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पाकिस्तानी इस्लाम ने ली कंदील की जान

आशीष कुमार ‘‘अंशु’


आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . फिलहाल विकास पत्रिका ‘सोपान’ से सम्बद्ध हैं और विभिन पत्र -पत्रिकाओं में लिखते हैं . संपर्क : 9868419453 .

‘‘एक महिला होने के नाते हमें अपने लिए जरूर खड़ा होना चाहिए, एक महिला होने के नाते हमें जरूर एक दूसरे के लिए खड़ा होना चाहिए, एक महिला होने के नाते हमें जरूर न्याय के साथ खड़ा होना चाहिए. मैं विश्वास करती हूं कि मैं आज के समय की फेमिनिस्ट हूं. मैं बराबरी में यकीन करती हूं. मुझे यह चुनने की जरूरत नहीं है कि मुझे किस तरह की औरत होना चाहिए. मुझे नहीं लगता कि समाज के लिए मुझे किसी तरह के लेबल की जरूरत है. मैं सिर्फ आजाद ख्याल और आजाद सोच वाली एक महिला हूं और मैं जैसी भी हूं, मुझे अपने इस होने से प्यार है.’’

16 जुलाई को दोपहर लगभग एक बजे किया गया कंदील बलोच  का यह ट्वीट कंदील का एक परिचय भी है. 17 जुलाई को अपनी बहन की हत्या के आरोप में कंदील  के भाई मोहम्मद वसीम की गिरफ्तारी हो गई है. वसीम ने मान लिया कि उसने अपनी बहन की हत्या की और उसे इस हत्या के बाद कोई पछतावा नहीं है. इस पछतावा ना होने को सम्मान के नाम पर हत्या से जोड़ कर दुनिया भर की मीडिया देख रही है लेकिन यहां सम्मान से अधिक बड़ा सवाल इस्लाम का था.

सेकुलर अफ्रीकन नाम की एक वेवसाइट इस्लाम के संबंध में लिखती है- इस्लाम में सेक्स मजदूर की अवधारणा पर कोई विवाद नहीं है और यह इस्लाम में तब तक रहेगा जब तक मानवता रहेगी. इस्लाम रहेगा. महिलाओं के साथ सेक्स मजदूर रखने में भी भेदभाव है. मतलब इस्लाम पुरुषों को तो सेक्स के लिए महिलाओं को खरीदने-बेचने की इजाजत देता है, लेकिन महिलाओं को यह अधिकार नहीं है. इसी प्रकार 72 हूरों की कल्पना इस्लाम में है लेकिन यदि कोई पुरुषों की तरह अल्लाह का राज अर्थात दारूल इस्लाम की स्थापना की राह में अपनी जान दे दे तो क्या उसे 72 पुरुष उपलब्ध होंगे ? क्या वह 72 नहीं तो 36 पुरुषों को अपने लिए उपलब्ध पायेंगी ?

जिन्हें लगता है कि कंदील बलोच ऑनर कीलिंग की शिकार हुई है, उन्हें पाकिस्तानी मीडिया की पुरानी रिपोर्टिंग और कवरेज देखनी चाहिए. किस तरह महिला हो या पुरुष एंकर, वह कंदील बलोच को कैमरे के सामने जलील करने की कोशिश करता था. पाकिस्तान का आवाम भी उसे पसंद नहीं करता था. कंदील के इंटरव्यू में बार-बार आवाम का जिक्र आ ही जाता था. पाकिस्तान के लोग कंदील को पसंद नहीं करते थे और कंदील भी उन्हें पसंद नहीं करती थी. फिर भी सोशल मीडिया की यह शहजादी वहां हमेशा चर्चा में रहीं. हत्या से कुछ समय पहले दिए अपने एक साक्षात्कार में कंदील ने कहा था कि मैंने अभी कुछ नहीं किया. अब मैं पाकिस्तान के आवाम को दिखाऊंगी की मैं क्या कर सकती हूं ?

भारत और पाकिस्तान के बीच के अंतर को हाल में भूपेन्द्र चौबे  के उस साक्षात्कार के हवाले से समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने पोर्न स्टार  शनि लियोन से कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछने की अभद्रता की. उसके बाद हर तरफ भूपेन्द्र चौबे  नाम के उस पत्रकार की आलोचना हुई। दूसरी तरफ जिस तरह बार-बार कंदील बलोच को पाकिस्तानी चैनलों पर जलील किया जा रहा था. वहां इसके विरोध में कोई आवाज सुनने को नहीं मिली. वास्तव में कंदिल सिर्फ अपने भाई मोहम्मद वसीम के लिए आॅनर का सवाल नहीं थी बल्कि कंदील पूरे पाकिस्तान के आॅनर की गर्दन पर लटकती तलवार बन गई थी। जबकि इस संबंध में इस्लाम कहता है- ‘जब तुममे हया ना रहे फिर तुम जो चाहे वह करो.’

अब जब पूरा पाकिस्तान कथित तौर पर कंदील बलोच  को बेहया मान चुका था फिर बार-बार उसके रास्ते में अंड़ंगा क्यों लगा रहा था ? इसकी बड़ी वजह यही रही होगी कि खुदा को मानने वालों की खुदा ने जो कहा है, उसे मानने में रूचि नहीं रही होगी. कंदील बलोच ने अपने साक्षात्कारों में बार-बार यह बात कही है कि मुझे खराब करने वाली आवाम है. बलूच ने यह भी कहा है- ‘बुराई तो अभी स्टार्ट हुई है. आगे देखिए मैं आवाम के साथ क्या करती हूं?’ पाकिस्तान के पत्रकारों के संबंध में कंदील ने एक साक्षात्कार में कहा था कि ये ठरकी लोग हैं. वैसे ठरकी तो वे मुफ्ती भी निकले जो ईद के चांद से पहले कंदिल का दीदार करना चाहते थे.

रोजे हयात समिति वाले मुफ्ती अब्दुल कबी के साथ पाकिस्तान के एक खबरिया चैनल पर कंदील मौजूद थीं. मुफ्ती के सामने कंदील ने कहा कि इन्होंने मुझसे पूछा था, तुम्हारा रोजा तो नहीं है. उसके बाद मुफ्ती ने कहा कि तुम्हारे नाम पर आज मैने अल्लाह से माफी मांग ली है और उसके बाद उन्होंने कंदील की जूठी सिगरेट और जूठा कोक पीया. जब यह पूरा प्रकरण पाकिस्तान की मीडिया में उछला उसके बाद कंदील अपनी हत्या की आशंका जता चुकी थी. कंदील के अनुसार मुफ्ती उसका हाथ अपनी अठारहवीं बेगम के तौर पर मांगने आए थे.गौरतलब है कि मुफ्ती की उम्र कंदील के पिता की उम्र के बराबर है.

कंदील  बलोच को पाकिस्तान भर से हत्या और जान से मारने की धमकी लगातार मिल रही थी, लेकिन उसे क्या पता था कि उसे खतरा बाहर वालों से नहीं है. उसका हत्यारा उसके घर में बैठा उसका भाई निकलेगा.  पाकिस्तान में एक अनुमान के अनुसार, प्रत्येक वर्ष 500 से अधिक महिलाओं की जान इस तरह के झूठे ‘सम्मान’ के नाम पर जाती है. कंदील बलोच के फेसबुक पोस्ट और ट्यूटर पोस्ट इस बात की गवाही है कि वह पाकिस्तानी आवाम की रूढिवादी कट्टर इस्लामिक सोच को बदलना चाहती थी. लेकिन न इस्लाम बदला, न पाकिस्तान बदला और ना निजाम बदला. वैसे खबरों पर यकीन करें तो कंदील बलोच का हत्यारा इस्लाम नहीं है, पाकिस्तान नहीं है. वह झूठे सम्मान की बलि चढ़ गई. बहरहाल, सच तो यही है कि कल तक कंदील को सिर्फ पाकिस्तान की आवाम जानती थी. आज उसे पूरी दुनिया जानती है। कंदिल बलोच होना आसान नहीं है.

मीसा भारती: महिलाओं को अधिकार दिये बिना सामाजिक न्याय अधूरा

डा. मीसा भारती

डा. मीसा भारती राज्यसभा सांसद हैं .

 राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय जनता दल की प्रभावशाली महिला नेता डा. मीसा भारती अपने इस लेख में महिलाओं के आरक्षण को समय की आवश्यकता बता रही हैं:

राजनीति में महिलायें ! यह आज भी एक बडा सवाल है. कम से कम भारतीय राजनीति में. प्रमाण यह कि यहां महिलाओं को हर स्तर पर स्वयं को साबित करना पडता है. बात यदि वंचित वर्ग की महिलाओं की हो तो प्रतिकुलता के स्तर में गुणोत्तर वृद्धि हो जाती है. एक ताजा प्रमाण यह कि देश में दलित राजनीति की शीर्ष नेत्री मायावती जी का सार्वजनिक अपमान भाजपा के उपाध्यक्ष पदधारी नेता द्वारा किया गया. यह सब उस पार्टी के नेता द्वारा किया गया जो धर्म के आधार पर महिलाओं को देवी का अवतार मानती है. इतना ही नहीं जब केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इसका विरोध किया तो उनका भी माखौल उडाया गया. ये घटनायें तो महज बानगी है.

कहने की आवश्यकता नहीं रह गयी है कि महिलायें आज न केवल सामाजिक जिम्मेवारियों के निर्वहन में सक्षम हैं बल्कि कई क्षेत्रों में उन्होंने स्वयं को पुरूषों से आगे निकलकर खुद को साबित किया है. हालांकि यह भी एक कटु सत्य है कि आधी आबादी को आज भी अपने अस्तित्व के लिए अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है, पुरुषों द्वारा परिभाषित कसौटी पर खुद को साबित करना पड़ता है.

हमारे समाज में महिलाएँ अपने हित से जुड़े निर्णय लेने में भी स्वतन्त्र नहीं हैं, इसके लिए भी उन्हें सदैव किसी ना किसी पुरुष की हामी पर ही निर्भर रहना पड़ता है.हमारे पुरुष प्रधान देश में बेटी या बहु को घर की इज़्ज़त बताने के बहाने सीमाएँ निर्धारित कर दी जाती हैं जो दरअसल महिलाओं को वश में रखने के लिए एक पुरुष प्रधान समाज द्वारा किए गए अन्यायपूर्ण उपायों से अधिक कुछ नहीं  हैं. दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि संविधान में भी महिलाओं को वाजिब हक मिल सके, इसके लिए न्यायपूर्ण प्रावधान नहीं किये जा सके हैं. ताजा उदाहरण संसदीय व्यवस्था में महिला आरक्षण के मुद्दे का है. इसे लेकर कई भ्रांतियां भी हैं जो समाज के विभिन्न तबकों में विषमता के कारण भी है और यथास्थिति के आदती हो चुके सामाजिक व्यवस्था के कारण भी.सबसे पहले तो यह समझना अनिवार्य है कि आरक्षण का उद्देश्य क्या है. अगर आरक्षण का उद्देश्य देश के संसाधनों, अवसरों और राजकाज में समाज के हर समूह की उपस्थिति सुनिश्चित करना है, तो यह बात अब निर्णायक रूप से कही जा सकती है कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था असफल हो गयी है.

सामाजिक न्याय का सिद्धांत दरअसल वहीं लागू हो सकता है, जहां लोगों (खासकर प्रभावशाली लोगों) की नीयत साफ हो. विशिष्ट सामाजिक बनावट की वजह से भारत जैसे देश में सामाजिक न्याय के सिद्धांत को असफल होना ही था और यही हुआ.

सर्वविदित है कि आजादी के पहले से ही भारत में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण लागू है. 1993 के बाद से अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण है. 2006 के बाद से केंद्र सरकार के शिक्षा संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण लागू हो गया. राज्यों के स्तर पर ओबीसी का आरक्षण काफी समय से चला आ रहा है. लेकिन इस तरह के तमाम आरक्षण का नतीजा क्या निकला ? यह एक विचारणीय प्रश्न है. भारतीय संविधान के मुताबिक  अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण लागू होने के साठ साल से अधिक समय बीत चुके हैं. अब मौका आ गया है कि देश के सभी तबकों के लोग आपस में मिलकर इस स्थिति पर विचार करें कि जिन उद्देश्यों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी, वह अभी तक अप्राप्य क्यों है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आरक्षण की समीक्षा के बहाने वंचित तबकों के हितों की उपेक्षा की जाय.

मेरे हिसाब से एक्सक्लूजन की  बजाय इन्क्लूजन की नीयत से आरक्षण की समीक्षा हो और जब ऐसा हो तो महिलाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. सामाजिक न्याय की अवधारणा ही समाज के सभी वंचित तबकों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने का है. फिर महिलाओं को इससे अलग कैसे किया जा सकता है. खास बात यह भी कि समीक्षा के पूर्व ठोस पहल किये जाने की आवश्यकता है. हालांकि पूर्ववती केंद्र सरकार ने देश में जातिगत जनगणना कर एक पहल की लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि इसे आजतक सार्वजनिक नहीं किया गया है.इसका परिणाम यह है कि आज नीतियां एवं योजनायें बिना किसी ठोस आधार के बनायी जा रही हैं. किसी को भी यह नहीं मालूम कि ओबीसी का आंकड़ा क्या है. दलित कितने हैं और आदिवासी कितने. इस देश में ओबीसी के लिए आरक्षण है, ओबीसी वित्त आयोग है, ओबीसी के लिए सरकार की ओर से मामूली सा ही सही लेकिन बजट है, राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय ओबीसी आयोग है, लेकिन ओबीसी का कोई आंकड़ा नहीं है. चूंकि आंकड़ा नहीं है इसलिए योजनाओं का कोई लक्ष्य भी नहीं है. किस राज्य को ओबीसी विकास के लिए कितनी रकम देनी है और कितनी स्कॉलरशिप देनी है, यह सब ओबीसी की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि राज्य की कुल आबादी के अनुपात में तय होता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में इस साल ओबीसी की 5400 सीटें योग्य कैंडिडेट न मिलने के नाम पर जनरल कटेगरी को ट्रांसफर कर दी गयीं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी लगभग ढाई सौ ओबीसी सीटें जनरल छात्रों से भरी गयीं. विश्वविद्यालयों में दलित, आदिवासी और ओबीसी कोटा किसी न किसी बहाने खाली रखा जाता है. आईआईटी और आईआईएम में यह समस्या और गंभीर है. समुदायों के स्तर पर यह असंतुलन लोकजीवन के अलग-अलग और लगभग सभी क्षेत्रों में देखा जा सकता है. राजनीति और सफाई के पेशे को अपवाद के तौर पर देख सकते हैं, जहां वंचित समुदायों के लोग अच्छी संख्या में हैं.इनमें से ज्यादातर बातें अनुमान या अनुभव के आधार पर इसलिए भी कहने की जरूरत पड़ती है क्योंकि इस देश में कभी भी यह जानने की कोशिश नहीं की जाती कि देश के अलग अलग समुदायों की वास्तविक स्थिति क्या है और किन समुदायों को कितना और किस तरह से विशेष अवसर देने की जरूरत है. इस बात को छिपाने पर जोर इतना ज्यादा है कि देश में  समाजशास्त्रीय महत्व के आंकड़े जुटाने का खुद समाजशास्त्री (अकादमिक क्षेत्र में वंचित समुदायों के लोग नाम मात्र ही हैं) ही विरोध करते हैं. मिसाल के तौर पर, अभी आंकड़ा संग्रह की जो स्थिति है, उसकी वजह से आप यह कभी नहीं जान पाएंगे कि इस देश में कितने लोग जाति से बाहर शादी करते हैं. बहरहाल ठोस आंकड़े न होने पर भी यह बात भरोसे के साथ कही जा सकती है कि देश के ज्यादातर संसाधनों, अवसरों और राजपाट (विधायिका को छोड़कर) पर दलित-आदिवासी और ओबीसी उपस्थिति सुनिश्चित करने में आरक्षण का मौजूदा स्वरूप असफल रहा है.

महिलाओं के मामले में खास बात यह भी है कि उन्हें कभी भी स्वतंत्र तौर पर नागरिक माना ही नहीं गया है. महिलाओं की जाति उनके पति की जाति के आधार पर तय करने की प्रथा है. सवाल केवल जाति निर्धारण का ही नहीं है बल्कि महिलाओं के अस्तित्व को स्वीकारने का है. जिस तरीके की विषमता पुरूषों के लिए समाज में मौजूद है, महिलाओं के लिए भी वहीं विषमतायें लागू होती हैं. मसलन महिलायें भी जाति के आधार पर श्रेणीकृत हैं. इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता है.

खैर महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए उनका  राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तीनों स्तरों पर उन्मुखीकरण अनिवार्य है. बिहार इस मामले में एक नजीर है. बिहार में पहली बार महिलाओं को पंचायती राज व्यवस्था के तहत पचास फीसदी आरक्षण दिया गया. हालाँकि इसके आलोचना में यह ज़रूर कहा जाता है कि अक्सर ये महिला उम्मीदवार अपने परिवार के किसी राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी पुरुष के महिला मुखौटा से अधिक कुछ नहीं होती हैं, और इस वास्तविकता से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. परंतु इसके साथ साथ इस वास्तविकता से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसी बहाने दूर दराज के गाँवों की  महिलायें अपने घर की दहलीज से बाहर निकलीं और कई अवसरों पर खुद को सामाजिक और राजनीतिक जीवन में साबित भी किया. अब देश के विभिन्न राज्यों द्वारा बिहार के इस उदाहरण को सराहा और अपनाया जा रहा है.

बहरहाल महिलायें सशक्त हों, इसके लिए आरक्षण आवश्यक है और यह भी सही है कि कोटा के तहत कोटा मिले तो यह एक न्यायपूर्ण स्थिति होगी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल पहल करने की है. जिस तरीके से महिलाओं को उनके हक-हुकूक से वंचित किये जाने की साजिश की जा रही है, अब बंद होना चाहिए. इसके लिए प्रबुद्ध महिलाओं को आगे आना होगा और गाँव गाँव जाकर इस सुनियोजित संस्थागत अन्याय के विरुद्ध सभी महिलाओं को जागृत और संगठित करना होगा. कोई न कोई मार्ग तो तलाशनी ही होगी ताकि आधी आबादी खुलकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाये.

डा. मीसा भारती राज्यसभा सांसद हैं

ब्रह्मचारी जीवन जीती औरतों के बीच एक दिन

संजीव चंदन

जिस दिन मैं उनके आश्रम में पहुंचा उस दिन मेहमाननवाजी की जिम्मेवारी गुजरात की गंगा बहन की थी. लम्बी, दुबली और हमेशा हंसमुख 70 साल से ऊपर की गंगा बहन बड़े सहज ढंग से मिलीं. शाम को उनके कमरे में बातचीत के लिए पहुंचा, उनके बारे में, ब्रह्मचर्य जीवन के बारे में बात करते हुए अचानक से जब मैंने उनसे कहा , ‘ आप बहुत खूबसूरत हैं,’ वे चिरपरिचित अंदाज में मुसकुरा भर दीं. छूटते ही मैंने उनसे पूछ लिया, ‘ कभी किसी को प्यार नहीं किया !’ उन्होंने कहा, ‘ सारे संसार से’.

इन पंक्तियों के लेखक ने 24 घंटे ब्रह्मचर्य जीवन जी रही औरतों के बीच गुजारे – अपनी यौनिकता के दमन के निर्णय के साथ आध्यात्मिक उन्नति में लगीं औरतों के बीच

ब्रह्मचर्य , सामूहिक निर्णय और श्रम-आधारित जीवन


नागपुर से 70 किलोमीटर दूर विनोबा के पवनार आश्रम ( ब्रह्म विद्या मंदिर)  में रह रहीं इन औरतों के लिए आश्रम जीवन का मतलब है : ब्रह्मचर्य , सामूहिक निर्णय और श्रम-आधारित जीवन. सुबह 4 बजे से उनकी दिनचर्या शुरू होती है. 4.30 पर वे ईशावास्योपनिषद का पाठ करती हैं, दिन में 10 बजे विष्णुसहस्रनाम का और शाम में गीता पाठ करती हैं. सामूहिक रसोई , खेती और पशुपालन के श्रम –जीवन की रूटीन के अलावा वे एक मासिक पत्रिका ( मैत्री) का सम्पादन करती हैं, विनोबा –साहित्य का सम्पादन और बौद्धिक –आध्यात्मिक चिन्तन में लगी होती हैं- बौद्धिक और शारीरिक श्रम के लिए एक-समान मजदूरी लेती हैं.

ये तीस औरतें जब आश्रम में आई थीं तब युवा-सपनों से भरी थीं.  सभी किसी न किसी गांधीवादी परिवार या स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े परिवार की बेटियाँ थीं, जिन्होंने विनोबा भावे के आन्दोलन भूदान से जुड़ने और ब्रह्मचर्य जीवन जीने का संकल्प लिया पवनार आश्रम को अपना ठिकाना बना लिया.

ब्रह्मचर्य और जेंडर –समानता का विनोबा- दर्शन 


विनायक नरहरि विनोबा ( विनोबा भावे ) ने किशोरावस्था में ही ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया था. अपने ब्रह्मचर्य प्रयोगों के लिए भी चर्चा में रहे महात्मा गांधी स्वीकार करते थे कि उन्हें विनोबा के ब्रह्मचर्य से प्रतिस्पर्धा है. विनोबा  ‘पुरुष और स्त्री होने के भाव से मुक्त होने को ब्रह्मचर्य’ की कसौटी मानते थे, जिसे वे ‘ नपुंसक’ होना कहते थे. वे पुरुषों के द्वारा औरतों पर किये गये प्रतिबंधों के खिलाफ उनके आन्दोलन से ज्यादा असरकारी इस ‘ नपुंसक भाव’ को मानते थे, जो उनके अनुसार जेंडर –समानता का सर्वोत्तम रूप है .

ब्रह्मचर्य के गांधीवादी प्रयोग और महिलायें 


गांधी विनोबा के आदर्श थे. गांधी ने भी ब्रह्मचर्य के प्रयोग औरतों पर किये. अपनी पोतियों के साथ उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोग के लिए गांधीवादियों और गांधी के आलोचकों के अपने –अपने पक्ष –विपक्ष हैं. जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती को 16 साल की उम्र में गांधी ने ब्रह्मचर्य के लिए प्रेरित किया, तब प्रभावती गांधी आश्रम में रहने लगी थीं और जय प्रकाश नारायण अपनी पढाई के लिए विदेश में थे. पवनार आश्रम की ये गांधीवादी औरतें भी गांधी-विनोबा  के ब्रह्मचर्य –विचार से प्रभावित हैं.

कटती गईं समाज से 


1959 में जब विनोबा ने यह आश्रम बनाया था, तो उनके साथ काम करने आई लडकियाँ , देश के विभिन्न राज्यों से थीं, कुछ की पारिवारिक पृष्ठभूमि पाकिस्तान के सिंध आदि प्रान्तों की भी है. जीवन के अंतिम वर्षों में प्रवेश कर चुकी ( लगभग 20 औरतें 70-75 की उम्र पार कर चुकी हैं) ये औरतें एक निश्चित रूटीन जी रही हैं. आश्रम से बाहर सामाजिक जीवन से जुड़ना इनके लिए मना है, जो इनके अनुसार इन्होने स्वयं तय कर रखा है. यद्यपि ये अपने परिवार में कभी –कभी आना –जाना करती हैं. आश्रम में ही रह रही प्रवीणा देसाई जब ‘ आचार्य कुल’ की अध्यक्षा बनीं और देश भर में विद्यार्थियों को ब्रह्मचर्य-जीवन के लिए प्रेरित करने लगीं तो आश्रम की सदस्याओं ने सामूहिक निर्णय की प्रक्रिया से इन्हें दूर कर दिया, एक तरह से उनके सामूहिक बहिष्कार का निर्णय लिया. प्रवीणा ने ब्रह्मचारी युवाओं के लिए ‘ निवेदिता निलयम’ की स्थापना की.

आन्दोलनों में भागीदारी 


विनोबा के जीवन काल में उन्होंने आश्रम के बाहर आंदोलनों में कई बार शिरकत की है.  भूदान आन्दोलन ( 1951) में भागीदारी के अलावा आश्रम की शुरुआत ( 1959) के तुरत बाद 1961 में बिहार के सहरसा जिले में बीघा –कट्ठा आन्दोलन में आश्रम की महिलाओं ने भाग लिया. 1978-79 में गोहत्या-बंदी आंदोलन में आश्रम की औरतें शामिल हुई थी और 1973  में गीता के प्रचार के लिए विनोबा ने उन्हें मुम्बई भेजा. 1982 में विनोबा की मृत्यु के बाद महिलायें आश्रम की रूटीन जीवन (जिसे वे आध्यात्मिक उन्नति के लिए जरूरी बताती हैं) में सीमित हो गई.

नहीं आ रही नई लडकियाँ


15 साल की उम्र से ब्रह्मचर्य जीवन जी रही शांति कृपलानी कहती हैं, ‘ ब्रह्मचर्य जीवन कठिन नहीं है, लेकिन हमारी चिंता का विषय है कि नई लडकियाँ यहाँ नही आ रही हैं, हममे से कई ८० वर्ष की उम्र पार कर चुकी हैं , हमारे बाद आश्रम का क्या होगा !’ प्रवीना देसाई इसके लिए आश्रम जीवन की नीरसता और समाज से अलगाव को कारण बताती हैं. हाल के दिनों में उड़ीसा  से 50 साल की नलिनी आश्रम में दाखिल हुई हैं . प्रवीना कहती हैं , ‘ हमारा नियम रहा है 25 से 30 के बीच की लडकियों को सदस्य बनाने का, ब्रह्मचर्य एक कठोर व्रत है, जो 50 साल तक गृहस्थ जीवन में रहते हुए कठिन है.

गाय –गीता और हिन्दू जीवन 


‘ कामहा , कामकृत कान्त , काम –कामप्रद प्रभु’ – विष्णु सहस्रनाम की इस पंक्ति वे हर रोज पाठ करती हैं. यह पंक्ति विष्णु के हजार नामों में उनके  ‘काम-देवता’ ( सेक्स –वासना के ईश्वर) नाम के जाप के लिए है.
दो –दर्जन से अधिक गायों की एक गोशाला आश्रम का हिस्सा है, जिनकी सेवा इनके श्रमपूर्ण जीवन का एक हिस्सा है. नियमित गीता पाठ और विष्णुसहस्रनाम के जाप को वे आध्यात्मिक जीवन का एक मार्ग बतलाती हैं, और इन्हें वे हिन्दू जीवन पद्धति मानने को तैयार नहीं होतीं.

दस फूट का संसार

सामूहिक खाना, श्रम और भजन के अलावा इनका समय इनके कमरे में ही बीतता है. एक छोटा बिस्तर , एक या दो कुर्सियां और कुछ धार्मिक किताबें- इनके कमरों का कुल दृश्य यही है. ज्यादातर औरतें एक कमरे में अकेले रहती हैं , लेकिन कुछ कमरों में दो –दो औरतें भी साथ रहती हैं. समाचारों के लिए आश्रम में आने वाले हिन्दी और मराठी के अख़बार पढती हैं. कई औरतों के पास रेडियो है और कई के पास मोबाईल भी, जिससे वे अपने घरों के सम्पर्क में भी रहती हैं

और भी हैं ब्रह्मचारी औरतों  के आश्रम 


देश भर में संचालित ब्रह्मकुमारी आश्रम भी औरतों  के ब्रह्मचर्य जीवन को संरक्षण देते हैं. ब्रह्मकुमारी मूलतः धार्मिक आंदोलन है, जो ब्रह्मचर्य को शान्तिपूर्ण और वासनारहित जीवन के लिए जरूरी मानता है. इनका मानना है कि एक ऐसा समय होगा, जब बच्चे भी मानसिक शक्ति से पैदा किये जा सकेंगे.

और पुरुष –नियन्त्रण 


औरतों  के इस आश्रम में एक पुरुष ब्रह्मचारी भी स्थाई रूप से रहते हैं – गौतम बजाज. वे 1951 से 13 साल की उम्र में विनोबा भावे से जुड़ गये थे. आश्रम की औरतें शान्ति और गंगा कहती हैं, ‘ गौतम भाई बचपन से हमारे बीच हैं, वे हम बहनों की ही तरह हैं, उनके पुरुष होने का कोई अर्थ नहीं है.’  गौतम बजाज आश्रम के प्रवेश द्वार पर बने कमरे में रहते हैं, जिनकी भूमिका व्यवस्थापक सी दिखती है. बजाज कहते हैं , ‘ आश्रम का संचालन महिलाओं के सामूहिक निर्णय से होता है, लेकिन कई मामलों में मेरी विशेषज्ञता का वे आदर करती हैं.’

महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली क़िस्त

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में  संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक  के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की  प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत  बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  ‘कोटा  विद  इन  कोटा’  की   सबसे  खराब  पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ‘ क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी , बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ‘ हालांकि  पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.  अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 
संपादक

11वीं लोकसभा की बहस, सत्र 2 (बजट)
गुरुवार, 12 सितंबर 1996
बहस का प्रकार: सरकारी विधेयक की प्रस्तुति
शीर्षक : संविधान (81वां संशोधन) विधेयक, 1996

पीठासीन अध्यक्ष : डॉ. के पी रामालिंगम, कृपया सुनिए. मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री का यह कहना सही है कि हमारे पास और कुछ निपटाने को नहीं है.  यह विधेयक पारित करना है. उ.प्र. का बजट पारित करना है. पत्रकार विधेयक पारित करना है. जाहिर है समय की कमी है लेकिन प्रधानमंत्री आज इस विधेयक को पेश करने पर सहमत हैं और इसे बिना चर्चा के पारित करना चाहते हैं. मुझे भी लगता है कि सदन की भावना यही है कि इस विधेयक को आज ही पारित कर दिया जाए. यह बहुत ऐतिहासिक निर्णय होने जा रहा है.

डॉ. मुरली मनोहर जोशी (इलाहाबाद) : समूचा सदन आपके साथ है. आप नियमों को शिथिल कर सकते हैं
श्री एस बंगारप्पा (शिमोगा): अध्यक्ष मोहदय, मैं एक बात पर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं. हम विधेयक की विषयवस्तु के खिलाफ नहीं जा रहे. विधेयक को पेश किया जाना चाहिए और बिना चर्चा के सर्वसम्मति से पारित भी. मैं इस विधेयक का समर्थन करता हूं, लेकिन मैं एक बात कहना चाहता हूं. इन तमाम चीजों से गुजरने के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था होगी. मुझे यह बात समझ नहीं आ रही. आखिर राज्यसभा में आरक्षण का क्या होगा ?

श्रीमती सुषमा स्वराज (दक्षिणी दिल्ली):  यह बिल आप पारित कीजिए.

श्री सोमनाथ चटर्जी (बोलपुर): श्री एस बंगारप्पा, आपकी बात सुन ली गई है. कृपया विधेयक को पास होने दें. मुझे लगता है कि यह सदन विधेयक को पारित करने को लेकर प्रतिबद्घ है.

18 जुलाई ,2016 को जंतर मंतर, नई दिल्ली ,पर महिला आरक्षण की मांग करते महिला कार्यकर्ता

पीठासीन अध्यक्ष : कृपया औरों को भी सुनें.

श्री एस बंगारप्पा: अध्यक्ष महोदय, आप मेरी बात क्यों नहीं सुन रहे ? मैं यह बात समझ नहीं पा रहा हूं. मैं केवल एक बात कहना चाहता हूं. मैं निवेदन करना चाहता हूं. मैं एक बात एकदम स्पष्ट  करना चाहता हूं.

पीठासीन अध्यक्ष : श्री सारपोतदार, मैं आपको बाद में बुलाऊंगा. अभी कृपया बैठ जाइए.

श्री एस बंगारप्पा: मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं. मैं इस विधेयक का पूर्ण समर्थन करता हूं. कि ना किसी चर्चा के हम इस विधेयक को पास करेंगे. मैं महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के पक्ष में हूं. मुझे बात समझ में आ रही है. मैं खुले दिल से इसका समर्थन करता हूं, लेकिन इकलौती चिंतित करने वाली बात यह है कि इस विधेयक में राज्य सभा में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया है. न ही विधान परिषद और संघ लोक सेवा आयोग व राज्य लोक सेवा में उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है. ये सभी संवैधानिक संस्थान हैं. आपको यह बात क्यों नहीं नजर आती ? यह बात खुद आपके हित में कही जा रही है और आप मेरी बात नहीं सुन रही हैं ? महिलाओं का राज्य सभा, राज्य विधान परिषद, संघ लोक सेवा आयोग और राज्यों के लोक सेवा आयोग में भी आरक्षण दिया जाए. अगर सरकार इसे लेकर कोई आश्वासन देती है तो मैं बहुत खुश होऊंगा. ऐसा करने से उद्देश्य पूर्ति हो जाएगी.

कुमारी उमा भारती (खजुराहो) : अध्यक्ष जी, इसके बाद मुझे एक बहुत जरूरी बात कहनी है.

श्री मधुकर सारपोतदारकर (मुंबई उत्तर-पूर्व): आदरणीय अध्यक्ष मोहदय, मेरी एकमात्र जिज्ञासा यह है कि क्या इस विधेयक के प्रावधान समूचे देश में बिना किसी अपवाद के लागू किए जाएंगे? यह मेरा पहला सवाल है.
दूसरा, इस विधेयक में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं को लेकर चाहे जो प्रावधान हों क्या इसमें उन दलों के लिए कोई व्यवस्था है, जो चुनावों में महिला प्रत्याशी नहीं उतारते ? अगर ऐसा नहीं है तो फिर विशेष प्रावधान बनाने की आवश्यकता ही क्या है ? यह मेरा दूसरा प्रश्न है. तीसरी बात, मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या आप देश के किसी राज्य को कोई रियायत देने जा रहे हैं ? अगर ऐसी कोई रियायत दी जा रही है तो ऐसा नहीं होना चाहिए और यह प्रावधान देश भर के सभी राज्यों पर लागू होना चाहिए. इन खास मुद्दों पर अगर प्रधानमंत्री आगे आकर कुछ स्पष्ट करना चाहते हैं तो हमें कोई दिक्कत नहीं है. मैं यही कहना चाहता था.

श्रीमती सुषमा स्वराज ( दक्षिण दिल्ली) : अध्यक्ष जी, यह अवरोध करने का नया तरीका है.

श्री पीसी चाको (मुकुंदपुरम): महोदय, आपने प्रश्न काल को निलंबित कर दिया और हम इस कानून को सर्वसम्मति से ग्रहण करने जा रहे हैं, क्योंकि आपने कहा है कि हम इस कानून को बिना किसी चर्चा के पारित करने जा रहे हैं. मुझे इजाजत दी जाए कि मैं एक मिनट में अपनी बात रख सकूं.  इस कानून को पढऩे के बाद मुझे लगा कि यह पर्याप्त प्रगतिशील नहीं है. मैं इसे पुरातनपंथी कानून नहीं कहना चाहता,  लेकिन मेरे केरल में 51.5 प्रतिशत आबादी स्त्रियों की है. मुझे नहीं पता कि स्त्री सदस्यों में से कितनी 30 प्रतिशत आरक्षण से संतुष्ट हैं.  मैं अपना विचार महिलाओं के पक्ष में ही जता रहा हूं…. मैं चाहता हूं कि आप एक मिनट के लिए मेरी बात सुनें. केरल में महिलाओं की आबादी 51.5 प्रतिशत है. ऐेसे  में उनको 51.5 प्रतिशत आरक्षण देना ही ठीक होगा. ऐसा करने से ही महिला उम्मीदवारों के साथ न्याय हो सकेगा.


पीठासीन अध्यक्ष : ठीक है. आपने अपनी बात कह दी. अगर हम इसी प्रकार आगे बढ़ते रहे तो यह बहस समाप्त नहीं होगी.

18 जुलाई ,2016 को जंतर मंतर, नई दिल्ली,पर महिला संगठन का प्रदर्शन

कुमारी उमा भारती: मैं प्रधानमंत्री से कुछ कह रही हूं… (अवरोध)
अध्यक्ष महोदय: नीतीश जी कृपया बैठ जाइए. मुद्दा मत उछालिए.

कुमारी उमा भारती: अध्यक्ष महोदय, मैं प्रधानमंत्री से कुछ कह रही हूं. प्रधानमंत्री जी, क्या आप मुझे सुनेंगे ?  मैं जानना चाहती हूं कि इस आरक्षण में क्या अनुसूचित जाति एवं जनजाति की महिलाओं के लिए भी आरक्षण होगा ?  मेरी मांग है कि पंचायती राज व्यवस्था के तर्ज पर पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए भी आरक्षण होना चाहिए. इस बात को विधेयक में शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि पिछड़ा वर्ग की महिलाएं भी पीडि़त हैं.  उनको कुछ नहीं मिलता है. उनको न घर में कोई सम्मान मिलता है न बाहर कोई सुविधा. ऐसे में आपके जरिए प्रधानमंत्री से मेरी मांग है कि यदि वह सहमत हों तो सदन के समक्ष यह वादा करें कि इस पर विचार करेंगे. जब आप अनुसूचित जाति-जनजाति के आरक्षण पर विचार करें तो कृपया पिछड़ा वर्ग के आरक्षण पर भी विचार करें.
पीठासीन अध्यक्ष : ठीक है..


श्री ई अहमद: महोदय हम महिलाओं के आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं लेकिन मैं सदन के समक्ष एक बात कहना चाहूंगा.  यह बहुत महत्त्वपूर्ण दिन है जब हम एक ऐतिहासिक कानून बनाने जा रहे हैं. लेकिन ऐसा कानून ऐसे नहीं बनाया जा सकता है, मानो डोसा बनाया जा रहा हो. हमें इस मसले पर चर्चा करनी होगी. विधेयक में कुछ कमियां भी हैं (बाधा) … मुझे बोलने की इजाजत दी जाए (बाधा)… इस बार भी ये लोग ऐसा ही कर रहे हैं. मुझे बोलने का मौका मिलना चाहिए (बाधा) … आपने मुझे बोलने की इजाजत दी है मुझे अपनी बात रखने का अधिकार है.

पीठासीन अध्यक्ष : हां, मेरी तरफ से आपको इजाजत है. मुझे पता नहीं अनावश्यक रूप से इतना शोर क्यों मचाया जा रहा है.(बाधा)

कुमारी उमा भारती: महोदय, कृपया प्रधानमंत्री से उत्तर देने को कहें… (बाधा)… यह बहुत महत्वपूर्ण विधेयक है. (बाधा)

पीठासीन अध्यक्ष : ममता जी, आप दूसरों को मौका क्यों नहीं दे रही हैं ? उन्हें अपनी बात कहने दीजिए.

श्री ई अहमद: महोदय हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं. यह दिया जाना चाहिए लेकिन प्रश्न यह है कि यह कैसे और किस तरीके से दिया जाए ? राज्यों की विधानसभाओं और विधान परिषद की बात करें तो अब तक क्या प्रावधान किए गए हैं ? क्या इनका निर्णय सदन में होगा ? राज्य सभा का क्या होगा ? सदन को इसका अनुमोदन करना है. यह बहुत अहम विधेयक है. यह विधेयक बिना चर्चा के पारित नहीं हो सकता. हमें इस पर चर्चा करनी होगी. हमें पुरातन विचार वाला नहीं कहा जाना चाहिए. इसलिए मैं कहता हूं कि विधेयक को पारित करने के पहले इस पर चर्चा हो.

महिला आरक्षण

पीठासीन अध्यक्ष : ठीक है मैंने हर किसी को सुन लिया है. हां, प्रधानमंत्री महोदय.
प्रधानमंत्री (श्री एचडी देवेगौड़ा): माननीय अध्यक्ष महोदय, आपकी अनुमति से मैं विधेयक पेश करना चाहूंगा
(बाधा)…
पीठासीन अध्यक्ष : विधेयक पेश होने दीजिए.


श्री एच डी देवेगौड़ा: कृपया मेरी बात सुनिए महोदय, मैं विधेयक पेश करने की इजाजत चाहता हूं ताकि भारतीय संविधान में संशोधन किया जा सके.

प्रधानमंत्री (श्री एच डी देवेगौड़ा): मैं विधेयक पेश करता हूं. विचारार्थ. मैं आप सभी से अनुरोध करूंगा कि हम आज सभी दलों के नेताओं की बैठक बुलाएंगे क्योंकि माननीय सदस्यों द्वारा कुछ अत्यंत अहम मुद्दे उठाए गए हैं. कुमारी उमा भारती ने पिछड़े वर्ग की स्त्रियों के आरक्षण को लेकर एक उपयुक्त प्रश्न किया है (बाधा) इनमें से कुछ को टाला नहीं जा सकता है. इसलिए हम आज ही सभी दलों के नेताओं की बैठक बुला रहे हैं (बाधा)

जस्टिस गुमान मल लोढ़ा : राज्य सभा का क्या ?… (बाधा)


पीठासीन अध्यक्ष : जस्टिल लोढ़ा जी, आप प्रधानमंत्री को क्यों टोक रहे हैं?


श्री एच डी देवेगौड़ा: उसके बाद जो भी निर्णय सभी दलों के नेताओं की बैठक में होग, उसे स्वीकार कर लिया जाएगा (बाधा)
पीठासीन अध्यक्ष : श्री मेहता, कृपया मेरी बात सुनिए. यह संविधान संशोधन है इसलिए विधेयक को मत विभाजन के जरिए पारित करना होगा. यह संवैधानिक अनिवार्यता है इसलिए सारी व्यवस्था करने में कुछ वक्त लगेगा.  दूसरा, प्रधानमंत्री ने सही कहा कि चूंकि कुछ बातें यहां-वहां हो रही हैं इसलिए वांछित यही है कि विधेयक पर विचार शुरू होने के पहले हम सभी दलों के नेताओं की एक बैठक करें. मैं एक घंटे के लिए सदन स्थगित कर रही हूं. सदन दोपहर 12.40 बजे पुन: शुरू होगा.
(बाधा)
पीठासीन अध्यक्ष : दोपहर 12 बजे सभी राजनीतिक दलों के नेता कृपया मेरे कक्ष में आए.

क्रमशः

गुनिया की माई

सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com

विवाह के छः वर्षो के बाद गाँव जाना मेरे लिए रोमांचक था, पिताजी ने नौकरी मिलते ही शहर में मकान बनवा लिया, यही हम पाँचों भाई-बहनों का जन्म हुआ. गाँव में बिजली पानी के अभाव के कारण बड़ी बहन गाँव जाने में मुँह सिकोड़ती, छोटी मासूम और संकोची जिसके कारण माँ उसे साथ ले ही नही जाती, बचती मैं, माँ की हरफनमौला बेटी मैं गाँव जाने के नाम पर स्कूल तक छोड़ देती. गाँव मेरे लिए प्रकृति की सुन्दर झाँकी थी, बाग-बगीचे, खेत-खलिहान, लड़कियों की स्वच्छन्द हँसी, बड़े बुजुर्गों का हास-परिहास मुझे बहुत गहरे तक छूता, कहना न होगा कि यही मेरे अन्दर के साहित्यिक कीड़े को पोषण  मिला. माँ कहती है कि मैं झटपट बन्ना-बन्नी और सहाना (गीत) बना लेती थी और हमारी टोली के गीत आकर्षक हो जाते थे. यहाँ जीवन संगीत उद्दान बहता है वसन्त में आम के मौर, महुए की सुगंध के साथ-साथ कोयल की मधुर तान वातावरण में उल्लास और उमंग भरता दुवार पर मण्डली जमती फगुवा, चैता, बिरहा, का दौर आधी रात को अपने चरम पर पहुँचता. अम्मा बड़ी माँ के साथ खिड़की में बैठकर सुनती और कभी-कभी डायरी में लिखती थी. मीरा के पदों को फगुवा के धुन पर अम्मा बड़ी खूबसूरती से गाती-
‘‘मन मोहे मुरलिया वाला सखी……….-2
अधर सुधा रस मुरली राजत, उर वैजन्ती माला सखी…

अम्मा के गले में मृदंग बजता, खनकदार आवाज और गजब की क्षमता घंटो अकेले गाती. होली में औरतों की टोली आँगन में और पुरुष दरवाजे पर फगुवा गाते, औरतें कीचड़, मिट्टी, रंग,पानी,आदि लम्बा घूँघट तान कर दूर से फेंककर भाग जातीं, पुरुष और जोश में गाते. पुरोहित जी एक बहुत सुन्दर गीत गाते जो मुझे आज भी याद है. करि पूजन की तैयारी, विदेह कुमारी / सब सखियाँ मिल पूजन करती, पहनी गुलाबी साड़ी… विदेह…
मंगल यादव नहले पर दहला मारते / पिया कई गईलें कवल करार
फगुनवे मेें आये….फगुवा के बाद चैता की बारी आती…. माँ का गाया चैता…
‘‘बन गईलीं बन की जोगिनियाँ हो रामा. पिया के करनवा मैं अक्सर अपनी मण्डली में आज भी गाती हूँ. मैनें देखा है ग्राम्य जन-जीवन का सहज और सरल प्रवाह लोक-गीतों में देखने को मिलता हैं.रोपनी करते हुए एक लय में श्रमगीत गाती औरतों का कंठ और हाथ एक साथ चलता.

कहानी आगे बढ़ाती हूँ क्योंकि लोक-गीतों पर लिखते-लिखते कहानी उपन्यास हो जाएगी. बाबा के मृत्यु के बाद आँगन में दण्डवार पड़ा पुस्तैनी बड़ा आँगन सिमट गया. बाबूजी की नौकरी व्यवसाय और शिक्षक संघ की राजनीति के कारण गाँव की सारी जिम्मेदारी अम्मा पर आन पड़ी, अम्मा अब फसल के दिनों में गाँव जाती, चौखट लांघ खेतों के मेढ़ पर खड़े हो खाद-बीज, रोपनी सोहनी सब कराया, आलोचकों के दौर  चले, इन सब से बिना डरे माँ मोर्चे पर डटीं रहीं, पिताजी ने समर्थन किया.खूब पैदावार होती, विरोधी परास्त हो घर गए. गाजीपुर का परगना पचोत्तर सब्जी के बेल्ट के रुप में विख्यात है, उँगली से जमीन कुरेद के बीज बो दो लौकी, कोहंड़े, भतुवा, नेनुवा की बेलें पड़ोसी के छप्पर लांघकर दुश्मनों तक के छत पर विजय पताका फहरा आती. बाबा के मरने के पहले हम गाँव बहुत कम जाते, जिसके कारण लोगों से घुलना-मिलना नहीं हो पाता किन्तु उनके मरते ही गाँव जाने का जो क्रम शुरु हुआ वह विवाह तक अनवरत चलता रहा. मेरे सामने पहली बार लम्बे प्रवास पर जो समस्या उत्पन्न हुई वह टोले की लड़कियों से मित्रता  करना था, लड़कियाँ हमारे शहरी विशिष्टता से दूर भागती और मैं अन्दर-अन्दर दुखी रहती.

 माँ ने उपाय निकाला, मेरे तीन सलवार कुर्ते को मिलाकर तिरंगा झण्डा पहनाया लाल फीते से चोटी बाँधी मैंने शीशे में देखा, बिल्कुल उनके जैसी भर डाली चना देकर बड़े पिताजी के बेटी के साथ भरसाँय भेजा.भरसाँय गाँव के बाहर था, शाम होते ही पूरे गाँव की लड़कियों और औरतों का हुजूम उमड़ता, गोड़िन गुनिया की माई बारी-बारी से सबका भूजा भुनती, कई बार आपस में औरतें लड़कियाँ लड़ पड़तीं, गुनिया की माई कलछुल पटककर खेदती, ‘‘ई-हमार भरसाँय है तोहन लोगन क दुवार ना.’’ एक तरफ कुँवर बाबा की पिण्डी बड़े से चबुतरे पर जहाँ बच्चे उछल-कूद करते, दूसरी तरफ चार खल करीने से लगे जहाँ एक लय में तीन-तीन चार-चार औरतों के मूसल गिरते, औरतें हरे धान का चूड़ा कूट रहीं थी. मुझे देखते ही चहक उठी अरे गुनिया महरानी जी के बोड़ा बिछाव’’, शिकायत किया, ‘‘काहें छोटकी मलकिन तोहें भेजली धिया, संदेशा पठवती गुनिया जा केले आवत’’आज लेट अइसे ही होत रहल.’’ गुनिया मुझसे एक साल बड़ा था, उस वक्त चैदह वर्ष का रहा होगा, ब्याह हो गया था, पत्नी गौने थी. गुनिया हमारे घर बचपन से आता था, माँ उसे अनाज दे देती और वह शाम को भुजा कर दे जाता. कभी-कभी दिन में उसकी माँ भी आती, घर में झाड़ू लगाना लिपना पोतना आदि कर जाती, अम्मा हमारे कपड़े अपनी साड़ियाँ जब भी गाँव आती ले आतीं और गुनिया की माई को देतीं, त्योहारों में नये देती, तरज-त्योहारी देना कभी नहीं भूलती.

हम गुनिया की माई को काकी कहते और वो हमें अधिकतर महरानी कहती. गुनिया और उसकी छोटी बहन गुनिया को छोड़कर पिता जो परदेश कमाने गये दोबारा लौट कर नहीं आये, उसने हार नहीं माना अकेले अपने दम पर बच्चों को पाला और भर माँग पियर सिन्दूर भरे बाट जोहती रहीं कि कभी तो परदेसी लौटेगा. माँ का उपाय सार्थक सिद्ध हुआ मेरा तिरंगा परिधान विजय गीत गाता वापस लौटा, शीघ्र ही मुनिया, कनक और सीमा सखी बनीं, हमने कुँवर बाबा के थान पर शपथ लिया कि कभी मित्रता नहीं तोड़ेंगे. दोपहर में मेरा दलान गुलजार हुआ लड़कियां मेजपोश के कपड़े लेकर आतीं और हम सब अम्मा से कढ़ाई सीखते, कभी-कभी फिल्मी गीतों के धुन पर गीत बनाते. शाम को हमारी टोली बाग की ओर जाती जहाँ सगड़ा पर बने पुलिया पर बैठकर पंचायत होती, योजना बनती, टोले भर की बहुओं की नकल उतारी जाती. मनचले उधर से गुजरते तो कनक तमक कर कहती- का ताकत हवे रे,  माई-बहिन ना हई का.’’ लड़के फुर्र हो लेते.इनके साथ ही मैंने सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, कूटना, फटकना सीखा. पहली बार अम्मा की चोरी चूड़ा कूटा, हाथों में छाला पड़ा तब जाना हरे धान के मीठे चूड़े का रहस्य.गुनिया का गौना हुआ, कनिया (नयी दुल्हन) देखने का प्लान बना, लाख मनाहट के बाद भी दोपहर में हमारी शैतान मण्डली मुनिया के साथ घर पहुँचा.

खपरैल का टूटा-फूटा मकान जिसे छा-छोपकर किसी तरह रहने लायक बनाया गया था. दरवाजे पर देशी गाय बँधी थी जिसे गुनिया की माई ने इसी वर्ष खरीदा था ताकि बहू को गोरु की कमी न खले. हमारे आँगन में धमकते ही खुश हो गयी, बहू की कोठरी में जाकर बेटे से कहा- ‘‘पंडिताने की लड़कियाँ कनिया देखने आयी हैं.’’ गुनिया लजाते हुए बाहर निकला, लड़कियों का समवेत ठहाका गूँजा. गुनिया की पत्नी साँवली-सलोनी, तीखे नैन नक्स, उम्र कोई-पन्द्रह सोलह वर्ष, पियरी पहने बोरा पर गठरी बनी बैठी थी. मुनिया ने घूँघट उठाकर मुँह दिखाया, उसने दोनों आँखें बंद कर रखी थी. कुछ देर मुनिया भाभी के हाथ के बने कढ़ाई, सिलाई के सामान दिखाती रही. गुनिया की माँ ने बहू का घूँघट उठा कर कहा इनसे का लजात हऊ, इन्हने लोगन क सेवा- टहल बजावे के है, बहू का चेहरा स्याह हो गया.अगली छुट्टियों में बड़े पिताजी की हमउम्र बेटी का ब्याह पड़ा मैं ग्रेजुएशन अंतिम वर्ष की छात्रा थी, गुनिया दो बच्चों का बाप बन चुका था, काकी सुबह-सुबह ही आ धमकती बर्तन-चैका, झाड़ू- बहाड़ू लगा कर माँ का पैर दबाती कभी हमारे पैरों में भी तेल लगाकर मालिश करती.

 लावा वाले दिन हम सब गाते-बजाते भरसाँय पहुँचे, गुनिया की माँ लावा लिए पहले से बैठी थी, गुनिया भरसाँय झोंक रहा था, पत्नी दाना भूज रही थी. रस्म खत्म होने पर सबने नेग दिया, मैंने कहा-‘‘काकी अब आप को आराम मिला बहू ने काम सम्भाल लिया.’’काकी रुआँसी हो गयी- ‘‘अरे का धिया कपूत परदेस कमाये जो ए कहत हऊँ.’’ गुनिया तमतमा उठा, लाठी फेंककर उठते हुए चिल्लाया-‘‘त का जिनगी भर इ-बभनन क जूठ चाटी’’ गुनिया के बागी तेवर अप्रत्याशित थे, बड़ी माँ ने सबको चलने का इशारा किया गुनिया की माई रोती रही, एम0ए0 अन्तिम वर्ष में मेरी भी शादी हो गयी. गाँव सपना हो गया, मायके जब जाती गाँव का प्रोग्राम बनता और बिगड़ता, छः वर्ष बीत गए, मैं दो बच्चों की माँ हो गयी. अबकी माँ ने दृढ़ संकल्प किया दो बच्चें हो गए और अभी तक शादी की पूजा बाकी है. हम निश्चित समय पर गाँव पहुँचे, कनक और सीमा भी मायके आयी हुई थीं, मिलते ही समय पंख हुआ. अगले दिन दिनभर पूजा-पाठ चलता रहा, शाम को माँ से कहा- ‘‘काकी नहीं आयी मैं उनके लिए साड़ी लेकर आयी थीं, बड़ा कर्ज है उनका कितनी सेवा की है. माँ ने मुस्कुराते हुए
कहा-‘‘कहलवाया तो था, शायद बीमार हो, आजकल बहुत अस्वस्थ रहती हैं, तुम जाकर मिल आओ, इस समय भरसाँय में  मिल सकती हैं.

मैं सखियों संग भरसाँय चली. दूर से ही भरसाँय ठण्डी दिखाई दे रही थी. गुनिया की माई कुँवर बाबा के पास वाले टीले पर बैठी ना जाने देर शून्य में क्या निहार रही थी ? जो देखा वह स्तब्ध करने वाला था, अब गुनिया की माई बाट जोहती है कि लड़कियाँ भर-भर डाली अनाज लेकर आएंगी और उसकी मड़ई गुलजार होंगी. ओखल इधर-उधर लुढ़के पड़े थे. मुझे देखते ही बुढ़िया मैली साड़ी के कोर से आँसू पोछते हुए बोली. ‘‘इ का हो रहा है बहिनी, अब, न कोयी कलछुल में लिट्टी पकवाता है न आगी माँगता है, लोग चूड़ा बालेश्वर बाबा के मशीन पर कूटाते हैं, हित-नाथ को रस-दाना नहीं, चाय नमकीन देते हैं. लड़कियाँ अब एक -दूसरे के घर कम ही जाती हैं, काहें प्रेम मर रहा है और फफक पड़ी. मैंने चुप कराते हुए माथे पर साड़ी रख हथेलियों पर पैसा रखा अनायास ही सर पैरों की ओर झुक गया उनकी सेवा मातृत्व से तनिक कम नहीं थी,

बुढ़िया ने लपकर हाथ थाम लिया, ‘‘काहें जनम नाश कर रही हैं महरानी जो, मरद छोड़ गया, अब गुनिया भी परदेश कमाता है, मेहर बच्चों को भी ले गया. कहाँ भरुँगी. मेरा गला रुँध गया, आवाज कंठ में फँस गयी, सीमा खिंचते हुए लेकर चली. आते हुए मुझेे अपने ही बनाये गीत पर क्रोध आ रहा था-‘‘मोहें शहरी पिया दिलादो मेरी माँ/गंवार पिया ना आवेला.’’ कुँवर बाबा का चबुतरा टूट-फूट गया था सबके दुवार अब  चाहरदीवारी में कैद हो चुके थे, बच्चे कान्वेन्ट में शहर पढ़ने जाते हैं, आँगन में चार-चार दण्डवार पड़ चुके थे, बाग-बगीचे उजड़ रहे हैं, सगड़ा पाट कर परधान ने कब्जा जमा लिया था, मेरे बाबा का बनवाया हुआ बंगला जहाँ पंचायत लगती थी, चारो गाँव के बारात डेरा डालते थे अब उजड़ कर अपनी विवशता पर सुबक रहा था. आत्मा चित्कार उठी- ‘‘उफ्फ, महज आठ वर्षों में मेरा गाँव शहर बन गया.’’

*‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ : यथार्थवादी कॉमेडी

जावेद अनीस

एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com
javed4media@gmail.com

भारत में एक बार आप राजनीति और सरकार पर क्रिटिकल होकर बात तो कर सकते है लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक मसलों पर ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है. “मिस टनकपुर हाजिर हो” यह काम करती है, ऐसे विषय पर फिल्म बनाना दुर्लभ और जोखिम भरा काम है और इसका स्वागत होना चाहिए, अपने ट्रीटमेंट की वजह से भले ही यह फिल्म एक सोशियो-कल्चरर  सटायर बनते बनते रह गयी है,फिर भी इसे इग्नोर नहीं किया जा सकता है, यह फिल्म भारतीय समाज के सेक्सुअलिटी, पिछड़ेपन, दोहरेपन और सामंतवादी जैसी प्रवृत्तियों पर एक बेबाक बयान है, यह बताती है कि कैसे आज भी इस देश के कई हिस्सों में पालतू मवेशियों और औरतों में कोई ख़ास अंतर नहीं किया जाता है और वे भी किसी मूंछवाले के घर के किसी खूटे में बंधी होने को अभिशप्त हैं.जैसा की होना ही था अपने सब्जेक्ट के वजह से इस पर जबरदस्त हंगामा हुआ, रिलीज होने से पहले ही फिल्म का इस हद तक विरोध हुआ कि यूपी के मुजफ्फरनगर जिले के एक खाप ने इसे आपत्तिजनक और समाज को गलत दिशा देने वाली फिल्म बताते हुए फरमान सुनाया दिया कि जो भी व्यक्ति  निर्देशक विनोद कापड़ी का सिर कलम करके लाएगा उसे 51 भैंस इनाम में दी जाएगी और साथ में धमकी भी दी गयी कि जिस भी थियेटर में फिल्म चलाई जाएगी वहां आग लगा दी जाएगी. रिलीज होने से पहले ही यह फिल्म खाप के साथ–साथ सिने-प्रेमियों और फिल्म जगत के दिग्गजों का ध्यान भी खीचने में कामयाब रही थी, सबसे पहले तो इसके पोस्टर ने कौतुहल पैदा किया जिसमें एक भैंस अदालत में खड़ी होती है और उसके पीछे कटघरे में एक दूल्हा खड़ा नजर आता है साथ ही पोस्टर में लिखा होता है “’इट्स हैपेंस ओनली इन इंडिया’

इस फिल्म का ट्रेलर भी इतना दिलचस्प था कि अमिताभ बच्चन ने भी इसके बारे में ट्वीट करते हुए ट्रेलर का लिंक भी शेयर किया. राजकुमार हिरानी के तरफ से भी ट्रेलर की तारीफ देखने को मिली. “’मिस टनकपुर हाजिर’ हो” पूरी तरह से कॉमेडी फिल्म नहीं है, यह एक यथार्थवादी फिल्म है जो समाज के ट्रेजडी को व्यंग्य के साथ पेश करती है, फिल्म “नाच बसंती नाच कुत्तों के सामने नाच” जैसे आईटम सांग से शुरू होती है, हलके-फुल्के हास्य के साथ पहला एक घंटा जैसे ही पार होता है इस कहानी की कॉमेडी ट्रेजडी में तब्दील हो जाती है और एक दर्शक के तौर पर आप का सामना यथार्थ से होने लगता है. फिल्म की कहानी राजस्थान की एक सच्ची घटना से प्रेरित है जिसमें भैंस से कुकर्म के आरोप में एक युवक पर मुकदमा चलाया गया था. यह फिल्म बेमेल विवाह, जोखिम भरी प्रेम कहानी और गावं के  पंचायतों के मध्यकालीन बर्ताव की दास्तान है. फिल्म की पृष्ठभूमि में हरियाणा का एक गांव टनकपुर है. टनकपुर का प्रधान सुआलाल गंदास (अनु कपूर) है जो कि बूढ़ा और नपुंसक होता है लेकिन अपने दौलत और प्रभाव के बल पर उसने अपने से काफी छोटी उम्र की लड़की माया (ऋषिता भट्ट) से शादी की होती है, अपनी नपुंसकता को लेकर उसे अपनी युवा बीवी के ताने भी सुनने पड़ते हैं, इसी चक्कर में वह अपने “मर्दानगी ताकत” को बढ़ाने के लिए नीम–हकीमों का चक्कर काटता रहता है और अपनी बीवी पर शक भी करता है. उसका शक सही भी होता है, माया को गावं में बिजली ठीक करने वाले लड़के अर्जुन (राजीव बग्गा) से प्यार हो जाता है जोकि पुलिस में भरती होने की तैयारी भी करता है.



इनके रिश्ते में सहानुभूति का पुट भी होता है. लेकिन इन दोनों का प्रेम ज्यादा दिनों तक छुपा नहीं रह पाता है और एक दिन सुआलाल दोनों को रंगे हाथों पकड़ ही लेता है, सबसे पहले वह अर्जुन के हाथ-पैर तुड़वाकर उसे बैलगाड़ी में बांध कर हवा में लटका देता है. लेकिन बदनामी के डर से सुआलाल एक कहानी गढ़ता है जिससे लाठी भी ना टूटे और सांप भी मर जाए, वह बाहर सार्वजनिक रूप से सबको बताता है कि अर्जुन ने उसकी भैंस “मिस टनकपुर” के साथ दुष्कर्म किया है. टनकपुर का प्रधान अपने पैसे और रुतबे के बल से थानेदार (ओम पुरी) को अपने साथ मिला लेता हैं और अर्जुन पर भैंस के साथ बलात्कार का मामला दर्ज हो जाता है, बाद में गांव की पंचायत जो की अपने आपको सभी अदालतों व कानून से ऊपर मानती है, आरोपी युवक को भैंस से शादी करने का हुक्म सुना देती है. परदे पर सभी किरदार असल लगते हैं, अनु कपूर और ओम पुरी, संजय मिश्रा, रवि किशन जैसे अभिनेता निराश नहीं करते हैं. राहुल बग्गा अर्जुन के किरदार को बखूबी निभाते हैं अपनी खामोशी और भाव से प्रभाव छोड़ते हैं. ऋषिता भट्ट इस फिल्म की कमजोर कड़ी है, वे माया जैसी किरदार के कश्मकश और पीड़ा को उभार पाने में नाकामयाब रही हैं, भैंस के सामने उनका दुखड़ा रोने वाला दृश्य बहुत प्रभावी हो सकता था, हालाँकि स्क्रिप्ट में भी उनका किरदार उभर नहीं पाया है. भीड़ के दृश्यों में शायद हापुड़ जिले के ग्रामीणों का इस्तेमाल किया गया है जो की दृश्यों को वास्तविक बनाने में मदद करते हैं.

निर्देशक विनोद कापडी के पास पत्रकारिता का लम्बा अनुभव है, इसका असर उनके निर्देशकीय प्रस्तुतिकरण में भी साफ़ झलकता है, जो कहीं न कहीं उनकी सीमा भी बन जाती है, इससे पहले वे ‘अन्ना हजारे’ पर एक वृत्तचित्र और डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘शपथ’ भी बना चुके है, ‘शपथ’ को नेशनल अवॉर्ड भी मिल चूका है, इसमें देश में महिलाओं के लिए शौचालय की कमी का मुद्दा उठाया गया था. अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि फिल्म बनाने की प्रेरणा उन्हें राजकुमार हिरानी से मिली है. फिल्म में कई सामाजिक मुद्दों को छूने की कोशिश की गयी है, जिसमें अंधविश्वास, बेमेल-शादी और उससे होने वाली समस्याओं, प्रभावशाली समूहों की दबंगियत, कमजोर समूहों की हताशा और इससे उपजी मजबूरियां और दब्बू सोच, खाप और पंचायतों की जकड़न, औरतों के साथ गैर-बराबरी का बर्ताव, लोकल राजनीति और इन सब में स्थानीय सरकारी मशीनरी की संलिप्तता जैसे मसले शामिल हैं. लेकिन फिल्म का अंत अपने आपको देश में दर्ज होने वाले सिर्फ झूठे आरोपों और मुकदमों से जोड़ कर सीमित कर लेती है. निश्चित रूप से विनोद कापड़ी में मुद्दों की पकड़ और उसे समझने की दृष्टि है, बस उन्हें एक पत्रकार से आगे बढ़कर इसे सिनेमा की भाषा में ट्रांसलेट करने में अभ्यस्त होना पड़ेगा. इन सब के बावजूद यह पत्रकारिता से फिल्म में उतरे एक शख्स द्वारा ईमानदारी के साथ बनायी गयी फिल्म है जो अपने आपको हमारे समाज के यथार्थ के साथ जोड़ने का प्रयास करती है, जमीनी सच्चाईयों के साथ इसका जैसा ट्रीटमेंट उस पर आप विश्वास कर सकते हैं. विनोद कापड़ी के अगली फिल्म का इन्तेजार रहेगा.

एक कविता पाब्लो नेरुदा के लिए

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

12 जुलाई 1904 को पाब्लो नेरुदा का जन्म हुआ था. पाब्लो को समर्पित मंजरी श्रीवास्तव की कविता ‘पाब्लो नेरुदा के लिए’, आइये पढ़ते हैं पाब्लो को याद करते हुए 

पृथ्वी के एक छोर पर खड़े होकर
तुमने फैलाई
अपनी अपरिमित, असीमित बाँहें
और समेट लिया अपनी बाँहों में ‘इस्ला नेग्रा’, ‘मेम्यार’ के अंचल से लेकर
पूरा विश्व
पूरी पृथ्वी
पृथ्वी को अपनी बाँहों में समेटकर चूमते हुए
तुमने लिखीं
बीस प्रेम कविताएँ
और लिखा
निराशा का एक गीत
बीस वर्ष की अपनी बाली उमर में

आज की रात भी
उतनी ही प्रासंगिक हैं
तुम्हारी लिखी
सबसे उदास कविताएँ
जो तब की रातों की जान हुआ करती थीं
नेरुदा

शुरू हुईं तुम्हारी कविताएँ
एक तन में
किसी एकाकीपन में नहीं
किसी अन्य के तन में
चाँदनी की एक त्वरा में
पृथ्वी के प्रचुर चुम्बनों में
तुमने गाए गीत
वीर्य के रहस्यमय प्रथम स्खलन के निमित्त
उस मुक्त क्षण में
जो मौन था तब.
तुमने उकेरी रक्त और प्रणय से अपनी कविताएँ
प्यार किया जननेन्द्रियों के उलझाव से
और खिला दिया कठोर भूमि में एक गुलाब
जिसके लिए लड़ना पड़ा आग और ओस को
और इस तरह समर्थ हुए तुम गाते रहने में.

तुमने मुक्त कर डाला प्रेम को वर्जनाओं से
देह की वर्जनाओं को तोड़ते हुए
तुमने रचा काव्य सर्जना का वह रूप
जो काम- भावना का पर्याय था.

पाब्लो नेरुदा

तुम्हें नहीं पसंद आईं कभी
रूह की तरह पाक-साफ कविताएँ
तुमने तोड़ डालीं कविताओं की ‘वर्जीनिटी’
और लगा दिए साहित्य के पन्नों पर
खून के धब्बे
कविताओं का ‘हाइमेन’ विनष्ट कर
तुमने कर डाली सौंदर्यशास्त्र की व्याख्या
एक ऐसे नए रूप में
जिसे आज भी देख लेने भर से
तेज हो जाती है खून की रफ़्तार
रगों में
तुमने कविताओं पर लगा दिए दाग़
जूठन के
खर-पतवार के
धूल-धक्कड़ के
और कल-कारखाने की कालिख कलौंछ के
और इन ‘कुरूप’ कविताओं को
लोकल से ग्लोबल बनाकर
समेटा इस कुरूपता के सौंदर्यशास्त्र को
अपनी बाँहों में
पश्चिमी से पूर्वी गोलार्द्ध तक
और बन गए विश्वकवि

तुमने पैदा किये खून में शब्द
और शब्द से ही दिया खून को खून
और जिन्दगी को जिन्दगी
आज भी हमारे रगों के खून में जिन्दा है
तुम्हारे खून की गरमाहट
नेरुदा

अभी तक बचाकर रखी है तुमने
अपनी प्रेम कविताओं में
प्रेम के मुहाने पर
आँसुओं के लिए थोड़ी-सी जगह
और प्रेम की कब्र भरने के लिए
अपर्याप्त मिट्टी
प्रेम के स्याह गड्ढों को पाटने के काम आ रही है
आज भी
आँसुओं से गीली वह मिट्टी

किसी ने देखा और तुम्हें बतलाया
समय का खेल देखना
तुम्हारी जिन्दगीयों  के प्रहर
मौन के ताश के पत्ते
छाया और उसका उद्देश्य
और तुम्हें बतलाया
की क्या खेलो
ताकि हारते जाओ
और तुम हारते रहे अपनों से
जो नहीं जानते थे
कि
तुम लड़े रोशनी के बीच उनके अंधेरों से

तुमने पैदा किया शब्द को
रक्त में
पाला स्याह तन में
स्पंदन दिया अपनी थरथराती उँगलियों से
और उड़ाया अपने काँपते रसीले होंठों से
यही शब्द और सामान्य जन की वाणी
दोनों मिलकर बने तुम्हारी कविता
तुमने किया
अपनी उन अनजान कविताओं से रूखे स्नेह से प्यार
सिर्फ इसलिए
क्योंकि
तुम्हें लगता था
कि
तुम्हारा सारा दुर्भाग्य इस कारण था
कि एक बार उसने छितरा दिए थे तुम पर
अपने केश
और ढँका था तुम्हें
अपनी छाया में.
अपने इस रूखेपन को दूर करने के लिए
तुमने माँगा था
पृथ्वी से, अपनी नियति से
वह मौन
जो कम-से-कम तुम्हारा अपना तो था.

न सह सके तुम मौन का विशाल बोझ
धारण करते ही मौन
काँप उठे तुम
बेध गई तुम्हें तेज हवा
और उड़ गया फाख्ते के साथ तुम्हारा हृदय
ढह गया मौन का प्राचीर
पर
यकीन है मुझे
जीवित हो अब भी तुम कल की राख में
और अगर हो गए हो मृत
तो भी जन्म लोगे
कल की राख से.

स्त्रियों ने रंगमंच की भाषा और प्रस्तुति को बदला: त्रिपुरारी शर्मा

बहू और काठ की गाड़ी जैसे चर्चित नाटकों की लेखिका और नाट्य निदेशक त्रिपुरारी शर्मा से स्त्रीकाल के लिए रेणु अरोड़ा, हिन्दी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, राजेश चंद्रा, संपादक समकालीन रंगमंच और संजीव चंदन,संपादक स्त्रीकाल ने बातचीत की. अपनी विस्तृत बातचीत में उन्होंने भारतीय नाटक में जेंडर और जाति के विविध  पहलुओं पर बात की. अभिनेत्रियों और स्त्री -निदेशकों के प्रभाव और महिला आन्दोलन में नाटकों के इस्तेमाल को स्पष्ट किया. यह बातचीत थियेटर की एक ऑनलाइन क्लास की तरह है.
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प्रकृति के लिए महिलाएं

उपासना बेहार

लेखिका  सामाजिक कार्यकर्ता हैं और महिला मुद्दों और बाल अधिकारों को लेकर मध्यप्रदेश में लम्बे समय से काम कर रही हैं संपर्क :’
upasana2006@gmail.com

महिलाओं का शुरू से ही प्रकृति से निकटतम का संबंध रहा है. एक तरफ वो प्रकृति की उत्पादनकर्ता, संग्रहकर्ता तो दूसरी तरफ प्रबंधक, संरक्षक की भूमिका निभाती रही हैं. महिलाओं ने इसकी रक्षा के लिए कई आदोंलन चलाये और अपने प्राण देने से भी नही हिचकचायी. महिलाओं के पर्यावरण-संरक्षण में अतुलनीय योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. ये आन्दोलनकारी महिलाएं एक बात अच्छे से जानती थी कि स्वच्छ पर्यावरण के बिना जीवन नहीं हैं और पर्यावरण को बचाकर ही जीवन को सुरक्षित रखा जा सकता है. अगर हम पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ करेगे तो उसका खामयाजा आने वाली कई पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ेगा. देश में हुए कई पर्यावरण-संरक्षण आंदोलनों खासकर वनों के संरक्षण में महिलाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इन आन्दोलनों पर अगर नजर डाले तो अमृता देवी के नेतृत्त्व में किये गए आन्दोलन की तस्वीर सबसे पहले आती है, वर्ष 1730 में जोधपुर के महाराजा को महल बनाने के लिए लकड़ी की जरूरत आई तो राजा के आदमी खिजड़ी गांव में पेड़ों को काटने पहुचें तब उस गांव की अमृता देवी के नेतृत्त्व में 84 गाँव के लोगों ने पेड़ों को काटने का विरोध किया, परंतु जब वे जबरदस्ती पेड़ों को काटने लगे तो अमृता देवी पेड़ से चिपक गयी और कहा कि पेड़ काटने से पहले उसे काटना होगा तब राजा के आदमियों ने अमृता देवी को पेड़ के साथ काट दिया, यहाँ से मूल रूप से चिपको आन्दोलन की शुरूआत हुई थी. अमृता देवी के इस बलिदान से प्रेरित हो कर गाँव के महिला और पुरुष पेड़ से चिपक गए. इस आन्दोलन ने बहुत विकराल रूप ले लिया और 363 लोग विरोध के दौरान मारे गए, तब राजा ने पेड़ों को काटने से मना किया.

इसी आंदोलन ने आजादी के बाद हुए चिपको आंदोलन को प्रेरित किया और दिशा दिखाई, सरकार को 26 मार्च 1974 को चमोली जिले के नीती घाटी के जंगलों  को काटने का कार्य शुरू करना था. इसका रैणी गांववासियों ने जोरदार विरोध किया जिससे डर कर ठेकेदारों ने रात में पेड़ काटने की योजना बनायी. लेकिन गौरा देवी ने गाँव की महिलाओं को एकत्रित किया और कहना कि, “जंगल हमारा मायका है हम इसे उजाड़ने नहीं देंगे.“ सभी महिलाएं जंगल में पेड़ों से चिपक गयी और कहा कुल्हाड़ी पहले हम पर चलानी पड़ेगी फिर इन पेड़ों पर,पूरी रात निर्भय होकर सभी पेड़ों से चिपकी रही,  ठेकेदारों को पुनः खाली हाथ जाना पड़ा, यह आन्दोलन पूरे उत्तराखंड में फैल गया. इसी प्रकार टिहरी जिले के हेंवल घाटी क्षेत्र के अदवाणी गांव की बचनी देवी भी ऐसी महिला हैं जिन्होंने चिपको आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी. 30 मई 1977 को अदवाणी गांव में वन निगम के ठेकेदार पेड़ों को काटने लगे तो बचनी देवी गांववासियों को साथ लेकर पेड़ बचाओ आंदोलन में कूद पड़ी और पेड़ों से चिपककर ठेकेदारों के हथियार छीन लिए और उन्हें वहां से भगा दिया. यह संघर्ष तकरीबन एक साल चला और आन्दोलन के कारण पेड़ों की कटान पर वन विभाग को रोक लगानी पड़ी.

दक्षिण में भी चिपको आन्दोलन की तर्ज पर ‘अप्पिको’ आंदोलन उभरा जो 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र से शुरू हुआ, सलकानी तथा निकट के गांवों के जंगलों को वन विभाग के आदेश से काटा जा रहा था तब इन गांवों की महिलाओं ने पेड़ों को गले से लगा लिया, यह आन्दोलन लगातार 38 दिनों तक चला, सरकार को मजबूर हो कर पेड़ों की कटाई रुकवाने का आदेश देना पड़ा.  इसी तरह से बेनगांव, हरसी गांव के हजारों महिलाओं और पुरुषों ने पेड़ों के काटे जाने का विरोध किया और पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले से लगा लिया. निदगोड में 300 लोगों ने इक्कठा होकर पेड़ों को गिराये जाने की प्रक्रिया को रोककर सफलता प्राप्त की. उत्तराखण्ड में महिलाओं ने ‘रक्षा सूत्र’ आंदोलन की शुरूआत की जिसमें उन्होंने पेड़ों पर ‘रक्षा धागा’ बांधते हुए उनकी रक्षा का संकल्प लिया. नर्मदा बचाओ आन्दोलन, साइलेंट घाटी आंदोलन में महिलाओं ने सक्रीय भागीदारी की. भारत में आजादी के पहले से वन नीति है, भारत की पहली राष्ट्रीय वन नीति वर्ष 1894 में बनी थी. स्वतंत्र भारत की पहली राष्ट्रीय वन नीति 1952 में, वन संरक्षण अधिनियम 1980 में बने  इन नीतियों में महिलाओं का कही जिक्र नहीं था, वनों को लेकर महिला एक उत्पादनकर्ता, संग्रहणकर्ता, संरक्षक और प्रबंधक की भूमिका निभाती हैं इस कारण प्रकृति से खिलवाड़ का दुष्प्रभाव सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ता है.

इन सब आन्दोलनों के दबाव के कारण 1988 में जो राष्ट्रीय वन नीति बनी उसमें लोगों को स्थान दिया गया. इसमें महिलाओं की सहभागिता को महत्व दिया गया और उनकी वनों पर निर्भरता, वनों को लेकर ज्ञान, वन प्रबंधन में उनकी सक्रीय भागीदारी को समझा गया और यह सोच बनी कि अगर वन प्रबंधन में महिलाओं की भी भागीदारी होगी तो वन नीति के गोल को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है इसी सोच के चलते संयुक्त वन प्रबंधन प्रोग्राम के अंतर्गत हर गावों में वन समिति बनायीं गयी और उस समिति में महिलाओं को भी शामिल किया गया. 1995 में राष्ट्रीय वन नीति में बदलाव करते हुए समितियों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण कर दिया गया. परंतु देखने में आया है कि ज्यादातर महिलाओं को संयुक्त वन प्रबंधन प्रोग्राम और वन समिति के बारे में जानकारी नहीं है, साथ ही पुरुषों के वर्चस्व वाले इस समाज में महिलाओं को कहने बोलने का स्पेस कम ही मिल पता है, लेकिन देखना ये है कि महिलाये इन चुनौतियों से कैसे पार पाती हैं और वनों के स्थायित्व विकास के लिए क्या और किस तरीके के कदम उठाती हैं.

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा:- आख़िरी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.

पहली क़िस्त पढने के लिए क्लिक करें :
यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त 

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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा: चौथी  क़िस्त
पांचवी क़िस्त पढने के लिए क्लिक करें:
छठी  क़िस्त पढने के लिए क्लिक करें:





महान भारतीय संस्कृति :आठवी  क़िस्त 



इस सन्दर्भ में सिर्फ इतना और कि प्राचीन भारत में समान जाति की स्त्री के साथ बलात्कार करने पर पुरुष की सम्पूर्ण सम्पत्ति छीनकर, उसके गुप्तांग काटकर उसे गधे पर चढ़ाकर घुमाया जाता था. मगर हीन-जाति की स्त्री के साथ बलात्कार में उपर्युक्त दंड का आधा दंड ही दिया जाता था. यदि स्त्री उच्च वर्ग की होती थी तो अपराधी के लिए मृत्युदंड था और सम्पत्ति छीन ली जाती थी. स्त्री के साथ धोखे से सम्भोग करने पर पुरुष को सम्पूर्ण सम्पत्ति से वंचित करके उसके मस्तक पर स्त्री का गुप्तांग चिह्नित करके नगर से निष्कासित कर दिया जाता था….बृहस्पति ने नीची जाति के पुरुष द्वारा उपभोग की गई उच्च जाति की निर्दाेष स्त्री को भी मृत्युदंड देने की व्यवस्था दी है. याज्ञवल्क्य और नारद के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी अविवाहित कन्या की इच्छा के विरुद्ध उससे सम्बन्ध रखता था तो उस व्यक्ति की दो अँगुलियाँ काट ली जाती थीं, किन्तु कन्या के उच्चवर्णी होने की स्थिति में उस व्यक्ति की सम्पत्ति छीनकर उसे मृत्युदंड दिया जाता था. कौटिल्य ने इस सन्दर्भ में कुछ भेद किए हैं. जो पुरुष स्वजाति की अरजस्वला कन्या को दूषित करे, उसका हाथ कटवा दिया जाए अथवा चार सौ पण दंड दिया जाए. यदि कन्या मर जाए तो पुरुष को प्राणदंड दिया जाए. रजस्वला हो चुकी कन्या की स्थिति में पुरुष की मध्यमा व तर्जनी अँगुलियाँ काट दी जाएँ अथवा दो सौ पण दंड दिया जाए और कन्या का पिता, जो भी क्षतिपूर्ति चाहे, उसे प्राप्त कराई जाए…वेश्या से बलात्कार का दंड बारह पण व दंड से सोलह गुना शुल्क गणिका को देने का नियम था. माता, मौसी, सास, भाभी, बुआ, चाची, ताई, मित्र-पत्नी, बहन, बहन-सी मित्र, पुत्रवधू, पुत्री, गुरु-पत्नी, सगोत्र, शरणागत, रानी, संन्यासिनी, धाय, ईमानदार स्त्री एवं उच्चवर्गी स्त्री के साथ सम्भोग करनेवाले पुरुष का गुप्तांग काट दिया जाता था.81


बलात्कारी को मृत्युदंड


कुछ माह पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी ‘हवाई घोषणा’ की थी कि उनकी सरकार बलात्कार के अपराधियों को मृत्युदंड देने का कानून बनाएगी. इस बयान की गम्भीरता, राजनीतिक भाषा और सम्भावना को समझने के लिए सिर्फ यह जान लेना काफी होगा कि सर्वोच्च न्यायालय कई बार यह कह चुका है कि मृत्युदंड सिर्फ हत्या के ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामलों में ही दिया जाना है. परिणामस्वरूप आज तक दहेज हत्या या वधूदहन के एक भी मामले में फाँसी नहीं दी गई है. ऐसे जिन मामलों में फाँसी की सजा सुनाई भी गई थी, उन्हें उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायमूर्तियों ने आजन्म कैद में बदल दिया. इसी प्रकार बच्चों से बलात्कार और हत्या के मामलों में भी (सिवा जुम्मन खान (1991) अपराधी को फाँसी की बजाय) उम्रकैद की सजा ही सुनाई गई है. ऐसी स्थिति में (सिर्फ) बलात्कार के अपराधी को मृत्युदंड कैसे दिया जा सकेगा ? अगर बलात्कारी के लिए मृत्युदंड का प्रावधान भी बन जाए, तो क्या वैधानिक और न्यायिक दृष्टिकोण भी बदला जाएगा ? संसद में बैठे पुरुष प्रतिनिधि क्या ऐसा कानून बनने देंगे ? ‘सहमति’ और ‘बदचलनी’ के कानूनी हथियारों का क्या होगा ? दहेज हत्याओं में मृत्युदंड का प्रावधान समाप्त करके, उम्रकैद का कानून (धारा 304-बी) बनाने वाली ‘पुरुष पंचायत’ बलात्कार के अपराधियों को सजा-ए-मौत देने का कानून बनाएगी  ? कैसे ? कब ? विशेषकर जब दुनिया भर में मृत्युदंड समाप्त करने की बहस और मानवाधिकारों का शोर हो.



जीने का मौलिक अधिकार

”बलात्कार एक ऐसा अनुभव है, जो पीडि़ता के जीवन की बुनियाद को हिला देता है. बहुत सी स्त्रियों के लिए इसका दुष्परिणाम लम्बे समय तक बना रहता है, व्यक्तिगत सम्बन्धों की क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित करता है, व्यवहार और मूल्यों को बदल आतंक पैदा करता है. (डब्ल्यू यंग, रेप स्टडी, 1983) सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री एस. सगीर अहमद और आर.पी. सेठी ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय (दिनांक 28 जनवरी, 2000) में कहा है कि किसी भी स्त्री के साथ बलात्कार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए दुष्कर्ष के लिए केन्द्र सरकार को भी जिम्मेवार ठहराया जा सकता है. विशेषकर हर्जाना अदा करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत भारतीय ही नहीं, विदेशी नागरिकों को भी जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है. सर्वोच्च न्यायालय के इस अभूतपूर्व निर्णय के निश्चित रूप से बहुत दूरगामी परिणाम होंगे. यौन हिंसा की शिकार स्त्रियों के मुकदमों में, अतीत के अनेक विवादास्पद फैसलों को देखते हुए, इसे सचमुच ‘न्यायिक प्रायश्चित्तÓ या ‘भूल सुधार’ भी कहा जा सकता है. पुलिस हिरासत में पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार के विचाराधीन मामलों में यह निर्णय अनेक नए आयाम जोडऩे की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. हालाँकि कुछ संविधान विशेषज्ञ अधिवक्ताओं का कहना है कि हर्जाने के आदेशों से पहले, अपराध प्रमाणित होना अनिवार्य है. यदि इस तर्क को सही मानें तो समस्या वहीं की वहीं अटकी रह जाएगी. अपराध प्रमाणित होने में तो लम्बा समय लगेगा और सम्भव है कानूनी तकनीकियों के जाल में उलझ जाए.

संक्षेप में उपरोक्त मुकदमे के तथ्यों के अनुसार बांग्लादेश की नागरिक हनुफा खातून के साथ हावड़ा रेलवे स्टेशन के यात्री निवास में कुछ रेलवे कर्मचारियों ने सामूहिक बलात्कार किया. हनुफा खातून को 26 फरवरी, 1998 को हावड़ा से अजमेर जाना था।.बलात्कार की दुर्घटना के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय की एक वकील चन्द्रिमा दास ने रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष से लेकर पुलिस अफसरों और केन्द्र सरकार तक के विरुद्ध एक याचिका उच्च न्यायालय में दायर की, जिसमें हर्जाने के अलावा कुछ आवश्यक दिशा-निर्देश देने की माँग भी की गई थी. सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को आदेश दिया कि पीडि़ता को दस लाख रुपया बतौर हर्जाना अदा करे. उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अध्यक्ष रेलवे बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की, जिसे बहस सुनने के बाद खारिज कर दिया गया. सर्वोच्च न्यायालय में सरकारी वकीलों द्वारा प्रस्तुत तर्कों में मुख्य तर्क यह था कि हनुफा खातून भारतीय नागरिक नहीं, बल्कि विदेशी है, इसलिए रेलवे हर्जाना देने के लिए जिम्मेवार नहीं है. यह भी कहा गया कि कर्मचारियों द्वारा किए गए अपराध के लिए रेलवे या केन्द्र सरकार को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता. बहस के दौरान सरकारी वकीलों ने दलील दी कि यह कुछ व्यक्तियों द्वारा किया गया अपराध है, जिसके लिए उन पर मुकदमा चलाया जाएगा और उन्हें दोषी पाए जाने पर दंडित भी किया जा सकता है और जुर्माना भी वसूला जा सकता है, लेकिन रेलवे या केन्द्र सरकार को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता. विद्वान वकीलों ने चन्द्रिमा दास द्वारा दायर याचिका की वैधता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वकील साहिबा को ऐसी याचिका दायर करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं, परन्तु सरकारी महाधिवक्ता के तमाम तर्कों को रद्द करते हुए माननीय न्यायमूर्तियों ने विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी.

विद्वान न्यायमूर्तियों ने सरकारी अफसरों और पुलिसकर्मियों द्वारा किए गए दुष्कर्मों के मामलों में पीडि़तों को हर्जाना देने सम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण नजीरों का हवाला दिया है. इनमें रुदुल शाह (1983), भीमसिंह (1985), सहेली (1980), इन्द्र सिंह (1995) डी.के. बसु (1997), कौशल्या (1998) से लेकर मंजू भाटिया (1998) तक शामिल हैं. जनहित याचिकाओं और उनमें प्रबुद्ध समाजसेवी वकीलों की भूमिका को रेखांकित करते हुए निर्णय में बहुत से उदाहरण दिए गए है. मौलिक अधिकार और विदेशी नागरिकता के सवाल पर न्यायमूर्तियों ने मानवाधिकारों से लेकर स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय प्रस्तावों तक का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायाधीशों और वकीलों को मानवाधिकरों के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायशास्त्र के प्रति जागरूक और सचेत रहना चाहिए, विशेषकर महिलाओं के सुरक्षा सम्बन्धी मानवाधिकारों से. न्यायमूर्तियों ने अपने निर्णय में अनवर बनाम जम्मू-कश्मीर (1971) का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20, 21 और 22 में प्रदत्त मौलिक अधिकार सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही उपलब्ध नहीं, बल्कि विदेशी नागरिकों को भी उपलब्ध हैं. बलात्कार को मौलिक अधिकार का उल्लंघन घोषित करनेवाले निर्णय (बौद्धिसत्व बनाम सुभद्रा चक्रवर्ती, 1996) को सही ठहराते हुए निर्णय में कहा गया है. ”बलात्कार सिर्फ एक स्त्री के विरुद्ध अपराध नहीं बल्कि समस्त समाज के विरुद्ध अपराध है. यह स्त्री की सम्पूर्ण मनोभावना को ध्वस्त कर देता है और उसे भयंकर भावनात्मक संकट में धकेलता है, इसलिए बलात्कार सबसे अधिक घृणित अपराध है. यह मूल मानवाधिकारों के विरुद्ध अपराध है और पीडि़ता के सबसे अधिक प्रिय अधिकार का उल्लंघन है, उदाहरण के लिए जीने का अधिकार जिसमें सम्मान से जीने का अधिकार शामिल है.

माननीय न्यायमूर्तियों ने अपने फैसले में लिखा कि हनुफा खातून इस देश की नागरिक नहीं है लेकिन फिर भी उसे संविधान द्वारा प्रदत्त जीने के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं. सम्मान से जीने का उसे भी उतना ही अधिकार है, जितना किसी भारतीय नागरिक को. विदेशी नागरिक होने के कारण उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जा सकता जो मानवीय गरिमा के नीचे हो और न ही उन सरकारी कर्मचारियों द्वारा शारीरिक हिंसा की जा सकती है, जिन्होंने उसके साथ बलात्कार किया. यह उसके मौलिक अधिकार का हनन है. परिणामस्वरूप यह राज्य की संवैधानिक जिम्मेवारी है कि उसे हर्जाना अदा करे. उच्च न्यायालय के निर्णय में कोई कानूनी खामी नजर नहीं आती. रेलवे बोर्ड और केन्द्र सरकार के बचाव में विद्वान महाधिवक्ता ने एक और दलील यह दी कि कर्मचारियों के कार्यों के लिए राज्य को केवल तभी जिम्मेवार माना जा सकता है, जब उन्होंने यह कार्य आधिकारिक उत्तरदायित्व निभाते हुए किया हो. चूँकि बलात्कार को उनका आधिकारिक दायित्व नहीं कहा जा सकता, इसलिए केन्द्रीय सरकार हर्जाना अदा करने के लिए जिम्मेवार नहीं, लेकिन न्यायमूर्तियों ने जवाब में लिखा, ”यह तर्क पूर्णतया गलत है और इस न्यायालय द्वारा सुनाए फैसलों के विपरीत. सरकारी वकीलों ने अपने पक्ष में जिस विवादास्पद नजीर (कस्तूरी लाल रुलिया राम जैन बनाम उत्तर प्रदेश, 1965) का हवाला दिया. उसके बारे में न्यायमूर्तियों ने कहा कि न्यायालय ने अपने बाद के फैसलों में उस निर्णय को कभी सही नहीं माना. हम भी उसे मानने के लिए बाध्य नहीं। वह एक अर्थहीन (व्यर्थ) नजीर सिद्ध हो चुकी है.

2000 एपैक्स डिसीजन (खंड एक) सुप्रीम कोर्ट, पृ. 401-21 में प्रकाशित, चेयरमैन रेलवे बोर्ड एंड अदर्स बनाम श्रीमती चन्द्रिमा दास के फैसले को पढ़ते हुए महसूस होता है कि राज्य (रेलवे बोर्ड या केन्द्र सरकार) के विद्वान वकील भी ठीक उसी तरह सरकार का बचाव कर रहे हैं, जैसे बचाव पक्ष का कोई वकील अपने किसी खूँखार अपराधी को बचाने के लिए करता है. सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सरकारी वकीलों के प्राय: सभी तर्क (कुतर्क) बेहद हास्यास्पद नजर आते हैं. वर्षों से स्पष्ट कानूनी प्रस्थापनाओं से बेखबर और ‘ओवर रूल्ड’ नजीरें पेश करते हुए इन या ऐसे सरकारी अधिवक्ताओं से मानवाधिकारों और लैंगिक न्याय की अवधारणाओं से सचेत होने की अपेक्षा करना व्यर्थ है. आश्चर्यजनक है कि राजसत्ता भी अदालत में पेशेवर अपराधी की तरह मुकदमेबाजी करती दिखाई पड़ती है. समझ नहीं आता कि आखिर केन्द्रीय सरकार किसे बचाना चाहती है/थी ? अपराधी कर्मचारियों को दस लाख रुपया हर्जाना ? बलात्कार के गम्भीर मामले में पीडि़त स्त्री (और वह भी विदेशी नागरिक) के साथ, केन्द्र सरकार का पूरा व्यवहार एकदम अवांछनीय प्रतीत होता है. महिला कल्याण के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च करने और स्त्री हितैषी बननेवाली सरकार अदालत में इतनी असंवेदनशील और अतार्कि क कैसे हो जाती है ?  क्यों ?  क्या यही है ‘राष्ट्रीय गरिमा’ और ‘नारी सम्मान’ का ढिंढोरा पीटनेवाले नायकों का असली चेहरा.

 इन प्रश्नों को सिर्फ अदालती, कानूनी या न्यायिक दृष्टि से पढऩा-समझना काफी नहीं. राज्य के स्तर पर एक व्यापक परिप्रेक्ष्य और सत्ता और आम नागरिक (विशेषत: स्त्री) के बीच अन्तर्सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए विचार करना होगा. ऐसे मामलों में सरकार की प्रतिष्ठा का कम, राष्ट्र की न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा का ध्यान अधिक है.
कहना न होगा कि सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय से न्यायिक संस्थाओं के प्रति शेष-अशेष जन आस्थाएँ खंडित होने से तो बची रहीं, साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के कानून और न्यायिक विवेक का भी प्रतिबिम्ब सामने आया। यह अलग बात है कि यौन हिंसा के अन्य मामलों में इससे स्त्रियों को कितना लाभ मिलता है। इतना अवश्य कहा जा सक ता है कि यह निर्णय लैंगिक न्याय की दिशा में एक प्रगतिशील कदम ही नहीं बल्कि मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। मानवाधिकार सिर्फ ‘मुठभेड़’ में मारे गए आतंकवादियों के लिए ही नहीं, यौन हिंसा का शिकार स्त्रियों के पक्ष में भी परिभाषित होना जरूरी ह.। अगर सरकारी संस्थाओं में भी जीवन सुरक्षा उपलब्ध नहीं, तो हजारों विदेशी पर्यटक ‘भारत भ्रमण’ पर क्यों आएँगे ?



और अन्त में…आत्मरक्षा

यशवन्त राव बनाम मध्य प्रदेश राज्य82 में अभियुक्त पर आरोप था कि उसने 5 अप्रैल, 1985 को लखन सिंह नाम के व्यक्ति की कुदाली से हत्या की है. सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को हत्या का अपराधी तो नहीं माना लेकिन गम्भीर चोट पहुँचाने के अपराध में एक साल कैद की सजा सुनाई. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपील में यह सजा अब तक भुगती जेल की सजा में बदल दी, जिसके विरुद्ध अभियुक्त ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री कुलदीप सिंह और योगेश्वर दयाल ने 4 मई, 1992 को अपने अभूतपूर्व ऐतिहासिक फैसले में लिखा है कि अभियुक्त को अपने बचाव का अधिकार है, जो इस मामले में भी लागू होता है, जब अभियुक्त की पन्द्रह वर्षीया बेटी के साथ मृतक बलात्कार कर रहा था. न्यायमूर्तियों ने कहा कि अभियुक्त के बचाव में सबसे पहले पुलिस में दर्ज रपट है, जिसमें अभियुक्त ने शिकायत की है कि उसकी नाबालिग बेटी छाया घर के पिछवाड़े शौच के लिए गई थी, जहाँ मृतक ने उसे पकड़ लिया और शोर सुनकर वह वहाँ पहुँचा तो मृतक अपने बचाव में भाग खड़ा हुआ था. इस तरह वह दीवार के टकराया और पथरीली जमीन पर गिरकर जख्मी हो गया. सत्र न्यायाधीश का विचार था कि नाबालिग लडक़ी, जिसकी उम्र पन्द्रह साल है, अपनी सहमति से जब लखन सिंह के साथ सम्भोग कर रही थी तब अभियुक्त ने उसे चोट पहुँचाई है. लडक़ी खुद लखन सिंह को घर से बुलाकर लाई थी. अभियुक्त ने अपनी बेटी को लखन सिंह के साथ सम्भोग करते देखा तो उसने उत्तेजना व गुस्से में मृतक पर हमला कर दिया.

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में उल्लेख किया है कि अभियुक्त ने अपने बचाव के अधिकार का तर्क सत्र न्यायाधीश के सामने भी रखा था. लेकिन सत्र न्यायाधीश ने सिर्फ इतना ही ध्यान दिया कि अभियुक्त ने चोट उत्तेजना और गुस्से में पहुँचाई है. इससे आगे मामले की जाँच नहीं की. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सम्भोग सहमति से हो रहा था या बिना सहमति के।. तथ्य यह है कि छाया की उम्र पन्द्रह साल थी और लखन सिंह द्वारा किया कृत्य भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 उपधारा 6 के अन्तर्गत बलात्कार ही माना जाएगा. पंचनामे से स्पष्ट है कि बलात्कार का प्रयास या सम्भोग पूरा नहीं हुआ था और इसी बीच अभियुक्त ने मृतक पर वार किया था. मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार भी मृत्यु कुदाली से चोट लगने की वजह से नहीं हुई है, बल्कि ‘लीवर’ फटने से हुई है. कारण कुछ भी हो, बचाव का अधिकार अभियुक्त को तब भी है जब कोई उसकी बेटी के साथ बलात्कार कर रहा हो. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि कानूनी अधिकारों के बारे में अनभिज्ञ माँ-बाप अक्सर ऐसे मौके पर बलात्कारी को खुद कुछ कहने-सुनने या मारने-पीटने की बजाय थाने में जाकर शिकायत करते हैं. शायद डर भी लगता है कि कहीं खुद ही कानून के जंजाल में न फँस जाएँ. परन्तु इस निर्णय से स्पष्ट है कि बेटी, बहू या बहन या किसी रिश्तेदार के साथ बलात्कार होता देखकर, बलात्कारी की हत्या तक कर देने में भी ‘बचाव का अधिकार’ (राइट ऑफ प्राइवेट डिफेंस) एक कानूनी अधिकार भी है और बलात्कारियों से निपटने का हथियार भी.

स्त्रियाँ स्वयं अपने बचाव में हथियार उठाने के कानूनी अधिकार का प्रयोग कर सकती हैं. दिल्ली में अभी कुछ दिन पहले एक चौदह वर्षीया लडक़ी ने बलात्कार का प्रयास करनेवाले व्यक्ति की हत्या कर दी थी. नि:सन्देह उसे अपने बचाव में हत्या करने का अधिकार मिलेगा. बलात्कारी कानूनी प्रक्रिया में सजा से बच सकता है. लेकिन जिस दिन औरतें खुद हथियार उठा लेंगी, उसे कोई नहीं बचा सकता. दरअसल भेडिय़ों के समाज में बच्चियों को असुरक्षित और निहत्था छोडऩे के बजाय उन्हें जूड़ों कर्राटे और गोली, गँड़ासा, दराँती चलाना सीखने या सिखाने की जरूरत है और यह भी बताने की जरूरत है कि अपनी सुरक्षा में, अपने बचाव में की गई हत्या भी कोई अपराध नहीं है.


सन्दर्भ

1. महावीर बनाम राज्य 55 (1994) दिल्ली लॉ टाइम्स 428
2. सिद्धेश्वर गांगुली बनाम पश्चिम बंगाल, ए. आई. आर. 1958 सुप्रीम कोर्ट, 143
3. ए. आई. आर. 1927 लाहौर 858
4. ए. आई. आर. 1928 पटना 326
5. ए. आई. आर. 1963 पंजाब 443
6. 1963 क्रिमिनल लॉ जर्नल 391
7. 4 ऑल इंडिया क्रिमिनल डिवीजन 469
8. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 939
9. वही, पृ. 942
10. रफीक बनाम उत्तर प्रदेश (1980) सुप्रीम कोर्ट केसस 262
11. ए. आई. आर. 1923 लाहौर 297
12. ए. आई. आर. 1980 सुप्रीम कोर्ट 559
13. 23 क्रिमिनल लॉ जर्नल 475
14. ए. आई. आर. 1924 लाहौर 669
15. ए. आई. आर. 1927 रंगून 67
16. ए. आई. आर. 1934 कलकत्ता 7
17. ए. आई. आर. 1935 लाहौर 8
18. ए. आई. आर. 1939 रंगून 128
19. ए. आई. आर. 1944 नागपुर 363
20. ए. आई. आर. 1947 इलाहाबाद 393
21. ए. आई. आर. 1949 कलकत्ता 613
22. ए. आई. आर. 1949 इलाहाबाद 710
23. ए. आई. आर. 1950 लाहौर 151
24. ए. आई. आर. 1950 नागपुर 9
25. ए. आई. आर. 1952 सुप्रीम कोर्ट 54
26. ए. आई. आर. 1955 पटना 3245
27. पडरिया बलात्कार कांड में न्यायाधीश ओ.पी. सिन्हा का फैसला
28. ए. आई. आर. 1977 सुप्रीम कोर्ट 1307
29. ए. आई. आर. 1970 सुप्रीम कोर्ट 1029
30. ए. आई. आर. 1973 सुप्रीम कोर्ट 343
31. तुकाराम बनाम महाराष्ट्र (ए. आई. आर. 1979 सुप्रीम कोर्ट 185)
32. फूलसिंह बनाम हरियाणा (ए. आई. आर. 1980 सुप्रीम कोर्ट 249)
33. भोगिन भाई हिरजी भाई बनाम गुजरात (ए. आई. आर. 1983 सुप्रीम कोर्ट 753)
34. ए. आई. आर. 1989 सुप्रीम कोर्ट 937
35. ए. आई. आर. 1990 सुप्रीम कोर्ट 538
36. ए. आई. आर. 1981 सुप्रीम कोर्ट 361
37. महाराष्ट्र बनाम चन्द्रप्रकाश केवलचन्द जैन ए.आई.आर. 1990 सुप्रीम कोर्ट 658
38. ए. आई. आर. 1927 लाहौर 772
39. छिद्दा राम बनाम दिल्ली प्रशासन, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 4073
40. ए. आई.आर. सुप्रीम कोर्ट 658
41. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 715
42. ए. आई. आर. 1962 मद्रास 31, ए. आई. आर. 1991 सुप्रीम कोर्ट 207
43. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1666
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45. 1988 (4) आर. सी. आर. (क्रिमिनल) 600
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54. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2834
55. विनोद कुमार बनाम राज्य, 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2360,
55ए. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2919
55बी. जहरलाल दास बनाम उड़ीसा राज्य 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1809
55सी. कुमुदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1999) एस.एल.टी. 636
56. ए. आई. आर. 1929 लाहौर 584
57. 1977 क्रिमिनल लॉ जर्नल 556
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59. रामरूपदास बनाम राज्य, 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1000
60. जगदीश प्रसाद बनाम राज्य, 58 (1995) दिल्ली लॉ टाइम्स 740
61. बलवान सिंह बनाम हरियाणा राज्य, 1994, क्रिमिनल लॉ जर्नल 2810
62. रामचित राजभर बनाम पश्चिम बंगाल, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 372
63. नाला रामबाबू बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 324
64. वी. लक्ष्मी नारायण बनाम पुलिस निरीक्षक, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 334
65. ओमी उर्फ ओमप्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 155
66. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 835
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68 ए. 63 (1996) दिल्ली लॉ टाइम्स 563
68 बी. 1994 क्रिमिनल केसस 56
69. फूलसिंह चंडीगढ़ क्रिमिनल केस 163
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71. 1979 राजस्थान क्रिमिनल केस 234
72. 1979 राजस्थान क्रिमिनल केस 56
73. 1978 राजस्थान क्रिमिनल केस 426
74. 1977 (2) राजस्थान क्रिमिनल केस 157
75. 1976 (1) राजस्थान क्रिमिनल केस 310
76. 1976 राजस्थान क्रिमिनल केस 258
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78. रीपिक रविन्द्र बनाम आन्ध्र प्रदेश, 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 595
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81. प्राचीन भारत में न्याय व्यवस्था, नताशा अरोड़ा
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