गद्य काव्य रचना त्रयी

भाग (1): संकल्प

 (  जवाब.. )

​” काफ़ी  समय  बाद  कुछ  ख़ाली  हुआ  हूँ  ख़ुद के लिए ….”

​यह भी  वर्तमान का सच है,

कि तुम्हें पता  चला है कि तुम  कुछ ख़ाली हुए हों !

कितनों को पता होता है ?

कि वह ख़ुद के लिए ख़ाली हुए हैं..??

सोचों, यदि पता ही नहीं चले कि हमें ख़ुद को कुछ ख़ाली करना है..?

उन चीजों से , भावनाओं से, रिश्तों से,

दूसरों की अपेक्षाओं के उन बोझ से जिनमें हम कभी ख़ुद के थे ही नहीं |

​तब ख़ुद को कुछ ख़ाली करना ,

यह इस तरह से हैं कि

“आप अपने थके हुए मन को प्यार से गले लगाने जा रहे हैं | “

“अपने शरीर की आत्मा को ख़ुशी से प्यार करने कि हिम्मत करने  जा रहे हैं |”

​कितना समय बीत गया ,

ख़ुद को प्यार किए बिना ?

दोस्त, अब ” मैं ” ख़ुद के साथ के बिना नहीं मिलूंगा तुम्हें….

अब जब  भी मिलेंगे तब अपने अपने किरदारों में ही मिलेंगे…

“मैं”ख़ुद के लिए  कुछ ख़ाली हुआ हूँ |

उम्र और जीवन  के  गलियारों  को  यूँ ही  ख़ुद से नहीं ढलने दूँगा |

बिना “ख़ुद” से “ख़ुद” की पहचान के ,

मैं , ख़ुद को अब नहीं मरने दूँगा |

नहीं मरने दूँगा ..

अब जब ” मैं ” ख़ुद के लिए कुछ ख़ाली हुआ हूँ  तो  उम्र को भी   यौ   ही नहीं जानें दूँगा..नहीं जाने दूँगा |

​भाग (2): ठहराव, निडरता और कायनात | ( ज़वाब)

​(उम्र के दौर, सफेद बालों की गरिमा, डर को गुलाम बनाने और गुज़रती उम्र में प्यार का उदाहरण बनने का  वैश्विक दर्शन)

​यह भी वर्तमान का सच है कि, तुम्हें पता चला है कि तुम कुछ ख़ाली हुए हो ।

कितनों को पता होता है ? कि वह खुद के लिए ख़ाली हुए हैं ….?

​उन चीज़ों से, भावनाओं से, रिश्तों से, दूसरों की उन अपेक्षाओं के उन बोझ से,

जिनमें हम कभी खुद के थे ही नहीं जिनमें हम खुद के थे, उनके धुँधले होने से बेखबर होते चले गए थे |

​अच्छा है कि उम्र दौरों के रूप में मिली हुई है, तो हर दौर के बाद एक ठहराव आता है ।

जो कुछ खुद के लिए ख़ाली हुए है, उन्हें ही यह ठहराव दिख सकता है ।

​जिनको दिख सकता है, ख़ुद का कुछ ख़ाली होना…. ऐसे है जैसे खुद को दुबारा से जी लेना |

​दुबारा जीने के लिए गुज़रती हुई जिंदगी से डरna ज़रूरी नहीं होता यह समझ लेना होता है …

डर किसी भी उम्र में आपको मिल ही जायेगा, लेकिन हर उम्र में डर आपको डरा सके यह उस डर के बस का नहीं होगा |

​क्योंकि यह अब आपके खुद के कुछ ख़ाली होने वाली जगहों से उपजा हुआ है |

अब समय है कि डर को डरा दिया जाए और उम्र के इस दौर को अपनी बाँहों में भर लिया जाए |

​जिनमें हम खुद के थे, उनको फिर से पा लिया जाए | किसी की बातों से मुस्करा लिया जाए |

किसी का हो लिया जाए । किसी को जी लिया जाए |

​ख़ुद को समझ लिया जाए, अब क्यों खुद को खुद से ही छुपाया जाए ? अपने सफेद होते बालों को लहरा दिया जाए |

अपनी आँखों से देखें अनुभवों को अब सामने बैठे युवा को दे दिया जाए |

​कौन सा डर जो उम्र के इस ठहराव को जीने से मना कर रहा है? कैसे तुम इस डर को जानते हो ?

डर तुम्हें या तुम डर को जानते हों ? तुम यदि डर को जानते हों, तो वह तुम्हारा साथी बनेगा |

ताक़त बन कर तुम्हें तुम्हारे नए जीवन में लेकर खुद आएगा |

​यह तुम्हारा दौर है, अब यह डर तुम्हारा गुलाम है |

लेकिन यह ठहराव तुम्हें किसके लिए चाहिए, यह तो पता है ? तुम्हारी उम्र, तुम्हारे सफेद होते बाल, तुम्हारी आँखों की कम होती रोशनी भी तुम्हें नहीं डरा पाएगी |

​क्योंकि डर तो उनका था, जिनकी उम्र कम थी, जिनके काले बाल थे, जिनकी आँखों की रोशनी भरपूर थी, लेकिन होश ना था |

डर तो उनका था, तुम इस उम्र में किस डर से डर रहे हो ?

​यह उम्र का दौर तुम्हारे अनुभवों के स्वागत में झुकना चाहता है। तुमसे जीना सीखना चाहता है, तुमसे प्यार सीखना चाहता है |

क्योंकि तुम खुद से कुछ ख़ाली हुए हो इस उम्र के दौर में। इसलिए तुम्हें तुम्हारी पूरी कायनात से मिलवाना चाहता है।

​खुद से ख़ाली लोगों के लिए उनका हर दौर इंतज़ार करता हैं। तुम्हें कैसे नहीं पता चला ?

कहाँ पर चले गए थे ? किसके लिए चले गए थे ?

​प्यार किसी एक दौर का नहीं हो सकता है । यह उनका होता है जो हर दौर में कुछ ख़ाली होते हैं ।

उन्हें पता होता है कि किसके लिए ख़ाली हुए हैं। वह ख़ाली जगह पर तुम्हें प्यार ज़रूर मिलेगा |

​मत डरो उम्र के इस दौर से, यह तुम्हारा अपना ही इंतज़ार करता हुआ दोस्त है जोकि अब मिला है । खुद से कुछ खाली हुए हों तो पता चला, उम्र का हर दौर इंतज़ार करता है … गुज़रती उम्र में प्यार का उदाहरण बन कर जिया जाएँ |

भाग (3) की वे पाँचों पंक्तियाँ,

​अब पूरी त्रयी (Trilogy) एक साथ जोकि प्रश्नों को महसूस करते हैं |

 फ़िर उनका जवाब क़ायनात देते हुए |

 मनुष्य दोस्त का प्रश्न  और  क़ायनात  का  ज़वाब |

(​दोस्त  तथा मेरे दोनों बच्चों को समर्पित |) ………..

काफ़ी समय बाद कुछ खाली हुआ हूँ खुद के लिए….

मुद्दत हुई, अब मुखातिब हो जाऊं खुद से ,

ज़हन सवाली का, ये सवाल अच्छा है;

बेख्याली मे, ये ख्याल अच्छा है….

कुछ उम्र गुज़र गयी, कुछ हम गुज़र गये,

( दोस्त  प्रश्न  के  रूप  में खुद से….

डिम्पल शिक्षिका

dimpalsingh1709@gmail.com

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ISSN 2394-093X
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