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कमल कुमार की कविताएं

कमल कुमार

कहानी, उपन्यास, कविता, आलोचना, स्त्री-विमर्शआदि पर 35 पुस्तकें प्रकाशित . सम्पर्क : kamalxyz@hotmail.com

जीवन से भिड़ंत की कविता

मैं मुक्तिबोध नहीं, न ही शैलेश मटियानी हूं
मैं न ‘वाम’ मैं न दक्षिण में और केंद्र में भी नहीं
विषमताओं, विरोधों, असंगतियों से संघर्ष
जीवन राग बन गया है कविता में
तभी कविता में मेरा चेहरा मुरझाया नहीं
भयावह भी नही हुआ खुरदरे कंटीले यथार्थ में
ताकि असहाय न हो जाए जीवन/
कथा साहित्य में पात्रों के अन्याय और उत्पीड़न को
अपने अन्तःकरण में सोख लिया
उसकी रचनात्मक पुनरावृत्ति में
वह सघन, उदार और विस्तृत हो गया/
साहित्य की भी राजनीति है/यहां है
बड़े शिरोमणि, मठाधीश और माफिया के सरगना
हाशिये पर खिसका देते है लिखे को
पर मैं जीतने की दौड़ में भी नहीं
आस्थावान मैं ‘आत्मा के ताप’ से संचालित
रचनाकर्म अपनी निरंतरता में क्रमशः रहें
इसी आंकाक्षा के साथ अग्रसर हूं
‘रजा’ का केंद्र ‘बिंदु’ है और मेरा भी
रच रही हूं शब्दों में जीवन की ज्यामिति/
अब नहीं रहा काल या इतिहास में सब्र पारखी का
समय की आंधी उड़ा ले जाएगी सभी/
‘मुट्ठियों में मठाधीशों’ की बचा रह जाए शायद/
आलोचकों की चर्चा में बनती है श्रेष्ठ कविता
कविता का ‘श्रेष्ठ’ धुंधलाने को विवश है.
बाज़ार ही करेगा चुनाव/कवि के सार्वजनिक सरोकारों का
कविता भी तो अब ‘फिनिश्ड प्रोडेक्ट’ है
आसानी से पहुंच जाती है पाठकों के बाज़ार में
आलोचकों को विमर्श में सभाओं और संस्थानों में
होने को सम्मानित और पुरस्कृत/
अपने समय और स्थितियों से घिरी
जीवन से भिड़ंत की कविता रच रही हूं मैं..

अल्बेयर कामू!

कामू, आप चिंतक, विचारक, लेखक पत्रकार थे
नाटककार, निदेशक, नोबेल पुरूस्कार विजेता भी!
परंतु आपके मित्र सात्रे ने, आलोचको ने क्या किया?
विद्धेष और उपेक्षा की राजनीति के बीच
आपको अपनों और दूसरों ने गलत ही समझा
शायद वक्त से पहले कह दिया था आपने.
आप जानते थे सत्ताएं क्रांति नहीं दमन से

अपनी सर्वज्ञता स्थापित करती है
एक विजयी और सफल नेता के पीछे
असंख्य जनों की विफलता और पराभव होता है/
स्वंतत्रता और समानता का पाठ
माक्र्स ने नहीं भूख और गरीबी ने पढ़ाया था
साहित्यकार ही उठाता है आवाज़
निरंकुश सत्ताधारियों के विरोध में.
‘ओशो’ की तरह समझा था जीवन को
तनी हुई रस्सी पर संतुलन साधकर
अनिश्चय की ओर आगे बढ़ते जाना है
आपने झेला था अभाव को बीमारी को उत्पीड़न को
पर अल्जीरिया जन्मभूमि की उदार प्रकृति
समुद्र की लहरों, नीले आकाश, धूप हरियाली ने
आपकी आत्मा को मुक्त कर दिया था
सकारात्मक सोच ने कुंठाओं से परे
मानवीय आस्था का असीम आकाश दिया था.
उस कार दुर्घटना में ‘पहले आदमी’ के
अधूरे पन्नों के बीच मृत मिले थे
कामू आप पहले नहीं
अपनी तरह के आखिरी आदमी भी थे!
नहीं, आप जानते थे समय सब मिटा देता है
तो भी इस दुनिया में सब वैसे ही चलता रहता है.
आपने जाना था, कोई सत्यपूर्ण नहीं होता
न कोई अभिव्यक्ति अंतिम होती है
कांच के टुकड़ों को जोड़ने जैसा होता है सच!
अपने को जानते है हम अपनी असफलताओं में
जीवन की अनिश्चित स्थितियों में
यह सीखा था आपने फुटबाॅल के खेल में
गेंद कभी हमारी चाही दिशा में नहीं आती
यह अनुभव जीवन का दिशा निर्देश करते रहे.
बचपन में ही ‘धार’ लिया था ‘लेखक बनूंगा’
शब्द ही शक्ति बनेंगे मेरे सत्य की
मेरी पीड़ा और त्रासदियों से मुुक्त करेगें
उम्र के पहले पड़ाव पर लेखक बन गये थे.
उस छोटे से कमरे में आसपास की दुगन्र्ध से बेपरवाह
छोटी सी खिड़की के सामने देखते थे
बच्चों की चिलूपों में लड़खड़ाते बीमार को
सड़क पार करते- और अपने अकेलेपन को/
उस अकेलेपन ने आपको कभी अकेला नहीं किया
एक बड़े मानवता के घेरे में बांध दिया

ले गया आपसे नियति, मनन चिंतन की ओर
सिद्ध कर सके थे सृजन का रास्ता
अकेला है पर अकेलेपन का नहीं
लालटेन की मद्धम और शब्दों के उजाले में
सपने को तर्क में और कल्पना को सच में बदलते देखा था/
कामू! हिंदू दर्शन को समझ गये थे
ग्रेनिये से प्रेरित हुए थे शासद!
शब्द स्वयं प्रकाशित, स्वयं सिद्ध, भविष्य के महान शून्य में
काल की सीमाओं के पार ज्योति आवृत्त अस्तित्व है-ओइम्
क्षितिज के पार महाकाश दृश्य हो गया था
एक भीतरी महोत्सव में प्रकृति के रहस्य खुल गये थे
‘मैं नहीं’ ‘बस तुम हो’, ‘तुम मुझमें हो’ ‘तत्वाससि’
बीईग एण्ड नंथिगनेस!
एक अटूटविश्वास मैं जीऊंगा और लिखूंगा.
मेरी अभिव्यक्ति मेरे अपराधों की स्वीकृति है
कड़वे अनुभवों के अंगूरों को कुचल कर निकला अमृत है
इससे मानवता के प्रति असीम करूणा है
जीवन के अधूरेपन को पूर्णता की ओर ले जाती है.
‘द रिबेल’-सत्ता की दमन क्रांति का मुखौटा पहनता है
एक विस्फोट ‘बस और नहीं.’
बर्फीले तूफानों में भीतरी धूप की आंच थी
पहाड़ों पर जो वृक्ष सहजते हैं  बर्फीली हवाएं
उनमें खिलते है सुन्दर फूल और लगते हैं बादाम.
अपनी आस्था और विश्वास से
कुछ भी उपलब्ध किया जा सकता है
‘मैं सोचता हूं’ इसलिए मेरा अस्तित्व है
कथा का सुखद अंत नहीं-

जो कही जा रही है वही सच है-‘स्ट्रेज़र’
जीवन के विरोधाभासों और विडम्बनाओं में
स्थित होता है ‘केलीगुला’
गिरगिर कर उठना, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना
जीवन जीने योग्य है ‘मिथ आफ सिसिफस’
कामू स्वयं उतरे थे ‘द फाॅल में ‘डायरी’ के पन्नों में
चलता रहा सृजन कम निरंतरता में
जीवन के अंतिम क्षणों तक
नहीं रूदृ कर सका बीमार दुर्बल शरीर
पारिवारिक सामाजिक दुःख और संताप
आप जान गये थे अपने साथ
परंतु अपने से अलग होने को शब्दों के विमर्श को.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

भाषा बहता नीर

निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamai

मैं जब बड़ी हो रही थी तो मेरे आस -पास अनेक बोली और भाषा के रंग थे.मैथिली, मगही, बंगला, उर्दू, पंजाबी, तेलगू समेत बिहार के हर कोस पर बदल जाने वाली बोली हमारे बीच थी.हमसबों ने उसी परिवेश में रहते हुए कुछ भाषा बिना मेहनत किये सीख ली.जैसे बंगला, उर्दू और मैथिली, कुछ पंजाबी और कुछ तेलगू के शब्द.बंगला और उर्दू तो जैसे हमारे बीच की भाषा हो गयी.भाषा के संस्कार जेर, जबर, नुख्ता दुरुस्त हुए .ये सब इसलिए हुआ कि अलग-अलग भाषा, संस्कृति से जुड़े लोग एक ही मुहल्ले में साथ रहते थे.हमारे बीच भात और रोटी का साथ था.मां कोई सालन बनाती तो शबनम चाचा के घर भेजती , चच्ची गोश्त भेजती.उसी मुहल्ले में केरल से आकर बसे परिवार  से हमलोगों की गहरी दोस्ती थी.

रज्जी उस परिवार का बेटा और मैं उसकी दीदी थी और अरमान भाई हमसब के भाई.अरमान भाई को इस बात का मलाल वर्षो तक रहा कि मेरी वजह से मुहल्ले की सारी लड़कियों के  वो बहन हो गये थे.राखी के दिन हमारे अपने भाईयों से ज्यादा मुहल्ले के भाई थे जो बहनों की सुरक्षा में लगे रहते थे.कभी-कभी हमें खींज होती थी उनके भाई वाले रौब से .पर हम सीख रहे थे, जीवन के अनेक रंगों से घुल-मिल रहे थे.आज जब मैं अपने देश में भाषा को लेकर गहरी हो रही दीवार को देखती हूं तो लगता है कि हम किस रास्ते चल पड़े हैं .


हम कौन सी जुबान को अपना कहें, किसे पराया.सारी जुबानें हमारे देश के रगों में बह रही हैं.हिन्दी , उर्दू तो बहनें हैं.उसे कैसे अलग कर सकते हैं.मैंने उर्दू और बंगला का संस्कार अपने बचपन से पाया.अगर नसीम चाचा, शबनम चाचा और उस जुबान को बोलने वाली मेरी सहेलियां नहीं होतीं तो हमसब उर्दू की खुशबू से उसकी तहजीब से वाकिफ नहीं होते.मुझे याद है छुटपन में हम सारे दोस्त कभी शबनम चाचा तो कभी रज्जी के घर पडे रहते.हिन्दी, उर्दू, कन्नड, बंगला जुबान का घाल-मेल होता रहता.हमलोग खूब हंसते.अक्सर देर हो जाती तो चच्ची कहती अरे अपने घर जाओ.रात हो रही है.उनका कहना था बाज ;बुरी आत्मा बदरुहें बच्चों की शक्ल में निकलती हैं. बदरुहें हवा में चिरागों की तरह उड़ती हैं.हमारी बोउदी  कहती – तुमरा एकला जाबे ना, दादा संगे निये जाओ और काकी कहती भादों के पुर्नमासी रैत में आत्मा सब नाव पर सवार  घुमैत रहे छै.हम बच्चे थोड़ा डरते और थोडा आत्मा के रहस्यमयी दुनिया के असर में रहते. ये कितनी अनोखी बात थी कि एक ही तरह की चिंता सारी जुबान में थी.बंगला मैंने सबसे आसानी से सीखा .बंगला और मैथिली का स्क्रिप्ट एक ही है.भला हो उस समय का जिसमें सारी जुबानें एक दूसरे की कातिल नहीं दोस्त थीं, बहनें थीं.

ये जुबान हमारी रुहें हैं.इसी दौर में मैंने उर्दू  पढ़ा, बंगला  और मैथिली भी.उर्दू का स्क्रिप्ट नहीं सीख पाने का मलाल है मुझे .इस बात का गहरा अफसोस है कि मैं अपने देश की और जुबान नहीं सीख पायी.उर्दू से मुहब्बत हुई.फैज मेरे पंसदीदा शायर हैं.क्रांति और मुहब्बत से लबरेज उनकी नज्म हम जंवा दिलों पर राज करती थीं, आज भी करती हैं.मैेने उर्दू में लिखने वाले तमाम अफसानानिगार को पढ़ा.मंटो, इस्मत, कुर्रतुल-एन हैदर को पढ़ते हुए जाना कि जुबान और देश की मुक्तलिफ तहजीव को जाने बगैर आप ना तो बेहतर अफसानानिगार हो सकते हैं ना बेहतर इंसान.जब मैं कुर्रतुल एन हैदर को पढ़ती हूं तो लगता है कि उन्होंने अपने देश की संस्कृति को कितने बेहतर तरीके से समझा है.कितनी गहरायी है उनमें.अपनी एक कहानी में लंका का बयान जो उन्होंने किया वो क्या  बगैर अपनी संस्कृति को समझे लिखा जा सकता है.

वे लिखती हैं-‘समंदर के वस्त में एक पहाड़ है .उस पर ब्रह्मा ने एक मजबूत किला बनाया है.जो इंद्र के शहर अमरावती से भी ज्यादा खूबसूरत था जो लंका कहलाता था.उसके चारों ओर समंदरी पानी की खंदक थी और उसकी दीवारें सोने की थी.जिसमें हीरे जवाहरात जड़े थे.रावण ने उस लंका को अपनी राजधानी बनाया था.इशरत, दौलत, बेटे, अफवाज, फतहो-नुसरत, ताकत, जहानत, सबकुछ उसका था.ये कुर्रतुल एन हैदर ही लिख सकती हैं.जिनके लिए रामयण और कुराण अलग नहीं है.जिन्होंने दुनिया की सारी तहजीब, इतिहास और संस्कृति को समझा है.अब जो लोग भाषा को लेकर नफरत की दीवार खडे कर रहे हैं वे बतायें ये किसकी भाषा है? किसका तहजीब है? तुम कौन सा रंग चुनोगे हर रंग मुहब्बत का है.हर जुबान हमारी है, हर तहजीब में देश बसा है और हर  शब्द में महकतें हैं रंग-बिरंगी जुबां के फूल.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  

नीलेश झाल्टे  जलगाँव  स्थित  पत्रकार हैं  और  दैनिक  लोकमत  समाचार  से  जुड़े  हैं  . संपर्क: 9822721292

 

औरतें : अंतिम किस्त

एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 

अनुवादक का नोट 

“Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।

उत्सव जो नहीं रहा


पातागोनिया के अर्जेंटीना में पड़ने वाले हिस्से के खेत-मजदूरों ने लम्बे होते काम के घंटों और लगातार छोटी पड़ती पगार के खिलाफ हड़ताल शुरू की थी। सेना ने तब हालात ‘ठीक’ करने का जिम्मा संभाल लिया था।
गोली चलाने से, जाहिर है, ‘थकान’ हो ही जाती है। 17 फरवरी, 1922 की उस रात हत्याएँ करने से थके सैनिक सान खुलियान बंदरगाह के वेश्याघर गए। वे वहाँ अपनी इस ‘मेहनत’ के बदले मिलने वाला ईनाम वसूलने गए थे।

औरतें

लेकिन, वहाँ काम करने वाली पाँचों औरतों ने देखते ही दरवाजे उनके मुहँ पर मारे थे और “हत्यारों, खूनियों, यहाँ से बाहर…” चीखते हुए इन सैनिकों को खदेड़ दिया था।
ओसवाल्दो बाइएर ने उन औरतों का नाम संभाल कर रखा है। उनके नाम थे: कोंसुएलो गार्सिया, आन्खेला फोर्तुनातो, आमालिया रोद्रीगेज़, मारिया खुलियाचे और माउद फ़ॉस्टर।
रंडियाँ! गैरत वालियाँ!



औरतें-क़िस्त दो (स्पेनिश कहानियाँ )


 लूई


मैं वह जानना चाहती हूँ, जो वे जानते हैं-उसने कहा।उसके साथ देश-निकाला भुगत रहे साथियों ने उसे चेताया कि वे जंगली लोग इंसानों का मांस खाने के सिवाय कुछ और नहीं जानते:
-तुम वहाँ से ज़िंदा नहीं निकलोगी।

औरतें – क़िस्त तीन ( स्पैनिश कहानियां )

लेकिन लुई मिशेल ने न्यू कालेदोनिया के मूलवासियों की जबान सीखी, उनके जंगल गई और ज़िंदा वापस लौटी।

उन लोगों ने उससे अपने दुःख बताए और पूछा कि उसे वहाँ क्यूँ भेज दिया गया था।
-क्या तुमने अपने पति का क़त्ल किया था?
तब उसने उन्हें पेरिस कम्यून के बारे में बताया:
-ओह!- तब तुम भी हमारी ही तरह हारी हुई हो। उन्होंने कहा।

छपने का ख़तरा


2004 में ग्वातेमाला की सरकार ने सत्ता के कानून से ऊपर बैठे होने की ‘रवायत’ एक बार तोड़ी थी। तब सरकारी तौर पर यह स्वीकार किया गया कि मिरना माक की हत्या राष्ट्रपति के आदेश पर की गई थी।
मिरना ने एक ‘प्रतिबंधित’ खोज कों अंजाम दिया था। धमकियों की परवाह न कर वह उन जंगलों और पहाड़ों में गई थी, जहां अपने ही देश में बेदखल, सेना के नरसंहारों में ज़िंदा बचे आदिवासी मारे-मारे फिरते थे। उसने उनकी आवाजों और अभिव्यक्तियों को दर्ज भी किया था।

औरतें – क़िस्त चौथी ( स्पैनिश कहानियां )

उसी समय यानी 1989 में सामाजिक विज्ञान पर हुई एक कांग्रेस में सयुंक्त राज्य अमरीका से आए एक मानवशास्त्री ने वहाँ के विश्वविद्यालयों की शिकायत की थी। नाराजगी विद्यार्थियों पर लगातार कुछ न कुछ प्रकाशित करते रहने के दबाव से थी।

-मेरे देश में- उसने कहा– अगर आप छपते नहीं हैं तो समझो गए।
तब मिरना ने कहा था:
-मेरे देश में आप की खैर नहीं गर आप छपते हैं।
उसके बाद वह छपी थी।
उसे चाकुओं से गोदकर मार डाला गया था।

साँस लेती संगमरमर 


आफ्रोदिता यूनानी मूर्तिकला के इतिहास की पहली निर्वस्त्र स्त्री थी। संगतराश प्राक्सितेलेस ने उसे तराशते वक्त देह का कपड़ा उसके पैरों के पास गिरा दिखाया था।। कोस शहर ने प्राक्सितेलेस से यह मांग की कि वह आफ्रोदिता को कपड़े पहनाए। एक दुसरे शहर स्नीदो ने, हांलाकि, आफ्रोदिता का स्वागत किया और उसके लिए एक मंदिर भी बनवाया। और तब देवियों में सबसे ज्यादा औरत और औरतों में सबसे ज्यादा देवी यहाँ रही थी।

मर्द’ तैयार करती सोच की पहली सीख : उलटबांसियां: उलटी दुनिया की पाठशाला (1998)

स्निदो में हांलाकि उसे घेरे में बंद और कितने ही पहरे में रखा गया था, चौकीदार उसके लिए पागल लोगों को पहरा तोड़ने से रोक नहीं पाते थे। इतने पहरे और इतनी बंदिशों से आजिज़ आकर आफ्रोदिता आखिर आज ही की तरह एक दिन भाग गई थी।

लेखक के बारे में

एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।


अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  

 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  

नीलेश झाल्टे  जलगाँव  स्थित  पत्रकार हैं  और  दैनिक  लोकमत  समाचार  से  जुड़े  हैं  . संपर्क: 9822721292

यहाँ झील और ज्यादा गहरी और शांत हो गयी

नूर ज़हीर

वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है.
हाल में हिन्दी अकादमी द्वारा शिखर सम्मान से सम्मानित नूर ज़हीर का यह लेख द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन से प्रकाशित ‘मेरा कमरा’ किताब का हिस्सा है.

एक छोटा सा कमरा हो, जिसकी एक खिडकी पहाड़ों की तरफ और दूसरी नीली, झिलमिलाती झील की तरफ खुले. लिखने की मेज हो और बाकी दप दीवारें, जिनमे खिड़कियाँ न हों, किताबों से भरी अलमारियों,ताकों से ढकी हों. मेज पर कागज-कलम तो हो ही,साथ ही जरुरत के
शब्दकोश,पर्यायवाची,मुहावरे-कहावतों की किताबें जरुर खुली-बिखरे पडी हों,जो हर आनेवाले को,यानी कमरे की मालकिन को भी यह एहसास दिलाएं की इस जगह काम होता है,यहाँ फिजूल वक़्त जाया न कीजिए,कुछ लिखिए-पढ़िए.



आज जब जवानी के ख़्वाब  की तस्वीर नजरों के सामने आती है तो ग़ालिब के शे’र का एक मिसरा याद आता है-‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले ‘लेकिन इस शे’र का दूसरा मिसरा अभी तक की गुज़री जिन्दगी पर पूरा नहीं उतरता, क्योंकि बहुत अरमान मेरे तो कभी नहीं निकले.
यह देखकर की वक़्त का कोई मूड नहीं है मेरे अरमान पूरे करने का, मैंने अपने ख़्वाब का दायरा कुछ घटा  दिया.झील या पहाड़ में से एक हो तो चलेगा.इतनी किताबें भी न हों तो भी चलेगा.घटते –घटते यह कमरा एक जरुरत भर की जगह रह गया.इस्टमैन कलर से ख़्वाब ब्लैक एंड व्हाईट हुए.दिल ने अलग एक कमरा और थोड़े से सुकून से समझौते कर लिया. इतना तो एक लेखक को चाहने का हक़ है,चाहे वह लेखक औरत ही क्यूँ न हो.

आज पुराने ख़्वाबों की पोटली खोलती हूँ तो दिल फिर उन वीरानियों में लौट जाना चाहता है,जहाँ ख्याल पर चाहतों की धमाचौकड़ी मची रहती है.सोचती हूँ अगर वह कमरा मिल जाता जो मैं सोलह सत्रह साल की उम्र मी चाहती थी,जब मैंने यह पक्का फैसला कर लिया थी की मुझे लेखक ही बनना है और खुछ नहीं तो…मैंने उस कमरे को हासिल करने की ज्यादा शिद्दत से कोशिश क्यों नही की.
क्या मेरा एक्टिविज्म जो मुझे सड़क-सड़क ,गाँव-गाँव घसीटता रहा ,वह जिम्मेदार है, क्योंकि काफी बड़ी उम्र तक तो जीवन में कुछ स्थायी हुआ ही नहीं या जब घर बसाने का फैसला किया तो एक ऐसे आदमी का हाथ पकड़ा जो लिखने के लिए एकांत या किसी  खास जगह को जरुरी नहीं समझता था और मैं अपनी जरुरत का एहसास उसे दिला पाने में नाकामयाब रही या यह कि बच्चों की जरूरतों और शोर-शराबे को ज्यादा एहमियत दे और अपनी जरुरत के बारे में नहीं सोचा.



ऐसा नहीं कि शौहर और बच्चे मेरे कोई बुरे है या मैं उनकी जरूरतें पूरी करके खुद को खुश नहीं पाती थी.सुबह उठकर अक्सर चार बजे घर के किसी कोने में दरी बिछाकर,तख्ती पर कागज़ लगाकर जल्दी जल्दी छः बजने के अन्दर वह सब लिख डालने की कोशिश करती जिसने रात भर में दिमाग के कोने –खुदरों से निकलकर एक शक्ल अख्तियार कर ली थी.छः बजे बच्चों को उठाकर स्कूल के लिए तैयार करना होता था.


अकसर खाली मिले कुछ लम्हों में झील और पहाड़ों वाला ख़्वाब सामने आकर मुह चिढाता.फर्क बस इतना होता की झील और नीली और ज्यादा गहरी, शांत हो गयी थी.कभी कभी तो उसके एक सिरे से सूरज उगाता दिखाई देता कभी कोई कश्ती तिरती हुई गुजर जाती .अजीब बात है की पूरे देश से हरियाली कम होती जा रही है.लेकिन मेरे ख़्वाबवाले पहाड़ ज्यादा हरे हो गए थे. ऊँचे देवदार के पेड़ों से ढकें.कभी कभी तो उनके बीच में से कोई झरना भी फूट पड़ता जो कल कल करती झील में रूपोश हो जाता.ख़्वाब था या कमबख्त पर्यावरण मंत्रालय का विज्ञापन.

एक चीज और यदि मैं अपनी मेज के आसपास होती तो मेरे दिल को बेहद तस्कीन पहुँचती .हुआ यूँ की जिस रचनाकार को भी मैं पढती और अगर वह मुझे बहुत पसंद आता तो जी चाहता उसकी तस्वीर मेरी मेज के आसपास हो. मैं लिखते लिखते सर उठाऊ तो उससे नज़ारे चार करके पूछ सकूँ-क्यों दोस्त यह चित्रण पसंद आया?यार यह कुछ वैसा नहीं बन रहा जैसा दिल चाहता है तुम ज़रा मदद करो न! प्रेमचंद,शेक्सपियर,यशपाल, अमृतलाल नागर, सीमोन डा बोउआर, वर्जीनिया वुल्फ, इस्मत चुगताई सब मौजूद रहते.रोज उनकी गिनती बढ़ती, क्योंकि मेरी किताबें ,मेरी जानकारी में इजाफा होता.


फिर कुछ ऐसा हुआ की घर भी अपना हो गया जिसके चलते मैं अपनी जरूरत और जेब के हिसाब से अपनी किताबें बढ़ा सकती थी .मेज एक कमरे में लग गयी.दो दीवारों पर लकड़ी के टाक भी बन गए और किताबों से भर गए .कमरा उतना हवादार है जितना एक फ़्लैट में हो सकता है सुकून उतना नहीं जितने की जरुरत है.निचलेवाले फ़्लैट की मिसेज जैन तार सप्तक में बात करते है फोन पर हो या धोबी से या अपने पतिदेव से.दिलासा यहीं है कि उनके बच्चे और मियाँ कभी बात नहीं करते फ़्लैट उपर होने से सड़क का शोर भी उतना नहीं आता गरज ये कि अपने कमरे की ख्वाहिश में जितने व्यवहारिक चीजें है,सो पूरी हो गयी है हाँ,पहाड़ ,झील नदारद है और शायद कभी होंगे भी नहीं.

सच पूछिए तो अपनी सुस्ती की देखकर कभी-कभी यह भी ख्याल आता है कि अगर यह सब पहले मिल जाता और पूरा का पूरा मिल जाता तो क्या मेरे लेखन में कुछ बदलाव आ गया होता? क्या मैं बेहतर लिख पाती ?क्या मैं ज्यादा लिख पाती?अभी तक  जो लिखा ,वह एक चुनौती,एक ढिठाई से लिखा कलम चलाते रहेंगे हालत साथ दे या की मुखालिफ हो. अगर सब कुछ मिल जाता तो शायद वह चुनौती या वह अड़ियलपन भी जाता रहता जो लेखन का आधार बना.आज यह हालत है कि वह खुद -ब -खुद चार बजे आँख खुल जाती है. मेरे कमरे में जहाँ कल्पना में तो पलंग नहीं था लेकिन हकीकत में एक अदद बिस्तर शामिल है,जब सूरज आकर रुकता है तो मुझे लिखता हुआ या कम से कम कुर्सी पर बैठे, कोहनियाँ मेज पर टिकाये खुद से बातें करते देखता है सूर्य भी पुरुष है कामकाजी महिला को सह नहीं पाटा ,आगे बढ़ जाता है.

मेरे सवालों का कोई जवाब नहीं दे सकता यह कमरा भी नहीं. एक तरह से अच्छा है यही मान लिया जाए की वह ख्वाब्वाला कमरा नहीं मिला जैसा की एक शे’र है-
यारब दुआए वस्ल ना हरगिज क़ुबूल हो,
फिर दिल में क्या रहेगा जो हसरत निकल गयी.

हाँ,एक चीज जरुर है जो इस अधूरे मगर मेरे अपने कमरे ने दी है.सिर्फ मेरे कमरा होने के कारण मैं इसकी दीवारों,दरवाजों पर कुछ भी लगा या चिपका सकती हूँ बहुत सारे लेखकों की तस्वीरों के अलावा एक नोटिस,कोई एक बरस पहले इस कमरे में अन्दर आनेवाले दरवाजे पर लगाई –‘यह नास्तिक का कमरा है .आस्थावान ज़रा सोच-समझ कर अन्दर आयें.

अनचाही बेटियाँ

जावेद अनीस

एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com
javed4media@gmail.com

हम एक लिंगभेदी मानसिकता वाले समाज हैं जहाँ लड़कों और लड़कियों में फर्क किया जाता है. यहाँ लड़की होकर पैदा होना आसान नहीं है और पैदा होने के बाद एक औरत के रूप में जिंदा रखन भी उतना ही चुनौतीपूर्ण है. यहाँ बेटी पैदा होने पर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोगों की ख़ुशी काफूर हो जाती है. नयी तकनीक ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है अब गर्भ में बेटी है या बेटा यह पता करने के लिए कि किसी ज्योतिष या बाबा के पास नहीं जाना पड़ता है इसके लिए अस्पताल और डाक्टर हैं जिनके पास आधुनिक मशीनें है जिनसे भ्रूण का लिंग बताने में कभी चूक नहीं होती है. आज तकनीक ने अजन्मे बच्चे की लिंग जांच करवा कर मादा भ्रूण को गर्भ में ही मार देने को बहुत आसान बना दिया है.

भारतीय समाज इस आसानी का भरपूर फायदा उठा रहा है, समाज में लिंग अनुपात संतुलन लगातार बिगड़ रहा है. वर्ष 1961 से लेकर 2011 तक की जनगणना पर नजर डालें तो यह बात साफ तौर पर उभर कर सामने आती है कि 0-6 वर्ष आयु समूह के बाल लिंगानुपात में 1961 से लगातार गिरावट हुई है पिछले 50 सालों में बाल लिंगानुपात में 63 पाइन्ट की गिरावट दर्ज की गयी है. लेकिन पिछले दशक के दौरान इसमें सांसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गयी है  वर्ष 2001 की जनगणना में जहाँ छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों में प्रति एक हजार बालक पर बालिकाओं की संख्या 927 थी लेकिन  2011 की जनगणना में यह घटकर कर 914 (पिछले दशक से -1.40 प्रतिशत कम) हो गया है. ध्यान देने वाली बात यह है कि अब तक की हुई सभी जनगणनाओं में यह अनुपात न्यून्तम है.

भारत में हर राज्य की अपनी सामाजिक,सांस्कृतिक, आर्थिक पहचान है जो कि अन्य राज्य से अलग है  इसी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक विभिन्नता के कारण हम देखते हैं कि एक ही देश में बाल लिगानुपात की स्थिति अलग अलग हैं. राज्यों की बात करें तो देश के सबसे निम्नतम बाल लिंगानुपात वाले तीन राज्य हरियाणा (830), पंजाब (846), जम्मू कश्मीर (859) हैं जबकि सबसे ज्यादा बाल लिंगानुपात वाले तीन राज्य मिजोरम (971),मेधालय (970), अंड़मान निकोबार (966) हैं.  देश में सबसे कम बाल लिगानुपात हरियाणा के झझर में 774 है जम्मू कश्मीर में 2001की तुलना में 2011 में सबसे ज्यादा गिरावट -8.71 प्रतिशत देखी गई है. वही दादर नागर हवेली तथा लक्ष्यद्वीप में 2001 की तुलना में 2011 में यह गिरावट क्रमशः कि एक दशक में बाल लिंगानुपात में गंभीर गिरावट के मामले में देश में दूसरे तथा तीसरे स्थान पर हैं.

भारत में लगातार घटते जा रहे इस बाल लिंगानुपात के कारण को गंभीरता देखने और समझने की जरुरत है. जाहिर है लिंगानुपात कम होने का कारण प्राकृतिक नही है और ना ही इसका संबंध अमीरी या गरीबी से है. यह एक मानव निर्मत समस्या है जो  कमोबेश देश के सभी हिस्सों,जातियों,वर्गो और समुदायों में व्याप्त है. भारतीय समाज में गहरायी तक व्याप्त लड़कियों के प्रति नजरिया, पितृसत्तात्मक सोच, सांस्कृतिक व्यवहार, पूर्वागृह, सामाजिक-आर्थिक दबाव, असुरक्षा, आधुनिक तकनीक का गलत इस्तेमाल इस समस्या के प्रमुख कारण हैं.

मौजूदा समय में लिंगानुपात के घटने के प्रमुख कारणों में से एक कारण चयनात्मसक गर्भपात के आसान विकल्प के रूप में उपलब्धता भी है . वैसे तो अल्ट्रासाउंड,एम्नियोसिंटेसिस इत्यादि तकनीकों की खोज गर्भ में भ्रुण की विकृतियों की जांच के लिए की गयी थी लेकिन समाज के पितृसत्तात्मक सोच के चलते धीरे धीरे इसका इस्तेमाल भ्रूण का लिंग पता करने तथा अगर लड़की हो तो उसका गर्भपात करने में किया जाने लगा. इस आधुनिक तकनीक से पहले भी बालिकाओं को अन्य पारम्परिक तरीकों जैसे जहर देना,गला घोटना, जमीन में गाड़ देना, नमक-अफीम-पुराना गुड़ या पपीते के बीज देकर इत्यादि का उपयोग कर मार दिया जाता था.


साल 2003 में  समाज में घटती महिलाओं की  घटती संख्या पर संख्या पर मातृभूमि: ए नेशन विदाउट वूमेन नाम से एक फिम आई थी इसमें एक ऐसे भविष्य के गाँव को दर्शाया गया था जहाँ सालों  से चली महिला शिशु हत्या के चलते अब यहाँ एक भी लड़की या महिला ज़िंदा नहीं है. दरअस्ल यह भविष्य की चेतावनी देने वाली फिल्म  थी जिसमें बताया गया था कि बेटियों के प्रति अनचाहे रुख से स्थिति कितनी भयावह हो सकती है. आज इस फिल्म की कई चेतावनियाँ हकीकत बन कर हमारे सामने हैं. हमारे देश के कई हिस्सों में  लड़कियों की लगातार गिरती संख्या  के कारण दुल्हनों का खरीद-फरोख्त हो रहा है, बड़ी संख्या में लड़कों को कुंवारा रहना पड़ रहा है और दुसरे राज्यों से बहुएं लानी पड़ रही है.

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लिंगानुपात को बढ़ाने के लिए अनेको प्रयास किये गये है लेकिन स्थिति सुधरने बिगड़ती ही गयी है. सुप्रीमकोर्ट द्वारा  भी इस दिशा में लगातार चिंता जतायी जाती रही है पिछले दिनों सुप्रीमकोर्ट ने  भ्रूणलिंग जांच से जुड़े विज्ञापन और कंटेंट दिखाने पर सुप्रीम कोर्ट ने गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट जैसी सर्च इंजन कंपनियों को यह कहते हुए फटकार लगाई “गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां मुनाफा कमाना तो जानती हैं, लेकिन भारतीय कानून की कद्र नहीं करतीं.’ कोर्ट ने तीनों सर्च इंजन को अपने यहां आंतरिक विशेषज्ञ समिति बनाने के निर्देश दिए हैं जो समिति भ्रूण लिंग जांच से जुड़े आपत्तिजनक शब्द पहचानकर उससे जुड़े कंटेंट ब्लॉक करेगी.

लेकिन अनुभव बताते है कि कानून,योजना और सुप्रीमकोर्ट के प्रयास जरूरी तो हैं लेकिन सिर्फ यहीं काफी नहीं हैं  इस समस्या के कारण सामाजिक स्तर के हैं जैसे समाज का पितृसत्तात्मक मानसिकता, लड़के की चाह, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, लिंग आधारित गर्भपात, कन्या शिशु की देखभाल ना करना,दहेज इत्यादी. यह जटिल और चुनौतीपूर्ण समस्यायें है. लेकिन समाज और सरकार को इन समस्याओं पर प्राथमिकता के साथ चोट करने की जरुरत है.

सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

नीलेश  झाल्टे 


 महाराष्ट्र में आदिवासियों के बीच उनकी लड़ाई में शामिल प्रतिभाताई शिंदे से महिला-नेतृत्व सीरीज के तहत  परिचित करा रहे हैं  नीलेश  झाल्टे : 



आदिवासी समाज  मूलभूत सुविधाओं से हमेशा से ही वंचित रहा है. गैर-आदिवासी लोगों ने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक संसाधनों का दोहन करने के लिए घुसना शुरू कर दिया, जिसके कारण आदिवासी लोगों की पारंपरिक अर्थव्यवस्था और समाज को भारी क्षति हुई है. यही आलम महाराष्ट्र में भी है. खासकर विदर्भ और खानदेश में आदिवासियों की संस्कृति और समाज की क्षति बड़े पैमाने में हुई है. खानदेश में सतपुड़ा की गोद में आदिवासियों का निवास बड़े पैमाने में है. वहां पर भी समस्याओं और अन्याय-अत्याचारों की घटनाओं की कमी नहीं है.

आदिवासी समूह में सामूहिक खेती का प्रचलन था, लेकिन जमींदारों, सूदखोरों और ठेकेदारों ने सामूहिक खेती की परंपरा पर हमला किया है. उनके जीने में संघर्ष भरा पड़ा है. ऐसी स्थिति में आदिवासियों के लिए सतपुड़ा की वादियों में रचनात्मक संघर्ष की एक ‘प्रतिभा’ उभर आई, जिन्होंने आदिवासियों के आन्दोलन को रचनात्मक रूप से लड़कर उन्हें अपने हक और अधिकारों के प्रति सजग किया है. इतना ही नहीं उनकी सुविधाओं और हजारो एकड़ जमीन आदिवासियों को देकर उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए प्रयासरत है.

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप
 

आज इन वादियों में प्रतिभाताई शिंदे का नाम लोकसंघर्ष का चेहरा बन चुका है. किसी भी प्रकार की राजनीतिक, आर्थिक स्वार्थ न रखते हुए आदिवासी, श्रमिक समूह के जीने के संघर्ष में शामिल होकर उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास प्रतिभाताई ने लगन के साथ किया है. यही कारण है कि ‘लोकसंघर्ष मोर्चा’ का नाम आज सतपुडा की वादियों में तूफ़ान की तरह फैला है.

पढ़ें: पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

प्रतिभाताई लोकसंघर्ष मोर्चा के बैनर तले आदिवासी, दलित, ग्रामीण, मजदूर वर्ग के लिए रचनात्मक संघर्ष किया है. महाराष्ट्र के नंदुरबार, जळगाव, धुलिया के साथ-साथ गुजरात के सूरत, भरूच, नर्मदा आदि जिलों में भी प्रतिभा ताई ने आदिवासी पिछड़े समूह के लिए संघर्ष किया है. पारिवारिक ऐशो आराम की जिन्दगी छोड़कर प्रतिभाताई ने लोकसंघर्ष मोर्चा के बैनर तले नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर प्रकल्प पीडितो के अन्यायपूर्ण विस्थापन के विरोध में पुनर्वास संघर्ष समिति के रूप में 1997 से लडाई आरंभ की. इस समय इन प्रकल्पपीडितो के लिए न्याय व संपूर्ण पुनर्वास की माग केंद्र में जरुर थी, लेकिन संगठन के काम का मुख्य लक्ष्य पिछड़े इलाकों के आदिवासी समूह को उनकी संस्कृति, परम्परा और उनकी अस्मिता की रक्षा कर विकास के राष्ट्रीय प्रवाह में शामिल होने के लिए संगठित करना था. यहाँ और मूल मुद्दा विकास का भले ही था लेकिन विकास की कल्पना पर ही प्रश्नचिन्ह था. क्योंकि, विकास का जो मुख्य प्रवाह था वह समाज के सभी घटकों को समान अवसर देनेवाला, सबको साथ में लेकर चलनेवाला नहीं था. बल्कि मुठ्ठीभर तथाकथित विकास के लिए समाज के बहुजन, शोषित समूह का शोषण और विषमता के लक्षण इस प्रवाह में निरंतर दिखाई देते है. इसलिए यहाँ पर इस तबके के विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रथम मानवी विकास और मानवी अधिकारों का आग्रह करना आवश्यक था. यहीं बात ध्यान में लेकर प्रतिभा ताई लोकसंघर्ष मोर्चा को अपने आंदोलन का मुख्य हाथियार बनाकर आदिवासियों के लिए रचनात्मक संघर्ष की भूमिका लेकर अपना काम शुरू किया.



सरदार सरोवर परियोजना में नंदुरबार जिले के 33 आदिवासी गाँव डूब रहे थे. उनके अन्यायपूर्वक विस्थापन के खिलाफ परियोजना से पीडितो की लड़ाई आरंभ हुई. इन 33 गाँवों के पुनर्वास के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 4200 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर 5 बसाहटों का निर्माण किया. कभी झांसा देकर तो कभी डरा-धमकाकर इन पांच बसाहटो में पुनर्वास के नाम पर पटक दिया गया. नये पुनर्वास के बदले आदिवासियों को पूरी तरह से फंसाया गया था. जिन बसाहटो में 200 परिवारों का पुनर्वास हो सकता है, वहां पर 400 से 500 परिवारों को रखा गया. यहाँ तक की, एक ही खेत पर या भूखंडपर दो प्रकल्पपीडितो के नाम डाले गए थे. तो कईयों को केवल कागज़ पर ही जमीन दी गयी थी. ऐसी कई विपरीत स्थितियों का सामना परियोजना पीडितो को करना पड़ा.

 :दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

 इन सभी पीडितो के अधिकार के लिए ‘पुनर्वसन संघर्ष समिति’  बैनर के तले उनकी मांगों के लिए और विकसित पुनर्वास के लिए सरकार के विरोध में आन्दोलन खडा किया. लोकसंघर्ष मोर्चा के बैनर तले प्रतिभा ताई के प्रयासों से सरदार सरोवर प्रकल्प के विस्थापितों का तलोदा और अक्कलकुआ तहसील में 9 वसाहटों में नया पुनर्वसन हुआ है. अंबाबारी तहया देहली प्रकल्पपीड़ितों का अन्यायपूर्ण विस्थापन पर रोक लगाकर उनके पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू है.

पीढ़ी दर पीढ़ी जंगल की जमीन पर खेती करनेवाले आदिवासियों को उनकी जमीन का हक मिलने के लिए तथा गाँव के सामूहिक प्राकृतिक संसाधनों का हिस्सा उन्हें मिले , इस उद्देश्य से वनों का अधिकार कानून 2005 लागू किया. इसके लिए प्रतिभाताई ने 4 हजार आदिवासियों की पदयात्रा जलगाँव से मुंबई निकाली थी. तब जाकर यह कानून मंजूर हुआ. इस कानून का उचित अमल करने के लिए वे प्रयासरत हैं. वे पेशा क़ानून बनाने के लिए क़ानून मंजूर कर उसके अमल के लिए भी प्रयासरत हैं. वे वनविभाग के समन्वय से आदिवासी क्षेत्र में आरक्षित वनक्षेत्र तथा जंगल का सुचारु विकास प्रकल्प बने इसकी भी कोशिश कर रही हैं.

बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर 

जल-जंगल-जमीन आदि प्राकृतिक संसाधनों के अधिकार मिले इसलिए आदिवासी स्वशासन कानून को नए सिरे से त्रुटीरहित बनाने और आदिवासियों में रोजगार के लिए होनेवाले मायग्रेशन को रोक लगाने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रतिभाताई काम कर रही हैं. साथ ही कुपोषण सहित आदिवासियों की अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए भी लोकसंघर्ष मोर्चा परिसर में कार्यरत है.

लोकसंघर्ष मोर्चा की इस लडाई में आदिवासी महिलाओं का नेतृत्व और सहभागिता भी महत्वपूर्ण है. झिलाबाई, भांगीबाई, सिताबाई, यमुनाबाई, सुगरीबाई जैसे कई नाम हैं, जो संगठन की नींव है. जो मुद्दे आदिवासियों के प्रतिरोध के केंद्र में रहे, उनका संबंध मुख्यत: उनकी परम्परागत जीवन पद्धति पर होने वाले हमलों से है,  तथा  जंगलों पर राज्य के एकाधिकार और उनके व्यापारिक दोहन व उनके प्रयोग पर कर लगाने से.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी लोगों के आगमन तथा उनके द्वारा आदिवासी किसानों के शोषण ने भी आदिवासी विद्रोहों को उत्पन्न किया. इस विद्रोह को आन्दोलन की आग में परिवर्तित कर प्रतिभाताई ने ‘लोकसंघर्ष’ को व्यापक बनाया है.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  


नीलेश झाल्टे  जलगाँव  स्थित  पत्रकार हैं  और  दैनिक  लोकमत  समाचार  से  जुड़े  हैं  . संपर्क: 9822721292


शंखमुखी शिखरों का कवि : लीलाधर जगूड़ी

रविता कुमारी

हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय
हरिद्वार, उत्तराखण्ड
ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in



साहित्य में विचारधारा को उत्तराधुनिकता के नाम से जाना जा रहा है. आजकल इसकी चर्चा जोरों पर है. केन्द्रीय वर्चस्व को अंगूठा दिखाकर यह स्थानीयता और उसकी विभिन्नताओं पर यह बल देती है. उत्तर आधुनिकतावाद अब बहुसंस्कृतिवाद या बहुलतावाद पर आधारित नया विमर्श है.आज के लिखे को समझने के लिए एक पूरी व्यवस्था पर नजर डालनी होगी. यह एक ऐसी अलग वैश्विक व्यवस्था है जिसमें छोटे से छाटे शहर की सीमाओं को अपने  पाश में जकड लिया है. इसमें चीजे बहुत सरल नहीं है, इसे कुछ ऐसे समझा जा सकता है कि आधुनिकता में उच्च तथा सुसंस्कृत वर्ग राजनीतिक जीवन पद्धति और कला संस्कृति का नियामक था. उत्तराधुनिकता ने इस को भी समाप्त कर दिया. यह केंद्र के लोगों को परिधि पर ले आया और परिधि के लोगों को केंद्र में लाकर समय के पहिये को पलट दिया. जहाँ उपेक्षितों, शोषितों, दलितों, स्त्रियों, समलैंगिकों को प्रमुखता दी जाने लगी. उत्तराधुनिकता ने लेखक कि महत्ता को नकार दिया. यहाँ पाठक का महत्व बढ़ गया. इसने यह भी मानने से इनकार कर दिया कि विज्ञान के पास सब समस्याओं का हल मौजूद है.

यह वही समय है जब बहुजन और समाजवादी राजनीति का चरम, शिक्षा मध्यम जातियों की ओर आती है. यह वही दशक है जब इस दसक में विद्रोही स्वर कवितायेँ लिखी गईं. यह वही समय है जब कविता में सबाल्टर्न स्टडीज, आइडेंटिटी पॉलिटिक्स, उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तरमार्क्सवाद,  उत्तर उपनिवेशवाद आदि से कवि गहरे प्रभावित होते हैं और यही समय है जब मध्यवर्गीय अवसरवादी (कथित वामपंथी) की मौका परस्ती और दोमुहँपन कविता में खुलता है. यदि इसे जनभाषा में कहा जाय तो यह वही समय है जब ‘साहित्य के पटवारी’ अपनी चकबंदी करते हैं और विचारधारा से आक्रांत सगा-सौतेला, चचाजात, भाई-विरादर है या नहीं कि ठीक ठीक पहचान भी. १९९० के बाद साम्प्रदायिक फासीवाद और पूंजीवाद भारत में उभरा है जिसमें छोटे बडा़ नौकरशाह, लुटेर डॉक्टर, ठग वकील, पूंजी के दलाल, मीडिया, एनजीओ और मिल बांट खाने और चुप रहने वाली संस्कृति के रहनुमा एक अलग अर्थ में विस्तार पाते हैं.
पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रघुवीर सहाय सम्मान आदि से सम्मानित तथा ‘शंखमुखी शिखरों पर’, ‘नाटक जारी है’, ‘इस यात्रा में’, ‘रात अब भी मौजूद है’, ‘बची हुई पृथ्वी’, ‘घबराए हुए शब्द’, ‘भय भी शक्ति देता है’, ‘अनुभव के आकाश में चाँद’, ‘महाकाव्य के बिना’, ‘ईश्वर की अध्यक्षता में’, ‘खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है’ आदि ग्यारह से अधिक कविता संग्रहों के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी आज 75वें वर्ष में प्रवेश कर गए. लीलाधर जगूड़ी उसी समय और सन्दर्भ के ऐसे सशक्त रचनाकार हैं जो भाषा और अनुभव के बीच एक ऐसा वितान रचते हैं जो अन्य कवियों में दुर्लभ है. भाषा में उन्होंने एक नया सौन्दर्यशास्त्र गढ़ा है. उनकी कविता का विराट जीवन और प्रतिबद्ध रचनात्मकता उनकी कविता में एक साथ देखी जा सकती है जो उन्हीं के समय के कवियों में विरल है. लीलाधर लिखते हैं :
पुलिस लाइन में आज क्या हो गया
पुलिस लाइन में पुलिस पर पुलिस हँस रही है.

उनकी कविता सिर्फ स्फीति नहीं है परन्तु विचार्रों का संकुल है. वह शुरू होकर कभी खत्म नहीं हुआ करती. अनुभव के आकाश में उनकी कविता चाँद है. उनकी रचनात्मकता सृजनशीलता के अनुभव से जन्मती है. अपनी भाषा से वे सर्जनात्मकता को नया टूल देते हैं. वे बार-बार दुहराई गई बातों को नए कथ्य और शिल्प के साथ प्रस्तुत कर अचंभित कर देते हैं. वे भोगी हुई तल्लीनता और तार्किकता को अपनी कविताओं का विषय बनाते हैं. सरलता और सहजता के हामी शायद ही कभी जान पायें कि कठिन को सरल रूप में कह पाना कितना कठिन होता है. अनुभव, भाषा और संवेदना के वैविध्य के लिए उन्होंने स्वयं ही कहा है-‘भाषाएं भी अलग-अलग रौनकों वाले पेड़ों की तरह हैं. सबका अपना अपना हरापन है, कुछ उन्हें काट कर उनकी छवियों का एक ही जगह बुरादा बना देते हैं.’

चार्वाकी संस्कृति में आज का मनुष्य सुख और चैन से नहीं रह सकता. पहले कर्ज को बुरा माना जाता था परन्तु आज का मनुष्य है जो आधे से अधिक कर्ज में डूबा हुआ है. आज कर्जा उसकी आर्थिक समृद्धि का परिचायक है. ‘अनुभव का सामाजिक अन्वय’ नामक अपने वृहद् आलेख में ओम निश्चल उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता के बारे में लिखते हैं कि :
‘जगूड़ी की कविता न तो पारंपरिक कविता की लीक और लय पर चलती है न आजमाए हुए बिम्ब-प्रतीकों का अवलंब ग्रहण करती है. यह कवित-विवेक के अपने खोजे-रचे प्रतिमानों और सौदर्यधायी मानदंडों फर टिकी है. रीति, रस,छंद और अलंकरण के दिखावटी सौष्ठव से परे यह आधुनिक जन-जीवन में खिलती प्रवॄत्तियों, उदारताओं, मिथ्या मान्यताओं, व्याऔधियों, किंवदन्तियों, क्रूरताओं का  खाका खीचती है. इसमें बरते गए शब्द आधुनिकता के स्वप्न और संघर्ष की पारस्प रिक रगड़ से उपजे हैं. पर्यावरण को ये कविताऍं चिंताओं और सरोकारों के नए धरातल से देखती हैं. इनमें सब कुछ के लुट जाने का और लुटते हुए को बचा लेने का हाहाकारी शोर और रोर नहीं है.

कितना कुछ बदला है. शक्तिशाली लोग सारे संसाधनों को अपना इलाका मान चुके हैं. वे सब कुछ लूट लेना चाहते हैं. इक्कीसवीं शताब्दी सूअरों की शताब्दी है. डा. कृष्णदत्त पालीवाल अपने एक आलेख में लिखते हैं कि ‘मिलेनियम ईयर’ का भूत मेरे ऊपर सवार है. यह कौन है जो मुझे हर जगह हर अवसर पर अकेला पाकर पकड़ लेता है और फिर कहता है-‘सुनो हजरत! इक्कीसवीं शताब्दी खाते पीते सूअरों की शताब्दी होगी.’ हालाँकि जीवन का संघर्ष चलता रहता है. यह लड़ाई कभी खत्म नहीं होती है. अपनी ‘लड़ाई’ कविता में हम देखते हैं :
दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई आज भी एक बच्चा लड़ता है
पेट के बल, कोहनियों के बल और घुटनों के बल
लेकिन जो लोग उस लड़ाई की मार्फत बड़े हो चुके
मैदान के बीचों-बीच उनसे पूछता हूं
कि घरों को भी खंदकों में क्यों बदल रहे हो?
जानते हो यह उस बच्चे के खेल का मैदान है
जो आज भी दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ता है
इस शताब्दी में आदमी की ‘आदमियत’ का कोई अर्थ नहीं बचेगा. आदमी का सूअर की जीवन पद्धति से जीना- मुक्त यौनवाद को गह लेगा.
लीलाधर जगूड़ी अपनी ‘अंतर्देशीय’ कविता में समाज के इसी के अंतर्द्वंद्व को व्यक्त करते हैं:
इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए / न अपने विचार. न अपनी यादें
इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए / न अपने संबंधों की छाप
न दुख, न शिकायतें / न अगली मुलाकात का वादा
न सक्रांमक बीमारियाँ / न पारिवारिक प्रलाप
न अपने हस्ताक्षर / वरना यह पत्र पकड़ा जा सकता है

उत्तर आधुनिकता को समझे बिना हम अपने समय को नहीं समझ सकते . आधुनिकता ने ईश्वर और प्रकृति के बीच मनुष्य को देखा. हमें यह समझना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि बिना इस बोध के हम समकालीन समाज और उसके सरोकारों को ठीक से नहीं समझ पायेंगे . उत्तर आधुनिकता विचारों, प्रवृत्तियों, बौद्धिक रुचियों का समुच्चय है. उत्तर आधुनिकता सुचना युग, बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद के वर्तमान पात्र के उस संस्कृति का नाम है जिसमें केन्द्रवाद नहीं है. इसमें वह प्रवृत्तियां घर कर रहीं है जहाँ हासिये के लोग अब केंद्र की तरफ बढ़ पा रहे हैं. इसके अर्थ बहुत व्यापक हैं और इन्हें सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता. सब कुछ माल में परिवर्तित हो गया है.
प्रकृति के अपार संहार से रिश्ते घावों का मवाद बन चुके है. सूचना संक्रांति का ड्रैगन अपना जाल फैला रहा है. नव अर्थशास्त्र की हवा निकल चुकी है. नारीवाद, गे-कल्चर, मुक्त यौनवाद सभी को स्वीकृति कर दुनिया कचरे के ढेर में परिवर्तित होती जा रही है. इसी के साथ जहाँ आधुनिकता का अवसान और उत्तर आधुनिकता का शिगूफा नए अर्थों में जन्मता है. अब यह समय कुंठित राष्ट्रवाद की तरफ लौटने का भी है. भले ही यह माना जाय आधुनिकता के बाद उत्तराधुनिकता पश्चिम के समाज और दर्शन की एक ऐतिहासिक यात्रा है.
साहित्य और समाज में मीडिया और मार्केट की मित्रता और गहरी हुई है. हर अनुभव सूचना बन रहा है और अर्थ की स्थिरता नहीं बची रही. वर्ग जाति में बदल गया है. दलित, स्त्री, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्तियों को और उनकी अस्मिताओं को स्वीकृति मिल रही है. उपभोक्तावाद ने सत्ता के खिलाफ हिंसा बढा दी है. लेकिन ऐसी मीठी सड़ांध कि सब अच्छा लगता है. मंद गति से होने वाले इस सांस्कृतिक संक्रमण से संस्कृतियों की पहचान को भी कोई खास नुकसान नहीं होता. ”मेरी आत्माद लोहार है’ में लीलाधर लिखते हैं कि :
ज़िन्दागी से रोज लोहा लेती है /मेरी आत्माह धोबी है
मन का मैल ऑंसुओं से धोती है/ मेरी आत्मात कुम्हाबर है
सपनों की मिट्टी से आकार बनाती है / मेरी आत्मा  बढ़ई है
रोज़ कोई न कोई विचार खराद देती है.

सन् साठ आजादी के बाद के मोहभंग का एक ऐसा मोड़ है जिसने केवल राजनीति की दिशा ही नहीं बदली, साहिात्यिक विधाओं के कथ्य और फैब्रिक को भी दूर तक प्रभावित किया. कविताओं को देखें तो साठोत्तर पद इसी मोड़ का परिचायक है. अकविता के उन्माद को चीर कर आगे बढ़ना वाकई कठिन था. पर धूमिल और जगूड़ी ने एक रास्ता बनाया. विक्षोभ और मोहभंग को तार्किकता में रूपायित करने की चेष्टा की. समाज के सन्दर्भ को उन्होंने कविता में ढाला. सारा ईंट-गारा अपने समय और सन्दर्भ से लिया. संसद से सड़क तक में यदि धूमिल अपने समय को रूपायित करते हैं तो नाटक जारी है में जगूड़ी अपने समय को. लीलाधर लिखते हैं कि बाद के दिनों में प्रकाशित रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक़्ति देता है–उस वक़्त की राजनैतिक, आार्थिक और सामाजिक हलचलों, अन्तर्ध्वृनियों का ही काव्याुत्मक विस्फोट हैं.
भोगवादी संस्कृति ही सब पर हावी है. गत सदी के अंतिम दो दशकों में हुई संचार क्रांति से पहले हालात दूसरी तरह के थे. विकसित संचार माध्यमों के अभाव में पहले सांस्कृतिक संक्रमण से होने वाले प्रतिरोध और आत्मसातीकरण में अक्सर समाज के सभी तबके शामिल नहीं होते थे. अक्सर समाज के कुछ तबकों में परिवर्तन हो जाते,  धीरे-धीरे उन्हें स्वीकृति भी मिल जाती और मामूली प्रतिरोध के बाद उन्हें संस्कृति का हिस्सा भी मान लिया जाता है .

भय भी शक्ति  देता है, अनुभव के आकाश में चाँद और ईश्वर की अध्यक्षता में जैसे बेहतरीन संग्रह जगूड़ी ने दिए.भय भी शक्तिक देता है की दर्जनों कविताऍं आधुनिक अर्थतंत्र, बाजारवाद और भूमंडलीकरण की आगत आहट को लेकर लिखी गयी थीं, जब उदारीकरण और भूमंडलीकरण की चर्चाऍं भी शुरू नहीं हुई थीं और अब उनके नवीनतम संग्रह खबर का मुँह विज्ञापन से ढका है—को देखें तो यह संग्रह न तो पुराने संग्रहों की जूठन से रचा गया है न पुराने अनुभवों का नवीन विस्तार है. यहॉ पुरानी सारी प्रविधियों को अलग रखते हुए सर्वथा नए ढंग से बात कहने की कोशिश है.

लीलाधर जगूड़ी की कविता विपत्ति में भी एक पुल का निर्माण करती है. वे बेहद तात्कालिक सामाजिक विषयों को जीवन-पद्धति से अदृश्य कारणों तक ले जाते हैं जहाँ चीजें भी मनुष्यों के बारे में सोच रही होती हैं. इसीलिए कवि कहता है कि चीजों के बारे में सोचना अब सरल नहीं रह गया है. जगूड़ी की प्रत्येक कविता का कथ्य और विन्यास देख कर लगता है कि अब कविता खुद अपने नए औजार पैदा कर रही है. उन्हें  पुराने औजारों से नहीं जाँचा जा सकता. संसाधन किसी का नहीं होता. कविता की यह सीढ़ी, नामक कविता मेंकवि कहता है कि दुनिया मुझे रोज बनानी पड़ती है. वे अपनी पेड़ कविता में लिखते हैं:
नदियाँ कहीं भी नागरिक नहीं होतीं / और पानी से यादा कठोर और काटनेवाला
कोई दूसरा औजार नहीं होता / फिर भी जो इस भयंकर बाढ़ में अपनी बगलों तक डूब कर खड़ा रहा
वह अतीत के जबड़े से छीन कर अपने टूटे हाथों को फिर से उगा रहा है
इस सपाट जगह के बाद उस कोने पर
जहाँ ढाल करीब-करीब बाईं ओर के अँधेरे में पड़ गया है

मुझे कुर्सी से उठ कर उससे मिलना चाहिए आलोचक या समीक्षक ही अपनी पुरानी नसैनी से यहाँ कैसे चढ़ सकता है—पहाड़ों पर खाइयों में नदियों में रास्ते-सी सीढि़याँ गिरी पड़ी दिखती हैं/ फिर भी जिस-जिस रास्ते से जाना होता है/उसे वह सीढ़ी खुद बनानी होती है/ एक एक कदम कविता में जैसे छोटे-छोटे वाक़्य/ हर नए कदम फर नए डंडे बिठाने पड़ते हैं–हवा में/….तब कहीं एक कविता उतर पाती है पृथ्वी पर…और चढ़ पाती है बिना शीर्षक के शीर्ष पर भी.—यही सीढ़ी उस रास्ते तक पहुँचाती है जो एक मजदूर दम्पीति के जीवन में जाता है लेकिन जिस रास्ते से वे बिल्कुल किनारा किए रहते हैं. उसी तकलीफ को समझने से पत्रकारिता की भाषा में वह कविता लिखी जा सकी जो एक रिपोर्ट जैसी है और जिसका उद्देश्य न प्रथमतः, न अंततः कविता होना नहीं था. भाषा, हालत का साथ नहीं दे रही है. जैसे रखे-रखे उड़ गया हो पानी का बोझ और गुस्सा.
लीलाधर अपने एक निबंध में लिखते हैं कि ‘जब भी मैं कविता के बारे में सोचता हूँ, मैं उन छूटी हुई घटनाओं की ओर चला जाता हूँ जो अतीत होकर भी व्ययतीत नहीं हो पाती हैं. वे हर नये मौसम के बादलों की तरह आपस में मिल जाती हैं और छा जाती हैं. भाषा वही होते हुए भी, वह हर अनुभव की अभिव्य क्ति में कोई न कोई सहज बदलाव प्राप्तह कर लेती है. ‘जाने-बूझे’ में भी एक अनजानापन पैदा हो जाता है. क्या  है जो कहा नहीं गया है फिर भी कविता कुछ नया ले आती है. यह संवेदना और भाषा का नया रिश्ताे भले ही कठिन और अटपटा लगता हो, लेकिन उसकी मनसा अपने समय में सरल और बोधगम्य  होने की ही रहती है.
बी.ए.पास रिक्शावाले की कविता
उस जगह को याद रखे हुए जिसे छोड़ आया हूँ / पहाड़ की चोटी पर
श्रम और पूँजी और विनिमय के बीच में
गमछे भर आधी करवट लेटने की जगह ढूँढ़ता हूँ मैं
शहर के कूड़े से बने रपटे में / सैकड़ों दिन की कड़ी मेहनत कठिन बचत से
उलझे हुए अपार जगत व्यापार में क्या-क्या पा सकता हूँ मैं
एक तो तिरछा ढाल जिस पर से मेढ़क भी गिर पड़े
चिड़िया भी रपट जाए

हर बार कलफदार भाषा कविता की पहचान नहीं होती है. आज का कवि केवल कल्पना का कवि नहीं रहा है. वह जीवन के कटु यथार्थ को बड़ी संजीदगी से साध रहा है. वह तुकें और अन्त्यानुप्रास भिड़ाने वाला प्राणी नहीं है. सूखे समाज में लहरें पैदा करने वाली विज्ञापन टीम फर उसकी पैनी नज़र है. आज की कविता केवल वही कविता नहीं है जिसमें वैश्विक परिदृश्य हों बल्कि आज की कविता वह कविता है जो ग्लोबल होने से पहले है. भारतीय समाज के यथार्थ से हटकर हम आज की कविता को नहीं देख सकते. अस्सी के बाद कविता की भाषा और संवेदना में जिस तरह का बदलाव आया है उसी का एक नमूना मात्र हैं जगूड़ी की कवितायें. वे बदलाव, विकास, आधुनिकता, तकनीकि संचार और नवाचारों का विरोध नहीं करते बल्कि उसे नोटिस में लेकर उससे लगातार जूझते हैं. उनकी कविता सम्पूर्ण मानवता की कविता हो जाती है. वे जंगल, पहाड़, नदी, नाले और अभिवंचित वर्ग की पीड़ा को अपनी कविता में उड़ेल देते हैं.

1. https://samalochan.blogspot.com/2015/07/blog-post.html
2.  खाते पीते सूअर की शताब्दी, उत्तर-आधुनिकता और दलित साहित्य, कृष्णदत्त पालीवाल, पेज-277
3.http://www.hindisamay.com/writer/leeladhar

ज़िंदा जलती होलिका

  बाल गंगाधर‘बाग़ी’

शोधार्थी जे.एन.यू. नई दिल्ली संपर्क : 09718976402 Email. bagijnu@gmail.com

अलग आस्वाद और बिंबों के साथ कवि बाल गंगाधर  बागी अपनी कविताओं के लय से न सिर्फ श्रोताओं को झुमाते हैं, बल्कि सामजिक क्रान्ति के सन्देश भी देते हैं. बागी को नीले आकाश और आंबेडकरी आकांक्षाओं का कवि कहा जा सकता है. आइये पढ़ते हैं उनकी कविता ‘ज़िंदा जलती होलिका.’  

 

अग्नि कुण्ड में जला-जलाकर, राखों में ढकने वाले
सती प्रथा में महिलाओं को जलाये हैं ये मतवाले
ज़िंदा जलती चीख-चीख कर, खून की बहती धारें
जलती नारी देख पर इनके आँख में पड़े नहीं छाले

नारी का सम्मान न करते, ज़िंदा उसे जलाते हैं
हत्याओं का जश्न मानकर, होली वही मनाते हैं

साल हज़ारों सदियाँ कितनी, खूनों में हैं डूब चुकी
आँखों से खूनों की धारा, नदियाँ बनकर सूख चुकी
नंगा बदन घुमाये कितने, गाँव शहर चौराहों पर
सामूहिक दुष्कर्म कर टाँगे, हैं खम्भे ‘औ’ पेड़ों पर

देवदासी बनाकर रात-दिन, रास रचाया करते हैं
धर्म नाम पर मंदिर के, कोठे में बिठाया करते हैं
सास बहू को क़ैद किये जो, घूंघट में अकुलाती हैं
भरे समाज बोले गर तो, वे शर्मसार की जाती हैं
दीन-दलित की महिलायें,उनसे बेईज़्ज़त की जाती हैं
अगर विरोध कर दें वे कुछ,तो नीलाम की जाती हैं

जन-मन का गीत गाकर,वो माँ का राग सुनाते हैं
जो बहू ठूस घर में अपने,आज़ाद नहीं कर पाते हैं

गाँव में दलित पिछड़ों के घर, होली में झोंके जाते हैं
फिर चारो ओर घूम-घूमकर, डण्डा लट्ठ बचाते हैं
वे अपने घर से पाँच-पाँच, खण्डे के टुकड़े लाते हैं
डाल होलिका में उसे फिर, फगुआ रास सुनाते हैं

दलित पिछड़ों के घर में घुस,बहुओं को रंग लगाते हैं
वे इसी बहाने छेड़छाड़ कर, दुष्कर्म भी कर जाते हैं

छेड़-छाड़ आतंक मचाती, हर रंगों की टोली है
ऊपर से ये कहते यारों, बुरा न मानो होली है
रंग लगाते घर में घुस, सामान चुरा ले जाते हैं
पानी कीचड़ रंग अवीर, कपड़े फाड़ चिल्लाते हैं

दहेज न मिलने पर, बहुओं को जिंदा जलाते हैं
मार पीट जिंदा जला, होलिका सी हाल बनाते हैं

हत्याओं का पर्व छिपाने, रंग गुलाल उड़ाते हैं
याद खून की होली को, वे रंगों से भर जाते हैं
दारु गांजा चरस अफीम, भांग संस्कृति फैलाते हैं
नशाखोरी में फंसा समाज, दलदल में ले जाते हैं

समझौता करने वाले, इन रंगों में खो जाते हैं
इतिहास भूल होली का,  पकवान बनाकर खाते हैं

कविता कृष्णपल्लवी की कविताएँ

कविता कृष्णपल्लवी ड़ी


कवियत्री-लेखक, सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यकर्ता , विशेषकर स्त्री-मजदूरों के बीच सक्रिय। संपर्क :kavita.krishnapallavi@gmail.com

कविताई का हुनर 

वह कठिन समय का जलता सच था.
गंध चिरांयध फैल रही थी
लाशों की बदबू फैली थी
आसपास उन्मादी नारे गूँज रहे थे.
मैंने इस सच को कविता में रखना चाहा.
हृदय व्यग्र था, उत्तेजित था.
कविता बनी, मगर कविता में
कविता कम थी, सच्चाई का
सीधे-सीधे कथन अधिक था.
कवि ने देखा, मुँह बिचकाया
धिक्कारा उसने, ”ऐसे कैसे सुकवि बनोगी?
तुम सब गुड़गोबर कर दोगी.”
कवि ने फिर कविताई का जौहर दिखलाया
झालर-फुँदनों से सच को ही ढँक डाला.
बोली मैं, ”कवि जी, यह कविता पास रखो तुम
काम आयेगी, चर्चा होगी और
बहुत सम्मान मिलेगा.
समय मिला तो हम भी माँजेंगे कविताई
लेकिन अभी ज़रूरत जैसी,
कम कविता और ज्यादा सच से
अपना काम चला लेंगे हम.”
अच्छी होती है कविताई,
दुर्लभ गुण है, लेकिन ऐसे कठिन समय में
सच्चाई और कविताई में चुनना ही हो
अगर हमें तो
सच्चाई को हम चुन लेंगे.
समय मिलेगा अगर कभी तो
कविता की बहुरंगी चादर भी बुन लेंगे.

नालन्दा के गिद्ध 

गिद्धों ने
नालन्दा के परिसर में स्थायी बसेरा बना लिया है.
पुस्तकालय में गिद्ध,
अध्ययन कक्षों और सभागारों में गिद्ध,
छापाखानों में गिद्ध, सूचना केन्द्रों में गिद्ध,
नाट्यशालाओं और कला-वीथिकाओं में गिद्ध.
गिद्ध नालन्दा से उड़ते हैं
बस्तियों की ओर
वहाँ वे जीवित संवेदनाओं, विश्वासों और आशाओं
को लाशों की तरह चीथते हैं,
पराजित घायलों और मृत योद्धाओं पर टूट पड़ते हैं.
फिर गिद्ध मार्क्सवाद से लेकर गाँधीवाद तक की भाषा में
मानवीय सरोकारों के प्रति गहरी चिन्ता जाहिर करते हैं
और तमाम बस्तियों को
अफ़वाहों, शक़-सन्देहों और तोहमतों की
बीट से भरते हुए
नालन्दा की खोहों में वापस लौट जाते हैं.

मेरी मां

मेरी मां
इक माटी का दियना
दिप-दिप जलती बाती.
लंबी रात में
दुख ही साथी
दुख ही सदा संघाती.

मेरी मां
बस दुख की दुल्हनियां
दुख से गांठ जुड़ाती.
दुख का चंदोवा
दुख का मंड़वा
दुखिया सभी बराती.

मेरी मां
इक घायल हारिल
सपन देस की बासी
कनक दीप का
सपना देखे
अनगिन बरत उपासी

मेरी मां
मौसम की मारी
पगली नदी बरसाती.
सावन-भादो
उमड़कर बहती
फिर सूखी रह जाती.

मेरी मां
इक खोई गइया
चौंरे बीच रंभाती.
बिछुड़ गये सब
बछड़े-बछिया
दूध बहाती जाती.

मेरी मां
एक प्यासी गगरिया
नदिया को लिखती पाती.
कोने बैठ
टकटकी बांधे
यादों को दुलराती.

मेरी मां
इक आंसू का कतरा
आंखे जिसे पी जातीं.
जलती-बुझती
रात-अंधेरे
भोर हुए झंप जाती.

मेरी मां
इक अकथ कहानी
सोच फटे यह छाती.
लिख ना सके
कोई बांच न पाये
अनबूझी रह जाती.

गाज़ा के एक बच्चे की कविता 

बाबा! मैं दौड़ नहीं पा रहा हूँ.
ख़ून सनी मिट्टी से लथपथ
मेरे जूते बहुत भारी हो गये हैं.
मेरी आँखें अंधी होती जा रही हैं
आसमान से बरसती आग की चकाचौंध से.
बाबा! मेरे हाथ अभी पत्थर
बहुत दूर तक नहीं फेंक पाते
और मेरे पंख भी अभी बहुत छोटे हैं.

बाबा! गलियों में बिखरे मलबे के बीच
छुपम-छुपाई खेलते
कहाँ चले गये मेरे तीनों भाई?
और वे तीन छोटे-छोटे ताबूत उठाये
दोस्तों और पड़ोसियों के साथ तुम कहाँ गये थे?
मैं डर गया था बाबा कि तुम्हें
पकड़ लिया गया होगा
और कहीं किसी गुमनाम अँधेरी जगह में
बंद कर दिया गया होगा
जैसा हुआ अहमद, माजिद और सफ़ी के
अब्बाओं के साथ.
मैं डर गया था बाबा कि
मुझे तुम्हारे बिना ही जीना पड़ेगा
जैसे मैं जीता हूँ अम्मी के बिना
उनके दुपट्टे के दूध सने साये और लोरियों की
यादों के साथ.

मैं नहीं जानता बाबा कि वे लोग
क्यों जला देते हैं जैतून के बागों को,
नहीं जानता कि हमारी बस्तियों का मलबा
हटाया क्यों नहीं गया अबतक
और नये घर बनाये क्यों नहीं गये अब तक!
बाबा! इस बहुत बड़ी दुनिया में
बहुत सारे बच्चे होंगे हमारे ही जैसे
और उनके भी वालिदैन होंगे.
जो उन्हें ढेरों प्यार देते होंगे.
बाबा! क्या कभी वे हमारे बारे में भी सोचते होंगे?

बाबा! मैं समंदर किनारे जा रहा हूँ
फुटबाल खेलने.
अगर मुझे बहुत देर हो जाये
तो तुम लेने ज़रूर आ जाना.
तुम मुझे गोद में उठाकर लाना
और एक बड़े से ताबूत में सुलाना
ताकि मैं उसमें बड़ा होता रहूँ.
तुम मुझे अमन-चैन के दिनों का
एक पुरसुक़ून नग्मा सुनाना,
जैतून के एक पौधे को दरख्‍़त बनते
देखते रहना
और धरती की गोद में
मेरे बड़े होने का इंतज़ार करना.

पूँजी 

कारखानों में खेतों में करती है श्रमशक्ति की चोरी
वह मिट्टी में ज़हर घोलती है
हवा से प्राणवायु सोखती है
ओजोन परत में छेद करती है
और आर्कटिक की बर्फीली टोपी को सिकोड़ती जाती है.
वह इंसान को अकेला करती है
माहौल में अवसाद भरती है
मंडी के जच्चाघर में राष्ट्रवाद का उन्माद पैदा करती है
स्‍वर्ग के तलघर में नर्क का अँधेरा रचती है.
आत्‍मसंवर्धन के लिए वह पूरी पृथ्वी पर
कृत्‍या राक्षसी की भाँति भागती है
वह अनचीते पलों में
दिमाग पर चोट करती है
युद्धों की भट्ठी में मनुष्यता को झोंकती है.
वह कभी मादक चाहत तो कभी
आत्मघाती इच्छा की तरह दिमाग में बसती है
युद्ध के दिनों में हिरोशिमा
और शान्ति के दिनों में
भोपाल रचती है.

झाड़ू पुराण

झाड़ू से बुहारी नहीं जा सकती हैं लाशें.
झाड़ू दामन पर लगे
खून के धब्बों को साफ नहीं कर सकता.
झाड़ू जली हुई वीरान बस्तियों को
आबाद नहीं कर सकता.
झाड़ू खण्डहरों को रौशन नहीं कर पाता.
और हाँ, झाड़ू स्मृतियों को
बुहार नहीं सकता,
न ही इतिहास को
कूड़ेदान के हवाले कर सकता है.
झाड़ू बदलाव के जज़्बे को
ठिकाने नहीं लगा पाता.
झाड़ू पर सवार जादूगरनी
हमेशा ही एक बच्चे के हाथों
मात खाती रही है.


विरासत

मेरे पास है
एक बीमार गुलाब.
मेरे पास है
एक काला पत्थर
पितरों की विरासत
और नग्न यक्षिणी की एक प्रतिमा.
मेरे पास है सुई-धागा,
कीलें अलग-अलग नापों की,
हथौड़ी, छेनी, निहाई, खुरपी, दरांती
और घंटी और डायरियां और झोले
और गर्भ की स्मृतियाँ
और शरीर पर जले-कटे के निशान
और आत्मा में
कोयला खदानों का अंधेरा
और उमस और टार्चों की रोशनी.
उपेक्षा ने सिखाया मुझे
सुलगते रहना.
दर्द से सीखा मैंने हुनर
भभककर जल उठने का.
आज़ादी चाहिए थी मुझे शुभचिंतकों से
मनमुआफिक विद्रोह के लिए
और मेरे पास वह कायरता भी थी
युगों से संचित
कि इतना समय लग गया ऐसा करने में.

युग नायिका सावित्री बाई फुले

रजनी तिलक


सावित्रीबाई फुले स्मृति दिवस पर विशेष 

सावित्री बाई फुले कोई साधारण महिला नहीं थी, जिन्हें इतिहास के गर्भ में छुपा दिया जाए और वे गुमनामी के अंधेरों में छुप जाये। उन्नीसवीं शताब्दी की वह वह सुनहरी किरण थी जिसमें ब्रिटिश उपनिवेशवाद के भीतर अपनी न केवल आभा बिखेरी बल्कि अंधविश्वास, पाखंड, ढोंग धार्मिक कर्मकांडों को चीर कर ज्ञान के स्रोत को अछूतों व स्त्रियों के लिये रेखांकित किया। तत्कालीन बीहड़ परिस्थितियों में समाज सुधारक क्रांतिज्योति सावित्री बाई फुले युग नायिका बनकर उभरी। अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, निर्भीक व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकारो से ओत-प्रोत ज्योतिबा फुले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दकियानूसी समाज को बदलने हेतु इन्होंने अपने तर्कों के आधार पर बहस किया। स्त्री जीवन को गौरवान्वित किया एवं सामाजिक न्याय को लक्षित किया।

भारत की प्रथम प्रशिक्षित शिक्षिका होने का गौरव उन्हें ही प्राप्त है। ऐसे समय में उन्होंने शिक्षा पर कार्य करना शुरू किया, जब शिक्षा के सारे द्वार स्त्रियों के लिए प्रायः बंद थे। स्त्रियों  को पैरों की जूती वाचाल, नर्क का द्वार कहा जाता था। उनका जीवन चूल्हे चैके और बच्चे पैदा करने, पति की सेवा करने तक ही सीमित था। उनकी इच्छा, रुचि, अभिरुचि व मान-सम्मान का कोई मूल्य नहीं था। किसी भी जाति की महिलाओं का जीवन निकृष्टतम था। वे स्वयं ये भी भूल चुकी थीं कि वे एक इंसान हैं। उच्च जाति के समुदायों की स्त्रियों  की स्थिति बेशक सोचनीय थी परन्तु दलित व पिछड़ी महिलाओं की स्थिति और अत्यधिक विकराल थी। उन पर उच्च जातियों के पुरुष-स्त्रियों के साथ-साथ अपने समाज के नियंत्राण का शिकंजा भी कसा हुआ था। अंग्रेज शासकों के आगमन पर उन्हें अपने प्रशासकीय कार्यों के लिए अंग्रेजी शिक्षा के जानकारों की जरूरत को समझते हुए अंग्रेजी शिक्षा के प्रबंध किये। उनकेआगमन से भारत के सुप्त जनमानस में सुगबुगाहट पैदा हुई। क्योंकि अंग्रेजों को अपने शासन-प्रशासन चलाने के लिए अंग्रेजी कर्मचारियों की जरूरत जो पड़ गयी थी, अतः इसीलिए उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा के विशेष प्रबंध किए हालांकि इससे भी उच्च जातियों का प्रभुत्व बढ़ गया, फिर भी यह नहीं नकारा जा सकता है कि अंग्रेजी शिक्षा के आरम्भ से ज्ञान और जानकारी के रास्ते खुले। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से सामाजिक सुधार लाने हेतु समाज सुधारकों के प्रयास शुरू हुए। इन सुधारों के जागरण में स्त्रिायां भी अछूती न रह सकी। भारत की स्त्रियों  की स्थिति में सुधार व उनमें जागरण लाने के कार्य में विभिन्न समाज सुधारकों में से ‘सावित्री बाई फुले’ ताराबाई शिंदे व पंडिता रमाबाई, का नाम अग्रणीय है। हम भारतीय स्त्री आंदोलन को समझना चाहते हैं तो हमें सावित्री बाई फुले के जीवन को, उनके कार्य को तत्कालीन समाज के समक्ष रखकर आंकना चाहिए। सावित्री बाई फुले हमारे देश की वह पहली औरत थी, जो दबे-पिछड़े समाज माली जाति में पैदा हुई। नौ वर्ष की अल्पायु में विवाह के बाद घर गृहस्थी के साथ-साथ कठोर परिश्रम करके स्वयं पढ़ी और गांव-गांव जाकर दीन-हीन दुखी दलित और स्त्रियों के लिए पाठशाला खोलने में अग्रसर हुई।

सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को नायगांव में हुआ, जब वे नौ वर्ष की अल्पायु में थीं। उनका विवाह महान क्रांतिकारी ज्योतिबा फुले (तेरह वर्ष) से 1840 में हुआ। ज्योतिबा फुले उनके जीवन में शिक्षक बनकर आए। 1841 में पढ़ने-लिखने का प्रशिक्षण उन्हें ज्योतिबा फुले से ही मिला। पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी नारी शिक्षा की पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी नारी शिक्षा की पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी नारी शिक्षा की पक्षधर थी। अतः नार्मल स्कूल द्वारा सावित्री बाई फुले को अध्यापिका प्रशिक्षण दिया गया। अंग्रेजी ज्ञान होने के बाद सावित्री बाई फुले ने 1855 में टामसन क्लार्कसन टामसन क्लार्कसन की जीवनी पढ़ी। टामसन क्लार्कसन नीग्रो टामसन क्लार्कसन नीग्रो पर हुए जुल्मों के विरुद्ध न केवल लड़े थे बल्कि कानून बनाने में सफल हुए थे। उनकी जीवनी पढ़कर सावित्री बाई फुले बहुत प्रभावित हुई। वह भारत के नीग्रो (अछूत और स्त्रियों ) की गुलामी के प्रति चिंतित थी। उन्होंने भारतीय गुलामों के शोषण का मुख्य कारण ‘अशिक्षा’ को खोजा। उदाहरणतः शिक्षा संबंधी कविताएं-

शूद्रों की चेतना जगाने के लिए
है सर्वोत्तम शिक्षा का मार्ग
शिक्षा से मिले ज्ञान,
ज्ञान से प्राप्त होवे इंसानियत
और पशुता होती है समाप्त।
                                                                              (शूद्रों का दर्द : पीड़ा )
                                                                      
जो करे खेती और करे सम्पादन विद्या
वे होवे ज्ञानी, और सुखी-समृद्ध
                                                                              ( सर्वश्रेष्ठ खेती )
विद्या है सच्ची धन-दौलत
है सभी दौलत से श्रेष्ठ
जिसके पास है ज्ञान का संचय
ज्ञानी वही सच्चा दुनिया में।
                                                                               ( सच्ची धन-दौलत) 
अनुवाद शेखर पवार अनुवाद शेखर पवार

1 जनवरी 1848 में बुधवार पेठ (पूना में) पहला स्कूल खोला गया जिसमें सावित्री बाई फुले अध्यापिका हुई। उनके शिक्षिका बनने पर समाज में प्रखर विरोध हुआ। उन्हें धर्म को डुबाने वाली एवं अश्लील गालियां देकर उनको प्रताड़ित किया गया। गाली-गलौच, पत्थर, गोबर फेंकने पर भी सावित्री बाई फुले ने जब अपना काम बंद नहीं किया तो ससुर द्वारा दबाव डलवाया गया कि यदि सावित्री बाई फुले ने अछूतों को पढ़ाना बंद नहीं किया तो उनकी बयालीस पीढ़ियां नरक में जाएंगी। सावित्री बाई फुले के साथ-साथ फातिमा शेख व सगुणा भी ज्योतिबा की छात्राएं थीं। फुले दम्पति ने शूद्रों-अतिशूद्रों और औरतों के बीच शिक्षा की ज्योति जलाकर गुलामी से मुक्ति की राह दिखाई। गांव-गांव में जाकर विद्यालय खोले। एक ओर ऊंची जातियों में बाल-विवाह से हुई विधवाएं बलात्कृत होती और गर्भवती होने पर भ्रूण हत्या करती या शर्म से स्वयं आत्महत्या कर लेती। दूसरी ओर अछूत औरतें एक बूंद पानी के लिए भी सवर्णों की दया पर जीती। सामाजिक बहिष्करण की शिकार होती। एक दिन जब सावित्री बाई फुले बच्चों को पढ़ाने पाठशाला जा रही थी तो उन्होंने देखा कि रास्ते में कुएं के पास कुछ औरतें फटे-पुराने कपड़े पहनकर धनी औरतों से मिन्नतें कर रही हैं ‘‘हमें मार लो, पीट लो, हमारी मार-मार कर खाल उधेड़ लो, परन्तु हमें दो लोटे पानी दे दो।’’ चिलचिलाती धूप में कुएं से दूर खड़ी इन औरतों को देखकर ऊंची जाति की औरतें हंस रही थीं और हंसते-हंसते डोल भर-भर कर पानी उनके ऊपर फेंक देती। सावित्री बाई फुले यह कृत्य सहन न कर सकीं। वे उन अछूत औरतों के पास गईं और उन्हें अपने घर लिवा लाईं। अपना तालाब दिखाते हुए बोली, ‘‘जितना चाहे पानी भर लो, आज से यह तालाब तुम सबके लिए है।’’ कहते हुए उन्होंने 1868 में अपना तालाब अस्पृश्यों के लिए खोल दिया। अंततः शिक्षा एवं अछूतों का साथ न छोड़ने पर उन्हें उनके पति के साथ घर से निकाल दिया गया।

1848 में एक तरफ इंग्लैंड में स्त्री  शिक्षा की मांग हो रही थी तो दूसरी ओर फ्रांस में मानव अधिकार के लिए संघर्ष चल रहा था। भारत में सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले ने शूद्रों अतिशूद्रों व स्त्री  शिक्षा एवं सामाजिक आधार की नींव रखकर नए युग का सूत्रापात किया। 1849 में पूना में उस्मान शेख के यहां उन्होंने प्रौढ़ शिक्षा आरंभ की 1849 में ही पूना, सतारा व अहमदनगर जिले में अन्य पाठशाला खोली। स्कूली शिक्षा के साथ-साथ ही सावित्री बाई फुले ने महसूस किया स्त्रियों  की स्थिति सुधारने के लिए स्त्रियों को संगठित करना चाहिए। 1842 में उन्होंने ‘महिला मंडल’ का गठन किया और बाल-विवाह के तहत हुई विधवाओं के साथ हो रहे जुल्म व शारीरिक शोषण का विरोध किया। स्त्रियों  के बाल काटने के विरुद्ध नाइयों से अनुरोध किया तथा इसमें सफलता हासिल की। ‘भ्रूण  हत्या’, ‘बाल हत्या’ के विरुद्ध विधवा मांओं को शरण देना शुरू किया। अंततः उनके लिए 1852 में बाल-हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की। 1864 में अनाथाश्रम की स्थापना की। छुआछूत उस समय बहुत ज्यादा थी। शूद्र सामाजिक जीवन से केवल बहिष्कृत ही नहीं थे, प्रताड़ित भी किये जाते थे। उनका खाना-पीना, रहना सब दूसरों की दया पर था, अतः उनका जीवन पशु समान था। अछूत महिलाएं घंटों दया की भीख मांगती, बदले में थोड़ा-सा पीने का पानी मिलता। उस्मान शेख की बहन फातिमा शेख भी स्त्री शिक्षा में सावित्री बाई फुले के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही थी। 24 सितम्बर 1873 में ‘‘सत्यशोधक समाज’’ की स्थापना कर सैकड़ों विवाह साधारण तरीके से कम खर्च किये कराए। 1875 से 1877 तक महाराष्ट्र में अकाल पीड़ित लोगों की मदद के लिए सरकार पर दबाव डालकर अनेक रिलीफ केन्द्र एवं भोजन केन्द्र शुरू करवाए।

सावित्री बाई फुले दंपति को अपना कोई बच्चा नहीं था। अतः उन्होंने एक काशीबाई नामक ब्राह्मण विधवा से हुए बच्चे को गोद लेकर उसे पढ़ाया-लिखाया व डाॅक्टर के रूप में अपने जैसा अच्छा इंसान बनाया। अपने पति की मृत्यु के बाद वे सत्य शोधक समाज की अध्यक्ष बनीं। उनकी अध्यक्षता में अनेक सुधारात्मक काम हुए। सत्य शोधक समाज की स्थापना 24 सितम्बर 1873 को हुई थी। जीवन के अंतिम दिनों में पुणे में प्लेग के प्रकोप से अछूत बस्तियों में लोगों की सेवा करती हुई निर्वाण को प्राप्त हुई।

आज से एक सौ पिच्चासी वर्ष पहले समाज में अंधविश्वास कुरीति-रूढ़ि परम्पराओं के विरुद्ध शिक्षा, ज्ञान, समता और नारी समानता के लिए लड़ने वाली भारत की पहली शिक्षिका, समाज सुधारने वाली पहली क्रांतिकारी नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता को इतिहास ने, मीडिया ने यहां तक की वर्तमान नारी मुक्ति आंदोलन ने भुला दिया।  आज मजबूरन उनको याद करने के लिए उनके स्मृति दिवस पर ब्राह्मणवाद, मनुवाद व हिन्दुत्व के विरुद्ध आंदोलित हुई हैं। हमारी सरकार ने प्रौढ़ शिक्षा, अध्यापक प्रशिक्षण सरकारी पाठ्यक्रम में उनका नामोनिशां तक नहीं रखा। उनके नाम के न तो कोई संस्थान हैं, न विद्यालय, न विश्वविद्यालय। इतिहास में ऐसी नारी को भुला दिया, जिसका जीवन स्वयं एक युग बोध है। आज हम नारीवादी आंदोलन और सावित्री बाई फुले के समय की नारी आंदोलन की समीक्षा करें तो पाएंगे कि वर्तमान मुद्दों पर नारी आंदोलन ठहर गया है। वे मुद्दे जो तत्कालीन समाज में सावित्री बाई फुले के नेतृत्व में बखूबी लड़े गए।

आज महानगरों में दहेज, भ्रूण-हत्या, यौन शोषण, बलात्कार के इर्द-गिर्द के मुद्दों पर ही नारी आंदोलन सक्रिय है, लेकिन एक सौ पिचहत्तर वर्ष के इतिहास में स्त्री  का दोयम दर्जा पूर्ववत है। शहरीकरण के चलते व पूंजीवाद के विकास ने औरतों को घर से बाहर निकलने का अवसर जरूर दिया है, पर मोटे तौर पर उसकी स्थिति नहीं बदली है।

सावित्री बाई फुले ने समाज के भीतरी ढांचे में छेद किया। उन्होंने पितृसत्तात्मक समाज का मूल स्रोत ब्राह्मणवाद में ढूंढ़ा, उन्होंने ब्राह्मणवाद से लड़ने का हल शिक्षा और समाज के ढांचे में परिवर्तन को माना। उनकी कार्य शैली में सादगी थी। वे सादा जीवन, वर बहु पक्ष को एकत्रित कर ब्राह्मणी आडम्बरी को छोड़ सामूहिक विवाह करने की प्रेरणा देती तो व शादी कराती। सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा पंडों व ब्राह्मणों का पर्दाफाश करती। बाल विधवाओं के केश काट देने पर वे नाइयों के पास गईं, उनसे बातचीत की कि वे ये मुंडन का काम अपने हाथों से न करें। उनके समझाने से पूरे नाई समाज ने उनकी बात मानी। उनके काम को जहां उच्च जातीय वर्ग का विरोध मिला वहां निचले समाज का खुलकर साथ मिला।

आज के नारी आंदोलन का हम गहन अध्ययन करें तो पाएंगे कि उनकी सभाओं में स्लम झुग्गी झोपड़ी की औरतें जरूर दिखेंगी लेकिन मुद्दों में गरीबी, आवास, आवश्यक नागरिक सुविधाएं, सरकारी शिक्षा, शौचालय, स्वास्थ्य इत्यादि के सवालों पर आंदोलन पर रुख उपेक्षित है। संगठनों के तौर तरीके, रहन-सहन व बैठकों से पूर्ण सुविधा वर्ग की झलक मिलती है। इन आंदोलनों के प्रति समाज के पूर्वाग्रह है तो संगठनों के तौर तरीके भी समाज से कटे हुए है। सावित्री बाई फुले का काम वर्ग और जातिविहीन नजर आता है। उनका अपना सब कुछ आंदोलन के लिए था, और वह स्वयं आंदोलन के लिए थी। 185 वर्ष पूर्व जब छुआछूत, नारी विरोध अपनी चरम सीमा पर था उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण, घर के सब साधन अछूतों व महिलाओं के लिए समर्पित कर दिये थे। पति के देहांत पर स्वयं क्रिया में शामिल हुई। आज भी इतनी महान क्रांतिकारी जननायिका ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगी। वह थी भारत के प्रथम क्रांतिकारी महिला नेता व शिक्षिका जिसके जीवन ने कोटि-कोटि औरतों को शिक्षा का मार्ग दिखाया। वह वास्तव में नारी आंदोलन की रीढ़ थी जबकि, 19वीं शदी, तत्कालीन सामाजिक प्रभाव ही संकुचित था। प्राचीन अंध परम्पराओं तथा नवीन विचारों के द्वंद जड़ मूर्ति पूजा से लेकर छुआछूत जैसी अनगिनत रीति रिवाज, परम्पराओं की विषमता तथा कूपमंडूकता से समाज ग्रस्त था। एक ही मानव समूह सैकड़ों और हजारों जातियों तथा उप-जातियों में बंटा हुआ था। हर जाति के अपने संस्कार थे। स्त्रियों  का जीवन शूद्रों की भांति घरेलू गुलामी का शिकार था। उसमें बदलाव लाने का काम सावित्री  बाई ने किया।

संपूर्ण देश में कुछेक जातियों को छोड़कर कुछ जातियों का जीवन अशिक्षा, आर्थिक विपन्नता, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा हुआ था। सामाजिक कुरीतियां, धार्मिक पाखंड अपने चर्म शिखर पर था। सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा बाल मुंडन, बलि प्रथा, विधवा विद्रोह के प्रतीक बनकर उभर रहे थे। पर्दा, देवदासी छुआछूत जैसे कृत्य समाज में बेरोकटोक अपना अस्तित्व बनाये हुए थे। इन कुरीतियों का फायदा उठाकर पुरोहित व ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्रों का वास्ता देकर समाज में अन्याय, शोषण, अंधविश्वास व गैर बराबरी को बरकरार रखने का षड्यंत्रा करता रहा। इसका प्रभाव समस्त स्त्रियों  के साथ विशेषतः शूद्रों और उनकी स्त्रियों  पर ज्यादा अन्यायमूलक, दमनात्मक शोषणकारी था। फुले दंपति ने ऐसी शिक्षा की कल्पना की जिसमें जाति, लिंग व वर्ग के वर्चस्व के कारण समुदाय में समायी गहरीखाई को पाटा जा सके। शिक्षा ही वह पहला संस्कार है जो मनुष्य मात्रा के बौद्धिक विकास को लक्षित करता है। अंग्रेजों के देश में आगमन से पारम्परिक शिक्षा में कुछ बदलाव शुरू हुए। फुले दंपति ब्राह्मणवादी विचारधारा पोषक शिक्षा के विरुद्ध थे। वे वर्ण-जाति-वर्ग आधारित शिक्षा के प्रचार-प्रसार के खिलाफ थे। उनके अनुसार- ‘‘विद्या बिना मति गयी, मति बिना गति गई’’ ‘‘विद्या बिना मति गयी, मति बिना गति गई’’ जीवन की गति सम्यक शिक्षा निर्धारित करती है।

सावित्री बाई फुले न केवल सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षिका थीं बल्कि वे कोमल हृदय चेतनाशील, कवयित्री  भी थीं। ‘काव्य फुले’ नाम की उनकी कविता संग्रह में उन्होंने अनेक मार्मिक एवं मारक कविताएं लिखीं। उनका यह कविता संग्रह 1854 में छपा तथा दूसरा कविता संग्रह ‘बाबन्न कशी सुबोध रत्नाकर’ 1891 में अपने पति ज्योतिबा फुले को याद करते हुए आया। वे प्रखर लेखिका व तार्किक विदुषी थीं, जब भी कोई समस्या आती वे उस पर गंभीरता से विचार करके सटीक जवाब देतीं। इतिहास और आंदोलनकारियों की उपेक्षा से भी सावित्री बाई फुले छुपी न रह सकी। दलित व पिछड़े समुदायों के आंदोलन की नायिका सावित्री बाई फुले आज अपने समूचे अस्तित्व के साथ उनमें स्थापित हो चुकी हैं।

सावित्री बाई फुले के बारे में 1990 में थोड़ी सी भनक शेखर पवार जो नागपुर महाराष्ट्र से आकर दिल्ली में बस चुके थे से मिली। 3 जनवरी 1993 में शेखर और यशवंत निकोसे ने मिलकर मंडी हाउस पर पहली बार सावित्री बाई फुले की जयंती मनाई थी। और इस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में तत्कालीन उप-सभापति नजमा हेपतुल्ला जी आई थीं। 10 मार्च 1991 में पचकुइंया रोड वाल्मीकि बस्ती में कदम संस्था ने सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस मनाया। जिसमें एडवोकेट भगवान दास, पत्राकार सुश्री मणिमाला जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज की। 10 मार्च 1992 में संगम पार्क में पुनः महिला दिवस मनाया गया। उत्तर भारत में एक समय था जब सावित्री बाई फुले को प्रायः ज्योतिबा फुले की पत्नी के रूप में ही स्वीकारा जाता था।

1995 में नागपुर में पहला अ.मा. दलित लेखिका सम्मेलन प्रो. कुमुद पावड़े के संयोजन में बुलाया गया। जिसमें सेंटर फॉर  आल्टरनेटिव दलित मीडिया (कदम) के संस्थापकों में अशोक भारती, राजीव सिंह के साथ साथ कुछ और लोगों  को जाने का मौका मिला। हम अपने दल बल के साथ शम्भू प्रसाद कोईराला, अनीता गुजराती, अनीता भारती, पुष्पा भारती, ज्योति एवं शेखर पवार, एन.आर. सागर, रजनी तिलक, विपला डिकुना भी पहुंचे। कार्यक्रम की समाप्ति पर प्रो. कुमुद पावडे के घर पर बातचीत के दौरान 1995 में दिल्ली में लेखिका सम्मेलन की जिम्मेदारी ‘कदम’ को सौंप दी गयी। साथ ही तय हुआ कि 2-3 जनवरी सावित्री बाई फुले के जन्म दिवस पर ही यह कार्यक्रम रहे। अगले वर्ष 1996 में अ.भा. दलित लेखिका सम्मेलन ने उत्तर भारत में इस कार्यक्रम ने अपने कीर्तिमान स्थापित किये। पांच भाषाओं की लेखिकाएं उपस्थित हुई। जनसत्ता ने 3 जनवरी को हेडलाइन में दलित लेखिकाओं की दस्तक को जगह दी। 1997 में ही झोड़गेबाई की मराठी में लिखी सावित्री बाई फुले जीवन की जीवनी ‘शलभ और शेखर ने अनुवाद की। अनुवाद की भाषा हिन्दी में पठनीय काबिल न होने हेतु इसका पुनर्लेखन रजनी तिलक द्वारा किया गया। कदम टीम ने सावित्री बाई फुले पर हिन्दी की पहली किताब लाने का दुस्साहस किया। दो हजार कापियांहाथों हाथ बंट गयी। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार तक किताबों को भेज दिया गया। लोगों को बहुत पसंद आयी। दूसरे, तीसरे एडिसन भी निकाले गये। आज उत्तर भारत का सामाजिक आंदोलन एवं दलित पिछड़े समुदायों के आंदोलन सावित्री बाई फुले के कार्यों और शौर्य को अपने समुदायों की महिलाओं के बीच ले जाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। परन्तु स्त्री  मुक्ति आंदोलन में जागोरी ने दलित महिला विशेषांक में सावित्री बाई फुले पर रोशनी डाली परन्तु संदर्भ देना भूल गये। मीडिया ने अभी तक सावित्री बाई फुले के कामों को पहचाना नहीं गया है। किसी भी दैनिक अखबार ने सावित्री बाई फुले, ज्योतिबा फुले पर कोई विशेष पेज नहीं निकाला।

2007 में नेशरल फेडरेशन ऑफ़ दलित वूमेन के प्रयास से सावित्री बाई फुले पर एक डाक टिकिट नेहरू युवा केन्द्र चाणक्यपुरी में रिलीज हुआ। इतिहास ने करवट ली। राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन ने सावित्री बाई फुले के जीवन को आदर्श मानकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, झारखंड मंे सावित्री बाई फुले के कामों को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया। इसी क्रम में सावित्री बाई फुले के जन्म दिन को भारतीय महिला दिवस 3 जनवरी 2014 से मनाना शुरू हुआ। राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन ने ग्रास रूट की 50 महिलाओं को सम्मानित किया। गुजरात से भारूलता काम्बले, पूणे से पुण्यनगरी  की चीफ एडिटर राही भीड़े, दिल्ली से रजनी तिलक व उनका संगठन राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन ने दिल्ली में भारतीय महिला दिवस मनाने का आह्वान किया। 3 जनवरी 2015 को इस कार्यक्रम में राही भीड़े मुख्य अतिथि रही। सहेली, जागोरी, बामसेफ से दलित लेखक संघ, सी.फार की प्रतिनिधि महिलाएं शामिल रहीं तथा पहली चीफ एडिटर राही भीड़े एवं उमा चक्रवर्ती, भारूलता कांबले को उनके कार्यों के लिए सम्मानित किया।

2016 में एससी, एसटी एम्पलाइज एसोसिएशन, आंध्र प्रदेश एवं आंध्र सरकार के साथ मिलकर आंध्र प्रदेश के भवन में मनाया गया। जिसमें पुनः राही भीड़े, राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य, संसद एवं भारतीय महिला जाागृति परिषद, यू वी डी एम आर के प्रतिनिधि शामिल रहे। ए.पी. भवन से आनंद राव के साथ सह आंदोलन में अनेक प्रस्ताव पारित हुए। 3 जनवरी 2017 को पहली बार मेवात में मुस्लिम आबादी में भारतीय महिला दिवस मनाया गया। जहां लगभग एक हजार स्त्री -पुरुष शामिल हुए। मेवात कारवां से डा. अफ्फाक, जफरूद्दीन, सरपंच बाला के सह आयोजन में बीसियों कार्यकर्ता महिला पुरुषों को सम्मानित किया गया। जागोरी ने पहली बार अजीम प्रेम जी के वित्तीय सहयोग से सावित्री बाई फुले पर छोटी सी कामिक्स बुक प्रकाशित की। पूना में क्रांतिज्योति सावित्री बाई फुले वूमेन स्टडी केन्द्र में महिलाओं को स्वाबलंबी बनाने हेतु अध्ययन व शोध कराये जाते हैं।

बिहार, उत्तर प्रदेश में आज सावित्री बाई फुले के नाम से सेल्फ हैल्प ग्रूप बनाये जा रहे हैं। संस्थाओं के नाम सावित्री बाई फुले न्याय मंच, महिला मंडल आदि रखने से प्रतीत होता है कि वे स्वयं आदर्श बनकर लोगों के जीवन में उतर आयी हैं। जाति और पितृसत्ता को नकारने वाले संगठनों ने फुले दंपति के दर्शन और उनके बताये रास्ते को अपनाना शुरू किया। इसी महत्वपूर्ण कार्यों में मा. हरीनरके, प्रो. विमल कीर्ति, कौशल्या बैसंत्री , शर्मिला रेगे एवं उत्तर भारत से कन्हैया लाल चंचरिक, मोहनदास नैमिशराय एवं ‘कदम’ संस्था ने उनके कामों को आगे बढ़ाया है एवं सावित्री बाई फुले के जन्म दिवस को भारतीय महिला दिवस मनाने की श्रृंखला शुरू की।
शेखर पवार जो महाराष्ट्र से दिल्ली आकर बसे उनकी पैरवी एवं अनुवाद के कारण सावित्री बाई फुले की कविताएं हिन्दी में अनुदित होकर आयी जिसका संपादन अनीता भारती ने किया जो स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित हुई।

सावित्री बाई फुले समग्र का अनुवार शेखर पवार कर चुके हैं, जो शीघ्र ही द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन ( स्त्रीकाल का अनुसंगी प्रकाशन) से लोगों  के बीच पहुंच जायेगा। सावित्री बाई फुले का जीवन न केवल दलित पिछड़ी अल्पसंख्यक आदिवासी, घुमन्तु जातियों के लिए प्रेरणादायी है बल्कि हमारे देश के लिए गौरव और सम्मान की पहचान है।

सावित्रीबाई की कवितायें: 

अंग्रेजी पढ़ो अंग्रेजी पढ़ो अंग्रेजी पढ़ो
स्वाबलंबन का उद्योग, ज्ञान धन का संच करो निरंतर।
विद्या के बिना व्यर्थ जीवन पशु जैसा, आलसी बन चुप ना बैठो।।
विद्या प्राप्त करे शद्रों-अतिशूद्रों के दुःख निवारण हेतु।
अंग्रेजी का ज्ञान हासिल करने का शुभ अवसर हाथ आया।
अंग्रजी लिखकर पढ़कर जात-पात की दीवारों को ढहा दो।
भट-बामणों के षड्यत्रों के पिटारों को दूर फेंककर।।

बालक को उपदेश 
काम करना है जो आज, उसे अब कर तत्काल।।
जो करना है दुपहरी में, उसे कर अब जाकर।।
कुछ क्षणों के बाद का कार्य, इसी वक्त करो पूरा जोर लगाकर।।
हो गया समाप्त कार्य या नहीं, न मौत पूछती है कारण।।

श्रेष्ठ धन दौलत
प्रातः काल में जाग जाओ बेटे। हाथ-मंुह धोकर बनो चुस्त।।
नहा धोकर बन तरो ताजा। करो माता-पिता को वंदन।।
स्मरण कर गुरुजनों को। पढ़ाई में लगाओ मन।।
समय बरबाद ना करो। बड़ा ही कीमती है दिन।।
करो हासिल ज्ञान। विद्या को देवता जान।।
लीजिए विद्या का लाभ। दृढ़ निश्चय कर।।
विद्या धन है बच्चे। सभी दौलत से बढ़कर।।
धन का संचय जिसके पास। ज्ञानी मानते हैं उसे सब जन।।

संत
जो वाणी से उच्चार करे,
वैसा ही बर्ताव करे,
वे ही नरनारी पूजनीय।
सेवा परमार्थ,
पालन करे व्रत यथार्थ, और
होवे कृतार्थ, वे सब वंदनीय।।
सुख हो या दुख,
कुछ स्वार्थ नहीं,
जो जतन से कर अन्यों का हित।
वे ही ऊंचे,
मानवता का रिश्ता जो जानते हैं वे सब,
सावित्री  कहे, सच्चे संत।।

संदर्भ:
भारत की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले संपादन: रजनी तिलक, अनुवाद: शेखर एवं शलभ।
सावित्री बाई फुले समग्र वाड्.मय, संपादक: डा. सारनाथ सादडकर, सारनाथ प्रकाशन बुक डिपो, परभणी।
महात्मा फुले का उत्तर भारत मंे प्रभाव – मोहन दास नैमिसराय, महात्मा फुले: साहित्य और विचार, संपादक: हरिनरके।
क्रांतिज्योति सावित्री बाई फुले: डी.के. खापर्डे, महात्मा फुले: साहित्य और विचार, संपादक: हरिनरके।

राजनीतिलक साहित्यकार, दलित स्त्रीवादी विचारक और एक्टिविस्ट हैं. संपर्क : rdmaindia@gmail.com