महिलाएं असुरक्षित, यहां भी और वहां भी

आशीष कुमार ‘‘अंशु’
आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . आशीष फिलहाल विकास पत्रिका 'सोपान' से सम्बद्ध हैं और विभिन पत्र -पत्रिकाओं में लिखते हैं . संपर्क : 9868419453 .
( पूर्वोत्तर से भारतीय सेना के द्वारा स्त्रियों पर अत्याचार की खबरें आती रहती  हैं , महिलाओं ने उनके खिलाफ व्यापक प्रदर्शन भी किये हैं.  पूर्वोत्तर के राज्य महिलाओं की स्वतंत्रता की लिहाज से अपेक्षाकृत बेहतर समाज माना जाता है. वहाँ महिलाओं पर स्थानीय पुरुषों द्वारा यौन हिंसा की यह रपट परेशान करती है.)

इम्फाल न्यायालय के बाहर एक सुबह की यह घटना है। टीजी हायर सेकेन्डरी स्कूल की लड़कियां न्यायालय के बाहर आकर इकट्ठी थीं। इन लड़कियों को उन दो लोगों कां इंतजार था, जिन्हें पुलिस अपनी हिरासत में लेकर न्यायालय में आई थी। उन लड़को को देखते ही  लड़कियों के एक झुण्ड   ने हमला कर दिया। लड़कियां उन दोनों लड़कों को छोड़ने के इरादे  में नहीं थी। बाद में लड़कियों के चंगुल से इन दोनों लड़कों को महिला पुलिस ने आकर बचाया। इन दो युवको पर बलात्कार का आरोप था। इनमें एक 27 वर्षिय पुलिस का सिपाही थोंगम तरूण था, थोंगम ने कुछ मणिपुरी फिल्मों में काम भी किया है। दूसरा मणिपुर पुलिस की गाड़ी का ड्राइवर 30 वर्षीय  युवनाम विलियम था। इन दोनों के ऊपर सोलह साल की एक स्कूल जाने वाली लड़की को खाने में नशा मिलाकर खिलाने और बलात्कार का आरोप था। आरोप है कि पहले थोंगम ने उस लड़की को अपने प्रेम के जाल में फंसाया और उसके बाद एक दिन मौका देखकर खाने में नशा मिलाकर पहले उसे बेहोश किया और उसके बाद अपने मित्र के साथ मिलकर उसके साथ बलात्कार किया।

इन युवको के लिए फांसी की मांग कर रही लड़कियां अपने स्कूल की पढ़ाई छोड़ कर आई थी और माहौल ऐसा बन गया था कि आज बिना उन दोनों  युवकों की फांसी तय हुए वे वापस नहीं जाएंगी। बाद में गृह मंत्रालय को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। गृह मंत्रालय की तरफ से लड़कियों को विश्वास दिलाया गया कि पीड़ित लड़की के साथ न्याय होगा। लड़कियां दोषियों के लिए फांसी की मांग कर रहीं थीं। गृह मंत्रालय की तरफ से मिले आश्वासन के बाद लड़कियों ने स्पष्ट किया - यदि गृह मंत्रालय ने अपना वादा पूरा नहीं किया तो वे अपना विरोध प्रदर्शन फिर जारी करेंगी।
बलात्कारियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए कोर्ट परिसर के बाहर खड़ी मणिपुरी महिलायें

पूर्वोत्तर भारत का जिक्र जब भी हमारे सामने आता है, हमारे सामने एक ऐसे प्रदेश की छवि उभरती है, जहां महिलाओं को आजादी है, अपने तरह से जीने की। जहां स्त्री और पुरूष में कोई भेद नहीं है। जहां स्त्री पर किसी भी तरह की हिंसा की बात कोई सोच भी नहीं सकता। पूर्वोत्तर में मणिपुर का दर्जा और भी ऊपर है, यहां विभिन्न आन्दोलनों और अभियानों को महिलाओं ने ही नेतृत्व दिया है। फर्स्ट वीमेंस  वार (1904) और सेकेन्ड वीमेंस  वार (1939-40) की जमीन है, मणिपुर। क्या अब मणिपुर बदल रहा है?

ह्यूमन राइट अलर्ट के बबलू लोइटोंगबम बताते हैं- ‘मणिपुर की स्थितियां पिछले दो-तीन दशकों में बदली हैं। इसमें टेलीविजन के सास-बहू वाले धारावाहिक और बॉलीवुड की फिल्मों ने बड़ी भूमिका निभाई है। मणिपुर में महिलाओं की स्थिति पूरे देश से बेहतर है, यह कहना ठीक नहीं होगा लेकिन यहां की महिलाओं को, जो दूसरे राज्यों की महिलाओं से थोड़ा अलग करता है, वह सिर्फ इतना की, यहां की आंतरिक अर्थव्यवस्था, ट्रेड और कॉमर्स महिलाओं के हाथ में हैं।' बबलू बताते हैं- 'इम्फाल का मुख्य इमा बाजार, जहां खाने-पीने से लेकर घर की जरूरत का दूसरा सारा सामान मिलता है। उसे मणिपुर के विभिन्न हिस्सों से आकर महिलाएं ही सम्भालती हैं। इमा बाजार मणिपुर में आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों का भी केन्द्र बना है। कारोबारी महिलाओं के इस ताकत का इस्तेमाल कई बार यहां के आन्दोलनों में भी हुआ।’

मणिपुर की यह घटना कई लोगों को चौंका सकती है, जिसमें ट्रक से अपने देवर के साथ तमेन्गलांग जिले से आ रही एक महिला का पीछा कार में सवार चार युवक करते हैं और एक सुनसान से रास्ते में ट्रक रूकवा कर महिला के साथ चारों युवक बलात्कार करते हैं। मणिपुर महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ एल इबेटॉम्बी देवी पत्रकारों से बात करते हुए कहती हैं- मणिपुर में बढ़े बलात्कार के मामले चिन्ताजनक हैं, और जो मामले प्रकाश में आए हैं, उनमें नशीले पदार्थों का उपयोग किसी न किसी तरह अधिकांश मामले में हुआ है। इम्फाल पूर्वी जिले में अक्टूबर में हुआ एक बारहवीं कक्षा की लड़की के साथ बलात्कार एक ऐसा ही मामला था। इबेटॉम्बी देवी जब प्रेस कान्फ्रेन्स में बता रहीं थी कि "जो मामले प्रकाश में आए हैं", उस वक्त उन्हें जानकारी थी कि बड़ी संख्या में मामले प्रकाश में आ नहीं पाते हैं।
भारतीय सेना के द्वारा लड़कियों के बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन करती मणिपुरी महिलाएं 


महिलाओं पर हुए अत्याचार के मणिपुर में 01 जनवारी 2012 से 15 अक्टूबर 2012 तक दर्ज हुए मामलों की जानकारी एक गैर सरकारी संस्था ने उपलब्ध कराई। मिली जानकारी के अनुसार, बलात्कार के कुल 21 मामले दर्ज हुए, बलात्कार के बाद हत्या के 04, आत्महत्या के 18, हत्या के 16, बलात्कार के प्रयास के 07, बलात्कार के बाद हत्या के प्रयास के 01, जलाए जाने के 01, गंभीर चोट पहुंचाए जाने के 41, अपहरण के 04, धमकी के 02, लापता हुई 30 लड़कियां, और परिवार ने जिन लड़कियों को अपने हाल पर छोड़ दिया ऐसे मामले 03 हैं।  यह सारे वे मामले हैं जो प्रकाश में आए। बहुत सारे मामलों के संबंध में जानकारी ही नहीं मिलती, क्योंकि सारी खबरों तक न पुलिस की पहुंच है और न ही अखबार और टीवी चैनलों की।

वीमन्स  एक्शन फॉर डेवलपमेन्ट की सबीता मंगस्ताबम के अनुसार मणिपुर के कुल नौ में से पांच जिले पहाड़ी हैं। पहाड़ी जिलों में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। सबीता बताती हैं- 'मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में आज भी पारम्परिक  कानून चलता, जिसमें महिलाओं के खिलाफ हत्या, बलात्कार जैसे घिनौने अपराध का निपटारा गाय, भैंस या फिर मुर्गे की लेन-देन से आज भी हो जाता है। मणिपुर की पुलिस महिलाओं पर हुए अत्याचार को कभी गंभीरता से देखने की कोशिश नहीं करती है। क्या पहले बलात्कार और उसके बाद पैसो या बकरी-गाय के बदले समझौता, क्या एक सभ्य समाज की परंपरा है? इसे लेकर मणिपुर के अंदर एक स्वस्थ्य बहस होनी चाहिए, जिससे अपराधी को सही  सजा मिल सके।"

खोपुर क्षेत्र में चार स्कूल जाने वाली लड़कियों के साथ बलात्कार का मामला सरकार के लिए शर्म की बात बनी हुई है। इस तरह के मामलों को सरकार हर तरह से मीडिया में आने से रोकना चाहती है। मीडिया में खबरों को आने से रोकने की जगह सरकार यदि अपराध को रोकने में कसरत करती तो वह मणिपुर समाज के लिए भी अच्छी खबर होती। राज्य के स्वैच्छिक संगठन लगातार इस मामले में न्याय की मांग कर रहे हैं। मणिपुर की स्थितियों की चर्चा करते हुए बबलू एक बात जोड़ते हैं- राज्य में महिलाओं पर बढ़े अत्याचार की बात करते हुए, आर्म्स फोर्सेस (स्पेशल पावर्स) एक्ट की इसमें भूमिका को कम करके नहीं देखा जा सकता। पूरे मणिपुर को फौजी कैम्प में बदल दिया गया है। प्रत्येक 40 मणिपुरी पर एक फौजी मणिपुर में तैनात कर दिया गया है। 25 लाख की आबादी पर साठ हजार जवान हैं यहां। आप सोचिए यहां के आम लोगों पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा?

सबीता का मानना कुछ बबलू जैसा ही था, ' मैदानी इलाकों की खबर मीडिया में आ भी जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में क्या हो रहा है, कौन जानता है? कौन लिख रहा है उनके बारे में और कौन दिखा रहा है उनकी कहानी? मणिपुर में जवानों को असीमित अधिकार दे दिया गया है और गांवों में तो वे किसी के साथ कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं क्योंकि वहां से कोई खबर शहर तक नहीं आती।'  पूर्वोत्तर में महिलाओं की स्थिति को लेकर जो एक आदर्श सी छवि हमारे दिमाग में है, उस तस्वीर को मिटाने की जरूरत नहीं है लेकिन हमें समझना चाहिए वह तस्वीर पूरी कहानी बयान नहीं करती क्योंकि वह एक अधूरी तस्वीर है।
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