यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : दूसरी किस्त

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com
भाषा  में देह की भोग 
न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि 'आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.' उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.'जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ' जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?' यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम. आज दूसरी क़िस्त... 

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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त 


क़ानून की भाषा 
भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 के अनुसार बलात्कार के लिए 'लिंगच्छेदन (पैनीटे्रशन) अनिवार्य शर्त है. किसी भी अन्य वस्तु या यंत्र से यौन शोषण या उत्पीडऩ को बलात्कार का अपराध नहीं माना जाता. स्त्री द्वारा सहमति की उम्र सोलह वर्ष तय की गई है. सोलह वर्ष से कम उम्र की लडक़ी के साथ सहवास बलात्कार होगा, भले ही उसकी सहमति हो या न हो. लेकिन इस प्रावधान में अपवाद यह है कि किसी भी पुरुष द्वारा पन्द्रह वर्ष से बड़ी उम्र की पत्नी के साथ सहवास को बलात्कार नहीं माना जाएगा. हालाँकि हिन्दू विवाह अधिनियम और बाल विवाह निरोधक अधिनियम के अनुसार विवाह के समय दुल्हन की उम्र अठारह साल से अधिक होनी चाहिए. स्त्री द्वारा सहवास के लिए सहमति की उम्र सोलह साल और विवाह के लिए अठारह साल रखी गई है. लेकिन पुरुष (पति) द्वारा सहवास (बलात्कार) के लिए लडक़ी की उम्र सीमा पन्द्रह साल काफी है. यही नहीं, अगर पत्नी की उम्र बारह साल से अधिक और पन्द्रह साल से कम हो तो पति को सजा में 'विशेष छूट मिलेगी. दो साल कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. जबकि अन्य बलात्कार के मामलों में यह सजा कम से कम दस साल कैद और अधिकतम उम्रकैद निर्धारित की गई है. बारह वर्ष से पन्द्रह वर्ष तक की पत्नी के साथ बलात्कार संज्ञेय अपराध नहीं और जमानत योग्य भी होगा. मतलब, पुलिस बिना मजिस्ट्रेट से वारंट लिये पति को गिरफ्तार नहीं कर सकती. और पति होने के 'विशेषाधिकार स्वरूप जमानत पर छोडऩा पड़ेगा. पन्द्रह साल से कम उम्र की पत्नी भी बलात्कार की शिकायत सिर्फ एक साल के भीतर ही कर सकती है. उसके बाद की गई शिकायत को सुनने का किसी भी अदालत को कोई अधिकार नहीं, जबकि अन्य मामलों में ऐसी कोई समय सीमा नहीं है.

सर्वोच्च न्यायालय तक कई बार कह चुका है कि बाल विवाह भले ही दंडनीय अपराध हो लेकिन विवाह गैरकानूनी या रद्द नहीं माना जाएगा. पति अपनी पत्नी का प्राकृतिक संरक्षक है, भले ही दोनों नाबालिग हो. विवाह का पंजीकरण कानूनन अनिवार्य नहीं है, इसलिए कैसे रुकेंगे बाल विवाह ? और ऐसे कानूनी प्रावधानों से स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा पर कैसे काबू पाया जा सकता है ? (देखें अध्याय बाल विवाह और बलात्कार).कानून की 'कॉमेडी यहीं समाप्त नहीं होती. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, में आज भी यह प्रावधान है कि गवाह की विश्वसनीयता खंडित करने के लिए ''अगर किसी व्यक्ति या पुरुष पर बलात्कार का आरोप हो तो उसे यह सिद्ध करना चाहिए कि पीडि़ता आमतौर से अनैतिक चरित्र की महिला है. (धारा 155(4)) महिला को अनैतिक चरित्र की महिला प्रमाणित करो और बाइज्जत रिहा हो जाओ. यानि  कानून के इस प्रावधान के रहते हर किसी को यह कानूनी अधिकार है कि वह वेश्याओं, कॉलगर्ल या चरित्रहीन महिलाओं (भले ही नाबालिग बच्ची हो) के साथ, जब चाहे बलात्कार कर सकता है या बलात्कार करने के बाद किसी भी महिला को अनैतिक चरित्र की औरत प्रमाणित करके, मूँछों पर ताव देते हुए अदालत से बाहर आ सकता है. दूसरे, भारतीय दंड संहिता के अनुसार व्यभिचार का अपराध किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी के साथ उसके पति की सहमति या मिलीभगत के बिना सहवास (बलात्कार नहीं) करना है. (धारा 497) आपसी सहमति से पुरुष किसी भी बालिग अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा महिला से सम्बन्ध रख सकता है. यह कोई अपराध नहीं. परिणामस्वरूप व्यापक स्तर पर वेश्यावृत्ति और कॉलगर्ल व्यापार फैल रहा है. अनैतिक देह व्यापार नियंत्रण अधिनियम के किसी भी प्रावधान में पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध ही नहीं बनता. अपराधी सिर्फ 'वेश्याएँ ही होंगी.उपरोक्त कानूनी जाल-जंजाल को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि पितृसत्ता ने जानबूझकर ऐसा चक्रव्यूह रचा हुआ है कि बलात्कारी किसी-न-किसी चोर दरवाजे से भाग निकल सके.

सुसन ब्राउन मिलर के शब्दों में, ''बलात्कार, पुरुषों द्वारा औरतों को लगातार बलात्कार से भयभीत रखकर, समस्त स्त्री समाज पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखने का षड्यंत्र है. मिलर की स्थापना से असहमत विद्वानों का कहना है कि पुरुषों का सत्ता, सम्पत्ति, समाज और स्त्रियों पर वैसे ही पूर्ण नियंत्रण है, रहा है. इसलिए बलात्कार का भय बनाए रखने की क्या जरूरत है ? बलात्कार, पितृसत्ता का षड्यंत्र नहीं, बल्कि कुछ विकृत, विक्षिप्त और 'स्टिरियो टाइप बीमार अपराधियों का व्यक्तिगत अपराध मात्र है. मिलर की स्थापना को सही न मानने का कोई कारण नहीं है. दुनिया भर के अधिकांश देशों में (जहाँ पितृसत्तात्मक समाज है) बलात्कार सम्बन्धी कानूनी प्रावधानों की भाषा, परिभाषा प्राय: समान है. विवाह संस्था में सहवास पति का कानूनी अधिकार है और अनैतिक चरित्र की महिलाओं के साथ बलात्कार में यह मानना स्वाभाविक है कि हो सकता है उन्होंने सहमति दी हो. कानूनी भाषा से न्यायिक परिभाषा और सामाजिक मान्यताओं या मिथ तक में सबके सब एकमत हैं. कानून बनाने से लेकर पुलिस, अदालत और संचार माध्यमों तक में स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा के सवाल पर पितृसत्ता की चुप्पी या तटस्थता का अर्थ (अनर्थ) इसका प्रमाण है. स्पष्ट है कि पितृसत्तात्मक समाजों में पुरुष की काम-पिपासा के लिए विवाह संस्था से लेकर वेश्यावृत्ति (देवदासी, जोगिन वगैरह) और व्यभिचार के सभी दरवाजे खुले छोड़ दिए गए हैं. पुरुष द्वारा व्यभिचार या बलात्कार की शिकार अधिकांश लड़कियों को अन्तत: वेश्यावृत्ति के व्यवसाय में ही शरण लेनी पड़ती है या पड़ेगी. वेश्यावृत्ति का व्यवसाय मूल रूप से पुरुषों के ही हित को पोषित करता है, इसलिए भी नाबालिग लड़कियों का अपहरण, बलात्कार लगातार बढ़ रहा है.



 भारत में इस समय लगभग तीस लाख महिलाएँ वेश्यावृत्ति करने को विवश हैं, जिसमें (सरकारी आँकड़ों और मानव संसाधन विकास मंत्री महोदय के राज्यसभा में बयानानुसार) लगभग पन्द्रह प्रतिशत वेश्याओं की उम्र पन्द्रह साल से कम है. इसका अर्थ यह हुआ कि करीब पाँच लाख नाबालिग लड़कियों के साथ रोज बलात्कार होता है या हो रहा है. क्योंकि आपके ही कानूनानुसार सोलह वर्ष से कम उम्र की लडक़ी के साथ सहवास बलात्कार है, भले ही उसकी सहमति हो या न हो...हम जानते हैं कि आप फिर वही कानून पढ़ाने लगेंगे या कुतर्क करेंगे—''वे सब 'भ्रष्ट और 'अनैतिक चरित्र की औरतें हैं...'वेश्या...'कॉलगर्ल...'रंडी... ग्राहक से पैसे लिये हैं, सो 'बलात्कार का सवाल ही नहीं उठता. है ना ! बाल वेश्याओं के यौन शोषण सम्बन्धी एक जनहित याचिका में माननीय न्यायमूर्तियों ने कहा, ''हमारे विचार से देश भर में केन्द्रीय जाँच ब्यूरो द्वारा पूछताछ या पड़ताल हो, व्यावहारिक रूप से न सम्भव है और न ही वांछित. उन्हें निर्देश देने से कोई लाभदायक उद्देश्य सिद्ध नहीं होनेवाला। यह सिर्फ सामाजिक नहीं, आर्थिक समस्या भी है. सजा से अधिक नियंत्रण आवश्यक है.
कहने की आवश्यकता नहीं कि अधिकांश (90 प्रतिशत) यौन हिंसा या बलात्कार के मामले परिवार की प्रतिष्ठा के  कारण थाने में दर्ज नहीं कराए जाते. जो दर्ज होते हैं, उनमें से अधिकांश (96 प्रतिशत) बलात्कारी निचली अदालतों द्वारा बाइज्जत बरी कर दिए जाते हैं. पुलिस ने जाँच ठीक से नहीं की या गवाह, प्रमाण, सबूत नहीं थे. जिन थोड़े से (तीन-चार प्रतिशत) बलात्कारियों को सजा होती है, वे उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक अपील-दर-अपील करते ही हैं. अपील में भी ज्यादातर बरी हो जाते हैं या किसी न किसी आधार पर सजा कम करवाने में कामयाब हो जाते हैं. अपील के दौरान 'जमानत पर छूटने की सम्भावना भी है और सालों मुकदमा लटकने की भी.

आँकड़े बताते हैं कि निचली अदालतों से कई गुना अधिक समय, अपील का निर्णय होने, करने में लगता है. यौन हिंसा की शिकार निर्धन स्त्री आखिर कब तक 'कोर्ट-कचहरी का चक्कर काट सकती है ? घर-परिवार-विवाह बच्चे-समाज-खर्च-भागदौड़ कौन करेगा? कहाँ से? कब तक? बहुत-सी समस्याएँ हैं. सब करने के बाद भी क्या गारंटी है कि 'न्याय होगा ? बड़े बाप की बेटियों या साधन-सम्पन्न और सत्ता-समर्थ स्त्रियों की बात अलग है.
यौन हिंसा की शिकार निर्धन, अशिक्षित आम औरत नहीं जानती–न्याय की प्रथम अवधारणा है कि जब तक अपराध सन्देह से परे तक सिद्ध न हो, अभियुक्त को निर्दोष ही माना जाएगा. वरना अभियुक्त को बाइज्जत बरी करना विवशता है. अदालत में थोड़ा सा भी सन्देह हुआ तो 'सन्देह का लाभ अभियुक्त को ही मिलेगा. सन्देह से परे तक अपराध सिद्ध होने के बावजूद उम्र, समय, स्थितियाँ (सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, राजनीतिक...), परिस्थितियाँ वगैरह-वगैरह के आधार पर अभियुक्त की सजा कम भी की जा सकती है. न्याय के सुधारवादी, उदारवादी, मानवीय दृष्टिकोण से रचे सारे नए शास्त्रों की व्याख्या का फायदा अभियुक्त को ही होता है, होता रहा है. न्याय की एक और उल्लेखनीय अवधारणा यह है कि भले ही हजारों दोषी व्यक्ति छूट जाएँ मगर एक भी निर्दोष आदमी को सजा नहीं होनी चाहिए. ऐसे में उसे यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि 'दुर्लभतम में दुर्लभ मामला हुआ तो बलात्कारी को फाँसी के फन्दे से कोई नहीं बचा सकता. न्याय में देरी का मतलब, न्याय नहीं मिलना है. मगर न्याय में जल्दबाजी का अर्थ न्याय को दफनाना भी है. ज्ञानी लोगों का कहना है, ''न्याय की चक्की धीरे पीसती है, मगर पीसती है, तो बहुत बारीक... खैर !



आओ न्याय करें : रेप यानी एक कहानी

यह कहानी 1974 की है और महावीर नाम के एक बीस-बाईस वर्षीय मर्द और पन्द्रह-सोलह वर्षीया लडक़ी शीला के इर्द-गिर्द घूमती है. दोनों आपस में दूर के सम्बन्धी हैं और दरअसल एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते हैं. 27 सितम्बर, 1974 को महावीर शीला को बहरामपुर ले गया. वहाँ वे करीब पन्द्रह दिन रहे और आपस में देह का ताप बाँटते रहे. जब वे वापस आए तो शीला के माँ-बाप बिना किसी देरी के शीला को लेकर पुलिस स्टेशन पहुँच गए, जहाँ उसकी माँ ने पहले से ही रिपोर्ट दर्ज करवा रखी थी. परिणामस्वरूप महावीर की गिरफ्तारी हुई और बाद में अभियोग चला. 13 अगस्त, 1976 को अदालत ने महावीर को अपराधी करार दे, भारतीय दंड संहिता की धारा 366 और 376 के तहत सजा सुनाई. यह उसी महावीर की अपील है. इस मुकदमे की कुंजी शीला के बयान में ही है. और यह क्या दर्शाती है ? यह दिखाती है कि उसके महावीर के साथ अच्छे दोस्ताना सम्बन्ध थे और वह यमुना नदी के किनारे, रेस्टोरेंट और अन्य अघोषित स्थानों पर उसके साथ घूमती रही है. यह वह ही थी, जो उस दिन 'आश्रम ' नामक स्थान पर महावीर से मिली. वहाँ से ये बहरामपुर की गाड़ी पकडऩे के लिए रेलवे स्टेशन आए. यह एक लम्बी यात्रा थी, जो 'एक दिन और रात खा गई. बहरामपुर में वे बुद्धू, गवाह नम्बर दो, के घर पर ठहरे, जहाँ उनके पास एक कमरा था और उसी कमरे में उन्होंने मांसल देह से विषय-सुख का खेल खेला. शीला हमें बताती है कि किसी भी स्तर पर उसकी सहमति नहीं थी. यही नहीं, उसने तो विरोध भी किया और रोती भी रही लेकिन सब बेकार. इससे मुझे कोई असर ही नहीं हो रहा। वह रेलवे स्टेशन गई. महावीर जब टिकट खरीदने गया तो वह वहाँ अकेली खड़ी रही.

 डिब्बे में अन्य यात्रियों के होते हुए वह उसके साथ घंटों यात्रा करती रही. बहरामपुर रेलवे स्टेशन से ताँगे में बुद्धू के घर तक गई. ताँगे में और सवारियाँ भी थी. तब भी उसने कोई विरोध नहीं किया, कोई विद्रोह का झंडा नहीं उठाया और भागने का भी कोई प्रयास नहीं किया. इस बीच उसके पास शोर मचाने, रुकने या महावीर से दूर रहने का काफी समय भी था और अवसर भी. और हाँ ! बहरामपुर में बुद्धू के घर पर क्या हुआ ? वह कहती है कि उसने उस समय विरोध किया था, जब महावीर उसका परिचय पत्नी के रूप में दे रहा था. बुद्धू उसे झूठा सिद्ध करता है. उसका अपना व्यवहार भी उसे 'फाँसी के तख्ते की ओर ले जाता है. बहरामपुर में वह साड़ी, पेटीकोट और ब्लाउज खरीदने बाजार भी गई थी. वह महावीर के साथ एक ही कमरे में रह रही थी और उसे अपनी देह का ताप देती रही, कभी रात में दो बार और कभी-कभी तीन बार भी. वह स्वीकार करती है कि देह की पुकार का शिकार होने से पहले वे अक्सर एक-दूसरे से बातचीत और आलिंगन करते रहते थे और बुद्धू हमें बताता है कि वहाँ कभी विरोध की फुसफुसाहट तक नहीं थी. यह विश्वास करना असम्भव है कि वह खेल में शामिल नहीं थी, बल्कि उसने सक्रिय रूप से पूरी सहमति के साथ इस खेल में अपना योगदान दिया है.
सरकारी वकील साहब ने तर्क दिया था कि उस समय शीला की सहमति भी थी, तो भी उसकी उम्र सोलह साल से कम है, इसलिए उसकी सहमति का कोई मतलब नहीं. क्या सचमुच शीला ने सोलह गर्मियाँ नहीं देखीं ? मुझे सभी महत्त्वपूर्ण दिन दोबारा बुलाने दो. वह सितम्बर 1974 था. हमारे पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है. स्कूल प्रमाणपत्र तक भी नहीं है. हमारे पास रिकॉर्ड में डॉक्टर विरमानी की सलाह (ओपिनियन) मौजूद है. उसके अनुसार शीला की उम्र करीब चौदह साल है और सोलह साल से कम है. लेकिन तब भी हम सब जानते हैं कि वह सिर्फ सलाह या विचार ही है, जिसमें डेढ़ से दो साल तक 'इधर-उधर होना सम्भव है. मगर तब हम इस सलाह पर जाते ही क्यों हैं विशेषकर जब स्वयं शीला और उसकी माँ हमें बताती हैं कि उम्र क्या मानी जानी चाहिए ? 19 अप्रैल, 1976 को अदालत में शीला का और अगले दिन यानी 20 अप्रैल, 1976 को उसकी माँ बयान हुआ था. शीला ने अपनी उम्र अठारह साल बताई थी. उसकी माँ ने भी उसकी उतनी ही उम्र बताई थी. अगर ऐसा ही है तो, गणना के दिन निश्चित रूप से वह सोलह की सीमा रेखा पार कर चुकी है. यह उसकी सहमति के मुद्दों को मजबूत करता है.

चूँकि, पूरे प्रकरण में उसकी सहमति मौजूद है, महावीर बिना किसी रुकावट के मुसीबतों के उस पार जा सकता है. महावीर की अपील में विजय होती है और उसे बाइज्जत रिहा किया जाता है. यह कोई मनगढ़न्त कहानी नहीं, बल्कि दिल्ली उच्च न्यायालय के एक विद्वान न्यायमूर्ति श्री जसपाल सिंह द्वारा 11 मई, 1994 को सुनाए एक फैसले का अनुवाद है. 1 1977 में दायर एक अपील, जिसका फैसला होने (करने) में लगभग सत्रह साल का समय लगा. सत्रह साल का समय कोई 'अनहोनी या 'आश्चर्यजनक बात नहीं. ऐसा 'न्यायिक विलम्ब प्राय: हो जाता है. विलम्ब के एक नहीं, अनेक कारण हैं. यहाँ उल्लेखनीय है कि बलात्कार के ऐसे मामलों में 'लडक़ी की उम्र सिद्ध करने का एकमात्र अकाट्य दस्तावेज है जन्म प्रमाणपत्र. मगर दुर्भाग्य से इस देश में जन्म प्रमाणपत्र प्राय: उपलब्ध नहीं होता.2 आसिफिकेशन टेस्ट के आधार पर डॉक्टर की रिपोर्ट महज सलाह, विचार (ओपिनियन) भर है. इसलिए अनुमान लगाने में एक से तीन साल तक का अन्तर हो सकता है. 'इधर या उधर 'जिधर  भी अभियुक्त या अपराधी को लाभ पहुँचता हो. इस सन्दर्भ में सैकड़ों नजीर गिनाने से क्या लाभ !



न्याय की भाषा : लिंग पूर्वग्रह

खैर, उपरोक्त निर्णय पढ़ते-पढ़ते अचानक ध्यान आता है कि 'न्याय की भाषा में पुरुष या लिंग पूर्वग्रह (दुराग्रह) पूरी आक्रामकता के साथ सक्रिय है. 'देह का ताप बाँटते रहे से लेकर 'वह उसे अपनी देह का ताप देती रही.कभी रात में दो बार और कभी-कभी तीन बार भी तक की भाषा का सम्पूर्ण व्याकरण स्त्री देह की कामना और आनन्द के शब्दजाल में भटक रहा है. न्याय की भाषा में मर्द भाषा की यह घुसपैठ पढ़ते हुए सचमुच डर लगने लगता है कि क्या न्याय व्यवस्था स्त्री के प्रति, इतने हत्यारे अर्थों में खड़ी है ? यह सोचते, समझते और लिखते समय अवमानना का आतंक भी सामने आ खड़ा होता है ? पारदर्शी पूर्वग्रहों के पीछे की पृष्ठभूमि क्या है–कहना कठिन है. परन्तु इतना साफ दिखाई देता है कि कहीं-न-कहीं वृद्ध यौन कुंठाएँ चेतन-अवचेतन को भयंकर रूप से विक्षिप्त और विकृत कर चुकी हैं. 'मांसल देह के ताप' और 'यौन सम्बन्धों के खेल'  की अवधारणा से अभिभूत न्यायमूर्ति दमित इच्छाओं की अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकात्मक या संकेतात्मक भाषा की बैसाखियों का सहारा लेते हैं. स्वयं से सवाल पूछते हैं, 'क्या शीला ने सोलह गर्मियाँ नहीं देखीं ? यहाँ 'गर्मियाँ शब्द का प्रयोग मौसम या वर्ष गणना के लिए नहीं किया गया लगता. वसन्त, सावन या सर्दी की अपेक्षा, 'सोलह गर्मियाँ लिखने का असली अभिप्राय निश्चित रूप से वह नहीं है, जो पढऩे में आता है. जो अर्थ पढऩे में आता है, वह समझने में नहीं आता. दोनों अर्थों का अन्तर हम सब अच्छी तरह जानते-समझते हैं. क्या नहीं ? फैसला पढऩे के बाद महसूस होता है कि महावीर जो 'खेल' देह से खेल रहा था, क्या न्यायमूर्ति उसी खेल को दोबारा शब्दों में खेलना-देखना चाहते हैं ? न्यायमूर्ति की भाषा में महावीर मन ही मन सोच रहा है, 'यह एक लम्बी यात्रा थी, जो एक दिन और रात खा गई. वरना वह इस समय का उपयोग भी देह उपभोग में करता. शायद कहीं गहरे में ईर्ष्या  और द्वेष भावना सिर उठा कहने-बताने लगती है, 'दे प्लेड द गेम ऑफ सेंसुअल फ्लैश. और कहीं आहत अतीत या अनुभव समझता है 'यह विश्वास करना असम्भव है कि वह खेल में शमिल नहीं थी.

भेष बदलते पुरुषों में यह पहचानना मुश्किल है कि कौन अपराधी है और कौन न्याय (धीश)। यह कैसा 'खेल' है जिसमें चारों ओर 'पुरुष' के बचाव में खड़े सुरक्षा प्रहरी कभी 'सहमति से सम्भोग' पर बहस करने लगते हैं और कभी उम्र के प्रश्न पर मतभेद. कानूनी मुद्दों पर न्यायमूर्ति के तर्क पूर्णतया विवेकसम्मत हो सकते हैं। हालाँकि न्यायिक विवेक और आलोचनात्मक व्याख्या की भी अपनी सीमा है, क्योंकि  पूर्व निर्धारित है. निर्णय सही-गलत हो सकता है. गलत होगा तो 'ऊपरवाला' सही कर देगा. लेकिन क्षमा करें मी लॉर्ड ! लिंग पूर्वग्रहों या व्यक्तिगत संस्कारों से ग्रस्त दुराग्रहों से रची यह भाषा, नि:सन्देह न्याय की भाषा नहीं कही जा सकती. मर्दवादी भाषा का कोई भी नकाब बीमार मानसिकता को छिपाने के लिए नाकाफी है. परपीड़ा में आनन्द खोजती, अवांछित भाषा का ऐसा शब्दजाल न्याय की गरिमा के अनुकूल नहीं. 'आधी दुनिया' की गरिमा के तो बिलकुल ही नहीं.
बलात्कार के मुकदमे में 'सेक्स' को 'गेम', स्त्री देह को 'सेंसुअल फ्लैश' और स्त्री-पुरुष को 'खिलाड़ी', मानकर चलना, स्वयं पितृसत्ता के उस सत्ता-विमर्श में शामिल हो जाना है, जहाँ स्त्री मात्र देह, वस्तु, भोग्या और सम्पत्ति है। 'खेल' के अन्त में न्यायमूर्ति घोषणा करते हैं 'महावीर विंज द अपील'. महावीर की 'विजय' का अर्थ है-स्त्री देह पर विजय. यही तो है पुरुष वर्चस्व का भाषाशास्त्र. अदालतों में न्यायमूर्ति अपील 'मंजूर' करते हैं या 'स्वीकार' करते हैं. अभियुक्त अपराधी की 'हार-जीत' घोषित नहीं करते.



पितृसत्ता के प्रेत : 'मर्यादाहीन' स्त्रियाँ

आश्चर्यजनक है कि 1994 में भी स्त्री के प्रति न्याय की भाषा सदियों पुरानी पुरुष मानसिकता की शिकार है. वर्षों पूर्व लाहौर उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने बलात्कार के अपराधी को रिहा करते समय कहा था, ''अभियुक्त महिला की सहमति से सहवास कर रहा था. जब वह (औरत) सहवास करते हुए, रँगे हाथों पकड़ी गई तो स्वाभाविक है कि उसने अपनी लाज बचाने के लिए, वह कहानी गढ़ी कि अभियुक्त ने जबर्दस्ती उसे पकड़ लिया.3 'शी नेचुरेली कांकोक्टेड ए स्टोरी, टू सेव हर फेस' न्यायिक नहीं, बल्कि सामन्ती शब्दावली है. लाहौर से दिल्ली तक, मर्द भाषा का यही 'न्यायशास्त्र' पढ़ा-पढ़ाया जाता रहा है. पटना उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने तो एक निर्णय में यहाँ तक कहा कि, 'लेकिन...जहाँ एक औरत की कोई गरिमा (मान-सम्मान, मर्यादा) ही न हो, वहाँ किसी पुरुष द्वारा उसके साथ सम्भोग को अपराध नहीं कहा जा सकता है.4 इसी परम्परा में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने एक मुकदमे में कहा कि अभियुक्त द्वारा सात महीने की बच्ची के विशेषांगों से छेड़छाड़ करना कोई अपराध नहीं है, क्योंकि ''शी इज फिजिकली इंकेपेबल ऑफ हैविंग एनी सेंस ऑफ मॉडेस्टी.5 न्याय की भाषा के इस शिल्प या स्वरूप को मर्दों की घृणित और घिनौनी 'मानसिक क्षमता' का उदाहरण ही कहा जा सकता है वरना ऐसी हजारों न्याय गाथाएँ सुरक्षित हैं. इसी क्रम में त्रिपुरा उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354 की व्याख्या करते हुए कहा है कि इस धारा के अन्तर्गत अपराध के लिए 'बलप्रयोग' अनिवार्य है. ''जहाँ अभियुक्त के विरुद्ध सिर्फ यह साक्ष्य हो कि उसने अपने कपड़े उतारे और गुप्तांग महिला को दिखाए, यह अपने आपमें धारा 354 के तहत कोई अपराध नहीं होगा.6

 कानून की भाषा-परिभाषा से लेकर न्याय की भाषा तक, पितृसत्ता का यही रूप दिखाई पड़ता है. एक और ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, ''बलात्कार कांड को सिर्फ देखना भर, बलात्कार के अपराध की उत्प्रेरणा नहीं कहा जा सकता.7 सामाजिक जीवन से लेकर सिनेमा और टी.वी. के पर्दे तक पर हो रहे बलात्कारों को देखना (और आनन्द उठाना) कोई अपराध नहीं. शौक से देखिए-दिखाइए. 'रेप-सीन' अभी और भी हैं, आप इसे देखते रहिए. 'इनसाफ का तराजू', 'मेरी आवाज सुनो' और 'जख्मी औरत' से लेकर 'बैंडिट क्वीन' तक. सम्पूर्ण मर्दवादी ढाँचे में पूर्वग्रहों और 'मनुवाद' से आतंकित, कानूनी व्याख्या में न्याय की भाषा का एक और भयावह रूप पेश होता है.स्वाति लोढा बनाम राजकुमार.8 इस मुकदमे में राजकुमार ने स्वाति से बिना विवाह  किए ही देह सम्बन्ध स्थापित किया. स्वाति गर्भवती हो गई. राजकुमार ने दूसरी स्त्री से विवाह कर घर बसा लिया. इस पर स्वाति ने राजकुमार पर बलात्कार का मुकदमा दायर किया और प्रमाण के लिए राजकुमार और उससे उत्पन्न हुए बच्चे के डी.एन.ए. टेस्ट की माँग की. राजस्थान उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा, ''स्वाति में एक वह माँ नहीं बोल रही जो बच्चे के किसी कानूनी अधिकार के लिए, उसके माता-पिता का निर्धारण करवाना चाहती है. यह एक स्त्री के प्रतिशोध का परिणाम है, जो वह राजकुमार के खिलाफ ले रही है, जिसने उसका कौमार्य, अस्मिता और पवित्रता भंग करने के बाद किसी दूसरी स्त्री से शादी कर ली है. यहाँ कौमार्य या पवित्रता को लेकर जो कहा जा रहा है, लगता है वह राजकुमार कह रहा है. यह है मर्दवादी भाषा का चमत्कार. इसी फैसले में यह टिप्पणी भी उल्लेखनीय है, ''उसके गन्दे कपड़ों के बारे में बताया गया है कि वे धो दिए गए हैं, यद्यपि राजकुमार के कथित गन्दे कपड़ों को अदालत में पेश करने की माँग की गई है.9 न्याय की माँग करनेवाली स्त्री की बात 'प्रतिशोध का परिणाम' लगती है क्योंकि 'उसका कौमार्य, अस्मिता और पवित्रता भंग' हो चुकी है. 'गन्दे कपड़े' धुल सकते हैं, लेकिन ऐसी भाषा का कोई क्या करे ?



बलात्कार मृत्युजनक शर्म है–सिर्फ स्त्री के लिए

इससे भी अधिक पेचीदा स्थिति वहाँ आती है, जहाँ न्याय की भाषा स्त्री के पक्ष में बोलती दिखती है. एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री आर. कृष्ण अय्यर लिखते हैं, ''कोई भी प्रतिष्ठित महिला किसी पर भी बलात्कार का आरोप नहीं लगाएगी क्योंकि ऐसा करके वह जो बलिदान करती है, वही तो उसे सबसे अधिक प्रिय है.10 यहाँ 'विमेन ऑफ ऑनर' यानी प्रतिष्ठित महिला की परिभाषा में वेश्या, कॉलगर्ल या चरित्रहीन औरतें शामिल नहीं हैं और न 'दोहरा अभिशाप' झेलती वे गरीब, हरिजन और आदिवासी औरतें, जो बिना किसी 'मानवीय गरिमा' या किसी भी 'गरिमा' की निर्धनता-रेखा से नीचे जी रही हैं. तर्क के दूसरी ओर यह छिपा है कि प्रतिष्ठित स्त्री को बलात्कार का आरोप लगाने की जरूरत नहीं और अप्रतिष्ठित को ऐसा आरोप लगाने का हक नहीं. यहाँ आर्थिक-भेद और लिंग-भेद किस कदर मिल-जुल गए हैं कि एक ओर तर्क से अमीर स्त्री की प्रतिष्ठा को उसका बन्धन बनाया जा रहा है दूसरी ओर गरीब स्त्री को प्रतिवाद के हक से वंचित किया जाता है वह तो ऐसी थी ही.उपरोक्त निर्णय से पचास साल पहले भी अदालत ऐसी ही भाषा बोल रही थी. ''यह बहुत ही कम सम्भावना है कि कोई आत्मस्वाभिमानी औरत न्याय की अदालत में आगे आकर अपने साथ हुए बलात्कार के बारे में, अपने सम्मान के विरुद्ध शर्मनाक बयान देगी, बशर्ते कि यह पूर्ण रूप से सच न हो.11 या (पूर्ण रूप से झूठ 'इज्जतदार औरतें' तो बलात्कार सच में हो जाने पर भी किसी को नहीं बतातीं, शर्म के मारे डूबकर या जलकर मर जाती हैं. पचास सालों में 'आत्मस्वाभिमानी औरत' की जगह 'प्रतिष्ठित महिला' ने ले ली. चूँकि स्त्री के लिए बलात्कार मृत्युजनक शर्म है.12 इसलिए चुप रहो। बेकार 'शर्मनाक बयान' देने से क्या फायदा ? 'न्याय के प्रहरी' इससे ज्यादा स्पष्ट और क्या कहें ? हर बार महसूस होता है कि स्त्री के प्रति वह न्याय की भाषा नहीं बल्कि क्रूरता  और दमन की भाषा है. पितृसत्ता द्वारा जारी आदेश और अध्यादेश की भाषा है. न्याय के नाम पर पीढिय़ों से विरासत में मिली अन्याय की भाषा है. बलात्कारी भाषा. मर्दवादी भाषा कहती है, मर्द को बर्दाश्त कर ! बस ! यह भाषा न्यायालय की है. न्यायालय भी तो मर्दवादी हो सकता है.
क्रमशः....

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