलनाडु राज्य के एक सुदूर समुद्र-तटीय गांव ‘इन्दिंथकरई’ के निवासियों में अभूतपूर्व भय का बीज डाल दिया. त्रासदी के समय टेलीविजन पर दिखाई जा रही फुटेज में वहां के लोगों को मास्क पहने हुए,  सफ़ेद वस्त्रों में ,  एक जगह से दूसरी जगह भागते हुए,संदूकों में बंद होकर अकेले जीने  की कोशिश करते  हुए , विकिरण के खतरे को मापने वाली कई जांचों से गुजरते हुए और अपने रिहाइशी इलाकों को हमेशा के लिए छोड़ते हुए दिखाया गया था. इन खबरों ने तमिलनाड़ु के इस गांव के निवासियों पर इतना गहरा असर इसलिए डाला कि गांव की एक दीवार परमाणु संयंत्र से लगी  है वहीँ दूसरी ओर  समुद्र उसकी सीमा बनाता है. 2004 में आई सुनामी के बाद राज्य सरकार द्वारा बसाई गई सुनामी पुनर्वास कॉलोनी के रहवासी हर सुबह जागते ही कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विशाल गुंबदों को देखकर नई आशंकाओं से भर जाते हैं. आगे कुंआं पीछे खाई के बीच फंसे होने का खतरा ही वह शक्तिशाली उत्प्रेरक है , जो ‘इंदिन्थकर’  के लोगों के जमीनी संघर्ष को अब तक गतिशील रखे हुए है, वरना इस आंदोलन को कुचलने की कई कोशिशें, दायर किये गये हजारों झूठ मामले, पुलिस की गोलीबारी, तट-रक्षकों के छापे, गांव में बम रखने की कोशिशें, संघर्षरत दलों को पैसों से खरीदकर उन्हें बाँटने की की चालें, मुख्य नेताओं की गिरफ्तारियाँ और कई अमानवीय यातनाएं इस आंदोलन को कभी का ख़त्म कर देतीं .

हम अक्सर परमाणु ऊर्जा के विरोध में चले  इन आंदोलनों  के बारे में पढ़ते हैं, इन्हें कोसते हैं या कभी-कभार इनके समर्थन में कुछ कह देते हैं. लेकिन यह सच है कि परमाणु ऊर्जा के विरोध में चल रहे आंदोलनों और अन्य सामाजिक आंदोलनों के बीच एक बड़ा फासला है, संवाद की  कमी दिखाई देती है. 8 नवमबर, 2013  को ‘कोलिशन फॉर न्यूक्लियर डिसआर्मामेंट एंड पीस’ तथा पाकिस्तान-इंडिया पीपुल्स फोरम द्वारा संयुक्त रूप से दिल्ली में आयोजित ‘परमाणु शस्त्रों का खात्मा’ विषय पर हुए चर्चा सत्र में सुश्री अरुणा रॉय ने कहा , “परमाणु उर्जा के विरोध में हो रहे आंदोलनों को अपनी नीतियों में पुनर्विचार की जरूरत है. इसके  संवाद की भाषा व तेवर में भी बदलाव आना चाहिए. इस मुद्दे पर व्यापक जनचर्चा व बहस हो, जिससे सामान्य जन का पक्ष उभरकर सामने आ सके. इससे दूसरे सामाजिक आंदोलनों को भी यह भान  हो सकेगा कि ‘परमाणु ऊर्जा-करण किस तरह उनके आंदोलनों से जुड़ा है.’ या भूमि-अधिकारों, सूचना व स्त्री-अधिकारों के लिए चल रहे आन्दोलनों के लिए यह मुद्दा अपना क्यों नहीं बना सका है ? परमाण्विक मुद्दों से जुड़े जेंडर सम्बन्धी मामलों पर भी चर्चा व बहस की जरूरत है.”

जेंडर-अधिकार आंदोलनों में परमाण्विक मुद्दों के महत्व का बोध न होना एक मुद्दा हो सकता है, पितृसत्तात्मक परमाणु लॉबी के जेंडर के प्रति समस्यापूर्ण रवैये से निपटने में इन आंदोलनों की असफलता भी मुद्दा है. और परमाणु-विरोधी आंदोलनों द्वारा जेंडर-अधिकारों को अपने संघर्ष के मुद्दों में शामिल न किये जाने की गलती भी इस संवादहीनता का एक और भी पहलू है.असल में यह संकेत है कि हम मुद्दों को समग्र रूप  में नहीं देख पा  रहे हैं. इस मामले में जेंडर भिन्नताओं और लैंगिक भूमिकाओं का गहराई से अध्ययन करना जरूरी है ताकि ‘परमाणु ऊर्जा विभाग’ जैसी धुर तानाशाह , पूंजीवादी उपनिवेशी संस्था से लोहा लिया जा सके. होमी भाभा (1948-1966) से रतन कुमार सिन्हा (2012  से वर्तमान ) तक पिछले 66 वर्षों में इस विभाग के प्रमुखों की सूची पर नजर डालें तो मूल प्रश्न यही उभर कर आता है कि यह पद अभी तक किसी महिला को नहीं मिला. क्या  यह एक सोची-समझी योजना का हिस्सा नहीं लगता ?

1987  में किये गए एक अध्ययन ‘परमाणु मुक्त व निशस्त्रीकरण के प्रति नजरिये में जेंडर की वजह से भिन्नता’ से इस अनुमान की पुष्टि होती है. अध्ययन के परिणाम साफ तौर पर बताते हैं “पिछले 30 वर्षों में पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ सैन्य अभियानों व सेना पर खर्च के ज्यादा खिलाफ थीं तथा शांति व समता की बड़ी समर्थक. वहीँ पुरुष सामान्यतः बल प्रयोग, मृत्युदंड व सैनिक अभियानों के पक्ष में थे और उन्हें बंदूकों व युद्धों पर नियंत्रण से सख्त ऐतराज था. अधिकांश स्त्रीवादी सिद्धांत भी इस धारणा पर बल देते हैं. जैसे कि सामाजिक स्त्रीवादी सिद्धांत यह दावा करता है कि “स्त्रियों की कमजोर आर्थिक स्थिति उन्हें विश्व को पुरुषों से भिन्न नजरिये से देखने के लिए प्रेरित करती है” और अधिक निश्चितता वाला जैविक सिद्धांत कहता है कि “स्त्रियाँ अपनी जैविक क्षमता के कारण मानव जाति के धरती पर बने रह्ने में एक अलग तरह की भूमिका निभाती हैं और इसलिए दुनिया को देखने का उनका नजरिया मूलभूत रूप से ही  अलग होता है”
परमाणु ऊर्जा-करण का जेंडर मुद्दों से सीधा संबंध है, इस सचाई को देखने की या तो कोशिश ही नहीं की जाती या फिर सावधानी से इस तथ्य को नजरअंदाज किया जाता है. युद्ध के परिप्रेक्ष्य में ‘स्त्रियों का जीवन’ सिर्फ हाशिये की चीज होता है, केंद्रीय कभी नहीं.

पिछले कई वर्षों का हमरा अनुभव कहता है कि अधिकांश सामाजिक आन्दोलन जमीनी स्तर पर स्त्रीवादी नजरिया अपनाने से सुदृढ़ व सफल हुए हैं और अपना अस्तित्व बनाये रख पाये हैं. यह साफ है कि ‘परमाणु अस्त्रीकरण या परमाणु ऊर्जाकरण के सामाजिक प्रभावों’ का मुद्दा स्त्रियों द्वारा ही सफलतापूर्वक उठाया जा सकता है, क्योंकि एक ऐसे देश में जहाँ आवास , भोजन, पानी, बिजली, स्वास्थ्य व शिक्षण जैसी मूलभूत आवश्यकतायें भी अब तक पूरी आबादी तक न पहुँच पाई हों, वहां संसाधनों की कमी स्त्रियों पर ही सबसे बड़ी आपदा बनकर टूटती है क्योंकि इन संसाधनों का बहुत छोटा हिस्सा ही उन तक पहुँचता है. बहुत छोटी लगने वाली चीजें जैसे पानी की कमी का मतलब एक स्त्री के लिए मेहनत में अतिरिक्त बढ़ावा है क्योंकि अब उसे अधिक दूर से पानी लाने  में ज्यादा समय व ऊर्जा व्यय करनी होगी और वह भी दिन के असुविधाजनक समय में. यह तो मात्र पानी की कमी की बात हुई, परमाणु आपदा के स्त्री पर अन्य अनगिन प्रभावों के बारे में विचार किया जाये तो ? जेंडर अधिकारों तथा और अन्य मुद्दों पर जमीनी लड़ाई लड़ रहे आंदोलनों को एक मंच पर लाने के इस विचार के पीछे मंशा यही है की परमाणु नीति पर एक सहमति बनाई  जा सके और परमाणु-विरोध को सबका सार्थान  मिल सके. साथ ही परमाण्विक संस्थानों के घोर पितृसत्तात्मक रवैये को स्त्रीवादी पक्ष की  चुनौती मिल सके. भारतीय परमाणु-नीति के इस अजीबोगरीब चरित्र या लापरवाही को ध्यान से देखें तो पायेंगे कि सारी  नीतियाँ न सिर्फ नैतिक प्रश्नों को दरकिनार करती चलतीं हैं बल्कि उनका जेंडरीकरण करके समस्या और बढ़ा देती हैं. यह कुलीन तबका अपने आपको तार्किक, वैज्ञानिक, आधुनिक और हाँ, सबल भी सिद्ध करना चाहता है; जबकि समाज व पर्यावरण की बलि चढ़ाकर नैतिक प्रश्न विकास-विरोधी, अनाधुनिक व थोथे भावात्मक कह कर परे ढकेल दिए गये हैं. सोच विचार का यह मार्ग सुझाता है कि मानवजीवन और कल्याण के प्रश्न, न जाने क्यों, न तो आधुनिक हैं और न ही पर्याप्त सफलता के सूचक. दरअसल यही सिद्ध हो रहा है कि चाहे मनुष्य में शांति व नैतिकता लाने की न तो कूवत हो और न उसे इनकी परवाह हो लेकिन वह पुरुष-स्त्रियों दोनों के लिए भयंकर परिणाम वाले निर्णय लेने की स्वतंत्रता जरूर चाहता है.

इन चौखटों को तोड़ना आज के वक़्त की जरूरत है और इदिन्थकरई या भोपाल की स्त्रियों के अकेले नेतृत्व सँभालने मात्र से यह लक्ष्य नहीं पाया जा सकेगा. बल्कि हम सबको साथ मिलकर अपनी-अपनी भूमिकायें तय करनी होंगी और परमाणु ऊर्जा पर बहसों को स्त्रीवादी नजरिये से देखना शुरू करना पड़ेगा. इदिन्थकरई की स्त्रियों ने अपने संघर्ष को मात्र अपनी जिंदगी से जुड़ा एक छोटा मुद्दा नहीं बनाया बल्कि उसे पृथ्वी माँ को बचाने जैसे व्यापक लक्ष्य से जोड़ लिया है और इस तरह एक अच्छा उदहारण हमारे सामने पेश किया है. इस जमीनी संघर्ष का अध्ययन गहराई से व जल्द ही होना चाहिये.
1980 के दशक में विश्व भर  में हुए परमाणु-विरोधी आंदोलनों में स्त्रियों ने महती भूमिका निभायी थी. यहाँ तक की उन्होंने एक वीमेंस फोरम की स्थापना थी, जिसका लक्ष्य परमाणु-अस्त्रों  से मानव जाति को मुक्त करना था. और जिसने यूरोप, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व जापान की स्त्रियों की अगुवाई में सेना की छावनियों  में कैंप किये थे. इसकी गतिविधियों से यह स्पष्ट हो गया था कि परमाणु-संस्थानों से संघर्ष में स्त्रीवादी तरीकों का क्या महत्व है. वक़्त आ गया है कि सच्चाई  को हम विश्व के इस भारतीय भूभाग में भी अनुभव करें.

भार्गवी ‘प्रोग्राम फॉर सोशल एक्शन’ से जुड़ी हुई हैं, सम्पर्क :bhargavi.dilipkumar@gmail.com
अनुवाद- आकांक्षा, पीएच.डी. शोधार्थी, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली.

अथ (साहित्य: पाठ और प्रसंग)

अनुपमा शर्मा


दिल्ली विश्वविद्यालय की शोधार्थी। कविताएं, समीक्षाएं, आलेख-पाठ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।सम्पर्क : anupamasharma89@gmail.com

पिछले दिनों आलोचक राजीव रंजन गिरि की पुस्तक ‘अथ (साहित्य : पाठ और प्रसंग)’ प्रकाशित हुई. देखा जाए तो यह पुस्तक भिन्न भिन्न अवसरों पर लिखे गए साहित्यिक लेखों का संकलन है,  जिनमें भरपूर वैविध्य मौज़ूद है कुछ शोध आलेखों के रूप में हैं, कुछ समीक्षात्मक ढंग में तो कुछ टिप्पणी की तर्ज़ पर लिखे गए लेख हैं. इन आलेखों के बहाने लेखक ने हिंदी साहित्य के अतीत और वर्तमान को पहचानने और विश्लेषित करने का प्रयास किया है. भले ही ये आलेख अलग अलग स्थितियों और समय में लिखे गए हों,  किन्तु हिंदी साहित्य के समय क्रम को एकसूत्रता में आगे बढ़ाते हुए ये लेख भक्ति काल से प्रारम्भ होकर आधुनिक काल, प्रेमचंद, जैनेन्द्र से होकर गुज़रते हुए अज्ञेय, नामवर सिंह तथा वर्तमान साहित्यिक विमर्शों तक की यात्रा तय करते हैं. लेखक ने इन आलेखों की अन्विति को बनाए रखने के लिए इन्हें नौ खण्डों में विभाजित किया है. जिनमें भक्ति आंदोलन का अवसान और अर्थवत्ता, आधुनिकता की तलाश, साम्प्रदायिकता सत्ता और साहित्य, प्रेमचंद, जैनेन्द्र का रचना संसार, अज्ञेय, भाषा साहित्य और शिक्षण पर बहुत ही वाजिब ढंग से विचार किया गया है. इन आलेखों को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित इस तरह संयोजित किया गया है कि पूरे वर्तमान हिंदी साहित्य की एक मुकम्मल तस्वीर उभर पाए.

पहला खंड ‘सार सार को गही रखे’
के केंद्र में मूलतः भक्ति काल के अंतिम पर्व को इस कालखंड की रचनाओं के आलोक में समझने की कोशिश की गई है, इसी कड़ी में तुलसीदास, राधा एवं कबीरदास पर हुए अध्ययनों पर लेखक राजीव रंजन गिरि ने सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषणात्मक ढंग से अपने विचार प्रस्तुत किए हैं. भक्ति आन्दोलन का उदय अपने समय के गहरे तनाव, संघर्षों एवं अंतर्द्वंद्वों का परिणाम था. ‘भक्ति आन्दोलन का अवसान और अर्थवत्ता’ लेख में भक्ति काल को भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण परिघटना के रूप में देखा गया है तथा इसके अवसान और उसकी वर्तमान अर्थवत्ता की अब तक हुए साहित्यिक अध्ययनों एवं शोधों के आधार पर विचार रखते हुए गहरी पड़ताल की गई है. यहाँ प्रश्न यह भी उठाया गया है कि जहाँ से भक्ति काल के पराभव को चिह्नित किया जाता है, वहां से परिस्थितियाँ असल में किस रूप में परिवर्तित हुई. यह भी शिनाख्त करने की कोशिश की गई है कि क्या भक्ति आन्दोलन के अवसान के पश्चात भक्ति साहित्य की रचना बंद हो गई. लेखक राजीव रंजन गिरि के शब्दों में “कला-संसार के भीतर की परिघटना के मद्देनज़र, यह कहना बेहतर होगा कि सांस्कृतिक इतिहास के एक ख़ास क्षण में, उस तरह की रचना का जो महत्व होता है, बाद में नहीं रह पाता,.. मनुष्य की चेतना के निर्माण में उसका वह महत्व नहीं रह जाता, जो तब था.” लेखक ने भक्ति काल के साहित्य पर अब तक हुए अध्ययनों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, रांगेय राघव और मैनेज़र पाण्डेय की भिन्न भिन्न समय पर दी गई मान्यताओं को भी तथ्यों एवं तर्कों की कसौटी पर विचारा है. लेखक की चिंता के दायरे में यह ज़रूरी सवाल भी मौज़ूद है कि जिस कैनननाइजेशन की परम्परा के चलते, भक्ति काल के सभी कवियों को एक कवि के लिए निर्मित प्रतिमान एवं प्रविधियों के चश्मे से देखा गया. ऐसे में क्या एक कवि विशेष के लिए निर्मित आलोचना प्राविधि अन्य कवियों के साथ न्याय कर सकती है. भक्ति काल के इन अंतर्विरोधों की पड़ताल करते हुए ही समीक्षात्मक लेख ‘अंधश्रद्धा भाव से आधुनिकता की पड़ताल’ में तुलसीदास को लेकर चले आ रहे पूर्वग्रहों से असम्पृक्त कर श्रीभगवान सिंह की पुस्तक ‘आधुनिकता और तुलसीदास’ के आलोक में तुलसीदास को लेकर चली आ रही परम्परागत मान्यताओं पर विचार किया गया है जिसमें तुलसी साहित्य के सामंती मूल्यों के रक्षक होने जैसी धारणाओं को खारिज़ कर मध्यकालीन परिवेश की सीमाओं के बीच तुलसीदास के साहित्य के सकारात्मक पहलुओं का भी विश्लेषण किया गया है. यह पुस्तक आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में एक संतुलित एवं तार्किक दृष्टि से तुलसी साहित्य को परखते हुए तुलसी को न केवल बढ़-चढ़कर ‘सामंत विरोधी’ मानती है अपितु मध्यकालीन बोध की सारी सीमाओं को नज़रंदाज़ कर तुलसीदास को अत्यंत आधुनिक घोषित करती है.

इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसका एक पूरा खंड हिंदी उर्दू के अमर कथाकार प्रेमचंद पर केन्द्रित है जिसमें  नौ आलेख हैं. प्रेमचंद के माध्यम से हिंदी साहित्य में जिस प्रगतिशील आन्दोलन का सूत्रपात माना गया, यह खंड उसी के आलोक में प्रेमचंद की रचनाओं के जरिए उस दौर की देशकाल परिस्थितियों को समझने एवं व्याख्यायित करने का प्रयास करता है. प्रेमचंद जिस समय में साहित्य को जीवन की आलोचना के रूप में देख रहे थे, वे स्पष्ट तौर पर बदलते समय को बारीकी से देख व समझ रहे थे यही कारण है कि उनकी रचनाओं में उठाए गए मुद्दे आगे चलकर साहित्यिक विमर्शों की दुनिया का हिस्सा बनते है. प्रेमचंद अपने साहित्य में दलितों, पीड़ितों एवं वंचितों की समस्याओं को बयान करते हुए भी एक साहित्यकार की प्रतिबद्धताओं को बखूबी समझते है तभी वे साहित्यकार को समाज की आगे चलकर मशाल दिखाती सच्चाई के रूप में देखते हैं. उन्होंने साहित्यकार को स्वभावतः प्रगतिशील माना. लेखक राजीव रंजन गिरि ने प्रेमचंद की रचनाओं के माध्यम से प्रेमचंद की अपने समय के प्रति, उसके सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धताओं की पड़ताल की है. प्रेमचंद की दलित जीवन पर लिखी कहानियों को केंद्र में रखकर लिखा गया लेख ‘दलित जीवन पर दृष्टि’ भी प्रेमचंद की कहानियों के माध्यम से दलित सवालों से संवाद करता लेख है जहाँ प्रेमचंद की कहानियाँ शुरू से आखिर तक दलित एवं स्त्री जीवन की समस्याओं को अपने चिंतन के दायरे में रखती हैं. एक ओर जब देश अंग्रेजों के विरुद्ध गुलामी से मुक्ति के लिए लड़ रहा है वहीँ दूसरी ओर भारतीय समाज एक दूसरे किस्म की गुलामी एवं प्रताड़ना की नींव रख रहा था. लेखक ने प्रेमचंद की कहानियों के माध्यम से ही सही पर पॉवर स्ट्रक्चर पर एक ज़रूरी और बुनियादी सवाल उठाया कि दलित जीवन की कहानियों के पात्रों की आर्थिक और सामाजिक बदहाली ही ऐसे अमानवीय जीवन एवं शोषण का तानाबाना बुनती है, इस आर्थिक और सामाजिक बदहाली में एक अनिवार्य रिश्ता है जो इस संक्रमित समाज और व्यवस्था की उपज है, प्रेमचंद के पात्र इन दोनों प्रकार के शोषण के शिकार हैं किन्तु प्रेमचंद वैचारिकी के स्तर पर अपने दलित पात्रों को आगे ले जाते हैं तथा उन्हें विकसित करते है , जिसमें यदि वे शोषण को सहन करने वाले पात्र दिखाते हैं तो वे इस व्यवस्था के प्रति प्रतिरोधी स्वर दर्ज़ कराने वाले पात्रों को भी सामने लाते हैं. मंदिर, कफ़न, सद्गति, ठाकुर का कुआँ इत्यादि प्रेमचंद की ऐसी ही कहानियाँ हैं जिन्हें लेखक ने प्रेमचंद की दलित जीवन पर दृष्टि बिम्बित करने का आधार बनाया है. इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण लेख ‘प्रेमचंद का बाल साहित्य’ है जो इस पुस्तक को विशेष रूप से संग्रहणीय बनाता है. प्रेमचंद के साहित्यिक विमर्शों से जुड़े साहित्यिक सृजन पर भरपूर ध्यान दिया गया जिसके चलते प्रेमचंद का बच्चों के लिए रचा गया साहित्य अपेक्षाकृत कम चर्चित हुआ. लेखक ने बहुत ही ज़रूरी ढंग से इस साहित्य की ओर ध्यान आकर्षित करने वाला लेख लिखा है. प्रेमचंद का बाल साहित्य कर्तव्य परायणता, ईमानदारी, सदाचार, सच्चाई, निर्भीकता, आपसी प्रेम सौहार्द और निज विवेक के विकास की शिक्षा देता है. यह भी ध्यातव्य है कि प्रेमचंद ने अपनी साहित्यिक समझ के बीच बच्चों के लिए साहित्य रचने को हिक़ारत के भाव से न देखकर दायित्व के रूप में लिया जिसका उद्देश्य भारतीय बालकों को चेतना संपन्न बनाना था.

इस पुस्तक का विशेष महत्व इसलिए भी दृष्टिगोचर होता है
कि लेखक ने विभिन्न स्थितियों, मनःस्थितियों एवं समय की माँग के अनुरूप ये आलेख लिखे हैं जिसमें यदि भक्तिकाल पर, भारतेंदु पर तथा प्रेमचंद पर विचार रखे गए हैं तो इसमें वर्तमान साहित्य को भी समाहित किया गया है. ‘हीरा भोजपुरी का हेराया बाज़ार में’ लेख कथाकार संजीव के उपन्यास ‘सूत्रधार’ पर केन्द्रित है. यह उपन्यास भोजपुरी भाषा के लोक कलाका भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित है. लेखक ने इस आलेख को दो भागों में लिखा है, पहले हिस्से में बजरिये ‘सूत्रधार’ कथाकार संजीव अपने कथा नायक भिखारी ठाकुर के जीवन और उस जमाने को जिस रूप में दिखाना चाहते हैं, उसे ज़ाहिर किया गया है. यह हिस्सा संजीव के पक्ष की व्याख्या है. दूसरे हिस्से में, संजीव के देखन और दिखावन का विश्लेषण करते हुए, उसमें निहित समस्याओं की तरफ इशारा किया गया है, ताकि कथाकार के पक्ष की जांच-पड़ताल हो सके. लेखक राजीव रंजन गिरि ने यह लेख भारतीय समाज की जटिलताओं के बीच ‘सूत्रधार’ को रखकर लिखा है जिसमें बेहद तर्कसंगत ढंग से उन्होंने इसकी समीक्षा की है.

गत वर्षों में साहित्यिक जगत में जिन विमर्शों ने जोर पकड़ा उनमें स्त्री  अस्मिता को लेकर बहुत ही ज़रूरी आवाज़ उठाई गई. लेखक ने अपने लेख ‘कविता में स्त्री’ में कहा भी है कि “वैचारिक विमर्श में स्त्री को एक कोटि के तौर पर स्थापित करने के लिए स्त्री अस्मिता का अतिरिक्त रेखांकन आवश्यक है. स्त्री ही क्यों किसी भी अस्मिता की पहचान के लिए यह पहल ज़रूरी है.” लेखक ने इस लेख में हिंदी स्त्री कविता में अनामिका के अवदान का विश्लेषणात्मक विवेचन किया है. यह लेख अनामिका के बहाने ही सही, अपनी वैचारिक समझ को प्रगतिशील रखने वाले लोगों से प्रछन्न रूप में ही सही स्त्री को वर्ग के वृत्त से बाहर रखने का आग्रह भी करता है. यह लेख कई सवाल भी उठाता है जिसमें अनामिका तथा इस दौर के अन्य रचनाकार, उनकी रचनाधर्मिता को कठघरे में खड़ा करता है जहाँ आत्मचिंतन की आवश्यकता शिद्दत से महसूस हो रही है कि क्या इस पीढ़ी का रचनाकार कविता के नाम पर केवल विचार को उगल रहा है चूँकि यदि विचारों को कविता के रूप में तरलता से संपादित न किया जाए तो यह कविता विचार के स्तर पर कितनी कारगर होगी यह सोचना लाज़िमी हो जाता है. एक कमज़ोर कविता किसी महत्वपूर्ण विचार को भी क्षीण कर देती है. इस लेख के द्वारा अनामिका का कविता के ज़रिए स्त्री-विमर्श में कलात्मक हस्तक्षेप प्रकट होता है.

प्रेमचंद ने वर्षों पहले कहा था कि कोई भी समाज तब तक विकास या प्रगति नहीं कर सकता जब तक उस
समाज के किसानों, दलितों एवं स्त्रियों की दशा नहीं सुधरती। उन्हें मनुष्य नहीं माना जाता, प्रेमचंद के इस कहन की जबकि हम हीरक जयंती मना चुके हैं तब भी स्थिति यह है कि हाशिए की पट्टी निरन्तर चौड़ी होती जा रही है. मुक्ति की चाह लिए हुए समाज का यह हिस्सा आज भी शोषण-अन्याय से पीड़ित है. जब पंछी धरती के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध अपनी पहली उड़ान भरता है तब जिस ऊर्जा से वह संचालित होता है, वह होती है – मुक्ति की चाह और उड़ान की अकुलाहट. समाज के इस हिस्से की आँखों में आज भी मुक्ति का स्वप्न और उन्मुक्त आकाश में उड़ पाने की अकुलाहट बनी हुई है. छठा खंड है-  ‘उड़ान की अकुलाहट’ यह मुख्यतः स्त्री-दलित विमर्श पर केंद्रित खंड है। जिसमें आठ लेखों के माध्यम से पितृसत्तात्मक संरचना के बीच में गढ़ती नई स्त्री छवि का बारीक़ी से विश्लेषण करने के साथ-साथ दलित अस्मिताओं पर भी विचार किया गया है. महादेवी वर्मा, पंचतंत्र, बेबी हालदार पर आधारित आलेखों के अलावा अरूण कमल की कविता पर आधारित आलेख लेखक की स्त्री विमर्श पर गहरी पकड़ को दर्शाते हैं. ‘मुक्ति-आकांक्षा की रचनाकार’ लेख जिसमें महादेवी वर्मा की रचनाओं की बाबत कई अनसुलझे सवालों पर गौर किया गया है. एक लम्बे इतिहास की पैठ में महादेवी को जिस स्टीरियो में क़ैद कर दिया गया तथा “मैं नीर भरी दुःख  की बदली” तक ही सीमित कर दिया गया, जबकि वे अपने विचारों में स्त्री पराधीनता को, उनके मुक्ति के स्वप्न को चरम पर रखती हैं. ऐसे में महादेवी को पढ़ने की एक नई दृष्टि प्रस्तावित करना काबिलेगौर है. महादेवी को स्त्री अधिकारों के पक्षधर के रूप में इस आलोक में देखने की  कोशिश करना कि जिस समय वे ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ लिख रही थीं उस समय कालांतर में स्त्री मुक्ति का बिगुल बजाने वाली सिमोन द बोउवार महज़ बच्ची थीं, भी महादेवी के विचारों के विश्लेषण, अंतर्विरोधों एवं सीमाओं को जानने-समझने का प्रस्थान बिंदु हो सकता है. लेखक अपने इन लेखों में उन सभी पशोपेशों से गुज़रता नज़र आता है जिनसे होकर एक स्त्रीत्व गुज़रता है. ‘सौंदर्य का मिथक निर्माण’ लेख में स्त्री छवि से लेकर सेक्स और जेंडर की तमाम तरह की बहसें समाहित  हैं जो स्त्री को कभी बायोलॉजिकल कन्स्ट्रक्ट मानती है तो कभी सोशियोलॉजिकल. ग़ौर करने पर दिखता है  कि पितृसत्ता ने जेंडर को भी प्राकृतिक, स्वाभाविक गुण के रूप में प्रचारित किया है असल  मायने में स्त्री विमर्श की सबसे बड़ी चुनौती स्त्री मुक्ति के लिए इसी ‘जेंडर’ से मुक्ति है.

बकौल लेखक ‘‘पितृसत्तात्मक संरचना अपने को नये रूप में ढ़ालकर स्त्री-देह का वस्तुकरण कर रही है। संभव है इसके पक्ष में ऊ परी तौर पर स्त्री की मर्जी भी दिखे। पर सोचने की बात है कि इस ‘मर्जी’ को कौन सी सत्ता परिचालित कर रही है, नियंत्रित कर रही है? लिहाजा पितृसत्ता की दहलीज को खुद लॉंघने के बावजूद स्त्री-देह किसके नियंत्रण में है, कौन सी ताकत इस दिशा में ठेल रही है, यह पहलू नजरअंदाज करके स्त्री-मुक्ति का न तो यथार्थ समझा जा सकता है और न ही यूटोपिया की रचना हो सकती है’’ स्त्री मुक्ति पर ही लिखा हुआ लेख स्वप्न भी एक शुरुआत है’ भी अरुण कमल की कविता ‘स्वप्न’ को आधार बनाकर कविता जगत में स्त्रीवादी दृष्टिकोण एवं स्त्री मुक्ति के विषय पर हस्तक्षेप करता एवं साथ ही ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ की धारणाओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को प्रकट करता लेख है. जहाँ पितृसत्तात्मक समाज के बीच स्त्री की जद्दोजेहद प्रकट होती है.  अरुण कमल की कविता में एक स्त्री है जो बार-बार ससुराल से मार खाकर भागती है और फिर अँधेरा होने पर उसी जगह लौट आती है और फिर मार खाती है.  इस लेख में मुक्ति का स्वप्न है, जिसमें स्त्री जीवन से मृत्यु की ओर नहीं अपितु मृत्यु से जीवन की ओर भाग रही है. इसकी पंक्तियाँ भी हैं- “मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न.” इस कविता में स्त्री के पास कहीं कोई रास्ता नहीं है और कहीं कोई अंतिम विकल्प के रूप में आसरा भी नही. ज़ाहिर है उसे अपना रास्ता खुद बनाना होगा, विकल्पहीनता में खुद विकल्प बनकर  उभरना होगा.  भले ही आज वह यूटोपिया लगे पर इस
उम्मीद के साथ कि कल यह हकीक़त होगा. इस लेख के अंत में वेणु गोपाल की एक कविता उदधृत है- “न हो कुछ भी/ सिर्फ सपना हो/ तो भी हो सकती है शुरुआत/ और यह एक शुरुआत ही तो है/ कि वहां एक सपना है.”

‘उड़ान की अकुलाहट’ में स्त्री विषयक एवं दलित विमर्श से जुड़े लेख हैं
‘अबकी जाना बहुरि नहीं आना’ शीर्षक अध्याय दलित और स्त्री आत्मकथाओं पर केंद्रित है जिसमें बेबी हालदार के रोज़नामचे के रूप में लिखी आत्मकथा के बहाने परिवार के भीतर पनपने वाली उपनिवेशवादी मानसिकता को बेबाक़ी से उघाड़ा गया है. ‘यातना का यथार्थ और मुक्ति का स्वप्न’लेख भी दलित आत्मकथाओं पर केंद्रित लेख है.  कुल मिलाकर राजीव रंजन गिरी के लिखे ये सभी स्त्री एवं दलित विषयक लेख यातना और दंश के कटु यथार्थ और इससे मुक्ति के स्वप्न को चित्रित करते हैं. ये लेख जिस उम्मीद से लिखे गए हैं वो है इन्सान को इन्सान समझे जाने की उम्मीद, शोषण से मुक्त समाज का स्वप्न लिए हुए जहाँ सभी के लिए समान रूप से उड़ान के लिए अथाह एवं उन्मुक्त आकाश हो, हाशिया बनाने के लिए जगह न हो.

इस पुस्तक की एक बड़ी उपलब्धि इसका आठवां खंड ‘भाषा बहता नीर’ है
. राजीव रंजन गिरि ने भाषा पर कई ज़रूरी बात रखी है. उनका मानना है कि जहाँ एक ओर हम हिंदी के प्रचार प्रसार विस्तार पर अभिमान करते देखे जाते हैं तो अगले ही क्षण हम ही हिंदी की बिगडती शैली, प्रकृति का मर्सिया पढ़ते दिखाई देते हैं. लेखक ने इसके कारणों की पड़ताल करते हुए इस पर प्रकाश डाला है कि हिंदी की बढती व्याप्ति का एक बड़ा कारक बाज़ार, मीडिया और फिल्म उद्योग है तथा इनकी माँग के अनुसार ही भाषा में समय समय पर परिवर्तन भी हुए किन्तु यह आत्मप्रलाप का विषय बना लेना उचित नहीं है. लेखक ने ‘आओ, हिंदी हिंदी खेलें’ लेख में यही विचार रखे
है- “मौजूदा दौर में हिंदी एकवचन न रहकर बहुवचन का रूप धारण कर चुकी है. यानी अब हिंदी की नहीं हिन्दियों की बात करनी होगी.” लेखक की यह माँग गौरतलब है चूँकि जबतक किसी ख़ास माध्यम की हिंदी को ही निर्धारक मानकर शेष हिन्दियों को परखा जाएगा तो निश्चित तौर पर नतीज़ा गलत ही निकलेगा. लेखक ने भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी की आवश्यकता और उसके बदलाव और उसके बदलाव की ज़रूरत को चिह्नित किया है. लेखक का एक ज़रूरी लेख ‘आठवीं अनुसूची: भोजपुरी का हक’ में हिंदी के बरक्स लोक भाषाओं की अस्मिता का प्रश्न उठाया है जिसमें आठवीं अनुसूची में जगह बनाने वाली भाषाओं के लिए कोई निश्चित मानदण्ड एवं पात्रता का अभाव तो नज़र आता ही है साथ ही इस अनुसूची में स्थान बनाने की ज़द्दोज़हद करती भाषाओं में एक प्रकार का भाषाई तनाव भी प्रकट होता है जो निश्चित तौर से इस अनुसूची को, इसकी धारणा को ही समस्याग्रस्त एवं विवादास्पद प्रतिबिम्बित करता है.

यह आलोचना पुस्तक अपनी वैविध्यपूर्ण सामग्री एवं विविध विषयों पर लिखे इन विचारपूर्ण लेखों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण, पठनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक है. जो भिन्न भिन्न समयों को देखती, उनसे बात करती, सवाल उठाती, जिरह करती एवं संवाद स्थापित करती शोध प्रविधियों से लैस  तथ्यपरक पुस्तक है.

पुस्तक: ‘अथ (साहित्य : पाठ और प्रसंग).
लेखक: राजीव रंजन गिरि
प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली
मूल्य: 750/-

आरक्षण के समर्थन में महिलाओं के नेतृत्व में प्रदर्शन

6 सितम्बर 2015 को जन्तर मंतर (नई दिल्‍ली ) पर  यूथ वॉयस, आरडीएमए, दलित लेखक संघ, महिला मैत्री, एचमसी व अन्‍य संगठनों की ओर से एक प्रदर्शन किया गया. प्रदर्शन की खासियत थी महिलाओं का नेतृत्व और उनकी भागीदारी . प्रदर्शन में आये कार्यकर्ताओं के बीच आरक्षण के मुद्दों और उसके खिलाफ साजिशों पर कविता कुमारी ( एचमसी), सुमेधा बौद्ध ( नैकडोर यूथ), पुष्पा विवेक ( राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन ), संजीव चंदन ( संपादक , स्त्रीकाल), आर पी भाटिया ( अखिल भारतीय एस सी एंड एस टी एम्पलाइज वेलफेयर दिल्ली) , एच एल दुसाध ( डायवर्सिटी मिशन ),  रजनी तिलक ( राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन ) ने अपनी बात  रखी.

जारी अपील 


( आरक्षण के समर्थन में इस प्रदर्शन के प्रसंग से भागीदारी के फर्क पर कार्यक्रम के बाद  फॉरवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन ने बातचीत में कहा कि भागीदारी के असर का एक फर्क अपील में आये महापुरुषों के नाम में भी दिखता है. रजनी तिलक के होने से और हस्तक्षेप से आज जारी अपील में सावित्री बाई फुले का नाम जुड़ सका अन्यथा पहली ड्राफ्टिंग में महात्मा फुले और डा.आम्बेडकर का ही नाम रखा गया था. ) 

पिछले कुछ वर्षों से समाज के विभिन्‍न समूहों में सरकारी नौकरियों में सुविधिाओं और भागीदारी को लेकर एक आकर्षण विकसित हुआ है। इसके फलस्‍वरूप समय–समय पर विभिन्‍न जाति समुदायों ने अपने आंदोलन विकसित किये हैं। कभी बिहार और उत्‍तर प्रदेश में कुछेक सवर्ण और द्विज जातियां तो कभी पश्चिमी राज्‍यों के जाट–गुर्जर इस तरह की मांग उठाते रहे हैं। फिलहाल पाटीदारों का आंदोलन चर्चा में है और इसे लेकर समाज में अनेक तरह के विचार विकसित हो रहे हैं।

जैसा कि सब जानते हैं कि पाटीदार गुजरात की किसान जाति है, जो सामाजिक श्रेणी में तो शायद अद्विज है, लेकिन उनकी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्‍कृतिक स्थिति ऐसी है, जिसे पिछडा वर्ग में नहीं रखा जा सकता। वहां के कॉरपोरेट सेक्‍टर में उनकी अच्‍छी–खासी उपस्थिति है। हीरा और होटल उद्येाग पर उनका प्रभावशाली अधिकार है। पाटीदारों की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि यह है कि वे स्‍वतंत्र भारत में लगातार दलितों और पिछडों के आरक्षण का विरोध करते रहे हैं। अब जाकर उनके तरूण नेता हा‍र्दिक पटेल को खुद को ओबीसी सूची में शामिल करने और पाटीदारों को आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं।

क लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में अपने समुदाय के लिए विभिन्‍न प्रकार की सहूलियतें मांगने का हक सभी को है। लेकिन पाटीदार समुदाय के नेता हार्दिक पटेल जिस भाषा और तर्क के साथ आरक्षण की मांग कर रहे हैं, उसकी धूर्तता पर दलित–पिछडा–अल्‍पसंख्‍यक समाज के लोगों को कडी नजर रखनी चाहिए। उनका जोर अपने समुदाय को आरक्षण के दायरे में लाने से ज्‍यादा आरक्षण की मौजूदा व्‍यवस्‍था को निर्मूल करने तथा हिंसक हिंदूवादी–सामंतवादी मूल्‍यों का प्रसार करने में हैं। इस पूरे मामले पर एक विहंगम दृष्टि डालें।

गत 25 अगस्‍त, 2015 को अहमदाबाद में एक बडी रैली आयोजित कर पाटीदारों ने ओबीसी समुदाय को मिल रहे 27 फीसीदी आरक्षण में पाटीदार समुदाय को भी शामिल करने की मांग की। रैली में बडी संख्‍या में ऐसे लोग शामिल थे, जिनके हाथों में आरक्षण को खत्‍म करने की मांग वाली तख्तियां थीं। इनके नेता भी अपने भाषणों और साक्षात्‍कारों में कह रहे हैं कि सरकार या तो पाटीदार समुदाय को आरक्षण दे, या फिर आरक्षण की व्‍यवस्‍था ही समाप्‍त कर दे। उनका यह भी कहना है कि आरक्षण देश के लिए भारी नुकसानदायक सिद्ध हुआ है तथा इससे देश 35 साल पीछे चला गया है। जाहिर है, उनकी यह बातें न सिर्फ तथ्‍यों के विपरीत हैं बल्कि इससे यह भी स्‍पष्‍ट तौर से पता चलता है कि वे पाटीदारों लिए आरक्षण की मांग की आड में आरक्षण की व्‍यवस्‍था को खत्‍म करने का ही माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
दरअसल, हार्दिक पटेल ने भी अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत एक आरक्षण विरोधी छात्र नेता के रूप में की थी। उन्‍होंने विभिन्‍न टेलीविजन चैनलों को दिये गये इंटरव्‍यू में स्‍वयं को हिंदुओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध बताया है । जाहिर है, उनका आशय हिंदू धर्म में शामिल दलित–पिछडी आबादी से नहीं है। उनके ऐसे अन्‍य अनेक बयान भी हमारे सामाने हैं, जिसमें उन्‍होंने आंतकवाद के बहाने पूरे मुसलमान समुदाय की देशभक्ति पर सवाल उठाए हैं। इसलिए यह अनायास नहीं हैं कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ, विश्‍व हिंदू परिषद और शिव सेना जैसे संगठन उनके साथ खडे हैं। ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं कि गुजरात का यह कथित पाटीदार आंदोलन आरक्षण विरोधी हिंदुत्‍ववादी शक्तियों की शह पर शुरू किया गया है।

पाटीदारों का कहना है कि उन्‍हें आरक्षण के दायरे में ओबीसी के लिए निर्धारित 27 फीसदी के अंतर्गत ही लाया जाए। वे चाहते तो अपने समुदाय के लिए अलग से विशेष आरक्षण की मांग कर आरक्षण की मौजूदा 50 फीसदी की सीलिंग को बढाने के लिए दबाव बना सकते थे। ऐसा कर वे बहुजन समुदाय की इस पुरानी मांग के साथ सहयोगी की भूमिका में आ सकते थे। लेकिन इसकी जगह वे दलित–पिछडे समुदायों के प्रतिभाशाली युवाओं के सामान्‍य वर्ग की सीटों पर चुने का जाने का विरोध कर रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि वे देश की 85 फीसदी शूद्र– अतिशूद्र– अद्विज आबादी (स्‍वयं पाटीदार भी जिसका हिस्‍सा हैं) को 50 फीसदी आरक्षण के बाडे ही रखे जाने की वकालत कर रहे हैं।

इस आंदोलन के बहाने न सिर्फ खुले तौर पर आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू करने को लेकर बहस चलाने की कोशिश की जा रही है बल्कि बहुजन (दलित–ओबीसी व अल्‍पसंख्‍यक) एकता को भी खंडित करने की कोशिश की जा रही है। आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल और उनसे जुडी हिंदूत्‍ववादी शक्तियों के निम्‍नांकित मुख्‍य उद्देश्‍य प्रतीत होते हैं :

ओबीसी आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू करवाना
मूल ओबीसी में शा‍मिल जा‍तियों को एक–दूसरे विरूद्ध खडा करना
पाटीदार आरक्षण के नाम पर संपन्‍न जाटों और मराठाओं के द्वारा की जा रही आरक्षण की मांग को बढावा देना
अनूसूचित जा‍ति–जनजाति को मिल रहे आरक्षण में भी क्रिमी लेयर को लागू करवाना
बहुजन तबकों में अल्‍पसंख्‍यक, विशेषकर मुसलमानों के लिए विद्वेष को बढाना

इन कारणों से हम दलित–पिछडे और अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के समाजिक कायकर्ता अपने राजनेता और आम जनता से अपील करते हैं कि :

अनुसूचित जाति–जनजाति की बढी हुई आबादी के अनुपात में आरक्षण का प्रतिशत बढाने के लिए सरकार पर दवाब बनाएं ।
जाति जनगणना के आंकडे शीघ्र जारी कर ओबीसी को भी आबादी के अनुसार आरक्षण देने की मांग तेज करें।
पाटीदार आंदोलन के बहाने सामाजिक न्‍याय की समतामूलक अवधारणा को नष्‍ट करने को कोशिश करने वाली ताकतों पर कडी नजर रखें
ऐसे किसी भी संगठन, राजनीतिक दल अथवा विचार को समर्थन न दें जो आरक्षण के मूल सिद्धतों पर कुठाराघात करता हो
दलित–ओबीसी और अल्‍पसंख्‍यक एकता को बनाए रखें तथा समाज विरोधी श‍क्तियों का मुकबला करने के लिए महात्‍मा जोतिबा फूले, सावित्री बाई फूले– डॉ. बाबा सा‍हब आम्‍बेडर द्वारा बताये गये रास्‍ते का अनुसरण करें।

संपर्क : 08826669024 (रजनी तिलक)
रिपोर्ट : अरुण कुमार प्रियम