कवि कभी मरता नहीं, वह अपनी रचनाओं में जीवित रहता है

सुरेंद्र स्निग्ध की 74वीं जयंती पर ‘क्यूटिकिल्स एवं अन्य कहानियाँ’ का लोकार्पण

 “कवि कभी मरता नहीं, वह अपनी रचनाओं में जीवित रहता है और अपने पाठकों को भी जीवित कर देता है।” वरिष्ठ साहित्यकार रवीन्द्र भारती की यह टिप्पणी रविवार को पटना संग्रहालय के सभागार में बार-बार उपस्थित जनों की स्मृतियों में गूंजती रही, जहाँ जनपक्षधर साहित्यकार, कवि, कथाकार, आलोचक और शिक्षक सुरेंद्र स्निग्ध (1952-2017) की 74वीं जयंती के अवसर पर उनकी मरणोपरांत प्रकाशित कहानी-पुस्तक ‘क्यूटिकिल्स एवं अन्य कहानियाँ’ का लोकार्पण किया गया।

साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘बागडोर’, जनवादी लेखक संघ और पटना संग्रहालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस समारोह में साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक वरिष्ठ रचनाकारों, बुद्धिजीवियों तथा नागरिकों ने भाग लिया। कार्यक्रम में रवीन्द्र भारती, अरविंद कुमार, संतोष दीक्षित, विजय कुमार सिंह, सुमन कुमार, रमेश ऋतंभर, श्रीधर करुणानिधि, आलोका बनर्जी, रेखा कुमारी, समीर, राकेश शर्मा, अजय कुमार, संजीव चंदन, अरुण मिश्रा, नागेंद्र राय, राजेश रंजन, सूरज, संतोष यादव और रणविजय सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी एवं नागरिक समाज के लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन अरुण नारायण ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ पत्रकार कुलभूषण ने किया।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में रवीन्द्र भारती ने सुरेंद्र स्निग्ध को याद करते हुए कहा कि वे ऐसे मित्र थे जिनके जाने की उम्र नहीं थी। “वे गहरे मानवीय सरोकारों और मुहब्बत से लबरेज इंसान थे। हमेशा चहकते हुए अपनी जिंदादिली का अहसास कराते थे।” उन्होंने स्मरण किया कि 1974 से उनका साथ रहा और उन्होंने स्निग्ध को जीवन भर एक संवेदनशील, प्रतिबद्ध और जमीनी लेखक के रूप में देखा। उन्होंने कहा कि आलोका बनर्जी उनके लिए केवल जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि सच्ची मित्र भी थीं।

रवीन्द्र भारती ने भावुक स्वर में कहा कि आज भी उन्हें सुरेंद्र स्निग्ध की उपस्थिति महसूस होती है। “उनके पके धान की गंध आज भी हमारे बीच मौजूद है।” उन्होंने कहा कि ‘क्यूटिकिल्स एवं अन्य कहानियाँ’ पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो हमारे भीतर का कोई मृत हिस्सा फिर से जीवित हो उठा हो। उन्होंने स्मरण किया कि ‘बीजपत्र’ में स्निग्ध की अनेक कविताएँ प्रकाशित हुई थीं और उनके चर्चित उपन्यास ‘छाड़न’ के अंश सुनने का अवसर भी उन्हें मिला था। उन्होंने कहा कि स्निग्ध का रिश्ता हमेशा आम लोगों से रहा। वे झुग्गी-बस्तियों के बच्चों को रंगकर्म के लिए प्रेरित करते थे और उनकी आर्थिक सहायता भी करते थे। “उन्होंने अपने विद्यार्थियों को केवल भाषा का संस्कार नहीं दिया, बल्कि जीवन और समाज के प्रति सरोकार का संस्कार दिया।”

‘प्राच्यप्रभा’ के संपादक विजय कुमार सिंह ने सुरेंद्र स्निग्ध से जुड़े कई आत्मीय संस्मरण साझा किए। उन्होंने गोरख पांडे और अपने पिता की स्मृति में लिखी गई कविताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी कविताएँ अपने कलात्मक सौंदर्य और भावात्मक गहराई के कारण लंबे समय तक याद रखी जाएँगी। उन्होंने कहा कि ऐसे रचनाकारों को लगातार याद किया जाना चाहिए ताकि नई पीढ़ी उनके साहित्यिक अवदान से परिचित हो सके।

आलोचक अरविंद कुमार ने कहा कि कॉलेज जीवन से लेकर आज तक सुरेंद्र स्निग्ध से उनका आत्मीय संबंध बना रहा। उन्होंने कहा कि ‘छाड़न’ पर विस्तार से लिखने का अवसर उन्हें मिला था और अब उनकी कहानियों को पढ़ना एक नया अनुभव है। उनके अनुसार स्निग्ध का कथा संसार भी उतना ही समृद्ध और महत्वपूर्ण है जितना उनका काव्य संसार।

कथाकार संतोष दीक्षित ने कहा कि सुरेंद्र स्निग्ध उन दुर्लभ शिक्षकों में थे जिन्होंने प्रतिभाशाली शिष्यों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की। उन्होंने कहा कि अध्यापन सबसे रचनात्मक कार्य है क्योंकि इसके माध्यम से भविष्य का निर्माण होता है। स्निग्ध को प्रेम और प्रकृति का कवि बताते हुए उन्होंने कहा कि उनकी कहानियाँ छोटे फ्रेम में बड़े सामाजिक यथार्थ को समेटती हैं। उन्होंने संग्रह की चर्चित कहानियों ‘कूड़ा’, ‘शंटिंग’ और ‘लाल सलाम’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ये कहानियाँ रूपक और यथार्थ के माध्यम से समाज के गहरे अंतर्विरोधों को उद्घाटित करती हैं। ‘कूड़ा’ में सामंती समाज की विडंबनाएँ हैं, जबकि ‘लाल सलाम’ सामाजिक बदलाव की कहानी है, जो कहीं-न-कहीं फणीश्वरनाथ रेणु की ‘पंचलाइट’ की याद दिलाती है।

कार्यक्रम की पृष्ठभूमि रखते हुए मुंगेर विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक एवं सुरेंद्र स्निग्ध के छात्र डॉ. राकेश शर्मा ने उनके साहित्यिक और व्यक्तिगत जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्निग्ध की सबसे बड़ी विशेषता उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और मनुष्य के पक्ष में निर्भीकता से खड़े होने का साहस था। उन्होंने कहा, “सुरेंद्र स्निग्ध की कविता के कंधे पर गद्य सवार है। वे अपनी पक्षधरता में बेहद स्पष्ट और मजबूत थे। साहित्य, समाज और आलोचना—तीनों क्षेत्रों में वे एक सच्चे कॉमरेड की तरह सक्रिय रहे।”

श्रीधर करुणानिधि ने कहा कि सुरेंद्र स्निग्ध की कहानियाँ अपने समय और समाज के जटिल प्रश्नों से सीधा संवाद करती हैं। वे कठिन विषयों को भी बिना किसी बनावट के प्रस्तुत करते हैं। उनकी रचनाओं में संवेदना और वैचारिक स्पष्टता का दुर्लभ संतुलन दिखाई देता है।

रेखा कुमारी ने उन्हें एक ऐसे शोध निर्देशक के रूप में याद किया, जिन्होंने विद्यार्थियों को केवल अकादमिक मार्गदर्शन ही नहीं दिया बल्कि जीवन और समाज को समझने की दृष्टि भी प्रदान की। सुनीता कुमारी ने उन्हें आदर्श शिक्षक बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने विद्यार्थियों को प्रश्न करना और स्वतंत्र रूप से सोचना सिखाया।

शोधार्थी एवं जेआरएफ समीर ने ‘क्यूटिकिल्स एवं अन्य कहानियाँ’ का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि लेखक की रचनाएँ पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करती हैं। उन्होंने संग्रह की कहानियों के अर्थ-संकेतों, वैचारिक पक्षों और रचनात्मक संरचना पर विस्तार से चर्चा की।

इंजीनियर संतोष ने उन्हें एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और रंगकर्मी के रूप में याद किया, जबकि सूरज ने छात्र जीवन के संस्मरण साझा किए। वरिष्ठ साहित्यकार रमेश ऋतंभर ने कहा कि कविता लिखना केवल साहित्यिक कर्म नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व भी है। उन्होंने बताया कि सुरेंद्र स्निग्ध का व्यक्तित्व सरल, निस्पृह और आडंबरहीन था। वे लोकतांत्रिक मूल्यों में गहरी आस्था रखते थे और उनका घर हमेशा संवाद और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बना रहता था।

समापन वक्तव्य में सुमन कुमार ने कहा कि सुरेंद्र स्निग्ध का साहित्य आज भी अपने समय के ज्वलंत प्रश्नों से संवाद करता है और नई पीढ़ी को संवेदना, मनुष्यता तथा सामाजिक प्रतिबद्धता का पाठ पढ़ाता है। कार्यक्रम में उनकी धर्मपत्नी आलोका बनर्जी भी उपस्थित रहीं।

पूरे आयोजन के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि सुरेंद्र स्निग्ध का साहित्य केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों,और सामाजिक चेतना और मानवीय सरोकारों की एक सामूहिक संकल्प यात्रा है।

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ISSN 2394-093X
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