शिवम अवस्थी की कविताएँ

1.तुम बताओ…

मौन के इन मोतियों में, गूँजते हैं साज़ कितने?

इन झुकी सी पलकों के, अक्स में परवाज़ कितने?

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

क्या किसी के अक्स ने, मन के मुकुर  को है निहारा?

क्या किसी को भोर के, तारों ने छुपकर है पुकारा?

क्या किसी की आहटों पर, धड़कनें नव-छंद रचतीं?

क्या किसी के वास्ते, आँखें तुम्हारी रात जगतीं?

सर्द सी इन धड़कनों में, तप रहे हैं राज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

क्या वह मेरे अश्क सा है, या कोई मुसकान सा है?

मेरी ही धड़कन का हिस्सा, या कोई अनजान सा है?

राजकुँवर वो कौन है, जो नींद की चोरी करे है,

किसके ख़ातिर ये कुँआरी, आँख रतजग से भरी है?

उस छलिये की प्रीत में, तुम भूल बैठी काज कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

क्या तुम्हारी चूड़ियों की, खनक में वो नाम सा है?

क्या तुम्हारे होंठ पर, वो अनकहे पयाम  सा है?

मुस्कुरा कर आज अपने, होंठों की गिरहें तो खोलो,

मौन का श्रृंगार तज कर, आज कुछ तो सच तुम बोलो!

देखती हो तुम मुझी में, खुद के ही अंदाज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

मैं यथार्थ की ज़मीं पर, नेह का बादल बना हूँ,

तुम जो कह दो तो मैं समझूँ, मैं ही वो राजकुँवर हूँ!

तुम मेरी इन धड़कनों की, आज बस आवाज़ सुन लो,

कल्पना का मोह तजकर, सत्य का आकाश चुन लो।

टूट कर फिर जुड़ रहे हैं, आज दिल के साज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!

2.ज़िन्दगी में स्वप्न कितने  

चाँदनी की पालकी में, अक्स किसका आ रहा है?

मौन की इन वादियों में, गीत कोई गा रहा है?

इन चुराती सी निगाहों, में छुपे हैं नाज़ कितने?

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िन्दगी में स्वप्न कितने!

क्या हथेली की लकीरें, अब नया कुछ बाँचती हैं?

क्या तुम्हारी उँगलियाँ भी, अब किसी को जाँचती हैं?

आईने से छुप-छुपाकर, तुम सँवारो रूप अपना,

क्या किसी के वास्ते ही, अब बुना है कोई सपना?

इस गुलाबी सी हया में, आज हैं अंदाज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िन्दगी में स्वप्न कितने!

क्या घटाओं से तुम्हारी, हो रही है गुफ़्तगू अब?

क्या किसी की धड़कनों की, जग रही है आरज़ू अब?

क्या किसी के नाम की, मेहँदी रचाना चाहती हो?

या किसी के गीत को, अपना बनाना चाहती हो?

भीगती सी बारिशों में, धुल रहे एतराज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िन्दगी में स्वप्न कितने!

मैं तुम्हारी हर उदासी, का मुकम्मल गीत हूँ बस,

तुम अगर जो हार जाओ, तो तुम्हारी जीत हूँ बस।

भोर की पहली किरन सी, आज मेरे पास आओ,

स्वप्न की इस कश्मकश से, सच की दुनिया में समाओ।

इस किनारे से नदी तक, तर रहे परवाज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िन्दगी में स्वप्न कितने!

 3.मुस्कुराना चाहती हो

छोड़कर सब आँसुओं को, मुस्कुराना चाहती हो,

क्या नयन को मूँदकर तुम, जग भुलाना चाहती हो।

धड़कनों में गूँजते हैं, गीत के यह साज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िन्दगी में स्वप्न कितने!

 

कौन है वह अजनबी जो, नींद तेरी ले उड़ा है,

रूप जिसका मन-नगर में, देवता सा आ बसा है।

प्यार के इन बादलों में, उड़ रहे परवाज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िन्दगी में स्वप्न कितने!

डायरी में नाम लिखकर, काटती हो तुम जिसे अब,

मौन रहकर पीर उसकी, बाँटती हो तुम जिसे अब।

मौन की इन धड़कनों में, सर्द से यह राज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िन्दगी में स्वप्न कितने!

आज मैं भी प्रेम पथ पर, मीत बनकर आ खड़ा हूँ,

सत्य की इस धूप में मैं, छाँव बनकर आ खड़ा हूँ।

आज मुझको सौंप दो तुम, कल्पना के नाज़ कितने,

तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िन्दगी में स्वप्न कितने!

 

4.ज़िन्दगी का बोझ

रोज़ अपनी ख़्वाहिशों का, हम गला खुद घोंटते हैं,

आईने के सामने आ, आँसुओं को पोंछते हैं।

उम्र के इस मोड़ पर आ, हौसले भी अब थके हैं,

क्या बताएँ ज़िन्दगी के, बोझ के नीचे दबे हैं!

रौशनी की आरज़ू में, हम अँधेरों से लड़े हैं,

मंज़िलें तो दूर हैं अब, रास्तों में ही खड़े हैं।

ज़िन्दगी की कश्मकश में, हम अधूरे से बचे हैं,

क्या बताएँ ज़िन्दगी के, बोझ के नीचे दबे हैं!

ख़्वाब सारे मोम बनकर, आज भट्टी में जले हैं,

चाहतों के जो महल थे, टूट कर अब गिर चुके हैं।

हर कदम पर उलझनों के, जाल ऐसे यह बिछे हैं,

क्या बताएँ ज़िन्दगी के, बोझ के नीचे दबे हैं!

 5.ज़िंदगी के प्रश्न

आँखों में जो तैरते हैं, अश्क हैं या मोतियाँ हैं?

हसरतों की जो जली हैं, राख हैं या बत्तियाँ हैं?

इस भरम के आईने में, आज छुपते अक्स कितने,

चाहतों की इस जुबां पर, आ रहे हैं लफ्ज़ कितने!

तुम बताओ, हैं तुम्हारी ज़िंदगी में स्वप्न कितने?

तुमने अब तक जी लिए हैं, ज़िंदगी के रंग कितने?

धूप की इन वादियों में, छाँव की तलाश क्या है?

रेत के इस आशियाने, में बची अब आस क्या है?

वक्त की इस आग में पल, जल चुके हैं आज कितने,

टूट कर भी जुड़ रहे हैं, ज़िंदगी के साज़ कितने!

आज तक ये कौन समझा, किस डगर पर नाव कितनी,

कौन गिन पाया है आखिर, धूप में भी छाँव कितनी?

उम्र बीती है कहाँ तक, और बाकी राह कितनी?

रोज़ ही तो टूटते हैं, आसमाँ से ये सितारे,

ज़िंदगी की कश्मकश में, हम खड़े हैं आज हारे।

ये अधूरी सी दुआएँ, लौट कर जब आ रही हैं,

धड़कनों की आहटें भी, अब हमें घबरा रही हैं।

इस छलावे के नगर में, आज सच के भेष कितने,

तुम बताओ, दिल में अब भी, आस कितनी शेष है?

आदमी के पास आखिर, साँस कितनी शेष है?

 

हाथ की मुट्ठी से ये पल, रेत सा फिसल जाएगा,

वक्त का ये कारवाँ कल, एक नया रुख मोड़ लेगा।

नींद की इन वादियों में, बेबसी सी सो चुकी है,

हम खड़े हैं उस दोराहे, जहाँ मंज़िल खो चुकी है।

रात के गहरे तिमिर में, रोशनी जब खो गई हो,

कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

ज़िंदगी है या कि केवल, प्रश्न बनकर रह गई हो?

 6.धूप और छाँव

चल पड़े जो इस सफ़र में, पाँव के छाले न गिनना,

मंज़िलों की इस डगर पर, फासलों के जाल बुनना।

ज़िंदगी तो एक पहेली, हर कदम पर उलझी-उलझी,

डूबती कश्ती के हिस्से, आ रही है नाव कितनी!

कौन गिन पाया है आखिर, धूप में भी छाँव कितनी?

उम्र बीती है कहाँ तक, और बाकी राह कितनी?

हम चले थे आसमां के, चाँद तारों को चुराने,

वक्त की इन साज़िशों के, अनकहे से तीर खाने।

मंज़िलों ने भी हमारे, साथ कैसा छल किया है,

इस अधूरे कारवाँ में, रह गई फ़रियाद कितनी!

कौन गिन पाया है आखिर, धूप में भी छाँव कितनी?

उम्र बीती है कहाँ तक, और बाकी राह कितनी?

हमसफ़र जो साथ थे कल, आज वो अनजान से हैं,

भीड़ के इस शहर में हम, किस कदर हैरान से हैं।

छूटते हाथों ने हमको, अश्क के उपहार बख्शे,

इन हथेली की लकीरों, में बची है याद कितनी!

कौन गिन पाया है आखिर, धूप में भी छाँव कितनी?

उम्र बीती है कहाँ तक, और बाकी राह कितनी?

रोशनी की खोज में हम, मोम से जलते रहे हैं,

शूल की इन वादियों में, मुस्कुरा चलते रहे हैं।

आँधियों के इस शहर में, हौसला बाक़ी बहुत है,

देखना है इन परों में, रह गई परवाज़ कितनी!

कौन गिन पाया है आखिर, धूप में भी छाँव कितनी?

उम्र बीती है कहाँ तक, और बाकी राह कितनी?

 

6.साँस कितनी शेष है

टूटते हैं रोज़ तारे, आसमाँ के आँगनों में,

और कितने घाव गहरे, छुप रहे हैं इस बदन में।

जो अधूरी रह गई हैं, वो दुआएँ चीख़ती हैं,

वक्त की इस पाठशाला में, निगाहेँ सीखती हैं।

इस छलावे के नगर में, आज सच के भेष कितने!

तुम बताओ, दिल में अब भी, आस कितनी शेष है?

आदमी के पास आखिर, साँस कितनी शेष है?

जिन ख़यालों की पकड़ कर, उँगलियाँ हम चल रहे थे,

ख़्वाब के कच्चे घरों में, हम अकेले पल रहे थे।

टूट कर बिखरे हैं वादे, रह गए आधे इरादे,

लुट गई है हर तमन्ना, हम न जाने कब थे सादे।

इन अधूरी चाहतों के, आ रहे संदेश कितने!

तुम बताओ, दिल में अब भी, आस कितनी शेष है?

आदमी के पास आखिर, साँस कितनी शेष है?

अजनबी से हो गए हैं, जो कभी अपने बहुत थे,

वो फरिश्ते आज गुम हैं, जो कभी सपने बहुत थे।

आईनों ने भी हमारी, शक्ल पहचानी नहीं है,

आँसुओं की इस नदी में, अब बचा पानी नहीं है।

दर्द के इस दरमियाँ अब, पल रहे हैं क्लेश कितने!

तुम बताओ, दिल में अब भी, आस कितनी शेष है?

आदमी के पास आखिर, साँस कितनी शेष है?

धूप की ढलती रवानी, छाँव को अब ढूँढती है,

बर्फ सी ठंडी ये रातें, ताप को अब ढूँढती हैं।

फिसलती ही जा रही है, उम्र की ये कच्ची डोरी,

हो रही है साँसों की भी, हर कदम पर जैसे चोरी।

इस किनारे बैठ कर हम, गिन रहे अवशेष कितने!

तुम बताओ, दिल में अब भी, आस कितनी शेष है?

आदमी के पास आखिर, साँस कितनी शेष है?

 

8.समय का प्रश्न

आज जो मुट्ठी में है पल, कल रेत सा फिसल जाएगा,

ये मुकद्दर का सितारा, कल दिशा बदल जाएगा।

हम खड़े हैं उस दोराहे, जहाँ मंज़िल खो चुकी है,

बंद आँखों की पलक पर, बेबसी सी सो चुकी है।

रात के गहरे तिमिर में, सुबह शायद सो गई हो!

कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

ज़िंदगी है या कि केवल, प्रश्न बनकर रह गई हो?

जिन हवाओं ने हमारे, कान में वादे बुने थे,

और हमने जो मुहब्बत, के हसीं किस्से सुने थे।

आज उन यादों की खुशबू, आँसुओं में घुल गई है,

साँस की डोरी अचानक, आंधियों में खुल गई है।

याद की वो नाव शायद, भँवरों में ही खो गई हो!

कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

ज़िंदगी है या कि केवल, प्रश्न बनकर रह गई हो?

जिन उम्मीदों के सहारे, उम्र का दरिया किया पार,

क्या मिला इस ज़िंदगी में, क्या रही है जीत या हार।

ढूँढते हैं हम जिन्हें अब, वो सितारे बुझ चुके हैं,

हसरतों के जाल में हम, किस कदर अब उलझ चुके हैं।

शूल की इस सेज पर अब, नींद अपनी रो गई हो!

कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

ज़िंदगी है या कि केवल, प्रश्न बनकर रह गई हो?

राख को मुट्ठी में लेकर, आग को हम ढूँढते हैं,

फासलों के शहर में हम, पास को हम ढूँढते हैं।

टूटती सी साँस को अब, कौन सी मंज़िल मिलेगी,

क्या पता इस पतझड़ों में, कौन सी कलियाँ खिलेंगी।

अश्क की इस धार में ही, हर हँसी क्या धो गई हो!

कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

ज़िंदगी है या कि केवल, प्रश्न बनकर रह गई हो?

 9.वक्त की शतरंज

वक्त की शतरंज पर, बाज़ी पलटते देर कितनी?

मुट्ठियों से रेत को, यूँ ही फिसलते देर कितनी?

आज जो हँसता हुआ, यह कारवाँ सा लग रहा है,

कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो!

कल तलक जो ताज पहने, चाँद तक उड़ने चले थे,

ख़्वाब के कच्चे घरों को, जो सदा बुनने चले थे।

वक्त की आंधी उठी तो, बुझ गए वो भी चराग़ अब,

राख की उस ढेरी में, वो हस्ती शायद सो गई हो!

कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

जिनकी आँखों में हमारे, ख़्वाब पलते थे कभी तो,

हाथ हाथों में लिए जो, साथ चलते थे कभी तो।

आज उनके रास्ते भी, अजनबी से हो गए हैं,

उम्र भर की वो वफ़ा भी, भीड़ में जब खो गई हो!

कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

साँस की इस डोर पर, इतरा रहा है आदमी जो,

रेत के इस महल को ही, सच समझता आदमी जो।

एक झटके में ही सब कुछ, राख हो जाएगा पल में,

अश्क की उस धार में, हर मुस्कुराहट धो गई हो!

कौन जाने कल समय की, चाल कैसी हो गई हो?

 10.कमी का अहसास

वक्त की इस तेज़ धूप में, क्या छाँव बन कर ढल सकेगी?

क्या कभी मेरी कमी भी, तुमको थोड़ी खल सकेगी?

जैसे सूने देवघर में, दीप की बाती जले है,

जैसे पतझर की रुतों में, फूल की छाती जले है।

क्या तुम्हारी बर्फ-सी ज़िद, आँच पा पिघल सकेगी?

क्या कभी मेरी कमी भी, तुमको थोड़ी खल सकेगी?

डायरी के बीच रक्खी, सूखती सी पाँख (पंख) जैसी,

याद मेरी चुभ रही क्या, आँख में अब फाँस जैसी।

क्या छुपाई सी हँसी वो, होंठ से फिसल सकेगी?

क्या कभी मेरी कमी भी, तुमको थोड़ी खल सकेगी?

रेत पर छूटे हुए उन, अक्स-सी जो मिट गई है,

एक कच्चे धागे जैसी, जो अचानक टूट गई है।

प्यास बन कर क्या वो नदिया, आँख से उबल सकेगी?

क्या कभी मेरी कमी भी, तुमको थोड़ी खल सकेगी?

शिवम अवस्थी
‘सौमनस’