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तो हत्यारे जीत जायेंगे….!

निवेदिता 


आज से 19 साल पहले चन्द्रशेखर मारा गया था. 19 साल बाद सीवान फिर गहरे सदमें,दुख और गुस्से में है. पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या ने पुराने जख्मों को ताजा कर दिया. मेरी आंखों में वे दिन रिसने लगे हैं. दिल बैठ गया है. जैसे भीतर की घड़ी चलना बंद हो गयी हो.  सिर्फ लहू का शोर धमनियों में सुनाई देता रहा. 19 साल पहले हम उसे इसी तरह सुलगती हुई लकडियों के बीच सुला आये थे. सबकी आंखें नम थी और भीतर गहरा गुस्सा. धूप पुरानी बुझी हुई चिताओं की काली कतार पर चली आयी थी. हमसब सूनी आंखों से उठती हुई लपटों को देख रहे थे. चन्द्रशेखर के लिए सैलाब उमड़ा था. देश भर से लोग आए थे उसकी मिट्टी में शामिल होने. हर आदमी की आंखें सुलग रही थी. आज फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है. राजदेव रंजन मारे गए. वे  हत्यारे अभी भी हिंसक मदमाती ज्वार में लपलपाती हुई जीभ निकाले हमारे बीच धूम रहे हैं. हमसब न्याय की मांग कर रहे है.  इतने सालों में चन्द्रशेखर के हत्यारे पकड़े नहीं गए. उसे न्याय नहीं मिला. उस समय भी पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौप दिया गया था. सीबीआई किसी नतीजे पर नहीं पंहुची.



आज भी राजदेव की हत्या की जांच सीबीआई को सौप दिया गया है. इतने दिनों में अभी तक ये पता नहीं चला कि इस हत्या के पीछे किसका हाथ था ? राजदेव की हत्या की खबर भी अखबारों के पन्ने से गायब हो रही है. खुद उसके अखबार में भी खबर जिस तरह से छप रही है उससे लगता है कि एक पत्रकार की मौत किसी के लिए मायने नहीं रखती. सच तो यह है कि हम  उस सत्ता से न्याय की उम्मीद कर रहे हैं जो अपराधियों को संरक्षण देती है. ये कैसी राजनीति है जो एक तरफ आश्वस्त करती है कि हत्यारे पकड़े जायेंगे और दूसरी तरफ अपराधियों को पार्टी के भीतर जगह देती है. क्या एक बार फिर ये सवाल जरुरी नहीं है कि राजनीति में जबतक अपराधियों को तरजीह मिलेगी न्याय की बात बेमानी है.दुनिया के पत्रकार खतरे झेलते रहते हैं. अपनी खबरों के लिए खतरा मोल लेते हैं. अगर पत्रकार खबर नहीं ला पाएं,लेखक लिख नहीं पाए,कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन ना कर पाएं तो फिर इस लोकतंत्र का क्या मतलब? इनकी सुरक्षा देश की लोकतंत्र की सुरक्षा है. पिछले 30 सालों से मैं पत्रकारिता में हूं. पर इतने बुरे दिन कभी नहीं आए जब पत्रकार इसलिए मार दिया जाय कि वह खबरों को लोगों तक ला रहा है. एक निर्भीक और गंभीर पत्रकारिता की ये कीमत किसी भी देश के जनतंत्र के लिए अच्छा नहीं है. हमसब एक एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां लिखने-पढ़ने वालों पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे है. पत्रकारों की हत्या के मामले में हमारा देश दसवीं सूची में शामिल है.

आंकड़े बताते हैं कि 1992 से अबतक हमारे देश के 1,189 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. फिर हमलोग किसका इंतजार कर रहे हैं ? किससे न्याय की आस लिए हैं ?  चन्द्रशेखर के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गयी पर उसे न्याय नहीं मिला. चन्द्रशेखर की मां न्याय की आस में चली गयीं. लोगों के दिलों दिमाग को हिला देने वाला, जाति, धर्म,असमानता  और हत्या की संस्कृति के खिलाफ जो खड़ा हुआ उसे तो हत्यारों की आंखों में चुभना ही था. चन्द्रशेखर और राजदेव रंजन जैसे लोग हमारी चेतना हमारी स्मृतियों बसे रहेंगे. पूरे देश की नसों में बहते रहेंगे. मुझे याद है चन्द्रशेखर की प्यारी ,खूबसूरत,चमकदार हंसी. मुझे याद हैं उसकी बैचेनी भरी गहरी निगाहें  जैसे आज भी हमें देख रही हों. चन्द्रशेखर अपने विचारों में जिंदा है. राजदेव जिंदा हैं अपने लेखन में. जिसने मौत की आंखों में आंखें डाल कर देखा हो. जो लोगों के दिलों में दाखिल हो.उसे कौन मार सकता है. वह अब मनों मिट्टी के नीचे सो रहा है. मैं रुखसत नहीं लेना चाहती. उपर सर्द अथाह आसमान की गहराइयां जगमगा रहीं हैं  और तारे चकमक पत्थर की तरह चमक रहे हैं. हवा शांत और परदर्शी है. शहर का कोलाहल अभी भी लहरों की तरह लोगों के दुख से भीगा है.अगर हम अभी भी खड़े नहीं हुए तो हत्यारे जीत जायेंगे और कलम की हार होगी.

तो देख्यो है घूंघट पट खोल- मीराबाई : हिन्दी की पहली स्त्रीवादी : आख़िरी क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

मीरा उत्पीड़न का विरोध कर उन्मुक्त स्त्री का सपना देख सकती है, अपनी स्त्री-नियति को बदल नहीं सकती. मीरा का स्त्री विमर्श इस तथ्य को बहुत गहरे रेखांकित करता है कि व्यवस्था एक साथ अमूर्त और ठोस है, जड़ और सनातन। इसके पास न संवेदना है न भाषा. अतः संवाद की संभावना भी नहीं. अपनी मूल संरचना में यह यंत्र-मानव है. मनुष्यता का निषेध कर मनुष्यता का दिखावा करने वाला तकनीकी कौशल. मध्ययुगीन सामंती समाज की जकड़न में बंधी मीरा की बड़ी सीमा यह रही है कि उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा और कानूनी अधिकारों के वरदान से सम्पन्न स्त्री को देखा नहीं. उनके युग की स्त्री सदैव दो मुट्ठी अन्न के लिए दूसरों पर आश्रित रही. योनि और गर्भ के अतिरिक्त उसकी कोई सत्ता नहीं रही. उसके पैरों को घर की ड्योढी लांघने और हाथों को अपने लिए कुंआ खोदने की स्वतंत्रता नहीं थी. मीरा अपने आप में पूर्ण ‘अकेली’ औरत का बिंब नहीं रच सकती. मुक्ति की कामना शून्य से अनंत तक पहुंच जाने की इकलौती छलांग नहीं होती, मुक्ति-छलांगों की लम्बी शृंखला की एक कड़ी मात्र होती है जो परम्परा से दिशा और ताकत लेकर उसमें अपनी एक और छलांग जोड़ती है. मीरा के पास विरासत के नाम पर पराधीनता में सुख ढूंढने का कांतासम्मत उपदेश है. इसलिए बेशक वह वर्जनाओं को तोड़ कर आत्मप्रसार का निर्णय ले, विद्वद्जन से दिशा-निर्देश पाने के बहाने  उन्हें अपनी लड़ाई में शरीक होने की दावत दे, जन-जन तक अपनी बात पहुंचा कर जनमत बनाने का प्रयास करे.
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बरजी मैं काही की नाहिं रही 
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माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल 
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तेरा नहीं कोई रोकणहारा 


वह अपने अकेलेपन से त्रस्त है. स्त्री को लेकर परंपरा और परिवेश में पसरी अनुर्वर अनुगूंजों ने उसे चुप्पियों को सर्जनात्मक बुनावट देने का विवेक नहीं दिया है. वह आत्माभिमानिनी संवेदनशील जागरूक स्त्री की तरह उन सभी स्थितियों का विरोध अवश्य कर रही है जो समकालीन स्त्री विमर्श का केन्द्रीय स्वर है किंतु अपनी देह और जीवन-दिशा के संदर्भ में लिए गए निर्णयों को अंत तक अडिग भाव से स्वीकार नहीं कर पाती.  मीरा की इस पराजय में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दबाव मुखर होते हैं जो आज की उन्मुक्त स्त्री के हर स्वतंत्र निर्णय से बौखला कर उस पर अनैतिक और उच्छ्रंखल हो जाने का आरोप लगाते है. चूंकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पास स्त्री और पुरुष को, सवर्ण और दलित को नापने के प्रतिमान अलग-अलग हैं, अतः नैतिकता और दायित्व, अधिकार और स्वतंत्रता की परिभाषाएं स्थित्यानुसार बदलने लगती है. मीरा का स्त्री विमर्श कृष्णा सोबती और मृदुला गर्ग के जरिए आगे बढ़ कर यदि मैत्रेयी पुष्पा तक न आया होता तो क्या स्त्री अपनी दैहिक मुक्ति की मुखर घोषणा के साथ देह को अस्त्र बना कर प्रतिद्वंद्वी पुरुष को पटकनी दे पाने का हौसला बटोर पाती? पराए मर्दों को लेकर चटखारेदार बातें करती कृष्णा सोबती की मित्रो चूंकि अंततः अपने उसी बगलोल पति सरदारी को समर्पित है और दाम्पत्येतर देह सम्बन्ध को पूरी ऊर्जा से भोगने वाली मनु (चितकोबरा) अंततः समाजसेवा में आश्रय पाती है, अतः व्यवस्था को न विवाह संस्था के टूटने का खतरा है, न नैतिकता के दोहरे मानदंडों के खिलाफ उठाए जाने वाले आंदोलन की आशंका. लेकिन मनु जैसी स्त्रियां जब ‘सिरफिरे’ आंदोलनधर्मी सरोकारों से जुड़ कर मंदा, अल्मा, सारंग बनती हैं तो न केवल सड़क-चौराहे पर नैतिकता के दोहरे मानदंडों को अभिमानपूर्वक तोड़ती पुरुष-सरीखी निर्लज्ज और नग्न स्त्री दिखाई पड़ती है, बल्कि पुरुष का ‘उपयोग’ कर राजनीति में घुसपैठ की ‘मर्दाना’ चालें भी चलती है.

 शतरंज की बिसात पर जब सामने वाला खिलाड़ी बराबर का चतुर हो तो हार के जोखिम में खेलने का मजा खत्म हो जाता है. इसलिए मर्दवादी आलोचना समकालीन स्त्री विमर्श को पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अतिक्रमण कर अपने लिए मानवीय स्पेस की आकांक्षा करती स्त्री-मुक्ति की अवधारणा के रूप में नहीं पढ़ती, देह-विमर्श में गूंथ कर थू-थू करती है.अपनी अंतिम परिणति में आंसू, समर्पण, दीनता का प्रसार करता मीरा का स्त्री विमर्श उसे स्वीकार्य है. यहां तक वह उसके विद्रोह और वेदना को सहानुभूति भी देती है और व्यवस्था को बदलने में अपनी ‘मगरमच्छी’ तत्परता भी निवेदित करती है. जुलूस में अंधी गली तक जाने और फिर निरापद अपनी दुनिया में लौट आने में भला क्या बुराई है? मीरा के अंतर्विरोध – पितृसत्तात्मक व्यवस्था का आंतरिकीकरण करने की मानसिकता – एक इकाई के रूप में मीरा की पराजय को भले ही संकेतित करें, मीरा द्वारा उत्पन्न स्त्री-चेतना को धूमिल नहीं करते.

संदर्भ

 ”बास्या कूस्या टूकड़ा ये, भाभी और मिलेगी खाटी छाय/भैं सोवो भूखा मरो ये, भाभी नहीं मिलैगो हरि आय”, मीरां बृहत् पदावली भाग 1, राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधनुर,पद 395
 ”साधुन के संग बैठ बैठ के, लाज गमाई सारी / नित प्रति उठि नीच घर जावो, कुल कूं लगावो गारी.बड़ा घरां की छोरी कहावो, नांचो दे दे तारी” वही, पद 16
 ”राणांजी तें जहर दियो मैं जाणी / जैसे कंचन दहत अगिन में, निकसत बाराबांणी / लोकलाज कुलकाण जगत की, दी बहाय ज्यूं पांणी /अपने घर का परदा कर लौं, मैं अबला बौरांणी / तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे, गरक गयो सनकांणी” वही, पद 505
 ”राणांजी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारो . . . जन्म जन्म रो पति परमेश्वर, राणाजी कोन बिचारो।” वही, पद 509
 ”राणांजी हूं अब न रहूंगी तोरी हटकी / साध-संग माहि प्यारा लागै, जाल गई घूंघट की  / . . . हार सिंगर सभी ल्यो अपना, चूड़ी कर की पटकी / मेरा सुहाग अब मोकूं दरसा, और न जाने घट की / महल किला राणां मोहिं न चाहिए, सारी रेशम पट की / हुई दीवानी मीरां डोलै, केस लटा सब छिटकी.” वही, पद 515
 ”जोगी आ जा आ जा, जोगी पांइ परूं मैं हौं चेरी तेरी / प्रेम-भक्ति को पैंडो न्यारो, हमकूं गैल बता जा / अगर चंदन की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा / जल बल भई भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा” वही, पद 176
 ‘मन हमारा बांध्यो माई / कंवल नैन अपने गुन तीखण तीर बेध शरीर दूरि गयो माई / लाग्यो तब जान्यों नहीं, अब न सह्यो जाई री माई / तंत मंत औषद करउ, तऊ पीर न जाई / है कोऊ उपकार करे, कठिन दरद री माई / निकटि हो तुम दूरि नहीं, बेगि मिलो आई. / मीरां गिरधर स्वामी दयाल, तन की तपति बुझाई री माई” वही, पद 368
 ”ऐसी ऐसी चांदनी में पिया घर नांई / चार पहर दिन सोवत बीत्ये, तड़पत रैन बिहाई / मैं सूती पिया अपने म्हैल में, सालूड़ा में आई सरदाई” वही, पद 56 
 ”मेरा मन को वैरागी कर गयो रे / हाथ लकुटिया कांधे कमलिया, जमुना पार उतर गयो रे / बारा बरस से सेवा कीन्हीं, रमती बिरियां रम गयो रे / सुण सुण हे मेरी पाड़ पड़ोसन, जलती में पूलो दे गयो रे / मीरां के प्रभु हरि अविनासी, धूकती धूनी धर गयो रे ” वही, पद 438
 ”गोबिंद का गुण गास्यां / राणोजी रूसैला तो गांम राखैला, हरि रूठ्यां कुमलास्यां / राम नाम की जहाज चलास्यां, भवसागर तिर जास्यां.”, वही, पद 129
 ”एक बिरियां मुख बोलो रे, धुतारा जोगी / . . . पूरब जनम की मैं हूं गोपिका, अधबिच पड़ गयो झोलो रे।/ जगत बदीती तुम करो मोहन, अब क्यों बजाऊँ ढोलो रे / तेरे कारए सब जग त्याग्ये, अब मोहे कर सों लो रे” वही, पद 55
 ”माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल./ कोई कहै सोंधो कोई कहै महंगौ, मैं तो लियो है हीरा सूं तोल।/कोई कहै हलको कोई कहै भारी, मैं तो लियो री ताखड़ियां तोल / कोई कहै छाने कोई कहै वोड़े, मैं तो लियो री बाजतां ढोल / कोई कहै घटतो कोई कहै बढ़तो, मैं तो लियो है बराबर तोल / कोई कहै कालो कोई कहै गोरो, मैं तो देख्यो है घूंघट पट खोल.” वही, पद 385
  ”पूर्ण में से पूर्ण निकल भी जाए तो भी जो बाकी रहता है, वह पूर्ण ही है.” कुंदनिका कापड़ीआ, दीवारों के पार आकाश, पृ0 276
 ”हरष शोक म्हारे मन नांही, नहिं लाभ नहिं हानी, कंचन लेर अगन में राख्यो, निकस्यो बाराबानी.”पद 153 
 गोविंद दुबे साचोरा ब्राह्यण तिनकी वार्ता: ”. . . और अेक समें गोविंद दुबे मीराबाई के घर हुते तहां मीरा बाई सों भगवद्वार्ता करत अटके. . . . ब्रजवासी ने आपके वह पत्र दीनों सो पत्र बांचे के गोविंद दुबे तत्काल उठे, तब मीरा बाई ने बहुत समाधान कियौ परि गोविंद दुबे ने फिर पाछें न देखौ.”
तथा
 अथ कृष्णदास अधिकारी तिनकी वार्ता: ” . . . कृष्णदास ने तौ आवत ही कही जो हूं तौ चलूंगौ. तब मीराबाई ने कही – जो बैठौ तब कितनेेक मोहर श्रीनाथजी को देने लागी सो कृष्णदास ने न लीनी और कह्यौ जो तूं श्री आचार्य महाप्रभून् की सेवक नाहीं होत ताते तेरी भेंट हम हाथ ते छूवेंगे नाहीं. सो ऐसे कहिकें कृष्णदास यहां ते उठि चले.” चौरासी वैष्णवन की वार्ता
”मैं मंदभागण काहे को सरजी, पिया मोसूं रहत उदासी / तुम हो हमारे अंतरजामी, मैं थारा चरणां री दासी / मीरां तो कुछ जाणत नांही, पकड़ी टेक निभासी.” वही, पद 62
  ये पद हैं – 398, 405, 568
 ”म्हारा हरिजी, चाकरी री चाह म्हारे मन राखोला सरण हजूरी / बैल बंधावो भांवे घोड़ा बंधावो, चाहै करावो मजूरी / खाबा पीबा की म्हांकी चिंता मत कीज्यौ, कंगनी दीज्यो भांवै कूरी / ओढ़न कूं कारी कामरिया दीज्यो और चटाई खजूरी / जो थे देशी, सो म्हे लेशी, याई मत म्हारे पूरी / मीरां के प्रभु गिरधर नागर, निज चरणन की धूरी” वही, पद 405
  पद 428
 ”उडि जावो री म्हारी सोनचिड़ी / काहे सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, काहे सूं मढ़ाऊँ थारी चोंचजड़ी / रूपा सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, सोना सूं मढ़ा ऊँ थारी चोंचजड़ी.” वही, पद 45
 ”श्री तुलसी सब गुण निधान दुख हरन गुसांई /. . . हमको कहा उचित करबो है सो लिखियो समझाई.” पद 571
”राणांजी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारो. . . जन्म जन्म रो पति परमेश्वर, राणेजी कोन बिचारो.” वही, पद 509
 ”राणांजी हूं अब न रहूंगी तोरी हटकी / साध-संग माहि प्यारा लागै, जाल गई घूंघट की / . . . हार सिंगर सभी ल्यो अपना, चूड़ी कर की पटकी / मेरा सुहाग अब मोकूं दरसा, और न जाने घट की / महल किला राणां मोहिं न चाहिए, सारी रेशम पट की / हुई दीवानी मीरां डोलै, केस लटा सब छिटकी” वही, पद 515
 ”जोगी आ जा आ जा, जोगी पांइ परूं मैं हौं चेरी तेरी / प्रेम-भक्ति को पैंडो न्यारो, हमकूं गैल बता जा / अगर चंदन की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा / जल बल भई भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा” वही, पद 176
 ‘मन हमारा बांध्यो माई / कंवल नैन अपने गुन तीखण तीर बेध शरीर दूरि गयो माई / लाग्यो तब जान्यों नहीं, अब न सह्यो जाई री माई / तंत मंत औषद करउ, तऊ पीर न जाई / है कोऊ उपकार करे, कठिन दरद री माई / निकटि हो तुम दूरि नहीं, बेगि मिलो आई / मीरां गिरधर स्वामी दयाल, तन की तपति बुझाई री माई.”’ वही, पद 368
”ऐसी ऐसी चांदनी में पिया घर नांई /चार पहर दिन सोवत बीत्ये, तड़पत रैन बिहाई / मैं सूती पिया अपने म्हैल में, सालूड़ा में आई सरदाई.” वही, पद 56 
”मेरा मन को वैरागी कर गयो रे / हाथ लकुटिया कांधे कमलिया, जमुना पार उतर गयो रे / बारा बरस से सेवा कीन्हीं, रमती बिरियां रम गयो रे / सुण सुण हे मेरी पाड़ पड़ोसन, जलती में पूलो दे गयो रे / मीरां के प्रभु हरि अविनासी, धूकती धूनी धर गयो रे.” वही, पद 438
”गोबिंद का गुण गास्यां / राणोजी रूसैला तो गांम राखैला, हरि रूठ्यां कुमलास्यां / राम नाम की जहाज चलास्यां, भवसागर तिर जास्यां.”, वही, पद 129
”एक बिरियां मुख बोलो रे, धुतारा जोगी / . . . पूरब जनम की मैं हूं गोपिका, अधबिच पड़ गयो झोलो रे / जगत बदीती तुम करो मोहन, अब क्यों बजाऊँ ढोलो रे / तेरे कारए सब जग त्याग्ये, अब मोहे कर सों लो रे.” वही, पद 55
”माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल।/ कोई कहै सोंधो कोई कहै महंगौ, मैं तो लियो है हीरा सूं तोल / कोई कहै हलको कोई कहै भारी, मैं तो लियो री ताखड़ियां तोल / कोई कहै छाने कोई कहै वोड़े, मैं तो लियो री बाजतां ढोल।/कोई कहै घटतो कोई कहै बढ़तो, मैं तो लियो है बराबर तोल।/कोई कहै कालो कोई कहै गोरो, मैं तो देख्यो है घूंघट पट खोल।” वही, पद 385
 ”पूर्ण में से पूर्ण निकल भी जाए तो भी जो बाकी रहता है, वह पूर्ण ही है.” कुंदनिका कापड़ीआ, दीवारों के पार आकाश, पृ0 276
 ”हरष शोक म्हारे मन नांही, नहिं लाभ नहिं हानी, कंचन लेर अगन में राख्यो, निकस्यो बाराबानी.”पद 153 
 गोविंद दुबे साचोरा ब्राह्यण तिनकी वार्ता: ”. . . और अेक समें गोविंद दुबे मीराबाई के घर हुते तहां मीरा बाई सों भगवद्वार्ता करत अटके . . . ब्रजवासी ने आपके वह पत्र दीनों सो पत्र बांचे के गोविंद दुबे तत्काल उठे, तब मीरा बाई ने बहुत समाधान कियौ परि गोविंद दुबे ने फिर पाछें न देखौ.”
तथा
अथ कृष्णदास अधिकारी तिनकी वार्ता: ” . . . कृष्णदास ने तौ आवत ही कही जो हूं तौ चलूंगौ. तब मीराबाई ने कही. जो बैठौ तब कितनेेक मोहर श्रीनाथजी को देने लागी सो कृष्णदास ने न लीनी और कह्यौ जो तूं श्री आचार्य महाप्रभून् की सेवक नाहीं होत ताते तेरी भेंट हम हाथ ते छूवेंगे नाहीं. सो ऐसे कहिकें कृष्णदास यहां ते उठि चले.” चौरासी वैष्णवन की वार्ता
”मैं मंदभागण काहे को सरजी, पिया मोसूं रहत उदासी / तुम हो हमारे अंतरजामी, मैं थारा चरणां री दासी / मीरां तो कुछ जाणत नांही, पकड़ी टेक निभासी. ” वही, पद 62
 ये पद हैं – 398, 405, 568
”म्हारा हरिजी, चाकरी री चाह म्हारे मन राखोला सरण हजूरी / बैल बंधावो भांवे घोड़ा बंधावो, चाहै करावो मजूरी /खाबा पीबा की म्हांकी चिंता मत कीज्यौ, कंगनी दीज्यो भांवै कूरी /ओढ़न कूं कारी कामरिया दीज्यो और चटाई खजूरी /जो थे देशी, सो म्हे लेशी, याई मत म्हारे पूरी /मीरां के प्रभु गिरधर नागर, निज चरणन की धूरी.” वही, पद 405
  पद 428
”उडि जावो री म्हारी सोनचिड़ी / काहे सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, काहे सूं मढ़ाऊँ थारी चोंचजड़ी / रूपा सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, सोना सूं मढ़ा ऊँ थारी चोंचजड़ी ” वही, पद 45
  ”श्री तुलसी सब गुण निधान दुख हरन गुसांई / हमको कहा उचित करबो है सो लिखियो समझाई ” पद 571

समाप्त 

कोठागोई : किस्सों का अपना चुनाव

संजीव चंदन


सबलोग के स्त्रीकाल कॉलम में प्रकाशित 


भारत में गणिकाओं, नगरवधुओं, वेश्याओं का पुराना इतिहास है. राम ने अपने भाई भरत को संबोधित करते हुए कहा कि वेश्याओं का साथ मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण साधन है. ( रामायण. अयोध्याकाण्ड) महाभारत के युद्ध के वक्त युद्ध शिविरों में वेश्याओं की उपस्थिति का उल्लेख महाभारत में मिलता है.
अश्वघोष ने लिखा है : 
द्वैपायनो धर्मपरायानाश्च रेने समंकशिषु –वेश्यवहवा 
ययाहतो, मुच्चलननू पुरेण पादेन विद्युल्लतयेव मेद्यः 
( धर्मात्मा व्यास ने काशी में वेश्यागमन किया. जैसे विफुल्लता मेद्य पर प्रहार करती है, उसी तरह उन्होंने उन वेश्याओं के नूपुर वाले चंचल पैरों का प्रहार झेला –अश्वघोष सौंदरानंद, 7-30)  रामायण, वर्तिका सूत्र और कामसूत्र आदि में वेश्याओं के संगठन के भी उल्लेख हैं.  प्राचीन भारत को समझने के ‘स्रोत- ग्रंथों’ में वेश्याओं के कई प्रकार बताये गये हैं, उनमें एक प्रकार रूपजीवाओं का है. रूपजीवाओं के तहत नटी वेश्याएं थीं, जो गीत –नृत्य से अपना जीवन यापन करती थीं. एक प्रकार गणिकाओं का था, जिनमें दो तरह की स्त्रियाँ होती थीं, कोठे पर रहने वाली, निजी घरों में रहने वाली. गणिकाओं को उच्चवर्गीय शिक्षित तथा गुणी वेश्याओं के तौर पर समझा जाता था. गणिकाओं का यद्यपि सामंत –जमींदारों , बाद में नवाबों उच्चवर्गीय कुलीनों के बीच सम्मान जरूर था, लेकिन ‘घर-बाहर’ के दायरे में वे बाहर की प्रतिनिधि थीं, जो स्त्रियों के लिए सम्मानजनक नहीं माना जाता था. सतीत्व, पत्नीत्व को आदर देने की सामाजिक –सांस्कृतिक व्यवस्था रूढ़ थी. इस तरह इनका एक अलग संसार बनता गया, जो सामान्य लोगों के बीच यथार्थ से ज्यादा किस्से –कहानियों की तरह उपस्थित थीं. कोठों की यह परंपरा हाल के दिनों तक आबाद रही है, बिहार के मुजफ्फरपुर के कोठे उनमें से एक हैं- कोठे हकीकत हैं, तो कोठे किस्से और कहानियां भी हैं . कहानियों में लोकप्रियता के तत्व भी हैं- रससिद्धी के तत्व. जबकि इन्हीं कहानियों से समाजशास्त्रीय अनुसंधान भी किये जा सकते हैं – समाज में जेंडर और जाति विभाजन को समझने के लिए.

चतुर्भुज स्थान , मुजफ्फरपुर की एक नर्तकी

 पिछले साल वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रभात रंजन की ‘ कोठागोई’ मुजफफरपुर के कोठों के किस्सों  की रोचक प्रस्तुति है, जिसका इरादा तय है कि कोई समाजशास्त्रीय अनुसंधान नहीं है. किस्से हैं , तो किस्सागोई होगी, कोठों के किस्से हैं तो उन्हें ‘कोठागोई’ कहा जाना अर्थ –चमत्कार के लिहाज से भी और ‘रससिद्धी’ के उद्देश्य से लोकप्रिय लेखन के लिहाज से भी उचित ही है. साहित्य में इन दिनों लोकप्रिय साहित्य का अपना दवाब है, सोशल मीडिया से इस लोकप्रिय लेखन को मदद भी मिलती है- बल्कि दोनो के आपसी सामंजस्य से साहित्य की कुछ विधाओं ने जन्म भी लिया है – मसलन ‘लप्रेक’- ( लघु प्रेम कथा).  पिछले दिनों फेसबुक, ट्वीटर, से लेकर साहित्य के मेलों –महोत्सवों में ‘लप्रेक’ की जितनी धूम रही,  वह नये समय की पाठकीयता के अनुरूप भी थी और साहित्य के बाजार के अनुरूप भी. इस धूम के बीच प्रभात रंजन की ‘कोठागोई’ ने अपनी अलग ही जगह बनाई. लगभग साल भर तक इस किताब की भी चर्चा रही, लोगों ने, साहित्यिक संस्थाओं ने , साहित्य –महोत्सवों ने किताब और प्रभात जी,  दोनो को हाथो –हाथ लिया. मुझे लगता है कि अब एक साल बीत जाने के बाद, चर्चाओं से अलग इस किताब को देखा जा सकता है-प्रभावमुक्त होकर.

किताब के लेखक की योजना में और उसके प्रयासों में एक ख़ास बात दिखती है कि वह जिनके किस्से कह रहा है, उनके प्रति दूसरेपन के भाव ( अदरनेस) से मुक्त हो, या उनका पवित्र उद्धारक या उनके काम और व्यक्तित्व के प्रति भद्रजन का भाव लिए उन्हें ‘ विक्टिम’ ( पीड़ित)  की तरह न देखे. इस मायने में मुझे यह किताब अच्छी लगी. जबकि कोठों के जीवन को लेकर हिन्दी की बहुचर्चित किताब, अमृतलाल नागर की ‘ ये कोठेवालियां’ को लेकर मेरी यही शिकायत रही है कि वह जबरदस्त अदरनेस के भाव में लिखा गया है. कोठे के जीवन जी रही स्त्रियों को अनिवार्य ‘विक्टिम’ मानते हुए.  ‘ये कोठेवालियां’ के विपरीत ‘ कोठागोई’ में न तो विक्टिमहुड की कोई नजर है और न ही इस किताब की योजना के लिए यह अनुकूल होता. बल्कि किस्सों से जो तस्वीर बनती है,  वह यह कि कोठों पर उनका होना जितना उन्हें विक्टिम नहीं बनाता है, उससे ज्यादा कोठों की संस्कृति के ख़त्म होने और कोठों के उजड जाने से वे विक्टिम होती हैं- लेखक का उद्देश्य रुदन से ज्यादा रससिद्धि है – जो समाज के द्वारा स्त्री के लिए नियत ‘गृहिणी’ और सतीत्व संपन्न पत्नी की भूमिकाओं से अलग जीवन जीती स्त्रियों की कहानियों में स्वतः पाई जाती हैं –कहानियां बनती ही ऐसे हैं – ये नियत ढर्रे पर चलने वाले लोगों के लिए ‘अजनबी-परिचितों’ की कहानियां हैं- आबाद और बर्बाद होने की कहानियां.

कोठागोई को पढ़ते हुए मुजफ्फरपुर के लोग ‘ चतुर्भुज स्थान की इन गायिकाओं’ की पहचान तलाश सकते हैं, या उन ‘रसिकों’ की जो इनके महफ़िलों के नियमित शान थे, कुछ क्रेता और कुछ मुहब्बत कर बैठे गंभीर किस्म के आशिक लोग- जमींदार से लेकर लेखक –गीतकार-कवियों तक की पहचान इनमें शामिल है. चतुर्भुज स्थान का जिक्र हो और किम्वदंती बन गये ‘महाकवि’ जानकीबल्लभ शास्त्री की चर्चा न हो, तो बात पूरी नहीं हो सकती है. इसलिए किताब में उनका होना लाजिमी था, उसी अंदाज में जिस अंदाज में वे किम्वदंती बनते गये- हिन्दी साहित्य के इतिहास से जितना अनुपस्थित, उतना ही उपस्थित –उतने ही जोर –शोर से स्वीकृति प्राप्त ‘महाकवि !’  यह सच है कि लेखक कोठों के इन किस्सों का समाजशास्त्रीय अध्ययन करने नहीं बैठा था, बल्कि ऐसे अध्ययन के लिए ये किस्से आधार हो सकते हैं, लेकिन क्या यह किताब किस्सों का सयोंजन (कम्पाइलेशन) मात्र है – नहीं इसकी एक योजना है, एक अंतरदृष्टि काम कर रही है इसमें –चुनाव की अन्तरदृष्टि और इसी से इस किताब और लेखक की ‘राजनीति’ भी तय होगी –या हम पाठकों की रुचि –अरूचि के कारण भी तय होंगे.

पिछले दिनों एन एस डी के रंगमहोत्सव के दौरान एक मराठी मंचन देखा. यह मंचन महाराष्ट्र के प्रसिद्द ‘लावणी नृत्य’ पर लिखी गई एक शोधपूर्ण किताब पर आधारित था. लावणी के नर्तकियों का जीवन इन मुजफ्फरपुर की कोठेवालियों से अलग नहीं होता था. इसके दर्शक और मुरीद भी समाज का कुलीन तबका होता रहा है. किस्सागोई की शैली में हुए इस मंचन में लावणी की अनिवार्य मांसलता और गीतों और नृत्य में यौनिकता के स्पष्ट सन्देश और इशारे दर्शकों को सीटियाँ बजाने के लिए आतुर कर रहे थे – रस्ससिद्धि का भरपूर आयोजन! इसके बावजूद लेखक की अपनी दृष्टि लावणी की नर्तकियों की सामाजिक अवस्थिति को स्पष्ट कर देती है. लेकिन ‘कोठागोई’ वहीं असफल होता दिखता है. एक लम्बे कालखंड के किस्सों में बदलते समाज –समय और संस्कृति की सारी झलकियाँ मिल जाती हैं, झलक नहीं मिलती है तो गायिकाओं, नर्तकियों की सामाजिक अवस्थिति की , कि किस जाति-समाज से ये आती हैं और उनके होने में उनके जाति- समाज की क्या भूमिका है.

 लेखक अपनी किताब की भूमिका में लिखता है, “ आप ‘कोठागोई’ के किस्सों का आनन्द लें. अच्छी लगे तो उन गुमनाम गायिकाओं के गुण गायें, न जमे तो दोष इस लेखक का.’ कोठों के इर्द –गिर्द बदलते समय के साथ लेखक ने बदलती संस्कृति को जरूर दर्ज किया है, ‘ समय बदल रहा था. पुराने जमींदार, सेठ, दरबार सब एक –एक कर खत्म हो रहे थे. शहराती लोगों का मिजाज बदल रहा था. गाना –नाचना उनके लिए कला का कोई रूप नहीं रह गया था. वह तो उनके लिए खालिस मनोरंजन भर था. पैसा फेको तमाशा देखो. अगर नाच –गान एक साथ ही हो तो – मुजरा का जोर बढ़ता जा रहा था. नवदौलातियों की नई खेप शहर में आ गई थी. पथ निर्माण विभाग, सिचाई विभाग का बजट बढ़ रहा था….थोक में माल कमाने वालों का एकदम नया तबका सामने आ रहा था, इस तबके को न अपनी परम्परा से मतलब था, न संस्कृति की उस जीती-जागती धरोहर पर उनको नाज था.’

ग्राहकों की प्रतीक्षा

संस्कृति  मुजफ्फरपुर में क्या सिर्फ नवदौलतिये शुक्ला, शर्मा नामधारियों के कारण बदल रही थी ? या लेखक जिस नाज पर अपना ईमान लेकर आ रहा है, उसे नकारने वाले हाशिये के लोगों की दखल से भी बदल रही थी ? क्या मजदूरों – दलितों के संघर्ष इन दिनों दर्ज नहीं हुए थे, या नाच –गान के ‘ जमींदार या साहबी ठाठ’ को निम्नवर्ग से चुनौती और धमकियां मिलनी शुरू नहीं हुई थीं? किस्से और भी होंगे, जो इस किताब की योजना के अनुकूल नहीं होंगे. इसलिए शेष पाठकों और शोधार्थियों के लिए, जिनका उद्देश्य ‘ रससिद्धि’ के अतिरिक्त भी होगा-उनके लिए यह किताब भी शोध सामग्री है और इसमें छूट गये अवांतर प्रसंग भी शोध सामग्री होंगे. इस किताब पर ज्यादा बोझ डालना भी अनुचित होगा क्योंकि इसके फ्लैप पर ही फिल्म निर्देशक इम्तियाज़ अली का साफ़ संकेत अंकित है , ‘ बदनाम कहे जाने वाली गायिकाओं की विरासत को एक सलाम है कोठागोई. प्रभात रंजन की कोठागोई इस संस्कृति से प्रेरित किस्सों का एक मजेदार संग्रह है. पढ़िए और सुनाइये, क्योंकि दोनो में बराबर मजा है.’

सभी फोटो गूगल से साभार 

‘तेरा कोई नहीं रोकणहारा, मगन होय मीरा चली’-मीराबाई : हिंदी की पहली स्त्रीवादी : तीसरी क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

 मीरा परमुखापेक्षी स्त्री का मिथक तोड़ कर स्वतंत्र निर्णय लेती नई स्त्री छवि को गढ़ती है. जब जीवन मीरा का है तो उसे परिचालित करने के लिए दूसरे को निर्णय लेने का क्या अधिकार ? अपने नारीत्व और बौद्धिक क्षमताओं का पूर्ण स्वीकार मीरा को पारंपरिक समाज-व्यवस्था की आचार-संहिता के प्रति सशंकित बनाता है. रूढ़ियां और वर्जनाएं क्या जीवनानुभवों को निरस्त कर सकती हैं ? घर की बंद व्यवस्था के समानांतर मीरा ने साधुओं की सत्संगति में ज्ञान के गवाक्ष खुलते देखे हैं. देशाटन कर लौटे संतों के अनुभव भी विस्तृत हैं और ज्ञान भी. स्वयं मीरा लोक-परलोक की गुत्थियां न समझना चाहे, लेकिन आत्मप्रसार करके जगत के साथ एक प्रत्यक्ष नाता तो जोड़ना ही चाहती है. पत्नीत्व और कुलकानि को तिलांजलि देकर उसे अपनी राहों का अन्वेषण स्वयं करना है. बेशक एक राह ‘जोगी’ की तलाश में ‘पूर्ण पुरुष’ को पाने की लालसा और आह्लाद तक जाती है, लेकिन ज्ञानार्जन की अभिलाषा में दूसरी राह साधुओं तक ही जाती है. साधु-संगति उसके लिए एक बृहत्तर और सार्थक दुनिया का प्रवेशद्वार है. वह उसके भौतिक/गार्हस्थिक बंधनों की निस्सारता का बोध कराती है. साधु-संगति ने उसे राणा के दिए गहरे घावों केा समझने, सहने और बिसारने का औदात्य दिया है . फिर क्यों न वह ”भाग खुल गए म्हारे साध संगत सूं’ की प्रतीति में अपने को समृद्धतर करे? पारिवारिक उत्पीड़न ने उसकी दसों दिशाओं को बाधित किया है, साधु-संगति उसी में से उसे हरि के बहाने अपने को पाने की युक्ति बताती है. अपने वजूद को हवा के झोंके की तरह अमूर्त और हल्का बना कर कहीं भी आने-जाने की मानसिक स्वतंत्रता का गुरु-मंत्र पाकर मीरा क्यों न साधु-संगति की भूरि-भूरि प्रशंसा करे. ”धन आज की घरी, सत्संग में परी / श्रीमद्भागोत श्रवण सुनी, रसना रटत हरी।/मन डूबत लीलासागर में, देही प्रीति धरी / गुरु संतन की सोहनि सूरत, उर बिच आइ अरी।”

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बरजी मैं काही की नाहिं रहूँ 

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माई मैं तो लियो सांवरिया मोल  

साधु-सेवा मीरा का सहज प्राप्य है, साधु-संगति नहीं. यह उसका सोचा-समझा निर्णय है – अपने मनुष्यत्व को पूर्णता में चिन्हें का उपक्रम.


यह ज्ञानार्जन की संश्लिष्ट प्रक्रिया है जिसमें सामने दीखती सच्चाइयां अनायास ओझल हो जाती हैं और अपनी परतों के बीच किन्हीं भिन्न अर्थों की व्यंजना करने लगती हैं. यह जगत से, अपने परिवेश से, अपने ‘आत्म’ से नया परिचय है. आत्मज्ञान नशा बन कर मीरा को भरमा रहा है. ”राणा कहे सौं एक न माना, साधु दुआरे नित आली हे माय.” मीरा नशे की मादकता को संकल्प बना कर अपनी दिशाएं और प्राथमिकताएं तय करने लगती है. मीरा समझने लगती है कि ताल की सीमाबद्धता में बंध कर ज्ञान सड़ने लगता है. अनंत राशि का विस्तार अनंत हो तो अपने पूरे वैभव, सौन्दर्य और गहनता के साथ पिपासु को आलोड़ित करेगा. ज्ञान गतिशीलता का पोषक है. एक संकुचित दायरे में पग घुघरू बांध कर नाचने और ताली बजाने से वह कितना ज्ञान पा सकेगी ? प्रश्न नहीं, ललक स्वप्न बन कर उसे बाहर निकलने को उकसाती है . ”चलां वाही देस प्रीतम पावां, चलां वाही देस” मीरा का गृहत्याग बुद्ध और महावीर की तरह जगत का परित्याग कर दार्शनिक प्रश्नों को सुलझाने और निर्वाण को पाने की ऊर्ध्वमुखी चेष्टा नहीं, जीवन के उल्लास को जीवन-प्रवाह के बीचोंबीच धंस कर भोगने की शिशुसुलभ उत्सुकता है. वह जीवन का नकार नहीं, जीवन का अभिषेक करना चाहती है, भले ही जिन साधुओं के सहारे वह अपनी बेड़ियां काट कर आई है, वे जीवन से विमुख हो समाज को अमूर्त ईश्वर की आराधना का पाठ पढ़ाते हैं. मीरा अपनी मुक्ति की सामाजिक स्वीकृति के लिए अपनी भावाभिव्यक्ति पर ईश-भक्ति का आरोपण करती है, उनकी तरह कहीं-कहीं निरगुनिया भाषा-प्रतीकों का प्रयोग भी करती है, लेकिन संसार को मिथ्या मानने का भाव उसमें नहीं पनपा है. वैराग्य मीरा को लोक और जगत दोनों से जोड़ता है. उसे सामाजिक पदानुक्रम में सबसे छोटे व्यक्ति के साथ संवाद की स्वतंत्रता देता है, और वह पाती है कि दोनों के सुख और दुख, आशाएं और स्वप्न कितनी समानधर्मा हैं. उस अकेली ने तो जहर का प्याला नहीं पिया. यहां तो सभी ‘घायल’ हैं और ‘घायल की गति’ जानने, उसका उपचार करने को आतुर भी.


 राजसत्ता एवं परिवार संस्था के विरुद्ध मीरा-काव्य के प्रतिरोध (कमपिंदबम) के स्वर उसकी अपनी मनोकांक्षा बन जाते हैं और मीरा को मिलता है एक बृहद् परिवार. बेशक वैराग्य ने मीरा के काव्य की प्रखरता को मंद किया है, किंतु उसके विद्रोह को एक नया आयाम देकर घर से बाहर स्त्री की अस्मिता और प्रतिष्ठा को स्वीकृति दी है. मीरा के काल तक स्त्रियों के लिए धर्मपरायणता का अर्थ था पति/पुरुष की सेवा, गार्हस्थिक-सामाजिक दायित्वों की पूर्ति, धार्मिक उत्सवों/अनुष्ठानों में यथानिर्दिष्ट भागीदारी, भक्ति की नित्यक्रमिक चर्या की पालना और साधु-सेवा. धर्म, धर्मग्रंथों के मर्म, ईश्वर के स्वरूप पर विचार करने या माया एवं अध्यात्म से जुड़े दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करने की आज्ञा उसे नहीं थी क्योंकि वेदपाठ शूद्रों के साथ-साथ स्त्रियों के लिए भी वर्जित था और गार्गी आदि स्त्रियों की तरह तर्क करना स्त्रियोचित धर्म के प्रतिकूल. स्त्री न संन्यास लेने के लिए स्वतंत्र थी, न तीर्थाटन करने के लिए. पहली बार मीरा इस वर्जना को तोड़ती है. संन्यास उसके लिए जीविकोपार्जन का जरिया ही नहीं (आज के संदर्भ में यह नौकरीपेशा स्त्री के आर्थिक स्वावलम्बन की समतुल्यता में ठहरता है जहां दो जून भोजन के लिए उसे परिवार के अनुग्रह पर आश्रित नहीं रहना पड़ता), ईश्वर पर ध्यान केन्द्रित करने के बहाने आत्मस्थ होने का, साधु-संगति के बहाने ज्ञानार्जन करने तथा तीर्थाटन के बहाने गतिशील होने और अपना सामाजिक दायरा बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम भी था. दरअसल देह में अवस्थित कामनाओं के ज्वार को पहचान कर ही मीरा अपनी निजता पाने के लिए महत्तर लक्ष्य की ओर उन्मुख हो सकी है. वैराग्य और भक्ति चूंकि मीरा का ध्येय नहीं रहा, इसलिए अपनी भावनाओं का उदात्तीकरण करने की बौद्धिक कवायद भी उनमें दिखाई नहीं देती. अंत तक दाम्पत्य जीवन की कटु स्मृतियां उन्हें सालती रहीं और भीतर की तपन बुझाने के लिए वे राणा को गरियाती रहीं हैं.

आज की स्त्रीविमर्शकारों की तरह मीरा भी जानती हैं कि स्त्री की मुक्ति का रहस्य उसकी स्वतंत्र निर्णय क्षमता में निहित है. निर्णय लेना जोखिम का काम है क्योंकि भविष्य के गर्भ में छिपे उसके दूरगामी प्रभाव सकारात्मक होंगे या नकारात्मक – पूर्वानुमान हमेशा सही नहीं होता. अतः निर्णय लेना जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उसकी जवाबदेही के प्रति स्वयं को तैयार करना. मीरा अपने हर निर्णय के लिए जवाबदेह है. इसलिए गलत साबित होने पर किसी दूसरे को लांछित-धिक्कारती नहीं, स्वयं उस स्थिति से मुठभेड़ करने के लिए अपने को मानसिक-नैतिक रूप से तैयार करती है. साधु-संगति के लिए बेहद ललकती मीरा ने कभी सोचा भी न होगा कि जिस विषमतामूलक दमनकारी व्यवस्था को महल के भीतर छोड़ कर वह गलियों में आई है, वह अपने उसी दंभी, निर्लज्ज, नग्न रूप में साधुओं की जमात में मिलेगी. साधु-संगति की लालसा में वृंदावन और काशी की गलियों में घूमती मीरा को ‘पुरुष’ मिले हैं, ‘साधु’ नहीं. यह मीरा का मोहभंग है. तीर्थाटन उसे उद्देश्यहीन लगता है और ज्ञान-चर्चा पाखंड. आरम्भिक उत्साह के बाद मीरा अपने काव्य में साधुओं को लेकर अचानक मौन हो जाती है. बस, इतनी सी टिप्पणी करती है कि ”कासी को लोग बड़ो बिसवासी, मुख मैं राम बगल मैं फांसी”.उसकी पूरक कथा ‘वैष्णवन की वार्ता’ में लिपिबद्ध है जहां मीरा मनुष्य नहीं, मादा देह है; पुरुषों की दुनिया में बलात् घुस कर उनका चरिरत्र स्खलन करने वाली मायास्वरूप कामिनी.  इतना भीषण स्त्रीद्वेष ! क्या इसलिए कि उसने न किसी के दबाव में आकर किसी पंथ विशेष की दीक्षा ली और न अपनी साधना-पद्धति बदली ? काव्य-रचना उसके लिए न पांडित्य प्रदर्शन का माध्यम रही, न भक्ति की दार्शनिक मीमांसा या परलोक प्राप्ति का सुलभ जरिया. वह तो उसके भीतर बहती भावनाओं का स्फोट है, आत्मालाप-आत्माभिव्यक्ति और आत्मप्रसार का जरिया जिसमें उसकी दमित वासनाएं और अमूर्त सपने दोनों अपनी सम्पूर्ण सत्ता के साथ विद्यमान हैं . अपने मनोजगत् का प्रत्यक्षीकरण ! पारदर्शी मीरा की दमघोंटू चुप्पी चरित्र-हनन के मर्मांतक घाव की टीस को अंत तक सहन न कर पाने की वेदना से जन्मी है.

संसार से विरत योगियों की दुनिया में भी स्त्री-पुरुष का लौकिक पदानुक्रम कहीं अधिक घृणा और वासना के साथ मौजूद है. तो क्या ज्ञान व्यक्ति को मुक्त नहीं करता ? उसकी क्षुद्रताओं और संकीर्णताओं पर शील और उदारता का मुलम्मा चढ़ाता है ? मीरा की पीड़ा आज के स्त्री विमर्श की भी पीड़ा है. स्त्री को पत्नी/स्त्री से इतर कुछ भी ‘होने’ के लिए आग के दरिया से गुजरना ही होगा. ‘नारि पुरुष के सम्बन्ध झूठे’ – यह बोध मीरा को विरक्त बनाता है और उसकी असहायता को तीव्रतर करता है – ”सगो सनेही मेरो और न कोई, बैरी सकल जहान.” वास्तव में यहां इस अनुभव से गुजर कर मीरा को पहली बार सही मायनों में ‘गली तो चारों बंद हुई’ की प्रतीति होती है. जाहिर है इसके बाद ‘रण’ छोड़ कर द्वारिका के रणछोड़ कृष्ण में समर्पण और दैन्य से भरी निष्क्रिय भक्ति करना जीवित मीरा की लौकिक मजबूरी बन जाती है. विश्वासभंग की इस चोट ने मीरा से जीवन की महक, उल्लास, संघर्ष और आशा की खनकती गूंज को छीन लिया है. मीरा की जीवन-यात्रा का यह हश्र पितृसत्तात्मक व्यवस्था  के पुनरीक्षण की मांग को वैध और न्यायोचित बनाता है. आखिर कब तक मनुष्य बन कर जीना खारिज करते रहेंगे हम?’ओ जी महाराज छोड़ मत जाओ, मैं अबला बल नाहीं’  ‘आधी राणा की फौज, आधी मीरा एकली रे’ का उद्घोष करने वाली मीरा की तेजोमयता मलिन होते-होते जब आत्मदया में तब्दील होने लगती है,  तब पितृसत्तात्मक व्यवस्था की कार्य-शैली की पड़ताल करना अनिवार्य हो जाता है. आखिर ‘मनुष्य’ को तोड़ कर ‘छवि’ बनाना इतना सरल नहीं होता. सीमोन द बउवा ने बहुत ठीक कहा है कि पुरुष कभी स्त्री का साथी, मित्र, हितैषी नहीं रहा. जज, ज्यूरी, अभियुक्त आदि सभी भूमिकाओं में अदालत में वह खुद बैठा है, अतः स्त्री की फरियाद पर कान न देना और उल्टे उसे ही सींखचों के पीछे धकेल देना उसका ‘धर्म’ है. यह शासन-तंत्र की कूटनीति है और आत्मरक्षा का नुस्खा भी.

पुरुष का ‘आत्म’ अपन पूरे वर्ग के अहं की रक्षा के साथ जुड़ा है, इसलिए स्त्री के दमन के लिए स्त्रीद्वेषी युक्तियों को अपनाने, स्त्री को लेकर कुत्सित कुटिल यथार्थ को गढ़ कर उसी में ‘स्त्री-सत्य’ को कैद करने, उस आरोपित ‘स्त्री सत्य’ के सहारे ‘बुद्धिहीना’, ‘कामिनी’ स्त्री को फटकारने-धिक्कारने का विवेकशील ‘पुरुष-धर्म’ और हाशिए पर फेंकी गई स्त्री को रोटी- कपड़ा-मकान जैसी भौतिक सुविधाएं देकर गृहस्वामिनी/देवी बनाने जैसा ‘बड़प्पन’ जताने के पीछे अपनी स्थिति को निरापद बनाने की साजिशें हैं. स्त्री उसकी ‘सहयोगिनी’ है और उसी के जरिए वह स्त्री को अपनी सत्ता पर समग्रता और निस्संगता से विचार न करने का संस्कार देता है. इसलिए यह व्यवस्था सबसे पहले मां के रूप में ही बेटी (स्त्री) पर वर्जनाओं के अंकुश लगा उसे ‘बधिया’ करती है और उसे ‘मनुष्य’ नहीं, ‘स्त्री’ बनने का प्रशिक्षण देती है. इस प्रशिक्षण में लाज, संकोच, शील जैसे अमूर्त मानवीय मूल्यों को आभूषण की तरह शोभित करने के साथ-साथ नख से शिख तक भौतिक आभूषणों को धारण करने, उसे ‘भर्त्ता’ पुरुष की सामाजिक हैसियत से जोड़ कर देखने और सुहाग-चिन्ह का रूप देने का संस्कार विद्यमान है. शिवरानी देवी के लाख प्रतिवाद के बावजूद प्रेमचंद जैसा प्रगतिशील लेखक तक यह स्वीकार नहीं कर पाया कि स्त्रियों की आभूषण-प्रियता की बात सच्चाई नहीं, गढंत है तथा आज की इक्कीसवीं सदी का मीडिया धारावाहिकों के जरिए पढ़ी-लिखी विद्रोही स्त्री को भारी भरकम जड़ाऊ जेवरों के मोह से मुक्त नहीं कर पाया तो सोलहवीं शताब्दी के सामंती परिवेश की राजरानी मीरा की स्त्री चेतना आभूषण-चेतना से कैसे मुक्त हो सकती थी? आभूषण को सौन्दर्य और सौन्दर्य को ‘स्त्रीत्व’ के साथ जोड़ कर आभूषण को स्त्री के लिए अपरिहार्य बना देना असल में पुरुष-प्रधानता के लिए स्त्री की चेतना को कंडीशन करना है. मीरा सजग-सचेत अवस्था में विद्रोह की टंकार करते हुए आभूषणों के परित्याग की गर्वभरी घोषणा करती हैं किंतु आक्रांत कर लेने वाले यथार्थ का सामना न कर पाने की अवशता में जब अपनी स्त्री-नियति का स्वीकार करती हैं तो हरि को रिझाने के लिए व्यवस्था की वाणी ही बोलने लगती हैं.’म्हे तो नखसिख गहणों पहरियो, म्हे तो जास्यां सांवलड़ा री सेज.”

यह व्यवस्था स्त्री के अहं और व्यक्तित्व दोनों को ही बचपन से विकसित नहीं होने देती. अबला और परनिर्भर होने का बोध उसकी सीमाओं को सुपरिभाषित करता चलता है और इस प्रक्रिया में न उड़ने को आसमान देता है, न पैर टिकाने को जमीन. वह ‘अंकशायिनी’ है, इसलिए ‘अंक’ की अधिकारिणी बनने के लिए रोज अपनी सुपात्रता और उपादेयता सिद्ध करनी पड़ती है. जाहिर है मान और स्वाभिमान की बात उसके लिए बेमानी हो जाती है. प्रमुख रहती है अनुकंपा की याचना – ”हा हा करत हूं, पैयां परत हूं, मत करो मान गुमान.” पति के दंभ की धज्ज्यिां उड़ा देने वाली स्त्री की यह कातरता उसकी शक्ति के चुक जाने से ज्यादा शक्ति को सही दिशा में निवेशित न कर पाने की दृष्टिहीनता से उपजी है. यह दृष्टिहीनता अंततः पितृसत्तात्मक व्यवस्था के आंतरिकीकरण की अलक्षित प्रक्रिया को त्वरित करती है जहां नकारी जाने वाली शक्ति (पुरुष वर्चस्व) ही उपास्य, लक्ष्य और स्वप्न बन जाती है. यहीं से आत्मदया और आत्मविघटन की प्रक्रिया शुरु होती है. ”म्हे तो जनम जनम की दासी, थे म्हारां सिरताज” तथा ”तुम तो स्वामी गुण रा सागर, म्हारा औगण चित्त मत ल्याज्यो.” यदि यह स्वीकारा जाए कि जागरुक मीरा स्त्री को पराधीन बनाने वाली व्यवस्था की साजिशों को समझती थी और इसीलिए बेहद चौकन्ने भाव से अपनी जीवन-यात्रा के पहले चरण में उनका विरोध करती रही तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि अब वह अपनी दीनता और पराजय का स्पष्ट स्वीकार कर रही है ? क्या इस स्वीकृति में अपने ‘किए’ पर प्रायश्चित भी है ? यदि नहीं, तो ‘म्हाने चाकर राखो जी’ शृंखला के अनेक पदों  में वे भौतिक जरूरतों को ही नहीं, बल्कि आत्मसम्मान को न्यूनतम करते हुए ‘जो थे देशी, सो म्हे लेशी, याई मत म्हारे पूरी’ की रिरियाती याचना क्यों करती हैं ? दरअसल स्वयं मीरा अपनी लैंगिक पहचान से मुक्त नहीं हो पाई है. बेशक सजग तौर पर वह जानती है कि मानवीय मूल्यों का दंभ भरने वाली पितृसत्तात्मक व्यवस्था में ‘मनुष्य’ का निषेध है. यहां उसके स्थानापन्न रूप में हैं लिंग, वर्ण, वर्ग. आम स्त्री की तरह मीरा की भी यह त्रासदी है कि अवचेतन में व्यवस्था के इसी दबाव को उसने संस्कार रूप में ग्रहण किया है.

यह संस्कार उसके मांस-मज्जा तक धंसा हुआ है, शायद इसलिए कि उसे इतना एक्सपोजर नहीं मिला कि कल्पना करके अपनी मुक्ति की राहों का अन्वेषण कर सके, विचार-विश्लेषण कर व्यवस्था का कोई नया प्रारूप तैयार कर सके या अकेले अपनी समानांतर सत्ता स्थापित कर पितृसत्ता की दीर्घायु को चुनौती दे सके. मीरा की ‘स्वप्न-पुरुष’ की अवधारणा पुरुष से चोट खाकर पुरुष में ही अपने स्त्रीत्व की सार्थकता ढूंढती है. चूंकि वह स्वयं ‘स्त्री’ है (विशिष्ट लैंगिक पहचान से युक्त सामाजिक निर्मिति), अतः सहचर की कामना में पुरुष हमेशा ‘पति’ रूप में आ विराजता है और वह दासी रूप में. अपनी तमाम मासूमियत में मीरा नहीं जान पाती कि समर्पण की इस दैन्य अवस्था में उसने कृष्ण/स्वप्न पुरुष को पति की ही तरह अलभ्य, कठोर, छलिया और श्रेष्ठ बना दिया है जिसके संग सम्बन्ध निभाने की इकतरफा कोशिश उसी के हिस्से आन पड़ी है. ”थे तो पलक उघाड़ो दीनानाथ, मैं हाजिर नाजिर कब की खड़ी.”यहीं इस बिंदु पर अनायास वह स्त्री की परंपरापोषित निष्क्रिय और अनुत्पादक छवि की प्रतिष्ठा करने लगती है जहां स्त्री प्रतीक्षारत है (”कान्हा तोरी रे जोवत रह गई बाट”); अकेली और असुरक्षित है (”हो जी महाराज छोड़ तम जाओ, मैं अबना बल नाहिं गुसाईं, तुम्हीं मेरे सिरताज. मैं गुणहीन गुण नाहिं गुसाईं, तुम समरथ महाराज”); विरह-विदग्ध है (”हो जी हरि कित गए नेह लगाए . . . मेरे मन में ऐसी आवे, मरूं जहर विष खाय”) और अपनी निष्ठा का मुखर प्रदर्शन कर अनुकंपा पाना चाहती है (”म्हारा जनम मरण का साथी, थांने नाहिं बिसरूं दिन राती।”) मीरा स्त्री-सुबोधिनी से भी खूब परिचित है. अतः आदर्श स्त्री की आचार-संहिता की परिपालना में हरि की आंख की पुतली बनी रहना चाहती है. इस आचार-संहिता में नित्यप्रति धर्मोपदेश का श्रवण है, साधु-सेवा का व्रत है, सुमिरन-ध्यान का नेम है, नेकी-बदी के प्रति जवाबदेही है और ‘मन हस्ती अंकुस दै मार्यौ’ की कठिन साधना है. दरअसल यह साधना अपने को न्यूनतम करते-करते अमूर्त कर देने का षड्यंत्रकारी प्रशिक्षण है. ऐसा नहीं कि मीरा इन षड्यंत्रों को न समझती हो.

तीसरे चरण में रचे इन पदों में अवसाद, हताशा, टूटन, थकान, पस्ती, विश्रांति, दुचित्तापन, आत्मधिक्कार आदि इसीलिए है कि अपनी मूल वृत्ति से दूर मीरा केा सामाजिक स्वीकृति के लिए वही सब करना पड़ा जिनका वह जीवन भर विरोध करती रही है. चिंतक के रूप में यह मीरा की असफलता है. वह साधक भी नहीं बन सकी क्योंकि साधना की मौलिक उद्भावना के लिए जिस बौद्धिक सम्पन्नता, कल्पनाशीलता, अंतर्दृष्टि और अतिक्रमण कर जाने की अनिवार्यता है, वह मीरा में नहीं. इसलिए भक्ति सदा आवृत्ति एवं दैन्य, पराजय एवं विश्रांति का पर्याय बन कर यथास्थितिवाद का पोषण करती चलती है, नई आकांक्षाओं को रचने का अनुष्ठान नहीं बन पाती. मीरा के निजी अनुभव विवाह के इर्दगिर्द बुने है. दाम्पत्य सम्बन्धों में कामना और स्वाभिमान से परिपूर्ण पत्नी की अस्मिता के बरक्स वह पुरुष का दंभ स्वीकार नहीं कर सकती, किंतु भक्ति उसके लिए निजी अनुभव नहीं है.
वह जीवन-संघर्ष से पलायन न भी हो तो भी शरणागति की अवस्था तो है ही. सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, अलौकिक ईश्वर की अवधारणा भक्त को ‘लो प्रोफाइल’ में रहने का संस्कार देती है जहां अपनी ऐहिक ऐषणाओं को मार कर ‘विदेह’ होने का ‘अहंकार’ है. यह ‘अहंकार’ एक ओर भक्त को दैन्य अवस्था में घिघियाते रहने की कुंठा से मुक्त करता है तो दूसरी ओर उसकी सत्ता को ‘संत’ का नाम देकर लौकिक व्यवस्था की परिधि से मुक्त करता है. अब उसका आचरण धर्म, राजसत्ता और अर्थशक्ति के गठबंधन से बनी पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के नियम-अनुशासनों को बाधित-प्रभावित नहीं करेगा. ईश्वर की सत्ता में राजा एवं पति की शक्ति एवं श्रेष्ठता का नियोजन कर मीरा भक्ति के माध्यम से इन्हीं लौकिक संस्थाओं को पुष्ट करती है. इसलिए मीरा सहित निर्गुण संत कवियों का विद्रोह अपनी पारिवारिक-सामाजिक अवस्था से शुरु होकर अभाव में जीने वाले (अपरिग्रही, संयमी, विवेकशील) व्यक्ति के अहंकार में तब्दील होता है और फिर ईश प्राप्ति हेतु स्वयं पर स्त्री की हीन भूमिका का आरोपण कर ‘समर्थ’ की आराधना में जुट जाता है. यह संघर्ष-यात्रा ऊर्ध्वमुखी न होकर उसी दलदली जमीन पर लौट आती है जहां की पकड़ से मानसिक-नैतिक रूप से मुक्त होकर उसने लड़ाई का बिगुल बजाया था.लिजलिजी भावुकता और इंसानी दुर्बलताओं को नष्ट किए बिना अपने भीतर विद्रोह की ज्वाला सुलगाना व्यक्ति के लिए संभव नही.

 मीरा जानती हैं कि आंसू व्यक्ति को कमजोर बनाते है. वे कुछ दुर्बल क्षणों का परिणाम होने के अतिरिक्त उसकी अपनी शक्तियों के निरंतर छीजते चले जाने की ईमानदार स्वीकृति भी होते है. यह ठीक है कि एक के आंसू दूसरे व्यक्ति में करुणा का उद्रेक करते है लेकिन साथ ही उसके भीतर विशिष्ट होने का आश्वस्तिपरक बोध भी विकसित करते है. यह बोध उसे अपने सामर्थ्य, ताकत और उद्धारक की अहम्मन्यता देता है. रोता हुआ व्यक्ति जितना हीन होगा, उतना ही दूसरे का बल और अहंकार बढ़ता जाएगा. हीन को दीन-हीन बनाए रखने में ‘उद्धारक’ की परदुखकातर छवि पोषित होती है. चूंकि स्त्री अबला और हीन है, इसलिए आंसुओं का सम्बन्ध समाज ने उसी के साथ जोड़ा है, पुरुष के साथ नहीं. उल्लेखनीय है कि मीरा ने आंसुओं के सैलाब में अपनी सत्ता को बहने नहीं दिया है. विद्रोह का निनाद करते हुए पारिवारिक उत्पीड़न और राजसत्ता के दमन दोनों को उसने डंके की चोट पर हंस कर झेला है. जोगी के विरह में वह अवश्य रोती है, लेकिन इस रुदन में असहायता नहीं, अपनी उद्दाम कामनाओं की अतृप्ति का स्वीकार है, अर्थात् वहां आत्मविस्मरण एवं आत्मदया की स्थिति नही. लेकिन जोगी के प्रेम से विरत होकर मीरा जब ‘गिरधारी’ को समर्पित होती है, तब अन्य भक्त कवियों की तरह विरहिणी आत्मा का चोला पहन वह अपने को आंसुओं से गलाने लगती है. किस तर्क से क्यों परमात्मा पुरुष है और आत्मा स्त्री – इस पर कभी शंका नहीं, न विवाद। आत्मा स्त्री है भी तो उस पर स्त्री-नियति का आरोपण क्यों ? मीरा जीवन भर जिस स्त्री-नियति से बचती रही, वह हर मोड़ पर उन्हें धर दबोचने को आगे आती रही. एक दीर्घ परम्परा का सहज स्वीकार मीरा की अवश इच्छा बन जाता है और शुरु हो जाता है उन्हीं-उन्हीं उपमानों-बिंबों-प्रतीकों में विरह-व्यंजना का खेल  – यह परंपरा-पालन की लीकबद्धता है अथवा विरह की अपेक्षा अकेलेपन और असुरक्षा से उपजी वेदना. हार्दिकता एवं कामनाओं की खनक नहीं जो व्यक्ति की निजता की गूंज बन कर दसों दिशाओं में फैल जाती है. भक्ति की अर्हता के रूप में स्वीकृत रुदन एक बार फिर समाज-व्यवस्था द्वारा अपनी पकड़ से बाहर जाते संतों/भक्तों पर अपने वर्चस्व की मुहर लगाने और सांसारिक छवियों का पोषण करवाते चलने का षड्यंत्र बन जाता है.
क्रमशः 

अकेली कुहुक को जवाब मिले


गुंजन भाटिया

वीगन, एनीमल राइट्स कार्यकर्ता। ‘Living by loving ब्लॉग लिखती हैं। शिकागो में रहती हैं।. संपर्क :gunjan.bhatia@gmail.com

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष 


20 अप्रैल 2016 – सुबह के चार बजे . 


यूकी – मेरी झबरैली डॉगी – की मनुहार भरी हुंकार ने मुझे नींद से उठा दिया. उसे अपना कंबल ओढ़ाकर, अपने पास बुलाकर, पानी देकर बहलाने-फुसलाने की सारी तरकीबें मैंने आजमा लीं  पर वह नहीं ही मानी . आखिर मैं उठकर बैठ गई – क्या चाहिए तुम्हें … ? उसने दरवाज़े का रुख किया. उसे जाना ही था. इस मुंह अंधेरे के वक्त, बेमतलब वह कभी उठाती नहीं ….. मैंने स्वेटर पहना और दरवाज़े के बाहर निकली. वह पूंछ हिलाकर कृतज्ञता ज़ाहिर कर रही थी. सड़क आते ही उसने अपना सुबह का काम निबटाया और हम आगे बढ़ने लगे. साथ लगे पार्क में हमारी रूटीन सैर आम तौर पर सुबह सात से नौ के बीच और रात की सैर देर 12 बजे तक होती है. आज इतनी सुबह सड़क पर अलग सा सन्नाटा था. रात की चुप्पी कितनी अलग होती है, सुबह के इस सुकूनदेह सन्नाटे से. अजब किस्म की भयावहता होती है रात के सन्नाटे में. तब मैं सड़क के हर मोड़ पर मानसिक रूप से पूरी तरह चौकस घर लौटने की जल्दी में रहती हूं. आज सुबह के चार बजे, भव्य किस्म की शांति , एक नए जादुई संसार में ले जा रही थी. सड़क के दोनों किनारों के पेड़ों पर चहचहाती चिडि़यों की संगीत लहरी सड़क पर पसरी निस्तब्धता को तोड़ रही थी .

यूकी और मैं उन सुरों का पीछा करते हुए आगे बढ़ रहे थे . एक सुरलहरी से अगली सुरलहरी तक. अचानक महसूस हुआ, इस मोहक सुरलहरी का जवाब दूसरी ओर के पेड़ों की हरियाली से आ रहा है. पूरा माहौल जैसे एक संगीतमय शो था जिसमें स्टेज के एक ओर से चिडि़यों की कुहुक गूंजती और जुगलबंदी में बिलकुल वैसा ही जवाब दूसरी ओर के पेड़ों की शाखों से आता. इस जुगलबंदी में एक अलग किस्म की कुहुक बीच-बीच में सुनाई दे रही थी . इसका अंदाज़ अलग था. लंबा खिंचने के बाद एक प्रश्नचिह्न पर ख़त्म होता सा ! हर बार यह पुकार किसी दूसरे कोने से नहीं लौटती. एक कसक सी मन में उठी. इस जवाब ढूंढती कुहुक को सुनकर एक डाॅक्यूमंट्री ‘Racing Extinction’ का पहला दृश्य याद आया जहां कुआई प्रजाति की आखिरी बची नर चिडि़या की अकेली कुहुक से फिल्म की शुरुआत होती है जिसका जवाब नहीं आता…..मैं फुटपाथ के किनारे खड़ी हो गई – पेड़ों की शाखाओं को निरखती, संगीत की स्वरलहरियों के जादू को पहचानती जो अब हर दस मिनट में धड़धड़ाती आवाज़ से टूट रहा था जैसे पत्थर पर सख्त रबर के चक्के रगड़ खा रहे हों.

इंसानों के नींद से उठने के आसार दिखने लगे थे. हर गाड़ी के पास से गुज़रने के साथ साथ हवा में गूंजती संगीत लहरी धीमी होती चली गई. धीरे धीरे गाड़ी की घरघराहट और मशीनों के शोर के बीच पक्षियों के गाने की आवाज़ शांत हो गई. अपने घर लौट आई हूं. जब मैं यह लिख रही हूं, यूकी अपने बिस्तर पर गहरी नींद सो रही है और मैं उन लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं जिन्होंने सड़कों के किनारे इन घने पेड़ों को बचाए रखा. शायद वे जानते थे कि एक दिन ये पेड़ प्रकृति का एक विराट रंगमंच बनेंगे जहां धरती की सबसे ख़ूबसूरत सिम्फ़नी का मंचन होगा और हम इस संगीतलहरी को हर सुबह सुनेंगे. कैसे भूल सकती हूँ कि दो दिन बाद ही पृथ्वी दिवस (World Earth Day ) है और मैं अपने सभी मित्रों से यह पोस्ट पढ़ने का अनुरोध कर सकती हूं. हम इंसानों की बहुत बड़ी दुनिया में रह रहे हैं – अपनी मशीनों और यंत्रों के साथ, अपनी इच्छाओं और ज़रूरतों के साथ, अपनी परेशानियों और आकांक्षाओं के साथ. लेकिन पशु-पक्षियों की दुनिया आज भी हमारे बीच जि़ंदा है – चुपचाप, छिपी हुई, लगभग अदृश्य क्योंकि हम खुद अपनी आंखें खोलकर इन्हें देखना और इसका संज्ञान लेना नहीं चाहते.

मेरी गुज़ारिश है आपसे कि अगले दो दिन, आप अपने इर्द गिर्द ग़ैर इंसानों के जीवन को देखें.  देखें कि वे आपस में कैसे रहते हैं, कैसे लड़ते हैं, कैसे गीत गाते हैं, कैसे प्यार का इज़हार करते है. पेड़ों को देखें और उनपर चहकती चिडि़याओं को देखें, कुत्ते और बिल्लियों को देखें, गाय-बकरी , मुर्गियों, कीड़ों को देखें – वे सब हमारी खूबसूरत धरती का हिस्सा है. अगले कुछ दिन आप अपनी धरती पर अपनी स्पेस और अपने मुकाम को देखें कि इस ज़िंदा प्रजाति को हम अपनी इंसानी दुनिया में कितनी जगह दे पाए है और कितनी जगह दी जानी चाहिए थी. खुद उन्हें देखें और अपने बच्चों को भी देखने दें. उन्हें हम पहचानेंगे तभी उस खूबसूरत खजाने को संभालकर रख पाएंगे और उनके साथ अपने दरकते रिश्तों को सुधार पाएंगे. उन्हें हम पहचानेंगे, तभी यह भी समझ पाएंगे कि कहां हमारी ज़रूरतें और इच्छाएं खत्म होती हैं और उनकी शुरू होती हैं. शायद तभी हम उनके संगीत को लौटाना भी सीख पाएंगे.तब कोई अकेली पुकार जवाब का इंतज़ार करती नहीं रह जाएगी.

और एक कविता 
इस धरती पर बहुत आहिस्ता चलो

इस धरती पर आहिस्ता
बहुत आहिस्ता चलो
बहुत संभाल के साथ
ताकि हमारी सांसों की आवाज़
दब न जाए हमारी इच्छाओं के बोझ से
बची रहे हमारे लिए जगह
और बचे रहें हम ।

इस धरती पर बहुत आहिस्ता चलो
बहुत प्यार के साथ
कि हमारी रूह महसूस कर सके
घर का सुकून
हमारी हथेलियां याद रखें
ज़ख़्मों को सहलाना
और दिल उमग कर गा सके
उड़ते परिंदों का गाना

इस धरती पर बहुत आहिस्ता चलो
क्योंकि इसी से बने हैं हम
नदियां हमारी शिराओं में बहता रक्त है,
शाखों वाले पेड़ हमारी हड्डियां
जीव जंतु इस धरती के
हमारी मासूम परछाइयां

इस धरती पर बहुत आहिस्ता चलो
बहुत एहतियात के साथ
ताकि तब भी हमारे लिये
आराम करने को जगह हो यहां
जब हम रह जाएं सिर्फ़ एक कतरा हवा …….

माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल’ — मीराबाई : हिंदी की पहली स्त्रीवादी : दूसरी क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

हिंदी आलोचना प्रायः राणा को मीरा के देवर विक्रमजीत सिंह के रूप में चिन्हित करती रही है और मीरा के सुखी दाम्पत्य जीवन की परिकल्पना कर ससुराल द्वारा वैधव्य के उपरांत मीरा के उत्पीड़न-दमन के तथ्य को रेखांकित करती रही है. संभवतया इसका कारण मीरा के जीवन से सम्बद्ध कुछ इतिहाससम्मत तथ्यों-तिथियों एवं घटनाओं की खोज कर ऐतिहासिक वातावरण की निर्मिति का विचार रहा हो लेकिन यह भी सत्य है कि मीरा को लेकर निर्विवाद रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता. अतः बाह्य-साक्ष्य को मीरा के काव्य पर आरोपित करने की अपेक्षा क्यों न अंतःसाक्ष्य के आधार पर मीरा के स्वर को सुना एवं गुना जाए ? मीरा अपने एक पद में हार-सिंगार, रेशम की साड़ी और हाथ की चूड़ियां त्यागने की बात करती है. उल्लेखनीय है कि विधवा मीरा देवर राणा से उन सभी सुहाग-चिन्हों को अभिमानपूर्वक त्यागने की बात नहीं कर सकती थी जो समाज व्यवस्था ने पति राणा की मृत्यु के उपरांत उससे जबरन छीन लिए हैं.  ठीक इसी प्रकार अपने एक पद में मीरा आत्मपरिचय देते हुए ”जैमल के घरि जनम लियो है, राणा नैं परणाई’ कहती जरूर हैं, लेकिन साथ ही बदली परिस्थितियों और विद्रोही मानसिकता में इस सम्बन्ध की आंतरिकता और नैतिकता का निषेध भी कर देती हैं कि ”जनम जनम की मैं दासी राम की, थारी नाहीं लुगाई.” मीरा का काव्य एक सामान्य स्त्री के हृदय का हाहाकार हैं. वह मनस्ताप का मुखर आर्त्तनाद है जहां किसी भी शिक्षित-अशिक्षित आधुनिका स्त्री की तरह वह सास-ननद और पति को बार-बार जी भर कर गालियां दे रही है.मन को टूक-टूक कर देने वाली कटु स्मृतियों की कसक एक लम्बे अंतराल के बाद भी क्षीण नहीं हुई.
पहली क़िस्त के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें :

‘बरजी मैं काही की नाहिं रहूं’ — मीराबाई : हिंदी की पहली स्त्रीवादी 

 राजसत्ता के प्रतीक रूप में ‘राणा’ सम्बोधन किसी को भी निवेदित हो सकता है, किंतु पारिवारिक सम्बन्ध में यदि मीरा देवर को दोष देना चाहती है तो वह पदवी विशेष की आड़ क्यों लेती है जबकि लोकजीवन में स्त्री ‘राणा’, ‘स्वामी’ आदि सम्बोधनों का प्रयोग पति के लिए करती है. यानी इस स्थिति से अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि राणा/पति को क्लीन चिट देने के पीछे हिंदी आलोचना का पुरुष श्रेष्ठता का दंभ सक्रिय रहा होगा. चूंकि पति परिवार में परमेश्वर का समरूप है, अतः उसकी सत्ता और वर्चस्व को निष्कलंक और स्वयंसिद्ध बनाए रखने के लिए उसकी छवि को निर्मल और उदात्त बनाना अनिवार्य है। वह पोषक है, कर्त्तव्यपरायण निःसंग पुरुष और न्यायशील प्रशासक. गृह-क्लेश और दमन-उत्पीड़न जैसी क्षुद्रताओं में संलग्नता उसकी इस उदात्त ‘अलौकिक’ छवि को क्षरित करती है. अतः पति के रूप में वह सदा काम्य और वरेण्य है, क्रूर और अमानुषिक नहीं, हालांकि आज भी दहेज-उत्पीड़न, वधू-दहन एवं घरेलू हिंसा से सम्बद्ध आंकड़े सास-ननद के साथ पति की सक्रिय भागीदारी की बात रेखांकित करते है.

 ‘आणै आणै जी रंगभीना म्हारै महल/प्यालो तो लियां हाजर खड़ी’

मीरा का समूचा काव्य उत्पीड़ित स्त्री के आर्त्तनाद और विरहिणी प्रिया के करुण हाहाकार का प्रामाणिक दस्तावेज है. निजी जीवन की अनुभूतियां और गोपन मन की रहस्यात्मकता जिस सूक्ष्म भाव से मीरा-काव्य में व्यंजित हुई है, वह उसे अन्य भक्त कवियों से अलगाता है. मीरा के पद अपनी मूल संरचना में उत्कट भावोच्छ्वास में लिखी गई डायरी की प्रविष्टियां है. मन का निजी कोना जहां न अपने को बेहतर रूप में प्रस्तुत करने की सामाजिकता है, न विकारों को छुपाने की व्यावहारिकता. है तो अपनी भौतिक सच्चाई को अकुंठ निर्भीक भाव से स्वीकारने की ईमानदारी  अपने को अतीत, वर्तमान और भविष्य की एक सीधी रेखा में रख का जांचने की निःसंगता. मीरा के सरोकार किसी स्त्रीविमर्शकार की तरह सजग-सचेतन रूप से न स्त्री जाति के कल्याण से जुड़े हैं, न पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पुनरीक्षण की मांग से. अपने से बाहर ‘मनुष्य’ की सत्ता को जानने का बोध मध्ययुगीन व्यवस्था में विकसित हुआ ही नहीं था. निर्गुण संत कवियों की बानी में गूंजने वाला सकारात्मक विद्रोही स्वर दरअसल वैयक्तिक स्तर पर अपनी पीड़ा और दमित आकांक्षाओं की मुखर एवं सामूहिक अभिव्यक्ति रही है. मीरा-काव्य में स्त्री मुक्ति के स्वर भी अपनी वैयक्तिकता की अभिव्यक्ति की उत्कट इच्छा का परिणाम है.
कृत्रिमता एव छद्म छल-छंद से सर्वथा मुक्त मीरा स्त्री-मानस को उसकी उद्दाम कामनाओं के साथ चित्रित करती हैं. इस प्रक्रिया  में लौकिक मर्यादाएं और वर्जनाएं बार-बार टूटने की कगार पर आती हैं, टूट भी जाती है.

अनेक बार मीरा अपने भीतर की प्रचंडता से आतंकित हो पुनः अपनी सुरक्षित चारदीवारी में बंध जाना चाहती है किंतु चारदीवारी के भीतर पलती नृशंसताओं एवं असुरक्षा को वह पहले ही प्राणों के मोल पर झेल चुकी है, अतः प्रत्यावर्तन का विकल्प भी नहीं. तब उसके सामने एक ही विकल्प है – युगीन प्रवाह में बह कर लौकिक पर आध्यात्मिक का आरोपण. यह विकल्प एक ओर यदि मीरा के भीतर की स्त्री की द्वंद्वग्रस्तता, निरीहता एवं विवशता का संकेतक है तो दूसरी ओर अपनी दैहिक कामनाओं को पूरी ऐन्द्रिकता के साथ प्रकट करती एक नई स्त्री-छवि को सम्पुष्ट भी करता है. ”अपणा गिरधर कै कारणै मीरा वैरागण हो गई रे” – मीरा की यह आरोपित भक्त-छवि विकल प्रेयसी के रूप में मीरा के अध्यात्म की प्रक्रिया को बाधित करती है किंतु जोगी के लिए ‘सरप डसी’ मीरा की टेरती टीस क्या अनसुनी की जा सकती है ?   इस जोगी की ‘माधुरी मूरत सुंदरी सूरत’ ‘नैनन’ में बसने वाले नंदलाल से भिन्न है. इस जोगी के अधरों पर न मुरली है, न ‘उर’ पर वैजयंती माल; न कटितट पर क्षुद्र घंटिका सुशोभित हैं, न नूपुर शब्द का मधुर रस, बल्कि यह ‘जोगी’ राजस्थानी वेशभूषा में घर-घर अलख लगाता संन्यासी भर है –
”कुसुमल पाग केसरियां जामा, ऊपर फूल हजारी / मुकुट ऊपरे छत्र बिराजे, कुंडल की छबि न्यारी.”
अथवा
”पाग कसूमल केसरया जामूं, सोहै कुंडल कांन.”

इस जोगी के संग वैवाहिक जीवन से अतृप्त स्त्री का मन जुड़ जाए तो अन्यथा क्या. पति से उसकी सामान्य अपेक्षाएं ही तो रहीं. वह कृपा-दृष्टि नहीं, प्रेम-दृष्टि चाहती है. पति की ‘रिसाई’ दृष्टि में कोप है जहां अपने को दग्ध होने से बचाने की सतर्कता है लेकिन जोगी की दृष्टि ‘मानो प्रेम की कटारी है’ जहां बिंध-बिंध कर अपने को सम्पूर्णता में चिन्ह  लेने की खुमारी है.  पति के ‘कूड़ा बचन’ उसके स्त्रीत्व की लानत-मलामत करते हैं, तो जोगी की मीठी बातें दिल और देह की तार-तार झंकृत कर उसके भीतर यौवन की दहकती कामनाएं उत्पन्न कर देती हैं. दाम्पत्य एवं देह मिलन के संदर्भ नए अर्थों में उसके समक्ष खुलते हैं तो वह अपने पत्नीत्व की सार्थक परिणति में आह्लाद से भर कर सेज सजाने की सभी तैयारियां पूर्ण कर लेना चाहती है –
”अतर सुगंध मिलायके जी, घी भर दिवला बार /जाई जूही केतकी जी, चंपाकली सुधार
पलकां सूं करां पांवड़ा जी, अंचलां सूं मग झार /गिरधर म्हारो परम सनेही, मीरां उनकी नार।”
‘आद अंत तन मन धन मेरे, आनंद करां कलोले’ – रोम-रोम में संचारित कामनाओं का उत्ताप उसे विह्वल बना देता है –
”करके सिंगार पलंग पर बैठी, रोम रोम रस भीना /चोली के मेरे बंद तरक गए, श्याम भए परबीना.”
प्रेम-दीवानी मीरा अपनी मनोभावनाओं को किसी से छुपाना भी नहीं चाहती –
”ज्यूं अमली से अमल अघारा, यूं रमैया प्राण हमारा /कोई निंदै बंदै दुख पावै, मोकूं तो रमैयां भावै.”
तथा
”अब कोऊ कछु कहो, दिल लागा रै / हंसा की प्रकृत हंसा जाणे, का जाणैं नर कागा रैं
तन भी लागा, मन भी लागा, ज्यों बामण गल धागा रैं.”
कामनाएं मानस में रस का उद्रेक भले ही कर दें, बौराई देह को तृप्त नहीं करतीं, विक्षिप्त अवश्य कर देती हैं।

काल्पनिक सुख मीरा – स्त्री – को दांपत्य जीवन की कटुता से पल भर को मुक्त करा सकता है, शारीरिक उत्ताप को शीतल नहीं कर सकता. ‘कबहुं मिलैगो मोहिं आई रे तू जोगिया . . मिलि का तपत बुझाई” – अपनी सेक्सुएलिटी का अकुंठ स्वीकार करती है मीरा और अतृप्ति की पीड़ा का भी – ”नींद नहिं आवै जी सारी रात. करवट लेकर सेज टटोलूं रूं पिया नहीं मेरे साथ” तथा ”सूनी सेज जहर ज्यूं लागे, सिसक-सिसक जिय जावे निद्रा नहिं आवे.” लौकिक जीवन का यथार्थ मीरा को पुनः एकाकी और पराजित कर देता है. ”मैं तो जाणूं जोगी संग चलेगा” – बारह वर्ष के सान्निध्य को धता बता कर अन्यत्र चले जाने वाला जोगी क्या विश्वासघाती नहीं ? मीरा ‘जोगी’ के इस पुरुष-चरित्र को खूब पहचानती है जिसका ‘मर्म’ पाना स्त्री के लिए संभव नहीं. लेकिन प्रेमजन्य विश्वास और संवाद के कारण हार्दिकता के तंतुओं को इतनी जल्दी झटकना नहीं चाहती. स्त्री बहुत जल्द विश्वास नहीं करती. कर ले तो उसकी सूक्ष्म व्यूह-रचना से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाती. मीरा का द्वंद्व और हताशा, भटकन और विरह स्त्री की इसी मानसिकता की स्वाभाविक परिणति है. आत्मछलना से दूर तक अपने को बींध कर क्षरित करती चलती है स्त्री. विकल्पों और संभावनाओं के महल खड़े कर अपने छिलते वजूद को आधार देना चाहती है. शायद भगवा भेष धारण कर के जोगी मिल जाए उसे –
”जोगिया ने कहियो रे आदेस /
आऊँगी मैं, नांहि रहूंगी कर जोगन को भेस। चीर को फाड़ूं कंथा पहरूं, लेऊँगी उपदेस.
गिणत गिणत घिस गई रे मेरी उंगलियां की रेख। मुद्रा माला भेष लूं रे, खप्पड़ लेऊँ हाथ.
जोगिन होय जग ढूंढसूं रे, रावलिया के साथ.”
या प्रेम पगे उलाहने में अपने ‘त्याग’ की कातरता पिरोने से पिघल जाए वह –
”इतनूं काई छैं मिजाज, म्हारै मिंदर आता, थांने इतनूं काई छैं मिजाज..
तन मन धन सब अरपन कीनूं, छाड़ी छै कुल की लाज
दो कुल त्याग भई बैरागण, आप मिलण की लाग.”
या शायद पूर्ण समर्पण से उसका अहं तुष्ट हो जाए –
”जोगी आ जा आ जा, जोगी पाई परूं मैं हौं चेरी तेरी.”

इस स्त्री का एकमात्र जीवन-सत्य है – ‘रमइया बिन रह्यो ही नजाई.’ तन-मन को बांध जाती ठीक वही कामातुरता जो मित्रो (मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती) को डिप्टी के साहचर्य के लिए उन्मत्त बनाती है और अपनी कामनाओं की ‘वाचाल’ अभिव्यक्ति कर भीतर ही भीतर वर्जना-भंग के ‘सुख’ से आनंद पाती है. उल्लेखनीय है कि हिंदी कथा साहित्य में स्त्री की दैहिकता को पहली बार खुली-स्पष्ट शब्दाभिव्यक्ति देने वाली कृष्णा सोबती स्त्री को मिलन के सुख से वंचित करती हैं (मित्रो मरजानी) या सुखानुभूति के जरिए सार्थकता की परितृप्ति करने के बाद मिलन एवं साहचर्य को किसी क्षीण सी नैतिक रेखा के अधीन स्थगित कर देती हैं (सूरजमुखी अंधेरे के)। यह परम्परा का स्वीकार है ? अंततः नैतिक मर्यादाओं का अतिक्रमण न कर पाने की कातरता ? अथवा स्त्री सम्बन्धी पुरुष-निर्मित मान्यताओं एवं पूर्वाग्रहों को धता बता कर स्त्री मानस का सही परिचय देने की व्याकुलता ताकि स्त्री-पुरुष सम्बन्ध एवं सामाजिक व्यवस्था की पुनर्संरचना नई आधारभूमि पर संभव हो सके ? मीरा के पदों को यदि आध्यात्मिकता के कुहासे से मुक्त किया जाए तो वे जीवन के राग, उल्लास, उत्सव और ठाठ-बाट के साथ ऐन्द्रिकता के उद्दाम का भी संस्पर्श करते हैं. घनघोर लौकितता के बीच घोर शृंगारिक बाना.मनोवृत्तियों का प्रकाशन भी ठीक नैसर्गिक रूप में है – व्यंग्य, आवेश, आक्रोश, पीड़ा, हठ, अहंकार. मीरा अपनी इच्छाओं के उच्छ्ल आवेग को जानती है, उन्हें पूरा करने की विधि नहीं जानती. यह उसका ‘दरद’ है क्योंकि लौकिक प्रिय के लौकिक स्वरूप को समाज स्वीकृति नहीं दे सकता. प्रेमदीवानी स्त्री की समाज में तभी स्वीकृति है जब उसका प्रेम पति को निवेदित हो गृहस्थ धर्म का पर्याय बन जाए या ईश्वर को निवेदित होकर अध्यात्म का उदात्त भाव जो अपनी लौकिक व्यंजना में पति में ईश्वरत्व का आरोपण कर उसकी सत्ता को स्वयंसिद्ध एवं अ-चुनौतीपूर्ण बनाए रखने का उपक्रम मात्र है.

 जब-जब स्त्री ने अपने प्रेम की उत्कटता को मजनूं, रांझा या फरहाद का नाम देकर किसी जीवित पुरुष को सामने रख कर राग भरे संयुक्त जीवन का स्वप्न देखा है, समाज ने लैला, हीर और शीरीं के रूप में अंकुराती स्त्री-स्वच्छंदता को जड़ से उखाड़ फेंका है. प्रेमोन्मादिनी स्त्री गृहस्थी के लिए, पुरुष के वर्चस्व के लिए, सम्बन्धों के विषमतामूलक ढांचे की दीर्घायु के लिए, धर्म एवं राजसत्ता के लिए चुनौती है जो अपनी निरीहता में समूची व्यवस्था की मजबूत आधारशिला को हिलाने का सामर्थ्य रखती है. स्त्री के परकीय प्रेम की स्वीकृति का अर्थ है स्त्री की स्वतंत्र सत्ता, योनिकता और महत्वाकांक्षा की स्वीकृति जो अपने लिए क्रमशः आधी जमीन और आधा असमान मांगने के उपरांत षड्यंत्रकारी समाज व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने का साहस जुटाएगी. मीरा के पद प्रेमाकुल मीरा के जीवनोल्लास, मोहभंग और समर्पण के तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं के जरिए व्यवस्था के समक्ष स्त्री की असफल संघर्ष-यात्रा का आरेखन करते है. मीरा लौकिक प्रिय (जोगी) से नहीं मिल सकती. अपनी संस्कारग्रस्तता (जिसे स्त्री के शील और संकोच के रूप में महिमामंडित किया जाता है), प्रिय की कायरता (जो पुरुष की भ्रमरवृत्ति के रूप में उसके पौरुष का शृंगार कही जाती है, किंतु स्त्री की दृष्टि में यह उसकी लम्पटता है) अथवा पारिवारिक नियंत्रण के कारण यह प्रेम सिरे नहीं चढ़ता. मीरा शील और संकोच को अंगूठा दिखा कर अपनी कामनाओं को अभिव्यक्त कर चुकी है.  परिवार के अंकुश बेमानी हैं. रमते जोगी से संवाद और ‘दरस’ पाने के लिए साधु-संगति शुरु कर दी है. ”गिरधर गास्यां, सती न होस्यां, मन मोह्यो घण नामी. जेठ बहू को नहिं राणाजी, थे सेवक म्हे स्वामी.’  बस, मात खाई है तो प्रेमी की भ्रमरवृत्ति से जो अभिज्ञान बन कर उसे विकल्पहीन सान्त्वना तो देती है, किंतु सब कुछ खो देने के उपरांत –
”जो मैं ऐसो जानती रै, प्रीत किए दुख होय/ नगर ढिंढोरा फेरती रै, प्रीत करो मत कोय।”

इस प्रेम-प्रवंचिता ने घर खोया है, अंतरंग सम्बन्ध की हार्दिकता के प्रति विश्वास को खोया है, यथार्थ जगत की विभीषिका के साथ-साथ पग-पग पर अपनी (स्त्री जाति की) सीमाबद्धता का साक्षात्कार किया है. घर-बाहर लीक से हट कर कुछ करने को स्वतंत्र नहीं. वर्तुलाकार परिधि में इन्द्रियों को नकार कर जीने वाली जीवन यात्रा – यही है कुल स्त्री जीवन. मीरा की स्त्री फैल-फूट कर अपना वजूद पाना चाहती है, किंतु अंकुराने के लिए बित्ता भर जगह और बूंद भर नमी भी नहीं पाती. सपनों का नष्ट हो जाना मनुष्यता का नष्ट हो जाना है. मीरा के भीतर जीवन ठाठें मार रहा है. वह अपने को बचाना चाहती है. इसलिए प्रेम पर भक्ति का अरोपण कर प्रिय की स्मृतियों के साथ अपने अनुभव संसार – प्रीत – को अमर कर देना चाहती है –
”जोगिया सों प्रीत कियां दुख होय।प्रीत कियां सुख नहिं मोरी सजनी, जोगी मीत न कोई
रात दिवस कल नाहिं परत है, तुम मिलियां बिन मोई / ऐसी सूरत या जग माहीं, फेरि न देखी सोई . . .
मिलिया आनंद होई।’
अब जोगी गिरधर है और मीरा गोपिका।  प्रेम पर दार्शनिकता के आवरण का खेल मजे से चल सकता है-
”आज्यो आज्यो गोविंदा म्हारै म्हैल/ निहारां थारी बाटड़ली खड़ी जी
साधु हमारी आतमा जी, हम साधुन की देह /रोम रोम में रम रही जी,ज्यूं बादल में मेह /सुरत हरि नाम से लागी जी.”
तथा
”आवो आवो जी रंगभीना म्हारै म्हैल, प्यालो तो लियां हाजर खड़ी। सतजुग में सूती रही, त्रेता लई जगाय.
द्वापर में समझी नहीं, कलजुग पोंहच्यो आय। सतगुरु शब्द उचारिया जी, बिनती करों सुनाय.
मीरां नैं गिरधर मिल्या जी, निरभै मंगल गाय.

मीरा के विरह पदों में मूर्त का अमूर्तीकरण व्यवस्था के प्रति मीरा के निरुपाय समर्थन की दमघोंटू व्यथा है. यही कारण है कि मीरा के इन तथाकथित भक्ति पदों की उत्कटता, हार्दिकता एवं भास्वरता क्षीणतर होते-होते भक्ति के लयबद्ध सुमिरन में घुट कर रह गई है. तुलनात्मक अध्ययन हेतु दो पद उद्धृत हैं:
”ए दोई नैण कह्यो नहिं मानैं, नदियां बहै जैसे सावन की /कहा करूं कछु नहिं बस मेरो, पांख नहिं उड़ जावन की
मीरा कहै प्रभु कब रै मिलैगो, चेरी भई हूं तेरे दावन की”
तथा
”पिया म्हारै नैनां आगै रहज्यो जी।नैनां आगे रहजो म्हाने, भूल मत जाज्यो जी.
भोसागर में बही जात हूं, बेग म्हारी सुध लीज्यो जी। मीरां के प्रभु गिरधर नागर, मिल बिछुरन मत कीज्यो जी.”
भक्ति के आरोपण के कारण मीरा अपनी ही कही बात उलटाने को विवश हुई है. जोगी को ढूंढने के लिए मीरा को ‘चारूं देस में’ घर-घर अलख जगाना पड़ा है. संभवतया तीर्थाटन जैसे स्त्री-निषिद्ध कर्म में लीन होने की तत्परता के पीछे संकल्पदृढ़ प्रेम विरहिणी स्त्री की प्रिय (शरीरी पुरुष) अथवा स्वप्न पुरुष (अशरीरी) को पाने की क्षीण आकांक्षा रही हो, किंतु अब जब से प्रिय गिरधर या सांवरिया हो गया है, निर्गुण संत कवियों की तरह वह उसके हृदय में बसने लगा है . ”जिनके पिया परदेस बसत हैं, लिख लिख भेजैं पाती।/मेरे पिया मेरे मांहि बसत हैं, कहूं न आती जाती।” संभवतया यह वही स्टेज है जब मीरा वृंदावन-काशी आदि में घूमने, साधु-संतों की संगति करने के उपरांत स्थायी तौर पर द्वारिका में बसी थीं – द्वारिका जो जीवन-राग से आपूरित रसिया कृष्ण की नहीं, रणछोड़ कृष्ण की नगरी है। तो क्या रणछोड़ की शरण में आना मीरा द्वारा अपने ‘रण’ को छोड़ने का सार्वजनिक ऐलान है? क्या यह समर्पण और विश्रांति की अवस्था है जहां जीवन की निस्सारता और अपने संघर्ष की व्यर्थता देख कर मृत्यु की प्रतीक्षा जीवन का अंतिम विकल्प बनती है?क्या यह सचमुच मीरा के संघर्ष की व्यर्थता है?
मीरा के विद्रोह की निस्सारता





 ‘माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल’

मीरा के भीतर की नारी वैषम्य एवं दमन पर आश्रित विवाह संस्था की जड़ता के कारण आहत है. प्रेम उसे परिपूर्णता नहीं दे पाता क्योंकि लोकापवाद का भय स्त्री के लिए सारे दरवाजे बंद रखता है. अलबत्ता पुरुष चाहे तो प्रेम के नाम पर कितनी ही स्त्रियों का आखेट करने को स्वतंत्र है. मीरा सहअस्तित्वपरक समाज की परिकल्पना करना चाहती है, लेकिन चाह कर भी अपने लिए मनमीत नहीं जुटा पाती. उसकी ‘बात’ समझने के लिए उसकी ‘भाषा’ और ‘विचार’ से कोई साझा तक नहीं करना चाहता. वह अकेली है लेकिन पराजित नहीं. स्वप्न-पुरुष की तलाश में बेशक असफल रही है, किंतु स्त्री की दृष्टि से स्वप्न-पुरुष की आधारभूत विशिष्टताओं को गिनाना नहीं भूलती. पुरुष ही सदा सर्वदा आदर्श स्त्री-छवि की सैद्धांतिकी क्यों गढ़े ? वह सबसे पहले स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में परस्पर समानता, सद्भाव और हार्दिकता की मांग करती है जहां किसी एक का व्यक्तित्व दूसरे का विलयन न करे, बल्कि साथ-साथ विकास और परिष्कार की संभावनाओं को फलीभूत करे. ऐसी अवस्था में कोई एक श्रेष्ठ और दूसरा हीन, कोई एक उपास्य और दूसरा उपासक नहीं होगा बल्कि एक-दूसरे से निरपेक्ष अपने आप में पूर्ण होंगे. पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्री के पुरुष निरपेक्ष रूप पर विचार करने की स्वतंत्रता ही नहीं देती. मीरा इस व्यवस्था का अतिक्रमण करने के लिए स्वप्न-लोक रचती है जहां की सामाजिकता विवाह-सूत्र में बंधी स्त्री के समक्ष न पातिव्रत्य की कठोर एकांगी साधना का आदर्श प्रस्तुत करती है, न वैधव्य का अभिशाप.
‘अचल सुहाग’ का वरदान देने वाला ‘वर’ मीरा की दृष्टि में ‘जगदीस’ से कम नहीं क्योंकि पुरुष वर्चस्व को कोई अलौकिक सत्ता ही मात कर सकती है, अकेली स्त्री या स्त्रियों का समवेत स्वर नहीं. ‘ऐसे वर को क्या वरूं जो जन्मे और मर जाए’ – मीरा अभिधात्मक अर्थ में अविनाशी पुरुष की कामना नहीं कर रही, वह सम्बन्ध को जन्म और मृत्यु के आदि-अंत से मुक्त कर नित्य और नवीन कर देना चाहती है.

ऐसा पूर्ण पुरुष निश्चय ही पत्नी से बौद्धिक-मानसिक-भावनात्मक ऐक्य की अपेक्षा करेगा, उसकी देह पर अपनी सत्ता की दंभी घोषणा करते सुहाग-चिन्हों की अनिवार्यता की नहीं. ”मांग और पाटी उतार धरूंगी, ना पहिरूं कर चूड़ो/ मीरा हठीली कहे संतन सों, बर पाया छै मैं पूरो”  – मीरा इन सुहाग-चिन्हों में अपने स्त्रीत्व और निजता की पराजय अनुभव कर रही है. मीरा आरोपित विवाह सम्बन्ध को अस्वीकार कर स्त्री द्वारा स्वयं पति रूप में पुरुष का वरण करने की स्वतंत्रता की पक्षधर है. विवाह संस्था स्त्री की देह पर की जाने वाली द्विपक्षीय संधि नहीं, न ही प्रतिशोध और प्रतिकार की अमानुषिकता. विवाह सम्बन्ध देह का कामुक खेल या कुलवृद्धि का शुष्क दायित्व नहीं, जीवन सहचर पाने की अनुराग भरी प्रक्रिया है. फलतः सम्बन्ध न आनन फानन में तय हों, न बाहरी दबाव से. ठगे जाने की प्रतीति ही न रहे, इसलिए ठोक बजा कर साथी ढूंढने का अवसर और अधिकार पाना चाहती है मीरा.  यहां न नारीसुलभ लज्जा की स्वीकृति है (मैं तो देख्यो है घूंघट के पट खोल), न अज्ञानी और अव्यावहारिक स्त्री की स्तुति (मैं तो लियो है बराबर तोल). मीरा की पूर्ण-पुरुष की प्रत्याशा वस्तुतः विवाह संस्था की जड़ताओं का नकार है. यह एक ऐसे समन्वित स्त्रीवाद (प्दजमहतंजमक थ्मउपदपेउ) का स्वप्न है जहां स्त्री ‘मनुष्य’ है. पत्नी, परित्यक्ता, विधवा या वेश्या नहीं और पुरुष भी ‘मनुष्य’ है, पति और रसिया नहीं. यह वही समन्वित स्त्रीवाद है जो मिथकों में अर्धनारीश्वर की परिकल्पना के जरिए और समकालीन हिंदी साहित्य में मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘कठगुलाब’ के विपिन और गुजराती साहित्य में कुंदनिका कापड़िया के उपन्यास ‘दीवारों के पार आकाश’ के आनंदग्राम के पुरुष पात्रों के जरिए उभर कर आता है.

मीरा का स्वप्न-पुरुष रसिया कृष्ण के रूपक में उपस्थित होकर दाम्पत्येतर प्रेम का पैरोकार भी है. प्रेम को समय व समाज की संकुलता से मुक्त कर वह दिक्काल से जोड़ता है जहां ‘स्व’ से ‘समाज’ और ‘आनंद’ से ‘आत्मोपलब्धि’ की बीहड़ अंतर्यात्राएं हैं. पूर्वजन्म की गोपिका के रूप में रसिया कृष्ण के संग चीरहरण सरीखी लीला का आनंद उठाने की कसमसाहट मीरा के पदों में एकाधिक बार व्यक्त हुई है. दरअसल यह आकांक्षा वर्जनाहीन प्रेम सम्बन्ध को छक कर जीने की मानवीय कामना है जो स्त्री के लिए निषिद्ध है. मीरा निषिद्ध को अपना अधिकार मानना चाहती है किंतु साथ ही जानती है कि उसकी स्त्री मुक्ति की अवधारणा ‘स्वप्न-पुरुष’ की विवेकशील अवधारणा के बिना संभव नहीं. क्या इस ‘स्वप्न-पुरुष’ को वह जीवन में पा सकेगी ? नहीं, ‘अड़सठ तीरथों’ का भ्रमण करके और ‘वृंदावन कासी’ की खाक छान कर भी उसकी उपलब्धि शून्य है – ”वै न मिले जिनकी हम दासी.” मीरा को कहीं विश्वास था कि साधुओं की नगरी वृंदावन-काशी में शायद उसे मनवांछित पुरुष मिल जाए लेकिन वहां या तो सभी ब्राह्यण-बनिए (क्षुद्र लौकिकताओं में लीन आत्मकामी पुरुष) थे या संन्यासी (आध्यात्मिक आनंद की तलाश में भटकते वीतरागी पुरुष). इनमें भी मनुष्यत्व का नाम नहीं. अमूमन सभी ‘बगल में छुरी, मुंह में राम राम’ के बिंब हो साकार करते हुए विश्वासघाती. इसलिए मीरा भौतिक जगत में स्वप्न-पुरुष की तलाश छोड़ कर रसिया कृष्ण की अमूर्त छवि में ही अपनी आशाओं, आकांक्षाओं और सपनों को केन्द्रित करने लगती है. उसका स्वप्न-पुरुष समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और राग का प्रसार करता एक अमूर्त विचार है जिसकी ठोस लौकिक उपस्थिति हर काल के स्त्री विमर्श का वरेण्य बिंदु है.

मीरा अंत तक आशा का संबल नहीं छोड़ना चाहती – ”म्हारा गिरधर रसिया छैल, मैं तो चालूं थारी गैल” किंतु लगता है कि अब ‘स्वप्न-पुरुष’ को आदर्शीकृत करते-करते वह स्वयं ही थक गई है. या शायद भीतर निहित अवश स्त्री भटकते-टूटते पूरी आक्रामकता के साथ उनके स्वप्नों को छिन्न-भिन्न करने में लगी है. यह स्त्री मूलतः दासी है अपने ही हाथों अपनी स्वतंत्रता का हनन करने को तत्पर! इसलिए नया जोखिम उठाने की अपेक्षा ‘स्वप्न-पुरुष’ में लौकिक पति की विशिष्टताएं रख देती है. अब उसे सहचर नहीं, उद्धारक की तलाश है – ”वेग पधारो सांवरा कठिन बनी है, आप बिन म्हारो कुण धनी है.” विद्रोह और दीनता के दो कूलों में प्रवाहित मीरा के स्त्री विमर्श का यह अंतर्विरोध समकालीन स्त्री विमर्श में भी कमोबेश इसी रूप में उपस्थित है जो स्त्री मुक्ति आंदोलन को ‘मानवीय पहचान’ का आंदोलन न बना कर पुरुष की स्वीकृति और अनुकंपा पाने का उपहासास्पद अनुष्ठान बना देता है.
क्रमशः 

फैंड्री : एक पत्थर जो हमारे सवर्ण जातिवादी दिलों में धंस गया है

पूजा सिंह

पत्रकार. पिछले १० वर्षों में तहलका , शुक्रवार, आई ए एन एस में पत्रकारिता . संपर्क :aboutpooja@gmail.com

यह टिप्पणी (मैं इसे समीक्षा नहीं कहूंगी) मराठी फिल्म ‘फैंड्री’ के बारे में है लेकिन इसकी शुरुआत हिंदी फिल्मों के गांवों की बात किए बिना नहीं हो सकती. वही…हरे-भरे गांव, पहाड़ों की चोटियां, घाटियां, झील, भोले भाले गांव वाले, मासूम सी एक नायिका, वगैरह वगैरह. ‘फैंड्री’ फिल्म का गांव ऐसा नहीं है. दूसरे शब्दों में कहें तो ‘फैंड्री’ का गांव झूठा सिनेमाई गांव नहीं है. वह सचमुच का गांव है. जहां सारी इंसानी क्रूरताएं और विद्रूपताएं अपनी पूरी गहनता के साथ घटित होती हैं.मुझे कुछ मासूम लोग मिले जिनको यह एक किशोर उम्र के युवा की प्रेम कहानी लगी. बहरहाल, आगे बात करने से पहले कहानी का छोटा सा जिक्र कर लेना लाजमी है.

जब्या (सोमनाथ अवघडे) एक दलित किशोर है जो महाराष्ट्र के एक गांव में रहता है और गांव की ही पाठशाला में सातवीं कक्षा में पढ़ता है. जब्या का परिवार बेहद गरीब है और मेहनत करके अपना पेट पालता है. जब्या को जब तक अपना स्कूल छोड़कर परिवार के काम में हाथ बंटाना पड़ता है. जब्या का अपनी कक्षा में पढऩे वाली एक सवर्ण लड़की शालू से इकतरफा लगाव है और वह मन ही मन उसे चाहता है. वह उसे अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए वशीकरण अपनाना चाहता है और इस कोशिश में हमेशा लगा रहता है कि उसे कहीं से काली गौरैया मिल जाए जिसे जलाकर वह उस लड़की पर छिड़क सके ताकि वह उसकी ओर आकर्षित हो.

जब्या का परिवार दलित है और यही वजह है कि दिन रात होने वाले अपमान में उनको कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता लेकिन जब्या स्कूल में पढ़ता है और वह अपने आत्मसम्मान को लेकर बेहद सजग है. उस गांव में जहां सुअर से छू जाने पर शालू और उसकी सखी को घरवालों द्वारा गोमूत्र छिड़ककर पवित्र किया जाता है वहां जब्या और उसके परिवार को एकदिन एक सुअर को पकडऩे का जिम्मा सौंपा जाता है. यह फिल्म का क्लाइमेक्स है जहां जब्या को न चाहते हुए भी परिवार वालों के साथ सुअर पकडऩे जाना पड़ता है जहां सारा स्कूल उसे ऐसा करते देखता है और ठहाके लगाता है. साथ पढऩे वाले बच्चे उसे फैंड्री (सुअर) कहकर चिढ़ाते हैं. हंसने वालों में जब्या की प्रिय शालू भी शामिल है.

फिल्म के आखिर में परेशान जब्या जब अपने परिवार की बेइज्जती और बरदाश्त नहीं कर पाता तो वह हंसने वाले लोगों पर पत्थर फेंकना शुरू कर देता है. एक किशोर बालक द्वारा उछाले गए पत्थर से भला किसे चोट लग सकती है लेकिन लगती है. जब्या का फेंका गया पत्थर सीधा परदे से बाहर निकलता है और दर्शक के भीतर घुसे बैठे सवर्ण जातिवादी व्यक्ति के सीने में नश्तर सा धंस जाता है.फिल्म की खास बात यह है कि यह लाउड नहीं है. न गैर जरूरी गीत संगीत, न लंबे चौड़े संवाद या भाषण. बस ऐसा लगता है कि किसी ने एक कैमरा उठाया और महाराष्ट्र के एक गांव में घटने वाली घटनाओं का अंकन कर लिया. साथ में चलती इकरफा मूक प्रेम कहानी जिसका नायक के मन से बाहर आना उतना ही असंभव है जितना कि किसी सवर्ण का भाग-भागकर सुअर पकडऩा.

कुछ दृश्य हैं जो आंखों में अटक जाते हैं और किरच की तरह चुभते हैं. कपड़े की दुकान पर गोरे चिट्टे नायक को देखकर हताश जब्या का अपनी नाक को उसी के जैसा नुकीला बनाने के लिए क्लिप से दबाना, सुअर पकड़ते वक्त अचानक स्कूल में जन-गण-मन शुरू हो जाने पर जब्या का और उसे देखकर उसके पूरे परिवार का ठिठक कर सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाना. यह दृश्य देखकर जेहन में रघुवीर सहाय की कविता गूंजती है- राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है, फटा सुथन्ना पहने जिसका गुण हरचरना गाता है. याद आती है किसी की कही बात कि राष्ट्रगीत में तो पूरे पूर्वोत्तर का जिक्र तक नहीं. लेकिन जिन प्रांतों का जिक्र है क्या उनमें रहने वाले कचरू और जब्या का भी ध्यान यह देश रखता है?


जब्या के उछाले पत्थर के जिक्र के बिना बात खत्म नहीं होगी. वह पत्थर अंतरिक्ष में उछाला गया है और अगर हमारा समाज यूंही अपने जन के आत्म सम्मान को अपने लिए पोषक तत्व बनाए रहा तो एक दिन वह पत्थर तोप के गोलों की तरह बरसेगा और खत्म कर देगा उस समाज को जहां बी आर अंबेडकर और ज्योतिबा फुले केवल तस्वीर हैं और भाईचारा और सद्भाव केवल किताबों के चैप्टर.

‘बरजी मैं काही की नाहिं रहूं’ — मीराबाई : हिंदी की पहली स्त्रीवादी : पहली क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

साहित्य समाज का दर्पण है. जब वह युगीन यथार्थ को प्रतिबिंबित करता है तो उसका लक्ष्य दोहरा होता है. एक, युगीन विकृतियों, विसंगतियों और रुग्णताओं को विश्लेषण का विषय बना कर उनके निवारण हेतु समुचित समाधान खोजना. दूसरा, अपने अनुभव-सत्य से गुजर कर बेहतर भविष्य के निर्माण  हेतु भावी पीढ़ी का दिशा-निर्देश करना. मीरा का काव्य स्त्री-मानस की पीड़ा को शब्द देता है. मीरा के युग में स्त्री आत्माभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र नहीं थी. वह पुरुष के उपयोग-उपभोग के लिए थी और पुरुष की दृष्टि से देखी जाती थी. स्त्री के सुख-दुख, सपने-आकांक्षाएं, वर्तमान-भविष्य उसके अपने भीतर निहित नहीं थे, पुरुष-समाज द्वारा प्रत्यारोपित किए जाते थे. इसलिए स्त्री की नजर से स्त्री-मानस को पढ़ने का संस्कार और आवश्यकता मध्ययुग में कहीं दिखाई नहीं देती. 1498 से 1546 तक की जिस कालावधि में मीरा के होने का अनुमान इतिहासकार लगाते हैं, वह काल हिंदी साहित्य में भक्तिकाल के नाम से जाना जाता है. भक्तिकाल सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक उत्पीड़न के विरोध में उठा एक सांस्कृतिक आंदोलन है जो व्यक्ति की ऐहिक-ऐन्द्रिक सत्ता को झुठला कर परलोक की सम्मोहक अवधारणा समक्ष रखता है. चाहे इसे नैराश्य से उबरने का जिजीविषापूर्ण प्रयास कहा जाए या अपनी क्षीण होती अस्मिता को बचाने की अकुलाहट – भक्ति आंदोलन ने पारलौकिकता के गाढ़े आवरण के बीच व्यक्ति की भौतिक सत्ता, समाज-व्यवस्था और सम्बन्धों के महीन अंतर्जाल को गहराई से देखा-परखा है. अलबत्ता लोक और परलोक के बीच अपने को स्थापित करने की द्वंद्वग्रस्तता भक्ति साहित्य में साफ झलकती है.

यह द्वंद्वग्रस्तता आत्मस्वीकृति चाहती है तो तत्काल आत्मनिषेध की गूंजती हुंकार से भयभीत हो पीछे हट जाती है. इसलिए विद्रोह और यथास्थितिवाद भक्तिकाल में साथ-साथ चले हैं. परवर्ती आलोचना इन द्वंद्वों को चिन्हित करने की अपेक्षा साहित्येतिहास के कालविभाजन और नामकरण को सटीक सिद्ध करने की कोशिश में सम्वत् 1350 से सम्वत् 1700 तक के मध्ययुगीन कालखंड को भक्ति-धारा से आप्लावित होने का पूर्वाग्रह लेकर चली है. यही कारण है कि वह मीरा काव्य की भास्वर आत्माभिव्यक्ति को अलक्षित कर उसे कबीर, सूर, तुलसी, रसखान सरीखे भक्त कवियों की कोटि में रखती आई है. परिणामस्वरूप मीरा-काव्य में निहित परिवार, कुलकानि, राजसत्ता के प्रति विद्रोह की तीव्र टंकार को लौकिक जीवन का निषेध कर अलौकिक ईश्वरीय सत्ता से जुड़ने की ललक के रूप में पढ़ा-गुना गया. आलोचना की यह परंपरागत दृष्टि मीरा-काव्य के मूल स्वर के साथ न्याय नहीं कर पाती. मीरा-काव्य के केन्द्र में है मीरा के भीतर की निखालिस स्त्री जो पुरुष-दृष्टि की चौकसी और दबाव से मुक्त हो अपने मनोजगत् में दहकती लालसाओं को निर्भीक भाव से व्यक्त कर रही है. वह अपने विरोध की प्रचंडता को भी जानती है, परकीय प्रेम के प्रति दुर्निवार आकर्षण की ‘अनैतिकता’ को भी और अकेले समाज से टकराने के जोखिम को भी. आज की आलोचना स्त्री विमर्श के नाम पर स्त्री की आत्माभिव्यक्ति को व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखने की कोशिश करती है.

स्त्री विमर्श अस्मिता आंदोलन है. यह हाशिए पर धकेल दी गई अस्मिताओं को पुनः केन्द्र में लाने और उनकी मानवीय गरिमा को पुनप्रतिष्ठित करने का महाभियान है. स्त्री विमर्श अपनी मूल चेतना में स्त्री को पराधीन बनाने वाली पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था का विश्लेषण करता है. यह स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी मानने का विरोध करता है और स्त्री को एक जीवंत मानवीय इकाई समझने का संस्कार देता है. स्त्री विमर्श पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पड़ताल करने के उपक्रम में विवाह संस्था, धर्म, न्याय और मीडिया की स्त्रीविरोधी भूमिका को प्रकाश में लाता है. यह ठीक वही भावोच्छ्वास है जो मीरा-काव्य में सर्वत्र बिखरा मिलता है. मीरा के काव्य में सर्वाधिक मुखर है विवाह संस्था के प्रति असंतोष का भाव जो राणाजी के जानलेवा षड्यंत्र और सास-ननद के उत्पीड़न के जरिए उभरता है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्री को शक्तिहीन करके पुरुष को बलशाली बनाने का महान उपक्रम है. स्त्री को शक्तिहीन और रिक्त करने की यह प्रक्रिया बेहद सूक्ष्म, जटिल, एवं संशिलष्ट है. एक ओर उसकी महत्ता के डंके पीट कर उसे शील, शक्ति और सौन्दर्य की अधिष्ठात्री कहा जाता है तो दूसरी ओर कर्त्तव्यपरायणता,
एकनिष्ठा, सहिष्णुता, त्याग और क्षमा जैसे उच्चादर्शों में बांध उसकी परिधि को बेहद संकुचित कर दिया जाता है. स्त्री अपने लिए नहीं जीती.उसे दूसरों के लिए जीना सिखाया जाता है.

पुरुष के लिए, पुरुष के परिवार के लिए, पुरुषनिर्मित व्यवस्था के लिए.  इसीलिए परिभाषाओं और वर्जनाओं में मात्र उसी की सत्ता को बांधा जाता है, पुरुष की नही. जन्म से स्त्री और पुरुष दोनों संस्कार रूप में इन परिभाषाओं और वर्जनाओं को मूक भाव से स्वीकार करते हैं और उन्हीं के अनुरूप अपनी जीवन-शैली विकसित करते हैं. सामान्यतया कहीं विवाद या संवाद की कोई गुंजाइश नही. किंतु मीरा के साथ ऐसा नहीं हुआ. निःसंदेह पितृगृह में उन्होंने भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का शासन और अनुशासन देखा होगा और स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में असमानता की बात उनके रोजमर्रा के जीवन से होकर गुजरी होगी. किंतु अनुभव के स्तर पर शायद अनुशासन और असमानता को उन्होंने न भोगा हो क्योंकि आम राजपूत कन्याओं से भिन्न उनकी शिक्षा-दीक्षा चचेरे भाई जयमल के साथ हुई. अंतःपुर से बाहर निकल कर भाई के संग शिक्षा ग्रहण करने के अधिकार ने मीरा में निश्चय ही एक स्वतंत्रचेता व्यक्तित्व का विकास किया जो विवेक, स्वाभिमान और दृढ़ता के सहारे अपनी मानवीय गरिमा अक्षुण्ण रखना जानता है. पुरुषों को ये गुण श्रेष्ठ बनाते हैं, स्त्रियों को जिद्दी, अहंकारी और कुलांगार. इसलिए पत्नी एवं कुलवधू के रूप में जैसे ही मीरा से पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा पोषित रूढ़ छवियों में बंधने की मांग की गई, स्वप्नद्रष्टा मीरा की स्वतंत्रता की भावना को गहरी ठेस लगी.



 ‘लोकलाज कुलकाण जगत की, दी बहाय ज्यूं पांणी. अपने घर का परदा कर लौं, मैं अबला बौरांणी.’ 

किसी भी आत्माभिमानी पुरुष की भांति मीरा अपने जीवन में किसी के अयाचित हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं कर सकती. अपने ढंग से जीना उसकी मजबूरी है. इस जीवन शैली में ‘मुंह उघाड़’ कर साधुओं की संगति का ‘दुस्साहस’ आए, तो भी. लेकिन मीरा का दुर्भाग्य है कि ‘सत्संगति’ की मामूली सी इच्छा को भी कोई स्वीकृति नहीं दे रहा है. सभी ओर से दुत्कार-फटकार-निषेध. मीरा चकित है और किंकर्त्तव्यविमूढ़ – ”राजा बरजै राणी बरजै, बरजै सब परिवारी/कुंवर पाटवी सो भी बरजै और सहेल्यां सारी.” जिस राणा से परिणय कर मेवाड़ आई, वह भी गरिया रहा है – ”राणो जी म्हासूं रूस रह्यौ छै, कूड़ा बचन निकासै हे माय.” यहां तक कि पितृकुल भी उसके संस्कार, शिक्षा-दीक्षा और निर्णय की अवमानना कर उसी को दोषी ठहरा रहा है -”मेड़तिया रा कागद आया, बाई मीरां ने जा खीज्ये जी/ बोहत भांति से लिख्याा ओलंभा, कुल कै दाग मत दीज्यो जी/ साधां को संग परो निवारे . . . पति आज्ञा में रीज्यो जी.” मीरा बताना चाहती है कि हरि भक्ति में लजाने जैसा कुछ भी नहीं. इससे तो उसके पितृकुल और श्वसुर कुल दोनों का ही उद्धार होगा – ‘एक कुल त्यारां राणा आपणो, दूजो बंस राठौड़. तीजो त्यारां जी राणा मेड़तो, चौथौ गढ़ चित्तौड़.” ननद ऊदांबाई ”साधां की संगत दुख भारी” कह कर जिस अभावग्रस्त जिंदगी की ओर संकेत करना चाहती है  , उसे तो मीरा मुक्ति का मार्ग समझती है. ”बास्या ता खास्यां टूकड़ा ये, बाई पीस्यां खाटी छाय।/भैं सोवां भूखां मरां ये, बाई जब रे मिलेगो हरि आय। माया म्है तो यूं तजी.”

मीरा परिवार से संवाद बनाए रखने की हर संभव कोशिश करती है. ननद ऊदां के सामने वह अपने अवश मन का रेशा-रेशा खोल देती है – ”यो मन लाग्यो वैराग से, रमस्या साधां री लार, संतां री लार, भक्ति न छूटै हरि नाम की.”अपने लौकिक अधिकारों एवं भौतिक सुखों का परित्याग करने में जरा भी संकोच नही.
”बाई ऊदां छोड्यो मैं मोत्यां को हार, गहणो तो पहर्यो सील संतोष को
 बाई ऊदां चढ़ चौबारा झांक, साधां की मंडली लागे सुहावणी.”
‘भाभी सब महलां में थारो सीर’ – ऊदां के प्रलोभनों से भी अडिग है मीरा – ”राजपाट भोगो तुम्हीं, हमें न तासूं काम.” अपने निर्णय को राणा तक पहुंचा कर वह निश्चिंत हो जाना चाहती है.
 ”मेरी बात नहीं जग छानी, ऊदांबाई समझो सुघर सयानी /साधू मात पिता कुल मेरे, सजन सनेही ज्ञानी
        संत चरन की सरन रैन दिन, सत्त कहत हूं बानी /राणा नैं समझावो जावो, मैं तो बात न मानी.”
चारित्रिक दृढ़ता एवं ईमानदारी के कारण पारदर्शिता मीरा की पहचान है और उसकी मानवीय रक्षा का प्रमुख घटक भी. मीरा ने छल या विश्वासघात नहीं किया तो लोकापवाद क्यो ? ‘संतन के ढिंग’ बैठने से और हरिभक्ति मे भावविभोर होकर नाचने से कुल की मर्यादा का हनन कैसे ?

 मीरा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के जड़ कठोर नियमों को नही  समझ सकती और स्वयं किसी तर्क द्वारा अपनी हार्दिकता और निश्छलता उस तक प्रेषित नहीं कर सकती. व्यवस्था और व्यक्ति के बीच संवाद संभव ही नहीं. इसलिए सम्बन्धों में घुटन और दरकन
”सास बुरी म्हारी ननद हठीली/जलबल होय जाय अंगीठी”
और
”राणा जी थे क्याने राखों मोंसू बैर/राणा जी म्हांने ऐसा लगत है ज्यूं बिरछन में कैर.”
या
”राणा जी का देस में कोई, जल पीबा को दोस.”
उत्पीड़न का संत्रास और संकल्पदृढ़ता का ठसका – मीरा अपने ही द्वंद्वों में अनिश्चित सी घिरी खड़ी है.
हेली म्हांसूं हरि बिन रह्यो न जाय। /सासु लड़ै मोरी ननद खिजावै, राणां रह्यो रिसाय
पहरो भी राख्यो, चोकी भी बिठाइयो, ताला दिया जुड़ाय /पूर्वजनम की प्रीत पुरानी सो क्यों छोड़ी जाय.”

मीरा सम्बन्धों में स्पेस चाहती है, सम्बन्धों से मुक्ति नहीं. उसकी मानसिक संरचना के ताने-बाने में पितृसत्तात्मक व्यवस्था की रूढ़ छवियों के साथ स्वप्नशील व्यक्ति की सघन संवेदनशीलता है; कर्त्तव्यपालन की एकनिष्ठ दृढ़ता के साथ ‘स्व’ की सुरक्षा और सम्मान की मानवीय आकांक्षा भी. एक औसत स्त्री की तरह मीरा सरलहृदया है, किंतु औसत स्त्री से भिन्न ज्ञानपिपासु. सत्संगति के महत्व की जो सैद्धांतिक बातें वह पोथियों में पढ़ती आई है, क्यों न उन्हें जीवन में उतार जीवन सफल बना ले. साधु संगति मीरा के लिए ज्ञानार्जन और आत्मविस्तार का जरिया है . भौतिक जगत के रहस्यों को जानने, जगत के साथ अपने सम्बन्धों को गुनने और अपनी मानवीय सत्ता को एक सार्थक दिशा देने का. मीरा के अनुभव सीमित हैं – अपने ही वृत्त में बंद स्त्री जीवन की नियति के कारण. वह आरोपित स्त्री नियति से ऊपर उठ कर ‘अपने’ को तलाशना और संवारना चाहती है. उल्लेखनीय है कि इस तलाश में परिवार और सम्बन्धों का निषेध नहीं है, बल्कि उनके अर्थ और अंतरंगता का विस्तार है.
”माई म्हारै साधां रो इक्तयार है/ साधु ही पीहर साधु ही सासरो, सांवरिया भरतार है
जात पांत कुल कुटम कबीलो, साधू ही परवार है/मीरां के प्रभु गिरधर नागर, रमस्यां साधां री लार है.”
‘भाग खुल गए म्हारे साध संगत सूं’ – अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने की विकलता मीरा के भीतर कितने ही संभव संकल्प-विकल्प जगाती है.

बरजी मैं काहू की नाहिं रहूं.. . . 
साध संगति करि हरि सुख ले, जगसूं मैं दूरी रहूं
तन धन मेरो सब ही जावो, भल मेरो सीस लहूं
मन मेरो लागो सुमिरन सेती, सबको मैं बोल सहूं.”
”सबको मैं बोल सहूं” कहने वाली नतशिर संयमी मीरा ‘म्हांने बोल्यां मत मारो जी राणां, यो लै थारो देस” कह कर राजसत्ता, पितृसत्ता, कुलकानि को ठोकर मारती विद्रोहिणी अनायास नहीं बनी है. तिरस्कार से अधिक दमन और उत्पीड़न ने उसके भीतर की कोमलता और मनुष्यता को आहत किया है. ‘गहरो लाग्यो है घाव’ – अपनी असुरक्षा से अधिक वे व्यक्ति के भीतर की अमानुषिकता को देख थर्रा गई हैं. वे स्तंभित हैं –
”सीसोद्या राणं प्यालो म्हांने क्यूं रे पठायो
       भली बुरी तो मैं नहिं कीन्हीं, क्यूं है रिसायो
. . .  कनक कटोरे ले विष घोल्यो, दयाराम पंडो लायो”
अवाक् भी –
”कोप कियो राणाजी जब ही, सांप गला में डार्यौ”
और अपमानित भी –
”राणूं मन में कोपियो जी, मारो याके सेल/ मार्यां तो पिराछित लागै जी, पीहर दो याकों मेल
रथड़ां बहल जुपाइया जी, ऊँटां कसिया भार/ डावो छोड़ो मेड़तो जी, पेलां पोषर जाय
राणां साड्यां मोकल्या जी, पाछा ल्यावो मोड़/ कुल की मांडण इस्तरी, मुरड़ चली राठोड़.”
घरेलू हिंसा की शिकार औसत स्त्री सरीखी मीरा के पास दो ही विकल्प हैं – रो-रो कर प्राण दे दे या सजग-चौकन्नी होकर अपने प्राण और स्वाभिमान की रक्षा करे.

सर्पदंश को पुष्पहार और विष को अमृत बना लेने का जीवट सामान्यतया स्त्रियों के पास नहीं होता. मीरा के पास है. एक नहीं, कई अहम फैसलों के रूप में. सबसे पहले आत्मसाक्षात्कार कि क्या खरा-खोटा सब डंके की चोट पर कह देने की निर्भीकता उसमें है ? मीरा यहां जरा भी संशयग्रस्त नहीं. ”जो कोउ मोको एक कहोगो, एक की लाख कहोंगी.” फिर विश्लेषण! जो व्यक्ति सम्बन्ध की गरिमा का निर्वाह न कर पाए, क्या उससे सम्बन्ध बनाया और निभाया जाना चाहिए ? बेहद आधुनिक सवाल जिसका जवाब गुनने में दोषारोपण हेतु उठी एक उंगली यदि दूसरों की ओर है तो अपनी ओर उठी हैं तीन अंगुलियां. मीरा क्षणिक आवेश में नहीं, धीरज के साथ गुन-बुन कर दाम्पत्य सम्बन्ध को नकारती हैं.
”राणांजी हूं तो गिरधर कै मन भाई/ जैमल के घरि जनम लियो है, राणा नैं परणाई.
सांचा सनेही म्हारै रामसंतजन, जासूं प्रीति लगाई./ जौ पकड़ोगा हाथ हमारो, खबरदार मन माही
सांचा मनसूं सराप ज द्यूंली, बलि’र भसम होइ जाई/जनम जनम की मैं दासी राम की, थारी नाहिं लुगाई.”
इतना ही महत्वपूर्ण है दूसरा सवाल कि जिससे सम्बन्ध त्याग दिया है, क्या उसके भौतिक-सामाजिक संरक्षण में रहना चाहिए ? आत्माभिमान से दिपदिपाती मीरा किसी भी आधुनिक विद्रोहिणी से कमतर नहीं.’खीर खांड’, ‘दिखणी चीर’ और ‘माणक मोती’ का परित्याग तो मीरा ने कब से कर रखा है, फिर दो मुट्ठी अन्न के लिए राणा की क्या धौंस – ”हो जी सीसोद्या राणा, मनड़ो बैरागी धन रो क्या करूं।” जब राह अलग है (‘मान अपमान दोउ धर पटके, निकली हूं ज्ञान गली) और जीवन शैली भी (पग घुंघरू बांध मीरा नाचत री/ पगा बजावत घूंघरा जी, हाथ बजावत ताल) तो राणा की सत्ता की क्या परवाह – ”तुम जावो राणा घर आपणे, मेरी तेरी नाहिं सरी”।

इसके बाद शेष रह जाता है अपनी स्वतंत्र राहों का अन्वेषण – कुल की मर्यादा या राजसत्ता पर आंच आती हो अपने कुल का पर्दा करने की जिम्मेदारी उनकी.  मीरा की निस्संगता और निर्ममता में लक्ष्यसिद्धि के लिए दृढ़संकल्प मनुष्य की एकनिष्ठ टंकार है – ”बाल्हा मैं बैरागिण हूंगी हो/जीं जीं भेस म्हारो साहिब रीझे, सोई-सोई भेस धरूंगी हो/. . .साधां संग रहूंगी हो.” दरअसल जब मीरा यह कहती है कि ‘अपने घर का परदा कर लौं, मैं अबला बौरानी’ तब दो चीजों को एक साथ परिलक्षित किया जा सकता है. एक, हताशा के गर्भ से फूटता स्त्री का विद्रोह और स्त्री के ‘मनुष्यत्व’ की रक्षा के लिए पितृसत्तात्मक व्यवस्था के स्वरूप की पुनर्संरचना.मीरा का विद्रोह उन स्थितियों की पड़ताल करने की नैतिक जवाबदेही है जो ‘अबला’ कही जाने वाली निरीह पराश्रित स्त्री को ‘बौराने’ और ‘आक्रामक’ होने को विवश करती हैं; बार-बार उन पूर्वाग्रहों और जड़ताओं को चिन्ह लेने की आकांक्षा करता है जो स्त्री की आत्मविकास की नैसर्गिक आकांक्षा को ‘लोकलाज’ और ‘कुलकानि’ के उल्लंघन से जोड़ता है – उस कुत्सित मानसिकता को तुरंत निषिद्ध कर देने की मांग करता है जो पुरुष और व्यवस्था की हर अमानुषिकता को अनुशासन और नियम-पालन का पर्याय बना देती है.

ल्लेखनीय है कि संवैधानिक कानूनों और सामाजिक अधिकारों के बावजूद आज भी स्वतंत्रचेता स्त्री उन्मुक्त सांस लेने की हर कोशिश में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बंद दरवाजों के बाहर खड़ी है; उसकी मानवीय आकांक्षाएं आज भी मीरा की तरह लगभग पांच सौ वर्ष बाद भी पूर्ति की राह देख रही है.मीरा का काव्य विद्रोहिणी स्त्री पर लगाए गए इन आरोपों का जवाब है कि वह स्वतंत्रता की आड़ में सम्बन्ध-व्यवस्था से मुक्त हो उच्छ्रंखल जीवन जीना चाहती है.बेशक बेहद मुखर हो मीरा स्वीकार करती है कि ‘मोहे या बदनामी लागै मीठी . . .मैं चाल चलूंगी अपूठी” लेकिन विद्रोह के हर बढ़ते कदम के साथ वह मानवीय सम्बन्धों के मानवीय, अंतरंग और सकारात्मक स्वरूप को स्वीकृति देती गई है. बेशक मीरा मनुष्य के रूप में अपनी गरिमा और आत्मसम्मान बनाए रखना चाहती है, लेकिन ‘सतीत्व’ का अस्वीकार भी नहीं करती. विवाह और परिवार संस्था के नकार की बात वह सोचती भी नहीं.  हां, उसके स्वरूप को पुनर्संस्कारित करना चाहती है जहां पति राणा जैसा क्रूर आत्मकेन्द्रित स्वार्थी पुरुष नहीं, कृष्ण जैसा संवेदनशील पुरुष है.
क्रमशः 

कठमुल्लों को चेतावनी संघियों को इशारा : हाथ तोड़कर अल्लाह के भरोसे छोड़ देंगी महिलाएं, यदि उनपर हाथ उठाया तो !

काउंसिल ऑफ़ इस्लामिक आईडियोलॉजी (CII) की महिला सुरक्षा बिल में पतियों द्वारा पत्नियों की हल्की पिटाई की सिफारिश का सोशल मीडिया पर मुखर विरोध हो रहा है | पाकिस्तानी समेत अन्य देशों की महिलायें #TryBeatingMeLightly कैम्पेन चला रही हैं | इस कैम्पेन में महिलाओं को पीटने के खिलाफ धमकी दी जा रही है | इस कैम्पेन की शुरुआत पाकिस्तानी पत्रकार फहाद राजपर ने की| फहाद ने पाकिस्तानी महिलाओं की तस्वीरों के साथ उनके स्टेटमेंट इसके खिलाफ सोशल मीडिया पर जारी किये|

महिला विरोधी बिल में  क्या लिखा है?
CII के बिल के मुताबिक, महिलाएं हिजाब न पहनें, अजनबियों से बात करें, ज्यादा ऊंची आवाज में बोलें और शौहर की इजाजत के बिना किसी को पैसे दें तो शौहर पिटाई कर सकता है।
– यह भी कहा गया है कि महिला नर्सें पुरुष मरीजों का ध्यान नहीं रख सकतीं।
– प्राइमरी एजुकेशन के बाद लड़कियां को-एड स्कूलों में नहीं पढ़ सकतीं। महिलाएं किसी फौजी लड़ाई में हिस्सा नहीं ले सकतीं।
–  वे विज्ञापन  में काम नहीं कर सकतीं।
– महिलाएं फॉरेन डेलिगेशन का वेलकम नहीं कर सकतीं। वे पुरुषों से घुल-मिल नहीं सकतीं, अजनबियों संग घूमने-फिरने नहीं जा सकतीं।

कठमुल्लों के  खिलाफ  युवा पीढी

इसके खिलाफ चल रहे कैम्पेन में महिलाओं ने क्या कहा : 


डॉक्टर शगुफ्ता अब्बास  ने लिखा , ‘मुझे पीटकर तो देखो| जो हाथ मुझ पर उठाओगे उसे तोड़कर अल्लाह के भरोसे छोड़ दूंगी|
ब्लॉगर सदिया अहमद लिखती हैं, ‘हमारा चैलेंज है पुरुष तो हमे अपने इंटीलेजिंस से पछाड़े| हम महिलायें सूरज की तरह है | हाथ लगाने की कोशिश की तो जलाकर राख कर दूंगी|’
फिजा रहमान लिखती हैं, ‘तुम मुझे घर में पिटोगे, मै तुम्हे लोगो के बीच ले जाकर पीटूंगी|’
अदिका लालवानी ने लिखा, ‘मुझे पीटने की कोशिश तो करके देखिये, मै तुम्हारे लिए तबाही बन जाउंगी |’
सुम्बुल उस्मान ने लिखा, ‘मुझ पर हाथ भी उठाया तो तुम अगली सुबह देखने के लिये जिंदा नहीं बचोगे|’
प्रियंका पाहुजा ने लिखा, ‘मुझे ड्राईविंग का 7 साल का अनुभव है | ऐसी कोशिश की तो तुम्हे कार से रौंद दूंगी |’
संदस रशीद ने लिखा, ‘अगर मुझे पीटा तो तुम्हारी बाकि जिन्दगी दयनीय बना दूंगी और इसके लिये तुम खुद जिम्मेदार होगे|
सोशल मीडिया पर इस कैम्पेन को काफी समर्थन भी मिल रहा है|

पाकिस्तान की महिलाओं के ये दिलेर जवाब भारत सहित दुनिया भर के वैसे लोगों लोगों को चेतावनी भी है जो आज भी महिलाओं पर मर्दाना हुकुम को कुदरती मानते हैं .

अकथनीय का कथन – एक औरत की नोटबुक

शालिनी माथुर

 आलोचक. स्त्रीवादी आलोचना में सशक्त हस्तक्षेप.

जो लेखिका पिछले पैंतालिस वर्षाे से
निरन्तर
लिख रही हो, जिसका लेखन स्तर अपनी स्तरीयता से कभी
डिगा न हो, जिसकी कलम की धार समय के साथ-साथ पैनी
होती गई हो, और कहानियां लिखने के अतिरिक्त जिसकी
सामाजिक चेतना और सामाजिक समझ ने उसे जमीनी सामाजिक कार्याे से जोड़ रखा हो, उनकी हर नई किताब अपना परिचय खुद होती
है. हमारे समय की बहुचर्चित और प्रतिष्ठित कथाकार सुधा अरोड़ा ऐसी ही लेखिका हैं और
उनकी नई किताब मेरे सामने है ”एक
औरत की नोटबुक” एक लम्बी लेखकीय यात्रा करने वाली
लेखिका के इस झोले में बेसक़ीमती सामान है, जिसे
उन्होंने जिन्दगी के गलियारों से बटोरा है और उस सामान का ब्यौरा इस नोटबुक में
लिख दिया है. इस नोटबुक में दो लंबे आलेख है. आलेखों के दायरे में आती दस छोटी
कहानियां, कहानियों को विश्लेषित करते वक्तव्य , कविताओं के कुछ टुकड़े ओैर एक
साक्षात्कार. बेहतरीन कहानियां लिखने के लिए जानी
जाने वाली इस कथाकार ने एक पत्रकार की भांति सामाजिक परिघटनाओं और उनमें चोट खाती, छटपटाती और संघर्ष करके फिर उठती हुई
स्त्रियों पर आलेख लिखे है. पुस्तक की कहानियां आकार में छोटी , कलात्मक और प्रतीकात्मक होते हुए भी
सरल सहज और बोधगम्य है. इन आलेखों ओैर कहानियों का रचना काल 1994 से 2009 तक विस्तृत है. ये किसी क्षणिक आवेग या आवेष में की गई रचनाएं नही
है.
कोई भी रचना पढ़ते समय मुझे यह जानना
बेहद रुचिकर और महत्वपूर्ण लगता हेै कि रचना किन समयों में, कैसी परिस्थितियों में और किस भावना से
रची गई होगी. मैंने सुधा अरोड़ा जी से कहा था कि हर रचनाकार को अपनी रचना के साथ
अपना एक वक्तव्य अवश्य देना चाहिए. दिन-तारीख़ समेत. सुधा जी ने अपने सरल सहज
स्वभाव के अनुरूप हंस कर कहा साहित्य में ऐसे थोड़े ही होता है. लेखक का काम है
रचना करना, रचना को अपने हिसाब से समझना और अर्थ
निकालना पाठक पर छोड़ देना चाहिए. इस बात को एक वर्ष बीत गया. ”एक औरत की नोटबुक” में सुधा जी की दस कहानियां है और उनके
साथ उनके वक्तव्य. अक्सर कहानियां जीवन की हक़ीक़त से कुछ ज़्यादा सच्ची होती है. अपनी हक़ीक़त से ज़्यादा सच्ची कहानियों के साथ जुड़े उनके वक्तव्यों ने पाठकों के
सामने कहानियां पढ़ने के लिए कई नए दृष्टिकोण रखे है. वक्तव्यों के आलोक में कहानी
को देखें तो हमें कई नए रंग दिखाई देंगे. कहानियां वक्तव्यों से बेहतर हैं या
वक्तव्य कहानी से बेहतर ,
यह कह पाना सम्भव नहीं. रचनाकार स्वयं
अपनी रचना पर टिप्पणी कर दे, फिर
भी पाठक के पास उसके नए आयाम ढूंढने की गुंजाइस  बनी रहती है. इन कहानियों के साथ
बंधे वक्तव्य पाठक की जिज्ञासा शान्त नहीं करते बल्कि पाठक को ओैर प्रश्नाकुल बनाते है. कहानियों के कथानक और वक्तव्यों के कथ्य स्त्री की अकथनीय व्यथा के कथन
है.


‘‘अपने लिए कब जीना सीखेगी ओैरत?’’ वक्तव्य के साथ गुंथी कहानी है. ‘‘एक औरत तीन बटा चार. ’’कहानी छोटी है – कलात्मक और
प्रतीकात्मक. कहानी की शुरूआत ऐसी है मानो ओ. हेनरी ने कोई किस्सा सुनाना शुरू
किया हो. ”एक तीस बरस पुराना घर था। वहाँ पचास
बरस पुरानी एक औरत थी. उसके चेहरे पर घर जितनी ही पुरानी लकीरें थीं.” (पृष्ठ-126) वह ”एक खूबसूरत औरत थी – आखिरी उंगली पर
डस्टर लपेटे – हर कोने कोने की धूलसाफ करती हुई. इसी दिनचर्या में से समय निकाल कर
वह बाहर भी जाती बच्चों की किताबें लेने – साहब की पसंद की सब्जियां लेने” ” हर महीने की एक निश्चित तारीख को सखी
सहेलियों के साथ चाय पार्टी में भी हिस्सा लेती” पर हर बार घर से बाहर निकलते समय वह अपना एक हिस्सा घर में ही छोड़
आती.” (पृ 131) इस प्रतीकात्मक कहानी का अंत वहां होता है जहां पर आत्मकेन्द्रित , दंभी पति पक्षाघात की बीमारी से उठकर
छड़ी ले कर चलने योग्य हुआ ओैर उसका घर संसार चलाने में अपना सर्वस्व लगा देने वाली
उसकी खूबसूरत पत्नी उसकी ‘‘
छड़ी बन गई” जो साहब के बाएं हिस्से के अनुरूप अपने
को हर माप के सांचे में ढाल ले. यह एक पूरी ओैरत के तीन बटा चार ‘‘मांस का लोथ” बनने की कहानी है. उधर ‘‘ताराबाई चाल- कमरा नम्बर एक सौ पैंतीस’’ में रहने वाली गरीब श्रमजीवी महिला अपने पति के परपीड़न सुख और निर्संश बेरहमी को झेलने के बाद गालियों की बौछार कर लेती है , जिसे अनसुना करके मर्द करवट बदल कर
खर्राटे भरने लगता है. (पृ 43) ‘‘उस बांझ औरत के अड़तीस वर्षीय मरद को मरे आज चैदहवां दिन था.’’ यातना देने वाले पति को याद करने के
लिए स्त्री स्वयं को यातना देती है स्वयं को सिगरेट से जलाती हुई.

कमरे में
दम्पत्ति का भीड़ की तरह एक
दूसरे से टकराना कतराना, रात के समय छत पर टंगे और दीवारों पर बैठे ख़र्राटों का आस-पास पसर
जाना, और मरे हुए पति के धुंधलाए अक्स का खाट
पर पैर हिलाते हुए बैठना,
सारे बिम्ब पति के परपीड़न सुख और पत्नी
के आत्मपीड़क आनन्द को दिखाते है. बड़े घर की ‘‘तीन बटा चार औरत’’ घर से निकलते समय केवल ‘‘एक बटा चार साथ’’ ले जाती है और छोटे घर में रहने वाली
गरीब औरत पति के मरने के चैदह दिन बाद पहली बार अपने आपको आईने में देखती है.” सारे बिखरे हुए टुकड़ों को मिलाकर उसने
अपना चेहरा पहली बार एक साथ देखा. गले से नीचे उसने अपने आप को आईने में देखा ही
नहीं था. उच्च और निम्न वर्ग के दम्पत्तियों के
ये चेहरे हिंसा के सूत्र में बंधे है. स्त्री के त्याग पर पति का पनपना और त्याग
का अनादर, उपेक्षा और अवहेलना करते हुए हिंसक ही
बने रहना.  ‘‘रहोगी तुम वही” कहानी, जो लेखिका ने अपने बारह वर्ष के मौन के बाद 1993 में लिखी, एकालाप शैली में लिखी छोटी कहानी है जो
अत्यंत लोकप्रिय हुई. ”सारा दिन घर घुसरी बनी क्यों बैठी रहती
हो. खुली हवा में थोड़ा बाहर निकला करो. बाल छोटे करवा लो, सूरत भी कुछ सुधर जाएगी.” और फिर पन्द्रह साल बाद ”यह तुमने बाल क्यों इतने छोटे करवा लिए
है. तुम्हें क्या लगता हेै,
छोटे बालो में बहुत खूबसूरत लगती हो? यू लुक हारिबल. (पृ 99)सुधा जी टिप्पणी करती है कि  ‘‘यह कहानी पुरुष के लगातार बोलने और औरत
के चुप रहने की कहानी नहीं है.

यह कहानी स्त्री के बदलने और पुरुष के स्वभाव की
यथास्थिति की कहानी है” यहां दृष्टव्य है कि स्त्री बदल रही है
अपनी मर्जी से नहीं. पति की प्रताड़ना से और पति के उकसाने पर परन्तु फिर भी पति
को संतोष नहीं. बदली हुई स्त्री के बदलाव को पति चिन्हित तो करता है – कटे बालों
को , रोज़ दाल रोटी बैगन भिंडी और आलू की जगह
बायल्ड वेजेटेबल्स को, समाज सेवा को और किताबों को, पर उसे न सम्मान दे पाता है , न स्वीकृति – ”कितनी भी किताबें पढ लो तुम्हारी
बुद्धि में बढ़ोत्तरी होने वाली नहीं है. ‘‘ रहोगी
तुम वही” (पृ 99) वाक्य में कितना तिरस्कार भरा है और कितनी हिकारत.   स्त्री शिक्षा , स्त्री सशक्तिकरण का स्रोत बनेगी , यह उम्मीद कैसे पूरी होगी ? पुरुषवादी मानसिकता और पूर्वाग्रह तो
स्थिति को बदलने ही नहीं देते.” वह
कब बदलेगा? यह सवाल चिरंतन है.” लेखिका पूछती हैं. मुझे लगता है
सशक्तीकरण एक मानसिक अवस्था है, उस
व्यक्ति की, जिसे सशक्त होना है और सशक्त महसूस
करना है. स्त्री को अपनी अवस्था बदलनी है. वह तब बदलेगी जब वह स्वयं को अपनी
दृष्टि से देखेगी. सामाजिक दृष्टि की परवाह किए बगै़र.  ”समुद्र में रेगिस्तान” कहानी इस संकलन की एक बहुत ख़ास कहानी
है. केवल अपने शिल्प की बारीक बयानी और अमूत्र्तन के कारण ही नहीं बल्कि अपने
कथ्य में छिपी गहन और प्रच्छन्न करुणा के कारण भी क्योंकि यह पूरी पुस्तक ही एक
औरत की नोट बुक है इसलिए इस कहानी की मुख्य पात्र भी एक औरत ही है. इस औरत ने अपनी
रचनात्मकता को पीछे छोड़ कर एक अधेड, तीन बच्चों वाले पुरुष का घर बसाया पर
स्वयं अधेड़ होने तक पीछे छूट गई अकेली.

सुधा अरोड़ा



हमारे देश में विवाह औरत को नई पहचान
नहीं दे पाता, बल्कि उससे उसकी निजी पहचान भी छीन
लेता है। नायिका छवि भी कहानी के अन्त में अपना नाम याद करती हेै, और पहचान पा लेती है. खुद अपने आप से
परिचित होती है. अपर्णा सेन की फिल्म परमा के अन्तिम दृष्य में भी घर से बहिष्कृत नायिका को एक पौधे का भूला हुआ नाम याद आ जाता है. कृष्णपल्लवी.  ‘‘समुद्र में रेगिस्तान’’ कहानी उन कहानियों में से है जो ‘‘अपना षिल्प अपने आप गढ़ती है.’’ कहानी यूँ षुरु होती है मानो कविता हो. ” दिन ,हफ्ते, महीने, साल. लगभग पैतीस सालों से वे खड़ी थी. खिड़की के आयताकार फ्रेम के दो
हिस्सों में बँटे समुद्र के निस्सीम विस्तार के सामने. ऐसे जैसे समुद्र का हिस्सा
हों वे. वे मानो कैलेंडर में जड़े एक खूबसूरत लैडस्केप का हिस्सा बन गई थी.” (पृ-111) व्यक्ति की मनःस्थिति जैसी होती है वाह्यजगत् भी उसे वैसा ही दिखाई
देता है.  ”तीस साल पहले समुद्र ऐसा मटमैला नहीं
था. चढ़ती दुपहरी में वह आसमान के हल्के नीले रंग से कुछ ज़्यादा नीलापन लिए दिखता. आसमानी नीले रंग से तीन शेड गहरा.”(पृ-112)” दस साल बाद एक दिन अचानक जब गर्मी की
छुट्टियां खत्म होने पर, बच्चे वापस पंचगनी के हाॅस्टल लौट गए, उन्हें समुद्र बदरंग सा नीला लगा.” समय गुज़रता गया. ”न जाने कब वह खिलंदड़ा समुद्र एकाकी और हतास  रेगिस्तान में बदल गया.” कहानी
के अंत में ”न जाने कैसे खिड़की के बाहर हिलोरें
लेता रेगिस्तान उमड़ते समुद्र की तरह बेरोकटोक कमरे में चला आया और सारे बांध तोड़
कर उफनता हुआ उनकी आंखों के रास्ते वह निकला। (पृ-115) नायिका का जीवन और समुद्र मानो एक ही गति से बहते है.

एक दिन अचानक एक पुराने सहपाठी ने
उन्हें नाम से बुलाया और ”दीवारों पर लगी पेंटिंग्स के कोनों पर
लिखा उनका छोटा सा नाम वहां से निकल कर पूरे कमरे में फैल गया. कमरे के बीचोंबीच वह
नाम जैसे उनकी प्रतीक्षा में बैठा था.” अपने
नाम का भूलना और उसका याद आ जाना हमारी खु़द से मुलाक़ात का प्रतीक है. नाम खोया
नहीं था , वहीं बैठा था कमरे में , लिखा था तस्वीर पर , याद था हमारे सहपाठियों को , ज़िन्दा था उनकी स्मृतियों में , भुलाया तो सिर्फ हमने था – उस सुख की
चाहत में जो सुख हमें इस पितृसत्तात्मक समाज की परिवार नामक इकाई का हिस्सा बनकर , विवाह नामक संस्था में प्रवेश करके , पति नामक प्राणी के माध्यम से प्राप्त
होने वाला था. पर हो न सका. मिला क्या, और छूटा क्या ?
कहानी में मातृत्व की चाहत के संकेत है, छह आठ और दस साल के बालकों को पालने के
लिए किए गए दूसरे विवाह के संकेत भी है.  परन्तु सच बात तो यह है कि मातृत्व की
चाहत भी समाज में द्वारा निर्मित ही होती है, तभी
तो विश्व के हर समाज में यह भावनाएं तथा चाहतें अलग अलग रूप में दिखलाई पड़ती हेै. इस प्रकार की कथाओं में पति के देहान्त और वयस्क पुत्रों के जाने के बाद खाली
घोंसले में अकेली छूटी नायिकायें हमें मन्नू भंडारी, मालती जोशी,
उषा प्रियंवदा की रचनाओं में भी मिलती
हेै परन्तु यह कहानी ख़ास है. क्योंकि यह कहानी समाज द्वारा छोड़ी हुई औरत की नहीं
बल्कि स्वयं अपने आप से बिछुड़ी हुई औरत की दास्तान है, जिनका नाम उनकी प्रतीक्षा कर रहा था , ‘‘जिससे वे हुलस कर मिलीं और ढह गईं.” (पृ-115)
अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी” का ज़िक्र किए बिना इस पुस्तक पर चर्चा
पूरी नहीं हो सकती. पूरब में कलकत्ते के पास बांकुड़ा से लेकर पश्चिम में बम्बई तक
फैला वितान, बरसात का मौसम, भीगी सड़क, तालाब, पोखर, नाली, कीचड़, केंचुए वर्षा  में भाई-बहनों का एक साथ खेलना, ”मोैसम की पहली बरसात देखकर हम कैसे उछलते कूदते, माँ का वर्षा  आने की खबर देते, जैसे पानी की बूँदे सिर्फ हमें ही
दिखाई देती है, और किसी को नहीं” (पृ-32) और निर्धन माँ बाप का बेटी ब्याहने का सपना, बेटी का ब्याह कर पराए देश जाना, उसकी गृहस्थी और जुड़वां बेटियों का
जन्म. अपने जीवन से त्रस्त क्षुब्ध, निराश  और व्यथित औरतें कितना डरती है बेटियों को जन्म देते ! उन्हें ज्ञात है – लड़की होना
होता क्या है. पूरी कहानी बाहर से एक भौगोलिक विस्तार रचती है बंगाल के एक छोटे से
गांव से बम्बई तक और भीतर ही भीतर रचती है एक अवचेतन का संसार जिसके भीतर रहते हुए
एक सूत्र से गुंथे है. पराए देश  ब्याही गई बेटी और उसके माँ बाप. क्या वे उसकी
पीड़ा जानते नहीं, फिर भी यही सुनना चाहते है कि बेटी
सुखी है.” तुम्हें मेरे ख़त कभी मिले ही नहीं.” बेटी ने माँ बाप को लिखा तो था
उन्होंने पढ़ा ही नहीं. पढ़ना चाहा नहीं. इस कहानी पर विस्तार से लिखने की इच्छा है. पर वह टिप्पणी फिर कभी , ऐसी रचना पर लेखनी उठाते हाथ कांपते
है. ‘‘डर’’ और ‘‘करवा चौथी औरत’’ मध्य तथा उच्च मध्य वर्ग की पढ़ी लिखी
औरत की दयनीय स्थिति की कहानियां है. लेखिका ने इन्हें करुण कथा की तरह नहीं ,रुचिकर क़िस्से की तरह बयान किया है.

अपने ही घर में गृहिणी का डर कर रहना (डर) और अपने ही घर में धीरे धीरे महत्वहीन होते
चले जाना (करवाचौथी औरत) मध्यवर्गीय स्त्री की वास्तविकता है. ‘‘सत्ता संवाद’’ कहानी एक स्त्री का एकालाप है जो पैसा
कमाने और घर की सारी जिम्मेदारी उठाने के लिए मजबूर स्त्री द्वारा गैर ज़िम्मेदार
लेखक टाइप पति को झेलते रहने से उपजा क्रोध है जो खीझयुक्त बड़बड़ाहट के रूप में
उभरता है. स्वयं को लेखक मानने वाले पाठक पाठिकाएं कदाचित् इस कहानी से सरलता से
तादात्म्य स्थापित कर पाएंगे, जब
कि यह कहानी किसी और प्रकार के दम्पत्ति की भी हो सकती है. ‘‘ तीसरी बेटी के नामः ये ठंडे सूखे बेजान शब्द ’’कहानी उस लड़की के विषय में है जिसने
प्रेम किया, प्रेम विवाह किया, पढाई भी की और नौकरी भी, परन्तु वह अपने महत्वाकांक्षी ईष्यालु
पति के द्वारा मारी गई. ‘‘तुझे तो फिर फिर बनना है औरत ’’ शीर्षक वाले वक्तव्य में लेखिका ने इस
कहानी को नयना साहनी और अंजू इल्यासी जैसी महिलाओं की हत्या के आलोक में लिखा
बताया है जो अपने पुरूष साथियों द्वारा मारी गई. सार्वजनिक स्मृति की आयु बहुत छोटी
होती है। इस तरह की घटनाएं हत्याकांडों के रुप में हिन्दी अखबारों के मुखपृष्ठ पर
कुछ दिन स्थान पाती हैं, फिर लुप्त हो जाती है. लोग कहते हैं, ये औरतें सबकुछ जानते हुए भी सार्वजनिक
जीवन में आई ही क्यों थीं ?
पुरुष तो बदमाश होते ही है. कहानी के
रुप में प्रस्तुत हो कर यही विचार भावनाओं में अनुस्यूत हो जाते हैं और हदय के
भीतर घर कर जाते है. ‘‘बड़ी हत्या,छोटी हत्या’’ कहानी संवाद शैली में लिखी गई कहानी है. जिसमें घर की बुज़ुर्ग महिला दाई द्वारा नवजात कन्या की हत्या करवाती है.

बीस बरस
तक पालपोस कर बड़ी की गई
बेटी को दहेज कम मिलने के कारण आधा टिन मिट्टी के तेल में फूंक दिया जाएगा , दादी यह जानती है, इसलिए नवजात पोती की हत्या करवा देती
है. उस दाई से, जो सबेरे से दो हत्याएं और कर चुकी है. ससुराल में जलने से बेहतर है जन्मते ही मरना. वक्तव्य में लेखिका ने कहा है.‘ बेटा बेटी के जन्म को भारतीय व्यापारी
वर्ग तो नफा नुकसान के अर्थ में देखता ही है मध्यवर्ग भी संतान में लड़के का शुमार
हुए बिना परिवार को पूरा नही मानता. ’’ (पृ-59) सुधा अरोड़ा की कई कहानियां यहां एक
दूसरे के बरक्स खड़ी है. ‘‘रहोगी तुम वही’’ के सामने ‘‘सत्ता संवाद’’ , ‘‘एक औरत-तीन बटा चार’’ के सामने ‘‘ताराबाई चाल’’ ,‘‘अन्नपूर्णा मंडल’’ के सामने ‘‘समुद्र में रेगिस्तान’’, ‘‘तीसरी बेटी’’ के सामने ‘‘बड़ी हत्या,छोटी हत्या’’और डर के सामने करवाचौथी औरत. बाहर से
बहुत दूर ओैर कितने अलग अलग दिखने वाले विश्व  भीतर से बिल्कुल एक से है. सम्पन्न
दम्पत्ति और विपन्न दम्पत्ति के घरों में सत्ता समीकरण एक जैसे है. कहानियां दर्शाती हैं कि सुविधाएं सुख का पर्याय नहीं होतीं, संभ्रान्तता से क्रूरता कम नहीं होती.  कोई आवश्यक नहीं कि शिक्षा और
उच्च पद किसी व्यक्ति  को मानवीय रिश्तों को बेहतर बनाने की सलाहियत दे सके. मानसिक प्रताड़ना के खि़लाफ अपने लम्बे
आलेख में लेखिका ने वर्गीय आधार पर प्रताड़ना का विश्लेषण किया हेै. लोग मार्क्सवादी वर्ग की धारणा को जानते है, जहाँ
मिल मालिक मजदूर का शोषण करता है , वह
पूँजी और श्रम की लड़ाई है,
और अमीर और ग़रीब की. परन्तु घरों के
भीतर एक और तरह की लड़ाई जारी है जिसमें गरीब गरीब को ही सताता है और अमीर अमीर को
ही. यह लिंगाधारित भूमिका विभाजन का प्रतिफल है.

जिसमें अधिकतर पुरुष ही शोषक की
भूमिका में रहता है, अपने ही वर्ग की स्त्री को सताता हुआ. ”अपवाद हर जगह हो सकते है पर अमूमन होता
यह है कि तकनीकी प्रबंधन की उच्च शिक्षा प्राप्त अभिजात घरों से आए लड़के किसी
इज्जतदार प्रतिष्ठित घराने की ज़हीन, देखने
में आकर्षक लड़की से सगर्व शादी करना चाहते है, पर
सारी मसक़्क़त केवल उसे हासिल करने तक सीमित होकर रह जाती है फिर उसका मुख्य स्पेस
रसोई हो जाता है. ’’ लेखिका ऐसे महिला कलाकारों की गणना
करती हैं जिन्हें उनकी कला पर रीझकर पति ने चुना पर कला जगत् छोड़ने पर मजबूर किया,  फलस्वरूप वे विवाह संस्था से बाहर आ
गई. वे कहती हैं कि ‘‘ निम्न वर्ग का पुरुष गु़स्सा आते ही
हाथ उठा देता है, वह इतना शातिर नहीं होता. सूक्ष्म
किस्म की मानसिक प्रताड़ना आमतौर पर आर्थिक रूप से सम्पन्न संभ्रान्त अभिजात पुरूष
या फिर सामाजिक फलक पर प्रतिष्ठा प्राप्त बुद्धिजीवी पुरुष देते है.’  ‘‘आक्रामकता के खि़लाफः एक आम औरत की
आवाज़ ’’ पुस्तक का प्रथम आलेख है. इसमें लेखिका
ने परामर्श केन्द्र से जुड़े अनुभवों को आधार बनाया है. मैंने देखा है कि आमतौर पर
परामर्श केन्द्र मध्यवर्ग की शिक्षित महिलाओं की पहल पर स्थापित हुए हेैं तथा उन्हीं
के द्वारा संचालित है. पर इनमें मामले निम्न आय वर्ग की महिलाओं के होते हैं
जिनमें से अधिकांश को मध्यवर्गीय महिलाओं ने भेजा होता है. कामकाजी, श्रमजीवी, घरों में चौका बर्तन करने वाली, कपड़े धोने वाली, सब्जी वाली – महिलाओं का एक बड़ा वर्ग
इनका लाभार्थी है.

            
पच्चीस वर्ष से ऐसे ही परामर्श केन्द्रों के साथ काम करते हुए मैंने भी यही पाया है कि उच्च तथा मध्य वर्ग की
महिलाएं गरीब स्त्रियों के केस लाती हैं, उन्हीं
का सरेआम बयान करती हैं ,
परन्तु वे यह नहीं बतातीं कि उनके अपने
घर के भीतर पारिवारिक रिश्तों के टूटने बिखरने की स्थिति क्या है. अपनी आया-बाई, महरी-मिसरानी की व्यथा कहकर और उनके
पतियों को उनके किए की सज़ा दिलवा कर मानो वे अपने सुशिक्षित, समृद्ध, सम्भ्रान्त दिखने वाले पतियों से उनकी क्रूरता तथा हिंसा का बदला ले
रही होती हैं. जब कोई महिला हमारे परामर्श केन्द्र में चार ऐसे केस भेज चुकी होती
है, मैं समझ लेती हूँ कि पांचवा केस उसका
खुद का होगा. सुधा अरोड़ा ने संभ्रान्त मुखौटे वाले क्रूर पुरुषों द्वारा की जाने
वाली हिंसा पर बहुत विस्तार से चर्चा की है जहां हिंसा जूतों डंडो, लाठी और गालियों से नहीं होती बल्कि
होती है – उदासीनता और उपेक्षा भरी निर्मम चुप्पी से.‘‘ द वायलेंस आॅफ सायलेंस. ’’साहित्य समाज का दर्पण होता है , या साहित्य को समाज का दर्पण होना
चाहिए या फिर साहित्य को समाज का पथप्रदर्शक भी होना चाहिए. ये प्रश्न स्त्री
विमर्श तथा दलित विमर्श के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते है. सुधा अरोड़ा एकाधिक बार कह चुकी है कि ” क्या कहानियां सिर्फ दोपहर की फु़र्सत
में महिलाओं को अच्छी नींद सुलाने के लिए लिखी जानी चाहिए? क्या हर कहानी का पहला उद्देष्य मात्र
मनोरंजन होना चाहिए ? नहीं. ’’ (पृ-9)

यह पुस्तक इसे सिद्ध ही नहीं करती , इसके व्यावहारिक पक्षों का विष्लेशण भी
करती है. इस पुस्तक की कहानियां समाज का दर्पण हैं और उन पर दिए गए वक्तव्य
पथप्रदर्शक.  साहित्यकार समाज से ही प्रसंग उठाता है
और उनमें कल्पना के रंग भरकर नाटक, कहानी, उपन्यास और कविता के रूप में अपनी रचना
कह कर प्रस्तुत करता है. साहित्यकार समाज का ऋणी होता है. विमर्श  के नाम पर
प्रकाशित सैकड़ों पुस्तकों के बीच कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा अरोड़ा की यह
पुस्तक अपनी इस विशेषता के लिए जानी जाएगी कि इस किताब के रूप में एक साहित्यकार
ने समाज को उसका ऋण चुकाया है.