धरती का महारस और प्रेम की आधुनिकता : गुलज़ार के फिल्मी गीतों में लौकिकता, आत्म और असीम का अंतर्संबंध

मेधा

सार
हिन्दी फिल्मी गीतों का इतिहास केवल मनोरंजन या सिनेमाई कथा के पूरक संगीत का इतिहास नहीं है; यह आधुनिक भारतीय समाज के भावनात्मक संसार के निर्माण का भी इतिहास है। प्रेम, विरह, इच्छा, अकेलापन, देह, घर, परिवार और आत्म की जिन अनुभूतियों को सामाजिक जीवन में प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करना कठिन था, फिल्मी गीतों ने उन्हें एक सांस्कृतिक भाषा प्रदान की। विशेषतः छोटे शहरों और कस्बों में रेडियो, टेप रिकॉर्डर, विवाह समारोहों और पड़ोस से आती ध्वनियों के माध्यम से गीतों ने सिनेमा को दृश्य से बाहर निकालकर निजी स्मृति और कल्पना का हिस्सा बनाया। इस लेख का केंद्रीय प्रश्न यह है कि हिन्दी फिल्मी प्रेम-गीतों की पारंपरिक रोमानी संरचना से गुलज़ार की प्रेम-दृष्टि किस प्रकार भिन्न है।

लेख का प्रतिपाद्य है कि पारंपरिक हिन्दी फिल्मी प्रेम-गीतों में प्रेम प्रायः नियति, पुनर्जन्म, अमरता, आदर्शीकृत सौंदर्य और अलौकिक मिलन की ओर उन्मुख दिखाई देता है, जबकि गुलज़ार प्रेम को घर, शहर, मिट्टी, खिड़की, चूल्हे, प्रकृति, रोज़मर्रा और साझा जीवन की ठोस परिस्थितियों में पुनर्स्थापित करते हैं। यह परिवर्तन प्रेम को आध्यात्मिकता से वंचित करना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव का लौकिकीकरण है। गुलज़ार के यहाँ असीम ससीम संसार के बाहर नहीं, उसी के भीतर प्रकट होता है। इस अर्थ में कबीर का “धरणि महारस” उनके प्रेम-विमर्श को समझने का एक उपयोगी दार्शनिक प्रतिमान बनता है।

सैद्धांतिक स्तर पर लेख रेमंड विलियम्स की “संरचना-ए-अनुभूति”, एंथनी गिडेन्स के आधुनिक आत्म और जीवन-परियोजना, हेनरी लेफेब्र के सामाजिक स्थान, मिशेल द सेर्तो के रोज़मर्रा के जीवन और ज़िग्मुंट बाउमन के आधुनिक प्रेम संबंधी विचारों से संवाद करता है। साथ ही नताली सराज़िन तथा रीटा कोठारी–अपूर्व शाह के फिल्मी गीत संबंधी अध्ययनों और सबा महमूद बशीर के गुलज़ार पर किए गए शोध को आधार बनाया गया है। निष्कर्षतः गुलज़ार की काव्यात्मक आधुनिकता को “लौकिकता के भीतर असीम की खोज” के रूप में समझा जा सकता है।

बीज-शब्द: गुलज़ार, हिन्दी फिल्मी गीत, प्रेम, आधुनिकता, लौकिकता, आत्म, असीम, कबीर, घर, शहर, हिन्दुस्तानी भाषा

 प्रस्तावना : जब सिनेमा गीत बनकर घर में प्रवेश करता है

सिनेमा का अनुभव हमेशा पर्दे पर फिल्म देखने से निर्मित नहीं होता। भारतीय छोटे शहरों और कस्बों में सिनेमा लंबे समय तक दृश्य से अधिक ध्वनि, स्मृति और कल्पना का सांस्कृतिक अनुभव रहा है। जहाँ किशोरियों और स्त्रियों के लिए सिनेमा-हॉल तक पहुँचना सामाजिक निगरानी से जुड़ा हो सकता था, वहाँ फिल्मी गीतों ने सिनेमा के लिए एक वैकल्पिक प्रवेश-द्वार बनाया। रेडियो, ग्रामोफोन, टेप रिकॉर्डर, विवाह समारोहों के लाउडस्पीकर और पड़ोस से आती धुनों के माध्यम से फिल्म घर की दीवारों के भीतर प्रवेश करती थी। गीत केवल सुना नहीं जाता था; वह श्रोता की कल्पना में एक निजी दृश्य रचता था। फिल्मी गीत को केवल मनोरंजन मानना उसके सांस्कृतिक महत्व को कम करना होगा। नताली सराज़िन ने हिन्दी सिनेमा के प्रेम-गीतों को कथा के अनावश्यक “विच्छेद” के बजाय देशज सौंदर्यशास्त्र, सांस्कृतिक मूल्यों और समकालीन सिनेमाई तकनीकों से जुड़ी संरचना माना है। उनके अनुसार गीत कथा की भावात्मक संरचना को तीव्र करता है।¹

रीटा कोठारी और अपूर्व शाह ने “दिल” को हिन्दी फिल्मी गीतों में इच्छा, निषेध, आत्म और सामाजिक निगरानी के बीच स्थित एक बहुस्तरीय सांस्कृतिक स्थल के रूप में पढ़ा है।² इससे स्पष्ट होता है कि फिल्मी गीतों की भाषा केवल प्रेम का वर्णन नहीं करती; वह प्रेम को सामाजिक रूप से कहने और सुनने योग्य बनाती भी है। यही कारण है कि गीत का वास्तविक जीवन फिल्म के दृश्य से कहीं आगे जाता है।

 फिल्मी गीत और भावनाओं की सामाजिक संरचना

रेमंड विलियम्स की “संरचना-ए-अनुभूति” की अवधारणा इस प्रश्न को समझने में विशेष उपयोगी है। किसी समय की ऐसी भावनाएँ जो अभी पूरी तरह औपचारिक विचारधारा में नहीं बदली हैं, वे साहित्य, संगीत और लोकप्रिय संस्कृति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। फिल्मी गीत इसी अर्थ में अपने समय के भावात्मक भूगोल के दस्तावेज हैं। वे समाज का घोषणापत्र नहीं होते, लेकिन वे समाज के बदलते हुए प्रेम-बोध, अकेलेपन, आकांक्षा और संबंधों की सूक्ष्म हलचलों को पकड़ते हैं।³

मिशेल द सेर्तो के रोज़मर्रा के जीवन संबंधी विचार यहाँ दूसरा महत्त्वपूर्ण उपकरण प्रदान करते हैं। संस्कृति का उपभोक्ता निष्क्रिय ग्रहणकर्ता नहीं होता; वह उपलब्ध सांस्कृतिक वस्तु को अपने अनुभव के अनुरूप पुनः अर्थ देता है।⁴ फिल्मी गीत सुनने वाला भी गीतकार के अर्थ को जस का तस ग्रहण नहीं करता। वह गीत को अपनी स्मृतियों, इच्छाओं, असफलताओं और कल्पनाओं में पुनर्लिखता है। इसीलिए एक ही गीत अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग भावात्मक जीवन ग्रहण कर सकता है। गीत की यह पुनर्व्याख्यात्मक शक्ति उसे निजी और सार्वजनिक के बीच एक विशिष्ट सांस्कृतिक क्षेत्र बनाती है। विवाह में बजने वाला गीत सामूहिक ध्वनि है, लेकिन उसे सुनती हुई कोई किशोरी अपने भीतर एक निजी कथा रच सकती है। रेडियो पर प्रसारित गीत सार्वजनिक है, पर उसकी पंक्तियाँ किसी एक व्यक्ति की निजी स्मृति बन सकती हैं। इस प्रकार फिल्मी गीत “सामूहिक श्रवण और निजी अर्थ” की द्विस्तरीय संरचना निर्मित करता है।

 पारंपरिक फिल्मी प्रेम : कल्पना, नियति और अतिक्रमण

हिन्दी फिल्मी प्रेम-गीतों की एक दीर्घ परंपरा प्रेम को वर्तमान सामाजिक जीवन की सीमाओं से ऊपर उठाने वाली कल्पना के रूप में निर्मित करती रही है। प्रेमी यदि वर्तमान जीवन में साथ नहीं रह सकते, तो पुनर्जन्म में मिलन की संभावना बची रहती है; सामाजिक असफलता अमर प्रेम में बदल जाती है; वर्तमान की सीमाएँ अनंत काल की कल्पना से पार की जाती हैं। “सौ बार जनम लेंगे…” जैसी गीतात्मक संरचनाएँ प्रेम की सत्यता को वर्तमान सामाजिक यथार्थ से अधिक उसके कालातीत बने रहने में खोजती हैं। यहाँ प्रेम एक प्रकार की अतिक्रमणकारी कल्पना है। वह संसार की ठोस संरचनाओं—परिवार, वर्ग, सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक असमानता और नियति—से टकराने के बजाय कई बार एक ऐसे भावलोक का निर्माण करता है जिसमें प्रेम की शुद्धता इन संरचनाओं से ऊपर स्थापित होती है। यह रोमानी कल्पना भारतीय सांस्कृतिक मानस की उन परंपराओं से भी संवाद करती है जहाँ प्रेम और भक्ति दोनों को देह तथा सांसारिक सीमाओं से परे जाने की शक्ति प्राप्त है।

किन्तु आधुनिकता के साथ प्रेम का अर्थ बदलने लगता है। एंथनी गिडेन्स के अनुसार आधुनिकता आत्म की पुनर्रचना की प्रक्रिया है। आधुनिक व्यक्ति को अपने जीवन की दिशा, पहचान और संबंधों को अधिकाधिक स्वयं निर्मित करना पड़ता है।⁶ प्रेम भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनता है। संबंध केवल सामाजिक नियति नहीं रहते; वे चुनाव, आत्म-अभिव्यक्ति, पारस्परिकता और साझा जीवन-परियोजना से जुड़ते हैं। यहीं गुलज़ार का महत्व सामने आता है। वे प्रेम को पारंपरिक प्रतीकों से मुक्त नहीं करते, बल्कि उन्हीं प्रतीकों के अर्थ बदल देते हैं। चाँद, सितारे, रात, बारिश, फूल और मौसम उनके यहाँ बने रहते हैं; किंतु वे अलौकिक प्रेमलोक के संकेत न रहकर रोज़मर्रा के जीवन के सहभागी बन जाते हैं। यह प्रतीकों का विनाश नहीं, उनका पुनर्लेखन है।

 गुलज़ार : प्रेम का लौकिकीकरण

गुलज़ार की काव्यात्मक विशिष्टता का मूल यह है कि वे प्रेम को न तो केवल देह में सीमित करते हैं और न ही उसे केवल आत्मा में विलीन कर देते हैं। प्रेम उनके यहाँ जीवन की परिस्थितियों में घटित होने वाली संवेदना है। यह प्रेम घर चाहता है, शहर में जगह चाहता है, साथ चलना चाहता है और रोज़मर्रा की कठिनाइयों में अपना अर्थ खोजता है। सबा महमूद बशीर के शोध से यह बात पुष्ट होती है कि गुलज़ार की फिल्मी और गैर-फिल्मी कविताएँ परस्पर संवाद करती हैं और उनकी कविता लोकप्रिय संस्कृति में एक विशिष्ट साहित्यिक ऊर्जा पैदा करती है।⁵ इसीलिए गुलज़ार को केवल सफल गीतकार के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। उनके गीतों में भाषा, बिंब, सामाजिक अनुभव और आत्मपरकता का ऐसा अंतर्संबंध दिखाई देता है जो उन्हें लोकप्रिय कविता की गंभीर परंपरा में स्थापित करता है। उनकी आधुनिकता का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष “प्रेम का लौकिकीकरण” है। यहाँ लौकिकता का अर्थ आध्यात्मिकता का निषेध नहीं है। इसका अर्थ है कि प्रेम और अर्थ की खोज संसार से पलायन करके नहीं, संसार के भीतर की जाती है। इस दृष्टि से गुलज़ार का प्रेम आधुनिक भी है और आध्यात्मिक भी; लेकिन उसकी आध्यात्मिकता धरती-विमुख नहीं, धरती-सापेक्ष है।

 “दो दीवाने शहर में”: प्रेम से आशियाने तक

फिल्म घरौंदा (1977) का “दो दीवाने शहर में” इस परिवर्तन का अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है। गीत के केंद्र में कोई काल्पनिक स्वर्ग या जन्म-जन्मांतर का आश्वासन नहीं, बल्कि शहर में रहने की वास्तविक आकांक्षा है। प्रेमी-युगल आब-ओ-दाना और आशियाना खोज रहा है। इस प्रकार प्रेम का सबसे बड़ा स्वप्न एक रहने योग्य घर बन जाता है।⁷ यहीं पारंपरिक रोमानी प्रेम और गुलज़ार के आधुनिक प्रेम के बीच निर्णायक अंतर दिखाई देता है। पारंपरिक संरचना पूछती है—क्या हम जन्म-जन्मांतर तक साथ रहेंगे? गुलज़ार की संरचना पूछती है—क्या इस शहर में हमारे लिए एक घर होगा?

हेनरी लेफेब्र के अनुसार सामाजिक स्थान केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं होता; वह सामाजिक संबंधों और शक्ति-संबंधों द्वारा निर्मित होता है।⁸ इसलिए गुलज़ार के गीत में शहर निष्पक्ष पृष्ठभूमि नहीं है। वह प्रेमी-युगल की आकांक्षा की परीक्षा लेता है। शहर में घर बनाना प्रेम को सामाजिक-आर्थिक यथार्थ से जोड़ता है। गीत में छोटी-छोटी वस्तुएँ—खिड़की, आकाश, मिट्टी, चूल्हा, धुआँ—प्रेम को देहधारी और श्रमधारी बनाती हैं। प्रेम अब केवल भाव नहीं, जीवन की व्यवस्था भी है। वह घर बनाता है, भोजन की चिंता करता है, शहर की महँगाई और भीड़ के बीच जगह खोजता है। इस प्रकार गुलज़ार प्रेम को किसी छोटे भाव में नहीं बदलते; वे उसे जीवन की व्यापक संरचना में पुनर्स्थापित करते हैं।

“जब तारे ज़मीं पर चलते हैं”: लौकिक जीवन में असीम

यहीं गुलज़ार की कविता का सबसे सुंदर विरोधाभास सामने आता है। यदि वे प्रेम को केवल सामाजिक यथार्थ तक सीमित कर देते, तो उनकी कविता केवल मध्यवर्गीय जीवन का दस्तावेज बनकर रह जाती। किंतु “दो दीवाने शहर में” में ही वह क्षण आता है जब “तारे ज़मीं पर चलते हैं” और “आकाश ज़मीं हो जाता है।”⁹ इस बिंब का महत्व इसलिए है कि यहाँ असीम धरती पर उतरता है। प्रेमी-युगल के जीवन में कोई बाहरी चमत्कार नहीं घटता; फिर भी साधारण जीवन असाधारण अनुभव में बदल जाता है। शहर वही है, संघर्ष वही है, लेकिन प्रेम की दृष्टि उस संसार को नए अर्थ से भर देती है।

यही गुलज़ार की काव्यात्मक आधुनिकता का मूल रहस्य है—अलौकिकता का निषेध नहीं, उसका लौकिकीकरण। चाँद आकाश में दूर बैठा हुआ देवतुल्य प्रतीक नहीं रह जाता; वह प्रेमियों की निकटता के अनुभव में धरती से जुड़ता है। आकाश और धरती की दूरी क्षण भर के लिए मिट जाती है, इसलिए गुलज़ार के यहाँ आध्यात्मिक अनुभव जीवन के बाहर नहीं है। वह जीवन की संवेदनात्मक तीव्रता से जन्म लेता है। प्रेमी जब साधारण जीवन को असाधारण अर्थ से भर देता है, तभी सीमित संसार में असीम की झलक मिलती है।

 कबीर का “धरणि महारस” और गुलज़ार

कबीर का पद—“कहै कबीर ते बिरला जोगी, धरणि महारस चाख्या” इस विमर्श को एक गहरी दार्शनिक पृष्ठभूमि देता है।¹⁰ “धरणि महारस” का अर्थ केवल धरती का भौतिक स्वाद नहीं है; यह संसार के भीतर छिपे हुए किसी गहन अनुभव की ओर संकेत करता है। साधना यदि संसार से पलायन मात्र बन जाए तो कबीर की उलटबाँसी की धार कम हो जाती है। कबीर के यहाँ साधारण संसार ही उस गहन सत्य का क्षेत्र बनता है जिसे साधक पहचानता है। इसी अर्थ में “धरणि महारस” गुलज़ार के प्रेम को समझने का उत्पादक प्रतिमान है। गुलज़ार के प्रेमी संसार छोड़कर प्रेम नहीं पाते। वे शहर, घर, मिट्टी, चूल्हे, खिड़की, बारिश, रात, अकेलेपन और संघर्ष के भीतर प्रेम की संभावना खोजते हैं। इस प्रकार गुलज़ार की आधुनिकता नास्तिक या निरर्थक आधुनिकता नहीं है। वह जीवन की ठोसता के भीतर अर्थ की खोज करती है।

“गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता”: प्रकृति का पुनर्लेखन

गुलज़ार के यहाँ प्रकृति केवल प्रेम की सजावटी पृष्ठभूमि नहीं है। “गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता” जैसे गीत में प्रिय का नाम प्रकृति के अर्थ को बदल देता है। फिल्म देवता (1978) से संबंधित यह गीत गुलज़ार की उस काव्यात्मक प्रवृत्ति का उदाहरण है जिसमें प्रकृति और मनुष्य के बीच आत्मीय संबंध निर्मित होता है।¹¹ चाँद, तारे, फूल, मौसम और बारिश उनके यहाँ निष्प्राण वस्तुएँ नहीं हैं। वे प्रेम के अनुभव में सहभागी होते हैं। यह केवल मानवीकरण नहीं है; इसे मनुष्य और प्रकृति के बीच कठोर विभाजन को ढीला करने वाली अद्वैतात्मक संवेदना के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इसलिए गुलज़ार की प्रकृति रोमानी सजावट नहीं; वह मनुष्य के भावात्मक आत्म का विस्तार है।

स्त्री, गीत और भावात्मक स्वायत्तता

फिल्मी गीतों की सांस्कृतिक भूमिका को समझते समय स्त्री के अनुभव को केंद्र में रखना आवश्यक है। दृश्य-संस्कृति पर सामाजिक निगरानी की तुलना में श्रव्य-संस्कृति अपेक्षाकृत अधिक निजी और गतिशील थी। गीत सुनती हुई स्त्री या किशोरी केवल किसी नायिका की कथा नहीं सुनती; वह गीत के भीतर अपने अनुभव की संभावना खोज सकती है।

कोठारी और शाह का “दिल” संबंधी अध्ययन इस संदर्भ में विशेष उपयोगी है। उनके अनुसार फिल्मी गीतों में “दिल” इच्छा और निषेध, आत्म और सामाजिक निगरानी, अभिव्यक्ति और छिपाव के बीच स्थित सांस्कृतिक स्थल है।² यह दिखाता है कि गीत सामाजिक नियंत्रण के भीतर इच्छा को व्यक्त करने का सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य माध्यम बन सकता है।

भाषा की आधुनिकता : हिन्दुस्तानी का जीवित भूगोल

गुलज़ार की आधुनिकता विषयगत होने के साथ भाषिक भी है। उनकी भाषा शुद्धतावादी हिन्दी या शुद्ध उर्दू की सीमाओं में स्वयं को बंद नहीं करती। वह हिन्दुस्तानी के बहुभाषिक और सांस्कृतिक भूगोल को सक्रिय करती है। “आब-ओ-दाना”, “आशियाना”, “मौसम”, “गुलमोहर”, “अंबर”, “खिड़की”, “चूल्हा” और “मिट्टी” जैसे शब्द एक ही काव्य-संसार में सह-अस्तित्व रखते हैं। बशीर के शोध में गुलज़ार की विशिष्ट भाषा, अलग-अलग भाषाओं से शब्द ग्रहण करने की प्रवृत्ति और असामान्य बिंब-विधान पर विशेष बल मिलता है।⁵ यह भाषिक मिश्रण केवल सजावट नहीं है। यह आधुनिक भारतीय अनुभव की बहुलता को अभिव्यक्त करता है। यह भाषिक बहुलता प्रेम के अर्थ को भी बदलती है। प्रेम किसी एक सांस्कृतिक कोड का बंद संसार नहीं रहता; वह अनेक स्मृतियों, भाषाओं और अनुभवों के बीच बनता है। इस प्रकार भाषा स्वयं आधुनिकता की वाहक बन जाती है।

असफल प्रेम, अकेलापन और आधुनिक आत्म

गुलज़ार की प्रेम-दृष्टि का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष असफल प्रेम और अकेलेपन की उनकी समझ है। पारंपरिक रोमानी गीतों में प्रेम-विफलता कभी-कभी पूरे संसार के निषेध में बदल जाती है—“ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं…” जैसी संरचना निजी विफलता को सार्वभौमिक निरर्थकता में रूपांतरित कर देती है। गुलज़ार के यहाँ दुख अधिक आत्मपरक है। प्रेम असफल हो सकता है, संबंध टूट सकता है, अकेलापन आ सकता है, लेकिन संसार समाप्त नहीं होता। यह आधुनिक आत्म की परिपक्वता का संकेत है।

गिडेन्स के अनुसार आधुनिक आत्म एक निरंतर पुनर्निर्मित होने वाली जीवन-परियोजना है।⁶ व्यक्ति अपने अनुभवों को देखता, समझता और पुनर्परिभाषित करता है। गुलज़ार के गीतों में अकेला मनुष्य इसी प्रकार अपने दुख को पहचानता है, लेकिन उसे अस्तित्व का अंतिम सत्य नहीं बनाता। “मीठा-सा ग़म” और “मीठी-सी तन्हाई” जैसी अभिव्यक्तियाँ दुख की प्रकृति को बदल देती हैं। अकेलापन केवल अभाव नहीं; वह कभी-कभी आत्म-संपर्क का अवसर भी है। प्रेम का अर्थ दूसरे में पूर्ण विलय नहीं, बल्कि दूसरे की अनुपस्थिति में भी किसी संवेदना को जीवित रखना हो सकता है।

इस दृष्टि से गुलज़ार का विरह मध्यकालीन विरह से संवाद करता है, लेकिन उसे आधुनिक मनोवैज्ञानिक अनुभव में रूपांतरित करता है। विरह यहाँ मोक्ष का साधन नहीं, आत्म-अनुभव का क्षेत्र है।

आध्यात्मिक आधुनिकता : परंपरा का पुनर्पाठ

गुलज़ार को केवल आधुनिक कहना पर्याप्त नहीं है। उनकी आधुनिकता उस मॉडल से भिन्न है, जिसमें आधुनिकता और परंपरा को अनिवार्य विरोधी मान लिया जाता है। भारतीय संदर्भ में आधुनिकता अनेक बार परंपरा को नष्ट करने के बजाय उसके अर्थों का पुनर्पाठ करती है।

गुलज़ार के यहाँ पुराने प्रतीक जीवित रहते हैं, पर उनका अर्थ बदल जाता है। चाँद वही है, लेकिन वह किसी दूरस्थ आदर्शलोक का प्रतीक नहीं; वह प्रेमी के अनुभव का सहभागी है। सितारे वही हैं, लेकिन वे धरती पर चलते हुए दिखाई देते हैं। घर वही है, लेकिन वह केवल घरेलू संरचना नहीं; वह प्रेम और आत्मनिर्माण का स्थान है।

इसे “अर्थ-संरचनात्मक आधुनिकीकरण” कहा जा सकता है—पुराना प्रतीक और नया जीवन-संदर्भ मिलकर नया काव्यात्मक अर्थ बनाते हैं। यही कारण है कि गुलज़ार की कविता आधुनिक होते हुए भी सांस्कृतिक स्मृति से कटती नहीं।यहाँ आध्यात्मिकता भी पुनर्परिभाषित होती है। वह संसार से बाहर किसी सत्य की खोज नहीं, संसार के भीतर अर्थ की गहन अनुभूति है। इसी बिंदु पर कबीर का “धरणि महारस” पुनः अर्थवान हो उठता है।

निष्कर्ष: प्रेम का भविष्य—कल्पना से जीवन की ओर

हिन्दी फिल्मी गीतों का इतिहास प्रेम की भाषा के बदलते इतिहास के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। पारंपरिक रोमानी गीतों में प्रेम अनेक बार नियति, पुनर्जन्म, अमरता और अलौकिक मिलन की सहायता से वर्तमान जीवन की सीमाओं से ऊपर उठता है। यह प्रेम सुंदर है, लेकिन उसकी सुंदरता कभी-कभी जीवन की ठोस सामाजिक संरचनाओं से दूरी बनाकर निर्मित होती है।

गुलज़ार इस संरचना को भीतर से बदलते हैं। वे प्रेम को समाप्त नहीं करते; उसे धरती पर वापस लाते हैं। उनके प्रेमी-युगल को महल नहीं चाहिए; घर चाहिए। उन्हें अनंत जन्मों का आश्वासन नहीं चाहिए; साथ चलने की संभावना चाहिए। उन्हें स्वर्गीय सौंदर्य से अधिक रोज़मर्रा की देह, मिट्टी, चूल्हा, खिड़की और शहर के भीतर साझा जीवन की आवश्यकता है। लेकिन इसी लौकिक जीवन के बीच अचानक तारे धरती पर उतर आते हैं। यही गुलज़ार की शक्ति है। वे प्रेम को आध्यात्मिकता से मुक्त नहीं करते; वे आध्यात्मिकता को जीवन की ठोस अनुभूति में पुनर्स्थापित करते हैं।

इसलिए गुलज़ार की आधुनिकता को “आधुनिकता बनाम परंपरा” के द्वैत से समझना पर्याप्त नहीं होगा। अधिक उपयुक्त प्रतिमान है—“लौकिकता के भीतर असीम की खोज।” घर आशियाना है और वही आकाश की ओर खुलता है; खिड़की छोटी है, लेकिन उसके पार अंबर है; साधारण मिट्टी प्रेम के स्पर्श से महारस बन जाती है।

कबीर का “धरणि महारस” इस अर्थ में केवल एक आध्यात्मिक रूपक नहीं रह जाता; वह आधुनिक प्रेम की एक वैकल्पिक दार्शनिक व्याख्या बन जाता है। जो धरती को छोड़कर असीम खोजता है, वह शायद संसार की ठोस अनुभूति से दूर चला जाता है; जो धरती के महारस को पहचानता है, वह सीमित जीवन में भी असीम की संभावना देख सकता है।

गुलज़ार के गीतों की आधुनिकता की अंतिम पहचान यही है कि उनकी खिड़की ससीम संसार में खुलती है, लेकिन उसके पार असीम दिखाई देता है। प्रेम धरती से भागकर नहीं, धरती को चखकर गहरा होता है; जीवन को नकारकर नहीं, जीवन को पूरी तरह जीकर अर्थवान होता है। यही गुलज़ार के प्रेम की वह आधुनिकता है जिसमें लोकप्रिय संस्कृति, साहित्यिक संवेदना, सामाजिक यथार्थ और आध्यात्मिक अनुभव एक-दूसरे से संवाद करते हैं।

टिप्पणियाँ / Footnotes

1. Natalie Sarrazin, “Celluloid Love Songs: Musical Modus Operandi and the Dramatic Aesthetics of Romantic Hindi Film,” Popular Music 27, no. 3 (2008): 393–411. DOI: 10.1017/S0261143008102197.
2. Rita Kothari and Apurva Shah, “Dil Se: Love, Fantasy and Negotiation in Hindi Film Songs,” Interventions 19, no. 4 (2017): 532–549. DOI: 10.1080/1369801X.2017.1294101.
3. Raymond Williams, Marxism and Literature (Oxford: Oxford University Press, 1977).
4. Michel de Certeau, The Practice of Everyday Life, trans. Steven Rendall (Berkeley: University of California Press, 1984).
5. Saba Mahmood Bashir, Gulzar, a Poet in Popular Culture: A Critical Study (PhD diss., Indian Institute of Technology Delhi, 2011).
6. Anthony Giddens, Modernity and Self-Identity: Self and Society in the Late Modern Age (Stanford: Stanford University Press, 1991).
7. “दो दीवाने शहर में,” घरौंदा (1977), गीतकार गुलज़ार, संगीत जयदेव.
8. Henri Lefebvre, The Production of Space, trans. Donald Nicholson-Smith (Oxford: Blackwell, 1991).
9. “दो दीवाने शहर में,” प्रमाणित गीत-पाठ में धरती पर चलते तारों और आकाश के धरती हो जाने का बिंब आता है।
10. कबीर, कबीर ग्रंथावली, संपादक श्यामसुंदर दास, पद 162.
11. “गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता,” देवता (1978), गीतकार गुलज़ार, संगीत आर. डी. बर्मन.
12. “तुम अगर साथ देने का वादा करो,” हमराज़ (1967), गीतकार साहिर लुधियानवी, संगीत रवि, गायक महेंद्र कपूर.
13. उसी गीत के पाठ में “संगमरमर की तस्वीर” और “तुम मेरी तक़दीर हो” जैसे रूपक प्रेम की आदर्शीकृत संरचना को रेखांकित करते हैं।

संदर्भ-सूची

Bashir, Saba Mahmood. Gulzar, a Poet in Popular Culture: A Critical Study. PhD diss., Indian Institute of Technology Delhi, 2011.

Bauman, Zygmunt. Liquid Love: On the Frailty of Human Bonds. Cambridge: Polity Press, 2003.

Certeau, Michel de. The Practice of Everyday Life. Translated by Steven Rendall. Berkeley: University of California Press, 1984.

Giddens, Anthony. Modernity and Self-Identity: Self and Society in the Late Modern Age. Stanford: Stanford University Press, 1991.

Kothari, Rita, and Apurva Shah. “Dil Se: Love, Fantasy and Negotiation in Hindi Film Songs.” Interventions 19, no. 4 (2017): 532–549.

Lefebvre, Henri. The Production of Space. Translated by Donald Nicholson-Smith. Oxford: Blackwell, 1991.

Sarrazin, Natalie. “Celluloid Love Songs: Musical Modus Operandi and the Dramatic Aesthetics of Romantic Hindi Film.” Popular Music 27, no. 3 (2008): 393–411.

Williams, Raymond. Marxism and Literature. Oxford: Oxford University Press, 1977.

प्राथमिक स्रोत

कबीर. कबीर ग्रंथावली. संपादक श्यामसुंदर दास. काशी: नागरी प्रचारिणी सभा.

Gulzar. Selected Poems. New Delhi: Penguin/HarperCollins India.

Gulzar. Ravi Paar. New Delhi: Rupa Publications.

Gulzar. Green Poems. New Delhi: Penguin India.

Gharaonda. Directed by Bhimsain. Music by Jaidev. Lyrics by Gulzar. 1977.

Devata. Music by R. D. Burman. Lyrics by Gulzar. 1978.

Humraaz. Music by Ravi. Lyrics by Sahir Ludhianvi. 1967.

डॉ. मेधा
असिस्टेंट प्रोफेसर , 
हिंदी विभाग, सत्यवती कॉलेज (सांध्य) ,
दिल्ली विश्वविद्यालय .

Email – medha.hindi@satyawatie.du.ac.in

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