पुनर्पाठ : रेणु की कहानी ‘संवदिया’सामंतवाद और पितृसत्ता के पक्ष में खड़ी

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फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘ संवदिया’ का पुनर्पाठ कर रही हैं सुनीता मंजू। उनके नजरिये ने इस कहानी को सामंतवाद और पितृसत्ता के पक्ष में पाया है।

वर्षों बाद “संवदिया”  पढ़ने का मौका मिला।  छात्र जीवन में पढ़ी हुई कहानी, अब बिल्कुल अलग लगी। पहले पढ़ा था तब बड़ी बहुरिया पर दया आई थी, हरगोबिन, गाँव के चाचा, भैया की तरह मजबूत लगा था। परंतु इस बार  हरगोबिन पर दया आई। बेचारा स्वयं ही बंधुआ मजदूर बनने को तैयार हो गया “मैं अब निठल्ला बैठा नहीं रहूँगा। तुम्हारा सब काम करूँगा। बोलो बड़ी माँ…. तुम…. तुम गाँव छोड़कर चली तो नहीं जाओगी? बोलो….”01

 सामंती व्यवस्था का ढहना:- फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी “संवदिया” सर्वप्रथम सन 1962 में प्रकाशित हुई थी। स्वतंत्र भारत, लोकतंत्र के मूल्यों को अपनाने में तत्पर था। जमींदारी प्रथा बिहार में समाप्त कर दी गई थी। ग्रामीण क्षेत्र के सामंतों पर यह बिजली बनकर गिरी। हालांकि येन-केन प्रकरेण वो अपनी अधिकांश जमीन जायदाद बचाने में सफल रहे। “लाल पान की बेगम” कहानी में बिरजू की माँ कहती है “बिरजू के बप्पा को कम सहना पड़ा है! बाबूसाहेब ग़ुस्से से सरकस नाच के बाघ की तरह हुमड़ते रह गए। उनका बड़ा बेटा घर में आग लगाने की धमकी देकर गया।…आखिर बाबूसाहेब ने अपने सबसे छोटे लड़के को भेजा। बिरजू की माँ को ‘मौसी’ कहके पुकारा—यह ज़मीन बाबू जी ने मेरे नाम से ख़रीदी थी। मेरी पढ़ाई-लिखाई इसी ज़मीन की उपज से चलती है।…और भी कितनी बातें। खूब मोहना जानता है उत्ता ज़रा-सा लड़का। जमींदार का बेटा है कि…”02 बड़ी बहुरिया की माँ के पूछने पर हरगोबिन कहता है “नहीं माईजी जायदाद अभी भी कुछ कम नहीं। जो है वही बहुत है। टूट भी गई है… है तो आखिर बड़ी हवेली ही”।03 उच्च वर्ग ने अपने भविष्य को सुरक्षित करने के रास्ते निकाल लिए थे। ये बात और है कि बड़के भैया (जमींदार) के ना रहने से स्थिति बिगड़ गई। संभवतः वो जीवित रहते, तो वही नौकर चाकरों का हुजूम रहता। बड़ी बहुरिया को सूपा में अनाज नहीं फटकना पड़ता। वही सामंती ठसक रहती। जिनके इन हाथों में सिर्फ मेहंदी लगाकर गाँव की नाइन परिवार पालती थी।  “कहाँ गए वे दिन! हरगोबिन ने लंबी साँस ली”।04 कहाँ गए वे दिन! ये अफसोस बड़ी बहुरिया, उनके देवर देवरानी करें तो शोभा देता है। पर बेचारा हरगोबिन ये समझ ही नहीं पाता, कि ये नाइन का शोषण हो रहा था। नाइन हाथों में मेहंदी, पैरों में महावर, उबटन, मालिश कार्यों के बदले छह महीने में साली (फसल उत्पादन के समय दिया जाने वाला अनाज) और एक कपड़ा पाती रही होगी। केवल इसी से उसका परिवार नहीं पलता होगा। उसका पति बड़के भैया की दाढ़ी,  हजामत, मालिश करता रहा होगा। फिर भी बाहर मजदूरी करनी पड़ती होगी। आज बूढ़ी नाइन से पूछो तो वो यही कहेगी, अच्छा हुआ वे दिन चले गए। भिखारी ठाकुर से पूछिए पहले का ज़माना कैसा था नाई को कितना कष्ट था। “ड्योढ़ी पर औरतें इकट्ठी होने लगी हैं। भागमभाग मच गयी है। एक भले से दिखने वाले आदमी से निहोरा करता है नाई युवक ‘बाबूसाहेब को खबर करवा न दीजिए कि कुतुबपुर  का नाई आया है न्यौता  लेकर’। आन्हर  हो? इतनी दूर  से आ रहे हैं मलिकार। पहले पानी-धानी पिएँ,  नहाए धोयें  कि पहले तुमरी  ही बात सुन  लें।”।05

पूँजीवादी व्यवस्था का असर:- मोदियाइन, जैसा की प्रतीत होता है छोटी मोटी दुकान चलाती है। एक सीमा से ज्यादा उधार देने पर उसकी दुकान चरमरा जाती है। अब मोदियाइन बड़ी बहुरिया से उधार वसूली करने में खरी खोटी सुनाती है। मोदियाइन और बड़ी बहुरिया का संबंध जमींदार और रैयत का न होकर ग्राहक और विक्रेता का है। बड़ी बहुरिया अपनी बदली हुई स्थिति भलीभाँति समझती है। वह प्रतिवाद नहीं करती। बदली हुई परिस्थितियों में जीवन यापन के नए रास्ते तलाशती है। परंतु सामंत परिवार की बहु  घर से बाहर निकल कर खेती करवाने, मेहनत करने, गाय को घास लाकर देने की नहीं सोचती। वह एकमात्र आश्रय मायके का सहारा लेने की सोचती है। आश्चर्य नहीं है, क्योंकि सामंती व्यवस्था में उच्च वर्ग के लिए श्रम वर्जित है। श्रम करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। हालांकि वो मायके में टहल करने को तैयार है। “माँ से कहना मैं भाई भाभियों की नौकरी करके पेट पाल लूँगी। बच्चों की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहूँगी”।06 बड़ी बहुरिया के देवर देवरानी समय की करवट को समझ चुके हैं। वो शहर में जाकर अपने जीवन यापन की व्यवस्था कर चुके हैं। संभव है देवरानियां भी ब्यूटी पार्लर या होम ट्यूशन का कुछ काम शुरू कर दें, ताकि आमदनी भी बढ़े और अपनी पहचान भी बने। पुनः मैं याद दिलाना चाहूँगी कि बड़के भैया की मृत्यु के कारण बड़ी बहुरिया की ऐसी स्थिति हुई है। वह जीवित रहते तो गाँव में ही पूँजीवादी व्यवस्था के तहत स्वयं को ढाल लेते। बड़ी बहुरिया को कोई कष्ट न होता। बड़ी हवेली की आमदनी कम भले ही हो गई हो, लेकिन अभी भी अनाज, फल का उत्पादन हो रहा है। “देवर देवरानिया भी कितने बेदर्द हैं। ठीक अगहनी धान के समय बाल बच्चों को लेकर शहर से आएँगे। दस पन्द्रह  दिनों में कर्ज उधार की ढेरी लगाकर,  वापस जाते समय दो दो मन के हिसाब से चावल चूड़ा ले जाएंगे। फिर आम के मौसम में आकर हाजिर। कच्चा पक्का आम तोड़कर बोरियों में बंद करके चले जाएंगे”।07 अगर बड़ी बहुरिया थोड़ा बहुत दखल देती, तो उसे बथुआ साग उबाल कर न खाना पड़ता। कर्ज उधार की ढेरी से भी साफ मुकर सकती थी। कह सकती थी कि जिसने लिया है वही वापस करेगा। पर बड़ी बहुरिया सामंती व्यवस्था की मारी है, और पूँजीवादी व्यवस्था में ढलने को तैयार नहीं है।

 दलितों पिछड़ों की स्थिति:- कहानी में दलित वर्ग का कोई पात्र नहीं है। जहाँ तक आभास होता है, हरगोबिन, मोदियाइन, बड़ी बहुरिया का नौकर, पिछड़े वर्ग के हैं। तभी वह घर आंगन में जा कर काम कर पा रहे हैं। श्रम के द्वारा सेवा कर रहे हैं। वर्ण व्यवस्था में तथाकथित शूद्र वर्ण (जिसमें शिल्पकार वर्ग,  श्रमिक वर्ग शामिल हैं) का कार्य बिना सही मजदूरी लिए, अन्य तीनों वर्णों की सेवा करना था। नाइन द्वारा बड़ी बहुरिया के हाथों पर मेहंदी लगाने का जिक्र कहानी में आया है। हरगोबिन  बिना राह खर्च के संवाद लेकर जाता है। कम पैसे होने के कारण वह कटिहार से जलालगढ़ बीस कोस की दूरी पैदल ही नाप देता है। संवाद लेकर जाना संवेदनशीलता का काम है, लेकिन है तो बेगारी ही। बिना मजदूरी, केवल भोजन और राह खर्च पर किया जाने वाला काम। तभी तो इसे कोई मजदूर नहीं करना चाहता। “गाँव के लोगों की गलत धारणा है, कि निठल्ला, कामचोर और पेटू आदमी ही संवदिया का काम करता है। ना आगे नाथ, ना पीछे पगहा। बिना मजदूरी लिए ही जो गाँव-गाँव संवाद  पहुँचाए उसको और क्या कहेंगे”।08 सामंती व्यवस्था से पूंजीवादी व्यवस्था में इतना ही अंतर दिखता है, कि मजदूर अब मजदूरी लेना अपना हक समझ रहे हैं। बिना मजदूरी के कोई कार्य करने को तैयार नहीं है। पर हरगोबिन तो सामंती व्यवस्था का मारा है। वह राह खर्च भी नहीं लेता, अपने खर्च पर जाता है। बड़ी बहुरिया से नही लिया, कम से कम लौटते समय उसके सम्पन्न मायके से तो लेना चाहिए था। कम पैसे होने के कारण रास्ते में कुछ भोजन भी नहीं करता। बड़की बहुरिया के लिए, उनकी माँ ने बासमती धान का चूड़ा भेजा है। उन्होंने हरगोबिन को रास्ते में खाने के लिए कुछ भी नहीं दिया, और बेटी को दी गई सौगात में से हर गोविंद एक दाना भी नहीं ले सकता। “कस्बा शहर पहुँचकर उसने पेट भर पानी पी लिया। पोटली में नाक लगाकर उसने सूंघा ‘अहा! बासमती धान का चूड़ा है! माँ की सौगात बेटी के लिए’ नहीं वह इसमें से एक मुट्ठी भी नहीं खा सकेगा”।09 सामंती व्यवस्था के टूटने का ही असर है, कि बड़ी बहुरिया का नौकर बिना मजदूरी के काम करने को तैयार नहीं। “एक नौकर था, वह भी कल भाग गया। गाय खूँटे से बंधी भूखी प्यासी हिकर  रही है”।10 मोदियाइन उधार न चुकाने पर बड़ी बहुरिया को खरी खोटी सुना सकती है।

महिलाओं की स्थिति:- बड़ी बहुरिया परंपरागत भारतीय नारी का प्रतिनिधित्व करती है। वह दयालु और शांत स्वभाव की है “हरगोबिन भाई, अब जी कैसा है?…लो, एक घूँट दूध और पी लो।…मुँह खोलो…हाँ…पी जाओ। पीओ!”11 वह मृदुभाषी, संवेदनशील, सौम्य महिला है, जो किसी भी झगड़े टंटे से दूर रहना चाहती है। आदर्श भारतीय नारी, जिसे सदा सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद दिया जाता है। जिसका सौभाग्य पति से जुड़ा रहता है। पति की मृत्यु के पश्चात बड़ी बहुरिया की स्थिति दयनीय हो गई है। बिना पति और संतान के वह जीवन को व्यर्थ समझती है। “कर्ज उधार अब कोई देते नहीं। एक पेट तो कुत्ता भी पालता है….लेकिन मैं?… माँ से कहना..12 वह इतनी सक्षम नहीं है, कि अपना खर्च स्वयं उठा सके। वह मायके जाने का निर्णय लेती है। वहाँ भी उसे अपनी स्थिति ज्ञात है। मायके में विधवा बेटी को सहज स्वीकार नहीं किया जाता। वह कहती है “बच्चों की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहूँगी। लेकिन अब यहाँ नहीं रह  सकूंगी। यदि माँ मुझे यहाँ से नहीं ले जाएगी, तो मैं किसी दिन गले में घड़ा बांधकर पोखरे में डूब मरुँगी। बथुआ साग खाकर कब तक जिऊँ? किसलिए.. किसके लिए?”13  बड़ी बहुरिया निम्न वर्ग की होती तो मेहनत मजदूरी करके अपना खर्च उठा लेती। परंतु हाय रे सामंतवाद! मायके की जूठन मंजूर, आत्महत्या मंजूर, लेकिन मेहनत मजदूरी नहीं मंजूर! बड़ी बहुरिया सामंतवाद  द्वारा सताई महिला है। गौर से देखा जाए तो उसकी समस्याएँ बड़ी नहीं है।   थोड़ी-बहुत खेती  है। आम के बगीचे हैं। दरवाजे पर गाय है। अगर वो थोड़ी हिम्मत दिखाती, तो उसे किसी समांग या हरगोबिन की जरूरत नहीं पड़ती।

हरगोबिन पितृ सत्ता का प्रहरी/ शिकार:-  हरगोबिन अपने गाँव की इज्जत बचाने के लिए बड़ी बहुरिया का संवाद नहीं पहुँचाता। वह स्वयं बड़ी बहुरिया के घर और खेत का काम संभालने को तैयार हो जाता है। अगर गौर से देखा जाए, तो हरगोबिन पितृ सत्ता  का प्रहरी साबित होता है। हरगोबिन बड़ी बहुरिया के मायके जा रहा है।  कन्या पक्ष के गाँव जा रहा है। उसका गाँव,  कन्या पक्ष के गाँव से श्रेष्ठ होना चाहिए।  उसके गाँव की हेठी नहीं होनी चाहिए। “किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा? कैसे कहेगा कि बड़ी बहुरिया बथुआ साग खाकर गुजारा कर रही है। सुनने वाले हरगोबिन के गाँव का नाम लेकर थूकेंगे। कैसा गाँव है,  जहाँ लक्ष्मी जैसी बहुरिया दुख भोग रही है!”14 अपने गाँव की बड़ी हवेली की प्रतिष्ठा के लिए वह झूठ बोलता है।  “बड़ी बहुरिया का तो सारा गाँव ही परिवार है। हमारे गाँव की लक्ष्मी है बड़ी बहुरिया। गाँव की लक्ष्मी, गाँव को छोड़कर शहर कैसे जाएगी? यूं देवर लोग हर बार आकर ले जाने की जिद करते हैं”15 वह बड़ी बहुरिया का संवाद नहीं कहता। वह स्वयं बड़ी बहुरिया के जीवन यापन की जिम्मेदारी लेने का निर्णय करता है। उसके भीतर का पुरुष यह सहन नहीं कर पाता, कि उसके रहते कोई महिला असहाय महसूस करे। मायके का आश्रय स्वीकार करे। यह उसके गाँव के साथ-साथ उसका भी अपमान है। उधर बड़ी बहुरिया भी संवाद भेजकर पछता रही थी। रास्ते में हरगोबिन अंधे सूरदास का गीत सुनता है “सूरदास के गीतों को सुनकर उसका जी स्थिर हुआ, थोड़ा—

….कि आहो रामा!
नैहरा को सुख सपन भयो अब,
देश पिया को डोलिया चली-ई-ई-ई,
भाई रोओ मति, यही करम की गति…!”16

गीत का अर्थ है एक बार विवाह हो जाने पर मायके का आश्रय लेना ठीक नहीं है। जो भाग्य में लिखा है, वो होगा। यहाँ भारतीय समाज की परम्परागत सोच “एक बार डोली गयी तो ससुराल से अर्थी ही निकलनी चाहिए” को बल मिल रहा है। अपने गाँव की प्रतिष्ठा के गर्व में फूला हरगोबिन राह खर्च के लिए पूछने पर मना कर देता है। “बड़ी बहुरिया के बड़े भाई ने पूछा- क्यों भाई राह खर्च तो है? हरगोबिन बोला- भैया जी आपकी दुआ से किसी बात की कमी नहीं। स्टेशन पर पहुँच कर हरगोबिन ने हिसाब किया। उसके पास जितने पैसे हैं,  उससे कटिहार तक का टिकट ही वह खरीद सकेगा”।17 पितृसत्ता के सजग प्रहरी की तरह हरगोबिन ने अपनी मूँछ नीची नहीं होने दी। परंतु इसकी कीमत उसे बीस कोस पैदल, भूखे पेट चलकर चुकानी पड़ी। अपने गाँव पहुंचते-पहुंचते उसकी ये हालत हो गई, कि वो बेहोश हो गया। इस प्रकार पितृ सत्ता का शिकार व स्वयं भी है। वह बड़ी बहुरिया का सारा काम करने को तैयार हो जाता है। निश्चय ही संवादिया एक अकेली विधवा की मार्मिक कहानी है। परंतु अंततः यह सामंतवाद और पितृसत्ता के पक्ष में खड़ी नजर आती है। यह कहानी एन०सी०ई०आर०टी० की बारहवीं कक्षा की पुस्तक अंतरा में शामिल है। मुझे राजस्थान राज्य की पाँचवीं कक्षा की पुस्तक में शामिल पन्ना धाय की कहानी याद आ गई।  पन्ना धाय ने राजकुमार के प्राण बचाने के लिए अपने पुत्र का बलिदान कर दिया था। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र-छात्राएँ पन्ना धाय और हरगोबिन  के वर्ग का ही प्रतिनिधित्व करते है,  राजकुमार और बड़ी बहुरिया के वर्ग का नहीं। प्रश्न यह है कि हम उन्हें क्या सिखाना चाह रहे हैं?

संदर्भ सूची
01 से 04   https://www.hindwi.org
05 संजीव  सूत्रधार (उपन्यास) राधाकृष्ण प्रकाशन, पाँचवाँ संस्करण, 2023 पृष्ठ संख्या-14
06 से 17 https://www.hindwi.org

 

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