‘प्रगतिशील सिनेमा’ प्रेमचंद का अधूरा सपना

प्रेमचंद जयंती पर विशेष

मानव केंद्रित नवजागरण काल में जबकि साहित्य प्रगतिशीलता की ओर बढ़ रहा था उसी समयकाल में धर्म-केंद्रित, चमत्कारपूर्ण और चमकीले-अश्लील सिनेमा का जन्म हो रहा था। ऐसे संक्रमण काल में प्रेमचंद का सिनेमा से जुड़ना महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना है । प्रेमचंद ने न केवल कथा साहित्य को तिलस्मी और अय्यारी परंपरा से मुक्त किया बल्कि उसे वर्गीय यथार्थ शोषण और सामाजिक विषमता के ठोस धरातल पर स्थापित किया। सिनेमा के आगमन से पूर्व ही उनकी रचनाओं में ऐसी चेतना विद्यमान है जो पूर्व-मार्क्सवादी होते हुए भी वर्ग संघर्ष और सामजिक न्याय की आकाँक्षा को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है। 1936 में होने वाले ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष प्रेमचंद जी इसके पूर्व ‘रंगभूमि’ {1925 } में साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष तथा कर्मभूमि {1930} में जन-आन्दोलन की ध्वनि इसी दिशा की और संकेत कर चुके थे। 

प्रेमचंद और सिनेमा के अंतर्संबंधों को हम ‘मिल मज़दूर’ फ़िल्म के संदर्भ में समझते आये हैं। इसे प्रेमचंद का ‘सिनेमा से मोहभंग’ के रूप में रेखांकित किया जाता है लेकिन इसे केवल व्यक्तिगत निराशा के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा में ‘तृतीय सिनेमा’ की असफल पूर्वपीठिका के रूप में समझा जाना चाहिए, जिसके केंद्र में एक स्पष्ट प्रगतिशील और वर्ग-चेतना दृष्टि विद्यमान है। ‘तृतीय सिनेमा’ की अवधारणा पर विचार करते समय फर्नांडो सोलानास और ऑक्टेवियो गेटिनो का उल्लेख अनिवार्य हो जाता है जो अर्जेटीना के प्रसिद्ध फिल्मकार,लेखक और राजनीतिक कार्यकर्त्ता थे, जिन्होंने 1960 के दशक में ‘तृतीय सिनेमा’ की अवधारणा विकसित और इसके ऐतिहासिक घोषणा पत्र ‘टुवर्ड्स ए थर्ड सिनेमा’ लिखा । तृतीय सिनेमा वह सिनेमा है जो उपनिवेशवाद, पूँजीवाद और सामाजिक असमानताओं के खिलाफ आवाज उठाता है । यह सिनेमा को केवल कला नहीं बल्कि संघर्ष का औजार मानता है जो दमन के विरुद्ध खड़ा होता है और जिसका ‘मार्क्सवादी विचारधारा’ से गहरा संबंध है। 

सिनेमा के तीन रूपों; प्रथम – व्यावसायिक व मनोरंजन प्रधान, द्वितीय- यूरोपीय कला सिनेमा और तृतीय – जन संघर्ष और राजनीतिक सिनेमा। इनके सन्दर्भ में अध्यन करें तो ‘मिल मज़दूर’ का कथ्य और दृष्टिकोण ‘तृतीय सिनेमा’ की अवधारणा के अधिक निकट प्रतीत होता है। जिसमे मनोरंजन से कहीं अधिक सामाजिक परिवर्तन का सपना है। साहित्य के उद्देश्य में जब वे लिख रहे हैं कि – “साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है –उसका दर्जा इतना न गिराइए । वह देश भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई सच्चाई है।” तो उनके मस्तिष्क में सिनेमा का वह स्वरुप भी था जिसे वे साहित्य से अलगाना चाह रहे थे।

मानव केंद्रित नवजागरण काल में जबकि साहित्य प्रगतिशीलता की ओर बढ़ रहा था उसी समयकाल में धर्म-केंद्रित, चमत्कारपूर्ण और चमकीले-अश्लील सिनेमा का जन्म हो रहा था। ऐसे संक्रमण काल में प्रेमचंद का सिनेमा से जुड़ना महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना है । प्रेमचंद ने न केवल कथा साहित्य को तिलस्मी और अय्यारी परंपरा से मुक्त किया बल्कि उसे वर्गीय यथार्थ शोषण और सामाजिक विषमता के ठोस धरातल पर स्थापित किया। सिनेमा के आगमन से पूर्व ही उनकी रचनाओं में ऐसी चेतना विद्यमान है जो पूर्व-मार्क्सवादी होते हुए भी वर्ग संघर्ष और सामजिक न्याय की आकाँक्षा को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है। 1936 में होने वाले ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष प्रेमचंद जी इसके पूर्व ‘रंगभूमि’ {1925 } में साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष तथा कर्मभूमि {1930} में जन-आन्दोलन की ध्वनि इसी दिशा की और संकेत कर चुके थे। 

यह जिज्ञासा भी सामने आती है कि यद्यपि प्रेमचंद अपने समृद्ध साहित्य और लोकप्रियता की वजह से ही सिनेमा जगत में आमंत्रित किए जाते हैं फिर क्या कारण रहे कि इतने सफल उपन्यास व कथा साहित्य और तीन-तीन नाटक होने के बावजूद भी ‘मिल मजदूर’ एक नई स्क्रिप्ट रचते हैं। उनके साहित्य का फ़िल्मी रूपांतरण अधिक स्वाभाविक विकल्प हो सकता था। इसका उत्तर भी सिनेमा की ‘संरचनात्मक प्रकृति’ में   निहित है । सिनेमा में कथा का नियंत्रण अंततः निर्देशक और निर्माता के हाथ में होता है और वह यह ध्यान रखता है कि कौन-सा दृश्य दर्शकों को आकर्षित करेगा और वह कहाँ पैसा वसूल हो सकता है ? यहाँ फिल्म के निर्देशक मोहन भवनानी की वैचारिकी भी प्रेमचंद को अपील की होगी तभी वे कहानी लिखने को तैयार हुए होंगे । निर्देशक ने ‘टू मिनट स्टोरी’ के तर्ज पर उन्हें कथा का मूल बिंदु बता दिया था जिसे प्रेमचंद जी ने आकार-विस्तार दिया, किरदार गढ़े, संवाद रचे । 

‘मिल मज़दूर’ फ़िल्म की पटकथा के कारणों की तह में कुछ वैश्विक सिनेमा पर भी दृष्टि जा सकती है । बीसवीं सदी के तीसरे दशक से पूर्व ही सोवियत रूस और यूरोपीय सिनेमा में श्रमिक जीवन, वर्ग-संघर्ष और पूंजीवादी शोषण पर आधारित फ़िल्में बन रही थीं ।सर्गेई आइज़ेश्टाइन की स्ट्राइक {1925 } और बैटलशिप पोटेमकिन{1925 } ने श्रमिक प्रतिरोध को सामूहिक नायक के रूप में प्रस्तुत किया । व्सोवोलोद पुदोव्किन की मदर {1926 }में भी वर्ग चेतना के उद्भव को संवेदनात्मक रूप दिया यह फ़िल्म मैक्सिम गोर्की के प्रसिद्ध उपन्यास माँ पर आधारित है इसकी पृष्ठभूमि 1905 की रूसी क्रांति है। इसी क्रम में कुहले वैम्पे जर्मन फ़िल्म {1932} भी है इसे कम्युनिस्ट के आंदोलनों को अराजक रूप में प्रस्तुत किया गया जिसे कट्टरपंथी भी माना गया । श्रमिक दृष्टिकोण से बनी इस फ़िल्म को दो बार प्रतिबंधित भी किया गया। उस समय की कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इसे स्वीकार नहीं किया था। इन सभी फ़िल्मों में बेरोज़गारी आर्थिक संकट और शर्मिक जीवन की त्रासदी को प्रत्यक्षत: मार्क्सवादी झंडे तले बनया गया । ‘मिल मजदूर’ लिखने से पूर्व संभवत: प्रेमचंद के सामने वैश्विक सिनेमा के ये उदाहरण अवश्य रहे होंगे विदेशी सिनेमा की सफलताओं से प्रभावित होकर भारतीय संदर्भ में सिनेमा लिखना आज कोई आश्चर्य की बात नहीं है यह हमेशा से होता आया है। सिनेमा की भाषा में इंस्पिरेशन कहा जाता है जो कल एक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भी है। और यही कारण भी रहा होगा कि समाज-सुधार और बदलाव के सपने के साथ उन्होंने सिनेमा की दुनिया में कदम रखा।

प्रेमचंद का यह सिनेमाई प्रयोग या प्रयास भारतीय सिनेमा के इतिहास में महत्वपूर्ण अध्याय है जो संकेत दे रहा था कि सिनेमा सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बन सकता है। आज़ादी से पूर्व ही हिन्दी सिनेमा में ‘प्रगतिशील विचारों की नींव’ ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ से जुड़े फिल्मकारों द्वारा रखी गई। इन कलाकारों ने सामजिक यथार्थ, साम्राज्यवाद-विरोध और मज़दूर-किसानों के उत्थान पर फ़िल्में बनाई और सफल भी रही प्रमुख नाम है – ख्वाज़ा अब्बास, अहमद,बलराज साहनी विमल राय, पृथ्वीराज कपूर, व्ही शांताराम, चेतन आनंद । 40 के बाद हिन्दी सिनेमा देखें तो सामाजिक, राजनीतिक और राष्ट्रभक्ति की फिल्में बन रही थी जो देशवासियों को प्रेरणा दे रही थी। प्रेमचंद यदि जीवित रहते तो सिनेमा से निराश न होते। साहित्य और सिनेमा के संदर्भ में जब बात की जाती है तो हम प्रेमचंद को भूल नहीं सकते लेकिन मुझे यह कहते हुए थोड़ा संकोच हो रहा है सम्भवतः यह मेरे ज्ञान की सीमा हो कि ‘जब सिनेमा के इतिहास’ की बात करते हैं तो हमें उपरोक्त बड़े नाम बार-बार पढ़ने को मिलते हैं लेकिन वहां प्रेमचंद और उनकी फ़िल्म ‘मिल मज़दूर’ का जिक्र नहीं आता। यह सिनेमा द्वारा साहित्य को जानबूझकर नज़रंदाज़ करना है।  

‘मिल मजदूर’ की कहानी अपने समय के ‘वर्ग संघर्ष’ को सामने लाती है। एक टेक्सटाइल मिल के मालिक की मृत्यु के बाद उसका बेटा उसका संचालन संभालता है और मुनाफे की अंधी दौड़ में मजदूरों का शोषण शुरू कर देता है इसके विपरीत उसकी बहन मजदूरों के पक्ष में खड़ी होती है उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करती है, हड़ताल का नेतृत्व भी करती है अंतत: शोषक भाई को दंड मिलता है और न्याय की स्थापना होती है यह कथा अपने मूल में एक प्रगतिशील और मार्क्सवादी दृष्टि से प्रेरित है। उल्लेखनीय है कि स्टूडियो की परंपरा से अलग इस फिल्म की शूटिंग वास्तविक ‘टेक्सटाइल मिल’ में की गई थी जिसमें  वहाँ के मजदूरों को भी शामिल किया गया। इस दृष्टि से यह फिल्म यथार्थवाद की ओर एक महत्वपूर्ण कदम थी। 

फ़िल्म का अन्य महत्वपूर्ण पक्ष इसकी नायिका जिसे  हीरो की तरह प्रस्तुत करना था जो आज स्त्री-विमर्श के अध्ययन का विषय है। फिल्म पितृसत्ता को चुनौती देती है। नायिका के संवाद और चरित्रांकन विशेष रूप से विद्रोहात्मक थे । मजदूरों के अधिकार के लिए नायिका का अपने ही भाई को जेल भिजवाना, संपत्ति के अधिकार के लिए संघर्ष करना आदि बिंदु उस समय के समाज के लिए अत्यंत असहज व क्रांतिकारी थे। यानी फिल्म भारतीय समाज की पितृसत्ता के वर्चस्व को तोड़ने का भी काम कर रही थी ।यहाँ तक की आज का समाज भी ‘स्त्री स्वायत्तता’ को सहजता से  स्वीकार नहीं कर सकता । याद कीजिए प्रियंका चोपड़ा और रणवीर सिंह की फिल्म {2015} ‘दिल धड़कने दो’ जिसमें बेटा अपने पारिवारिक व्यवसाय छोड़ने का इरादा रखता है जबकि परिवार वाले उसकी बहन यानी अपनी बेटी को उसे संपत्ति में अधिकार देने के बिल्कुल पक्ष में नहीं है।

यह भी कारण है कि ‘मिल मजदूर’ को व्यापक रूप से प्रदर्शित नहीं किया जाने दिया गया। इसकी व्यावसायिक असफलता ठीक से प्रदर्शित न होने के कारण थी। जिसके केंद्र में पूँजीवाद के विरोध का ही मामला नहीं था बल्कि सामाजिक-वैचारिक अस्वीकृति भी थी। प्रेमचंद स्वयं इस बात से व्यथित थे कि  जिस प्रकार की सशक्त और विद्रोही नायिकाओं की रचना करते हैं उन्हें निभाने के लिए कोई अभिनेत्री तैयार नहीं होती। कारण स्पष्ट है स्त्रियों के लिए निर्धारित नैतिक मानदंड जो नायिकाओं के भी पैमाने बने । यदि कोई अभिनेत्री ऐसे ‘विद्रोही-चरित्र’ को निभाती तो उसे नायिका नहीं बल्कि ‘बुरी औरत’ के रूप में देखा जाता। इस प्रकार सिनेमा की संरचना स्वयं में यह वैचारिक परिवर्तन के मार्ग में बाधा बन जाती है।

बाद में यद्यपि इसे ‘सेठ की लड़की’ या ‘दया की देवी’ के नाम से भी प्रदर्शित करने की कोशिश की गई लेकिन पितृसत्तात्मक समाज इन शीर्षकों को भी स्वीकार नहीं कर सका अंततः फिल्म लगभग लुप्त हो गई जिसकी आज कोई प्रति उपलब्ध नहीं है। यह अत्यंत शोचनीय है कि 1934 की बनी ‘मिल मजदूर’ की एक भी कॉपी नहीं बची जबकि पूर्व उल्लिखित विदेशी फिल्में जो बहुत पहले पूर्व बनी आज भी आपको यूट्यूब पर देखने को मिल जाएंगी । 

यह मात्र संयोग नहीं बल्कि प्रेमचंद की कलम का क्रांतिकारी रूप ही है कि जब उनका पहला कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ आता है तो सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया जाता है और जब उनके द्वारा लिखी पहली फ़िल्म प्रदर्शित होती है तो उस पर भी पूँजीवाद और मीडिया के गठजोड़ से बैन करवा दिया जाता है। कहानी संग्रह के प्रतिबन्ध के बाद भी प्रेमचंद लिखना नहीं छोड़ते । वे नए नाम से लेखन यात्रा आरम्भ करते हैं और एक लम्बी पारी खेलते हैं । इसलिए मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि वे जीवित रहते तो सिनेमा की ओर ज़रूर वापस लौटते और बिना समझौते अपने लेखकीय धर्म को निभाते। वस्तुत: प्रेमचंद के सिनेमाई अनुभव की पड़ताल करें तो पायेंगे कि साहित्य में जिस तरह से वे स्वतंत्र रूप से अपने विचारों को रख पा रहे थे सिनेमा के पूंजीवादी ढांचे में वे फिट नहीं हो सके और सिनेमा की पितृसत्तात्मक शैली को भी वे स्वीकार न कर सके। परिणामत: उनकी रचनात्मक जिजीविषा और सिनेमा का माध्यम एक दूसरे के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाया। 

अंतत: प्रेमचंद का सिनेमाई अनुभव केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग-भर नहीं है बल्कि आज भी प्रासंगिक प्रश्नों को उठता है। विशेषकर आज के समय में जबकि सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा इस मनोरंजन को प्रोपेगैंडा के रूप में इस्तेमाल कर रहा है प्रेमचंद का अधूरा सपना कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है- क्या सिनेमा केवल मनोरंजन है? या वह सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी हो सकता है? क्या पूँजी और रचनात्मकता के बीच संतुलन संभव है? जैसे कि उन्होंने लिखा भी है कि सिनेमा जनरुचि का अनुगामी है – क्या दर्शक स्वयं उस परिवर्तन के लिए तैयार है जिसे सिनेमा प्रस्तुत करना चाहता है ? 

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