गैंगस्टर माँ का साया और एक आज़ाद बेटी की परवाज़
परायों की गली में नितांत अकेला कुशवाहा सम्राट (चौधरी) !
प्रतीकों की लड़ाई: महिष दसरा, वर्चस्व का इतिहास और सत्ता का मौन
फिल्मों में स्त्री-भूमिका के प्रश्न “भूमिका” फ़िल्म के सन्दर्भ में
औरत मार्च: बदलते पाकिस्तान की दास्तान
भगत सिंह: हवा में रहेगी मेरे ख़यालों की बिजली
हाय मैं हिन्दी पीएचडी, पकोड़े की दुकान भी नहीं खोल सकती
धारा 377 की मौत और पितृसत्तात्मक विमर्श पद्धति
समता की सड़क जोतीबा फुले से होकर गुजरती है.
न मार्क्सवाद, न अंबेडकरवाद, न स्त्रीवाद , बस एक्सपोजर चाहिए और मंच
तुम्हारी माँ भी छेड़छाड़ की शिकार हुई, बेटों तुम्हें जानना चाहिए औरत की देह पर उसका अपना हक़ होता है
बेपढ़ ऐंकरों द्वारा दलित साहित्य पर हमले की नाकाम कोशिश अर्थात साहित्य आजतक
ऐतिहासिक और अमिट है समाजवाद की वैचारिक धारा वरसी जी स्मृति समारोह में वक्ताओं की राय