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देश के किसी नेता में न यह हैसियत है, न हिम्मत की वह तानाशाही लेकर आये: देवीप्रसाद त्रिपाठी



राज्यसभा सांसद और हिन्दी के विद्वान् देवीप्रासाद त्रिपाठी से संजीव चंदन और उत्पलकान्त अनीस की बातचीत  

मूलतः हमलोग समय को लेकर बात करेंगे. आपको अभी क्या लग रहा है? पिछले कुछ सालों से इस समय को आप किस रूप में देखते हैं? क्या हम उन्माद की तरफ जा रहे हैं? क्या क्षरण की ओर जा रहे हैं?
उन्माद दरअसल क्षरण का ही प्रतीक है. देश में हो क्या रहा है आज की परिस्थिति में- राजनीति का क्षरण, साहित्य का क्षरण,संस्कृति का क्षरण हो रहा है. मैं आपको जो बताने जा रहा हूँ, जिससे बहुत से लोग असहमत होते हैं कि राजनीति, साहित्य और संस्कृति का बहुत अन्योन्याश्रित संबंध है. पूरे भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधीजी हिंदी साहित्य के तमाम साहित्कारों से मिलते थे और उस समय के सारे नेताओं को देखिये, सब लिखते थे, पढ़ते थे, चिंतन करते थे. तो साहित्य, कला, संस्कृति के विकास में राजनीतिक चेतना की भूमिका महत्वपूर्ण है. राजनीति के विषय में एक समझदारी, साहित्य, कला, संस्कृति के क्षेत्र में भी. फिर क्या हुआ पिछले तीन दशकों में कि ये जो पारस्परिक संबंध थे, वह टूट गया है. बड़े साहित्यकार का सम्मान करना पड़ेगा चाहे कोई राजनेता हो.

ये तीन दशक का मतलब आप 1990 के बाद चिन्हित कर रहे हैं…
उससे पहले से भी होता रहा है.

वैसे यह 1990 के बाद का दौर किसी दूसरे सकारात्मक कारणों से भी जाना जाता है और वह  है दलितों और पिछड़ों के भागीदारी को लेकर, साहित्य से लेकर राजनीति तक में – शिल्प बदला, कथ्य बदला, साहित्य बदला और राजनीति के कथन बदल गये हैं, यह एक सकारात्मक पक्ष भी रहा है.
यह एकदम सकारात्मक पक्ष है कि दलित, पिछड़ों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों इन सबकी भूमिका साहित्य, कला, संस्कृति और राजनीति में होना बहुत आवश्यक है-देश की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक है. यह सकारात्मक बात हुई, लेकिन सकरात्मक बात के बावजूद जो संगति राजनीति और संस्कृति, साहित्य में होनी चाहिए वह संगति अव्यवस्थित हो गई है.

मैं समझना ये चाह रहा था कि वह हुआ कैसे? इसका एक पक्ष और कथ्य ऐसे होगा न कि तीस साल पहले जो समाज था वहां साहित्य और राजनीति का परस्पर संबंध भी था. अब यहां जब पीछे छूट गये लोगों की बारी आई है, चेहरे बदल गये हैं, दोनों तरफ साहित्य और राजनीति में- तो क्या रूचियां इनकी घट गई हैं? एक तो यह है और दूसरा कि क्या वे इस योग्यता के साथ नहीं आये, उस सांस्कृतिक समझ के साथ नहीं हैं? 

लेकिन बुनियादी कमी तो राजनीतिक क्षेत्र की है. राजनीतिक नेताओं में सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक रुचि के अभाव ने इस तालमेल में गड़बड़ी पैदा किया. 


अभी तो उन्माद की स्थिति पूरे देश में है लेकिन यह एक तरह से हिंदी प्रदेशों में सांस्कृतिक हलचलों के कम होने का प्रत्युदपाद देख रहे हैं कि 1990 के बाद यही प्रदेश है जो सक्रिय प्रदेश हो गया– दक्षिणपंथी उभार के लिए, भाजपा के उभार के लिये, सांप्रदायिक ताकतों के उभार के लिए.
देखिये, प्रमुख कारण इसका यह है कि सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधि कम हुई है. सांस्कृतिक चेतना का पूरी तरह से अभाव हो गया है. हिंदी सांस्कृतिक चेतना की अगर बात करें तो वह  एकदम अनुपस्थित है. मैं जोर देकर कहना चाहूँगा कि हिंदी सांस्कृतिक चेतना, हिंदी से अनुपस्थित है. उसका कारण है कि समाज में नकारात्मक विचार उभरे हैं, और यह आपकी पहचान, आपकी वैचारिक रूझान, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र इन सभी विषयों पर निर्भर करता है.

उस सांस्कृतिक चेतना को आप कहाँ देख रहे है? कौन सी सांस्कृतिक चेतना, एक सांस्कृतिक चेतना जो लोहिया की है, एक सांस्कृतिक चेतना जो राम की है. एक तीसरी भी बात हो रही है कि राम के पूरे मिथकीय चरित्र को सवालों के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, एक स्त्री के हिसाब से, दलित के हिसाब से, आदिवासियों के तरफ से….
लोहिया तो रामायण मेला का भी आयोजन करते थे, लोहिया ने तो राम और कृष्ण के ऊपर लेख भी लिखा है.  यही तो एक सांस्कृतिक समझ थी समग्रता की.

आप कहां खड़े हैं? लोहिया वाले राम या हमारी जो राम की व्याख्या है- स्त्री दृष्टि से या दलित दृष्टि से, हम जो शम्बूक की दृष्टि से देखते है राम को, सीता के उत्पीड़न के दृष्टि से. यह भी तो एक सांस्कृतिक चेतना है और यह भी हिंदी पट्टी की आवाज है, जैसे महिषासुर का मामला संसद में गूंजा और यही हिंदी पट्टी आज महिषासुर की शहादत दिवस मना रहा है. 
ऐसा है कि सारे प्रश्न सही नहीं है. एक होता है नकारात्मक विचार. अब महिषासुर की जयन्ती मनाना एक नकारात्मक विचार है. क्योंकि कई पुस्तकें हिन्दुओं ने अपनी शास्त्रों की पढी नहीं. जरा दुर्गा सप्तशती पढ़िए आप. उसमें क्या होता है, जब राक्षस संग्राम करने जाता है दुर्गा से तो दुर्गा के सौन्दर्य का वर्णन करता है. उससे कहता है कि मुझसे विवाह करो. तो दुर्गा कहती है कि हां, लेकिन एक शर्त है कि तुम मुझे युद्ध में हरा दो. ये तो एक विनियोजित यथार्थ है. हिन्दुओं ने ज्यादातर शास्त्रों को पढ़ा ही नहीं तो दिक्कत यही है. तमाम मूर्खता, दुर्लभ मूर्खता की बाते आपको यहीं मिलेगी? मेरा ख्याल है कि समाज सुधार करने के लिए राम और सीता को गाली देने की जरूरत नहीं है. लोहिया यह काम नहीं करते थे, लोहिया को पढ़िए आप. लोहिया भारतीय राजनीति के एक तरह से अकेले मौलिक चिंतक हैं, जो भारतीय संस्कृति की, सभ्यता की मूल धारणाओं को समझने की कोशिश करते है- वे निडर होकर बात करते हैं और डरते नहीं हैं.

लेकिन जिन-जिन समूहों को लगता है कि राम हमारी कथा नहीं है या जो-जो समूह महिषासुर से अपने आप को जोड़ते है, रावन के साथ जोड़ते हैं, सूर्पनखा के साथ जुड़ते है, अपनी व्याख्यायें लेकर आ रहे हैं- मिथकीय कथाओं का, उनको कैसे रोका जा सकता है! यह उनका हक़ है , और यही आप नकारते हैं. फिर तो आप कहीं न कहीं संस्कृति के होमोजेनाइजड तर्क के साथ, स्मृति ईरानी के चिखने के साथ खड़े हो जाते हैं. यही कारण था कि कोई भी नहीं खडा हुआ स्मृति ईरानी के विरोध में, जब वे संसद में ‘दुर्गा प्रकरण’ पर चीख रही थीं, सीताराम येचुरी को छोड़कर- जिन्होंने महाबली की बात की. येचुरी ने कहा कि आपका बामन आपका अवतार हो सकता है लेकिन बहुत से लोग महाबली से जुड़े हुए हैं.  तो मसला यही है कि आपकी पूरी सांस्कृतिक चेतना हिन्दू सांस्कृतिक चेतना है.
देखिये इन मसलों को कहना कतई जरूरी नहीं है, जो सीताराम येचुरी ने संसद में कही है वो कोई बड़ी बात है, ऐसा मैं नहीं मानता. ये आलोचना की रचनात्मक पृष्ठभूमि से अलग बात होती है. राम की आलोचना बहुतों ने की है. पेरियार पर किसी ने प्रश्न उठाया? उन्होंने राम की आलोचना की, इसी देश में खूब की, उस समय में की, जब बहुत मुश्किल समय था. अब राम की इस तरह की आलोचना का कोई अर्थ नहीं है. यह मानना कि भारत में जो सांस्कृतिक और सभ्यता की चेतना है वह  हिन्दू चेतना है, गलत है.  जाहिर है कि तमाम नास्तिक लोग भी रह रहे हैं, जिसने लिखा है, सबकुछ लिखा है तो किसी हिन्दू ने उनके खिलाफ तो कुछ नहीं बोला. अब हिन्दू सांस्कृतिक चेतना में भी नकारात्मक और उग्रवादी तत्व प्रखर हो रहे है, जो सही नहीं है, सर्वथा अनुचित है. मैं मानता हूँ कि लोहिया की दृष्टि से देखने की जरूरत है, नरेन्द्र देव की दृष्टि से देखते, जवाहरलाल की दृष्टि से देखते तो शायद ऐसा नहीं हो सकता. क्योंकि वे समावेशी चेतना की बात करते हैं, जहां आपने एकदम विरोधाभाषी चेतना की बात की वहां बिखराव, संघर्ष और आपसी मतभेद की शुरूआत होती है जो नहीं करना चाहिए.

लेकिन आपके यहां,  महाराष्ट्र में, वहां की जो दलित चेतना है इन मिथकों से टकराती है..
वे अपने मिथक को ठीक ढंग से समझते नहीं हैं. पूरे हिंदुस्तान का आप भक्ति आन्दोलन देख लीजिये. भक्ति आन्दोलन में अगर तुलसीदास और मीरा को छोड़ दें, वैसे मीरा तो महिला थी , उसको तो पिछड़ा मानना चाहिए- अगर तुलसीदास को छोड़ दें तो उसमें उच्च जातियों का कोई संत या कवि नहीं है या तो पिछड़े जातियों के हैं या दलित हैं. पूरा भक्ति आन्दोलन, जो आधुनिक भारत की भाषा, सांस्कृति, सभ्यता का जो निर्माण करता है तो उस आन्दोलन में देखिये कि कौन से लोग हैं और कौन से लोग नहीं हैं. उस आन्दोलन में सब हो गया, पूरे समाज ने उसे स्वीकार कर लिया, अब आप कह रहे है कि हम इस समाज को नहीं सुधार सकते है तो आप एकता की नहीं विभाजन की बात कर रहे हैं. यह जो विभाजन की भाषा है, बिखराव की भाषा है, बांटने की भाषा है,  वह जोड़ने का काम नहीं कर सकती और देश में, संस्कृति में, साहित्य में आज जोड़ने की जरूरत है.

तो अब हम ऐसे समझें कि 1990 के बाद या तीन दशकों के बाद ये सब जो स्वर आये हैं, इन स्वरों को आने को आप जातिवादी होने के रूप में चिन्हित कर रहे है. जाति के सवाल उठेंगे- जहां जाति की सवाल उठती है, वहां आप बात करने लगते हैं विभाजन की, तो आपकी दृष्टि और वह भी भाजपा वाली समरसता की दृष्टि में क्या फर्क है?
पहली बात तो यह है कि दलित प्रश्न को तो उठना ही है, आवश्यक है.

तो वह क्या जातिवाद है?
नहीं मेरी दृष्टि से वह जातिवाद नहीं है. एक वर्ग और समुदाय की आकांक्षाओं का प्रतिफलन है. महिलाओं का प्रश्न है, युवाओं का प्रश्न है. ये सारे प्रश्न अनिवार्य हैं. और आज के भारतवर्ष में किसानों का प्रश्न ये भी बड़ा महत्वपूर्ण है. किसान तो जातियों से ऊपर हैं, जाति की तो बात ही नहीं है वहां पर. तो दलित, युवा, महिला और किसान ये मिलकर आज का भारतवर्ष बनते हैं , और उनकी चेतना के बिना न राजनीति न संस्कृति सही रास्ते पर जा सकती है.

अभी आप राजनीति की क्या दशा और दिशा देखते है? अभी क्या लगता है कि किस तरफ हमलोग जा रहे हैं? क्या हम डिक्टेटरशीप देखने वाले हैं? 
नहीं, बड़े से बड़े नेता की या प्रधानमंत्री की न हिम्मत है न हैसियत है कि वह तानाशाही की  तरफ जाये. देश में लोकतांत्रिक परिपाटी की कुछ ऐसी व्यवस्था है कि यह संभव नहीं है. एक और सकारात्मक बात भारतीय राजनीति में हो रही है, जिसका जिक्र कोई नहीं करता कि नया नेतृत्व पैदा हो रहा है, हर पार्टी में, कहीं नीतीश कुमार है, कहीं शिवराज सिंह चौहान हैं तो कहीं सुदूर त्रिपुरा में माणिक सरकार.

ये सब नेतृत्व तो पिछले 20-30 सालों का नेतृत्व है…
आप समझ नहीं रहे हैं. ये सब नया रास्ता दिखा रहे हैं. ये नेतृत्व ऐसा है कि किसी को तीन बार, दो बार, चार बार जनता का समर्थन मिला है- सबको. यह देखना महत्वपूर्ण है. जिसको हमलोग देख नहीं रहे हैं. मायावती तीन बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं- दलित महिला मुख्यमंत्री भारत के सबसे बड़े प्रदेश में, ये कल्पना की थी किसी ने? दलित भी हैं और महिला भी हैं. कोई कल्पना करता था तीन दशक पहले कि ये नेता होंगे इस देश में. आज आप देखिये कि हर क्षेत्र में नया नेतृत्व आया है.

लेकिन इसमें मायावती को छोड़ दें तो बाकी सभी का राजनीतिक कथन एक ही है और वह है विकास.  राजनीतिक कथन आज के केंद्र के सत्ताधारियों का भी वही है, बल्कि उनका दायरा काफी बड़ा है, विस्तृत है.
विकास के अलग अलग तरीके हैं. सब नया- नया नेतृत्व उभरा है. कुछ आन्दोलन से, कुछ अलग-अलग तरीके से उभरा है. इस नए नेतृत्व की  ब्याख्या जब तक आप नहीं करेंगे, विश्लेषण नहीं करेंगे तब तक भारत की राजनीति में जो नया आयाम उभरा है, उसे नहीं समझ सकते .
उसको किस खास तरीके से देख रहे हैं? अंततः राष्ट्रीय क्षितिज पर तो कोई परिवर्तन तो होता नहीं. क्षत्रप के तौर पर हर जगह है.
यही तो परिवर्तन कहेंगे. एक परिवर्तन तो भारत की राजनीति में हो गया न. एकवचन समाप्त हो गया, बहुवचन आया. आज केंद्र में भाजपा बहुमत लाने के बावजूद अन्य पार्टियों के सहयोग से सरकार चला रही है, आगे भी चलाना पड़ेगा.

आगे भी आप यही संभावना देख रहे हैं? क्षत्रपों के गठबंधन से सरकार बनेगा?
गठबंधन का मतलब क्षत्रप नहीं होता है. दुनिया के लोकतंत्र में जो देश हैं, उनमें ज्यादातर देशों में गठबंधन सरकारें चल रही है और अच्छे तरीके से चल रही है. ऐसा नहीं है कि आर्थिक विकास, सामाजिक विकास नहीं हो रहा है, हो रहा है.

राजनीति विकल्प नहीं दिखाई देता है. 1990 के बाद एक ही परिघटना है,  वह है मनमोहन सिंह, उसी का विस्तार है नरेंद्र मोदी सरकार. ये जो आप नाम ले रहे हैं,  उनके यहां क्या वैकल्पिक दशा और दिशा देख रहे है?
आप देखिये समय आ रहा है. जनता का संकल्प, विकल्प तलाश लेता है और आप आनेवाले दिनों में इसे देखेंगे.

शरद पवार की राजनीति को आप कैसे देखते हैं?
वे देश के बहुत बड़े और अनुभवी नेता हैं, पार्टी उनकी छोटी है- सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही है उनके सामने और पार्टी मूलतः महाराष्ट्र में केन्द्रित है.

तो क्या उनके यहाँ संभावना नहीं दिखती है, शरद पवार के राजनीतिक चातुर्य के साथ बहुत दिनों के सरकार का उनका अनुभव..वह तो है, एक, कोई भी सरकार में प्रधानमंत्री रहे उसको शरद पवार साहब से सलाह लेनी पड़ती है. लेकिन शरद पवार स्वयं प्रधानमंत्री बनें इसकी संभावना कम दिखाई पड़ती है.एक आरोप लगता है शरद पवार पर यह कि उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति को चीनी मिल और कोआपरेटिव सेक्टर के बीच सीमित रखके और कम करके भ्रष्ट किया है, भ्रष्टों का नेतृत्व के आरोप भी लगते रहे हैं ....
यह एकदम गलत बात है, आधारहीन है. इस तरह का काम शरद पवार ने नहीं किया है. शरद पवार को इस बात के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने प्रदेश को विकसित किया है. अगर आप बारामती चले जाइये, जो पहले उनका क्षेत्र था, अब सुप्रिया सुले का क्षेत्र है, तो आपको पता लग जायेगा कि विकास क्या है. अमेठी, रायबरेली ये तमाम क्षेत्र है प्रधानमंत्रीयों के इस देश में. लेकिन फर्क बारामती में जाकर देख लीजिये पता चल जायेगा. उनहोंने जनता के उद्यम और अध्यवसाय पर आधारित आर्थिक सामाजिक विकास किया है. इसलिए मैं आपसे चाहूंगा कि शरद पवार पर इस तरह की आधारहीन बात करने की  बजाय ज़रा बारामती जाकर आप देख लीजिये, जनता से पूछ लीजिये.

मोदी की सरकार से ज्यादा आर.एस.एस. की सरकार ने दो ढाई सालों में समाज में एक हलचल पैदा किया है, हर जगह पर- वह चाहे शिक्षा हो, या सामाजिक या लेखन का क्षेत्र हो, एक बेचैनी पैदा कर दी. अपने एजेंडे पर वह सफल रही. क्या लगता है आपको कि इन सारी चुनौतियों से निकलकर 2019 में मोदी का विकल्प तैयार हो सकेगा?
विकल्प तो जनता तलाशेगी. जनता को जागृत करना राजनीतिक दलों का कर्त्तव्य है- खासकर जो लोकतांत्रिक जनतांत्रिक राजनीति दल हैं, उनको चाहिए कि वे जनता के बीच जाकर मोदी सरकार की विफलताओं के बारे में बात करें. जहां तक आर.एस.एस. और मोदी सरकार की हिंदुत्व राजनीति की सफलता की बात है,  तो वह सफल नहीं हो पाया और न सफल हो पायेगा. सारी कोशिश वे कर रहे हैं – घर वापसी से लेकर लव-जिहाद, क्या क्या नहीं उठा रहे हैं – लेकिन कहीं सफलता मिली क्या – नहीं मिली..

लेकिन हमें सफलता दिख रही है. हैदराबाद में अप्पा राव बने हुए हैं, एफटीआईआई में चौहान बने हुए हैं, यूपी में मटन, बीफ में बदला जा रहा है. उनहोंने हलचल और बेचैनी पैदा कर दी और वे अपने एजेंडे पर कायम हैं. लोग विरोध कर थक और हार जा रहे हैं.
नहीं, हलचल कौन सी पैदा की- खाने के सवाल पर, विभिन्न साम्प्रदायिक सवालों पर.  तमाम अयोग्य लोगों को सिर्फ विचारधारा के स्तर पर तमाम संस्थाओं में नियुक्त करना. ये इन्होंने एक फैसला किया, लेकिन उस फैसला के बावजूद, लागू करने के बावजूद क्या समाज ने उसे स्वीकार किया. जो एफटीआईआई के मुद्दे पर विरोध हुआ उसकी कल्पना करिए आप. पूरे देश में रोहित वेमुला के प्रश्न पर कितना विरोध हुआ. जेएनयू के मुद्दे पर कितना विरोध हुआ देशभर में. ऐसा नहीं है. एक जो आम स्वीकृति हो उनके विचारधारा की, उनकी गतिविधियों की, कार्यकलापों की, नहीं हो रही है समाज में.

वामपंथी राजनीति से शुरूआत करके आप यहां आ गये. यानि आपको मोहभंग हो गया होगा? इस राजनीति की कितनी सफलता आप देख रहे हैं? एक लम्बा दौर हो गया आपको वामपंथियों से अलग हुए?
वामपंथियों से मैं अलग नहीं हूं. लेकिन मूलतः मैं वामपंथी हूं. मैं मानता हूं कि भारत के विकास के लिए वामपंथी विचारधारा आवश्यक है. लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि जब देश को वामपंथ की सबसे ज्यादा आवश्यकता है, तब वामपंथ निरंतर कमजोर हो रहा है.जिसमें उनके नेतृत्व की गलतियां है, उनकी राजनीतिक सोच और समझ की गलतियां हैं. उसके लिए वो जिम्मेदार हैं,  और कोई जिम्मेदार नहीं है. यूपीए सरकार से भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर समर्थन वापस लेकर सीपीएम ने अपना काम तमाम कर लिया 61 से 26 पर पहुंच गई. बंगाल में तीसरे नंबर पर पहुंच गई, जहां माना जाता था कि वामपंथ का कितना बड़ा आधार है. आज केरल में सरकार जरूर बन गई है लेकिन आगे देखिएगा क्या होता है..

अलग होने का कोई व्यक्तिगत कारण था?
कोई व्यक्तिगत कारण नहीं था. मेरा मतभेद था, लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर जेएनयू के दिनों से ही. खासकर मैं जब यूरोप गया, सोवियत यूनियन गया तो वहां कुछ क्षेत्रों में कम्युनिस्ट सरकारों को देखा तो लगा कि कहीं न कहीं कोई गड़बड़ है, दुनिया के कम्युनिस्टों में.

आप जब अपनी आत्मसमीक्षा से भी देखते होंगे खुद के प्रसंग में कि आपकी स्वीकार्यता खेमों से अलग है अर्थात सभी खेमों में है, ये कैसे संभव है?
संभव इसलिए है कि मैं लोकतंत्र में किसी को शत्रु नहीं मानता हूं और संवाद की निरंतरता और अनिवार्यता पर विश्वास करता हूं. अगर आप बात नहीं करेंगे लोगों से तो किस तरह से उनको एक सही विचार के तरफ लायेंगे. मैं चाहे सरकार हो, चाहे विपक्ष हो सबसे बात करता हूं. नरेंद्र मोदी से भी मैं बात करूंगा और सीताराम येचुरी से भी.

साहित्यिक हलकों की भी मैं बात कर रहा हूं, यहां भी आपकी सर्वस्वीकारता है…
मैं सबसे बात करता हूं. देखिये संवाद की निरंतरता और अनिवार्यता हर क्षेत्र की आवश्यकता है. शिक्षा, संस्कृति, कला और साहित्य, राजनीति, विज्ञान और कोई भी क्षेत्र हो- सबमें संवाद की आवश्यकता है.

क्या हम इसको ऐसे कह सकते है कि आप अजातशत्रु देवी प्रसाद त्रिपाठी रहे हैं?
वो तो मैं नहीं कह सकता हूं कि मैं क्या हूं, शत्रु तो गाहे-बगाहे मिलते रहते है. हमारे समाज में शत्रुभाव ज्यादा है, मित्रभाव कम है, जो दुर्भाग्य की बात है, हिंदी प्रदेशों में तो और भी. किसी से नकारात्मक व्यवहार रखने की जरूरत नहीं है, सोच भी रखने की जरूरत नहीं है. सबसे प्रसन्न रहिये, आपका काम भी अच्छा होगा और जीवन प्रसन्न भी रहेगा.



साभार : लहक 

समाज, संसाधन और संविधान बचाने के लिए एकजुट हों – मेधा पाटकर


जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) का तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ आरंभ

एनएपीएम के  ​11 वां द्विवार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन का आगाज सांस्कृतिक तरीके से 20 राज्यों के जनप्रतिनिधि और आन्दोलन के साथियों के बीच हुआ. बिहार से रमेश पंकज, महेंद्र यादव ने सम्मेलन ​की भूमिका बांधते हुए सबका स्वागत किया और बिहार में हो रहे अन्याय और दमन को पूरे देश के मुद्दों के साथ साझा किया, जिसमें जमीन से लेकर नदियो, मजदूर, किसान, मछुआरे सभी के मुद्दे अहम् है ऐसा बताया. समाज संसाधन और संविधान पर चौतरफा हमले हो रहे हैं. इस हमले के खिलाफ कश्मीर से कन्याकुमारी तक और उत्तर पूर्व से गुजरात तक के लोगों और जन आन्दोलनों को एक साथ आना होगा. अगर हम आज इकट्ठे हो कर आगे नहीं आयें तो संविधानिक मूल्यों को बचाना मुश्किल होगा. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने यह बात शुक्रवार को जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के मौके पर कहीं.

मेधा पाटकर ने जल, जंगल और ज़मीन के लिए आन्दोलन कर रहे साथियों से कहा कि हमें सिर्फ ज़मीन ही नहीं, ज़मीर भी बचाना है. आत्मसम्मान कि हिफाजत करनी है | उन्होंने जन आन्दोलनों को वक़्त की जरुरत बताया. मेधा ने कहा कि हमें चुनावी राजनीती से अलग और आगे जा कर सोचना और काम करना होगा. उन्होंने अलग अलग आन्दोलनों को याद करते हुए कहा कि हमें भी आन्दोलन के तौर तरीकों पर गौर करना होगा और नयी सोच के साथ युवाओं को जोड़ते हुए आगे बढ़ना होगा.

​​उद्घाटन सत्र को देश भर के अलग अलग जन आन्दोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया.

असहमत विचारों को चुप करने की कोशिश : उमर खालिद
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जे.एन.यू) के छात्र आन्दोलन के प्रतिनिधि उमर खालिद ने अपनी बात की शुरुआत बिहार में दलितों के नरसंहार पर आये हाल के फैसलों से की. उनका कहना था कि कितने ताज्जुब की बात है कि दलित मारे गए और किसी को सजा नहीं हुई. आंखिर कैसे? मगर जन आन्दोलनों का ही दवाब था क आज रणवीर सेना कहीं नहीं है. उमर ने कहा कि हमारा आन्दोलन छात्रों तक सीमित नहीं है. हमारे आन्दोलन का जुड़ाव समाज में चल रहे दूसरे जन आन्दोलनों के साथ भी है. उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर की सरकार राज्य की ताकत का इस्तेमाल कर असहमत विचारों को चुप कराने के लिए कर रही है. नजीब के लापता होने के बाद जे.एन.यू में एक ख़ास समुदाय के विद्यार्थियों में दहशत का माहौल है. उन्हें डराया और धमकाया जा रहा है.

​​हमारी लड़ाई जाति व्यवस्था को ख़त्म करने की है : डोंथा प्रशांत
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के रोहित वेमुला के साथी और अम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के प्रतिनिधि डोंथा प्रशांत ने कैंपस में दलित विद्यार्थियों के साथ होने वाले भेदभाव के बारे में विस्तार से बात की. उन्होंने अम्बेडकर को याद करते हुए कहा कि हमने कैंपस में आत्मसम्मान के आन्दोलन की शुरुआत की. जब हमने देश के अलग अलग हिस्सों में दलितों, अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले के खिलाफ आवाज़ उठाई तो हमारी आवाज़ को कुचलने कि हर मुमकिन कोशिश की गयी. हमारे विचार डा अम्बेडकर के विचार हैं. आज इसी विचार को कैम्पस में खतरनाक और राष्ट्र के खिलाफ माना जा रहा है. रोहित की मौत संस्थानिक हत्या का एक जीता जागता उदाहरण है. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का माहौल हमारे लिए जेल के माहौल से भी बदतर है. हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि जाति ख़त्म करने की लड़ाई लड़ी जाए. यही डॉक्टर आंबेडकर का ख्वाब था और रोहित का सपना भी. हमारे लिए जाति ख़त्म करने का मतलब भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य का अधिकार और लैंगिक समानता भी है.

जानवरों की तरह जी रहें हैं बस्तर के आदिवासी : सुनीता
बस्तर की सुनीता ने बेगुनाह आदिवासियों पर हो रहे ज़ुल्म की दास्तान सुनाई. उसने बताया कि किस तरह आम आदिवासियों को पुलिस पकड़ कर ले जाती है और उसे नक्सली बता कर मार देती है. महिलाओं के साथ यौन हिंसा की जा रही है. आदिवासी जंगलों में जानवरों कि तरह डर और छिप कर रह रहे हैं.

​​ट्रांसजेंडर को भी मिले संवैधानिक हक: ग्रेस बानो
तामिलनाडू से आई ग्रेस बानो देश की पहली दलित ट्रांसजेंडर इंजिनियर हैं. उन्होंने कहा कि ट्रांसजेंडर भी इंसान हैं और संविधान ने उन्हें भी बाकी लोगों जैसा सामान अधिकार दिया है. लेकिन हमें वे अधिकार नहीं मिल रहे हैं. ट्रांसजेंडर के लिए जो नया कानून बनाने की कोशिश हो रही है उसमें कई खामियां हैं इसलिए हमारी मांग है कि इसे बनाने में हमारी भागेदारी भी होनी चाहिए. उन्होंने सम्मेलन में मौजूद लोगों से ट्रांसजेंडर के प्रति होने वाले भेदभाव पर चुप्पी तोड़ने की अपील की. ग्रेस का कहना था कि मौन भी एक हिंसा है.

​​नफरत की राजनीती के खिलाफ सतत प्रयास जरूरी : आशीष
बिहार में काम कर रहे जन जागरण शक्ति संगठन के आशीष ने कहा की विधानसभा चुनाव के दौरान बिहार की ज़मीन पर नफरत के बीज बोने की खूब कोशिश की गयी. मगर जनआन्दोलनों से जुड़े लोगों ने इस नफरत की राजनीती के खिलाफ गाँव गाँव अभियान चलाया. इसका नतीजा हमें चुनाव में देखने को मिला और नफरत फैलाने वाली ताकतें परास्त हुई. यह ताकतें चुनाव में भले हारी हों लेकिन वे आज भी सक्रिय हैं और जनता को बांटने में लगी हैं. हम जब तक इकट्ठे इन शक्तियों के खिआफ सतत अभियान नहीं चलाएंगे तब तक इन्हें असली पराजय नहीं मिलेगी.

राष्ट्रीय सेवा दल के सुरेश खेरनार ने कश्मीर के मौजूदा हालात की विस्तार से चर्चा की.
उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों की समस्या के लिए हम सब को आगे आना होगा. उनकी आवाज सुननी होगी. उन्हे अपना राह चुनने की आजादी मिलनी चाहिए. उन्होंने 23 मार्च को कश्मीर चलने का आह्वाहन किया. इनके अलावा उड़ीसा के लिंगराज भाई ने मलकानगिरी, वेणुगोपाल ने केरल में, समर बागची ने बंगाल में चल रहे संघर्ष के बारे में बताया.

तीन दिनों का यह सम्मेलन पटना के ऐतिहासिक अंजुमन इस्लामिया हॉल में 2 दिसम्बर को शुरू हुआ. इस सम्मेलन में 20 राज्यों के 200 से ज्यादा जन आन्दोलनों से जुड़े संगठनो के लगभग 1000 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं| सम्मेलन “अस्मिता अस्तित्व और जन आन्दोलन” पर केन्द्रित है | सम्मेलन में 5 अलग-अलग सत्रों में अलग अलग मुद्दों पर गहन चर्चा हुई|

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें – 
महेंद्र यादव 9973936658​, आशीष 9973363664, हिमशी 9867348307

फेसबुक की खिड़की से झांकती ललनायें/असूर्यमपश्यायें

निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

सोशल मीडिया ने एक स्पेस दिया है, पब्लिक स्फीअर का एक प्लेटफ़ॉर्म बनाया है, जहां वंचितों ने अपनी दावेदारी ठोक दी है, किसी निर्णायक, संपादक या पितृसत्ताक या ब्राहमणवादी-सामन्तवादी लठैत की दखल को धत्ता जताते हुए. एक वातायन है सोशल मीडिया, फेसबुक उस वातायान के एक रूप, जिसने स्त्रियों को अभिव्यक्ति की आजादी है, पारम्परिक संस्थाओं और मूल्यों की चूलें हिलने लगी हैं. सबलोग के दिसंबर अंक में  स्त्रीकाल कालम के लिए इसी नई फिजां पर कवयित्री, पत्रकार और स्त्रीकाल के संपादन मंडल की सदस्य निवेदिता का लेख. 

अभिव्यक्ति विद्रोह का पहला क्षण हैं . यह बात सबसे ज्यादा इस दौर में समझ में आती है . यह नया दौर जनसंचार का दौर है. जिसने दुनिया को एक सिरे में बांध दिया. हमारे बीच आभासी दुनिया का ऐसा विस्तार हुआ कि समाज की नींव दरकने लगी. फेसबुक एक चारागाह बना जिसने दुनिया के तमाम नस्लों को चरने के लिए जमीन दी. यहां तक तो सब ठीक था पर जैसे ही इस जमीन पर स्त्री ने चरना शुरु किया पृथ्वी हिल गयी. ये एक ऐसा विस्फोट था जिसने समाजिक,पारवारिक ताना-बाना तहस नहस कर दिया. पुरुषों की बनायी दुनिया बिखरने लगी. फेसबुक ईजाद करने वाले मार्क जुकर बर्ग   को भी पता नहीं था कि उनके इस अविष्कार से दुनिया की छवि बदल जायेगी. इस आभासी दुनिया ने हमारे जीवन से बहुत कुछ छीन लिया पर जो उसने दिया वह स्त्री की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बना. उसके लिए निर्धारित आदर्श वाक्य है-‘मैं चुप रहूंगी‘ क्योंकि ज्ञान पर पुरुषों का अधिकार था. वह उसका रचयिता था. ज्ञान कौन रच रहा है और कब वह रचा जा रहा है,इस से ज्ञान का स्वरुप तय होता है. यह बात अब स्त्रियों को समझ में आ रही है. वे जान रही हैं कि कैसे वर्चस्वकारी समूह असमान और अन्यायी सामाजिक संबंध बनाते हैं और उसे बरकरार रखते हैं.

ऐसा नहीं है कि इस माध्यम ने स्त्री को मुक्त कर दिया. या ये माध्यम स्त्री के प्रति ज्यादा संवेदनशील है. जन संचार का सबसे ज्यादा उपयोग स्त्री को बस्तु में बदलने के लिए किया जा रहा है. पर यह इस माध्यम की मजबूरी है कि वह नहीं चाहते हुए भी अभिव्यक्ती की आजादी देता है. उसकी पहुंच घरों की चारदीवारी के भीतर भी है और बाजार में भी है. ऐसा नहीं है कि फेसबुक आने के पहले स्त्री रच नहीं रही थी. लोहा नहीं ले रही थी. समाज से लड़-भिड़ नहीं रही थी. पर इस माध्यम ने उसे व्यक्तिगत आजादी का स्वाद चखाया. वह खुद को खोल रही है, प्रेम गली में विचर रही है, वह लड़ रही है, भिड़ रही है. वह कविता लिखती है,कहांनियां कहती है, मजे लेती है और पोल खोलती है. सारे गोपन कक्ष धाराशायी हो रहे हैं. जब वह फेसबुक वाॅल पर अपनी माहवारी के बारे में लिखती है. जब वह कहती हंै कि  अपने लिए सेनेटरी नैपकीन खरीदने गयी तो दुकानदार उसे काले पोलीथीन में लपेट कर दे रहा था. उसने कहा कि इसे लपेटे नहीं. और वह सेनेटरी नैपकीन को बिना रैप किये सड़क पर निकल गयी. जब वह यह बयां कर रही है तो समाज के बनाये नियमों के विरुद्ध खड़ी होने का साहस कर रही है. वह अपने वाल पर प्रेम का इजहार कर रही है या प्रेम के गोपन कक्षों का भेद खोल रही है. जिस पुरुष समाज ने उसे देह के आगे जाना नहीं, जिसने कभी पुछा नहीं की स्त्री क्या चाहती है .  जिसने ये कहा कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग देवता भी नहीं जानते, उसी स्त्री ने पूरी परिभाषा बदल दी. अब खुलकर  उसने कहना शुरु किया कि पुरुष का चरित्र और स्त्री का भाग वह जानती है. अब पुरुष उसके लिए ज्ञान का केन्द्रीय विषय नहीं रहा. वह बाकी संसार को भी जानना चाहती है, और फेसबुक को अपनी ताकत की अजमाईश का मैदान बनाना चाहती है. अपने वाल पर उसके द्वारा लगाये गये सामग्री पर कितने लाईक किये गये वह भी उसकी अपनी मजबूत उपस्थिती का एक स्त्रोत है.


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सामान्य स्त्री के संसार की खबर ये है कि उसमें स्वाधीनता के लिए तड़प है और वह परंपरा के घेरे से बाहर निकलना चाहती है. फेसबुक ने उसके निजी घेरे को तोड दिया. निजी और वैयक्तिगत के भीतर सामाजिक और सार्वजनिक समाया हुआ है. इसलिए स्त्री विर्मश में आत्मवृतों की खास जगह है.-पर्सनल इज पोलिटिकल.  स्त्री अपने जीवन का पाठ स्वंय रच रही है. एक दूसरे की कहानी में इज्जत यानी घर की बात . गोपन की जंजीरो में  स्त्री को बांध रखने के खिलाफ ये विद्रोह है दूसरी तरफ अनुभव की साझेदारी जो दुनिया की स्त्री समुदाय को जोडकर विराट राजनीतिक पक्ष का निर्माण भी कर रही है. जब वह कहती है राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़े. जब वह बाजार के बनाये नियम के विरुद्ध लिखती है. जो बाजार उसे सौर्दय मिथक में बदलना चाहता है और उसकी त्वचा को नर्म,मुलायम और गोरा बनाने की ग्रंथी भरता है तो उसके विरुद्ध वह लिखती है कि अगर काली रात खूबसूरत है तो काली त्वचा क्यों नहीं. दरअसल  पृत सत्ता ने स्त्री के देह का उपयोग किया और और उसी देह को अपवित्र कहा. यह सत्ता तय करती रही खूबसूरत और बदसूरत स्त्री का पैमाना. यह सत्ता यह भी चाहती है कि स्त्री की देह पर उसका अधिकार रहे और वह देह के बाहर खुद को नहीं देखे.



90 के दशक की मशहूर माॅडल लीजा रे ने अचानक तय किया कि वह अपनी सेक्सी छवि को बदल कर दिमाग वाली स्त्री के रुप में खुद को स्थापित करेंगी तो उसके खिलाफ हमले तेज हो गए. यहां तक कहा गया कि ‘बिल्लयां कितना भी गुर्राएं वे अपनी त्वचा का डिजाईन नहीं बदल सकतीं. दरअसल बाजार यही चाहता है कि औरत अपने सौन्दर्य से अभिभूत रहे. तभी वह अपने प्रोडक्ट बेच पायेगा.  कोई सामान खरीदते ही सुदंर स्त्री चुबंन करते हुए या संभोग के लिए तैयार दिखती है. इस मर्दवादी सोच के खिलाफ सड़कों पर जो संघर्ष चल रहा है उसका असर फेसबुक पर भी है. महिलाएं इस माध्यम का इस्तेमाल अपने हक के लिए भी कर रही हैं. पुरुषों की देहगं्रथी के खिलाफ लिखती हैं, उन कामातुर आंखों के खिलाफ जिसकी नजर उसकी देह से आगे नहीं जाती. संचार माध्यमों पर स्त्री की छवि का मतलब है स्त्री की देह का वैभव,उसके रहस्य, उसके गोपन, उसकी लज्जाएं. ये छवि स्त्री को भी असहज बनाये रखते हैं. पर फेसबुक पर आयी लड़कियां अपनी ही देह पर खुल कर लिख रही हैं. अपने शरीर को लेकर वह सदियों से इतनी सहज कभी नहीं रही  जितनी इस सदी में है. केयर फ्री , विस्पर,माला डी, कोहीनूर के माध्यम से अपने मासिक धर्म , उन्मत रति भाव जैसे विषय फेसबुक पर गंभीरता से कर रहीं है. सदियों के बाद एक भरपूर खुली सांस ले पाने में समर्थ दिख रही  हैं. परंरागत समाज की नींव अगर स्त्री की शर्म पर टिकी है तो बेशक वो हिल उठी है . अब वह मानती है यौन शुचिता, पतिवत्रा,सतीत्व जैसे मूल्य स्त्री के सम्मान का नहीं पुरुष की अंहकार, दीनता,और असुरक्षा का पैमाना है. ऐसा नहीं है कि यह सब उसे आसानी से मिला है. उसने अपनी बेड़ियों की कीमत चुकाई है. इस माध्यम ने भी स्त्री को उसके जद में रहने के लिए लगातार घेराबंदी की है. उसे धर्म, जाति और यौन शुचिता के नाम पर घेरने की कोशिश करती रहती है. मेरे अनुभव यही कहते हैं जब कोई स्त्री धर्म , जाति, कट्टरता और लैंगिक सवाल उठाती है तो उसे तरह तरह से अपमानित किया जाता है. पुरुषों की शब्दावली में जितनी मादा गालियां है वह दी जाती है.


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फेसबुक पर दोस्त बनने वाले अधिकांश दोस्तों को मेरा नाम आकर्षित करता है. कई बार धार्मिक कट्टरता के विरु़द्ध खड़े होने पर मुझे मुसलमान करार दिया जाता है. यह हमला दोनों तरफ से होता है. दुनिया का कोई धर्म नहीं है जहां स्त्री का दोयम दर्जा नहीं है.  ये सवाल उन तमाम लोगों को चुभता है जो स्त्री को उसके खोल से बाहर नहीं आने देना चाहते. पृतसत्ता किसी को आसानी से अपने चंगुल से छूट निकलने की इजाजत नहीं देती. यह माध्यम पुरुषों को डरा रहा है. उनके घर दरक रहे हैं. एकनिष्ठ पत्नि, प्रेमिका की परिभाषा बदल रही है. स्त्री के पास अब चुनने की आजादी है. प्रेम करने की आजादी ले ली है उसने. उसके पास संगीतकार है, कवि है,उघोगपति है और दोस्त हैं. हालाकी उसकी ये आजादी जोखिम से भरी है. फेसबुक पर मर्द दाना डाले बैठे रहते हैं कि अब फंसी की तब फंसी. पर स्त्री ने जान लिया है कि इन शिकारियों से कैसे निपटा जाय. वे दाना चुग लेती हैं और फंदे से बाहर निकल आती हैं. पर कुछ पेशेवर शिकारी घात लगाए बैठे रहते हैं. ये नया माध्यम है जिसने स्त्री को आजादी दी है पर अभी अपनी आजादी का पूरा जश्न नहीं मना पा रही है. वह जानती है स्वाधीनता का चुनाव आसान नहीं है. वह खुद भी ड़रती है. स्वाधीनता का मतलब है ख्ुाद अपने फैसले ले सकना. कम से कम फेसबुक ने यह स्पेस दिया है जहां वह अपने को खोल सकती है. लिख सकती है. अपनी राय दे सकती है.

 ये सही है कि फेसबुक पर बहुत कुछ कचरा और कुड़ा रहता है. फेसबुक ने लोगों के पढ़ने-लिखने का समय ले लिया है . आभासी दुनिया का नशा भी है जिस नशे में आप अपनी असली दुनिया भूले रहते हैं. लेकिन ये दुनिया आपको नया रंग -रुप और स्वाद देती है. मुझे लगता है कि मैंने बहुत कुछ नया जाना, समझा और कुछ नये लोग जो मेरे जीवन में आये उसका श्रेय फेसबुक को है. जिसमें कुछ अच्छे दोसत भी बने. मैं अपने मित्रों और परिजनों से कहती हूं कि इस नये माध्यम से भागो नहीं और रोको नहीं. यह माध्यम हमारे लिए नया आकाश है जहां मेघ भी हैं और चमकीले तारे भी . जहां उजाला भी है और गहरा अंधेरा भी. यहां मवाद और पीप से भरे घांव है तो तारों के उझास में आप अपने प्रिय अफसानानिगार और कवि को पढ़ सकते हैं . हमने मंटों समेत कई लिखने वालों को यहां पढ़ा और कई लिखने वालों से दोस्ती की. मुझे हैरानी हुई कि हमने फेसबुक पर मंटों के बारे में जितना पढ़ा और जितने अलग तरह के अफसाने पढ़े शायद उनसब को सिर्फ किताबों में पढ़ना मुमकिन नहीं होता. उनको पढ़ते हुए लिखा भी.

प्रेम से लबालब भरी कविताएं लिखी. फेसबुक ने कविता लिखने के लिए सबसे ज्यादा उकसाया. फेसबुक पर मिली तारीफ आपको हौसला देते हैं कि आप लिख सकते हैं. हमने लिखा-
स्त्रियाँ करेंगी प्रेम  .बार
मत बताना सखी
भीतर.भीतर बहने की कला
मत बताना कि
हम प्रेम से लबालब भरी हैं
और आता है हमें अंधेरो से लड़ना
उन लम्हों का जिक्र मत करना
जो चाँद रातों में
हमारे भीतर उतरता रहा
सृष्टी के अनंत छोर तक फैलते हुए
प्रेम करती रहना
प्रेम
जिन्दगी के लिए
उनके लिए जिनका हिर्दय सूख गया है
प्रेम जो बचाता है देश कोए
लोगों को
प्रेम जो तानाशाह को देता है चुनौति
प्रेम अगर पाप है तो कहना
स्त्रियाँ
करेंगी ये पाप
बार बार

करेंगी प्रेम बार. बार

अगर आप गौर करें तो पता चलेगा कि क्या कुछ लिखा जा रहा है. कौन लिख रही हैं. किस वर्ग और किस समुदाय की महिलाएं हैं. मैंने पाया कि घरेलू महिलाएं , कामगार महिलाएं , काॅलेज,स्कूल जाती लड़कियों के अलावा  स्त्रियों का एक बड़ा समुदाय अपनी बात फेसबुक पर लिख रहीं हैं. मैं मनिषा झा की चर्चा करना चाहुगीं . मनिषा के लेखन को फेसबुक पर इतना पंसंद किया गया कि अब उसकी किताब आ रही है. व्यंगय लिखना सबसे मुशिकल विधा है. उसने सुबोध भैया नाम का चरित्र गढ़ा और उसके हवाले से देश, दुनिया पर टिप्पणी  करने लगी. सुबोध भैया कहते हैं कि इश्क़ करो या सिगरेट पियो सुलगती दोनों में हैं ए लगती दोनों में है.  फिर इश्क़ में डिस्क्लेमर क्यूँ नहीं . इश्क़ करना हानिकारक है . सुबोध भैया ने ऐसे आशिक़ों के लिये नर्क में अलग से डालडा का कढ़ाई लगवाए हैं .

मनिषा की तरह कई लड़कियां लिख रही हैं. पाखी जैसी साहित्यक पत्रिका ने भी कुछ दिन पहले 40 पार की औरतों पर लिखते हुए कहा था कि फेसबुक के माध्यम से ये औरतें सुरक्षित दायरें में इश्क कर रही हैं. इस पर खूब बहस हुई थी. मैंने उनके आलेख पर टिप्प्णी की थी यहां पर उसके कुछ अंश दे रही हूं. ‘‘मैं नहीं जानती की जिन 40 पार की स्त्रियों का जिक्र संपादकीय में किया गया है वे किस दुनिया की स्त्री हैं? जहां प्रेम भी प्रेम जैसा नहीं है. टाइम पास है. सिनेमा का मध्यांतर है. जहां मौज मस्ती के साथ पाॅपकार्न खा लेने भर का ही वक्त है.  प्रेम भारद्वाज की यह स्त्री छलना है, परपुरुष गामीनी है. अपने घर के दायरे को सुरक्षित रखकर प्रेम करती है, मजा लेती है. यह वह स्त्री नहीं है जो प्रेम के लिए मर जाती है या मार दी जाती है. जिसने घरती पर पांव जमाने के लिए खुरदरी जमीन पर अपनी मेहनत से फसल उगायी है. जिसने अपने हिस्से के आसमान के लिए खून से भरे,शोक के फर्श पर सदियां बितायी है. ये कौन स्त्री है? किस वर्ग की? किस दुनिया की जिसे अपने गोपन कक्ष में प्रेम करने की आजादी है. जहां वह प्रेमी के साथ जीती है,पति के साथ सोती है? और यह बेचारा पुरुष कितना मासूम, प्रेम में मरने वाला, जान देने वाला है. राम सजीवन जैसा पुरुष किस दुनिया में रहता है ? काश कि किसी स्त्री के जीवन में इतने संवेदनशील मर्द होते!  सब्जेक्शन आॅफ विमेन में जाॅन स्टुअर्ट मिल कहते हैं-‘पुरुष अपनी स्त्रियों  को एक बाध्य गुलाम की तरह नहीं बल्कि एक इच्छुक गुलाम की तरह रखना चाहते हैं,सिर्फ गुलाम नहीं, बल्कि पंसदीदा गुलाम. इसलिए उनके मस्तिष्क को बंदी बनाए रखने के लिए उन्होंने सारे संभव रास्ते अपनाए हैं.’

हर नैतिकता स्त्री से यही कहती फिरती है कि स्त्री को दूसरों के लिए जीना चाहिए. सच तो यह है पराजित नस्लों और गुलामों से भी ज्यादा सख्ती और कु्ररता से स्त्री को दबाया गया. यह हम नहीं कह रहे हैं यह स्त्री का इतिहास बताता है. क्या कोई भी गुलाम इतने लंबे समय के लिए गुलाम रहा है जितनी की स्त्री? क्या यह स्थापित करने की कोशिश नहीं है कि अच्छे पुरुष की निरंकुश सत्ता में चारों तरफ भलाई,सुख और प्रेम के झरने बह रहे हैं. जिसकी आड़ में  वह हर स्त्री के साथ मनमाना व्यवहार कर सकता है. उसकी हत्या तक कर सकता है और थोड़ी होशियारी बरत कर वह हत्या कर के भी कानून से बचा रह सकता है. वह अपनी सारी दबी हुई कुंठा अपनी पत्नी पर निकाल सकता है. जो अपनी असहाय स्थिति के कारण न पलट कर जबाव दे सकती है, न उससे बचकर जा सकती है. अगर यकीन न हो तो हर रोज मारी जा रही स्त्रियों के आंकड़े को उठा कर देख लें.

 40 के पार की औरतोें अगर प्रेम में इतनी ही पकी होतीं तो हर रोज रस्सी के फंदे से झूलती खबरें अखबारों के पन्ने पर नजर नहीं आती. सच तो यह है कि उसकी पूरी जिन्दगी अपने घर को बचाने में चली जाती है. घर उसके जीने का केन्द्र है. उसके हंसने, बोलने, रोने का. इसलिए उसने घर को अपना फैलाव माना. उसे सींचा. पर इसके पेड़ का फल पुरुषों ने ही खाया. उसे राम सजीवन जैसा न कभी प्रेमी मिलता है न एकनिष्ठ पति. फिर भी वह अनैतिक है. पुरुष को नैतिक और  स्त्री को अनैतिक बनाने की मानसिकता के पीछे यह बताना है कि पुरुष नैतिक रुप से श्रेष्ठ है. नैतिकता और अनैतिकता को लेकर हमेशा से अतंर्विरोध रहा है. जिसका नायाब उदाहरण है टाॅलस्टाय का उपन्यास अन्ना कैरेनिना. अनैतिक अन्ना विश्व उपन्यास की सबसे यादगार चरित्रों में से है.  टाॅलस्टाय के नैतिकता संबंधी विचारों को उसकी कला ध्वस्त कर देती है. जिस समाज में प्रेम अपराध है उस समाज में स्त्री को इस बात की छूट कहां कि वह प्रेम से भरी दिखे. वह प्रेम के लिए जिए. वह प्रेम कविता लिखे. जिस फेसबुक को स्त्री के लिए किसी दरीचे के ख्ुालने जैसा मान रहे हैं, तो फिर उसके खुलेपन  से इतने आहत क्यों? फेसबुक पुरुषों का भी  चारागाह है. जहां वे शिकारियों की तरह ताक में बैठे रहते हैं कि जाने कौन किस चाल में फंसे. दरअसल ये पूरी बहस ही बेमानी है. प्रेम को किसी अलग सदंर्भ में नहीं देखा जा सकता. हमारी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक और लैंगिक बुनावट तय करती है कि कौन सा समाज किन मूल्यों के साथ जीता है. इसी समाज में ईरोम भी है और अरुणा राय भी. सवाल उठता है कि हम स्त्री को किस तरह से देखते हैं. एक आब्जेक्ट के रुप में या मनुष्य के रुप में ? अगर हम मनुष्य की तरह देखेंगे तो हमें तीसरी कसम का हीरामन ही याद नहीं आयेगा हीराबाई के प्रति भी हमारी गहरी संवेदना होगी. देवदास शराब में डूब कर मर जाता है पारो जिन्दगी से लड़ती है, पलायन नहीं करती. अगर लैेला नहीं होती तो आज मजनूं नहीं होता. न लैला कहती मेरा कब्र वहीं बनाना जहां मैं पहली बार उससे मिली थी. उससे कहना कि मेरी कब्र पर आयें,और सामने क्षितिज की ओर देखें. वहां मैं उसका इंतजार कर रही हूंगी. और जिन आंखों में मजनूं के सिवा कोई समाया नहीं था, वे आंखें हमेशा के लिए बंद हो गयी.
कागा सब तन खाइयो
चुनि-चुनि खाइयो मांस
दुुई अंखियां मत खाइयो

पिया मिलन की आस.

दरअसल प्रेम यही है. इससे इतर कुछ नहीं. वह 40 की पार औरतें हों या फिर 16 साल की मासूम उम्र. जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियाबी रस्मों rवाज छू पाते हैं. फेसबुक हो या और कोई माध्यम स्त्री की सबसे बड़ी चुनौति है वह अपने मूल्यों के साथ जब खड़ी होगी तो उसपर हमले होंगे ही. हमारा समाज आज भी स्त्री को मनुष्य मानने से इंकार करता है. इसकी लड़ाई सिर्फ फेसबुक पर नहीं लड़ी जा सकती.  इसके लिए उसे संघर्ष के रास्ते चुनने होंगे. सड़को पर उतरना ही होगा. आभासी दुनिया ने हमें स्पेस दिया है, यह हमसब पर निर्भर है कि हम अपनी जमीन का इस्तेमाल कैसे करते हैं. हम अपनी आजादी से कितनी मुहब्बत करते हैं और उसके लिए कीमत चुकाने को तैयार हैं या नहीं.

वो निशान जो लाल-नीले नहीं होते

सुमन उपाध्याय


स्वतंत्र लेखन,टी.वी.सीरियल्स में संवाद लेखन,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित . संपर्क :sumanbala.umesh@gmail.com

1.
वो निशान जो लाल-नीले नहीं होते
ना फूटते हैं ना बहते हैं
पर रिसते-टीसते रहते हैं,
हर पल हर क्षण,
होते हैं, अपने पूरे वजूद के साथ
यमराज के साए से संतप्त
मन के सीलन भरे कोने में
मकड़ी के जालों से जूझते
कतरा भर रोशनी को तरसते
ना कोई दवा ना कोई दुआ
कोई स्थूल मसीहा नहीं,
असहाय स्वयं से
नहीं समझ पाते, कि
मसीहा पैदा नहीं होते
पैदा किये जाते हैं
स्वयं ही जगाना पड़ता है
–अपने अंतर के सोये मसीहे को !!

2.
वो लाल-उजले गुण
जिस पर दुनिया-जहान वारे जाते
ताड़ना की टोकरी  बन जाती है
अधिकार पाते ही,
जैसे हस्तगत करना ही लक्ष्य हो !!
जाने कैसे कालपुरूष की बौद्धिक प्रखरता
घुटनों में आ जाती है,
और होठों की खिलखिलाती हंसी
व्यंग्य की तिरछी मुस्कान बन जाती है
हर ढलती शाम जाने कहाँ से पा जाती है
एक नए रंग और नाम का ठेंगा !
साहस फिर भी कम न होता
क्षण-क्षण दम तोड़ती प्रतिभा की
और जोहती बाट—अगले जनम की !!

3.
हर शाम वो आता 
अपने जूते फटकारता,
काले साए सा दाखिल होता दरवाजे से
दंभ के निशान छोड़ता आगे बढ़ता
धंस जाता घर की आत्मा में !

अपने होने के गुमान में फुफकारता
पूरे होशो-हवास में, बेसुध
डंसता ऐसा, कि
महकता खिलता बागीचा बदल जाता
कब्रिस्तान में !
और कब्र में दफ़न सारे मुर्दे
सुबह के इंतज़ार में कुलबुलाते रहते
अपने-अपने ताबूतों में !!

4.
सपनों में सिलवटें पड़ने लगी हैं
भोर का उजास लुभाता भी नहीं
अंतर की उदासी भी बंटती नहीं
दिवानगी ठिठकी खड़ी है
और कुण्डी चढ़ा दी है सयानेपन ने !
बालमन दौड़ना चाहे
बहुरूपियों और जंगमों के पीछे,
हो-हो कर झूठ-मूठ डरना चाहे
उसके लाल-काले-नीले चेहरे से,
पर बचपन की आवारगी और अल्हड़ता
का चेहरा ज़र्द हो गया है !
अब नहीं बहते–
चपल-चंचल हंसी के झोंके !
लुप्त होने लगी है—
आँखों से कौतूहल और मासूमियत !
क्योंकि हर चेहरे की आँखें
भेड़िये सी दिखने लगी हैं,
और दिखने लगे हैं
–हाथों के लम्बे नाखून और उनसे टपकता लहू !!

5.
वो जीते-जागते हँसते-बोलते
परछाइयों में तब्दील हो जाते हैं,
चलती-फिरतीं परछाइयाँ !
हाँ, परछाइयाँ !

क्योंकि परछाइयाँ होतीं हैं,
शब्दहीन और शक्ल विहीन !
जहाँ संवादों के नाम पर होते हैं
सिर्फ, कुछ शारीरिक हरकतें !

जहाँ वेदना-संवेदना होती तो हैं
पर जर्जर शिरायें उस सन्देश को,
चेतना तक पहुंचा ही नहीं पातीं !

खामोशी का डेसिबल
ऋणात्मकता के उस हिस्से को छू लेता है
जहाँ अपने दिलों की धड़कनें ही
झंझावात पैदा करने लगतीं हैं !
जहाँ स्वयं के विचार सजीव हो उठते हैं
और फिर, असह्य हो जाती है – तिलमिलाहट !

परछाइयाँ भागतीं हैं- फिर से उसी शोर की ओर
और चलती रहतीं हैं, हम कदम बन
हाथों में हाथ डाले !
अपने विचारों के एक सौ अस्सी डिग्री पर !
साथ-साथ ! आजीवन !

पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और जैनेन्द्र (विशेष सन्दर्भ-‘पत्नी’ कहानी)

आदित्य कुमार गिरि

शोधार्थी,कलकत्ता विश्वविद्यालय,. सम्पर्क : adityakumargiri@gmail.com


“आज का साहित्य विमर्श स्त्री विमर्श के बिना पूरा नहीं होता,लेकिन ज्यादातर इसका रूप फैशन वाला ही है.बौद्धिक लफ्फाजी की शक्ल में लिखे गए लेख और संपादकीय प्रायः पत्र पत्रिकाओ में दिखाई पड़ते हैं लेकिन स्त्रियों की सामाजिक राजनैतिक सांस्कृतिक साहित्यिक स्थिति के संबंध में गंभीर विवेचनात्मक और तर्कपूर्ण लेखन का अभाव बना हुआ है.“1


असल में स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखना महत्वपूर्ण होते हुए भी केवल यही मुख्य नहीं होना चाहिए.जबतक उसे किसी ‘दृष्टि’ से न लिखा जाए.बिना विजन के किए लेखन को फैशन का लेखन कहा जाता है.“स्त्री विमर्श को लेकर किए गए गंभीर कार्य इक्सवी सदी के खाते में नहीं बल्कि उससे पहले की सदियों के नाम दर्ज हैं.उभरते पूँजीवाद ने चिंतन के क्षेत्र में नए मुद्दे खड़े किए,जिनकी पहले अनदेखी होती आई थी.स्त्री का मुद्दा भी उनमें से एक था.स्त्री को लेकर इस उदार पूँजीवादी,बुर्जुआ चिंतन की सीमा है पर इसी ने सबसे पहले आगे बढ़कर स्त्री को ‘मनुष्यता’ के धरातल पर देखने की गुहार लगाई.“2

“समाज के नजरिए को बदलने और स्त्रियों के सवालों को उठाने,स्त्री के संदर्भ में स्त्रियों के साथ साथ पुरुषों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है,बल्कि स्त्री के सवालों को सहानुभूतिपूर्ण ढंग से सक्षम और समर्थ पुरुष विचारकों द्वारा उठाए जाने के बाद ही पुंसवादी वर्चस्व वाली सामाजिक चेतना के दुर्ग में सेंध लगी.स्त्री विमर्श के लिए एक सकारात्मक वातावरण बना.”3

इसी अर्थ में जैनेन्द्र के साहित्य को भी स्त्री विमर्श की बहस को पुरुष लेखक की ओर से आगे बढ़ाने वाला समझना चाहिए.जैनेन्द्र कुमार प्रेमचंद की परंपरा में आनेवाले कथाकार नहीं हैं.उन्होंने कथा-लेखन की अपनी अलग राह चुनी है.इस राह में वे कई कथा युक्तियों का प्रयोग करते हैं,जो उनसे पहले प्रयोग में नहीं लाई गई थी.जैनेन्द्र ने अपने कथा साहित्य में स्त्री के सवालों को एक नए दृष्टिकोण से उठाया है.

स्त्री के सवालों को उठाने के दौरान उसकी स्थिति और ‘परिवेश’ का बेहद महत्त्व होता है.जैनेन्द्र के कथा साहित्य को पढ़ते वक्त यह चीज़ ज्यादा स्पष्ट होती है.जैनेन्द्र जिस सत्य को प्रकट करना चाहते हैं उसके लिए ‘परिवेश’ बेहद महत्त्वपूर्ण है.उनकी कहानियों के पाठ से यह चीज़ और ज्यादा साफ होती है.वे परिवेश को एक “टूल” की तरह प्रयोग में लाते हैं.पूरी कहानी बेहद कम शब्दों में आगे बढ़ रही होती है लेकिन परिवेश के कारण कथा का यथार्थ बेहद तीव्रता से प्रकट होता है.


सुनंदा के माध्यम से स्त्री जीवन की एक गंभीर समस्या की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की गई है और साथ ही इसकी मूल जड़ की भी पड़ताल की गई है.यह अचानक नहीं है कि कथाकार ने कहानी का नाम ‘पत्नी’ रखा है.यह सुनंदा के बहाने असल में ‘पत्नी’ और परिवार के ‘ढ़ाँचे’ पर प्रश्न चिन्ह है.यह कैसी व्यवस्था है जहाँ एक तरफा नियम चलता है.जहाँ पुरुषों को असीमित अधिकार हैं लेकिन वहीं उसकी सहधर्मिणी(?) की भूमिकाएँ तय हैं.सीमीत हैं.उसकी व्य़क्तिगत जिन्दगी दायरे में बँधी है.

जैनेन्द्र को मनोवैज्ञानिक कथाकार कहकर हम छुटकारा नहीं पा सकते.असल में वे गहरे सरोकारों को व्यक्त करने वाले कथाकार हैं.इस कहानी में सुनंदा और उसके पति के माध्यम से परिवार के अस्तित्त्व पर प्रश्न चिन्ह लगाया गया है.

इस कहानी में पति के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की गई है कि पुरुष का दृष्टिकोण क्या है.आज स्त्री की मूल समस्या यही ‘दृष्टिकोण’ है.जिसकी ज़द में स्त्रियाँ भी हैं.स्त्रियाँ भी पुरुषवादी दृष्टिकोण के कारण स्त्रीवादी मूल्यों के आलोक में चीजों को नहीं देख पातीं.स्त्री को जिन मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है,वह पूरा का पूरा पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण है.इस दृष्टिकोण ने समाज में अपनी इतनी पैठ कर ली है कि इस सोच से स्त्री भी मुक्त नहीं है.स्त्री भी खुद को पुरुषवादी दृष्टिकोण से देखने को अभिशप्त है.सुनंदा की तमाम चिंताएं अपने पति को लेकर है.उसका खान-पान,उसकी रक्षा,उसके दोस्त उसकी आवश्यकताएँ बस इन्हीं के ईर्द-गिर्द वह जीती है.जैनेन्द्र जानते हैं कि स्त्री का ‘समाज’ असल में पुरुष का समाज है.इस समाज में उसकी अपनी कोई ‘अस्मिता’ नहीं है.इसकी अपनी कोई इच्छा,कोई आवश्यकता,आशा-आकांक्षा नहीं है.

पत्नी’(यों) की चर्चा करते समय अब तक जिन मुद्दों पर बहस की गई है.असल में वे सब नाकाफी हैं.कहानी को पढ़ते हुए एकबारगी लगेगा जैसे सुनंदा(पत्नी) खुद अपने लिए कोई आजादी नहीं चाहती.उसकी आंखों में कोई सपना नहीं है,लेकिन सत्य इससे अलग है.भारत देश की पत्नियाँ अपने लिए जिस दृष्टिकोण को धारण किये हुए हैं और उनमें जो परिवर्तन परिलक्षित हैं,जैनेन्द्र ने असल में कहानी का मूल विषय उसे बनाया है.हम जिस समाज में रह रहे हैं,वहां स्त्रियां कोई सपना नहीं देखतीं.इनकी पूरी जिंदगी पति,पिता,पुत्र के लिए खुशियाँ इकट्ठी करने में लगी हुई हैं.

सुनंदा जिस घर में रहती है,जिन सरोकारों को जीती है उसे हम घर की चाहरदीवारी की जगह पर अगर समाज के रुप में देखें,तब बात और ज्यादा स्पष्ट होगी.सुनंदा भारतीय समाज की किसी भी एक आम स्त्री का प्रतिनिधित्व कर रही है.जिसकी पूरी जिंदगी और उसके सरोकार अपने पति(पुरुष) के ईर्द-गिर्द घूमते हैं.

जैनेन्द्र के अलावे अज्ञेय भी एक अलग तरीके से इसी सवाल को अपनी कहानी ‘रोज़’4 में उठाते हैं.वहां भी स्त्री की तमाम चिंताएँ अपने पति और मर चुके बच्चे की यादों को लेकर है.पतियों की एक अलग दुनिया जरुर है.जहां लोगबाग हैं,दोस्त-यार हैं.देश है,दुनिया है,दुनिया की चिताएं हैं.नहीं है तो सिर्फ स्त्री और स्त्री की चिंता.
देश की स्वतंत्रता,हिंसा,शोषण,समाज सभी विषयों पर पुरुषपात्र सोचता है,परंतु नहीं सोचता तो सिर्फ अपनी घर की स्त्री पात्र के संबंध में.जैनेन्द्र इसकी ओर भी इशारा करते हैं.‘पत्नी’ इस मुद्दे से भी टकराती है. कहानी की शुरुआत ही सुनंदा(पत्नियों)की स्थिति को प्रकट करने के लिए काफी है.यह शुरुआत पारंपरिक पत्नी के रूप को प्रस्तुत करती है लेकिन उसी वर्णन में सुनंदा का एक और रूप निकल कर सामने आता है.संभवतः जैनेन्द्र का उद्देश्य भी उसी रूप को विकसित करना रहा हो.वे परिवार की इस महत्त्वपूर्ण ईकाई के ‘शोषण’ पर ही चोट करना चाहते हैं.जैनेन्द्र की पत्नी कहानी असल में पत्नी के माध्यम से परिवार संस्था के शोषक रूप पर चोट है.यह इतना बारीक है कि एकबारगी पूरी कहानी पारंपरिक स्त्री के,पारंपरिक पत्नी जिसे संस्कारी(तथाकथित) कहा जाता है,की कहानी लगती है लेकिन यह पूरी कहानी बेहद बारीकि से ‘व्यंजनात्मक’ रूप से इस छवि का विलोम बनाती है.इसमें दिख रही पत्नी असल में अपनी स्थिति से असन्तुष्ट है.वह पुरुष द्वारा प्रदत्त अपनी भूमिका से विद्रोह की सीमा तक रुष्ठ है.



जैनेन्द्र के ‘नैरेशन’ में इस चीज़ को समझा जा सकता है “शहर के बाहर एक तिरष्कृत मकान……वहाँ चौके में एक स्त्री अंगीठी सामने लिए बैठी है.अंगीठी की आग राख हुई जा रही है.वह जाने क्या सोच रही थी.उसकी अवस्था बीस बाइस के लगभग होगी.देह से कुछ दुबली है और संभ्रान्त कुल की मालूम होती है.
एकाएक अंगीठी में राख होती हुई आग की राख पर स्त्री का ध्यान गया.घुटनों पर हाथ देकर वह उठी.उठकर कुछ कोयले लाई.कोयले अंगीठी में डालकर फिर किनारे ऐसे बैठ गई मानो दाय करना चाहती है कि अब क्या करुँ ? घर में और कोई नहीं है और समय बारह से ऊपर हो गया है.”5

यह पति की प्रतिक्षा करती पारंपरिक पत्नी का वर्णन है लेकिन इसी पत्नी की मनःस्थिति के बदलते बिन्दुओं को व्यक्त करती अगली पंक्तियाँ “वह जाने कब आएँगे.एक बज गया है.कुछ हो,आदमी को अपनी देह की फिक्र तो करनी चाहिए….और सुनंदा बैठी है.वह कुछ कर नहीं रही है.जब वह आएँगे तब रोटी बना देगी.वह जाने कहां कहां देर लगा देते हैं और कब तक बैठूँ.मुझसे नहीं बैठा जाता.कोयले भी लहक आए हैं और उसने झल्लाकर तवा अंगीठी पर रख दिया.नहीं,अब वह रोटी बना ही देगी.उने खीझकर जोड़ से आटे की थाली सामने खींच ली और रोटी बेलने लगी.”6

यह “झल्लाहट”,यह खीझ ही इस ,कहानी की ‘उपलब्धि’ है.एकबारगी लगता है यह पति की चिंता से उपजी खीझ है लेकिन असल में यह अपनी उपेक्षा और ‘बेकारी’ की चिढ़ है.यह एक ऐसी स्त्री की तलाश है जिसे अपनी उपेक्षा बर्दाश्त नहीं हो रही.भारतीय समाज में प्रेमचंद युग तक यह दुर्लभ था.यह जैनेन्द्र युग की ‘खोज’ है.जैनेन्द्र का कथा साहित्य इसी मामले में अलग है.जैनेन्द्र के सामने जो समस्या है वह यह है कि स्त्री सक्षम हो,सशक्त हो,लेकिन वे जानते हैं कि सबसे पहले उसे “स्व” का बोध हो,यह ज्यादा जरुरी है.असल में पुरुषवादी नजरिया स्त्री के लिए वह स्पेस नहीं देता,जो स्त्री के ‘स्व’ के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक है.ऐसा नहीं है कि स्त्री ,जो परिवार की चिंता,उसकी देखभाल कर पा रही है,वह समाज के मुद्दे पर असफल हो जाएगी.परन्तु उसे वह सामाजिक स्पेस देना पड़ेगा.स्त्री सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावों के बीच उसकी बुनियादी समस्याएं कहीं-न-कहीं दब सी गई हैं.यह इसलिए क्योंकि स्त्री सशक्तिकरण के लिए पहले स्त्री की समस्याओं की पहचान जरूरी है,क्योंकि समस्याओं को समझे बिना सशक्तिकरण केवल कोरा नारा है.

जैनेन्द्र के साहित्य के केन्द्र में पुरुषवादी समाज का ‘दृष्टिकोण’ है.जिसने सदियों से स्त्रियों को गुलाम तो बनाए ही रखा है साथ ही स्त्रियों के अन्दर ‘हीन-भावना’ को भी जन्म दिया है.यह ‘दृष्टिकोण’ एक ऐसी व्यवस्था का जन्मदाता है जिसने पुरुष को श्रेष्ठ और स्त्री को ‘हीन’ बनाया(बताया) है.चूँकि स्त्री हीन है,कमजोर है,कम श्रेष्ठ(?) है अतः वह पुरुष की मातहत है,उसके अधीन है.उसके पास जो भी अधिकार(?) होंगे वे पुरुष समाज द्वारा प्रदत्त होंगे.जो ईकाई अधीन है,कमजोर है, जाहिर सी बात है उसकी समझ भी कम होगी,दुनियावी झमेलों की उसे समझ होगी नहीं.अतः वह दुनियायवी(सार्वजनिक) जगत से दूर रहे.यह स्त्री की सामाजिक जिन्दगी की मौत की अवधारणा और दृष्टि है.स्त्री चाहरदिवारी तक सीमित रहे,उसकी सामाजिक सांस्कृतिक,राजनीतिक भूमिका तय कर दी गई.

यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसके द्वारा स्त्रियों की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी रोकी जाती है और यह ऐसा मानती है कि स्त्री का जन्म ही पुरुष की अनुगामिनी बनकर रहने के लिए हुआ है.
‘पुंसवादी समाज की यह जनप्रिय व्यवस्था यह मानकर चलती है कि इसमें स्त्री-पुरुष और समाज,सबका कल्याण,सबका हित है.’7

जॉन स्टुअर्ट मिल स्त्री की पुरुषवादी समाज और पुरुषवादी व्यवस्था में स्त्री के प्रति मौजूद दृष्टि के विरोध में हैं.वे स्त्री के लिए स्पेस की बातें करते हैं.वे पुरुषवादी व्यवस्था के इतर स्त्री को अबतक न परखने का तर्क देते हैं और मानते हैं कि यही व्यवस्था एकमात्र आदर्श या विकल्प हो ही नहीं सकती.स्त्री और पुरुष के इस संबंध जिसमें स्त्री मातहत और पुरुष ‘रक्षक’(?) है,के लिए कोई वैज्ञानिक आधार या तर्क नहीं है बल्कि यह शुद्ध रूप से ‘शक्ति’ और सत्ता का खेल है.स्त्रियों की पारिवारिक नाकेबंदी को निर्दोष और गैरराजनीतिक दृष्टि से व्याख्यायित करना स्त्री के साथ अन्याय है.स्त्री के शोषण की इस अवधारणा को सत्ता,शक्ति और सम्पत्ति से जोड़कर देखना चाहिए.जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी पुस्तकदि सबजुगेशन ऑफ वुमेन’(स्त्रियों की पराधीनता-प्रगति     सक्सेना,अनुवाद,राजकमल प्रकाशन,2002) में कहा है ‘स्त्रियों की निर्भरता दासता की आदिम अवस्था का ही एक रूप है.इसमें मौलिक पाशविकता का ऐब आज भी है.’8

स्त्री की तुलना स्टुअर्ट मिल ने दासों से की है.दास प्रथा तो समय के साथ खत्म हो गई लेकिन स्त्री का शोषण और स्थिति में आज तक कोई परिवर्तन नहीं आया बल्कि समय के साथ उसकी गंभीरता और बढ़ती ही गई है.“पूर्व स्थापित व्यवस्था में ऐसी ही शक्ति होती है,चाहे वह बिल्कुल ही सार्वभौमिक न हो,और चाहे इतिहास के लगभग हर युग में उससे विपरीत बेहतर व्यवस्था के महान व सुविख्यात उदाहरण हों,लेकिन वह लगभग हमेशा सबसे प्रतिष्ठित व समृद्ध समुदायों में पाई ही जाती है.इस स्थिति में भी,अत्यधिक सत्ता का स्वामी और प्रत्यक्षतः उसमें रुचि रखने वाला व्यक्ति सिर्फ एक होता है,जबकि जो इसका शिकार होते हैं,इसे भुगतते हैं,वे शब्दशः सभी होते हैं.पराधीनता स्वाभाविक व आवश्यक रूप से सभी लोगों के लिए अपमानजनक होती है,सिवाय उस व्यक्ति के जो शासक है या ज्यादा से ज्यादा उस व्यक्ति के लिए जिसे गद्दी का उत्तराधिकारी बनने की उम्मीद है.यह स्थिति स्त्री पर पुरुष की सत्ता से कितनी भिन्न है.”9

क्योंकि सत्ता में रहने की मानसिकता से पूरा पुरुष समाज लबरेज होता है.वह स्त्री को द्वीतीय नागरिक समझता है.वह उसे न्यूनतम सम्मान भी नहीं देता.उसकी इस दृष्टि ने स्त्री को हीन बना दिया है. जैनेन्द्र इसी दृष्टिकोण से लड़ रहे हैं.उनकी कहानियों में पुरुष समाज द्वारा विकसित व्यवस्था के प्रति रोष है और उस रोष को दिशा देने की कोशिश भी की गई है.जैनेन्द्र स्त्री की सामाजिक,राजनैतिक,सांस्कृतिक स्थिति पर पुरुषवादी सोच का विलोम तैयार करते हैं.वे इस व्यवस्था से असन्तुष्ट हैं.उनके पात्र बेहद छटपटा रहे हैं.पत्नी की,सुनंदा की उदासी और ऊब और दिनभर पति केन्द्रित क्रियाकलाप पाठकों में उसकी तीव्रता को स्पष्ट करते हैं.सुनंदा की स्थिति देखकर पाठक अगर क्रोधित होता है तो खुद सुनंदा भी एक अलग तरह की पात्र है.जैनेन्द्र रचित सभी स्त्री पात्र अपने आप में अद्भुत हैं लेकिन सुनंदा की निर्मिती सबसे मौलिक है.सुनंदा का चरित्र दो स्तरों पर निर्मित किया गया है.पहला वह जो पुरुषवादी समाज व्यवस्था की परिचित स्त्री है.जिसे अपने पति की चिंता है.उनके खाने पीने की,उनके रहने सहने की,उनके स्वास्थ्य की,उनके सामाजिक जीवन की,उनके दोस्तों की.वह हर घड़ी इन्हीं चीजों को सोचती रहती हैं.पति ने खाया नहीं,वे खा लेते,बहस बाद में करते,ज़रा धीरे धीरे बोलते,पुलिसवाले बाहर ही बैठे हैं,उन्हें नहीं पता क्या कि पुलिस वाले सादी वर्दी में हर घड़ी बाहर ही बैठे रहते हैं,क्या उन्हें इसकी थोड़ी भी परवाह नहीं आदि आदि.दूसरी ओर पति द्वारा अपनी उपेक्षा या हक न जताने पर उसका गुस्सा सब उसी पारंपरिक स्त्री को प्रस्तुत करते हैं.ठीक इसके उलट सुनंदा का एक और रूप है जो जैनेन्द्र की मौलिकता है और वह है उसका विद्रोही रूप.यह आधुनिक मूल्यों के आलोक में तैयार हुई एक स्त्री का रवैया(एटीट्यूड) है.जैनेन्द्र ने बड़ी बारीकि से इसे चित्रित किया है.सुनंदा का एक मन हमेशा पति केन्द्रित रहता है लेकिन व्यवहार में एक पक्ष ऐसा है जो पति की उपेक्षा से विचलित,नाराज है.वह पति से ‘संवाददीनता’ में प्रकट होता है.पति के कुछ भी पूछने और कहने पर ‘मौन’ रूप.वह खाना बनाने के सवाल(अनुरोध ?) पर चुप रहती है और खुद ब खुद बनाकर दे जाती है.पति इसे अपनी बेइज्जती समझते हैं,समाज और दोस्तों के सामने इसे असहजता की वजह के रूप में देखते हैं.यहाँ भी पुरुषवादी स्वार्थ दिखता है.उन्हें पत्नी की परवाह नहीं है,उन्हें इसकी भी चिंता नहीं कि पत्नी के मन में क्या चल रहा है वे केवल अपनी सामाजिक स्थिति को लेकर चिंतित हैं.उन्हें इस बात की लज्जा है कि सुनंदा के व्यवहार से दोस्तों में उनकी यह छवि बनेगी कि उनकी पत्नी ‘उनके कहने’ में नहीं.यह पत्नी की चिंता का नहीं,अपने अहम की चिंता का उदाहरण है.सुनंदा हमेशा अपने पति को खुश देखना चाहती है,उनके अनुरूप खुद को ढालना चाहती है लेकिन जब ‘व्यवहार’ की बात आती है तब वह अपने सोचे हुए के ठीक विपरीत करती है.यह भारतीय समाज में नई स्त्री के ‘स्व’ को रेखांकित करता प्रसंग है.यह स्त्री खुद की उपेक्षा को बरदाश्त नहीं कर पाती.

पूरी कहानी में पति-पत्नी में एक तनाव की सी स्थिति है.जबकि सुनंदा और कालिन्दीचरण के स्तर पर ऐसा कुछ नहीं लेकिन ‘व्यवहार’ में उनका यह तनाव प्रकट होता है.‘पत्नी’ कहानी पत्नी की कथित श्रेणी के बाहर एक नई स्त्री की ‘खोज’ है.पत्नी सुनंदा अपनी उपेक्षा और वर्तमान दशा से असन्तुष्ट है.यही कहानी की विशेषता है.जैनेन्द्र सुनंदा के माध्यम से परिवार में बल्कि कहना चाहिए परिवार से स्त्री के मोहभंग को प्रकट करते हैं.
स्त्री को कृतार्थ करने का भाव पुरुष समाज की अन्य विशेषता है.स्त्री जानती है वह निरी वस्तु है.पुरुष अपने अनुभवों में उसे शामिल नहीं करेगा.उससे कुछ भी ‘शेयर’ नहीं करेगा,वह अंदर ही अंदर घुटती रहेगी,जलती रहेगी लेकिन पुरुष उसे अपने अनुभवों का साझेदार नहीं बनाएगा,क्योंकि उसकी नज़र में वह केवल खाना बनाने और बच्चे जनने की मशीन है.वह सौन्दर्य की वस्तु है.बिस्तर की वस्तु है.उसकी उपस्थिति घर में भी बेहद उपेक्षित सी है.वह घर में भी केवल पुरुष की जरूरतों की भरपाई के लिए है.उसका पूरा अस्तित्तव पुरुष का ध्यान रखने और जरूरतों की पूर्ति भर तक सीमित है.उसे व्यक्ति समझा ही नहीं जाता.कहने का आशय यह है कि स्त्री को सामाजिक ईकाई के रुप में देखे जाने की जरुरत है.स्त्री भी एक आम मनुष्य है.उसे भी इंसान की तरह देखा जाना चाहिए.दूसरी महत्वपूर्ण चीज यह है कि स्त्री के लिए अब तक जिस दृष्टिकोण का प्रयोग किया जाता रहा है,उसकी जड़ों पर आघात करना सबसे ज्यादा जरुरी है.स्त्री की गुलामी(चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक)उसकी शुरुआत परिवार से ही होती है.तो क्या यही कारण नहीं है कि जैनेन्द्र अपनी कहानी में परिवार और परिवार की एक महत्वपूर्ण,बल्कि कहना चाहिए कि दो महत्वपूर्ण ईकाई स्त्री और पुरुष को अपनी कथा का आधार बनाते हैंबस इन्हीं कारणों से जैनेन्द्र हिंदी कथा परंपरा में अलग दिखते हैं.क्योंकि स्त्री को लेकर उनका जो दृष्टिकोण है,वह बाकि कहानीकारों से बिल्कुल भिन्न है.वे अपने तरह के अकेले रचनाकार हैं

आज उत्तर-आधुनिक साहित्यिक परिदृश्य ने स्त्री-विमर्श को साहित्य के केन्द्र में ला खड़ा किया है.कहना होगा कि बहुतेरे रचनाकार और उनका स्त्री को लेकर एक नया दृष्टिकोण है,लेकिन इन सबके बीच जैनेन्द्र की अपनी एक अलग पहचान है.क्योंकि वे स्त्री के लिए जिस स्पेस की मांग कर रहे हैं,वह आज भी बहुतेरे लेखकों के लिए दूर की कौड़ी है.उसकी दयनीय स्थिति को समाज में उसकी नियति की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है.जैनेन्द्र इस मामले में स्पष्ट हैं कि स्त्री की इस दशा के लिए पुरुषवादी सोच जिम्मेदार है.पत्नी कहानी इस मायने में और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वह परिवार को एड्रेस करती है,जहां स्त्री की विडंबनाश्(शोषण) ज्यादा खुलकर सामने आती है.


स्त्रियों की स्थिति पर स्टुअर्ट मिल कहते हैं—“सामाजिक व प्राकृतिक सभी कारण मिलकर यह असंभव कर देते हैं कि महिलाएँ संगठित तौर पर पुरुषों की सत्ता का विरोध कर सकें.वे इस अर्थ में अन्य पराधीन वर्गों से भिन्न स्थिति में हैं कि उनके मालिक उनसे वास्तविक सेवा के अतिरिक्त कुछ और भी चाहते हैं.पुरुष केवल महिलाओं की पूरी पूरी आज्ञाकारिता ही नहीं चाहते,वे उनकी भावनाएँ भी चाहते हैं.सबसे क्रूर एवं निर्दयी पुरुष को छोड़कर सभी पुरुष अपनी निकटतम संबंधी महिला में एक जबरन बनाए गए दास की नहीं,बल्कि स्वेच्छा से बने दास की इच्छा रखते हैं—सिर्फ एक दास नहीं बल्कि अपना प्रायः अपना चहेता व्यक्ति चाहते हैं.अतः उन्होंने महिलाओं के मस्तिष्क को दास बनाने के लिए हर चीज़ का इस्तेमाल किया है.अन्य दासों के मालिक आज्ञाकारिता बनाए रखने के लिए भय का प्रयोग करते हैं—उनका खुद का भय या धार्मिक भय.स्त्रियों के मालिक साधारण आज्ञाकारिता से कुछ अधिक चाहते थे और उन्होंने शिक्षा के पूरे बल का इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया.बहुत बचपन से स्त्रियों को यह सिखाया जाता है कि उनका आदर्श चरित्र पुरुष से ठीक विपरीत होना चाहिए.इच्छा शक्ति और आत्म नियंत्रण नहीं बल्कि समर्पण और दूसरे के नियंत्रण के समझ झुक जाना गुण होना चाहिए.सारी नैतिकता उन्हें बताती है कि यह महिलाओं का कर्तव्य है और सभी मौजूदा भावनाओं के अनुसार यह उनका स्वभाव है कि वे दूसरों के लिए जिएँ,पूर्ण आत्मत्याग करें और स्नेह संबंधों के अतिरिक्त उनका अपना कोई जीवन न हो.स्नेह संबंधों से तात्पर्य सिर्फ उन संबंधों से है जिनकी उन्हें इजाजत है—वे पुरुष जिनसे स्त्री संबंधित हो या वे बच्चे जो पुरुष व उनमें एक अटूट व अतिरिक्त बंधन होते हैं.जब इन तीन चीजों को साथ रखते हैं—पहला,दो विपरीत लिंगों में स्वाभाविक आकर्षण,दूसरे,पत्नी की पति पर पूर्णतः निर्भरता,उसकी हर सुविधा व सुख या तो पति का इनाम होता है,या पूरी तरह से उसकी इच्छा पर निर्भर करता है,और अंतिम कि मानव इच्छा की जो मुख्य वस्तुएँ हैं,सम्मान और सामाजिक महत्वाकांक्षा की सभी चीजों सामानयतः एक स्त्री अपने पति के जरिए ही पाती है या पाने की कोशिश करती है.इन तीनों चीजों को साथ रखकर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि स्त्री की शिक्षा व उसके चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के केंद्र में पुरुष के लिए आकर्षक बनने का उद्देश्य न होना एक चमत्कार ही होता है.महिलाओं की बुद्धि पर साधनों के इस प्रभाव को हासिल कर पुरुषों के स्वार्थी स्वाभाव ने इसका पूरा पूरा महिलाओं को अधीन रखने के लिए भी किया हैउन्हें यह जतलाया गया कि विनम्रता,समर्पण और अपनी निजी इच्छा का पुरुष के हाथों पूर्ण अर्पण ही महिलाओं के शारीरिक आकर्षण का आवश्यक भाग है.क्या इस बात पर संदेह किया जा सकता है कि अन्य प्रकार की दासताएँ जिन्हें मानव जाति तोड़ने में कामयाब हुई है,वे अब तक टिकी रहतीं यदि साधन इतनी ही मेहनत से (अधीन) लोगों के दिमाग को झुकाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं ?”10

“पितृसत्तात्मक समाज के पक्ष में तर्क देने वालों की भी यही दलील होती है कि पितृसत्ता सबसे पुरानी और सहज व्यवस्था है.सहज शायद इसलिए भी कि यहाँ बिना खून खराबा,युद्ध हिंसा,मार काट,संघर्ष के बिना ही एक वर्ग केवल लिंग के आधार परदूसरे से श्रेष्ठ मान लिया गया.उसे जीवनभर दूसरे वर्ग से हीन होकर उसके रहने को तैयार किया गया.इसलिए ऐसे लोगों को पितृसत्ता सबसे स्वाभाविक सत्ता लगती है.पुरुष का स्त्री पर आधिपत्य—हर प्रकार का पितृसत्तात्मकता के वकीलों को सबसे ज्यादा स्वाभाविक लगता है.”11

असल में यहाँ दिक्कत यह है कि स्त्री को शोषण हो रहा है इससे खुद स्त्री भी अनभिज्ञ है.यह एक ऐसी लड़ाई है जहाँ शोषित वर्ग को पहले यह विश्वास दिलाना होगा कि उसका शोषण हो रहा है फिर अगला कदम होगा.
आधुनिकता की बहस के साथ स्वतंत्रता और निजी का जो भाव जन्मा,स्त्री उससे बिल्कुल लाभान्वित नहीं हुई.स्त्री पूरी तरह से आधुनिकता की,नवजारगण की उपलब्धियों से दूर रही.उसके लिए नए आधुनिक समाज का कोई मतलब नहीं रहा.वह पहले ही की तरह ‘गुलाम’ रही,उपेक्षित रही.“पुंसवादी धारणा है कि स्त्रियों की स्वाभाविक योग्यता पत्नी और माँ बनने में ही है.ऐसा सोचने वाले विवाह को स्त्रियों के लिए कितना वांछनीय और आकर्षक नहीं बताते कि वे स्वेच्छया इस बंधन में बंधना चाहें.वे स्त्रियों के लिए विवाह को अनिवार्य बना देते हैं या तो यह अथवा कुछ नहीं.”12

कालिन्दीचरण की दृष्टि में सुनंदा कुछ भी बताने लायक जीव नहीं है.और सामाजिक राजनैतिक विषय तो बिल्कुल भी नहीं बताए जाने चाहिएँ.स्त्रियों को लेकर ऐसे दृष्टिकोण पर मिल लिखते हैं—“निस्संदेह यह प्रायः होता है कि एक व्यक्ति जिसने दूसरे के विचारों के एक विषय पर भलीभाँति व विस्तार से नहीं पढ़ा है,उसे स्वाभाविक विलक्षणता के परिणामस्वरूप एक आभास होता है जिसे वह सुझा तो सकता है पर सिद्ध नहीं कर सकता,लेकिन फिर जो परिपक्व होकर ज्ञान में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी बन सकता है…..क्या यह मान लिया जा सकता है कि ऐसे अद्भुत विचार महिलाओं को नहीं सूझते ? हर बुद्धिमान महिला को ऐसे सैकड़ों विचार सूझते हैं.लेकिन अधिकतर वे विचार पति या एक ऐसे मित्र की कमी के कारण खो जाते हैं,जिसके पास यह दूसरा ज्ञान हो और उनके विचारों का ठीक ठाक अनुमान लगाकर उन्हें दुनिया के सामंने ला सकें.और जब वे दुनिया के समझ लाए भी जाते हैं तो वे उसके(पुरुष के) विचार अधिक लगते हैं,उसके मूल लेखक के नहीं.कौन बता सकता है कि पुरुष लेखकों द्वारा व्यक्त किए गए कितने सर्वाधिक मौलिक विचार दरअसल एक महिला द्वारा सुझाए गए थे और वे सिर्फ स्त्यापित करने व उन पर काम करने के बाद ही उनके अपने विचार बने ?”13

कालिन्दीचरण ‘भारतमाता को स्वतंत्र’ करने और “देशोद्धार” की बातें करते हैं.इसका ‘नैरेटिव’ इतना सुंदर है कि इससे कथा के तनाव को समझा जा सकता है.पूरी घटना का विवरण ऐसे दिया जा रहा है मानो कहानीकार ‘नैरेट’ नहीं कर रहा बल्कि सुनंदा ‘नैरेट’ कर रही है और यह ‘नैरेशन’ एक “ताना” हो.यानी जिस आदमी को अपनी पत्नी की समस्याएँ नहीं दिख रही हैं वह एक और(अन्य) औरत(भारतमाता) को आजाद करने निकला है.
सुनंदा उनकी बातों को सुन रही होती है.“सुन रही है कि उसके पति कालिन्दीचरण अपने मित्रों के साथ क्यों और क्या बातें कर रहे हैं.उसे जोश का कारण नहीं समझ में आता.उत्साह उसके लिए अपरिचित है.वह उसके लिए कुछ दूर की वस्तु है,स्पृहणीय मनोरम और हरियाली.यह भारत माता की स्वतंत्रता को समझना चाहती है.उसे इन लोगों की इस जोरों की बातचीत का मतलब समझ में नहीं आता.फिर भी,सच उत्साह की उनमें बड़ी भूख है.जीवन की होंस उनमें बुझती सी जा रही है,पर वह जीना चाहती है.उसने बहुत चाहा कि पति उससे भी कुछ देश की बातें करें.उसमें बुद्धि तो जरा कम है पर धीरे धीरे क्या वह भी समझने नहीं लगेगी ? सोचती है, कम पढ़ी हूँ,तो इसमें मेरा ऐसा कसूर क्या है ? अब तो पढ़ने को मैं तैयार हूँ लेकिन पत्नी के साथ पति का धीरज खो जाता है.खैर,उसने सोचा है उसका काम तो सेवा है.बस,यह मानकर जैसे कुछ समझने की चाह ही छोड़ दी है.“14

सुनंदा के जीवन से “उत्साह” जाता रहा है.और वह हर तरह से नीरस जिन्दगी जी रही होती है लेकिन फिर भी उसमें जीने की ‘चाह’ है वह अपने पति की उपेक्षा की टीस से घायल है.वह अपने पति से खुद के लिए समय चाहती है,परवाह चाहती है,उनकी बातों और अनुभवों की साझेदार बनना चाहती है.वह यह भी मानने को तैयार है कि वह कम जानती है,कम पढ़ी लिखी है लेकिन पति के सिखाने पर वह जल्द ही सीख जाएगी सबकुछ समझ जाएगी.यह पूरा नैरेशन असल में सुनंदा(ओं) की उपेक्षाओं का दस्तावेज है.सुनंदा हर सूरत में अपने अकेलेपन जो कि इस पुरुषवादी समाज की देन है क्योंकि पति अपने अनुभव पत्नी से बाँटेगा नहीं और पत्नी चाहरदीवारी में कैद है,ऐसी पत्नियों का एकांत भी असल में समाज प्रदत्त ही है.स्त्री के प्रति इस रवैये ने उसे ‘आत्महीनता’ से भर दिया है.वह अपने को पति(पुरुष) से कम कर आँकने लगी है जबकि उसे यह मालूम ही नहीं कि जिन अनुभवों को उसने जिया ही नहीं उसके आलोक में कोई आकलन कैसे संभव हो सकता है.उसका खुद को “सेवा” करने वाली समझना असल में ‘नैरेटर’ की व्यंजना है.सुनंदा(ओं) की स्थिति देखकर कोई भी कह सकता है कि वह ‘सेवक’ से अधिक कुछ है भी नहीं.“वह अनायास भाव से पति के साथ रहती है और कभी उनकी राह में आने का नहीं सोचती.वह एक बात जानती है कि उसके पति ने अगर आराम छोड़ दिया है,घर का मकान छोड़ दिया है,जानबूझकर उखड़े उखड़े और मारे मारे जो फिरते हैं,इसमें वे कुछ भला ही सोचते होंगे…..पति ने कहा भी है कि तुम मेरे साथ क्यों दुख उठाती हो,पर सुनकर वह चुप रह गई है.”15

जिस पितृसत्तात्मक समाज ने सुनंदाओं को सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़ा बना दिया है,जिसकी आर्थिक निर्भरता पूरी तरह से पति(पुरुष) केन्द्रित हो उससे यह कहना कि वह उनके साथ क्यों दुख उठा रही है एक क्रूर व्यंग्य ही कहा जाएगा.पूरी कहानी में ‘नैरेशन’ के दौरान सुनंदा की बातें आँखें खोलने का काम करती हैं.सुनंदा की बेचारगी का ‘नैरेशन’ असल में पितृसत्तात्मक समाज की क्रुरताओं का प्रकटीकरण है.जैनेन्द्र इसमें सफल भी होते हैं.सुनंदा अपनी स्थिति को लेकर सोचते हुए भी पति केन्द्रित सोच से निकल नहीं पाती.कहानीकार यह चाहता भी नहीं कि वह निकले.झकमारकर,झल्लाकर सोचना उसने पति को लेकर ही है क्योंकि उसके पास और विषय भी तो नहीं हैं.उसका पति को लेकर चिंता करना,खुफिया पुलिस के आदमी की तैनाती
सेअनभिज्ञ(लापरवाह) पति की चिंता और इन तमाम चिंताओं में ‘खोए’ बच्चे की यादें.“वे बड़ी प्यारी आँखें,छोटी छोटी उँगलियाँ और नन्हें नन्हें ओंठ याद आते हैं.अठखेलियाँ याद आती हैं.सबसे ज्यादा उसका मरना याद आता है.”16

आधुनिक काल में रेनेसां की तमाम बहसों और उपलब्धियों को ध्यान में रखकर सोचा जाए तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि स्त्री को उनसे कुछ नहीं मिला.वह न आजादी ले सकी,न ‘स्व’ की भावना आई और न ‘निजी समय’ और ‘विषय.‘पति के पूछने पर “खाने वाले हम चार हैं.खाना हो गया ?”“सुनंदा चून की थाली और चकला बेलन और बटलोई वगैरह खाली बरतन उठाकर चल दी,कुछ भी बोली नहीं.”17

यह पत्नी का सत्याग्रह(अहिंसा) है.पति के ‘विनयात्मक’ वाक्य पर उसकी प्रतिक्रिया भी ‘मौन’ ही होती है लेकिन उस दौरान भी वह मन में सोचती है.सोचती है “यहा उससे क्षमा प्रार्थी से क्यों बात कर रहे हैं.हँसकर क्यों नहीं कह देते कि कुछ और खाना बना दो.जैसे मैं गैर हूँ.अच्छी बात है,तो मैं भी गुलाम नहीं हूँ कि इनके ही काम में लगी रहूँ.मैं कुछ नहीं जानती खाना वाना.”18


यहाँ दो चीजें ध्यान देने योग्य हैं पहली सुनंदा पति से “मित्रवत्” व्यवहार चाहती है,दूसरे वह बोलती कुछ नहीं.मित्रवत व्यवहार उसकी ‘इच्छा’ को व्यक्त करती है, चुप रहना उसके ‘विरोध’ को.उसके अन्दर कितनी छटपटाहट है,कितनी पीड़ा है इसे इस वर्णन से समझा जा सकता है“कालिन्दीचरण ने जोर से कहा-सुनंदा. सुनंदा के जी में ऐसा हुआ कि हाथ की बटलोई को खूब जोर से फेंक दे.”थोड़ी देर पहले के सुनंदा और और इस सुनंदा में ज़मीन आसमान का फर्क है बल्कि कहना चाहिए मन की सुनंदा और व्यवहार की सुनंदा में ज़मीन आसमान का फर्क है.कालिन्दीचरण अहिंसावादी होते हैं.वे अहिंसात्मक तरीके से देश की आजादी के प्रयासों को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं लेकिन जब पत्नी से “झगड़ा” हो जाता है तब आकर ‘हिंसा’ का समर्थन करने लगते हैं.“कालिन्दी अपने दल में उग्र नहीं समझे जाते थे,किसी कदर उदार समझे जाते हैं…..कुछ लोग उनके धीमेपन पर रुष्ठ भी हैं.वह दल में विवेक के प्रतिनिधि हैं और उत्ताप पर अंकुश का काम करते हैं……पर जब सुनंदा के पास से लौटकर आए तब कालिन्दी अपने पक्ष पर दृढ़ नहीं हैं.वह सहमत हो सकते हैं कि हाँ आतंक जरूरी भी है.”19

जैनेन्द्र ने ऐसे कालिन्दी और सुनंदा के तनाव का रूपक तैयार किया है.पत्नी का ‘असहयोग’ पति के लिए अहिंसा से हिंसा में गमन बन जाता है.यह सुनंदा के विरोध की जीत होती है.सुनंदा(ओं) की दशा के लिए जिम्मेदार तत्त्वों से सुनंनदाएँ अब ऐसे ही विरोध करें.पत्नी केवल पति की सुख सुविधाओं के ध्यान के लिए जन्मी है.वह अपने लिए कुछ नहीं कर सकती.वह अपने लिए तो तब कुछ करे जब पति से अलग उसकी कोई जिन्दगी हो.जैनेन्द्र की सुनंदा में लेकिन यह ‘स्व’ आ चुका है.“सुनंदा ने अपने लिए कुछ बचाकर नहीं रखा था.उसे यह सूझा ही न था कि उसे भी खाना है.अब कालिन्दी के लौटने पर जैसे उसे मालूम हुआ कि उसने अपने लिए कुछ बचाकर नहीं रखा है.वह अपने से रुष्ट हुई.उसका मन कठोर हुआ.इसलिए नहीं कि क्यों उसने खाना नहीं बचाया.इसपर तो उसमें स्वाभिमान का भाव जागता था.मन कठोर यों हुआ कि वह इस तरह की बात सोचती ही क्यों है ? छिः.यह भी सोचने की बात है और उसमें कड़वाहट भी फैली.हठात् यह उसके मन को लगता ही है कि देखो उन्होंने एक बार भी नहीं पूछा कि तुम क्या खाओगी.क्या मैं यह सह सकती थी कि मैं तो खाऊं और उनके मित्र भूखे रहें.पर पूछ लेते तो क्या था.”20

दो दो सुनंदाओं का द्वंद.पहली सुनंदा पति के सुख से सुखी और दूसरी अपनी उपेक्षा से दुखी,विद्रोही.यह दूसरी सुनंदा ही जैनेन्द्र युग की देन है.

संदर्भ ग्रंथ
1.सिंह,सुधा,’ज्ञान का स्त्रीवादीपाठ’,प्रथम संस्करण 2008,ग्रन्थ शिल्पी(इंडिया)प्राइवेट लिमिटेड,दिल्ली. पृ 19
2.वही,पृ 19
3.वही,पृ 19
4.’अज्ञेय’ सम्पूर्ण कहानियाँ,संस्करण 2004,राजपाल एंड सन्ज,कश्मीरी गेट,दिल्ली 110006,(पृ207-215).
5.कुमार,जैनेन्द्र,’पत्नी’,’आधुनिक कहानियाँ’,सं. सुनीता,प्रथम संस्करण 2012,आनंद प्रकाशन,कलकत्ता 700007,पृ 27
6.वही,पृ 27
7. सिंह,सुधा,’ज्ञान का स्त्रीवादीपाठ’,प्रथम संस्करण 2008,ग्रन्थ शिल्पी(इंडिया)प्राइवेट लिमिटेड,दिल्ली. पृ 21
8.सक्सेना,प्रगति,स्त्रियों की पराधीनता,(अनुवाद),2002,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली 110002,पृ 37
9.वही,पृ 41-42
10.वही,पृ46-47
11. सिंह,सुधा,’ज्ञान का स्त्रीवादीपाठ’,प्रथम संस्करण 2008,ग्रन्थ शिल्पी(इंडिया)प्राइवेट लिमिटेड,दिल्ली. पृ24
12.वही,पृ 30
13. सक्सेना,प्रगति,स्त्रियों की पराधीनता,(अनुवाद),2002,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली 110002,पृ 102
14. कुमार,जैनेन्द्र,’पत्नी’,’आधुनिक कहानियाँ’,सं. सुनीता,प्रथम संस्करण 2012,आनंद प्रकाशन,कलकत्ता 700007,पृ 28
15.वही पृ28
16.वही 29
17.वही 29
18.वही पृ29
19.वही पृ30
20.वही पृ31

कोने से कमरे तक: चार पीढ़ियों की अन्तर्यात्रा

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.sudhaarora@gmail.com

वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है.वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा  अपने कमरे की अहमियत के इस सवाल के साथ ही अपने अतीत को देख रही  है… 

याद नहीं कितने बरस हुए, जब वर्जीनिया वुल्फ़ की किताब ‘‘अ रूम आॅफ़ वन्स ओन’’ पढ़ी थी. इससे पहले लगता था – स्त्रियों का तो पूरा घर ही होता है बल्कि घर होता ही स्त्री से है ! घर का पर्याय उस घर की गृहिणी है, फिर घर में एक कमरा हो या दस कमरे, स्त्री के ही होंगे. पर नहीं, यह सच नहीं था. समझ में आया कि पुरुष जितने अधिकार और आधिपत्य से ‘‘मेरा कमरा, मेरा साम्राज्य’’ की बात कर सकता है, स्त्री नहीं कर सकती . घर नामक एक संस्थान की मैनेजर है गृहिणी . वहां रहनेवाले सभी सदस्यों का रख-रखाव, स्वास्थ्य और दिनचर्या, सेहतमंद खान-पान और अच्छी नींद, सब उसके जिम्मे हैं. ….और उसका अपना आप ? उसके लिए तो कमरा क्या, एक कोना भी नहीं जहां वह अपने बारे में फ़ुरसत से, इत्मीनान से कुछ सोचने की मोहलत पा सके. उसके अपने होने, जीने और खुशहाल रहने का नंबर उस घर में आखिरी पायदान पर है. आखिरी पायदान पर यह ओहदा खुद उसने अपने लिए चुना, इसलिये अपराधी भी कोई और नहीं, वह ख़ुद है.

स्मृतियों में लौटूं तो अपनी नानी-दादी याद आती हैं. बेटियों के घर रहने से माता-पिता को ‘नरक’ का भागी होना पड़ता है, इसलिए नानी हमेशा  अपने बेटे के पास ही रहती थीं – पोती और पोतों को संभालती हुईं. वही उनका स्थायी ठिकाना था . नानी को हम भाबी जी कहते थे. मामी भी उन्हें बहुत इज़्ज़त-मान देतीं. पर अपनी दोनों बेटियों यानी मेरी मां और मौसी , में से जिसके बच्चे बीमार हो जाते, वे अपनी एक जोड़ी पोशाक, जपुजी साहब का गुटका, मनकों वाली जाप की माला और तनियों वाली गुत्थी में अपनी जमा-पूंजी के कुछ रुपए पैसों के साथ बनफ़सां  और अजवायन के टोटके लिए तीमारदारी के लिए हाज़िर हो जातीं. उनका छोटा सा साम्राज्य तो उस एक झोले में ही सिमटा होता. नानी के हाथों के दुलार और जी-जान से की गई सेवा टहल से बीमार नातिनें सेहतमंद हो जातीं और वे वापस अपने ठिये पर लौट जातीं . जाते जाते वे दिन के हिसाब से उनकी हथेली में अपनी रोटी-दाल के पैसे थमाना नहीं भूलतीं – ‘रक्ख लओ नी कुड़ियों . धी दे घर रोट्टी खाण दा हिसाब ओस दाता नूं देणा ए.’ अंतिम सांस तक भाबी जी की दिनचर्या ऐसी ही रही. उनका जाना बहुत अखरा . जैसे हमारा डाॅक्टर, हमारा ख़ैरख्वाह चला गया हमें छोड़कर . कई दिनों उनका जाना याद कर करके मैं रोती रही . वे मेरी बेहद प्रिय शख्सियत थीं . गज़ब की स्नेहिल . बच्चों के साथ घुल-मिल कर बच्चा बन जाने वालीं . हमें गोद में बिठाकर जपुजी साहब का पाठ सुनाने वालीं . अपनी आंखों से लाड़ का दरिया उंड़ेलने वालीं . अपनी हथेलियों की मुलायम थपकियों से हमें सुनहरी नींद में सुला देने वालीं .

दादी की किस्म अलग थी. पिता उनके इकलौते लाड़ले बेटे थे. घर में दादी का रुतबा था. घर के सारे क्रियाकलाप उनके इंगित पर परिचालित होते थे. एक-डेढ़ कमरे से हैसियत बढ़ते बढ़ते, तीन तल्ले के मकान तक बढ़ गई पर मां की ओर वह रुतबा स्थानांतरित नहीं हुआ. बेशक मां उस ज़माने की बेहद पढ़ी लिखी लड़की थी . प्रभाकर पास कर साहित्य रत्न में दाखिला लेकर किताबों में छिपाकर अपनी कविताएं लिखती हुई . पर मां की औकात वही रही जो डेढ़ कमरे के वक्त थी. इकलौते बेटे और उनकी लाड़ली मां को बड़ा परिवार चाहिए था सो हर डेढ़-दो साल के अंतराल में एक एक कर सात बच्चे मां ने पैदा कर लिए और अपनी सारी ज़िंदगी उन बच्चों को क़ाबिल, सेहतमंद और संस्कारी इंसान बनाने में ग़र्क कर दी. अपने होने तक उनका सरोकार उनके बच्चे ही रहे. ज़िंदगी ने उन्हें अपनी ओर ताकने और अपने बारे में सोचने की फ़ुरसत ही नहीं दी.

पढ़ाई के दौरान ही मैंने जब लिखना और छपना शुरु किया तो मां को जैसे नयी ज़िंदगी मिल गई. वे जो अपनी कविताएं छिपाकर रखती थीं, मुझे मेरे नाम से छपते देख मुतमइन होती रहीं. उनकी गर्वीली मुस्कान मैं पहचान रही थी . मुझमें उन्होंने अपना विस्तार देखा. उनकी सारी रचनात्मक आकांक्षाएं मुझ तक स्थानांतरित हो गईं. उनकी ज़ेहनियत ने सिर उठाया.  हर मां अपने बच्चों में उन कोंपलों को अंकुरित देखना चाहती है जो वह अपनी शाखाओं पर अंकुरित नहीं कर पाती और उस न कर पाने के बोझ तले अपनी कराह को भी अपने से छिपाती रहती है. जिन्होंने किसी ज़ोर-जुल्म के लिए कभी अपनी ज़बान नहीं खोली थी , मेरी पढ़ाई के लिए वे दादा-दादी के सामने मेरे ढाल-कवच की तरह खड़ी हो गईं. घर गृहस्थी की उनकी बेशुमार ज़िम्मेदारियों में घर के बड़े बुज़ुर्गों के साथ मेरे लिए उतनी लड़ाई जीत लेना ही उनके लिए काफ़ी था. न सिर्फ़ मेरी शादी के तयशुदा रिश्ते को उन्होंने सिरे से अपदस्थ किया, मुझे उस बेमेल शादी  से बचा लिया बल्कि उसका सारा दारोमदार भी अपने सिर ले लिया . मेरे हाथ में कलम कागज़ देखते ही वे इसी कोशिश में रहतीं कि घर के कामकाज का बोझ वे अकेले उठा लें . न मुझे एक गिलास पानी लाने को कहतीं, न किसी को मेरे पास फटकने देतीं. उस बड़े से घर का वह छोटा सा कोना मेरा, नितांत मेरा था जिसमें पढ़ने की मेज़ थी. मेरा काम पढ़ना और सिर्फ़ पढ़ना था. हर बार जब मैं पूरे काॅलेज में या विश्विद्यालय में टाॅप करती, मां गर्व की चमक से भर जातीं .

लिखने-पढ़ने की वैसी सहूलियतें और अपने लिए वैसा आरक्षित कोना उसके बाद मुझे बहुत सालों तक नहीं मिला . मां के घर में सबकुछ इतनी सहजता से मिला था कि उसकी अहमियत का अहसास तक नहीं हुआ. मुझे उन्होंने शिक्षा के साथ साथ बेचैनी का कीड़ा तो सौंप दिया था जो मुझसे लिखवाता था पर आर्थिक आत्मनिर्भरता का पाठ नहीं पढ़ा पाई . न मेरी ही लेखकीय जुनून से अंटी पड़ी बुद्धि में वह चिनगारी कौंधी . शिक्षा और शिक्षा की चमक हमें आगे तो बढ़ाती है, हमारी राहों को उजला भी करती है पर उन संस्कारों का क्या करें जो पैरों में बेड़ियां नहीं, पायल की तरह झनकारते हुए हम साथ ले आते हैं . गोया वे संस्कार एक तमगा, एक शिल्ड है गर्व करने के लिए.  सो संस्कारों से लंदे फंदे मानस का, शिक्षा और गले में लटके स्वर्णपदक भी क्या परिष्कार करते !

शादी के बाद लेखन का कम होते होते बंद हो जाना मुझसे ज़्यादा उनके लिए त्रासद था . शायद हर स्त्री के लिए शादी  के बाद का यह बदलाव और अपनी ‘स्पेस’ का छिन जाना जल्दी से पहचान में नहीं आता . वह एक लड़की से औरत और औरत से ‘मां’ के चमकदार ओहदे से इतनी आक्रांत रहती है कि अपना आप उसके हाथ से छिटककर कहीं दूर जा गिरता है. इस गिरने की आहट भी नहीं होती . अर्थसत्ता और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के सामने सबकुछ बड़ी सहजता से होम होता रहता है और नये नये परिवार की नयी ज़िम्मेदारियों के बीच वह उन्हें देख भी नहीं पाती. वह जो कोना मां ने संजोया था, अपने कहे जाने वाले तथाकथित घर में एक बार खोया तो ऐसा कि उसे ढूंढने में तेरह साल लग गए.

अक्सर औरतों के साथ यह होता है और उन्हें इसकी पहचान भी नहीं होती. जब पहचान हुई तो उसे अपनी नोटबुक में इस तरह बयान किया – एक पढ़ी-लिखी हिदुस्तानी औरत की त्रासदी ही यह है कि पूरी तरह घर, पति और बच्चों को समर्पित, अपनी निजी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण और सुनहरा हिस्सा वे अपना घर सुचारू रूप से चलाने में, अपने पति की रुचि और पसंद के अनुसार अपने आपको ढालने में, अपने बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य की चिंता में होम कर देती है. अपने पति और बच्चों को आगे बढ़ते, फलते-फूलते देखकर वह एक लंबे अरसे तक अपने तईं परम तृप्त , अघाई रहती है, जब तक उसके सींचे हुए पौधे अपनी जड़ों में पानी डालने के लिए उसके मोहताज नहीं रह जाते. तब जाकर अपने आप को ढूंढने का उसका अभियान शुरु होता है पर उसका अपना आप उसके ढूंढे नहीं मिलता .

चालीस-पैंतालीस की उम्र के बाद यह औरत अचानक पाती हैं कि वह एक फालतू सामान की तरह घर में पड़ी है . बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं और मां उनके लिए बहुत बड़ी जरूरत नहीं रह गई है. पति के लिए वह एक ‘आदत’ बन चुकी है. अब या तो वह पुराने जमाने की औरत की तरह अपने तथाकथित ‘त्याग’ को लेकर आत्ममुग्ध स्थिति में गद्गद् भाव से प्रतिष्ठता हो ले या अपने बीते दिनों की जुगाली कर आंसू बहाए. होता यह है कि अपने घरेलू सिंहासन के आकस्मिक स्थानांतरण से बौखलाकर वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है और अपने अस्तित्व की सार्थकता की तलाश  में छटपटाती है. इसे वह ‘मेनोपाॅज’ या ‘हाॅर्मोन्स’ के ‘इम्बैलेन्स’  का नाम देकर अपने को बहलाने में एक हद तक कामयाब भी हो जाती है. ज़ाहिर है, अपनी ‘स्पेस’, अपना कमरा और कमरे का वह कोना माइनस हो चुका होता है.

शायद इसीलिए जब वह कलम कागज़ मेरी जिंदगी से परे हो गए तो मुझसे ज़्यादा तकलीफ़ मां को हुई . हर उस औरत को होती है जो अपने बच्चों को अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए देखना चाहती है और उसके सपनों के बूते ज़िंदा रहती है. अपनी बेटी को अपनी ही तरह, फिर से एक औरत होने के संजाल में भरभराकर ढहते देखना उसके लिए बहुत मारक होता है.

ख़ैर, यह स्थिति लंबी नहीं खिंची . लिखना शुरु हुआ और वह कोना जो घर में बाहर से ज़्यादा मन के भीतर था, रात को सबके सो जाने के बाद जगता था और घर के सदस्यों की चैन की नींद में खलल डाले बिना, अपनी बेचैनी को कागज़ पर उंड़ेलता था.  भारत में मध्यवर्ग की अधिकांश  महिला रचनाकारों का लेखन उस पसरती रात को ही आकार लेता है जब वह घर-गृहस्थी के सारे काम निबटा चुकती है, बच्चे और बड़े नींद के आगोश  में चले जाते हैं और वह किसी की जवाबदेह नहीं होती . वह समय उसका अपना होता है . रात के इसी प्रहर में आलोकित होता है वह कोना जिसकी उसे हमेशा  तलाश रहती है.

मेरा वह कोना भी लंबी  तलाश के बाद मुझे मिल ही गया और इसी कोने में मेरा ‘मैं’ ज़िंदा रहा . अब यह मेरी आदत से ज़्यादा मेरा जुनून बन गया है और मुझे यह कोना चाहिए ही. अब वह रात में ही नहीं , दिन-दोपहर-शाम, जो  कि चौबीस घंटे मेरे साथ होता है. खोई हुई चीज़ें जब मिल जाती हैं तो बड़ी बेशकीमती होती हैं. उन्हें हम ताउम्र संभाले रखना चाहते हैं.

नहीं, इसे पढ़कर परेशान न हों. बदल रहा है यह माहौल . मेरी दोनों बेटियों ने अपने बेशकीमती ‘स्पेस’ को शादी के बाद भी बरकरार रखा. आज की लड़की चाहे वह मध्यवर्ग की हो या निम्न वर्ग की , रात के ढलते प्रहर का इंतज़ार नहीं करती . वह अपने को ढूंढना, अपने को पाना सीख रही है . उसकी प्राथमिकताएं बदल रही हैं . हमने उन्हें यह पाठ बेशक न पढ़ाया हो पर हमारी पीढ़ी की कुलबुलाहट और अकुलाहट देख देखकर उसने खुद इस रोशनी को पहचान लिया है.

आज की पीढ़ी की लड़की, अपने जागने के लिए, सबके सोने का इंतज़ार नहीं करती . यह कितनी बड़ी सीख है जो उसने हमारी सीख के बग़ैर भी अपने लिए हासिल की है. उसके अपने कोने को छीनने का अब किसी को हक़ नहीं.

रंजनाशरण की कविताएँ

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रंजनाशरण


कवयित्री,नागपुर विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में इंग्लिश पढ़ती है . संपर्क :9371131735

तानतानी के फूल

सूरज निकलने के पहले ही
घुंघलके में वह जागती है
और तेज कदमों से बढ़ती है
उन बंगलो की ओर
जहाँ जूठेबर्तन, झाडू और बासी बिखरा रसोई घर
उसका इन्तजार कर रहे होते है
हाँ! वह जिन्दा है
हल्के बैंगनी और गहरे पीले
तानतानी के फूलों की तरह
जो सूखी पथरीली मिट्टी के फैलाव में
खिलते रहते हैं:
कंटीली झाडियों
और भूरी पत्तियों का
एक बेजान विस्तार
उसकेअन्दर छिपे हुए कुछ रहस्य
जीभ लपलपाते हुए
बाहर निकलना चाहते हैं
उसकी इच्छा के विरूध्द.
परन्तु जल्दी ही
वे मुँह की अलमारी में
कैद हो जाते है.
आदिम प्रजाति की श्यामला
काले संगमरमर की एक मूर्ति
दो सुडौल गोलों ने उसे बना दिया है
एक जिन्दाऔरत !
अन्तःपुर की मद्धिम रोशनी में
न जाने कितनी बार उसे
बनाया और तोडा गया-
अपरिभाषित कमरे
लहसुनऔर तली मछलियों की
गंध से भरा रसोई घर
और विशाल वातानुकूलित बैठक
जहाँ हैसियत
लंबे काँच के गिलासों में
झाग उगलती है.
जीवन की कठिन या़त्रा के दौरान
घण्टे दिन और साल
यायावर पक्षियों की तरह
सुदूर अजनबी प्रदेश  में उड चले
अग्निपथ पर थके पाँवो की
अंतहीन यात्रा
कोई राहत नही
गर्म हवाओं से
जिन्होंने बीस सुहाने वसन्तों को
भट्ठी में झोंक दिया,
गर्मी के दिनोंऔर तूफानी रातों में
वह बन जाती थी
पेड पर अटकी

एक प्लास्टिक की पन्नी
जो हवा के तेज झोंकों से
फूलती और पचकती थी.
परन्तु आज वह स्त्री
आग और शीत के बीच
अपनी दौड को
रोक देना चाहती है;
वह अपनी दुनियां से
ऊपर की और देखती है
और पाती है
एक केसरिया आकाश
वह सुनती है
प्रभात के पद चापों को
जो तारों भरे आकाश  के
झूमरों को रौंदता हुआ
आ पहुँचता है
और बन बैठता है
प्रथम सत्र का अक्ष्यक्ष !

बौना

समय 3.45
सुबह होने से पहले
डूबते चाँद की रोशनी
उसके कमरे में
नदी की बाढ की तरह
फैल जाती है.
आधा सोया और आधा  जगा
वह आदमी सपने में बुदबुदाता है
और दाँत पीसता है-
गंगा घाट पर
एक हरा-भूरा घडियाल
अपने शिकार को पकडकर
चीर डालता है
और मरे हुए जीव को
अपनी मादा के पास
घसीटता हुआ ले जाता है

शेकू मेरे बेटे
कहाँ हो तुम ?
पापा…….पापा…….पापा……..
अपने नौ वर्ष के बेटे को
वह आदमी बचाना चाहता है
परन्तु उसेअपना कद
घटता हुआ महसुस होता है
गली वर प्रदेश  के
एक बौने की तरह

दु:स्वप्न  उसे बुरी तरह
झकझोर देता है;
पसीने से सराबोर
वह चौक कर
उठ बैठता है ;
उसे याद आता है
वह मनहूस दिन
जब उसका बेटा
अगवाकर लिया गया था-
दो नकाबपोश दिनदहाडे
उस मासूम पर
गिध्द की तरह
टूट पडे थे और दबोच कर
काले शीशेवाली गाडी में
ठूंस दिया था.
लोगों ने सुनी उसकी चीख पुकार
और मदद की गुहार,
परन्तु वे देखते रहे मौन
कुछ मजबूर थे
कुछ कौतुहल वश
तमाशा  देख रहे मौन:
गाडी चल पडी थी पूरे वेग से
और जल्दी ही आँखों  से
ओझल हो गई थी
धूल भी नही उडी
उस आदमी ने
हथियार डाल दिये-
तकदीर के आगे?
भय मे मारे ?
शहर में स्वच्छन्द धूमते
भेडिये और सियारों के भय ने
उसे बौना बना दिया
दुःख और पश्चताप से घिरा
वह अपनी खिडकी से बाहर देखता है
उसकी थैली भरआई है
वह अपने शरीर से
पीले पानी को निकालता है
और निश्चित हो
एक नींद की गोली
निगल लेता है.



आदि और अन्त  


जब रूपहली आभा ने
आकाश  का आलिंगन कर
उसे अन्धकार मुक्त किया
वह नींद से जागी ;
उस अलौकिक क्षण में
उसने देखा एक दिव्य शिशु
उसके जीवन का प्रथम और अन्तिम अक्षर !
श्वेत एवं नग्न
वह उसके वक्षस्थल के पास पडा था

शिशु को देख
भावनाएँ उमड पडीं
समुद्र तटपर
उठती लहरों की तरह
भाग्य की डोर से बंधी
उस स्त्री ने अपने अनेक शिशुओं को
उनकी शाप मुक्ति के लिए
जल में प्रवाहित कर दिया था-
भगीरथ की गंगा की तरह
परन्तु अब यह भागीरथी
शिशुओं का विछोह
नही सहन कर सकती
अन्दर की धीमी आवाज
हाहाकार बन जाती है
और वह नन्हे शिशु  को
बाहों  में समेट
अपनी छाती से चिपका लेती है:
तभी आसमान का गुलाबी पर्दा हटाकर
सूरज झाँकता है
और शाप की कालीसाया
दूर हो जाती है-
आदि  और अन्त से परे
वह पल अनन्त हो जाता है

महात्मा जोतीबा फुले का ब्राह्मणवाद से संघर्ष

सुजाता पारमिता

बिना विद्या मति गयी, बिना मति नीति गयी।
बिना नीति गति गयी, बिना गति वित्त गया।
बिना वित्त शुद्र दबा, इतना अनर्थ अविद्य से हुआ।

-जोतीबा फुले

1860 का पुणे

ब्रिटिश काल में सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी लडाई लडने वाले महान योद्धा महात्मा जोतीबाराव फुले का स्थान भारतीय सामाजिक क्रान्तिकारियों में सबसे महत्वपूर्ण है। हजारों वर्षों से भारत में शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों पर होनेवाले अत्याचारों के विरूद्ध उनके संघर्षों के कारण ही ब्रिटिशराज में परिवर्तन आने शुरू हुये और अंग्रेज शासकों द्वारा नये कानून बनाये गये। जोतीबा ने भारतीय समाज की सबसे बडी बीमारी जाति व्यवस्था और उसकी जड ब्राह्मणवाद को न केवल समझा बल्कि उस पर जबरदस्त प्रहार भी किये जो परिवर्तनवादी जन आन्दोलन के इतिहास मे स्वर्ण अक्षरो में दर्ज है। इसी कारण डॉ. आंबेडकर  ने उन्हें अपना गुरू माना और उनके सामाजिक दर्शन को अपने आन्दोलन का मुख्य आधार बनाया। ब्राह्मणवाद और पुरोहित वर्ग दोनों से ही जोतीबा का संघर्ष तब तक चलता रहा जब तक वे जीवित रहे। उनके आन्दोलन का केन्द्र हिन्दु धर्म की वे तमाम कुरीतिया और परम्पराये थीं जो ब्राह्मणवाद की सदियो से पोषक रही है और जिसके कारण ही देश के बहुसंख्यक नागरिक वर्ग को शिक्षा समेत सभी मानवाधिकारों से सदियों तक वंचित रहना पड़ा।

ब्राह्मणवर्ग विशेषकर पुरोहितों ने अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिये ही वर्ण व्यवस्था की स्थापना की थी। अंततः पीडित बहुसंख्यक जनता, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसका विरोध करती रही। वर्ण व्यवस्था से लाभ उठाने वाला दूसरा वर्ग शासकों का था, जिन्होंने पुरोहितों के हितों को अगर बढाया नहीं तो घटाया भी नहीं। अंग्रेज शासकों ने भी उसी नीति का अनुसरण किया, उनके द्वारा ब्राह्मणों के बीच शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिये जो कुछ किया गया उसका लिखित प्रमाण उपलब्ध है। बरतानिया सरकार भी ब्राह्मणों को तुष्ट करने और उनका सहयोग प्राप्त करने में अपने पूर्ववर्ती शासकों से पीछे नहीं रही। उनकी मान्यता थी कि साम्राज्य के स्थायित्व के लिये यह जरूरी है। अंततः 1813 के चार्टर एक्ट में शिक्षा पर खर्च करने के लिये जो एक लाख रूपये का प्रावधान किया गया था उसका एक अंश ब्राह्मणों की शिक्षा पर खर्च किया जाने लगा। बनारस संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना (1791) से लेकर 1820-21 तक वहां  तथा दिल्ली, आगरा और पुणे स्थित सभी महाविद्यालयों में भरती केवल छात्रवृत्ति प्राप्त विद्यार्थियों तक ही सीमित थी जो सभी ब्राह्मण थे। 1820-21 के बाद, मांग को देखते हुये, यद्यापि इन महाविद्यालयों में गैर- ब्राह्मण विद्यार्थियों की भी भरती होने लगी, पर छात्रवृत्ति केवल ब्राह्मण विद्यार्थियो को ही दी जाती रही। 1836 मे इस योजना को समाप्त करने का निर्णय लिया गया जो 1838 से लागू हुआ। इसके परिणाम स्वरूप जहाँ 1833 मे दिल्ली महाविद्यालय मे 431 छात्र थे जिनमें से 377 छात्रों को छात्रवृत्ति मिलती थी। वहाँ 1840-41 मे छात्रों की संख्या घटकर मात्र 155 रह गयी। 1838 के बाद अंग्रेजी शासन ने ‘इनकिलट्रेशन‘ नाम से एक नयी योजना की शुरूआत की जिसका उद्देश्य था कि पहले ऊपर के वर्ग यानी ब्राह्मणों को शिक्षित किया जाय, ऐसा करने से शिक्षा स्वतः ही निचले स्तर तक पहुंच जायेगी। अंग्रेज सरकार का जमीनी सच्चाइयों से कोई सरोकार नहीं था, अगर वे इस ओर जरा सा भी ध्यान देते तो उन्हें यह समझते देर नहीं लगती कि, जिस वर्ग ने सदियों से निम्नवर्ग को पढने के अधिकार और अवसरों से बराबर वंचित रखा, भला वे क्योंकर उन्हें पढाते, अंततः वह योजना बुरी तरह असफल रही। उसके बाद 1854 में ‘वूडस डीस्पैच’ आया, जिसके अन्तर्गत सरकार ने जनता को शिक्षित करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया। यह जिम्मेदारी किस प्रकार निभायी गयी इसके साक्षी हंटर कमीशन (1881) मे जोतीबा के दिये गये वे प्रतिवेदन है, जिसमें कई जगह यह बताया गया है, कि किस प्रकार ब्राह्मण शिक्षको और विद्यार्थियो ने निम्न वर्ग के गरीब विद्यार्थियो की शिक्षा के मार्ग में रोड़े अटकाये।

जोतीबा अशिक्षा, अज्ञानता और अंधविश्वास को दलित और स्त्रियों की मुक्ति में सबसे बड़ी बाधाएं मानते थे। इसीलिए उनके सामाजिक संघर्षो में शिक्षा का स्थान र्स्वोपरि था। वे सभी जाति व धर्मों के गरीब, दलित और स्त्रियों की शिक्षा के सबसे बड़ं हिमायती थे। और इसके लिए उन्होने विशेषरूप से पहला स्कूल स्त्रियों के लिए 1 जनवरी 1848 में पुणे की भिड़ेवाड़ी में खोला, जो भारत में स्त्री शिक्षा का पहला स्कूल था। इसी स्कूल में अध्यापन का काम शुरू कर सावित्रीबाई देश की पहली स्त्री शिक्षिका बनीं। 15 मई 1848 को पुणे की एक दलित बस्ती में दूसरा स्कूल खोला, जहां गरीब, दलित बच्चों को बढ़ाया जाता था। जोतीबा ने 1855 में एक रात्रि पाठशाला आरंभ की जहां दिन में काम करने वाले स्त्री पुरूष को शिक्षित किया जा सके, इसी पाठशाला में फातिमा शेख ने भी शिक्षा पाई,  जिन्होंने आगे चलकर फुले दम्पत्ति द्वारा चलाये जाने वाले एक स्कूल में अध्यापन का काम कर मुस्लिम समाज की पहली स्त्री शिक्षिका होने का गौरव हासिल किया। दलितों में शिक्षा के विस्तार को ध्यान में रखकर जोतीबा ने पहला पुस्तकालय भी खोला।

जोतीबा धार्मिक कार्यों में ब्राह्मण पुराहितों की सहायता लेने के विरूद्ध थे। इसलिये जनमानस में चेतना के प्रसार के लिये उन्होंने दो पुस्तकें लिखी – पुरोहितों का पर्दाफाश (1867) और ब्रिटिश साम्राज्य में ब्राह्मणी वेश में गुलामी (1873) पहली पुस्तक मे जोतीबा ने बताया कि किस प्रकार जन्म से मरण तक विभिन्न कर्मकाडों द्वारा पुरोहित यजमानों का आर्थिक शोषण करते हैं और दूसरी पुस्तक में किस प्रकार लोगों की अशिक्षा अज्ञानता तथा अन्धविÜवास का लाभ उठाकर ब्राह्मणों ने शूद्रों और अतिशूद्रों को गुलाम बनाये रखा है। उन्होंने 1872 में इसी आशय का एक घोषणापत्र भी प्रकाशित किया। जोतीबा सिर्फ पुस्तक लिखकर बैठ जाने वाले व्यक्ति नहीं थे, इसीलिये 24 सितम्बर 1873 को उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की एक सभा आयोजित की, जिसमें मार्गदर्शन के लिये सत्यशोधक समाज नाम से एक केद्रीय सगंठन बनाया गया। बाद मं  कई स्थानों पर उसकी अन्य शाखायें स्थापित की गयीं।

जोतीबा ने ब्राह्मण पुरोहित के बिना ही दो विधवा विवाह सम्पन्न कराये। पहला विवाह दिसम्बर 1873 में और दूसरा उसी के पाँच महीने बाद मई 1874 में। ब्राह्मणों ने विवाह रोकने के लिये क्या कुछ नहीं किया पर सफल न हो सके। इसके बाद जोतीबा के एक अनुयायी ने भी अपने बेटे का विवाह ब्राह्मण पुरोहित के बिना सम्पन्न कराया इस पर पुरोहित मामले को न्यायालय में ले गया। अवर जज ने जो स्वयं ब्राह्मण थे, उस पुरोहित के पक्ष में ही निर्णय दिया। इस निर्णय से खिन्न जोतीबा ने जिला न्यायाधीश के यहाँ अपील की। जिला न्यायधीश ने निचले न्यायालय के फैसले के विरूद्ध निर्णय दिया। पुरोहित कहाँ हार मानने वाला था उसने उस निर्णय के बाद मुम्बई उच्च न्यायालय में अपील दायर की परन्तु वहाँ भी वह हार गया। इस प्रकरण के बाद से पुणे का ब्राह्मणवर्ग पूरी तरह से जोतीबा के खिलाफ हो गया।

यहाँ इसी से मिलते-जुलते एक अन्य मुकदमे का जिक्र करना जरूरी है। 1878 पुणे में एक व्यक्ति ने अपने पुश्तैनी पुरोहित की बजाय अन्य पुरोहित से अपने बेटे की शादी करवायी प्रभावित पुरोहित ने महादेव गोविन्द रानडे के न्यायालय में, जो उन दिनों पुणे में ही प्रथम श्रेणी के अवर जज थे, मुकदमा दायर किया जिसमें दक्षिणा के अलावा हरजाने की भी मांग की। रानडे ने पुश्तैनी पुरोहित के पक्ष में निर्णय दिया और कहा कि वादी को बुलाना या ना बुलाना प्रतिवादी की इच्छा पर निर्भर नहीं करता लेकिन बाद में जिला और उच्च दोनों ही न्यायालयों ने न्यायमूर्ती रानडे के इस फैसले को रद्द कर दिया अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम घातक हो सकते थे। ब्राह्मण पुरोहितों के बिना वैद्य विवाह सम्पन्न नहीं हो सकते इस परम्परावादी दलिल को अमान्य करने वाला बम्बई न्यायालय तीसरा न्यायालय था। बंगाल तथा तत्कालीन पश्चिमोत्तर  उच्चतर न्यायालाय इसे पहले ही अस्वीकार कर चुके थे, बाद में मद्रास उच्चतर न्यायालय ने भी इसे नामंजुर कर दिया था जिसके बाद तो यह विवाद का विषय ही नहीं रहा। जोतीबा के लिये यह बड़ी जीत साबित हुयी।

विभिन्न भारतीय प्रांतों में पहले से ही प्रचलित दक्षिणा प्रथा को अंग्रेज शासकों ने अपने शासन काल में भी जारी रखा। बारहाल उन्होंने दक्षिणा कोष की अधिकतम सीमा 50,000 रूपये तक वार्षिक निर्धारित कर दी। कई अन्य उपाय भी किये गये जिनसे दक्षिणा पाने वाले ब्राह्मणों की संख्या धीरे-धीरे कम होती गयी। एक बार तय किया गया कि बची हुयी राशि में से प्रतिवर्ष 20,000 रूपये पुणे महाविद्यालय को दिये जायेंगे क्योंकि उसमें अधिकतर ब्राह्मण ही पढते-पढाते थे। एक बार जब कोष मे 3,000 रूपये अतिरिक्त बच गये तो पुणे के कुछ सुधारवादी ब्राह्मणों ने गवर्नर को आवेदन दिया कि इस बची हुयी राशि को आधे-आधे भाग मे बाँट कर संस्कृत और मराठी में मौलिक साहित्य तैयार करने वाले साहित्यकारों को परितोषिक के रूप में दे दिये जाये लेकिन पुणे के परम्परावादी ब्राह्मणों ने इसे जाति विरोधी मान कर इसके लिये पहल करने वालों को दंडित करने के लिए एक समिती गठित की और सभा के लिए एक दिन भी निश्चित  किया। जब समझाने से काम नहीं बना तब सुधारवादियों ने जोतीबा से भेंट कर मदद मांगी। जोतीबा ने तब कुछ दलित बस्तियों में से 200 हट्टे-कट्टे जवान लडके जमा किये और जुलूस बनाकर निर्धारित स्थान पर पहुँचे। जोतीबा के साथ उन लोगों को देखकर, वहा जमा हुये ब्राह्मणों के होश उड गये, लेकिन जोतीबा के सुझावों पर उन्होंने अपनी सहमति दे दी और वे समझौते के लिए राजी हो गये। बाद मे गवर्नर ने भी बची हुयी राशि को साहित्य सृजन के कार्य पर खर्च किये जाने की अनुमति दे दी।

पेशवा का दरबार


बडौदा राज मे बहुत वर्षो से ब्राह्मणो को रोज मुफ्त
खिचडी बांटने की प्रथा चली आ रही थी। राजकोष से इस प्रथा पर प्रतिवर्ष एक मोटी रकम खर्च की जाती थी। जोतीबा ने 1884 मे बडौदा महाराज को इसके संबध में लिखा और उनसे जा कर मिले। उन्होंने महाराज को समझाया की जब कठोर परिश्रम कर राजकोष भरने वाले किसान भूखे-नंगे जीवन जी रहे हैं तब ब्राह्मणों पर इतना खर्च करना कहाँ तक उचित है। उसके बाद बडौदा राज मे खिचडी बाँटने की प्रथा को समाप्त कर दिया गया।

जोतीबा के जीवनकाल में पुणे जिले में जमींदार और साहूकार प्रायः सभी ब्राह्मण थे। सरकारी कार्यालयों में भी निम्न और मध्यम स्तर पर काम करने वाले सभी कर्मचारी ब्राह्मण थे। अतः गरीब दलित और पिछडे वर्ग के लोगों को कहीं से भी न्याय नहीं मिलता। जोतीबा ने इस स्थिति से निपटने के लिये ‘दीनबन्धु’ नाम की एक पत्रिका निकाली। उसके बाद उन्होंने खेतिहरो की चाबुक (1873) शीर्षक से एक पुस्तक लिखी जिसमें गरीब किसानों की समस्याएँ उसके कारण और निदान पर प्रकाश डाला गया। सरकारी कर्मचारीयो के शोषण से गरीब जनता की रक्षा के लिये जोतीबा ने अपनी पुस्तक में यह मांग रखी की सरकारी नौकरीयो में ब्राह्मणों की नियुक्ति उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक ना की जाय बाकी बचे स्थानों पर शूद्रों-अतिशूद्रों के होनहार युवको को प्रशिक्षित कर नियुक्त किया जाय। पुरोहितों के चुंगल से शूद्रों की रक्षा करने के लिये उन्होंने प्राईमरी शिक्षा को अनिवार्य बनाने की मांग की। जोतीबा ने शूद्रों, अतिशूद्रों और किसानों के कल्याण के लिये जो सुझाव उस वक्त बताये थे इतने वर्षों बाद आज कार्यान्वित किये जा रहे है। जिनमें नदियों पर बांध बांधना, कुएँ खोदने के लिये सरकार द्वारा गरीबों को वित्तीय सहायता प्रदान करना, समय-समय पर प्रदर्शनी लगाकर स्वरोजगार के साधन उपलब्ध कराना, अच्छी नस्ल के मवेशियों का आयात करना तथा वैज्ञानिक ढंग से खेती की शिक्षा जनमानस तक पहुँचाना शामिल हैं। पुणे जिले की जुनार तहसील में 1884 में जोतीबा ने गरीब किसानों पर होने वाले जुल्मों के विरोध में देश का पहला किसान सत्याग्रह किया,  जो सालभर तक चला और तभी समाप्त हुआ जब जमींदार, साहूकार और सरकार के प्रतिनिधियों ने स्वयं आकर जोतीबा से समझौता किया।

पानी का सवाल दलितों के जीवन का सबसे बड़ा मुश्किल रहा। अपनी जमीन न होने के कारण उनका जल-संसाधनों पर कोई अधिकार नहीं था। इसीलिए पानी हमेंशा से ही उनकी पहुंच के बाहर रहा। ज्योतिबा ने 1860-1868 में दलितों के लिए अपने घर के पानी का हौद खोल दिया। जहां से सभी को पानी लेने की अनुमति थी।

दलितों के बीच चेतना जगाने और दलित नेतृत्व तैयार करने के लिये जोतिबा निरन्तर दलित बस्तियों में आया-जाया करते थे। जोतिबा भारतीय मजदूर आन्दोलन के जन्मदाताओं में प्रमुख थे। वे जब भी मुंबई जाते अपने प्रवास के दौरान मजदूर बस्तियों में भी जरूर जाते। नारायणराव लोखंडे जिन्होंने 1880 में देश का प्रथम मजदूर संगठन ‘बम्बई मीलहैड’ की स्थापना की थी। उनके अनुयायी और सत्य शोधक समाज के प्रमुख सदस्य थे। 1889 मे बम्बई नगरपालिका और अलिबाग नगरपालिका के दलित मजदूरों ने जो सफल हडताल की थी वह भी जोतीबा के प्रयासों का ही नतीजा था।

आज शिवाजी महाराज पर अपना दावा ठोंकने वालों को यह शायद ही याद हो कि जोतिबा ने ही रायगढ जाकर पत्थर और पत्तियों के ढेर तले दबी जीर्ण शीर्ण अवस्था में पडी शिवाजी महाराज की समाधी को ढूँढ निकाला और उसकी मरमत्त भी करवाई। बाद में उन्होंने शिवाजी महाराज पर एक छन्दबद्ध जीवनी भी लिखी।

स्मृतियाँ और पुराण शूद्रों और स्त्रियों के खिलाफ वह अध्यादेश है, जो उनके जीवन को पूरी तरह से नियन्त्रित करता है। उन्हें गुलामी में जीने के लिये बाध्य करता है, आज भी जिसका असर भारत के सभी धर्मो पर समान रूप से दिखायी देता है। अस्पृशता, देवदासी प्रथा, सती प्रथा, बालविवाह, कन्याभ्रूण हत्या, बेगारी और विधवा विवाह पर पाबन्दी जैसी अनेक अमानवीय धार्मिक प्रथाएँ हैं, जो देश के लगभग सभी राज्यों में अगर आज जिंदा है, तो इसके पीछे भी पुरोहित वर्ग का ही हाथ है। हालाँकि जोतीबा के समय में कानून सती प्रथा को बन्द किया जा चुका था और कहीं-कहीं विधवा विवाह होने लगे थे। पर महिलाओं की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति में कोई विशेष अन्तर नहीं आया था। जोतीबा ने विष्णू शास्त्री पंडित द्वारा चलाये जा रहे विधवा विवाह आन्दोलन में पूरा सहयोग दिया। उन्होंने बाल-विवाह और बहुविवाह का भी खुलकर विरोध किया। उनके द्वारा लिखी गयी ‘सतसार’ नामक एक पुस्तिका में भी स्त्रियों की स्थिति पर रोशनी डाली गयी है। यहाँ विशेष रूप से ऐसी दो घटनाओं का जिक्र जरूरी है जो साबित करती हैं कि जोतीबा के विचार इन मुद्दों पर कितने कठोर थे। एक बार जब महादेव गोविन्द रानडे जो उन दिनों पुणे में जज थे, जोतीबा को बताया कि उनकी भी एक बाल विधवा बहन है, तो उन्होंने दुखी हो कर पूछा कि उसका विवाह क्यों नहीं किया गया। जब रानाडे से जबाब देते नहीं बना और वे टाल-मटोल करने लगे तो पास बैठे जोतीबा भडक गये और गुस्से में बोले ‘राव साहब, आप अपने आप को आगे से समाज सुधारक ना ही कहें तो अच्छा होगा’। बाद में जोतीबा ने रानडे को दूसरी बार तब फटकारा जब उन्हें पता चला कि अपनी पहली पत्नी के मरने के बाद उन्होने 32 वर्ष की उम्र में एक 11 वर्ष की बच्ची से दूसरा विवाह किया।

ब्राह्मणवाद से शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों के सम्मान और अधिकार के लिये शायद ही किसी ने इतना संघर्ष किया जितना कि जोतीबा ने किया। आज भी अनके विचार सभी भारतीय दलित और स्त्रीवादी आन्दोलन के लिये मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं, जब पूँजीवाद और  भूमंडलीकरण की बदौलत उपजी भयानक असमानता की चपेट में आया गरीब दलित और आदिवासी वर्ग लगातार मर रहा है।

सुजाता पारमिता थियेटर और आर्ट क्रिटिक हैं, सामाजिक कार्यकर्ता और साहित्यकार हैं. संपर्क : sujataparmita@yahoo.com

क्रांति के अग्रदूत का जाना: लाल सलाम कामरेड

गुंजन सिंह

शोधार्थी,मानवविज्ञान विभाग, हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा . संपर्क :gunjansingh070@gmail.com

हमारे समय के सर्वाधिक लोकप्रिय क्रांतिकारी नायक फिदेल कास्त्रो का निधन पूरी मानवता के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है. उन्हें क्यूबा में समाजवादी क्रांति का जनक माना जाता है. बीसवीं शताब्दी का इतिहास जब मेहनतकश आवाम के नज़रिए से लिखा जाएगा तो उसमें सबसे ऊपर के पायदान में फिदेल का नाम होगा. जब पूरी दुनिया में अमेरिकी साम्राज्यवाद अपने सबसे बर्बर स्वरुप में दिखाई दे रहा था, उस समय भी इस बर्बरता को चुनौती देने का काम फिदेल के नेतृत्व में क्यूबा जैसे छोटे से देश की तरफ से हो रहा था. फिदेल ने समाजवाद का एक ऐसा विकल्प पूरी दुनिया के सामने रखा, जहाँ नस्ल, लैंगिक व वर्गीय आधार पर होने वाले शोषण के बरखिलाफ राजसत्ता पूरी इमानदारी के साथ खड़ी हुई. आधुनिक स्वास्थ्य सेवांए, शिक्षा के क्षेत्र में क्यूबा ने जो उपलब्धियां हासिल कीं वह दुनिया के सबसे विकसित पूंजीवादी देशों में भी मेहनतकश अवाम को मयस्सर नहीं थीं.

पूरी दुनिया में लैटिन अमेरिका का छोटा सा देश क्यूबा फिदेल कास्त्रो की अगुवाई में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ता रहा है. हालांकि क्यूबा में भी साम्राज्यवादी संक्रमण की समस्याएँ पूरी तरह से हल नहीं हो पायी हैं. फिदेल कास्त्रो ने न केवल साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखी बल्कि समाजवादी देशो की मदद के लिए हर संभव प्रयास किये. दक्षिण अफ्रीका के अंगोला, इथियोपिया, निकारागुआ, वेनेजुएला सहित अन्य देशो में मदद के लिए सेना भेजना, आर्थिक दान, डॉक्टरो की टीम भेजना आदि के माध्यम से लगातार इन देशों के जनांदोलनों को अपना समर्थन दिया.

फिदेल एलोजेंद्रो कास्त्रो रूज का जन्म 13 अगस्त 1926 में हुआ था. हवाना विश्वविद्यालय से उन्होंने कानून में डिग्री प्राप्त की और इसी समय राजनीति में सक्रिय हुए. फिदेल ने इसी दौरान एक रईस परिवार की लड़की मीरटा डायज ब्लार्ट से शादी कर ली. शादी के बाद ऐसा सोचा गया कि अब फिदेल पूरी तरह से ऐशो आराम का जीवन व्यतीत करेंगे लेकिन शादी के बाद से ही वह पूरी तरह से सशस्त्र  क्रांति का हिस्सा बन चुके थे. फिदेल कास्त्रो यह अच्छी तरह से समझ चुके थे कि क्यूबा में बिना हथियार के क्रांति संभव नहीं है. उनमें गजब का साहस और आत्मविश्वास था. उनका कहना था कि “क्रांति कोई गुलाबों का बिस्तर नहीं होती, यह भूत और भविष्य के बीच संघर्ष है.” क्यूबा में बतिस्ता सरकार पर असफल हमले के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा परन्तु राजनीतिक दबाव के चलते बतिस्ता सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा. इसी दौरान उन्होंने मीरटा डायज ब्लार्ट को तलाक दे दिया और डालिया सोटो डेल वाल्वे से शादी की. 1955 में जेल से छुटने के बाद वो मेक्सिको चले गए, जहाँ उनकी मुलाकात एर्नेस्तो चे ग्वेरा से हुई. चे ग्वेरा गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के समर्थक थे. मेक्सिको में ही क्यूबा के तख्ता पलट की योजनाये बनी. फिदेल कास्त्रो को देश के अंदर जबरदस्त जनसमर्थन प्राप्त था, जिसके चलते उनका आत्मविश्वास बढ़ता ही रहा. उनका मानना था कि अगर नैतिक शक्ति क्रांति में है तो भौतिक शक्ति जनता में है. जनता के समर्थन के आधार पर ही उन्होंने कहा था कि “मैंने 82 लोगो के साथ क्रांति की शुरुआत की. मैं यही काम 10 या 15 लोगो के साथ फिर कर सकता हूँ, वो भी पूरे भरोसे के साथ, अगर आपको खुद में भरोसा है और एक पुख्ता योजना है, तो यह बिलकुल मायने नहीं रखता की आप कितने छोटे है.”  फिदेल ने मात्र 32 वर्ष की उम्र में फुल्गेंकियों बतिस्ता की तानाशाह सरकार का तख्ता पलट चे ग्वेरा और अन्य साथियों के साथ मिलकर किया और 1959 से 1976 तक क्यूबा के प्रधानमंत्री और फिर 2008 तक राष्ट्रपति रहे.

फिदेल कास्त्रो अमेरिकी साम्राज्यवादी नीतियों के घोर विरोधी रहे थे. जिसके चलते अमेरिका ने क्यूबा में तमाम आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिये थे. लेकिन फिदेल इन सबके बाद भी इन नीतियों के सामने नहीं झुके और उनके लगातार आरम्भिक समाजवादी प्रयोगों ने जनता को सदियों की दासता से मुक्ति दिलायी और लोगो का जीवन स्तर कई गुना ऊपर उठा दिया. बेहद गरीबी और कठोर अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करते हुए भी क्यूबा में शिक्षा और स्वास्थ्य को सभी के लिए मुफ्त उपलब्ध करा दिया गया. क्यूबा में अमेरिकी सम्पति और कारोबार का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. कृषि में भी शानदार प्रयोग किये गए. 1980 में क्यूबा में एक ‘पेट प्रोजेक्ट’ शुरू किया गया. यह प्रोजेक्ट अदभुत रूप से सफल रहा जिसमें ‘उब्रे ब्लैका’ नस्ल की गाय एक दिन में 110 लीटर दूध देने लगी. यह रिकार्ड गिनीज बुक में भी दर्ज हुआ. 1962 में विश्व दो स्पष्टः दो भागो में बंट चुका था. अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध चल रहा था. फिदेल कास्त्रो अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती थे, उन्होंने अमेरिकी हमले के खिलाफ रूस की तरफ से क्यूबा में मिसाइल तैनात कर सबको सकते में डाल दिया था. सीआईए ने फिदेल कास्त्रो को मारने के लगभग 638 प्रयास किये थे ,जिसे ‘368 वेस टू कील कास्त्रो’ नामक डॉक्यूमेंट्री में भी दिखाया गया था. अपने अडिग निर्णयों के कारण ही उन पर तानाशाह होने के आरोप भी लगते रहे हैं. फिदेल कास्त्रो के शासनकाल में ही क्यूबा एकल पार्टी समाजवादी राज्य बना. अपने पूरे कार्यकाल के दौरान इस क्रांति दूत ने लाल झंडा हमेशा ऊँचा रखा.

फिदेल कास्त्रो ने एक और रिकार्ड भाषण दे कर बनाया था. 29 सितम्बर 1960 में उन्होंने यूएन में 4 घंटे 29 मिनट का भाषण दिया था. इसके अलावा 1986 में हवाना में उनका 7 घंटे 10 मिनट का सबसे लम्बा भाषण कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में दिया गया था. ऐसा कहा जाता था कि फिदेल का भाषण सुनने के लिए लोग चटाई और टिफिन लेकर जाते थे.

फिदेल कास्त्रो की सार्वजनिक छवि सैनिको वाली रही है, वह हमेशा ही वर्दी में नजर आते थे. एकाध बार और बाद के वर्षों में वो कभी-कभी सूट में भी नजर आने लगे थे. उन्हें उनके उपनाम ‘एल काबल्लो’ से भी पुकारा जाता था, जिसका अर्थ ‘हार्स’ यानि घोडा था. हर्बर्ट मैथ्यूज द्वारा न्यूयार्क टाइम्स के लिए फिदेल का इंटरव्यू और सैनिक वर्दी में सिगार, बिगड़ी हुई दाढ़ी और टोपी वाली फोटो छापी गई थी. फिदेल कास्त्रो की यह रोमंटिक फोटो ही उनकी आकर्षक पहचान भी बनी.

फिदेल कास्त्रो समाजवाद का सपना लिए क्रांति की राह पर आगे बढ़े और उसे लागू करने का सफल प्रयास किया. उनकी इस लड़ाई से पूरी दुनिया के समाजवादी आन्दोलन प्रेरित होते रहे हैं और उन्हें अपना आदर्श मानते रहे है. फिदेल कास्त्रो के चले जाने के बाद जो निराशा और दुःख का बादल फट पड़ा है, उसे आगे की उमीदों और समाजवाद के सपने में खुद की भूमिका की सक्रियता से हटाना होगा. कामरेड फिदेल कास्त्रो को लाल सलाम…………..!

यह जनता है

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फिदेल कास्त्रो


जब हम जनता की बात करते हैं तो हमारा मतलब उन आरामतलब रईसों और देश के दकियानूस तत्वों से हरगिज नहीं होता जो किसी भी जालिम सरकार, किसी भी तानाशाही निरंकुशता का स्वागत करने व हाकिमे-वक्त के सामने नाक रगड़ने के लिए तत्पर रहते हैं जब तक कि वह अपने माथे को रगड़-रगड़कर चूर नहीं कर लेते. जब हम संघर्ष की बात करते हैं तो जनता से हमारा मतलब उस विशाल जनसमूह से होता है, जिसके साथ वादे सभी लोग करते हैं और जिसे धोखा भी सभी लोग देते हैं, जनता की मुराद उन लोगों से है जो बेहतर, ज्यादा सम्मानपूर्ण तथा न्यायपूर्ण राष्ट्र, की रचना की इच्छा करते हैं. जो न्याय प्राप्ति के लिए वंशानुगत ढंग से प्रेरित होते हैं, क्योंकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनको न्याय से वंचित रखा गया है और उन्हें मज़ाक का खिलौना बनाया गया है. हम जनता उन लोगों को कहते हैं जो अपने जीवन के सभी पहलुओं में भारी बुद्धिमतापूर्ण परिवर्तनों के लिए कटिबद्ध हैं और उस परिवर्तन को लाने के लिए अपने जीवन की आखिरी सांस तक का बलिदान करने को तैयार हैं. इसका अर्थ है वे किसी वस्तु में या किसी व्यक्ति में और विशेष रूप से स्वयं अपने ऊपर विशवास रखते हैं.



अपना उद्देश्य बयान करने के सिलसिले में ईमानदारी, सच्चाई या वफादारी की पहली शर्त यह है कि ठीक वही बात करें जो दूसरे नहीं करते, इसका अर्थ है, बिलकुल सफाई के साथ निडर होकर बात करें. बड़े बड़े बातूनी और पेशेवर राजनीतिज्ञ जो हर बात में तथा हर समय सही होने का दंभ भरते हैं, हमेशा ही आवश्यकता से हर बात के बारे में हर किसी के साथ धोखाधड़ी करते है. क्रान्तिकारियों को अपने विचार साहस के साथ निडर होकर पेश करने चाहिए. हमें अपने सिद्धांतों की परिभाषा तथा अपने इरादों का इजहार इस प्रकार करना है ताकि दोस्त व दुश्मन किसी को भी कोई धोखा न हो. अपने संघर्ष के लिए हम जिस जनता पर भरोसा करते हैं उसमें ये लोग शामिल हैं:

(क) छः लाख बेरोजगार क्यूबावासी जो बिना किसी काम के इधर-उधर मंडरा रहे हैं. जो ईमानदारी से अपनी रोजी कमाने की कामना करते हैं और चाहते हैं कि इसके लिए उन्हें देश छोड़कर बाहर न जाना पड़े.

(ख) पांच लाख कृषि मजदूर जो दयनीय झोपड़ियों में अपनी जिन्दगी काटते हैं, साल में चार महीने काम करते हैं और बाकी दिन फाकामस्ती करते हैं. अपने बच्चों के साथ मिलकर मुसीबत के पहाड़ काटते है, जिनके पास खेती करने के लिए अपनी एक इंच जमीन भी नहीं हैं और जिनके करुनामय जीवन पर पत्थर ह्रदय वाले लोग भी द्रवित हो जायेंगे.

(ग) चार लाख औद्योगिक मजदूर और कर्मचारी, जिनके अवकाश प्राप्ति के बाद के लिए रक्षित कोष का नियमित रूप से गबन किया जाता है, जिनको हर प्रकार की सुख सुविधाओं से वंचित रखा जाता है, जिनके आवास सूअरवाड़ों से भी बुरी स्थिति में रहते हैं, जिनका वेतन मालिकों के हाथ से निकलकर महाजन की तिजोरी में चला जाता है. जिनका भविष्य है, वेतन कटौती और नौकरी से बर्खास्तगी. जिनके भाग्य में अनवरत रूप से काम करते जाना और आराम के लिए कब्र में लेट जाना लिखा है.

(घ) एक लाख छोटे किसान जो ऐसी जमीन पर काम करते हैं, जीते और मरते हैं जो उनकी अपनी नहीं है. वह निराशाभरी निगाहों से उसी प्रकार उस जमीन को देखते हैं, जैसे मोसेज ने एक जमीन के टुकड़े पर टकटकी बांधे अपने प्राणों का त्याग कर दिया था क्योंकि उसे वह जमीन देने का वादा किया गया था, किन्तु जमीन दी नहीं गयी थी. जिन्हें सामंती युग के गुलामों की तरह अपनी उपज का एक बड़ा भाग अपने सामंती स्वामी को अदा करना पड़ता है. उन्हें अपनी जमीन से प्यार करने, उसमें सुधार करने, उसे सुन्दर बनाने, उसमें देवदार या नारंगी का कोई पेड़ लगाने का भी अधिकार हासिल नहीं है, क्योंकि उनके सर पर यह खतरा मंडराया करता है कि कब भूस्वामियों के कारिंदे आ जायें और उन्हें जमीन से बेदखल कर दें.

(ङ) तीस हजार शिक्षक और प्रोफेसर जो भावी पीढ़ियों के सुन्दर भविष्य के लिए पूर्ण रूप से निष्ठावान हैं और समर्पित हैं और जिनके साथ अत्यधिक अनुचित रूप से सलूक किया जाता है.
(च) बीस हजार छोटे दुकानदार और व्यापारी जो कर्जों के बोझ से दबे हुए हैं, संकट से तबाह हैं और जिन्हें तिकड़मी और घूसखोर अधिकारियों के कोप का भाजन बनना पड़ता है.

(छ) दस हजार युवा व्यवसायी-डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पशु चिकित्सक, स्कूल शिक्षक, दंतकार, फार्मेसिष्ट, पत्रकार, चित्रकार, मूर्तिकार आदि जो स्कूलों से डिग्रियां लेकर निकलते हैं, काम करने की आकांक्षा और आशा लेकर और जिन्हें ठोकरें खाने के बाद पता चलता है कि वे तो अंतिम छोर तक पहुंच गये हैं, जहां सारे दरवाजे उनके लिए बंद हैं तथा कोई भी आदमी उनकी दारुन गाथा को सुनने के लिए तैयार नहीं है.

यही जनता है, और यही वे लोग हैं, जिन्होनें मुसीबतों के पहाड़ों को झेला है, इसीलिए असीम साहस के साथ संघर्ष करने में पूर्णरूप से सक्षम हैं.


यही वे लोग हैं जिनके जीवन की राहों में विश्वासघात और मिथ्या आश्वासनों के कुटिलतापूर्ण चौके बिछाये जाते रहे हैं. इनसे हम यही नहीं कह सकते थे कि ‘हम तुम्हें यह देंगे’ बल्कि हमने कहा, ‘यह सुन्दर भविष्य तुम्हारा है, अपनी पूरी शक्ति के साथ इसे प्राप्त करने का संघर्ष करो ताकि स्वतन्त्रता और प्रसन्नता तुम्हारे कदमों को चूम ले.’
(‘इतिहास मुझे सही साबित करेगा’ से लिया गया)
समय के साखी, वर्ष 8, मई – जून 2016