Home Blog Page 98

सॉफ्ट पोर्न नहीं: ये मध्यवर्गीय स्त्री की कामनाओं के नोट्स हैं

एक आंकडे के अनुसार भारत में 67 प्रतिशत लोगों के पास आज भी गैस कनेक्शन नहीं है, वे लकड़ी, कोयला या अन्य इंधन माध्यमों के उपयोग से खाना बनाते हैं- इस तरह गैस की बढ़ती कीमत 67 प्रतिशत का कंसर्न नहीं है, वे उससे ज्यादा गंभीर चिंताओं से घिरे हैं, लेकिन गैस की कीमत बढना 33% के लिए गहरा कंसर्न है और बचे 67 के लिए भी क्योंकि हर बार बढ़ती कीमत गैस तक उनकी पहुँच से उन्हें दूर कर देगा.


सेक्स में ओर्गैज्म की प्राप्ति, सेक्स का पोजीशन या सेक्सुअलिटी की दृष्टि से उत्पीड़ित के भाव से मुक्ति जैसे मुद्दों से ज्यादा जरूरी मुद्दे जरूर हो सकते हैं मातृत्व मृत्यू दर का बढ़ना, स्वास्थ्य  सुविधाओं का अभाव, भ्रूण ह्त्या, आनर कीलिंग, शिक्षा या जाति-वर्ग आधारित आधारित भेदभाव के मुद्दे, लेकिन इन चिंताओं से मुक्त एक समूह के लिए सेक्स में ओर्गैज्म की प्राप्ति, सेक्स का पोजीशन या सेक्सुअलिटी की दृष्टि से उत्पीड़ित के भाव से मुक्ति भी एक गहरा कंसर्न है और वह इस कंसर्न को जाहिर करने के अधिकार से वंचित नहीं हो सकता. और यह भी सच है कि यह कंसर्न जेंडर विभेद से पीड़ित हर स्त्री का होगा, जब विभेद और उत्पीडन के दूसरे मसले जब हल भी हो जायेंगे,  क्योंकि सेक्सुअलिटी जेंडर भेद का मूल आधार है.



लक्ष्य समूह 


ये बातें इसलिए कि पिछले दिनों नीलिमा चौहान की ‘वाणी प्रकाशन’ से आई किताब ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ को लेकर एक समूह हाय-तौबा कर रहा है, वह इस किताब को साहित्य और विमर्श की अगंभीरता का एक नमूना मान रहा है. इसे सॉफ्ट पोर्न तक कहा जा रहा है, तो कई आलोचक प्रकारंतर से इसे स्त्री-विरोधी भी बता रहे हैं. ऐसा भी नहीं है कि प्रकाशन के बाद इस किताब ने सिर्फ तौबा-तौबा ही बटोरे हैं, बल्कि कई प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ और आलोचना मेरी नजरों से भी गुजरे. किताब का आक्रामक प्रचार भी किया प्रकाशकों ने. इस दोहरे वातावरण में मैं यह किताब पढ़ रहा हूँ. हालांकि पूर्व की टिप्पणियाँ या आलोचनायें पूर्वग्रह निर्माण के लिए काफी होती हैं, लेकिन आलोचना कर्म के लिए उनका अपना महत्व भी होता है.


उर्दू की रवानगी वाली हिन्दुस्तानी भाषा( हिन्दी नहीं) का मिजाज आपको यदि बाँध लेता हो, इश्मत चुगताई के कहन का चुटीलापन यदि आपको प्रिय रहा हो और 19वीं सदी की कुछ महत्पूर्ण किताबों, मसलन सीमंतनी उपदेश और स्त्री-पुरुष तुलना की शैली, उसके विमर्श के विषय पुरुषवादी जड़ता को तोड़ने और स्त्रियों के मन-परत पर बैठे अनुकूलन से उन्हें सहज मुक्त करने की दिशा में कारगर लगते हों, तो यह किताब आपको उसी कड़ी में दिखेगी- उसका आधुनिक वर्जन. इस किताब का लक्ष्य समूह मध्यवर्गीय स्त्रियाँ हैं, इसलिए इससे कुछ अधिक की अपेक्षा रखना किताब के साथ ज्यादती होगी.



मातृसत्तातमक व्यवस्था स्त्रीवादियों का लक्ष्य नहीं है : संजीव चंदन


अनुकूलन पर प्रहार 


यह किताब सबसे पहले तो अनुकूलन पर प्रहार करती है- मध्यवर्गीय विवाहिता स्त्री के अनुकूलन पर. अनुकूलन का परिवेश, क्षेत्र रसोई घर से लेकर फेसबुक पर उपस्थिति तक में है- जहां, स्त्रियाँ, पत्नियां पति या पुरुष के आईने से अपना स्व निर्धारित कर रही हैं. हिन्दी साहित्य में जैनेन्द्र की पत्नी से लेकर प्रेमचंद की बड़े घर की बेटियों का बड़ा दबदबा रहा है- ‘पतनशील पत्नियों के  नोट्स’, इस दबदबा को अतिक्रमित कर रही है-किताब में शामिल नोट्स सचेत करते हैं कि इन पत्नियों और बड़े घर की बेटियों के मोहल्ले में ही ‘हाडा रानी’ भी रहती है-जो लड़ाई के मैदान में जाते अपने पति को अपना सिर अर्पित कर देती है कि कहीं मोहपाश उन्हें हरा न दे. किताब में पहला ही शीर्षक नोट है ‘बीबी हूँ जी, हॉर्नी हसीना नहीं.’ घर-गृहस्थी में कैद स्त्री से पति चंचल और उन्मुख देह की चाह भी रखता है, मसालों के गंध और गृहस्थी की चिंताओं से थोड़ा अलग होकर जबतक की हॉर्नी हसीना की भूमिका में वह आती है, पति संतुष्ट हो चुका होता है. पत्नी के भीतर सुप्त स्त्री जाग्रत होकर फिर हताश हो जाती है: ‘हाय, हर बार ठीक उस वक्त, जब तुम किला फतह कर रहे होते हो, मैं बाँध के परे रह गई कसमसाती, प्यासी, मुरझाई नदी बनकर रह जाती हूँ. यह लो, एकबार फिर इस बेमकसद कवायद में हारी हुई हताश बीबी रह गई है और एक जमकर बरसा हुआ जिस्म दोबारा पति में तब्दील होकर, पीठ घुमाकर बेखबर पड़ा सोया है. उफ्फ, कैसी जहरीली नागन सी है ये रात, कितनी आवारा, कितनी बदचलन, कितनी खार खाई सी.’



पत्नी और स्त्री के दो राहे से गुजरती स्त्री ही अपनी कामनाओं के साथ ‘पतनशील पत्नी’ है. कामनाओं को मारकर वह मसालों का गंध समेटे पत्नी है और पतनशील होते ही वह स्त्री हो जाती है. ऐसा भी नहीं है कि कामनाओं और वासनाओं की अभियक्ति किसी नीलिमा चौहान का एकांगी स्वर भर है, या बाजार की मांग के पूर्ती के लिए किसी व्यापारी लेखिका का टूल भर( जैसा कि कुछ आलोचनाएँ कहने का प्रयास करती दिखी) . कामनाओं  की सहज अभिव्यक्ति 19वीं सदी में समता का संघर्ष करती, लड़कियों के लिए स्कूल खोती, पठन-पाठन में लगी, प्लेग के बीमारों की सुश्रूषा करती सावित्रीबाई फुले के यहाँ भी है, यानी मुद्दों का चुनाव अनिवार्य रूप से मुक्ति संघर्ष को एकहरा नहीं करता. सावित्रीबाई फुले की एक श्रृंगार कविता पढी जा सकती है:

कितनी स्त्रीवादी होती हैं विवाहेत्तर संबंधों पर टिप्पणियाँ और सोच (!)

सुनहरी चंपा

जैसे मदन करता है आकर्षित अपनी प्रियतमा रति को,
वैसे ही चंपा जगाती है कवि की संवेदनाएं,
…वह देती है आनंद और ऐन्द्रिक सुख,
पारखी को करती है प्रसन्न और फिर नष्ट हो जाती है।
और यह भी


जाई फूल

…एकदम शुभ्र, नशीली खुशबू से लबरेज़,
वह अपनी कोमल चमक से करता है मुझे प्रफुल्लित।
उसकी मीठी मुस्कुराहट और शर्मीली नज़र,
मेरे दिमाग को ले जाती है किसी दूसरी दुनिया में।


अनुकूलन का एक दूसरा प्रसंग भी है-खुद को पुरुषों की नजर से देखना- आत्मसात किये जा चुके मेल गेज की जद्द में जीना और नियन्त्रण की लाठी को अपने सर पर लटकाये चलना: ‘जान लीजिये कि लडकी कभी अकेली नहीं होती, अपने गुसलखाने में भी नहीं, अपने कमरे के अपने बिस्तर पर भी नहीं, अपने घर से बाहर तो कभी भी नहीं. उसके भगवान, उसके बड़े-बुजूर्ग, उसके वहम, उसके सबक, उसकी फितरत, उसका आगा-पीछा हमेशा उसके साथ हुआ करता है.’

हमबिस्तर नहीं, हमदिवार 


कई-कई नोट्स में लेखिका स्त्री-पुरुष के साझेपन के स्वांग की बखिया उधेड़ती जाती है. स्पष्ट करती है कि पति और पत्नी दो दुनिया हैं, एक से दिखते हुए- एक होने का स्वांग रचते हुए. स्वांग से अपने स्व को स्त्री तभी देख सकती है, जब वह आरोपित पत्नीत्व से पतित होती है- पतनशील होती है-अपनी इच्छाओं, वासनाओं, कामुकता, स्वप्नों और सहजताओं के पूरे पॅकेज के साथ पतनशील


स्व की पहचान, और अपनी एजेंसी का निर्माण


इस किताब के लेखन में कोई ख़ास योजना नहीं दिखती- प्रसंगवश लिखे गये छोटे नोट्स से यह किताब शक्ल लेती है. इस किताब के मूल में सोशल मीडिया का प्रभाव भी कहा जा सकता है, जिसके प्रभाव में लप्रेक नामक विधा में किताब लिखी गई और चर्चित हुई तो छः शब्दों में या ट्वीटर की शब्द संख्या में कहानियां लिखी गई. सोशल मीडिया ने गद्य लेखन की क्षणिकाओं, हाइकुओं को जन्म दिया. किताब में शामिल नोट्स भी सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक के स्टेटस से पैदा हुए हैं. फिर भी एक ख़ास किस्म की सरोकारी योजना है किताब में शामिल नोट्स की, वह है स्त्रियों के अपने कर्तापन को पुख्ता करना-उत्पीड़ित भाव से मुक्ति का आयोजन करना. इस प्रक्रम में छेड़ी जाती स्त्री भी छेड़ने वाले के मर्दाने आनंद को रफूचक्कर कर देती है या रेडलाईट पर घूरती स्नेहिल आँखों को स्नेहिल प्रत्युत्तर दे देती है. नोट्स में स्त्री अपने ऊपर हर प्रकार के आरोपण को खारिज कर देती है, निर्मित छवि, स्टीरियोटाइप या वस्त्र से लेकर चाल-चलन, देह और देह के बाहर हर अभिव्यक्ति के लिए निर्धारित स्टीरियोटाइप को नकार देती है.



इस किताब के अपने मायने हैं, एक ख़ास पाठक वर्ग के लिए इसका व्यापक सन्दर्भ है. यह बोरियत भरी गद्यात्मकता से मुक्त होने के कारण रचनात्मक लेखन की किताब है और रचनात्मकता के लिए अनिवार्य कल्पनाशीलता या गल्पात्मकता की सीमा से थोड़ी दूरी पर ठहरकर ललित टिप्पणियों की किताब है- ऐसी ललित टिप्पणियाँ- जो पूरा-पूरा विमर्श रचती हैं.


इस किताब को इसलिए कभी न पढ़ें कि आपको इसमें घरेलूं हिंसा की जानकारियाँ देते लेख मिलेंगे या उससे संघर्ष के दास्तान, या यौन हिंसा के खिलाफ महिलाओं के संघर्ष का इतिहास मिलेगा या बस्तर से लेकर नंदीग्राम और मणिपुर संघर्ष करती स्त्रियों की कहानियां, या जाति उत्पीडन के हृदयविदारक प्रसंग. इसलिए भी कभी न पढ़ें कि यह आपको किसी किस्सागोई का आनंद देगी, या अच्छी कहानियां पढने की आपकी चाहत को पूरा करेगी, इस किताब को आप तब पढ़ें जब मध्यवर्गीय स्त्री के, जो रसोई घर में है, कालेजों में-विश्वविद्यालयों में पढ़ाती है, कॉर्पोरेट में या सरकारी संस्थानों में क्लर्की से लेकर अफसरी करती है- घर गृहस्थी संभालती है और फेसबुक ट्वीटर पर विचरण भी करती है-जिसका एक पति है और एक दोस्त, सिर्फ एक पति, या एक पति और प्रेमी भी, या सिर्फ एक प्रेमी, स्वत्व को समझना चाहते हों- बिना बोझिल विश्लेषणों के. और हाँ, अपराजिता शर्मा   के द्वारा आवरण  और इलस्ट्रेशन  इस किताब की प्रस्तुति की एक ख़ास उपलब्धि है .  


संजीव चंदन स्त्रीकाल के संपादक हैं  


संपर्क :8130284314


स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 

सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 

संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 




‘अनारकली आॅफ आरा’ : आंसुओं से उपजी आग और भरोसे की उम्मीद

मृणाल वल्लरी 
 
राष्ट्रगान के वक्त खड़े होने की ड्यूटी पूरी करने के बाद जब आप खींचती हुई एक खास जमीनी मंचीय आवाज के साथ दुष्यंत कुमार की पंक्तियों से रूबरू होते हैं, तभी एक सोंधी खुशबू से सराबोर सिनेमा का अंदाजा लगा लेना चाहिए। तो इसी के साथ खुश मेरा मन भी ढेर सारी उम्मीदों के साथ परदे पर टिक गया था। शुक्रवार को सिनेमा घरों में आने के बाद महज तीन दिनों के भीतर बहुत सारे लोगों ने इतना लिख दिया था कि शायद इससे पहले किसी फिल्म के साथ ऐसा नहीं हुआ हो। शुरुआती सीन पर्दे पर आने से पहले ही आंखों के सामने तैरने लगा। ‘अनारकली आॅफ आरा’ के प्रमोशन के वक्त से ही ‘मोहल्ला लाइव’ पर चला सिनेमा का डिबेट याद आ रहा था। अनुराग कश्यप की शैली और गालियों पर चला विमर्श। उसे याद करते हुए इस फिल्म के नाम और उसके कॉन्सेप्ट का अंदाजा लगा कर थोड़ा पूर्वग्रह से ग्रसित थी। लग रहा था कि अभी तक फेसबुक पर लिखा गया जो पढ़ा वह महज दोस्तों की हौसलाअफजाई तो नहीं थी। फिल्मों में अनुराग कश्यप किस हद तक स्त्री विरोधी दिखने लगते हैं, वह सोच रही थी।
अनारकली की भूमिका: स्वरा भास्कर
बल्कि ‘रिवोली’ में शो के लिए अंदर जाते वक्त भी पूर्वग्रह बरकरार था। इसके पहले ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ ने वैसे भी पत्रकारों पर संदेह पैदा कर दिया था कि भदेसपन के नाम पर खिलवाड़ करके खुद को बचा ले जाने और उसके जरिए एक व्यवस्था को आगे बढ़ा देने का खेल कैसे किया जाता है। दरअसल, जब आप पहले ही घेरने लायक, आलोचना करने लायक खोजने का मूड बना कर बैठ जाएं और बाद में जीवंत से सेट के साथ हर दृश्य पर मुग्ध होते जाएं तो क्या हालत होती है, मैं ‘अनारकली आॅफ आरा’ देखते हुए हर अगले मिनट महसूस कर रही थी। दुख हुआ जब बगल में बैठे दो लोग यह कह कर उठ कर चले गए कि ‘अरे… यह तो भोजपुरी फिल्म है!’ मन किया कि उनकी बांह पकड़ कर बैठा दूं कि भाई, थोड़ी देर बैठ जाओ!
इस फिल्म पर इतने सारे लोगों ने इतना कुछ लिख दिया है कि सोचती हूं कि अब मैं क्या लिखूं। यह क्या कम है कि अंदाज के उलट ‘अनारकली आॅफ आरा’ कहीं से भी स्त्री विरोधी नहीं होती है, बल्कि स्त्री की जिंदगी पर अपने हक के जयकारे के साथ खत्म कर होती है। फिल्म की शुरुआत का गाना जहां जिंदगी छीन लेता है तो इसका आखिरी गाना और उसका अंत अपनी जिंदगी पर अपने हक का दावा स्थापित करता है। ‘जन -गन- मन’ पर तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से सभी खड़े होने ही लगे हैं, मेरे सामने की लाइन में जो छह-सात महिलाएं बैठी थीं, आखिरी सीन में अनारकली का लहंगा उड़ते ही वे सभी खड़े होकर देर तक ताली बजाती रहीं। फिल्म के साथ यह दृश्य मेरे लिए नहीं भुला सकने वाला दृश्य रहा। पूरी तरह कमर्शियल ‘चक दे इंडिया’ के बाद हॉल में मेरा इस तरह का यह दूसरा अनुभव था।
महानगरों के हिसाब से कम से कम गाने के सब-टाइटल दिए जाते तो अच्छा रहता। उन महिलाओं के बीच बातचीत से लग रहा था कि उन सबने ‘अब त गुलमिया के ना ना ना…’ को ठीक से नहीं समझा। और अगर ‘अपनी रे देहिया की हम महरनिया’ को नहीं समझा तो फिर उनके लिए यह क्लाइमेक्स तो आम हिंदी फिल्मों की तरह ही था। भोजपुरी के शब्दों के कारण बहुत से महानगरीय दर्शक इस गाने का असल संदेश नहीं समझ पाए। कुछ और भी जगह लोग शब्दों को लेकर उलझ रहे थे और एक-दूसरे से पूछ रहे थे। लेकिन अनारकली जो थी, उससे अलग शक्ल में उसे दिखाया भी कैसे जा सकता था!
बहरहाल, दुष्यंत कुमार की वे शुरुआती पंक्तियां और हीरामन। अनारकली से लेकर कोई और… दिल्ली से लेकर पटना और आरा तक। हर स्त्री को एक हीरामन जरूर मिलता है जो उसकी जिंदगी का सफर आसान करता है! और फिर हालात के सामने लाचारी की राह में वह छूट भी जाता है। यह हीरामन उसका प्रेमी या पति या हमेशा साथ रहने वाला दोस्त नहीं होता है। इस हालत को कौन और कब समझेगा कि इस हीरामन के नाम वह अपनी लिखी किताब समर्पित नहीं कर सकती है, सार्वजनिक मंच पर उसका नाम लेकर गीत नहीं गा सकती है, वाट्स ऐप या फेसबुक पर उसकी प्रोफाइल नहीं डाल सकती है… मोबाइल या किसी और पासवर्ड में उसके नाम के शब्द नहीं होते हैं…!
नायिका स्वरा भास्कर  और निदेशक अविनाश दास
 
दरअसल, अनारकली अगर सामंती पितृसत्ता के खिलाफ जंग का चेहरा है तो हीरामन उस पुरुष का चेहरा है जिसमें स्त्री भी समाई होती है। पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिल्ली से वापस जाती अनारकली और छत पर रोता हुआ हीरामन। हीरामन के इसी आंसू को तो अनारकली अपनी जमा-पूंजी कहती है…‘आपके जइसा साधु इंसान मिला… यही हमरी जमा-पूंजी है!’ घर की दहलीज से बाहर निकली हर स्त्री के पास ऐसी एक जमा-पूंजी जरूर होती है। एक रोता हुआ हीरामन सामने वाली स्त्री को कितना मजबूत कर देता है! अनारकली के प्रतिरोध का स्वर का आग बन जाना हीरामन के आंसू के बिना अधूरा रहता!
सिनेमा हॉल में मौजूद अमूमन हर स्त्री की आंखें अपनी जिंदगी में कभी मौजूद रहे अपने-अपने हीरामन को याद कर जरूर गीली हुई होंगी। हमारे उस हीरामन को, जो कहीं छूट गया है, फिर से आंखों से निकालने के लिए थैंक्यू अविनाश दास। चुनावी नतीजों और पिछले कुछ समय से बने माहौल के कारण जो एक डिप्रेशन की स्थिति बनी थी, ‘मोरा पिया मतलब का यार…’ जैसे बड़े महत्त्व के गीतों से लैस ‘अनारकली आॅफ आरा’ देखने के बाद दिमाग उससे भी कुछ हल्का हुआ। हीरामन और अनारकली थोड़ी-सी जिंदगी की उम्मीद जगा गए, थोड़ा रुला कर बड़ा भरोसा पैदा कर गए…!
लेखिका  पत्रकार  हैं , जनसत्ता से  संबद्ध . संम्पर्क : mrinaal.vallari@gmail.com

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 

सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 

संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

समकालीन कहानी: भाषिक अस्मिता और भूमंडलीकरण की चुनौतियाँ (संदर्भः उदय प्रकाश की कहानी मैंगोसिल)

रानी कुमारी 

रानी कुमारी (शोधार्थी) पीएच. डी (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय संपर्क:मो. 8447695277



समकालीन समाज भूमंडलीकरण के प्रभाव में पल बढ़ रहा है। इसी कारण इसके सरोकार बदल गए हैं। इसे मूल्य-परिवर्तन भी कहा जा सकता है। परंपरागत मूल्यों से आज के मूल्य एकदम बदले हुए हैं। भाव-बोध बदल गया है। जाहिर है कि जब भाव बदला है तो भाषा भी बदलेगी। व्यक्ति और समाज के इस बदलते भाव-बोध को उसकी (साहित्यिक-भाषिक) अभिव्यक्ति से समझा जा सकता है।

जब हम समकालीन कहानी कर बात करते हैं तो उसका कथा-पटल बेहद विस्तृत मिलता है। उसमें स्त्री, दलित, आदिवासी और अन्य अस्मिताओं को स्थान मिल रहा है। बात जब आलोच्य कथाकार उदय प्रकाश की आती है तो उनके लेखन में भूमंडलीकरण से उपजी स्थितियो को बखूबी देखा जा सकता है।

आज का समय बड़ी तेज़ी से बदल रहा है। समाज में हो रहे परिवर्तन को साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है। आज हम भूमंडलीकरण के दौर में हैं। जिसके कारण विज्ञान और प्रौधोगिकी के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। दुनिया में हो रही घटनाओं का ब्यौरा जल्द ही हम तक पहुँच जाता है। साहित्य भी इन बदलावों से अछूता नहीं रहा है। साहित्यिक विधाओं में व्यक्त संवेदना से यह बदलाव नज़र आ जाता है। जिसका श्रेय सूचना तंत्र को जाता है। इन सब बातों की गहन पड़ताल हमे उदय प्रकाश की कहानियों में भी मिलती है।


उदय प्रकाश की कहानियों का विषय विविध रहा है। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए एक ’सस्पेंस’ बना रहता है। अपनी कहानियों में वह हाशिये के लोगों से लेकर पूंजीपति वर्ग की बात करते हैं। उन्होंने हिन्दी कहानी के नैरेटिव स्ट्रक्चर (कथ्य संरचना) और सरोकारों को बदल दिया है। उनकी कहानियों में पात्र खुद ही संवाद करता है और कहानीकार कम ही दिखाई पड़ता है। जबकि पहले की कहानियों में कहानीकार ज्यादा मौजूद रहते थे और पात्र कम संवाद करते थे। उनके नैरेशन से पाठक उद्वेलित हो जाता है। जैसे: ’हीरालाल का भूत’, ’और अंत में प्रार्थना’, ’छप्पन तोले का करधन’, ’पॉल गोमरा का स्कूटर’, ’दिल्ली की दीवार’ और मैंगोसिल आदि उदय प्रकाश के विषय में कहा भी गया है कि “सरोकारो का अलग होना किसी अलग दुनिया से साक्षात्कार कराने से नहीं है बल्कि अलग तरीके से हाशिये की दुनिया की तकलीफ़ो को समझने से है। भ्रष्टाचार के बारे में हम जानते हैं पर उसके स्वरूप और प्रक्रिया को नहीं पहचान पाते जिसके चलते भ्रष्टाचार की जड़े समाज में इतनी गहरी हैं।’’  दरअसल वैश्वीकरण के दौर में घूस लेने-देने में फर्क नहीं आया है बल्कि ’ब्लैक मनी’ (अन-अकाउंटेड मनी) के इस्तेमाल में भी फर्क नहीं आया है। इसका उदाहरण ’दिल्ली की दीवार’ कहानी है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय समाज निरंतर परिवर्तनशील रहा है। परंपरागत भारतीय समाज में राजनीतिक-सामाजिक संस्कृति की रचना हुई थी। लेकिन 1990 के दौर में यह राजनीतिक और सामाजिक संस्कृति बदल गई है। “चार दशक से ज्यादा की अवधि में जिस राष्ट्रीय राजनीतिक-सामाजिक संस्कृति की रचना हुई थी, एक पल में उसकी बागडोर ऐसे हाथों में चली गयी जो शुद्ध रूप से भारतीय हाथ नहीं थे। यह भारत के ग्लोबलाइज़ेशन यानी भूमंडलीकरण की शुरुआत थी।’’


देखा जाए तो भूमंडलीकरण और वैश्वीकरण नाम ज्यादा चर्चित हैं। डॉ. अमरनाथ ने भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के पीछे अमेरिका का हाथ माना है। उनके अनुसार “यह शब्द बीसवीं सदी के अंतिम दशक में व्यापक रूप में प्रयोग में आया 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद जब दुनिया एक ध्रुवीय हो गयी और अमेरिका के नेतृत्व में बहुराष्ट्रीय कंपनियो ने दुनिया के, खासतौर पर तीसरी दुनिया के बाज़ार पर कब्ज़ा जमाना शुरू किया तो इसे न्याय संगत ठहराने के लिए भूमंडलीकरण जैसा आकर्षक नाम दिया गया।’’  भूमंडलीकरण का अर्थ है कि विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ देना और एक नई भूमंडलीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति का निर्माण करना। इससे उपभोक्तावादी संस्कृति और मूल्यो का जन्म हुआ।



1990 के बाद विश्व में अनेक घटनाएँ घटी। जिसमे एक मुख्य सोवियत संघ का पतन होना भी था। विचारों, सोच, रिश्तों, पहनावे तक में बदलाव दिखाई देने लगे। आस-पास के परिवर्तन का असर भाषा पर भी पड़ा। भाषा में से शिष्टता धीरे-धीरे गायब होने लगी। मुश्किल से प्रयोग होने वाले शब्द अब रोज़मर्रा की ज़िंदगी में प्रयोग होने लगे।

 वैश्वीकरण के दौर में ‘भाषा’ का संकट गहराता जा रहा है। साहित्य, आम-बोलचाल की भाषा और समाचार पत्रों की भाषा बदलती जा रही है। जहाँ शुद्ध हिन्दी या फिर अंग्रेजी का इस्तेमाल होता था। आज उसकी जगह ‘हिंगलिश’ ने ले ली है। प्रत्येक भाषा का मर्म, अपनत्व खोता जा रहा है। पुष्पपाल सिंह का मत है कि ‘‘भाषाई परिनिष्ठता, शुचिता का प्रश्न यहाँ बेमानी हो गया है, भाषाई शुचिता की दीवारें तेजी से गिरती जा रही हैं। यहाँ यह विचारणीय नहीं है कि बाज़ार की शक्तियों ने हिन्दी को कितना ऊर्जावान और सक्षम-सशक्त किया है, चिंता का विषय यह है कि भूमंडलीकरण की इस प्रक्रिया ने जनभाषाओं और बोलियों को हाशिए पर डालकर उन्हें विलुप्ति की ओर अग्रसर किया है। प्रांतीय भाषाओं की भी स्थिति यही है, उनका अधिकाधिक अंग्रेजीकरण हो रहा है। हिन्दी और शेष प्रांतीय भाषाओं की जातीय अस्मिता और चरित्र की निजता विलुप्ति की प्रक्रिया में है।’’  हाल के दिनों में आदिवासी बहुल क्षेत्रों से किसी भाषा-भाषी के मरने के साथ उसकी भाषा के भी मर जाने की खबरें आई हैं। यह भूमंडलीकरण का ही प्रभाव है कि हम भाषा-भाषी को भी लाभ व उपयोगितावादी नजरिये से देखते हैं। इस बदलाव को आज के साहित्य में देखा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि यह भाषागत बदलाव सिर्फ उदय प्रकाश के यहाँ दिखाई देते हैं, अन्य कथाकारों के यहाँ भी दिखाई देते हैं – मनोहर श्याम जोशी, काशीनाथ सिंह, अलका सरावगी, प्रभा खेतान, सुरेन्द्र वर्मा, अखिलेश, संजीव आदि। लेकिन उदय प्रकाश इन सबसे अलग अपनी छवि निर्मित करते हैं। हाशिए के लोगों के जीवन को उनकी शैली में ही अभिव्यक्त करते हैं। ऐसा लगता है कि आम और खास आदमी उन सब को अपनी आँखों से देख पा रहा है, समझ पा रहा है।


उदय प्रकाश की कहानियों में भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद और सूचना-तंत्र से उपजी स्थिति और उसके प्रभावों को केंद्र में रखा जाता रहा है। पर उन्होंने हाशिये के लोगों का नारकीय जीवन भी प्रस्तुत किया है। समाज के ठेकेदारों ने गरीब लोगों का जमकर शोषण किया। इस शोषण का शिकार अलग से बनती है ‘स्त्री’। ऐसा ही कुछ उनकी कहानी ‘मैंगोसिल’ में दिखाई देता है। अमानवीय स्थितियों, व्यक्ति विरोधी व्यवस्था के वीभत्स जंजाल में से कुछ मानवीय, कुछ सुंदर, कुछ जीवनपरक खोजने का प्रयास मैंगोसिल कहानी में दिखाई पड़ता है।

मैंगोसिल, महाराष्ट्र के दलित चन्द्रकान्त थोराट की कहानी है। चन्द्रकान्त, 55 साल के बिल्डर के यहाँ गाड़ी चलाता है। दरोगा के कहने पर बिल्डर, शोभा के घर उसे अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए जाता है। चन्द्रकान्त को इस बात का अंदाजा ही नहीं है कि उसके (शोभा) साथ क्या क्या होता है? शोभा अपने पति के साथ सारणी में रहती थी। रमाकांत (शोभा का पहला पति) इतना नीच आदमी था कि अपनी पत्नी शोभा के लिए दलाल ढूंढता था। अपनी पत्नी की दलाली करने से उसे कुछ रुपये और शराब पीने को मिल जाती थी। पुलिस के दरोगा की नजर शोभा पर पड़ गई। जिसके बाद शोभा कि जिंदगी नरक से भी भयावह बन गई। हर रोज शोभा के साथ बलात्कार होता, जिसमें उसका पति भी शामिल होता। एक दिन दरोगा अपने साथ अधेड़ बिल्डर को शोभा के घर लाता है। वह रात शोभा के लिए भयावह और यंत्रणादायक होती है। इन सब से परेशान होकर शोभा, बिल्डर के ड्राइवर चन्द्रकान्त के साथ भाग जाती है।

कहानी में नया मोड़ आता है। शोभा, चन्द्रकान्त की पत्नी बनकर उसके साथ रहती है। भयावह और यंत्रणा से भरी जिंदगी जीने के बाद, वह माँ बनने का सुख बहुत देर से पाती है। शोभा को दो बच्चे सूर्यकांत और अमरकान्त होते हैं। कहानी के अंत में मैंगोसिल नाम की बीमारी के कारण परेशान होकर सूर्यकांत आत्महत्या कर लेता है।


स्त्री के शोषण की इतनी वीभत्स कहानी, बहुत कम ही दिखाई पड़ती है। शोभा के साथ जो दुर्व्यवहार  किया जाता है वह उपभोक्तावादी संस्कृति का चरम रूप है। जहाँ स्त्री एक वस्तु है। ‘जिसका इस्तेमाल करो और नष्ट कर दो।’ शोभा की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है ‘‘मैली-गँधाती बनियान से मटके की तरह बाहर निकली दरोगा की रोयेंदार रीछ जैसी तोंद और पसीने तथा मैल से चीकट हो चुके उसके जांघिये के बीच धंसा हुआ शोभा का सिर। शोभा की हर सांस के साथ मोहल्ले की नालियों से भी विकट बदबू अंदर जाती और वह बहुत मुश्किल से वहीं, दरोगा की जांघ पर, उल्टी करने से खुद को रोकती। दरोगा दारू पीता हुआ उसके बालों को सहलाता जाता और मुंह से ऐसी आवाज निकालता जैसे उसे नींबू की खटास और हरी मिर्च के तितास का स्वाद एक साथ मिल रहा हो। घर का दरवाजा खुला रहता था और देर रात बाहर गली में निकलने वाले अक्सर यह दृश्य देखते। बल्कि घर के सामने खाली पड़ी जगह, जहाँ लोग दिशा – फरागत के लिए जाया करते थे, वहाँ अंधेरे में, पुलिस के दलाल रमाकांत के घर पर, आधी रात चलने वाली इस जिंदा ब्लू फिल्म को देखने वाले कम उम्र शोहदों की भीड़ लग जाती।’’  दरोगा, बिल्डर, रमाकांत द्वारा शोभा का शोषण पहली, दूसरी दुनिया का शोषणकारी द्वन्द्व और उससे पैदा हुई तीसरी दुनिया (सूर्यकांत $ मैंगोसिल) को प्रतीकात्मक रूप में देखा जा सकता है। यहाँ तीसरी दुनिया के निर्माण की प्रक्रिया को भी समझा जा सकता है कि किस प्रकार शोषण से शोभा और सूर्यकांत की दुर्गति होती है ऐसा एक बहुत बड़ा वर्ग हमारे समाज में पनपता व बढ़ता जा रहा है।


भूमंडलीकरण के कारण नैतिकताएँ, मर्यादाएँ टूट रही हैं। जहाँ सिर्फ स्वार्थ, लाभ और भ्रष्टाचार का ही घिनौना रूप दिखाई देता है। जिस समाज में पति ही पत्नी के लिए दलाल ढूंढ रहा हो, वह समाज क्या नवयुवकों को शिक्षा देगा? जहाँ रक्षक (पुलिस) ही भक्षक हो, वहाँ स्त्री कैसे अपने वजूद की रक्षा कर पाएगी? उसकी अस्मिता और पहचान पर लगातार खतरा मंडराता रहता है। ‘‘भूमंडलीकरण वस्तुतः आर्थिक जगत में पनपने वाला जंगल राज है। यह समाज में आर्थिक स्वरूप के अनुरूप वर्गभेद, विषमता, वर्ग-संघर्ष, कटुता, शत्रुता पैदा कर रहा है। भौतिकतावादी सभ्यता का विकास कर रहा है। इसका मुख्य लक्ष्य ही भौतिक सुख का भोग है।’

उदय प्रकाश समाज का ऐसा घिनौना चेहरा हमारे सामने लाते हैं, जो पाठक के अन्तर्मन को झकझोर के रख देता है। भूमंडलीय यथार्थ एवं भाषा का एक सशक्त उदाहरण कहानी में इस प्रकार हैं बिल्डर और दरोगा ने शोभा के साथ अप्राकृतिक काम किया और बिल्डर ने उसके रेक्टम में बियर की बोतल घुसेड़ दी। दरोगा ने हंसते हुए पूछा – ‘ये क्या कर रहे हो?’ तो बिल्डर ने कहा था – ‘अरे यार पीछे ड्रिल करके जरा बोर बड़ा कर लेने दे, तभी तो नीचे मोटर फिट होगा! साला मेरा बीस हॉर्सपावर का जेनुइन क्रांपटन का मोटर है।’ और ठहाके मार कर हंसने लगा था। शोभा की सांसे रुक चुकीं थीं, वह लहूलुहान थी। कमरे के फर्श पर उसका खून फैल गया था, दरी भीग गई थी और मानिटर पर ब्लू-फिल्म चल रही थी। बेहोशी ने शोभा को उन पीड़ाओं के अनुभव से बचाया, जिनसे होश में रहने पर उसे गुजरना पड़ता। उस रात जब दरोगा और बिल्डर गये, तब सुबह के चार बजने वाले थे। असहनीय दर्द के बीच, बेहोशी टूटने पर शोभा ने जब अपने कपड़े पहनने और अपनी देह में लिपटा खून और वीर्य धोने के लिए उठना चाहा, तो उसने पाया कि रमाकांत उसके ऊपर चढ़ा हुआ है।’’  कहानी का यह प्रसंग हमें भूमंडलीय यथार्थ से रूबरू कराता है। जिसमें इसका साथ ‘भाषा’ देती हैं। जैसे-थूक, लार, वीर्य, खून, ब्लू-फिल्म आदि जैसी शब्दावली जो अब तक की हिन्दी कहानी में वर्जित मानी जाती थी। ‘‘भाषा केवल विचार, भावना, इच्छा एक दूसरे को विदित कराने का व्यावहारिक स्तर का संज्ञापन साधन नहीं। भाषा केवल अपनी-अपनी छोटी बड़ी अस्मिता जतन करने का सामाजिक प्रतीक नहीं। (मैं महाराष्ट्रीयन हूँ ऐसी छोटी-बड़ी अस्मिताएँ हो सकती हैं।) भाषा तो इन सबसे बढ़कर और अधिक कुछ है। भाषा मानव की काव्यात्मक, आध्यात्मिक, वैचारिक सर्जनशीलता को खिलाने का माध्यम भी है। भाषा के वैश्विकीकरण की क्रिया में यह महत्त्वपूर्ण बोध खोना नहीं चाहिए।’’  अशोक केलकर जी ने अपने लेख ‘भाषा का वैश्विकीकरण और वैश्विकीकरण की भाषा’ में ठीक कहा है, लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में भाषा का बोध खत्म होता जा रहा है। जहाँ सिर्फ भाषा को ईजी और फूहड़ बनाने की प्रक्रिया जारी है। समाज में ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं। आए दिन अखबारों, टी.वी. चैनलों पर बलात्कार की खबरें आती हैं। कहानीकार अपने समय और समाज को संबोधित, रचनाक्रम करता है। जिसमें उदय प्रकाश काफी हद तक सफल होते हैं।



भूमंडलीय दृष्टिकोण को जयनन्दन की कहानी ‘विश्व बाज़ार का ऊँट’ से भी समझा जा सकता है। जहाँ उसके भाषाई पहलू खुलकर सामने आते हैं। किस तरह भूमंडलीकरण के कारण समाज का दोहन हुआ है और हो रहा है। जहाँ अब पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतर नहीं दिखाई देता, बल्कि कुछ सालों के फासले ही इस अंतर को बढ़ा देते हैं। युवा पीढ़ी पर उपभोक्तावादी समाज और बाज़ार का विशेष प्रभाव पड़ा है। आज कोई भी सूचना आप को तुरंत मिल जाएगी। जिसके कारण आज जैसे बच्चों का बचपन खोता जा रहा है। पहचान का संकट और भाषाई अस्मिता आज खतरे में दिखाई देती है। ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ में भाषाई अस्मिता को बखूबी देखा जा सकता है। भूमंडलीय यथार्थ को समझने के लिए उसी भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए, जो वर्तमान दौर में बोली जा रही है। ‘मैंगोसिल’ कहानी में लेखक ने उसी यथार्थ को पकड़ने की कोशिश की है। कहा जा सकता है कि ‘‘ ‘वारेन हेस्टिंग का साँड’, ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’, ‘और अंत में प्रार्थना’, ‘मैंगोसिल’, ‘मोहनदास’ और ‘पीली छतरी वाली लड़की’ ये कहानियाँ साहित्य में नव औपनिवेशिक परिवेश, पात्र, अस्मिता और आत्मनिर्वासन का द्वंद, इतिहास और आख्यान का जटिल तनाव, संप्रेषणीयता और वाक्य संरचना, यथार्थ कल्पना और फैंटेसी, आख्यान के पारंपरिक स्वरूप तथा बदलते यथार्थ के संदर्भ में नयी संरचना की चुनौतियाँ, भाषा में परिवर्तन के साथ ही नये संदर्भों की बहुलार्थी भाषा को लेकर हमारे समय के यथार्थ को पकड़ती है, अभिव्यक्ति करती है, खंडित करती है, और उसे गढ़ती भी है।’’


इस प्रकार हम कह सकते है कि भूमण्डलीकरण ने हमारे भाव, भाषा और बोली को भी बदल कर रख दिया है। बाज़ार ने ‘भाषा’ रूपी संस्कार को बुरी तरह बदल दिया हैं। बाज़ार ने जिस नई भाषा को गढ़ा है, उसका असर समाज पर भी पड़ा है, उसे कथा साहित्य के माध्यम से बखूबी समझा जा सकता है। कथाकार उदय प्रकाश ने अपने कथा साहित्य में उस बदलती हुई भाषा पर फोकस किया है तथा भूमण्डलीय यथार्थ से हमारा परिचय रचनात्मक स्तर पर करवाया है।

संदर्भ: 

   1शीतलवाणी, त्रैमासिक पत्रिका, संपादक-डॉ. वीरेंद्र आज़म, अगस्त-अक्टूबर 2012, सहारनपुर, पृ. 22.
 
2भारत का भूमंडलीकरण, संपादक-अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, संस्करण-2008, पृ. 21.
 
3हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, डॉ. अमरनाथ, राजकमल प्रकाशन, पहला                              संस्करण-2009, पृ. 372.
  
4भूमंडलीकरण और हिन्दी उपन्यास, पुष्पपाल सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, पहला संस्करण-2012, पृ. 72-         73.
  
5मैंगोसिल कहानी संग्रह, उदय प्रकाश, पृ. 91.
  
6 अक्षर पर्व, साहित्यिक-वैचारिक मासिक पत्रिका, संपादक-सर्वमित्रा सुरजन, दिसम्बर-2014, पृ. 66.
 
7मैंगोसिल कहानी संग्रह, उदय प्रकाश, पृ. 92.
 
8आलोचना, त्रैमासिक पत्रिका, प्रधान संपादक-नामवर सिंह, संपादक-परमानंद श्रीवास्तव, अप्रैल-जून     2002, पृ. 89.
 
9सृजनात्मकता के आयाम, उदय प्रकाश पर एकाग्र, संपादक-ज्योतिष जोशी, नयी किताब प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2013, पृ. 87.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर


अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 


सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.


दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 


संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

जरुर पढ़े ये किताबें


1.जाति कोई अफ़वाह नहीं
                                
किताब के बारे में 


रोहित वेमुला एक शानदार लेखक थे और उनका लेखन आधुनिक भारत में जाति की पीड़ादायक हक़ीक़त को बयान करता है। 17 जनवरी 2016 को खुदकुशी कर लेने वाले रोहित ने फेसबुक पर आठ साल के अपने लेखन के दौरान गाज़ा से लेकर गाज़ियाबाद तक, शायद ही कोई मुद्दा हो जिस पर टिप्पणी नहीं की हो। जाति से लेकर गाय की राजनीति तक पर लिखी गई पोस्टों में वे एक गज़ब की काव्यात्मक भाषा और रेडिकल नज़रिए के साथ अपनी बात कहते हैं, जिसमें ताज़गी है, मुद्दों को सुलझाने की एक ज़िद है और सवाल करने का अपार साहस है।

लेखक परिचय


रोहित वेमुला (26 वर्ष) हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक होनहार शोधार्थी और एक छात्र नेता था, जो डॉ. बी.आर. आंबेडकर के जाति के खात्मे की लड़ाई में मजबूती से यकीन करता था। उसे विश्वविद्यालय कैंपस में होस्टल और सार्वजनिक जगहों से बहिष्कृत कर दिया गया था और 17 जनवरी 2016 को अपनी खुदकुशी के बाद वो दलितों के प्रति होनेवाले भेदभाव के खिलाफ व्यापक आंदोलन का चेहरा बन गया। रोहित की मां राधिका वेमुला और उसके छोटे भाई राजा वेमुला उसके इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहे हैं।

खास बातें


• इस साल के सबसे चर्चित युवा शख्सियतों में से एक
• पहली बार उनका लेखन प्रकाशित हो रहा है
• देश भर में उनके इंसाफ के लिए चल रहे आंदोलन में लाखों युवा भाग ले रहे हैं। सबकी रुचि उनका लिखा पढ़ने में है।


 प्रकाशक :जगरनॉट बुक , लेखक: रोहित वेमुला, प्रकाशन:जनवरी 2017• कीमत:250• पृष्ठ 302


 2.शाह मोहम्मद का तांगा
   
  किताब के बारे में 


सतलुज में बाढ़ आई है और गांव ख़ाली हो गया है। क्या मदद का इंतज़ार करते बेसहारा क़ायम दीन को बचाने कोई आएगा या वो डूब जाएगा? तांगे वाला शाह मोहम्मद मोटर गाड़ियों की फंतासी में जीता था, लेकिन क्या हुआ जब फंतासी से निकल कर मोटर गाड़ियां उसके रास्ते में आ खड़ी हुईं?

इन कहानियों में कोई भी एक आदर्श किरदार नहीं है। दबे-कुचले तबकों से आने वाले इन किरदारों में अच्छाइयां भी हैं और बुराइयां भी। वे एक दूसरे से प्यार भी करते हैं और किसी की जान भी ले सकते हैं। अपनी सादगी में ये कहानियांप्रेमचंद के करीब हैं तो अपने कसैलेपन में मंटो की याद दिलाती हैं। नातिक़ अपनी इस शोहरत पर खरे उतरे हैं कि वे पाकिस्तानी अदब की दुनिया के सबसे चमकदार सितारे हैं।

लेखक परिचय


अली अकबर नातिक़ का जन्म 1974 में ओकारा, पाकिस्तान में हुआ था। मैट्रिक करने के बाद उन्होंने अपने परिवार के गुज़ारे के लिए एक राजमिस्त्री के रूप में काम करना शुरू किया और गुंबदों और मीनारों के माहिर मिस्त्री बन गए। उन्होंने उर्दू और अरबी साहित्य खूब पढ़ा और प्राइवेट से बीए की डिग्री हासिल की। उन्होंने उर्दू पत्रिकाओं में अपनी शुरुआती कहानियों और कविताओं के प्रकाशन के साथ ही साहित्य की दुनिया में अपना खास मुकाम बना लिया। उन्हें उर्दू में लिखने वाले बेहतरीन युवा लेखकों में से एक माना जाता है।

 खास बातें


• पाकिस्तानी के सबसे मशहूर लेखकों में से एक
• हिंदी में पहली बार प्रकाशित कहानी संग्रह
• प्रेमचंद और मंटो की परंपरा की कहानियां


 प्रकाशक :जगरनॉट बुक, लेखक: अली अकबर नातिक़, प्रकाशन:जनवरी 2017• कीमत:250• पृष्ठ 204•

3 .ज़िंदगी लाइव
   26/11 की वह रात जो खत्म नहीं हुई

किताब के बारे में 


मुंबई 26/11 की रात। हर तरफ़ अफरा-तफरी का माहौल पसरा हुआ। वहीं दिल्ली में टीवी ऐंकर सुलभा और उनके रिपोर्टर पति विशाल काम की आपाधापी में अपने छोटे-से बेटे अभि को क्रेच से उठाना भूल जाते हैं। ये भूल बहुत भारी साबित होती है। उनका बेटा गुम हो जाता है और बाद में उसका अपहरण कर लिया जाता है। उसकी तलाश में वे बदहवास हो जाते हैं। क्या अभि उन्हें मिल जाएगा या ये उनके जीवन के सबसे भयावह दिन होंगे?

लेखक परिचय


प्रियदर्शन एनडीटीवी में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और एक वरिष्ठ लेखक और कवि हैं। विभिन्न प्रकाशनों से उनकी कई फिक्शन और नॉनफिक्शन किताबें छप चुकी है। इसके अलावा वे जाने मानी कृतियों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

खास बातें


• यह एक अपराध कथा है जो बड़ी तेजी से आगे बढ़ती और रोमांचक मोड़ लेती है
• इस कहानी की पृष्ठभूमि 26/11 के मुंबई हमले हैं
• लेखक एक जानेमाने टीवी पत्रकार और कवि हैं

 प्रकाशक :जगरनॉट बुक, लेखक: प्रियदर्शन, प्रकाशन: अक्तूबर 2016 • कीमत:250• पृष्ठ 258•

4.लक्ष्मी प्रसाद की अमर दास्तान 

किताब के बारे में 


एक दुबली और लंबी सी लड़की पूरे गांव को बदल देती है. अड़सठ साल की बूढ़ी नोनी आपा एक शादीशुदा आदमी की ओर आकर्षित हैं और सोचती हैं कि रिश्तों को परिभाषित करना ज़रूरी क्यों है. बबलू केवट का परिवार आतंकित है कि उसपर सेनिटरीनैपकिन्स का जुनून सवार है और पांच शादियां करनेवाली एक नौजवान लड़की अपनी हरेक शादी के मंसूबे बनाते वक्त मौसम की भविष्यवाणियों पर नज़र रखती है. इस मज़ेदार, बारीक निगाहों वाली और समझदार क़िस्सागोई से आप खुद को दूर नहीं रख सकेंगे.

लेखक परिचय


ट्विंकलखन्ना एक मशहूर स्तंभकार और बेस्टसेलिंग किताब मिसेज़फनीबोन्स की लेखिका हैं। वे मुंबई में रहती हैं।

खास बातें


• ये अंग्रेजी की बेस्टसेलर कहानियां हैं
• ट्विंकलखन्ना के प्रशंसकोंकी एक बड़ी तादाद है और लोग उनकी लिखी रचनाएं पसंद करते हैं



 प्रकाशक :जगरनॉट बुक, लेखक:ट्विंकलखन्ना, प्रकाशन:फरवरी 2017• कीमत:250• पृष्ठ 240•
   
प्रस्तुति :मनीषा कुमारी 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर
अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.
दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

रंडी, या रंडी से कम और हाँ, बीबी से भी बलात्कार हक़ नहीं

अखिलेश कुमार


बी.एच.यु. से इतिहास में स्नातक कर रहे है संपर्क:akhileshfssbhu@gmail.com

मैंने पहली बार जब ‘ना’ कहा तब मैं 8 बरस की थी,
“अंकल नहीं .. नहीं अंकल ‘

एक बड़ी चॉकलेट मेरे मुंह में भर दी अंकल ने,
मेरे ‘ना’ को चॉकलेट कुतर कुतर कर खा गई,
मैं लज्जा से सुबकती रही, बरसों अंकलों से सहमती रही,
फिर मैंने “ना” कहा रोज ट्यूशन तक पीछा करते उस ढीठ लड़के को’ “ना ,प्लीज मेरा हाथ ना पकड़ो “ना…
मैंने कहा न ” ना ”

मैं नहीं जानती थी कि “ना “एक लफ्ज़ नहीं,
एक तीर है जो सीधे जाकर गड़ता है मर्द के ईगो में,

कुछ पलों बाद मैं अपनी साईकिल सहित औंधी पड़ी थी,
मेरा ” ना” भी मिट्टी में लिथड़ा दम तोड़ रहा था,

तीसरी बार मैंने “ना” कहा अपने उस प्रोफेसर को,
जिसने थीसिस के बदले चाहा मेरा आधा घण्टा,

मैंने बहुत ज़ोर से कहा था ” ना ”

“अच्छा..! मुझे ना कहती है ” और फिर बताया कि
जानते थे वो, क्या- क्या करती हूँ मैं अपने बॉयफ्रेंड के साथ,
अपने निजी प्रेमिल लम्हों की अश्लील व्याख्या सुनते हुए मैं खड़ी रही बुत बनी,

सुलगने के वक्त बुत बन जाने की अपराधिनी मैं
थीसिस को डाल आयी कूड़ेदान में और
अपने ‘”ना ” को सहेज लायी,

वो जीवनसाथी हैं मेरे जिन्हें मैं कह देती हूँ कभी कभार
” ना ,,,,प्लीज़ ,आज नहीं ”

वे पढ़े लिखे हैं ,ज़िद नही करते, झटकते हैं मेरा हाथ और मुंह फेर लेते हैं निःशब्द,
मेरे स्नेहिल स्पर्श को ठुकराकर वे लेते हैं ‘ना’ का बदला,

आखिर मैं एक बार आँखें बंद कर झटके से खोलती हूँ,
अपने “ना “को तकिए के नीचे सरकाती हूँ,
और उनका चेहरा पलटाकर अपने सीने पर रख लेती हूँ,

“मैं और मेरा ‘ना’ कसमसाते रहते हैं रात भर,”
“” ना “” क्या है ?,,,,,,केवल एक लफ्ज़ ही तो जो बताता है मेरी मर्ज़ी, खोलता है मेरे मन का ताला,
कि मैं नहीं छुआ जाना चाहती तुमसे, कम-से-कम इस वक्त,

तुम नहीं सुनते,
तुम ‘ना’ को मसल देते हो पंखुरी की तरह,
कभी बल से , तो कभी छल से,

और जिस पल तुम मेरी देह छू रहे होते हो,
मेरी आत्मा कट कट कर गिर रही होती है,

“कितने तो पुरुष मिले, कितने ही देवता,”

एक ऐसा इंसान न मिला..
जो मुझे #प्रेम करता मेरे _____”नां” __के साथ,……..

विवाह के भीतर बलात्कार 

“क्यों भाभी, अभी तो आपकी शादी को एक ही साल हुये हैं फिर इसकी क्या ज़रूरत थी?”
{बेबी-बम्प के साथ एक लड़की और मैं, लड़की बरामदे में और घर के बाहर झांकती है और  धीरे से बोलती है
“बाबू, अभी तो मैं भी ये बच्चा नहीं चाहती  थी लेकिन तुम्हारे भईया कहाँ सुनने वाले हैं,  ”
“आप उन्हें मना भी तो कर  सकती थीं ”
“मैं उन्हें कैसे मना कर सकती हूँ, आख़िर वो मेरे हसबैंड हैं , वैसे भी मेरा मन उनके लिए कहाँ मायने रखता है क्योंकि मेरी तबियत चाहे ठीक हो या ना हो उन्हें तो सिर्फ मेरे साथ ……. करने से मतलब हैं  ”
“अरे आप मना क्यों नहीं कर  सकती हैं आख़िरकार  वो आपको शादी करके लाये हैं कोई खरीदकर नहीं ”
“कैसे बातें कर रहे हो, उन्हें मना करके मुझे नरक में  जाना है जाना है क्या ? ”


   ‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में (!)

  दोस्तों ये हैं उस समस्या का असल रूप जिसे क़ानून की क़िताबों में “विवाह में  बलात्कार” यानी “Marital Rape” के नाम से  जाना जाता हैँ। (अग़र सोशल मीडिया के ज़माने मैं भी आपका पाला इस शब्द से न पड़ा हो तो जान लीजिये कि “बलात्कार वह सम्बन्ध होता है जो कि प्यार  के अभाव में स्थापित किया जाये” और ये कोई ज़रूरी नहीं की शादी होते ही प्यार भी हो जाएगा इसलिए ऐसे ज़बरदस्ती के शारीरिक सम्बन्ध को  “विवाह में  बलात्कार”  की संज्ञा दी गयी है।)


 हर लड़की का यह सपना होता है की जब वो बड़ी हो तब उसकी केयरिंग करने वाला उसे समझने वाला एक अच्छे दिलवाला पति या बॉयफ्रेंड मिले लेकिन वहीँ लड़की जब 20-21 साल तक अपने मैरिज लाइफ के सुनहरे सपने संजोकर जबरन हलाल (सॉरी निक़ाह) होने के लिए  पिया की सेज पर बैठा दी जाती है तब  नियति से उसका पहला क्रूर साक्षात्कार  होता है क्योंकि उसका राजकुमार उस पर आकर ऐसे टूट पड़ता है मानो वो कई  जन्मों का भूखा हो ,हवस का पुजारी।



अग़र आप संस्कारी होंगे(Anti-Romeo Squad या बानर दल वाले) तो ये कहेंगे  कि  हंमारी संस्कृति में तो पत्नी को अर्धांगिनी कहा गया है, तो फिर ऐसा कोई अपनी पत्नी के साथ कैसे कर सकता है।  आईये आपको आँकड़ों की  मदद से समझाता हूँ क्योंकि “हाथ कंगन को आरसी क्या ,पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या और पान को बनारसी क्या? ”

National Health Family Survey 2016  के अनुसार भारत में 37% औरतें अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी में शारीरिक , मानसिक और Sexual हिंसा (विवाह में  बलात्कार) झेलती हैं। प्रख्यात समाजशास्त्री डॉ. राम आहूजा का मानना  था कि “शिक्षित महिलाओं की तुलना में घरेलु हिंसा (जिसमें Marital Rapes  भी शामिल है) अशिक्षित महिलाओं के साथ ज्यादा होती है “, जबकि इस  सर्वे के मुताबिक घरेलु हिंसा और विवाह में बलात्कार झेलने वाली  महिलाओं में  केवल 29% औरतें ही   नहीं पढ़ी- पढ़ी-लिखी थी जबकि  71% औरतें ग्रेजुएट थीं या इससे भी अधिक पढ़ी लिखी थीं। इस रिपोर्ट के अनुसार  39% महिलाओं के  पति उनकी मर्जी के बिना उनके  करते हैं और 46% औरतों ने यह भी बताया की उनके  पतियों द्वारा contraception का यूज़ ना  बिना अपनी मर्जी के प्रेग्नेंट हो चुकी हैं। यह एक प्रमाणित तथ्य है कि पति खुद contraception means का यूज़ नहीं करता  बल्कि  अपनी पत्नी को जबरदस्ती contraceptive pills दे-देकर उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से अपाहिज  बना देते हैं क्योंकि अनवांटेड-72 जैसे गर्भनिरोधक दवाओं  के साइड-इफ़ेक्ट के कारण औरतों और अनब्याहीं लड़कियों में अधकपारी, खून की कमी , चक्कर आना और बाँझपन जैसे समस्याएं आम हो जाती हैं। और फिर गाँव के लोग ही   नहीं बल्कि कुछ पढ़े-लिखे भी इनसे छुटकारा पाने के लिए साधुओं और तांत्रिकों के पास जाते हैं जो कि धर्म  की आड़ में अपनी हवस पूरी करते हैं।

 “विवाह में  बलात्कार  के कारण

भारत जैसे देश में जहां एक घर के छज्जे का पानी अग़र दूसरे घऱ की छत पर गिरने लगता है तो मार-काट मच जाती है वहीँ घरेलु हिंसा और   “विवाह में  बलात्कार चाहे वो पति करे, देवर करे या ससुर करे ) का नाम सामने आने पर लोग इसे “दूसरे के घऱ की बात” कहकर चुप करवा देते हैं। असल में  इन सबके पीछे लोगों की धार्मिक अंधभक्ति काम करती है, आईये समझते हैं कैसे ?



किसी भी धर्म में  सबसे अधिक आस्था(या अंधभक्ति?)औरतें  ही रखती हैं और वहीँ  धर्म का सबसे आसान शिकार भी  बनती हैं। इसी की वज़ह से कठमुल्लों और पंडों ने करवाचौथ जैसे व्रत और तीन-तलाक़ व हलाल निकाह जैसे अमानवीय नियम बनाकर पुरुषों की सत्ता को स्त्रियों पर थोप दिया है।  क्या हिन्दू क्या मुस्लिम बल्कि पुरे दक्षिण-एशिया में कोई भी ऐसी बीवी नहीं है जोकि  इन सब कुरीतियों पर आवाज़ उठाये। और सबसे बड़ी बात हमारे धर्मग्रंथों नें भी इन्हीं पुरुषसत्तात्मक कुरीतियों को प्रश्रय ही दिया है।  चलिए इसकी भी  थोड़ी सी झलकी  आपको दिखा देते हैं

उस आख़िरी दृश्य में अनारकली !


 मनुस्मृति (5.147-150)  के अनुसार, “पिता या पिता की आज्ञा से भाई चाहे जिस भी आदमी से तुम्हारी शादी करा दे उस की ज़िन्दगी  भर सेवा करो और उसके मारने के बाद भी धर्म का उल्लंघन  ना करों। ” इसी में   स्मृतिकार आगे कहता है कि, “अग़र पति विद्या-गुण आदि से हीन, शराबी, कदाचारी या दूसरी औरत के साथ सम्बन्ध रखता हो  तब भी पत्नी को उसकी सेवा देवता के समान  करनी चाहिए। पत्नी को कोई   भी व्रत, उपवास या यज्ञ अलग से करने की आवश्यकता नहीं है  क्योंकि वह पति की सेवा करने  से ही स्वर्ग में पूजित होती है।” ऐसे  स्मृतिकार तो औरतों को स्वर्ग का लालच किस तरह देते हैं ये देखिये,”जो स्त्री स्वर्ग जाना चाहती हो उसे अपने जीवित या मृत पति की इच्छा के विरुद्ध कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए।”


 और तो और ये धर्मग्रन्थ  औरतों को किस तरह से मानसिक ग़ुलाम बनातें हैं ये भी देखिये, मनुस्मृति (5.147-166) में स्मृतिकार कहता है कि “अपने हीन पति(Scrubbed Husband) को त्याग कर अन्य  श्रेष्ठ पुरुष को स्वीकार करने वाली  स्त्री इस संसार में निंदित होती हुई व्यभिचारिणी(Adulteress) कहलाती है। ऐसे कोई औरत  जो दूसरे आदमी से सम्बन्ध रखती है तो उसे कुष्ठ रोग(Leprosy) हो जाता है और अगले जन्म में वह गीदड़ी (Jackal ) के रूप में जन्म लेती है।”

 दरअसल, बचपन  से ही हमारे चेतन में धार्मिक प्रवित्तियां इतनी कूट-कूट कर भर दी  जाती हैं की अगर कोई पंडित ये कहे की ये गोबर नहीं गंणेश हैं तो हम भी वहीँ  मान बैठते हैं। हमारी महिलाएं तो इस मामले में और भी ज्यादा अन्धविश्वासी होती हैं वरना चन्द्रमा के किये की सज़ा अहिल्या को नहीं भुगतनी पड़ती और ना ही पांडवों के कर्मों का पाप द्रौपदी को भरी  सभा में निर्वस्त्र होकर झेलना पड़ता।

वास्तव में  जो पति दिनभर काम के बाद घऱ आता है तो वह पत्नी को For Granted Thing समझ लेता है और बिस्तर पर उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ रेप करता है {जिनको रेप शब्द पर आपत्ति है वे जान लें की सेक्स और रेप में वहीँ अंतर है जो किसी लड़की की  हाँ या ना में हैं , या यूँ कहें की ज़मीन या आसमान में है।} और पत्नी के कॉउन्टर-रिस्पांस न  देने पर ” साली ठण्डी है ”  कहता है और थप्पड़ लगाकर अपनी मर्दानगी साबित करता है।  और हमारी वहीँ  औरतें सुबह  कड़क सर्दी में उठकर,  पति की लंबी उम्र के लिए वट- सावित्री या एकादशी का व्रत करती हैं , और फिर से अपनी गृहस्थी में कोल्हू के बैल की तरह रम जाती हैं। और हम अंधे-बहरे लोग, “ये तो उनका आपस का मामला है” कहकर मुंह फेर लेते हैं।

  उपाय


“शिक्षा सभी रोगों की रामबाण दवा है”, मतलब  ये की जब तक हमारी स्कूल  की किताबों में ये लिखा रहेगा, “राजू विद्यालय जा”, “आनंद पढ़ाई कर”, “कमला कपड़े धो”,”किरण माँ की मदद कर” तब तक “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ”  के नारे खोखली लफ़्फ़ाज़ी ही साबित  होंगे क्योंकि आज भी हमारे देश के लगभग सभी बोर्डों की स्कूली किताबों में पुरुषसत्तात्मक सत्ता की साफ़ झलक देखने  को मिलती है। अग़र आपकी मेमोरी कमजोर ना हो तो{ आप कुछ ही दिनों में सब कुछ भूल जाते है,क्योंकि आपको न तो ईरोम शर्मीला का सोलह साल का अनशन याद  रहता है, न ही इशरत जहाँ की क़ुरबानी और ना ही सोनी सूरी पर हुआ अत्याचार }  आपको याद होगा कि कुछ ही महीने पहले महाराष्ट्र सरकार के  ग्यारहवीं की समाजशास्त्र की Text Book में ये कहा गया था कि कम गोरी या अपाहिज न लड़कियों के माता -पिता को अधिक दहेज देना पड़ता है और ऐसी  लड़कियों के पति भी उनसे प्यार नहीं  करते हैं। {अब ये मत कहियेगा कि ये तो भगवा या बानर दल वालों  की ही सोच है क्योंकि मैंने ऐसी घटिया सोच रखने वाले तथाकथित समाजवादियों को भी देखा है} ऐसे सोच वैसे लोग भी रखते हैं जिनका नारीमुक्ति  और नारीवाद का प्रश्न केवल लड़कियों के शॉर्ट्स पहनने, सिगरेट-शराब पीने , और पब में डांस करने तक ही सीमित  रह जाता है क्योंकि ये Elite Feminist समाज के निचले तबके तक  तक जा ही नहीं पाते हैं वरना ये देखते कि किस तरह गाँव में लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी गयी सरपंच की जगह उसका पति-देवर या भाई काम करता है।

 रंडी अश्लील शब्द है और फक धार्मिक (!) … पिंक के बहाने कुछ जरूरी सवाल

बहरहाल, चाहे “विवाह में बलात्कार ” हो या कोई और घरेलू हिंसा , उसे रोकने के लिए हमें पहली पाठशाला से ही लैंगिक समानता विषयक कविता, कहानियों और उदाहरणों को शामिल  करना होगा , और हाँ ये “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” वाली बात तो भूल ही जाईये क्योंकि इसका भी यहीं हश्र हुआ है जो रघुबीर सहाय जी  की कविता में है:-
“पढ़िए गीता
बनिए सीता
फिर इन सब में लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घर-बार बसाइए.

होंय कँटीली
आँखें गीली
लकड़ी सीली, तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइए.”

तो रेपिस्ट पतियों ये बात याद रखो कि पत्नी  सिर्फ हमबिस्तर नहीं बल्कि हमसफ़र होती है.
और आधी आबादी के लिए मेरा यहीं सन्देश है की
“तुम चुप रहकर जो सहती हो , तो क्या ये ज़माना बदला है.
तुम बोलोगी मुंह खोलोगी , तब ही तो ज़माना बदलेगा.


सन्दर्भ:  


1.”अस्मिताओं का संघर्ष : भारतीय संस्कृति का पुनर्लेखन ” , 
2. कमल किशोर कठेरिया , 
3. वाणी प्रकाशन-2016
4.   P. Venugopal:Different Forms of Violence and Harassment against Women, Indian Journal of       Criminology vol.29, 2001
5.   Ram Ahuja : Disquistional Criminology

लेखक का शीर्षक अनारकली ऑफ़ आरा फिल्म से साभार लिया गया है.
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर
अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.
दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 
 

उस आख़िरी दृश्य में अनारकली !

डिस्क्लेमर: इस फिल्म के साथ हालिया प्रदर्शित फिल्म पिंक और पार्च्ड की एकाधिक बार तुलना इसलिए कि ये सारी फ़िल्में स्त्रीवादी फ्रेम की दावेदारी रखती हैं. 

अनारकली ऑफ़ आरा एक सीधी रेखा की कहानी, कई बार जानी पहचानी कहानी पर बनी फिल्म है. फिल्म की केन्द्रीय घटना तो एक खबर का कथांतरण है-चर्चित गायिका देवी ने 2011 में बिहार के जेपी यूनिवर्सिटी छपरा के तत्कालीन कुलपति पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था. कहानी के परिवेश को थोड़ा खीच कर पीछे ले जाया जा सकता है, जब अलग-अलग अवसर पर नर्तकियों का नाच बिहार की संस्कृति में आम था. लेकिन क्या ख़ास है, जो अविनाश दास के लेखन और निर्देशन में बनी पहली ही फिल्म को बेहद खास बनाता है, पहली ही कृति के क्लासिक हो जाने की हद तक ख़ास.

मैं बहुत निर्मम दृष्टि लेकर फिल्म देखने गया था. ऐसा इसलिए भी कि अपने पास से बेहद पास से किसी साथी की कोई मार्क होती सफलता सामने आती है तो आप उत्सुकता, कौतुहल, अभिमान और कुछ-कुछ कठोर आलोचना के भाव से उस सफलता को देखते हैं. मुम्बई की ओर रुख करने के तीन-चार साल के भीतर अविनाश दास ने एक फिल्म हमारे सामने रख दी-निदेशन और लेखन के साथ तो स्वाभाविक है इन मिश्रित भावों के साथ इस घटना का स्वागत. इसी बीच ‘ ज़रा घिस ल, तनी रगड़ ल, ये दारोगा दुनलिया में जंग लागा हो’ जैसे गीत और कथित द्विअर्थी संवादों के टीजर सामने आ रहे थे, फिल्म भी नाचने-गाने के पेशे वाली एक स्त्री के इर्द-गिर्द बताई जा रही थी, फिर तो एक बात और स्वाभाविक थी -इसे देखते वक्त जाति और जेंडर की दृष्टि का केंद्र में होना. इस तरह सिनेमा देखने के निर्मम टूल से गुजरना था फिल्म को, उसके निदेशक, कथाकार, अभिनेत्री और अभिनेताओं को.  फिल्म निर्माण और उसके चलने की व्यावसायिक आवश्यकताओं के बीच रस्सी संतुलन की अपेक्षा तब और बढ़ जाती है, जब देश के सबसे संवेदनशील माने जाने वाले विश्वविद्यालय की प्रोडक्ट और देश की अलग-अलग घटनाओं पर अपनी बेबाक और प्रगतिशील राय रखने वाली अभिनेत्री इसकी लीड भूमिका में हो.
 ‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में (!)

पावरफुल इमेजरी (बिंब) जो फिल्म को ख़ास बनाते हैं:    

इसके पहले कि कैमरे की बोलती भाषा, जो स्पष्ट बिंबों के माध्यम से सामने आती है को पढ़ें, डिकोड करें एक संकेत की ओर ध्यान स्वतः रुक जाता है. आप फिल्म देखने के पहले तक तो गानों और कथित द्विअर्थी संवादों की सूचना से लोडेड भाव में होते हैं, कुछ और देखने-बूझने के इरादे में होते हैं कि पर्दे पर दुष्यंत की पंक्ति आपकी सोच को थोड़ा झटका देती है और आप सचेत हो जाते हैं कि आप जिस मानस से यहाँ फिल्म देखने आये हैं, उससे कुछ तो अलग दिखने वाला है. पंक्ति है:
  ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा 
                मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा. 
अब ज़रा कैमरे की भाषा और फिल्मकार के सचेत संकेतों को समझते हैं

प्रतिनायकों की जाति और जनेऊ (यज्ञोपवीत का धागा) का सन्देश 

फिल्म का पहला प्रतिनायक आरा के किसी कुबेर सिंह विश्वविद्यालय, जो संवादों में आरा का कुंवर सिंह विश्विद्यालय ही है, का कुलपति है. नाम के पीछे चौहान सरनेम लगा है, जिससे यदि जाति स्पष्ट नहीं हो तो उसे समझाने के लिए बार-बार उसके गले से लटकते जनेऊ पर फोकस करता कैमरा उसकी जाति स्पष्ट कर देता है- द्विज जातियों के बीच लोकेट कर देता है. प्रतिनायक के साथ ही दूसरा प्रतिनायक है थाने का थानेदार: जिसके कंधे से लगे नेम प्लेट पर कैमरे का फोकस सूचित करता है- बुलबुल पांडे.



नायिका के घर से झांकती वर्गीय और सामाजिक स्थिति 

फिल्म का एक ख़ास और बहुत देर तक बार-बार दिखने वाला लोकेशन है नायिका अनारकली का घर, जो है तो किसी रिहायशी इलाके में ही, कोठा नहीं है, लेकिन उसके घर का आँगन, छोटी-छोटी कोठरियां, चापानल, स्टोव पर बनता खाना, बिखरे-बेतरतीब सामान और नृत्य के साज-सामान- ये सब काफी हैं गायिका-नर्तकी के पेशे से गुजर बसर करने वाली नायिका की वर्गीय और सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करने के लिए, बहुत कुछ उसके नाम और उसके आस-पास के लोगों के नाम-काम से भी स्पष्ट हैं. और  उसकी मां की शादी के नाच के दौरान ह्त्या के बाद बेटी का भी इस पेशे में आने की विवशता, यानी पीढी-दर-पीढी सा चलन के साथ ही बेटी का पढाई इसलिए छोड़ना का स्कूल का मास्टर उसके गायिका की बेटी होने के कारण ही शायद, उससे अश्लील गाना सुनना चाहता है- इस सबके साथ दुष्यंत की पंक्ति काफी है नायिका की सामाजिक स्थिति और संघर्ष से दर्शकों को जोड़ देने के लिए.

 रंडी अश्लील शब्द है और फक धार्मिक (!) … पिंक के बहाने कुछ जरूरी सवाल

हीरामन की खोज 

तीसरी कसम फिल्म के नायक हीरामन का भोलापन तीसरी कसम फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है- तीसरी कसम के इस भोले और नन-डिमांडिंग आशिक की छाप दर्शकों पर अमिट पड़ती है यह चरित्र आज भी हिन्दी सिनेमा की मजबूत उपस्थिति है. इस फिल्म में भी एक हीरामन है, सातवें दशक के हीरामन सा ही भोला, लेकिन ग्रामीण नहीं स्लमवासी हीरामन !. नायिका के द्वारा पहली बार अपनी बांह पर छुअन के अहसास का आनंद लेते/ उसे याद करते हीरामन को एकाधिक बार देखना नायिका के प्रति उसकी मोह को स्पष्ट करता देता है. उसकी ‘छुअन’ के प्रति प्रतिक्रया शायद आपको हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास के नायक ‘रैक्व’ की पीठ पर स्त्री की छुअन के बाद की प्रतिक्रिया से जोड़ दे, यदि आपने ‘अनामदास का पोथा पढ़ा हो तो.’ और वह क्षण भी आप नोटिस करेंगे, जब भोगने या ऐन्द्रिक प्रेम के लिए अपने चारो ओर नाचते पुरुषों के बीच एक हीरामन को देखकर अनारकली उसके पाँव छू कर अपनी प्रतिक्रया देती है, सम्मान देती है.  ‘देश के खातिर’ के अपने टेक के साथ यह हीरामन भी यकीनन आपको फिल्म देखने के बहुत बाद तक याद रहेगा.

और अनारकली की  वह पदचाप, चेहरे का वह तोष 

फिल्म के अंत में अनारकली अपनी लड़ाई को अपनी नाच के तांडव भाव से क्लाइमेक्स तक ले जाती है, तांडव भाव के साथ उसका क्रोध, उसकी बदहवासी, उसकी पीड़ा लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के बाद तक जारी रहते हैं- लड़ाई के अंजाम के साथ वह अकेले निकल पड़ती है सड़कों पर, सडक जो अपने दृश्यों से किसी भी शहर के सिविल लाइन इलाके की सडक है- और अचानक से, झटके में वह इस तांडव भाव से
बाहर निकलती है, उसकी चाल बदल जाती है, उसकी  पदचाप भी और चेहरे पर पीड़ा की जगह तोष का भाव खिल जाता है- वह भाव बदले के भाव या जंग जीतने के भाव से अलग है, सारी चीजों से निकल आने का भाव और अपनी लड़ाई के अंजाम की पटकथा खुद लिखने का भाव, उसके आस-पास तब न उसका हीरामन है, न नया दोस्त अनवर और न कोई अन्य रखवाला- यहीं से यह फिल्म ‘नो’ कहने के महत्व को समझाने के लिए बनी कोर्ट रूम में अतिनाटकीय और अविश्वसनीय रूप से घटित होने वाली फिल्म ‘पिंक’ से कोसो आगे चली जाती है. पिंक फिल्म में मैंने मर्दाने या संरक्षक स्त्रीवाद की आलोचना करते हुए एक विस्तृत समीक्षा पहले लिखी थी- इस पूरे दृश्य में कैमरे की भाषा है और कैमरे के पीछे से संचालक का विवेक, जिसे स्वरा भास्कर के अभिनय ने बखूबी अभिव्यक्त किया है.


कहानी जानी-पहचानी होकर भी क्यों नई है? 


ऐसी कितनी कहानियां हम सबने देखी होंगी अलग-अलग फिल्मों में. एक नायिका, नाचने-गाने वाले परिवेश से, और उसे भोगने के लिए व्याकुल शक्तिशाली खलनायक के षड्यंत्रों और उनके खिलाफ नायिका के संघर्षों से आगे बढ़ती कहानी. उन फिल्मों में पीडिता नायिका होती है और उसके उद्धार के लिए एक प्रेमी होता है, एक नायक होता है. लेकिन अनारकली ऑफ़ आरा के इर्द-गिर्द प्रेमियों की जमात तो है, लेकिन उद्धारक की भूमिका वह उन्हें लेने नहीं देती, अपने हिस्से की लड़ाई वह खुद लड़ती है अंजाम तक-मर्द तो बहुत हैं, नाच-गाने के उसके लिए सट्टा ठीक करने वाला उसका आशिक रंगीला, हीरामन, उसका कमउम्र आशिक अनवर और कैसेट कंपनी का मालिक- सबके सब उसके मददगार हैं, लेकिन न कोई उद्धारक है, न उद्धार के लिए तत्पर, और न ही ऐसा स्पेस उन्हें अनारकली देती है. कहानी नायिका की एजेंसी को कर्तापन के भाव को बखूबी उभारती है. वह स्वीकार करती है कि ऐसा नहीं है कि नाचते-गाते हुए वह किसी के साथ संबंध बनाने से पूरी तरह परहेज करती हैं, लेकिन कोई बिना उसकी मर्जी के सरेआम उसकी बेइज्जती नहीं कर सकता है. यही कर्तापन इस फिल्म की कहानी को प्रचलित कहानियों से अलग करता है. कहानी का अंत एक सन्देश से होता है, ‘पत्नी के भी न कहने के अधिकार से’ और हाँ अंत प्रतिनायक की मौत या ह्त्या से नहीं उसकी संभावित गिरफ्तारी और उसके बहते आंसुओं के साथ होता है. पूरी फिल्म में दर्शक नायिका की पीड़ा से जबतक कि जुड़ता है और उसके प्रति किसी सहानुभूति भाव में आता है, नायिका पीडिता की बनती छवि से बाहर आ जाती है, बार-बार बाहर आ जाती है, अपनी लड़ाई में अपनी एजेंसी के साथ- बेचारा दर्शक भी उसके उद्धारकर्म में अपनी भूमिका नहीं निभा पाता.



आंचलिकता के बावजूद संप्रेषणीयता


फिल्म अपने नाम, अपने कथा-परिवेश, फिल्मांकन और संवाद के स्तर पर आंचलिक है. उसके द्विअर्थी संवादों को समझने के लिए भी उस अंचल की भाषा को समझना जरूरी है. लेकिन कुछ तो दृश्य माध्यमों की अपनी ताकत के कारण और कुछ आंचलिक भाषा के बीच से संवाद की संप्रेषणीयता के कारण दर्शक शायद ही कहीं खुद को डिटैच महसूस कर पाता होगा. फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ की क्षमता को जो समझता है, वह इसे भी समझ सकता है.

न विक्टिमाइजेशन, और न देह राग 

इस फिल्म की खासियत है कि इसमें कथाकार और निदेशक का दूसराभाव (अदरनेस) शायद ही कहीं हावी हुआ है, निश्चित तौर पर वह इस चरित्र के लिए अदर है, लेकिन उसका अदर होना इस फिल्म को कहीं प्रभावित करता नहीं दिखता. नायिका का न तो कहीं विक्टिमाइजेशन है, अति पीडिता की छवि है, और न ही कहीं उसकी देह की अतिकेंद्रियता या दैहिक अंतरंगता के लम्बे प्रसंग- ये सारे तत्व ऐसी थीम पर बनी फिल्मों में बहुधा पाये जाते हैं. इन तत्वों के होने या सायास उन्हें लाने से महिला निदेशक भी नहीं बच पाती हैं, हालिया प्रदर्शित फिल्म पार्च्ड इसका एक उदाहरण है.

अभेनित्रियों की उपस्थिति 


यह फिल्म बॉलीवुड में नायिकाओं की बढ़ती ताकत का भी एक उदाहरण है, जो अपने अभिनय के बल पर नायक विहीन सफल फ़िल्में दे रही है. स्वरा भास्कर फिल्म की नायिका के रूप में अप्रतिम है. फिल्म का अभिनय पक्ष काफी मजबूत है- जो सभी चरित्रों के हिस्से से एक समान सच है. मुझे अनारकली (स्वरा के अभिनय से उभरी अनारकली) में वे नायिकायें दिखाई दे रही थीं, जिनसे अपने शोध के दौरान मैं मिला था- नाच-गाने और देह व्यापार से जुडी महिलायें- उस आख़िरी दृश्य में भी जब अपनी अस्मिता के सम्पूर्ण बोध के साथ अनारकली सडक पर अपादमस्तक अकेली थिरक सी उठती है.
और अंत में गीत. सच में इस फिल्म के गीत इसकी जान हैं. एक गायिका की कहानी में जिसका होना जरूरी भी है. एक गीत साथी डा. सागर ने भी लिखा है, अपने चिरपरिचित अंदाज का श्रृंगार गीत.

पुनश्च 


अनारकली यानी बाई जी


‘बाई जी’ (अनारकली)के बारे में तो बचपन में बहुत पहले सुन लिया था, जब लोग दुर्गापूजा के आयोजन के लिए गाँव के लिए बाई जी बुलाने की तैयारी करते, गाँव में कभी बाई जी नहीं आई-लौंडा नाच या वीसीआर रिकार्ड से काम चलाया गया. सबसे स्पष्ट और बाई जी की यौनिकता पर सीधा प्रहार करते हुए घटना का जिक्र सुना शहर में सातवीं-आठवीं में, जब पान की दुकान पर पता चला कि पड़ोस के विधायक जी के परिवार के लोगों ने ‘बाई जी’ लोगों को बुलाया था- नाच के दौरान और तथा नाच के बाद रात भर तंग करते रहे-प्राइवेट पार्ट को टच, चोट आदि, आदि -बाई जी रोते -रोते गईं थीं. आगे चलकर यह भी सुना कि मध्य बिहार के एक बाहुबली ने एक बाई जी से शादी कर ली-हालांकि बाद के दिनों में उन्हें घर में सम्मानित देखा, मोहल्ले में दबंग. फिर एम.फिल के रिसर्च के दौरान ‘बाई जी’, यानी नाचने वाली महिलाओं से उनके कोठे पर मिला और देह व्यापार करने वालियों से भी. जिनसे मिला, उनमें से कुछ सिन्दूर लगाती थीं, उनके बच्चे पढ़-लिख रहे थे और वे रोज मुजरा करतीं अपने कोठे पर.


एक कहानी भी पढ़ी हरि भटनागर  की इन दिनों ‘मुसुआ’. कहानी का अंत एक किशोर होते बच्चे ‘मुसुआ’ के द्वारा अपनी बाई जी से बदला लेने के साथ होता है, वह उनका टहलुआ होता है, रोज उनकी देह टिपता है, पाँव- पीठ, जांघ-कभी वासनात्मक सोच नहीं होती उसके मन में- लेकिन किसी दिन अपने एक अपमान का बदला लेने के लिए वह उनके लहंगे में ‘मूस’ डाल देता है- बाई जी पीड़ा से कराहती हैं और वह ताली बजाकर हंसता है.
बाई जी की पहली घटना और कहानी में बाई जी के साथ मुसुआ का बदला-‘बाई जी’ की यौनिकता पर मर्दाने हमले से जुड़े हैं, कमोवेश एक जैसे. हालांकि मुसुआ की बाई जी दबंग हैं, मेरे शोध की बाई जी लोगों की तरह या बाहुबली की पत्नी की तरह- पीड़ा के उनके अपने प्रसंग होंगे विधायक जी वाली घटना की बाई जी की तरह, लेकिन अधिकाँश मामले में लोगों के साथ व्यवहार करते हुए वे दबंग होती जाती हैं और अपनी अस्मिता के प्रति सचेत और यौनिकता के प्रति अपने नियन्त्रण बोध से भरी भी- इसके उदाहरण कोठों के इलाके से घूमते हुए कई बार आपको मिल सकते हैं, जब बुलंद आवाज में बाई जी लोग किसी-किसी ‘मर्द’ को डपटती आपको मिल जायेंगी.

और एक बाई जी अनारकली ऑफ़ आरा के रूप में भी है स्क्रीन पर. वह दबंग, बोल्ड और अपनी वजूद पर अधिकार बोध से भरी है- वह गालियाँ गाती जरूर है, विधायक जी के परिवार जैसे गलीजों से निपटना भी जानती है- हालांकि इस फिल्म का प्रतिनायक विधायक नहीं, कोई पारम्परिक लफंगा नहीं- एक बड़ा भारी शिक्षाविद है, शिक्षा का अफसर!

संजीव चंदन स्त्रीकाल के संपादक है 
संपर्क :8130284314 


स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर
अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.
दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

क्या इसे ही जंगलराज कहते है योगी जी

योगी जी इधर आप रोमियो स्क्वैड बना रहे हैं  उधर आपके राज्य के दबंग बलात्कार पीडिता को तेज़ाब पिला रहे हैं. क्या इसी को जंगलराज कहते हैं….? 

गैंग-रेप, एसिड अटैक और अब दबंगों ने सरेआम पिलाया तेजाब, शीरोज की सदस्य विमला गंभीर हालत में केजीएमयू में भर्ती.


एसिड अटैक सर्वाइवर्स द्वारा चलाए जा रहे कैफे शीरोज हैंगआउट की सदस्य विमला को 23 मार्च को  कुछ दबंगों ने लखनऊ के मोहनलालगंज स्टेशन के पास चलती ट्रेन में जबरन तेजाब पिलाकर मारने की कोशिश की. विमला गंभीर हालत में लखनऊ की किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में एडिमट हैं. मौके पर मौजूद जीआरपी ने विमला पर हुए इस हमले की जानकारी कैफे शीरोज की लखनऊ शाखा को दी है. अपनी बेटी को हाईस्कूल की परीक्षा दिलाने के लिये विमला 10 मार्च को कैफे से छुट्टी लेकर घर गई थीं. आज वे रायबरेली से वापस लखनऊ लौट रही थीं और इसी की जानकारी पाकर अपराधियों ने विमला पर चलती ट्रेन मे हमला कर दिया.

अगर पुलिस पहले दर्ज किये गए मामलों में कोई कानूनी कार्यवाही करती तो शायद इस घटना को बचाया जा सकता है. विमला पर इससे पहले भी चार बार अलग अलग हमले कराए गए हैं जिनकी एफआईआर दर्ज होने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गई. फिलहाल पुलिस ने भरोषा दिया है कि विमला के परिवार को सुरक्षा दी जाएगी और उनकी बेटी को कल हाईस्कूल की परीक्षा दिलाने के लिये पुलिस मौजूद होगी और सीधे उन्हे लखनऊ में किसी सुरक्षित जगह लाया जाएगा.

कौन हैं विमला


विमला एक बहादुर महिला हैं जो सभी ओर से बेरूखी झेलने के बाद भी अपनी लड़ाई लड़ रही हैं. 2009 में उनके गांव के ही कुछ दबंगों ने उनके साथ गैंगरेप किया और धमकी दी कि अगर उन्होने कानूनी कार्यवाही की तो जान गंवानी पड़ेगी. विमला ने रायबरेली जिले के ऊंचाहार थाने में इस बारे में सूचना दी हालाकि पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की. विमला की कोशिशों से एक लंबे समय बाद एफआईआर लिखी गई. किसी की भी गिरफ्तारी नहीं हुई साथ ही दो सालों बाद 2011 में विमला पर चाकू से हमला किया गया. एक बार फिर, इस घटना की एफआईआर तो दर्ज हुई लेकिन आरोपियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. 2012 में भी विमला पर जानलेवा हमला किया गया और इस बारे में पुलिस फिर कुछ न कर सकी. विमला ने हिम्मत खो दी थी लेकिन वह कुछ लोगों की मदद से लड़ती रही. 2013 में विमला पर उन्ही दबंगों ने एसिड अटैक कर दिया जिससे उनका शरीर बुरी तरह झुलस गया.

इस बीच विमला की जंग जारी रही. कभी वो लोग विमला को बयान देने से रोकते थे तो कभी उसे और उसके बच्चों को जान से मार देने की धमकी देते थे. कुछ समय छिपते छिपाते विमला अपनी लड़ाई लड़ती रहीं और 2016 में उन्होने कैफे शीरोज हैंगआउट के रीच-आउट एंड वेलफेअर विभाग से संपर्क किया. विमला को कैफे पर बतौर सहायक मैनेजर नियुक्त कर छांव फाउंडेशन ने उनकी कानूनी लड़ाई में कार्यवाही शुरू की. इसकी सूचना पर उन दबंगों ने कैफे को भी लिखित धमकी पत्र भेजा जिसमे लिखा था- “सविनय निवेदन है कि विमला को अपनी कंपनी से निकाल दो या केस वापस करवा दो, अगर यह सब नहीं किया तो विमला के शरीर में खून नहीं तेजाब दौड़ेगा” इस धमकी के बाद कैंपेन टीम ने यूपी पुलिस से इस बारे में संपर्क कर कार्यवाही की अपील की. पुलिस अपना काम कर ही रही थी कि कुछ महीनों के भीतर आज सुबह घर से छुट्टी से लौट रही विमला को कुछ लोगों ने जबरन तेजाब पिला दिया जिससे उसके अंदरूनी अंग बुरी तरह झुलस गए हैं. विमला की हालत अभी नाजुक है और वे कुछ भी बोल नहीं पा रही हैं.

इस घटना के बाद शीरोज भी डर गई हैं 

कैफे शीरोज से जुड़ी सभी एसिड अटैक सर्वाइवर्स, जो सर्वाइवर से बेहतर शीरोज (SHE+Heroes) कहलाना पसंद करती हैं, इस घटना के बाद पहली बार डरा हुआ और अकेला महसूस कर रही हैं. इस बारे में एक वीडियो बयान जारी कर (लिंक- bit.ly/HelpVimla) कैंपेनर लक्ष्मी ने लोगों से इस घटना को नवनियुक्त मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मंत्री महिला एवं बाल विकास रीता बहुगुणा जोशी से अपील की है कि वे जल्द से जल्द इस मामले में अपराधियों पर कार्यवाही करवाने की कोशिश करें. साथ ही विमला और उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराने के लिये भी सोशल मीडिया पर एक कैंपेन चलाया जा रहा है.

पुलिस ने दिलाया है कार्यवाही का भरोसा 

घटना की जानकारी पाकर एसएसपी मंजिल सैनी, एसपी रायबरेली, एसपी नार्थ लखनऊ आज कैफे शीरोज हैंगआउट पहुचे और मामले की पूरी जानकारी लेकर कार्यवाही का आश्वासन दिया है. साथ ही इस बारे में आश्वस्त भी किया है कि विमला की बेटी बिना किसी डर के अपने हाईस्कूल का इम्तेहान दे सकेगी और फिर उसे लखनऊ लाकर किसी सुरक्षित स्थान पर रखा जाएगा.सूचना मिलने तक पुलिस अपराधियों का पता नहीं लगा सकी है और इस घटना से जुड़े किसी भी हमलावर का पता नहीं चल पाया है.

किसी भी सूचना के लिये नीचे दिये नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है-
9717900302, 9958066951, 7052957657

उपासना झा के फेसबुक वाल से साभार 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर
अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.
दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

शैली किरण की कविताएँ

शैली किरण


प्रवक्ता, हिंदी राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला धनेटा, संपर्क:Shellykiran72@gmail.com

1

सुनो मित्र, मेरे अन्तर्मन की….

मुझे नहीं बनना तुम्हारी रोल माडल,
मुझे नहीं सजना किंगफ़िशर के कैलेंडर पर,
मुझे नहीं चाहिए,तुम्हारे प्रेम अश्वाशन,

मुझे नहीं बनना वनवास पाने को सीता,
मुझे नहीं बँटने के लिए होना द्रोपदी,
मुझे नहीं होना मीरा ,तुम्हारी स्तुति पाने को,

मैं ख़ुश हूँ,
प्रकृति होकर,हँसकर ,रोकर,
कुछ नहीं पाना मुझे,
तुम्हारे विचार तुम्हारी संस्कृति ढोकर,

मित्रता का अर्थ है,स्वीकार्य,
स्वतंत्रता का सम्मान,
मैं दोस्त हूँ तो इंसान मुझे,
बराबर हर स्तर पर मान..।

2


बीमारी ..
बीमारी एक कला फ़िल्म है,
ब्लैक एंड वाइट ,
जिसका अंत लेखक नहीं,
निर्देशक तय करता है ।
बीमारी एक गीत है,
शोक गीत,
अनचाहा अलाप,
जिसकी तान ,
गीतकार नहीं,
संगतकार तय करता है ,
बीमारी एक खरपतवार है,
विचार का कुपोषण,
जिसका बढ़ना ,
किसान नहीं,
मौसम तय करता है,
बाहर सब समान्य है,
भीतर टूट रहा होता है जीवन,
दीमक की तरह,
शोर नहीं करती बीमारी,
पर बीमार हो जाता है खोखला ।



3

सुनो साथी,
खंड खंड टूटेंगे,
वो जुगत लगाकर तोड़ेंगे,
हम अमीबा की तरह,
बढ़ेंगे,
जितना तोड़ेंगे,
उतना बढ़ेंगे,
वे रक्तबीज कहकर,
उपहास करेंगे,
हम अणु अणु,
बिखर विध्वंस रचेंगे,
ये दुनिया ख़ूबसूरत होगी,
इक दिन,
जागती आँख से,
हम कीड़े मकोड़े,
मकड़ी के विरुद्ध,
जाल बुनेगे..!

4


सुनो प्रिय,
जब मैं कहती हूँ,
लौट जाओ,
उस वक़्त भी,
राह तुम्हारी ताक रही होती हूँ,,
गिनकर क़दमों की आहट,
खिड़की से झाँक रही होती हूँ,,
तुमने कहा प्रेम,
और खो गए उसमें,
हो गए मौन,
मैं तलाश करने लगी वजूद,
समझ स्वयं को गौण,
और एक दिन समझ आया,
तुम प्रेम हो,
नहीं हो साया,,!
प्रेम करता है स्वतंत्र,
करता नहीं पराया,,!

5


सुनो सखी,
तुमसे बात करने को,
आज शब्द नहीं मेरे पास,
मन को यूँ समझा लेना,,
बस ये की अनंत शून्य,
पूरा करने ख़ुद को,
निगल जाता है,
कई सूर्य और चंद्रमा,
बस अमावस की रात में,
तारों सी टिमटिमा लेना,
आसमा की बाँहों में सर धर,
आँसू बहा लेना !
हम औरतें सुख की चाबी,
तलाश करती है तमाम उम्र,
पर दुःख का ताला,
हमारी क़िस्मत का दरवाज़ा,उसके भीतर क्रांति है,

6


गरीब ने दूसरे गरीब की थाली ,
ईर्ष्या से देखी,
बादशाह की थाली,
देखने की हिम्मत,
किसी में नहीं थी,
संत्री ने मंत्री की थाली देखी,
और थूक दिया रसोइये पर,
मंत्री पर थूकने की हिम्मत,
किसी में नहीं थी,
बादशाह बदले ,
प्रजा नहीं,
थाली में युगों परोसा गया ताज,
सब मूक घृणा में जले,
क्योंकि बलिदान की आग में,
जलने की हिम्मत किसी में नहीं थी.




सुनो प्रिय,
प्रेम और महत्वाकांक्षा में,
जब द्वंद्व हो,
तुम महत्वाकांक्षा चुनना,
क्योंकि मैं सदियों से,
प्रेम चुनते आई हूँ ।
पलकों के करघे पर,
रेशमी सपने,
आँसुओं की बाढ़ में,
बुनते आई हूँ,,।सुनो प्रिय,
प्रेम और महत्वाकांक्षा में,
जब द्वंद्व हो,
तुम महत्वाकांक्षा चुनना,
क्योंकि मैं सदियों से,
प्रेम चुनते आई हूँ ।
पलकों के करघे पर,
रेशमी सपने,
आँसुओं की बाढ़ में,
बुनते आई हूँ,,.

8


सुनो प्रिय,
शिकायतों की एक पोटली है,
मेरे पास,
जिसे तुम्हें दिखाना है,
पर जग से छिपाना है,
जैसे बचपन में सुंदर कंचे,
रखने पडते थे,
छिपाकर सबकी नज़र से,
जैसे बचपन में इकठ्ठा रेजगारी समेटे,
बचा ली गुल्लक मँहगाई के असर से,
जैसे माँ छिपाकर रखती थी,
कँवलनयन काजल की डिब्बी,
और लिपस्टिक ,
बचा जाती थीं दीवारें,
रंगीन तस्वीरों से,
जैसे बची रहती थी,
पेसिंल छीलने के बाद,
जियोमैटरी बाक्स में,
छील से बनी कलाकृतियाँ,
चाक के छोटे टुकड़े,
हो सकता है,इक उम्र में,
जज्बात हो जाते हैं कचरा,
बढप्पन निगल जाता है बचपना,
गंभीरता का चश्मा,
देखने लगता है,
सबकुछ साफ़ ,
चाहता है सबकुछ संपूर्ण,
सब हो उजला,
पर फिर भी लिखना,
एक बचकाना प्रेम पत्र,
किसी दिन शिकायतों की पोटली खोलेंगे,
गुड्डी गुड्डे के साथ घर घर खेलेंगे.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर
अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.
दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

कुमकुम में लिपटी औरते

सुनीता झाड़े


सुनीता झाड़े मराठी और हिन्दी में कविताएँ  लिखती हैं  तीन मराठी कविता संग्रह प्रकाशित संपर्क: commonwomen@gmail.com



एक

डोर बेल बजाने के
कोई तीसरी चौथी बार में
दीक्षित भाभी दरवाजा खोलती हैं
पहली नजर में दिखाई देता है
माथे पर जोर से लगाया कुमकुम
कुछ रूठ कर हाथ पांव फैलाता हुआ
भीगी पलकें, झुकीं ऑंखें….

किसी और के आने की आहट सुन
अंदर जाकर सारे रंगों को
मलकर निकालती हुई
अपनी धवल काया के साथ
अपने घर के दीवान-ए-खास पर बैठती
दीक्षित  भाभी…
कुछ पूछती नहीं
फिर भी कराह कर कहती
बहुत मन करता है
कुमकुम लगाने को
अभी तो कोई बुलाता भी नहीं
घर में भी कोई नहीं लगाता
सब टालते हैं
वैधव्य मानो छूत की बीमारी हो कोई….

बाद तुम्हारे


दो

वह अपने आपको
थ्री फोर्थ पेंट-टी शर्ट में ढाले
अपने मंहगे से सोफा सेट पर
पैरों को यूं फैला बैठी…
फिर अपनी रुआंसी आवाज को
हौले से थाम
हाथों से बतियाते
‘भाभी के यहां हो आई
… पुजा प्रसाद के लिए
बुलाया था
वहां उनकी दूर की बहन
कुमकुम लगाने आई
तब उन्होंने सबके सामने कहा
उन्हे कुमकुम ना लगाना सखी

उन्हें क्या लगा?
क्या मैं उनकी कुमकुम की मोहताज हूं
मैं अपने घर नहीं लगा सकती
देखो,
पुजाघर में रखे कुमकुम को
आड़े हाथों माथे पर फैलाये  रक्त..रक्त…


हम गुनाहगार औरतें और अन्य 

तीन

देर रात उसके मुंह से आनेवाली
शराब की बू को टालते
धीरे से उसके गले से नीचे उतर
बाहों में…
फिर सीने पर माथा टेकती
उसी मन्नत के साथ
सुनो,
(उसकी नशे में डूबी उंगलियों को माथे से छूआते…)
मुझे यहां माथे पर कुमकुम लगाना बहुत अच्छा लगता है
मेरी इसी चाह के लिए ही सही
तुम यूं शराब पीकर खुद को मारना छोडो…
.
.
.
उसके तकिये के करीब सीमोन द बोउआर की *सेकंड सोच.!

(सीमोन द बोउआर की मुल किताब का नाम ’सेकंड सेक्स’)

महाराष्ट्र के हर घर में हर दिन पुजा के समय, हर त्योहार में माथे पर हल्दी कुमकुम
लगाने की प्रथा है. इस प्रथा में घर की सुहागने ही शामिल  होती है. उन्ही को यह सम्मान दिया जाता है. बाकी जिनके पति नही है, छोड गये है, या छोड दिया गया है उनको यह सम्मान ना देकर अपमानित किया जाता है. सारे शुभ कार्य में उनको बडे ही अभद्र व्यवहार का सामना करना पडता है. उपर तीनो कविताओं की नायिका ऐसे ही मराठी घरों में से है…

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर
अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.
दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

राष्ट्रपति, क्या कुलपति के खिलाफ कार्रवाई करने वाले हैं!

स्त्रीकाल डेस्क 


कार्य स्थलों पर महिला कर्मियों के यौन  उत्पीडन को लेकर 2013 में क़ानून बना. इसके पहले कार्यस्थलों पर यौन  उत्पीड़न के प्रसंग में 1997 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशाखा बनाम राजस्थान बनाम सरकार के मामले में दिये गये दिशानिर्देश का अनुसरण किया जाता था, जिसे  विशाखा गाइडलाइन  भी कहा जाता है. 2013 में बना क़ानून कार्यस्थलों पर यौन उत्पीडन के मामले में बहुत स्पष्ट प्रावधान करता है. उसके प्रावधानों  में धारा 16 के अनुसार शिकायतकर्ता पीडिता के नाम, उसकी पहचान आदि को जांच के दौरान जांच समिति या नियोक्ता जाहिर नहीं कर सकता है. यदि ऐसा वह करता है तो धारा 17 में उसपर स्पष्ट कार्रवाई का प्रावधान है.

देखें धारा 16-17 के प्रावधान : 

 

पूरा क़ानून पढने के लिए  क्लिक करें : कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न क़ानून 

गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा ( केन्द्रीय विश्वविद्यालय) के कुलसचिव के हस्ताक्षर से उसकी वेब साईट पर एक नोटिस लगी. यह नोटिस चीनी छात्राओं द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप पर विश्वविद्यालय के  एक असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के निलंबन की है.  एक्ट की धारा 16 कहती है कि पीडिता का नाम और पहचान जांच चलने तक उजागर नहीं करना चाहिए , जबकि इस नोटिस में पीड़िताओं  नाम स्पष्ट रूप से जाहिर किये गये हैं.
देखें तस्वीर, इसे विश्वविद्यालय यदि हटाती भी है तो भी 48 घंटे से यह वहाँ बना हुआ है, स्क्रीनशॉट स्त्रीकाल के पास है. यहाँ दी गई तस्वीर में पीड़िताओं के नाम ब्लैक कर दिये गये हैं.

अब सवाल है कि यदि क़ानून का उल्लंघन विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारी कर रहे हैं  तो धारा 17, जो ऐसा करने वाले को दण्डित करने का प्रावधान करती है का अनुपालन कौन करेगा. कुलपति का नियोक्ता भारत के राष्ट्रपति होते हैं, तो क्या राष्ट्रपति कुलपति और अन्य शीर्ष अधिकारियों पर कार्रवाई करने वाले हैं? लेकिन राष्ट्रपति मानवसंसाधन विकास मंत्री की अनुशंसा पर काम करते हैं, तो क्या देश के मानवसंसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर ऐसी अनुशंसा करने वाले हैं?  क्या विदेशमंत्री सुषमा स्वराज पीडिता के विदेशी होने के कारण कानूनी कार्रवाई के लिए हस्तक्षेप करेंगी ! सवाल है कि क्या सरकार अपने क़ानून का उल्लंघन करने वाले शीर्ष अधिकारियों का न सिर्फ बचाव करने से बचेगी, बल्कि क्या एक विदेशी छात्रा के उत्पीडन के मामले में अधिकारियों को दंडित करने की मिसाल कायम करेगी?

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर
अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.
दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com