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औरतें

एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 


अनुवादक का नोट 


एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। 
लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।


 “Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।

 

शहरजाद

एक की बेवफाई का बदला लेने के लिए राजा सारी दुल्हनों  के गले उतार लिया करता था.रात होने से पहले वह ब्याह रचाता और सुबह होते-होते अपना ब्याह खुद खतम भी कर डालता था. इस तरह, एक के बाद एक लड़कियाँ आती गईं और अपना कौमार्य तथा जीवन गंवाती गईं. शहरजाद वह अकेली लड़की थी, जो पहली रात के बाद जिंदा बची रही और इसके बाद वह हर रात एक और नया दिन पाने की खातिर कहानियाँ बदलती रही. ये कहानियाँ जो शहरजाद ने कहीं से सुनी , पढी  या फिर यूँ ही बनाई थी, उसे सरकलमी से बचाती थी. वह इन्हें धीमी आवाज में, आधे अंधेरे कमरे में सिर्फ़  चांदनी की रोशनी में कहा करती थी।इन्हें कहते वक्त उसे एक रूहानी खुशी मिला करती थी, जिसे वह राजा तक पहुंचाया करती. वह, हाँलाकि , एहतियात भी बहुत रखती थी.कभी-कभी अच्छी-भली चल रही कहानी  के बीच उसे यह अहसास हुआ करता कि राजा उसकी  गर्दन देख रहा है.वहां राजा का मन ऊबा और यहाँ वह गई.और फिर मरने के डर से कहने की कला शुरू हुई.

आधुनिक नॉविल की पहली ईंट

आज से हज़ार साल पहले, दो जापानी औरतें ऐसा लिख रहीं थी  मानों वह आज की बात हो.खोर्खे लुईस बोरखेस (Jorge Luis Borges) और मार्गेरिते योरसेनार (Marguerite Yourcenar) कहते हैं कि आज तक मुरासाकी शिकिबु (Murasaki Shikibu) जैसा बेहतरीन उपन्यास किसी ने नहीं लिखा. शिकिबु की गेंजी की कहानी पुरुषों के रोमांचक कारनामों तथा औरतों के पीछे हटने या हार जाने की एक शानदार किस्सागोई है.
मुरासाकी के साथ एक और औरत अपने जाने के हजार साल बाद तारीफ के इतने शब्दों के साथ याद किए जाने का दुर्लभ सम्मान हासिल कर रही थी. सेई शोनागोन (Sei Shonagon) की Libro de la Almohada (लिब्रो दे ला आलमोआदा – शाब्दिक अर्थ “तकिए की किताब” यानी  बिस्तर पर या सोने से पहले आराम से, आनंद के साथ पढ़ी जाने वाली किताब) ने  zuihitsu (जुईहित्सु) नाम की एक पूरी विधा को ही जन्म दिया था. जुईहित्सु का शाब्दिक अर्थ “पेंट-ब्रुश या कूची की रौ के संग बहना” होता है. यह छोटी-छोटी कहानियों, नोट्स, विचारों, खबरों और कविताओं से गूंथे हुए एक बहुरंगी मोजैक या रंगीन पत्थरों और काँचों से बनी कलाकृतियों की तरह लिखा जाता था. देखने में इधर-उधर बिखरे मालूम पड़ने वाले इसके टुकड़े दरअसल कथ्य के विविध आयाम बुनते हैं और हमें अपने लोक तथा समय में दाखिल होने का न्यौता देते हैं.

कहने की धुन (1)

मार्सेला उत्तर के बर्फीले इलाकों में गई थी. वहाँ नार्वे  की राजधानी ओस्लो में एक रात उसकी मुलाकात एक औरत से हुई, जो गाती और कहती है. एक गाना खत्म और दूसरा शुरू होने के बीच वह मजेदार कहानियाँ सुनाया करती है. वह इन्हें कागज के छोटे-छोटे पर्चो पर नजर फिराते हुए कहती है, ऐसे जैसे कोई बड़ी बेफिक्री से किसी का भविष्य बाँच रहा हो.ओस्लो की वह औरत एक बहुत बड़े घेरे वाला स्कर्ट पहनती है, जिसमें कई-कई तो जेबें हैं. इन्हीं जेबों से वह एक-एक कर ये पर्चे निकालती है. हर पर्चे में कहने को एक मजेदार कहानी रहती है। वह कहानी जो एक शुरुआत और इस शुरुआत के बीज रोपे जाने के बारे में है. हर कहानी उन लोगों की है, जो कुछ जादुई रचने-गढ़ने की कला की खातिर दुबारा जीना चाहते हैं. और इस तरह वह भुला दिए और मर गए लोगों को फिर से जिलाया करती है; उसके स्कर्ट की तहों से इंसानों के सफर और उनके  इश्क की कई दास्तानें बाहर निकल सामने आ खड़ी होती हैं. वही इंसान जो जीते हुए, कुछ कहते हुए चलते जाते हैं.

अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  आजकल फ्रांस में हैं. 

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा :सातवीं क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.

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अदालती ‘आशा और विश्वास’    

मगर दिल्ली उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री जसपाल सिंह ने अपने निर्णय68ए में दुनिया-भर के सन्दर्भ, शोध और निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि लिंगच्छेदन बलात्कार के अपराध की अनिवार्य शर्त है. निर्णय के अन्त में दिशा-निर्देश देते हुए माननीय न्यायाधीश ने गम्भीरतापूर्वक लिखा, ”बाल यौन शोषण अत्यन्त गम्भीर और नुकसानदेह अपराधों में से एक है.  इसलिए सत्र न्यायाधीश को चाहिए कि वह इस केस को संवेदनशीलता से चलाएँ और यह भी सुनिश्चित करें कि मुकदमे की कार्यवाही न्यायसंगत हो. उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी ऐसा सवाल न पूछा जाए जो पेचीदा या उलझानेवाला हो…न्यायमूर्ति का यह निर्णय, सचमुच अनेक कारणों से पढऩे योग्य है. एक जगह तो न्यायमूर्ति आत्मनिरीक्षण करते हुए कहते हैं, ”इट इज आपलिंग टू वाच द डैथ एगनी ऑफ ए होप. मिस्टर जेटली वांटेड मी टू पुश फॉरवर्ड द ? टू द फ्यूचर्स फ्रंटलाइंस.  टू हिम, परहैप्स, आई रिमेन एन ओल्ड गार्ड हैंकरिंग डाउन इन द बंकर्स ऑफ टै्रडिशन. अखबारों में ‘बेटी से बलात्कार’ की खबरें प्राय: प्रकाशित होती ही रहती हैं. कभी प्राइवेट कम्पनी में मैनेजर (सुब्रतो राय) द्वारा अपनी अठारह वर्षीय बेटी से बलात्कार, कभी मध्यमवर्गीय (राजकुमार) द्वारा चौदह वर्षीय पुत्री के साथ बलात् सम्भोग, कभी स्कूटर ड्राइवर (अश्विनी सहगल) द्वारा आठ वर्षीय बेटी की ‘इज्जत बर्बाद  और कभी पिता व भाई दोनों ने मिलकर सोलह वर्षीय बहन-बेटी को अपनी हवस का शिकार बनाया. लड़कियाँ सम्बन्धों की किसी भी छत के नीचे सुरक्षित नहीं.

भारतीय समाज में भी अमानवीयकरण इस कदर बढ़ गया है कि ऐसी खौफनाक दुर्घटनाओं की लगातार पुनरावृत्ति रुकने की सम्भावनाएँ समाप्त या लगभग शून्य हो गई हैं. अधिकांश मामलों में इसका एक मुख्य कारण पति-पत्नी के बीच तनाव, लड़ाई-झगड़ा या अलगाव है, दूसरा कारण है, बेटा न होने का दुख. बेटियाँ अपने ही घर में, अपने ही पिता, भाई या सम्बन्धियों के बीच भयभीत, आतंकित और असुरक्षित हो जाएँ तो उसे न सम्मान से जीने का कोई रास्ता नजर आता है और न गुमनाम मरने का.  बलात्कार की संस्कृति के सहारे पितृसत्ता अजर, अमर नजर आती है. नारायण इराना पोतकंडी बनाम महाराष्ट्र68बी में सात वर्षीया बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में माननीय न्यायमूर्ति श्री एम.एस. वैद्य ने सजा के सवाल पर कहा है कि जब कानून में न्यूनतम सजा दस साल निर्धारित की गई है तो किसी भी आधार पर सजा कम करना न्यायोचित नहीं. मुकदमे के निर्णय में उल्लेख किया है, ”अन्त में, दोनों पक्षों के वकीलों ने कहा कि बालिका-बलात्कार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, विशेषकर इस क्षेत्र में. यह बताया गया कि जिला अदालतों द्वारा इस प्रकार के मामलों में बच्चों की गवाही और अन्य साक्ष्यों सम्बन्धी कानूनी प्रावधान या आदेशों का सही ढंग से अनुपालन नहीं किया जाता है कि भविष्य में अदालतें इस प्रकार के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय और गुजरात उच्च न्यायालय के फैसलों के अनुसार ही कानून और प्रक्रिया का प्रयोग करेंगे. हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि ‘आशा और विश्वास’ भरे ऐसे दिशा-निर्देश सर्वोच्च न्यायालय के सत्र न्यायालय वाया उच्च न्यायालय शीघ्र समय से पहुँच जाएँगे.

इतनी सख्त सजा न्यायोचित नहीं

उल्लेखनीय है कि कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार करनेवाले युवक की उम्र अगर पच्चीस साल से अधिक नहीं है तो अधिकांश मामलों में, इसी आधार पर न्यायमूर्तियों ने सजा कम की है. कुछ मामलों में तो इतनी कम कि पढ़-सुनकर आश्चर्य होता है. उदाहरण के लिए अभियुक्त की उम्र बाईस साल है और वह कोई पेशेवर अपराधी नहीं है. इसलिए चार साल कैद की सजा घटाकर दो साल की जाती है.69 अपराध के समय अभियुक्त की उम्र सोलह साल थी. इसलिए सजा घटाकर पच्चीस दिन कैद की जाती है, जो वह पहले ही भुगत चुका है.70 अभियुक्त इक्कीस वर्षीय नौजवान है, जिसे पाँच साल कैद की सजा दी गई है. सात साल मुकदमा चलता रहा और अभियुक्त आठ महीने कैद काट चुका है. ऐसी हालत में उसकी सजा आठ महीने की काफी है. हाँ, कम सजा के बदले में एक हजार रुपया जुर्माना देना पड़ेगा.71 अभियुक्त की उम्र सिर्फ सत्रह-अठारह साल है. बलात्कार के अपराध में तीन साल कैद और एक हजार रुपए जुर्माने की सजा घटाकर सात महीने कैद करना उचित है, जो वह पहले ही काट चुका है. जुर्माना देने की कोई जरूरत नहीं.72



अभियुक्त की उम्र सोलह से अठारह वर्ष के बीच है. सजा में उदारता का अधिकारी है. पाँच साल कैद की सजा घटाकर ढाई साल करना न्यायोचित है. ढाई साल कैद में वह पहले ही रह चुका है.73 अभियुक्त की उम्र सोलह साल और बारह साल की बच्ची से बलात्कार की सजा कैद. अपराधियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण को देखते हुए. एक साल कारावास और एक हजार रुपए जुर्माना74. उम्र बाईस साल और नौ वर्षीया बालिका से बलात्कार की सजा सात साल कैद. बहुत हिंसा की है मगर गुप्तागों पर कोई चोट नहीं. सजा कम करके पाँच साल जेल. ‘न्याय का उद्देश्य’ पूरा हो जाएगा.75 दस साल की लडक़ी के साथ बलात्कार के अपराध में सत्रह वर्षीय युवक की सजा पाँच साल से कम करके चार साल कैद करने से भी ‘न्याय का लक्ष्य’ पूर्ण हो जाएगा76. अभियुक्त की उम्र मुश्किल से तेरह साल है. दो वर्षीया बच्ची के साथ बलात्कार की सजा चार साल कैद से घटाकर, एक साल कैद और दो हजार रुपए जुर्माना किया जाता है. लम्बी कैद की सजा अभियुक्त को कठोर अपराधी बना देगी. जुर्माना वसूल हो जाए तो रकम हर्जाने के रूप में लडक़ी की माँ को दे दी जाए. बाल अपराधियों के मामलों में समसामयिक अपराधशास्त्र के अनुसार मानवीय दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य.77
किशोरों को जेल या सुधार-गृह

बच्चियों से बलात्कार के मामलों में किशोरों और ‘टीन एजर’ युवकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. पन्द्रह वर्षीय युवक द्वारा सात वर्षीया बच्ची के साथ बलात्कार के अपराध में सत्र न्यायाधीश ने दस साल कैद और पाँच सौ रुपए जुर्माने की सजा सुनाई. लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने 1990 में अपील स्वीकार करते हुए कहा, ”अभियुक्त को जेल भेजने का अर्थ, इसे खूँखार अपराधी बनाना होगा. किशोर न्याय अधिनियम, 1986 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 361 के अनुसार किशोर अपराधियों को जेल में नहीं, बल्कि सुधार-गृहों में रखा जाना चाहिए. अभियुक्त को तीन साल के लिए आन्ध्र प्रदेश ब्रोस्टल के स्कूल में भेजने के आदेश देते हुए न्यायमूर्ति ने जुर्माना वापस करने के भी आदेश दिए. अभियुक्त के वकील ने सजा कम करवाने का एक तर्क यह भी दिया था कि ”लडक़ा होटल में काम करता है और वयस्क यात्रियों को ‘ब्लू फिल्म’ व अन्य यौन क्रीड़ाएँ करते हुए देख-देखकर स्वयं भी अनुभव करने की इच्छा के फलस्वरूप ऐसा अपराध करने को उत्प्रेरित हुआ होगा. यह उसे छोड़ देने के लिए कोई उचित बहाना नहीं है, पर सजा के सवाल पर विचारणीय अवश्य है. बचाव पक्ष के वकील ने न्यायमूर्ति ओ. चिन्नप्पा रेड्डी द्वारा लिखी एक पुस्तक की भूमिका से दोहराया, ”आपराधिक कानून का उद्देश्य सिर्फ अपराधियों को पकडऩा, मुकदमा चलाना और सजा देना ही नहीं है, बल्कि अपराध के असली कारणों को भी जानना है. कानून का अन्तिम ध्येय अपराधियों को सिर्फ सजा देना ही नहीं है. जब भी, जहाँ सम्भव हो उन्हें सुधारना भी है.78

उपरोक्त निर्णय के विपरीत इसी उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने कुछ साल पूर्व 1984 में कहा था–
”सर्वज्ञात तथ्य है कि इधर कमजोर वर्ग, उदाहरण के लिए स्त्रियों पर अपराधों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही है और ऐसे अपराधों को रोकना एक समस्या बन गई है. अब यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा है कि औरतों पर बढ़ रहे हिंसक अपराधों को रोकने के लिए क्या उपाय किए जाएँ. अगर अपराधियों को ‘प्रोबेशन ऑफ अफेंडर्स एक्ट’ की लाभदायक धाराओं के अन्तर्गत ऐसे अपराधों में भी छोड़ दिया जाएगा तो यह निश्चित रूप से औरतों के विरुद्ध अपराधों को बढ़ावा देना ही होगा. यही नहीं, निर्दोष बच्चियों के विरुद्ध ऐसे अपराधों को रोकना एकदम असम्भव हो जाएगा. अगर ऐसे अपराधों को रोका नहीं गया तो सामाजिक सन्तुलन व औरतों के स्वतंत्रतापूर्वक आने-जाने के लिए ही धमकी बन जाएगा और समाज की सुरक्षा के लिए भयंकर खतरा.79 नि:सन्देह सामाजिक परिप्रेक्ष्य से परे हटते ही, न्यायमूर्ति की आँखों के सामने भ्रामक मिथ और मानसिक मकडज़ाल छाने लगता है. गवाहों, साक्ष्यों, रिपोर्टों, दस्तावेजों और स्थितियों के बीच तकनीकी विसंगतियाँ और अन्तर्विरोध अनेक प्रकार से दिशाभ्रमित करते हैं. डॉक्टरी रिपोर्ट, पुलिस जाँच में घपले, सालों बाद गवाही में स्वाभाविक भूल, बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा गढ़े तर्क (कुतर्क), नई-पुरानी हजारों नजीरें और वर्षों फैसला न होने (करने) का दबाव या
अपराधबोध, यानी सब अभियुक्त के पक्ष में ही होता रहता है. जब तक सन्देह से परे तक अपराध सिद्ध न हो, अभियुक्त को निर्दोष माना जाएगा और पूरी व्यवस्था उसे बचाने में लगी रहती है.

परिणामस्वरूप अधिकांश (96 प्रतिशत) अभियुक्त बाइज्जत रिहा हो जाते हैं या सन्देह का लाभ पाकर मुक्त. जिन्हें बचाव का कोई (चोर) रास्ता नहीं मिल पाता, वे अपराधी भी किसी-न-किसी आधार पर न्यायमूर्ति से रहम की अपील मंजूर करवा ही लेते हैं. सजा कम करने के अनेक ‘उदारवादी’ निर्णय उपलब्ध हैं. सजा बढ़ाने के फैसले अपवादस्वरूप ही मिल सकते हैं. कुछ मामलों में तो न्यायमूर्तियों द्वारा सजा कम करने का एकमात्र कारण है.सालों से अपील की सुनवाई या फैसला न होना. अब इतने साल बाद सजा देने से भी क्या लाभ ? संसद द्वारा बनाए सम्बन्धित कानूनों की भाषा और परिभाषा दोनों ही आमूल-चूल संशोधन माँगती है. मगर विधि आयोग द्वारा संशोधन की सिफारिशों पर राष्ट्रीय बहस बाकी है. कानूनी लूपहोल या गहरे गड्ढों के रहते यौन हिंसा की शिकार स्त्री के साथ न्याय असम्भव है. अक्सर यह कहा जाता है कि कानून तो बहुत बने/बनाए गए हैं लेकिन उनका पालन सही ढंग से नहीं हो रहा है. काफी दार्शनिक अन्दाज में यह भी बार-बार सुनने में आता है कि सिर्फ कानून बनाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता, नहीं होगा. समाधान के लिए समाज में जागरूकता, स्त्रियों में चेतना और पुरुष मानसिकता में बदलाव अनिवार्य है. बिना शिक्षा के यह सब कैसे होगा ? सभी को शिक्षित करने योग्य संसाधन ही नहीं हैं और ऊपर से देश की जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है. ऐसे में विधायिका या न्यायपालिका या कार्यपालिका भी क्या कर सकती है ?



विकल्प की तलाश


दिल्ली के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्री एम.एम. अग्रवाल ने 24 अगस्त, 1990 को जगदीश प्रसाद को साढ़े तीन वर्षीया ममता के साथ बलात्कार के अपराध में आजीवन कारावास की सजा सुनाई. 5 सितम्बर, 1990 को यह भी निर्देश दिया कि ”जब तक संसद ऐसे मामलों में अनिवार्य बन्ध्याकरण का कानून नहीं बनाती, मुझे लगता है कि जघन्य अपराध के अपराधियों को स्वैच्छिक रूप से बन्ध्याकरण के लिए प्रोत्साहित करने की कोई शुरुआत की जानी चाहिए, ताकि ऐसे लोगों को जेल में बन्दी रखने के बजाय उनका कुछ लाभ/उपयोग उनके परिवारवाले उठा सकें. इसलिए मैं ऐसा निर्णय ले रहा हूँ कि अपराधी जगदीश स्वेच्छा से बन्ध्याकरण का ऑपरेशन, सरकारी अस्पताल से करवा ले (उच्च न्यायालय दिल्ली की पूर्व-सहमति से) तो उसकी कैद की सजा माफ मानी जाएगी.
कानून और न्याय के ऐतिहासिक प्रथम ‘क्रान्तिकारी’ फैसले की बहुत दिनों तक राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा (बहस) होती रही। होनी ही थी. निर्णय के खिलाफ अपील में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री पी.के. बाहरी ने पाया कि इस मामले में पुलिस के जाँच अधिकारियों ने शैतानीपूर्वक गड़बडिय़ाँ (घपले) की हैं. हालाँकि सत्र न्यायाधीश ने इनकी खूब प्रशंसा की है. बच्ची के योनिद्वार की झिल्ली थोड़ी फटी हुई पाई गई लेकिन यह जरूरी नहीं है कि ऐसा अपीलार्थी द्वारा लिंगच्छेदन के कारण हुआ हो. सर्वज्ञात है कि इतनी छोटी बच्ची के गुप्तागों पर हलका-सा भी दबाव पडऩे से झिल्ली फट सकती है. ऐसा लगता है कि अभियुक्त अपनी हवस के कारण लडक़ी से बलात्कार करना चाहता था. मगर लडक़ी के माँ-बाप के मौके पर पहुँचने के कारण कर नहीं पाया. अभियुक्त बलात्कार करने का अपराधी नहीं, बल्कि बलात्कार का प्रयास करने का अपराधी है.

अपीलार्थी की सजा भारतीय दंड संहिता की धारा 376 की अपेक्षा, धारा 511 के तहत बदली जाती है. वह साढ़े सात साल कैद की सजा पहले ही काट चुका है। अब उसे रिहा कर दिया जाए.बन्ध्याकरण के विषय में न्यायमूर्तियों का विचार था, ”विद्वान सत्र न्यायाधीश ने स्वेच्छा से बन्ध्याकरण का आदेश देकर ठीक नहीं किया. ऐसा आदेश पूर्णतया गैर-कानूनी है, क्योंकि उच्च न्यायालय के नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. न्याय मौजूदा कानून के आधार पर ही किया जाना चाहिए. कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अगर बलात्कार का अपराधी स्वेच्छा से बन्ध्याकरण करवा ले तो कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम सजा अदालत द्वारा माफ की जा सकती है. वही सजा दी जानी चाहिए जो कानून निर्माताओं (संसद) ने निर्धारित की है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश को ऐसा प्रस्ताव, जो कानून के अनुसार नहीं है, देने से, अपने आपको रोकना चाहिए था.80

विद्वान सत्र न्यायाधीश द्वारा बन्ध्याकरण (कॉस्टे्रशन) के आदेश का असली उद्देश्य अभियुक्त के परिवार को लाभ पहुँचाना है या अपराधी का ‘पुरुष चिह्न’ (लिंग) नष्ट करके अपमानित करना ? ऐसा करके वे कोई ‘नई शुरुआत’कर रहे हैं या महान् भारतीय संस्कृति की न्याय व्यवस्था के अतीत में लौट रहे हैं ? कॉस्टे्रशन का अर्थ बन्ध्याकरण या बधिया करना है और बधिया सिर्फ बैल या बकरे जैसे जानवारों को ही किया जा सकता है. पुरुषों को बधिया नहीं किया जा सकता। हाँ, नसबन्दी हो सकती है लेकिन उससे सम्भोग क्षमता पर क्या असर पड़ेगा ? खैर…उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों द्वारा ऐसे आदेश को गैर-कानूनी ही ठहराया जाएगा. इसे कानून और न्याय-सम्मत कैसे ठहराया जा सकता है? अब तो न ऐसा कोई नियम है और न कानून। बलात्कार का अपराध भले ही ‘जघन्यतम और क्रूरतम’ माना जाता हो, लेकिन सजा सख्त या कठोर होने की बजाय ‘मानवीय’ और ‘न्यायोचित’ ही होनी चाहिए, होती है. अपराधी पितृसत्तात्मक समाज की गन्दगी या कूड़ा है, लेकिन आखिर है तो उसी का उत्तराधिकारी. स्वयं अपने पुत्रों को ‘नपुंसक’ या ‘पौरुषहीन’ होने की सजा कैसे दे? सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण के लिए ‘बलात्कार का भय’ या ‘आतंक’ भी तो बनाए रखना जरूरी है. वरना ‘पुरुष वर्चस्व’ ही समाप्त हो जाएगा. वैसे भी ‘सभ्य समाज’ में ऐसी सजा देना बर्बर और अमानवीय ही माना जाएगा. नहीं, ऐसे विकल्प समस्या का समाधान नहीं.
क्रमशः…

घर/कहानी

नीरा परमार

 कविता, कहानी और शोध -आलोचना के क्षेत्र में योगदान. एक कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित . संपर्क : parmarn08@gmail.com

नीरा परमार हाशिये के साहित्यिक स्त्री विमर्श में उल्लेखनीय हस्ताक्षर है. कहानीकार, कवयित्री और शोधकर्ता के तौर पर उनका जो लेखन रहा है उसमें दलित, आदिवासी व वंचित समुदायों और स्त्री के प्रश्नों का मुख्य स्थान रहा है. उनकी यह कहानी जाति, वर्ग और स्त्री विमर्श तीनों कोण से पढ़ी जा सकती है.
फारूक शाह
कवि / आलोचक

बरसात खत्म होते-होते बंगला तैयार हो जाना चाहिए था. ठेकेदार को बंगले के मालिक ने कहा दिया था कि बंगलौर से आ रहे बेटे-बहू के साथ इस बार की बरसात वे नए बंगले में बिताएंगे. पुराने बंगले में रहते-रहते वे तंग आ चुके थे. नया बंगला वे बनवा भी बड़े शौक से रहे थे. ऊपर-नीचे बड़े-बड़े हॉलनुमा कमरे, बड़े-बड़े बरामदे विशाल लॉन, खुली छत, पूजा घर, सर्वेन्ट्स क्वाटर्स सब-कुछ उनकी छोटी-छोटी रुचियों और हुक्म को ध्यान में रखकर बन रहा था. इस बंगले को बनाने वाले रेजा-कुलिऐं में परबतिया और उसका घरवाला भी था. परबतिया और उसके घरवाले को इस बरसात अपने झोपड़े के खपरैल बदलने की चिंता खाए जा रही थी. पिछले साल ही उन दोनों ने कई बरसात से चूते घर की मरम्मत करवाने की ठानी थी, लेकिन घर पर एक के बाद एक मुसीबतें आती चली गईं और वे कर्ज में डूबते चले गए. पहले छोटे लड़के को मलेरिया हो गया, फिर परबतिया को माँ के मर जाने पर मायके चला जाना पड़ा. वहाँ से लौटी तो बूढ़ा ससुर कै-दस्त की चपेट में आ गया, वह जब तक सम्हले, सास ने खाट पकड़ ली. पिछली बरसात में छोटे-मोटे बरतन इधर-उधर रखे गए लेकिन पाँच-पाँच लड़का-लड़की, बूढ़ा और वे दोनों प्राणी बरसात की झड़ी में भीगते बीमार होते रहे. इस बरस अगर बरसात के पहले मरम्मत नहीं करवाई तो पूरे परिवार को पेड़ के नीचे गुजारा करना होगा.

बंगले की ढलाई आज खत्म हो गई थी. अब तेजी से टाइल्स बिछाने, दरवाजे़-खिड़कियाँ आदि लगवाने का काम शुरू होने वाला था. परबतिया की बड़ी लड़की मुँह अंधेरे उठकर माँ के काम में हाथ बंटाती, घर-आँगन बुहारना, कुएं से पानी लाना, भात पकाना ये सारे छोटे-बड़े काम वह माँ के साथ तेजी से निबटाती. सुबह ही बंगले पर पहुँचती. कल तक जहाँ सीमेंट और ईंट के बिखरे ढेर थे, आज वहीं भव्य आलीशान बंगला खड़ा था. सब मजदूरों ने झुलसती गर्मी में तन-मन से मेहनत की थी. देखते-देखते बंगले में शीशे की तरह चमकते रंग-बिरंगे टाईल्स बिछ गए. बाथरूम में हरे रंग के अन्य जगह हल्के भूरे. बगल की दीवारें भी हल्के पीले रंग में रंग उठी. एक-एक फर्श, एक-एक दीवारे चमक लिए अपनी खूबसूरती में एक दूसरे से जैसे होड़ लेने लगी. बंगले का मैनेजर दूसरे मजदूरों के साथ पुराने बंगले का फर्नीचर सजाने लगा. ड्राइंगरूम में आदमी समा जाए ऐसे मखमली विशाल सोफे, दीवान, दीवार तक सटे कारपेट, धूप-छांह से खेलते रेशमी पर्दें, विशाल झाड़फानूस, एक से एक नायाब कला कृतियाँ सज गई. बंगले के शयन कक्ष, पूजा-घर, बाथरूम भी धीरे-धीरे सामान से एक नयी आभा पाने लगे. बरामदे में भी लगा झूला जरा-सा छू लेने पर नदी में उठती लहरों-सा तरंगित हो उठता. सेठानी और कॉलेज में पढ़ने वाली उनकी बेटी नौकरों से सारा फर्नीचर इधर से उधर खिसकवाते रहती. सब इकट्ठे होते तो पुराने बंगले के दोष गिनाते और नए बंगले की एक-एक खूबियों की प्रशंसा करते नहीं अघाते.

परबतिया और उसका घरवाला मैनेजर के कहने पर बंगले के अंदर छुटा हुआ साफ-सफाई का काम निबटाने में लग गए. आसपास कोई नहीं रहने पर घरवाले की धीमी डपट के बावजूद परबतिया अपने खुरदरे हाथों से कभी रेशमी परदे को, कभी मखमली गलीचे तो कभी सोफे को छू लेती. सेठ जी के परिवार में उनकी लड़की का स्वभाव बहुत कड़ा था. इसलिए मैनेजर कोई ऐसी स्थिति आने न देना चाहता था, जिससे सबके सामने उसे जलील होना पड़े. बंगले का काम एक दो दिन में पूरी तरह से निबट जाने वाला था. सब मजदूर-रेजाओं को छुट्टी दे दी गई थी. बंगले की मालकिन ने परबतिया और उसके घरवाले को गृह-प्रवेश तक रोक लिया था. इधर रात-दिन की झड़ी से परबतिया के घर का खपरैल जगह-जगह से चूने लगा था. पूरा परिवार इस कोने से उस कोने में सोते-सोते आँखों में रात काट देता. छोटे-छोटे बच्चों को पानी से बचाने में वह स्वयं भींग जाती. चूल्हे की आग से आखि़र कितनी बार कपड़े सुखाती. दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भीगे कपड़ों में ठिठुरती झपकी लेती, पानी का वेग आँखें खोल देता, फिर किसी तरह सोने की कोशिश करती. सपने में बंगले के झिलमिलाते परदे, मखमल कालीन, ऊँचे पलंग दीखते. हड्डी ठिठुराती मिट्टी की दीवार से सटी परबतिया इन सबका कोमल स्पर्श याद करती अंधेरे में उसका घर और बंगला सब गड्डमड्ड हो जाता.

नए बंगले को दुल्हन की तरह सजाया गया था. सारे मेहमान आ चुके थे. सब कमरे चहल-पहल लिए खचाखच भरे थे. पूरा बंगला गेंदे के फूल और आम के पत्तों की मालाओं से सजाया गया था. गेट के बाहर विशाल तोरण द्वार बना था. दरवाजे़ के दोनों तरफ सुंदर गमले और केले के पत्ते पेड़ों की तरह सजाए गए थे. सुंदर अल्पना से बंगले का द्वार और भव्य लग रहा था. बंगले के पीछे वाले विशाल आंगन में मीठे पकवान की सुगंध वातावरण में भर उठी थी. इस बार की बरसात में ठंड लग जाने के कारण परबतिया की कमर और घुटने में तेज दर्द हो रहा था. सुबह से मालकिन के बताए कामों को वह चुपचाप दर्द दबाए किए जा रही थी, सबसे छोटे लड़के को रात भर तेज बुखार था, जिसके चलते वह एक पल सो नहीं पाई थी. काम करते-करते उसे बार-बार चक्कर आ रहे थे.
शहर में औरों के लिए पेशाब-पाखाने की थोड़ी-बहुत व्यवस्था होती ही है, लेकिन गरीब मजदूर रेजाओं के लिए ऐसी कोई सुविधा नहीं होती. मजदूर तो कहीं चले जाते हैं, लेकिन रेजाओं के लिए आड़ खोजना मुसीबत बन जाती है. ऐसे तो शर्म-लाज छोड़कर वे खड़े-खड़े ही पशु कर तरह पेशाब कर लेती हैं, लेकिन माहवारी के समय घर बैठना तो होता नहीं, ऐसे में उनका जीना दूभर हो जाता है. पखाने के लिए भी उनको प्राणों पर संकट आ जाता है. ठेकेदार की गालियों से बचते हुए वे जैसे-जैसे ये सब काम भी निबटा लेती हैं.

परबतिया सुबह से चार-पाँच बार बंगले के पिछवाड़े आड़ में गई थी. उसे एक घंटे से पेशाब लगा हुआ था. मालकिन की लड़की के एक के बाद दूसरे छूटते हुक्म के कारण वह साँस भी नहीं ले पा रही थी. पूजा-घर, बड़ा आँगन, बरामदा धोने-पोछने के बाद लड़की सिर पर सवार थी कि जल्दी से जल्दी बाथरूम धो दे. सुबह नौ बजे रहे थे. घर की औरतें छत पर रात में लगाई गई मेंहदी एक-दूसरे को दिखा रही थी. मेहमानों का आना शुरू हो गया था. परबतिया को पेशाब के लिए आँगन पार करके जाना होता. लड़की छत से उसे गुजरते देखती और चिल्लाने लगती. पेशाब का दबाव बढ़ने से परबतिया के पेट में जोरो से दर्द होने लगा. तबियत ठीक न होने से चक्कर आ रहे थे. उसका घरवाला सब्जियों, फलों और मिठाइयों की टोकरी ढो रहा था, नहीं तो वह उससे कहकर चुपचाप चली जाती. आज मिठाई रुपए मिलने के लालच में उसका घरवाला भी क्यों सुनता. वह तो मन ही मन खुश था कि रेजा-कुलियों में सिर्फ़ वह और उसकी घरवाली ही रोक लिए गए हैं. घर के नौकरों के साथ उन्हें भी ईनाम मिलेगा. परबतिया दर्द से दाँत भींच झाड़ू लेकर लड़कों के बेडरूम में घुसी. बाथरूम में जिस दिन हरे रंग का टाइल लग रहा था, उसी रात को उसका बूढ़ा ससुर रात भर दमे के कारण आँगन में छटपटाता खाट पर करवट-बदलते रह गया था. परबतिया का सुख-दुख इस बंगले की एक-एक ईट से जुड़ा हुआ था.

वह कल यहाँ से चली जाएगी, लेकिन बंगला बनाते समय किस तरह आंधी-पानी में उसने मुसीबतों का पहाड़ उठाया है, ये सारी बातें इन दरवाजों-दीवारों में कैद रहेंगी. किस तरह पीड़ा से कराहते हुए उसने माथे पर तसला उठाए ईट-गारा ढोया है, क्या वह एक-एक घड़ी को भूल सकती है. लड़की बहुत ही शौकीन मिजाज थी. बाथरूम में गुलाबी रंग का बाथ-टब था. नए चमचमाते स्टील के नल, झरने, साबुन, शैम्पू की शीशियाँ और छोटे-बड़े नैपकिन-तौलिए करीने से रखे हुए थे. एक तरफ नक्काशीदार बड़ा-सा आईना लगा हुआ था. परबतिया थोड़ी देर के लिए सारा दर्द भूल इस साफ जगमगाती दूसरी दुनिया को देख भौंचक्की रह गई. अचानक उसे लगा कि वह पेशाब के दबाव को रोक नहीं पाएगी. दर्द पूरे शहर में जैसे लहरें लेने लगा. पीड़ा की तेज लहर उसको संज्ञा-शून्य किए दे रही थी. लग रहा था उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है. बाथरूम का दरवाज़ा उसने उढ़का दिया, हड़बड़ी में दरवाज़ा बंद करे इसके पहले ही वह राहत की लंबी साँस लेकर बैठ गई. कुछ देर के लिए उसका सारा तनाव ठहर गया. लड़की का क्रोध, मेहमानों की चहल-पहल, हवन की अग्नि का पवित्र धुआँ, वह मिल रही राहत में जैसे सब कुछ भूल गई.

अचानक धड़ाक से बाथरूम का दरवाज़ा खुला ‘ओ माई गॉड’ की आतंकमयी चीत्कार के साथ दरवाज़ा बंद हो गया. चीख लड़की की थी. परबतिया का इतनी देर से रुका हुआ पेशाब रुकने का नाम नहीं ले रहा था. उसने भय से आँखें बंद कर ली. बाथरूम के बाहर लड़की की चीख-पुकार से भीड़ जमा हो गई. मालकिन और उनकी लड़की बेतहाशा गालियाँ दिए जा रही थी. परबतिया ने बाथरूम में बड़ी बाल्टी से दो-तीन बाल्टी पानी डाल दरवाज़ा खोल दिया. लड़की के कमरे में भीड़ जमा हो गई थी. बंगले के मालिक, बंगलौर वाले बेटे-बहू, मैनेजर और कपड़े-जेवर से लदी औरतें कमरे में जमा थी. लड़की की आँखें गुस्से, घृणा और जुगुप्सा से बाहर निकली जा रही थी. रोष से जबान लड़खड़ा रही थी. उसका घरवाला भय और अचरज से उसको घूरे जा रहा था. लड़की का तमतमाया, लाल हुआ गोरा मुँह विकृत हो उठा था, ‘‘जरा इस कमीनी की हिम्मत तो देखो. आज गृह-प्रवेश के दिन पूजा-पाठ के समय महारानी यहाँ घुसी हुई है.’’ उसने क्रोध से फूट पड़ते हुए उँची एड़ी का सैंडल हाथ में ले लिए, ‘‘ठहर अभी मजा चखाती हूँ. हरामज़ादी, तेरी यह मजाल!’’ चारों तरफ ‘मारो साली को’ की आवाज़ें आ रही थी. ‘‘माफी दे दो छोटी मालकिन, जी अच्छा नहीं था, इसलिए ऐसी ग़लती हो गई,’’ परबतिया ने आँसुओं से तर चेहरा लिए हाथ जोड़ दिए.

क्रोध तो बंगले के मालिक-मालकिन को भी आ रहा था. लेकिन आज के दिन वे कोई हंगामा नहीं चाह रहे थे. मालिक ने मालकिन को हुक्म सुना दिया कि इन कमीनों को अभी घरसे बाहर करो. मालिक पत्नी पर बरस रहे थे कि इतने नौकर-चाकर के रहते हुए इन रेजा-कुली को रोकने की क्या जरूरत थी. परबतिया का घरवाला अपना गुस्सा काबू में रख नहीं पाया. कहाँ तो उसने सोचा था कि दो शाम का खाना और ईनाम लेकर घर जाएगा और कहाँ मेहनत-मजदूरी के रुपए भी गंवाने पड़ रहे थे. उसने बरामदे में पड़ा मोटा डंडा उठा लिया और परबतिया की कमर पर एक लात जमाते हुए उसे डंडे से धुनने लगा. दाँत पीसते हुए परबतिया का झोटा पकड़ घसीटते हुए घर ले जाने लगा, ‘‘साली मेमसाब की चाल सीखती है. चल कुतिया घर चल, आज शाम को हाँडी नहीं चढे़गी न तो सब शौख निकलता हूँ तेरा…’’ परबतिया के घरवाले पर जैसे भूत सवार था. रोती चिल्लाती घरवाली को माँ-बहन की गंदी-गंदी गालियाँ देता घसीटता वह उसे घर ले रहा था.

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : छठी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.

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आरोप झूठा है : गवाह ‘खतरनाक’ छठी क़िस्त 


एक अन्य मामले में छह वर्षीया मंजू के साथ मई, 1988 में बलात्कार का प्रयास किया गया. सत्र न्यायाधीश ने मई, 1990 में तीन साल कैद और 500 रुपए जुर्माना किया. लेकिन पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति ने जनवरी, 1994 में गवाहों के बयान में विसंगतियों के आधार पर केस को झूठा मानते हुए, अभियुक्त को सन्देह का लाभ देकर बरी कर दिया. न्यायमूर्ति ने कहा, ”मंजू स्वयं बच्ची है और वह गवाहों की उस ‘खतरनाक श्रेणी’ में आती है, जिन्हें आसानी से उनके माता-पिता या बुजुर्ग, अपने निजी स्वार्थों के लिए, बेबुनियाद आरोप लगाने के लिए बहका सकते हैं. रिपोर्ट में मात्र पाँच घण्टे की देरी को अस्वाभाविक मानते हुए न्यायमूर्ति ने लिखा, ”यह तथ्य स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि अपीलार्थी को फँसाने के लिए काफी समय उपलब्ध था.61 बच्चे गवाह नहीं हो सकते, उनकी गवाही ‘खतरनाक’ है. उन्हें बहकाना आसान है और ‘निजी स्वार्थों’ के लिए, माँ-बाप ‘बेटी से बलात्कार’ का ‘झूठा आरोप’ भी लगा सकते हैं. बदलते भारतीय समाज की संरचना को समझने के लिए, ऐसे निर्णय वास्तव में ही ‘उल्लेखनीय हैं। विशेषकर समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए.इसके विपरीत नौ वर्षीया रेखा के साथ बलात्कार के मामले में अभियुक्त ने अपने बचाव में तर्क दिया कि आपसी रंजिश की वजह से उसे सबक सिखाने के लिए झूठे मुकदमे में फँसाया गया है. कलकत्ता उच्च न्यायालय के
न्यायमूर्ति श्री जे.एन. होरे और ए. राजखोवा ने कहा, ”आपसी रंजिश का तर्क एक दुधारी तलवार की तरह है जो दोनों तरफ से काटती है…हमें लगता है कि इस बात की बहुत कम सम्भावना है कि अभियुक्त को ऐसे अपराध के झूठे इल्जाम में फँसाया गया हो, जिससे लडक़ी की प्रतिष्ठा और भविष्य प्रभावित होते हों और छोटे से आपसी झगड़े की वजह से सामाजिक दाग लगता हो.62 ऐसे घृणित अपराध में झूठे अपराध लगाना सम्भव है या नहीं, इसका सही जवाब बेटी के माँ-बाप ही दे सकते हैं.

एक और मामले में चौबीस साल के नवयुवक ने दस साल की स्कूल जाती लडक़ी के साथ, गन्ने के खेत में बलात्कार किया. अभियुक्त के वकीलों ने अपील में कहा, ”अभियुक्त की सही पहचान नहीं हुई है. रिपोर्ट देरी से दर्ज कराई गई है और अभियुक्त चौबीस वर्षीय नौजवान है, जिसके पास ‘उज्ज्वल भविष्य’है. इसलिए सजा कम करने में नरम रुख अपनाया जाए. लेकिन उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री राधाकृष्ण राव ने कहा, ”यह एक भयंकर अपराध है जो सुबह आठ बजे, दिन-दहाड़े दस साल की मासूम बच्ची के साथ किया गया। यह उस लडक़ी का जीवन भर पीछा करता रहेगा। रहम का कोई कारण नहीं है. रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी के तर्कों को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति ने लिखा है, ”विशेषकर बलात्कार और छेड़छाड़ के मामलों में औरतें या उनके सम्बन्धी स्वाभाविक रूप से थाने में रपट दर्ज कराने से पहले दो बार सोचते हैं. गाँवों में यह और अधिक होता है, क्योंकि इससे पीडि़ता के परिवार की प्रतिष्ठा और इज्जत जुड़ी हुई है.63 गाँव के खेत में बेरहमी से बलात्कार के एक और केस में दस वर्षीया लडक़ी के साथ बलात्कार करनेवाले बीस वर्षीय युवक के वकीलों ने बहस में कहा, ”गाँव में पार्टीबाजी की वजह से लडक़ी के बाप ने अभियुक्त को गलत मुकदमे में फँसाया है. लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा, ”कोई भी आदमी इस हद तक नीचे नहीं गिरेगा कि वह पार्टीबाजी की वजह से अपनी नाबालिग बेटी के भविष्य को, बलात्कार के आरोप लगाकर दाँव पर लगा दे. न्यायमूर्ति श्री डी.जे. जगन्नाथ राजू की यह टिप्पणी भी महत्त्वपूर्ण है, ”खेत की रखवाली के लिए भेजी गई लडक़ी के साथ बहुत ही अमानवीय ढंग से बलात्कार किया गया है. इस तरह के अभियुक्त के साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति नहीं दिखाई जा सकती। याद रखना चाहिए कि ग्रामीण इलाकों में अकेली औरतें खेतों में कृषि-कार्य करती हैं. अगर इस प्रकार के अभियुक्तों के साथ ढंग से व्यवहार नहीं किया गया तो खेतों में अकेली काम करनेवाली औरतों की कोई सुरक्षा या संरक्षा ही नहीं रह जाएगी.64

छोटी उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में कुछ न्यायमूर्तियों की भाषा अपेक्षाकृत संयमित और संवेदनात्मक है। परन्तु कुछ निर्णय पढ़ते हुए, अभी भी लगता है कि न्यायमूर्ति सिर्फ कानून और न्याय की भाषा ही जानते हैं. दस-बारह साल की बच्ची के अपहरण और बलात्कार के एक मामले में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री जी.एस.एन. त्रिपाठी डॉक्टरी रिपोर्ट का पोस्टमार्टम करते हुए कहते हैं, ”तो मैं कह सकता हूँ कि लडक़ी काफी लम्बे समय से सम्भोग की आदी थी और ”मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि यह एक भ्रष्ट चरित्र की लडक़ी थी और बिना अन्य प्रमाणों के, सिर्फ उसका बयान सजा सुनाने के लिए पर्याप्त नहीं है.65 ऐसी भ्रष्ट चरित्र की लडक़ी के आरोपों को ‘विश्वसनीय’, कैसे माना जा सकता है? ‘विद्वान सत्र न्यायाधीश को फौजदारी कानून का बिलकुल कुछ ज्ञान ही नहीं था. वरना…ऐसे बेबुनियाद मुकदमे में सजा सुनाता. सजा देने का अधिकार नहीं उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्तियों द्वारा लिखी कानून और न्याय की ऐसी ‘मानवीय’, ‘संवेदनशील’ और नैतिक संस्कारों में बँधी भाषा के बीच, मुझे दिल्ली की जिला अदालत के एक युवा मजिस्टे्रट श्री राजकुमार चौहान द्वारा सुनाया एक फैसला अक्सर याद आ जाता है. आठ वर्षीया चन्दा के साथ, उसके अपने पिता द्वारा अप्राकृतिक मैथुन के मामले की वर्ष भर में सुनवाई समाप्त करने के बाद, मजिस्टे्रट चौहान ने अपने अविस्मरणीय निर्णय में लिखा कि ”इस मुकदमे की सुनवाई के दौरान मुझे हमेशा अहसास होता रहा कि मैं स्वयं कटघरे में खड़ा हूँ. चन्दा द्वारा अपने पिता के विरुद्ध लगाए गम्भीर (पवित्र) आरोप, सचमुच आश्चर्यचकित करनेवाले थे और पिता का अपराध बेहद घृणित. लडक़ी की माँ सरस्वती की आँसू-भरी चीखों और इस आत्मलाप को सुनने के बाद मेरा हृदय और आत्मा तक आहत ही नहीं, बल्कि लहूलुहान हो गए कि अगर मुझे सपने में भी खयाल आ जाता कि मेरा पति ऐसा दुष्कर्म करेगा तो मैं उसके बच्चों की माँ ही नहीं बनती.



मजिस्टे्रट चौहान ने अपने निर्णय में संयुक्त परिवारों के विघटन, औद्योगिकीकरण से लेकर एकल परिवारों में पुरुष वर्चस्व की ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए लिखा है कि न्यायाधीश की भूमिका तो शुरू ही तब होती है, जब खेत की मेड़ ही घास खा चुकी होती है. खैर अभियुक्त को पूर्ण रूप से दोषी मानते हुए श्री चौहान ने अपना फैसला मुख्य दंडाधिकारी को भेजा, जिन्होंने अभियुक्त को छह वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई. इसके विरुद्ध अभियुक्त ने सत्र न्यायाधीश के यहाँ अपील दायर की और फिर जमानत पर छूट गया. कोई नहीं जानता कि ऐसी अपीलों का अन्तिम फैसला कब होगा. क्या होगा ?  यहाँ यह बताना जरूरी है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक मैथुन) की सुनवाई का तो अधिकार मजिस्टे्रट को है लेकिन उसे तीन साल कैद से अधिक सजा सुनाने का अधिकार नहीं है. जबकि इस अपराध के लिए अधिकतम सजा आजीवन कारावास या दस साल कारावास और जुर्माना निर्धारित की गई है या तो ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार सत्र न्यायाधीश को होना चाहिए या फिर मजिस्टे्रट को सुनवाई का ही नहीं, सजा देने का भी अधिकार हो। वरना…उचित न्याय कठिन है.


बहस दोबारा होऽऽ

नन्दकिशोर रथ बनाम नन्दा उर्फ अनन्त सोहरा वह अन्य66 में 30 जनवरी, 1985, रात आठ बजे, गाँव रंभा, जिला कटक में आठ साल की लडक़ी चम्पीना गाँव में कथक देखने जा रही थी कि रास्ते में अभियुक्त उसे पकडक़र घर ले गया और बलात्कार किया. खून से भीगी पैंट पहने लडक़ी घर पहुँची  तो जाकर माँ को बताया. रात करीब नौ बजे पिता घर लौटे तो माँ-बेटी दोनों बैठी रो रही थी. डॉक्टरी रिपार्ट के अनुसार भी बलात्कार प्रमाणित हुआ लेकिन सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को बाइज्जत बरी कर दिया और कहा कि ”सिर्फ लडक़ी के बयान के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती और बयान की पुष्टि अन्य प्रमाणों से नहीं हो रही है. 1986 में सत्र न्यायाधीश के निर्णय के विरुद्ध लडक़ी के पिता ने उड़ीसा उच्च न्यायालय में पुनर्समीक्षा याचिका दायर की. सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री बी. गोपालास्वामी ने मुकदमे के तथ्यों, गवाहों और प्रमाणों के साथ सर्वोच्च न्यायालय के अनेक फैसलों के आधार पर निर्णय दिया कि सहायक सत्र न्यायाधीश का निर्णय गलत तर्क और न्यायिक दृष्टिकोण की कमी का परिणाम है जो कानून की निगाह में उचित नहीं ठहराया जा सकता. सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को छोडक़र गम्भीर गलती की है और यह मानना भी गलत है कि पीडि़त लडक़ी की गवाही की पुष्टि के लिए अन्य प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. चार साल बाद 14 अगस्त, 1990 को न्यायमूर्ति गोपालास्वामी ने मुकदमा, सत्र न्यायाधीश को दोबारा बहस सुनने तथा कानून के अनुसार शीघ्र-अति-शीघ्र निर्णय करने लिए वापस भेज दिया. इसके बाद क्या (न्याय) हुआ कहना कठिन है.

कर्नाटक राज्य बनाम महाबलेश्वर जी नामक67 मामले में अभियुक्त की उम्र अठारह साल और बलात्कार की शिकार लडक़ी पलाक्षी की उम्र पन्द्रह साल थी. लडक़ी नवीं कक्षा की छात्रा थी. 3 अक्टूबर, 1977 को दोपहर दो बजे के करीब लडक़ी स्कूल से लौट रही थी तो अभियुक्त उसे पकडक़र पास के जंगल में ले गया, जहाँ उसने जबर्दस्ती बलात्कार किया. लडक़ी ने अपनी माँ और भाई को बताया कि अभियुक्त ने जंगल में ले जाकर जबर्दस्ती उसे ‘बरबाद’ किया है. गिरफ्तारी के बाद मुकदमे की शुरुआत होने से पहले ही पलाक्षी ने आत्महत्या कर ली और इसका लाभ मिला अभियुक्त को क्योंकि सत्र न्यायाधीश और उच्च न्यायालय ने पीडि़ता (लडक़ी) की गवाही न होने की स्थिति में सन्देह का लाभ देते हुए अभियुक्त को बलात्कार के अपराध से बरी कर दिया. हालाँकि चोट पहुँचाने के अपराध में सिर्फ चार महीने कैद की सजा सुनाई. राज्य सरकार द्वारा 1979 में दायर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति श्री एस. रतनेवल पांडियन और एम.एम. पंछी ने कहा कि ”सिर्फ इस कारण से कि पीडि़ता की मृत्यु हो गई है और वह गवाही के लिए उपलब्ध नहीं है. अभियुक्त को बरी नहीं किया जा सकता अगर अभियुक्त के अपराध को प्रमाणित करनेवाले अन्य साक्ष्य उपलब्ध है. सर्वोच्च न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्त को बलात्कार के अपराध का दोषी पाते हुए पाँच साल कैद की सजा सुनाई. यह दूसरी बात है कि राज्य सरकार द्वारा दायर 1979 की याचिका का फैसला 15 मई, 1992 तक सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन पड़ा रहा.



बेटी से बलात्कार : ‘क्षणिक उत्तेजना

अब्दुल वहीद बहादुर अली शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य68 वह मुकदमा है जिसमें एक बाप ने खुद अपनी ही सात साल की बेटी प्रवीण के साथ 21 दिसम्बर, 1985 की रात बलात्कार किया. अदालत में बाप के बचाव के लिए वकीलों ने बार-बार सात साल की बेटी से ही पूछा कि वह चीखी क्यों नहीं ? चिल्लाई क्यों नहीं? शोर क्यों नहीं मचाया? वही ‘बलात्कार’ का अनिवार्य कर्मकांड. वही फिल्मी सीन और वह नहीं तो बलात्कार हुआ कहाँ ? हर सम्भव कोशिश यह प्रमाणित करने की कि उसने अपराध नहीं किया, जबकि सारे सबूतों और गवाहों के चेहरों पर अपराध साफ दिखाई दे रहा था. 1988 में सत्र न्यायाधीश ने बलात्कार के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनाई लेकिन अपील में बम्बई उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री एस.एम. दाऊद और एम.एफ. सलदाना ने 16 जनवरी, 1992 को आजीवन कारावास की सजा घटाकर 10 साल कैद कर दी. हालाँकि उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने लिखा है, ”इस मुकदमे में सत्र न्यायाधीश ने काफी सख्त, गम्भीर दृष्टिकोण अपनाया है और हमारे विचार से ऐसा ठीक ही किया है. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि यौन अपराध अपीलार्थी द्वारा अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ किया गया है. यह कारण काफी हद तक अपराध की संगीनता को बढ़ाता है और हमारे विचार से सख्त सजा की ही नहीं, बल्कि कड़ी सजा की माँग करता है…

अपीलार्थी के वकील ने सजा कम करने के लिए एक तर्क यह भी दिया कि ”इस केस को उन केसों के बराबर नहीं समझना चाहिए, जिसमें बेबस औरतों व बच्चों पर हवस पूरी करने के लिए क्रूर  ताकत का इस्तेमाल किया गया हो. तथ्यों के आधार पर ज्यादा-से-ज्यादा इसे क्षणिक उत्तेजना का अपराध माना जा सकता है. दूसरी तरफ सरकारी वकील का कहना था कि बाप द्वारा अपनी ही नाबालिग सात साल की बेटी के साथ बलात्कार से ज्यादा घृणित और जघन्य अपराध और क्या होगा? इसलिए अपराधी को अधिकतम सजा दी जानी चाहिए. न्यायमूर्तियों ने लिखा है, ”हम स्वीकार करते हैं, जैसा कि विद्वान सरकारी वकील ने दर्शाया है कि यह अपराध जघन्य भी है और क्रूरतापूर्ण  भी लेकिन यह भी आवश्यक है कि स्थितियों का सम्पूर्ण जायजा लेकर ही निर्णय करना चाहिए. अपीलार्थी झुग्गी में रहता है, उसकी गरीबी ने उसे ऐसे कठिन हालात में डाल दिया है कि वह छोटी-सी जगह में रहने को विवश है. इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. रिकॉर्ड बताता है कि उसकी पत्नी उसे तीन साल पहले ही छोडक़र चली गई थी. अपीलार्थी समाज के सबसे निर्धन वर्ग का व्यक्ति है. शिक्षा से पूर्ण रूप से वंचित होने के कारण संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए, उसे सामान्य बोध तक का अवसर नहीं मिल पाया… रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है कि अपीलार्थी की यौन अपराध करने की कोई पृष्ठभूमि हो. यहाँ तक कि दुव्र्यवहार तक नहीं. दूसरी तरफ हम देखते हैं कि हालाँकि उसकी पत्नी उसे छोड़ गई है या फिर भी वह नाबालिग बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजता है, खाना बनाता है या होटल से लाता है, सारा दिन काम करता है. कभी-कभी उनके लिए खिलौने लाता, जेबखर्च देता और रात को आकर खाना बनाता था. यह वे परिस्थितियाँ हैं जो हमें यह मानने के लिए कहती हैं कि अपीलार्थी की दयनीय स्थिति के कारण, उससे हुई ये क्षणिक भूल थी.

 एक तरफ अपराध सख्त से सख्त सजा की माँग करता है दूसरी तरफ ऐसे कारण हैं जो हमें ‘उचित सीमा’ में रहने को विवश कर रहे हैं. काफी ध्यान से विचार करने के बाद, हमारे विचार से दस साल कैद की सजा उचित और काफी रहेगी. क्या यहाँ ‘इनसैस्ट की ‘थियरी’ नहीं दी जा रही ? परिस्थितियों का विवरण बलात्कार की वैधता बताने के लिए दिया जाता है. यह अक्सर होता है, होता रहा है. पिछले कुछ सालों में पिता द्वारा अपनी ही बेटी (या सौतेली बेटी) के साथ बलात्कार या यौन शोषण और उत्पीडऩ के अनेक मामलों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है. इन मामलों में पिता किसी झुग्गी-झोंपड़ी में रहनेवाला अनपढ़ या निर्धन व्यक्ति नहीं. 1994 में गृह मंत्रालय के ‘अंडर सेके्रटरी’ के. सी. जाखू एंड पार्टी के विरुद्ध बलात्कार, अप्राकृतिक मैथुन, यौन शोषण और उत्पीडऩ और अपहरण का केस दर्ज हुआ था. इसमें जाखू की छह वर्षीय बेटी का आरोप था कि उसके पिता उसे दफ्तर ले जाते. दफ्तर से अपने दोस्तों व महिला मित्रों के साथ होटल। वहाँ वे शराब पीते, ब्लू फिल्म देखते और सामूहिक सम्भोग करते. उसके पिता उसे भी शराब पिलाते, कपड़े उतारते और अँगुली योनि व गुदा में डाल देते. घर में भी रात को माँ व बहनों को बेहोश करने के बाद मुख मैथुन करते-करवाते. सत्र न्यायाधीश ने सब अप्राकृतिक मैथुन और मर्यादा भंग करने सम्बन्धी आरोप तो लगाए लेकिन बलात्कार का मुकदमा चलाने से इनकार कर दिया. इस निर्णय के विरुद्ध लडक़ी की माँ सुदेश जाखू ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की.

यौन हिंसा और न्याय की भाषा: पांचवी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.


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बचपन से बलात्कार : हत्या

जुम्मन खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य50 एकमात्र निर्णय है, जिसमें छह वर्षीया लडक़ी (सकीना) के साथ बलात्कार के बाद हत्या के अपराध में फाँसी की सजा हुई. गवर्नर और राष्ट्रपति द्वारा रहम की अपील रद्द होने के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी पुनर्विचार याचिका या रिट पिटीशन रद्द की गई. इस दुर्भाग्यपूर्ण मुकदमे में 26 जून, 1983 को करीब चार बजे जुम्मन मियाँ ने अपने पड़ोसी यूसुफ खाँ की पत्नी दुल्हे खान बेगम से प्रार्थना की कि वह अपनी बेटी सकीना को उसके साथ बाजार भेज दे, वह उसके लिए आइसक्रीम लाना चाहता है. बेगम ने बिटिया जुम्मन के साथ भेज दी और खुद सो गई. घंटे-भर बाद उठी तो देखा बेटी अभी तक नहीं आई. पहले उसने सोचा शायद बाहर बच्चों के साथ खेल रही होगी. लेकिन समय बीता तो वह घबराई. इधर-उधर देखने के बाद जब सकीना नहीं मिली तो वह खुद जुम्मन के घर पहुँची लेकिन वहाँ ताला लगा मिला. पति आए करीब सात बजे तो अड़ोस-पड़ोस में बच्ची ढूँढ़ते रहे, पर बच्ची होती तो मिलती. मामला सुन-सुनकर भीड़ इकट्ठी हो गई. जब यूसुफ खान दोबारा जुम्मन के घर जा रहे थे तो पड़ोसी ने बताया कि करीब साढ़े चार बजे उसने सकीना को एक हाथ में आइसक्रीम लिये, जुम्मन की उँगली पकड़े घर में घुसते हुए देखा था. दूसरे ने बताया कि वह जुम्मन के घर के आगे से गुजर रहा था तो उसने घर के अन्दर से आती बच्ची के रोने की आवाज सुनी थी. उत्तेजित भीड़ जुम्मन के घर पहुँची और दरवाजे के सुराख से टॉर्च जलाकर देखा तो अन्दर चारपाई पर बुर्के में लिपटी बच्ची की लाश पड़ी थी. दरवाजा तोडक़र भीड़ अन्दर पहुँची तो पाया कि लाश सकीना की ही थी, जिसके शरीर पर काफी चोटों के निशान मौजूद थे.

आगरा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने जुम्मन को फाँसी का हुक्म दिया. उच्च न्यायालय ने भी फैसले की पुष्टि करते हुए कहा, ”अपराधी के जघन्य और अमानुषिक कृत्यों को देखते हुए वह किसी प्रकार की नरमी का अधिकारी नहीं है. उसने सोच-समझकर छह साल की बेबस बच्ची के साथ बलात्कार किया है और गला घोंट कर हत्या करने तक गया है. उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध जुम्मन ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च, 1986 को याचिका खारिज करते हुए ऐतिहासिक निर्णय सुनाया, ”जहाँ अपराध समाज के विरुद्ध हो, वहाँ ऐसे गम्भीर मामलों में मृत्युदंड की सजा न देना विशेषकर हत्या के ऐसे मामलों में जो अत्यन्त नृशंसता के साथ किए गए हों, भारतीय दंड संहिता की धारा 302 जो (फाँसी की सजा का प्रावधान करती है) को शून्य में बदलना होगा।. अदालत का यह कर्तव्य है कि अपराध की गम्भीरता के अनुसार उचित सजा के निर्णय सुनाए. सामाजिक आवश्यकता और सम्भावित अपराधियों को रोकने के लिए भी एकमात्र उचित सजा जो अपराधी जुम्मन को मिलनी चाहिए, वह मृत्युदंड के अलावा और कुछ भी नहीं हो सकती, क्योंकि उसने अपनी कामपिपासा शान्त करने के लिए, एक निर्दोष बच्ची की भयंकर तरीके से कलंकपूर्ण हत्या का अपराध किया है.


जुम्मन ने 12 अप्रैल, 1986 को गवर्नर से रहम की अपील भी की जो 18 फरवरी, 1988 को रद्द हो गई. राष्ट्रपति ने भी रहम की अपील 10 जून, 1988 को ठुकरा दी. 15 जुलाई, 1988 को दूसरी रहम की अपील की गई. इसके बाद 10 नवम्बर, 1988 को फिर सुप्रीम कोर्ट में एक रिट दाखिल की गई, जिसमें मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई और फिलहाल के लिए मृत्युदंड रुकवा दिया गया. इस याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों ने 30 नवम्बर, 1990 को मानने से इनकार कर दिया. जुम्मन के विद्वान वकील श्री आर.के . जैन (जो मृत्युदंड के कट्टर विरोधी हैं) की सारी दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्तियों को सजा घटाने का कोई उचित आधार या तर्क नजर नहीं आया। कैसे आता ? लेकिन दुखद तथ्य यह है कि जुम्मन खान के बाद भी मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार के बाद हत्या के मामलों को ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ नहीं माना गया. अनेक फैसले इसका प्रमाण हैं.
राजकीय महाविद्यालय, सुनाम के प्रोफेसर गुरपाल सिंह अपनी पत्नी मनजीत कौर और करीब दो वर्षीया बेटी मल्हार के साथ अपनी भानजी की शादी के अवसर पर चुघे कलाँ (पंजाब) गए हुए थे. शादी के अगले दिन 21 मार्च, 1991 को मल्हार, हरचेत सिंह की गोदी में रही थी. हरचेत सिंह (उम्र 29 साल) गुरपाल सिंह के जीजा कश्मीरा सिंह का मित्र था जो घर अक्सर आता रहता था. दूल्ला-दुल्हन के जाने के बाद गुरपाल सिंह और उनकी पत्नी ने जब मल्हार की तलाश की तो आसपास कहीं नहीं मिली. काफी ढूँढऩे के बाद जब वे खेत में पहुँचे तो देखा कि हरचेत सिंह दो वर्षीया मल्हार के साथ बलात्कार कर रहा है. उन्हें देखकर हरचेत सिंह भाग खड़ा हुआ। मल्हार के पास पहुँचे तो वह खून से लथपथ दम तोड़ चुकी थी.

 पुलिस-थाना-कोर्ट-कचहरी-गवाहों के बयान और वकीलों की बहस सुनने के बाद भटिंडा के सत्र न्यायाधीश ने हरचेत सिंह को बलात्कार के जुर्म में उम्रकैद और दो हजार रुपया जुर्माने और हत्या के जुर्म में फाँसी और दो हजार रुपया जुर्माने की सजा सुनाई. लेकिन पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री जय सिंह शेखो और ए.एस. नेहरा ने अपील में फाँसी की सजा रद्द करके सिर्फ आजीवन कैद का फैसला50 सुनाते हुए कहा, ”सजा के सवाल पर बहस सुनने के बाद, हम महसूस करते हैं कि यह केस ‘दुर्लभतम में दुर्लभÓ की श्रेणी में नहीं आता है. अतएव माननीय न्यायमूर्तियों ने फाँसी की सजा देने से मना कर दिया था. दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भी राज्य बनाम अतरू रहमान51 में फाँसी की सजा की पुष्टि नहीं की थी. हालाँकि अभियुक्त ने छह साल की बच्ची के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी. जुम्मन खान के मामले में52 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यहाँ लागू नहीं होता। (जिसे सेशन जज ने आधार माना है) क्योंकि ”उस केस में जुम्मन ने पहले से सोच-समझ और पूरी तैयारी के साथ बेबस बच्ची के साथ बलात्कार किया था, गला घोंटकर हत्या की थी. प्रस्तुत मुकदमे में मृतक (मल्हार) की मृत्यु बलात्कार के कारण पीड़ा, खून बहने व सदमे से हुई है जो आमतौर पर मृत्यु के लिए काफी है. अपराध कामपिपासा शान्त करने के लिए किया गया था. पहले से दोनों पक्षों के बीच कोई दुश्मनी नहीं थी. ऐसा लगता है कि अपीलार्थी में कामपिपासा इतनी अधिक बढ़ गई थी कि उसे आदमी के रूप में जानवर बना दिया था.


दो साल की बच्ची के साथ 29 वर्षीय नौजवान आदमी बलात्कार करेगा तो निश्चित ही है कि बच्ची जिन्दा कैसे बचेगी ? कामपिपासा शान्त करने के लिए, दो साल की बच्ची के साथ ऐसा कुकर्म ? इससे अधिक घृणित और जघन्यतम अपराध और क्या होगा ? जब इसे घृणित और ‘जघन्यतम अपराध’ मान लिया जाता है तो यह कहने का क्या अर्थ है कि यह ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं है. आदमी जब जानवर (भेडिय़ा) हो जाए तो उसे आजीवन कैद में रखने का मतलब सजा देना है और ऐसे भेडिय़ों को जेल में सुरक्षित रखना ? दिल्ली प्रशासन बनाम पन्नालाल उर्फ पंडितजी उर्फ बन्ना उर्फ सरदार में दो वर्षीय नीतू के साथ बलात्कार और हत्या के अपराध में सत्र न्यायाधीश श्री एम.एम. अग्रवाल ने फाँसी की सजा सुनाई मगर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों (श्रीमती सुनन्दा भंडारे और अनिलदेव सिंह) ने उम्रकैद में बदल दिया. हालाँकि निर्णय में स्वीकार किया गया है कि ”दो साल की बच्ची को एक विकृत पुरुष की हवस का शिकार होते देखना, बेहद घृणास्पद है. बेबस बच्चों से बलात्कार के कँपा देनेवाले अपराध, सचमुच कानून द्वारा निर्धारित अधिकतम दंड के अधिकारी हैं लेकिन…53 मृत्युदंड को आजीवन कैद और आजीवन कैद को दस साल कारावास में बदलना यह प्रथम और अन्तिम फैसला नहीं है. सत्र-न्यायमूर्तियों ने अधिकांश मामलों में सजा कम की है, जिसका व्यापक स्तर पर असर हुआ है. प्राय: हर मामले में अपील दायर की जाती है. अपील मंजूर होने पर जमानत होने की सम्भावना और फैसला होने तक आजादी से इनकार नहीं किया जा सकता. अपील का फैसला होने में (पाँच से बीस साल तक) तो समय लगेगा. लगता ही है.

रियासत बनाम उत्तर प्रदेश, छह साल की गुडिय़ा के साथ बलात्कार के बाद नृशंस हत्या की भयावह कहानी है. गुडिय़ा हरिजन बाप बदलू की बेटी का नाम है, जिसकी रियासत ने 31 जनवरी, 1991 को गन्ने के खेत में बलात्कार के बाद उस समय हत्या कर दी. जब सारे देश में हर्षोल्लास के साथ रविदास जयन्ती मनाई जा रही थी। हरिद्वार के जिला व सत्र न्यायाधीश श्री जे.सी. गुप्ता ने रियासत को मृत्युदंड सुनाया लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एस.के. मुखर्जी और जे. पी. सेमवाल ने फाँसी की सजा रद्द करके उम्रकैद की सजा सुनाते हुए कहा, ”बलात्कार करने के बाद अपीलार्थी ने हत्या की है. हत्या पहले से सोचकर, योजनाबद्ध या संकल्प के साथ नहीं की गई. हत्या मात्र अधीरता या इस भय के बाद की गई कि कहीं मृतक भेद न खोल दे. अपराधी एक नौजवान व्यक्ति है और गुडिय़ा के साथ बलात्कार करने के बाद अपने आपे में नहीं रहा और उसी बीमार मानसिक स्थिति में उसने हत्या कर दी. यह कर्म एक प्रकार की मानसिक विक्षिप्तता की तरफ ले जाता है. हत्या के मामले में आमतौर पर सजा उम्रकैद होती है. विशेष मामलों में निर्णय के कारण लिखकर मृत्युदंड भी दिया जा सकता है. अपीलार्थी उम्रकैद की सजा भुगत सकता है और उसे भविष्य में ऐसा अपराध करने का मौका नहीं मिलेगा.54 विनोद बनाम राज्य में 11-12 साल की रेणु के साथ प्रेमदत्त ने शिव मन्दिर, अलीगढ़ में बलात्कार किया और उसके बाद हत्या. सत्र न्यायाधीश ने हत्या के लिए फाँसी की सजा सुनाई मगर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री गिरधर मालवीय और ए.बी. श्रीवास्तव ने फाँसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलते हुए कहा, ”हमें लगता है कि यह केस फाँसी की अधिकतम सजा की माँग नहीं करता. अपीलार्थी जिसकी उम्र सिर्फ बाईस साल थी, ऐसा लगता है कि मृतका को अपने साथ हत्या करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी हवस पूरी करने के लिए ले गया था. हम महसूस करते हैं कि ‘न्याय का उद्देश्य’ अपराधी को उम्रकैद की सजा से पूरा हो
जाएगा.55

सिद्दिक  सिंह बनाम महाराष्ट्र 55ए में 26 वर्षीय, फौजी जवान द्वारा चार महीने की बच्ची के अपहरण,बलात्कार और हत्या (लाश अन्धे कुएँ में) के मामले में भी सजा उम्रकैद ही रही. हालाँकि न्यायमूर्तियों ने स्वीकारा, ”हमारे लिए इससे अधिक जघन्य बलात्कार की कल्पना तक करना कठिन है. निर्णय में जुम्मन खान का उल्लेख तक नहीं है. बच्चियों से बलात्कार और हत्या के अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें अभियुक्त को सन्देह का लाभ देकर बाइज्जत बरी किया गया है. पाँच वर्षीया सुकुमारी के साथ बलात्कार और हत्या के अपराध के एक मामले में मुजरिम को रिहा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एस. रतनावेल पांडियन और के. जयचन्द्रा रेड्डी ने कहा, ”हम सचेत हैं कि एक गम्भीर और संगीन अपराध हुआ है, लेकिन जब अपराध का कोई सन्तोषजनक प्रमाण न हो तो हमारे पास अभियुक्त को सन्देह का लाभ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, इसलिए इस मुकदमे में हम ऐसा करने को विवश हैं55बी. चौदह वर्षीया लडक़ी माड़ी के साथ बलात्कार के बाद हत्या के एक और मामले में मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलते हुए सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री जी.टी. नानावती ने लिखा है, ”लेकिन उपलब्ध साक्ष्य उच्च न्यायालय द्वारा मृत्युदंड के कारणों को उचित नहीं ठहराते. साक्ष्यों से यह नहीं लगता कि अभियुक्त ने माड़ी को अचानक पकड़ लिया था और वह एकदम विवश थी. उसने अपनी सलवार पूरी तरह से उतार रखी थी जो शायद आवश्यक नहीं थी अगर वह केवल निवृत्त होने गई थी. घटनास्थल पर कोई पाखाना नहीं मिला. अगर उस पर इस प्रकार अचानक हमला हुआ था (जैसा कि उच्च न्यायालय ने माना है) तो वह पहले ही चिल्लाती न कि अपीलार्थी द्वारा बलात्कार शुरू करने के बाद….उसने अपनी सलवार ही नहीं उतारी हुई थी, बल्कि कुर्ता भी गर्दन पर चढ़ाया हुआ था….परिस्थितियाँ बताती हैं कि सम्भवत: आरम्भ में वह स्वयं भी अपीलार्थी को कुछ हद तक आजादी ले लेने के प्रति अनिच्छुक नहीं थी.


अपीलार्थी अपनी काम-इच्छा नहीं रोक पाने के कारण लडक़ी की अनिच्छा के बावजूद आगे बढ़ गया. इस पर लडक़ी ने प्रतिवाद किया और शोर मचाना शुरू किया. लडक़ी को शोर मचाने से रोकने के लिए अपीलार्थी ने सलवार उसके गले में बाँध दी जिससे उसकी दम घुटने से मृत्यु हो गई.55सी. माननीय न्यायमूर्ति के अनुसार लडक़ी कुछ हद तक ‘छेड़छाड़’ के लिए तो उत्सुक थी मगर सम्भोग के लिए राजी नहीं थी. अगर यह सच माना जाए तो उसे सलवार उतारने की क्या जरूरत थी ? चौदह वर्षीया लडक़ी की सहमति या असहमति का प्रश्न उठाना व्यर्थ है. बिना सलवार उतारे बलात्कार कैसे होता ? क्या अभियुक्त कुर्ता ऊपर नहीं कर सकता ? लडक़ी को चुप कराने के लिए सलवार से गला घोंटा गया है. बलात्कार और हत्या का उद्देश्य और कारण ‘कामपिपासा या हवस शान्त करना और विक्षिप्त या मानसिक बीमारी मानते हुए सजा कम करते निर्णयों से क्या ‘न्याय का लक्ष्य पूरा हो रहा है ? हो जाएगा ? सजा कम करने के लिए अगर अपीलार्थी की उम्र महत्त्वपूर्ण है, तेा अधिकतम दंड के लिए बलात्कार और हत्या की शिकार बच्ची की उम्र और अपराध की जघन्यता को कैसे भुलाया जा सकता है ? बच्चों से बलात्कार घृणित और जघन्यतम अपराध हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वयस्क महिलाओं से बलात्कार कम घृणित हैं.



न्याय का लक्ष्य

‘न्याय का लक्ष्य’ या ‘उद्देश्य’ पूरा हो या न हो, पुरुषों की हवस या कामपिपासा तो पूरी हो ही रही है. बच्चियों से बलात्कार में बढ़ोतरी का एक मुख्य कारण यह भी है कि युवा लड़कियाँ, बच्चियों की अपेक्षा अधिक विरोध कर सकती हैं, चीख सकती हैं और शिकायत कर सकती हैं. बलात्कारी पुरुष सोचता है–बच्चियाँ बेचारी क्या कर लेंगी ? विशेषकर जब बलात्कार घर में पिता, भाई, चाचा, ताऊ या अन्य रिश्तेदारों द्वारा किया गया है. अक्सर कम उम्र की बच्चियाँ बलात्कार के कारण मर जाती हैं. हत्या और बलात्कार के अधिकांश मामलों में अभियुक्त बरी हो जाता है या सजा कम करवा पाने में सफल क्योंकि लडक़ी गवाही के लिए अदालत के सामने नहीं होती. ऐसे में हो सकता है (होता है) कि अदालत की सहानुभूति मृतक ‘गुडिय़ा’, ‘मल्हार’ या ‘रेणु’ की बजाय बलात्कारी बटोर ले जाए.सजा के सवाल पर न्यायमूर्तियों के मानवीय दृष्टिकोण से न्याय का लक्ष्य, पूरा हो जाएगा–कहना कठिन है. लगभग सत्तर साल पहले लाहौर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने चेतावनी देते हुए कहा था कि ”औरतों पर हिंसा के अपराध के साथ, जो स्वयं अपनी रक्षा करने की स्थिति में नहीं हैं, सख्ती से निपटना पड़ेगा. यह अत्यन्त दुखद स्थिति होगी, अगर अपराधियों को यह सन्देश मिलता है कि औरतों के साथ हिंसा या बलात्कार करना कोई गम्भीर मसला नहीं है. और अगर वे अपेक्षाकृत कम कारावास की सजा भुगतने के लिए तैयार हों, तो वे हमेशा अपनी पाशविक कामनाओं को शान्त कर सकते हैं.56 यानी, कम सजा की सम्भावना, हिंसक अपराधों को शान्त कर सकते हैं.56 यानी, कम सजा की हिंसक अपराधों को बढ़ावा देती है. देती रहेगी. एक और न्यायमूर्ति के शब्दों में सजा कम करने का अर्थ ”असुरक्षित लड़कियों को समाज में भेडिय़ों के सामने छोड़ देना ही होगा.57 क्या ‘मानवाधिकार’ सिर्फ खूँख्वार अपराधियों के लिए ही हैं ? अपने बचाव में बालिग स्त्री को तो हत्या करने का कानूनी अधिकार है, मगर अबोध बच्चियाँ क्या करें ?

इसी सन्दर्भ में इमरतलाल के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति की विवशतापूर्ण टिप्पणी है, ”जब बलात्कार का अपराध सिद्ध हो जाए और वह भी छोटी उम्र की बच्ची के साथ तो ऐसे में अपराध की सजा कठोरता से दी जानी चाहिए. अपराधी को सिर्फ तीन साल कैद की सजा देने का अर्थ उसे ‘पिकनिक पर भेजना है. राज्य सरकार ने सजा को चुनौती नहीं दी है, इसलिए सजा बढ़ाई नहीं जा सकती.58 राज्य सरकार द्वारा ‘सजा को चुनौती’ न देने के कारण, अब तक न जाने कितने अपराधियों को ‘पिकनिक’ पर भेजना पड़ा है. कानूनी नियमों से बँधे न्याय की मजबूरी है.राज्य सरकार द्वारा सजा को चुनौती न दिए जाने के कारण अपराधी की सजा बढ़ाई नहीं जा सकती मगर घटाई जा सकती है. सजा कम करने का कारण, कभी अपराधी की ‘उम्र’ है तो कभी ‘नौकरी छूट जाना’ या ‘सामाजिक अपमान और बदनामी’ कुछ फैसलों की शुरुआत, ‘अधम, घृणित, जघन्य, भयावह, पाशविक वगैरह-वगैरह’ से होती है. फिर पाशविक इच्छाओं, यौनशुचिता, प्रतिष्ठा, गरिमा, सम्मान, नैतिकता और सामाजिक मान-मर्यादा का पाठ पढ़ाती कुछ नजीरों में बेहतरीन भाषा के नमूने. अन्य में ”यद्यपि अभियुक्त का अपराध बेहद घृणित और तिरस्कार योग्य है, लेकिन हम इसे अधिकतम सजा के लिए उपयुक्त नहीं मानते और दस वर्ष कारावास की वैकल्पिक सजा में बदल रहे हैं.59 क्योंकि अधिकतम सजा ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामलों में ही दी जानी चाहिए. स्कूल हेडमास्टर द्वारा दस वर्षीया बालिका से बलात्कार की इस घटना ने ‘गुरु-शिष्य के सम्माननीय सम्बन्धों को कलंकित किया है. लेकिन आजीवन कारावास की अधिकतम सजा ‘उचित’ नहीं हो सकती। न्यूनतम सजा से ही न्याय का लक्ष्य पूरा हो जाएगा.



रामरूपदास बनाम राज्य के उपरोक्त मामले में विद्वान न्यायमूर्ति ए. पासायत और एम. पटनायक के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की ‘भाषा का जादू’ भी देखा जा सकता है और ‘जादुई भाषा’ का कमाल भी. पूरा निर्णय उधार की भाषा में इस प्रकार लिखा गया है कि मुझ जैसे अनेक कानून के विद्यार्थी आश्चर्यचकित रह जाए. आधे से ज्यादा निर्णय में तो सर्वोच्च न्यायालय की नजीरों का उल्लेख तक नहीं किया गया. लगता है, न्यायमूर्तियों की मौलिक और अप्रकाशित रचना है. क्या ऐसे ही ‘न्याय की भाषा’ विकसित और समृद्ध होगी? जाहिर है, कैसे हो सकती है? स्त्री के विरुद्ध हिंसा के प्रति सहानुभूति और संवेदना की भाषा को टुकड़ों में काट-बाँट कर नहीं देखा जा सकता. परिपूर्णता में देखना होगा. यहाँ सर्वोच्च न्यायालय की नजीरों से आतंकित, न्यायिक विवेक सिर्फ विकल्प ढूँढ़ता दिखाई देता है. अपराध, अपराधी, तथ्यों, स्थितियों को, न्याय की तुला पर तौलते हाथ काँपते नजर आते हैं. क्यों?छह वर्षीया बालिका शिवानी के साथ पैंसठ वर्षीय वृद्ध पुरुष द्वारा बलात्कार के अपराध को जघन्यतम करार देते हुए भी, दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री पी.के. बाहरी और एस.डी. पंडित ने सजा के सवाल पर कहा, ”इस घटना के बाद अभियुक्त की पत्नी की मृत्यु हो गई है. वह तब से अब तक जेल में है. बहुत बूढ़ा है. आंंशिक लिंगच्छेदन किया है. सहवास का केवल प्रयास किया है और बालिका के गुप्तांगों को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचा है. इन परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हम, उम्रकैद की सजा कम करके दस साल कारावास में बदल रहे हैं.60 अपराध संगीन है लेकिन…

क्रमशः…..

‘निल बट्टे सन्नाटा’ और घरेलू कामगार महिलायें

जावेद अनीस

एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com
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विदेशों में सभी परिवार “घरेलू सहायक” अफोर्ड नहीं कर पाते हैं क्योंकि उनकी पगार बहुत ज्यादा होती है, लेकिन भारत में “काम वाली बाई” रखना बहुत सस्ता है. शायद इसी वजह से यहाँ घरेलू कामगार महिलायें अदृष्य सी हैं. उनके काम को आर्थिक और सामाजिक रूप से महत्त्व नहीं दिया जाता है, हालाँकि इन दोनों ही क्षेत्रों में इनका महत्वपूर्ण योगदान है. भूमंडलीकरण और बढ़ते शहरीकरण के साथ संयुक्त परिवार खत्म हो रहे हैं, अब पति-पत्नी दोनों ही काम के लिए बाहर रहते हैं जिसकी वजह से घर पर बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल के लिए परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं होता है. ऐसे में इनकी देखभाल और अन्य घरेलू कामों के लिए कामगारों की जरुरत पड़ती है इसलिए घरेलू कामगारों की मांग बढ़ती जा रही है अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मुताबिक, भारत में करीब छह करोड़ घरेलू कामगार महिलाएं हैं. राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (एनएसएसओ) 2004-05 के अनुसार, देश में लगभग 47.50 लाख घरेलू कामगार हैं. इस क्षेत्र में जिस तेजी़ से बढ़ोत्तरी दर्ज हो रही है उस लिहाज से वर्तमान में  इनकी संख्या काफी बढ़ चुकी होगी.

भारत में घरेलू काम का लम्बा इतिहास है, परम्परागत रूप से पहले महिला और पुरुष दोनों ही नौकर के तौर पर काम करते रहे हैं, इसका संबध जाति से रहा है जैसे कि वंचित जातियों के लोगों से साफ-सफाई का काम कराया जाता था जबकि ऊँची जातियों से खाना बनाने का काम कराया जाता था. हालाँकि भारत में घरेलू काम नया पेशा नही है लेकिन इसे मात्र सामंतवादी संस्कृति के नौकरों के तौर पर नही देखा जा सकता था. वर्तमान समय में ग्रामीण और शहरी संदर्भों में कामगारों और काम में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है, अब इस क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व बढ़ा है. शहरी क्षेत्रों में तो ज्यादातर महिलायें ही घरेलू कामगार के तौर पर काम करती हैं, इनमें से अधिकतम ऐसी हैं जो गावों से पलायन कर रोजगार की तलाश में शहर आती हैं. शहरी मध्यवर्ग को घरेलू काम व बच्चों की देखभाल के लिए घरेलू कामगारों की जरूरत पड़ती है और वे इस जरूरत को पूरा करती हैं. आमतौर पर ये महिलायें कमजोर जातियों से होती हैं और कम पढ़ी-लिखी या अशिक्षित होती हैं और इसी वजह से उनके पास घरेलू कामगार बनने जैसी सीमित कामों का ही विकल्प होता है.

इनकी दिनचर्या बहुत लम्बी और थकाऊ होती है और उनके कार्यास्थल के हालात बहुत खराब होती है. हमारे देश में सदियों से चली आ रही मान्यताओं की वजह से आज भी घरेलू काम करने वालों को नौकरानी का दर्जा दिया जाता है. उन्हें अपने काम के बदले कम वेतन मिलता ही हैं साथ में उन्हें कमतर भी माना जाता है, उनके साथ जातिगत भेदभाव भी होते हैं. उन्हें सम्मान नही दिया जाता है, कानूनी रूप से भी उन्हें उन्हें श्रमिक का दर्जा नहीं मिल सका है. घरेलू कामगार जटिल परिस्थितियों का सामना करते हैं, उनके श्रम का अवमूल्यन उन्हें सामाजिक और आर्थिक तौर पर निम्न स्तर पर रखता है. कार्यस्थल पर इन्हें कम मजदूरी, काम का समय तय ना होना, कम पैसे में ज्यादा काम करना, नियोक्ताओं का गलत व्यवहार, शारीरिक व यौन-शोषण जैसी समस्याओं को झेलना पड़ता है. एक अध्ययन के अनुसार घरों में काम करने वाले कामगार किसी न किसी तरीके से प्रताडि़त होते रहते हैं, आम तौर पर नियोक्ता का व्यवहार इनके प्रति नकारात्मक होता है, कुछ कामगारों के साथ अछूतों की तरह व्यवहार किया जाता है और काम की जगहों के अलावा उनके बाकी घर में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी जाती है, उन्हें अपमानजनक संबोधन से बुलाया जाता है, घर में कुछ भी चीज चोरी हो तो सीधा इन पर ही इलजाम लगाया जाता है, घरेलू कामगारों के साथ दुर्व्यवहार, शारीरिक और मानसिक हिंसा एवं यौन उत्पीड़न की घटनाऐं आये दिन सुर्खियां बनती हैं.

महिला बाल विकास विभाग द्वारा 2014 में संसद में दी गई जाकारी के अनुसार वर्ष 2010 से 12 के बीच देश में घरेलू कामगारों के प्रति अपराध के 10503 केस दर्ज हुए है जिसमें साल 2012 में 3564 मामले दर्ज हुए. भारत में विशिष्ट कानूनों का अभाव,शिक्षा और कौशल की कमी और समाज में व्याप्त सामंतवादी मानसिकता के कारण घरेलू कामकाजी महिलाओं की यह स्थिति बनी है.सरकार द्वारा उनके काम को श्रम की श्रेणी में स्वीकार नही किया गया है और इसे समाज और अर्थव्यवस्था में योगदान के तौर पर मान्यता नही दी जाती है. घरेलू कामगारों को संगठित करने वाले ट्रेड यूनियन और संगठन लगातार उनके पक्ष में एक कानून बनाने को लेकर सरकार पर दबाव डाल रहे हैं ताकि उनकी परिस्थितियों में सुधार हो और उन्हें सम्मान, उचित वेतन, अवकाश बोनस आदि मिल सके. ‘निल बट्टे सन्नाटा’ फिल्म इसी तरह के एक “काम वाली बाई” और उसकी बेटी की कहानी है. वैसे तो हमारी ज्यादातर फिल्में दर्शकों को अपनी ही रची गयी फतांसी दुनिया की सैर कराती हैं, लेकिन इनमें कुछ फिल्में ऐसी भी होती है जो वास्तविक दुनिया और इंसानी सपनों का अक्स बन जाती हैं. अजीब से नाम वाली “निल बट्टे सन्नाटा’ एक ऐसी ही फिल्म है जहाँ “काम वाली बाई” और एक सरकारी स्कूल प्रिंसिपल प्रमुख किरदारों के तौर पर मौजूद हैं. इन किरदारों को निभाने वाले कलाकार भी कोई सुपरस्टार नहीं है. इन सबके बावजूद 1 घंटे 40 मिनट की यह फिल्म आदर्शवादी या लेक्चर झाड़ने वाली फिल्म ना हो कर आपको रोजमर्रा की जिंदगी से सामना कराती है और वास्तविक जीवन में चीजें और घटनायें जिस रूप में हो सकती हैं उन्हें उसी तरह दिखाने की कोशिश करती है.

कहानी के पृष्ठिभूमि में अपने ताजमहल के लिए मशहूर शहर “आगरा” है जहां किसी एक स्लम-नुमा लेकिन मिक्स्ड बस्ती में चंदा सहाय (स्वरा भास्कर) अपनी बेटी अपेक्षा उर्फ अप्पू (रिया शुक्ला) के साथ रहती है,चंदा एक सिंगल मां है जो “बड़े लोगों” के घरों में जाकर काम करती है, उसे अपनी बेटी से बड़ी अपेक्षायें है शायद इसीलिए वह उनका नाम “अपेक्षा” रखती है, चंदा अपने बेटी के भविष्य के लिए बहुत चिंतित रहती है और नहीं चाहती कि उसकी बेटी को भी उसी की तरह “नौकारानी” बन कर रहना पड़े, हर गरीब की तरह वह भी चाहती है कि उसकी बेटी पढ़-लिख कर कुछ बन जाए, इसीलिए वह अक्सर अपनी बेटी से पूछती रहती है कि “बेटा अप्पू तू पढ़ लिख कर क्या बनेगी ?” वह खुद उसे डॉक्टर या इंजीनयर बनाना चाहती है इसीलिए  वह घरों में काम के अलावा एक चमड़े के जूते की फैक्ट्री में भी काम करने लगती है. अप्पू एक तरह से उसका सपना है.
इधर हर बच्चे की तरह “अप्पू” भी अपनी ही दुनिया में मस्त रहती है, पढ़ाई से ज्यादा उसका मन मस्ती में लगता है, उसे अपनी माँ के सपने से कोई फर्क नहीं पड़ता है और वह इस पर ज्यादा ध्यान भी नहीं देती है। उसे लगता है कि जिस तरह से इंजीनयर का बेटा इंजीनयर बनता है और डॉक्टर का बेटा डॉक्टर उसी तरह से बाई की बेटी बाई ही बन सकती है। उसे तो यह भी लगता है कि उसकी माँ अपने सपने उस पर थोप रही है। उसके दिमाग में यह कड़वी सच्चाई भी है कि अगर वह मैट्रिक पास भी हो जाए तो उसकी माँ  के लिए उसे आगे पढ़ना आसन नहीं होगी.

 “अप्पू” गणित में “निल बट्टे सन्नाटा” यानी काफी कमजोर होती है इसलिए जब वह दसवीं क्लास में पहुँचती है तो उसकी मां को काफी चिंता होने लगती है. चंदा जिन डॉक्टर दीवान (रत्ना पाठक शाह) के यहाँ काम करती है, संयोग से वे काफी अच्छी और मददगार होती हैं, उन्हीं की सलाह पर चंदा अपनी बेटी को प्रेरित करने उसी स्कूल में दाखिला लेती है जहां अपेक्षा पढ़ती है, यहाँ दोनों का सामना खुशमिमाज और मेहनती प्रिंसिपल (पंकज त्रिपाठी) से होता है जो गणित पढ़ाते हैं. एक ही क्लास में पढ़ते हुए दोनों के बीच एक अजीब सा तनाव पैदा हो जाता है. यही तनाव फिल्म को अपने अंजाम तक ले जाती है. स्वरा भास्कर हमारे समय की एक जागरूक और हिम्मती अभिनेत्री है, पिछले दिनों हमने उन्हें सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर लिखते और बोलते सुना है, वे भीड़ में अलग नजर आती हैं, उनके अभिनय में स्वभाविकता है और अपने किरदारों को निभाते हुए वे खुद की पहचान खो देती है, यहाँ भी उन्होंने निराश नहीं किया है, उनकी बेटी बनी रिया शुक्ला ने भी उनका अच्छा साथ दिया है. अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने एक बार फिर चौकाया है, उनमें मौलिकता है और वे लगातार अपने आप को निखार रहे हैं इस फिल्म के बाद उन्हें इग्नोर करना आसान नहीं होगा. मालकिन के किरदार में रत्ना पाठक शाह हमेशा की तरह बेहतर हैं.

निर्देशक के तौर पर ‘निल बट्टे सन्नाटा’ अश्विनी अय्यर तिवारी की पहली फिल्म है, वे ऐड मेकिंग से फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में आई हैं, सब कुछ रियलस्टिक रखते हुए उन्होंने रोजमर्रा की आम जिंदगी को बहुत खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है, वे उम्मीद जगाती हैं. फिल्म की शूटिंग आगरा में की गयी है लेकिन एक भी क्षण ऐसा नहीं हैं जहाँ फोकस “ताज” पर जाता हो, एक-आध सीन में अगर “ताज” नजर भी आता भी है तो वह नेपथ्य में है, धुंधला और अपने आप में सिमटा सा, मानो वह अपने पूरे वैभव और खूबसूरती से कहानी में कोई खलल ना डालना चाहता हो. यह एक साधारण सी कहानी है जहाँ सपने और हकीकत एक साथ चलते हैं, जहाँ आम जीवन की तरह एक गरीब मां अपने स्थिति से बाहर निकलने के लिए अपनी बेटी के जरिये एक सपना देखती है,यह एक सिंगल माँ और उसके बेटी के बीच के खट्टे–मीठे रिश्तों की भी कहानी भी है. फिल्म का टोन आम भारतीयों के जीवन जैसा है तो अपनी तमाम मुश्किलात और संघर्षो से भरे जीवन के बीच मुस्कराने और खुश होने के लम्हे ढूढ़ ही लेते हैं.अंत में यह एक “बाई” की कहानी है जिसकी समस्याओं को आम जिंदिगी में कोई भी देखना और समझना नहीं चाहता है. उसे “काम वाली बाई” से “घरेलू सहायिका” की स्थिति तक पहुँचने के लिए लम्बा सफर तय करना होगा ताकि इस काम को करते हुए वह अपने आप को कमतर महसूस ना कर सके. बहरहाल यह “बाई” बड़े परदे पर एक फिल्म के मुख्य किरदार के तौर पर मौजूद है इसके लिए फिल्म की पूरी टीम बधाई की पात्र है.

यौन हिंसा और न्याय की भाषा: चौथी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.
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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त 

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चरित्र प्रमाणपत्र कहाँ है


बंटी उर्फ बलविन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश41 सामूहिक बलात्कार का एक ऐसा मामला है, जिसमें पच्चीस वर्षीय विवाहिता महिला के साथ बलात्कार करनेवाले पाँचों अभियुक्तों को बाइज्जत रिहा करते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एस.के. सेठ और एस.के. चावला ने निर्णय में लिखा, ”यहाँ यह बता दें कि यह सामूहिक बलात्कार का मुकदमा है. एक औरत, जो भले ही कितनी भी दुराचारी क्यों न हो, इतने व्यक्तियों को अपमानजनक ढंग से सामूहिक सम्भोग करने की आमतौर पर सहमति नहीं देगी, जैसे वह सार्वजनिक प्रयोग के लिए कोई जानवर हो. उन्होंने आगे कहा, ”कानून मानता है कि भले ही कोई स्त्री अनैतिक चरित्र की हो या वेश्या ही हो, उसकी अपनी गरिमा और सम्मान होता है. उसके इस नीच व्यवसाय के कारण ही उसके साथ अतिक्रमण नहीं किया जा सकता.  लेकिन निर्णय के अन्त तक आते-आते न्यायमूर्तियों ने स्थापना दी, ”लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि फिर भी, अनैतिक चरित्र पूर्णतया गौण परिस्थिति नहीं होगी. यह स्वयं सारी कहानी को अविश्वसनीय बना सकता है. यह कहानी से उस सम्भावना शक्ति को छीन सकता है, जो किसी ऐसी महिला ने सुनाई हो, जिसका कोई नैतिक चरित्र ही नहीं. जिस अनैतिक चरित्र की महिला पर विश्वास करना कठिन है, अगर वह यह कहे कि कुछ व्यक्तियों ने उसके साथ (बलात्) सम्भोग किया है, बशर्ते कि इस बात का कोई सन्तोषजनक प्रमाण उपलब्ध न हो.

वर्षों पूर्व मद्रास उच्च न्यायालय के एक निर्णय42 में भी कहा था, ”किसी वेश्या की मर्यादा को भी सम्मान सुरक्षा का उतना ही अधिकार है, जितना किसी अन्य महिला को, लेकिन हर बार, न्याय की तुला में एक तरफ बलात्कार और अपमानजनक पीड़ा होती है और दूसरी तरफ पीडि़ता का नैतिक चरित्र. जाहिर है ऐसे में, ऐसी स्त्री के साथ न्याय असम्भव है, क्योंकि उसकी पूरी कहानी सन्देह के घेरे में ही घूमती रहेगी. उसकी बात पर कौन यकीन करेगा ? फिलहाल ऐसे सामाजिक या मानसिक बदलाव की कोई आधारभूमि नजर नहीं आ रही. सिर्फ न्यायमूर्तियों को दोषी ठहराना भी व्यर्थ होगा, क्योंकि वे भी उसी समय और समाज की उपज हैं, जिसमें नैतिकता, मर्यादा, पवित्रता, यौनशुचिता वगैरह की सारी जिम्मेवारी सिर्फ स्त्री पर लाद दी गई है. धर्मशास्त्रों से लेकर न्यायशास्त्रों तक में. स्त्री के लिए इस दुश्चक्र  से बाहर निकलने का तब तक कोई दरवाजा नहीं, जब तक सत्ता और सम्पत्ति पर निर्णय लेने का उसे भी बराबर हक नहीं मिल जाता या वह न्याय व्यवस्था की गूढ़ भाषा पढऩे-समझने योग्य नहीं हो जाती. सुशिक्षित और प्रतिष्ठित, सचेत और अधिकारों के प्रति पूर्ण रूप से जागरूक.

वक्ष, जाँघ, नितम्ब या पीठ पर चोट के निशान दिखाओ

बिरम सोरेन बनाम पश्चिम बंगाल 43 केस में अभियुक्त घर में अकेली लडक़ी (उम्र सोलह-सत्रह वर्ष) के साथ बलात्कार करके भाग गया. माँ-बाप लौटकर आए तो लडक़ी के बताने पर थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई. सत्र न्यायाधीश ने बलात्कार के अपराधी को दस साल कैद और 5000 रुपए जुर्माना की सजा सुनाई. लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.पी. राजखोबा ने अपील का फैसला सुनाते हुए कहा, ”स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि दोनों में प्रेम था या नहीं, मगर स्थितियों ने शारीरिक मिलन का अवसर प्रदान किया. अधिकांश ग्रामीण फुटबाल मैच देखने गए हुए थे. कुछ अड़ोसी-पड़ोसी भी फुटबाल मैच देखने गए हुए थे और माता-पिता बाजार. वह घर में अकेली थी. सारे तर्कों को तोड़ते हुए दोनों की आत्मीय यौन इच्छा बढ़ गई और यौन आनन्द उठाते हुए उन्होंने सम्भोग कामना शान्त की. यौन झिल्ली फटने और खून बहने का कारण यह है कि उसके जीवन में सम्भोग का प्रथम अनुभव था. शरीर के किसी हिस्से पर चोट के निशान नहीं होना, उसकी इस बात को झूठा प्रमाणित करता है कि उसने प्रतिरोध किया था और नतीजतन ब्लाउज फट गया था….बाहरी चोटों का न होना जैसे वक्षस्थल पर नाखूनों के निशान, जाँघ, नितम्ब और पीठ वगैरह पर खरोंच सहमति का सुझाव ही देते हैं.
अन्त में न्यायमूर्ति ने कहा, ”पीडि़ता के गुप्तांगों पर चोट के निशान हमें भय से कँपकँपा देनेवाले हैं. परन्तु हम यह कहने को विवश हैं कि बलात्कार का मामला नहीं है….अभियुक्त को जेल से आजादी दे दी जाए…दूसरे न्यायमूर्ति जे.एन. होरे ने लिखा, ”मैं सहमत हूँ, और निर्णय में अपने हस्ताक्षर कर दिए.

लगता है, अदालत के लिए बलात्कार एक ‘स्टीरियो टाइप’ है कर्मकांड की तरह उसमें वही सब होना है जो होना चाहिए. यह सब बलात्कार को ‘संयोग में बदलने की युक्तियाँ हैं. बलात्कार की शिकार स्त्री सिर्फ एक गवाह है. गवाह को केवल बलात्कार का अनुभव दोहराना है. अपने अस्तित्व को भुलाकर दोबारा बताना है कि बलात्कार कब, कहाँ, कैसे और किसने किया. यही नहीं, यह भी बताना है कि उसने खुद क्या किया ? कुछ नहीं किया तो क्यों ? यानी एक बार फिर ‘बलात्कार’. मामूली-सी भूल-बलात्कार को सहमति से सम्भोग में बदल सकती है. बदलती रही है. ‘वक्षस्थल पर नाखूनों के निशान और जाँघ, नितम्ब और पीठ वगैरह पर खरोंच दिखाना मत भूलना. वरना…न्याय की भाषा में इसे ‘सहमति का सुझाव’ समझा जाएगा, समझा जाता है. सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि उसने मेरी ‘इज्जत’ लूट ली, अपना ‘मुँह काला’ किया, जीवन ‘बर्बाद’ कर दिया या उसने मेरे साथ ‘वो काम किया जो उसे नहीं करना चाहिए था. ‘हर सेक्सुअललॅस्ट’ अपहरण और बलात्कार के एक अन्य मामले में न्यायमूर्तियों ने स्कूल सर्टीफिकेट को प्रामाणिक नहीं माना और डॉक्टरी रिपोर्ट को महज राय मानते हुए अभियुक्त को सन्देह का लाभ देकर छोड़ दिया. बलात्कार के आरोप को सहमति से सम्भोग घोषित करते हुए न्यायमूर्तियों ने कहा, ”अपीलार्थी के साथ रहने में नन्दा की पूर्व सहमति थी ताकि वह अपनी यौन लिप्सा शान्त कर सके.44 न्याय की भाषा में, अब तक जहाँ ‘हिज सेक्सुअल लॅस्ट’ का इस्तेमाल किया जाता रहा है, वहाँ अब ‘हर सेक्सुअल लॅस्ट’ लिखा जाने लगा है. मर्दों की दुनिया में स्त्री के  ‘मौन’ को सम्भोगेच्छा ही मानकर चला जाता है.

अनिल कुमार बनाम हरियाणा45 में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों का निर्णय है कि एक जवान लडक़ी और एक युवा व्यक्ति एकान्त में, एक ही छत के नीचे, तीन दिन से ज्यादा रहे हों, तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि अनिवार्य रूप से वे आपस में मैथुन करते रहे होंगे. इस निष्कर्ष के आधार बिन्दु वही प्रचलित मिथ हैं कि स्त्री-पुरुष के बीच घनिष्ठ सम्बन्धों का मतलब है यौन सम्बन्ध. इसके अलावा कुछ और तो सोचा ही नहीं जा सकता है न. सुभाष बनाम हरियाणा46 में बलात्कार के आरोप को सहमति से सम्भोग मानते हुए न्यायमूर्तियों का कहना था, ”स्कूल प्रमाणपत्र के अनुसार लडक़ी की उम्र सोलह वर्ष से ज्यादा है और डॉक्टरी रिपोर्ट के मुताबिक यह सम्भोग की आदी है. शरीर पर न कोई चोट का निशान है और न खून बहने के ताजा चिह्न. लडक़ी द्वारा लिखे दो प्रेम पत्रों से पता लगता है कि वह अभियुक्त से प्रेम करती थी. अगर प्रेम और सहमति थी, तो फिर बलात्कार का आरोप वह लगाती ही क्यों ?


ब्रजेश कुमार बनाम हरियाणा47 में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कहते हैं, ”अगर कोई सोलह वर्ष से बड़ी उम्र की लडक़ी सम्भोग में आनन्द उठाने के लिए, स्वेच्छा से किसी पुरुष के सामने समर्पण करती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि पुरुष ने बलात्कार किया है. यहाँ, ‘सम्भोग का आनन्द’और पुरुष के सामने ‘स्वेच्छा से समर्पण’ की भाषा-संरचना के पीछे वही पुराना तर्क है कि ऐसी स्त्री स्वयं बलात् (सम्भोग) की इच्छुक होती है. अच्छी लडक़ी होती तो अपनी जान जोखिम में डालकर भी ‘सतीत्व’ या ‘कौमार्य’ की रक्षा करती. औरत के प्रतिरोध न करने का अर्थ है स्वेच्छा से समर्पण. और कानून या न्याय की भाषा में इसे ‘बलात्कार’ नहीं माना जाता. विवाहित महिला के साथ बलात्कार के एक मामले में सत्र न्यायाधीश ने तीन वर्ष कठोर कारावास की सजा सुनाई, परन्तु उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री पी.पी. गुप्ता ने अभियुक्त को रिहा करते समय कहा कि पीडि़ता की गवाही पूर्णतया अमान्य और अविश्वसनीय है. निर्णय में लिखा है, ”यह विश्वास करने के लिए बेहद असम्भावित है कि पीडि़ता को उस समय भी यह पता नहीं लग पाया कि अभियुक्त उसका पति है या कोई और, जब अभियुक्त ने सम्भोग आरम्भ किया. एक विवाहित महिला और वह भी दो बच्चों की माँ, साँसों की गन्ध, डीलडौल, लिंग के आकार और लम्बाई, सम्भोग के तरीके और अन्य तत्त्वों तक से फौरन महसूस कर लेगी कि सहवास करनेवाला व्यक्ति उसका अपना पति है या कोई अन्य व्यक्ति….अस्तु, यह तथ्य कि सम्भोग शुरू होने के समय पीडि़ता ने न तो कोई प्रतिरोध किया और न ही शोर मचाया, उसके अपने व्यवहार को सन्देहास्पद बनाता है…उसने अभियुक्त को सम्भोग पूरा करने का अवसर दिया और इसके बाद ही शोर मचाना शुरू किया.48



सचित्र कोकशास्त्र से मुकाबला करती न्याय की भाषा

न्यायाधीश का अगला तर्क यह था कि उस दिन अँधेरी रात थी. तब वह अभियुक्त को कैसे पहचान सकती है–यह भी स्पष्ट नहीं होता. यही नहीं, यह भी सम्भवत: विश्वास योग्य नहीं है कि अभियुक्त ने एक हाथ से मुँह बन्द करके रखा और चारपाई से नीचे लाकर सम्भोग करने में कामयाब रहा… अभियुक्त को झूठे मुकदमे में फँसाने की इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अभियुक्त के पिता और पीडि़ता के पति के सम्बन्ध तनावपूर्ण थे. उपरोक्त निर्णय में न्याय की भाषा तर्क (कुतर्क) की भाषा है. सामाजिक जीवन में स्त्री की स्थिति को भयावह अनुभव की भाषा नहीं कहा जा सकता. हालाँकि कानून और न्याय हमेशा तार्किक नहीं होता. नहीं हो सकता. अँधेरे में औरत अपने पति ‘परमेश्वर’ को तो पहचान सकती है–अभियुक्त को नहीं. पति को ‘साँसों की गन्ध’ या ‘लिंग का आकार और लम्बाई’ से पहचाना जा सकता है. मानो विवाहित औरतें पति के ‘लिंग का आकार और लम्बाई’ इंचटेप से नाप कर रखती हैं. दरअसल कानून, न्यायशास्त्र और ऐतिहासिक निर्णय ऐसी भाषा (अंग्रेजी) में हैं, जिसे ‘बहुमत’ पढऩा-लिखना ही नहीं जानता, समझना तो और दूर की बात है. जिस दिन ‘बहुमत’ अनपढ़ नहीं रहेगा या अपनी भाषा में जानने लगेगा, उस दिन यह ‘न्याय की भाषा’ नहीं रहेगी. नहीं रह सकती.
जनता की भाषा में ही न्याय की भाषा विकसित और समृद्ध हो सकती है. अगर अदालत की भाषा वादी, प्रतिवादी या मुवक्किल की भाषा नहीं है तो उस बेचारे वादी, प्रतिवादी या मुवक्किल को तो पता ही नहीं लगता कि वकीलों ने बहस में क्या कहा और न्यायमूर्ति ने क्या हुक्म दे दिया. मुवक्किल, वकील और न्यायमूर्ति जब एक दूसरे की भाषा को समान रूप से समझेंगे, तब सबको मालूम रहेगा कि क्या हुआ. न्याय या अन्याय ? गलत या सही ? विरोध-प्रतिरोध की सम्भावनाएँ बढ़ेंगी तो अन्याय की सम्भावना स्वत: समाप्त हो जाएगी. उस स्थिति में न्यायमूर्ति के निर्णय का हर शब्द, बहुत सोच-समझकर लिखा जाएगा, लिखना पड़ेगा, वरना…जनता सवाल करेगी और सवालों के जवाब भी देने ही पड़ेंगे.

‘फिट ऑफ पैशन’ : टोकन पनिशमेंट

राजू और कृष्णा बनाम कर्नाटक राज्य49 से सैलीना डिसूजा नाम की इक्कीस वर्षीया एक नर्स को अपने भाई की शादी में जाना था. रास्ते में देर हो गई. बंगलौर पहुँची तो पाँच बज गए. बस में साथ सफर कर रहे दो युवकों पर विश्वास करके, रात को होटल के एक कमरे में रुक गई. लडक़ों ने बारी-बारी से बलात्कार किया. मौका मिलते ही चीखी, चिल्लाई, शोर मचाया. सत्र न्यायाधीश ने 1980 में राजू को अपराधी माना मगर कृष्णा को नहीं. अभियुक्त की युवा उम्र और इस तथ्य को देखते हुए कि लडक़ी स्वेच्छा से अभियुक्त के साथ होटल के एक ही कमरे में रहने के लिए आई थी, जहाँ अभियुक्त ने सम्भोग कामना के दौर (फिट ऑफ पैशन) में बलात्कार किया, अभियुक्त राजू को उस दिन अदालत बन्द होने तक हिरासत में रखने और 500 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई. बलात्कार के मामले में ऐसी ‘टोकन’ सजा का, शायद यह ‘अभूतपूर्व निर्णय’ कहा जा सकता है. अपील में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने 2 अगस्त, 1982 को दोनों अभियुक्तों को दोषी पाया और सात साल कैद का आदेश दिया. इसके विरुद्ध अभियुक्तों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री के. जयचन्द्रा रेड्डी और जी.एन. राय ने 12 अक्टूबर, 1993 को फैसला सुनाते समय कहा, ”भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के अन्तर्गत दोनों अभियुक्तों की सजा में हस्तक्षेप करने का हमें कोई कारण नहीं मिला. जहाँ तक दोनों अभियुक्तों को सात साल कैद की सजा का सवाल है, हमें ऐसा लगता है कि यह असम्भव नहीं है कि शुरू में अभियुक्तों की वास्तव में यह ही इच्छा रही हो कि लडक़ी को भाई के घर जल्दी से जल्दी पहुँचाने में मदद की जाए. लेकिन बाद में जब वह रात को होटल के एक ही कमरे में साथ रहने को सहमत हो गई तो दोनों नवयुवक यौन हवस के शिकार हो गए और उन्होंने लडक़ी की असहमति और विरोध के बावजूद बलात्कार किया.

अभियुक्तों की बहुत युवा उम्र और उन परिस्थितियों को देखते हुए, जहाँ इस बात की सभी सम्भावनाएँ मौजूद हैं कि वे अपनी सम्भोग कामना के दौरे पर काबू नहीं पा सके, सारी सौम्यता और नैतिकता भुला बैठे और अन्तत: बलात्कार का अपराध किया (कर बैठे). इस तथ्य को भी देखते हुए कि यह घटना बहुत पहले घटी थी और इस अदालत तक मुकदमेबाजी के दौरान, दोनों ही बहुत बदनामी और मानसिक पीड़ा झेल चुके हैं, हम सोचते हैं कि अगर दोनों अभियुक्तों को कम सजा सुनाई जाए, तो भी न्याय का लक्ष्य पूर्ण हो जाएगा. इसलिए हम निर्देश देते हैं कि इन दोनों अभियुक्तों को तीन साल कठोर कारावास का दंड भुगतना चाहिए….अपील के दौरान अभियुक्त जमानत पर रहे हैं। उन्हें हिरासत में ले लिया जाना चाहिए ताकि वे सजा भुगत सके. अभियुक्त के विद्वान वकील का तर्क था, ”लडक़ी ने खुद उत्पे्ररित किया था. अभियुक्त नौजवान था. उत्प्रेरणा और गम्भीर रूप से उकसाने पर, वह सम्भोग इच्छा के वशीभूत हो, मानसिक सन्तुलन खो बैठा. उस उम्र में यह सब होना बहुत स्वाभाविक है. क्या सचमुच ‘वेरी नेच्युरल’ नहीं ? राज्य सरकार की ओर से विद्वान अधिवक्ता ने गम्भीरतापूर्वक कहा, ”अगर वह थोड़ी-सी बुद्धिमान और सतर्क होती तो शायद इन दो अनजान युवकों पर विश्वास न करती और ऐसा दुर्भाग्य न झेलना पड़ता.

हालाँकि शिक्षित है, मगर दिल से बहुत सीधी-सरल और मानवीय अच्छाइयों का सम्मान करनेवाली. सिर्फ भरोसा और विश्वास क रने का अर्थ यह नहीं कि अभियोजन पक्ष पर अविश्वास किया जाए….अगर अभियुक्त ने दुष्कर्ष नहीं, बल्कि लडक़ी की मदद की है तो यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह अभियुक्तों पर बलात्कार का झूठा आरोप लगाएगी. सवाल है कि आखिर वह ऐसा क्यों करेगी वह ही क्या, कोई भी नहीं कर सकता. उपरोक्त केस में सत्र न्यायाधीश द्वारा सुनाई ‘टोकन पनिशमेंट’ से लेकर सुप्रीम कोर्ट के उदारवादी-सुधारवादी निर्णय तक, एक शब्द बार-बार दोहराया गया है–’फिट ऑफ पैशन’. न्यायमूर्तियों द्वारा ही नहीं, बल्कि बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा भी दो युवा लडक़े और एक जवान लडक़ी, तीनों होटल के एक ही कमरे में। रात का समय. ऐसी स्थिति में ‘सभी सम्भावनाएँ मौजूद’ हैं. नवयुवकों को ‘सम्भोग इच्छा का दौरा’ पडऩा भी ‘स्वाभाविक’ है और ‘सौम्यता और नैतिकताÓ के पाठ भूल जाना भी। तेरह साल कोर्ट-कचहरी के दौरान युवकों ने कितनी ‘बदनामी और मानसिक पीड़ा’ झेली होगी ? तेरह में ग्यारह साल तो सर्वोच्च न्यायालय में ही लग गए. हाँ ! यही सब सचमुच ‘बहुत स्वाभाविक’ है. ‘वेरी नेच्युरल’, यू नो




क्रमशः…..

एक दूसरे के खिलाफ लड़ाई जा रही अस्मिताएं

शालिनी आर्य 

इस बार फिर मेरे हमसफर रतन लाल सूर्खियों में हैं. इस बार उनका सुर्खियों में होना पिछले अनेक बार की तुलना में अलग है. पहले वे अपने जुझारूपन, न्याय के लिए अपने संघर्ष, अपने  संस्थान में दलित -बहुजन हितों के लिए अपने संघर्ष और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक सक्रियता के लिए सुर्खियों में रहते रहे हैं. लेकिन इस बार मामला थोड़ा भिन्न है. इस बार उनके कॉलेज के प्रशासन में शामिल एक महिला ने अपने उत्पीडन और अपमान का आरोप लगाया है. महिला का कहना है कि जब वे मेरे यहाँ आईं तो रतन ने उन्हें अपशब्द कहे. हमेशा की तरह यह लड़ाई वे खुद भी लड़ सकते थे, बल्कि लड़ भी रहे हैं. लेकिन इस बार थोड़ी बात मुझे भी कहने की इच्छा हो रही है. क्योंकि दो अस्मिताओं को आपस में टकराने के माहौल बनाने का ब्राह्मणवादी इलीट षड़यंत्र दूसरी बार देख रही हूँ रतन के मामले में. रतन चूकी दलित प्रोफ़ेसर हैं, विद्यार्थियों में लोकप्रिय हैं, दलित -बहुजन हितों के लिए लड़ते है, कॉलेज और विश्वविद्यालय में आरक्षण की लड़ाई भी लड़ते रहे हैं इसलिए ब्राह्मणवादी भ्रष्ट तंत्र ने उनके खिलाफ महिला अस्मिता को खडा करने की कोशिश की. इसके पहले एक बार एक काल्पनिक नाम से ऐसा करने की कोशिश हुई थी और अब एक उपस्थित महिला से ऐसा करवाया गया है.

वे अपने शोध के लिए 2010 से 2013 तक अकादमिक छुट्टी पर थे. कॉलेज में लौटने से पहले से ही हिन्दू कॉलेज प्रशासन द्वारा इनके खिलाफ साजिश होते मैंने देखा. 3 नवम्बर 2014 को डॉ. प्रदुम्न कुमार, Officiating Principal, ने इन्हें एक पत्र लिखा (पत्र संख्या HC -2/2260). इस पत्र के साथ AR (Colleges) जिसके साथ किसी मोनिका राय का पत्र संलग्न था. मोनिका राय ने दिल्ली विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर महोदय को एक पत्र लिखा था, जिसकी प्रतियाँ, चांसलर महोदय, हिन्दू कॉलेज गवर्निंग बॉडी के चेयरमैन, प्रिंसिपल, स्टाफ एसोसिएशन के अध्यक्ष तथा दिल्ली के जॉइंट लेबर कमिश्नर को भी भेजी गई थी. मोनिका जी ने इस पत्र में रतन के ऊपर कई गंभीर आरोप लगाए थे. रतन ने इस पत्र के साथ कई शंकाएं जाहिर की. मसलन:

(१) चूँकि यह पत्र वाईस चांसलर के ऑफिस से आया है, कही वे मुझे फंसाने की साजिश तो नहीं कर रहे हैं? फिर उन्होंने खुद ही कहा कि ‘VC साहब बहुत बड़े आदमी हैं, मेरे जैसे छोटे-मोटे शिक्षक से उन्हें क्या लेना देना!’
(२) सवाल यह भी था कि वाईस चांसलर साहब के ऑफिस में से तो कोई षड्यंत्र नहीं रच रहा?
(३) क्या Assistant Registrar वगैर किसी के निर्देश के या वगैर किसी वेरिफिकेशन के इस तरह लेटर फॉरवर्ड कर सकती हैं?
(४) क्या यह कॉलेज प्रशासन की साजिश हैं? उन्होंने उन्हीं दिनों कॉलेज में नियुक्तियों में धांधली और आरक्षण की अवहेलना को लेकर मैंने कॉलेज प्रशासन के खिलाफ़ VC महोदय, UGC, MHRD हर जगह ज्ञापन दिया था.
(5) फिर लगा कहीं यह सामूहिक साजिश तो नहीं?

मोनिका राय का ज्ञापन 23.9.14 को VC ऑफिस में जमा हुआ था और  तक़रीबन चालीस दिन के अन्दर ही कई ऑफिस से गुजरता हुआ रतन के पास पहुंचा था. रतन आश्चर्यचकित थे कि आम तौर पर कोई अपने प्रिंसिपल या वाईस चांसलर महोदय को कोई पत्र लिखे, तो एक तो कोई जबाव आता ही नहीं, यदि आंशिक जबाव आया तो उसका कोई मतलब नहीं. लेकिन मोनिका रॉय के मामले में VC ऑफिस से लेकर प्रिंसिपल ऑफिस की तत्परता उनके लिए चौंकाने वाला, हतप्रभ करने वाला था. खैर, रतन ने उस पत्र का जवाब दिया उस पत्र में जो पता आदि था उसकी जानकारी के लिए उन्होंने  चुनाव आयोग के वेबसाइट पर जाकर कथित शिकायतकर्ता का नाम और पता जानने की कोशिश की. साथ ही इन्द्रपुरी में रहने वाले कुछ साथियों से इन्द्रपुरी के इस पते पर जाकर पता करने का आग्रह किया कि जरा इस व्यक्ति और इनके पते की जानकारी दें. सामने जो तथ्य आए वो चौंकाने वाले थे; नाम, संगठन और पता सब फर्जी थे, दिल्ली के नक़्शे पर वे मौजूद ही नहीं थे. शिकायतकर्ता के विश्वसनीयता की जांच के बिना रतन लाल से सवाल पूछ लिया गया था, पत्र में कोई कांटेक्ट नंबर भी नहीं था.  वह यह साजिश नहीं तो और क्या थी?

यह साजिश एक स्त्री ( काल्पनिक) को एक दलित प्राध्यापक के खिलाफ इस्तेमाल की थी. रतन ने व्यंग्य किया कि ‘अब सीधे इन्द्रलोक (इन्द्रपुरी नहीं) से ‘देवी’ को, मोनिका के अवतार में ले आये हैं वे. इसे कहते हैं ‘छल-लीला’. रतन के अनुसार  काल्पनिक ‘मोनिका राय’ के ज्ञापन और उनके स्टाफ रूम के उनके कुछ विरोधियों की चर्चा में अभूतपूर्व समानता थी. स्टाफरूम की पूरी चर्चा मेरे घर के कैंपस और डा. आंबेडकर की प्रतिमा पर केन्द्रित होती थी. ऐसा लगता है कि जब काल्पनिक महिला से,  व्यवस्था के दमन और आतंक से रतन पीछे नहीं हटे तो अब एक वास्तविक महिला को उनके खिलाफ उतरा गया है – फर्जी आरोपों के साथ. मैं सोचती हूँ कि क्या महिलायें कभी यह समझ पाएंगी कि ऐसे तंत्र में उनका सिर्फ इस्तेमाल होता है. सच है कि महिलाओं की कोई जाति नहीं होती, लेकिन महिलायें जाति से मुक्त भी नहीं हो पातीं. जिन्हें साझा लड़ाइयां लडनी चाहिए थी, वे एक दूसरे के खिलाफ लड़ाये जा रहे हैं. यह सब अंततः ब्राह्मणवादी व्यवस्था के हित में ही जाता है और हाशिये पर छूट जाते हैं दलित -बहुजन और स्त्रियाँ !

पुनश्च : एक पत्नी होने के नाते रतन के संघर्ष, मानसिक दशा को कौन बेहतर समझ सकता है। संकट और अभाव में रहकर भी कभी  हार नहीं मानते। मुझे अमिट विश्वास है रतन इस संघर्ष से भी बहादुरी से निबटेंगे। हमलोग इस संघर्ष के आदि हो गये हैं, हमारे घर में इससे  कोई नहीं डरता हमारे बच्चे भी नहीं।

लेखिका हाउसमेकर हैं. संपर्क: 09971798567 

वे नहीं चाहते कि आजाद सोच के लोग पैदा हों: तीस्ता सीतलवाड़

स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और संपादक तीस्ता सीतलवाड़ इस समय  की  चुनौतियों, जनता के संघर्ष  की  प्राथमिकताओं, न्याय व्यवस्था, जेंडर और जाति के  सवाल पर बात की. तीस्ता सीतलवाड़ पिछले कई सालों से गुजरात के  दंगा  पीड़ितों  को  न्याय के  लिए  कई मोर्चों  पर  सक्रिय हैं, इसलिए  सत्ता के निशाने पर भी हैं.

बलात्कार पर नजरिया और सलमान खान

आशीष कुमार ‘‘अंशु’


आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . फिलहाल विकास पत्रिका ‘सोपान’ से सम्बद्ध हैं और विभिन पत्र -पत्रिकाओं में लिखते हैं . संपर्क : 9868419453 .

सलमान खान
ने अपनी एक फिल्म के
शूटिंग के दौरान होने वाली शारीरिक पीड़ा की तुलना पिछले दिनों मीडिया के सामने बलात्कार से कर दी उसके बाद से हीसमाज में
तो नहीं लेकिन भारती इलेक्ट्रानिक मीडिया में इसे लेकर घमासान मचा है. गौरतलब
है कि जो मीडिया इस वक्त बलात्कार शब्द पर अति संवेदना प्रकट कर
रहा है, मीडिया कांफ्रेन्स
में बलात्कार शब्द पर उनके प्रतिनिधियों
की जो हंसी सुनाई देती है, वह मीडिया
प्रतिनिधियों की संवेदनशीलता
की ही कहानी कहती है. बात माफी
की करते हैं. देश के एक सरोकारी टेलीविजन चैनल में काम करने वाले एक वरिष्ठ
एंकर ने विदर्भ की महिलाओं के लिए अपनी किताब में लिखा कि वे किसान
पति की आत्महत्या के बाद वेश्यावृत्ति करती हैं. ऐसा उन्होंने अपने ही चैनल
की एक झूठी रिपोर्ट को आधार बनाकर लिखा लेकिन क्या मजाल उस टीवी एंकर
ने कभी अपने इस झूठ के लिए अपने पाठक/दर्शक से कभी माफी मांगी हो.


भारतीय दंड
संहिता में सेक्शन 375
के तहत 15 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाना बलात्कार माना गया है. कई रिपोर्ट इस बात की पुष्टी करती हैं कि भारत
में ऐसी ‘धर्म-पत्नियों’ की कमी नहीं हैं, जो बिस्तर पर अपने पति द्वारा
बलात्कार की शिकार होती हैं, अगले दिन फिर सुबह चाय बनाने से लेकर अपने
‘बलात्कारी’ बिस्तर पार्टनर के लिए नाश्ता बनाने
तक का काम वह करती हैं
क्योंकि उनके पार्टनर को बलात्कार का कानूनी अधिकार मिला हुआ है. यह सब लिखने
के पीछे मुराद सिर्फ इतनी है कि बलात्कार को ऐसा शब्द ना बनाइए जिसका
उपयोग समाज में ना किया जा सके. यदि एक व्यक्ति अपने शारीरिक तकलीफ की
तुलना बलात्कृत महिला से कर रहा है तो यह उसकी कम-समझी भी हो सकती है. वास्तव में यह लेख सलमान खान के पक्ष से अधिक उस समझ के खिलाफ है, जो बलात्कार को एक वर्जित शब्द बनाना
चाहता है. ऐसा वर्जित
शब्द जिसका इस्तेमाल
पीड़िता भी करते हुए कई बार सोचे, वह अपने ऊपर हुए अत्याचार
की कहानी किसी को बताए या ना बताए.

मित्र क्या सोंचेगे? समाज क्या सोचेगा? कायदे से मीडिया की कोशिश यह होनी
चाहिए कि उन महिलाओं और युवतियों को
वह बोलने के लिए प्रेरित करे जो अपनों के हाथों बलात्कृत हुई हैं. अपने
पति, अपने पिता, अपने चाचा, अपने ताऊ, अपने मामा, अपने पड़ोसी. कई बार पीड़िता
जब अपना दर्द परिवार में अपनी मां को या अपने किसी सबसे अच्छे दोस्त
को बताती है, अधिक मामलों
में उसे चुप रहने को कहा जाता है. इस तरह जो
मामले मीडिया में आते हैं, वास्तविक
मामले उससे कई गुणा अधिक हैं. उन चुप रहने
की सलाह देने वाले अभिभावकों और मीडिया द्वारा सलमान के लिए
चलाए जा रहे
माफी मांगों अभियान में अधिक अंतर नहीं है. बिहार की
एक दोस्त ने बताया था, किस तरह उसके
चाचा ने उस वक्त उसके साथ बलात्कार
किया, जब उसकी उम्र
दस-बारह साल की थी. खून से लथपथ हुई वह मां के पास शिकायत
करने गई और मां ने उसे नहला दिया और डांटते हुए कहा -‘तुम्हारी
ही गलती रही होगी.’ जब मीडिया
को महिलाओं को इसलिए जागरूक करना चाहिए कि वे अपने ऊपर हुए ‘बलात्कार’ के लिए सामने आएं.

समाज क्या कहेगा, पड़ोसी क्या सोचेंगे, यह सब सोचकर
किसी अपराधी का साथ ना दें. लेकिन मीडिया की रूचि बलात्कार को समस्या के
तौर पर देखने से अधिक ‘सलमान’ को माफी मांगते हुए देखने में अधिक है. दिल्ली का
ही एक मामला था, जब मेरे एक
मित्र योगेन्द्र योगी ने अपने टीवी चैनल के लिए
एक छोटे बच्चे पर हुए बलात्कार पर रिपोर्ट बनाई थी. उसके चैनल ने पूरी
रिपोर्ट इसलिए खारिज कर दी क्योंकि पीड़ित और बलात्कारी दोनों मजदूर
पृष्ठभूमि के थे. बहरहाल, सलमान के
पूरे ‘माफी मांगो
प्रकरण’ को संवेदना
नहीं चैनल के अर्थशास्त्र की नजर से ही समझा जा सकता है. फिलहाल इस
पूरे मामले पर अपनी समझ यही बनी है और अंत में: बलात्कार को
एक ऐसा अभिशप्त शब्द बना दिया गया जिसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. ऐसा करने वाले सोचते होंगे इससे वे पीड़िता का कुछ भला कर रहे हैं जबकि
इससे पीड़िता क्या भला होगा, मीडिया में काम कर रहे बुद्धीजीवी पत्रकारों
की मानसिकता का खुलासा जरूर हो जाता है.



बलात्कार पीड़िताओं के लिए सहानुभूति
जुटाने के अभियान में लगा मीडिया उन्हें न्याय दिलाने के लिए ईमानदार
कोशिश करता या फिर कोई बलात्कार का अपराधी कभी पीड़िता को धमकाने की
जुर्रत ना करे ऐसी कोई तरकीब निकालता या सलीम खान से माफी मंगवाने की
जगह कोई ऐसी कोशिश मीडिया की तरफ से होती कि बलात्कार के अपराधियों
को जब तक सजा ना हो जाए, हर एक बलात्कार
के केस का फॉलो अप लगातार मीडिया
में आएगा तो वास्तव में वह काबिले तारिफ कोशिश कहलाती. एक अभिनेता
जो बलात्कार की पीड़ा से अपने शारीरिक श्रम से हुई पीड़ा की तुलना करता
है, उसके पीछे
सभी मीडिया चैनल वाले इस तरह पड़ गए जैसे फैसला वे कर चुके
हों और अब इस मामले में वह अभिनेता का स्पष्टीकरण भी नहीं सुनना चाहते. मुझे याद है कि महीनों और फिर सालों तक हरियाणा के भगाना की बलात्कार
पीड़िता बहनें दिल्ली के जंतर मंतर पर टिकी रही. ना जाने बलात्कार
पीड़िताओं के लिए सहानुभूति से भरी भारतीय मीडिया उन दिनों कहां थी ? उनके अपराधियों को सजा कहां हुई ?

जयपुर की एक छोटी बच्ची के साथ हुए बलात्कार
मामले में वहां की एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने बड़ी बेशर्मी से मुझे कहा
था कि लड़की के परिवार वाले पैसों के भूखे हैं, इसलिए लड़की के लिए न्याय
मांगने का ढोंग कर रहे हैं. मीडिया समाज की इस मानसिकता को बदलने के
लिए क्या कर रही है ? किसी की जुबान
बंद करने से सोच नहीं बदलती. वास्तव में
रेप शारीरिक से अधिक ‪मानसिक-उत्पीड़न है. अपराधी
एक बार किसी स्त्री
के साथ रेप करता है लेकिन पीड़िता का रेप उसके बाद खत्म नहीं होता, उसके बाद प्रतिदिन परिवार/समाज उसका
रेप करता है. वास्तव में रेप के मामले
में माफी यदि मंगवाई जा सकती है तो उस ‘सोच’ से मंगवाने का प्रयास करना
चाहिए, जिसके साथ
हम पलते, बढ़ते है
और बलात्कार करने से अधिक हमें
परेशान बलात्कार ‘शब्द’ का एक अभिनेता द्वारा इस्तेमाल किया जाना करता
है. है ना शर्मनाक !