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कुंडली-मिलान शादी के अमरत्व की गारंटी देता है क्या?

तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य. तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक और चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक रहे हैं. आपने अधिकार दर्पण का भी संपादन कार्य किया है. हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित.  आजकल स्वतंत्र लेखन में रत हैं.

शादी की कहानी कोई नई नहीं है. शादी ना ही कोई नया रास्ता है. चाहे-अनचाहे सभी इस रास्ते से गुजरते हैं. कुछ चाहकर और कुछ न चाहकर भी…..कुछ कम उम्र में तो कुछ चढ़ी उम्र में….किंतु कमाल का सच ये है कि इस रास्ते में आई बाधाओं के किस्से चुटकलों के जरिए तो सुनने/पढ़ने को खूब मिलते हैं, किंतु इन चुटकलों के सच को कोई भी पति अथवा पत्नी व्यक्तिश: स्वीकार नहीं करता. क्यों……? लोक-लज्जा का डर, पुरूष को पुरुषत्व का डर, पत्नी को स्त्रीत्व का डर…… डर दोनों के दिमाग में ही बना रहता है… इसलिए पति व पत्नी दोनों आपस में तो तमाम जिन्दगी झगड़ते रहते हैं,  किंतु इस सच को सार्वजनिक करने से हमेशा कतराते हैं.
एक समय था कि जब शादी के मामले में लड़के और लड़की की इसके अलावा कोई भूमिका नहीं होती थी कि वो दोनों आँख और नाक ही नहीं अपितु साँस बन्द करके माँ-बाप अथवा दूसरे सगे-संबन्धियों की इच्छा के अनुसार शादी के लिए तैयार हो जाएं. इसके पीछे समाज का अशिक्षित होना भी माना जा सकता है. किंतु जैसे-जैसे समाज में शिक्षा का व्यापक प्रचार और प्रसार हुआ तो नूतन समाज के विचार पुरातन विचारों से टकराने लगे, अब शादी के मामले में लड़के और लड़की की इच्छाएं भी पुरातन संस्कृति के आड़े आने लगी हैं. फलत: पिछले कुछ दशकों से यह देखने को मिल रहा है कि शादी के परम्परागत पहलुओं के इतर शादी से पहले लड़के और लड़की को देखने का प्रचलन जोरों पर है. पहले यह उपक्रम केवल शहरों-नगरों तक ही सीमित था किंतु आजकल तो यह उपक्रम दूरस्थ गाँवों तक पहुँच गया है.

यहाँ एक सवाल का उठना बड़ा ही जायज लगता है कि शादी के उद्देश्य से लड़के और लड़की की पंद्रह-बीस मिनट की मुलाकात में लड़का लड़की और लड़की लड़के के विषय में क्या और कितना जान पाते होंगे, कहना कठिन है. सिवाय इसके कि एक दूसरा, एक दूसरे की चमड़ी भर को ही देख-भर ले. दोनों एक दूसरे की नकली हंसी को किसी न किसी हिचकिचाहट के साथ दबे मन से स्वीकार कर लें. इस सबका कोई साक्षी तो होता नहीं है. अगर हो भी तो उनका इस प्रक्रिया में कुछ भी कहने का कोई अधिकार यदि होता है तो वह केवल लड़के और लड़की को केवल शादी के लिए तैयार करना होता है. इसके अलावा और कुछ नहीं. अमूनन देखा गया है कि शादी के बन्धन में बन्धने जा रहे जोड़े को दूसरी मुलाकात का मौका प्राय: दिया ही नहीं जाता. धार्मिक बाधाएं इस सबके सामने खड़ी कर दी जाती हैं. हमको इस धार्मिक उपक्रम ने इस हद तक कमजोर और कायल बना दिया है कि हम सारा समय लड़के और लड़की की कुंडलियाँ मिलाने में गवां देते हैं


व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो यह कतई सच है कि प्रथम दृष्टि में, आजकल लड़के और लड़की को शादी से पूर्व मिलने का मौका तो अवश्य दिया जाता है, किंतु उसके बाद उन्हें फोन पर भी बातचीत करने का मौका न दिए जाने तक की कवायद होती है. यह बात अलग है कि आज के संचार के विविध माध्यमों और नई-नई तकनीकी संचार युक्तियों के युग में लड़का–लड़की चोरी-छिपे फोन, वाटसेप, इंटरनेट या फिर फेसबुक के जरिए बराबर बात करते रहते हैं किंतु हम बच्चों को शादी से पूर्व एक से ज्यादा बार मिलने का मौका ही नहीं देते. और न ही  बच्चों के माता-पिता ही  दोबारा ऐसा कोई मौका लेने का प्रयास करते हैं.  बस! घड़ी-भर का मिलना पूरे जीवन का बन्धन बना दिया जाता है. यह कहाँ तक उचित है?

सच तो ये है कि शादी जीवन का एक अकेला ऐसा सौदा है जो एक-दो दिन की मुलाकात में ही तय मान लिया जाता है जबकि एक टी.वी. या फ्रिज जैसी दैनिक उपयोग की चीजें खरीदने की कवायद में सप्ताह, हफ्ता ही नहीं, यहाँ तक की कई-कई महीने तक लग जाते हैं…. कौन सी कम्पनी का लें? इसकी क्या और कितने दिनों की गारंटी है?……. इसका लुक औरों के मुकाबले कैसा है?… न जाने क्या-क्या…… न जाने कितने मित्रों से इसकी जानकारी हासिल की जाती हैं….. इतना ही नहीं, सब्जी तक दस दुकानों की खाक छानने के बाद  भाव-मोल करने के बाद ही खरीदी जाती हैं….किंतु लड़का-लड़की के बीच जीवन-भर का रिश्ता बनाने में जान-पहचान के बजाय बच्चों की शिक्षा के स्तर और उनकी आमदनी के विषय में ही ज्यादा सोचा जाता है……………और कुछ नहीं.
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जहाँ तक कुंडलियों के मिलान का सवाल है, यह एक ढोंग है,  अन्धविश्वास है, जो सदियों से होता आ रहा है और पता नहीं भविष्य इस परिपाटी को कब तक ढोने को बाध्य होगा.  यहाँ यह सवाल उठता है कि  क्या ये कुंडली-मिलान रिश्तों के अमरत्व की कोई गारंटी देता है. क्या कुंडली-मिलान वाले जोड़ों के बीच कभी कोई दरार नहीं पड़ती? क्या उनका जीवन-भर मधुर साथ बना रहता है? क्या उनके जीवन में कोई प्राक्टतिक बाधा नहीं आती?  जैसी कि  कुंडली मिलाते समय आशा की जाती है……व्यापक रूप से ये भामक मानसिकता है, ऐसा करने से कभी भी किसी दम्पति को आशातित शांति शायद कभी नही और कतई नहीं मिलती. यह उपक्रम अपने को स्वय धोखा देने के बराबार है. मुझे लगता है कि इसके इतर यह अच्छा होगा कि लड़के और लड़की की जन्मकुंडली के बदले उनकी चिकित्सीय कुंडलीयों  का मिलान भी किया जाना चाहिए. खुशवंत सिंह की पुस्तक ‘दिल्ली’ में उद्धृत  महात्मा शेख सादी के इस बयान से जाना जा सकता है – “यदि औरत बिस्तर से बेमजा उठेगी तो बिना किसी वजह के ही मर्द से बार-बार झग़ड़ेगी|”  किंतु ये एक ऐसा सत्य है जिसे कोई भी पुरुष अथवा औरत मानने वाला  नहीं है …… किंतु ऐसा होता है. रिश्तों की खटास में यह भी एक और सबसे बड़ा कारण है. इस कारण के बाद आता है…….दौलत का सवाल…. श्रंगारिक संसाधनों की उपलब्धता……. गहनों की अधिकाधिक रमक……..आदि…. आदि. पुरुषों के मामले में दहेज का लालच….और न जाने क्या-क्या. क्या लड़के और लड़्के के माता-पिता द्वाराइस ओर कुंडलियाँ मिलाते समय ध्यान दिया जाता है?  अमूनन नहीं…
नवभारत टाइम्स – 06.02.2015 में छपे एक सर्वे के जरिए यह तथ्य सामने आया है कि ज्यादातर दम्पत्तियों के बीच शादी वाला प्यार शादी होने के पहले दो सालों में ही फुर्र हो जाता है …. कुछ का तीन सालों बाद …… और जिनका बचा रहता है ……. इनके सामने  किसी न किसी प्रकार की सामाजिक मजबूरी ही होती है. …. ये पहले कभी होता होगा कि पति-पत्नी बुढ़ापे में एक दूसरे के मददगार बने रहते थे….. आज समय इतना बदल गया है कि बुढ़ापा आने से पहले ही सारा खेल बिगड़ जाता है……

अधिकाँश मामले में औरतों के पति पत्नी के जीवित रहते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं. फलत: पत्नियों को ऐसा पीड़ा भरा असहाय जीवन जीना पड़ता है जिसकी कल्पना करना भी दूभर होता है. एक उपेक्षित जीवन जीना…….और वहशी आँखों की किरकिरी बने रहना……. विधवाओं की  नियति हो जाती है.  कुछ लोग कह सकते हैं कि विधवा की देखभाल के लिए क्या उसके बच्चे नहीं होते. इस सवाल का उत्तर वो जीवित विधुर और विधवा अपने गिरेबान में झाँककर खोजें कि मृत्यु के बाद उनके स्वयं के बच्चे उनका कितना ध्यान रखते हैं? दान-दहेज की बात के इतर इस ओर कभी किसी का ध्यान शायद ही गया हो. लगता तो ये है कि इसके कारणों को खोजने का प्रयत्न भी शायद नहीं किया गया जो अत्यंत ही शोचनीय विषय है. मुझे तो लगता है कि समाज में ये जो प्रथा है कि लड़का उम्र के लिहाज से लड़की से प्रत्येक हालत में कम से कम पाँच वर्ष बड़ा होना ही चाहिए, इस प्रकार की सारी विपदाओं के लिए जिम्मेदार है. शायद आप भी इस मत से सहमत होंगे कि उम्र के इस अंतर को मिटाने की खास आवश्यकता है. लड़का-लड़की की उम्र यदि बराबर भी है तो इसमें हानि क्या है? या फिर शादी के एवज पारस्परिक रिश्तों को क्यूँ न स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए……… विछोह तो आगे….पीछे होना तय है ही……..भला धुट-घुटकर जीवन यापन करने की बाध्यता शादी ही क्यों हो?

इस सबसे इतर, नवभारत टाइम्स दिनांक 23.05.2015 के माध्यम से अनीता मिश्रा कहती हैं कि शादी सिर्फ आर्थिक और शारीरिक जरूरतों को पूरा करने भारत का माध्यम नहीं है. लड़कियों को ऐसे जीवन साथी की तलाश रहती है जो उन्हें समझे. उनकी भावनात्मक जरूरतें भी उनके साथी के महत्तवपूर्ण हों. वे  फिल्म ‘पीकू’ में एक संवाद का हवाला देती हैं…….   “ शादी बिना मकसद के नहीं होनी चाहिए. फिल्म की नायिका का पिता भी पारम्परिक पिताओं से हटकर है. वह कहता है, ‘ मेरी बेटी इकनामिकली, इमोशनली और सेक्सुअली इंडिपेंडेंट है, उसे शादी करने की क्या जरूरत?’ मैं समझता हूँ कि यह तर्क अपने आप में इमोशनल जरूर है. फिर भी यह आम-जन का ध्यान तो आकर्षित करता ही है.

अनीता जी आगे लिखती है कि यहाँ एक सवाल यह भी है कि विवाह संस्था को नकारने का कदम स्त्रियां ही क्यों उठाना चाहती है. शायद इसके लिए हमारा पितृसत्तात्मक समाज दोषी है. वर्तमान ढांचे में विवाह के बाद स्त्री की हैसियत एक शोषित और उपयोग की वस्तु की हो जाती है. आत्मनिर्भर स्त्री के भी सारे निर्णय उसका पति या पेशंट के परिवार वाले ही करते हैं. शादी होने के बाद (कुछ अपवादों को छोड़कर) उसका पति मालिक और निरंकुश शासक  की तरह ही व्यवहार करता है. ऐसे में स्त्री के लिए दफ्तर की जिन्दगी और घरेलू जिन्दगी में तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है. कहा जा सकता है कि ज्यादातर स्त्रियों को दफ्तर में काम करने के बाद भी घर में एक पारम्परिक स्त्री की तरह खुद को साबित करना होता है. किसी भी स्त्री को जब सफलता मिलती है तो यह भी जोड़ दिया जाता है कि उसने करियर के साथ सारे पारवारिक दायित्व कितनी खूबी से निभाए. जबकि पुरुषों की सफलता में सिर्फ उनकी उपलब्धियां गिनी जाती है.

यहाँ यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि शादी समाज की एक जरूरी व्यवस्था रही है किंतु आजादी चाहने वाली लड़कियां शादी को एक बन्धन की तरह देखती हैं. फिर मानव समाज की दृष्टि से एक सामाजिक व्यवस्था के तौर पर विवाह का विकल्प क्या है? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि बदलते परिवेश में स्त्री शादी का विकल्प खुद खोजे? जाहिर तौर पर अब तक पुरुषों की आर्थिक स्वनिर्भरता और सक्षमता ने केवल उन्हें ही निर्णय लेने का अधिकार दे रखा था. अब अगर महिलाएं भी इसी हैसियत में पहुँचने के बाद अपनी जिन्दगी की दिशा तय करने वाला फैसला खुद लेने लगी हैं तो इसमें गलत क्या है? फिर क्यों न आत्मनिर्भर, जागरूक और सक्षम महिला को शादी करने, न करने का फैसला खुद लेने दिया जाए?

समानता के लिए जरूरी है महिला आरक्षण: सीताराम येचुरी

एनएफआईडवल्यू  द्वारा 12 सितंबर  2016 को आयोजित सेमिनार में सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी ने महिला आरक्षण बिल को जल्द पास करवाये जाने पर जोड़ दिया. उन्होंने इसके मार्ग की बाधाओं पर विस्तार से बात की. सेमिनार का आयोजन सीपीआई की भूतपूर्व सांसद और एनएफआईडवल्यू की भूतपूर्व एक्जक्यूटिव काउंसिल सदस्य गीता मुखर्जी द्वारा महिला आरक्षण बिल के ड्राफ्ट कमिटी की अध्यक्ष के रूप में पेश किये गये बिल के 20 साल पूरे होने पर किया गया था. येचुरी ने कहा कि संविधान में मिले समानता के अधिकार को वास्तविकता में हासिल करने के लिए जरूरी है महिलाओं का आरक्षण. सुनें  पूरा भाषण:

सीताराम येचुरी का भाषण

अपराधी बादशाह जो बन बैठा

मधुलिका बेन पटेल 

केन्द्रीय विश्वविद्यालय तमिलनाडु में हिंदी विभाग में पढ़ाती हैं संपर्क :ben.madhulika@gmail.com

अपने जीवन के लगभग 29 वर्ष बिताने के बाद मैं इतना तो समझ गयी थी कि अपराधी बादशाह की भूमिका में होता है और सच अपराधी की तरह. मुक्तिबोध की कविता ‘‘भूल गलती’ की ये पंक्तियां याद आ रही थी –
भूल गलती/
आज बैठी है जिहरबख्तर पहन कर
 तख्त पर दिल के चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक 
आँखें चिलकती हैं
नुकीले तेज पत्थर-सी 
खड़ी हैं सिर झुकाए सब कतारें..’’.

जो अपराधी था उसी के जिम्मे न्याय की कलम पकड़ा दी गयी थी. जो सच था, उस से दलीलें माँगी जा रही थी. साँप, घड़ियाल एकजुट हो गए थे. व्यवस्था की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति गिरगिट से भी ज्यादा तेज गति से रंग बदल रहा था. अपनी सफेद शर्ट के नीचे लड़कियों की हड्डियाँ छुपाए फिरता था. यह एक ऐसा समय था जब ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा जोर पकड़ रहा था. ऐसे ही समय में बेटियाँ सरेआम जुल्मों से लहूलुहान थी. आखिर न्याय की कलम बादशाह बन बैठे अपराधी के हाथ में जो थी. जुल्मों का अध्याय दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था और मनुष्य सभ्य और शिक्षित हो रहा था. ऐसे में एक सवाल बार-बार मेरे मन में दस्तक दे रहा था कि यह कैसी सभ्यता है, जिसके हर पन्ने  पर खून के दाग लगे हुए हैं ?

उस दिन समाचार पत्र जनसत्ता (26.09.2016) मेरे  सामने था. तीन खबरें महिलाओं से संबंधित थी. एक-राजधानी और दिलवालों की दिल्ली में किशोरी बच्ची से बलात्कार के मामले में डाक्टरों ने अहम सबूत भ्रूण को कूड़े में फेंक दिया था. दो- चंड़ीगढ़ के रोहतक में सामूहिक बलात्कार  के बाद महिला ने खुदकुशी कर ली. तीन-तीन तलाक के मामले में महिलाओं ने की सुप्रीम कोर्ट से विरोध की अपील.यह वही समय था, जब पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत 21 मुस्लिम देशों में इसे समाप्त कर दिया गया था. मेरे हिंदुस्तान में महिलाओं और वंचितों के मामलों में धार्मिक न्याय प्रणाली अभी भी अपनाई जा रही थी. आजादी के बाद देश का संविधान लागू हो चुका था और संविधान की धज्जियाँ उड़ाने का सिलसिला भी.छोटी से बड़ी हर व्यवस्था में अपराधी बादशाह जो बन बैठा है’यही पंक्ति बार-बार मेरे दिमाग में घूम रही थी.छेड़ी गई, सताई गई, जिबह की गई औरतों का कोई हिसाब न था. पीढ़ियाँ की पीढ़ियाँ गुजर गई थीे. आदिमानव से जानवर तक का सफर सामने था. ताज्जुब की बात यह थी कि इसमें मानव कहीं न था. हिंसक जानवर और नरभक्षी मानव एक में गड्डमड्ड हो गए थे. एक रंग…एक सुर…जो अलग थे, वे नरभक्षी मानवों द्वारा भक्ष लिए गए.

नरभक्षियों ने नाखून काट लिए थे. गले में टाई, बदन पर सूट आ गया था. और सबसे अहम बात, उनके हाथों में संगीने, छुरे, चाकू और एसिड जैसी नवनिर्मित चीजें आ गई थी. जिसमें स्त्रियों का समाज गल- गल कर अपने खून के धब्बे इतिहास पर छोड़ रहा था. जुल्मों के पृष्ठ लम्बे हो रहे थे. द्रौपदी की साड़ी की तरह. और हरबार दरिन्दों का समाज साड़ी के भीतर कुछ खोजते हुए नन्हीं-मुन्नी बच्चियों के नन्हें फ्राॅक के नीचे भी कुछ खोजने लगा था. उनका वहशीपन पिताओं, जेठ, ससुर, देवर, भाइयों, पड़ोसियों, समेत हर रिश्तों में घुल कर बजबजाती नालियों की तरह बह रहा था.

आज से ठीक 4 वर्ष पूर्व 13 जून 2012 को बी.बी.सी. हिन्दी न्यूज के सर्वे के अनुसार- 19 देशों की सूची में हिन्दुस्तान सबसे नीचे पायदान पर था- औरतों की स्थिति के मामले में मेरे देश की तुलना सऊदी अरब जैसे देश से की गई थी….कहाँ मेरी शस्य श्यामला भूमि …कहाँ सऊदी अरब….मेरा देशभक्त मन आहत हो गया.‘यत्र नार्यस्तु पूज्न्ते, तत्र रमन्ते देवता’ और ‘माँ का स्थान सबसे ऊँचा’सरीखी पंक्तियाँ सूखती नदियों की तरह मुरझा गई थी. और आँखों के सामने नाचने लगा-‘माँ माने सिर्फ डेटाॅल का धुला’, ‘इनकी तरह करोड़ों माँ भरोसा करती हैं सिर्फ कोलगेट पर’, ‘टेस्ट में बेस्ट…मम्मी और एवरेस्ट’.

मैं भी न…क्या चार साल पहले के सर्वे की बात छेड़ दी. भाड़ में जाए बी.बी.सी. स्त्रियों के मामले में हमारा तो गौरवशाली इतिहास रहा है. जितना त्याग और समर्पण हमारे देश की स्त्रियों में है, उतना है किसी देश की स्त्रियों में ?जितना अत्याचार हमारे देश की स्त्रियाँ सहती हैं, उतना किसी अन्य देश की नहीं. इसलिए तो भारतीय नारी सहनशील मानी जाती है. किसी अन्य देश की नारी है क्या इस मामले में इतनी सहनशील ? मैत्रेयी, गार्गी, सती सीता, सावित्री…अरे इतना पीछे क्यूं ? आज ही साक्षी मलिक को ही देख लो, पहलवानी में ओलम्पिक में जीत कर आई है. पी टी उषा, कर्णममल्हेश्वरी, मैरी काॅम, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा समेत खिलाड़ियों को देख लो….इतिहास और वर्तमान का यह चेहरा सामने आते ही मन गदगद हो गया. अरे मारो गोली‘पंजाब केसरी’ की खबर को. इसी साल जनवरी में आस्ट्रेलिया में रह रहे भारतवंशी की बेटी यहाँ आना चाहती थी. सुनते ही उनके पिता का मुँह सूख गया. कहने लगे ‘हमारी मातृृभूमि में स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं’. छी!छी!!छी!!!लगता है राजा कृृष्णा मेनन की फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ नहीं देखी. अन्त में अपना देश ही काम आता है बच्चू.

अरे देखा न तसलीमा नसरीन का ...कर दी बगावत पुरुषों के अत्याचारों से. कैसे अपनी मातृभूमि से 1994 ई. में चुपचाप भागना पड़ा. और तो और बंगाल सरकार ने भी तो कर दी उसकी किताब बैन. राज्य से बाहर भी निकाल दिया. दिल्ली में नजरबन्द कर दिया गया था उसे. औरत चाहे कहीं की हो, अगर एक देश के पुरुषों को ललकार सकती है, तो दूसरे देश में भी तो वैसे ही पुरुष होते हैं. उनको भी ललकार सकती है. उसका देखा देखी दूसरी औरतें करने लगी तो ? वे भी बगावत पर उतर आई तो ? क्या होगा उस सभ्य समाज का, जो मुँह पर शहद लपेटे आँखों से हलाहल विष उगलता रहता है. हमारे यहाँ की तो यही रीत है औरतों के इनकार के बदले फेंक दो एसिड उसके चेहरे पर. जीवन भर कोसती रहेंगी खुद को. इसी सितम्बर की 27 तारीख कोमुआ ‘नव भारत टाइम्स’ ने बुलन्दशहर की खबर छाप दी-‘रेप पीड़िता पर चार दबंगों ने तेजाब फेंका’. धत् बुलन्दशहर का लगभग 1200 बरस के गौरव पर पानी फिर गया.वेस्ट यूपी की ‘छोटी काशी’ के नाम से मशहूर है यह शहर.राजा अहिबरन ने इसे दिल वालों की दिल्ली के आसपास ही बसा दिया था….लो अब, इसकी वजह से काशी भी बदनाम, दिल्ली भी बदनाम. छींटें तो आसपास पडेंगे ही न.फिर कहने सुनने वाली क्या बात है आज से तीन साल पहले ही एसिड अटैक कानूनन अपराध घोषित कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने तो इसकी बिक्री पर भी रोक लगा रखी है. उसी समय की बात है जब नई दिल्ली, नरेला की रहने वाली प्रीती राठी पर अंकुर नारायणलाल पंवार ने तेजाब फेंक कर उसकी हत्या कर डाली थी-राम! राम! बड़ा ऐतिहासिक फैसला हुआ था उस समय, अंकुर की फाँसी का. जुल्मों के इतिहास में अपराधी को फाँसी! ऐसा कभी-कभार ही देखने को मिलता है. ग्रह नक्षत्रों की दिशा बदल गई होगी शायद. वरना सरकार, घूसखोर आला अमला अपने काले चरित्र पर चूने का दाग कैसे लगने देता.

ये पेपर वाले भी न अक्सर चूहों की तरह जड़ खोदने का काम कर ही जाते है. अपने देश का तो छोड़ो विश्व भर के आँकड़े जुटा लिए.पूरे विश्व में हर साल 1500 एसिड अटैक के  मामले होते है. इनमें 1000 से अधिक मामले भारत में होते हैं. लगता है खबर छापने वाला और खबर लाने वाला दोनों देशभक्त की जात से बिलांग नहीं करते थे.खैर… एसिड अटैक के हर मामलों के पीछे प्रेम संबंध हो ऐसा नहीं. कुछ लोग बेटियाँ जनने पर भी तेजाब फेंक दिया करते हैं. 1994 ई. में मुंबई में जो दुर्घटना अनमोल और उनकी माँ के साथ घटी उसे आज भी भुलाया नहीं जा सकता. क्योंकि अनमोल उसका दंश आज भी भुगत रही हैं. कितने लोग हैं, जो शीरोज कैफे (आगरा) को जानते हैं ? जिसे एसिड अटैक की शिकार हुई लड़कियाँ चलाती हैं. ..और कितने लोग हैं, जो आगरा जाने पर इस कैफे को चुनते हैं ?

‘बढ़ रहा है इण्डिया, डिजिटल बन रहा है इण्डिया’ के बीच हैदराबाद में इसी 8 अक्टूबर को महज 13 साल  की बच्ची की 68 दिन के व्रत के बाद मृत्यु हो गई. सबसे ताज्जुब की बात यह है कि उस व्रत समारोह में सांसद की पत्नी भी गई थी और उस बच्ची  की मृत्यु यात्रा को ‘शोभा यात्रा’ का नाम दिया गया. उसमें 600 लोग शामिल हुए. किसी की भूख से हुई मृत्यु शोभा यात्रा कैसे बन सकती है ? मेरे समझ से बाहर है. फिर तो हमारे देश में भूख के कारण हो रही आत्महत्याओं पर अधिक से अधिक ‘शोभा यात्रा’ निकालने के अवसर मिलेंगे.


लोग जश्न का कोई मौका नहीं छोड़ते. हत्याओं पर जश्न. क्या करें इतिहास में ही खोट है. बार-बार वर्तमान में आ धमकता है.मार्च 2016 को गाजीपुर में एक स्त्री की हत्या हुई. 23 जुलाई ’16 की खबर के अनुसार महोबा में जुँड़वा बच्चियों की हत्या हुई, 26 अगस्त को हरियाणा (मेवात) में दो लड़कियों से गैंग रेप की घटना घटी. अक्टूबरकी दर्दनाक खबर थी दिल्ली के विकासपुरी इलाके की, जहाँ 11 महीने और तीन साल के मासूमों के साथ रेप की घटना घटी. अकेले उत्तर प्रदेश में 2014 और 2015 में रेप की कुल घटनाएँ 12,542 थी.अगस्त 2016 की विश्वरत्न श्रीवास्तव की रिपोर्ट के अनुसारमहिलाओं पर अत्याचार के मामलों में महाराष्ट्र में 26,693 घटनाएँ,दिल्ली में 15,265, असम में 19,139 घटनाएँ हुईं. पूरे भारत में तो निसन्देहऔर आहत करने वाले आँकड़े होंगे.नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (2015) के अनुसार आपराधिक मामलों में जोधपुरका प्रथम स्थान था. यहाँ रेप दर 13.4 थी. दूसरा स्थान दिल्ली का, रेप दर 11.6, तीसरे स्थान पर ग्वालियर, रेप दर 10.4, चौथे स्थान पर भोपाल, रेप दर 7.1, पाँचवा स्थान नागपुर, रेप दर 6.6 और छठाँ स्थान दुर्ग-भिलाई का.यहाँ रेप दर 7.9 रही.

10 मई 16 की ताारीख की खबर – बलिया में दहेज  के लिए एक स्त्री  को जला कर मार डाला गया. 1 सितम्बर 16 की खौफनाक खबर-रामपुर इलाके की 20 वर्ष की युवती की दहेज के लिए हत्या कर दी गई. 2013 में किए गए आकलन के हिसाब से भारत में 1 घंटे में 1 महिला की मौत होती है. 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक हर महीने दहेज के लिए 700 औरतों की हत्या होती है. पिछले 3 सालों में भारत में 24,771 हत्याएँ की गईं.राजनीतिक पार्टियों की बंदरनुमा उछल कूद के बीच अकेले उत्तर प्रदेश में 7048 मृत्यु, बिहार में 3830 और मध्य प्रदेश में 2252 मौतें, सिर्फ दहेज के लिए. घरेलू हिंसा के मामलों में नृत्य, संगीत एवं चलचित्रों की सुव्यवस्थित परंपरा वाले नगरपश्चिम बंगाल में 61,259 घटनाएँ, शौर्यपूर्ण गाथाओं के लिए प्रसिद्ध राजस्थान में 44,331 और ‘भारत का धान का कटोरा’ कहे जाने वाले आंध्र प्रदेश में 34,835 घटनाएँ सामने आईं.आँकड़े जुटाते-जुटाते थक जाएगें. ये घटनाएँ जैसे रोजमर्रा की चीजें हो गई हों. एक सिलसिला चल पड़ा है. जो बच गए उनकी किस्मत. जैसे सरपट दौड़ती गाड़ियों के बीच बिना किसी एक्सीडेंट के घर आ गए हों.

क्यों महिलाएँ रात में निकलने पर डरती हैं, सारी पुलिस व्यवस्था के बावजूद. मुझे बरसों पहले पढ़ी गई वह घटना याद आ रही है, जिसमें एक लड़की ने कहा था कि हिन्दुस्तान में उसे गुण्डों से ज्यादा पुलिस से डर लगता है.कोई नहीं जानता, कब क्या घटित हो जाए. जैसे दहशत के साये में जी रहे हो. आदमखोर के युग में. यहाँ आदमी ही आदमी का भक्षक है. आदमी ने सारी चीजें भक्ष ली हैं.दलित, स्त्री, आदिवासी, जानवर, कीड़े-मकोड़े, पेड़, पौधे,पत्थर, पहाड़ फूल, नदियाँ सब.आदमी की अपरिमित इच्छाओं के बीच हर चीज हजारों तरीके से नोची-खसोटी गई है.22 जुलाई 2014 को @topyapshindi पर सन्तोष शांडिल्य की रिपोर्ट के मुताबिक स्त्रियों की महिमामयी स्थिति पर गर्व करने वाले देश में उनकी खरीद फरोख्त के लिए अनेक कुख्यात स्थल हैं. संगम के लिए प्रसिद्ध नगरी प्रयागराज में मीरागंज, बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में शिवदासपुर, मुजफ्फरपुर(बिहार) में चतुर्भुजस्थान, कोलकाता में सोनागाछी, देश की वाणिज्यिक राजधानी मुम्बई में कमाठीपुरा, देश की राजधानी दिल्ली में जी. बी. रोड, नागपुर (महाराष्ट्र) में गंगा जमुना, गणपति के प्रसिद्ध मन्दिर स्थल बुधवार पेठ (पुणे)आदि जगहों पर बड़ी जिस्म मंडी लगती है. यहाँ बच्चियों को भी बड़ी बेदर्दी से बेचा जाता है. उस समय न बाबा भोले काम आते हैं न कालभैरव और न ही कोई गणपति बप्पा मोरया. आदमखोर की चालें सब पर भारी.मुझे तसलीमा नसरीन की पुस्तक ‘औरत के हक़’ में की रूलाने वाली पंक्ति याद आ रही, जिसे बगैर लिखे मैं आगे नहीं बढ़ सकती-‘‘बाजार में इतना सस्ता और कुछ नहीं मिलता जितनी सस्ती मिलती हैं लड़कियाँ’’जहाँ एशिया का सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया मौजूद हो वहाँ के लोगों को स्त्रियों की दशा का बखान करते समय नाले में डूब मरना चाहिए. और देश के नेताओं को मरने के लिए भी धरती का कोई हिस्सा देना मुनासिब न होगा. क्योंकि वे जल, जंगल, जमीन, और जिन्दगी के हंता है.‘कौशल भारत और कुशल भारत’ के नारे के बीच खून की नदियाँ बहती हैं, बच सको तो बचो.

पहली महिला राष्ट्रपति नहीं सेक्सिस्ट राष्ट्रपति: अमेरिकी जनादेश

दुनिया के सबसे ताकतवर माने जाने वाले मुल्क ने अपना राष्ट्रपति चुन लिया है और इस तरह विवादों में रहने वाला, महिलाओं को देह मात्र मानने वाला शख्स अमेरिकी लोकतंत्र का कर्ता-धर्ता बन गया है. डोनाल्ड ट्रंप का चुना जाना अमेरिकी समाज की पितृसत्तात्मक सोच की बेहद मजबूत बुनियाद का प्रतीक है, जिसकी जड़ें भारत में भी कम मजबूत नहीं है, ट्रंप के लिए भारत में हो रहे यज्ञों और उनके पक्ष में उठ रही आवाजें इसका प्रतीक हैं. भारत के सोशल मीडिया में सक्रिय अश्लील और आक्रामक स्त्री-दलित-वंचित और अल्पसंख्यक विरोधियों से ट्रंप के समर्थक भी कम नहीं हैं. एक खबर- विश्लेषण के अनुसार उनके समर्थकों ने इस साल की शुरुआत में ही पत्रकार मेगन केली को ट्वीट करते हुए गालियों की बौछार कर दी थी- बीच, व्होर, बिम्बो, कंट जैसी गालियों से उनपर हमला बो दिया था, ऐसा इसलिए कि ट्रंप ने केली के शो में जाने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि ‘वह ( ट्रंप) केली को पसंद नहीं करते.



अमेरिका की मोदी परिघटना

भारत की घटनाओं से साम्य रखती इन घटनाओं और हमलों के बीच रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप डेमोक्रैट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को हराकर अमेरिका के राष्ट्रपति बन गये हैं. इसके राजनीतिक मायने ठीक-ठीक वही हैं, जो 2014 की गर्मी में भारत में सत्ता परिवर्तन के राजनीतिक मायने थे, यानी मनमोहन सिंह की हार और नरेंद्र मोदी की जीत. इससे ज्यादा वाम-दक्षिण जैसी कोई बायनरी नहीं बनती. मई 2014 के मई में आये चुनाव परिणाम के साथ भारत की राजनीति ‘दक्षिण’ से और दक्षिण की ओर बढ़ी है- अमेरिका का चुनाव परिणाम उसकी आंतरिक राजनीति को वही खीच कर ले जा रहा है. लेकिन ट्रंप की जीत का विशेष मायने यह है कि अमेरिका के व्हाईट हाउस में पहली महिला नहीं जा सकी. नस्लवाद के खिलाफ एक सन्देश तो अमेरिकियों ने 2008 में दे दिया था- ब्लैक बराक ओबामा को राष्ट्रपति चुनकर, लेकिन वे इसे पुरुषवाद के खिलाफ जनादेश तक विस्तार नहीं दे सके. ऐसा मैं सिर्फ टोकन के तौर पर नहीं कह रहा हूँ- ओबामा से नस्लवादी नफरत करने वाले अमेरिकियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बहुमत नस्लावाद से ऊपर गया. ऐसा 2016 में नहीं हो सका, अमेरिकी जनता ने महिलाओं को गालियाँ देने वाले, उनका उत्पीडन करने वाले सेक्सिस्ट ट्रंप को अपना प्रतिनधि चुन लिया.


अमेरिकी प्रतिभा पाटिल

यदि हिलेरी क्लिंटन चुन ली गई होतीं तो जनादेश महिलाविरोधी आचरणों के खिलाफ एक सन्देश होता, और यह महत्वपूर्ण होता. देश की पहली महिला राष्ट्रपति होने का भी एक अर्थ सन्दर्भ है, हालांकि भारत ने देखा है कि उसकी पहली महिला राष्ट्रपति कहीं से भी स्त्रीवादी नहीं थी, बल्किन बाबाओं-माताओं और भूत-प्रेत में विश्वास करने वाली स्त्रीविरोधी सोच की पतिव्रता स्त्री भर थीं. अमेरिका में भी हिलेरी के होने से स्त्रीवाद की कोई जीत का जश्न नहीं होने वाला था. बल्कि हिलेरी भी प्रतिभा पाटिल की तरह ही आत्मा-संवाद (मरे हुए व्यक्ति से) करने में अपनी महारत की दावेदार रही हैं, उनका दावा राष्ट्रपति फ्रेंकलीन रूजवेल्ट की पत्नी एलेनार रूजवेल्ट से बात करने की रही है, जबकि प्रतिभा पाटिल का दावा ‘ब्रह्मकुमारी माता’ से बात करने की रही है.
व्हाईट हाउस की होड़ में पहली महिला स्त्रीवादी थीं

हिलेरी क्लिंटन निश्चित ही आधिकारिक तौर पर पहली महिला राष्ट्रपति जरूर होतीं, लेकिन व्हाईट हाउस की आंतरिक सत्ता संभालने की पत्नीवत भूमिका से आगे बढ़कर शासन-प्रशासन और राजनीतिक निर्णयों में अगुआई करने का एक श्रेय एडिथ विल्सन को जाता है, जो अपने राष्ट्रपति पति वुडरो विल्सन के बीमार होने के बाद 17 महीने तक देश की सत्ता की बागडोर संभाली. कुछ विश्लेषक उन्हें भी अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति मानते हैं. हालांकि ऐसा आधिकारिक तौर पर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह महज संयोग था, राष्ट्रपति की शारीरिक अक्षमता की स्थिति में अमेरिकी संविधान तब बहुत स्पष्ट प्रावधान नहीं रखता था. हालांकि अमेरिकी की पहली महिला राष्ट्रपति होने की होड़ में महिलायें पहले भी आगे आती रही हैं, लेकिन रिपब्लिकन और डेमोक्रैट जैसी बड़ी पार्टी से पहली अधिकारिक उम्मीदवार, हिलेरी क्लिंटन ही रही हैं, जो जीततीं तो कीर्तिमान रचतीं.

अमेरिकी इतिहास में पहली राष्ट्रपति पद की पहली महिला उम्मीदवार विक्टोरिया वुडहल रही हैं, जिन्होंने 1872 में चुनाव लड़ा था. विक्टोरिया वुडहल महिला अधिकार और श्रमिक अधिकार के लिए सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थीं. हिलेरी क्लिंटन की ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं है, लेकिन उनकी जीत जरूर एक स्त्री एक पक्ष में जनादेश होती, क्योंकि ट्रंप के महिलाविरोधी आचरण, उनके सेक्सिस्ट रिमार्क और उनके द्वारा महिलाओं का ‘तथाकथित उत्पीडन’ इस बार चुनाव में मुद्दा बन गया था.

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हिलेरी क्लिंटन बनाम डोनाल्ड ट्रंप: सामाजिक पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि एक और मामले में अमेरिकी चुनाव भारत के 2014 के चुनाव से साम्य रखता है, वह साम्य बनता है, दोनो उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर. एक ओर पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन थीं, जिनके पास सपष्ट राजनीतिक विरासत है और प्रशासनिक अनुभव भी, दूसरी ओर व्यवसायी और 19 सालों से सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के मालिक अराजनीतिक पृष्ठभूमि वाले ट्रंप- यहाँ राजनीतिक जुमले में चाय जैसा ही कोई संयोग था.

पति को संतुष्ट नहीं कर पाई, अमेरिकी जनता को क्या संतुष्ट करेगी: 

ट्रंप अपने पूरे करिअर में महिला विरोधी हलके रिमार्क के लिए कुख्यात रहे है. वे महिलाओं की देह, चेहरे और व्यक्तिव को लेकर सेकसिस्ट रिमार्क देते रहे हैं, अमेरिका की कई बड़ी महिला हस्तियों ने उनपर यौन शोषण के आरोप लगाये, जिसकी संख्या चुनाव प्रचार के दौरान बढ़ती ही गई. सीमा का उल्लंघन तो तब हुआ, जब उनके ट्वीटर हैंडल से हिलेरी के बारे में ट्वीट हुआ कि, ‘ जो पति को संतुष्ट नहीं कर पाई, वह अमेरिकी जनता को क्या संतुष्ट करेगी,’ हिलेरी के बारे में यह रिमार्क उनके पति और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लिवेन्स्की के प्रसंग में किया गया था, मोनिका लिवेन्स्की ने क्लिंटन पर यौन शोषण का आरोप लागाया था. अपने विरोधियों के खिलाफ अश्लील ट्वीटर पोस्ट को दुबारा शेयर करने वाले ट्रंप ( हालांकि वे शेयर करने के बाद अपनी ओर से उसे स्वीकारने या अस्वीकारने का कोई कमेन्ट नहीं देते) के खुद के ऐसे अश्लील और सेक्सिस्ट रिमार्क की लम्बी फेहरिश्त है, जो ऑडियो, वीडियो की शक्ल में भी सोशल मीडिया में वायरल हैं. वे एक वायरल ऑडियो में एक विवाहिता के साथ सेक्स करने की बात अश्लील तरीके से कहते हुए सुने जा सकते हैं.
स्त्रियों के शरीर और खासकर यौन अंगों के बारे में बात करना उनका पसंदीदा काम है, ऐसा आरोप अमेरिका की कई बड़ी हस्तियों ने लगाया है, और ऐसा करते हुए वे सार्जनिक टीवी शो और अपने साक्षात्कारों में भी देखे गये हैं.

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तो सवाल है कि क्या अमेरिकियों ने स्पष्ट सन्देश दिया है की वे पहली स्त्री को तो व्हाईट हाउस  भेजने के लिए तैयार नहीं ही हुए हैं, बल्कि उससे भी आगे बढ़कर एक स्त्रीविरोध शख्स को देश की बाग़डोर सौपने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है.

मीडिया से मजदूर गायब, सेक्सी माडल्स बिल्डिंग बना रहे हैं !

आदित्य कुमार गिरि

शोधार्थी,कलकत्ता विश्वविद्यालय,ईमेल आईडी-adityakumargiri@gmail.com

टीवी पर ‘अल्ट्राटेक सीमेंट’ का नया विज्ञापन आ रहा है.सुंदर और सेक्सी मॉडल्स बिल्डिंग  बना रहे हैं.मतलब विज्ञापन में वे मज़दूर की भूमिका में हैं.लड़के मज़दूर ‘सिक्स-पैक’ की बॉडी के साथ और लड़कियाँ मज़दूर ‘ज़ीरो फिगर’ वाली,छरहरी सुंदर.


मतलब बिल्डिंग भी यह सोचकर कभी न गिरे कि ‘क्या खूब हाथों ने हमें बनाया है.’
पूँजीपति वर्ग का आज के युग में मज़दूरों पर यह सबसे सुंदर(?) मज़ाक है.(अगर इसे ऐसे देखें तो.)


हालाँकि सौन्दर्यवादी दृष्टि से विज्ञापन खूबसूरत बन पड़ा है लेकिन जिन मज़दूरों को चित्रित किया गया है वे लोग ऐसे होते नहीं.उनकी स्थिति दर्दनाक होती है.
पूँजीवाद ने अब मज़दूरों को भी विज्ञापन में सौंदर्य के प्रतिमान की तरह चित्रित करना शुरू कर दिया है.यानी यह नई कला से मज़दूर को गायब करने की शुरुआत है.इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मज़दूरों और किसानों और आदिवासियों को लुप्त करने जा रहा है.

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यह मीडिया-क्रांति का युग है.मीडिया से मज़दूर गायब,किसान गायब,आदिवासी गायब यह अचानक नहीं है.यह एक सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है.
बहस के लिए उछाले जा रहे मुद्दे बुनियादी मुद्दों से अलग हैं.राहुल गाँधी की यात्रा की ‘कवरेज’ जरूरी है,किसानों की स्थिति नहीं.राहुल गाँधी की मिट्टी उठाती तस्वीर महत्त्वपूर्ण है,रोज-रोज वही काम कर रहे मज़दूर नहीं.उनकी तस्वीर नहीं.

‘चाय वाले’ लीडर पर कवरेज तो होगी लेकिन असली चाय वालों को बहस से बाहर रखा जाएगा.उनकी स्थिति,उनका दर्द मीडिया से गायब होगा.मज़दूरों पर मीडिया ‘बाईट्स’ तो होंगी लेकिन मज़दूर गायब होंगे.

आधुनिक मीडिया पूँजीवाद का पिट्ठू है.वह आमजन के बुनियादी मुद्दों से अलग फैशन और मनोरंजन को जगह देने वाला माध्यम है.मीडिया में जब से ‘बड़ी-पूँजी’ का प्रवेश हुआ है उसे आमजन या लोकतंत्र के हथियार के रूप में जानने और मानने वालों को निराशा हुई है.

आधुनिक मीडिया पूँजीपतियों के हित साधन के लिए खबरें निर्मित करता है.इसने कला के हर रूप को अपने अंदर समाहित कर लिया है.वे सारे रूप जो कल तक जन सरोकारों से जुडे थे मीडिया ने उन्हें अपने कब्जे में कर लिया है.कविताओं और कहानियों के बाद अब विज्ञापन और सीरियल्स और कला के सभी आधुनिक रूपों पर पूँजीपतियों का कब्जा है.आमजन के हित के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाइयों के सभी माध्यमों पर पूँजीपति नजर गड़ाए है.वह पिछली सदी वाली गलती नहीं करना चाहता.

लेकिन इन सबके बीच जो सबसे बड़ी समस्या है वह यह कि आमजन मञ्च विहीन हो गया है.उसके लिए लड़ी जाने वाली हर लड़ाई ‘फिक्स्ड’ है.उसका हर हीरो बिका हुआ है.वह किसी पर भरोसा नहीं कर सकता.
जन प्रतिनिधि उसे केवल मुददे के रूप में देख रहा है और पूँजीवाद उसे सौन्दर्य प्रसाधन या मनोरंजन के एक प्रकार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है.जहां उसकी चर्चा तो होगी लेकिन नॉनसेंस के लिए.मजदूर मीडिया में नॉनसेंस होगा.टीवी देख रहे मजदूर उजबक की तरह टुकुर टुकुर ताकेंगे.

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यह युग एंटी मजदूर,एंटी किसान,एंटी आदिवासी है.बड़ी पूँजी ने समूची सभ्यता को खेल बना दिया है.ऐसा खेल जिसके सारे नियम उसने खुद बनाए हैं.मजदूर सिर्फ एक वस्तु बनकर रह गया है.किसी भी मजदूर या किसान की आत्महत्या अब मनोरंजन की वस्तु है.मीडिया ने उसे एक रूटिन खबर बना दिया है.लोग जैसे फिल्में और सीरियल्स और गाने देखते हैं हिंसा या हत्या या मृत्यु की खबरें वैसे ही देख रहे हैं.लोगों की संवेदनहीनता असल में मीडिया निर्मित है.यह मीडिया निर्मित स्थिति है..यह एक खराब युग है.जहाँ विरोध के सारे साधन,सारे नियम जिसका विरोध हो रहा है उसके कब्जे में है.ऐसे में यह लड़ाई बहुत खतरनाक और गंभीर हो गई है.इसकी चुनौतियाँ दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं.



लोग अपने आस पास के मुद्दों को मीडिया में देखें, उसके ग्लैमर के रंग में रंग जायें यही उद्देश्य है.मुक्तिबोध ने शीतयुद्धीय समय में जिसे ‘कॉस्मेटिक सौन्दर्य’ कहा था असल में वह शुरुआती दौर था.अब हम उसे उसके विकसित रूप में देख रहे हैं.लोगों की बेबसी और लाचारी असल में पूँजीपतियों की ताकत के फलस्वरूप की स्थिति है.

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मीडिया भ्रम बनाए रखता है कि वह जन सरोकार के मुद्दों के प्रति गंभीर है जबकि एक मुहीम के तहत वह जन सरोकार के मुद्दों को हल्का कर रहा होता है.उसके खिलाफ पनप रहे स्वाभाविक गुस्से को खत्म करने की स्थिति पैदा करता है.मीडिया का यह भ्रम असल में पूँजीपतियों के लिए जन्म ले सकती किसी भी अप्रिय स्थिति का तोड़ है.आमजन मीडिया को विरोध के ज़रिए के रूप में देखे और इधर मीडिया पूँजीपतियों के हित में काम करे.



गंभीर से गंभीर मुद्दे को मनोरंजन बना देना,हल्का बना देना कोई अचानक हो रही चीज़ नहीं है.मीडिया सबसे पहले व्यक्ति की आलोचनात्मकता को नष्ट करने का काम कर रहा है.मतलब जो दिखाया जा रहा है उसे चुपचाप दर्शक भाव से देखिए और स्वीकारिए.मीडिया ने विराट जनमानस को पंगु करने का काम किया है.
मैं इस विज्ञापन के पीछे की विचारधारा के खतरे को साफ देख रहा हूँ.मीडिया ने हर एक बुनियादी सवाल को सौन्दर्य की वस्तु बना दिया है और आमजन को दर्शक.
फुकोयामा ने कहा था ‘हम जिस गाडी में बैठे हैं उसकी ड्राइविंग सीट पर राजनीति नहीं है.’

स्तन कैंसर/ब्रेस्ट कैंसर: कवितायें विभा रानी की

विभा रानी

लेखिका, रंगमंच में सशक्त उपस्थिति, संपर्क :मो- 09820619161 gonujha.jha@gmail.com

कैंसर का जश्न!

क्या फर्क पड़ता है!
सीना सपाट हो या उभरा
चेहरा सलोना हो या बिगड़ा
सर पर घने बाल हों या हो वह गंजा!
ज़िन्दगी से सुंदर,
गुदाज़
और यौवनमय नहीं है कुछ भी.
आओ, मनाएं,
जश्न – इस यौवन का
जश्न – इस जीवन का!


गाँठ

मन पर पड़े या तन पर
भुगतते हैं खामियाजे तन और मन दोनों ही
एक के उठने या दूसरे के बैठने से
नहीं हो जाती है हार या जीत किसी एक या दोनों की.
गाँठ पड़ती है कभी
पेड़ों के पत्तों पर भी
और नदी के छिलकों पर भी.
गाँठ जीवन से जितनी जल्दी निकले
उतना ही अच्छा.
पड़ गए शगुन के पीले चावल,
चलो, उठाओ गीत कोई.
गाँठ हल्दी तो है नहीं
जो पिघल ही जाएगी
कभी न कभी
बर्फ की तरह.


गांठ : मनके-सी!

एक दिन
मैंने उससे कहा
देखो न!
गले में पड़े मनके की तरह
उग आई हैं गांठें।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि
गले से उतारकर रखी गई माला की तरह ही
हौले से गांठ को भी निकालकर
रख दें किसी मखमली डब्बे में बंद
उसकी आंखों में दो मोती चमके
और उसने घुट घुट कर पी लिया अपनी आंखों से
मेरी आंखों का सारा पानी।
गांठ गाने लगी आंखों की नदी की लहरों की ताल पर
हैया हो… हैया हो…
माझी गहो पतवार, हैया हो..।



छोले, राजमा, चने सी गाँठ!

उपमा देते हैं गांठों की
अक्सर खाद्य पदार्थों से
चने दाल सी, मटर के साइज सी
भीगे छोले या राजमा के आकार सी
छोटे, मझोले, बड़े साइज के आलू सी.
फिर खाते भी रहते हैं इन सबको
बिना आए हूल
बगैर सोचे कि
अभी तो दिए थे गांठों को कई नाम-उपनाम
उपनाम तो आते हैं कई-कई
पर शायद संगत नहीं बैठ पाती
कि कहा जाए –
गाँठ –
क्रोसिन की टिकिया जैसी
बिकोसूल के कैप्सूल जैसी.
सभी को पता है
आलू से लेकर छोले, चने, राजमे का आकार-प्रकार
क्या सभी को पता होगा
क्रोसिन-बिकोसूल का रूप-रंग?
गाँठ को जोड़ना चाहते हैं –
जीवन की सार्वभौमिकता से
और तानते रहते हैं उपमाओं के
शामियाने-चंदोबे!



कैंसू डार्लिंग! किस्सू डियर!! 

मेरा ना…….म है – कैंसर!
प्यार से लोग मुझे कुछ भी नहीं कहते.
न कैंसू, न किस्सू, न कैन्स.
और तुम्हारा नाम क्या है –
सुषमा, सरोज, ममता या अम्बा.
रफ़ी, डिसूजा, इस्सर, जगदम्बा.
उस रोज
रात भर बजती रही थी
शहनाई, बांसुरी, ढोलक की बेसुरी धुन!
खुलते रहे थे दिल और दिमाग के
खिड़की – कपाट.
मन चीख रहा था गाने की शक्ल में
दे नहीं रहा था ध्यान सुर या ले पर.
हुहुआ रही थी एक ही आंधी
डुबा रही थी दिल को – एक ही धड़कन
कैसे? कैसे ये सब हुआ??
क्यों? और क्यों ये सब हुआ?
कैंसर!
मुझे पता है तेरा नाम
दी है अपने ही घर के तीन लोगों की आहुति
फिर भी नहीं भरा तुम्हारा पेट जो
आ गए मेरे पास?
और अब गा रहे हो बड़ा चमक-छमक के, कि
मेरा ना……म है कैंसर!
और कर भी रहे हो शिकायत कि
नहीं लोग पुकारते हैं तुम्हें प्यार से
किस्सू डियर या कैंसू डार्लिंग!
आओ,
अब, जब तुम आ ही गए हो मेरे सीने में
मेरे दिल के ठीक ऊपर
जमा ही लिया है डेरा
तो कह रही हूँ तुम्हें
कैंसू डार्लिंग, किस्सू डियर!
खुश!
लो, पूरी करो अपनी मियाद
और चलते बनो
अपने देस-नगर को,
जहां से मत देना आवाज किसी को
न पुकारना किसी का नाम
इठलाकर, बल खाकर
ओ माई कैंसू डियर!
ओ माई किस्सू डार्लिंग!!


ब्रेस्ट कैंसर.

अच्छी लगती है अंग्रेजी, कभी कभी
दे देती है भावों को भाषा का आवरण
भदेस क्या! शुद्ध सुसंस्कृत भाषा में भी,
नहीं उचार या बोल पाते.
स्तन – स्तन का कैंसर
जितने फर्राटे से हम बोलने लगे हैं –
ब्रेस्ट – ब्रेस्ट कैंसर!
नहीं आती है शर्म या होती है कोई झिझक
बॉस से लेकर बाउजी तक
डॉक्टर से लेकर डियर वन्स तक को बताने में
ब्रेस्ट कैंसर, यूट्रेस कैंसर.
यह भाषा का सरलीकरण है
या भाव का भावहीनता तक का विस्तार
या बोल बोल कर, बार बार
भ्रम – पाने का डर से निजात
ब्रेस्ट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, ब्रेस्ट
ब्रेस्ट, ब्रेस्ट, ब्रेस्ट कैंसर!



तुम और तुम्हारी वकत ओ स्तन!

याद नहीं,
पर आते ही धरती पर
मैंने तुम्हें महसूसा होगा
जब मेरी माँ ने मेरे मुंह में दिया होगा – तुम्हें.
यहीं से शुरू हो जाता है
हर शिशु का तुमसे नाता
जो बढ़कर उम्र के साथ
बन जाता है माँ से मादा तक का हाथ –
छूता, टटोलता, कसता
या घूम जाता तुम्हारी गोलाई में.
इधर-उधर के ताने-बाने के साथ.
तुम्हें ही मानकर पहेली
तुम्हीं के संग बनकर सहेली
खेली थी होली
की थी अठखेली
भाभी संग, संग ननद के भी
जब मुंह के बदले बोली थी
स्तन की बोली.
मेरी समझ में आया था
क्या है वकत तुम्हारी
तुमसे ही होती है पहचान हमारी
ओ मादा! ओ औरत ज़ात!
कितना बड़ा हिस्सा है देह के इस अंग का
तुम्हारे साथ!


जनाना चीज

बचपन में ही चल गया था पता
कि बड़ी जनाना चीज है ये.
मरे जाते हैं सभी इसके लिए
छोकरे- देखने के लिए
छोकरियाँ-दिखाने के लिए
बाज़ार- बेचने और भुनाने के लिए
सभी होते हैं निराश
गर नहीं है मन-मुआफिक इसका आकार!
बेचनेवाले कैसे बेचें उत्पाद
ब्रेसरी की मालिश की दवा
कॉस्मोटोलोजी या खाने की टिकिया
पहेलियां भी बन गईं- बूझ-अबूझ
‘कनक छड़ी सी कामिनी, काहे को कटि छीन?
कटि को कंचन काट विधि, कुचन मध्य धरि दीन!’
ये तो हुआ साहित्य विमर्श
बड़े-बड़े देते हैं इसके उद्धरण
साहित्य से नहीं चलता जीवन या समाज.
सो उसने बनाया अपना बुझौअल और बुझाई यह पहेली-
गोर बदन मुख सांवरे, बसे समंदर तीर
एक अचंभा हमने देखा, एक नाम दो बीर!
वीर डटे हुए हैं मैदान में
कवियों के राग में
ठुमरी की तान में
‘जब रे सिपाहिया, चोली के बन्द खोले,
जोबन दुनु डट गई रात मोरी अम्मा!’
खुल जाते हैं चोली के बंद
बार-बार, लगातार
सूख जाती है लाज-हया की गंगा
बैशाख-जेठ की गरमी सी
खत्म हो जाती है लोक-लाज की गठरी
आंखों में बैठ जाता है सूखे कांटे सा
कैंसर!
उघाड़ते-उघाड़ते
जांच कराते-कराते
संवेदनहीन हो जाता है डॉक्टर संग
मरीज भी!



पॉप कॉर्न सा ब्रेस्ट!

पॉप कॉर्न सा उछलता
बिखरता ब्रेस्ट कैंसर।
यहां-वहां, इधर-उधर
जब-तब, निरंतर।
प्रियजन,
नाते-रिश्तेदार
हित-मित्र, दोस्त-यार।
किसी की माँ
किसी की बहन
किसी की भाभी
किसी की बीबी
कोई नहीं तो अपनी पड़ोसन।
दादी-नानी भी नहीं है अछूती
न अछूता है रोग।
आने पर ब्रेस्ट कैंसर की सवारी
खोजते हैं आने की वजह?
लाइफ स्टाइल?
स्ट्रेस?
लेट मैरिज?
लेट संतान?
एक या दो ही बच्चे?
नहीं कराया स्तन-पान?
डॉक्टर और विशेषज्ञ हैं हैरान
नहीं पता कारण
नहीं निष्कर्ष इतना आसान
हर मरीज के अपने लक्षण
अपने-अपने कारण।
पूछते हैं सवाल एक से- कैसे हो गया?
जवाब जो होता मालूम
तो फेंक आते किसी गठरी में बांधकर
किसी पर्वत की ऊंचाई पर
या पाताल की गहराई में
पॉप कॉर्न से कैंसर के ये दाने।

मेरे अल्लाह मेरी दुआ सुनना : अरावली हिल्स पर पथराई आँखों की पुकार

रायसीना हिल्स से लेकर अरावली हिल्स के उस टुकड़े तक पिछले एक महीने से एक मां और एक बहन का आर्तनाद गूँज रहा है- या खुदा मेरे नजीब को वापस ला दो, खुदा के लिए मेरे नजीब को वापस ला दो, और हृदयहीन सत्तासीन राजनीतिक बयानवाजियों और ट्वीटर पर ट्वीट करने में लगे हैं. पिछले एक महीने से  पुलिस पचास  हजार की रकम से दो लाख रुपये तक की रकम की घोषणा कर चुकी है, नजीब का पता बताने के लिए ,लेकिन अंतिम बार नजीब की पिटाई करने वाले छात्रों से एक सवाल पूछना भी मुनासिब नहीं समझती. जेएनयू से गायब नजीब की मां दिल्ली की सड़कों पर बेटे को पथराई आँखों से ढूंढ रही हैं… पढ़ें जेएनयू के ही शोधार्थी अभय की उनसे यह ख़ास बातचीत और रपट. 

नजीब की मां



शुक्रवार की शाम जाकिर नगर की ऊबर-खाबड़ और बीहड़ सड़क, जैसा की आमतौर पर होता है, लोगो की भीड़ से ठसा-ठस भरी हुई थी . सड़क के किनारे-किनारे लगे हुए कबाब के बहुत सारे दुकानों से उठने वाला धुँआ इस जगह को जरा  घना बना रहा था. गाड़ी के हार्न से निकलने वाले शोर तकलीफों में और इजाफा कर रहे थे. जाम मे फँसा एक बैटरी-रिक्शा एक अधेड़ उम्र की महिला और उसकी बेटी को ले जा रहा था.  उनके बगल में बैठ कर मैं महिला में बढ़ती हुई बैचेनी को देख रहा था. कुछ वक्त बाद ट्रैफिक की भीड़- भाड़ खत्म हुई और बैटरी-रिक्शा चालक ने अपनी चाल दुरुस्त की , कोशिश करने लगा की दूसरी गाड़ियों से आगे निकल सके. महिला ने ड्राईवर को हिदायत देते हुए कहा कि “ दायीं ओर मुड़ो” , वो उस गली की ओर इशारा कर रही थी, जो ऐतिहासिक जामिया-मिलिया इसलामिया से लगी हुई है. महबूब नगर गली से सौ गज के भीतर रिक्शा एक घर के सामने रुका. रिक्शा से उतरने के बाद जरा सा वक्त बीता होगा की वह आँसुओ से शराबोर थीं : “ अल्लाह मैं आज फिर बगैर नजीब के वापस आई”.

उनकी बेटी ने जल्दी ही नीचे उत्तर कर उन्हे अपने आगोश मे ले लिया. माँ की मायूसी कायम रही. परिवार के कुछ और सदस्य घर से निकले और उन्हे दिलासा देने की कोशिश की. उन्होने कहा –“ नजीब जल्द ही वापस आएगा”. आगे , कुछ और रिश्तेदारों ने घर से बाहर निकल उन्हे गले से लगाया और वे इस बात की जिद्द करने लगे कि उन्हे मेहमानखाने चले जाना चाहिए. उन्होने एक बार उन्हे फिर से दिलासा दिया : “ नजीब जल्द ही वापस आएगा”. आखिरकार, वह मेहमानखाने में तशरीफ लाई और सोफ़े पे बैठ गई. उनकी दो जवान बेटियां  और मैं उनके बगल में बैठ गए.

कमरे में मैने दिवारो पर टंगी हुई कई तस्वीरे देखी, जिसमें  कुरान की पाक आयतें छपी हुई थी.  उनमें  से कुछ लोग :“ अल्लाह” (भगवान)  और  “बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहिम” (अल्लाह के नामो मे सबसे अधिक परोपकारी, सबसे अधिक दयावान)- का नाम पढ़ रहे थें. कुछ मिनट के बाद, एक दस वर्ष की लड़की ने उन्हे पानी दिया और उन्हे रोने से मना किया. मगर उन्होने पानी पीने से इंकार कर दिया.

रोने वाली यह औरत फातिमा नफीस थी- नजीब की माँ.  उनकी बेटी थी सदाफ मुशर्रफ—नजीब की बड़ी और एक मात्र बहन. करीब-करीब हर रोज नजीब की माँ और बहन एक उम्मीद के साथ घर से बाहर निकलती है और शाम मायूसी के साथ खत्म होती है.

शुक्रवार की दोपहर को आईटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय  मे मैं नजीब की माँ और बहन से मिला. वे वहाँ एक धरना-प्रदर्शन में शरीक होने पहुँचे थे. मैं वहाँ जामिया, जेएनयू  और एमयू से आए छात्रों के साथ इक्टठा हुआ था.  धरने की जगह पर  प्रदर्शनकारीयों की आँखों मे गुस्से की चिन्गारी जल रही थी.  दिल्ली पुलिस मुर्दाबाद के नारे फिजा में दो घण्टे तक गुंजते रहे.

बायोटेक्नोलोजी (एम. एससी) के प्रथम वर्ष के छात्र नजीब के गायब होने के बाद से विश्वविद्यालय प्रशासन, दिल्ली पुलिस और हिन्दुत्त्व सरकार की बेरहमी और निकम्मेपन के खिलाफ लगभग रोज प्रदर्शन के कई तरीके – कब्जा कर बैठ जाना,  वाइस-चांसलर का घेराव, गृह मत्रांलय की और  मार्च – इस्तेमाल मे लाऐ जा रहे हैं. दिल्ली पुलिस मुख्यालय में किया गया प्रदर्शन भी चल रहे संघर्ष का हिस्सा था. प्रतिरोध के प्रतीक के बतौर नजीब की माँ और बहन ऐसे हर मौके पर मौजूद होती हैं.

ध्यान रहे कि नजीब के गायब होने की पहली रिपोर्ट अक्टूबर  15 को दर्ज कराई गयी थी, जो आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी के सद्स्यों के द्वारा किये गये बेरहम हिंसा का नतीजा था.  चश्मदीद गावाहों के अनुसार, पिछली रात को एबीवीपी से जुडे़ दर्जनो कार्यकर्ताओं ने जेएनयू के माही-माण्डवी होस्टल मे नजीब को इतनी बुरी तरह से पीटा था कि उसके मुँह और नाक से खून बह रहा था.

जैसे ही अँधेरा होता गया भीड़ का जमावाड़ा कम पड़ता गया. नजीब की माँ और बहन लौटने की तैयारी करने लगे. उनको अकेला देखकर मैं उनके करीब पहुँचा और अपना सलाम पेश किया. मैं उन से जेएनयूं के अन्दर और बाहर कई मौको पर पहले ही मिल चुका था, इसलिये उन्होने मुझे बड़ी आसानी से पहचान लिया.
शाम का अन्धेरा और ठंडक अब बढने लगा था. यह महसूस करते हुए कि अब काफी देर हो चुकी है, मैने नजीब की माँ और बहन से साहस बटोर कर कहा : ‘ मैं आप लोगो के साथ कुछ वक्त बीताना चाहता हूँ….’. मैं जिस दुविधा मे था मेरी झिझक उस से निकल कर आ रही थी. मै पूरे  यकीन मे नहीं  था कि वे इस वक्त मुझ से बात करने को राजी हो जाएंगे. हालाकि वे अपनी इच्छा से इस पर राजी हो गए और मुझे अपनी  कार में बैठने को कहा.

कुछ मिनटो बाद कार जाकिर नगर के लिये रवाना हो चुकी थी. नजीब की बहन ने मुझे आगे ड्राइवर की सीट के बगल में बैठने को कहा जबकि नजीब की माँ बीच की पक्तिं मे बैठ गई. नजीब की बहन अपने शौहर के साथ पीछे की सीट पर बैंठी. जैसे ही कार कनाट प्लेस के घेरे तक पहुँची, मैने महसूस किया कि मेरी झिझक बहुत हद तक खत्म हो चुकी थी.

नजीब की बहन जो दिल्ली के हमदर्द मे उर्दू पढाती हैं, ने कहा ,” जेएनयू के छात्रों ने नजीब के लिये जो मोहब्बत दिखलाई है वह हमारे करीबी रिश्तेदारो से भी कही ज्यादा है”. नजीब के परिवार के अन्य सद्स्यों ने भी इस सराहे जाने को दोहराया.हालाकि नजीब का परिवार  जेएनयू प्रशासन  का खास तौर से वाइस-चांसलर जगदीश का असंवेदनशील रवैया देखकर मायूस था. नजीब की बहन, जिनका चेहरा, गला और बाल नीले हिजाब से ढँका हुआ था, ने विश्वविद्धालय प्रशासन और छात्रों  के रवैये के बीच जो फर्क है, उसे बड़ी खूबसूरती से बयाँ किया: ‘ जेएनयू के छात्र कोई खास खाना खा रहे हैं, जिस की वजह से उनको नजीब से इतनी मुहब्बत है . आगर वीसी को पता चले तो वह इनका खाना बंद करा दे’.

नजीब की मां और बहन

वाइस-चाँसलर की आलोचना मे नजीब के माँ ने भी जोड़ते हुए कहा: ‘वाइस-चाँसलर एक ऐसी शखसियत है, जिसके जज्बात मर चुके हैं. वह एक बुत की तरह बैठा था.’ ध्यान रहे एक एकेश्वरवादी धर्म के बतौर इस्लाम बुत के पूजे जाने का सश्क्त विरोध करता है, और बुत एक नकारात्मक संकेतार्थ है. और इसलिये बुत से वीसी की तुलना उसके लिए उनमे मौजूद गहरे असंतोष को बयाँ करता है.वाइस-चांसलर की आलोचना को जारी रखते हुए नजीब की बहन ने उस घटना को याद किया, जब वह उनसे  18अक्टुबर को मिलने गई थीं. जैसा कि उन्होने बताया वाइस-चांसलर ने काफी लम्बे इंतजार के बाद ही उनसे मुलाकात की. आधे घण्टे तक चलने वाली इस बैठक मे उन्होने किसी भी बात का अश्वासन नही दिया. “वाइस- चांसलर ने हमारे किसी भी सवाल का जवाब नही दिया. जब उनसे कुछ कहने को कहा जाता तो वे हमारे सवालो को वहाँ बैठे अन्य विश्वविद्धयालय अधिकारियों की ओर बढा देते थें” , नजीब की बहन ने मायूस होते हुए कहा, ‘वाइस- चांसलर के असवेंदनशील रवैये ने उन्हे काफी परेशान किया’  वह इतनी जज्बाती हो गई कि अगले दिन उन्होने वाइस- चांसलर के अफिस पर सैकड़ो छात्रों को सम्बोधित किया . उनका भाषण कई लोगो को रुला गया.

तब तक कार कनाट प्लेस के औटर रिंग के पास  पहुँच गई थी. हमारी बातचीत का रुख अब मिडिया की ओर मुड़ चुका था. उनकी बहन मिडिया, खास तौर से इलेक्ट्रोनिक मिडिया की “चुप्पी” देखकर दुखी थीं. ‘कुछ अखबारो ने नजीब के केस को कवर किया है मगर इलेक्ट्रोनिक मिडिया अधिकतर चुप ही रहा है”, उन्होने शोक व्यक्त करते हुए कहा.हालांकि  नजीब की माँ की मीडिया मे कोई दिलचस्पी  नहीं थी. उनके जेहन मे सिर्फ एक ही बात तैर रही थीं- अपने बेटे की तालाश: ‘ अगर नजीब मिल गया, मैं तुम सब को पार्टी मे बुलाबा दूंगी’. इस बात को महसूस करते हुए कि नजीब के मिलने की खुशी इतनी ज्यादा होगी कि वह केवल तभी पूरी हो सकती है जब कि समारोह मे जेएनयू के सभी छात्र मौजूद हो, उन्होने खुद को सुधारते हुए कहा: ‘अगर नजीब मिल गया, तो मैं जेएनयू के सारे छात्रो  को पार्टी मे बुलाबा दूंगी’.

जबकि नजीब का गायब होने से जेएनयू को लेकर परिवार के सदस्यों में  गहरे जख्म के निशान बन गये हैं, नजीब के लिये छात्रो की दी गई मदद भी विश्वविद्यालय  को उनके लिये खास बनाता है. अपने परिवार के तरफ से जेएनयू के छात्रो की मदद को याद करते हुए , नजीब की बहन बोली कि धरने की जगह पर वे हमे घेरते हुए बैठ गए और हमे पूरी सुरक्षा दे रहे थे, जैसे कि “ हम उनके परिवार के सदस्य हों”. कुछ ही हफ्ते के भीतर जेएनयू  के लिये नजीब की बहन मे एक गहरी मुहब्बत पनप चुकी है. “ पहले हममे जामिया के लिये मोहब्बत थी और जामिया के इलाके में पहुँच कर हमेशा घर जैसा महसूस होता था मगर अब हममे जामिया के लिए भी ऐसी मुहब्बत पनप चुकी  है”, नजीब की बहन ने कहा.

जब मैंने नजीब और उसके तालीम के बारे मे पूछा, तब नजीब की माँ ने कहा कि वह एक मेहनती छात्र था और चार नामी-गिरामी विश्वविद्यालय  की प्रवेश परिक्षा उसने पास की थी—एएमयू, हमदर्द, जामीया और  जेएनयू. हालांकि  उसने उनकी इच्छा के विरुद्ध  जेएनयू को प्राथमिकता दी . वह नजीब  को जेएनयू क्यों नही भेजना चाहती थी? वह जवाव देती हैं: “ मैं जेएनयू में  हुए पिछले विवाद को लेकर सतर्क थीं……… मैं नही चाहती थीं की नजीब वहाँ जाए लेकिन उसने मेरी नही सुनी. वह वहाँ मोहरा बन गया’, वह रोए जा रही थीं और उनके आँसू  उनके नीले और सफेद कुर्ते को गीला कर रहे थे.

एक घण्टे तक चलने के बाद कार जामिया नगर इलाके में पहुँची. नजीब के साथ हुई हालिया बातचीत को साझा करते हुए उन्होंने  कहा कि नजीब कमरे में खटमल के डर की शिकायत कर रहा था.  यह सुनकर नजीब की माँ ने आश्वासन देते हए कहा था कि वहाँ उसके अब्बा जाएंगे और कमरे मे कीटनाशक का छिड़काव करवा देंगे.  लेकिन यह नजीब की उदासी दूर  नही कर सका: “ खटमल सभी होस्टलो मे मौजूद है. इसमे पापा क्या कर सकते हैं ?”

तब तक कार जाकिर नगर पहुँच चुकी  थी और हम ने जाकिर नगर इलाके मे स्थित नजीब के फुफी ( नजीब के पिता की बहन) के  घर जाने के लिए बैटरी-रिक्शा लिया. नजीब के फुफेरे भाई ने हम सब के लिये चाय लाई, हम सब साथ चाय पीने लगे. नजीब की अम्मी थक चुकी थीं और मैने सोचा मुझे निकलना चाहिए. नजीब की माँ के होठो पर बस ये ही शब्द हैं: “ मेरे अल्लाह मेरी दुआ सुनना और नजीब को जल्द से जल्द वापस ले आना”.

अभय कुमार जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन केंद्र में ‘आधुनिक राज्य धर्मनिरपेक्ष कानून और अल्पसंख्यक’ विषय पर शोधरत हैं। संपर्क: 9868660402

नीतीश जी, आपकी पुलिस गालियाँ देती है और टार्चर करती है

राष्ट्रीय महिला आयोग सेपीडिता की शिकायत 


बिहार के भागलपुर में अपने पैतृक संपत्ति के हक़ के लिए संघर्षरत महिला जब शिकायत करने पुलिस के पास गई तो पुलिस ने उल्टा उसे ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. उसकी प्रताड़ना के गवाह बने भागलपुर विधि संग के अधिवक्ता. सवाल है कि राज्य सरकार क्या पीडिता के पक्ष में अपने न्याय सिस्टम को दुरुस्त करेगी या दबंगों का ही साथ देगी?  सवाल यह है कि पढी –लिखी महिला के साथ जब पुलिस का यह वर्ताव है तो गरीब अनपढ़ महिलाओं के साथ राज्य की पुलिस का क्या व्यवहार होता होगा.  पीडिता ने राष्ट्रीय महिला आयोग को पत्र लिखा है: 

सेवा में,
अध्यक्षा महोदया
राष्ट्रीय महिला आयोग, नई दिल्ली

महाशया,

 मैं, सपना सुमन (उम्र 32 वर्ष), पिता– स्व. कनक लाल राम, माता- स्व. मीरा मधुर बिहार प्रांत के भागलपुर शहर के नया बाजार की स्थायी निवासी हूँ. मेरे माँ-बाप दोनों की मौत एक दशक पूर्व हो चुकी है. मैं 17 अक्तूबर, 2016 (दिन रविवार) को भागलपुर शहर स्थित ततारपुर थाना के थाना अध्यक्ष अजय कुमार के पास अपने घर में हुई चोरी की प्राथमिकी दर्ज कराने गई. कई बार थाना जाकर मैंने प्राथमिकी दर्ज करने की थानाध्यक्ष से गुहार लगाई किन्तु उन्होंने प्राथमिकी दर्ज नहीं की.

इससे परेशान होकर मैं इसकी शिकायत लेकर 20 अक्तूबर को लगभग 3:30 बजे अपराहन एस एस पी कार्यालय पहुंची. लेकिन मुझे एसएसपी कार्यालय भागलपुर के बाहर तैनात आदेशपाल गणेश कुमार ने उनसे मिलने नहीं दिया और कहा कि ‘अभी रुकिये आरक्षी अधीक्षक जब आपको बुलायेगा तब आपको मिलवा दिया जाएगा.’ मैंने उन्हें अपने नाम का पुर्जा लिखकर भी दे दिया किन्तु तीन घंटे बीत जाने के बाद भी एसएसपी मुझसे नहीं मिले.

मैं कार्यालय के बाहर उनके चेम्बर के पास बैठी रही. अचानक साढ़े छह बजे के लगभग महिला थाना अध्यक्षा ज्ञान भारती एवं एक अन्य महिला पुलिसकर्मी सादे लिबास में एवं चार-पाँच की संख्या में पुरुष पुलिसकर्मी, वे भी सादे लिबास में थे, आये और मुझे चारो तरफ से घेर लिया. ज्ञान भारती और उनके साथ आई एक महिला पुलिसकर्मी मुझे जबरन घसीटते हुए वहाँ से बाहर सड़क पर ले जाने लगीं. मैंने उनसे पूछा कि आप मुझे ऐसे कैसे और कहाँ ले जा रही हैं? इससे घबराकर मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और कहा कि – एसएसपी सर बचाओ! देखो ये लोग मुझे घसीटकर कहाँ ले जा रहे हैं! इस पर एसएसपी साहब बाहर निकले और अनदेखा कर वापस अंदर चले गए. तब महिलाथाना अध्यक्ष ज्ञान भारती ने कहा कि- ‘रंडी! बहुत हल्ला कर रही हो! चलो तुम्हारा अच्छे से इलाज करती हूँ!’ और उनके साथ सादे लिबास में आये पुलिस कर्मी  मुझे और मेरे चार वर्षीय बेटी, जो मेरे साथ ही थी, को घसीटते हुए एस एस पी आफिस से बाहर सड़क पर ले जाने लगे.

महिला थाना अध्यक्षा ज्ञान भारती ने मेरा मोबाईल और पर्स छिन लिया. इस बीच हम माँ-बेटी के रोने-चिल्लाने की आवाज सुनकर जिला विधिज्ञ संघ भागलपुर के महासचिव श्री संजय कुमार मोदी एवं कई अधिवक्ता वहाँ आ गए. श्री मोदी ने अपना परिचय देते हुए महिला थानेदार ज्ञान भारती से जब पूछा कि ‘आपलोग इस महिला के साथ इस प्रकार का  दुर्व्यवहार एवं  मारपीट क्यों कर रहे हैं और इसे कहाँ ले जा रहे हैं?’ मैंने उन्हें बताया कि मैं एसएसपी साहब के पास फरियाद लेकर आई थी किन्तु देखिये ये लोग मेरे साथ ही मारपीट व दुर्व्यवहार कर रहे हैं और कहाँ ले जा रहे हैं! महासचिव सहित अन्य अधिवक्ताओं द्वारा पुलिसकर्मियों से कहा कि आप इस तरह से इस महिला के साथ मारपीट एवं दुर्व्यवहार इस तरह से नहीं कर सकते हैं, लेकिन उपरोक्त सभी पुलिस वालों ने इन अधिवक्ताओं की एक नहीं सुनी. उलटे ज्ञान भारती ने मेरी तरफ देखते हुए कहा कि ‘ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, कम्पलेन केस करोगी!’ और यह कहते हुए मुझे और मेरी बेटी को उनलोगों ने सफ़ेद रंग की जीप में फेंक दिया. इस क्रम में हम दोनों माँ-बेटी को काफी चोटें आईं.



 इसके उपरांत ज्ञान भारती खुद और एक महिला पुलिसकर्मी व अन्य पुरुष पुलिसकर्मी भी जीप पर सवार हो गये. उन लोगों ने जिप्सी के अंदर की बत्ती भी बुझा दी थी. मैं और मेरी बेटी बुरी तरह डरे हुए थे. मेरे रोने-चिल्लाने पर दो पुरुष पुलिसकर्मियों ने पहले तो मुझे भद्दी-भद्दी गालियां दी फिर थप्पड़ मारने लगे. उसके बाद मुझे उन लोगों के द्वारा चुपचाप रहने की नसीहत दी गई. रास्ते में जिप्सी पर मौजूद एक पुरुष पुलिसकर्मी ने अंधेरे में मेरी छाती पर गलत मंशा से हाथ भी रखा. इस पर मैं जब चिल्लाने लगी तो ज्ञान भारती एवं दूसरी महिला पुलिस मेरा सिर झुकाकर मेरे पीठ पर कोहनी से मारने लगी. इसको देख जब मेरी बेटी रोने लगी तो इन निर्दयी पुलिस वालों ने उसकी भी चोटी पकड़ कर दो-तीन चाटा जड़ दिया. मुझे शहर के कोतवाली थाना लाया गया. कोतवाली थाना पहुंचते ही ज्ञान भारती ने मेरा बाल पकड़ कर खींचते हुए जीप से उतारा. उसके बाद मुझे वहाँ लगभग आधे घंटे तक 7:30 बजे संध्या तक थाना पर बैठाये रखा गया. मैं बार-बार उनसे घर जाने देने की गुहार लगाती रही,किन्तु उन्होंने मुझे घर जाने नहीं दिया.


 फिर कोतवाली स्थित महिला थाना से ज्ञान भारती समेत अन्य पुलिसकर्मी मुझे जबरन उठाकर शहर के ही ततारपुर थाना ले गए. वहाँ मुझे 8:30 बजे तक बैठाकर रखा. मेरी चार साल की बेटी को भूख और प्यास लग रही थी और वो लगातार पानी मांग रही थी. लेकिन किसी पुलिसवाले को हमारे ऊपर रहम नहीं आई और उन्होंने हम दोनों को पानी तक नहीं दिया.

ततारपुर थाना अध्यक्ष अजय कुमार कहने लगे कि, ‘अरे मैडम को ले आये! जरा इसके चेहरे का बढ़िया से फोटो खींचो! बहुत एसएसपी और आईजी के पास हमलोगों की शिकायत करती है!’ उनके कहने पर थाना में मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों ने अपनी मोबाईल से मेरी फोटो भी खींची. इसके बाद अजय कुमार ने मुझसे कहा कि, ‘केस-मुकदमे के चक्कर में मत पड़ो, चुपचाप घर पर बैठ जाओ नहीं तो किसी झूठे मामले में फंसाकर जेल भेज देंगे. जीना मुश्किल कर देंगे. समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी.’ इस दौरान थाना में मौजूद सभी पुलिसकर्मी ठहाके लगाकर हंसते हुए मेरे बारे में गंदी-गंदी बातें बोल रहे थे. पुनः अजय कुमार ने मुझे गाली देते हुए कहा कि- ‘चलो इस रंडी को इसीके घर पर ले जाकर इसकी इंक्वायरी करते हैं.’

ज्ञान भारती और अजय कुमार सहित कई पुलिसकर्मी दो जीप में मुझे और मेरी बेटी को साथ लेकर मेरे घर ले आये और मेरे चाचा और मेरी तथाकथित सौतेली माँ से कहने लगे कि- ‘इसका ईलाज कर दिये हैं.’ और दोबारा गाड़ी में बैठाकर मुझे और मेरी बेटी को पुनः जीप पर जबरन बैठाकर ततारपुर थाना ले जाने लगे. रास्ते में जब हम बहुत रोने-चीखने लगे तो हमें रात्रि के 9:15 के आसपास रास्ते में उतार दिया गया और मेरा मोबाईल व पर्स फेंककर मुझे वापस कर दिया गया. उतारते वक्त दोनों थाना अध्यक्षों ने मुझे धमकी देते हुए कहा कि-‘भविष्य में दोबारा अगर सौतेली माँ व चाचा पर कोई कांप्लेन करने की कोशिश की तो इससे भी बुरा हाल करेंगे.’

पुलिस वालों द्वारा मुझे और मेरी बेटी के साथ मारपीट करने से हम दोनों को गंभीर चोटें आईं जिसका ईलाज भागलपुर शहर स्थित सदर अस्पताल में चल रहा है. उक्त घटना से मैं और मेरी बेटी काफी भयभीत हैं. मुझे डर है कि पुलिस वाले मेरी कभी भी हत्या कर अथवा करा सकते हैं. मेरे ऊपर झूठे मुकदमे कर अथवा करवाये जा सकते हैं. मैंने इस पूरी घटना से आरक्षी महानिरीक्षक और एसएसपी को लिखित आवेदन व दूरभाष द्वारा देकर कार्यवाही की मांग भी की है. बावजूद इसके अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है. आज भी आते-जाते हमारे ऊपर नजर रखी जा रही है और हमारा पीछा भी किया जा रहा है. हम दहशत के साये में जी रहे हैं.

इतना ही नहीं दिनांक 03/11/2016 की सुबह करीब 06:30 बजे तातारपुर थानाध्यक्ष, अजय कुमार एवं छः सात की संख्या में अन्य पुलिसकर्मी मेरे घर पर आए और मेरे घर का दरवाजा पीटते हुए घर के अंदर प्रवेश कर गए और मैं जिस कमरे में सोती हूँ उस कमरे का दरवाजा भी जोर – जोर से पीटते हुए भद्दी – भद्दी गाली देने लगे और कहा कि तुम थाना चलो, तुम मेरे और एस एस पी पर केस की हो. आज तुम्हारा उस दिन से भी बूरा हाल करेगें और मेरे कमरे के दरवाजा के सामने थानाध्यक्ष कुर्सी मंगाकर बैठ गए तथा उनके साथ आए अन्य पुलिसकर्मी भी उनके इर्द गिर्द खड़े थे जिस कारण न मैं अपनी नित्य क्रिया भी नहीं कर पा रही थी, ये लोग लगातार 09:00 बजे सुबह तक वहाँ बैठे रहे और मुझे प्रताड़ित करते रहे. इस घटना की जानकारी मैने अपने मोबाईल द्वारा श्रीमान् आई जी, भागलपुर और श्रीमान डी आई जी, भागलपुर को दी.उपरोक्त तथ्यों के आलोक में निवेदन है कि मनोज कुमार वरीय आरक्षी अधीक्षक, भागलपुर, ज्ञान भारती महिलाथाना अध्यक्ष, कोतवाली, भागलपुर, अजय कुमार, थाना अध्यक्ष, ततारपुर, भागलपुर, सहित चार-पांच की संख्या में सादे लिवास में पुलिसकर्मी जिसे देखने पर मैं पहचान सकती हूँ, के ऊपर ठोस कार्रवाई करते हुए अविलंब मुअत्तल करने की कृपा की जाय तथा साथ ही मेरे एवं मेरी बेटी के जान-माल की सुरक्षा व न्याय प्रदान की जाय.

                                                                                                                                                                    विश्वासभाजन 
                                                                                                                                              (सपनासुमन)
                  

हमें खत्म करने के पहले वे लोकतंत्र को खत्म करेंगे

स्त्रीकाल संपादकीय टीम 

चाहे कोई भी संघर्ष हो-जाति के खिलाफ, ब्राह्मणवाद के खिलाफ, पितृसत्ता के खिलाफ, तानाशाही के खिलाफ- वह  तभी तक जारी रह सकता है, जबतक लोकतंत्र पर कोई खतरा नहीं है या आपके सवाल करने और अपनी बात कहने या अपने लिए हक़ हासिल करने के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष करने की आजादी बची हो. पिछले कई महीनों से इसी आजादी पर सत्ता के प्रत्यक्ष और परोक्ष घटक हमले कर रहे हैं. पिछले कई महीनों से निरंतर तनाव की स्थिति राज्यसत्ता और उसके सहयोगी अंगों, संगठनों और समूहों के द्वारा बनाई जा रही है. जिम्मेवार पदों पर बैठे लोग ‘सवाल’ न करने की चेतावनी दे रहे हैं. हुक्मरानों और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का हित ही राष्ट्र हित बताया जा रहा है. यह एक खतरनाक माहौल का संकेत है. यह लोकतंत्र के खात्मे का संकेत है, जिसके पहले चरण से हम गुजर रहे हैं- अघोषित आपातकाल और उच्चवर्गीय, उच्चवर्णीय पितृसत्ताकों के स्वर्ग का निर्माण काल है यह- इनके अलावा जिस किसी भी गैर ब्राह्मण , गैर-उच्च वर्गीय -वर्णीय पुरुष -समूह को या किसी भी स्त्री-समूह को अपने ‘अच्छे दिन’ आने का भ्रम हो रहा है, तो वह छलावे में है, वे दिवास्वप्न’ देख रहे हैं, वे किसी निश्चित उद्देश्य के लिए किये जा रहे है यज्ञ की आहुति भर हैं, बलि के पात्र भर हैं.

हमने जो कुछ भी हासिल किया है पिछली  शताब्दियों में वह निरंतर आधुनिकता की ओर अपनी उन्मुखता और लोकतंत्र के अपने चुनाव के कारण ही. स्त्रियों, दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों, सभी वंचितों के हक़ के लिए संघर्ष और हासिल की पृष्ठभूमि है लोकतंत्र. अभी उसी पर प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रहार हो रहे हैं और जनता के एक बड़े वर्ग की सहमति भी इस प्रहार में शामिल कर ली गई है. इसका ताजा उदाहरण है एनडीटीवी इंडिया पर एक दिन का प्रतिबंध. जब मौजूदा दौर के कई सता पोषित चैनल उन्माद, अंधविश्वास, घृणा और छद्मराष्ट्रवाद के नाम पर हिंसक चेतना का निर्माण कर रहे हैं, एक ख़ास चैनल पर यह हमला सवाल करने वालों को सत्ता के द्वारा दिया जाने वाला संकेत भी है, हम सब का गला घोटा जाने वाला है, सबको  चुप कराया जायेगा- यह जबरन चुप्पी हमारी अंतिम पराजय की ओर ले जायेगी- जहां स्त्रियों, दलितों, वंचितों के सारे अधिकार उर्ध्वमुखी सत्ता के लिए छीन लिए जाते हैं –यही उनकी कल्पना का स्वर्ग है.



हमें उनकी कल्पना के इस स्वर्ग की जगह लोकतंत्र को बचाये रखने के लिए जी –जान लगा देना चाहिए, जरूरी है वंचितों की लड़ाई के लिए. एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध की हम भर्त्सना करते हैं. स्त्रीकाल के पाठकों को छोड़ जाते हैं एनडीटीवी के पक्ष के साथ, जो उनके द्वारा अपने हिन्दी चैनल पर एकदिन के प्रतिबंध के बाद जारी किया गया है और चीफ एडिटर, इंडियन एक्सप्रेस, राजकमल झा, के एक महत्वपूर्ण भाषण के साथ, जो रामनाथ गोयनका अवार्ड के मौके (3 अक्टूबर) पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने, उन्होंने दिया. कहते हैं कि उस समय प्रधानमंत्री के चेहरे पर बेचैनी साफ़ देखी जा सकी, लेकिन दूसरे ही दिन उनकी सरकार ने मीडिया के एक दूसरे हाउस को प्रतिबंध का एक नोटिस थमा दिया.  सुनें  वीडियो लिंक में राजकमल झा और देखें हुक्मरानों के चेहरों की प्रतिक्रया…

एनडीटीवी का पक्ष: 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का आदेश प्राप्त हुआ है. बेहद आश्चर्य की बात है कि NDTV को इस तरीके से चुना गया. सभी समाचार चैनलों और अखबारों की कवरेज एक जैसी ही थी. वास्तविकता  में NDTV की कवरेज विशेष रूप से संतुलित थी. आपातकाल के काले दिनों के बाद जब प्रेस को बेड़ियों से जकड़ दिया गया था, उसके बाद से NDTV पर इस तरह की कार्रवाई अपने आप में असाधारण घटना है. इसके मद्देनजर NDTV इस मामले में सभी विकल्पों  पर विचार कर रहा है.



राजकमल चौधरी का पक्ष 

आपके शब्दों के लिए बहुत आभार. आपका यहाँ होना एक मज़बूत सन्देश है. हम उम्मीद करते हैं कि अच्छी पत्रकारिता उस काम से तय की जाएगी जिसे आज की शाम सम्मानित किया जा रहा है, जिसे रिपोर्टर्स ने किया है, जिसे एडिटर्स ने किया है. अच्छी पत्रकारिता सेल्फी पत्रकार नहीं परिभाषित करेंगे जो आजकल कुछ ज़्यादा ही नज़र आ रहे हैं, जो हमेशा आपने आप से अभिभूत रहते हैं, अपने चेहरे से, अपने विचारों से जो कैमरा को उनकी तरफ रखते हैं, उनके लिए सिर्फ एक ही चीज़ मायने रखती है, उनकी आवाज़ और उनका चेहरा. आज के सेल्फी पत्रकारिता में अगर आपके पास तथ्य नहीं हैं तो कोई बात नहीं, फ्रेम में बस झंडा रखिये और उसके पीछे छुप जाइये. आपके भाषण के लिए बहुत बहुत शुक्रिया सर, आपने साख/भरोसे की ज़रूरत को अंडरलाइन किया. ये बहुत ज़रूरी बात है जो हम पत्रकार आपके भाषण से सीख सकते हैं. आपने पत्रकारों के बारे में बहुत अच्छी बातें कही जिससे हम थोड़ा नर्वस भी हैं. आपको ये विकिपीडिया पर नहीं मिलेगा, लेकिन मैं इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर की हैसियत से कह सकता हूँ कि रामनाथ गोयनका ने एक रिपोर्टर को नौकरी से निकाल दिया जब उन्हें एक राज्य के मुख्यमंत्री ने बताया कि आपका रिपोर्टर बड़ा अच्छा काम कर रहा है. इस साल मैं 50 का हो रहा हूँ और मैं कह सकता हूँ कि इस वक़्त जब हमारे पास ऐसे पत्रकार हैं जो रिट्वीट और लाइक के ज़माने में जवान हो रहे हैं, जिन्हें पता नहीं है कि सरकार की तरफ से की गयी आलोचना हमारे लिए इज़्ज़त की बात है.

वीडियो में 1 घंटे 34वें मिनट  पर देखें राजकमल झा का भाषण और देखें नेताओं के चेहरे की प्रतिक्रया



इस साल हमारे पास इस अवार्ड के लिए 562 एप्लीकेशन आयीं. ये अब तक की सबसे ज़्यादा एप्लीकेशन हैं. ये उन लोगों को जवाब है जिन्हें लगता है कि अच्छी पत्रकारिता मर रही है और पत्रकारों को सरकार ने खरीद लिया है.अच्छी पत्रकारिता मर नहीं रही, ये बेहतर और बड़ी हो रही है. हाँ, बस इतना है कि बुरी पत्रकारिता ज़्यादा शोर मचा रही है जो 5 साल पहले नहीं मचाती थी.

स्वयं सिद्धा !

रंजना गुप्ता

दो कविता संग्रह(रजनी गन्धा,परिंदे),एक कहानी संग्रह(स्वयं सिद्धा) प्रकाशित! निजी व्यवसायी, स्वतंत्र लेखन! संपर्क : ranjanaguptadr@gmail.com

सुष्मिता आज ऑफिस जाने के मूड में नही थी ! उसने लिहाफ को उठा कर फिर से मुहँ ढक लिया ,जैसे उसे नींद आ ही जाएगी ! लेकिन थोड़ी ही देर में लिहाफ के श्वेत श्याम धब्बे उसे बैचैन करने लगे !उसे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे ये धब्बे उसकी पूरी जिंदगी पर छा जाना चाहते है ,घबरा कर उसने बिस्तर छोड़ दिया ,और कारीडोर में टहलने लगी !उसने पूरब की ओर देखा ,सूरज की लालिमा चारो दिशाओं में सुनहरी आभा के रूप में फैलने लगी थी !सुष्मिता का निश्चय बड़ा अटल होता है ,आज वह एक बार भी फैक्ट्री नही जाएगी ,वर्कर्स को जो करना है करे !वैसे भी वे उसकी सुनते नही ,उन्हें जो करना होता है वे वही करते है !उसने कई बार देखा है ,जब वह अचानक पहुँचती है ,तो मंडली लगा कर बैठे उसके कारीगर बीडी फूँक रहे होते है ,उनके मुहँ दबा -दबा कर हँसने और फुसफुसा कर बात करने का ढंग बताता है ,कि वे उसकी अनुपस्थिति से बहुत मौज में है ,जैसे ही ऑफिस में सुष्मिता के आने की आहट होती है ,वे तुरंत सभा समाप्त कर ,अपनी-अपनी मशीनों पर बैठ जाते है !और ऐसे मनोयोग से मशीनें चलाने लगते है ,नीचे के कारीगर इतनी तल्लीनता से माल की कटाई -छटाई में जुट जाते है ,जैसे उनके जैसी कार्य कुशलता ,कर्मठता और व्यस्तता कही और के कारीगरों में या फैक्ट्री में ,पाई ही नहीं जाती है !सुष्मिता का व्यवहार अपने वर्कर्स के साथ बेहद मानवीय और सौहार्द्य पूर्ण है ,वह बड़ी सह्रदयता से उनके सुख दुःख में साझीदार बनती है ,पर वे उसकी इस संवेदन शीलता को उसकी कमजोरी समझते है , जबकि उसके सारे कारीगर प्राय: एडवांस पर ही रहते है ,तब भी उनकी यह कामचोरी की आदत …


उफ़ वह उब चुकी है ..उसके वर्कर्स अपनी कार्य क्षमता को बहुत संभाल-संभाल कर खर्च करते है,चाहे जितना अनिवार्य कार्य चल रहा हो ,उन लोगो का इससे ज्यादा मतलब नही रहता !चाहे मार्केट में सुष्मिता की प्रतिष्ठा और उसकी कम्पनी की धज्जियाँ उड़ जाये ,चाहे उसका पैसा लेट लतीफी की वजह से डूब जाये ,उन्हें तो बस अपनी प्रतिमाह की सैलरी ,वह भी नियत समय पर ,और अधिक से अधिक ओवर टाइम बनाने से मतलब !एडवांस तो हर समय चाहिए ,वरना काम छोड़ने की धमकी !और धीमी कार्य प्रणाली तो उनकी यूनियन बाजी का जैसे पहला सबक ही है !

पन्द्रह -बीस वर्कर्स की इस छोटी सी यूनिट से काम निकलवाने में सुष्मिता को पसीने आ जाते है !सुष्मिता अत्यंत शिष्ट -सुसंस्कृत ,और सुशिक्षित ,मृदु भाषी महिला उद्यमी है ! वह नारी स्वतंत्रता की सही अर्थो में जीवित पर्याय है ! उसने महिला पॉलिटेक्निक से डिग्री लेकर एक प्रोजेक्ट तैयार किया था ,जिसके फाइनेंस हेतु जब उसने बैक के अधिकारियो से संपर्क किया तो ,बैंक अधिकारियो की प्रतिक्रिया अत्यंत सकारात्मक रही ,उन्होंने उसके प्रोजेक्ट की जम कर सराहना की ,और इस तरह उसे बड़ी आसानी से फैक्ट्री शुरू करने के लिए लोन उपलब्ध हो गया !पिता के खाली पड़े प्लाट पर उसने फैक्ट्री की आधार शिला रखी ! बड़े जोश और उमंग के साथ उसने अपना उद्योग शुरू किया था ,यह फैक्ट्री उसके पिता का सपना थी ,वह अपने दिवंगत पिता की इकलौती वारिस थी ,उनके बाद उसका अपना कोई नही बचा था ,माँ का देहांत बहुत पहले ही हो चुका था ,पिता के लाख जिद करने के बावजूद उसने विवाह नही किया था ! उसे डर था,कि विवाह के पश्चात् ,वह पिता के प्रति अपने दायित्वों को शायद पूरी तरह निभा नही सकेगी !वह कर्तव्य जो भारतीय समाज में एक पुत्र का पिता के लिए माना जाता है ,वह पुत्री होकर भी पिता के लिए अत्यंत सहजता से उन्ही कर्तव्यो का निर्वाह तभी शायद कर सकी थी !उसके पिता सदैव करते थे ,कि नौकरी करके तुम अपनी आजीविका तो आसानी से कमा सकती हो ,लेकिन एक उद्योग मनुष्यों के एक पूरे समूह को रोजगार देता है ,उद्योग धंधे में तुम अपने साथ-साथ ही दूसरे पचासों व्यक्तियों की जीविका भी आसानी से चला सकती हो !उद्योग किसी सामाजिक संगठन की तरह बेहद कल्याणकारी वह व्यावसायिक संगठन है ,जो कितने ही घरो में चूल्हे जलाने का माध्यम बनता है ,पिता की इस राष्ट्रीय सोच को सुष्मिता ने अपना कैरियर बना लिया !उसके पिता आदर्शो की प्रति मूर्ति थे ,कुछ-कुछ अति मानव जैसी उनमे कई विशेषताएँ एक साथ मौजूद थी ! सच्चाई ईमानदारी की तो वे जीती जागती मिसाल थे ! वे उससे प्राय: कहा करते थे , कि तुम कभी अन्याय का साथ नही देना ,किसी पर अन्याय नही करना !हर बुराई के लिए जम कर लड़ना सीखो ,लेकिन कभी किसी बुराई के लिए अपनी अच्छाई को दांव पर नही लगाना !

 माँ के सरल निश्छल वात्सल्य ने उसके ह्दय को आकार दिया ,तो पिता के दृढ़ विचारो ने सुष्मिता के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को एक कवच रूपी सांचे में ढाल दिया था ,सुष्मिता में इसी कारण एक अदभुत जीवनी शक्ति थी ,जो उसे जल्दी टूटने नही देती थी ,आत्म विश्वास तो उसमे कूट-कूट कर भरा था ,डरना वह जानती नही थी ,अध्यवसायी पिता की उस अध्यवसायी पुत्री ने ,विवेकानंद से लेकर टॉलस्टॉय ,भारतीय दर्शन से लेकर पाश्चात्य विचारकों तक ,वैचारिक अध्ययन का कोई क्षेत्र नही छोड़ा था !लेकिन अंत में एक मात्र गीता ही उसकी सर्व प्रिय पुस्तक रही !पर हित और पर कल्याण की भावना को ,उसने अपने व्यवसाय तक में गूँथरखा था !पैसे के लिए बात-बात पर बिक जाने वाली व्यापारिक बुद्धि से वह कोसो दूर थी !विरासत में मिले संस्कार उसे व्यावसायिक असफलता दिलाने में ,अत्यंत अहम् भूमिका रखते थे !वह सुष्मिता जिसे बाजार वाद ,और धन की कुरूप लालसा का ,चश्मा पहन कर देखना ,बिलकुल असंभव था !उसे उसके ही अनपढ ,गंवार लेकिन पेशेवर चालक बुद्धि के कारीगर प्राय: चकमा देते रहते थे !लेकिन पैसा कमाने की होड़ में आदमियत को रौंद कर ,आगे बढना सुष्मिता को मंजूर नही था !धन के साथ-साथ धर्म कमाने की ,नैतिक सॊंच ही उसकी इस कार्य क्षेत्र में ,सबसे बड़ी बाधा बन गयी थी !कभी -कभी बाजार वाद के कठोर शिकंजे में फंस कर ,बेबस होकर वह फैक्टी बंद करने की सोचती ,लेकिन अपने पिता के सपने को एक लक्ष्य की भांति देखने वाली सुष्मिता ,फैक्ट्री में ताला तब तक नही डाल सकती थी,जब तक उसके एक भी कारीगरको ,उससे रोजी रोटी मिलती रहे !आजकल वह प्राय:अनमनस्क सी रहने लगी थी !वह अपने उदार ह्रदय के किसी कोने में ,ईर्ष्या के एक नन्हे पौधे को लगातार पनपता हुआ देख रही थी !वह उस पौधे को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती थी ,लेकिन वह बेशर्म पौधा उसके सिद्धान्तों की हरी -भरी सृष्टि का ही जीवन रस पीकर ,बढता ही जा रहा था ! इसका कारण वह धीरे -धीरे समझने लगी थी !


उसकी फैक्ट्री के सामने ही ,स्थित चाय समोसे की छोटी सी दुकान ,कुछ ही सालो में किस तरह शहर की प्रतिष्ठित मिठाई की दुकान में बदल गयी ,और देखते ही देखते ,नगर निगम की जमींन पर अवैध कब्जा करके बैठा ,वह करतार नाम का व्यक्ति कैसे रातों रात कालोनी के धनाढयो में शुमार हो गया ,वह यह सारा खेल चमत्कृत होकर देखती ही रह गयी ,उसे याद है ,थोड़े दिनों पहले अपने गंदे अंगौछे से नाक साफ करता ,हुआ और उसी हाथ से बना-बना कर समोसे ढेर करता हुआ ,यह आदमी सदैव उसके मन में जुगुप्सा जगाता रहता था ,उसके समोसे छोले खाकर बीमार पड़ते लोगो के कारण उसकी करतार से आये दिन झड़प होती रहती !और वह छोटा सा पहाड़ी नौकर तो क़डाही को जैसे साफ करके रखता ,सड़क का आवारा कुत्ता उसे चाट कर फ़िर से साफ़ कर देता ,उसे और भी बहुत कुछ याद है ,नगर निगम की गाड़ी ,थाने का दरोगा ,जब तब करतार को तंग करते थे !रोज उसकी झोपड़ी नुमा दुकान उजडती और अगले दिन ही फिर बन जाती !

धीरे -धीरे समय बीतने लगा ,अब करतार की उन्ही नगर निगम के अधिकारियों से हँस-हँस कर बाते होने लगी थी !वह थाने का दरोगा भी ,उसके यहाँ से मिठाईयों के बड़े-बड़े टोकरे ,अक्सर घर ले जाने लगा !करतार का कद धीरे-धीरे बढ़ रहा था ! यहाँ तक कि सुष्मिता स्वयं को उसके सामने बौना पाने लगी थी ,वह लगातार सुरसा के मुहँ की भांति फैलता हुआ सौ योजन तक फ़ैल चुका था !और सुष्मिता ,वह तो उसके सामने बिंदु भर रह गयी थी !आज उसके दुकान की शानदार चार मंजिला भव्य इमारत शहर की मुख्य सडक पर बन कर तैयारहो गयी थी ,उसका उद्घाटन करने ,शहर के मेयर आ रहे थे !अपने पान से रंगे गंदे दांतो को निकले हुये ,वह दो दिन पहले सुष्मिता को भी आमंत्रित करने आया था ! एक हिकारत भरी नज़र उसकी फैक्ट्री पर डाल ,अत्यन्त धूर्तता पूर्वक हाथ जोड़ कर उसी भांति मुस्करा रहा था ,जैसे नेता वोट माँगने के लिए जनता के सामने ढोंगी मुद्रा में खडा रहता है ,सुष्मिता उसकी विषैली हँसी को अभी तक भूल नही पाई थी !अपने ही बनाये आदर्शो का तिलिस्म आज उसे ,बिखरता नजर आरहा था !वह स्वयं को पहली बार कटघरे में खड़ा पा रही थी ! इस अंतरतम के विद्रोह का चेहरा उसे बिल्कुल अजनबी लग रहा था !मन एक अनजानी सी ग्लानि से विचलित हुआ जा रहा था !आज वह अपनी ही निष्ठा ,ईमान दारी ,और सत्य परकता को जितना कोस सकती थी ,कोस रही थी !लेकिन थोड़ी ही देर बाद थक हार कर बैठ गई ,और वह कर भी क्या सकती थी ?अपने जीवन मूल्यों को बदलना या उनसे समझौता करना ,उसके बस की बात तो थी नही !यह वह अच्छी तरह समझती थी !तभी फोन की घंटी बज उठी !
‘बिटिया आपका फोन है ! अचानक विचारों के सतत प्रवाह को ईश्वर काका की आवाज ने टोक दिया
!यह ईश्वर काका भी …..

पापा के समय से ही वह उसके साथ है !और आज भी उसी समर्पित भाव से उसकी देख भाल करते है !उससे भी बढ़ कर पितृ तुल्य स्नेह देते है !उन्ही के कारण वह घर से निश्चिन्त होकर फैक्ट्री का कार्य भार संभालती है !ढेरसारे पेड़पौधों से भरा ,विस्तृत पृष्ठ भूमि में संजोया ,यह छोटा सा घर उसे सही मायने में सन्तुष्टि और चैन देता है !दुनिया की चालबाजियों ,मायावी द्वन्द फंदों से अब वह उकता चुकी है ! लेकिन बंदी के कगार पर खड़ी उसकी फैक्ट्री …..ओह …तनाव के कारण उसका सर दुखने लगा था !

उसने आखिर इतना गलत फैसला लिया ही क्यों ? उसे तो किसी यूनिवर्सिटी ,में प्रोफ़ेसर आदि होना चाहिए था !या फिर किसी पत्रिका का संपादक जैसा ही कुछ …जहाँवह स्वयं को वास्तविक रूप में अभिव्यक्त कर सकती थी !उमड़ते विचारों को स्थायित्व दे सकती थी !आज उसे रह -रह कर पिता की शिक्षा पर भी क्रोध आ रहा था …. भला सच्चाई और ईमानदारी से कहीं आज के जमाने में सफलता मिल सकती है ? वातावरण में चारों और बिखरी घुटन और हताशा उस पर पूरी तरह हावी होने लगी थी ! ‘बिटिया आपका फोन है ,आपने बात नही की ….’
थोड़ी ही देर बाद उसके लिए नाश्ता लेकर लौटे ,ईश्वर काका ने फोन का रिसीवर अलग रखा देखा तो आश्चर्य से पूछ बैठे ,पहले तो कभी इतना सोंच में डूबा सुष्मिता को उन्होंने नही देखा था !
..’जरुर कोई बड़ी बात है ….’


ईश्वर काका के माथे पर उभर आई बुढापे की लकीरों में ,चिंता की लकीरे भी सम्मलित हो गयी ! ..उन्होंने चुप चाप फोन का रिसीवर ठीक से रखा ,और बिना कुछ कहे वापस किचन में चले गए !सुष्मिता का अनकहा दुःख वे भली भांति समझते थे ..लेकिन उसके अड़ियल और जिद्दी स्वभाव को भी बचपन से जानते थे ! थोड़ी ही देर में फोन की घंटी फिर से बजी ,इस बार सुष्मिता ने स्वयं ही फोन उठाया ,’हेलो ..,मालकिन ..मालकिन ..’ ‘हाँ ..हाँ..बोलो किशन …’ ‘आज आप आई नही …करतार की नई बिल्डिग पर इनकम टैक्स वालों की रेड पड़ गयी है …..हेलो…हेलो…’ लेकिन तब तक बिना कुछ कहे ,बिना कुछ सुने ,सुष्मिता ने फोन रख दिया था ! वह इस ख़बर से जैसे जड़ हो गयी !और पुन:उसी मुद्रा में कुर्सी पर बैठ गयी !

खिड़की से आती मन्द बासंतिक हवा ,और खिली -खिली धूप ने जैसे उसके चेहरे से ,चिन्ता परेशानियाँ, और कशमकश के बादलों को किनारे हटाना शुरु कर दिया ,थोड़ी ही देर में उसने स्वयं को ,फिर उसी उर्जा से परिपूर्ण कर लिया ,और अपने सोये हुए सबेरे को जगा कर उठ खड़ी हुई ! ‘ईश्वर काका ,मेरा बैग कहाँ है? मुझे ऑफिस पहुँचना है ,जल्दी करो …’अचानक उल्लास से भीगा स्वर सुन कर ,ईश्वर काका निहाल हो गये !अपनी प्यारी बिटिया की निर्णयात्मक दृढता ,और उन्मुक्त जिजीविषा को उन्होंने तुरंत पहचान लिया !उनके माथे की लकीरों में अब प्रभु से प्रार्थना की कपँकपाहट उभरने लगी थी !अगले ही पल सुष्मिता की गाड़ी सड़क पर दौड़ रही थी !दूर समुन्द्र की उछलती चमकती लहरों में बार -बार उसको अपने पिता का चेहरा,दिखाई दे रहा था !जो उससे कह रहे थे ,कि’ झूठ और बेइमानी की आयु जितनी विद्युत रेखा के समान चकाचौंध भरी होती है ,उतनी ही क्षणिक और विनाश कारी भी होती है ,जो स्वयं तो जलती ही है , साथ में दूसरों का घर भी जला देती है !