लोक से विश्व तक गूंजती छत्तीसगढ़ की धड़कन अब खामोश: तीजन बाई
रीतिकालीन कविता और स्त्री यौनिकता विमर्श
हँसना है तो थोड़ा रो लें: मैं वापस आऊंगा’
“भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता कीअभिव्यक्ति : एक आलोचनात्मक अध्ययन”
विमर्श से परे: स्त्री और पुरुष-दूसरी किश्त
ऊप्स मूमेंट : स्त्री को देह बनाते कैमरे
विमर्श से परे: स्त्री और पुरुष-पहली किश्त
हम चार दशक पीछे चले गए हैं :
यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता: भाग 3
बदलाव की बयार : जद्दोजहद अभी बाकी है
मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है : अरविन्द जैन
यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता -भाग 2
सूखा नशा