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बोलबू ढेर ?

  शाश्वत उपाध्याय

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययनरत. संपर्क: shashwatupadhyay098@gmail.com

महिला दिवस पर विशेष 

पूर्वांचल के लोगों के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय किसी वरदान या आक्सफोर्ड से कम नहीं है। यहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार के अलावा तमाम राज्यों से और विदेशों से छात्र- छात्राएं उच्च शिक्षा के लिए आते हैं। यूँ तो बीएचयू बहुत सारे भेदभाव को लेकर हमेशा सवालों के कटघरे में रहा है लेकिन ताज़ा मामला लड़कियों के लिए रात को लाइब्रेरी जाने को लेकर है। इन लड़कियों की मांग है कि होस्टल को रात के सात बजे के बाद भी खोला जाए ताकि वे लाइब्रेरी जा सकें। सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग डीयू मामले में गुरमोहर कौर के पक्ष में खड़ा हुआ लेकिन क्या आपको पता है इस जायज मांग को लेकर आंदोलन कर रही लड़कियों को भी बलात्कार और जान से मारने की धमकी दी गई। जितना जरूरी गुरमोहर के पक्ष में खड़ा होना है उतना ही जरूरी है कि इन लड़कियों के साथ भी खड़ा हुआ जाए। सस्पेंड कर दिए जाने के डर के बावज़ूद ये लड़कियां जिस तरह से खड़ी हैं उससे एक बात तो साफ़ है कि इन लड़कियों ने गंगा पट्टी की पितृसत्तात्मक दीवार में छेद तो कर ही दिया है अब बस उसका गिरना बाकी है। कविता के माध्यम से इन लड़कियों के हौसले को मेरी और से एक सलाम।

एक तस्वीर में कैप्शन है ” बोलबू ढेर ?” इसे लगाने का मकसद सिर्फ इतना है कि लड़कियों को लेकर पूर्वांचल की अधिकांश मानसिकता यही है। अगर लड़की कहीं भी किसी भी रूप में अपनी आवाज़ अपने हक़ के लिए उठा रही है तो उसे धमकी स्वरूप यह बोलकर चुप करा देना कि “बोलबू ढेर” यह सिर्फ शब्द नहीं है यह अपने आपमें एक धमकी है कि चुप रहो वरना हम अपने तरीके से चुप कराएँगे। आज जबकि महिला दिवस है तब हमें अपने पूरे सिस्टम पर एक बार पलट कर सोचने की जरूरी है कि आखिर महिलाओं के लिए एक जरूरी और सम्मानजनक माहौल तैयार करने में हम सफल हो पाये हैं या अभी बाकी है।

शाश्वत

पिंजरे के विरुद्ध 

जादू जानते हैं?
वही हो रहा है यहाँ !
देखेंगे …. बे टिकट है .
आइये ,
‘बाएं चलियेगा’
सौ कदम बाद एक पिंजरा दिखेगा….
बाहर से ही दिखेगा .
पिंजरा क्या है सेट है जादूगर का .
नही नही हम जादूगर का नाम नही लेंगे .
कहीं हमको खरगोश बना दिया तो टोपी में डाल के….
तो पता है क्या हुआ ,
तीन चार बेहूदे बेलगाम जानवर हैं वो करतब नही दिखा रहे थे अड़े हुये थे पेट भर खाने के लिये
मछली मांस खाने का मन है उनका…..
और कल जब जानवर पिंजरे की जंजीरों में दौड़ रहे करेंट की बात कर रहे थे
तो जादूगर और उनके टोपी ,छड़ी , नाक , सूट ,जैकेट , सेट को झटका लगने लगा ।
झटका तो मतलब अभी लगना शुरू ही हुआ है वैसे ।
तो अब उनके चरणकमल के रज (कण) लगे हुए  हैं मामला सम्भालने में ।
पूरा का पूरा सर्कस हो गया है मतलब .
अच्छा,
एक और पिंजरा के रखवाले जी हैं
नही नही मै नाम नही लूंगा ,
कहीं मुझे लड़की बना के पिंजरे में रख लेंगे तो फजीहत हो जायेगी .
एनएसएस  करना पड़ेगा ,
बड़के जादूगर को सलामी देना पड़ेगा
और सबसे बड़ी बात  लड़की होने पर दहेज नही मिलेगा.
मेरे उपधिया जी को तो खुद ही बी. पी. है .
अच्छा एक बात अब ये है ,
सोचियेगा आप,
जानवरों का क्या होगा .
घर बाहर तो नही हो जायेंगे ?
ए भइया ,
देखियेगा आप लोग जरा , बहुत डर लग रहा है ।
वैसे जादू तो शुरू हो गया है .करेंट तो लगेगा अभी .
लेकिन डरवाइये जरा इन लोगों को … बेहुद्दा जानवर हैं डरते ही नही हैं ।
आप लोग सिंग ओंघ दिखाइए . धमकी वगैरह सब देना पड़ेगा न ! कब देंगे ?
डरना बन्द कर देंगे सब तो बड़ा दिक्कत होगा .
गोरख पाण्डेय बोलबे किये थे

“वे डरते हैं
किस चीज़ से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और चुप्प लोग
उनसे डरना
बंद कर देंगे ।”

आप तमाम जादूगरों ,सर्कस करने वालों और जोकरों की धमकी, गाली आदि की पूर्व उम्मीद के साथ 

मेरी बच्ची


मेरी बाहें तुम्हारे डोर से सजकर सुंदर
और
मन समंदर हो गया है ।
मेरी बच्ची ,
मुझे याद है ,
अधपके करौंदे
कि जिसके लिये हर बार मै अपने भाई संग तुमसे बेईमान हो जाता ।

मुझे याद है ,
क्या बेजोड़ डांटा था मैंने
जब कालोनी के किस्सों को चाव दे रही थी तुम ।

मुझे याद है ,
जब उठ रहा था छोटी बुआ का शगुन
तुम नाचते -नाचते धप्प से रुक गई
कि मै किसी काम से अंदर कमरे मे आ गया था ।

मुझे याद है ,
मेरी आँखों भर से….
तुम बाल बांध कर कॉलेज जाती ।
तुम बाइक पर एक तरफ बैठती ।
तुम फोन को हाथ भी नही लगती ।
और ओढ़नी,
ओढ़नी तो जैसे गाय का पगहा !

आह !
न जाने हर रोज की कितनी बातें / डांट
मुझे आज बीरा रहे
सबके लिये सबक हो यह
सबके लिये क्षमा करो मुझे ।

पर मेरी बच्ची
आज डोर बांधते वक्त जिस अदा से हाथ घुमा कर
तुमने स्काउट की न मालूम कौन सी गांठ लगाई है
समझो की मै झूम गया भीतर तक ।

मेरी बच्ची
मुझे सिखाओ मै सीखूंगा
फिर
जोर करूँगा
ऐसी एक गांठ लगाने की सूरज पर
की छन के आये रौशनी तुम तक ।
मेरी बच्ची
मुबारक हो डोरी का त्यौहार
तुम्हारी डोर से…..

आवाज़ और अन्य कविताएं

अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

उसका नाम तेज है 

वह औरत
देखती है
सुनती है
बोलती है
लड़ती है,
अन्याय के विरुद्ध
परवाह नहीं करती
उस समाज की
जो रोकता है उसे
देखने से,
सुनने से,
और बोलने से.
उसने नहीं दिया कभी दगा
नहीं चुराया कभी धन किसी का
नहीं मारी ज़मीन / मकान किसी का
नहीं तोड़ा घर किसी का
उसने छोड़ा तो कभी – कभी
हक़ अपना.
वह खुद्दार है
इसलिए उसका तेज़ है !
और मेरा नाम तेज़ है !!
मेरी पहचान
मेरे माथे पे
बिंदी न देख
कुछ आँखें पूछती हैं
तुम मुसलमान हो ?
पैरों में बिछुए न देख
पूछती हैं
तुम कुंवारी हो ?
पूजा न करते देख
पूछती हैं
तुम आर्य समाजी हो ?
तुम नास्तिक हो ?
मैं धीमे से कहती हूँ
मैं प्रकृति की कृति हूँ
पर उन आँखों में किरकिराहट आ जाती है
और वे अपने जेब में रखे बिल्लों में से
एक बिल्ला मेरे माथे पे चस्पा कर देती हैं
मेरे लिए मुश्किल होता है
उन आँखों को कहना कि
तुम भी सबसे पहले यही हो
बस यही बाकी सब बाद में.
पर शायद वो बना दी गई हैं
पहले ये सब !

ऐ लड़की!

तुम लड़की हो
अपने हाथों को समेटकर चलना सीखो
अभी सीखने हैं तुम्हें,
बहुत से तौर – तरीके.
कल को कुछ हो गया
तो फुसफुसाहट सुनाई देगी –
उसलड़की की इज्ज़त लुट गई !
कुछ जुबानें साफ़ –साफ़ कहेंगी
क्यों पहनती हो छोटे – छोटेकपड़े ?
क्यों निकलती हो टाइम – बेटाइम बाहर
आज का अखबार कह रहा है
तीन साल की लड़की का हुआ
बलात्कार….
फिरहत्या!
आवाज़

बहनों उठो !
तोड़ दो,
गुलामी की जंजीरों को
बाहर आओ
खुली हवा में.
फेफड़े भर कर सांस लो
और उड़ चलो
उस हवा के साथ
जो जाती है उन्मुक्त आकाश में !

भारतेंदु की स्त्री चेतना का स्वरूप, सन्दर्भ: ‘बालाबोधिनी’ पत्रिका

  अरुण कुमार प्रियम

स्वतंत्र लेखन संपर्क : 9560713852 Email. akpriyam@gmail.com

भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक माने जाते हैं ! खड़ी बोली हिंदी को साहित्य के माध्यम के रूप में प्रसारित-प्रचारित करने तथा रचनात्मक स्तर पर इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के लिए भी,उन्हें याद जाना जाता है ! सुविदित है कि 1870 के दशक में उनकी प्रकाशन गतिविधियाँ बहुत तेजी से बढीं और वे उत्तर-पश्चिमी प्रान्तों में महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं वैचारिक शख्सियत के रूप में उभरे ! उनकी दो साहित्यिक पत्रिकाएं-कविवचनसुधा (1868-85) और हरिश्चंद्र मैगज़ीन, जिसका नाम बाद में हरिश्चंद्र चन्द्रिका (1873-85) कर दिया गया, उनके जीवनकाल में ही प्रसिद्धि हासिल कर चुकी थीं ! इनके साथ-साथ 1874से 1877 तक उन्होंने स्त्री केंद्रित  पत्रिका,‘बालाबोधिनी’ भी सम्पादित की थी, जिसका हिंदी की पहली स्त्री-पत्रिका होने के नाते साहित्यिक इतिहास में विशिष्ट महत्व है ! इस पत्रिका की सामग्री, अंतर्वस्तु या ढब-ढांचे को लेकर कहीं कोई विवेचन-विश्लेषण नहीं मिलता और न ही इसकी प्रतियाँ कहीं सुलभ हैं. विभिन स्रोतों से इकठ्ठा किए गए ‘बालाबोधिनी’ के अंको को पुस्तकाकार रूप में लाकर वसुधा डालमियां और संजीव कुमार ने एक महत्वपूर्ण कार्य किया है. इससे हिंदी प्रदेश में नवजागरण के अगुवा भारतेंदु हरिश्चंद्र के स्त्री-दृष्टिकोण को जानने-समझने में मदद मिलती है. साथ ही तत्कालीन ‘स्त्री-उद्धारकों’ द्वारा निर्मित स्त्री के स्वरूप का भी पता चलता है.

स्त्रियों के सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक स्फीयर) में आने और अपने जीवन से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखने से स्त्री उद्धारकों’ के बीच और व्यापक जन-समाज में स्त्री  जीवन से सम्बन्धित बहस ने जन्म लिया. हाँ यह भी सच है कि इस बहस के केंद्र में एक खास वर्ग की स्त्रियाँ ही थीं.


सन् 1874 से सन् 1877 तक ‘बालाबोधिनी’ का सम्पादन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने किया। वसुध डालमिया ने ‘बालाबोधिनी’ के अंकों का संकलन व सम्पादन कर अपने भूमिकानुमा लेख में लिखा है कि ‘‘यह दस पृष्ठों की एक कृशकाय पत्रिका थी,  जिसका पहला अंक जनवरी 1874 में निकला था। इसे तीन साल से थोड़ी ही अधिक आयु मिली। पत्रिका की कितनी प्रतियां छपती थीं, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती, हालांकि यह पता चलता है कि इसकी सौ प्रतियां सरकार खरीदती थी। जैसे ही फरवरी 1877 में यह राज्याश्रय बन्द हुआ, पत्रिका एकबारगी बन्द हो गयी।’’1

‘बालाबोधिनी’ के इस अल्प जीवन के बाद ‘कविवचनसुध’ में बालाबोधिनी का विलय हो गया। लेकिन अपने इस अल्प जीवन में पत्रिका में भारतेन्दु ने स्त्री प्रश्नों को किस प्रकार स्थान दिया, उसका विश्लेषण आवश्यक है।यह पत्रिका सोद्देश्य थी, इसके नाम से ही स्पष्ट है. पत्रिका में स्त्रियों से संबंधित प्रकाशित सामग्री के विश्लेषण और स्वरूप के आधार पर भारतेंदु  के स्त्री -दृष्टिकोण को समझने में मदद मिलती है. क्योंकि यह व्यावसायिक पत्रिका नहीं थी. एक खास तबके को लक्ष्य करके इसका सम्पादन और प्रकाशन शुरू किया गया था. जाहिर है भारतेंदु के मष्तिष्क सम्पादकीय नीति जरूर रही होगी. कुछ बिन्दुओं के आधार पर ‘बालाबोधिनी’और भारतेंदु के स्त्री-विमर्श को समझा सकता है-

स्त्री -शिक्षा


स्त्रियों में चेतना और विवेक पैदा करने के उद्देश्य से प्रकाशित इस पत्रिका में एक स्थान पर स्त्री  शिक्षा को आवश्यक इसलिए माना गया कि यदि स्त्रियां पढ़ लिख जाएंगी तो ठगी का शिकार नहीं होंगी। अन्धविश्वासों  से उबर जाएंगी। तर्क यह दिया जाता है कि जबसे पुरुष पढ़ने लिखने लगे तब से वो ठगे नहीं जाते। एक उदाहरण दृष्टव्य है, जो इन्द्रजाल की कहानी के पर्दाफाश के  रूप में पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। ‘‘जबसे अंग्रेज बहादुर का राज्य हुआ है और पुरुष लोग किमिसरौ इत्यादि विद्या पढ़ने लगे हैं तब से वह प्रायः भूत विद्या वालों से नहीं ठगे जाते पर स्त्रियों से अब तक यह मूर्खता नहीं गयी है इसी से उनको प्रायः धूर्त लोग जो  अपने को शुद्ध तांत्रिक रसायनी और दरसनियां भूत विद्या वाले बतलाते हैं, बहुत ठगा करते हैं और स्त्रियां उनके जाल में आकर सैकड़ों वरन हजारों रुपया खराब करती हैं।’’2

उपर्युक्त उद्धरण  से ज्ञात होता है कि लेखक जिसका लेख में नाम नहीं है, वह स्त्रियों को मूर्ख मानता है। इसीलिए स्त्रियां तमाम तरह के तांत्रिकों द्वारा ठगी जाती हैं। लेखक स्त्री  शिक्षा की हिमायत सिर्फ इसलिए करता है कि स्त्रियां ठगने से बच जाएंगी, यदि वो पुरुषों की तरह शिक्षित होंगी। तांत्रिकों की ठगी.जाल से सचेत होने के लिए पत्रिका में कई तरह के प्रयोग कौतुक के रूप में प्रकाशित किए गए हैं . मसलन-रंगीन फूल सफेद करने की युक्ति, गुप्त अक्षर, नींबू दौड़े, बोतल में अण्डा इत्यादि।

इसके साथ ही ‘बालाबोधिनी’ में ‘सती चरित्रा’ नामक शीर्षक से निरन्तर एक नीति वचन प्रकाशित होता है जिसमें स्त्रियों को पति परायणा होने की सीख दी जाती है। शिव-पार्वती ;सतीद्ध के मिथकीय आख्यान के सहारे स्त्रियों को पति परायणता जो स्त्रियों को वैचारिक धर्मिक रूप से कैद करने की साजिश है, का पाठ पढ़ाया जाता है। ‘सती चरित्र’ में जब पार्वती बिना नियंत्रण के अपने पिता दक्ष के यहां जाती है और उसका अनादर होता है तो आत्म ग्लानि से सती ;पार्वती आत्महत्या कर लेती है। इसी प्रसंग को प्रकाशित करते हुए कहा गया है, ‘‘इस आख्यान से यही शिक्षा है जो पति का वाक्य नहीं मानती वह सती की भांति नष्ट हो जाती है स्त्री  को पति से बढ़कर और किसी का अभिमान नहीं होता इससे विवाह उपरांत की आज्ञा के बिना पिता के घर भी जाना उचित नहीं…. देखो तुम लोग भी इसी शिक्षा के अनुरूप चलो पति की आज्ञा मानो…’’3

इस तरह ज्ञात होता है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘बालाबोधिनी’ महिलाओं को शिक्षा का बोध तो कराना चाहती थी लेकिन यह बोध कैसा होगा, साथ में यह भी बताना नहीं भूलती। पत्रिका के प्रथम पृष्ठ में एक निवेदन छपता है कि, “मैं जो कुछ कहूँगी तुम्हारे हित की कहूँगी”4 और अंत में यह आशा भी प्रकट की जाती है कि “सभी स्त्रियाँ पढ़ लिखकर  पुरुषों की सहभागिनी हो जाएँ.”5 यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तव में निवेदनकार स्त्रियों का भला चाहता है. यह संभव भी है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में निवेदनकार ऐसा निवेदन कर स्त्रियों का भला ही चाहता हो, लेकिन अगले ही पृष्ठ में ‘शीलवती’ शीर्षक कहानी में वह स्त्रियों को एक सीमारेखा के अन्दर रहने की हिदायत देना भी नहीं भूलता है. कहानी में राधावल्लभ महाजन की पत्नी का नाम शीलवती है. लेखक कहता है कि नाम के अनुरूप ही उसके गुण हैं. अपने अछे स्वभाव के कारण उसने सबको अपने वश में कर रखा है.अगर उससे कोई क्रोधित होता है तो वह नम्रतापूर्वक उससे अपने अपराधों की क्षमा मांग लेती है. उसके गुणों का उल्लेख करते हुए कहानी में लिखा गया है कि, “ पड़ोस वालों ने कभी उसकी बोली नहीं सुनी वह अटारी और झरोखों में कभी न बैठती और न मनुष्य से बहुत बोली…. जिस समय उसको घर के कामों से छुट्टी मिलती वह धर्म की पुस्तकों को देखती. सुई का काम वह बहुत अच्छा कर सकती थी, बेल बूटा लगाना, झालर निकालना, सीना पिरोना इत्यादि… पति के सम्मुख नेत्र सदा नीचे रखती और कभी जब पति किसी विषय में कुछ पूछता तो बड़ी सावधानता से अच्छा और हितकारी मंत्र कहती पर यह भी कह देती कि नाथ! मैं क्या जानूं मेरी स्त्री की बुद्धि कितनी”6  शीलवती के लिए इतना आदेश-उपदेश होने के साथ उसके विद्या रूपी गुणों के बारे में बताया गया-“ इसके सिवाय ईश्वर ने विद्या भी उसको दी थी जिससे वह और भी आदर करने योग्य थी. घर के गृहस्थी का सब हिसाब अपने हाथ से लिख पढ़ लेती थी और नैहर वालों को और नाते की स्त्रियों को पत्र भी लिख लिया करती थी.”7

उपर्युक्त दोनों उदाहरण से ज्ञात होता है कि लेखक शीलवती कहानी की पात्र जैसी भारतीय स्त्री  चाहता है। ऐसी स्त्री  जो इतना पढ़ ले कि धार्मिक पुस्तकें पढ़ सके और घरेलू हिसाब कर ले और कुछ चिट्ठी-पत्री लिख सके। हां यह भी कि इसके साथ अपने तयशुदा काम सीना-परोना भी करे।

स्त्री के कर्तव्य और उसका चरित्र कैसा हो

‘बालाबोधिनी’ पत्रिका में स्त्री चरित्र के लिए अधिकांश स्थानों पर मिथकीय और पौराणिक चरित्रों अथवा काल्पनिक पात्रों का सृजन कर उनके जीवन की कहानी को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वैसा चरित्र बनाना हर स्त्री अपना सपना बना ले। पत्रिका में ‘बालाप्रबोध्’ नामक एक पुस्तक की सूचना है जिसमें मंगलाचरण से ज्ञात होता है कि यह काव्य पुस्तक पुरुष ने लिखी है। वह पुरुष अंग्रेज सरकार से प्रार्थना करता है कि यह पुस्तक स्त्रियों की पाठशालाओं में पाठ्यसामग्री के रूप में लगायी जाय। लेखक अपना नाम हीरालाल बताता है जो सिकंदराबाद के  निवासी है। उसका कहना है कि यह पुस्तक संवाद शैली में लिखी गयी है जिसमें सरस्वती वक्ता हैं और सुमति श्रोता है। पहले अध्याय में सरस्वती सुमति से कहती है कि तुम ससुराल जाती हो और मेरी पुत्री के समान हो। मैं तुम्हें दान करना चाहती हूं और ‘‘मेरे विचार में वह वस्तु अविनाशी उत्तम शिक्षा है सो मैं तुम्हें वही दान करती हूं और प्रथम शिक्षा से उत्तम मध्यम कनिष्ठ स्त्रियों के लक्षण और कुलीन स्त्रियों के धर्मों का निरूपण करती हूं।’’8


प्रस्तुत उद्धरण में सरस्वती द्वारा स्त्री  शिक्षा को सर्वोत्तम दान कहा गया है. लेकिन साथ ही वह स्त्रियों का वर्गीकरण करना भी नहीं भूलती। वह कुछ खास गुणों को ‘धारण’ करने के आधार पर स्त्रियों को उत्तम,माध्यम और निम्न श्रेणियों में विभाजित करती है. इस पुस्तक और बालाबोधिनी में इसका समीक्षात्मक परिचय प्रकाशित होने का एकमात्र निष्कर्ष ये है कि हर स्त्री में ‘उत्तम’ बनने की चाह पैदा हो, जो समाज के प्रचलित ढांचे को जस का तस बनाये रखने में सहायक हो. सरस्वती स्त्रियों के लक्षण तय करते हुए कहती है कि ‘‘लज्जा, दया, शील और सत् उत्तम स्त्रियों का लक्षण है।’’9 मध्यम स्त्रियों के बारे में वो कहती है कि ‘‘उनकी प्रीति अपने पुरुष से निर्दोष होती है और जो कुटुंब के संबंधी  हैं उनसे व्यवहारी प्रीति रहती है और लोकलाज करके बताती  है वो भी भली हैं।’’10


कनिष्ठ स्त्रियों के चरित्र के बारे में वो कहती है कि ‘‘एक घर के चार घर कर देने, परिवार के लोगों से प्रीति न करनी और प्रीति करनी तो पड़ोस की छोटी जातों से और पति से भी व्यवहार प्रीति रखनी….. निश्चय जानो कि इनकी प्राप्ति से मृत्यु की प्राप्ति उत्तम है।11



इसी पुस्तक की पात्र सरस्वती एक अध्याय में यह भी निर्धरित करती है कि ‘‘स्त्रियों को निरंतर अपने पति के अनुसार रहना और मन क्रम वचन करके उत्तम सेवा करना उनका धर्म  है और केवल पति की सेवा ही को वे अपना परलोक साधना  जानती हैं।’’12


स्पष्ट है कि पति सेवा को स्त्रियों का धर्म घोषित करके और ऐसा करके स्त्रियों का परलोक सुधरने का काम भी ‘बालाबोधिनी’ ने किया। परलोक का डर दिखाकर स्त्रियों की गतिशीलता को नियंत्रित किया गया और स्त्रियों के ऐसे कर्तव्य निर्धरित करके उन्हें महिमा मंडित किया गया। ऐसा न करने वाली स्त्री का चरित्र भी बता दिया गया। ऐसी स्थिति में कौन स्त्री ‘बदचरित्र’ होने का साहस करेगी।आगे एक उद्धरण  से यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि बिरादरी में आने जाने के क्या नियम निर्धरित किए गए, ‘‘जब कभी किसी बिरादरी के घर से तुम्हारे बुलाने को आवें तो जो पति समीप हो तो प्रथम पति से फिर सास, ससुर जेठ, जिठानी आदि सम्बन्धियों  से आज्ञा मांगों जो वह आज्ञा दें तो कुछ दोष नहीं है जाओ और बिना आज्ञा तो चाहे कैसी ही प्रीत करके तुमको बुलावे और तुमको उनके साथ विशेष प्रीत हो तब नहीं जाना चाहिए।’’13


स्त्रियों के लिए ये नैतिक कर्तव्य निर्धरित करने के पश्चात एक नैतिक आचार संहिता भी प्रस्तुत आलेख में लेखक ने सुझायी है जिससे स्त्रियों के चरित्रा का ‘नैतिक पतन’ न हो। वह लिखता है, ‘‘हंसी ठट्ठे क्रोध् अभिमान निर्लज्ज बातों से वर्जित रहो और अपने भेद की गुप्त बात अथवा घर के दुख-सुख को किसी न कहो कि इसका परिणाम भला नहीं है।’’14

स्पष्ट है कि यहां लेखक निजी और सार्वजनिक को अलग-अलग या गुप्त रखने की बात स्त्रियों को समझाता है। घर के अन्दर स्त्राी के जीवन में कितनी भी पीड़ा, कितना भी अत्याचार, कितना भी दुख, शोषण हो उसे घर और परिवार के निजी दायरे से बाहर कहीं भी अभिव्यक्त नहीं करना है। इस तरह स्त्री की गतिशीलता पर पुरुष का नियंत्रण कायम रहेगा। इस तरह के लेख पितृसत्ता की वैधता बनाए रखने के लिए स्त्रियों को अनुकूलित करते हैं।


पतिव्रतपत्रिका में स्त्रियों को अपने पतियों के प्रति ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ बने रहने की शिक्षा देने के लिए ‘पतिव्रत’ शीर्षक से लेख प्रकाशित होते थे। ऐसे ही एक लेख में लेखक स्त्रियों को सम्बोधित करते  हुए कहता है कि ‘‘पति की सेवा से बढ़कर सपने में भी स्त्रियों को दूसरा धर्म वेदों में नहीं मिलता, हंसी से व क्रोध से वा अनजाने व किसी और किसी प्रकार से अनादर करके पति को जो कोई स्त्री कुछ कडुवी बात कहती है, उसको और कोई प्रायश्चित नहीं है, कर्म सेवा मन से व बानी से जो पति का सपने में भी अनादर करती हैं, उनका नरकों से उद्धार नहीं होता जो स्त्री पति की प्यारी नहीं है उसका सब सौभाग्य व्यर्थ है उसका खाना, पीना, सोना,  शृंगार करना बरंच जीना तक भी व्यर्थ  है क्योंकि जिसको पति और उसका प्रेम नहीं प्यारा है वह संसार में व्यर्थ जन्मी है….’’15

उपर्युक्त उद्धारण से ज्ञात होता है कि स्त्री के लिए उसका पति ही सर्वस्व माना गया है। पति ही के लिए स्त्री का जन्म हुआ, पति को खुश रखना उसके लिए ही जीना उसका जीवन है। यहाँ तक कि जिसने तनिक भी पति की उपेक्षा की उसका जीवन ही नहीं जन्म लेना ही व्यर्थ है।

किशोरावस्था और शिशु पालन पत्रिका के लगभग हर अंक में शिशुपालन के तौर तरीकों पर लेख प्रकाशित हुए। शिशु पालन केवल स्त्रियों का कर्तव्य है, पत्रिका में प्रकाशित लेखों में इस बात पर बहुत जोर दिया गया है। हां एक खास बात ये जरूर है कि पत्रिका में गर्भवती स्त्रियों के खान-पान और दिनचर्या संबंधी लेख भी प्रकाशित होते थे। ऐसे अनेक उद्धारण देखे जा सकते हैं। कुछ उद्धारण निम्नवत हैं- ‘‘गर्भवती स्त्राी को परिमित आहार करना अर्थात जैसी क्षुध और परिपाक शक्ति हो उसके अनुसार खाना, अधिक वा न्यून न खाना चाहिए, और जो पच के शरीर की पुष्टि उत्पन्न करे वही उत्तम पदार्थ गर्भवती स्त्री के खाने के योग्य है।’’16


‘‘गर्भिणी स्त्राी को प्रतिदिन निर्मल वायु सेवन करना उचित है अर्थात् देह धेना और नहाना आवश्यक है। जो शरीर दुर्बल हो तो गुनगुने पानी से स्नान करना और बदन धोना चाहिए…..गर्भधरण काल में जननी के मन का भाव जिस प्रकार का होता है संतान का स्वभाव भी प्रायः वैसा ही होता है…….’’18

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि गर्भवती स्त्रियों की देखभाल के प्रति समाज को जागरूक करने के लिए पत्रिका में अेधिकतर लेख प्रकाशित होते थे। संभवतः ये स्त्रियों की संतानोत्पत्ति करने के विशिष्ट गुण के कारण था ताकि वो देश के लिए अच्छे बच्चे पैदा कर और उनका अच्छे से पालन-पोषण भी कर सके। इसलिए पत्रिका में स्थान-स्थान पर शिशुपालन की तरकीबें बतायीं जाती थीं।

पत्रिका में स्त्रियों को अर्थशास्त्र और अर्थनीति संबंधी  ज्ञान देने के लिए भी लेख प्रकाशित हुए थे। सन्तानोत्पत्ति और अच्छी मां बनने के साथ-साथ स्त्रियों को स्वावलम्बी बनने की सलाह दिए जाने वाले लेख भी छपे। इसका वास्तव में यह अर्थ नहीं था कि स्त्रियां सम्पत्ति की मालिक बनें। लेखक की चिंता यह थी कि स्त्रियां जब दान करें तो अपनी कमाई से दान-धर्म का कार्य करें। पति की कमाई से दान का पुण्य उन्हें नहीं प्राप्त होगा। मेहनत की कमाई से दान फलदायक होगा। लेकिन इसी बहाने स्त्रियों को कम से कम सम्पत्ति अर्जित करने का एक अवसर तो मिला। यह ऐसे लेखों की सार्थकता थी।

सती का महिमामंडन


पत्रिका में ‘लाजवन्ती’ नामक लेख में एक बाग की खूबसूरती का वर्णन लेखक ने किया है हालांकि लेख में लेखक/लेखिका का नाम नहीं है। सुन्दर बाग का वर्णन करते-करते लेखक मध्य में सायास मेंहदी के पौधे  का जिक्र करता है और उससे सती स्त्रियों का प्रसंग आता है। बाग में एक सती के चउरे की उपस्थिति का वर्णन भी लेख में आती है। निम्न उद्धारण में हम देख सकते हैं कि सती प्रथा का किस प्रकार सहज तरीके से महिमामंडन किया गया है।‘‘यह मेंहदी भी सोहाग के सिंगारों में एक बड़ी चीज है और यह कुल की सतियों को चढ़ाई जाती हैंऋ देखो उसी बगीचे के किनारे एक सती का छोटा सा चउरा भी है, अहा इसकी अपने प्यारे प्रीतम में कैसी प्रीति थी कि उसी के साथ ही जल गई।’’19

उपर्युक्त उद्धारण से पता चलता है कि उस कुल में सती होने की प्रथा थी और मेंहदी सतियों को चढ़ाई जाती थी। यह पत्रिका उस कालखण्ड में प्रकाशित होती थी जब सती प्रथा पर रोक लग चुकी थी और जहां-जहां प्रभाव बाकी था वहां पर रोक लगाने के प्रयास जारी थे। ऐसे समय में पत्रिका के सम्पादक ने इस प्रकार का लेख क्यों प्रकाशित किये जिसमें एक स्त्री हुलस कर कहती है, ‘‘अहा, इसकी अपने प्रीतम में कितनी प्रीति थी कि उसके साथ ही जल गयी।’’19 यह लेख सम्पादक की स्त्री मुक्ति की मुहिम या मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। थी। यह पत्रिका उस कालखण्ड में प्रकाशित होती थी जब सती प्रथा पर रोक लग चुकी थी और जहां-जहां प्रभाव बाकी था वहां पर रोक लगाने के प्रयास जारी थे। ऐसे समय में पत्रिका के सम्पादक ने इस प्रकार का लेख क्यों प्रकाशित किये जिसमें एक स्त्री हुलस कर कहती है, ‘‘अहा, इसकी अपने प्रीतम में कितनी प्रीति थी कि उसके साथ ही जल गयी।’’19 यह लेख सम्पादक की स्त्री मुक्ति की मुहिम या मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

भारतेंदु ‘बालाबोधिनी’ माध्यम से ऐसी स्त्री का निर्माण करना कहते थे जो घर परिवार रूपी संस्था को सुचारू से चलाने के लिए कुशल अवैतनिक मैनेजर की भांति काम करे और अपने ‘उद्धारक’ मालिक के प्रति वफादार रहे. वह संस्कारी हिन्दू मानस की हो. जिससे नए मध्य वर्गीय हिन्दू मानस वाले समाज  की अच्छी,योग्य और सुशील स्त्री पाने की तृषा की तुष्टि हो. वह अच्छी मां बने. शिशु पालन के तरीके उसे आते हों. हाँ शिशु पालन और सती विषय पर पत्रिका में बहुतायत में लेख प्रकाशित होते थे. बच्चों की देखभाल और परिवरिश करना स्त्रियों का कर्तव्य है, ये समझाने वाले लेखों को पत्रिका में नियमित जगह मिलती दिखाई देती है. सती और सतीत्व को महिमामंडित करने हेतु अक्सर मिथकीय सतियों का गुणगान और गौरव गान पत्रिका में प्रकाशित होता है. संपादकद्वय ने जब पत्रिका का संकलन संपादन किया तो भारतेंदु के विषय सती से संबंधित पंक्तियों को संकलन के मुखपृष्ठ पर जगह दी. पंक्तियाँ हैं-
“सीता अनुसुइया सती अरुंघती अनुहारि
शीललाज विद्यादि गुण लहौ सकल जग नारि.”20

 बालाबोधिनी में प्रकाशित सामग्री के अध्ययन-विश्लेषण से ज्ञात होता है की भारतेंदु मनुवादी पुनरुत्थान को खाद पानी दे रहे थे. जो कालांतर में खूब फलता-फूलता है. ध्यान रहे की भारतेंदु के अध्येताओं ने भारतेंदु को हिंदी साहित्य में आधुनिक काल का जनक कहा है और नवजागरण के अग्रदूत की संज्ञा भी दी गई. पता नहीं किस गणित से रामविलास शर्मा उन्हें इन संज्ञाओं से नवाजते हैं. ऐसा भी कहा जा सकता है कि बालाबोधिनी के  अध्ययन से मूल्य निर्णय देना भारतेंदु के साथ ज्यादती है. ऐसा हो भी सकता है. लेकिन बालाबोधिनी का संपादन और उसके  कंटेंट का चयन भारतेंदु के लिए नवजागरण की संज्ञा पर एक प्रश्न अवश्य है. जिसे सुना जाना चाहिए. अगर भारतेंदु पुनरुत्थान के समर्थक नहीं थे तो क्या यह अकारण है कि वो अपने बलिया वाले भाषण में स्त्री शिक्षा पर बोलते हुए कहते हैं कि  ‘‘लड़कियों को भी पढ़ाइए किन्तु उस चाल से नहीं जैसी कि आजकल पढ़ाई जाती है जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ….ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज शिक्षा दें।’’21इतना ही नहीं स्त्री शिक्षा पर हंटर कमीशन के सामने बयान  देते हुए वे कहते हैं कि ‘‘मैं इस देश में लड़के-लड़कियों के मिले-जुले स्कूल की योजना का समर्थन कभी नहीं कर सकता।’’22 इतना ही नहीं उन्होंने ‘विद्यांकुर’ और ‘इतिहास तिमिरनाशक’ जैसी पुस्तकों को लड़कियों के पाठ्यक्रम से हटाने की सिफारिश की क्योंकि इससे उनके अनुसार स्त्रियों के चरित्रा का कोई विकास नहीं होता।


जाहिर है भारतेंदु एक ऐसी स्त्री की निर्मिती चाहते थे जो न सिर्फ पश्चिमी स्त्री के बरक्स हो बल्कि आम परम्परागत भारतीय स्त्राी जैसे घरेलू दाई, धेबिन, नाउन, फेरी लगाने वाली के बरक्स हो.ध्यान रहे कि भारतेंदु की बालाबोधिनी में समाज के निचले तबके की स्त्रियों की समस्याओं पर स्त्रियों को तो छोड़ ही दीजिये, पुरुषों यानि स्त्री के ‘उद्धारकों’का भी कोई लेख या रपट नहीं मिलती है. जाति व्यवस्था की क्रूरता और घृणा पर कोई टिपण्णी तक नहीं मिलती  और भारतेंदु नवजागरण एवं हिंदी में आधुनिक काल के जनक कहे जाने लगते हैं.


सन्दर्भ सूची
1. बालबोधिनी,संपादक-भारतेंदु हरिश्चंद्रएसंकलन-संपादनः वसुध डालमिया, संजीव कुमार, राजकमल       
        प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, पहला संस्करण-2014, पृष्ठ-6
2. वही, पृष्ठः 119-120
3. वही, पृष्ठ-129
4. वही, पृष्ठ-31
5. वही, पृष्ठ-32
6. वही, पृष्ठ 35-36
7. वही, पृष्ठ-35
8. वही, पृष्ठ-146
9. वही
10. वही
11. वही, पृष्ठ 146-147
12. वही, पृष्ठ-147
13. वही, पृष्ठ-193
14. वही
15. वही, पृष्ठ 58-59
16. वही, पृष्ठ-63
17. वही, पृष्ठ-68
18. वही, पृष्ठ-69
19. वही, पृष्ठ-55
20. वही, मुख पृष्ठ
21भारतेंदु समग्र, सं. हेमन्त शर्मा, हिन्दी प्रचार संस्थान, 1989, पृष्ठ-1013
22. वही, पृष्ठ-1010

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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यौन सम्बन्ध को प्यार का रूप देना जरुरी

इति शरण

युवा पत्रकार इति आईआईएमसी से रेडियो टीवी पत्रकारिता करने के बाद पटना में रिर्पोटींग कर रही हैं और जी न्यूज़ के वेब DNA में रिर्पोटर के रूप में कार्यरत हैं. संपर्क : ई मेल- itisharan@gmail.com

इति शरण 

कुछ सालों तक मैंने एक सामुदायिक रेडियो “गुडगाँव की आवाज़” में सेक्सुअल हेल्थ पर काम किया। इस दौरान सेक्सुअल हेल्थ से सम्बंधित कई विषयों पर काम करने का मौका मिला, जिसमें एक गंभीर विषय से भी हमारा सामना हुआ- मैरिटल रेप ( वैवाहिक बलात्कार ) । महिलाओं से बात करने पर पता चला कि बड़ी संख्या में महिलाएं इस तरह के बलात्कार का शिकार हो रही हैं, जिसके खिलाफ वे आवाज़ भी नहीं उठा पाती।

इस प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरी कई औरतों से बातचीत हुई। मगर एक दिन एक ऐसी महिला ने मुझे अपनी कहानी बताई , जिससे मैं अक्सर मिला करती थी, लेकिन कभी पता ही नहीं चला कि वह भी मैरिटल रेप की शिकार है। उसकी शादी 18 साल की उम्र में ही कर दी गई थी। शादी की पहली रात से ही वह अपने पति की जबरदस्ती सहने को मजबूर रही थी। उस महिला ने उस दिन विस्तार से मुझे अपनी कहानी बताई।

“मुझे नहीं पता था कि शादी के बाद क्या होता है। कच्ची उम्र में ही मेरी शादी तो तय कर दी गई, मगर शादी के बाद की चीज़ों के बारे में मुझे कुछ नहीं बताया गया। शादी की पहली रात मेरे पति जैसे मुझपर चढ़ ही गए थे, मेरे लिए सब बहुत डरावना था। मुझे दर्द भी हो रहा था और बहुत शर्म भी आ रही थी। कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि कोई मेरे शरीर के साथ ऐसा कुछ करेगा। मेरे पति तब तक नहीं रुके जब तक उन्हें नींद नहीं आ गई। सुबह होते ही मैंने अपनी माँ को फ़ोन लगाया और रात की बात बताते हुए रोने लगी। मेरी माँ ने कहा “पागल है क्या तू, वह तेरे पति हैं, इसे अपना पत्नी धर्म समझ कर निभा ले।”

उस औरत ने बताया कि धीरे-धीरे वह इसकी आदी  हो गई। अब तो मासिक धर्म के दिन भी उसका पति उसे नहीं छोड़ता। उसका पूरा बिस्तर खून से सन जाता था। कुछ दिन बाद वह गर्भवती हो गई। उसे मायके भेज दिया गया। वह खुश थी, उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हो रहा था। बच्चा होने के बाद उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया। इस कारण डॉक्टर ने कुछ दिनों तक उन्हें सम्बन्ध बनाने के लिए मना किया हुआ था, मगर उसका पति मानने वालो में से नहीं था यहाँ तक कि उसे प्रोटेक्शन लेना भी मंजूर नहीं था। नतीजतन एक महीने बाद ही वह दोबारा गर्भवती हो गई। शरीर से कमजोर होने के कारण 2 महीने में ही उसका बच्चा गिर गया ।अपनी कहानी बताने के बाद उस महिला ने कहा था “अपने पति से मैं भी प्यार करना चाहती थी, मगर कभी कर नहीं पाई।
इस तरह की कहानी हमारे समाज में हर दूसरे घर में मिल जाएँगी, जहाँ औरतें अपने पति द्वारा ही बलात्कार की शिकार हो रही।

वैसे इसके लिए जिम्मेदार अकेले उस एक पुरुष को नहीं ठहराया जा सकता है बल्कि इसका जिम्मेदार हमारा वह समाज है, जहाँ सेक्स को पुरुषों की मर्दानगी से जोड़कर देखा जाता है। मुझे याद है एक औरत ने अपनी कहानी बताते हुए कहा था, मैडम मेरे पति बहुत अच्छे हैं। कभी भी मेरी इजाज़त के बिना सम्बन्ध नहीं बनाते। यहाँ तक कि पहली रात भी मेरे मना करने के बाद वह कुछ नहीं बोले। मगर उन्होंने मुझे कहा था कि किसी और को मत बताना कि हमारे बीच कुछ भी नहीं हुआ , वरना लोग मेरी मर्दानगी पर ताना देंगे। इस घटना को हम एक ऐसे उदाहरण के रूप में देख सकते हैं, जब मर्दानगी के नाम पर एक पुरुष को जबरन सम्बन्ध बानने के लिए ज़ोर दिया जाता है।

इन सबका परिणाम स्त्रियों के मन में यौन सम्बन्ध के प्रति नफरत घर कर लेती है। प्यार का यह अनमोल रूप हिंसा में तब्दील हो जाता है। जबकि यौन सम्बन्ध पुरुष और स्त्री दोनों की इच्छा और जरुरत है।  पुरुषों की शारीरिक बनावट ऐसी होती है कि सम्बन्ध बानने से उनकी थकान दूर होती है, जबकि औरतों को इसमें कुछ हद तक थकान महसूस होती है। वैसे भी हमारे समाज में सामान्यतः घर की सारी जिम्मेदारी घर की औरतों के सर पर ही थोप दी जाती है, दिन भर काम से थकने के बाद हर दिन उसका सम्बन्ध बनाने का मन नहीं होता।

करीब 50 साल की एक महिला ने अपने पति के बार में बताते हुए कहा था “वे आज मुझे अगर अपने पास बैठने के लिए बुलाते भी हैं तो उनके पास जाकर बैठने का मन नहीं करता। मन भी कैसे करे, शादी होते ही घर की सारी जिम्मेदारी मेरे सर पर थोप दी गई, दिन भर काम करके शरीर बिल्कुल जवाब दे देता था। उम्र भी बहुत कम थी मेरी। मगर काम के बाद जब आराम करने का मन होता तो पति घर आते ही बिस्तर में चलने के लिए बोलते। अगर मना करो तो फिर घर में बवाल कि मेरी इससे थकान दूर होती है और वैसे भी तू तो दिन भर घर में ही रहती है, अब किस बात की पत्नी जो पति का थकान भी दूर न करे। उस औरत का कहना था कि सम्बन्ध बनाना मेरे लिए कोई प्यार नहीं रहा बल्कि सज़ा थी मेरे लिए।  उनके लिए तो मैं बस उसकी ज़रुरत पूरी करने वाली मशीन थी। उसके घर का सारा काम करने वाली और दूसरा सम्बन्ध बनाकर उसकी थकान दूर करने वाली औरत।

इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत हम लोग एक रेडियो नाटक भी बनाया करते थे, जिसमें लाइव डॉक्टर के जुड़ने का एक सेशन हुआ करता था। डॉक्टर उस सेशन में अक्सर लोगों को यह सलाह दिया करते थे कि आप पत्नी के पास सिर्फ सम्बन्ध बनाने मत जाया करो, बल्कि अपने प्यार का इज़हार दूसरी तरह से भी करने की कोशिश करो, देखना आपकी पत्नी आपसे कितनी खुश रहा करेगी।  डॉक्टर से बात करने के लिए हमारे स्टेशन में काफी कॉल आया करते थे। कई पुरुषों का कहना था कि हमें बार-बार अपनी पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाने का मन होता है। कुछ पुरुषों ने बताया कि मैं ऑफिस में रहता हूँ तब भी मन होता है जल्दी से घर जाकर पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाऊं, ऐसा नहीं कर पाने पर बहुत बेचैनी होती है।

डॉक्टरों का कहना हैं कि यह एक तरह कि मानसिक स्थिति भी है, किसी चीज़ की लत लग जाना या उसके बारे में दिन रात सोचने पर हर बार आपका दिमाग उसी ओर जाता है। खासकर युवाओं के साथ ऐसा कई बार होता है। डॉक्टरों का कहना है कि पहले तो उन पुरुषों को अपना ध्यान कहीं  और लगाने की कोशिश करनी चाहिये। दूसरा कई बार पुरुषों के उत्तेजित हो जाने पर उनका वीर्य भी निकल आता है, जिसके बाद उन्हें सेक्स करने की जरुरत महसूस होती है। अगर उस वक़्त वह पुरुष अपने साथी के साथ नहीं हैं या उसकी साथी की रज़ामंदी नहीं हैं तो वह  हस्तमैथुन करके भी अपनी उत्तेजना शांत कर सकता है।

हांलाकि हमारे समाज में हस्तमैथुन को गलत नज़रिये से देखा जाता है। जबकि इसमें कोई बुराई नहीं है। यह एक सामान्य सी बात है। डॉक्टर भी इसे गलत नहीं मानते। कई लोगों का यह भी मानना होता है कि हस्तमैथुन करने से कमजोरी या अन्य कोई बीमारी होती है, मगर यह सब गलत धारणा है। यह चिंता का विषय तब बनता है जब रोजमर्रा के काम में रूकावट बनने लगे या तनाव मुक्त करने का यही एकमात्र साधन बन जाए।

जबरन सम्बन्ध बनाने का खामियाज़ा कई बार खुद पुरुषों को भी सहना पड़ता है। पुरुषों के जबरदस्ती करने पर कई बार औरतें सम्बन्ध बनाने के नाम से ही नफरत करने लगती है। वे घर के कामों में खुद को इतना व्यस्त कर लेती हैं कि पति के तरफ कभी ध्यान भी नहीं जाता। परिणामस्वरूप जल्द ही दोनों के बीच यौन सम्बन्ध बनना बंद हो जाता हैं और पुरुष चाह कर भी इससे वंचित रह जाते हैं। इसलिए इस प्यार को बरक़रार रखने के लिए यौन सम्बन्ध को हिंसा नहीं बल्कि प्यार का रूप देना जरुरी है।

बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत आज मिलते हैं बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर से. उनके जीवन और विचार उत्पल कान्त अनीस के शब्दों में. 


उत्पलकान्त अनीस

बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर अपनी सामाजिक सक्रियता और राजनीतिक चेतना के लिए बहुजन आंदोलन में एक समादृत नाम हैं. ऐसी बहुत कम महिलायें हुई हैं, जो अपने मेडिकल प्रोफेशनल कैरियर के साथ-साथ सामजिक क्षेत्र में भी बहुत सक्रिय हों. लेकिन मनीषा ने मेडिकल प्रोफेशनल के साथ-साथ समाज में व्याप्त रोगों की पहचान की और वे उनके निदान के लिए लगातार प्रयत्नशील भी हैं.पेशे से डॉक्टर मनीषा अभी डिपार्टमेंट ऑफ़ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, डेक्कन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज हैदराबाद में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और हैदराबाद के कॉरपरेट हॉस्पिटल में लीवर ट्रांसप्लांट की विशेषज्ञ हैं. नागपुर में जनमी, पली-बढी मनीषा ने और वहीं से एम.बी.बी.एस. तथा एमडी तक की शिक्षा गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से प्राप्त की, उसके बाद उन्होंने गैस्ट्रोलाजी में सुपर स्पेश्लाइजेशन पीजीआई चंडीगढ़ और जी बी पन्त इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली से हासिल की. वे लगभग 18 सालों से बामसेफ से जुड़ी हैं और अभी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेवारी के साथ-साथ केन्द्रीय कार्यकारी परिषद की सदस्य के रूप में भी बामसेफ के आन्दोलन की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी से जुडी हैं. बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने से पहले वे मूलनिवासी महिला संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं.

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप 

नागपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में इनका जन्म हुआ. इनके माता का नाम प्रमिला रंगारी और पिता का नाम भागवत रंगारी है. इनका परिवार आंबेडकरी विचारधारा से जुड़ा हुआ है. वैसे इनकी माँ का पंजाबी महाराष्ट्रीयन परिवार से ताल्लुक रहा, जबकि इनके पापा का महाराष्ट्रीयन परिवार से. इनकी परिवारिक पृष्ठभूमि में दलित और पिछड़ी दोनों जातियों का अंतरजातीय वैवाहिक सबंध रहा है. यही कारण है कि मनीषा अपनेआप को जन्मना/जन्मजा बहुजन कहती हैं. इनके नाना-नानी ने 1956 में नागपुर में बाबासाहेब के साथ बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया था. इनकी मामी सुलोचनाताई डोंगरे थीं, जिन्होंने 1942 में ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस वीमेंस कॉन्फ्रेंस (20जुलाई 1942) में  की अध्यक्षता की थी. वे बाबा साहेब के साथ मिलकर सी पी बेरार और  मराठबाड़ा प्रदेश में फेडरेशन का काम करती थीं.

पढ़ें: पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

इनका परिवार दादा-दादी के समय से ही सामाजिक रूप से काफी उन्मुख रहा. इनके परिवार में फुले और आंबेडकरी विचार का बहुत गहरा प्रभाव रहा है. यही कारण रहा कि घर में शुरू से पढाई का माहौल था. इनके पापा (भागवत रंगारी) सरकारी अफसर थे और माँ (प्रमिला रंगारी) नागपुर विश्वविद्यालय के शिक्षण विभाग की विभागाध्यक्ष पद से रिटायर हुईं. इनके पिता चार भाई थे, जिनमें अन्य तीन भाई आइएएस., सिविल जज और आइआइटीयन रहे. उच्च शिक्षित परिवार में जन्म होने के कारण मनीषा को बचपन से एक उन्नत शैक्षणिक माहौल मिला. लेकिन इतने उच्च शिक्षित परिवार में जन्म होने के बावजूद भी इन्हें अपने छात्र जीवन में काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा.


फुले और आंबेडकरी विचार से लैस परिवार में जन्म होने के कारण इनका बचपन से ही बाबा साहेब के विचारों से परिचय हुआ. यही कारण रहा कि मनीषा बचपन से ही सामाजिक चेतना से लैस रहीं और उन्होंने बचपन से ही जातिवाद और अन्याय का विरोध करना शुरू कर दिया. इसका परिणाम भी उन्हें भुगतना पड़ा.



:दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

सेंट जोसफ कांन्वेंट स्कूल में पढाई होने के कारण स्कूली जीवन में इन्हें भेदभाव नहीं सहना पड़ा. लेकिन जब मनीषा भिडे जूनियर कॉलेज, जो ब्राह्मण शैक्षणिक संस्थान है, में गईं तो वहां इनका सामना जातिवाद से हुआ. लेकिन हमेशा प्रतिरोध करती रही. बारहवीं में कॉलेज टॉप करने के बाद भी जाति से गैरब्राहमण होने के कारण इनका नाम स्कूल वालों ने अखबार वालों को नहीं भेजा था. इनकी जगह पर दूसरा स्थान प्राप्त विद्यार्थी का नाम छपा. यहाँ तक कि प्रिंसिपल और शिक्षक किसी को बताने से भी हिचकिचाते रहे. मनीषा ने कॉलेज अथॉरिटी के सामने ये सवाल उठाया. अंततः पुरस्कार वितरण के समय कॉलेज को मनीषा के टॉप होने की घोषणा करनी ही पड़ी.


गवर्मेंट मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के दौरान पढ़ने में टॉप होने के कारण भेदभाव नहीं सहना पड़ा, लेकिन एम डी करते हुए ब्राह्मण और अन्य उच्चवर्णीय फैकल्टी का भेदभाव सहना पड़ा. इंदिरा मेडिकल कॉलेज में एमडी गोल्ड मेडलिस्ट होने के बावजूद भी उस साल मनीषा को गोल्ड मैडल से वंचित कर दिया गया.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

 ब्रहामणवादी शिक्षकों ने सुनियोजित तरीके से यूनिवर्सिटी प्रशासन से साजिश करके इन्हें गोल्ड मैडल से वंचित कर दिया और मनीषा को जवाब दिया गया कि राउंडवाइज गोल्ड मैडल इस बार दूसरे विभाग को दिया जाएगा. आगे चलकर मनीषा ने पीजीआई चंडीगढ़ बतौर सीनियर रेजीडेंट ज्वाइन किया.  इसके बाद सुपरस्पेशलाइजेशन और डॉक्टरेट इन मेडिसिन करने के लिए वे जी.बी.पंत इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, दिल्ली आई. यहाँ जातिवादी उच्चवर्णीय सहपाठियों ने उन्हें परेशान किया लेकिन अंततः वे वहां अपनी डिग्री पूरा कर पायीं. यहाँ मनीषा को लैंगिक और जातिगत भेदभाव काफी झेलना पड़ा. यहीं वे बामसेफ से 1998 में जुड़ी.

फिर शादी के बाद मुंबई गयीं. वहां मनीषा ने जे.जे. मेडिकल कॉलेज ज्वाइन किया. इस बीच बामसेफ में उन्होंने सांगठनिक स्तर पर काफी काम किया. पूरे देश में घूम-घूम कर संगठन को मजबूत किया. बामसेफ के अंदर महिला मुद्दे और नेतृत्व को लेकर जमीनी स्तर पर भी काफी काम किया. उन्होंने टीएनएमसी नायर हॉस्पिटल में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया. यहाँ पर मनीषा ने पितृसत्ता और जातिवादियों के खिलाफ मोर्चा खोला और इन्हें जीत मिली. इसके बाद हैदराबाद आ गयीं.



दलित महिला कारोबारी का संघर्ष 

हैदराबाद आने के बाद उन्होंने मेडवीन हॉस्पिटल में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डिविजन में हेड के तौर पर ज्वाइन किया. अंतररार्ष्ट्रीय और राष्ट्रीय जर्नल में कई आलेख प्रकाशित हुये. वहाँ कई नामचीन कॉर्पोरेट अस्पतालों में लीवर स्पेशलिस्ट के तौर पर काम करती रहीं.


मनीषा दलित स्त्रीवाद के बदले बहुजन स्त्रीवाद पर जोर देती हैं. ‘दलित स्त्रीवाद’ शब्दावली को सवर्णों के साजिश के तौर पर देखती हैं. मनीषा का मानना है कि दलित स्त्रीवाद जिन मुद्दों को उठाता है या उसका जो धरातल है, वह सभी ओबीसी, आदिवासी, एससी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए बराबर है. हरएक समूह का अपना एक विशेष शोषण होता है, लेकिन सभी शोषण की जड़ें ब्राह्मणवाद से उत्पन्न जातिवाद तथा पितृसत्ता की मान्यतायें ही हैं. उच्च वर्णीय महिलाओं के शोषण में जाति की भूमिका नहीं होती, पितृसत्ता उसके मूल में है. स्त्रीवाद शब्द ब्राह्मण, सवर्ण महिलाओं के लिए तो ठीक है लेकिन बहुजन महिलाओं के नहीं. भारत का स्त्रीवाद जातिगत प्रताड़ना के प्रश्न पर कई दशकों तक चुप रहा है और बहुजन महिलाओं पर वर्चस्व बनाता रहा, इसी प्रक्रम में जाति का अहम मसला भी दबाता रहा. इसी वजह से दलित स्त्रीवाद का जन्म हुआ. ब्राहमण सवर्ण महिलायें सिर्फ बहुजनों के शोषण तथा गरीबी पर एनजीओ के जरिये पैसा, ओहदा, पारितोषिक, किताबों में आलेख, किताबें लिखना आदि अनेक लाभ लेने में लगी थीं, मगर जाति सिस्टम, जो कि पितृसत्ता को जन्म देता है, को नेस्तनाबूद करने के लिए कुछ नहीं कर रही थी. स्त्रीवाद के नाम पर जाति के अहम मुद्दों को ब्राहमण/ सवर्ण महिलायें निगल जाती हैं, ऐसा मनीषा बांगर समझती हैं. वे कहती हैं कि ‘इस तरह ब्राह्मण/ सवर्ण महिला ब्राह्मणवाद को बढ़ावा ही नहीं, जानबूझकर बनाये रखने में सवर्ण पुरुषों का साथ देती है. इस तरह का छद्म स्त्रीवाद भारत में पनप रहा है.’ वे स्पष्ट करती हैं कि, ‘एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं की लड़ाई ब्राह्मणवाद के खिलाफ है, ज्यों ही ब्राह्मणवाद ख़त्म होगा, त्यो ही बहुजन महिलाओं का शोषण खत्म होगा. जिस मात्रा में जातिवाद का निर्मूलन होता रहेगा, उसी मात्रा में पितृसत्ता  का प्रश्न भी सुलझाता रहेगा, क्योंकि भारत में पितृसत्ता जातिवाद का अभिन्न अंग है, दोनो एक दूसरे को जीवित रखते हैं, जबतक दोनो जीवित रहते हैं, तभी तक ब्राह्मणवाद फलता-फूलता रहता है. दलित स्त्रीवाद पर सवाल खड़ा करते हुए कहती हैं कि जोतिबा  फूले, बाबा साहेब आम्बेडकर और पेरियार ने जितना महिलाओं के हक-हूकूक के लिए काम किया है, वह स्त्रीवाद के नाम से नहीं किया बल्कि जातिवाद और ब्राहमणवाद का विरोध करते हुए महिलाओं को इसका सबसे पीड़ित समुदाय बताते हुए न सिर्फ काम किया बल्कि विमर्श भी खड़ा किया. मनीषा सावित्रीबाई फूले को आदर्श मानती हैं .



मनीषा महिला आरक्षण को लेकर सिर्फ 33 फीसदी नहीं बल्कि 50 फीसदी आरक्षण के पक्ष में हैं क्योंकि उनके अनुसार महिला की जनसंख्या के अनुपात में ही उन्हें प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. अगर बहुजन स्त्री का उसकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व का प्रावधान नहीं होता है तो सवर्ण/ ब्राह्मण महिलायें सम्पूर्ण बहुजन महिलाओं का प्रतिनिधित्व निगल जायेंगी. ब्राह्मण/ सवर्ण महिलायें आरक्षण के भीतर आरक्षण के हक़ में नहीं हैं. यही इस बात का सबूत है कि भारत में सभी महिलायें एक होमोजनियस (एकरूपीय) समूह नहीं हैं. इसलिए इन्हें आरक्षण भी होमोजनियस (एकरूपीय) समूह की तरह नहीं मिलना चाहिए.  बहुजन महिलाओं के सवालों से जिस तरह से मुख्यधारा का मीडिया मुंह मोड़ता है,  उसपर भी मनीषा सवाल खडी करती हैं.


बामसेफ में महिलाओं की नेतृत्व को लेकर भी मनीषा ने संगठन के अंदर काफी सुधार किया है. उनका कहना है कि बामसेफ भी चूकि इसी समाज का हिस्सा है, तो वहां भी तमाम खामियां है. लेकिन हमलोगों ने उसपर धयान देना शुरू किया हैं. भारत सरकार के गाइडलाइन के अनुसार ‘वीमेंस सेल’ शुरू करवाया है, जो कि शायद ही किसी पॉलिटिकल संस्था में अभी तक हो. मनीषा ने बामसेफ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ाया है, जैसे यूके, यूएसए या मीडिल ईस्ट तक. उन्होंने 13 अप्रैल 2016 को यूनाइटेड नेशन में भी बहुजनों की समस्या पर अपनी बात रखी.



अभी पिछड़े आरक्षण के लिए विभिन्न आन्दोलनों के बारे में बताती हैं कि ये सारी जातियां और समाज ब्राहमणवाद के शिकार रहे हैं इसलिए ये पिछड़ते गये. इसलिए सबसे पहले जाति जनगणना करवाई जाये. वे कहती हैं पिछड़े और दलितों को बांटने में मार्क्सवादियों और ब्राहमणवादियों दोनों का हाथ है.

वे मायावती के काम की एक तरफ सराहना करती हैं तो उनकी राजनीति को भी लिमिटेड बताती हैं, क्योंकि उनके अनुसार वह प्रादेशिक पोलिटिकल पार्टी की नेता की तरह हो गई हैं और उन्होंने एक दलित पहचान के रूप में ब्राह्मण मीडिया और अन्य पोलिटिकल पार्टियों को सम्मति दी है, अघोषित ही सही. उन्होंने अपनी पार्टी सहित संगठन की शक्ति बढ़ाने की तरफ ध्यान नहीं दिया है, वैकल्पिक नेतृत्व पनपने नहीं दिया है, इसीलिए वह एक लिमिटेड अवधि तक सीमित हो जायेंगी. वे कहती हैं कि बीएसपी को संगठन की शक्ति बढ़ानी चाहिए और ओबीसी तथा पसमांदा तक विस्तार करना चाहिए.  मनीषा आह्वान करती हैं कि बहुजन महिलाओं को भी एक साथ आना चाहिए.

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समझ और सरोकार कविता का हासिल

आरती मिश्रा


भोपाल में प्रलेस के दो दिवसीय कविता शिविर में तमाम प्रतिभागियों ने न केवल अपनी कविता को मांजना सीखा बल्कि कविता और वैचारिकी के रिश्ते को उन्होंने बारीकी से समझा.


आपाधापी और जल्दबाजी के इस दौर में जहां ठहरकर सीखने, समझने की प्रक्रिया धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है, प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) की मध्य प्रदेश इकाई ने फरवरी 2017 में राजधानी भोपाल में युवा कवियों के लिए दो दिवसीय आवासीय कविता शिविर का आयोजन किया. इस शिविर में हिंदी के भिन्न-भिन्न इलाकों से आये कवियों ने शिरकत की. शिविर में आठ युवा कवि और पांच वरिष्ठ कवि लगातार दो दिन मौजूद रहे. इसके साथ ही कुछ युवा एवं वरिष्ठ कवियों का आनाजाना भी हुआ. शिविर का उद्देश्य था कि युवा कवियों की कविताएँ सुनी जाएँ और उन पर समुचित चर्चा और विश्लेषण के ज़रिए उनके अच्छे और बुरे पहलुओं पर गौर किया जाए. ज़ाहिर है इन कविताओं का ताक़त, संभावनाएँ और उनकी सीमाएँ भी इस चर्चा का हिस्सा होनी थीं और हुईं भी. यद्यपि इन्हीं तारीखों में इस्मत चुगताई पर नूर ज़हीर के बनाये नाटक में किरदार निभाने की वजह से रजनीश साहिल इस शिविर में शामिल नहीं हो सके लेकिन प्रतिभागियों के चयन का महत्त्वपूर्ण कार्यभार उन्होंने दिल्ली में बैठकर बखूबी निभाया.

शिविर के उद्देश्य और स्वरुप का परिचय शिविर संयोजक के नाते प्रलेसं की मध्य प्रदेश इकाई के महासचिव विनीत तिवारी ने दिया. उन्होंने प्रलेस द्वारा पूर्व में मांडव, साँची, अशोकनगर, सतना, गुना, इंदौर, कालाकुंड, मंदसौर और उज्जैन आदि स्थानों पर आयोजित इस तरह के रचना और विचार शिविरों की जानकारी दी और कहा कि आवासीय शिविरों से नए और पुराने कवियों के बीच  संकोच समाप्त होते हैं और खुल कर बात हो पाती है. साथ ही पूरे वक़्त साथ रहने से साहित्य और संसार को समझने का माहौल कविताओं को अनेकानेक कोणों से देखने का अवकाश संभव करता है
. उन्होंने पूर्व में लगाए गए शिविरों  को याद करते हुए कहा कि  आज के दौर के अनेक प्रमुख कवि शिविरों के बाद ही अपनी सही ज़मीन और पहचान हासिल कर पाए. ज्ञानरंजन, चंद्रकांत देवताले, कृष्णकांत निलोसे, राजेंद्र शर्मा और कुमार अम्बुज द्वारा आयोजित ऐसे ही एक मांडव शिविर से पवन करण, अनिल करमेले, विवेक गुप्ता, आशीष त्रिपाठी और स्वयं मैं कविता के दायरे में गंभीरता से शामिल हुए. उन्होंने शिविरार्थियों से अपेक्षा की कि जिस तरह हमने जो हासिल किया, उसे हम पिछले २० वर्षों से  बाद वाली पीढी के कवियों को देने की कोशिश कर रहे हैं, वैसे ही आप सभी को भी आगे ऐसे शिविर आयोजित करने की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

मुक्तिबोध को याद करते हुए वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज ने कहा कि साहित्य विवेक और जीवन विवेक अलग – अलग नहीं हैं. सभी के परिचय, जिसमे उनका साबका साहित्य से कैसे पड़ा, इसका ज़िक्र भी शामिल था, के बाद कुमार अम्बुज ने सभी शिविरार्थियों से प्रश्न किया कि दुनिया की उत्पत्ति के बारे में उनका क्या सोचना है? उनका ये सवाल भी उनसे दशकों पहले किसी शिविर में भगवत रावत जी या कमलाप्रसाद जी या मलय जी द्वारा पूछे गए सवाल की प्रासंगिक स्मृति थी. दरअसल यह सवाल इस शिविर की जमीन तैयार कर रहा था. सभी युवा कवियों ने दुनिया की उत्पत्ति और इस प्रकार ईश्वर की अवधारणा, उसकी सत्ता को लेकर अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये. इस प्रकार कविता, कवि और वैज्ञानिक चेतना के अंतर्संबंधों को लेकर एक विस्तृत चर्चा आरंभ हुई. कुमार अंबुज ने कहा कि एक कवि के लिए यह आवश्यक है कि वह वैज्ञानिक चेतना से पूरी तरह लैस हो. क्योंकि अगर कवि अपने आसपास की घटनाओं को वैज्ञानिकता की कसौटी पर नहीं कसता, उसे तर्कसंगत करके नहीं देखता और राजनीतिक समझ से संचालित नहीं होता तो उसकी कविता और उसका उद्देश्य इतना बड़ा नहीं हो पाएगा कि वह व्यापक समाज में अपने अनुभवों को सही ढंग से संप्रेषित कर सके.


चर्चा के दौरान धर्म, ईश्वरीय आस्था और अंध श्रद्घा को लेकर भी बातचीत हुई. इस चर्चा के अंत में लगभग सभी प्रतिभागी इस बात पर सहमत थे कि एकदम निर्दोष नजर आने वाली आस्था भी इस बात का जोखिम पैदा कर देती है कि जरूरत आने पर उसे अंधश्रद्घा में तब्दील करने की कोशिश की जाये. ठीक उसी तरह मुक्ति के धर्मशास्त्र (लिबरेशन थियोलोजी) के क्रांतिकारी इतिहास पर भी बात हुई.


चर्चा के उपसंहार के तौर पर विनीत तिवारी ने उरुग्वे के सुप्रसिद्घ लेखक एडुवार्डो गैलियानो के महत्त्वपूर्ण लेख ‘आखिर हम लिखते ही क्यों हैं?’ का पाठ किया. इस लेख में गैलियानो ने अपनी व्यक्तिगत रचना प्रक्रिया से जुड़े कुछ सवालों के जवाब दिए हैं जो कमोबेश हर लेखक से जुड़े होते हैं. मसलन वह लिखता क्यों है? लेखक की पक्षधरता के क्या मायने हैं, वह क्यों जरूरी है आदि. लेख पर हुई विस्तृत चर्चा ने युवा कवियों के मन की अनेक दुविधाओं को दूर किया और  नए सवालों और नई बेचैनियों को पैदा किया.


इस तरह शिविर का पहला सत्र  समाप्त हुआ.  तब तक नए कवियों को ये समझ नहीं आ रहा था कि इस शिविर में कविता लिखना सिखाया जाएगा या नहीं. दोपहर के खाने के बाद दूसरा सत्र शुरू हुआ. हल्की सर्दी का वक़्त था और दोपहर की गुनगुनी धूप बाहर आमंत्रित कर रही थी. सभी लोग इस सत्र के लिए धूप में निकल आये. ये सत्र प्रतिभागी युवा कवियों की कविताओं का था. शिविर में आठ पूरा वक़्ती नए प्रतिभागी थे: दीपाली चौरसिया, मानस भारद्वाज, प्रज्ञा शालिनी, अल्तमश जलाल, पूजा सिंह, संदीप कुमार, अभिदेव आजाद और श्रद्घा श्रीवास्तव. पहले दिन दीपाली, मानस, प्रज्ञा शालिनी और अल्तमश जलाल ने अपनी कवितायें पढ़ीं. प्रत्येक कवि के कविता पाठ के बाद शेष सभी प्रतिभागियों ने इन कविताओं पर अपने विचार रखे. वरिष्ठ कवियों कुमार अंबुज, विनीत तिवारी, अनिल करमेले, रवींद्र स्वप्रिल प्रजापति और आरती ने इन कविताओं की खूबियों और खामियों पर चर्चा की. इस दौरान कविताओं के बिंबों, कुछ कविताओं में बार-बार आ रहे नॉस्टैल्जिया यानी अतीत मोह समेत तमाम छुए-अनछुए पहलुओं पर व्यापक बातचीत हुई. कुमार अंबुज ने कहा कि नॉस्टैल्जिया को केवल छूकर गुजर जाना कोई मायने नहीं रखता. हम सभी की जड़ें कहीं न कहीं हैं और हम सभी अपने अतीत को याद करते हैं लेकिन एक कवि के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह उन यादों में क्या लेकर जाता है और वहां से पाठक के लिए क्या लेकर आता है. कविता में लयात्मकता और कविता की आतंरिक लय के बीच के अंतर को समझने की भी कोशिश हुई. यह सत्र निश्चित रूप से अत्यंत समृद्ध रहा और इसने कवियों को कविता को पढऩे, समझने और उसके विश्लेषण की दृष्टि विकसित करने का अवसर प्रदान किया. अनिल करमेले ने कहा कि किसी की कविताओं में नास्टैल्जिया बहुत प्रखरता से आया था लेकिन वो आगे नहीं निभ सका. किसी की कविता में विचार तो अच्छा था लेकिन वो कविता में ठीक से नहीं आ पाया. किसी की कविताओं में आत्मदया उसी तरह असमानुपाती थी जैसे कभी कभी कुछ कविताओं में अनावश्यक आत्म गौरव जाता है. अस्मिता की राजनीति  जीवन दर्शन और साहित्य को किस तरह प्रभावित करती है, ये बात भी हुई. इस बात पर ज़ोर दिया गया कि तारीफ़ एवं विश्लेषण का विवेक भी होना चाहिए अन्यइथा कवि के भीतर सुधार की संभावनाएँ विरल हो जातीं हैं.
युवा कवयित्री दीपाली ने माना कि उनके लिए कविता अब तक केवल अपने मनोभावों को प्रकट करने का जरिया भर थी. शिविर में आने के बाद उनको पता चला कि कविता का एक शिल्प होता है और वैज्ञानिकता से कविता का कितना गहरा नाता है. युवा कवि मानस भारद्वाज ने कहा कि कविता शिविर में हिस्सेदारी ने एक साथ कवि और श्रोता होने की जो सुविधा प्रदान की वह अन्यत्र नहीं मिल सकती. यह एक ऐसी स्थिति है जहां आप अपनी कविताओं की प्रत्यक्ष आलोचना सुनने की स्थिति में होते हैं. यह सुधार की इच्छा रखने वालों के लिए बहुत बेहतर बात है.

शाम की चाय के बाद फिर हॉल के भीतर इकठ्ठा होकर कविताएँ और उन पर बातचीत शुरू हो गई. कुछ साथियों ने अपनी पसंद के कवियों की कवितायेँ सुनाईं और उन कविताओं पर चर्चा भी हुई. रवींद्र स्वप्निल प्रजापति, अनिल करमेले और आरती ने अपनी कुछ कविताएँ सुनाईं जिन पर  नए कवियों सहित सभी प्रतिभागियों ने अपनी अपनी  समझ से टिप्पणी की.

लगभग रात दस बजे शिविर के पहले दिन का औपचारिक समापन हुआ और अनौपचारिक तौर पर फिर शिविर में कविताएँ और उन पर बातचीत, एक-दूसरे के साथ परिचय के दो-चार कदम रात 2-3 बजे तक बढ़ते रहे. शिविर में इंदौर के कलाकार  अशोक  दुबे के कविता पोस्टर्स की प्रदर्शनी भी लगाई गयी.
शिविर के दूसरे दिन के प्रथम सत्र की शुरुआत में विनीत तिवारी ने कविता शिविर के महत्त्व के बारे में बात की. उन्होंने कहा कि कविता और साहित्य दोनों प्रतिरोध के उपकरण हैं. कविता केवल कुछ कहने के लिए नहीं की जानी चाहिए बल्कि उसमें गलत का विरोध करने, उसे परास्त करने और सही सामाजिक व्यवस्था लागू करने की भावना भी होनी चाहिए. साहित्य और कला वैसे तो कभी स्वान्तः सुखाय नहीं कही जा सकती थी क्योंकि उसकी सदा ही एक सामाजिक भूमिका रही है लेकिन आज तो वो मनुष्यता के पक्ष में खड़े लोगों के प्रतिरोध का भी अस्त्र है इसलिए उसे सिर्फ भाषा या व्याकरण से ही नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में समझना और बरतना होगा. ये कविता को उपयोगितावाद के नज़रिये से देखना नहीं है बल्कि कविता को जीवन की गतिविधियों में रचाना बसाना है.

मौजूदा वर्ष हिंदी के महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी वर्ष भी है. वह हमारी भाषा के एक ऐसे कवि हैं जिनके जिक्र के बिना हिंदी भाषा की कविता का कोई भी सिलसिला अधूरा ही रह जायेगा. यही वजह है कि शिविर के दूसरे दिन का प्रथम सत्र मुक्तिबोध को समर्पित किया गया. उन्होंने मुक्तिबोध को याद करते हुए कहा कि सबकुछ राजनीति के भीतर होता है और हमें ये समझना चाहिए कि हमारी रचना किसके पक्ष में  रही है और उसे किस राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

मुक्तिबोध ने हर सामान्य मनुष्य और हर जागरूक मनुष्य से अपनी कविता में अपना राजनीतिक पक्ष साफ़ करने की बात की है. जैसे जैसे हम साहित्य की समाज में भूमिका को समझते जाते हैं, हमारी चुनौती और जि़म्मेदारी बढ़ती जाती है. तब साहित्य मात्र मनोरंजन नहीं रह जाता बल्कि वो बेहतरी के लिए संघर्ष का हिस्सा बन जाता है.

इस सत्र में विनीत तिवारी ने मुक्तिबोध के लेख “जनता का साहित्य किसे कहते हैं” का पाठ किया. इस  पाठ के पश्चात तमाम प्रतिभागियों ने लेख के कथ्य पर चर्चा की. इस पाठ का निष्कर्ष यही निकला कि जनता का साहित्य वह साहित्य है जो उसके जीवन की समस्याओं को संबोधित कर सकता है और उनका हल निकालने में हमारी मदद कर सकता है. मनुष्यता को बचाये रखने और मानवता को मुक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा इसी साहित्य से मिलती है. कुमार अंबुज ने कहा कि मुक्तिबोध ने जीवन विवेक को ही साहित्य विवेक कहा था और आज भी वह पैमाना बदला नहीं है बल्कि अपनी जगह पर मौजूद है.


शिविर के दूसरे दिन का दूसरा सत्र एक बार फिर युवा कवियों के कविता पाठ का था. पहले दिन के शेष प्रतिभागियों श्रद्घा श्रीवास्तव, अभिदेव आजाद और संदीप कुमार ने दूसरे दिन अपनी कवितायें सुनाईं. इन कविताओं में भी नॉस्टैल्जिया, आकांक्षाएं और कामनाएं बार-बार आईं. कुमार अंबुज, विनीत तिवारी, अनिल करमेले, आरती ने युवा कवियों की कविताओं पर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं. इसके अलावा शिविर में मौजूद अन्य साथियों दीपक, पूजा, मनु आदि ने भी इन कविताओं पर अपनी राय रखी. दूसरे दिन भी कविताओं पर टिप्पणी के बहाने कविता लेखन के अलग-अलग पहलुओं को छुआ गया. इस दौरान तुकांत और अतुकांत कविता, कविता में लयात्मकता, उसके बिंब विधान आदि पर विस्तार से चर्चा हुई. वरिष्ठों की राय में संदीप की कविता में एक परिपक्व विचार तो दिखा लेकिन वो जल्दबाज़ी का शिकार होकर जल्दी ख़त्म हो गया. अभिदेव आज़ाद की कविताएँ अपने आपको एक नए और अछूते शिल्प और भाषा में व्यक्त करती हैं लेकिन उनकी कविताएँ जीवन दृष्टि, जीवनानुभव और प्रगतिशील मूल्यबोध की मांग करती हैं. श्रद्धा की कविताएँ धीर – गंभीर हैं, उनमें विचार भी समृद्ध है लेकिन उन्हें नयी कविता की भाषा और मुहावरे को पकड़ने का प्रयास करना होगा.

 इस दौरान एक बात जिस पर आम सहमति बनी वह यह थी कि कुछ भी लिखने से पहले हमें मोटे तौर पर यह जानकारी अवश्य होनी चाहिए कि हमसे पहले के लोगों ने क्या-क्या लिखा है. इससे भी बढ़कर यह जानना जरूरी है कि कि हमसे पहले के लोगों ने क्या अच्छा और क्या चुनौतीपूर्ण लिखा है? सच यही है कि एक कवि अथवा साहित्यकार अपने कहने का तरीका, विषयवस्तु और जिस भाषा का वह इस्तेमाल करता है उसका चुनाव केवल अपने समय से ही नहीं करता बल्कि वह अपने पूववर्ती लेखकों को पढ़ते हुए भी उनसे लगातार सीखता रहता है.

चर्चा के दौरान वरिष्ठ साथियों ने युवा मित्रों को कुछ नाम भी सुझाए जिनको पढऩा उन्हें और अधिक परिष्कृत करेगा. जिन देशी-विदेशी रचनाकारों के नाम लिए गए वे हैं: रसूल हमजातोव, चांगीज आइत्मायतोव, मक्सिम गोर्की, हावर्ड फ्रास्ट, फ्योदोर दोस्तोयेवस्की, लेव तॉल्सतॉय, मिखाइल शोलोखोव, पाब्लो नेरुदा, बेर्टोल्ट ब्रेष्ट, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, शरतचंद्र, रेणु, हरिशंकर परसाई, प्रेमचंद, श्रीलाल शुक्ल, पाश आदि शामिल थे. जिन प्रमुख रचनाओं का नाम सामने आया वे हैं:  मेरा दागिस्तान, पहला अध्यापक, मेरा बचपन, मेरे विश्वविद्यालय, जीवन की राहों पर, आदि विद्रोही, मां, अपराध और दंड, समकालीन यूरोपीय कविता, अन्ना केरनिना, धीरे बहो दोन रे, रिल्के के खत, धरती धन न अपना, एक साहित्यिक की डायरी, आत्महत्या के विरुद्घ, राग दरबारी, चरित्रहीन, मैला आंचल, सदाचार का ताबीज, मुर्दाघर, कर्मभूमि आदि. ऐसा भी नहीं था कि शिविर केवल निर्धारित सत्रों में ही चला. औपचारिक सत्र तो कायदे के मुताबिक चले ही. उनके समापन के बाद भी प्रतिभागियों का उत्साह और जिज्ञासा कम नहीं हुए. ऐसे में चाय पीते हुए, खाना बनाते-खाते हुए और यहां तक कि भोजनोपरांत देर रात टहलते हुए भी युवा और वरिष्ठ कवियों का आपसी संवाद जारी रहा. लब्बोलुआब यह कि कहने को चार-पांच सत्रों वाला यह शिविर दरअसल 48 घंटों की एक संपूर्ण कार्यशाला में बदल गया था जिसका अंत आते-आते वरिष्ठ और युवा साथियों के बीच के संकोच और दूरी बरतते सम्मान की जगह आपसी स्नेह और करीबी ने ले ली. और जिस प्रेम और सम्बंधों की ऊष्मा के घर में ये हुआ, उस घर की दीवारें भी लंबे अरसे के लिए कविताओं में सराबोर हो गईं.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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बाल गंगाधर‘बाग़ी’ की कविताएँ

  बाल गंगाधर‘बाग़ी’

शोधार्थी जे.एन.यू. नई दिल्ली संपर्क : 09718976402 Email. bagijnu@gmail.com

अलग आस्वाद और बिंबों के साथ कवि बाल गंगाधर  बागी अपनी कविताओं के लय से न सिर्फ श्रोताओं को झुमाते हैं, बल्कि सामजिक क्रान्ति के सन्देश भी देते हैं. बागी को नीले आकाश और आंबेडकरी आकांक्षाओं का कवि कहा जा सकता है 



गेहूँ और कान की बाली


गेंहूँ की बाली खेतों में,मन की डाली में डोल रहें
धूप छाँव के कंधों पे,हर रहस्य हैं अपना खोल रहें
बालाओं के कानों बाली,नज़रें कितनी हैं टटोल रहें
घर की बाली से खेतों तक,सवर्णों के मन डोल रहें

पैदा घर की दहलीजों में,कितने काँटों के बींधों से
वो जवां हुई नज़रों में तड़प, कितने भौरों के सीने में
चलती है वह मटक जहाँ,दरिया जिसपे मनमानी है
बेकस कश्ती भौरों में तड़पती,उसकी यही कहानी है

खाये हों थापेड़े मौसम के,बीज से बाली बनने तक
कितने ओझल दिन रैन हुए,बीज से रोटी बनने तक
कितनी दोपहर में नग्न खड़ी,सुनहरी,लाली के जैसे
क्यों? दूर हुई खलियानों से,घर जाती हुई सवर्णों के

दोनों बाली की दशा एक,न घर मेरे रह पाती हैं
अपनी हाथों से निकल,लाचार हमें कर जाती हैं
दोनों पे मेहनत खर्च मेरे,कई ख्वाब बुन जाती हैं
अनन्त प्रश्न सवर्णों के,घर जा करके बन जाती है

 दलित नारी का सौन्दर्य

झील सा निर्मल तेरा चितवन, फूलों जैसी काया है
मलय समीर तेरा चंचल मन,क्यों हसिया हाथ में आया है
सुमन की रंगत फूलों के संग,तेरे रंग पसीने हैं
लट छितराये बिखरी भौंहे, नैनों के रंग पीले हैं

सुर्ख लबों का रंग है सूखा,वीरां रेगिस्तानॊं सी
ढूँढ रही विधवा- सी वह,दुनिया रंग बहारों की
चातक जैसा धैर्य है उसका, अभिलाषा की वर्षा का
मिल जाये दो वक्त की रोटी, घर कपडा मेरे बच्चों का

मेरे आँसू हिमालय की निकलती,नदियों जैसे हैं
मेरे अहसास भी जलती चिताओं जैसे हैं रोशन
यही है सिलसिला बद से मेरी बदहाल हालत की
ढलती शाम की मानिन्द,बुझती शमाँ सी रौशन

गेंहू धान सरसो की डांठ काटती हूँ
भूँखें पेट बच्चों संग रात काटती हूँ
धूप ठंडी वर्षा की ध्यान छोड़कर के
कभी बुन के सपनों के तार काटती हूँ

क्यों और अब तक हिसाब लोगे ?
कब मुझे इसका जवाब दोगे ?
बेबस कर लूटी इज्ज्त का
कब तक उजडा शबाब दोगे ?

जब खो जाती पहचान यहाँ
अपनी धरती पर छाँव यहाँ
क्या मैं छुआछूत की जननी हूँ
ये दुनिया मुझे बताओ यहाँ

हर रोम है जलता सुलग-सुलग
जब लोग निहारें गाँव शहर
न मिले इज्जत मर्यादा से
मनुस्मृति की कटुता गाथा से !

दिन रात खटूँ मशीनों सी
पेट पीठ की बन छाया
अपशब्द अभद्र व्यवहारों की
अपमानित जाति मेरी काया !

रह-रह कर बादल सपनों का
नयनों की घटा बन जाता है
कभी तन्हाई,  संग अपनो के
कभी ज्वाला में ढल जाता है.

हम तुम्हारा बलात्कार कर देंगे: भारत माता की जय!

 संजीव चंदन 


ऐसा नहीं है कि उन्होंने पहली बार गुरमेहर कौर को और उसके दोस्तों को ही बलात्कार की धमकी दी है- ऐसा वे पहले भी करते आये हैं, क्या फर्क पड़ता है वे किस छात्र संगठन में हैं या किस समूह में- वे राष्ट्रवादी हैं, उनके राष्ट्रवाद का मतलब है ‘हाई कास्ट हिन्दू मेल’, यानी ‘सवर्ण हिन्दू पुरुष’. उनका राष्ट्रवाद लिंग केन्द्रित है- फैलससेंट्रिक.

वे स्वयंभू राष्ट्रवादी किसी अल्पसंख्यक की आवाज को पाकिस्तान भेज देना चाहते हैं, किसी दलित की आवाज पर आवाज पर उसे पीटना चाहते हैं, उसे मरने को मजबूर करते हैं, किसी स्त्री की आवाज को बलात्कार से दबा देना चाहते हैं- ऐसा करते हुए उन्हें कथित भारत माता की जय कहने में उन्माद और अतिरेक का आनंद आता है, भारत माता की जय, वन्दे मातरम या जय श्रीराम – वे ऐसा कुछ भी चीख सकते हैं, जब वे राष्ट्रवादी उन्माद में होते हैं.

वे सत्ता के संरक्षण में इतने निर्भीक होते हैं कि घटना-दर-घटना अंजाम देते जाते हैं और सत्ता का शीर्ष उनके बेशर्म बचाव में खड़ा हो जाता है, वह भी राष्टवाद की ढाल के साथ. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, कुछ ऐसे ही सिरफिरों ने एक लेखिका नीलिमा चौहान  के खिलाफ भाषिक बलात्कार को अंजाम दिया तो उसके भी पहले कविता कृष्णन जैसी सक्रिय एक्टिविस्ट के खिलाफ भी या दिल्ली विश्वविद्यालय की एक प्रोफ़ेसर के खिलाफ भी. सोशल मीडिया में ऐसे कई उदाहरण हैं 10वीं की छात्रा कनुप्रिया इन राष्ट्रवादियों के भाषिक हमले का शिकार हुई.  वे ऐसा हर रोज करते हैं. गुरमेहर कई और भी हैं- वे सब, जो उनके सवर्ण-पुरुष केन्द्रित, लिंग केन्द्रित राष्ट्रवाद से अलग भी किसी राष्ट्र को जानते समझते हैं.

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संकट कई और भी हैं- उनकी आक्रामकता इतनी प्रबल है कि हम सब राष्ट्रवाद-राष्ट्रवाद के शोर में शामिल हो गये हैं, जिसे 20वीं सदी में ही रवींद्रनाथ टैगोर जैसे लोगों ने नकार दिया था. ऐसा भी नहीं है कि सत्ता संरक्षित यह बलात्कारी राष्ट्रवाद एकतरफा विजयोन्माद में हो, उसे गुरमेहर जैसे कई लडकियां चुनौती दे रही हैं, कई लड़के चुनौती दे रहे हैं- उसके खिलाफ संवेदनशील लोगों की एक पूरी जमात है. दिल्ली विश्वविद्यालय में सामूहिक प्रतिरोध के लिए जुटे लोग ऐसा ही तो सन्देश दे रहे हैं. ये वे लोग हैं, जो पुणे से लेकर, हैदराबाद तक, जेनएनयू ,दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर जाधवपुर तक लगातार प्रतिरोध कर रहे हैं- सत्ता की निरंकुशता को इन लोगों से डरना चाहिए.

गुरमेहर कौर 

संकट यह है कि एक तार्किक बात को वे अतार्किक सेलिब्रेटी चकाचौंध से दबा देना चाहते हैं. पहले उनके पास एक अनुपम खेर होते थे, इस बार तो वीरेन्द्र सहवाग, गीता फोगट से लेकर योगेश्वर दत्त तक की फ़ौज खड़ी है. राष्ट्रवादियों की ही ‘कारगिल भावुकता’ से ‘खेल राष्ट्रवाद’ की भावुकता लड़ने को तैयार है. इस सब के बीच वह लडकी, 20 साल की लडकी गुरमेहर जो कहना चाहती थी, वह तो कहीं पीछे ही छूट गया. दरअसल बलात्कारी राष्ट्वादियों की जमात अपने बनाये दायरे से बाहर कुछ समझना नहीं चाहती, समझना उनके वश की बात नहीं है, क्योंकि उनकी समझ पर नागपुर (संघ मुख्यालय) का ब्रेनवाश हावी है.

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संकट यह भी है कि गुरमेहर कौर से मुकाबले के लिए इन बलात्कारी राष्ट्रवादियों के पक्ष में कुछ स्त्री चेहरे भी सामने आ जाते हैं- जो छात्र संगठनों से लेकर दुर्गावाहिनी तक सक्रिय रहते हुए यह सोच भी नहीं पाते कि बलात्कार की यह भाषा कैसे उनके खिलाफ भी एक स्टेटमेंट है, उनकी सक्रियता के खिलाफ भी एक चेतावनी. वे फैलससेंट्रिक राष्ट्रवाद के पक्ष में खडी एक टूल भर ही तो होती हैं अन्यथा एक स्त्री का भाषिक बलात्कार या उसे मिलने वाली बलात्कार की धमकी उनके लिए सुकून और राष्ट्रवादी स्वर्ग का विषय कैसे हो सकती है. यह समझ से परे है कि किसी की चेतना इतनी कुंद कैसे की जा सकती है कि वह अपने ही वर्ग के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगे. गुरमेहर के खिलाफ किसी गीता फोगट या किसी जोशी, झा को देखकर आश्चर्य और दुःख होता है.

गुरमेहर कौर का शान्ति सन्देश, जिसके सन्देश समझने की बजाय तथाकथित राष्ट्रवादी उन्हें ट्रोल करने लगे…

दुखद यह भी है कि आज जब विश्वविद्यालयों सहित पब्लिक स्पेस पर पीछे छूट गये समूहों की भागीदारी बढ़ी है, बल्कि यह सिलसिला शुरू ही हुआ है, तभी सवर्ण-पुरुष केन्द्रित विमर्श, भाव और भाषा का माहौल बन रहा है. बलात्कार की ये धमकियां इस स्पेस को पुनः छीन लेने की कवायद ही तो हैं.

पढ़ें : सोनिया गांधी का नागरिकता प्रसंग 

सुखद यह है कि बलात्कारी राष्ट्रवाद के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रदर्शनों में लड़कियों की बहुतायत देखने को मिल रही है. ऐसा देश भर में हो रहा है. हम सब उम्मीद ही कर सकते हैं और इस उम्मीद को सफल बनाने में शामिल हो सकते हैं कि समय को पीछे की ओर ले जाने की जिद्द पर अड़े बलात्कारी राष्ट्रवादियों को एक दिन हार माननी ही पड़ेगी!

बहनों, हम तुम्हारे संघर्ष में तुम्हारे साथ हैं, लेकिन इस लड़ाई की अगुआई तुम्हें ही करनी चाहिए. और हां, थकना नहीं या पीछे नहीं हटना, इतिहास से सबक सीखो, क्योंकि लड़ाई के मोर्चे और भी हैं, जहां तुम्हें होना चाहिए ! यह लड़ाई सामूहिकता और निरंतरता की लडाई है, क्योंकि बलात्कारी राष्ट्रवादी तुम्हें शुंग काल में खीच ले जाना चाहते हैं, मनुस्मृतीय विधानों में जकड़ देना चाहते हैं.

ब्राह्मणवाद,पितृसत्ता और पुनरुत्थानवाद की चुनौतियों से निपटने की जरूरत

स्त्रीकाल और राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन द्वारा वर्तमान का ‘सामाजिक और सांस्कृतिक संकट तथा दलित साहित्य के समक्ष चुनौतियां’, और ‘ समता की समग्र समझ: दलित स्त्रीवाद’ विषय पर एक दिवसीय सेमिनार सत्ता विरोधी वक्तव्य के साथ आज सम्पन्न हुआ। सेमिनार के वक्ताओं ने ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता और पुनरूत्थानवाद की चुनौतियों से निपटने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि आज राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह की आक्रामकता देखी जा रही है, वह एक राष्ट्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव के इस प्रस्ताव से उपस्थितों ने सहमति जताई कि आज कमजोर राजनीतिक विपक्ष के दौर में विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी ही वास्तविक प्रतिपक्ष हैं.
प्रथम सत्र में वर्तमान का ‘सामाजिक और सांस्कृतिक संकट तथा दलित साहित्य के समक्ष चुनौतियां’ विषय की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक चौथीराम यादव ने कहा कि ‘कलबुर्गी, पानसारे आदि लेखकों की ह्त्या कोई नई घटना नहीं है, ब्राह्मणवादियों ने भक्तिकाल में भी विरोधी लेखकों की हत्याएं करवाई है. उन्होंने कहा कि रामराज्य को आदर्श बनाकर पेश करने वाली ब्राह्मण चेतना ने दलित संत कवि रैदास की कल्याणकारी राज्य की संकल्पना बेगमपुरा को तबज्जो तक नहीं दिया, जबकि रैदास कहते हैं: ‘ऐसा चाहूँ राज्य मैं जहां मिलै सबन को अन्न, छोट-बड़े सब सम बसै रैदास रहे प्रसन्न.” चौथीराम यादव ने वर्तमान में हिंदुत्ववादी उत्साह के खतरे और उसे संबोधित करने की दलित साहित्य की भूमिका को जरूरी बताया.
सत्र की शुरुआत में लेखिका रजनीतिलक ने दलित साहित्य की प्रवृत्तियों पर अपनी बात कहते हुए प्रतिरोध को उसकी मूल प्रवृत्ति के रूप में चिह्नित किया साथ ही इस बात पर चिंता जताई कि अभी दलित साहित्य अपनी अस्मिता की दावेदारी के साथ दर्ज ही हो रहा है कि इसके ही एक खेमे से ‘दलित शब्द’ पर ही आपत्ति दर्ज की जा रही है.”
 
आलोचक बजरंग बिहारी ने कहा कि ‘रामजस कॉलेज सहित हालिया घटनाओं को लेकर चिंतित हूँ, यह चिंता आज के विषय से भी जुड़ जाती है, जिस भाषा और भंगिमा के साथ राष्ट्रवाद को परोसा जा रहा है वह खतरनाक है. दलित साहित्य को इन सवालों को, उग्र हिंदुत्व के खतरे के सवालों पर विचार करना होगा.”
 
युवा आलोचक गंगा सहाय मीणा ने वर्तमान की स्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उससे हो रहे संघर्षों को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि ‘ सारे संघर्षों को वास्तविक रूप से एक साथ आना होगा. जय भीम लाल सलाम को भी और उसे विस्तार देते हुए जय भीम जोहार जयपाल तक, ऐसा कहते हुए  गंगा साही  संविधान निर्माण के दौरान जयपाल सिंह मुंडा और बाबा साहेब आंबेडकर के संवादों को ख़ास तौर पर रेखांकित कर रहे थे.
 
दूसरे सत्र में ‘समता की समग्र समझ: दलित स्त्रीवाद’ विषय पर वक्ताओं ने दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी और उसकी मुख्य स्थापनाओं पर बात की. वक्ताओं ने जेंडर, जाति और वर्ग के सवालों को दलित स्त्री के नजरिये से व्याख्यायित किया. छात्र एक्टिविस्ट और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधरत अपराजिता ने दलित पैंथर के घोषणा पत्र को रेफर करते हुए दलित शब्द के भीतर महिला अस्मिता को शामिल किये जाने की ऐतिहासिकता पर बात की और साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इस ऐतिहासिकता के बावजूद दलित स्त्रियों को अपनी बात क्यों कहानी पड़ी.
 
आलोचक कवितेंद्र ने जहां दलित स्त्रियों के दोहरे शोषण को रेखांकित करते हुए जाति और जेंडर को शोषण की कैटगरी के रूप में चिह्नित किया वहीं उन्होंने कहा कि शोषण तो त्रिस्तरीय है, यानी वर्ग भी एक कैटगरी है. साथ ही उन्होंने कहा कि सभी अस्मिताओं को, सारे संघर्षों को अनिवार्य शत्रुता से बचते हुए साझे संघर्ष की भूमिका बनानी चाहिए.’
आलोचक और रचनाकार रजनीदिसोदिया ने फिल्मों और साहित्य के माध्यम से अलग-अलग जाति-समूहों की स्त्रियों की अलग-अलग मुक्ति प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया और दलित स्त्री के अपने संघर्ष में सामूहिकता के भाव और सवर्ण स्त्री के संघर्ष में निजता के भाव को चिह्नित किया.
 
स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन ने आंतरिक नेतृत्व की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने यह भी सपष्ट किया कि जबतक दलित स्त्री और स्त्री के निजी संपत्ति के अधिकार सुनिश्चित नहीं होंगे,  उतराधिकार को पुत्राधिकार से मुक्त कर पुत्र्याधिकार तक नहीं विस्तृत किया जाएगा तब तक उसकी यौनिकता पर नियंत्रण की व्यवस्था बनी रहेगी.
 
सत्र की अध्यक्षता करते हुए रचनाकार और आलोचक अनिता भारती ने कहा कि सत्र का विषय ‘ समता की समग्र समझ: दलित स्त्रीवाद’ ही अपने-आप में दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी सपष्ट कर देता है. उन्होंने दलित स्त्री के लेखन और सवर्ण स्त्री के लेखन में विषय और ट्रीटमेंट के भेद पर भी बात की.
 
स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने आयोजन के उद्देश्य को लेकर बताया कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से व्यवस्था को तत्कालीन और सर्वकालिक चुनौतियों के लिए आयोजन के महत्व पर जोर दिया. उनके अनुसार इन संवादों से वर्चस्वशाली व्यवस्था और दर्शन के खिलाफ समतामूलक दर्शन को मजबूती मिलती है. टिपण्णीकार के रूप में महेश ठोलिया और भीम प्रज्ञा के संपादक हरेश पंवार ने अपनी बात कही.
 
दोनो सत्रों का संचालन क्रमशः अरुण कुमार और धर्मवीर सिंह ने किया. इस अवसर पर कई किताबों का लोकार्पण भी किया गया. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के द्वारा प्रकाशित और अनिता भारती के अतिथि संपादन में संपादित ‘दलित स्त्रीवाद’, मजीद अहमद द्वारा संपादित ‘मेरा कमरा’ सहित, रजनी तिलक की किताब पत्रकारिता एवं दलित स्त्रीवाद, टेकचंद का उपन्यास दाई, सुशीला टाकभोरे का उपन्यास तुम्हें बदलना ही होगा और कावेरी की आत्मकथाम  टुकड़ा टुकड़ा जीवन आदि किताब लोकार्पित किये गये.
 कार्यक्रम का प्रायोजन जयराम यादव,  चेयरमैन संतोष देवी चैरिटेबल ट्रस्ट जखराना का था.

शूद्रा: एक समाज शास्त्रीय अध्ययन (धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण से)

डा .कौशल पंवार

  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709



सांस्कृतिक अतीत के दीर्ध पटल पर दृष्टिपात कर ‘शूद्रा’ के संदर्भ में क्या अवधारणाएं मिलती हैं और उसके सामाजिक निहितार्थ क्या रहे हैं उसका अध्ययन करने का यहाँ उपक्रम है. भारतीय संस्कृति का इतिहास अत्यन्त प्राचीन माना गया है. मिथकों की मानें तो सतयुग, त्रेता, द्वापर व कलियुग के रूप में चार युगों का वर्णन है. प्रत्येक युग की अपनी ही विशेषताएँ है, अपने ही बनाए गये नियम है तथा अपने ही जनमानस के लिए विभिन्न आदर्श है. स्मृतियाँ भी इसी प्रकार विभिन्न युगों के जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए निर्धारित किए गए नियमों का संकलन है. सतयुग में मनु प्रोक्त धर्मशास्त्र की प्रधानता थी, त्रेता युग में गौतम प्रणीत धर्मशास्त्र की प्रधानता रही, द्वापर में शंख के द्वारा कहे गये धर्मशास्त्र प्रधान रहे तथा कलियुग में पूर्वयुगीन पाराशर के धर्मशास्त्रों में धर्म-व्यवस्था समुचित बताई गयी. (1)


जितो धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं वानृतेञ्च, 
जिताश्चैरेश्च राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः.
सीदन्ति चाग्निहोत्राणि गुरुपूजा प्रणशयति,
कुर्मायश्च प्रसूयन्ते तस्मिन्कलियुगे सदा॥ (2) 

यदि स्त्री धूर्त पति का अवदान करती है तो वह मृत्यु के अनन्तर कुतियां अथवा सूकर योनि को प्राप्त करती है. यथा:
दरिद्रं व्याधितं धूर्तं भर्तारं याऽवमन्यते.
सा शुची जायते मृत्वा सूकरी च पुनः पुनः॥ (3)

पति के जीवित रहने पर जो नारी निराहार रहकर व्रत का आचरण करती है, वह स्त्री पति की आयु का हरण करती है और नरक को प्राप्त करती है. मनु के द्वारा कहा गया है कि जो स्त्री पति की आज्ञा के बिना व्रत का आचरण करती है, वह उसका तामस व्रत कहलाता है. महर्षि पाराशर ने स्त्रियों के गर्भ ठहरने व गर्भपात के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया है. यथा:

बान्धवानां सजातीनां दुर्वृतं कुरुते तु या,
गर्भपातं च या कुर्यान्न तां संभाषयेत्क्वचित्.
यत्पापं ब्रह्महत्या द्विगुणं गर्भपातके,
प्रायश्चिते न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते॥ (4) 

जो स्त्री बन्धुओं, सजातियों के साथ दुराचारिणी हो जाये अथवा जो गर्भपात कराये, उससे कभी वार्तालाप न करें. जो पाप ब्रह्महत्या करने पर लगता है, उसका कोई प्रायश्चित नहीं है. इसलिए उस स्त्री का त्याग ही उचित है. स्त्री द्वारा गर्भ का धारण किया जाना स्त्री के दुराचार का परिणाम है या पुरुष (बन्धु-बान्धव या सजातीय) द्वारा बलपूर्वक सम्बन्ध बनाना. इस बात को ऋषि ने स्पष्ट नहीं कहा है. गर्भपात के पीछे ब्रह्महत्या के पाप को जोड़कर एक स्त्री के जीवन को आस्था व विश्वास के नाम पर जंजीरों मे जकड़ा गया है. महर्षि पाराशर ने स्त्रियों के लिए सती व ब्रह्मचर्य का समर्थन करते हुए कहा हैः

मृते भर्तरि या नारि ब्रह्मचर्यवृते स्थिता.
सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः.
तिस्रः कोटयोऽर्धंकोटी च यानि लोमानि मानवे.   
तावत्कालं वसेत्स्वर्गें भर्तारं याऽनुगच्छति॥ (5)

महर्षि पाराशर ने स्त्रियों के लिए सती व ब्रह्मचर्य का समर्थन करते हुए कहा है:

मृते भर्तरि या नारि ब्रह्मचर्यवृते स्त्रिता,
सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः.
तिसृ कोटयोऽर्धंकोटि च यानि लोमानि मानवे,
तावत्काल वसेत्स्वर्गें भर्तारं याऽनुगच्छति॥ (6)  



पति के मर जाने पर जो स्त्री ब्रह्मचर्य व्रत से परायण होकर अपना जीवन बिताती है, वह स्त्री, जिस प्रकार अपने आचरण में स्थित हुए ब्रह्मचारी स्वर्ग में जाते हैं, उसी प्रकार स्वर्ग को प्राप्त करती है. मनुष्य के शरीर में साढे तीन करोड़ रोग बताए गए हैं, उतने ही वर्ष तक वह स्त्री स्वर्ग को प्राप्त होती है. जो स्त्री पति की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह नहीं करती तथा विधवा के रूप में जीवन व्यतीत नहीं करती तो वह पति के साथ सती हो सकती है. इसका पुण्यफल भी उसे प्राप्त होगा. यथा:

व्यालग्राही यथा व्यालं बलाद्धरते बिलात्,
एवं स्त्री पतिमुद्धृत्य तेनैव सह मोदते॥ (7)

पति के मर जाने पर सती होती है वह स्त्री, जिस प्रकार सर्प को पकड़ने वाला बलपूर्वक बिल में से सर्प को निकाल लेता है, उसी प्रकार वह स्त्री भी पति का उद्धार करके स्वर्ग में उसी के साथ आनंद प्राप्त करती है.

इससे प्रतीत होता है कि स्त्री पर आस्था, विश्वास तथा स्वर्ग का लोभ आदि के नाम पर कर्तव्य आरोपित किए गए हैं. बालिकाओं के विवाहादि संस्कार शीघ्रातिशीघ्र सम्पन्न कर दिये जाने का विधान निर्मित कर दिया गया ताकि उनकी अपनी निर्णय शक्ति का विकास ही न हो पाए, इसके लिए अवश्य ही स्त्रियों की रक्षा का कारण बताया गया है. यथा:

अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा तु रोहिणी,
दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊधर्वं रजस्वला.
प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति,
मासि-मासि रजस्वत्याः पिबन्ति पितरोऽनिशम्.
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च,
त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्॥ (8)  

आठ वर्ष की गौरी, नौ वर्ष की रोहिणी, दस वर्ष या उसके ऊपर की कन्या रजस्वला होती है. बारहवां वर्ष प्राप्त होने पर जो कन्यादान नहीं करता, प्रत्येक मास में होने वाले रज का सदा उसके पितर पान करते हैं. माता-पिता व बड़ा भाई तीनों रजस्वला कन्या को देखकर नरक को प्राप्त करते हैं. वस्तुतः नारी को समस्त रूपों में कठोर अनुशासन से बांधा गया है.


धर्मशास्त्रों में स्त्री  की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए भी समाज में उनकी स्वतंत्रता तथा अधिकारों का हनन करके उनकी प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध सा कर दिया था जिसमें सामाजिक विकास की प्रक्रिया में स्त्री की भूमिका काफी निर्बल हो गयी थी. उनसे तो साक्ष्य देने का देने का भी अधिकार छीन लिया गया था यथाकृ “स्त्री की बुद्धि अस्थिर होती है अतः वह गवाही के योग्य नहीं है.” (9) परन्तु स्त्रियों की साक्ष्य स्त्रियां हो जाती है “स्त्रीणां साक्ष्य स्त्रियः कुर्यः.” (10) धर्मसूत्रों और स्मृतियों का युग स्त्री सन्दर्भ की दृष्टि से बहुत उज्ज्वल नहीं था. तत्कालीन समाज में धर्म और समाज की रक्षा के नाम पर अनेकों ऐसी व्यवस्थाओं का नियमन हुआ जो स्त्री की गरिमा के विरुद्ध था.

‘ऋग्वेद’ की उपमा “अनवधा पतिणुष्टेव नारी” (11) से स्पष्ट है कि तत्कालीन समाज में पति संसर्ग में रहने वाली और पति के द्वारा सेवित पतिव्रता नारी को अनिन्धा, विशुद्ध चरित्र वाली माना जाता था. (12) ‘अथर्ववेद’ में पति के सहचर्य में रहने वाली साध्वी नारी को सुपत्नी कहा गया है. (13) ‘अथर्ववेद’ में विवाह संस्कार के एक मन्त्र में वधू को पति की अनुवर्तिनी बनने को कहा गया है. (14) वह अपने जीवन में वस्तुतः पति का अनुवर्तन करती थी. ‘ऋग्वेद’ के सायण भाष्य से विदित होता है कि देव-शाप से नपुंसक बने हुए आसंग नामक राजा को उसकी पत्नी ने अपनी तपस्या के बल पर पुंसत्व की प्राप्ति कराई थी. (15)

‘मनुस्मृति’ व ‘याज्ञवल्क्यस्मृति’ में नारी की मुक्ति सम्बन्धी अवधारणा और श्रेष्ठता को पाने का कारण बताते हुए मनु कहते हैं:
अक्षमाला वसिष्ठेन संयुताऽधमयोनिजा.
शारङ्गी मन्दकाले न जगामाश्चयर्हणीयताम्॥ (16) 

नीच योनि से उत्पन्न हुई अक्षमाला नामक स्त्री वशिष्ठ से विवाहित होने से तथा शरङ्गी नामक स्त्री मन्दपाल ऋषि से विवाहित होकर पुत्रता को प्राप्त हो गयी. आगे कहा गया है:

एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्ट प्रसूतयः.
उत्कर्ष योषितः प्राप्तः स्वैः स्वैः भ्रर्तृगुणैः शुचैः॥ (17)

भिन्न और नीच योनि से उत्पन्न हुई स्त्रियां इस संसार में अपने-अपने पति के शुभ गुणों के कारण श्रेष्ठता को प्राप्त हुई है.

उपर्युक्त दोनों श्लोकों में देखने योग्य बात यह है कि पति के प्रताप से ही पत्नियां मुक्त हो रही हैं तथा दूसरा शब्द आया है “नीचयोनि” इसका अर्थ क्या है? उपर्युक्त उद्धरणों में जो भावार्थ निकलता है वह स्त्री समुदाय की अस्मिता, उनके गुणों को न केवल पूरी तरह नकार देता है बल्कि पुरुष के संसर्ग में ही उसकी मुक्ति की बात करता है. पति जैसा चाहे, वैसा पत्नी करे. उसकी अपनी इच्छाएं, सपनें, धड़कनों, चाहतों का कोई मोल नहीं. वह अगर गुलाम बनकर रहे, कोई प्रतिकार न करे तो गुणवान और संस्कारित कही जायेगी. लेकिन अगर उसने जहाँ अपने सपनों को, चाहतों को स्वतन्त्र रूप से पंख लेने की कोशिश की तो सर्वप्रथम उसे चरित्रहीन, कलंकनी कहा जाएगा. एक और शब्द गढ़ा है पितृसत्तात्मक मूल्यों के निर्वहन वाले विद्वत् जनों ने “पतिता” यानि पति से इतर किसी से भी सम्बन्ध बनने पर वह पतिता कही जाती है. देह व्यापार करने पर वेश्या. इसी के समानान्तर यदि कोई पुरुष ऐसा करता है तो उनके लिए कोई ऐसा शब्द नहीं है, जो उसकी पहचान अलग बनाए? असल में प्राचीनकाल से लेकर आज तक पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने निरन्तर ऐसे शब्दों, अर्थों और अवधारणाओं का निर्माण किया कि स्त्री के भीतर प्रतिरोध की चेतना विकसित ही न होने पाए. वह सेविका, मातृसत्ता की मूर्ति, अच्छी घरेलू पत्नी, पतिव्रता, सुगढ़ ग्रहणी, सेविका ही बनी रहे. जरा सा प्रतिवाद करने या घर की चैखट लाघंने पर चरित्रहीन होने का तमगा उस पर लगा दिया जाता है. इसलिए यहां पर कहा जाना चाहिये कि ब्राह्मणवादी वैचारिकी से निर्मित संस्कृति ने ऐसे पितृसतात्मक मूल्यों एवं जातिवादी चेतना का निर्माण किया जो आज तक भी निरन्तर समाज में स्थापित है और इसमें संस्कृत के धर्मग्रन्थों ने अनिवार्य भूमिका भी निभाई है. किसी भी तरह से इस व्यवस्था के नियमों को तोड़ने पर उनके लिए अनेक तरह से कड़े विधान और प्रायश्चित के नियम बनाये गये हैं. यथा:


१. भक्ष्याभक्ष्य का विधानरू स्त्री के वश में रहने वाले का अन्न नहीं खाना चाहिए –
अवीशस्त्री स्वर्गकारस्त्रीणित ग्रमयाणिनाम्.
शस्त्रविक्रयिकर्मारतन्तु वायश्र्ववृतिनाम्॥ (18)
२. वेश्यों के अन्न को नहीं खाना चाहिए.
३. मनु पत्नी के साथ भोजन का निषेध करते हैं यथा:
नाश्नीयाद्भार्यया सार्थं नैनामीक्षेत चाश्नतीम्.
युवतीं जृभ्भमानां व न चासीनां यथासुखम्॥ (19)

पुरुष स्त्री के साथ एक थाली में न खाये, भोजन करती हुई, छींकती हुई, जंभाई लेती हुई, मनमाने ढंग से बैठी हुई स्त्री को न देखे.
४. पुरुष पत्नी के सामने एक वस्त्र पहनकर एवं खड़ा होकर भोजन न करें.
५. याज्ञवल्क्य ने अपने से उच्च जाति की कन्या से बलात्कार करने पर मृत्यु दण्ड तथा अपनी या अपने से नीच जाति की कन्या से अनाचार पर भारी अर्थदण्ड की व्यवस्था की है.
६. पति की हत्या, गर्भपात या किसी नीच जाति के पुरुष संसर्ग से गर्भवती होने पर मृत्युदण्ड का विधान किया गया है. (20)
७. यदि कोई पुरुष किसी दासी, अपने बच्चे की दाई या नौकर की पत्नी से सम्भोग करता था तो उसे ५० पणों का दण्ड दिया जाता है. (21)

धर्मशास्त्र, जो मूलतः सूत्रों, स्मृतियों, कौटिलीय अर्थशास्त्र, महाकाव्यों, पुराणों टीकाओं एवं निबन्धकारों से मिलकर बने है, भारतीय ज्ञान-परम्परा का अकिंचन अंग माने गये है. इन सभी धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में स्त्रियों के लिए असाम्यता का विधान ही वर्णित किया गया है स्त्री के लिए प्रयुक्त किए गए सम्बोधन लैंगिक असाम्यता के स्वर को मुखरित करते है. यथारू ओजस्वती (22), सहस्रवीर्या (23) सहीयसी (24) अत्यन्त बल वाली साम्राज्ञी (शासिका) (25) मनीषा (मन को वश में करने वाली) (26) राज्ञी (दीप्तिमान्) (27) सभा सदा (सभा के अधिकारी) (28) अषाढा (अपराजिता घोषित किया जाना) (29) यज्ञिया (यज्ञ करने वाली उपाधि से युक्त) (30) स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ (ब्रह्मा स्त्री से विभूषित है). (31)


किसी सभ्यता की आत्मा को समझने तथा उसकी उपलब्धियों एवं श्रेष्ठता के मूल्यांकन का सर्वोत्तम आधार उसमें महिलाओं की स्थिति का अध्ययन करना है. तदर्थ स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को जानने का सर्वोत्तम उपाय है, उसको दिए गये अधिकारों के बारे में जानना.


* शिक्षा का अधिकार


‘ऋग्वेद’ में शिक्षा को मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार माना गया है. (32) शिक्षा से व्यक्ति विशेष में बुद्धि, आत्मविश्वास एवं कार्य क्षमता का विकास होता है. वस्तुतः शिक्षा ही मनुष्य को सही अर्थों में मानवता से भूषित करती है. यह पिता के समान पथ-प्रदर्शक, माता के समान संरक्षिका होती है जो सदैव सच्चे मित्र की भांति मार्ग में सहायक होती है. प्राचीन काल में नगर एवं ग्राम से दूर आचार्यों के गुरुकुल के सन्दर्भ मिलते हैं.

भारतीय मनीषियों ने सम्पूर्ण जीवन को चार आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास में विभाजित करते हुए ब्रह्मचर्य को शिक्षा काल से जोड़ा था जिसका अर्थ था- ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाध्ययन एवं धर्म के अर्थ को समझना और सदा अस्तेयपूर्ण जीवन बिताते हुए व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करना.

वैदिक युग में कुछ सन्दर्भ प्राप्त होते हैं. जहां पर ब्रह्मचारिणी के रूप में स्त्रियां शिक्षा प्राप्त करती थी. ऐसी कन्याओं को दो वर्गों में विभाजित किया गया था – 1. साधुवधू 2. ब्रह्मवादिनी. (33)

1. साधुवधू – जो विवाह पूर्व तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती थी.
2. ब्रह्मवादिनी – जो गृहस्थ जीवन से विमुख होकर अपना जीवन तपस्या करके बिताती थी.
कुछ स्त्रियों का उल्लेख ही हमें प्राचीन साहित्य में मिलता है. केवल सन्तोषजनक कहा जा सकता है.


‘ऋग्वेद’ में मन्त्र की रचना करने वाली लगभग २० ऋषिकाओं का वर्णन मिलता है. यथा: घोषा काक्षीवती (ऋ.१०/३९/१-१४), गोधा (ऋ. ५/२८१-६), विश्ववारा (ऋ. ५/२८/१-६), अपाला (ऋ. ८/९१/१-७), निषत् बुहू (ऋ. १०/१०९/१७), अदिति (ऋ. १०/७२/ध्१-९), इन्द्राणी (ऋ. १०/८६/१-२३/१०, १४५/१-६), सरमा देवशुनी (ऋ. १०, १०८, २, ४, ६, ८, १०, ११), रोमशा (ऋ. १/१७९/१-६), उर्वशी (ऋ. १०/९५/२, ४, ७, ११, १३, १५, १६, १८), लोपामुद्रा (ऋ. १/१७९/१-६), यमीवैवस्वती ऋ.१०/१०/१, ३, ५, ६, ७, ११, १३), शाश्वती अङिरसी (ऋ. ८/१/३४), सूर्या (ऋ. १०/८५/१-४७), सावित्री (ये स्त्री ब्रह्मवादि स्त्रियां है, ऋ. १०/८५/१-४७), सिकतानिनावरी (ऋ.९/८६/११/२०), यमी वैवस्वती (ऋ. १०/१०/२, ३, ४, ६, ७, ११, १३), इन्द्रस्नुषा (ऋ. १०/२८/१), अगस्त्य स्वसा (ऋ. १०/६०/६), दक्षिणा प्रजापत्या (ऋ. १०/१०७/१-११), वागाम्भृणी (ऋ. १०/१२५/१-८), कुशिका रात्रि (ऋ. १०/१२७/१-८), ऋद्धा कामायनी (ऋ. १०/१५१/१-५), इन्द्र मातरः (ऋ. १०/१५३/१-५), शची पौलोमी (ऋ. १०/१५९/१-६), सार्दराज्ञा (ऋ. १०/१८९/१-३).

इन ऋषिकाओं से स्वतः सिद्ध होता है कि ऋग्वैदिक काल में कुछ ऋषिकाएँ अवश्य रही होंगी जिन्होने मन्त्रों और सूक्तों की रचना की थी. प्राचीन भारत में स्त्री शिक्षा निषेध के बारे में आभा मिश्रा पाठक (पृ. २६१) लिखती हैं कि उच्च वर्ग की कन्याओं का उपनयन संस्कार सम्पन्न होता था और वे विशिष्ट विषयों का अध्ययन करती थी परन्तु उच्च अध्ययन के लिए गुरुकुल में भेजने की प्रथा मान्य नहीं होने के कारण वह घर पर ही शिक्षा प्राप्त करती थी. परिवार के निकट सम्बन्धी उसे शिक्षा देते थे. उन्हें धर्म और दर्शन की विशेष शिक्षा दी जाती थी. ‘ऋग्वेद’ में अपाला द्वारा अपने पिता की कृषि कार्य में सहायता करने का वर्णन प्राप्त होता है. (34) गृह-कृषि कार्य हेतु कूपों से जल लाने वाली, (35) गाय दुहने वाली एवं मक्खन तैयार करने वाली, (36) कताई, बुनाई (37) एवं सिलाई (38) में निपुणता रखने वाली स्त्रियों के उदाहरण इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि तत्कालीन स्त्रियाँ प्रतिदिन के कामों में भी पर्याप्त कुशल थी. गाय दुहने में निपुणता रखने के कारण ही उन्हें दुहिता भी कहा गया है. (39) तत्कालीन स्त्रियाँ युद्ध कला में भी निपुण थी. विश्पाल द्वारा युद्ध में घायल होना एवं अश्विनी कुमार द्वारा उसके पैरों की शल्य क्रिया किया जाना इस बात को ओर स्पष्ट करते हैं. (40) स्त्रियों के लिए गायन एवं नृत्य कला में पारंगत होने के सन्दर्भ भी प्राप्त होते हैं. (41) ‘तैत्तिरीय संहिता’ एवं ‘मैत्रायणी संहिता’ में स्त्रियों द्वारा नृत्य एवं गायन की शिक्षा प्राप्त करने का उल्लेख भी मिलता है. (42)

उपर्युक्त संदर्भ से ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की शिक्षा की व्यवस्था के लिए कुछ सन्दर्भ दिखते हैं लेकिन उनमें “शूद्रा” के लिए क्या व्यवस्था थी? इस सन्दर्भ में ‘ऋग्वेद’ भी मौन दिखाई देता है. द्विज वर्णा के लिए भी यह व्यवस्था सुदृढ़ रूप से दिखाई नहीं देती. कालान्तर में उसे भी सब अधिकारों से वंचित कर दिया गया.

संभवतः कहीं पर भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि शूद्र या शूद्र स्त्री भी ऋचाओं का सृजन किया करती थी. जिस प्रकार का विधान शूद्रों के लिए बना दिया गया था उसमें शूद्र स्त्री कैसे अलग रह सकती थी? उस पर भी शूद्र के लिए बनाये गये विधान पूरी तरह से लागू होते थे.

हमने पहले भी उल्लेख किया है कि धर्मशास्त्रों ने ऐसी विलगावपूर्ण सूक्तियों और मन्त्र/श्लोकों का निर्माण किया जिसमें स्त्री व पुरुष के रूप में ही समाज का विभाजन नहीं हुआ बल्कि ऊंची एवं नीची जाति के रूप में समाज बंटता चला गया. हालांकि इस बंटवारे का कोई ठोस वैज्ञानिक या प्रकृतिजन्य आधार नहीं था  बल्कि अपने वर्चस्व, प्रभुता एवं अपने वर्ग को बचाए रखना था. जिस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र से शूद्र व अछूतों को बाहर किया गया, उसी प्रकार स्त्री को भी उससे बाहर किया गया. हालांकि कहीं-कहीं पर यह उल्लेख आता है कि प्राचीन समय में कुछ स्त्रियाँ शिक्षित थी और पिता और पति के साथ यज्ञ में शामिल हुआ करती थी. हम इस तथ्यात्मक, वास्तविकता या प्रमाणिकता का विश्लेषण करेंगें. लेकिन उससे पहले यहां शिक्षा के लिये यज्ञोपवीत संस्कार का सर्वप्रथम उल्लेख करेंगे. भारत में प्राचीन काल से ही वर्ण-व्यवस्था कायम कर दी गई थी. समाज चार वर्णों में बंटा हुआ था. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र. एक अन्य वर्ग था अछूत जिसको किसी भी वर्ग में स्थान नहीं दिया गया था. अन्य जातियों की तरह स्त्रियाँ भी जातियों में बंट गई थी क्योंकि ब्रह्मा के अंगों से ये चार वर्ण प्रमुख रूप से बने थे. इसी से पुरुषों की उत्पत्ति हुई थी. स्त्री की उत्पत्ति ब्रह्मा के किस अंग से हुई? यह नहीं बताया गया और न ही यह अनिवार्यता समझी गई. पुरुषों की जातियाँ निर्धारित थी. केवल पुरुषों के कर्मों के आधार पर ही जातियाँ निर्मित की गई थी. स्त्रियों के कर्मों के आधार पर जातियाँ नहीं बनी, यह घोर आश्चर्य है. स्त्रियाँ तो किसी कर्म के लायक नहीं समझी गई थी. ब्राह्मण मुख है- क्योंकि वही वेद मन्त्रों व धार्मिक कार्यों का कर्ता व रचयिता था. उसी के आधार पर पत्नी ब्राह्मण हुई. यानि उसकी कोई पहचान नहीं थी. क्षत्रिय बाहु है – उसका गुण लड़ना, रक्षा करना इत्यादि है. वही देश, समाज, कुटुम्ब व परिवार का रक्षक है. वह शस्त्र धारण करता है इसलिए उसकी पत्नी क्षत्राणी कहलाएगी. उसकी भी कोई पहचान नहीं. तीसरे पायदान पर आता है वैश्य यानि जंघा- उसका गुण है चलना, व्यापार करना आदि. इसकी पत्नी भी वैश्य कहलाएगी. इसकी भी कोई पहचान नहीं. फिर चैथे पायदान पर खड़ा है शूद्र- यानि सेवाकार्य करने वाला. इसकी पत्नी शूद्राणी यानि सेविका. यहां पर यह ध्यान रखना चाहिये कि उपर्युक्त तीनों वर्गों की पत्नियाँ भी सेविकाएं ही हैं. पति के गुणों से ही उनकी पहचान है. वह न तो शास्त्र की शिक्षा ले सकती हैं या न ही शस्त्र की तथा वह न ही व्यापार कर सकती है और न ही स्वतन्त्र भ्रमण. इसी प्रकार तीनों वर्णों के पुरुष का ही उपनयन संस्कार होने की बात धर्मशास्त्रों में कही गई है. स्त्रियों के उपनयन संस्कार को मनु ने अलग ढंग से स्थापित किया है. शूद्र का उपनयन होता ही नहीं था क्योंकि उसकी जरुरत नहीं थी. उपनयन संस्कार को विद्यार्थी का श्रुति विहित संस्कार कहा गया है. यानि ‘उपनयनम् विद्यार्थस्य श्रुतिः संस्कारः’ इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा ग्रहण करने से पूर्व विद्यार्थी का उपनयन संस्कार अनिवार्य था. लेकिन स्त्रियों के लिये भी उपनयन संस्कार का विधान था, वर्णन करते हुये कहा गया है. यथा:

अमन्त्रिकास्तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः.
संस्काराद्ये शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम्॥ (43)

केशान्त पर्यन्त नारी के समस्त कार्य (संस्कार) ठीक उसी प्रकार किये जाये, किन्तु वे वैदिक मन्त्रोच्चारण के बिना हो और नारियों का विवाह संस्कार ही उपनयन संस्कार के समान है. (44)



मनु की अनुसार स्त्रियों का विवाह ही यज्ञोपवीत हो, पतिसेवा ही गुरुकुल निवास हो और गृहकार्य ही यज्ञ के समान हो. इससे स्पष्ट होता है कि स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार नहीं था क्योंकि शिक्षा के पूर्व उपनयन एक अनिवार्य धार्मिक एवं कार्मिक अनुष्ठान था. स्त्रियों के लिये पतिसेवा ही सर्वश्रेष्ठ विद्या एवं धर्म का पालन माना गया.


अब हम पुनः लौटते हैं उस कथन की प्रमाणिकता की ओर, जब यह कहा जाता है कि प्राचीन समय में बहुत सी स्त्रियां शिक्षित थी और यज्ञ अनुष्ठान आदि में बैठा करती थी. इस संदर्भ में प्राचीन धर्मग्रंथ के अध्येता मुद्राराक्षस का कहना है कि बहुत से लोग तर्क देते हैं कि, “‘ऋग्वेद’ की ऋचाओं की लेखिकायें लोपाद्रुमा जैसी स्त्रियां थी. वे वहां थी, शायद उन्हें ऋषिका का दर्जा मिलता रहा होगा पर निश्चय ही वे गिनी-चुनी स्त्रियों में रही होंगी जो मध्य एशिया से ब्रह्मणों के साथ आई होंगी” पर भारत में ‘ऋग्वेद’ गवाही देता है कि, “ब्रह्मण, ऋचाओं में इन्द्र से शत्रु को जीतकर स्त्रियां दिलाने की प्रार्थना कर रहा था.” (45) इस प्रकार के विचार अन्य धर्मग्रन्थों में तथा महाकाव्यों में भी दिखाई देते हैं जो स्त्रियों की कारुणिक दशा का वर्णन करते हैं. महाभारत में भी स्त्री के लिये द्रष्टव्य है- “क्षुरधारा विषं सर्पौ वन्हिरेत्येभेतः स्त्रियः” (46) यानी छुरे की धार, विष, सांप और आग एक तरफ और स्त्री दूसरी तरफ. किस प्रकार के धार्मिक ग्रन्थों से स्त्रियों की तुलना की जा रही है? इसी प्रकार आगे यह बताया गया है कि किस प्रकार से विधि विधान एवं क्रियाओं में स्त्री की भागीदारी नहीं थी या नहीं होनी चाहिये थी. भीष्म पितामह महाभारत में इस प्रकार से कहते हैं – ‘न स्त्रीणां क्रियाः काश्चिदिति धर्मौ व्यवस्थितः’ (47) अर्थात् स्त्री के लिये किसी भी धार्मिक कर्मों-क्रियाओं का विधान नहीं है. इसी प्रकार से ‘मैत्रायणी संहिता’ में भी स्त्रियों को झूठ से उत्पन्न होने वाली कहा गया है यानी कि उस पर विचार नहीं किया जाना चाहिये. इसी प्रकार से आपस्तम्बधर्मसूत्र में भी कहा गया है – “असतो वा एष संभूर्ता तय शूद्रः” यानी कि शूद्र भी झूठ से ही उत्पन्न हुआ है.


भारतीय समाज की दो धार्मिक ग्रन्थों में बहुत आस्था बनी हुई है. कभी भी वे उसे स्त्री व शूद्र निन्दक ग्रन्थों के रुप में देखने का प्रयास नही कर सके. दोनों ग्रन्थों में स्त्री सम्बन्धी घोर अपमान सम्बन्धी बातें लिखी गयी हैं. महाभारत के अनुशासन पर्व के 20वें अध्याय में आया है कि,“नास्ति स्वतन्त्रता स्त्रीणां अस्वतंत्रा हि योषित” (48) यानी स्त्रियां स्वतन्त्र नहीं रह सकती हैं, क्योंकि वह तो पराधीन रहने के लिये बनी हुई है. इसी अध्याय में आगे कहा गया है कि, “प्रजापतिमतं हि एतद् स्त्री स्वतन्त्रयं अर्हति” (49) यानी कि स्त्री स्वतन्त्र नहीं होनी चाहिये. मुद्राराक्षस अपनी पुस्तक में महाभारत के अनुशासन पर्व के दान पक्ष का विश्लेषण करते हैं कि अश्वनिकुमार सुदर्शन जब घर से बाहर गया हुआ था तब एक ब्राह्मण आ जाता है और वह सुदर्शन की पत्नी से कहता है कि –


यदि प्रमाणं धर्मस्ते ग्रहस्थाश्रमसम्मतः.
प्रदानेनात्मनो राशि कर्तुमर्हसि मे प्रियम॥ (50)

यदि तुम गृहस्थ धर्म को मानती हो तो मुझे अपना शरीर देकर प्रसन्न करो. जब ब्राह्मण और सुदर्शन की पत्नी अन्दर चले जाते हैं तो उस समय सुदर्शन वापिस आ जाता है. वह ब्राह्मण की करतूत को जानकर सिर्फ इतना ही कहता है कि, “सुरतं ते अस्तु विप्राग्रय प्रीतिहि परमा मम” यानी तुम रति क्रिया करो और यह मुझे भी पसन्द है. (51) उपर्युक्त विश्लेषण एवं उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि धार्मिक शास्त्रों के अन्तर्गत जिस प्रकार से स्त्रियों का चित्रांकन हुआ है, वह किसी भी प्रकार से एक आदर्श समाज की कल्पना को प्रस्तुत नहीं करता है. स्त्रियों के सम्बन्ध में जिस प्रकार के मन्त्रों व श्लोकों की रचना की गई है, वह निन्दनीय है. धर्मग्रन्थों से पता चलता है कि वहां पर भी स्त्री का शरीर ही महत्त्वपूर्ण है. इसलिये शरीर का वर्णन बहुत ही थोड़े व अश्लील रूप में आया है. बहुत ही कम रूप में उसकी चाहतों, इच्छाओं व सपनों का उल्लेख हुआ है. स्त्री किसी भी रूप में स्वतन्त्र नहीं होनी चाहिये. वह सारे पिण्ड की दासी बनी रहे और उसकी मुक्ति केवल पुरुष मात्र से ही संम्भव हो. वह केवल पुरुषों की सेवा के लिये, नाचने के लिये तथा पुरुषों के मनोरंजन के लिये ही पैदा हुई है. किसी भी प्रकार के अधिकार उसके हिस्से में नहीं आये. जननी के रूप में वह ब्रह्मा थी. परन्तु कल्पना करके उसकी कोख को अपमानित किया गया. जिस योनि में नये सृजन का आगमन होता है, उसे भी पितृसत्तात्मक मूल्यों के अन्वेषक मनीषियों ने नीच योनि और उच्च योनि में विभक्त कर दिया. जैसे कि समाज में निम्न समुदाय है तथा उच्च समुदाय. उसी प्रकार जनसमुदाय का भी निर्धारण कर दिया. इस काल में स्त्रियां ज्ञान, बुद्धि एवं चातुर्य में कौशल प्राप्त करने के साथ-साथ दर्शन, तर्क, मीमांसा, साहित्य आदि विषयों में पारंगत है. काशकृत्स्नी ने मीमांसा जैसे क्लिष्ट विषय पर ग्रन्थ लिखकर विशेष ख्याति प्राप्त की जो ग्रंथ उसी के नाम से विख्यात हुआ और उस पुस्तक का अध्ययन करने वाला वर्ग “काशकृत्स्नी” कहलाया. वस्तुतः धर्मग्रंथों व धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने पर नारी के सम्बन्ध में बहुधा परस्पर विरोधी बातें मिलती है जिस कारण से किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने में कठिनाई होती है. यथा जहां एक तरफ वैदिक कालीन समाज में स्त्रियां ऋषिकाओं के रूप में प्राप्त होती है. लेकिन बहुत से सन्दर्भ ऐसे भी प्राप्त होते है कि स्त्रियां को वेदाध्ययन या ब्रह्मचर्य आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं होता था. यथा:


वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः,
पतिसेवा गुरौवासो गृहार्थोऽग्नि परिक्रिया॥ (52)

विवाह संस्कार ही स्त्रियों का उपनयन संस्कार है, पति सेवा ही गुरुकुल में वास तथा घर के काम ही दोनों समय का होम रूपी अग्नि की सेवा है. इससे प्रतीत होता है कि तत्कालीन समाज में स्त्री के लिए सिर्फ विवाह संस्कार की ही मान्यता थी और उस पर भी पुरुष वर्ग का ही.  वही तय करता था कि कन्या का विवाह कब और किन परिस्थितियों में करना है? स्त्री की स्वतन्त्रता का पूर्णतः निषेध किया गया है. जन्म से लेकर मृत्यु तक स्त्रीको पुरुष के नियंत्रण में रखने का निर्देश दिया गया है.

सन्दर्भ: 


1. पाराशर स्मृति, प्रथमोऽध्याय 7 श्लोक 1.
2. पा. प्रथमोऽध्याय ३०-३१.
3. पा. ४.१७.१८.
4. पा. ४.१९.२०.
5. पा. ४.३१.३२.
6. पा. ४.३१-३२.
7. पा. ४.३३.
8. पा. ७.६-८.
9. मनु ८/७७.
10. मनु ८/६८.
11. ऋग्वेद १/७३/३.
12. अथर्ववेद ११/१/२४.
13. अथर्ववेद १४/१/४२.
14. ऋग्वेद ८/१/३४.
15. मनुस्मृति, 9.23.
16. मनुस्मृति,9.24.
17. याज्ञ. आचाराध्याय १६३.
18. मनु ४.४३.
19. वशिष्ठ धर्मसूत्र २१.१०, 
20. याज्ञ. १.७२.
21. याज्ञ. आ ८९९२/२९०,
22. नारद १५.७९.
23. यजु. १०/३.
24. यजु. २३ध्/२६.
25. अथर्व. १०/५/४३.
26. ऋ. १/८५/४६.
27. ऋ. ९६/८.
28. यजु. १४/१३.
29. अथर्व. ८/८/९.
30. यजु. १३/२६.
31. यजु. ४/१९.
32. ऋ .८/३३/१९.
33. ऋ. १०.७१.७.
34. भारत वर्ष का सामाजिक इतिहास – विमलचन्द्र पाण्डेय, इलाहबाद, १९६०, पृ ११६.
35. भारतवर्ष का सामाजिक इतिहास – विमल चन्द्र पाण्डेय, पृ. ११६.
36. ऋ. ८.९१.५-६.
37. ऋ. १.११.१४.
38. ऋ. १.१३५.७.
39. ऋ. २.३.६.
40. ऋ. २.३२.४.
41. प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास – जयशंकर मिश्र, पटना, १९९९, पृ ४१०.
42. ऋ १.९४.४, ९.६६.८, १०.७१.११.
43. तै. ६.१.६.५,
44. मै. ३.७.३.
45. मनुस्मृति, 2.66.
46. वैवाहिकोविधिः स्त्रीणांसंस्कारोंवैदिकः स्मृतः, मनुस्मृति 2.67.
47. धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ – मुद्राराक्षस इतिहास बोध प्रकाशन पृष्ठ 127.
48. महाभरत, अनुशासनपर्व, अध्याय 20.
49. वही 20.
50. धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ – मुद्राराक्षस इतिहास बोध प्रकाशन पृष्ठ 209-10.
51. मनु. २.३७.
52. नारद स्मृति, स्त्री, पुसं, ५/४५.