गैंगस्टर माँ का साया और एक आज़ाद बेटी की परवाज़
परायों की गली में नितांत अकेला कुशवाहा सम्राट (चौधरी) !
प्रतीकों की लड़ाई: महिष दसरा, वर्चस्व का इतिहास और सत्ता का मौन
फिल्मों में स्त्री-भूमिका के प्रश्न “भूमिका” फ़िल्म के सन्दर्भ में
‘द वायस ऑफ़ हिन्द रजब’
बापू टावर में सवर्ण वर्चस्व का नंगा नाच
लोक से विश्व तक गूंजती छत्तीसगढ़ की धड़कन अब खामोश: तीजन बाई
हँसना है तो थोड़ा रो लें: मैं वापस आऊंगा’
सूखा नशा
राहुल गांधी,कांग्रेस की परंपरा और INDIA गठबंधन का असहज भविष्य
कवि कभी मरता नहीं, वह अपनी रचनाओं में जीवित रहता है
ओटीटी और भारतीय समाज की बदलती ‘दर्शक संस्कृति’
ऐतिहासिक और अमिट है समाजवाद की वैचारिक धारा वरसी जी स्मृति समारोह में वक्ताओं की राय