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यौन हिंसा और न्याय की भाषा: पांचवी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.


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यौन हिंसा और न्याय की भाषा: चौथी  क़िस्त







बचपन से बलात्कार : हत्या

जुम्मन खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य50 एकमात्र निर्णय है, जिसमें छह वर्षीया लडक़ी (सकीना) के साथ बलात्कार के बाद हत्या के अपराध में फाँसी की सजा हुई. गवर्नर और राष्ट्रपति द्वारा रहम की अपील रद्द होने के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी पुनर्विचार याचिका या रिट पिटीशन रद्द की गई. इस दुर्भाग्यपूर्ण मुकदमे में 26 जून, 1983 को करीब चार बजे जुम्मन मियाँ ने अपने पड़ोसी यूसुफ खाँ की पत्नी दुल्हे खान बेगम से प्रार्थना की कि वह अपनी बेटी सकीना को उसके साथ बाजार भेज दे, वह उसके लिए आइसक्रीम लाना चाहता है. बेगम ने बिटिया जुम्मन के साथ भेज दी और खुद सो गई. घंटे-भर बाद उठी तो देखा बेटी अभी तक नहीं आई. पहले उसने सोचा शायद बाहर बच्चों के साथ खेल रही होगी. लेकिन समय बीता तो वह घबराई. इधर-उधर देखने के बाद जब सकीना नहीं मिली तो वह खुद जुम्मन के घर पहुँची लेकिन वहाँ ताला लगा मिला. पति आए करीब सात बजे तो अड़ोस-पड़ोस में बच्ची ढूँढ़ते रहे, पर बच्ची होती तो मिलती. मामला सुन-सुनकर भीड़ इकट्ठी हो गई. जब यूसुफ खान दोबारा जुम्मन के घर जा रहे थे तो पड़ोसी ने बताया कि करीब साढ़े चार बजे उसने सकीना को एक हाथ में आइसक्रीम लिये, जुम्मन की उँगली पकड़े घर में घुसते हुए देखा था. दूसरे ने बताया कि वह जुम्मन के घर के आगे से गुजर रहा था तो उसने घर के अन्दर से आती बच्ची के रोने की आवाज सुनी थी. उत्तेजित भीड़ जुम्मन के घर पहुँची और दरवाजे के सुराख से टॉर्च जलाकर देखा तो अन्दर चारपाई पर बुर्के में लिपटी बच्ची की लाश पड़ी थी. दरवाजा तोडक़र भीड़ अन्दर पहुँची तो पाया कि लाश सकीना की ही थी, जिसके शरीर पर काफी चोटों के निशान मौजूद थे.

आगरा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने जुम्मन को फाँसी का हुक्म दिया. उच्च न्यायालय ने भी फैसले की पुष्टि करते हुए कहा, ”अपराधी के जघन्य और अमानुषिक कृत्यों को देखते हुए वह किसी प्रकार की नरमी का अधिकारी नहीं है. उसने सोच-समझकर छह साल की बेबस बच्ची के साथ बलात्कार किया है और गला घोंट कर हत्या करने तक गया है. उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध जुम्मन ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च, 1986 को याचिका खारिज करते हुए ऐतिहासिक निर्णय सुनाया, ”जहाँ अपराध समाज के विरुद्ध हो, वहाँ ऐसे गम्भीर मामलों में मृत्युदंड की सजा न देना विशेषकर हत्या के ऐसे मामलों में जो अत्यन्त नृशंसता के साथ किए गए हों, भारतीय दंड संहिता की धारा 302 जो (फाँसी की सजा का प्रावधान करती है) को शून्य में बदलना होगा।. अदालत का यह कर्तव्य है कि अपराध की गम्भीरता के अनुसार उचित सजा के निर्णय सुनाए. सामाजिक आवश्यकता और सम्भावित अपराधियों को रोकने के लिए भी एकमात्र उचित सजा जो अपराधी जुम्मन को मिलनी चाहिए, वह मृत्युदंड के अलावा और कुछ भी नहीं हो सकती, क्योंकि उसने अपनी कामपिपासा शान्त करने के लिए, एक निर्दोष बच्ची की भयंकर तरीके से कलंकपूर्ण हत्या का अपराध किया है.


जुम्मन ने 12 अप्रैल, 1986 को गवर्नर से रहम की अपील भी की जो 18 फरवरी, 1988 को रद्द हो गई. राष्ट्रपति ने भी रहम की अपील 10 जून, 1988 को ठुकरा दी. 15 जुलाई, 1988 को दूसरी रहम की अपील की गई. इसके बाद 10 नवम्बर, 1988 को फिर सुप्रीम कोर्ट में एक रिट दाखिल की गई, जिसमें मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई और फिलहाल के लिए मृत्युदंड रुकवा दिया गया. इस याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों ने 30 नवम्बर, 1990 को मानने से इनकार कर दिया. जुम्मन के विद्वान वकील श्री आर.के . जैन (जो मृत्युदंड के कट्टर विरोधी हैं) की सारी दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्तियों को सजा घटाने का कोई उचित आधार या तर्क नजर नहीं आया। कैसे आता ? लेकिन दुखद तथ्य यह है कि जुम्मन खान के बाद भी मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार के बाद हत्या के मामलों को ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ नहीं माना गया. अनेक फैसले इसका प्रमाण हैं.
राजकीय महाविद्यालय, सुनाम के प्रोफेसर गुरपाल सिंह अपनी पत्नी मनजीत कौर और करीब दो वर्षीया बेटी मल्हार के साथ अपनी भानजी की शादी के अवसर पर चुघे कलाँ (पंजाब) गए हुए थे. शादी के अगले दिन 21 मार्च, 1991 को मल्हार, हरचेत सिंह की गोदी में रही थी. हरचेत सिंह (उम्र 29 साल) गुरपाल सिंह के जीजा कश्मीरा सिंह का मित्र था जो घर अक्सर आता रहता था. दूल्ला-दुल्हन के जाने के बाद गुरपाल सिंह और उनकी पत्नी ने जब मल्हार की तलाश की तो आसपास कहीं नहीं मिली. काफी ढूँढऩे के बाद जब वे खेत में पहुँचे तो देखा कि हरचेत सिंह दो वर्षीया मल्हार के साथ बलात्कार कर रहा है. उन्हें देखकर हरचेत सिंह भाग खड़ा हुआ। मल्हार के पास पहुँचे तो वह खून से लथपथ दम तोड़ चुकी थी.

 पुलिस-थाना-कोर्ट-कचहरी-गवाहों के बयान और वकीलों की बहस सुनने के बाद भटिंडा के सत्र न्यायाधीश ने हरचेत सिंह को बलात्कार के जुर्म में उम्रकैद और दो हजार रुपया जुर्माने और हत्या के जुर्म में फाँसी और दो हजार रुपया जुर्माने की सजा सुनाई. लेकिन पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री जय सिंह शेखो और ए.एस. नेहरा ने अपील में फाँसी की सजा रद्द करके सिर्फ आजीवन कैद का फैसला50 सुनाते हुए कहा, ”सजा के सवाल पर बहस सुनने के बाद, हम महसूस करते हैं कि यह केस ‘दुर्लभतम में दुर्लभÓ की श्रेणी में नहीं आता है. अतएव माननीय न्यायमूर्तियों ने फाँसी की सजा देने से मना कर दिया था. दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भी राज्य बनाम अतरू रहमान51 में फाँसी की सजा की पुष्टि नहीं की थी. हालाँकि अभियुक्त ने छह साल की बच्ची के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी. जुम्मन खान के मामले में52 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यहाँ लागू नहीं होता। (जिसे सेशन जज ने आधार माना है) क्योंकि ”उस केस में जुम्मन ने पहले से सोच-समझ और पूरी तैयारी के साथ बेबस बच्ची के साथ बलात्कार किया था, गला घोंटकर हत्या की थी. प्रस्तुत मुकदमे में मृतक (मल्हार) की मृत्यु बलात्कार के कारण पीड़ा, खून बहने व सदमे से हुई है जो आमतौर पर मृत्यु के लिए काफी है. अपराध कामपिपासा शान्त करने के लिए किया गया था. पहले से दोनों पक्षों के बीच कोई दुश्मनी नहीं थी. ऐसा लगता है कि अपीलार्थी में कामपिपासा इतनी अधिक बढ़ गई थी कि उसे आदमी के रूप में जानवर बना दिया था.


दो साल की बच्ची के साथ 29 वर्षीय नौजवान आदमी बलात्कार करेगा तो निश्चित ही है कि बच्ची जिन्दा कैसे बचेगी ? कामपिपासा शान्त करने के लिए, दो साल की बच्ची के साथ ऐसा कुकर्म ? इससे अधिक घृणित और जघन्यतम अपराध और क्या होगा ? जब इसे घृणित और ‘जघन्यतम अपराध’ मान लिया जाता है तो यह कहने का क्या अर्थ है कि यह ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं है. आदमी जब जानवर (भेडिय़ा) हो जाए तो उसे आजीवन कैद में रखने का मतलब सजा देना है और ऐसे भेडिय़ों को जेल में सुरक्षित रखना ? दिल्ली प्रशासन बनाम पन्नालाल उर्फ पंडितजी उर्फ बन्ना उर्फ सरदार में दो वर्षीय नीतू के साथ बलात्कार और हत्या के अपराध में सत्र न्यायाधीश श्री एम.एम. अग्रवाल ने फाँसी की सजा सुनाई मगर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों (श्रीमती सुनन्दा भंडारे और अनिलदेव सिंह) ने उम्रकैद में बदल दिया. हालाँकि निर्णय में स्वीकार किया गया है कि ”दो साल की बच्ची को एक विकृत पुरुष की हवस का शिकार होते देखना, बेहद घृणास्पद है. बेबस बच्चों से बलात्कार के कँपा देनेवाले अपराध, सचमुच कानून द्वारा निर्धारित अधिकतम दंड के अधिकारी हैं लेकिन…53 मृत्युदंड को आजीवन कैद और आजीवन कैद को दस साल कारावास में बदलना यह प्रथम और अन्तिम फैसला नहीं है. सत्र-न्यायमूर्तियों ने अधिकांश मामलों में सजा कम की है, जिसका व्यापक स्तर पर असर हुआ है. प्राय: हर मामले में अपील दायर की जाती है. अपील मंजूर होने पर जमानत होने की सम्भावना और फैसला होने तक आजादी से इनकार नहीं किया जा सकता. अपील का फैसला होने में (पाँच से बीस साल तक) तो समय लगेगा. लगता ही है.

रियासत बनाम उत्तर प्रदेश, छह साल की गुडिय़ा के साथ बलात्कार के बाद नृशंस हत्या की भयावह कहानी है. गुडिय़ा हरिजन बाप बदलू की बेटी का नाम है, जिसकी रियासत ने 31 जनवरी, 1991 को गन्ने के खेत में बलात्कार के बाद उस समय हत्या कर दी. जब सारे देश में हर्षोल्लास के साथ रविदास जयन्ती मनाई जा रही थी। हरिद्वार के जिला व सत्र न्यायाधीश श्री जे.सी. गुप्ता ने रियासत को मृत्युदंड सुनाया लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एस.के. मुखर्जी और जे. पी. सेमवाल ने फाँसी की सजा रद्द करके उम्रकैद की सजा सुनाते हुए कहा, ”बलात्कार करने के बाद अपीलार्थी ने हत्या की है. हत्या पहले से सोचकर, योजनाबद्ध या संकल्प के साथ नहीं की गई. हत्या मात्र अधीरता या इस भय के बाद की गई कि कहीं मृतक भेद न खोल दे. अपराधी एक नौजवान व्यक्ति है और गुडिय़ा के साथ बलात्कार करने के बाद अपने आपे में नहीं रहा और उसी बीमार मानसिक स्थिति में उसने हत्या कर दी. यह कर्म एक प्रकार की मानसिक विक्षिप्तता की तरफ ले जाता है. हत्या के मामले में आमतौर पर सजा उम्रकैद होती है. विशेष मामलों में निर्णय के कारण लिखकर मृत्युदंड भी दिया जा सकता है. अपीलार्थी उम्रकैद की सजा भुगत सकता है और उसे भविष्य में ऐसा अपराध करने का मौका नहीं मिलेगा.54 विनोद बनाम राज्य में 11-12 साल की रेणु के साथ प्रेमदत्त ने शिव मन्दिर, अलीगढ़ में बलात्कार किया और उसके बाद हत्या. सत्र न्यायाधीश ने हत्या के लिए फाँसी की सजा सुनाई मगर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री गिरधर मालवीय और ए.बी. श्रीवास्तव ने फाँसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलते हुए कहा, ”हमें लगता है कि यह केस फाँसी की अधिकतम सजा की माँग नहीं करता. अपीलार्थी जिसकी उम्र सिर्फ बाईस साल थी, ऐसा लगता है कि मृतका को अपने साथ हत्या करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी हवस पूरी करने के लिए ले गया था. हम महसूस करते हैं कि ‘न्याय का उद्देश्य’ अपराधी को उम्रकैद की सजा से पूरा हो
जाएगा.55

सिद्दिक  सिंह बनाम महाराष्ट्र 55ए में 26 वर्षीय, फौजी जवान द्वारा चार महीने की बच्ची के अपहरण,बलात्कार और हत्या (लाश अन्धे कुएँ में) के मामले में भी सजा उम्रकैद ही रही. हालाँकि न्यायमूर्तियों ने स्वीकारा, ”हमारे लिए इससे अधिक जघन्य बलात्कार की कल्पना तक करना कठिन है. निर्णय में जुम्मन खान का उल्लेख तक नहीं है. बच्चियों से बलात्कार और हत्या के अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें अभियुक्त को सन्देह का लाभ देकर बाइज्जत बरी किया गया है. पाँच वर्षीया सुकुमारी के साथ बलात्कार और हत्या के अपराध के एक मामले में मुजरिम को रिहा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एस. रतनावेल पांडियन और के. जयचन्द्रा रेड्डी ने कहा, ”हम सचेत हैं कि एक गम्भीर और संगीन अपराध हुआ है, लेकिन जब अपराध का कोई सन्तोषजनक प्रमाण न हो तो हमारे पास अभियुक्त को सन्देह का लाभ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, इसलिए इस मुकदमे में हम ऐसा करने को विवश हैं55बी. चौदह वर्षीया लडक़ी माड़ी के साथ बलात्कार के बाद हत्या के एक और मामले में मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलते हुए सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री जी.टी. नानावती ने लिखा है, ”लेकिन उपलब्ध साक्ष्य उच्च न्यायालय द्वारा मृत्युदंड के कारणों को उचित नहीं ठहराते. साक्ष्यों से यह नहीं लगता कि अभियुक्त ने माड़ी को अचानक पकड़ लिया था और वह एकदम विवश थी. उसने अपनी सलवार पूरी तरह से उतार रखी थी जो शायद आवश्यक नहीं थी अगर वह केवल निवृत्त होने गई थी. घटनास्थल पर कोई पाखाना नहीं मिला. अगर उस पर इस प्रकार अचानक हमला हुआ था (जैसा कि उच्च न्यायालय ने माना है) तो वह पहले ही चिल्लाती न कि अपीलार्थी द्वारा बलात्कार शुरू करने के बाद….उसने अपनी सलवार ही नहीं उतारी हुई थी, बल्कि कुर्ता भी गर्दन पर चढ़ाया हुआ था….परिस्थितियाँ बताती हैं कि सम्भवत: आरम्भ में वह स्वयं भी अपीलार्थी को कुछ हद तक आजादी ले लेने के प्रति अनिच्छुक नहीं थी.


अपीलार्थी अपनी काम-इच्छा नहीं रोक पाने के कारण लडक़ी की अनिच्छा के बावजूद आगे बढ़ गया. इस पर लडक़ी ने प्रतिवाद किया और शोर मचाना शुरू किया. लडक़ी को शोर मचाने से रोकने के लिए अपीलार्थी ने सलवार उसके गले में बाँध दी जिससे उसकी दम घुटने से मृत्यु हो गई.55सी. माननीय न्यायमूर्ति के अनुसार लडक़ी कुछ हद तक ‘छेड़छाड़’ के लिए तो उत्सुक थी मगर सम्भोग के लिए राजी नहीं थी. अगर यह सच माना जाए तो उसे सलवार उतारने की क्या जरूरत थी ? चौदह वर्षीया लडक़ी की सहमति या असहमति का प्रश्न उठाना व्यर्थ है. बिना सलवार उतारे बलात्कार कैसे होता ? क्या अभियुक्त कुर्ता ऊपर नहीं कर सकता ? लडक़ी को चुप कराने के लिए सलवार से गला घोंटा गया है. बलात्कार और हत्या का उद्देश्य और कारण ‘कामपिपासा या हवस शान्त करना और विक्षिप्त या मानसिक बीमारी मानते हुए सजा कम करते निर्णयों से क्या ‘न्याय का लक्ष्य पूरा हो रहा है ? हो जाएगा ? सजा कम करने के लिए अगर अपीलार्थी की उम्र महत्त्वपूर्ण है, तेा अधिकतम दंड के लिए बलात्कार और हत्या की शिकार बच्ची की उम्र और अपराध की जघन्यता को कैसे भुलाया जा सकता है ? बच्चों से बलात्कार घृणित और जघन्यतम अपराध हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वयस्क महिलाओं से बलात्कार कम घृणित हैं.



न्याय का लक्ष्य

‘न्याय का लक्ष्य’ या ‘उद्देश्य’ पूरा हो या न हो, पुरुषों की हवस या कामपिपासा तो पूरी हो ही रही है. बच्चियों से बलात्कार में बढ़ोतरी का एक मुख्य कारण यह भी है कि युवा लड़कियाँ, बच्चियों की अपेक्षा अधिक विरोध कर सकती हैं, चीख सकती हैं और शिकायत कर सकती हैं. बलात्कारी पुरुष सोचता है–बच्चियाँ बेचारी क्या कर लेंगी ? विशेषकर जब बलात्कार घर में पिता, भाई, चाचा, ताऊ या अन्य रिश्तेदारों द्वारा किया गया है. अक्सर कम उम्र की बच्चियाँ बलात्कार के कारण मर जाती हैं. हत्या और बलात्कार के अधिकांश मामलों में अभियुक्त बरी हो जाता है या सजा कम करवा पाने में सफल क्योंकि लडक़ी गवाही के लिए अदालत के सामने नहीं होती. ऐसे में हो सकता है (होता है) कि अदालत की सहानुभूति मृतक ‘गुडिय़ा’, ‘मल्हार’ या ‘रेणु’ की बजाय बलात्कारी बटोर ले जाए.सजा के सवाल पर न्यायमूर्तियों के मानवीय दृष्टिकोण से न्याय का लक्ष्य, पूरा हो जाएगा–कहना कठिन है. लगभग सत्तर साल पहले लाहौर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने चेतावनी देते हुए कहा था कि ”औरतों पर हिंसा के अपराध के साथ, जो स्वयं अपनी रक्षा करने की स्थिति में नहीं हैं, सख्ती से निपटना पड़ेगा. यह अत्यन्त दुखद स्थिति होगी, अगर अपराधियों को यह सन्देश मिलता है कि औरतों के साथ हिंसा या बलात्कार करना कोई गम्भीर मसला नहीं है. और अगर वे अपेक्षाकृत कम कारावास की सजा भुगतने के लिए तैयार हों, तो वे हमेशा अपनी पाशविक कामनाओं को शान्त कर सकते हैं.56 यानी, कम सजा की सम्भावना, हिंसक अपराधों को शान्त कर सकते हैं.56 यानी, कम सजा की हिंसक अपराधों को बढ़ावा देती है. देती रहेगी. एक और न्यायमूर्ति के शब्दों में सजा कम करने का अर्थ ”असुरक्षित लड़कियों को समाज में भेडिय़ों के सामने छोड़ देना ही होगा.57 क्या ‘मानवाधिकार’ सिर्फ खूँख्वार अपराधियों के लिए ही हैं ? अपने बचाव में बालिग स्त्री को तो हत्या करने का कानूनी अधिकार है, मगर अबोध बच्चियाँ क्या करें ?

इसी सन्दर्भ में इमरतलाल के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति की विवशतापूर्ण टिप्पणी है, ”जब बलात्कार का अपराध सिद्ध हो जाए और वह भी छोटी उम्र की बच्ची के साथ तो ऐसे में अपराध की सजा कठोरता से दी जानी चाहिए. अपराधी को सिर्फ तीन साल कैद की सजा देने का अर्थ उसे ‘पिकनिक पर भेजना है. राज्य सरकार ने सजा को चुनौती नहीं दी है, इसलिए सजा बढ़ाई नहीं जा सकती.58 राज्य सरकार द्वारा ‘सजा को चुनौती’ न देने के कारण, अब तक न जाने कितने अपराधियों को ‘पिकनिक’ पर भेजना पड़ा है. कानूनी नियमों से बँधे न्याय की मजबूरी है.राज्य सरकार द्वारा सजा को चुनौती न दिए जाने के कारण अपराधी की सजा बढ़ाई नहीं जा सकती मगर घटाई जा सकती है. सजा कम करने का कारण, कभी अपराधी की ‘उम्र’ है तो कभी ‘नौकरी छूट जाना’ या ‘सामाजिक अपमान और बदनामी’ कुछ फैसलों की शुरुआत, ‘अधम, घृणित, जघन्य, भयावह, पाशविक वगैरह-वगैरह’ से होती है. फिर पाशविक इच्छाओं, यौनशुचिता, प्रतिष्ठा, गरिमा, सम्मान, नैतिकता और सामाजिक मान-मर्यादा का पाठ पढ़ाती कुछ नजीरों में बेहतरीन भाषा के नमूने. अन्य में ”यद्यपि अभियुक्त का अपराध बेहद घृणित और तिरस्कार योग्य है, लेकिन हम इसे अधिकतम सजा के लिए उपयुक्त नहीं मानते और दस वर्ष कारावास की वैकल्पिक सजा में बदल रहे हैं.59 क्योंकि अधिकतम सजा ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामलों में ही दी जानी चाहिए. स्कूल हेडमास्टर द्वारा दस वर्षीया बालिका से बलात्कार की इस घटना ने ‘गुरु-शिष्य के सम्माननीय सम्बन्धों को कलंकित किया है. लेकिन आजीवन कारावास की अधिकतम सजा ‘उचित’ नहीं हो सकती। न्यूनतम सजा से ही न्याय का लक्ष्य पूरा हो जाएगा.



रामरूपदास बनाम राज्य के उपरोक्त मामले में विद्वान न्यायमूर्ति ए. पासायत और एम. पटनायक के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की ‘भाषा का जादू’ भी देखा जा सकता है और ‘जादुई भाषा’ का कमाल भी. पूरा निर्णय उधार की भाषा में इस प्रकार लिखा गया है कि मुझ जैसे अनेक कानून के विद्यार्थी आश्चर्यचकित रह जाए. आधे से ज्यादा निर्णय में तो सर्वोच्च न्यायालय की नजीरों का उल्लेख तक नहीं किया गया. लगता है, न्यायमूर्तियों की मौलिक और अप्रकाशित रचना है. क्या ऐसे ही ‘न्याय की भाषा’ विकसित और समृद्ध होगी? जाहिर है, कैसे हो सकती है? स्त्री के विरुद्ध हिंसा के प्रति सहानुभूति और संवेदना की भाषा को टुकड़ों में काट-बाँट कर नहीं देखा जा सकता. परिपूर्णता में देखना होगा. यहाँ सर्वोच्च न्यायालय की नजीरों से आतंकित, न्यायिक विवेक सिर्फ विकल्प ढूँढ़ता दिखाई देता है. अपराध, अपराधी, तथ्यों, स्थितियों को, न्याय की तुला पर तौलते हाथ काँपते नजर आते हैं. क्यों?छह वर्षीया बालिका शिवानी के साथ पैंसठ वर्षीय वृद्ध पुरुष द्वारा बलात्कार के अपराध को जघन्यतम करार देते हुए भी, दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री पी.के. बाहरी और एस.डी. पंडित ने सजा के सवाल पर कहा, ”इस घटना के बाद अभियुक्त की पत्नी की मृत्यु हो गई है. वह तब से अब तक जेल में है. बहुत बूढ़ा है. आंंशिक लिंगच्छेदन किया है. सहवास का केवल प्रयास किया है और बालिका के गुप्तांगों को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचा है. इन परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हम, उम्रकैद की सजा कम करके दस साल कारावास में बदल रहे हैं.60 अपराध संगीन है लेकिन…

क्रमशः…..

‘निल बट्टे सन्नाटा’ और घरेलू कामगार महिलायें

जावेद अनीस

एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com
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विदेशों में सभी परिवार “घरेलू सहायक” अफोर्ड नहीं कर पाते हैं क्योंकि उनकी पगार बहुत ज्यादा होती है, लेकिन भारत में “काम वाली बाई” रखना बहुत सस्ता है. शायद इसी वजह से यहाँ घरेलू कामगार महिलायें अदृष्य सी हैं. उनके काम को आर्थिक और सामाजिक रूप से महत्त्व नहीं दिया जाता है, हालाँकि इन दोनों ही क्षेत्रों में इनका महत्वपूर्ण योगदान है. भूमंडलीकरण और बढ़ते शहरीकरण के साथ संयुक्त परिवार खत्म हो रहे हैं, अब पति-पत्नी दोनों ही काम के लिए बाहर रहते हैं जिसकी वजह से घर पर बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल के लिए परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं होता है. ऐसे में इनकी देखभाल और अन्य घरेलू कामों के लिए कामगारों की जरुरत पड़ती है इसलिए घरेलू कामगारों की मांग बढ़ती जा रही है अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मुताबिक, भारत में करीब छह करोड़ घरेलू कामगार महिलाएं हैं. राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (एनएसएसओ) 2004-05 के अनुसार, देश में लगभग 47.50 लाख घरेलू कामगार हैं. इस क्षेत्र में जिस तेजी़ से बढ़ोत्तरी दर्ज हो रही है उस लिहाज से वर्तमान में  इनकी संख्या काफी बढ़ चुकी होगी.

भारत में घरेलू काम का लम्बा इतिहास है, परम्परागत रूप से पहले महिला और पुरुष दोनों ही नौकर के तौर पर काम करते रहे हैं, इसका संबध जाति से रहा है जैसे कि वंचित जातियों के लोगों से साफ-सफाई का काम कराया जाता था जबकि ऊँची जातियों से खाना बनाने का काम कराया जाता था. हालाँकि भारत में घरेलू काम नया पेशा नही है लेकिन इसे मात्र सामंतवादी संस्कृति के नौकरों के तौर पर नही देखा जा सकता था. वर्तमान समय में ग्रामीण और शहरी संदर्भों में कामगारों और काम में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है, अब इस क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व बढ़ा है. शहरी क्षेत्रों में तो ज्यादातर महिलायें ही घरेलू कामगार के तौर पर काम करती हैं, इनमें से अधिकतम ऐसी हैं जो गावों से पलायन कर रोजगार की तलाश में शहर आती हैं. शहरी मध्यवर्ग को घरेलू काम व बच्चों की देखभाल के लिए घरेलू कामगारों की जरूरत पड़ती है और वे इस जरूरत को पूरा करती हैं. आमतौर पर ये महिलायें कमजोर जातियों से होती हैं और कम पढ़ी-लिखी या अशिक्षित होती हैं और इसी वजह से उनके पास घरेलू कामगार बनने जैसी सीमित कामों का ही विकल्प होता है.

इनकी दिनचर्या बहुत लम्बी और थकाऊ होती है और उनके कार्यास्थल के हालात बहुत खराब होती है. हमारे देश में सदियों से चली आ रही मान्यताओं की वजह से आज भी घरेलू काम करने वालों को नौकरानी का दर्जा दिया जाता है. उन्हें अपने काम के बदले कम वेतन मिलता ही हैं साथ में उन्हें कमतर भी माना जाता है, उनके साथ जातिगत भेदभाव भी होते हैं. उन्हें सम्मान नही दिया जाता है, कानूनी रूप से भी उन्हें उन्हें श्रमिक का दर्जा नहीं मिल सका है. घरेलू कामगार जटिल परिस्थितियों का सामना करते हैं, उनके श्रम का अवमूल्यन उन्हें सामाजिक और आर्थिक तौर पर निम्न स्तर पर रखता है. कार्यस्थल पर इन्हें कम मजदूरी, काम का समय तय ना होना, कम पैसे में ज्यादा काम करना, नियोक्ताओं का गलत व्यवहार, शारीरिक व यौन-शोषण जैसी समस्याओं को झेलना पड़ता है. एक अध्ययन के अनुसार घरों में काम करने वाले कामगार किसी न किसी तरीके से प्रताडि़त होते रहते हैं, आम तौर पर नियोक्ता का व्यवहार इनके प्रति नकारात्मक होता है, कुछ कामगारों के साथ अछूतों की तरह व्यवहार किया जाता है और काम की जगहों के अलावा उनके बाकी घर में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी जाती है, उन्हें अपमानजनक संबोधन से बुलाया जाता है, घर में कुछ भी चीज चोरी हो तो सीधा इन पर ही इलजाम लगाया जाता है, घरेलू कामगारों के साथ दुर्व्यवहार, शारीरिक और मानसिक हिंसा एवं यौन उत्पीड़न की घटनाऐं आये दिन सुर्खियां बनती हैं.

महिला बाल विकास विभाग द्वारा 2014 में संसद में दी गई जाकारी के अनुसार वर्ष 2010 से 12 के बीच देश में घरेलू कामगारों के प्रति अपराध के 10503 केस दर्ज हुए है जिसमें साल 2012 में 3564 मामले दर्ज हुए. भारत में विशिष्ट कानूनों का अभाव,शिक्षा और कौशल की कमी और समाज में व्याप्त सामंतवादी मानसिकता के कारण घरेलू कामकाजी महिलाओं की यह स्थिति बनी है.सरकार द्वारा उनके काम को श्रम की श्रेणी में स्वीकार नही किया गया है और इसे समाज और अर्थव्यवस्था में योगदान के तौर पर मान्यता नही दी जाती है. घरेलू कामगारों को संगठित करने वाले ट्रेड यूनियन और संगठन लगातार उनके पक्ष में एक कानून बनाने को लेकर सरकार पर दबाव डाल रहे हैं ताकि उनकी परिस्थितियों में सुधार हो और उन्हें सम्मान, उचित वेतन, अवकाश बोनस आदि मिल सके. ‘निल बट्टे सन्नाटा’ फिल्म इसी तरह के एक “काम वाली बाई” और उसकी बेटी की कहानी है. वैसे तो हमारी ज्यादातर फिल्में दर्शकों को अपनी ही रची गयी फतांसी दुनिया की सैर कराती हैं, लेकिन इनमें कुछ फिल्में ऐसी भी होती है जो वास्तविक दुनिया और इंसानी सपनों का अक्स बन जाती हैं. अजीब से नाम वाली “निल बट्टे सन्नाटा’ एक ऐसी ही फिल्म है जहाँ “काम वाली बाई” और एक सरकारी स्कूल प्रिंसिपल प्रमुख किरदारों के तौर पर मौजूद हैं. इन किरदारों को निभाने वाले कलाकार भी कोई सुपरस्टार नहीं है. इन सबके बावजूद 1 घंटे 40 मिनट की यह फिल्म आदर्शवादी या लेक्चर झाड़ने वाली फिल्म ना हो कर आपको रोजमर्रा की जिंदगी से सामना कराती है और वास्तविक जीवन में चीजें और घटनायें जिस रूप में हो सकती हैं उन्हें उसी तरह दिखाने की कोशिश करती है.

कहानी के पृष्ठिभूमि में अपने ताजमहल के लिए मशहूर शहर “आगरा” है जहां किसी एक स्लम-नुमा लेकिन मिक्स्ड बस्ती में चंदा सहाय (स्वरा भास्कर) अपनी बेटी अपेक्षा उर्फ अप्पू (रिया शुक्ला) के साथ रहती है,चंदा एक सिंगल मां है जो “बड़े लोगों” के घरों में जाकर काम करती है, उसे अपनी बेटी से बड़ी अपेक्षायें है शायद इसीलिए वह उनका नाम “अपेक्षा” रखती है, चंदा अपने बेटी के भविष्य के लिए बहुत चिंतित रहती है और नहीं चाहती कि उसकी बेटी को भी उसी की तरह “नौकारानी” बन कर रहना पड़े, हर गरीब की तरह वह भी चाहती है कि उसकी बेटी पढ़-लिख कर कुछ बन जाए, इसीलिए वह अक्सर अपनी बेटी से पूछती रहती है कि “बेटा अप्पू तू पढ़ लिख कर क्या बनेगी ?” वह खुद उसे डॉक्टर या इंजीनयर बनाना चाहती है इसीलिए  वह घरों में काम के अलावा एक चमड़े के जूते की फैक्ट्री में भी काम करने लगती है. अप्पू एक तरह से उसका सपना है.
इधर हर बच्चे की तरह “अप्पू” भी अपनी ही दुनिया में मस्त रहती है, पढ़ाई से ज्यादा उसका मन मस्ती में लगता है, उसे अपनी माँ के सपने से कोई फर्क नहीं पड़ता है और वह इस पर ज्यादा ध्यान भी नहीं देती है। उसे लगता है कि जिस तरह से इंजीनयर का बेटा इंजीनयर बनता है और डॉक्टर का बेटा डॉक्टर उसी तरह से बाई की बेटी बाई ही बन सकती है। उसे तो यह भी लगता है कि उसकी माँ अपने सपने उस पर थोप रही है। उसके दिमाग में यह कड़वी सच्चाई भी है कि अगर वह मैट्रिक पास भी हो जाए तो उसकी माँ  के लिए उसे आगे पढ़ना आसन नहीं होगी.

 “अप्पू” गणित में “निल बट्टे सन्नाटा” यानी काफी कमजोर होती है इसलिए जब वह दसवीं क्लास में पहुँचती है तो उसकी मां को काफी चिंता होने लगती है. चंदा जिन डॉक्टर दीवान (रत्ना पाठक शाह) के यहाँ काम करती है, संयोग से वे काफी अच्छी और मददगार होती हैं, उन्हीं की सलाह पर चंदा अपनी बेटी को प्रेरित करने उसी स्कूल में दाखिला लेती है जहां अपेक्षा पढ़ती है, यहाँ दोनों का सामना खुशमिमाज और मेहनती प्रिंसिपल (पंकज त्रिपाठी) से होता है जो गणित पढ़ाते हैं. एक ही क्लास में पढ़ते हुए दोनों के बीच एक अजीब सा तनाव पैदा हो जाता है. यही तनाव फिल्म को अपने अंजाम तक ले जाती है. स्वरा भास्कर हमारे समय की एक जागरूक और हिम्मती अभिनेत्री है, पिछले दिनों हमने उन्हें सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर लिखते और बोलते सुना है, वे भीड़ में अलग नजर आती हैं, उनके अभिनय में स्वभाविकता है और अपने किरदारों को निभाते हुए वे खुद की पहचान खो देती है, यहाँ भी उन्होंने निराश नहीं किया है, उनकी बेटी बनी रिया शुक्ला ने भी उनका अच्छा साथ दिया है. अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने एक बार फिर चौकाया है, उनमें मौलिकता है और वे लगातार अपने आप को निखार रहे हैं इस फिल्म के बाद उन्हें इग्नोर करना आसान नहीं होगा. मालकिन के किरदार में रत्ना पाठक शाह हमेशा की तरह बेहतर हैं.

निर्देशक के तौर पर ‘निल बट्टे सन्नाटा’ अश्विनी अय्यर तिवारी की पहली फिल्म है, वे ऐड मेकिंग से फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में आई हैं, सब कुछ रियलस्टिक रखते हुए उन्होंने रोजमर्रा की आम जिंदगी को बहुत खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है, वे उम्मीद जगाती हैं. फिल्म की शूटिंग आगरा में की गयी है लेकिन एक भी क्षण ऐसा नहीं हैं जहाँ फोकस “ताज” पर जाता हो, एक-आध सीन में अगर “ताज” नजर भी आता भी है तो वह नेपथ्य में है, धुंधला और अपने आप में सिमटा सा, मानो वह अपने पूरे वैभव और खूबसूरती से कहानी में कोई खलल ना डालना चाहता हो. यह एक साधारण सी कहानी है जहाँ सपने और हकीकत एक साथ चलते हैं, जहाँ आम जीवन की तरह एक गरीब मां अपने स्थिति से बाहर निकलने के लिए अपनी बेटी के जरिये एक सपना देखती है,यह एक सिंगल माँ और उसके बेटी के बीच के खट्टे–मीठे रिश्तों की भी कहानी भी है. फिल्म का टोन आम भारतीयों के जीवन जैसा है तो अपनी तमाम मुश्किलात और संघर्षो से भरे जीवन के बीच मुस्कराने और खुश होने के लम्हे ढूढ़ ही लेते हैं.अंत में यह एक “बाई” की कहानी है जिसकी समस्याओं को आम जिंदिगी में कोई भी देखना और समझना नहीं चाहता है. उसे “काम वाली बाई” से “घरेलू सहायिका” की स्थिति तक पहुँचने के लिए लम्बा सफर तय करना होगा ताकि इस काम को करते हुए वह अपने आप को कमतर महसूस ना कर सके. बहरहाल यह “बाई” बड़े परदे पर एक फिल्म के मुख्य किरदार के तौर पर मौजूद है इसके लिए फिल्म की पूरी टीम बधाई की पात्र है.

यौन हिंसा और न्याय की भाषा: चौथी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.
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चरित्र प्रमाणपत्र कहाँ है


बंटी उर्फ बलविन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश41 सामूहिक बलात्कार का एक ऐसा मामला है, जिसमें पच्चीस वर्षीय विवाहिता महिला के साथ बलात्कार करनेवाले पाँचों अभियुक्तों को बाइज्जत रिहा करते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एस.के. सेठ और एस.के. चावला ने निर्णय में लिखा, ”यहाँ यह बता दें कि यह सामूहिक बलात्कार का मुकदमा है. एक औरत, जो भले ही कितनी भी दुराचारी क्यों न हो, इतने व्यक्तियों को अपमानजनक ढंग से सामूहिक सम्भोग करने की आमतौर पर सहमति नहीं देगी, जैसे वह सार्वजनिक प्रयोग के लिए कोई जानवर हो. उन्होंने आगे कहा, ”कानून मानता है कि भले ही कोई स्त्री अनैतिक चरित्र की हो या वेश्या ही हो, उसकी अपनी गरिमा और सम्मान होता है. उसके इस नीच व्यवसाय के कारण ही उसके साथ अतिक्रमण नहीं किया जा सकता.  लेकिन निर्णय के अन्त तक आते-आते न्यायमूर्तियों ने स्थापना दी, ”लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि फिर भी, अनैतिक चरित्र पूर्णतया गौण परिस्थिति नहीं होगी. यह स्वयं सारी कहानी को अविश्वसनीय बना सकता है. यह कहानी से उस सम्भावना शक्ति को छीन सकता है, जो किसी ऐसी महिला ने सुनाई हो, जिसका कोई नैतिक चरित्र ही नहीं. जिस अनैतिक चरित्र की महिला पर विश्वास करना कठिन है, अगर वह यह कहे कि कुछ व्यक्तियों ने उसके साथ (बलात्) सम्भोग किया है, बशर्ते कि इस बात का कोई सन्तोषजनक प्रमाण उपलब्ध न हो.

वर्षों पूर्व मद्रास उच्च न्यायालय के एक निर्णय42 में भी कहा था, ”किसी वेश्या की मर्यादा को भी सम्मान सुरक्षा का उतना ही अधिकार है, जितना किसी अन्य महिला को, लेकिन हर बार, न्याय की तुला में एक तरफ बलात्कार और अपमानजनक पीड़ा होती है और दूसरी तरफ पीडि़ता का नैतिक चरित्र. जाहिर है ऐसे में, ऐसी स्त्री के साथ न्याय असम्भव है, क्योंकि उसकी पूरी कहानी सन्देह के घेरे में ही घूमती रहेगी. उसकी बात पर कौन यकीन करेगा ? फिलहाल ऐसे सामाजिक या मानसिक बदलाव की कोई आधारभूमि नजर नहीं आ रही. सिर्फ न्यायमूर्तियों को दोषी ठहराना भी व्यर्थ होगा, क्योंकि वे भी उसी समय और समाज की उपज हैं, जिसमें नैतिकता, मर्यादा, पवित्रता, यौनशुचिता वगैरह की सारी जिम्मेवारी सिर्फ स्त्री पर लाद दी गई है. धर्मशास्त्रों से लेकर न्यायशास्त्रों तक में. स्त्री के लिए इस दुश्चक्र  से बाहर निकलने का तब तक कोई दरवाजा नहीं, जब तक सत्ता और सम्पत्ति पर निर्णय लेने का उसे भी बराबर हक नहीं मिल जाता या वह न्याय व्यवस्था की गूढ़ भाषा पढऩे-समझने योग्य नहीं हो जाती. सुशिक्षित और प्रतिष्ठित, सचेत और अधिकारों के प्रति पूर्ण रूप से जागरूक.

वक्ष, जाँघ, नितम्ब या पीठ पर चोट के निशान दिखाओ

बिरम सोरेन बनाम पश्चिम बंगाल 43 केस में अभियुक्त घर में अकेली लडक़ी (उम्र सोलह-सत्रह वर्ष) के साथ बलात्कार करके भाग गया. माँ-बाप लौटकर आए तो लडक़ी के बताने पर थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई. सत्र न्यायाधीश ने बलात्कार के अपराधी को दस साल कैद और 5000 रुपए जुर्माना की सजा सुनाई. लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.पी. राजखोबा ने अपील का फैसला सुनाते हुए कहा, ”स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि दोनों में प्रेम था या नहीं, मगर स्थितियों ने शारीरिक मिलन का अवसर प्रदान किया. अधिकांश ग्रामीण फुटबाल मैच देखने गए हुए थे. कुछ अड़ोसी-पड़ोसी भी फुटबाल मैच देखने गए हुए थे और माता-पिता बाजार. वह घर में अकेली थी. सारे तर्कों को तोड़ते हुए दोनों की आत्मीय यौन इच्छा बढ़ गई और यौन आनन्द उठाते हुए उन्होंने सम्भोग कामना शान्त की. यौन झिल्ली फटने और खून बहने का कारण यह है कि उसके जीवन में सम्भोग का प्रथम अनुभव था. शरीर के किसी हिस्से पर चोट के निशान नहीं होना, उसकी इस बात को झूठा प्रमाणित करता है कि उसने प्रतिरोध किया था और नतीजतन ब्लाउज फट गया था….बाहरी चोटों का न होना जैसे वक्षस्थल पर नाखूनों के निशान, जाँघ, नितम्ब और पीठ वगैरह पर खरोंच सहमति का सुझाव ही देते हैं.
अन्त में न्यायमूर्ति ने कहा, ”पीडि़ता के गुप्तांगों पर चोट के निशान हमें भय से कँपकँपा देनेवाले हैं. परन्तु हम यह कहने को विवश हैं कि बलात्कार का मामला नहीं है….अभियुक्त को जेल से आजादी दे दी जाए…दूसरे न्यायमूर्ति जे.एन. होरे ने लिखा, ”मैं सहमत हूँ, और निर्णय में अपने हस्ताक्षर कर दिए.

लगता है, अदालत के लिए बलात्कार एक ‘स्टीरियो टाइप’ है कर्मकांड की तरह उसमें वही सब होना है जो होना चाहिए. यह सब बलात्कार को ‘संयोग में बदलने की युक्तियाँ हैं. बलात्कार की शिकार स्त्री सिर्फ एक गवाह है. गवाह को केवल बलात्कार का अनुभव दोहराना है. अपने अस्तित्व को भुलाकर दोबारा बताना है कि बलात्कार कब, कहाँ, कैसे और किसने किया. यही नहीं, यह भी बताना है कि उसने खुद क्या किया ? कुछ नहीं किया तो क्यों ? यानी एक बार फिर ‘बलात्कार’. मामूली-सी भूल-बलात्कार को सहमति से सम्भोग में बदल सकती है. बदलती रही है. ‘वक्षस्थल पर नाखूनों के निशान और जाँघ, नितम्ब और पीठ वगैरह पर खरोंच दिखाना मत भूलना. वरना…न्याय की भाषा में इसे ‘सहमति का सुझाव’ समझा जाएगा, समझा जाता है. सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि उसने मेरी ‘इज्जत’ लूट ली, अपना ‘मुँह काला’ किया, जीवन ‘बर्बाद’ कर दिया या उसने मेरे साथ ‘वो काम किया जो उसे नहीं करना चाहिए था. ‘हर सेक्सुअललॅस्ट’ अपहरण और बलात्कार के एक अन्य मामले में न्यायमूर्तियों ने स्कूल सर्टीफिकेट को प्रामाणिक नहीं माना और डॉक्टरी रिपोर्ट को महज राय मानते हुए अभियुक्त को सन्देह का लाभ देकर छोड़ दिया. बलात्कार के आरोप को सहमति से सम्भोग घोषित करते हुए न्यायमूर्तियों ने कहा, ”अपीलार्थी के साथ रहने में नन्दा की पूर्व सहमति थी ताकि वह अपनी यौन लिप्सा शान्त कर सके.44 न्याय की भाषा में, अब तक जहाँ ‘हिज सेक्सुअल लॅस्ट’ का इस्तेमाल किया जाता रहा है, वहाँ अब ‘हर सेक्सुअल लॅस्ट’ लिखा जाने लगा है. मर्दों की दुनिया में स्त्री के  ‘मौन’ को सम्भोगेच्छा ही मानकर चला जाता है.

अनिल कुमार बनाम हरियाणा45 में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों का निर्णय है कि एक जवान लडक़ी और एक युवा व्यक्ति एकान्त में, एक ही छत के नीचे, तीन दिन से ज्यादा रहे हों, तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि अनिवार्य रूप से वे आपस में मैथुन करते रहे होंगे. इस निष्कर्ष के आधार बिन्दु वही प्रचलित मिथ हैं कि स्त्री-पुरुष के बीच घनिष्ठ सम्बन्धों का मतलब है यौन सम्बन्ध. इसके अलावा कुछ और तो सोचा ही नहीं जा सकता है न. सुभाष बनाम हरियाणा46 में बलात्कार के आरोप को सहमति से सम्भोग मानते हुए न्यायमूर्तियों का कहना था, ”स्कूल प्रमाणपत्र के अनुसार लडक़ी की उम्र सोलह वर्ष से ज्यादा है और डॉक्टरी रिपोर्ट के मुताबिक यह सम्भोग की आदी है. शरीर पर न कोई चोट का निशान है और न खून बहने के ताजा चिह्न. लडक़ी द्वारा लिखे दो प्रेम पत्रों से पता लगता है कि वह अभियुक्त से प्रेम करती थी. अगर प्रेम और सहमति थी, तो फिर बलात्कार का आरोप वह लगाती ही क्यों ?


ब्रजेश कुमार बनाम हरियाणा47 में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कहते हैं, ”अगर कोई सोलह वर्ष से बड़ी उम्र की लडक़ी सम्भोग में आनन्द उठाने के लिए, स्वेच्छा से किसी पुरुष के सामने समर्पण करती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि पुरुष ने बलात्कार किया है. यहाँ, ‘सम्भोग का आनन्द’और पुरुष के सामने ‘स्वेच्छा से समर्पण’ की भाषा-संरचना के पीछे वही पुराना तर्क है कि ऐसी स्त्री स्वयं बलात् (सम्भोग) की इच्छुक होती है. अच्छी लडक़ी होती तो अपनी जान जोखिम में डालकर भी ‘सतीत्व’ या ‘कौमार्य’ की रक्षा करती. औरत के प्रतिरोध न करने का अर्थ है स्वेच्छा से समर्पण. और कानून या न्याय की भाषा में इसे ‘बलात्कार’ नहीं माना जाता. विवाहित महिला के साथ बलात्कार के एक मामले में सत्र न्यायाधीश ने तीन वर्ष कठोर कारावास की सजा सुनाई, परन्तु उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री पी.पी. गुप्ता ने अभियुक्त को रिहा करते समय कहा कि पीडि़ता की गवाही पूर्णतया अमान्य और अविश्वसनीय है. निर्णय में लिखा है, ”यह विश्वास करने के लिए बेहद असम्भावित है कि पीडि़ता को उस समय भी यह पता नहीं लग पाया कि अभियुक्त उसका पति है या कोई और, जब अभियुक्त ने सम्भोग आरम्भ किया. एक विवाहित महिला और वह भी दो बच्चों की माँ, साँसों की गन्ध, डीलडौल, लिंग के आकार और लम्बाई, सम्भोग के तरीके और अन्य तत्त्वों तक से फौरन महसूस कर लेगी कि सहवास करनेवाला व्यक्ति उसका अपना पति है या कोई अन्य व्यक्ति….अस्तु, यह तथ्य कि सम्भोग शुरू होने के समय पीडि़ता ने न तो कोई प्रतिरोध किया और न ही शोर मचाया, उसके अपने व्यवहार को सन्देहास्पद बनाता है…उसने अभियुक्त को सम्भोग पूरा करने का अवसर दिया और इसके बाद ही शोर मचाना शुरू किया.48



सचित्र कोकशास्त्र से मुकाबला करती न्याय की भाषा

न्यायाधीश का अगला तर्क यह था कि उस दिन अँधेरी रात थी. तब वह अभियुक्त को कैसे पहचान सकती है–यह भी स्पष्ट नहीं होता. यही नहीं, यह भी सम्भवत: विश्वास योग्य नहीं है कि अभियुक्त ने एक हाथ से मुँह बन्द करके रखा और चारपाई से नीचे लाकर सम्भोग करने में कामयाब रहा… अभियुक्त को झूठे मुकदमे में फँसाने की इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अभियुक्त के पिता और पीडि़ता के पति के सम्बन्ध तनावपूर्ण थे. उपरोक्त निर्णय में न्याय की भाषा तर्क (कुतर्क) की भाषा है. सामाजिक जीवन में स्त्री की स्थिति को भयावह अनुभव की भाषा नहीं कहा जा सकता. हालाँकि कानून और न्याय हमेशा तार्किक नहीं होता. नहीं हो सकता. अँधेरे में औरत अपने पति ‘परमेश्वर’ को तो पहचान सकती है–अभियुक्त को नहीं. पति को ‘साँसों की गन्ध’ या ‘लिंग का आकार और लम्बाई’ से पहचाना जा सकता है. मानो विवाहित औरतें पति के ‘लिंग का आकार और लम्बाई’ इंचटेप से नाप कर रखती हैं. दरअसल कानून, न्यायशास्त्र और ऐतिहासिक निर्णय ऐसी भाषा (अंग्रेजी) में हैं, जिसे ‘बहुमत’ पढऩा-लिखना ही नहीं जानता, समझना तो और दूर की बात है. जिस दिन ‘बहुमत’ अनपढ़ नहीं रहेगा या अपनी भाषा में जानने लगेगा, उस दिन यह ‘न्याय की भाषा’ नहीं रहेगी. नहीं रह सकती.
जनता की भाषा में ही न्याय की भाषा विकसित और समृद्ध हो सकती है. अगर अदालत की भाषा वादी, प्रतिवादी या मुवक्किल की भाषा नहीं है तो उस बेचारे वादी, प्रतिवादी या मुवक्किल को तो पता ही नहीं लगता कि वकीलों ने बहस में क्या कहा और न्यायमूर्ति ने क्या हुक्म दे दिया. मुवक्किल, वकील और न्यायमूर्ति जब एक दूसरे की भाषा को समान रूप से समझेंगे, तब सबको मालूम रहेगा कि क्या हुआ. न्याय या अन्याय ? गलत या सही ? विरोध-प्रतिरोध की सम्भावनाएँ बढ़ेंगी तो अन्याय की सम्भावना स्वत: समाप्त हो जाएगी. उस स्थिति में न्यायमूर्ति के निर्णय का हर शब्द, बहुत सोच-समझकर लिखा जाएगा, लिखना पड़ेगा, वरना…जनता सवाल करेगी और सवालों के जवाब भी देने ही पड़ेंगे.

‘फिट ऑफ पैशन’ : टोकन पनिशमेंट

राजू और कृष्णा बनाम कर्नाटक राज्य49 से सैलीना डिसूजा नाम की इक्कीस वर्षीया एक नर्स को अपने भाई की शादी में जाना था. रास्ते में देर हो गई. बंगलौर पहुँची तो पाँच बज गए. बस में साथ सफर कर रहे दो युवकों पर विश्वास करके, रात को होटल के एक कमरे में रुक गई. लडक़ों ने बारी-बारी से बलात्कार किया. मौका मिलते ही चीखी, चिल्लाई, शोर मचाया. सत्र न्यायाधीश ने 1980 में राजू को अपराधी माना मगर कृष्णा को नहीं. अभियुक्त की युवा उम्र और इस तथ्य को देखते हुए कि लडक़ी स्वेच्छा से अभियुक्त के साथ होटल के एक ही कमरे में रहने के लिए आई थी, जहाँ अभियुक्त ने सम्भोग कामना के दौर (फिट ऑफ पैशन) में बलात्कार किया, अभियुक्त राजू को उस दिन अदालत बन्द होने तक हिरासत में रखने और 500 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई. बलात्कार के मामले में ऐसी ‘टोकन’ सजा का, शायद यह ‘अभूतपूर्व निर्णय’ कहा जा सकता है. अपील में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने 2 अगस्त, 1982 को दोनों अभियुक्तों को दोषी पाया और सात साल कैद का आदेश दिया. इसके विरुद्ध अभियुक्तों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री के. जयचन्द्रा रेड्डी और जी.एन. राय ने 12 अक्टूबर, 1993 को फैसला सुनाते समय कहा, ”भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के अन्तर्गत दोनों अभियुक्तों की सजा में हस्तक्षेप करने का हमें कोई कारण नहीं मिला. जहाँ तक दोनों अभियुक्तों को सात साल कैद की सजा का सवाल है, हमें ऐसा लगता है कि यह असम्भव नहीं है कि शुरू में अभियुक्तों की वास्तव में यह ही इच्छा रही हो कि लडक़ी को भाई के घर जल्दी से जल्दी पहुँचाने में मदद की जाए. लेकिन बाद में जब वह रात को होटल के एक ही कमरे में साथ रहने को सहमत हो गई तो दोनों नवयुवक यौन हवस के शिकार हो गए और उन्होंने लडक़ी की असहमति और विरोध के बावजूद बलात्कार किया.

अभियुक्तों की बहुत युवा उम्र और उन परिस्थितियों को देखते हुए, जहाँ इस बात की सभी सम्भावनाएँ मौजूद हैं कि वे अपनी सम्भोग कामना के दौरे पर काबू नहीं पा सके, सारी सौम्यता और नैतिकता भुला बैठे और अन्तत: बलात्कार का अपराध किया (कर बैठे). इस तथ्य को भी देखते हुए कि यह घटना बहुत पहले घटी थी और इस अदालत तक मुकदमेबाजी के दौरान, दोनों ही बहुत बदनामी और मानसिक पीड़ा झेल चुके हैं, हम सोचते हैं कि अगर दोनों अभियुक्तों को कम सजा सुनाई जाए, तो भी न्याय का लक्ष्य पूर्ण हो जाएगा. इसलिए हम निर्देश देते हैं कि इन दोनों अभियुक्तों को तीन साल कठोर कारावास का दंड भुगतना चाहिए….अपील के दौरान अभियुक्त जमानत पर रहे हैं। उन्हें हिरासत में ले लिया जाना चाहिए ताकि वे सजा भुगत सके. अभियुक्त के विद्वान वकील का तर्क था, ”लडक़ी ने खुद उत्पे्ररित किया था. अभियुक्त नौजवान था. उत्प्रेरणा और गम्भीर रूप से उकसाने पर, वह सम्भोग इच्छा के वशीभूत हो, मानसिक सन्तुलन खो बैठा. उस उम्र में यह सब होना बहुत स्वाभाविक है. क्या सचमुच ‘वेरी नेच्युरल’ नहीं ? राज्य सरकार की ओर से विद्वान अधिवक्ता ने गम्भीरतापूर्वक कहा, ”अगर वह थोड़ी-सी बुद्धिमान और सतर्क होती तो शायद इन दो अनजान युवकों पर विश्वास न करती और ऐसा दुर्भाग्य न झेलना पड़ता.

हालाँकि शिक्षित है, मगर दिल से बहुत सीधी-सरल और मानवीय अच्छाइयों का सम्मान करनेवाली. सिर्फ भरोसा और विश्वास क रने का अर्थ यह नहीं कि अभियोजन पक्ष पर अविश्वास किया जाए….अगर अभियुक्त ने दुष्कर्ष नहीं, बल्कि लडक़ी की मदद की है तो यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह अभियुक्तों पर बलात्कार का झूठा आरोप लगाएगी. सवाल है कि आखिर वह ऐसा क्यों करेगी वह ही क्या, कोई भी नहीं कर सकता. उपरोक्त केस में सत्र न्यायाधीश द्वारा सुनाई ‘टोकन पनिशमेंट’ से लेकर सुप्रीम कोर्ट के उदारवादी-सुधारवादी निर्णय तक, एक शब्द बार-बार दोहराया गया है–’फिट ऑफ पैशन’. न्यायमूर्तियों द्वारा ही नहीं, बल्कि बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा भी दो युवा लडक़े और एक जवान लडक़ी, तीनों होटल के एक ही कमरे में। रात का समय. ऐसी स्थिति में ‘सभी सम्भावनाएँ मौजूद’ हैं. नवयुवकों को ‘सम्भोग इच्छा का दौरा’ पडऩा भी ‘स्वाभाविक’ है और ‘सौम्यता और नैतिकताÓ के पाठ भूल जाना भी। तेरह साल कोर्ट-कचहरी के दौरान युवकों ने कितनी ‘बदनामी और मानसिक पीड़ा’ झेली होगी ? तेरह में ग्यारह साल तो सर्वोच्च न्यायालय में ही लग गए. हाँ ! यही सब सचमुच ‘बहुत स्वाभाविक’ है. ‘वेरी नेच्युरल’, यू नो




क्रमशः…..

एक दूसरे के खिलाफ लड़ाई जा रही अस्मिताएं

शालिनी आर्य 

इस बार फिर मेरे हमसफर रतन लाल सूर्खियों में हैं. इस बार उनका सुर्खियों में होना पिछले अनेक बार की तुलना में अलग है. पहले वे अपने जुझारूपन, न्याय के लिए अपने संघर्ष, अपने  संस्थान में दलित -बहुजन हितों के लिए अपने संघर्ष और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक सक्रियता के लिए सुर्खियों में रहते रहे हैं. लेकिन इस बार मामला थोड़ा भिन्न है. इस बार उनके कॉलेज के प्रशासन में शामिल एक महिला ने अपने उत्पीडन और अपमान का आरोप लगाया है. महिला का कहना है कि जब वे मेरे यहाँ आईं तो रतन ने उन्हें अपशब्द कहे. हमेशा की तरह यह लड़ाई वे खुद भी लड़ सकते थे, बल्कि लड़ भी रहे हैं. लेकिन इस बार थोड़ी बात मुझे भी कहने की इच्छा हो रही है. क्योंकि दो अस्मिताओं को आपस में टकराने के माहौल बनाने का ब्राह्मणवादी इलीट षड़यंत्र दूसरी बार देख रही हूँ रतन के मामले में. रतन चूकी दलित प्रोफ़ेसर हैं, विद्यार्थियों में लोकप्रिय हैं, दलित -बहुजन हितों के लिए लड़ते है, कॉलेज और विश्वविद्यालय में आरक्षण की लड़ाई भी लड़ते रहे हैं इसलिए ब्राह्मणवादी भ्रष्ट तंत्र ने उनके खिलाफ महिला अस्मिता को खडा करने की कोशिश की. इसके पहले एक बार एक काल्पनिक नाम से ऐसा करने की कोशिश हुई थी और अब एक उपस्थित महिला से ऐसा करवाया गया है.

वे अपने शोध के लिए 2010 से 2013 तक अकादमिक छुट्टी पर थे. कॉलेज में लौटने से पहले से ही हिन्दू कॉलेज प्रशासन द्वारा इनके खिलाफ साजिश होते मैंने देखा. 3 नवम्बर 2014 को डॉ. प्रदुम्न कुमार, Officiating Principal, ने इन्हें एक पत्र लिखा (पत्र संख्या HC -2/2260). इस पत्र के साथ AR (Colleges) जिसके साथ किसी मोनिका राय का पत्र संलग्न था. मोनिका राय ने दिल्ली विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर महोदय को एक पत्र लिखा था, जिसकी प्रतियाँ, चांसलर महोदय, हिन्दू कॉलेज गवर्निंग बॉडी के चेयरमैन, प्रिंसिपल, स्टाफ एसोसिएशन के अध्यक्ष तथा दिल्ली के जॉइंट लेबर कमिश्नर को भी भेजी गई थी. मोनिका जी ने इस पत्र में रतन के ऊपर कई गंभीर आरोप लगाए थे. रतन ने इस पत्र के साथ कई शंकाएं जाहिर की. मसलन:

(१) चूँकि यह पत्र वाईस चांसलर के ऑफिस से आया है, कही वे मुझे फंसाने की साजिश तो नहीं कर रहे हैं? फिर उन्होंने खुद ही कहा कि ‘VC साहब बहुत बड़े आदमी हैं, मेरे जैसे छोटे-मोटे शिक्षक से उन्हें क्या लेना देना!’
(२) सवाल यह भी था कि वाईस चांसलर साहब के ऑफिस में से तो कोई षड्यंत्र नहीं रच रहा?
(३) क्या Assistant Registrar वगैर किसी के निर्देश के या वगैर किसी वेरिफिकेशन के इस तरह लेटर फॉरवर्ड कर सकती हैं?
(४) क्या यह कॉलेज प्रशासन की साजिश हैं? उन्होंने उन्हीं दिनों कॉलेज में नियुक्तियों में धांधली और आरक्षण की अवहेलना को लेकर मैंने कॉलेज प्रशासन के खिलाफ़ VC महोदय, UGC, MHRD हर जगह ज्ञापन दिया था.
(5) फिर लगा कहीं यह सामूहिक साजिश तो नहीं?

मोनिका राय का ज्ञापन 23.9.14 को VC ऑफिस में जमा हुआ था और  तक़रीबन चालीस दिन के अन्दर ही कई ऑफिस से गुजरता हुआ रतन के पास पहुंचा था. रतन आश्चर्यचकित थे कि आम तौर पर कोई अपने प्रिंसिपल या वाईस चांसलर महोदय को कोई पत्र लिखे, तो एक तो कोई जबाव आता ही नहीं, यदि आंशिक जबाव आया तो उसका कोई मतलब नहीं. लेकिन मोनिका रॉय के मामले में VC ऑफिस से लेकर प्रिंसिपल ऑफिस की तत्परता उनके लिए चौंकाने वाला, हतप्रभ करने वाला था. खैर, रतन ने उस पत्र का जवाब दिया उस पत्र में जो पता आदि था उसकी जानकारी के लिए उन्होंने  चुनाव आयोग के वेबसाइट पर जाकर कथित शिकायतकर्ता का नाम और पता जानने की कोशिश की. साथ ही इन्द्रपुरी में रहने वाले कुछ साथियों से इन्द्रपुरी के इस पते पर जाकर पता करने का आग्रह किया कि जरा इस व्यक्ति और इनके पते की जानकारी दें. सामने जो तथ्य आए वो चौंकाने वाले थे; नाम, संगठन और पता सब फर्जी थे, दिल्ली के नक़्शे पर वे मौजूद ही नहीं थे. शिकायतकर्ता के विश्वसनीयता की जांच के बिना रतन लाल से सवाल पूछ लिया गया था, पत्र में कोई कांटेक्ट नंबर भी नहीं था.  वह यह साजिश नहीं तो और क्या थी?

यह साजिश एक स्त्री ( काल्पनिक) को एक दलित प्राध्यापक के खिलाफ इस्तेमाल की थी. रतन ने व्यंग्य किया कि ‘अब सीधे इन्द्रलोक (इन्द्रपुरी नहीं) से ‘देवी’ को, मोनिका के अवतार में ले आये हैं वे. इसे कहते हैं ‘छल-लीला’. रतन के अनुसार  काल्पनिक ‘मोनिका राय’ के ज्ञापन और उनके स्टाफ रूम के उनके कुछ विरोधियों की चर्चा में अभूतपूर्व समानता थी. स्टाफरूम की पूरी चर्चा मेरे घर के कैंपस और डा. आंबेडकर की प्रतिमा पर केन्द्रित होती थी. ऐसा लगता है कि जब काल्पनिक महिला से,  व्यवस्था के दमन और आतंक से रतन पीछे नहीं हटे तो अब एक वास्तविक महिला को उनके खिलाफ उतरा गया है – फर्जी आरोपों के साथ. मैं सोचती हूँ कि क्या महिलायें कभी यह समझ पाएंगी कि ऐसे तंत्र में उनका सिर्फ इस्तेमाल होता है. सच है कि महिलाओं की कोई जाति नहीं होती, लेकिन महिलायें जाति से मुक्त भी नहीं हो पातीं. जिन्हें साझा लड़ाइयां लडनी चाहिए थी, वे एक दूसरे के खिलाफ लड़ाये जा रहे हैं. यह सब अंततः ब्राह्मणवादी व्यवस्था के हित में ही जाता है और हाशिये पर छूट जाते हैं दलित -बहुजन और स्त्रियाँ !

पुनश्च : एक पत्नी होने के नाते रतन के संघर्ष, मानसिक दशा को कौन बेहतर समझ सकता है। संकट और अभाव में रहकर भी कभी  हार नहीं मानते। मुझे अमिट विश्वास है रतन इस संघर्ष से भी बहादुरी से निबटेंगे। हमलोग इस संघर्ष के आदि हो गये हैं, हमारे घर में इससे  कोई नहीं डरता हमारे बच्चे भी नहीं।

लेखिका हाउसमेकर हैं. संपर्क: 09971798567 

वे नहीं चाहते कि आजाद सोच के लोग पैदा हों: तीस्ता सीतलवाड़

स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और संपादक तीस्ता सीतलवाड़ इस समय  की  चुनौतियों, जनता के संघर्ष  की  प्राथमिकताओं, न्याय व्यवस्था, जेंडर और जाति के  सवाल पर बात की. तीस्ता सीतलवाड़ पिछले कई सालों से गुजरात के  दंगा  पीड़ितों  को  न्याय के  लिए  कई मोर्चों  पर  सक्रिय हैं, इसलिए  सत्ता के निशाने पर भी हैं.

बलात्कार पर नजरिया और सलमान खान

आशीष कुमार ‘‘अंशु’


आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . फिलहाल विकास पत्रिका ‘सोपान’ से सम्बद्ध हैं और विभिन पत्र -पत्रिकाओं में लिखते हैं . संपर्क : 9868419453 .

सलमान खान
ने अपनी एक फिल्म के
शूटिंग के दौरान होने वाली शारीरिक पीड़ा की तुलना पिछले दिनों मीडिया के सामने बलात्कार से कर दी उसके बाद से हीसमाज में
तो नहीं लेकिन भारती इलेक्ट्रानिक मीडिया में इसे लेकर घमासान मचा है. गौरतलब
है कि जो मीडिया इस वक्त बलात्कार शब्द पर अति संवेदना प्रकट कर
रहा है, मीडिया कांफ्रेन्स
में बलात्कार शब्द पर उनके प्रतिनिधियों
की जो हंसी सुनाई देती है, वह मीडिया
प्रतिनिधियों की संवेदनशीलता
की ही कहानी कहती है. बात माफी
की करते हैं. देश के एक सरोकारी टेलीविजन चैनल में काम करने वाले एक वरिष्ठ
एंकर ने विदर्भ की महिलाओं के लिए अपनी किताब में लिखा कि वे किसान
पति की आत्महत्या के बाद वेश्यावृत्ति करती हैं. ऐसा उन्होंने अपने ही चैनल
की एक झूठी रिपोर्ट को आधार बनाकर लिखा लेकिन क्या मजाल उस टीवी एंकर
ने कभी अपने इस झूठ के लिए अपने पाठक/दर्शक से कभी माफी मांगी हो.


भारतीय दंड
संहिता में सेक्शन 375
के तहत 15 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाना बलात्कार माना गया है. कई रिपोर्ट इस बात की पुष्टी करती हैं कि भारत
में ऐसी ‘धर्म-पत्नियों’ की कमी नहीं हैं, जो बिस्तर पर अपने पति द्वारा
बलात्कार की शिकार होती हैं, अगले दिन फिर सुबह चाय बनाने से लेकर अपने
‘बलात्कारी’ बिस्तर पार्टनर के लिए नाश्ता बनाने
तक का काम वह करती हैं
क्योंकि उनके पार्टनर को बलात्कार का कानूनी अधिकार मिला हुआ है. यह सब लिखने
के पीछे मुराद सिर्फ इतनी है कि बलात्कार को ऐसा शब्द ना बनाइए जिसका
उपयोग समाज में ना किया जा सके. यदि एक व्यक्ति अपने शारीरिक तकलीफ की
तुलना बलात्कृत महिला से कर रहा है तो यह उसकी कम-समझी भी हो सकती है. वास्तव में यह लेख सलमान खान के पक्ष से अधिक उस समझ के खिलाफ है, जो बलात्कार को एक वर्जित शब्द बनाना
चाहता है. ऐसा वर्जित
शब्द जिसका इस्तेमाल
पीड़िता भी करते हुए कई बार सोचे, वह अपने ऊपर हुए अत्याचार
की कहानी किसी को बताए या ना बताए.

मित्र क्या सोंचेगे? समाज क्या सोचेगा? कायदे से मीडिया की कोशिश यह होनी
चाहिए कि उन महिलाओं और युवतियों को
वह बोलने के लिए प्रेरित करे जो अपनों के हाथों बलात्कृत हुई हैं. अपने
पति, अपने पिता, अपने चाचा, अपने ताऊ, अपने मामा, अपने पड़ोसी. कई बार पीड़िता
जब अपना दर्द परिवार में अपनी मां को या अपने किसी सबसे अच्छे दोस्त
को बताती है, अधिक मामलों
में उसे चुप रहने को कहा जाता है. इस तरह जो
मामले मीडिया में आते हैं, वास्तविक
मामले उससे कई गुणा अधिक हैं. उन चुप रहने
की सलाह देने वाले अभिभावकों और मीडिया द्वारा सलमान के लिए
चलाए जा रहे
माफी मांगों अभियान में अधिक अंतर नहीं है. बिहार की
एक दोस्त ने बताया था, किस तरह उसके
चाचा ने उस वक्त उसके साथ बलात्कार
किया, जब उसकी उम्र
दस-बारह साल की थी. खून से लथपथ हुई वह मां के पास शिकायत
करने गई और मां ने उसे नहला दिया और डांटते हुए कहा -‘तुम्हारी
ही गलती रही होगी.’ जब मीडिया
को महिलाओं को इसलिए जागरूक करना चाहिए कि वे अपने ऊपर हुए ‘बलात्कार’ के लिए सामने आएं.

समाज क्या कहेगा, पड़ोसी क्या सोचेंगे, यह सब सोचकर
किसी अपराधी का साथ ना दें. लेकिन मीडिया की रूचि बलात्कार को समस्या के
तौर पर देखने से अधिक ‘सलमान’ को माफी मांगते हुए देखने में अधिक है. दिल्ली का
ही एक मामला था, जब मेरे एक
मित्र योगेन्द्र योगी ने अपने टीवी चैनल के लिए
एक छोटे बच्चे पर हुए बलात्कार पर रिपोर्ट बनाई थी. उसके चैनल ने पूरी
रिपोर्ट इसलिए खारिज कर दी क्योंकि पीड़ित और बलात्कारी दोनों मजदूर
पृष्ठभूमि के थे. बहरहाल, सलमान के
पूरे ‘माफी मांगो
प्रकरण’ को संवेदना
नहीं चैनल के अर्थशास्त्र की नजर से ही समझा जा सकता है. फिलहाल इस
पूरे मामले पर अपनी समझ यही बनी है और अंत में: बलात्कार को
एक ऐसा अभिशप्त शब्द बना दिया गया जिसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. ऐसा करने वाले सोचते होंगे इससे वे पीड़िता का कुछ भला कर रहे हैं जबकि
इससे पीड़िता क्या भला होगा, मीडिया में काम कर रहे बुद्धीजीवी पत्रकारों
की मानसिकता का खुलासा जरूर हो जाता है.



बलात्कार पीड़िताओं के लिए सहानुभूति
जुटाने के अभियान में लगा मीडिया उन्हें न्याय दिलाने के लिए ईमानदार
कोशिश करता या फिर कोई बलात्कार का अपराधी कभी पीड़िता को धमकाने की
जुर्रत ना करे ऐसी कोई तरकीब निकालता या सलीम खान से माफी मंगवाने की
जगह कोई ऐसी कोशिश मीडिया की तरफ से होती कि बलात्कार के अपराधियों
को जब तक सजा ना हो जाए, हर एक बलात्कार
के केस का फॉलो अप लगातार मीडिया
में आएगा तो वास्तव में वह काबिले तारिफ कोशिश कहलाती. एक अभिनेता
जो बलात्कार की पीड़ा से अपने शारीरिक श्रम से हुई पीड़ा की तुलना करता
है, उसके पीछे
सभी मीडिया चैनल वाले इस तरह पड़ गए जैसे फैसला वे कर चुके
हों और अब इस मामले में वह अभिनेता का स्पष्टीकरण भी नहीं सुनना चाहते. मुझे याद है कि महीनों और फिर सालों तक हरियाणा के भगाना की बलात्कार
पीड़िता बहनें दिल्ली के जंतर मंतर पर टिकी रही. ना जाने बलात्कार
पीड़िताओं के लिए सहानुभूति से भरी भारतीय मीडिया उन दिनों कहां थी ? उनके अपराधियों को सजा कहां हुई ?

जयपुर की एक छोटी बच्ची के साथ हुए बलात्कार
मामले में वहां की एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने बड़ी बेशर्मी से मुझे कहा
था कि लड़की के परिवार वाले पैसों के भूखे हैं, इसलिए लड़की के लिए न्याय
मांगने का ढोंग कर रहे हैं. मीडिया समाज की इस मानसिकता को बदलने के
लिए क्या कर रही है ? किसी की जुबान
बंद करने से सोच नहीं बदलती. वास्तव में
रेप शारीरिक से अधिक ‪मानसिक-उत्पीड़न है. अपराधी
एक बार किसी स्त्री
के साथ रेप करता है लेकिन पीड़िता का रेप उसके बाद खत्म नहीं होता, उसके बाद प्रतिदिन परिवार/समाज उसका
रेप करता है. वास्तव में रेप के मामले
में माफी यदि मंगवाई जा सकती है तो उस ‘सोच’ से मंगवाने का प्रयास करना
चाहिए, जिसके साथ
हम पलते, बढ़ते है
और बलात्कार करने से अधिक हमें
परेशान बलात्कार ‘शब्द’ का एक अभिनेता द्वारा इस्तेमाल किया जाना करता
है. है ना शर्मनाक !

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : तीसरी किस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम. आज तीसरी  क़िस्त… 

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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त 

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न्याय की बुद्धिमत्ता का नियम 

20वीं सदी के आरम्भ से लेकर अब तक अदालत, कानून और न्याय की भाषा-परिभाषा मूलत: स्त्री के प्रति अविश्वास, घृणा और अपमान से उपजी भाषा है. ”बलात्कार के मामलों में, सिर्फ बलात्कृत स्त्री के आरोपों पर किसी भी व्यक्ति (पुरुष) को सजा सुनाना बेहद असुरक्षित (‘क्वाइट अनसेफ) होगा.13  असुरक्षित ही नहीं बल्कि एक कदम आगे बढ़ न्यायमूर्ति ने चेतावनी दी, ”बिना अन्य प्रमाणों के सिर्फ उसके बयान के आधार पर सजा देना अत्यन्त खतरनाक होगा. 14 तीन साल बाद एक अन्य न्यायमूर्ति ने ऐलान किया, बिना अन्य प्रमाणों के सिर्फ स्त्री के बयान पर विश्वास करना, प्रत्यक्ष रूप से बहुत असुरक्षित (नोटोरियसली वेरी अनसेफ) होगा.15 इसलिए स्त्री की गवाही को अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से जोडक़र देखना अनिवार्य है.16 और ”अन्य प्रमाणों की अनुपस्थिति में, सिर्फ तथाकथित बलात्कार की शिकार स्त्री के बयान के आधार पर अभियुक्त को दोषी ठहराना उपयुक्त नहीं.17
उपरोक्त फैसलों के कुछ साल बाद एक न्यायमूर्ति ने थोड़ा संशोधन करते हुए कहा, ”बलात्कार के मामलों में अन्य प्रमाण अनिवार्य नहीं. अदालत को अधिकार है कि वह बिना अन्य प्रमाणों के लडक़ी का साक्ष्य स्वीकार कर सकती है. लेकिन इसे स्वीकारने में धीमा रहना चाहिए. अदालत द्वारा उसकी गवाही (साक्ष्य) को बहुत ध्यान से देखना अनिवार्य है.18  दूसरे न्यायमूर्ति ने लिखा है, ”दस वर्षीया बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में कानून के लिए यह जरूरी नहीं कि अन्य स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध हों. हाँ, किसी औरत द्वारा बलात्कार का आरोप लगाना एकदम भिन्न स्थिति है और किसी बच्ची द्वारा यह कहना कि अमुक व्यक्ति दोषी है–भिन्न स्थिति है.19 परन्तु तीसरे न्यायमूर्ति का विचार था, ”बलात्कार के मामले में सिर्फ लडक़ी के साक्ष्य को काफी न मानना ही एक अच्छा नियम है.20 क्योंकि ”यह नियम कि बलात्कार की शिकार स्त्री का साक्ष्य मानने के लिए अन्य प्रमाण अनिवार्य हैं.

दरअसल बुद्धिमत्ता का नियम (रूल ऑफ प्रूडेंस) है. 21 इसके बिना ”अभियुक्त को सजा देने के लिए, इसे उचित आधार के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए.22 कुल मिलाकर नतीजा वही है कि ‘सिर्फ स्त्री की गवाही के आधार पर सजा देना उचित नहीं. स्त्री के बयान पर विश्वास करना ‘खतरनाक’ है. बलात्कार के अन्य प्रमाण, सबूत और गवाह अनिवार्य हैं. बीसवीं सदी के पचास साल तक न्यायमूर्ति, बलात्कार की शिकार स्त्री से स्वतंत्र साक्ष्य की माँग करते रहे और न्याय की भाषा ‘बेहद असुरक्षित’ से ‘बेहद खतरनाकहोती गई. 1950 में लाहौर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने पुनर्विचार करने के बाद स्पष्ट किया, ”अन्य प्रमाणों को देखने का नियम सह-अपराधियों के लिए बनाया गया है और बलात्कार की शिकार स्त्री सह-अपराधी नहीं, बल्कि अपराध से पीडि़त स्त्री है. इसलिए बलात्कार के मामलों में पीडि़ता के साक्ष्य मानने के लिए अन्य प्रमाण हमेशा अनिवार्य नहीं हैं. ऐसे मामलों में याद रखनेवाली बात यह है कि क्या सिर्फ उस (स्त्री) के बयान के आधार पर सजा देना सुरक्षित है ? यह हर मुकदमे की स्थितियों पर निर्भर करता है.23 लेकिन उसी समय नागपुर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने विरोध में स्थापना दी, ”यद्यपि कानूनन यह मानने योग्य है, लेकिन बिना अन्य प्रमाणों के अभियुक्त को सजा देना खतरनाक है. यह नियम समान रूप से जरूरी है, चाहे पीडि़ता वयस्क महिला हो या सात वर्षीया कन्या. व्यवहार में यह नियम मजबूत नियम है कि बिना अन्य प्रमाणों के बच्ची की गवाही न मानी जाए. हालाँकि भारतीय कानून में यह नियम बुद्धिमत्ता का नियम है–कानून का नहीं.24 यह स्थापना देते हुए विद्वान न्यायमूर्तियों ने कुछ वर्ष पूर्व सुनाए अपने ही फैसले को निरस्त कर दिया. कानूनी नियम न होते हुए भी यह नियम न्यायमूर्तियों की ‘बुद्धिमत्ता का नियम’ बना रहा. बना हुआ है। कौन कहे–क्यों ? सवाल करो भी तो जवाब कौन देगा ?

खैर…आजादी के बाद, भारतीय गणतंत्र की सर्वोच्च अदालत ने लाहौर उच्च न्यायालय के 1950 वाले फैसले की तर्ज पर दोहराया, ”यह नियम, जो फैसलों के अनुसार कानूनी नियम बन गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि सजा के लिए अन्य प्रमाण अनिवार्य हैं. लेकिन बुद्धिमत्ता के लिए अन्य प्रमाणों का होना जरूरी है, सवाल यह है कि बुद्धिमत्ता का यह नियम हमेशा याद रहना चाहिए. व्यवहार में ऐसा कोई नियम नहीं है कि हर मुकदमे में, सजा देने से पहले अन्य प्रमाणों को देखना अनिवार्य हो.25 सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने ‘बुद्धिमत्ता के नियम’ को भी ‘कानून का नियमÓ घोषित कर दिया। इस निर्णय का प्रभाव यह हुआ कि सभी उच्च न्यायालयों को इसे मानना पड़ेगा. कुछ उच्च न्यायालयों के न्यायमूर्तियों ने इस फैसले को मानते हुए निर्णय सुनाए. लेकिन…कुछ न्यायमूर्ति ‘बुद्धिमत्ता के नियम’ के अनुसार ही न्याय करते रहे. पटना उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय के बावजूद कहा, ”बलात्कार के मामले में, वयस्क महिला के मुकदमे में अन्य प्रमाण अनिवार्य ही नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्र स्रोतों से भी होने चाहिए.26



बलात्कार नहीं, ‘शान्तिपूर्ण मामला’


इसके बाद करीब तीन दशकों तक बलात्कार की शिकार स्त्री से ‘बुद्धिमत्ता का नियम’ प्राय: ‘अन्य प्रमाण’ माँगता ही रहा. आहत, अपमानित और पीडि़त हजारों स्त्रियों की चीखें कानून की किताबों में बन्द पड़ी हैं. न्याय की नजर में उसका चीखना…चिल्लाना…शोर मचाना सिर्फ झूठ के ऊतक (‘टिशू ऑफ लाइज’) हैं. ये सब औरतें ‘भंयकर रूप से झूठी थीं और उनकी गवाही ‘झूठ और असम्भावनाओं से भरी पड़ी हैं. उनके शरीर पर कोई ‘चोट’ का निशान नहीं था. ‘यौन झिल्ली पहले से ही फटी’ हुई थी। ‘सम्भोग की आदी’ थीं और ‘कथित सम्भोग एक शान्तिपूर्ण मामला’ था. उन्होंने खुद ‘पूर्ण रूप से हवस शान्त करने’ की सहमति दी थी. मत भूलो कि ‘सम्भोग और बलात्कार में दुनिया भर का भेद है. इन पर ‘विश्वास करना ‘खतरनाक’ है. ”इन महिलाओं की तुलना सभ्य और प्रतिष्ठित समाज की महिलाओं से नहीं की जा सकती। ये महिलाएँ नीच काम में शामिल थीं और उनका चरित्र सन्दिग्ध है.27 1972 में प्रमिला कुमारी रावत के साथ तीन व्यक्तियों ने बलात्कार किया. उस समय प्रमिला गर्भवती थी. अदालत ने अपने निर्णय28 में कहा कि प्रमिला ‘रखैल’ थी, सम्भोग की आदी थी, उसने कोई चीख-पुकार नहीं मचाई, बलात्कार के बावजूद गर्भपात चार-पाँच दिन बाद हुआ. (अत:) लगता है, इन परिस्थितियों में जो कुछ हुआ, उसकी मर्जी या सहमति से हुआ या फिर उसमें पति (प्रेमी) की भी मिलीभगत थी. परिणामस्वरूप तीनों अभियुक्तों को बाइज्जत बरी किया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री पी.एन. भगवती और मुर्तजा फजल ने सेशन और हाई कोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए इसे ‘सीरियस मिसकैरिज ऑफ जस्टिस’ माना था. विद्वान न्यायमूर्तियों के अनुसार बलात्कार के कारण प्रमिला का गर्भपात नहीं बल्कि निर्दोष अभियुक्तों को सजा सुनाने के कारण, न्याय का गर्भपात हुआ था.

एक अन्य मामले29 में सर्वोच्च न्यायालय ने देव समाज स्कूल अम्बाला की 9वीं कक्षा की छात्रा सतनाम कौर के साथ बलात्कार के चार अभियुक्तों को रिहा करते हुए कहा था कि लडक़ी सम्भोग की आदी थी और उसकी यौन झिल्ली पहले से भंग थी. इसी प्रकार महादेव व रहीम बेग बनाम राज्य 30 में एक बारह वर्षीय लडक़ी की दो अभियुक्तों ने बलात्कार के बाद हत्या कर दी. न्यायालय ने उन्हें इस आधार पर बरी कर दिया, ”लँगोट पर मिले वीर्य के धब्बे अनिवार्य रूप से बलात्कार सिद्ध नहीं करते और उनके लिंगों पर भी किसी प्रकार के चोट के निशान नहीं हैं. प्रश्न यह है कि शादीशुदा या सम्भोग की अनुभवी महिलाओं के साथ हुए बलात्कार को अपराध न मानना कहाँ तक उचित है ? 1978 में मथुरा बलात्कार कांड में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री जसवन्त सिंह,  पी. एस. कैलाशम और ए.डी. कौशल का फैसला31 न्याय की भाषा का ‘सर्वश्रेष्ठ’ नमूना कहा जा सकता है. पुलिस स्टेशन में पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार के इस मामले में न्यायमूर्तियों का (विवादास्पद) निर्णय था कि ‘प्रश्नगत सम्भोग बलात्कार प्रमाणित नहीं होता और अपीलार्थी गणपत के खिलाफ अपराध का कोई मामला नहीं बनता. मान लो मथुरा ‘झूठी’ थी और गणपत ने उसके साथ सहमति से सम्भोग किया था इसलिए बलात्कार का अपराध नहीं बनता और उसे कोई सजा नहीं दी जा सकती. परन्तु यह भी तो सच है कि गणपत ने पुलिस स्टेशन में सम्भोग किया. चूँकि सहमति से सम्भोग अपराध नहीं है तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी पुलिस या अन्य सरकारी अधिकारी दफ्तरों में खुलेआम सहमति से सम्भोग कर सकते हैं ? क्या पुलिस स्टेशन को ‘वेश्यालय’ की तरह इस्तेमाल करना कोई अपराध नहीं है और उपरोक्त निर्णय ‘लाइसेंस’ नहीं ?

मथुरा केस में सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त निर्णय के विरुद्ध महिलाओं द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर विरोध और आन्दोलनों के परिणामस्वरूप 1983 में बलात्कार सम्बन्धी प्रावधानों में संशोधन करना पड़ा. कानून के संशोधन के बावजूद ‘गहरे गड्ढे मौजूद हैं और न्यायिक दृष्टिकोण से भी कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं हुआ लगता. मथुरा के बाद सुमन से लेकर भँवरीबाई बलात्कार कांड तक में हुए निर्णय इसका प्रमाण हैं. न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के शब्दों में इसका कारण यह है कि ”नारी शरीर और पवित्रता को लेकर कोई सन्तोषजनक राष्ट्रीय योजना नहीं है.32 कहना न होगा कि इसके बाद न्याय की भाषा में जो बदलाव दिखाई भी देता है, वह अगर-मगर, किन्तु-परन्तु और लेकिन के मर्दवादी मुहावरों में ही उलझा हुआ है. भँवरीबाई केस में अभियुक्तों को रिहा करते हुए सत्र न्यायाधीश ‘ब्राह्मण जाति’ की श्रेष्ठता से लेकर ‘भारतीय संस्कृति’ की महानता तक का गुणगान करते हैं. उच्च जाति के भद्र पुरुष नीच जाति की स्त्रियों से बलात्कार करेंगे. न्यायाधीश को लगता है कि यह आरोप ‘सन्देह से परे तक सिद्ध’ नहीं हो पाया. कैसे हो सकता है? स्त्री के विरुद्ध लगातार बढ़ती हिंसा के प्रश्न पर गहरी चिन्ता या चिन्ता के बावजूद ‘न्याय का लक्ष्य’ अपराधियों की बाइज्जत रिहाई या सजा कम करना ही रहा है. बढ़ते अपराधों और घटती सजाओं के आँकड़ों को प्रतिशत की पद्धति में सिद्ध करना बेकार है.



जले पर नमक छिडक़ता पुरुष वर्चस्व


1983 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने एक अन्य मामले का निर्णय लिखते हुए कहा, ”इस समय जरूरत है कि कानून को इस प्रकार बनाया और ढाला जाए कि यह और अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनकर समय की माँग पूरी कर सके और इस मूलभूत समस्या का समाधान भी कि क्या, कब और किस हद तक बलात्कार की शिकार स्त्री की गवाही को सच मानने के लिए अन्य प्रमाण/साक्ष्य अनिवार्य हैं. भारतीय स्त्रियों के लिए इस समस्या का विशेष महत्त्व है क्योंकि प्राय: उनका शोषण भी होता रहा है और उन्हें समान न्याय से वंचित भी किया जा रहा है। इस समस्या पर भारतीय स्त्रियों की साठ करोड़ उत्सुक आँखें केन्द्रित हैं.33 स्त्री के विरुद्ध हिंसा के आँकड़ों को देखते और न्यायशास्त्र की पुनर्समीक्षा की जरूरत महसूस करते हुए न्यायमूर्तियों ने बलात्कार की शिकार महिला से अन्य प्रमाण माँगनेवाले नियमों को ‘जले पर नमक छिडक़ना कहते हुए कहा, ”बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला की गवाही को शंका, अविश्वास और सन्देह के चश्मे से ही क्यों देखा जाए ? ऐसा करना पुरुष-प्रधान समाज के वर्चस्व के आरोपों को सही ठहराना होगा. भारतीय परिप्रेक्ष्य में स्त्री की पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक और नैतिक स्थितियों का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्तियों ने कहा कि कोई भी स्त्री अपनी और परिवार की प्रतिष्ठा, लाज, शर्म और बदनामी के खतरे नहीं उठाना चाहती. निर्दोष होते हुए भी वह हमेशा भयभीत ही रहती है. वह तो सच कहने से भी डरती है–झूठ कैसे कहेगी? और क्यों कहेगी ? लेकिन ‘वयस्क महिला’ के बारे में ‘बुद्धिमत्ता के नियम’को बचाते हुए कहा कि ‘वयस्क महिला’ अगर सम्भोग की स्थिति में पकड़ी जाती है और अपने को बचाने के लिए ऐसे आरोप लगाने की सम्भावना दिखाई देती है तो उससे अन्य प्रमाण माँगे जा सकते हैं.

ध्यान से पढऩे-देखने के बाद लगता है कि यही सब तो 1952 में भी कहा गया था इसमें नई बात क्या है ?
अन्तत: दस-बारह साल की दो बच्चियों के साथ बलात्कार के प्रयास के इस उपरोक्त मुकदमे में न्यायमूर्तियों ने कहा, ”अभियुक्त ने जो अपराध किया, उसको बहुत ही गम्भीर रूप से लेना जरूरी है. लेकिन ”हाईकोर्ट द्वारा सजा के बाद (बेचारे की) नौकरी छूट गई है। घटना सात साल पहले घटी थी. अब साढ़े छह साल बाद अभियुक्त को दोबारा जेल भेजना पड़ेगा. समाज में भी अभी तक बहुत बेइज्जती और अपमान सहना पड़ा होगा…सब बातों को देखते हुए हमें लगता है कि अगर सजा ढाई साल से घटाकर सवा साल कर दी जाए तो ‘न्याय का लक्ष्य’ पूरा हो जाएगा.देखा ! मर्द के साथ कितनी जल्दी हमदर्दी पैदा हुई मर्दों को.


‘वर्दीवाला गुंडा’ और ‘जवान लडक़ी’


सुमन बलात्कार कांड (1989) में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों द्वारा हरियाणा के पुलिसवालों की सजा दस साल से घटाकर पाँच साल की गई थी.34 कारण–’लडक़ी सन्दिग्ध चरित्र’ की है. पुलिस पक्ष की ओर से मुकदमे की पैरवी मानवाधिकारों के चैम्पियन गोविन्द मुखौटी ने की. जब अखबारों और पत्रिकाओं में इस निर्णय की आलोचना हुई तो मुखौटी को सार्वजनिक रूप से माफी माँगते हुए पी.यू.डी.आर. की अध्यक्ष की कुर्सी ने इस्तीफा देना पड़ा था. पुनर्विचार याचिका में न्यायमूर्तियों ने अपना फैसला तो नहीं बदला, हाँ, इतना स्पष्टीकरण जरूर दिया कि हमारे पूर्व फैसले का आधार लडक़ी का चरित्रहीन होना नहीं, बल्कि रिपोर्ट पाँच दिन बाद करवाना है. पुनर्विचार के बाद निर्णय में कहा गया है, ”हम यह कहना चाहते हैं कि यह अदालत स्त्री गरिमा और सम्मान की रक्षा में किसी से कम नहीं है.35 पुलिस हिरासत में बलात्कार के अपराध के लिए कम-से-कम दस साल जेल का प्रावधान होते हुए, सुमन-केस में पाँच साल की सजा क्यों ? सजा कम करने की ‘विशेष परिस्थिति’ क्या थी ? क्या सिर्फ रपट लिखवाने में पाँच दिन देरी की वजह से, पाँच साल सजा कम करना उचित है ? हरपाल सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश 36 में तो रपट दस दिन बाद लिखवाई गई थी और देरी को उचित मानते हुए माननीय न्यायाधीशों ने कहा था, ”जवान लडक़ी के साथ बलात्कार होने पर, इस तरह की देरी स्वाभाविक है. सुमन-केस में तो रपट लिखने वाला भी वही पुलिस स्टेशन है, जहाँ के सिपाहियों ने उसके साथ बलात्कार किया था और क्या सुमन ‘जवान लडक़ी’ नहीं थी ? यहाँ विचारणीय है कि न्याय की भाषा में ‘जवान लडक़ी’ पर विशेष जोर दिया है. यानी ‘वयस्क महिला’ हो तो देरी उचित नहीं.

एक और मामले में पुलिसकर्मी चन्द्रप्रकाश केवलचन्द्र जैन द्वारा बलात्कार के अपराध में सत्र न्यायाधीश ने पाँच साल कैद की सजा सुनाई. अपील में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों (ए.एम. अहमदी और फातिमा बीवी) ने कहा, ”सजा के सवाल पर हम सिर्फ इतना ही कह सकते हैं कि जब कोई वर्दीवाला किसी जवान लडक़ी के साथ ऐसा गम्भीर अपराध करता है तो उसके साथ सहानुभूति या दया की कोई गुंजाइश नहीं. ऐसे मामलों में सजा उदाहरणीय होनी चाहिए.37 यहाँ भी सजा के प्रश्न पर न्यायमूर्ति सख्ती का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन… ‘जवान लडक़ी’ के साथ बलात्कार होने पर सजा सख्त होनी चाहिए का दूसरा अर्थ, क्या यह नहीं कि वयस्क महिला के मामलों में सजा ‘नरम’ भी हो सकती है ? हालाँकि ‘जवान लडक़ी’ के मामलों में भी कठोरतम (अधिकतम) सजा कहाँ सुनाई जाती है ? हर बार सजा कम करने के लिए, कोई-न-कोई ‘विशेष परिस्थिति’ मौजूद रहती है. सात दशक पहले न्यायमूर्ति सीधे-सीधे कहते थे, ”जहाँ साक्ष्यों से मालूम हो कि बलात्कृत लडक़ी ‘अक्षत योनि’ या ‘पवित्र’नहीं है, वहाँ सात साल कठोर कारावास की सजा बहुत सख्त सजा है.38 अब, वही बात काफी ‘घुमावदार भाषा में कहने लगे हैं।

नारी अस्मिता और गरिमा पर न्याय की चिन्ता

न्यायमूर्ति पुरुष हो या स्त्री, न्याय की भाषा तो अक्सर वही रहती है, जो अब तक रची-गढ़ी गई है. पन्नालाल केस में न्यायमूर्ति सुनन्दा भंडारे और अनिल देव सिंह के निर्णय के अलावा भी अनेक उदाहरण हैं उपरोक्त खंडपीठ के निर्णय पुरुष न्यायमूर्तियों द्वारा लिये गए हैं. यही नहीं, बलात्कार के एक और केस में दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुश्री उषा मेहरा ने अपने निर्णय के आरम्भ में गम्भीरतापूर्वक लिखा, ”हमारे समाज में नारी अस्मिता के प्रति सम्मान घटता जा रहा है और बलात्कार के मामले बढ़ते जा रहे हैं. हालाँकि ऐसे अपराध बीमार दिमाग के व्यक्तियों द्वारा किए जाते हैं, लेकिन, चूँकि यह मुद्दा सार्वजनिक जीवन में सौम्यता और नैतिकता से जुड़ा है और स्त्रीत्व की गरिमा को छूता है, इसलिए अपराधियों के साथ सख्ती से निपटना चाहिए.39 लेकिन अन्तत: अभियुक्त को बाइज्जत रिहा कर दिया. जन्म प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं. डॉक्टर की रिपोर्ट महज राय है. स्कूल प्रमाण पत्र पर विश्वास नहीं किया जा सकता और लडक़ी पहले से ही ‘सम्भोग की आदी’ है 29 मई, 1975 के इस मुकदमे की अपील का निर्णय 14 जुलाई, 1992 को (लगभग सत्रह साल बाद) हुआ। न्यायाधीश अय्यर के शब्दों में ‘वट ए पिटी’. स्त्री के विरुद्ध हिंसा के जलते सवालों पर (महिला) न्यायमूर्ति द्वारा मानवीय सरोकारों से लैस, संवेदना के शब्द सचमुच सराहनीय हैं. लेकिन मौलिक अभिव्यक्ति न होने के कारण, पेचीदा कानूनी प्रावधान और न्याय के चक्रव्यूह में ही फँसी रह जाती है. दो साल पहले सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने भी तो यही कहा था, ”यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में स्त्रीत्व का सम्मान घटता जा रहा है और छेड़छाड़ और बलात्कार के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं…सार्वजनिक जीवन में सौम्यता और नैतिकता का विकास और रक्षा केवल तभी की जा सकती है, जब अदालतें सामाजिक नियमों का उल्लंघन करनेवालों के साथ सख्ती से पेश आए.40 बलात्कार के अपराधियों को बीमार, विकृत और विक्षिप्त मानसिकता के व्यक्ति घोषित करते, अपने निर्णय बताए-गिनाए जा सकते हैं.

क्रमशः…..

धार्मिक औरतें या गुलाम औरतें ….!

 संजय सहाय 


सन् 2000 में शनि शिंगनापुर मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर निषेध के खिलाफ एक पदयात्रा आयोजित की गई थी. पंढरपुर से शनि शिंगनापुर तक की इस विरोध यात्रा का नेतृत्व जाने-माने तर्कवादी,लेखक और महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर ने किया था. इस पदयात्रा में अनेक प्रगतिशील लोगों सहितदेश की जानी-मानी हस्तियां शामिल हुई थीं जिनमें डाॅ. श्रीराम लागू और किसान नेता एन.डी. पाटिल उल्लेखनीय हैं. हालांकि तब दक्षिणपंथी शक्तियों भाजपा और शिवसेना सहित उनके हिंदुत्ववादी संगठनों ने उनके शिंगनापुर में स्त्रियों के प्रवेश कराने के इस प्रयास को विफल कर दिया था. मजेदार बात यह कि वोटों को ध्यान में रख 2011 में उसी भाजपा ने राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ मिलकर कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर के दरवाजे स्त्रियों के लिए खुलवा दिए थे. भाजपा का स्त्रियों के प्रति उमड़ा यह आदर और प्रेम वैसा ही था जैसा कि अपनी खस्ता हालत को देखते हुए उनमें चकराता के दलितों के लिए आज अचानक उमड़ पड़ा है. 26 जनवरी, 2016 को इसी मुद्दे को लेकर रणरागिनी भूमाता ब्रिगेड की कार्यकर्ताओं को शनि शिंगनापुर के सत्तर किलोमीटर दूर सूपा गांव में गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उन्हें चार सौ वर्ष पुरानी उस घटिया-सी परंपरा को तोड़ने से रोक दिया जिसके खिलाफ यह आंदोलन चलाया जा रहा था. तुर्रा यह कि ऐसा उन्होंने स्त्रियों को ही उन हानिकारक तरंगों से बचाने के लिए किया था जो शनिदेव की मूर्ति से उन स्त्रियों के प्रवेश करने पर निकल सकती थीं. इस आंदोलन की सूत्रधार सुश्री तृप्ति देसाई ने कहा कि यह लोकतंत्र के लिए एक काला दिन है. अप्रैल आते-आते हाईकोर्ट के निर्देश पर मंदिर के न्यासियों को स्त्रियों के लिए गर्भगृह के द्वार खोलने पड़े. कुल चार महीनों के इस आंदोलन से चार सौ वर्षों की यह न्यायहीन परंपरा धूल चाटती नज़र आई.

हालांकि पितृसत्ता के चौकीदार शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद बिलबिलाकर धमका गए कि स्त्रियां जीत का जश्न न मनाएं.शनि के पूजन से उन पर बलात्कार बढ़ने वाले हैं. इसी प्रकार 29 अप्रैल, 2016 को सुश्री तृप्ति और उनकी भूमाता ब्रिगेड की सदस्याओं ने मुंबई के हाजीअली दरगाह में घुसने की चेष्टा की. विडंबना यह रही कि भिन्न राजनीतिक दलों और संस्थाओं से संबद्ध एक सौ मुसलमान महिलाओं ने ही उनको अंदर घुसने से रोक दिया इस दरगाह में 2011 तक महिला जायरीनों के प्रवेश पर प्रतिबंध न था किंतु उसके बाद यह कहकर रोक लगा दी गई कि एक पुरुष संत की दरगाह होने की वजह से यहां सिर्फ पुरुषों का प्रवेश ही उचित होगा. 13 मई को पुनः तृप्ति ने महिलाओं के लिए तयशुदा सीमा तक पहुंचकर पंद्रह दिनों का अल्टीमेटम दिया है कि या तो पुरुषों की तरह महिलाओं को भी अंदर तक जाने की छूट मिले अन्यथा शिंगनापुर की भांति ही यहां भी आंदोलन होगा. तृप्ति नासिक और कोल्हापुर के मंदिरों में भी ऐसे परिवर्तन लाने के लिए आंदोलन की योजना बना रही हैं. स्त्रियों को पुरुष से कमतर अथवा अपवित्र मानने वाली इस पुरुषवादी व्यवस्था का इस्तेमाल बेशर्मी के साथ अनेक उपासना स्थलों में होता रहा है. केरल के सबसे पुराने और भव्य मंदिरों में से एक शबरीमाला श्री अयप्पा मंदिर में दस वर्ष की आयु से लेकर पचास वर्ष तक की महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. ‘हजार वर्षों से चली आ रही इस प्रथा में रजस्वला महिलाओं को अपवित्र माना जाता रहा है. कुछ ही वक्त पहले मंदिर बोर्ड के अध्यक्ष ने एक बेहूदा-सा बयान जारी किया था कि जब तक महिलाओं के मासिक स्राव  की जांच करने वाला यंत्र न बन जाए तब तक उनके मंदिर प्रवेश पर निषेध रहेगा. केरल के ही पद्मनाभ स्वामी मंदिर के गर्भगृह में स्त्रियों के जाने पर रोक है.

विश्व के सबसे धनी मंदिरों में से एक इस मंदिर के प्रबंधन का मानना है कि महिलाओं के गर्भगृह में प्रवेश से मंदिर के खजाने को बुरी नज़र लग जाएगी और कि सोलह हजार रानियों के साथ विलास करने वाले कृष्ण के मूल स्वरूप विष्णु महाराज स्त्रियों को देख कुपित हो जाएंगे. इसी तरह म्हस्कोबा मंदिर (पुणे), मारूति मंदिर (बीड) पटबौसी सत्र मंदिर (असम), पुष्कर के कार्तिकेय मंदिर (राजस्थान), रनकपुर के जैन मंदिर या दिल्ली  की निजामुद्दीन दरगाह के साथ-साथ देश के अनेक पूजागृहों में स्त्रियों के प्रवेश पर आंशिक या पूर्ण प्रतिबंध है तमाम धार्मिक स्थलों में प्रतिबंधों के पीछे स्त्री  को माहवारी के दौरान अपवित्रा माना जाना एक बड़ा कारण होता है. एक प्राकृतिक प्रक्रिया स्त्री  को अपवित्र बना डालती है किंतु उसी स्त्री के  ‘अपवित्र’ जननांगों से पैदा होने वाले पंडित-मुल्ला स्वयं को पवित्रता की प्रतिमूर्ति मानते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि उपासना स्थलों के पुजारी शायद हगते-मूतते भी नहीं होंगे बहरहाल, जहां तक बात रही ऐसे आंदोलनों की तो बराबरी के हक की लड़ाई का औचित्य समझ में आता है किंतु व्यापकता में देखा जाए तो यह पितृसत्ता के षड्यंत्रकारी और घिनौने खेल में एक खिलौना बने रहने की जिद्द से अधिक और कुछ नहीं है. विश्व के तमाम धर्म पितृसत्ता के संरक्षण और पोषण हेतु पुरुषों द्वारा ही गढ़े गए हैं. हर धर्म का संस्थापक और उसका परमपिता कोई पुरुष ही होता है. अलबत्ता कुछ स्त्रियों को छोटे-मोटे ओहदे दे दिए गए हैं किंतु परमपिताओं से बहुत नीचे के दर्जे के. सनातन धर्म हो या प्राचीन यूनानी धर्म, ज़रूरत पड़ने पर देवताओं द्वारा इन देवियों के यौन शोषण में भी कोई गुरेज नहीं होता. इंद्र से लेकर यूनानी देवता ज़ियूस तक के बलात्कारों और व्यभिचारों के किस्सों से धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं. अपनी पुत्री सरस्वती से विवाह कर लेने में ब्रह्मा को कोई आपत्ति नहीं थी. ज़ियूस ने भी अपनी बहन हेरा से विवाह किया था.

 परम शक्तिशाली जूपिटर भी उसी  ज़ियूस का रोमन संस्करण हैं. गोया कि कोई भी पुरुष इन ईश्वरों/देवताओं के हवाले अपने तमाम कुकर्मों को जायज़ ठहरा सकता है.बहू-बेटियों का बलात्कार कर भी देवतुल्य बना रह सकता है. बचाव में तो खाप पंचायतें खड़ी हो ही जाती हैं. देवियों को विष कन्याओं और वेश्याओं की तरह इस्तेमाल करने में भी ‘ईश्वरों’ को कभी परहेज नहीं रहा जैन स्त्रियां तो स्वर्ग जा ही नहीं सकतीं जब तक वे पुरुष योनि में पुनर्जन्म न ले लें. बुद्ध भी स्त्रियों को अपवित्र मानते थे. अपने भिक्षुकसंघ में स्त्रियों को शामिल करते हुए बुद्ध ने जो नियम और कानून बनाएथे उसमें उनका पूर्वाग्रह साफ झलकता है. उन्होंने मान रखा था कि स्त्रियां स्वभावतः बुरी होती हैं. बुद्ध ने भिक्षुणियों को भिक्षुओं के बराबरका दर्जा नहीं दिया. न ही उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने-समझने और रहनेकी आजादी दी. घुमा-फिराकर उन्हें भिक्षुओं के नियंत्रण में ही रहना था मैथुनक्रिया और स्त्रियों की यौनिकता को लेकर भी बुद्ध का नज़रिया बहुत भटका हुआ था. आनंद ने पूछा”भंते स्त्रियों के साथ हम कैसा व्यवहार करें ?/ “बुद्ध ने उत्तर दिया-”आनंद उनका अदर्शन.“/ आनंद ने प्रतिप्रश्न किया-”भंते, दिखाई दे जाने पर उनसे कैसा व्यवहार करें ?/ “बुद्ध ने उत्तर दिया”उनसे असंवाद !“ इसी तरह ईसाई धर्म में रोमन कैथोलिक या आर्थोडाॅक्स चर्च में महिलाएं पुरोहित नहीं बन सकतीं. पोप और कार्डिनल जैसे ओहदे सिर्फ पुरुषों के लिए सुरक्षित हैं. इस्लाम में अनेक कायदे-कानूनों आ परिधान संहिता में बंधी महिलाएं बिना पति या नजदीकी रिश्तेदार के हज नहीं कर सकतीं.


मूर्खतापूर्ण हिंदू मान्यताओं की तर्ज पर ही मासिक धर्म के वक्त उनके तवाफ़ (काबा के सात चक्कर) पर रोक है. इसी तरह खास परिस्थितियों को छोड़ महरम बगै़र या पति की इजाजत के बिना वे मस्जिद नहीं जा सकतीं. वहां भी औरतों के बैठने की जगह पुरुषों के पीछे ही होती है. सिर्फ सिक्ख धर्म को छोड़ दें.जहां स्त्री -पुरुष के लिए समान अधिकारों की बातें कही गई हैं (हालांकि यह अब तक कितना हासिल हो पाया है कहना कठिन है) तो यहूदी, सनातन, जैन, बौद्ध, ईसाइयत या इस्लाम कुल मिलाकर सभी धर्मों में औरतों की हैसियत बद से बदतर है. जबकि सभी धर्मों की सबसे समर्पित भक्त महिलाएं ही होती हैं. धर्म का सारा व्यापार और कारोबार उनके ही भरोसे चलता है. आस्था की बड़ी कीमत औरतें चुकाती हैं. उनका यह आत्मपीड़क व्यवहार अचरज में डालता है. हर प्रकार के छोटे-बड़े त्याग करने का जिम्मा स्त्रियों के सर होता है और पुरुषों को एकतरफा अधिकार है कि अपनी मर्दानगी उन पर झाड़ते रहें. उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में शरीर विज्ञानी ईवान पेट्रोविच पावलोव जिस क्लासिकल कंडीशनिंग की या मनोविज्ञानी एडवर्ड थाॅर्नडाइक और बी.एफ. स्किनर जिस आॅपरेंट कंडीशनिंग की बातें करते रहे उसे पितृसत्ता अपने संरक्षण हेतु धर्मों के सहारे सहस्राब्दियों  से सफलतापूर्वक आजमाती रही है. हमारे यहां लोग इस कंडीशनिंग को ‘संस्कार’ के नाम से जानते हैं.

पितृसत्तात्मक धर्म व्यवस्थाओं ने लोगों.विशेषकर स्त्रियों को संस्कारों की घुट्टी पिला-पिलाकर और मर्यादाओं की दुहाई दे-देकर मानसिक रूप से अपंग बना डाला है. ये सभी भक्त धर्मों के बंधक हैं. मजे़दार बात यह है कि इन्हें गुलामी तक पहुंचाने वाले वे ही हैं जो खुद भी उसी व्यवस्था के दास हैं. कुल मिलाकर यह एक भयानक अंतहीन चक्र है जिससे छूटना नामुमकिन लगता है. यदि स्त्रियों को वाकई बराबरी का दर्जा चाहिए तो उन्हें  तमाम धर्मों को लात मारनी होगी. छोटे-बड़े हर ईश्वर को खंडित करना होगा. उन्हें निर्णय लेना होगा कि ‘मां’ प्रकृति और ‘पिता’ परमेश्वर में से किसे चुनें ! पहला रास्ता उन्हें और उनकी संतानों को तार्किक और वैज्ञानिक सोच की ओर ले जाता है और दूसरा पितृसत्ता की चाकरी की तरफ ! विश्व के सभी धर्म चारित्रिक रूप से सीढ़ीदारहोते हैं जहां कभी भी सबके बराबरी पर खड़े रहने की कोई संभावना नहीं होती. मानवता और तार्किकता के लोकतांत्रिक समतल वहां नहीं पाए जाते. यदि स्त्रियां वाकई नास्तिक हो जाएं तो उनकी और उनकी कोख से निकलने वाली आधुनिक पीढ़ियों के सहारे हजारों सालों की इस दासता का अंत चंद वर्षों में ही हो जा सकता है.

हंस के जून अंक का संपादकीय ( साभार ) 
कथाकार संजय सहाय मासिक पत्रिका हंस के संपादक हैं. संपर्क: sanjaysahay1@gmail.com

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : दूसरी किस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
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भाषा  में देह की भोग 
न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम. आज दूसरी क़िस्त… 


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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त 

क़ानून की भाषा 
भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 के अनुसार बलात्कार के लिए ‘लिंगच्छेदन (पैनीटे्रशन) अनिवार्य शर्त है. किसी भी अन्य वस्तु या यंत्र से यौन शोषण या उत्पीडऩ को बलात्कार का अपराध नहीं माना जाता. स्त्री द्वारा सहमति की उम्र सोलह वर्ष तय की गई है. सोलह वर्ष से कम उम्र की लडक़ी के साथ सहवास बलात्कार होगा, भले ही उसकी सहमति हो या न हो. लेकिन इस प्रावधान में अपवाद यह है कि किसी भी पुरुष द्वारा पन्द्रह वर्ष से बड़ी उम्र की पत्नी के साथ सहवास को बलात्कार नहीं माना जाएगा. हालाँकि हिन्दू विवाह अधिनियम और बाल विवाह निरोधक अधिनियम के अनुसार विवाह के समय दुल्हन की उम्र अठारह साल से अधिक होनी चाहिए. स्त्री द्वारा सहवास के लिए सहमति की उम्र सोलह साल और विवाह के लिए अठारह साल रखी गई है. लेकिन पुरुष (पति) द्वारा सहवास (बलात्कार) के लिए लडक़ी की उम्र सीमा पन्द्रह साल काफी है. यही नहीं, अगर पत्नी की उम्र बारह साल से अधिक और पन्द्रह साल से कम हो तो पति को सजा में ‘विशेष छूट मिलेगी. दो साल कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. जबकि अन्य बलात्कार के मामलों में यह सजा कम से कम दस साल कैद और अधिकतम उम्रकैद निर्धारित की गई है. बारह वर्ष से पन्द्रह वर्ष तक की पत्नी के साथ बलात्कार संज्ञेय अपराध नहीं और जमानत योग्य भी होगा. मतलब, पुलिस बिना मजिस्ट्रेट से वारंट लिये पति को गिरफ्तार नहीं कर सकती. और पति होने के ‘विशेषाधिकार स्वरूप जमानत पर छोडऩा पड़ेगा. पन्द्रह साल से कम उम्र की पत्नी भी बलात्कार की शिकायत सिर्फ एक साल के भीतर ही कर सकती है. उसके बाद की गई शिकायत को सुनने का किसी भी अदालत को कोई अधिकार नहीं, जबकि अन्य मामलों में ऐसी कोई समय सीमा नहीं है.

सर्वोच्च न्यायालय तक कई बार कह चुका है कि बाल विवाह भले ही दंडनीय अपराध हो लेकिन विवाह गैरकानूनी या रद्द नहीं माना जाएगा. पति अपनी पत्नी का प्राकृतिक संरक्षक है, भले ही दोनों नाबालिग हो. विवाह का पंजीकरण कानूनन अनिवार्य नहीं है, इसलिए कैसे रुकेंगे बाल विवाह ? और ऐसे कानूनी प्रावधानों से स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा पर कैसे काबू पाया जा सकता है ? (देखें अध्याय बाल विवाह और बलात्कार).कानून की ‘कॉमेडी यहीं समाप्त नहीं होती. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, में आज भी यह प्रावधान है कि गवाह की विश्वसनीयता खंडित करने के लिए ”अगर किसी व्यक्ति या पुरुष पर बलात्कार का आरोप हो तो उसे यह सिद्ध करना चाहिए कि पीडि़ता आमतौर से अनैतिक चरित्र की महिला है. (धारा 155(4)) महिला को अनैतिक चरित्र की महिला प्रमाणित करो और बाइज्जत रिहा हो जाओ. यानि  कानून के इस प्रावधान के रहते हर किसी को यह कानूनी अधिकार है कि वह वेश्याओं, कॉलगर्ल या चरित्रहीन महिलाओं (भले ही नाबालिग बच्ची हो) के साथ, जब चाहे बलात्कार कर सकता है या बलात्कार करने के बाद किसी भी महिला को अनैतिक चरित्र की औरत प्रमाणित करके, मूँछों पर ताव देते हुए अदालत से बाहर आ सकता है. दूसरे, भारतीय दंड संहिता के अनुसार व्यभिचार का अपराध किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी के साथ उसके पति की सहमति या मिलीभगत के बिना सहवास (बलात्कार नहीं) करना है. (धारा 497) आपसी सहमति से पुरुष किसी भी बालिग अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा महिला से सम्बन्ध रख सकता है. यह कोई अपराध नहीं. परिणामस्वरूप व्यापक स्तर पर वेश्यावृत्ति और कॉलगर्ल व्यापार फैल रहा है. अनैतिक देह व्यापार नियंत्रण अधिनियम के किसी भी प्रावधान में पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध ही नहीं बनता. अपराधी सिर्फ ‘वेश्याएँ ही होंगी.उपरोक्त कानूनी जाल-जंजाल को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि पितृसत्ता ने जानबूझकर ऐसा चक्रव्यूह रचा हुआ है कि बलात्कारी किसी-न-किसी चोर दरवाजे से भाग निकल सके.

सुसन ब्राउन मिलर के शब्दों में, ”बलात्कार, पुरुषों द्वारा औरतों को लगातार बलात्कार से भयभीत रखकर, समस्त स्त्री समाज पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखने का षड्यंत्र है. मिलर की स्थापना से असहमत विद्वानों का कहना है कि पुरुषों का सत्ता, सम्पत्ति, समाज और स्त्रियों पर वैसे ही पूर्ण नियंत्रण है, रहा है. इसलिए बलात्कार का भय बनाए रखने की क्या जरूरत है ? बलात्कार, पितृसत्ता का षड्यंत्र नहीं, बल्कि कुछ विकृत, विक्षिप्त और ‘स्टिरियो टाइप बीमार अपराधियों का व्यक्तिगत अपराध मात्र है. मिलर की स्थापना को सही न मानने का कोई कारण नहीं है. दुनिया भर के अधिकांश देशों में (जहाँ पितृसत्तात्मक समाज है) बलात्कार सम्बन्धी कानूनी प्रावधानों की भाषा, परिभाषा प्राय: समान है. विवाह संस्था में सहवास पति का कानूनी अधिकार है और अनैतिक चरित्र की महिलाओं के साथ बलात्कार में यह मानना स्वाभाविक है कि हो सकता है उन्होंने सहमति दी हो. कानूनी भाषा से न्यायिक परिभाषा और सामाजिक मान्यताओं या मिथ तक में सबके सब एकमत हैं. कानून बनाने से लेकर पुलिस, अदालत और संचार माध्यमों तक में स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा के सवाल पर पितृसत्ता की चुप्पी या तटस्थता का अर्थ (अनर्थ) इसका प्रमाण है. स्पष्ट है कि पितृसत्तात्मक समाजों में पुरुष की काम-पिपासा के लिए विवाह संस्था से लेकर वेश्यावृत्ति (देवदासी, जोगिन वगैरह) और व्यभिचार के सभी दरवाजे खुले छोड़ दिए गए हैं. पुरुष द्वारा व्यभिचार या बलात्कार की शिकार अधिकांश लड़कियों को अन्तत: वेश्यावृत्ति के व्यवसाय में ही शरण लेनी पड़ती है या पड़ेगी. वेश्यावृत्ति का व्यवसाय मूल रूप से पुरुषों के ही हित को पोषित करता है, इसलिए भी नाबालिग लड़कियों का अपहरण, बलात्कार लगातार बढ़ रहा है.

 भारत में इस समय लगभग तीस लाख महिलाएँ वेश्यावृत्ति करने को विवश हैं, जिसमें (सरकारी आँकड़ों और मानव संसाधन विकास मंत्री महोदय के राज्यसभा में बयानानुसार) लगभग पन्द्रह प्रतिशत वेश्याओं की उम्र पन्द्रह साल से कम है. इसका अर्थ यह हुआ कि करीब पाँच लाख नाबालिग लड़कियों के साथ रोज बलात्कार होता है या हो रहा है. क्योंकि आपके ही कानूनानुसार सोलह वर्ष से कम उम्र की लडक़ी के साथ सहवास बलात्कार है, भले ही उसकी सहमति हो या न हो…हम जानते हैं कि आप फिर वही कानून पढ़ाने लगेंगे या कुतर्क करेंगे—”वे सब ‘भ्रष्ट और ‘अनैतिक चरित्र की औरतें हैं…’वेश्या…’कॉलगर्ल…’रंडी… ग्राहक से पैसे लिये हैं, सो ‘बलात्कार का सवाल ही नहीं उठता. है ना ! बाल वेश्याओं के यौन शोषण सम्बन्धी एक जनहित याचिका में माननीय न्यायमूर्तियों ने कहा, ”हमारे विचार से देश भर में केन्द्रीय जाँच ब्यूरो द्वारा पूछताछ या पड़ताल हो, व्यावहारिक रूप से न सम्भव है और न ही वांछित. उन्हें निर्देश देने से कोई लाभदायक उद्देश्य सिद्ध नहीं होनेवाला। यह सिर्फ सामाजिक नहीं, आर्थिक समस्या भी है. सजा से अधिक नियंत्रण आवश्यक है.
कहने की आवश्यकता नहीं कि अधिकांश (90 प्रतिशत) यौन हिंसा या बलात्कार के मामले परिवार की प्रतिष्ठा के  कारण थाने में दर्ज नहीं कराए जाते. जो दर्ज होते हैं, उनमें से अधिकांश (96 प्रतिशत) बलात्कारी निचली अदालतों द्वारा बाइज्जत बरी कर दिए जाते हैं. पुलिस ने जाँच ठीक से नहीं की या गवाह, प्रमाण, सबूत नहीं थे. जिन थोड़े से (तीन-चार प्रतिशत) बलात्कारियों को सजा होती है, वे उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक अपील-दर-अपील करते ही हैं. अपील में भी ज्यादातर बरी हो जाते हैं या किसी न किसी आधार पर सजा कम करवाने में कामयाब हो जाते हैं. अपील के दौरान ‘जमानत पर छूटने की सम्भावना भी है और सालों मुकदमा लटकने की भी.


आँकड़े बताते हैं कि निचली अदालतों से कई गुना अधिक समय, अपील का निर्णय होने, करने में लगता है. यौन हिंसा की शिकार निर्धन स्त्री आखिर कब तक ‘कोर्ट-कचहरी का चक्कर काट सकती है ? घर-परिवार-विवाह बच्चे-समाज-खर्च-भागदौड़ कौन करेगा? कहाँ से? कब तक? बहुत-सी समस्याएँ हैं. सब करने के बाद भी क्या गारंटी है कि ‘न्याय होगा ? बड़े बाप की बेटियों या साधन-सम्पन्न और सत्ता-समर्थ स्त्रियों की बात अलग है.
यौन हिंसा की शिकार निर्धन, अशिक्षित आम औरत नहीं जानती–न्याय की प्रथम अवधारणा है कि जब तक अपराध सन्देह से परे तक सिद्ध न हो, अभियुक्त को निर्दोष ही माना जाएगा. वरना अभियुक्त को बाइज्जत बरी करना विवशता है. अदालत में थोड़ा सा भी सन्देह हुआ तो ‘सन्देह का लाभ अभियुक्त को ही मिलेगा. सन्देह से परे तक अपराध सिद्ध होने के बावजूद उम्र, समय, स्थितियाँ (सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, राजनीतिक…), परिस्थितियाँ वगैरह-वगैरह के आधार पर अभियुक्त की सजा कम भी की जा सकती है. न्याय के सुधारवादी, उदारवादी, मानवीय दृष्टिकोण से रचे सारे नए शास्त्रों की व्याख्या का फायदा अभियुक्त को ही होता है, होता रहा है. न्याय की एक और उल्लेखनीय अवधारणा यह है कि भले ही हजारों दोषी व्यक्ति छूट जाएँ मगर एक भी निर्दोष आदमी को सजा नहीं होनी चाहिए. ऐसे में उसे यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि ‘दुर्लभतम में दुर्लभ मामला हुआ तो बलात्कारी को फाँसी के फन्दे से कोई नहीं बचा सकता. न्याय में देरी का मतलब, न्याय नहीं मिलना है. मगर न्याय में जल्दबाजी का अर्थ न्याय को दफनाना भी है. ज्ञानी लोगों का कहना है, ”न्याय की चक्की धीरे पीसती है, मगर पीसती है, तो बहुत बारीक… खैर !

आओ न्याय करें : रेप यानी एक कहानी

यह कहानी 1974 की है और महावीर नाम के एक बीस-बाईस वर्षीय मर्द और पन्द्रह-सोलह वर्षीया लडक़ी शीला के इर्द-गिर्द घूमती है. दोनों आपस में दूर के सम्बन्धी हैं और दरअसल एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते हैं. 27 सितम्बर, 1974 को महावीर शीला को बहरामपुर ले गया. वहाँ वे करीब पन्द्रह दिन रहे और आपस में देह का ताप बाँटते रहे. जब वे वापस आए तो शीला के माँ-बाप बिना किसी देरी के शीला को लेकर पुलिस स्टेशन पहुँच गए, जहाँ उसकी माँ ने पहले से ही रिपोर्ट दर्ज करवा रखी थी. परिणामस्वरूप महावीर की गिरफ्तारी हुई और बाद में अभियोग चला. 13 अगस्त, 1976 को अदालत ने महावीर को अपराधी करार दे, भारतीय दंड संहिता की धारा 366 और 376 के तहत सजा सुनाई. यह उसी महावीर की अपील है. इस मुकदमे की कुंजी शीला के बयान में ही है. और यह क्या दर्शाती है ? यह दिखाती है कि उसके महावीर के साथ अच्छे दोस्ताना सम्बन्ध थे और वह यमुना नदी के किनारे, रेस्टोरेंट और अन्य अघोषित स्थानों पर उसके साथ घूमती रही है. यह वह ही थी, जो उस दिन ‘आश्रम ‘ नामक स्थान पर महावीर से मिली. वहाँ से ये बहरामपुर की गाड़ी पकडऩे के लिए रेलवे स्टेशन आए. यह एक लम्बी यात्रा थी, जो ‘एक दिन और रात खा गई. बहरामपुर में वे बुद्धू, गवाह नम्बर दो, के घर पर ठहरे, जहाँ उनके पास एक कमरा था और उसी कमरे में उन्होंने मांसल देह से विषय-सुख का खेल खेला. शीला हमें बताती है कि किसी भी स्तर पर उसकी सहमति नहीं थी. यही नहीं, उसने तो विरोध भी किया और रोती भी रही लेकिन सब बेकार. इससे मुझे कोई असर ही नहीं हो रहा। वह रेलवे स्टेशन गई. महावीर जब टिकट खरीदने गया तो वह वहाँ अकेली खड़ी रही.

 डिब्बे में अन्य यात्रियों के होते हुए वह उसके साथ घंटों यात्रा करती रही. बहरामपुर रेलवे स्टेशन से ताँगे में बुद्धू के घर तक गई. ताँगे में और सवारियाँ भी थी. तब भी उसने कोई विरोध नहीं किया, कोई विद्रोह का झंडा नहीं उठाया और भागने का भी कोई प्रयास नहीं किया. इस बीच उसके पास शोर मचाने, रुकने या महावीर से दूर रहने का काफी समय भी था और अवसर भी. और हाँ ! बहरामपुर में बुद्धू के घर पर क्या हुआ ? वह कहती है कि उसने उस समय विरोध किया था, जब महावीर उसका परिचय पत्नी के रूप में दे रहा था. बुद्धू उसे झूठा सिद्ध करता है. उसका अपना व्यवहार भी उसे ‘फाँसी के तख्ते की ओर ले जाता है. बहरामपुर में वह साड़ी, पेटीकोट और ब्लाउज खरीदने बाजार भी गई थी. वह महावीर के साथ एक ही कमरे में रह रही थी और उसे अपनी देह का ताप देती रही, कभी रात में दो बार और कभी-कभी तीन बार भी. वह स्वीकार करती है कि देह की पुकार का शिकार होने से पहले वे अक्सर एक-दूसरे से बातचीत और आलिंगन करते रहते थे और बुद्धू हमें बताता है कि वहाँ कभी विरोध की फुसफुसाहट तक नहीं थी. यह विश्वास करना असम्भव है कि वह खेल में शामिल नहीं थी, बल्कि उसने सक्रिय रूप से पूरी सहमति के साथ इस खेल में अपना योगदान दिया है.
सरकारी वकील साहब ने तर्क दिया था कि उस समय शीला की सहमति भी थी, तो भी उसकी उम्र सोलह साल से कम है, इसलिए उसकी सहमति का कोई मतलब नहीं. क्या सचमुच शीला ने सोलह गर्मियाँ नहीं देखीं ? मुझे सभी महत्त्वपूर्ण दिन दोबारा बुलाने दो. वह सितम्बर 1974 था. हमारे पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है. स्कूल प्रमाणपत्र तक भी नहीं है. हमारे पास रिकॉर्ड में डॉक्टर विरमानी की सलाह (ओपिनियन) मौजूद है. उसके अनुसार शीला की उम्र करीब चौदह साल है और सोलह साल से कम है. लेकिन तब भी हम सब जानते हैं कि वह सिर्फ सलाह या विचार ही है, जिसमें डेढ़ से दो साल तक ‘इधर-उधर होना सम्भव है. मगर तब हम इस सलाह पर जाते ही क्यों हैं विशेषकर जब स्वयं शीला और उसकी माँ हमें बताती हैं कि उम्र क्या मानी जानी चाहिए ? 19 अप्रैल, 1976 को अदालत में शीला का और अगले दिन यानी 20 अप्रैल, 1976 को उसकी माँ बयान हुआ था. शीला ने अपनी उम्र अठारह साल बताई थी. उसकी माँ ने भी उसकी उतनी ही उम्र बताई थी. अगर ऐसा ही है तो, गणना के दिन निश्चित रूप से वह सोलह की सीमा रेखा पार कर चुकी है. यह उसकी सहमति के मुद्दों को मजबूत करता है.

चूँकि, पूरे प्रकरण में उसकी सहमति मौजूद है, महावीर बिना किसी रुकावट के मुसीबतों के उस पार जा सकता है. महावीर की अपील में विजय होती है और उसे बाइज्जत रिहा किया जाता है. यह कोई मनगढ़न्त कहानी नहीं, बल्कि दिल्ली उच्च न्यायालय के एक विद्वान न्यायमूर्ति श्री जसपाल सिंह द्वारा 11 मई, 1994 को सुनाए एक फैसले का अनुवाद है. 1 1977 में दायर एक अपील, जिसका फैसला होने (करने) में लगभग सत्रह साल का समय लगा. सत्रह साल का समय कोई ‘अनहोनी या ‘आश्चर्यजनक बात नहीं. ऐसा ‘न्यायिक विलम्ब प्राय: हो जाता है. विलम्ब के एक नहीं, अनेक कारण हैं. यहाँ उल्लेखनीय है कि बलात्कार के ऐसे मामलों में ‘लडक़ी की उम्र सिद्ध करने का एकमात्र अकाट्य दस्तावेज है जन्म प्रमाणपत्र. मगर दुर्भाग्य से इस देश में जन्म प्रमाणपत्र प्राय: उपलब्ध नहीं होता.2 आसिफिकेशन टेस्ट के आधार पर डॉक्टर की रिपोर्ट महज सलाह, विचार (ओपिनियन) भर है. इसलिए अनुमान लगाने में एक से तीन साल तक का अन्तर हो सकता है. ‘इधर या उधर ‘जिधर  भी अभियुक्त या अपराधी को लाभ पहुँचता हो. इस सन्दर्भ में सैकड़ों नजीर गिनाने से क्या लाभ !

न्याय की भाषा : लिंग पूर्वग्रह

खैर, उपरोक्त निर्णय पढ़ते-पढ़ते अचानक ध्यान आता है कि ‘न्याय की भाषा में पुरुष या लिंग पूर्वग्रह (दुराग्रह) पूरी आक्रामकता के साथ सक्रिय है. ‘देह का ताप बाँटते रहे से लेकर ‘वह उसे अपनी देह का ताप देती रही.कभी रात में दो बार और कभी-कभी तीन बार भी तक की भाषा का सम्पूर्ण व्याकरण स्त्री देह की कामना और आनन्द के शब्दजाल में भटक रहा है. न्याय की भाषा में मर्द भाषा की यह घुसपैठ पढ़ते हुए सचमुच डर लगने लगता है कि क्या न्याय व्यवस्था स्त्री के प्रति, इतने हत्यारे अर्थों में खड़ी है ? यह सोचते, समझते और लिखते समय अवमानना का आतंक भी सामने आ खड़ा होता है ? पारदर्शी पूर्वग्रहों के पीछे की पृष्ठभूमि क्या है–कहना कठिन है. परन्तु इतना साफ दिखाई देता है कि कहीं-न-कहीं वृद्ध यौन कुंठाएँ चेतन-अवचेतन को भयंकर रूप से विक्षिप्त और विकृत कर चुकी हैं. ‘मांसल देह के ताप’ और ‘यौन सम्बन्धों के खेल’  की अवधारणा से अभिभूत न्यायमूर्ति दमित इच्छाओं की अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकात्मक या संकेतात्मक भाषा की बैसाखियों का सहारा लेते हैं. स्वयं से सवाल पूछते हैं, ‘क्या शीला ने सोलह गर्मियाँ नहीं देखीं ? यहाँ ‘गर्मियाँ शब्द का प्रयोग मौसम या वर्ष गणना के लिए नहीं किया गया लगता. वसन्त, सावन या सर्दी की अपेक्षा, ‘सोलह गर्मियाँ लिखने का असली अभिप्राय निश्चित रूप से वह नहीं है, जो पढऩे में आता है. जो अर्थ पढऩे में आता है, वह समझने में नहीं आता. दोनों अर्थों का अन्तर हम सब अच्छी तरह जानते-समझते हैं. क्या नहीं ? फैसला पढऩे के बाद महसूस होता है कि महावीर जो ‘खेल’ देह से खेल रहा था, क्या न्यायमूर्ति उसी खेल को दोबारा शब्दों में खेलना-देखना चाहते हैं ? न्यायमूर्ति की भाषा में महावीर मन ही मन सोच रहा है, ‘यह एक लम्बी यात्रा थी, जो एक दिन और रात खा गई. वरना वह इस समय का उपयोग भी देह उपभोग में करता. शायद कहीं गहरे में ईर्ष्या  और द्वेष भावना सिर उठा कहने-बताने लगती है, ‘दे प्लेड द गेम ऑफ सेंसुअल फ्लैश. और कहीं आहत अतीत या अनुभव समझता है ‘यह विश्वास करना असम्भव है कि वह खेल में शमिल नहीं थी.

भेष बदलते पुरुषों में यह पहचानना मुश्किल है कि कौन अपराधी है और कौन न्याय (धीश)। यह कैसा ‘खेल’ है जिसमें चारों ओर ‘पुरुष’ के बचाव में खड़े सुरक्षा प्रहरी कभी ‘सहमति से सम्भोग’ पर बहस करने लगते हैं और कभी उम्र के प्रश्न पर मतभेद. कानूनी मुद्दों पर न्यायमूर्ति के तर्क पूर्णतया विवेकसम्मत हो सकते हैं। हालाँकि न्यायिक विवेक और आलोचनात्मक व्याख्या की भी अपनी सीमा है, क्योंकि  पूर्व निर्धारित है. निर्णय सही-गलत हो सकता है. गलत होगा तो ‘ऊपरवाला’ सही कर देगा. लेकिन क्षमा करें मी लॉर्ड ! लिंग पूर्वग्रहों या व्यक्तिगत संस्कारों से ग्रस्त दुराग्रहों से रची यह भाषा, नि:सन्देह न्याय की भाषा नहीं कही जा सकती. मर्दवादी भाषा का कोई भी नकाब बीमार मानसिकता को छिपाने के लिए नाकाफी है. परपीड़ा में आनन्द खोजती, अवांछित भाषा का ऐसा शब्दजाल न्याय की गरिमा के अनुकूल नहीं. ‘आधी दुनिया’ की गरिमा के तो बिलकुल ही नहीं.
बलात्कार के मुकदमे में ‘सेक्स’ को ‘गेम’, स्त्री देह को ‘सेंसुअल फ्लैश’ और स्त्री-पुरुष को ‘खिलाड़ी’, मानकर चलना, स्वयं पितृसत्ता के उस सत्ता-विमर्श में शामिल हो जाना है, जहाँ स्त्री मात्र देह, वस्तु, भोग्या और सम्पत्ति है। ‘खेल’ के अन्त में न्यायमूर्ति घोषणा करते हैं ‘महावीर विंज द अपील’. महावीर की ‘विजय’ का अर्थ है-स्त्री देह पर विजय. यही तो है पुरुष वर्चस्व का भाषाशास्त्र. अदालतों में न्यायमूर्ति अपील ‘मंजूर’ करते हैं या ‘स्वीकार’ करते हैं. अभियुक्त अपराधी की ‘हार-जीत’ घोषित नहीं करते.



पितृसत्ता के प्रेत : ‘मर्यादाहीन’ स्त्रियाँ

आश्चर्यजनक है कि 1994 में भी स्त्री के प्रति न्याय की भाषा सदियों पुरानी पुरुष मानसिकता की शिकार है. वर्षों पूर्व लाहौर उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने बलात्कार के अपराधी को रिहा करते समय कहा था, ”अभियुक्त महिला की सहमति से सहवास कर रहा था. जब वह (औरत) सहवास करते हुए, रँगे हाथों पकड़ी गई तो स्वाभाविक है कि उसने अपनी लाज बचाने के लिए, वह कहानी गढ़ी कि अभियुक्त ने जबर्दस्ती उसे पकड़ लिया.3 ‘शी नेचुरेली कांकोक्टेड ए स्टोरी, टू सेव हर फेस’ न्यायिक नहीं, बल्कि सामन्ती शब्दावली है. लाहौर से दिल्ली तक, मर्द भाषा का यही ‘न्यायशास्त्र’ पढ़ा-पढ़ाया जाता रहा है. पटना उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने तो एक निर्णय में यहाँ तक कहा कि, ‘लेकिन…जहाँ एक औरत की कोई गरिमा (मान-सम्मान, मर्यादा) ही न हो, वहाँ किसी पुरुष द्वारा उसके साथ सम्भोग को अपराध नहीं कहा जा सकता है.4 इसी परम्परा में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने एक मुकदमे में कहा कि अभियुक्त द्वारा सात महीने की बच्ची के विशेषांगों से छेड़छाड़ करना कोई अपराध नहीं है, क्योंकि ”शी इज फिजिकली इंकेपेबल ऑफ हैविंग एनी सेंस ऑफ मॉडेस्टी.5 न्याय की भाषा के इस शिल्प या स्वरूप को मर्दों की घृणित और घिनौनी ‘मानसिक क्षमता’ का उदाहरण ही कहा जा सकता है वरना ऐसी हजारों न्याय गाथाएँ सुरक्षित हैं. इसी क्रम में त्रिपुरा उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354 की व्याख्या करते हुए कहा है कि इस धारा के अन्तर्गत अपराध के लिए ‘बलप्रयोग’ अनिवार्य है. ”जहाँ अभियुक्त के विरुद्ध सिर्फ यह साक्ष्य हो कि उसने अपने कपड़े उतारे और गुप्तांग महिला को दिखाए, यह अपने आपमें धारा 354 के तहत कोई अपराध नहीं होगा.6

 कानून की भाषा-परिभाषा से लेकर न्याय की भाषा तक, पितृसत्ता का यही रूप दिखाई पड़ता है. एक और ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, ”बलात्कार कांड को सिर्फ देखना भर, बलात्कार के अपराध की उत्प्रेरणा नहीं कहा जा सकता.7 सामाजिक जीवन से लेकर सिनेमा और टी.वी. के पर्दे तक पर हो रहे बलात्कारों को देखना (और आनन्द उठाना) कोई अपराध नहीं. शौक से देखिए-दिखाइए. ‘रेप-सीन’ अभी और भी हैं, आप इसे देखते रहिए. ‘इनसाफ का तराजू’, ‘मेरी आवाज सुनो’ और ‘जख्मी औरत’ से लेकर ‘बैंडिट क्वीन’ तक. सम्पूर्ण मर्दवादी ढाँचे में पूर्वग्रहों और ‘मनुवाद’ से आतंकित, कानूनी व्याख्या में न्याय की भाषा का एक और भयावह रूप पेश होता है.स्वाति लोढा बनाम राजकुमार.8 इस मुकदमे में राजकुमार ने स्वाति से बिना विवाह  किए ही देह सम्बन्ध स्थापित किया. स्वाति गर्भवती हो गई. राजकुमार ने दूसरी स्त्री से विवाह कर घर बसा लिया. इस पर स्वाति ने राजकुमार पर बलात्कार का मुकदमा दायर किया और प्रमाण के लिए राजकुमार और उससे उत्पन्न हुए बच्चे के डी.एन.ए. टेस्ट की माँग की. राजस्थान उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा, ”स्वाति में एक वह माँ नहीं बोल रही जो बच्चे के किसी कानूनी अधिकार के लिए, उसके माता-पिता का निर्धारण करवाना चाहती है. यह एक स्त्री के प्रतिशोध का परिणाम है, जो वह राजकुमार के खिलाफ ले रही है, जिसने उसका कौमार्य, अस्मिता और पवित्रता भंग करने के बाद किसी दूसरी स्त्री से शादी कर ली है. यहाँ कौमार्य या पवित्रता को लेकर जो कहा जा रहा है, लगता है वह राजकुमार कह रहा है. यह है मर्दवादी भाषा का चमत्कार. इसी फैसले में यह टिप्पणी भी उल्लेखनीय है, ”उसके गन्दे कपड़ों के बारे में बताया गया है कि वे धो दिए गए हैं, यद्यपि राजकुमार के कथित गन्दे कपड़ों को अदालत में पेश करने की माँग की गई है.9 न्याय की माँग करनेवाली स्त्री की बात ‘प्रतिशोध का परिणाम’ लगती है क्योंकि ‘उसका कौमार्य, अस्मिता और पवित्रता भंग’ हो चुकी है. ‘गन्दे कपड़े’ धुल सकते हैं, लेकिन ऐसी भाषा का कोई क्या करे ?

बलात्कार मृत्युजनक शर्म है–सिर्फ स्त्री के लिए

इससे भी अधिक पेचीदा स्थिति वहाँ आती है, जहाँ न्याय की भाषा स्त्री के पक्ष में बोलती दिखती है. एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री आर. कृष्ण अय्यर लिखते हैं, ”कोई भी प्रतिष्ठित महिला किसी पर भी बलात्कार का आरोप नहीं लगाएगी क्योंकि ऐसा करके वह जो बलिदान करती है, वही तो उसे सबसे अधिक प्रिय है.10 यहाँ ‘विमेन ऑफ ऑनर’ यानी प्रतिष्ठित महिला की परिभाषा में वेश्या, कॉलगर्ल या चरित्रहीन औरतें शामिल नहीं हैं और न ‘दोहरा अभिशाप’ झेलती वे गरीब, हरिजन और आदिवासी औरतें, जो बिना किसी ‘मानवीय गरिमा’ या किसी भी ‘गरिमा’ की निर्धनता-रेखा से नीचे जी रही हैं. तर्क के दूसरी ओर यह छिपा है कि प्रतिष्ठित स्त्री को बलात्कार का आरोप लगाने की जरूरत नहीं और अप्रतिष्ठित को ऐसा आरोप लगाने का हक नहीं. यहाँ आर्थिक-भेद और लिंग-भेद किस कदर मिल-जुल गए हैं कि एक ओर तर्क से अमीर स्त्री की प्रतिष्ठा को उसका बन्धन बनाया जा रहा है दूसरी ओर गरीब स्त्री को प्रतिवाद के हक से वंचित किया जाता है वह तो ऐसी थी ही.उपरोक्त निर्णय से पचास साल पहले भी अदालत ऐसी ही भाषा बोल रही थी. ”यह बहुत ही कम सम्भावना है कि कोई आत्मस्वाभिमानी औरत न्याय की अदालत में आगे आकर अपने साथ हुए बलात्कार के बारे में, अपने सम्मान के विरुद्ध शर्मनाक बयान देगी, बशर्ते कि यह पूर्ण रूप से सच न हो.11 या (पूर्ण रूप से झूठ ‘इज्जतदार औरतें’ तो बलात्कार सच में हो जाने पर भी किसी को नहीं बतातीं, शर्म के मारे डूबकर या जलकर मर जाती हैं. पचास सालों में ‘आत्मस्वाभिमानी औरत’ की जगह ‘प्रतिष्ठित महिला’ ने ले ली. चूँकि स्त्री के लिए बलात्कार मृत्युजनक शर्म है.12 इसलिए चुप रहो। बेकार ‘शर्मनाक बयान’ देने से क्या फायदा ? ‘न्याय के प्रहरी’ इससे ज्यादा स्पष्ट और क्या कहें ? हर बार महसूस होता है कि स्त्री के प्रति वह न्याय की भाषा नहीं बल्कि क्रूरता  और दमन की भाषा है. पितृसत्ता द्वारा जारी आदेश और अध्यादेश की भाषा है. न्याय के नाम पर पीढिय़ों से विरासत में मिली अन्याय की भाषा है. बलात्कारी भाषा. मर्दवादी भाषा कहती है, मर्द को बर्दाश्त कर ! बस ! यह भाषा न्यायालय की है. न्यायालय भी तो मर्दवादी हो सकता है.
क्रमशः….

मुसलमान भी नहीं पैदा करना चाहते बेटियां

नासिरूद्दीन हैदर खाँ


नासिरूद्दीन हैदर खाँ पेशे से पत्रकार हैं और जेंडर जिहाद के संपादक हैं .

‘..और (इनका हाल यह है कि) जब इनमें से किसी को लड़की पैदा होने की खुशखबरी दी जाती है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह तकलीफ में घुटने लगता है। जो खुशखबरी उसे दी गयी वह उसके लिए ऐसी बुराई की बात हुई कि लोगों से छिपा फिरता है। (सोचता है) अपमान सहन करते हुए उसे जिंदा रहने दे या उसे मिट्टी में दबा दे।’                     (कुरान: सूरा अल-नहल आयत ५८-५९)

यह चौदह सौ साल पहले का अरब समाज का चेहरा था, जिसका जि़क्र क़ुरान की इस आयत में आता है. …मगर इन चौदह सौ सालों में कुछ नहीं बदला तो बेटियों के पैदा होने का दु:ख ! क़ुरान की दुहाई देने वाले कितने मुसलमान हैं, जो बेटी की पैदाइश को ख़ुशख़बरी मानते हैं और लड्डू बाँटते हैं ? आज भी ‘बेटी’ सुनते ही ज्यारदातर लोगों का चेहरा स्याह पड़ जाता है. ..यह आयत आज के भारतीय समाज पर पूरी तरह सटीक है.
आम तौर पर बार-बार बताया जाता है कि इस्लाम ने औरतों को काफी हुक़ूक़ दिए हैं. सचाई भी है. लेकिन क्या वाक़ई में ‘मर्दिया सोच के अलम्बरदार’ मुसलमान औरतों को वे हक़ दे रहे हैं ? और कुछ नहीं तो सिर्फ जि़दगी का हक़ ! जी हाँ, पैदा होने और जिंदा रहने का हक़. (आगे पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें)

सन् 2001 की जनगणना कई मायनों में अहम है. यह पहली जनगणना है, जिसके आँकड़े विभिन्न मज़हबों की सामाजिक-आर्थिक हालत का भी आँकड़ा पेश करती है. इसने कई मिथक तोड़े, तो कई नए तथ्य उजागर भी किए. एक मिथक था कि मुसलमानों में लिंग चयन और लिंग चयनित गर्भपात नहीं होता ! सन् 2001 की मरदुमशुमारी के मुताबिक मुसलमान देश की कुल आबादी का 13.4 फीसदी हैं. यानी करीब तेरह करोड़ इक्यासी लाख अट्ठासी हजार. इसमें मर्दों की आबादी सात करोड़ तेरह लाख (7,13,74,134) है. क़ायदे से इतनी ही या इससे ज्यादा औरतें होनी चाहिए. लेकिन इस आबादी में मर्दों के मुकाबले पैंतालीस लाख साठ हजार (45,60,028) मुसलमान औरतें कम हैं या कहे गायब हैं. यानि  कल्पना करें कि एक सुबह जब हम उठें तो पता चले कि लखनऊ और मथुरा में रहने वाले सभी लोग गायब हो गये हैं. … उस सुबह कोहराम मचेगा या जिंदगी हर रोज़ की तरह इत्मीनान से चलेगी ? अफसोस, इतनी तादाद में मुसलमान औरतें गायब हैं, लेकिन किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती.

तत्कालीन अरब समाज के कई कबीलों में लड़कियों की पैदाइश को अपशगुन माना जाता था और उन्हें मार डालने की रवायत थी और चौदह सौ साल पहले क़ुरान ने और इस्लाम ने इसे बड़ा जुर्म माना. (कुरान के सूरा अत-तकवीर की आयत (एक से नौ) है)- जब सूरज बेनूर हो जायेगा/ और जब सितारे धूमिल पड़ जाएँगे/ जब पहाड़ चलाये जाएँगे/../ और जब दरिया भड़काए जाएँगे/../ और जब जिंदा गाड़ी हुई लड़कियों से पूछा जाएगा/ कि वह किस गुनाह पर मार डाली गई. यानि  मुसलमानों से कहा गया कि उस वक्त को याद करो जब उस लड़की से पूछा जाएगा जिसे जिंदा गाड़ दिया गया था कि किस जुर्म में उसे मारा गया. इस तम्बीह का आज के मुसलमान कितना पाबंद हैं, देखें. आज बेटियों को जिंदा गाड़ने की ज़रूरत नहीं है बल्कि रहम (गर्भ) की जाँच कराकर उसे खत्म कर दिया जा रहा है. इस लिहाज़ से क़ुरान की आयत की रोशनी में यह भी गलत है.

औरतें कहीं हवा में गायब नहीं हो गईं, बल्कि खुद मुसलमान, बेटों की ललक में उन्हें पैदा ही नहीं होने दे रहे. हिन्दुओं, सिखों और जैनियों की तरह मुसलमान भी ‘बिटिया संहार’ में शामिल हैं. उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड की सबसे ज्यादा मुसलमान आबादी वाले शहर बांदा, पूरी दुनिया में तहजीब का झंडा उठाने वाले शहर लखनऊ और इल्म के मरकज़ अलीगढ़ और दारुल उलूम, देवबंद की वजह से बार-बार चर्चा में रहने वाली धरती सहारनपुर में मुसलमान जोड़े अपनी आने वाली औलाद की सेक्स की जाँच करा रहे हैं और लड़की को पैदा नहीं होने दे रहे. (जाहिर है सब ऐसा नहीं करते) ऐसी ही हालत गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में भी है. कहीं काफी पहले से ही दूसरे मज़ाहिब के लोगों की ही तरह बेटी नहीं पैदा होने दी जा रही थी तो कहीं अब देखा-देखी यह चलन जोर पकड़ रहा है.

बेटियों को गायब करने का काम तहज़ीब याफ्ता मुसलमान ख़ानदान, पढ़े-लिखे, धनी, ज़मीन वाले, और शहरों में रहने वाले सबसे बढ़ कर कर रहे हैं. इस काम में मुसलमान डॉक्टर भी खुलकर मदद दे रहे हैं. क्यों ? क्योंकि बेटियों को पैदा न होने देने का धँधा काफी मुनाफे वाला है. मुसलमानों की आबादी के लिहाज से उत्तर प्रदेश काफी अहम है. यहाँ की आबादी में साढ़े अट्ठारह (18.5) फीसदी यानी तीन करोड़ सात लाख चालीस हजार (30,740,158) मुसलमान हैं. यहाँ की मुसलमान आबादी में तेरह लाख 16 हजार बेटियाँ गायब हैं. यानी, मुसलमान लड़कियों को गायब करने में अकेले यूपी का हिस्सा करीब 29 फीसदी है बाकि में देश के पूरे राज्य ! यहाँ के चंद मुस्लिम बहुल जिलों का हाल जान लें. अलीगढ़ की आबादी से करीब 33 हजार लड़कियाँ लापता हैं. अलीगढ़ का लिंग अनुपात, मतलब एक हजार लड़कों पर लड़कियों की तादाद, 883 है। इसी तरह लखनऊ में करीब साढ़े सात लाख (748687) मुसलमान हैं. यहाँ मर्दों के मुकाबले करीब लगभग चौंतीस हजार (34169) मुसलमान औरतें कम हैं.

मर्दों के मुकाबले सहारनपुर में सत्तहत्तर हजार तो मुजफरनगर में करीब चौहत्तर हजार, बिजनौर में 58 हजार और कानपुर शहर में करीब चालीस हजार मुसलमान औरतें कम हैं. इनमें हर उम्र की औरत शामिल हैं और वह भी शामिल है जिसे यह जानकर पैदा नहीं होने दिया गया कि वो लड़की है और जिनके साथ लड़की होने के नाते जिंदगी में हर कदम पर भेदभाव किया गया और मौत के मुँह में ढकेल दिया गया. इनमें से कइयों को सिर्फ इसलिए मार दिया गया कि वे अपने साथ मोटा दहेज लेकर नहीं आई थी. बेटियों को गायब करने का काम तहज़ीब याफ्ता मुसलमान ख़ानदान, पढ़े-लिखे, धनी, ज़मीन वाले, और शहरों में रहने वाले सबसे बढ़ कर कर रहे हैं. इस काम में मुसलमान डॉक्टर भी खुलकर मदद दे रहे हैं. क्यों, क्योंकि बेटियों को पैदा न होने देने का धँधा काफी मुनाफे वाला है. इस मसले के सामाजिक पहलू पर नजर डाली जाए तो अंदाजा होता है कि समाज में लड़कियों को कमतर समझने का रुझान तो था ही मगर दहेज के बढ़ते रिवाज ने अब इनकी जिंदगियों को ही खतरे में डाल दिया है.



पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश आर्थिक रूप से काफी खुशहाल हैं लेकिन वहाँ भी बेटियाँ अनचाही हैं. सबसे बढ़कर तकनीक की तरक्की ने लड़कियों के खिलाफ पहले से ही मौजूद पितृसत्तात्म विभेद की खाई को और ज्यादा गहरा करने का काम किया है. तकनीक का इस्तेमाल डिजायनर फेमिली बनाने में किया जा रहा है. यानि एक बेटा या दो बेटे या एक बेटा और एक बेटी. बिटिया संहार का नतीजा, हमारे सामने आ रहा है. लड़कियाँ तो लड़कों की चाह में गायब की गईं लेकिन कभी किसी ने सोचा, लड़कों की दुल्हन कहाँ से आयेगी ! यही नहीं ये तो क़ुदरत के निज़ाम को बर्बाद करना है. कुरान की रोशनी में अगर आज के हालात में अगर यह कहा जाए कि और उस वक्त को याद करो जब बेटियों से यह पूछा जाएगा कि किस बिना पर तुम पेट में ही पहचान कर मार डाली गयी. आप ही बताएँ कि उस लड़की का क्या जवाब होगा ? कहीं वह यह तो नहीं कहेगी-
ओरे विधाता, बिनती करुँ, परुँ पइयाँ बारम्बार
अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो, चाहे नरक में दीजो डार