औरतों की कारगुजारियों का इतिहास अगर कभी पूरी ईमानदारी और साफ़गोई से लिखा जाएगा, तो तारीख़ के बंद पन्नों से निकलकर कई बेहद अहम और आलीशान किरदार अपनी मुकम्मल रवानी में हमारी आँखों के सामने से गुज़रते नज़र आएँगे। उस वक़्त आप हैरान होकर अपने दिल पर हाथ रखेंगे और बेसाख़्ता कह उठेंगे कि, अरे वाह! इतनी फ़ौलादी हिम्मत? जब वक़्त और समाज की हवाओं का रुख़ आपके बिल्कुल मुख़ालिफ़ था, तब भी आप तन्हा खड़ी रहीं और ऐसा ऐतिहासिक इंक़लाब कर सकीं!
जी हाँ, इतिहास की उसी गौरवमयी सूची में भारत की एक महिला मैरी राॅय का नाम हमेशा ‘सरे -फेहरिस्त’ यानी सबसे ऊपर दर्ज रहेगा। इस संघर्ष को अपने से जोड़ कर इस लिए देख पाई, क्योंकि इतना जानती थी कि देश के ईसाई पर्सनल लाॅ का हाल भी मुस्लिम पर्सनल लाॅ से कम बुरा नहीं है। और इस दक़ियानूसी पर्सनल लाॅ की जागीर को उसी समुदाय से उठी एक महिला ने हिलाकर वक़्त के माथे पर एक असाधारण कमाल दर्ज कर दिया है।
त्रावणकोर क्रिश्चियन इनहेरिटेंस एक्ट-1916 में जिस तरह ईसाई महिला पैत्रिक सम्पत्ति से लगभग ग़ायब थी, बेटियों के आर्थिक वजूद को सिरे से मिटा दिया जाता था, उस संस्थागत नाइंसाफ़ी को मैरी राॅय ने मुल्क की सबसे बड़ी अदालत के कटघरे में अकेले खींच लिया था।
ये सच है कि धारा के विपरीत चलती औरतों ने ही हमेशा इस दुनिया को बदला है, और मैरी राॅय का ऐतिहासिक मुक़दमा मैरी राॅय बनाम केरल राज्य-1986, इस बात की सबसे ज़िंदा और फ़ौलादी मिसाल है। अपनी इस तारीखी लड़ाई के लिए जिसके तहत आज ईसाई औरतें पैत्रिक सम्पत्ति में बराबर का हक़ पा सकती हैं, मैरी राॅय रहती दुनिया तक याद की जाती रहेंगी।
उसी फ़ौलादी महिला की बेटी हैं अरुंधति राॅय। यह कहना क़तई नामुनासिब न होगा कि जिंदगी के तमाम नशीब-ओ-फ़राज़ से गुज़रते हुए अरुंधति राॅय ने आज जो मुक़ाम हासिल किया है, ज़ाहिर है उन्हें वह बेबाक हिम्मत अपनी माँ की विरासत से ही मिली होगी। वो कहते हैं न कि-
“दु निया ने तजुर्बात-ओ-हवादिस की शक़्ल में, जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं…” सच है कि इंसान इस समाज को आख़िरकार वही कुछ लौटाता है जो उसने खुद अपनों से पाया होता है।
मैरी राॅय का वह पूरा बचपन और जवानी इसी लहू-लुहान मंज़रनामे की गवाह रही, जहाँ उन्होंने घर के भीतर सिर्फ अपनी बेबस माँ को पिता के हाथों बेरहमी से पिटते देखा, इतना पिटते कि वे ख़ून से लथपथ हो जाती थीं। मैरी पर अपने ही पिता का वह वहशियाना जुल्म, घर के सारे सदस्य का चैबीस घंटे बस आपस में लड़ते-भिड़ते नज़र आना और चारों तरफ़ पसरा वह गहरा असंतोष यही तो उनकी कुल जमा पूँजी थी। ऐसे दमघोंटू माहौल से तंग आकर मैरी राॅय को जो पहला शख़्स प्रपोज करता है, वे महज़ एक “निजात” की चाह में उसी की हो जाती हैं। लेकिन त्रासदी का आलम देखिए कि वह पहला आदमी भी उनके ज़ालिम पिता का ही दूसरा अक्स निकला! ऐसे में उस भटकी हुई लड़की का जीवन भला कैसा और कितना नारकीय होगा? बस, मैरी राॅय ने भी अपनी उस कड़वाहट और ज़िद में आकर अरुंधति को अनजाने में वही कुछ लौटा दिया जो उन्होंने खुद जिंदगी से पाया था।
इसी दास्तान की पथरीली ज़मीन पर अरुंधति राॅय का यह ताज़ा जिंदगीनामा “मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर” अपनी शुरुआत करता है, जो आज अपनी तालीम, सुरक्षा और वजूद के लिए सड़कों पर जंग लड़ रही हज़ारों लड़कियों के लिए एक पढ़ा जाने वाला मुकम्मल, फ़ौलादी और बेहद जरूरी घोषणापत्र है।
अरुंधति राॅय की इस किताब की सबसे बड़ी नफ़ासत और ख़ासियत है जो अमूमन और कहीं, नहीं के बराबर दिखती है, उनकी साफ़गोई। वह मातृत्व के उस पारंपरिक और झूठे ताने-बाने को मलबे में तब्दील कर देती हैं, जहाँ माँ के किरदार को महज़ एक बेज़बान देवी बनाकर उसका अंधा महिमामंडन किया जाता है। पुस्तक के पहले ही अध्याय में, जिसका नाम ही “गैंगस्टर” है, इस पाखंडी परदे को झटके से उतारकर मैरी राॅय की एक बेहद पेचीदा, डरावनी और फौलादी शख़्सियत को पाठकों के सामने बेबाकी से रख देती हैं, वो भारतीय समाज की परवाह नहीं करती जहाॅं माँ को इंसान नहीं महिमामंडित भगवान या फिर डायन के रूप में पेश किया जाता है।
वे अपनी आपबीती में दर्ज करती हैं कि कैसे वे बचपन में अपनी ही माँ के उस अनपेक्षित गुस्से और ज़हनी तौर पर बिठाए गए तानाशाही पहरे से किस क़दर ख़ौफ़ खाती थीं। यह रिश्ता महज़ ममता का कोई मखमली झूला नहीं था, बल्कि कलेजे को कुतर देने वाला, नियंत्रण, डर और अपने वजूद को जिंदा रखने की एक बेहद कड़वी जद्दोजहद का मैदान बन गया था। इसी दमघोंटू माहौल और माँ के उस सख़्त, निष्ठुर ढर्रे से तंग आकर आखि़रकार उन्होंने महज़ 18 बरस की उम्र में उस घर की दहलीज को हमेशा के लिए लांघ दिया।
यह किताब यक़ीनन आज अपनी शर्तों पर रास्ता तलाश रहीं उन तमाम लड़कियों को पितृसत्ता के उस दक़ियानूसी पहरे से निजात दिलाने, और माँ को किसी वेदी पर बिठाने के बजाय एक जीता-जागता इंसान मानकर उसकी ख़ामियों और ख़ूबियों को मुकम्मल तौर पर कबूल करने का एक बेबाक साहस देगी।
इस किताब का एक बुनियादी फ़लसफ़ा लेखक के इस एक ख़याल में सिमट जाता है जहाँ वे कहती है, “मैंने इसलिए अपनी माँ को नहीं छोड़ा कि मुझे उनसे प्यार नहीं था, बल्कि इसलिए कि मैं उन्हें प्यार करती रह सकूँ। साथ रहती तो यह नामुमकिन हो जाता” यह मारक पंक्ति दरअसल नियंत्रण और मोहब्बत के उसी भयावह अंतर्द्वंद्व को बेनकाब करती है, जहाँ कभी-कभी रिश्तों की गरिमा को महफूज़ रखने के लिए फ़ासला ही इकलौती सूरत बन जाता है।
किताब का शुरुआती पस-मंजर केरल और ऊटी की उन स्याह और तल्ख़ यादों में तैरता है, जहाँ किसी ठाट-बाठ या वैभव का नामो-निशान तक न था, बल्कि सिर्फ और सिर्फ गुरबत का एक मुकम्मल साम्राज्य था। उसी में अपनी ही माँ का हर छोटी सी बात पर अरुंधति और उनके भाई पर लगातार चीखना-चिल्लाना, भाई को मर्दवादी और उन्हें कुतिया, रंडी तक कह देना। उस अकेले संघर्ष की कड़वाहट को साफ बयाँ करता है। भाई और खुद अरुंधति का टीबी जैसी ख़ौफ़नाक बीमारी की चपेट में आ जाना, और उधर पूरे ख़ानदान का चैबीस घंटे आपस में भिड़ते रहना उनके पूरे बचपन को एक ख़ौफ़नाक और डरावने ख़्वाब में तब्दील कर देता है।
एक तन्हा माँ का अपने बच्चों को पालने का वह अकेला संघर्ष ऐसा था, जिसे ख़ानदान और आस-पड़ोस के तमाम तमाशाबीन लोग बड़ी आसानी से भाँप लेते हैं, और अफ़सोस कि उस बेबसी का भी एक बेहद ख़ौफ़नाक ख़ामियाज़ा एक मासूम भुगतती है। इस कड़वे सच को आज भी हूबहू महसूस किया जा सकता है। ख़ानदान के बुज़ुर्ग से यौन हिंसा को सहना, जिल्लत का यह सिलसिला दिल्ली आने के बाद भी खानदानी नाना द्वारा दोहराया जाना, बच्चियों की समाज में असुरक्षित स्थिति को बताता है। इस मानसिक और शारीरिक पीडा को न तो परिवार और न ही समाज समझता है।
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो का बाल यौन हिंसा का आधिकारिक डेटा आज भी चीख़-चीख़ कर इसी स्याह हक़ीक़त की तस्दीक करता है कि मासूम बच्चियों के वजूद को सबसे ज़्यादा ख़तरा घर के बाहर के अंजान भेड़ियों से नहीं, बल्कि घर की उसी पवित्र मानी जाने वाली चैखट के भीतर बैठे इन्हीं नाते-रिश्तेदारों से होता है।
दिल्ली की अजनबी सड़कों पर भटकती वह तन्हा लड़की महज़ अपने वजूद की जंग नहीं लड़ रही थी, बल्कि उसकी पैनी निगाहें इस मुल्क की सियासी और सामाजिक नब्ज पर भी टिकी हुई थीं। वो आंदोलनों में जाती है, कमज़ोर के साथ खड़ी होती है, गिरफ़्तारी देती है, समाज की बेजा आवाज़ों का विरोध करती है, और उसी में वह खुद को गढ़ती भी रहती है। वो बेहतर समाज बनाने में प्रयासरत रहती है। वह औरतों के लिए चूल्हे-चैके, शादी-ब्याह, हांडी-रकाबी के सारे नियमों को मानने से इनकार कर देती है।
इन तमाम ज़हनी और जिस्मानी संघर्षों के दोहरे पाटों के बीच पिसते हुए भी अरुंधति ने अपनी जिंदगी का सबसे बेशक़ीमती सबक यही सीखा कि हार को गले कैसे लगाया जाता है और वही हार एक दिन जीत में कैसे तब्दील होती है।
वैचारिक रूप से एक क्रांतिकारी दस्तावेज होने के बावजूद, इसमें कुछ कमज़ोरिया भी रह गई है। यूॅं तो हिंदी तर्जुमा प्रभात सिंह ने बहुत अच्छा किया, हिंदी पाठकों के दिल में उतार दिया। लेकिन उर्दू के कुछ भारी-भरकम शब्दों का बेवजह इस्तेमाल किया गया है, वह कहीं-कहीं अच्छा नहीं लगता, ग़ैर ज़रूरी मालूम देता है। कुछ शब्द ग़लत भी हैं जैसे तेइस साल के लड़के को उम्र दराज़ कह देना । वह इसकी सार्थकता पर सवाल खड़ा करता है। जब कोई कहानी अपनी स्वाभाविक और जमीनी रवानी में बह रही हो, तो उसमें ऐसे थोपे गए शब्द पानी की तरह घुलने के बजाय चुभने लगते हैं। बनावटीपन पैदा कर देते हैं। ऐसा कई जगहों पर हुआ है। यदि इन भारी लफ्जों को थोपने के बजाय भाषा को सहज हिंदुस्तानी या लखनवी नफासत की तरह पानी की तरह बहने दिया जाता, तो इस शाहकार का सौंदर्य और भी ज्यादा निखर कर सामने आता।
लेकिन इन भाषाई विसंगतियों के बावजूद, आज के इस समकालीन दौर में, जब देश में लड़कियाॅं ख़ासी उथल-पुथल मचा रही हैं, अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरकर एक कड़ा संघर्ष कर रही हैं, तब अरुंधति राॅय का यह संस्मरण एक मार्गदर्शिका बनकर उभरता है। यह पुस्तक आज की हर उस लड़की की आवाज को बुलंद करती है जो अपनी छतों और अपनी चैखटों को मोर्चा बनाकर अपने लिए जगह तलाश रही हैं और जिन्होंने मर्तबानबंद जिंदगी जीने से इनकार कर दिया है।
नाइश हसन
सामाजिक राजनीतिक विषयों पर टिप्पणीकार


