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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

 न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.


“The Ideology of rape is aided by more than a system of linient laws that serve to protect offenders and is abetted by more than the fiat of total male control over the lawful use of power. The ideology of rape is fueled by cultural, values that are perpetuated at every level of our society, and nothing less than a frontal attack is needed to repel this cultural attack.”
(Susan Brownmiller in Against Our will : Men,
Women and Rape, Page 389)
“Viewing of violent pornography results in higher rates of aggression against women by male subjects.”
(Diana E.H. Russell in pornography : Women
violence and Civil liberties, page 374)
“There are certainly more rapes committed in marriage than out side.” (Havelock Ellis)

बलात्कार के (सरकारी) आँकड़े पूर्ण रूप से अविश्वसनीय हैं क्योंकि बलात्कार की सभी दुर्घटनाएँ आँकड़ों पर पहुँचती ही नहीं. फिर भी जो आँकड़े उपलब्ध हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि इस प्रकार की दुर्घटनाएँ निरन्तर बढ़ रही हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट (1996) के अनुसार, देश भर में 1996 में 14,849 बलात्कार हुए, जबकि 1990 में यह संख्या 10,068 थी. यानी 1990 के मुकाबले 1996 में 47.5 प्रतिशत अधिक बलात्कार हुए. 1995 में बलात्कार के अपराधों की संख्या 13,774 थी, इसलिए पिछले वर्ष से 1996 में सिर्फ 7.8 प्रतिशत अधिक अपराध हुए. कहा यह भी जा सकता है कि अपराधों की ‘रिपोर्टिंग बढ़ रही है. कुछ संवेदनशाली विद्वानों का कहना है, ”अपराधों की बढ़ोतरी को जनसंख्या के अनुपात में देखें तो अपराध कहाँ बढ़ रहे हैं ?  एक और तर्क (कुतर्क) यह भी दिया जाता है कि कुल अपराधों की तुलना में स्त्री के प्रति अपराध का प्रतिशत तो सिर्फ  6.8 ही है.


आँकड़ों का आतंक

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी 1996 की रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 88 पर तालिका 7.2 में बलात्कार के आँकड़े कहते हैं कि 1994 में 12,351, 1995 में 13,774 और 1996 में 14,849 बलात्कार हुए. लेकिन इसी रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 90 पर तालिका 7.4 कहती है कि 1994 में 13,218, 1995 में 13,774 और 1996 में 14,649 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए. एक तालिका के अनुसार 1994 में 12,351 बलात्कार हुए और दूसरी के अनुसार 13,218 यानी 867 बलात्कार के मामलों का घपला है. किसे सही माना जाए और किसे गलत ? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 1994 वाली रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 212 पर 1994 में बलात्कार के अपराध का आँकड़ा 12,351 ही है. 1995 की रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 222 में भी 1994 में हुए बलात्कारों की संख्या 12,351 ही दिखाई गई है. लेकिन क्रमश: पृष्ठ 216 और 226 में बनाई तालिका में यह संख्या 13,218 प्रकाशित हुई है. 1994 की रिपोर्ट (पृष्ठ 212) के अनुसार 1993 में 11,242, 1992 में 11,112 बलात्कार के केस दर्ज हुए लेकिन इसी रिपोर्ट के पृष्ठ 216 पर बनी तालिका के अनुसार 1993 में 12,223 और 1992 में 11,734 बलात्कार हुए। मतलब यह है कि 1993 में 981 और 1992 में 622 बलात्कार के मामलों का घपला है. 1992 से 1996 तक कुल 2,493 बलात्कार के मामलों का यह अन्तर किसी की भी समझ से बाहर का मामला है. आँकड़ों के इस ‘घपले पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ही स्थिति स्पष्ट कर सकता है. तीन सालों में आँकड़े क्या ‘भूलवश छपते रहे हैं और छपते रहेंगे ? यह मात्र एक उदाहरण है, घपले अभी और भी हैं. शेष फिर कभी.

यौन हिंसा की शिकार युवा स्त्री

1996 में हुए 14,849 बलात्कारों में से 8,281 (55.76 प्रतिशत) 16 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ और 3,475 (23.4 प्रतिशत) 10 से 16 वर्ष की किशोरियों के साथ हुए। दोनों को जमा करें तो मालूम होगा कि 79.16 प्रतिशत बलात्कार की शिकार स्त्रियाँ 10 से 30 वर्ष की थी.  30 वर्ष से अधिक उम्र की स्त्रियों के साथ बलात्कार के अपराध 608 (4.1 प्रतिशत) हैं. संक्षेप में, लगभग 80 प्रतिशत बलात्कार 10 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ और करीब 20 प्रतिशत बलात्कार 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों और 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ हुए. स्पष्ट है कि युवा स्त्रियों के साथ बलात्कार की सम्भावना सबसे अधिक रहती है.

गत वर्ष की तुलना में 

हालाँकि प्रतिशत की भाषा में 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ हुए बलात्कार लगभग 4 प्रतिशत ही हैं, लेकिन यह प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है. इसलिए गम्भीर चिन्ता का विषय है.बच्चियों के बढ़ते बलात्कार को अधिक गम्भीर कहने का मतलब यह नहीं है कि शेष बलात्कारों को गम्भीर अपराध न माना जाए. 1996 में 10 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए बलात्कार का आँकड़ा 1990 से 394 से बढक़र 608 हो गया है. 1990 के मुकाबले 1996 में 54.3 प्रतिशत अधिक बलात्कार हुए मगर 1995 में हुए 747 बलात्कारों की तुलना में 18.6 प्रतिशत घट गए हैं. 1991 में आश्चर्यजनक रूप से यह संख्या पिछले वर्ष की अपेक्षा 47.12 प्रतिशत बढक़र 1,099 हो गई थी. इन दोनों ही सालों में हुई आश्चर्यजनक बढ़ोतरी या घटोतरी विश्वास योग्य नहीं लग रही. 1996 के आँकड़ों की तुलना अगर 1991 के आँकड़ों से करें तो सारे प्रतिशत उलट-पुलट हो जाते है. 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार में 44.3 प्रतिशत की कमी और 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं से बलात्कार में 88 प्रतिशत वृद्धि यह असम्भव नहीं मगर…विश्वास योग्य भी नहीं. इसके विपरीत, 1996 में 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ 2,485 बलात्कार हुए। 1995 में यह संख्या 1955 है.

 कहने का अभिप्राय यह है कि 1996 में 1,995 की तुलना में बलात्कार 27.1 प्रतिशत अधिक हुए हैं. 1991 में 1990 की तुलना में जहाँ 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार 178.9 प्रतिशत बढ़ गया था, वहीं 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ 14.4 प्रतिशत और 16 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ 10.8 प्रतिशत घट गया था. 1992 में अचानक 10 वर्ष की उम्र की बच्चियों से बलात्कार 1,099 से घटकर 532 (51.5 प्रतिशत कम) हो गया लेकिन 16.30 वर्ष के वर्ग में 30 प्रतिशत और 30 वर्ष से अधिक वर्ग में 22.8 यानी 52.8 प्रतिशत बढ़ गया. अगर ये आँकड़े सचमुच विश्वनीय हैं तो इसका विस्तार से विवेचन आवश्यक है कि इन वर्षों में ऐसा होने के पीछे कौन से कारण या स्थितियाँ सक्रिय थी. कहीं यह आँकड़ों की उलटफेर ही तो नहीं है ? 1991 के आँकड़ों में कहीं कुछ गम्भीर गड़बड़ है। इसके आधार पर तो नतीजे एकदम काल्पनिक लगते हैं. क्या नहीं ?



सात सालों में हिंसा

खैर…1990 से 1996 तक हुए बलात्कार के अपराधों को देखें तो सात सालों में 86,291 बलात्कार हुए. 4,748 (5.5 प्रतिशत) 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ, 20,114 (23.3 प्रतिशत) 10 से 16 वर्ष की किशोरियों के साथ, 48,918 (56.7 प्रतिशत) 16 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ और 12,511 (14.5 प्रतिशत) 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ हुए. साफ दिखाई देता है कि 16 से 30 वर्ष की युवा स्त्रियाँ सबसे अधिक बलात्कार की शिकार बनी.  80 प्रतिशत बलात्कार के मामलों में महिलाओं की उम्र 10 से 30 साल है. 22.8 प्रतिशत बलात्कार के मामले सिर्फ 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए. उल्लेखनीय है कि 16 वर्ष से कम उम्र की लडक़ी से सहवास बलात्कार ही माना जाता है, भले ही सहमति हो.


प्रतिशत की भाषा

हालाँकि बलात्कार की शिकार अधिकांश महिलाओं की उम्र 16 से 30 साल के बीच रहती है लेकिन 1990 की तुलना में 1996 में इस वर्ग में सबसे कम 37.4 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है. सबसे अधिक अपराध (65.1 प्रतिशत) 10 से 16 वर्ष की किशोरियों के साथ बढ़े. 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ 6.12 प्रतिशत और 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ 54.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. मतलब यह है बलात्कार के मामलों में 16-30 वर्ष की स्त्रियों की संख्या सबसे अधिक रही है, परन्तु 1990 की अपेक्षा 1996 में 10-16 वर्ष की किशोरियों के साथ हुए बलात्कारों का प्रतिशत सबसे अधिक बढ़ा है. कहा जा सकता है कि इस वर्ग की लड़कियों के साथ बलात्कार की आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ रही है. जहाँ कुल अपराधों का 1996 में प्रतिशत (1990 की तुलना में) 47.5 प्रतिशत बढ़ा है, वहाँ 10-16 वर्ष की किशोरियों के साथ बलात्कार की दुर्घटनाएँ 65.1 प्रतिशत अधिक हो गई हैं.
1990 से 1996 तक हुए बलात्कारों में 71 प्रतिशत बलात्कार 16 साल से अधिक उम्र की स्त्रियों के साथ और 29 प्रतिशत बलात्कार 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए हैं. 1990 में यही प्रतिशत क्रमश: 75 प्रतिशत और 25 प्रतिशत के लगभग था. अभिप्राय यह है कि पिछले सात सालों में जहाँ 4 प्रतिशत बलात्कार 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ बढ़े हैं, वहीं 16 वर्ष से अधिक उम्र की स्त्रियों के साथ हुए बलात्कारों में 4 प्रतिशत की कमी हुई है. यह 4 प्रतिशत का परिवर्तन बेहद महत्त्वपूर्ण बदलाव की ओर संकेत देता है। इस बदलाव के सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों को रेखांकित करने के लिए अपराध और संचार माध्यमों की भूमिका को भी देखना पड़ेगा.

रिपोर्ट के अनुसार देश के 23 महानगरों में वर्ष 1996 के दौरान 545 बलात्कार 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ, और 456 केस 16 से 30 वर्ष की स्त्रियों के साथ और 95 मामले 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ हुए. शहरी क्षेत्रों में 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा लगभग दो गुना है. 16 वर्ष से बड़ी उम्र की स्त्रियाँ शहरी क्षेत्रों में अन्य की तुलना में 20 प्रतिशत कम बलात्कार की शिकार हुई हैं. 1996 में हुए 14,849 बलात्कार के मामलों में से मध्य प्रदेश में 3,265 (22 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश में 1,854 (12.5 प्रतिशत), बिहार में 1,453 (9.8 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 1,444 (9.7 प्रतिशत), राजस्थान में 1,162 (7.8 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल में 855 (5.8) प्रतिशत हुए। दिल्ली में 484 (3.3 प्रतिशत) बलात्कार के केस दर्ज किए गए. जनसंख्या के अनुसार अपराध दर, सबसे अधिक मध्य प्रदेश (4.4 प्रतिशत) और दिल्ली (4.37 प्रतिशत) में रही. 1994 की अपेक्षा 1996 में जहाँ उपरोक्त राज्यों में (बिहार और दिल्ली के अलावा) बलात्कार के अपराधों में कमी आई है, वहाँ बिहार और दिल्ली के साथ-साथ केरल, हरियाणा, उड़ीसा, पंजाब, सिक्किम और त्रिपुरा में भी बलात्कार के अपराधों में बढ़ोतरी हुई है. इसके आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों की जाँच-पड़ताल अनिवार्य है.

दिल्ली और हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी का शासन रहा है और बिहार में लालू यादव का. बिहार में 1994 में जहाँ 823 (6.7 प्रतिशत) बलात्कार रिकॉर्ड हुए थे, वहाँ 1996 में यह संख्या बढक़र 1,453 (9.8 प्रतिशत) पर पहुँच गई है. दिल्ली में 1994 में 261 (2.1 प्रतिशत) से बढक़र 1996 में 484 (3.3 प्रतिशत) वृद्धि हुई है. आश्चर्यजनक रूप से हरियाणा में भी 1994 में 198 बलात्कार का आँकड़ा बढक़र 336 पर पहुँच गया.
इसी सन्दर्भ में थोड़ा और पीछे मुडक़र देखने पर पता चलता है कि जहाँ 1976 में 3,893 बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे, वहाँ 1978 में यह संख्या बढक़र 4,559, 1980 में 5023, 1984 में 6,203, 1985 में 6,356 और 1988 में 6,888 हो गई थी. अगर 1976को आधार वर्ष मानें तो 1996 में 282 प्रतिशत बलात्कार हुए हैं. दिल्ली में 1985 में 88, 1986 में 97, 1987 में 104, 1988 में 127, 1989 में 161, 1990 में 196, 1991 में 214 बलात्कार बढक़र 1996 में 419 हो गए। 1985 की अपेक्षा 1996 में यह भयावह वृद्धि 376 प्रतिशत बैठती है.


सबसे आगे कौन?

16 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के मामले में भी मध्य प्रदेश (873), उत्तर प्रदेश (535), महाराष्ट्र (453), आन्ध्र प्रदेश (269), दिल्ली (269), पश्चिम बंगाल (251) और बिहार (217) सबसे आगे रहे। उपरोक्त राज्यों में ही कुल बलात्कारों का प्रतिशत 70.7 बैठता है। 30 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के साथ मध्य प्रदेश (95), महाराष्ट्र (60), दिल्ली (67), उत्तर प्रदेश (49), आन्ध्र प्रदेश (48) और पंजाब में (46) बलात्कार दर्ज हुए. 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के लिए सबसे अधिक खतरनाक शहर इस देश की राजधानी दिल्ली ही है, जहाँ 1996 में 232 बलात्कार हुए। इसके बाद बम्बई में (97), बंगलौर में (24), भोपाल में (19) और पुणे में (24) मामले रिकॉर्ड किए गए. उल्लेखनीय है कि अधिकांश महानगरों में 98 प्रतिशत बलात्कार 30 वर्ष तक की महिलाओं के साथ और 2 प्रतिशत इससे बड़ी उम्र की स्त्रियों के साथ हुए. कुछ महानगरों में, जैसे—हैदराबाद, लुधियाना, मद्रास, मदुरै, सूरत, बड़ौदा में 100 प्रतिशत बलात्कार सिर्फ 30 वर्ष से कम उम्र की स्त्रियों के साथ ही हुए। बलात्कार ही नहीं, स्त्री के प्रति हिंसा और अपराध में भी दिल्ली सबसे आगे है. यहाँ अपराध 23.5 प्रतिशत है जबकि महाराष्ट्र में 14.3, मध्य प्रदेश में 12.9 और उत्तर प्रदेश में 11.8 प्रतिशत है.

अनुसूचित जाति की महिलाओं के साथ 1994 में 992, 1995 में 873 और 1996 में 949 बलात्कार हुए. इनमें से 34 प्रतिशत बलात्कार अकेले उत्तर प्रदेश में हुए. अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के साथ 1996 में 385, 1995 में 369 और 1996 में 314 बलात्कार की दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें से करीब 53 प्रतिशत अकेले मध्य प्रदेश में हुई. हालाँकि हर साल यह संख्या घट रही है, लेकिन स्थिति चिन्ताजनक है. अनुसूचित जाति पर हुए अपराधों में उत्तर प्रदेश (35 प्रतिशत), राजस्थान (21 प्रतिशत) और मध्य प्रदेश (13 प्रतिशत) सबसे प्रमुख हैं। इन तीनों प्रदेशों का कुल हिस्सा ही 69 प्रतिशत बैठता है. अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध अपराधों में मध्य प्रदेश (29.4 प्रतिशत), राजस्थान (28 प्रतिशत), गुजरात (7.4 प्रतिशत), महाराष्ट्र (6.8 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (6.7 प्रतिशत) प्रमुख हैं. जनजातियों के विरुद्ध अपराधों का करीब 78 प्रतिशत अपराध इन पाँच राज्यों में हो रहा है. राजस्थान में जनजातियों व अनुसूचित जातियों के प्रति अपराध समान रूप से जारी है. बलात्कारियों का वर्ग, वर्ण और जाति के आधार पर विवेचन उपलब्ध नहीं है.



न्याय में देर या अँधेर?

ब्यूरो रिपोर्ट के अनुसार 1995-96 में पुलिस के पास जाँच के लिए क्रमश: 18,914 और 19,963 बलात्कार के मामले आए. इनमें से सिर्फ 72-73 प्रतिशत मामलों में जाँच-पड़ताल होने के बाद सिर्फ 62-63 प्रतिशत मामले लटके पड़े रहे. दूसरी तरफ देश-भर में 1995 में 47,084 और 1996 में 51,734 बलात्कार केस सुनवाई के लिए थे. इनमें से केवल 16-17 प्रतिशत की सुनवाई हो पाई, शेष 83 प्रतिशत मामले अधर में लटके रहे. 1995 में जहाँ 5 प्रतिशत अपराधियों को सजा हुई, वहाँ 1996 में यह सजा घटकर 4.5 प्रतिशत ही रह गई. 1996 में अन्त तक बलात्कार के 43,016, अपहरण के 36,470 दहेज हत्या के 14,133, छेड़छाड़ के 72,539, यौन उत्पीडऩ के 8,656, पति व सम्बन्धियों द्वारा क्रूरता के 83,195, वेश्यावृत्ति के 4,799, दहेज के 6,175, अश्लील प्रदर्शन के 500 और सती के 3 मुकदमों का फैसला होना बाकी था. अदालतों ने 1995-96 में वेश्यावृत्ति के 60-61 प्रतिशत मामलों का फैसला सुनाते हुए करीब 53-54 प्रतिशत अपराधियों को सजा सुनाई. कहने की आवश्यकता नहीं है कि इनमें से अधिकांश अपराधी स्वयं वेश्या (स्त्री) ही रही होंगी. सती के तीनों मुकदमों में कोई फैसला नहीं हो पाया. अदालतों में सालों की देरी और कानूनी चोर दरवाजों से अधिकांश अपराधियों के साफ बच निकल जाने का परिणाम है कि स्त्री के प्रति यौन हिंसा लगातार बढ़ रही है.


घर या वधस्थल

उपरोक्त आँकड़ों के विवेचन, विश्लेषण और अध्ययन के आधार पर नि:सन्देह यह स्पष्ट होता है कि 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ यौन हिंसा के अपराध लगातार बढ़ रहे हैं विशेषकर महानगरों में, अधिकांश बलात्कारी नजदीकी रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त या परिचित होता है. पिता, भाई, चाचा, ताऊ, मामा वगैरह द्वारा भी बलात्कारों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है. कम उम्र की बच्चियों की प्राय: बलात्कार के बाद हत्या कर दी जाती है या आघात से मृत्यु हो जाती है. कुछ मामलों में बलात्कार की शिकार लडक़ी सामाजिक अपमान और लज्जा के कारण आत्महत्या कर लेती है.



मीडिया की भूमिका


यह मात्र संयोग नहीं है कि जैसे-जैसे अश्लील और यौन साहित्य, फिल्म, वीडियो वगैरह बढ़े हैं, वैसे-वैसे यौन अपराध बढ़ते गए हैं. बड़ी उम्र की लड़कियों या स्त्रियों के विरोध-प्रतिरोध और शिकायत से बचने के लिए 16 वर्ष से कम उम्र की अबोध बच्चियों से बलात्कार के अपराध बढ़े हैं. इन्हें बहलाना, फुसलाना या काबू करना
अपेक्षाकृत आसान है. दूसरा कारण अक्षत योनि की आदिम आकांक्षा भी है और विक्षिप्त यौन कुंठाएँ भी. इसके अलावा किशोर उम्र के लडक़ों द्वारा कम उम्र की बच्चियों के साथ यौन अपराध की प्रवृत्ति भी लगातार बढ़ रही है. नाबालिग किशोर युवकों द्वारा कम उम्र की बच्चियों से दुष्क र्म (बलात्कार) भी हर साल बढ़ता जा रहा है. संचार माध्यमों में बढ़ा ‘सेक्स और हिंसा का प्रदर्शन, समाज में भी यौन अपराधों के बढऩे में ‘उत्प्रेरक का काम करता है. जैसे-जैसे नारी चेतना और मुक्ति के स्वर पहले से अधिक मुखर होकर सामने आए हैं वैसे-वैसे स्त्री के विरुद्ध हिंसा (यौन हिंसा) बढ़ी है. जितना विरोध और प्रतिरोध बढ़ रहा है, उससे ज्यादा यौन अपराध बढ़ रहे हैं.

यौन हिंसा का मुख्य कारण काम-पिपासा शान्त करना या मानसिक विक्षिप्तता कम, बदला लेना अधिक है. अपराधियों को सुधारवादी-उदारवादी न्याय नीति के अन्तर्गत कम सजा देने सेे ‘न्याय का लक्ष्य भले ही पूरा हो जाए मगर इस प्रकार के अपराधों को बढ़ावा ही मिलता है. दंड-भय ही न रहे तो अपराध कैसे कम (समाप्त) होंगे !कानून व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन के साथ-साथ जरूरी है सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक सोच में बदलाव. बलात्कारियों का मृत्युदंड की ‘हवाई घोषणाओं से क्या होना है? यौन हिंसा के ये आँकड़े और आँकड़ों का तुलनात्मक जमा-घटा सिर्फ संकेत मात्र है. स्त्री के विरुद्ध पुरुष द्वारा की जा रही यौन हिंसा की वास्तविक स्थिति (सरकारी) आँकड़ों से कहीं अधिक विस्फोटक, भयावह और खतरनाक है.
क्रमशः 

उपभोक्तावादी आधुनिकता की आजादी के बीच स्त्री

सुनीता

 शोधार्थी,  हिन्दी साहित्य, आंबेडकर  विश्वविघालय दिल्ली
संपर्क :sunitas988@gmail.com

90 के दशक में भारत देश ने अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए भूंमडलीकरण, बाजारवाद और उदारीकरण की नीति को अपनाया. जो एक तरफा ट्रैफिक की तरह यहाँ आ गया, जबकि हमारा देश इसके लिए तैयार नही था. भारत ने विकास के इस मॉडल को मात्र इसलिए अपनाया क्योंकि यह पश्चिम में फल—फूल रहा था. जिसका कारण था, पश्चिमी, सभ्यता और संस्कृति का इसके लिए पूर्णतः तैयार होना. परंतु भारत ने न तो उस विकास मॉडल का यहाँ की परिस्थितियों के साथ कोई पूर्व परीक्षण किया, दूसरा पूर्वी और पश्चिमी संस्कृति के भेद को भी नजरअंदाज किया. भारत में जिस तरह का सामाजिक ढाँचा है उसमें एक समूह का दूसरे समूह पर वर्चस्व देखने को मिलता है. सवर्ण का दलित पर, अमीर का गरीब पर और पुरुष का स्त्री पर. यहाँ आज भी सिर पर मैला ढोने वाले को कोई भी सवर्ण अपने घर में साथ बिठाकर चाय की प्याली नही पिलाता. जबकि पश्चिम में ऐसा होता है. ठीक यही स्थिति स्त्री-पुरुष संबंधो की भी है. हमारे समाज में स्त्री-पुरुष अनुपात में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है. यह स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराध का प्रमुख कारण है. भारतीय समाज में स्त्री को पर्दे में रखने की संस्कृति रही है. लेकिन जब बाजारवाद आया तो उसने स्त्री को एक वस्तु बना कर पेश किया. देह की मुक्ति का नारा लगाया. इस आकस्मिक बदलाव को भारतीय पुरुष पचा नही पाया और स्त्री की इस नग्नता पर उसे एक खीज पैदा हुई. अपनी इस चिढ़ को उसने स्त्री पर घिनौने अपराध करके निकाला. क्योंकि पुरुष की मानसिकता बदलने की कोई पूर्व तैयारी हमारे समाज में नही की गयी. न तो उसकी परवरिश के माध्यम से और न ही उसकी शिक्षा-दीक्षा में लेकिन सामाजिक कलेवर बदल गया. आज भी ये दोनो विपरीत परिस्थितियाँ एक-दूसरे के साथ सामंजस्य नही बिठा पाई है.

महादेवी स्त्री और पुरुष को अलग-अलग भूमिकाओं में देखती है। उनका मानना है कि स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक मानसिकता वैपरीत्य द्वारा ही हमारा समाज सामंजस्यपूर्ण और अखण्ड हो सकता है. भारतीय समाज और संस्कृति को महादेवी ने स्त्री के अनुकूल नही पाया है. वह इसमें परिवर्तन की मांग करती है लेकिन स्त्री—विमर्श के उस पहलू की आलोचना करती है जिसमें स्त्री स्वयं पुरुष हो जाना चाहती है. वह इसे स्त्री के मधुर व्यक्तित्व को जलाकर उसकी भस्म से पुरुष की रूक्ष मूर्ति गढ़ लेना’ मानती है. अतः लेखिका का आग्रह है कि स्त्री पुरुष प्रवृति को नही ओढ़े बल्कि स्त्रीत्त्व की सीमाओं  और समस्याओ से संघर्ष करके स्त्री के अधिकारो और अस्तित्व को हासिल करे. वर्तमान में स्त्रियों को शैक्षिक , व्यवसायिक व राजनैतिक क्षेत्रो में प्रवेश ही नही बल्कि कई सम्मानित और प्रतिष्ठित पदों पर आसीन भी किया जा रहा है. लेकिन यह केवल सत्ता की प्रधानता का हस्तंातरण है न कि व्यवस्था-परिवर्तन. उसी पुरुषवादी व्यवस्था में स्त्रियों को स्थान दिया जा रहा है और उनसे प्रयत्क्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषों द्वारा निर्मित इस व्यवस्था में पुरुषों के ही हित सधवाएँ जा रहे हैं. यह मृग- मरीचिका की तरह है. जिसमें पारंपरिक स्त्रियोचित्त गुणो के प्रति भी विशेष जोर है. स्त्रीमुक्ति का संघर्ष दो अंतर्विरोधों से गुजरता है. पहला स्त्रियाँ, पुरुषों द्वारा निर्मित उनकी इस व्यवस्था का पूर्णतः निषेध करे. वे उसमें शमिल न हो और उन सभी चीजों को जिन पर पुरुष अपना दावा करते है, उस दुनिया से स्वयं को बाहर रखें और उसका पुरजोर विरोध करे. या फिर स्त्रियों को उसी अंधी दौड़ में शमिल हो जाना चाहिए, पुरुष पहले से ही जिसका हिस्सा है. इसका नकारात्मक प्रभाव यह होगा कि पुरुषों के दुर्गणों और कमियों को भी वे अख्तियार कर लेगी.

महादेवी का मानना है कि स्त्रियों द्वारा पुरुष बनने की कोशिश उन्हे कहीं नही पहुँचाएगी. यह भी एक तरह का पतन ही होगा. दूसरा सभ्यता के विकास के लिए उपार्जित ज्ञान और उत्पादन में स्त्री का भी सहयोग रहा है इसलिए उसे इनके निषेध की नहीं बल्कि अपनी प्रतिभा के बल पर उपयोग की आवश्यकता है. सीमोन द बोउआ लिखती है यदि कोई औरत कराटे सीखती है तो यह भी एक मर्दानी चीज़ है. हमें पुरुषों की दुनिया को नकाराना नही है, बल्कि उस पर लगा पुरुषत्व का ठप्पा मिटाना है क्योंकि कुछ भी हो यह दुनिया हम औरतो की भी तो है.’’ 1आत्मरक्षा में समर्थ स्त्रियाँ इस दुनिया में खुद को ज्यादा सहज और मुक्त महसूस करेंगी. भारतीय सरकार भी स्त्री शक्तिकरण की बात करती है. कुछ संगठन जैसे दुर्गावाहिनी’ और संघर्ष-वाहिनी’ महिलाओ को सशस्त्र प्रशिक्षण देते है, आत्मरक्षा के लिए. इस प्रयास की आलोचना हमें इस रूप में देखने को मिलती है कि समाज जैसा भी है, ठीक है और वह वैसा ही रहेगा. केवल स्त्री को इसके लिए तैयार करना है कि वह कैसे इस बर्बर व्यवस्था में सर्वाइव कर सके. वह भी हिंसा का मार्ग अपनाकरं वहीं नारीवादी, स्त्री के स्वतंत्र होने की मांग करते है न कि उसे वर्तमान व्यवस्था में ही सशक्त करने की. सत्ता पक्ष एक तरफ तो स्त्री सशक्तिकरण  की बात करेगा और दूसरी तरफ गोधरा ’ जैसे कांड करवाएगा, जिसमें स्त्री के भ्रूण को त्रिशूल से बाहर निकालकर उसे मारा गया.महादेवी स्त्री मुक्ति को केवल स्त्री के हित में नहीं बल्कि समाज के सर्वागीण विकास से जोड़कर देखती है. समाज  में स्त्री भी कुटुम्ब, समाज, नगर तथा राष्ट्र की विशिष्ट सदस्य है तथा उसकी प्रत्येक क्रिया का प्रतिफल सबके विकास में बाधा भी डाल सकता है और उनके मार्ग को प्रशस्त भी कर सकता है.’’2



महादेवी इस मुक्ति की लड़ाई में औरत से अपेक्षा करती है कि आज आजादी मांगने से मिलती कहाँ है ? आजादी तो हम औरतो को छीनकर लेनी होगी, पंरतु समता के नाम पर पश्चिम से उधार ली हुई समता की बात से मैं सहमत नही हूँ. समता की बात करके औरत मर्द बन जाना चाहती है, जबकि उसे मर्द नही, विवेकशील, विचारवान औरत बनना है और यह नए और पुराने के संतुलित समन्वय से संभव होगा.’’3 महादेवी के यहाँ स्त्री मुक्ति की लड़ाई में स्त्री का संघर्ष पुरुष से नही बल्कि पुरुष निर्मित व्यवस्था और केन्द्रित सत्ता से है। लेखिका एक ऐसे समतामूलक समाज की कल्पना करती है जहाँ स्त्री और पुरुष समान होते हुए भी भिन्न हो सकेंगे. इस पृथ्वी पर जीवन के सृजन का दायित्व स्त्री और पुरुष दोनो के मिलन पर ही आधारित है. ऐसे में हम पुरुष विहीन समाज की कल्पना कैसे कर सकते है ? आधुनिकीकरण ने स्त्री मुक्ति के जो विकल्प सामने रखे है,समलैंगिकता, किराए की कोख, गिलास की डिश में गर्भधारण, मातृत्त्व का मशीनीकरण आदि स्त्री और संपूर्ण सृष्टि को कहाँ पहुँचायेंगे. स्त्री -विमर्श में शुरूआती तौर पर ही गर्भ -निरोधक’ और गर्भपात ’ के अधिकार की मांग की जाती रही है और उसे स्त्री की मुक्ति से जोड़कर देखा जाता है. पर क्या ऐसे अधिकार स्त्री को सही अर्थो में मुक्त कर पाए हैं. क्योंकि स्त्री-पुरुष संबंध से अगर कोई सृष्टि होती है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी स्त्री की ही है, और इन अधिकारो के चलते उसे रोकने की जिम्मेदारी भी स्त्री की ही हो जाएगी. जिससे स्त्री तो नही पर पुरुष जरूर अतिरिक्त रूप में मुक्त हुआ है. इस बाजारवादी व्यवस्था में गर्भ-निरोधक’ और गर्भपात’ दोनो ही मुनाफे का बड़ा बाजार बनकर सामने आए है.

 स्त्री-शरीर कास्मेटिक उद्योग को भुनाने के लिए खान बन गया है. लेकिन इससे स्त्री के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिले है. हांलाकि इसमें कोई शक नही है कि गर्भनिरोधक ’ और गर्भपात ’ का कानूनी अधिकार स्त्री मुक्ति के संघर्ष में मददगार साबित हुए है. महादेवी का जोर मातृत्व की प्रतिष्ठा पर है किन्तु उस निर्णय का अधिकार स्त्री को हो.’ आधुनिक युग में महिलाओ को किराय की कोख’ के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा है. इसकी जड़ में वर्ग-विभाजन कार्य करता है. जहाँ इलीट क्लॉस की महिलाएँ अपनी शारीरिक निर्मितियों से भी मुक्त होना चाहती है. और इसका भार वह सर्वहारा वर्ग की महिलाओ पर डाल रही है. अतः इसने स्त्री-विमर्श में तो एक दरार डाली ही है साथ ही सीमोन और सुलमिथ फॉयरस्टोन जैसी उग्र नारीवादी लेखिकाओं के स्त्री-विमर्श की सीमा को भी उजागर किया है. सीमोन लिखती है कि अपनी  शारीरिक सीमाओं  से उबर कर ही औरत एक पूर्ण मनुष्य बन सकती है.’’4 पंरतु यह कैसे सम्भव है कि नारी मात्र अपने शरीर की प्राकृतिक निर्मित (मासिक धर्म, गर्भधारण, प्रसव, स्तनपान) का अतिक्रमण कर सके.उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रो की लड़कियों को राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के उन इलाको में बेच दिया जाता है जहाँ स्त्री अनुपात पुरुष की तुलना में बहुत कम है. शादी का छलावा देकर इन्हे यहाँ लाया जाता है और जब बच्चा पैदा हो जाता है, तब उस बच्चे के थोड़ा बड़ा होने तक उस महिला को रखा जाता है, फिर उसे छोड़ दिया जाता है। यह स्त्री के लिए बहुत बड़ी समस्या है जो उसके अस्तित्व पर खतरे की तरह है। इस प्रक्रिया में संतान को केवल पिता के अंश से उत्पन्न माना जाता है। माता का उस पर कोई अधिकार नही है. वह मात्र कोख है. जबकि महादेवी मातृत्व को स्त्री के स्वाभिमान और स्वत्व से जोड़कर देखती है.


मातृत्व स्त्री का वह गुण है. जो संपूर्ण सृष्टि की रचना का दायित्व निभाता है. आज पुरुष स्त्री के मातृत्व को भी उससे छीन लेना चाहता है. महादेवी मानती हैं कि आधुनिक स्त्री ने अपने जीवन को इतने परिश्रम और यत्न से जो रूप दिया है. वह बहुत सुंदर भविष्य का परिचायक नही जान पड़ता. पश्चिमी  स्त्री की स्थिति क्या यह प्रमाणित कर सकेगी कि वह आदिम नारी की दुर्बलताओ से रहित है ? सम्भवतः नही.  शृंगार के इतने संख्यातीत उपकरण, रूप को स्थिर रखने के इतने कृत्रिम साधन, आकर्षित करने के उपहास योग्य प्रयास आदि क्या इस विषय में कोई संदेह का स्थान रहने देते है ? नारी का रमणीत्व नष्ट नही हो सका, चाहे उसे गारिमा देनेवाले गुणों का नाश हो गया.’’5 समाज द्वारा स्त्री के दमन का यह भी एक पैतंरा है कि उसे स्वयं को सौदंर्य का पर्याय साबित करना है. इस कारण सौंदर्य उसके लिए एक मनोग्रंथि के रूप में बहुत घातक साबित होता है जो उसकी दिमागी चेतना और रचनात्मकता को समूलतः नष्ट करके दोयम दर्जे का बना देता है. महादेवी ने स्त्री मुक्ति में बौद्धिक सौदंर्य को महत्त्व दिया है. महादेवी ने स्त्रीत्त्व को भी दो भागो में बाँटकर देखा है. एक प्रसाधित  शृंगारित स्त्रीत्त्व’ जो आधुनिक नारी में विधमान है और दूसरा संस्कारित प्राकृतिक स्त्रीत्त्व’ जो मातृत्व की पूर्ति करता हुआ परम्परागत भारतीय स्त्री में विद्यमान है. सभी स्त्रियाँ फिर चाहे वह आधुनिकता से लेस हो या परम्परागत  रूढ़ि से बंधी हो, दोनो ही पराधीनता के बोझ को ढ़ो रही है. भारत देश पोर्न सिनेमा और साहित्य के बाजार में विश्व में तीसरे स्थान पर है.



यह बहुत ही शर्मनाक है कि इस तरह का असामाजिक उत्पादन और अश्लील गतिविधियाँ हमारे समाज में बड़ी तेजी से फैल रही है. इसमें प्रशासन की मिलीभगत देखने को मिलती है और सरकार लाचारी ओढ़े है. आखिर क्यों…? चुटकी बजाते ही हजारो वर्षो से स्त्रियों पर किए जा रहे इन अपराधो पर रोक नही लगेगी. न ही पलक झपकते उसकी सामाजिक हैसियत में कोई बदलाव आ जाएगा, क्योंकि ईमानदारी के साथ इसकी कोशिश कभी की ही नही जाती. जिसका सबसे बड़ा कारण है पुरुष समाज का वर्चस्व में होना जो यह कभी नही चाहेगा कि उसकी दासी उसके बराबर में आसीन हो. स्त्री की  शृंखला की कड़ियाँ आपस में एक-दूसरे से जुड़ी हुई संगुम्फित है. जिन्हे जड़ से शुरू कर परम्परा तक तोड़ते आना होगा. हमारे समाज में लिंग अनुपात में विषमता बढ़ती ही जा रही है. माँ-बाप नही चाहते कि वे बेटी को जन्म दे इसलिए इतनी बड़ी तादाद में कन्या भ्रूण हत्याएं  होती है. मैत्रेयी पुष्पा लिखती है कि समाज के विधायक, पंडित, पुरोहित, चिंतक और लेखक गौर करे कि उन्होंने अब तक स्त्री की स्तुति और निंदा में कहाँ कमी छोड़ दी थी कि वैज्ञानिको और चिकित्सकों ने उसको गायब करने के नायाब तरीके खोज लिए ?’’6  ऐसा नही है कि स्त्री जीवन को नष्ट करने के ऐसे घिनौने अपराध केवल आधुनिकता की देन है. बल्कि भारतीय संस्कृति में तो इसका लम्बा इतिहास रहा है. “Suraji
Jadesa was penalized Rs. 12,000 Case by British government for facilitating
female infanticide on November 6,1833”7 
फर्क सिर्फ  इतना है कि पहले यह कार्य लड़की के जन्म लेने के उपरांत उसके ही परिजनों या दाई द्वारा, उसके मुँह व नाक में गर्म रेत डालकर अथवा गला घोटकर उसे मार दिया जाता था. पर अब यह कार्य डॉक्टर अपनी मोटी फीस लेकर करते है. वह भी जन्म से पूर्व ही माँ के पेट में भ्रूण हत्या. जिसके प्रतिकुल प्रभाव उस गर्भवती स्त्री के मानस तथा शरीर पर भी होते है.


इस तरह की गैरकानूनी गतिविधि 70 के दशक में अस्तित्व में आयी. जब सर्वेक्षण से यह आंकडे़ सामने आए कि भारत में जनसंख्या वृद्धि का एक बड़ा कारण लोगो की पुत्र लालसा है. अतः डॅाक्टरो ने सरकारी तौर पर इसका एक तोड़ निकाला। सोनोग्राफी द्वारा लिंग की जाँच करके कन्या भ्रूण हत्या करना। यह सब बड़े ही गुप्त ढंग से जनसंख्या नियंत्रण की एक कोशिश के रूप में अपनाया गया. परंतु समाज में बढ़ते हुए लिंग अनुपात को देखते हुए जब इसे गैर कानूनी घोषित किया गया तब तक यह अपना व्यावसायिक रूप ले चुका था. आज भी कई निजी स्वास्थ्य संस्थान इस कार्य को अंजाम दे रहे है और पैसा कमा रहे है. वर्तमान में इस मुनाफे का लालच इतना अधिक बढ़ गया है कि डॉक्टर, परिजनों  को गलत रिर्पोट देकर भी भ्रूण हत्याएँ कर रहे है. आखिर क्यो भारतीय संस्कृति स्त्री-विरोधी है. माता-पिता क्यों बेटी के जन्म से डरते है ? क्योंकि उन्हे बेटी के विवाह में अपने जीवन की सारी जमा पूंजी दहेज में देनी पड़ती है. वर्तमान समय में दहेज की मात्रा भी वर तथा वधू पक्ष की प्रतिष्ठा का सबब बन गयी है. उपभोक्तावादी संस्कृति ने दहेज जैसी कुप्रथा को और अधिक पुष्पित-पल्लवित किया है. दहेज-प्रथा के दो प्रमुख कारण रहे हैं, पहला पुत्री को पिता की संपत्ति में हिस्सा न देना पड़े. दूसरा, भावी पत्नी का आार्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होना. दोनो ही कारण स्त्री की सामाजिक और परिवारिक स्थिति में गिरावट लाते है. आगे चलकर यह कुप्रथा पत्नी उत्पीड़न का पर्याय और स्त्री के प्रति बढ़ते अपराध का जरिया बन गयी. जिसे हिन्दु समाज परम्परा के रूप मैं आज भी ढो रहा है.अभिभावक लड़की की शिक्षा और रोजगार को उतना महत्त्व नही देते. न ही उसे अपना जीवन सवाँरने के लिए पर्याप्त समय देते है. वह बेटी को घर के बाहर भेजने से डरते है, उसे बाहर महफूज नही पाते. उन्हें डर है कि कही वह घर की मर्यादा तोड़कर प्रेम विवाह न कर ले.

हमारे समाज में स्त्री को अभी भी वरण की स्वतंत्रता नही है. ऑनर किलिंग जैसे भयानक अपराध आज भी होते है. दूसरा अगर किसी ने लड़की का अपहरण कर लिया उसके साथ बलात्कार किया तो परिवाार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी . इसलिए उसे घर की चार दीवारी में कैद करके उस पर पहरे बिठाए जाते है. स्त्रीवदियों का मानना है कि बलात्कार एक पोलिटिकल ऐक्ट होता है. जिसमें सैक्स का आस्पैक्ट कम होता है जबकि जेंडर वर्चस्व अधिक. इस तरह बलात्कार पुरुषवादी प्रभुत्व दिखाने का माध्यम हैं. पूंजीवादी देशो में बलात्कार को शारीरिक एवं मानसिक ट्रोमा के रूप में माना जाता है. वही भारत में सामंतवादी मूल्यों के कारण अभी भी इसे मर्यादा भंग होने, इज्जत लुट जाने के रूप में देखा जाता है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था के तहत बलात्कार मृत्यु से बड़ा अभिशाप है और इससे बचने का उपाय यह कि स्त्री, घर परिवार और पितृसत्ता के नियंत्रण में रहे. अतः बलात्कार के लिए स्त्री स्वयं जिम्मेदार होती है क्योंकि उसने गृह और सम्मान की लक्ष्मण रेखा लाघंने की गलती की है. वही स्त्रीवादी इसे लैंगिक हिंसा मानते है और इससे लड़ने का तरीका यह है कि स्त्रियों में आत्मविश्वास पैदा किया जाए. उनके लिए सार्वजनिक स्थानों को और ज्यादा सुरक्षित बनाया जाए तथा बलात्कारियों को सख्त सजा दी जाय. अतः भय नही वरन संघर्ष लैंगिक हिंसा से लड़ने का साधन है.फैशन और पश्चिमी वस्तुओ तथा संस्कृति को सैक्स अतिरेक व महिला अपराधो से जोड़ कर देखा गया. ये कैसी सड़ी-गली मानसिकता और खोखले मूल्य है जिन्हें हमारा समाज आज तक ढ़ो रहा है. स्त्री आज भी इस उपभोक्तावादी आधुनिकता और सामंतशाही परम्परा रूपी चाक के दो पाटो के बीच पिस रही है.

भारतीय संस्कृति संयम प्रधान है. यहाँ ब्रह्मचारी का चित्र में स्त्री-दर्शन भी वर्ज्य है तथा एकान्त में माता की सन्निकटता भी अनुचित मानी गई. ऐसे अस्वभाविक वातावरण में बालक-बालिकाओ को पल कर बड़ा होना पड़ता है. घर और समाज दोनों उन्हे इतनी दूर रखते है कि एक संकीर्ण सीमा में निकट रहते हुए भी पिता, पुत्री, भाई-बहन अपने चारो ओर मिथ्या संकोच की दीवार खड़ी कर लेते है. घर  के वातावरण से निकलकर जब वे एक-दूसरे को कुछ निकट से देखने का अवकाश तथा सुविधा पा लेते है तब एक-दूसरे को जानने के कौतूहल में उस निर्धारित रेखा का उल्लघंन कर जाते है. इसमें किसी व्यक्ति विशेष को दोष देना व्यर्थ है.’’8 महादेवी ने स्त्री चिंतन के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि किस तरह भारतीय समाज संक्रमणकालीन प्रभाव का शिकार हो रहा है. भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक भाव-बोध के बीच जो गहन अंतर्विरोध चल रहा है, उसने स्त्री के प्रति पुरुष की समझ को और अधिक विकृत बनाया है. तथा स्त्री की व्यवहारिक चुनौतियों को बढ़ाया है. व्यक्ति के निर्माण में महादेवी साहित्य और शिक्षा से बहुत अपेक्षाएँ रखती है परन्तु आधुनिक युवाओ पर साहित्य के प्रभाव को वह इन शब्दो में आंकती है कि आधुनिक साहित्यिक वातावरण में भी विकृत प्रेम का विष इस प्रकार घुल गया है कि बेचारे विद्यार्थी को जीवन की शिक्षा के प्रत्येक घूँट के साथ उसे अपने रक्त में मिलाना ही पड़ता है. कहानियों का आधार, कविता का अवलम्ब, उपन्यासो का आश्रय सब कुछ विकृत पार्थिव प्रेम ही है; जीवन-पुस्तक के और सारे अध्याय मानो नष्ट हो गए है, केवल यही परिच्छेद बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक पढ़ा जाने वाला है.’’9

महादेवी द्वारा साहित्यिक प्रभाव का यह एकतरफा विश्लेषण कहा जा सकता है. परंतु यह इतिहास की उस नब्ज को पकड़ने का प्रयास तो है ही जो युवको की अस्वस्थ मनोवृत्ति का कारण रही है; स्त्री की श्रृगांरिक निर्मिति.’ वर्तमान समय में इस अस्वस्थ्य मानसिकता की हैवानियत इतनी बढ़ गयी है कि 5 साल या उससे कम उम्र की बच्चियों के साथ भी बलात्कार जैसी घटनाएँ होती है. जिसमें एक अभियुक्त का बयान था कि इस घिनौने अपराध को अंजाम देने से पूर्व वह अपने मोबाइल फोन में अश्लील विडियों देख रहा था. यह घटना 19 अप्रैल 2013 की है. ऐसे न जाने कितने ही अपराध स्त्रियों के साथ हर रोज हो रहे है. 16 दिसम्बर 2012 की वारदात को कौन भूल सकता है. जिसने पूरे देश में महिलाओ की सुरक्षा और उनके प्रति समाज के नजरिये को लेकर एक उबाल सा ला दिया था. क्या आज भी हम उस सामंती बर्बर व्यवस्था में रह रहे है जहाँ स्त्री एक स्त्री होने के नाते महफूज नही है. पिछले दो-तीन दशको में भारतीय समाज में महिलाओ की स्थिति में बहुत से बदलाव आए है. परंतु आज भी यह विकट समस्या हमारे सामने मुँह बाए खड़ी है कि स्त्री की स्थिति में सुधार के लिए किस राह को चुना जाए. क्या हमें प्राचीन भारतीय संस्कृति और मूल्यो की और लौटाना चाहिए ? स्त्री की वेशभूषा पर एक सांस्कृतिक पहरा हो. मंनोरंजन और साहित्य की दुनिया पर नैतिकता का आवरण चढ़ा दे. क्याेंकि इस तरह की आजादी और उन्मुक्तता के लिए हमारा समाज अभी तैयार नही हैं. इसलिए पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव को हमें अपने यहाँ आने से रोक देना चाहिए या फिर उसे अपने सांस्कृतिक कलेवर में फिट करके स्वीकार करना चाहिए. भारतीय समाज, संसद और धार्मिक संस्थानों में इस तरह की आवाजे निरंतर सुनाई देने लगी है परिवार  बचाओ’, भारतीय  संस्कृति की रक्षा’, वेदों की ओर लौटो.’

मान लीजिए अगर हम अपनी सामाजिक मुक्ति और स्त्री-सुधार के लिए यही राह चुनते है तो हम कहाँ पहुंचेंगे? समय कभी पीछे की ओर नही लौटता वह निरंतर गतिशील है. आज जिस संक्रमण को पूरा देश झेल रहा है, अब अगर उसकी दिशा मोड़ भी दी जाए तो आगे आने वाली पीढ़ियाँ फिर से इस दबाव को झेलेंगी. एक स्वस्थ और सभ्य समाज उसे कह सकते है जहाँ पुरुष का स्त्री के प्रति व्यवहार इस बात पर निर्भर नही करना चाहिए कि वह नग्न है, अर्धनग्न है या फिर सिर से पांव तक बुर्के में ढकी हैं. यूरोपीय देशो की महिलाएँ अपने पहनावे, जीवन-शैली  और देह की स्वतंत्रता को लेकर मुक्त है वहाँ न यौन शुचिता का प्रश्न है और न ही उच्छ्न्खलता का. वहाँ स्त्री पर ऐसी कोई पाबन्दियाँ नही है न ही वह स्वयं को इतना असुरक्षित महसूस करती है.
मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि पश्चिमी समाज पितृसत्ता की सभी बुराइयों से मुक्त हैं. परंतु भारतीय स्त्री की सापेक्षता वहाँ स्त्रियाँ आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक और यौनिक स्तर पर अधिक महफूज और स्वतंत्र है. पश्चिम की स्त्री ने अपनी मुक्ति की लड़ाई में पुरुष के प्रति स्पर्धा के साथ ही उसे आकर्षित करने की प्रवृत्ति भी अपनाई. आधुनिक भारतीय महिलाओ में भी पश्चिमी स्त्री-विमर्श के इस पक्ष का अनुकरण देखने को मिलता है. जो उन्हें कही नही पहुँचाएगा. अनेक सामाजिक रूढ़ियों और परम्परागत संस्कारों के कारण उसे पश्चिमी स्त्री के समान न सुविधाएँ मिली और न सुयोग, परन्तु उसने उन्ही को अपना मार्ग दर्शक बनाना निश्चित किया. महादेवी इसका विरोध करती है. ऐसा नही है कि महादेवी स्त्री संबंधी पश्चिमी विचारो से आँख फेर लेना चाहती थी बल्कि कई मुद्दों पर उनके विचार पश्चिमी विचारो से साम्य रखते है. मसलन स्त्रियों की शिक्षा, उनका आर्थिक रूप से सुदृढ़ होना तथा निर्णय लेने की स्वतंत्रता आदि.

महादेवी के यहाँ स्त्री मुक्ति का मॉडल, पश्चिम से एकदम भिन्न है. पश्चिमी स्त्रियों ने संघर्ष का माध्यम ध्वस को बनाया जिसमें स्त्री ने अपने स्त्रीत्व को क्षत-विक्षत कर डाला. पंरतु महादेवी संघर्ष के उस रूप को अपनाती है जो निमार्ण और विकास की ओर बढ़ता है. इसलिए वे स्त्री मुक्ति के साथ-साथ स्त्रीत्व के उन गुणो को बनाए रखना चाहती है जिनसे समाज में मातृत्व और मानवता फलती-फूलती रहे. एक स्वस्थ और सुंदर समाज का निर्माण हो सके. जब तक स्त्री घर के बाहर स्वयं को सुरक्षित नही पाएगी तब तक वह अपनी मुक्ति के संघर्ष को सही मंजिल तक नही ले जा सकती. अतः असुरक्षा के भय से वह फिर सामंतवादी पितृसत्तात्मक ढाँचे में कैद हो जाएगी. राज्य की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वह स्त्रियों को सुरक्षा मुहैया कराए. समाज को उनके लिए महफूज बनाए और अपनी इस जवाबदेही से सरकार भाग नही सकती. हालांकि भारत में दहेज हत्या, बलात्कार, घरेलू हिंसा और वेश्यावृत्ति की घटनाओ में कमी आने की बजाय बढ़ोत्तरी होती जा रही है. इसके अलावा कानून से सजा पाने वाले ऐसे अपराधियों की तादाद भी नगण्य है. स्त्री अधिकारो के प्रति बढ़ती चेतना के इस दौर में पास हुए तमाम कानून सही मायने में उपयोगी होने के बजाय सजावट की वस्तु साबित हुए है. महादेवी बहुत पहले ही इस विषय पर अपनी चिंता प्रकट कर चुकी है. वह लिखती है. कानून हमारे स्वत्वों की रक्षा का कारण न बनकर चीनियों के काठ के के जूते की तरह हमारे ही जीवन के आवश्यक तथा जन्मसिद्ध अधिकारों को संकुचित बनाता जा रहा है.’’10

संदर्भ
1. बोउआ, सीमोन दी, स्त्री के पास खोने के लिए कुछ नही है (अनु. मनीषा पांडेय), पृ. 137
2. वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 17
3. वही, पृ. 19
4. बोआ, सीमोन दी, स्त्री—उपेक्षित (अनु. प्रभा खेतान), पृ. 223
5.वही, पृ. 39
6.पुष्पा, मैत्रेयी, खुली खिड़कियाँ, पृ. 50
7.Times of India, 11 July 2012
8. वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 107
9. वही, पृ. 108
10. वही, पृ. 68

मेरे पिता

पवन करण


पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि हैं. ‘स्त्री मेरे भीतर’ चर्चित  कविता संग्रह . संपर्क :  pawankaran64@rediffmail.com

बहन और मां के प्रेम के पक्ष में कवितायें लिखने वाले हम सबके प्रिय कवि पवन करण का आज जन्मदिन है. पितृसत्तात्मक समाज  की  सबसे बड़ी ग्रंथी है पुरुष का पिता-पति-बेटा के  रूप में स्त्री का संरक्षक होने की , डिक्टेटर होने की. पवन करण की कवितायें पढ़ते हुए यह ग्रंथी पिघलती जाती है. आज उनके जन्मदिन पर उनकी कविताओं से अलग कुछ – ‘ पिता की यादें.’ पिता होना ही पितृसत्ताक होना नहीं है. बडे आत्मीय संस्मरण का एक हिस्सा. 


दिसंबर शुरू हो चुका था 2012 का बरस पिता के लिये बहुत कठिन था. पिछले बरसों से लगातार खराब चलती आई उनकी तबीयत इस बरस तीन बार बिगड़ी. पहली और दूसरी, दोनोें बार, हमें ऐसा लगा कि वे  गये, लेकिन सौ बरस जीने की अपनी अदम्य इच्छा के चलते उन्होंने हमें दोनों बार अपना कुतका ( अंगूठा ) दिखा दिया. इस बरस मई-जून में जब पहली बार पिता गंभीर रूप से बीमार पड़े तब छुट्टियों में तीनों बहनों का अपने बच्चों के साथ घर पर आने का समय था. जो उनके  लिये वरदान साबित हुआ.  पिता की हालत बहनों के घर पर आने से, कुछ पहले से, खराब होती जा रही थी, जिसके चलते वे अपनी समझ लगातार खोते जा रहे थे. उनके द्वारा बोले जाने वाले वाक्य उनके मुंह में गड़बड़ाने लगे थे. साथ ही लगातार वे इतने कमजोर हो रहे थे कि रात को गुसलखाने में गिरने लगे थे. उन दिनों मैं पिता के पास ही घर में ग्राउंड फ्लोर पर बने हाॅल में जिसमें पिता नितांत अकेले रहते थे, सोने लगा था. उनकी हालत देखकर बहनों के साथ-साथ मुझे भी लगने लगा था, कि वे उम्र का अंतिम पड़ाव तय कर रहे हैं और किसी भी दिन वे हमें छोड़ सकते हैं. युवावस्था से तपेदिक के शिकार रहे पिता उम्र बढ़ने के साथ-साथ बुरी तरह असाध्य अस्थमा के शिकार होते गये. अस्थमा के अकाट्य प्रभाव के चलते अपने अंतिम दो-तीन बरसों में तो वह बिस्तर पर तकिये में मुंह घुसाये घुटनों के बल बैठे-बैठे सोेते रहते. हम उन्हें समझा-बुझा कर या फिर उन पर गुस्सा करते हुए पीठ के बल बिस्तर पर लिटा भी देते तो वे कुछ देर बाद सांस लेने में आराम देने वाली अपनी उसी शारीरिक मुद्रा में बैठ जाते. इस तरह रात-दिन सांस लेने के लिये उनको इस तरह संघर्ष करते देखना बहुत पीड़ा दायक था. मगर पीड़ा को अपने पर हावी न होने देना उसका बखान न करना तथा पीड़ा का लगभग तिरस्कार करना, उनकी उस जीवटता में शामिल था जो हमें आश्चर्य में डाले रहती थी। उन्हें अंतिम चार-पांच बरसों में डायबिटीज भी हो गयी थी.

हालांकी  वे उन भारतीय पुरूषों में से थे जो ये कतई मानने को तैयार नहीं थे, कि शक्कर की भी कोई बीमारी हो सकती है. उनके लिये तो शक्कर ही जीवन था. शक्कर नही तो जीवन नहीं. जब भी डायबिटीज का जिक्र चलता, वे कहते पता नहीं ये कहां से हो गई. बहनों ने आते ही पिता की देखभाल शुरू कर दी. चूकि बहनें गर्मियों में ही घर आतीं हैं तो घर में नीचे हाॅल में ही अपने बच्चों के साथ अपना डेरा जमा लेती हैं. हाॅल के ऊपर दो मंजिला मकान बना है इस वजह से हाॅल गर्मियों में ठंडा रहता है और एक बड़े कूलर और पंखे के सहारे उसमें रहना आसान होता है. बिजली चले जाने पर भी कुछ समय उसमें आराम से बिताया जा सकता है. बहनों के बच्चे भी आराम से अपने खेल-कूद और शोर-शराबे के साथ उसमें समा जाते हैं. फिर पिता के पास साथ रहने का संतोष सबसे ऊपर. बहनें जब आतीं और महीने पंद्रह रोज रहतीं तो मैं पिता की तरफ से निश्चिंत हो जाता. मैं पिता के उन दिनों को उनके जीवन के सबसे अच्छे दिन मानकर चलता. हालाकि मां की मृत्यु के बाद घर में, हम सबके साथ रहते हुए भी, अकेले रहते उनकी जिंदगी और मन में अकेलापन इस कदर भर गया था, कि अपने दोस्तों के अलावा उनके पास ज्यादा देर तक बैठा रहने वाला घर का कोई भी सदस्य उन्हें नहीं सुहाता था. थोड़ी देर चलकर उनके पास बैठा जाये यह सोचकर मेरे अलावा घर का कोई सदस्य उनके पास ज्यादा देर बैठ जाता तो वे खुद ही कहने लगते जाओ ऊपर जाकर अपना काम देखो. क्या तुम्हें कोई काम नहीं है, जो मेरे पास बैठे हो.  ब्याह के बाद बरस में एक बार घर में आने वालीं बहनों के मामले में उनका यही हाल था. वे उनका भी अपने पास ज्यादा रहना बर्दाश्त नहीं करते थे.

 मैं शाम को घर लौटता तो मुझसे कहते, ये बच्चे दिन भर ऊधम करते हैं. दिन में सोने भी नहीं देते. और ये तीनों लड़कियां हैं जो रात-रात भर आपस में बातें करती रहती. सोती नहीं हैं. पता नहीं क्या बातें करती हैं. इनकी बातें ही खत्म नहीं होती. तब हंसते हुए मैं उनसे कहता, अरे बरस में एक बार तीनों एक साथ घर आती हैं, मिलती हैं, तो अपने मन की बातें करती रहती हैं. ससुराल में कहां इन्हें खाने-पीने और इस हद तक बोलने-बतराने की आजादी होती है. इस मामले में मेरी समझाइस सुनकर पिता, “फिर ठीक है भईया तुम जानो” कहकर चुप हो जाते. मगर एक बार तो अपने अकेलेपन की रक्षा करते पिता ने हद ही कर दी, जो मेरी छोटी बहन ने मुझे दफ्तर से जब मैं घर लौटा, तब बताया. घर में रहते दस दिन से ज्यादा रह चुकीं अपनी बेटियों से वे बोले, मोड़ियों अब तुम्हें यहां रहते हुए बहुत दिन हो गये. अब ऐसा करो कि अपने-अपने घर जाओ. जाकर अपना घर संभालो. भैया अर्थात मेरी बात करते हुए उन्होंने यह भी कह दिया कि वो अकेला कमाने वाला है. उस पर ज्यादा बोझ डालना ठीक नही. तुम आती हो तो उसका खर्चा भी तो होता होगा ना. जबकि खर्च या बोझ की कोई बात ही नहीं थी. उनकी पेंशन से ही इतने पैसे बच जाते थे कि बहनों का आराम से आना-जाना और भावनाओं से भरा सम्मान हो जाता था. किंतु बात बहनों के घर से अपने बच्चों के साथ अपने-अपने घरों के जाने की नहीं, उनके अकेलेपन की थी, जिसके साथ रहने की उन्हें आदत पड़ गई थी. उनकी कही इस बात को जब सबसे छोटी बहन ने मुझे बताया तो मैं और तीनों बहनें खूब हंसे. भले ही ही अपनी बेटियों से कही उनकी बात को सुनकर हम सब हंस कर रह गये. मगर तीस साल पहले विधुर हुए पिता का अकेलापन धारदार हंसिये की तरह मुझे, पिता से ज्यादा काटता.

अपने अकेलेपन को लेकर उनके भीतर कितनी टीस थी इसे उन्होंने, अपने अंतिम बरस में किसी बात पर अकेले में मुझसे खीजते हुए कि हमसे तो बड़ी गलती हो गई, यह कहने के अलावा हमें कभी नहीं बताया. ” अब जो है सो है “ यह कहकर उन्होंने हमेशा विषय बदल दिया. बीमारी और अकेलेपन से परेशान पिता अपनी जिस गलती की तरफ इशारा कर रहे थे. मैं उसे जानता था. मगर परिवार की जो हालत थी. उसमें जिस कदर निर्धनता और अशिक्षा पसरी हुई थी. उसे देखते हुए मां की मृत्यु के बाद पिता ऐसा-वैसा कोई कदम उठाने की स्थिति में थे भी नहीं. हालाकि बिना सोचे-समझे बुआजी ने उन पर इस बात का पर्याप्त दबाब बनाया कि उनहें दूसरा विवाह कर लेना चाहिये. मगर पिता ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया. मगर जब तक पिता जीवित रहे मेरे भीतर इस बात को लेकर हमेशा बेचैनी बनी रही कि काश हम इतने धनी होते कि पिता, घर में तो कतई नहीं, मगर चाहते तो घर के बाहर अपने मन का कुछ कर लेते. छोटे से घर में तो वैसे भी दरिद्रता और तपेदिक के साथ मैं और मुझसे छोटी चार बहनें ठुसे थे. ऐसे में उनके लिये कुछ भी कर पाना संभव नहीं था. सोचता हूं यदि उन्होंने ऐसा कोई निर्णय ले लिया होता तो क्या होता ? मगर आगे चलकर मेरी नौकरी के चलते घर की कुछ हालत सुधरी तो उन्होंने घर से दूर थोड़ा-बहुत कहीं कुछ किया तो था. जिसके बारे में घर में और घर के बाहर चलने वाली खुसुर-पुसुर मेरे कानों तक पहुंची. मगर मैंने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया. यह उन्हें लेकर मेरी समझदारी थी. उन्हें लेकर मुझे खुद पर इतना विश्वास था कि कहीं कुछ मामला बिगड़ेगा भी तो मैं उसे संभाल लूंगा. मगर ऐसा कुछ हुआ भी नहीं. मैं उनके जीवन और अकेलेपन को लेकर ऐसा ही सोचता और चाहता भी था. वह एक समय का मामला था जो पिता के स्तर पर ही निपट गया.

मैंने महसूस किया कि अंतिम दिनों में उन्हें अपना अकेलापन अखरने लगा था. चूकि वे पढ़ नहीं सके थे, तो पढ़े-लिखे लोगों के बीच अपना स्थान बना पाने में विफल रहते थे. इस वजह से यहां सिटी सेंटर  में रहने आने के बाद शुरू में तो उन्हें कुछ समस्या हुई मगर कुछ ही दिनों में यहां भी उन्होंने अपना समाज बना लिया था. जिसके बीच उनकी सुबह शाम कटती. जिसकी आदत उन्हें माधवगंज और अपनी युवावस्था से थी. आश्चर्य की बात यह थी कि बीमारी की सघनता में बेहद कमजोर होते जाने तथा गुसलखाने और हाॅल तथा रास्ते में गिर पड़ने के बावजूद उन्होंने  घर से बाहर जाना और अपने दोस्तों के बीच बैठना बंद नहीं किया. घर के बाहर निकलकर जिस चाय के ठेले पर उनकी नियमित बैठक होती. वहां कुछ युवा आॅटो चालक भी बैठते तो धीरे-धीरे उनकी उन आॅटो चालकों में से एक-दो से गहरी पटने लगी. वे उनसे मजाक करने के साथ उनका बड़ा आदर भी करते. देर या थकान-बुखार होने पर कई बार आॅटो चालक उन्हें घर छोड़ जाते. अंतिम दिनों में जब वे घर से बाहर निकले बिना नहीं मानते थे. तो मैंने उनसे कह दिया. आप किसी आॅटो वाले को कह दो कि वह आपको घर से ले जाया करे और घर पर छोड़ जाया करे. मैंने देखा कि वे ऐसा करने लगे थे. लेकिन उनकी खराब हालत को देखकर घर-बाहर सब ऐसा चाहते थे कि वे घर में ही रहें. आॅटो वालों ने भी कहा भैया अब इन्हें बाहर नहीं निकलने दिया करो. अब इनके हाथ-पैर काम करना बंद कर रहे हैं और ये चल भी नहीं पाते हैं. मगर पिता इस मामले में किसी की मानने को तैयार नहीं थे. घर से बाहर निकले बिना वे जी ही नहीं सकते थे. चूकि मैं दिन भर अपने कार्यालय में रहता तो दिन में उनके घर से बाहर निकलने पर नियंत्रण नहीं रख पाता था.

चूकि अंतिम दिनों में उनकी तबीयत ज्यादा खराब थी और ऐसे में एक आॅटोवाला उन्हें लेने घर आया तो उनकी बहू यानि मेरी पत्नी ने उससे यह कहते हुए, देखते नहीं, उनकी कितनी तबीयत खराब है और ऐसे में भी आप उन्हें बाहर ले जा रहे हो, उन्हें कहीं कुछ हो गया तो, यह कह आॅटो वाले को कर डांट कर भगा दिया. आॅटोवाला बहू के बारे में पिता के भय से परिचित था तो वह चुपचाप सुनकर चला गया। उसने उससे यह तक नहीं कहा कि मुझसे बाबूजी ने कहा है, तभी मैं उन्हें लेने आया हूं. यह बात दुखी होते हुए पिता ने शाम को मैं जब दफ्तर से घर लौटा तब मुझे बताई तो मैंने अपनी पत्नी को समझाया कि मेरे ही कहने पर ही आटो वाला उन्हें लेने आता है, ताकि वे थोड़ा घर से बाहर जाकर घूम कर आ सकें और उनका मन लगे. हमारे पास तो समय है नहीं कि उन्हें  कहीं ले जा सके.  हालाकि वे कभी हमारे साथ नहीं जाते, क्योंकि वे अपने अंतिम समय तक मस्तराम थे. उस दिन के बाद आॅटोवाला उनकी बहू से डरकर बाबूजी को आवाज लगाकर बुलाने की जगह उनके हाॅल के या घर के दरवाजे पर दिखाई देने की प्रतीक्षा में घर के चक्कर लगाने लगा. घर में सर्दियों में जब वे मेरी धौंस के चलते नहा-धोकर घूप में पलंग पर लेटे होते. घर में काम करने वाला लड़का उनके पास आकर चुपचाप बताता कि बाबूजी नीचे आॅटोवाला आपको देख रहा है तो वह नीचे उतरकर उसके साथ घर से बाहर चले जाते. मैं भी यही चाहता था कि अपने अंतिम समय तक वे घूमते-फिरते रहें. उनके हाथ-पैर चलते रहे.उन्हें  जीते देख और उनके बारे में सोचते हुए मुझे हमेशा लगता कि समय ने उनके लिये यह कैसा जीवन चुना था ? माधवगंज में सड़क वाला ग्यारह बाई बारह फुट जमीन पर एक के ऊपर एक कमरों की शक्ल में बना मकान तथा यहां सिटी सेंटर में लिया बड़ा मकान जिसमें ऊपर की मंजिलों पर तीन बेडरूम और एक बड़ा तथा एक छोटा दो हाॅल थे. दोनो ही ऐसे थे जो उनके परिवार से अलग रहने की परिस्थितियां निर्मित करते थे.

जब हम माधवगंज वाला घर छोड़कर सिटी सेंटर वाले घर में पहुंचे, तो स्वाभाविक रूप से हमने उनके और उन्होंने अपने रहने के लिये भूतल पर बने हाॅल को चुन लिया. जो पहली मंजिल पर बने भाग के बराबर ही था. जिसमें उनके लिये हाॅल से लगा बाथरूम था जो इससे पहले उनके जीवन में शामिल नहीं था. उन्होंने भले ही इस बारे में कभी कहा नहीं मगर जिसकी कमी उन्हें लगातार खलती रही। वह गुसलखाना उनका था जिसका बस वही उपयोग करते. या बहनें जब आतीं तब उनका उपयोग होता अथवा किसी मेहमान के आने पर उनके अलावा कोई उसका उपयोग करता. चूकि पुरूष मेहमानों के लिये हमने हाॅल में ही रूकने की व्यवस्था की हुई थी, अतः जब भी कोई आता वह हाॅल में ही पिता के पास ही रूकता. मगर किसी के आने और अपने एकांत में खलल पड़ने पर पिता भले ही बाहर से कुछ नहीं कहते, मगर भीतर ही भीतर खीजते, उनकी खीज हमें उनके चेहरे पर दिखाई देती. पिता उसी हालत में हमारे साथ एक ही मंजिल पर रह सकते थे कि जो घर हमने लिया था वह एक ही मंजिल पर बना होता. और उसमें भी उनके लिये एक कमरा अलग होता, जो उनके जीवन में संयोग से भी नहीं था. उन्हें युवावस्था से ही भयानक तपेदिक था, जिसकी वजह से वे लगातार खांसते और कफ उगलते रहते इस कारण भी वे हमसे घर में  कुछ दूरी बनाकर चलना चाहते थे. वे इस मामले में समझदार थे. चूकि परिवार में तपेदिक का खूंखार इतिहास रहा था, जिसके बारे में मैंने अपने आत्मकथ्य के पहले खंड बुरा बच्चा में लिखा भी है इस वजह से हम भी यही चाहते थे कि उनसे थोड़ी दूर बनी रहे तो बेहतर क्योंकि तपेदिक को जिस हद तक हमारे परिवार ने भोगा था, हमारे जानने वालों में से शायद ही किसी परिवार ने भोगा हो. इस वजह से पिता के साथ-साथ हम भी कतई यह नहीं चाहते थे कि वह और आगे बढ़े. मैंने पिता के तपेदिक का बहुत इलाज कराया, इतना कि मैं उन्हें तपेदिक की दवाईयां खिलाते-खिलाते और मेरे आग्रह और दबाव पर वे दवाईयां खाते-खाते थक गये. मगर उनका यह रोग कभी उनहें छोड़कर दूर खड़ा नहीं हुआ. साल-साल भर दवाईयां खिलाने के बाद भी वे मुंह से खून उगलने लगते. उनका मुंह से खून और कफ उगलना तो मरते दम तक बंद नहीं हुआ.

अंतिम दिनों तक एक्सरे उन्हें तपेदिक होना बताता रहा. आखिरी के महीने में मेरे और उनके बीच इस बात पर सहमति बनी की अब सब दवाईयां बंद कर दी जायें. बहनों ने उनकी इच्छा के अनुसार उनके लगातार सूखते और निढाल होते जा रहे हाथ-पैरों पर लहसुन मिलाकर गर्म किया जाता सरसों का तेल लगाना शुरू कर दिया. जो बहनों के सिवा घर में इतनी आत्मीयता से कोई नहीं कर सकता था. हालाकि उनके कृशकाय शरीर को देखकर लगने लगा था कि अब बहुत देर हो चुकी है, मगर इससे उन्हें फौरी तौर पर राहत मिलती, क्योंकि उनका बदन कसरती था. उन्हें लगता था कि उनके शरीर में रक्तसंचार धीमा हो रहा है. इस वजह से उनका शरीर अब हमेशा दुखता रहता है अतः उनके शरीर को मालिस की बहुत जरूरत है. युवावस्था से ही में सुबह जल्दी उठकर घूमने जाने तथा व्यायाम करने की आदत के चलते जो अब शरीर कमजोर पड़ने के साथ-साथ छूट चुकी कि वजह से उनका शरीर अब जाकर तड़कता था. उनके हाथ-पैरों की रगड़कर मालिस करते हुए उनके साथ बातें करते जाने वाली बहनों में सबसे बड़ी सुनीता ने उन्हें खांसी और कफ के चलते पीने के लिये गरम पानी आदि भी देना प्रारंभ कर दिया. जिसके बारे में इससे पहले मेरे साथ-साथ किसी ने नहीं सोचा था, हालाकि उससे उन्हें कितना आराम मिला, यह मैं ठीक-ठीक तो नहीं कह सकता. मगर जब मैं उनके लिये हाॅल में नीचे ही गर्म करने के लिये बिजली का बर्तन तथा रात में रात भी पानी गर्म बनाये रहने वाला जग ले आया, तो  पिता बोले क्यों इतने पैसे खर्च कर रहे हो, हटाओ इन्हें यहां से, घर में क्या बर्तनों की कमी है, जो ये और खरीद लाये. वे पुराने जग की तरफ इशारा करके बोले क्या ये बर्तन नहीं हैं.

हालांकी वे कहते तो यह सब उनके लिये बहुत पहले ही कर चुका होता. मगर उनका हर तरह की सुविधा से चिढ़ना किसी को भी परेशान कर सकता था. पिता हमेशा कम सुविधाओं में जिये. इस हद तक कि उन्हें अपने लिये जूते तक खरीदना गवारा न था. जब भी मैं कहता कि चलो आपको नये जूते पहना लाऊं. वे कहते क्या करना है जूतों का, मुझे कहां जाना है. वो तुम्हारे पुराने जूते रखे तो हैं, यदि मुझे कहीं जाना होगा तो मैं उन्हें ही पहन लूंगा. लेकिन मृत्यु से तीन बरस पहले मैं उन्हें जबरदस्ती मोटर सायकल पर बिठाकर ले गया और उन्हें एक जोड़ी उनके नाप के जूते पहना लाया. जो बमुश्किल  उन्होंने एक-दो बार पहने. जिसे उनकी मृत्यु के बाद पत्नी ने किसी रिश्तेदार को दे दिया. मैं उसी बरस उन्हें उनकी पसंद के के कपड़े भी दिलाकर लाया. मैंने उन्हें कपड़े की दुकान पर ले जाकर बिठा दिया. जब उनके पास मुझसे बचने का कोई चारा नहीं रहा तो उन्होंने अपनी पसंद से चार जोड़ी पेंट-शर्ट के कपड़े अपने लिये खरीदे. जो मैंने हाथों-हाथ दर्जी के यहां सिलने डलवा दिये. जिसमें से उन्होंने दो ही जोड़ी कपड़े पहने. दो जोड़ी बिना पहने कपड़े उनकी लोहे की अलमारी में अंतिम समय तक रखे रहे.  जिंदगी में पहली बार जब मैं इस तरह उनकी पसंद के कपड़े दिलवा रहा था. मैंने उन्हें अपनी पसंद के रंग की शर्ट का कपड़ा दिलवाना चाहा तो उन्होंने मना कर दिया. मेरी पसंद के रंग को मना करते हुए उन्हें अपनी पसंद के रंग की शर्ट का कपड़ा खरीदते देखना. पिता को लेकर मेरी दुर्लभ स्मृतियों में से एक हैं. अपनी पसंद के रंग की शर्ट को भी उन्होंने एक दो बार ही पहना. वे जब भी उसे पहनते मेरा मन उल्लास से भर जाता. मुझे हमेशा वह शर्ट, शर्ट की तरह नहीं, उनकी पसंद उनके मन के उस हिस्से की तरह दिखाई देती जिससे मेरा तक परिचय नहीं था.

 हालांकी  उन्हें खुद दुकान पर ले जाकर कपड़े दिलवाने के पीछे कुछ बरस पहले मुझसे उनकी कही यह बात मेरा पीछा रही थी कि हमारा क्या है हम तो उतरन पहनते रहते हैं. वे अधिकतर मेरे वे कपड़े ही पहनते थे जिन्हें मैं पहनना बंद कर देता था. मैं उनसे उनकी इस बात पर क्या कहता. मगर इतना जरूर था कि मैं उनकी इस बात पर अपना मन मसोसकर रह गया. मगर मैंने उनसे इतना जरूर कहा, बाबूजी, चलो मेरे साथ चलो आप जैसे कपड़े लेना चाहो मेरे साथ चलकर ले लो, मैं आपसे हमेशा कपड़े लेने की कहता हूं, मगर आप ही मना कर देते हो. चलो मेरे साथ. अभी चलो. फिर मेरे कपड़े आपके लिये उतरन कैसे हो सकते हैं. मैं आपका बेटा हूं. आपने आज तक ऐसा नहीं कहा. आप खुशी-खुशी पहन लेते हैं. फिर आप तो खुद सक्षम हैं. कमाते हैं. आपको पेंशन मिलती है. आप जैसा चाहें पहन सकते हैं. अब आप ही न लेना चाहें तो मैं क्या करूं. चलो, मेरे साथ मैं आपको अभी जैसे आप चाहें कपड़े दिलवाकर लाता हूं. फिर अपनी कही इस बात पर मुझे दुखी होते देख वे बोले कोई बात नहीं मैं तो यूंही कह रहा था. ये इतने सारे कपड़े हैं तो इनका क्या होगा. चलो, जाओ मैंने तो यूंहीं कह दिया. मगर पिता के मन में कपड़ो को लेकर जो फांस थी, वह उस रोज उभरकर बाहर आ गई. मैं सोचता हूं कपड़ों को लेकर पिता के मन को जानने की मैंने कभी कोशिश नहीं की. सिर्फ पहनने के कपड़ों को ही क्यों ? उनके बिस्तर के बारे में, वे जिस कमरे में वे रहते, जिस में उनकी इच्छा जाने बिना हम चाहे जिस मेहमान को सुला देते, उसके बारे में.  वे क्या खाना चाहते हैं इस बारे में, उनहोंने कुछ कहा नही तो हमने भी यह मान लिया कि उन्हें सब स्वीकार है. हो सकता है वे यह चाहते हों कि जिस तरह वे बचपन में मुझे जबरदस्ती कपड़े पहनाते और खिलाते-पिलाते होंगे. मुझे भी उन्हें अच्छा खिलाने-पिलाने की जिद करनी चाहिये थी. मां थी नहीं तो फिर उनसे कौन पूछता कि आज कौन सी सब्जी खाओगे.

 हालांकी  जहां तक मुझे याद है मेरी शादी के बाद कभी उनसे यह पूछा भी कि कौन सी सब्जी खाओगे तो उन्होंने  कह दिया, भैया से पूछो वह क्या खाना चाहता है. मगर उनके जाने के बाद लगता है कि हर चीज के बारे में  उनसे जिद करके पूछना चाहिये था. मैं खुद से पूछता हूं उनके जाने के बाद ही यह क्यों लग रहा है, तब क्यों नहीं लगा. तब क्या घर की संवेदना सो रही थी. हां लेकिन जब बहने  घर आतीं रसोई से अधिकार समाप्त हो जाने के बाद भी वे पिता से खाने को लेकर उनकी पसंद जरूर पूछती. मगर पिता बहनों को अपनी पसंद बताकर कतई प्रोत्साहित नहीं करते. हमेशा उनसे यही कहते तुम्हें जो खाना हो वह बना लो, या भैया से पूछो. बहनें जब भी आतीं तो पिता का अकेलापन तोड़ने की नियत से उनसे हमेशा कुछ दिन के लिये को अपने घर चलकर रहने और अपने साथ चलने की कहती.  कभी-कभार वे उनको किसी तीर्थ पर ले जाने की भी मुझसे बात करती.  मैं भी जिन दोस्तों के बीच रहता उनके माता-पिता को तीर्थयात्रा पर जाते हुए देखता तो मैं सोचता कि काश मां होती तो मैं भी इन्हें मां के साथ अपने खर्च पर तीर्थ यात्रा करने भेजता. सोचता कि इस बहाने ही सही जीवन भर घर और बीमारियों  में ही हाड़ खपाने वाले पिता भी इस बहाने कहीं घूम आते. मगर कभी-कभार पूजा-पाठ करने वाले, कभी मंदिर नहीं जाने वाले, कर्मकांडों और को लेकर हमेशा नाक-भौं सिकोड़ने वाले पिता तीर्थ यात्रा की बात पर चलने पर लपककर कहते, कुछ नहीं होता इनसे ये सब फालतू बाते हैं. उनके अपनी बेटी के घर जाकर रहने का तो प्रश्न तो इसीलिये नही उठता था कि वे बेटियों की कही इस बात को सुनकर हमेशा कहते क्यों, यहां क्या मैं ठीक नहीं हूं, यहां मुझे किस बात की परेशानी है. यहां भी तो सब ठीक है. मां नहीं रही तो पिता कहीं घूमने नहीं गये. मैंने किसी के साथ उनके जाने की कोशिश भी की तो उसका कोई नतीजा नहीं निकला. धीरे-धीरे हम उनके तीर्थ-यात्रा पर जाने की बात भूलते चले गये, और देखते-देखते उनके गंभीर रूप से बीमार पिता के अंतिम यात्रा पर जाने का समय निकट आ गया.

यह उनकी आदत में शामिल था कि वे मुझसे अपने किसी काम के लिये कभी-कभार ही कहते. मगर अपनी आदत के मुताबिक मैं उनकी पूछ-परख, देखभाल, और उनके काम करता रहता. पत्नी सुबह ऊपर मेरे कमरे में चाय लेकर आती तो उससे सबसे पहले मेरा यही पूछना होता. बाबूजी को चाय दे आईं ?   कई बार वह मुझ पर इस बात को लेकर खीज भी जाती कि क्या मैं बाबूजी को चाय देकर नहीं आती जो चाय पीने से पहले रोज मुझसे यह पूछते हो. कई बार मेरे पूछने पर वह गुस्से में कहती हां दे आई, इन्हें विश्वास ही नहीं होता. यहीं हाल रात के खाने का था. साढ़े आठ बजे खाना खाने के लिये बैठते समय पूछता, बाबूजी को खाना पहुंचा दिया. इस बात पर पत्नी की प्रतिक्रिया तीखी होती. पत्नी की पिता के प्रति बेरूखी मुझे हमेशा संदेह से भरे रहती. पिता की मृत्यु के बाद मेरी बिटिया ने कहा भी कि हमसे गलती हुई हमने बाबा की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया. पता नहीं उसका इशारा किसकी तरफ था. सबकी तरफ या. हालांकी मैं  मानता हूं कि मेरी एक भी बहन यहां ग्वालियर में ब्याही होती, तो उनका अकेलापन कुछ कम होता. जिसे वह स्वयं अपने बेटे के लिये पसंद करके लाये हों और बेटे ने एक इस वजह से भी उसके प्रति अपनी जिम्मेवारी बनाये रखी हो वह बहू, बेटी होने से इंकार कर दे, ससुर के लिये इससे अधिक तिरस्कारपूर्ण और दुखद क्या होगा. मगर पत्थर का चेहरा तो बदल सकता है स्वभाव नहीं. यह सोचकर मैं मन मसोसकर रहा जाता. साथ ही मेरा भी अपने आप में खोया रहना निश्चित तौर उनकी अनदेखी करता था. हालांकी, बहनों के घर पर रहने आने के दौरान भी, उनके जल्दी से बिस्तर से उठकर गुसलखाने में जाकर कफ न उगलपाने तथा उसे बिस्तर के पास ही फर्श पर ही थूक देने अथवा उल्टी कर देने पर, उसे में ही साफ करता. आखिरी बरस में उनकी उतारी चड्डी बनियान भी मैंने धोना शुरू कर दी थी. कपड़े धोने के लिये मैंने धोबी को कह दिया था. वह आता और उनके कपड़े धोकर दे जाता. मैंने उनसे कह दिया था कि आप कंजूसी मत करना आप तो अपने कपड़े धोने के लिये धोबी को दे देना. उसे धुलाई के पैसे मैं दे दूंगा.


हालांकी  मेरे पैसे देने की नौबत कभी नहीं आई क्योंकि उनके पास पेंशन के पर्याप्त पैसे रहते थे, जिसे वे एक माह में खर्च भी नहीं कर पाते थे. मैंने माधवगंज का मकान बेचकर उन्हें यहां लाने के बाद इस बात का शुरू से ही ख्याल रखा कि उनकी जेब में हमेशा पैसे रहे. बेचे गये मकान के पैसों को मैंने बैंक में उनके नाम से फिक्स कर दिया और उस पर मिलने वाले ब्याज का पैसा भी उनके और मेरे नाम से बैंक में खुला खाते में जमा करवाने लगा. जिसके बारे में बार-बार मुझसे पूछते. कई बार वे बेचे गये मकान के रूपयों के बारे में संदेह व्यक्त करते तो मैं गुस्से में उनसे कहता. आपको विश्वास नही तो चलो मेरे साथ बैंक में जाकर पूछ लो आपके सारे रूपये जमा हैं मैंने उसमें से एक भी पैसा खर्च नहीं किया है ? पिता के बुजुर्ग होने को लेकर सोचते हुए मेरा हमेशा से यह मानना रहा और मैं इस बात का उल्लेख अपने दोस्तों के बीच और खुद पिता से भी करता भी रहा कि बुजुर्ग की जेब खाली होने का मतलब उसकी जिंदगी खाली हो जाना है. पैसा बूढ़ा, बच्चा जवान सब को ताकत देता है. ऐसा कभी नहीं होना चाहिये कि घर के बुजुर्ग का पैसा उसकी जगह उसके बच्चों की जेब में हो, बुजुर्गों की इससे बड़ी पराधीनता क्या होगी. बुजुर्ग का रूपया बुजुर्ग की जेब में ही होना चाहिये. इसीलिये हर महीने की पहली-दूसरी तारीख को मैं पेंशन की अस्सी प्रतिशत राशि निकालकर उनके हवाले कर देता. जिसमें से वे कुछ बचा लेते कुछ अपने खाने-पीने पर खर्च कर लेते. घर में मेरा सब को सख्त निर्देश था कि अपनी पेंशन के पैसे का वे क्या करते हैं, यह जानने की कभी कोशिश मत करना. वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा. वे अपने पैसे का चाहे जो करें, चाहे आग लगा दें. हालाकि अंतिम बरसों में उनके साथ यह भी होने लगा था कि रास्ते में उनसे रूपये गिर जाते या जब वे घर से माधवगंज जाते तो टेम्पों में उनकी जेब कट जाती जिसका मुझे बाद में किसी और से पता चलता.

पिता मुझे सीधे और तुरंत इसीलिये नहीं बताते कि मैं सुनकर नाराज होउंगा. जब उनके साथ दो-चार बार ऐसा हो गया तो मैंने एक दिन उन्हें आराम से समझाया कि आप जितने पैसे एक दिन में खर्च कर सकते हो उतने ही रूपये लेकर चला करो, सारे पैसे लेकर टेम्पों में सफर क्यों करते हो. उतने ही रूपये जेब में होंगे तो कहीं गिर जायें या कोई निकाल भी ले तो ज्यादा नुकसान तो नहीं होगा तो मेरी बात उनकी समझ में आ गई. फिर वे उतने ही पैसे लेकर घर से बाहर लेकर निकलते जितने कि उन्हें जरूरत होती, बाकी पैसे वे घर में ही अपनी उस अलमारी में रख जाते, जो उनकी कहलाती थी, जो माधवगंज में मकान में उनके कमरे में रखी थी, और जो अब उठकर यहां नये मकान में आ गई थी. जो भले ही उनकी अलमारी कहलाती थी मगर जिसमें माधवगंज से लेकर यहां तक मैं उसमें उनसे ज्यादा घुसा हुआ था, अपनी जेब की जगह जिसमें अब वे मेरे कहने पर पेंशन के पैसे रखने लगे थे. बीच-बीच में मुझे मालूम चलता उनके पेंशन के पैसों में से उनके साथ-साथ उनके नाती का भी चटोरापन सधता.माधवगंज बाजार में जहां हम पहले रहते थे. वहां शरीर की मालिस करने के लिये लोग मिल जाया करते थे, किंतु यहां कालोनी में मालिस करने वाला मिलना मुश्किल था. माधवगंज छोड़कर यहां आने के बाद जो उनकी कुछ शिकायतें थी. जिन्हें वह लगातार हमसे दोहराते रहते. जैसे कि यहां कालोनी में बस अपने घर में अकेले पागलों की तरफ पड़े रहो। न कोई बोलने को न बतराने को, सब अपने घरों में घुसे रहते हैं, वहां बाजार में घर था तो कम-से-कम समय तो कटता था. फिर दूर होने की वजह से यहां कोई मिलने भी नहीं आता, कभी-कभार कोई आ जाये तो ठीक वरना किसी से दोस्त यार से मिले महीनों गुजर जाते हैं और वहां तो बाजार में आते-जाते ही लोग मिलते हुए चले जाते थे. न तो यहां समय ही नहीं कटता और नहीं यहां खाने को कुछ ठीक मिलता है.

वहां बाजार था तो सब सस्ता चटर-पटर उपलब्ध था. मिठाई- कचैड़ी-पकौड़ी की दुकाने थी.  जब चाहा उठे और जाकर खा लिया. इसी सस्ती मिठाई और कचैड़ी पकौड़ी खाने की आदत ने जीवन के अंतिम बरसों में उनके स्वास्थ्य को गहरे से प्रभावित किया. उसका कारण यह रहा कि जब हम माधवगंज वाला मकान छोड़कर यहां रहने के लिये आये तो पिता की वजह से हमने माधवगंज बाजार के उस मकान को नहीं बेचा था, जिसके बारे में पिता को जीवन में यह कहते हमने कई बार सुना कि अरे हमारा मकान तो बहुत सही जगह बाजार में हैं. कम से कम वह हमें भूखा तो नहीं मरने देगा. यदि हमने घर के दरवाजे पर रखकर ही कुछ सामान बेचना शुरू कर दिया तो जीवन कट जायेगा, और यही उन्होंने पिछले बीस बरस तक किया भी.

मानवी से भोग्य वस्तु में तब्दील स्त्री अस्मिता का भौतिक सत्य – भारतीय और वैश्विक संदर्भों में

मुद्रा राक्षस 
 
सुधा अरोड़ा की कहानी ‘‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी’’ के परिप्रेक्ष्य में 


अश्वेत लेखिका टोनी मारिसन ने अपने विख्यात उपन्यास ’बिलवेड‘ के सिलसिले में एक वास्तविक घटना का जिक्र किया है. एक अश्वेत महिला मार्गरेट गार्नर दासी के रूप में काम करती थी. एक दिन छुटकारे की आकांक्षा से वह चुपचाप भाग खड़ी हुई. उसने सबसे पहले अपनी बेटी की हत्या कर दी ताकि बेटी को दासता न झेलनी पड़े. बाद में गार्नर पर मुकदमा चला – टोनी की हत्या के लिए नहीं, सम्पत्ति (यानी दासी) चुराने के लिए. टोनी मारिसन ने इस घटना का इस्तेमाल और ज़्यादा बड़े समाज-शास्त्र के लिए किया. उसके उपन्यास ’बिलवेड‘ में भी नायिका सेशे अपने बच्चे की हत्या कर देती है.अश्वेत लेखिका एलिस वाकर ने एक अन्य अश्वेत लेखक ज्याॅ टूमर के हवाले से लिखा था – जब कवि ज्याॅ टूमर तीस के दशक के शुरू मे दक्षिण जा रहा था उसका ध्यान एक विचित्र चीज़ पर गया और वह थी एक अश्वेत स्त्री. अश्वेत स्त्रियां जिनकी आध्यात्मिकता इतनी गहरी , इतनी गहन और स्वाभाविक थी कि खुद उन्हें भी इसका बोध नहीं था. अपनी ज़िन्दगी वे अटपटे ढंग से जी रही थी. उनके शरीर घायल प्राणियों की तरह तकलीफ से छटपटाते हुए जैसे उम्मीद का कोई सूत्र उनके आसपास न हो.

एक अरसा पहले मैंने सुधा अरोड़ा की कहानी वागर्थ में पढ़ी थी – ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी.‘ कहानी पढ़ने के बाद टोनी मारिसन की अनुभूत घटना और एलिस वाकर का उक्त उद्धरण , दोनों शिद्दत  से याद आए थे. कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो कहानी से बहुत ज्यादा कुछ होती हैं – शायद एक लंबा और बाढ़ के पानी की तरह उमड़ आया गंदला इतिहास या किसी ममी में तब्दील कर दिया गया समाजशास्त्र. सुधा अरोड़ा की ‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी’ एक बहुत छोटी सी कहानी है फिर भी यह एक महागाथा है.  मुझे याद नहीं आता कि इतनी विराट कथा इतने छोटे आकार में और कहां देखी जा सकती है. यह उन रचनाओं मे से है जिसका बयान बहुत मुश्किल, लगभग असंभव होता है. आप लियोनार्डो द विंची की मोनालिसा का ब्यौरा दे सकते हैं , गोगाॅ की तस्वीर ’क्या तुम्हें ईर्ष्या हो रही है‘ का बयान कर सकते हैं, पर क्या चित्रकार फर्नाण्ड की कृति ’ए वुमन इन ब्लू‘ का ब्यौरा दे सकते हैं? नहीं . कुछ रचनाएं सरापा बयान होती हैं और बयान का बयान नहीं किया जा सकता. उनके लिए अनिवर्चनीय शब्द बहुत भोंडा होता है.मातृत्व को गौरवान्वित करते हुए हजारों बयान हिन्दू धर्म ग्रंथों में ही नहीं साहित्यिक कृतियों में भी मिल जायेंगे. स्त्री यह सच जानती है पर उसकी स्वतंत्र चिंतन की ताकत पथरा चुकी होती है. इसीलिए वह स्त्री को मां बन कर अपने वजूद को सफल करने की सलाह देती है पर बेटी के जन्म से घबरा जाती है.

सुधा अरोड़ा की कहानी लगभग सूत्र जैसे शिल्प मे यह इतनी लंबी गाथा देती है। इसमें मातृत्व से घबराहट के इतिहास-सांस्कृतिक सत्य की छाया है और यह अभिशाप भी मौजूद है जिसमें स्त्री खुद स्त्री के जन्म को अभिशाप मानती है – लेकिन यह सब सिर्फ इतना ही नहीं है. स्त्री-विमर्श का सुधा अरोड़ा का भाष्य  स्त्री के अस्तित्व के असीम और अछोर उलझाव से एक धारदार मुठभेड़ है। पर इस मुठभेड़ की पहचान के लिए हम एक दूसरे क्षेत्र में जाना चाहेंगे. इस कहानी को समझने के लिए हमें कहानी से बाहर उसके आसपास की दुनिया को देखना होगा. पिछले कुछ अरसे से हिन्दी में स्त्री-विमर्श काफी प्रमुखता से सामने आया है. सुधा अरोड़ा की कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए समाज में स्त्री प्रश्न की गुत्थियों पर नज़र डालनी होगी. पाकिस्तान की विख्यात लेखिका किश्वर नाहीद ने स्त्री को लेकर आत्मकथा में कुछ गंभीर और विचारणीय टिप्पणियां की है. नाहीद ने लिखा है – ’यहां तो औरतें ही एक दूसरे को नहीं समझतीं बल्कि अपने वजूद (अस्तित्व) की इनफ़रादियत (स्वाधीनता) पे एतमाद नहीं रखती. खुद अपनी ज़ाया को तनहा काबिले इज़्जत समझती ही नहीं. या फिर मर्द के बनाए हुए एखलाकी और जज़्बाती उसूलों पे चल कर ज़िन्दगी को मेराज (चरम सीमा) पे पहुंचा हुआ महसूस करती हैं. दुनिया में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, इससे उनका सीधा ताल्लुक न बनने दिया जाता है और न वह समझती हैं कि ताल्लुक बाकायदा हो सकता है.‘

परिवार और निजी सम्पत्ति की बुनियाद पर खड़े समाज में औरत एक अपरिवर्तनीय, स्थायी और किसी भी चुनौती से परे जो परिस्थिति की या इकालजी स्त्री के लिए निर्धारित होती रही है उसने इतिहास के लंबे दौर में स्त्री की चेतना के साथ कुछ वैसा सुलूक किया है जैसा पुराने चीन में बच्चियों के पांव छोटे रखने वाले सांचे करते थे. बेहद तकलीफदेह ये सांचे उस जमाने में चीन की औरतों के गौरव हुआ करते थे. पैर सांचे में डाल कर बदशक्ल न बनाए जायें, यह बात खुद औरत को ही नापसंद थी. स्त्री यह समझने की आदी हो जाती है कि उसकी ज़िन्दगी अर्धांगिनी होने में ही है। पति से ही वह पूर्णांगिनी हो सकती है. बिना पति वह अधूरी ही रहेगी. वह समझने लगती है कि उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व संभव ही नहीं है. दुनिया से भी वह अपना संबंध पति की मार्फत ही देखने की अभ्यस्त हो जाती है. पश्चिम के मनोविश्लेषकों ने इस बात पर लंबी बहसें की है कि व्यक्ति के परिवेश और जीवन की स्थितियां उसके मानसिक विकास पर क्या असर डालती हैं. इस प्रश्न को हमें स्त्री के उस परिवेश से जोड़ कर देखना चाहिए जो पूरी दुनिया मेें उसे परिवार व्यवस्था के कारण मिलता है. जब युवावस्था में पहुंच कर स्त्री दुनिया को देखने समझने की दहलीज़ तक आती है उसका संसार सिर्फ उतना रह जाता है जो उसे दुनिया नहीं पति और परिवार से जोड़ सके. उसकी जिज्ञासाओं के सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं. वह खाना बनाती है , घर की व्यवस्था करती है , बच्चे पैदा करती और पालती है. उसकी रचनात्मकता सलाद या तकिए पर चित्रकारी में सीमित हो जाती है. रचनात्मकता अगर बहुत उत्तेजित करे जो हथेली पर मेंहदी लगाने या गमलों में पौधे उगाने में प्रतिफलित होती है. निश्चय ही यह वातावरण स्त्री के अबाध मानसिक विकास में सबसे बड़ी बाधा होता है और इस बाधा में जीने ओर संतुष्ट रहने का स्त्री को हजारों बरस पुराना अभ्यास होता है.

आत्मकथा में किश्वर नाहीद ने फ्लोरेंस नाइटिंगेल का एक उद्धरण दिया है – ’ख्वाहिशें , ख्वाब , सरगर्मियां और ऐब सब बारी-बारी पहले मर जाते हैं, सबसे आखिर में जो चीज़ मरती है वह है ज़हानत.‘ ज़हानत या विवेक का बीज हर इंसान की तरह स्त्री में भी मौजूद होता है. किसी जमाने में कुछ समाजों में पति कुछ अरसे के लिए बाहर जाता था तो औरत को लोहे की जांघिया ताले लगाकर पहना जाता था. लगभग सारी दुनिया में, हर समाज में स्त्री के विवेक का बीज लोहे में लपेट कर रखा जाता है और धीरे-धीरे वह पथरा जाता है.  किश्वर नाहीद ने बहुत बेचैनी से लिखा – ’समाज और मर्द ने अपने आप फैसले करके फितरत और कुदरत के नाम लगा दिए. पहला फैसला यह कि औरत के वजूद का बुनियादी मकसद बच्चा पैदा करना है कि इसके अंदर बच्चेदानी इसी मकसद के लिए है. सही है कि इसके अंदर बच्चादानी है मगर इसके अंदर एक दिमाग़ भी तो है.‘ बच्चेदानी को भरपूर उपजाऊ बनाए रखने और दिमाग को सुखाने का जो करतब मर्द की दुनिया दिखाती है उसी का एक नतीजा है टोनी मारीसन द्वारा उल्लिखित वह घटना जिसे हमने लेख के शुरू में दिया था। इस जगह पहुंच कर हम सुधा की कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ को उठाना चाहेंगे. ’ तुम चारो मुझे घेर कर खड़े हो गए…भला पहला बच्चा भी कोई गिराता है. पहला बच्चा गिराने से फिर गर्भ ठहरता ही नहीं. मां बनने में ही नारी की पूर्णता है. मां बनने के बाद सब ठीक हो जाता है , जीने का अर्थ मिल जाता है. मां तुम अपनी तरह मुझे भी पूर्ण होते हुए देखना चाहती थी.  मैंने तुम्हारी बात मान ली और तुम सबके सपनों को पेट में संजो कर वापस लौट गई. ‘

मां के जीने का अर्थ मां बनना था , उसकी मां का भी.  उसकी बेटी अन्नपूर्णा मंडल के जीने का अर्थ भी मां बनना है और बेटी की बेटी का भी. विचित्र बात है , सदियां बीतती है स्त्री को यह सवाल पूछते कि जीने का अर्थ क्या है और सदियो से एक ही उत्तर वह सुनती है – मां बनना. आखिर मातृत्व महिमामंडन के इस अतिरेक का रहस्य क्या है ? महाभारत सहित सभी धर्म पुस्तकों , धर्म-शास्त्रों में स्त्री को लेकर घोर निंदनीय बातें कही गई है और अक्सर खासी अश्लील भाषा में भी. ऐसी स्थिति में मातृत्व के महिमामंडन के अतिरेक का कारण क्या हो सकता है ? इसका कारण देख पाना ज्यादा कठिन नहीं है. पुरुष निरंतर यह कोशिश करता रहा कि स्त्री-पुरुष निर्भरता को अपना संस्कार बना ले , वह एक वेश्या की ज़रूरत भी पूरी करे और निःशुल्क दासता भी करे , गाय , बकरी या कुतिया की तरह घर से बंधी रहे और मर्द की ज़रूरत के अनुसार पुत्र पैदा करने वाली एक मशीन बनी रहे. इस दयनीय स्थिति मे स्त्री संतुष्ट और खुश भी रहे. मां अपनी बेटी को, बेटी अपनी बेटी को इसी जीवन पद्धति का उपदेश भी देती रहे.

हिन्दू धर्म ने तो स्त्री की इस भूमिका का आश्चर्यजनक व्याख्यान किया है. यहां हम पांच भाइयों के साथ सोने को मजबूर और बर्तन-भांडे की तरह जुए में दांव पर लगा दी जाने वाली स्त्री द्रौपदी पर केन्द्रित महाभारत के एक महत्वपूर्ण प्रसंग का जिक्र करना चाहेंगे. यह कथा उद्योगपर्व में आई है. कथा यों है। ऋषि विश्वामित्र ने अपने शिष्य गालव से आठ सौ सफेद लेकिन काले कान वाले घोड़े मांगे. गालव ऐसे घोड़े प्राप्त करने के लिए अयोध्या के राजा के पास गया. अयोध्या के राजा ने उसे अपनी बेहद सुंदर कन्या देकर कहा – इसे जिस राजा को दे दोगे वह तुम्हें इतने घोड़े दे देगा. गालव घोड़ों के बदले कन्या लेकर राजा हर्यश्व के पास पहुंचा. हर्यश्व ने कन्या से एक पुत्र पैदा करके कन्या के शुल्क के रूप मे दो सौ घोड़े देकर कन्या वापस कर दी. इसके बाद गालव दिवोदास और उशीनर के पास गया. उन दोनों ने भी कन्या को एक-एक साल अपने पास रख कर एक-एक बेटा पैदा किया. उन दोनों से भी दो-दो सौ घोड़े मिले. तब छह सौ घोड़े और बाकी दो सौ घोड़ों के बदले वह कन्या गालव ने विश्वामित्र को दे दी. विश्वामित्र ने भी लड़की को एक साल अपने हरम में रखकर एक पुत्र पैदा किया. यह है उस पुरुष समुदाय का सच जो मातृत्व की अतिरंजित गरिमा का बयान करता है. मातृत्व का गौरव वह स्त्री को इसी तरह देता है , एक वेश्या में तब्दील करने के बाद.

क्यूबिस्ट चित्रकार विचारक आन्द्रे लेवेल ने कहा था कि रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाली वस्तुओं का विश्लेषण जब अलग-अलग कोणों से उनकी सम्पूर्णता या आंशिकता (टुकड़ों) में किया जाता है तो उनकी सामान्य पहचान गायब हो जाती है और उनके छीछड़े दिखाई देने लगते हैं.‘ इसी क्यूबिज्म का अगला विकास था सर्रियलिज्म जिसके प्रतिनिधि चित्रकार के रूप में साल्वेडार डाली ने अपार ख्याति पाई थी. इसके व्याख्याकार चित्रकार आन्द्रे ब्रेतां ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी – ’चेतना का एक वह स्तर भी होता है जहां जीवन और मृत्यु , वास्तविक और काल्पनिक , अतीत और भविष्य के अन्तर्विरोध समाप्त हो जाते हैं.‘ सुधा अरोड़ा की कहानी उक्त दोनों संदर्भों में देखी जानी चाहिए. कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ में अन्नपूर्णा मंडल आत्महत्या का चुनाव करती है दो बच्चियों को जन्म देने के बाद. जैसा चित्रकार आलोचक आन्द्रे ब्रेतां ने कहा था जब अन्नपूर्णा मंडल स्त्री के रूप में सचेत होती है उसे लगता है कि जीवन और मृत्यु के बीच का फासला गायब हो चुका है. वस्तु सत्य या जीवन और विश्व की वास्तविकताएं जिस कोण से भी देखो अपना अर्थ और स्वरूप खो चुकी हैं. वस्तु सत्य अगर कुछ होेता है तो वह चीथड़ों के ढेर में तब्दील हो चुका है.

निश्चय ही चेतना एक भौतिक तत्व की मानसिक स्थिति होती है. नव प्रभाववादी चित्रकार मातिसे को कहना था कि वह चित्र बनाते समय एक नन्हें शिशु की मानसिक स्थिति में पहुंच जाता है. ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ स्त्री-विमर्श की दुनिया में कदम रखते ही मातिसे हो जाती है. वह समूचा विश्व एक शिशु-बोध में परिवर्तित कर देती है. नव प्रभाववादी कला का जिक्र करते हुए कला समीक्षकों ने स्पेन की आल्टामीरा पर्वतीय गुफाओं की आदिम चित्रकारी का जिक्र विस्तार से किया है. गुफा में आदिम मानव ने एक विराट और खूंखार भैसे का चित्र बनाया है. इस चित्र में आदि मानव ने भैसे के प्रमुख लक्षणों का सावधानी से चित्रण किया है जबकि दूसरी अनेक बारीकियों की उपेक्षा की है। इसका जिक्र करते हुए कला समीक्षकों ने स्वीकार किया है कि कला के इतिहास के इतने अधिक विकसित हो जाने के बाद हम उस आदिम चेतना तक वापस नहीं जा सकते. पर सुधा अरोड़ा के साथ यह हुआ है. शायद इसलिए कि स्त्री अगर इतिहास के प्रति सचेत होती है तो अपने को सृष्टि के आदि में ही देखती है जब रीढ़हीन केंचुओं का पृथ्वी पर आर्विभाव हुआ होगा.कहानी दो नन्हें भाई-बहनों के खेल से शुरू होती है. बारिश होती है तो दोनों बच्चे पूकुर के पास रेंगते केंचुओं पर नमक डाल-डाल कर उन्हें मारते हैं. ‘‘ बाबा तुम डाकघर से लौटते तो पूछते – तुम दोनों हत्यारों ने आज कितनों की हत्याएं कीं ? फिर मुझे पास बिठाकर प्यार से समझाते – बाबला की नकल क्यों करती है रे ! तू तो मां अन्नपूर्णा है , देवी स्वरूपा , तुझे क्या जीव-जन्तुओं की हत्या करना शोभा देता है. ‘

मुद्राराक्षस

भारत के हिन्दू समाज में स्त्री को मातृत्व की देवी बनाकर भारी-भरकम शब्दावली में गौरवान्वित किया जाता है. इस महिमामंडन के बाद उसे पांच अदमियों को सौंप दिया जाता है , जुए में दांव पर लगाया जाता है , उसका अपहरण हो जाय तो उसे अग्निपरीक्षा देने के बाद भी अस्वीकार कर दिया जाता है , पति मर जाय तो जीवित जलाया जाता है. सीता का अपहरण हुआ. अग्निपरीक्षा के बाद भी गर्भिणी अवस्था में घर से निकाला गया. बच्चों को जन्म देने के बाद अन्ततः जीवित मिट्टी में दफन होना पड़ा. स्त्री यातना से अभिनंदित होने वाले इस पुरुष को अन्नपूर्णा मंडल भयाक्रांत होकर देखती है -‘‘ जब बांकुड़ा से बम्बई के लिए मैं रवाना हुई तुम सबकी नम आंखों में कैसे दिये टिमटिमा रहे थे जैसे तुम्हारी बेटी न जाने कौन से परीलोक जा रही है जहां दिव्य अप्सराएं उसके स्वागत में फूलों के थाल हाथ में लिए खड़ी होंगी.‘ यह सिर्फ अन्नपूर्णा मंडल जानती है कि उसके साथ क्या होने जा रहा है , कहां वह जीवित दफ़न होने जा रही हैं. भारत में शादी के बाद कन्या अकसर बहुत बुरी तरह रोती है. सिर्फ वही जानती है कि उससे क्या जबर्दस्ती छीना जा रहा है और ये आशंकाएं उसी क्षण से उसे अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं कि निरपराध होने पर भी उसे लगातार अपनी पवित्रता का प्रमाण-पत्र लहराते रहना होगा और फिर भी दांव पर लग जाने से लेकर जीवित दफ़न होने के लिए तैयार रहना होगा. हैरानी यह है कि उसे अन्नपूर्णा ’मैया‘ का दर्जा इसी शर्त पर मिलेगा. इसी शर्त पर उसे महिमामंडित किया जायेगा.

नव प्रभाववादी चित्रकला के संबंध में आल्टामीरा गुफाओं के चित्रांकन का जिक्र किया जाता है. मातिसे से लेकर पालक्ली तक अनेक बड़े चित्रकारों ने अपनी कृतियों में अक्सर संस्कृति के उस प्रारंभिक बिंदु पर लौटने की कोशिश की है. स्त्री खास कर तीसरी दुनिया में हजारों साल से सांस्कृृतिक विकास की यात्रा सें वंचित , आदिम युग में ही खड़ी रखी गई है. इसलिए अपनी रचनादृष्टि में वह ऐसा सब कुछ आसानी से ला सकती है जिसे मातिसे बहुत श्रम से अर्जित करता है और यह सुधा की कहानी में आसानी से घटित होते देखा जा सकता है.
’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ में प्रकृति है , जन-जीवन है , लोग हैं , रीति-रिवाज हैं , रिश्ते हैं , घर हैं पर वे वैसे नहीं हैं जिन्हें मेघदूत , कादंबरी या कामायनी में देखा जा सकता है. कहानी में दो जगह बरसात के मौसम का खास तौर से जिक्र है. एक जगह वहां जहां अन्नपूर्णा मंडल बच्ची है. हमने आल्टामीरा गुफा की आदिम चित्र रचनाओं का जिक्र किया था. इसी संदर्भ में हमें चित्रकार मातिसे का वह वक्तव्य भी ध्यान में रखना होगा जिसमें मातिसे कहता है – मैं कोशिश करता हूं कि मैं एक शिशु की मनःस्थिति में पहुंच जाऊं.‘ सुधा अपनी बात कहने के लिए इसी युक्ति का इस्तेमाल करती हैं  बारिश मेघदूत के ’आषाढ़स्य प्रथम दिवसे‘ से अलग है. बारिश ने रचनाकारों को बहुत आकर्षित किया है. रीतिकाल के कवि ही नहीं बीसवीं सदी के छायावाद पंत और निराला को भी बरसात के मौसम ने बहुत आकृष्ट किया था. यह सारा लेखन वयस्कों का लेखन है. सुधा की कहानी इस वयस्कता से मुक्ति लेती है. जिसे रचनात्मक सौन्दर्यबोध कहा जाता है वह रचनाकार की वयस्कता की उपलब्धि होता है.

सुधा अरोड़ा

 ऋतुसंहार में कालिदास ने बारिश के बारे में बहुत खूबसूरत बात कही है – ’तृणोत्करैः संगत कोमलांकुरैः विचित्र नीलैः हरिणीमुखक्षतैः। वनानि वन्यानि हरन्ति मानसं विभूषितानि उत्पल कल्लवैद्रुमैः. यानी धरती पर कोमल अंखुए फूट आए हैं , वनों में विचित्र वर्णवाले मृगों ने घास के तृणों को चबाया है. घास अधकटी दिखाई दे रही है। वनों के वृक्षों में नए पत्ते आ गए हैं , यब सब देखकर मन पुलकित हो जाता है. कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ की बारिश भी मन में पुलक पैदा करती है पर उसमें हिरणों की चराई नहीं दिखाई देती -’ मां झीखती रहतीं और हम सारा दिन पोखर के पास और आंगन के बाहर नमक की पोटली लिए बरसाती केंचुओं को ढूंढते रहते थे. ये इधर-उधर बिलबिलाते से हमसे छिपते फिरते थे और हम उन्हें ढूंढ ढूंढकर मारते थे. नमक डालने पर उनका रंग कैसे बदलता था , केंचुए हिलते थे और उनका शरीर सिकुड़ कर रस्सी हो जाता था.‘
इसी बरसात का एक बहुत संक्षिप्त सा जिक्र कहानी में और है -’ तुम्हें पता है न बंबई में बरसात का मौसम शुरू हो गया है. मैं तो मना रही थी कि बरसात जितनी टल सके , टल जाय लेकिन वह समय से पहले ही आ धमकी. और मुझे जिसका डर था वही हुआ. इस बार बरसात में पार्क की गीली मिट्टी सड़क से उठकर उन्हीं लाल केंचुओं की फौज घर के भीतर तक चली आई है. रसोई में जाओ तो मोरी के कोनों से ये केंचुए मुंह उचका कर झांकते हैं , नहाने जाओ तो बाल्टी के नीचे कोने पर वे बेखौफ चिपके रहते हैं.‘

शादी करके पति के घर में आ गई अन्नपूर्णा को सिर्फ दो स्थान ज्यादा याद आते हैं एक रसोई और दूसरा स्नानघर. शादी के बाद किसी हिन्दू स्त्री का सबसे गहरा रिश्ता घर की तीन जगहों से ही होता है – रसोई , स्नानघर और शयनकक्ष. ड्राइंगरूम , लिविंगरूम , छत , दरवाजे , खिड़की और बरामदे उसके लिए नहीं होेते. अन्नपूर्णा मंडल का अपनी नियति से समूचा साक्षात्कार इन्हीं दो जगहों पर होता है – रसोई और स्नानघर. यहां हम एक और सामाजिक मुद्दों  की तरफ संकेत करना चाहेंगे. एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि स्त्री की अपनी सामाजिक हैसियत क्या होती है ? हिन्दू धर्म ग्रंथों में स्त्री की हैसियत पति द्वारा निर्धारित होती है. कमोबेश यही स्थिति लगभग सभी समाजों में रही है. चूंकि स्त्री हर समाज में पराधीन रही है इसलिए स्वतंत्र रूप से उसकी हैसियत लगभग शून्य रही है. हैसियत का एक आधार हो सकता है समाज में मिलने वाला सम्मान पर स्त्री की नियति रही है कि उसके सम्मान की गारंटी सिर्फ उसका पति हो सकता है. इब्सन का नाटक ’दि डाल्स हाउस‘ इसी कड़ी सच्चाई का ही खुलासा करता है. स्त्री का अपना सामाजिक सम्मान इसलिए एक दुर्लभ स्थिति होता है कि स्त्री समाजतंत्र में स्वतंत्र रूप से (बहुत बिरले उदाहरण छोड़कर) न तो सत्ताशक्ति की स्वामिनी होती है न सम्पत्ति की और न ही अपनी जीवनचर्या की. इनसे वंचित रखकर ही स्त्री की पूर्ण पराधीनता और पतिनिर्भरता संभव होती है.

इस नियति का इस भाषा में अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी  में कहीं कोई उल्लेख नहीं है पर इस स्थिति का अनुभव होने पर स्त्री मे कैसी घबराहट जन्म लेती है , इसका परिचय इसमे जरूर मिल जाता है -’ फोन पर इतनी बातें करना संभव कहां है. फोन के तारों पर मेरी आवाज जैसे ही तैरती हुई तुम तक पहुंचती है तुम्हें लगता है सब ठीक है , जैसे मेरा जिन्दा होना ही मेरे ठीक रहने की निशानी है और फोन पर तुम्हारी आवाज़ सुनकर मैं परेशान हो जाती हूं क्योंकि फोन पर मैं तुम्हें बता नहीं सकती कि तुम जिस आवाज़ को मेरी आवाज़ समझ रहे हो वह मेरी नहीं है.‘ अन्नपूर्णा बहुत ठंडे तरीके से आत्महत्या का चुनाव करती है पर अन्नपूर्णा मंडल का मृत्यु का चुनाव क्या सचमुच इतनी ठंडी घटना है ? क्या उसके पीछे भी अवांछित हिंसा का एक लंबा सिलसिला नहीं है ? वह कहती है -’ जिस आवाज़ को मेरी आवाज़ समझ रहे हो वह मेरी नहीं है. ‘  रैल्फ एलिसन का कथानायक कहता है -’ कौन जानता है शायद निचली ध्वनितरंगों में मैं तुम्हारी तरफ से ही बोल रहा हूं.‘ संत्रास कैसे अपनी आवाज़ को अपने से ही अजनबी कर देते हैं इसका उदाहरण बेहद छोटी कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ में मिलता है या फिर विराट आकार के उपन्यास ’द इनविजिबल मैन‘ में.हमने शुरू में टोनी मारिसन द्वारा उद्धृृत एक अश्वेत महिला द्वारा दासता से भाग निकलने के बाद सबसे पहले अपनी बेटी की हत्या का उल्लेख किया था। वह हत्या इसलिए कर देती है कि बेटी को वह दिन न देखना पड़े जो उसकी मां ने देखा.

 अन्नपूर्णा मंडल में भी बहुत अलग ढंग से एक हत्या है , अन्नपूर्णा की आत्महत्या पर यह आत्महत्या से ज्यादा एक  हत्या ही है सद्यः प्रसूता जुड़वां बेटियों की क्योंकि वे दोनों भी अन्नपूर्णा मंडल ही हैं – ’ इन दोनों के रूप में तुम्हारी बेटी तुम्हें सूद सहित वापस लौटा रही हूं. इनमें तुम मुझे देख पाओगे शायद . ‘ इस कहानी को अन्त से शुरू करके पीछे के पृष्ठ पढ़ना कहानी के कुछ और गहरे तत्व उभारता है. सूद समेत बेटी को लौटाने से ठीक पहले एक आतंक का बयान है – ’ जब बाहर सड़क पर मैदान के पास की गीली मिट्टी में केंचुओं को सरकते देखती हूं तो इन दोनों की शक्ल दिखाई देती है. मुझे डर लगता है कहीं मेरे पति घर में घुसते ही इन पर चप्पलों की चटाख-चटाख बौछार न कर दें. या मेरी सास इन पर केतली का खौलता हुआ पानी न डाल दें. मैं जानती हूं  यह मेरा वहम है पर यह लाइलाज है और मैं अब इस वहम का बोझ नहीं उठा सकती. चित्रकार विन्सेन्ट वैन्गाग ने एक बार अपने भाई को लिखा था – ’मैं अपनी आत्मा को बचाना चाहता हूं. मैं जिन्दा गोश्त और खून से चित्र बना रहा हूं.‘ अन्नपूर्णा मंडल अपनी ’आत्मा‘ को बचा लेना चाहती है , शायद वैन्गाग की तरह। अन्नपूर्णा सद्यःजात बच्चियों को अपनी बगल में देखती है.

 दुनिया के साहित्य में ’मातृत्व‘ का ऐसा ख़ौफनाक बोध शायद ही किसी रचना में आया हो -’ पांचवे महीने में मेरे पेट में जब उस आकार ने हिलना-डुलना शुरू किया ,मैं भय से कांपने लगी थी. मुझे लगा मेरे पेट में वही बरसाती केंचुए रेंग रहे हैं , सरक रहे हैं. आखिर वह घड़ी भी आई जब उन्हें मेरे शरीर से बाहर आना था. और सच में जब लम्बी बेहोशी के बाद मैंने आंख खोल कर अपने बगल में लेटी सलवटों वाली चमड़ी लिए अपनी जुड़वां बेटियों को देखा, मैं सकते में आ गई. उनकी शक्ल वैसी ही गिजगिजी लाल केंचुओ जैसी झुर्रीदार थी. मैंने तुमसे कहा भी था – देखो तो मां ये दोनों कितनी बदशक्ल हैं…‘यहां दो वीनस मूर्तियों का जिक्र ज़रूरी है। एक नन्हीं मूर्ति नग्न स्त्री की मोराविया के उत्खनन में मिली थी. उसके हाथ नहीं हैं. विशाल कूल्हे , विराट स्तन और और अत्यन्त स्वस्थ शरीर वाली इस आदिम मूर्ति को उत्खननकर्ताओं ने वीनस कहा है. एक वीनस बहुत बाद में तथाकथित सभ्य समाज ने बनाई थी. उसके भी हाथ नहीं है पर वह एक सर्वांग भोग्या वस्तु है. मानवी से भोग्या वस्तु में तब्दील स्त्री की अस्मिता का भौतिक सत्य क्या होता है इसी की कहानी है ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ विश्वविद्यालयी समझदारी से देखने वाला कोई भी विचारक इसमें केंचुए को एक प्रतीक मान लेगा.



पारंपरिक आलोचना का यही कष्ट है. वह फार्मूलों से बाहर निकल नहीं सकती. वह केंचुए को केंचुए की तरह देखेगी और स्त्री को स्त्री की तरह. फिर दोनों चित्रों को जोड़ेगी. यह ग़लत समझ है.सुधा अरोड़ा की वह स्त्री जो स्त्री भी है और केंचुओं का गुच्छा भी. इस वस्तु सत्य को लेखिका विश्वसनीयता देने में भी सफल हुई है. पुरुष समुदाय के लिए मत्स्य कन्या , आधी कन्या आधी मछली खासी विश्वसनीय रही है. पर वह पुरुष की कृति है. सुधा की कृति इस मानसिक संरचना प्रक्रिया के प्रति सीधा विद्रोह है – ’ एक दिन एक केंचुआ मेरी निगाह बचा कर रसोई से बाहर चला गया. सास ने उसे देख लिया. उसकी आंखें गुस्से से लाल हो गईं. सास ने चाय की खौलती हुई केतली उठाई और रसोई मे बिलबिलाते हुए सब केंचुओं पर गालियां बरसाते हुए उबलता पानी डाल दिया. सच मानो बाबा मेरे पूरे शरीर पर जैसे फफोले पड़ गए थे जैसे खौलता हुआ पानी उस पर नहीं मुझ पर डाला गया हो. वे सब फौरन मर गए , एक भी नहीं बचा , लेकिन मैं ज़िंदा रही.‘ निश्चय ही यह स्त्री-विमर्श हिन्दी कथा लेखन का अगला नया अध्याय शुरू करता है. यह इस बात की भी चुनौती है कि हिन्दी कहानी को कविता सुलभ सौन्दर्यबोध की ज़मीन से हटकर समझने की कोशिश करनी होगी

वागर्थ: अक्टूबर 2002 में प्रकाशित ‘‘ एक कहानी का रचना जगत -‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी‘ ’’ से साभार 

पितृसत्ता से आगे जहाँ और भी है

राहुल सिंह

युवा आलोचक, हिन्दी साहित्य का  प्राध्यापक
संपर्क : alochakrahul@gmail.com

इस समय प्रचलित विमर्शों की गर थोड़ी जानकारी हो तो निश्चित तौर पर आप स्त्री विमर्श से परिचित होंगे. हिन्दी में प्रचलित स्त्री विमर्श की एक बड़ी सीमा उसका ‘एकायामी’ होना है. ‘एकायामी’ होने से आशय यह कि वह ज्यादातर मौकों पर पितृसत्तात्मक प्रवृतियों को निशाने पर रखती है. पितृसत्तात्मक सोच से उपजी मानसिकता ही हिन्दी में प्रचलित स्त्री विमर्श का स्थायी निशाना है. स्त्री विरोधी संस्थागत चेष्टायें या सरकारों द्वारा लिये गये नीतिगत निर्णयों को कायदे से स्त्री विमर्श की प्रचलित समझदारी में शामिल करने की कवायद इक्की-दुक्की कहीं दिखती हो तो बात अलग है, पर वह हिन्दी में प्रचलित स्त्री विमर्श का स्थायी हिस्सा नहीं बन सका है. वह पितृसत्ता की अजपा-जाप में ही लीन है. इस बीच छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार समेत देश के अनेक हिस्सों में स्त्रियों की बच्चेदानी निकाले जाने की सरकारी योजनाओं के मूल में स्त्रियों के साथ जिस अमानवीय तरीके से पेश आया जा रहा है, उसको लेकर कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है. मोमबत्ती की रोशनी में या फर्श पर लिटाकर उनका आॅपरेशन कर दिया जा रहा है. आॅपरेशन के बाद उनकी सेहत के मद्देनजर बुनियादी सुविधाओं तक का खयाल नहीं रखा जा रहा है. बच्चेदानी निकालना ‘टार्गेट’ पूरा करने का मामला भर बन कर रह गया है. इस बीच होनेवाली मौतों का भी कायदे से कोई सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. अगर ऐसा लग रहा हो कि यह सब पिछड़े और आदिवासी बहुल इलाकों में घटित हो रहा है तो आप बहुत बड़ी गलती पर हैं. हर वह स्त्री जो बच्चे को जन्म देने में सक्षम है, इससे मिलती-जुलती हिंसा के निशाने पर है. कोख और मातृत्व दोनों निशाने पर है.

यदि आपके घर में कोई स्त्री गर्भाधान की प्रक्रिया से गुजर रही है तो क्या आप उसकी जाँच और चिकित्सा के लिए किसी सरकारी अस्पताल में जा रहे हैं या प्राइवेट नर्सिंग होम में ? जिनकी जेब में थोड़ा भी पैसा है, वे निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं. सरकारी अस्पतालों के डाॅक्टर भी अपने घर में नर्सिंग होम चला रहे हैं और भीड़ से बचने और इत्मीनान से देखे जाने के नाम पर घर आने की सलाह दे रहे हैं. सरकारी अस्पतालों में व्याप्त कुप्रबंधन निजी अस्पतालों की ओर जाने का सबसे बड़ा प्रेरक है. अपने प्रबंधन, अनुशासन, आधारभूत संरचना और साफ-सफाई के कारण पहली निगाह में सरकारी अस्पतालों की तुलना में बेहतर दिखनेवाले यह निजी अस्पताल और नर्सिंग होम भले ज्यादा बेहतर जान पड़ते हों, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं. बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों को छोड़ दें तो छोटे शहरों के निजी अस्पतालों में यह एक आम प्रवृति है , कि वे अल्ट्रा साउंड से लेकर अनेक तरह की जाँच बाहर के लैब से कराना पसंद करते हैं. सोचने की बात यह है कि इतने निवेश के बाद भी ऐसे निजी अस्पताल खुद अल्ट्रासाउंड जैसी जाँच से जान छुड़ाना क्यों चाहते हैं ? इसके लिए आपको अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ना होगा, जिसमें कहीं एक ‘स्टार’ दर्ज होगा, ठीक वैसा ही जैसी किसी बीमा की पाॅलिसी में दर्ज रहता है, जिसकी ओर आपका ध्यान नुकसान होने पर जाता है. फुटनोट पर लिखा होता है कि ‘दिस रिपोर्ट इज नाॅट वेलिड फाॅर मेडिको-लीगल पर्पस’. दरअसल यही वह नुक्ता है जो एक साथ आपकी जेब और स्त्री की कोख पर हमला करता है.

निजी अस्पताल बाहर से जाँच कराने के नाम पर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं, उन जाँच घरों में जाकर ना सिर्फ आप ‘कट सिस्टम’ का शिकार हो जाते हैं, बल्कि वहीं आपको जो रिपोर्ट सौंपी जाती है, उसमें ‘सीजर’ की पृष्ठभूमि तैयार कर दी जाती है. सीजेरियन’ की पूरी पृष्ठभूमि निर्मित करने में इन जाँच केन्द्रों की निर्णायक भूमिका हैै. यह अपनी रिपोर्ट में आखिरी वक्त में कुछ संभावित जटिलताओं का संकेत करके ऐसा दबाव बनाने का काम करते हैं. छोटे शहरों में पाँच-सात कायदे के जाँच केन्द्र होते हैं और किसी भी निजी अस्पताल का उनसे अच्छा संबंध होता है कुल मिलाकर इस गिरोहबंदी का शिकार होने के अलावा ज्यादा विकल्प किसी के पास बचता नहीं है. कई निजी अस्पताल और डाॅक्टर तो साफ तौर पर आपको निर्देश भी देते हैं कि फलां जाँच केन्द्र में चले जाइये उनकी रिपोर्ट सटीक और सही होती है. असल में सामान्य प्रसव की तुलना में ‘सीजर’ ज्यादा मुनाफे का सौदा है. मुनाफा किसी भी निजी क्षेत्र का आधारभूत प्रतिज्ञा है. कोख में चीरा लगाकर सबसे ज्यादा पैसा बनाया जा सकता है. सीजर के बाद कम से कम दो दिन तो आप अस्पताल के बिस्तर या कमरे में पड़े रहने को बेबस होते हैं, इस बीच अस्पताल का मीटर किसी चालू टैक्सी की तरह चलता रहता है. घरेलू हिंसा के बाद भारत में स्त्रियाँ सबसे ज्यादा इस चिकित्सिकीय हिंसा की शिकार हैं. अफसोस की बात यह है कि ‘सीजर’ के नाम पर स्त्रियों के साथ की जा रही इस संगठित हिंसा के मूल में ज्यादातर जगहों पर नर्स और ‘लेडी गाइनो’ ही शामिल हैं.


निजी अस्पतालों में एक और चिंताजनक बात यह है कि लोग डाॅक्टर के नाम पर जाते हैं पर वहाँ नियुक्त नर्सें पूरी तरह प्रशिक्षित हों यह कोई जरुरी नहीं है. पर कोख और स्त्री की देह पर जारी यह संगठित हिंसा हिन्दी के स्त्री विमर्श की प्रचलित समझदारी का हिस्सा नहीं है. हिन्दी का स्त्रीसंवेदी धड़ा किसी अपमानजनक संबोधन के प्रति तो महीनों आंदोलित रह सकता है पर सोनी-सोरी के गुप्तांगों पर कंकड़ डाल दिये जाने की घटना पर या उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिये जाने पर आंदोलित नहीं होता है. यह सनी लियोने से अपमानजनक सवाल पूछ लिये जाने पर सोशल मीडिया में अपनी प्रतिबद्धता साबित करने के लिए तो बढ़-चढ़ कर सामने आता है, पर छत्तीसगढ़ में स्त्रियों की बच्चेदानी निकाले जाने के दौरान हुई मौतों पर भी चुप लगा जाता है. यह मेट्रो, माॅल या डीटीसी पर हुई ‘ईव टीजिंग’ को फेसबुक का स्टेटस बनाना तो पसंद करता है, पर झारखंड की आदिवासी बच्चियों को दिल्ली के घरों में बलात् रखे जाने पर चुप लगा जाता है.छोटानागपुर के आस-पास के इलाकों से पत्तल, दोने, जामुन, आम, कटहल जैसे मौसमी उत्पाद बेचने आये महिलाओं पर ट्रेन और प्लेटफार्म पर होनेवाली बदतमजियों पर चुप रहता है.

पितृसत्ता से इतर भी सत्तायें हैं जो स्त्रियों की देह पर लगातार हमले कर रहा है, जरुरत इस बात की है कि उनकी पहचान करके उनके प्रति एक व्यापक समझदारी निर्मित की जाये. उनिभू (उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण) ने स्त्रियों के लिए अगर मुक्ति की नई राहें खोलीं हैं तो बंधन की नई बेड़ियाँ भी तैयार की हैं. मुक्ति की इन राहों का तो खूब ढोल पीटा जा रहा है पर ‘उनिभू’ से उत्पन्न परिस्थितियों ने स्त्री के लिए नई किस्म की प्रतिकूलतायें भी विकसित की हैं, उनकी पहचान और परख भी आवश्यक है. आखिर तमाम दावों के बावजूद हमारा समय स्त्रियों के प्रति पहले से कहीं ज्यादा हिंसक हुआ है. हिंसा की नई शक्लें हमारे सामने रोज दरपेश हो रही हैं. ऐसे में जरुरत इस बात की है कि स्त्रियों के प्रति हिंसा के यह जो नये मचान बन रहे हैं उसके प्रति एक नई समझदारी विकसित की जाये.

सबलोग जून अंक से 

वेद निरर्थक ध्वनियां मात्र

मुद्राराक्षस 


वे हमारे बीच नहीं रहे, मुद्राराक्षस ने हिन्दू धर्म की  स्थापित ‘ ईश्वर की सत्ता’ को चुनौती दी. उन्हें नमन.  


देश की वर्तमान सामाजिक स्थितियों पर पड़ोस के एक राज्य में धार्मिक सम्मेलन था. सम्मेलन आर्यसमाजी विचारकों था. आयोजक ने मुझे भी आमंत्रित किया था. कोई भी धार्मिक संगठन देश के किसी भी मुद्दे पर चर्चा करे,अंतत: वह उनकी धार्मिक आस्थाओं पर केन्द्रित हो जाती है. यहां भी यही हुआ. दो वक्ताओं की बात अयोध्या में राममंदिर निर्माण की बाधाओं तक जा पहुंची. मैं नहीं जानता स्वयं स्वामी दयानंद सरस्वती की इन भाषणों पर क्या प्रतिक्रिया होती जो कृष्ण-राम को खारिज करते थे और उनके साहित्य को नदी में फेंकने की बात कहते थे.जिस राम मंदिर को वे उत्साही वक्ता हिन्दुत्व की अस्मिता से जोड़ रहे थे उसी ‘हिंदू’ शब्द को खारिज करके स्वामी दयानंद ने आर्य को जातीय संज्ञा दी थी. वे जानते थे कि किसी भी वैदिक ग्रंथ में हिंदू शब्द नहीं है. फारसी भाषियों ने इसका प्रयोग इसलिए किया था कि उनके शब्द कोषों में ‘हिंदू’ का अर्थ ‘काला’ जैसे अर्थ में हुआ था.

उक्त सेमिनार में यह भी कहा गया कि वेद सृष्टि के आदि में ईश्वर द्वारा रचे गए थे और वे दुनिया की प्राचीनतम पुस्तक हैं. दोनों ही बातें किसी तार्किक व्यक्ति के गले नहीं उतर सकतीं. स्वयं स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेदादि भाष्य-भूमिका में लिखा था- सकल जगत ईश्वर द्वारा रचा गया तो वेदों की रचना में क्या शंका? माना जाता है कि वेद सृष्टि की रचना के साथ ही रचे गए और जैसे रचे गए थे वैसे ही आज भी हैं. उनमें कभी कोई फेरबदल नहीं हुआ. यहां यह याद दिलाना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उत्तरवैदिक काल के एक वैयाकरण कौरस ने कहा था कि वेद अर्थहीन किताबें हैं. खैर, हम संक्षेप में यह देखेंगे कि क्या वेदों का स्वरूप वैसे का वैसा है या उसमें फेरबदल हुई है.एक शाखा के अनुसार ऋग्वेद में 8 अष्टक, 64 अध्याय और 2006 वर्ग हैं लेकिन एक अन्य शाखा के अनुसार 10 मंडल, 85 अनुवाक और हर अनुवाक में सूक्त हैं. सूक्तों की संख्या 1017 मानी जाती है पर इनमें बालखिल्य के 11 सूक्त छोड़ दिए गए हैं. क्यों? ऋ ग्वेद के मंत्रों की कुल संख्या 10472 मानी गयी है लेकिन शौनक मंत्रों की संख्या 10528 मानते हैं. ऋ ग्वेद शाकल संहिता के दसवें मंडल में मंत्रों की संख्या कुल 15,000 बतायी गयी है. बाष्कल शाखा में तो 10वां मंडल है ही नहीं.

शाकल संहिता में कुल मंत्र 10,517 हैं तब बाकी 4,483 मंत्र कहां और क्यों गायब हुए? वेद ईश्वर कृत हैं इसके बावजूद एक आदमी (या ऋषि ) उनमें इतने फेरबदल कैसे कर देता है? दुनिया में किसी भी धर्मग्रंथ में कभी कोई फेरबदल नहीं की गई-न बाइबिल में, न कुरान में. इनमें कभी किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया. लेकिन वेद की 31 शाखाएं हो गर्इं और हर शाखा में पाठ भेद है. शाखाओं की उपशाखाएं भी हैं और उनमें भी भारी अन्तर हैं.
आधुनिक समय के वेदों के सबसे बड़े अध्येता सत्यव्रत सामाश्रमि भट्टाचार्य की टिप्पणी देखनी चाहिए-जैसे अध्यायभेद होता है उस तरह शाखाभेद नहीं समझना चाहिए. अलग-अलग समय और अलग-अलग स्थान पर महत्त्वपूर्ण पुस्तक में जैसे हो जाता है उसी तरह पाठ भेद को समझा जाना चाहिए. लेकिन सामाश्रमि यह भूल जाते हैं कि यह पाठभेद लगभग एक ही क्षेत्र के विद्वानों ने किया था.

वैदिक साहित्य में एक दिलचस्प किताब है- विकृति बल्लरी. इसके लेखक थे व्याडि. उन्होंने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि कैसे शाकल की जो पांचों शाखाओं में पाठभेद हैं वे पाठ भेद नहीं हैं. क्या कुरान की भी कोई शाखाएं और पाठभेद हैं? जो कुरान को ईश्वरीय मानते हैं, वे उसमें पाठभेद करने की हिम्मत नहीं करते. ऋग्वेद की बाष्कल संहिता के सूक्तों से शाकल में आठ सूक्त कम हैं. यह कैसे हुआ? ऋग्वेद में बालखिल्य के कहीं तो 11 सूक्त हैं कहीं आठ.एक तथ्य और हैरान करता है-ऋ ग्वेद के अनेक भाष्यकारों ने सिर्फ शाकल संहिता का ही भाष्य किया है पर हर भाष्यकार हर मंत्र का अलग अर्थ देता है. सायण, महीधर, स्कंद स्वामी, माधव भट्ट यहां तक कि स्वामी दयानंद ने भी वेद मंत्रों के जो भाष्य किए हैं वे एक दूसरे से बहुत अलग और परस्पर विरोधी भी हैं. तब वेद किस तरह के ईश्वरीय धर्मग्रंथ है? क्या अन्तत: कौत्स ही सही है कि वेद निरर्थक ध्वनियां मात्र हैं?

जातिवादी जड़ताओं के बरक्स एक प्रेम कहानी : पीली छतरी वाली लडकी

संजीव चंदन

हिन्दी के बहुपठित कथाकार उदय प्रकाश की कहानी ‘ पीली छतरी वाली लडकी’ जब पहली बार कथा मासिक हंस में प्रकाशित हुई , तो हिन्दी कथा परिदृश्य में व्यापक हलचल हुई – प्रशंसा और हमले की बाढ़ सी आ गई थी. इस कहानी की ताकत इसपर होने वाले हमलों की पृष्ठभूमि से बनती है , क्योंकि यह एक ऐसी प्रेमकथा है , जो हिन्दी विभागों , विश्वविद्यालयों और हिन्दी पट्टी के स्वभाव में शामिल जातिवाद के खिलाफ एक कालजयी कथन की तरह घटित हुई है. निसस्न्देह जब जड़ता पर प्रहार होता है, तो वह बदले में ‘प्रतिप्रहार’ भी उतना ही तेज करती है.  जब यह धारावाहिक प्रकाशित हुई थी, तब मैंने कॉलेज की पढाई ख़त्म की थी, विश्वविद्यालय में जाने ही वाला था, बाद में जिस विश्विद्यालय का छात्र हुआ , वह हिन्दी के लिए ही स्थापित है, शायद इसीलिए वहां इस कहानी में उपस्थित जातिवाद और क्रूर, और घृणित रूप में दिखा . कहानी यथार्थ और जादुई यथार्थ के साथ हमारे समय के सच के रूप में घटित होती दिखी.

पहले पाठ के बाद कहानी में जातिविहीन नायक( कहानी में उसकी जाति का उल्लेख नहीं हैं , लेकिन उसका लोकेशन ब्राह्मणवाद विरोधी है ) राहुल के द्वारा ब्राह्मण नायिका अंजलि के साथ आक्रामक यौन संबंध स्त्रीवादी आलोचना के नजरिये से स्त्रीविरोधी दिखा . सवाल बना कि क्या नायक अपनी पीड़ा और अपमान का बदला एक जाति की स्त्री के प्रति हमलावर होकर लेने का सन्देश तो नहीं दे रहा है ! लेकिन नहीं, वह व्याप्त जातिवादी / ब्राह्मणवादी अन्याय के प्रति आक्रोश से बनी अपनी ‘ कुंठा’ से तत्क्षण बाहर आकर लडकी के प्रति प्रेम और स्नेह से भर उठता है –प्रेम ही जातिरूढ़ समाज का सफल प्रतिकार हो सकता है. तब तक नामदेव ढसाल की कविता के भीतर आक्रोश और उसके व्यक्त करने के स्टाइल से मैं परिचित नहीं हुआ था. ‘दलित –जीवन’ के दंश, जीते हुए हर पल के अपमान और उपेक्षा के खिलाफ विश्वकवि ढसाल न सिर्फ ‘ पैंथर आन्दोलन’ के रूप में आक्रामक प्रतिकार के साथ सक्रिय हुए, बल्कि आक्रोश और आक्रामकता , जिसका अंतिम लक्ष्य करुणा और समता था के साथ वे अपनी कविताओं में भी प्रकट हुए हैं . उदय प्रकाश की कहानी में यह प्रसंग मेरे सामने नामदेव ढसाल की कविता की तरह अब खुलता है – यद्यपि ढसाल और उदय प्रकाश का जातीय लोकेशन सर्वथा भिन्न है – और उदय जी का नायक भी गैरद्विज दलित नहीं , जातिहीन नायक है – अपनी प्रिय कहानी का बार –बार पाठ नए अर्थ –सन्दर्भों के साथ खुलता जाता है .


इन दिनों इस कहानी को पढ़ते हुए हालांकि एक बात खटकती है और कहानीकार के आज के लेखन और चिंतन को देखते हुए ऐसा लगता है कि शायद वे आज, जब इस कहानी को लिखें तो वे भी उन प्रतीकों से परहेज करें , जिसे उन्होंने तब अपनाया था. कहानी में बुराई और जातिवाद के प्रतीक के तौर पर मिथकीय चरित्र ‘ रावण’ को और उससे संघर्ष करते हुए मिथकीय चरित्र ‘राम’ को प्रतीक के तौर पर बार –बार पेश किया गया है . ऐसा इसलिए कि रावण की जाति ‘ ब्राह्मण’ बताई जाती रही है. हालांकि कहानीकार इस बात से जरूर वाकिफ  हैं कि रावण और राम के चरित्र का पुनर्पाठ दलित अस्मिता किस तरह करती है. बहुपठित कथाकार से रामकथा के वैकल्पिक पाठ अछूते नहीं होंगे – कहानी के शिल्प में ही मौजूद व्यापक फलक पर फ़ैली जानकारियाँ तो कम से कम कथाकार को यह छूट नहीं दे सकती कि वह दलित अस्मिता के द्वारा ‘ रावण –राम’ मिथ के पुनर्पाठ से खुद को अलगा ले.



कहानी का अंत सुखद है . विश्विद्यालय कैम्पस के युवा जातिवादी , नस्लवादी समूह से सफल लड़ाई लड़ते हैं. अपने करियर को दांव पर लगा कर , यातना सहते हुए भी एक बड़े कॉकस से वे मुठभेड़ करते हैं. नायक –नायिका अपने सफल प्रेम की यात्रा पर अपने मित्रों की मदद से निकल जाते हैं . हालांकि सुखद अंत के पूर्व एक भयावह स्वप्न दृश्य भी नायक के सपने के साथ उपस्थित होता है, जो पाठकों के को दुःख और क्षोभ से भर देता है. लेकिन अंत सफल प्रेम संघर्ष के रूप में होता है , ट्रेन की गति के साथ सारी बुराइयों, जड़ताओं और मक्कार परिवेश को पीछे छोड़ते हुए. कहानी के इस सुखद अंत से अधिक क्रूर है यथार्थ , जो अंत के पूर्व के भयावह स्वप्न दृश्य तक ही घटित होता है – उदाहरण के लिए जाति-पंचायतों के सामने निरीह जोड़ों की कहानियाँ हमारे सामने हैं . कहानी में यथार्थ स्वप्न में घटित होता है और मारे जो रहे प्रेमी युगलों के बावजूद प्रेम कहानियों की निरंतरता के सत्य की तरह स्वप्न (यूटोपिया) यथार्थ में घटित है . यही कहानी की सफलता है.

दैनिक भास्कर से साभार 

स्त्री का समाज और समाज में स्त्री‘अकेली’

अल्पना मिश्र

एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
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 वरिष्ठ लेखिका मन्नू भंडारी के जन्मदिन पर विशेष 


अलग -अलग समय की स्त्री रचनाकारों ने हमेशा मुझे यह देखने और समझने के लिए उकसाया कि किस तरह वे स्त्री की तयशुदा सामाजिक भूमिकाओं से अलग उसके अपने स्वत्व और उसकी अपनी सामाजिकता के सवाल उठा रही थी.  पितृसत्ता द्वारा की जा रही स्त्री के सामाजीकरण की प्रक्रिया को पहचानना एक मुश्किल और उतना ही बारीक समझ का काम है. इसे मन्नू भंडारी की ‘अकेली’ कहानी में उसकी पेंचदगियों और उससे बननेवाली टकराहटों के साथ अभिव्यक्त किया गया है. स्त्री के उपर थोपे गए समाज और सहज मानवीय जरूरतों से बनने वाले समाज के अंतर को यह कहानी बखूबी दिखा देती है, साथ ही यह भी दिखाने से नहीं चूकती कि स्त्री इस थोपे गए समाज के बरक्स अपना समाज रचने को लगातार उससे जूझती, टकराती और इस क्रम में अपनी दिमागी कंडिशनिंग को कुछ ढीला करती, व्यवस्था और उसकी नियमावली को प्रश्नांकित भी करती चलती है. सामाजीकरण की इस पूरी प्रक्रिया में की गई स्त्री की दिमागी कंडिशनिंग उसे इस बात के लिए तैयार करती है कि वह स्वयं ही यह मान ले कि उसके जीवन की सार्थकता मातृत्व में है और मातृत्व की महती उॅचाई प्राप्त कर लेने के बाद स्त्री का जीवन संपूर्ण और लक्ष्य समाप्त हो जाता है. इसे खो देने पर जीवन निरर्थक और समाज के लिए भविष्योन्मुखी न होने के कारण व्यर्थ हो जाता है. समाज ऐसे स्त्री जीवन को पग पग पर खारिज करता चलता है. यहाॅ यह ध्यान देना जरूरी है कि मातृत्व की पूरी अवधारणा मात्र पुत्र के संदर्भ में है, कन्या के जन्म को इसमें गिना नहीं गया है. इसलिए मातृत्व की यह अवधारणा अजीब तरह से पुंसोमुखी हो कर मनुष्यविरोधी बन जाती है.

 यह अवधारणा स्त्री के समूचे अस्तित्व को ढक कर उसे सीमित और दयनीय बना देती है. जबकि देखने की बात यह है कि भारतीय संस्कृति में इस मातृत्व का इतना गुणगान किया गया है और इसी मातृ पद के कारण उसे समाज में अत्यंत गौरवमय और काव्य में अत्यंत करूणामय, साथ ही महिमामय स्थान दे डाला गया है, परंतु व्यवहारिकता इसके उलट है. जिस मातृत्व को इतना विशिष्ट स्थान दे कर पितृसत्ता ने उसे अपने माथे पर मुकुट की धारण किया हुआ दिखाया, उसी माँ  को उसके ही बच्चों के सामने पिता किसी तरह का आदर न देकर लगातार अपमानित, लक्षित करता रहता है. ऐसे उदाहरण आप आए दिन अपने घरों में या आस पास देख सकते हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में यह दृश्य इतना आम हो चुका है कि किसी का ध्यान भी नहीं जाता कि यही वह महिमामय पद है, जिसके बिना स्त्री जीवन ही निरर्थक बना दिया जाता है, फिर इसकी ऐसी बे-कदरी ! यह इतना बड़ा झूठ उसके सिर पर थोप दिया गया और जब उसने इसे समझना शुरू किया तो उससे बड़ा अपराधी कोई नहीं ! यहां मेरे कहने का यह अर्थ कतई नहीं है कि माएं अपने पुत्रों को प्यार न करें या देखभाल न करें, बच्चे को प्रेम करना एक सहज स्थिति है और उसे सहज ही बने रहना चाहिए। अब दूसरी स्थिति देखिए, जहां इसी हमारे पौराणिक इतिहास की तमाम कहानियां यह बताती हैं कि यदि स्त्री ने पितृसत्ता की नियमावली का किसी भी प्रकार से उल्लंघन किया तो मातृत्व के गौरव से युक्त स्त्री को उसी की संतान के हाथों दंडित करवाया जायेगा. इस तरह संतान का पद पाने वाले पुत्र को माता को सजा देने की क्रूरता के लिए भी मानसिक रूप से तैयार कर देने की स्थितियाॅ पहले ही बता दी जाती हैं।

यह नृशंसता का भयानक उदाहरण है कि पिता के आदेश पर पुत्र माता का वध करे, पिता के आदेश पर पुत्र माता की जिह्वा काट ले आदि.  शायद यह पुरूष के भीतर, मां के लिए गहरे बैठी संरक्षकत्व की भावना को जड़ से उखाड़ फेंकने और स्वयं को मां  से अधिक वर्चस्वशाली की स्थिति में मान लेने का भाव पैदा करने के लिए भी रचा गया होगा और पुत्र के भीतर की कोमल भावनाओं को सुखा कर, तोड़ कर, उसे स्त्री के प्रति क्रूर, एक निर्मित समाज का हिस्सा बनने के लिए तैयार किया जाना भी होगा. इस तरह दिया गया मातृत्व का पद भी एक टिकाउ और विश्वसनीय पद नहीं बना रह जाता. चूॅकि पुत्री को दूसरे घर कन्यादान में दिया जाना है, इसलिए बचपन से ही उसे तरह तरह से अनुकूलित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है. स्त्री स्वत्व को कुचल देने की यह प्रक्रिया इतनी बारीक रही है और इतनी महिमा मंडित की जाती रही है कि बहुत छोटी लड़कियां  भी बिना बताए अपने जीवन को व्यवस्था के अनुरूप ढालने का श्रम शुरू कर देती हैं. उन्हें अपने जीवन का आदर्श स्वतः ही पूर्व पीढ़ियों से हस्तांतरित होता हुआ मिलता रहता है. यातना का आदर्श स्त्री के लिए जिस तरह से रचा गया है, मानसिक अनुकूलन से थोड़ा सा निकल कर देखने पर ही वह हैरान कर देने वाली अमानवीयता से भरा दिखाई पड़ेगा. ऐसे में स्त्री का अपना कोई समाज नहीं रह जाता. वह एक दिए हुए समाज में, उसी के अनुसार आचार व्यवहार करने के लिए तैयार की जाती है, ऐसा न करने पर विवश बनाई जाती है या बहिष्कृत की जाती है. ऐसी निर्मित स्त्री से उसका मनोवांछित समाज रच ले जाने की अपेक्षा करना थोड़ा ज्यादा लग सकता है. परंतु यह निर्मित स्त्री भी अपने प्रयत्नों में सहज सामाजिक संबंधों के निर्माण और निर्वाह की तरफ जाना चाहती है. जैसा कि हम उपर्युक्त कहानी की प्रमुख पात्र सोमा बुआ में देख सकते हैं.

दरअसल यह अनुकूलन प्रायः ही स्त्री को सुख और संतुष्टि की तरफ नहीं ले पाता. उसे तयशुदा जीवन के अगल बगल कुछ और चाहिए, जो उसकी आकांक्षा से जुड़ता हो, जो उसके मन के निकट हो, जिसमें उसके स्वत्व की भागीदारी हो, जिसमें मानवीय जीवन की बुनियादी गरिमा शामिल हो, उसकी बुद्धि और समझदारी की भी एक जगह बनती हो, इसी दुनिया के भीतर उसकी अपनी तरह की नितांत निजी और नितांत सामाजिक दुनिया भी हो. यह छटपटाहट तब और भी मुखर हो उठती है जब मातृत्व का पद उसके हाथ से जा चुका होता है और अब वह इस समाज के भीतर निरे खाली हाथ, समाज के गणित में शून्य साबित की गई की तरह खड़ी हो. तब नए सिरे से स्त्री अपने जीने की जद्दोजहद में राह बनाती सामाजिक संबंधों के निर्माण और निर्वाह की तरफ जाना चाहती है. वह समाज से अपने इस अतिरिक्त श्रम के एवज में अपनी पहचान और अपनी जगह की मांग करती है. यह समझते हुए भी कि यह समाज उसका बनाया नहीं है, वह इसी में अपनी जगह तलाशती, संबंधों को नए रूप में सिरजती, जीवन को अपने पक्ष में कर लेना चाहती है. यदि हम इस परिप्रेक्ष्य में सोमा बुआ को रख कर देखेंगे तो वे एक भौतिक प्राणी की प्रतिकूल बना दी गई परिस्थितियों के बीच की जा रही बेहद मानवीय कोशिशों की तरह पढ़ी जायेंगी.



मन्नू भंडारी की उपर्युक्त कहानी उनके दूसरे कहानी संग्रह ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’ में संकलित है. यह संग्रह सन् 1958 में प्रकाशित हुआ था. तात्पर्य यह है कि कहानी में वर्णित परिस्थितियाॅ साठवें दशक के उत्तरार्ध की अथवा उससे पहले की हैं किंतु स्त्री के लिए यह स्थिति कमोबेश आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है. सहज भाषा में रची गई यह कहानी पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना के भीतर अकेली बना दी गई स्त्री के साथ साथ समाज संरचना की बारीक पड़ताल भी एकदम चुपचाप तरीके से करती चलती है.  उपर्युक्त कहानी की प्रारम्भिक तीन पंक्तियाॅ स्त्री जीवन का पूरा समाजशास्त्र अपने में समेटे हुए हैं –
‘‘सोमा बुआ बुढिया हैं/ सोमा बुआ परित्यक्ता हैं/सोमा बुआ अकेली हैं.’’ स्त्री को अकेला बना देने के दो सबसे बड़े कारण यहाॅ दिए हुए हैं- ‘बुढ़िया और परित्यक्ता’. यदि दोनों एक साथ हैं तो यह अकेलापन कई गुना भारी है. तो क्या इन दोनों कारणों के नहीं होने पर स्त्री अकेली नहीं है? कुछ देर को यह भ्रम हो सकता है कि भरे पूरे परिवार के बीच स्त्री किसी भी प्रकार के अकेलेपन से दूर हो जायेगी, पर ऐसा है नहीं, क्योंकि पूरी संरचना स्त्री के विरूद्ध कुछ इस तरह से है कि वह कभी भी अकेली बना दी जा सकती है अथवा प्रायः ही अकेली है, असंगठित है, घर के भीतर भी और घर के बाहर भी. असंगठित होने के कारण अशक्त भी है और बेचारी भी. इसलिए यहाॅ उपर्युक्त दोनों शब्द स्त्री जीवन की समाजशास्त्रीय व्याख्या करने के लिए अपनेआप में प्र्याप्त हो जाते हैं.

पहला कारण है सोमा बुआ का बुढ़िया होना. ‘बुढ़िया’ हो जाने का अर्थ केवल शारीरिक रूप से अशक्त हो जाना भर नहीं है, क्योंकि हम पाते हैं कि सोमा बुआ लगातार सक्रिय हैं. बुढ़ापे के बावजूद वे लोगों के घरों में होने वाले बड़े बड़े आयोजनों में घरेलू कामों में उनकी मदद करने पूरे मन से पॅहुच जाती हैं. लोगों को उनकी मदद लेने में कोई गुरेज भी नहीं है, पर उनकी इस पूरे मन से की गई मदद अर्थात श्रमशीलता का कोई सम्मान नहीं दिखता. न ही स्त्री द्वारा इस किए गए अतिरिक्त श्रम से, स्त्री की कोई जगह समाज निर्धारित करता है. दरअसल ‘बुढ़ापा’ स्त्री जीवन को एक भिन्न अर्थ में भी अकेला करता है. वह स्त्री जीवन की अर्थवत्ता के लिए तय किए गए सौंदर्य के मानदंडों को ‘बुढ़ापा’ आते ही खो देती है, साथ ही संतानोतपत्ति की उपयोगिता भी. परिणामतः वह पुंसवादी समाज के लिए व्यर्थ मान ली जाती है. और उसका श्रम एक मजदूर अथवा दास के श्रम से अधिक नहीं गिना जा सकता है. इस तरह उसके श्रम का सदा ही अवमूल्यन किया गया. इसलिए अपनी तय सामाजिक भूमिका के नकार को मिटाने के लिए, वह जो अपने श्रम द्वारा संबंधों के निर्माण की तरफ जाना चाहती है, समाज उसे उचित सम्मान नहीं दे पाता. यद्धपि समाज उसके श्रम का उपयोग अपने लाभ के लिए कर लेता है परंतु मूल्यांकन करते समय उसे उसका उचित स्थान नहीं देना चाहता बल्कि श्रम की मानवीय गरिमा भी नहीं प्रदान करना चाहता है.

 सन् 1934 में ही महादेवी वर्मा ने अपने निबंध ‘हिंदू स्त्री का पत्नीत्व’ में बहुत साफ शब्दों  में भारतीय स्त्री की सामाजिक स्थिति की बात कह दी थी- ‘‘ भारतीय स्त्री की सामाजिक स्थिति का इतिहास भी उसके विकृत से विकृततर होने की कहानी मात्र है. बीती हुई शताब्दियां  उसके सामाजिक प्रासाद के लिए नींव के पत्थर नहीं बनीं, वरन् उसे ढहाने के लिए वज्रपात बनती रही हैं. फलतः उसकी स्थिति उत्तरोत्तर दृढ़ तथा सुंदर होने के बदले दुर्बल और कुत्सित होती गई.’’2. स्त्री श्रम, आज के आधुनिक समाज में भी एक जटिल स्थिति है. उसके श्रम का दोहन भी होता है और समाज उसे श्रमिक के रूप में मान्यता भी नहीं देता. यहां  तक कि उसके श्रम को अतयंत नगण्य की श्रेणी में डाल दिया जाता है. जबकि उसके हिस्से श्रम का अधिकतम भाग है. सीमान द बोउवा ने समाज के भीतर स्त्री श्रम की इस जटिलता पर गहराई से विचार किया और कामकाजी स्त्रियों की स्थिति को अधिक जटिल पाया. वे लिखली हैं कि ‘‘ फैक्ट्री में काम करने के कारण जो आर्थिक स्वतंत्रता उन्हें मिली है, उससे इनकी घरेलू जिंदगी का बोझ  कम नहीं हो जाता. उन्हें न समाज और न अपने पति से वह सहारा मिल पाता है, जिससे वे यथार्थ जीवन में पुरूष के बराबर हो सकें.’’3.

इसतरह समाज वृद्ध स्त्री के श्रम का दोहन करने के बावजूद उसे स्वीकरता नहीं है. लगातार उसका अवमूल्यन करता और उसके अपने सामाजिक संबंध निर्माण की प्रक्रिया को बाधित तथा खारिज करता चलता है. तथापि स्त्री की जीजिविषा और सामाजिक प्राणी होने का उसका प्रकृत्ति प्रदत्त दावा उसे इस विरूपता से टकराने के लिए उत्प्रेरित करता ही है. वृद्ध होने से उसका मनुष्य होना झूठा नहीं पड़ सकता. अतः बार बार लहूलुहान होकर भी वह मानवीय आकांक्षाओं से उतनी ही युक्त बनी रहती है और अपने परिश्रम से अपना समाज बनाना चाहती, जितना कोई भी सामाजिक प्राणी कहा जाने वाला मनुष्य चाहेगा. दूसरी स्थिति ‘परित्यक्ता’ की है. यह स्थिति पहली से भी भयावह है. ‘परित्यक्ता’ की स्थिति हीनतर स्थिति है. समाज द्वारा तय की गई सुरक्षा की गारंटी ऐसी स्त्री के हाथ से छिन चुकी है. वह निरूपाय और बेबस मान ली गई है, जबकि बेबस है नहीं. वह सोमा बुआ की तरह श्रमशील हो सकती है या आज की स्त्री की भाॅति आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर. यद्धपि आर्थिक आत्मनिर्भरता ने स्त्री को पहले से कुछ मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है और परित्यक्ता जैसी स्थिति में वह अपने जीवन को ठीक ढंग से जी सकने में सक्षम हुई है तथापि समाज में आज भी परित्यक्ता के लिए नकारात्मक सोच बनी हुई है.

 सोमा बुआ का समय तो साठ के दशक का पूर्वार्द्ध या उससे कुछ पहले का है जब स्त्री के लिए शिक्षा के द्वार तो खुल गए थे परंतु आजीविका के विविध साधनों में उनका प्रवेश नगण्य था। इसलिए अतिरिक्त श्रम के बावजूद सोमा बुआ की आजीविका का कोई बेहतर और नियमित प्रबंध एक समस्या ही है और सोमा बुआ की स्थिति प्रछन्न परित्यक्ता की है भी नहीं. वे अपनी आजीविका का इंतजाम जैसे तैसे करने में लगी रहती हैं परंतु उनके इस संघर्ष में एक और दुखद यर्थाथ जुड़ा है- पुत्र शोक का. उनके पति ने पुत्र के देहांत के बाद सन्यासी का जीवन अपना लिया था.हर साल एक महीने के लिए उनके पति, उनके पास आकर रहते थे. लेकिन पति के रहने पर उनका अकेलापन दूर होने की बजाय और बढ़ जाता था. कारण कि ‘‘ पति के स्नेह हीन व्यवहार का अंकुश उनके रोजमर्रा के जीवन की अबाध गति से बहती स्वच्छंद धारा को कुंठित कर देता. उस समय उनका घूमना, फिरना, मिलना जुलना बंद हो जाता और सन्यासी जी महाराज से तो यह भी नहीं होता कि दो मीठे बोल बोल कर सोमा बुआ को एक ऐसा संबल ही पकड़ा दें, जिसका आसरा ले कर वह उनके वियोग के ग्यारह महीने काट दें.’’ 4.पति के साथ दुख बाॅटना भारतीय समाज में प्रायः एक कल्पित स्थिति है. यद्धपि आज कहीं कहीं बहुत नगण्य
ही पर स्थिति कुछ बेहतर की तरफ बढ़ी है परंतु अब भी मित्रता की सुखद स्थिति में नहीं पॅहुच पाई है.

 दूसरे  बुआ के सन्यासी पति की उपस्थिति में उनकी जीवन गति का निषेध हो जाता है. उनका घूमना, फिरना, मिलना जुलना बंद हो जाता है अर्थात जिंदगी ठहर कर सन्यासी जी के इर्द गिर्द केन्द्रित हो जाती है. सामाजिकता से कट जाना और पति का संग साथ भी न मिल पाना दुखी और अकेली सोमा बुआ के लिए कितना बोझिल बन जाता है, इससे सन्यासी जी को कोई सरोकार नहीं है. बल्कि किसी न किसी बात पर ताने मार कर वे, उन्हें नियन्त्रित करने का प्रयत्न भी वे करते ही रहते हैं। पति के जाते ही सोमा बुआ की दिनचर्या का यह रूका बाॅध टूट जाता है और आस पड़ोस के सुख दुख में शामिल हो कर अपना जीवन काटने की कोशिश करने लगती हैं. पति के संग का यह दुखद यर्थाथ भारतीय दाम्पत्य के खोखले आदर्श के रेशे उधेड़ देता है। इस दुःसह पति संग और पुत्र वियोग दोनों को भुलाने का उपाय भी बुआ के पास अपने श्रम के बल पर समाज में शामिल होने के प्रयत्न में छिपा है. इसके लिए वे किसी पास पड़ोस के बुलावे का इंतजार नहीं करतीं. अपने घर के न रहने पर पूरा मोहल्ला उनका घर है. बिन बुलावे के उनकी यह उपस्थिति बड़ी मर्मभेदक है.

 यह स्त्री की, समाज के भीतर जीने की बेहद मानवीय इच्छा है. इसलिए बुलावा न भेजने पर वे पड़ोस को माफ करती रहती हैं और उपाय भी क्या है? यह माफ कर देना एक तरह से स्वयं को दिलासा देना है कि सामाजिक उपेक्षा दरअसल जानबूझ कर नहीं की गई है. इस दिलासा में वे अपना होना भी खोजती चलती हैं – ‘‘ बेचारे इतने हंगामे में बुलाना भूल गए तो मैं भी मान करके बैठ जाती ?….. मैं तो अपनेपन की बात जानती हूँ ….. आज हरखू नहीं है इसी से दूसरों को देख देख कर मन भरमाती रहती हॅू.’’ 5. और बुआ राधा भाभी के आगे फूट फूट कर रो पड़ती हैं. यह रो पड़ना बुआ के भीतर गहरे धंसे सामाजिकता के खोखले सत्य को खोल देता है. अर्थात बुआ के आगे उपेक्षा का यह यर्थाथ भ्रमात्मक नहीं है. लाख उपेक्षा के बावजूद यह पास पड़ोस ही है, जो बुआ के जीने का सहारा है न कि पति का संग साथ. पति की दुनिया एक समानान्तर संसार है, जिसमें पत्नी की जगह नहीं है. परंतु गृहिणी धर्म में उनकी जरा भी लावरवाही सन्यासी जी को बर्दाश्त नहीं है.

भारतीय दर्शन में वैराग्य एक ऐसा यूटोपिया है, जो सबसे पहले पुरूष के निकट स्त्री सत्य को वज्रय बनाता है।.इसतरह एक बड़े सामाजिक यर्थाथ के बीच बनने वाले उत्तरदायित्व से पुरूष को मुक्त कर देता है. इसी के साथ पितृसत्ता का वह आत्मविश्वास भी उन्हें प्राप्त है जो समाज के बीच बुआ के प्रयत्नों को उपहास्यास्पद और अंततः व्यर्थ मान कर चलता है. वे वैरागी जरूर हैं पर खासे दुनियादार भी हैं. समाज को अच्छी तरह समझते तो हैं पर मनुष्य के सुख दुख में शामिल नहीं होना चाहते. बल्कि संयास ले कर पुत्र शोक से उत्पन्न यथार्थ की समस्याओं से भी भागते हैं. अपने दुख को वे संयास की महिमा से मंडित कर के जी रहे हैं और सोमा बुआ का दुख ? इसके लिए उनके पास सांत्वना का कोई शब्द नहीं है.  इस तरह घर और समाज दोनों तरफ से बुआ के हिस्से में अकेलापन ही आता है. इस अकेलेपन से जूझती बुआ क्या समाज के बीच अपनी पूर्णता को खोजना चाहती हैं ? या कि समाज द्वारा प्रदत्त मातृत्व पद में स्त्री की अंतिम परिणति को खो देने के कारण अपनी अपूर्णता को ढकने की कोशिश में लगी हुई हैं ? समाज का व्यावहारिक गणित ऐसी स्त्री में कोई भविष्य नहीं देखता, जो परित्यक्त है और जिसका पुत्र नहीं रहा. क्या सोमा बुआ ऐसी ही प्रदत्त सामाजिकता की शिकार नहीं हैं ? फिर सोमा बुआ की इन कोशिशों के परिणाम क्या निकल सकेंगे ?

मुझे बार बार ऐसा लगता है कि सोमा बुआ अपनी इन कोशिशों से लगातार एक निहायत मानवीय और अपना मनचीता समाज, जिसमें स्त्री सहज, स्वाभाविक रूप से अपने व्यक्तित्व के साथ शामिल हो सके, रच डालने की जिद में लगी हैं. यह जिद उन्हें कई बार बेचारा बना डालती है पर हर बार व्यवस्था के विरूद्ध, स्त्री के लिए तय कर दी गई सामाजिकता के विरूद्ध और उसके जीवन की निर्मित की गई सामाजीकरण की प्रक्रिया के  विरूद्ध  भी उन्हें खड़ा कर देती है. उनकी इन कोशिशों में लगातार हार है, परंतु यह हार उन्हें फिर भी समाप्त कर डालने तक नहीं पहचानती बुआ, जो अपना बेटा खो चुकी हैं, अपने पति द्वारा त्याज्य जैसी स्थिति में हैं, समाज उन्हें बार बार तिरस्कृत करता है, फिर भी क्या है, जो उन्हें हर बार पिछले को भूल कर नई कोशिशों के लिए तैयार कर देता है ! वे दुख की नदी में अपने को डूब मरने के लिए नहीं छोड़तीं. लगातार अपने को सामुदायिक हलचलों से जोड़े रखती हैं. यहां  वे, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के समाज के भीतर किए गए महत कर्म को बड़ा तप मानने जैसे तर्क के साथ बड़ा तप करती दिखती हैं. ‘‘एकांत का तप बड़ा तप नहीं है. समाज में जाओ.’’ आचार्य जी की यह बात बुआ पर खरी उतरती है. इसीलिए तो एक धक्के केे कोई सप्ताह भर बाद ही वे जीवन से फिर जुड़ जाती हैं और प्रसन्न मन से संयासी जी से कहती हैं -‘‘ सुनते हो, देवर जी के ससुरालवालों की किसी लड़की का संबंध भागीरथ जी के यहां हुआ है. वे सब लोग यहीं आ कर ब्याह कर रहे हैं. देवर जी के बाद तो उन लोगों से कोई संबंध ही नहीं रहा, फिर भी हैं तो समधी ही. वे तो तुमको भी बुलाये बिना नहीं मानेंगे. समधी को आखिर कैसे छोड़ सकते हैं?’’ और बुआ पुलकित हो कर हंस  पड़ीं.’’6.

 यह है बुआ के भीतर गहरे पड़े दुख में भी सांस लेने की इच्छा. जीवन का उत्साह, उमंग, इच्छाएं, हरा भरा सब दबा पड़ा है उनमें. वे कुछ देर को अपना दुख भूल कर, दूसरों के सुख में प्रसन्न हो जाने की सामर्थ्य रखती हैं पर संयासी जी नहीं. इन्हीं छोटे छोटे क्षणों में उनके भीतर का दबा कुचला जीवन अपनी झलक दिखला जाता है. शादी में जाने की तैयारी का हुलास बुआ में भी कम नहीं है- ‘‘ गली में बुआ ने चूड़ीवाले की आवाज सुनी तो एकाएक ही उनकी नजर अपने हाथ की भद्दी चूड़ियों पर जा कर टिक गई. कल समधियों के यहां जाना है, जेवर नहीं है तो कम से कम काॅच की चूड़ी तो अच्छी पहन ले. पर एक अव्यक्त लाज ने उनके कदमों को रोक दिया, कोई देख लेगा तो. लेकिन दूसरे ही क्षण अपनी इस कमजोरी पर विजय पाती सी पीछे के दरवाजे पर पॅहुच गईं और एक रूपया कलदार खर्च कर के लाल हरी चूड़ियों के बंद पहन लिए. पर सारे दिन हाथों को साड़ी के आंचल से ढके-ढुके फिरीं.’’ 7. स्त्रीत्व, मातृत्व और पत्नीत्व से अलग है. बुआ का लाल हरी चूड़ियों के बंद पहन कर शादी में जाने की तैयारी के लिए मन ही मन उत्साहित होना, साड़ी पीले रंग में रंगना और राधा भाभी से पूछना कि -‘‘ क्यों राधा, तू तो रंगी साड़ी पहनती है तो बड़ी आब रहती है, चमक रहती है, इसमें तो चमक आई नहीं ?’’ 8. शादी में दिए जाने वाले सामान की तैयारी करना आदि उनके भीतर की स्त्री से परिचित कराता है, जो सारे दुखों, उपेक्षाओं, तिरस्कार के बावजूद स्त्री है और विवाह में शामिल होने की अपनी बेहद सामान्य सी हुलस को ; जो कि सोमा बुआ जैसी स्त्रियों के लिए स्वीकृत नहीं है द्ध रोक नहीं पाती हैं.

यहां लेखिका ने कहानी को स्त्री के व्यक्तिगत दुख की परिधि से निकाल कर सत्रीत्व की व्यापक परिधि में खड़ा कर दिया है. किंतु यथार्थ यह है कि परित्यक्त और पुत्र शोक से ग्रस्त स्त्री के लिए जीवन की यह हरियाली समाज में छिपाने की बात है. बुआ इस छिपाने में भी कैशोर्य लज्जा का भान करा जाती हैं. बुआ को अपना मन उस समाज से छिपाना है, जिसमें शामिल होने की इच्छा के आगे समर्पित हो कर उन्होंने अपने पुत्र की एकमात्र निशानी सोने की अंगूठी को बेच दिया है. चूॅकि यह अंगूठी पुत्र की निशानी के साथ साथ उनका एकमात्र धन भी है, इसलिए समधी को रस्म के तौर पर कुछ देने का यह प्रयास, समधी को देने से ज्यादा अपने लिए कुछ पा लेना है या अपने एकांत को कुछ भर लेना अधिक है. नहीं तो राधा भाभी का सुझाया विकल्प तो था ही -‘‘ तो जाओ ही मत. चलो, छुट्टी हुई. इतने लोगों में किसे पता लगेगा कि आई या नहीं.’’ 9. पर यह विकल्प बुआ को स्वीकार्य नहीं है. फिर इस विकल्प से तो पही होना है जो स्त्री के लिए तय किया गया है. इसतरह स्त्री छूटती चली जाएगी और अपने प्राणघातक एकांत में कैद होकर रह जाएगी। बुआ को इससे इंकार है.

आखिर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो स्त्री भी सामाजिक प्राणी है. परंतु पितृसत्तात्मक संरचना के भीतर उसे उनकी शर्तों पर शामिल होना है न कि मनुष्य होने के कारण. परिणामतः कदम कदम पर उसे निषेधों से जूझना है. और चूॅकि वह मनुष्य है इसलिए एक अदद अपने समाज की उसकी इच्छा अंततः नहीं मरती. सोमा बुआ की भी यह इच्छा अंततः बची रह जाती है, जो उन्हें बार बार की निराशा में भी उठा कर खड़ा कर देती है. हांलाकि इस बार हरखू की एकमात्र निशानी को नातेदारी में होने वाली शादी के उपहार पर न्यौछावर कर देने के बाद बुलावे के इंतजार में छत पर खड़ी बुआ, जो समधियों के यहां बिना बुलावे के नहीं जा सकती थीं, जिस तरह संयत बने रहने की कोशिश करती हैं और अपने निकट पसरे यथार्थ को स्वीकार कर अपनी दिनचर्या में लौटती हैं, वह विचलित करने वाला है और कोई भी सहृदय पाठक यहां  पहुंच कर बुआ से फिर उठ खड़े होने की अपील करने से अपने को शायद ही रोक पाए

संदर्भ 

1. मन्नू भंडारी की चुनी हुई कहानियाॅ, अकेली, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 29
2. श्रृंखला की कड़ियाॅ, महादेवी वर्मा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 76
3. स्त्री: उपेक्षिता, सीमोन द बोउवा, अनुवाद – प्रभा खेतान, पृ. 318
4. मन्नू भंडारी की चुनी हुई कहानियाॅ, अकेली, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 29
5. वही, पृ. 31
6. वही, पृ. 31
7. वही, पृ. 33
8. वही, पृ. 34
9. वही, पृ. 33

इक्कीसवीं सदी का कचरा यानी टिक टिक करता टाइम बम

गरिमा भाटिया

केमिकल इंजीनियरिंग में पी च डी. नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन में कार्यरत. प्रकृति से गहरा लगाव और फोटोग्राफी से भी. ई मेल- garima_bhatia@yahoo.com

पिछले कुछ वर्षों से निश्चिरूप से पर्यावरण के बारे में जागरूकता काफी बढी है और यह शुभ संकेत है – विशेषकर भारत जैसे आबादी बहुल देश के लिए , जहाँ कृषि और उद्योग के कारण धरती पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है और इस दबाव के दुष्प्रभाव  खतरनाक होते है. ऐसी स्थिति में पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से लेने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढी के लिए हम अपने इस सबसे सुंदर ग्रह पृथ्वी को सुरक्षित रख सकें.
एक पुराना जुमला है- ‘We do not inherit the Earth from our ancestors ;
we borrow it from our children!’ धरती हमारे पुरखों की अमानत नही है बल्कि हमारे अपने बच्चों का कर्ज है हमपर. हमारा हर एक छोटा कदम हमारी धरती और इसके भविष्य को प्रभावित करता है. अगली पीढ़ी के लिए यह हमारा कर्तव्य है कि अपनी पीढ़ी के द्वारा पैदा की गई समस्यायों को सुलझाएं. आइये , इस संदर्भ में हम अपने आसपास के पर्यावरण का और धरती के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का आकलन करे.आमतौर पर, पर्यावरण पर हमारी चर्चा शहरों के प्रदूषण और स्वच्छता को लेकर शिकायत के तहत होती है कि कैसे हर छोटी से छोटी जगह कूडे-कचरे से अंटी पडी है. हम फुटपाथ पर चल रहे हैं और वहां केले संतरे के छिलके , कागज और चॉकलेट बिस्कुटों के प्लोस्टिक रैपर हवा में उड रहे हैं, रिहायशी इलाकों में सडक के किनारे किनारे कूडे कचरे का गंधाता ढेर लगा हुआ है, सरकार और म्यूनिसिपैलिटी इसे नियंत्रित करने के लिए कितना कम प्रयास कर रही है और हम नाक पर रूमाल दबा कर आगे बढ जाते है. अगर हम एक पल रूककर इस पर सोचें तो पाएंगे कि ऐसा बहुत कुछ है जिसे एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम स्वयं करके स्थिति को बेहतर बना सकते है.
आइये, हम अपने समय की गंभीर समस्याओं में से कुछ की जांच पडताल करें जिन्हें छोटे स्तर पर ही सही लेकिन गंभीरता से किये गये महत्वपूर्ण प्रयासों से हम दूर कर सकते है.

कितनी प्लास्टिक थैलियां दिन में लेते हैं हम ?

आप रोज सब्जियां या फल खरीदने जाते हैं और हर बार अपने घर से कपडे की थैली या एक झोला लाना भूल जाते हैं, सब्जीे वाला धडाधड एक एक सब्जी अलग अलग प्लास्टिक की थैलियों में बांधकर आपको पकडा देता है , घर आते ही मिनट भर में यह प्लास्टिक कचरे का हिस्सा बन जाता है. आप बडे बडे मॉल से सामान खरीदते हैं, दाल से लेकर मसालों तक सबकुछ आपको प्लास्टिक की थैलियों में सील किया हुआ मिलता है. कई मायनों में सुविधाजनक लगने वाले प्लास्टिक और प्लास्टिक की पैकेजिंग ने हमारे आधुनिक जीवन को बीमार बना दिया है. प्लास्टिक एक ऐसी चीज़ है जिसे पूरी तरह नष्ट होने में एक हजार साल लग सकते है. फिर भी हम इसका अंधाधुंध इस्तेमाल करते हैं और इधर-उधर  सड़क पर फेंक देते हैं जिसके खाने से सड़क चलती भूखी गायों की दर्दनाक मौत हो जाती है. ऐसे कई हादसों  में गायों की आंतों से पंद्रह से पैंतीस किलो प्लास्टिक निकाला गया. अगर गाय इसे नहीं खाती तो यह इधर उधर फैले रहते है. इसमें व्याप्त रसायन भूजल में रिस जाते हैं जिससे पानी जहरीला हो जाता है और कई तरह के रोग फैलने लगते है. भारी बरसात में प्लास्टिक से अक्सर नालियां जाम हो जाती है. यदि प्लास्टिक प्रबन्धन पर ध्यान दिया गया होता और मीठी नदी ,जिसमें मुंबई का बरसाती पानी प्रवाहित होता है, प्लास्टिक से जाम न हुई होती तो मुम्बई में सन् 2005 की मूसलाधार बारिश का इतना खतरनाक दुश्प्रभाव न होता. ऐसी समस्याओं की सूची बहुत लंबी है. प्लास्टिक का कचरा इतना खतरनाक है कि सुप्रीम कोर्ट को अन्ततः यह कहना पड़ा कि यह ‘टिक टिक करता हुआ टाइम बम’ है जिस पर शहरों के नागरिकों को तत्काल ध्यान देने की सख्त जरूरत है.

प्लास्टिक के बैग जिनका उपयोग हम सब्जी आदि खरीदने में करते हैं और काम पूरा होते ही उसे फेंक देते हैं, पर्यावरण के असल अपराधी है.  जिन प्लास्टिक बैग पर बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का लेबल लगा हो उसे पर्यावरण फ्रेंडली मान कर भ्रमित नही होना चाहिए. यह भी आम प्लास्टिक जितना ही खतरनाक है. बिना सोचे समझे प्लास्टिक के बैग इकट्ठे करते जाने से बेहतर है कि जब भी सौदा सुलुफ खरीदने आप बाहर निकलें तो एक कपड़े का झोला साथ ले लें ताकि प्लास्टिक के भयावह उपयोग से बचा जा सके. अगर आपके पास कोई बैग नहीं है तो किसी भी दर्जी से , घर के बचे हुए कपडे से , ऐसा बैग सिलवाया जा सकता है. इसके अलावा तहा कर रखने वाले कुछ उपयोगी बैग होते हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल और देखने में सुन्दर होते है.  ऐसे बैग उन कामगार ग्रामीण औरतों को फायदा पहुंचाते हैं जो उन्हें बनाती हैं. पांडिचेरि के एक गैर सरकारी संगठन – स्माॅल स्टेप्स द्वारा एक शुरुआत की गई है। यह संगठन ऐसा झोला बनाता है जिसे तहाकर पर्स में रखा जा सकता है. इसमें एक हुक लगा होता है जिससे इसे आसानी से बेल्ट में भी लगाया जा सकता है. ऐसा झोला मैं हमेशा अपने साथ रखती हूं , कुछ मेरी गाडी में भी पड़े रहते है. मैं बिना इस कपड़े वाले बैग के कभी बाजार नही जाती. इस संस्था ने मुझे यह नायाब सौगात दी है. मैं अपनी मित्रों को भी इन्हें उपहार में देती हूं.

कचरा – नाॅट इन माय बैकयार्ड सिंड्रोम

हममें से जो लोग शहरों में रहते हैं ,उनकी सोच कचरे को लेकर कुछ अजीब सी होती है. वे मानते हैं कि बस मेरे घर के आंगन में कचरा दूर रहे. ( अंग्रेजी में इसे NIMB सिंड्रोम कहते हैं – नॉट इन माय बैकयार्ड ) हम काले रंग की प्लास्टिक की थैली में अपना गंधाता कचरा डाल देते हैं और देख नहीं पाते कि उसके अंदर क्या है. एक बार जैसे ही यह कचरा और दुर्गंध हमारे घर से बेदखल कर दिया जाता है,  उसके बाद इस कचरे का क्या हश्र होता है, यह सोचना न हमारे सरोकार का हिस्सा है, न हमारी जिम्मेदारी में शामिल है. बेशक यह किसी और की समस्या बन जाए, उससे हमें फर्क नहीं पडता. हम यह जानना ही नहीं चाहते कि आगे इस का क्या होता है. हमारे लिये यह बडे इत्मीनान से किसी और की समस्या बन जाता है. हमारे अपने शहरों में बिखरा कचरा कितना खतरनाक हो सकता है, इस विषय पर हम कभी विचार नहीं करते जबकि हम स्वयं इस शहरी गन्दगी का एक हिस्सा है. क्या हम इस समस्या का एक हिस्सा है ? जवाब है – हां ! शत प्रतिशत ! फिर इन स्थितियों को बदला कैसे जाए ? जबकि इससे हमारे हाथ गन्दे हो रहे है. इसके समाधान के लिए सरकार या नगरपालिका का इंतजार करना गलत है. समय आ गया है कि हम अपनी नागरिक जवाबदेही को समझते हुए इसको निपटाने की जिम्मेदारी खुद ले. इसके लिये सबसे पहली जरूरत है कि हम यह जानने और समझने की कोशिश करें कि कचरा जब हमारे घर से बाहर जाता है तो इसका होता क्या है. हमें अपने घर के कचरे की जिम्मेदारी खुद लेनी चाहिए जो हमारा पैदा किया हुआ है. जो कचरा हमारे घरों से आता है – वह गांव या शहर के बाहर की खाली जमीन पर फेंका जाता है ,जिसके आसपास रहने वाले वाशिन्दों को हर तरह से नुकसान पहुंचता है.

इस्तेामाल कर फेंके गये अंधाधुंध प्लास्टिक, जैवप्रदूषक, मिश्रित कचरे से पैदा हुए रसायन – केमिकल्स – कई तरह की बीमारियां पैदा करते हैं और जमीन की तलहटी मे पानी के साथ मिलकर पीने के पानी तक को प्रदूषित कर देते हैं. ऐसा पानी न घरेलू इस्तेमाल  लायक रहता है, न पीने लायक. जिनके घरों के नजदीक कूड़े का विशालकाय ढेर पूरे पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है, वहां के वाशिंदे बताते हैं कि जहां पहले चिडियां चहचहाती थीं और साफ़ सुगंधित हवा बहती थी,  अब एक परिंदा भी उस जमीन पर नहीं दिखता. वे भी उड़कर साफ हवा और हरे भरे वातावरण में चले जाते हैं, पर वहां के इंसान कहां जाये. उन्हें तो उसी प्रदूषण में रहना पडता है. उनकी तो कहीं सुनवाई तक नहीं है. इस दुष्चक्र को बदलने के लिए हमें कचरे के प्रति अपनी मानसिकता बदलनी होगी. वस्तुतः जिसे हम खराब कहकर अपदस्थ कर देते हैं, उसमें से कचरा कुछ भी नहीं होता. फेंकी जाने वाली हर चीज का मूल्य होता है. जो खाद्य पदार्थ – केले, पपीते, फलों और सब्जियों के छिलके हम फेंक देते हैं, उन्हें पेड-पौधों के उपयोग में आने वाली बेशकीमती खाद के रूप में तब्दील किया जा सकता है. इन छिलकों को अगर हम घर के एक गमले में मिट्टी की तहों से दबाकर रखें तो तीन से चार सप्ताह के अंदर यह तथाकथित कचरा कीमती खाद में बदल जाता है जो पूरी तरह आॅर्गेनिक और पेड़ पौधों के लिये प्राणदायक है. प्लास्टिक और कागज हम यूं ही फेंक देते हैं, उसे भी रीसाइकल कर फिर से उपयोग में लाया जा सकता है, लेकिन उन्हें अगर खाने के अपशिष्ट पदार्थ से मिश्रित कर दिया गया तो आसानी से उसे रीसाइकल – पुनसंस्कारित – नही किया जा सकेगा.

कचरा हमारी संपति बन सकता है….


इसलिये अगर हमें कचरा प्रबंधन में जिम्मेददारी बरतनी है तो हमें अपने घर का कचरा इस तरह अलगा कर रखना होगा कि वह बाहर जाकर भी एक समस्यां और परेशानी का बायस न बने. हालांकि यह थोड़ा विचित्र लगता है लेकिन है बहुत ही आसान. अपनी रसोई में सिर्फ दो डस्टबिन रखें – एक जैवअपशिष्ट पदार्थों जैसे- तरकारी,छिलके,खुरचन,बचे हुए खाद्य अपशिष्ट एवं दूसरा सूखे पदार्थों जैसे- कागज,प्लास्टिक,धातु , पन्नी, खाद्य पैकेजिंग के रैपर. सूखे और गीले कचरे को अलग रख कर इस स्थिति से निपटा जा सकता है. सूखा कचरा किसी भी स्थानीय कबाड़ी वाले को दिया जा सकता है. आजकल  कई शहरों में ड्राई अपशिष्ट पदार्थों के लिए घरेलू संग्रह कार्यक्रम भी आयोजित किये जा रहे  है. आईटीसी इस तरह की एक कंपनी है जो, ‘‘बेकार से बहुमूल्य’’ या ‘‘कचरे से संपत्ति’’( Small Steps)जैसा कार्यक्रम चलाती है जिसमें रिहायशी इलाकों से सूखा सामान एकत्र किया जाता . इनको रीसाइकल कर वह अपने उपयोग के लिये इस्तेमाल करती है, और प्लास्टिक दूसरी कम्पनी को बेच देती है जो फेंके गये प्लास्टिक से कोलतार बनाते है, सोच कर देखें अगर आप के इस्तेमाल किये गये प्लास्टिक की तरह ही पूरे शहर में बिखरे हुए सारे प्लास्टिक का इतना ही उपयोगी इस्तेमाल हो पाता.

महिलाएं और सेनेटरी नैपकिन्स –

क्या आपने कभी सोचा है कि आप जो सेनेटरी पैड इस्तेमाल करती हैं और बाद में उसे फेंक देती हैं,उसका क्या होता है ? एक आंकड़े के अनुसार एक स्त्री अपने जीवन में औसतन 125 किलोग्राम सेनेटरी पैड का इस्तेमाल  कर डालती है. इसके फेंके या जलाए जाने से यह हानिकारक रसायन छोड़ता है. वास्तव में सेनेटरी पैड भी प्रमुख रूप से प्लास्टिक का बना होता है. एक पैड को पूरी तरह नष्ट होने में 500 साल या इससे अधिक साल लग जाते है. सेनेटरी पैड के अधिक स्वच्छ और इको फ्रेंडली – पर्यावरण स्नेही – विकल्प उपलब्ध है.  पांडिचेरी में इको फेम नाम का एक समूह है जो ग्रामीण स्त्रियों को धोने और दोबारा उपयोग मे लाए जाने योग्य सेनेटरी पैड बनाने का काम देकर उनको रोजगार देती है.

इलेक्ट्रॉनिक कचरे का निपटारा कैसे करें ?

प्रदूषण का एक अन्य प्रकार भी है, जो इलेक्ट्रानिक अपशिष्ट या ई-अपशिष्ट कहलाता है. जिसमें कोई भी इलेक्ट्रानिक सामान, जैसे-लैपटाप, पेनड्राइव, डीवीडी, फ्लापी डिस्क, सीएफएल बल्ब और ट्यूबलाइट आदि  शामिल है. दो कारणों से इन अपशिष्ट को अधिक महत्व देना जरूरी है – पहला , आजकल बड़ी संख्या में इलेक्ट्रानिक सामग्रियों का उपभोग हमारे द्वारा किया जाता है , दूसरा इन इलेक्ट्रानिक उत्पादों में बेहद विषाक्त रसायन होते हैं , जैसे सीसा और पारा ,जो स्वास्थ्य को जबरदस्त क्षति पहुंचाते है.  इनकी वजह से बच्चे जन्म से ही असामान्य या विकलांग पैदा होते है. इसलिए इस अपशिष्ट  का उचित निपटारा बहुत जरूरी है. कुछ शहरों में इन अपशिष्टों के पुनर्चक्रण का काम भी हो रहा है. घरेलू स्तर पर इन्हें फेंकते समय हम ध्यान रखें कि खाद्य सामग्री और ई-कचरा अलग-अलग रखा जाए. अगर आपने टूटा हुआ थर्मामीटर या फ्यूज हुआ बल्ब कचरे में मिला दिया तो उसका जहर पूरे कचरे को विषाक्त कर देगा और ऐसा कचरा कहीं भी डाला जाये वह अन्ततः प्रदूषित माहौल में जबरदस्त बढ़ोतरी करेगा.

पीने का पानी और बोतलबन्द पानी

पानी ही है जो हमारी सुंदर पृथ्वी को जीवन प्रदान करता है. प्रकृति द्वारा यह हमें बहुतायत में यह निःशुल्क प्राप्त है लेकिन इन दिनों शहरों मे पानी की किल्लत आम बात है. कुछ लोगों का मानना है कि अगला विश्व- युद्ध पानी के लिए ही होगा. कई इलाकों में पानी को लेकर राजनीति तेज हो गई है.  कई देश और राज्य पानी के वितरण को लेकर आपस में लड़ रहे है.  हम सब जानते हैं कि पृथ्वी का 70 प्रतिशत हिस्सा पानी ही है. अधिकांश भाग समुद्र होने के कारण यह पानी खारा होता है और पीने लायक नही होता. इसलिए पानी की बचत और शुद्धीकरण आवश्यक है, बोतलबंद पानी प्लास्टिक कचरे की बढ़ोतरी में इजाफा करता है और गैर जिम्मेदाराना ढंग से प्लास्टिक की बोतलों को फेंकने से अक्सर गंभीर समस्या उठ खड़ी होती है. अगर आप हिमालय की यात्रा पर निकलें तो प्लास्टिक की बोतलों का विशालकाय ढेर आसपास के प्राकृतिक सौंदर्य को बिगाड़ता हुआ दिखाई देगा. हाल ही के एक अध्ययन में मालूम हुआ कि प्रशान्त महासागर में, मानव आवास से दो हजार किलोमीटर की दूरी पर एक सुदूर द्वीप पर ढेर सारे परिन्दे मृत पाए गए और उनके पेट में प्लास्टिक की बोतलों के ढक्कन और नुकीले कांच थे. अन्य अपशिष्ट सागर में कहीं दूर बह गए होंगे. सच तो यह है कि बोतल बन्द पानी एक नया फेनॉमिना है और निश्चित रूप से एक अनावश्यक खरीद. आखिर हम इतने बडे स्तर पर बोतल बन्द पानी के आदी कैसे हो गए ! ज्यादातर रेस्तरां और होटलों में फिल्टर या एक्वागार्ड लगे होते हैं फिर भी वेटर को बोतल बन्द पानी ऑफर करने की जल्दी रहती है. कारण साफ है — आर्थिक मुनाफा. जो चीज होटलों और रेस्तरां को मुफ्त में देनी चाहिये उसकी भी वे कीमत वसूल करना चाहते है. बोतलबन्द पानी बेचने वाली कम्पनियां भी इसे प्रोत्साहित करती हैं क्योंकि उन्हें मुफ्त में पब्लिसिटी मिल जाती है.

हम शायद इस तथ्य से वाकिफ नहीं हैं कि इन कम्पनियों पर आरोप है कि वे धरती से अधिक पानी निकाल लेती हैं जिससे गांव में रहने वालों के खेतों की सिंचाई के लिये पानी कम पड जाता है.  बोतलबंद पानी की फैक्ट्रियों से बढ़ता प्रदूषण भी हमारे सरोकार का हिस्सा है. गांव वाले अपने सिंचाई के अधिकारों के लिये संघर्ष कर रहे है. इन तथ्यों की जानकारी आम आदमी को न हो इसके लिए ये कम्पनियां बड़ी रकम खर्च करती है. जनता को गुमराह करने के लिये हरित वातावरण स्रजन की छवि का छद्म परोसा जा रहा है. जितनी बार हम बोतलबन्द पानी की खरीद करते हैं, एक गलत प्रवृत्ति का समर्थन और गांव के खेतों के सिंचाई अधिकारों का हनन करते है. इसका समाधान आसान है ! जहाँ भी हम जाएं, हमारे साथ पानी की एक बोतल हो, और जब भी संभव हो हम इसे फिर से भर ले. प्लास्टिक की बेहिसाब खाली बोतलें फेंकने में इजाफ़ा न करे.

अपने बगीचे में अपनी बनाई खाद डालें – गृह खाद और पर्यावरण

हममें से सभी का यह कर्तव्य है कि थोड़े से प्रयास द्वारा हम अपनी खूबसूरत पृथ्वी को बचायें और जो कुछ भी न्यूनतम हमारे लिये संभव है , जरूर करे.  इस क्रम में पर्यावरण को तात्कालिक सुरक्षा देने के लिए सबसे जरूरी है – गृह खाद. खाद-निर्माण और कुछ और नहीं बल्कि कार्बनिक और बायोग्रेडेबल (जैवअपघटक) पदार्थों जैसे- खाद्य, सब्जी और फलों के छिलके, स्क्रैप, चिकन मछली की हड्डियों आदि को पोषक-युक्त खाद बनाना है ताकि इनका उपयोग हमारे पौधों और बागीचों में किया जा सके. खाद-निर्माण एक प्राकृतिक प्रक्रिया है. सूक्ष्म जीवों द्वारा समय के साथ , अपने आप ही होता है. घर पर कम्पोस्टिंग की प्रक्रिया किसी बड़े बर्तन में या कम्पोस्ट बनाए जाने वाले गडढे में या मिट्टी के हंडे में की जा सकती है. सबसे आसान और पापुलर गृह कम्पोस्ट यूनिट बैंगलोर का डेली डम्प यूनिट है, जो कम्पोस्ट बनाने वाले पाॅट ‘हंडे’ का निर्माण करता है और बेचता भी है. ये बड़े आकार वाले मिट्टी के बर्तन होते हैं जिनके ऊपर खूबसूरती से पेंट किया जाता है. देखने में भी ये आकर्षक होते है. इसमें असानी से कम्पोस्ट बनाया जा सकता है. इसके निर्माण में कोई दुर्गन्ध नही होती और इस तरह आप पर्यावरण सुरक्षा के एक योद्धा होने की खुशी और गर्व पा जाते है. मैंने अपने घर पर पिछले सात सालों तक खाद बनाई है और लैंडफिल में जाने वाला अढाई हजार किलो कचरा बचा लिया. एक बार आपने कम्पोस्ट बना लिया तो आप अपने घर के किचन गार्डेन या टैरेस गार्डेन को पनपा सकते है. ताकि आप अपनी ही बेशकीमती खाद से अपने गमलों या गार्डेन में स्वस्थ ऑर्गेनिक सब्जी खुद उगा सकें. पालक , मेथी , पोदीना , टमाटर , नीबू , हरी मिर्च तो आप गमलों में भी उगा सकते है. ऐसी सब्जियां आपको किसी दूकान या बाजार में नहीं मिलेंगी. कम्पोस्टिगं एवं गार्डेन के इस उपयोगी रिश्ते से और मिट्टी से सब्जियां उगाने की घर की खेती से आप अपने बच्चों को भी परिचित कराये. निश्चित रूप से इसमें उन्हें  किसी खेल सा आनंद मिलेगा.

ग्लोबल वॉर्मिंग – पृथ्वी को ताप से बचाएं

वैश्विक ताप के इस युग में, मौसम का मिजाज निरन्तर खराब होता जा रहा है. पृथ्वी दिन प्रति दिन गरम होती जा रही है. हमारे ऊर्जा के स्रोत कम होते जा रहे है. लगातार जल की कमी हो रही है. यह ग्रीन हाउस गैस – जो मानव द्वारा बनाए गए उद्योगों, एवं शहरी यातायात से उत्पन्न हुई हैं – से ओजोन स्तर लगातार क्षीण होता  जा रहा  है. नतीजा यह कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है. यह ऐसी प्रक्रिया है जो अप्रत्याशित है. इन हालातों में हमे व्यक्तिगत वाहनों की जगह सामुदायिक परिवहन वाले साधनों का प्रयोग करना चाहिए. जहां तक हो जल और ऊर्जा की बचत करे. व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर हमें पर्यावरण सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए.
तस्वीरें गूगल से साभार 

‘मध्यरात्रि के बीच’ और अन्य कविताएं ( कवयित्री इला कुमार)

इला कुमार

इला कुमार का पहला कविता संग्रह ‘जिद मछली की’ है । ‘किन्‍हीं रात्रियों में’ ‘ठहरा हुआ अहसास’ और ‘कार्तिक का पहला गुलाब’ ‘आज पूरे शहर पर’ आदि अब तक ५ संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. संपर्क : ई -मेल : ilakumar2002@yahoo.co.in

मध्यरात्रि के बीच

एक रात
मध्यरात्रि के बीच
सूरज उग पड़ा
सुबह का सूर्य
रात में
आकाश के योजनों विस्तृत वक्ष पर
मनसर’ के खेतों, पेड़ों के बीच से लुकता-छिपता
उस मध्यरात्रि में
निकल पड़ा
अवतरित हुआ वह
खुले आसमान की क्रोड़ से
या
कि आसमान ही आकार ले रहा था
शनैः शनैः उसकी गोद से
किसे पता
सूरज के पास था उजाला
दर्प, आस्था, न्याय और प्रश्न
प्रश्न उसके पास थे अनंत
खेतों में बीजों के अंकुरने का प्रश्न
नदियों की सतह के वापिष्त होने का प्रश्न
प्रश्नों की आकांक्षाओं से भरे प्रश्न उसके पास थे
इससे-उससे सबसे पूछता रहा वह प्रश्न
उस रात मध्यरात्रि में
पानी की चक्रायित गति का प्रश्न
गूँज उठा विदर्भ की जमीं पर
चक्राकार योजना के बीच
घूमती थीअनवरत तब वाष्प की बूंदें
बूंदों से भरते तालाबों की छाती की सल्-सल्
उन्हीं तालाबों की जड़ों के बल पर
शेशनाग के फन पर सम्हाली-सहेजी गई
पृथ्वी के अंतर में स्थित ज्वाला की थर्-थर्
अनगिनत तत्वों से जुड़े अनत प्रश्न आकाश में मंडरा उठे
उस रात
सृष्टि की शुरुआत में सूर्य के अंदर पैठे देव ने
रची थी एक अद्भुत चक्राकार योजना
करोड़ों रश्मि किरणों के बल पर
खींच लिया करेगा वह वाष्पों के अदृश्य कण
वाष्प आवेशित कण-कण का महीन जोड़
बादलों की शक्ल लेगा
और
वे ही बादल कण हर बीज में, धन-धान्य में प्राण बन लहरा उठेंगे
आज भी अदृश्य वाष्प कणों को थामे
अपरिमित रश्मियाँ पसर जाती हैं
नवकलिकाओं के सद्यस्फुटित प्रस्फुटन के प्रथम अवगुंठन पर
कई विज्ञ जन प्रथम दृश्य बाल सूर्य को अध्र्य देते हुए उचारते हैं…
…ऊँ दिवाकरऽऽ…! ऊँ पूषाअन्नै…!
श्रुतियों, स्मृतियों का पोषणहार
अनगिनत चतुर्युगियों से पोषण का धर्म
निभाता है
लेकिन पृथ्वी का धर्म ?
वाश्प का, जल का, बूंदों का चक्र
किसने खंडित किया
थल के उर में समाए जल और गगन में पसरी रश्मियों के
अद्भुत समन्वय को
पूरी पृथ्वी पर स्थापित आचरण के
सही स्वरूप को तोड़ डाला
आखिर किसने ?
पृथ्वी, धरती, जल, बादल और संभावित जीवन से जुड़े अनगिनत प्रश्न थे
प्रश्न बहुत थे सूरज के पास
उसके प्रश्नों का जवाब पृथ्वीवासियों के पास न था
प्रश्न वही हैं
वे हीहैं
सूरज भी
धरती क्या नहीं रहेगी ?
और हम ?

धूसर धरती

धूसर धरती पर लम्बे पेड़ों के निकट
घूमती बलखाती सड़क के साथ है
नदी के बिम्ब
प्रतिबिम्ब सरीखे
पहाड़ों के पैरों से दूर
बीते दशकों की लम्बाई के पीछे ठिठककर
नदी ने फैलाई थीं अपनी बाँहें
पसारी थी अपनी काया
अद्भुत तरलता भरी
शहर आकर बसाया था उसके तटों पर
पनी मिट्टी स्थूल सूक्ष्म सभी कुछ देती रही नदी
सालों- साल
लगातार निर्मल मीठा पानी अपनी रगो में उतार
दुधमुहें बच्चों ने पाई उड़ान
सौदर्यित saashwit  काया के संग
हुए वे बच्चे युवा
नई सभ्यता के छल बल से पूर्ण
अक्ल के विस्तारित तहों के पार खड़े होकर
खरीदे उन्होंने धुंआ उगलने वाली भीमकाय मशीनें
नदी के किनारों पर खड़े किए
आसमान छूते ढांचे लोहे और स्टील के
तालाबों को मूंद बनवाए गए रिहायशी मकान
पुरानी संस्कृति/पृथ्वी की प्रथम संस्कृति
वर्षा  जल को थाती समक्ष सकने वाली संस्कृति को
समाज से विलग कर
हुए पूर्वाग्रहों से मुक्त आधुनिक जीव
नदी आज सूख गई है
शहर से मानों रूठ गई है
अगले दशकों में बिन पानी
शहर क्या बना रहेगा ?
शायद नहीं
शायद . . . .


अजन्में बच्चे

माताओं के गर्भों में
जल पर डोलते बच्चे
हाथ जोड़े पनाह माँगते हैं
जल को बचे रहने देने का आश्वासन
अपने लिए
संसार को बचाए रखने का विश्वास
चुप हैं ज्ञाता-विज्ञाता
प्रशासक लापरवाही का ताना-बाना लपेटे
नीतियों के संरक्षण में मशगूल
नेता वोट-नोट और गोट ढूंढते हुए
प्रार्थनारत बालक हैरान हैं
भयमुक्त्ता का दिखावा करते समाज का भय
मीलों लम्बा पसरा हुआ है
माता !
सिर्फ माता रातों के बीच कालिमामयी रात्रि देखती हुई जगती है

ध्यान में बैठ गुनती है
त्राण-परित्राण के रास्तों को गुहारती है
अक्षमता स्वयं को, अपने को तौलती है
कल शायद
भविष्य  पर छाया हाहाकार छंट जाएगा
लेकिन आज चिंता में  डूबी माता
माता की माता
नवजात शिशुओं और अजन्में बच्चों के बारे में सोचती है
किन्तु नदी अभी नही दिखती है
एक दिन बरसाती कहर बन
तट पर बसे शहर को लील जाएगी
भयमुक्त होगी एक बार फिर
नदी!

बढ़ने के क्रम में

बढ़ने के क्रम में
वह
हवाई जड़ों को तना बनने देता है
अपनी नई जड़ों के बल पर सारी जमीन पर छा जाने के लिए
जिस पृथ्वी को पूर्वज वराह कभी सात समुद्रों के बीच से
निकाल लाए थे
उसी पृथ्वी को
अपने पत्तों के बल पर वह
हरी पृथ्वी में बदल देना चाहता है
पृथ्वी
जो महाजलप्लावन के बाद
आज से एक अरब बेरानवें करोड़ वर्ष पहले जल से बाहर
निकल आई थी
अब सात मन्वन्तरों के बाद
उसे
एक बरगद
अपने पत्तों के बल पर
ढांक लेना चाहता है
बीत चुके चतुर्युगियों की याद बरगद को नहीं है
उसे इस सत्य से भी कोई सरोकार नहीं
कि
किस चतुर्युगी में शिव ने संहार किया
और ब्रह्मा ने सृष्टि
बरगद की रुचि नहीं है
बीते हुए मनवन्तरों के लेखा जोखा रखने में
सेतुबंध के राम उसकी दृष्टि की परिधि पर अभी नहीं हैं
कृष्णावतार, यशोदा और ब्रजभूमि की ओर वह नजर डालना
नहीं चाहता
वह
मदुरै की मीनाक्षी और सुरेश्वर के बारे में कुछ भी नहीं सोचता
बरगद
शेषाचल के श्रीनिवास और पद्मावती के बारे में भी
अनजान बना रहना चाहता है
उसे अपने जड़ों पत्तों और डालियों के बढ़ने की चिंता है
उसे

पृथ्वी की चिन्ता है
पृथ्वी के क्षत विक्षत मानस को वह हेरता है
उसके सफेद दूध पर
भविय में
पृथ्वी के ऊपर टिककर खड़ी
प्लास्टिक की पृथ्वी का बिम्ब उभरता है
अन्य सभी अन्यायों से वह
वेन पृथु की पृथ्वी को बचा ले जाना चाहता है
अपने पत्तों के बल पर
हरी पृथ्वी रचने के क्रम में
बरगद
डाली दर डाली, पत्ता दर पत्ता आगे बढ़ता है
नए बिम्बों को रचते हुए
एक से अनेक हो उठता है
एकोऽहं बहुस्यामि के
ब्रह्म की तरह


कहा मैंने शहर से

कहा मैंने शहर से
‘‘जगह दो नदी को
बहने दो उसकी निश्च्छल, उज्ज्वल धारा को
पूरने दो कलेजा धरती का’’
नहीं दी नगर ने जगह नदी को
अपनी ऊँची इमारतों के पांवों को धंसने दिया
नदी के सकुचाए तटों पर
कंक्रीट के चौड़े सीमेंटी पटरों से पाट दिया बहती धारा की छाती को
कहा मैंने गृहवासियों से
‘‘जगह दो नदी को
बहने दो उसकी कल कल उज्ज्वल धारा को
नम होने दो धरा को’’
नहीं दिया गृह धारकों ने जगह धारा को
धरा को घेर-घेर बना लिए एक मंजिले-दुमंजिले मकान
सिकुड़ गई नदी बंटती रही उपधाराओं में
नाली जैसा रूप धर कर
इधर से उधर डोलती रही
कहा मैंने बार-बार
बहुतों से बहुत बार
सुनी नहीं उन्होंने मेरी बात
रुचि नहीं उन्हें मेरी गुहार
उनमें से कई हुए नाराज
मेरी अन-अपेक्षित दखलअंदाजी पर उन्हें था गहरा एतराज
नाराज मैं रही लगातार

नगर, शहर और ग्रामवासियों से
उनकी निर्मम लापरवाही से
बीतते दशकों के बीच वर्शों के हुजुम आगे बढ़ गए
मनुष्य आसुरत्व के बीच ठिठके रहे
अब धरा है नाराज
नगर-डगर, धूप-छांव के बीच प्यासे डोल रहे
थलचर, नभचर, जलचर
जल चाहिए सबों को !
वाकई
जल हम सबों को चाहिए, कुछ घंटों के अंतराल पर
प्यास से कंठ सूख जाता है रह-रह कर
नाराज नहीं है अगर
तो वह है नदी
हल्की बारिश होते ही वह झिलमिला उठती है
वरना वह तो सूख गई है
जमीं के नीचे जाकर बैठ गई है
समाज, सभ्यता और संस्कृति को पोषित करने वाली धारा
लुप्त हो गई है
लोग जल खोजने निकल पड़े हैं चंद्रमा और मंगल पर
लेकिन वहाँ नहीं है नदियों के पैरों की नम्र छाप
जल को तलाशते मनुष्यों के हाथ-पैर और मन-प्राण
ब्रह्मांड में भटक रहे हैं