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प्रेमा झा की कविताएँ

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प्रेमा झा

प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ  और कविताएँ प्रकाशित. फिलवक्त अपने एक उपन्यास को लेकर शोधरत . संपर्क : ईमेल – prema23284@gmail.com

मेरा प्रेमी पाकिस्तानी है
अक्सर सीमा पार भाग जाया करती थी
ये उन दिनों की बात है जब
जोगबनी और बिराटनगर के बीच
कांटें घेर दिए गए थे
मैं महज पाँच बरस की थी
मुझे अकेले भागने में और/
कांटें पार करने में बड़ा मज़ा आता था
बॉर्डर का इतिहास मेरी ज़िन्दगी में
तब से जुड़ा है/
मैं क्रॉस-बॉर्डर खेलती कभी अपने पांव
कीचड़ में फंसाती/
धूल झाड़ती/
कभी बॉर्डर पर बंधे कांटें से खुद को ज़ख़्मी कर लेती थी/
जख्मी होना मेरी आदतों में शुमार रहा है तब से
मुझे याद है वो दिन
जब मैं सीमा पार के लड़कों के साथ छुपकर खेला करती थी/
फिर एक वक़्त आया है कि-
एक लड़का जो सीमा-पार का है
मुझसे मुहब्बत की बातें करने लगा है/
अब मैं अमृतसर के बाघा बॉर्डर पर सैल्यूट डांस में शरीक हुई/
बॉर्डर मेरी ज़िन्दगी में दुबारा आ गया है!
वो देश जहां का प्रेमी है मेरा
मेरे देश के साथ उसके रिश्ते विवादास्पद है
मेरा देश और उसका देश अक्सर
हिदायतें और एहतियात की बातें करता है
मेरा प्रेम मशहूर हो गया है इन दिनों
ये बॉर्डर और उसकी सीमाएं
हमारे प्यार के बीच कहीं नहीं हैं/
शुक्र है!
खैर मुबारका मेरा रिश्ता!!
मेरा एक सुंदर सपना है
हमारा घर हो
बॉर्डर पार का
जिसके दरवाज़े मेरे देश में खुलें
हम एक-दूसरे के देश को
अपना घर मानने लगे हैं
हाँ, मेरा प्रेमी पाकिस्तानी है!
देशवासियों, हमारे लिए मंगलकामना करना
मैंने बॉर्डर पार प्रेम कर लिया है

गुनाह-ए-कबीर


फिर तुम्हें उसका ख्याल रखना होगा
उसकी हरेक बात और ज़रुरत में
पूछना होगा कि कल रात उसने कितनी
रोटियाँ बे-चबायी छोड़ दी थी
और/
उठकर पानी पीने लगी
तुम्हें उसे बतलाना होगा कि ये दिन बहुत दिन नहीं रहेंगे
फिर हम अपने एक सुंदर घर में रहने लगेंगे
दिन लौट आएँगे/
अच्छे दिन/
एक दिन/
इन सब बातों की बाबत उसकी डायरी का एक पन्ना
जो वो हर वक़्त अपने सिरहाने रखती है
उसे भी तुम्हें पढ़ना होगा
जिसमें वो अपने कई सपनों की लिस्ट बनाती है
तुम्हें उसकी फटी ओढ़नी का जो सितारा
टूट गया है/
उसे भी संभालना होगा
तनिक देर के लिए नहीं
बहुत देर के मद्देनज़र
एक सुई और धागे की मजबूती में
उसका कहना है कि-
वो ज़िन्दगी की किताब को पन्ने-दर-पन्ने
खोलती है हर रोज़
और/
हर रोज़ ख़त्म कर देती है
इसलिए अब कोई भी बात उसे ज्यादा प्रभावी नहीं लगती

लोगों के बात का जो चाबुक है
उसे हर रोज़
जब भी वो सड़क से गुजरती है
मारता रहता है/
तुम्हें उससे कहना होगा कि
वो ये मार अब नहीं खाएगी
क्योंकि तुमने  उसकी हिफ़ाजत में
अब एक मज़बूत दीवार खड़ी कर दी है
जिनके ऊपर एक एलिगेंट छत होगी
वहाँ एक अड़गनी झूलेगी
फिर तुम दोनों उसपर ग़म सुखो दोगे
और
खुशियाँ टांगकर रखोगे

तुम्हें उसको और भी कई बातें बतानी होगी
मसलन तुम जो उसके इतने करीब हो तो
कोई हवा भी उसे नहीं छू सकती
मगर इन सब बातों के लिए
तुम्हारा उससे प्रेम करना जरूरी होगा
तुम्हें अब यह लग सकता है कि
अच्छा है प्रेम करना छोड़ दिया जाए/

तुम अब कभी-कभी सोचने लगे हो
ज़िन्दगी को चुपचाप
पतली गली से निकलने दिया जाए/
चोर निगाहों से उसे देखकर
तुम्हें अब अपनी रोटी का ख्याल आता है
जिसकी पहले ही तुम चौथाई कर चुके हो
बचे हिस्से के साथ उसे बांटना
तुम्हारी भूख इसकी इजाज़त नहीं देगी/
तुम भूख नाम के इस राक्षस से
पहले भी वाकिफ रहे हो/
अब जो भी हो जाए
तुम भूख से फ़्लर्ट नहीं करोगे
अच्छा है प्रेम करना
आगे डैश रहने देना ………
क्योंकि भूख मारना गुनाहे-कबीर है.

सिगरेट

कहानी लम्बी है
सिगरेट सुलगाती हूँ और कहने लगती हूँ
एक छल्ले धुएँ में
कहानी अपना जाल बुनने लगती है/
शुरू होती है
और /
एक-एक वाकया, हादसा और दिन दस्तक देता है
मेरी कागज़ी अदालत में
हरेक बात सच कहूँगी आज
जज़्ब हर अनुभूति, तथ्य, कर्म और नाटक
शामिल होंगे इस धुएँ में
धुएं का गुबार बढ़ता जाता है
और /
उस रात को बुलाता है जब मेरे पास कोई छत नहीं थी
मैं गुबार इतनी हो गई
और /
फैलती चली गई
एक शहर, दूसरे शहर
एक गली, दूसरी गलियाँ
ये सड़क इस अदालती कार्रवाई में
गवाह बनेंगी आज
और जज भी, जिसे फैसला सुनाना है/
मेरी सिगरेट आधी जल चुकी है और
दूसरी मैंने निकालकर बाहर रख ली है/
कहानी में सिगरेट का रोल बहुत अहम है
जब कोई नहीं होता है
ये गुबार मेरा साथ निभाते
और एक ख्याली आकाश बनाकर
मुझे ढांढस बंधाते रहते हैं /
कहानी बढ़ने लगती है
ऐसा लग रहा है मानों
मैं “रेमी” में हूँ अभी
और /
हर वो हादसा, वाकया और दिन
खुलते, बंद होते जा रहे
एक दृश्य में चलने लगे हैं
इस तरह मैं
टूटती, बिखरती, संवरती और फिर चलने लगती हूँ/
ऐसा लगता है जैसे धुआँ ही हो गई हूँ /
इन सब दृश्यों में
खुद को देखती हुई
वह नायिका बन जाती हूँ
जो फिल्म की कहानी में
शुरू से अंत तक गाती-नाचती रहती है /
कभी-कभी इस नायिका का चरित्र
इतना प्रौढ हो जाता कि-
धुआँ सिमटकर ओस बन जाता
मैंने दूसरी सिगरेट जला ली
अब मैं खुद को आइने में देख रही हूँ
और /
हँसने लगी हूँ बिना किसी आवाज़ के
क्योंकि जो शोर मेरे भीतर था-
वह काफी था
अब मुझे किसी लिपि की ज़रुरत नहीं थी/
मैं धुएँ में खुद से बात कर सकती हूँ/
लिख लेती हूँ
एक पूरी कविता
जिसमें होता है
धुएँ के आकाश तले
चलती नवजात ख़ामोशी
जो हमेशा मौन गृह में हँसता रहता है
और /

तब कोई लिपि, कोई भाषा
इतनी प्रभावी और सशक्त नहीं हो पाती कि
कोई उसे सुन ले!
ऐसे वक़्त में
सिगरेट बहुत काम आती है
जिसके पास होता है
हमेशा एक आकाश!

एक लड़की 


एक अकेला टापू
बस्ती की एक लड़की
नीचे खंडहर में
टनेल से गुजरती हुई
हाथ में लालटेन लिए
क्या ढूंढ रही है?
इतनी सुनसान और स्याह सड़क पर
एक तिनका ढूँढने की अकुलाहट
या तो लड़की भोगती है
या देखती है चुप सड़क

हिंदी भाषा में स्त्री-विमर्श

राजेन्द्र प्रसाद सिंह

भाषाशास्त्री. हाशिये का विमर्शकार. ‘ हिन्दी साहित्य का सबाल्टर्न इतिहास’  सहित आधा दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित.  संपर्क : ईमेल: rpsingh.ssm65@yahoo.in मो. – 9431917451

पिछले कुछ दशकों से हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श खूब फूला, फला और समृद्ध हुआ है, पर पुरुष वर्चस्ववादी हिंदी भाषा, व्याकरण तथा शब्दकोष के आईने में इसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई है। यह भी होना चाहिए। हिंदी में ‘‘स्त्री’’ स्वतंत्र शब्द है। ‘‘नारी’’ परतंत्र है। ‘‘नर’’ में स्त्री प्रत्यय जोड़ने से ‘‘नारी’’ शब्द निर्मित होता है। ‘‘स्त्री’’ शब्द किसी ‘‘स्त्रा’’ शब्द का मुखापेक्षी नहीं है। शायद इसीलिए हिंदी विमर्शकारों ने ‘‘नारी विमर्श’’ की जगह ‘‘स्त्री विमर्श’’ को चुना है। हिंदी व्याकरण का यह नियम है कि पुरुषवाची शब्दों में स्त्री प्रत्यय जोड़ देने से वे स्त्रीवादी शब्द हो जाया करेंगे – जैसे लड़का = लड़की, बालक = बालिका, माली = मालिन, देवर = देवरानी आदि। तात्पर्य यह है कि हिंदी व्याकरण में पुंलिंग शब्दों को मूल और स्त्रीलिंग शब्दों को व्युत्पन्न समझा जाता है। जाहिर है कि हिंदी में व्युत्पन्न शब्द एक प्रकार से गौण अथवा दोयम दर्जे के शब्द हैं। इससे हिंदी व्याकरण का पुरुष मानसिकता से रचे होने का प्रमाण मिलता है। हिंदी के कुछेक शब्दों यथा मौसी = मौसा, बहन = बहनोई आदि को छोड़कर प्रायः स्त्रीलिंग शब्दों का निर्माण ऐसे ही पुरुषवाची शब्दों में स्त्री प्रत्यय जोड़ देने से हुआ करता है।

हिंदी में स्त्री प्रत्यय की अवधारणा है। इसीलिए इसमें ‘‘कुतिया’’ से ‘‘कुत्ता’’ अथवा ‘‘घोड़ी’’ से ‘‘घोड़ा’’ का निर्माण नहीं होता है अपितु ‘‘कुत्ता’’ से ‘‘कुतिया’’ तथा ‘‘घोड़ा’’ से ‘‘घोड़ी’’ शब्द बनते हैं। पर भारत की वे भाषाएँ जो स्त्री प्रत्यय नहीं बल्कि ‘‘लिंग प्रत्यय’’ की अवधारणा में विश्वास करती हैं, उनमें ‘‘कुत्ता’’ से ‘‘कुतिया’’ अथवा ‘‘घोड़ा’’ से ‘‘घोड़ी’’ बनाने के लिए अलग-अलग स्वतंत्र प्रत्यय हैं, जिन्हें ‘‘लिंग प्रत्यय’’ कहते हैं। ऐसी भाषाओं में ‘‘स्त्री प्रत्यय’’ नहीं बल्कि ‘‘लिंग प्रत्यय’’ हुआ करता है। नागालैंड तथा मणिपुर में बोली जानेवाली अनेक भाषाओं (अंगामी, लोथा, कुकी, कोन्यक, लियांगमाइ आदि) से इसे समझा जा सकता है। मिसाल के तौर पर लियांगमाइ भाषा को लें। इसमें पुलिंग और स्त्रीलिंग बनाने के लिए अलग-अलग प्रत्यय हुआ करते हैं। इस भाषा में ‘‘कुत्ता’’ और ‘‘कुतिया’’ दोनों को ‘‘तथी’’ कहा जाता है। यदि सिर्फ ‘‘कुत्ता’’ कहना है तो उसमें पुंलिंग प्रत्यय ‘‘ची’’ जुड़ जाएगा और यदि सिर्फ ‘‘कुतिया’’ कहना है तो उसमें स्त्री प्रत्यय ‘‘पुइ’’ जुड़ जाएगा, तब ‘‘कुत्ता’’ के लिए शब्द होगा ‘‘तथिची’’ और ‘‘कुतिया’’ के लिए शब्द होगा ‘‘तथिपुइ’’। कहना न होगा कि ऐसी भाषाओं में स्त्रीलिंग और पुलिंग दोनों प्रकार के शब्द समानता के धरातल पर खड़े हैं। इनमें कोई भी शब्द एक-दूसरे का गुलाम नहीं है। पर हिंदी में स्त्री प्रत्यय जोड़कर बनाए जानेवाले सभी स्त्रीवाची शब्द पुरुषवाची शब्दों के गुलाम हैं और ऐसा पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता के कारण हुआ है।

जैसा कि कहा गया है कि हिंदी में पुंलिंग शब्दों को मूल तथा उससे निर्मित स्त्रीलिंग शब्दों को व्युत्पन्न अथवा दोयम दर्जे का शब्द समझा जाता है। यही कारण है कि ‘‘बाल’’ का स्त्रीलिंग ‘‘बाला’’ होगा, पर ‘‘बाल’’ से जितने शब्द निर्मित होंगे, उतने ‘‘बाला’’ से नहीं बनेंगे। वजह यह कि ‘‘बाला’’ (बच्ची अथवा लड़की के अर्थ में) स्वयं ‘‘बाल’’ (बच्चा अथवा लड़का के अर्थ में) से व्युत्पन्न शब्द है। मिसाल के तौर पर हिंदी में ‘‘बाल’’ से निर्मित कुछेक शब्दों को देखा जा सकता है यथा बाल -काल, बाल -क्रीड़ा, बाल -गृह, बाल -बुद्धि, बाल -रोग, बाल- साहित्य आदि। पर हिंदी में बाला साहित्य अथवा बाला रोग जैसे शब्दों का प्रचलन नहीं है। इसलिए कि मूल शब्दों में जनने की क्षमता अधिक होती है जबकि व्युत्पन्न शब्दों में कम होती है। स्त्री भले ही ‘‘जननी’’ कही जाती है, पर पुंलिंग से बने स्त्रीलिंग शब्दों में शब्दों को जनने की क्षमता कम होती है।

दरअसल भाषा में स्त्रीलिंग और पुंलिंग का भेद बाद का है, उससे पहले मानव और मानवेतर जैसा भेद किया जाता था। द्रविड़ तथा नाग भाषाओं में इस तरह का भेद अब भी एक सीमा तक प्रचलित है। पहले द्रविड़ भाषाओं में संज्ञाओं का मूल विभाजन मानव और मानवेतर समुदायों में था। मानव-समुदाय के अन्तर्गत स्त्रीलिंग और पुंलिंग का भेद बाद का है। आद्य भारोपीय में भी यह अनुमान किया गया है कि उसमें मूलतः दो ही लिंग रहे होंगे: एक ‘‘सामान्य लिंग’’ जिसमें पुंलिंग और स्त्रीलिंग दोनों शामिल होंगे, तथा दूसरा ‘‘नपुंसक लिंग’’। इसकी पुष्टि हित्ताइत भाषा से हो जाती है। हित्ती में केवल दो लिंग हैं: पुंलिंग और नपुसंक लिंग। इसमें स्त्रीलिंग नहीं है। जाहिर है कि भाषा का इतिहास इस बात का गवाह है कि स्त्रीलिंग और पुंलिंग का भेद बाद का है। भारत में बोली जानेवाली मुंडावर्ग की भाषाएँ भी कुछ ऐसा ही प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। मुंडारी और हो भाषाओं में संज्ञाओं का मूल विभाजन प्राणिवाचक और अप्राणिवाचक है। संथाली में भी प्राणित्व तथा अप्राणित्व के आधार पर लिंगभेद है, पर हिंदी में पुंसत्व-स्त्रीत्व पर आधारित लिंगभेद है। ऐसे प्राणि-अप्राणिवाचक लिंग को ‘‘जैवलिंग’’ कहा जाता है। सिंहली इसका प्रमाण है जहाँ प्राणत्व को लेकर प्राणवान तथा प्राणहीन दो लिंग हैं। निश्चित रूप से हिंदी में पुंसत्व-स्त्रीत्व पर आधारित लिंगभेद अत्यंत गहरा है।

हिंदी की भाषा-संरचना में पग-पग पर स्त्रीलिंग और पुंलिंग की पहचान की जा सकती है। क्रियाओं में (जाता/जाती), संबंध प्रत्ययों में (का/की), विशेषणों में (अच्छा/अच्छी), सादृश्य विधायक शब्दों में (जैसा/जैसी)-सभी पर लिंग का असर है। हिंदी में लड़का जाता है, पर लड़की जाती है। लड़की जाता है, ऐसा लिखने-बोलने की मनाही है। पर पूर्वोत्तर में बोली जानेवाली तिब्बती-बर्मी वर्ग की भाषाएँ ऐसे लिंगभेद से पीडि़त नहीं हैं। पुनः लियांगमाइ भाषा के एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। इसमें ‘‘आदमी जाता है’’ को ‘‘म्पिउमाइ तात’’ कहा जाता है और ‘‘औरत जाती है’’ को ‘‘म्पुइमाइ तात’’ बोला जाता है। अर्थात् स्त्री-पुरुष दोनों के लिए क्रिया ‘‘तात’’ का ही प्रयोग होता है। क्रिया पर पुंसत्व अथवा स्त्रीत्व का कोई प्रभाव नहीं होता है। ऐसा संताली में भी है। वहाँ भी क्रिया लियांगमाइ की भाँति अपरिवर्तित रहती है। छिता ए चाला: काना (छिता जा रही है) और दिनू ए चाला: काना (दिनू जा रहा है) – दोनों में क्रिया रूप ‘‘चाला: काना’’ है अर्थात् क्रिया पर पुंसत्व अथवा स्त्रीत्व का कोई प्रभाव नहीं हैं। इसमें कोई शक नहीं कि बदलते समाज और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हिंदी भाषा में लिंग विषयक चेतना भी बदल रही है। विश्वविद्यालयों में पढ़नेवाली छात्राएँ यही कहती हैं कि हम चाय पीने जा रहे हैं। मनोहर श्याम जोशी की ‘‘हमलोग’’ जैसी धारावाहिक शृंखलाओं में एक भी स्त्रीवाची क्रियाएँ नहीं हैं। बहन जी आप क्या खाओगे/मैडम जी आप कब चलोगे जैसी क्रियाएँ नए भाषायी परिवर्तन के द्योतक हैं। विनोबा भावे ने भी अपनी पुस्तक ‘‘स्त्री-शक्ति’’ में यह विचार दिया है कि भाषा में पुरुषवाची और स्त्रीवाची सभी शब्दों के लिए एक ही क्रियारूप, विशेषणरूप आदि होने चाहिए।

दरअसल हिंदी के नाम शब्दों (संज्ञा आदि) में ही ‘‘लिंग’’ की सत्ता वास्तविक होती है, शेष में (क्रिया, विशेषण आदि) इसे आरोपित किया जाता है। अंग्रेजी में अथवा भारत के नाग-मुंडा वर्ग की भाषाओं में क्रिया, विशेषण आदि शब्दों पर लिंग आरोपित नहीं किए जाते हैं। अंग्रेजी में ‘‘लड़का‘‘ के साथ भी ‘‘गुड’’ विशेषण लगेगा और ‘‘लड़की’’ के साथ भी ‘‘गुड’’ विशेषण ही लगेगा। नाग वर्ग की लोथा भाषा में यदि ‘‘नया’’ के लिए ‘‘एथान’’ शब्द है तो ‘‘नई’’ के लिए कोई अलग शब्द नहीं है। प्रत्येक हालत में विशेषण अपरिवर्तित रहेगा। किंतु हिंदी के विशेषण पुंसत्व और स्त्रीत्व को आधार मानकर अपना रूप बदल देते हैं। यहाँ ‘‘अच्छा’’ का ‘‘अच्छी’’ हो जाएगा और ‘‘नया’’ का ‘‘नई’’ हो जाएगा। जाहिर है कि अच्छा/अच्छी अथवा जाता/जाती जैसे विशेषण-क्रियाओं पर हिंदी में लिंग आरोपित किए जाते हैं। लिंग की वास्तविक सत्ता ‘‘अच्छा’’ अथवा ‘‘जाना’’ में नहीं है। लड़का अथवा लड़की में पुंसत्व-स्त्रीत्व है, पर क्रिया अथवा विशेषण में नहीं है, उसे कृत्रिम रूप से बना दिया जाता है। ‘‘द सेकेंड सैक्स’’ में सिमोन द बोउआ की स्थापना है कि स्त्री पैदा नहीं होती, स्त्री बना दी जाती है। ऐसे ही हिंदी में क्रिया, विशेषण, संबंध प्रत्यय आदि सभी को स्त्रीलिंग बना दिया जाता है।

पदवीसूचक शब्दों को लिंग-निरपेक्ष अथवा उभयलिंगी कहकर हिंदी के वैयाकरणों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद, सचिव, निदेशक, उपायुक्त, जिलाधीश, अधीक्षक जैसे पदनामों को स्त्रीलिंग-पुंलिंग के दायरे से बाहर रखा है। पर कुछेक पदवीसूचक शब्दों का भी स्त्रीरूप बनाए जाते हैं यथा अध्यक्ष = अध्यक्षा, आचार्य = आचार्या आदि। ऐसे आचार्यों को यदि मौका मिले तो वे प्रधानमंत्राणी, निदेशिका, जिलाधिकारिणी जैसे स्त्री-शब्द गढ़ डालेंगे। यह तो सुखद संयोग है कि ऐसे आचार्यगणों ने  भाववाचक संज्ञाओं के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं किए वरना वे साबित कर डालते कि ‘‘आचार्यत्व’’ तो ‘‘आचार्य’’ में है, पर ‘‘आचार्यात्व’’ का गुण ‘‘आचार्या’’ में है। जिस हिंदी भाषा के रेशे-रेशे में स्त्रीलिंग-पुंलिंग भाव समाया हुआ है, वहाँ स्त्रीलिंग ‘‘अध्यक्षा’’ के लिए क्यों नहीं अध्यक्ष होने की क्रिया ‘‘अध्यक्षाता’’ शब्द बनाया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कौन करेगा- अध्यक्ष अथवा अध्यक्षा? ‘‘नायक’’ का ‘‘नायकत्व’’ किसमें है – नायक अथवा नायिका में? क्यों नहीं, हिंदी के आचार्यों ने भाषा के रग-रग में लिंगभेद आरोपित करके ‘‘नायिकात्व’’ शब्द गढ़ लिया? हिंदी के कुछेक पदवीसूचक शब्द ‘‘पति’’ के मेल से बने हैं यथा राष्ट्रपति, कुलाधिपति, कुलपति आदि। ‘‘पत्नी’’ के मेल से कोई भी पदवीसूचक शब्द नहीं हैं। यदि ‘‘पति’’ का अर्थ ‘‘मालिक’’ भी है तो अरबपति, लखपति जैसे शब्द पुरुष मानसिकता की ही देन है।

किशोरीदास वाजपेयी ने स्वतंत्रता और परतंत्रता की कसौटी पर आत्मा तथा परमात्मा का लिंग तय करते हुए लिखा है कि आत्मा तो ईश्वर के अधीन है, स्वतंत्र नहीं है। परमात्मा स्वाधीन है, स्वतंत्र है। स्वतंत्रता की व्यंजना के लिए परमात्मा पुंलिंग में तथा पराधीनता के प्रदर्शन के लिए आत्मा स्त्रीलिंग में है। ‘‘आत्मा’’ परतंत्र है। इसलिए वह स्त्रीलिंग है। फिर ‘महात्मा’’ पुंलिंग क्यों है? ‘‘महात्मा’’ पर सिर्फ पुरुषों का कब्जा कैसे है? ‘‘शक्ति’’ स्त्रीलिंग है तो ‘‘महाशक्ति’’ भी स्त्रीलिंग है। फिर ‘‘आत्मा’’ स्त्रीलिंग है तो ‘‘महात्मा’’ पुंलिंग क्यों है? दरअसल हिंदी में कुछेक अपवादों को छोड़कर प्रायः सभी ‘‘महा’’ युक्त विशेषण/संज्ञाएँ पुरुषों के लिए सुरक्षित हैं यथा महामना, महामहिम, महानुभाव, महारथी आदि। यह तो हिंदी वैयाकरणों ने कृपा की है कि ‘‘महाशय’’ का स्त्रीलिंग भी बना डाला है, वह है ‘‘महाशया’’। जाहिर है कि महानता या कहें स्वतंत्रता और परतंत्रता की कसौटी पर शब्दों के लिंग-निर्णय के ऐसे नियम-कानून और उसकी व्याख्या पुरुष मानसिकता की देन है। यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई ‘‘माता’’ का विलोम ‘‘पिता’’ कह डाले या ‘‘लड़की’’ का विलोम ‘‘लड़का’’ बता डाले। दरअसल इस तरह के विलोम छद्म हुआ करते हैं। लिंग विलोम का आधार नहीं है। माता और पिता दोनों एक-दूसरे के पुरक हैं। इसे विलोम कहना गलत है।

हिंदी में महिला कथाकार, महिला खिलाड़ी, महिला वकील जैसे समास-प्रक्रिया द्वारा निर्मित लिंग- विभेदक शब्दों की भी परंपरा चल पड़ी है। व्यवसाय, पेशा आदि से जुड़े शब्दों में इसका प्रचलन बढ़ा है। अब तो महिला थाना, महिला बैंक आदि भी खुलने लगे हैं। ऐसे लिंग-विभेदक शब्दों की खासियत यह है कि यह स्त्री प्रत्यय की तरह एकतरफा नहीं है बल्कि ‘‘पुरुष’’ शब्द जोड़कर भी पुंलिंग शब्द बनाए जा रहे हैं जैसे पुरुष खिलाड़ी, पुरुष सदस्य आदि। परंतु यदि वाक्य में पुरुष खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी एक साथ आ जाए तो क्रिया का लिंग तुरंत पुरुष के अनुसार हो जाता है। हिंदी में ‘‘पुरुष खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी आ रही हैं’’ नहीं होगा बल्कि ‘‘पुरुष खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी आ रहे हैं’’ होगा। कारण वही पुरुष मानसिकता है। यदि हिंदी वाक्य में दो भिन्न लिंगों के कत्र्ता भी द्वन्द्वसमास के अनुसार प्रयुक्त हों तो भी उनकी क्रिया पुंलिंग होती है। माता-पिता, स्त्री-पुरुष जैसे समस्त पद हिंदी में पुंलिंग होते हैं। जाहिर है कि व्याकरण में कत्र्ता और क्रिया का ऐसा मेल पुरुषवादी है।

हिंदी सर्वनामों की खासियत यह है कि वे एक ही रूप में स्त्रीलिंग और पुंलिंग दोनों के लिए प्रयुक्त हैं। वह, तुम, मैं आदि सर्वनाम पुरुष के लिए भी आते हैं, महिला के लिए भी। अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। वहाँ He, She,It जैसे प्रयोग हैं। पर अंगे्रजी Person की जगह ‘‘पुरुष’’ को स्थापित करके हिंदी व्याकरण ने पुरुष मानसिकता का परिचय दिया है। हिंदी में पुरुषवाचक सर्वनाम की परिभाषा है कि वे पुरुषों के नाम के बदले आते हैं। हिंदी शब्दकोश बताता है कि पुरुष में सिर्फ मानव जाति का नर प्राणी (स्त्री से भिन्न) शामिल है। फिर पुरुषवाचक सर्वनाम में महिलाएँ कैसे आएंगी? जाहिर है कि पुरुषवाचक सर्वनाम स्त्री या पुरुष दोनों के नाम के बदले आते हैं, पर हिंदी व्याकरण में उसे पुरुष मानसिकता के कारण ‘‘पुरुषवाचक’’ सर्वनाम कहते हैं। पुनः पुरुषवाचक सर्वनाम में ‘‘पुरुष’’ शब्द जोड़कर हिंदी व्याकरण तीन भेद करता है- उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष एवं अन्य पुरुष। जाहिर है कि हिंदी व्याकरण में सर्वनाम के ऐसे भेद-प्रभेद का नामकरण पुरुष मानसिकता की वजह से हुए हैं। ऐसे भी ‘‘उत्तम पुरुष’’ को घुमाकर ‘‘पुरुषोत्तम’’ कह सकते हैं। भारतीय संस्कृति में ‘‘पुरुषोत्तम’’ हैं जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम (राम), लीला पुरुषोत्तम (कृष्ण) आदि; परंतु ‘‘स्त्रीयोत्तम’’ की अवधारणा नहीं है।

‘‘पुरुष’’ जोड़कर हिंदी व्याकरण में समास का भी एक भेद है। वह है- तत्पुरुष समास। तत्पुरुष समास उसे कहते हैं जिसका अंतिम पद प्रधान हो, वह अंतिम पद स्त्री हो अथवा पुरुष, वह ‘‘तत्पुरुष’’ ही होगा। ‘‘तत्स्त्री’’ पुरुष निर्मित हिंदी व्याकरण में नहीं चलेगा। ‘‘राजपुत्र’’ भी तत्पुरुष है और ‘‘राजपुत्री’’ भी तत्पुरुष है, ‘‘तत्स्त्री’’ कोई नहीं है। हिंदी व्याकरण में ‘‘व्यधिकरण तत्पुरुष’’ के भेदों में पुनः ‘‘पुरुष’’ शब्द जोड़कर ही एक सिलसिला चल पड़ता है- कर्म तत्पुरुष, करण तत्पुरुष, संप्रदान तत्पुरुष आदि। यह तो अच्छा हुआ कि हिंदी वैयाकरणों ने कोई ‘‘कत्र्ता तत्पुरुष’’ की अवधारणा नहीं दी। पर कारक के प्रसंग में ‘‘कत्र्ता’’ की अवधारणा है। हिंदी शब्दकोश के अनुसार करनेवाला अथवा रचनेवाला कत्र्ता है जैसे सृष्टिकत्र्ता, यज्ञकत्र्ता आदि। हिंदी आचार्यों ने ‘‘शोधकत्र्री’’ (शोध करनेवाली अथवा रचनेवाली) को प्रचलित कर दिया, पर हिंदी व्याकरण का ‘‘कत्र्ता कारक’’ वैसे ही रह गया। पुरुष मानसिकता के कारण व्याकरण में क्रिया को करनेवाला और करनेवाली दोनों कत्र्ता हैं। वचन प्रकरण में भी ‘‘लोग’’ जैसे बहुवचन बोधक शब्दों को जोड़कर हिंदी व्याकरण अपनी पुरुष मानसिकता का परिचय देता है। हिंदी शब्दकोश में ‘‘लोग’’ का अर्थ ‘‘मनुष्यों का समूह’’ है। ‘‘लोग’’ का स्त्रीलिंग ‘‘लुगाइ्र्र’’ है। पर हिंदी में बहुवचन का रूप ‘‘लुगाई’’ से सिद्ध नहीं होता है। ‘‘हमलोग’’ में सभी शामिल हैं- पुरुष भी, स्त्री भी। ‘‘हम लुगाई’’ जैसे शब्द वचन प्रकरण में नहीं मिलेगा। हिंदी में श्रोता ‘‘लोग’’ ही चलेगा। श्रोता के संग ‘‘लुगाई’’ नहीं चलेगा। कारण कि हिंदी व्याकरण पुरुषों की जययात्रा है।

निराला की कविता में स्त्री मुक्ति का स्वर

नीरज कुमार

निराला का ब्याह तेरह (13) बरस की उम्र के आस-पास हो गया था। तकरीबन सोलह (16) बरस की उम्र में उनका गौना हुआ। संभवतः तेईस (23) वर्ष की उम्र में निराला विधुर हो गए थे। निराला की साहित्य साधना के प्रथम खंड में रामविलास शर्मा ने उल्लेख किया है-युद्ध और महामारी में चोली-दामन का सम्बन्ध है। यूरोप में लड़ाई खत्म होने पर भारत में महामारी फैली। सुर्जकुमार को तार मिला-तुम्हारी स्त्री सख्त बीमार है, फौरन आओ। सुर्जकुमार ने तुरंत डलमऊ के लिए कूच किया। राम-राम करते जब ससुराल पहुँचे, तब मालूम हुआ, मनोहरा देवी पहले ही चिता में जल चुकी हंै।1 जिस युद्ध का उपर्युक्त पंक्तियों में जि़क्र आया है, वह सन् 1914 से 1918 तक चलने वाला प्रथम विश्व युद्ध है। निराला का जन्म वर्ष सन् 1896 है। वर्ष 1996 में उनके पैतृक गाँव गढ़ाकोला में उनका जन्म शताब्दी वर्ष मनाया गया था। वर्षानुसार गणना करें तो निराला का शारिरिक साथ मनोहरा देवी से तेईस वर्ष की उम्र में छूट गया था। विधुर होने के बाद निराला तकरीबन ब्यालिस (42) वर्ष और जिए।

निराला

निराला के पुत्र रामकृष्ण उस समय चार बरस के थे। पुत्री सरोज मात्र साल-भर की थी। निराला पर दूसरे विवाह का दबाव था। बच्चे छोटे थे। निराला तैयार नहीं हुए। दो-तीन बरस बाद दबाव और बढ़ा। लड़की एन्ट्रेस पास थी। निराला छब्बीस के थे। आकर्षण प्रबल था। मन डावाँ-डोल। सरोज का चेहरा सामने था। जन्म कुंडली सरोज के हाथ में दे दी। कुंडली में दो विवाह लिखे थे। बालिका सरोज ने कुंडली के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। इस तरह निराला ने अपनी शैली में भाग्य अंक को खण्डित कर दिया।2 आकर्षण पर दायित्व भारी पड़ा।
निराला का एक उपन्यास है- कुल्लीभाट। उपन्यास में कुल्ली का चरित है। निराला का अपना चरित भी आ गया है। थोड़ा कम। उपन्यास में विधुर पुरुष की मनोदशा देखी जा सकती है। निराला अत्यंत व्यथित थे। ख़ुद को संभाला। साहित्यिक कर्म में डूब गए। शोक सागर से उभर आए। ससुराल गए हुए थे। कुल्ली मिले।-
कुल्ली ने मुझे देखते हुए आवेश से पूछा, ‘‘आपने दूसरी शादी नहीं की?’’
मैंने कहा, ‘‘करने की आवश्यकता नहीं मालूम दी।’’
पूछा, ‘‘रहते किस तरह हैं?’’
उत्तर दिया, ‘‘एक विधवा जिस तरह रहती है।’’
कुल्ली, ‘‘विधवाएँ तो तरह-तरह से व्यभिचार करती हैं।’’
मैं, ‘‘तो मैं भी करता हूँगा।’’3

कुल्ली भाट वास्तविक पात्र है। उनका नाम पथवारी दीन भट्ट था। निराला उन्हें अपना मित्र मानते थे।4 कुल्ली से निराला की उक्त बातचीत संभवतः 1925 के आसपास का वाकया है। उस समय तक निराला साहित्यिक दुनिया में दाखिल हो चुके थे। उनकी बहुत-सी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी थी। उन्हीं रचनाओं में से एक रचना है- ’भारत की विधवा’। यह कविता 27 अक्तूबर, 1923 के ‘मतवाला’, साप्ताहिक, कलकत्ता में प्रकाशित हुई थी।5 कविता का ढब छायावादी है। भाषा तत्सम है। कुछ दूर तक लाक्षणिक है। भावुकता यथायोग्य है। कथ्य यथार्थ संगत है। दृष्टि विसंगति-उद्घाटक है। यथार्थ का दबाव कविता को मात्र कोरी कल्पना नहीं बनने देता। स्त्री जीवन के जटिल प्रश्न से कवि जूझता है। हालाँकि कविता सहानुभूतिजन्य लगती है। सहानुभूति से जुड़े जोखिम की ललकार भी कविता में है। आगे इस पर विशेष बात की जाएगी।
निराला रचनावली में यह कविता ‘विधवा’ शीर्षक से छपी है। कविता की पहली पंक्ति में कवि ने विधवा स्त्री को जिस उपमा से सम्बोधित किया है। वह महत्वपूर्ण है। कवि कहता है-
वह इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी6

विधवा स्त्री के व्यक्तित्व में कवि को आध्यात्मिक पवित्रता का भान होता है। क्या यह मात्र छायावादी भावुकता है? अगर निराला वस्तुतः ऐसा समझते हैं तो कुल्ली का विरोध क्यों नहीं करते! यह कविता कुल्ली से हुई बातचीत से पहले लिखी गई थी। निराला के जीवन के घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो जाता है। ‘कुल्लीभाट’ उपन्यास में भी इसके संकेत हैं। ऐसा तो नहीं हो सकता कि निराला के विचार कुल्ली से मिलने तक बदल गए हो। आखिर मामला क्या है? समाज जिसे व्यभिचारी मानता है वह कवि के लिए ‘पूजा-सी’ पवित्र क्यों है? आइए इस पर विचार करते हैं।

कुल्ली की बातचीत का संदर्भ ले तो विधुर पुरुष के लिए पुनर्विवाह करना सहज-स्वाभाविक है। ‘सरोज-स्मृति’ का संदर्भ देखे तो खुद निराला की सास उनका विवाह करवाने को तत्पर है। विधवा स्त्री को विधवा की तरह रहना होता है। इच्छा रहते हुए भी वह दूसरा विवाह नहीं कर सकती। विधुर पुरुष का दूसरा विवाह उसकी इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर है। समाज-परिवार उस पर दूसरे विवाह का दबाव बनाता है। वही समाज-परिवार विधवा बालिका-युवती-स्त्री को जबरदस्ती विधवा बनाएँ रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। इच्छा-अनिच्छा की कोई परवाह नहीं। न जाति-बिरादरी धर्म को न घर-परिवार-समाज को। उस पर तुर्रा यह है कि विधवाएँ व्यभिचार करती हैं। किसके साथ? क्यों? तथाकथित व्यभिचार की स्थितियाँ पैदा किसने की? यह प्रश्न बहुत बड़ा है। इस प्रश्न का उत्तर देना किसी पुरुष के बस की बात नहीं है। यह विषय सहानुभूति का नहीं है। स्वानुभूति का है। कुल्ली से हुई बातचीत से दशकों पहले एक स्त्री इसका जवाब दे चुकी थी। सन् 1882 में छपी पुस्तक ‘सीमन्तनी उपदेश’ में विधवा स्त्री की मनोदशा का जैसा वर्णन लेखिका ने किया है। वैसा बाद में शायद ही कोई कर पाया हो। उस समय-समाज में विधवा स्त्री के मन की दशा के बारे में लिखना साहसपूर्ण काम था। लेखिका ने अपनी बात तार्किक ढंग से रखी। निस्संकोच। निर्विकार। यथातथ्य। पुस्तक के चैदह (14) नम्बर मजमून का उनवान है- ‘जवाब एक औरत का’- जवाब देखिए।

जब परमेश्वर ने इनको (औरतों को) पैदा किया तो सब इन्द्रियाँ मर्दों के बराबर दीं। यह कुछ बात नहीं कि एक खाविंद मर जाए तो साथ सब इन्द्रियाँ अपना असर छोड़ दें। जब तक देह में दम है ये जरूर वक्त पर अपना असर करेंगी। ऐसा कोई दुनिया में पैदा नहीं हुआ जिसने इनके फै`ल को रोका हो। बड़े-बड़े महात्माओं की इन्द्रियाँ चलायमान हो गई है। फिर औरत क्या चीज़ है जो रोक सके।… ज़रा सोच के देखों तो मालूम हो कि मर्दों से सौ गुना ज्यादा सब्र इनमें हैं, मगर फिर भी यह इन्द्रियाँ अपना असर करती है। बस लाचार होकर हम बदकाम करती हैं क्योंकि दूसरी शादी हमको करने नहीं देते, उधर हमें इन्द्रियाँ चैन नहीं लेने देती। उस वक्त हमारी आँखें अंधी हो जाती हैं। नफे नुकसान की कुछ खबर नहीं रहती।… अगर इस हालत में वह अपने ज़रूरी कामों के लिए चोरी करे सो पाप नहीं।… जरा इंसाफ की नजर से देखों कि यह मुसीबतें इनसे कौन उठवाता है?7
जानबूझकर आँख मूंदे बैठे समाज के पास इंसाफ की नज़र कहाँ से आएगी। ऐसे समाज की आँख में उंगली डालकर लेखिका अपनी बात सामने लाती है। कुल्ली कहते हैं- विधवाएँ व्याभिचार करती हंै। ‘सीमन्तनी उपदेश’ का यह वाक्य इस मायने में गौरतलब है- दूसरी शादी हमको करने नहीं देते, उधर हमें इन्द्रियाँ चैन नहीं लेने देती। इसलिए लाचार होकर हम बदकाम करती हैं। लेखिका शरीर की स्वाभाविक ज़रूरत को पूरा करना ’बदकाम’ मानती हैं। कुल्ली भी इसे बदकाम कहते हैं। दोनों में फ़र्क क्या है? कुल्ली सामंती मानसिकता के चलते ऐसा सोचते हैं। ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका इसे सामाजिक विसंगति-असमानता की उपज मानती है। दूसरे विवाह की छूट हो तो तथाकथित बदकाम की नौबत नहीं आएगी।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध को भारतीय नवजागरण के रूप में जाना जाता है। उत्तर भारत में इस काल खंड को डाॅ. रामविलास शर्मा ने हिन्दी नवजागरण के रूप में पहचाना है। विधवा पुनर्विवाह पर नवजागरण काल के समाज सुधारकों ने विशेष बल दिया। विधवाओं की सामाजिक-आर्थिक दुर्दशा के मार्मिक प्रसंग भारतेन्दु मंडल के रचनाकारों के यहाँ मिल जाते हैं। व्यभिचारियों का शिकार होती विधवाओं का जि़क्र भी मिलता है।8 स्त्री यौनिकता का प्रश्न संभवतः इन रचनाकारों के चिंतन में नहीं है। लड़की के लिए विवाह की उम्र निर्धारित करते हुए ‘भाग्यवती’ उपन्यास में श्रद्धाराम फिल्लौरी यह जि़क्र ज़रूर करते हैं कि बारह वर्ष से पहले लड़की की लड़के की चाह नहीं होती।9 विधवा स्त्री की भी चाह होती है। उसका भी ‘स्वप्न’ होता है।10 इस पर भारतेन्दु युग के रचनाकार नहीं सोच पाए। जिस विषय पर तमाम ‘रैशनल’ विचारक-सुधारक नहीं सोच पाएँ। उस विषय पर एक स्त्री की बेबाक अभिव्यक्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। तथ्य शीशे की तरह साफ। आर-पार दिखता है। शब्द सीसे की तरह उबलते हुए। फ्रीज मेंटेलिटी को पिघला देते हैं। जड़ सामंती मानसिकता को झकझोरती ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका को शायद इसीलिए ‘एक अज्ञात हिन्दू औरत’ होकर रह जाना पड़ा है।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में तथा बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में विधवा पुनर्विवाह व्यापक बहस का विषय रहा है। इसके पक्ष-विपक्ष में अनेक तर्क दिए गए हैं। एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो विधवा पुनर्विवाह को ‘पाप’ समझता है। सती प्रथा पर प्रतिबन्ध के बावजूद ये वर्ग स्त्रियों के चरित्र में ‘सतीत्व’ देखने का पक्षधर है। बाल विधवाएँ जिन्होंने अपने पति का चेहरा भी नहीं देखा, उनसे आजीवन ‘सतीत्व’ की माँग करता है। विधवाओं को अकेलेपन के अंधेरे में ढकेल देता है। अपनी समझ में उन्हें अनाकर्षक बनाए रखता है। सिर मुड़वा देना। शृंगार न करने देना। रंगीन कपड़े न पहनने देना। इसी मानसिकता का प्रमाण है। हैरानी की बात यह है कि इस वर्ग में सिर्फ पुरुष ही नहीं स्त्रियाँ भी है। ऐसा सोचने वाली स्त्रियाँ निराला के समय में भी मौजूद थी। यहाँ तक कि कविता भी लिख रही थी। अक्तूबर 1923 में निराला की कविता ‘भारत की विधवा’ छपी है। अप्रैल 1923 में चाँद पत्रिका में- ‘समाज पर हिन्दू-विधवा’ शीर्षक से कविता छपी है। कवयित्री का नाम छपा है- ले. श्रीमती कृष्ण कुमारी जी बघेल। लेखिका विधवा स्त्रियों के जीवन की त्रासदी से वाकि़फ है। समाज द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों को भी जानती है। फिर भी वह विधवा पुनर्विवाह की पक्षधर नहीं है। विधवा स्त्री का वैधव्य लेखिका के लिए ऊँचे आदर्श का विषय है। कठोर सामाजिक नियमों के बंधनों को वह ढीला नहीं करना चाहती। उसका मानना है कि प्रत्येक जाति के जीवन का निश्चित उद्देश्य होता है। रीति-रिवाजों और नियमों का पालन सबको करना चाहिए। वरना समाज का सच्चा उत्कर्ष न हो पाएगा-
द्रवित हुआ है हे समाज तू,
सुन विधवाओं का क्रन्दन।
पर ढीला मत करना अपने,
नियमों का कठोर बन्धन।
देख, सम्हल! तू मत गिरने दे,
भारत के ऊँचे आदर्श।
जहाँ नहीं आदर्श वहाँ कब-
हो सकता सच्चा उत्कर्ष।11

लेखिका की भाषा पर पितृसत्तात्मक सामंती संस्कारों का असर साफ तौर पर दिखता है। सामंती समाज जिन नियम-कायदों को गढ़ता है। कालांतर में वह सामाजिक मानसिकता बन जाते हैं। जिन समाजों में सामंती स्थितियाँ दीर्घकाल तक रही हैं। उन समाजों की मानसिक बनावट कमोवेश एक जैसी हो जाती है। उन समाजों के ‘अधिकार वंचित’ वर्ग भी वैसा ही सोचने लगते हैं। अधिकार वंचित वर्ग-विशेषतः स्त्रियाँ और दलित- जब तक बना दी गई मानसिक बनावट से बाहर नहीं आते, तब तक सामंती स्थितियाँ बनी रहती हैं। सामंती समाज की सफलता और जीवन यथास्थिति बनाए रखने में है। उपर्युक्त कविता में लेखिका यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में है। कविता में एक जगह पर वह ‘इन्द्रिय सुख खोने से आस टूटने का’12 जि़क्र करती हैं। मुख्यतः लेखिका पुरुष समाज को उलाहना देना चाहती है। वासना में डूबा पुरुष समाज ‘विधवाओं के जीवन के महान गौरव’ को नहीं समझ सकता। स्त्री-यौनिकता का प्रश्न लेखिका के सामने नहीं है। तथाकथित सामाजिक आदर्श की बात वह करती है। पतित होकर कठोर पापाचार करने वाली विधवाओं का उल्लेख कविता में है। लेखिका ऐसी स्त्रियों को ‘धर्म-नीति के ज्ञान’ से रहित, ‘नारी के महान कर्तव्य’ से अनभिज्ञ मानती है।

क्या ‘सीमंतनी उपदेश’ की गूंज हिन्दी क्षेत्र में नहीं सुनी गई थी! ज्बकि हिन्दी प्रदेश के बाहर भी इस पुस्तक का असर दिखता है। पंडिता रमाबाई ने अपनी पुस्तक ‘The High Caste Hindu Women’ में इस पुस्तक का एक अंश उद्धृत किया है।13 ‘चाँद’ के जिस अंक में कृष्ण कुमारी जी बघेल की कविता छपी है। वह विधवा अंक है। इस अंक में और भी कई रचनाकारों की रचनाएँ हैं। श्रीमती विमला देवी चैधरानी का उपन्यास ‘विधवा’ शीर्षक से उन्हीं दिनों धारावाहिक रूप में छप रहा था। जनवरी 1923 के अंक में इस उपन्यास की पहली किस्त छपी थी। उपन्यास की पहली कुछ पंक्तियाँ देखिए-
अभागी विधवा हूँ। अपवित्र हूँं दुखिया हूँ, और क्रूर हिन्दू समाज की सतायी- एक अबला हूँ। मेरी जीवनी लगातार दुःखों से परिपूर्ण है।14

खुद को अभागा, अपवित्र, दुखियाँ और अबला कहकर संभवतः लेखिका पाठक वर्ग से सहानभूति चाहती है। अप्रैल, 1923 के अंक में उपन्यास का शीर्षक ‘विधवा अथवा अभागी कामिनी की आत्म-कथा’ छपा है। सम्पादकीय टिप्पणी में सम्पादक ने इस रचना को सामाजिक उपन्यास माना है।15 उपन्यास की कथा आदर्शवादी ढंग से रची गयी है। बाल विधवा कामिनी पर ससुराल में व्यभिचारिणी होने का आरोप लगता है। उसका सम्बन्ध देवर से जोड़ा जाता है। देवर ज़हर खाकर जान दे देता है। परिवार और समाज से लड़ने के बजाय अपनी पत्नी को भी विधवा की स्थिति में छोड़ जाता है। उपन्यास में लेखिका ने आंकड़े देकर यह बताया है कि विधवाओं को वेश्या बनाया जा रहा है। विधवाएँ स्वयं भी हिन्दू समाज के चंगुल से मुक्त होने के लिए वेश्यावृत्ति अपना रही हैं।

‘विधवा’ उपन्यास की तरह एक और रचना का जि़क्र मिलता है। ‘सरला-एक विधवा की आत्म जीवनी’ शीर्षक से यह रचना स्त्री-दर्पण पत्रिका में धारावाहिक रूप में छपी थी। लेखिका का नाम दुखिनीबाला छपा है। इस रचना को पुस्तकाकार रूप में छपवाने का श्रेय सुश्री प्रज्ञा पाठक को जाता है। वे इस रचना को हिंदी क्षेत्र में स्त्री-मुक्ति आंदोलन का दस्तावेज़ मानती हैं।16 पुस्तक निश्चित रूप में महत्वपूर्ण है। बाल विधवा को जिस सहूलियत के साथ मायके में रखा जाता है। उस पर विश्वास करना ज़रा कठिन है। जिस मासूमियत के साथ विधवा जीवन से सम्बन्धित सवाल पूछे गए हैं। वह हृदयद्रावक हैं। उठने-बैठने, खाने-पीने, पढ़ने-लिखने का जो सुभीता विधवा बेटी को दिया जाता है। अगर वास्तव में यह स्थिति होती तो यह आत्म जीवनी न लिखी जाती।
‘सीमन्तनी उपदेश’ के तीस-चालीस बरस बाद तक भी हिन्दी प्रदेश में विधवा स्त्री के जीवन की वास्तविक समस्याओं को लेकर कोई गंभीर रचनात्मक काम संभवतः नहीं हुआ। इस तरह की पहल के लिए चिंतन के ढाँचे में जिस टूट-फूट की ज़रूरत थी, वैसी आवश्यक टूट-फूट शायद नहीं हो पाई थी। विधवा को अभागिन मानना और विध्ुार के लिए लड़कियों की कमी न होने का भाव ‘सरला: एक विधवा की आत्मजीवनी’ तक में मौजूद है। पितृसत्तात्मक समाज, विवाह संस्था, धर्म शास्त्र के नाम पर लगाए जाने वाले तथाकथित नैतिक बंधनों को चुनौती देने की स्थितियाँ समाज में नहीं बन पा रही थी। जैसी खरी-खरी बातें ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका ने अपनी पुस्तक में कहीं हैं, वैसी चेतना बाद के रचनाकारों में नहीं है। कृष्ण कुमारी बघेल ‘सामाजिक नैतिकता और आदर्श’ के चलते विधवा पुनर्विवाह नहीं चाहती। ‘सीमन्तनी उपदेश’ के 18 नम्बर मज़मून का शीर्षक है- ‘पुरुष की हर रोज की मार खाने से रांड रहना अच्छा है। इस अध्याय का पहला वाक्य है- आजकल के जमाने में जिसका एक खाविंद मर जावे मेरी राय में उसको दूसरी शादी नहीं करनी चाहिए।17 लेखिका की यह राय किसी आदर्श या नैतिकता के कारण नहीं बल्कि जीवन की ठेठ यथार्थ स्थितियों से बनी है। शादी से होने वाली तकलीफों का जि़क्र करते हुए वे आगे कहती हैं- …शादी करने से अपने अखत्यारात दूसरे के अखत्यार में देने पड़ते हैं। …अगर इस दुनिया में कुछ खुशी है तो उन्हीं को है जो अपने तई आजाद रखते हैं। हिन्दूस्तानी औरतों को तो आजादी किसी हालत में नहीं हो सकती। बाप, भाई, बेटा, रिश्तेदार- सभी हुकूमत रखते हैं। मगर जिस क़द्र खाविंद जुल्म करता है उतना कोई नहीं करता।18 यह पंक्तियाँ सन् 1882 में लिखी गई है। इस अज्ञात हिन्दू औरत को हिन्दुस्तानी औरत की पारिवारिक वैवाहिक, सामाजिक स्थिति कितनी ज्ञात है। इन्हें किसी स्त्री-विमर्श या आंदोलन का इंतजार नहीं था। सामंती मानसिक बनावट से बाहर आने की ज़रूरत भर थी। लेखिका समझती है कि पितृसत्तात्मक सामंती समाज की हुकूमत मंे रहने वाली हिन्दुस्तानी औरत किसी हालत में आज़ाद नहीं रह सकती। उसे आजाद होने के लिए पितृसत्ता के घेरे को तोड़ना ही होगा। विवाह संस्था की अमानवीयता से वह वाकिफ है। पति के रूप में पुरुष के जुल्मों के दिल दहला देने वाले ब्योरे पुस्तक में अनेक स्थानों पर मौजूद हैं। स्त्री यौनिकता की प्रबल पक्षधर होने के बावजूद लेखिका का मानना है कि सिर्फ इन्द्रिय सुख के लिए फिर से विवाह संस्था में दाखिल होना अपने आपको दोबारा गुलाम बनाना भी है। लेकिन ‘बदमाशी’ करने की बजाय दोबारा विवाह करना लेखिका बेहतर मानती है।

पंडिता रमाबाई

इन्द्रिय सुख अथवा आकर्षण की दुर्दमनीयता को समझते हुए भी एक स्तर पर ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका इन्द्रियों पर नियंत्रण की बात करती है। पितृसत्तात्मक समाज में विवाह संस्था को वह स्त्री पराधीनता का बड़ा कारण मानती है। विवाह संस्था का विकल्प अलबत्ता वह नहीं देती। एक तरह के आदर्शवाद की ओर लेखिका बढ़ती है। यह आदर्शवाद बहुत व्यवहारिक नहीं है। हाँ, उस ज़माने में वह चुनौतीपूर्ण ज़रूर रहा होगा। विधवा स्त्री को लेखिका आज़ाद स्त्री मानती है। कहती है- बस, इस आज़ादी को गनीमत समझ अपने तन-मन-धन को पर-उपकार में लगाओ। उसमें (पुनर्विवाह में) सिर्फ एक इन्द्रिय को खुशी होगी और इसमें (पर उपहार में) अपने आत्मा को आनंद और गैरों की इन्द्रियाँ सुख पाकर आशिष देंगी।19 आत्मा के आनंद की बात करते हुए भी लेखिका जीवन के यथार्थ धरातल से जुड़ी रहती है। ‘दुखिनीबाला’ की तरह स्त्री-पुरुष की समानता की बात करते हुए स्वर्ग-नरक की फैंटेसी नहीं रचती। कृष्ण कुमारी बघेल की तरह सतीत्व के आदर्श को नहीं बखानती। वैधव्य को एक जीवन स्थिति मानती है। इस जीवन-स्थिति से जुड़ी समस्याओं को सामाजिक आचरण पद्धति की विसंगतियों से जोड़ कर देखती है। इसके लिए जि़म्मेदार सामाजिक संस्थाओं को चिन्हित करती हैं। इसलिए उसके निशाने पर पितृसत्ता, विवाह संस्था, परिवार, धर्म जैसी संस्थाएँ आ जाते हैं।

क्या निराला ने ‘सीमन्तनी उपदेश’ रचना पढ़ी थी। ‘The High Caste Hindu Women उनकी निगाह से गुज़री थी। निराला के विभिन्न विषयक निबंधो, के  सम्पादकीय टिप्पणियों को देखने से लगता है कि वह अपने समय-समाज पर पैनी दृष्टि रखते थे। सरस्वती, विशाल भारत, माधुरी, प्रभा, चाँद ही नहीं स्त्री दर्पण, गृह लक्ष्मी तथा स्त्री धर्म शिक्षक जैसी स्त्री केन्द्रित पत्रिकाएँ भी वे देखते रहे होंगे। सुश्री नीरजा माधव ने अपनी पुस्तक ’हिन्दी साहित्य का ओझल नारी इतिहास’ में छायावाद युग के आस-पास की जिन स्त्री रचनाकारों का जि़क्र किया है।20 तत्कालीन रचनाकारों की निगाह से सम्भवतः वे ओझल न रही होंगी। भारतेन्दु युग से लगातार हो रहे स्त्री सम्बन्धी लेखन से निराला वाकिफ़ रहे होंगे। विधवाओं की सामाजिक स्थिति उन्हें आंदोलित करती रही है। अपने लेखन के आंरभिक दौर में निराला विधवा-जीवन की समस्याओं को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। ‘मारवाड़ी सुधार’ मासिक कलकत्ता के फरवरी 1923 में अंक में निराला की एक कविता छपी- ‘बाबा और नाती’। उन दिनों निराला महिषादल स्टेट की नौकरी छोड़कर कलकत्ता आ चुके थे। पहले वे रामकृष्ण मिशन की पत्रिका ‘समन्वय’ से जुड़े। बाद में महादेव सेठ की पत्रिका ’मतवाला’ में आ गए। मनोहरा देवी को गए हुए चार बरस बीत चुके थे। निराला विधुर होने का अर्थ जानते थे। विधुर पुरुष और विधवा स्त्री की सामाजिक स्थिति के परस्पर अंतर को खूब पहचानते थे। तीसरी आजी की मृत्यु के बाद चैथी शादी करने को तत्पर वृद्ध बाबा के सामने काॅलेज में बी0ए0 के छात्र नाती को खड़ा कर देते हैं। बीस साल की विधवा पुत्री को ब्रह्मचारिणी बनाए रखने वाले सत्तर पार के वृद्ध पर पड़ने वाली प्रेम चांदनी की शीतलता को आंच में बदलने वाले भाव से नाती कहता है।
आस वृथा करते विवाह की, ब्याह नहीं होने दूंगा
एक बहिन को जीवनभर, सिर पीट नहीं रोने दूंगा।21

‘सरोज स्मृति’ की पंक्तियों को साक्ष्य माने तो छब्बीस बरस की आयु में निराला के लिए इंट्रेस पास अट्ठारह वर्षीय लड़की का रिश्ता आया। निराला ने सरोज का चेहरा देखा। विवाह नहीं किया। उपयुक्र्त कविता लिखते समय निराला की उम्र सत्ताईस बरस रही होगी। क्या बाबा के सामने नाती के रूप में निराला स्वयं खड़े हैं। निराला के समूचे साहित्य में शिक्षित युवक-युवतियां तथाकथित सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ते हुए देखे जा सकते हैं। बाबा को लगता है- नाती ने मरजाद धो दी है- उनकी करमगति उनसे रूठ गई है। पुरुष की सामाजिक मान्यता प्राप्त करमगति यह है कि एक के बाद एक विवाह करता चला जाए। स्त्री को सामाजिक मरजाद में बांधकर रखे। स्त्रियों के हाथ में ‘सीता’ और ‘सावित्री’ की कथाएं देकर बगल में चैरासी आसन दबाने वाले पुरुषों की नैतिकता को निराला ने ’देवी’ कहानी में उधाड़ा है।22 उसकी जड़े उनकी प्रारंभिक कविता ’बाबा और नाती’ में देखी जा सकती हैं। 1923 के ’चांद’ के विधवा अंक की रचनाएं इस भावभूमि तक नहीं पहुंच पाती हैं। ‘सरलाः एक विधवा की आत्म जीवनी’ की लेखिका दुखिनी बाला भी इस विसंगति का संकेत भर करती हंै। सरला अपनी भाभी की मृत्यु पर सियापा करने आई स्त्रियों को भाई की दूसरी शादी का लीला क्षेत्र रचते देख नाराज़ होती है। अपने स्तर पर बहिष्कार भी करती है। लेकिन डट कर सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। सरला के माँ-बाप उसके लिए सारी सुविधाएं जुटाते हैं। दूसरी शादी की बात वे नहीं करते। क्या सरला घर में रह कर बिगड़ी न होगी! उसके लिए ’बदकाम’ करने की नौबत न आयी होगी। अगर ऐसा नहीं है तो बेचैन कर देने वाली इन्द्रियों के हाथों विवश होकर ‘बदकाम’ करने वाली वे विधवा स्त्रियां कौन हैं जिनका उल्लेख ‘सीमन्तनी उपदेश’ में है। भीतर तक झकझोर देने वाले बयान देती वे विधवा स्त्रियां कौन हैं जिनका जि़क्र स्फुरणा देवी ने अपनी रचना-‘अबलाओं का इंसाफ’ में किया है।23

‘दुखिनी बाला’ सरला से कर्नल टाॅड का राजस्थान पढ़वा सकती है। स्त्री-पुरुष समानता – असमानता के सामाजिक, दार्शनिक, जैविक कारणों पर चर्चा करवा सकती है। जीवन के वास्तविक यथार्थ के नज़दीक नहीं ले जाती। सरला पति पत्नी विहीन उस समाज की कल्पना करती है जहां स्त्री-पुरुष समान हैं। लेकिन यह जगह स्वर्ग में है। दुनिया में नहीं। यहाँ प्रश्न स्त्री की मुक्ति का है। उसकी इच्छा का है। सामाजिक स्थिति का है। निसंदेह स्त्री यौनिकता का भी है। किसी रचना को कमतर या श्रेष्ठ कहने से बात नहीं बनेगी। देखना यह होगा कि कौन सी रचना ऐसी है जो भविष्य का रास्ता खोलती है। विधवा बेटी के लिए जे़वर, गहने का फि़क्र करने वाली माँ को ‘सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका कैसे फटकारती हैं। देखिए ’ माँ कहती है ‘‘भला इसने दुनिया में आकर देखा ही क्या है। हमारे आगे न पहने तो कब पहनेगी? हम पहन ओढ़ कर बैठें और यह हमारे सामने मन मार के बैठे?’’

लेखिका कहती हैं – वाह री समझ! कोई पूछे इनसे जब आप पलंग पर गर्म होती हैं उस वक्त लड़की के मन का क्या बंदोवस्त करती हो ? सच है,जेवर बिन नहीं देखी जाती ख़ाविंद ब़गैर देखी जाती है।24
यह सवाल एक स्त्री ही पूछ सकती है। पितृसत्ता में रचा-बसा दी गई स्त्री। गहने, कपड़े, श्रृंगार पिटार में उलझा दी गई स्त्री, स्त्री के पक्ष में कैसे सोच पाएगी! डाॅ0 विश्वनाथ त्रिपाठी अपने वक्तव्यों में अक्सर कहा करते हैं-क्रांतियां संतानवती होती हैं। रचनाएं भी संतानवती होती हैं। ’सीमन्तनी उपदेश’ की उपयुक्र्त पंक्तियों को निराला की कविता ‘बाबा और नाती’ की इन पंक्तियों के साथ मिलाकर पढि़ए-
बीस बरस की विधवा बेटी, ब्रह्मचारिणी बनी रहे-
जहां सत्तर पार पिता पर पड़ी प्रेम चांदनी रहे।25

संदर्भ भिन्न है। वहां मां है, यहां पिता है। काल खंड भिन्न है। सामाजिक संरचना एक ही है, पितृसत्तात्मक बनावट भी एक है। इसलिए समस्या भी एक जैसी है। समस्या पर विचार करने वाले रचनाकारों की शैलीगत भिन्नता होते हुए भी तर्क पद्धति एक जैसी है। समस्या का ट्रीटमेंट भी परस्पर काॅम्पलीमेंटरी है। ’सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका जैसी बेबाक़ी निराला में नहीं है। अलबत्ता समयानुकूल दृढ़ता और क्रांतदर्शिता निराला के यहां भी दिखती है। पितृसतात्मक समाज में पुरुष की मनमानी मान्य है। इस व्यवस्था के तमाम सामाजिक संस्थान पुरुष को ‘शक्ति सम्पन्न’ बनाते हैं। यह शक्ति केवल ‘सवर्ण’ पुरुष को दी जाती है। इस शक्ति का इस्तेमाल पुरुष-स्त्री और अवर्णों-दलितों को दबाए रखने के लिए करता है। पितृसत्तात्मक सत्ता पुरुष को जितना जन्मना ‘पुरुष’ बनाती है उससे कहीं ज़्यादा स्त्री और अवर्ण को जन्मना ‘स्त्री’ और ‘अवर्ण’ बनाती है। यह सत्ता ऐसा करने के लिए वर्ण धर्म ,रीति-रिवाज, ब्राह्यचार को सख़्ती से लागू करती है। इस समाज में रहने वाली स्त्री सिखा दी गई नैतिकता और बना दी गई मर्यादा के घेरे में बंधी रहती है। सीमोन द बोउवा की यह स्थापना की स्त्री जन्मती नहीं बनायी (गढ़ी) जाती है। बाद में आई है।26 जिन रचनाओं पर यहां चर्चा हो रही है वे पहले आ चुकी थी। इस मायने में निराला के अनेक स्त्री पात्र ’सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका के वंशज लगते हैं।
निराला के उपन्यास-कहानियों के कई स्त्री पात्र पितृसत्तात्मक सत्ता को चुनौती देते हैं। पितृसत्ता द्वारा ‘गढ़’ दी गई स्त्री की छवि से बाहर आकर अपना स्वत्व पहचानने वाली ऐसी ही एक स्त्री पात्र है-सावित्री। सावित्री निराला के उपन्यास ‘अलका’ का अत्यंत सशक्त पात्र है। सावित्री श्रृंगार नहीं करती। सुहाग चिह्न धारण नहीं करती। सुहाग चिह्नों को सौभाग्य का लक्षण मानकर धारण करने वाली स्त्रियों के लिए वह कहती है। ‘‘सुहाग प्राणों का विषय है, किसी चिह्न का धारण उसे धवल नहीं करता। दागे हुए साँड या कम्पनी विशेष के घोड़ों की तरह किसी देवता या पुरुष के नाम चढ़ जाने की मुहर लगाकर फिरना स्त्रियों के लिए सम्मान जनक कदापि नहीं हंै।’’27 सावित्री की ‘भाषा’ सीमन्तनी उपदेश की भाषा के बेहद करीब है। दोनों की भाषा पर संस्थानिक दबाव नहीं है। स्त्री के मन, उसकी इच्छा और सम्मान की बात दोनों करती हैं। हालांकि सावित्री सुहाग को प्राणों का विषय मानती है, परंतु वह स्त्री के सम्मान के साथ समझौता नहीं करती। अपनी गरिमा और पहचान वह किसी पुरुष से जोड़ने के बजाय अपने व्यक्तित्व से जोड़ती है। ‘सुकुल की बीबी’ कहानी की कुंवर, पदमा और लिली कहानी की पद्मा ‘ज्योर्तिमयी’ कहानी की ज्योर्तिमयी, अधूरे उपन्यास ‘चमेली’ की चमेली जैसे स्त्री पात्र पितृसत्तात्मक सामंती समाज से लोहा लेते हैं।

‘ज्योतिर्मयी’ कहानी में बाल-विधवा ज्योतिर्मयी और उसकी बहिन के एम0एम0 अंग्रेजी पास देवर विजय का संवाद इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है। सत्रह वर्षीय विधवा युवती विजय से विधवा विवाह पर चर्चा करती है। विजय उसे पतिव्रता स्त्रियों का आदर्श समझाता है। पतिव्रता स्त्रियों पर टिप्पणी करते हुए ज्योतिर्मयी कहती है- ‘‘मानती रहें, चूंकि आप ही लोगों ने, आप ही के बनाये हुए शास्त्रों ने जो हमारे प्रतिकूल हैं, हमें जबरन गुलाम बना रक्खा हैय कोई चारा भी तो नहीं कैसी बात है’’।विजय कहता है- ‘‘नहीं पतिव्रता पत्नी तमाम जीवन तपस्या करने के पश्चात् परलोक में अपने पति से मिलती है।’’युवती मुस्कुराती हुई बोली- ‘‘अच्छा बतलाइए तो, यदि पहले ब्याही स्त्री इसी तरह स्वर्ग में अपने पूज्यपाद पति-देवता की प्रतीक्षा करती हो, और पति देव क्रमशः दूसरी, तीसरी, चैथी पत्नियों को मार-मारकर प्रतीक्षार्थ स्वर्ग भेजते रहे, तो खुद मरकर किसके पास पहुंचेंगे? युवती खिलखिला दी।28

पितृसत्ता द्वारा गढ़े गए, स्त्री विरोधी शास्त्रों की अतार्किकता और अमानवीयता को एक साधारण पढ़ी-लिखी युवती अपने अनुभव से पलभर में षडत्रयंत्रकारी सिद्ध कर देती है। स्त्री को पतिव्रता बनाये रखने वाले पुरुष समाज को तथाकथित आदर्श, नैतिकता और परलोक के ढोंग को थोथा साबित कर देती हैं। ज्योतिर्मयी के मन में विवाह करने की इच्छा है। वह इसे स्पष्ट करने से चूकती नहीं है। विजय के प्रति अपने आकर्षण को ज्योतिर्मयी छिपाती नहीं। यही स्थिति ‘अलका’ उपन्यास की विधवा पात्र वीणा की भी है। उसके मन में भी अजित के लिए प्रबल आकर्षण हैं। वह इसका संकेत भी करती है। लेकिन निराला के यह विधवा पात्र व्यभिचार अथवा बदकाम की ओर नहीं बढ़ते हैं। सामाजिक स्थितियों के भीतर अपने लिए सम्मानजनक राह तलाशते हैं। ज्योतिर्मयी विजय से विवाह करना चाहती है। विजय सामाजिक दबाव के चलते तैयार नहीं होता। निराला दूसरा रास्ता निकालते हैं। धोखे से ब्याह करवा देते हैं। कहानी न तो विधवा जीवन की समस्याओं का समाधान देती है। समाज के लिए कोई सार्थक संदेश भी कहानी में नहीं हैं। जैसे को तैसा भावबोध नहीं होता। अलबत्ता बदले की भावना बनकर रह जाता है। ज्योतिर्मयी की तरह विजय भी यदि पितृसत्ता की विसंगतियों को चुनौती देता तो कहानी अपने उद्ेश्य में ज़्यादा सफल होती। यह महत्वपूर्ण है कि निराला विधवा युवती की मनस्थिति को समझने में सफल रहे हैं। यही स्थिति ‘अलका’ उपन्यास की वीणा की भी है। निराला लिखते हैं-‘क्या विधवा-जैसी दुखी विधाता की दूसरी भी सृष्टि होगी, जो सखियों में भी खुले प्राणों से बातचीत नहीं कर सकती। भोग सुखवाले संसार के बीच में रहकर भी भोग सुख से जिसे विरत रहना पड़ता ह,ै आँख के रहते भी जिसे चिरकाल तक दृष्टिहीन होकर रहना पड़ता है।29

भोग-सुख वाले संसार से विरत कर दी गई विधवा युवती की मनोदशा को निराला ने उपन्यास में रेखांकित किया है। अपने मन-प्राण की बात किसी से न कहने वाली असहाय युवती के मन की करुण पुकार अजित सुन लेता है। किसी अनावश्यक सामाजिक दबाव को न मानने वाला क्रांतिकारी युवक विधवा युवती के सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है। वीणा सहज ही तैयार हो जाती है। पितृसत्तात्मक सामंती मानसिकता में रहने वाली विधवा युवती के लिए अपमान उपेक्षा, दःुख-तकलीफ और बंधनों के अलावा कुछ नहीं है। इन स्थितियों में रहती स्त्री ‘बदकाम’ और ‘व्यभिचार’ का जोखिम तो उठा लेती है। पितृसत्ता को चुनौती देकर अपनी सामाजिक स्थिति नहीं बदल पाती। पितृसत्ता प्रदत्त मानसिकता से बाहर आकर ही स्त्री पुरुष परस्पर एक-दूसरे के लिए सखा – सहायक और आत्मीय हो सकते हैं। अजित और वीणा का संबंध ऐसा ही है। पितृसत्ता द्वारा निर्धारित ‘मरजाद’ का पालन करती स्त्री ’सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका के अनुसार बेचैन इन्द्रियों के दबाव में ‘बदकाम’ की ओर बढ़ती है या फिर स्फुरण देवी की रचना ‘अबलाओं का इंसाफ’ में बयान दर्ज करवाती ‘व्यभिचारी’ स्त्री बनती है।

निराला ने इस अंतर को साफतौर पर समझा था। देह सुख के लिए अपने सम्मान से समझौता करने वाली विधवा स्त्रियों का उल्लेख उनके साहित्य में है। अधूरे उपन्यास ‘चमेली’ में ऐसी स्त्रियों को देखा जा सकता है। पं0 शिवराम दत्त के परिवार में दो विधवा स्त्रियां हैं। उसके छोटे भाई की पत्नी (भैहू) और बहिन। भैहू का सम्बन्ध जेठ से है। बहन का संबंध गांव के पुरुष खोदाया बिसाते से है। पितृसत्तात्मक सामंती मानसिकता की ‘मरजाद’ का रूप जेठ और भैहू के संवाद में देखिए-‘‘सुनो’’, पण्डित जी ने आदर से कहा। भैहू एक कदम बढ़कर बिल्कुल सटकर जैसी खड़ी हुई। ‘‘वह दवा जो तुम्हें दी थी, इसे भी पिला दो।’’ ‘‘तुम निरे वह हो’’, जेठ की छाती पर धक्का मारकर भैहू ने कहा, ‘‘बाम्हन ठाकुरों के यहाँ कोई बेवा वह दवा खिलाये बिना रखी भी जाती है? वह गावदी होगा जो रक्खेगा। एक-आध हमल रह जाता है, लापरवाही से । यह वह सब कर चुकी है।’’30 यह है पितृसत्ता का असली चेहरा। पुरुष और स्त्री की मानसिक बनावट ऐसी है कि उनके खाने और दिखाने के दाँत अलग-अलग हैं। बिना स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ के कुछ न पाने वाले पण्डित जी के ‘संयम’ का असली रूप उपयुकर््त पंक्तियों में देखिए। अवध के इस ब्राह्मण देवता ने ‘रामचरित मानस’ तो अवश्य पढ़ा होगा। तुलसी की यह पंक्तियां कद्ाचित उसे याद नहीं रही होंगी।
अनुज वधू भगनि सुतनारी
सुन सठ् कन्या सम एहचारी।31

स्त्री को भोग की वस्तु समझने वाला सामंती समाज इन पंक्तियों का पाठ सैकड़ों दफा करेगा। आचरण में कभी नहीं लाएगा। पितृसत्तात्मक सामंती समाज के आचरण के इस दोगलेपन को निराला जानते थे। सामाजिक बदलाव के पक्षधर निराला के युवा स्त्री-पुरुष पात्र इसलिए थोप दी गई नैतिकता, आदर्श और परम्परागत जीवन पद्धति को स्वीकार नहीं करते। अपने व्यवहार से वे न केवल नई जीवन पद्धति को प्रस्तावित करते हैं बल्कि नई सामाजिक संरचना का भी आह्वान करते हैं। उनके लिए जीवन स्थितियां सामाजिक संस्थानों की परिणित है न कि भाग्य-नियति अथवा शास्त्र का परिणाम। इसलिए वे सामाजिक संस्थाओं के रद्दो-बदल में यकीन रखते हैं। भौतिक-सामाजिक स्थितियों को जीवन स्थितियों का कारण मानने की वजह से निराला के साहित्य का मिज़ाज अपने समय के साहित्य से थोड़ा अलग हो जाता है। कृष्ण कुमारी बघेल, विमला देवी चैधरानी, दुखिनीबाला या स्फुरणा देवी की तरह वे नहीं सोच पाते। ’सीमन्तनी उपदेश’ की लेखिका एक अज्ञात हिन्दू औरत की तरह निराला पितृसत्तात्मक सामंती समाज के अत्याचारों की शिकार स्त्री की मानसिक और भावनात्मक दशा को समझने की कोशिश करते हैं। संभवतः इसलिए उनके यहां ज्योतिर्मयी और वीणा जैसे पात्र हैं और ‘विधवा’ जैसी कविता है।

निराला विधवा स्त्री के बारे में क्या सोचते थे ? उसकी मनोदशा को कैसे समझते थे? यह जानने के लिए ‘विधवा’ अथवा ‘भारत की विधवा’ कविता का एक नज़दीकी पाठ करने का प्रयास यहां किया जाएगा। इसी क्रम में उनके साहित्य में विधवा जीवन संबंधी संदर्भ आएं हैं-उनका भी जि़क्र करने की कोशिश की जाएगी। सुविधा के लिए कविता को कुछ हिस्सों में विभाजित करके समझने की ज़रूरत है। आइए पहला हिस्सा देखते हैं-
वह इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी
वह दीपशिखा-सी शान्त, भाव में लीन
वह क्रूर काल-ताण्डव की स्मृति-रेखा-सी
वह टूटे तरु की छुटी लता सी दीन-
दलित भारत की ही विधवा है।32
पहले हिस्से में निराला विधवा स्त्री का परिचय पाठक से करवाते हैं। यह परिचय उनके समकालीन तथा पूर्व साहित्य में उल्लिखित विधवा स्त्री की छवि से भिन्न है। इस भिन्नता का कारण है कवि का नज़रिया। विधवा स्त्री की पारिवारिक और सामाजिक दशा की पड़ताल निराला यथार्थपरक स्तर पर करते हैं। स्त्री के विधवा-जीवन के लिए जिन पारिवारिक, सामाजिक, नैतिक तथा शास्त्रगत आदर्शें की दुहाई दी जाती है वे निराला की चिंता का विषय नहीं है। उनकी चिंता का मुख्य विषय है-विधवा स्त्री की जीवन-स्थितियाँ, मनोदशा, इच्छाएं और सबसे बढ़कर उसके सपने। निराला की यह चिंता उनके चिंतन से प्रभावित है। वे विधवा स्त्री की जीवन स्थितियों को नियति से जोड़कर नहीं देखते। जीवन की अन्य स्थितियों की तरह इसे भी एक स्थिति मानते हैं। इस स्थिति की कवि अपरिवर्तनीय नहीं मानता। स्थिति की कष्टमयता से वह अनुभव के स्तर पर वाकिफ़ हैं। कष्ट में पड़े मनुष्य को जिस भावनात्मक-मानवीय सरोकार की ज़रूरत होती है, कवि उस सरोकार के लिए समाज का आह्वान करता है। विधवा स्त्री को परंपरागत नज़रिए से देखने वाले समाज के सामने कवि उपमाओं की झड़ी लगा देता है। ऐसी उपमाएं जो विधवा स्त्री के लिए कभी इस्तेमाल नहीं की जाती थी। उपर्युक्त पंक्तियों पर ध्यान दीजिए पांच में से चार पंक्तियों में ‘सी’ शब्द का प्रयोग किया गया है। क्यों? क्योंकि कवि समाज को बताना चाहता है कि विधवा स्त्री वैसी नहीं है, जैसी आप समझते हैं। उसे किस रूप में देखना चाहिए यह कविता में प्रस्तावित है।

परम्पराग्रस्त नज़रिया प्रस्तावित नवाचार को अमूमन स्वीकार नहीं करता। इसलिए कवि उपमाओं के लिए प्रयुक्त प्रतीकों के पीछे की जीवनगत बिम्बमाला को भी कविता में लाता है। अपने तई कवि विधवा स्त्री के जीवन विम्बों के लिए जिन उपमागत प्रतीकों को कविता में सिरजता है, उनकी वास्तविकता को जानता-मानता भी है। इसलिए पाँचवी पंक्ति में निश्चयात्मक शब्द ‘ही’ का प्रयोग करता है। इस प्रयोग से कवि स्पष्ट कर देता है कि विधवा स्त्री को किस रूप में देखना होगा। ’ही’ का प्रयोग एक तरफ नवाचार का दबाव बनाता है, वहीं दूसरी तरफ कविता में अनुपस्थित परम्परागत सामाजिक दृष्टि को गतकालिक भी बनाता है। जैसे परम्परागत दृष्टि से विधवा स्त्री को देखने वाला समाज उसे अपवित्र-अभागी-अशुभ आदि न जाने क्या-क्या कहेगा। कविता इस दृष्टि को अपदस्थ करती है। परम्परागत दृष्टि सिद्ध गणितीय समीकरण से विधवा को अशुभ मानती है। जैसे वर्ण विशेष में जन्म लेते ही वर्णगत संस्कार मनुष्य में खुद-ब-खुद आ जाते हंै। वैसे स्त्री के विधवा होते ही वह अपने आप अशुभ-अभागी हो जाती है। ‘सरला’, एक विधवा की आत्म जीवनी’ में दुःखिनीबाला ने इस परम्परागत सामाजिक दृष्टि को दिखाया है। विधवा होने पर सरला को ससुराल में कैसे अनुभव होते हैं- देखिए – ‘‘उस दिन पहिले-पहिल यह मालूम हुआ कि विधवा का अर्थ कुलक्षिनी है, अभागिनी है।३विधवा होने से पहले मैंने ये शब्द कभी नहीं सुने थे। मेरे बाबू जी कभी कभी मुझे ‘आओ लक्ष्मी’ कहकर बैठाते थे किंतु अब मैं कुलक्षिनी हूं, अभागिनी हूं। मैं सब तरह से वही हूँ,वैसी ही हूँ, मेरे शरीर में , मेरी शक्तियों में, मेरी मस्तिष्क में बिना किसी प्रकार के अंतर हुए ही केवल मात्र विधवा होने से मैं कुलक्षिनी और अभागिनी
हो गई’’33

विधवा स्त्री की जीवन स्थिति से निर्धारित जीवन दशा को दःुखिनीबाला अस्वीकार करती है। निराला भी इसे नहीं मानते। जीवन स्थिति और जीवन दशा के बीच से परम्परागत दृष्टि को हटाकर निराला वहां मानवीय दृष्टि को रख देते हैं। इसलिए उनकी कविता में विधवा, कुलक्षिनी-अभागिनी नहीं बल्कि पवित्रतम है। कवि उसे इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी कहता है। जिस समाज में विधवा स्त्री को व्यभिचारी समझा जाता है। तथाकथित रूप में व्यभिचारी बनाया जाता है। उस समाज में विधवा के लिए ‘पूजा-सी’ सम्बोधन चुनौती की तरह है। सामंती मानसिकता के लोग मांगलिक एवं शुभ कामों में विधवा स्त्री की छाया भी नहीं पड़ने देते थे। निराला उस समाज के मंगलतम-पवित्रतम कार्यकलाप के साथ विधवा स्त्री की छवि जोड़ देते हैं। ऐसा करना या कहना कोई बहुत व्यावहारिक स्थिति नहीं है। निराला उसे ‘दीपशिखा- सी शांत भाव में लीन’ रूप में भी देखते हंै। ‘दीप-शिखा’ प्रतीक अपने आप में महत्वपूर्ण है। दीपक की लौ अपने को दग्ध करके दूसरों को आलोकित करती है। इस क्रम में वह स्वयं निरंतर नष्ट होती है। इतने पर भी वह शांत है। अकम्प है। बिना विचलित हुए जल रही है। यह विधवा स्त्री के संयम-धैर्य और त्याग का प्रतीक रूपक है। वह अपने आप में सिमटी है। जिस मनःस्थिति में समाज ने पहुंचा दिया है। उसी भाव में लीन है। शिकायत नहीं। विद्रोह नहीं। छटपटाहट भी नहीं। तीसरी पंक्ति में निराला स्पष्ट करते हैं कि वह ऐसी क्यों हंै। निराला लिखते हैं -‘वह क्रूरकाल-ताण्डव की स्मृति रेखा सी’ है। काल ने क्रूरता पूर्वक जो ताण्डव किया है स्त्री का वैधव्य उसका परिणाम है। उसकी स्मृति है। अब काल का ताण्डव नहीं है। उसका परिणाम लेकिन है। काल मायने क्या? समय! महाकाल! जहां तक ताण्डव का प्रश्न है, वह तो महाकाल शिव से जुड़ा है। कल्याणकारी शिव से नहीं प्रलयंकर शिव से जुड़ा नृत्य। कविता में काल शिवत्व से जुड़ा नहीं है। यहां उसका विशेषण ‘क्रूर’ है। ‘काल’ यहां दार्शनिक-आध्यात्मिक अर्थ नहीं देगा। विधवा स्त्री की जीवन स्थिति के संदर्भ में काल की क्रूरता का मौलिक अर्थ होगा। सामाजिक स्थितियों में काल की क्रूरता सामाजिक आचरण में खुलनी चाहिए।
निराला की इस कविता के बाईस बरस बाद शमशेर ने एक कविता लिखी-’बात-बोलेगी’। कविता में उन्होंने काल को भीषण विशेषण दिया। काल की भीषणता के कारण स्थितियां क्रूर हो जाती हैं। सोचने समझने की क्षमता समाप्त हो जाती है। बुद्धि कंगाल हो जाती है। नतीजा घर भर मजूर हो जाता है। पंक्तियां देखिए-
दैन्य दानव; काल
भीषण; क्रूर
स्थिति; कंगाल
बुद्धि; घर मजूर।34

इस कविता में भी काल की भीषणता सामाजिक स्थितियों में खुलती है। विधवा कविता में ‘क्रूर काल का ताण्डव’ पितृसत्तात्मक सामंती समाज का विशिष्ट आचरण है। स्थिति विशेष में यह मनुष्य के जीवन पर इस कदर हावी होता है कि जीना मुहाल हो जाता है। वर्तमान समाज में खाप पंचायत की गतिविधियों पर ध्यान दीजिएा। बात स्पष्ट हो जाएगी। होना तो यह चाहिए कि किसी टूटे हुए पेड़ की छुटी हुई लता की तरह बेसहारा विधवा स्त्री को सहारा दिया जाए। होता उल्टा है। उस पर तरह-तरह के अत्याचार किए जाते हैं। वैधव्य यदि नियति के संदर्भ में काल की क्रूरता का परिणाम है तो उसकी निरंतरता सामंती समाज बनाए रखेगा। अगर वैधव्य एक जीवन-स्थिति है तो उसे बदलना चाहिए। क्योंकि प्रत्येक जीवन स्थिति कालांतर में बदल जाती है। काल की क्रूरता के बावजूद खुद को दीप-शिखा सी शांत और भाव में लीन बनाए रखने वाली विधवा स्त्री निराला को इष्टदेव के मन्दिर की पूजा सी लगती है। कवि समूचे समाज का ध्यान इस स्त्री की जीवन दशा की ओर खींचना चाहता है। ‘जागो फिर एक बार’ कविता में ‘कालचक्र’ में दबे भारतीय समाज को जाग्रत करते हुए मुक्त होने का संदेश निराला देते हैं।35 वैसे ही यहां वे क्रूर काल ताण्डव की शिकार विधवा स्त्री की मुक्ति की बात करते हैं। ‘दलित भारत’ वस्तुतः पराधीन भारत है। पराधीन भारत को मुक्त करवाने के लिए स्वाधीनता आंदोलन चाहिए। पराधीन स्त्री को मुक्त करवाने के लिए सामाजिक आंदोलन चाहिए। विधवा कविता इसी समाजिक आंदोलन की एक कड़ी है।
आइए दूसरे हिस्से पर बात करते हैंः-
षड्-ऋतुओं का श्रृंगार,
कुसमित कानन में नीरव-पद-संचार,
अमर कल्पना में स्वच्छंद विहार-
व्यथा की भूली हुई कथा है,
उसका एक स्वप्न अथवा है।36

इन पंक्तियों के माध्यम से निराला समाज को यह अहसास दिलाना चाहते हैं कि विधवा स्त्री का भी कोई स्वप्न हो सकता है। पति के न रहने का दुःख पत्नी के लिए निश्चित रूप में बहुत बड़ा होता होगा। एकबारगी लगता होगा कि जीवन समाप्त हो गया है। जीवन में अब कुछ नहीं बचा। लेकिन यह मनःस्थिति है -वस्तु स्थिति नहीं। पितृसत्तात्मक सामंती समाज इसी मनः स्थिति में स्त्री को हमेशा बने रहने के लिए बाध्य करता है। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि कोई भी मनःस्थिति हमेशा के लिए नहीं बनी रह सकती। कोई भी मनुष्य न तो हमेशा खुश रह सकता है और न ही परेशान या दुःखी। समय के अंतराल पर बड़े से बड़े दुःख भूल जाते हैं या उनकी तीव्रता कम हो जाती है। धनीभूत दुःख से उपजा भावावेग सहज जीवन व्यापार को खण्डित कर देता है। स्थगित कर देता है। भावावेग कम होते ही जीवन व्यापार फिर से अपनी पुरानी चाल में आ जाता है। हू-ब-हू वैसा न भी हो तो लगभग वैसा तो होता ही है। इस स्थिति को न समझने वाला समाज विधवा स्त्री-युवती-किशोरी को हर प्रकार के बंधन में बांधे रखना चाहता हैं। उसे जीवन की तमाम सुख सुविधाओं से वंचित रखना चाहता है। कपड़े-लत्ते,गहने-जेवर तो दूर खाने-पीने, हंसने-बोलने-बतियाने की भी मनाही रहती है। जीवन जगत से संबंध बनाने वाली ज्ञानेन्द्रियों पर भी सामंती समाज पहरा बिठा देता है। रूप-रस-गंध स्पर्श के बिना कोई कैसे जी सकता है। इनके आकर्षण से कोई कैसे बच सकता है। संभवतः इसलिए सामंती समाज का सौन्दर्य-बोध उपभोग मूलक और कुंठाग्रस्त होता है। स्त्री और पुरुष के लिए सामाजिक कायदे मुख़्तलिफ़ होते हैं। पुरुष समाज स्त्री की मनःस्थिति को समझ नहीं पाता। समझना नहीं चाहता। ऐसा समाज आचारण को संचालित करने वाले कायदों से मनोविकारों को भी नियंत्रित करने लगता है। मनोविकारों की स्वभाविकता, सहजता और स्वतः स्फूर्तता को नहीं समझ पाता। मनः स्थिति और वस्तुस्थिति के द्वैत अथवा विषमता से निर्मित आचरण को यह समाज अनैतिक मानता है। मनःस्थिति के अनुकूल वस्तुस्थिति यह समाज बनने नहीं देता। बेचैन इन्द्रियों के हाथों लाचार स्त्री के आचरण को ‘बदकाम’ कहेगा। उसे दूसरा विवाह नहीं करने देगा। बात यही तक नहीं है। अगर विधवा स्त्री ने मनमर्जी माफिक कपड़ा पहन लिया। हंस-बोल लिया। तब भी उसकी खैर नहीं। महादेवी वर्मा का एक रेखाचित्र-’भाभी’- इस मायने में बहुत महत्वूपर्ण है। उन्नीस वर्षीय विधवा मारवाड़ी युवती की मनःस्थिति और वस्तुस्थिति का अत्यंत मार्मिक और दिल दहला देने वाला वर्णन महादेवी वर्मा ने किया है। रंगों पर प्राण देने वाली विधवा युवती आठ वर्षीय बालिका के साथ गुड्डे-गुडि़या का खेल-खेलती है। गुड्डे-गुडि़या का श्रृंगार पिटार करती है। काला लहंगा और सफेद ओढ़नी पहनने को अभिशप्त युवती को वह एक रोज़ अनायास रंगीन ओढ़नी ओढ़ा देती है तो वह कितनी प्रसन्न होती है- देखिए… दबे पांव जाक़र मैंने उस ओढ़नी को खोलकर उसके सिर पर डाल दिया, वह हड़बड़ा कर उठ बैठी। रंगों पर उसके प्राण जाते ही थे…. आश्चर्य नहीं कि वह क्षण भर के लिए अपनी उसी स्थिति को भूल गयी, जिसमें उसके लिए रंगीन वस्त्र वर्जित थे और नये खिलौने से प्रसन्न बालिका के समान, एक बेसुधपन में उसे ओढ़, मेरी ठुड्डी पकड़कर खिलाखिला पड़ी।37

रंगीन कपड़ा और खिलखिलाहट ही उसके लिए ‘बदकाम’ बन जाते हैं। ससुर और ननद की क्रूरता का तांडव उस युवती को झेलना पड़ता है। अपनी विवाहिता बेटी के लिए रंगीन घाघरे-ओढ़नी लाने वाला पिता पुत्रवधू को रंगीन कपड़े पहने देख क्रोध से कांपने लगता है। लगभग हम उम्र ननद-भाभी की इच्छाएं भी एक होगी। इस ओर ससुर का ध्यान नहीं जाता। पितृसत्तात्मक समाज की व्यवहार बुद्धि इसी तरह मनःस्थिति और वस्तुस्थिति में द्वैत उत्पन्न करती है। विधवा होने मात्र से रंगों के प्रति आकर्षण अपने आप खत्म हो जाना चाहिए। जीवन के प्रति किसी तरह का आकर्षण नहीं होना चाहिए। निराला और महादेवी वर्मा, दोनों ही ऐसा नहीं मानते। निराला के कथा साहित्य में आए विधवा पात्र अपने मन की इच्छा व्यक्त करने का साहस करते हैं। निराला यह स्पष्ट करते हैं कि पितृसत्तात्मक सामंती समाज प्रदत मानसिकता में जीने वाले पात्र ऐसा नहीं कर पाते। ऐसे पात्र उनके कथा साहित्य में भी ‘बदकाम’ करते पाए जाते हैं। अधूरे उपन्यास चमेली के संदर्भ में ऊपर ऐसे पात्रों का जि़क्र आया है। दूसरी तरफ सामंती समाज को चुनौती देने वाले पात्र अपने जीवन केा नया रूप देते हैं। ‘ज्योतिर्मयी’ कहानी का उल्लेख हो चुका है। ‘अलका’ उपन्यास के एक पात्र वीणा के मन में उठने वाली भावनाओं पर ध्यान दीजिए । विधवा वीणा अजित के प्रति आकर्षित है। अजित पढ़ा-लिखा आधुनिक युवक है। सामंती समाज की रिवायतों को नहीं मानता है। भोग-सुखवाले संसार में भोग सुख से वंचित वीणा को मन की भावना को समझता है। वीणा का वैधव्य अजित के मन में उठने वाली कोमल भावनाओं के आड़े नहीं आता । यही स्थिति वीणा की भी है। ‘अलका’ उपन्यास की निम्न पंक्तियां इस संदर्भ में विशेष रूप से दृष्टव्य हंै – ’’कैसे दो परस्पर विरोधी संग्राम वीणा के जीवन में छिड़े हैं। एक ओर तो मरूस्थल के पथिक का सा चित्त सदैव व्याकुल है, दूसरी ओर उसके जीवन की अदृश अप्सरा अपनी सोलहों कलाओं से विकसित, उसके हृदय के तारों को खींच-खींचकर चढ़ा रही है, प्रति-जीवन की रंगभूमि में जैसे मृदु चरण उतरकर अपनी वासना-विह्वल नई रागिनी गाया करती है, गाना चाहती हैय यह ज्ञान नहीं कि यह विधवा है इसके उज्ज्वल वस्त्र पर काले छींटे पड़ेंगे-जीवों को साँस-साँस पर पैदा हुई प्राण-प्रियता में बांधकर चिर-अधीन कर रखने वाली प्रकृति देह की विटपी को वासन्तिक पृथुल पल्लव-भार, सुमनाभरण सौरभमद से भर रही है।38

उपर्युक्त पंक्तियों में उल्लिखित वीणा के जीवन का परस्पर विरोध संग्राम दरअसल पितृसत्तात्मक सामंती समाज द्वारा निर्धारित जीवन आचारण तथा आलम्बनगत जीवन स्थितियों से उद्दीप्त मनोविकारों का द्वंद है। समाज विधवा वीणा को जीवनभर मरूस्थल में व्याकुल पथिक सा प्यासा रखना चाहता है। जबकि वीणा सामने बहते मीठे जल के सोते का ठंडा पानी छककर पीना चाहती है। ‘जीवन की अदृश्य अप्सरा’ मन के भीतर का सुंदर है, शुभ है, कल्पना है, इच्छा है। इसी अप्सरा को निराला ने कविता में ‘अमर कल्पना’ में ‘स्व्छंद विहार’ लिखा है। समाज आचरण-स्वभाव को कर्तव्यरूढ़ बनाना चाहता है। ‘अप्सरा’ आचरण-स्वभाव को आदिम प्रवृत्तियों के अनुकूल संचालित करना चाहती है। इसलिए निराला ने कविता में लिखा है- उसका एक स्वप्न अथवा है – यह अप्सरा सोलहों कला सम्पूर्ण है। कहने का तरीका अलग है, लेकिन बात निराला ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका जैसी ही कह रहे हैं। अप्सरा के सोलह कला सम्पूर्ण होने का अर्थ जीवन के प्रति भरपूर आकर्षण है। समाज धर्म होता है। मानव धर्म होता है। मन और देह का भी धर्म होता है। और धर्मों की तरह मन और देह धर्म को निभाना ज़रूरी होता है। सामंती समाज की यह ख़ास पहचान होती है कि वह स्त्री को मन और देह के धर्म से हमेशा विमुख रखना चाहता है। निराला स्पष्ट करते हैं कि मन और देह का स्वाभाविक धर्म तथाकथित सामाजिक धर्म को नहीं मानता। तभी तो विधवा वीणा के भीतर की ‘अदृश्य अप्सरा’ उसके लिए प्रति-जीवन का सृजन कर रही है। विधवा जीवन के समानान्तर इच्छित नया जीवन ही ‘प्रति-जीवन’ ह’ै। ‘अप्सरा’ वीणा को जीवन की ‘वासना विह्वल’ रागिनी सुनाना चाहती है। वह इस बात की परवाह नहीं करती कि वीणा विधवा है। उसका सामाजिक अपयश होगा। ‘वासना’ मायने उद्वाम-तीव्रतर इच्छा। ‘विह्वल’ मायने बैचैनी। अर्थात बेचैन कर देने वाली तीव्रतर इच्छाएँ। अब इसे ‘सीमंतनी उपदेश’ की इस पंक्ति से जोड़कर देखिए- दूसरी शादी हमको करने नहीं देते, उधर इन्द्रियां हमें चैन नहीं लेने देती। निराला लेखिका जैसी बेबाकी नहीं ला पाते। अलबत्ता उज्ज्वल वस्त्रों पर काले छींटे डालने वाले समाज की थोथी मानसिकता को उजागर कर देते हैं। यह समाज विधवा स्त्री की मनःस्थिति नहीं समझता इसलिए निराला ने कविता में लिखा है-‘व्यथा की भूली हुई कथा है’।

वीणा के संदर्भ में निराला जि़क्र करते हैं-प्रकृति अर्थात् अपने आकर्षण में बांधकर मनुष्य को चिर-अधीन रखने वाली आदिम प्रवृत्तियां ;(Basic
Instincts)  वीणा की देहलता को वासन्तिक पृथल-पल्लव-भार-सुमनाभरण-सौरभमद से भर रही है। कविता में उल्लिखित पंक्ति षड् ऋतुओं का श्रृंगार, कुसमित कानन में नीरव पद संचार का अर्थ यही है। आदिम प्रवृतियों को सामाजिक विकास से संस्कारित तो किया जा सकता है। सामाजिक नियमों से उन्हें संचालित नहीं किया जा सकता। निराला लिखते हैं- ‘‘मनुष्यों के कानून का कोई मूल्य होता, यदि वह पूर्ण के लिए पूर्ण कुछ होता, तो प्रकृति भी मार्यादा को मानकर उसके सामने आंखे झुकाकर चलती।39 पितृसत्तात्मक समाज में एकांगी दृष्टिकोण से बनायी गयी मर्यादाएं ‘पूर्ण’ नहीं हो सकती। स्त्री मन और देह धर्म के लिए वहां कोई स्वप्न नहीं है। हर प्रकार से कुंठित स्त्री इस समाज को मंजूर है। अपनी इच्छाओं के अनुरूप जीने वाली सहज मानवी स्वीकार नहीं। निराला की कविता ‘विधवा’ स्त्री की भुला दी गई व्यथा की कथा कहती है।

ज्योतिर्मयी के मन में विजय के लिए आकर्षण, वीण का अजित के प्रति कोमल भाव दिखा कर निराला दरअसल सामाजिक मर्यादा के बरक्स सहज  मानवीय भावनाओं को तरजीह देते हैं। सामाजिक सांस्कृतिक विकास के दौरान अस्तित्व में आने वाले संस्थानों की भी पड़ताल करते हैं। धर्म, परिवार, विवाह जैसी संस्थाएं मनुष्य के जीवन में व्यवस्था तो लाते हैं लेकिन कहीं न कहीं उसके मन और भावनाओं की व्यवस्था को विश्रृंखल भी करते हैं। ‘ज्योतिर्मयी’ कहानी में विजय से तर्क करती हुई ज्योतिर्मयी को विजय कहता है-
‘‘मैं इतना ही कहता हूं, आपके विचार समाज के तिनके के लिए आग है’’।’ ज्योतिर्मयी का जवाब देखिए-
‘‘लेकिन मेरे भी हृदय के मोम के पुतले को गलाकर बहा देने, मुझसे जुदा कर देने के लिए समाज आग है, साथ-साथ यह भी कहिए।’’40

पितृसत्तात्मक समाज स्त्री के हृदय को उससे अलग कर देता है। उसे शरीर मात्र रहने देते हैं। शरीर भी केवल अपने उपभोग के लिए बस। सम्वेदना-भावनाओं का संस्थानीकरण कर दिया जाता है। निराला की रचनाएं भावनाओं के संस्थानीकरण का विरोध करती है। मानव मन की सहज-स्वाभाविक प्रवृतियों का समर्थन-संस्थापन करती है। अजित के लिए वीणा के मन में उत्पन्न भावनाओं को निराला ने ’उत्सव’ कहा है। वीणा के मन को वे ’चिर अभ्यासी रुचिर मन’ कहते हैं। ’’चिर अभ्यास में बंधा वीणा का रुचिर मन भीतर के इस अपार उत्सव में इसलिए आप ही आप सम्मिलित हो जाता है, जब कि यह मन की ही एक स्वतंत्र रचना है, जहां वीणा को उसने संसार के यज्ञ में श्रेष्ठ भाग लेने के योग्य बना दिया।’’41 चिर अभ्यास में बंधा रुचिर मन’ सहजात आदिम प्रवृतियों की निरंतरता है। यह निरंतरता सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थानों की बाध्यताओं के बावजूद मौजूद रहती है। निराला अपने लेखन में स्त्री के इस ‘रुचिर मन’ को नज़रअंदाज नहीं करते। ‘विधवा’ कविता में ‘अमर कल्पना में स्वच्छंद विहार’ इसी तरह से संभव है। विधवा स्त्री के लिए षड्ऋतुओं का कोई अर्थ समाज भले ही न मानता हो। स्त्री के लिए तो उनका अर्थ होता ही है। षड्ऋतुओं से संबंध मनोविकार तो उदित होते ही हैं। मन अपने वांछित (कल्पना) लोक में स्वच्छंद विचरण करना चाहता ही है। नव अनुरागिनी राधा की तरह मन कोई बाधा नहीं मानना चाहता। कविता में इस स्थिति को स्पष्ट करने के बाद निराला समाज को इस ‘व्यथा’ पर विचार करने के लिए कहते हैं। यह ‘व्यथा’ समाज की देन है। इसका निराकरण भी समाज द्वारा संभव है। जब समाज इस व्यथा को समझ जाएगा। विधवा स्त्री की मनःस्थ्तिि को भाँप लेगा तो उसे समझ आयेगा कि इसका भी कोई स्वप्न है। इच्छा है। इसके भीतर भी कामनाएं हैं।

कविता के पहले दो हिस्सों में विधवा स्त्री की मनःस्थिति का सघन ब्योरा है। बाक़ी हिस्सों में निराला विधवा स्त्री की वस्तुस्थिति का मार्मिक उल्लेख करते हैं। तीसरा हिस्सा देखिए-
उसके मधु-सुहाग का दर्पण,
जिसमें देखा था उसने
बस एक बार बिम्बित अपना जीवन धन,
अबल हाथों का एक सहारा-
लक्ष्य जीवन का प्यारा वह धुव्रतारा।
दूर हुआ वह बहा रहा है
उस अनन्त पथ से करुणा की धारा।42

ऐसा लगता है कि निराला ने किसी विधवा युवती को ध्यान में रखकर यह कविता लिखी है। कविता में युवती के जीवन की समस्याओं का ट्रीटमेंट उसे किसी एक युवती तक सीमित नहीं रहने देता। इस युवती ने ‘मधु-सुहाग’ के दर्पण में अपने ‘जीवन-धन’ को मात्र एक बार ही बिम्बित होते देखा है। वामन शिवराम आप्टे के संस्कृत-हिन्दी कोश में ‘मधु’ शब्द के कई अर्थ दिए गए हैं-मध्ुार, सुखद, रूचिकर, आनन्दयुक्त43 इत्यादि। सुहाग शब्द का संबंध सौभाग्य से है। ‘मधु-सुहाग’ का अर्थ युवती की वैवाहिक जीवन की अवधि से जुड़ा है। वह अवधि युवती के लिए सुखद आनंददायक थी। जिसके कारण जीवन स्थितियां सुखद होती हैं- वह युवती के लिए ‘जीवन-धन’ हैं। ऐसा धन जो खर्च नहीं किया जाता। जीवन पर्यन्त सहेज कर रखा जाता है। जीवन के निर्वाह का आधार-धन है वह। उसके न रहने पर युवती के जीवन का निर्वाह संभव नहीं। उसके जीवन से सुख और आनंद जाता रहेगा। सामंती समाज में स्त्री के सुख और आनंद को इसी तरह पुरुष केन्द्रित कर दिया जाता है। स्त्री को स्वाभाविक रूप में कमज़ोर माना जाता है। इसलिए वह ‘जीवन-धन’ अबल हाथों का सहारा बन जाता है। ‘अबल’का शाब्दिक अर्थ निर्बल-दुर्बल, बलहीन होता है। सामाजिक अर्थ ज़्यादा गंभीर है। स्त्री को अबल समझने वाला समाज मानता है कि वह बिना सहारे के नहीं रह सकती। कविता का भाव-बोध, सहानुभूति मूलक है। इस क्रम में शब्द चयन भी सहानुभूति उत्पन्न करने वाला है। लेकिन यह शब्दावली स्त्री को सामंती दृष्टि से देखने वाली है।

निराला सामंती प्रकृति के पोषक नहीं थे। कविता का विषय भले ही बहुत यथार्थपरक है, छायावादी भावुकता शब्दावली को बहुत यथार्थ परक नहीं बनने देती। स्त्री जीवन की त्रासदी को अलबता ज़रूर प्रकट कर देती है। कविता में उल्लिखित युवती ’मधु-सुहाग’ के दर्पण में अपने ’जीवन-धन’ को एक बार ही ‘बिम्बित’ होते देख पाई है। कविता में ‘एक बार’ का अर्थ एक बार ही है। कवि प्रतीक रुप में एक बार का प्रयोग नहीं कर रहा। एक बार को अभिधात्मक बनाने के लिए कवि उससे पहले बस शब्द का प्रयोग करता है। ‘बस’ का अर्थ यहां केवल है। केवल एक बार अपने जीवन धन के दर्शन करने वाली युवती अब विधवा है। उसके जीवन का लक्ष्य अब धु्रवतारा बन कर दूर आकाश में चमक रहा है। युवती के जीवनाकाश में धु्रवतारा बनकर वह अटल हो गया है। यह स्नेह संबंध अटल रह सकता है यदि जैविकता इसमें बाधा न उत्पन्न करें। समाज जैविकता को नज़रअंदाज करके संबंध को अटल बनाये रखने में यकीन रखता है। इसका परिणाम यह है वह ‘जीवन-धन’ लौट कर न आने वाले अनंत पथ पर बढ़ जाने के बाद भी स्त्री के जीवन में ‘करुणा की धारा’ ही प्रवाहित कर पाता है। करुणा का अर्थ यहां दया, अनुकंपा अथवा दयालुता नहीं है। करुणा का अर्थ यहां शोक, रंज अथवा दुख है। अगले हिस्से का आरंभ इस शोक की स्थिति से होता है। बस एक बार देखे जाने वाले इस अल्पावधि ने इस नेह नाते से उपजने वाला शोक दीर्घावधि है। आजीवन बना रहने वाला शोक। पितृसत्तात्मक समाज इस शोक को जस का तस बनाये रखना चाहता है। निराला इस शोक का उपचार चाहते हैं। स्त्री की कारुणिक दशा को देखकर भी अकरुण बने रहने वाले समाज में कवि के मन मधुकर की पांखे भीग जाती हैं। पंक्तियां देखिए-
हैं करुणा-रस से पुलकित इसकी आँखें
देखा, तो भीगी मन-मधुकर की पाँखें
मृदु-रसावेश में निकला जो गुन्जार
यह और न था कुछ, था बस हाहाकार!44

इस विधवा युवती की आँखें करुणा-रस से पुलकित हैं। स्नेह का भौतिक आधार न रहने से उपजने वाली करुणा तो समझ में आती है। इससे विधवा स्त्री की सामाजिक स्थिति कारुणिक नहीं बनती। सामाजिक स्थिति का जि़म्मेदार समाज है। क्यों? क्योंकि यह समाज करुणा रस से पुलकित आँखों की पीड़ा को महसूस नहीं कर पाता। ‘पुलकित’ शब्द का कोशगत अर्थ यहां काम न देगा। आंखंे करुण रस से रोमांचित नहीं है। करुणा के रस में डूबी हुई हैं। इस युवती की आँखें उसकी मनःस्थिति की परिचायक हैं। मन में रोमांच नहीं सिहरन है। अपार दुख से उपजने वाली सिहरन। इस सिहरन का प्रतिबिम्ब आंखों में दिखता है। प्रतिबिम्ब के माध्यम से बिम्ब तक पहुंचना। बिम्ब के माध्यम से हृदयावस्था को महसूस करने वाली दृष्टि उसकी विभीषिका को देखकर स्वंय रोमांचित होती हैं। आंखों की पुलक हर्ष से नहीं विषाद से जुड़ी है।विषादग्रस्त मनःस्थिति वाली युवती की आँखों में करुण-रस है। उससे कहीं ज़्यादा करुणा उन आँखों को देखने वाले में उपजनी चाहिए। सिर्फ देखना नहीं, वास्तव में देखना। महसूस करते हुए देखना। महसूस करते हुए देखें तो ‘मन-मधुकर’ ठिठक जायेगा। उसके लिए आगे बढ़ना संभव न होगा। जिस भंवरे के पंख करुणा के रस में भीग गए हों, उसके लिए उड़ना मुश्किल हो जाता है। यह भंवरा साधारण नहीं है। मन-मधुकर है। मनरूपी भंवरा। यह कवि का मन है। विधवा युवती की कारुणिक अवस्था – उसके विषादग्रस्त हृदय तक कवि ‘करुण-रस में पुलकित’ आँखों के माध्यम से पहुंच जाता है। कवि का मन विधवा युवती की स्थिति से खुद को अलग नहीं कर पाता। पहले जि़क्र किया गया है वह युवती के शोक का उपचार चाहता है। उसके मन की पीड़ा को आत्मसात करने पर ‘मृदु रसावेश’ की स्थिति में कवि-मन जो गुंजार करता है वह और कुछ नहीं होता बस हाहाकार ही होता है। यह हाहाकार दरअसल विधवा युवती के हृदय का है। समाज इस हाहाकार की गूंज नहीं सुन पाता जबकि निराला सुन लेते हैं। कवि मन पीडि़त मन के दुख-पीड़ा को अपनी वाणी इसी प्रकार देता है। ‘मृदु रसावेश’ का अर्थ भी यही है। मृदु रस में प्रवेश करना। कोमल रस के अधिकार में अथवा प्रभाव में आ जाना। यह कोमल रस करुण रस है, जो विधवा युवती की आँखों से उतरकर कवि के हृदय में प्रवेश करता है। अगली पंक्तियां देखिए-
उस करुणा की सरिता के मलिन पुलिन पर,
लघु टूटी हुई कुटी का मौन बढ़ाकर
अति छिन्न हुए भीगे अंचल में मन को
दुख रूखे-सूखे अधर-त्रस्त चितवन को-
वह दुनिया की नज़रों से दूर बचाकर
रोती है अस्फुट स्वर में,
दुख सुनता है आकाश धीर-
निश्चल समीर,
सरिता की वे लहरें भी ठहर-ठहर कर।45

यह कौन सी करुणा की सरिता नदी है जिसका पुलिन-रेतीला किनारा मलिन– कलंकित -मैला, घिनौना है। समूची कविता में तीन बार करुण शब्द का  उल्लेख आया है। पहला, करुणा की वह धारा जो युवती का जीवन धन अनंतपथ से बहा रहा है। दूसरा करुणा का वह रस जिसमें युवती की आँखें पुलकित हैं। तीसरा उल्लेख उपर्युक्त हिस्से में है। इस हिस्से में कवि विधवा युवती की जीवन स्थिति का वर्णन करता है। युवती की जीवन स्थिति अत्यंत दयनीय है। युवती की विषादग्रस्त अवस्था से उपजी करुणा के बावजूद उसकी स्थिति दयनीय है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था। इसलिए करुणा की इस नदी का किनारा कलंकित है। मैला है। यह कलंक उस समाज के लिए विशेष रूप में है, जिसके सामने सबकुछ घट रहा है। हालांकि करुणा की लहरें महसूस करने वाले के हृदय में उठ रही है। करुणा की नदी के तट पर रहती उस युवती के उपेक्षित जीवन की दशा देखिए। उसे लघु टूटी हुई कुटी में रखा जाता है। उसकी सुविधा का किसी को ख़याल नहीं है। ‘कुटी’ शब्द उसके साधारण रहन-सहन का प्रतीक है। उसके एकाकीपन का परिचायक है। इसी शब्द से उसके तपस्विनी रूप का बोध होता है। इस कुटी का मौन भी वह निरंतर बढ़ाती रहती है। मौन का अर्थ यहां चुप रहने से कम और निश्चेष्ट रहने से ज़्यादा है। उसका जीवन ठहर गया है। दीपशिखा सी शांत, भाव में लीन का एक अर्थ यह भी है। इस मौन की अभिव्यंजना को समझने वाला कोई नहीं है।

उस युवती का आंचल ‘अति छिन्न’ है, भीगा हुआ है। सूरदास ने उर में बहने वाले पनारों का जि़क्र किया है। इन पनारों की वजह से ’कंचुकि पट’ सूखता नहीं था। युवती का आंचल भी गीला है। स्थिति में लेकिन फर्क है। कृष्ण अनंत पथ पर नहीं गए थे। युवती का ‘जीवन-धन’ अनंत पथ पर चला गया है। विरह में मिलन की संभावना होती है। कृष्ण अनुपस्थित है अनुपलब्ध नहीं। उनसे मथुरा जाकर मिला जा सकता है। युवती के ‘जीवन का लक्ष्य’ अनुपस्थित भी है और अनुपलब्ध भी। कंचुँकि पट के सूखने की संभावना है। आंचल का भीगे रहना युवती की नियति है। यह स्थिति उसके आंचल को अतिछिन्न-विदीर्ण-खण्डित-फटा हुआ बनाती है। इसी छिन्न आंचल में युवती अपने मन-रुचिर-मन को जो स्थिति विशेष में संतप्त हो गया है और कालांतर में फिर रुचिर हो जायेगा को दुनिया से छिपाकर रखती है। निज मन की व्यथा वह छुपाकर रखती है। दुख रूखे-सूखे अधर और त्रस्त चितवन को भी वह दुनिया की नज़रों से दूर बचाकर रखती है। होंठ दुख के कारण रूखे-सूखे हैं। दुःख न हो तो! चित्तवन सामाजिक दबाव से त्रस्त भयभीत डरा हुआ है। सामाजिक दबाव न हो तो! चित्तवन का स्वभाव चंचलता होता है। कम से कम सरस तो होता ही है।

उस युवती ने अपनी मनःस्थिति को दुनिया की नज़रों से बचाकर-छिपाकर रखा हुआ है। वह अपनी स्थिति पर अस्फुट स्वर में रोती है। अस्फुट दुर्बोध-अस्पष्ट। रोना तो सामान्यतः प्रत्यक्ष होता है। यहां रोने का स्वर अस्फुट है। किसके लिए? उनके लिए जो इस युवती के रोने के कारण को समझना नहीं चाहते। विधवा युवती की व्यथा को सुनने वाला कोई नहीं है। उसका दुख महसूस करने वाला कोई नहीं है। विधवा युवती के दुख को सुनने के लिए आकाश जैसी धीरता चाहिए। आकाश जैसा धैर्यवान्-स्वस्थचित्त व्यक्ति ही उसका दुःख सुन सकता है। समीर हालांकि निश्चल नहीं होती। बहती हुई हवा को उसके दुख को महसूसने के लिए रुकना होगा। सरिता की लहरों को भी रुक-रुक कर उस युवती की व्यथा जाननी होगी। यह सरिता करुणा की ही है। जिसका जि़क्र पहले हो चुका है। उस युवती के प्रति केवल करुणा प्रकट करके नहीं रह जाना होगा। सकर्मक होकर उसके दुःख को दूर भी करना होगा। ऐसा करने पर करुणा की सरिता का पुलिन मलिन नहीं रह जाएगा। इसके मूल में यह विचार है कि परम्परागत भावबोध से विधवा युवती के दःुख को नहीं समझा जा सकता।
इसके बाद कवि चुनौती देते हुए जैसे दो पंक्तियां लिखता है-
कौन इसको धीरज दे सके?
दुःख का भार कौन ले सके?46

पितृसत्तात्मक समाज में विधवा युवती को धीरज देना जोखिम का काम है। धीरज देने का अर्थ साधारण नहीं है। धीरज देना मायने युवती के मन में छिपे स्वप्न को साकार करने का प्रयत्न करना। मनःस्थिति को वस्तुस्थिति के यथार्थ तक लाने के लिए सामाजिक परिवर्तन करना। समाज के विरोध का मुकाबला करने का साहस अपने भतीर पैदा करना। ऐसा करने पर ही कोई उसके दुःख का भार ले सकेगा। निराला विधवा युवती की मुक्ति का आह्वान करते हैं। दुःख का उल्टा यहाँ सुख नहीं है। दुःख का कारण-जीवन स्थिति को बदलना है। स्थिति बदलने पर दुःख स्वयं समाप्त हो जायेगा। ’ज्योतिर्मयी’ कहानी का विजय यह नहीं कर पाता। ’अलका’ उपन्यास का अजित ऐसा करने में सक्षम होता है। वीण के स्वप्न को वह साकार कर देता है। 1923 में लिखी इस कविता में उठाएं इस प्रश्नों का हल निराला अपने परवर्ती साहित्य विशेषतः कथा साहित्य, में करते दीख पड़ते हैं।
कविता का अंतिम हिस्सा देखिए-
यह दुःख वह जिसका नहीं कुछ छोर है
दैव अत्याचार कैसा घोर और कठोर है
क्या कभी पोंछे किसी ने अश्रु -जल?
या किया करते रहे सबको विकल?
ओंस-कण सा पल्लवों से झर गया।
जो अश्रु, भारत का उसी से सर गया।47

विधवा युवती का दःुख असहनीय है। अनवरत है। उसके दुःख का कोई ओर-छोर नहीं है। कवि ‘दैव’ शब्द का इस्तेमाल इस हिस्से में करता है। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि कविता समाप्त करते-करते कवि नियतिवादी हो जाता है। ‘दैव शब्द’ को संबोधन की शैली के रूप में लेना चाहिए। कविता में आध्यात्मिकता का संस्पर्श तो कई जगह पर है। नियतिवाद कवि के भाव बोध का हिस्सा नहीं है। दैव शब्द उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्वपूर्ण उसके सामने रखा गया प्रश्न है। युवती पर घोर और कठोर अत्याचार हो रहा है। यह अत्याचार कौन कर रहा है? वैधव्य दैविक ताप नहीं है। भौतिक दशा है। इसका परिणाम मानसिक-दैहिक ताप है। विधवा पर अत्याचार करने वाला समाज कठोर है। पूरी कविता में कवि विधवा की दीन दशा को समाज के सामने रखता है। समाज की उसके प्रति जि़म्मेदारी तय करता है। अपनी जि़म्मेदारी न निभाहने वाले समाज को वह कठघरे में भी खड़ा करता है। संकट में पड़े मुनष्य को सांत्वना देने के बजाय उसे और विकल कर देने वाले समाज की अमानवीयता को कवि उजागर करता है। ऐसा समाज विधवा युवती के ‘अश्रु-जल’ क्यों पोंछने लगा। ‘अश्रु-जल’ पोंछने का अर्थ भी धीरज देने अथवा दुःख का भार लेने से ही है। इसका जि़क्र पहले हो चुका है। कविता की अंतिम पंक्ति का अर्थ डाॅ विश्वनाथ कुछ इस प्रकार करते हैंः-‘‘विधवा की आँखों का करुणाजल किसी ने नहीं पोंछा। वह पल्लवों से ओस जैसा झड़ गया। (पल्लव आँखे हैं, ओस करुणा जल) उस अश्रु (विधवा की करुण स्थिति के कारण) से भारत (का) सर गया।48

विधवा युवती के आँसुओं को न पोंछने वाले भारत का सर चला गया है। सर’ यहां सिर है। सिर का प्रतिकार्थ सम्मान से लेना चाहिए। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना रखने वाला मानवीय करुणायुक्त भारत का सम्मान अपने देश की दीन-हीन मलिन बना दी गई विधवा युवती की उपेक्षा करने के कारण नहीं रहा।कविता से एक बार गुज़र जाने के बाद यह समझ में आता है कि निराला विधवा युवती को इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी क्यों कहते हैं। निराला ने स्त्री के विधवा जीवन पर सहानुभूति से विचार नहीं किया है। वे उसकी त्रासद जीवन स्थिति से वाकिफ थे। विधवा स्त्री की मनोदशा को बारीकी से समझते हैं। ‘सीमन्तनी-उपदेश’ की लेखिका अथवा महादेवी वर्मा के स्तर पर वे भले ही न पहुंच पाए हों, अलबत्ता उनके आस-पास ज़रूर रहते हैं। हालांकि दोनों लेखिकाओं ने अपनी भावनाओं को गद्य में व्यक्त किया है। निराला अपनी बात गद्य और पद्य दोनों में कह सके हैं। विधवा स्त्री के मन की भावदशाओं की अचूक पकड़ उनके यहां मिलती है। स्त्री यौनिकता का जैसा उल्लेख ’एक अज्ञात हिन्दू औरत’ ने किया है। निराला भले ही वैसा न कर पाए हों। कविता में जिस स्वप्न का जि़क्र आया है उसमें स्त्री यौनिकता भी निहित है। वीणा के संदर्भ में ’जीवन की अदृश्य अप्सरा’ में भी यह भाव सम्मिलित है। कुल्लीभाट से बातचीत और कुल्लीभाट रचना के प्रकाशन में तकरीबन डेढ़ दशक का अंतर है। विधवाओं को व्यभिचारी मानने वाले कुल्ली को जवाब निराला ज्योतिर्मयी जैसी कहानी और अलका जैसे उपन्यास में देते हैं। वैधव्य को नियति न मान कर जीवन स्थिति मानने वाली है ‘विधवा’ कविता भी इसका सशक्त प्रमाण है। इस कविता को स्त्री-मुक्ति के आह्वान के रूप में देखना चाहिए।

सन्दर्भ ग्रन्थ : 

1. निराला की साहित्य सामना – भाग-1 पृ0 33
2. निराला रचनावली – भाग – 1 पृ0 318-19
3. वही भाग-4 पृ0 59
4. वही – पृ0 22
5. वही भाग-1 पृ073
6. वही पृ0 72
7. सम्पादक डाॅ धर्मवीर, लेखिका ‘एक अज्ञात हिन्दू औरत-सीमन्तनी उपदेश, पृ071
8. सम्पादक कमेन्द्र शिशिर, भारतेंदु मंडल के प्रमुख रचनाकार-राधाचरण गोस्वामी की प्रमुख रचनाएं पृ0 127
9. दृष्टव्य-भाग्यवती-श्रद्धाराम फिल्लौरी
10. ;पद्ध निराला रचनावली, भाग 1 पृ0 72
;पपद्ध भाभी-अतीत के चलचित्र, महादेवी वर्मा पृ0 24-31
11. चाँद पत्रिका वर्ष 1, खं 17 संख्या 6, अप्रैल , 1923, पृ0 45
12. वही पृ0 545
13. दृष्टव्य The
High Caste Hindu Women 82
14. चांद पत्रिका वर्ष 1, खं 1, संख्या 3, जनवरी, 1923, पृ0 176
15. चांद पत्रिका, वर्ष 1, सं0 17 संख्या 6, अप्रैल 1923
16. प्रस्तुति प्रज्ञा पाठक, दृष्टव्य-सरला एक विधवा की आत्म जीवनी- लेखिका दुखिनी बाला-प्रकाशन परमेश्वरी प्रकाशन, दिल्ली-110092
17. सम्पादक डाॅ0 धर्मवीर, लेखिका एक अज्ञात हिन्दू औरत, सीमन्तनी उपदेश- पृ084
18. वही
19. वही, पृ0 88
20. नीरजा माधव, दृष्टव्य- स्त्री लेखनः नये क्षितिज से परिचय-हिन्दी साहित्य का ओझल नारी इतिहास (1857-1947)।
21. निराला रचनावली भाग-1, पृ0 46
22. निराला रचनावली, भाग – 4, पृ0 356
23. स्फुरणा देवी, दृष्टव्य-कृष्णा, भानमती, सुशीला इत्यादि के बयान, अबलाओं का इंसाफ
24. डाॅ0 धर्मवीर, लेखिका एक अज्ञात हिन्दू औरत, सीमन्तनी उपदेश, पृ0 94
25. निराला रचनावली, भाग-1 पृ046
26. दृष्टव्य-स्त्री उपेक्षिता-सिमोन द बोउवा
27. निराला रचनावली, भाग-3, पृ0175
28. निराला रचनावली, भाग-4, पृ0289
29. निराला रचनावली, भाग-3, पृ0 197
30. चमेली-अधूरा उपन्यास-निराला रचनावली भाग-4 पृ0 258
31. दृष्टव्य रामचरित मानस
32. निराला रचनावली भाग-1 पृ0 72
33. प्रस्तुति प्रज्ञा पाठक- लेखिका दुखिनीबाला, सरला एक विधवा की आत्मजीवनी, पृ0-39
34. सम्पादक नामवर सिंह- प्रतिनिधि कविताएं- शमशेर बहादुर सिंह पृ0 43
35. दृष्टव्य – जागो फिर एक बार, भाग-2, निराला रचनावली भाग-1, पृ0 154
36. निराला रचनावली भाग-1 पृ0 72
37. अतीत के चलचित्र – महादेवी वर्मा पृ0 29
38. निराला रचनावली भाग-3, पृ0 197
39. वही
40. निराला रचनावली, भाग-4, पृ0 289
41. निराला रचनावली, भाग-3, पृ0 197
42. निराला रचनावली, भाग-1, पृ0 73
43. वामन शिवराम आप्टे- संस्कृत हिन्दी कोश, पृ0 767
44. निराला रचनावली-भाग-1, पृ0 73
45. वही
46. वही
47. वही
48. तद्भव में प्रकाशित-विश्वनाथ त्रिपाठी का लेख-आँखें वे देखी हैं जबसे – सं॰ अखिलेश वर्ष-3, अंक-1, अक्टूबर 2014, पृ0 14

संपर्क :
नीरज कुमार
एसोशिएट प्रोफेसर
हिन्दी-विभाग
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
नई दिल्ली-110025
मो॰ 9312225213
ईमेल- nrjkumar560@gmail.com

नीलम मैदीरत्ता ‘गुँचा’ की कविताएँ

नीलम मैदीरत्ता

प्रकाशित संग्रह : “तेरे नाम के पीले फूल”
कविताएँ/आलेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित संपर्क : ईमेल -neelammadiratta@rediffmail.com / neelamadiratta@gmail.com

1.
सब से अमीर होती है वह लड़की,
जिस के पास खोने के लिए,
अपनी इज्ज़त के सिवा कुछ नहीं होता,
और यह जानते हुए भी,
कि भीड़ भरे रास्तों पर,
उसे कोई छू पाए या ना छू पाए,
पर उछाले जा सकते है पत्थर और कीचड़,
वो तोड़ती है हाथों की चूड़ियाँ,
वो तोड़ती है अपनों का विश्वास,
लांघती है घर की दहलीज़,
बांधती है सर पर कफ़न,
मुहँतोड़ देती है जवाब,
उसे नहीं दिखाई देते,
अपने आँचल के धब्बे,
दिखती है तो सिर्फ,
मछली की आँख,
लडती है कर्मक्षेत्र,
और जिंदा रह कर,
जीती है अपनी ज़िन्दगी..
सब से अमीर होती है वो लड़की …

सब से गरीब होती है वह लड़की,
जिस के पास खोने के लिए होती है,
अपनी इज्ज़त के साथ साथ,
माँ प्यो दी इज्ज़त,
सारे कुनबे दी इज्ज़त,
अपनों का प्यार और विश्वास,
आन बान और शान,
वो पहनती है रंगबिरंगी चूड़ियाँ,
सीती है अपनी गुलाबी जुबान,
ओढती है सपनों की चूनर,
मरती है रोज़ लम्हा लम्हा,
और मुस्कुराते हुए,
जीती है अपनी ज़िन्दगी,
सब से गरीब होती है वह लड़की

2.
धृतराष्ट्र अँधा नहीं अहंकारी अँधा था,
गंधारी ने त्याग की नहीं स्वार्थ की पट्टी बाँधी थी,
भीष्म वक़्त की भांति मौन रहा,
शतरंज की बिसात बिछायी गयी,
शकुनि की चालें चली गयी,

भानुमती दाँव पर लगाईं गयी,
इस कलयुग में चीर हरण निषेध था,
पर मन चीरने की कोई सजा नहीं थी,
द्रौपदी का मन नहीं चीरा जा सकता था,
भानुमती का मन चीर लिया गया,
भानुमती रोई, चीखी, चिल्लायी,
और इस से पहले,
कि उस के मुख से फूट पड़ते,
श्राप और बद्दुआयें,
नियति चीख पड़ी,
.
मौन हो जा….मौन हो जा,
.
भानुमती ने हाथ जोड़े और पुकारा,
गोविन्द !! गोविन्द !! गोविन्द !!
.
गोविन्द दूर से देखते रहे …मौन और लाचार

3.
सुनो ! लडकों !!
अच्छा नहीं लगता,
तुम्हारा घर आना,
किसी भी लड़की के माँ-बाप को,
उन की अनुपस्थिति में,
क्योंकिं जानते है वो,
कि नहीं सिखाया गया तुम्हें,
किसी भी स्कूल में,
किसी भी क्लास में,
ना ही सिखाया,
तुम्हारे माँ-बाप ने,
कि लड़की की देह होती है,
रुई से भी ज्यादा सफ़ेद और कोमल,
तुम्हारे ज़बरदस्ती छूने से हो जाती है मैली,
और चीख जाती है लड़की,
और यह चीख आखिरी नहीं होती,
ताउम्र साथ रहती है….
.
जाओ पूछो अपने माँ-बाप से,
कि क्यों न सिखाया मुझे कुछ?
बहना को तो तुम सिखाती रही सब कुछ,
मुझे क्योँ ना सिखाया?
आज लोगो की आँखों में देखता हूँ,
प्रशनचिन्ह अपने लिए,
पूछते है वो,
कि क्यों आये हो? कैसे आये हो?
कुछ काम-वाम नहीं है क्या? …

4.
मै खुश हूँ,
कि मेरी ख़ुशी तेरे दिए,
चंद सिक्कों की खनक की,
मोहताज़ न रही …..
मै खुश हूँ,
कि मेरे सपनों को तेरे दिए,
इन्द्रधनुषी रंगों की,
ज़रूरत ना रही …
मै खुश हूँ,
कि मेरे लड़खड़ाते कदमो को,
तेरे सहारे की,
उम्मीद ना रही …
मै खुश हूँ,
कि मेरी तनहाइयों को,
तेरे ख्याल की,
जुस्तजू ना रही …
मै खुश हूँ,
कि मै बहुत खुश हूँ,
कि मैंने खुद ही में ढूँढ लिये,
ख़ुशी, रंग, सहारा,
और प्रेम,
और अब !!
अब !! मै तेरी दास न रही

मै ही हूँ मैला आंचल में डाक्टर ममता: लतिका

 किसी इंसान , महान व्यक्तित्व , सार्वजनिक जीवन की शख्सियत -लेखक , कलाकार को जानने -समझने का उसके हमसफ़र का उसके प्रति के नजरिये से बेहतर जरिया और क्या हो सकता है. हम सब के प्रिय लेखक फणीश्वर नाथ रेणु की प्रेयसी / पत्नी लतिका जी से स्वतंत्र पत्रकार , शोधार्थी व ‘ फणीश्वरनाथ रेणु डाॅट काॅम’  के माॅडरेटर अनन्त ने उनके निधन (जनवरी 2011) के पहले आत्मीय बातचीत की थी. कई बैठकों में ( पटना से रेणु  के गाँव औराही हिंगना तक ) की गई बातचीत का एक अंश स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . पूरी बातचीत हम प्रिंट एडिशन में प्रकाशित करेंगे. आइये थोड़ा रेणु को थोड़ा लतिका जी को जानें इस बातचीत से.

लतिका

साक्षात्कारकर्ता का नोट 


8-9 साल पुरानी घटना है। फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन व उनके  साहित्य को समझने का फैसला किया।  
रेणु से जुड़े व उन्हें  समझने वालों के  साक्षात्कार की योजना बनाई. सबसे पहले लतिका जी से बात करने का फैसला किया. मैं एक दिन लतिका जी के घर  जा ही धमका। दरवाजा खटखटाया: 
अंदर से आवाज आई , “कौन ?”
मैने परिचय भी नहीं दिया था कि पुनः आवाज आई ‘‘ मेरे पास कुछ नहीं है क्या लेने आये हो ? जो था सब तुम लोगो को दे दिया।”
मैने पुनः दरवाजा खटखटाया,  फिर वे चिल्लाकर बोलीं:- “भागो , भागता है कि नहीं ,” इसके साथ पदचाप सुनाई दी। मैं डरा सहमा वहां से भागा। घुमावदार सीढियों से भागते हए नीचे उतरा। मैं तुरंत अरूण भैया ( रेणु जी के दामाद )  के आवास की ओर कूच किया। पसीना से तर-बतर स्थिति में पहूॅंचा। नवनीता भाभी (रेणु जी की बेटी) और अरूण  भैया कमरे में बैठे थे। पूरा वाकया  एक ही साॅस में सुनाने लगा। दोनो मंद-मंद मुस्कुराने लगे। पूरी घटना सुनने के बाद हॅसने लगे। 
मैने कहा , ‘ अगर हीरामन की तरह भोला-भाला मासूम होता,  तो लतिका जी से नहीं मिलने का कसम ही खा लेता। ” भाभी बोली आपको कसम खाने की जरूरत नहीं है। मैं आपको मिलवा दूॅंगीं।  हम दुबारा उनके घर गये. 
 भाभी ने लतिका जी से कहा कि ‘‘आप इन्हें एक बार डांटकर भगा दी थीं। ’’ लतिका जी बोली:- ‘‘ मुझे याद नहीं मैने इसे डांटा है।’’ लतिका जी आगे बोलीं:- ‘‘ अरे मै बोलती कुछ हूॅ , छपता कुछ है। बाद में पता चलने पर गुस्सा आता है।”  मेरी ओर मुखातिब होकर बोलीं, ‘ तुम सही-सही लिखना। जब भी मिलने आना,  धीरे से दरवाजा खटखटाना। वहां से चलते वक्त जैसे ही प्रणाम किया झट से सर पर हाथ रख दिया। मुझे रेणु की कालजयी रचना मैला आंचल की डाक्टर ममता के  ममत्व व प्यार अहसास हुआ था।
लतिका जी से मुलाकात वर्ष 2006 में हुई थी। इसके बाद जब भी वक्त मिलता लतिकाजी के पास पहुंच  जाता। लतिकाजी जब औराही हिंगना चली गई। मैं औराही हिंगना पंद्रह दिनों तक रहा। इस दरमियान भी लतिका जी से बाते हुई। बातचीत का सिलसिला टुकड़े-टुकड़े में चार वर्षो तक चलता रहा है : 

आप रेणुजी से सबसे पहले कब और कैसे मिलीं ? पहली मुलकात में रेणु कैसे लगे ?
1944-45 में शायद पहली बार मिली थी। मैं राउंड पर थी, अचानक मेरी नजर भागलपुर जेल से आये पुलिसकर्मियों पर पड़ी। मैं पूछ बैठी कि आपके साहब लोग तो चले गए ना। पुलिसकर्मियों ने बेड की ओर इशारा किया। मैं बेड के करीब गई तो देखी कि एक मरीज बेसुध पड़ा है। हाथों में बेडि़यां है। मैं नजदीक पहुँची  तो वह मुझे सूनी नजरों से देखने लगा। मैंने  कुछ पूछना चाहा , तो उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैं उस वक्त कुछ समझ नहीं पाई। आज मैं महसूस करती हूॅ कि उस मरीज की नजरों में  जीने की चाह थी।

रेणु की दूसरी पत्नी पद्मा के साथ लतिका

कभी यह जानने का प्रयास किया था कि रेणुजी ने पहली मुलाकात में नजरें क्यों फेर ली  थी  ?
(याद करने की कोशिश करते हुए )  एक बार पूछी थी।  क्रांतिकारी थे, क्रांति की बात सोच रहे थे। अंग्रेज कब भागेगें ? उनके साथियों  के स्वास्थ्य  को लेकर चिंतित रहते थे, जो कि अस्पताल से स्वस्थ होकर लौट गये थे.  उनकी एक ही इच्छा थी कि जल्द से जल्द स्वस्थ हों । जेल से छूटे और भारत मां की सेवा करें। अक्सर ऐसे ही सवालों सें घिरे रहते थे। मै हाल-चाल पूछने गई थी। जीवन जीने की आशा जगी थी उनके दिल में। आंखों पर जब अचानक रौशनी पड़ती  है तो पलकें बंद हो ही जाती है। शायद ऐसा ही महसूस किया था।

रेणुजी को देखकर आप कभी अचंभित भी हुई थीं ?
अचंभित तो पहली मुलकात में हुई थी। मै मन ही मन सोंचती थी कि दुबला पतला बीमार आदमी क्रांतिकारी भी हो सकता है ? अरे भाई शरीर में ताकत रहेगी,  तभी कोई संघर्ष कर सकता है। उनसे जब जुड़ी तब जानने का मौका मिला। स्वभाव से क्रांतिकारी थे। आजादी के बाद भी नेपाली क्रांति- समाजवादी आन्दोलन से जुड़े रहे।

 रेणुजी की कौन-कौन सी आदतें आपको आज भी याद आती है ?
(गंभीर मुद्रा में) बच्चे की तरह जिद्द करने की आदत। उनकी बाल सुलभ चपलता, स्वादिष्ट भोजन की फरमाइश। जीवन जीने का सलीका, उनके दरवाजा खटखटाने का अंदाज। ऐसी कई छोटी बातें, पहले बहुत याद आती थी। अब भी याद आती है। जब तक जीवित हूॅ, उनकी यादें  याद आती रहेंगी।

आज जब उनकी याद सताती है तो क्या करती हैं ?
पहले बहुत परेशान रहती थी। उनकी तस्वीरे किताबों को देखकर खुद ढाढ़स बंधाती थी। मन नहीं लगता था तो राम कृष्ण मिशन आश्रम चली जाती थी। अपने काम में ध्यान लगाती थी। अब तो शरीर में ताकत भी नहीं कि कहीं जा सकूॅ। घर में रहती हूॅ। अकेले जीने की आदत सी पड़ गई है। मेरी भतीजी काॅरवा  पास में रहती है। उसके यहां भी चली जाती हूॅ। जरूरत पड़ने नीता को बुलावा भेज देती हूॅ। अब  इश्वर से प्रार्थना करती हूॅ कि जल्दी जीवन से मुक्ति मिले। बहुत जीवन जी लिया। अब जीने का मन नहीं करता।

फणीश्वरनाथ रेणु

आप शारीरिक रूप से कमजोर होती जा रही हैं। घर में नौकरानी क्यों नहीं रख लेती हैं ? वह  आपकी देखभाल किया करेगी।
क्या करूंगी  नौकरानी रखकर ? उसका खर्च कहां से आयेगा ? अब कमाती भी नही हूॅ। आया को पैसा कहां से दूॅगी ? आजकल की आया घर का काम ठीक से नहीं करती है। रसोई घर को गंदा ही छोड़ देती है, घर में झाडू भी ठीक से नहीं लगाती। सिर्फ पैसा ऐंठती है। अपना काम खुद करना चाहिए , दूसरे के भरोसे जीने से जिंदगी बोझ बन जाती है।

आप पटना,  हजारीबाग से पटना कैसे आईं ?मैं नर्सिग ट्रेनिंग करने के लिये पटना आई थी। पीएमसीएच में ही प्रशिक्षण लिया और यहीं नौकरी भी मिल गई। फिर रेणुजी से शादी हो गई। वही कोई 1938-40 के वर्ष में पटना आई थी।

आप नर्स क्यों और कैसे बनीं ?
जीवन को सेवा के प्रति समर्पित  करने का फैसला लिया था। इस वजह से नर्सिग सेवा में आई। युद्ध में जख्मी सैनिकों और देश के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों की सेवा करना बड़ा पुण्य का काम था। आजादी की लड़ाई में सब लोग अपने-अपने तरीके से सहयोग कर रहे थे। मै मरीजों को सेवा के जरिये देश की सेवा करने का फैसला किया था। जब तक नौकरी में रही ठीक वैसे ही मरीजों की सेवा करती रही। नर्सिग की पढ़ाई के दरम्यान ‘ ‘ फलोरेंस नाईटेंगल’ के जीवन से परिचित हुई। उनकी सेवा भावना ने भी मुझे काफी प्रभावित किया। फलोरेंस  का नाम सुने हो। अरे ! वही वो महिला जो सबसे पहले घायल सैनिकों की सेवा किया करती थी। उसी के बाद नर्सिग ट्रेनिंग की शुरूआत हुई। उस जमाने में मरीजों की सेवा अपने परिवार की तरह किया जाता था। मरीज और परिवार में कोई अंतर नहीं माना जाता था। मरीज को सिर्फ दवा खिला देने से डयूटी पूरी नहीं हो जाती थी। मरीजों का बिस्तर तैयार करना, वक्त पर भोजन देना सहित कई अन्य कार्य भी ख्याल रखना पड़ता था। मरीजों के लिए ऐसा माहौल बनाकर रखना पड़ता था कि उसे घर की चिंता न सतायें। जरूरत पड़ने परदुआ भी करनी पड़ती थी। बहुत जिम्मेवारी का काम है नर्स का।

रेणुजी के लिए भी दुआएं की होंगी ? (रेणु  का नाम सुनते ही उनके चेहरे पर मायूसी छा गई)  अरे वो तो बिमरिया आदमी थे। उन्हें एक साथ कई बी मारियां थी:- टीबी , अल्सर , सहित कई रोग के रोगी थे। ऐसा रोगी मैंने कभी नहीं देखा । एक बीमारी ठीक होती नहीं थी कि दूसरी  उपट जाती थी। रात-रात भर खून की उल्टियां करते थे। दर्द से बहुत कराहते थे।  पीड़ा सहन करना मुश्किल हो जाता था। उतना कष्ट भोगते किसी को नहीं देखी । न जाने कितनी रातें उनके सिराहने बैठकर बिताई ? हालत में सुधार नहीं दिखती,  तब मैं दुआएं करती थी। दुआओं का असर भी देखी हूॅ। लेकिन मैं यह नहीं कहती कि वोे मेरी दुआओं के भरोसे ही जिन्दा थे। मैं तो सिर्फ उनकी सेवा करती रही। मेरे जीवन का उद्देश्य भी यही था।

 आप सुभाष चन्द्र बोस को सुनीं  , गांधी  से मिलीं  , राजेन्द्र प्रसाद से मिलीं । इन सब में आपके प्रिय कौन हैं ?
अरे ! ये सभी महान पुरूष हैं। सबों का विचार बहुत अच्छा है। मैं इनलोगों में अच्छे-बुरे काभेद कभी नहीं करती।  सभी लोग मेरे प्रिय हैं। गांधी जी और राजेन्द्र बाबु से जब मिली थी तब बहुत कम उम्र की थी। इन दोनों को सिर्फ देखी ही थी। उनकी बातों को सुनी थी या नहीं यह भी याद भी नहीं। सुभाष दा को जब पहली बार सुनी थी तो उस वक्त कितनी बड़ी थी ? ये अप्पु (रेणुजी का दूसरा बेटा) की बेटी मोना है,  उसके उम्र की रही होगी। मैं  17-18 वर्ष की थी। बोस दा से बाद में भी मिली भी थी। इसलिए बोस दा को ज्यादा जान पाई।

तीसरी कसम का एक दृश्य

 बोस दा से कब और कैसे मिली थी ?
मैं यहीं पटना में रहकर पढ़ाई कर रही थी। हजारीबाग से चिट्टी आई। चिट्टी से ही जानकारी
मिली सुभाषचन्द्र बोस रामगढ़ में सम्मेलन की तैयारी में जुटें है। मेरे परिवार के लोग भी सम्मेलन की तैयारी में जुटे थे। मै भी हजारीबाग पहुंच गई। मैंने  अपनी बहन के साथ लड़कियों का जत्था बनया । हजारीबाग में घर-घर जाकर महिलाओं  से सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए अनुरोध किया। बहुत सारी महिलाएं इस अभियान से जुड़ी। फिर सम्मेलन में महिलाओं को साथ लेकर हजारीबाग से रामगढ़ गई। माया भी इस सम्मेलन में खूब  काम की थी। इसी बीच बोस दा के करीब जाने का मौका मिला।

 हजारीबाग में जब घर-घर जाकर बेटियों, बहुओं एवं महिलाओं को आजादी के आन्दोलन से जोड़ने का प्रयास कर रही थी। तब समाज में विरोध का भी सामना करना पड़ा होगा।
– हजारीबाग में बंगालियों की काफी संख्या थी। सम्मेलन की तैयारी में बंगाली लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। हमलोगों का काम था महिलाओं को हिम्मत दिलाना। उन्हें समझाना कि सम्मेलन का महत्व क्या है ? आजादी कितनी जरूरी है ? घर के पुरूषों का भी सहयोग मिलता था। शुरूआती दौर में ही थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी थी। बाद में तो बंगाली समुदाय के अलावा  अन्य समुदाय की महिलाओं को इस आन्दोलन से जोड़ना आसान हो गया था।

आपको याद है कि आपके आवास पर रेणु जी से मिलने कौन -कौन आते थे ?
बी0पी0 कोईराला आये थे। ये नेपाल के प्रधानमंत्री भी बने थे। शैलेन्द्र भी आये है,  इस घर में। शैलेन्द्र जी  तो साथ में तीसरी कसम देखने का वादा किए, लेकिन ऐसे फंसे कि पटना पुनः नहीं आ सके। नवेन्दु घोष का भी आना हुआ था। अज्ञेय जी आते थे, नागार्जुन जी भी। दिनकर जी तो अक्सर आते थे लेकिन वह ज्यादातर नीचे से ही आवाज लगाते थे। वे पड़ोस में ही रहते थे। भोला चटर्जी, मनमथनाथ गुप्त, रघुवीर सहाय, सहित कई लोग आये हैं। वो जब तक जीवित रहे लोगों का आना जाना लगा ही रहा। वैसे उनसे मिलने वाले ज्यादातर लोग काफी हाउस मे ही मिला करते थे। रामवचन राय , जुगनू  शारदेय तो इनके साया बने चलते थे। भूपेन्द्र अबोध , डाक्टर सियाराम तिवारी , जितेन्द्र सिंह , आलोक धन्वा , सत्यनारायण जी। साहित्यकार , पत्रकार , गायक , वादक रंगकर्मी– किस्म-किस्म के लोग आते रहते थे। मैं तो खातीरदारी में ही परेशान रहती थी।

इसका मतलब है कि रेणु जी में बहुत आकर्षण था?
अरे गप्पी आदमी थे। गप्प लड़ाने में माहिर थे। गप्प करते-करते उन्हें वक्त का भी पता नहीं चलता था। किस्सा सुनाते थे लोग सुनते थे। कई बार तो लोग भ्रम में पड़ जाते थे। झूठ और मनगढंत बातों को भी ऐसे सुनाते थे कि सच और झूठ में फैसला करना मुश्किल हो जाता था। जो एक बार बातें कर लेता था दूसरी मिलने का वादा कर ही यहां से जाता था। मैला आंचल से प्रसिद्धि मिली हुई  थी। ‘मारे गए गुलफाम’  कहानी पर ‘तीसरी कसम’ पर फिल्म का निर्माण हो चुका था। एक आकर्षण तो था ही लोगों के बीच। घर से लेकर काफी हाउस तक लोगों से मिलते रहते थे।

अब कौन-कौन लोग आते हैं।
उनके जाते ही यहां सब कुछ सुना हो गया। उनका ऐसा मायाजाल था कि लोग लोग खींचे चले आते थे। मै तो यहां सिर्फ तमाशबीन थी। उनके जाने के कुछ महीने बाद तक लोग आते-जाते रहते थे। तरह-तरह के किस्से सुनाते थे। मैं सुनती थी। कई वर्षो तक सिर्फ मैं सुनती रही। किस्से कहानियों को सुनकर परेशान भी हो जाती थी। अब तो लगता है कि कुछ लोग वेवजह की भी बाते करते थे। सच यह है कि अब कुशल छेम पूछने बहुत कम ही लोग आते है।

 रामबचन राय और जुगनू  शारदेय तो रेणु के हनुमान कहे जाते थे। रेणु जी के इन दोनो हनुमान का आपके प्रति बात-व्यवहार कैसा है ?
रामबचन जी कभी-कभी आते रहते हैं। राजनीति में जाने के बाद भी एक दो बार मिलने आये हैं। सीधे सरल आदमी है। लेकिन इनका भी आना न के बराबर ही होता है। अपने काम में व्यस्त रहते होगें। जुगनू  का तो नाम भी मत लो। वह भारी बदमाश आदमी है। विश्वासी तो कभी नहीं रहा।

लतिका

पदमा जी से कैसे रिश्ते रहे ? फिर कोई विवाद आप दोनों के बीच में ? 
जब पहली बार गयी थी। उस वक्त थोड़ा बहुत विवाद हुआ था। जब कोई  आदमी दो शादी करता है तो उसकी पत्नियों के बीच विवाद होता ही है। कोई भी स्त्री पति के प्यार का बटवारा नहीं करना चाहती है। (पदमा जी की ओर इशारा करते हुए) हमारे और इनके बीच कुछ ऐसा ही हुआ था। मैं वहां कुछ दिन रही भी थी। फिर मैं पटना चली आई। मै यहां पटना में रहने लगी। यह (पदमाजी) गांव (औराही-हिंगना) में रहती थी। फिर कभी कोई विवाद नहीं हुआ।

 रेणु  को गुस्सा कब आता था ? 
गांव में कम ही रहते थे। जब वे घर पर रहते तो बच्चे भी उनकी नजरों के सामने बदमाशी नहीं करते थे । वेणु होश संभालते ही बाहर का काम करने लगा था। यहां अधिकांशतः रात को ही ‘ पंचलाईट ‘  जलाकर उस वक्त लिखना शुरू करते थे । जब गांव के लोग सो जाते थे। निःशब्द  रात में ही ज्यादातर लिखने का काम करते थे। जब वह लिखते रहते तो टोक-टाक की बात तो दूर उनके पास कोई जाता भी नहीं था। एक घटना याद आ रही है। गर्मी का दिन था। घर के पिछवाड़े में बैठकर कुछ लिखने में मगन थे। शायद ‘तीसरी कसम’  कहानी लिख रहे थे। इसी बीच मैं खाना लेकर दबे पांव पहुंची । लगभग आधे घंटे से भी अधिक वक्त तक मैं खड़ी। लेकिन मै कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। यह सब घटना उनकी छोटी बहन महथी देख रही थीं। वही बोली भइया भाभी खाना लेके खाड़ छिये। उनकी नजर मेरे उपर पड़ी तो बोले कि बोले के चाही न। हित-कुटुम्ब सगा-संबंधी के आदर सत्कार कोई कमी होती तो थोड़ा गुस्सा होते थे। वैसे मैं  कोई  मौका ही नहीं देती थी गुस्सा होने का।

सुना है कि रेणु  रिवालवर भी रखते थे ? एक रचनाकार को रिवालर रखने की क्या जरूरत पड़ गई।
ठीक सुना है तुमने रिवालवर रखा करते थे। मेड इंन इंगलैड का था। उस रिवालवर का नाम बबली था। कलकता में अक्षय कुमार लाहा की दुकान से 12000 रु0 में मै ही खरीदकर लाई थी। उनको जान पर खतरा महसूस हुआ था , जमीन -जाल वाले आदमी थे। इसको लेकर झगड़ा फसाद हुआ होगा। हमले की आशंका होगी। जान पर खतरे की बात उन्होंने दिनकर जी को बतायी  थी। उस वक्त प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे। दिनकर जी ने शास्त्री जी को यह बात बताई। शास्त्री जी ने  इसकी जांच करवाई। , इसके बाद लाइसेंस निर्गत हुआ था।

रिवाॅलवर की खरीददारी में सारा पैसा रेणु जी ने लगाया था या आपने भी मदद की थी? 
उनको अच्छे किस्म की रिवाॅलवर चाहिए थी। उनके पास मात्र 2800  रूपये थे। 6000 रु0 मैंने निकाला। अपने साथ में नौमी (कुत्ता) को साथ लेकर पहले हजारीबाग गई। अपने बड़े भाई हथियार के शौकीन आदमी थे। हथियार के संबंध में अच्छी जानकारी रखते थे। उनके सलाह पर कलकता गई रिवाॅलवर की खरीदारी कर पटना लौट आई।

 सुना है कि हीरामन नाम का आदमी आपके घर में काम करता था। उसी के  बात व्यवहार हाव भाव  वेश-भूषा  को केन्द्रित कर तीसरी कसम कहानी लिखी  थी उन्होंने । 
तीसरी कसम का हिरामन मेरे घर में काम करने वाला हिरामन से प्रेरित अवश्य है। लेकिन शत-प्रतिशत वही हीरामन नही है। मेरे  घर के हिरामन से तीसरी कसम के हिरामन की सादगी, मासूमियत और वेश-भूषा को लिया गया है। शेष पूर्णिया के इलाके के किसी गाड़ीबान के चरित्र को मिलाकर तीसरी कसम का हिरामन जीवंत होता है। हिरामन मेरे घर का सबसे विश्वासी आदमी था। वह तीसरी कसम के हिरामन की तरह ही कपड़ा पहनता था। सहज दिल का इंसान था। रेणुजी हजारीबाग गये हुये थे। हीरामन घर में काम कर रहा था। रेणु जी उससे काफी देर तक बाते करते रहे। उसके भोलेपन से प्रभावित होकर तीसरी कसम लिखते वक्त पात्र के रूप में उसका चित्रण किया था। हीरामन मुझे पीसी ही कहता था। मै उसकी मासूमियत और भोलेपन की कायल थी। उसकी इच्छा थी पटना आकर गंगा स्नान की .
क्या यह सच है कि आप ही मैला आंचल की डाक्टर ममता हैं ?
( मुस्कुराते हुए ) हाॅ ! मै ही हूॅ मैला आंचल में डाक्टर ममता। डाक्टर ममता के रूप में मेरी ही छवि को उकेरा है उन्होने।
 आप यहां (औराही हिंगना) में भी मरीजों की सेवा करती थीं ? 
(दरवाजे की ओर इशारा करते हुए)  यह तो बहुत परानी बात हो गई। जब मै यहां रहा करती थी । कुछ दवाईयां रखती थी , किसी को कुछ होता तो दौरा-दौरा चला आता था। इस इलाके में दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं था। यहां जो सबसे नजदीक अस्पताल है, वह फारबिसगंज में था। फारबिसगंज यहां से 20-25 किलोमीटर दूर है। मै डाक्टर तो थी नहीं , नर्सिग सेवा के दरमियान जो ज्ञान हासिल किया था। सीमित सुविधाओं में मरीजों की सेवा करती थी। यहां तो छोटी-छोटी बीमारियों से लोग इलाज के आभाव में मर जाते थे।

आखिर रेणु में क्या खास बात थी कि आप उनसे शादी करने के लिये राजी हो गयीं ?
देखने में वे साधारण लगे थे, लेकिन अस्पताल में असाधारण काम करने के बाद ही रोगी बनकर पहुंचे  थे। उनके अंदर मेरे प्रति विश्वास और आशा  थी। उनके जीने की चाह को भी मैं देखी थी। उनकी चाह को मैने पूरा किया। बााद के दिनों में उन्होने क्या किया और उनके अंदर क्या खास बात थी , यह बताने की जरूरत नहीं है।

 क्या आपको कभी ऐसा लगा कि रेणु के साथ  शादी करके बहुत बड़ी गलती की है ? 
शादी का फैसला मेरा था। मुझे अपने फैसले पर कभी अफसोस नहीं हुआ। वैसे भी सेवाभाव के साथ जीवन यापन करने का फैसला काफी पहले ले चुकी थी।

उमा झुनझुनवाला की कविताएं

उमा झुनझुनवाला

उमा रंगकर्म की दुनिया मे चर्चित उपस्थिति हैं, कविताएं भी लिखती हैं : ई मेल-jhunjhunwala.uma@gmail.com

आखिरी चीख

पूछो ज़रा समाज के
इन ठेकेदारों से….
जब जब गूंजती है चीख़
आसमां में… ट्रक, बस, रेल या
कि गाड़ी मोटर में
सुनसान सड़क के—
किसी किनारे
या किसी झाड़ियों के पीछे
या बंद कमरों की
मज़बूत दीवारों में तड़पती
किसी सीली सी खाट या
अपमानित होती नर्म बिस्तर पे
उन अनगिनत
बेआवाज़ स्त्रीलिंगों की
घुटती चीखों का रंग क्या होता है ….
लाल,  हरा,  नीला….
केसरिया या पीला….
उनका मज़हब कौन सा होता है?…..

अच्छा एक बात बताओ ज़रा….
माँ के दूध का रंग
किस धर्म का होता है?

और बेटियाँ
क्या बापों की नहीं होती…?
वो क्या सिर्फ़ हिन्दू मुसलामान होती हैं ?
बहने सिर्फ़ इसलिए
गुनाहगार होती हैं कि—
वो दूसरे तीसरे मज़हब की होती हैं…
और लड़कियों की तो कोई बिसात ही नहीं
जो अपनी पसंद से
चुन सके जीवन साथी भी
देखो तो तुमने
मुहब्बत को कितनी आसानी से
हिन्दू मुसलमान बना कर
टांग दिया है चौराहे पे
और जननी को
धर्म के हाथों की
बना कर कठपुतली
रख दिया है
अपने घरों की ताक पर

हमारी भावी नस्लें
अपनी ज़िन्दगी के कैनवास पर
नहीं भर पाएंगी कभी
अपनी ख्वाहिशों के रंग
बदरंग जो बना दिया है तुमने
उसे ज़हरीली ज़ात-पात के ब्रश से
अब अल्लाह ही बेहतर जाने
इसका राज़ क्या है
ईश्वर ने भविष्य के गर्भ में
जाने क्या छुपा रखा है
ज़िन्दगी को तो बाँट दिया है
इसने बड़ी सहजता से
इनके खून का रंग क्यूँ नहीं
अलग अलग बनाया है?
कितनी दिक्कतें आती होंगी ना
तुम्हे उन्हें पहचानने में….
‘इसकी माँ की और उसकी बहन’ की
….जब करना होता होगा
जानती हूँ ये बहुत ही पुराना
और घिसापिटा मुहावरा है
हम सब की रगों में बहने वाले
खून का रंग लाल होता है
जनती है जब औरत बच्चा
वो लाल खून में ही सना होता है
बहता है जब लहू रगों से बाहर सड़कों पर
लाल ही होता है
और जब शर्मशार हो रही होती है
कोई भी औरत कहीं भी
उसकी चीख़ का रंग
तुम्हारी माँ की कोख के रंग का होता है
लेकिन इससे फ़र्क ही क्या पड़ता है
चीख़ चाहे जिसकी भी हो
धर्म का काम किसी भी हाल में
कहीं भी नहीं रुकना चाहिए
ईश्वर और अल्लाह के मान सम्मान
और अस्मिता का प्रश्न है
लेकिन याद रखना—
—मेरी आख़िरी चीख़ निर्णयात्मक चीख़ होगी
और इस चीख़ से मेरा गर्भ
हमेशा के लिए बंजर हो जायेगा
फिर तुम और तुम्हारे धर्म-रक्षक
—- सब मिलकर
इस दुनिया को आगे बढ़ाते रहना
——– मेरे बग़ैर
मैं भी तो देखूं
धर्म का झंडा
फिर तुम कैसे उठाये फिरोगे…… !!

तुमने कहा था एक बार

तुमने कहा था एक बार
निर्मल आकाश
निर्मल मौसम
निर्मल मन
——————-निर्मल तुम हम

तुमने कहा था एक बार
मीठे फल
मीठी प्रार्थनाएं
मीठी कारगुज़ारियाँ
———————मीठे हम तुम

मैंने तो बस देखा था
सूना मन
सूना नभ
सूना रब
—————सूने धरती आकाश

मुझे सुनाई दिए कई बार
गूंगे कोलाहल
गूंगी धड़कने
गूंगे शब्द
—————गूंगे तेरे मेरे बोल

मेरे यात्री-सखा”

कैसे हो यात्री…!!

अनजाने शहर में अनजाने लोग
कभी कभी बहुत अपने से लगते हैं….
हम बेख़ौफ़ हो कर वो सारी बाते
उनसे साझा कर लेते हैं
जो अपनों से नहीं कर पाते…
वहाँ अतीत, वर्तमान और भविष्य का डर नहीं रहता…..
पल दो पल का साथ रहता है…..
रोना-हँसना, गुनगुनाना, उदासी,….
सारे भाव रहते हैं…
बस एक दूसरे से प्रेम का भाव नहीं होता….
पल भर के प्यार के बारे में सोचता ही कौन है….

हमारी मुलाकात भी तो ऐसी ही थी…
कभी सुबह काम पर जाते हुए दिख जाते
और कभी लौटते वक़्त….
और कभी कभी नहीं भी…अक्सर छुट्टियों वाले दिन…
तुम बोगी के दरवाज़े पर खामोश खड़े सिगरेट पीते रहते..
कभी दो कभी तीन…
अक्सर अनजाने में गिन ही लेती थी मैं सिगरेट…
और मेरी भी सीट लगभग तय ही हुआ करती थी…
अपना स्टेशन आने तक मैं अक्सर कोई किताब पढ़ती होती
या कोई कविता लिखती होती…
बीच बीच में नज़र तुम पर चली ही जाती…
तुम अपने ख्यालों में मशगुल रहते
कभी कभी हमारी नज़रे आपस में टकरा जाती
और दोनों ही असहज हो फिर से अपने काम में लग जाते…

जाने कितना वक़्त गुज़रा होगा ऐसे ही
एक बार कई दिनों तक मैंने उन पटरियों की सवारी नहीं की
तुम धुंधले से ख्यालों में आते थे ज़रूर
मगर धुंध के साथ ही वापस भी चले जाते
उस दिन सुबह जब मैं बोगी में चढ़ी
तो देखा तुम मेरी वाली सीट पर ही बैठे थे
मुझे देखते ही तुम लगभग मुझपर चिल्ला पड़े–
“कहाँ थी इतने दिनों तक…
तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था रोज़ इसी सीट पर…”

मैं हैरान सी तुम्हे देख रही थी
इन प्रश्नों के लिए कहाँ तैयार थी मैं
और तुम भी अपने इस बर्ताव पर शायद हैरान हो गए थे
तेज़ी से मुझसे नज़रे हटा कर हमेशा की तरह
सिगरेट जला कर दरवाज़े पर खड़े हो गए…
तुम्हारी आँखों से कई प्रश्नों को बहते देखा था मैंने उस रोज़
पहली बार अपने वजूद को धडकते महसूस किया

उस रोज़ तुमने उसके बाद एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा
मैं इसलिए जानती हूँ क्योंकि उस दिन मैं तुम्हे एकटक देख रही थी
हममे फिर कोई बात नहीं हुई
ना ही मैंने बताया कि मैं क्यूँ ग़ायब थी
और नाही फिर तुमने जानना चाहा था उसके बाद
अगले दिन से दरवाज़े का साथी
मेरी बगल वाली सीट पर होने लगा
हममे अब भी कोई बात नहीं होती थी…
ख़ामोशी दोनों को पसंद थी
लेकिन अब तुम मेरी डायरी का हर पन्ना पढने लगे थे
तुम्हारी आँखों में उभरे लाल रेशों में
अपनी परवाह को सुकून पाते देखती फिर मैं

सुनो सखा !!
हम आज भी उतने ही अनजान हैं एक दूसरे के लिए
लेकिन फिर भी मैं तुम्हे उतने ही क़रीब पाती हूँ
जितने आँखों के करीब उसकी दृष्टि…
जितना प्लेटफ़ॉर्म पर लगे शहरों के नाम की तख्ती..
या जितना बोगी का वो दरवाज़ा और वो सीट…
अच्छा है न कि हमारे संबंधो का कोई नाम नहीं…
लेकिन कभी कभी सोचती हूँ
तुम मेरी डायरी के पन्नो की तरह ही हो
अनजान भी……
हमराज़ भी…..
“मेरे यात्री-सखा”


जो तुम चाहो तो

जो तुम चाहो तो
लिख दूँ
सारे जज़्बात…
अपनी छुअन से
इन रिक्त बिन्दुओं में

या चाहो तो
लिख दूँ
सारे अफ़साने…
अपनी आँखों से
तुम्हारी इन आँखों में

या लिख दूँ
अपनी साँसों को
तुम्हारी साँसों पर…
ज्योति बनकर
जलती है जो हमारे बीच में

तुम चाहो तो
इन होठों से लिपटी
खामोशियों को…
लफ़्ज़ दे दूँ
सागर की नीली गहराईयों सी

या फिर
लिख दूँ
तुम्हारे लिए…
इस आसमां पे
सारी उद्घोषणाएँ चाहतों की

जो तुम चाहो
लिख दूँ, बस मुझे—
तुम्हारी जेब में…
रखी हुई वो क़लम दे दो
जिसमें सुनहरी स्याही भरी है

किसलय पंचोली की कविताएं

किसलय पंचोली

ज्ञानोदय, कथादेश, कथन, कथाक्रम, अक्षरपर्व आदि पत्रिकाओं में कवितायें , कहानियां प्रकाशित
संपर्क : ई मेल-kislyapancholi@gmail.com

इस पंद्रह अगस्त को……

इस पंद्रह अगस्त को
वह स्वतंत्र होना चाहती है .

उसके वक्त पर, अपनों के पहरे से.
उसके पहनावे पर, सगों के फतवे  से.

उसके आने-जाने पर, सम्बन्धियों की चौकीदारी से.
उसके शरीर पर, करीबी लोगों की जमींदारी से.

उसके उठने-बैठने पर, घरेलू नुक्ताचीनी से.

उसके मातृत्व पर, पारिवारिक गुंडागर्दी से.
उसके मन पर, कुलीन संस्कारजन्य मनाही से.

वह स्वतंत्र होना चाहती है .
पहरे, फतवे, चौकीदारी, जमींदारी, नुक्ताचीनी, गुंडागर्दी और मनाही से.

घबराइये मत, डरिये मत, चौंकिए मत !

हाँ, इस बार पंद्रह अगस्त को
वह वाकई स्वतंत्र होना चाहती है!

सशक्त नारी……

अब वह समझ चुकी है
अपनी क्षमता
तुम न समझना चाहो

यह ‘परेशानी’ तुम्हारी है.

वह जान चुकी है
अपनी शक्ति
तुम जान कर अनजान बनो
यह ‘दिक्क्त’ तुम्हारी है.

वह पा कर रहेगी
उसका समुचित सम्मान
तुम न देना चाहो
यह ‘उलझन’ तुम्हारी है.

वह हो कर रहेगी
जल्द ही सशक्त
तुम अहम ग्रस्त रहो
यह ‘समस्या’ तुम्हारी है.

समय रहते अपनी
परेशानियों, दिककतों, उलझनों, समस्याओं
से ऊपर उठो

वह सशक्त  नारी है !

 आत्मविश्वासी छंद 

अब हम
न रखेंगी
अपने होंठ बंद !

बुहार देंगी
हर छोटी-बड़ी
बदसलूकियों की गंद !

बदलेगा पौरुष
सुन, आधी आबादी के
आत्मविश्वासी छंद !

सेक्सिज़्म भाषा के ढाँचे में नहीं, लेखक के अन्तर्मन में होता है: आख़िरी क़िस्त

शंभु गुप्त

 हिन्दी विश्वविद्यालय  में स्त्री अध्ययन विभाग में  प्रोफ़ेसर. सम्पर्क : ई  मेल- shambhugupt@gmail.com, मोबाइल:  8600552663

सेक्सिज़्म भाषा के ढाँचे में नहीं, तत्वतः लेखक के अन्तर्मन में होता है

पहली क़िस्त पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें :

धूमिल और स्त्री : अर्थात् वक़्त की चैकी पर बैठा अधेड़ मुंशी: पहली क़िस्त

देखने की बात यहाँ यह है कि लोहिया ऐसा तब लिख रहे हैं जब कि स्वदेशी भाषा (हिन्दी) और संस्कृति से उन्हें बेइन्तहा प्यार है और किसी भी हद तक वे उसके समर्थक हैं। उनका तर्क है कि दिल्ली जो ‘‘विश्व-इतिहास की अत्यंत हृदयहीन वेश्या’’ बनी है तो ‘‘इसका सबसे बड़ा कारण भाषा की शक्ति रहा है। किसी भी राजधानी ने इतने लंबे समय तक विदेशी और सामंती भाषा में काम नहीं किया है। गगग वेश्या आम जनता से एक हद तक ही संबंध रखना चाहती थी और इसलिए उसने अपना काम ऐसी भाषा में चलाया जिसे जनता नहीं समझती थी।’’ (राममनोहर लोहिया रचनावली, भाग-8, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लि. नई दिल्ली (प्र. सं. 2008), पृ. 194)। अन्तर्वस्तु के लिहाज़ से तो लोहिया यहाँ एकदम चैकस हैं। लेकिन जो उपमान-विधान उन्होंने बनाया है, वह बेहद आपत्तिजनक है। क्या किसी और उपमान द्वारा यह बात नहीं कही जा सकती थी? और फिर यह भी क्या ज़रूरी है कि बात को किसी अप्रस्तुत-विधान में ही कहा जाए? बात को सीधे-सीधे वर्णनात्मक या अनलंकृत तरीक़े से भी तो कहा जा सकता है। यह कथित काव्यात्मकता ज़बर्दस्ती घुसेड़ने की ज़रूरत भला क्या है? जो हो। लेकिन लोहिया यहाँ पकड़े जाते हैं। एक और बात जो संज्ञान में आती है वह यह है कि लोहिया जब कि स्वदेशी और आम जनता की भाषा में यह सब लिख रहे थे तो स्वदेशी भाषा से काम लेने पर भी यह सैक्सिस्ट उपमान-विधान कहाँ से चला आया? क्या सैक्सिज़्म स्वदेशी भाषा की अन्तस्संरचना में निहित है? आखि़र अनजाने या अचेत भाव से ही सही, पुरुष लेखक की रचनाओं में यह यौनवाद आता कैसे है? क्या यह यों ही स्वभावतः चला आता है? क्या हमारी भाषा की संरचना ही पक्षपातपूर्ण है? अभयकुमार दुबे ने अपने उसी लेख में एक जगह लिखा है ‘‘(क्योंकि उसका मैस्क्युलिन जेंडराइज़ेशन या मर्दानाकरण पहले ही हो चुका है) गगग स्त्री के पक्ष में सोचते और लिखते समय भी अगर सतर्क न रहा जाए तो मर्दाने लिंग में ढली भाषा ही स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है।’’ (वही, पृ. 405 एवं 406)। मेरा ख़याल है कि सारा का सारा दोष भाषा के मत्थे मँढ़ देना एक उचित तार्किकता नहीं है। यह ठीक है कि भाषा मूलतः मर्दाने लिंग में ढली है, वह स्त्री के प्रति दुराग्रहों से भरी है लेकिन यह भी देखा ही तो जाता है कि इसी भाषा में अनेकानेक पुरुष-लेखकों ने स्त्री को पूरा सम्मान और स्पेस देते हुए अपनी रचनाएँ लिखी हैं। निश्चय ही यहाँ उन्हें बेहद सतर्क रहना पड़ा होगा और कोई वैकल्पिक जेंडर-न्यूट्रल या जेंडर समानतामूलक भाषा विकसित की होगी। इसका एक अर्थ यह भी है कि दरअसल सैक्सिज़्म व्यक्ति के अन्तर्मन में निहित होता है। मर्दाने लिंग में ढली भाषा तभी उसे स्वाभाविक लगेगी, जब वह ख़ुद मर्दाना यौन-मानसिकता में ढला होगा। सैक्सिज़्म की जड़ इसी मानसिकता में धँसी होती है। किसी की भाषा तभी सैक्सिस्ट होती है जब उसकी मानसिकता पर सैक्स हावी हो। अतः यह क़तई नहीं माना जा सकता कि कोई पुरुष है तो वह स्त्री के प्रति यौनवादी होगा ही और कोई स्त्री है तो वह पुरुष के प्रति यौनवादी होगी ही। इसे इस तरह सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता। देखना यह होगा कि अपनी वस्तु, अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति तीनों में वह जेंडर के हिसाब से सतर्क और समतामूलकतावादी है या नहीं! क्या लोहिया मर्दाना यौन-मानसिकता में ढले थे? जो हो।

वक़्त की चैकी पर बैठा (और निष्क्रिय) अधेड़ मुंशी
इस सैद्धान्तिकी के आलोक में धूमिल की कविता पर विचार करने पर हम पाते हैं कि उनमें बहुत सारी चीजें गड्डमड्ड हैं। वे, जैसा कि कहा गया, अपनी वस्तु और अन्तर्वस्तु की अभिव्यक्ति के लिए स्त्री-देह के अंगों, उसकी जैविक कार्य-प्रणाली, विभिन्न गतिविधियों इत्यादि को उपमान के रूप में स्तेमाल करते हैं और उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे अपनी बात ज़्यादा प्रभावशाली ढंग से कह पा रहे हैं। धूमिल के इस विशिष्ट शिल्प-विधान के उत्स पर बात की जाए तो इसका असल स्रोत वही है जिसकी ओर विद्यानिवास मिश्र ने संकेत किया था; जिसका कि ऊपर उल्लेख किया गया; हालाँकि एकदम उस अर्थ में नहीं, जिसका तर्क उन्होंने दिया है। विद्यानिवास मिश्र का तर्क था कि ‘‘गगग धूमिल के गाँव वाले मन को बात सीधी तौर पर कहने के लिए लाचारी से इतना आक्रामक होना पड़ा है। गगग जो कवि फरेब से, हर तरह के फरेब से एकदम अफना गया हो वह शहरी नारी गरिमा के फरेब को भी दूर फेंक देता है, गगग’’। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया, विद्यानिवासजी का कहना था कि ‘‘शायद उसका उत्साह विस्थापित है’’ लेकिन उनका यह भी कहना था कि ‘‘उसका ईमान अपनी जगह पर है’’। (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 12)। इस तर्क-शृंखला पर विचार किया जाए तो एक अज़ीबोग़रीब विमर्श पैदा होने लगता है। विद्यानिवास यह तो मानते हैं कि यह नारी-गरिमा के खि़लाफ़ बात है। लेकिन साथ ही यह भी जोड़ देते हैं कि शहरी नारी ही इस तरह की बातों पर उज्र करती है, देहाती औरतों को इससे कोई परेशानी नहीं है। विद्यानिवासजी का आखि़र मन्तव्य क्या है? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि इस तरह की बातों पर ऐतराज़ करना एक तरह का फरेब है और चूँकि देहाती स्त्रियाँ तो सीधी-सादी होती हैं, फरेब शहरी औरतों का ही चरित्रोपलक्षण है अतः वे ही इन पर आपत्ति करती देखी जाती हैं? यानी कि यह जो धूमिल या कोई भी लेखक स्त्री को अपनी अन्तर्वस्तु के उपनिवेश या उपमान या अप्रस्तुत-विधान के रूप में स्तेमाल करता है, वह शहरी स्त्रियों को ही चुभता है, ग्रामीण स्त्रियाँ तो यह सब न तो जानती हैं और जानती भी हों तो उनके लिए यह कोई आपत्ति या आश्चर्यजनक बात नहीं है, यह लगभग उनके रोज़मर्रा जि़न्दगी का हिस्सा है, अत्यन्त स्वाभाविक और सहज उपक्रम है! विद्यानिवास मिश्र के विषय में यह कहा जाता है कि वे अत्यन्त ही लोकवादी थे, लोक/ग्राम्य जीवन में उनकी आत्मा बसती थी। पता नहीं यह कैसा लोकवाद है जो स्त्री को इस क़दर डि-ग्रेड करके चलता है। और फिर यह मानना कि धूमिल या किसी और ने जो किया, वह उसकी गरिमा के खि़लाफ़ नहीं है और वह उसे सह्य है, पूरी तरह पुरुष-मन की गढ़न्त है। स्त्री के बारे में यह पुरुष-मानसिकता का इकतरफ़ा फ़ैसला है। चूँकि गाँव में अभी भी, और आज से चालीस साल पहले तो- जब धूमिल यह सब लिख रहे थे- और भी ज़्यादा सामन्ती माहौल था अतः स्त्री के पास चुप रहने के अलावा और क्या चारा था! इस चुप्पी को उसकी स्वीकृति और यहाँ तक कि गरिमा कहकर परिभाषित करना हद दजेऱ् की चालाकी (अगर कोई ‘धूर्तता’ शब्द को गै़र-साहित्यिक मानने पर कटिबद्ध न हो तो दरअसल धूर्तता) है। विद्यानिवास मिश्र की यह तार्किकता धूमिल को कठघरे से निकालने के बज़ाय और गहरे उसमें धँसा देती है। हो सकता है, धूमिल का ईमान अपनी जगह पर हो और इसके महत्व से किसी को इनकार भला क्यों होगा? लेकिन एक ईमान की आड़ में दूसरी बेईमानी करने की इज़ाज़त तो किसी को नहीं दी जा सकती। जिस तरह से धूमिल स्त्री को लाते हैं, उसके आधार पर निर्विवाद रूप से यह कैसे कहा जा सकता है कि धूमिल के काव्य में काम नहीं है, या कामुकता के प्रति वितृष्णा है? स्त्री सम्बन्धी यौन-बिम्ब क्या काम-भावना के बिना आ सकते हैं। ऊपर लोहिया के सन्दर्भ से यह स्पष्ट किया गया कि इस तरह के बिम्ब या प्रतीक या उपमान तभी आते हैं जब मन पर सैक्सिज़्म हावी होता है। जब मन में स्त्री को लेकर लगभग इसी तरह का चिन्तन-अनुचिन्तन चलता रहता है। ग्रामीण सांस्कारिकता के साथ तो इस मामले में और भी दिक़्कत है क्योंकि उसमें सामन्ती तत्व किसी न किसी रूप में लगातार मौज़ूद रहते हैं। विद्यानिवासजी कहते हैं कि यह कवि फरेब से, हर तरह के फरेब से अफना गया था इसलिए लाचारी में आक्रामक हुआ। लेकिन आक्रामक होने के लिए स्त्री का इस तरह यौनवादी स्तेमाल क्यों? क्या इसलिए कि वह उस समय इस स्थिति में नहीं थी कि आपकी क़लम पकड़ सके और कहीं मिल जाएँ तो आपका भी वही हाल करे जो इधर कुछ स्त्री को निशाना बनाने वाले लेखकों का हुआ। यहाँ नाम लेने की ज़रूरत नहीं है, उनसे सब परिचित हैं। आज तो हालत यह है कि अभी म. गां. अं. हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के ‘हिन्दी का दूसरा समय’ (01-05 फरवरी 2013) के मीडिया वाले सारांश सत्र में एक वक्ता ने जब धूमिल के इस जुमले का किसी प्रसंग में इस्तेमाल किया कि ‘जिसकी पूँछ उठाई, वही मादा निकला’ (‘‘मैंने जिसकी पूँछ उठायी है उसको मादा पाया है।’’-संसद से सड़क तक, पृ. 126) तो विरोध की ऐसी लहर उठी कि वक्ता को तत्काल अपने शब्द वापस लेने पड़े। आज धूमिल की कैसी भी पुनव्र्याख्या कर ली जाए, यह कलंक उन पर लगेगा ही। और फिर उस समय भी क्या और दूसरे कवि नहीं थे, जो फरेब से एकदम अफना गए थे; जैसे कि मुक्तिबोध या रघुवीर सहाय या और बहुत-से अन्य कवि, जिनके यथार्थानुभवों में कई समानताएँ भी हैं, जैसे कि ‘पटकथा’ का यह अंश, जिसकी तुलना मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ (मुक्तिबोध, ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’/भारतीय ज्ञानपीठ) के प्रोसेशन में शामिल विभिन्न सत्तोन्मुख षड्यन्त्रकारियों से की जा सकती है: ‘‘वे सब के सब तिजोरियों के दुभाषिये हैं।/वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।/अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक/हैं। लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।/यानी कि-/कानून की भाषा बोलता हुआ/अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।’’ (वही); इन लोगों का उपमान-विधान स्त्री के यौनिक स्तेमाल से कैसे बचा? क्या इनके सामने भी एकदम वही परिदृश्य नहीं था? आखि़र धूमिल और उनके जैसे कुछ और कवियों को ही स्त्री-देह इतना परेशान क्यों किए थी? इसका उत्तर सिवाय इसके और क्या हो सकता है कि यह दरअसल स्त्री के बाबत हमारी कुल मानसिकता से ही तय होता है कि हमारे लिखे में वह कैसे आएगी और आएगी भी या नहीं? आलोचकों ने धूमिल का बचाव करते हुए और उनकी दूसरी-दूसरी कविताओं का हवाला देते हुए यह सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है कि स्त्री के प्रति धूमिल की दृष्टि वस्तुवादी नहीं है, उनका यह कथन कि औरत एक देह है, ‘‘उपभोक्तावादी सोच से अलग है। जहाँ स्त्री-शरीर एक माल है, वस्तु अथवा माल बेचने का औजार’’ (श्रीराम त्रिपाठी, धूमिल और परवर्ती जनवादी कविता, रंगद्वार प्रकाशन अहमदाबाद/द्वितीय संस्करण, 2002; पृ. 66)। इस सन्दर्भ में धूमिल की ‘नौ मादा कविताएँ’ शृंखला की आठवीं कविता ‘स्त्री’ का हवाला दिया गया है, जिसमें कथित तौर पर धूमिल विज्ञापन में स्त्री के इस्तेमाल पर टिप्पणी करते हैं। (वही; पृ. 67)। यह तो किसी हद तक ठीक है। लेकिन इससे पहले की इन आप्तवाक्यमूलक पंक्तियों की व्याख्या कैसे की जाएगी जिनमें धूमिल वक्तव्य देते हैं कि-
मुझे पता है
स्त्री-
देह के अँधेरे में
बिस्तर की
अराजकता है।
(सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 130)।

क्या यह वक्तव्य स्त्री के बारे में किसी पुरुष का इकतरफ़ा अभिमत नहीं है? यह ठीक है कि इस तरह के विचार-निर्णय के मूल में कवि का आम तौर पर अनुभव किया हुआ यथार्थ और उसका सामान्य पर्यवेक्षण होता है लेकिन देखने की बात यही तो होती है कि कवि अनुभव की हुई बातों को ज्यों का त्यों उल्था कर दे रहा है या उसमें अपनी अन्तर्दृष्टि के कुछ सूत्र भी मिलाकर उसे कोई सम्भावनाशील मोड़ दे दे रहा है या नहीं। कवि की अन्तर्दृष्टि की पहचान और परीक्षा दरअसल इसी बिन्दु पर होती है कि यथार्थ को कोई नया अग्रगामी आयाम वह दे रहा है या नहीं? इस दृष्टि से धूमिल पर विचार करते हैं तो और भी ज़्यादा निराशा होती है क्योंकि प्रतीत यह होता है कि धूमिल समकालीन राजनीति, राज्य-व्यवस्था, उससे जुड़े लोगों, उनकी गतिविधियों और इस सबसे बने परिदृश्य की घनघोर आलोचना करते हैं, उस पर बहुत ही तीखी, चुनौतीपूर्ण और काटकर रख देने वाली टिप्पणियाँ करते हैं, लेकिन ख़ुद कहीं किसी अँधेरे में खड़े कहीं से रोशनी चले आने का इन्तज़ार-भर करते रहते हैं और इस पर तुर्रा यह कि इसे वह ‘सहज’ होना भी कहते हैं-
मैं यहाँ, इस अँधेरे में खड़ा हूँ।
यहीं,
मेरे देश ने
मुझे रोशनी देने को कहा है।          (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 61-62)।
देखा जा सकता है कि देश यहाँ किस तरह अमूर्तता ग्रहण करता जाता है। इसमें कोई शक़ नहीं कि एक व्यक्ति/कवि के तौर पर धूमिल यहाँ व्यवस्था का दंश झेलने को तत्पर हैं लेकिन जबकि आप एक चेतना-सम्पन्न कवि हैं, लोग आपकी तरफ़ एक अन्तर्दृष्टि के लिए टकटकी लगाए खड़े हैं; आप इससे आगे बढ़ने का हौसला ही नहीं दिखाते-
वक्त की चैकी पर बैठे हुए अधेड़
मुंशी की तरह
मैं अपने बहते हुए खून में
तुम्हारे दाँतों की रपट पढ़ता हूँ।                               (वही, 62)।
भगतसिंह पैदा तो हो, लेकिन पड़ौसी के घर में!
धूमिल की विशेषता यह है कि वे जो कुछ देखते हैं, उसे अन्दर तक अनुभव करते हैं। उनके आत्मानुभव और यथार्थ की वास्तविकता लगभग एक है, उसमें कोई विभेद नहीं है। यथार्थ की वास्तविकता और उसके उनके अनुभव के बीच कोई तीसरी चीज नहीं है। इसीलिए दरअसल ऐसा हुआ है कि वे आम को आम और चाकू को चाकू कह सके हैं। आम को आम और चाकू को चाकू कह सकना एक कवि की सबसे बड़ी सहजता कही जा सकती है-
मैं चाहता हूँ मैं वह सब कुछ
अनुभव करूँ जो कुछ देखता हूँ।
मैं साहस नहीं चाहता
मैं सहज होना चाहता हूँ
ताकि आम को आम
और चाकू को चाकू कह सकूँ!                                 (वही, 61)।
आम को आम और चाकू को चाकू कह सकना उस समय आसान नहीं था और समय की यह एक भारी ज़रूरत थी। यह एक चुनौती थी जिसे धूमिल ने न केवल स्वीकार किया बल्कि उसे एक उल्लेखनीय मुक़ाम तक पहुँचाया भी। लेकिन कवि की सहजता के अन्तर्गत यह भी आता है और नहीं आता तो आना चाहिए कि उसके पास आने वाले समय का, समय की सम्भावनाओं का एक नक़्शा/ब्लू प्रिंट भी हो। धूमिल यहाँ मात खाते हैं। वे लगभग इस शैली में बात करते हैं कि भगत सिंह पैदा तो हो, लेकिन मेरे नहीं, पड़ौसी के घर में! वे ख़ुद कुछ पहल करने की स्थिति में नहीं हैं, सिर्फ़ दूसरों को ललकारने में उनकी शक्ति लगी रहती है-
गगग अपनी दुविधाओं में
लहूलुहान एक गद्दीनशीन औरत
टाँगों में धमाका दबाए बैठी है
और सारा हिन्दुस्तान
जबड़े में भिंची हुई
कलेजी की तरह बमक रहा है
क्या तुम निहत्थे हो?                                         (वही, 68)।

जैविक तत्ववाद का ज़बर्दस्त अभ्यास अर्थात् धूमिल का सैक्सिस्ट देहाती माइंड-सेट

इस कविता में धूमिल नक्सलवाद के न केवल समर्थक/सिम्पैथाइज़र, बल्कि एक निगूढ़ प्रवक्ता की तरह पेश आते हैं। बाद की उनकी बहुत-सी कविताओं में उनका यह रूप हमें देखने को मिलता है। आलोचकों ने उनके इस पक्ष की सराहना भी ख़ूब की है। लेकिन मेरा ऐसा ख़याल है कि धूमिल में नक्सलवाद एक आवेगी वैचारिकता की तरह आयत्त होता है। मूलतः वैचारिकता आवेगी नहीं होती, उसका स्वरूप चिन्तनपरक और दर्शनात्मक ही होता है। लेकिन धूमिल चूँकि आधारभूत रूप से एक आवेगी कवि हैं अतः अन्य विचारों के साथ नक्सलवाद भी एक आवेग की तरह ही उनकी कविताओं में आता है। यह आवेगशीलता बहुत आकर्षक और टटकी है तो इसके कई पाश्र्व ऐसे भी हैं जो सारे किए-कराए पर पानी फेर देते हैं। जैसे कि यदि इसी अंश में देखा जाए तो जिस ‘औरत’ का जि़क्र यहाँ किया गया है, वह औरत बाद में है, एक डरा हुआ तानाशाह पहले, बल्कि मूलतः है। यह कोई पुरुष भी हो सकता था। जिस औरत का जि़क्र यहाँ है, वह अपने औरतपन से काफ़ी पहले पीछा छुड़ा चुकी थी और अब वह सिर्फ़ एक शासक-वर्ग की नेता थी। भारतीय राजनीति का यह समय बहुत ही नाकस रहा है। लोकतन्त्र के संसाधनों से ही लोकतन्त्र के संसाधनों को ही जिस तरह से नेस्तनाबूद किया गया, वह अपने-आप में एक हौलनाक परिदृश्य था। इस स्थिति पर हिन्दी के उस समय के बहुत-सारे कवियों-लेखकों ने क़लम चलायी। बाबा नागार्जन की कविताएँ इस सन्दर्भ में याद की जा सकती हैं। लेकिन धूमिल ‘औरत टाँगों में धमाका दबाए बैठी है’ जैसा सैक्सिस्ट बिम्ब लाकर सारा ध्यान दूसरी जगह भटका देते हैं। पाठक चाहे स्त्री हो या पुरुश, उसका ध्यान सबसे पहले इसी जगह जाता है और अटका रह जाता है। ‘सारा हिन्दुस्तान जबड़े में भिंची हुई कलेजी’ के बिम्ब में जो तेजी, तुर्शी और प्रहारात्मकता थी, उसे इस यौनवादी बिम्ब ने मटियामेट कर दिया और पाठक भौंचक देखता रह जाता है कि कवि ने आखि़र यह किया क्या? इसके अलावा एक बात यह भी उसके दिमाग़ में आती है कि नक्सलवाद की कवि की यह कैसी समझ है कि वह एक राजनीतिक तानाशाह को जैविक तत्ववाद की निगाह से देख रहा है! धूमिल इस जैविक तत्ववाद के इतने ज़्यादा अभ्यस्त हैं कि लगभग हर जगह यह एक स्वाभाविक संस्कार की तरह उनके सिर चढ़कर बोलने लगता है। यह दरअसल स्त्री के प्रति एक ख़ास कि़स्म का देहाती ‘माइंड-सेट’ है, जो सैक्सिस्ट है, सैक्स से शुरू होकर सैक्स पर ही ख़त्म होता है। यहाँ यह सवाल नहीं है कि जैसा कि विद्यानिवासजी ने बहस उठाई थी कि धूमिल के काव्य में काम है कि नहीं है या कामुकता के प्रति वितृष्णा है या नहीं है। हो सकता है कि वहाँ काम न हो, कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा हो; लेकिन ऐसा भला कैसे हो सकता है कि आप लगातार यौन-प्रतीक और बिम्ब लाएँ और कहें कि नहीं, कामुकता से इसका कोई लेना-देना नहीं। हो सकता है कि आपका न हो, लेकिन पाठक तो पाठ और भाषा से ही आप तक पहुँचेगा, क्या आप उसे मना करने आएँगे कि भाई, इसका यह अर्थ मत लेना जो यहाँ निकल रहा है, बल्कि मैं बताउँगा कि क्या अर्थ लेना है! लेकिन यह सब दरअसल एक ख़ामख़याली है। असल बात यह है कि कवि ख़ुद यह चाहता है कि इसका यही अर्थ लिया जाए! वह स्वयं यथार्थ को इस तरह पेश कर रहा है कि वह इतना ही अश्लील और भदेस है, जितना उसका यह उपमान! इस पर ऊपर हमने बात की। यानी कि कवि मूलतः यह मानता है कि स्त्री पर्याय है यौन का और यौन का अर्थ है, अश्लीलता! इस तरह दुनिया-भर का सारा बोझ आप औरत के कन्धों पर डाल देते हैं और उस पर अबोधता यह कि आप कहते हैं कि मैं तो कामुकता से कोसों दूर हूँ। होंगे आप दूर, व्यक्तिगत तौर पर आप काम से परहेज़ भी करते होंगे लेकिन आपका अन्तर्मन तो वहीं चक्कर काटता रहता है, जब भी आप कुछ लिखने का मन बनाते हैं, आपका यह अन्तर्मन आपकी अभिव्यक्ति पर क़ब्ज़ा कर लेता है। धूमिल का यह दरअसल सबसे बड़ा अन्तर्विरोध है कि वे ख़ुद कामुकता से बहुत-बहुत दूर हैं लेकिन उनकी कविता बरबस इसी में अपनी सार्थकता तलाशती है। निश्चय ही, जैसा कि मैंने कहा, यथार्थ-निरूपण की कवि की क्षमता में कहीं कोई कमी नहीं है, पर यह यथार्थ विरूपित और अन्यथाकृत होकर पाठक तक पहुँचता है। जहाँ धूमिल स्त्री को उपमान की तरह नहीं लाते, उसका वस्तुकरण नहीं करते, उसे एक जीते-जागते अस्तित्ववान व्यक्ति के रूप में/मुख्य विषयवस्तु के रूप में लाते हैं, वहाँ वे बहुत ही संयत और दृष्टि-सम्पन्न रूप में सामने आते

हैं।
धूमिल की काव्य-प्रविधि अर्थात् प्रकरी-पताका रूप में स्त्री
धूमिल के पास ऐसी बहुत-सी कविताएँ हैं, जिनमें स्त्री एक स्वायत्त काव्यवस्तु के रूप में आती है। धूमिल ने आधारभूत रूप में भी इस काव्यवस्तु को लिया है और इस पर केन्द्रित कुछ स्वतन्त्र कविताएँ लिखी हैं। इसके अलावा अन्य विषय-सन्दर्भ-केन्द्री कविताओं में भी प्रसंगवश इस मुद्दे को लिया है और नायाब टिप्पणियाँ की हैं। इनमें एक अतिमहत्वपूर्ण विषय तो यही है कि भारतीय-विशेषतः हिन्दू-समाज में औरत की वास्तविक स्थिति क्या व कैसी है। इस मामले में धूमिल एकदम बेबाक और दो-टूक हैं। इस मामले में वे किसी को नहीं बख़्शते; यहाँ तक कि ख़ुद को भी, अपने कथित पुरखों को भी, समाज के ठेकेदारों को भी। ‘नौ मादा कविताएँ’ की पाँचवीं कड़ी ‘पाँचवें पुरखे की कथा’ में वे लिखते हैं-
उनके लिए पूजा-पाठ:
केवल ढकोसला था
ऐसे अहिंसक कि-
उनकी बन्दूक में
बया का घोंसला था

ऐसे थे संयमी कि-
औरत जो एक बार
जाँघ से उतर गई
उनके लिए मर गई
चतुरी चमार की
लटुरी पतौह को                       (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 124)।
यहाँ जाति और जेंडर के अन्तर्सम्बन्ध देखे जा सकते हैं, जहाँ दलित जातियों की स्त्रियाँ सदियों से कथित उच्च वर्ण-विशेषतः ब्राह्मण-के पुरुषों के निशाने पर रहती आई हैं। इसी तरह वर्ग और जेंडर के अन्तर्सम्बन्धों का खुलासा इन पंक्तियों में होता है-
यह जानकर कि तुम्हारी मातृभाषा
उस महरी की तरह है, जो
महाजन के साथ रात-भर
सोने के लिए
एक साड़ी पर राज़ी है                       (संसद से सड़क तक, पृ. 13)।
यहाँ बेशक़ धूमिल उपमान-विधान में सैक्सिस्ट हैं और व्यंग्य की उनकी धार नैगेटिव है क्योंकि यह महरी एक साड़ी के एवज़ में यह सब करने के लिए ख़ुद राज़ी नहीं है, उसके सामने ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न की गई हैं कि ऐसा करने के लिए वह विवश है। कोई भी स्त्री यदि उसके सामने कोई और विकल्प होता है तो इस विकल्प को कदापि नहीं चुनती। वह ख़ुद राज़ी है, यह कहने का अर्थ तो यह होता है कि इस तरह बिक जाना स्त्री-मात्र की आम प्रवृत्ति है और वह मूलभूत रूप से ऐसी होती है। धूमिल अन्यत्र कहीं ऐसा कहते भी हैं। बावज़ूद इस सब के यह बिम्ब-जिसे कि यहाँ उपमान के रूप में लाया गया है-महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय इसलिए है कि इसके मार्फ़त धूमिल अपने अनजाने स्त्री-सम्बन्धी एक भीषण यथार्थ को उजागर कर सके हैं। जैसी कि धूमिल की काव्य-प्रविधि है, स्त्री का यह यथार्थ उनका मूल कथ्य नहीं है, यह एक प्रकरी-पताका ही है, लेकिन जिस रूप में भी है, वस्तुगत रूप से हमारे काम का है।

धूमिल का प्रिय विषय: दाम्पत्य अर्थात् अतृप्त यौन-संवेदना का परावर्तन

आम हिन्दू दाम्पत्य पर धूमिल की काव्यात्मक टिप्पणियाँ इतनी मारक और काटकर रख देने वाली हैं कि ताज़्ज़ुब होता है कि यह कवि इन अनुभवों को कहाँ से लाया! हो सकता है, इनमें उनके अपने व्यक्तिगत जीवनानुभव भी शामिल हों। और न भी हों तो इतना तो निश्चित है कि कवि की पर्यवेक्षण-शक्ति इतनी तीव्र और मर्मभेदी है कि वह सिर्फ़ असलियत को निकालकर बाहर लाती है। हिन्दी के आम कवि की तरह दाम्पत्य के इर्द-गिर्द वह कोई ग्लैमर-जिसे दरअसल घटाटोप कहना चाहिए-, नहीं बुनता बल्कि इतने निर्मम और बेलौस तरीक़े से उसे तार-तार करता है कि सहसा विश्वास नहीं होता कि अपने स्थापत्य में स्त्री को खिलौने की तरह बरतता यह कवि उसके प्रति हद दजऱ्े तक सहानुभूतिशील भी है। उसका लगभग यह स्पष्ट और अन्तिम निष्कर्ष है कि भारतीय दाम्पत्य-व्यवस्था में स्त्री के लिए कोई स्वतन्त्र-स्वायत्त स्पेस नहीं है। विद्यानिवास मिश्र की तरह उनके बारे में यह क़तई नहीं कहा जा सकता कि धूमिल के काव्य में काम नहीं है या कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा है। धूमिल के काव्य में काम-भावना है और बहुत ही सघन और प्रकृष्ट रूप में है। कामुकता-दरअसल इसे यौनिकता कहना चाहिए-भी ख़ूब है। हाँ, कह सकते हैं कि लम्पटता नहीं है। नारी की गरिमा जैसे मुहावरे का यहाँ कोई अर्थ नहीं है बल्कि यह वस्तुस्थिति को बरगलाने/अन्यथाकृत करने का एक उपागम है। इसके पीछे मर्दवादी मानसिकता की बू आती है। जो हो। हमें कहना यहाँ यह है कि धूमिल दाम्पत्य में स्त्री की दोयम दजऱ्े की स्थिति से बेहद चिन्तित और परेशान दिखाई देते हैं। वे बार-बार यह दिखाते हैं कि समाज ने औरत की यह क्या हालत कर रखी है कि न वह इधर की है न उधर की। न उसे एक पत्नी के रूप में ही ठीक से रहने दिया गया है, न एक माँ के रूप में ही। एक स्त्री के रूप में तो ख़ैर ठीक से रहने का सवाल ही कहाँ उठता है! हर तरफ़ से जि़न्दगी-भर वह बेहद दबाव में रहती आती है।
धूमिल ने स्त्री को जो अपने अप्रस्तुत-विधान के एक अवयव के रूप में लिया है तो इसकी एक ध्वनि यह भी है कि भारतीय समाज में औरत की हैसियत एक ‘अप्रस्तुत’ की तरह ही है, वह समाज का केन्द्रीय सन्दर्भ नहीं है, मुख्यधारा में नहीं है। ध्यान रहे कि हम कविता में एक अप्रस्तुत की तरह स्त्री के स्तेमाल के औचित्य पर विचार नहीं कर रहे हैं, सिर्फ़ धूमिल के सन्दर्भ में उसकी कैफि़यत की सम्भावनाओं पर बात कर रहे हैं। धूमिल को यह दुनिया जैसी मिली, उसमें उसने कोई तब्दीली नहीं की, तब्दीली करने की इच्छा उसकी रही होगी लेकिन उसने ख़ुद को इस पर रिएक्ट करने, इसकी लानत-मलामत करने, इसकी बखिया उधेड़ने तक सीमित रखा; यह ऊपर हम कह चुके हैं। यह काम भी हालाँकि कोई कम महत्व का नहीं था। यह काम समय की ज़रूरत थी। धूमिल की उल्लेखनीयता यह है कि उसने इसे एक ऐसी ऊँचाई तक पहुँचाया कि बहुत-सारे कवि स्वतः उसके आगे फीके पड़ गए। ‘आलोचनात्मक यथार्थवाद’ धूमिल की सीमा भी रही और शक्ति भी। इसका कारण शायद यह रहा हो कि एक ग़ज़ब तटस्थता या कहें कि यथातथता धूमिल में पाई जाती है जो पर्यवेक्षणात्मक आनुभविकता से आगे उन्हें नहीं बढ़ने देती। सम्भवतः इसीलिए ज़्यादातर वे ग़ुस्से, तानाक़शी, लानत भेजने, चोट पहुँचाने जैसी मानसिकता में देखे जाते हैं। इसका काव्यात्मक प्रतिफल यह हुआ कि यथार्थ बहुविध और बहुआयामी रूप में उभरकर सामने आया। वस्तुस्थिति बहुत मारक और लगभग संहारक प्ररूप में नमूदार हुई। जैसे कि शायद ही किसी हिन्दी-कवि के यहाँ ऐसी पंक्तियाँ मिलेंगी-
नेकर में नाड़े-सी पड़ी हुई पत्नी का प्यार
रिश्तों की तगार में ऊँघती हुई
एक खास और घरेलू किस्म की थू
आक् !                                (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 26)।
धूमिल बहुत निर्मम तरीक़े से एक परम्परागत समाज में पति-पत्नी के कथित प्यार की वास्तविक अन्दरूनी तहों को खोलते हैं और देखते हैं कि प्यार के नाम पर वहाँ केवल स्त्री का उपनिवेशीकरण है-
प्यार-
मैं। सुनता हूँ खून में
अन्धाकुप का साइरन अपनी शिराओं में
सुनता हूँ मगर नहीं जानता-
यह साइरन
अन्धाकुप खुलने का है या शुरू
होने का। मैं प्यार को नहीं जानता।
सिर्फ जानता हूँ कि हम दोनों
ज्यादातर चुप हैं या जब भी हम बोलते हैं
मेरे शब्द तुम्हारे शब्दों को
ढक लेते हैं।                              (वही, पृ. 128)।

यह कितना विचित्र है कि भारतीय-विशेषतः देहाती-परिदृश्य में पति-पत्नी का प्यार इकतरफ़ा क्रिया है। कुछ इस तरह का दृश्य है कि स्त्री यहाँ अकर्मक क्रिया की तरह है। वह ऐक्टिव नहीं पैसिव रूप में ही है। सक्रियता सिर्फ़ पुरुष के हिस्से में है। ज़रा सोचा जाए कि कालान्तर में इस इकतरफ़ापन के क्या-क्या नतीज़े सामने आ सकते हैं? इसके कम से कम चार नतीज़े तो ख़ुद धूमिल ने ही गिनाए हैं, जो उनकी ‘गृहस्थी: चार आयाम’ कविता में निबद्ध हैं। इनमें पहले दो आयाम तो ये हैं-
1.    स्त्री का उसकी भावनाओं, संवेदनाओं, अन्तरात्मा से रहित होकर  केवल एक देह में तब्दील हो आना (कल सुनना मुझे, पृ. 81),
2.    स्त्री का धीरे-धीरे सारी क्रिया के प्रति उदासीन और रुचिहीनता की स्थिति में पहुँच जाना। (वही)।
और बाक़ी के दो आयाम ये-
3.    पुरुष का भी इस स्थिति से संक्रमित हो आना; दोनों के बीच एक बेहिसाब ठसपन पैदा हो आना (रात की प्रतीक्षा में/हमने सारा दिन गुजार दिया है/और अब जब कि रात/आ चुकी है/हम इस गहरे सन्नाटे में/बीमार बिस्तर के सिरहाने बैठकर/किसी स्वस्थ क्षण की/प्रतीक्षा कर रहे हैं) (वही, पृ. 81-82) और;
4.    पति-पत्नी का पूरी तरह एक यौन-मशीन में बदल जाना (न मैंने/न तुमने/ये सभी बच्चे/हमारी मुलाकातों ने जने हैं/हम दोनों तो केवल/इन अबोध जन्मों के/माध्यम बने हैं।) (वही, पृ. 82)।
इसकी एक पाँचवीं स्थिति और है-जि़न्दगी से यौनिकता का हमेशा-हमेशा के लिए तिरोहित हो जाना-‘‘अन्त में हमने तय किया अपनी टाँगें/अब शरीक नहीं करेंगे हम अपनी/दिनचर्या में अपने बिस्तर की/सेहत के लिए/       /प्रार्थना करेंगे/चमड़े की जिल्द में बँधी हुई अपनी मुहब्बत/का मजा/रोजमर्रा के खर्च में जमा करते हुए।’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, पृ. 131)। कोई चाहे तो कह सकता है कि यह प्यार का उदात्तीकरण है या देह की भौतिकता से उठकर जि़न्दगी की आधिभौतिक व्यापकता में उसका रवाँ हो जाना है! जो लोग इस तरह का भ्रम पाले हुए हैं, उन्हें यह वैचारिकता मुबारक़। लेकिन हक़ीक़त यह है कि यह दाम्पत्य का पूरी तरह असफल हो जाना है, इसके अलावा कुछ नहीं। क्योंकि यौनिकता एक ऐसी मूलाधार-भूमि है, जिस पर दाम्पत्य टिका होता है। इस ज़मीन के तिड़कने का अर्थ है, भवन का भरभराकर गिर जाना; हम चाहे उसे कितना भी अन्यथागत रूप में व्याख्यायित करते जाएँ! यह देखकर दुखद आश्चर्य होता है कि परम्परागत समाजों में दाम्पत्य के बिखरने की यह प्रक्रिया विवाह के दिन से ही शुरू हो जाती है। धूमिल की ‘नौ मादा कविताएँ’ की सातवीं कड़ी ‘प्यार’ का यह अंश देखा जाए-‘‘मैं/छोटी-छोटी सुविधाओं के मोर्चों पर/मारा गया/कुल का एक बटा सात/ब्याह के दिन मारा गया मैं/मेरी सुहागरात/उस सितारे की चीख थी/जो सागर में चमकी और बिना किसी/भाषा के बुझ गई।’’ (वही, पृ. 128-29)।
यह सचमुच कितना विचित्र है कि जिस देश में दाम्पत्य को इस क़दर महिमामंडित किया गया हो कि वह सात जन्मों का बन्धन तक कह दिया गया हो, वहाँ पहले ही जनम में पति-पत्नी की यह हालत है! दरअसल सात जन्मों वाली बाध्यता केवल स्त्री के लिए थी, पुरुष के लिए नहीं। और स्त्री की हालत तो हमने देखी ही। पुरुष की स्थिति भी उससे कुछ ज़्यादा बेहतर नहीं है। सामाजिक रूप से वर्चस्व के बावज़ूद पुरुष की यह हालत है! दरअसल दाम्पत्य की गाड़ी समानता, संवेदनशीलता और इन दोनों से पैदा सहअस्तित्व से चलती है। परम्परागत सामाजिकीकरण और सांस्कृतीकरण की प्रथा इसे सामन्ती सम्बन्धों में बदल देती है। यह प्रथा हमारे अनजाने हमारे अन्दर प्रवेश करती है और सारा गुड़-गोबर कर देती है। धूमिल ने हिन्दी-कविता में सम्भवतः पहली बार इस यथार्थ को इस गहराई से पकड़ा। मेरा अनुमान है कि धूमिल के यहाँ यौन प्रतीकों, बिम्बों इत्यादि का जो इतना घटाटोप छाया है, इसी अतृप्त यौन-संवेदना का परावर्तन (पर्वर्जन) है। अन्य शब्दों में इसे यौन-कुंठा भी कहा जा सकता है। एक तरह से धूमिल ख़ुद दाम्पत्य में घुसी सामन्ती सांस्कारिकता से क्षुब्ध दिखाई देते हैं।

नक्सलवादी आन्दोलन में भाग लेती स्त्रियों के बहाने कुछ गतिशील विचार
यह एक सुखद आश्चर्य ही है कि धूमिल अपनी काव्य-यात्रा के क्रम में ही अपनी इस कुंठा को काबू में करते हैं और नक्सलवादी आन्दोलन में भाग लेती आदिवासी या और दूसरी स्त्रियों के बहाने स्त्री के प्रति अपने गतिशील विचारों को प्रकाश में लाते हैं। अब यह जाँचने या मापने का साहित्येतर कोई पैमाना हमारे पास नहीं है कि सचमुच धूमिल अपनी कुंठाओं से उबर पाए थे या नहीं या नक्सलवाद जैसा डि-क्लास वे हो पाए थे कि नहीं? हिन्दी में एक अज़ीब स्थिति यह पाई जाती है कि आप मंच पर अच्छा-अच्छा बोलते चलिए, अच्छी-अच्छी धाँसू क्रान्तिकारी कविताएँ लिखते चलिए, जुलूसों में गला फाड़-फाड़कर नारे लगाते चलिए लेकिन जब कतल की रात आए तो चुपचाप अपने दड़बे में घुस जाइये या आप लाख ढूँढ़ने पर भी कहीं न मिलें तो अगले दिन पता चले कि आप तो दूसरे शिविर में अपने कुछ सजातियों के साथ बैठे चमगोइयाँ करते देखे गए थे! अमूमन यह देखने-सुनने में आया है कि वे लोग जिन्होंने स्त्री की स्वतन्त्रता, स्वायत्तता, आत्मनिर्भरता इत्यादि पर शानदार कविताएँ लिखी हैं, लेख लिखे हैं, घर पहुँचते ही शराब या शक़ के नशे में पत्नी को पीटते-प्रताडि़त करते पाए गए हैं। स्त्री व्यावहारिक तौर पर कभी भी स्वतन्त्रता-योग्य उन्हें नहीं लगी! अपने मर्दवाद को वे कभी भी जीत नहीं पाए। साहित्य ही नहीं प्रायः हर कला-क्षेत्र में ऐसी विभूतियाँ देखने को मिलेंगी। प्रसिद्ध कथाकार सुधा अरोड़ा ने अपने एक लेख ‘कलाकार के सौ गुनाह माफ हैं’ (आम औरत: जिंदा सवाल; सामयिक प्रकाशन, न. दि. 2009; पृ.129-132) में नामज़द रूप से उदाहरण सहित इसके ब्यौरे दिए हैं। और कुछ नहीं तो चुप्पी और उपेक्षा-अवहेलना की हिंसा से तो आप उसे क़ाबू में कर ही सकते हैं। ‘सेंस आॅफ नाॅन बिलांगिंग’ और ‘चुप्पी की हिंसा’ एक ऐसा हथियार है, जिससे अच्छी से अच्छी पढ़ी-लिखी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और दमदार महिला को भी आप नाकों चने चबवा सकते हैं। या तो वह आपसे पीछा छुड़ाकर भाग जाए या आपकी बाँदी बन जाए; दोनों स्थितियों में आपका ही आपका फायदा है। (द्रष्टव्य, सुधा अरोड़ा का ‘जिसके निशान नहीं दिखते… मानसिक प्रताड़ना के खिलाफ’ शीर्षक लेख, वही, पृ. 147-65)। मुझे नहीं मालूम कि धूमिल ऐसे थे कि नहीं, उनकी कविताओं से तो यही लगता है कि स्त्री की इस दोयमता से वे बहुत परेशान थे और उनका विचार था कि स्त्री अपनी मादा सीमाओं और असुरक्षा-बोध से ऊपर उठ ले तो उसके सामने एक नई और बेहतर दुनिया खुल सकती है। जैसे कि कुमारी रोशनारा बेगम की आत्म कुर्बानी के वाक़ये पर लिखी अपनी कविता ‘आतिश के अनार-सी वह लड़की’ में एक जगह वे लिखते हैं-
मुमकिन था यह भी कि अपने देशवासियों की गरीबी से
साढ़े तीन हाथ अलग हटकर
एक लड़की अपने प्रेमी का सिर छाती पर रखकर
सो रहती देह के अँधेरे में
अपनी समझ और अपने सपनों के बीच

मुमकिन यह भी था कि थोड़ी-सी मेंहदी और
एक अदद ओढ़नी का लोभ
लाल तिकोने के खि़लाफ़ बोलता जिहाद
और अपने ‘वैनिटी बैग’ में छोड़कर बच्चों की एक लम्बी फेहरिस्त
एक दिन चुपचाप कब्र में सो जाती हौवा की इंकलाबी औलाद
(कल सुनना मुझे, पृ. 58)।

इन पंक्तियों के बीच यह अंश और आता है-‘‘मैं उसे कुछ भी न कहता सिर्फ कविता का दरवाज़ा/उसके लिए बन्द रहता लेकिन क्या समय भी उसे/यूँ ही छोड़ देता ?/      /वह उसके चुम्बन के साथ बारूद से जले हुए गोश्त का/एक सड़ा हुआ टुकड़ा जोड़ देता/और हवा में टाँग देता उसके लिए/एक असंसदीय शब्द-नीच !’’ (वही)। यानी कि जिसका जूता उसी का सिर! समय यानी कि समाज और उसकी परम्परा। पहले तो स्त्री को यही उसका कर्तव्य-कर्म और आदर्श बता-बताकर यहीं तक सीमित कर दिया कि वह सिंगारदान, आईने, केश-सज्जा यानी कि देह-केन्द्रिकता में फँसी रहे (वही, पृ. 59), और फिर इसी देह-केन्द्रिकता के आधार पर उसका अवमाननीकरण (डि-ग्रेडेशन)! यह हमारे यहाँ ही है कि पहले तो स्त्री को उसकी दैहिकता में गौरवान्वित और महिमामंडित किया और फिर उसी देह के चलते उसका उपनिवेशीकरण हुआ! धूमिल की एक और कविता है-‘कल’। इस कविता में वे इस प्रक्रिया पर इस तरह प्रकाश डालते हैं-‘‘कल तुम ज़मीन पर पड़ी होगी और बसन्त पेड़ पर होगा/नीमतल्ला, बेलियाघाट, जोड़बगान/फूलों की मृत्यु से उदास फूलदान/और उगलदान में कोई फर्क नहीं होगा।’’ (वही, पृ. 78)। फूलदान से उगलदान बन जाना; कुल यही नियति भारतीय समाज ने स्त्री को दी है। धूमिल कथित तौर पर इसका निषेध करते हैं और एक ज़्यादा खुला आसमान उसके लिए उपस्थित घोषित करते हैं। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि अब जनता को ही नहीं कविता को भी अपनी मुक्ति का एक शानदार रास्ता मिल गया है-
जैसे वह आदिवासी औरत झाड़ी की ओट से
जलते हुए झोंपड़ों को देखती उतरती चली गई
वो जंगली ढलान-
जहाँ फौरी कार्रवाई के लिए हमलावर दस्ता
पेटियाँ कस रहा था।
इसके बाद
तुम जानते ही हो शब्द शस्त्र बन गए हैं
और अगवा बन्दूक की निशानदेही पर
कविता ने ढूँढ़ लिया है अपनी मुक्ति का रास्ता
दुश्मन की छाती के खून भरे छेद से ।         (सुदामा पाँडे़ का प्रजातन्त्र, पृ. 76-77)।

वामपंथी विचार का आवश्यक चरण: जेंडर-संवेदनशीलता
यह तो ठीक है। लेकिन रोशनआरा बेगम के लिए लिखी कविता में धूमिल आदतन फिर कुछ ऐसे भाषा-प्रयोगों से बच नहीं पाए हैं, जो स्त्री के प्रति पुरुष की एक ख़ास मानसिकता से पैदा होते हैं। जैसे यह कि ‘‘बाबुल के देश का चुटिहल धड़कता हुआ टुकड़ा था सीने में’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 57) या जैसे यह कि ‘‘एक हाथ जो नाजुक जरूर था’’ (वही) या यह कि ‘‘और लोग चकित थे देखकर कि एक नंहा गुलाब’’ (वही, पृ. 58) या यह कि ‘‘बीस सेबों की मिठास से भरा हुआ यौवन’’ (वही, पृ. 59)। ये शब्द-प्रयोग उसी जैविक तत्ववाद के प्रतीक हैं, जिसका यहाँ ऊपर हमने जि़क्र किया और जिससे धूमिल जीवन-भर मुक्त नहीं हो पाए। सम्भवतः जिस माहौल में वे थे, इनसे मुक्त हो सकते नहीं थे। जहाँ तक सतर्क रहे आने(अ. कु. दु.) की बात है तो कम से कम धूमिल से तो यह उम्मीद करना बेकार है। यहाँ ध्यान देने की बात एक यह भी है कि यदि नक्सलवाद या (मोटे तौर पर) वामपंथी विचारधारा को मात्र लबादे या दिखावटी आवेग की तरह ओढ़ा न जाए और सचमुच में इसे आत्मसात् किया जाए तो इस आत्मसात्करण की प्रक्रिया का एक आवश्यक चरएा है- जेंडर-सेंसिटाइज़ेशन यानी जेंडर-सचेतनता या संवेदनशीलता। नक्सलवादी सन्दर्भों पर कविता लिखते समय भी यदि कोई भाषा के मर्दवादी ढाँचे के प्रति सतर्क नहीं है तो इसका सिवाय इसके और क्या अर्थ हो सकता है कि कवि अपने स्वयं के कठघरों से मुक्त नहीं हो पाया है और उसकी यह काव्यगत वैचारिकता सिर्फ़ एक शाब्दिक कलाकारी है। यह बात धूमिल ही नहीं, हिन्दी के और भी कई नामचीन कवियों के बाबत जाँचने योग्य है।

धूमिल और स्त्री : अर्थात् वक़्त की चैकी पर बैठा अधेड़ मुंशी: पहली क़िस्त

शंभु गुप्त

 हिन्दी विश्वविद्यालय  में स्त्री अध्ययन  विभाग में  प्रोफ़ेसर.  सम्पर्क : ई  मेल- shambhugupt@gmail.com, मोबाइल:  8600552663

काव्य-सृजन की प्रक्रिया में लिंग-भेद की भूमिका

कविता में स्त्री अमूमन इन तीन रूपों में आती देखी जाती है-
1. कविता की मूल वस्तु, केन्द्रीय कथ्य के रूप में।
2. उपनिवेश/उपजीव्य के रूप में; और
3. अप्रस्तुत-विधान के रूप में।

किन्तु कविता में उपस्थित होने वाले इन तीनों रूपों पर चर्चा किए जाने से पहले जिस चीज पर हमारा ध्यान जाता है, या जाना चाहिए, वह यह है कि लिखने वाला कवि है या कवियित्री। यानी स्त्री है या पुरुष। काव्य-सृजन की प्रक्रिया में रचनाकार का लिंग- जिसे ‘जेंडर’ कहा जाता है- बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। यह बात कुछ लोगों को नाग़वार गुज़र सकती है, लेकिन यह एक बहुत बड़ा सच है कि साहित्य-सृजन की प्रक्रिया में लिंग-भेद की अनिवार्य और अपरिहार्य भूमिका होती है। दलित साहित्य में जिस तरह से लम्बे समय से यह बहस चल रही है कि दलित जाति में जन्मा व्यक्ति ही एक सही और प्रामाणिक और गतिशील दलित साहित्य लिख सकता है, वैसी बहस स्त्री-साहित्य में देखने को हालाँकि नहीं मिलती; यहाँ तक कि हिन्दी में स्त्री-साहित्य जैसी कोई कोटि अभी तक बन नहीं पायी है। हिन्दी की स्त्री लेखिकाएँ ही इसका सबसे ज़्यादा विरोध करती देखी गई हैं। उनका कहना है कि लेखक लेखक होता है, स्त्री या पुरुष नहीं होता। जो हो। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लैंगिकता सृजनात्मक लेखन के स्वरूप-निर्धारण में सबसे ज़्यादा विस्तृत और गहरी भूमिका निभाती है। यदि मुक्तिबोध का सन्दर्भ लिया जाए तो मुक्तिबोध जिसे कला का पहला और दूसरा क्षण कहते हैं, वे यहाँ सबसे ज़्यादा सक्रिय रहते हैं। तीसरा क्षण एक जैसा हो सकता है, हालाँकि यहाँ भी लिंग (सेक्स) और जेंडर दोनों कहीं न कहीं सक्रिय रहते हैं। कविता की संरचना और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर यह सक्रियता देखी जा सकती है। (द्रष्टव्यः गजानन माधव मुक्तिबोध; एक साहित्यिक की डायरी/भारतीय ज्ञानपीठ/में ‘कला का तीसरा क्षण’ शीर्षक लेख)।

 चूँकि एक दलित में और एक सवर्ण में जैविक रूप से कोई प्रभेद नहीं होता, सामाजिक प्रभेद ही होता है अतः जीवनानुभवों के किसी न किसी स्तर पर यह असम्भवता सम्भवता में बदल सकती है। जिस किसी भी दिन अम्बेडकर का सपना पूरा होगा और एक जाति-विहीन समाज बन सकेगा, उस दिन दलित साहित्य की बहुत सारी वर्तमान सौन्दर्यशास्त्रीय अवधारणाएँ अप्रासंगिक हो जाएँगी। लेकिन कायान्तरण का यह नियम स्त्रियों और पुरुषों पर किसी भी तरह लागू नहीं हो सकता क्योंकि जैविक विभेद वहाँ कायान्तरण की इज़ाज़त नहीं देता। कोई लिंग-परिवर्तन करा ले तो अलग बात है, हालाँकि वहाँ भी कायान्तरण नहीं होता, मूलभूत रूप से जैविकता का ही परिवर्तन होता है। अतः जैविकता प्राथमिक तौर पर अनिवार्यतः वहाँ मौज़ूद है। जैविकता रचनाकार के जीवनानुभवों, रचनापरक प्राथमिकताओं, उसकी रचनाओं के वस्तु, दृष्टि और रचना तीनों ही स्तरों के स्वरूप-निर्धारण इत्यादि को एक निश्चित और विशिष्ट दिशा देने में अहम भूमिका निभाती देखी जाती है।

जैविकता और सामाजिकता की अनुपूरकता अर्थात् तू सारे जग से हारी!
यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि इस जैविकता के साथ सामाजिकता स्वभावतः और अनिवार्यतः नत्थी है। तकनीकी तरीक़े से इस बात को इस तरह कह सकते हैं कि स्त्री और पुरुष की अलग-अलग सामाजिकीकरण और सांस्कृतीकरण की प्रक्रिया और प्रविधियाँ इन दोनों की जैविकताओं को आधिभौतिकता प्रदान करती चलती हैं। जैविकता और सामाजिकता दोनों एक-दूसरे की अनुपूरक बनती चली जाती हैं। इन दोनों के बीच अन्तक्र्रिया का सिलसिला चलता है और उसका स्वरूप अनादि, अनन्त और अनित्य जैसा होता है। मूलतः वर्चस्व की वृत्ति स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की पहचान नहीं है, सह-अस्तित्व और सहकार ही उसके अन्तर्वर्ती तत्व हैं। राज्य के अस्तित्व में आने के बाद वर्चस्व की प्रवृत्ति का आविर्भाव होता है और पितृसत्ता उभरकर सामने आती है। सरल शब्दों में कहें तो पुरुष का आधिपत्य और स्त्री की पराधीनता या पुरुष-आश्रितता पितृसत्ता का मूल है। परस्पर सहकार और सह-अस्तित्व के स्थान पर पराधीनता और पराश्रितता जैसे स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की स्वाभाविकता बनती चली गई। परस्पर सहकार और सह-अस्तित्व जैसी चीज़ें अब भी थीं पर पुरुष की शर्तों पर। जैविकता और सामाजिकता दोनों का स्त्री की इस पराधीनता में बराबर का हाथ रहा है, बल्कि विमर्शकारों का एक वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि जैविकता इसके असल मूल में है। इनका कहना है कि चूँकि स्त्री शारीरिक रूप से कमज़ोर और कोमल होती है, उसकी हड्डियाँ/मांसपेशियाँ अपेक्षाकृत कम मज़बूत और कम कठोर होती हैं, उसकी दिनचर्या में ऐसे अनेकानेक क्षण आते हैं जब वह ख़ुद को असहाय स्थिति में पाती है और किसी न किसी के सहारे की ज़रूरत उसे होती है (विशेषतः प्रजनन के प्रक्रम में) अतः उसका पुरुष से एक दर्जा़ नीचे रहना ही लाजि़मी है। विमर्शकारों का यह वर्ग इस तरह ज़ीन के आधार पर स्त्री की दोयमता को तर्कसंगत और स्वाभाविक ठहराता है। जैविकतामूलक यह अवधारणा सामाजिक रूप लेते-लेते इस क़दर अलग-अलग स्तरों पर फलीभूत होने लगती है कि सहअस्तित्वमूलक परस्पर सहकार के स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के मूलाधार सिरे से ग़ायब होने लग जाते हैं। सहअस्तित्वमूलक सहकार के मूलाधारों के ग़ायब होते ही जो चीज उभरकर सामने आती है, वह है, यौनवाद, स्त्री को एक मनुष्य के सम्माननीय आसन से गिराकर एक मादा में तब्दील करते जाना, (यह आकस्मिक नहीं है कि धूमिल स्त्री के लिए ज़्यादातर ‘मादा’ शब्द का स्तेमाल करते हैं।) उसे मात्र एक यौनिक देह के बतौर लेना, उसे ‘अवयव की कोमलता लेकर’ सारे जग से, हर तरह से हार जाने जैसी मनःस्थिति में जकड़ा घोषित करना। (द्रष्टव्यः जयशंकर प्रसाद की कामायनी की यह प्रसिद्ध पंक्ति ‘अवयव की कोमलता लेकर मैं सारे जग से हारी।’)। सब जानते हैं कि यह सब पुरुष-एकाधिकार बल्कि सर्वाधिकार का मामला है, जिसमें स्त्री ‘टेकेन फ़ाॅर ग्रांटेड’ जैसी स्थिति से आगे नहीं जाने दी जाती। समाज में औसतन यही स्थिति हर तरफ़ देखी जाती है। इधर जब से सबाल्टर्न स्टडीज़ का दौर आया है और हाशिया के समाजों की तरफ़ लोगों का ध्यान गया है, तब भी स्त्री की स्थिति में कोई ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ा है। हाँ, इतना ज़रूर हुआ है कि स्त्रियों में  अस्मिता-बोध, प्रतिरोध एवं वैकल्पिकता, संघर्षशीलता इत्यादि का पैमाना बढ़ा और बदला है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि जितना इज़ाफ़ा इन चीजों में हुआ है, इसी के समानान्तर पितृसत्ता और पुरुष-वर्चस्व के नए-नए प्ररूपों-प्रविधियों का आविष्कार और विस्तार भी निरन्तर हुआ है। स्त्री-देह की ही बात करें तो स्त्री-मुक्ति के इस क्रान्तिकारी प्रत्यय को कि ‘यह मेरा शरीर है। इसके बारे में फैसला करने का अधिकार भी मुझे होना चाहिए।’ को भाई लोग ले उड़े और कहा कि अच्छा ठीक है। इस पर तुम्हारा ही अधिकार है और रहेगा। बस तुम इतना और जोड़ दो कि यह मेरा शरीर है, इसका मैं जैसे चाहे इस्तेमाल करुँ। मनचाहा इस्तेमाल किए जाने की बात किसी ने कही नहीं थी, पर 1995 के बीजिंग के अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन की उक्त उद्घोषणा का यही अर्थ पुरुष-मानसिकता ने निकाला। भूमंडलीकरण के दौर में स्त्री के नए सिरे से एक उपभोग्य वस्तु में हद दर्जे तक बदल दिए जाने के पीछे उक्त घोषणा का लगभग यही निर्वचन रहा है।

हिन्दी की नायकवादी प्रेम-कविताएँ और स्त्री


इधर हालाँकि यह हुआ है कि अब कोई कवि स्त्री-देह को धूमिल या राजकमल चैधरी या उन्हीं के जैसे किसी और कवि की तरह अप्रस्तुत-विधान का हिस्सा नहीं बना सकता लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि हिन्दी के पुरुष कवियों में स्त्री का वह स्वतन्त्र और स्वयं-सापेक्ष व्यक्तित्व-निरूपण बहुत ढूँढ़ने पर ही कहीं-कहीं और कभी-कभी ही मिलता है और वह भी आधा-अधूरा ही; जो स्त्री को उसका उपयुक्त दाय दिला सके। ज़्यादातर कवि स्त्री को अपने स्वयं के पुरुष-सन्दर्भ में देखते पाए जाते हैं। यहाँ तक कि उनकी कथित प्रेम-कविताएँ भी ज़्यादातर इकतरफ़ा और आत्मास्फालनमूलक ही हैं। यह सचमुच अज़ीब है कि स्त्री यहाँ या तो ‘साइलेंट’ है या ‘पैसिव’ रूप में निबद्ध है। ऐक्टिव और लाउड केवल पुरुष है, जो कि ‘नायक’ की भूमिका में है। इन कविताओं में स्त्री केवल उपजीव्य रूप में सामने आती है। प्रेम के या और भी जो कोई हों, सर्वाधिकार पुरुष/नायक के पास सुरक्षित हैं। जैसे कि धूमिल की ‘किस्सा जनतन्त्र’ शीर्षक कविता की ये आखि़री पंक्तियाँ हैं-
‘ऐसी क्या हड़बड़ी कि जल्दी में पत्नी को
चूमना-
देखो, फिर भूल गया।’
(कल सुनना मुझे, संस्करण 2003, वाणी, पृ. 53)।

धूमिल पर यह आरोप रहा है कि उसके यहाँ स्त्री एक मज़ाक का, गाली का या अवमानना का पात्र है। मज़ाक, गाली और अवमानना के मार्फ़त उसे वह अपमानित करता है और इस तरह अपनी हताशा, निराशा और हतवीर्यता की कुंठाओं का खुलासा करता है। स्त्री उसके और उसकी पीढ़ी के लिए अपनी कुंठाओं के निरसन के ‘डंपिंग ग्राउण्ड’ के बतौर काम में ली जाती है और बस। इसके आगे वहाँ स्त्री का कोई वज़ूद नहीं। यौन-बिम्बों, प्रतीकों के अप्रस्तुत-विधान के बतौर स्त्री-शरीर वहाँ आता है, जो कि कविता की मूल वस्तु या केन्द्रीय कथ्य नहीं बल्कि एक उदाहरण मात्र होता है और वह भी अपमानजनक। स्त्री-शरीर का इस तरह का उदाहरणात्मक उपस्थापन स्त्री के प्रति पुरुष-रचनाकार के यौनवादी रुझान के अलावा कुछ नहीं। लगभग हर आलोचक ने इसकी अभिव्याख्या लगभग इसी तरह की है जिसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ कहीं धूमिल में स्त्री कविता की मूल या केन्द्रीय वस्तु की तरह आती है, उसे भी इसी भदेस के खत्ते में डाल दिया गया। यह तो लगभग स्पष्ट है कि धूमिल ने, आज जिसे स्त्री-केन्द्री कविताएँ कहा जाता है, वैसी कविताएँ नहीं लिखीं। यह उस समय सम्भव भी नहीं था। हाँ, यह ज़रूर है कि धूमिल जब कभी भी स्त्री को थोड़ा व्यक्ति-रूप में लेते हैं, तब-तब तो कम से कम सही ही वह यौनवाद के अन्तर्गत नहीं आती। मुहावरा भी वहाँ यौनवादी नहीं होता। हालाँकि यह एक तथ्य है कि मुहावरे काव्याभिप्रेत या काव्य की अन्तर्वस्तु भी नहीं होते। काव्य का अभिप्रेत या अन्तर्वस्तु तो हालाँकि उस वक्तव्यात्मकता को भी नहीं माना जा सकता जिसे धूमिल कविता का पर्याय कहते हैं; चाहे वह कितनी भी सार्थक क्यों न हो। एक सार्थकतम वक्तव्य भी कम से कम कविता तभी बनता है, जब उसके अन्तर्तम में जीवन धड़कता हो। वक्तव्यात्मकता भी कुलमिलाकर एक स्थापत्य या प्रविधि ही है जिसके मार्फ़त लेखक यथार्थ की सीढि़याँ फलाँगता है। आलोचना के मुहावरे में कहें तो वक्तव्यात्मकता यथार्थारोहण की एक भंगिमा है जिससे कवि अपने काव्याभिप्रेत के संकेत देते चलने का काम लेता है। वक्तव्य सिर्फ़ एक भंगिमा है, अभिप्रेत नहीं है। धूमिल जब यह कहते हैं कि ‘‘एक सही कविता/पहले/एक सार्थक वक्तव्य होती है।’’ (संसद से सड़क तक) तो इसका अर्थ सम्भवतः यही है कि कविता वक्तव्य नहीं, बल्कि उसका अगला चरण है। धूमिल के सन्दर्भ में ही यदि हम इस तथ्य की पड़ताल करें तो पाएँगे कि वक्तव्य मूल काव्याभिप्रेत तक पहुँचने का, काव्याभिप्रेत से ठीक पहले का सांकेतिक क़दम है। जैसे कि यदि इसी बात को लिया जाए कि काव्यनायक घर से नौकरी पर निकलते वक़्त फिर पत्नी को चूमना भूल गया तो पत्नी को चूमना यहाँ काव्याभिप्रेत नहीं है, हालाँकि यह जीवन का और दिनचर्या का एक बहुत ही स्वाभाविक और ज़रूरी हिस्सा है और इसके बिना जीवन जीवन नहीं, एक निरर्थक भागमभाग भले हो! तो, पत्नी को चूमने की स्वाभाविकता और ज़रूरत के अभाव के मार्फ़त धूमिल इस व्यवस्था में एक निम्न वित्तीय पति-पत्नी की दिनचर्या के व्यर्थता-बोध को सामने लाते हैं कि देखो, किस क़दर इन स्त्री-पुरुषों की जि़न्दगी सुबह से लेकर रात तक केवल अनुत्पादक कार्यों में खप जाती है। पत्नी को चूमना यहाँ एक सांकेतिक भंगिमा है तो मूल काव्यवस्तु का एक अंगीभूत हिस्सा भी है बल्कि मूल काव्यवस्तु का हिस्सा ज़्यादा है। पूरी कविता में भूख और हर तरह की अभावग्रस्तता का जो हैरतअंगेज़ ठसपन फैला है, उसमें प्रेम और दूसरी भावुकताओं के लिए कोई जगह ही नहीं बची रह गई है। इस गृहस्थी में बेतरह खटती इस स्त्री का ध्यान तो सारा इस गणित में लगा है कि इतनी कम रोटियों में सबका पेट आखि़र कैसे भर पाएगा! इस स्थिति के बावज़ूद वह इस सहजता में है कि भावुकता के लिए थोड़ी जगह निकाल सके-‘‘वक्त घड़ी से निकलकर/अँगुली पर आ जाता है और जूता/पैरों में, एक दन्तटूटी कंघी/बालों में गाने लगती है’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 53)। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, इस सदिच्छा का यहाँ कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इसमें कोई नवोन्मेश नहीं है, यह केवल एक ठस दुहराव-भर है। कवि का मूल संकेत शायद इस तरफ़ है कि हिन्दुस्तान के इन भारी अभावग्रस्त निम्न वित्तीय तबक़ों की जि़न्दगी के रस-स्रोत पूरी तरह सूखते जा रहे हैं और उसकी सम्भावनाएँ संकटग्रस्त हैं। आगे इस पर हम और बात करेंगे।

धूमिल पर आरोप और धूमिल का बचाव अर्थात् अन्तर्विरोध पर अन्तर्विरोध
जैसा कि मैंने ऊपर कहा, धूमिल पर हिन्दी-आलोचना का यह एक लगभग सुस्थिर आरोप है कि वह स्त्री-शरीर को, उसके अंग-प्रत्यंगों को अपनी कविता के अप्रस्तुत-विधान की तरह, बिम्बों, प्रतीकों, उपमाओं, उदाहरणों की तरह स्तेमाल करते हैं और इस तरह उसका न केवल अपमान करते हैं बल्कि उसकी एक ग़लत छवि भी पेश करते हैं। ऊपर इस बाबत और भी बातें कही गईं। यह भी कि यह एक मर्दवादी पुरुष-रचनाकार का अश्लील यौनवाद है जो स्त्री-देह को बींधकर तुष्ट होता है। इस आरोप को और आगे फैलाते हुए आलोचकों द्वारा यह भी मन्तव्य प्रकट किया गया कि धूमिल की काव्यभाषा मर्दवादी है और उसमें स्त्री इसी रूप में आ सकती थी; आदि-आदि।

इस सन्दर्भ में कुछ विद्वानों ने धूमिल का बचाव करने और इसकी कोई तर्क-संगति निकालने की कोशिश भी की। ऐसा अनेक लोगों ने किया। ये सारे अभिमत मिलकर भी धूमिल की विशिष्ट काव्यभाषा की उस विषिष्ट स्त्री-सन्दर्भी भंगिमा की अन्दरूनी गाँठ को नहीं सुलझा पाते जो एक तरह की ‘घुरगाँठ’ ही है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘‘समकालीन जीवन की अव्यवस्था की वास्तविकता को पाठकों के गले उतारने के लिए जहाँ उसने राजनीतिक और सामाजिक जीवन के विद्रूप पक्ष को चुना वहीं यौन-जीवन के कुरूप को भी चुना। यदि यौन-जीवन की समस्याओं से घिरा चित्रित करना हो तो नारी को देवी बनाकर तो नहीं किया जा सकता।’’ (गणेश तुलसी अष्टेकर, कठघरे का कवि ‘धूमिल’, पृ. 145)। इसी तरह रामकृपाल पांडेय ने लिखा कि ‘‘धूमिल की कविताओं में यौन-जीवन के चित्र भी यत्र-तत्र मिलते हैं। उन चित्रों में वे चित्र अपने आसपास के जीवन और समाज से लिये गये हैं। समाज में यौन सम्बन्धों की अनेक रूपता है। वहाँ अगर व्यभिचार का दलदल है तो प्यार-स्नेह की सरिता भी है, किन्तु धूमिल ने चित्रण के लिए दलदल को ही चुना। लगता है कि धूमिल जीवन की विकृतियों को उघाड़कर फेंक देना चाहते हैं और अपना असन्तोष-आक्रोश प्रकट करते हुए विद्रोह की आग भड़काना चाहते हैं। अतः यह समझ बैठना कि धूमिल को यौन-विकृतियाँ पसन्द हैं-बहुत बड़ी भूल होगी। वस्तुतः उनके चित्रण के मूल में अस्वीकार का स्वर है, स्वीकार का नहीं। गगग उन्होंने कहीं भी जीवन के उज्ज्वल पक्ष पर चोट नहीं की है, भले ही उसका चित्रण उन्होंने कम किया हो। प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुन्दर और स्वीकार्य पर नहीं, जो मूलतः एक विद्रोही व्यक्तित्व के कवि के लिए सर्वथा स्वाभाविक है।’’ (आलोचना अंक 33, अप्रैल-जून ’75, पृ. 77)।

इस मामले में पं. विद्यानिवास मिश्र का मत सबसे अलग और विचित्र है। उनका मानना है कि यह उसके गँवई या देहाती स्वभाव के चलते आया है। इस तरह की अभिव्यक्तियों पर ऐतराज़ करना शहरी चोंचलेबाज़ी है। दरअसल इस तरह वह स्त्री की गरिमा की ही रक्षा करना चाहता था। मिश्रजी ने धूमिल के तीसरे संग्रह ‘सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र’ (प्रथम संस्करण) की भूमिका में लिखा था-‘‘लोग मुझसे सवाल पूछते हैं कि धूमिल की कविता में यौन प्रतीकों का इस तरह इस्तेमाल क्या आवश्यक है, क्या उचित है? मैं एक ही उत्तर देता हूँ कि शायद धूमिल के गाँव वाले मन को बात सीधी तौर पर कहने के लिए लाचारी से इतना आक्रामक होना पड़ा है। मैं उनकी भाषा का न पक्षधर हूँ न स्त्री के शरीर का इस तरह भाषिक उपयोग करने को काव्योचित मानता हूँ, परन्तु जो कवि फरेब से, हर एक तरह के फरेब से एकदम अफना गया हो वह शहरी नारी­गरिमा के फरेब को भी दूर फेंक देता है, शायद उसका उत्साह विस्थापित है, पर उसका ईमान अपनी जगह पर है और यही बात हमारे लिए महत्वपूर्ण होनी चाहिए। धूमिल के काव्य में काम नहीं है, कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा है। वह पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र की तरह गरिमा के लिए ही कुछ तीखा होना चाहता है।’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, संस्करण 2001, वाणी, पृ. 12)। इससे पहले धूमिल के दूसरे संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ (प्रथम संस्करण) की प्रस्तावना में उन्होंने यह भी लिखा था-‘‘जिन लोगों ने धूमिल की फ़ोश भाषा का बहुत जिक्र किया, उन्हें ऊपर की पंक्तियाँ ध्यान से पढ़नी चाहिए। ख्‘गाँव में कीर्तन’,। दन्तहीन शिशु की किलकारी (अत्यन्त अहिंस्र उत्फुल्लता) ही धूमिल का वास्तविक चित्र है। यौन और ऊपर से बीभत्स लगने वाले बिम्ब, प्रतीक और सादृश्य विधान तो उनकी भाषा को चैखटा देने वाले हाशिया मात्र हैं। धूमिल मन से इतने स्वस्थ थे कि समूची सामाजिक व्यवस्था के अस्वास्थ्य को सह नहीं पाते थे गगग।’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 09)।

इन तीनों अभिमतों से पहली बात जो निकलकर आती है, वह यह है कि धूमिल प्रतिक्रियावश ऐसा करते हैं। स्त्री के प्रति पुरुषवादी यौनवादी दृष्टि उनकी नहीं है, लेकिन चूँकि उन्हें अपने समकालीन राजनैतिक/कथित लोकतान्त्रिक यथार्थ का चित्रण करना है और चूँकि यह राजनैतिक-लोकतान्त्रिक यथार्थ एकदम और लगभग पूरी तरह अश्लील और बेहया हो आया है अतः इसके एकदम सटीक और सही-सही चित्रण के लिए यौनमूलक बिम्बों, प्रतीकों, घटनाओं, उदाहरणों से बेहतर अप्रस्तुत और क्या होगा? इनसे दूसरी बात यह निकलकर आती है कि यौन-जीवन का विद्रूप राजनैतिक और सामाजिक विद्रूप की तरह ही उनकी काव्यवस्तु का अंगीभूत हिस्सा है और उसकी तरफ़ भी प्रमुखता से वे बराबर ध्यान देते चले हैं। और, तीसरी बात जो निकलकर आती है, वह यह कि धूमिल का कुल काव्योद्देश्य यह रहा है कि इस देश का हर तरह का विद्रूप ख़त्म हो और जीवन ख़ुशहाल हो।

प्रस्तुत और अप्रस्तुत के बीच असन्तुलन और असमानता
इन तीनों अभिप्रायों पर एक साथ विचार करने पर शिद्दत से यह महसूस हुए बिना नहीं रहता कि इन तीनों के बीच गहरे अन्तर्विरोध हैं और इनमें से कई बातें एक-दूसरे को काटती चली हैं। जैसे यही कि अपने समकालीन राजनैतिक-सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए; इस नाकस स्थिति में भी कि वह एकदम और लगभग पूरी तरह ‘अश्लील’ और बेहया हो आया हो; यह क्यों ज़रूरी है कि आप स्त्री-यौनिकता को ही अप्रस्तुत की तरह काम में लें? स्त्री-यौनिकता को अपनी कविता के अप्रस्तुत-विधान का हिस्सा बनाते ही कई पेचीदा और अशोभनीय सवाल एक साथ उठ खड़े हो सकते हैं। जैसे कि पहला तो यह कि स्त्री-यौनिकता को क्या आप मूलतः या आधारभूत रूप से एक अश्लीलता-भरा उपक्रम मानते हैं? क्या अश्लीलता या बेहयाई या चालूपन स्त्री-यौनिकता की अन्तर्वस्तु है? क्या हम मूलभूत रूप से यह मानकर चलें कि स्त्रीत्व अश्लीलता, बेहयाई या चालूपन इत्यादि का पर्याय होता है? क्या यह धारणा इस बात की सूचना नहीं देती कि पुरुष-सत्ता का आत्मकेन्द्री चालाक खेल इसके पीछे सक्रिय है और स्त्री सम्बन्धी और बहुत सारे मिथों की तरह यह भी एक मिथ ही है, एक ऐसा मिथ, जिसके मार्फ़त स्त्री को कथित नैतिक-अनैतिक पैमाने से नियन्त्रित किया जा सके? आखि़र स्त्री-यौनिकता किसी भी तरह के विद्रूप की तुलना का अप्रस्तुत कैसे हो सकता है? स्त्री-यौनिकता कोई पदार्थगत उपादान नहीं है, वह एक स्वतन्त्र/स्वायत्त संवेदनात्मक जीवनोपागम है, जिसकी स्थिति संप्रभुता-सम्पन्नता की है; भला एक संप्रभु संवेदन को किसी और का उपजीव्य कैसे बनाया जा सकता है? अतः धूमिल के यहाँ पहली दिक़्कत तो यही है कि प्रस्तुत और अप्रस्तुत के बीच असन्तुलन और असमानता की स्थितियाँ हैं।

मर्दवादी आर्यसमाजी नैतिकता-बोध से घिरी हिन्दी-आलोचना
चलिए, अगर यह मान भी लिया जाए कि यह कवि की अपनी स्वयंभवता है कि वह किसी भी उपागम को अप्रस्तुत की तरह स्तेमाल कर सकता है तो, स्त्री-यौनिकता को अप्रस्तुत की तरह स्तेमाल करने पर दूसरा सवाल यह उठेगा कि क्या स्त्री-यौनिकता की दिशा या नियति राजनीति की तरह अश्लीलता और बेहयाई ही है? रामकृपाल पांडेय के ये तर्क बहुत ही निरर्थक, बोगस और गढ़े हुए हैं कि ‘उन्होंने कहीं भी जीवन के उज्ज्वल पक्ष पर चोट नहीं की है’ और ‘प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुन्दर और स्वीकार्य पर नहीं’। यह ठीक है कि वास्तव में राजनीति और समाज की तरह स्त्री-यौनिकता भी विद्रूप की चपेट में उस समय थी लेकिन सवाल यह है कि स्त्री-यौनिकता के विद्रूप के लिए उत्तरदायी कौन था? धूमिल ने अपनी कविताओं में यौन-विद्रूप के जो बहुत-से दृश्य उकेरे हैं, जैसे यह कि ‘‘हर लड़की तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला हो जाती है’’ (संसद से सड़क तक, राजकमल 2009, पृ. 07) या यह कि ‘‘गलियों में नंगी घूमती हुई पागल औरत के ‘गाभिन पेट’’ (वही; पृ. 12) या यह कि ‘‘उस महरी की तरह है, जो महाजन के साथ रात-भर सोने के लिए एक साड़ी पर राज़ी है’’ (वही; पृ. 13) या यह कि ‘‘अन्धी लड़की की आँखों में उससे सहवास का सुख तलाशना’’ (वही; पृ. 60) या यह कि ‘‘हिजड़ों ने भाषण दिए लिंग-बोध पर, वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं आत्म-शोध पर प्रेम में असफल छात्राएँ अध्यापिकाएँ बन गयी हैं’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 63-64) या यह कि ‘‘चुटकुलों-सी घूमती लड़कियों के स्तन’’ (वही; पृ. 99) या यह कि ‘‘औरत की लालची जाँघ’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, पृ. 12) या यह कि ‘‘स्त्री- देह के अँधेरे में बिस्तर की अराजकता है। (वही; पृ. 130); आदि-आदि। ऐसे अनगिनत चित्र और दृश्यांश हैं, जिनमें इसी तरह की आप्तवाक्यात्मकता निहित है, एक ऐसी आप्तवाक्यात्मकता जो लगभग स्थिर है, जिसकी कोई दिशा नहीं है। इन स्थितियों की यह स्थिरता और दिशाहीनता ही यह संकेत करती है कि धूमिल इनसे परेशान तो हैं लेकिन वे इन्हें ‘उघाड़कर फेंक देना चाहते हैं और अपना असन्तोश-आक्रोश प्रकट करते हुए विद्रोह की आग भड़काना चाहते हैं’ यह लगभग सत्य से परे और कवि के प्रति किसी सम्मोहपूर्ण आग्रहवश दिया हुआ अभिमत ही ज़्यादा लगता है। यह रामकृपाल पांडेय की ख़ामख़याली ही है कि ‘प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुन्दर और स्वीकार्य पर नहीं, जो मूलतः एक विद्रोही व्यक्तित्व के कवि के लिए सर्वथा स्वाभाविक है।’ इस वक्तव्य पर विचार किया जाए तो यह देखकर हैरत होती है कि हिन्दी-आलोचना जेंडर और स्त्री की यौनिकता के मामले में किस क़दर मर्दवादी आर्यसमाजी नैतिकता-बोध से घिरी हुई है। क्या यहाँ पूछा जा सकता है कि यौन सम्बन्धों की अनेक रूपता के अन्तर्गत ‘व्यभिचार का दलदल’ और ‘प्यार-स्नेह की सरिता’ की पहचान और परिभाषा भला क्या है? ‘व्यभिचार’ और ‘प्यार-स्नेह’ इन दोनों प्रत्ययों की स्त्री-दृष्टि के हिसाब से कैसी और क्या व्याख्या की जानी चाहिए? जहाँ पत्नी पति के लिए ‘टेकेन फ़ाॅर ग्रांटेड’ है, उस तथाकथित दाम्पत्य में स्त्री के हिस्से में कौन-सा प्यार और स्नेह सचमुच में आता है? (बलात्कार को कोई प्यार कहे तो यह एक अलग बात है।)  जिसे हम प्यार-स्नेह कहते हैं, जिसे कि आलोचक लोग ‘जीवन का उज्ज्वल पक्ष’ कहकर ‘सुन्दर और स्वीकार्य’ बताते हैं, जैसे कि धूमिल की इन पंक्तियों में उसके दर्शन हों कि ‘‘पत्नी की आँखें आँखें नहीं/हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं’’ (सुदामा पाँड़े का प्रजातन्त्र, पृ. 46) या इनमें कि-
तुम्हारी अँगुलियाँ जैसे कविता की
गतिशील पंक्तियाँ हैं
तुम्हारी आँखें कविता की गम्भीर
किन्तु कोमल कल्पना है
तुम्हारा चेहरा
जैसे कविता की
जमीन है
तुम एक सुन्दर और सार्थक
कविता हो मेरे लिए।                       (वही; पृ. 120)।
स्त्री! तू देह से बढ़कर कुछ नहीं!

क्या सचमुच इस भावाभिव्यक्ति में पत्नी के लिए कोई बराबर की जगह है? क्या पत्नी की वास्तविक निगाह में इन पंक्तियों में उसके जीवन का कोई उज्ज्वल पक्ष और सुन्दरता निहित है? सम्भवतः नहीं, क्योंकि वस्तुतः यहाँ वह एक आत्मसम्पन्न व्यक्ति इकाई है ही नहीं। उसकी हैसियत सिर्फ़ इतनी है कि जैसे कि एक प्रसिद्ध हिन्दी-फिल्म का एक बहुत ही प्रसिद्ध रोमांटिक गीत है कि ‘कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है कि… तुम्हें बनाया गया है मेरे लिए’! केन्द्र या नायक की भूमिका में पुरुष/पति है और चूँकि उसे नायक बनना है, अपना वज़ूद खड़ा करना है अतः सहारे के लिए लीजिए, यह स्त्री मौज़ूद है! इस स्त्री की औक़ात सिर्फ़ इतनी है कि यह आपको थामे खड़ी रहे और इसकी हर चीज आपकी तुष्टि और सफलता के लिए हो। और वह भी किस रूप में? इसकी आँखें, इसकी अँगुलियाँ, इसका चेहरा, इसके हाथ; आदि-आदि और बस! आत्मा नाम की चीज तो जैसे इसके है ही नहीं। जो कुछ है, यह मादा शरीर है और इसके आकर्षक अंग-प्रत्यंग हैं। देखा जा सकता है कि यह प्रेम है या देह का यौनिक आख्यान! निश्चय ही यह एक तथ्य है कि स्त्री-पुरुष प्रेम में देह एक अनिवार्य उपादान है। ख़ुद धूमिल इसी कविता की शुरुआत में हालाँकि यह कहते ही तो हैं कि-
देह तो आत्मा तक जाने के लिए सुरंग है
रास्ता है।                  (वही)।

लेकिन सवाल यही है कि यह आत्मा किसकी है? कौन किसकी आत्मा तक पहुँच रहा है? स्त्री की आत्मा न जाने यहाँ कहाँ है? हो सकता है, वह पुरुष की आत्मा में विलयित हो गई हो! पे्रम की और ख़ास तौर से स्त्री की सार्थकता इसी में तो है कि वह अपना शरीर-मन-प्राण सब पुरुष को सौंप दे और ख़ुद…? उसके ख़ुद का भला क्या है! वह ख़ुद न जाने क्या, कहाँ है, कवि को नहीं पता! धूमिल अपनी एक कविता में यह स्वीकार करते हैं कि स्त्री कुलमिलाकर एक देह ही तो है-‘‘(औरत: आँचल है,/जैसा कि लोग कहते हैं-स्नेह है,/किन्तु मुझे लगता है-/इन दोनों से बढ़कर/औरत एक देह है)’’ (कल सुनना मुझे, पृ. 81)। हालाँकि यह कहते हुए वे एक अफ़सोस जैसी स्थिति में ख़ुद को पाते हैं-‘‘मेरे सामने/तुम सूर्य नमस्कार की मुद्रा में/खड़ी हो,/और मैं लज्जित-सा तुम्हें/चुप-चाप देख रहा हूँ’’ (वही)।

दरअसल धूमिल में स्त्री को लेकर कई सारी दुविधाएँ और अन्तर्विरोध पाए जाते हैं। ये दुविधाएँ और अन्तर्विरोध सम्भवतः उनके समकालीन वैश्विक विमर्शों के प्रभावों और मूल देशज सांस्कारिकता के बीच के अन्तर्विरोध हैं। तीसरी चीज उस समय के राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य और प्रतिरोध की गतिविधियों के बीच के द्वन्द्व हैं। ये तीनों चीजें मिलकर एक अज़ीब-सा रसायन तैयार करती हैं जिसमें सब-कुछ गड्डमड्ड है और एक चीज दूसरी को काटने से नहीं चूकती। यहाँ कुछ भी सुनिश्चित और एकतान नहीं है और धूप-छाया का-सा खेल चलता रहता देखा जा सकता है। इस अनिश्चय और अनिर्दिष्टता की सबसे ज़्यादा गाज़ स्त्री पर पड़ती है। इतिहास गवाह है कि ऐसे अराजक और दिशाहीन समय में यौनिकता और देहवाद एकदम सतह पर आ जाते हैं और स्त्री खामखाँ इनकी चपेट में ले ली जाती है। पुरुष-सत्ता को अपनी सार्थकता और सफलता इसी में दिखने लगती हैं कि स्त्री को उसकी यौनिकता के आधार पर ही पहचाना जाए!

लोहिया का सैक्सिस्ट सांगरूपक: ‘दिल्ली जो देहली भी कहलाती है


यह सारी प्रक्रिया इतने अचेत भाव से चलती है कि अच्छे-अच्छे दृष्टिवान् लोग भी गच्चा खा जाते हैं और उन्हें यह होश ही नहीं रहता कि वे क्या कर रहे हैं! जैसे राममनोहर लोहिया के बारे में क्या कोई यह सोच सकता है कि जबकि वे अपने समय के जाने-माने स्त्री-मुक्ति-समर्थक रहे, अपनी भाषा को यौनवादी होने से नहीं बचा सके। राममनोहर लोहिया का एक लेख है, ‘दिल्ली जो देहली भी कहलाती है’। इस लेख में वे दिल्ली शहर के लगभग हज़ार साल के इतिहास पर इस दृष्टि से विचार करते हैं कि किस तरह दिल्ली को हर आने वाले विजेता ने जीता, नए सिरे से बसाया, बनाया, उजाड़ा और किस तरह यह दिल्ली अपने ही रहवासियों/जनता से कटी-कटी रही आई। आज भी (यानी 1959 में भी, जब यह लेख उन्होंने लिखा था) यह जनता से ज़्यादा अपने पर राज करने वालों की अपनी है। इस विचार-निदर्शन में कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। लोहिया ने दिल्ली के असल यथार्थ को ही यहाँ उजागर किया है। लेकिन इस यथार्थ की अभिव्यक्ति जिस रूपकात्मकता के साथ उन्होंने की है, वह हैरतअंगेज़ है। यह रूपकात्मकता इतनी सघन और लम्बी खींचकर ले जाई गई है कि धीरे-धीरे लगने लगता है कि लेखक को प्रस्तुत से ज़्यादा अप्रस्तुत में आनन्द आ रहा है। दिल्ली का रूपायन करते-करते लोहिया न जाने किस हरजाई वेश्या का चरित्रांकन करने लग जाते हैं-‘‘दुनिया की तमाम राजधानियों में दिल्ली सबसे प्यारी और हसीन कुलटा है। उसने अभी तक किसी वफादार प्रेमी के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया है। उसे हमेशा ही क्रूर शासकों ने अपने अधीन किया जिन्हें उसने सभ्य, सुसंस्कृत और क्लीव बनाने की कोशिश की। गगग दिल्ली का कभी कोई पति नहीं रहा। उसने प्रेमी भी नहीं बनाया। गगग वह विश्व की निष्ठावान और अडिग वेश्या बनी रही जो नए क्रूर शासक को जिसने उसे अपने कब्जे में किया, सुसभ्य बनाने और उसे निस्तेज करने का प्रयास करती रही। उसका हुस्न विस्मयकारी और शुद्ध कपट से भरा है। उसके पास दिल नाम की चीज बिल्कुल नहीं है और वह सिर्फ खूबसूरती तथा सलीके के लिए जीती है और यद्यपि उसमें प्रेमिका, विवाहिता तथा छिनाल के कुछ-कुछ गुण मिल जाएंगे, उसने अपनी विशुद्ध धूर्तता से उन सबको दबा दिया है। गगग दिल्ली ने पीछे हटने को कला बना लिया है। उसने विजेताओं के लिए अपनी छातियां खोल दी हैं, इस उम्मीद में कि उन्हें प्रेम के जाल में फांसकर अंततः पालतू बनाया जा सकता है। उसकी छातियों में कभी उन्मादक सुंदरता रही होगी। गगग दिल्ली ने अपनी छातियों को विजेताओं के लिए खोला किंतु अक्सर उसका तत्काल उपयोग नहीं हुआ। तैमूर और नादिरशाह ने उसे दागों से कुरूप बना दिया गगग। गगग यह दुष्ट बूढ़ी औरत कुमारी से भी ज्यादा खूबसूरत है। गगग वह इस बात पर खुश होती है कि आज की जनता जो इतनी गरीब है कि इस आधुनिक शैली को नहीं अपना सकती, उन विदेशी शैली के आलीशान भवनों से दूर रहेगी जिनमें वह बिना बाधा के, विदेशी शैली के देशी दरबारियों के साथ अभिसार कर सकती है। वह इस अभिसार को देश का धार्मिक कर्तव्य भी कह सकती है जिसमें जनता रूपी वैध पति से खर्चीला अलगाव भी सम्मिलित है ताकि देश आधुनिक बन जाए।’’ (राममनोहर लोहिया रचनावली, भाग-8, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लि. नई दिल्ली (प्र. सं. 2008), पृ. 184-196।)।

यह इतना लम्बा उद्धरण इसलिए दिया गया कि रूपक पूरा का पूरा आ सके। यह दरअसल सांगरूपक है। कोई यह न समझे कि सांगरूपक सिर्फ़ काव्य की बपौती है, गद्य में भी यह आ सकता है और बाक़ायदा आ सकता है। और जब लोहिया जैसे रणबाँकुरे हों तो बात ही क्या! रूपक तो उनके आगे पानी माँगता दिखाई देगा! देखा जा सकता है कि लेखक का ध्यान प्रस्तुत से ज़्यादा अप्रस्तुत के पूर्ण निरूपण पर है। हो सकता है कि दिल्ली के इतिहास से जुड़ी कोई बात यहाँ लेखक से छूट गई हो लेकिन इतना गारंटी से कहा जा सकता है कि जिससे उसका रूपक बिठाया गया है उससे जुड़ी कोई बात लेखक ने नहीं छोड़ी है। दिल्ली ही नहीं, इस लेख में लोहियाजी दुनिया के और भी कई राजधानी-शहरों का इसी तरह के उपमान-विधान के साथ वर्णन करते हैं। जैसे कि पेरिस: ‘‘निस्सन्देह, पेरिस दुनिया की प्रेयसी है। उसके प्रेमी स्थायी हैं जिन्हें वह बदलती नहीं। किंतु यह प्रेमी, फ्रांसीसी, उसकी विवाहेतर मौज-मस्ती से आंखें फेर लेता है या मुस्करा भर देता है। वह वफादार है लेकिन मौज-मस्ती की शौकीन है, आग और पानी का मेल; कुछ ऐसा जो दिल को मरोड़ देकर ताजा कर देता है लेकिन उसे सुस्त नहीं पड़ने देता।’’ (वही)। इसी तरह वाशिंगटन, टोक्यो, दमिश्क, लंदन इत्यादि का वर्णन वे करते हैं। इनमें से कोई ‘संगमरमर की शुद्धता वाली विवाहिता’ है, कोई ‘ईमानदार और मेहनती छिनालें’, किसी ‘की छाती बहुत चैड़ी है’ जो बेहिसाब ‘सुगठित और ऐंद्रिक सुंदरता लिए हुए है।’ (वही)।

रचना का सृजन ही नहीं, अधिगम भी मर्दवादी


ज़रा सोचा जाए कि यह सब पढ़ते हुए पाठक पर क्या बीतती रही होगी? क्या पाठक का ध्यान दिल्ली या किसी और शहर के इतिहास या भूगोल पर टिक पाता है? पहले-पहल आखि़र वह किस चीज को ग्रहण करता है? निश्चय ही मूल विषय से ज़्यादा उसका ध्यान रूपक पर अटका रह जाता है। यहाँ भी लैंगिक विभेद से पाठकों का अभिग्रहण/अधिगम भिन्न-भिन्न हो सकता है। हो सकता है, पुरुष पाठकों को इसमें मज़ा आने लगे। प्रतीत यही होता है कि इस तरह की विचाराभिव्यक्तियाँ यह सोचते हुए ही सम्भव होती हैं कि पुरुष-पाठक ही इन्हें पढ़ेगा। पढ़ेगा और आनन्द लेगा! दरअसल इस तरह की संरचना के पीछे, जाने-अनजाने लेखक इसी धारणा से संचालित होता है कि उसके पाठक सिर्फ़ पुरुष हैं। और पुरुष भी कैसे? वे, जिन्हें इस तरह की यौनिकता में रस आता है! क्योंकि स्त्रियाँ तो इसे पढ़ते ही या तो आग-बबूला हो जाएँगी या शर्म या आत्मग्लानि से उनका माथा झुक जाएगा। सम्भवतः कोई भी स्त्री इस तरह अपना वस्तुकरण बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। इसका एक उदाहरण लगभग तीन साल पहले 3 से 7 अक्टूबर 2010 को शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की ‘रीडिंग लोहिया’ वर्कशाप में दिखाई दिया जब ‘‘डा.ॅ राममनोहर लोहिया की रचनाओं पर हो रही बहस के दौरान कुमकुम यादव ने सवाल उठाया कि शहरों पर लिखे अपने आलेख में लोहिया जैसा स्त्री-मुक्ति का समर्थक इस क़दर सैक्सिस्ट भाषा का इस्तेमाल क्यों कर रहा है?’’ (अभयकुमार दुबे, ‘पटरी से उतरी हुई औरतों का यूटोपिया’ शीर्षक लेख, प्रतिमान समय समाज संस्कृति, प्रवेशांक, जन.-जून 2013, पृ. 406)। (कुमकुम यादव दिल्ली के एक काॅलेज में अंग्रेज़ी पढ़ाती हैं और लोहिया की अध्ययेता हैं। उन्होंने लोहिया की अनेक रचनाओं का हिन्दी से अँग्रेज़ी में अनुवाद किया है। वे लोहिया के स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी विचारों की प्रशंसक हैं और इस सम्बन्ध में उन्होंने काफ़़ी-कुछ लिखा भी है। (द्रष्टव्य, ‘इकाॅनाॅमिक एण्ड पाॅलिटिकल वीकली, वाॅ. एक्स एल वी नं. 48, नवं. 27-दिसं. 03, 2010 में पृ. 107-112 पर उनका लेख ‘द्रोपदी आॅर सावित्री: लोहिया’ज़ फ़ैमिनिस्ट रीडिंग आॅव् माइथाॅलाॅज़ी’। लेकिन लोहिया की इस तरह की भाषा पर उन्हें भी ऐतराज़ है।)।

स्त्री रचनाधर्मिता और आंदोलन का आयोजन

‘दलित लेखक संघ’ के तत्वावधान में  एक दिवसीय काव्य गोष्ठी ( महिला रचनाकारों की )  व  ‘संवैधानिक और समाजिक परिवेश में स्त्री विमर्श ’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। 







रिपोर्ट 


17 अगस्त 2015 को ‘दलित लेखक संघ’ के द्वारा  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में  एक दिवसीय काव्य गोष्ठी व परिचर्चा का आयोजन किया गया।  दो स्तरों में विभक्त इस कार्यक्रम के पहले सत्र में महिला रचनाकारों  ने कविता पाठ किये एवं दूसरे सत्र में ‘संवैधानिक और समाजिक परिवेश में स्त्री विमर्श ’ विषय पर वक्ताओं ने अपनी बातें रखीं .

रजनी तिलक, सुमित्रा मेरोल, अनीता भारती, वंदना ग्रोवर, रेनू हुसैन, शेफाली फ्रॉस्ट, नीलम मदारित्ता,अंजू शर्मा, पुष्पा विवेक, प्रियंका सोनकर, आरती प्रजापति, पूजा प्रजापति, चन्द्रकान्ता सिवाल, निरुपमा सिंह, मीनाक्षी गौतम, कुलीना, प्रज्ञा, विनीता, धनवती, मुन्नी भारती, मनीषा जैन, इंदु कुमारी आदि महिला रचनाकारों की कविताओं में स्त्री के अधिकार , आजादी , संघर्ष के मुद्दों  और उनके सपनों की सहज अभिव्यक्ति हुई . कविता पाठ पीढ़ियों के आपसी संवाद के साथ और अपने-अपने   जाति-वर्ग पोजिशंन  की पहचान के साथ ‘ विश्व भगिनिवाद’ को पुष्ट करते हुए सम्पन्न हुआ . यद्यपि दूसरे सत्र में वक्ताओं ने जाति-अवस्थिति को चिह्नित करते हुए रचनाकारों से और अधिक संवेदनशील और संविधान के प्रति सजगता के प्रस्ताव रखे.

दूसरे सत्र में मुख्य अतिथि एवं प्रसिद्द लेखिका विमल थोरात ने कहा कि ‘ दलित लेखक संघ अपनी उद्देश्य पूर्ति में सफल हो रहा है , पूरी टीम बधाई की पात्र है।’  विमल थोरात  दलित लेखक संघ की पूर्व अध्यक्ष भी रही हैं . उन्होनें कहा कि’  स्त्री स्वतंत्रता अभी देह तक ही सिमटी हुई है, इसे वैचारिक तौर पर पोसना होगा और महिला विमर्श को आंदोलन में तब्दील  करना होगा, तभी हम महिलाओं के सम्वैधानिक हक़ों की रक्षा की बात कर सकते हैं।’  मुख्य वक्ताओं में शामिल आलोचक एवं लेखिका हेमलता महिश्वर ने अपने सम्बोधन में कहा कि ‘ महिलाएं अब धीरे -धीरे अपने हक़ों को लेकर जागरूक हो रही हैं,  लेकिन समाज अभी भी उसको पूर्ण मौलिक अधिकारों से वंचित रखे हुए है.  अब भी उन पर समाज के पारम्परिक तौर- तरीके पाबंदी  की भूमिका में है।’  स्त्रीकाल के संपादक संजीव चन्दन ने कहा कि ‘ बाबा साहेब आम्बेडकर  के द्वारा दिलाये गए संवैधानिक हक़ प्रगतिशील समाज बनाने में सफल हो रहे हैं लेकिन क्योंकि प्रतिगामी ताकतें संविधान बनने के समय से ही बाधा उत्पन करती हैं। महिला आंदोलन को भी इन बाधाओं से जूझना पड़ा है.  लेखिका रजनी दिसोदिया ने कहा कि ‘ समाज में महिलाओं के प्रति वातावरण अनुकूल  नहीं रहा, लेकिन यह भी सच है कि आगे बढ़ने वालों के लिए भी रास्ते प्रशस्त हैं।’  विशिष्ठ अतिथि  और लेखिका रजत रानी मीनू ने अपने वक्तव्य में इस ओर इशारा किया कि ‘ मनुवादी दृष्टिकोण ही सबसे ज़्यादा बाधक है महिलाओं के संवैधानिक हक़ों को गौण रखने में।’  लेखिका एवं सामाजिक आन्दोलन कर्मी रजनी तिलक ने भी अपने विचारों में यही तल्खी इख़्तियार करते हुए कहा कि ‘ दलित महिलाओं को ज़्यादा भेदभाव और उपेक्षाओं का सामना करना पड़ता है,  वे ही सबसे ज़्यादा शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई हैं।’

विशेष उपस्थित जे एन यू के प्रोफ़ेसर और चिंतक  डॉ रामचन्द्र ने दलित लेखक संघ के इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि ‘ आज इन बदलती परिस्थितियों में यह कार्यक्रम मिल का पत्थर साबित होना चाहिए। ऐसे ही कार्यक्रमों की बदौलत आज की महिलाएं जागरूक स्थिति में आ रही हैं।’  कार्यक्रम का सञ्चालन करते हुए हीरालाल राजस्थानी ने कहा कि ‘ मनुवादी, धार्मिक -रूढ़िवादी परम्पराओं के प्रभाव के चलते  महिलाओं के संवैधानिक हक़ों को प्राप्त करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है .’ अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे दलित लेखक संघ के अध्यक्ष कर्मशील भारती ने फूलन देवी के जीवन को याद करते हुए कहा कि ‘ जब तक महिलाएं स्वयं अपने  संघर्ष को नहीं समझेंगी तब तक वे  दम- घोंटू रूढ़ियों में जकड़ी रहेंगी।’ उन्होनें काव्य पाठ में शामिल हुई १८ साल की प्रज्ञा से लेकर ७० साल की धनदेवी जैसी सभी कवियत्रियों के आक्रोश को स्वाभाविक मानते हुए उनकी कविताओं को यथार्थ परक बतलाया.

प्रमुख रूप से जे एन यू के प्रोफ़ेसर राजेश पासवान, फॉरवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन और साहित्यकार पूरन  सिंह भी उपस्थित रहे।  धन्यवाद ज्ञापन अनीता भारती ने किया। इस कार्यक्रम की वीडियोग्राफी योगी ने की।कार्यक्रम में शामिल हुई कवियत्रियों, वक्ताओं व सभी गणमान्य अतिथियों को दलेस की ओर से प्रशंसा- पत्र भेंट किये गए।

रिपोर्ट प्रस्तुति  : दलेस