यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : छठी क़िस्त

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com
न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि 'आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.' उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.'जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ' जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?' यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.

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आरोप झूठा है : गवाह 'खतरनाक' छठी क़िस्त 

एक अन्य मामले में छह वर्षीया मंजू के साथ मई, 1988 में बलात्कार का प्रयास किया गया. सत्र न्यायाधीश ने मई, 1990 में तीन साल कैद और 500 रुपए जुर्माना किया. लेकिन पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति ने जनवरी, 1994 में गवाहों के बयान में विसंगतियों के आधार पर केस को झूठा मानते हुए, अभियुक्त को सन्देह का लाभ देकर बरी कर दिया. न्यायमूर्ति ने कहा, ''मंजू स्वयं बच्ची है और वह गवाहों की उस 'खतरनाक श्रेणी' में आती है, जिन्हें आसानी से उनके माता-पिता या बुजुर्ग, अपने निजी स्वार्थों के लिए, बेबुनियाद आरोप लगाने के लिए बहका सकते हैं. रिपोर्ट में मात्र पाँच घण्टे की देरी को अस्वाभाविक मानते हुए न्यायमूर्ति ने लिखा, ''यह तथ्य स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि अपीलार्थी को फँसाने के लिए काफी समय उपलब्ध था.61 बच्चे गवाह नहीं हो सकते, उनकी गवाही 'खतरनाक' है. उन्हें बहकाना आसान है और 'निजी स्वार्थों' के लिए, माँ-बाप 'बेटी से बलात्कार' का 'झूठा आरोप' भी लगा सकते हैं. बदलते भारतीय समाज की संरचना को समझने के लिए, ऐसे निर्णय वास्तव में ही 'उल्लेखनीय हैं। विशेषकर समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए.इसके विपरीत नौ वर्षीया रेखा के साथ बलात्कार के मामले में अभियुक्त ने अपने बचाव में तर्क दिया कि आपसी रंजिश की वजह से उसे सबक सिखाने के लिए झूठे मुकदमे में फँसाया गया है. कलकत्ता उच्च न्यायालय के
न्यायमूर्ति श्री जे.एन. होरे और ए. राजखोवा ने कहा, ''आपसी रंजिश का तर्क एक दुधारी तलवार की तरह है जो दोनों तरफ से काटती है...हमें लगता है कि इस बात की बहुत कम सम्भावना है कि अभियुक्त को ऐसे अपराध के झूठे इल्जाम में फँसाया गया हो, जिससे लडक़ी की प्रतिष्ठा और भविष्य प्रभावित होते हों और छोटे से आपसी झगड़े की वजह से सामाजिक दाग लगता हो.62 ऐसे घृणित अपराध में झूठे अपराध लगाना सम्भव है या नहीं, इसका सही जवाब बेटी के माँ-बाप ही दे सकते हैं.

एक और मामले में चौबीस साल के नवयुवक ने दस साल की स्कूल जाती लडक़ी के साथ, गन्ने के खेत में बलात्कार किया. अभियुक्त के वकीलों ने अपील में कहा, ''अभियुक्त की सही पहचान नहीं हुई है. रिपोर्ट देरी से दर्ज कराई गई है और अभियुक्त चौबीस वर्षीय नौजवान है, जिसके पास 'उज्ज्वल भविष्य'है. इसलिए सजा कम करने में नरम रुख अपनाया जाए. लेकिन उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री राधाकृष्ण राव ने कहा, ''यह एक भयंकर अपराध है जो सुबह आठ बजे, दिन-दहाड़े दस साल की मासूम बच्ची के साथ किया गया। यह उस लडक़ी का जीवन भर पीछा करता रहेगा। रहम का कोई कारण नहीं है. रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी के तर्कों को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति ने लिखा है, ''विशेषकर बलात्कार और छेड़छाड़ के मामलों में औरतें या उनके सम्बन्धी स्वाभाविक रूप से थाने में रपट दर्ज कराने से पहले दो बार सोचते हैं. गाँवों में यह और अधिक होता है, क्योंकि इससे पीडि़ता के परिवार की प्रतिष्ठा और इज्जत जुड़ी हुई है.63 गाँव के खेत में बेरहमी से बलात्कार के एक और केस में दस वर्षीया लडक़ी के साथ बलात्कार करनेवाले बीस वर्षीय युवक के वकीलों ने बहस में कहा, ''गाँव में पार्टीबाजी की वजह से लडक़ी के बाप ने अभियुक्त को गलत मुकदमे में फँसाया है. लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा, ''कोई भी आदमी इस हद तक नीचे नहीं गिरेगा कि वह पार्टीबाजी की वजह से अपनी नाबालिग बेटी के भविष्य को, बलात्कार के आरोप लगाकर दाँव पर लगा दे. न्यायमूर्ति श्री डी.जे. जगन्नाथ राजू की यह टिप्पणी भी महत्त्वपूर्ण है, ''खेत की रखवाली के लिए भेजी गई लडक़ी के साथ बहुत ही अमानवीय ढंग से बलात्कार किया गया है. इस तरह के अभियुक्त के साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति नहीं दिखाई जा सकती। याद रखना चाहिए कि ग्रामीण इलाकों में अकेली औरतें खेतों में कृषि-कार्य करती हैं. अगर इस प्रकार के अभियुक्तों के साथ ढंग से व्यवहार नहीं किया गया तो खेतों में अकेली काम करनेवाली औरतों की कोई सुरक्षा या संरक्षा ही नहीं रह जाएगी.64

छोटी उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में कुछ न्यायमूर्तियों की भाषा अपेक्षाकृत संयमित और संवेदनात्मक है। परन्तु कुछ निर्णय पढ़ते हुए, अभी भी लगता है कि न्यायमूर्ति सिर्फ कानून और न्याय की भाषा ही जानते हैं. दस-बारह साल की बच्ची के अपहरण और बलात्कार के एक मामले में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री जी.एस.एन. त्रिपाठी डॉक्टरी रिपोर्ट का पोस्टमार्टम करते हुए कहते हैं, ''तो मैं कह सकता हूँ कि लडक़ी काफी लम्बे समय से सम्भोग की आदी थी और ''मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि यह एक भ्रष्ट चरित्र की लडक़ी थी और बिना अन्य प्रमाणों के, सिर्फ उसका बयान सजा सुनाने के लिए पर्याप्त नहीं है.65 ऐसी भ्रष्ट चरित्र की लडक़ी के आरोपों को 'विश्वसनीय', कैसे माना जा सकता है? 'विद्वान सत्र न्यायाधीश को फौजदारी कानून का बिलकुल कुछ ज्ञान ही नहीं था. वरना...ऐसे बेबुनियाद मुकदमे में सजा सुनाता. सजा देने का अधिकार नहीं उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्तियों द्वारा लिखी कानून और न्याय की ऐसी 'मानवीय', 'संवेदनशील' और नैतिक संस्कारों में बँधी भाषा के बीच, मुझे दिल्ली की जिला अदालत के एक युवा मजिस्टे्रट श्री राजकुमार चौहान द्वारा सुनाया एक फैसला अक्सर याद आ जाता है. आठ वर्षीया चन्दा के साथ, उसके अपने पिता द्वारा अप्राकृतिक मैथुन के मामले की वर्ष भर में सुनवाई समाप्त करने के बाद, मजिस्टे्रट चौहान ने अपने अविस्मरणीय निर्णय में लिखा कि ''इस मुकदमे की सुनवाई के दौरान मुझे हमेशा अहसास होता रहा कि मैं स्वयं कटघरे में खड़ा हूँ. चन्दा द्वारा अपने पिता के विरुद्ध लगाए गम्भीर (पवित्र) आरोप, सचमुच आश्चर्यचकित करनेवाले थे और पिता का अपराध बेहद घृणित. लडक़ी की माँ सरस्वती की आँसू-भरी चीखों और इस आत्मलाप को सुनने के बाद मेरा हृदय और आत्मा तक आहत ही नहीं, बल्कि लहूलुहान हो गए कि अगर मुझे सपने में भी खयाल आ जाता कि मेरा पति ऐसा दुष्कर्म करेगा तो मैं उसके बच्चों की माँ ही नहीं बनती.


मजिस्टे्रट चौहान ने अपने निर्णय में संयुक्त परिवारों के विघटन, औद्योगिकीकरण से लेकर एकल परिवारों में पुरुष वर्चस्व की ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए लिखा है कि न्यायाधीश की भूमिका तो शुरू ही तब होती है, जब खेत की मेड़ ही घास खा चुकी होती है. खैर अभियुक्त को पूर्ण रूप से दोषी मानते हुए श्री चौहान ने अपना फैसला मुख्य दंडाधिकारी को भेजा, जिन्होंने अभियुक्त को छह वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई. इसके विरुद्ध अभियुक्त ने सत्र न्यायाधीश के यहाँ अपील दायर की और फिर जमानत पर छूट गया. कोई नहीं जानता कि ऐसी अपीलों का अन्तिम फैसला कब होगा. क्या होगा ?  यहाँ यह बताना जरूरी है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक मैथुन) की सुनवाई का तो अधिकार मजिस्टे्रट को है लेकिन उसे तीन साल कैद से अधिक सजा सुनाने का अधिकार नहीं है. जबकि इस अपराध के लिए अधिकतम सजा आजीवन कारावास या दस साल कारावास और जुर्माना निर्धारित की गई है या तो ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार सत्र न्यायाधीश को होना चाहिए या फिर मजिस्टे्रट को सुनवाई का ही नहीं, सजा देने का भी अधिकार हो। वरना...उचित न्याय कठिन है.

बहस दोबारा होऽऽ

नन्दकिशोर रथ बनाम नन्दा उर्फ अनन्त सोहरा वह अन्य66 में 30 जनवरी, 1985, रात आठ बजे, गाँव रंभा, जिला कटक में आठ साल की लडक़ी चम्पीना गाँव में कथक देखने जा रही थी कि रास्ते में अभियुक्त उसे पकडक़र घर ले गया और बलात्कार किया. खून से भीगी पैंट पहने लडक़ी घर पहुँची  तो जाकर माँ को बताया. रात करीब नौ बजे पिता घर लौटे तो माँ-बेटी दोनों बैठी रो रही थी. डॉक्टरी रिपार्ट के अनुसार भी बलात्कार प्रमाणित हुआ लेकिन सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को बाइज्जत बरी कर दिया और कहा कि ''सिर्फ लडक़ी के बयान के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती और बयान की पुष्टि अन्य प्रमाणों से नहीं हो रही है. 1986 में सत्र न्यायाधीश के निर्णय के विरुद्ध लडक़ी के पिता ने उड़ीसा उच्च न्यायालय में पुनर्समीक्षा याचिका दायर की. सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री बी. गोपालास्वामी ने मुकदमे के तथ्यों, गवाहों और प्रमाणों के साथ सर्वोच्च न्यायालय के अनेक फैसलों के आधार पर निर्णय दिया कि सहायक सत्र न्यायाधीश का निर्णय गलत तर्क और न्यायिक दृष्टिकोण की कमी का परिणाम है जो कानून की निगाह में उचित नहीं ठहराया जा सकता. सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को छोडक़र गम्भीर गलती की है और यह मानना भी गलत है कि पीडि़त लडक़ी की गवाही की पुष्टि के लिए अन्य प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. चार साल बाद 14 अगस्त, 1990 को न्यायमूर्ति गोपालास्वामी ने मुकदमा, सत्र न्यायाधीश को दोबारा बहस सुनने तथा कानून के अनुसार शीघ्र-अति-शीघ्र निर्णय करने लिए वापस भेज दिया. इसके बाद क्या (न्याय) हुआ कहना कठिन है.

कर्नाटक राज्य बनाम महाबलेश्वर जी नामक67 मामले में अभियुक्त की उम्र अठारह साल और बलात्कार की शिकार लडक़ी पलाक्षी की उम्र पन्द्रह साल थी. लडक़ी नवीं कक्षा की छात्रा थी. 3 अक्टूबर, 1977 को दोपहर दो बजे के करीब लडक़ी स्कूल से लौट रही थी तो अभियुक्त उसे पकडक़र पास के जंगल में ले गया, जहाँ उसने जबर्दस्ती बलात्कार किया. लडक़ी ने अपनी माँ और भाई को बताया कि अभियुक्त ने जंगल में ले जाकर जबर्दस्ती उसे 'बरबाद' किया है. गिरफ्तारी के बाद मुकदमे की शुरुआत होने से पहले ही पलाक्षी ने आत्महत्या कर ली और इसका लाभ मिला अभियुक्त को क्योंकि सत्र न्यायाधीश और उच्च न्यायालय ने पीडि़ता (लडक़ी) की गवाही न होने की स्थिति में सन्देह का लाभ देते हुए अभियुक्त को बलात्कार के अपराध से बरी कर दिया. हालाँकि चोट पहुँचाने के अपराध में सिर्फ चार महीने कैद की सजा सुनाई. राज्य सरकार द्वारा 1979 में दायर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति श्री एस. रतनेवल पांडियन और एम.एम. पंछी ने कहा कि ''सिर्फ इस कारण से कि पीडि़ता की मृत्यु हो गई है और वह गवाही के लिए उपलब्ध नहीं है. अभियुक्त को बरी नहीं किया जा सकता अगर अभियुक्त के अपराध को प्रमाणित करनेवाले अन्य साक्ष्य उपलब्ध है. सर्वोच्च न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्त को बलात्कार के अपराध का दोषी पाते हुए पाँच साल कैद की सजा सुनाई. यह दूसरी बात है कि राज्य सरकार द्वारा दायर 1979 की याचिका का फैसला 15 मई, 1992 तक सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन पड़ा रहा.


बेटी से बलात्कार : 'क्षणिक उत्तेजना

अब्दुल वहीद बहादुर अली शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य68 वह मुकदमा है जिसमें एक बाप ने खुद अपनी ही सात साल की बेटी प्रवीण के साथ 21 दिसम्बर, 1985 की रात बलात्कार किया. अदालत में बाप के बचाव के लिए वकीलों ने बार-बार सात साल की बेटी से ही पूछा कि वह चीखी क्यों नहीं ? चिल्लाई क्यों नहीं? शोर क्यों नहीं मचाया? वही 'बलात्कार' का अनिवार्य कर्मकांड. वही फिल्मी सीन और वह नहीं तो बलात्कार हुआ कहाँ ? हर सम्भव कोशिश यह प्रमाणित करने की कि उसने अपराध नहीं किया, जबकि सारे सबूतों और गवाहों के चेहरों पर अपराध साफ दिखाई दे रहा था. 1988 में सत्र न्यायाधीश ने बलात्कार के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनाई लेकिन अपील में बम्बई उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री एस.एम. दाऊद और एम.एफ. सलदाना ने 16 जनवरी, 1992 को आजीवन कारावास की सजा घटाकर 10 साल कैद कर दी. हालाँकि उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने लिखा है, ''इस मुकदमे में सत्र न्यायाधीश ने काफी सख्त, गम्भीर दृष्टिकोण अपनाया है और हमारे विचार से ऐसा ठीक ही किया है. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि यौन अपराध अपीलार्थी द्वारा अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ किया गया है. यह कारण काफी हद तक अपराध की संगीनता को बढ़ाता है और हमारे विचार से सख्त सजा की ही नहीं, बल्कि कड़ी सजा की माँग करता है...

अपीलार्थी के वकील ने सजा कम करने के लिए एक तर्क यह भी दिया कि ''इस केस को उन केसों के बराबर नहीं समझना चाहिए, जिसमें बेबस औरतों व बच्चों पर हवस पूरी करने के लिए क्रूर  ताकत का इस्तेमाल किया गया हो. तथ्यों के आधार पर ज्यादा-से-ज्यादा इसे क्षणिक उत्तेजना का अपराध माना जा सकता है. दूसरी तरफ सरकारी वकील का कहना था कि बाप द्वारा अपनी ही नाबालिग सात साल की बेटी के साथ बलात्कार से ज्यादा घृणित और जघन्य अपराध और क्या होगा? इसलिए अपराधी को अधिकतम सजा दी जानी चाहिए. न्यायमूर्तियों ने लिखा है, ''हम स्वीकार करते हैं, जैसा कि विद्वान सरकारी वकील ने दर्शाया है कि यह अपराध जघन्य भी है और क्रूरतापूर्ण  भी लेकिन यह भी आवश्यक है कि स्थितियों का सम्पूर्ण जायजा लेकर ही निर्णय करना चाहिए. अपीलार्थी झुग्गी में रहता है, उसकी गरीबी ने उसे ऐसे कठिन हालात में डाल दिया है कि वह छोटी-सी जगह में रहने को विवश है. इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. रिकॉर्ड बताता है कि उसकी पत्नी उसे तीन साल पहले ही छोडक़र चली गई थी. अपीलार्थी समाज के सबसे निर्धन वर्ग का व्यक्ति है. शिक्षा से पूर्ण रूप से वंचित होने के कारण संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए, उसे सामान्य बोध तक का अवसर नहीं मिल पाया... रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है कि अपीलार्थी की यौन अपराध करने की कोई पृष्ठभूमि हो. यहाँ तक कि दुव्र्यवहार तक नहीं. दूसरी तरफ हम देखते हैं कि हालाँकि उसकी पत्नी उसे छोड़ गई है या फिर भी वह नाबालिग बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजता है, खाना बनाता है या होटल से लाता है, सारा दिन काम करता है. कभी-कभी उनके लिए खिलौने लाता, जेबखर्च देता और रात को आकर खाना बनाता था. यह वे परिस्थितियाँ हैं जो हमें यह मानने के लिए कहती हैं कि अपीलार्थी की दयनीय स्थिति के कारण, उससे हुई ये क्षणिक भूल थी.


 एक तरफ अपराध सख्त से सख्त सजा की माँग करता है दूसरी तरफ ऐसे कारण हैं जो हमें 'उचित सीमा' में रहने को विवश कर रहे हैं. काफी ध्यान से विचार करने के बाद, हमारे विचार से दस साल कैद की सजा उचित और काफी रहेगी. क्या यहाँ 'इनसैस्ट की 'थियरी' नहीं दी जा रही ? परिस्थितियों का विवरण बलात्कार की वैधता बताने के लिए दिया जाता है. यह अक्सर होता है, होता रहा है. पिछले कुछ सालों में पिता द्वारा अपनी ही बेटी (या सौतेली बेटी) के साथ बलात्कार या यौन शोषण और उत्पीडऩ के अनेक मामलों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है. इन मामलों में पिता किसी झुग्गी-झोंपड़ी में रहनेवाला अनपढ़ या निर्धन व्यक्ति नहीं. 1994 में गृह मंत्रालय के 'अंडर सेके्रटरी' के. सी. जाखू एंड पार्टी के विरुद्ध बलात्कार, अप्राकृतिक मैथुन, यौन शोषण और उत्पीडऩ और अपहरण का केस दर्ज हुआ था. इसमें जाखू की छह वर्षीय बेटी का आरोप था कि उसके पिता उसे दफ्तर ले जाते. दफ्तर से अपने दोस्तों व महिला मित्रों के साथ होटल। वहाँ वे शराब पीते, ब्लू फिल्म देखते और सामूहिक सम्भोग करते. उसके पिता उसे भी शराब पिलाते, कपड़े उतारते और अँगुली योनि व गुदा में डाल देते. घर में भी रात को माँ व बहनों को बेहोश करने के बाद मुख मैथुन करते-करवाते. सत्र न्यायाधीश ने सब अप्राकृतिक मैथुन और मर्यादा भंग करने सम्बन्धी आरोप तो लगाए लेकिन बलात्कार का मुकदमा चलाने से इनकार कर दिया. इस निर्णय के विरुद्ध लडक़ी की माँ सुदेश जाखू ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की.

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