गैंगस्टर माँ का साया और एक आज़ाद बेटी की परवाज़
परायों की गली में नितांत अकेला कुशवाहा सम्राट (चौधरी) !
प्रतीकों की लड़ाई: महिष दसरा, वर्चस्व का इतिहास और सत्ता का मौन
फिल्मों में स्त्री-भूमिका के प्रश्न “भूमिका” फ़िल्म के सन्दर्भ में
नदियों की उदासी का छन्द रचती कविताएँ
प्रलेस की एक सदस्या की खुली चिट्ठी :पितृसत्ता के खिलाफ हर लड़ाई में हम आपके साथ हैं
लेखक संगठनों को समावेशी बनाने के सुझाव के साथ आगे आये लेखक: प्रलेस से की पहल की मांग
जब प्रलेस के बड़े लेखकों ने पाकिस्तानी महिलाओं से बदसुलूकी की
लेखिका ने गिनाये प्रगतिशील लेखक संघ के महिला विरोधी निर्णय: संघ सेक्सिस्ट पुलिसवाले के आगे नतमस्क
‘स्त्री’ : एक सार्थक हॉरर फिल्म
मिसोजिनी, नायकत्व और ‘कबीर सिंह’
एक युवा फिल्मकार की दस्तक: मंजिलें अभी शेष है!
ऐतिहासिक और अमिट है समाजवाद की वैचारिक धारा वरसी जी स्मृति समारोह में वक्ताओं की राय