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सम्मानित होंगे रवीश कुमार

मनीषा कुमारी 


इस वर्ष पत्रकारिता जगत में एक प्रतिष्ठित पुरस्कार योजना की शुरुआत गांधी शान्ति प्रतिष्ठान और कुलदीप नैयर के सहयोग से हुई है. इस वर्ष यह पुरस्कार एनडीवी टीवी के रवीश कुमार को दिया जाएगा.

 प्रथम कुलदीप नैयर पत्रकारिता पुरस्कार चर्चित पत्रकार रवीश कुमार को दिया जाएगा. सम्मान समारोह का आयोजन 19 मार्चए 2017 को नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शाम 6 बजे आयोजित होगा. इस पत्रकारिता पुरस्कार की शुरूआत गांधी शांति प्रतिष्ठान व प्रतिष्ठित पत्रकार कुलदीप नैयर ने संयुक्त रूप से की है.

पुस्कार के लिए गठित संचालन समिति में  कुलदीप नैयर के अतिरिक्त गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत, राजनीतिशास्त्री आशीष नंदी, जनसत्ता के पूर्व संपादक ओम थानवी, वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी, संजय पारीख, रिजवान कैसर, प्रियदर्शन, अशोक कुमार, जयशंकर गुप्त, विजय प्रताप व फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन शामिल थे.

गांधी शान्ति प्रतिष्ठान और इस पुरस्कार योजना के सचिव अशोक कुमार ने बताया कि इस पुरस्कार योजना के तहत हर वर्ष भारतीय भाषाओं में काम करने वाले स्वतंत्रचेता, लोकतांत्रिक मूल्य व नागरिक अधिकार के लिए अपनी पत्रकारिता का इस्तेमाल करने वाले एक पत्रकार को हर वर्ष 1 लाख रुपये का पुरस्कार दिया जायेगा. कुलदीप नैयर ने इसके लिए बीज राशि दी है. उन्होंने कहा कि यह पुस्कार इस कारण विशिष्ट है क्योंकि इसे पत्रकारों द्वारा पत्रकारों को दिया जा जाएगा. इस मामले में यह पुरस्कार नया, अलग और अकेला है. गौरतलब है कि कुलदीप नैयर भारतीय पत्रकारिता के स्तंभों में से रहे हैं. वे इस सम्मान योजना के अगुआ रहे हैं तथा उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान को इस पुस्कार योजना के संयोजन-संचालन से जोड़ा तथा उसके बाद कई पत्रकार-लेखक मित्रों के सहयोग से यह योजना साकार हुई है.

उन्होंने बताया कि इस पुरस्कार के लिए भारतीय भाषा की पत्रकारिता के किसी भी माध्यम के पत्रकार पर विचार किया जा सकेगा.

चलो नागपुर! मनुवाद और हिन्दुत्व के खिलाफ महिलाओं का संर्धषषील कदम

यह रोज-रोज नहीं होता कि दलित, मुसलमान, आदिवासी, बहुजन, अल्पसंख्यक,समलैंगिक महिलायें, किन्नर (ट्रांसजेण्डर), सेक्स वर्कर, खाना बदोस, जनजातियों की महिलायें, छात्र छात्रायें और वह तमाम लोग जिनके साथ जाति वर्ग धर्म समुदाय यौनिकता, जेण्डर,अक्षमता, व्यवसाय या उम्र की वजह से भेद भाव किया जाये वो एक साथ एक जुट होकर उन समप्रदायिक ब्राहम्णवादी, सामन्ती, जातिवादी, पूंजीवादी, पितृसत्तात्मक ताकतों के खिलाफ आवाज उठायें। यह भी रोज-रोज नही होता कि तमाम प्रकार के लोग एक जगह एकत्रित होकर क्रान्तिज्योति सावित्री बाई फुले का  स्मृति दिवस मनायें और इसलिये हम रोज-रोज चलो नागपुर भी नहीं कहते।

10 मार्च 2017 को करीब 5 हजार महिलायें जोकि महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, उ0प्र0, गुजरात, आन्ध्रा, तेलांगाना, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल और बिहार से तालुक रखती हैं नागपुर में सावित्री बाई फुले की 120वीं स्मृति दिवस पर एकजुट होकर नफरत, अन्याय और प्रभुत्ववादी ताकतों के खिलाफ एक जोरदार प्रदर्शन करेंगीं। गीत, नृत्य, कला, कविता और रंगमंच जैसे माध्यमों से हम फैली असमानता और असहिसुणता गांव शहरों युनिवरसिटी कैम्पसों में, कार्यस्थलों पर, घरों से सड़कों पर, जहां हमें खामोश कर देने की कोशिशें हैं, ताकतें हैं, उनसे मोर्चा लेंगें। हम उठेंगे अपने आवाज के लिये, अपने हकों के लिये, अपनी सुरक्षा के लिये, जो इस देश का संविधान हमारे लिये निधार्रित करता है। हम मिलकर दोहरायेंगें कि एक धर्म निरपेक्ष व एक प्रजा तांत्रिक देश में किसी को  यह हक नही है कि वहकिसी व्यक्ति समुदाय की बेईज्जती करे, भेदभाव करे, हनन करे या किसी भी प्रकार से उसकी पहचान के आधार पर उस पर जुल्म-ज्यादती करे।

हम आलोचना करते हैं, नकारते हैं, एैसी सभी ताकतों को  चाहे वह प्रभुत्ववादी जातियां हों या स्वयं राज्य जिनकी वजह से सुरेखा भोतमांगे खैरलांजी से, राजस्थान से देलटा मेधवाल, केरला से मेधना, जीशा जैसी दलित महिलायें सोनी सोरी जैसी आदिवासी महिलायें, भगाना से नवयुवतियां, बीजापुर की महिलायें, मेवाल और मुज्जफरनगर की मुस्लिम महिलायें व अन्य तमाम एैसी महिलायें इस उतेजित हिन्दुत्व राजनीति की आग में झुलस गयी हैं। हम न्याय और जवावदेही की मांग करते हैं इन महिलालों  के लिये व इनके जैसी हजारो महिलाओं  के लिये जो  हर साल इन जुल्मों का शिकार होती हैं। साथ ही यह मांग भी करते हैं कि तुरंत राज्य इन अपराधी प्रवत्ति के लोगों को, जो  इन अपराधों को बेधडक करते हैं, पर रियायत वढील को खत्म करें। हम चारो ओर फैली असमानताओं हिंसा अत्याचार और क्रूरता को जड़ से  खत्म करने की मांग करते हैं।

महिला आन्दोलन के नेतृत्व में  बतौर कार्यक्रम हमसब अपनी विभिन्न पहचानो के साथ संधर्ष की इस नई राह पर अग्रसर है। हम उस सावित्रीबाई फुले से प्रेरित हैं जो पहली महिला शिक्षक थी, कवित्री थी, लेखिका थी और महिला अधिकारों  पर नेतृत्व की मिशाल थीं जिसने 19वीं शताब्दी में ब्राहम्णवादी, पितृसत्तात्मक ढॉचे को चुनौती दी और साथ ही शूद्रों  और महिलाओ को  जाग्रत कर मनुस्मृति, धार्मिक  लेखों और ब्राहम्णवादी तौर तरीकों को कड़ी चुनौती दी। वह सावित्री बाई फुले ही  थी, जिसने पराम्परागत रूप से चली आ रही महिलाओं पर रोक-टोक व नियंत्रण का बायकाट किया था और हमें आज़ादी की राह लेने का रास्ता दिखाया था।

इसलिये चलो नागपुर, जो सावित्री बाई फुले का सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन का केन्द्र है। यह वह शहर है जहॉं बाबा साहेब ने आज तक की सबसे बड़ी महिला गोष्ठी शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के बैनर तले आयोजित की थी, जिसमें 30 हजार महिलाओं ने एक साथ आकर पितृसत्ता के बत्तर तरीकों को चोट पहुंचायी और हमारी नारी वादी नजरिये औरएक्टीविज़म को प्रेरित किया।

एक एैतिहासिक दिन जब 5000 लोग एक जुट होकर कविताओं, नृत्य, गानों और परफामेन्स के जरिये खुद को अभिव्यक्त करेंगी । चलो नागपुर की कल्पना इसका आयोजन जिसका खर्च कई सौ महिलाओं द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया है।
चलो कि मनुवाद और  हिन्दुत्व के खिलाफ –
चलो कि ब्राहम्ण बाद और  पितृसत्ता के खिलाफ
चलो कि मिल कर चलें।
हजारो  सलाम; जय सावित्री, जय फातिमा, जय भीम, जय वीरसा

स्थान – इन्दौरा मैदान, इन्दौरा
चौक,  कामटी रोड, नागपुर
समय – 10.00 सुबह से 4.00 बजे शाम

आयोजकों की तरफ से

अभिन्यां कांवले, अजिता राय, अनिता घई, बिटटू कोर्तिक कोनडिटा, छाया खोब्रागडे, दुर्गा झा, एलिना हारो, हसिना खान, जया शर्मा, किरन देशमुख, लता प्रतिभा, मुधुकर, माधवी कुकरेजा, मनिशा बंगाड, मंनजुला प्रदीप, मारिया सेशू, मोनिशा बहल, निषा शिडें, निवेदितामेनन, प्रदन्य बागडे, रजनी तिलक, रिनुपरना, संगीता मनोजी, संदयाली अरूना

रजनीश आनंद की कविताएं

रजनीश आनंद


कॉपी राइटर, प्रभात खबर, रांची, झारखंड
संपर्क : 9835933669, 8083119988

महिला दिवस पर कुछ कविताएं


मैं नहीं छिनने दूंगी अपनी पहचान…

ऐ सुनो पितृसत्तामक समाज
मैं तुमसे पूछना चाहती हूं एक सवाल?
क्यों मेरी पहचान छिनना चाहते हो तुम?
मैंने तो तुमसे कभी नहीं कहा
भूल जाओ, अपनी जड़ों को
मां-बाप, परिजनों को
उन गलियों को जहां हम जीते हैं
अपना बचपन, जहां होती है जिंदगी जवां
कैसे भूलूं मैं मां की लोरियों को
पापा के लाड़ को,
भैया-दीदी, दोस्तों के साथ की मस्ती को
मैं तो अपनी जड़ों से बिछड़कर
लहलहाती हूं तुम्हारे आंगन में
हां सही है मेरा नाम जुड़ा है तुमसे
संग कटेंगे अब जीवन के शेष अध्याय
लेकिन इसके माने ये तो नहीं
कि तुमसे जुड़ते ही जीवन की किताब के
मिट गये सारे पुराने पन्ने.
इस समाज ने हमेशा छिनी औरतों से उसकी पहचान
लेकिन मैं अपनी मां की तरह
नहीं करूंगी त्याग, नहीं फटने दूंगी
अपने जीवन से प्रारंभिक पन्नों को
तुम मेरे जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय हो
किंतु मेरी बुनियाद प्रारंभिक पन्ने हैं
उन पन्नों के बिना गिर जायेगी
मेरी जीवनरूपी इमारत
इसलिए मैं सफल नहीं होने दूंगी
इस साजिश को,
मैं तुम्हारे साथ हूं खड़ी
लेकिन तब ही, जब तुम
स्वीकारो मेरी पहचान को
क्योंकि मैंने तो तुमसे
कभी नहीं छिनी तुम्हारी पहचान…
रजनीश आनंद

मात्र देह होने का एहसास…

मैं औरत हूं, लेकिन
बार-बार होता है एहसास
मात्र देह होने का
आईने के सामने खड़े होकर
जब भी टटोला है खुद को
साफ उभर आयीं, वो वहशी नजरें
जो बचपन से आज तक
मुझे लील जाने को आतुर थीं
जिन्होंने बार-बार कराया मुझे
मात्र देह होने का एहसास
घर के परिचित, जो मां के सामने
पुचकारते थे मुझे, वही
मां के जाते ही, खूंखार लगने लगते थे
उनकी तेज होतीं सांसें, आज भी
डरा जातीं हैं मुझे

मां के जाते ही वे जकड़ना चाहते थे मुझे
अपनी वासना के जाल में
मैं भागकर छुप जाती थी मां के आंचल में
ऐसी ललचाती नजरों से कभी नहीं बच पायी मैं
घर-बाहर हर जगह मौजूद हैं ऐसी नजरें
तभी तो हर शाम जब आफिस से घर आती हूं
ऐसी घूरती, निगलने को आतुर नजरों से भिड़कर
औरत नहीं मात्र देह होने का
एहसास घर कर जाता है मन में…

अब इच्छाओं पर नहीं लगेगा ताला

क्यों मेरी हर इच्छा पर
ताला लगा दिया जाता है?
और चाबी नहीं दी जाती मुझे
मरती इच्छाओं के बंद कमरे में
घुटन सी महसूस होती है
पसीने से तर-बतर शरीर
लेकिन फिर भी मैं
जद्दोजहद करती हूं
कोई झरोखा मिल जाये
जहां से झांकू मैं
अपनी इच्छाओं का बालपन निहारूं
उसकी अल्हड़ जवानी का लुत्फ उठाऊं
लेकिन नहीं, मैंने तो हमेशा
अपनी इच्छाओं को अर्थीं पर देखा
हां, उसे कांधा देने समाज के कई ठेकेदार आ जाते थे
लेकिन बस अब और नहीं
तय कर लिया है मैंने
तोड़ दूंगी हर दीवार
नहीं सजने दूंगी
अपनी इच्छाओं की अर्थी
औरत हूं मैं, सृजन कर सकती हूं
तो जन्म दूंगी अपनी
इच्छाओं के मधुर जीवन को
मासूम बालपन से गंभीर वृद्धावस्था
तक संवारूंगी उसे, क्योंकि अब कोई
ताला नहीं लगा सकेगा मेरी इच्छाओं पर…

ताकि सुंदर बने स्त्री-पुरुष संबंध…

बस बहुत हुआ अब,रूक जाओ कि
मैं अब नहीं सह पाऊंगी
कब तक तुम रहोगे
मेरे तारणहार की भूमिका में
अरे! मैं निर्णय ले सकती हूं
यह जीवन मेरा है, मैं इसे
अपने तरह से जीना चाहती हूं
हमेशा मेरे लिए निर्णय लेकर
क्यों  पंगु बनाकर रखना चाहते हो मुझे
हमेशा मैं छली जाती हूं
प्यार, अधिकार से ना मानूं
तो ताकत का जोर दिखाते हो तुम
उसपर भी ना मानूं तो
रस्मो-रिवाज की पाबंदी लगाते हो तुम?
तुम भी तो इसी समाज का हिस्सा हो
तो तुम क्यों नहीं मानते उन रिवाजों को?
मैं अकेली क्यों पिसती रहूं परंपरा की चक्की में
जब से मानव सभ्य हुआ, उसने औरतों पर

कसा अपना शिकंजा, बनाया उसे वस्तु
जो या तो बिस्तर पर शोभा देती है
या फिर घरेलू कामकाज में पिसती है
घर के बाहर जाकर काम करके भी
वो नहीं थकती, तुम थकते हो
तभी तो जब आफिस से दोनों आते हैं
तुम हुक्म बजाते हो, वो बांदी बन जाती है
कब समझोगे तुम भला
एक ही सिक्के के दो पहलू हैं हम
जीवन की नैया अगर तुम,तो पतवार हूं मै नहीं चल सकता दोनों के सामंजस्य
बिना यह सुंदर जीवन
तुम्हारी चाहते हैं, तो क्या मेरी नहीं हैं
तुम कह सकते हो अपनी बात
मैं कहूं तो बदचलन कहलाती हूं
लेकिन बस अब और नहीं
मुझे नहीं चाहिए, तुम्हारी दया
हां, मैं तुम्हें दोस्त के रूप में चाहती हूं
जो चले मेरे साथ, मुझे ऊर्जा दे
मेरी ऊर्जा को, मेरे जीवन को निस्तेज ना करे
तो आओ निर्णयकर्ता नहीं मित्र बनो तुम
ताकि सुंदर बने स्त्री-पुरुष संबंध…

देह और प्रज्ञा के बीच: अलका प्रकाश की कविताएं

अलका प्रकाश


स्त्री -विमर्श से संबंधित तीन पुस्तकें ,” नारी चेतना के आयाम “,”तंद्रा टूटने तक”एवं “सत्ता प्रतिष्ठान और स्त्री अस्मिता “.’सिर्फ सवाल नहीं’कविता संग्रह
संपर्क : alka.prakash12@gmail.com

महिला दिवस पर 


देह और प्रज्ञा के बीच

बिखर गई मेधा
देेह के आगे
दिखती नहीं प्रज्ञा
एक  जोड़ी जांघों के समक्ष

जाना केवल
आदिम रसना ने
देह का मादक स्वाद

अन्य मनस का बोध
होने न दिया अहंकार ने
प्रकृति,   पुरूष से हारी
क्या करती वह बेचारी

ले आती घोर बवडंर
कभी अंधड़ कभी तूफान
फिर भी एहसास
कहाँ करा पाती

शिव-शक्ति का संमन्वय
मात्र, मिथ एक कल्पना
अहा! देवी देह से परे
तुम हो क्या ?

पंच कन्याओं से पूँछू
उत्तर देंगी क्या वे?

सुमित्रा महाजन से पूँछू
शायद कुछ बतला सकें
स्मृति इरानी या सुजाता सिंह
एक बार स्पष्ट कर दें

देह मुक्त छवि होती है क्या स्त्री की?
या वंचना हैं ये सब!

फरेब

जब बनी मैं माँ
तब समझा महानता का छद्म
गरिमा और मर्यादा का विद्रूप

आज चेहरे की झुर्रियाँ और एकाकीपन
मिला यही सेवा का प्रदाय
सारा जीवन सब में बीता
कहाँ गये वे सब

मातृत्व महान तब क्यों नहीं
जब अनब्याही बनती है माँ
प्रेम पाप कैसे हो गया?

समर्पण का वह पल तो पावन था
कुछ हंसी कुछ वक्र निगाहों के साये
सब कुछ पितृसत्ता की सहूलियत
उस दायरे के बाहर सब पाप

फरेब ऐसा रचा कि
समझ न सके हम



सोलह  दिसंबर के बाद रफू होती आत्मा

शाम बहुत उदास है आज
मन कहीं गहरे में असहज

आता है बार-बार ख्याल
कि कैसे होगी वह

हो रही है रात
आ रही होगीे आॅफिस से अकेले

कभी-कभी उचट जाती नींद
उन सब स्त्रियों के लिए
जो अपनी आँखो से
देख रही है सपने
बुन रही हैं भविष्य के नीड़

बना रहता है डर
कर लेती हूँ फोन
हो पाती हूँ किन्तु
कुछ ही देर के लिए निश्ंिचत

लगता है सब तरफ से
चीख रहीं है न लड़कियाॅं
आशंकाएं आशंकाए आशंकाए
कि कहीं एक्सीडेंट न हो जाय
हो जाय बलात्कार
कर दी जाय हत्या

दरिंदे बी.बी.सी. पर कह रहे हैं
न जाने क्या क्या ….

नहीं फूट रही है
अब प्रेम की कोपलें
उग रहे हैं जगह-जगह
विष वृक्ष कांटेदार

निर्भया का जाना
दे गया है भय
चीर गयी है आत्मा अभागी
सभी स्त्रियां कर रहीं हैं प्रार्थनाएं
कि वह पुनः जन्म न ले इस धरती पर कभी .
कि मिले मिले उसको शांति

लड़ रहे है हम लड़ाई
हमें क्षमा कर देना निर्भया
तंद्रा का टूटना जरूरी था

प्रश्नाकुल भाव जगत
और ये आँखे सदानीरा
कि रक्त संबंध भी तो कभी-कभी
दे जाते हैं धोखा
और जब उन्होंने कहा
‘‘कि यह स्पर आॅफ मोमेंट था’’ …

तो लगा कि यह देह का टैबू
आत्मा से बहुत बड़ा हो गया जैसे दैत्याकार

अब तो नहीं होता किसी भी पुरूष पर
विश्वास करने को जी

‘‘वासांसि जीर्णानि,’’
पढ़ते-पढ़ते सोचती हूँ…
नये वस्त्र के अचानक
तार – तार हो जाने पर
रफू से काम चल जायेगा क्या?

मन का चेहरा

जो तेजाब तुम्हारे चेहरे
पर फेंका गया था
उसके कुछ छींटे
हम सबकी आत्मा पर भी पड़े है लक्ष्मी
हरा है वह घाव अब भी

वो चेहरे बिगाड़ने वालों !
देखो आत्मा कितनी उजली हैं हमारी

देखो कैसे हंस रही है तुम पर
मर्मांतक पीड़ा झेलती
जी गई अनन्या फिर भी

सोचा क्या था सनातन पुरूष तुमने
मेरी न हुई तो नष्ट कर दूंगा?

मेरी औरत/तेरी औरत /उसकी औरत
ज्यादा दिन सुख नहीं लूट पाओगे तुम
साध यौनिकता पर नियंत्रण
डाल मानसिक गुलामी और दासता की बेड़ियां
अब कुछ उखाड़ नहीं पाओगे तुम

तुम्हारा जो खूंटा है न
हो गया है बहुत जर्जर
पहले उसे तो उखड़ने से बचा लो!

बेघर 

लड़की का कोई घर नहीं होता
कोई जाति नहीं होती:मिसेज मिश्रा……
यह घर तुम्हारा नहीं
फिर तुम कौन हो इस घर में
जो बार-बार अन्दर-बाहर,
की जाती हो

रात दिन क्यों सजा रही हो इसे
इजाज़त लेती हो हर काम की
जो कभी मिलती, कभी नहीं मिलती

कोई नया कदम उठाते
तुम्हें याद आता है
कभी पापा का चेहरा
कभी मां की आंखें
कभी बच्चे की किलकारी
कभी उसकी तुमसे जुड़ी जरूरतें

सब खोने का भय तुम्हें
बहुत-बहुत डराता है
कुछ पाने के एवज में!

तुम आश्चर्य से देखती हो
हंसते हुए लोग
विवाह की पच्चीसवीं वर्षगांठ
मनाते हुए लोग
ज़ेवर से लदी खुशहाल औरतें
पति के साथ सैर करती औरतें
समझौता दर समझौता करती औरतें

तुम क्यों नहीं कर पाती समझौता
जो घर तुम्हारा नहीं है
फिर भी जिसका सबसे अधिक मोह है

औरत हूँ न

घर में पर्याप्त खाना है
पर  खा नहीं पा रही हूँ
मेरा श्रृंगारदान  प्रसाधनों से अंटा है

पर सज नहीं पा रही हूँ
अपने लंबे केशों को संवारने का मन नही करता
कल  मैं इन्हें कटवा दूँगी
बोलने का मन नहीं करता
लोग मेरी बड़-बड़ पर हँसते

कुछ है जो बहुत तंग करता
यह बेचैनी जीने नहीं देती
भाव में अभाव नहीं खोजती
कुछ है मेरी बनावट में कमी
असफलताओ की लंबी श्रंृखला ने

निराशा भर दी
किसी का दोष नहीं
उनको हाथ पीला करने की जल्दी थी
इनको सब परफ्ेक्शन में चाहिये था
सब सज गया है घर-आँगन–फुलवारी
पर मन रो रहा है

अब अमिधा और व्यंजना का नहीं प्रश्न
बात-सीधे-सीधे कहती हूँं
सपाट बयानी मेरी आदत

कला तो उलझाती है
उसका अन्त करती है

एक लड़की की उधेड़बुन

लोकल बस में सफर करते
अक्सर उसकी देह
रगड़ जाती है मर्दों से

सकुचाती वह बैठी रहती
कभी घूरती निगाहों से बचने के लिए
दुपट्टा सिर से बाँध लेती

कभी उसके सहयोगी कहते
चलिए घर छोड़ दें
वह मना कर देती

उसने सुने हैं उनके कह-कहे
‘यार सीट गरम हो गयी’
ऐसी-जैसी बहुत सी बातों को
प्रायः वह अनसुना कर देती

सुबह की आपा-धापी में
जब सारे काम निपटा कर
वह दफ्तर पहुँचती
एक कड़वा स्वर गूँजता
‘कमरे में गरमी आ गयी यार’
अब काॅफी की जरूरत नहीं
‘भोला जाओ कोलड्रिंक लाओ’

उसे पता है-
इसी ‘हाॅट’ शब्द के चक्कर में
विज्ञापन सुंदरियाँ अनवरत्
वक्षों और नितंबो की
शल्य क्रिया करा रही हैं
घर पर कुछ बोले तो
एक रटा-रटाया वाक्य
किसने कहा था, बाहर निकलने को
घर पर पड़ी रहो
क्या वहाॅ खतरे कम हैं

अगर रो कर दुख बाहर करे तो
तमाम कंधे हैं मौके की तलाश में
ऊँगली से हाथ पकड़ने का सफर

उसके कानों में गूंजते हैं रहीम के दोहे
‘रहिमन निज मन की व्यथा’…….
दूसरी ओर से एक नारा-

‘साइलेंस इज वायलेंस’
उसी उधेड़बुन में
उसका सिर चकरा जाता

बाॅस के चैंबर में कैसे जाय
जो टैब पर पोर्न देख
कुर्सी पर टाॅग फैलाए
ढूंढ रहा है अगला शिकार

कहाॅ जा कर फरियाद करे
नौकरी जाने का भय
नारीवाद तो सिखा रहा है
‘देह को मुक्त करो’

उसका प्रश्न है किसके लिए

इन ड्रेकुलाओ के लिए
कोई दार्शनिक की भंगिमा में
कह रहा है, देखो!
औरत की देह हथियार है

इस बाजारवाद के दौर में
तुम्हारे पास देह है
तुम कुछ भी खरीद सकती हो

वह उत्तर देती है-
मेरी देह में एक आत्मा भी है
इसका मैं क्या करूं?

बोलबू ढेर ?

  शाश्वत उपाध्याय

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययनरत. संपर्क: shashwatupadhyay098@gmail.com

महिला दिवस पर विशेष 

पूर्वांचल के लोगों के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय किसी वरदान या आक्सफोर्ड से कम नहीं है। यहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार के अलावा तमाम राज्यों से और विदेशों से छात्र- छात्राएं उच्च शिक्षा के लिए आते हैं। यूँ तो बीएचयू बहुत सारे भेदभाव को लेकर हमेशा सवालों के कटघरे में रहा है लेकिन ताज़ा मामला लड़कियों के लिए रात को लाइब्रेरी जाने को लेकर है। इन लड़कियों की मांग है कि होस्टल को रात के सात बजे के बाद भी खोला जाए ताकि वे लाइब्रेरी जा सकें। सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग डीयू मामले में गुरमोहर कौर के पक्ष में खड़ा हुआ लेकिन क्या आपको पता है इस जायज मांग को लेकर आंदोलन कर रही लड़कियों को भी बलात्कार और जान से मारने की धमकी दी गई। जितना जरूरी गुरमोहर के पक्ष में खड़ा होना है उतना ही जरूरी है कि इन लड़कियों के साथ भी खड़ा हुआ जाए। सस्पेंड कर दिए जाने के डर के बावज़ूद ये लड़कियां जिस तरह से खड़ी हैं उससे एक बात तो साफ़ है कि इन लड़कियों ने गंगा पट्टी की पितृसत्तात्मक दीवार में छेद तो कर ही दिया है अब बस उसका गिरना बाकी है। कविता के माध्यम से इन लड़कियों के हौसले को मेरी और से एक सलाम।

एक तस्वीर में कैप्शन है ” बोलबू ढेर ?” इसे लगाने का मकसद सिर्फ इतना है कि लड़कियों को लेकर पूर्वांचल की अधिकांश मानसिकता यही है। अगर लड़की कहीं भी किसी भी रूप में अपनी आवाज़ अपने हक़ के लिए उठा रही है तो उसे धमकी स्वरूप यह बोलकर चुप करा देना कि “बोलबू ढेर” यह सिर्फ शब्द नहीं है यह अपने आपमें एक धमकी है कि चुप रहो वरना हम अपने तरीके से चुप कराएँगे। आज जबकि महिला दिवस है तब हमें अपने पूरे सिस्टम पर एक बार पलट कर सोचने की जरूरी है कि आखिर महिलाओं के लिए एक जरूरी और सम्मानजनक माहौल तैयार करने में हम सफल हो पाये हैं या अभी बाकी है।

शाश्वत

पिंजरे के विरुद्ध 

जादू जानते हैं?
वही हो रहा है यहाँ !
देखेंगे …. बे टिकट है .
आइये ,
‘बाएं चलियेगा’
सौ कदम बाद एक पिंजरा दिखेगा….
बाहर से ही दिखेगा .
पिंजरा क्या है सेट है जादूगर का .
नही नही हम जादूगर का नाम नही लेंगे .
कहीं हमको खरगोश बना दिया तो टोपी में डाल के….
तो पता है क्या हुआ ,
तीन चार बेहूदे बेलगाम जानवर हैं वो करतब नही दिखा रहे थे अड़े हुये थे पेट भर खाने के लिये
मछली मांस खाने का मन है उनका…..
और कल जब जानवर पिंजरे की जंजीरों में दौड़ रहे करेंट की बात कर रहे थे
तो जादूगर और उनके टोपी ,छड़ी , नाक , सूट ,जैकेट , सेट को झटका लगने लगा ।
झटका तो मतलब अभी लगना शुरू ही हुआ है वैसे ।
तो अब उनके चरणकमल के रज (कण) लगे हुए  हैं मामला सम्भालने में ।
पूरा का पूरा सर्कस हो गया है मतलब .
अच्छा,
एक और पिंजरा के रखवाले जी हैं
नही नही मै नाम नही लूंगा ,
कहीं मुझे लड़की बना के पिंजरे में रख लेंगे तो फजीहत हो जायेगी .
एनएसएस  करना पड़ेगा ,
बड़के जादूगर को सलामी देना पड़ेगा
और सबसे बड़ी बात  लड़की होने पर दहेज नही मिलेगा.
मेरे उपधिया जी को तो खुद ही बी. पी. है .
अच्छा एक बात अब ये है ,
सोचियेगा आप,
जानवरों का क्या होगा .
घर बाहर तो नही हो जायेंगे ?
ए भइया ,
देखियेगा आप लोग जरा , बहुत डर लग रहा है ।
वैसे जादू तो शुरू हो गया है .करेंट तो लगेगा अभी .
लेकिन डरवाइये जरा इन लोगों को … बेहुद्दा जानवर हैं डरते ही नही हैं ।
आप लोग सिंग ओंघ दिखाइए . धमकी वगैरह सब देना पड़ेगा न ! कब देंगे ?
डरना बन्द कर देंगे सब तो बड़ा दिक्कत होगा .
गोरख पाण्डेय बोलबे किये थे

“वे डरते हैं
किस चीज़ से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और चुप्प लोग
उनसे डरना
बंद कर देंगे ।”

आप तमाम जादूगरों ,सर्कस करने वालों और जोकरों की धमकी, गाली आदि की पूर्व उम्मीद के साथ 

मेरी बच्ची


मेरी बाहें तुम्हारे डोर से सजकर सुंदर
और
मन समंदर हो गया है ।
मेरी बच्ची ,
मुझे याद है ,
अधपके करौंदे
कि जिसके लिये हर बार मै अपने भाई संग तुमसे बेईमान हो जाता ।

मुझे याद है ,
क्या बेजोड़ डांटा था मैंने
जब कालोनी के किस्सों को चाव दे रही थी तुम ।

मुझे याद है ,
जब उठ रहा था छोटी बुआ का शगुन
तुम नाचते -नाचते धप्प से रुक गई
कि मै किसी काम से अंदर कमरे मे आ गया था ।

मुझे याद है ,
मेरी आँखों भर से….
तुम बाल बांध कर कॉलेज जाती ।
तुम बाइक पर एक तरफ बैठती ।
तुम फोन को हाथ भी नही लगती ।
और ओढ़नी,
ओढ़नी तो जैसे गाय का पगहा !

आह !
न जाने हर रोज की कितनी बातें / डांट
मुझे आज बीरा रहे
सबके लिये सबक हो यह
सबके लिये क्षमा करो मुझे ।

पर मेरी बच्ची
आज डोर बांधते वक्त जिस अदा से हाथ घुमा कर
तुमने स्काउट की न मालूम कौन सी गांठ लगाई है
समझो की मै झूम गया भीतर तक ।

मेरी बच्ची
मुझे सिखाओ मै सीखूंगा
फिर
जोर करूँगा
ऐसी एक गांठ लगाने की सूरज पर
की छन के आये रौशनी तुम तक ।
मेरी बच्ची
मुबारक हो डोरी का त्यौहार
तुम्हारी डोर से…..

आवाज़ और अन्य कविताएं

अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

उसका नाम तेज है 

वह औरत
देखती है
सुनती है
बोलती है
लड़ती है,
अन्याय के विरुद्ध
परवाह नहीं करती
उस समाज की
जो रोकता है उसे
देखने से,
सुनने से,
और बोलने से.
उसने नहीं दिया कभी दगा
नहीं चुराया कभी धन किसी का
नहीं मारी ज़मीन / मकान किसी का
नहीं तोड़ा घर किसी का
उसने छोड़ा तो कभी – कभी
हक़ अपना.
वह खुद्दार है
इसलिए उसका तेज़ है !
और मेरा नाम तेज़ है !!
मेरी पहचान
मेरे माथे पे
बिंदी न देख
कुछ आँखें पूछती हैं
तुम मुसलमान हो ?
पैरों में बिछुए न देख
पूछती हैं
तुम कुंवारी हो ?
पूजा न करते देख
पूछती हैं
तुम आर्य समाजी हो ?
तुम नास्तिक हो ?
मैं धीमे से कहती हूँ
मैं प्रकृति की कृति हूँ
पर उन आँखों में किरकिराहट आ जाती है
और वे अपने जेब में रखे बिल्लों में से
एक बिल्ला मेरे माथे पे चस्पा कर देती हैं
मेरे लिए मुश्किल होता है
उन आँखों को कहना कि
तुम भी सबसे पहले यही हो
बस यही बाकी सब बाद में.
पर शायद वो बना दी गई हैं
पहले ये सब !

ऐ लड़की!

तुम लड़की हो
अपने हाथों को समेटकर चलना सीखो
अभी सीखने हैं तुम्हें,
बहुत से तौर – तरीके.
कल को कुछ हो गया
तो फुसफुसाहट सुनाई देगी –
उसलड़की की इज्ज़त लुट गई !
कुछ जुबानें साफ़ –साफ़ कहेंगी
क्यों पहनती हो छोटे – छोटेकपड़े ?
क्यों निकलती हो टाइम – बेटाइम बाहर
आज का अखबार कह रहा है
तीन साल की लड़की का हुआ
बलात्कार….
फिरहत्या!
आवाज़

बहनों उठो !
तोड़ दो,
गुलामी की जंजीरों को
बाहर आओ
खुली हवा में.
फेफड़े भर कर सांस लो
और उड़ चलो
उस हवा के साथ
जो जाती है उन्मुक्त आकाश में !

भारतेंदु की स्त्री चेतना का स्वरूप, सन्दर्भ: ‘बालाबोधिनी’ पत्रिका

  अरुण कुमार प्रियम

स्वतंत्र लेखन संपर्क : 9560713852 Email. akpriyam@gmail.com

भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक माने जाते हैं ! खड़ी बोली हिंदी को साहित्य के माध्यम के रूप में प्रसारित-प्रचारित करने तथा रचनात्मक स्तर पर इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के लिए भी,उन्हें याद जाना जाता है ! सुविदित है कि 1870 के दशक में उनकी प्रकाशन गतिविधियाँ बहुत तेजी से बढीं और वे उत्तर-पश्चिमी प्रान्तों में महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं वैचारिक शख्सियत के रूप में उभरे ! उनकी दो साहित्यिक पत्रिकाएं-कविवचनसुधा (1868-85) और हरिश्चंद्र मैगज़ीन, जिसका नाम बाद में हरिश्चंद्र चन्द्रिका (1873-85) कर दिया गया, उनके जीवनकाल में ही प्रसिद्धि हासिल कर चुकी थीं ! इनके साथ-साथ 1874से 1877 तक उन्होंने स्त्री केंद्रित  पत्रिका,‘बालाबोधिनी’ भी सम्पादित की थी, जिसका हिंदी की पहली स्त्री-पत्रिका होने के नाते साहित्यिक इतिहास में विशिष्ट महत्व है ! इस पत्रिका की सामग्री, अंतर्वस्तु या ढब-ढांचे को लेकर कहीं कोई विवेचन-विश्लेषण नहीं मिलता और न ही इसकी प्रतियाँ कहीं सुलभ हैं. विभिन स्रोतों से इकठ्ठा किए गए ‘बालाबोधिनी’ के अंको को पुस्तकाकार रूप में लाकर वसुधा डालमियां और संजीव कुमार ने एक महत्वपूर्ण कार्य किया है. इससे हिंदी प्रदेश में नवजागरण के अगुवा भारतेंदु हरिश्चंद्र के स्त्री-दृष्टिकोण को जानने-समझने में मदद मिलती है. साथ ही तत्कालीन ‘स्त्री-उद्धारकों’ द्वारा निर्मित स्त्री के स्वरूप का भी पता चलता है.

स्त्रियों के सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक स्फीयर) में आने और अपने जीवन से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखने से स्त्री उद्धारकों’ के बीच और व्यापक जन-समाज में स्त्री  जीवन से सम्बन्धित बहस ने जन्म लिया. हाँ यह भी सच है कि इस बहस के केंद्र में एक खास वर्ग की स्त्रियाँ ही थीं.


सन् 1874 से सन् 1877 तक ‘बालाबोधिनी’ का सम्पादन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने किया। वसुध डालमिया ने ‘बालाबोधिनी’ के अंकों का संकलन व सम्पादन कर अपने भूमिकानुमा लेख में लिखा है कि ‘‘यह दस पृष्ठों की एक कृशकाय पत्रिका थी,  जिसका पहला अंक जनवरी 1874 में निकला था। इसे तीन साल से थोड़ी ही अधिक आयु मिली। पत्रिका की कितनी प्रतियां छपती थीं, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती, हालांकि यह पता चलता है कि इसकी सौ प्रतियां सरकार खरीदती थी। जैसे ही फरवरी 1877 में यह राज्याश्रय बन्द हुआ, पत्रिका एकबारगी बन्द हो गयी।’’1

‘बालाबोधिनी’ के इस अल्प जीवन के बाद ‘कविवचनसुध’ में बालाबोधिनी का विलय हो गया। लेकिन अपने इस अल्प जीवन में पत्रिका में भारतेन्दु ने स्त्री प्रश्नों को किस प्रकार स्थान दिया, उसका विश्लेषण आवश्यक है।यह पत्रिका सोद्देश्य थी, इसके नाम से ही स्पष्ट है. पत्रिका में स्त्रियों से संबंधित प्रकाशित सामग्री के विश्लेषण और स्वरूप के आधार पर भारतेंदु  के स्त्री -दृष्टिकोण को समझने में मदद मिलती है. क्योंकि यह व्यावसायिक पत्रिका नहीं थी. एक खास तबके को लक्ष्य करके इसका सम्पादन और प्रकाशन शुरू किया गया था. जाहिर है भारतेंदु के मष्तिष्क सम्पादकीय नीति जरूर रही होगी. कुछ बिन्दुओं के आधार पर ‘बालाबोधिनी’और भारतेंदु के स्त्री-विमर्श को समझा सकता है-

स्त्री -शिक्षा


स्त्रियों में चेतना और विवेक पैदा करने के उद्देश्य से प्रकाशित इस पत्रिका में एक स्थान पर स्त्री  शिक्षा को आवश्यक इसलिए माना गया कि यदि स्त्रियां पढ़ लिख जाएंगी तो ठगी का शिकार नहीं होंगी। अन्धविश्वासों  से उबर जाएंगी। तर्क यह दिया जाता है कि जबसे पुरुष पढ़ने लिखने लगे तब से वो ठगे नहीं जाते। एक उदाहरण दृष्टव्य है, जो इन्द्रजाल की कहानी के पर्दाफाश के  रूप में पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। ‘‘जबसे अंग्रेज बहादुर का राज्य हुआ है और पुरुष लोग किमिसरौ इत्यादि विद्या पढ़ने लगे हैं तब से वह प्रायः भूत विद्या वालों से नहीं ठगे जाते पर स्त्रियों से अब तक यह मूर्खता नहीं गयी है इसी से उनको प्रायः धूर्त लोग जो  अपने को शुद्ध तांत्रिक रसायनी और दरसनियां भूत विद्या वाले बतलाते हैं, बहुत ठगा करते हैं और स्त्रियां उनके जाल में आकर सैकड़ों वरन हजारों रुपया खराब करती हैं।’’2

उपर्युक्त उद्धरण  से ज्ञात होता है कि लेखक जिसका लेख में नाम नहीं है, वह स्त्रियों को मूर्ख मानता है। इसीलिए स्त्रियां तमाम तरह के तांत्रिकों द्वारा ठगी जाती हैं। लेखक स्त्री  शिक्षा की हिमायत सिर्फ इसलिए करता है कि स्त्रियां ठगने से बच जाएंगी, यदि वो पुरुषों की तरह शिक्षित होंगी। तांत्रिकों की ठगी.जाल से सचेत होने के लिए पत्रिका में कई तरह के प्रयोग कौतुक के रूप में प्रकाशित किए गए हैं . मसलन-रंगीन फूल सफेद करने की युक्ति, गुप्त अक्षर, नींबू दौड़े, बोतल में अण्डा इत्यादि।

इसके साथ ही ‘बालाबोधिनी’ में ‘सती चरित्रा’ नामक शीर्षक से निरन्तर एक नीति वचन प्रकाशित होता है जिसमें स्त्रियों को पति परायणा होने की सीख दी जाती है। शिव-पार्वती ;सतीद्ध के मिथकीय आख्यान के सहारे स्त्रियों को पति परायणता जो स्त्रियों को वैचारिक धर्मिक रूप से कैद करने की साजिश है, का पाठ पढ़ाया जाता है। ‘सती चरित्र’ में जब पार्वती बिना नियंत्रण के अपने पिता दक्ष के यहां जाती है और उसका अनादर होता है तो आत्म ग्लानि से सती ;पार्वती आत्महत्या कर लेती है। इसी प्रसंग को प्रकाशित करते हुए कहा गया है, ‘‘इस आख्यान से यही शिक्षा है जो पति का वाक्य नहीं मानती वह सती की भांति नष्ट हो जाती है स्त्री  को पति से बढ़कर और किसी का अभिमान नहीं होता इससे विवाह उपरांत की आज्ञा के बिना पिता के घर भी जाना उचित नहीं…. देखो तुम लोग भी इसी शिक्षा के अनुरूप चलो पति की आज्ञा मानो…’’3

इस तरह ज्ञात होता है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘बालाबोधिनी’ महिलाओं को शिक्षा का बोध तो कराना चाहती थी लेकिन यह बोध कैसा होगा, साथ में यह भी बताना नहीं भूलती। पत्रिका के प्रथम पृष्ठ में एक निवेदन छपता है कि, “मैं जो कुछ कहूँगी तुम्हारे हित की कहूँगी”4 और अंत में यह आशा भी प्रकट की जाती है कि “सभी स्त्रियाँ पढ़ लिखकर  पुरुषों की सहभागिनी हो जाएँ.”5 यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तव में निवेदनकार स्त्रियों का भला चाहता है. यह संभव भी है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में निवेदनकार ऐसा निवेदन कर स्त्रियों का भला ही चाहता हो, लेकिन अगले ही पृष्ठ में ‘शीलवती’ शीर्षक कहानी में वह स्त्रियों को एक सीमारेखा के अन्दर रहने की हिदायत देना भी नहीं भूलता है. कहानी में राधावल्लभ महाजन की पत्नी का नाम शीलवती है. लेखक कहता है कि नाम के अनुरूप ही उसके गुण हैं. अपने अछे स्वभाव के कारण उसने सबको अपने वश में कर रखा है.अगर उससे कोई क्रोधित होता है तो वह नम्रतापूर्वक उससे अपने अपराधों की क्षमा मांग लेती है. उसके गुणों का उल्लेख करते हुए कहानी में लिखा गया है कि, “ पड़ोस वालों ने कभी उसकी बोली नहीं सुनी वह अटारी और झरोखों में कभी न बैठती और न मनुष्य से बहुत बोली…. जिस समय उसको घर के कामों से छुट्टी मिलती वह धर्म की पुस्तकों को देखती. सुई का काम वह बहुत अच्छा कर सकती थी, बेल बूटा लगाना, झालर निकालना, सीना पिरोना इत्यादि… पति के सम्मुख नेत्र सदा नीचे रखती और कभी जब पति किसी विषय में कुछ पूछता तो बड़ी सावधानता से अच्छा और हितकारी मंत्र कहती पर यह भी कह देती कि नाथ! मैं क्या जानूं मेरी स्त्री की बुद्धि कितनी”6  शीलवती के लिए इतना आदेश-उपदेश होने के साथ उसके विद्या रूपी गुणों के बारे में बताया गया-“ इसके सिवाय ईश्वर ने विद्या भी उसको दी थी जिससे वह और भी आदर करने योग्य थी. घर के गृहस्थी का सब हिसाब अपने हाथ से लिख पढ़ लेती थी और नैहर वालों को और नाते की स्त्रियों को पत्र भी लिख लिया करती थी.”7

उपर्युक्त दोनों उदाहरण से ज्ञात होता है कि लेखक शीलवती कहानी की पात्र जैसी भारतीय स्त्री  चाहता है। ऐसी स्त्री  जो इतना पढ़ ले कि धार्मिक पुस्तकें पढ़ सके और घरेलू हिसाब कर ले और कुछ चिट्ठी-पत्री लिख सके। हां यह भी कि इसके साथ अपने तयशुदा काम सीना-परोना भी करे।

स्त्री के कर्तव्य और उसका चरित्र कैसा हो

‘बालाबोधिनी’ पत्रिका में स्त्री चरित्र के लिए अधिकांश स्थानों पर मिथकीय और पौराणिक चरित्रों अथवा काल्पनिक पात्रों का सृजन कर उनके जीवन की कहानी को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वैसा चरित्र बनाना हर स्त्री अपना सपना बना ले। पत्रिका में ‘बालाप्रबोध्’ नामक एक पुस्तक की सूचना है जिसमें मंगलाचरण से ज्ञात होता है कि यह काव्य पुस्तक पुरुष ने लिखी है। वह पुरुष अंग्रेज सरकार से प्रार्थना करता है कि यह पुस्तक स्त्रियों की पाठशालाओं में पाठ्यसामग्री के रूप में लगायी जाय। लेखक अपना नाम हीरालाल बताता है जो सिकंदराबाद के  निवासी है। उसका कहना है कि यह पुस्तक संवाद शैली में लिखी गयी है जिसमें सरस्वती वक्ता हैं और सुमति श्रोता है। पहले अध्याय में सरस्वती सुमति से कहती है कि तुम ससुराल जाती हो और मेरी पुत्री के समान हो। मैं तुम्हें दान करना चाहती हूं और ‘‘मेरे विचार में वह वस्तु अविनाशी उत्तम शिक्षा है सो मैं तुम्हें वही दान करती हूं और प्रथम शिक्षा से उत्तम मध्यम कनिष्ठ स्त्रियों के लक्षण और कुलीन स्त्रियों के धर्मों का निरूपण करती हूं।’’8


प्रस्तुत उद्धरण में सरस्वती द्वारा स्त्री  शिक्षा को सर्वोत्तम दान कहा गया है. लेकिन साथ ही वह स्त्रियों का वर्गीकरण करना भी नहीं भूलती। वह कुछ खास गुणों को ‘धारण’ करने के आधार पर स्त्रियों को उत्तम,माध्यम और निम्न श्रेणियों में विभाजित करती है. इस पुस्तक और बालाबोधिनी में इसका समीक्षात्मक परिचय प्रकाशित होने का एकमात्र निष्कर्ष ये है कि हर स्त्री में ‘उत्तम’ बनने की चाह पैदा हो, जो समाज के प्रचलित ढांचे को जस का तस बनाये रखने में सहायक हो. सरस्वती स्त्रियों के लक्षण तय करते हुए कहती है कि ‘‘लज्जा, दया, शील और सत् उत्तम स्त्रियों का लक्षण है।’’9 मध्यम स्त्रियों के बारे में वो कहती है कि ‘‘उनकी प्रीति अपने पुरुष से निर्दोष होती है और जो कुटुंब के संबंधी  हैं उनसे व्यवहारी प्रीति रहती है और लोकलाज करके बताती  है वो भी भली हैं।’’10


कनिष्ठ स्त्रियों के चरित्र के बारे में वो कहती है कि ‘‘एक घर के चार घर कर देने, परिवार के लोगों से प्रीति न करनी और प्रीति करनी तो पड़ोस की छोटी जातों से और पति से भी व्यवहार प्रीति रखनी….. निश्चय जानो कि इनकी प्राप्ति से मृत्यु की प्राप्ति उत्तम है।11



इसी पुस्तक की पात्र सरस्वती एक अध्याय में यह भी निर्धरित करती है कि ‘‘स्त्रियों को निरंतर अपने पति के अनुसार रहना और मन क्रम वचन करके उत्तम सेवा करना उनका धर्म  है और केवल पति की सेवा ही को वे अपना परलोक साधना  जानती हैं।’’12


स्पष्ट है कि पति सेवा को स्त्रियों का धर्म घोषित करके और ऐसा करके स्त्रियों का परलोक सुधरने का काम भी ‘बालाबोधिनी’ ने किया। परलोक का डर दिखाकर स्त्रियों की गतिशीलता को नियंत्रित किया गया और स्त्रियों के ऐसे कर्तव्य निर्धरित करके उन्हें महिमा मंडित किया गया। ऐसा न करने वाली स्त्री का चरित्र भी बता दिया गया। ऐसी स्थिति में कौन स्त्री ‘बदचरित्र’ होने का साहस करेगी।आगे एक उद्धरण  से यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि बिरादरी में आने जाने के क्या नियम निर्धरित किए गए, ‘‘जब कभी किसी बिरादरी के घर से तुम्हारे बुलाने को आवें तो जो पति समीप हो तो प्रथम पति से फिर सास, ससुर जेठ, जिठानी आदि सम्बन्धियों  से आज्ञा मांगों जो वह आज्ञा दें तो कुछ दोष नहीं है जाओ और बिना आज्ञा तो चाहे कैसी ही प्रीत करके तुमको बुलावे और तुमको उनके साथ विशेष प्रीत हो तब नहीं जाना चाहिए।’’13


स्त्रियों के लिए ये नैतिक कर्तव्य निर्धरित करने के पश्चात एक नैतिक आचार संहिता भी प्रस्तुत आलेख में लेखक ने सुझायी है जिससे स्त्रियों के चरित्रा का ‘नैतिक पतन’ न हो। वह लिखता है, ‘‘हंसी ठट्ठे क्रोध् अभिमान निर्लज्ज बातों से वर्जित रहो और अपने भेद की गुप्त बात अथवा घर के दुख-सुख को किसी न कहो कि इसका परिणाम भला नहीं है।’’14

स्पष्ट है कि यहां लेखक निजी और सार्वजनिक को अलग-अलग या गुप्त रखने की बात स्त्रियों को समझाता है। घर के अन्दर स्त्राी के जीवन में कितनी भी पीड़ा, कितना भी अत्याचार, कितना भी दुख, शोषण हो उसे घर और परिवार के निजी दायरे से बाहर कहीं भी अभिव्यक्त नहीं करना है। इस तरह स्त्री की गतिशीलता पर पुरुष का नियंत्रण कायम रहेगा। इस तरह के लेख पितृसत्ता की वैधता बनाए रखने के लिए स्त्रियों को अनुकूलित करते हैं।


पतिव्रतपत्रिका में स्त्रियों को अपने पतियों के प्रति ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ बने रहने की शिक्षा देने के लिए ‘पतिव्रत’ शीर्षक से लेख प्रकाशित होते थे। ऐसे ही एक लेख में लेखक स्त्रियों को सम्बोधित करते  हुए कहता है कि ‘‘पति की सेवा से बढ़कर सपने में भी स्त्रियों को दूसरा धर्म वेदों में नहीं मिलता, हंसी से व क्रोध से वा अनजाने व किसी और किसी प्रकार से अनादर करके पति को जो कोई स्त्री कुछ कडुवी बात कहती है, उसको और कोई प्रायश्चित नहीं है, कर्म सेवा मन से व बानी से जो पति का सपने में भी अनादर करती हैं, उनका नरकों से उद्धार नहीं होता जो स्त्री पति की प्यारी नहीं है उसका सब सौभाग्य व्यर्थ है उसका खाना, पीना, सोना,  शृंगार करना बरंच जीना तक भी व्यर्थ  है क्योंकि जिसको पति और उसका प्रेम नहीं प्यारा है वह संसार में व्यर्थ जन्मी है….’’15

उपर्युक्त उद्धारण से ज्ञात होता है कि स्त्री के लिए उसका पति ही सर्वस्व माना गया है। पति ही के लिए स्त्री का जन्म हुआ, पति को खुश रखना उसके लिए ही जीना उसका जीवन है। यहाँ तक कि जिसने तनिक भी पति की उपेक्षा की उसका जीवन ही नहीं जन्म लेना ही व्यर्थ है।

किशोरावस्था और शिशु पालन पत्रिका के लगभग हर अंक में शिशुपालन के तौर तरीकों पर लेख प्रकाशित हुए। शिशु पालन केवल स्त्रियों का कर्तव्य है, पत्रिका में प्रकाशित लेखों में इस बात पर बहुत जोर दिया गया है। हां एक खास बात ये जरूर है कि पत्रिका में गर्भवती स्त्रियों के खान-पान और दिनचर्या संबंधी लेख भी प्रकाशित होते थे। ऐसे अनेक उद्धारण देखे जा सकते हैं। कुछ उद्धारण निम्नवत हैं- ‘‘गर्भवती स्त्राी को परिमित आहार करना अर्थात जैसी क्षुध और परिपाक शक्ति हो उसके अनुसार खाना, अधिक वा न्यून न खाना चाहिए, और जो पच के शरीर की पुष्टि उत्पन्न करे वही उत्तम पदार्थ गर्भवती स्त्री के खाने के योग्य है।’’16


‘‘गर्भिणी स्त्राी को प्रतिदिन निर्मल वायु सेवन करना उचित है अर्थात् देह धेना और नहाना आवश्यक है। जो शरीर दुर्बल हो तो गुनगुने पानी से स्नान करना और बदन धोना चाहिए…..गर्भधरण काल में जननी के मन का भाव जिस प्रकार का होता है संतान का स्वभाव भी प्रायः वैसा ही होता है…….’’18

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि गर्भवती स्त्रियों की देखभाल के प्रति समाज को जागरूक करने के लिए पत्रिका में अेधिकतर लेख प्रकाशित होते थे। संभवतः ये स्त्रियों की संतानोत्पत्ति करने के विशिष्ट गुण के कारण था ताकि वो देश के लिए अच्छे बच्चे पैदा कर और उनका अच्छे से पालन-पोषण भी कर सके। इसलिए पत्रिका में स्थान-स्थान पर शिशुपालन की तरकीबें बतायीं जाती थीं।

पत्रिका में स्त्रियों को अर्थशास्त्र और अर्थनीति संबंधी  ज्ञान देने के लिए भी लेख प्रकाशित हुए थे। सन्तानोत्पत्ति और अच्छी मां बनने के साथ-साथ स्त्रियों को स्वावलम्बी बनने की सलाह दिए जाने वाले लेख भी छपे। इसका वास्तव में यह अर्थ नहीं था कि स्त्रियां सम्पत्ति की मालिक बनें। लेखक की चिंता यह थी कि स्त्रियां जब दान करें तो अपनी कमाई से दान-धर्म का कार्य करें। पति की कमाई से दान का पुण्य उन्हें नहीं प्राप्त होगा। मेहनत की कमाई से दान फलदायक होगा। लेकिन इसी बहाने स्त्रियों को कम से कम सम्पत्ति अर्जित करने का एक अवसर तो मिला। यह ऐसे लेखों की सार्थकता थी।

सती का महिमामंडन


पत्रिका में ‘लाजवन्ती’ नामक लेख में एक बाग की खूबसूरती का वर्णन लेखक ने किया है हालांकि लेख में लेखक/लेखिका का नाम नहीं है। सुन्दर बाग का वर्णन करते-करते लेखक मध्य में सायास मेंहदी के पौधे  का जिक्र करता है और उससे सती स्त्रियों का प्रसंग आता है। बाग में एक सती के चउरे की उपस्थिति का वर्णन भी लेख में आती है। निम्न उद्धारण में हम देख सकते हैं कि सती प्रथा का किस प्रकार सहज तरीके से महिमामंडन किया गया है।‘‘यह मेंहदी भी सोहाग के सिंगारों में एक बड़ी चीज है और यह कुल की सतियों को चढ़ाई जाती हैंऋ देखो उसी बगीचे के किनारे एक सती का छोटा सा चउरा भी है, अहा इसकी अपने प्यारे प्रीतम में कैसी प्रीति थी कि उसी के साथ ही जल गई।’’19

उपर्युक्त उद्धारण से पता चलता है कि उस कुल में सती होने की प्रथा थी और मेंहदी सतियों को चढ़ाई जाती थी। यह पत्रिका उस कालखण्ड में प्रकाशित होती थी जब सती प्रथा पर रोक लग चुकी थी और जहां-जहां प्रभाव बाकी था वहां पर रोक लगाने के प्रयास जारी थे। ऐसे समय में पत्रिका के सम्पादक ने इस प्रकार का लेख क्यों प्रकाशित किये जिसमें एक स्त्री हुलस कर कहती है, ‘‘अहा, इसकी अपने प्रीतम में कितनी प्रीति थी कि उसके साथ ही जल गयी।’’19 यह लेख सम्पादक की स्त्री मुक्ति की मुहिम या मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। थी। यह पत्रिका उस कालखण्ड में प्रकाशित होती थी जब सती प्रथा पर रोक लग चुकी थी और जहां-जहां प्रभाव बाकी था वहां पर रोक लगाने के प्रयास जारी थे। ऐसे समय में पत्रिका के सम्पादक ने इस प्रकार का लेख क्यों प्रकाशित किये जिसमें एक स्त्री हुलस कर कहती है, ‘‘अहा, इसकी अपने प्रीतम में कितनी प्रीति थी कि उसके साथ ही जल गयी।’’19 यह लेख सम्पादक की स्त्री मुक्ति की मुहिम या मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

भारतेंदु ‘बालाबोधिनी’ माध्यम से ऐसी स्त्री का निर्माण करना कहते थे जो घर परिवार रूपी संस्था को सुचारू से चलाने के लिए कुशल अवैतनिक मैनेजर की भांति काम करे और अपने ‘उद्धारक’ मालिक के प्रति वफादार रहे. वह संस्कारी हिन्दू मानस की हो. जिससे नए मध्य वर्गीय हिन्दू मानस वाले समाज  की अच्छी,योग्य और सुशील स्त्री पाने की तृषा की तुष्टि हो. वह अच्छी मां बने. शिशु पालन के तरीके उसे आते हों. हाँ शिशु पालन और सती विषय पर पत्रिका में बहुतायत में लेख प्रकाशित होते थे. बच्चों की देखभाल और परिवरिश करना स्त्रियों का कर्तव्य है, ये समझाने वाले लेखों को पत्रिका में नियमित जगह मिलती दिखाई देती है. सती और सतीत्व को महिमामंडित करने हेतु अक्सर मिथकीय सतियों का गुणगान और गौरव गान पत्रिका में प्रकाशित होता है. संपादकद्वय ने जब पत्रिका का संकलन संपादन किया तो भारतेंदु के विषय सती से संबंधित पंक्तियों को संकलन के मुखपृष्ठ पर जगह दी. पंक्तियाँ हैं-
“सीता अनुसुइया सती अरुंघती अनुहारि
शीललाज विद्यादि गुण लहौ सकल जग नारि.”20

 बालाबोधिनी में प्रकाशित सामग्री के अध्ययन-विश्लेषण से ज्ञात होता है की भारतेंदु मनुवादी पुनरुत्थान को खाद पानी दे रहे थे. जो कालांतर में खूब फलता-फूलता है. ध्यान रहे की भारतेंदु के अध्येताओं ने भारतेंदु को हिंदी साहित्य में आधुनिक काल का जनक कहा है और नवजागरण के अग्रदूत की संज्ञा भी दी गई. पता नहीं किस गणित से रामविलास शर्मा उन्हें इन संज्ञाओं से नवाजते हैं. ऐसा भी कहा जा सकता है कि बालाबोधिनी के  अध्ययन से मूल्य निर्णय देना भारतेंदु के साथ ज्यादती है. ऐसा हो भी सकता है. लेकिन बालाबोधिनी का संपादन और उसके  कंटेंट का चयन भारतेंदु के लिए नवजागरण की संज्ञा पर एक प्रश्न अवश्य है. जिसे सुना जाना चाहिए. अगर भारतेंदु पुनरुत्थान के समर्थक नहीं थे तो क्या यह अकारण है कि वो अपने बलिया वाले भाषण में स्त्री शिक्षा पर बोलते हुए कहते हैं कि  ‘‘लड़कियों को भी पढ़ाइए किन्तु उस चाल से नहीं जैसी कि आजकल पढ़ाई जाती है जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ….ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज शिक्षा दें।’’21इतना ही नहीं स्त्री शिक्षा पर हंटर कमीशन के सामने बयान  देते हुए वे कहते हैं कि ‘‘मैं इस देश में लड़के-लड़कियों के मिले-जुले स्कूल की योजना का समर्थन कभी नहीं कर सकता।’’22 इतना ही नहीं उन्होंने ‘विद्यांकुर’ और ‘इतिहास तिमिरनाशक’ जैसी पुस्तकों को लड़कियों के पाठ्यक्रम से हटाने की सिफारिश की क्योंकि इससे उनके अनुसार स्त्रियों के चरित्रा का कोई विकास नहीं होता।


जाहिर है भारतेंदु एक ऐसी स्त्री की निर्मिती चाहते थे जो न सिर्फ पश्चिमी स्त्री के बरक्स हो बल्कि आम परम्परागत भारतीय स्त्राी जैसे घरेलू दाई, धेबिन, नाउन, फेरी लगाने वाली के बरक्स हो.ध्यान रहे कि भारतेंदु की बालाबोधिनी में समाज के निचले तबके की स्त्रियों की समस्याओं पर स्त्रियों को तो छोड़ ही दीजिये, पुरुषों यानि स्त्री के ‘उद्धारकों’का भी कोई लेख या रपट नहीं मिलती है. जाति व्यवस्था की क्रूरता और घृणा पर कोई टिपण्णी तक नहीं मिलती  और भारतेंदु नवजागरण एवं हिंदी में आधुनिक काल के जनक कहे जाने लगते हैं.


सन्दर्भ सूची
1. बालबोधिनी,संपादक-भारतेंदु हरिश्चंद्रएसंकलन-संपादनः वसुध डालमिया, संजीव कुमार, राजकमल       
        प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, पहला संस्करण-2014, पृष्ठ-6
2. वही, पृष्ठः 119-120
3. वही, पृष्ठ-129
4. वही, पृष्ठ-31
5. वही, पृष्ठ-32
6. वही, पृष्ठ 35-36
7. वही, पृष्ठ-35
8. वही, पृष्ठ-146
9. वही
10. वही
11. वही, पृष्ठ 146-147
12. वही, पृष्ठ-147
13. वही, पृष्ठ-193
14. वही
15. वही, पृष्ठ 58-59
16. वही, पृष्ठ-63
17. वही, पृष्ठ-68
18. वही, पृष्ठ-69
19. वही, पृष्ठ-55
20. वही, मुख पृष्ठ
21भारतेंदु समग्र, सं. हेमन्त शर्मा, हिन्दी प्रचार संस्थान, 1989, पृष्ठ-1013
22. वही, पृष्ठ-1010

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यौन सम्बन्ध को प्यार का रूप देना जरुरी

इति शरण

युवा पत्रकार इति आईआईएमसी से रेडियो टीवी पत्रकारिता करने के बाद पटना में रिर्पोटींग कर रही हैं और जी न्यूज़ के वेब DNA में रिर्पोटर के रूप में कार्यरत हैं. संपर्क : ई मेल- itisharan@gmail.com

इति शरण 

कुछ सालों तक मैंने एक सामुदायिक रेडियो “गुडगाँव की आवाज़” में सेक्सुअल हेल्थ पर काम किया। इस दौरान सेक्सुअल हेल्थ से सम्बंधित कई विषयों पर काम करने का मौका मिला, जिसमें एक गंभीर विषय से भी हमारा सामना हुआ- मैरिटल रेप ( वैवाहिक बलात्कार ) । महिलाओं से बात करने पर पता चला कि बड़ी संख्या में महिलाएं इस तरह के बलात्कार का शिकार हो रही हैं, जिसके खिलाफ वे आवाज़ भी नहीं उठा पाती।

इस प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरी कई औरतों से बातचीत हुई। मगर एक दिन एक ऐसी महिला ने मुझे अपनी कहानी बताई , जिससे मैं अक्सर मिला करती थी, लेकिन कभी पता ही नहीं चला कि वह भी मैरिटल रेप की शिकार है। उसकी शादी 18 साल की उम्र में ही कर दी गई थी। शादी की पहली रात से ही वह अपने पति की जबरदस्ती सहने को मजबूर रही थी। उस महिला ने उस दिन विस्तार से मुझे अपनी कहानी बताई।

“मुझे नहीं पता था कि शादी के बाद क्या होता है। कच्ची उम्र में ही मेरी शादी तो तय कर दी गई, मगर शादी के बाद की चीज़ों के बारे में मुझे कुछ नहीं बताया गया। शादी की पहली रात मेरे पति जैसे मुझपर चढ़ ही गए थे, मेरे लिए सब बहुत डरावना था। मुझे दर्द भी हो रहा था और बहुत शर्म भी आ रही थी। कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि कोई मेरे शरीर के साथ ऐसा कुछ करेगा। मेरे पति तब तक नहीं रुके जब तक उन्हें नींद नहीं आ गई। सुबह होते ही मैंने अपनी माँ को फ़ोन लगाया और रात की बात बताते हुए रोने लगी। मेरी माँ ने कहा “पागल है क्या तू, वह तेरे पति हैं, इसे अपना पत्नी धर्म समझ कर निभा ले।”

उस औरत ने बताया कि धीरे-धीरे वह इसकी आदी  हो गई। अब तो मासिक धर्म के दिन भी उसका पति उसे नहीं छोड़ता। उसका पूरा बिस्तर खून से सन जाता था। कुछ दिन बाद वह गर्भवती हो गई। उसे मायके भेज दिया गया। वह खुश थी, उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हो रहा था। बच्चा होने के बाद उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया। इस कारण डॉक्टर ने कुछ दिनों तक उन्हें सम्बन्ध बनाने के लिए मना किया हुआ था, मगर उसका पति मानने वालो में से नहीं था यहाँ तक कि उसे प्रोटेक्शन लेना भी मंजूर नहीं था। नतीजतन एक महीने बाद ही वह दोबारा गर्भवती हो गई। शरीर से कमजोर होने के कारण 2 महीने में ही उसका बच्चा गिर गया ।अपनी कहानी बताने के बाद उस महिला ने कहा था “अपने पति से मैं भी प्यार करना चाहती थी, मगर कभी कर नहीं पाई।
इस तरह की कहानी हमारे समाज में हर दूसरे घर में मिल जाएँगी, जहाँ औरतें अपने पति द्वारा ही बलात्कार की शिकार हो रही।

वैसे इसके लिए जिम्मेदार अकेले उस एक पुरुष को नहीं ठहराया जा सकता है बल्कि इसका जिम्मेदार हमारा वह समाज है, जहाँ सेक्स को पुरुषों की मर्दानगी से जोड़कर देखा जाता है। मुझे याद है एक औरत ने अपनी कहानी बताते हुए कहा था, मैडम मेरे पति बहुत अच्छे हैं। कभी भी मेरी इजाज़त के बिना सम्बन्ध नहीं बनाते। यहाँ तक कि पहली रात भी मेरे मना करने के बाद वह कुछ नहीं बोले। मगर उन्होंने मुझे कहा था कि किसी और को मत बताना कि हमारे बीच कुछ भी नहीं हुआ , वरना लोग मेरी मर्दानगी पर ताना देंगे। इस घटना को हम एक ऐसे उदाहरण के रूप में देख सकते हैं, जब मर्दानगी के नाम पर एक पुरुष को जबरन सम्बन्ध बानने के लिए ज़ोर दिया जाता है।

इन सबका परिणाम स्त्रियों के मन में यौन सम्बन्ध के प्रति नफरत घर कर लेती है। प्यार का यह अनमोल रूप हिंसा में तब्दील हो जाता है। जबकि यौन सम्बन्ध पुरुष और स्त्री दोनों की इच्छा और जरुरत है।  पुरुषों की शारीरिक बनावट ऐसी होती है कि सम्बन्ध बानने से उनकी थकान दूर होती है, जबकि औरतों को इसमें कुछ हद तक थकान महसूस होती है। वैसे भी हमारे समाज में सामान्यतः घर की सारी जिम्मेदारी घर की औरतों के सर पर ही थोप दी जाती है, दिन भर काम से थकने के बाद हर दिन उसका सम्बन्ध बनाने का मन नहीं होता।

करीब 50 साल की एक महिला ने अपने पति के बार में बताते हुए कहा था “वे आज मुझे अगर अपने पास बैठने के लिए बुलाते भी हैं तो उनके पास जाकर बैठने का मन नहीं करता। मन भी कैसे करे, शादी होते ही घर की सारी जिम्मेदारी मेरे सर पर थोप दी गई, दिन भर काम करके शरीर बिल्कुल जवाब दे देता था। उम्र भी बहुत कम थी मेरी। मगर काम के बाद जब आराम करने का मन होता तो पति घर आते ही बिस्तर में चलने के लिए बोलते। अगर मना करो तो फिर घर में बवाल कि मेरी इससे थकान दूर होती है और वैसे भी तू तो दिन भर घर में ही रहती है, अब किस बात की पत्नी जो पति का थकान भी दूर न करे। उस औरत का कहना था कि सम्बन्ध बनाना मेरे लिए कोई प्यार नहीं रहा बल्कि सज़ा थी मेरे लिए।  उनके लिए तो मैं बस उसकी ज़रुरत पूरी करने वाली मशीन थी। उसके घर का सारा काम करने वाली और दूसरा सम्बन्ध बनाकर उसकी थकान दूर करने वाली औरत।

इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत हम लोग एक रेडियो नाटक भी बनाया करते थे, जिसमें लाइव डॉक्टर के जुड़ने का एक सेशन हुआ करता था। डॉक्टर उस सेशन में अक्सर लोगों को यह सलाह दिया करते थे कि आप पत्नी के पास सिर्फ सम्बन्ध बनाने मत जाया करो, बल्कि अपने प्यार का इज़हार दूसरी तरह से भी करने की कोशिश करो, देखना आपकी पत्नी आपसे कितनी खुश रहा करेगी।  डॉक्टर से बात करने के लिए हमारे स्टेशन में काफी कॉल आया करते थे। कई पुरुषों का कहना था कि हमें बार-बार अपनी पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाने का मन होता है। कुछ पुरुषों ने बताया कि मैं ऑफिस में रहता हूँ तब भी मन होता है जल्दी से घर जाकर पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाऊं, ऐसा नहीं कर पाने पर बहुत बेचैनी होती है।

डॉक्टरों का कहना हैं कि यह एक तरह कि मानसिक स्थिति भी है, किसी चीज़ की लत लग जाना या उसके बारे में दिन रात सोचने पर हर बार आपका दिमाग उसी ओर जाता है। खासकर युवाओं के साथ ऐसा कई बार होता है। डॉक्टरों का कहना है कि पहले तो उन पुरुषों को अपना ध्यान कहीं  और लगाने की कोशिश करनी चाहिये। दूसरा कई बार पुरुषों के उत्तेजित हो जाने पर उनका वीर्य भी निकल आता है, जिसके बाद उन्हें सेक्स करने की जरुरत महसूस होती है। अगर उस वक़्त वह पुरुष अपने साथी के साथ नहीं हैं या उसकी साथी की रज़ामंदी नहीं हैं तो वह  हस्तमैथुन करके भी अपनी उत्तेजना शांत कर सकता है।

हांलाकि हमारे समाज में हस्तमैथुन को गलत नज़रिये से देखा जाता है। जबकि इसमें कोई बुराई नहीं है। यह एक सामान्य सी बात है। डॉक्टर भी इसे गलत नहीं मानते। कई लोगों का यह भी मानना होता है कि हस्तमैथुन करने से कमजोरी या अन्य कोई बीमारी होती है, मगर यह सब गलत धारणा है। यह चिंता का विषय तब बनता है जब रोजमर्रा के काम में रूकावट बनने लगे या तनाव मुक्त करने का यही एकमात्र साधन बन जाए।

जबरन सम्बन्ध बनाने का खामियाज़ा कई बार खुद पुरुषों को भी सहना पड़ता है। पुरुषों के जबरदस्ती करने पर कई बार औरतें सम्बन्ध बनाने के नाम से ही नफरत करने लगती है। वे घर के कामों में खुद को इतना व्यस्त कर लेती हैं कि पति के तरफ कभी ध्यान भी नहीं जाता। परिणामस्वरूप जल्द ही दोनों के बीच यौन सम्बन्ध बनना बंद हो जाता हैं और पुरुष चाह कर भी इससे वंचित रह जाते हैं। इसलिए इस प्यार को बरक़रार रखने के लिए यौन सम्बन्ध को हिंसा नहीं बल्कि प्यार का रूप देना जरुरी है।

बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत आज मिलते हैं बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर से. उनके जीवन और विचार उत्पल कान्त अनीस के शब्दों में. 


उत्पलकान्त अनीस

बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर अपनी सामाजिक सक्रियता और राजनीतिक चेतना के लिए बहुजन आंदोलन में एक समादृत नाम हैं. ऐसी बहुत कम महिलायें हुई हैं, जो अपने मेडिकल प्रोफेशनल कैरियर के साथ-साथ सामजिक क्षेत्र में भी बहुत सक्रिय हों. लेकिन मनीषा ने मेडिकल प्रोफेशनल के साथ-साथ समाज में व्याप्त रोगों की पहचान की और वे उनके निदान के लिए लगातार प्रयत्नशील भी हैं.पेशे से डॉक्टर मनीषा अभी डिपार्टमेंट ऑफ़ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, डेक्कन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज हैदराबाद में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और हैदराबाद के कॉरपरेट हॉस्पिटल में लीवर ट्रांसप्लांट की विशेषज्ञ हैं. नागपुर में जनमी, पली-बढी मनीषा ने और वहीं से एम.बी.बी.एस. तथा एमडी तक की शिक्षा गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से प्राप्त की, उसके बाद उन्होंने गैस्ट्रोलाजी में सुपर स्पेश्लाइजेशन पीजीआई चंडीगढ़ और जी बी पन्त इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली से हासिल की. वे लगभग 18 सालों से बामसेफ से जुड़ी हैं और अभी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेवारी के साथ-साथ केन्द्रीय कार्यकारी परिषद की सदस्य के रूप में भी बामसेफ के आन्दोलन की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी से जुडी हैं. बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने से पहले वे मूलनिवासी महिला संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं.

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप 

नागपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में इनका जन्म हुआ. इनके माता का नाम प्रमिला रंगारी और पिता का नाम भागवत रंगारी है. इनका परिवार आंबेडकरी विचारधारा से जुड़ा हुआ है. वैसे इनकी माँ का पंजाबी महाराष्ट्रीयन परिवार से ताल्लुक रहा, जबकि इनके पापा का महाराष्ट्रीयन परिवार से. इनकी परिवारिक पृष्ठभूमि में दलित और पिछड़ी दोनों जातियों का अंतरजातीय वैवाहिक सबंध रहा है. यही कारण है कि मनीषा अपनेआप को जन्मना/जन्मजा बहुजन कहती हैं. इनके नाना-नानी ने 1956 में नागपुर में बाबासाहेब के साथ बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया था. इनकी मामी सुलोचनाताई डोंगरे थीं, जिन्होंने 1942 में ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस वीमेंस कॉन्फ्रेंस (20जुलाई 1942) में  की अध्यक्षता की थी. वे बाबा साहेब के साथ मिलकर सी पी बेरार और  मराठबाड़ा प्रदेश में फेडरेशन का काम करती थीं.

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इनका परिवार दादा-दादी के समय से ही सामाजिक रूप से काफी उन्मुख रहा. इनके परिवार में फुले और आंबेडकरी विचार का बहुत गहरा प्रभाव रहा है. यही कारण रहा कि घर में शुरू से पढाई का माहौल था. इनके पापा (भागवत रंगारी) सरकारी अफसर थे और माँ (प्रमिला रंगारी) नागपुर विश्वविद्यालय के शिक्षण विभाग की विभागाध्यक्ष पद से रिटायर हुईं. इनके पिता चार भाई थे, जिनमें अन्य तीन भाई आइएएस., सिविल जज और आइआइटीयन रहे. उच्च शिक्षित परिवार में जन्म होने के कारण मनीषा को बचपन से एक उन्नत शैक्षणिक माहौल मिला. लेकिन इतने उच्च शिक्षित परिवार में जन्म होने के बावजूद भी इन्हें अपने छात्र जीवन में काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा.


फुले और आंबेडकरी विचार से लैस परिवार में जन्म होने के कारण इनका बचपन से ही बाबा साहेब के विचारों से परिचय हुआ. यही कारण रहा कि मनीषा बचपन से ही सामाजिक चेतना से लैस रहीं और उन्होंने बचपन से ही जातिवाद और अन्याय का विरोध करना शुरू कर दिया. इसका परिणाम भी उन्हें भुगतना पड़ा.



:दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

सेंट जोसफ कांन्वेंट स्कूल में पढाई होने के कारण स्कूली जीवन में इन्हें भेदभाव नहीं सहना पड़ा. लेकिन जब मनीषा भिडे जूनियर कॉलेज, जो ब्राह्मण शैक्षणिक संस्थान है, में गईं तो वहां इनका सामना जातिवाद से हुआ. लेकिन हमेशा प्रतिरोध करती रही. बारहवीं में कॉलेज टॉप करने के बाद भी जाति से गैरब्राहमण होने के कारण इनका नाम स्कूल वालों ने अखबार वालों को नहीं भेजा था. इनकी जगह पर दूसरा स्थान प्राप्त विद्यार्थी का नाम छपा. यहाँ तक कि प्रिंसिपल और शिक्षक किसी को बताने से भी हिचकिचाते रहे. मनीषा ने कॉलेज अथॉरिटी के सामने ये सवाल उठाया. अंततः पुरस्कार वितरण के समय कॉलेज को मनीषा के टॉप होने की घोषणा करनी ही पड़ी.


गवर्मेंट मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के दौरान पढ़ने में टॉप होने के कारण भेदभाव नहीं सहना पड़ा, लेकिन एम डी करते हुए ब्राह्मण और अन्य उच्चवर्णीय फैकल्टी का भेदभाव सहना पड़ा. इंदिरा मेडिकल कॉलेज में एमडी गोल्ड मेडलिस्ट होने के बावजूद भी उस साल मनीषा को गोल्ड मैडल से वंचित कर दिया गया.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

 ब्रहामणवादी शिक्षकों ने सुनियोजित तरीके से यूनिवर्सिटी प्रशासन से साजिश करके इन्हें गोल्ड मैडल से वंचित कर दिया और मनीषा को जवाब दिया गया कि राउंडवाइज गोल्ड मैडल इस बार दूसरे विभाग को दिया जाएगा. आगे चलकर मनीषा ने पीजीआई चंडीगढ़ बतौर सीनियर रेजीडेंट ज्वाइन किया.  इसके बाद सुपरस्पेशलाइजेशन और डॉक्टरेट इन मेडिसिन करने के लिए वे जी.बी.पंत इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, दिल्ली आई. यहाँ जातिवादी उच्चवर्णीय सहपाठियों ने उन्हें परेशान किया लेकिन अंततः वे वहां अपनी डिग्री पूरा कर पायीं. यहाँ मनीषा को लैंगिक और जातिगत भेदभाव काफी झेलना पड़ा. यहीं वे बामसेफ से 1998 में जुड़ी.

फिर शादी के बाद मुंबई गयीं. वहां मनीषा ने जे.जे. मेडिकल कॉलेज ज्वाइन किया. इस बीच बामसेफ में उन्होंने सांगठनिक स्तर पर काफी काम किया. पूरे देश में घूम-घूम कर संगठन को मजबूत किया. बामसेफ के अंदर महिला मुद्दे और नेतृत्व को लेकर जमीनी स्तर पर भी काफी काम किया. उन्होंने टीएनएमसी नायर हॉस्पिटल में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया. यहाँ पर मनीषा ने पितृसत्ता और जातिवादियों के खिलाफ मोर्चा खोला और इन्हें जीत मिली. इसके बाद हैदराबाद आ गयीं.



दलित महिला कारोबारी का संघर्ष 

हैदराबाद आने के बाद उन्होंने मेडवीन हॉस्पिटल में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डिविजन में हेड के तौर पर ज्वाइन किया. अंतररार्ष्ट्रीय और राष्ट्रीय जर्नल में कई आलेख प्रकाशित हुये. वहाँ कई नामचीन कॉर्पोरेट अस्पतालों में लीवर स्पेशलिस्ट के तौर पर काम करती रहीं.


मनीषा दलित स्त्रीवाद के बदले बहुजन स्त्रीवाद पर जोर देती हैं. ‘दलित स्त्रीवाद’ शब्दावली को सवर्णों के साजिश के तौर पर देखती हैं. मनीषा का मानना है कि दलित स्त्रीवाद जिन मुद्दों को उठाता है या उसका जो धरातल है, वह सभी ओबीसी, आदिवासी, एससी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए बराबर है. हरएक समूह का अपना एक विशेष शोषण होता है, लेकिन सभी शोषण की जड़ें ब्राह्मणवाद से उत्पन्न जातिवाद तथा पितृसत्ता की मान्यतायें ही हैं. उच्च वर्णीय महिलाओं के शोषण में जाति की भूमिका नहीं होती, पितृसत्ता उसके मूल में है. स्त्रीवाद शब्द ब्राह्मण, सवर्ण महिलाओं के लिए तो ठीक है लेकिन बहुजन महिलाओं के नहीं. भारत का स्त्रीवाद जातिगत प्रताड़ना के प्रश्न पर कई दशकों तक चुप रहा है और बहुजन महिलाओं पर वर्चस्व बनाता रहा, इसी प्रक्रम में जाति का अहम मसला भी दबाता रहा. इसी वजह से दलित स्त्रीवाद का जन्म हुआ. ब्राहमण सवर्ण महिलायें सिर्फ बहुजनों के शोषण तथा गरीबी पर एनजीओ के जरिये पैसा, ओहदा, पारितोषिक, किताबों में आलेख, किताबें लिखना आदि अनेक लाभ लेने में लगी थीं, मगर जाति सिस्टम, जो कि पितृसत्ता को जन्म देता है, को नेस्तनाबूद करने के लिए कुछ नहीं कर रही थी. स्त्रीवाद के नाम पर जाति के अहम मुद्दों को ब्राहमण/ सवर्ण महिलायें निगल जाती हैं, ऐसा मनीषा बांगर समझती हैं. वे कहती हैं कि ‘इस तरह ब्राह्मण/ सवर्ण महिला ब्राह्मणवाद को बढ़ावा ही नहीं, जानबूझकर बनाये रखने में सवर्ण पुरुषों का साथ देती है. इस तरह का छद्म स्त्रीवाद भारत में पनप रहा है.’ वे स्पष्ट करती हैं कि, ‘एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं की लड़ाई ब्राह्मणवाद के खिलाफ है, ज्यों ही ब्राह्मणवाद ख़त्म होगा, त्यो ही बहुजन महिलाओं का शोषण खत्म होगा. जिस मात्रा में जातिवाद का निर्मूलन होता रहेगा, उसी मात्रा में पितृसत्ता  का प्रश्न भी सुलझाता रहेगा, क्योंकि भारत में पितृसत्ता जातिवाद का अभिन्न अंग है, दोनो एक दूसरे को जीवित रखते हैं, जबतक दोनो जीवित रहते हैं, तभी तक ब्राह्मणवाद फलता-फूलता रहता है. दलित स्त्रीवाद पर सवाल खड़ा करते हुए कहती हैं कि जोतिबा  फूले, बाबा साहेब आम्बेडकर और पेरियार ने जितना महिलाओं के हक-हूकूक के लिए काम किया है, वह स्त्रीवाद के नाम से नहीं किया बल्कि जातिवाद और ब्राहमणवाद का विरोध करते हुए महिलाओं को इसका सबसे पीड़ित समुदाय बताते हुए न सिर्फ काम किया बल्कि विमर्श भी खड़ा किया. मनीषा सावित्रीबाई फूले को आदर्श मानती हैं .



मनीषा महिला आरक्षण को लेकर सिर्फ 33 फीसदी नहीं बल्कि 50 फीसदी आरक्षण के पक्ष में हैं क्योंकि उनके अनुसार महिला की जनसंख्या के अनुपात में ही उन्हें प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. अगर बहुजन स्त्री का उसकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व का प्रावधान नहीं होता है तो सवर्ण/ ब्राह्मण महिलायें सम्पूर्ण बहुजन महिलाओं का प्रतिनिधित्व निगल जायेंगी. ब्राह्मण/ सवर्ण महिलायें आरक्षण के भीतर आरक्षण के हक़ में नहीं हैं. यही इस बात का सबूत है कि भारत में सभी महिलायें एक होमोजनियस (एकरूपीय) समूह नहीं हैं. इसलिए इन्हें आरक्षण भी होमोजनियस (एकरूपीय) समूह की तरह नहीं मिलना चाहिए.  बहुजन महिलाओं के सवालों से जिस तरह से मुख्यधारा का मीडिया मुंह मोड़ता है,  उसपर भी मनीषा सवाल खडी करती हैं.


बामसेफ में महिलाओं की नेतृत्व को लेकर भी मनीषा ने संगठन के अंदर काफी सुधार किया है. उनका कहना है कि बामसेफ भी चूकि इसी समाज का हिस्सा है, तो वहां भी तमाम खामियां है. लेकिन हमलोगों ने उसपर धयान देना शुरू किया हैं. भारत सरकार के गाइडलाइन के अनुसार ‘वीमेंस सेल’ शुरू करवाया है, जो कि शायद ही किसी पॉलिटिकल संस्था में अभी तक हो. मनीषा ने बामसेफ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ाया है, जैसे यूके, यूएसए या मीडिल ईस्ट तक. उन्होंने 13 अप्रैल 2016 को यूनाइटेड नेशन में भी बहुजनों की समस्या पर अपनी बात रखी.



अभी पिछड़े आरक्षण के लिए विभिन्न आन्दोलनों के बारे में बताती हैं कि ये सारी जातियां और समाज ब्राहमणवाद के शिकार रहे हैं इसलिए ये पिछड़ते गये. इसलिए सबसे पहले जाति जनगणना करवाई जाये. वे कहती हैं पिछड़े और दलितों को बांटने में मार्क्सवादियों और ब्राहमणवादियों दोनों का हाथ है.

वे मायावती के काम की एक तरफ सराहना करती हैं तो उनकी राजनीति को भी लिमिटेड बताती हैं, क्योंकि उनके अनुसार वह प्रादेशिक पोलिटिकल पार्टी की नेता की तरह हो गई हैं और उन्होंने एक दलित पहचान के रूप में ब्राह्मण मीडिया और अन्य पोलिटिकल पार्टियों को सम्मति दी है, अघोषित ही सही. उन्होंने अपनी पार्टी सहित संगठन की शक्ति बढ़ाने की तरफ ध्यान नहीं दिया है, वैकल्पिक नेतृत्व पनपने नहीं दिया है, इसीलिए वह एक लिमिटेड अवधि तक सीमित हो जायेंगी. वे कहती हैं कि बीएसपी को संगठन की शक्ति बढ़ानी चाहिए और ओबीसी तथा पसमांदा तक विस्तार करना चाहिए.  मनीषा आह्वान करती हैं कि बहुजन महिलाओं को भी एक साथ आना चाहिए.

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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  

समझ और सरोकार कविता का हासिल

आरती मिश्रा


भोपाल में प्रलेस के दो दिवसीय कविता शिविर में तमाम प्रतिभागियों ने न केवल अपनी कविता को मांजना सीखा बल्कि कविता और वैचारिकी के रिश्ते को उन्होंने बारीकी से समझा.


आपाधापी और जल्दबाजी के इस दौर में जहां ठहरकर सीखने, समझने की प्रक्रिया धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है, प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) की मध्य प्रदेश इकाई ने फरवरी 2017 में राजधानी भोपाल में युवा कवियों के लिए दो दिवसीय आवासीय कविता शिविर का आयोजन किया. इस शिविर में हिंदी के भिन्न-भिन्न इलाकों से आये कवियों ने शिरकत की. शिविर में आठ युवा कवि और पांच वरिष्ठ कवि लगातार दो दिन मौजूद रहे. इसके साथ ही कुछ युवा एवं वरिष्ठ कवियों का आनाजाना भी हुआ. शिविर का उद्देश्य था कि युवा कवियों की कविताएँ सुनी जाएँ और उन पर समुचित चर्चा और विश्लेषण के ज़रिए उनके अच्छे और बुरे पहलुओं पर गौर किया जाए. ज़ाहिर है इन कविताओं का ताक़त, संभावनाएँ और उनकी सीमाएँ भी इस चर्चा का हिस्सा होनी थीं और हुईं भी. यद्यपि इन्हीं तारीखों में इस्मत चुगताई पर नूर ज़हीर के बनाये नाटक में किरदार निभाने की वजह से रजनीश साहिल इस शिविर में शामिल नहीं हो सके लेकिन प्रतिभागियों के चयन का महत्त्वपूर्ण कार्यभार उन्होंने दिल्ली में बैठकर बखूबी निभाया.

शिविर के उद्देश्य और स्वरुप का परिचय शिविर संयोजक के नाते प्रलेसं की मध्य प्रदेश इकाई के महासचिव विनीत तिवारी ने दिया. उन्होंने प्रलेस द्वारा पूर्व में मांडव, साँची, अशोकनगर, सतना, गुना, इंदौर, कालाकुंड, मंदसौर और उज्जैन आदि स्थानों पर आयोजित इस तरह के रचना और विचार शिविरों की जानकारी दी और कहा कि आवासीय शिविरों से नए और पुराने कवियों के बीच  संकोच समाप्त होते हैं और खुल कर बात हो पाती है. साथ ही पूरे वक़्त साथ रहने से साहित्य और संसार को समझने का माहौल कविताओं को अनेकानेक कोणों से देखने का अवकाश संभव करता है
. उन्होंने पूर्व में लगाए गए शिविरों  को याद करते हुए कहा कि  आज के दौर के अनेक प्रमुख कवि शिविरों के बाद ही अपनी सही ज़मीन और पहचान हासिल कर पाए. ज्ञानरंजन, चंद्रकांत देवताले, कृष्णकांत निलोसे, राजेंद्र शर्मा और कुमार अम्बुज द्वारा आयोजित ऐसे ही एक मांडव शिविर से पवन करण, अनिल करमेले, विवेक गुप्ता, आशीष त्रिपाठी और स्वयं मैं कविता के दायरे में गंभीरता से शामिल हुए. उन्होंने शिविरार्थियों से अपेक्षा की कि जिस तरह हमने जो हासिल किया, उसे हम पिछले २० वर्षों से  बाद वाली पीढी के कवियों को देने की कोशिश कर रहे हैं, वैसे ही आप सभी को भी आगे ऐसे शिविर आयोजित करने की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

मुक्तिबोध को याद करते हुए वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज ने कहा कि साहित्य विवेक और जीवन विवेक अलग – अलग नहीं हैं. सभी के परिचय, जिसमे उनका साबका साहित्य से कैसे पड़ा, इसका ज़िक्र भी शामिल था, के बाद कुमार अम्बुज ने सभी शिविरार्थियों से प्रश्न किया कि दुनिया की उत्पत्ति के बारे में उनका क्या सोचना है? उनका ये सवाल भी उनसे दशकों पहले किसी शिविर में भगवत रावत जी या कमलाप्रसाद जी या मलय जी द्वारा पूछे गए सवाल की प्रासंगिक स्मृति थी. दरअसल यह सवाल इस शिविर की जमीन तैयार कर रहा था. सभी युवा कवियों ने दुनिया की उत्पत्ति और इस प्रकार ईश्वर की अवधारणा, उसकी सत्ता को लेकर अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये. इस प्रकार कविता, कवि और वैज्ञानिक चेतना के अंतर्संबंधों को लेकर एक विस्तृत चर्चा आरंभ हुई. कुमार अंबुज ने कहा कि एक कवि के लिए यह आवश्यक है कि वह वैज्ञानिक चेतना से पूरी तरह लैस हो. क्योंकि अगर कवि अपने आसपास की घटनाओं को वैज्ञानिकता की कसौटी पर नहीं कसता, उसे तर्कसंगत करके नहीं देखता और राजनीतिक समझ से संचालित नहीं होता तो उसकी कविता और उसका उद्देश्य इतना बड़ा नहीं हो पाएगा कि वह व्यापक समाज में अपने अनुभवों को सही ढंग से संप्रेषित कर सके.


चर्चा के दौरान धर्म, ईश्वरीय आस्था और अंध श्रद्घा को लेकर भी बातचीत हुई. इस चर्चा के अंत में लगभग सभी प्रतिभागी इस बात पर सहमत थे कि एकदम निर्दोष नजर आने वाली आस्था भी इस बात का जोखिम पैदा कर देती है कि जरूरत आने पर उसे अंधश्रद्घा में तब्दील करने की कोशिश की जाये. ठीक उसी तरह मुक्ति के धर्मशास्त्र (लिबरेशन थियोलोजी) के क्रांतिकारी इतिहास पर भी बात हुई.


चर्चा के उपसंहार के तौर पर विनीत तिवारी ने उरुग्वे के सुप्रसिद्घ लेखक एडुवार्डो गैलियानो के महत्त्वपूर्ण लेख ‘आखिर हम लिखते ही क्यों हैं?’ का पाठ किया. इस लेख में गैलियानो ने अपनी व्यक्तिगत रचना प्रक्रिया से जुड़े कुछ सवालों के जवाब दिए हैं जो कमोबेश हर लेखक से जुड़े होते हैं. मसलन वह लिखता क्यों है? लेखक की पक्षधरता के क्या मायने हैं, वह क्यों जरूरी है आदि. लेख पर हुई विस्तृत चर्चा ने युवा कवियों के मन की अनेक दुविधाओं को दूर किया और  नए सवालों और नई बेचैनियों को पैदा किया.


इस तरह शिविर का पहला सत्र  समाप्त हुआ.  तब तक नए कवियों को ये समझ नहीं आ रहा था कि इस शिविर में कविता लिखना सिखाया जाएगा या नहीं. दोपहर के खाने के बाद दूसरा सत्र शुरू हुआ. हल्की सर्दी का वक़्त था और दोपहर की गुनगुनी धूप बाहर आमंत्रित कर रही थी. सभी लोग इस सत्र के लिए धूप में निकल आये. ये सत्र प्रतिभागी युवा कवियों की कविताओं का था. शिविर में आठ पूरा वक़्ती नए प्रतिभागी थे: दीपाली चौरसिया, मानस भारद्वाज, प्रज्ञा शालिनी, अल्तमश जलाल, पूजा सिंह, संदीप कुमार, अभिदेव आजाद और श्रद्घा श्रीवास्तव. पहले दिन दीपाली, मानस, प्रज्ञा शालिनी और अल्तमश जलाल ने अपनी कवितायें पढ़ीं. प्रत्येक कवि के कविता पाठ के बाद शेष सभी प्रतिभागियों ने इन कविताओं पर अपने विचार रखे. वरिष्ठ कवियों कुमार अंबुज, विनीत तिवारी, अनिल करमेले, रवींद्र स्वप्रिल प्रजापति और आरती ने इन कविताओं की खूबियों और खामियों पर चर्चा की. इस दौरान कविताओं के बिंबों, कुछ कविताओं में बार-बार आ रहे नॉस्टैल्जिया यानी अतीत मोह समेत तमाम छुए-अनछुए पहलुओं पर व्यापक बातचीत हुई. कुमार अंबुज ने कहा कि नॉस्टैल्जिया को केवल छूकर गुजर जाना कोई मायने नहीं रखता. हम सभी की जड़ें कहीं न कहीं हैं और हम सभी अपने अतीत को याद करते हैं लेकिन एक कवि के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह उन यादों में क्या लेकर जाता है और वहां से पाठक के लिए क्या लेकर आता है. कविता में लयात्मकता और कविता की आतंरिक लय के बीच के अंतर को समझने की भी कोशिश हुई. यह सत्र निश्चित रूप से अत्यंत समृद्ध रहा और इसने कवियों को कविता को पढऩे, समझने और उसके विश्लेषण की दृष्टि विकसित करने का अवसर प्रदान किया. अनिल करमेले ने कहा कि किसी की कविताओं में नास्टैल्जिया बहुत प्रखरता से आया था लेकिन वो आगे नहीं निभ सका. किसी की कविता में विचार तो अच्छा था लेकिन वो कविता में ठीक से नहीं आ पाया. किसी की कविताओं में आत्मदया उसी तरह असमानुपाती थी जैसे कभी कभी कुछ कविताओं में अनावश्यक आत्म गौरव जाता है. अस्मिता की राजनीति  जीवन दर्शन और साहित्य को किस तरह प्रभावित करती है, ये बात भी हुई. इस बात पर ज़ोर दिया गया कि तारीफ़ एवं विश्लेषण का विवेक भी होना चाहिए अन्यइथा कवि के भीतर सुधार की संभावनाएँ विरल हो जातीं हैं.
युवा कवयित्री दीपाली ने माना कि उनके लिए कविता अब तक केवल अपने मनोभावों को प्रकट करने का जरिया भर थी. शिविर में आने के बाद उनको पता चला कि कविता का एक शिल्प होता है और वैज्ञानिकता से कविता का कितना गहरा नाता है. युवा कवि मानस भारद्वाज ने कहा कि कविता शिविर में हिस्सेदारी ने एक साथ कवि और श्रोता होने की जो सुविधा प्रदान की वह अन्यत्र नहीं मिल सकती. यह एक ऐसी स्थिति है जहां आप अपनी कविताओं की प्रत्यक्ष आलोचना सुनने की स्थिति में होते हैं. यह सुधार की इच्छा रखने वालों के लिए बहुत बेहतर बात है.

शाम की चाय के बाद फिर हॉल के भीतर इकठ्ठा होकर कविताएँ और उन पर बातचीत शुरू हो गई. कुछ साथियों ने अपनी पसंद के कवियों की कवितायेँ सुनाईं और उन कविताओं पर चर्चा भी हुई. रवींद्र स्वप्निल प्रजापति, अनिल करमेले और आरती ने अपनी कुछ कविताएँ सुनाईं जिन पर  नए कवियों सहित सभी प्रतिभागियों ने अपनी अपनी  समझ से टिप्पणी की.

लगभग रात दस बजे शिविर के पहले दिन का औपचारिक समापन हुआ और अनौपचारिक तौर पर फिर शिविर में कविताएँ और उन पर बातचीत, एक-दूसरे के साथ परिचय के दो-चार कदम रात 2-3 बजे तक बढ़ते रहे. शिविर में इंदौर के कलाकार  अशोक  दुबे के कविता पोस्टर्स की प्रदर्शनी भी लगाई गयी.
शिविर के दूसरे दिन के प्रथम सत्र की शुरुआत में विनीत तिवारी ने कविता शिविर के महत्त्व के बारे में बात की. उन्होंने कहा कि कविता और साहित्य दोनों प्रतिरोध के उपकरण हैं. कविता केवल कुछ कहने के लिए नहीं की जानी चाहिए बल्कि उसमें गलत का विरोध करने, उसे परास्त करने और सही सामाजिक व्यवस्था लागू करने की भावना भी होनी चाहिए. साहित्य और कला वैसे तो कभी स्वान्तः सुखाय नहीं कही जा सकती थी क्योंकि उसकी सदा ही एक सामाजिक भूमिका रही है लेकिन आज तो वो मनुष्यता के पक्ष में खड़े लोगों के प्रतिरोध का भी अस्त्र है इसलिए उसे सिर्फ भाषा या व्याकरण से ही नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में समझना और बरतना होगा. ये कविता को उपयोगितावाद के नज़रिये से देखना नहीं है बल्कि कविता को जीवन की गतिविधियों में रचाना बसाना है.

मौजूदा वर्ष हिंदी के महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी वर्ष भी है. वह हमारी भाषा के एक ऐसे कवि हैं जिनके जिक्र के बिना हिंदी भाषा की कविता का कोई भी सिलसिला अधूरा ही रह जायेगा. यही वजह है कि शिविर के दूसरे दिन का प्रथम सत्र मुक्तिबोध को समर्पित किया गया. उन्होंने मुक्तिबोध को याद करते हुए कहा कि सबकुछ राजनीति के भीतर होता है और हमें ये समझना चाहिए कि हमारी रचना किसके पक्ष में  रही है और उसे किस राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

मुक्तिबोध ने हर सामान्य मनुष्य और हर जागरूक मनुष्य से अपनी कविता में अपना राजनीतिक पक्ष साफ़ करने की बात की है. जैसे जैसे हम साहित्य की समाज में भूमिका को समझते जाते हैं, हमारी चुनौती और जि़म्मेदारी बढ़ती जाती है. तब साहित्य मात्र मनोरंजन नहीं रह जाता बल्कि वो बेहतरी के लिए संघर्ष का हिस्सा बन जाता है.

इस सत्र में विनीत तिवारी ने मुक्तिबोध के लेख “जनता का साहित्य किसे कहते हैं” का पाठ किया. इस  पाठ के पश्चात तमाम प्रतिभागियों ने लेख के कथ्य पर चर्चा की. इस पाठ का निष्कर्ष यही निकला कि जनता का साहित्य वह साहित्य है जो उसके जीवन की समस्याओं को संबोधित कर सकता है और उनका हल निकालने में हमारी मदद कर सकता है. मनुष्यता को बचाये रखने और मानवता को मुक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा इसी साहित्य से मिलती है. कुमार अंबुज ने कहा कि मुक्तिबोध ने जीवन विवेक को ही साहित्य विवेक कहा था और आज भी वह पैमाना बदला नहीं है बल्कि अपनी जगह पर मौजूद है.


शिविर के दूसरे दिन का दूसरा सत्र एक बार फिर युवा कवियों के कविता पाठ का था. पहले दिन के शेष प्रतिभागियों श्रद्घा श्रीवास्तव, अभिदेव आजाद और संदीप कुमार ने दूसरे दिन अपनी कवितायें सुनाईं. इन कविताओं में भी नॉस्टैल्जिया, आकांक्षाएं और कामनाएं बार-बार आईं. कुमार अंबुज, विनीत तिवारी, अनिल करमेले, आरती ने युवा कवियों की कविताओं पर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं. इसके अलावा शिविर में मौजूद अन्य साथियों दीपक, पूजा, मनु आदि ने भी इन कविताओं पर अपनी राय रखी. दूसरे दिन भी कविताओं पर टिप्पणी के बहाने कविता लेखन के अलग-अलग पहलुओं को छुआ गया. इस दौरान तुकांत और अतुकांत कविता, कविता में लयात्मकता, उसके बिंब विधान आदि पर विस्तार से चर्चा हुई. वरिष्ठों की राय में संदीप की कविता में एक परिपक्व विचार तो दिखा लेकिन वो जल्दबाज़ी का शिकार होकर जल्दी ख़त्म हो गया. अभिदेव आज़ाद की कविताएँ अपने आपको एक नए और अछूते शिल्प और भाषा में व्यक्त करती हैं लेकिन उनकी कविताएँ जीवन दृष्टि, जीवनानुभव और प्रगतिशील मूल्यबोध की मांग करती हैं. श्रद्धा की कविताएँ धीर – गंभीर हैं, उनमें विचार भी समृद्ध है लेकिन उन्हें नयी कविता की भाषा और मुहावरे को पकड़ने का प्रयास करना होगा.

 इस दौरान एक बात जिस पर आम सहमति बनी वह यह थी कि कुछ भी लिखने से पहले हमें मोटे तौर पर यह जानकारी अवश्य होनी चाहिए कि हमसे पहले के लोगों ने क्या-क्या लिखा है. इससे भी बढ़कर यह जानना जरूरी है कि कि हमसे पहले के लोगों ने क्या अच्छा और क्या चुनौतीपूर्ण लिखा है? सच यही है कि एक कवि अथवा साहित्यकार अपने कहने का तरीका, विषयवस्तु और जिस भाषा का वह इस्तेमाल करता है उसका चुनाव केवल अपने समय से ही नहीं करता बल्कि वह अपने पूववर्ती लेखकों को पढ़ते हुए भी उनसे लगातार सीखता रहता है.

चर्चा के दौरान वरिष्ठ साथियों ने युवा मित्रों को कुछ नाम भी सुझाए जिनको पढऩा उन्हें और अधिक परिष्कृत करेगा. जिन देशी-विदेशी रचनाकारों के नाम लिए गए वे हैं: रसूल हमजातोव, चांगीज आइत्मायतोव, मक्सिम गोर्की, हावर्ड फ्रास्ट, फ्योदोर दोस्तोयेवस्की, लेव तॉल्सतॉय, मिखाइल शोलोखोव, पाब्लो नेरुदा, बेर्टोल्ट ब्रेष्ट, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, शरतचंद्र, रेणु, हरिशंकर परसाई, प्रेमचंद, श्रीलाल शुक्ल, पाश आदि शामिल थे. जिन प्रमुख रचनाओं का नाम सामने आया वे हैं:  मेरा दागिस्तान, पहला अध्यापक, मेरा बचपन, मेरे विश्वविद्यालय, जीवन की राहों पर, आदि विद्रोही, मां, अपराध और दंड, समकालीन यूरोपीय कविता, अन्ना केरनिना, धीरे बहो दोन रे, रिल्के के खत, धरती धन न अपना, एक साहित्यिक की डायरी, आत्महत्या के विरुद्घ, राग दरबारी, चरित्रहीन, मैला आंचल, सदाचार का ताबीज, मुर्दाघर, कर्मभूमि आदि. ऐसा भी नहीं था कि शिविर केवल निर्धारित सत्रों में ही चला. औपचारिक सत्र तो कायदे के मुताबिक चले ही. उनके समापन के बाद भी प्रतिभागियों का उत्साह और जिज्ञासा कम नहीं हुए. ऐसे में चाय पीते हुए, खाना बनाते-खाते हुए और यहां तक कि भोजनोपरांत देर रात टहलते हुए भी युवा और वरिष्ठ कवियों का आपसी संवाद जारी रहा. लब्बोलुआब यह कि कहने को चार-पांच सत्रों वाला यह शिविर दरअसल 48 घंटों की एक संपूर्ण कार्यशाला में बदल गया था जिसका अंत आते-आते वरिष्ठ और युवा साथियों के बीच के संकोच और दूरी बरतते सम्मान की जगह आपसी स्नेह और करीबी ने ले ली. और जिस प्रेम और सम्बंधों की ऊष्मा के घर में ये हुआ, उस घर की दीवारें भी लंबे अरसे के लिए कविताओं में सराबोर हो गईं.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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