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स्त्री सिर्फ देह नहीं

रजनीश आनंद


कॉपी राइटर, प्रभात खबर, रांची, झारखंड
संपर्क : 9835933669, 8083119988

समाज में स्त्री के अस्तित्व से जुड़े सवाल मुझे बेचैन करते हैं. जब भी इन सवालों के जवाब तलाशने बैठती हूं, पुरुषवादी सोच के बाण इस कदर चलते हैं कि ‘डिफेंस’ करते-करते सारा ‘एग्रेशन’ चूक जाता है. जी करता है दहाड़ मार कर रो लूं ताकि सारी पीड़ा हृदय से द्रव की तरह बह जाये और मैं मुस्कुरा सकूं. लेकिन अब तो अपनी मुस्कान से भी खीज होती है, क्योंकि उसका सौंदर्यबोध मुझे पुरुषवादी सोच का पोषक जान पड़ता है. जी करता है नोच दूं अपने होंठों से वो मुस्कान जो महज किसी पुरुष को रिझाने-लुभाने के लिए मेरे होंठों पर थिरकते हैं.

मैं एक औरत हूं, इस दुनिया की दूसरी जाति. संभवत:  औरत की रचना सृष्टि में पहली जाति पुरुष के सहचरी के रूप में हुई थी. दोनों को एक दूसरे का पूरक बनाया गया था, किंतु ना जानें कब मैं सिर्फ और सिर्फ उसके लिए ‘इंटरटेनमेंट’ का साधन बन गयी. जब उसका जी चाहा, सीने से लगा लिया और जब चाहा कदमों तले रौंद दिया.

आधुनिक काल में जब मनुष्य सभ्य होने का दावा करता है और स्त्री अधिकारों को सुनिश्चित करने की पुरजोर वकालत होती है, स्त्री आज भी इंसान की पहचान से महरूम है. उसे पुरुषवादी सोच सिर्फ देह के रूप में स्थापित करता है. एक स्त्री जो अपनी पहचान इंसान के रूप में बनाना चाहती है, उसके लिए बहुत मुश्किल होता है देह की पहचान को दरकिनार करना.


समाज में जब कोई स्त्री अपनी प्रतिभा के बल पर पुरुषों के समकक्ष या उससे आगे की पंक्ति में खड़ी दिखती है, तो यह कह दिया जाता है कि प्रतिभा तो है किंतु उसे ‘स्त्री होने का लाभ’ मिला है. ‘प्वाइंट टू बी नोटेडेड’ स्त्री होने का लाभ. जी हां, यही सोच तमाम फसाद की जड़ है और एक स्त्री को उसके अधिकारों के लिए जूझने पर मजबूर करती है. इसी सोच ने स्त्री को समाज में सिर्फ ‘देह’ बनाकर रख दिया है. नारी चाहे जैसी भी हो अद्‌भुत प्रतिभा की धनी, सामान्य या फिर निरक्षर उसकी क्षमता और प्रतिभा का आकलन उसकी देह की सुंदरता से किया जाता है. स्त्री के अस्तित्व पर उसका देह इस कदर हावी है कि शेष तमाम बातें सिफर मालूम होती हैं.



इसकी बानगी देखिए-उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस ने अपने स्टार प्रचारकों में प्रियंका गांधी का नाम भी जारी किया है. यह जगजाहिर कि प्रियंका गांधी सोनिया गांधी और राजीव गांधी की बेटी हैं और राजनीति में बहुत सक्रिय नहीं हैं. हालांकि लोगों को उनमें इंदिरा गांधी का अक्स दिखता है और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की उनसे उम्मीद जुड़ी है. बावजूद इसके प्रियंका गांधी का अनुभव राजनीति में नाम मात्र का है और उन्हें एक कुशल राजनेता की संज्ञा नहीं दी जा सकती. लेकिन परिवारवाद की राजनीति में उनका जादू चलता है, यह बात भी हम सब अच्छे से जानते हैं. ऐसे में जब भाजपा सांसद विनय कटियार से यह पूछा गया कि क्या प्रियंका गांधी के  प्रचार करने से भाजपा को कोई नुकसान होगा? तो जवाब में विनय कटियार ने प्रियंका गांधी की क्षमता, प्रतिभा और अनुभव पर सवाल उठाने की बजाय, एक स्त्री के अस्तित्व पर चोट किया और उन्हें सिर्फ ‘देह’ करार दिया. कटियार का मानना है कि प्रियंका से सुंदर कई प्रचारक हैं. विनय कटियार का यह बयान स्त्री जाति का अपमान है. कटियार की इसी पुरुषवादी सोच का परिणाम है कि आज लोग मुलायम परिवार की दो बहुओं की तुलना उनकी राजनीतिक समझ से नहीं बल्कि दैहिक सुंदरता से करते हैं.



जबकि हिंदुस्तान एक ऐसा देश है, जहां राजनीति में महिला नेतृत्व किसी भी अन्य देश की तुलना में ज्यादा बेहतर ढंग से उभरा है. इंदिरा गांधी, मायावती, सोनिया गांधी, जयललिता और ममता बनर्जी जैसे नाम इसके उदाहरण हैं. इन महिला नेत्रियों ने पुरुषों के नेतृत्व क्षमता को चुनौती दी और खुद को साबित किया. बावजूद इसके इतिहास से लेकर आज तक वह अपनी पहचान के लिए जूझ रही है. स्त्री-पुरुष के बीच देह का आकर्षण प्राकृतिक है, लेकिन इसे किसी की पहचान बना देना सर्वथा अनुचित है.

जायसी और पद्माकर की नायिकाओं के व्यक्तित्व के सामाजिक पक्ष का तुलनात्मक अध्ययन:अंतिम क़िस्त

आरती रानी प्रजापति

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com



पदमावत में रानी नागमती नहीं चाहती कि हीरामन उसके राजभवन में रहकर राजा से पद्मावती की कोई भी बात करे. वह सुआ की हत्या का आदेश देती है. यहाँ नागमती का डर उसे पद से वंचित होने का डर भी है. पद्मावती आयेगी तो उसका पद नागमती से उँचा होगा इसलिए नागमती नहीं चाहती कि रत्नसेन को पद्मावती के बारे में पता लगे. वह हीरामन को मरवा देती है. राजा को जब ये पता लगता है तो वह उसे कहता है कि तुम उसे किसी भी प्रकार लेकर आओ या तुम भी चली जाओ. यहाँ नागमती के माध्यम से बहुपत्नी प्रथा में पटरानी तक की अवस्था को समझा जा सकता है. वह है तो रानी के पद पर किंतु उसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं है वह मात्र पितृसत्ता की कठपुतली है. नित्यानंद तिवारी लिखते हैं


‘अध्यात्म में तो वह बड़ी बाधा है ही, काम के क्षेत्र में भी वह केवल उपभोग की वस्तु है. उसकी अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता और अस्मिता नहीं है. कवि ने उस आध्यात्मिक और कामुकता के अतिरेक से भरे समाज में नागमती की ‘प्लेसिंग’ इस तरह से की है कि नारी की सामाजिक हैसियत अत्यंत त्रासद रुप में उभरती है’.
वह रानी है पर उसका जीवन एक पुरुष के अधीन है. वह पुरुष ही जिसके कारण वह रानी के पद पर है पर उसी के कारण उसे सुआ जैसे प्राणी जिसे राजभवन में आये ज्यादा समय नहीं हुआ था कि मौत पर अपनी राजभवन में सही स्थिति का पता लगता है. नागमती को राजा ये ही दर्शाता है कि उसे वह बेहद प्रेम करता है पर उसकी जरा सी गलती उसे बर्दाश्त नहीं. पदमावत की ये घटना हमारे भारतीय समाज की बहुत बड़ी सच्चाई है. जहाँ औरत को महान पद में भी पुरुष के अधीन रखा गया है. नागमती कहती है
एतनिक दोस बिरचि पिउ रूठा. जो पिउ आपन कहै सो झूठा..3॥
ऐसें गरब न भूलै कोई. जेहि डर बहुत पियारी सोई॥4॥21
अपने रुप और पति पर प्रेम का गर्व करने वाली नागमती को सुआ मरवाते ही अपनी वास्तविक स्थिति का पता लगता है. वह रानी है पर क्या वह अधिकारों में भी रानी बन पाती है? नित्यानंद तिवारी लिखते हैं

‘नागमती पटरानी है और पुराने इतिहास ग्रन्थों के अनुसार उसे विशेष प्रशासनिक और राजकीय अधिकार प्राप्त हैं. लेकिन उसकी विशेष राजकीय स्थिति के बावजूद, नारी होने के कारण, उसकी सामाजिक हैसियत नगण्य है’22.रत्नसेन ने पहले भी ऐसा किया होगा तभी तभी रानी को ऐसी चिंता सताती है. राजा रत्नसेन राज्य में ध्यान नहीं देता बस उसका ध्यान इस बात में रहता है कि कहाँ सुन्दर स्त्री है. अगर रत्नसेन अपने राज्य पर ठीक से ध्यान देता तो कभी नागमती को सती होने की आवश्यकता न होती. नागमती सभी रानियों में सुंदर और रत्नसेन की पटरानी है फिर भी उसे ये भय सताता है कि रत्नसेन उसे छोड देगा तो अन्य रानियों की क्या दशा होती होगी? वह कितनी चिंतित रहती होगी? रत्नसेन पद्मावती के रुप पर इतना मोहित हुआ कि अपने राज्य को छोडकर उसे पाने के लिए निकल पड़ा. किसी भी आलोचक को यह बात नहीं खटकती. रत्नसेन की क्या कोई जिम्मेदारी अपने राज्य के प्रति नहीं थी? क्या वह प्रेम को पाने के लिए जाता है एक स्त्री के लिए जाता है पर उसका जाना महिमा मंडित कर दिया गया है. एक स्त्री को पाने के लिए दूसरी को छोडकर जाना यहाँ उचित बन जाता है. पद्मावती में स्त्री की झलक दिखा कर जायसी ने रत्नसेन को सभी प्रकार की खुली छूट दे दी. उसका दूसरी स्त्री के पास जाना इतना मंडित हुआ है कि सभी उसमें खो जाते है. लक्ष्य था स्त्री को पाना पर उसे ईश्वर को पाने में बदल दिया गया.
तुम्ह तिरिआ मति हीन तुम्हारी. मूरुख सो जो मतै घर नारी.
राघौ जौं सीता सँग लाई. रावन हरी कवन सिधि पाई.
यहु संसार सपन कर लेखा. बिछुरि गए जानहु नहिं देखा.
राजा भरभरि सुनि रे अयानी. जेहि के घर सोरह सै रानी.
कुचन्ह लिहें तरवा सहराई. भा जोगी कोइ साथ न लाई.
जोगिहि काह भोग सों काजू. चहै न मेहरी चहै न राजू.
जूड़ कुरकुटा पै भखु चाहा. जोगिहि तात भात दहुँ काहा.
कहा न मानै राजा तजी सबाई भीर.
चला छाड़ि सब रोवत फिरि कै देइ न घीर.23
राजा स्त्री को पाने के लिए जा रहा है और कहता है कि योगी को राज्य और स्त्री से कोई मतलब नहीं होता. मतलब दूसरी स्त्री के पास सबकुछ छोडकर योगी हो कर जाना एक महान कार्य है. जायसी के समयके साहित्यकारों ने नारी के लिए अलग-अलग स्थितियों का उल्लेख किया है. वे पतिव्रता की अहमियत को बताते हैं पर स्त्री के भावों की कद्र वे नहीं जानते. वे स्त्री को त्यागने की बात करते हैं और खुद स्त्री होकर ईश्वर को समर्पित होना चाहते हैं. यहाँ जायसी ने पद्मावती में ईश्वर की झलक दिखा दी इसलिए रत्नसेन उसे पाने के लिए दौड पडता है. किंतु पद्मावती चितौड आते ही अपने साधारण रुप में आ जाती है. वह नागमती से लडती है.
समाज पुरुष को बहुपत्नी की आज़ादी अनायास ही दे देता है. हमारे समाज में ऐसे कई लोग हैं जो अपने किसी और स्त्री से संबंध रखने को अनुचित नहीं मानते. साहित्य में भी इस बात का अधिकांश चित्रण मिल जाता है. ये सम्बंध विवाहेत्तर भी हो सकते हैं. मध्यकालीन समाज में बहुपत्नी रखने का चलन था. जायसी कृत पदमावत में रत्नसेन की कई पत्नियाँ थी. वह पद्मावती के रुप सौंदर्य को सुनकर ही उसे पाने के लिए दौड़ पडता है. वह एक पल भी नहीं सोचता कि उसकी और पत्नियाँ हैं. उनकी क्या दशा होगी? इस व्यवहार से क्या उनकी मन:स्थिति को कोई ठेस पहुँचेगी? जब रत्नसेन को पद्मावती को पाने की धुन लगती है तो वह सब कुछ भूल जाता है. पद्मावती को पाने के लिए रत्नसेन घर छोड़ देता है. नागमती व अन्य रानियाँ विलाप करती रह जाती हैं.
रोवै नागमती रनिवासू. केइँ तुम्ह कंत दीन्ह बन बासू.24

राजा की अनेक रानियाँ हो सकती है इसे समाज स्वीकार करता है. राम के पिता दशरथ की तीन रानियाँ थी ये बात भी सभी जानते हैं और कोई कुछ नहीं कहता. पुरुष की अनेक पत्नियाँ हो सकती हैं पर जब भी किसी औरत ने अनेक पुरुषों से संबंध बनाए हैं उसे हीन नज़रों से ही देखा गया है. पति चाहे जैसा हो पर हमारा समाज औरत को हमेशा उसकी गुलामी सीखाता है. स्त्री किसी अन्य से संबंध बना ले तो उसे परकीया कह देते हैं और यदि वह स्त्री कई पुरुषों से संबंध रखना चाहती है तो उसे कुल्टा कह दिया जाता है. स्त्री को सामाजिक, शारीरिक संदर्भों में स्वतंत्रता देने वाले पद्माकर भी उसके अनेक पुरुषों से संबंध बनाने पर कह उठते हैं:
पुरुष अनेकन सों जु तिय राखति रति की चाह.
कुलटा ताहि बखानहीं जे कबीन के नाह॥25

ये पद्माकर अपने मन से भले ही कह रहे हो, इसमें उनका रचनाकार भले ही शामिल हो किंतु समाज में स्त्री के लिए ऐसे ही मानदंड बने हुए हैं. समाज स्त्री को प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं देता. जायसी के समयसे आज आधुनिक काल तक जो भी स्त्री कई पुरुषों से संबंध बनाती है उसे कुलटा, कुलनासिन जैसे शब्दों से नवाज़ा जाता है. स्त्री के मन को कोई महत्व नहीं दिया जाता. सूरदास स्त्री को प्रेम करने की आज़ादी तो देते हैं पर वह प्रेम भी कृष्ण से कर रही हैं. पति और कृष्ण इसके अलावा उनके कोई और प्रेम सम्बंध नहीं दिखाये गये. स्त्री के मन को किस तरह कुचला जाता है. इस बात को हम यहाँ देख सकते हैं. उसके मन को ही बचपन से ऐसा बनाया जाता है कि वह एक ही पुरुष की हो कर रहे और यदि वह एक से अधिक पुरुषों से संबंध बनाती है तो उसे कुलटा कहा जाता है. क्या समाज या साहित्य में कभी कुल्टा शब्द पुरुष के लिए भी प्रयुक्त हुआ है? इन दोनों रचनाओं के माध्यम से हम मध्यकालीन और आधुनिक समाज को भी मूल्यांकित कर सकते हैं.

पहली क़िस्त  :जायसी और पद्माकर की नायिकाओं के व्यक्तित्व के सामाजिक पक्ष का तुलनात्मक अध्ययन

समाज में पुरुष को इतनी स्वतंत्रता मिली हुई है कि वह एक पत्नी के होते हुए दूसरी के पास जाना अपना हक समझता है| यदि किसी स्त्री के अनेक पति हो तब भी वह रूप से आकर्षित होकर अन्य पुरुष के पास उससे विवाह के लिए चली जाए तो ऐसा ग्रंथ महान बन जायेगा? नहीं ऐसे साहित्य को पापाचार की कथा कहकर या तो जलाया जायेगा या प्रतिबंधित कर दिया जायेगा. वैसे हमारी मानसिकता ये सोच भी नहीं सकती कि किसी स्त्री के अनेक पति हो सकते हैं. ये अधिकार पुरुषों को ही प्राप्त हैं. पदमावत में तो राजा रत्नसेन को कवि साफ छूट देते दिखते है| कवि का उद्देश्य राजा को दूसरी स्त्री के पास भेजकर ही पूरा होना था इसलिए उन्होंने इस स्त्री में ईश्वर की झलक देखने का प्रयास किया| साहित्य समाज को राह दिखाने का काम भी करता है| क्या जायसी ने ये सोचा होगा की जिस तरह वे इस ग्रन्थ की रचना कर रहे हैं उसका समाज पर क्या असर पडेगा? समाज में प्रत्येक पुरुष स्त्री में ईश्वर की झलक देखकर विवाह करता रहेगा बिना ये सोचे की स्त्री की क्या मन:स्थिति होती है| समासोक्ति का माध्यम अपनाने वाले जायसी ने नागमती के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री उसका वियोग वर्णन लिख कर पा ली| मध्यकाल में राजाओं की अनेक रानियाँ होती थी| साहित्य के माध्यम से हम उन स्त्रियों की दशा को भली-भांति समझ सकते हैं| एक स्त्री जो अपना सब कुछ छोड़कर पुरुष के परिवार को अपनाती है यदि पुरुष दूसरी स्त्री को उसका स्थान दे उसे प्रेम करे तो स्त्री की क्या दशा हो सकती है? वह अपने को ठगा हुआ महसूस करती है| राजा रत्नसेन जब रानी पद्मावती को साथ लेकर वापस चितौड़ आता है रानी नागमती अपना रोष इस प्रकार प्रकट करती है|
नागमती मुख फेरि बईठी| सौंह न करै पुरुख सौं डीठी||
ग्रीखम जरत छाडि जो जाई| पावस आव कवन मुख लाई||
जबहिं जरे परबत बन लागे| औ तेहि झार पंखि उडि भागे||
अब साखा देखिअ औ छाहाँ| कवने रहस पसारियअ बाहाँ||
कोउ नाहिं थिरकि बैठ तेहि डारा| कोउ नहि करै केलि कुरुआरा||
तूँ जोगी होइगा बैरागी| हौं जरि मई छार तोहि लागी||
काह हंससि तूँ मोसौं किए जो और सौं नेहु||
तोहि मुख चमके बीजुरी मोहि मुख बरसे मेहु||26

जगद्विनोद में एक नायिका का पति रात भर दूसरी स्त्री के पास रहकर आता है. स्त्री ने जब अपने पति के आलस्य से भरे नेत्र देखे उसने कुछ नहीं किया. न पति को अति आदर देने का कार्य वह करती है न उसपर रोष प्रकट करती है बस कुछ नहीं कहती जैसी है वैसी ही बनी रहती है. यहाँ नायिका के व्यक्तित्व में उसका समाज देखा जा सकता है. वह जानती है कि पति रात भर किसी अन्य स्त्री से साथ प्रेम में था तब भी वह कुछ नहीं कहती. ऐसी ही रहती है जैसे उसे कुछ फर्क नहीं पड रहा है.
रसिकराज आलस भरे खरे दृगन की ओर.
कछु न कोप आदर न कछु भावती भोर॥27
ऐसा नहीं हो सकता है कि उसके मन को दु:ख न हुआ है पर वह दु:ख वह चाह के भी व्यक्त नहीं कर सकती. समाज इस चीज की स्वतन्त्रता स्त्री को नहीं देता. स्त्री को इतना ही अधिकार मिला हुआ है कि बाहर गये पति का पूरी रात इंतज़ार करे या नागमती की तरह साल भर से ज्यादा विरह में बिता दे. एक ही समाज में स्त्री-पुरुष दोनों रह रहे हैं पर पुरुष को ऐसे कई अधिकार मिले हुए हैं जिनसे स्त्री के मन को पीड़ा मिलती है.

पदमावत में पुरुष का दूसरी स्त्री के पास जाना महिमा-मंडित कर दिया गया है| समाज की यही स्थिति है पर समाज स्त्री को ऐसी स्वतंत्रता नहीं देता कि वह दूसरे पुरुष से सम्बन्ध बनाए| विवाहिता के लिए परपुरुष से सम्बन्ध बनाना तो पूर्ण रूप से वर्जित ही होता है| किन्तु पद्माकर उढा नायिका के माध्यम से समाज की उन स्त्रियों का चित्रण कर देते हैं जो अपने विवाहेत्तर सम्बन्ध बना रही थी| वह ससुराल में बहुत कठिनाईयों के बाद प्रियतम से मिल पाने का मौका निकाल पाती है| ये प्रियतम रीतिकाल में कृष्ण ही थे किंतु थे तो सही. कृष्ण के माध्यम से इन कवियों ने बड़ी सहजता से स्त्रियों के सामाजिक बंधनों को दिखा दिया है. स्त्री का प्रेम भले ही किसी आमपुरुष से हो पर वह उसके लिए उसी उत्कंठा से सबकुछ छोडकर चली आती है जैसे कृष्ण के प्रेम में गोपियाँ.
गोकुल के कुल के गली के गोप गाउन के जौ लगि कछू को कछू भारत भनै नहीं.
कहै पदमाकर परोस पिछवारन के द्वारन के दौरि गुन औगुन गनैं नहीं.
तौं लौं चली चातुर सहेली याहि कोऊ कहूँ नीके कै निचोरै ताहि करत मनै नहीं.
हौं तौ स्यामरंग में चुराइ चित्त चोराबोर बोरत तौ बोरयौ पै निचोरत बनै नहीं.28


यहाँ हम यह नहीं कह सकते कि पद्माकर की स्त्री का प्रेम रत्नसेन से कमत्तर है. वह अपने प्रेम के बारे में कहती है कि उसका रंग अब उतरेगा नहीं क्योंकि वह प्रियतम के रंग में बार-बार रंगी है| जिससे उसके प्रेम का रंग गहरा और गहरा होता जाता है| क्योंकि ये समाज की पितृसत्ता के ढांचे को तोड़ने वाली स्त्री है इसलिए हम इसे गलत कह सकते हैं| यहाँ पद्माकर की नायिका समाज में स्त्री की प्रचलित छवि को बदलती है. स्त्री का भी मन होता है कि वह अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष से सम्बंध बनाये वह इस काम को कर नहीं पाती क्योंकि समाज नहीं चाहता| पद्माकर की नायिका समाज से विद्रोह करती है| सबके सामने वह प्रेम को स्वीकार भी करती है.

रत्नसेन कभी पद्मावती के पास जाता है कभी नागमती| उसके अन्दर का पुरुष उसे कभी एक स्त्री से संतुष्ट नहीं रहने देता| रत्नसेन को पद्मावती अच्छी लगती है वह उसके पास चला जाता है, उसे नागमती की याद आती है तो वह चितौड़ वापस आ जाता है| जिस नागमती को रतनसेन अपशब्द ‘तुम्ह तिरिआ मति हीन तुम्हारी’ कहकर गया था अचानक उसे वह इतनी प्रिय हो जाती है कि वह चितौड़ की पहली रात उसके साथ बिताता है| कवि ने समासोक्ति के चक्कर में मानवीयता का हनन कर दिया है| मूल भारतीय कथा में कोई नागमती नहीं है| रत्नसेन को यदि आविवाहित अवस्था में पद्मावती मिलती तो किसी का किसी से दुराग्रह न होता| क्योंकि नागमती और पद्मावती सौत है इसलिए नायक एक के पास जाता है तो दूसरी जल उठती है|
कही दुख कथा रैनि बिहानी| भोर भएउ जहँ पदुमिनि रानी||
भान देख ससि बदन मलीनी| कँवल नैन राते तन खीनी||
रैनि नखत गनि कीन्ह बिहानू| बिमल भई जस देखे भानू||
सुरुज हँसा ससि रोई डफारा| टूटी आंसू नखतंह के मारा||
रहै न राखे होइ निसांसी| तंहवहि जाहि निसि बासी||
हौं के नेहु आनि कुँव मेली| सींचै लाग झुरानी बेली||
भए वै नैन रहंट की घरी| भरीं ते ढारी छूंछी भरीं||29


जायसी की नायिका पति के दूसरी औरत के पास जाने पर चुपचाप आंसू बहाती है. वह उसे कुछ कह नहीं सकती. मामूली सा विरोध कर देने पर वह पति को पुन: अपनाती है. क्या कोई सहजता से ऐसे संबंधों को अपना सकता है? जायसी की नायिका पति को परमेश्वर मानने वाली स्त्री है. पति से रोष प्रकट करने की छूट पितृसत्ता उन्हें नहीं देती इसलिए नागमती वर्ष भर रोती हुई रत्नसेन की प्रतीक्षा करती है. जब रत्नसेन उसे अपमानित करके त्याग देता है तो भी ऐसे व्यक्ति के साथ बंधे रहने का क्या अर्थ है? जायसी अपने उद्देश्य को तो पूरा होने (रत्नसेन का पद्मावती से मिलना) देते हैं पर नागमती के आत्मसम्मान की रक्षा वह नहीं करते.

पद्माकर की नायिका नागमती से थोडी अलग स्थिति की है. वह पति को अपना सब-कुछ मानती है पर पति की गलतियों को स्वीकार करना उसके व्यक्तित्व का पक्ष नहीं. वह पति को सुनाती है, उसे अपना प्रत्यक्ष रोष दिखाती है. यहाँ ये नायिका आधुनिक स्त्री की तरह बर्ताव करती है. पद्माकर की नायिका पति पर व्यग्यं करती है.
भूले से भ्रमे से काहि सोचत स्रमे से अकुलाने से बिकाने से ठगे से ठीक ठाए हौ.
कहै पद्माकरसु गोरे रंग बोरे दृग थोरे थोरे अजब कुसुंभी करि लाए हौ.
आगे कौं धरत पर पीछे कौं परत पग भोर ही तें आज कछु औरै छबि छाए हौ.
कहाँ आए तेरे धाम कौन काम घर जानि तहाँ जावो कहाँ जहाँ मन धरि आए हौ.30
भारतीय समाज पर पितृसत्ता बहुत गहरे तक हावी है. रत्नसेन नागमती के पास आता है. वह उससे बात नहीं करती रत्नसेन ने इसे अपनी अवज्ञा समझी. यहाँ रानी नागमती के व्यक्तित्व का वह पक्ष उजागर होता है जिसमें उसकी इच्छा, अस्वीकार का कोई मूल्य नहीं:
 नागमती तूँ पहिलि बियाही. कान्ह पिरीति डही जसि राही.
बहुते दिनन्ह आवै जौं पीऊ. धनि न मिलै धनि पाहन जीऊ.31

समाज की पितृसत्ता और पुरुष की मानसिकता जो स्त्री को अपनी वस्तु के रूप में देखती है, पर महादेवी वर्मा लिखती हैं-“भारतीय पुरुष जैसे अपने मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे पक्षी पाल लेता है; उपयोग के लिए गाय-घोड़े पाल लेता है, उसी प्रकार वह एक स्त्री को भी पालता है तथा अपने पालिक पशु-पक्षियों के समान ही उसके शरीर और मन पर अपना अधिकार समझता है.”32रत्नसेन का वापस आना और नागमती को संयोग न करने पर बुरा-भला कहना उसपर अपना अधिकार जमाना ही था. स्त्री मात्र वस्तु समझी जाती है इसलिए उसपर अपना हक हर कोई जमा लेता है. आलोचकों को नागमती का विरह-वर्णन हिंदी का सर्वश्रेष्ठ विरह वर्णन लगता है. आलोचक स्त्री के हक, अधिकार की बात नहीं करते. ये ही आलोचक रीतिकाल में खंडिता नायिका के वर्णन को ठीक मानते हैं. पुरुष की गलती इन्हें दिखाई नहीं देती. मानों ये आलोचक भी स्त्री के विरह के पक्ष में हो. आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं:‘जायसी के भावुक हद्य ने स्वकीया के पुनीत प्रेम के सौंदर्य को पहचाना नागमती का वियोग हिंदी साहित्य में विप्रलम्भ शृंगार का अत्यंत उत्कृष्ट निरूपण है.’33

रत्नसेन ने जब चाहा नागमती को त्याग दिया फिर मन किया तो अपनाने चला आया. पद्मावती से शादी के बाद क्या नागमती बुद्धमति हो गई थी जो रत्नसेन उसके पास चला आता है. यदि उसे इतना ही प्रेम नागमती से था तो वह गया ही क्यों? क्या विवाह इसे ही कहते है. पति चाहे कुछ भी कर ले यदि वह पत्नी के पास आता है तो पत्नी को उससे मिलना ही चाहिए. नागमती का यह व्यक्तित्व उसी राज-दरबारी परम्परा की देन है जिसमें वह और पद्मावती पैदा हुई. वह चाह कर भी अपने पति की अवज्ञा नहीं कर सकती. पर क्या समाज की औरत ऐसी ही होती है? जायसी की नायिकायें अपना दु:ख प्रकट नहीं करती उनके मन का रोष व्यक्त नहीं हो पाता पर पद्माकर की नायिका अपने पति को दूसरी के पास जाने पर आपार दु:ख का अनुभव करती है और उसे दूसरों से कहती भी है. एक स्त्री अपना सबकुछ छोड़कर पति के पास आती है पर यदि उसे वहाँ भी छल मिले तो वह बहुत दु:ख होती है. पद्माकर के समाज में भी भले ही पुरुष परस्त्री गमन कर रहा था पर उनकी नायिका बोलना सीख गयी थी पद्माकर की नायिका पति के दूसरी औरत के पास आने पर तीव्र विरोध कर कहती है:
   खान  पान  सज्जासयन  जासु  भरोसे आइ.
  करै सु छलि अलि आप सौं ताको कहा बसाइ..34
जायसी की नायिका पद्मावती यौवन में अपने अलग स्थान यानि धवलगृह में रहती है. पद्मावती का यहाँ रहना उसके व्यक्तित्व के आर्थिक पक्ष का एक रुप है. राजकुमारियों को व्यस्क होने पर ऐसी जगह रखा जाता है जो सबसे उंची होती थी. उसके साथ ऐसी सहेलियाँ रखी जाती है जो अभी तक कौमार्य धारण किये हुए हैं. पति का जिनसे संग नहीं हुआ है.
      बारह बरिस मौह भइरानी. राजैं सुना संजोग सयानी.
      सात खंड धौराहर तासू. पदुमिनी कहै सो दीन्ह नेवासू.
     औ दीन्ही संग सखी सहेली. जो संग करहिं रहस रस केली.
     सबै नवल पिय संग न सोई. कॅवल पास जनु बिगसहिं कोई॥35



यहाँ कुमारी कन्याओं को पद्मावती के संग रखना समाज की यौन शुचिता की धारणा है. पद्मावती के संग यदि ऐसी सखियों को रखा जाता जो विवाहित है तो वह अपनी सखी पद्मावती को यौन-सम्बंधों के बारे में बताती तब वह भी प्रेम करने की इच्छा व्यक्त करती जिसकी मध्यकाल इजाजत नहीं देता. पद्मावती के पास उसके उम्र की व अविवाहित स्त्रियों रखने के कारण वह पति से मिलने को इतनी व्याकुल नहीं है. इसलिए पद्मावती खेल क्रियाओं में लगी रहती है. पद्मावती का अपने यौवन काल में किसी पुरुष को साथ सम्पर्क नहीं दिखाया गया है. इसका असर उसके व्यक्तित्व पर गहरा पडता है. वह अपने जीवन में आने वाले प्रथम पुरुष रत्नसेन से ही प्रेम कर बैठती है.


पद्माकर की नायिका का समाज ऐसा नहीं है वह पुरुष से प्रेम करना चाहती है. समाज में उसे भी कई बंधनों को झेलने पड रहे थे पर फिर भी वह पद्मावती से कहीं ज्यादा स्वतन्त्र है. पद्माकर की नायिका अविवाहित होने पर भी विवाहित पुरुष से प्रेम करती है वह भले ही अज्ञातयौवना बन कर भी चित्रित हुई है पर यदि उसे प्रेम का बोध हो जाता है तो समाज के सारे बंधनों को वह तोड‌ती है. जहाँ एक ओर पद्मावती जीवन में आये प्रथम पुरुष से प्रेम करती है वहीं पद्माकर की नायिका ने जरुर चुनाव करके, भली-भांति सोच कर ही विवाहित पुरुष का संग किया होगा.
अनब्याही तिय होति जहँ सरस पुरुष रस लीन.
ताहि  अनूढ़ा कहत  हैं  कबि  पंडित परबीन॥36


राजकुमारी पद्मावती राजा के बंधनों में जकड़ी है उसका सबसे प्रिय मित्र (तोता) भी राजा मारना चाहता है. रानी जिसके पास मन बहलाने के लिए तोता या सखियाँ थी. वह अपने मन की बात किसी से नहीं कह सकती थी. तोता हीरामन पद्मावती के हृदय की बात सुनता और समझता है. राजा पद्मावती के इस मित्र को भी छीन लेना चाहता है क्योंकि वह सुआ पद्मावती के मन को समझकर उसके अनुकुल वर ढूढने की बात कह रहा था. पद्मावती राजकुमारी है उसके पास सब सुख-सुविधायें हैं पर वह अपने मन की बात किसी से नहीं कर सकती थी. पद्मावती को कवि ने भले ही ईश्वर की झलक बनाने की कोशिश की है पर उसके मन को समझा नहीं है. वह अपने दिल की बात सुआ हीरामन से करती है और राजा उसे ही मारना चाहता है. ये कैसा समाज है जिसमें स्त्री को कहीं भी अपनी बात कहने का हक नहीं है. नागमती और पद्मावती अपने प्रतीकात्मक रुप में अलग-अलग स्थान रखती है (आलोचकों के अनुसार) पर जहाँ वे स्त्री है वहाँ उनकी स्थिति एक सी है. एक बंधक जैसी स्थिति जहाँ उन्हें कोई स्वतंत्रता नहीं है.


जायसी की नायिका पति के दूर जाने पर विरह में व्याकुल हो रही है. पति दूसरी स्त्री के पास गया है तब भी वह उसी पति की चाहना करती है और चाहती है कि वह वापस आ जाये. पुरुष समाज ने स्त्री को मानसिक रुप से इस कदर जकड लिया है कि वह इससे निकलने की सोच भी नहीं पाती. पति दूसरी स्त्री के पास गया है तब भी नागमती उसके लिए मरे जाती है मानो उसका व्यक्तित्व ही रत्नसेन से हो. यहाँ नागमती की सामाजिक स्थिति को बखूबी समझा जा सकता है. वह विद्रोह नहीं करती घर से भागती नहीं है. बस रत्नसेन के लौट आने का इंतज़ार करती रहती है. जिसमें उसे ये भी नहीं पता कि वो कब आयेगा? आयेगा भी या नहीं?
नागमती चितउर पँथ हेरा. पिउ जो गए फिरि कीन्ह न फेरा.37



किंतु पद्माकर की नायिका ऐसी नहीं है उसका पति अगर दूसरी स्त्री के पास जाता है तो वह उसे अपना क्रोध प्रकट करती है. पद्माकर की स्त्री भी वियोगी होती है पर इस अवस्था में वह तब नहीं पहुँच रही जब पति किसी दूसरी स्त्री के पास गया है बल्कि वह पति के देस से बाहर जाने पर दु:ख होती है. यहाँ इन दोनों नायिकाओं के व्यक्तित्व का अंतर साफ हो जाता है. दोनों ही स्त्रियाँ विवाहित हैं. एक वो है जो जानती है कि पति किसी दूसरी के पास गया है उस स्त्री को यह तक नहीं पता कि उसका पति वापस आयेगा भी या नहीं. रत्नसेन के जाने और लौट के आने तक कोई सूचना चितौड़ में नहीं थी कि वह कब आयेगा. तब भी नागमती वियोग में जलती रहती है. ऊर्मिला के वियोग की समयावधि पहले से तय थी इसलिए वह रात-दिन गिनती है पर नागमती को तो भी अंदेशा नहीं था कि रत्नसेन कब आयेगा? फिर भी वह बेचारी इंतजार करती रहती है. इसलिए नागमती सिर्फ इसी संदर्भ में आलोचकों को अच्छी लगती है. यहां हमें हिंदी आलोचना को भी समझना चाहिए. साहित्य में अब विद्रोही स्त्री की कद्र होने लगी है, अब तक हर ऐसी स्त्री को नीची नज़र से देखा जाता था. इसलिए नागमती की उस समय आलोचना होती है जब वह रत्नसेन को जाने से रोकती है और विरह में प्रशंसा. पद्माकर की नायिका ऐसी नहीं है. उसका समाजीकरण ऐसा नहीं हुआ है. किंतु ऐसा नहीं है कि वह अपने पति को कम प्रेम करती है पर वह पति के अत्याचार को नहीं सहती.
अनत रमें पति की सु अति गहि गहि गहकि गुनाह.
 दृग सरोज  मुख मोरि तिय  छुवन देति नहि  छाँह॥38

समाज आज भी स्त्री-पुरुष के प्रेम सम्बन्ध को स्वीकार नहीं करता| प्रेम चोरी-चोरी किया जाये तब तो चल जाता है किन्तु प्रेम का पता किसी को चल गया तो समाज उस स्त्री को जीने नहीं देता| समाज में पुरुष का प्रेम करना सबको उचित लगता है पर स्त्री के प्रेम का पता लगने पर उसे विभिन्न यातनाओं से गुजरना पडता है. पदमावत में पद्मावती अपने प्रेम में व्याकुल होने की चर्चा सिर्फ तोते  और धाय करती है. प्रेम को गुप्त रखना ही उसे जीवित रखना होता है. समाज को ताक पर रख कर स्त्री प्रेम कर लेती है पर उसे हर वक्त डर रहता है कि कही उसके प्रेम का पता न चल जाए| पद्मावती को ये डर नहीं सताता. किंतु पद्माकर की नायिका प्रतिपल इस बात से डरती है कि कहीं उसके प्रेम का बोध किसी को न हो जाये. उसका ये डर तत्कालीन समाज में प्रेम करने वाली स्त्री की स्थिति को बताता है. ये नायिका उस समाज से परिचालित है जहाँ वह चोरी-छुपे प्रेम तो कर लेती हैं पर भीतर- ही-भीतर भयाकुल रहती हैं. जगद्विनोद की नायिका नायक से कहती है:
 मैं तरुनी तुम तरुन तन चुगुल चवाई गाउँ.
मुरली लै  न बजाइयौ  कबहूँ  हमारो नाउँ||39


जायसी का समाज औरत को जीने की स्वतंत्रता तो देता ही नहीं है पर उसे मरने पर मजबूर जरुर कर देता है. पदमावत में नागमती और पद्मावती रत्नसेन के मरने पर आत्महत्या कर लेती हैं ताकि वह मुस्लिम शासक के हाथों न आ पाये. समाज में स्त्री को इस सांचें में ढालना सीखा दिया जाता है कि वह कैसे अपने शील की रक्षा करे उसे लड़ना नहीं सीखाया जाता बस ये समझा दिया जाता है कि यदि कभी उसके शील पर आ बने तो उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए. तत्कालीन समाज में एक कुप्रथा भी प्रचलित थी जिसे सती प्रथा का नाम दिया जाता है. यानि पति मर गया तो स्त्री को भी उसके साथ मर जाना चाहिए. समाज हर समय स्त्री को यह बताना चाहता है कि पति के बिना तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं है. पति के साथ मरने की इस प्रथा को महिमा‌-मंडित भी किया गया ताकि स्त्रियाँ स्वयं इस कार्य को करें. पदमावत में सती प्रसंग पर रामचंद्र शुक्ल कहते हैं:‘राजा रत्नसेन के मरने पर रोना-धोना नहीं सुनाई देता. नागमती और पद्मावती दोनों शृंगार करके प्रिय से उस लोक में मिलने के लिए तैयार होती हैं. यह दृश्य हिंदू स्त्री के जीवन दीपक की अत्यंत उज्ज्वल और दिव्य प्रभा है जो निर्वाण के पूर्व दिखाई पड़ती है.’40


रामचंद्र शुक्ल जैसे आलोचक स्त्री की इस आत्महत्या में गौरव देख रहे हैं. शुक्ल जी किसी मध्ययुग के आलोचक नहीं हैं. वे उस समय के हैं जब सती प्रथा का विरोध होने लगा था. तब भी वे पदमावती और नागमती की सती घटना को गौरव मानते हैं. स्त्री का गौरव उसके मर जाने में है क्योंकि वो जिंदा रहेगी तो दूसरे की बन सकती है. इससे उसका पतिव्रता धर्म खंडित होगा. स्त्री को लड़ना, विपरीत परिस्थितियों का समना करना नहीं सीखा रहे बस पति मर गया तो वह भी मर गई. यहाँ हम मध्यकालीन समाज की स्त्री को इन दोनों नायिकाओं के माध्यम से समझ सकते हैं. पति के मरने के बाद कोई स्त्री यदि जीने की कामना करती थी तो उसे मीरां की तरह कई दु:ख झेलने पडते थे. मीरां इसलिए भी सती नहीं हो पाई क्योंकि वह राज घराने से थी और उसका मोह कृष्ण से था पर किसी भी आम स्त्री के लिए यह कर पाना सम्भव नहीं था. स्त्रियों को जबरन आग में डाल दिया जाता था. शासक अकबर ने सती प्रथा का विरोध किया था. इस कुप्रथा पर उनका मत था-
‘भारत में यह एक प्राचीन प्रथा है कि अपने पति की मृत्यु के पश्चात स्त्री, चाहे उसे अपने पति के हाथों दुर्व्यवहार ही क्यों न सहना पड़ा हो, अपने आपको आग में झोंक देती है और पूरी बहादुरी के साथ अपने बहुमूल्य जीवन का बलिदान कर देती है और इस कार्य को वह अपने पति की मुक्ति का साधन समझती है. पुरुषों का भी यह विचित्र आचरण है कि अपनी मुक्ति के लिए वे अपनी पत्नियों से इस प्रकार की सहायता की अपेक्षा रखते हैं.’41


यहाँ पद्मावती और नागमती स्वयं आग में जल रही हैं क्योंकि उनको भी उसी समाज ने ये सब बातें समझाई हैं कि पति बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं है और ये ही एक उपाय है दूसरों से अपने शील को बचाये रखने का. किंतु पद्माकर की नायिका ऐसा नहीं करतीं. रीतिकाल में ऐसा वर्णन शायद ही मिले. रीतिकाल के कवि स्त्री के जीवन के पक्ष में हैं. वे स्त्री-जीवन के महत्व को समझते हैं इसलिये उनके काव्य की स्त्री सभी कालों से भिन्न ही दिखाई देती है. रीतिकाल की स्त्री अपनी स्वतंत्रता की बात करती है. वह समाज के कई बंधनों को तोडती है उसे कवि प्रेम करने का अधिकार देते हैं. रीतिकालीन समाज में भले ही स्त्री सती हो रही रही थी पर कवियों ने इस स्थिति को प्राय: नहीं ही दिखाया है. रीतिकाल के रचनाकारों के लेखन के इस पक्ष पर त्रिलोचन शास्त्री ने लिखा है.‘रीतिकाल में सतीप्रथा पूरे जोर पर थी, कोई गाँव शायद ही रहा हो जहाँ ‘सती चौरा’ न रहा हो. हमारे इन (रीतिकालीन) कवियों में से किसी ने इधर ध्यान नहीं दिया; अनुकूल या प्रतिकूल लिखने की बात ही अलग है.’42
दरबार में कवि लिख रहे थे. दरबार में सती प्रथा के विरोध या पक्ष में बात सुनी जा सकती है? जो शासक स्त्री-पुरुष के सन्योग के चित्रण में आनंदित थे उनके रचनाकार स्त्री के जबरन मर जाने की घटना को काव्य का विषय बनायेगे और राजा और अन्य दरबारी सुन भी लेंगे? राजमहल में कवि चाह के भी ऐसी बात नहीं कह सकता. रचनाकार की परिस्थिति को जानते हुए भी शास्त्री जी का यह कथन अनुचित सा लगता है.



समाज के स्त्री समुदाय का एक सच उसमें रहने वाली वेश्यायें भी हैं. हमारे समाज में स्त्री को घर में बंद कर पुरुषों को स्वतंत्रता दी जाती है. पदमावत और जगद्विनोद दोनों में ये स्थिति हम देख सकते हैं. पुरुष दूसरी स्त्री के पास जाता है पर वह विवाहिता उसे कुछ नहीं कहती. अपना लेती है हर समय. यह हमारे समाज की पितृसत्ता ही है जो स्त्री से ये सब करवा लेती है. इसी पितृसत्ता की देन स्त्री का वेश्या होना है. वेश्या वो स्त्री होती है जो धन या किसी अन्य उद्देश्य के लिए देह को माध्यम बनाती है. आज वेश्याओं की दयनीय दशा सोची भी नहीं जा सकती क्योंकि आज ये एक देह क्रिया से जुड गया है. आदिकाल, मध्यकाल में वेश्याओं की ऐसी स्थिति नहीं थी. उपन्यास सलाम आखिरी में मध्यकालीन वेश्या की स्थिति का पता इस सम्वाद से चलता है.


‘वे विभिन्न कलाओं को जानने वाली गुणी स्त्रियों होती थी. पहले नृत्य और संगीत पर सिर्फ वेश्याओं एवं बाईजियों का ही एकाधिकार था पर आज बदलते सोच के चलते, नृत्य और संगीत की स्कूलों के चलते नृत्य और संगीत घर-घर तक पहुच गये हैं . तो उस लिहाज से भी ज्यों-ज्यों इनकी कला का स्तर गिरता गया वे हीन विलुप्त हो गई और बचा रह गया केवल शरीर… एक स्थूल शरीर कलाहीन, रुपहीन रुप की हाट में बिकता एक रुग्ण शरीर.’43

मध्यकालीन व्यवस्था में वेश्या की स्थिति भले ही एक विवाहिता जैसी नहीं थी पर उस समाज में कवि इस स्त्री को भी भरपूर मान देते थे. भक्तिकाव्य में नागमती जो एकनिष्ठ प्रेम में जी रही है, पतिव्रता है को जायसी अपशब्द कहलवाते हैं. उस काल के ठीक बाद के काल रीतिकाल में वेश्या स्त्री सम्मान से देखी गई है. रीतिकालीन कवि वेश्या का भी चित्रण अपने काव्य में करते हैं. वेश्या धन के हेतु रति करती है यहाँ वेश्या के चरित्र की एक विशेषता उभर कर आती है कि वह स्त्री विवाहिता नहीं है न ही परकीया है इन दोनों से अलग वह ऐसी स्त्री है को काम सम्बंधों में केवल धन को चुनती है. वेश्या के इस चयन में भी उसके सामाजिक व्यक्तित्व को देखा जा सकता है.
तन सुबरन सुबरन बसन सुबरन उकति उछाह.
धनि सुबरनमय ह्वै रही सुबरन की ही चाह॥44
यदि वह दरबारी वेश्या है तो वह ऐसे व्यक्ति को ही अपना संग देती है जो दरबार का हो. साधारण वेश्या के लिए चयन की ये स्थिति नहीं है.


गणिका के व्यक्तित्व में आराम नहीं है. वह रात-भर केलि करती है और सुबह भी केलि के उसे तैयार रहना पड़ता है. गणिका की स्थिति रीतिकालीन समाज में वैसी ही थी जैसी आज की वेश्याओं की है. वे भी रात-दिन देह-व्यापार करती थीं और ये भी. गणिका रात-भर केलि में रत रहकर भी आराम नहीं कर सकती क्योंकि उसे आजीविका के लिए काम करना पडेगा| गणिका आराम इसलिए नहीं करना चाहती क्योंकि उसके पेशे के दिन अधिक नहीं होते| उम्र के साथ उसकी मांग कम होती जाती है| इसलिए वो निरंतर काम करना चाहती है| रात की केलि से थकी, आलस्य से भरी वेश्या का चित्रण करते हुए पद्माकर लिखते हैं
आरस सों आरत सम्हारत न सीसपट गजब गुजारत गरीबन की धार पर.
    कहै पदमाकर सुगंध  सरसार  बेस बिथुरि बिराजैं  बार हीरन के हार पर.
 छाजत छबीले छिति छहरि छरा के छोर भोर उठि आई केलिमंदिर के द्वार पर.
  एक पग भीतर  सु एक देहरी पै धरे  एक कर कंज  एक कर है  किवार पर॥45



रीतिकाल के कवियों ने गणिका को सामान्य स्त्री की भांति ही संवेदनशील समझते हुए उसके हर मनोभावों को चित्रित किया गया है. स्वकीया के जो भेद जैसे आगतपतिका, प्रवत्स्यपतिका आदि मिलते हैं वही गणिका के लिए भी चित्रित हो रहे हैं. एक तरफ साहित्य का जायसी का समय है जिसमें स्त्री को अपशब्द कहे जा रहे थे दूसरी तरफ रीतिकाल में सर्वत्र स्त्री ही स्त्री दिखाई देती है. ये स्त्री भले ही पुरुष द्वारा चित्रित है, पर क्या समाज में ऐसी स्त्रियाँ नहीं थी? नायिका भेद सिर्फ दरबारी स्त्रियों पर लिखा गया हो ऐसा भी नहीं है. वहाँ हर तरह की स्त्री है. क्या ऐसा हमें जायसी का समय में दिखाई देता है? गणिका अपने कार्य के अनुसार व्यक्ति का चयन करके ही उससे प्रेम करती है|
बड़े साह लखि हम करी तुम सौं प्रीति बिचारि|
कहा जानि तुम करत हौ हमैं चोरि की नारि॥46
इस चयन में नायिका को कितने द्वंद से गुजरना पड़ा होगा? वह पुरुष को देख-समझ कर ही उससे प्रीति रखती होगी| जगद्विनोद में गणिका के इन मनोभावों और सामाजिक पक्ष  को कवि ने बखूबी चित्रित किया है|


निष्कर्ष- जायसी और पद्माकर के समाज में काफी अंतर है. एक के कवि हैं दूसरे रीतिकाल के लिए. जायसी का समयमें स्त्री को माया माना गया है. नागमती उसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जायसी और पद्माकर का ये परिवेश उनकी रचनाओं में चित्रित नायिकाओं के व्यक्तित्व पर भी प्रभाव डालता है. नागमती मुह बंद करके रहती है. पति के दूसरी स्त्री के पास जाने पर भी वह कुछ नहीं करती पर जगद्विनोद की नायिका स्वतंत्र है इन सभी मामलों में. वह पिय को पास बुलाती है और यदि वह किसी और के पास से आता है तो उसे सुनाती भी है. वह रति में आनंद भी लेती है और रोष होने पर रति से विमुख भी होती है. वह समाज से निडर होकर प्रेम भी करती है पर जैसे ही लगता है कि वह पकडी जायेगी, डरती भी है.पद्माकर और जायसी ने अपने समय के अनुसार काव्य रचना की है. पदमावत और जगद्विनोद का अध्ययन करने पर कहीं-कहीं लगता है कि जायसी की नायिकायें इस लोक की नहीं है पर जगद्विनोद की नायिकायें इसी लोक की स्त्री का प्रतिनिधित्व करती नज़र आती हैं.

संदर्भ सूची


20.नित्यानंद तिवारी, मध्यकालीन साहित्य:पुनरवलोकन, पृष्ठ-80 
21. पदमावत, पद-89
22. नित्यानंद तिवारी, मध्यकालीन साहित्य:पुनरवलोकन, पृष्ठ-80
23.पदमावत, पद–132
24.  पदमावत, पद-131 (प्रथम पंक्ति) 
25. जगद्विनोद, छंद- 108
26.   पदमावत, पद -527
27. जगद्विनोद, छन्द-162
28.जगद्विनोद, छन्द-80
29.पदमावत, पद-430
30.जगद्विनोद, छंद-61
31.पदमावत, पद-428
32.महादेवी वर्मा, शृंखला की कड़ियाँ, पृष्ठ-83
33.रामचंद्र शुक्ल, त्रिवेणी, पृष्ठ-38 
34.जगद्विनोद- छन्द-131 
35. पदमावत, पद-54
36.जगद्विनोद, छंद 
37.पदमावत, पद-341
38. जगद्विनोद, छंद-74
39.वही छंद-22-
40.रामचंद्र शुक्ल, त्रिवेणी, पृ.37, 
41.अकबर की सूक्तियाँ अकबरनामा से (उल्लेखित) भारतीय इतिहास में मध्यकाल, लेखक इरफान    हबीब, पृष्ठ-38
42.त्रिलोचन शास्त्री, रीतिकाल एक क्षयी युग- (लेख), पुस्त. साहित्य इतिहास और आधुनिक बोध,        पृ.199, 
43. सलाम आखिरी
44.जगद्विनोद, छंद-125  
45.वही, छंद-124 
46.वही, छंद-170


दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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गरीबी जिसके लिए बाधा नहीं : किरण ठाकरे

एक घरेलू कामगार माँ की बेटी किरण ठाकरे में नेतृत्व की व्यापक संभावनाएं हैं. वे अपने जीवन का पहला चुनाव भी नागपुर महानगरपालिका के लिए लड़ रही हैं. ओबीसी जाति से आने वाली किरण के संघर्षों और उनके राजनीतिक स्वप्न को हम सझते हैं विक्रम कुमार से  स्त्रीकाल में महिला-नेतृत्व सीरीज के तहत. 

21 तारीख को नागपुर महानगरपालिका का चुनाव होने जा रहा है, जहाँ एक तरफ आरएसएस-बीजेपी सहित सभी बड़ी पार्टियां धन-बल के साथ चुनाव में उतरेगी वहीँ दूसरी तरफ 23 वर्षीय किरण ठाकरे धन-बल और साम्प्रदायिकता की राजनीति को ख़ारिज करने के लिए नागपुर महानगरपालिका का चुनाव लड़ रहीं हैं, मतदाताओं से ही चंदा लेकर. किरण ठाकरे समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत है और इस बदलाव में उनका परिवार भी उनके साथ है, जबकि उनकी पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं है, एक कमरे का घर है, जिसमे मां, पिता, छोटी बहन निशा ठाकरे और खुद किरण भी रहती हैं.

किरण ठाकरे के घर उनका हौसला आफजाई करने पहुँची एनएफआईडवल्यू की राष्ट्रीय महासचिव

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप 

2009 में एक दुखद घटना घटी, उनकी छोटी बहन योगिता ठाकरे (किरण ठाकरे की छोटी बहन) की संदेहास्पद मौत हो गई और इनकी लाश वर्तमान में केन्द्रीय मंत्री सह बीजेपी के बड़े नेता नितिन गडकरी के कार में मिली. योगिता ठाकरे के मृत शरीर पर 17 जख्म के निशान थे और मुंह, नाक से खून बह रहा था, तब से किरण ने आपनी बहन के साथ-साथ औरों को भी इंसाफ दिलाने की लड़ाई शुरू कर दी. किरण की मां गाँव में ही बरतन मांझने का काम करती है, जिससे इनका घर चलता है, इतनी कठिन परिस्थिति में होने के बावजूद इन्होंने हार नहीं माना और एक मोर्चा खोल दिया आरएसएस और बीजेपी के खिलाफ|.आज ये आरएसएस-बीजेपी के गढ में नितिन गडकरी को चुनौती देने के लिए तैयार हैं, उनके घर के इलाके से आम आदमी शहर विकास मंच के तरफ से नागपुर महानगरपालिका का चुनाव लड़ रही हैं|  एक तरफ धनबल दूसरी तरफ जनता से चन्दा लेकर किरण चुनाव लड़ रही हैं, अबतक अधिकांश घरों में इन्होने संपर्क पूरा कर लिया है.

पढ़ें: पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

किरण ने अपनी पढाई नागपुर के सरकारी स्कूलों से की है- मैट्रिक, इंटर (कला) करने के बाद इन्होंने आगे की  पढ़ाई के लिए नागपुर विश्वविद्यालय में स्नातक (राजनीति विज्ञान) में दाखिला लिया और अपनी पढ़ाई को जरी रखा है|  किरण बताती हैं कि उन्के  गाँव में सरकार द्वारा संचालित स्कूलों  को बंद करा दिया गया है और जो शिक्षक थे उनको कोई दूसरा काम दे दिया गया है ताकि वे स्कूल में पढ़ा ना पायें. किरण का मानना है कि ‘शिक्षा का निजीकरण और व्यापारीकरण नहीं होना चाहिए नहीं तो गरीब, किसान-मजदूर के बच्चे पढ़ नहीं पाएंगे, शिक्षा सबको बिना किसी भेद-भाव के सामान रूप से मिलनी चाहिए. इस समाज में बदलाव लाने के लिए शिक्षा सबसे ज्यादा जरुरी है, इसीलिए इन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी है.’

मतदाताओं से मिलती किरण

मार्क्सवादी विचारधारा ने किरण को सबसे ज्यादा प्रभावित किया, जिससे कि आन्दोलन तथा इसकी जमीन तैयार करने में उन्हें बहुत सहायता मिली उन्होंने नागपुर में मजदूर आंदोलनों में कई बार हिस्सा लिया और नेतृत्व भी किया. इस तरह के आंदोलनों में रहने से राजनीतिक समझ और भी प्रगाढ हो जाती है. किरण कहती हैं कि “राजनीति में अधिकांशतः जिनके पास धन और बल है या जो विशेष परिवार से ताल्लुक रखते हैं, वही लोग राजनीति कर रहे है, जिसका मकसद जनता को लूटना है और यही सब देख कर लोग कहते है कि राजनीति गन्दी होती है.”

:दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

किरण ने मार्क्स, लेनिन और भगत सिंह को पढ़ा है. आंदोलनों के अनुभव से उनकी अपनी एक समझदारी बनी, जो वे आपनी बातों में रखती भी हैं. उन्होंने कहा कि “राजनीति गन्दी नहीं होती है बल्कि कुछ लोगों कि गन्दी हरकतों के कारण ऐसालगने लगती है,” उनका मानना है कि सबको राजनीति करनी चाहिए और जबतक गरीब मजदूर महिलाएं राजनीति नहीं करेंगे, तबतक वे अपने हक़ को नहीं ले पाएंगे. ऐसे में किरण का नागपुर महानगरपालिका का चुनाव लड़ना यह दिखाता है कि अब वे  दिन नहीं रहे जब  सर्वहारा वर्ग सिर्फ नेता चुनेगा अब नेता बनने का दिन आ गया है.  इनकी लड़ाई बराबरी की लड़ाई है, जो कि पूंजीवाद और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ है, जिससे न सिर्फ समाज को नुकसान है, बल्कि समाज का अस्तित्व भी खतरे में आ जाता है.
किरण जहाँ से चुनाव लड़ रही हैं,  वहां उन्होंने कई सारे मुद्दों पर काम किया है.  मुख्य रूप से महिलाओं पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं, उनके सवाल बुलंदी के साथ उठाया है और वे खुद भी अपनी छोटी बहन के न्याय के लिए लड़ रहीं हैं, जिसकी हत्या कर दी गई थी. इन्होंने नागपुर में महिलों को एक हिम्मत देने का काम किया है और आरएसएस के खिलाफ आमने-सामने मैदान में हैं.जाति हमारे समाज की सच्चाई है जिससे होकर दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों को गुजरना पड़ता है, किरण और इनकी मां ने भी इसका सामना किया, किरण की मां जहाँ काम करने ब्राह्मणों के घर में जाती हैं, तो उन्हें जाति के नाम पर प्रताड़ित किया जाता रहा है.  ये कोई एक घर की बात नहीं है, ऐसा सभी ब्राह्मणों के घरों में होता है. सभी लड़ाइयों के साथ-साथ यह भी एक लड़ाई है और परिवार ने हिम्मत रखा और लड़ा. किरण कहती हैं कि “ये जो अमीरी और गरीबी के मध्य जो शोषण की खाई है उसे ख़त्म होना चाहिए, नहीं तो इस पूंजीवादी व्यवस्था में अमीर और अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और गरीब होते जा रहा है- अगर इसी तरह से चलता रहा तो शोषण का रूप और भी भयानक होगा फिर इंसानियत खतरे में आ जायेगी.” किरण के बुलंद इरादों के लिए एक अच्छी बात यह रही है कि उन्हें जनता के मुद्दों के लिए हमेशा संघर्षरत जम्मू आंनद का मार्गदर्शन मिला.  पिछले सात-आठ सालों से उनका राजनीतिक प्रशिक्षण जम्मू आनंद के साथ जनता के सवालों पर संघर्ष करते हुए हुआ. बुलंद इरादों वाली इस लडकी की हौसला आफजाई के लिए पिछले 10 फरवरी को एनएफआईडवल्यू की राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा उनसे मिलने उनके घर पहुँचीनी और  चुनावी लड़ाई के लिए उन्हें शुभकामनायें दी.



समाज में जब भी आम लोगों का शोषण होगा शोषित अपनी आवाज बुलंद करेंगे और शोषण के कारोबार को ध्वस्त करेंगे. किरण विकास के वर्तमान मॉडल को झूठी मानती हैं, “जहाँ ऊँची ईमारत बना देना, पुल बना देना, बांध बना देना ही विकास के तौर पर दिखाया जाता है. ये सब एक छलावा है,  इस तरह के विकास का फायदा आम आदमी को नहीं होता. देश की आम जनता खुश नहीं है , उसे जिंदगी को बचने के लिए जद्दोजहद करना पड़ रहा है.” किरण के अनुसार, “विकास वह होगा, जिसमें सबको शिक्षा, आवास, रोजगार, खाना और सबको समान रूप से न्याय दिया जायेगा.”

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ

किरण जिस सोच के साथ आगे बढ़ रही हैं, इससे कहीं न कहीं लगता है कि बदलाव हो रहा है और जब समाज में कुछ बदलने की हलचल होती है तब लोग सचेत अवस्था में आते हैं, किरण ने यही किया है, समाज में लोगों को सचेत करने की कोशिश शुरू की है और यह जरुरी है कि आम जनता को सोच कर तय करना पड़ेगा कि क्या सही हो रहा है और क्या गलत हो रहा है, यह तय होना भी बदलाव है.


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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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बहन भी तो मेट्रो ले रही होगी इस वक्त

सिद्धार्थ प्रियदर्शी


क्रिएटिव राइटर और फिल्मों और सीरियल्स में सक्रिय लेखन।संपर्क: 9718277003

शाम 6 बजे ऑफिस छूटने के बाद की भारी भीड़ में 17 मिनट के इंतज़ार के बाद आई यह पहली मेट्रो ट्रेन थी. दरवाज़े खुलने के 6 सेकेंड बाद सारी सीटें फुल और अगले ही पल खड़े होने का ठिकाना ढूंढते लोग. ठसाठस भरी मेट्रो ट्रेन, दरवाज़े के पास वाले पैसेज में बलिष्ठ देह संरचनाओं के बीच 3 कमनीय युवतियां और अचानक मेहरबां हुई अपनी किस्मत पे इतराते वह चार लड़के !
अनाउंसमेंट हुआ – “दरवाजों से हटकर खड़े हों”

अपने शरीर को दरवाज़े से बचाने के क्रम में कमनीय काया ने खुद को थोड़ा पीछे किया. इधर उसके खुले बाल पीछे खड़े एक ‘भइया जी’ के कन्धों पे झूल गए और किसी अनोखी ‘फील’ से भइया जी का रोम रोम तृप्त हो उठा. युवती कानों में इयर प्लग लगाए किसी गीत में लीन थी और भइया जी सबसे नज़रें चुराकर युवती के बालों से लेकर नितम्बों तक उसके जिस्म को आँखों से सहलाने में तल्लीन थे. कभी ये युवती की नंगी सुराहीदार गर्दन को निहारते; कभी उसके बालों की खुशबू को 3 इंच की दूरी से अपने नथुनों में भरकर घर तक ले जाने की चेष्टा करते हैं. भइया जी तीन स्टेशन बाद यह सौभाग्यशाली यात्रा समाप्त कर ट्रेन से उतर गए.


ये तीनो युवतियां बेपरवाह और बेलौस थी. मेट्रो के इस ठेलम-ठेल के बीच सफ़र को ‘सफर’ करना उनके रोजमर्रा की दिनचर्या में था. वृहन महानगरीय संस्कृति की परिभाषा में स्त्री- पुरुष के बीच घटते सामाजिक फ़ासले की स्वीकार्यता और बढ़ती यौन कुंठाओं की जुगुप्सा ने इन लड़कियों को नफ़ा और नुक्सान दोनों पहुचाया है.

फ़िलहाल, ट्रेन चलती जा रही है. स्टेशनों के बाईं ओर स्थित प्लेटफार्म पर ट्रेन रूकती है. लोग उतरते और चढ़ते जा रहे हैं पर दाहिने दरवाजे के इस सुरक्षित कोने में दृश्य वैसा ही है जैसा कि उपर की पंक्तियों में बताया गया है.


ख़ैर; अब दूसरी रूपसी पर नज़र डालते हैं…


दिल्ली शहर के मौसम से सर्दी उतार पर है. फिर भी सुबह शाम टी-शर्ट में घूमना दिलेरी का काम है. जिम में पसीना बहाकर बनाई गई मुग्दड़ जैसी बाँहों को काली और सफ़ेद टी शर्ट में एक्सपोज़ करते दो देसी बन्दों के निहायत ही घटिया और हर बात में एक दूसरे की ‘भैंण’ को समर्पित क्रियात्मक शब्दों के बीच एक लकदक अत्याधुनिका बाला ! दिल्ली एनसीआर में भैंणें ( पढ़ें–बहनें ) बड़ी सस्ती बिकती हैं; हर बात में बिकती हैं, चाहे किसी की भी हों. ट्रेन की छत से लटकते स्टैंडिंग सपोर्ट को पकड़ने के क्रम में दोनों देसी ब्वॉयज़ ने अपने कन्धों के बीच युवती को लगभग जकड़ रखा है. इधर परेशान युवती बार-बार; इधर-उधर शिफ़्ट होकर उन्हें अपने होने के एहसास दिलाने की प्रक्रिया में उन्हें अपनी छुवन का और आनंद दे रही थी. और दोनों भाई लोग कस के आनंद ले रहे हैे. देखने वालों के नज़रिये में यहाँ गलती लड़की की ही है. ट्रेन में महिला डिब्बा होने के बावजूद वह सामान्य डिब्बे में चढ़ गई है, ज़रूर यह भी लोगों के बीच दबकर मज़े लेना चाहती होगी. कपडे भी बड़े मॉडर्न टाइप हैं, मतलब यह ********.


इतने में एक देसी ब्वॉय का हाथ नीचे की ओर गया और युवती अचानक चिहुँक उठी.
” एक्सक्यूज़ मी ! विल यू प्लीज स्टैंड प्रॉपरली !”
नम्र आवाज़ में की गई इस याचना का उत्तर उतनी ही फटी आवाज़ में आता है—-
“के घणीं तकलीफ़ हो राखी है मैडम. बाक्की लोग्ग भी तो खाडे हैं !”
युवती ने निराशा में सिर को हलके से हिलाया और वापस वैसे ही खड़ी हो गई. अब उस लड़के का हाथ बार बार नीचे जा रहा है. युवती अब मौन है क्योंकि उसे भी एहसास हो गया कि अगले दस या बीस मिनट तक ये ज़लालत उसे झेलनी ही है. दोनों लड़कों की आपसी फुसफुसाहट और मुखर हो उठती है——
“देक्ख, केसो सिकुड़ी सी खडी है”

“भैंण** ! लाग रहा प्रपोज़ल डे के दिन साड़े ब्वायफ़्रेंड ने इसे अपणां प्रपोजल थाम दिया.
“खें खें खें……”
” भैंण की ** ! बाहें तो देख, मखमल सी हो राखी हैं”
” भाई, मेने तो टाँगे लेग-इन के ऊपर से हौलू से सहला दी.”
आसपास के चार छह लोग ये जुगुप्सा जगाने वाली फुसफुसाहट सुन रहे हैं. उनकी बातों से कुछ के चेहरों पर मुस्कराहट है तो कुछ के चेहरों पर क्षोभ के भाव हैं. ये क्षोभ वाले चेहरे देखकर संतोष हुआ कि लोगों में ‘अभाव’ का ‘भाव’ भले हो; ‘भाव’ का ‘अभाव’ नहीं हैं.


अब कहानी के तीसरे पटल को देखिये.


जब उपर के दोनों दृश्य फिल्माए जा रहे हैं, उस वक़्त सिद्धार्थ बाबू ट्रेन डिब्बे के इस दायें दरवाज़े से सट कर बनाये गए उस खाली स्थान का लुफ़्त उठा रहे है जो भीड़ में खड़े होने के लिहाज़ से सर्वोत्तम है. सबसे ऊपर जिस चौथे लड़के का जिक्र किया गया है, ये वही हैं. हाँ, इनके साथ किस्मत पे इतराने वाली बात ज़रा सूट नहीं करती क्योंकि ये ऐसे पेशे से तआल्लुक़ रखते हैं जहाँ लड़के और लड़कियों के बीच का अनुपात 1 : 24 का है. एक नवयौवना इनसे सटकर खड़ी है. सिद्धार्थ बाबू ने शालीनता से उसको अधिकतम संभव स्थान दे रखा है. पर भीड़ के धक्के और लोगों के जिस्म का दबाव अब उनके पैरों को अस्थिर कर रहा है. अपने आईपैड को सँभालते औए कानों से हैडफ़ोन उतारते उनका पैर यौवना के जूतों पर पड़ जाता है. उधर से एक सिसकारी निकली और इधर सिद्धार्थ बाबू के मुँह बड्डड्डा वाला सॉरी. दोनों ने एक दूसरे की मज़बूरी समझी, आखों में मुस्कुराये और वापस पहले जैसी मुद्रा में खड़े हो गए. इस बार सटकर खड़े होने में भी दोनों तरफ निश्चिन्तता के भाव हैं. उसके बाएं हाथ के करीने से कटे नाख़ून और उस पर मैजेंटा कलर का नेलपेंट सिद्धार्थ बाबू को बहुत मोहक लगा.
एक उद्घोषणा होती है—–

“यह राजीव चौक स्टेशन है, दरवाज़े बाईं तरफ खुलेंगे”
अब सबको उतरने की जल्दी है. वो तीन युवतियां और सिद्धार्थ बाबू समेत दोनों देसी ब्वॉयज़ उतरने के लिए दाहिने दरवाज़े से बाएं दरवाज़े की तरफ आते हैं. सिद्धार्थ बाबू उस तीसरी युवती को सुगम निकास देने के लिए उसके आगे आ जाते हैं और भीड़ के बीच रास्ता बनाते हुए उतरते हैं. प्लेटफार्म तक पहुँचते पहुँचते सिद्धार्थ बाबू के पीछे चल रही तीसरी युवती फुसफुसाती है—— ‘रॉस्कल’ ! वह चौंकते हैं और आगे जाकर पीछे देखने के लिए मुड़ते हैं. लड़की अब येलो लाइन की ट्रेन लेने अंडर ग्राउंड सीढ़ियों की तरफ जा रही है. दोनों देसी ब्वॉयज़ बेशर्मी से किसी बात पे हँस रहे हैं. वह तीनो गेट नं 7 की ओर से कनॉट प्लेस के लिए बाहर निकल रहे हैं. आगे आगे दांत निपोरते देसी डूडस और पीछे सिद्धार्थ बाबू .
“भैंण की ** के तरबूज़ पे हाथ फेर दिया भाई”



एक देसी ब्वॉय अपनी महानतम उपलब्धि की बेशर्म मुनादी कर रहा है. दूसरा उससे बड़ी बेशर्मी से गर्व करता है—-
” भाई मेने तो 20 मिंट जम के मज़े किये”
अचानक सिद्धार्थ बाबू को याद आता है कि उनकी बहन इस वक़्त गुड़गाँव स्थित अपने ऑफिस से निकलकर मेट्रो ले रही होगी. एकदम वह बहुत थके से महसूस करने लगे. पैरों में जैसे जान नहीं रही. ट्रेन के अंदर के सारे दृश्य उनकी आँखों पर चलचित्र बना रहे हैं. स्टेशन के चारों तरफ उठते शोर में उन्हें सिर्फ एक ही शब्द सुनाई देता है—–
” बहन…बहन…बहन….भैण..भैन

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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छुई-मुई

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सुशांत सुप्रिय


सुशांत सुप्रिय कथाकार, कवि और अनुवादक हैं. अब तक दो कथा-संग्रह ‘हत्यारे’ (२०१०) तथा ‘हे राम’ (२०१२) और एक काव्य-संग्रह ‘ एक बूँद यह भी ‘ ( 2014) प्रकाशित हो चुके हैं। अनुवाद की एक पुस्तक ‘ विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ ‘ प्रकाशनाधीन है ।संपर्क: 09868511282 / 08512070086

( अब आप बड़े आदमी हो गए हैं . कार में चलते हैं . छुरी-चम्मच से खाना खाते हैं . विमान से  देश-विदेश की यात्राएँ करते हैं . कॉन्फ़्रेंसों के दौरान पंच-सितारा होटलों में ठहरते हैं . एक पढ़ी- लिखी सम्भ्रांत स्त्री से आपका विवाह हो चुका है . लेकिन अपनी स्मृतियों का आप क्या करेंगे ? कुछ स्मृतियाँ हैं जिनकी जड़ें अन्य सभी स्मृतियों से अधिक गहरी हैं . समय और स्थान की दूरी भी उन्हें आपसे कभी अलग नहीं कर सकती . अक्सर आपका मन आपको वहीं अतीत  में लौटा ले जाना चाहता है जहाँ आपका एक अंश पीछे छूट गया है . जैसे काली रात में आकाश में बिजली कौंधने पर पल भर  के लिए उजाला हो जाता है और आपको क्षणिक ही सही , सब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई देने लगता है … )

तो उस गाँव में एक घर है जिसमें मैं रहता हूँ . उस घर के पुरुष जनेऊ पहनते हैं . उस गाँव के बिना इमारत , बिना छत वाले स्कूल में एक मास्टरजी पढ़ाते हैं जिन्हें हम सुकुल मास्टरजी कहते हैं . मैं उस स्कूल में पढ़ता हूँ . उनके सोंटे से डरता हूँ . गाँव के कुएँ के चबूतरे पर खेलता हूँ . गाँव के मंदिर में पिताजी के साथ पूजा करता हूँ . लेकिन गाँव में ऐसे बच्चे भी हैं जो इस स्कूल में नहीं पढ़ सकते . जो कुएँ के चबूतरे पर क़दम नहीं धर सकते . जो गाँव के मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकते . जो उस मंदिर में पूजा नहीं कर सकते .

 एक दिन स्कूल के बाद मैं खेलता-खेलता मुसहर टोले की तरफ़ चला गया , हालाँकि उधर जाना मना था . वहाँ एक नौ-दस साल की लड़की तालाब के किनारे मछली पकड़ रही थी . वह लड़की मुझे अच्छी लगी .
” ऐ लड़की , तुम्हारा नाम क्या है ? हमसे दोस्ती करोगी ? हमको मछली पकड़ना सिखाओगी ? ” मैंने धड़कते दिल से पूछा .
” धनिया . ” उसने कहा . हमको अपने साथ इस्कूल ले कर जाओगे ? ”

  अच्छा है , स्कूल में इसका साथ रहेगा , यह सोचकर मैंने जल्दी से हाँ कर दी . हालाँकि मुझे माँ-पिताजी की बात याद आई कि मुसहर टोले में गंदे लोग रहते हैं , उधर नहीं जाना चाहिए . और यह सोचकर कि मैंने मुसहर टोले की एक लड़की को अपना दोस्त बना लिया है , मुझे डर भी लगा . कहीं भैया या दीदी ने देख लिया तो ? माँ-पिताजी को पता चल गया तो ? लेकिन धनिया से दोस्ती का आकर्षण उस डर से बड़ा था .


  फिर क्या था . मैं रोज़ स्कूल से लौटते समय कुछ देर के लिए मुसहर टोले के आगे गाँव के बाहर उगे जंगल में धनिया से मिलने के लिए जाने लगा . कुछ ही दिनों में मुसहर टोले के कई और लड़के भी मेरे अच्छे दोस्त बन गए . कलुआ , बिसेसरा , गनेसी , रमुआ — सब धनिया के साथ वहीं जंगल में घूमते रहते थे . उनकी नाक बह रही होती थी . उनके कपड़े फटे हुए और गंदे होते थे . फिर भी वे मुझे अच्छे लगते थे . वे शहद के छत्ते में आग लगा कर शहद निकाल लेते थे , गुलेल से निशाना लगा कर उड़ती चिड़िया गिरा लेते थे .
” हमको भी गुलेल चलाना सिखाओ न ” एक दिन मैंने ज़िद की .
” तुम्हारे बाबू को पता चला कि तुम हम लोगों के साथ घूमते हो तो तुमको बड़ी मार पड़ेगी . ” धनिया बोली .
” क्यों ? ” मैं यह जानता था लेकिन मैंने बड़ी मासूमियत से पूछा .
” हम लोगों के साथ घूमने-फिरने से , हमारा छुआ खाने-पीने से तुम्हारा धर्म ख़राब हो जाएगा . ” बिसेसर बोला .
” हम नहीं मानते . ” मैंने कहा .

 एक बारह साल के बच्चे के लिए तालाब के पानी में चपटे पत्थर से ‘ छिछली ‘ खेलना सीखना , आम के पेड़ पर चढ़ना सीखना , गुलेल चलाना सीखना और मछली पकड़ना सीखना जैसे काम ‘ धरम ‘ के बारे में सोचने से ज़्यादा ज़रूरी थे . यूँ भी मुझे उनका साथ अच्छा लगता था . इसलिए घर पर पता चल जाने पर मार पड़ने का डर होते हुए भी मैंने उन सबका साथ नहीं छोड़ा .
एक दिन मैंने उनसे पूछा — ” अच्छा , बताओ , मुझे तुम सब लोग क्यों अच्छे लगते हो ? ”
इससे पहले कि मेरे बाक़ी साथी कुछ कह पाते , धनिया तपाक से बोली — ” पिछले जन्म में तुम भी मुसहर रहे होगे , और का ! ” न जाने क्यों यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा .
” ये कौन-सा पौधा है ? ” एक दिन तालाब के किनारे घूमते हुए मैंने पूछा . पत्तियों को हाथ लगाते ही वे सिकुड़ जाती थीं , सिमट जाती थीं . जैसे शरमा कर खुद में ही बंद हो रही हों .
” इ छुई-मुई है . ” धनिया बोली .

अगले दिन शरारत में ही मैंने धनिया के पेट में उँगली से गुदगुदी कर दी . वह हँसते-हँसते ज़मीन पर गिरकर लोट-पोट होने लगी . मैं भी उसके साथ ज़मीन पर बैठकर उसकी देह में उँगलियों से गुदगुदी करता रहा . इस सब के बीच मेरा मुँह उसके मुँह के क़रीब आ गया और मैंने उसे चूम लिया . उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया . लाज से उसकी देह ऐसे सिमट गई जैसे वह छुई-मुई की पत्ती हो .
” अरे , तुम तो बिलकुल छुई-मुई जैसा करती हो . ” मैंने कहा .
” धत् ! ” यह कहकर वह वहाँ से भाग गई .
” आज से हमने तुम्हारा नाम छुई-मुई रख दिया है . ” मैं चिल्लाया .

 इसी तरह दिन बीतते रहे . एक दिन स्कूल के बाद जब मैं छुई-मुई और दूसरे दोस्तों से मिलने गया तो उन्होंने मुझे मेरा वादा याद दिलाया कि मैं उन सबको भी अपने साथ स्कूल ले जाऊँगा . अगले दिन के लिए बात तय हो गई . अगली सुबह छुई-मुई और मेरे दूसरे साथी स्कूल के पास मेरा इंतज़ार कर रहे थे . उन्हें लेकर मैं सुकुल मास्टरजी के पास पहुँचा . उन्हें देखकर सुकुल मास्टरजी के माथे पर बल पड़ गए .
” क्या है रे ? आज देर से क्यों आया है ? ”
” मास्साब , ये सब हमारे दोस्त हैं . ये भी हमारी तरह स्कूल में पढ़ना चाहते हैं . ” उनके सवाल का जवाब दिए बग़ैर मैंने कहा .

मास्टर साहब शायद उन सब के बारे में पहले से जानते थे . उन सबको ज़ोर से डाँटकर वे बोले — ” भागो यहाँ से , ससुरो ! अब मुसहर लोग भी स्कूल में पढ़ेंगे ! ”
यह सुनकर छुई-मुई की आँखों में आँसू आ गए . मुझे बहुत बुरा लग रहा था . पर मैं मास्टर साहब के सोंटे से बहुत डरता था . कलुआ , बिसेसर वग़ैरह मास्टर साहब को गाली देते हुए वहाँ से भाग गए . छुई-मुई भी रोते-रोते वहाँ से चली गई .
” कुल का नाम खूब रोशन कर रहे हो , बबुआ ! ” उनके जाने के बाद मुझे सोंटे से मारते हुए मास्टर साहब बोले .
उसी दिन उन्होंने मेरे पिताजी को सारी बात बता दी . उस रात घर पर मेरी खूब पिटाई हुई और छुई-मुई और मुसहर टोले के दूसरे दोस्तों से मेरा मिलना-जुलना बंद करवा दिया गया .इस घटना के एक महीने के बाद पिताजी ने मेरा नाम शहर के स्कूल में लिखवा दिया और आगे की पढ़ाई के लिए मुझे चाचाजी के पास शहर भेज दिया गया .
” गाँव में रहकर यह बुरी संगत में बिगड़ रहा था . ” मुझे शहर तक छोड़ने आए पिताजी ने चाचाजी से कहा .
अब मैं साल में एकाध बार ही गाँव आ पाता . वहाँ भी मुझ पर कड़ी नज़र रखी जाती . मेरा मन छुई-मुई और दूसरे दोस्तों से मिलने के लिए छटपटाता रहता .

फिर स्कूल की पढ़ाई ख़त्म करके मैंने किसी दूसरे शहर में कॉलेज में दाख़िला ले लिया . गाँव आए हुए मुझे कई साल हो गए , लेकिन छुई-मुई की छवि मेरे भीतर अब भी सुरक्षित थी . अब मैं बड़ा हो गया था . मेरी दाढ़ी-मूँछें निकल आई थीं . मैं शेव करने लगा था . मेरे भीतर छुई-मुई से मिलने की इच्छा बलवती होती जा रही थी . किंतु फिर मेरी नौकरी लग गई . और मैं उधर व्यस्त हो गया .

कई साल बाद पिताजी की मृत्यु के मौक़े पर जब मैं गाँव लौटा तो मैंने पाया कि मेरा गाँव अब पहले वाला गाँव नहीं रह गया था . वह बहुत बदल चुका था .पिताजी के दाह-संस्कार के बाद मैं छुई-मुई और दूसरे साथियों के बारे में पता करने मुसहर टोला पहुँचा .
” धनिया के साथ बहुत बुरा हुआ , बेटा . पैसा-रुतबा वाला लोगन का लड़िका सब ऊ के साथ मुँह काला कर के ऊ का गला घोंट दिया और लास को तालाब में फेंक दिया . ” मुसहर टोले के एक बुज़ुर्ग ने दुखी मन से बताया .

यह सुनकर मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया . मेरा गला सूखने लगा . और मुझे साँस लेने में तकलीफ़ होने लगी .मुझे लगा जैसे मेरी उड़ान का आकाश हमेशा के लिए खो गया हो .
” और बिसेसर , कलुआ वग़ैरह कहाँ हैं ? ” मैंने किसी तरह खुद को सम्भालते हुए पूछा .
” बेटा , ऊ लोग धनिया की मौत का बदला लेने गए . पर हत्यारा सब ने हमार सब बचवा को गोली मार दी . उहे रात ऊ सब का गुंडा लोग आय के मुसहर टोला में आग लगा दिया . ” बुज़ुर्ग की आँखों में अँधेरा भरा हुआ था .
” और धनिया के माँ-बाप का क्या हुआ ? ” मैंने डरते-डरते पूछा .
” ऊ बेचारे भी हमार टोला में लगी आग में जल के मर गए .” बुज़ुर्ग ने रुँधे गले से बताया .
” पुलिस ने कुछ नहीं किया ? ”
” पुलिस तो पैसा-रुतबा वालन की सुने है . हम ही लोगन को डरा-धमका के चली गई . ”

तो यह था मेरे देश की इक्कीसवीं सदी का कड़वा सच ! हर गाँव में खैरलाँजी और मिर्चपुर .  मैं वहाँ से ख़ाली हाथ लौट आया . मुझे लगा जैसे मेरी दुनिया लुट गई हो . हत्यारों की पहुँच ऊपर तक थी . मैं छटपटा कर रह गया .लेकिन  इस घटना से बेचैन हो कर मैंने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया . मैंने गाँव के बचे हुए दलित लड़के-लड़कियों के साथ अपने पुश्तैनी धन से शहर में अपना एक एन. जी. ओ. स्थापित किया जो प्रताड़ित दलितों और आदिवासियों के बीच जा कर उनके पुनर्वास लिए काम करता है और उनके अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करता है .

 मैंने गाँव में और तालाब के किनारे छुई-मुई के पौधे खोजने की बहुत कोशिश की , पर अब गाँव में छुई-मुई का पौधा कहीं नहीं बचा है . गाँव में जगह-जगह पक्के मकान बन गए हैं . बिजली के खम्भे लग गए हैं . एक पक्की सड़क अब गाँव को हाइवे से जोड़ती है . सुकुल मास्टरजी का देहांत हो चुका है . गाँव के जिस बिना इमारत , बिना छत वाले स्कूल से मैंने अपनी शुरुआती शिक्षा पाई थी , उसकी जगह एक पक्के इमारत वाला स्कूल बन गया है . मुसहर टोले के उस पार उगा सारा जंगल कट चुका है . जहाँ पहले छुई-मुई उगती थी , उस जगह अब दुकानें बन गई हैं — डिश टी. वी . और केबल टी. वी. वालों की दुकानें , कोका कोला और पेप्सी बेचने वाली दुकानें . तालाब का ज़्यादातर हिस्सा सूख गया है . जहाँ थोड़ा-बहुत पानी बचा है , वहाँ काई की एक मोटी परत जमी हुई है . वहाँ अब बीमारी फैलाने वाले मच्छर पनपते हैं .

बस एक चीज़ नहीं बदली है — वह है गाँव का मुसहर टोला . वह आज भी उतना ही उपेक्षित , उतना ही अलग-थलग पड़ा हुआ. एक दिन आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला मेरा बारह वर्षीय बेटा अपनी’ बायोलाजी ‘ की कापी लेकर  मेरे पास आया .
” पापा , ये ‘ मुमोसिका पुडिका ‘ क्या होती है ? ” उसने पूछा .
” यह एक पौधा होता है जिसे ‘ छुई-मुई ‘ कहते हैं . इसकी पत्तियों को हाथ लगाओ तो ये जैसे शरमा कर सिकुड़ जाती हैं . ” मैंने कहा .
” कितना फ़नी नाम है , पापा ! यह दिखने में कैसी होती है ? ”
कंक्रीट-जंगल वाले इस शहर में अब मैं तुझे क्या बताऊँ बेटा कि छुई-मुई दिखने में कैसी होती है . अब तो गाँव में भी छुई-मुई नहीं बची — मैंने मन में सोचा .
मुझसे अपने सवाल का जवाब नहीं पाकर वह बोला ” कोई बात नहीं , पापा . मैं इंटरनेट पर गूगल में ढूँढ़ लूँगा .”

( यदि आप मुझसे पूछेंगे तो मैं आपको नहीं बता पाऊँगा कि बहती हुई नाक वाले बच्चे मुझे क्यों अच्छे लगते हैं . फटे हुए गंदे कपड़े पहने बच्चे मुझे आज भी क्यों अपने-से लगते हैं . ढाबों में काम करने वाले बच्चों और मुझमें क्या रिश्ता है . फ़ुटपाथ पर जूते पॉलिश करने वाले बच्चों में मैं किन्हें ढूँढ़ता हूँ . लाल बत्ती पर गाड़ियों के शीशे साफ़ करने वाले बच्चों को मैं क्यों हर बार बीस-बीस रुपयों के नोट पकड़ा देता हूँ . इन्हें देखकर मैं क्यों उदास हो जाता हूँ . क्यों मेरा मन करता है कि मैं किसी तरह इन्हें इनका खोया बचपन वापस लौटा सकूँ . यदि आप मुझसे यह सब पूछेंगे तो मैं आपको वाकई यह नहीं बता पाऊँगा कि मुखौटा लगाए , पढ़े-लिखे , तथाकथित सभ्य , साहब लोगों के बीच मैं क्यों एक मिसफ़िट हूँ . धनाढ़्य लोगों के बीच मैं क्यों एक अजनबी हूँ . तथाकथित ऊँची जाति वाले लोगों के बीच मैं क्यों खुद को एक विदेशी जासूस-सा महसूस करता हूँ . छुई-मुई के प्रदेश से . छुई-मुई के काल से . छुई-मुई की जमात से … )

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 

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जायसी और पद्माकर की नायिकाओं के व्यक्तित्व के सामाजिक पक्ष का तुलनात्मक अध्ययन

आरती रानी प्रजापति

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण में समाज की अहम भूमिका होती है| समाज ही हमें बचपन से लेकर मृत्यु तक के आचार, व्यवहार को सिखाता है| व्यक्ति जहां रहता है वही उसका समाज है| उस जगह के नियम-क़ानून उसे मानने ही पड़ते हैं| यही नियम-क़ानून व्यक्ति के चरित्र को बनाते बिगाड़ते हैं.

स्त्री के चरित्र निर्माण में समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है| प्रसिद्ध लेखिका सिमोन का कथन ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है’ सही ही है| समाज की व्यवस्था ही स्त्री-पुरुष को उनके अंतर बताती है| स्त्री को घर संभालना है और पुरुष को बाहर काम करना है ये समाज के द्वारा ही तय होता है| प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर समाज को समेटे रहता है.

नारी समाज का अभिन्न अंग है. आदिम समय में स्त्री-पुरुष दोनों समान महत्व रखते थे. वह ऐसा समय था जब मनुष्य को काम सम्बन्ध बनाने की पूरी स्वतंत्रता थी. वह जब चाहे जिससे चाहे रज़ामंदी से संबंध बना सकता था. उस समाज में स्त्रियों को भी इस क्षेत्र में आज़ादी थी. वे अपनी मर्जी से किसी से भी संबंध स्थापित कर सकती थी. एकनिष्ठता का वहाँ कोई दायरा नहीं था. किंतु जैसे-जैसे समय बदला नारी की स्थिति खराब होती गई. उसे समाज में स्थापित पितृसत्ता ने गुलाम बना दिया. समाज में नारी के विभिन्न रुप मिलते हैं जैसे बेटी, पत्नी, माँ, बहन, प्रेमिका आदि. नारी के ये विभिन्न रुप पितृसत्ता की देन हैं. पितृसत्ता स्त्री को इन सम्बंधों में कैद कर उसकी स्वतंत्रता को पूरी तरह से छीन लेती है. उसे आदर्श पत्नी, माँ, बहन, बेटी बनने पर मजबूर किया जाता है. स्त्री को बालपन से ही उसके क्रियाकलापों (स्त्रियोंचित) समझाये जाते हैं वैसा ही व्यवहार करने को उसे बाध्य किया जाता है. ये सभी कुछ स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण रखने के लिए किया जाता है. स्वतंत्र स्त्री अपने हक़ की मांग कर सकती है| जिसे समाज बर्दाश्त नहीं करता इससे उसकी सत्ता कमजोर पड़ने लगती है.

साहित्य में भी स्त्रियों की दशा का चित्रण होता आया है| साहित्य के आदिकाल की यदि बात करें तो उसमें भले ही स्त्री केन्द्रित साहित्य नहीं लिखा गया, राजाओं की प्रशंसा ही की गयी थी तब भी उस काव्य के माध्यम से हम उस काल की स्त्रियों की दशा को समझ सकते हैं| पृथ्वीराज रासो के माध्यम से ये जान सकते हैं कि क्यों कैमास मारा गया| जबकि उसने कोई अपराध नहीं किया था| वह अपनी प्रिया के साथ रति में लीन था| लेकिन वह स्त्री राजा को पसंद थी इसलिए वह किसी और की हो जाए ये कैसे संभव था| यानी स्त्री को संपत्ति माना जाता था| संपत्ति पर कोई हक़ कैसे कर सकता है? स्त्री केन्द्रित कोई साहित्य भले ही न हो पर यदि उसमें स्त्री पात्र आता है तो उसके व्यक्तित्व के माध्यम से हम उस समाज को समझ सकते हैं| हिंदी साहित्य के मध्यकाल में स्त्रियों की अलग ही दशा देखने को मिलती है. जायसी-युग में स्त्री का पतिव्रता रुप अधिक मिलता है और रीतिकाल में प्रेमिका का.

जायसी कालीन साहित्य में नारी– जायसी के युग में स्त्री के विभिन्न पक्ष देखने को मिलते हैं| इस साहित्य में स्त्री के पतिव्रता रूप की प्रशंसा की गयी है| किन्तु पत्नी की इच्छाओं को वहां कोई स्थान नहीं दिया गया| पत्नी वह जो पति के हर कार्य को पूरा करे और उसे साधना करने दे| किन्तु पत्नी को कोई अधिकार वहां नहीं दिए गए| भक्तिकालीन समाज ने स्त्री पर शंका करने का बीड़ा उठाया| वह बात-बात पर स्त्री को ताड़ना देने की भी बात करता है| भक्तिकालीन समाज एक ऐसा समाज है जिसने स्त्री पर अविश्वास किया और उसकी बार-बार परीक्षा लेता है| मीरां इस समाज में अधिकारहीन स्त्री को अधिकार देने की बात करती है| वह भक्ति का अधिकार जो पुरुषों को प्राप्त है और स्त्रियों को कुल की लाज का हवाला देकर उनसे छीन लिया जाता है| भक्तिकालीन साहित्य में पुरुष कवि स्त्री की इसलिए निंदा करते हैं कि वह उसे विषय या संसार में लगाए रखती है| उसे साधना में बाधा दिखाई देती है स्त्री| साहित्य की कृष्ण काव्य धारा ने स्त्री के अन्य पक्षों को भी सामने रखा वह स्त्री की स्वतंत्रता की बात करते हैं| वह ऐसी स्त्री की कामना करते हैं जो अपने प्रेम के लिए सब-कुछ छोड़ कर आये. राम-कृष्ण की बाल लीलाओं के माध्यम से एक माँ की भावनाओं का भी वहां चित्रण किया गया है| इसकाल में सूफी काव्य परम्परा भी मिलाती है| जिसमें स्त्री को थोडा सम्मान दिया गया है| सूफी स्त्री में ईश्वर की झलक देखते हैं| इस कारण वहां स्त्री सामान की नज़रों से देखी गयी है पर समझने की बात ये है कि वहाँ हर स्त्री ईश्वर नहीं है| हर कण में ईश्वर के सिद्धांत को सूफी नहीं मानते| उनके लिए वही स्त्री ईश्वर हो सकती है जो देखने में अद्वितीय हो| अन्य कोई गुण उसके लिय मान्य नहीं है| बस देखने में इतनी सुन्दर हो कि लगे सब सुन्दर चीज उसी की उपज है| यदि कोई और सुन्दर स्त्री उन्हें दिख जाए तो शायद वे भी प्रतीक बन जायेगी पर क्योंकि सूफी कवियों को समाज में ये स्थापित नहीं करना था इसलिए ऐसा कुछ उन्होंने नहीं दिखाया| अधिकांश सूफी काव्य में दो स्त्रियाँ नायिका होती हैं|  इन प्रेमाख्यान काव्यों में चित्रित नायक-नायिका भारतीय पारिवारिक संरचना को बताते हैं. हिंदी साहित्य के इतिहास में डॉ. नगेंद्र लिखते हैं- प्रेमाख्यान-रचयिताओं ने, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लमान, भारतीय वातावरण एवं हिंदू समाज की मर्यादाओं के अनुरूप ही नायक-नायिका का चित्रण किया है. भारतीय समाज में पुरुष के लिए बहु-विवाह की अनुमति थी, अत: इनके नायक भी प्राय: एक से अधिक विवाह करते हैं जबकि नायिकायें, भारतीय परम्परा के अनुसार पातिव्रत्य का पालन करती हुई अंत में सती हो जाती है.1

एक वो जो किसी राजा की पत्नी है दूसरी वह जिसमें ईश्वर का रूप कवि दिखाना चाहता है| नायक जो पहली स्त्री को छोड़ कर दूसरी को पाने के लिए जाता है पर जैसे ही नायक ईश्वर की झलक मिलने वाली स्त्री को पा लेता है वह भी सामान्य रानी बन जाती है.

जायसी के समय को देखे तो यह काल स्त्री के पक्ष से काफी महत्वपूर्ण है| जिस तरह से समाज में स्त्री थी और उसी को कवि लिख रहे थे| भक्तिकालीन साहित्य, समाज में व्याप्त पितृसत्ता को मजबूत करता है| कृष्णकाव्य परम्परा इसका अपवाद लग सकती हैं पर ऐसा है नहीं| यह सच है कि कृष्ण काव्य ने स्त्री को प्रेम करने की स्वतंत्रता दी पर वहां वह भक्ति की आड़ लेकर एक पुरुष के अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध दिखाते हैं वहां किसी भी आलोचक की नज़र नहीं जाती| भक्तिभाव रखने वाले सामान्य जन कृष्ण की इस बात की प्रशंसा करते हैं कि वह एक ही समय में रास लीला व अन्य क्रियाएं करते हैं| सूरदास की बात आते ही आलोचकों को परकीया प्रेम उचित लगता है. जबकि यही आलोचक रीतिकाल में परकीया प्रेम-चित्रण की निंदा करते हैं. सूरदास के काव्य में ज्ञान पर प्रेम की जीत दिखाई गई है. कृष्ण की बांसुरी बजते ही गोपियाँ सब-कुछ छोड़ कृष्ण के पास चली आती हैं. तब वह उचित बात हो जाती है पर रीतिकाल की इसी बात के लिए आज तक रीतिकाल आलोचकों की मार सह रहा है. भ्रमरगीत की गोपियाँ इसलिए जानी जाती हैं क्योंकि वे अपने प्रेम के लिए ज्ञान को तर्क सहित त्यागती हैं.

पद्माकर कालीन साहित्य में नारी – रीतिकाल में स्त्री को केंद्र बनाकर काव्य रचना की गई है. जायसी के समय में जो स्त्री ताड़ना की अधिकारी थी वहीं रीतिकाल में मान करती, प्रेम के लिए अपने प्रियतम को बुलाती दिखाई देती है. वहाँ स्त्री को किसी कवि ने तुच्छ साबित करने की कोशिश नहीं की. रीतिकाल में भले ही परकीया महत्वपूर्ण है पर वहाँ स्वकीया भी अपनी आदर्श स्थिति में दिखाई देती है. रीतिकाल में कवि सामंजस्य करके चलते हैं. स्वकीया और परकीया दोनों को सम्भाव से वहाँ चित्रित किया गया है. रीतिकाल में नारी पूरी तरह स्वतंत्र हैं. वह अपने मन के कामातुर होने पर प्रियतम को बुलाना भी जानती हैं और यदि उनका प्रियतम किसी दूसरी स्त्री के पास जाकर आता है तो वह उसे सुनाती भी हैं. वहाँ कवि उसे ये अधिकार देते हैं कि वह अपने पति जिसे जायसी के समयकी पितृसत्ता व्यवस्था परमेश्वर बना देती है उसे व्यग्यांत्मक, प्रत्यक्ष रुप से सुना कर, अपना रोष प्रकट कर सके. भक्तिकाव्य में कृष्ण के अन्य स्त्रियों से सम्बंध बनाने पर जो स्त्रियाँ उस पर रोष नहीं जता पाती वहीं वे इस कमी को रीतिकाल में पूरा कर देती हैं.
पलनु, पीक, अंजनु अधर, धरे महावरू भाल.
आजू, मिले, सु भली करी; भले बने हौ लाल.2

यहाँ नायिका व्यंग के माध्यम से नायक को कह रही है| उसे रोष है नायक पर वह उसे सुनाती है| जायसी के समयकी कोई भी स्त्री अपने पति को इस तरह नहीं कह पाती| कवि की मानसिकता में ही नहीं था कि स्त्री भी पुरुष पर व्यंग कर सकती है| वह तो स्त्री को मात्र ताड़ना का अधिकारी बना देते हैं बिना इस बात को सोचे के उसकी मानसिक दशा क्या होती होगी अपने भावों को कुचलते समय.

रीतिकाल में समाज में हेय दृष्टि से देखे जाने वाली गणिका भी नायिका बन जाती है. रीतिकाल के कवियों ने गाणिका को सामान्य स्त्री की भांति ही संवेदनशील समझते हुए उसके हर मनोभावों को चित्रित किया गया है. स्वकीया के जो भेद जैसे आगतपतिका, प्रवत्स्यपतिका आदि मिलते हैं वही गणिका के लिए भी चित्रित हो रहे हैं. रीतिकाल में सर्वत्र स्त्री ही स्त्री दिखाई देती है. ये स्त्री भले ही पुरुष द्वारा चित्रित है, पर क्या समाज में ऐसी स्त्रियाँ नहीं थी? नायिका भेद सिर्फ दरबारी स्त्रियों पर लिखा गया हो ऐसा भी नहीं है. वहाँ हर तरह की स्त्री है. रीतिकाल की एक अन्य शाखा रीतिमुक्त कवियों की है. इस शाखा में आलम, बोधा, घनानंद, ठाकुर जैसे कवि आते हैं. ये कवि प्रेम को अपने काव्य का विषय बनाते हैं. इन कवियों ने स्त्री के प्रेमिका रुप का चित्रण किया है. यहाँ इनके काव्य में स्त्री को प्रेयसी का मान दिया गया जो अब तक साहित्य में नहीं मिल रहा था| सूर की गोपियाँ भी प्रेमिकाएँ हैं पर घनानंद और सूरदास में रात-दिन का अंतर है| घनानंद स्त्री को इतना मान देते हैं, कि अपनी रचनाओं में स्त्रीही बन जाते हैं. वह भी इस बात को समझते हैं कि प्रेम का चित्रण पुरुष के द्वारा यदि हो भी जाए तो वह इतना स्वभाविक नहीं बन पाएगा. प्रेम में डूबे यह कवि एक अलग ही आदर्श की स्थापना करते हैं.
पदमावत की कथावस्तु- ‘सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन की कन्या पद्मावती रुप और गुण में जगत में अद्वितीय थी. उसके योग्य वर कहीं न मिलता था. उसके पास हीरामन नाम का एक सुआ था जिसका वर्ण सोने के समान था और जो पूरा वाचाल और पंडित था. एक दिन वह पद्मावती से उसके वर न मिलने के विषय में कुछ कह रहा था कि राजा ने सुन लिया और बहुत कोप किया. सूआ राजा के डर से एक दिन उड़ गया. पद्मावती ने सुनकर बहुत विलाप किया.


सूआ वन में उड़ता‌-उड़ता एक बहेलिया के हाथ पड़ गया जिसने बाज़ार में लाकर उसे चितौड़ के एक ब्राह्मण के हाथ बेच दिया. उस ब्राह्मण को एक लाख देकर चितौड़ के राजा रत्नसेन ने उसे ले लिया. धीरे-धीरे रतनसेन उसे बहुत चाहने लगा. एक दिन जब राजा शिकार को गया तब उसकी रानी नागमती ने, जिसे अपने रुप पर बड़ा गर्व था आकर सूए से पूछा कि ‘संसार में मेरे समान सुंदरी भी कहीं है?’ इस पर सूआ हँसा और उसने सिंहल की पद्मिनी का वर्णन करके कहा कि उसमें और तुममें दिन और अंधेरी रात का अंतर है. रानी ने इस भय से कि कहीं यह सूआ राजा से भी पद्मिनी के रूप की प्रशंसा न करे, उसे मारने की आज्ञा दे दी. पर चेरी ने उसे राजा के भय से मारा नहीं, अपने घर छिपा रखा. लौटने पर जब सूए के बिना राजा रतनसेन बहुत व्याकुल और क्रुद्ध हुआ तब सूआ लाया गया और उसने सारी व्यथा कह सुनाई. पद्मिनी के रूप का वर्णन सुनकर राजा मूर्च्छित हो गया और अंत में वियोग से व्याकुल होकर उसकी खोज में घर से जोगी होकर निकल पड़ा. उसके आगे-आगे राह दिखाने वाला वही हीरामन सूआ था और साथ में सोलह हजार कुँवर जोगियों के वेश में थे.

कलिंग से जोगियों का यह दल बहुत जहाजों में सवार होकर सिंहल की ओर चला और अनेक कष्ट झेलने के उपरांत सिंहल पहुँचा. वहाँ पहुँचने पर राजा तो शिव के मंदिर में जोगियों के साथ बैठकर पद्मावती का ध्यान और जप करने लगा और हीरामन सूए ने जाकर पद्मावती से यह सब हाल कहा. राजा के प्रेम की सत्यता के प्रभाव से पद्मावती प्रेम में विकल हुई. श्रीपंचमी के दिन पद्मावती शिवपूजन के लिए उस मन्दिर में गयी, पर राजा उसके रूप को देखते ही मूर्च्छित हो गया, उसका दर्शन अच्छी तरह न कर सका. जागने पर राजा बहुत अधीर हुआ. इस पर पद्मावती ने कहला भेजा कि समय पर तो तुम चूक गये; अब तो इस दुर्गम सिंहलगढ़ पर चढ़ सको तभी मुझे देख सकते हो. शिव से सिद्धि प्राप्त कर राजा रात को जोगियों सहित गढ़ में घुसने लगा, पर सवेरा हो गया और पकड़ा गया. राजा गंधर्वसेन की सारी सेना हार गयी. अंत में जोगियों के बीच शिव को पहचान कर गंधर्वसेन उनके पैरों पर गिर पड़ा और बोला कि ‘पद्मावती आपकी है जिसको चाहे दीजिए’. इस प्रकार रतनसेन के साथ पद्मावती का विवाह हो गया और दोनों चितौड़गढ़ आ गये.

रतनसेन की सभा में राघवचेतन नामक एक पंडित था जिसे यक्षिणी सिद्ध थी. और पंडितों को नीचा दिखाने के लिए उसने एक दिन प्रतिपदा को द्वितीया कहकर यक्षिणी के बल से चंद्रमा दिखा दिया. जब राजा को यह कार्रवाई मालूम हुई तब उसने राघवचेतन को देश से निकाल दिया. राघव राजा से बदला लेने और भारी पुरस्कार की आशा से दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन के दरबार में पहुँचा और उसने दान में पाये हुए पद्मावती के कंगन को दिखाकर उसके रूप को संसार के ऊपर बताया. अलाउद्दीन ने पद्मिनी को भेज देने के लिए राजा रतनसेन को पत्र भेजा, जिसे पढ़कर राजा अत्यंत क्रुद्ध हुआ और लड़ाई की तैयारी करने लगा. कई वर्ष तक अलाउद्दीन चितौड़ घेरे रहा, पर उसे तोड़ न सका. अंत में उसने छलपूर्वक संधि का प्रस्ताव भेजा. राजा ने उसे स्वीकार करके बादशाह की दावत की. राजा के साथ शतरंज खेलते समय अलाउद्दीन ने पद्मिनी के रूप की एक झलक सामने रखे हुए एक दर्पण में देख पायी, जिसे देखते ही वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा. प्रस्थान के दिन जब राजा बादशाह को बाहरी फाटक तक पहुँचाने गया तब अलाउद्दीन के छिपे हुए सैनिकों द्वारा पकड़ लिया गया और दिल्ली पहुँचाया गया.

पद्मिनी को जब यह समाचार मिला तब वह बहुत व्याकुल हुई; पर तुरन्त एक वीर क्षत्राणी के समान अपने पति के उद्धार का उपाय सोचने लगी. गोरा, बादल नामक दो वीर क्षत्रिय सरदार 700 पालकियों में सशस्त्र सैनिक छिपाकर दिल्ली पहुँचे और बादशाह के पास यह संवाद भेजा कि पद्मिनी अपने पति से थोड़ी देर मिलकर तब आपके हरम में जायेगी. आज्ञा मिलते ही एक ढँकी पालकी राजा की कोठरी के पास रखी गयी और उसमें से एक लोहार निकल आये. शाही सेना पीछे आते देखकर वृद्ध गोरा तो कुछ सिपाहियों के साथ उस सेना को रोकता रहा और बादल रतनसेन को लेकर चितौड़ पहुँच गया. चितौड़ आने पर पद्मिनी ने रतनसेन के कुभंलनेर को राजा देवपाल द्वारा दूती भेजने की बात कही जिसे सुनते ही राजा रतनसेन ने कुभंलनेर को जा घेरा. लड़ाई में देवपाल और रतनसेन दोनों मारे गये.

रतनसेन का शव चितौड़ लाया गया. उसकी दोनों रानियाँ नागमती और पद्मावती हँसते-हँसते पति के शव के साथ चिता में बैठा गयीं. पीछे जब सेना सहित अलाउद्दीन चितौड़ पहुँचा तब वहाँ राख के ढेर के सिवा कुछ न मिला.’3

पद्माकर का जगद्विनोद एक लक्षण ग्रन्थ है जिसमें कवि ने समाज में मिलने वाली विभिन्न स्त्रियों का वर्णन किया है| ये स्त्रियाँ समाज के घर-घर में व्याप्त हैं| पद्माकर ने स्त्रियों के कुछ पक्षों को ही सामने रखा है| माँ, बेटी, बहन इनके जगद्विनोद में नहीं मिलती किन्तु विवाहित नारी के जीवन के विभिन्न पक्षों को पद्माकर ने बखूबी चित्रित किया है.

जायसी और पद्माकर दोनों के समाज में काफी अंतर है. यह परिवर्तन समय के लम्बे अंतराल के कारण आया है. जायसी भक्तिकाल के रचनाकार हैं और पद्माकर रीतिकाल के जायसी दरबार में बैठ कर काव्य रचना नहीं कर रहे थे पर उनकी नायिकायें दरबार की स्त्री हैं. वह आम घर की महिलायें नहीं हैं. पद्माकर दरबार में बैठकर काव्य रचना कर रहे थे किंतु उनकी नायिकायें दरबार में रहने वाली आरामपरस्त स्त्रियाँ प्राय: नहीं हैं. पद्माकर की स्त्रियाँ दरबारी कम और घर-घर में मिलने वाली औरतें ज्यादा हैं.

समाज में वही स्त्री नैतिक रुप से उच्च मानी गई है जो अपने पति की ही होकर रहे. उसे कहीं दूसरे पुरष की तरफ देखने का अधिकार भी समाज नहीं देता. यदि स्त्री ऐसा करती है तो समाज उसे ताने दे देकर ये एहसास करवाता है कि तुमने गलती की. पुरुष को भारतीय समाज परस्त्री गामी होने पर कोई उल्हाना नहीं देता पर स्त्री के लिए हर जगह बंधन हैं| वह चाह के भी दूसरे पुरुष से सम्बन्ध नहीं बना सकती| समाज में विवाह एक ऐसी संस्था है जिसने स्त्री को पूरी तरह पितृसत्ता का गुलाम बना दिया है| स्त्री के पैदा होते ही उसे इस सामाजिक संरचना में ढलना सिखाया जाता है| उसे एक पुरुष की होकर रहना सीखाया जाता है| वही समाज उस स्त्री (पत्नी) को त्यागने की बात कर देता है यदि उसे ईश्वर की झलक दिखाई देती हुई पद्मावती दिखती है| पुरुष या नायक-भेद में स्वकीया जैसी कोई अवधारणा नहीं मिलती| मतलब एकनिष्ठता का कोई मानदण्ड़ पुरुष के लिए नहीं था. बल्कि उसे दूसरी स्त्री का मार्ग दिखाने वाले को (सूफी काव्य में) गुरु माना गया| ये समाज के कैसे नियम हैं जो पुरुष के लिए अलग और स्त्री के लिए अलग हैं.


जायसी के समयमें सूफी काव्य प्रचुर मात्रा में लिखा गया| सूफी काव्य जिस स्त्री में ईश्वर की झलक देखी जाती है उसे पाने के लिए संसार के तमाम बंधनों से मुक्त होना पड़ता है| अधिकतर सूफी काव्यों में दो स्त्रियाँ चित्रित हुई हैं एक जो पत्नी है जिसे माया कहा जाता है दूसरी स्त्री जिसको पुरुष पाने के लिए सारे काव्य में संघर्षरत रहता है इसी स्त्री में ईश्वर की झलक देखी जाती है| सूफी कवियों ने समासोक्ति के माध्यम से अपनी बात कहने का रास्ता अपनाया.

मालिक मोहम्मद जायसी कृत पदमावत हिन्दी साहित्य में अपना अलग स्थान रखता है| यह ग्रन्थ प्रतीकात्मक शैली में लिखा गया है ऐसा सभी मानते हैं| इस ग्रन्थ की नायिका पद्मावती को ईश्वर, रत्नसेन को ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्सुक भक्त, और नागमती को माया माना गया है| पदमावत में चित्रित समाज दरबारी है| वहां दरबार की संस्कृति देखने को मिलती है| रानी नागमती और पद्मावती दरबार में रहने वाली स्त्रियाँ हैं| घर-घर में मिलने वाली कामगार, घरेलू श्रम करने वाली स्त्री का यहाँ अभाव है इसलिए इस काव्य में नारी की वास्तविक स्थिति प्राय: देखने को नहीं मिलती.


वहीँ पद्माकर के जगद्विनोद में कवि लिख तो रहे थे दरबार में बैठ कर पर उनका लेखन उन्हें उस दरबार से निकाल कर जनमानस में पहुंचा देता है| कवि पद्माकर ने जिस समाज को देखा वह वैसा ही उसे लिख देते हैं| कुछ पद जगत विनोद के भी उसकी दरबारी संस्कृति को दिखाते हैं पर ऐसे पद 5-6 से ज्यादा नहीं हैं| पद्माकर ने नायिकाओं को तीन भागों में विभाजित किया है-
१.स्वकीया
२.परकीया
३.गणिका
स्त्री के लिए स्वकीया जैसे भेद स्थापित किए गए है पर पुरुष के लिए ऐसे कोई भेद नहीं है| उसके लिए कहीं नहीं आता कि उसे ऐसा होना चाहिए| पद्माकर का समाज भले ही स्त्री के नज़रिए से कुछ स्वतंत्रता वाला दीखता हो पर एक पतिव्रता को भी वहां तुलसी की मानसिकता का युग ही झेलना पड़ रहा था.

पदमावत  में स्त्री को ईश्वर की झलक के रुप में चित्रित किया गया है. वही स्त्री इस काव्य की नायिका है. भले ही पदमावत  में स्त्री को ईश्वर माना गया है पर यह विचार करना चाहिए कि क्या सभी स्त्रियाँ वहाँ भगवान बन जाती है? ऐसी स्त्री जिसमें ईश्वर की झलक दिखाई दे कौन है? क्या कोई भी स्त्री वहाँ ईश्वर की झलक बनती है? नहीं पदमावत में कई स्त्रियाँ है पर वहाँ पद्मावती ही वह स्त्री है जिसमें कवि ईश्वर की झलक दिखाते हैं. पदमावत में कई स्त्रियाँ पद्मावती के समान ही सुंदर है. उनमें भी वैसा ही सौंदर्य है जैसा पद्मावती में पर सिर्फ पद्मावती को ईश्वर की झलक बना दिया गया है. रामचंद्र तिवारी लिखते हैं- ‘सूफियों ने अपने साध्य परमतत्व को परम सौंदर्य के रुप में देखा और नारी-सौंदर्य में उसका प्रतिबिम्ब अनुभव किया. इसलिए नारी-सौंदर्य की खान सिंहल-द्वीप जायसी के लिए खुदा के नूर को अवतरित करने की प्रेरणा-भूमि बन गया. सर्वश्रेष्ठ सुंदरी पद्मिनी के रुप में उन्होंने उस ज्योति ले अवतरण की कल्पना की. जायसी ने कुरानशरीफ की कयामत वाली कथा को भी इसी में सम्मिलित कर लिया.’4


यहाँ रामचन्द्र तिवारी नारी सौंदर्य की बात कर रहे हैं किंतु वे भूल जाते हैं कि सूफियों ने सभी नारियों के सौंदर्य में परमसत्ता की झलक नहीं देखी है. जो सौंदर्य में भी अति कर जाये लगे कि अब सभी कुछ इसी की आभा है वही स्त्री उनके लिए ईश्वर की झलक हो सकती है. ऐसा करके कवि सुंदर स्त्री का सम्मान कर रहे थे किंतु कम सुंदर का मजाक भी बना रहे थे. पदमावत में नागमती के साथ कवि ऐसा ही करते हैं.



पदमावत में एक स्त्री को ईश्वर की झलक बना के प्रस्तुत किया गया है. जगद्विनोद के कवि स्त्री को ईश्वर बनाने की कोशिश नहीं करते बल्कि उसकी दयनीय दशा को स्पष्ट करते हैं. पद्माकर के समय में भी स्त्री से अपेक्षा की जाती थी कि वह मन, वचन काया से पति में ही रत रहे जबकि उसी जगद्विनोद में परकीया नायिकाएं भी हैं जिससे पता चलता है कि समाज में पुरुष के दूसरी स्त्री से भी सम्बन्ध होते थे. स्त्रियाँ भी दूसरे पुरुषों से संबंध रखती थी किंतु आदर्श स्वकीया की मानी गई है.
निज पति ही के प्रेममय जाको मन बच काइ.
कहत सुकीया ताकि को लज्जासील सुभाइ॥5

स्त्री के विभिन्न पद और रूप पितृसत्तात्मक समाज की उपज है. जिसमें स्त्री को मात्र पितृसत्ता के बंधनों तक सीमित कर दिता जाता है. उसे इस प्रकार बना दिया जाता है मानो कोई गुलाम हो जो अपने मालिक के आदेश के पूर्व की सारी व्यस्थायें कर के दे दे. समाज में जो स्वरुप स्त्री का है वह पुरुष को वर्चस्ववादी और स्त्री को एक दास के रुप में स्थापित कर देता है. समाज की मान्यताओं के अनुसार उत्तम पत्नी वही है जो अपने पति के पहले जागे, बाद में खाए| समाज के बन्धनों को स्त्री पर लाद दिया जाता है उसे बार-बार आदर्श पत्नी बनने पर मजबूर किया जाता है.

स्त्री का यह रुप विवाहिता या कहे स्वकीया के लिये दिया गया उत्तम उदाहरण है. परकीया स्त्री स्त्री के लिये ये स्थिति नहीं है. पद्माकर समाज में प्रचलित स्वकीया के रुप का चित्रण करते हुए लिखते हैं:
खान पान पीछू करति सोवति पिछले छोर .
प्रान पियारे तें प्रथम जगत भावती भोर॥6
वहीं पदमावत में रानी पद्मावती रत्नसेन के बाद जागती है
बिहँसि जगावहिं सखी सयानी| सूर उठा उठु पदुमिनि रानी.7

दोनों ही नायिकाये मध्यकालीन समाज में चित्रित की गयी हैं पर एक नायिका वो है जो पति के आगे-पीछे चाकर की तरह घुमती है जिसपर घर की पूरी जिम्मेदारी है| पद्माकर की नायिका जो पत्नी होने के कारण श्रेष्ठ है उसकी स्थिति भी अच्छी नहीं है. उसको समाज में कोई स्वतंत्रता नहीं है. उसे पूरे दिन काम करने हैं और रात में भी पति के सोने के बाद सोना है. हमारे समाज में देर से जागती हुई स्त्री को सहन नहीं किया जाता इसलिए समाज स्त्री को बचपन से ही इस तरह के जीवन की आदत डलवाता है ताकि वह अच्छी पत्नी बन सके. दूसरी नायिका वो है जो आराम से जीवन व्यतीत कर रही है| पद्मावती जैसी नायिकायें हमें अपने समाज में नहीं मिलाती क्योंकि ये दरबारी स्त्रियाँ है पर पद्माकर की नायिकाए हमें अपने समाज में रोज देखने को मिलाती है| पद्मावती का व्यक्तित्व यहाँ एक साधारण स्त्री की तरह नहीं दीखता क्योंकि वह राजमहल की स्त्री है.

पदमावत में रानी पद्मावती को बहुत कोमल दिखया गया है. ये भी उसके समाज का एक हिस्सा है. दरबार में रहने वाली स्त्री खासकर रानी मेहनतकश नहीं हो सकती. उसके व्यक्तित्व में मेहनत है ही नहीं. उसे दूसरों पर आश्रित होना पडता है. वह हर काम दूसरों से करवाती है. वह नायिका इतनी कोमल है कि उसे गुलाब के फूल भी तकलीफ देते हैं. जायसी की नायिका न आम जीवन से सम्बंधित है और न ही उससे है साधारण स्त्री की स्थिति का बोध होता है. जायसी ने इस कोमलपन का वर्णन पद्मावती के रुप को और बढ़ाने के लिए किया है.
का धनि कहौं जैसि सुकुवारा. फूल के छुएँ जाइ बिकरार.
पँखुरी लीजहि फूलन्ह सेंती. सो नित डासिह सेज सुपेती.
फूल समूच रहै जो पावा. ब्याकुलि होइ नींद नहिं आवा.
सहै न खीर खाँड औ घीऊ. पान अधार रहै तन जीऊ.
नसि पानन्ह कै काढ़िअ हेरी. अधरन्ह गड़ै फाँस ओहि केरी.
मकरी क तार ताहि कर चीरू. सो पहिरें छिलि जाइ सरीरू.
पालक पाँव कि आछहिं पाटा. नेत बिछाइअ जौं चल बाटा.8

पद्माकर ने भी ऐसी नायिका का वर्णन किया है जो काफी नज़ाकत भरी हैं पर पूरे जगदविनोद में ऐसी स्त्रियों की छवि कम ही देखने को मिलती है. क्योंकि जगद्विनोद के रचनाकार का उद्देश्य ऐसी स्त्रियों को चित्रित करना नहीं था जो दरबार की ही हो. क्योंकि पद्माकर दरबार में बैठ कर ही लिख रहे थे. उनके पाठक के दरबारी लोग होते थे जो इस तरह की दिनचर्या से भली-भांति परिचित थे. यदि पद्माकर या अन्य कवि कोमलांगी, नज़ाकत से भरी स्त्रियों का वर्णन करते तो राजाओं व अन्य दरबारियों को उसमें कोई रस नहीं मिलता. पद्माकर ने जगद्विनोद में कुछ छंद ही दरबार की स्त्रियों की दशा और उनकी सामाजिक स्थिति को चित्रित करने के लिये रखे हैं. पद्माकर की नायिका मखमल के बिछोने पर भी असहज महसूस करती है.
सुन्दर सुरंग नैन सोभित अनंगरंग अंग अंग फैलत तरंग परिमल के.
बारन के भार सुकुमार को लचत लंक राजै परजंक पर भीतर महल के.
कहै पदमाकर बिलोकि जन रीझै जाहि अंबर अमल के सकल जल थल के.
कोमल कमल के गुलाबन के दल के सु जात गड़ि पाइन बिछोना मखमल के.9

पद्माकर और जायसी की नायिकाओं के इस पक्ष को देखे तो हम पायेंगे कि ये नायिकायें आम घर की नहीं है, दरबारी है. यह ऐसी स्त्री हैं जो पूरी तरह से काल्पनिक हैं| समाज में दरबार की स्त्रियों के लिए ऐसी ही कल्पना प्रचलित है| ऐसी स्त्री कैसी जीवित रह सकती है जो खाना ही न खाती हो| ऐसा मनुष्य क्या तो काम करेगा? सभी प्रकार के कार्यों के लिए ऊर्जा चाहिए वह ऐसे मनुष्य में कैसे आयेगी जो कुछ भी न खाता हो और पान-फूल पर ज़िंदा हो| पद्मावती इतनी कोमल है कि गुलाब का फूल अगर उसकी शैय्या पर रह जाए यो वह व्याकुल हो जाती है. उसे नींद नहीं आती. पद्माकर की नायिका इतनी कोमल है कि उससे बालों का ही भार सहन नहीं होता. तिस पर सभी कवियों के सौंदर्यबोध में लम्बे बालों वाली स्त्रियाँ ही शामिल थी. सौंदर्य का प्रतिमान माने जाने वाले ये लम्बे बाल नायिकाओं से सहन ही नहीं होते तो भी कवि का सौंदर्य-बोध नहीं बदलता.

समाज की एक प्रबल संस्था विवाह की है जिसमें स्त्री को पुरुष के घर विवाह के उपरांत जाना पड़ता है| इस संस्था में स्त्री का सब कुछ पीछे रह जाता है. वह अपने माँ-पिता के घर में बड़े चाव से पलती है और एक दिन उसे कोई पुरुष अपने घर ले जाता है जहां उसे उस परिवार की मर्यादा को निभाना होता है| शादी सिर्फ स्त्री की ही होती है ऐसा नहीं है पर विवाह में सब कुछ स्त्री ही त्यागती है| विवाह-संस्था से स्त्री के स्वभाव पर भी काफी असर पड़ता है| एक लड़की जो जब-तब खेल सकती थी, कहीं भी जा-आ सकती थी विवाह के बाद उसे संयम और मर्यादापूर्ण जीवन में रहना पड़ता है| ऐसा नहीं है कि शादी होते ही कोई महिला अपने आप बदल जाती है पर समाज उसे शुरू से ही इस तरह बनाता है कि वह बदलने को मजबूर हो जाती है| विवाह की परम्परा को अक्सर साहित्य में दिखाया जाता है| किस तरह से स्त्री अपने को बदल लेती है सब सहने की आदि हो जाती है, साहित्य इस सच से हमें रु-ब-रु करवाता है.

पद्मावती अपनी सखियों के साथ सरोवर पर नहाने जाती है| वह प्रसन्नचित्त है पर एकाएक उसे ध्यान आता है कि ये सुख अब ज्यादा दिन का नहीं है| पति के घर जाना है फिर जाने पिता के घर कब आना हो| आज ही सब खेल खेल लो| पद्मावती की सखियाँ उससे यह सब कहती हैं| पद्मावती को पदमावत में राजकुमारी दिखाया गया है पर यह सब राज-ठाठ धरे के धरे रह जाते हैं| कोई भी कितना ही राजा क्यों न हो पर स्त्री को विवाह करके दूसरे घर जाना ही पड़ता है| पद्मावती राजकुमारी है| वह चाहे तो अपने मर्जी चला सकती है पर क्योंकि वह स्त्री है इसलिए वह यह जानती है कि उसे अपने होने वाले पुरुष के अधीन ही रहना होगा| वास्तव में स्त्री हर जगह परतन्त्र है. स्त्री जिस जगह होती है उसकी परतंत्रता वैसे ही तय होती जाती है. पितृसत्ता का वह रुप नहीं मिलेगा जो दरबार में है. आज की बात करूँ तो निम्न, मध्य और उच्च वर्ग में स्त्री की अलग-अलग तरह की पराधीनता देखने को मिलती है. निम्न वर्ग में वह मार भी सहती है, घर-बाहर के काम भी करती है. उच्च वर्ग में वह अलग-अलग नियम कायदों से संचालित होती है. मध्यम वर्ग में वह तमाम नैतिकताओं को झेलती है. स्त्री की इसी स्थिति पर उमा चक्रवती कहती हैं-
‘विश्व के अधिकत्तर हिस्सों के दर्ज इतिहास की अधिकांश अवस्थाओं में स्त्री पराधीनता का वजूद रहा है. लेकिन इस पराधीनता की हद और स्वरुप का निर्धारण सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारक करते रहे हैं. दूसरे शब्दों में, स्त्री का परिवेश उसकी पराधीनता की प्रकृति को तय करता है’.10

पितृसत्ता में घिरी पद्मावती रानी से साधारण स्त्री के रूप में आ जाती है| समाज में हर स्त्री विवाह के बाद किस तरह से अपने परिवार से बिछुड़ जाती है पद्मावती के इस पक्ष का इससे पता लगता है|
ऐ रानी मन देखु बिचारी| एहि नैहर रहना दिन चारी||३||
जौ लहि अहै पिता कर राजू| खेलि लेहु जौ खेलहु आजू||४||
पुनि सासुर हम गौनब काली| कित हम कित एह सरवर पाली||५||
कित आवन पुनि अपने हाथां| कित मिलिकै खेलब एक साथा||६||11


मानो विवाह न हुआ कोई बंधन हो गया| बचपन से स्त्री किसी न किसी के आश्रय में रहती है| उसे कहाँ आना-जाना है ये घरवाले ही तय करके है| पद्मावती अपने मायके में हर जगह जा आ सकती है पर ससुराल में उसे इतनी स्वतंत्रता नहीं मिलेगी उसे डर है इस बात का| अपने खेल छूट जायेंगे ये सोच के वे दुखी है| पद्मावती जो कि इस ग्रंथ की नायिका है और एक उच्च घराने की स्त्री है वह इतना चिंतित है तो आम स्त्री की दशा का अंदाजा लगया जा सकता है. पद्माकर की नायिका इसलिए चिंतित है कि पति चाहता तो उसे बहुत है पर उसे मायके नहीं जाने देता| एक स्त्री जो अपने परिवार को छोड कर आती है विवाह के बाद उसका अपने संबंधियों से कोई नाता नहीं रह जाता. उसे हर काम अपने पति से पूछ कर उसकी इच्छा अनुसार करने पडते हैं. पद्माकर की नायिका का व्यक्तित्व सिर्फ जगद्विनोद में ही नहीं बल्कि समाज में नारी की दशा को भी बताता है. पद्मावती और उसकी सखियाँ अपने खेल और न भविष्य में मिल पाने की चिंता से दुखी है पर पद्माकर की नायिका अपने घरवालों के चिंता से परेशान है| उसे दुःख है कि वह अपने घर नहीं जा पाती|
मो बिन माइ न खाइ कछु पद्माकरत्यों भई भाबी अचेत है|
बीरन आए लिवाइबे कौं तिनकी मृदु बानिहूँ मानि न लेत है|
प्रीतम कों समुझावति क्यों नहीं ए सखी तूँ जु पै राखति हेत है|
और तौं मोहि सबै सुख री दुख री यहै माइकै जान न देत है||12

शादी के पहले और बाद स्त्री मन में कई डर होते हैं| ससुराल कैसा होगा? पति कैसे स्वभाव का होगा? सबसे ज्यादा डर उसे शादी के बाद स्थापित होने वाले शारीरिक संबंधों से होता है|  स्त्री का यह डर एक स्वाभाविक स्थिति है हर स्त्री के मन में ये डर होता है| स्त्री के मन का यह डर समाज में काम सम्बंधों की वर्जना का परिणाम है. समाज में स्त्री को काम सम्बंधों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाती. उसे काम क्रिया से पूर्व कोई ज्ञान इस विषय में नहीं होता. स्त्री का काम सम्बंधों की बात करना भी अपराध माना जाता है. उसे बचपन से ही इस तरह से पोषित किया जाता है मानो काम संबंध कोई अपराध हो पर उसी काम संबंध को जब स्त्री विवाह करती है तो अनिवार्य बना दिया जाता है. स्त्री को अनेक वर्जनाओं का पालन समाज में करना पडता है. जिस कारण उसे पति से शादी के समय काफी डर लगता है. ये स्त्री का ही सामाजिककरण है क्योंकि इस क्रिया को लेकर पुरुष में कोई डर नहीं होता. बल्कि पुरुषों में इस अवसर पर उत्साह देखने को मिलता है. यदि पुरुष की तरह स्त्री समुदाय भी इस सब बातों से अवगत हो तो उसमें भय-लाज न हो और यह सम्बंध मधुर बन सके. जायसी की नायिका पद्मावती राजदरबार में रहती थी पर फिर भी उसे समाज की नैतिकताओं से बाँधा गया. काम की बातों के बारे में वह अनजान थी. संयोग के लिए जाते समय पद्मावती चिंतित हो उठती है.
सँवरि सेज धनि मन भौ संका. ठाढ़ि तिवानि टेकि कै लंका.
अनचिन्ह पिउ काँपै मन माहाँ. का मैं कहब गहब जब बाँहाँ.
बारि बएस गौं प्रीति न जानी. तरुनी भइ मैमंत भुलानी.
जोबन गरब कछु मैं नहिं चेता. नेहु न जानिउँ स्याम कि सेता.
अब जौं कंत पूँछिहि सेइ बाता. कस मुँह होइहि पीत कि राता.
हौं सो बारि औ दुलहिनि पिउ सो तरुन औ तेज.
नहिं जानौं कस होइहि चढ़त कंत की सेज.13

जायसी के समयसे रीतिकाल तक आते-आते नारी की ये स्थिति नहीं बदली थी. आज भी नहीं बदली है. आज भी हम शादी से पूर्व लड़कियों को ऐसी उहा-पोह में देख सकते हैं. किंतु पद्माकर की नायिका रति से बहुत ही ज्यादा डरती है. इस डर में वह रति भी नहीं चाहती.
अति डर तें अति लाज तें जो न चहै रति बाम.
त्यों मुग्धा को कहत हैं सुकबि नवोढ़ा नाम॥14
स्त्री-पुरुष का वह सम्बंध जो उनके बीच प्रेम को स्थापित करने वाला होता है उसमें स्त्री का इस तरह से भयभीत होना उसे हमेशा के लिए पुरुष के प्रथम स्पर्श के सुख से वंचित कर देता है. स्त्री के काम संबंधों की जानकारी जरुरी है कामसूत्र में वात्स्यायन कहते हैं-‘वात्स्यायन का कहना है कि सम्भोग के लिए कामशास्त्र का ज्ञान परम आवश्यक है क्योंकि यदि स्त्री अथवा पुरुष दोंनो में से कोई भी भयभीत, लज्जांवित अथवा पराधीन होता है तो ऐसे समय जिन उपायों की आवश्यकता पड़ती है उन्हें कामशास्त्र ही बतलाता है.’15

उच्च वर्गों में पुरुषों को वेश्याओं के पास काम संबंधों को समझने के लिए भेजा जाता था. उनकी इस विषय में शिक्षा होती थी. वही समाज में नारी के लिए ऐसा कहीं प्रावधान नहीं था. तभी वह हर वक्त काम सम्बंधों से डरी हुई रहती है. स्त्री को यदि सही तरह से इन संबंधों के बारे में बताया जाए तो उसे भी इन सभी में रुचि लगे पर समाज की नैतिकताओं ने सदियों से स्त्री को इस सुख से वंचित कर रखा है. जिसके कारण वह रति के पहले अनुभव से डरती हैं. मध्यकालीन नायिकायें चाहे वह जायसी के समयकी हों या रीतिकाल की अपनी सामाजिक पितृसत्तात्मक संरचना के कारण रति से डरती थी. ये ठीक है किंतु उनके इस व्यक्तित्व का एक अन्य समाजिक पहलू भी है. आदिकाल से ही समाज में बाल-विवाह की कुप्रथा जोर पकड़ने लगी थी. बाल-विवाह, अनमेल विवाह दोनों स्त्री के रति के प्रति डर के अहम कारण हैं. यौवन से युक्त लड़का अपनी अज्ञातयौवना को काम की नज़रों से देखता है जिससे वह हमेशा घबराती है. इसका कारण उसका अबोध न कम उम्र का होना है. ऐसे में पद्माकर व जायसी की नायिकाओं का डर उनकी कम उम्र के कारण भी अधिक जान पड़ता है.

नागमती रानी है पर उसे इस बात का हर समय खतरा रहता था कि रत्नसेन कहीं दूसरी स्त्री के मोह में आकर उसे छोड न दे. नागमती और अन्य स्त्रियाँ अपने पिता के घर को छोडकर रत्नसेन के पास आई हैं. वे अच्छे से जानती हैं कि रत्नसेन किसी स्त्री के मोह में पड़ गया तो वह उन्हें छोड देगा. नागमती को ये चिंता हर वक्त सताती है क्योंकि हीरामन तोता अब चितौड में था. वह पद्मावती के रुप की चर्चा यदि रत्नसेन से कर देता तो वह उसे पाने के लिए भी दौड पडता. जायसी के प्रबल समर्थक भी कवि की इन नासमझी को समझते हैं. प्रेम इस तरह पैदा नहीं होता इस पर शुक्ल जी कहते हैं-
‘किसी के रुपगुण की प्रशंसा सुनते ही एक बारगी प्रेम उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक नहीं जान पड़ता. प्रेम दूसरों की आँखों नहीं देखता अपनी आँख देखता है. अत: राजा रत्नसेन तोते के मुहँ से पद्मावती का अलौकिक रूपवर्णन सुन जिस भाव की प्रेरणा से निकल पड़ता है वह पहले रूपलोभ ही कहा जा सकता है. इस दृष्टि से देखने पर कवि जो उसके प्रयत्न को तप का स्वरूप देता हुआ आत्मत्याग और विरह विह्वलता का विस्तृत वर्णन करता है वह एक नकल सी मालूम होती है’.16

यानि रानी नागमती रत्नसेन की मानसिकता को जानती है. इसलिए वह हर वक्त डरी रहती है. यहाँ नागमती की इस स्थिति को भली प्रकार समझा जा सकता है कि वह किस तरह असुरक्षा में जीती है. कहीं कोई उसकी जगह न आ जाए. कोई उसकी पटरानी की जगह न ग्रहण कर ले. यहाँ उसकी सामाजिक स्थिति को साफ समझा जा सकता. वह विद्रोह नहीं कर रही बस चाहती है कि किसी तरह सुआ रत्नसेन से पद्मावती के रुप की चर्चा न कर दे.
जौं यह सुआ मँदिर महँ रहई. कबहुँ कि होइ राजा सौं कहई.
सुनि राजा पुनि होइ बियोगी. छाँड़ै राज चलै होइ जोगी||17

पुनि होइ बियोगी मतलब पहले भी ऐसा हुआ होगा. शायद नागमती को पाने के लिए उसके प्रेम में बेसुध होकर वह दौड़ पड़ा हो. तब नागमती सुंदर लगती थी अब कोई और सुंदर लग सकती है. पद्मावती से नागमती को डर उसकी सुंदरता के ही कारण है. पद्मावती के अन्य गुणों को जायसी ने आकर्षण का कारण नहीं बनाया है. इससे तत्कालीन समाज और उसमें स्त्री की दशा का पता लगता है. स्त्री के गुण को बड़े से बड़ा कवि नकार रहा है. बस आकर्षण है तो सौंदर्य के कारण. इस सौंदर्य की सार्थकता भी तब तक है जब तक उससे अधिक सौंदर्यवान नहीं मिल जाती.

जहाँ पदमावत  में स्त्री इस बात से चिंतित है कि उसका पति दूसरी के पास चला जायेगा वहीं पद्माकर की नायिका को पता है कि उसका पति किसी अन्य स्त्री के पास गया है वह दु:खी होती है पर वह एक कदम भी उठाती है. जिससे वह मध्यकाल की अन्य स्त्रियों से आगे दिखाई देती है. वह स्त्री पडोस में गये अपने पति को वहीं जा कर पकड़ कर लाती है. स्त्री को ऐसा करने की कहीं अनुमति नहीं है. जायसी होते तो वह इस स्त्री को फिर माया कहलवा देते पर पद्माकर ऐसा नहीं करते. नागमती वर्ष भर से ज्यादा अपने विरह में निकाल देती है. अपमान को सहते हुए. पद्माकर की नायिका अपने पति से नहीं डरती है. ये नायिका दब कर बैठने वाली स्त्री नहीं है वह मौके पर कदम उठाने वाली स्त्री है. इस स्त्री ने किन मानसिक तनावों को झेला होगा. सामजिक रुप से अपनी वास्तविक स्थिति को कितना आंका होगा तब जाकर उसने ये कदम उठाया.
रोस करि पकरि परोस तें लियाई घरै पी कों प्रानप्यारी भुजलतनि भरै भरै.
कहै पदमाकर न ऐसो दोस कीज्यो फिरि सखिन समीप यों सुनावति खरै खरै.
प्यौ छ्ल छ्पावै बात हँसि बहरावै तिय गद्गद कंठ दृग आँसुन झरै झरै.
ऐसी धनि धन्य धनी धन्य है सु वैसो जाहि फूल की छरी सों खरी हनति हरै हरै.18

नायिका –भेद के इस अंग के कारण हम ये समझ पाते हैं कि उस समय जिसे हम मध्य्काल कहते हैं ऐसी भी स्त्रियाँ थी जो कोई भी कदम उठा लेती थी. ये स्त्रियाँ अपने अपमान को सहने वाली आम महिलाओं में से नहीं है अपितु वे जाकर पति का सामना करती है ये सोचे बिना के उसका परिणाम क्या होगा. नायिका-भेद को आलोचक बहुत बुरी निगाह से देखते हैं. वे इस भेद से स्त्रियों की दशा को नहीं समझना चाहते बस आलोचना करते हैं. हिंदी के परिष्कारक माने जाने वाले महावीर प्रसाद द्विवेदी नायिका-भेद के बारे में कहते हैं-
‘जहाँ तक हम देखते हैं स्त्रियों के भेद-वर्णन से कोई लाभ नहीं, हानि अवश्य है; और बहुत भारी हानि है. फिर हम नहीं जानते, क्या समझकर लोग इस विषय के इतना पीछे पड़े हुए हैं. आश्चर्य की बात है कि इस भेद-शक्ति के प्रतिकूल आज तक किसी ने चकार तक मुख से नहीं निकाला.’19


द्विवेदी जी नायिका-भेद को बुरा-भला कहते हैं. मान लेते हैं कि उनकी बात ठीक भी है पर क्या उस 200 साल के साहित्य में ऐसा कुछ नहीं जिसके कारण उसे पढ़ा जाना चाहिये? नायिका-भेद हमें उस समाज में स्त्रियों की जो दशा थी उसे बताता है. स्त्री का मनोविज्ञान पेश करता है. यह बात हम तभी समझ सकते हैं जब हम स्त्री की दशा को उसके उत्पीड़न को समझने की जरूरत महसूस करेंगे. जिन स्वतंत्र स्त्रियों की रीतिकाल में कल्पना है वह पितृसत्तात्मक सोच वाले समाज को पसंद आनी मुश्किल है. हमारे प्रिय आलोचकों को खंडिता नायिका पसन्द आती है. जो अपने पति के दूसरी जगह जाने पर चित्रित की गई है. रोती-मन मार कर बैठने वाली. विद्रोह करने वाली या अपने मन के अनुसार प्रेमी का चयन करने वाली स्त्रियाँ इन्हें पसंद नहीं आती. इन्हें पितृसत्तात्मक ढ़ांचे में ढली हुई औरत ही श्रेयस्कर लगती है.
क्रमशः

संदर्भ सूची 


1. डॉ. नगेंद्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ.152 
2.  जगन्नाथदास रत्नाकर, बिहारी-रत्नाकर, दोहा-22
3.  रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ.101-103
4.  डॉ.रामचंद्र तिवारी, मध्ययुगीन काव्य-साधना, पृष्ठ-68
 5. पद्माकर कृत जगद्विनोद, छंद 17
 6.  वही, छंद 18
 7. मलिक मुहम्मद जायसी कृत पदमावत  
 8. पदमावत-485 
 9. जगद्विनोद-12   
 10. उमा चक्रवर्ती, जाति समाज में पितृसत्ता, अनुवादक- विजय कुमार झा, 
  11.पदमावत, पद-60
 12. जगद्विनोद-137
 13. पदमावत, पद- 300 
  14.जगद्विनोद, छंद 38
  15.श्री देवदत्त शास्त्री, , कामसूत्रम्- वात्स्यायन, आमुख, पृष्ठ-11
  16.रामचंद्र शुक्ल, त्रिवेणी, सम्पादक कृष्णानंद, पृष्ठ-34 
  17.पदमावत, पद-85
  18.जगद्विनोद, छंद-70
  19.महावीर प्रसाद द्वेदी, रचना संचयन, पृ.-179

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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दलित महिला कारोबारी का संघर्ष



‘स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत दलित महिला कारोबारी के संघर्ष और उनकी उपलब्धियों से रू-ब-रू करा रहे हैं  पत्रकार नितिन राउत.


कमानी ट्यूब्स  की चेयरपर्सन और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित कल्पना सरोज की कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं- सफलता के शिखर तक पहुँचने के पीछे कड़े संघर्ष की कहानी है, उनकी कहानी. एक दौर था जब उन्होने जिंदगी खत्म करने के लिए जहर पी लिया था. लेकिन कहते हैं विश्वास और निरंतरता हो तो स्थितियां बदलते देर नहीं लगतीं, कल्पना सरोज की स्थितियों ने ऐसी करवट बदली कि उन्हे नयी जिंदगी के साथ बेशुमार दौलत की मालिक बना डाला. कभी जहर पीकर आत्महत्या करने की कोशिश वाली कल्पना सरोज आज 500 करोड की कारोबारी हैं.

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप 

किसान आत्महत्या के लिए परिचित महाराष्ट्र में विदर्भ के एक दलित परिवार में कल्पना सरोज का जन्म हुआ. पुलिस कांस्टेबल पिता के घर के हालात काफी खराब थे. खेलने की उम्र में अपनी उम्र से 10 साल बडे एक इन्सान से उनकी शादी हो गई. जिस उम्र में हाथ में कलम और किताबें होनी थी उस उम्र में उनके हाथ घर गृहस्थी की जिम्मेवारी आ गई. पति और ससुराल के लोगो की सेवा करना ही इनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद रह गया था. लेकिन उनके लिये यह सफर भी आसान कहाँ था? घरेलू हिंसा और असामाजिक ढंग का घाव झेलना अभी बाकी था. विदर्भ से दूर मुंबई मे उनका ससुराल था. पढाई पूरी तरह से बंद हो गई. घर गृहस्थी के काम-काज समेत घरेलू हिंसा उनके जीवन का हिस्सा बन गई थी. कल्पना की रोज पिटाई होती. कभी पति के हाथों, तो कभी ससुराल वालो के हाथो उनकी खूब पिटाई होती. पिटाई के जख्म जैसे उनके शरीर पर जम से गये थे. रोज पडती मार से उनकी जिंदगी की चाह तो जैसे खत्म हो चुकी थी. कल्पना से मुंबई मिलने पहुंचे उनके पिता उनकी इस हालत को देख उन्हें अपने घर ले आये . लेकिन एक नर्क छोड दूसरे नर्क के दरवाजे उनके स्वागत के लिये तैयार थे. वापस आने पर समाज का उनकी और देखने का रवैया बहुत बुरा था . पति के घर से वापस आयी कल्पना पर और उनके परिवार पर गाँव  ने बहिष्कार डाल दिया. शारीरिक मानसिक तौर से परेशान एक दिन कल्पना ने जहर पीकर जान देने की कोशिश की. खुदकुशी के लिए कीटनाशक की तीन बोतल उन्होने पी डाली. समय पर इलाज से उन्हे बचा लिया गया.

पढ़ें: पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

आत्महत्या की कोशिश के बाद उनके जीवन में नया मोड़ आया  . 16 साल की उम्र में उन्होंने फिर जिंदगी की और रुख किया, और मुंबई चली आई. अब उनके जीवन मे नई सुबह होने वाली थी. घर में कपडे सिलने की हुनर के कारण उनको जॉब मिल गया. एक गारमेंट कंपनी में कपडे सीलने का काम किया करती . दिन में दो रुपये की मजदूरी उनको मिला करती. लेकिन मुंबई में ये कम थी. उन्हें अपनी बहन का इलाज भी कराना था और बहन का इलाज इन पैसो में संभव नहीं था. घर पर ब्लाउज सिलने शुरू किये, आय प्रति ब्लाउज 2 रुपये से प्रति ब्लाउज दस रुपये तक पहुंची. लेकिन पैसे की किल्लत ने कई दिनो से बीमार बहन की सासें छीन ली. आय बढाने के लिये 14 से 16 घंटे काम करती. दिन में तीस से चालीस ब्लाउज सिलती. धीरे धीरे बिजनस को बढावा मिल रहा था, फिर सिलाई और बुटिक का काम शुरू किया . बिजनस बढाने के लिये उन्होने महात्मा फुले महामंडळ से  50,000 रूपये लोन की अपील की . उनको 50,000 लोन मिला. इस लोन के साथ फर्निचर का बिजनस शुरू किया . उल्हास नगर से सस्ते फर्निचर खरीदकर और उन्हें बेचकर बिजनस आगे बढ रहा था. तरक्की उनके कदम चूम रही थी. कच्चा माल कहाँ से लाना और उसे लाकर कहा बेचना, इसका पूरा अभ्यास उन्हें हो गया. लिया कर्जा उन्होंने चुका दिया. पूरे दो साल लगे उनको कर्जा चुकाने मे. लेकिन नये-नये बिजनस की तलाश जारी थी. रोज पेपर में आते स्कीम वे तलाशतीं . अच्छे उद्योग की तलाश उन्हें हमेशा रहती . विवादो में फसी एक जमीन का सौदा उन्होंने किया . पैसों  की जरुरत के चलते जमीन मालिक ने उन्हें जमीन बेच दी थी. जमीन को कल्पना ने अपने कब्जे में ले लिया . विवादों में फसी जमीन के लिए उनको कोर्ट के दरवाजे खटखटाने पडे. कई साल लगे उन्हे उनकी जमीन को हासिल करने में. जमीन हासिल कर उसे विकसित करने का उन्होने फैसला किया. लेकिन रास्ता नहीं मिल राहा था . बिजनस के लिए उन्होने पार्टनर की  तलाश शुरू की . 65 फिसदी भागीदारी से उन्होंने बिजनस शुरू किया . ईटों की इमारत खडी हो गई. रियल इस्टेट का बिजनस इसी बिल्डींग से शुरू हुआ .फर्निचर और रियल इस्टेट का बिजनस काफी जोर पकड रहा था- लेकिन गोल्डन दिन अभी बाकी थे. सफलता कल्पना के कदम चूम रही थी .

:दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

मुंबई में उन्हें पहचान मिलने लगी, उन्होंने दूसरी शादी की। इसी जान- पहचान के बल पर कल्पना को पता चला कि 17 साल से बंद पड़ी कमानी ट्यूब्स को सुप्रीम कोर्ट ने उसके कामगारों से शुरू करने को कहा है। कंपनी के कामगार कल्पना से मिले और कंपनी को फिर से शुरू करने में मदद की अपील की। यह कंपनी कई विवादों के चलते 1988 से बंद पड़ी थी। कल्पना ने वर्करों के साथ मिलकर अथक मेहनत और हौसले के बल पर 17 सालों से बंद पड़ी कंपनी में जान फूंक दी. आज कमानी ट्यूब्स कंपनी 500 करोड से अधिक मूल्य की कंपनी है.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

दलित महिला उद्योगपति कल्पना न सिर्फ आर्थिक उन्नति तक सीमित नाम है, बल्कि डा. आंबेडकर के सपनों का समाज बनाने के लिए इनका समर्पण भी जग-जाहिर है. सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध बहुत कम उद्योगपतियों में उनका नाम शुमार है.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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यौन संबंध को प्यार का रूप देना जरूरी

इति शरण 

तब  मैं एक सामुदायिक रेडियो “गुडगाँव की आवाज़” में सेक्सुअल हेल्थ पर काम कर रही थी। इस दौरान सेक्सुअल हेल्थ से सम्बंधित कई विषयों पर काम करने का मौका मिला, जिसमें एक गंभीर विषय से भी हमारा सामना हुआ- मैरिटलल रेप ( वैवाहिक बलात्कार ) । महिलाओं से बात करने पर पता चला कि बड़ी संख्या में महिलाएं इस तरह के बलात्कार का शिकार हो रही हैं, जिसके खिलाफ वे आवाज़ भी नहीं उठा पाती।

इस प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरी कई औरतों से बातचीत हुई। मगर एक दिन एक ऐसी महिला ने मुझे अपनी कहानी बताई , जिससे मैं अक्सर मिला करती थी, लेकिन कभी पता ही नहीं चला कि वह भी मैरिटल रेप की शिकार है। उसकी शादी 18 साल की उम्र में ही कर दी गई थी। शादी की पहली रात से ही वह अपने पति की जबरदस्ती सहने को मजबूर रही थी। उस महिला ने उस दिन विस्तार से मुझे अपनी कहानी बताई।

“मुझे नहीं पता था कि शादी के बाद क्या होता हैं। कच्ची उम्र में ही मेरी शादी तो तय कर दी गई, मगर शादी के बाद की चीज़ों के बारे में मुझे कुछ नहीं बताया गया। शादी की पहली रात मेरे पति जैसे मुझपर चढ़ ही गए थे, मेरे लिए सब बहुत डरावना था। मुझे दर्द भी हो रहा था और बहुत शर्म भी आ रही थी। कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि कोई मेरे शरीर के साथ ऐसा कुछ करेगा। मेरे पति तब तक नहीं रुके जब तक उन्हें नींद नहीं आ गई। सुबह होते ही मैंने अपनी माँ को फ़ोन लगाया और रात की बात बताते हुए रोने लगी। मेरी माँ ने कहा “पागल हैं क्या तू, वह तेरे पति हैं, इसे अपना पत्नी धर्म समझ कर निभा ले।”

उस औरत ने बताया कि धीरे-धीरे वह इसकी आदी  हो गई। अब तो मासिक धर्म के दिन भी उसका पति उसे नहीं छोड़ता। उसका पूरा बिस्तर खून से सन जाता था। कुछ दिन बाद वह गर्भवती हो गई। उसे मायके भेज दिया गया। वह खुश थी, उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हो रहा था। बच्चा होने के बाद उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया। इस कारण डॉक्टर ने कुछ दिनों तक उन्हें सम्बन्ध बनाने के लिए मना किया हुआ था, मगर उसका पति मानने वालो में से नहीं था यहाँ तक कि उसे प्रोटेक्शन लेना भी मंजूर नहीं था। नतीजतन एक महीने बाद ही वह दोबारा गर्भवती हो गई। शरीर से कमजोर होने के कारण 2 महीने में ही उसका बच्चा गिर गया ।अपनी कहानी बताने के बाद उस महिला ने कहा था “अपने पति से मैं भी प्यार करना चाहती थी, मगर कभी कर नहीं पाई।
इस तरह की कहानी हमारे समाज में हर दूसरे घर में मिल जाएँगी, जहाँ औरतें अपने पति द्वारा ही बलात्कार की शिकार हो रही।

वैसे इसके लिए जिम्मेदार अकेले उस एक पुरुष को नहीं ठहराया जा सकता है बल्कि इसका जिम्मेदार हमारा वह समाज है, जहाँ सेक्स को पुरुषों की मर्दानगी से जोड़कर देखा जाता है। मुझे याद हैं एक औरत ने अपनी कहानी बताते हुए कहा था, मैडम मेरे पति बहुत अच्छे हैं। कभी भी मेरी इजाज़त के बिना सम्बन्ध नहीं बनाते। यहाँ तक कि पहली रात भी मेरे मना करने के बाद वह कुछ नहीं बोले। मगर उन्होंने मुझे कहा था कि किसी और को मत बताना कि हमारे बीच कुछ भी नहीं हुआ , वरना लोग मेरी मर्दानगी पर ताना देंगे। इस घटना को हम एक ऐसे उदाहरण के रूप में देख सकते हैं, जब मर्दानगी के नाम पर एक पुरुष को जबरन सम्बन्ध बानने के लिए ज़ोर दिया जाता है।

इन सबका परिणाम स्त्रियों के मन में यौन सम्बन्ध के प्रति नफरत घर कर लेती है। प्यार का यह अनमोल रूप हिंसा में तब्दील हो जाता है। जबकि यौन सम्बन्ध पुरुष और स्त्री दोनों की इच्छा और जरुरत है।  पुरुषों की शारीरिक बनावट ऐसी होती हैं कि सम्बन्ध बानने से उनकी थकान दूर होती हैं, जबकि औरतों को इसमें कुछ हद तक थकान महसूस होती है। वैसे भी हमारे समाज में सामान्यतः घर की सारी जिम्मेदारी घर की औरतों के सर पर ही थोप दी जाती हैं, दिन भर काम से थकने के बाद हर दिन उसका सम्बन्ध बनाने का मन नहीं होता।

करीब 50 साल की एक महिला ने अपने पति के बार में बताते हुए कहा था “वो आज मुझे अगर अपने पास बैठने के लिए बुलाते भी हैं तो उनके पास जाकर बैठने का मन नहीं करता। मन भी कैसे करे, शादी होते ही घर की सारी जिम्मेदारी मेरे सर पर थोप दी गई, दिन भर काम करके शरीर बिल्कुल जवाब दे देता था। उम्र भी बहुत कम थी मेरी। मगर काम के बाद जब आराम करने का मन होता तो पति घर आते ही बिस्तर में चलने के लिए बोलते। अगर मना करो तो फिर घर में बवाल कि मेरी इससे थकान दूर होती है और वैसे भी तू तो दिन भर घर में ही रहती है, अब किस बात की पत्नी जो पति का थकान भी दूर न करे। उस औरत का कहना था कि सम्बन्ध बनाना मेरे लिए कोई प्यार नहीं रहा बल्कि सज़ा थी मेरे लिए।  उनके लिए तो मैं बस उसकी ज़रुरत पूरी करने वाली मशीन थी। उसके घर का सारा काम करने वाली और दूसरा सम्बन्ध बनाकर उसकी थकान दूर करने वाली औरत।

इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत हम लोग एक रेडियो नाटक भी बनाया करते थे, जिसमें लाइव डॉक्टर के जुड़ने का एक सेशन हुआ करता था। डॉक्टर उस सेशन में अक्सर लोगों को यह सलाह दिया करते थे कि आप पत्नी के पास सिर्फ सम्बन्ध बनाने मत जाया करो, बल्कि अपने प्यार का इज़हार दूसरी तरह से भी करने की कोशिश करो, देखना आपकी पत्नी आपसे कितनी खुश रहा करेगी।  डॉक्टर से बात करने के लिए हमारे स्टेशन में काफी कॉल आया करते थे। कई पुरुषों का कहना था कि हमें बार-बार अपनी पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाने का मन होता है। कुछ पुरुषों ने बताया कि मैं ऑफिस में रहता हूँ तब भी मन होता है जल्दी से घर जाकर पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाऊं, ऐसा नहीं कर पाने पर बहुत बेचैनी होती है।

डॉक्टरों का कहना हैं कि यह एक तरह कि मानसिक स्थिति भी है, किसी चीज़ की लत लग जाना या उसके बारे में दिन रात सोचने पर हर बार आपका दिमाग उसी ओर जाता है। खासकर युवाओं के साथ ऐसा कई बार होता है। डॉक्टरों का कहना है कि पहले तो उन पुरुषों को अपना ध्यान कहीं  और लगाने की कोशिश करनी चाहिये। दूसरा कई बार पुरुषों के उत्तेजित हो जाने पर उनका वीर्य भी निकल आता है, जिसके बाद उन्हें सेक्स करने की जरुरत महसूस होती है। अगर उस वक़्त वह पुरुष अपने साथी के साथ नहीं हैं या उसकी साथी की रज़ामंदी नहीं हैं तो वह  हस्तमैथुन करके भी अपनी उत्तेजना शांत कर सकता है।

हांलाकि हमारे समाज में हस्तमैथुन को गलत नज़रिये से देखा जाता है। जबकि इसमें कोई बुराई नहीं है। यह एक सामान्य सी बात है। डॉक्टर भी इसे गलत नहीं मानते। कई लोगों का यह भी मानना होता है कि हस्तमैथुन करने से कमजोरी या अन्य कोई बीमारी होती है, मगर यह सब गलत धारणा है। यह चिंता का विषय तब बनता है जब रोजमर्रा के काम में रूकावट बनने लगे या तनाव मुक्त करने का यही एकमात्र साधन बन जाए।

जबरन सम्बन्ध बनाने का खामियाज़ा कई बार खुद पुरुषों को भी सहना पड़ता है। पुरुषों के जबरदस्ती करने पर कई बार औरतें सम्बन्ध बनाने के नाम से ही नफरत करने लगती है। वे घर के कामों में खुद को इतना व्यस्त कर लेती हैं कि पति के तरफ कभी ध्यान भी नहीं जाता। परिणामस्वरूप जल्द ही दोनों के बीच यौन सम्बन्ध बनना बंद हो जाता हैं और पुरुष चाह कर भी इससे वंचित रह जाते हैं। इसलिए इस प्यार को बरक़रार रखने के लिए यौन सम्बन्ध को हिंसा नहीं बल्कि प्यार का रूप देना जरुरी है।

लेखिका पेशे से पत्रकार है. सम्पर्क: itisharan@gmail.com
तस्वीरें गूगल से साभार 
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
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सत्ता और विमर्श के अन्तर्सम्बन्धों की रवायत (चित्रा मुद्गल की कहानियों का पुनराकलन)

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शंभु गुप्त

 हिन्दी विश्वविद्यालय  में स्त्री अध्ययन विभाग में  प्रोफ़ेसर. सम्पर्क : ई  मेल- shambhugupt@gmail.com, मोबाइल:  8600552663

वरिष्ठ कथालेखिका चित्रा मुद्गल की कहानियाँ एक बार फिर चर्चा में हैं. ख़ास तौर से ‘मामला आगे बढ़ेगा अभी’, ‘भूख’, ‘जगदम्बा बाबू गाँव आ रहे हैं’, ‘प्रेतयोनि’ आदि. आज से दस साल पहले भी इन कहानियों की लगभग यही स्थिति थी. लेकिन आज जब फिर से इन पर चर्चा ज़ोरों पर है तो इस बहाने मेरे जैसे पाठक को यह मौक़ा मिलता है कि इन्हें कथित चर्चेबाज़ी, चर्चेबाज़ी की राजनीति से अलग समय के असल आईने में देखा जाए, इन कहानियों को पढ़ने के बाद एक सामान्य पाठक के बतौर मैं किस तरह, क्या सोचता हूँ, इसे बेखटके सबके सामने लाऊँ; क्योंकि हिन्दी में चर्चेबाज़ी का एक धड़ा ऐसा भी है, जो प्रश्न भी ख़ुद तैयार करता है और बहुत ही सूफ़ियाना तरीक़े से उनके उत्तर भी ख़ुद डिक्टेट करता है. हिन्दी में हिन्दी की अन्तरात्मा को ठेस पहुँचाती ‘पीआरशिप’ की यह प्रवृत्ति पिछले दिनों ख़ूब पनपी है और इसने लगभग एक परम्परा का स्वरूप अख़्तियार कर लिया है. आम पाठक के पास इस इन्द्रजाल को पहचानने/काटने का कोई ज़रिया नहीं, सिवा इसके कि वह ख़ुद मोर्चा सम्भाले और आलोचकों के तिलिस्म को तार-तार करे!

कोई आलोचक किस कृति के बारे में कैसे, क्या सोचता है, यह उसका अपना मामला है क्योंकि आलोचक भी इसी लागलपेट भरी दुनिया का हिस्सा है और यह क़तई नहीं माना जा सकता कि इस पीआरशिप की चपेट में वह बिल्कुल न आया हुआ होगा! सब धान बाईस पँसेरी हमारा मन्तव्य नहीं है. बहुत विनम्रतापूर्वक सिर्फ़ इतना कहना है कि आलोचकों को भी कभी-कभी आईने में अपना चेहरा देख लेना चाहिए. आलोचना की पहली और आख़िरी कसौटी ख़ुद रचना होती है, होनी चाहिए; न कि यह कि लेखक या लेखिका की हैसियत और पहुँच क्या और कहाँ तक है, वह कितने बड़े, फ़ायदा पहुँचा सकने वाले आहदे पर है या कहें कि किसी का कुछ बना या बिगाड़ सकने की कितनी सामथ्र्य उसमें है! अरसे से हिन्दी आलोचना के बहुत सारे ‘प्रतिमान’ इसी ‘उर्वरा’ भूमि से निकलकर आ रहे हैं, पाठक को ऐसा दरकिनार किया गया कि लगभग उसे ‘हाँका’ गया! होना तो दरअसल यह चाहिए था कि जैसा कि एक जनतान्त्रिक व्यवस्था में होता है कि देश के हर नागरिक की उसमें प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष  हिस्सेदारी/भूमिका होती है; लेखक की रचना-प्रक्रिया में पाठक की भी लगभग यही हैसियत होती है, होनी चाहिए. हुआ यह है कि जैसे राजनीति आम आदमी को किनारे कर के चलती है और उसी के कन्धों पर सवार होकर उसी को चकमा देती रहती है, ठीक वैसे ही साहित्य में भी आम आदमी, शोषित -उत्पीड़ित वर्गों, निम्नवर्गीय जीवन इत्यादि का इस्तेमाल ही किया गया. यह ठीक है कि साहित्य क्रान्ति नहीं करता पर उसकी भूमिका और मानसिकता तो बनाता है. लेकिन यदि वह यह भी न कर पाए तो आप क्या कहेंगे?

कोई रचनाकार जब आम आदमी,शोषित-उत्पीड़ित वर्गों, निम्नवर्गीय जीवन इत्यादि को अपना विषय बनाता है तो तय है कि वह इस तथ्य से तो सुपरिचित होगा ही कि ऐसा किए जाने के लिए तत्वतः और स्पष्टत: उसे डिक्लास/डिकास्ट होने की प्रक्रिया से गुज़रना ज़रूरी है. वह भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ. राजनेताओं की तरह साहित्यकार भी यदि ऐसा करने लगेंगे कि पहले वे समस्या गढ़ेंगे और फिर उसका समाधान भी और इस चक्कर में सारा ज़मीन-आसमान एक कर देंगे तो यह तो वही बात हो जाएगी न कि यह मेरी खेती! इसे जैसे मैं बोऊँ-काटूँ! हालाँकि अपने कहानी-संग्रहों की भूमिकाओं में चित्राजी बाक़ायदा इस ‘उपभोक्तावाद’ का विरोध करती हैं और इसकी लम्बी ख़बर लेती हैं. जैसे कि ‘लपटें’ की भूमिका ‘द्वन्द्व’ में एक जगह उन्होंने लिखा है-‘‘आज लेखक के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह अपने समय-समाज के सच से मुठभेड़ करने का ख़तरा उठा रहा है? उन छिपे ख़तरों के भयावह और लगभग तबाह कर देनेवाले दूरगामी परिणामों को टोहने-सूँघने का उपक्रम कर रहा है? गगग वे उन्हें नहीं पहचान रहे तो क्यों? या पहचान कर भी उन्हें देखा-अनदेखा कर वादों और खेमों की छतरियों के नीचे सुरक्षित-सीमित उखाड़ पछाड़ तथा श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ, प्रतिबद्ध-अप्रतिबद्ध की क्षुद्र  राजनीति में उलझे हुए वर्चस्ववाद के पैंतरे भाँजते एक-दूसरे को नीचा दिखाने में अपनी समूची सर्जनात्मक ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं? उनकी चिन्ता में आम आदमी कितना और कहाँ तक रह गया है, सोचते ही बेचैनियाँ आँखों में उँगलियाँ डालने लगती हैं कि हमने उनके लिए कुछ किया है तो मात्र इतना कि उन्हें वैचारिक उल्टियों, चश्मे से बँधी-रची कृतियों, पोस्टरों, नुक्कड़ नाटकों, चौंधियाहट लदे-फँदे नारों में क़ैद कर उन्हें उनकी ज़मीन से ख़ुद बेदख़ल कर इस्तेमाल की छद्म हित-चिन्तक राजनीति का मोहरा बना डाला! कलम के इस उपभोक्तावाद को हम किस खाँचे में डालेंगे? क्या नाम देंगे इसे?’’ (लपटें, भारतीय ज्ञानपीठ, पाँचवाँ संस्करण 2004, पृष्ठ  छह). आगे इस क्रम में इसे वे ‘अभिव्यक्ति में ख़ालिस व्यक्तिवादी रवैये’ का ‘अनुगामी’ कहते हुए इससे ‘सामाजिक सरोकारों के प्रति शब्दशक्ति’ के प्रज्ज्वलन की असम्भवता का प्रतिपादन करते हुए आह्वान करती हैं कि लेखक लोग अपनी ‘कलम की दराँती को छद्म के पाश से मुक्त’ करें, ताकि ‘‘मारक दबावों की चौतरफ़ा मार से त्रस्त-ध्वस्त लगभग जड़ावस्था में पहुँच रहे जनमानस की ग़ुलामी की हदें छूती सहिष्णुता को अभिव्यक्ति की तीव्रता दरका सके, उन्हें उनका सही पाठ सौंप सके, उनमें अपेक्षित आँच-ताप जगा सके कि ऐसा होना उनकी नियति नहीं है, न निरपेक्षता उसका समाधान!’’ (वही).

इस लम्बे उद्धरण की प्रासंगिकता इसमें निहित वह अन्तर्विरोध है, जो न केवल चित्रा मुद्गल के वक्तव्यों, उनके पीछे सक्रिय विचारों, उनमें निहित उनकी कथित ’अवधारणाओं’ बल्कि आगे चलकर उनकी रचनाओं की अन्तर्वस्तु को अंतर्दृष्टिपरक संभ्रम वैचारिकता के संकट से संग्रस्त कर देता है. इस उद्धरण में एक तरफ़ वे वादों-खेमों, प्रतिबद्धता-अप्रतिबद्धता जैसे अवधारणात्मक शब्दों की एक तरह से खिल्ली उड़ाती हैं तो दूसरी तरफ़ अन्त तक पहुँचते-पहुँचते ‘निरपेक्षता ’ का भी निषेध करती चलती हैं. दो नावों पर एक साथ सवार कैसे हुआ जा सकता है? लेकिन चित्रा मुद्गल वक्तव्यों में भी और रचना में भी जब-तब इसकी चपेट में आ ही जाती हैं. उनके साथ दरअसल दिक़्क़त यह है कि यथार्थ की अन्दरूनी सतह तक पहुँचने से काफ़ी पहले ही उनकी विचारचिन्तना और सृजनात्मकता ज़बाव देने लगती है और इस स्थिति में वे अगल-बगल और आगे-पीछे और ऊपर-नीचे के घटना, पात्रों, स्थितियों के लम्बे-लम्बे ब्यौरों और भाषायी खेल का सहारा लेते हुए कहानी को एक अंज़ाम तक पहुँचाती हैं. मसलन उनकी ‘जिनावर’ कहानी को देखा जाए. विशेषतः इसके अन्तिम हिस्से को, जहाँ घोड़ी सरवरी की मौत और उसके हर्ज़ाने के बाद असलम के ठीक से सो न पाने और उसके किसी गहरे अपराध-बोध और क्षोभ की गिरफ़्त में आ फँसने की मनःस्थिति का कथांकन है. यहाँ दो दृश्य हैं. पहला यह कि उसे सोते में सरवरी का रुन-झुन हिनहिनाहट का प्रखर स्वर बार-बार बेताबी के साथ सुनाई देता है और उसकी नींद उचट जाती है. वह हड़बड़ाकर कोठरी के बाहर आता है पर वहाँ उसे बिना सरवरी के अकेले उदास खड़े ताँगे के अलावा कुछ नहीं नज़र आता. ठीक इसी क्षण उसे यह अपराध-बोध सालना शुरू होता है-‘‘सरवरी यहां हो भी कैसे सकती है? उसे तो वह वहीं सड़क पर मुर्दा छोड़ आया था-नगरपालिका की बेजान लावारिस पशुओं की लाशें ढोने वाली गाड़ी के भरोसे. कितनी तेजी से वह तांगा लेकर भागा था घटनास्थल से.’’ (आदि-अनादि -3, चित्रा मुद्गल की सम्पूर्ण कहानियां; सामयिक प्रकाशन 2009; पृ. 52). दूसरा दृश्य वह है, जिसमें वह हर्ज़ाने में मिले नोटों को लानत भेजता हुआ अपनी हरामज़दगी/बेमुरौव्वती का बखान/ऐलान करता हुआ बेतरह ख़ुद को कोसता चला जाता है-‘‘नहीं, वह जुदा नहीं हुई, उसके जुदा होने से पहले ही मैंने उसे मार दिया, मैंने उसकी मौत से सौदा कर लिया, बीबी! जान-बूझकर उसे गाड़ी से भेड़ दिया! यही सोचकर कि अपनी मौत तो वह मरेगी ही, आगे-पीछे किसी गाड़ी से भेड़ दूंगा तो वह मरते-मरते अपनी कीमत अदा कर जाएगी…ये नोट, नोट नहीं, मेरी सरवरी की बोटियां हैं…बोटियां, बीबी…’’ (वही).

इन दोनों दृश्यों का समेकन और समाकलन करने पर जो चीज हाथ लगती है, वह क्या है, पता नहीं! चित्राजी के बारे में कहा जाता है कि वे समाज के निम्नवर्गीय तबक़े की विशेषज्ञ हैं, उनके बीच वे एक सहानुभूतिशील कार्यकर्ता की तरह सक्रिय रही हैं, इस तबक़े के यथार्थ-चित्रण में वे सिद्धहस्त हैं, आदि-आदि. हमें इस कथन से कोई गुरेज़ नहीं है, बशर्ते यह कहीं एक ‘किंवदन्ती’ न बन जाए! जो हो. तो, किस तरह का निम्नवर्गीय यथार्थ यह कहानी हमारे सामने प्रस्तुत करती है? क्या लेखिका निम्नवर्गीय मानसिकता के किसी काइयांपन, टुच्चेपन, बेहयाई-बेमुरौव्वती इत्यादि का खुलासा करने के मक़सद से इस कहानी को लिखती प्रतीत होती है? क्या सचमुच इस कहानी में निहित वर्ग-दृष्टि  इतनी प्रकृष्ट  है कि इससे हमारी आँखें खुल जाती हैं! पता नहीं, सच क्या है! एक पाठक के रूप में मैं भारी सम्भ्रम/दिग्भ्रम की स्थिति में हूँ! क्योंकि अब तक निम्नवर्गीय मानसिकता के किसी काइयांपन, टुच्चेपन, बेहयाई-बेमुरौव्वती इत्यादि का खुलासा जिस तरह कहानियों में होते देखा है, उसमें लेखक का रुख़ और रवैया कहानी के एकदम प्रारम्भ से क्रिटिकल या तुर्श देखा गया है. अपने पात्र/चरित्र पर वह बराबर तीखी पैनी खरादभरी निगाह रखता चलता था; कुछ इस तरह कि देखें बच्चू, बचकर कहाँ जाता है! ठीक वैसे जैसे इस कहानी में लेखिका का असलम की बीबी जुबैदा के प्रति लगातार तीखा रवैया है. पाठक के मन में उसके प्रति अन्त तक एक तरह की वितृष्णा और अनमनापन-सा बना रहा आता है तो दरअसल इसलिए कि वह हमारे अज़ीज़ बेचारे कथानायक असलम को लगातार कोसती, परेशान करती रहती है! असलम के प्रति एक पाठक के बतौर सहानुभूति का ग्राफ़ हमारे मन में लगातार ऊपर चढ़ता चलता है. अतः जब हम उसे ऐसा काइयांपन और टुच्चापन करते देखते हैं तो यक़ायक़ यक़ीन नहीं हो पाता कि यह वही हमारा नायक है, जो एक तरफ़ ग़रीबी तो दूसरी तरफ़ बीबी के दबावों से परेशान है! जब हम उसे अपने दिलोजान से प्यारी सरवरी के साथ ऐसी ग़द्दारी करते देखते हैं तो हमारा सारा तिलिस्म तार-तार हो जाता है और कहानी नितान्त अविश्वसनीय हो उठती है कि आख़िर लेखिका हमारी पाठकीय अस्मिता के साथ यह कैसा खिलवाड़ अब तक करती रही! एक पाठक के बतौर हम तय नहीं कर पाते कि लेखिका पहले वाले असलम के साथ है या इस दूसरे वाले ग़द्दार असलम की खोचड़ी वह करना चाह रही है? इस स्पष्ट  पक्ष -ग्रहण या स्टैंड के अभाव में कहानी गुड्डे-गुड़ियों का खेल बनकर रह जाती है. भाववादी या मनभावन तरीक़े से कहानी कैसे लिखी जाती है, यह कहानी उसका उल्लेखनीय उदाहरण है.

इसी तरह उनकी एक और कथित रूप से अतिचर्चित कहानी ‘प्रेतयोनि’ को लिया जाए. इस कहानी पर कानपुर विश्वविद्यालय के प्रांगण में उपस्थित दो उदग्र श्रोताओं की प्रतिक्रियाओं का जो हवाला चित्राजी ने अपनी ‘चर्चित कहानियाँ’ (सामयिक 2006) की भूमिका ‘पाठकों की सत्ता’ में दिया है, उसमें यह चीज समझ से परे है कि डा. सुरेश अवस्थी और डा. प्रेमा रश्मि में से डा. प्रेमा रश्मि की ही प्रतिक्रिया लेखिका को क्यों पसन्द आई? क्या इसलिए कि वह लेखिका के अभिप्रायानुकूल है? फिर यह पाठक की सत्ता कहाँ हुई; यह तो अन्ततः लेखक की ही सत्ता स्थापित हुई न! हमें लेखक की सत्ता से कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते कि वह पाठक के जनतान्त्रिक अधिकारों के आड़े न आने लगे. डा. सुरेश अवस्थी का अभिमत, हो सकता है, थोड़ा पूर्वाग्रही हो, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘‘कहानी को चरमोत्कर्ष की ओर ले जाने के लालच में लेखिका ने मां के भीतर अविश्वास आरोपित किया है. यथार्थ में कोई मां अपनी बेटी के प्रति इस कदर अमानवीय नहीं हो सकती.’’ (चर्चित कहानियाँ, सामयिक प्रकाशन 2006, पृ. 07). लेकिन डा. प्रेमा रश्मि का यह अभिमत और ख़ुद लेखिका द्वारा उसे उद्धृत किया जाना तो और भी ज़्यादा गड़बड़ है कि जिसमें उन्होंने कहा कि ‘‘कहानी में वर्णित सत्य में रत्ती भर भी अतिशयोक्ति नहीं. वास्तविकता यही है कि जिस समाज में बेटे के सात खून माफ कर देने की परंपरा हो उसी समाज में निर्दोश बेटी के साथ लोकापवाद की आड़ में किस सीमा तक अमानवीय हुआ जा सकता है, इसका अनुमान मां के आंचल में विशेश दर्जा पाने वाले पुत्रों को होना असंभव है…’’ (वही).

यानी कि डा. सुरेश अवस्थी के अभिमत को आप इसलिए नकार देंगी कि वह एक बेटे (पुरुष ) के मुँह से निकला है! हम, निश्चय ही, जैसा कि हमने कहा, यह आवश्यक नहीं कि डा. सुरेश अवस्थी के मत से इत्तिफ़ाक़ रखा ही जाए; लेकिन यह तो और भी अनावश्यक होगा कि आप उसे इसलिए नकारें कि वह एक पुरुष का अभिमत है! निश्चय ही हम यह मानते हैं कि हर व्यक्ति की अभिव्यक्तियों/प्रतिक्रियाओं की संरचना में उसके जेण्डर का कहीं न कहीं कुछ न कुछ हस्तक्शेप अवश्य होता है, लेकिन डिक्लास और डिकास्ट होने की तरह डिजेण्डर या कि जेण्डर न्यूट्रल होने की भी एक प्रक्रिया होती है जो डिक्लास और डिकास्ट होने की ही तरह बल्कि उससे थोड़ा ज़्यादा ही असुविधाकारी और दुरूह होती है. असम्भव होती है, ऐसा नहीं; यह बिल्कुल सम्भवनीय है, बशर्ते कि आपका मष्तिष्क अनुनादी और सूक्ष्मरन्ध्र उभयलिंगी मस्तिष्क जैसी पूर्ण विकासावस्था को प्राप्त हो चुका हो. ऐसा पूर्ण विकसित उभयलिंगी मस्तिष्क ही सृजनात्मक होता है. (वर्जीनिया वुल्फ). एकलिंगी मस्तिष्क; चाहे वह स्त्री का हो या पुरुष  का; लैंगिक विभाजन के आग्रहों से मुक्त नहीं हो सकता. अतः उक्त दोनों प्रतिक्रियाओं को हमें इसी उभयलिंगी मस्तिष्क के स्वभावानुसार ग्रहण करना होगा. खेद है कि चित्राजी ऐसा नहीं कर पातीं! ऐसा नहीं है कि वे ऐसा कर नहीं सकती थीं. बाक़ायदा वे ऐसा कर सकती थीं. अपनी कई कहानियों में उन्होंने अपने उभयलिंगी सृजनात्मक मस्तिष्क का उल्लेखनीय परिचय दिया है, जैसे कि ‘त्रिशंकु’, ‘पाली का आदमी’, ‘अपनी वापसी’ आदि; हालाँकि इन कहानियों में भी कुछ गहरी और ध्यानाकार्षी गड़बड़ियाँ हो गई हैं, जिन पर विचार आगे. ‘प्रेतयोनि’ पर डा. रश्मि के उक्त अभिमत के सामने वे विवश हैं क्योंकि दरअसल यह गड़बड़ कहानी में ख़ुद उनकी की हुई है.

पाठक विचार करें कि लोकापवाद क्या इस कहानी की अन्तर्वस्तु का अपना स्वाभाविक हिस्सा है? मेरी बात कुछ लोगों को अटपटी लग सकती है, पर कहानी की वस्तु को ज़रा ग़ौर से देखिए तो पता चलेगा कि लेखिका ने जानबूझकर कहानी में ट्विस्ट पैदा किया है. कहानी साफ़ दो विपरीत दिशाओं में एक साथ चलती दिखाई दे रही है. यह ज़रा तसल्ली से सोचने की बात है कि कुमारी अनिता गुप्ता की बहादुरी, संघर्शशीलता और संघर्शक्शमता, प्रत्युत्पन्नमति, आत्मविश्वास, आत्मबल, धैर्य, प्रतिरोध इत्यादि का मूलाधार, मूलस्रोत और उत्प्रेरणा क्या और कहाँ अवस्थित रही हैं? उसमें झाँसी की रानी और दुर्गा जैसी सक्शमताएँ कहाँ से आईं? कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है. ख़ुद कहानी बाक़ायदा इसका स्पश्ट ज़वाब देती दिख जाएगी. दरअसल यह उसका अपना परिवार ही था; विशेशतः उसके अम्मा-बाबूजी; सबसे ज़्यादा बाबूजी; जहाँ से यह ऊर्जा उसे मिली थी, मिलती थी. कहानी में एक नहीं अनेक जगह साफ़ इसके हवाले आए हैं. जैसे यह कि ‘‘कहां से संचित किया था आत्मबल अपने रोम-रोम में? बाबूजी से ही पाया था न?’’ (आदि-अनादि -3, पृ. 97). कहानी में इन बाबूजी के विशय में और जो कुछ कहा गया है, वह निहायत ही एक जेण्डर न्यूट्रल उभयलिंगी विकसित सृजनात्मक मस्तिष्क की उपस्थिति की सूचना देने वाला है कि बाबूजी स्त्री सम्बन्धी परम्परागत पितृसत्तावादी सोच से एकदम मुक्त हैं कि ‘‘बाबूजी ही कहते थे न-बेटियां ही मेरे बुढ़ापे की लकुटिया बनेंगी.  यही व्यक्ति है, जो अम्मा से हमेशा इस बात के लिए लड़ता-भिड़ता रहा कि मैं अपनी लड़कियों को कुछ दहेज में दूंगा तो सिर्फ शिक्षा. शिक्षा  ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगी. अपनी ऊंच-नीच स्वयं निबटेंगी.’’ (वही, पृ. 96-97). शायद इसी मस्तिष्क से उपजा यह वाक्य भी था, जो अपनी बेटी के लौटने के समय उनके मुँह से फूटा था कि ‘‘भूल जा बेटी, जो कुछ तुझ पर बीती, सोच ले, दुःस्वप्न था. हमारे लिए यही बहुत है कि तू जीवित है…हमारी आंखों के सामने है. तू एक नहीं, दो-दो यमराजों को पछाड़कर आ रही है.’’ (वही, पृ. 99).

यह कहानी की एक दिशा थी.


कहानी की दूसरी दिशा वहाँ से शुरू होती है, जहाँ अख़बार में एक दिन पहले उसके साथ घटे वाक़ये की ख़बर ‘एक बहादुर लड़की की शौर्यगाथा’ बाॅक्स आइटम के रूप में उनके दृष्टि पथ  से गुज़रती है और लेखिका के सहयोग से एकदम बेतरह पलटी खाते हुए वे खाप पंचायतों के प्रवक्ताओं-प्रतिनिधियों के निम्नतम ग़लीज़ स्तर पर उतर आते हैं. इस ख़बर के बाद पूरे परिवार का जो पितृसत्तात्मक ध्रुवीकरण क़दम-दर-क़दम उभरकर सामने आता है, वह हैरतअंगेज़ है. इस ध्रुवीकरण को अपरिक्राम्य और सहज-स्वाभाविक बनाने के लिए कुछ मिर्च-मसाले भी डाले गए हैं, जैसे यह कि ‘‘नाड़ा?’’ ‘‘टूट गया? कैसे?’’ नाड़ा गठियाया हुआ नहीं था, फिर भी टूट गया; इसका मतलब? यानी कि कहीं कुछ ‘गड़बड़’/‘ग़लत’ ज़रूर हुआ! लड़की के कहने से क्या होता है कि ‘‘भागते-भागते…’’ ‘‘टूट गया’’ (वही, पृ. 102). और यह कि ‘‘हाथ आई को मर्द छोड़ता है कहीं?’’ (वही, पृ. 108). और यह भी कि ‘‘महीने को कितने दिन शेष  हैं?’’ (वही, पृ. 102). कोई लाख चाहे यह कहता रहे कि ‘‘हाथ आती तब न! तुमसे झूठ बोला है कभी?’’ (वही). और कहानी भी चाहे पाठकों को बराबर यह बताती रहे कि ‘‘अपने आत्मसंघर्ष  के बूते पर पाई मुक्ति’’ (वही, पृ. 93), ‘‘साहसी अनिता ने बड़ी बहादुरी से वहशी टैक्सी-चालक का सामना किया और किसी प्रकार उस दरिंदे के चंगुल से निकल भागने में सफल हुई.’’ (वही, पृ. 95), ‘अम्मा, तुम जिस आशंका से पीड़ित होकर यह प्रश्न पूछ रही हो, वैसा कुछ उस कामुक राक्षस  की पूरी कोशिश के बावजूद संभव नहीं हो पाया! मैं प्राणपण से लड़ी हूं…’ (वही, पृ. 102-03); आदि-आदि; पर लेखिका ने जो तय किया हुआ है, उसे उससे राई-रत्ती टस से मस नहीं होना है! आख़िर क्या तय किया हुआ है, लेखिका ने?
दरअसल यही कि उसे एक ऐसी कहानी लिख मारनी है जो लोकापवाद का सांघातिक यथार्थ उजागर कर सके. इस विनिश्चय में कोई बुराई नहीं थी. लोकापवाद एक भारी भावुकतावादी समस्या है. लेकिन इस कहानी में तो वह भी नहीं है. यहाँ दरअसल लोकापवाद नहीं, उसका ‘प्रेत’ है. यानी कि लोकापवाद नहीं, मात्र उसका आभास! आभासी लोकापवाद! सारी कहानी की ऊर्जा का कचूमर इस एक जानबूझकर लाए गए ‘लेखकीय’ वाक्य ने निकाल कर रख दिया; जो कि ख़ुद लेखिका भी जानती थी कि यह निर्मूल है-‘‘भोपाल से आ रही  अनिता गुप्ता  मथुरा के निकट शहर से दूर एक निर्जन स्थान पर कामुक टैक्सी-चालक की हवस का शिकार हुई.’’ (वही, पृ. 94). इसके अगले ही वाक्य में हालाँकि इसका स्पष्टीकरण है कि यह एक अर्धसत्य ही है. ‘हवस का शिकार हुई’ का वह अर्थ नहीं है, जो लिया जाता है. बलात्कार दरअसल हुआ ही नहीं. लेखिका बार-बार हमें याद दिलाती चलती है कि ध्यान रहे, बलात्कार हुआ नहीं! जब बलात्कार हुआ ही नहीं तो चिन्ता की बात क्या? इस कहानी की ‘तारीफ़’ यह है कि बलात्कार से ज़्यादा भयावह स्थितियाँ इसने पैदा कर दीं! क्यों आख़िर लेखिका को बार-बार यह साफ़ करना पड़ रहा कि बलात्कार नहीं हुआ? यदि हो जाता तो कहानी की संरचना में क्या फ़र्क पड़ जाता?
लेखिका का पहला दुराग्रह यह है कि बलात्कार नहीं हुआ और दूसरा दुराग्रह यह कि नहीं हुआ तो क्या हुआ, घर वाले तो मान रहे हैं कि हुआ! पाठक देखें कि माँ आख़िर उसे कौन-सा काढ़ा पिलाने पर आमादा है! ये सन्दर्भ ऊपर आ चुके हैं. माँ को लग गया है कि बेटी की माहवारी में शायद देरी हो गई है और यह भी कि क्यों? वह यह पक्के तौर पर मान कर चल रही है कि अब कुछ बचा नहीं है! इसीलिए वह कहती है-‘‘काढ़ा पी लेने से महीना किसी हालत में नहीं रुकेगा…’’ (वही, पृ. 108). यानी कि आभासी यथार्थ का ऐसा घटाटोप कि कथानायिका के साथ पाठक भी पनाह माँगने लगे! कहानी ख़ुद यहाँ अपने केन्द्रीय चरित्र के ख़िलाफ़ चली जाती है. डा. सुरेश अवस्थी ने शायद इसीलिए इस अविश्वास के मार्फ़त लेखिका के कहानी को चरमोत्कर्ष  की ओर ले जाने के लालच वाली बात उठाई थी. लेकिन डा. अवस्थाी शायद एक बात भूल गए. उन्हें दरअसल कहना चाहिए था कि कहानी को नहीं, कहानी में सायास आरोपित एक आभासी यथार्थ को चरमोत्कर्ष  की ओर ले जाने का लालच वस्तुतः लेखिका के मन में था!

एक तरह से कहा जाए तो दरअसल आभासी यथार्थ का चरमोत्कर्ष ही चित्रा मुद्गल की कहानी-कला का नाभि-केन्द्र है. उनकी कोई भी कहानी उठाकर देखी जाए; आभासी यथार्थ उसके केन्द्र में मिलेगा. आभासी यथार्थ अर्थात् यथार्थ का सम्भ्रम अर्थात् एक प्रकार का अयथार्थ यथार्थ अर्थात् भाववाद या भावुकतावाद; और थोड़ा आगे चलें तो, एक प्रकार का गढ़ा हुआ यथार्थ. यह गढ़ा हुआ यथार्थ उनकी अधिकांश कहानियों में अधिकांशतः देखा जा सकता है. चाहे वह उनकी प्रारम्भिक कहानी हो या परवर्ती. जिन्हें वे अपनी ‘बहुचर्चित’ कहानियाँ मानती हैं, वे दरअसल इसी गढ़े हुए यथार्थ से आक्रान्त कहानियाँ हैं. चाहे वह ‘अपनी वापसी’ हो या ‘भूख’ हो या ‘लकड़बग्घा’ हो या ‘मामला आगे बढ़ेगा अभी’ हो. ये सब की सब कहानियाँ अन्दर ही अन्दर कुछ ऐसी दरारों से भरी पड़ी हैं कि मन यक़ायक़ झुँझला उठता है कि आख़िर इतनी-सी बात लेखिका के दिमाग़ में आने से कैसे रह गई! जैसे कि ‘भूख’ कहानी को ही लिया जाए तो कहानी ख़त्म करने के बाद सबसे पहली बात दिमाग़ में यही आती है कि क्या कहानी इसी तरह गढ़ी जाती है! भूख में निहित ‘यातना, अमानवीयकरण, शोषणजन्य हत्या’ इत्यादि (चर्चित कहानियाँ, पृ. 07) से हमें कोई ऐतराज़ नहीं है. हम तो सिर्फ़ यह जानना चाहते थे कि इस कहानी की लक्ष्मा आख़िर कैसी माँ रही कि शाम से सुबह तक छोटू उसके पास होता था फिर भी वह उसकी यह असलियत नहीं समझ पाई कि दिन भर खाने को उसे कुछ नहीं मिला है, वह निपट भूखा है! क्या यह माना जा सकता है कि छोटू जितने छोटे बच्चे की भूख का पता ही न चले? यह अज़ीब है कि कांबले तायी को तो यह पता है कि भीख माँगने के लिए इस तरह किराए पर लिए बच्चों की क्या नियति होती है कि-‘‘वो छिनाल बच्चे का पेट भरती तो बच्चा आराम से गोदी में सोता, पिच्छू उसको भीक कौन देता? अरे वो बच्चे को फकत भुक्काच नईं रक्खते, रोता नईं तो चिकोटी काट-काट के रुलाते कि लोगों का दिल पिघलना…’’ (वही, पृ. 48-49) पर लक्ष्मा लगातार इसी मुग़लते में है कि ‘‘वो तो बोलती होती कि वो उसको दूध देती…बिस्किट खिलाती…’’ (वही, पृ. 48). लक्ष्मा का यह ‘भोलापन’ कितना विश्वसनीय है, पाठक ख़ुद इस पर विचार करें. हम तो सिर्फ़ इतना कहना चाहते हैं कि इतने छोटे बच्चे में रात भर में भूख का कोई लक्षण  न दिखे, यह क़तई एक अनहोनी और मनगढ़न्त बात है. क्या यक़ायक़ ऐसा हो सकता है कि रातों-रात किसी बच्चे की आँतें सूखकर चिपक जाएँ! बड़े से बड़ा रोग भी सांघातिक होने के पहले अपने कुछ लक्षण दिखाता है. जो हो.

यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि लक्ष्मा को अपने छोटे-से बच्चे की इस स्थिति की क़तई भनक तक नहीं लगी! कहानी में सिर्फ़ इतना उल्लेख है कि ‘‘इधर छोटू बोत चीं-चीं करने लगा है.’’ (वही, पृ. 46). लेकिन लक्ष्मा इसे उसकी नखरेबाज़ी से अधिक कुछ नहीं समझती-‘‘उसे लगता है कि दिनभर जग्गूबाई की गोदी चढ़े रहने और घर से बाहर रहने के कारण छोटू को घुमक्कड़ी की बुरी लत हो गई. यही वजह है कि घर में घुसते ही वह लगातार मिमियाता रहता है और चाहता है कि कोइ-न-कोई उसे गोदी में उठाए ही रहे.’’ (वही). इसीलिए जब यह सुनकर कि बच्चा भूख से मर गया, उसकी आँतें सूखकर चिपक गईं; उसके गले से ‘आरी-सी काटती एक करुण चीख फूट पड़ी’ (वही, पृ. 48) तो एकाएक विश्वास नहीं हो पाता कि यह सचमुच एक माँ की चीख है! पता नहीं, कृष्णदत पालीवाल सचमुच में ही इससे भीतर तक हिल गए थे (द्रष्टव्य वही, पृ. 07) या शायद उन्हें भी लगा कि नहीं हिलेंगे तो उन्हें सहृदय पाठक कौन मानेगा! निश्चय ही भीतर तक तो मैं भी हिला, लेकिन इसलिए नहीं कि लक्ष्मा के दुःख, उसके तड़पते ममत्व से मुझे कोई सहानुभूति थी. दरअसल कहानी की अन्तर्वस्तु ममत्व है ही नहीं. भूख भी एक सीमा तक ही कहानी की वस्तु बनी रहती है. उससे आगे वह भी चुक जाती है. तो फिर इस कहानी की असल अन्तर्वस्तु क्या है?


मेरी दृष्टि  में इस कहानी की अन्तर्वस्तु दरअसल निम्न/सर्वहारा वर्ग का वह शर्मनाक यथार्थ है, जिसमें एक माँ अपने बच्चों को पालने के लिए अपने दुधमुँहे बच्चे को भिखमंगी औरतों को किराए पर उठाने को विवश है. लेकिन यथार्थ का यह सिर्फ़ एक व पूर्ववर्ती पहलू है. इस यथार्थ का दूसरा व उत्तरवर्ती पहलू यह है कि यह यथार्थ नहीं यथार्थवाद है और हर्गिज़ इसके चंगुल में फँसने की ज़रूरत नहीं है! यथार्थ वास्तविकता तो यह है कि भिखारिनों को भीख माँगने के लिए अपने दुधमुँहे बच्चे को किराए पर दे देना लोगों के लिए अब एक धन्धा बन चुका है. यहाँ भावुकता, रिश्तों की संवेदना इत्यादि का कोई स्थान नहीं, यह शुद्ध एक ‘धन्धा’ है. देशभर में बाक़ायदा इसका पूरा जाल बिछा है. कहानी में भी एक जगह इसे धन्धा ही कहा गया है.लक्ष्मा के मँझले बेटे किस्तू से एक जगह कहलवाया गया है,-‘‘छोटू धन्धे पर से नहीं आया? आएगा तो पिच्छू भाकरी देगी?’’ (वही, पृ. 46). गड़बड़ दरअसल यह हुई है कि लेखिका ने अपना सारा ध्यान  इस यथार्थ के पहले पक्ष  पर केन्द्रित कर दिया जो कि इस यथार्थ का सिर्फ़ एक भाववादी पहलू है. एक माँ की पीड़ा को नज़रन्दाज़ करना हमारा मक़सद नहीं है. ऐसी हिमाक़त कोई भला कर भी कैसे सकता है! लेकिन कोई भला क्या इस जघन्य वास्तविकता से भी आँख चुरा सकने की हिमाक़त कर सकता है कि अपने दुधमुँहे बच्चों को भिखमंगी औरतों को किराए पर दे देने का चलन अब एक व्यवस्थित व्यवसाय बन गया है? मेरा विनम्र ख्याल है कि चित्राजी यदि इस बिन्दु की संकेन्द्रीयता से इस कहानी को उठातीं तो कहानी कहीं ज़्यादा मौज़ूँ और ठोस यथार्थपरक हो आती. इस वस्तु को इस कोण से यदि विकसित और निरूपित किया जाता, समझा जाता तो शायद और ज़्यादा गहरी कारुणिक आरी-सी काटती चीख ख़ुद पाठक को अपने अन्दर से फूट पड़ती सुनाई पड़ती जो उसके कलेजे को चीर कर रख देती. फ़िलहाल तो यह कहानी कथित ममत्व के इकतरफ़ा भाववाद में सिमटकर रह गई है.

इसी तरह का एक इकतरफ़ापन उनकी ‘मामला आगे बढ़ेगा अभी’ कहानी में भी दिखाई देता है बल्कि कुछ डिग्री ज़्यादा ही जहाँ, एक सर्वहारा किशोर अपनी मालकिन के आभासी मातृत्व के फेर में लगभग पागलपन की स्थिति में पहुँच रहा है. इस कहानी के बारे में कहा जा सकता है कि यह एक ‘पीड़ित ममत्व’ की कहानी है. पीड़ित ममत्व किसका? तय है कि मोट्या का! आख़िर क्यों? यह मेम साहब की तरफ़ से क्यों नहीं? मोट्या की तरफ़ से ही क्यों? मोट्या की तरफ़ से इसलिए कि वह बेचारा मातृत्व-विहीन अभागा अनाथ ‘बच्चा’ है और अपनी ज़िन्दगी में पहली बार जो वह एक अधेड़ औरत के सम्पर्क में आया तो फिर जैसे न केवल उसकी नौकरी बल्कि उसकी अब तक की कमी माँ की ज़रूरत भी उससे पूरी होती दिखी. लिहाज़ा वह अपनी मेमसा’ब माँ को साधिकार अपना दिल दे बैठा. उसका दिमाग़ ठनका तब जब बीमारी के कारण ड्यूटी में हुए नागा के चलते उसकी पगार में कटौती कर ली गई, ‘खाड़ा’ काटा गया और मेमसा’ब ने उसे कटने दिया. न केवल इतना बल्कि यह भी कि सा’ब ने खाड़ा के वास्ते झगड़ने पर मोट्या को ‘‘झापड़ चढ़ा के दफा हो जाने को बोला’’ (वही, पृ. 123) और इसके साथ ‘‘धक्का मारके घर से बाहर कर दिया…’’ (वही). मोट्या को दरअसल यह पीड़ा नहीं है कि सा’ब ने उसके साथ ऐसी क्रूरता बरती, बल्कि उसकी असल पीड़ा इस पूरे मामले में मेमसा’ब की लगातार चुप्पी को लेकर है. मेमसा’ब के इस अप्रत्याशित/संदिग्ध व्यवहार से उसे असल चोट पहुँची है. वह न केवल तावड़े के सामने यह सब साफ़-साफ़ बयान कर देता है (द्रश्टव्य, वही) बल्कि ख़ुद मेमसा’ब के सामने तक यह उलाहना देने से नहीं चूकता कि ‘‘तुमने खाड़ा कटवा दिया न मेमसा’ब…अपने सामने चांटा मारने कू दिया न!…मैं…मैं…’’ (वही, पृ. 125). सा’ब ने क्रूरता बरती और मेमसा’ब का उसे मूक समर्थन मिला; लिहाज़ा अब मोट्या के पास इसके अलावा और क्या रास्ता है कि वह इस ‘अपनी’ पर उतर आए और उन सबको बता दे कि वह क्या चीज है!

इस पूरे वाक़ये को पढ़-सुनकर क्या किसी को कहीं लग सकता है कि यह वर्गचेतना से जुड़ा मामला है? मोट्या के निम्न और सक्सेना सा’ब-मेमसा’ब के उच्च वर्ग से जुड़े होने मात्र से तो यह कहानी वर्गचेतना का प्रतिपादन करने वाली कहानी हो नहीं जाएगी. वर्गदृष्टि का प्रतिनिधित्व तो यहाँ चौकीदार तावड़े कर रहा है जो बार-बार मोट्या को अपने भले-बुरे का ज्ञान कराता रहता है.

बात दरअसल अपने भले-बुरे के ज्ञान की यहाँ नहीं है. बात यह है कि मोट्या का मामला आगे कहाँ तक बढ़ेगा और कुछ बढ़ेगा भी या नहीं? लेकिन इससे पहले तो यही तय करना पड़ेगा कि मोट्या का मामला आख़िर है क्या? ऊपर हमने अपनी समझ से इस कहानी के बारे में जो कयास लगाया है, उसके हिसाब से तो मोट्या का मामला विशुद्ध रूप से एक भावनात्मक विक्षोभ  का मामला है. हिन्दी की मसाला फ़िल्मों में ऐसे भावनात्मक दृश्य आए दिन आपको देखने को मिल जाएँगे जहाँ अमीर माँ अपने नौकर को अपने बेटे जैसा समझती देखी जाती है या इसके उलट भी कि किसी ग़रीब माँ के चरणों में किसी अमीरज़ादे होनहार को ज़न्नत के दर्शन होते दिखाई देने लगते हैं. क्या सचमुच इस भावुकतावाद का कोई भविष्य होता है? क्या चित्राजी मोट्या के आक्रोश को वर्गीय आक्रोश के बतौर पेश करना चाह रही थीं? यदि ऐसा है तो हिन्दी फ़िल्मों में अमिताभ बच्चन की सारी एंग्री-यंगमैन की भूमिकाएँ तथा और भी बहुत सारे टपोरी टाइप कैरेक्टर सर्वहारा के वर्गीय आक्रोश की प्रतिमूर्ति हो उठेंगे. फिर भला क्रान्ति आने और सक्सेना सा’ब जैसे जनविरोधी लोगों और मेमसा’ब जैसी गद्दारों की अक़्ल ठिकाने आने में क्या देर लगनी! हम मानते हैं कि मोट्या के दिल को गहरी ठेस लगी है और वह चुप बैठने वाला नहीं है. चाहे इकतरफ़ा ही सही, भावुकता का कुछ न कुछ असर तो आदमी पर पड़ता ही है. तो आगे क्या करेगा मोट्या? उसका आक्रोश किस रूप में विस्फोट करेगा आगे? जो हो, जैसा भी हो, मेरा यह दृढ़ मत है कि वह नितान्त वैयक्तिक और निजी, कुछ हद तक शायद षड्यन्त्रमूलक भी; होगा. इसके अलावा कुछ नहीं. कम से कम उसका कोई वर्गीय-जैसा चरित्र तो नहीं ही होगा. पता नहीं, मोट्या में कौन-सी वर्गीय सम्भावना लोगों को दिखाई देती है?

मेरा मानना है कि जैसा कि ऊपर उनके एक संग्रह की भूमिका के एक अंश के मार्फ़त मैंने संकेत किया; चित्राजी बहुत सारी चीजों को एक साथ समेटकर चलने की कोशिश करती हैं. इन बहुत सारी चीजों में कुछ एक-दूसरे की धुर विरोधी और कुचालक भी होती हैं. दुर्भाग्यवश वे इनकी छँटनी करना भूल जाती हैं या कई बार ऐसा भी होता है कि जानते-बूझते उन्हें वे अपने साथ लगाए-लगाए फिरती हैं कि शायद इनके बिना वे सत्ता-विहीन हो जाएँगी! सत्ता और विमर्श के बीच के अन्तर्सम्बन्धों की रवायत को ध्यान में रखते हुए आज चित्रा मुद्गल ही नहीं, और भी कई रचनाकारों की रचनाओं का पुनराकलन करने का वक़्त आ गया है.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

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बिना इजाज़त अन्दर आना मना है

अर्चना वर्मा

प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क: mamushu46@gmail.com 

वर्जीनिया वुल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. 

आयताकार. तीन दीवारो पर किताबों के शेल्फ़. चौथी दीवार में एक खिड़की और दीवार के सहारे एक दीवान. खिड़की के बाहर कोहरा, घना, सफ़ेद, ठोस, अपारदर्शी अपारदर्शी. खिड़की पर शीशा न होता तो जंगले का लिहाज़ किये बिना कमरे मेँ घुसा चला आ रहा होता. इससे ज़्यादा तो घने अंधेरे में भी सूझ जाता है. कम से कम आभास तो होता है, कोने में ज़्यादा घने होते अँधेरे से किसी परछाईं का, किसी और वजूद का. सफ़ेद मुझे इतना प्रिय होने के बावजूद पता नहीं क्यों इस वक्त ऐसा लग रहा है कि सफ़ेद को नाहक महिमा-मण्डित किया जाता है. भोला, पवित्र, निष्पाप वगैरह. लेकिन अन्धकार भी होता है वह. सफ़ेद होने के बावजूद. बीच दिसम्बर की एक सुन्न शाम. इस एक इकलौती, कोहरे से ढकी खिड़की वाले सन्नाटे कमरे मेँ लगता है इस क्षण जैसे कुल इतनी ही दुनिया है, इसके बाहर सारे ब्रह्माण्ड में कहीँ कुछ और है ही नहीं, कोई जीव-जन्तु – चरिन्दा, परिन्दा या दरिन्दा – कोई बस्ती, कोई आवाज़ कहीं कुछ भी नहीं.खिड़की से लौट कर मैँ कमरे में देखती हूँ.


यह सृजन का एकान्त है. कमरे, दीवार और खिड़की में उसका बिम्ब मैं रचती हूँ लेकिन दीवारों में वह समाता नहीं है, वह मेरे अस्तित्व के भीतर कहीं पैठता, मेरे दिमाग के रगो-रेशे में भिनता, मेरे साथ साथ होता है, हर कहीं. और अक्सर तो जहाँ मैं नहीं होती हूँ वहाँ भी –

” बार बार लौट आने के लिये / यही एक द्वार / मेरी प्रतीक्षा में रहता है/
परिचित हर कील, हर निशान, हर दीवार / चक्करदार सीढ़ियाँ और कोनों में / गाढा होता हुअ अन्धकार
यहाँ नहीं है उधार की रोशनी और माँगा हुआ संगीत.
खिड़की पर एक परदा है रेशमी / हवा से हिल जाता है / सबकुछ उसके बाहर है – /कोई आहट, कोई आघात, कोई आसमान / बिना इजाज़त अन्दर आना मना है.
उस पार दुनिया बहुत छोटी रह जाती है / यहाँ सिर्फ़ अपने झुलसने का प्रकाश है / बीमार ज़मीन और बौना आसमान / ढो नहीं पाते उसका ताप / कृपा करुणा दान – मुझे कुछ भी नहीं स्वीकार / चाहे उसे प्यार कहो या बन्धुता /अन्दर आने की इजाज़त नहीं है.
सिर्फ़ एक परदा है, रेशमी / हवा उसे हिला सकती है / और मैं यह फ़ासला तय करने से /इंकार कर देती हूँ.
बार बार लौटकर आने के लिये वही द्वार / कभी रक्षा के लिये गढ़ है, कभी कारागार.”

आज मेरे पास यह कमरा है. सचमुच का मेरा अपना कमरा. अपना साम्राज्य. यहाँ किसी का कोई दखल, कोई घुसपैठ, कोई हस्तक्षेप नहीं. कहीं कोई ऐसा आभास तक नहीं. स्वच्छन्दता का यह शब्दातीत अनुभव, स्वयं अपना मोल ; अनमोल. मेरे सृजन का एकान्त. नहीं,यह संसार से विमुखता का पर्याय नहीं है, सामाजिकता से त्रुटित एकान्त नहीं है, किसी दूसरे वजूद की असहनीयता नहीं है. लेकिन इस क्षण यह, बस, ऐसा ही है. सुन्न, निश्चील, शब्दातीत. अचेतन की तलहटी को मथ कर उठती हलचल से फूटते शब्दों और उनकी बुनावट के तन्तुओं के जाल के फैलने की प्रतीक्षा का मौन एकान्त. यह कोई हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करता.

मजीद भाई की ज़िद है कि मुझसे मेरे कमरे के बारे में लिखवाये बिना अपनी किताब को छपायेंगे ही नहीं और मैँ हूँ कि अब तो कई बरस हुए, टालती ही जा रही हूँ. नहीं, मुझे न लिखने की कोई ज़िद नहीं. बस ठीक ठीक पकड़ नहीं पा रही हूँ कि मेरे इस कमरे के बारे में ऐसा क्या है जो लिखने लायक हो. क्या लिखा जा सकता है कमरे के बारे में? मजीद भाई के स्तम्भ मेँ शामिल सभी भागीदार चूँकि लेखक हैँ इसलिये नतीजा निकाला जा सकता है कि मेरे कमरे का मतलब लिखने का कमरा है. लेकिन ऐसा मैने अब तक लिखा ही क्या है; और जो कुछ भी लिखा है वह इतना थोड़ा और कभी कभार; कि बावजूद लिखने की मेज़ और किताबों की अलमारियों के, मैँ खुद को लेखक और अपने बैठने की इस जगह को खींच-तान कर भी लेखक के कमरे की तरह परिभाषित करना एक तरह की ज़्यादती या मज़ाक ही पा रही हूँ.


तो समझिये कि यह कुल मिलाकर एक स्त्री का कमरा है जिसे पढ़ने, सोचने, समझने और कभी कभार कुछ लिख लेने का भी मुगालता है. और यही फ़िलहाल इस कमरे की आबादी और उसके संसार को निश्चि त, निर्धारित और परिभाषित करने वाला तथ्य है. इस आबादी का कुछ प्रतिशत पुरुषों का भी है लेकिन फ़िलहाल बात एक स्त्री की, और उसके कमरे की है. यह स्त्री कभी कभार की लेखिका और यह कमरा उसके लिखने की जगह है इसलिये फ़ोकस फ़िलहाल स्त्री पर ही है. इस स्त्री ने तकरीबन पचास साल पहले एक किताब पढ़ी थी, जो पचासी साल पहले लिखी गयी थी – ‘ए रूम ऑफ़ वन्स ओन’. वह साहित्य-जगत का, खास तौर से स्त्री-साहित्य-जगत का मौलिक ‘मेरा कमरा’ था.

हमको भले लगता हो, एक खास उम्र में तो ज़रूर, कि मानो हम ही पहले-पहल नमूदार हुए हैँ इस अहसास से गुजरने वाले. जैसे नया शिशु देखता है नयी नकोर आँखों से, पहली बारिश. पेड़ में फूटने वाली हर नयी कोंपल को लगता है, धरती पर यह पहला वसन्त है. फिर बीतते हुए बरसों में धीरे धीरे पहचाना जाता हैँ, “हमसे पहले भी बर्दाश्तस की हद थी”. सन 1929 में छपी इस किताब मेँ वर्जीनिया वुल्फ़ ने तय पाया था कि लेखिका बनने की इच्छुक हर स्त्री के लिये ज़रूरी है कि उसके पास अपना पैसा और अपना एक कमरा हो. आमदनी का अपना एक जरिया और बिल्कुल अपनी एक जगह. यह आज़ादी की नींव है. आत्मनिर्भरता जिससे स्त्री वंचित थी. वह पहले विश्व.युद्ध के बाद का संसार था. जब वर्जीनिया वुल्फ़ ने सवाल पूछा था कि इंगलैण्ड में सर्जनात्मकता के चरम शिखर – एलिज़ाबेथ के शासन काल- में सारे के सारे एक से बढ़ कर एक रचनाकार केवल पुरुष ही क्यों हैं, कहीं भूले से भी एक स्त्री का नाम क्यों दर्ज नहीं है? और जवाब में पाया था कि औरत हमेशा वंचित और हीन रखी गयी है, अपने अस्तित्व के लिये दूसरों पर निर्भर रखी गयी है, निर्धन रखी गयी है. निर्धनता का दारुण असर दिल और दिमाग पर पड़ता है. वह सृजन की क्षमता को या तो पनपने ही नहीं देता या छीन लेता है.

आज मेरे पास यह अपना कमरा है और मैँ कोई अपवाद नहीं हूँ. मेरी पीढ़ी में मेरे जैसियों की गिनती भले कुछ कम रही हो लेकिन आज की पीढ़ी में बहुत हैं. पचासी साल बाद हालात बदले हैँ. सारी दुनिया में बदले हैँ. कहीं काफ़ी कुछ. कहीं थोड़ा बहुत. हिन्दुस्तान मेँ भी बदले हैँ.

हालाँकि यह टिप्पणी दुनिया में औरत के बदलते हालात पर तफ़सरा नहीं है लेकिन फिर भी लोभ बहुत है ये सूचनाएँ शामिल कर लेने का जिन्हें मैँ मौका मिलते ही, बल्कि अक्सर तो मौका निकाल कर भी अपने आलेखों में घसीट लाती हूँ. कि आज भी पूरी दुनिया मैँ नितान्त निर्धनता मेँ रहने वाले लोगों की संख्या कुल मिलाकर 1.3 बिलियन है. इनमेँ 70% स्त्रियों का है. यही नहीं, पूरी दुनिया में जो 774 मिलियन वयस्क पढ़ लिख नहीं सकते उनका दो तिहाई औरतों का है. विकासशील दुनिया और तीसरी दुनिया मेँ इज्ज़त के लिये औरत की हत्या आज भी एक सम्मानित प्रथा है. आज भी कानून के बावजूद स्त्री प्रायः शिक्षा और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से वंचित रखी जाती है. भारत मेँ किशोर वय की लड़कियों को “अस्थायी जन” कहा गया है जो एक बार ब्याह दिये जाने के बाद कम से कम अपने पिता के लिये अपना अस्तित्व खो बैठेंगी (“Temporary people who would cease to exist at least by their fathers once they are married”) क्योंकि यहाँ लड़की के विवाह का अर्थ अब भी बड़े पैमाने पर अपने मातृकुल की सदस्यता से वंचित और अस्तित्वहीन हो जाना है. घरेलू हिंसा तथा अपनी स्वतंत्रता पर अन्य सांस्कृतिक और और नैतिक प्रतिबन्ध स्वयं स्त्रियों को भी स्वीकृत हैं – कहीं स्वेच्छा से, कहीं मज़बूरी से.

ये सभी सूचनाएँ यहाँ CARE (Cooperative for Assistance and Relief Everywhere) नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की प्रोजेक्ट रिपोर्टों ( 2008–13) से संकलित की गयी हैँ.

इन सूचनाओं को संकलित करने के लिये ललचाते और इन्हें इस आलेख में शामिल करते हुए मुझे अहसास था कि यह टिप्पणी दुनिया की या हिन्दुस्तान की औरतों के हालात पर नहीं, मेरे कमरे बारे में है लेकिन इन्हें यहाँ दर्ज कर चुकने के बाद मैं महसूस कर रही हूँ कि यह विषयान्तर नहीं. कि मेरा कमरा वहाँ तक फैला है जहाँ मैँ खुद मौजूद रहती हूँ और वहाँ तक भी जहाँ मैँ नहीं भी रहती हूँ. इसका विस्तार सृजन के वायवीय, अतीन्द्रिय एकान्त से लेकर स्मृति के उस माँसल, ऐन्द्रिक संसार तक फैला है जो ज़्यादातर वक्त विस्मृति में बिलाया रहता है, लगभग गायब रहता हुआ भी अचेतन में मौजूद, मेरे समूचे अस्तित्व का अदृश्यह “आयतन”.

पैतालीस साल के अध्यापकीय जीवन में इस कमरे के बाशिन्दों में  जो शामिल होती गयी हैं वे पता नहीं किस कोने अँतरे से उठकर गाहे-बगाहे सामने आ खड़ी होती हैं. वह जिसकी पढ़ाई हर साल छुड़ा दी जाने की आशंका की सूली पर चढ़ी रहती थी ; वह जो फ़ाइनल-इयर के इम्तहान के ऐन पहले ब्याह दी गयी थी, पहले दूसरे साल में प्रथम श्रेणी लाई थी तो क्या, अब तो किताब को हाथ लगाने भर से मारी पीटी जाती है ; वह जिसे बाज़ार से आये सामान के लिफ़ाफे या पुड़िया के अखबारी काग़ज़ से पढ़ने की ललक मिटाने के लिये सबकी नज़र बचाकर बाथरूम में या छत पर छिपना पड़ता है – उन्हें सचमुच के कमरे की तो कौन कहे, अपने भीतर के एकान्त की भी तलाश का मौका मिला ही नहीं; वह भी जो ज़िद ठान कर तरह तरह की बाधाएँ पार कर भी गयी, लेकिन एक दिन किसी पत्रिका या पुस्तक पर उसके छपे हुए नाम और तस्वीर या किसी प्रशंसक के पत्र ने उसके हिस्से में घर और दाम्पत्त्य की एक नयी कहानी शुरु कर दी. वह भी जिसके पास नौकरी भी है और आमदनी का अपना एक जरिया भी लेकिन सारी योग्यताओं और संभावनाओं के बावजूद अपना कमरा यानी अपने वजूद के लिये जगह फिर भी नहीं. वह झेलती है पति के घायल अहं के साथ टकराव या फिर तनाव की परतों में लपेटी हुई कही-अनकही अपेक्षाओं का दबाव कि दाल छौंकने और बटन लगाने जैसे ज़्यादा ज़रूरी काम सँभाले जायें और हथियार (कलम, कॉपी, किताब?) डाल देती है. उसके हिस्से की नौकरी घर की आमदनी बढ़ाने का जरिया भर है, अपनी योग्यता की अभिव्यक्ति का सामान नहीं.

मैँ यहाँ स्त्री की व्यथा-वेदना के अपरम्पार सागर की थाह लेने नहीं बैठी. मानती हूँ कि जिसका उपचार सम्भव न हो वह रोग नहीं, जीवन कहलाता है. तो अपने कमरे के इन बाशिन्दों में मैँ सिर्फ़ उन्हीं की गिनती कर रही हूँ जिनके भीतर खुद अपना एक कमरा पाने की गुंजाइश थी लेकिन पूरी होने से रह गयी, और उनकी भी जो उसे पा लेने के आस-पास तक जा पहुँचने के बावजूद इन बाधाओं को कवच बनाकर अपने आपे का आमना-सामना करने से कतराती रह गयी.

भीतर की घुटन और असन्तोष के नतीजे में  खीझ और चिड़चिड़ाहट के स्थायी नशे में खौलती उबलती इस नायिका को मैं चाहे जो सुझाव दूँ, चाहे जो उपाय बताऊँ, उसके पास हर एक का तोड़ मौजूद होगा जिसकी वजह से वैसा किया नहीं जा सकता. लेकिन असल में इन मज़बूरियों और उनकी चिड़चिड़ाहट के बिना जिया भी नहीं जा सकता क्योंकि उसी मेँ उसकी अपनी अपरीक्षित विशिष्टता का अहसास भी छिपा है. परीक्षा का खतरा वह नहीं उठाती. अभी तो उसके पास बिना लड़े ही एक संघर्ष का अहसास है, असहनीय दुख की शक्ल मेँ एक सुख (?) जिसे वह जीवन-विधि की तरह अपनाती है. उनकी भी गिनती कोई कम नहीं जो मानसिक असन्तुलन के कगार पर आखिरी हद पार कर जाने से जैसे तैसे बची रह कर एक लम्बी लगातार आत्महत्या की अनवरत अवधि को जीवन की तरह जिये जाती हैँ. जो दाम्पत्त्य, मातृत्व और परिवार में ‘स्वयं’ को पूरा विलीन नही कर पाती, अपनी इच्छा, अपने वजूद के लिये लिये थोड़ा सा भी निजी अर्थ, निजी पहचान चाहती है उसकी कहानी के भी अन्य अनेक-आदि- इत्यादि संस्करण होंगे. वे भी मौजूद हैं इसी कमरे के किसी कोने में. एक दिन उठकर सामने आ खड़े होने और अपनी सुनाने की प्रतीक्षा में लेकिन उतना अथाह धीरज, उतनी ताकत, उतनी हिम्मत, उतनी सहानुभूति मैँ कभी जुटा पाउँगी या नहीं, कहना कठिन है. जिसने खुद ही अपने-आपे से इंकार कर दिया है उसकी पीड़ा की थाह लायक अथाह धीरज दूसरे किसीके पास कहाँ हो सकता है? लेकिन इसके बावजूद मेरे कमरे मेँ वे मौजूद हैं. क्यों?



क्योंकि इस बात पर मेरा बस नहीं कि कमरे में किसे दाखिला दूँ और किसे प्रवेश-निषेध की तख्ती दिखा दूँ, ‘बिना इजाज़त अन्दर आना मना है’ की घोषणा के बावजूद! इस उधेड़बुन में ज़रूर कुछ वक्त शायद व्यर्थ खर्च कर सकती हूँ कि क्या-क्या कैसे और क्यों इस कमरे में दाखिल होता और यहीं बसा रह जाता है. प्रवेश निषेध की यह तख्ती चारदीवारी वाले उस ठिकाने पर लगायी जा सकती है केवल, जो तीन तरफ़ किताबों के शेल्फ़ और एक तरफ़ खिड़की भर कोहरे और दीवान से बना है. भीतर से सिटकनी लगा ली जाये या बाहर से ताला डाल दिया जाय, भले ही गाहे-बगाहे दरवाजे का खटखटाया और भीतर के एकान्त क्रिया-कलाप का छन्द-भंग होना या उसे पूरी तरह से छिन्न-भिन्न किया जाना अपवाद की बजाय नियम की तरह ज़रूरी होता हो. एकान्त की यह चारदीवारी इसी दैनन्दिन दुनिया मेँ मौजूद है और उसकी अपनी दिनचर्या, अपनी मजबूरियाँ हैं. उधार के शब्दों में कहूँ तो “एक ढर्रा रोज़मर्रा,” या “जीवन की आपाधापी,” के हमले.

लेकिन इस चारदीवारी में न समाने वाला, हर जगह मेरे साथ चला आने वाला और वहाँ तक भी फैल जाने वाला यह भीतर का कमरा मेरे बावजूद मुझसे अलग एक दुनिया है, सम्प्रभु और स्वायत्त. 1929 के उस मौलिक कमरे की मालकिन वर्जीनिया वुल्फ़ ने कहा था, “ तुम चाहे दुनिया भर के पुस्तकालयों पर ताले डाल दो… “कोई किवाड़, कोई ताला, कोई सिटकनी नहीं जिसे तुम मेरे दिमाग़ की आ़ज़ादी पर लगा सको.”


उस वक्त उसकी दुनिया में पुस्तकालयों पर ताले थे और उसे अपने लिये एक कमरे की तलाश थी. आज मैँ नहीं जानती यह मेरे दिमाग की आजादी है या उस आजादी के सामने खुद मेरी बेबसी. अब कहीं कोई रोक नहीं. अब पूरी दुनिया इसके भीतर है, न कोई निषेध, न कोई वर्जना. रास्ते, चौराहे, पेड़, पहाड़ पंछी, पोखर से लेकर अदब-कायदा, मर्यादा, अमर्यादा, बर्दाश्तत, नाबर्दाश्‍‍त, उन्माद, आक्रोश, ध्वंस, प्यार, सृजन, ईश्वर, मृत्यु और विस्फोट.

यह एक औरत का कमरा है जिसे पढ़ने, सोचने, समझने और कभी -कभी कुछ लिख लेने का मुगालता है.

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