Home Blog Page 109

आधी आबादी का डर

मुजतबा मन्नान


हाल ही में महिलाओं के साथ हुई कुछ बेहद दुखद हिंसात्मक घटनाएँ टीवी चैनलों व अखबारों की सुर्खियां बनी.पहली घटना में राजधानी दिल्ली के बुराड़ी इलाके में एक 34 वर्षीय युवक ने एकतरफा प्यार के चलते एक 21 वर्षीय लड़की की हत्या कर दी.लड़की स्कूल टीचर थी, जब वह अपने स्कूल से घर जा रही थी तो युवक ने टूटी केंची से छब्बीस बार वार कर उसकी हत्या कर दी.दूसरी घटना गुडगाँव के मेट्रो स्टेशन पर घटी, जिसमें एकतरफा प्यार में पागल एक युवक ने महिला के इंकार करने पर सरेआम तीस बार चाकू से वार कर उसकी हत्या कर दी.तीसरी घटना में राजस्थान के अलवर जिले में एक बेहद क्रूर तरीके से महिला की हत्या का मामला सामने आया.युवक ने अपनी पत्नी के चरित्र पर शक के कारण मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जला दिया और फिर चाकू से उसके अंगो के टुकड़े कर शहर के अलग-अलग हिस्सों में फेंक दिए.एक अन्य घटना में बिहार के मुजफ्फपुर जिले में एक महिला इंजीनियर को जिंदा जलाने का सनसनीखेज मामला सामने आया.

महिलाओं पर इस तरह बेहद क्रूरता के साथ हमले होने की यह कोई पहली घटना नहीं है.रोज़ाना टीवी चैनलों व अखबारों में महिलाओं पर हमले होने की खबरें सुर्खियाँ बनती रहती हैं.जैसे‘युवक ने बदला लेने के लिए महिला पर तेज़ाब डाला,लड़के ने बीच सड़क पर लड़की को चाकू मारा,दहेज़ के लालच में दुल्हन को ज़िंदा जलाया,घर में घुसकर महिला से सामूहिक दुष्कर्म’ इत्यादि. हर रोज़ महिलाओं को छेड़छाड़,पिटाई, अपमान, बलात्कार,यौन शोषण जैसी हिंसात्मक घटनाओं का सामना करना पड़ता है.हालात यह हैं कि महिलाएं सिर्फ सड़कों व सार्वजनिक स्थानों पर ही असुरक्षित नहीं हैं बल्कि घर में भी उनके जीवनसाथी या उसके परिवार के सदस्य ही उनकी हत्या कर देते हैं. ज्यादातर घटनाओं के बारें में तो पता ही नहीं चलता है क्योंकि शोषित व प्रताड़ित महिलाएं किसी को इसके बारें में बताने से घबरातीहैं. उन्हें डर लगता है कि कहीं ये पितृसत्तात्मक समाज उनको ही दोषी न ठहरा दे.

यह भी पढ़े 


महिलाओं के प्रति इस प्रकार की हिंसात्मक घटनाओं को देख कर प्रश्न उठता है कि आखिर कोई पुरुष महिला को चोट क्यों पहुँचाना चाहता है?,एक पुरुष सरेआम महिला केप्रति इतना हिंसात्मक क्यों हो जाता है?और केवल महिला के इंकार करने पर पुरुष हमलावर क्यों हो जाता है? आदि.आमतौर पर कोई भी पुरुष महिला को चोट पहुंचाने के लिए अनेक बहाने बना सकता है. जैसे ‘वह शराब के नशे में था, वह गुस्से में अपना आपा खो बैठा या फिर वह महिला इसी लायक है’इत्यादि.परंतु वास्तविकता यह है कि पुरुष हिंसा का रास्ता केवल इसलिए अपनाता है क्योंकि वह केवल इस माध्यम से वह सब प्राप्त कर सकता है जिन्हें वह एक पुरुष होने के कारण अपना हक़ समझता हैं. इस घातक मानसिकता का ही परिणाम हैं कि महिलाओं के साथ छेड़छाड़, बलात्कार, दहेज़मृत्यु, हत्या तथा यौन उत्पीडन जैसे हिंसात्मकअपराधों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है.

ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारत में महिलाओं को अपराधों व हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने तथा आर्थिक, सामाजिक दशाओं में सुधार हेतु ढेर सारे कानूनों का संरक्षण हासिल है. जिनमें अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कुटुंब न्यायालय अधिनियम 1984, महिलाओं का अशिष्ट-रूपण प्रतिषेध अधिनियम 1986, सती निषेध अधिनियम 1987,गर्भाधारण पूर्व लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994,कार्यस्थल पर महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005,राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 2006, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़िन (निवारण, प्रतिषेध) अधिनियम 2013 प्रमुख हैं. लेकिन त्रासदी है कि इन क़ानूनों के बावजूद भी महिलाओं पर हिंसा और अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा है. देश में घरेलू हिंसा, बलात्कार, दहेज मृत्यु, अपहरण,औनर किलिंग जैसी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं.

यह भी पढ़े 


दरअसल विडंबना यह है कि समाज में स्वतंत्रता और आधुनिकता के विस्तार के साथ-साथ महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव भी बढ़ा है.प्राचीन सामाज में ही नहीं बल्कि आधुनिक समाज की दृष्टि में भी महिलाएं केवल औरत है जिसको थोपी व गढ़ी-बुनी गई तथाकथित नैतिकता की परिधि से बाहर नहीं आना चाहिए.दी यूएन डिक्लेरेशन ऑन दी एलिमिनेशन ऑफ वोइलेंस अगेन्स्ट वुमेन के अनुसार ‘महिलाओं के प्रति हिंसा पुरुषों और महिलाओं के बीच ऐतिहासिक शक्ति की असमानता का प्रकटीकरण है.’ और यह भी कि “महिलाओं के प्रति हिंसा एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा कमतर स्थिति में धकेल दी जाती हैं.’



आज भी बहुत-सी संस्कृतियों में महिलाओं को पुरुषों से कम दर्ज़ा दिया जाता है दरअसल महिलाओं के साथ भेदभाव करने का रवैया, समाज में कूट-कूटकर भरा है.उनके खिलाफ की जानेवाली हर किस्म की हिंसा एक ऐसी समस्या बन गई है, जो मिटने का नाम नहीं ले रही है.संयुक्त राष्ट्र के भूतपूर्व सेक्रेटरी-जनरल, कोफ़ी अन्नान ने कहा था ‘दुनिया के कोने-कोने में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जा रही है.हर समाज और हर संस्कृतिकी महिलाएं इस जुल्म की शिकार हो रही हैं.वे चाहे किसी भी जाति, राष्ट्र, समाज या तबके की क्यों न हों, या उनका जन्म चाहे जहाँ भी हुआ हो, वे हिंसा से अछूती नहीं हैं.’वहीं महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली संस्था एमनेस्टीइंटर्नेशनल के अनुसार ‘महिलाओं औरलड़कियोंके खिलाफ की जाने वाली हिंसा, आज मानवअधिकारों का उल्लंघन करने वाली सबसे बड़ी समस्या है.’

यह भी पढ़े 


समाज में पुरुषों और महिलाओं के लिए प्रयोग किए जाने वाले शब्दों पर गौर करें तो पुरुष के लिए निडर, मज़बूत, मर्द ताकतवर, तगड़ा, सत्ताधारी, कठोर ह्रदय, मूँछों वालाऔर महिलाओं के लिए कोमल, बेचारी, अबला, घर बिगाडू, कमज़ोर, बदचलन, झगडालू आदि शब्द प्रयोग किये जाते हैं. इनमें से कुछ शब्द तो महिला-पुरुष में प्राकृतिक अंतर का प्रतीक हैं लेकिन ज्यादातर शब्द प्राकृतिक कम सामाजिक ज्यादा हैं यानि पितृसत्तात्मक समाज ने इन शब्दों तथा इसके पीछे की अवधारणा को गढ़ा है जबकि असलियत में यह शब्द केवल महिलाओं को कमज़ोर दिखाने के लिएही प्रयोग किए जाते हैं क्योंकि केवल पुरुष ही नहीं बल्कि एक महिला भी ताकतवर, मजबूत और निडर होती है और एक पुरुष भी घर बिगाड़ू, बदचलन और झगड़ालू हो सकता है.

महिलाओं के प्रति इस प्रकार की हिंसात्मक घटनाएँ पुरुषों की ‘मर्दानगी’को लेकर दोहरा रवैया दिखा रही हैं. एक तरफ अगर लड़की उनका प्रस्ताव ठुकरा दे तो उनकी मर्दानगी को ठेस पहुँच जाती हैं और फिर पुरुष बदला लेने के लिए सरेआम महिला पर हमला कर देता है. दूसरी ओर कुछ पुरुष अपनी आँखों के सामने किसी महिला की बेरहमी से हत्या होते हुए देख कर आगे निकल जाते हैं. प्रश्न उठता है कि किसी लड़की द्वारा ठुकरा दिए जाने परपुरुष की मर्दानगी को तो ठेस पहुँच जाती है लेकिन हैरानी की बात यह है कि किसी की हत्या होते समय पर ‘मर्दानगी’ कम नहीं होती है?



अगर कोई व्यक्ति सामान्य तरीकों का प्रयोग करके अपने जीवन को नियंत्रित करने का प्रयत्न करता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन अगर कोई व्यक्ति दूसरों के जीवन पर हिंसा के प्रयोग से नियंत्रण करने की कोशिश करे तो यह ठीक नहीं है. दूसरा कोई भी पुरुष मर्द होने से पहले इंसान है और अगर किसी के साथ हिंसा होते देख कर भी अगर हम आगे बढ़ जाते हैं तो इंसानियत कहीं पीछे छूट जाती है.एक महिला के शब्दों में,‘आज हालात यह हैं कि घर, समाज में महिलाओं के लिए डर ही उनकी एक ऐसी सखी है, जो हरपल उनके साथ रहती है और हिंसा एक ऐसा खतरनाक अजनबी है जो किसी भी वक्त, किसी भी मोड़, सड़क या आम जगह पर उन्हें धर-दबोच सकता है.’

यह भी पढ़े 


कई देशों में नियम हैं कि यदि मुसीबत की स्थिति में आप किसी की मदद नहीं करते हैं तो आपके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है इसलिए भी लोग जहमत नहीं उठाना चाहते हैं. लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या समाज में इंसानियत को याद दिलाने के लिए भी कोई कानून बनाने की जरूरत है?25 नवंबर 1999 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा मिटाओं’ नाम से अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाने की घोषणा की ताकि लोगों में महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा हो, क्योंकि हिंसा का प्रभाव केवल एक महिला पर ही नहीं बल्कि अगर एक महिला को चोट पहुँचती है तो वह उसके बच्चों, परिवार तथा पूरे समाज को प्रभावित करती है.

संदर्भ व सहायक सामग्री

1. दिल्ली में युवक ने दिनदहाड़े चाकू से बार-बार गोदा, सीसीटीवी में कैद हुई घटना.

2. गुड़गांव मेट्रो स्टेशन पर युवक ने दिनदहाड़े महिला को चाकू से गोद डाला.

3. चरित्र के संदेह में हैवान बना पति, बकरे की तरह काट डाले पत्नी के अंग.

4. बिहार में महिला इंजीनियर को कुर्सी से बांधकर ज़िंदा जलाया.

लेखक जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से स्नातकोत्तर हैं और हरियाणा के जिला मेवात में रहते । आजकल शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत है। लेखन में रुचि रखते है और सामाजिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. संपर्क ; 9891022472, 7073777713 

 

दलित महिलाएं और पत्रकारिता

सुशीला टाकभौरे  

चर्चित लेखिका. दो उपन्यास. तीन कहानी संग्रह , तीन कविता संग्रह सहित व्यंग्य,नाटक, आलोचना की किताबें प्रकाशित. संपर्क :9422548822



दलित साहित्य के विषय में सभी जानते हैं, दलितों का, दलितों के लिए दलितों द्वारा लिखा साहित्य. अब यह स्थापित साहित्य के समानान्तर माना जाने वाला सर्वमान्य साहित्य है. दलित साहित्य की आधार भूमि डॉ. भीमराव अम्बेडकर की विचारधारा है. पिछड़े दबे कुचलों की स्थिति को बताकर, उनकी समस्याओं का निदान और उनकी प्रगति परिवर्तन की दिशा में अग्रसर होने का संदेश ही दलित साहित्य का उद्देश्य है.


लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में दलित साहित्य अपनी विशेष स्थिति पा रहा है. देश की सभी भाषाओं में दलित साहित्य लिखा जा रहा है. अनुवाद-रूपान्तर के द्वारा अलग अलग भाषा के लोग एक दूसरे के साहित्य को पढ़कर समझ रहे हैं. पूरे देश में दलित साहित्यकारों की व्यथा, सम्पूर्ण दलित वर्ग की व्यथा के रूप में प्रचारित – प्रसारित हुई है और लगातार हो रही है.

साहित्य के विचार प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम मीडिया है. मीडिया का अपना महत्त्व है. अभी तक मीडिया सवर्णों के हाथों में ही था. और अभी भी है. सवर्ण अपनी विचारधारा अपने ढंग से सशक्त रूप में, त्वरित रूप में फैलाते रहे हैं. यही कारण है कि देश और विदेशों में अभी भी दलितों की व्यथा को सही मूल्यांकन नहीं मिल पाया है. ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाले अपने ही देश में, दलित सदियों से कितने कष्ट और अभाव का जीवन जी रहे हैं, यह सर्वविदित है. समाज में अभी तक उन्हें न तो समता सम्मान मिला, न ही भाईचारा मिल सका है. देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद भी, देश का लिखित संविधान लागू होने के बाद भी देश के दलितों की स्थिति में परिवर्तन नहीं हो सका. इसका मुख्य कारण है मीडिया पर सवर्णो का एकाधिकार होना. सवर्ण मीडिया हमेशा यही बताता रहा – ‘देश में कहीं कोई भेदभाव नहीं है, सब बराबर हैं और सब मिलजुल कर रहते हैं.’

गांधीजी ने अपने ‘हरिजन’ पत्र के माध्यम से, शुरू से यही बताया था कि देश के अछूत हिन्दुओं से अलग नहीं हैं. वे सब प्रेम के साथ मिल जुलकर रहते हैं. जबकि स्थिति इसके विपरीत थी जिसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर अच्छी तरह समझ सके थे. गांधीजी को मानने वाले गांधीवादी, ब्राम्हणवाद को मानने वाले मनुवादी और आर्यसमाजी छद्म बातों का प्रचार प्रसार करते रहे हैं और अभी भी कर रहे हैं.

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने पत्रकारिता के माध्यम से ‘हरिजन’ पत्र के समानान्तर अपने समाचार पत्रों का प्रकाशन किया और अपनी बात सही रूप में देशवासियों तक पहुंचाई. उन्होंने मूकनायक, प्रबुद्ध भारत  जनता जैसे पत्रों को प्रकाशित किया था. अब बाबासाहेब को मानने वाले अम्बेडकरवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करके, उनके विचार और दलित शोषितों की स्थिति के सत्य रूप को समाज तक पहुंचा रहे हैं. दलित स्वयं अपनी व्यथा को कविता कहानी लेख नाटक उपन्यास और आत्मकथाओं के रूप में लिख रहे हैं और प्रकाशित कर रहे हैं, दलित पत्रिकाओं के माध्यम से उसे पूरे देशवासियों तक सभी भाषा-भाषियों तक पहुंचाया जा रहा है.

जो दलित मानव सदियों तक गूंगे बहरों की तरह चुपचाप शोषण अत्याचार सहते रहे, वे अब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के संघर्षपूर्ण प्रयत्नों से अधिकार पाकर अपनी व्यथा कह रहे हैं. वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी दखल दे रहे हैं, मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज समाज तक पहुंचा रहे हैं. पत्रकारिता में दलितों का प्रवेश विशेष सफलता पा रहा है. हिन्दी दलित पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक छोटी और बड़ी पत्रिकाएं लगातार छप रही हैं. अब स्थिति यह बन गई है कि सवर्ण पत्रकारिता द्वारा भी उनका स्वागत किया जा रहा है. केवल इतना ही नहीं बल्कि सवर्ण पत्रिकाओं के विशेषांक ‘दलित विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित किये जा रहे हैं, जिनमें पूर्ण रूप में दलितों की रचनाओं को छापा जा रहा है. इन दलित विशेषांकों का अपना महत्त्व है. दलितों द्वारा प्रकाशित की जाने वाली छोटी बड़ी दलित पत्रिकाओं का भी अधिक महत्त्व है.



सवर्णो द्वारा प्रकाशित की जाने वाली महत्त्वपूर्ण नारीवादी पत्रिकाओं में – ‘नारी संवाद’, सं. रेनू दीवान बिहार, युद्धरत आम आदमी, सम्पादक रमणिका गुप्ता, दिल्ली है. इन पत्रिकाओं ने विशेष रूप से महिलाओं और दलितों के प्रश्नों को आवाज दी है, उनकी समस्याओं को विश्लेषण के लिए समाज के समक्ष रखा है. ऐसी अनेक पत्रिकाएँ हैं, जो विशेष रूप से महिलाओं दलितों और आदिवासियों के साहित्य को छाप रही हैं, उन्हें जोड़ रही है और उनका समाज के साथ सीधा संवाद बना रही हैं.


दलित पत्रिकाओं में विशेष रूप से ‘अस्मितादर्श’ पत्रिका महत्त्वपूर्ण है. मराठी भाषा में छपने वाली महाराष्ट्र की इस पत्रिका ने अपना इतिहास रचा है. यह दलित पत्रिकाओं की प्रमुख और मार्गदर्शक पत्रिका है. ‘अस्मितादर्श’ पत्रिका के सम्पादक गंगाधर पानतावने हैं. पत्रिका औरंगाबाद से प्रकाशित होती है. इस पत्रिका के अनेक विशेषांक भी छपे हैं.

हिन्दी दलित पत्रिकाओं में ‘बयान’ ने अपनी एक विशेष जगह बनाई है. ‘बयान’ के सम्पादक मोहनदास नैमिशराय हैं. दिल्ली से प्रकाशित इस पत्रिका में, दलितों की समस्याओं के साथ समसामयिक प्रश्नों को अच्छे तरीके से उठाया जा रहा है. ऐसी ही विशेष पत्रिकाएँ हैं – ‘अम्बेडकर मिशन पत्रिका’, सम्पादक बुद्धशरण हंस, पटना. ‘अरावली उदघोष’ सम्पादक बी. पी. वर्मा, जयपुर राजस्थान. ‘मूकवक्ता’, सम्पादक सी. बी. राहुल दिल्ली, ‘आश्वस्त’, सं. तारा परमार उज्जैन मध्यप्रदेश, ‘आजीवक विजन’, सम्पादक शील बोधि, दिल्ली.


मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, दिल्ली से प्रकाशित होने वाली अनेक दलित पत्रिकाएँ हैं. कुछ पत्रिकाओं ने अपनी विशेष पहचान बनाई है. किसी भी पत्रिका को अच्छे वैचारिक मुद्दों की जरूरत होती है. समसामयिक और ज्वलन्त प्रश्नों को उठाना समय की मांग है. आवश्यक मुद्दों और ज्वलन्त प्रश्नों पर लिखी रचनाओं को महत्त्व देकर प्रकाशित करना प्रगतिवादी विचारधारा का प्रतीक है. इसके साथ उन पत्रिकाओं को महत्त्वपूर्ण माना जाता है, जिनमें स्त्रियों और अल्पसंख्यकों को स्थान प्राप्त हो.

‘दलित विमर्श’ और ‘स्त्री विमर्श’ अब सीमित क्षेत्र का विषय नहीं है. अब इन विषयों पर विश्वस्तर पर चर्चा हो रही है. दलित पत्रिका इसमें बराबर की हिस्सेदारी निभा रही हैं. इस दृष्टि से ‘अपेक्षा’ पत्रिका ने विशेष मुकाम हासिल किया है. इस पत्रिका ने दलित लेखिकाओं को भी जोड़ा है. लेकिन यह भी सत्य है कि दलित लेखिकाएँ अधिक संख्या में आगे नहीं आ सकीं. अभी भी उनकी संख्या कम है. ‘लेखन में दलित महिलाएँ’ किस मुकाम तक पहुंची है, इसे पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेखन से समझा जा सकता है.


दलित साहित्य की संवाहक ‘अपेक्षा’ पत्रिका का सन 2003 में ‘दलित आत्मवृत विशेषांक’ प्रकाशित हुआ था. इस विशेषांक के ‘दलित स्त्री चिन्तन’ खण्ड में डॉ. विमल थोरात’, माधुरी छेड़ा और तारा परमार ने दलित महिलाओं की आत्मकथाओं पर समीक्षात्मक विचार लिखे. इन्होंने महिलाओं की मराठी दलित आत्मकथाओं पर ही चर्चा की थी. डॉ. नगमा मलिक ने बेबी कामड़े की मराठी आत्मकथा ‘जीना आमुचा’ अर्थात् ‘जीवन हमारा’ की समीक्षा लिखी. डॉ. प्रेमलता चुटेेल ने कौशल्या बेसन्त्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ की समीक्षा लिखी. प्रज्ञा शुक्ल, रजनी बजारिया, सुमित्रा अग्रवाल और मुन्नी चैधरी ने दलित जीवन का मूल्यांकन करते हुए, अपने विचार रखे थे. इस अंक में हिन्दी दलित लेखिकाओं की संख्या कम है.

सवाल यह है कि हिन्दी दलित लेखिकाओं की संख्या कम क्यों है ? इसका पहला और मुख्य कारण यह है कि हमारी महिलाएं लेखन के क्षेत्र में पीछे हैं. दूसरा कारण यह है कि उन्हें प्रेरणा और प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है. तीसरा कारण है सहयोग की कमी. यदि उन्हें सहयोग के साथ प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया जाये, तो हमारी लेखिकाएँ अधिक संख्या में आगे आयेगीं. यदि घर परिवार से उन्हें सहयोग और प्रेरणा प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है, तो ऐसी साहित्यिक सामाजिक संस्थाएँ बनाई जायें, जो दलित स्त्रियों को लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में आने आगे के लिए प्रोत्साहित करें. ऐसा होने पर, यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि दलित महिलाएँ पुरूषों की अपेक्षा अधिक संख्या में आगे आयेंगी और लेखन प्रकाशन के क्षेत्र में अपना कीर्तिमान स्थापित करेंगी.

कई बार ऐसा होता है, दलित लेखिकाओं से रचनाएँ आमंत्रित की जाती हैं, मगर वे समय पर अपनी रचनाएँ भेज नहीं पाती हैं. जब रचनाएँ भेजी ही नहीं, तो छपेंगी कैसे ? भले ही लेखिका ने बहुत लिखा है मगर प्रकाशित नहीं किया, तब लोग कैसे जानेंगे कि लेखिका ने क्या कैसा और कितना लिखा है ? हमारी दलित लेखिकाएँ घर परिवार के काम और जिम्मेदारियों के बोझ से लदी होने के कारण, अपने लेखन और प्रकाशन को समझ नहीं पाती हैं. उसका महत्त्व समझने के लिए उनके पास समय ही नहीं होता है. वे यह भी नहीं जानती हैं कि लेखन के साथ प्रकाशन को ज्यादा महत्त्व होता है. इस अज्ञानता के कारण वे अपनी रचनाएं ठीक करके पत्रिकाओं में प्रकाशन हेतु नहीं भेजती हैं. मैं इन बातों को अच्छी तरह जानती हूँ, क्योंकि मैं स्वयं इसकी शिकार रही हूँ.

अप्रैल – जून 2007 में ‘अपेक्षा’ का अम्बेडकरवादी कहानी विशेषांक प्रकाशित हुआ था. इस विशेषांक में अनेक पुरूष दलित साहित्यकारों की कहानियाँ छपी थीं. दलित लेखिकाओं में रजनी दिसोदिया की कहानी – ‘‘एक गैर साहित्यिक डायरी’, अनीता भारती की ‘एक थी कोटेवाली’, रजतरानी मीनू की ‘वे दिन’ और सुशीला टाकभौरे की ‘रामकली’ कहानी छपी थी. इस अंक में बाबीस कहानीकारों में सिर्फ चार दलित लेखिकाओं की कहानी छपी. कारण स्पष्ट है, दलित साहित्यकारों में लेखिकाओं की संख्या कम है, साथ ही उनका लेखन भी कम है. ‘अपेक्षा’ पत्रिका नियमित रूप से त्रैमासिक रूप में छप रही है. सामान्य अंकों में इक्का दुक्का दलित लेखिकाएँ छप रही हैं. विशेषांकों में छपे दलित लेखन में दलित स्त्रियों की स्थिति को समग्र रूप में देखा और समझा जा सकता है.

जनवरी – मार्च 2008 में अपेक्षा पत्रिका का विशेषांक ‘दलित स्त्री चिन्तन’ पर केन्द्रित था. इस अंक के लिए दिल्ली की अनीता भारती ने विशेष सहयोग दिया. उन्होंने विशेष रूप से दलित लेखिकाओं से सम्पर्क करके, उन्हें प्रोत्साहित करते हुए उनसे आत्मकथांश लिखवाये थे. जिसका परिणाम यह हुआ कि अपेक्षा के इस अंक में इक्कीस दलित लेखिकाओं के आत्मकथांश छपे. उनके नाम-बेबीताई कामले, रमा पांचाल, सुशीला टाकभौरे, रजनी तिलक, उर्मिला पवार, पी. शिवकामी, रजनी दिशोदिया, अनीता भारती, रजतरानी मीनू, हेमलता महिश्वर, पुष्पा विवेक, रानी नाथ, उपासना गौतम, तबस्सुम, थेसोक्रोपी, सम्पत देवी पाल, ज्योत्सना, निर्मला रानी गीता सिंह, और स्मिता पाटिल हैं. इसके साथ विशेषांक के ‘साहित्य दृष्टि खण्ड’ में कुसुम मेघवाल, उत्तिमा केशरी और आभालता चैधरी के लेख छपे.

‘अपेक्षा’ के इस विशेषांक को दलित लेखिकाओं के लेखन के परिचय का अंक माना गया. तब दलित लेखन के क्षेत्र में यह जोरदार चर्चा चली थी – ‘क्या इतनी बड़ी संख्या में दलित लेखिकाएँ दलित साहित्य लिख रही हैं ?’ लेखिकाओं के लिए यह गौरव की बात है. यह गौरव उन्हें ‘अपेक्षा’ पत्रिका के सम्पादक डॉ. तेजसिंह ने दिया. इससे यह भी स्पष्ट है कि दलित लेखिकाओं को यदि सहयोग और प्रेरणा प्रोत्साहन दिया जाये, तो वे जरूर लेखन प्रकाशन में अपना कीर्तिमान स्थापित कर सकती हैं. जनवरी मार्च 2008 ‘अपेक्षा’ के विशेषांक में इतनी बड़ी संख्या में दलित लेखिकाओं के परिचय और लेखन प्रकाशन के बाद भी, कम लेखिकाएं ही चर्चा में हैं. लेखन – प्रकाशन लगातार होने पर ही वे सभी चर्चा में आ सकेंगीं.



पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘हंस’ जन चेतना की मासिक पत्रिका का अपना महत्त्व है. यह प्रतिष्ठित पत्रिका इन्टरनेट पर भी पढी जाती है. हिन्दी साहित्यकार प्रेमचन्द द्वारा स्थापित और वर्तमान में राजेन्द्र यादव द्वारा संपादित यह पत्रिका सवर्णो के साथ, बहुजनों और दलितों के सरोकार से जुड़ी पत्रिका  बन गई है. दिल्ली से प्रकाशित यह पत्रिका बौद्धिकता और वैचारिकता के साथ कहानी आन्दोलन के कई आयामों को रेखांकित करती हुई आगे बढ़ रही है. समीक्षा और आलोचना में भी यह दखल रखती है.


‘हंस’ का दलित विशेषांक अगस्त 2004 में ‘सत्ता विमर्श और दलित’ प्रकाशित हुआ. इस विशेषांक में ‘स्वानुभूति खण्ड’ में बारह दलित साहित्यकारों ने आत्मकथांश दिये थे, जिनमें सिर्फ दलित लेखिका किरणदेवी भारती का नाम है. ‘वैचारिकी खण्ड’ में भी सभी दलित पुरूष साहित्यकार हैं. ‘कहानी खण्ड’ में इक्कीस कहानीकारों में दलित लेखिकाएँ कंचन लता, अनीता रश्मि, रजत रानी मीनू, ऊषा चन्द्रा, सरिता भारत – सिर्फ पांच के नाम हैं. ‘कविता खण्ड’ में भी दलित कवयित्रियों की कविताएँ नहीं है.

‘हंस’ के इस दलित विशेषांक का अतिथि सम्पादन डॉ. श्योराज सिंह बेचैन ने किया था. इस अंक में दलित लेखिकाओं को प्रोत्साहन के साथ अधिक संख्या में छापना, उनकी जिम्मेदारी माना जा सकता है. यद्यपि यह भी जरूरी है कि दलित लेखिकाएं स्वयं आगे आकर लेखन और प्रकाशन में अपना नाम दर्ज करायें.


सवर्ण बहुजन द्वारा चलाई जाने वाली पत्रिकाओं में दलितों की भी हिस्सेदारी हो. यह पत्रिका में आरक्षण मांगने की बात नहीं है, बल्कि उत्तम रचना के साथ दलित साहित्यकारों को पत्रिका में उचित स्थान मिले, इसके लिए सम्पादकों और साहित्यकारों दोनों ने ही जिम्मेदारी उठाना चाहिए.


पत्रिका प्रकाशन के क्षेत्र में ‘अन्यथा’ त्रैमासिक पत्रिका लुधियाना से छपने वाली बहुत ही सुन्दर और गरिमापूर्ण पत्रिका है. इसके सम्पादक कृष्ण किशोर जी हैं. ‘अन्यथा’ पत्रिका ने भी दलित बहुजन पिछड़े वर्ग के लिए अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. जुलाई-सितम्बर 2007 का अंक क्रमांक 10 में, विशेष रूप से ‘बनती मिटती जलती बुझती झोपड़पट्टियां’ पर विशेषांक केन्द्रित किया गया था. इस अंक में शोषित दलित जीवन से जुड़े प्रश्नो और समस्याओं पर जनवादी दृष्टिकोण से विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है.


इसके बाद ‘अन्यथा’ के अक्टूबर-नवम्बर 2007 के अंक 13 को ‘हमारी कहानी संदर्भ और संभावना’ पर विशेष केन्द्रित किया है. यह अंक बहुत ही व्यवस्थित रूप में प्रकाशित हुआ है. कहानी विधा पर सवर्ण साहित्यकारों के साथ दलित साहित्यकारों के विचारों को प्रकाशित किया है. इस अंक में अनीता भारती द्वारा आयोजित दलित कहानी पर चर्चा में ओमप्रकाश वाल्मीकि, अजय नावरिया, रूपनारायण सोनकर, राज वाल्मीकि, पूरन सिंह, सुशीला टाकभौरे, टेकचन्द, उमरावसिंह जाटव, रजतरानी मीनू और सुमित्रा महरोल सहभागी हुए हैं.


इस अंक में हिन्दी दलित लेखिकाओं में कौशल्या बेसन्त्री, सुशीला टाकभौरे, और सुमित्रा महरोल के आत्मकथांश हैं. रजतरानी ‘मीनू’ का साक्षात्कार छपा है. रजनी तिलक, कुसुम मेघवाल, अनीता भारती और सुमित्रा महरोल की कहानी छपी है. विनोदिनी की तेलगू कहानी का अनुवाद है. हेमलता महिश्वर का लेख छपा है. इसके साथ मराठी दलित कविता में प्रज्ञा दया पवार, मल्लिका अमर शेख, ज्योति लांजेवार, प्रतिभा अहिरे, और हीरा बनसोड़े की कविताएं हैं. ये कवयित्रियाँ मराठी भाषी हैं.

‘अन्यथा’ के इस अंक में – ‘अश्वेत गुलाम महिलाओं की संघर्ष कथा’ खण्ड में हृदय को हिला देने वाले आत्मकथांश और उपन्यास अंश छापे गये हैं. आत्मकथांश – हैरियट जेक्बस, मैरी जैकसन के हैं. उपन्यास अंश – हैरियट बाचर, स्टोव, जोरानील हस्र्टन ओईडा सैबेस्बियन के हैं.

सोजोर्नर टूथ के प्रसिद्ध भाषण का अंश – ‘‘मैं पूछती हूँ क्या मैं औरत नही हूँ’’ – का अनुवाद कृष्ण किशोर जी ने किया है. इजाबैला बोमफ्री का सोजोर्नर टूथ छपा है. अनुवाद भवजोत ने किया है. अनेक कविताएँ भी अनुवाद करके छपी हैं.


इस अंक का महत्त्व इसलिए अधिक है कि इसमें हिन्दी, मराठी, तामिल और अश्वेत महिलाओं के मार्मिक आत्मकथांश हैं. दलित लेखन में शुरू से ही, मराठी दलित साहित्य में दलित लेखिकाओं की संख्या बहुत ज्यादा है. इसका कारण है, सर्वप्रथम महारष्ट्र में अम्बेडकरवादी दलित आन्दोलन का प्रारम्भ हुआ. यहाँ की दलित महिलाएँ भी दलित आन्दोलन से जुड़ी. महिला जागृति के साथ वे लेखन से भी जुड़ गई. साथ ही, मराठी दलित साहित्य बीसवीं शताब्दी के छठवें दशक में मराठी भाषा में प्रकाशित होने लगा था, जबकि यह हिन्दी में आठवे दसक में आया. परिणाम स्वरूप मराठी दलित साहित्य में मराठी दलित लेखिकाएँ अधिक संख्या में जुड़ गईं. मराठी पत्रिकाओं के माध्यम से मराठी दलित साहित्य का प्रचार प्रसार अधिक हुआ.

‘बायजा’ पूना से प्रकाशित होने वाली, महिलाओं के प्रश्नों और समस्याओं पर केन्द्रित पत्रिका है. इससे सवर्ण महिलाओं के ‘महिला मुक्ति आन्दोलन’ और महर्षि कर्वे की नारी मुक्ति की विचारधारा का प्रचार प्रसार अधिक होता रहा है. दलित महिलाओं के ‘सेमिनार’ या ‘विचार गोष्ठी’ पर केन्द्रित अंकों में, दलित महिलाओं की समस्याओं की बात पत्रिका में छपती रही है.


‘सुगावा’ मराठी पत्रिका है. 1998 में ‘सुगावा’ का ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर प्रेरणा विशेषांक’ प्रकाशित हुआ था. इसका अतिथि सम्पादन विलास वाघ ने किया था. इस विशेषांक में अनेक प्रसिद्ध मराठी दलित लेखिकाओं के विचारात्मक लेख छपे थे. उनके नाम हैं – कुमुद पावड़े, डॉ. आशा थोरात, उर्मिला पवार, डॉ. तारा भावाळकर, ज्योति लांजेवार, मंगला कुलकर्णी, रजनी ठाकुर, कल्पना ढावरे, माया बोरसे, प्राध्यापक डॉ. माधवी खरात, डॉ. पदमा वेलासकर, सौ निर्मला विलास, प्राध्यापक अर्चना हातेकर, अनुपमा, मंगला वराळे, एड. शीला हिरेकर, प्रा. सुलभा पाटोळे, डॉ. सरिता जांभुळे, मीनाक्षी मून, अलका कोकणे, कुसुमताई गागुर्डे, स्नेहलता कसबे, डॉ. प्रमिला लीला सम्पत, नलनी लढ़के – इन सभी लेखिकाओं ने अपने वैचारिक लेख 1998 में लिखे थे. उनका लेखन प्रगतिशील और परिवर्तनवादी था. डॉ. भीमराव अम्बेडकर के सामाजिक आन्दोलन से जुड़कर, ‘दलित और महिला आन्दोलन’ में सक्रिय रूप में भाग लेकर, मराठी दलित लेखिकाओं ने वैचारिक परिपक्वता पाई है. दलित साहित्य लेखन में उनके अग्रसर होने का कारण महाराष्ट्र में डॉ. अम्बेडकर के आन्दोलन का विशेष प्रभाव है.

उत्तर भारत में, लेखन में यह प्रभाव 1980 के समय आया. मराठी दलित साहित्य से प्रभावित होकर अनेक हिन्दी दलित लेखकों ने अपनी रचनाएँ और पुस्तकें प्रकाशित कीं. मगर इनमें लेखिकाओं की संख्या कम ही रही. इसके कारणों को खोजकर, उनके निदान की आवश्यकता है. तभी दलित लेखिकाओं के लेखन और प्रकाशन को बढ़ाया जा सकेगा.


दलित लेखिकाओं की संख्या आज भले ही कम है, लेकिन उनके लेखन का आधार विरोध, आक्रोश और विद्रोह है. वे सदियों से चली आ रही हिन्दूवादी नारी शोषण की परम्पराओं को तोड़ने की बाते कह रही हैं. दलित लेखिकाएँ अपनी अस्मिता, और अस्तित्व की बात अपने लेखन के माध्यम से कर रही हैं. वे जातिभेद के कारण होने वाले अन्याय अत्याचार के विरोध की बात भी कह रही हैं. वे नारी शोषण, दलित शोषण के विरूद्ध अपने विचार रखते हुए, दलित मानस में मनोबल का निर्माण करने का काम कर रही हैं.

दलित लेखन मात्र लेखन नहीं, बल्कि दलित आन्दोलन का साधन है. इस साधन का उपयोग दलित लेखिकाएँ भी समाज व्यवस्था में परिवर्तन के लिए कर रही हैं. दलित महिलाओं के अपने संगठन हैं. समय समय पर महिलाओं के सम्मेलन सेमिनार शिविर और विचार गोष्ठियाँ होते हैं, जिनमें दलित महिलाओं की वर्तमान स्थिति और भविष्य की प्रगति पर चर्चा करके सुझाव और प्रस्ताव रखे जाते हैं. महिला संगठनों के ऐसे कार्यक्रमों से जुड़कर, दलित लेखिकाएं दलित आन्दोलन का उद्देश्य और अपने लेखन का लक्ष्य समझ रही हैं. इस तरह उनका लेखन उद्देश्यनिष्ठ बन गया है.

दलित लेखिकाएँ और कार्यकर्ता महिलाएँ संगठित होकर अपने उद्देश्य की ओर लगातार बढ़ रही हैं. वे अपने साथ अधिक से अधिक महिलाओं को जोड़ रही हैं. इस क्षेत्र में ‘कदम’ और ‘नेक्डोर’ जैसी एन. जी. ओ. के माध्यम से यह काम प्रयत्नपूर्वक किया जा रहा है. दलित महिलाओं के लेखन और प्रकाशन में वृद्धि हो रही है. भाषान्तर के द्वारा भी अलग भाषा भाषी लेखिकाओं का परिचय बढ़ रहा है.

लेखन प्रकाशन के साथ प्रचार माध्यमों से जुड़ना दलित लेखिकाओं के लिए आवश्यक है. इसलिए यह जरूरी है कि दलित लेखिकाएँ पत्रिकाओं से जुड़कर, लेखन प्रकाशन का प्रचार प्रसार करें. महिलाओं की अपनी पत्रिकाएँ हों, जिनके माध्यम से वे अपनी समस्याओं और सवालों को राष्ट्रीय स्तर पर और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उठायें. तभी उनका लेखन और ‘महिला जागृति आन्दोलन’ पूर्णता के साथ सफलता पा सकेगा.

आरती रानी प्रजापति की कवितायें

0
आरती रानी प्रजापति

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

1

हाँ मैंने महसूस किया है
तुम्हारी देह को हर बार
तुम करना चाहते हो
अनाधिकार प्रवेश उसमें
कर देना चाहते हो
छलनी मेरे हर अरमान
छीन लेना चाहते हो
मेरे होंठों से मुस्कराहट
करना चाहते हो
घाव मेरे दिल-दिमाग शरीर पर
क्यों?
क्या तुम नहीं समझते मुझे एक इंसान
क्या ये सब नहीं हो सकता बिना हिंसा के?
क्या शरीर का मिलन तुम्हारे लिए मात्र क्रिया है?
जिसे पूरा करना चाहते हो तुम चाहे जब
जैसे भी….


2

राशन की दुकान में
लम्बी लाइन में खड़ी
तुम
सोचती हो कल रात की घटना
काँप जाती है तुम्हारी आत्मा
रोने को होता है
मन
कल तुमने अपनी आँखों से देखा
कालू की बेटी
भूख से मर गई
राशन की दुकान पर
तुम्हारी तरह खड़ी थी
उसकी भी माँ
कई दिन से
बंद कर दी गई दुकान
वक्त से पहले
एलान कर दिया गया
राशन के खत्म होने का
कई दिनों से खडे होने पर
कल पहुँच ही गई थी
दरवाजे तक

तभी राशनवाले ने
सुना दिया फरमान
कई दिनों से पानी पर
टिकी उस मासूम की आस
का बाँध टूट गया
हालांकि देश में
चल रहा था
विदेशी अर्थव्यवस्था को अपनाने का
ख्याल
फिर भी देश की इस व्यवस्था
की ओर
न था ध्यान किसी का
एक बार फिर
काँप जाती है तुम्हारी देह
सोच कर
मुन्ना भी कई दिनों से भूखा है….

3

दबा दो आवाज
तोड दो अंगुली
खत्म करो गुस्सा
बंद करो चीख
ये प्रजातंत्र है.

4

चादर के सभी कोने से
खुद को
सावधानी से ढक
फटे हिस्सों से बचती
मेट्रो की छत बनाने
गाँव से आई वह
युवती
छत के आभाव में
सड़क के डिवाडर
पर बैठ
जल्दी जल्दी
नहाने लगी


5

प्रेम के गंभीर
पलों में
उसने महसूस की
गंध
उसके जाति
अहम्
पुरुषत्व की
तुरंत
वह छोड़ भाग गई
प्रगतिशील विचारों की
उस फटी चादर को….

6

सिन्दूर
मंगलसूत्र
कंगन
बिछुआ
पायल
बिंदी
बोरला
न सही पर कुछ तो हो
जो तुम्हें मेरा घोषित करें…

7

हमारी ही तरह
तुम भी
बने हो
माहवारी से
खोली थी आंखें तुमने भी
योनि से
निकल कर,
जन्म देने वाली
स्त्री ही थी
जब स्त्री की कोई
जाति नहीं होती
फिर कैसे तुम
सवर्ण
हम
अवर्ण
घोषित हुए

8

गोरापन
कोमलता
अदा
नाज-नखरे
इठलाना
फैशन
भरी-देह
तुम्हारे पैमानों का
आदि-अंत
हो
किन्तु स्त्री इससे
इतर भी बहुत कुछ है…

9

मुझे नहीं पसंद
चूल्हे की रोटी
उसे बनाने से
न जाने कितनी माँ
खासती रहती हैं
सारा दिन
कितनी ही बहनें
होती हैं बलात्कृत
खोज में लकड़ियों के
सुनती हैं तानें
झगड़ती हैं
अपने ही लोगों से
ये बहने ढोती हैं
लकड़ियों का बोझ
किताबों की जगह
बच्चों की प्रतीक्षा
हो जाती है लम्बी
चूल्हा याद करते ही
मुझे याद  आने  लगते हैं
सिर्फ आंसू
माँ, बहन, बच्चों के…..

सभी सरकारें दोषी हैं महिला आरक्षण बिल के मसले पर: महिला आयोग अध्यक्ष

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमार मंगलम महिला आरक्षण बिल न पास होने का कारण बता रही हैं सभी राजनीतिक पार्टियों की अनिच्छा को. पितृसत्ता की गहरी पैठ को जो महिलाओं को समान अधिकार नहीं देना चाहती. इस संदर्भ में वर्तमान सरकार से लेकर सभी सरकारों को दोषी बता रही हैं, जिसने गंभीरता पूर्वक महिला आरक्षण बिल को पास कराने में रुचि नहीं ली है. वे बता रही हैं कि ‘ ऐसा बहुत कम होता है , जब बीजेपी और कांग्रेस एक साथ एक प्लेटफॉर्म  पर आये और जब आई तो राज्यसभा में बिल पास हो गया. ये बातें  उन्होंने 12 सितंबर 2016 को एनएफआईडवल्यू के द्वारा आयोजित सेमिनार में कही. सेमिनार महिला आरक्षण बिल के पेश किये  जाने के 20 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित था:

प्रेमा झा की कवितायें

0
प्रेमा झा 

युवा कवयित्री,ब्लॉगर संपर्क :prema23284@gmail.com

मेरा देश अभी सीरिया या इज़रायल नहीं हुआ है  

मैं जनता हूँ
आम जनता हूँ
मैं लूट चूका हूँ
मैं बर्बाद और बेबस हूँ
मैं मुज़रिम हूँ,
दोषी हूँ और सजायाफ्ता कैदी
से जरा बड़ा मेरा दोष है
क्योंकि मैंने पाई-पाई जोड़े हैं
बुरे वक़्त में काम आने के लिए
बच्चों की फ़ीस भरने और जोरों के दर्द में काम आने के लिए
अब तक मेरे खाते में कई सील बंद कर दी गई है
और मुझे बड़ा चोर बताकर कतार में खड़ा कर दिया गया
मेरे हाथ में रखे नोटों को मैं अब माँ गंगा की भेंट चढ़ा रहा हूँ
भक्ति  के नाम पर उसने मुझसे कहा है कि पुण्य कमा
काम आएगी माँ गंगा
जब मय्यत के दिन
तेरी अर्थी का राख़ उस गंगा में विसर्जित की जाएगी
माँ गंगा तब भी काम आएगी
जब तेरे पास से ऐसे ही बहुत से नोट निकलेंगे
एक बार माँ के नाम से भेंट चढ़ा
फिर देखना सब पाप धुल जाएँगे
जिन्होंने बहुत से पाप, लूट, हत्याएं और कालाबाज़ारी की थी
वो स्विस-अकाउंट में पैसे भर चुके थे
और वो गंगा के पास आकर केवल हवन और ग्रहण करते थे!
वो अब तक कनाडा और यू.एस. शिफ्ट कर चुके हैं
वे बड़े-भारी लोग हैं
उनसे माँ गंगा कभी-कभी मिलती भी हैं
उन्होंने कई पेटी भरने के बाद अब सूची से नाम काट लिया है
कतार में बस मजदूर, बेबस और लाचार लोग बचे थे
ये जनता हैं
आम जनता हैं
रियासत का कहना था-
भूख से मरो, बीमारी से मरो
मगर स्वच्छ रहना
हर पाप से, पाई-पाई के हिसाब से
मेरा पांच साल का बच्चा न्यूमोनिया से लड़ रहा है
और ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है
और मैं लाइन में खड़ा हूँ
इस इंतज़ार में की पैसे मिलते ही सब ठीक हो जाएगा
मेरा बच्चा बच जाएगा
मगर मेरा बच्चा मर चूका था!
लाइन ख़त्म नहीं हुई अब भी
हुक्मरानों का कहना था
इससे देश से कालाधन साफ़ होने में

और
अर्थव्यवस्था मज़बूत होने में मदद मिलेगी
मगर मेरे घर में चीत्कार फट रही है
मैं अब भी लाइन में खड़ा हूँ
मैं जनता हूँ
आम जनता हूँ
जनता जो तमाम टूजी, थ्रीजी घोटाले करने के बाद
इन्फ्निट लाइन में खड़ी हो जाती है
अडानी, मोदी और माल्या विदेश कूच कर जाते हैं
तब रियासत एक नया पैंतरा फेंकती है
अभी एक जवान औरत की लाश निकल रही है
देश में जियो सिम आ गया है
ताकि मौत की खबर को जल्द-से-जल्द
बिना किसी परेशानी और राशि के पंहुचाया जा सके
हुक्मरानों ने हिरोशिमा और नागासाकी के स्टेशन पर
नया सन्देश पंहुचाया है
देश प्रगति के पथ पर है
मेरे घर में तेरहवीं का मातम है
मैं जनता हूँ
आम जनता हूँ
मुझे खुश होना चाहिए
मेरा देश अभी सीरिया या इज़रायल नहीं हुआ है
मैं लाइन में खड़ा हूँ
और बुदबुदा रहा हूँ
मेरा बच्चा मर गया
लेकिन, देश अभी सीरिया या इज़रायल नहीं हुआ है

कश्मीर पुरुष    

हे कश्मीर पुरुष,
मैं देहलवी तुम्हारे रूप से
मोहित होकर
तुम्हारी खूबसूरत वादियों में आ गई हूँ
मुझे संभालो न!
देखो न, अन्ना केरेनिना की तरह
मेरे वस्त्रों की सिलवटें
सब तुम्हारे आलिंगन और चुम्बन के लिए
तरसने लगी है
तुम बेहद सुंदर पुरुष हो
धरती के सबसे सुंदर पुरुष
स्त्री से पुरुष का आकर्षण
इससे पहले कईयों ने दोहराया होगा
मगर एक पुरुष से स्त्री के आकर्षण पर
अब इतिहास लिखा जाएगा
मैं उसी तरह तुम्हारे पास
जैसे हद्दे नज़र तक सुंदर घाटियाँ

और
घाटी में घुसे हुए घुसपैठिये
की तरह देखो न!
अब षड़यंत्र भी रचने लगी हूँ
किसी हारी प्रेमिका की तरह!
मैं, देहलवी तुम पर दावा ठोकूंगी
तुम्हें गिरफ्त में करूंगी
अपनी कुछ जटिल योजनाओं के तहत
और
सुर्ख प्रेम-लिपियों में
तुम पर ग्रन्थ भी लिखूंगी
मैं, मेरे अंगरक्षक जो मेरे
बाप और भाई होने का दावा करते हैं
उनसे तुम्हारे लिए प्रस्ताव भेजूंगी!
तुम मेरे हो सिर्फ मेरे
हे कश्मीर पुरुष,
जब कश्मीरियों पर जुल्म
ढाया गया था-
मैंने ही चुपके से
अभिसारी मेनका को
तुम्हारा तप भंग करने को भेजा था
हे कश्मीर पुरुष,
मैं दोषी हूँ देहलवी
मेनका ने रूप बदलकर
भागकर स्वर्ग से दूर
बारूदी-सुरंगों में शरण ले ली!
हे कश्मीर पुरुष,
मैं दोषी हूँ
उन सब असंस्कारी संततियों की
जिसने बारूद के गोले से
रेत पर लिखे अक्षरों जैसे
घर, घर की दीवारें और चौखट बना दिए
मैंने उन्हें सँभालने की बहुत कोशिश की
मगर
बारूदी घरों ने धीरे-धीरे
संतति पैदा करते हुए
एक पूरा क़स्बा, शहर
और फिर मुल्क बना लिए
बुरहान वानी मेरी ही षड्यंत्रों का साजिश था
हे कश्मीर पुरुष,
मैं, तुमसे मगर मुआफ़ी नहीं मांगूंगी
क्योंकि मैं तुमको जीतना चाहती हूँ
और हाँ; बारूद बने मुल्क और उनकी स्त्रियों का कहना है कि
तुम उनके हो?
मैं, तुमको बाँट नहीं सकती कश्मीर पुरुष
नहीं चाहती सौतनें अपने लिए!
इस तरह
तुम्हारी नाजायज़ संतानें भी मुझे शिरोधार्य होगी
मेरे अंगरक्षकों और मेरे सैनिकों का कहना है
मेरी प्यारी देहलवी
तेरी हर मुराद मैं पूरी करूँगा
तुझसे ईर्ष्या करने वाली हर स्त्रियों का वही हाल होगा
जो बड़े महल के मुख्य-द्वार पर काँटों में फंसी
उस मकड़ी का हुआ है
मकड़ी जो घर तो बना लेती है
मगर उसे पता नहीं होता
वो काँटों के बिना पर खड़ी है
हे कश्मीर पुरुष,
मैं देहलवी तेरे लिए जान दे भी दूंगी
और ले भी लूंगी
सच बताऊँ; सैनिकों का जो जखीरा
कश्मीरियों पर हमला बोला था
उसको मैंने गुरु-मंत्र में
धर्म, असहिष्णुता, हिंसा, गोले-बारूद
और नफरत दे दी!
मेरे अंगरक्षक आज बदल गए है
लेकिन, मैंने गुरु मंत्र नहीं बदले
हे कश्मीर पुरुष,
फिर भी मैं चिंतित हूँ
तुम्हारे चौड़े सीने पर उगे बाल
जो स्त्री से पुरुष की आसक्ति दर्शाती है
उसमें धीरे-धीरे
बारूद कि ज्वाला भड़कने लगी है

घाटी जल रही है
अंगरक्षक, सैनिक, सौतनें और प्रेमिका
मुझे इंतज़ार है किस दिन
दावेदारी छोड़कर
सच में प्रेम करने लगेंगे
मैं बदल रही हूँ कश्मीर पुरुष
बदलने लगी हूँ
फिर भी तुमसे मेरा मोह नहीं छूटता
अब बोलो तुम क्या कहना चाहोगे?
तभी घाटी के
पुरअसरार, सुनसान रास्ते से
एक गीत निकलता है
और वह जन गण मन होता है!

बिहार और जातिवाद का इतिहास ‘दिनकर’ की कलम से:

डॉ.रतन लाल

एसोसिएट प्रोफेसर
इतिहास विभाग
हिन्दू कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क : lalratan72@gmail.com.

भारत में जब चुनाव या किसी अन्य गतिविधि की चर्चा होती है तब निःसंदेह जातिवाद की चर्चा अवश्य होती है, ऐसा लगता है कि जाति और राजनीति एक दूसरे के पर्याय हों. हालाँकि सत्ता और संसाधन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जो इससे अछूता हो. लेकिन सबसे मज़ेदार बात यह है कि जातिवाद की राजनीति करने को तोहमत सिर्फ दलित और पिछड़ों पर ही थोप दिया जाता है और बाकी सवर्ण जातियों को सर्वग्राही, सर्वमान्य, और पूरे समाज का नेता मान लिया जाता है. यहाँ ध्यान रखने की जरुरत है कि यदि ‘जाति’, ‘जाति’ में अंतर है तो ‘जातिवाद’ और ‘जातिवाद’ – सवर्णवाद और पिछड़ा या दलितवाद – में भी अन्तर है और यह दोनों ‘वाद’ एक दूसरे के विपरीत भी हैं.

यदि बिहार की ऐतिहासिक-सामाजिक पृष्ठभूमि को खंगालें तो बड़े-बड़े ‘सवर्ण’ राजनैतिक-साहित्यिक ‘शूरवीर’ जातिवाद की ज़मीन बनाते दिख जायेंगे. एक बार जब जातिवाद की ज़मीन तैयार हो गई तो उसकी बदौलत सवर्ण तबका पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता और संसाधन की मलाई खाता रहा. अस्सी और नब्बे के दशक में जब दलित-पिछड़ों में सामाजिक-राजनीतिक चेतना का सन्चार होता है और सत्ता के समीकरण बदलने लगते हैं तब वर्चस्वशाली सवर्ण लोगों को अचानक राजनीति में ‘जातिवाद’ दिखने लगता है।


‘दिनकर’ – रामधारी सिंह ‘दिनकर’ – भारत के बौद्धिक जगत के एक चर्चित और प्रसिद्द नाम. यह लेख, रामधारी सिंह दिनकर – अधिकारी, ‘राष्ट्रकवि’, साहित्यकार, प्रोफेसर, वाईस-चांसलर, राजनेता सब कुछ थे – के लेखन द्वारा बिहार की राजनीति को समझने का प्रयास है. यह अध्ययन, ‘दिनकर की डायरी’ और ‘दिनकर रचनावली’ खंड, -14 के अध्ययन पर आधारित है. ‘दिनकर की डायरी’ में तो उनके व्यक्तिगत अनुभवों, और खाली क्षण में उनके लिखे गए उनके विचारों का संकलन है. दिनकर के व्यक्तिगत विचार और दर्शन को समझने के लिए ये दोनों स्रोत काफी महत्वपूर्ण हैं. विशेष रूप से पत्रों के संकलन का अध्ययन महत्वपूर्ण है.

हिंदी जगत अपने उद्भव काल से ही सवर्ण जातीयता का अड्डा रहा है और अपने-अपने वर्चस्व के लिए इनके आपसी संघर्ष की गाथा भी सर्वविदित है. आज़ादी से काफी पहले, 12 सितम्बर 1939 को दिनकर लिखते हैं, “…बिहार में कायस्थ, राजपूत और भूमिहार की फीलिंग बड़े जोरों पर चल रही है और साहित्य क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं बच रहा है. इसका दुःख है. इस फीलिंग की कुछ डंक मुझे भी लग रही है अन्यथा मैं अपने जीवन को कुछ दूसरा रूप देने में समर्थ हो सकता था.”

अब देखिए दिनकर-गुप्त-बेनीपुरी कथा, जिसकी चर्चा दिनकर द्वारा सूर्यनारायण व्यास को लिखे गए पत्र (14.8.53) में मिलती है. दिनकर उस समय राज्य-सभा सदस्य थे और उनके बारे में अफवाह फैलाई गई कि वे मंत्री बनने के लिए नौकरी छोड़कर दिल्ली आए हैं. दिनकर लिखते हैं, “…इस प्रवाद को फ़ैलाने में सर्वाधिक हाथ पितृवत, परम श्रद्धेय राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण जी को है. वे संसद में आ गए, यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार था, मैं गरीब क्यों आया, इसका उन्हें क्रोध है. सच कहता हूँ, जन्म भर गुप्त जी पर श्रद्धा सच्चे मन से करता रहा हूँ. हृदय को चीरकर देखता हूँ तब भी यह दिखलाई नहीं पड़ता कि उनका मैंने रंच भर भी अहित किया हो, स्तुति में लेख लिखा, विद्वानों के बीच उनकी ओर से लड़ा, एक कांड को लेकर ब्रजशंकर जैसे निश्छल मित्र से रुष्टता मोल ली, यूनिवर्सिटी में उनकी किताबें कोर्स में लगवाता रहा, अभी-अभी एक किताब कोर्स में लगवा दी. दिल्ली में भी कम सेवा नहीं की मगर फिर भी यह देवता कुपित है और इतना कुपित है कि छिप-छिपकर वह मुझे सभी भले आदमियों की आँख से गिरा रहा है. मेरे एक पत्रकार मित्र का यह कहना है कि प्रबंध-काव्य लिखकर तुम गुप्त जी के मित्र नहीं रह सकते क्योंकि इससे उनके व्यापार पर धक्का आता है. अस्तु.”

इसी पत्र में दिनकर आगे लिखते हैं, “बेनीपुरी भी नाराज़ थे क्योंकि वे खेत चरना चाहते थे और मुझसे यह उम्मीद करते थे कि मैं लाठी लेकर झाड़ पर घूमता रहूँ, जिससे कोई खेतवाला भैंस को खेत से बाहर नहीं करे. और भी एक-दो मित्र अकारण रुष्ट हैं. और यहाँ की विद्वान मंडली तो पहले जाति पूछती है. सबसे दूर, सबसे अलग, आजकल सिमटकर अपने घर में घुस गया हूँ. बिहार नष्ट हो गया है, इसका सांस्कृतिक जीवन भी अब विषाक्त है. अब तुम जाति की सुविधा के बिना यहाँ न तो कहीं कोई दोस्त पा सकते हो, न प्रेमी, न प्रशंसक और न मददगार. जय हो यहाँ की राजनीति की! और सुधार कौन करे? जो खड़ा होगा, उसपर एक अलग किस्म की बौछार होगी. मेरा पक्का विश्वास है कि बुद्ध यहाँ नहीं आए थे, महावीर का जन्म यहाँ नहीं हुआ था. यह सारा इतिहास गलत है. साहित्य का क्षेत्र यहाँ बिलकुल गन्दा हो गया है. ‘पंडित सोइ जो गाल बजावा’ भी नहीं, यहाँ का साहित्यकार अब वह है जो ‘टेक्स्ट-बुक’ लिखता है. बेनीपुरी रूपए कमाते-कमाते भी थक गया, आजकल मूर्च्छा से पीड़ित रहता है. चारों ओर का वातावरण देखकर मैं भयभीत हो गया हूँ. चारों ओर रेगिस्तान है, चारों ओर ‘कैक्टस लैंड’ का प्रसार है.”

अब जरा कॉलेज के वातावरण का हाल देखिए, “वहां भी जातिवादियों का जाल था, वहां भी अपमानजनक बातें सुनने में आईं, वहां भी इर्ष्या-द्वेष और मालिनता का सामना करना पड़ा. साथ ही, यह भी भासित होता रहा कि कविता की सबसे अच्छी कब्र कॉलेज ही है. कविता को बचाने के लिए वहां से भागने को तो पहले ही तैयार था. जब कांग्रेस का ऑफर आया, मैं नौकरी छोड़कर संसद में आ गया. अब मैथिलीशरण और अर्थाभाव, ये दो संकट झेल रहा हूँ और बाहर तो लोग अब भी काफी अमीर समझते हैं.”   इस समय तक दिनकर 45 वर्ष के हो चुके थे और उनके विचारों में परिपक्वता देखी जा सकती है. बिहार और साहित्य जगत में फैले जातिवाद को लेकर अब वे इतने दुखी महसूस कर रहे थे कि वे आक्रोश में इतिहास को ही नकार रहे थे, “मेरा पक्का विश्वास है कि बुद्ध यहाँ नहीं आए थे, महावीर का जन्म यहाँ नहीं हुआ था. यह सारा इतिहास गलत है.”

जाति के प्रश्न पर दिनकर के समझ की व्यापकता और ‘आक्रोश’ उम्र के पचासवें में देखी जा सकती है. सन 1961 में दिनकर राज्य सभा के सदस्य थे. 4 मार्च 1961 को दिनकर ने श्री रामसागर चौधरी नाम के एक व्यक्ति को पत्र लिखा, “सच ही, मैं आपको नहीं जानता तब भी आपका 28.2.61 का पत्र पढ़ कर दुखी हुआ. यह लज्जा की बात है कि बिहार के युवक इतनी छोटी बातों में आ पड़े. मैं जातिवादी नहीं हूँ. तब भी अनेक बार लोगों ने मेरे विरुद्ध प्रचार किया है और जैसा आपने लिखा है, अब वे ऐसी गन्दी बातें बोलते हैं. लेकिन तब मैं जातिवादी नहीं बनूँगा. अगर आप भूमिहार वंश में जन्मे या मैं जनमा तो यह काम हमने अपनी इच्छा से तो नहीं किया, इसी प्रकार जो लोग दूसरी जातियों में जनमते हैं, उनका भी अपने जन्म पर अधिकार नहीं होता. हमारे वश की बात यह है कि भूमिहार होकर भी हम गुण केवल भूमिहारों में ही नहीं देखें. अपनी जाति का आदमी अच्छा और दूसरी जाति का बुरा होता है, यह सिद्धांत मानकर चलने वाला आदमी छोटे मिजाज का आदमी होता है. आप लोग यानी सभी जातियों के नौजवान – इस छोटेपन से बचिए. प्रजातंत्र का नियम है कि जो नेता चुना जाता है, सभी वर्गों के लोग उससे से न्याय की आशा करते हैं. कुख्यात प्रान्त बिहार को सुधारने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि लोग जातियों को भूलकर गुणवान के आदर में एक हों. याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजानिक जीवन गल जाएगा.”

व्यक्तिगत सुझाव और जातिय संबंधों में सत्ता के खेल की व्याख्या करते हुए दिनकर आगे लिखते है, “आप सोचेंगे, यह उपदेश मैं आपको क्यों दे रहा हूँ? किन्तु आपने पुछा, इसलिए आप ही को लिख भी रहा हूँ. आज आप पीड़ित हैं, अपने आपको दुखी समझते हैं. आपके विरुद्ध जिनका द्वेष उभरा है, कल उनका क्या भाव था? शायद अपने को वे उपेक्षित अनुभव करते थे. इसलिए, स्वाभाविक है कि उनका असंतोष व्यक्त हो रहा है. और उपाय भी क्या था? इसलिए आपको धीरज रखने को कहता हूँ, उच्चता पर आरूढ़ रहने को कहता हूँ.”
जातीय राजनीति की वर्गीय चरित्र और सीमाओं की चर्चा करते हुए दिनकर लिखते है, “जाति-नाम का शोषण करके मौज मारनेवाले चन्द लोग, जो कुछ करते हैं, उसकी कुत्सा उस जातिभर को झेलनी पड़ती है, यह आप लोग समझ रहे हैं? यही शिक्षा कल उन्हें भी मिलेगी, जो आपको केवल इस लिए डस रहे हैं कि आप भूमिहार हैं. तो इससे निकलने का मार्ग कौन सा है? केवल एक मार्ग है. नियमपूर्वक अपनी जाति के लोगों को श्रेष्ठ और अन्य जातिवालों को अधम मत समझिए. और यह धर्म उस समय तो और भी चमक सकता है जब आदमी जांच की कसौटी पर हो.”

इस पत्र को पढ़ने पर कुछ बातें झलकती हैं. पहली बात तो यह है की श्री रामसागर चौधरी, दिनकर के स्वजातीय – भूमिहार – थे. चौधरी साहब को किसी गैर-भूमिहार से कोई परेशानी थी, इसलिए मदद के लिए उन्होंने अपने स्वजातीय सांसद श्री दिनकर को पत्र लिखा. ऐसा लगता है कि चौधरी साहब ने जाति के आधार पर दिनकर से मदद मांगी, इसीलिए दिनकर व्यथित थे और उन्हें लिखना पड़ा, “मैं जातिवादी नहीं हूँ.” दूसरी महत्वपूर्ण बात, जिस समय यह पत्र लिखा गया उस समय बिहार में श्रीबाबू (श्रीकृष्ण सिंह) मुख्य-मंत्री थे और वे भी जाति से भूमिहार थे. अब प्रश्न उठता है कि क्या श्रीबाबू की राजनीति शैली ऐसी हो चुकी थी कि बिहार उसी समय कुख्यात हो गया था. लगता है दिनकर को, श्रीबाबू की रुढ़िवादी जातिवादी राजनीति से क्षुब्ध होकर, लिखना पड़ा, “कुख्यात प्रान्त बिहार को सुधारने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि लोग जातियों को भूलकर गुणवान के आदर में एक हों. याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजानिक जीवन गल जाएगा.”
आधुनिक बिहार के इतिहास में राजनीति में जातिवाद के जन्म का श्रेय बिहार के पढ़े-लिखे और ‘समझदार’ सवर्णों को जाता है. लेकिन सत्ता के गलियारे में वर्चस्व को लेकर के.बी. सहाय और महेश प्रसाद सिन्हा में जातीय गुटबंदी सर्वविदित थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि दोनों 1957 के विधान सभा चुनाव में हार गये. लेकिन चुनाव हारने के बावजूद, श्रीबाबू ने महेश प्रसाद सिन्हा को तो राज्य खादी बोर्ड का चेयरमैन बनाया, परन्तु सहाय को कुछ नहीं बनाया गया. यही नहीं उनके कैबिनेट और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर दलितों की संख्या अपर्याप्त थी एवं पिछड़ी जातियों महिला तथा आदिवासी नदारद. यही कारण था कि दिनकर ने लिखा, “याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजानिक जीवन गल जाएगा.”

जीवन के छठे दशक में जाति के प्रश्न पर दिनकर के विचारों की परिपक्वता और व्यापकता और अधिक बढ़ती गई और अब उनके विचारों में आक्रोश के साथ व्यंग भी दीखता है. वे अपनी डायरी में लिखते हैं, “सरदार पटेल की 96वीं जयंती का सभापतित्व करने को साहित्य सम्मलेन-भवन गया. मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री भी आए हुए थे. प्रायः सभी वक्ता एक ही जाति के थे. अधिक श्रोता भी उसी जाति के थे. सोचकर हंसी आती है कि स्वामी सहजानंद और बाबू श्रीकृष्ण सिंह भूमिहार बनकर जी रहे हैं. अनुग्रह बाबू के नामलेवा राजपूत हैं और सरदार पटेल की जयंती बिहार में कुर्मी बंधु मनाते हैं. बिहार गर्त में गिरता जा रहा है. कहाँ जाकर रुकेगा इसका पता नहीं चलता.”

अपने स्वजातीय बंधुओं से ही हुए उत्पीड़न की व्यथा वे इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, “मैं भी अपनी पोती के लिए लड़का खोज रहा हूँ. कोई सीधे मुंह बात ही नहीं करता. पहले समाज में ऐसे लोग थे, जिन्होंने मुफ्त लड़के देकर, मेरा उपकार किया था. मगर अब वे लोग समाज से लुप्त हो गए हैं. नई पीढ़ी के भूमिहार केवल अर्थ-पिशाच हैं. मैं भी जात से बाहर जाने को तैयार हूँ. दूसरा विकल्प यह कि लड़की क्वाँरी रह जाय. और क्या कर सकता हूँ? पहले लोग सोचते थे दिनकर कंगाल नहीं है, उसके पास कीर्ति है, उसे शरण मिलनी चाहिए. अब ऐसी बात कोई नहीं सोचता. ऐसी भ्रष्ट जाति से बाहर निकलने का रास्ता मिले तो इससे अच्छा और क्या होगा. मगर कोई रास्ता तो मिले. 9 लड़कियों की शादी कर चुका हूँ. रामसेवक की तीन लड़कियां और हैं. कम से कम दो की शादी करके मरना चाहता हूँ. मुझे लगता है, भगवान ने मुझे 11 लड़कियों के ब्याह के लिए भेजा था. वह काम पूरा हो जाए तो समझूँ मेरे अवतार का कार्य पूरा हो गया….असल में भूमिहार ही नहीं सारा प्रान्त सड़ गया है.”
जातिवाद के दंश से शिक्षा का भी क्षेत्र नहीं बच पाया. बुद्धिजीवियों की भूमिका की चर्चा करते हुए दिनकर लिखते हैं, “असली स्थिति यह है कि जनता चाहती है कि मनीषी ऐसा हो कि वह राजा और प्रजा, दोनों को डांट सके. जब तक मनीषी इस धर्म का पालन करता है, तब तक जनता उसके साथ रहती है. स्वराज्य के पूर्व तक मनीषियों का इस देश में बड़ा सम्मान था, क्योंकि मनीषी शासकों के खिलाफ़ आवाज़ उठाते थे. मगर अब मनीषियों का आदर बहुत कम हो गया है. जो मनीषी लेखक और कवि हैं, वे कला की सेवा तो करते हैं, लेकिन समय के जलते प्रश्नों पर अपना विचार व्यक्त नहीं करते. स्पष्ट ही यह सुरक्षा की राह है और जो सुरक्षा खोजता है, जनता उसकी खोज नहीं करती. हमलोग सुरक्षा की खोज में ही मारे गये हैं.”

राजनीति, अफसरशाही और मनीषियों के सम्बन्ध और उभरते चाटुकारिता और घुटनाटेक संस्कृति की चर्चा करते हुए दिनकर लिखते हैं, “आज तो स्थिति यह है कि जिस समाज में हम जीते हैं, उसका प्रोप्रेइटर राजनीतिज्ञ है, मैनजर अफसर है और मनीषी मजदूर है. कुछ मनीषी अध्यापक और प्राध्यापक हैं, कुछ लेखक, कवि और पत्रकार हैं. मगर वे हमेशा चौकन्ने और सतर्क रहते हैं कि कहीं कुछ ऐसी बात मुंह या कलम से न निकल जाय, जिससे सरकार या विश्वविद्यालय के अधिकारी नाराज़ हो. जिस समाज के मनीषी असुरक्षा से इतने शंकित और भयभीत हों, उस समाज का नेता राजनीतिज्ञ ही रहेगा. सरस्वती और लक्ष्मी में बैर है, यही सिद्धांत ठीक था. हमने इस बैर को बुझाने की कोशिश की, यही हमसे बड़ी भरी भूल हो गयी.”

ध्यान देने की जरुरत है, जिन मनीषियों की चर्चा दिनकर यहां कर रहे हैं, वे कौन लोग थे इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं.बहरहाल, दिनकर के जीवन के जिस चार दशक की यहाँ चर्चा की गई है, उसमें जाति के सम्बन्ध में दिनकर दिनकर के विचारों को स्पष्ट रेखांकित किया जा सकता है.अपने निजी जीवन में अपने स्वजातीय बंधुओं से इतने सताए गए की उन्हें लिखना पड़ा “नई पीढ़ी के भूमिहार केवल अर्थ-पिशाच हैं.” लेकिन जाति और धर्म में सत्ता के खेल को दिनकर चुनौती नहीं दे पाए.गौरतलब है कि उनके मित्र राहुल संकृत्यायन तो काफ़ी पहले ही हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध बन गए, लेकिन दिनकर न तो अपने धर्म का त्याग किया और न जाति का ही!

दिनकर एक बहुयायामी व्यक्तित्व रहे हैं – शिक्षक, साहित्यकार, ऑफिसर, नेता, वाईस-चांसलर, प्रकाशक इत्यादि. जाति-व्यवस्था में सत्ता का खेल है, दिनकर इस बात को समझते थे. लेकिन जाति व्यवस्था के प्रति उनका प्रतिरोध निजी पत्रों में ही दीखता है. महाकाव्य के पठन में कर्ण दिनकर का नायक है, लेकिन सार्वजानिक जीवन में (जहाँ तक हमें ज्ञात है) दिनकर ने जाति-व्यवस्था में सत्ता के खेल पर खुलकर प्रहार नहीं किया: यहीं दिनकर का द्वन्द दीखता है. ज्ञान का विमर्श, तर्क का विमर्श होता है और समीक्षा का उद्देश्य होता है – पाठ की उलझनों का पर्दाफ़ाश करना. जिस तरह से एक पाठ के असंख्य पठन हो सकते हैं, उसी तरह से एक बहुयायामी व्यक्ति के व्यक्तित्व और कृतित्व का भी असंख्य पठन हो सकता है. हम चाहे जो कहें लोग तो अपने ढंग से पढ़ेंगे ही, और व्यक्तित्व और कृति दोनों के पाठ वक़्त के साथ बदलते रहे हैं, बदलते रहेंगे। जैसे महाभारत का पुनर्पाठ शिवाजी सावंत और दिनकर ने किया, उसी तरह दिनकर का पाठ हम अपने ढंग से कर सकते हैं। और, यह पठन सिर्फ प्रारंभ बिंदु है.

अब यहां ध्यान देने की जरुरत है कि देश की आज़ादी की लड़ाई सभी वर्गों के लोगों ने लड़ी थी और कुर्बानियां भी दी थीं. लेकिन आज़ादी के शीघ्र बाद ही सत्ता की हिस्सेदारी से राजपूतों, ब्राह्मणों, कायस्थों तक को खदेड़ दिया गया और सिर्फ एक ‘जाति’ विशेष का ही वर्चस्व बना रहा, दलित और पिछड़ों की कौन कहे? बिहार को सड़ने के रास्ते पर कौन ले गया? बिहार की राजनीति में जातिवाद को जन्म किसने दिया? क्या इतिहास से यह सवाल पूछना लाजिमी नहीं है? जातिवादी राजनीति और उसके पोषण के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? आज़ादी के बाद भी जिस तरीके से बहुसंख्यक जनता, विशेष रूप से दलितों पर जो अमानवीय अत्याचार हुए, उसकी आवाज़ उठाना या उनके हकों की वकालत करना जातिवाद था? यक़ीनन नहीं. आज जिस तरह से राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सत्ता का संकेन्द्रन कुछ व्यक्तियों एवं जातियों में हो रहा है, यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है.
सनद रहे, इस पूरे विमर्श में स्त्री नदारद है.


  सन्दर्भ सूची
1.नन्दकिशोर नवल, तरुण कुमार (सं.), रामधारी सिंह दिनकर रचनावली – 14, लोकभारती प्रकाशन,नई    दिल्ली, 2011. पृष्ठ 136. 
2. वही, पृष्ठ 527.
3. वही, पृष्ठ 527-528.
4.वही, 528
5.वही, पृष्ठ 528.
6.वही, पृष्ठ 211.
7.वही, पृष्ठ 211.
8.वही, पृष्ठ 212. 
9. दिनकर की डायरी, पृष्ठ 245, 31 अक्टूबर 1971.
10. दिनकर रचनावली खंड, -14, पृष्ठ 50.
11. दिनकर की डायरी, 1 मई, 1972, पृष्ठ 304.
12. वही, पृष्ठ 305.

 

उपासना झा की कवितायें

0
प्रेम  में,

प्रेम  में,
देह की देहरी लांघ
आम्रपाली बन जाना
क्या कठिन था
कठिन था बुद्ध सा
सत्पात्र मिलना।

प्रेम में,
देह से उठती लपट को
शीश नत स्वीकार करना
क्या कठिन था
कठिन था नल सा
आह्लाद मिलना

प्रेम में,
आत्मा का लीन होना
प्रिय के चुंबनों में
क्या कठिन था
कठिन था पुरु सा
उन्माद मिलना

उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थी

उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थी
उनकी भौहें तनी रहती थी मान से
उनके होंठो पर तिरता नहीं था मंद हास्य
कोनों में नहीं दबी रहती थी मृदु भंगिमाएं
कंठ से खिल कर फूटता था अट्टहास
ग्रीवा में बाँध रखती थी लिप्सायें
उनके वसनों में घूमता रहता था बसंत
देखा नहीं कभी उन रक्तिम ऋतुओं का अंत
उनकी सभ्यता वक्षों को ढकने भर नहीं थी,
न था उनका सम्मान केवल उनकी जंघा भर
कमरधनी में हिलोरें लेती थी
उनतक उछली कई अतृप्त वासनाएं
वे कुटिल, पतित और श्रीहीन थीं
उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थीं..

उनको पा लेने की इच्छायें लिए पुरुष
जाति, धर्म, गति, वर्ग से च्युत होकर
सभी संकीर्ण बन्धनों से मुक्त होकर
सृष्टि से श्रेष्ठत्व के मोह में आत्ममुग्ध
आते थे सहज ही उधर होकर कामदग्ध
अपने नियमों पर धरा को भोगते थे
हवा को, दिशा को, मेघ को टोहते थे
अपने बनाये सिक्कों की खनखन में
स्त्री को, जीवन को, यौवन को तोलते थे।
उस नगर के वही थे पालक और दाता
स्त्रियाँ थीं पतित पुरुष थे त्राता
उस नगर की स्त्रियाँ प्रेम से विहीन थी
उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थीं।

उदासी के दिनों में प्यार

जब तय था कि समझ लिया जाता
मोह और प्रेम कोई भावना नहीं होती
रात को नींद देर से आने की
हज़ार जायज वजहें हो सकती हैं
ज़रा सा रद्दोबदल होता है
बताते हैं साईन्सगो,
हार्मोन्स जाने कौन से बढ़ जाते हैं
इंसान वही करता है
जो उसे नहीं करना चाहिए
गोया कुफ़्र हो

जब दीवार पर लगे कैलेंडर पर
दूध और धोबी का हिसाब भर हो तारीखें
उन तारीखों का रुक जाना
क्या कहा जायेगा
साल के बारह महीने एक सा
रहनेवाला मौसम अचानक
बदल जायेगा तेज़ बारिश में,
जब ऐसी बरसातों में वो पहले
भीग कर जल चुकी थी,

जब मान लिया जाना चाहिए
कि ज्यादा पढ़ना दिमाग पर करता है
बुरा असर
ये तमाम किताबें और रिसाले
वक़्त की बर्बादी भर हैं
जो इस्तेमाल किया जा सकता था
पकाने-पिरोने-सजाने-संवारने में
और बने रहने में तयशुद

जब समझ लिया गया था
चाँद में महबूब की शक़्ल नहीं दिखती
न प्यार होने से हवाएं
सुरों में बहती हैं
न धूप बन जाती है चाँदनी
न आँसू ढल सकते हैं मोतियों में
न जागने से रातें छोटी होती है
उस उम्र में अब ऐसा नहीं होना था

उन उदासी से भरे दिन-दुपहरों में
हल्दी और लहसन की गंध
में डूबी हथेलियों वाली
औरत को उसदिन
महसूस हुआ कि उसके पाँव
हवा में उड़ते रहते हैं।
उसने कैलेंडर पर एक और
कॉलम डाला है-
रोने का हिसाब….


तितलियाँ फिर उड़ेंगी

तिनका-तिनका नीड़ की तलाश में
कतरा-कतरा चैन जोड़ती..
भूल जाती हैं तितलियाँ
की उनको उड़ना भी आता है..

जोड़ते रहने की ख्वाहिश में..
खुद को तोड़ती जाती हैं..
भूल जाती है दुनिया के रंगों को..
और उनसे भी ख़ूबसूरत अपने परो को.

कतर दिए जाते हैं पर उनके..
नोंच डाले जाते हैं रंग उनके..
फूलों की बस्ती से बेदखल की जाती है..
भूल जाती हैं की उनको लड़ना आता है

हर क्षण खंडित होती उनकी आत्मा में..
अब भी सपनें है आसमानों के
लाख पहरे हो..लाख दीवारें
कौन रोक पाया है उड़ानों को..

तितलियाँ ख़ोज लेंगी अपना रास्ता.
नोंचे हुए…मटमैले परों को..
समेटना और उठना भी उनको आता है..
तितलियाँ फिर उड़ेंगी..

 लड़कियों का घर 

कौन सा घर होता है लड़कियों का..
जहाँ चलना सीखा और ये भी की..
ठीक से चलो एक दिन अपने घर जाना है..
जहाँ बचपन के खिलौने भी..
गुड्डे-गुड़िया हुआ करते हैं..
उनकी शादी, डोली और विदाई..
और उनसे समय बचे तो..
उसकी अनकही तैयारियां..

क्यों बोये जाते हैं…अनगिन
लड़कियों के मन में सेमल के फ़ूल..
जो देखने में इतने सुन्दर…
और रस-गंध हीन होते हैं…
हर लड़की के जीवन की एकमात्र
उपलब्धि अपने घर जाना
क्यों बनाया जाता है..

हल्दी…मेहन्दी…और आलते
से रचे हाथों और पैरों से..
जब आती हैं लड़कियां दुल्हन बनके
‘अपने घर’ अपना असली घर छोड़ के..
वही अपना घर जो कभी अपना नहीं होता
जहाँ एक छोटी सी कमी काफी है
बाप के घर वापिस भेजने के लिए..

अब भी लडकियाँ जलाई जाती हैं..
अपने घरों में…और जो मरती नहीं
वो रोज़ जलती हैं अपनी ही आग में
और जो स्वीकार नहीं करती मरना..
वो बन जाती है.. किस्सा और तमाशा
उनका ऐसा कोई घर नहीं होता..

भागी हुई लड़की 

हर रोज़ रात को भाग जाती हूँ मैं घर से..डायरी लिखते-लिखते..
उन बहुत सी लड़कियों की तरह जो भागती हैं मन ही मन..
यकीन करो घर से भागने वाली लडकियाँ भी होती है….
वैसी ही जिनकी तुम घरों में कल्पना करते हो तुलसी को जल देते..
साहसी से एक कदम ज्यादा दुस्साहसी..
वही लडकियाँ जो प्रेमिका भी हो सकती हैं..पत्नी भी…वेश्या भी..
मैं इंतज़ार करती हूँ..तुम्हारा ख्यालों में तय की उसी जगह पर..
किसी रात तुम नहीं आते..तो मैं बेचैन होकर उस धुंधली रौशनी में बार-बार देखती हूँ राह..
और थक कर लौट आती हूँ…
निराश प्रेमिका की तरह..
तुम आ जाते हो कुछ रातों में..तो गले लगकर कहती हूँ की आज मत जाओ.. तुम्हारी मानिनी पत्नी की तरह..
जिस पुरुष ने कभी ये अनुभव किया हो…किसी स्त्री का पृथ्वी हो जाना..अपने लिए..उसने प्रेम को जाना है..
और कुछ रातें तुम होते हों मुझसे पहले..अपनी जरूरतो की राह मेरे दुपट्टे तक बनाते..
और मेरे होंठो पर होती है वही बाज़ारी मुस्कान..
मैं रोज़ रात को डायरी बंद करके होती हूँ ये तीन औरतों..
और सुबह वापिस सूरज के जागते ही..
मैं होती हूँ वही मस्तमौला लड़की..
राज़ छिपाती..बिना बात हँसती..
रात होने और फिर भागने का इन्तजार करती..
(आलोक धन्वा की भागी हुई लड़कियों को समर्पित)

डॉन्ट वरी डियर सोनम गुप्ता

प्रियंका


बदलते समय ने बहुत सारे लोगों को स्त्री और दलित सरीखी उत्पीड़ित-उपेक्षित अस्मिताओं के पक्ष में दिखावे के लिए ही सही खड़े होने के लिए विवश तो किया, लेकिन इसने उनके भीतर की कुंठाओं क्रूरताओं और घृणा को भी साफ कर दिया हो, यह भ्रम न ही रखा जाए तो अच्छा है . समय के साथ-साथ लोगों की चालाकियाँ भी अधिक बढ़ती जा रही हैं. शत्रुओं ने अपना अंदाज बदलना सीख लिया है. उन्हें पहचानना अधिक कठिन हो गया है. इसके बावजूद समय-समय पर उनकी चालाकियाँ ही ख़ुद को डिकोड करने के अवसर देती रहती हैं .



जब देश बिना उचित तैयारी के ‘मुद्रा परिवर्तन’ के अचानक ले लिये गये फैसले से जूझ रहा है : लोगों को ‘मज़ाक’ सूझ रहा है. सोशल मीडिया पर कुछ दिनों पहले दस रुपये के नोट पर किसी का यह लिखा कि ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’ खूब प्रसारित हुआ था . इसे लिखे जाने और वायरल होने के पीछे की असल कहानी क्या है,नहीं पता, लेकिन मेरा ख़याल है कि लोगों को इसमें किसी चोट खाए आशिक का दर्द नज़र आया होगा और उसके लिए अभिव्यक्ति की चुनी गयी जगह उन्हें आकर्षित कर रही होगी और सबसे बड़ा कारण यह रहा होगा कि इसमें मज़े लेने की भरपूर संभावना दिखी होगी. अब मुद्रा परिवर्तन के दौर में सोशल मीडिया पर चलाई जा रही ‘अघोषित हास्य प्रतियोगिताओं’ में अचानक से इसके और भी नये-नये ‘क्रिएटिव वर्सन’ सामने आने लगे हैं . लगभग हर कोई इसमें अपनी शिरकत करना चाह रहा है. कोई इससे जुड़ी किसी की ‘क्रिएटिविटी’ को शेयर कर रहा है तो कोई अपनी ‘क्रिएटिविटी’ दिखाने को आतुर है . यानी सोनम गुप्ता पर्याप्त मशहूर हो गयी है- नहीं यह गलत शब्द होगा, मशहूर होना औरतों के हिस्से का दुर्लभतम सुख है-सही शब्द यह होगा कि वह बुरी तरह बदनाम हो गयी है . यह दस रुपये के नोट पर उकेरी गयी पहली ‘क्रिएटिविटी’ की शानदार सफलता है . उसमें निहित भावना का फलिभूत होना है .

इसे लिखने वाले ने कुछ तो मानवता दिखाई कि सोनम गुप्ता का पता या पहचान जाहिर करने वाला कुछ नहीं लिखा. चूँकि इस नाम से पहचान जाहिर नहीं होती, कोई एक टारगेट तय नहीं होता इसलिए लोगों को यह अपने करतब दिखाने के लिए खुला मैदान लग रहा है . कोई ख़तरा नहीं और कुंठाओं के लिए आसानी से सोशल मीडिया  भी उपलब्ध हो रहा है. क्या इसे इस कोण से कोई नहीं सोचता कि यह सब एक साथ सोनम गुप्ता नाम की कई औरतों को असहज करता होगा ? कि किसी का नाम सोनम गुप्ता सुनकर, प्रकट-अप्रकट एक टेढ़ी मुस्कान खिंच जाती होगी? कभी ‘चिंटुआ के दीदी तनी प्यार करे द’, भोजपुरी गीत ने ऐसी ही कुंठा के लिए आश्रय उपलब्ध कराया था. चौक-चौराहों , बाजार , विवाह पार्टियों बरात आदि में यह गीत खूब बजता, तब चिंटू नाम पर आफत थी और उसकी दीदी के रूप में महिलायें इसका टार्गेट थीं, शिकार थीं.

विडम्बना से भरा है लेकिन सच है, कि जहाँ सदियों से चली आ रही व्यवस्था ऐसी है कि औरतों को कोई दो कौड़ी की इज्ज़त के लायक भी नहीं समझता, वहीं की औरतें अपनी इज्ज़त और चरित्र की परवाह में ही अपना पूरा जीवन खपा देती हैं . इसलिए औरतों से लड़ने का सबसे बड़ा प्रामाणिक हथियार उनके चरित्र, उनकी निष्ठा और उनकी इज्ज़त की धज्जियाँ उड़ाने वाले दुष्प्रचार हैं . आए दिन तकनीक के दुरूपयोग से अथवा धोखे से औरतों की निजी तस्वीरों, विडियो अथवा अपमानित करने वाली अन्य सामग्रियों को सार्वजनिक करने के काम धड़ल्ले से किये जा रहे हैं . प्रकट में इसे गलत कहने वाले अधिकांश लोग भी भावना के स्तर पर इसे मनोरंजन की सामग्री ही समझते हैं . इस तरह कि प्रवृत्ति ने न जाने कितने लोगों को अकथनीय प्रताड़ना दी है और आत्महत्या तक के लिए विवश किया है .


बेवफाई की दास्तान तो औरतों को केन्द्र में रख कर लिखे जाने की हमारे यहाँ परंपरा ही रही है, प्यार एकतरफा हो तब भी ! सिरफिरे आशिकों के क्रूरतम एसिड अटैक और उसके अपने मन ही मन तय कर ली की गयी प्रेमिका के विषय में तरह तरह के दुष्प्रचार आम बातें हैं . यदि किसी को ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’ : बीज वाक्य में सोनम गुप्ता का चुनौतियों और आशंकाओं से भरा भविष्य नहीं दिख रहा, बल्कि हास्य और मज़े लेने की संभावनाएँ दिख रही हैं, तो उसे अपनी संवेदनशीलता पर ठहर कर पुनर्विचार अवश्य करना चाहिए . यह वह पहला पड़ाव है, जिसके बाद के ख़तरनाक रास्ते कई बार किसी स्त्री पर एसिड अटैक या आत्महत्या पर जाकर ख़त्म होते हैं बल्कि कई बार यहाँ भी ख़त्म नहीं होते !

ऐसे अवसर लोगों की चालाकियों को डिकोड करने के अच्छे अवसर होते  हैं . ‘सोनम’ तुम भी इसे इसी तरह से देखो . धैर्य से इस तरह की टुच्ची मानसिकता का मुकाबला करना सीखो . उत्पीड़ित अस्मिताओं का शायद ही कोई मसीहा होता है . मसीहा होने का दावा करने वाले बहुत सारे लोग होते हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएँ होती हैं और अपना एजेंडा भी होता है और कई बार वे मसीहों के मुखौटे भर पहने हुए होते हैं . उत्पीड़ित अस्मिताओं को खुद ही अपनी जंग लड़नी होती है . इसलिए यह कोई नई बात नहीं है, कि तुम्हें घबराने की जरूरत हो . डॉन्ट वरी डियर, हो सके तो ऐसे लोगों पर हँसो या कम से कम हँसना सीखो उन पर, जो अपने क्रूर हास्यबोध के कारण इस दुनिया को मरघट में तब्दील कर देने में लगातार योगदान दे रहे हैं, और उनकी मासूमियत ऐसी कि इसका उन्हें पता तक नहीं !!



शोध छात्रा, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय

सुधार नहीं पूर्ण बदलाव चाहेंगी महिलायें

नूर जहीर

‘डिनायड बाय अल्लाह’ और ‘अपना खुदा एक औरत’ जैसी चर्चित कृतियों की रचनाकार
संपर्क : noorzaheer4@gmail.com.



कॉमन सिविल कोड के संघर्ष में तीन पक्ष हैं, एक प्रगतिशील मुसलमान-हिन्दू महिलाओं-पुरुषों का और उनके साथी अन्य प्रगतिशीलों का दूसरा दक्षिणपंथी हिन्दू जमातों का और तीसरा दक्षिणपंथी, परंपरावादी मुसलमानों का. इस त्रिकोण में मुस्लिम स्त्रियों की सामाजिक-कानूनी  स्थिति और उनका संघर्ष शोर –शराबे में दब जाता है – पढ़ें नूर ज़हीर का दृष्टिकोण, एक इनसाडर प्रगतिशील नजरिया. यह आलेख मासिक पत्रिका सबलोग के स्त्रीकाल कालम में नवंबर में प्रकाशित हुआ है. 
संपादक

एक मुसलमान  सज्जन से मैंने पूछा “क्या आप समझते हैं कि कोई भी महिला पति की दूसरी शादी को पसंद करेगी? या एकतरफा दिए गए एक झोक में तीन बार तलाक़ को ख़ुशी से क़ुबूल करेगी?’ वे  बोले “अगर वह एक अच्छी मुसलमान है तो ज़रूर करेगी।”  यही आकर इस गंभीर मुद्दे पर  बहस रुक जाती है।  मौलवियों  का कहना है कि उनके अनुसार चलना ही ‘अच्छे मुसलमान’ होने की कसौटी है भले ही उनका कहा क़ुरान के खिलाफ हो।  यह तो मौलवी भी मानते हैं कि कुरआन एक बार में तीन तलाक़ को ग़लत बतलाता है। पहली बार तलाक़ कहने के बाद एक माह दस दिन, दूसरी बार के बाद भी, और तीसरी बार के बाद 3 माह दस दिन की इद्दत के बाद ही तलाक़ माना जाना चाहिए।  लेकिन आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में बैठे मौलाना कहते हैं कि आज अगर इसे लागू किया गया और पुरुषों को दो महीने  बीस  दिन इंतज़ार करना पड़ा तो वे अपनी पत्नियों को ज़हर दे देंगे, खून कर देंगे.

यानी इतनी बेक़रारी है सुन्नी मुस्लिम पुरुषों में कि उनसे  80 दिन इंतज़ार नहीं होगा।  या आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में बैठे मौलाना आज सड़क पे उतरी हुई न्याय की मांग करती मुसलमान  महिलाओं को धमकी दे रहे हैं, ‘इस मांग पर आंदोलन करना बंद करो वरना मार दी जाओगी!’  अगर ऐसा है तो एक सर्वे करवाने की ज़रूरत है मुसलमानों के  शिया फ़िर्क़े में  जिनमे ट्रिपल तलाक़ एक साथ नहीं माना जाता, कितनो ने अपनी पत्नियों का खून कर दिया और  हिन्दू जिन्हें ‘तत्काल तलाक़’ में भी  3 महीने इंतज़ार करना पड़ता है, क्या पत्नियों का खून कर देते है? या सुन्नी मुस्लिम पुरुष किसी अलग तरह के मर्द हैं ?

“चकरघिन्नी” : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न


लेकिन अपने आप में तीन तलाक़ पर रोक लगे यह मांग  अधूरी है। क्योंकि तीन तलाक़ एक वक़्त में मुस्लिम महिला नहीं दे सकती। यदि मुस्लिम महिला रिश्ता तोडना चाहे तो उसे कारण बताना पड़ता है, उस कारण पर मौलवी विचार करते हैं कि कारण जायज़ है या नहीं, महिला को अपना ‘महर’ यदि वह शादी के वक़्त न दिया हो तो छोड़ना पड़ता है, अगर दे दिया गया हो तो लौटाना पड़ता है और अक्सर कुछ और रकम देकर अपने लिए ‘तलाक़’ खरीदना पड़ता है।  इतना करने के बाद भी ‘तलाक़, तलाक़ ,तलाक़’ कहता पुरुष ही है, महिला नहीं। इसमें अक्सर कई साल लग जाते हैं।  पुरुष को क्योंकि इस्लाम 4 शादियों की एक वक़्त में इजाज़त देता है दूसरी शादी करके आराम से रहता है, और तलाक़ चाहने वाली महिला अकेली विधिशास्त्र के महकमों/संस्थानों के चक्कर काटती रह जाती है। यह पता लगाने की ज़रूरत है कि इस लंबी दुर्दशा से जूझते हुए  में कितनी मुस्लिम  महिलाओं ने अपने पतियों की हत्या करने की कोशिश की है।

बच्चों की लिए अनुरक्षण से भी पुरुष अक्सर छूट जाते हैं और पत्नी के लिए तो अनुरक्षण हो ऐसा मानते ही नहीं मुसलमान मौलवी। बस महर देना ही ज़रूरी है और अमूमन  यह भी नहीं पूरी मिलती क्योंकि अक्सर जो मौलवी तलाकनामा बनाते हैं वह कुछ पैसों की लालच में ‘महर अदा  की गई’ भी जोड़ देते हैं।  ऐसे ही एक केस में महिला ने दार उल उलूम तक की गुहार लगाई जहाँ से उसे कहा गया कि “अल्लाह ऐसे बेईमान मौलवी और पति को ज़रूर सजा देगा, उन्हें इसका बदला दूसरी दुनिया में चुकाना होगा।” लेकिन जीना  तो औरत को इस दुनिया में है और आज मुस्लिम महिला अल्लाह से नहीं उच्चतम न्यायालय से न्याय मांग रही है।


मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड


आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यह भी कहता है कि  लंबी चलने वाली न्यायिक गतिविधि महिला के पक्ष में नहीं क्योंकि पुरुष उसे बदनाम करके उसके पुनः विवाह के रास्ते बंद कर सकता है। तलाक़शुदा होना ही अपने आप में एक शाप  की तरह माना  जाता है इस देश में; मौलवी तो बुर्का पहने हुए आंदोलनकारी महिलाओं को बदतरीन गालियाँ दे रहे हैं; इससे ज़्यादा क्या और बदनाम होंगी।  दूसरे यह सोचना महिलाओं का काम है कि  वे इस बदनामी से कैसे जूझे , मौलवीगण महिलाओं के चरित्र पर लगे दाग़ की चिंता न करें।

वे कहते हैं कि बहुविवाह और तीन तलाक़ एक बार में, मुसलमानों का  संस्कृतिक और सामाजिक मामला है और उच्चत्तम न्यायालय को इससे दूर रहना चाहिए। किसी भी समाज में होने वाले अन्याय में उच्चतम न्यायालय  नहीं तो और कौन बोलेगा? वे जो अभी तक अन्याय करते रहे हैं?  ज़्यादातर पुरुष दूसरी शादी करके पहली वाली को तलाक़ नहीं देते क्योंकि वे महर नहीं देना चाहते। इस तरह से वे दोनों शादियों का मज़ा ले सकते हैं , पहली वाली घर संभाले और दूसरी पति संभाले। वे यह भी कहते हैं कि बहुविवाह इसलिए महिला के फायदे में है क्योंकि इससे बहुत सारी  महिलाओं की शादी हो पाती है वरना वे कुवारीं रह जाएँगी।  शायद यह इतनी बुरी बात भी न हो क्योंकि बुरे रिश्ते से रिश्ते का न होना बेहतर है। और लड़की पढ़ी लिखी, आत्मनिर्भर हो तो शायद वह अपनी मन मर्ज़ी का साथी मिलने तक अकेली जीवन व्यतीत करना पसंद करे?

इस्लाम में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट है यह बात सही है लेकिन मौलवी कहते हैं इस कॉन्ट्रैक्ट में दोनों पार्टियाँ बराबर नहीं हैं।  यह सरासर संविधान के जो हर नागरिक को बराबर मानता है,  विरुद्ध बात है।  यहाँ पर यह सवाल पूछने की भी ज़रूरत है कि  आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  की वैद्यता क्या है ? क्यों  ज़रूरी है उच्चतम न्यालय के लिए इस बोर्ड की राय लेना।  यह मुद्दा महिलाओं का है, उन्हें ही इसे भोगना पड़ता है, वही इसके खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं, पीआईएल दाखिल कर रही हैं और  सड़क पर उतरी हैं। फिर भी यह कैसी पैतृक मानसिकता है जिसके तहत उस संस्था से राय मांगी जा रही है जिस पर उलेमा हावी हैं जो न कोई बदलाव चाहते हैं न कोई बदलाव लाने की सलाहियत रखते हैं। मज़े की बात यह है कि कुछ महिलाये भी जुट जाती हैं पुरुषों के इस एक तरफ़ा तलाक़ देने की तरफदारी करने।  यह वे हैं जो बातें तो बड़ी बड़ी करती हैं लेकिन ज़मीनी हकीकत से नावाकिफ हैं।  या हो सकता है की उनके सिरों पर पतियों  ने ‘तीन तलाक़’ की तलवार लटका रखी हो। जी हाँ अक्सर महिलाओं से बात करके यह मालूम हुआ कि उनके पतियों ने उन्हें धमकाया “आंदोलन किया, जलूस में गईं  तो तुम्हे तलाक़ दे देंगे। ”


मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ


सिर्फ इतना ही नहीं है कि  तलाक़ एकतरफा है. मुसलमान महिला इसको मानने के लिए बाध्य है, वह न इसे नकार सकती है और न ही इसे किसी कोर्ट में चुनौती दे सकती है। 22 इस्लामी देशों ने तीन तलाक़ को रद्द कर दिया है लेकिन भारत एक जनतांत्रिक देश है , जिसके  संविधान की   प्रस्तावना   में ही हर नागरिक को बराबर माना गया है , ये लागू नहीं। खैर जो  मामला अभी गरमाया है कुछ देर में उसमें उबाल भी आएगा ये प्राकृतिक नियम है। उस उबाल के लिए भी तैयारी रहनी चाहिए मुस्लिम समाज की. रिफॉर्म्स से कुछ हासिल नहीं होता क्योंकि उसे बग़ैर आम बहस के रद्द किया जा सकता है।  कानून के साथ ऐसा नहीं है और इसीलिए मांग कानून में बदलाव की होनी चाहिए।  और इसके लिए ज़रूरी है कि  यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा शुरू हो।  अमूमन यह मान लिया जाता है कि  यूनिफॉर्म सिविल कोड, मुसलमानो से उनके हक़ छीन लेगा और हिंदुओं को कुछ भी गवाना नहीं होगा. . आज जिस तरह से यूनिफार्म सिविल कोड को मुसलमानो को धमकाते हुए डंडे की तरह नचाया जा रहा है,, उससे इस बात पर विशवास भी होता है। लेकिन इसका जवाब इस चुनौती से भाग जाना तो नहीं है।  एक ड्राफ्ट क्यों नहीं लाती उदार वादी संस्थाए और पार्टियां,  जो सभी पर्सनल लॉ पर विचार करके सबमे बदलाव के सुझाव रखे और सबसे प्रगतिशील सूत्रों को चाहे वे  किसी भी धर्म के हों, इस यूनिफॉर्म सिविल कोड की ड्राफ्ट में शामिल करे।  कमसे कम एक लिखित सूचि तो सामने आएगी, जिसकी बुनियाद पर आगे बहस चलाई जा सकेगी।

जो शरीयत मुसलमानो के लिए अटल मानी जा रही है वह तो कुरआन और हदीस को मिलकर बनाया गया एक व्याख्या है ; ऐसी किसी और व्याख्या पर पाबन्दी भला कैसे लगाई जा सकती है ?आख़िरी  बात ये है कि अगर ये संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा है भी तो क्या बस इसीलिए इसे बदला नहीं जा सकता? क्या संस्कृति और सभ्यता अटल और जड़ होती है कि  उसे हिलाया नहीं जा सकता? इस्लाम की ही बात ली जाये तो इस धर्म के माध्यम से ही बहुत सरे बदलाव हुए, जिनमे प्रमुख है ‘तलाक़’ जो कबाइली सभ्यता में मौजूद तो था लेकिन जिसमे कोई विधिवद तरीका नहीं था।  तलाक़ को बाक़ायदा दस्तावेज़ी शक्ल इस्लाम ने दी उस समय की संस्कृति के खिलाफ जाकर।

मैं भारतीय मुसलमान स्त्री हूं : तलाक से आगे भी जहां है मेरी

आज ज़रूरत है कि धर्म और क़ानून को अलग-अलग किया जाये। आखिर डर किस बात का है मुसलमानो को और खास करके महिलाओं को? इस्लाम के पांच स्तंभों को यानि : शहादा [ अल्लाह और उनके आखरी पैग़म्बर पर विशवास] , सलात [नमाज़ ] , ज़कात[दान], सावेम [रोज़ा ] हज [तीर्थ] ये बदलाव कहीं भी चुनौती नहीं देते। जो कुछ छोटे-छोटे बदलाव की मांग मुस्लिम महिलाये कर रही है उनपर अगर उलेमा और सर्कार दोनों ग़ौर नहीं करते हैं तो बहुत संभव है कुछ दिन बाद मुस्लिम महिलाये एक गणतांत्रिक देश में अपने हक़ समझ कर पूरी बराबरी की मांग लेकर सड़क पर उत्तर आएं  और बराबरी पाकर ही छोड़े. उस वक़्त न ये मौलवी उन्हें रोक पाएंगे न ही वो महिलाये जो आज इन न्यायिक मांग करती हुई महिलाओं के खिलाफ ज़हर उगल रही हैं.

सौ के नोट दिखाते लंपट और परेशान महिलायें

आइये समझते हैं नोटबंदी को लेखिकाओं और महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर से:


सरकारें फैसला लेती हैं, स्थितियाँ बदलती हैं या सुधरती हैं, फैसला जनहित में कहलाता है लेकिन औरत की दुनिया इन सबसे कैसे प्रभावित हो सकती है या होती है, इस पर कम ही विचार किया जाता है.  औरत की दुनिया वैसे भी राजनीति की दुनिया से बड़े फासले पर स्थित है, दोनों में न्यूनतम संबंध है. आज मेरी कामवाली हंसी -हंसी में नए नोट पर कई व्यवहारिक टिप्पणियाँ कर रही थी. इन टिप्पणियों में छिपे कड़वे सच को हम जैसे वेतनभोगी, व्यापारी, सफेदपोश वास्तव में नहीं समझ सकते क्योंकि हमने बैंक जाकर कम से कम दस हज़ार रूपए का इंतजाम लाईन में लगकर या रसूख़ के बल पर कर लिया है, कुछ को शायद अन्य वजहों से जाने की भी जरूरत न पड़ी हो.


हम सब इस फैसले का राजनीतिक आकलन कर रहे हैं, लेकिन ग़रीब आदमी इस फैसले की कड़वी परिणितियों को झेल रहा है. मैं कल बैंक से पैसे लेकर आई थी और मैंने उसमें से दस, सौ-सौ के नोट अपनी कामवाली को दे दिए ताकि उसका ख़र्च चल सके. लेकिन छह-सात लोगों के परिवार में हज़ार रूपए कितने दिन चलेंगे? उसे भी शहर से ही आटा-नमक ख़रीदना है.



इस राजनीतिक फैसले का औरत के जीवन के लिए जो काला पक्ष हो सकता है, उसे उसके मुंह से सुनकर मैं दंग रह गई, सपने में भी नहीं सोचा था कि एक नतीजा यह भी हो सकता है, जिस पर कोई सरकार कभी ध्यान नहीं देगी ! उसने बताया कि दो-तीन दिन से उसके मुहल्ले में शाम को शराब पीकर लोग गाड़ियाँ लेकर खड़े होते हैं और आती जाती, बातचीत करती परेशान कामवालियों से पूछते हैं कि दो -तीन सौ खुले रूपए हम देंगे, कितना खुला चाहिए?
भले मानुष! इस घटना का मतलब समझने में आपको परेशानी तो नहीं हो रही या समझ नहीं रहे ?
सुधा सिंह ,प्रोफ़ेसर दिल्ली विश्वविद्यालय 


“शासन का घूँसा किसी बड़ी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बड़ी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूँसा पड़ जाता है .”
परसाई यूँ ही परसाई नहीं हैं!
संज्ञा उपाध्याय, लेखिका  और असिटेंट प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय 

बलिदान ,संयम और त्याग की बात वो कर रहे है जिनके पास डेबिट क्रेडिट और तमाम तरह के कार्ड है और जिनके बच्चे विदेश में बैठे है और जिनके पास महीने भर का राशन है.
अनिता भारती, लेखिका 


स्त्रियों का मजाक बनाने के बजाय सोच कर देखिये उन्होंने किस तरह खुद की ख्वाहिशों में कतरब्योंत करके , इतना दिमाग लगा कर ये पैसे बचाये होंगे. जरुरत पड़ने पर अपने पिटारे से हमें ही निकाल कर देती हैं ….ये उन्हें स्वाभिमान और सुरक्षा देता है ..उनकी मदद करें …आपके लिए होगा काला धन उनका ये इमोशनल धन है. आज के नवभारत टाइम्स के इस लेख में इसी धन की बात है.
अनीता मिश्रा, लेखिका महिलाओं के पास बचत के धन का मजाक उडाये जाने पर 

आजकल हमारे कुछ अम्बेडकरवादी सरकार के नोटबदली को बाबासाहेब की उस बात से जोड़ रहे है कि उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए हर दस साल में नोट बदलने चाहिए . क्या ये सही वक्त है याद दिलाने का? जब पूरा देश एक मुस्किल से गुजर रहा है. क्या बाबा साहेब ने ये भी कहा था कि यह सब अचानक कर देना चाहिए ?मुझे लगता है किस इस मुश्किल समय बाबासाहेब को कोट नहीं करना चाहिये हमारा बडबोलापन ही हमे ले डूबता है . हमे अपनी तकलीफों को और बढ़ाना नहीं चाहिए .हमे धैर्य से शान्ति से मुस्किल समय से गुजरना है, मजे ले ले कर मजाक न करे .
रजनी तिलक ,लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता

कोइ बुलेट ट्रेन में सफर कर रहा है तो कोई दिन भर बैंको में लाइन लगा कर .लेकिन सफर दोनों कर रहे है …कोई मौज में है तो कोई घर चलाने की जद्दोजेहद में
ताहिरा हसन, सामाजिक कार्यकर्ता