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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : तीसरी किस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम. आज तीसरी  क़िस्त… 

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न्याय की बुद्धिमत्ता का नियम 

20वीं सदी के आरम्भ से लेकर अब तक अदालत, कानून और न्याय की भाषा-परिभाषा मूलत: स्त्री के प्रति अविश्वास, घृणा और अपमान से उपजी भाषा है. ”बलात्कार के मामलों में, सिर्फ बलात्कृत स्त्री के आरोपों पर किसी भी व्यक्ति (पुरुष) को सजा सुनाना बेहद असुरक्षित (‘क्वाइट अनसेफ) होगा.13  असुरक्षित ही नहीं बल्कि एक कदम आगे बढ़ न्यायमूर्ति ने चेतावनी दी, ”बिना अन्य प्रमाणों के सिर्फ उसके बयान के आधार पर सजा देना अत्यन्त खतरनाक होगा. 14 तीन साल बाद एक अन्य न्यायमूर्ति ने ऐलान किया, बिना अन्य प्रमाणों के सिर्फ स्त्री के बयान पर विश्वास करना, प्रत्यक्ष रूप से बहुत असुरक्षित (नोटोरियसली वेरी अनसेफ) होगा.15 इसलिए स्त्री की गवाही को अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से जोडक़र देखना अनिवार्य है.16 और ”अन्य प्रमाणों की अनुपस्थिति में, सिर्फ तथाकथित बलात्कार की शिकार स्त्री के बयान के आधार पर अभियुक्त को दोषी ठहराना उपयुक्त नहीं.17
उपरोक्त फैसलों के कुछ साल बाद एक न्यायमूर्ति ने थोड़ा संशोधन करते हुए कहा, ”बलात्कार के मामलों में अन्य प्रमाण अनिवार्य नहीं. अदालत को अधिकार है कि वह बिना अन्य प्रमाणों के लडक़ी का साक्ष्य स्वीकार कर सकती है. लेकिन इसे स्वीकारने में धीमा रहना चाहिए. अदालत द्वारा उसकी गवाही (साक्ष्य) को बहुत ध्यान से देखना अनिवार्य है.18  दूसरे न्यायमूर्ति ने लिखा है, ”दस वर्षीया बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में कानून के लिए यह जरूरी नहीं कि अन्य स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध हों. हाँ, किसी औरत द्वारा बलात्कार का आरोप लगाना एकदम भिन्न स्थिति है और किसी बच्ची द्वारा यह कहना कि अमुक व्यक्ति दोषी है–भिन्न स्थिति है.19 परन्तु तीसरे न्यायमूर्ति का विचार था, ”बलात्कार के मामले में सिर्फ लडक़ी के साक्ष्य को काफी न मानना ही एक अच्छा नियम है.20 क्योंकि ”यह नियम कि बलात्कार की शिकार स्त्री का साक्ष्य मानने के लिए अन्य प्रमाण अनिवार्य हैं.

दरअसल बुद्धिमत्ता का नियम (रूल ऑफ प्रूडेंस) है. 21 इसके बिना ”अभियुक्त को सजा देने के लिए, इसे उचित आधार के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए.22 कुल मिलाकर नतीजा वही है कि ‘सिर्फ स्त्री की गवाही के आधार पर सजा देना उचित नहीं. स्त्री के बयान पर विश्वास करना ‘खतरनाक’ है. बलात्कार के अन्य प्रमाण, सबूत और गवाह अनिवार्य हैं. बीसवीं सदी के पचास साल तक न्यायमूर्ति, बलात्कार की शिकार स्त्री से स्वतंत्र साक्ष्य की माँग करते रहे और न्याय की भाषा ‘बेहद असुरक्षित’ से ‘बेहद खतरनाकहोती गई. 1950 में लाहौर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने पुनर्विचार करने के बाद स्पष्ट किया, ”अन्य प्रमाणों को देखने का नियम सह-अपराधियों के लिए बनाया गया है और बलात्कार की शिकार स्त्री सह-अपराधी नहीं, बल्कि अपराध से पीडि़त स्त्री है. इसलिए बलात्कार के मामलों में पीडि़ता के साक्ष्य मानने के लिए अन्य प्रमाण हमेशा अनिवार्य नहीं हैं. ऐसे मामलों में याद रखनेवाली बात यह है कि क्या सिर्फ उस (स्त्री) के बयान के आधार पर सजा देना सुरक्षित है ? यह हर मुकदमे की स्थितियों पर निर्भर करता है.23 लेकिन उसी समय नागपुर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने विरोध में स्थापना दी, ”यद्यपि कानूनन यह मानने योग्य है, लेकिन बिना अन्य प्रमाणों के अभियुक्त को सजा देना खतरनाक है. यह नियम समान रूप से जरूरी है, चाहे पीडि़ता वयस्क महिला हो या सात वर्षीया कन्या. व्यवहार में यह नियम मजबूत नियम है कि बिना अन्य प्रमाणों के बच्ची की गवाही न मानी जाए. हालाँकि भारतीय कानून में यह नियम बुद्धिमत्ता का नियम है–कानून का नहीं.24 यह स्थापना देते हुए विद्वान न्यायमूर्तियों ने कुछ वर्ष पूर्व सुनाए अपने ही फैसले को निरस्त कर दिया. कानूनी नियम न होते हुए भी यह नियम न्यायमूर्तियों की ‘बुद्धिमत्ता का नियम’ बना रहा. बना हुआ है। कौन कहे–क्यों ? सवाल करो भी तो जवाब कौन देगा ?

खैर…आजादी के बाद, भारतीय गणतंत्र की सर्वोच्च अदालत ने लाहौर उच्च न्यायालय के 1950 वाले फैसले की तर्ज पर दोहराया, ”यह नियम, जो फैसलों के अनुसार कानूनी नियम बन गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि सजा के लिए अन्य प्रमाण अनिवार्य हैं. लेकिन बुद्धिमत्ता के लिए अन्य प्रमाणों का होना जरूरी है, सवाल यह है कि बुद्धिमत्ता का यह नियम हमेशा याद रहना चाहिए. व्यवहार में ऐसा कोई नियम नहीं है कि हर मुकदमे में, सजा देने से पहले अन्य प्रमाणों को देखना अनिवार्य हो.25 सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने ‘बुद्धिमत्ता के नियम’ को भी ‘कानून का नियमÓ घोषित कर दिया। इस निर्णय का प्रभाव यह हुआ कि सभी उच्च न्यायालयों को इसे मानना पड़ेगा. कुछ उच्च न्यायालयों के न्यायमूर्तियों ने इस फैसले को मानते हुए निर्णय सुनाए. लेकिन…कुछ न्यायमूर्ति ‘बुद्धिमत्ता के नियम’ के अनुसार ही न्याय करते रहे. पटना उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय के बावजूद कहा, ”बलात्कार के मामले में, वयस्क महिला के मुकदमे में अन्य प्रमाण अनिवार्य ही नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्र स्रोतों से भी होने चाहिए.26



बलात्कार नहीं, ‘शान्तिपूर्ण मामला’


इसके बाद करीब तीन दशकों तक बलात्कार की शिकार स्त्री से ‘बुद्धिमत्ता का नियम’ प्राय: ‘अन्य प्रमाण’ माँगता ही रहा. आहत, अपमानित और पीडि़त हजारों स्त्रियों की चीखें कानून की किताबों में बन्द पड़ी हैं. न्याय की नजर में उसका चीखना…चिल्लाना…शोर मचाना सिर्फ झूठ के ऊतक (‘टिशू ऑफ लाइज’) हैं. ये सब औरतें ‘भंयकर रूप से झूठी थीं और उनकी गवाही ‘झूठ और असम्भावनाओं से भरी पड़ी हैं. उनके शरीर पर कोई ‘चोट’ का निशान नहीं था. ‘यौन झिल्ली पहले से ही फटी’ हुई थी। ‘सम्भोग की आदी’ थीं और ‘कथित सम्भोग एक शान्तिपूर्ण मामला’ था. उन्होंने खुद ‘पूर्ण रूप से हवस शान्त करने’ की सहमति दी थी. मत भूलो कि ‘सम्भोग और बलात्कार में दुनिया भर का भेद है. इन पर ‘विश्वास करना ‘खतरनाक’ है. ”इन महिलाओं की तुलना सभ्य और प्रतिष्ठित समाज की महिलाओं से नहीं की जा सकती। ये महिलाएँ नीच काम में शामिल थीं और उनका चरित्र सन्दिग्ध है.27 1972 में प्रमिला कुमारी रावत के साथ तीन व्यक्तियों ने बलात्कार किया. उस समय प्रमिला गर्भवती थी. अदालत ने अपने निर्णय28 में कहा कि प्रमिला ‘रखैल’ थी, सम्भोग की आदी थी, उसने कोई चीख-पुकार नहीं मचाई, बलात्कार के बावजूद गर्भपात चार-पाँच दिन बाद हुआ. (अत:) लगता है, इन परिस्थितियों में जो कुछ हुआ, उसकी मर्जी या सहमति से हुआ या फिर उसमें पति (प्रेमी) की भी मिलीभगत थी. परिणामस्वरूप तीनों अभियुक्तों को बाइज्जत बरी किया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री पी.एन. भगवती और मुर्तजा फजल ने सेशन और हाई कोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए इसे ‘सीरियस मिसकैरिज ऑफ जस्टिस’ माना था. विद्वान न्यायमूर्तियों के अनुसार बलात्कार के कारण प्रमिला का गर्भपात नहीं बल्कि निर्दोष अभियुक्तों को सजा सुनाने के कारण, न्याय का गर्भपात हुआ था.

एक अन्य मामले29 में सर्वोच्च न्यायालय ने देव समाज स्कूल अम्बाला की 9वीं कक्षा की छात्रा सतनाम कौर के साथ बलात्कार के चार अभियुक्तों को रिहा करते हुए कहा था कि लडक़ी सम्भोग की आदी थी और उसकी यौन झिल्ली पहले से भंग थी. इसी प्रकार महादेव व रहीम बेग बनाम राज्य 30 में एक बारह वर्षीय लडक़ी की दो अभियुक्तों ने बलात्कार के बाद हत्या कर दी. न्यायालय ने उन्हें इस आधार पर बरी कर दिया, ”लँगोट पर मिले वीर्य के धब्बे अनिवार्य रूप से बलात्कार सिद्ध नहीं करते और उनके लिंगों पर भी किसी प्रकार के चोट के निशान नहीं हैं. प्रश्न यह है कि शादीशुदा या सम्भोग की अनुभवी महिलाओं के साथ हुए बलात्कार को अपराध न मानना कहाँ तक उचित है ? 1978 में मथुरा बलात्कार कांड में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री जसवन्त सिंह,  पी. एस. कैलाशम और ए.डी. कौशल का फैसला31 न्याय की भाषा का ‘सर्वश्रेष्ठ’ नमूना कहा जा सकता है. पुलिस स्टेशन में पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार के इस मामले में न्यायमूर्तियों का (विवादास्पद) निर्णय था कि ‘प्रश्नगत सम्भोग बलात्कार प्रमाणित नहीं होता और अपीलार्थी गणपत के खिलाफ अपराध का कोई मामला नहीं बनता. मान लो मथुरा ‘झूठी’ थी और गणपत ने उसके साथ सहमति से सम्भोग किया था इसलिए बलात्कार का अपराध नहीं बनता और उसे कोई सजा नहीं दी जा सकती. परन्तु यह भी तो सच है कि गणपत ने पुलिस स्टेशन में सम्भोग किया. चूँकि सहमति से सम्भोग अपराध नहीं है तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी पुलिस या अन्य सरकारी अधिकारी दफ्तरों में खुलेआम सहमति से सम्भोग कर सकते हैं ? क्या पुलिस स्टेशन को ‘वेश्यालय’ की तरह इस्तेमाल करना कोई अपराध नहीं है और उपरोक्त निर्णय ‘लाइसेंस’ नहीं ?

मथुरा केस में सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त निर्णय के विरुद्ध महिलाओं द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर विरोध और आन्दोलनों के परिणामस्वरूप 1983 में बलात्कार सम्बन्धी प्रावधानों में संशोधन करना पड़ा. कानून के संशोधन के बावजूद ‘गहरे गड्ढे मौजूद हैं और न्यायिक दृष्टिकोण से भी कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं हुआ लगता. मथुरा के बाद सुमन से लेकर भँवरीबाई बलात्कार कांड तक में हुए निर्णय इसका प्रमाण हैं. न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के शब्दों में इसका कारण यह है कि ”नारी शरीर और पवित्रता को लेकर कोई सन्तोषजनक राष्ट्रीय योजना नहीं है.32 कहना न होगा कि इसके बाद न्याय की भाषा में जो बदलाव दिखाई भी देता है, वह अगर-मगर, किन्तु-परन्तु और लेकिन के मर्दवादी मुहावरों में ही उलझा हुआ है. भँवरीबाई केस में अभियुक्तों को रिहा करते हुए सत्र न्यायाधीश ‘ब्राह्मण जाति’ की श्रेष्ठता से लेकर ‘भारतीय संस्कृति’ की महानता तक का गुणगान करते हैं. उच्च जाति के भद्र पुरुष नीच जाति की स्त्रियों से बलात्कार करेंगे. न्यायाधीश को लगता है कि यह आरोप ‘सन्देह से परे तक सिद्ध’ नहीं हो पाया. कैसे हो सकता है? स्त्री के विरुद्ध लगातार बढ़ती हिंसा के प्रश्न पर गहरी चिन्ता या चिन्ता के बावजूद ‘न्याय का लक्ष्य’ अपराधियों की बाइज्जत रिहाई या सजा कम करना ही रहा है. बढ़ते अपराधों और घटती सजाओं के आँकड़ों को प्रतिशत की पद्धति में सिद्ध करना बेकार है.



जले पर नमक छिडक़ता पुरुष वर्चस्व


1983 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने एक अन्य मामले का निर्णय लिखते हुए कहा, ”इस समय जरूरत है कि कानून को इस प्रकार बनाया और ढाला जाए कि यह और अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनकर समय की माँग पूरी कर सके और इस मूलभूत समस्या का समाधान भी कि क्या, कब और किस हद तक बलात्कार की शिकार स्त्री की गवाही को सच मानने के लिए अन्य प्रमाण/साक्ष्य अनिवार्य हैं. भारतीय स्त्रियों के लिए इस समस्या का विशेष महत्त्व है क्योंकि प्राय: उनका शोषण भी होता रहा है और उन्हें समान न्याय से वंचित भी किया जा रहा है। इस समस्या पर भारतीय स्त्रियों की साठ करोड़ उत्सुक आँखें केन्द्रित हैं.33 स्त्री के विरुद्ध हिंसा के आँकड़ों को देखते और न्यायशास्त्र की पुनर्समीक्षा की जरूरत महसूस करते हुए न्यायमूर्तियों ने बलात्कार की शिकार महिला से अन्य प्रमाण माँगनेवाले नियमों को ‘जले पर नमक छिडक़ना कहते हुए कहा, ”बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला की गवाही को शंका, अविश्वास और सन्देह के चश्मे से ही क्यों देखा जाए ? ऐसा करना पुरुष-प्रधान समाज के वर्चस्व के आरोपों को सही ठहराना होगा. भारतीय परिप्रेक्ष्य में स्त्री की पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक और नैतिक स्थितियों का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्तियों ने कहा कि कोई भी स्त्री अपनी और परिवार की प्रतिष्ठा, लाज, शर्म और बदनामी के खतरे नहीं उठाना चाहती. निर्दोष होते हुए भी वह हमेशा भयभीत ही रहती है. वह तो सच कहने से भी डरती है–झूठ कैसे कहेगी? और क्यों कहेगी ? लेकिन ‘वयस्क महिला’ के बारे में ‘बुद्धिमत्ता के नियम’को बचाते हुए कहा कि ‘वयस्क महिला’ अगर सम्भोग की स्थिति में पकड़ी जाती है और अपने को बचाने के लिए ऐसे आरोप लगाने की सम्भावना दिखाई देती है तो उससे अन्य प्रमाण माँगे जा सकते हैं.

ध्यान से पढऩे-देखने के बाद लगता है कि यही सब तो 1952 में भी कहा गया था इसमें नई बात क्या है ?
अन्तत: दस-बारह साल की दो बच्चियों के साथ बलात्कार के प्रयास के इस उपरोक्त मुकदमे में न्यायमूर्तियों ने कहा, ”अभियुक्त ने जो अपराध किया, उसको बहुत ही गम्भीर रूप से लेना जरूरी है. लेकिन ”हाईकोर्ट द्वारा सजा के बाद (बेचारे की) नौकरी छूट गई है। घटना सात साल पहले घटी थी. अब साढ़े छह साल बाद अभियुक्त को दोबारा जेल भेजना पड़ेगा. समाज में भी अभी तक बहुत बेइज्जती और अपमान सहना पड़ा होगा…सब बातों को देखते हुए हमें लगता है कि अगर सजा ढाई साल से घटाकर सवा साल कर दी जाए तो ‘न्याय का लक्ष्य’ पूरा हो जाएगा.देखा ! मर्द के साथ कितनी जल्दी हमदर्दी पैदा हुई मर्दों को.


‘वर्दीवाला गुंडा’ और ‘जवान लडक़ी’


सुमन बलात्कार कांड (1989) में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों द्वारा हरियाणा के पुलिसवालों की सजा दस साल से घटाकर पाँच साल की गई थी.34 कारण–’लडक़ी सन्दिग्ध चरित्र’ की है. पुलिस पक्ष की ओर से मुकदमे की पैरवी मानवाधिकारों के चैम्पियन गोविन्द मुखौटी ने की. जब अखबारों और पत्रिकाओं में इस निर्णय की आलोचना हुई तो मुखौटी को सार्वजनिक रूप से माफी माँगते हुए पी.यू.डी.आर. की अध्यक्ष की कुर्सी ने इस्तीफा देना पड़ा था. पुनर्विचार याचिका में न्यायमूर्तियों ने अपना फैसला तो नहीं बदला, हाँ, इतना स्पष्टीकरण जरूर दिया कि हमारे पूर्व फैसले का आधार लडक़ी का चरित्रहीन होना नहीं, बल्कि रिपोर्ट पाँच दिन बाद करवाना है. पुनर्विचार के बाद निर्णय में कहा गया है, ”हम यह कहना चाहते हैं कि यह अदालत स्त्री गरिमा और सम्मान की रक्षा में किसी से कम नहीं है.35 पुलिस हिरासत में बलात्कार के अपराध के लिए कम-से-कम दस साल जेल का प्रावधान होते हुए, सुमन-केस में पाँच साल की सजा क्यों ? सजा कम करने की ‘विशेष परिस्थिति’ क्या थी ? क्या सिर्फ रपट लिखवाने में पाँच दिन देरी की वजह से, पाँच साल सजा कम करना उचित है ? हरपाल सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश 36 में तो रपट दस दिन बाद लिखवाई गई थी और देरी को उचित मानते हुए माननीय न्यायाधीशों ने कहा था, ”जवान लडक़ी के साथ बलात्कार होने पर, इस तरह की देरी स्वाभाविक है. सुमन-केस में तो रपट लिखने वाला भी वही पुलिस स्टेशन है, जहाँ के सिपाहियों ने उसके साथ बलात्कार किया था और क्या सुमन ‘जवान लडक़ी’ नहीं थी ? यहाँ विचारणीय है कि न्याय की भाषा में ‘जवान लडक़ी’ पर विशेष जोर दिया है. यानी ‘वयस्क महिला’ हो तो देरी उचित नहीं.

एक और मामले में पुलिसकर्मी चन्द्रप्रकाश केवलचन्द्र जैन द्वारा बलात्कार के अपराध में सत्र न्यायाधीश ने पाँच साल कैद की सजा सुनाई. अपील में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों (ए.एम. अहमदी और फातिमा बीवी) ने कहा, ”सजा के सवाल पर हम सिर्फ इतना ही कह सकते हैं कि जब कोई वर्दीवाला किसी जवान लडक़ी के साथ ऐसा गम्भीर अपराध करता है तो उसके साथ सहानुभूति या दया की कोई गुंजाइश नहीं. ऐसे मामलों में सजा उदाहरणीय होनी चाहिए.37 यहाँ भी सजा के प्रश्न पर न्यायमूर्ति सख्ती का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन… ‘जवान लडक़ी’ के साथ बलात्कार होने पर सजा सख्त होनी चाहिए का दूसरा अर्थ, क्या यह नहीं कि वयस्क महिला के मामलों में सजा ‘नरम’ भी हो सकती है ? हालाँकि ‘जवान लडक़ी’ के मामलों में भी कठोरतम (अधिकतम) सजा कहाँ सुनाई जाती है ? हर बार सजा कम करने के लिए, कोई-न-कोई ‘विशेष परिस्थिति’ मौजूद रहती है. सात दशक पहले न्यायमूर्ति सीधे-सीधे कहते थे, ”जहाँ साक्ष्यों से मालूम हो कि बलात्कृत लडक़ी ‘अक्षत योनि’ या ‘पवित्र’नहीं है, वहाँ सात साल कठोर कारावास की सजा बहुत सख्त सजा है.38 अब, वही बात काफी ‘घुमावदार भाषा में कहने लगे हैं।

नारी अस्मिता और गरिमा पर न्याय की चिन्ता

न्यायमूर्ति पुरुष हो या स्त्री, न्याय की भाषा तो अक्सर वही रहती है, जो अब तक रची-गढ़ी गई है. पन्नालाल केस में न्यायमूर्ति सुनन्दा भंडारे और अनिल देव सिंह के निर्णय के अलावा भी अनेक उदाहरण हैं उपरोक्त खंडपीठ के निर्णय पुरुष न्यायमूर्तियों द्वारा लिये गए हैं. यही नहीं, बलात्कार के एक और केस में दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुश्री उषा मेहरा ने अपने निर्णय के आरम्भ में गम्भीरतापूर्वक लिखा, ”हमारे समाज में नारी अस्मिता के प्रति सम्मान घटता जा रहा है और बलात्कार के मामले बढ़ते जा रहे हैं. हालाँकि ऐसे अपराध बीमार दिमाग के व्यक्तियों द्वारा किए जाते हैं, लेकिन, चूँकि यह मुद्दा सार्वजनिक जीवन में सौम्यता और नैतिकता से जुड़ा है और स्त्रीत्व की गरिमा को छूता है, इसलिए अपराधियों के साथ सख्ती से निपटना चाहिए.39 लेकिन अन्तत: अभियुक्त को बाइज्जत रिहा कर दिया. जन्म प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं. डॉक्टर की रिपोर्ट महज राय है. स्कूल प्रमाण पत्र पर विश्वास नहीं किया जा सकता और लडक़ी पहले से ही ‘सम्भोग की आदी’ है 29 मई, 1975 के इस मुकदमे की अपील का निर्णय 14 जुलाई, 1992 को (लगभग सत्रह साल बाद) हुआ। न्यायाधीश अय्यर के शब्दों में ‘वट ए पिटी’. स्त्री के विरुद्ध हिंसा के जलते सवालों पर (महिला) न्यायमूर्ति द्वारा मानवीय सरोकारों से लैस, संवेदना के शब्द सचमुच सराहनीय हैं. लेकिन मौलिक अभिव्यक्ति न होने के कारण, पेचीदा कानूनी प्रावधान और न्याय के चक्रव्यूह में ही फँसी रह जाती है. दो साल पहले सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने भी तो यही कहा था, ”यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में स्त्रीत्व का सम्मान घटता जा रहा है और छेड़छाड़ और बलात्कार के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं…सार्वजनिक जीवन में सौम्यता और नैतिकता का विकास और रक्षा केवल तभी की जा सकती है, जब अदालतें सामाजिक नियमों का उल्लंघन करनेवालों के साथ सख्ती से पेश आए.40 बलात्कार के अपराधियों को बीमार, विकृत और विक्षिप्त मानसिकता के व्यक्ति घोषित करते, अपने निर्णय बताए-गिनाए जा सकते हैं.

क्रमशः…..

धार्मिक औरतें या गुलाम औरतें ….!

 संजय सहाय 


सन् 2000 में शनि शिंगनापुर मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर निषेध के खिलाफ एक पदयात्रा आयोजित की गई थी. पंढरपुर से शनि शिंगनापुर तक की इस विरोध यात्रा का नेतृत्व जाने-माने तर्कवादी,लेखक और महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर ने किया था. इस पदयात्रा में अनेक प्रगतिशील लोगों सहितदेश की जानी-मानी हस्तियां शामिल हुई थीं जिनमें डाॅ. श्रीराम लागू और किसान नेता एन.डी. पाटिल उल्लेखनीय हैं. हालांकि तब दक्षिणपंथी शक्तियों भाजपा और शिवसेना सहित उनके हिंदुत्ववादी संगठनों ने उनके शिंगनापुर में स्त्रियों के प्रवेश कराने के इस प्रयास को विफल कर दिया था. मजेदार बात यह कि वोटों को ध्यान में रख 2011 में उसी भाजपा ने राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ मिलकर कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर के दरवाजे स्त्रियों के लिए खुलवा दिए थे. भाजपा का स्त्रियों के प्रति उमड़ा यह आदर और प्रेम वैसा ही था जैसा कि अपनी खस्ता हालत को देखते हुए उनमें चकराता के दलितों के लिए आज अचानक उमड़ पड़ा है. 26 जनवरी, 2016 को इसी मुद्दे को लेकर रणरागिनी भूमाता ब्रिगेड की कार्यकर्ताओं को शनि शिंगनापुर के सत्तर किलोमीटर दूर सूपा गांव में गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उन्हें चार सौ वर्ष पुरानी उस घटिया-सी परंपरा को तोड़ने से रोक दिया जिसके खिलाफ यह आंदोलन चलाया जा रहा था. तुर्रा यह कि ऐसा उन्होंने स्त्रियों को ही उन हानिकारक तरंगों से बचाने के लिए किया था जो शनिदेव की मूर्ति से उन स्त्रियों के प्रवेश करने पर निकल सकती थीं. इस आंदोलन की सूत्रधार सुश्री तृप्ति देसाई ने कहा कि यह लोकतंत्र के लिए एक काला दिन है. अप्रैल आते-आते हाईकोर्ट के निर्देश पर मंदिर के न्यासियों को स्त्रियों के लिए गर्भगृह के द्वार खोलने पड़े. कुल चार महीनों के इस आंदोलन से चार सौ वर्षों की यह न्यायहीन परंपरा धूल चाटती नज़र आई.

हालांकि पितृसत्ता के चौकीदार शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद बिलबिलाकर धमका गए कि स्त्रियां जीत का जश्न न मनाएं.शनि के पूजन से उन पर बलात्कार बढ़ने वाले हैं. इसी प्रकार 29 अप्रैल, 2016 को सुश्री तृप्ति और उनकी भूमाता ब्रिगेड की सदस्याओं ने मुंबई के हाजीअली दरगाह में घुसने की चेष्टा की. विडंबना यह रही कि भिन्न राजनीतिक दलों और संस्थाओं से संबद्ध एक सौ मुसलमान महिलाओं ने ही उनको अंदर घुसने से रोक दिया इस दरगाह में 2011 तक महिला जायरीनों के प्रवेश पर प्रतिबंध न था किंतु उसके बाद यह कहकर रोक लगा दी गई कि एक पुरुष संत की दरगाह होने की वजह से यहां सिर्फ पुरुषों का प्रवेश ही उचित होगा. 13 मई को पुनः तृप्ति ने महिलाओं के लिए तयशुदा सीमा तक पहुंचकर पंद्रह दिनों का अल्टीमेटम दिया है कि या तो पुरुषों की तरह महिलाओं को भी अंदर तक जाने की छूट मिले अन्यथा शिंगनापुर की भांति ही यहां भी आंदोलन होगा. तृप्ति नासिक और कोल्हापुर के मंदिरों में भी ऐसे परिवर्तन लाने के लिए आंदोलन की योजना बना रही हैं. स्त्रियों को पुरुष से कमतर अथवा अपवित्र मानने वाली इस पुरुषवादी व्यवस्था का इस्तेमाल बेशर्मी के साथ अनेक उपासना स्थलों में होता रहा है. केरल के सबसे पुराने और भव्य मंदिरों में से एक शबरीमाला श्री अयप्पा मंदिर में दस वर्ष की आयु से लेकर पचास वर्ष तक की महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. ‘हजार वर्षों से चली आ रही इस प्रथा में रजस्वला महिलाओं को अपवित्र माना जाता रहा है. कुछ ही वक्त पहले मंदिर बोर्ड के अध्यक्ष ने एक बेहूदा-सा बयान जारी किया था कि जब तक महिलाओं के मासिक स्राव  की जांच करने वाला यंत्र न बन जाए तब तक उनके मंदिर प्रवेश पर निषेध रहेगा. केरल के ही पद्मनाभ स्वामी मंदिर के गर्भगृह में स्त्रियों के जाने पर रोक है.

विश्व के सबसे धनी मंदिरों में से एक इस मंदिर के प्रबंधन का मानना है कि महिलाओं के गर्भगृह में प्रवेश से मंदिर के खजाने को बुरी नज़र लग जाएगी और कि सोलह हजार रानियों के साथ विलास करने वाले कृष्ण के मूल स्वरूप विष्णु महाराज स्त्रियों को देख कुपित हो जाएंगे. इसी तरह म्हस्कोबा मंदिर (पुणे), मारूति मंदिर (बीड) पटबौसी सत्र मंदिर (असम), पुष्कर के कार्तिकेय मंदिर (राजस्थान), रनकपुर के जैन मंदिर या दिल्ली  की निजामुद्दीन दरगाह के साथ-साथ देश के अनेक पूजागृहों में स्त्रियों के प्रवेश पर आंशिक या पूर्ण प्रतिबंध है तमाम धार्मिक स्थलों में प्रतिबंधों के पीछे स्त्री  को माहवारी के दौरान अपवित्रा माना जाना एक बड़ा कारण होता है. एक प्राकृतिक प्रक्रिया स्त्री  को अपवित्र बना डालती है किंतु उसी स्त्री के  ‘अपवित्र’ जननांगों से पैदा होने वाले पंडित-मुल्ला स्वयं को पवित्रता की प्रतिमूर्ति मानते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि उपासना स्थलों के पुजारी शायद हगते-मूतते भी नहीं होंगे बहरहाल, जहां तक बात रही ऐसे आंदोलनों की तो बराबरी के हक की लड़ाई का औचित्य समझ में आता है किंतु व्यापकता में देखा जाए तो यह पितृसत्ता के षड्यंत्रकारी और घिनौने खेल में एक खिलौना बने रहने की जिद्द से अधिक और कुछ नहीं है. विश्व के तमाम धर्म पितृसत्ता के संरक्षण और पोषण हेतु पुरुषों द्वारा ही गढ़े गए हैं. हर धर्म का संस्थापक और उसका परमपिता कोई पुरुष ही होता है. अलबत्ता कुछ स्त्रियों को छोटे-मोटे ओहदे दे दिए गए हैं किंतु परमपिताओं से बहुत नीचे के दर्जे के. सनातन धर्म हो या प्राचीन यूनानी धर्म, ज़रूरत पड़ने पर देवताओं द्वारा इन देवियों के यौन शोषण में भी कोई गुरेज नहीं होता. इंद्र से लेकर यूनानी देवता ज़ियूस तक के बलात्कारों और व्यभिचारों के किस्सों से धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं. अपनी पुत्री सरस्वती से विवाह कर लेने में ब्रह्मा को कोई आपत्ति नहीं थी. ज़ियूस ने भी अपनी बहन हेरा से विवाह किया था.

 परम शक्तिशाली जूपिटर भी उसी  ज़ियूस का रोमन संस्करण हैं. गोया कि कोई भी पुरुष इन ईश्वरों/देवताओं के हवाले अपने तमाम कुकर्मों को जायज़ ठहरा सकता है.बहू-बेटियों का बलात्कार कर भी देवतुल्य बना रह सकता है. बचाव में तो खाप पंचायतें खड़ी हो ही जाती हैं. देवियों को विष कन्याओं और वेश्याओं की तरह इस्तेमाल करने में भी ‘ईश्वरों’ को कभी परहेज नहीं रहा जैन स्त्रियां तो स्वर्ग जा ही नहीं सकतीं जब तक वे पुरुष योनि में पुनर्जन्म न ले लें. बुद्ध भी स्त्रियों को अपवित्र मानते थे. अपने भिक्षुकसंघ में स्त्रियों को शामिल करते हुए बुद्ध ने जो नियम और कानून बनाएथे उसमें उनका पूर्वाग्रह साफ झलकता है. उन्होंने मान रखा था कि स्त्रियां स्वभावतः बुरी होती हैं. बुद्ध ने भिक्षुणियों को भिक्षुओं के बराबरका दर्जा नहीं दिया. न ही उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने-समझने और रहनेकी आजादी दी. घुमा-फिराकर उन्हें भिक्षुओं के नियंत्रण में ही रहना था मैथुनक्रिया और स्त्रियों की यौनिकता को लेकर भी बुद्ध का नज़रिया बहुत भटका हुआ था. आनंद ने पूछा”भंते स्त्रियों के साथ हम कैसा व्यवहार करें ?/ “बुद्ध ने उत्तर दिया-”आनंद उनका अदर्शन.“/ आनंद ने प्रतिप्रश्न किया-”भंते, दिखाई दे जाने पर उनसे कैसा व्यवहार करें ?/ “बुद्ध ने उत्तर दिया”उनसे असंवाद !“ इसी तरह ईसाई धर्म में रोमन कैथोलिक या आर्थोडाॅक्स चर्च में महिलाएं पुरोहित नहीं बन सकतीं. पोप और कार्डिनल जैसे ओहदे सिर्फ पुरुषों के लिए सुरक्षित हैं. इस्लाम में अनेक कायदे-कानूनों आ परिधान संहिता में बंधी महिलाएं बिना पति या नजदीकी रिश्तेदार के हज नहीं कर सकतीं.


मूर्खतापूर्ण हिंदू मान्यताओं की तर्ज पर ही मासिक धर्म के वक्त उनके तवाफ़ (काबा के सात चक्कर) पर रोक है. इसी तरह खास परिस्थितियों को छोड़ महरम बगै़र या पति की इजाजत के बिना वे मस्जिद नहीं जा सकतीं. वहां भी औरतों के बैठने की जगह पुरुषों के पीछे ही होती है. सिर्फ सिक्ख धर्म को छोड़ दें.जहां स्त्री -पुरुष के लिए समान अधिकारों की बातें कही गई हैं (हालांकि यह अब तक कितना हासिल हो पाया है कहना कठिन है) तो यहूदी, सनातन, जैन, बौद्ध, ईसाइयत या इस्लाम कुल मिलाकर सभी धर्मों में औरतों की हैसियत बद से बदतर है. जबकि सभी धर्मों की सबसे समर्पित भक्त महिलाएं ही होती हैं. धर्म का सारा व्यापार और कारोबार उनके ही भरोसे चलता है. आस्था की बड़ी कीमत औरतें चुकाती हैं. उनका यह आत्मपीड़क व्यवहार अचरज में डालता है. हर प्रकार के छोटे-बड़े त्याग करने का जिम्मा स्त्रियों के सर होता है और पुरुषों को एकतरफा अधिकार है कि अपनी मर्दानगी उन पर झाड़ते रहें. उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में शरीर विज्ञानी ईवान पेट्रोविच पावलोव जिस क्लासिकल कंडीशनिंग की या मनोविज्ञानी एडवर्ड थाॅर्नडाइक और बी.एफ. स्किनर जिस आॅपरेंट कंडीशनिंग की बातें करते रहे उसे पितृसत्ता अपने संरक्षण हेतु धर्मों के सहारे सहस्राब्दियों  से सफलतापूर्वक आजमाती रही है. हमारे यहां लोग इस कंडीशनिंग को ‘संस्कार’ के नाम से जानते हैं.

पितृसत्तात्मक धर्म व्यवस्थाओं ने लोगों.विशेषकर स्त्रियों को संस्कारों की घुट्टी पिला-पिलाकर और मर्यादाओं की दुहाई दे-देकर मानसिक रूप से अपंग बना डाला है. ये सभी भक्त धर्मों के बंधक हैं. मजे़दार बात यह है कि इन्हें गुलामी तक पहुंचाने वाले वे ही हैं जो खुद भी उसी व्यवस्था के दास हैं. कुल मिलाकर यह एक भयानक अंतहीन चक्र है जिससे छूटना नामुमकिन लगता है. यदि स्त्रियों को वाकई बराबरी का दर्जा चाहिए तो उन्हें  तमाम धर्मों को लात मारनी होगी. छोटे-बड़े हर ईश्वर को खंडित करना होगा. उन्हें निर्णय लेना होगा कि ‘मां’ प्रकृति और ‘पिता’ परमेश्वर में से किसे चुनें ! पहला रास्ता उन्हें और उनकी संतानों को तार्किक और वैज्ञानिक सोच की ओर ले जाता है और दूसरा पितृसत्ता की चाकरी की तरफ ! विश्व के सभी धर्म चारित्रिक रूप से सीढ़ीदारहोते हैं जहां कभी भी सबके बराबरी पर खड़े रहने की कोई संभावना नहीं होती. मानवता और तार्किकता के लोकतांत्रिक समतल वहां नहीं पाए जाते. यदि स्त्रियां वाकई नास्तिक हो जाएं तो उनकी और उनकी कोख से निकलने वाली आधुनिक पीढ़ियों के सहारे हजारों सालों की इस दासता का अंत चंद वर्षों में ही हो जा सकता है.

हंस के जून अंक का संपादकीय ( साभार ) 
कथाकार संजय सहाय मासिक पत्रिका हंस के संपादक हैं. संपर्क: sanjaysahay1@gmail.com

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : दूसरी किस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

भाषा  में देह की भोग 
न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम. आज दूसरी क़िस्त… 


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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त 

क़ानून की भाषा 
भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 के अनुसार बलात्कार के लिए ‘लिंगच्छेदन (पैनीटे्रशन) अनिवार्य शर्त है. किसी भी अन्य वस्तु या यंत्र से यौन शोषण या उत्पीडऩ को बलात्कार का अपराध नहीं माना जाता. स्त्री द्वारा सहमति की उम्र सोलह वर्ष तय की गई है. सोलह वर्ष से कम उम्र की लडक़ी के साथ सहवास बलात्कार होगा, भले ही उसकी सहमति हो या न हो. लेकिन इस प्रावधान में अपवाद यह है कि किसी भी पुरुष द्वारा पन्द्रह वर्ष से बड़ी उम्र की पत्नी के साथ सहवास को बलात्कार नहीं माना जाएगा. हालाँकि हिन्दू विवाह अधिनियम और बाल विवाह निरोधक अधिनियम के अनुसार विवाह के समय दुल्हन की उम्र अठारह साल से अधिक होनी चाहिए. स्त्री द्वारा सहवास के लिए सहमति की उम्र सोलह साल और विवाह के लिए अठारह साल रखी गई है. लेकिन पुरुष (पति) द्वारा सहवास (बलात्कार) के लिए लडक़ी की उम्र सीमा पन्द्रह साल काफी है. यही नहीं, अगर पत्नी की उम्र बारह साल से अधिक और पन्द्रह साल से कम हो तो पति को सजा में ‘विशेष छूट मिलेगी. दो साल कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. जबकि अन्य बलात्कार के मामलों में यह सजा कम से कम दस साल कैद और अधिकतम उम्रकैद निर्धारित की गई है. बारह वर्ष से पन्द्रह वर्ष तक की पत्नी के साथ बलात्कार संज्ञेय अपराध नहीं और जमानत योग्य भी होगा. मतलब, पुलिस बिना मजिस्ट्रेट से वारंट लिये पति को गिरफ्तार नहीं कर सकती. और पति होने के ‘विशेषाधिकार स्वरूप जमानत पर छोडऩा पड़ेगा. पन्द्रह साल से कम उम्र की पत्नी भी बलात्कार की शिकायत सिर्फ एक साल के भीतर ही कर सकती है. उसके बाद की गई शिकायत को सुनने का किसी भी अदालत को कोई अधिकार नहीं, जबकि अन्य मामलों में ऐसी कोई समय सीमा नहीं है.

सर्वोच्च न्यायालय तक कई बार कह चुका है कि बाल विवाह भले ही दंडनीय अपराध हो लेकिन विवाह गैरकानूनी या रद्द नहीं माना जाएगा. पति अपनी पत्नी का प्राकृतिक संरक्षक है, भले ही दोनों नाबालिग हो. विवाह का पंजीकरण कानूनन अनिवार्य नहीं है, इसलिए कैसे रुकेंगे बाल विवाह ? और ऐसे कानूनी प्रावधानों से स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा पर कैसे काबू पाया जा सकता है ? (देखें अध्याय बाल विवाह और बलात्कार).कानून की ‘कॉमेडी यहीं समाप्त नहीं होती. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, में आज भी यह प्रावधान है कि गवाह की विश्वसनीयता खंडित करने के लिए ”अगर किसी व्यक्ति या पुरुष पर बलात्कार का आरोप हो तो उसे यह सिद्ध करना चाहिए कि पीडि़ता आमतौर से अनैतिक चरित्र की महिला है. (धारा 155(4)) महिला को अनैतिक चरित्र की महिला प्रमाणित करो और बाइज्जत रिहा हो जाओ. यानि  कानून के इस प्रावधान के रहते हर किसी को यह कानूनी अधिकार है कि वह वेश्याओं, कॉलगर्ल या चरित्रहीन महिलाओं (भले ही नाबालिग बच्ची हो) के साथ, जब चाहे बलात्कार कर सकता है या बलात्कार करने के बाद किसी भी महिला को अनैतिक चरित्र की औरत प्रमाणित करके, मूँछों पर ताव देते हुए अदालत से बाहर आ सकता है. दूसरे, भारतीय दंड संहिता के अनुसार व्यभिचार का अपराध किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी के साथ उसके पति की सहमति या मिलीभगत के बिना सहवास (बलात्कार नहीं) करना है. (धारा 497) आपसी सहमति से पुरुष किसी भी बालिग अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा महिला से सम्बन्ध रख सकता है. यह कोई अपराध नहीं. परिणामस्वरूप व्यापक स्तर पर वेश्यावृत्ति और कॉलगर्ल व्यापार फैल रहा है. अनैतिक देह व्यापार नियंत्रण अधिनियम के किसी भी प्रावधान में पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध ही नहीं बनता. अपराधी सिर्फ ‘वेश्याएँ ही होंगी.उपरोक्त कानूनी जाल-जंजाल को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि पितृसत्ता ने जानबूझकर ऐसा चक्रव्यूह रचा हुआ है कि बलात्कारी किसी-न-किसी चोर दरवाजे से भाग निकल सके.

सुसन ब्राउन मिलर के शब्दों में, ”बलात्कार, पुरुषों द्वारा औरतों को लगातार बलात्कार से भयभीत रखकर, समस्त स्त्री समाज पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखने का षड्यंत्र है. मिलर की स्थापना से असहमत विद्वानों का कहना है कि पुरुषों का सत्ता, सम्पत्ति, समाज और स्त्रियों पर वैसे ही पूर्ण नियंत्रण है, रहा है. इसलिए बलात्कार का भय बनाए रखने की क्या जरूरत है ? बलात्कार, पितृसत्ता का षड्यंत्र नहीं, बल्कि कुछ विकृत, विक्षिप्त और ‘स्टिरियो टाइप बीमार अपराधियों का व्यक्तिगत अपराध मात्र है. मिलर की स्थापना को सही न मानने का कोई कारण नहीं है. दुनिया भर के अधिकांश देशों में (जहाँ पितृसत्तात्मक समाज है) बलात्कार सम्बन्धी कानूनी प्रावधानों की भाषा, परिभाषा प्राय: समान है. विवाह संस्था में सहवास पति का कानूनी अधिकार है और अनैतिक चरित्र की महिलाओं के साथ बलात्कार में यह मानना स्वाभाविक है कि हो सकता है उन्होंने सहमति दी हो. कानूनी भाषा से न्यायिक परिभाषा और सामाजिक मान्यताओं या मिथ तक में सबके सब एकमत हैं. कानून बनाने से लेकर पुलिस, अदालत और संचार माध्यमों तक में स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा के सवाल पर पितृसत्ता की चुप्पी या तटस्थता का अर्थ (अनर्थ) इसका प्रमाण है. स्पष्ट है कि पितृसत्तात्मक समाजों में पुरुष की काम-पिपासा के लिए विवाह संस्था से लेकर वेश्यावृत्ति (देवदासी, जोगिन वगैरह) और व्यभिचार के सभी दरवाजे खुले छोड़ दिए गए हैं. पुरुष द्वारा व्यभिचार या बलात्कार की शिकार अधिकांश लड़कियों को अन्तत: वेश्यावृत्ति के व्यवसाय में ही शरण लेनी पड़ती है या पड़ेगी. वेश्यावृत्ति का व्यवसाय मूल रूप से पुरुषों के ही हित को पोषित करता है, इसलिए भी नाबालिग लड़कियों का अपहरण, बलात्कार लगातार बढ़ रहा है.

 भारत में इस समय लगभग तीस लाख महिलाएँ वेश्यावृत्ति करने को विवश हैं, जिसमें (सरकारी आँकड़ों और मानव संसाधन विकास मंत्री महोदय के राज्यसभा में बयानानुसार) लगभग पन्द्रह प्रतिशत वेश्याओं की उम्र पन्द्रह साल से कम है. इसका अर्थ यह हुआ कि करीब पाँच लाख नाबालिग लड़कियों के साथ रोज बलात्कार होता है या हो रहा है. क्योंकि आपके ही कानूनानुसार सोलह वर्ष से कम उम्र की लडक़ी के साथ सहवास बलात्कार है, भले ही उसकी सहमति हो या न हो…हम जानते हैं कि आप फिर वही कानून पढ़ाने लगेंगे या कुतर्क करेंगे—”वे सब ‘भ्रष्ट और ‘अनैतिक चरित्र की औरतें हैं…’वेश्या…’कॉलगर्ल…’रंडी… ग्राहक से पैसे लिये हैं, सो ‘बलात्कार का सवाल ही नहीं उठता. है ना ! बाल वेश्याओं के यौन शोषण सम्बन्धी एक जनहित याचिका में माननीय न्यायमूर्तियों ने कहा, ”हमारे विचार से देश भर में केन्द्रीय जाँच ब्यूरो द्वारा पूछताछ या पड़ताल हो, व्यावहारिक रूप से न सम्भव है और न ही वांछित. उन्हें निर्देश देने से कोई लाभदायक उद्देश्य सिद्ध नहीं होनेवाला। यह सिर्फ सामाजिक नहीं, आर्थिक समस्या भी है. सजा से अधिक नियंत्रण आवश्यक है.
कहने की आवश्यकता नहीं कि अधिकांश (90 प्रतिशत) यौन हिंसा या बलात्कार के मामले परिवार की प्रतिष्ठा के  कारण थाने में दर्ज नहीं कराए जाते. जो दर्ज होते हैं, उनमें से अधिकांश (96 प्रतिशत) बलात्कारी निचली अदालतों द्वारा बाइज्जत बरी कर दिए जाते हैं. पुलिस ने जाँच ठीक से नहीं की या गवाह, प्रमाण, सबूत नहीं थे. जिन थोड़े से (तीन-चार प्रतिशत) बलात्कारियों को सजा होती है, वे उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक अपील-दर-अपील करते ही हैं. अपील में भी ज्यादातर बरी हो जाते हैं या किसी न किसी आधार पर सजा कम करवाने में कामयाब हो जाते हैं. अपील के दौरान ‘जमानत पर छूटने की सम्भावना भी है और सालों मुकदमा लटकने की भी.


आँकड़े बताते हैं कि निचली अदालतों से कई गुना अधिक समय, अपील का निर्णय होने, करने में लगता है. यौन हिंसा की शिकार निर्धन स्त्री आखिर कब तक ‘कोर्ट-कचहरी का चक्कर काट सकती है ? घर-परिवार-विवाह बच्चे-समाज-खर्च-भागदौड़ कौन करेगा? कहाँ से? कब तक? बहुत-सी समस्याएँ हैं. सब करने के बाद भी क्या गारंटी है कि ‘न्याय होगा ? बड़े बाप की बेटियों या साधन-सम्पन्न और सत्ता-समर्थ स्त्रियों की बात अलग है.
यौन हिंसा की शिकार निर्धन, अशिक्षित आम औरत नहीं जानती–न्याय की प्रथम अवधारणा है कि जब तक अपराध सन्देह से परे तक सिद्ध न हो, अभियुक्त को निर्दोष ही माना जाएगा. वरना अभियुक्त को बाइज्जत बरी करना विवशता है. अदालत में थोड़ा सा भी सन्देह हुआ तो ‘सन्देह का लाभ अभियुक्त को ही मिलेगा. सन्देह से परे तक अपराध सिद्ध होने के बावजूद उम्र, समय, स्थितियाँ (सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, राजनीतिक…), परिस्थितियाँ वगैरह-वगैरह के आधार पर अभियुक्त की सजा कम भी की जा सकती है. न्याय के सुधारवादी, उदारवादी, मानवीय दृष्टिकोण से रचे सारे नए शास्त्रों की व्याख्या का फायदा अभियुक्त को ही होता है, होता रहा है. न्याय की एक और उल्लेखनीय अवधारणा यह है कि भले ही हजारों दोषी व्यक्ति छूट जाएँ मगर एक भी निर्दोष आदमी को सजा नहीं होनी चाहिए. ऐसे में उसे यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि ‘दुर्लभतम में दुर्लभ मामला हुआ तो बलात्कारी को फाँसी के फन्दे से कोई नहीं बचा सकता. न्याय में देरी का मतलब, न्याय नहीं मिलना है. मगर न्याय में जल्दबाजी का अर्थ न्याय को दफनाना भी है. ज्ञानी लोगों का कहना है, ”न्याय की चक्की धीरे पीसती है, मगर पीसती है, तो बहुत बारीक… खैर !

आओ न्याय करें : रेप यानी एक कहानी

यह कहानी 1974 की है और महावीर नाम के एक बीस-बाईस वर्षीय मर्द और पन्द्रह-सोलह वर्षीया लडक़ी शीला के इर्द-गिर्द घूमती है. दोनों आपस में दूर के सम्बन्धी हैं और दरअसल एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते हैं. 27 सितम्बर, 1974 को महावीर शीला को बहरामपुर ले गया. वहाँ वे करीब पन्द्रह दिन रहे और आपस में देह का ताप बाँटते रहे. जब वे वापस आए तो शीला के माँ-बाप बिना किसी देरी के शीला को लेकर पुलिस स्टेशन पहुँच गए, जहाँ उसकी माँ ने पहले से ही रिपोर्ट दर्ज करवा रखी थी. परिणामस्वरूप महावीर की गिरफ्तारी हुई और बाद में अभियोग चला. 13 अगस्त, 1976 को अदालत ने महावीर को अपराधी करार दे, भारतीय दंड संहिता की धारा 366 और 376 के तहत सजा सुनाई. यह उसी महावीर की अपील है. इस मुकदमे की कुंजी शीला के बयान में ही है. और यह क्या दर्शाती है ? यह दिखाती है कि उसके महावीर के साथ अच्छे दोस्ताना सम्बन्ध थे और वह यमुना नदी के किनारे, रेस्टोरेंट और अन्य अघोषित स्थानों पर उसके साथ घूमती रही है. यह वह ही थी, जो उस दिन ‘आश्रम ‘ नामक स्थान पर महावीर से मिली. वहाँ से ये बहरामपुर की गाड़ी पकडऩे के लिए रेलवे स्टेशन आए. यह एक लम्बी यात्रा थी, जो ‘एक दिन और रात खा गई. बहरामपुर में वे बुद्धू, गवाह नम्बर दो, के घर पर ठहरे, जहाँ उनके पास एक कमरा था और उसी कमरे में उन्होंने मांसल देह से विषय-सुख का खेल खेला. शीला हमें बताती है कि किसी भी स्तर पर उसकी सहमति नहीं थी. यही नहीं, उसने तो विरोध भी किया और रोती भी रही लेकिन सब बेकार. इससे मुझे कोई असर ही नहीं हो रहा। वह रेलवे स्टेशन गई. महावीर जब टिकट खरीदने गया तो वह वहाँ अकेली खड़ी रही.

 डिब्बे में अन्य यात्रियों के होते हुए वह उसके साथ घंटों यात्रा करती रही. बहरामपुर रेलवे स्टेशन से ताँगे में बुद्धू के घर तक गई. ताँगे में और सवारियाँ भी थी. तब भी उसने कोई विरोध नहीं किया, कोई विद्रोह का झंडा नहीं उठाया और भागने का भी कोई प्रयास नहीं किया. इस बीच उसके पास शोर मचाने, रुकने या महावीर से दूर रहने का काफी समय भी था और अवसर भी. और हाँ ! बहरामपुर में बुद्धू के घर पर क्या हुआ ? वह कहती है कि उसने उस समय विरोध किया था, जब महावीर उसका परिचय पत्नी के रूप में दे रहा था. बुद्धू उसे झूठा सिद्ध करता है. उसका अपना व्यवहार भी उसे ‘फाँसी के तख्ते की ओर ले जाता है. बहरामपुर में वह साड़ी, पेटीकोट और ब्लाउज खरीदने बाजार भी गई थी. वह महावीर के साथ एक ही कमरे में रह रही थी और उसे अपनी देह का ताप देती रही, कभी रात में दो बार और कभी-कभी तीन बार भी. वह स्वीकार करती है कि देह की पुकार का शिकार होने से पहले वे अक्सर एक-दूसरे से बातचीत और आलिंगन करते रहते थे और बुद्धू हमें बताता है कि वहाँ कभी विरोध की फुसफुसाहट तक नहीं थी. यह विश्वास करना असम्भव है कि वह खेल में शामिल नहीं थी, बल्कि उसने सक्रिय रूप से पूरी सहमति के साथ इस खेल में अपना योगदान दिया है.
सरकारी वकील साहब ने तर्क दिया था कि उस समय शीला की सहमति भी थी, तो भी उसकी उम्र सोलह साल से कम है, इसलिए उसकी सहमति का कोई मतलब नहीं. क्या सचमुच शीला ने सोलह गर्मियाँ नहीं देखीं ? मुझे सभी महत्त्वपूर्ण दिन दोबारा बुलाने दो. वह सितम्बर 1974 था. हमारे पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है. स्कूल प्रमाणपत्र तक भी नहीं है. हमारे पास रिकॉर्ड में डॉक्टर विरमानी की सलाह (ओपिनियन) मौजूद है. उसके अनुसार शीला की उम्र करीब चौदह साल है और सोलह साल से कम है. लेकिन तब भी हम सब जानते हैं कि वह सिर्फ सलाह या विचार ही है, जिसमें डेढ़ से दो साल तक ‘इधर-उधर होना सम्भव है. मगर तब हम इस सलाह पर जाते ही क्यों हैं विशेषकर जब स्वयं शीला और उसकी माँ हमें बताती हैं कि उम्र क्या मानी जानी चाहिए ? 19 अप्रैल, 1976 को अदालत में शीला का और अगले दिन यानी 20 अप्रैल, 1976 को उसकी माँ बयान हुआ था. शीला ने अपनी उम्र अठारह साल बताई थी. उसकी माँ ने भी उसकी उतनी ही उम्र बताई थी. अगर ऐसा ही है तो, गणना के दिन निश्चित रूप से वह सोलह की सीमा रेखा पार कर चुकी है. यह उसकी सहमति के मुद्दों को मजबूत करता है.

चूँकि, पूरे प्रकरण में उसकी सहमति मौजूद है, महावीर बिना किसी रुकावट के मुसीबतों के उस पार जा सकता है. महावीर की अपील में विजय होती है और उसे बाइज्जत रिहा किया जाता है. यह कोई मनगढ़न्त कहानी नहीं, बल्कि दिल्ली उच्च न्यायालय के एक विद्वान न्यायमूर्ति श्री जसपाल सिंह द्वारा 11 मई, 1994 को सुनाए एक फैसले का अनुवाद है. 1 1977 में दायर एक अपील, जिसका फैसला होने (करने) में लगभग सत्रह साल का समय लगा. सत्रह साल का समय कोई ‘अनहोनी या ‘आश्चर्यजनक बात नहीं. ऐसा ‘न्यायिक विलम्ब प्राय: हो जाता है. विलम्ब के एक नहीं, अनेक कारण हैं. यहाँ उल्लेखनीय है कि बलात्कार के ऐसे मामलों में ‘लडक़ी की उम्र सिद्ध करने का एकमात्र अकाट्य दस्तावेज है जन्म प्रमाणपत्र. मगर दुर्भाग्य से इस देश में जन्म प्रमाणपत्र प्राय: उपलब्ध नहीं होता.2 आसिफिकेशन टेस्ट के आधार पर डॉक्टर की रिपोर्ट महज सलाह, विचार (ओपिनियन) भर है. इसलिए अनुमान लगाने में एक से तीन साल तक का अन्तर हो सकता है. ‘इधर या उधर ‘जिधर  भी अभियुक्त या अपराधी को लाभ पहुँचता हो. इस सन्दर्भ में सैकड़ों नजीर गिनाने से क्या लाभ !

न्याय की भाषा : लिंग पूर्वग्रह

खैर, उपरोक्त निर्णय पढ़ते-पढ़ते अचानक ध्यान आता है कि ‘न्याय की भाषा में पुरुष या लिंग पूर्वग्रह (दुराग्रह) पूरी आक्रामकता के साथ सक्रिय है. ‘देह का ताप बाँटते रहे से लेकर ‘वह उसे अपनी देह का ताप देती रही.कभी रात में दो बार और कभी-कभी तीन बार भी तक की भाषा का सम्पूर्ण व्याकरण स्त्री देह की कामना और आनन्द के शब्दजाल में भटक रहा है. न्याय की भाषा में मर्द भाषा की यह घुसपैठ पढ़ते हुए सचमुच डर लगने लगता है कि क्या न्याय व्यवस्था स्त्री के प्रति, इतने हत्यारे अर्थों में खड़ी है ? यह सोचते, समझते और लिखते समय अवमानना का आतंक भी सामने आ खड़ा होता है ? पारदर्शी पूर्वग्रहों के पीछे की पृष्ठभूमि क्या है–कहना कठिन है. परन्तु इतना साफ दिखाई देता है कि कहीं-न-कहीं वृद्ध यौन कुंठाएँ चेतन-अवचेतन को भयंकर रूप से विक्षिप्त और विकृत कर चुकी हैं. ‘मांसल देह के ताप’ और ‘यौन सम्बन्धों के खेल’  की अवधारणा से अभिभूत न्यायमूर्ति दमित इच्छाओं की अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकात्मक या संकेतात्मक भाषा की बैसाखियों का सहारा लेते हैं. स्वयं से सवाल पूछते हैं, ‘क्या शीला ने सोलह गर्मियाँ नहीं देखीं ? यहाँ ‘गर्मियाँ शब्द का प्रयोग मौसम या वर्ष गणना के लिए नहीं किया गया लगता. वसन्त, सावन या सर्दी की अपेक्षा, ‘सोलह गर्मियाँ लिखने का असली अभिप्राय निश्चित रूप से वह नहीं है, जो पढऩे में आता है. जो अर्थ पढऩे में आता है, वह समझने में नहीं आता. दोनों अर्थों का अन्तर हम सब अच्छी तरह जानते-समझते हैं. क्या नहीं ? फैसला पढऩे के बाद महसूस होता है कि महावीर जो ‘खेल’ देह से खेल रहा था, क्या न्यायमूर्ति उसी खेल को दोबारा शब्दों में खेलना-देखना चाहते हैं ? न्यायमूर्ति की भाषा में महावीर मन ही मन सोच रहा है, ‘यह एक लम्बी यात्रा थी, जो एक दिन और रात खा गई. वरना वह इस समय का उपयोग भी देह उपभोग में करता. शायद कहीं गहरे में ईर्ष्या  और द्वेष भावना सिर उठा कहने-बताने लगती है, ‘दे प्लेड द गेम ऑफ सेंसुअल फ्लैश. और कहीं आहत अतीत या अनुभव समझता है ‘यह विश्वास करना असम्भव है कि वह खेल में शमिल नहीं थी.

भेष बदलते पुरुषों में यह पहचानना मुश्किल है कि कौन अपराधी है और कौन न्याय (धीश)। यह कैसा ‘खेल’ है जिसमें चारों ओर ‘पुरुष’ के बचाव में खड़े सुरक्षा प्रहरी कभी ‘सहमति से सम्भोग’ पर बहस करने लगते हैं और कभी उम्र के प्रश्न पर मतभेद. कानूनी मुद्दों पर न्यायमूर्ति के तर्क पूर्णतया विवेकसम्मत हो सकते हैं। हालाँकि न्यायिक विवेक और आलोचनात्मक व्याख्या की भी अपनी सीमा है, क्योंकि  पूर्व निर्धारित है. निर्णय सही-गलत हो सकता है. गलत होगा तो ‘ऊपरवाला’ सही कर देगा. लेकिन क्षमा करें मी लॉर्ड ! लिंग पूर्वग्रहों या व्यक्तिगत संस्कारों से ग्रस्त दुराग्रहों से रची यह भाषा, नि:सन्देह न्याय की भाषा नहीं कही जा सकती. मर्दवादी भाषा का कोई भी नकाब बीमार मानसिकता को छिपाने के लिए नाकाफी है. परपीड़ा में आनन्द खोजती, अवांछित भाषा का ऐसा शब्दजाल न्याय की गरिमा के अनुकूल नहीं. ‘आधी दुनिया’ की गरिमा के तो बिलकुल ही नहीं.
बलात्कार के मुकदमे में ‘सेक्स’ को ‘गेम’, स्त्री देह को ‘सेंसुअल फ्लैश’ और स्त्री-पुरुष को ‘खिलाड़ी’, मानकर चलना, स्वयं पितृसत्ता के उस सत्ता-विमर्श में शामिल हो जाना है, जहाँ स्त्री मात्र देह, वस्तु, भोग्या और सम्पत्ति है। ‘खेल’ के अन्त में न्यायमूर्ति घोषणा करते हैं ‘महावीर विंज द अपील’. महावीर की ‘विजय’ का अर्थ है-स्त्री देह पर विजय. यही तो है पुरुष वर्चस्व का भाषाशास्त्र. अदालतों में न्यायमूर्ति अपील ‘मंजूर’ करते हैं या ‘स्वीकार’ करते हैं. अभियुक्त अपराधी की ‘हार-जीत’ घोषित नहीं करते.



पितृसत्ता के प्रेत : ‘मर्यादाहीन’ स्त्रियाँ

आश्चर्यजनक है कि 1994 में भी स्त्री के प्रति न्याय की भाषा सदियों पुरानी पुरुष मानसिकता की शिकार है. वर्षों पूर्व लाहौर उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने बलात्कार के अपराधी को रिहा करते समय कहा था, ”अभियुक्त महिला की सहमति से सहवास कर रहा था. जब वह (औरत) सहवास करते हुए, रँगे हाथों पकड़ी गई तो स्वाभाविक है कि उसने अपनी लाज बचाने के लिए, वह कहानी गढ़ी कि अभियुक्त ने जबर्दस्ती उसे पकड़ लिया.3 ‘शी नेचुरेली कांकोक्टेड ए स्टोरी, टू सेव हर फेस’ न्यायिक नहीं, बल्कि सामन्ती शब्दावली है. लाहौर से दिल्ली तक, मर्द भाषा का यही ‘न्यायशास्त्र’ पढ़ा-पढ़ाया जाता रहा है. पटना उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने तो एक निर्णय में यहाँ तक कहा कि, ‘लेकिन…जहाँ एक औरत की कोई गरिमा (मान-सम्मान, मर्यादा) ही न हो, वहाँ किसी पुरुष द्वारा उसके साथ सम्भोग को अपराध नहीं कहा जा सकता है.4 इसी परम्परा में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने एक मुकदमे में कहा कि अभियुक्त द्वारा सात महीने की बच्ची के विशेषांगों से छेड़छाड़ करना कोई अपराध नहीं है, क्योंकि ”शी इज फिजिकली इंकेपेबल ऑफ हैविंग एनी सेंस ऑफ मॉडेस्टी.5 न्याय की भाषा के इस शिल्प या स्वरूप को मर्दों की घृणित और घिनौनी ‘मानसिक क्षमता’ का उदाहरण ही कहा जा सकता है वरना ऐसी हजारों न्याय गाथाएँ सुरक्षित हैं. इसी क्रम में त्रिपुरा उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354 की व्याख्या करते हुए कहा है कि इस धारा के अन्तर्गत अपराध के लिए ‘बलप्रयोग’ अनिवार्य है. ”जहाँ अभियुक्त के विरुद्ध सिर्फ यह साक्ष्य हो कि उसने अपने कपड़े उतारे और गुप्तांग महिला को दिखाए, यह अपने आपमें धारा 354 के तहत कोई अपराध नहीं होगा.6

 कानून की भाषा-परिभाषा से लेकर न्याय की भाषा तक, पितृसत्ता का यही रूप दिखाई पड़ता है. एक और ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, ”बलात्कार कांड को सिर्फ देखना भर, बलात्कार के अपराध की उत्प्रेरणा नहीं कहा जा सकता.7 सामाजिक जीवन से लेकर सिनेमा और टी.वी. के पर्दे तक पर हो रहे बलात्कारों को देखना (और आनन्द उठाना) कोई अपराध नहीं. शौक से देखिए-दिखाइए. ‘रेप-सीन’ अभी और भी हैं, आप इसे देखते रहिए. ‘इनसाफ का तराजू’, ‘मेरी आवाज सुनो’ और ‘जख्मी औरत’ से लेकर ‘बैंडिट क्वीन’ तक. सम्पूर्ण मर्दवादी ढाँचे में पूर्वग्रहों और ‘मनुवाद’ से आतंकित, कानूनी व्याख्या में न्याय की भाषा का एक और भयावह रूप पेश होता है.स्वाति लोढा बनाम राजकुमार.8 इस मुकदमे में राजकुमार ने स्वाति से बिना विवाह  किए ही देह सम्बन्ध स्थापित किया. स्वाति गर्भवती हो गई. राजकुमार ने दूसरी स्त्री से विवाह कर घर बसा लिया. इस पर स्वाति ने राजकुमार पर बलात्कार का मुकदमा दायर किया और प्रमाण के लिए राजकुमार और उससे उत्पन्न हुए बच्चे के डी.एन.ए. टेस्ट की माँग की. राजस्थान उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा, ”स्वाति में एक वह माँ नहीं बोल रही जो बच्चे के किसी कानूनी अधिकार के लिए, उसके माता-पिता का निर्धारण करवाना चाहती है. यह एक स्त्री के प्रतिशोध का परिणाम है, जो वह राजकुमार के खिलाफ ले रही है, जिसने उसका कौमार्य, अस्मिता और पवित्रता भंग करने के बाद किसी दूसरी स्त्री से शादी कर ली है. यहाँ कौमार्य या पवित्रता को लेकर जो कहा जा रहा है, लगता है वह राजकुमार कह रहा है. यह है मर्दवादी भाषा का चमत्कार. इसी फैसले में यह टिप्पणी भी उल्लेखनीय है, ”उसके गन्दे कपड़ों के बारे में बताया गया है कि वे धो दिए गए हैं, यद्यपि राजकुमार के कथित गन्दे कपड़ों को अदालत में पेश करने की माँग की गई है.9 न्याय की माँग करनेवाली स्त्री की बात ‘प्रतिशोध का परिणाम’ लगती है क्योंकि ‘उसका कौमार्य, अस्मिता और पवित्रता भंग’ हो चुकी है. ‘गन्दे कपड़े’ धुल सकते हैं, लेकिन ऐसी भाषा का कोई क्या करे ?

बलात्कार मृत्युजनक शर्म है–सिर्फ स्त्री के लिए

इससे भी अधिक पेचीदा स्थिति वहाँ आती है, जहाँ न्याय की भाषा स्त्री के पक्ष में बोलती दिखती है. एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री आर. कृष्ण अय्यर लिखते हैं, ”कोई भी प्रतिष्ठित महिला किसी पर भी बलात्कार का आरोप नहीं लगाएगी क्योंकि ऐसा करके वह जो बलिदान करती है, वही तो उसे सबसे अधिक प्रिय है.10 यहाँ ‘विमेन ऑफ ऑनर’ यानी प्रतिष्ठित महिला की परिभाषा में वेश्या, कॉलगर्ल या चरित्रहीन औरतें शामिल नहीं हैं और न ‘दोहरा अभिशाप’ झेलती वे गरीब, हरिजन और आदिवासी औरतें, जो बिना किसी ‘मानवीय गरिमा’ या किसी भी ‘गरिमा’ की निर्धनता-रेखा से नीचे जी रही हैं. तर्क के दूसरी ओर यह छिपा है कि प्रतिष्ठित स्त्री को बलात्कार का आरोप लगाने की जरूरत नहीं और अप्रतिष्ठित को ऐसा आरोप लगाने का हक नहीं. यहाँ आर्थिक-भेद और लिंग-भेद किस कदर मिल-जुल गए हैं कि एक ओर तर्क से अमीर स्त्री की प्रतिष्ठा को उसका बन्धन बनाया जा रहा है दूसरी ओर गरीब स्त्री को प्रतिवाद के हक से वंचित किया जाता है वह तो ऐसी थी ही.उपरोक्त निर्णय से पचास साल पहले भी अदालत ऐसी ही भाषा बोल रही थी. ”यह बहुत ही कम सम्भावना है कि कोई आत्मस्वाभिमानी औरत न्याय की अदालत में आगे आकर अपने साथ हुए बलात्कार के बारे में, अपने सम्मान के विरुद्ध शर्मनाक बयान देगी, बशर्ते कि यह पूर्ण रूप से सच न हो.11 या (पूर्ण रूप से झूठ ‘इज्जतदार औरतें’ तो बलात्कार सच में हो जाने पर भी किसी को नहीं बतातीं, शर्म के मारे डूबकर या जलकर मर जाती हैं. पचास सालों में ‘आत्मस्वाभिमानी औरत’ की जगह ‘प्रतिष्ठित महिला’ ने ले ली. चूँकि स्त्री के लिए बलात्कार मृत्युजनक शर्म है.12 इसलिए चुप रहो। बेकार ‘शर्मनाक बयान’ देने से क्या फायदा ? ‘न्याय के प्रहरी’ इससे ज्यादा स्पष्ट और क्या कहें ? हर बार महसूस होता है कि स्त्री के प्रति वह न्याय की भाषा नहीं बल्कि क्रूरता  और दमन की भाषा है. पितृसत्ता द्वारा जारी आदेश और अध्यादेश की भाषा है. न्याय के नाम पर पीढिय़ों से विरासत में मिली अन्याय की भाषा है. बलात्कारी भाषा. मर्दवादी भाषा कहती है, मर्द को बर्दाश्त कर ! बस ! यह भाषा न्यायालय की है. न्यायालय भी तो मर्दवादी हो सकता है.
क्रमशः….

मुसलमान भी नहीं पैदा करना चाहते बेटियां

नासिरूद्दीन हैदर खाँ


नासिरूद्दीन हैदर खाँ पेशे से पत्रकार हैं और जेंडर जिहाद के संपादक हैं .

‘..और (इनका हाल यह है कि) जब इनमें से किसी को लड़की पैदा होने की खुशखबरी दी जाती है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह तकलीफ में घुटने लगता है। जो खुशखबरी उसे दी गयी वह उसके लिए ऐसी बुराई की बात हुई कि लोगों से छिपा फिरता है। (सोचता है) अपमान सहन करते हुए उसे जिंदा रहने दे या उसे मिट्टी में दबा दे।’                     (कुरान: सूरा अल-नहल आयत ५८-५९)

यह चौदह सौ साल पहले का अरब समाज का चेहरा था, जिसका जि़क्र क़ुरान की इस आयत में आता है. …मगर इन चौदह सौ सालों में कुछ नहीं बदला तो बेटियों के पैदा होने का दु:ख ! क़ुरान की दुहाई देने वाले कितने मुसलमान हैं, जो बेटी की पैदाइश को ख़ुशख़बरी मानते हैं और लड्डू बाँटते हैं ? आज भी ‘बेटी’ सुनते ही ज्यारदातर लोगों का चेहरा स्याह पड़ जाता है. ..यह आयत आज के भारतीय समाज पर पूरी तरह सटीक है.
आम तौर पर बार-बार बताया जाता है कि इस्लाम ने औरतों को काफी हुक़ूक़ दिए हैं. सचाई भी है. लेकिन क्या वाक़ई में ‘मर्दिया सोच के अलम्बरदार’ मुसलमान औरतों को वे हक़ दे रहे हैं ? और कुछ नहीं तो सिर्फ जि़दगी का हक़ ! जी हाँ, पैदा होने और जिंदा रहने का हक़. (आगे पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें)

सन् 2001 की जनगणना कई मायनों में अहम है. यह पहली जनगणना है, जिसके आँकड़े विभिन्न मज़हबों की सामाजिक-आर्थिक हालत का भी आँकड़ा पेश करती है. इसने कई मिथक तोड़े, तो कई नए तथ्य उजागर भी किए. एक मिथक था कि मुसलमानों में लिंग चयन और लिंग चयनित गर्भपात नहीं होता ! सन् 2001 की मरदुमशुमारी के मुताबिक मुसलमान देश की कुल आबादी का 13.4 फीसदी हैं. यानी करीब तेरह करोड़ इक्यासी लाख अट्ठासी हजार. इसमें मर्दों की आबादी सात करोड़ तेरह लाख (7,13,74,134) है. क़ायदे से इतनी ही या इससे ज्यादा औरतें होनी चाहिए. लेकिन इस आबादी में मर्दों के मुकाबले पैंतालीस लाख साठ हजार (45,60,028) मुसलमान औरतें कम हैं या कहे गायब हैं. यानि  कल्पना करें कि एक सुबह जब हम उठें तो पता चले कि लखनऊ और मथुरा में रहने वाले सभी लोग गायब हो गये हैं. … उस सुबह कोहराम मचेगा या जिंदगी हर रोज़ की तरह इत्मीनान से चलेगी ? अफसोस, इतनी तादाद में मुसलमान औरतें गायब हैं, लेकिन किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती.

तत्कालीन अरब समाज के कई कबीलों में लड़कियों की पैदाइश को अपशगुन माना जाता था और उन्हें मार डालने की रवायत थी और चौदह सौ साल पहले क़ुरान ने और इस्लाम ने इसे बड़ा जुर्म माना. (कुरान के सूरा अत-तकवीर की आयत (एक से नौ) है)- जब सूरज बेनूर हो जायेगा/ और जब सितारे धूमिल पड़ जाएँगे/ जब पहाड़ चलाये जाएँगे/../ और जब दरिया भड़काए जाएँगे/../ और जब जिंदा गाड़ी हुई लड़कियों से पूछा जाएगा/ कि वह किस गुनाह पर मार डाली गई. यानि  मुसलमानों से कहा गया कि उस वक्त को याद करो जब उस लड़की से पूछा जाएगा जिसे जिंदा गाड़ दिया गया था कि किस जुर्म में उसे मारा गया. इस तम्बीह का आज के मुसलमान कितना पाबंद हैं, देखें. आज बेटियों को जिंदा गाड़ने की ज़रूरत नहीं है बल्कि रहम (गर्भ) की जाँच कराकर उसे खत्म कर दिया जा रहा है. इस लिहाज़ से क़ुरान की आयत की रोशनी में यह भी गलत है.

औरतें कहीं हवा में गायब नहीं हो गईं, बल्कि खुद मुसलमान, बेटों की ललक में उन्हें पैदा ही नहीं होने दे रहे. हिन्दुओं, सिखों और जैनियों की तरह मुसलमान भी ‘बिटिया संहार’ में शामिल हैं. उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड की सबसे ज्यादा मुसलमान आबादी वाले शहर बांदा, पूरी दुनिया में तहजीब का झंडा उठाने वाले शहर लखनऊ और इल्म के मरकज़ अलीगढ़ और दारुल उलूम, देवबंद की वजह से बार-बार चर्चा में रहने वाली धरती सहारनपुर में मुसलमान जोड़े अपनी आने वाली औलाद की सेक्स की जाँच करा रहे हैं और लड़की को पैदा नहीं होने दे रहे. (जाहिर है सब ऐसा नहीं करते) ऐसी ही हालत गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में भी है. कहीं काफी पहले से ही दूसरे मज़ाहिब के लोगों की ही तरह बेटी नहीं पैदा होने दी जा रही थी तो कहीं अब देखा-देखी यह चलन जोर पकड़ रहा है.

बेटियों को गायब करने का काम तहज़ीब याफ्ता मुसलमान ख़ानदान, पढ़े-लिखे, धनी, ज़मीन वाले, और शहरों में रहने वाले सबसे बढ़ कर कर रहे हैं. इस काम में मुसलमान डॉक्टर भी खुलकर मदद दे रहे हैं. क्यों ? क्योंकि बेटियों को पैदा न होने देने का धँधा काफी मुनाफे वाला है. मुसलमानों की आबादी के लिहाज से उत्तर प्रदेश काफी अहम है. यहाँ की आबादी में साढ़े अट्ठारह (18.5) फीसदी यानी तीन करोड़ सात लाख चालीस हजार (30,740,158) मुसलमान हैं. यहाँ की मुसलमान आबादी में तेरह लाख 16 हजार बेटियाँ गायब हैं. यानी, मुसलमान लड़कियों को गायब करने में अकेले यूपी का हिस्सा करीब 29 फीसदी है बाकि में देश के पूरे राज्य ! यहाँ के चंद मुस्लिम बहुल जिलों का हाल जान लें. अलीगढ़ की आबादी से करीब 33 हजार लड़कियाँ लापता हैं. अलीगढ़ का लिंग अनुपात, मतलब एक हजार लड़कों पर लड़कियों की तादाद, 883 है। इसी तरह लखनऊ में करीब साढ़े सात लाख (748687) मुसलमान हैं. यहाँ मर्दों के मुकाबले करीब लगभग चौंतीस हजार (34169) मुसलमान औरतें कम हैं.

मर्दों के मुकाबले सहारनपुर में सत्तहत्तर हजार तो मुजफरनगर में करीब चौहत्तर हजार, बिजनौर में 58 हजार और कानपुर शहर में करीब चालीस हजार मुसलमान औरतें कम हैं. इनमें हर उम्र की औरत शामिल हैं और वह भी शामिल है जिसे यह जानकर पैदा नहीं होने दिया गया कि वो लड़की है और जिनके साथ लड़की होने के नाते जिंदगी में हर कदम पर भेदभाव किया गया और मौत के मुँह में ढकेल दिया गया. इनमें से कइयों को सिर्फ इसलिए मार दिया गया कि वे अपने साथ मोटा दहेज लेकर नहीं आई थी. बेटियों को गायब करने का काम तहज़ीब याफ्ता मुसलमान ख़ानदान, पढ़े-लिखे, धनी, ज़मीन वाले, और शहरों में रहने वाले सबसे बढ़ कर कर रहे हैं. इस काम में मुसलमान डॉक्टर भी खुलकर मदद दे रहे हैं. क्यों, क्योंकि बेटियों को पैदा न होने देने का धँधा काफी मुनाफे वाला है. इस मसले के सामाजिक पहलू पर नजर डाली जाए तो अंदाजा होता है कि समाज में लड़कियों को कमतर समझने का रुझान तो था ही मगर दहेज के बढ़ते रिवाज ने अब इनकी जिंदगियों को ही खतरे में डाल दिया है.



पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश आर्थिक रूप से काफी खुशहाल हैं लेकिन वहाँ भी बेटियाँ अनचाही हैं. सबसे बढ़कर तकनीक की तरक्की ने लड़कियों के खिलाफ पहले से ही मौजूद पितृसत्तात्म विभेद की खाई को और ज्यादा गहरा करने का काम किया है. तकनीक का इस्तेमाल डिजायनर फेमिली बनाने में किया जा रहा है. यानि एक बेटा या दो बेटे या एक बेटा और एक बेटी. बिटिया संहार का नतीजा, हमारे सामने आ रहा है. लड़कियाँ तो लड़कों की चाह में गायब की गईं लेकिन कभी किसी ने सोचा, लड़कों की दुल्हन कहाँ से आयेगी ! यही नहीं ये तो क़ुदरत के निज़ाम को बर्बाद करना है. कुरान की रोशनी में अगर आज के हालात में अगर यह कहा जाए कि और उस वक्त को याद करो जब बेटियों से यह पूछा जाएगा कि किस बिना पर तुम पेट में ही पहचान कर मार डाली गयी. आप ही बताएँ कि उस लड़की का क्या जवाब होगा ? कहीं वह यह तो नहीं कहेगी-
ओरे विधाता, बिनती करुँ, परुँ पइयाँ बारम्बार
अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो, चाहे नरक में दीजो डार

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

 न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.


“The Ideology of rape is aided by more than a system of linient laws that serve to protect offenders and is abetted by more than the fiat of total male control over the lawful use of power. The ideology of rape is fueled by cultural, values that are perpetuated at every level of our society, and nothing less than a frontal attack is needed to repel this cultural attack.”
(Susan Brownmiller in Against Our will : Men,
Women and Rape, Page 389)
“Viewing of violent pornography results in higher rates of aggression against women by male subjects.”
(Diana E.H. Russell in pornography : Women
violence and Civil liberties, page 374)
“There are certainly more rapes committed in marriage than out side.” (Havelock Ellis)

बलात्कार के (सरकारी) आँकड़े पूर्ण रूप से अविश्वसनीय हैं क्योंकि बलात्कार की सभी दुर्घटनाएँ आँकड़ों पर पहुँचती ही नहीं. फिर भी जो आँकड़े उपलब्ध हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि इस प्रकार की दुर्घटनाएँ निरन्तर बढ़ रही हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट (1996) के अनुसार, देश भर में 1996 में 14,849 बलात्कार हुए, जबकि 1990 में यह संख्या 10,068 थी. यानी 1990 के मुकाबले 1996 में 47.5 प्रतिशत अधिक बलात्कार हुए. 1995 में बलात्कार के अपराधों की संख्या 13,774 थी, इसलिए पिछले वर्ष से 1996 में सिर्फ 7.8 प्रतिशत अधिक अपराध हुए. कहा यह भी जा सकता है कि अपराधों की ‘रिपोर्टिंग बढ़ रही है. कुछ संवेदनशाली विद्वानों का कहना है, ”अपराधों की बढ़ोतरी को जनसंख्या के अनुपात में देखें तो अपराध कहाँ बढ़ रहे हैं ?  एक और तर्क (कुतर्क) यह भी दिया जाता है कि कुल अपराधों की तुलना में स्त्री के प्रति अपराध का प्रतिशत तो सिर्फ  6.8 ही है.


आँकड़ों का आतंक

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी 1996 की रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 88 पर तालिका 7.2 में बलात्कार के आँकड़े कहते हैं कि 1994 में 12,351, 1995 में 13,774 और 1996 में 14,849 बलात्कार हुए. लेकिन इसी रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 90 पर तालिका 7.4 कहती है कि 1994 में 13,218, 1995 में 13,774 और 1996 में 14,649 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए. एक तालिका के अनुसार 1994 में 12,351 बलात्कार हुए और दूसरी के अनुसार 13,218 यानी 867 बलात्कार के मामलों का घपला है. किसे सही माना जाए और किसे गलत ? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 1994 वाली रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 212 पर 1994 में बलात्कार के अपराध का आँकड़ा 12,351 ही है. 1995 की रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 222 में भी 1994 में हुए बलात्कारों की संख्या 12,351 ही दिखाई गई है. लेकिन क्रमश: पृष्ठ 216 और 226 में बनाई तालिका में यह संख्या 13,218 प्रकाशित हुई है. 1994 की रिपोर्ट (पृष्ठ 212) के अनुसार 1993 में 11,242, 1992 में 11,112 बलात्कार के केस दर्ज हुए लेकिन इसी रिपोर्ट के पृष्ठ 216 पर बनी तालिका के अनुसार 1993 में 12,223 और 1992 में 11,734 बलात्कार हुए। मतलब यह है कि 1993 में 981 और 1992 में 622 बलात्कार के मामलों का घपला है. 1992 से 1996 तक कुल 2,493 बलात्कार के मामलों का यह अन्तर किसी की भी समझ से बाहर का मामला है. आँकड़ों के इस ‘घपले पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ही स्थिति स्पष्ट कर सकता है. तीन सालों में आँकड़े क्या ‘भूलवश छपते रहे हैं और छपते रहेंगे ? यह मात्र एक उदाहरण है, घपले अभी और भी हैं. शेष फिर कभी.

यौन हिंसा की शिकार युवा स्त्री

1996 में हुए 14,849 बलात्कारों में से 8,281 (55.76 प्रतिशत) 16 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ और 3,475 (23.4 प्रतिशत) 10 से 16 वर्ष की किशोरियों के साथ हुए। दोनों को जमा करें तो मालूम होगा कि 79.16 प्रतिशत बलात्कार की शिकार स्त्रियाँ 10 से 30 वर्ष की थी.  30 वर्ष से अधिक उम्र की स्त्रियों के साथ बलात्कार के अपराध 608 (4.1 प्रतिशत) हैं. संक्षेप में, लगभग 80 प्रतिशत बलात्कार 10 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ और करीब 20 प्रतिशत बलात्कार 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों और 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ हुए. स्पष्ट है कि युवा स्त्रियों के साथ बलात्कार की सम्भावना सबसे अधिक रहती है.

गत वर्ष की तुलना में 

हालाँकि प्रतिशत की भाषा में 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ हुए बलात्कार लगभग 4 प्रतिशत ही हैं, लेकिन यह प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है. इसलिए गम्भीर चिन्ता का विषय है.बच्चियों के बढ़ते बलात्कार को अधिक गम्भीर कहने का मतलब यह नहीं है कि शेष बलात्कारों को गम्भीर अपराध न माना जाए. 1996 में 10 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए बलात्कार का आँकड़ा 1990 से 394 से बढक़र 608 हो गया है. 1990 के मुकाबले 1996 में 54.3 प्रतिशत अधिक बलात्कार हुए मगर 1995 में हुए 747 बलात्कारों की तुलना में 18.6 प्रतिशत घट गए हैं. 1991 में आश्चर्यजनक रूप से यह संख्या पिछले वर्ष की अपेक्षा 47.12 प्रतिशत बढक़र 1,099 हो गई थी. इन दोनों ही सालों में हुई आश्चर्यजनक बढ़ोतरी या घटोतरी विश्वास योग्य नहीं लग रही. 1996 के आँकड़ों की तुलना अगर 1991 के आँकड़ों से करें तो सारे प्रतिशत उलट-पुलट हो जाते है. 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार में 44.3 प्रतिशत की कमी और 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं से बलात्कार में 88 प्रतिशत वृद्धि यह असम्भव नहीं मगर…विश्वास योग्य भी नहीं. इसके विपरीत, 1996 में 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ 2,485 बलात्कार हुए। 1995 में यह संख्या 1955 है.

 कहने का अभिप्राय यह है कि 1996 में 1,995 की तुलना में बलात्कार 27.1 प्रतिशत अधिक हुए हैं. 1991 में 1990 की तुलना में जहाँ 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार 178.9 प्रतिशत बढ़ गया था, वहीं 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ 14.4 प्रतिशत और 16 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ 10.8 प्रतिशत घट गया था. 1992 में अचानक 10 वर्ष की उम्र की बच्चियों से बलात्कार 1,099 से घटकर 532 (51.5 प्रतिशत कम) हो गया लेकिन 16.30 वर्ष के वर्ग में 30 प्रतिशत और 30 वर्ष से अधिक वर्ग में 22.8 यानी 52.8 प्रतिशत बढ़ गया. अगर ये आँकड़े सचमुच विश्वनीय हैं तो इसका विस्तार से विवेचन आवश्यक है कि इन वर्षों में ऐसा होने के पीछे कौन से कारण या स्थितियाँ सक्रिय थी. कहीं यह आँकड़ों की उलटफेर ही तो नहीं है ? 1991 के आँकड़ों में कहीं कुछ गम्भीर गड़बड़ है। इसके आधार पर तो नतीजे एकदम काल्पनिक लगते हैं. क्या नहीं ?



सात सालों में हिंसा

खैर…1990 से 1996 तक हुए बलात्कार के अपराधों को देखें तो सात सालों में 86,291 बलात्कार हुए. 4,748 (5.5 प्रतिशत) 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ, 20,114 (23.3 प्रतिशत) 10 से 16 वर्ष की किशोरियों के साथ, 48,918 (56.7 प्रतिशत) 16 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ और 12,511 (14.5 प्रतिशत) 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ हुए. साफ दिखाई देता है कि 16 से 30 वर्ष की युवा स्त्रियाँ सबसे अधिक बलात्कार की शिकार बनी.  80 प्रतिशत बलात्कार के मामलों में महिलाओं की उम्र 10 से 30 साल है. 22.8 प्रतिशत बलात्कार के मामले सिर्फ 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए. उल्लेखनीय है कि 16 वर्ष से कम उम्र की लडक़ी से सहवास बलात्कार ही माना जाता है, भले ही सहमति हो.


प्रतिशत की भाषा

हालाँकि बलात्कार की शिकार अधिकांश महिलाओं की उम्र 16 से 30 साल के बीच रहती है लेकिन 1990 की तुलना में 1996 में इस वर्ग में सबसे कम 37.4 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है. सबसे अधिक अपराध (65.1 प्रतिशत) 10 से 16 वर्ष की किशोरियों के साथ बढ़े. 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ 6.12 प्रतिशत और 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ 54.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. मतलब यह है बलात्कार के मामलों में 16-30 वर्ष की स्त्रियों की संख्या सबसे अधिक रही है, परन्तु 1990 की अपेक्षा 1996 में 10-16 वर्ष की किशोरियों के साथ हुए बलात्कारों का प्रतिशत सबसे अधिक बढ़ा है. कहा जा सकता है कि इस वर्ग की लड़कियों के साथ बलात्कार की आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ रही है. जहाँ कुल अपराधों का 1996 में प्रतिशत (1990 की तुलना में) 47.5 प्रतिशत बढ़ा है, वहाँ 10-16 वर्ष की किशोरियों के साथ बलात्कार की दुर्घटनाएँ 65.1 प्रतिशत अधिक हो गई हैं.
1990 से 1996 तक हुए बलात्कारों में 71 प्रतिशत बलात्कार 16 साल से अधिक उम्र की स्त्रियों के साथ और 29 प्रतिशत बलात्कार 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए हैं. 1990 में यही प्रतिशत क्रमश: 75 प्रतिशत और 25 प्रतिशत के लगभग था. अभिप्राय यह है कि पिछले सात सालों में जहाँ 4 प्रतिशत बलात्कार 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ बढ़े हैं, वहीं 16 वर्ष से अधिक उम्र की स्त्रियों के साथ हुए बलात्कारों में 4 प्रतिशत की कमी हुई है. यह 4 प्रतिशत का परिवर्तन बेहद महत्त्वपूर्ण बदलाव की ओर संकेत देता है। इस बदलाव के सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों को रेखांकित करने के लिए अपराध और संचार माध्यमों की भूमिका को भी देखना पड़ेगा.

रिपोर्ट के अनुसार देश के 23 महानगरों में वर्ष 1996 के दौरान 545 बलात्कार 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ, और 456 केस 16 से 30 वर्ष की स्त्रियों के साथ और 95 मामले 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ हुए. शहरी क्षेत्रों में 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा लगभग दो गुना है. 16 वर्ष से बड़ी उम्र की स्त्रियाँ शहरी क्षेत्रों में अन्य की तुलना में 20 प्रतिशत कम बलात्कार की शिकार हुई हैं. 1996 में हुए 14,849 बलात्कार के मामलों में से मध्य प्रदेश में 3,265 (22 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश में 1,854 (12.5 प्रतिशत), बिहार में 1,453 (9.8 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 1,444 (9.7 प्रतिशत), राजस्थान में 1,162 (7.8 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल में 855 (5.8) प्रतिशत हुए। दिल्ली में 484 (3.3 प्रतिशत) बलात्कार के केस दर्ज किए गए. जनसंख्या के अनुसार अपराध दर, सबसे अधिक मध्य प्रदेश (4.4 प्रतिशत) और दिल्ली (4.37 प्रतिशत) में रही. 1994 की अपेक्षा 1996 में जहाँ उपरोक्त राज्यों में (बिहार और दिल्ली के अलावा) बलात्कार के अपराधों में कमी आई है, वहाँ बिहार और दिल्ली के साथ-साथ केरल, हरियाणा, उड़ीसा, पंजाब, सिक्किम और त्रिपुरा में भी बलात्कार के अपराधों में बढ़ोतरी हुई है. इसके आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों की जाँच-पड़ताल अनिवार्य है.

दिल्ली और हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी का शासन रहा है और बिहार में लालू यादव का. बिहार में 1994 में जहाँ 823 (6.7 प्रतिशत) बलात्कार रिकॉर्ड हुए थे, वहाँ 1996 में यह संख्या बढक़र 1,453 (9.8 प्रतिशत) पर पहुँच गई है. दिल्ली में 1994 में 261 (2.1 प्रतिशत) से बढक़र 1996 में 484 (3.3 प्रतिशत) वृद्धि हुई है. आश्चर्यजनक रूप से हरियाणा में भी 1994 में 198 बलात्कार का आँकड़ा बढक़र 336 पर पहुँच गया.
इसी सन्दर्भ में थोड़ा और पीछे मुडक़र देखने पर पता चलता है कि जहाँ 1976 में 3,893 बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे, वहाँ 1978 में यह संख्या बढक़र 4,559, 1980 में 5023, 1984 में 6,203, 1985 में 6,356 और 1988 में 6,888 हो गई थी. अगर 1976को आधार वर्ष मानें तो 1996 में 282 प्रतिशत बलात्कार हुए हैं. दिल्ली में 1985 में 88, 1986 में 97, 1987 में 104, 1988 में 127, 1989 में 161, 1990 में 196, 1991 में 214 बलात्कार बढक़र 1996 में 419 हो गए। 1985 की अपेक्षा 1996 में यह भयावह वृद्धि 376 प्रतिशत बैठती है.


सबसे आगे कौन?

16 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के मामले में भी मध्य प्रदेश (873), उत्तर प्रदेश (535), महाराष्ट्र (453), आन्ध्र प्रदेश (269), दिल्ली (269), पश्चिम बंगाल (251) और बिहार (217) सबसे आगे रहे। उपरोक्त राज्यों में ही कुल बलात्कारों का प्रतिशत 70.7 बैठता है। 30 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के साथ मध्य प्रदेश (95), महाराष्ट्र (60), दिल्ली (67), उत्तर प्रदेश (49), आन्ध्र प्रदेश (48) और पंजाब में (46) बलात्कार दर्ज हुए. 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के लिए सबसे अधिक खतरनाक शहर इस देश की राजधानी दिल्ली ही है, जहाँ 1996 में 232 बलात्कार हुए। इसके बाद बम्बई में (97), बंगलौर में (24), भोपाल में (19) और पुणे में (24) मामले रिकॉर्ड किए गए. उल्लेखनीय है कि अधिकांश महानगरों में 98 प्रतिशत बलात्कार 30 वर्ष तक की महिलाओं के साथ और 2 प्रतिशत इससे बड़ी उम्र की स्त्रियों के साथ हुए. कुछ महानगरों में, जैसे—हैदराबाद, लुधियाना, मद्रास, मदुरै, सूरत, बड़ौदा में 100 प्रतिशत बलात्कार सिर्फ 30 वर्ष से कम उम्र की स्त्रियों के साथ ही हुए। बलात्कार ही नहीं, स्त्री के प्रति हिंसा और अपराध में भी दिल्ली सबसे आगे है. यहाँ अपराध 23.5 प्रतिशत है जबकि महाराष्ट्र में 14.3, मध्य प्रदेश में 12.9 और उत्तर प्रदेश में 11.8 प्रतिशत है.

अनुसूचित जाति की महिलाओं के साथ 1994 में 992, 1995 में 873 और 1996 में 949 बलात्कार हुए. इनमें से 34 प्रतिशत बलात्कार अकेले उत्तर प्रदेश में हुए. अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के साथ 1996 में 385, 1995 में 369 और 1996 में 314 बलात्कार की दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें से करीब 53 प्रतिशत अकेले मध्य प्रदेश में हुई. हालाँकि हर साल यह संख्या घट रही है, लेकिन स्थिति चिन्ताजनक है. अनुसूचित जाति पर हुए अपराधों में उत्तर प्रदेश (35 प्रतिशत), राजस्थान (21 प्रतिशत) और मध्य प्रदेश (13 प्रतिशत) सबसे प्रमुख हैं। इन तीनों प्रदेशों का कुल हिस्सा ही 69 प्रतिशत बैठता है. अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध अपराधों में मध्य प्रदेश (29.4 प्रतिशत), राजस्थान (28 प्रतिशत), गुजरात (7.4 प्रतिशत), महाराष्ट्र (6.8 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (6.7 प्रतिशत) प्रमुख हैं. जनजातियों के विरुद्ध अपराधों का करीब 78 प्रतिशत अपराध इन पाँच राज्यों में हो रहा है. राजस्थान में जनजातियों व अनुसूचित जातियों के प्रति अपराध समान रूप से जारी है. बलात्कारियों का वर्ग, वर्ण और जाति के आधार पर विवेचन उपलब्ध नहीं है.



न्याय में देर या अँधेर?

ब्यूरो रिपोर्ट के अनुसार 1995-96 में पुलिस के पास जाँच के लिए क्रमश: 18,914 और 19,963 बलात्कार के मामले आए. इनमें से सिर्फ 72-73 प्रतिशत मामलों में जाँच-पड़ताल होने के बाद सिर्फ 62-63 प्रतिशत मामले लटके पड़े रहे. दूसरी तरफ देश-भर में 1995 में 47,084 और 1996 में 51,734 बलात्कार केस सुनवाई के लिए थे. इनमें से केवल 16-17 प्रतिशत की सुनवाई हो पाई, शेष 83 प्रतिशत मामले अधर में लटके रहे. 1995 में जहाँ 5 प्रतिशत अपराधियों को सजा हुई, वहाँ 1996 में यह सजा घटकर 4.5 प्रतिशत ही रह गई. 1996 में अन्त तक बलात्कार के 43,016, अपहरण के 36,470 दहेज हत्या के 14,133, छेड़छाड़ के 72,539, यौन उत्पीडऩ के 8,656, पति व सम्बन्धियों द्वारा क्रूरता के 83,195, वेश्यावृत्ति के 4,799, दहेज के 6,175, अश्लील प्रदर्शन के 500 और सती के 3 मुकदमों का फैसला होना बाकी था. अदालतों ने 1995-96 में वेश्यावृत्ति के 60-61 प्रतिशत मामलों का फैसला सुनाते हुए करीब 53-54 प्रतिशत अपराधियों को सजा सुनाई. कहने की आवश्यकता नहीं है कि इनमें से अधिकांश अपराधी स्वयं वेश्या (स्त्री) ही रही होंगी. सती के तीनों मुकदमों में कोई फैसला नहीं हो पाया. अदालतों में सालों की देरी और कानूनी चोर दरवाजों से अधिकांश अपराधियों के साफ बच निकल जाने का परिणाम है कि स्त्री के प्रति यौन हिंसा लगातार बढ़ रही है.


घर या वधस्थल

उपरोक्त आँकड़ों के विवेचन, विश्लेषण और अध्ययन के आधार पर नि:सन्देह यह स्पष्ट होता है कि 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ यौन हिंसा के अपराध लगातार बढ़ रहे हैं विशेषकर महानगरों में, अधिकांश बलात्कारी नजदीकी रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त या परिचित होता है. पिता, भाई, चाचा, ताऊ, मामा वगैरह द्वारा भी बलात्कारों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है. कम उम्र की बच्चियों की प्राय: बलात्कार के बाद हत्या कर दी जाती है या आघात से मृत्यु हो जाती है. कुछ मामलों में बलात्कार की शिकार लडक़ी सामाजिक अपमान और लज्जा के कारण आत्महत्या कर लेती है.



मीडिया की भूमिका


यह मात्र संयोग नहीं है कि जैसे-जैसे अश्लील और यौन साहित्य, फिल्म, वीडियो वगैरह बढ़े हैं, वैसे-वैसे यौन अपराध बढ़ते गए हैं. बड़ी उम्र की लड़कियों या स्त्रियों के विरोध-प्रतिरोध और शिकायत से बचने के लिए 16 वर्ष से कम उम्र की अबोध बच्चियों से बलात्कार के अपराध बढ़े हैं. इन्हें बहलाना, फुसलाना या काबू करना
अपेक्षाकृत आसान है. दूसरा कारण अक्षत योनि की आदिम आकांक्षा भी है और विक्षिप्त यौन कुंठाएँ भी. इसके अलावा किशोर उम्र के लडक़ों द्वारा कम उम्र की बच्चियों के साथ यौन अपराध की प्रवृत्ति भी लगातार बढ़ रही है. नाबालिग किशोर युवकों द्वारा कम उम्र की बच्चियों से दुष्क र्म (बलात्कार) भी हर साल बढ़ता जा रहा है. संचार माध्यमों में बढ़ा ‘सेक्स और हिंसा का प्रदर्शन, समाज में भी यौन अपराधों के बढऩे में ‘उत्प्रेरक का काम करता है. जैसे-जैसे नारी चेतना और मुक्ति के स्वर पहले से अधिक मुखर होकर सामने आए हैं वैसे-वैसे स्त्री के विरुद्ध हिंसा (यौन हिंसा) बढ़ी है. जितना विरोध और प्रतिरोध बढ़ रहा है, उससे ज्यादा यौन अपराध बढ़ रहे हैं.

यौन हिंसा का मुख्य कारण काम-पिपासा शान्त करना या मानसिक विक्षिप्तता कम, बदला लेना अधिक है. अपराधियों को सुधारवादी-उदारवादी न्याय नीति के अन्तर्गत कम सजा देने सेे ‘न्याय का लक्ष्य भले ही पूरा हो जाए मगर इस प्रकार के अपराधों को बढ़ावा ही मिलता है. दंड-भय ही न रहे तो अपराध कैसे कम (समाप्त) होंगे !कानून व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन के साथ-साथ जरूरी है सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक सोच में बदलाव. बलात्कारियों का मृत्युदंड की ‘हवाई घोषणाओं से क्या होना है? यौन हिंसा के ये आँकड़े और आँकड़ों का तुलनात्मक जमा-घटा सिर्फ संकेत मात्र है. स्त्री के विरुद्ध पुरुष द्वारा की जा रही यौन हिंसा की वास्तविक स्थिति (सरकारी) आँकड़ों से कहीं अधिक विस्फोटक, भयावह और खतरनाक है.
क्रमशः 

उपभोक्तावादी आधुनिकता की आजादी के बीच स्त्री

सुनीता

 शोधार्थी,  हिन्दी साहित्य, आंबेडकर  विश्वविघालय दिल्ली
संपर्क :sunitas988@gmail.com

90 के दशक में भारत देश ने अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए भूंमडलीकरण, बाजारवाद और उदारीकरण की नीति को अपनाया. जो एक तरफा ट्रैफिक की तरह यहाँ आ गया, जबकि हमारा देश इसके लिए तैयार नही था. भारत ने विकास के इस मॉडल को मात्र इसलिए अपनाया क्योंकि यह पश्चिम में फल—फूल रहा था. जिसका कारण था, पश्चिमी, सभ्यता और संस्कृति का इसके लिए पूर्णतः तैयार होना. परंतु भारत ने न तो उस विकास मॉडल का यहाँ की परिस्थितियों के साथ कोई पूर्व परीक्षण किया, दूसरा पूर्वी और पश्चिमी संस्कृति के भेद को भी नजरअंदाज किया. भारत में जिस तरह का सामाजिक ढाँचा है उसमें एक समूह का दूसरे समूह पर वर्चस्व देखने को मिलता है. सवर्ण का दलित पर, अमीर का गरीब पर और पुरुष का स्त्री पर. यहाँ आज भी सिर पर मैला ढोने वाले को कोई भी सवर्ण अपने घर में साथ बिठाकर चाय की प्याली नही पिलाता. जबकि पश्चिम में ऐसा होता है. ठीक यही स्थिति स्त्री-पुरुष संबंधो की भी है. हमारे समाज में स्त्री-पुरुष अनुपात में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है. यह स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराध का प्रमुख कारण है. भारतीय समाज में स्त्री को पर्दे में रखने की संस्कृति रही है. लेकिन जब बाजारवाद आया तो उसने स्त्री को एक वस्तु बना कर पेश किया. देह की मुक्ति का नारा लगाया. इस आकस्मिक बदलाव को भारतीय पुरुष पचा नही पाया और स्त्री की इस नग्नता पर उसे एक खीज पैदा हुई. अपनी इस चिढ़ को उसने स्त्री पर घिनौने अपराध करके निकाला. क्योंकि पुरुष की मानसिकता बदलने की कोई पूर्व तैयारी हमारे समाज में नही की गयी. न तो उसकी परवरिश के माध्यम से और न ही उसकी शिक्षा-दीक्षा में लेकिन सामाजिक कलेवर बदल गया. आज भी ये दोनो विपरीत परिस्थितियाँ एक-दूसरे के साथ सामंजस्य नही बिठा पाई है.

महादेवी स्त्री और पुरुष को अलग-अलग भूमिकाओं में देखती है। उनका मानना है कि स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक मानसिकता वैपरीत्य द्वारा ही हमारा समाज सामंजस्यपूर्ण और अखण्ड हो सकता है. भारतीय समाज और संस्कृति को महादेवी ने स्त्री के अनुकूल नही पाया है. वह इसमें परिवर्तन की मांग करती है लेकिन स्त्री—विमर्श के उस पहलू की आलोचना करती है जिसमें स्त्री स्वयं पुरुष हो जाना चाहती है. वह इसे स्त्री के मधुर व्यक्तित्व को जलाकर उसकी भस्म से पुरुष की रूक्ष मूर्ति गढ़ लेना’ मानती है. अतः लेखिका का आग्रह है कि स्त्री पुरुष प्रवृति को नही ओढ़े बल्कि स्त्रीत्त्व की सीमाओं  और समस्याओ से संघर्ष करके स्त्री के अधिकारो और अस्तित्व को हासिल करे. वर्तमान में स्त्रियों को शैक्षिक , व्यवसायिक व राजनैतिक क्षेत्रो में प्रवेश ही नही बल्कि कई सम्मानित और प्रतिष्ठित पदों पर आसीन भी किया जा रहा है. लेकिन यह केवल सत्ता की प्रधानता का हस्तंातरण है न कि व्यवस्था-परिवर्तन. उसी पुरुषवादी व्यवस्था में स्त्रियों को स्थान दिया जा रहा है और उनसे प्रयत्क्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषों द्वारा निर्मित इस व्यवस्था में पुरुषों के ही हित सधवाएँ जा रहे हैं. यह मृग- मरीचिका की तरह है. जिसमें पारंपरिक स्त्रियोचित्त गुणो के प्रति भी विशेष जोर है. स्त्रीमुक्ति का संघर्ष दो अंतर्विरोधों से गुजरता है. पहला स्त्रियाँ, पुरुषों द्वारा निर्मित उनकी इस व्यवस्था का पूर्णतः निषेध करे. वे उसमें शमिल न हो और उन सभी चीजों को जिन पर पुरुष अपना दावा करते है, उस दुनिया से स्वयं को बाहर रखें और उसका पुरजोर विरोध करे. या फिर स्त्रियों को उसी अंधी दौड़ में शमिल हो जाना चाहिए, पुरुष पहले से ही जिसका हिस्सा है. इसका नकारात्मक प्रभाव यह होगा कि पुरुषों के दुर्गणों और कमियों को भी वे अख्तियार कर लेगी.

महादेवी का मानना है कि स्त्रियों द्वारा पुरुष बनने की कोशिश उन्हे कहीं नही पहुँचाएगी. यह भी एक तरह का पतन ही होगा. दूसरा सभ्यता के विकास के लिए उपार्जित ज्ञान और उत्पादन में स्त्री का भी सहयोग रहा है इसलिए उसे इनके निषेध की नहीं बल्कि अपनी प्रतिभा के बल पर उपयोग की आवश्यकता है. सीमोन द बोउआ लिखती है यदि कोई औरत कराटे सीखती है तो यह भी एक मर्दानी चीज़ है. हमें पुरुषों की दुनिया को नकाराना नही है, बल्कि उस पर लगा पुरुषत्व का ठप्पा मिटाना है क्योंकि कुछ भी हो यह दुनिया हम औरतो की भी तो है.’’ 1आत्मरक्षा में समर्थ स्त्रियाँ इस दुनिया में खुद को ज्यादा सहज और मुक्त महसूस करेंगी. भारतीय सरकार भी स्त्री शक्तिकरण की बात करती है. कुछ संगठन जैसे दुर्गावाहिनी’ और संघर्ष-वाहिनी’ महिलाओ को सशस्त्र प्रशिक्षण देते है, आत्मरक्षा के लिए. इस प्रयास की आलोचना हमें इस रूप में देखने को मिलती है कि समाज जैसा भी है, ठीक है और वह वैसा ही रहेगा. केवल स्त्री को इसके लिए तैयार करना है कि वह कैसे इस बर्बर व्यवस्था में सर्वाइव कर सके. वह भी हिंसा का मार्ग अपनाकरं वहीं नारीवादी, स्त्री के स्वतंत्र होने की मांग करते है न कि उसे वर्तमान व्यवस्था में ही सशक्त करने की. सत्ता पक्ष एक तरफ तो स्त्री सशक्तिकरण  की बात करेगा और दूसरी तरफ गोधरा ’ जैसे कांड करवाएगा, जिसमें स्त्री के भ्रूण को त्रिशूल से बाहर निकालकर उसे मारा गया.महादेवी स्त्री मुक्ति को केवल स्त्री के हित में नहीं बल्कि समाज के सर्वागीण विकास से जोड़कर देखती है. समाज  में स्त्री भी कुटुम्ब, समाज, नगर तथा राष्ट्र की विशिष्ट सदस्य है तथा उसकी प्रत्येक क्रिया का प्रतिफल सबके विकास में बाधा भी डाल सकता है और उनके मार्ग को प्रशस्त भी कर सकता है.’’2



महादेवी इस मुक्ति की लड़ाई में औरत से अपेक्षा करती है कि आज आजादी मांगने से मिलती कहाँ है ? आजादी तो हम औरतो को छीनकर लेनी होगी, पंरतु समता के नाम पर पश्चिम से उधार ली हुई समता की बात से मैं सहमत नही हूँ. समता की बात करके औरत मर्द बन जाना चाहती है, जबकि उसे मर्द नही, विवेकशील, विचारवान औरत बनना है और यह नए और पुराने के संतुलित समन्वय से संभव होगा.’’3 महादेवी के यहाँ स्त्री मुक्ति की लड़ाई में स्त्री का संघर्ष पुरुष से नही बल्कि पुरुष निर्मित व्यवस्था और केन्द्रित सत्ता से है। लेखिका एक ऐसे समतामूलक समाज की कल्पना करती है जहाँ स्त्री और पुरुष समान होते हुए भी भिन्न हो सकेंगे. इस पृथ्वी पर जीवन के सृजन का दायित्व स्त्री और पुरुष दोनो के मिलन पर ही आधारित है. ऐसे में हम पुरुष विहीन समाज की कल्पना कैसे कर सकते है ? आधुनिकीकरण ने स्त्री मुक्ति के जो विकल्प सामने रखे है,समलैंगिकता, किराए की कोख, गिलास की डिश में गर्भधारण, मातृत्त्व का मशीनीकरण आदि स्त्री और संपूर्ण सृष्टि को कहाँ पहुँचायेंगे. स्त्री -विमर्श में शुरूआती तौर पर ही गर्भ -निरोधक’ और गर्भपात ’ के अधिकार की मांग की जाती रही है और उसे स्त्री की मुक्ति से जोड़कर देखा जाता है. पर क्या ऐसे अधिकार स्त्री को सही अर्थो में मुक्त कर पाए हैं. क्योंकि स्त्री-पुरुष संबंध से अगर कोई सृष्टि होती है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी स्त्री की ही है, और इन अधिकारो के चलते उसे रोकने की जिम्मेदारी भी स्त्री की ही हो जाएगी. जिससे स्त्री तो नही पर पुरुष जरूर अतिरिक्त रूप में मुक्त हुआ है. इस बाजारवादी व्यवस्था में गर्भ-निरोधक’ और गर्भपात’ दोनो ही मुनाफे का बड़ा बाजार बनकर सामने आए है.

 स्त्री-शरीर कास्मेटिक उद्योग को भुनाने के लिए खान बन गया है. लेकिन इससे स्त्री के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिले है. हांलाकि इसमें कोई शक नही है कि गर्भनिरोधक ’ और गर्भपात ’ का कानूनी अधिकार स्त्री मुक्ति के संघर्ष में मददगार साबित हुए है. महादेवी का जोर मातृत्व की प्रतिष्ठा पर है किन्तु उस निर्णय का अधिकार स्त्री को हो.’ आधुनिक युग में महिलाओ को किराय की कोख’ के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा है. इसकी जड़ में वर्ग-विभाजन कार्य करता है. जहाँ इलीट क्लॉस की महिलाएँ अपनी शारीरिक निर्मितियों से भी मुक्त होना चाहती है. और इसका भार वह सर्वहारा वर्ग की महिलाओ पर डाल रही है. अतः इसने स्त्री-विमर्श में तो एक दरार डाली ही है साथ ही सीमोन और सुलमिथ फॉयरस्टोन जैसी उग्र नारीवादी लेखिकाओं के स्त्री-विमर्श की सीमा को भी उजागर किया है. सीमोन लिखती है कि अपनी  शारीरिक सीमाओं  से उबर कर ही औरत एक पूर्ण मनुष्य बन सकती है.’’4 पंरतु यह कैसे सम्भव है कि नारी मात्र अपने शरीर की प्राकृतिक निर्मित (मासिक धर्म, गर्भधारण, प्रसव, स्तनपान) का अतिक्रमण कर सके.उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रो की लड़कियों को राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के उन इलाको में बेच दिया जाता है जहाँ स्त्री अनुपात पुरुष की तुलना में बहुत कम है. शादी का छलावा देकर इन्हे यहाँ लाया जाता है और जब बच्चा पैदा हो जाता है, तब उस बच्चे के थोड़ा बड़ा होने तक उस महिला को रखा जाता है, फिर उसे छोड़ दिया जाता है। यह स्त्री के लिए बहुत बड़ी समस्या है जो उसके अस्तित्व पर खतरे की तरह है। इस प्रक्रिया में संतान को केवल पिता के अंश से उत्पन्न माना जाता है। माता का उस पर कोई अधिकार नही है. वह मात्र कोख है. जबकि महादेवी मातृत्व को स्त्री के स्वाभिमान और स्वत्व से जोड़कर देखती है.


मातृत्व स्त्री का वह गुण है. जो संपूर्ण सृष्टि की रचना का दायित्व निभाता है. आज पुरुष स्त्री के मातृत्व को भी उससे छीन लेना चाहता है. महादेवी मानती हैं कि आधुनिक स्त्री ने अपने जीवन को इतने परिश्रम और यत्न से जो रूप दिया है. वह बहुत सुंदर भविष्य का परिचायक नही जान पड़ता. पश्चिमी  स्त्री की स्थिति क्या यह प्रमाणित कर सकेगी कि वह आदिम नारी की दुर्बलताओ से रहित है ? सम्भवतः नही.  शृंगार के इतने संख्यातीत उपकरण, रूप को स्थिर रखने के इतने कृत्रिम साधन, आकर्षित करने के उपहास योग्य प्रयास आदि क्या इस विषय में कोई संदेह का स्थान रहने देते है ? नारी का रमणीत्व नष्ट नही हो सका, चाहे उसे गारिमा देनेवाले गुणों का नाश हो गया.’’5 समाज द्वारा स्त्री के दमन का यह भी एक पैतंरा है कि उसे स्वयं को सौदंर्य का पर्याय साबित करना है. इस कारण सौंदर्य उसके लिए एक मनोग्रंथि के रूप में बहुत घातक साबित होता है जो उसकी दिमागी चेतना और रचनात्मकता को समूलतः नष्ट करके दोयम दर्जे का बना देता है. महादेवी ने स्त्री मुक्ति में बौद्धिक सौदंर्य को महत्त्व दिया है. महादेवी ने स्त्रीत्त्व को भी दो भागो में बाँटकर देखा है. एक प्रसाधित  शृंगारित स्त्रीत्त्व’ जो आधुनिक नारी में विधमान है और दूसरा संस्कारित प्राकृतिक स्त्रीत्त्व’ जो मातृत्व की पूर्ति करता हुआ परम्परागत भारतीय स्त्री में विद्यमान है. सभी स्त्रियाँ फिर चाहे वह आधुनिकता से लेस हो या परम्परागत  रूढ़ि से बंधी हो, दोनो ही पराधीनता के बोझ को ढ़ो रही है. भारत देश पोर्न सिनेमा और साहित्य के बाजार में विश्व में तीसरे स्थान पर है.



यह बहुत ही शर्मनाक है कि इस तरह का असामाजिक उत्पादन और अश्लील गतिविधियाँ हमारे समाज में बड़ी तेजी से फैल रही है. इसमें प्रशासन की मिलीभगत देखने को मिलती है और सरकार लाचारी ओढ़े है. आखिर क्यों…? चुटकी बजाते ही हजारो वर्षो से स्त्रियों पर किए जा रहे इन अपराधो पर रोक नही लगेगी. न ही पलक झपकते उसकी सामाजिक हैसियत में कोई बदलाव आ जाएगा, क्योंकि ईमानदारी के साथ इसकी कोशिश कभी की ही नही जाती. जिसका सबसे बड़ा कारण है पुरुष समाज का वर्चस्व में होना जो यह कभी नही चाहेगा कि उसकी दासी उसके बराबर में आसीन हो. स्त्री की  शृंखला की कड़ियाँ आपस में एक-दूसरे से जुड़ी हुई संगुम्फित है. जिन्हे जड़ से शुरू कर परम्परा तक तोड़ते आना होगा. हमारे समाज में लिंग अनुपात में विषमता बढ़ती ही जा रही है. माँ-बाप नही चाहते कि वे बेटी को जन्म दे इसलिए इतनी बड़ी तादाद में कन्या भ्रूण हत्याएं  होती है. मैत्रेयी पुष्पा लिखती है कि समाज के विधायक, पंडित, पुरोहित, चिंतक और लेखक गौर करे कि उन्होंने अब तक स्त्री की स्तुति और निंदा में कहाँ कमी छोड़ दी थी कि वैज्ञानिको और चिकित्सकों ने उसको गायब करने के नायाब तरीके खोज लिए ?’’6  ऐसा नही है कि स्त्री जीवन को नष्ट करने के ऐसे घिनौने अपराध केवल आधुनिकता की देन है. बल्कि भारतीय संस्कृति में तो इसका लम्बा इतिहास रहा है. “Suraji
Jadesa was penalized Rs. 12,000 Case by British government for facilitating
female infanticide on November 6,1833”7 
फर्क सिर्फ  इतना है कि पहले यह कार्य लड़की के जन्म लेने के उपरांत उसके ही परिजनों या दाई द्वारा, उसके मुँह व नाक में गर्म रेत डालकर अथवा गला घोटकर उसे मार दिया जाता था. पर अब यह कार्य डॉक्टर अपनी मोटी फीस लेकर करते है. वह भी जन्म से पूर्व ही माँ के पेट में भ्रूण हत्या. जिसके प्रतिकुल प्रभाव उस गर्भवती स्त्री के मानस तथा शरीर पर भी होते है.


इस तरह की गैरकानूनी गतिविधि 70 के दशक में अस्तित्व में आयी. जब सर्वेक्षण से यह आंकडे़ सामने आए कि भारत में जनसंख्या वृद्धि का एक बड़ा कारण लोगो की पुत्र लालसा है. अतः डॅाक्टरो ने सरकारी तौर पर इसका एक तोड़ निकाला। सोनोग्राफी द्वारा लिंग की जाँच करके कन्या भ्रूण हत्या करना। यह सब बड़े ही गुप्त ढंग से जनसंख्या नियंत्रण की एक कोशिश के रूप में अपनाया गया. परंतु समाज में बढ़ते हुए लिंग अनुपात को देखते हुए जब इसे गैर कानूनी घोषित किया गया तब तक यह अपना व्यावसायिक रूप ले चुका था. आज भी कई निजी स्वास्थ्य संस्थान इस कार्य को अंजाम दे रहे है और पैसा कमा रहे है. वर्तमान में इस मुनाफे का लालच इतना अधिक बढ़ गया है कि डॉक्टर, परिजनों  को गलत रिर्पोट देकर भी भ्रूण हत्याएँ कर रहे है. आखिर क्यो भारतीय संस्कृति स्त्री-विरोधी है. माता-पिता क्यों बेटी के जन्म से डरते है ? क्योंकि उन्हे बेटी के विवाह में अपने जीवन की सारी जमा पूंजी दहेज में देनी पड़ती है. वर्तमान समय में दहेज की मात्रा भी वर तथा वधू पक्ष की प्रतिष्ठा का सबब बन गयी है. उपभोक्तावादी संस्कृति ने दहेज जैसी कुप्रथा को और अधिक पुष्पित-पल्लवित किया है. दहेज-प्रथा के दो प्रमुख कारण रहे हैं, पहला पुत्री को पिता की संपत्ति में हिस्सा न देना पड़े. दूसरा, भावी पत्नी का आार्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होना. दोनो ही कारण स्त्री की सामाजिक और परिवारिक स्थिति में गिरावट लाते है. आगे चलकर यह कुप्रथा पत्नी उत्पीड़न का पर्याय और स्त्री के प्रति बढ़ते अपराध का जरिया बन गयी. जिसे हिन्दु समाज परम्परा के रूप मैं आज भी ढो रहा है.अभिभावक लड़की की शिक्षा और रोजगार को उतना महत्त्व नही देते. न ही उसे अपना जीवन सवाँरने के लिए पर्याप्त समय देते है. वह बेटी को घर के बाहर भेजने से डरते है, उसे बाहर महफूज नही पाते. उन्हें डर है कि कही वह घर की मर्यादा तोड़कर प्रेम विवाह न कर ले.

हमारे समाज में स्त्री को अभी भी वरण की स्वतंत्रता नही है. ऑनर किलिंग जैसे भयानक अपराध आज भी होते है. दूसरा अगर किसी ने लड़की का अपहरण कर लिया उसके साथ बलात्कार किया तो परिवाार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी . इसलिए उसे घर की चार दीवारी में कैद करके उस पर पहरे बिठाए जाते है. स्त्रीवदियों का मानना है कि बलात्कार एक पोलिटिकल ऐक्ट होता है. जिसमें सैक्स का आस्पैक्ट कम होता है जबकि जेंडर वर्चस्व अधिक. इस तरह बलात्कार पुरुषवादी प्रभुत्व दिखाने का माध्यम हैं. पूंजीवादी देशो में बलात्कार को शारीरिक एवं मानसिक ट्रोमा के रूप में माना जाता है. वही भारत में सामंतवादी मूल्यों के कारण अभी भी इसे मर्यादा भंग होने, इज्जत लुट जाने के रूप में देखा जाता है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था के तहत बलात्कार मृत्यु से बड़ा अभिशाप है और इससे बचने का उपाय यह कि स्त्री, घर परिवार और पितृसत्ता के नियंत्रण में रहे. अतः बलात्कार के लिए स्त्री स्वयं जिम्मेदार होती है क्योंकि उसने गृह और सम्मान की लक्ष्मण रेखा लाघंने की गलती की है. वही स्त्रीवादी इसे लैंगिक हिंसा मानते है और इससे लड़ने का तरीका यह है कि स्त्रियों में आत्मविश्वास पैदा किया जाए. उनके लिए सार्वजनिक स्थानों को और ज्यादा सुरक्षित बनाया जाए तथा बलात्कारियों को सख्त सजा दी जाय. अतः भय नही वरन संघर्ष लैंगिक हिंसा से लड़ने का साधन है.फैशन और पश्चिमी वस्तुओ तथा संस्कृति को सैक्स अतिरेक व महिला अपराधो से जोड़ कर देखा गया. ये कैसी सड़ी-गली मानसिकता और खोखले मूल्य है जिन्हें हमारा समाज आज तक ढ़ो रहा है. स्त्री आज भी इस उपभोक्तावादी आधुनिकता और सामंतशाही परम्परा रूपी चाक के दो पाटो के बीच पिस रही है.

भारतीय संस्कृति संयम प्रधान है. यहाँ ब्रह्मचारी का चित्र में स्त्री-दर्शन भी वर्ज्य है तथा एकान्त में माता की सन्निकटता भी अनुचित मानी गई. ऐसे अस्वभाविक वातावरण में बालक-बालिकाओ को पल कर बड़ा होना पड़ता है. घर और समाज दोनों उन्हे इतनी दूर रखते है कि एक संकीर्ण सीमा में निकट रहते हुए भी पिता, पुत्री, भाई-बहन अपने चारो ओर मिथ्या संकोच की दीवार खड़ी कर लेते है. घर  के वातावरण से निकलकर जब वे एक-दूसरे को कुछ निकट से देखने का अवकाश तथा सुविधा पा लेते है तब एक-दूसरे को जानने के कौतूहल में उस निर्धारित रेखा का उल्लघंन कर जाते है. इसमें किसी व्यक्ति विशेष को दोष देना व्यर्थ है.’’8 महादेवी ने स्त्री चिंतन के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि किस तरह भारतीय समाज संक्रमणकालीन प्रभाव का शिकार हो रहा है. भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक भाव-बोध के बीच जो गहन अंतर्विरोध चल रहा है, उसने स्त्री के प्रति पुरुष की समझ को और अधिक विकृत बनाया है. तथा स्त्री की व्यवहारिक चुनौतियों को बढ़ाया है. व्यक्ति के निर्माण में महादेवी साहित्य और शिक्षा से बहुत अपेक्षाएँ रखती है परन्तु आधुनिक युवाओ पर साहित्य के प्रभाव को वह इन शब्दो में आंकती है कि आधुनिक साहित्यिक वातावरण में भी विकृत प्रेम का विष इस प्रकार घुल गया है कि बेचारे विद्यार्थी को जीवन की शिक्षा के प्रत्येक घूँट के साथ उसे अपने रक्त में मिलाना ही पड़ता है. कहानियों का आधार, कविता का अवलम्ब, उपन्यासो का आश्रय सब कुछ विकृत पार्थिव प्रेम ही है; जीवन-पुस्तक के और सारे अध्याय मानो नष्ट हो गए है, केवल यही परिच्छेद बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक पढ़ा जाने वाला है.’’9

महादेवी द्वारा साहित्यिक प्रभाव का यह एकतरफा विश्लेषण कहा जा सकता है. परंतु यह इतिहास की उस नब्ज को पकड़ने का प्रयास तो है ही जो युवको की अस्वस्थ मनोवृत्ति का कारण रही है; स्त्री की श्रृगांरिक निर्मिति.’ वर्तमान समय में इस अस्वस्थ्य मानसिकता की हैवानियत इतनी बढ़ गयी है कि 5 साल या उससे कम उम्र की बच्चियों के साथ भी बलात्कार जैसी घटनाएँ होती है. जिसमें एक अभियुक्त का बयान था कि इस घिनौने अपराध को अंजाम देने से पूर्व वह अपने मोबाइल फोन में अश्लील विडियों देख रहा था. यह घटना 19 अप्रैल 2013 की है. ऐसे न जाने कितने ही अपराध स्त्रियों के साथ हर रोज हो रहे है. 16 दिसम्बर 2012 की वारदात को कौन भूल सकता है. जिसने पूरे देश में महिलाओ की सुरक्षा और उनके प्रति समाज के नजरिये को लेकर एक उबाल सा ला दिया था. क्या आज भी हम उस सामंती बर्बर व्यवस्था में रह रहे है जहाँ स्त्री एक स्त्री होने के नाते महफूज नही है. पिछले दो-तीन दशको में भारतीय समाज में महिलाओ की स्थिति में बहुत से बदलाव आए है. परंतु आज भी यह विकट समस्या हमारे सामने मुँह बाए खड़ी है कि स्त्री की स्थिति में सुधार के लिए किस राह को चुना जाए. क्या हमें प्राचीन भारतीय संस्कृति और मूल्यो की और लौटाना चाहिए ? स्त्री की वेशभूषा पर एक सांस्कृतिक पहरा हो. मंनोरंजन और साहित्य की दुनिया पर नैतिकता का आवरण चढ़ा दे. क्याेंकि इस तरह की आजादी और उन्मुक्तता के लिए हमारा समाज अभी तैयार नही हैं. इसलिए पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव को हमें अपने यहाँ आने से रोक देना चाहिए या फिर उसे अपने सांस्कृतिक कलेवर में फिट करके स्वीकार करना चाहिए. भारतीय समाज, संसद और धार्मिक संस्थानों में इस तरह की आवाजे निरंतर सुनाई देने लगी है परिवार  बचाओ’, भारतीय  संस्कृति की रक्षा’, वेदों की ओर लौटो.’

मान लीजिए अगर हम अपनी सामाजिक मुक्ति और स्त्री-सुधार के लिए यही राह चुनते है तो हम कहाँ पहुंचेंगे? समय कभी पीछे की ओर नही लौटता वह निरंतर गतिशील है. आज जिस संक्रमण को पूरा देश झेल रहा है, अब अगर उसकी दिशा मोड़ भी दी जाए तो आगे आने वाली पीढ़ियाँ फिर से इस दबाव को झेलेंगी. एक स्वस्थ और सभ्य समाज उसे कह सकते है जहाँ पुरुष का स्त्री के प्रति व्यवहार इस बात पर निर्भर नही करना चाहिए कि वह नग्न है, अर्धनग्न है या फिर सिर से पांव तक बुर्के में ढकी हैं. यूरोपीय देशो की महिलाएँ अपने पहनावे, जीवन-शैली  और देह की स्वतंत्रता को लेकर मुक्त है वहाँ न यौन शुचिता का प्रश्न है और न ही उच्छ्न्खलता का. वहाँ स्त्री पर ऐसी कोई पाबन्दियाँ नही है न ही वह स्वयं को इतना असुरक्षित महसूस करती है.
मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि पश्चिमी समाज पितृसत्ता की सभी बुराइयों से मुक्त हैं. परंतु भारतीय स्त्री की सापेक्षता वहाँ स्त्रियाँ आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक और यौनिक स्तर पर अधिक महफूज और स्वतंत्र है. पश्चिम की स्त्री ने अपनी मुक्ति की लड़ाई में पुरुष के प्रति स्पर्धा के साथ ही उसे आकर्षित करने की प्रवृत्ति भी अपनाई. आधुनिक भारतीय महिलाओ में भी पश्चिमी स्त्री-विमर्श के इस पक्ष का अनुकरण देखने को मिलता है. जो उन्हें कही नही पहुँचाएगा. अनेक सामाजिक रूढ़ियों और परम्परागत संस्कारों के कारण उसे पश्चिमी स्त्री के समान न सुविधाएँ मिली और न सुयोग, परन्तु उसने उन्ही को अपना मार्ग दर्शक बनाना निश्चित किया. महादेवी इसका विरोध करती है. ऐसा नही है कि महादेवी स्त्री संबंधी पश्चिमी विचारो से आँख फेर लेना चाहती थी बल्कि कई मुद्दों पर उनके विचार पश्चिमी विचारो से साम्य रखते है. मसलन स्त्रियों की शिक्षा, उनका आर्थिक रूप से सुदृढ़ होना तथा निर्णय लेने की स्वतंत्रता आदि.

महादेवी के यहाँ स्त्री मुक्ति का मॉडल, पश्चिम से एकदम भिन्न है. पश्चिमी स्त्रियों ने संघर्ष का माध्यम ध्वस को बनाया जिसमें स्त्री ने अपने स्त्रीत्व को क्षत-विक्षत कर डाला. पंरतु महादेवी संघर्ष के उस रूप को अपनाती है जो निमार्ण और विकास की ओर बढ़ता है. इसलिए वे स्त्री मुक्ति के साथ-साथ स्त्रीत्व के उन गुणो को बनाए रखना चाहती है जिनसे समाज में मातृत्व और मानवता फलती-फूलती रहे. एक स्वस्थ और सुंदर समाज का निर्माण हो सके. जब तक स्त्री घर के बाहर स्वयं को सुरक्षित नही पाएगी तब तक वह अपनी मुक्ति के संघर्ष को सही मंजिल तक नही ले जा सकती. अतः असुरक्षा के भय से वह फिर सामंतवादी पितृसत्तात्मक ढाँचे में कैद हो जाएगी. राज्य की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वह स्त्रियों को सुरक्षा मुहैया कराए. समाज को उनके लिए महफूज बनाए और अपनी इस जवाबदेही से सरकार भाग नही सकती. हालांकि भारत में दहेज हत्या, बलात्कार, घरेलू हिंसा और वेश्यावृत्ति की घटनाओ में कमी आने की बजाय बढ़ोत्तरी होती जा रही है. इसके अलावा कानून से सजा पाने वाले ऐसे अपराधियों की तादाद भी नगण्य है. स्त्री अधिकारो के प्रति बढ़ती चेतना के इस दौर में पास हुए तमाम कानून सही मायने में उपयोगी होने के बजाय सजावट की वस्तु साबित हुए है. महादेवी बहुत पहले ही इस विषय पर अपनी चिंता प्रकट कर चुकी है. वह लिखती है. कानून हमारे स्वत्वों की रक्षा का कारण न बनकर चीनियों के काठ के के जूते की तरह हमारे ही जीवन के आवश्यक तथा जन्मसिद्ध अधिकारों को संकुचित बनाता जा रहा है.’’10

संदर्भ
1. बोउआ, सीमोन दी, स्त्री के पास खोने के लिए कुछ नही है (अनु. मनीषा पांडेय), पृ. 137
2. वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 17
3. वही, पृ. 19
4. बोआ, सीमोन दी, स्त्री—उपेक्षित (अनु. प्रभा खेतान), पृ. 223
5.वही, पृ. 39
6.पुष्पा, मैत्रेयी, खुली खिड़कियाँ, पृ. 50
7.Times of India, 11 July 2012
8. वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 107
9. वही, पृ. 108
10. वही, पृ. 68

मेरे पिता

पवन करण


पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि हैं. ‘स्त्री मेरे भीतर’ चर्चित  कविता संग्रह . संपर्क :  pawankaran64@rediffmail.com

बहन और मां के प्रेम के पक्ष में कवितायें लिखने वाले हम सबके प्रिय कवि पवन करण का आज जन्मदिन है. पितृसत्तात्मक समाज  की  सबसे बड़ी ग्रंथी है पुरुष का पिता-पति-बेटा के  रूप में स्त्री का संरक्षक होने की , डिक्टेटर होने की. पवन करण की कवितायें पढ़ते हुए यह ग्रंथी पिघलती जाती है. आज उनके जन्मदिन पर उनकी कविताओं से अलग कुछ – ‘ पिता की यादें.’ पिता होना ही पितृसत्ताक होना नहीं है. बडे आत्मीय संस्मरण का एक हिस्सा. 


दिसंबर शुरू हो चुका था 2012 का बरस पिता के लिये बहुत कठिन था. पिछले बरसों से लगातार खराब चलती आई उनकी तबीयत इस बरस तीन बार बिगड़ी. पहली और दूसरी, दोनोें बार, हमें ऐसा लगा कि वे  गये, लेकिन सौ बरस जीने की अपनी अदम्य इच्छा के चलते उन्होंने हमें दोनों बार अपना कुतका ( अंगूठा ) दिखा दिया. इस बरस मई-जून में जब पहली बार पिता गंभीर रूप से बीमार पड़े तब छुट्टियों में तीनों बहनों का अपने बच्चों के साथ घर पर आने का समय था. जो उनके  लिये वरदान साबित हुआ.  पिता की हालत बहनों के घर पर आने से, कुछ पहले से, खराब होती जा रही थी, जिसके चलते वे अपनी समझ लगातार खोते जा रहे थे. उनके द्वारा बोले जाने वाले वाक्य उनके मुंह में गड़बड़ाने लगे थे. साथ ही लगातार वे इतने कमजोर हो रहे थे कि रात को गुसलखाने में गिरने लगे थे. उन दिनों मैं पिता के पास ही घर में ग्राउंड फ्लोर पर बने हाॅल में जिसमें पिता नितांत अकेले रहते थे, सोने लगा था. उनकी हालत देखकर बहनों के साथ-साथ मुझे भी लगने लगा था, कि वे उम्र का अंतिम पड़ाव तय कर रहे हैं और किसी भी दिन वे हमें छोड़ सकते हैं. युवावस्था से तपेदिक के शिकार रहे पिता उम्र बढ़ने के साथ-साथ बुरी तरह असाध्य अस्थमा के शिकार होते गये. अस्थमा के अकाट्य प्रभाव के चलते अपने अंतिम दो-तीन बरसों में तो वह बिस्तर पर तकिये में मुंह घुसाये घुटनों के बल बैठे-बैठे सोेते रहते. हम उन्हें समझा-बुझा कर या फिर उन पर गुस्सा करते हुए पीठ के बल बिस्तर पर लिटा भी देते तो वे कुछ देर बाद सांस लेने में आराम देने वाली अपनी उसी शारीरिक मुद्रा में बैठ जाते. इस तरह रात-दिन सांस लेने के लिये उनको इस तरह संघर्ष करते देखना बहुत पीड़ा दायक था. मगर पीड़ा को अपने पर हावी न होने देना उसका बखान न करना तथा पीड़ा का लगभग तिरस्कार करना, उनकी उस जीवटता में शामिल था जो हमें आश्चर्य में डाले रहती थी। उन्हें अंतिम चार-पांच बरसों में डायबिटीज भी हो गयी थी.

हालांकी  वे उन भारतीय पुरूषों में से थे जो ये कतई मानने को तैयार नहीं थे, कि शक्कर की भी कोई बीमारी हो सकती है. उनके लिये तो शक्कर ही जीवन था. शक्कर नही तो जीवन नहीं. जब भी डायबिटीज का जिक्र चलता, वे कहते पता नहीं ये कहां से हो गई. बहनों ने आते ही पिता की देखभाल शुरू कर दी. चूकि बहनें गर्मियों में ही घर आतीं हैं तो घर में नीचे हाॅल में ही अपने बच्चों के साथ अपना डेरा जमा लेती हैं. हाॅल के ऊपर दो मंजिला मकान बना है इस वजह से हाॅल गर्मियों में ठंडा रहता है और एक बड़े कूलर और पंखे के सहारे उसमें रहना आसान होता है. बिजली चले जाने पर भी कुछ समय उसमें आराम से बिताया जा सकता है. बहनों के बच्चे भी आराम से अपने खेल-कूद और शोर-शराबे के साथ उसमें समा जाते हैं. फिर पिता के पास साथ रहने का संतोष सबसे ऊपर. बहनें जब आतीं और महीने पंद्रह रोज रहतीं तो मैं पिता की तरफ से निश्चिंत हो जाता. मैं पिता के उन दिनों को उनके जीवन के सबसे अच्छे दिन मानकर चलता. हालाकि मां की मृत्यु के बाद घर में, हम सबके साथ रहते हुए भी, अकेले रहते उनकी जिंदगी और मन में अकेलापन इस कदर भर गया था, कि अपने दोस्तों के अलावा उनके पास ज्यादा देर तक बैठा रहने वाला घर का कोई भी सदस्य उन्हें नहीं सुहाता था. थोड़ी देर चलकर उनके पास बैठा जाये यह सोचकर मेरे अलावा घर का कोई सदस्य उनके पास ज्यादा देर बैठ जाता तो वे खुद ही कहने लगते जाओ ऊपर जाकर अपना काम देखो. क्या तुम्हें कोई काम नहीं है, जो मेरे पास बैठे हो.  ब्याह के बाद बरस में एक बार घर में आने वालीं बहनों के मामले में उनका यही हाल था. वे उनका भी अपने पास ज्यादा रहना बर्दाश्त नहीं करते थे.

 मैं शाम को घर लौटता तो मुझसे कहते, ये बच्चे दिन भर ऊधम करते हैं. दिन में सोने भी नहीं देते. और ये तीनों लड़कियां हैं जो रात-रात भर आपस में बातें करती रहती. सोती नहीं हैं. पता नहीं क्या बातें करती हैं. इनकी बातें ही खत्म नहीं होती. तब हंसते हुए मैं उनसे कहता, अरे बरस में एक बार तीनों एक साथ घर आती हैं, मिलती हैं, तो अपने मन की बातें करती रहती हैं. ससुराल में कहां इन्हें खाने-पीने और इस हद तक बोलने-बतराने की आजादी होती है. इस मामले में मेरी समझाइस सुनकर पिता, “फिर ठीक है भईया तुम जानो” कहकर चुप हो जाते. मगर एक बार तो अपने अकेलेपन की रक्षा करते पिता ने हद ही कर दी, जो मेरी छोटी बहन ने मुझे दफ्तर से जब मैं घर लौटा, तब बताया. घर में रहते दस दिन से ज्यादा रह चुकीं अपनी बेटियों से वे बोले, मोड़ियों अब तुम्हें यहां रहते हुए बहुत दिन हो गये. अब ऐसा करो कि अपने-अपने घर जाओ. जाकर अपना घर संभालो. भैया अर्थात मेरी बात करते हुए उन्होंने यह भी कह दिया कि वो अकेला कमाने वाला है. उस पर ज्यादा बोझ डालना ठीक नही. तुम आती हो तो उसका खर्चा भी तो होता होगा ना. जबकि खर्च या बोझ की कोई बात ही नहीं थी. उनकी पेंशन से ही इतने पैसे बच जाते थे कि बहनों का आराम से आना-जाना और भावनाओं से भरा सम्मान हो जाता था. किंतु बात बहनों के घर से अपने बच्चों के साथ अपने-अपने घरों के जाने की नहीं, उनके अकेलेपन की थी, जिसके साथ रहने की उन्हें आदत पड़ गई थी. उनकी कही इस बात को जब सबसे छोटी बहन ने मुझे बताया तो मैं और तीनों बहनें खूब हंसे. भले ही ही अपनी बेटियों से कही उनकी बात को सुनकर हम सब हंस कर रह गये. मगर तीस साल पहले विधुर हुए पिता का अकेलापन धारदार हंसिये की तरह मुझे, पिता से ज्यादा काटता.

अपने अकेलेपन को लेकर उनके भीतर कितनी टीस थी इसे उन्होंने, अपने अंतिम बरस में किसी बात पर अकेले में मुझसे खीजते हुए कि हमसे तो बड़ी गलती हो गई, यह कहने के अलावा हमें कभी नहीं बताया. ” अब जो है सो है “ यह कहकर उन्होंने हमेशा विषय बदल दिया. बीमारी और अकेलेपन से परेशान पिता अपनी जिस गलती की तरफ इशारा कर रहे थे. मैं उसे जानता था. मगर परिवार की जो हालत थी. उसमें जिस कदर निर्धनता और अशिक्षा पसरी हुई थी. उसे देखते हुए मां की मृत्यु के बाद पिता ऐसा-वैसा कोई कदम उठाने की स्थिति में थे भी नहीं. हालाकि बिना सोचे-समझे बुआजी ने उन पर इस बात का पर्याप्त दबाब बनाया कि उनहें दूसरा विवाह कर लेना चाहिये. मगर पिता ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया. मगर जब तक पिता जीवित रहे मेरे भीतर इस बात को लेकर हमेशा बेचैनी बनी रही कि काश हम इतने धनी होते कि पिता, घर में तो कतई नहीं, मगर चाहते तो घर के बाहर अपने मन का कुछ कर लेते. छोटे से घर में तो वैसे भी दरिद्रता और तपेदिक के साथ मैं और मुझसे छोटी चार बहनें ठुसे थे. ऐसे में उनके लिये कुछ भी कर पाना संभव नहीं था. सोचता हूं यदि उन्होंने ऐसा कोई निर्णय ले लिया होता तो क्या होता ? मगर आगे चलकर मेरी नौकरी के चलते घर की कुछ हालत सुधरी तो उन्होंने घर से दूर थोड़ा-बहुत कहीं कुछ किया तो था. जिसके बारे में घर में और घर के बाहर चलने वाली खुसुर-पुसुर मेरे कानों तक पहुंची. मगर मैंने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया. यह उन्हें लेकर मेरी समझदारी थी. उन्हें लेकर मुझे खुद पर इतना विश्वास था कि कहीं कुछ मामला बिगड़ेगा भी तो मैं उसे संभाल लूंगा. मगर ऐसा कुछ हुआ भी नहीं. मैं उनके जीवन और अकेलेपन को लेकर ऐसा ही सोचता और चाहता भी था. वह एक समय का मामला था जो पिता के स्तर पर ही निपट गया.

मैंने महसूस किया कि अंतिम दिनों में उन्हें अपना अकेलापन अखरने लगा था. चूकि वे पढ़ नहीं सके थे, तो पढ़े-लिखे लोगों के बीच अपना स्थान बना पाने में विफल रहते थे. इस वजह से यहां सिटी सेंटर  में रहने आने के बाद शुरू में तो उन्हें कुछ समस्या हुई मगर कुछ ही दिनों में यहां भी उन्होंने अपना समाज बना लिया था. जिसके बीच उनकी सुबह शाम कटती. जिसकी आदत उन्हें माधवगंज और अपनी युवावस्था से थी. आश्चर्य की बात यह थी कि बीमारी की सघनता में बेहद कमजोर होते जाने तथा गुसलखाने और हाॅल तथा रास्ते में गिर पड़ने के बावजूद उन्होंने  घर से बाहर जाना और अपने दोस्तों के बीच बैठना बंद नहीं किया. घर के बाहर निकलकर जिस चाय के ठेले पर उनकी नियमित बैठक होती. वहां कुछ युवा आॅटो चालक भी बैठते तो धीरे-धीरे उनकी उन आॅटो चालकों में से एक-दो से गहरी पटने लगी. वे उनसे मजाक करने के साथ उनका बड़ा आदर भी करते. देर या थकान-बुखार होने पर कई बार आॅटो चालक उन्हें घर छोड़ जाते. अंतिम दिनों में जब वे घर से बाहर निकले बिना नहीं मानते थे. तो मैंने उनसे कह दिया. आप किसी आॅटो वाले को कह दो कि वह आपको घर से ले जाया करे और घर पर छोड़ जाया करे. मैंने देखा कि वे ऐसा करने लगे थे. लेकिन उनकी खराब हालत को देखकर घर-बाहर सब ऐसा चाहते थे कि वे घर में ही रहें. आॅटो वालों ने भी कहा भैया अब इन्हें बाहर नहीं निकलने दिया करो. अब इनके हाथ-पैर काम करना बंद कर रहे हैं और ये चल भी नहीं पाते हैं. मगर पिता इस मामले में किसी की मानने को तैयार नहीं थे. घर से बाहर निकले बिना वे जी ही नहीं सकते थे. चूकि मैं दिन भर अपने कार्यालय में रहता तो दिन में उनके घर से बाहर निकलने पर नियंत्रण नहीं रख पाता था.

चूकि अंतिम दिनों में उनकी तबीयत ज्यादा खराब थी और ऐसे में एक आॅटोवाला उन्हें लेने घर आया तो उनकी बहू यानि मेरी पत्नी ने उससे यह कहते हुए, देखते नहीं, उनकी कितनी तबीयत खराब है और ऐसे में भी आप उन्हें बाहर ले जा रहे हो, उन्हें कहीं कुछ हो गया तो, यह कह आॅटो वाले को कर डांट कर भगा दिया. आॅटोवाला बहू के बारे में पिता के भय से परिचित था तो वह चुपचाप सुनकर चला गया। उसने उससे यह तक नहीं कहा कि मुझसे बाबूजी ने कहा है, तभी मैं उन्हें लेने आया हूं. यह बात दुखी होते हुए पिता ने शाम को मैं जब दफ्तर से घर लौटा तब मुझे बताई तो मैंने अपनी पत्नी को समझाया कि मेरे ही कहने पर ही आटो वाला उन्हें लेने आता है, ताकि वे थोड़ा घर से बाहर जाकर घूम कर आ सकें और उनका मन लगे. हमारे पास तो समय है नहीं कि उन्हें  कहीं ले जा सके.  हालाकि वे कभी हमारे साथ नहीं जाते, क्योंकि वे अपने अंतिम समय तक मस्तराम थे. उस दिन के बाद आॅटोवाला उनकी बहू से डरकर बाबूजी को आवाज लगाकर बुलाने की जगह उनके हाॅल के या घर के दरवाजे पर दिखाई देने की प्रतीक्षा में घर के चक्कर लगाने लगा. घर में सर्दियों में जब वे मेरी धौंस के चलते नहा-धोकर घूप में पलंग पर लेटे होते. घर में काम करने वाला लड़का उनके पास आकर चुपचाप बताता कि बाबूजी नीचे आॅटोवाला आपको देख रहा है तो वह नीचे उतरकर उसके साथ घर से बाहर चले जाते. मैं भी यही चाहता था कि अपने अंतिम समय तक वे घूमते-फिरते रहें. उनके हाथ-पैर चलते रहे.उन्हें  जीते देख और उनके बारे में सोचते हुए मुझे हमेशा लगता कि समय ने उनके लिये यह कैसा जीवन चुना था ? माधवगंज में सड़क वाला ग्यारह बाई बारह फुट जमीन पर एक के ऊपर एक कमरों की शक्ल में बना मकान तथा यहां सिटी सेंटर में लिया बड़ा मकान जिसमें ऊपर की मंजिलों पर तीन बेडरूम और एक बड़ा तथा एक छोटा दो हाॅल थे. दोनो ही ऐसे थे जो उनके परिवार से अलग रहने की परिस्थितियां निर्मित करते थे.

जब हम माधवगंज वाला घर छोड़कर सिटी सेंटर वाले घर में पहुंचे, तो स्वाभाविक रूप से हमने उनके और उन्होंने अपने रहने के लिये भूतल पर बने हाॅल को चुन लिया. जो पहली मंजिल पर बने भाग के बराबर ही था. जिसमें उनके लिये हाॅल से लगा बाथरूम था जो इससे पहले उनके जीवन में शामिल नहीं था. उन्होंने भले ही इस बारे में कभी कहा नहीं मगर जिसकी कमी उन्हें लगातार खलती रही। वह गुसलखाना उनका था जिसका बस वही उपयोग करते. या बहनें जब आतीं तब उनका उपयोग होता अथवा किसी मेहमान के आने पर उनके अलावा कोई उसका उपयोग करता. चूकि पुरूष मेहमानों के लिये हमने हाॅल में ही रूकने की व्यवस्था की हुई थी, अतः जब भी कोई आता वह हाॅल में ही पिता के पास ही रूकता. मगर किसी के आने और अपने एकांत में खलल पड़ने पर पिता भले ही बाहर से कुछ नहीं कहते, मगर भीतर ही भीतर खीजते, उनकी खीज हमें उनके चेहरे पर दिखाई देती. पिता उसी हालत में हमारे साथ एक ही मंजिल पर रह सकते थे कि जो घर हमने लिया था वह एक ही मंजिल पर बना होता. और उसमें भी उनके लिये एक कमरा अलग होता, जो उनके जीवन में संयोग से भी नहीं था. उन्हें युवावस्था से ही भयानक तपेदिक था, जिसकी वजह से वे लगातार खांसते और कफ उगलते रहते इस कारण भी वे हमसे घर में  कुछ दूरी बनाकर चलना चाहते थे. वे इस मामले में समझदार थे. चूकि परिवार में तपेदिक का खूंखार इतिहास रहा था, जिसके बारे में मैंने अपने आत्मकथ्य के पहले खंड बुरा बच्चा में लिखा भी है इस वजह से हम भी यही चाहते थे कि उनसे थोड़ी दूर बनी रहे तो बेहतर क्योंकि तपेदिक को जिस हद तक हमारे परिवार ने भोगा था, हमारे जानने वालों में से शायद ही किसी परिवार ने भोगा हो. इस वजह से पिता के साथ-साथ हम भी कतई यह नहीं चाहते थे कि वह और आगे बढ़े. मैंने पिता के तपेदिक का बहुत इलाज कराया, इतना कि मैं उन्हें तपेदिक की दवाईयां खिलाते-खिलाते और मेरे आग्रह और दबाव पर वे दवाईयां खाते-खाते थक गये. मगर उनका यह रोग कभी उनहें छोड़कर दूर खड़ा नहीं हुआ. साल-साल भर दवाईयां खिलाने के बाद भी वे मुंह से खून उगलने लगते. उनका मुंह से खून और कफ उगलना तो मरते दम तक बंद नहीं हुआ.

अंतिम दिनों तक एक्सरे उन्हें तपेदिक होना बताता रहा. आखिरी के महीने में मेरे और उनके बीच इस बात पर सहमति बनी की अब सब दवाईयां बंद कर दी जायें. बहनों ने उनकी इच्छा के अनुसार उनके लगातार सूखते और निढाल होते जा रहे हाथ-पैरों पर लहसुन मिलाकर गर्म किया जाता सरसों का तेल लगाना शुरू कर दिया. जो बहनों के सिवा घर में इतनी आत्मीयता से कोई नहीं कर सकता था. हालाकि उनके कृशकाय शरीर को देखकर लगने लगा था कि अब बहुत देर हो चुकी है, मगर इससे उन्हें फौरी तौर पर राहत मिलती, क्योंकि उनका बदन कसरती था. उन्हें लगता था कि उनके शरीर में रक्तसंचार धीमा हो रहा है. इस वजह से उनका शरीर अब हमेशा दुखता रहता है अतः उनके शरीर को मालिस की बहुत जरूरत है. युवावस्था से ही में सुबह जल्दी उठकर घूमने जाने तथा व्यायाम करने की आदत के चलते जो अब शरीर कमजोर पड़ने के साथ-साथ छूट चुकी कि वजह से उनका शरीर अब जाकर तड़कता था. उनके हाथ-पैरों की रगड़कर मालिस करते हुए उनके साथ बातें करते जाने वाली बहनों में सबसे बड़ी सुनीता ने उन्हें खांसी और कफ के चलते पीने के लिये गरम पानी आदि भी देना प्रारंभ कर दिया. जिसके बारे में इससे पहले मेरे साथ-साथ किसी ने नहीं सोचा था, हालाकि उससे उन्हें कितना आराम मिला, यह मैं ठीक-ठीक तो नहीं कह सकता. मगर जब मैं उनके लिये हाॅल में नीचे ही गर्म करने के लिये बिजली का बर्तन तथा रात में रात भी पानी गर्म बनाये रहने वाला जग ले आया, तो  पिता बोले क्यों इतने पैसे खर्च कर रहे हो, हटाओ इन्हें यहां से, घर में क्या बर्तनों की कमी है, जो ये और खरीद लाये. वे पुराने जग की तरफ इशारा करके बोले क्या ये बर्तन नहीं हैं.

हालांकी वे कहते तो यह सब उनके लिये बहुत पहले ही कर चुका होता. मगर उनका हर तरह की सुविधा से चिढ़ना किसी को भी परेशान कर सकता था. पिता हमेशा कम सुविधाओं में जिये. इस हद तक कि उन्हें अपने लिये जूते तक खरीदना गवारा न था. जब भी मैं कहता कि चलो आपको नये जूते पहना लाऊं. वे कहते क्या करना है जूतों का, मुझे कहां जाना है. वो तुम्हारे पुराने जूते रखे तो हैं, यदि मुझे कहीं जाना होगा तो मैं उन्हें ही पहन लूंगा. लेकिन मृत्यु से तीन बरस पहले मैं उन्हें जबरदस्ती मोटर सायकल पर बिठाकर ले गया और उन्हें एक जोड़ी उनके नाप के जूते पहना लाया. जो बमुश्किल  उन्होंने एक-दो बार पहने. जिसे उनकी मृत्यु के बाद पत्नी ने किसी रिश्तेदार को दे दिया. मैं उसी बरस उन्हें उनकी पसंद के के कपड़े भी दिलाकर लाया. मैंने उन्हें कपड़े की दुकान पर ले जाकर बिठा दिया. जब उनके पास मुझसे बचने का कोई चारा नहीं रहा तो उन्होंने अपनी पसंद से चार जोड़ी पेंट-शर्ट के कपड़े अपने लिये खरीदे. जो मैंने हाथों-हाथ दर्जी के यहां सिलने डलवा दिये. जिसमें से उन्होंने दो ही जोड़ी कपड़े पहने. दो जोड़ी बिना पहने कपड़े उनकी लोहे की अलमारी में अंतिम समय तक रखे रहे.  जिंदगी में पहली बार जब मैं इस तरह उनकी पसंद के कपड़े दिलवा रहा था. मैंने उन्हें अपनी पसंद के रंग की शर्ट का कपड़ा दिलवाना चाहा तो उन्होंने मना कर दिया. मेरी पसंद के रंग को मना करते हुए उन्हें अपनी पसंद के रंग की शर्ट का कपड़ा खरीदते देखना. पिता को लेकर मेरी दुर्लभ स्मृतियों में से एक हैं. अपनी पसंद के रंग की शर्ट को भी उन्होंने एक दो बार ही पहना. वे जब भी उसे पहनते मेरा मन उल्लास से भर जाता. मुझे हमेशा वह शर्ट, शर्ट की तरह नहीं, उनकी पसंद उनके मन के उस हिस्से की तरह दिखाई देती जिससे मेरा तक परिचय नहीं था.

 हालांकी  उन्हें खुद दुकान पर ले जाकर कपड़े दिलवाने के पीछे कुछ बरस पहले मुझसे उनकी कही यह बात मेरा पीछा रही थी कि हमारा क्या है हम तो उतरन पहनते रहते हैं. वे अधिकतर मेरे वे कपड़े ही पहनते थे जिन्हें मैं पहनना बंद कर देता था. मैं उनसे उनकी इस बात पर क्या कहता. मगर इतना जरूर था कि मैं उनकी इस बात पर अपना मन मसोसकर रह गया. मगर मैंने उनसे इतना जरूर कहा, बाबूजी, चलो मेरे साथ चलो आप जैसे कपड़े लेना चाहो मेरे साथ चलकर ले लो, मैं आपसे हमेशा कपड़े लेने की कहता हूं, मगर आप ही मना कर देते हो. चलो मेरे साथ. अभी चलो. फिर मेरे कपड़े आपके लिये उतरन कैसे हो सकते हैं. मैं आपका बेटा हूं. आपने आज तक ऐसा नहीं कहा. आप खुशी-खुशी पहन लेते हैं. फिर आप तो खुद सक्षम हैं. कमाते हैं. आपको पेंशन मिलती है. आप जैसा चाहें पहन सकते हैं. अब आप ही न लेना चाहें तो मैं क्या करूं. चलो, मेरे साथ मैं आपको अभी जैसे आप चाहें कपड़े दिलवाकर लाता हूं. फिर अपनी कही इस बात पर मुझे दुखी होते देख वे बोले कोई बात नहीं मैं तो यूंही कह रहा था. ये इतने सारे कपड़े हैं तो इनका क्या होगा. चलो, जाओ मैंने तो यूंहीं कह दिया. मगर पिता के मन में कपड़ो को लेकर जो फांस थी, वह उस रोज उभरकर बाहर आ गई. मैं सोचता हूं कपड़ों को लेकर पिता के मन को जानने की मैंने कभी कोशिश नहीं की. सिर्फ पहनने के कपड़ों को ही क्यों ? उनके बिस्तर के बारे में, वे जिस कमरे में वे रहते, जिस में उनकी इच्छा जाने बिना हम चाहे जिस मेहमान को सुला देते, उसके बारे में.  वे क्या खाना चाहते हैं इस बारे में, उनहोंने कुछ कहा नही तो हमने भी यह मान लिया कि उन्हें सब स्वीकार है. हो सकता है वे यह चाहते हों कि जिस तरह वे बचपन में मुझे जबरदस्ती कपड़े पहनाते और खिलाते-पिलाते होंगे. मुझे भी उन्हें अच्छा खिलाने-पिलाने की जिद करनी चाहिये थी. मां थी नहीं तो फिर उनसे कौन पूछता कि आज कौन सी सब्जी खाओगे.

 हालांकी  जहां तक मुझे याद है मेरी शादी के बाद कभी उनसे यह पूछा भी कि कौन सी सब्जी खाओगे तो उन्होंने  कह दिया, भैया से पूछो वह क्या खाना चाहता है. मगर उनके जाने के बाद लगता है कि हर चीज के बारे में  उनसे जिद करके पूछना चाहिये था. मैं खुद से पूछता हूं उनके जाने के बाद ही यह क्यों लग रहा है, तब क्यों नहीं लगा. तब क्या घर की संवेदना सो रही थी. हां लेकिन जब बहने  घर आतीं रसोई से अधिकार समाप्त हो जाने के बाद भी वे पिता से खाने को लेकर उनकी पसंद जरूर पूछती. मगर पिता बहनों को अपनी पसंद बताकर कतई प्रोत्साहित नहीं करते. हमेशा उनसे यही कहते तुम्हें जो खाना हो वह बना लो, या भैया से पूछो. बहनें जब भी आतीं तो पिता का अकेलापन तोड़ने की नियत से उनसे हमेशा कुछ दिन के लिये को अपने घर चलकर रहने और अपने साथ चलने की कहती.  कभी-कभार वे उनको किसी तीर्थ पर ले जाने की भी मुझसे बात करती.  मैं भी जिन दोस्तों के बीच रहता उनके माता-पिता को तीर्थयात्रा पर जाते हुए देखता तो मैं सोचता कि काश मां होती तो मैं भी इन्हें मां के साथ अपने खर्च पर तीर्थ यात्रा करने भेजता. सोचता कि इस बहाने ही सही जीवन भर घर और बीमारियों  में ही हाड़ खपाने वाले पिता भी इस बहाने कहीं घूम आते. मगर कभी-कभार पूजा-पाठ करने वाले, कभी मंदिर नहीं जाने वाले, कर्मकांडों और को लेकर हमेशा नाक-भौं सिकोड़ने वाले पिता तीर्थ यात्रा की बात पर चलने पर लपककर कहते, कुछ नहीं होता इनसे ये सब फालतू बाते हैं. उनके अपनी बेटी के घर जाकर रहने का तो प्रश्न तो इसीलिये नही उठता था कि वे बेटियों की कही इस बात को सुनकर हमेशा कहते क्यों, यहां क्या मैं ठीक नहीं हूं, यहां मुझे किस बात की परेशानी है. यहां भी तो सब ठीक है. मां नहीं रही तो पिता कहीं घूमने नहीं गये. मैंने किसी के साथ उनके जाने की कोशिश भी की तो उसका कोई नतीजा नहीं निकला. धीरे-धीरे हम उनके तीर्थ-यात्रा पर जाने की बात भूलते चले गये, और देखते-देखते उनके गंभीर रूप से बीमार पिता के अंतिम यात्रा पर जाने का समय निकट आ गया.

यह उनकी आदत में शामिल था कि वे मुझसे अपने किसी काम के लिये कभी-कभार ही कहते. मगर अपनी आदत के मुताबिक मैं उनकी पूछ-परख, देखभाल, और उनके काम करता रहता. पत्नी सुबह ऊपर मेरे कमरे में चाय लेकर आती तो उससे सबसे पहले मेरा यही पूछना होता. बाबूजी को चाय दे आईं ?   कई बार वह मुझ पर इस बात को लेकर खीज भी जाती कि क्या मैं बाबूजी को चाय देकर नहीं आती जो चाय पीने से पहले रोज मुझसे यह पूछते हो. कई बार मेरे पूछने पर वह गुस्से में कहती हां दे आई, इन्हें विश्वास ही नहीं होता. यहीं हाल रात के खाने का था. साढ़े आठ बजे खाना खाने के लिये बैठते समय पूछता, बाबूजी को खाना पहुंचा दिया. इस बात पर पत्नी की प्रतिक्रिया तीखी होती. पत्नी की पिता के प्रति बेरूखी मुझे हमेशा संदेह से भरे रहती. पिता की मृत्यु के बाद मेरी बिटिया ने कहा भी कि हमसे गलती हुई हमने बाबा की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया. पता नहीं उसका इशारा किसकी तरफ था. सबकी तरफ या. हालांकी मैं  मानता हूं कि मेरी एक भी बहन यहां ग्वालियर में ब्याही होती, तो उनका अकेलापन कुछ कम होता. जिसे वह स्वयं अपने बेटे के लिये पसंद करके लाये हों और बेटे ने एक इस वजह से भी उसके प्रति अपनी जिम्मेवारी बनाये रखी हो वह बहू, बेटी होने से इंकार कर दे, ससुर के लिये इससे अधिक तिरस्कारपूर्ण और दुखद क्या होगा. मगर पत्थर का चेहरा तो बदल सकता है स्वभाव नहीं. यह सोचकर मैं मन मसोसकर रहा जाता. साथ ही मेरा भी अपने आप में खोया रहना निश्चित तौर उनकी अनदेखी करता था. हालांकी, बहनों के घर पर रहने आने के दौरान भी, उनके जल्दी से बिस्तर से उठकर गुसलखाने में जाकर कफ न उगलपाने तथा उसे बिस्तर के पास ही फर्श पर ही थूक देने अथवा उल्टी कर देने पर, उसे में ही साफ करता. आखिरी बरस में उनकी उतारी चड्डी बनियान भी मैंने धोना शुरू कर दी थी. कपड़े धोने के लिये मैंने धोबी को कह दिया था. वह आता और उनके कपड़े धोकर दे जाता. मैंने उनसे कह दिया था कि आप कंजूसी मत करना आप तो अपने कपड़े धोने के लिये धोबी को दे देना. उसे धुलाई के पैसे मैं दे दूंगा.


हालांकी  मेरे पैसे देने की नौबत कभी नहीं आई क्योंकि उनके पास पेंशन के पर्याप्त पैसे रहते थे, जिसे वे एक माह में खर्च भी नहीं कर पाते थे. मैंने माधवगंज का मकान बेचकर उन्हें यहां लाने के बाद इस बात का शुरू से ही ख्याल रखा कि उनकी जेब में हमेशा पैसे रहे. बेचे गये मकान के पैसों को मैंने बैंक में उनके नाम से फिक्स कर दिया और उस पर मिलने वाले ब्याज का पैसा भी उनके और मेरे नाम से बैंक में खुला खाते में जमा करवाने लगा. जिसके बारे में बार-बार मुझसे पूछते. कई बार वे बेचे गये मकान के रूपयों के बारे में संदेह व्यक्त करते तो मैं गुस्से में उनसे कहता. आपको विश्वास नही तो चलो मेरे साथ बैंक में जाकर पूछ लो आपके सारे रूपये जमा हैं मैंने उसमें से एक भी पैसा खर्च नहीं किया है ? पिता के बुजुर्ग होने को लेकर सोचते हुए मेरा हमेशा से यह मानना रहा और मैं इस बात का उल्लेख अपने दोस्तों के बीच और खुद पिता से भी करता भी रहा कि बुजुर्ग की जेब खाली होने का मतलब उसकी जिंदगी खाली हो जाना है. पैसा बूढ़ा, बच्चा जवान सब को ताकत देता है. ऐसा कभी नहीं होना चाहिये कि घर के बुजुर्ग का पैसा उसकी जगह उसके बच्चों की जेब में हो, बुजुर्गों की इससे बड़ी पराधीनता क्या होगी. बुजुर्ग का रूपया बुजुर्ग की जेब में ही होना चाहिये. इसीलिये हर महीने की पहली-दूसरी तारीख को मैं पेंशन की अस्सी प्रतिशत राशि निकालकर उनके हवाले कर देता. जिसमें से वे कुछ बचा लेते कुछ अपने खाने-पीने पर खर्च कर लेते. घर में मेरा सब को सख्त निर्देश था कि अपनी पेंशन के पैसे का वे क्या करते हैं, यह जानने की कभी कोशिश मत करना. वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा. वे अपने पैसे का चाहे जो करें, चाहे आग लगा दें. हालाकि अंतिम बरसों में उनके साथ यह भी होने लगा था कि रास्ते में उनसे रूपये गिर जाते या जब वे घर से माधवगंज जाते तो टेम्पों में उनकी जेब कट जाती जिसका मुझे बाद में किसी और से पता चलता.

पिता मुझे सीधे और तुरंत इसीलिये नहीं बताते कि मैं सुनकर नाराज होउंगा. जब उनके साथ दो-चार बार ऐसा हो गया तो मैंने एक दिन उन्हें आराम से समझाया कि आप जितने पैसे एक दिन में खर्च कर सकते हो उतने ही रूपये लेकर चला करो, सारे पैसे लेकर टेम्पों में सफर क्यों करते हो. उतने ही रूपये जेब में होंगे तो कहीं गिर जायें या कोई निकाल भी ले तो ज्यादा नुकसान तो नहीं होगा तो मेरी बात उनकी समझ में आ गई. फिर वे उतने ही पैसे लेकर घर से बाहर लेकर निकलते जितने कि उन्हें जरूरत होती, बाकी पैसे वे घर में ही अपनी उस अलमारी में रख जाते, जो उनकी कहलाती थी, जो माधवगंज में मकान में उनके कमरे में रखी थी, और जो अब उठकर यहां नये मकान में आ गई थी. जो भले ही उनकी अलमारी कहलाती थी मगर जिसमें माधवगंज से लेकर यहां तक मैं उसमें उनसे ज्यादा घुसा हुआ था, अपनी जेब की जगह जिसमें अब वे मेरे कहने पर पेंशन के पैसे रखने लगे थे. बीच-बीच में मुझे मालूम चलता उनके पेंशन के पैसों में से उनके साथ-साथ उनके नाती का भी चटोरापन सधता.माधवगंज बाजार में जहां हम पहले रहते थे. वहां शरीर की मालिस करने के लिये लोग मिल जाया करते थे, किंतु यहां कालोनी में मालिस करने वाला मिलना मुश्किल था. माधवगंज छोड़कर यहां आने के बाद जो उनकी कुछ शिकायतें थी. जिन्हें वह लगातार हमसे दोहराते रहते. जैसे कि यहां कालोनी में बस अपने घर में अकेले पागलों की तरफ पड़े रहो। न कोई बोलने को न बतराने को, सब अपने घरों में घुसे रहते हैं, वहां बाजार में घर था तो कम-से-कम समय तो कटता था. फिर दूर होने की वजह से यहां कोई मिलने भी नहीं आता, कभी-कभार कोई आ जाये तो ठीक वरना किसी से दोस्त यार से मिले महीनों गुजर जाते हैं और वहां तो बाजार में आते-जाते ही लोग मिलते हुए चले जाते थे. न तो यहां समय ही नहीं कटता और नहीं यहां खाने को कुछ ठीक मिलता है.

वहां बाजार था तो सब सस्ता चटर-पटर उपलब्ध था. मिठाई- कचैड़ी-पकौड़ी की दुकाने थी.  जब चाहा उठे और जाकर खा लिया. इसी सस्ती मिठाई और कचैड़ी पकौड़ी खाने की आदत ने जीवन के अंतिम बरसों में उनके स्वास्थ्य को गहरे से प्रभावित किया. उसका कारण यह रहा कि जब हम माधवगंज वाला मकान छोड़कर यहां रहने के लिये आये तो पिता की वजह से हमने माधवगंज बाजार के उस मकान को नहीं बेचा था, जिसके बारे में पिता को जीवन में यह कहते हमने कई बार सुना कि अरे हमारा मकान तो बहुत सही जगह बाजार में हैं. कम से कम वह हमें भूखा तो नहीं मरने देगा. यदि हमने घर के दरवाजे पर रखकर ही कुछ सामान बेचना शुरू कर दिया तो जीवन कट जायेगा, और यही उन्होंने पिछले बीस बरस तक किया भी.

मानवी से भोग्य वस्तु में तब्दील स्त्री अस्मिता का भौतिक सत्य – भारतीय और वैश्विक संदर्भों में

मुद्रा राक्षस 
 
सुधा अरोड़ा की कहानी ‘‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी’’ के परिप्रेक्ष्य में 


अश्वेत लेखिका टोनी मारिसन ने अपने विख्यात उपन्यास ’बिलवेड‘ के सिलसिले में एक वास्तविक घटना का जिक्र किया है. एक अश्वेत महिला मार्गरेट गार्नर दासी के रूप में काम करती थी. एक दिन छुटकारे की आकांक्षा से वह चुपचाप भाग खड़ी हुई. उसने सबसे पहले अपनी बेटी की हत्या कर दी ताकि बेटी को दासता न झेलनी पड़े. बाद में गार्नर पर मुकदमा चला – टोनी की हत्या के लिए नहीं, सम्पत्ति (यानी दासी) चुराने के लिए. टोनी मारिसन ने इस घटना का इस्तेमाल और ज़्यादा बड़े समाज-शास्त्र के लिए किया. उसके उपन्यास ’बिलवेड‘ में भी नायिका सेशे अपने बच्चे की हत्या कर देती है.अश्वेत लेखिका एलिस वाकर ने एक अन्य अश्वेत लेखक ज्याॅ टूमर के हवाले से लिखा था – जब कवि ज्याॅ टूमर तीस के दशक के शुरू मे दक्षिण जा रहा था उसका ध्यान एक विचित्र चीज़ पर गया और वह थी एक अश्वेत स्त्री. अश्वेत स्त्रियां जिनकी आध्यात्मिकता इतनी गहरी , इतनी गहन और स्वाभाविक थी कि खुद उन्हें भी इसका बोध नहीं था. अपनी ज़िन्दगी वे अटपटे ढंग से जी रही थी. उनके शरीर घायल प्राणियों की तरह तकलीफ से छटपटाते हुए जैसे उम्मीद का कोई सूत्र उनके आसपास न हो.

एक अरसा पहले मैंने सुधा अरोड़ा की कहानी वागर्थ में पढ़ी थी – ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी.‘ कहानी पढ़ने के बाद टोनी मारिसन की अनुभूत घटना और एलिस वाकर का उक्त उद्धरण , दोनों शिद्दत  से याद आए थे. कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो कहानी से बहुत ज्यादा कुछ होती हैं – शायद एक लंबा और बाढ़ के पानी की तरह उमड़ आया गंदला इतिहास या किसी ममी में तब्दील कर दिया गया समाजशास्त्र. सुधा अरोड़ा की ‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी’ एक बहुत छोटी सी कहानी है फिर भी यह एक महागाथा है.  मुझे याद नहीं आता कि इतनी विराट कथा इतने छोटे आकार में और कहां देखी जा सकती है. यह उन रचनाओं मे से है जिसका बयान बहुत मुश्किल, लगभग असंभव होता है. आप लियोनार्डो द विंची की मोनालिसा का ब्यौरा दे सकते हैं , गोगाॅ की तस्वीर ’क्या तुम्हें ईर्ष्या हो रही है‘ का बयान कर सकते हैं, पर क्या चित्रकार फर्नाण्ड की कृति ’ए वुमन इन ब्लू‘ का ब्यौरा दे सकते हैं? नहीं . कुछ रचनाएं सरापा बयान होती हैं और बयान का बयान नहीं किया जा सकता. उनके लिए अनिवर्चनीय शब्द बहुत भोंडा होता है.मातृत्व को गौरवान्वित करते हुए हजारों बयान हिन्दू धर्म ग्रंथों में ही नहीं साहित्यिक कृतियों में भी मिल जायेंगे. स्त्री यह सच जानती है पर उसकी स्वतंत्र चिंतन की ताकत पथरा चुकी होती है. इसीलिए वह स्त्री को मां बन कर अपने वजूद को सफल करने की सलाह देती है पर बेटी के जन्म से घबरा जाती है.

सुधा अरोड़ा की कहानी लगभग सूत्र जैसे शिल्प मे यह इतनी लंबी गाथा देती है। इसमें मातृत्व से घबराहट के इतिहास-सांस्कृतिक सत्य की छाया है और यह अभिशाप भी मौजूद है जिसमें स्त्री खुद स्त्री के जन्म को अभिशाप मानती है – लेकिन यह सब सिर्फ इतना ही नहीं है. स्त्री-विमर्श का सुधा अरोड़ा का भाष्य  स्त्री के अस्तित्व के असीम और अछोर उलझाव से एक धारदार मुठभेड़ है। पर इस मुठभेड़ की पहचान के लिए हम एक दूसरे क्षेत्र में जाना चाहेंगे. इस कहानी को समझने के लिए हमें कहानी से बाहर उसके आसपास की दुनिया को देखना होगा. पिछले कुछ अरसे से हिन्दी में स्त्री-विमर्श काफी प्रमुखता से सामने आया है. सुधा अरोड़ा की कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए समाज में स्त्री प्रश्न की गुत्थियों पर नज़र डालनी होगी. पाकिस्तान की विख्यात लेखिका किश्वर नाहीद ने स्त्री को लेकर आत्मकथा में कुछ गंभीर और विचारणीय टिप्पणियां की है. नाहीद ने लिखा है – ’यहां तो औरतें ही एक दूसरे को नहीं समझतीं बल्कि अपने वजूद (अस्तित्व) की इनफ़रादियत (स्वाधीनता) पे एतमाद नहीं रखती. खुद अपनी ज़ाया को तनहा काबिले इज़्जत समझती ही नहीं. या फिर मर्द के बनाए हुए एखलाकी और जज़्बाती उसूलों पे चल कर ज़िन्दगी को मेराज (चरम सीमा) पे पहुंचा हुआ महसूस करती हैं. दुनिया में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, इससे उनका सीधा ताल्लुक न बनने दिया जाता है और न वह समझती हैं कि ताल्लुक बाकायदा हो सकता है.‘

परिवार और निजी सम्पत्ति की बुनियाद पर खड़े समाज में औरत एक अपरिवर्तनीय, स्थायी और किसी भी चुनौती से परे जो परिस्थिति की या इकालजी स्त्री के लिए निर्धारित होती रही है उसने इतिहास के लंबे दौर में स्त्री की चेतना के साथ कुछ वैसा सुलूक किया है जैसा पुराने चीन में बच्चियों के पांव छोटे रखने वाले सांचे करते थे. बेहद तकलीफदेह ये सांचे उस जमाने में चीन की औरतों के गौरव हुआ करते थे. पैर सांचे में डाल कर बदशक्ल न बनाए जायें, यह बात खुद औरत को ही नापसंद थी. स्त्री यह समझने की आदी हो जाती है कि उसकी ज़िन्दगी अर्धांगिनी होने में ही है। पति से ही वह पूर्णांगिनी हो सकती है. बिना पति वह अधूरी ही रहेगी. वह समझने लगती है कि उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व संभव ही नहीं है. दुनिया से भी वह अपना संबंध पति की मार्फत ही देखने की अभ्यस्त हो जाती है. पश्चिम के मनोविश्लेषकों ने इस बात पर लंबी बहसें की है कि व्यक्ति के परिवेश और जीवन की स्थितियां उसके मानसिक विकास पर क्या असर डालती हैं. इस प्रश्न को हमें स्त्री के उस परिवेश से जोड़ कर देखना चाहिए जो पूरी दुनिया मेें उसे परिवार व्यवस्था के कारण मिलता है. जब युवावस्था में पहुंच कर स्त्री दुनिया को देखने समझने की दहलीज़ तक आती है उसका संसार सिर्फ उतना रह जाता है जो उसे दुनिया नहीं पति और परिवार से जोड़ सके. उसकी जिज्ञासाओं के सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं. वह खाना बनाती है , घर की व्यवस्था करती है , बच्चे पैदा करती और पालती है. उसकी रचनात्मकता सलाद या तकिए पर चित्रकारी में सीमित हो जाती है. रचनात्मकता अगर बहुत उत्तेजित करे जो हथेली पर मेंहदी लगाने या गमलों में पौधे उगाने में प्रतिफलित होती है. निश्चय ही यह वातावरण स्त्री के अबाध मानसिक विकास में सबसे बड़ी बाधा होता है और इस बाधा में जीने ओर संतुष्ट रहने का स्त्री को हजारों बरस पुराना अभ्यास होता है.

आत्मकथा में किश्वर नाहीद ने फ्लोरेंस नाइटिंगेल का एक उद्धरण दिया है – ’ख्वाहिशें , ख्वाब , सरगर्मियां और ऐब सब बारी-बारी पहले मर जाते हैं, सबसे आखिर में जो चीज़ मरती है वह है ज़हानत.‘ ज़हानत या विवेक का बीज हर इंसान की तरह स्त्री में भी मौजूद होता है. किसी जमाने में कुछ समाजों में पति कुछ अरसे के लिए बाहर जाता था तो औरत को लोहे की जांघिया ताले लगाकर पहना जाता था. लगभग सारी दुनिया में, हर समाज में स्त्री के विवेक का बीज लोहे में लपेट कर रखा जाता है और धीरे-धीरे वह पथरा जाता है.  किश्वर नाहीद ने बहुत बेचैनी से लिखा – ’समाज और मर्द ने अपने आप फैसले करके फितरत और कुदरत के नाम लगा दिए. पहला फैसला यह कि औरत के वजूद का बुनियादी मकसद बच्चा पैदा करना है कि इसके अंदर बच्चेदानी इसी मकसद के लिए है. सही है कि इसके अंदर बच्चादानी है मगर इसके अंदर एक दिमाग़ भी तो है.‘ बच्चेदानी को भरपूर उपजाऊ बनाए रखने और दिमाग को सुखाने का जो करतब मर्द की दुनिया दिखाती है उसी का एक नतीजा है टोनी मारीसन द्वारा उल्लिखित वह घटना जिसे हमने लेख के शुरू में दिया था। इस जगह पहुंच कर हम सुधा की कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ को उठाना चाहेंगे. ’ तुम चारो मुझे घेर कर खड़े हो गए…भला पहला बच्चा भी कोई गिराता है. पहला बच्चा गिराने से फिर गर्भ ठहरता ही नहीं. मां बनने में ही नारी की पूर्णता है. मां बनने के बाद सब ठीक हो जाता है , जीने का अर्थ मिल जाता है. मां तुम अपनी तरह मुझे भी पूर्ण होते हुए देखना चाहती थी.  मैंने तुम्हारी बात मान ली और तुम सबके सपनों को पेट में संजो कर वापस लौट गई. ‘

मां के जीने का अर्थ मां बनना था , उसकी मां का भी.  उसकी बेटी अन्नपूर्णा मंडल के जीने का अर्थ भी मां बनना है और बेटी की बेटी का भी. विचित्र बात है , सदियां बीतती है स्त्री को यह सवाल पूछते कि जीने का अर्थ क्या है और सदियो से एक ही उत्तर वह सुनती है – मां बनना. आखिर मातृत्व महिमामंडन के इस अतिरेक का रहस्य क्या है ? महाभारत सहित सभी धर्म पुस्तकों , धर्म-शास्त्रों में स्त्री को लेकर घोर निंदनीय बातें कही गई है और अक्सर खासी अश्लील भाषा में भी. ऐसी स्थिति में मातृत्व के महिमामंडन के अतिरेक का कारण क्या हो सकता है ? इसका कारण देख पाना ज्यादा कठिन नहीं है. पुरुष निरंतर यह कोशिश करता रहा कि स्त्री-पुरुष निर्भरता को अपना संस्कार बना ले , वह एक वेश्या की ज़रूरत भी पूरी करे और निःशुल्क दासता भी करे , गाय , बकरी या कुतिया की तरह घर से बंधी रहे और मर्द की ज़रूरत के अनुसार पुत्र पैदा करने वाली एक मशीन बनी रहे. इस दयनीय स्थिति मे स्त्री संतुष्ट और खुश भी रहे. मां अपनी बेटी को, बेटी अपनी बेटी को इसी जीवन पद्धति का उपदेश भी देती रहे.

हिन्दू धर्म ने तो स्त्री की इस भूमिका का आश्चर्यजनक व्याख्यान किया है. यहां हम पांच भाइयों के साथ सोने को मजबूर और बर्तन-भांडे की तरह जुए में दांव पर लगा दी जाने वाली स्त्री द्रौपदी पर केन्द्रित महाभारत के एक महत्वपूर्ण प्रसंग का जिक्र करना चाहेंगे. यह कथा उद्योगपर्व में आई है. कथा यों है। ऋषि विश्वामित्र ने अपने शिष्य गालव से आठ सौ सफेद लेकिन काले कान वाले घोड़े मांगे. गालव ऐसे घोड़े प्राप्त करने के लिए अयोध्या के राजा के पास गया. अयोध्या के राजा ने उसे अपनी बेहद सुंदर कन्या देकर कहा – इसे जिस राजा को दे दोगे वह तुम्हें इतने घोड़े दे देगा. गालव घोड़ों के बदले कन्या लेकर राजा हर्यश्व के पास पहुंचा. हर्यश्व ने कन्या से एक पुत्र पैदा करके कन्या के शुल्क के रूप मे दो सौ घोड़े देकर कन्या वापस कर दी. इसके बाद गालव दिवोदास और उशीनर के पास गया. उन दोनों ने भी कन्या को एक-एक साल अपने पास रख कर एक-एक बेटा पैदा किया. उन दोनों से भी दो-दो सौ घोड़े मिले. तब छह सौ घोड़े और बाकी दो सौ घोड़ों के बदले वह कन्या गालव ने विश्वामित्र को दे दी. विश्वामित्र ने भी लड़की को एक साल अपने हरम में रखकर एक पुत्र पैदा किया. यह है उस पुरुष समुदाय का सच जो मातृत्व की अतिरंजित गरिमा का बयान करता है. मातृत्व का गौरव वह स्त्री को इसी तरह देता है , एक वेश्या में तब्दील करने के बाद.

क्यूबिस्ट चित्रकार विचारक आन्द्रे लेवेल ने कहा था कि रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाली वस्तुओं का विश्लेषण जब अलग-अलग कोणों से उनकी सम्पूर्णता या आंशिकता (टुकड़ों) में किया जाता है तो उनकी सामान्य पहचान गायब हो जाती है और उनके छीछड़े दिखाई देने लगते हैं.‘ इसी क्यूबिज्म का अगला विकास था सर्रियलिज्म जिसके प्रतिनिधि चित्रकार के रूप में साल्वेडार डाली ने अपार ख्याति पाई थी. इसके व्याख्याकार चित्रकार आन्द्रे ब्रेतां ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी – ’चेतना का एक वह स्तर भी होता है जहां जीवन और मृत्यु , वास्तविक और काल्पनिक , अतीत और भविष्य के अन्तर्विरोध समाप्त हो जाते हैं.‘ सुधा अरोड़ा की कहानी उक्त दोनों संदर्भों में देखी जानी चाहिए. कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ में अन्नपूर्णा मंडल आत्महत्या का चुनाव करती है दो बच्चियों को जन्म देने के बाद. जैसा चित्रकार आलोचक आन्द्रे ब्रेतां ने कहा था जब अन्नपूर्णा मंडल स्त्री के रूप में सचेत होती है उसे लगता है कि जीवन और मृत्यु के बीच का फासला गायब हो चुका है. वस्तु सत्य या जीवन और विश्व की वास्तविकताएं जिस कोण से भी देखो अपना अर्थ और स्वरूप खो चुकी हैं. वस्तु सत्य अगर कुछ होेता है तो वह चीथड़ों के ढेर में तब्दील हो चुका है.

निश्चय ही चेतना एक भौतिक तत्व की मानसिक स्थिति होती है. नव प्रभाववादी चित्रकार मातिसे को कहना था कि वह चित्र बनाते समय एक नन्हें शिशु की मानसिक स्थिति में पहुंच जाता है. ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ स्त्री-विमर्श की दुनिया में कदम रखते ही मातिसे हो जाती है. वह समूचा विश्व एक शिशु-बोध में परिवर्तित कर देती है. नव प्रभाववादी कला का जिक्र करते हुए कला समीक्षकों ने स्पेन की आल्टामीरा पर्वतीय गुफाओं की आदिम चित्रकारी का जिक्र विस्तार से किया है. गुफा में आदिम मानव ने एक विराट और खूंखार भैसे का चित्र बनाया है. इस चित्र में आदि मानव ने भैसे के प्रमुख लक्षणों का सावधानी से चित्रण किया है जबकि दूसरी अनेक बारीकियों की उपेक्षा की है। इसका जिक्र करते हुए कला समीक्षकों ने स्वीकार किया है कि कला के इतिहास के इतने अधिक विकसित हो जाने के बाद हम उस आदिम चेतना तक वापस नहीं जा सकते. पर सुधा अरोड़ा के साथ यह हुआ है. शायद इसलिए कि स्त्री अगर इतिहास के प्रति सचेत होती है तो अपने को सृष्टि के आदि में ही देखती है जब रीढ़हीन केंचुओं का पृथ्वी पर आर्विभाव हुआ होगा.कहानी दो नन्हें भाई-बहनों के खेल से शुरू होती है. बारिश होती है तो दोनों बच्चे पूकुर के पास रेंगते केंचुओं पर नमक डाल-डाल कर उन्हें मारते हैं. ‘‘ बाबा तुम डाकघर से लौटते तो पूछते – तुम दोनों हत्यारों ने आज कितनों की हत्याएं कीं ? फिर मुझे पास बिठाकर प्यार से समझाते – बाबला की नकल क्यों करती है रे ! तू तो मां अन्नपूर्णा है , देवी स्वरूपा , तुझे क्या जीव-जन्तुओं की हत्या करना शोभा देता है. ‘

मुद्राराक्षस

भारत के हिन्दू समाज में स्त्री को मातृत्व की देवी बनाकर भारी-भरकम शब्दावली में गौरवान्वित किया जाता है. इस महिमामंडन के बाद उसे पांच अदमियों को सौंप दिया जाता है , जुए में दांव पर लगाया जाता है , उसका अपहरण हो जाय तो उसे अग्निपरीक्षा देने के बाद भी अस्वीकार कर दिया जाता है , पति मर जाय तो जीवित जलाया जाता है. सीता का अपहरण हुआ. अग्निपरीक्षा के बाद भी गर्भिणी अवस्था में घर से निकाला गया. बच्चों को जन्म देने के बाद अन्ततः जीवित मिट्टी में दफन होना पड़ा. स्त्री यातना से अभिनंदित होने वाले इस पुरुष को अन्नपूर्णा मंडल भयाक्रांत होकर देखती है -‘‘ जब बांकुड़ा से बम्बई के लिए मैं रवाना हुई तुम सबकी नम आंखों में कैसे दिये टिमटिमा रहे थे जैसे तुम्हारी बेटी न जाने कौन से परीलोक जा रही है जहां दिव्य अप्सराएं उसके स्वागत में फूलों के थाल हाथ में लिए खड़ी होंगी.‘ यह सिर्फ अन्नपूर्णा मंडल जानती है कि उसके साथ क्या होने जा रहा है , कहां वह जीवित दफ़न होने जा रही हैं. भारत में शादी के बाद कन्या अकसर बहुत बुरी तरह रोती है. सिर्फ वही जानती है कि उससे क्या जबर्दस्ती छीना जा रहा है और ये आशंकाएं उसी क्षण से उसे अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं कि निरपराध होने पर भी उसे लगातार अपनी पवित्रता का प्रमाण-पत्र लहराते रहना होगा और फिर भी दांव पर लग जाने से लेकर जीवित दफ़न होने के लिए तैयार रहना होगा. हैरानी यह है कि उसे अन्नपूर्णा ’मैया‘ का दर्जा इसी शर्त पर मिलेगा. इसी शर्त पर उसे महिमामंडित किया जायेगा.

नव प्रभाववादी चित्रकला के संबंध में आल्टामीरा गुफाओं के चित्रांकन का जिक्र किया जाता है. मातिसे से लेकर पालक्ली तक अनेक बड़े चित्रकारों ने अपनी कृतियों में अक्सर संस्कृति के उस प्रारंभिक बिंदु पर लौटने की कोशिश की है. स्त्री खास कर तीसरी दुनिया में हजारों साल से सांस्कृृतिक विकास की यात्रा सें वंचित , आदिम युग में ही खड़ी रखी गई है. इसलिए अपनी रचनादृष्टि में वह ऐसा सब कुछ आसानी से ला सकती है जिसे मातिसे बहुत श्रम से अर्जित करता है और यह सुधा की कहानी में आसानी से घटित होते देखा जा सकता है.
’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ में प्रकृति है , जन-जीवन है , लोग हैं , रीति-रिवाज हैं , रिश्ते हैं , घर हैं पर वे वैसे नहीं हैं जिन्हें मेघदूत , कादंबरी या कामायनी में देखा जा सकता है. कहानी में दो जगह बरसात के मौसम का खास तौर से जिक्र है. एक जगह वहां जहां अन्नपूर्णा मंडल बच्ची है. हमने आल्टामीरा गुफा की आदिम चित्र रचनाओं का जिक्र किया था. इसी संदर्भ में हमें चित्रकार मातिसे का वह वक्तव्य भी ध्यान में रखना होगा जिसमें मातिसे कहता है – मैं कोशिश करता हूं कि मैं एक शिशु की मनःस्थिति में पहुंच जाऊं.‘ सुधा अपनी बात कहने के लिए इसी युक्ति का इस्तेमाल करती हैं  बारिश मेघदूत के ’आषाढ़स्य प्रथम दिवसे‘ से अलग है. बारिश ने रचनाकारों को बहुत आकर्षित किया है. रीतिकाल के कवि ही नहीं बीसवीं सदी के छायावाद पंत और निराला को भी बरसात के मौसम ने बहुत आकृष्ट किया था. यह सारा लेखन वयस्कों का लेखन है. सुधा की कहानी इस वयस्कता से मुक्ति लेती है. जिसे रचनात्मक सौन्दर्यबोध कहा जाता है वह रचनाकार की वयस्कता की उपलब्धि होता है.

सुधा अरोड़ा

 ऋतुसंहार में कालिदास ने बारिश के बारे में बहुत खूबसूरत बात कही है – ’तृणोत्करैः संगत कोमलांकुरैः विचित्र नीलैः हरिणीमुखक्षतैः। वनानि वन्यानि हरन्ति मानसं विभूषितानि उत्पल कल्लवैद्रुमैः. यानी धरती पर कोमल अंखुए फूट आए हैं , वनों में विचित्र वर्णवाले मृगों ने घास के तृणों को चबाया है. घास अधकटी दिखाई दे रही है। वनों के वृक्षों में नए पत्ते आ गए हैं , यब सब देखकर मन पुलकित हो जाता है. कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ की बारिश भी मन में पुलक पैदा करती है पर उसमें हिरणों की चराई नहीं दिखाई देती -’ मां झीखती रहतीं और हम सारा दिन पोखर के पास और आंगन के बाहर नमक की पोटली लिए बरसाती केंचुओं को ढूंढते रहते थे. ये इधर-उधर बिलबिलाते से हमसे छिपते फिरते थे और हम उन्हें ढूंढ ढूंढकर मारते थे. नमक डालने पर उनका रंग कैसे बदलता था , केंचुए हिलते थे और उनका शरीर सिकुड़ कर रस्सी हो जाता था.‘
इसी बरसात का एक बहुत संक्षिप्त सा जिक्र कहानी में और है -’ तुम्हें पता है न बंबई में बरसात का मौसम शुरू हो गया है. मैं तो मना रही थी कि बरसात जितनी टल सके , टल जाय लेकिन वह समय से पहले ही आ धमकी. और मुझे जिसका डर था वही हुआ. इस बार बरसात में पार्क की गीली मिट्टी सड़क से उठकर उन्हीं लाल केंचुओं की फौज घर के भीतर तक चली आई है. रसोई में जाओ तो मोरी के कोनों से ये केंचुए मुंह उचका कर झांकते हैं , नहाने जाओ तो बाल्टी के नीचे कोने पर वे बेखौफ चिपके रहते हैं.‘

शादी करके पति के घर में आ गई अन्नपूर्णा को सिर्फ दो स्थान ज्यादा याद आते हैं एक रसोई और दूसरा स्नानघर. शादी के बाद किसी हिन्दू स्त्री का सबसे गहरा रिश्ता घर की तीन जगहों से ही होता है – रसोई , स्नानघर और शयनकक्ष. ड्राइंगरूम , लिविंगरूम , छत , दरवाजे , खिड़की और बरामदे उसके लिए नहीं होेते. अन्नपूर्णा मंडल का अपनी नियति से समूचा साक्षात्कार इन्हीं दो जगहों पर होता है – रसोई और स्नानघर. यहां हम एक और सामाजिक मुद्दों  की तरफ संकेत करना चाहेंगे. एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि स्त्री की अपनी सामाजिक हैसियत क्या होती है ? हिन्दू धर्म ग्रंथों में स्त्री की हैसियत पति द्वारा निर्धारित होती है. कमोबेश यही स्थिति लगभग सभी समाजों में रही है. चूंकि स्त्री हर समाज में पराधीन रही है इसलिए स्वतंत्र रूप से उसकी हैसियत लगभग शून्य रही है. हैसियत का एक आधार हो सकता है समाज में मिलने वाला सम्मान पर स्त्री की नियति रही है कि उसके सम्मान की गारंटी सिर्फ उसका पति हो सकता है. इब्सन का नाटक ’दि डाल्स हाउस‘ इसी कड़ी सच्चाई का ही खुलासा करता है. स्त्री का अपना सामाजिक सम्मान इसलिए एक दुर्लभ स्थिति होता है कि स्त्री समाजतंत्र में स्वतंत्र रूप से (बहुत बिरले उदाहरण छोड़कर) न तो सत्ताशक्ति की स्वामिनी होती है न सम्पत्ति की और न ही अपनी जीवनचर्या की. इनसे वंचित रखकर ही स्त्री की पूर्ण पराधीनता और पतिनिर्भरता संभव होती है.

इस नियति का इस भाषा में अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी  में कहीं कोई उल्लेख नहीं है पर इस स्थिति का अनुभव होने पर स्त्री मे कैसी घबराहट जन्म लेती है , इसका परिचय इसमे जरूर मिल जाता है -’ फोन पर इतनी बातें करना संभव कहां है. फोन के तारों पर मेरी आवाज जैसे ही तैरती हुई तुम तक पहुंचती है तुम्हें लगता है सब ठीक है , जैसे मेरा जिन्दा होना ही मेरे ठीक रहने की निशानी है और फोन पर तुम्हारी आवाज़ सुनकर मैं परेशान हो जाती हूं क्योंकि फोन पर मैं तुम्हें बता नहीं सकती कि तुम जिस आवाज़ को मेरी आवाज़ समझ रहे हो वह मेरी नहीं है.‘ अन्नपूर्णा बहुत ठंडे तरीके से आत्महत्या का चुनाव करती है पर अन्नपूर्णा मंडल का मृत्यु का चुनाव क्या सचमुच इतनी ठंडी घटना है ? क्या उसके पीछे भी अवांछित हिंसा का एक लंबा सिलसिला नहीं है ? वह कहती है -’ जिस आवाज़ को मेरी आवाज़ समझ रहे हो वह मेरी नहीं है. ‘  रैल्फ एलिसन का कथानायक कहता है -’ कौन जानता है शायद निचली ध्वनितरंगों में मैं तुम्हारी तरफ से ही बोल रहा हूं.‘ संत्रास कैसे अपनी आवाज़ को अपने से ही अजनबी कर देते हैं इसका उदाहरण बेहद छोटी कहानी ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ में मिलता है या फिर विराट आकार के उपन्यास ’द इनविजिबल मैन‘ में.हमने शुरू में टोनी मारिसन द्वारा उद्धृृत एक अश्वेत महिला द्वारा दासता से भाग निकलने के बाद सबसे पहले अपनी बेटी की हत्या का उल्लेख किया था। वह हत्या इसलिए कर देती है कि बेटी को वह दिन न देखना पड़े जो उसकी मां ने देखा.

 अन्नपूर्णा मंडल में भी बहुत अलग ढंग से एक हत्या है , अन्नपूर्णा की आत्महत्या पर यह आत्महत्या से ज्यादा एक  हत्या ही है सद्यः प्रसूता जुड़वां बेटियों की क्योंकि वे दोनों भी अन्नपूर्णा मंडल ही हैं – ’ इन दोनों के रूप में तुम्हारी बेटी तुम्हें सूद सहित वापस लौटा रही हूं. इनमें तुम मुझे देख पाओगे शायद . ‘ इस कहानी को अन्त से शुरू करके पीछे के पृष्ठ पढ़ना कहानी के कुछ और गहरे तत्व उभारता है. सूद समेत बेटी को लौटाने से ठीक पहले एक आतंक का बयान है – ’ जब बाहर सड़क पर मैदान के पास की गीली मिट्टी में केंचुओं को सरकते देखती हूं तो इन दोनों की शक्ल दिखाई देती है. मुझे डर लगता है कहीं मेरे पति घर में घुसते ही इन पर चप्पलों की चटाख-चटाख बौछार न कर दें. या मेरी सास इन पर केतली का खौलता हुआ पानी न डाल दें. मैं जानती हूं  यह मेरा वहम है पर यह लाइलाज है और मैं अब इस वहम का बोझ नहीं उठा सकती. चित्रकार विन्सेन्ट वैन्गाग ने एक बार अपने भाई को लिखा था – ’मैं अपनी आत्मा को बचाना चाहता हूं. मैं जिन्दा गोश्त और खून से चित्र बना रहा हूं.‘ अन्नपूर्णा मंडल अपनी ’आत्मा‘ को बचा लेना चाहती है , शायद वैन्गाग की तरह। अन्नपूर्णा सद्यःजात बच्चियों को अपनी बगल में देखती है.

 दुनिया के साहित्य में ’मातृत्व‘ का ऐसा ख़ौफनाक बोध शायद ही किसी रचना में आया हो -’ पांचवे महीने में मेरे पेट में जब उस आकार ने हिलना-डुलना शुरू किया ,मैं भय से कांपने लगी थी. मुझे लगा मेरे पेट में वही बरसाती केंचुए रेंग रहे हैं , सरक रहे हैं. आखिर वह घड़ी भी आई जब उन्हें मेरे शरीर से बाहर आना था. और सच में जब लम्बी बेहोशी के बाद मैंने आंख खोल कर अपने बगल में लेटी सलवटों वाली चमड़ी लिए अपनी जुड़वां बेटियों को देखा, मैं सकते में आ गई. उनकी शक्ल वैसी ही गिजगिजी लाल केंचुओ जैसी झुर्रीदार थी. मैंने तुमसे कहा भी था – देखो तो मां ये दोनों कितनी बदशक्ल हैं…‘यहां दो वीनस मूर्तियों का जिक्र ज़रूरी है। एक नन्हीं मूर्ति नग्न स्त्री की मोराविया के उत्खनन में मिली थी. उसके हाथ नहीं हैं. विशाल कूल्हे , विराट स्तन और और अत्यन्त स्वस्थ शरीर वाली इस आदिम मूर्ति को उत्खननकर्ताओं ने वीनस कहा है. एक वीनस बहुत बाद में तथाकथित सभ्य समाज ने बनाई थी. उसके भी हाथ नहीं है पर वह एक सर्वांग भोग्या वस्तु है. मानवी से भोग्या वस्तु में तब्दील स्त्री की अस्मिता का भौतिक सत्य क्या होता है इसी की कहानी है ’अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिठ्ठी ‘ विश्वविद्यालयी समझदारी से देखने वाला कोई भी विचारक इसमें केंचुए को एक प्रतीक मान लेगा.



पारंपरिक आलोचना का यही कष्ट है. वह फार्मूलों से बाहर निकल नहीं सकती. वह केंचुए को केंचुए की तरह देखेगी और स्त्री को स्त्री की तरह. फिर दोनों चित्रों को जोड़ेगी. यह ग़लत समझ है.सुधा अरोड़ा की वह स्त्री जो स्त्री भी है और केंचुओं का गुच्छा भी. इस वस्तु सत्य को लेखिका विश्वसनीयता देने में भी सफल हुई है. पुरुष समुदाय के लिए मत्स्य कन्या , आधी कन्या आधी मछली खासी विश्वसनीय रही है. पर वह पुरुष की कृति है. सुधा की कृति इस मानसिक संरचना प्रक्रिया के प्रति सीधा विद्रोह है – ’ एक दिन एक केंचुआ मेरी निगाह बचा कर रसोई से बाहर चला गया. सास ने उसे देख लिया. उसकी आंखें गुस्से से लाल हो गईं. सास ने चाय की खौलती हुई केतली उठाई और रसोई मे बिलबिलाते हुए सब केंचुओं पर गालियां बरसाते हुए उबलता पानी डाल दिया. सच मानो बाबा मेरे पूरे शरीर पर जैसे फफोले पड़ गए थे जैसे खौलता हुआ पानी उस पर नहीं मुझ पर डाला गया हो. वे सब फौरन मर गए , एक भी नहीं बचा , लेकिन मैं ज़िंदा रही.‘ निश्चय ही यह स्त्री-विमर्श हिन्दी कथा लेखन का अगला नया अध्याय शुरू करता है. यह इस बात की भी चुनौती है कि हिन्दी कहानी को कविता सुलभ सौन्दर्यबोध की ज़मीन से हटकर समझने की कोशिश करनी होगी

वागर्थ: अक्टूबर 2002 में प्रकाशित ‘‘ एक कहानी का रचना जगत -‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी‘ ’’ से साभार 

पितृसत्ता से आगे जहाँ और भी है

राहुल सिंह

युवा आलोचक, हिन्दी साहित्य का  प्राध्यापक
संपर्क : alochakrahul@gmail.com

इस समय प्रचलित विमर्शों की गर थोड़ी जानकारी हो तो निश्चित तौर पर आप स्त्री विमर्श से परिचित होंगे. हिन्दी में प्रचलित स्त्री विमर्श की एक बड़ी सीमा उसका ‘एकायामी’ होना है. ‘एकायामी’ होने से आशय यह कि वह ज्यादातर मौकों पर पितृसत्तात्मक प्रवृतियों को निशाने पर रखती है. पितृसत्तात्मक सोच से उपजी मानसिकता ही हिन्दी में प्रचलित स्त्री विमर्श का स्थायी निशाना है. स्त्री विरोधी संस्थागत चेष्टायें या सरकारों द्वारा लिये गये नीतिगत निर्णयों को कायदे से स्त्री विमर्श की प्रचलित समझदारी में शामिल करने की कवायद इक्की-दुक्की कहीं दिखती हो तो बात अलग है, पर वह हिन्दी में प्रचलित स्त्री विमर्श का स्थायी हिस्सा नहीं बन सका है. वह पितृसत्ता की अजपा-जाप में ही लीन है. इस बीच छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार समेत देश के अनेक हिस्सों में स्त्रियों की बच्चेदानी निकाले जाने की सरकारी योजनाओं के मूल में स्त्रियों के साथ जिस अमानवीय तरीके से पेश आया जा रहा है, उसको लेकर कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है. मोमबत्ती की रोशनी में या फर्श पर लिटाकर उनका आॅपरेशन कर दिया जा रहा है. आॅपरेशन के बाद उनकी सेहत के मद्देनजर बुनियादी सुविधाओं तक का खयाल नहीं रखा जा रहा है. बच्चेदानी निकालना ‘टार्गेट’ पूरा करने का मामला भर बन कर रह गया है. इस बीच होनेवाली मौतों का भी कायदे से कोई सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. अगर ऐसा लग रहा हो कि यह सब पिछड़े और आदिवासी बहुल इलाकों में घटित हो रहा है तो आप बहुत बड़ी गलती पर हैं. हर वह स्त्री जो बच्चे को जन्म देने में सक्षम है, इससे मिलती-जुलती हिंसा के निशाने पर है. कोख और मातृत्व दोनों निशाने पर है.

यदि आपके घर में कोई स्त्री गर्भाधान की प्रक्रिया से गुजर रही है तो क्या आप उसकी जाँच और चिकित्सा के लिए किसी सरकारी अस्पताल में जा रहे हैं या प्राइवेट नर्सिंग होम में ? जिनकी जेब में थोड़ा भी पैसा है, वे निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं. सरकारी अस्पतालों के डाॅक्टर भी अपने घर में नर्सिंग होम चला रहे हैं और भीड़ से बचने और इत्मीनान से देखे जाने के नाम पर घर आने की सलाह दे रहे हैं. सरकारी अस्पतालों में व्याप्त कुप्रबंधन निजी अस्पतालों की ओर जाने का सबसे बड़ा प्रेरक है. अपने प्रबंधन, अनुशासन, आधारभूत संरचना और साफ-सफाई के कारण पहली निगाह में सरकारी अस्पतालों की तुलना में बेहतर दिखनेवाले यह निजी अस्पताल और नर्सिंग होम भले ज्यादा बेहतर जान पड़ते हों, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं. बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों को छोड़ दें तो छोटे शहरों के निजी अस्पतालों में यह एक आम प्रवृति है , कि वे अल्ट्रा साउंड से लेकर अनेक तरह की जाँच बाहर के लैब से कराना पसंद करते हैं. सोचने की बात यह है कि इतने निवेश के बाद भी ऐसे निजी अस्पताल खुद अल्ट्रासाउंड जैसी जाँच से जान छुड़ाना क्यों चाहते हैं ? इसके लिए आपको अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ना होगा, जिसमें कहीं एक ‘स्टार’ दर्ज होगा, ठीक वैसा ही जैसी किसी बीमा की पाॅलिसी में दर्ज रहता है, जिसकी ओर आपका ध्यान नुकसान होने पर जाता है. फुटनोट पर लिखा होता है कि ‘दिस रिपोर्ट इज नाॅट वेलिड फाॅर मेडिको-लीगल पर्पस’. दरअसल यही वह नुक्ता है जो एक साथ आपकी जेब और स्त्री की कोख पर हमला करता है.

निजी अस्पताल बाहर से जाँच कराने के नाम पर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं, उन जाँच घरों में जाकर ना सिर्फ आप ‘कट सिस्टम’ का शिकार हो जाते हैं, बल्कि वहीं आपको जो रिपोर्ट सौंपी जाती है, उसमें ‘सीजर’ की पृष्ठभूमि तैयार कर दी जाती है. सीजेरियन’ की पूरी पृष्ठभूमि निर्मित करने में इन जाँच केन्द्रों की निर्णायक भूमिका हैै. यह अपनी रिपोर्ट में आखिरी वक्त में कुछ संभावित जटिलताओं का संकेत करके ऐसा दबाव बनाने का काम करते हैं. छोटे शहरों में पाँच-सात कायदे के जाँच केन्द्र होते हैं और किसी भी निजी अस्पताल का उनसे अच्छा संबंध होता है कुल मिलाकर इस गिरोहबंदी का शिकार होने के अलावा ज्यादा विकल्प किसी के पास बचता नहीं है. कई निजी अस्पताल और डाॅक्टर तो साफ तौर पर आपको निर्देश भी देते हैं कि फलां जाँच केन्द्र में चले जाइये उनकी रिपोर्ट सटीक और सही होती है. असल में सामान्य प्रसव की तुलना में ‘सीजर’ ज्यादा मुनाफे का सौदा है. मुनाफा किसी भी निजी क्षेत्र का आधारभूत प्रतिज्ञा है. कोख में चीरा लगाकर सबसे ज्यादा पैसा बनाया जा सकता है. सीजर के बाद कम से कम दो दिन तो आप अस्पताल के बिस्तर या कमरे में पड़े रहने को बेबस होते हैं, इस बीच अस्पताल का मीटर किसी चालू टैक्सी की तरह चलता रहता है. घरेलू हिंसा के बाद भारत में स्त्रियाँ सबसे ज्यादा इस चिकित्सिकीय हिंसा की शिकार हैं. अफसोस की बात यह है कि ‘सीजर’ के नाम पर स्त्रियों के साथ की जा रही इस संगठित हिंसा के मूल में ज्यादातर जगहों पर नर्स और ‘लेडी गाइनो’ ही शामिल हैं.


निजी अस्पतालों में एक और चिंताजनक बात यह है कि लोग डाॅक्टर के नाम पर जाते हैं पर वहाँ नियुक्त नर्सें पूरी तरह प्रशिक्षित हों यह कोई जरुरी नहीं है. पर कोख और स्त्री की देह पर जारी यह संगठित हिंसा हिन्दी के स्त्री विमर्श की प्रचलित समझदारी का हिस्सा नहीं है. हिन्दी का स्त्रीसंवेदी धड़ा किसी अपमानजनक संबोधन के प्रति तो महीनों आंदोलित रह सकता है पर सोनी-सोरी के गुप्तांगों पर कंकड़ डाल दिये जाने की घटना पर या उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिये जाने पर आंदोलित नहीं होता है. यह सनी लियोने से अपमानजनक सवाल पूछ लिये जाने पर सोशल मीडिया में अपनी प्रतिबद्धता साबित करने के लिए तो बढ़-चढ़ कर सामने आता है, पर छत्तीसगढ़ में स्त्रियों की बच्चेदानी निकाले जाने के दौरान हुई मौतों पर भी चुप लगा जाता है. यह मेट्रो, माॅल या डीटीसी पर हुई ‘ईव टीजिंग’ को फेसबुक का स्टेटस बनाना तो पसंद करता है, पर झारखंड की आदिवासी बच्चियों को दिल्ली के घरों में बलात् रखे जाने पर चुप लगा जाता है.छोटानागपुर के आस-पास के इलाकों से पत्तल, दोने, जामुन, आम, कटहल जैसे मौसमी उत्पाद बेचने आये महिलाओं पर ट्रेन और प्लेटफार्म पर होनेवाली बदतमजियों पर चुप रहता है.

पितृसत्ता से इतर भी सत्तायें हैं जो स्त्रियों की देह पर लगातार हमले कर रहा है, जरुरत इस बात की है कि उनकी पहचान करके उनके प्रति एक व्यापक समझदारी निर्मित की जाये. उनिभू (उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण) ने स्त्रियों के लिए अगर मुक्ति की नई राहें खोलीं हैं तो बंधन की नई बेड़ियाँ भी तैयार की हैं. मुक्ति की इन राहों का तो खूब ढोल पीटा जा रहा है पर ‘उनिभू’ से उत्पन्न परिस्थितियों ने स्त्री के लिए नई किस्म की प्रतिकूलतायें भी विकसित की हैं, उनकी पहचान और परख भी आवश्यक है. आखिर तमाम दावों के बावजूद हमारा समय स्त्रियों के प्रति पहले से कहीं ज्यादा हिंसक हुआ है. हिंसा की नई शक्लें हमारे सामने रोज दरपेश हो रही हैं. ऐसे में जरुरत इस बात की है कि स्त्रियों के प्रति हिंसा के यह जो नये मचान बन रहे हैं उसके प्रति एक नई समझदारी विकसित की जाये.

सबलोग जून अंक से 

वेद निरर्थक ध्वनियां मात्र

मुद्राराक्षस 


वे हमारे बीच नहीं रहे, मुद्राराक्षस ने हिन्दू धर्म की  स्थापित ‘ ईश्वर की सत्ता’ को चुनौती दी. उन्हें नमन.  


देश की वर्तमान सामाजिक स्थितियों पर पड़ोस के एक राज्य में धार्मिक सम्मेलन था. सम्मेलन आर्यसमाजी विचारकों था. आयोजक ने मुझे भी आमंत्रित किया था. कोई भी धार्मिक संगठन देश के किसी भी मुद्दे पर चर्चा करे,अंतत: वह उनकी धार्मिक आस्थाओं पर केन्द्रित हो जाती है. यहां भी यही हुआ. दो वक्ताओं की बात अयोध्या में राममंदिर निर्माण की बाधाओं तक जा पहुंची. मैं नहीं जानता स्वयं स्वामी दयानंद सरस्वती की इन भाषणों पर क्या प्रतिक्रिया होती जो कृष्ण-राम को खारिज करते थे और उनके साहित्य को नदी में फेंकने की बात कहते थे.जिस राम मंदिर को वे उत्साही वक्ता हिन्दुत्व की अस्मिता से जोड़ रहे थे उसी ‘हिंदू’ शब्द को खारिज करके स्वामी दयानंद ने आर्य को जातीय संज्ञा दी थी. वे जानते थे कि किसी भी वैदिक ग्रंथ में हिंदू शब्द नहीं है. फारसी भाषियों ने इसका प्रयोग इसलिए किया था कि उनके शब्द कोषों में ‘हिंदू’ का अर्थ ‘काला’ जैसे अर्थ में हुआ था.

उक्त सेमिनार में यह भी कहा गया कि वेद सृष्टि के आदि में ईश्वर द्वारा रचे गए थे और वे दुनिया की प्राचीनतम पुस्तक हैं. दोनों ही बातें किसी तार्किक व्यक्ति के गले नहीं उतर सकतीं. स्वयं स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेदादि भाष्य-भूमिका में लिखा था- सकल जगत ईश्वर द्वारा रचा गया तो वेदों की रचना में क्या शंका? माना जाता है कि वेद सृष्टि की रचना के साथ ही रचे गए और जैसे रचे गए थे वैसे ही आज भी हैं. उनमें कभी कोई फेरबदल नहीं हुआ. यहां यह याद दिलाना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उत्तरवैदिक काल के एक वैयाकरण कौरस ने कहा था कि वेद अर्थहीन किताबें हैं. खैर, हम संक्षेप में यह देखेंगे कि क्या वेदों का स्वरूप वैसे का वैसा है या उसमें फेरबदल हुई है.एक शाखा के अनुसार ऋग्वेद में 8 अष्टक, 64 अध्याय और 2006 वर्ग हैं लेकिन एक अन्य शाखा के अनुसार 10 मंडल, 85 अनुवाक और हर अनुवाक में सूक्त हैं. सूक्तों की संख्या 1017 मानी जाती है पर इनमें बालखिल्य के 11 सूक्त छोड़ दिए गए हैं. क्यों? ऋ ग्वेद के मंत्रों की कुल संख्या 10472 मानी गयी है लेकिन शौनक मंत्रों की संख्या 10528 मानते हैं. ऋ ग्वेद शाकल संहिता के दसवें मंडल में मंत्रों की संख्या कुल 15,000 बतायी गयी है. बाष्कल शाखा में तो 10वां मंडल है ही नहीं.

शाकल संहिता में कुल मंत्र 10,517 हैं तब बाकी 4,483 मंत्र कहां और क्यों गायब हुए? वेद ईश्वर कृत हैं इसके बावजूद एक आदमी (या ऋषि ) उनमें इतने फेरबदल कैसे कर देता है? दुनिया में किसी भी धर्मग्रंथ में कभी कोई फेरबदल नहीं की गई-न बाइबिल में, न कुरान में. इनमें कभी किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया. लेकिन वेद की 31 शाखाएं हो गर्इं और हर शाखा में पाठ भेद है. शाखाओं की उपशाखाएं भी हैं और उनमें भी भारी अन्तर हैं.
आधुनिक समय के वेदों के सबसे बड़े अध्येता सत्यव्रत सामाश्रमि भट्टाचार्य की टिप्पणी देखनी चाहिए-जैसे अध्यायभेद होता है उस तरह शाखाभेद नहीं समझना चाहिए. अलग-अलग समय और अलग-अलग स्थान पर महत्त्वपूर्ण पुस्तक में जैसे हो जाता है उसी तरह पाठ भेद को समझा जाना चाहिए. लेकिन सामाश्रमि यह भूल जाते हैं कि यह पाठभेद लगभग एक ही क्षेत्र के विद्वानों ने किया था.

वैदिक साहित्य में एक दिलचस्प किताब है- विकृति बल्लरी. इसके लेखक थे व्याडि. उन्होंने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि कैसे शाकल की जो पांचों शाखाओं में पाठभेद हैं वे पाठ भेद नहीं हैं. क्या कुरान की भी कोई शाखाएं और पाठभेद हैं? जो कुरान को ईश्वरीय मानते हैं, वे उसमें पाठभेद करने की हिम्मत नहीं करते. ऋग्वेद की बाष्कल संहिता के सूक्तों से शाकल में आठ सूक्त कम हैं. यह कैसे हुआ? ऋग्वेद में बालखिल्य के कहीं तो 11 सूक्त हैं कहीं आठ.एक तथ्य और हैरान करता है-ऋ ग्वेद के अनेक भाष्यकारों ने सिर्फ शाकल संहिता का ही भाष्य किया है पर हर भाष्यकार हर मंत्र का अलग अर्थ देता है. सायण, महीधर, स्कंद स्वामी, माधव भट्ट यहां तक कि स्वामी दयानंद ने भी वेद मंत्रों के जो भाष्य किए हैं वे एक दूसरे से बहुत अलग और परस्पर विरोधी भी हैं. तब वेद किस तरह के ईश्वरीय धर्मग्रंथ है? क्या अन्तत: कौत्स ही सही है कि वेद निरर्थक ध्वनियां मात्र हैं?