जान दे देंगे, जमीन नहीं:राहुल गांधी को क्यों कह रहे हैं कर्नाटक के किसान

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बंगलुरु विधानसभा, जहाँ मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार बैठते हैं, वहां से मात्र 50 किलोमीटर की दुरी पर बैरमंगला सर्कल पर हजारों किसानों को विरोध प्रदर्शन पर बैठे हुए जल्दी ही 600 दिन होने वाल हैं और उनका एक ही नारा है “जीवा कोट्टेवु, भूमि कोडल्ला” यानी जान दे देंगे, जमीन नहीं। किसान विरोध कर रहे हैं, बिदादी-हरोहल्ली क्षेत्र में प्रस्तावित ग्रेटर बंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप “भारत की पहली AI-पावर्ड सिटी” या “AI सिटी” का। और यह अकारण नहीं है, लगभग 9,600 एकड़ जमीन पर प्रतावित इस परियोजना के दायरे में दक्षिण बंगलुरु जिले के बिदादी के 25 गांव आ रहे हैं। प्रदर्शन पर बैठे किसान कहते हैं कि यह क्षेत्र मल्टीक्रॉप यानी सिल्क, डेयरी, नारियल, अरेकनट, आम, चीकू, केला, रागी, धान आदि का प्रमुख उत्पादक है। बेंगलुरु शहर को रोजाना लगभग 18 लाख लीटर दूध की जरूरत होती है जिसमें से 6 लाख लीटर दूध यहीं से जाता है। इसके अलावा आम, चीकू, नारियल समेत लगभग 2 लाख से ज्यादा पेड़ों की कटाई से पर्यावरण और खाद्य आपूर्ति भयंकर रूप से प्रभावित होने जा रहा है। वृषभावती नदी इस पुरे इलाके को रिचार्ज करती हैं, जमीन के भीतर 500 फ़ीट तक यहाँ पानी मिल जाता है, कंक्रीट जंगल बसाने का मतलब भूमिगत जल का भी संकट है। पर्यावरण कार्यकर्ता विजय निशांत और अन्य पर्यावरणविदों ने भी इस परियोजना को लेकर गंभीर चिंताएं जताई हैं। परियोजना के खिलाफ एक ऑनलाइन याचिका पर अब तक 85,000 से अधिक लोगों ने हस्ताक्षर किये हैं जो परियोजना के खिलाफ किसानों के साथ जनता के भी कड़े विरोध को का सबूत है।

 सरकार के द्वारा इस परियोजना को “भारत की पहली AI-पावर्ड सिटी” या “AI सिटी” के रूप में प्रमोट किया जा रहा है। परियोजना की अनुमानित लागत ₹18,000-20,000 करोड़ है। सरकार इसे बेंगलुरु के दबाव को कम करने वाला “वर्क-लिव-प्ले” टाउनशिप बताती है, जहां AI इंडस्ट्री, रिहायशी इलाके, कमर्शियल जोन और ग्रीन स्पेस होंगे। और जिसमें 2,000 एकड़ से अधिक AI-आधारित उद्योगों के लिए आरक्षित होगा, साथ ही एक लाख से ज्यादा नौकरियों का दावा किया गया है। इसके लिए पहली अंतिम अधिसूचना में तीन गांवों (केंपय्यानापल्या, मंडलाहल्ली, वडेराहल्ली) में जून 2026 में लगभग 499-518 एकड़ अधिग्रहण की घोषणा हुई। बाद में जुलाई में चार गांवों में लगभग 4,944 एकड़ की अधिसूचना भी आई। कुल लक्ष्य 7,481-9,600 एकड़ है। जहाँ तक मुआवजे की बात है तो 2.07 करोड़ से 2.55 करोड़ प्रति एकड़ बताया गया (बाद में डीके शिवकुमार ने 3 करोड़ या अधिक का ऑफर भी दिया) साथ ही नकद या विकसित भूमि का 45-50% हिस्सा देने की बात है और पेड़ों के लिए अलग मुआवजा (नारियल ₹25,000, आम ₹45,000, अरेकनट ₹6,000)। अधिग्रहण से विकास तक सालाना 25 -50 हजार तक सहायता राशि देने का भी वादा है।

सरकार का दावा है कि कुछ किसानों को मुआवजा दे दिया गया है, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं है, और सरकार का ये भी कहना है कि 70-80% भूस्वामी सहमत हैं, जबकि विरोध करने वाले किसान कह रहे हैं कि 80% सहमति का नियम नहीं पूरा हुआ। एक और बड़ा सवाल डीपीआर को लेकर है जून 2026 में जीबीडीए ने मास्टर प्लान और DPR तैयार करने के लिए ₹26 करोड़ का टेंडर जारी किया। यानी अधिग्रहण शुरू होने के बावजूद विस्तृत परियोजना रिपोर्ट और मास्टर प्लान अभी तैयार नहीं था । विरोध कर रहे किसान कह रहे हैं, भूमि पहले ले ली जा रही है, योजना बाद में।

इस पूरी परियोजना को लेकर बिदादी के 25 गांव के किसानों में भारी गुस्सा और निराशा है, प्रभावित होने वाले पांच हजार से ज्यादा भूमालिक और दो हजार से ज्यादा भूमिहीन किसान जगह-जगह इसका विरोध कर रह हैं जिसमें, रायतरा भूहिता रक्षण संघ, कर्नाटक प्रांत रायत संघ,संयुक्त होराटा कर्नाटक, विभिन्न ग्राम पंचायत स्तर के समूह, महिला संगठन सहित लगभग 40 किसान समूह शामिल है। बैरमंगला सर्किल पर ही व्यस्त दिनों म भी रोजाना डेढ़ से तीन हजार किसान जुटते हैं और समय मिलन पर पांच हजार स ज्यादा भी। यहाँ बैठने वालों किसानों में 80 साल की पार्वतम्मा और अन्य कई महिलाएं भी होती हैं और आसपास के गांव के मुनियप्पा, गिरियप्पा, कृष्णप्पा, नागराज ,चंद्रशेखर, नागेश, रविंद्र जैसे सैकड़ों किसान भी, ये सभी राज्य सरकार से, मुख्यमंत्री से नाराज हैं, बल्कि सभी राजनीतिक दल और नेताओं से । इसलिए इनके प्रदर्शन स्थल पर विवेकानंद, सिद्धागंगा मठ के स्वामी, केंपेगौड़ा, बालगंगाधर नाथस्वामी, गांधी अंबेडकर, बसवन्ना, एम.डी. नंजुंडास्वामी और कुवेम्पु की तस्वीरें हैं वर्तमान के किसी भी नेता की नहीं। नंजुंडास्वामी की बेटी चिक्की नंजुंडास्वामी भी इस प्रदर्शन में शामिल हैं। हालाँकि किसानों के मुताबिक निखिल कुमारस्वामी और कुमारस्वामी जरूर किसानों के साथ आए, पदयात्राएं कीं, मुलाकातें कीं। लेकिन किसान कहते हैं कि वे मुख्य रूप से अकेले लड़ रहे हैं, बीजेपी के आर अशोक और येदुरप्पा के बेटे विजयेंद्र बस आकर चले गए, किसानों में इस बात पर बहुत नाराजगी है। उन्होंने यह भी बताया कि मार्च 2025 की प्रारंभिक अधिसूचना के बाद से निरंतर विरोध चल रहा है। बैरमंगला सर्कल पर धरना, भूख हड़ताल, सड़क जाम आम हैं। 21-25 सितंबर 2026 को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल और बिदादी-हरोहल्ली रोड ब्लॉक के दौरान 50-60 किसानों (महिलाओं सहित) को हिरासत में लिया गया, फिर छोड़ा गया, लेकिन कई FIR दर्ज हुईं। हाँ विरोध पर सरकार नई इस प्रोजेक्ट की समीक्षा के लिए एक हाई-लेवल कमिटी बनाई है, जिसके अध्यक्ष हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस गुहानथन नरेंद्रन है। लेकिन विरोध कर रहे हैं किसानों और गांव के लोगों ने बताया कि कमेटी के लोग आते हैं और देख कर चले जाते हैं किसी ने भी औपचारिक के अलावा गहन तरीके से बातचीत करने की कोशिश नहीं की है अब तक।

क्या सरकार ने इस परियोजना के बारे में और मुआवजा या स्कीम के बारे में जानकारी दी इस बारे में प्रदर्शनकारी किसान नागेश कहते हैं कोई जानकारी नहीं दी गई। 7 हजार एकड़ जमीन अधिगृहित कर लेने और और 1800 करोड़ मुआवजा बांटने के सरकार के दावे भी झूठे हैं, 80 -85 प्रतिशत किसान विरोध में हैं। यहाँ बैठने वाले सभी किसानों में से 200 से ज्यादा किसानों पर मुकदमे हैं, विरोध पर बैठे नागराजू और नागेश के खिलाफ भी चार से पाँच केस है। किसानों का यहाँ तक कहना है कि राहुल गाँधी अंडमान में पेड़ों को बचाने चले जाते हैं लेकिन अपने ही राज्य सरकार में काटे जा रह लाखों पेड़ों की उन्हें थोड़ी भी चिंता नहीं होती है। किसानों ने निराश होकर बताया कि उन्होंने राहुल गांधी को भी चिट्ठी लिखी है और मोदी को भी, लेकिन किसी की भी कोई प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई है। जबकि 5,000 किसानों की जमीन और 17,000 से ज्यादा आबादी इस प्रभावित हो रही है। उनका यह भी सवाल है कि सरकार के पास पहले से लैंड बैंक में लाखों एकड़ जमीन है, KIADB के पास कई औद्योगिक क्षेत्र हैं, बेंगलुरु के आसपास हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहित की जा चुकी है या प्रक्रिया में है। सरकार फिर उपजाऊ जमीन क्यों ले रही है, इसकी स्पष्टता नहीं है।

मंडलाहल्ली गांव के नागराजू और उनकी पत्नी भाग्या भी उन्हीं किसानों में से एक हैं जिनकी 12 एकड़ जमीन पुरे गांव की जमीन के साथ इस परियोजना में जाने वाली है और दोनों किसी भी कीमत पर अपनी जमीन और गांव छोड़कर कहीं जाने को तैयार नहीं हैं। नागराजू भी रोज प्रोटेस्ट में बैठते हैं और कहते हैं रोज उनके साथ बैरमंगला सर्कल पर डेढ़ से तीन हजार किसान बैठते हैं और उनमें से किसी को भी अपनी जमीन नहीं देनी है चाहे सरकार कोई भी कीमत दें। भाग्या कहती हैं, हमारे बच्चे बंगलौर, मैसूर या हासन में पढ़ते हैं लेकिन वो वापस अपने गांव में ही लौटना चाहते हैं, हमें उन्हें उनका गांव सौंपना है। उनके गांव में केवल सात घर हैं जो परियोजना के पक्ष में हैं। नागराजू के पास अल्फांसों, रसपुरी, बादामी 200 आम के पेड़ हैं,20 कटहल पेड़, नारियल के 150 पेड़ हैं और अरेकानट के हजार पेड़ हैं, इन सभी से इनकी सालाना वार्षिक आय 12 लाख के लगभग हो जाती है।

मारेगौडन दोड्डी गांव में कुल 48 घर हैं जिसमें केवल 1 घर इस परियोजना के पक्ष में हैं यहीं के थिम्मेगौड़ा कहते हैं बाकी सभी किसान, सरकार के पीछे हटने तक अपना विरोध जारी रखेंगे। मनगनहल्ली गांव के कुल 90 घर में 4 -5 किसानों ने सहमति दी है, इसी गांव के मुनिराजू के पास 8 एकड़ जमीन है, उन्होंने अपनी मर्जी से नौकरी के बदले किसानी चुनी है और सरकार के किसी भी ऑफर में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं। वो कहते हैं पास में ही में 4 -5 किमी पर टोयोटा का प्लांट है जिसमें 5 गांव की जमीन गई, बदले में गांव के लोगों को सिक्युरिटी गार्ड, माली, सफाई कर्मचारी की नौकरी मिली। हाउसिंग प्लॉट और जमीन के बदले मिलने वाले पैसे में भी किसी की कोई रूचि नहीं है। पैसा ख़त्म हो जाता है। इसके अलावा प्रति एकड़ 2 या 2 .5 करोड़ जो पैसे मिल रहे हैं वो भी काफी नहीं हैं मुनिराजू बताते हैं अगर यहाँ से 50 किमी आगे हम एक एकड़ जमीन खरीदना चाहें तो उसकी कीमत 4 -5 करोड़ तक है।
नागप्पा और श्रीनिवास अरालालुसंद्रा गांव से आते हैं जबकि प्रसन्ना बन्निगेरे गांव से अरालालुसंद्रा में कुल 150 घर हैं जिसमें 10 प्रतिशत को छोड़कर सभी विरोध में हैं, नागप्पा और श्रीनिवास दोनों पढ़े -लिखे हैं और 6 -8 एकड़ जमीन पर अरेकानट, नारियल की खेती करते हैं, महीने का अस्सी से एक लाख तक आराम से कमाते हैं। आखिर क्यों हम अपना काम छोड़कर किसी आईटी कंपनी या कॉर्पोरेट की नौकरी करें? जबकि यही 25 -26 गांव सालाना 30-40 करोड़ सिल्क उत्पादन से अर्जित करते हैं और सैकड़ों लोगों को रोजगार देते हैं।एक और गौर करने वाली बात ये भी है कि इन 25 गांवों की लगभग 95 फीसदी से ज्यादा महिलायें इस परियोजना के विरोध में हैं और उसका कारण उनकी अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता है जो डेयरी और सिल्क फार्मिंग से उन्हें हासिल है, किसी भी कीमत पर महिलाएं इसे खोना नहीं चाहती हैं।

बैरमंगला सर्कल के पास केम्पाशेट्टीडोड्डी गाँव में लगभग 250 घर हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, इनमें से केवल 10 घर ऐसे हैं जो प्रस्तावित इंटीग्रेटेड सिटी परियोजना का समर्थन करते हैं, जबकि बाकी 240 घर इसके विरोध में हैं। विरोध करने वाले ग्रामीण रोज़ सर्किल पर एकत्रित होकर धरना देते हैं। इस आंदोलन में महिलाएँ भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं। गांव स्थित कर्नाटक को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स फेडरेशन लिमिटेड (KMF) द्वारा संचालित मिल्क कलेक्शन सेंटर पर कई महिलाएँ और किसान दूध जमा करने आये थे। उनसे बातचीत में पता चला कि खेती और पशुपालन उनके लिए केवल पारंपरिक काम नहीं, बल्कि आजीविका का मजबूत साधन है। इसी गांव की जयलक्ष्म्मा के पास एक एकड़ ज़मीन और तीन गाय है वो तीस हजार तक कमा लेती हैं। शिवकुमार के पास तीन एकड़ ज़मीन है। वे गाय पालने के साथ-साथ रेशम उत्पादन से भी जुड़े हैं। दोनों काम से मिलाकर उनकी मासिक कमाई लगभग 75,000 रुपये तक पहुँच जाती है। इसी तरह शोभा के पास आधा एकड़ ज़मीन है और प्रेमा, कुमार और सुधा जैसे कुछ लोगों के पास अपनी ज़मीन नहीं है, लेकिन वे पट्टे पर ज़मीन लेकर या दूसरे तरीकों से पशुपालन और रेशम उत्पादन का काम करते हैं और अपने दम पर महीने में लगभग 20,000 से 30,000 रुपये तक कमा लेते हैं। कलेक्शन सेंटर के प्रभारी पुरुषोत्तम ने बताया कि यहाँ प्रतिदिन लगभग 10 -15 हजार लीटर दूध एकत्र किया जाता है। और KMF से जुड़े किसान किसी भी कीमत पर ये जगह नहीं देने वाले हैं।

आईटी कंपनी में काम करने वाले गांव के कार्तिक जैसे युवा भी जो दूध जमा करने कलेक्शन सेंटर आए थे, इस इंटीग्रेटेड सिटी परियोजना के पक्ष में नहीं हैं, किसानों के आंदोलन के साथ खड़े हैं। उन्होंने बताया युवा पीढ़ी पर्यावरण के मसलों पर बहुत गंभीर रुख रखती है। वहीँ शास्त्री जी के पास 4 एकड़ जमीन और चार-पाँच गायें हैं। उन्होंने बताया कि सरकार उनकी ज़मीन के बदले प्रति एकड़ डेढ़ करोड़ रुपये देने की बात कर रही है, लेकिन उन्हें यह पैसा नहीं चाहिए, उनका बेटा बेंगलुरु में रहता है और चाहता है कि ज़मीन दे दी जाए, लेकिन शास्त्री जी इसके पक्ष में नहीं हैं। उनका तर्क है कि ज़मीन के बदले मिला पैसा एक दिन खर्च हो जाएगा, जबकि ज़मीन लंबे समय तक परिवार का सहारा बनी रह सकती है।
केम्पाशेट्टीडोड्डी में ही डेढ़ एकड़ ज़मीन के मालिक मंजुनाथ बताते हैं, गाँव में अधिकतर किसान छोटे और सीमांत हैं। दस एकड़ से अधिक ज़मीन केवल तीन-चार लोगों के पास है। कई ग्रामीण भूमिहीन हैं, लेकिन वे भी दूसरों की ज़मीन की घास , पट्टे पर ज़मीन लेकर पशुपालन और रेशम उत्पादन के ज़रिए अपनी आजीविका चलाते हैं। उनके लिए ज़मीन का मालिक होना ही कमाई का एकमात्र रास्ता नहीं है; ज़मीन और उससे जुड़े संसाधनों तक पहुँच भी उन्हें सम्मानजनक आमदनी का अवसर देती है।

एक दूसरे किसान मंजुनाथ के पास केवल 15 गुंटा ज़मीन है, फिर भी वे पाँच गायें पालते हैं। उनके मुताबिक, वे पंद्रह दिनों में लगभग 15,000 रुपये तक कमा लेते हैं। वहीं 76 वर्षीय दासप्पा के पास चार एकड़ ज़मीन है। वे आज भी खेती के ज़रिए महीने में लगभग 30,000 से 40,000 रुपये तक कमा लेते हैं। उनका कहना है कि जब वे खुद मेहनत करके अपनी आजीविका चला सकते हैं, तो उन्हें सरकार से पेंशन की ज़रूरत क्यों होनी चाहिए? मंजुनाथ बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं। वे सवाल उठाते हैं कि उनके जैसे ग्रामीण, जिनकी औपचारिक शिक्षा सीमित है, परियोजना के तहत ज़मीन खोने के बाद किस तरह की नौकरी कर पाएँगे। उनके मुताबिक, गाँव और आसपास के इलाकों में 2,000 से अधिक ऐसे महिला-पुरुष हैं जिनके पास अपनी ज़मीन नहीं है, फिर भी वे डेयरी और रेशम उत्पादन के सहारे ठीक-ठाक आमदनी कर रहे हैं। ऐसे में ज़मीन और उससे जुड़े रोज़गार के साधन छिन जाने का असर केवल ज़मीन के मालिकों पर नहीं, बल्कि भूमिहीन ग्रामीणों पर भी पड़ेगा।

मंजुनाथ एक पुराना उदाहरण भी देते हैं। उनके मुताबिक, लगभग दस साल पहले इसी गाँव के कुछ लोगों ने एग्रीगोल्ड कंपनी को चार से छह लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से ज़मीन बेची थी। बाद में उनमें से कुछ लोगों को ड्राइवर या सफाईकर्मी के रूप में काम करना पड़ा। इसके अलावा बिदादी इंडस्ट्रियल एरिया और हरोहल्ली इंडस्ट्रियल एरिया के लिया जिन किसानों की जमीन गई उनकी भी दुर्दशा का उदाहरण सभी के सामने है। स्पष्ट है ज़मीन के बदले मिलने वाला एकमुश्त मुआवज़ा उनके लंबे समय के रोज़गार और आर्थिक सुरक्षा की भरपाई नहीं कर सकता है। इसलिए ग्रामीणों की चिंताओं के केंद्र में मुआवज़े की रकम नहीं बल्कि ज़मीन खेती, पशुपालन, रेशम उत्पादन और उससे जुड़े कई छोटे-बड़े रोज़गार के ख़त्म होने का डर है। उनका सवाल है कि अगर ज़मीन चली गई, तो क्या वे आज की तरह अपने परिवार का खर्च चला पाएंगे और आर्थिक रूप से स्वतंत्र बने रहेंगे? इसलिए मंजुनाथ खुद पूरे गाँव के साथ इंटीग्रेटेड सिटी परियोजना का विरोध कर रहे हैं। लेकिन विरोध करने पर ग्रामीणों के खिलाफ 200 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। मंजुनाथ के मुताबिक, उनके खिलाफ भी चार मामले दर्ज हैं।

इस बारे में और जानकारी देते हुए किसान आंदोलन के नागराजू ने बताया 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी के शासन में पांच सैटेलाइट टाउनशिप का प्रस्ताव आया था, जिसमें बिदादी प्रमुख था। डीएलएफ को पीपीपी मॉडल में शामिल किया गया, लेकिन 2008-09 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद कंपनी पीछे हट गई और परियोजना ठप हो गई। भूमि पर “रेड जोन” लगा दिया गया, जिससे किसानों के भूमि बेचने या विकसित करने पर प्रतिबंध लग गया। कई सालों तक यह रुकी रही। 2023 में शहरी विकास विभाग के प्रभारी डीके शिवकुमार (तब डिप्टी सीएम, सिद्धारमैया सरकार) ने इसे पुनर्जीवित किया। फरवरी 2025 में कैबिनेट ने मंजूरी दी, मार्च 2025 में प्रारंभिक अधिग्रहण अधिसूचना जारी हुई। जून 2026 में अंतिम अधिसूचनाएं शुरू हुईं। किसानों का कहना है कि सिद्धारमैया सरकार ने इसे नहीं छुआ, लेकिन डीके शिवकुमार (जो कनकपुरा से विधायक हैं, बिदादी से करीब 25 किमी) ने इसे आगे बढ़ाया। शिवकुमार का क्षेत्र बेंगलुरु साउथ है और वे इसे अपना फ्लैगशिप प्रोजेक्ट मानते हैं। लकिन अपन विधानसभा के किसानों की जमीन को बचाकर। कई किसानों ने बताया कि मुख्यमंत्री ने अपने विधानसभा के किसानों को कहा ज़मीन सोना है मत बेचना।

इस परियोजना पर कई सवाल हैं, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और बंगलुरु क आसपास ही उद्योगों का केंद्रीकरण लकिन क्या सरकार योजना वापस लेगी? शिवकुमार ने स्पष्ट कहा है कि जबरन अधिग्रहण नहीं होगा और केवल इच्छुक किसानों से जमीन ली जाएगी। पर पहले की अधिसूचित जमीन डिनोटिफाई करने से इनकार किया है । समिति की रिपोर्ट के आधार पर संशोधन संभव है, लेकिन पूर्ण वापसी की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं। जबकि किसान पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे हैं 80 फीसदी स ज्यादा किसानों को अपनी जमीन देनी ही नहीं है और सरकार भी अगर पीछे नहीं हटी तो आने वाले दिनों में प्रतिरोध गहरा सकता है।

इस रिपोर्ट का एक छोटा हिस्सा दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है।

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