आधुनिक भारत में महिलाओं की भूमिका : परिवर्तन, उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ

  अहमद आली

शोध सार— भारतीय समाज अपने सुदीर्घ इतिहास में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तनों का साक्षी रहा है, किंतु इन परिवर्तनों के बीच महिलाओं की भूमिका में आया रूपांतरण विशेष रूप से उल्लेखनीय और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। वैदिक युग में अपेक्षाकृत सम्मानजनक सामाजिक स्थिति प्राप्त महिलाओं की स्थिति मध्यकाल में सामाजिक रूढ़ियों, कुप्रथाओं और पितृसत्तात्मक संरचनाओं के प्रभाव से संकुचित होती चली गई। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के समाज-सुधार आंदोलनों, स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की सक्रिय सहभागिता तथा स्वतंत्र भारत में किए गए संवैधानिक एवं विधिक प्रावधानों ने महिलाओं की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन की आधारभूमि तैयार की। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात शिक्षा के प्रसार, औद्योगीकरण, नगरीकरण, वैश्वीकरण और सूचना-प्रौद्योगिकी के विकास ने महिलाओं की भूमिकाओं और अवसरों के नए आयाम खोले हैं। आज महिलाएँ शिक्षा, रोजगार, राजनीति, प्रशासन, सुरक्षा-बल, खेलकूद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय एवं प्रभावशाली भागीदारी निभा रही हैं। इसके साथ ही वेतन-असमानता, ग्रामीण-शहरी विभाजन, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न, अवसरों की असमानता तथा पितृसत्तात्मक सामाजिक मानसिकता जैसी चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं। अतः आधुनिक भारत में महिलाओं की बदलती भूमिका को केवल उनकी बढ़ती भागीदारी के संदर्भ में नहीं, सामाजिक परिवर्तन, लैंगिक समानता, आत्मनिर्भरता और सशक्तीकरण की व्यापक प्रक्रिया के संदर्भ में समझना आवश्यक है।

बीज शब्द – महिला सशक्तिकरण, लैंगिक समानता, आधुनिक भारत, नारी शिक्षा, कार्यक्षेत्र में महिलाएँ, संवैधानिक अधिकार, सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक सहभागिता, पितृसत्ता, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।

मूल आलेख – भारतीय सभ्यता की गाथा जितनी प्राचीन है, उतनी ही जटिल और बहुआयामी उसमें नारी की स्थिति की कहानी भी रही है। इतिहास के विभिन्न कालखंडों में स्त्री कभी देवी के रूप में पूजी गई तो कभी उसे चारदीवारी में सीमित कर दिया गया। ऋग्वैदिक काल में गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी स्त्रियों ने दार्शनिक वाद-विवादों में पुरुषों के समकक्ष भाग लिया, शिक्षा ग्रहण करने और यज्ञोपवीत धारण करने का उन्हें अधिकार प्राप्त था। किंतु कालांतर में, विशेषतः मध्यकालीन आक्रमणों और सामंती व्यवस्था के सुदृढ़ होने के साथ, स्त्री की स्वतंत्रता संकुचित होती गई। सती प्रथा, बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, विधवा-पुनर्विवाह पर प्रतिबंध, तथा शिक्षा से वंचना जैसी कुरीतियों ने नारी को समाज के हाशिये पर धकेल दिया। यह वह कालखंड था जब स्त्री की पहचान केवल गृहस्थी और संतानोत्पत्ति तक सीमित कर दी गई थी, और उसकी बौद्धिक तथा सामाजिक क्षमताओं को नकारा जाता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के आगमन के साथ भारतीय पुनर्जागरण की एक नई लहर उठी, जिसने स्त्री की दशा और दिशा दोनों को बदलने का ऐतिहासिक कार्य किया। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध जो अथक संघर्ष किया, उसने 1829 में इस अमानवीय प्रथा के विधिक उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त किया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा-पुनर्विवाह के समर्थन में तथा बाल-विवाह के विरोध में जो आंदोलन चलाया, वह भारतीय समाज-सुधार के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के दंपती ने स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में जो अग्रणी कार्य किया, उसने निम्न वर्ग और पिछड़ी जातियों की स्त्रियों के लिए भी शिक्षा के द्वार खोले। स्वामी विवेकानंद, महर्षि कर्वे तथा अन्य समाज-सुधारकों ने भी नारी-शिक्षा और नारी-सम्मान की दिशा में सारगर्भित योगदान दिया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, विजयलक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली, कैप्टन लक्ष्मी सहगल जैसी वीरांगनाओं ने न केवल राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और यह भी सिद्ध किया कि स्त्री केवल घर की चारदीवारी तक सीमित प्राणी नहीं, अपितु राष्ट्र-निर्माण की समान भागीदार है।

स्वतंत्र भारत के संविधान-निर्माताओं ने इस ऐतिहासिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए स्त्री-पुरुष समानता को मूल अधिकारों का अभिन्न अंग बनाया। अनुच्छेद 14 द्वारा विधि के समक्ष समानता, अनुच्छेद 15 द्वारा लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध, तथा अनुच्छेद 16 द्वारा लोक-नियोजन में अवसर की समानता जैसे प्रावधानों ने स्त्री-सशक्तिकरण की संवैधानिक नींव रखी। इसके अतिरिक्त पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था ने ग्रामीण भारत में भी स्त्रियों की राजनीतिक सहभागिता को नई ऊँचाई प्रदान की। किंतु विधिक प्रावधान मात्र से सामाजिक परिवर्तन संपन्न नहीं होता इसके लिए दीर्घकालिक सामाजिक प्रयास, शैक्षणिक जागरूकता तथा आर्थिक अवसरों की आवश्यकता होती है, और यही प्रक्रिया विगत सात-आठ दशकों में क्रमिक रूप से घटित होती रही है।

शिक्षा के क्षेत्र में हुए परिवर्तन को इस रूपांतरण का सबसे सशक्त आधार माना जा सकता है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय स्त्री-साक्षरता दर मात्र आठ-नौ प्रतिशत के आसपास थी, जो आज सत्तर प्रतिशत के लक्ष्य के समीप पहुँच चुकी है। विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में छात्राओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है; चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विधि, प्रबंधन तथा विज्ञान की उच्च शिक्षा में बालिकाएँ अब बालकों के समकक्ष, कहीं-कहीं तो उनसे भी आगे, प्रदर्शन कर रही हैं। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसी सरकारी योजनाओं ने कन्या-भ्रूण हत्या के विरुद्ध जन-जागरूकता उत्पन्न करने के साथ-साथ बालिका-शिक्षा को प्राथमिकता देने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। सुकन्या समृद्धि योजना जैसी वित्तीय योजनाओं ने अभिभावकों को बालिकाओं की शिक्षा और विवाह हेतु आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया है। शिक्षा केवल साक्षरता की दृष्टि से ही नहीं, अपितु स्त्री की मानसिक स्वतंत्रता, आत्मविश्वास तथा निर्णय-क्षमता के विकास की दृष्टि से भी क्रांतिकारी सिद्ध हुई है।

रोज़गार और आर्थिक स्वावलंबन के क्षेत्र में भी स्त्री की भूमिका असाधारण रूप से विस्तृत हुई है। कभी जो कार्यक्षेत्र पूर्णतः पुरुष-प्रधान माने जाते थे, आज उनमें स्त्रियाँ नेतृत्वकारी भूमिकाओं में दिखाई देती हैं। बैंकिंग, सूचना-प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य-सेवा, शिक्षा, मीडिया, विज्ञापन, विधि तथा प्रशासनिक सेवाओं में महिलाओं की उपस्थिति निरंतर सुदृढ़ हो रही है। इंदिरा नूयी, किरण मजूमदार-शॉ, चंदा कोचर जैसी उद्योग-जगत की प्रमुख हस्तियों ने यह सिद्ध किया है कि नेतृत्व-क्षमता का लिंग से कोई संबंध नहीं होता। स्टार्ट-अप संस्कृति के विकास के साथ महिला उद्यमियों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है; मुद्रा योजना, स्टैंड-अप इंडिया जैसी योजनाओं ने ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों की महिलाओं को भी लघु एवं मध्यम उद्यम स्थापित करने हेतु वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई है। स्वयं-सहायता समूहों (Self Help Groups) के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं ने सामूहिक आर्थिक गतिविधियों में भाग लेकर न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ की है, अपितु सामाजिक निर्णय-प्रक्रिया में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों की सहभागिता भी उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुई है। स्वतंत्र भारत की प्रथम प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर वर्तमान समय की अनेक मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों तथा सांसदों तक, स्त्रियों ने यह प्रमाणित किया है कि राजनीतिक नेतृत्व की क्षमता किसी विशेष लिंग तक सीमित नहीं है। पंचायती राज संस्थाओं में तैंतीस प्रतिशत, कहीं-कहीं पचास प्रतिशत तक आरक्षण की व्यवस्था ने ग्रामीण स्त्रियों को स्थानीय शासन-व्यवस्था में सक्रिय भागीदार बनाया है। यद्यपि संसद और विधानसभाओं में महिला-आरक्षण विधेयक को पारित होने में दीर्घ प्रतीक्षा करनी पड़ी, तथापि इसका अधिनियमित होना इस दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा सकती है, जो भविष्य में विधायी निकायों में स्त्री-प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ करने की क्षमता रखती है।

रक्षा एवं सुरक्षा-बलों में भी स्त्रियों की भूमिका में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिला है। भारतीय सेना, वायुसेना तथा नौसेना में महिलाओं को अब स्थायी कमीशन प्राप्त हो रहा है; लड़ाकू विमान उड़ाने से लेकर सीमा-सुरक्षा बल में तैनाती तक, महिलाएँ अब उन क्षेत्रों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं जो कभी पूर्णतः पुरुषों के लिए आरक्षित माने जाते थे। पुलिस-बल में भी महिला अधिकारियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, जिससे न केवल संस्थागत लैंगिक संतुलन सुदृढ़ हुआ है, अपितु स्त्री-संबंधी अपराधों की जाँच-प्रक्रिया में भी संवेदनशीलता का समावेश हुआ है। खेल जगत में भी भारतीय महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम गौरवान्वित किया है। पी.वी. सिंधु का ओलंपिक पदक, मैरी कॉम की मुक्केबाजी में विश्व-उपलब्धियाँ, साक्षी मलिक की कुश्ती में सफलता, मिताली राज तथा हरमनप्रीत कौर का क्रिकेट-जगत में योगदान—ये सभी उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय बेटियाँ अब शारीरिक क्षमता और मानसिक दृढ़ता, दोनों ही स्तरों पर विश्व-स्तरीय प्रतिस्पर्धा में सक्षम हैं। विज्ञान एवं अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भी भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने इसरो के चंद्रयान एवं मंगलयान जैसे मिशनों में महत्वपूर्ण योगदान देकर यह सिद्ध किया है कि नारी-बुद्धि किसी भी दृष्टि से पुरुष-बुद्धि से कमतर नहीं है।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में भी स्त्री की भूमिका में गुणात्मक परिवर्तन आया है। विवाह की आयु में वृद्धि, आत्म-निर्णय की स्वतंत्रता, वैवाहिक जीवन में समानता की अपेक्षा, तथा संतानोत्पत्ति संबंधी निर्णयों में स्त्री की सहभागिता—ये सभी परिवर्तन आधुनिक भारतीय स्त्री की बदलती मानसिकता के परिचायक हैं। नगरीकरण तथा शिक्षा के प्रसार के साथ संयुक्त परिवार व्यवस्था में भी परिवर्तन आया है, जिसमें स्त्री की भूमिका अब केवल गृहिणी तक सीमित न रहकर, आर्थिक उपार्जक, निर्णायक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श की सक्रिय सहभागी के रूप में परिवर्तित हो गई है। साहित्य, कला, सिनेमा तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी स्त्रियों ने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा से समाज को नई दिशा दी है। तथापि, इस समस्त प्रगति-यात्रा के मध्य कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं, जिनका समाधान किए बिना समग्र एवं समावेशी लैंगिक समानता की प्राप्ति असंभव प्रतीत होती है। सर्वप्रथम, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के मध्य विद्यमान असमानता एक गंभीर समस्या बनी हुई है; जहाँ शहरी क्षेत्रों की स्त्रियाँ शिक्षा और रोज़गार के अपेक्षाकृत अधिक अवसर प्राप्त कर रही हैं, वहीं अनेक ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों की बालिकाएँ आज भी विद्यालय के द्वार तक नहीं पहुँच पातीं। द्वितीय, कार्यक्षेत्र में वेतन-असमानता की समस्या आज भी विद्यमान है, जहाँ समान कार्य के लिए स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत कम पारिश्रमिक प्राप्त होता है। तृतीय, घरेलू हिंसा, दहेज-प्रताड़ना, यौन-उत्पीड़न तथा कार्यस्थल पर असुरक्षा जैसी समस्याएँ आज भी भारतीय स्त्री के जीवन को प्रभावित करती हैं, जो यह इंगित करती हैं कि विधिक प्रावधानों के बावजूद सामाजिक मानसिकता में मूलगामी परिवर्तन अभी अपेक्षित है। चतुर्थ, कन्या-भ्रूण हत्या तथा लिंगानुपात में असंतुलन की समस्या, यद्यपि सरकारी प्रयासों से कुछ हद तक नियंत्रित हुई है, तथापि यह आज भी समाज के कुछ वर्गों में गहराई से व्याप्त पितृसत्तात्मक मानसिकता का द्योतक है। पंचम, कार्य-जीवन संतुलन की चुनौती, विशेषतः विवाहोपरांत तथा मातृत्व-काल में, आज भी अनेक कार्यशील महिलाओं के करियर-विकास में बाधक सिद्ध होती है।

इन चुनौतियों के निराकरण हेतु बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है। सर्वप्रथम, बालिका-शिक्षा को न केवल नीतिगत प्राथमिकता अपितु सामाजिक प्राथमिकता बनाना आवश्यक है, ताकि प्रत्येक बालिका को समान अवसर प्राप्त हो सके। द्वितीय, कार्यस्थल पर लैंगिक समानता सुनिश्चित करने हेतु समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत का कठोरता से पालन किया जाना चाहिए। तृतीय, स्त्री-सुरक्षा से संबंधित विधानों का प्रभावी क्रियान्वयन तथा त्वरित न्याय-प्रक्रिया सुनिश्चित की जानी चाहिए। चतुर्थ, विद्यालयी पाठ्यक्रम में लैंगिक-संवेदनशीलता तथा समानता से संबंधित विषयों को सम्मिलित किया जाना चाहिए, ताकि आगामी पीढ़ी में समता-मूलक मानसिकता का विकास बाल्यावस्था से ही हो सके। पंचम, मीडिया तथा जन-संचार माध्यमों को भी स्त्री की सकारात्मक तथा सशक्त छवि प्रस्तुत करने में अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए, न कि रूढ़िवादी अथवा वस्तुकरण करने वाली छवियों का प्रसार करना चाहिए।

निष्कर्ष –  आधुनिक भारत में महिलाओं की भूमिका में जो रूपांतरण घटित हुआ है, वह किसी एक कारक का परिणाम नहीं यह शिक्षा के प्रसार, संवैधानिक प्रावधानों, सामाजिक-सुधार आंदोलनों, सरकारी नीतियों तथा स्वयं स्त्रियों के अदम्य साहस एवं संघर्ष का सम्मिलित परिणाम है। घर की चारदीवारी से निकलकर आकाश की ऊँचाइयों तक, रसोईघर से लेकर संसद भवन तक, तथा विद्यालय की कक्षा से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्रों तक – भारतीय स्त्री ने अपनी उपस्थिति और क्षमता को हर क्षेत्र में सिद्ध किया है। तथापि, यह यात्रा अभी अपूर्ण है। जब तक समाज के प्रत्येक वर्ग में, प्रत्येक क्षेत्र में तथा प्रत्येक परिवार में स्त्री-पुरुष समानता को केवल संवैधानिक अधिकार के रूप में नहीं, अपितु मानवीय मूल्य के रूप में आत्मसात नहीं किया जाता, तब तक सच्चे अर्थों में सशक्तिकरण की परिकल्पना साकार नहीं हो सकती। अतः यह आवश्यक है कि नीति-निर्माता, शिक्षाविद्, सामाजिक संगठन तथा प्रत्येक नागरिक मिलकर ऐसे समाज के निर्माण हेतु प्रयासरत रहें, जहाँ प्रत्येक स्त्री को अपनी क्षमताओं के अनुरूप विकसित होने तथा आत्म-साक्षात्कार करने का समान अवसर प्राप्त हो। यही सच्चे अर्थों में आधुनिक, समावेशी तथा सशक्त भारत के निर्माण की आधारशिला होगी, और यही इस राष्ट्र की भावी प्रगति-यात्रा की सर्वाधिक विश्वसनीय गारंटी भी।

संपर्क सूत्र-अहमद अली, शोधार्थी, हिन्दी विभाग, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद (तेलंगाना), sayaadali99@gmail.com

 

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