परायों की गली में नितांत अकेला कुशवाहा सम्राट (चौधरी) !

कुशवाहा समाज के एक बड़े हिस्से के लिए यह सवाल है कि जदुनन्दन मेहता, जगदेव प्रसाद, मास्टर जगदीश की वर्तमान परंपरा अथवा बुद्ध से अशोक तक, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले से लेकर रामस्वरूप वर्मा तक की विरासत पर दावेदारी की ऐतिहासिक परंपरा को क्या भाजपा के जरिए ही एक ठौर मिलना था! एक हिस्से ने इसे त्रिवेणी संघ का चक्र पूरा होना माना-यादव-कुर्मी-कुशवाहा तो एक हिस्सा इस सिद्धांत के प्रति संदेह के भाव में है। उत्तर प्रदेश से आने वाले दिल्ली के एक कुशवाहा पुलिस अधिकारी ने एक बार मुझे एक बात कही थी। मेरे एक कुशवाहा साथी के बारे में सवाल करते हुए उन्होंने मुझसे पूछा, 'क्या वे कुशवाहा हैं?' मेरे सकारात्मक उत्तर के बाद उन्होंने कहा कि हमारे यहाँ कुशवाहा कुश के वंशज हैं, राम के और बिहार में कुशवाहा खुद को मौर्य कहते हैं, अशोक के वंशज बताते हैं, ये फर्क है। सवाल है कि क्या सम्राट चौधरी अशोक की परंपरा में, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले की परंपरा में खुद को कभी देखा या उनकी सरकार उस परंपरा के प्रति निष्ठावान है? इस परंपरा के बिहार में कुशवाहा वाहक उपेंद्र कुशवाहा रहे हैं, जो आजकल अपनी ही पार्टी के विधायकों के रडार पर हैं।

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बात 15 अप्रैल 2026 के लगभग एक महीने बाद की होगी, यानी बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ताजपोशी के लगभग एक महीने बाद की। किसी मीडिया हाउस के मित्रों ने बताया कि नए सम्राट के लिए मीडिया में, उस हाउस में, मीडियाकर्मियों में उत्साह नहीं है। वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि किस गति और आवेग में नए सम्राट की छवि को जनता के सामने पेश किया जाए। किसी संस्थान में छपने वाली एक पत्रिका का एक अंक तेजी से तैयार करते हुए अधिकारियों ने पुराने सम्राट नीतीश कुमार को ही तवज्जो देने की नीति अपनाई। यह क्या था? लगभग 20 साल बाद और तकनीकी तौर पर 10 साल बाद हुए बदलाव का जैसा उत्साह होना चाहिए था, वह सत्ता के गलियारे की हवा में नहीं था। जाहिर है, सत्ता के गलियारे की हवा ही मीडिया के गलियारे में बहती है, बहती रही है। नीतीश कुमार को थोड़ी सी भी आँच, उन्हें थोड़ी सी भी तपिश, मीडिया के ‘महानों’ को बेचैन कर देती थी। यह अकारण तो नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस और तब प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरपर्सन मार्कंडेय काटजू ने 2012 में बिहार की मीडिया पर सत्ता के नियंत्रण की बात की तो उसके प्रतिवाद में प्रभात खबर ने, खासकर उसके संपादक हरिवंश ने, कलम तोड़ दिए। उसका अच्छा फल भी मिला उन्हें, सत्ता ने उनके आगे सीढ़ियाँ लगा दीं, वे बाद के दिनों में राज्यसभा भेजे गए और फिर प्रधानमंत्री मोदी की प्रियता हासिल करते हुए नीतीश कुमार की भी इच्छा-अनिच्छा से परे चले गए।

बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के प्रति ऐसा लय, ऐसा तालमेल, ऐसा उत्साह मीडिया में सिरे से गायब दिख रहा था। भाजपा समर्थक मीडिया में थोड़ी सी खुशी सिर्फ इस बात की थी कि बिहार में पहली बार सत्ता भाजपा के हाथ में आई थी, जिसे भाजपा का ही एक बड़ा समूह आधा-अधूरा मान रहा था। भाजपा के नाखुश बड़े समूह में निराशा इस बात की थी कि फिर से सत्ता यादव-कुर्मी-कोईरी (कुशवाहा) खित्ते में ही स्थिर रह गई थी और भाजपा का पहला मुख्यमंत्री न उनका अपना कैडर था और न आरएसएस से ही उसका कोई रिश्ता था। नीतीश कुमार भी, हालांकि, मीडिया के सर्वमान्य डार्लिंग नहीं रहे। जब-जब वे बीजेपी से अलग होकर महागठबंधन के साथ जाते रहे, तब-तब मीडिया में एक बँटवारा भी हुआ है। मीडिया के ‘महान’ भी बँट जाया करते रहे हैं। ऐसा तब होता है जब राज्य सरकार एक बड़ा विज्ञापनदाता होती है। मेरा अपना अनुभव भी रहा जब 2014 में मैंने नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के साथ आने की जरूरत पर एक लेख जनसत्ता में लिखा तो राज्य की राजधानी के एक बड़े पत्रकार (अंग्रेजी के पत्रकार) ने मेरे खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी अखबार को भेजी।

ऐसा नहीं है कि मीडिया की इस मानसिकता को आप किसी आँकड़े या कुछ खबरों से स्पष्ट कर सकते हैं। इसे समझने के लिए एक पाठक को, एक शोधकर्ता को खबरों के पैटर्न पर, उसकी प्राथमिकताओं पर नजर रखनी होती है। मंडल की आवोहवा के बीच लालू प्रसाद और राबड़ी देवी जब क्रमशः मुख्यमंत्री हुए तो राज्य में अपराधों के लिए अखबारों ने ‘क्लबिंग पॉलिसी’ अपनाई थी। राज्य भर की अपराध की घटनाओं को एक साथ प्रकाशित करना, देश के दूसरे हिस्सों से उसकी तुलना न करना और सरकार की एक खास छवि बनते जाने देना। आजकल एल्गोरिद्म ने अपने ढंग से छवि निर्माण में भूमिका निभाई है।

सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री पद के लिए नाम की घोषणा करते हुए भाजपा के कद्दावर भूमिहार नेता और नीतीश कुमार की सरकार में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा की नाराजगी खुलकर सामने आई। 14 अप्रैल को अपने साथी डिप्टी सीएम का नाम विधायक दल के नेता के रूप में प्रस्तावित करते हुए विजय सिन्हा ने कहा, ‘अभी BJP में तीसरी और चौथी पीढ़ी सक्रिय है। हमने बरसों-बरस खून-पसीना बहाया और बलिदान दिया, तब यह अवसर आया है। अपने कमांडर के आदेश के अनुसार, गठबंधन की राजनीति को साथ लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी के नाम का प्रस्ताव किया है।’ इस बयान को नए नेता के स्वागत के लिए विजय सिन्हा के खुले संकोच के रूप में देखा गया। अखबारों ने इसे ऐसे ही पेश भी किया। उनके पूर्व समकक्ष की सत्ता शुरू होते ही विजय सिन्हा की सुरक्षा Z+ से Z कर दी गई, जबकि निशांत कुमार को तब हाल ही में Z+ सुरक्षा दी गई थी। डिप्टी सीएम सिन्हा नए मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री बने, उनसे पुराना राजस्व विभाग ले लिया गया और सरकार बनने के 5-6 दिनों में ही राजस्व विभाग में उनके द्वारा अधिकारियों के निलंबन के पूर्व के फैसले को नए सीएम ने उलट दिया। इसके पहले 18 अप्रैल को नवभारत ने अपने वेब वर्जन में विश्लेषण रिपोर्ताज छापा, ‘क्या बिहार की सियासत में सिर्फ K कार्ड चलेगा? विजय सिन्हा के बहाने भूमिहार-ब्राह्मण से दिखने लगी बीजेपी की दूरी।’ K का अर्थ यहाँ कोइरी-कुर्मी से है। 26 अप्रैल को विजय सिन्हा को बेगूसराय में यह कहते हुए बताया गया कि ‘सम्राट बीजेपी के नहीं NDA के मुख्यमंत्री हैं।’ विजय सिन्हा की नाराजगी की इन खबरों ने बिहार में भाजपा के भूमिहार और खासकर सवर्ण समर्थकों में सम्राट को एक पराया मुख्यमंत्री बना दिया, जिसकी रही-सही कसर नेता विपक्ष तेजस्वी यादव के बयानों ने पूरी कर दी, उन्हें राजद संस्कृति का मुख्यमंत्री बताकर। ऐसे हमले जन सुराज के स्वयंभू प्रमुख प्रशांत किशोर के पहले से भी होते रहे हैं। ये दोनों ही नेता अलग-अलग कारणों से नए सीएम की डिग्री का सवाल भी उठाते रहे हैं।

इस माहौल का परिणाम आना शेष था, लेकिन सवर्ण समाज में सीएम के परायेपन का इन पंक्तियों के लेखक के लिए एक संदर्भ और रहा है। संदर्भ है बिहार विधानसभा चुनाव के पूर्व संघ प्रमुख मोहन भागवत का मुजफ्फरपुर में एक बयान। उन्होंने चुनाव के पहले नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़े जा रहे चुनाव के पहले उन्होंने अनुयायियों को आश्वस्त किया था कि ‘दुर्भाग्य बहुत दिनों तक नहीं रहता।’ लेकिन बिहार के राजनीतिक घटनाक्रमों ने नीतीश कुमार के बाद राजद से राजनीति की शुरुआत करने वाले, संघ से बाहर की संस्कृति में पले-बढ़े सम्राट को गद्दी दे दी। उनके पिता शकुनि चौधरी की राजनीति भी भाजपा की विरोधी लाइन पर खड़ी रही है। सवर्ण समाज की हताशा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझाते हुए एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न लिए जाने की शर्त पर मुझे बताया कि मंडल की तीव्र हवा से थपेड़े खा चुका और इस पृष्ठभूमि में लालू प्रसाद-राबड़ी देवी के शासन से दुखी सवर्ण समाज के लिए नीतीश कुमार एक उम्मीद का विकल्प बनकर आए, जो भाजपा के साथ कदमताल कर रहे थे, लेकिन जल्द ही सुशील मोदी और नीतीश कुमार की जोड़ी उन्हें अपनी सत्ता के लिए अपर्याप्त लगने लगी थी। इस बार वे न सिर्फ भाजपा से बल्कि सवर्ण मुख्यमंत्री की उम्मीद कर रहे थे, क्योंकि भाजपा के पास न सिर्फ अधिक सीटें थीं, बल्कि जोड़-तोड़ से अपना मुख्यमंत्री बना लेने की हैसियत में पार्टी पहली बार आई थी।’ वरिष्ठ पत्रकार की व्याख्या को और भी विस्तार में ले जाने पर एक तथ्य और स्पष्ट होता है कि विजय सिन्हा के रूप में सवर्णों में भी राज्य स्तर पर हर तरह से प्रभावी हैसियत वाले भूमिहारों को भी दशकों बाद अपना मुख्यमंत्री पाने का यह अवसर था। श्रीकृष्णसिंह के बाद राज्य में भूमिहार मुख्यमंत्री के लिए 6 दशक बाद अवसर बना था। 80 के दशक में कांग्रेस ने पाँच मुख्यमंत्री बनाए, जिनमें तीन ब्राह्मण और दो राजपूत थे। जाहिर है, हताशा का असर मीडिया से लेकर समाज-साहित्य-संस्कृति की ‘महान’ हस्तियों से होते हुए आम लोगों तक पहुँचा। यह अकारण तो नहीं है कि जल्द ही उन्हें प्रतिकार के लिए ‘भरत तिवारी’ और प्रशांत किशोर, दो गतिविधियों और दो फलसफों के नायक मिल गए।

17 जून को भरत तिवारी नाम का युवा भोजपुर में एनकाउंटर में मारा गया। पुलिस को घंटों तक ललकारने वाला यह युवक सवर्ण राजनीति के लिए शहीद की पात्रता वाला किरदार था। मीडिया में इस घटना की प्रस्तुति देखे जाने लायक थी। दैनिक भास्कर ने खबर बनाई, ‘एनकाउंटर पर उठे सवाल, सरेंडर के बाद क्यों गोली मारी?’ दैनिक हिंदुस्तान ने ‘मुठभेड़ पर सवाल, न्यायिक जाँच’ जैसे शीर्षक से इस घटना को कवर किया। यह वह मीडिया थी जो ‘तीन हाफ, दो साफ; सम्राट चौधरी के राज में 18 दिन में मगध से अंग और सारण तक पाँच एनकाउंटर’ (लाइव हिंदुस्तान) जैसी खबरें लिख रही थी, या रामधनी यादव, मिंटू यादव के एनकाउंटर में मारे जाने को सरकारी पक्ष में झुका कवरेज कर रही थी। योगी मॉडल की सराहना करने वाले भाजपा नेता भी अपनी ही सरकार और पुलिस की आलोचना में उतर आए। खुद मारे गए युवक का योगी मॉडल और एनकाउंटर के समर्थन के वीडियो भी सोशल मीडिया में देखे जा सकते थे। कुछ दिनों के अंदर ही भरत तिवारी की सवर्ण समाज में मिथकीय छवि बनाई जाने लगी। भगत सिंह से तुलना होने लगी। बांकीपुर विधानसभा में हुए उपचुनाव फिर एक ऐसा मौका आया, जब सवर्ण इकोतंत्र पार्टी से ऊपर जाकर प्रशांत किशोर को जवाबी प्रतीक बनाने में लग गया। विपक्षी दलों में, खासकर कांग्रेस के कई नेता प्रशांत किशोर के पक्ष में खुलकर सामने आए तो भाजपा के भीतर भी बांकीपुर को संदेश बनाने की कोशिश हुई। प्रशांत किशोर निजी तौर पर मुख्यमंत्री पर हमलावर रहते हैं, उन्हें खुलेआम अपराधी और न जाने क्या-क्या कहते हैं। प्रशांत इसलिए भी दुलारे हैं सवर्ण आहत मन के लिए कि वे भी चार दशकों बाद सत्ता की उम्मीद जगाते हैं। भरत तिवारी उनके लिए भी शहीद रहा और अनंत सिंह का संग-साथ भी उन्हें प्रिय है। प्रशांत की कोई विचारधारा नहीं है, बड़े वादे और अवसरों का इस्तेमाल उनकी राजनीति का पैटर्न है, वादों में और हार की स्थिति में टिकट बँटवारे की डायवर्सिटी उनकी रणनीति।

वर्तमान मुख्यमंत्री के प्रति एक तबके में, खुद उनकी पार्टी में परायेपन का यह पक्ष तो स्पष्ट और मुखर है, लेकिन सवाल है कि क्या सम्राट चौधरी की खुद की राजनीतिक शैली इस वातावरण को उद्दीप्त भी करती है? मुख्यमंत्री बनने के बाद बीरेंद्र यादव न्यूज के लिए इसके अप्रैल अंक में लिखते हुए उनकी राजनीतिक विशेषता पर मैंने टिप्पणी की थी, ‘2017 में आखिरकार उन्होंने (सम्राट ने) भाजपा ज्वाइन कर लिया- ये सारी कवायद एक नेता की सत्ता हासिल करने की भूख की तरह देखी जा सकती है और यह एक नेता के लिए जरूरी अवयव भी होता है। इस लचीलेपन के कारण अवसरों को साधने और संतुलित करने की राजनैतिक महारत वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की वे पसंद बनते गए। ……. क्या लचीलापन, सत्ता की भूख और अवसरों की पहचान ही उनकी भी ताकत बनती गई या पिछले दो सालों में उन्होंने नीतीश कुमार के प्रति केयर और समर्पण की नीति के साथ उनका विश्वास हासिल कर लिया या लव-कुश आधार के लिए वे अनिवार्य होते गए…..’ उसी लेख में मैंने उनकी आगे की राजनीति के लिए कुछ रास्तों का उल्लेख किया था, योगी मॉडल का अनुसरण या लालू प्रसाद और उनके परिवार को पंचिंग बैग की तरह इस्तेमाल करना, जैसा सुशील मोदी करते थे और अपनी जाति के नेताओं में नंबर वन होकर उभरना, इसके लिए अन्य कद्दावर नेताओं, खासकर उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति को कमजोर करना। सत्ता हासिल करने के बाद वे एक साथ इन सभी रास्तों पर चल पड़े।

बिहार में एनकाउंटर की नीति की शुरुआती सराहना के बाद भरत तिवारी की घटना ने इस नीति की रफ्तार थाम दी, लालू प्रसाद और उनके परिवार को टारगेट कर राजनीति करने की उनकी नीति कटुता और यादव विरोध के वातावरण में बदल गई, जो अब बहुजन स्पेस में एक तीखे पलटवार में बदल गया है, अपराधियों की जाति खोजी जाने लगी है। तेजस्वी यादव की डिग्री पर खुद मुख्यमंत्री द्वारा कभी उठाए गए सवाल उनकी ओर ही विराट बनकर वापस लौट आए हैं, जिसमें प्रशांत किशोर की इस मुद्दे पर मुखरता ने आग में घी का काम किया है।

अति पिछड़ा समाज कई कारणों से सम्राट का फिलहाल तो नहीं है, आगे भी नहीं हो शायद। उसका सत्ता समीकरण भाजपा से जुड़ा है और उसकी उम्मीदें नीतीश कुमार के साथ जुड़ीं। अति पिछड़ा प्रभावी रूप से एक वर्ग के रूप में चिह्नित है, लेकिन सत्ता में भागीदारी का यथार्थ इस वर्ग के तेली, चंद्रवंशी जैसी अपेक्षाकृत कुछ अधिक संख्या वाली जातियों तक सीमित है। इस वर्ग में सम्राट की विश्वसनीयता टेढ़ी खीर इसलिए भी है कि तमाम उम्मीदों के बावजूद 2014 में अलग चुनाव लड़ने पर और 2015 में महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ने पर नीतीश कुमार इसकी पहली पसंद नहीं बन पाए थे। बिहार में दलित समाज तीन प्रमुख जातियों की बहुसंख्या की अगुआई में बनता है। पासवान और मांझी जातियों के अपने स्वतंत्र नेता हैं, उनमें से चिराग पासवान की कोई लॉयलिटी सम्राट चौधरी के साथ नहीं है और खुद चिराग एवं उनकी जाति की महत्वाकांक्षा एवं उम्मीदें चिराग को ऐसी किसी लॉयलिटी की सुविधा नहीं देतीं। जीतन राम मांझी का राजनीतिक पैटर्न सत्ता के साथ लॉयलिटी का है, और निजी कृतज्ञता उनकी नीतीश कुमार के साथ है। इस वक्त जीतन राम मांझी अपने पैटर्न के कारण भी और खुद मुख्यमंत्री रहते हुए तब युवा सम्राट चौधरी के साथ काम करते हुए भी उनके प्रति स्नेह का भाव रखते जरूर हैं, लेकिन सर्वाइवल इंस्टिंक्ट सबसे ज्यादा उनमें है, जो स्नेह को राजनीतिक समर्पण बनने से रोकता है। रविदास समाज का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ होता है, शेष सत्ता के समीकरण के साथ।

K फैक्टर में भी K अब कैपिटल नहीं रहा, कुर्मी और कुशवाहा से K बड़ा बनता है, लेकिन कुर्मी समाज सम्राट को मन से अपना नहीं मान रहा है, बल्कि आहत है कि नीतीश कुमार को सत्ता से बेदखल किए जाने के भाजपा-प्रॉजेक्ट का हिस्सा और आधार बन गए सम्राट चौधरी। कई बार परसेप्शन नेताओं से बड़ा हो जाता है। कुर्मी समाज में अपने लिए इस परसेप्शन को खत्म करने में खुद नीतीश सक्षम नहीं हैं तो सम्राट चौधरी कैसे हो पाएंगे। उदाहरण के तौर पर बांकीपुर में कुर्मी मतदाता या तो प्रशांत को पसंद कर रहे थे या उदासीन थे। पटना में लव-कुश सम्मेलन भी कुशवाहा उत्साह का सम्मेलन बनकर रह गया। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद कुशवाहा समाज में स्वागत भाव जरूर देखा गया है। लंबे समय से सत्ता की आकांक्षा पूरी हुई, भले ही भाजपा के जरिए। सामाजिक न्याय की सत्ता में जाति-समाज के ये मनोभाव अनिवार्य मनोविज्ञान का हिस्सा हैं, लेकिन वहाँ भी सवाल कई हैं, जिसे राजद के कुशवाहा नेता अलोक मेहता अपना स्वर देते रहते हैं।

कुशवाहा समाज के एक बड़े हिस्से के लिए यह सवाल है कि जदुनन्दन मेहता, जगदेव प्रसाद, मास्टर जगदीश की वर्तमान परंपरा अथवा बुद्ध से अशोक तक, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले से लेकर रामस्वरूप वर्मा तक की विरासत पर दावेदारी की ऐतिहासिक परंपरा को क्या भाजपा के जरिए ही एक ठौर मिलना था! एक हिस्से ने इसे त्रिवेणी संघ का चक्र पूरा होना माना-यादव-कुर्मी-कुशवाहा तो एक हिस्सा इस सिद्धांत के प्रति संदेह के भाव में है। उत्तर प्रदेश से आने वाले दिल्ली के एक कुशवाहा पुलिस अधिकारी ने एक बार मुझे एक बात कही थी। मेरे एक कुशवाहा साथी के बारे में सवाल करते हुए उन्होंने मुझसे पूछा, ‘क्या वे कुशवाहा हैं?’ मेरे सकारात्मक उत्तर के बाद उन्होंने कहा कि हमारे यहाँ कुशवाहा कुश के वंशज हैं, राम के और बिहार में कुशवाहा खुद को मौर्य कहते हैं, अशोक के वंशज बताते हैं, ये फर्क है। सवाल है कि क्या सम्राट चौधरी अशोक की परंपरा में, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले की परंपरा में खुद को कभी देखा या उनकी सरकार उस परंपरा के प्रति निष्ठावान है? इस परंपरा के बिहार में कुशवाहा वाहक उपेंद्र कुशवाहा रहे हैं, जो आजकल अपनी ही पार्टी के विधायकों के रडार पर हैं।

सम्राट ने मुख्यमंत्री बनते ही दक्षिण के विवादास्पद गुरु जग्गी वासुदेव के साथ श्मशानों का समझौता किया, सस्ते दर पर जमीन उपलब्ध कराई। विश्वविद्यालय खोलने की घोषणाएँ भी सम्राट ‘सीता माता’ के नाम पर कर रहे हैं। उन्होंने और उनकी सरकार ने नीतीश कुमार की बौद्ध प्रतीकों के प्रति जुड़ाव की नीति से अलग राह ले ली है। तो सवाल है कि क्या अपने लिए परायेपन का वातावरण बनाने में सम्राट चौधरी ने खुद अपना योगदान दिया है? क्या उनके लिए एक परसेप्शन बन जाएगा कि वे सबके तो नहीं ही हैं, जैसे नीतीश कुमार सबके होने का अहसास देते थे, वे किसी के हो भी नहीं सके हैं। क्या यह अर्जित परायापन है? जब से सम्राट ने शपथ ली है तब से मीडिया का एक बड़ा तबका, समाज का एक बड़ा तबका स्थायी नहीं मान रहा है, समय-समय पर उनकी जगह दूसरा मुख्यमंत्री बनाए जाने की डेडलाइन तय करता है, जिसमें प्रशांत किशोर के बयान सहित भाजपा नेताओं की समय-समय पर टिप्पणियाँ उद्दीपन पैदा करती हैं।

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