स्त्रीत्व, देहबोध और आत्मानुभूति : सामाजिक निषेध से आध्यात्मिक स्वायत्तता तक

मेधा

सार
भारतीय भक्ति परंपरा में स्त्री-संतों की उपस्थिति केवल धार्मिक इतिहास का विषय नहीं है; यह देह, लिंग, यौनिकता, इच्छा, विवाह, सामाजिक सत्ता और आध्यात्मिक स्वायत्तता के जटिल अंतर्संबंधों को समझने का एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक स्रोत भी है। अव्वैयार, कराइकल अम्मैयार और अक्का महादेवी की जीवन-कथाएँ और काव्य इस प्रश्न को तीन अलग-अलग रूपों में हमारे सामने रखते हैं कि स्त्री अपनी देह और उसकी सामाजिक व्याख्या के साथ आध्यात्मिक संबंध कैसे स्थापित करती है। अव्वैयार का वृद्ध और कुरूप स्त्री में रूपांतरण, कराइकल अम्मैयार का पिशाच-सदृश देह की आकांक्षा करना और अक्का महादेवी का वस्त्र और सामाजिक स्त्री-परिचय त्यागकर दिगम्बर साधिका के रूप में विचरण करना—इन तीनों को केवल वैराग्य की धार्मिक कथाओं के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है।

यह लेख स्त्री देह को एक प्राकृतिक एवं स्थिर सत्ता मानने के बजाय उसे सामाजिक-सांस्कृतिक निर्मिति के रूप में देखने वाले आधुनिक जेंडर सिद्धांतों तथा भारतीय भक्ति-विमर्श के अंतःसंवाद से इन तीनों स्त्री-संतों को पुनर्पाठित करता है। मिशेल फूको के सत्ता-यौनिकता संबंधी विमर्श, जूडिथ बटलर की gender performativity, मैरी डगलस के शरीर और सामाजिक व्यवस्था संबंधी विचार तथा एलिजाबेथ ग्रॉस के embodied subjectivity के संदर्भ में यह लेख तर्क करता है कि भक्ति स्त्री को केवल पितृसत्तात्मक देह-व्यवस्था से पलायन का मार्ग ही नहीं देती, बल्कि उसे अपनी देह, इच्छा और आध्यात्मिक सत्ता के नए अर्थ निर्मित करने की संभावना भी प्रदान करती है। अव्वैयार और कराइकल अम्मैयार में देह का निषेध या रूपांतरण स्त्री-यौनिकता से मुक्ति का एक सांस्कृतिक उपाय बनता है, जबकि अक्का महादेवी में वही देह सामाजिक नियंत्रण के विरुद्ध आध्यात्मिक और अस्तित्वगत स्वायत्तता का क्षेत्र बन जाती है। इस अर्थ में अक्का महादेवी का देह को अनावृत करना ( वस्त्र – त्याग का निर्णय) आधुनिक अर्थों में ‘sexual liberation’ कहना जितना सरलीकरण होगा, उतना ही उसे केवल ‘देह-त्याग’ मानना भी। उनका काव्य देह, इच्छा और आध्यात्मिकता के बीच एक ऐसी वैकल्पिक संरचना प्रस्तावित करता है जिसमें स्त्री अपने शरीर की वस्तु नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विषय (subject) बनती है।

बीज शब्द

स्त्री देह, लिंग, यौनिकता, आध्यात्मिकता, भक्ति, अव्वैयार, कराइकल अम्मैयार, अक्का महादेवी, स्त्री-अस्मिता, देह-राजनीति।

 प्रस्तावना : देह को देखने की हमारी दृष्टि

मनुष्य के लिए वस्तुओं, परिस्थितियों और स्वयं को उसी रूप में देख पाना कठिन है जैसी वे वास्तव में हैं। हमारा देखना हमेशा किसी न किसी सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषिक और वैचारिक संरचना से होकर गुजरता है, इसीलिए देह भी केवल जैविक या प्राकृतिक इकाई नहीं है। हम जिस शरीर को ‘अपना शरीर’ कहते हैं, उसका अर्थ केवल उसकी जैविक संरचना से निर्धारित नहीं होता; समाज उस शरीर को अर्थ देता है, उसे वर्गीकृत करता है, उसके लिए आचरण निर्धारित करता है और उसकी इच्छाओं को वैध-अवैध ठहराता है।

मिशेल फूको ने आधुनिक सत्ता की संरचनाओं का विश्लेषण करते हुए दिखाया कि यौनिकता कोई ऐसी स्वाभाविक और अपरिवर्तनीय सत्ता नहीं है जो सत्ता-संरचनाओं से बाहर मौजूद हो। यौनिकता के बारे में ज्ञान, नैतिकता, चिकित्सकीय विमर्श और सामाजिक अनुशासन मिलकर उसे निर्मित करते हैं।[1] जूडिथ बटलर ने इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए ‘gender’ को किसी स्थिर आंतरिक सार के बजाय सामाजिक रूप से दोहराए जाने वाले कर्मों और व्यवहारों की प्रक्रिया के रूप में समझाया।[2] अर्थात् स्त्री होना केवल स्त्री शरीर लेकर जन्म लेने का परिणाम नहीं है; ‘स्त्री’ होने के सामाजिक अर्थ लगातार निर्मित किए जाते हैं। स्त्री के शरीर, वस्त्र, चाल, इच्छा, कामना, विवाह, मातृत्व और यौन व्यवहार के लिए जो अपेक्षाएँ निर्धारित होती हैं, वे इसी निर्माण का हिस्सा हैं।

मैरी डगलस के अनुसार शरीर स्वयं सामाजिक व्यवस्था का एक प्रतीकात्मक स्थल है। समाज जिस प्रकार अपने भीतर शुद्ध-अशुद्ध, वैध-अवैध और सीमित-असीमित की संरचनाएँ बनाता है, शरीर भी उन्हीं सांस्कृतिक सीमाओं को अभिव्यक्त करता है।[3] इसलिए स्त्री देह को समझना केवल शरीर विज्ञान को समझना नहीं है; यह उन सामाजिक शक्तियों को समझना भी है जो उस देह को अर्थ देती हैं। यहीं से भारतीय भक्ति की स्त्री-संत परंपरा का अध्ययन अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

 स्त्री देह और आध्यात्मिकता : निषेध की परंपरा

अनेक धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में शरीर और आत्मा के बीच द्वैत निर्मित किया गया है। शरीर को परिवर्तनशील, नश्वर, रोगग्रस्त और इच्छाओं का आधार माना गया, जबकि आत्मा को शाश्वत और उच्चतर सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। भारतीय दार्शनिक परंपराएँ एकरूप नहीं हैं और उनमें शरीर के प्रति दृष्टियाँ भी अत्यंत विविध हैं; फिर भी वैराग्यपरक धार्मिक विमर्श में देह को मोह, आसक्ति और कामना का आधार मानने की एक प्रभावशाली परंपरा अवश्य मिलती है। मैत्रायणीय/मैत्री उपनिषद् में शरीर की नश्वरता और अशुचिता पर बल दिया गया है।[4] बौद्ध साहित्य में भी शरीर की अस्थिरता, क्षणभंगुरता और अशुचिता का ध्यान साधना की एक महत्त्वपूर्ण पद्धति रहा है।[5] किंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन परंपराओं में शरीर-विमर्श का लक्ष्य केवल ‘शरीर से घृणा’ उत्पन्न करना नहीं था; वह अनित्यता, आसक्ति और अहंकार के विघटन से भी संबंधित था।

समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इस सामान्य देह-वैराग्य को स्त्री देह के साथ विशेष रूप से जोड़ दिया जाता है। स्त्री शरीर को पुरुष साधक की आध्यात्मिक यात्रा में आकर्षण, प्रलोभन और विचलन के स्रोत के रूप में देखने की प्रवृत्ति ने स्त्री यौनिकता को धार्मिक अनुशासन का विषय बना दिया, इसलिए स्त्री के लिए आध्यात्मिक मुक्ति का प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि वह संसार का त्याग कैसे करे; प्रश्न यह भी बन जाता है कि वह उस स्त्री देह का क्या करे जिसे समाज ने उसकी पहचान का प्राथमिक आधार बना दिया है। यहीं भक्ति का स्त्री-विमर्श महत्त्वपूर्ण हो उठता है।

 भक्ति : देह के निषेध से देह के पुनर्पाठ तक

भक्ति परंपरा ने ईश्वर और भक्त के संबंध को अनेक स्तरों पर पुनर्गठित किया। ईश्वर केवल दूरस्थ, दार्शनिक या वैदिक सत्ता नहीं रहा; वह प्रियतम, पति, मित्र, स्वामी, सहचर और अंतरंग प्रेमी भी बन गया। स्त्री भक्त के लिए यह परिवर्तन अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। यदि लौकिक विवाह स्त्री की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करता था, तो भक्ति ने उसे ईश्वर के साथ एक वैकल्पिक संबंध स्थापित करने का अवसर दिया। उमा चक्रवर्ती ने दक्षिण भारतीय भक्त – स्त्रियों के संदर्भ में यह दिखाया है कि कई भक्ति-परंपराओं में ईश्वर के प्रति समर्पण स्त्री को पति, परिवार और सामाजिक नियंत्रण की निर्धारित भूमिकाओं से बाहर निकलने का वैचारिक आधार प्रदान करता है।[6]भक्ति इस प्रकार स्त्री को एक विरोधाभासी लेकिन सृजनात्मक स्थिति में ले आती है। एक ओर वह अपनी देह को संसार की देह-राजनीति से बचाने के लिए उसका निषेध करती है; दूसरी ओर उसी देह और इच्छा के माध्यम से ईश्वर के साथ अपना संबंध निर्मित करती है।अव्वैयार, कराइकल अम्मैयार और अक्का महादेवी इसी क्रम के तीन अलग-अलग पड़ाव हैं।

 अव्वैयार : स्त्री यौवन का निषेध और आध्यात्मिक स्वायत्तता

अव्वैयार की कथा में स्त्री देह सबसे पहले विवाह और यौनिकता की सामाजिक संस्था के रूप में सामने आती है। कथा के अनुसार वे शिव की अनन्य भक्त थीं और लौकिक विवाह स्वीकार नहीं करना चाहती थीं। किंतु सामाजिक व्यवस्था के भीतर स्त्री की इच्छा अंतिम निर्णायक सत्ता नहीं थी। यहाँ सौंदर्य स्वयं एक समस्या बन जाता है।अव्वैयार का सौंदर्य उन्हें ऐसी सामाजिक पहचान देता है, जिसके साथ विवाह, पुरुष-संबंध और पारिवारिक जीवन की अपेक्षाएँ जुड़ी हुई हैं, इसलिए वे अपने सौंदर्य और यौवन से ही मुक्ति की प्रार्थना करती हैं और वृद्ध तथा कुरूप स्त्री में बदल जाती हैं। इस कथा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि स्त्री की आध्यात्मिक स्वतंत्रता के लिए उसकी कामनात्मक देह को हटाना आवश्यक मान लिया जाता है। अर्थात् समस्या आध्यात्मिक इच्छा में नहीं है; समस्या उस स्त्री देह में है, जिसे समाज यौनिक अर्थ देता है।

अव्वैयार का वृद्ध होना इसलिए जैविक वृद्धावस्था नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक रणनीति है। वृद्ध स्त्री की देह सामाजिक पुरुष-दृष्टि के लिए कम आकर्षक मानी जाती है। परिणामतः वह विवाह, यौनिकता और पुरुष-संरक्षण की अनिवार्यता से बाहर निकल सकती है। यहाँ Simone de Beauvoir की प्रसिद्ध अवधारणा—स्त्री को ‘Other’ बनाए जाने की प्रक्रिया—की रोशनी में भी विचार किया जा सकता है।[7] अव्वैयार की कथा में स्त्री की सामाजिक पहचान को पुरुष की दृष्टि और विवाह संस्था से अलग करने के लिए उसके स्त्री-सौंदर्य का निषेध आवश्यक हो जाता है, इसलिए अव्वैयार की कथा को केवल त्याग की कथा कहना अपर्याप्त होगा। यह उस सामाजिक संरचना को भी उजागर करती है जिसमें यौवनशील स्त्री होना स्वयं सामाजिक नियंत्रण का कारण है।

कराइकल अम्मैयार : सुंदर स्त्री से ‘पिशाच’ तक

कराइकल अम्मैयार की कथा इस प्रश्न को और अधिक तीव्र बनाती है। ऐतिहासिक रूप से कराइकल अम्मैयार छठी शताब्दी की महत्त्वपूर्ण तमिल शिवभक्त कवयित्री मानी जाती हैं और उनकी रचनाओं में श्मशान, शिव के उग्र रूप और देह की अस्थिरता विशेष महत्त्व रखते हैं।[8] Karen Pechilis ने उनके काव्य में भक्ति और तांत्रिक कल्पना के अंतर्संबंध की ओर ध्यान आकर्षित किया है।[9] लोकप्रिय जीवन-कथा में पुनितवती का सौंदर्य, उनका विवाह, उनके पति का उनसे दूर हो जाना और अंततः उनका अपने सुंदर स्त्री शरीर को त्यागकर भूत/पिशाच-सदृश रूप की इच्छा करना—इन सभी घटनाओं को एक साथ रखा गया है।यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक उलटफेर दिखाई देता है। सामान्यतः धार्मिक साहित्य में ‘सुंदर स्त्री’ कामना का स्रोत और ‘कुरूप/भूत’ संसार से विरक्ति का प्रतीक हो सकता है। कराइकल अम्मैयार इस प्रतीक-व्यवस्था को अपने पक्ष में उलट देती हैं। वे सुंदर स्त्री बने रहकर आध्यात्मिक सत्ता प्राप्त नहीं करतीं; वे स्वयं ऐसी देह की इच्छा करती हैं जो सामाजिक सौंदर्य-व्यवस्था को अस्वीकार कर दे। लेकिन यहाँ भी एक प्रश्न बचा रहता है—क्या यह स्त्री देह से मुक्ति है या स्त्री देह पर समाज के अधिकार से मुक्ति?

Pechilis का अध्ययन इस प्रश्न को अधिक जटिल बनाता है। उनके अनुसार कराइकल अम्मैयार की कविता में शरीर केवल त्याज्य वस्तु नहीं है; शरीर, उसकी सीमाएँ, उसकी असुरक्षा और ईश्वर के विराट शरीर के साथ उसका संबंध उनकी devotional subjectivity के निर्माण का हिस्सा है।[10] इसलिए उन्हें केवल ‘शरीर का निषेध करने वाली’ संत कहना उनके काव्य की जटिलता को कम कर देता है।उनका श्मशान की ओर जाना भी महत्त्वपूर्ण है। श्मशान वह स्थान है जहाँ सामाजिक सौंदर्य, जाति, संपत्ति, विवाह और देह की प्रतिष्ठा अंततः समाप्त हो जाती है। कराइकल अम्मैयार अपने लिए उसी सीमा-क्षेत्र को चुनती हैं।उनकी आध्यात्मिकता इसलिए सामाजिक रूप से स्वीकृत सुंदर स्त्री की आध्यात्मिकता नहीं है। वह एक ऐसी स्त्री की आध्यात्मिकता है जिसने सामाजिक रूप से वांछनीय देह को ही अस्वीकार कर दिया है।

अक्का महादेवी : देह का निषेध नहीं, देह का पुनराधिकार

अक्का महादेवी का प्रसंग इस पूरी संरचना को निर्णायक रूप से बदल देता है। बारहवीं शताब्दी की कन्नड़ वीरशैव/वचन परंपरा की यह संत कवयित्री चन्नमल्लिकार्जुन को अपना परम प्रिय और पति मानती हैं। लोककथा के अनुसार स्थानीय राजा कौशिक से उनका विवाह हुआ, लेकिन उन्होंने वैवाहिक संबंध की निर्धारित शर्तों को स्वीकार नहीं किया। अंततः वे राजमहल छोड़कर निकल गईं और वस्त्र त्यागकर साधना के मार्ग पर चली गईं। यहाँ पहली दृष्टि में अक्का महादेवी का व्यवहार भी अव्वैयार और कराइकल अम्मैयार के समान दिखाई दे सकता है—तीनों लौकिक विवाह को अस्वीकार करती हैं। लेकिन तीनों के बीच निर्णायक अंतर है। अव्वैयार अपने यौवन को वृद्धावस्था में बदल देती हैं। कराइकल अम्मैयार अपने सुंदर स्त्री शरीर को पिशाच-सदृश देह में बदलने की इच्छा करती हैं। अक्का महादेवी अपनी स्त्री देह को परिवर्तित नहीं करती हैं। वह उसे छिपाती भी नहीं हैं। वह उसके सामाजिक अर्थ को चुनौती देती हैं।यही इस लेख की केंद्रीय अवधारणा है—देह का पुनरधिकार।

 नग्नता : देह-त्याग नहीं, सामाजिक दृष्टि का निषेध

अक्का महादेवी की नग्नता को आधुनिक ‘sexual freedom’ की अवधारणा में रख देना ऐतिहासिक रूप से सावधानीहीन होगा। बारहवीं शताब्दी की वीरशैव आध्यात्मिकता को आधुनिक लैंगिक पहचान की श्रेणियों से सीधे परिभाषित नहीं किया जा सकता। फिर भी उनकी नग्नता का सामाजिक अर्थ अत्यंत गहरा है। वस्त्र केवल शरीर को ढकते नहीं; वे शरीर को सामाजिक पहचान भी देते हैं। स्त्री का वस्त्र उसकी मर्यादा, जाति, वैवाहिक स्थिति और सामाजिक भूमिका को संकेतित कर सकता है। वस्त्र त्यागना इस अर्थ में केवल कपड़े उतारना नहीं, बल्कि उन सामाजिक संकेतों को अस्वीकार करना भी है जिनके माध्यम से स्त्री को पढ़ा जाता है।

अक्का महादेवी का नग्न विचरण इसलिए एक प्रकार का de-signification of the female body है—स्त्री देह को उन अर्थों से मुक्त करने का प्रयास जो समाज ने उस पर आरोपित किए हैं। Shalini Shah ने दक्षिण भारतीय स्त्री भक्त कवयित्रियों की चर्चा करते हुए अक्का महादेवी के शरीर और कामना के संबंध को विशेष रूप से रेखांकित किया है।[11 लेकिन अक्का का काव्य केवल शरीर की उपस्थिति का उत्सव नहीं है। उसमें शरीर और इच्छा को दिव्य प्रेम की दिशा में पुनर्नियोजित किया जाता है।यहीं उनकी आध्यात्मिकता की विशिष्टता सामने आती है।

 ‘स्त्री देह के भीतर से’: अक्का महादेवी का प्रतिरोध

अक्का महादेवी को केवल इसलिए क्रांतिकारी नहीं कहा जाना चाहिए कि उन्होंने वस्त्र त्यागे। उनका महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने स्त्री होने की सामाजिक शर्तों को स्वीकार किए बिना स्त्री देह के भीतर से आध्यात्मिक subjectivity निर्मित की। यहाँ Uma Chakravarti का विश्लेषण अत्यंत उपयोगी है। उनके अनुसार दक्षिण भारतीय स्त्री भक्तों में देह और यौनिकता से निपटने के विभिन्न तरीके दिखाई देते हैं—कहीं यौनिकता का निषेध, कहीं उसका ईश्वर की ओर रूपांतरण और अक्का महादेवी के मामले में स्त्री यौनिकता का सीधा सामना।[12]इसलिए अक्का महादेवी को अव्वैयार और कराइकल अम्मैयार के साथ रखने पर एक वैचारिक क्रम दिखाई देता है:

अव्वैयार — देह का रूपांतरण

कराइकल अम्मैयार — देह का विकृतिकरण

अक्का महादेवी — देह का पुनरधिकार

यह क्रम ‘विकास’ का सरल ऐतिहासिक क्रम नहीं है, बल्कि स्त्री देह के प्रति भक्ति के भीतर उपलब्ध तीन अलग-अलग आध्यात्मिक रणनीतियों का वैचारिक मानचित्र है।

 इच्छा : पाप नहीं, आध्यात्मिक ऊर्जा

अक्का महादेवी की वचन-कविता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है—उनकी ईश्वर के प्रति आकांक्षा की तीव्रता। वह चन्नमल्लिकार्जुन को केवल आराध्य देव नहीं मानतीं; उनका संबंध प्रेमी और प्रियतम का है। इस संबंध में स्त्री की इच्छा स्वयं बोलती है। यहाँ भक्ति का एक बड़ा वैचारिक परिवर्तन दिखाई देता है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की इच्छा प्रायः पुरुष के माध्यम से वैध होती है—विवाह के भीतर, पत्नी के रूप में, मातृत्व के भीतर। अक्का महादेवी इस संरचना को उलट देती हैं।उनकी इच्छा का अंतिम विषय कोई लौकिक पुरुष नहीं, बल्कि ईश्वर है, इसलिए उनकी आध्यात्मिकता desire को suppress नहीं करती; उसे transform करती है। यह अंतर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। स्त्री की इच्छा को नष्ट कर देना और उसे अपनी आध्यात्मिक agency में बदल देना एक ही बात नहीं है।

 भक्ति और जेंडर परफॉर्मेटिविटी

Judith Butler की gender performativity की अवधारणा के संदर्भ में अक्का महादेवी का अध्ययन विशेष रूप से रोचक हो जाता है। Butler के अनुसार जेंडर कोई ऐसी स्थिर पहचान नहीं है जिसे व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक वैसे ही धारण करता है; वह सामाजिक रूप से दोहराए जाने वाले व्यवहारों से निर्मित और पुनरुत्पादित होता है।[13] अक्का महादेवी इन अपेक्षित gender performances को बाधित करती हैं। वह पत्नी की पाम्परिक भूमिका स्वीकार नहीं करतीं। वह महल और घरेलू जीवन छोड़ देती हैं। वह स्त्री के लिए निर्धारित वस्त्र-व्यवस्था को अस्वीकार करती हैं। वह सार्वजनिक क्षेत्र में विचरण करती हैं। वह आध्यात्मिक अधिकार की भाषा में बोलती हैं।इस प्रकार उनकी साधना केवल धार्मिक कर्म नहीं रह जाती; वह gendered social order के विरुद्ध embodied performance बन जाती है।

लेकिन यहाँ भी थोड़ी सी सावधानी की आवश्यकता है। अक्का को सीधे आधुनिक feminist subject के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास का अतिक्रमण होगा। उनकी प्राथमिक भाषा आधुनिक समानता, अधिकार या लैंगिक मुक्ति की भाषा नहीं, बल्कि शिव के प्रति पूर्ण आध्यात्मिक समर्पण की भाषा है। फिर भी उनके धार्मिक कर्म का सामाजिक प्रभाव पितृसत्तात्मक gender order को अस्थिर करता है। यही इतिहास और सिद्धांत के बीच संवाद का सबसे उपजाऊ बिंदु है।

 शरीर : बाधा से माध्यम तक

भारतीय भक्ति की एक बड़ी वैचारिक उपलब्धि यह है कि उसने आध्यात्मिकता को केवल बौद्धिक ज्ञान या कर्मकांड से अलग करके अनुभव, प्रेम और देहधारी जीवन से जोड़ा।कबीर का श्रमशील शरीर, रैदास का श्रम, चोखामेला का सामाजिक रूप से अपवर्जित शरीर और अनेक भक्तों का सांसारिक जीवन इस बात के उदाहरण हैं कि आध्यात्मिक अनुभव केवल शरीर से बाहर नहीं घटित होता।इस संदर्भ में Elizabeth Grosz की embodied subjectivity की अवधारणा उपयोगी है। Grosz शरीर को निष्क्रिय वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि subjectivity के निर्माण में सक्रिय सत्ता के रूप में देखती हैं।[14]भक्ति में शरीर इसी प्रकार आध्यात्मिक अनुभव का माध्यम बन सकता है। प्रेम शरीर में घटित होता है। विरह शरीर में घटित होता है। नृत्य, संगीत, आँसू, कंपन, रोमांच, श्रम और साधना शरीर के माध्यम से अनुभव किए जाते हैं। इस अर्थ में भक्ति का शरीर-विमर्श केवल ‘देह का त्याग’ नहीं है। वह ‘ देह के आध्यात्मिकीकरण’ की प्रक्रिया भी है।

तीन स्त्री-संत और तीन देह-रणनीतियाँ

अव्वैयार, कराइकल अम्मैयार और अक्का महादेवी को साथ रखकर देखने पर स्त्री देह के तीन विशिष्ट प्रतिरूप सामने आ

ते हैं। पहला : देह का निषेध

अव्वैयार के यहाँ यौवन और सौंदर्य सामाजिक विवाह-व्यवस्था से जुड़े हैं। इसलिए वृद्धावस्था आध्यात्मिक स्वतंत्रता का साधन बनती है।

दूसरा : देह का विकृतिकरण

कराइकल अम्मैयार के यहाँ सुंदर स्त्री शरीर का स्थान एक अस्थि-सदृश, भूत-सदृश शरीर लेता है। श्मशान उनकी आध्यात्मिकता का क्षेत्र बन जाता है। इस प्रकार वह सामाजिक सौंदर्यशास्त्र को उलट देती हैं।

तीसरा : देह का पुनरधिकार

अक्का महादेवी के यहाँ स्त्री देह को नष्ट या विकृत नहीं किया जाता। उसके ऊपर समाज द्वारा आरोपित अर्थों को अस्वीकार किया जाता है। नग्नता शरीर की वस्तुकरणकारी दृष्टि को चुनौती देने का साधन बनती है। यहाँ एक वैचारिक संक्रमण दिखाई देता है: देह से मुक्ति देह के सामाजिक अर्थ से मुक्ति देह पर स्वयं का अधिकार।

देह, सत्ता और आध्यात्मिक एजेंसी 

फूको का सत्ता-विमर्श यहाँ पुनः उपयोगी है। सत्ता केवल दमन नहीं करती; वह subject भी निर्मित करती है।[15] स्त्री को ‘पत्नी’, ‘माँ’, ‘कुलवधू’, ‘पवित्र स्त्री’ या ‘कामना की वस्तु’ के रूप में परिभाषित करना भी सत्ता की प्रक्रिया है। भक्ति इन परिभाषाओं से बाहर एक वैकल्पिक subjectivity उपलब्ध कराती है। स्त्री कह सकती है— मैं पत्नी होने से पहले भक्त हूँ। मैं किसी पुरुष की संपत्ति नहीं हूँ। मेरी इच्छा का अंतिम केंद्र लौकिक पुरुष होना आवश्यक नहीं। मेरी देह मेरी आध्यात्मिक यात्रा की बाधा नहीं है।

और अंततः—मैं अपनी आध्यात्मिक सत्ता स्वयं परिभाषित कर सकती हूँ।

अक्का महादेवी की महत्ता इसी बिंदु पर सबसे अधिक स्पष्ट होती है।

निष्कर्ष : देह की मुक्ति या देह के अर्थ की मुक्ति?

अव्वैयार, कराइकल अम्मैयार और अक्का महादेवी की कथाएँ हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती हैं कि आध्यात्मिक मुक्ति का संबंध देह से किस प्रकार स्थापित होता है। अव्वैयार की कथा बताती है कि स्त्री की आध्यात्मिक स्वतंत्रता के रास्ते में उसकी यौवनशील देह सामाजिक बाधा बन सकती है। कराइकल अम्मैयार इस बाधा को और आगे ले जाती हैं और सुंदर स्त्री देह को ही अस्वीकार करके एक ऐसी देह की कल्पना करती हैं जो सामाजिक आकर्षण और पुरुष-दृष्टि से बाहर हो। लेकिन अक्का महादेवी एक निर्णायक मोड़ प्रस्तुत करती हैं। वह देह को नष्ट नहीं करतीं। वह अपनी देह को वृद्ध नहीं बनातीं। वह उसे पिशाच में नहीं बदलतीं। वह उसी स्त्री देह के साथ समाज से बाहर निकलती हैं इसलिए अक्का महादेवी की नग्नता का सबसे गहरा अर्थ नग्न होना नहीं, बल्कि देह को देखने और परिभाषित करने के अधिकार को अपने हाथ में लेना है। यहाँ भक्ति केवल ईश्वर से प्रेम की साधना नहीं रह जाती। वह subjectivity का निर्माण करती है। भक्ति स्त्री को यह कहने की शक्ति देती है कि उसकी पहचान किसी पुरुष से संबंध के द्वारा पूरी तरह निर्धारित नहीं होती। उसका शरीर केवल विवाह, मातृत्व और पुरुष-इच्छा का माध्यम नहीं है। उसकी इच्छा आध्यात्मिक अर्थ ग्रहण कर सकती हैऔर उसकी देह, जिसे पितृसत्ता नियंत्रित करना चाहती है, वही देह उसकी आध्यात्मिक agency का माध्यम बन सकती है।

इस प्रकार इन तीन संत कवयित्रियों को एक साथ पढ़ने पर भारतीय भक्ति में स्त्री देह का एक गहरा वैचारिक रूपांतरण दिखाई देता है— अव्वैयार में देह से दूरी,
कराइकल अम्मैयार में देह का विघटन,
और अक्का महादेवी में देह का पुनरधिकार। यही इस अध्ययन का केंद्रीय निष्कर्ष है कि स्त्री आध्यात्मिकता की यात्रा को केवल देह से मुक्ति की यात्रा मानना अधूरा है; वह देह पर आरोपित सामाजिक अर्थों से मुक्ति और अंततः देह की अपनी स्वायत्त व्याख्या निर्मित करने की यात्रा भी हो सकती है।भक्ति का सबसे क्रांतिकारी पक्ष शायद यही है कि वह स्त्री को केवल ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग नहीं देती; वह उसे स्वयं को एक आध्यात्मिक subject के रूप में पुनर्निर्मित करने की भाषा भी देती है।

टिप्पणियाँ / Footnotes

[1] Michel Foucault, The History of Sexuality, Volume 1: An Introduction, trans. Robert Hurley (New York: Vintage Books, 1978).

[2] Judith Butler, Gender Trouble: Feminism and the Subversion of Identity (New York: Routledge, 1990).

[3] Mary Douglas, Purity and Danger: An Analysis of Concepts of Pollution and Taboo (London: Routledge & Kegan Paul, 1966).

[4] Maitrāyaṇīya Upaniṣad, 2.5–9. शरीर की अनित्यता और अशुचिता के संदर्भ में उपनिषद् की वैराग्यपरक दृष्टि देखें।

[5] Aṅguttara Nikāya, विशेषतः शरीर और अनित्यता संबंधी बौद्ध चिंतन; साथ ही Satipaṭṭhāna परंपरा में kāyānupassanā का संदर्भ।

[6] Uma Chakravarti, “Whatever Happened to the Vedic Dasi? Orientalism, Nationalism and a Script for the Past,” in Recasting Women: Essays in Indian Colonial History, ed. Kumkum Sangari and Sudesh Vaid (New Delhi: Kali for Women, 1989); तथा Uma Chakravarti, “Wifehood, Widowhood and Adultery: Female Sexuality, Surveillance and the State in Eighteenth-Century Maharashtra,” Economic and Political Weekly 29, nos. 1–2 (1995).

[7] Simone de Beauvoir, The Second Sex, trans. H. M. Parshley (New York: Vintage Books, 1989 [1949]).

[8] Elaine Craddock, Siva’s Warriors: The Kāraikkāl Ammaiyār and the Birth of the Bhakti Movement (Albany: State University of New York Press, 2010). कराइकल अम्मैयार को छठी शताब्दी की आरंभिक तमिल शिवभक्त कवयित्री के रूप में स्थापित करने वाले अध्ययनों में यह प्रमुख कार्य है। 

[9] Karen Pechilis, “Bhakti and Tantra Intertwined: The Explorations of the Tamil Poetess Kāraikkāl Ammaiyār,” International Journal of Dharma Studies 4, no. 2 (2016). Pechilis कराइकल अम्मैयार की कविता में भक्ति और तांत्रिक परंपरा के अंतर्संबंध तथा श्मशान की केंद्रीयता पर विचार करती हैं। 

[10] Karen Pechilis, Interpreting Devotion: The Poetry and Legacy of a Female Bhakti Saint of India (London: Routledge, 2012).

[11] Shalini Shah, “Poetesses in Classical Sanskrit Literature,” Indian Journal of Gender Studies 15, no. 1 (2008): 1–26. Shah अक्का महादेवी के शरीर, नग्नता और इच्छा को दक्षिण भारतीय स्त्री भक्ति के विशिष्ट प्रसंग में रखती हैं। 

[12] Uma Chakravarti, “The World of the Bhaktin: Women and the Bhakti Movement,” विभिन्न संकलनों में प्रकाशित उनके स्त्री-भक्ति संबंधी लेखन; विशेष रूप से दक्षिण भारतीय भक्ति स्त्रियों के देह और यौनिकता संबंधी विश्लेषण के लिए 2006 तक उपलब्ध उनका कार्य देखें। भक्ति में स्त्री द्वारा ईश्वर को पति/प्रियतम के रूप में ग्रहण करने और विवाह संस्था से दूरी बनाने की इस संरचना का शैक्षिक संक्षेप भी उपलब्ध है। 

[13] Judith Butler, Gender Trouble, विशेषतः gender को performative प्रक्रिया के रूप में देखने वाला सैद्धांतिक प्रतिपादन।

[14] Elizabeth Grosz, Volatile Bodies: Toward a Corporeal Feminism (Bloomington: Indiana University Press, 1994).

[15] Michel Foucault, Discipline and Punish: The Birth of the Prison, trans. Alan Sheridan (New York: Vintage Books, 1977); तथा The History of Sexuality, vol. 1 (1978).

[16] Karen Pechilis, “Devotional Subjectivity and the Fiction of Femaleness: Feminist Hermeneutics and the Articulation of Difference,” Journal of Feminist Studies in Religion 30, no. 1 (2014). Pechilis कराइकल अम्मैयार की devotional subjectivity को feminist hermeneutics के माध्यम से पढ़ने की संभावना प्रस्तुत करती हैं। 

संदर्भ-सूची / References

प्राथमिक स्रोत

  1. Aṅguttara Nikāya. Translated editions. London: Pali Text Society.
  2. Maitrāyaṇīya Upaniṣad. In The Principal Upanishads, edited and translated by S. Radhakrishnan. New Delhi: HarperCollins/George Allen & Unwin editions.
  3. Ramanujan, A. K., trans. Speaking of Śiva. Harmondsworth: Penguin Books, 1973.
  4. Ramanujan, A. K., trans. Hymns for the Drowning: Poems for Viṣṇu by Nammāḻvār. Princeton: Princeton University Press, 1981.

द्वितीयक एवं सैद्धांतिक स्रोत

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  2. Butler, Judith. Gender Trouble: Feminism and the Subversion of Identity. New York: Routledge, 1990.
  3. Chakravarti, Uma. “Whatever Happened to the Vedic Dasi? Orientalism, Nationalism and a Script for the Past.” In Recasting Women: Essays in Indian Colonial History, edited by Kumkum Sangari and Sudesh Vaid. New Delhi: Kali for Women, 1989.
  4. Chakravarti, Uma. “Wifehood, Widowhood and Adultery: Female Sexuality, Surveillance and the State in Eighteenth-Century Maharashtra.” Economic and Political Weekly 29, nos. 1–2 (1995).
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  7. Foucault, Michel. Discipline and Punish: The Birth of the Prison. Translated by Alan Sheridan. New York: Vintage Books, 1977.
  8. Foucault, Michel. The History of Sexuality, Volume 1: An Introduction. Translated by Robert Hurley. New York: Vintage Books, 1978.
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  10. Mukta, Parita. Upholding the Common Life: The Community of Mirabai. New Delhi: Oxford University Press, 1994.
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  12. Pechilis, Karen. “Bhakti and Tantra Intertwined: The Explorations of the Tamil Poetess Kāraikkāl Ammaiyār.” International Journal of Dharma Studies 4, no. 2 (2016). 
  13. Pechilis, Karen. “Devotional Subjectivity and the Fiction of Femaleness: Feminist Hermeneutics and the Articulation of Difference.” Journal of Feminist Studies in Religion 30, no. 1 (2014). 
  14. Ramaswamy, Vijaya. Walking Naked: Women, Society, Spirituality in South India. Shimla: Indian Institute of Advanced Study, 1997.
  15. Shah, Shalini. “Poetesses in Classical Sanskrit Literature.” Indian Journal of Gender Studies 15, no. 1 (2008): 1–26. 
  16. Sangari, Kumkum, and Sudesh Vaid, eds. Recasting Women: Essays in Indian Colonial History. New Delhi: Kali for Women, 1989.  

डॉ. मेधा,
असिस्टेंट प्रोफेसर ,
हिंदी विभाग, सत्यवती कॉलेज ( सांध्य ) ,
दिल्ली विश्वविद्यालय .
Email – medha.hindi@satyawatie.du.ac.in

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ISSN 2394-093X
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