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सामाजिक परिवर्तन के अगुआ शाहूजी महाराज

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ललिता धारा


आम्बेडकर कालेज आॅफ कामर्स एण्ड इकानामिक्स, पुणे के गणित व सांख्यिकी विभाग की अध्यक्ष और संस्थान की उपप्राचार्या. ‘फुलेज एण्ड वीमेन्स क्वश्चन (2011) का सम्पादन । संपर्क : lali.dhara@gmail.com .

शाहू जी महाराज पर किनके और कौनसे प्रभाव थे? जब उन्होंने सत्ता संभाली, तब ज़मीनी हालात कैसे थे? उनके सुधारों के पीछे कौन सी प्रेरक शक्तियां थीं? तत्कालीन परिस्थितियों के कारण उन पर किस तरह की सीमाएं थीं? यहां हम कोल्हापुर के क्रांतिकारी शासक शाहू को समझने का विनम्र प्रयास कर रहे हैं.

सन 1884 में जब शाहू को विधिवत गोद लेकर गद्दी का उत्तराधिकारी घोषित किया गया, तब वे केवल दस वर्ष के थे. उनका राजतिलक 1894 में हुआ. जब उनकी आयु 20 वर्ष की थी. इन दस वर्षों में उनकी शिक्षा-दीक्षा एक सहृदय, न्यायप्रिय और उदारवादी अंग्रेज़ स्टुअर्ट फ्रेजर की देखभाल में हुई. राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, विज्ञान और भाषाओं के अतिरिक्त, शाहू को जो किताबें पढ़वाई गईं उनमें से एक थी महात्मा फुले के मित्र और विश्वासपात्र मामा परमानंद की पुस्तक ‘लैटर्स टू एन इंडियन राजा’. इस पुस्तक में प्रकाशित पत्रों में शिवाजी को किसानों का नेता और अकबर को एक न्यायप्रिय शासक बताया गया था. ऐसा माना जाता है कि इस पुस्तक का युवा शाहू पर गहरा प्रभाव पड़ा. उन्हें तीन बार पूरे देश के भ्रमण पर भी ले जाया गया. कोल्हापुर के होने वाले राजा ने अपने राज्य का भी विस्तृत दौरा किया. इन यात्राओं के दौरान उन्होंने किसानों, चरवाहों और अन्य सामान्य लोगों के साथ चर्चाएं कीं. स्वभाव से ही संवेदनशील और दयालु होने के कारण, शाहू पर आमजनों की घोर गरीबी, उनके जातिगत दमन और शोषण का गहरा प्रभाव पड़ा. इन यात्राओं ने उन्हें आम लोगों की वंचना से परिचित करवाया और उनकी सोच के क्षितिज को विस्तार दिया.

19वीं सदी के महाराष्ट्र में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में ब्राह्मणों का वर्चस्व था. केवल वे ही उस आधुनिक पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे से लाभ उठाने में सक्षम थे, जिन्हें अंग्रेज़ उस इलाके में शनैः-शनैः स्थापित कर रहे थे. प्रशासन और शिक्षा व्यवस्था पर ब्राह्मणों का कब्ज़ा था और वे अन्य सभी को इनसे बाहर रखते थे. कुटिल ब्राह्मण अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए ऐसा दिखाते थे कि मानो समाज केवल दो हिस्सों में बंटा है-ऊँची जाति के ब्राह्मण और नीची जाति के शूद्र. जाति के पिरामिड के शीर्ष पर से एक के बाद एक जातियां नीची ढकेली जा रही थीं. इनमें राजघरानों के सदस्य शामिल थे, जो जातिगत पदक्रम में ब्राह्मणों के  नीचे थे।

जब शाहू ने 1894 में कोल्हापुर की सत्ता संभाली तब उन्होंने पाया कि उनके प्रशासन पर ब्राह्मणों का एकाधिकार है. उन्हें यह महसूस हुआ कि यह एकाधिकार, ब्रिटिश राज से भी ज्यादा खतरनाक है. उस समय तक महात्मा फुले और सावित्री बाई फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज की गतिविधियां और प्रभाव बहुत क्षीण हो गए थे. ब्राह्मणों के वर्चस्व को चुनौती देने वाला कोई ज़मीनी आंदोलन नहीं था. शाहू की शक्तियां भी सीमित थीं. वे एक तरह से अंग्रेज़ों के अधीन जागीरदार थे. वे अंग्रेज़ों को नाराज़ नहीं कर सकते थे,  क्योंकि ऐसा होने पर यह खतरा था कि अंग्रेज़ उनके राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बना लेते. उन्हें काम करने की पूरी स्वतंत्रता नहीं थी.

राजकाज संभालने के कुछ ही दिनों बाद उनका ब्राह्मणों से ‘वेदोक्त’ मुद्दे पर टकराव हो गया. सन 1889 में जब वे स्नान कर रहे थे तब उन्हें पता चला कि ब्राह्मण राजपुरोहित, जिसका यह कर्तव्य था कि वह राजा के लिए वैदिक कर्मकांड करे, उन्हें धोखा दे रहा था और वैसे कर्मकांड कर रहा था, जिन्हें पूर्णोक्त कहा जाता है और जो शूद्रों के लिए होते हैं. इससे शाहू बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्राह्मणों के जातिगत अहंकार के विरूद्ध मोर्चा खोल दिया. यहीं से उनकी वह लंबी यात्रा शुरू हुई, जिसके दौरान उन्होंने दूरगामी सामाजिक और कानूनी सुधार किए, जिनसे ब्राह्मणों का पारंपरिक वर्चस्व समाप्त हो सके और पिछड़े वर्गों के लोग उच्च पदों पर आसीन हो सकें.



इस घटना के तुरंत बाद उन्होंने अपना क्रांतिकारी घोषणापत्र जारी किया, जिसके अंतर्गत शासकीय नौकरियों में दमित वर्गों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया. प्रारंभ में वे भले ही अपने व्यक्तिगत जातिगत अपमान से प्रेरित रहे हों, परंतु बाद में वे जाति के कारण दमन और शोषण का शिकार हो रहे सभी लोगों के प्रति संवेदनशील बन गए. इन वर्गों के प्रति उनके मन में गहरी संवेदना और सहानुभूति थी. परंतु उन्होंने केवल इन वर्गों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रूख अपनाने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा. उन्होंने कई ऐसे मौलिक कानून बनाए जिससे पदक्रम-आधारित जातिगत ढांचा उलट सके और ब्राह्मणों को उनकी उच्च स्थिति से अपदस्थ किया जा सके. इस तरह उन्होंने इतिहास रचा और स्वयं को देश का एक अनूठा शासक सिद्ध किया.

फुले से समानताएं और विभिन्नताएं

शाहूजी ने जो कुछ किया, उस पर फुले की छाप स्पष्ट दिखलाई देती है. फुले ने ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक जाति व्यवस्था की कड़ी आलोचना की थी, जो महिलाओं, शूद्रों और अतिशूद्रों को गुलाम और अज्ञानी बनाए रखना चाहती थी. फुले ने इन वर्गों का आह्वान किया कि वे ब्राह्मण शेठजी/भट्टजी – पुरोहित, सामंत और साहूकार – के गठबंधन की चालबाज़ियों का विरोध करें. इसके लिए सबसे पहले ज़रूरी था कि दमित वर्गों को शिक्षित किया जाए. फुले को आशा थी कि शिक्षा और एकजुटता के सहारे दमित वर्ग ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था के ढांचे का ध्वंस कर सकेंगे.

शाहू ने फुले के शिक्षा के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करने का प्रयास किया. उन्होंने अछूत प्रथा को उखाड़ फेंकने की कोशिश भी की और ब्राह्मण पुरोहितों के चंगुल से अपने प्रजाजनों को मुक्त कराने की दिशा में कदम उठाए. उन्होंने ब्राह्मण नौकरशाही की रीढ़ तोड़ने का प्रयास भी किया. परंतु जैसा कि पहले बताया जा चुका है, वे अंग्रेज़ों के अधीन थे और पूरी तरह से स्वतंत्रतापूर्वक काम नहीं कर सकते थे. अंग्रेज़ उन पर कड़ी नज़र रखते थे. इसके अतिरिक्त, उनकी प्रशासनिक मशीनरी, जिस पर ब्राह्मणों का नियंत्रण था, भी उनके रास्ते में रोड़े अटकाती थी. अपने शासनकाल के अंत तक उन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों और कार्यों के चलते ब्राह्मणों को इतना अधिक नाराज़ कर लिया था कि वे उन पर कई तरह के बेबुनियाद आरोप लगाने लगे थे. इस हमले से मुकाबला करने के लिए उन्हें विदेशी शासकों से हाथ मिलाना पड़ा. उन्होंने यह घोषित किया कि उनका सत्यशोधक समाज से कोई लेनादेना नहीं है और यह भी कि वे आर्य समाज के समर्थक हैं. आर्य समाज, जो जातिगत भेदभाव को तो खारिज करता था परंतु वेदों की पवित्रता में विश्वास रखता था, अंग्रेज़ों को आमूल परिवर्तनवादी सत्यशोधक समाज से अधिक स्वीकार्य था.

शाहू न केवल राजा थे वरन जातिगत पदक्रम में भी वे फुले से काफी ऊपर थे. फुले, मूलतः किसान थे और शूद्र भी. शाहू, फुले की तरह क्रांतिकारी नहीं बन सकते थे. फुले, ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था के पूर्ण ध्वंस और पुरोहितों की भक्त व उसके भगवान के बीच मध्यस्थता की समाप्ति के हामी थे. शाहू ने केवल ब्राह्मण पुरोहितों को अन्य जातियों के पुरोहितों से प्रतिस्थापित किया। शासक होने के कारण भी उनकी सोच फुले से भिन्न थी। वे ब्राह्मणवाद को खारिज तो करते थे परंतु न केवल स्वयं बल्कि अन्यों के लिए ब्राह्मणों का दर्जा भी चाहते थे।

इन सीमाओं और बाधाओं के बावजूद उन्होंने जातिगत भेदभाव मिटाने, अछूत प्रथा को समाप्त करने और आमजनों को शिक्षित करने के लिए जो कदम उठाए, उनका इतना गहरा प्रभाव पड़ा जितनी शाहू ने स्वयं भी कल्पना नहीं की होगी. उन्होंने पददलितों को जागृत कर दिया और उनके मन में एक समतावादी समाज का हिस्सा बनने की महत्वाकांक्षा पैदा कर दी. उन्होंने दमितों का पूर्ण समर्थन किया परंतु वे अपने वर्गीय  हितों के संरक्षण के प्रति भी सजग थे। सौभाग्यवश, ये दोनों उद्देश्य एक दूसरे के पूरक थे। अंततः उन्होंने जिन सामाजिक शक्तियों को खड़ा किया, उनका प्रभाव उनके राज्य के बाहर भी पड़ा। .


आंबेडकरः शाहू की विरासत और उससे आगे 


शाहू, डा. आंबेडकर के अनन्य प्रशंसक थे और दमित वर्गों के नेता के रूप में उन्हें मान्यता देते थे. आंबेडकर भी शाहू पर श्रद्धा रखते थे और उन्हें आमजनों और उनके हितों का संरक्षक और हिमायती मानते थे. बाबासाहेब, शाहू की ‘सकारात्मक भेदभाव’ की नीतियों और कार्यक्रमों से बहुत प्रभावित थे. जब आंबेडकर स्वतंत्रता के बाद देश के विधिमंत्री बने, तब उन्होंने शाहू के सामाजिक-कानूनी सुधारों को आगे बढ़ाया. इनमें शामिल था वंचित वर्गों के लिए आरक्षण और हिन्दू विधि को संहिताबद्ध कर पूरे देश पर लागू करने का प्रयास. परंतु दोनों के बीच महत्वपूर्ण अंतर भी थे. जहां शाहू एक राजा थे वहीं आंबेडकर एक अछूत थे. इसलिए आश्चर्य नहीं कि शाहू की तुलना में आंबेडकर  जाति के उन्मूलन के एजेंडे के प्रति अधिक प्रतिबद्ध थे.

आंबेडकर की जाति की विवेचना और समझ, अद्वितीय और मौलिक थी. आंबेडकर जाति प्रथा को एक ऐसे श्रेणीबद्ध पदक्रम के रूप में देखते थे जिसमें जातियां श्रद्धा के बढ़ते हुए और तिरस्कार के घटते हुए क्रम में जमी हुई थीं. इस कारण इस बात की आशा कम ही थी कि विभिन्न दमित जातियां एक होकर व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करंेगी. इस मामले में वे फुले से भिन्न मत रखते थे. फुले की मान्यता थी कि स्त्रियां, शूद्र और अतिशूद्र एकजूट हो ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष कर सकते हैं. आंबेडकर का मानना था कि ऐसा होने की कोई संभावना नहीं है और इसलिए उन्होंने हिन्दू धर्म को छोड़कर समतावादी बौद्ध धर्म को अंगीकार किया और अपने समर्थकों को भी ऐसा ही करने की प्रेरणा दी.

फुले, शाहू और आंबेडकर में कई समानताएं थीं. तीनों ने अंग्रेज़ी शिक्षा ग्रहण की थी और उन पर उदारवादी, पश्चिमी चिंतकों का प्रभाव था. फुले, थाॅमस पेन की पुस्तक ‘राईट्स आफ मेन’ से बहुत प्रभावित थे. आंबेडकर, जानेमाने बुद्धिजीवी, मानवतावादी और कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनके प्रोफेसर जान डेवी के उत्कट अनुयायी थे. शाहू, अपने गुरू फ्रेज़र से बहुत प्रेम और सम्मान करते थे. वे अमरीकी मिशनरियों के भी प्रशंसक थे, विशेषकर डा. वानलेस व डा. वेलके के, जिनकी सोच समतावादी थी और जो दबे-कुचले वर्गों के बीच काम करते थे. तीनों ने ब्राह्मणों के हाथों अपमान भोगा था और तीनों ही इतने परिपक्व थे कि वे यह समझ सकें कि उनके व्यक्तिगत जख्मों का कारण जाति व्यवस्था थी. तीनों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव से ऊपर उठकर सभी के लिए संघर्ष किया. तीनों यह मानते थे कि शिक्षा, दमित वर्गों की मुक्ति की कुंजी  है. तीनों ने अपनी सोच को अलग-अलग शब्दों में व्यक्त किया. फुले के शब्दों में शिक्षा लोगों के लिए ‘तृतीय रत्न’ का द्वार खोलेगी और वे यह समझ सकेंगे कि उनका शोषण हो रहा है और उसके विरूद्ध संघर्ष कर सकेंगे. शाहू ने अपनी जनता को ज्ञान प्राप्त करने, एकजुट होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया. आंबेडकर ने शिक्षा, आंदोलन और संगठन पर ज़ोर दिया.

शाहू के कानूनी सुधारों की विरासत


तीनों के बीच समानताओं के बावजूद, दुनिया को देखने की उनकी दृष्टि अलग-अलग थी क्योंकि वे जाति की सीढ़ी के अलग-अलग पायदानों पर खड़े थे. तीनों में से शाहू की स्थिति सबसे अलग थी. वे  एक  राजा  थे। वेदोक्त मुद्दा, शाहू के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया और इसे उन्होंने  ब्राह्मणों के खिलाफ युद्ध में परिवर्तित कर दिया. परंतु उन्होंने अपनी इस लड़ाई में जातिगत पदक्रम में अपने से नीचे के वर्गों को भी शामिल किया और एक सच्चे समावेशी समाज का निर्माण करने की कोशिश की. उन्होंने इसके लिए एक अनूठा तरीका अपनाया. उन्होंने जातिगत पदक्रम के दोनों छोरों पर प्रहार किए. एक ओर उन्होंने शासन में ब्राह्मणों के वर्चस्व को कम करने का प्रयास किया तो दूसरी ओर दमित वर्गों को शिक्षा प्राप्त करने और आगे बढ़ने के अधिकाधिक अवसर उपलब्ध करवाए. मध्यम जातियों के मामले में उनकी रणनीति अलग थी. उन्होंने इन जातियों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे अपने विश्वस्त नेताओं के नेतृत्व में अपना विकास करें. उन्होंने विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग होस्टल खोले. उन्होंने विभिन्न जातियों के लोगों को एक साथ खाने-पीने और आपस में विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया. इन सब कारणों से उन्हें महाराष्ट्र के सामाजिक इतिहास में एक अद्वितीय स्थान प्राप्त हुआ. उन्हें राजश्री की उपाधि से नवाज़ा गया और ‘‘सामाजिक प्रजातंत्र का स्तम्भ’’ निरूपित किया गया. वे महाराष्ट्र के गैर-ब्राह्मण आंदोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी थे. इस आंदोलन ने आगे चलकर महाराष्ट्र के सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला. उनके अप्रितम और अभूतपूर्व योगदानों में शामिल हैं तीन नए कानून. पहला, पिछड़े वर्गों के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण, दूसरा, प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण और तीसरा, महिलाओं के साथ क्रूरता का प्रतिषेध. ये तीनों ही कदम स्वतंत्र भारत में आरक्षण, शिक्षा का अधिकार अधिनियम और घरेलू हिंसा प्रतिषेध अधिनियम के रूप में हमारे सामने है.


फुले, शाहू, आंबेडकरः लैंगिक क्रांतिकारी


लैंगिक मुद्दों पर भी इन तीनों सामाजिक क्रांतिकारियों में कई समानताएं थीं और तीनों ने लैंगिक न्याय के लिए काम किया. फुले, शाहू और आंबेडकर को यह सहजबोध था कि जाति और पितृसत्तात्मकता के बीच अपवित्र गठबंधन है और वे एक-दूसरे को मज़बूती देती है. यह कहना मुश्किल है कि कहां जाति का अंत होता है और पितृसत्तात्मकता शुरू होती है. उनका यह भी मानना था कि ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक जाति पदक्रम महिलाओं और ‘नीची जातियों’ को हमेशा अपने अधीन रखना चाहता है ताकि उसकी सत्ता बनी रहे. इसलिए तीनों ने इन दोनों वर्गों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया. फुले ने दमनकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए स्त्रियों, शूद्रों और अतिशूद्रों की एकता की वकालत की. उनके अनुसार इन वर्गों के पास खोने के लिए फकत पांव की जंज़ीरें ही थीं. तीनों समाज सुधारकों ने इन वर्गों की भरसक सहायता करने की कोशिश की और व्यवस्था को उखाड़ फेकने के साथ-साथ उसमें इन वर्गों की स्थिति को बेहतर बनाने का प्रयास भी किया.

फुले ने महिलाओं के लिए स्कूल खोले, विधवा आश्रम स्थापित किया और विधवाओं के पुनर्विवाह करवाए. शाहू ने देवदासी प्रथा और घरेलू हिंसा के खिलाफ कड़े कानून बनाए और अंतर्जातीय व अंतर्धामिक विवाहों और विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता दी. वे इस तथ्य से वाकिफ थे कि किस तरह महिलाओं को परोक्ष ढंग से प्रताड़ित किया जाता है. उन्होंने एक आदेश जारी कर होली के त्योहार पर नशे में महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार अथवा छींटाकसी को प्रतिबंधित किया. उन्होंने महिलाओं की वयस्कता की आयु को पुरूषों की तरह 18 वर्ष घोषित किया. आंबेडकर ने संविधान के ज़रिए महिलाओं को समान दर्जा दिया. उन्होंने महिला श्रमिकों के लिए सवैतनिक मातृत्व अवकाश की व्यवस्था करवाई और इस बात पर ज़ोर दिया कि महिलाओं को यह निर्णय करने का अधिकार होना चाहिए कि वे कब और कितने बच्चे पैदा करें. आंबेडकर सामाजिक उत्पादन में महिलाओं की भूमिका को समझते थे. उन्होंने यह कोशिश भी की कि महिलाओं को उत्तराधिकार में संपत्ति प्राप्त करने का पुरूषों के बराबर अधिकार मिल सके

शाहू, फुले और आंबेडकर के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी थे. आंबेडकर और फुले 19वीं व 20वीं सदी के पूर्वार्ध में महाराष्ट्र में उभरे महिला मुक्ति आंदोलन के अगुवा थे. शाहू ने जो मशाल फुले से ली थी, वह उन्होंने आंबेडकर को सौंपी. यह उनका ऐतिहासिक, क्रांतिकारी और लैंगिक न्याय को आगे बढ़ाने वाला योगदान था.

साभार :फारवर्ड प्रेस 

तीन तलाक, समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार: अंतिम किस्त

जावेद अनीस

एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com
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अंतिम क़िस्त 



● इस्लाम क्या कहता है 

इस्लाम में जायज़ कामों में तलाक को सबसे बुरा काम कहा गया है. कुरआन में कहा गया है कि जहां तक मुमकिन हो तलाक से बचो और यदि तलाक करना ही हो तो हर सूरत में न्यायपूर्ण ढंग से हो और तलाक में पत्नी के हित और उसके जीवनयापन के इंतजाम को ध्यान में रखा जाए.


जामिया मिलिया इस्लामिया में इस्लामी अध्ययन विभाग के प्रोफेसर जुनैद हारिस के अनुसार “हमारे देश में एक साथ तीन तलाक की जो व्यवस्था है और पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिसे मान्यता दी है वो पूरी तरह कुरान और इस्लाम के मुताबिक नहीं है. तलाक की पूरी व्यवस्था को लोगों ने अपनी सहूलियत के मुताबिक बना दिया है. इसमें कुरान के मुताबिक संशोधन की सख्त जरूरत है”.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ज़किया सोमन कहती हैं कि “कुरआन के मुताबिक, शादी एक सामाजिक करार है. एक आदर्श करार में दोनों पक्षों की शर्तें दर्ज होनी चाहिए. निकाहनामा का यही महत्त्व है. अच्छे निकाहनामा में मैहर की रकम, शादी की शर्तें, बहुपत्नीत्व पर रोक की बात, तलाक का तरीका और शर्त इत्यादि दर्ज होनी चाहिए. लेकिन असल ज़िन्दगी में यह होता नहीं है”.




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तीन तलाक, समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार


● दुनिया में चलन

दरअसल एक झटके में तीन बार ‘तलाक, तलाक, तलाक’ बोल कर बीवी से छुटकारा हासिल करने का चलन दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व एशिया में ही है और यहाँ भी ज्यादातर सुन्नी मुसलमानों के बीच ही इसकी वैधता है. मिस्र पहला देश था जिसने 1929 में तीन तलाक पर रोक लगा दिया था. आज ज्यादातर मुस्लिम देशों जिनमें पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल हैं ने अपने यहां सीधे-सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से तीन बार तलाक की प्रथा खत्म कर दी है. जानकार श्रीलंका में तीन तलाक के मुद्दे पर बने कानून को आदर्श बताते हैं. तकरीबन 10 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले श्रीलंका में शौहर को तलाक देने के लिए काजी को इसकी सूचना देनी होती है. इसके बाद अगले 30 दिन के भीतर काजी मियां-बीवी के बीच सुलह करवाने की कोशिश करता है. इस समयावधि के बाद अगर सुलह नहीं हो सके तो काजी और दो चश्मदीदों के सामने तलाक हो सकता है.

● संघ परिवार के घड़ियाली आंसू

हमारे देश में तीन तलाक के मुद्दे पर सभी राजनीतिक दल सुविधा की राजनीति कर रहे हैं और  इस मामले में उनका रुख अपना सियासी नफा-नुकसान देखकर ही तय होता है. वर्तमान में केंद्र में दक्षिणपंथी सरकार है जिसको लेकर अल्पसंख्यकों में आशंका की भावना व्यापत है और इसके किसी भी कदम को लेकर उनमें भरोसा नहीं है.

केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने लेख में लिखा है कि “पर्सनल लॉ को संविधान के दायरे में होना चाहिए और ऐसे में ‘एक साथ तीन बार तलाक बोलने’ को समानता तथा सम्मान के साथ जीने के अधिकार के मानदंडों पर कसा जाना चाहिए”. वहीँ मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के कार्यकारिणी सदस्य जफरयाब जिलानी के अनुसार इसके बहाने बीजेपी समान नागरिक संहिता लागू करना चाहती है जो कि उसके चुनावी घोषणापत्र में पहले से मौजूद है. वह कहते हैं कि “हमारा स्टैंड साफ है. इससे सरकार की असलियत खुल गई है कि वह पर्सनल लॉ में धीरे-धीरे घुसपैठ करना चाहती है.”

प्रश्न यह भी है कि जिस समय मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन जैसे संगठनों का तीन तलाक की रिवायत को खत्म करने का अभियान जोर पकड़ रहा था और इसका असर भी दिखाई पड़ने लगा था ऐसे में सरकार द्वारा विधि आयोग के माध्यम से सुनियोजित तरीके से समान नागरिक संहिता का शगूफा क्यों छोड़ा गया? इससे तीन तलाक का अभियान कमजोर हुआ है. सरकार के इस कदम पर मुस्लिम महिला संगठनों ने भी सवाल उठाये हैं.

सवाल यह भी है कि भाजपा और संघ परिवार अचानक मुस्लिम महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए इतने आतुर क्यों दिखाई पड़ रहे हैं? जिनके दामन पर बाबरी मस्जिद ढहाने और गुजरात के दंगों का दाग हो उनमें अचानक मुस्लिम समाज में सुधार की इतनी सहानुभूति क्यों पैदा हो गयी है? कहीं यह महज घड़ियाली आंसू तो नहीं हैं जिसके निशाने पर मुस्लिम औरतों के अधिकार दिलाने के बहाने कुछ और हो.

इसका जवाब सितम्बर माह में केरल के कोझिकोड में आयोजित बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में है जिसमें उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय को याद करते हुआ कहा था कि “दीनदयाल जी का कहना था कि मुसलमानों को न पुरस्कृत करो न ही तिरस्कृत करो बल्कि उनका परिष्कार किया जाए”. यहाँ  “परिष्कार” शब्द पर ध्यान देने की जरूरत है जिसका मतलब होता है “ प्यूरीफाई ” यानी शुद्ध करना. हिंदुत्ववादी खेमे में “परिष्कार” शब्द का विशेष अर्थ है जिसे समझना जरूरी है दरअसल हिंदुत्व के सिद्धांतकार विनायक दामोदर सावरकर  मानते थे कि ‘चूकिं इस्लाम और ईसाईयत का जन्म भारत की धरती पर नहीं हुआ था इसलिए मुसलमान और ईसाइयों की भारत पितृभूमि नहीं हैं, उनके धर्म, संस्कृति और पुराणशास्त्र भी विदेशी हैं इसलिए इनका राष्ट्रीयकरण (शुद्धिकरण) करना जरुरी है.पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने “परिष्कार” शब्द का विचार सावरकर से लिया था जिसका नरेंद्र मोदी उल्लेख कर रहे थे. पिछले दिनों संघ परिवार द्वारा चलाया “घर वापसी अभियान” खासा चर्चित हुआ था. संघ परिवार और भाजपा का मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को लेकर चिंता, समान नागरिक संहिता का राग इसी सन्दर्भ में समझा जाना चाहिए.

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● क्या किया जाना चाहिए 

हर बार जब मुस्लिम समाज के अन्दर से सुधार की मांग उठती है तो शरिया का हवाला देकर इसे दबाने की कोशिश की जाती है. इस मामले में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठन किसी संवाद और बहस के लिए भी तैयार नहीं होते हैं. इसलिए सबसे पहले तो जरूरी है कि तीन तलाक और अन्य कुरीतियों को लेकर समाज में स्वस्थ्य और खुली बहस चले और अन्दर से उठाये गये सवालों को दबाया ना जाए .

इसी तरह से अगर समाज की महिलायें पूछ रही हैं कि चार शादी  शादी के तरीकों, बेटियों को  जायदाद में उनका वाजिब हिस्सा देने जैसे मामलों में कुरआन और शरियत का पालन क्यों नहीं किया जा रहा है, तो इन सवालों को सुना जाना चाहिए और अपने अंदर से ही इसका हल निकालने की कोशिश की जानी चाहिय.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संघटनों को संघ परिवार की राजनीति भी समझनी चाहिए जो चाहते ही है कि आप इसी तरह प्रतिक्रिया दें ताकी माहौल बनाया जा सके .इसलिए बोर्ड को चाहिए की वे आक्रोश दिखाने के बजाये सुधारों के बारे में गंभीरता से सोचे और ऐसा कोई मौका ना दे जिससे संघ परिवार अपनी राजनीति में कामयाब हो सके. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को  दूसरे मुस्लिम देशों में हुए सुधारों का अध्ययन करने की भी जरूरत है .

सुधार की एक छोटी से शुरुआत भोपाल से देखने को मिली है जहाँ साल 2010 से ही दारुल क़ज़ा (शरियत कोर्ट) ने तीन तलाक पर अर्जी लेना बंद कर दिया है. (हालांकि तीन तलाक पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध नहीं लगाया गया है) पिछले दिनों इस बारे में भोपाल शहर काजी सैयद मुस्ताक अली नदवी ने एक आखबार तो बताया था कि “शरिया कानून कुछ दुर्लभ मामलों को छोड़ कर एकतरफा तलाक की इजाजत नहीं देता है इसलिए यह बेहतर है कि इस प्रथा के चलन को हतोत्साहित किया जाये”. इसी तरह से सितम्बर माह में ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी अपना मार्डन निकाहनामा पेश किया है. उम्मीद है सुधार का यह सिलसिला आगे बढ़ेगा.
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● ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड का “सनद-ए-निकाह” (मॉडर्न निकाहनामा)  

सितम्बर 2016 में ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपना ‘सनद-ए-निकाह’(मॉडर्न निकाहनामा) पेश किया है. इस निकाहनामे में पति द्वारा तीन बार तलाक कहकर रिश्ता तोड़ने को गैर इस्लामिक बताया गया है और दो विशेष परिस्थितियों में महिलाओं को भी तलाक का अधिकार दिया गया है।


निकाहनामे की प्रमुख बातें 

▪ तीन बार बोलकर तलाक की प्रथा खत्म हो.
▪ पुरुष के अकेले के चाहने से तलाक नहीं दिया जा सकेगा.
▪ एक बैठक में भी तलाक नहीं होगा.
▪ पति-पत्नी आपस में बात करें,बात न बने तो दोनों के परिवार साथ बैठकर बात करेंगे.
▪ यह कुछ दिनों के अंतराल पर होगा ताकि किसी पक्ष में गुस्सा है तो उसे शांत करने का समय मिलेगा.
▪ पति-पत्नी फिर से बातचीत करेंगे, जिसमें अंतिम निर्णय लिया जाएगा.

दो स्थितियों में पत्नी को तलाक का हक दिया गया है .

▪ अगर पति बार-बार गायब होता है और जीने के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं देता है ऐसा चार साल तक चले तो पत्नी तलाक दे सकती है.

अगर पति ताकत का उपयोग कर पत्नी को शारीरिक नुकसान पहुंचाता है, उसे अपाहिज करने का खतरा पैदा करता है, अपने दोस्तों के साथ संबंध बनाने के लिए कहता है, तो दोनों स्थितियों में पत्नी अपने पति को तलाक दे सकती है.

तीन तलाक, समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार: पहली किस्त

जावेद अनीस

एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com
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तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह से शुरू हुई बहस समान नागरिक संहिता तक पहुँचा दी गयी है. समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड) स्वतंत्र भारत के कुछ सबसे विवादित मुद्दों में से एक रहा है और वर्तमान में केंद्र की सत्ता पर काबिज पार्टी और उसके पितृ संगठन द्वारा इस मुद्दे को लम्बे समय से उठाया जाता रहा है. यूनिफार्म सिविल कोड लागू कराना उनके हिन्दुतत्व के एजेंडे का हिस्सा है. सत्तारूढ़ भाजपा के चुनावी एजेंडे में हिन्दुतत्व के तीन मुद्दे शामिल हैं -अनुच्छेद 370 की समाप्ति, राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण और समान नागरिक संहिता लागू करना. इन तीनों मुद्दों का सम्बन्ध किसी ना किसी तरह से अल्पसंख्यक समुदायों से है और इन्हें उठाने का मकसद बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय को एकजुट करना और अल्पसंख्यक समुदायों पर निशाना साधना रहा है. इसीलिए वर्तमान सरकार जब समान नागरिक संहिता की बात कर रही है तो उसकी नियत पर सवाल उठाये जा रहे हैं.


मुस्लिम महिलाओं की तरफ से समान नागरिक संहिता नहीं बल्कि एकतरफा तीन तलाक़, हलाला व बहुविवाह के खिलाफ आवाज उठायी जा रही है और महिला संगठनों ने इन्हीं मुद्दों को लेकर न्यायालय में कई आवेदन दाख़िल किए थे जिसमें उनकी मांग थी कि तीन तलाक, हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक लगाया जाए और उन्हें भी खुला का हक मिले.


बहरहाल आने वाले महीनों में कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं शायद इसीलिए समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर माहौल गर्म किया जा रहा है. भाजपा और संघ के नेता अचानक मुस्लिम महिलाओं की स्थिति पर खासी चिंतित दिखाई पड़ने लगे हैं वही दूसरी तरह ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कई मुस्लिम संगठन इसके खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं और किसी भी बदलाव को इस्लाम के खिलाफ बता रहे हैं.

● असल मुद्दा क्या है ?

इस पूरे विवाद की शुरुआत विधि आयोग की ओर से तीन तलाक और समान नागरिक संहिता पर लोगों की राय मांगे जाने से हुई थी जिसके बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसके विरोध में खड़े हो गये. जबकि ये दोनों अलग मुद्दे हैं तथा इनको आपस में जोड़ने का मकसद ‘असल मुद्दों से ध्यान हटाना है. पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह कहते हैं कि “तीन तलाक के मुद्दे को अनावश्यक रूप से समान नागरिक संहिता के साथ नत्थी करने से गफलत बढ़ रही है नतीजतन भारत के अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज को तार्किक तौर पर बचाव की मुद्रा में आने को मजबूर होना पड़ रहा है”. दरअसल असली मुद्दा तीन बार तलाक बोल कर शादी तोड़ने और भरण-पोषण का है. सुप्रीम कोर्ट भी इस समय मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ विवादित प्रावधानों की ही समीक्षा कर रहा है जिसमें तीन तलाक, मर्दों को चार शादी की इजाज़त और हलाला शामिल हैं.


केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू कह रहे है कि “तीन तलाक को समान नागरिक संहिता से जोड़कर भ्रम फैलाया जा रहा है.” लेकिन ऐसा कर कौन रहा है ? तीन तलाक पर केंद्र सरकार को समर्थन देने वाली आल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड इसके लिए केंद्र सरकार को ही जिम्मेदार ठहरा रही है. बोर्ड का कहना है कि केंद्र सरकार तीन तलाक का प्रोपगंडा फैला रही है. बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने बयान दिया है कि “तीन तलाक की आड़ में केंद्र सरकार मुसलमानों की शर्रियत में दखलअंदाजी करके कॉमन सिविल कोड लागू करना चाहती है जिसकी बोर्ड मज़म्मत करता है.” दूसरी तरफ भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक जकिया सोमान का आरोप है कि “मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तीन तलाक के मामले को लेकर ‘बैकफुट पर आने’ के बाद इसे समान नागरिक संहिता से जोड़ने की कोशिश कर रहा है”.

जो भी हो तीन तलाक और समान नागरिक संहिता का आपस में घालमेल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह दोनों अलग-अलग चीजें हैं उन्हें उसी हिसाब से समझना चाहिए. यूनिफॉर्म सिविल कोड एक व्यापक विषय है, इसमें पारिवारिक कानूनों में एकरूपता लाने की बात है. यूनिफॉर्म सिविल कोड में व्यापक रूप से विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेना और संपत्ति के बंटवारे जैसे विषय शामिल हैं. यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने का मतलब होगा किसी समुदाय विशेष के लिए शादी, तलाक, उत्तराधिकार जैसे मसलों में अलग नियम नहीं होंगें लेकिन इसका ये मतलब यह भी नहीं है कि इसकी वजह से विवाह मौलवी या पंडित नहीं करवाएंगे. ये परंपराएं बदस्तूर बनी रहेंगी, नागरिकों के खान-पान, पूजा-इबादत, वेश-भूषा पर इसका कोई असर नहीं होगा. हाँ इसके बाद परिवार के सदस्यों के आपसी संबंध और अधिकारों को लेकर जाति-धर्म-परंपरा के आधार पर कोई रियायत नहीं मिलेगी.

लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यूनिफॉर्म सिविल कोड का मसला अकेले मुसलमानों तक सीमित नहीं है. इससे ईसाई, पारसी और आदिवासी समुदाय भी प्रभावित होगें. जामिया मिलिया इस्लामिया में इस्लामी अध्ययन विभाग के प्रोफेसर जुनैद हारिस का कहना है कि,  ‘‘समान नागरिक संहिता के मुद्दे को मुसलमानों से जोड़कर देखना पूरी तरह गलत है यह मुसलमानों का नहीं, बल्कि देश की संस्कृति से जुड़ा मुद्दा है हमारा देश अलग धर्मों, आस्थाओं, परंपराओं और रीति-रिवाजों का एक संग्रहालय है. अलग अलग समुदायों के अपने पर्सनल लॉ हैं. ऐसे में इस मामले को सिर्फ मुस्लिम समुदाय के साथ जोड़कर देखना पूरी तरह गलत है।.’’

तो क्या समान नागरिक संहिता की इस बहस से भाजपा धुर्वीकरण की कोशिश कर रही है इसकी वजह से मुस्लिम समाज के भीतर से उठी प्रगतिशीलता और बदलाव की आवाजें कमजोर पड़ जायेगीं? कांग्रेस नेता और पूर्व कानून मंत्री वीरप्पा मोईली इसे मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने की चाल बताते हुए कहते हैं “जब राम मंदिर और दूसरे मुद्दे धराशायी हो गए तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए यह समाज के ध्रुवीकरण की ख़तरनाक कोशिश है, भारत जैसे बहुसांस्कृतिक, बहुजातीय और बहु-आयामी देश में इसे लागू करना आसान नहीं है”. महिला संगठनों का भी कहना है कि समान नागरिक संहिता को लेकर हो रही राजनीति के चलते तीन तलाक का मुद्दा पीछे छूट सकता है.


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● मुस्लिम महिलाओं की वाजिब समस्यायें और उनकी पहल  

मुस्लिम औरतों की सबसे बड़ी समस्या तीन तलाक है. मर्दों के लिए यह बहुत आसन है कि तीन बार तलाक, तलाक, तलाक कह दिया और सब-कुछ खत्म, इसके बाद मर्द तो दूसरी शादी कर लेते हैं लेकिन आत्मनिर्भर ना होने की वजह से महिलाओं का जीवन बहुत चुनौतीपूर्ण हो जाता है. तलाक के बाद उन्हें भरण-पोषण के लिए गुजारा भत्ता नहीं मिलता और अनेकों  मामलों में तो उन्हें मेहर भी वापस नहीं दी जाती है. कई मामलों में तो ईमेल, वाट्सएप, फोन, एसएमएस के माध्यम से या रिश्तेदारों, काजी से कहलवा कर तलाक दे दिया जाता है. इसी तरह से हलाला का चलन भी एक अमानवीय है. दुर्भाग्यपूर्ण कई मुस्लिम तंजीमों और मौलवीयों द्वारा तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह का समर्थन किया जाता है.

2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में एक तलाकशुदा मुस्लिम पुरुष पर चार तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं का अनुपात है. हालाँकि सिखों को छोड़कर सभी धार्मिक समुदायों में तलाकशुदा पुरुषों की तुलना में तलाकशुदा महिलाओं की संख्या अधिक है लेकिन मुसलमानों में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा 79:21 हैं. इसी तरह से पतियों से अलग रह रही महिलाओं के मामले में भी मुस्लिम समुदाय आगे है. इस समुदाय में अलग रह रही कुल आबादी में 75 फीसदी महिलाएं हैं.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक, नूरजहां सफिया नियाज कहती है कि “भारत में तीन तलाक से काफी संख्या में मुस्लिम महिलाएं पीडि़त हैं. आन्दोलन द्वारा 2015 में देश के दस राज्यों में 4,710 मुस्लिम महिलाओं के बीच किये गये सर्वे के अनुसार सर्वे में शामिल 525 तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ था, जबकि 78 फीसदी का एकतरफा तरीके से तलाक हुआ था. मेहर की बात करें तो 40 फीसदी औरतों को निकाह के वक्त 1000 रुपये से भी कम मेहर मिली थी, जबकि 44 फीसदी महिलायें ऐसी पायी गयीं जिन्हें मेहर की रकम कभी मिली ही नहीं. इसी तरह से ज्यादातर महिलाओं के पास निकाहनामा भी नही था.

सर्वे में दावा किया गया है कि करीब 92.1 फीसदी मुस्लिम महिलाओं ने एकतरफा तलाक और तीन तलाक की पद्धति को बिल्कुल गलत मानते हुए इसे खत्म करने की वकालत की है. 91.2 फीसदी महिलायें बहुविवाह के खिलाफ हैं और मर्दों की चार शादियां करने की छूट पर पाबन्दी चाहती हैं. इसी तरह से 83.3 प्रतिशत महिलाओं ने माना है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए मुस्लिम फैमिली लॉ में सुधार करने की जरूरत है.

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● शाह बानो से शायरा बानो तक

इंदौर की शाह बानो को जब उनके पति ने तलाक दे दिया तो उस समय उनके साथ पांच बच्चे थे लेकिन कमाई का कोई जरिया नहीं था. लिहाजा उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के अंतर्गत अपने पति से भरण पोषण भत्ता दिए जाने की मांग की. न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया. न्यायालय के इस फैसले का भारी विरोध हुआ. आखिरकार राजीव गांधी सरकार ने दबाव में आकर मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित कर दिया. इस अधिनियम के जरिये शाह बानो के पक्ष में आया न्यायालय का फैसला भी पलट दिया गया जिसके विरोध में राजीव मंत्रिमंडल के गृह राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने इस्तीफ़ा दे दिया था.

आज लगभग तीस साल बाद शायरा बानो नाम की एक मुस्लिम महिला ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है. उत्तराखंड की शायरा बानो की साल 2002 में इलाहाबाद में रहने वाले रिजवान अहमद से शादी हुई थी. शायरा के अनुसार अप्रैल 2015 में उनके पति ने उन्हें जबरदस्ती मायके भेज दिया और कुछ समय बाद ‘तीन तलाक’ देते हुए उनसे रिश्ता ही समाप्त कर दिया. इसी तलाक की वैध्यता को चुनौती देते हुए शायरा सर्वोच्च न्यायालय पहुँची हैं. शायरा की याचिका का मुख्य पहलू यह भी है कि याचिका में ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937’ की धारा 2 की संवैधानिकता को भी चुनौती दी गई है. यही वह धारा है जिसके जरिये मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह, ‘तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) और ‘निकाह-हलाला’ जैसी प्रथाओं को वैध्यता मिलती है. इनके साथ ही शायरा ने ‘मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939’ को भी इस तर्क के साथ चुनौती दी है कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं को बहुविवाह जैसी कुरीतियों से संरक्षित करने में सक्षम नहीं है.

कोई भी बदलाव अन्दर से ही होता है और जिस तरह से तीन तलाक जैसे मुद्दे पर इंसाफ के लिए मुस्लिम महिलाएं सामने आईं हैं उसका स्वागत किया जाना चाहिए. इसे मुस्लिम समुदाय में एक सकारात्मक हलचल के तौर पर देखा जाना चाहिए. महिलाओं में आई इस जागरूकता से अब पुरुष भी इस तरफ सोचने पर मजबूर हुए हैं. हमारे देश में तीन तलाक पर पाबंदी की कोशिशें चल रही हैं. इन कोशिशों में देश की मुस्लिम महिलाएं सबसे आगे हैं. वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में अलग-अलग महिलाओं की करीब आधा दर्जन याचिकाएं लंबित हैं. कई राज्यों के सत्र अदालतों तथा कई उच्च न्यायालयों में भी मुस्लिम महिलाओं की याचिकाएं दर्ज हैं.

आल इंडिया मुस्लिम वीमन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता कहती है कि “तीन तलाक की इस प्रक्रिया के खिलाफ सबसे पहले हमने आवाज उठाई थी, हम मांग करते रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय में निकाह, तलाक, दूसरा निकाह तथा विरासत आदि के बारे में प्रावधान कर मुस्लिम मैरिज एक्ट बनाया जाए”.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ीं मारिया सलीम कहती हैं कि “बीएमएम की लड़ाई कुरआन तथा शरियत पर आधारित है, हमारी मांग है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ का संहिताकरण किया जाए. तीन तलाक इस्लाम विरोधी और महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है लिहाजा इसको खत्म किया जाए”.



इसी दिशा में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने “मुस्लिम मैरिज और डाइवोर्स एक्ट” नाम से एक ड्राफ्ट तैयार किया है. इस ड्राफ्ट के तहत मुस्लिम समाज में तीन तलाक, बहुविवाह और मेहर की रकम पर नए कानून बनाए जाने की बात कही गई है. ड्राफ्ट में बोलकर दिए जाने वाले तलाक को खत्म करने की वकालत करते हुए तलाक-ए-अहसान के तरीके को अपनाने की बात कही गई है. इसके तहत तलाक के बाद जोड़ों को आपसी मतभेद सुलझाने के लिए 3 महीने का वक्त दिया जा सकेगा और अगर दोनों सहमत हों तो तलाक की अर्जी वापस भी ली जा सकेगी.

बीएमएमए द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी खत लिखा है. अपने खत में बीएमएमए ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए या तो शरीयत एप्लीकेशन लॉ, 1937 और मुस्लिम मैरिज ऐक्ट, 1939 में संशोधन किए जाए या फिर मुस्लिम पर्सनल कानूनों का एक नया स्वरूप लाया जाए.


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● भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन द्वारा जारी मुस्लिम फैमिली एक्ट का मसौदा 


भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन का पिछले कुछ सालों में कई मुस्लिम महिलाओं, वकीलों, धार्मिक विद्वानों की सलाह व सुझाव से मुस्लिम फैमिली लॉ का एक ड्राफ्ट बनाया है, जिसमें विवाह की उम्र, मेहर, तलाक, बहु-विवाह , निर्वाह-भत्ता (मेंटेनेंस) और बच्चों पर अधिकार जैसे विषय शामिल हैं।


ड्राफ्ट के मुख्य:

▪ शादी की न्यूनतम उम्र , लडकी के लिए 18 और लड़के के लिए 21.
▪ बिना बलप्रयोग के और बिना किसी धोखे के दोनो पार्टी की सहमति
▪ निकाह के समय दुल्हे के एक साल की आय के बराबर का न्यूनतम मेहर
▪ मौखिक तलाक अवैध घोषित हो. तलाक –ए-अहसन 90 दिन के भीतर अनिवार्य आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया से हो
▪ शादी के भीतर निर्वाह की जिम्मेदारी पति पर हो, यद्यपि पत्नी का स्वतंत्र आर्थिक आधार हो, तो भी.
▪ मुस्लिम वीमेंस प्रोटेक्शन ऑन डाइवोर्स एक्ट, 1986 के अनुसार मेंटेंनेस
▪ बहु–विवाह अवैध घोषित हो
▪ माँ और पिता, दोनो बच्चे के प्राकृतिक संरक्षक हों
▪ बच्चे का संरक्षण (कस्टडी) उसके हितों के अनुसार और उसकी इच्छा के अनुरूप हो
▪ हलाला अपराध की श्रेणी में हो
▪ सम्पत्ति के मामले में कुरआन के नियम लागू हों,
▪ लड़कियों को लड़कों की तरह वसीयत/उपहार या हिबा के जरिये संपत्ति में बराबर भाग हो
▪ निकाहों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन हो

मुसलामानों को लेकर गलतफहमी और दुष्प्रचार

मुस्लिम समुदाय भारत का दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय है लेकिन देश के दूसरे धार्मिक समुदायों में इनको लेकर जबरदस्त गलतफहमी व्याप्त है. इस गलतफहमी को बनाने और बढ़ाने में हिन्दुत्ववादी संगठनों की बड़ी भूमिका रही है.ऐसा स्वभाविक रूप से मान लिया जाता है कि एक से अधिक पत्नी रखने के मामले में मुस्लिम समुदाय सबसे आगे है. हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा बहुसंख्यक समुदाय में संख्या का भय पैदा करने के मकसद से यह जोरशोर से दुष्प्रचार भी किया जाता है कि मुसलमान ज्यादा शादी करके ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं और एक दिन ऐसा आएगा कि उनकी आबादी हिंदुओं से ज्यादा हो जाएगी. लेकिन वास्तविकता यह है कि बहुविवाह की घटनाएं मुसलमानों की तुलना में हिंदुओं में अधिक होती हैं। आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं. धर्म और समुदाय आधारित शादियों को लेकर भारत सरकार द्वारा आखिरी सर्वे 1961 में हुआ था. जिसके अनुसार एक से अधिक पत्नी रखने के मामले में मुस्लिम मर्द पांचवे नंबर पर आते हैं। पहले पर आदिवासी, दूसरे पर जैन, तीसरे पायदान पर बौद्ध, चौथे पर हिंदू हैं.

भारत में बहुपत्नी प्रथा की स्थिति ( प्रतिशत में )

आदिवासी-15.25 %
बौद्ध – 7.9
जैन – 6.7
हिंदू – 5.8
मुस्लिम  – 5.7

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इसी तरह से तलाक को लेकर भी गलत भ्रम फैलाया जाता है यह बात सही है कि भारतीय मुसलामानों में एकतरफा तलाक का चलन है और तलाक के बाद महिलाओं को पर्याप्त भरणपोषण भी नहीं मिलता है लेकिन यहाँ तलाक की दर कम है. 2011 की जनगणना के अनुसार तलाकशुदा भारतीय महिलाओं में 23.3 फीसदी मुस्लिम है जबकि 68 फीसदी हिंदू हैं.

● अदालत का रुख 

सुप्रीमकोर्ट पहले भी कह चूका है कि अगर सती प्रथा बंद हो सकती है तो बहुविवाह एवं तीन तलाक जैसी प्रथाओं को बंद क्यों नही किया जा सकता. वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट तलाक या मुस्लिम बहुविवाह के मामलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे की समीक्षा कर रहा है. दरअसल उत्तराखंड की रहने वाली शायरा बानो सहित कई महिलाओं ने ‘तीन बार तलाक’ को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट यह समीक्षा करने पर राजी हो गया है कि कहीं तीन तलाक, बहुविवाह, निकाह और हलाला जैसे प्रावधानों से कहीं मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा है.

इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार से कहा है कि वह 23 नवम्बर 2016 तक जवाब दे कि मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे जेंडर–विभेद को संविधान की धारा 14,15 और 21 के तहत मूल अधिकारों का एवं अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन क्यों नहीं माना जाए?

● मोदी सरकार की पहल

सुप्रीम कोर्ट के पूछने पर केंद्र सरकार ने जवाब दिया है कि ‘वह तीन तलाक का विरोध करती है और इसे जारी रखने देने के पक्ष में नहीं है’. सुप्रीमकोर्ट में दाखिल अपने जवाब में सरकार ने ‘तीन तलाक’ और मर्दों को एक से ज्यादा शादी की इजाजत को संविधान के खिलाफ बताते हुए कहा है कि “समानता और सम्मान से जीने का अधिकार हर नागरिक को मिलना चाहिए. इसमें धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता.”

केंद्र सरकार ने तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में प्रमुख रूप से तीन बातें कही हैं.
▪ ‘तीन तलाक’ संविधान के खिलाफ है.
▪ संविधान मर्दों को एक से ज्यादा शादी की इजाजत नहीं देता है.
▪ ‘तीन तलाक’ और बहुविवाह’ इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है.


मुस्लिम महिलाओं के एक समूह ने ‘तीन तलाक’ पर सरकार के रुख का समर्थन किया है. 16 महिला कार्यकर्ताओं ने एक संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा है कि “हम सुप्रीम कोर्ट में सरकारी हलफनामें के स्पष्ट बयान का स्वागत करते हैं कि तीन तलाक, निकाह, हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाएं महिलाओं की समानता और गरिमा का उल्लंघन करती हैं और इसलिए इन्हें समाप्त किया जाना जरूरी है.”


इसके बाद विधि आयोग ने 16 सवालों की लिस्ट जारी कर ट्रिपल तलाक़ और कॉमन सिविल कोड पर जनता से राय मांगी थी जिसपर विवाद हो गया. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे समाज को बांटने वाला और मुसलमानों के संवैधानिक अधिकार पर हमला बताते हुए इसके बायकॉट करने का ऐलान कर दिया.



मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की सदस्य अस्मा जेहरा का कहना है कि “दरअसल,यह भाजपा का मुसलमानों के पर्सनल लॉ पर सोचा-विचारा आक्रमण है, जिसका मकसद उनके बुनियादी हकों को छीनना है. उनके अनुसार लॉ कमीशन ने जो 16 सवाल तय किये हैं उसके जवाब में ‘‘मैं सहमत नहीं’ का कॉलम रखा ही नहीं गया है. इस प्रश्नावली को उन लोगों ने अपने एजेंडे के मुताबिक ऐसे तैयार किया है कि आपको कॉमन सिविल कोड पर रजामंद ही होना है.

शक जताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव नजदीक है इसीलिए विधि आयोग के माध्यम से समान नागरिक संहिता का मुद्दा सामने लाया गया है. पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की  एक चुनावी रैली में नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं का मुद्दा छेड़ा है उससे इस आशंका को और बल मिलता है.

● समाज और संगठनों का रुख 

मुस्लिम महिलाओं की मांगों को लेकर सबसे कड़ा रुख पर्सनल लॉ बोर्ड का रहा है. इस बार भी बोर्ड का यही रुख कायम है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जवाबी हलफनामा में बोर्ड ने कहा कि एक साथ तीन तलाक, बहुविवाह या ऐसे ही अन्य मुद्दों पर किसी तरह का विचार करना शरीयत के खिलाफ है. इनकी वजह से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के हनन की बात बेमानी है. इसके उलट, इन सबकी वजह से मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और इज्जत की हिफाजत हो रही है. अपने हलफनामे में बोर्ड ने तर्क दिया है कि “पति छुटकारा पाने के लिए पत्नी का कत्ल कर दे, इससे बेहतर है उसे तलाक बोलने का हक दिया जाए.” मर्दों को चार शादी की इजाज़त के बचाव पर बोर्ड का तर्क है कि, “पत्नी के बीमार होने पर या किसी और वजह से पति उसे तलाक दे सकता है. अगर मर्द को दूसरी शादी की इजाज़त हो तो पहली पत्नी तलाक से बच जाती है.”


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पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक के मुद्दे पर सरकार से पर जनमत संग्रह करवाने की भी मांग की है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी का कहना है कि ‘‘90 फीसदी मुस्लिम महिलाएं शरीया कानून का समर्थन करती हैं.’’ केंद्र सरकार तीन तलाक के मुद्दे पर जनमत संग्रह करा सकती है. जाहिर है बोर्ड किसी भी बदलाव के खिलाफ है.

इस मुद्दे पर मुस्लिम समाज भी बंटता हुआ नजर आ रहा है. ज्यादातर मौलाना, उलेमा और धार्मिक संगठन तीन बार बोल कर तलाक देने की प्रथा को जारी रखने के पक्ष में हैं तो दूसरी तरफ महिलाएं और उनके हितों के लिए काम करने वाले संगठन इस प्रथा को पक्षपातपूर्ण करार देते हुए इसके खात्मे के पक्ष में हैं.

पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह कहते हैं कि “मुस्लिम पर्सनल लॉ का आधार स्रेत मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लिकेशन एक्ट, 1937 है  यानी एक उपनिवेशवादी कानून है जो 1857 के युद्ध के बाद मौलवियों को खुश करने और उन्हें ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ जाने से रोकने और मनाने के लिए बनाया गया था”.
क्रमशः 

मेरा कोना / मेरा कमरा

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डा .कौशल पंवार

  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709

 
वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. वाल्मीकि समुदाय और बेहद कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से से आने वाली लेखिका और संस्कृत की प्राध्यापिका कौशल पंवार ने अपना मुकाम बनाया. उनके के लिए ‘अपना कमरा’ तो बड़ी बात है , एक कमरे के घर में अपना कोना पाना भी मुश्किल था. आइये समझते  हैं एक कोने के लिए उनकी छटपटाहट से लेकर अपने कमरे को हासिल करने की उनकी यात्रा को..

मेरा भी घर मे एक कोना होता,  उसमें एक टेबल और कुर्सी होती, मै हमेशा इसके लिए तरसती थी. पर मेरे लिए वह कोना सुनिश्चित होना घर के एक हिस्से को घेरे रखने के बराबर होता. इसमें मेरे मां- बाप की कोई गलती नहीं थी, उन्होने भी तो सारी उम्र घर की इसी कोठड़ी में बिता दी थी. यह घर ही इसलिए कहलाया गया था क्योंकि इसी घर में सब मिलकर रहते थे, चाहे वह बकरी हो, मुर्गे हों  या फ़िर एक कोने में रखा चूल्हा ही क्यों न हो, उसी  के साथ सटे रहते थे एल्मुनियम के कुछ बर्तन. उसी कोठड़ी में एक कोने में पीने के पानी के लिए एक मटका रखा रहता था, और एक कोने में अनाज को रखने का एक खुटला(एक तरह से मिट्टी की बनी अनाज को संग्रहित करने की टंकी) तो ये थी हमारी कोठड़ी, जो अन्दर और बाहर से थी जिसका हर एक कोना निश्चित था, इसलिए मेरे लिए उस कोठरी में एक कोना स्थाई रूप से बनना ही बहुत मुश्किल था. उस समय का ये मेरा सबसे बड़ा सपना बन गया था कि मेरे भी मुर्गे और बकरी की तरह ही सही एक कोना बना रहे, जो हर दिन मुझे बदलना न पड़े पर नहीं बन सका था. उसी कमरे में मां, दादी और मेरे लिए भी एक कोना नहाने का बन जाता था,  जिससे नहाने के बाद साफ़ कर दिया जाता था और उसी में चुल्हे पर खाना भी बनता था. मैं अपने पढने के लिए खाट पर बैठकर घुटनों को मो ड़कर ही उस पर किताब रख कर पढ लिया करती थी. पढने का जनून बचपन से ही मैने पाल लिया था. घर में बाहर से कोई सामान कागज में लपेट कर भी आता था तो मैं उस मुड़े-तुड़े कागज को पढने में लग जाती थी. मेरे चाचा ( मेरे पिता को मैं चाचा ही कहती थी) मेरी इस लगन से बहुत प्रभावित थे. जब भी उनके आगे मैं बैठकर घुटना  मोड़कर कभी इधर, कभी उधर करती और किताब लिए घूमना  पड़ता तो उनको देखकर अच्छा नहीं लगता था.

एक दिन चाचा ने पूछा कि मुझे क्या चाहिए, मैंने मना कर दिया कि मुझे तो किसी चीज की कोई जरुरत नहीं है. वे उठकर बाहर चले गये. कैसे उनको बताती कि मुझे एक कुर्सी और मेज चाहिए जिस पर मैं बैठकर कुछ लिख संकू और पढ संकू. घर के हालात ऐसे थे नहीं कि मैं उन्हे कह पाती. यह घर के लिए भी अनावश्यक चीज थी, जिसे रखने के लिए जगह निश्चित करना भी मुश्किल था. चाचा शाम को घर लौटे तो उनके हाथ में छोटा सा  स्टूल था और छोटी सी प्लास्टीक की कुर्सी. मुझे देखकर बहूत हंसी आयी. मैं पेट पकड़कर हंसती रही. चाचा चुपचाप मेरी ओर देखते रहे. जब मैं चुप हुई तो उन्होने कहा ये लो इस पर पढा करो. जमीन पर रखकर बाहर चले गये थे. मैं हंसने के बाद रोने लगी थी, मुझे अजीब सी ग्लानि हुई थी उस वक्त. जब घर में खाने तक के लाले पडे थे तो चाचा ये सब मेरे लिए कर रहे थे. सोचती रही थी कि कही मेरे हंसने से चाचा को बुरा न लगा हो. पर फ़िर भी मैं बहुत खुश हुई थी, अब मेरा कोना घर में निश्चित हो गया था. हांलाकि स्टूल और कुर्सी का साइज छोटा था और मैं अब बडी हो चुकी थी, पर चाचा के लिए मैं आज भी छोटी ही थी. मां ने कहा भी कि अब ये छोटी नहीं रही इस स्टूल में से पैर बाहर निकल रहे हैं  और कुर्सी पर धस कर बैठी है. चाचा हंसी का कारण समझ गये थे और खुद भी मुस्कराने लगे थे. पर मैं बहुत खुश थी, मेरे  मन की मुराद पूरी हुई थी.

इस तरह मेरा कमरा, यानी वह प्लास्टीक की कुर्सी और छोटा स्टूल , बन गया था पर ‘मल्टी परपज’ भी बना साथ मे ही. जब भी कोई मेहमान आता था मेरी किताबों को वहां से उतारकर उस पर चाय रखने के लिए दे दी जाती,  जिससे मुझे बड़ा खराब लगता था. चाय पी लेने के  बाद फ़िर वह मेरा ही बन जाता

समय गुजरता चला गया और मैं दसवीं में आ गयी थी, पर पढाई के साथ – साथ में अब जो भी आस-पास घट रहा होता, मेरे घर परिवार में जो भी हो रहा होता मैं उसे अब कागजों पर उतारने लगी थी. जब अपने गुस्से को शांत कर जाती, यूं कहे की वो पल गुजर जाते, जो मन को बहुत विचलित करते थे, तो उन्हीं कागजों को फ़ाड़ देती थी. मेरे हम उम्र सब जानते थे कि मैं कुछ न कुछ पढाई के अलावा लिखती भी रहती हूं, कभी-कभार वे पढते और मुझे कहते की अगर किसी ने पढ लिया तो बहुत मारेंगे तुझे, स्कूल से निकाल लेंगे और मैं ओर भी डर जाती और फ़ाड़ देती. अपने मन की बात कहने और घर के आये दिन झगडों से परेशान होकर अपने मन की भड़ास मैं इन कागज के टुकडों पर ही निकालती और इसके अलावा अपने भाई सुभाष, जो मुझे दूर रहता था उसे चिट्ठी लिखती रहती. उसमे सब का जिक्र होता.  उससे पिछली बार मिलने के बाद की सारी आस -पास घटी घटनाओं को बहुत विस्तार से वर्णन होता, और जब भी वह मिलता तो मैं उसे दे देती थी.  ऐसे ही वह भी करता. हमारा एक दूसरे को लिखा पत्र-व्यवहार आज भी मेरे पास सुरक्षित है. मैं  और मेरा वह स्टूल और कुर्सी, जो अब केवल किताबे रखने के काम आता था, एक जरुर और आवश्यक अंग बन गए थे  घर का. पर जिसे एक जगह से दूसरी जगह रख दिया जाता था, ठीक उसी तरह जैसे मैं भी अब उसे छोडकर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पीछे बनी झुग्गी में रहने के लिए आ गयी थी. पर पूरे परिवार में वह स्टूल मेरे नाम से ही जाना गया था. मैं अब गांव में नहीं थी, पर मेरा स्टूल, मेरा वह कोना, दोनों मैं अपनी विरासत के रूप में अपनी पहचान के रुप में छोडकर चली आयी थी.विश्वविधायल के छात्रावास की फ़ीस बहुत ज्यादा थी, जो मेरे और चाचा के बुते की बात नहीं हीं थी. एम.ए. करना ही था तो पहले कुछ महीने राजौंद और कुरुक्षेत्र के बीच में पडने वाले फ़रल, पुंडरी में नानकों के घर पर बिताये जहां पर नानी दूसरों के घरों में काम करके अपनी जिन्दगी बिता रही थी. मुझे भी नानी के साथ बहुत बार सफ़ाई और मैला उठाने के लिए जाना पडता था. हम दोनों के लिए रोटी और आचार या कभी कभी सब्जी भी उस गंध को अपने सिर पर ढोकर ले जाने के बदले मिल जाती थी. इस पर विस्तार से कभी फ़िर लिखूंगी. ऐसे में मेरी पढाई को नुकसान हो रहा था, तो मैने चाचा के साथ बात करके वहीं विश्वविद्यालय के छात्रावास के पीछे पड़ने वाली झुग्गी में रहकर पढने की बात की. घर से राशन पानी और छोटा स्टोव और एक थाली, चम्च्च, गिलास आदि ये सब लेकर गयी. जितने कम से कम खर्च हो पाये इसकी मेरी कोशिश रही. मां और चाचा की आर्थिक स्थिति क्या है, मैं जानती थी. सबने मना किया था आगे पढने के लिए, बहुत सारे कारणों के साथ एक कारण यह भी तो था कि विश्वविद्याल की पढाई का खर्चा पूरा नहीं होगा, यह बात मैं और चाचा दोनों ही जानते थे, पर दोनों को ही दृढ विश्वास था कि कम से कम खर्च में मैं अपनी आगे की पढाई पूरी कर सकती हूँ.  किताबों पर खर्च करने के अलावा ऐसा कोई खर्च था भी नहीं जो झेला न जा सके. ना कभी अपने आपको सुन्दर दिखाने के लिए प्रयोग होने वाले क्रीम आदि का मुझे शौक था न किसी और  चीज का ही शौक था, और न ही तन ढकने के अलावा कपडों का ही शौक था, इसलिए चाचा की सहमति से मैं आ गयी थी इस झुग्गी बस्ती  में जो चूहडो की बस्ती  के नाम से भी जानी जाती थी. पूरी बस्ती का एक ही  टायलट  था और एक ही नल, सुबह के समय बहुत परेशानी होती थी. इन सब का सामना करते हुए मैं अपने बारे में बहुत कुछ लिखती थी. कई डायरियां भर दी. जब कभी सुभाष आता तो उसे दे देती पढने के लिए, जिसमें  हर दिन गुजरने वाली पीड़ा, दुःख -तकलीफ़ अभाव भरा हुआ था. कुछ मन की कोमल भावनायें होतीं और वह अगली बार मिलता तो खूब रो लेता और अपनी असमर्थता जता जाता, हौसला देता, अपने सपने पूरे करने की कसमें दे जाता, चाचा के खून-पसीने से निकलने और मेरे लिए उंचाई पर पंहुचने के उनके अरमानों को पूरा करने की दुहाई दे जाता. बस अब यही उद्देश्य बन चुका था. अब मेरा कमरा था मेरे पास, मेरी वह चालिस रुपये में किराये पर ली झुग्गी, जिसे मैं वहीं आस-पास के विधार्थियों को ट्यूशन पढाकर दे दिया करती थी, उन छात्रों के हालत भी मेरे जैसे ही रहती थी, इसलिए कई बार मेरे इस कमरे का किराया भी नहीं दे पाती थी. जिसके कारण बहुत कुछ सुनना भी पडता था.

एम.ए. के इस कठिन दौर में मेरे सुख-दुख का साथी, मेरा भाई, मुझे छोडकर चला गया- टूट गया था, बहुत कुछ अंदर से, कदम भी लड़खड़ा गये थे, पर उसका वह वाक्य कि ‘अपनी पढाई को बीच में नहीं छोड़ना, कुछ बनना है, सपनों को पूरा करना है चाहे कुछ भी हो जाये, थकना नहीं, हारना नहीं.’ बहुत कुछ लिखा इस दौरान, मेरे  पाठयक्रम की पढाई के अलावा मैं और भी बहुत कुछ करती, यूपीएससी की तैयारी के साथ कविता, कहानियां बल्कि यूं कहूं की अपना दर्द कागजों पर उतारने लगी थी. पर इनको सहेजने  का ख्याल न मुझे पहले आया था, और न इस दौरान, बस अगर इधर-उधर कापियों पर लिखा रह गया था थोड़ा बहुत. अभी समय को  एक और  झटका देना बाकी था. एम.ए. प्रथम वर्ष पास कर लिया था, फ़ाइनल में प्रवेश ले लिए थे. मेरे इस झुग्गी वाले कमरे के हर कोने में कुछ साहित्यक पत्र पत्रकायें जमा होने लगी थीं.नेट की तैयारी दिन रात कर रही थी. पुस्तकालय खुलते ही का द्वितीय तल के कोने की कुर्सी में लायब्रेरी  में घुसती थी और बन्द होने तक वहीं रहती थी. साथ ही साथ यूपीएससी, जो मेरे अपना -सपना था, उसकी भी तैयारी चल रही थी.  चाचा स्कूल में मैडम और सबसे बड़ी डीग्री लेने का सपना देख रहे थे, सुभाष कालेज के लेक्चर स्टैंड़ पर लेक्चर देते हुए देखना चाहते थे और नीचे पटरी रखकर उस पर चढकर भाषण देने का सपना देखते थे- मेरी हाइट छोटी थी, इसलिए पटरी  का साहरा लेकर लेक्चर देने का बिम्ब रचते.  और मैं- मेरा सपना था यूपीएससी पास करना और बड़ी अधिकारी बनना,  जिसके लिए मुफ़्त में चलने वाली कोचिंग भी मैंने चाचा को बिना बताये शुरु कर रखी थी.

और  एक दिन वह भी अपने सपने के साथ इस सफ़र में साथ छोड़कर चले गये अनजान दुनियां में, कभी वापिस न आने के लिए. बस अब मैं और मेरा कमरा ही रह गये थे, मतलब वह किराये की झुग्गी. अब कुछ भी करने का मतलब नहीं रह गया था, न अब सुभाष का साथ था और न चाचा. बाकी जितने भी रिश्ते थे, वे खून के रिश्ते  जरुर थे पर उनसे कभी अपनेपन के दो शब्द नहीं मिल. अगर कुछ भी मिला था तो वह  शक करने वाली निगाहें  थीं, जो मेरे गांव आने पर मानो एक ही सवाल पूछती थी कि मैं ………मेरे अन्दर लड़की होने का शेष कुछ बचा भी है या……. सब. और मैं मानो तसल्ली देने के लिए उनसे अपनी सफ़ाई देती की मैं पढ रही हूं और बहुत मेहनत कर रही हूँ- हर बार की अग्नि परीक्षा, जो मेरे हौसले को तोड़ने के लिए काफ़ी होती थी.

पर अब क्या? सब कुछ खत्म….. तीन महीने लगे मुझे इस सदमे से बाहर आने के लिए. पर सबने जैसे अब मेरा साथ देने का मन भी बना  लिया था, और सबसे ज्यादा मां मेरे साथ पूरी तरह से जुट गयी थी, मानो चाचा ने मां को अब उनकी जगह लेने की कसम दे दी हो,  दोनों भाई भी अब मेरे फ़ैसले के साथ थे. और इस सफ़र में हमसफ़र बनकर आया मेरी जिन्दगी में मुकेश, जिसने मेरे अन्दर के खालीपन को भर दिया, उन्होने चाचा और भाई का प्यार तो नहीं दिया पर कमी जरुर पूरी कर दी थी, उस मंजिल और सपने को पूरा करने में मेरा साथ दिया, फ़िर चाचा के सपने को जिन्दगी का मकसद बना लिया और फ़िर पीछे मुड़कर नहीं देखा. हारना मानों मैने बिसरा ही दिया. चाचा का एक एक शब्द अब मेरे जीने के लिए काफ़ी था.

झुग्गी अब छूट गयी थी, एम.ए. के बाद अब बी.एड. करने करनाल आ गयी थी. यहां पर भी किराये का अपना कमरा ले लिया था, जब भी मकान मालिक को पता चलता की मैं ‘चूहड़े’ समाज की हूं, कमरा छोड़ना पडता. इसी दौरान हमसफ़र को ताउम्र हमसफ़र बनाने का निर्णय लिया और हमने शादी कर ली. शादी के दूसरे दिन ही वापिस उसी कमरे में लौटना हुआ. बी.एड़ करने के बाद एम फ़िल. रोहतक से किया और फ़िर जेएनयू तक का सफ़र. अपना कमरा न होते हुए भी इन्ही कमरों में लेखन कार्य चलता रहा.

अब मैं एक अध्यापिका बन गयी थी, वो भी चंडीगढ जैसे बडे शहर में. पर यहां भी अपना कमरा तो था, लेकिन किराये का. कभी रामदरबार का कमरा तो कभी डड्डूमाजरा का कमरा. इन सब को पार करते हुए पंहुच गयी थी दिल्ली विश्वविद्यालय में पर यहां भी कमरा तो मिला पर अपना नहीं, और इसी दौरान जातिव्यवस्था से जूझते हुए अपना घर, अपना कमरा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा-पर अटल निश्चय था और सामने मंजिल. मैंने  सहूलियत न होते हुए भी अपना घर और उस घर में मेरा कमरा हो, ऐसा ठान लिया था. और आज मेरे पास अपना कमरा है, उस कमरे में अपनी पसंद की कुर्सी और टेबल है, पूरा कमरा ही मेरा पुस्तकालय है, जिसमे पूरे घर के सामान को मिलाकर सबसे ज्यादा जो बनता है, वह पुस्तकें ही है.  अब मेरे पास मेरा कमरा है, और उसके साथ चाचा की यादें हैं, जो मुझे निरन्तर आगे बढने को प्रेरित करती हैं.

आधी आबादी का डर

मुजतबा मन्नान


हाल ही में महिलाओं के साथ हुई कुछ बेहद दुखद हिंसात्मक घटनाएँ टीवी चैनलों व अखबारों की सुर्खियां बनी.पहली घटना में राजधानी दिल्ली के बुराड़ी इलाके में एक 34 वर्षीय युवक ने एकतरफा प्यार के चलते एक 21 वर्षीय लड़की की हत्या कर दी.लड़की स्कूल टीचर थी, जब वह अपने स्कूल से घर जा रही थी तो युवक ने टूटी केंची से छब्बीस बार वार कर उसकी हत्या कर दी.दूसरी घटना गुडगाँव के मेट्रो स्टेशन पर घटी, जिसमें एकतरफा प्यार में पागल एक युवक ने महिला के इंकार करने पर सरेआम तीस बार चाकू से वार कर उसकी हत्या कर दी.तीसरी घटना में राजस्थान के अलवर जिले में एक बेहद क्रूर तरीके से महिला की हत्या का मामला सामने आया.युवक ने अपनी पत्नी के चरित्र पर शक के कारण मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जला दिया और फिर चाकू से उसके अंगो के टुकड़े कर शहर के अलग-अलग हिस्सों में फेंक दिए.एक अन्य घटना में बिहार के मुजफ्फपुर जिले में एक महिला इंजीनियर को जिंदा जलाने का सनसनीखेज मामला सामने आया.

महिलाओं पर इस तरह बेहद क्रूरता के साथ हमले होने की यह कोई पहली घटना नहीं है.रोज़ाना टीवी चैनलों व अखबारों में महिलाओं पर हमले होने की खबरें सुर्खियाँ बनती रहती हैं.जैसे‘युवक ने बदला लेने के लिए महिला पर तेज़ाब डाला,लड़के ने बीच सड़क पर लड़की को चाकू मारा,दहेज़ के लालच में दुल्हन को ज़िंदा जलाया,घर में घुसकर महिला से सामूहिक दुष्कर्म’ इत्यादि. हर रोज़ महिलाओं को छेड़छाड़,पिटाई, अपमान, बलात्कार,यौन शोषण जैसी हिंसात्मक घटनाओं का सामना करना पड़ता है.हालात यह हैं कि महिलाएं सिर्फ सड़कों व सार्वजनिक स्थानों पर ही असुरक्षित नहीं हैं बल्कि घर में भी उनके जीवनसाथी या उसके परिवार के सदस्य ही उनकी हत्या कर देते हैं. ज्यादातर घटनाओं के बारें में तो पता ही नहीं चलता है क्योंकि शोषित व प्रताड़ित महिलाएं किसी को इसके बारें में बताने से घबरातीहैं. उन्हें डर लगता है कि कहीं ये पितृसत्तात्मक समाज उनको ही दोषी न ठहरा दे.

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महिलाओं के प्रति इस प्रकार की हिंसात्मक घटनाओं को देख कर प्रश्न उठता है कि आखिर कोई पुरुष महिला को चोट क्यों पहुँचाना चाहता है?,एक पुरुष सरेआम महिला केप्रति इतना हिंसात्मक क्यों हो जाता है?और केवल महिला के इंकार करने पर पुरुष हमलावर क्यों हो जाता है? आदि.आमतौर पर कोई भी पुरुष महिला को चोट पहुंचाने के लिए अनेक बहाने बना सकता है. जैसे ‘वह शराब के नशे में था, वह गुस्से में अपना आपा खो बैठा या फिर वह महिला इसी लायक है’इत्यादि.परंतु वास्तविकता यह है कि पुरुष हिंसा का रास्ता केवल इसलिए अपनाता है क्योंकि वह केवल इस माध्यम से वह सब प्राप्त कर सकता है जिन्हें वह एक पुरुष होने के कारण अपना हक़ समझता हैं. इस घातक मानसिकता का ही परिणाम हैं कि महिलाओं के साथ छेड़छाड़, बलात्कार, दहेज़मृत्यु, हत्या तथा यौन उत्पीडन जैसे हिंसात्मकअपराधों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है.

ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारत में महिलाओं को अपराधों व हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने तथा आर्थिक, सामाजिक दशाओं में सुधार हेतु ढेर सारे कानूनों का संरक्षण हासिल है. जिनमें अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कुटुंब न्यायालय अधिनियम 1984, महिलाओं का अशिष्ट-रूपण प्रतिषेध अधिनियम 1986, सती निषेध अधिनियम 1987,गर्भाधारण पूर्व लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994,कार्यस्थल पर महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005,राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 2006, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़िन (निवारण, प्रतिषेध) अधिनियम 2013 प्रमुख हैं. लेकिन त्रासदी है कि इन क़ानूनों के बावजूद भी महिलाओं पर हिंसा और अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा है. देश में घरेलू हिंसा, बलात्कार, दहेज मृत्यु, अपहरण,औनर किलिंग जैसी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं.

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दरअसल विडंबना यह है कि समाज में स्वतंत्रता और आधुनिकता के विस्तार के साथ-साथ महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव भी बढ़ा है.प्राचीन सामाज में ही नहीं बल्कि आधुनिक समाज की दृष्टि में भी महिलाएं केवल औरत है जिसको थोपी व गढ़ी-बुनी गई तथाकथित नैतिकता की परिधि से बाहर नहीं आना चाहिए.दी यूएन डिक्लेरेशन ऑन दी एलिमिनेशन ऑफ वोइलेंस अगेन्स्ट वुमेन के अनुसार ‘महिलाओं के प्रति हिंसा पुरुषों और महिलाओं के बीच ऐतिहासिक शक्ति की असमानता का प्रकटीकरण है.’ और यह भी कि “महिलाओं के प्रति हिंसा एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा कमतर स्थिति में धकेल दी जाती हैं.’



आज भी बहुत-सी संस्कृतियों में महिलाओं को पुरुषों से कम दर्ज़ा दिया जाता है दरअसल महिलाओं के साथ भेदभाव करने का रवैया, समाज में कूट-कूटकर भरा है.उनके खिलाफ की जानेवाली हर किस्म की हिंसा एक ऐसी समस्या बन गई है, जो मिटने का नाम नहीं ले रही है.संयुक्त राष्ट्र के भूतपूर्व सेक्रेटरी-जनरल, कोफ़ी अन्नान ने कहा था ‘दुनिया के कोने-कोने में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जा रही है.हर समाज और हर संस्कृतिकी महिलाएं इस जुल्म की शिकार हो रही हैं.वे चाहे किसी भी जाति, राष्ट्र, समाज या तबके की क्यों न हों, या उनका जन्म चाहे जहाँ भी हुआ हो, वे हिंसा से अछूती नहीं हैं.’वहीं महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली संस्था एमनेस्टीइंटर्नेशनल के अनुसार ‘महिलाओं औरलड़कियोंके खिलाफ की जाने वाली हिंसा, आज मानवअधिकारों का उल्लंघन करने वाली सबसे बड़ी समस्या है.’

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समाज में पुरुषों और महिलाओं के लिए प्रयोग किए जाने वाले शब्दों पर गौर करें तो पुरुष के लिए निडर, मज़बूत, मर्द ताकतवर, तगड़ा, सत्ताधारी, कठोर ह्रदय, मूँछों वालाऔर महिलाओं के लिए कोमल, बेचारी, अबला, घर बिगाडू, कमज़ोर, बदचलन, झगडालू आदि शब्द प्रयोग किये जाते हैं. इनमें से कुछ शब्द तो महिला-पुरुष में प्राकृतिक अंतर का प्रतीक हैं लेकिन ज्यादातर शब्द प्राकृतिक कम सामाजिक ज्यादा हैं यानि पितृसत्तात्मक समाज ने इन शब्दों तथा इसके पीछे की अवधारणा को गढ़ा है जबकि असलियत में यह शब्द केवल महिलाओं को कमज़ोर दिखाने के लिएही प्रयोग किए जाते हैं क्योंकि केवल पुरुष ही नहीं बल्कि एक महिला भी ताकतवर, मजबूत और निडर होती है और एक पुरुष भी घर बिगाड़ू, बदचलन और झगड़ालू हो सकता है.

महिलाओं के प्रति इस प्रकार की हिंसात्मक घटनाएँ पुरुषों की ‘मर्दानगी’को लेकर दोहरा रवैया दिखा रही हैं. एक तरफ अगर लड़की उनका प्रस्ताव ठुकरा दे तो उनकी मर्दानगी को ठेस पहुँच जाती हैं और फिर पुरुष बदला लेने के लिए सरेआम महिला पर हमला कर देता है. दूसरी ओर कुछ पुरुष अपनी आँखों के सामने किसी महिला की बेरहमी से हत्या होते हुए देख कर आगे निकल जाते हैं. प्रश्न उठता है कि किसी लड़की द्वारा ठुकरा दिए जाने परपुरुष की मर्दानगी को तो ठेस पहुँच जाती है लेकिन हैरानी की बात यह है कि किसी की हत्या होते समय पर ‘मर्दानगी’ कम नहीं होती है?



अगर कोई व्यक्ति सामान्य तरीकों का प्रयोग करके अपने जीवन को नियंत्रित करने का प्रयत्न करता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन अगर कोई व्यक्ति दूसरों के जीवन पर हिंसा के प्रयोग से नियंत्रण करने की कोशिश करे तो यह ठीक नहीं है. दूसरा कोई भी पुरुष मर्द होने से पहले इंसान है और अगर किसी के साथ हिंसा होते देख कर भी अगर हम आगे बढ़ जाते हैं तो इंसानियत कहीं पीछे छूट जाती है.एक महिला के शब्दों में,‘आज हालात यह हैं कि घर, समाज में महिलाओं के लिए डर ही उनकी एक ऐसी सखी है, जो हरपल उनके साथ रहती है और हिंसा एक ऐसा खतरनाक अजनबी है जो किसी भी वक्त, किसी भी मोड़, सड़क या आम जगह पर उन्हें धर-दबोच सकता है.’

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कई देशों में नियम हैं कि यदि मुसीबत की स्थिति में आप किसी की मदद नहीं करते हैं तो आपके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है इसलिए भी लोग जहमत नहीं उठाना चाहते हैं. लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या समाज में इंसानियत को याद दिलाने के लिए भी कोई कानून बनाने की जरूरत है?25 नवंबर 1999 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा मिटाओं’ नाम से अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाने की घोषणा की ताकि लोगों में महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा हो, क्योंकि हिंसा का प्रभाव केवल एक महिला पर ही नहीं बल्कि अगर एक महिला को चोट पहुँचती है तो वह उसके बच्चों, परिवार तथा पूरे समाज को प्रभावित करती है.

संदर्भ व सहायक सामग्री

1. दिल्ली में युवक ने दिनदहाड़े चाकू से बार-बार गोदा, सीसीटीवी में कैद हुई घटना.

2. गुड़गांव मेट्रो स्टेशन पर युवक ने दिनदहाड़े महिला को चाकू से गोद डाला.

3. चरित्र के संदेह में हैवान बना पति, बकरे की तरह काट डाले पत्नी के अंग.

4. बिहार में महिला इंजीनियर को कुर्सी से बांधकर ज़िंदा जलाया.

लेखक जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से स्नातकोत्तर हैं और हरियाणा के जिला मेवात में रहते । आजकल शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत है। लेखन में रुचि रखते है और सामाजिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. संपर्क ; 9891022472, 7073777713 

 

दलित महिलाएं और पत्रकारिता

सुशीला टाकभौरे  

चर्चित लेखिका. दो उपन्यास. तीन कहानी संग्रह , तीन कविता संग्रह सहित व्यंग्य,नाटक, आलोचना की किताबें प्रकाशित. संपर्क :9422548822



दलित साहित्य के विषय में सभी जानते हैं, दलितों का, दलितों के लिए दलितों द्वारा लिखा साहित्य. अब यह स्थापित साहित्य के समानान्तर माना जाने वाला सर्वमान्य साहित्य है. दलित साहित्य की आधार भूमि डॉ. भीमराव अम्बेडकर की विचारधारा है. पिछड़े दबे कुचलों की स्थिति को बताकर, उनकी समस्याओं का निदान और उनकी प्रगति परिवर्तन की दिशा में अग्रसर होने का संदेश ही दलित साहित्य का उद्देश्य है.


लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में दलित साहित्य अपनी विशेष स्थिति पा रहा है. देश की सभी भाषाओं में दलित साहित्य लिखा जा रहा है. अनुवाद-रूपान्तर के द्वारा अलग अलग भाषा के लोग एक दूसरे के साहित्य को पढ़कर समझ रहे हैं. पूरे देश में दलित साहित्यकारों की व्यथा, सम्पूर्ण दलित वर्ग की व्यथा के रूप में प्रचारित – प्रसारित हुई है और लगातार हो रही है.

साहित्य के विचार प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम मीडिया है. मीडिया का अपना महत्त्व है. अभी तक मीडिया सवर्णों के हाथों में ही था. और अभी भी है. सवर्ण अपनी विचारधारा अपने ढंग से सशक्त रूप में, त्वरित रूप में फैलाते रहे हैं. यही कारण है कि देश और विदेशों में अभी भी दलितों की व्यथा को सही मूल्यांकन नहीं मिल पाया है. ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाले अपने ही देश में, दलित सदियों से कितने कष्ट और अभाव का जीवन जी रहे हैं, यह सर्वविदित है. समाज में अभी तक उन्हें न तो समता सम्मान मिला, न ही भाईचारा मिल सका है. देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद भी, देश का लिखित संविधान लागू होने के बाद भी देश के दलितों की स्थिति में परिवर्तन नहीं हो सका. इसका मुख्य कारण है मीडिया पर सवर्णो का एकाधिकार होना. सवर्ण मीडिया हमेशा यही बताता रहा – ‘देश में कहीं कोई भेदभाव नहीं है, सब बराबर हैं और सब मिलजुल कर रहते हैं.’

गांधीजी ने अपने ‘हरिजन’ पत्र के माध्यम से, शुरू से यही बताया था कि देश के अछूत हिन्दुओं से अलग नहीं हैं. वे सब प्रेम के साथ मिल जुलकर रहते हैं. जबकि स्थिति इसके विपरीत थी जिसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर अच्छी तरह समझ सके थे. गांधीजी को मानने वाले गांधीवादी, ब्राम्हणवाद को मानने वाले मनुवादी और आर्यसमाजी छद्म बातों का प्रचार प्रसार करते रहे हैं और अभी भी कर रहे हैं.

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने पत्रकारिता के माध्यम से ‘हरिजन’ पत्र के समानान्तर अपने समाचार पत्रों का प्रकाशन किया और अपनी बात सही रूप में देशवासियों तक पहुंचाई. उन्होंने मूकनायक, प्रबुद्ध भारत  जनता जैसे पत्रों को प्रकाशित किया था. अब बाबासाहेब को मानने वाले अम्बेडकरवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करके, उनके विचार और दलित शोषितों की स्थिति के सत्य रूप को समाज तक पहुंचा रहे हैं. दलित स्वयं अपनी व्यथा को कविता कहानी लेख नाटक उपन्यास और आत्मकथाओं के रूप में लिख रहे हैं और प्रकाशित कर रहे हैं, दलित पत्रिकाओं के माध्यम से उसे पूरे देशवासियों तक सभी भाषा-भाषियों तक पहुंचाया जा रहा है.

जो दलित मानव सदियों तक गूंगे बहरों की तरह चुपचाप शोषण अत्याचार सहते रहे, वे अब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के संघर्षपूर्ण प्रयत्नों से अधिकार पाकर अपनी व्यथा कह रहे हैं. वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी दखल दे रहे हैं, मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज समाज तक पहुंचा रहे हैं. पत्रकारिता में दलितों का प्रवेश विशेष सफलता पा रहा है. हिन्दी दलित पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक छोटी और बड़ी पत्रिकाएं लगातार छप रही हैं. अब स्थिति यह बन गई है कि सवर्ण पत्रकारिता द्वारा भी उनका स्वागत किया जा रहा है. केवल इतना ही नहीं बल्कि सवर्ण पत्रिकाओं के विशेषांक ‘दलित विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित किये जा रहे हैं, जिनमें पूर्ण रूप में दलितों की रचनाओं को छापा जा रहा है. इन दलित विशेषांकों का अपना महत्त्व है. दलितों द्वारा प्रकाशित की जाने वाली छोटी बड़ी दलित पत्रिकाओं का भी अधिक महत्त्व है.



सवर्णो द्वारा प्रकाशित की जाने वाली महत्त्वपूर्ण नारीवादी पत्रिकाओं में – ‘नारी संवाद’, सं. रेनू दीवान बिहार, युद्धरत आम आदमी, सम्पादक रमणिका गुप्ता, दिल्ली है. इन पत्रिकाओं ने विशेष रूप से महिलाओं और दलितों के प्रश्नों को आवाज दी है, उनकी समस्याओं को विश्लेषण के लिए समाज के समक्ष रखा है. ऐसी अनेक पत्रिकाएँ हैं, जो विशेष रूप से महिलाओं दलितों और आदिवासियों के साहित्य को छाप रही हैं, उन्हें जोड़ रही है और उनका समाज के साथ सीधा संवाद बना रही हैं.


दलित पत्रिकाओं में विशेष रूप से ‘अस्मितादर्श’ पत्रिका महत्त्वपूर्ण है. मराठी भाषा में छपने वाली महाराष्ट्र की इस पत्रिका ने अपना इतिहास रचा है. यह दलित पत्रिकाओं की प्रमुख और मार्गदर्शक पत्रिका है. ‘अस्मितादर्श’ पत्रिका के सम्पादक गंगाधर पानतावने हैं. पत्रिका औरंगाबाद से प्रकाशित होती है. इस पत्रिका के अनेक विशेषांक भी छपे हैं.

हिन्दी दलित पत्रिकाओं में ‘बयान’ ने अपनी एक विशेष जगह बनाई है. ‘बयान’ के सम्पादक मोहनदास नैमिशराय हैं. दिल्ली से प्रकाशित इस पत्रिका में, दलितों की समस्याओं के साथ समसामयिक प्रश्नों को अच्छे तरीके से उठाया जा रहा है. ऐसी ही विशेष पत्रिकाएँ हैं – ‘अम्बेडकर मिशन पत्रिका’, सम्पादक बुद्धशरण हंस, पटना. ‘अरावली उदघोष’ सम्पादक बी. पी. वर्मा, जयपुर राजस्थान. ‘मूकवक्ता’, सम्पादक सी. बी. राहुल दिल्ली, ‘आश्वस्त’, सं. तारा परमार उज्जैन मध्यप्रदेश, ‘आजीवक विजन’, सम्पादक शील बोधि, दिल्ली.


मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, दिल्ली से प्रकाशित होने वाली अनेक दलित पत्रिकाएँ हैं. कुछ पत्रिकाओं ने अपनी विशेष पहचान बनाई है. किसी भी पत्रिका को अच्छे वैचारिक मुद्दों की जरूरत होती है. समसामयिक और ज्वलन्त प्रश्नों को उठाना समय की मांग है. आवश्यक मुद्दों और ज्वलन्त प्रश्नों पर लिखी रचनाओं को महत्त्व देकर प्रकाशित करना प्रगतिवादी विचारधारा का प्रतीक है. इसके साथ उन पत्रिकाओं को महत्त्वपूर्ण माना जाता है, जिनमें स्त्रियों और अल्पसंख्यकों को स्थान प्राप्त हो.

‘दलित विमर्श’ और ‘स्त्री विमर्श’ अब सीमित क्षेत्र का विषय नहीं है. अब इन विषयों पर विश्वस्तर पर चर्चा हो रही है. दलित पत्रिका इसमें बराबर की हिस्सेदारी निभा रही हैं. इस दृष्टि से ‘अपेक्षा’ पत्रिका ने विशेष मुकाम हासिल किया है. इस पत्रिका ने दलित लेखिकाओं को भी जोड़ा है. लेकिन यह भी सत्य है कि दलित लेखिकाएँ अधिक संख्या में आगे नहीं आ सकीं. अभी भी उनकी संख्या कम है. ‘लेखन में दलित महिलाएँ’ किस मुकाम तक पहुंची है, इसे पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेखन से समझा जा सकता है.


दलित साहित्य की संवाहक ‘अपेक्षा’ पत्रिका का सन 2003 में ‘दलित आत्मवृत विशेषांक’ प्रकाशित हुआ था. इस विशेषांक के ‘दलित स्त्री चिन्तन’ खण्ड में डॉ. विमल थोरात’, माधुरी छेड़ा और तारा परमार ने दलित महिलाओं की आत्मकथाओं पर समीक्षात्मक विचार लिखे. इन्होंने महिलाओं की मराठी दलित आत्मकथाओं पर ही चर्चा की थी. डॉ. नगमा मलिक ने बेबी कामड़े की मराठी आत्मकथा ‘जीना आमुचा’ अर्थात् ‘जीवन हमारा’ की समीक्षा लिखी. डॉ. प्रेमलता चुटेेल ने कौशल्या बेसन्त्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ की समीक्षा लिखी. प्रज्ञा शुक्ल, रजनी बजारिया, सुमित्रा अग्रवाल और मुन्नी चैधरी ने दलित जीवन का मूल्यांकन करते हुए, अपने विचार रखे थे. इस अंक में हिन्दी दलित लेखिकाओं की संख्या कम है.

सवाल यह है कि हिन्दी दलित लेखिकाओं की संख्या कम क्यों है ? इसका पहला और मुख्य कारण यह है कि हमारी महिलाएं लेखन के क्षेत्र में पीछे हैं. दूसरा कारण यह है कि उन्हें प्रेरणा और प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है. तीसरा कारण है सहयोग की कमी. यदि उन्हें सहयोग के साथ प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया जाये, तो हमारी लेखिकाएँ अधिक संख्या में आगे आयेगीं. यदि घर परिवार से उन्हें सहयोग और प्रेरणा प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है, तो ऐसी साहित्यिक सामाजिक संस्थाएँ बनाई जायें, जो दलित स्त्रियों को लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में आने आगे के लिए प्रोत्साहित करें. ऐसा होने पर, यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि दलित महिलाएँ पुरूषों की अपेक्षा अधिक संख्या में आगे आयेंगी और लेखन प्रकाशन के क्षेत्र में अपना कीर्तिमान स्थापित करेंगी.

कई बार ऐसा होता है, दलित लेखिकाओं से रचनाएँ आमंत्रित की जाती हैं, मगर वे समय पर अपनी रचनाएँ भेज नहीं पाती हैं. जब रचनाएँ भेजी ही नहीं, तो छपेंगी कैसे ? भले ही लेखिका ने बहुत लिखा है मगर प्रकाशित नहीं किया, तब लोग कैसे जानेंगे कि लेखिका ने क्या कैसा और कितना लिखा है ? हमारी दलित लेखिकाएँ घर परिवार के काम और जिम्मेदारियों के बोझ से लदी होने के कारण, अपने लेखन और प्रकाशन को समझ नहीं पाती हैं. उसका महत्त्व समझने के लिए उनके पास समय ही नहीं होता है. वे यह भी नहीं जानती हैं कि लेखन के साथ प्रकाशन को ज्यादा महत्त्व होता है. इस अज्ञानता के कारण वे अपनी रचनाएं ठीक करके पत्रिकाओं में प्रकाशन हेतु नहीं भेजती हैं. मैं इन बातों को अच्छी तरह जानती हूँ, क्योंकि मैं स्वयं इसकी शिकार रही हूँ.

अप्रैल – जून 2007 में ‘अपेक्षा’ का अम्बेडकरवादी कहानी विशेषांक प्रकाशित हुआ था. इस विशेषांक में अनेक पुरूष दलित साहित्यकारों की कहानियाँ छपी थीं. दलित लेखिकाओं में रजनी दिसोदिया की कहानी – ‘‘एक गैर साहित्यिक डायरी’, अनीता भारती की ‘एक थी कोटेवाली’, रजतरानी मीनू की ‘वे दिन’ और सुशीला टाकभौरे की ‘रामकली’ कहानी छपी थी. इस अंक में बाबीस कहानीकारों में सिर्फ चार दलित लेखिकाओं की कहानी छपी. कारण स्पष्ट है, दलित साहित्यकारों में लेखिकाओं की संख्या कम है, साथ ही उनका लेखन भी कम है. ‘अपेक्षा’ पत्रिका नियमित रूप से त्रैमासिक रूप में छप रही है. सामान्य अंकों में इक्का दुक्का दलित लेखिकाएँ छप रही हैं. विशेषांकों में छपे दलित लेखन में दलित स्त्रियों की स्थिति को समग्र रूप में देखा और समझा जा सकता है.

जनवरी – मार्च 2008 में अपेक्षा पत्रिका का विशेषांक ‘दलित स्त्री चिन्तन’ पर केन्द्रित था. इस अंक के लिए दिल्ली की अनीता भारती ने विशेष सहयोग दिया. उन्होंने विशेष रूप से दलित लेखिकाओं से सम्पर्क करके, उन्हें प्रोत्साहित करते हुए उनसे आत्मकथांश लिखवाये थे. जिसका परिणाम यह हुआ कि अपेक्षा के इस अंक में इक्कीस दलित लेखिकाओं के आत्मकथांश छपे. उनके नाम-बेबीताई कामले, रमा पांचाल, सुशीला टाकभौरे, रजनी तिलक, उर्मिला पवार, पी. शिवकामी, रजनी दिशोदिया, अनीता भारती, रजतरानी मीनू, हेमलता महिश्वर, पुष्पा विवेक, रानी नाथ, उपासना गौतम, तबस्सुम, थेसोक्रोपी, सम्पत देवी पाल, ज्योत्सना, निर्मला रानी गीता सिंह, और स्मिता पाटिल हैं. इसके साथ विशेषांक के ‘साहित्य दृष्टि खण्ड’ में कुसुम मेघवाल, उत्तिमा केशरी और आभालता चैधरी के लेख छपे.

‘अपेक्षा’ के इस विशेषांक को दलित लेखिकाओं के लेखन के परिचय का अंक माना गया. तब दलित लेखन के क्षेत्र में यह जोरदार चर्चा चली थी – ‘क्या इतनी बड़ी संख्या में दलित लेखिकाएँ दलित साहित्य लिख रही हैं ?’ लेखिकाओं के लिए यह गौरव की बात है. यह गौरव उन्हें ‘अपेक्षा’ पत्रिका के सम्पादक डॉ. तेजसिंह ने दिया. इससे यह भी स्पष्ट है कि दलित लेखिकाओं को यदि सहयोग और प्रेरणा प्रोत्साहन दिया जाये, तो वे जरूर लेखन प्रकाशन में अपना कीर्तिमान स्थापित कर सकती हैं. जनवरी मार्च 2008 ‘अपेक्षा’ के विशेषांक में इतनी बड़ी संख्या में दलित लेखिकाओं के परिचय और लेखन प्रकाशन के बाद भी, कम लेखिकाएं ही चर्चा में हैं. लेखन – प्रकाशन लगातार होने पर ही वे सभी चर्चा में आ सकेंगीं.



पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘हंस’ जन चेतना की मासिक पत्रिका का अपना महत्त्व है. यह प्रतिष्ठित पत्रिका इन्टरनेट पर भी पढी जाती है. हिन्दी साहित्यकार प्रेमचन्द द्वारा स्थापित और वर्तमान में राजेन्द्र यादव द्वारा संपादित यह पत्रिका सवर्णो के साथ, बहुजनों और दलितों के सरोकार से जुड़ी पत्रिका  बन गई है. दिल्ली से प्रकाशित यह पत्रिका बौद्धिकता और वैचारिकता के साथ कहानी आन्दोलन के कई आयामों को रेखांकित करती हुई आगे बढ़ रही है. समीक्षा और आलोचना में भी यह दखल रखती है.


‘हंस’ का दलित विशेषांक अगस्त 2004 में ‘सत्ता विमर्श और दलित’ प्रकाशित हुआ. इस विशेषांक में ‘स्वानुभूति खण्ड’ में बारह दलित साहित्यकारों ने आत्मकथांश दिये थे, जिनमें सिर्फ दलित लेखिका किरणदेवी भारती का नाम है. ‘वैचारिकी खण्ड’ में भी सभी दलित पुरूष साहित्यकार हैं. ‘कहानी खण्ड’ में इक्कीस कहानीकारों में दलित लेखिकाएँ कंचन लता, अनीता रश्मि, रजत रानी मीनू, ऊषा चन्द्रा, सरिता भारत – सिर्फ पांच के नाम हैं. ‘कविता खण्ड’ में भी दलित कवयित्रियों की कविताएँ नहीं है.

‘हंस’ के इस दलित विशेषांक का अतिथि सम्पादन डॉ. श्योराज सिंह बेचैन ने किया था. इस अंक में दलित लेखिकाओं को प्रोत्साहन के साथ अधिक संख्या में छापना, उनकी जिम्मेदारी माना जा सकता है. यद्यपि यह भी जरूरी है कि दलित लेखिकाएं स्वयं आगे आकर लेखन और प्रकाशन में अपना नाम दर्ज करायें.


सवर्ण बहुजन द्वारा चलाई जाने वाली पत्रिकाओं में दलितों की भी हिस्सेदारी हो. यह पत्रिका में आरक्षण मांगने की बात नहीं है, बल्कि उत्तम रचना के साथ दलित साहित्यकारों को पत्रिका में उचित स्थान मिले, इसके लिए सम्पादकों और साहित्यकारों दोनों ने ही जिम्मेदारी उठाना चाहिए.


पत्रिका प्रकाशन के क्षेत्र में ‘अन्यथा’ त्रैमासिक पत्रिका लुधियाना से छपने वाली बहुत ही सुन्दर और गरिमापूर्ण पत्रिका है. इसके सम्पादक कृष्ण किशोर जी हैं. ‘अन्यथा’ पत्रिका ने भी दलित बहुजन पिछड़े वर्ग के लिए अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. जुलाई-सितम्बर 2007 का अंक क्रमांक 10 में, विशेष रूप से ‘बनती मिटती जलती बुझती झोपड़पट्टियां’ पर विशेषांक केन्द्रित किया गया था. इस अंक में शोषित दलित जीवन से जुड़े प्रश्नो और समस्याओं पर जनवादी दृष्टिकोण से विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है.


इसके बाद ‘अन्यथा’ के अक्टूबर-नवम्बर 2007 के अंक 13 को ‘हमारी कहानी संदर्भ और संभावना’ पर विशेष केन्द्रित किया है. यह अंक बहुत ही व्यवस्थित रूप में प्रकाशित हुआ है. कहानी विधा पर सवर्ण साहित्यकारों के साथ दलित साहित्यकारों के विचारों को प्रकाशित किया है. इस अंक में अनीता भारती द्वारा आयोजित दलित कहानी पर चर्चा में ओमप्रकाश वाल्मीकि, अजय नावरिया, रूपनारायण सोनकर, राज वाल्मीकि, पूरन सिंह, सुशीला टाकभौरे, टेकचन्द, उमरावसिंह जाटव, रजतरानी मीनू और सुमित्रा महरोल सहभागी हुए हैं.


इस अंक में हिन्दी दलित लेखिकाओं में कौशल्या बेसन्त्री, सुशीला टाकभौरे, और सुमित्रा महरोल के आत्मकथांश हैं. रजतरानी ‘मीनू’ का साक्षात्कार छपा है. रजनी तिलक, कुसुम मेघवाल, अनीता भारती और सुमित्रा महरोल की कहानी छपी है. विनोदिनी की तेलगू कहानी का अनुवाद है. हेमलता महिश्वर का लेख छपा है. इसके साथ मराठी दलित कविता में प्रज्ञा दया पवार, मल्लिका अमर शेख, ज्योति लांजेवार, प्रतिभा अहिरे, और हीरा बनसोड़े की कविताएं हैं. ये कवयित्रियाँ मराठी भाषी हैं.

‘अन्यथा’ के इस अंक में – ‘अश्वेत गुलाम महिलाओं की संघर्ष कथा’ खण्ड में हृदय को हिला देने वाले आत्मकथांश और उपन्यास अंश छापे गये हैं. आत्मकथांश – हैरियट जेक्बस, मैरी जैकसन के हैं. उपन्यास अंश – हैरियट बाचर, स्टोव, जोरानील हस्र्टन ओईडा सैबेस्बियन के हैं.

सोजोर्नर टूथ के प्रसिद्ध भाषण का अंश – ‘‘मैं पूछती हूँ क्या मैं औरत नही हूँ’’ – का अनुवाद कृष्ण किशोर जी ने किया है. इजाबैला बोमफ्री का सोजोर्नर टूथ छपा है. अनुवाद भवजोत ने किया है. अनेक कविताएँ भी अनुवाद करके छपी हैं.


इस अंक का महत्त्व इसलिए अधिक है कि इसमें हिन्दी, मराठी, तामिल और अश्वेत महिलाओं के मार्मिक आत्मकथांश हैं. दलित लेखन में शुरू से ही, मराठी दलित साहित्य में दलित लेखिकाओं की संख्या बहुत ज्यादा है. इसका कारण है, सर्वप्रथम महारष्ट्र में अम्बेडकरवादी दलित आन्दोलन का प्रारम्भ हुआ. यहाँ की दलित महिलाएँ भी दलित आन्दोलन से जुड़ी. महिला जागृति के साथ वे लेखन से भी जुड़ गई. साथ ही, मराठी दलित साहित्य बीसवीं शताब्दी के छठवें दशक में मराठी भाषा में प्रकाशित होने लगा था, जबकि यह हिन्दी में आठवे दसक में आया. परिणाम स्वरूप मराठी दलित साहित्य में मराठी दलित लेखिकाएँ अधिक संख्या में जुड़ गईं. मराठी पत्रिकाओं के माध्यम से मराठी दलित साहित्य का प्रचार प्रसार अधिक हुआ.

‘बायजा’ पूना से प्रकाशित होने वाली, महिलाओं के प्रश्नों और समस्याओं पर केन्द्रित पत्रिका है. इससे सवर्ण महिलाओं के ‘महिला मुक्ति आन्दोलन’ और महर्षि कर्वे की नारी मुक्ति की विचारधारा का प्रचार प्रसार अधिक होता रहा है. दलित महिलाओं के ‘सेमिनार’ या ‘विचार गोष्ठी’ पर केन्द्रित अंकों में, दलित महिलाओं की समस्याओं की बात पत्रिका में छपती रही है.


‘सुगावा’ मराठी पत्रिका है. 1998 में ‘सुगावा’ का ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर प्रेरणा विशेषांक’ प्रकाशित हुआ था. इसका अतिथि सम्पादन विलास वाघ ने किया था. इस विशेषांक में अनेक प्रसिद्ध मराठी दलित लेखिकाओं के विचारात्मक लेख छपे थे. उनके नाम हैं – कुमुद पावड़े, डॉ. आशा थोरात, उर्मिला पवार, डॉ. तारा भावाळकर, ज्योति लांजेवार, मंगला कुलकर्णी, रजनी ठाकुर, कल्पना ढावरे, माया बोरसे, प्राध्यापक डॉ. माधवी खरात, डॉ. पदमा वेलासकर, सौ निर्मला विलास, प्राध्यापक अर्चना हातेकर, अनुपमा, मंगला वराळे, एड. शीला हिरेकर, प्रा. सुलभा पाटोळे, डॉ. सरिता जांभुळे, मीनाक्षी मून, अलका कोकणे, कुसुमताई गागुर्डे, स्नेहलता कसबे, डॉ. प्रमिला लीला सम्पत, नलनी लढ़के – इन सभी लेखिकाओं ने अपने वैचारिक लेख 1998 में लिखे थे. उनका लेखन प्रगतिशील और परिवर्तनवादी था. डॉ. भीमराव अम्बेडकर के सामाजिक आन्दोलन से जुड़कर, ‘दलित और महिला आन्दोलन’ में सक्रिय रूप में भाग लेकर, मराठी दलित लेखिकाओं ने वैचारिक परिपक्वता पाई है. दलित साहित्य लेखन में उनके अग्रसर होने का कारण महाराष्ट्र में डॉ. अम्बेडकर के आन्दोलन का विशेष प्रभाव है.

उत्तर भारत में, लेखन में यह प्रभाव 1980 के समय आया. मराठी दलित साहित्य से प्रभावित होकर अनेक हिन्दी दलित लेखकों ने अपनी रचनाएँ और पुस्तकें प्रकाशित कीं. मगर इनमें लेखिकाओं की संख्या कम ही रही. इसके कारणों को खोजकर, उनके निदान की आवश्यकता है. तभी दलित लेखिकाओं के लेखन और प्रकाशन को बढ़ाया जा सकेगा.


दलित लेखिकाओं की संख्या आज भले ही कम है, लेकिन उनके लेखन का आधार विरोध, आक्रोश और विद्रोह है. वे सदियों से चली आ रही हिन्दूवादी नारी शोषण की परम्पराओं को तोड़ने की बाते कह रही हैं. दलित लेखिकाएँ अपनी अस्मिता, और अस्तित्व की बात अपने लेखन के माध्यम से कर रही हैं. वे जातिभेद के कारण होने वाले अन्याय अत्याचार के विरोध की बात भी कह रही हैं. वे नारी शोषण, दलित शोषण के विरूद्ध अपने विचार रखते हुए, दलित मानस में मनोबल का निर्माण करने का काम कर रही हैं.

दलित लेखन मात्र लेखन नहीं, बल्कि दलित आन्दोलन का साधन है. इस साधन का उपयोग दलित लेखिकाएँ भी समाज व्यवस्था में परिवर्तन के लिए कर रही हैं. दलित महिलाओं के अपने संगठन हैं. समय समय पर महिलाओं के सम्मेलन सेमिनार शिविर और विचार गोष्ठियाँ होते हैं, जिनमें दलित महिलाओं की वर्तमान स्थिति और भविष्य की प्रगति पर चर्चा करके सुझाव और प्रस्ताव रखे जाते हैं. महिला संगठनों के ऐसे कार्यक्रमों से जुड़कर, दलित लेखिकाएं दलित आन्दोलन का उद्देश्य और अपने लेखन का लक्ष्य समझ रही हैं. इस तरह उनका लेखन उद्देश्यनिष्ठ बन गया है.

दलित लेखिकाएँ और कार्यकर्ता महिलाएँ संगठित होकर अपने उद्देश्य की ओर लगातार बढ़ रही हैं. वे अपने साथ अधिक से अधिक महिलाओं को जोड़ रही हैं. इस क्षेत्र में ‘कदम’ और ‘नेक्डोर’ जैसी एन. जी. ओ. के माध्यम से यह काम प्रयत्नपूर्वक किया जा रहा है. दलित महिलाओं के लेखन और प्रकाशन में वृद्धि हो रही है. भाषान्तर के द्वारा भी अलग भाषा भाषी लेखिकाओं का परिचय बढ़ रहा है.

लेखन प्रकाशन के साथ प्रचार माध्यमों से जुड़ना दलित लेखिकाओं के लिए आवश्यक है. इसलिए यह जरूरी है कि दलित लेखिकाएँ पत्रिकाओं से जुड़कर, लेखन प्रकाशन का प्रचार प्रसार करें. महिलाओं की अपनी पत्रिकाएँ हों, जिनके माध्यम से वे अपनी समस्याओं और सवालों को राष्ट्रीय स्तर पर और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उठायें. तभी उनका लेखन और ‘महिला जागृति आन्दोलन’ पूर्णता के साथ सफलता पा सकेगा.

आरती रानी प्रजापति की कवितायें

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आरती रानी प्रजापति

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

1

हाँ मैंने महसूस किया है
तुम्हारी देह को हर बार
तुम करना चाहते हो
अनाधिकार प्रवेश उसमें
कर देना चाहते हो
छलनी मेरे हर अरमान
छीन लेना चाहते हो
मेरे होंठों से मुस्कराहट
करना चाहते हो
घाव मेरे दिल-दिमाग शरीर पर
क्यों?
क्या तुम नहीं समझते मुझे एक इंसान
क्या ये सब नहीं हो सकता बिना हिंसा के?
क्या शरीर का मिलन तुम्हारे लिए मात्र क्रिया है?
जिसे पूरा करना चाहते हो तुम चाहे जब
जैसे भी….


2

राशन की दुकान में
लम्बी लाइन में खड़ी
तुम
सोचती हो कल रात की घटना
काँप जाती है तुम्हारी आत्मा
रोने को होता है
मन
कल तुमने अपनी आँखों से देखा
कालू की बेटी
भूख से मर गई
राशन की दुकान पर
तुम्हारी तरह खड़ी थी
उसकी भी माँ
कई दिन से
बंद कर दी गई दुकान
वक्त से पहले
एलान कर दिया गया
राशन के खत्म होने का
कई दिनों से खडे होने पर
कल पहुँच ही गई थी
दरवाजे तक

तभी राशनवाले ने
सुना दिया फरमान
कई दिनों से पानी पर
टिकी उस मासूम की आस
का बाँध टूट गया
हालांकि देश में
चल रहा था
विदेशी अर्थव्यवस्था को अपनाने का
ख्याल
फिर भी देश की इस व्यवस्था
की ओर
न था ध्यान किसी का
एक बार फिर
काँप जाती है तुम्हारी देह
सोच कर
मुन्ना भी कई दिनों से भूखा है….

3

दबा दो आवाज
तोड दो अंगुली
खत्म करो गुस्सा
बंद करो चीख
ये प्रजातंत्र है.

4

चादर के सभी कोने से
खुद को
सावधानी से ढक
फटे हिस्सों से बचती
मेट्रो की छत बनाने
गाँव से आई वह
युवती
छत के आभाव में
सड़क के डिवाडर
पर बैठ
जल्दी जल्दी
नहाने लगी


5

प्रेम के गंभीर
पलों में
उसने महसूस की
गंध
उसके जाति
अहम्
पुरुषत्व की
तुरंत
वह छोड़ भाग गई
प्रगतिशील विचारों की
उस फटी चादर को….

6

सिन्दूर
मंगलसूत्र
कंगन
बिछुआ
पायल
बिंदी
बोरला
न सही पर कुछ तो हो
जो तुम्हें मेरा घोषित करें…

7

हमारी ही तरह
तुम भी
बने हो
माहवारी से
खोली थी आंखें तुमने भी
योनि से
निकल कर,
जन्म देने वाली
स्त्री ही थी
जब स्त्री की कोई
जाति नहीं होती
फिर कैसे तुम
सवर्ण
हम
अवर्ण
घोषित हुए

8

गोरापन
कोमलता
अदा
नाज-नखरे
इठलाना
फैशन
भरी-देह
तुम्हारे पैमानों का
आदि-अंत
हो
किन्तु स्त्री इससे
इतर भी बहुत कुछ है…

9

मुझे नहीं पसंद
चूल्हे की रोटी
उसे बनाने से
न जाने कितनी माँ
खासती रहती हैं
सारा दिन
कितनी ही बहनें
होती हैं बलात्कृत
खोज में लकड़ियों के
सुनती हैं तानें
झगड़ती हैं
अपने ही लोगों से
ये बहने ढोती हैं
लकड़ियों का बोझ
किताबों की जगह
बच्चों की प्रतीक्षा
हो जाती है लम्बी
चूल्हा याद करते ही
मुझे याद  आने  लगते हैं
सिर्फ आंसू
माँ, बहन, बच्चों के…..

सभी सरकारें दोषी हैं महिला आरक्षण बिल के मसले पर: महिला आयोग अध्यक्ष

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमार मंगलम महिला आरक्षण बिल न पास होने का कारण बता रही हैं सभी राजनीतिक पार्टियों की अनिच्छा को. पितृसत्ता की गहरी पैठ को जो महिलाओं को समान अधिकार नहीं देना चाहती. इस संदर्भ में वर्तमान सरकार से लेकर सभी सरकारों को दोषी बता रही हैं, जिसने गंभीरता पूर्वक महिला आरक्षण बिल को पास कराने में रुचि नहीं ली है. वे बता रही हैं कि ‘ ऐसा बहुत कम होता है , जब बीजेपी और कांग्रेस एक साथ एक प्लेटफॉर्म  पर आये और जब आई तो राज्यसभा में बिल पास हो गया. ये बातें  उन्होंने 12 सितंबर 2016 को एनएफआईडवल्यू के द्वारा आयोजित सेमिनार में कही. सेमिनार महिला आरक्षण बिल के पेश किये  जाने के 20 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित था:

प्रेमा झा की कवितायें

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प्रेमा झा 

युवा कवयित्री,ब्लॉगर संपर्क :prema23284@gmail.com

मेरा देश अभी सीरिया या इज़रायल नहीं हुआ है  

मैं जनता हूँ
आम जनता हूँ
मैं लूट चूका हूँ
मैं बर्बाद और बेबस हूँ
मैं मुज़रिम हूँ,
दोषी हूँ और सजायाफ्ता कैदी
से जरा बड़ा मेरा दोष है
क्योंकि मैंने पाई-पाई जोड़े हैं
बुरे वक़्त में काम आने के लिए
बच्चों की फ़ीस भरने और जोरों के दर्द में काम आने के लिए
अब तक मेरे खाते में कई सील बंद कर दी गई है
और मुझे बड़ा चोर बताकर कतार में खड़ा कर दिया गया
मेरे हाथ में रखे नोटों को मैं अब माँ गंगा की भेंट चढ़ा रहा हूँ
भक्ति  के नाम पर उसने मुझसे कहा है कि पुण्य कमा
काम आएगी माँ गंगा
जब मय्यत के दिन
तेरी अर्थी का राख़ उस गंगा में विसर्जित की जाएगी
माँ गंगा तब भी काम आएगी
जब तेरे पास से ऐसे ही बहुत से नोट निकलेंगे
एक बार माँ के नाम से भेंट चढ़ा
फिर देखना सब पाप धुल जाएँगे
जिन्होंने बहुत से पाप, लूट, हत्याएं और कालाबाज़ारी की थी
वो स्विस-अकाउंट में पैसे भर चुके थे
और वो गंगा के पास आकर केवल हवन और ग्रहण करते थे!
वो अब तक कनाडा और यू.एस. शिफ्ट कर चुके हैं
वे बड़े-भारी लोग हैं
उनसे माँ गंगा कभी-कभी मिलती भी हैं
उन्होंने कई पेटी भरने के बाद अब सूची से नाम काट लिया है
कतार में बस मजदूर, बेबस और लाचार लोग बचे थे
ये जनता हैं
आम जनता हैं
रियासत का कहना था-
भूख से मरो, बीमारी से मरो
मगर स्वच्छ रहना
हर पाप से, पाई-पाई के हिसाब से
मेरा पांच साल का बच्चा न्यूमोनिया से लड़ रहा है
और ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है
और मैं लाइन में खड़ा हूँ
इस इंतज़ार में की पैसे मिलते ही सब ठीक हो जाएगा
मेरा बच्चा बच जाएगा
मगर मेरा बच्चा मर चूका था!
लाइन ख़त्म नहीं हुई अब भी
हुक्मरानों का कहना था
इससे देश से कालाधन साफ़ होने में

और
अर्थव्यवस्था मज़बूत होने में मदद मिलेगी
मगर मेरे घर में चीत्कार फट रही है
मैं अब भी लाइन में खड़ा हूँ
मैं जनता हूँ
आम जनता हूँ
जनता जो तमाम टूजी, थ्रीजी घोटाले करने के बाद
इन्फ्निट लाइन में खड़ी हो जाती है
अडानी, मोदी और माल्या विदेश कूच कर जाते हैं
तब रियासत एक नया पैंतरा फेंकती है
अभी एक जवान औरत की लाश निकल रही है
देश में जियो सिम आ गया है
ताकि मौत की खबर को जल्द-से-जल्द
बिना किसी परेशानी और राशि के पंहुचाया जा सके
हुक्मरानों ने हिरोशिमा और नागासाकी के स्टेशन पर
नया सन्देश पंहुचाया है
देश प्रगति के पथ पर है
मेरे घर में तेरहवीं का मातम है
मैं जनता हूँ
आम जनता हूँ
मुझे खुश होना चाहिए
मेरा देश अभी सीरिया या इज़रायल नहीं हुआ है
मैं लाइन में खड़ा हूँ
और बुदबुदा रहा हूँ
मेरा बच्चा मर गया
लेकिन, देश अभी सीरिया या इज़रायल नहीं हुआ है

कश्मीर पुरुष    

हे कश्मीर पुरुष,
मैं देहलवी तुम्हारे रूप से
मोहित होकर
तुम्हारी खूबसूरत वादियों में आ गई हूँ
मुझे संभालो न!
देखो न, अन्ना केरेनिना की तरह
मेरे वस्त्रों की सिलवटें
सब तुम्हारे आलिंगन और चुम्बन के लिए
तरसने लगी है
तुम बेहद सुंदर पुरुष हो
धरती के सबसे सुंदर पुरुष
स्त्री से पुरुष का आकर्षण
इससे पहले कईयों ने दोहराया होगा
मगर एक पुरुष से स्त्री के आकर्षण पर
अब इतिहास लिखा जाएगा
मैं उसी तरह तुम्हारे पास
जैसे हद्दे नज़र तक सुंदर घाटियाँ

और
घाटी में घुसे हुए घुसपैठिये
की तरह देखो न!
अब षड़यंत्र भी रचने लगी हूँ
किसी हारी प्रेमिका की तरह!
मैं, देहलवी तुम पर दावा ठोकूंगी
तुम्हें गिरफ्त में करूंगी
अपनी कुछ जटिल योजनाओं के तहत
और
सुर्ख प्रेम-लिपियों में
तुम पर ग्रन्थ भी लिखूंगी
मैं, मेरे अंगरक्षक जो मेरे
बाप और भाई होने का दावा करते हैं
उनसे तुम्हारे लिए प्रस्ताव भेजूंगी!
तुम मेरे हो सिर्फ मेरे
हे कश्मीर पुरुष,
जब कश्मीरियों पर जुल्म
ढाया गया था-
मैंने ही चुपके से
अभिसारी मेनका को
तुम्हारा तप भंग करने को भेजा था
हे कश्मीर पुरुष,
मैं दोषी हूँ देहलवी
मेनका ने रूप बदलकर
भागकर स्वर्ग से दूर
बारूदी-सुरंगों में शरण ले ली!
हे कश्मीर पुरुष,
मैं दोषी हूँ
उन सब असंस्कारी संततियों की
जिसने बारूद के गोले से
रेत पर लिखे अक्षरों जैसे
घर, घर की दीवारें और चौखट बना दिए
मैंने उन्हें सँभालने की बहुत कोशिश की
मगर
बारूदी घरों ने धीरे-धीरे
संतति पैदा करते हुए
एक पूरा क़स्बा, शहर
और फिर मुल्क बना लिए
बुरहान वानी मेरी ही षड्यंत्रों का साजिश था
हे कश्मीर पुरुष,
मैं, तुमसे मगर मुआफ़ी नहीं मांगूंगी
क्योंकि मैं तुमको जीतना चाहती हूँ
और हाँ; बारूद बने मुल्क और उनकी स्त्रियों का कहना है कि
तुम उनके हो?
मैं, तुमको बाँट नहीं सकती कश्मीर पुरुष
नहीं चाहती सौतनें अपने लिए!
इस तरह
तुम्हारी नाजायज़ संतानें भी मुझे शिरोधार्य होगी
मेरे अंगरक्षकों और मेरे सैनिकों का कहना है
मेरी प्यारी देहलवी
तेरी हर मुराद मैं पूरी करूँगा
तुझसे ईर्ष्या करने वाली हर स्त्रियों का वही हाल होगा
जो बड़े महल के मुख्य-द्वार पर काँटों में फंसी
उस मकड़ी का हुआ है
मकड़ी जो घर तो बना लेती है
मगर उसे पता नहीं होता
वो काँटों के बिना पर खड़ी है
हे कश्मीर पुरुष,
मैं देहलवी तेरे लिए जान दे भी दूंगी
और ले भी लूंगी
सच बताऊँ; सैनिकों का जो जखीरा
कश्मीरियों पर हमला बोला था
उसको मैंने गुरु-मंत्र में
धर्म, असहिष्णुता, हिंसा, गोले-बारूद
और नफरत दे दी!
मेरे अंगरक्षक आज बदल गए है
लेकिन, मैंने गुरु मंत्र नहीं बदले
हे कश्मीर पुरुष,
फिर भी मैं चिंतित हूँ
तुम्हारे चौड़े सीने पर उगे बाल
जो स्त्री से पुरुष की आसक्ति दर्शाती है
उसमें धीरे-धीरे
बारूद कि ज्वाला भड़कने लगी है

घाटी जल रही है
अंगरक्षक, सैनिक, सौतनें और प्रेमिका
मुझे इंतज़ार है किस दिन
दावेदारी छोड़कर
सच में प्रेम करने लगेंगे
मैं बदल रही हूँ कश्मीर पुरुष
बदलने लगी हूँ
फिर भी तुमसे मेरा मोह नहीं छूटता
अब बोलो तुम क्या कहना चाहोगे?
तभी घाटी के
पुरअसरार, सुनसान रास्ते से
एक गीत निकलता है
और वह जन गण मन होता है!

बिहार और जातिवाद का इतिहास ‘दिनकर’ की कलम से:

डॉ.रतन लाल

एसोसिएट प्रोफेसर
इतिहास विभाग
हिन्दू कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क : lalratan72@gmail.com.

भारत में जब चुनाव या किसी अन्य गतिविधि की चर्चा होती है तब निःसंदेह जातिवाद की चर्चा अवश्य होती है, ऐसा लगता है कि जाति और राजनीति एक दूसरे के पर्याय हों. हालाँकि सत्ता और संसाधन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जो इससे अछूता हो. लेकिन सबसे मज़ेदार बात यह है कि जातिवाद की राजनीति करने को तोहमत सिर्फ दलित और पिछड़ों पर ही थोप दिया जाता है और बाकी सवर्ण जातियों को सर्वग्राही, सर्वमान्य, और पूरे समाज का नेता मान लिया जाता है. यहाँ ध्यान रखने की जरुरत है कि यदि ‘जाति’, ‘जाति’ में अंतर है तो ‘जातिवाद’ और ‘जातिवाद’ – सवर्णवाद और पिछड़ा या दलितवाद – में भी अन्तर है और यह दोनों ‘वाद’ एक दूसरे के विपरीत भी हैं.

यदि बिहार की ऐतिहासिक-सामाजिक पृष्ठभूमि को खंगालें तो बड़े-बड़े ‘सवर्ण’ राजनैतिक-साहित्यिक ‘शूरवीर’ जातिवाद की ज़मीन बनाते दिख जायेंगे. एक बार जब जातिवाद की ज़मीन तैयार हो गई तो उसकी बदौलत सवर्ण तबका पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता और संसाधन की मलाई खाता रहा. अस्सी और नब्बे के दशक में जब दलित-पिछड़ों में सामाजिक-राजनीतिक चेतना का सन्चार होता है और सत्ता के समीकरण बदलने लगते हैं तब वर्चस्वशाली सवर्ण लोगों को अचानक राजनीति में ‘जातिवाद’ दिखने लगता है।


‘दिनकर’ – रामधारी सिंह ‘दिनकर’ – भारत के बौद्धिक जगत के एक चर्चित और प्रसिद्द नाम. यह लेख, रामधारी सिंह दिनकर – अधिकारी, ‘राष्ट्रकवि’, साहित्यकार, प्रोफेसर, वाईस-चांसलर, राजनेता सब कुछ थे – के लेखन द्वारा बिहार की राजनीति को समझने का प्रयास है. यह अध्ययन, ‘दिनकर की डायरी’ और ‘दिनकर रचनावली’ खंड, -14 के अध्ययन पर आधारित है. ‘दिनकर की डायरी’ में तो उनके व्यक्तिगत अनुभवों, और खाली क्षण में उनके लिखे गए उनके विचारों का संकलन है. दिनकर के व्यक्तिगत विचार और दर्शन को समझने के लिए ये दोनों स्रोत काफी महत्वपूर्ण हैं. विशेष रूप से पत्रों के संकलन का अध्ययन महत्वपूर्ण है.

हिंदी जगत अपने उद्भव काल से ही सवर्ण जातीयता का अड्डा रहा है और अपने-अपने वर्चस्व के लिए इनके आपसी संघर्ष की गाथा भी सर्वविदित है. आज़ादी से काफी पहले, 12 सितम्बर 1939 को दिनकर लिखते हैं, “…बिहार में कायस्थ, राजपूत और भूमिहार की फीलिंग बड़े जोरों पर चल रही है और साहित्य क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं बच रहा है. इसका दुःख है. इस फीलिंग की कुछ डंक मुझे भी लग रही है अन्यथा मैं अपने जीवन को कुछ दूसरा रूप देने में समर्थ हो सकता था.”

अब देखिए दिनकर-गुप्त-बेनीपुरी कथा, जिसकी चर्चा दिनकर द्वारा सूर्यनारायण व्यास को लिखे गए पत्र (14.8.53) में मिलती है. दिनकर उस समय राज्य-सभा सदस्य थे और उनके बारे में अफवाह फैलाई गई कि वे मंत्री बनने के लिए नौकरी छोड़कर दिल्ली आए हैं. दिनकर लिखते हैं, “…इस प्रवाद को फ़ैलाने में सर्वाधिक हाथ पितृवत, परम श्रद्धेय राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण जी को है. वे संसद में आ गए, यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार था, मैं गरीब क्यों आया, इसका उन्हें क्रोध है. सच कहता हूँ, जन्म भर गुप्त जी पर श्रद्धा सच्चे मन से करता रहा हूँ. हृदय को चीरकर देखता हूँ तब भी यह दिखलाई नहीं पड़ता कि उनका मैंने रंच भर भी अहित किया हो, स्तुति में लेख लिखा, विद्वानों के बीच उनकी ओर से लड़ा, एक कांड को लेकर ब्रजशंकर जैसे निश्छल मित्र से रुष्टता मोल ली, यूनिवर्सिटी में उनकी किताबें कोर्स में लगवाता रहा, अभी-अभी एक किताब कोर्स में लगवा दी. दिल्ली में भी कम सेवा नहीं की मगर फिर भी यह देवता कुपित है और इतना कुपित है कि छिप-छिपकर वह मुझे सभी भले आदमियों की आँख से गिरा रहा है. मेरे एक पत्रकार मित्र का यह कहना है कि प्रबंध-काव्य लिखकर तुम गुप्त जी के मित्र नहीं रह सकते क्योंकि इससे उनके व्यापार पर धक्का आता है. अस्तु.”

इसी पत्र में दिनकर आगे लिखते हैं, “बेनीपुरी भी नाराज़ थे क्योंकि वे खेत चरना चाहते थे और मुझसे यह उम्मीद करते थे कि मैं लाठी लेकर झाड़ पर घूमता रहूँ, जिससे कोई खेतवाला भैंस को खेत से बाहर नहीं करे. और भी एक-दो मित्र अकारण रुष्ट हैं. और यहाँ की विद्वान मंडली तो पहले जाति पूछती है. सबसे दूर, सबसे अलग, आजकल सिमटकर अपने घर में घुस गया हूँ. बिहार नष्ट हो गया है, इसका सांस्कृतिक जीवन भी अब विषाक्त है. अब तुम जाति की सुविधा के बिना यहाँ न तो कहीं कोई दोस्त पा सकते हो, न प्रेमी, न प्रशंसक और न मददगार. जय हो यहाँ की राजनीति की! और सुधार कौन करे? जो खड़ा होगा, उसपर एक अलग किस्म की बौछार होगी. मेरा पक्का विश्वास है कि बुद्ध यहाँ नहीं आए थे, महावीर का जन्म यहाँ नहीं हुआ था. यह सारा इतिहास गलत है. साहित्य का क्षेत्र यहाँ बिलकुल गन्दा हो गया है. ‘पंडित सोइ जो गाल बजावा’ भी नहीं, यहाँ का साहित्यकार अब वह है जो ‘टेक्स्ट-बुक’ लिखता है. बेनीपुरी रूपए कमाते-कमाते भी थक गया, आजकल मूर्च्छा से पीड़ित रहता है. चारों ओर का वातावरण देखकर मैं भयभीत हो गया हूँ. चारों ओर रेगिस्तान है, चारों ओर ‘कैक्टस लैंड’ का प्रसार है.”

अब जरा कॉलेज के वातावरण का हाल देखिए, “वहां भी जातिवादियों का जाल था, वहां भी अपमानजनक बातें सुनने में आईं, वहां भी इर्ष्या-द्वेष और मालिनता का सामना करना पड़ा. साथ ही, यह भी भासित होता रहा कि कविता की सबसे अच्छी कब्र कॉलेज ही है. कविता को बचाने के लिए वहां से भागने को तो पहले ही तैयार था. जब कांग्रेस का ऑफर आया, मैं नौकरी छोड़कर संसद में आ गया. अब मैथिलीशरण और अर्थाभाव, ये दो संकट झेल रहा हूँ और बाहर तो लोग अब भी काफी अमीर समझते हैं.”   इस समय तक दिनकर 45 वर्ष के हो चुके थे और उनके विचारों में परिपक्वता देखी जा सकती है. बिहार और साहित्य जगत में फैले जातिवाद को लेकर अब वे इतने दुखी महसूस कर रहे थे कि वे आक्रोश में इतिहास को ही नकार रहे थे, “मेरा पक्का विश्वास है कि बुद्ध यहाँ नहीं आए थे, महावीर का जन्म यहाँ नहीं हुआ था. यह सारा इतिहास गलत है.”

जाति के प्रश्न पर दिनकर के समझ की व्यापकता और ‘आक्रोश’ उम्र के पचासवें में देखी जा सकती है. सन 1961 में दिनकर राज्य सभा के सदस्य थे. 4 मार्च 1961 को दिनकर ने श्री रामसागर चौधरी नाम के एक व्यक्ति को पत्र लिखा, “सच ही, मैं आपको नहीं जानता तब भी आपका 28.2.61 का पत्र पढ़ कर दुखी हुआ. यह लज्जा की बात है कि बिहार के युवक इतनी छोटी बातों में आ पड़े. मैं जातिवादी नहीं हूँ. तब भी अनेक बार लोगों ने मेरे विरुद्ध प्रचार किया है और जैसा आपने लिखा है, अब वे ऐसी गन्दी बातें बोलते हैं. लेकिन तब मैं जातिवादी नहीं बनूँगा. अगर आप भूमिहार वंश में जन्मे या मैं जनमा तो यह काम हमने अपनी इच्छा से तो नहीं किया, इसी प्रकार जो लोग दूसरी जातियों में जनमते हैं, उनका भी अपने जन्म पर अधिकार नहीं होता. हमारे वश की बात यह है कि भूमिहार होकर भी हम गुण केवल भूमिहारों में ही नहीं देखें. अपनी जाति का आदमी अच्छा और दूसरी जाति का बुरा होता है, यह सिद्धांत मानकर चलने वाला आदमी छोटे मिजाज का आदमी होता है. आप लोग यानी सभी जातियों के नौजवान – इस छोटेपन से बचिए. प्रजातंत्र का नियम है कि जो नेता चुना जाता है, सभी वर्गों के लोग उससे से न्याय की आशा करते हैं. कुख्यात प्रान्त बिहार को सुधारने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि लोग जातियों को भूलकर गुणवान के आदर में एक हों. याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजानिक जीवन गल जाएगा.”

व्यक्तिगत सुझाव और जातिय संबंधों में सत्ता के खेल की व्याख्या करते हुए दिनकर आगे लिखते है, “आप सोचेंगे, यह उपदेश मैं आपको क्यों दे रहा हूँ? किन्तु आपने पुछा, इसलिए आप ही को लिख भी रहा हूँ. आज आप पीड़ित हैं, अपने आपको दुखी समझते हैं. आपके विरुद्ध जिनका द्वेष उभरा है, कल उनका क्या भाव था? शायद अपने को वे उपेक्षित अनुभव करते थे. इसलिए, स्वाभाविक है कि उनका असंतोष व्यक्त हो रहा है. और उपाय भी क्या था? इसलिए आपको धीरज रखने को कहता हूँ, उच्चता पर आरूढ़ रहने को कहता हूँ.”
जातीय राजनीति की वर्गीय चरित्र और सीमाओं की चर्चा करते हुए दिनकर लिखते है, “जाति-नाम का शोषण करके मौज मारनेवाले चन्द लोग, जो कुछ करते हैं, उसकी कुत्सा उस जातिभर को झेलनी पड़ती है, यह आप लोग समझ रहे हैं? यही शिक्षा कल उन्हें भी मिलेगी, जो आपको केवल इस लिए डस रहे हैं कि आप भूमिहार हैं. तो इससे निकलने का मार्ग कौन सा है? केवल एक मार्ग है. नियमपूर्वक अपनी जाति के लोगों को श्रेष्ठ और अन्य जातिवालों को अधम मत समझिए. और यह धर्म उस समय तो और भी चमक सकता है जब आदमी जांच की कसौटी पर हो.”

इस पत्र को पढ़ने पर कुछ बातें झलकती हैं. पहली बात तो यह है की श्री रामसागर चौधरी, दिनकर के स्वजातीय – भूमिहार – थे. चौधरी साहब को किसी गैर-भूमिहार से कोई परेशानी थी, इसलिए मदद के लिए उन्होंने अपने स्वजातीय सांसद श्री दिनकर को पत्र लिखा. ऐसा लगता है कि चौधरी साहब ने जाति के आधार पर दिनकर से मदद मांगी, इसीलिए दिनकर व्यथित थे और उन्हें लिखना पड़ा, “मैं जातिवादी नहीं हूँ.” दूसरी महत्वपूर्ण बात, जिस समय यह पत्र लिखा गया उस समय बिहार में श्रीबाबू (श्रीकृष्ण सिंह) मुख्य-मंत्री थे और वे भी जाति से भूमिहार थे. अब प्रश्न उठता है कि क्या श्रीबाबू की राजनीति शैली ऐसी हो चुकी थी कि बिहार उसी समय कुख्यात हो गया था. लगता है दिनकर को, श्रीबाबू की रुढ़िवादी जातिवादी राजनीति से क्षुब्ध होकर, लिखना पड़ा, “कुख्यात प्रान्त बिहार को सुधारने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि लोग जातियों को भूलकर गुणवान के आदर में एक हों. याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजानिक जीवन गल जाएगा.”
आधुनिक बिहार के इतिहास में राजनीति में जातिवाद के जन्म का श्रेय बिहार के पढ़े-लिखे और ‘समझदार’ सवर्णों को जाता है. लेकिन सत्ता के गलियारे में वर्चस्व को लेकर के.बी. सहाय और महेश प्रसाद सिन्हा में जातीय गुटबंदी सर्वविदित थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि दोनों 1957 के विधान सभा चुनाव में हार गये. लेकिन चुनाव हारने के बावजूद, श्रीबाबू ने महेश प्रसाद सिन्हा को तो राज्य खादी बोर्ड का चेयरमैन बनाया, परन्तु सहाय को कुछ नहीं बनाया गया. यही नहीं उनके कैबिनेट और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर दलितों की संख्या अपर्याप्त थी एवं पिछड़ी जातियों महिला तथा आदिवासी नदारद. यही कारण था कि दिनकर ने लिखा, “याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजानिक जीवन गल जाएगा.”

जीवन के छठे दशक में जाति के प्रश्न पर दिनकर के विचारों की परिपक्वता और व्यापकता और अधिक बढ़ती गई और अब उनके विचारों में आक्रोश के साथ व्यंग भी दीखता है. वे अपनी डायरी में लिखते हैं, “सरदार पटेल की 96वीं जयंती का सभापतित्व करने को साहित्य सम्मलेन-भवन गया. मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री भी आए हुए थे. प्रायः सभी वक्ता एक ही जाति के थे. अधिक श्रोता भी उसी जाति के थे. सोचकर हंसी आती है कि स्वामी सहजानंद और बाबू श्रीकृष्ण सिंह भूमिहार बनकर जी रहे हैं. अनुग्रह बाबू के नामलेवा राजपूत हैं और सरदार पटेल की जयंती बिहार में कुर्मी बंधु मनाते हैं. बिहार गर्त में गिरता जा रहा है. कहाँ जाकर रुकेगा इसका पता नहीं चलता.”

अपने स्वजातीय बंधुओं से ही हुए उत्पीड़न की व्यथा वे इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, “मैं भी अपनी पोती के लिए लड़का खोज रहा हूँ. कोई सीधे मुंह बात ही नहीं करता. पहले समाज में ऐसे लोग थे, जिन्होंने मुफ्त लड़के देकर, मेरा उपकार किया था. मगर अब वे लोग समाज से लुप्त हो गए हैं. नई पीढ़ी के भूमिहार केवल अर्थ-पिशाच हैं. मैं भी जात से बाहर जाने को तैयार हूँ. दूसरा विकल्प यह कि लड़की क्वाँरी रह जाय. और क्या कर सकता हूँ? पहले लोग सोचते थे दिनकर कंगाल नहीं है, उसके पास कीर्ति है, उसे शरण मिलनी चाहिए. अब ऐसी बात कोई नहीं सोचता. ऐसी भ्रष्ट जाति से बाहर निकलने का रास्ता मिले तो इससे अच्छा और क्या होगा. मगर कोई रास्ता तो मिले. 9 लड़कियों की शादी कर चुका हूँ. रामसेवक की तीन लड़कियां और हैं. कम से कम दो की शादी करके मरना चाहता हूँ. मुझे लगता है, भगवान ने मुझे 11 लड़कियों के ब्याह के लिए भेजा था. वह काम पूरा हो जाए तो समझूँ मेरे अवतार का कार्य पूरा हो गया….असल में भूमिहार ही नहीं सारा प्रान्त सड़ गया है.”
जातिवाद के दंश से शिक्षा का भी क्षेत्र नहीं बच पाया. बुद्धिजीवियों की भूमिका की चर्चा करते हुए दिनकर लिखते हैं, “असली स्थिति यह है कि जनता चाहती है कि मनीषी ऐसा हो कि वह राजा और प्रजा, दोनों को डांट सके. जब तक मनीषी इस धर्म का पालन करता है, तब तक जनता उसके साथ रहती है. स्वराज्य के पूर्व तक मनीषियों का इस देश में बड़ा सम्मान था, क्योंकि मनीषी शासकों के खिलाफ़ आवाज़ उठाते थे. मगर अब मनीषियों का आदर बहुत कम हो गया है. जो मनीषी लेखक और कवि हैं, वे कला की सेवा तो करते हैं, लेकिन समय के जलते प्रश्नों पर अपना विचार व्यक्त नहीं करते. स्पष्ट ही यह सुरक्षा की राह है और जो सुरक्षा खोजता है, जनता उसकी खोज नहीं करती. हमलोग सुरक्षा की खोज में ही मारे गये हैं.”

राजनीति, अफसरशाही और मनीषियों के सम्बन्ध और उभरते चाटुकारिता और घुटनाटेक संस्कृति की चर्चा करते हुए दिनकर लिखते हैं, “आज तो स्थिति यह है कि जिस समाज में हम जीते हैं, उसका प्रोप्रेइटर राजनीतिज्ञ है, मैनजर अफसर है और मनीषी मजदूर है. कुछ मनीषी अध्यापक और प्राध्यापक हैं, कुछ लेखक, कवि और पत्रकार हैं. मगर वे हमेशा चौकन्ने और सतर्क रहते हैं कि कहीं कुछ ऐसी बात मुंह या कलम से न निकल जाय, जिससे सरकार या विश्वविद्यालय के अधिकारी नाराज़ हो. जिस समाज के मनीषी असुरक्षा से इतने शंकित और भयभीत हों, उस समाज का नेता राजनीतिज्ञ ही रहेगा. सरस्वती और लक्ष्मी में बैर है, यही सिद्धांत ठीक था. हमने इस बैर को बुझाने की कोशिश की, यही हमसे बड़ी भरी भूल हो गयी.”

ध्यान देने की जरुरत है, जिन मनीषियों की चर्चा दिनकर यहां कर रहे हैं, वे कौन लोग थे इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं.बहरहाल, दिनकर के जीवन के जिस चार दशक की यहाँ चर्चा की गई है, उसमें जाति के सम्बन्ध में दिनकर दिनकर के विचारों को स्पष्ट रेखांकित किया जा सकता है.अपने निजी जीवन में अपने स्वजातीय बंधुओं से इतने सताए गए की उन्हें लिखना पड़ा “नई पीढ़ी के भूमिहार केवल अर्थ-पिशाच हैं.” लेकिन जाति और धर्म में सत्ता के खेल को दिनकर चुनौती नहीं दे पाए.गौरतलब है कि उनके मित्र राहुल संकृत्यायन तो काफ़ी पहले ही हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध बन गए, लेकिन दिनकर न तो अपने धर्म का त्याग किया और न जाति का ही!

दिनकर एक बहुयायामी व्यक्तित्व रहे हैं – शिक्षक, साहित्यकार, ऑफिसर, नेता, वाईस-चांसलर, प्रकाशक इत्यादि. जाति-व्यवस्था में सत्ता का खेल है, दिनकर इस बात को समझते थे. लेकिन जाति व्यवस्था के प्रति उनका प्रतिरोध निजी पत्रों में ही दीखता है. महाकाव्य के पठन में कर्ण दिनकर का नायक है, लेकिन सार्वजानिक जीवन में (जहाँ तक हमें ज्ञात है) दिनकर ने जाति-व्यवस्था में सत्ता के खेल पर खुलकर प्रहार नहीं किया: यहीं दिनकर का द्वन्द दीखता है. ज्ञान का विमर्श, तर्क का विमर्श होता है और समीक्षा का उद्देश्य होता है – पाठ की उलझनों का पर्दाफ़ाश करना. जिस तरह से एक पाठ के असंख्य पठन हो सकते हैं, उसी तरह से एक बहुयायामी व्यक्ति के व्यक्तित्व और कृतित्व का भी असंख्य पठन हो सकता है. हम चाहे जो कहें लोग तो अपने ढंग से पढ़ेंगे ही, और व्यक्तित्व और कृति दोनों के पाठ वक़्त के साथ बदलते रहे हैं, बदलते रहेंगे। जैसे महाभारत का पुनर्पाठ शिवाजी सावंत और दिनकर ने किया, उसी तरह दिनकर का पाठ हम अपने ढंग से कर सकते हैं। और, यह पठन सिर्फ प्रारंभ बिंदु है.

अब यहां ध्यान देने की जरुरत है कि देश की आज़ादी की लड़ाई सभी वर्गों के लोगों ने लड़ी थी और कुर्बानियां भी दी थीं. लेकिन आज़ादी के शीघ्र बाद ही सत्ता की हिस्सेदारी से राजपूतों, ब्राह्मणों, कायस्थों तक को खदेड़ दिया गया और सिर्फ एक ‘जाति’ विशेष का ही वर्चस्व बना रहा, दलित और पिछड़ों की कौन कहे? बिहार को सड़ने के रास्ते पर कौन ले गया? बिहार की राजनीति में जातिवाद को जन्म किसने दिया? क्या इतिहास से यह सवाल पूछना लाजिमी नहीं है? जातिवादी राजनीति और उसके पोषण के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? आज़ादी के बाद भी जिस तरीके से बहुसंख्यक जनता, विशेष रूप से दलितों पर जो अमानवीय अत्याचार हुए, उसकी आवाज़ उठाना या उनके हकों की वकालत करना जातिवाद था? यक़ीनन नहीं. आज जिस तरह से राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सत्ता का संकेन्द्रन कुछ व्यक्तियों एवं जातियों में हो रहा है, यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है.
सनद रहे, इस पूरे विमर्श में स्त्री नदारद है.


  सन्दर्भ सूची
1.नन्दकिशोर नवल, तरुण कुमार (सं.), रामधारी सिंह दिनकर रचनावली – 14, लोकभारती प्रकाशन,नई    दिल्ली, 2011. पृष्ठ 136. 
2. वही, पृष्ठ 527.
3. वही, पृष्ठ 527-528.
4.वही, 528
5.वही, पृष्ठ 528.
6.वही, पृष्ठ 211.
7.वही, पृष्ठ 211.
8.वही, पृष्ठ 212. 
9. दिनकर की डायरी, पृष्ठ 245, 31 अक्टूबर 1971.
10. दिनकर रचनावली खंड, -14, पृष्ठ 50.
11. दिनकर की डायरी, 1 मई, 1972, पृष्ठ 304.
12. वही, पृष्ठ 305.