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अनचाही बेटियाँ

जावेद अनीस

एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com
javed4media@gmail.com

हम एक लिंगभेदी मानसिकता वाले समाज हैं जहाँ लड़कों और लड़कियों में फर्क किया जाता है. यहाँ लड़की होकर पैदा होना आसान नहीं है और पैदा होने के बाद एक औरत के रूप में जिंदा रखन भी उतना ही चुनौतीपूर्ण है. यहाँ बेटी पैदा होने पर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोगों की ख़ुशी काफूर हो जाती है. नयी तकनीक ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है अब गर्भ में बेटी है या बेटा यह पता करने के लिए कि किसी ज्योतिष या बाबा के पास नहीं जाना पड़ता है इसके लिए अस्पताल और डाक्टर हैं जिनके पास आधुनिक मशीनें है जिनसे भ्रूण का लिंग बताने में कभी चूक नहीं होती है. आज तकनीक ने अजन्मे बच्चे की लिंग जांच करवा कर मादा भ्रूण को गर्भ में ही मार देने को बहुत आसान बना दिया है.

भारतीय समाज इस आसानी का भरपूर फायदा उठा रहा है, समाज में लिंग अनुपात संतुलन लगातार बिगड़ रहा है. वर्ष 1961 से लेकर 2011 तक की जनगणना पर नजर डालें तो यह बात साफ तौर पर उभर कर सामने आती है कि 0-6 वर्ष आयु समूह के बाल लिंगानुपात में 1961 से लगातार गिरावट हुई है पिछले 50 सालों में बाल लिंगानुपात में 63 पाइन्ट की गिरावट दर्ज की गयी है. लेकिन पिछले दशक के दौरान इसमें सांसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गयी है  वर्ष 2001 की जनगणना में जहाँ छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों में प्रति एक हजार बालक पर बालिकाओं की संख्या 927 थी लेकिन  2011 की जनगणना में यह घटकर कर 914 (पिछले दशक से -1.40 प्रतिशत कम) हो गया है. ध्यान देने वाली बात यह है कि अब तक की हुई सभी जनगणनाओं में यह अनुपात न्यून्तम है.

भारत में हर राज्य की अपनी सामाजिक,सांस्कृतिक, आर्थिक पहचान है जो कि अन्य राज्य से अलग है  इसी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक विभिन्नता के कारण हम देखते हैं कि एक ही देश में बाल लिगानुपात की स्थिति अलग अलग हैं. राज्यों की बात करें तो देश के सबसे निम्नतम बाल लिंगानुपात वाले तीन राज्य हरियाणा (830), पंजाब (846), जम्मू कश्मीर (859) हैं जबकि सबसे ज्यादा बाल लिंगानुपात वाले तीन राज्य मिजोरम (971),मेधालय (970), अंड़मान निकोबार (966) हैं.  देश में सबसे कम बाल लिगानुपात हरियाणा के झझर में 774 है जम्मू कश्मीर में 2001की तुलना में 2011 में सबसे ज्यादा गिरावट -8.71 प्रतिशत देखी गई है. वही दादर नागर हवेली तथा लक्ष्यद्वीप में 2001 की तुलना में 2011 में यह गिरावट क्रमशः कि एक दशक में बाल लिंगानुपात में गंभीर गिरावट के मामले में देश में दूसरे तथा तीसरे स्थान पर हैं.

भारत में लगातार घटते जा रहे इस बाल लिंगानुपात के कारण को गंभीरता देखने और समझने की जरुरत है. जाहिर है लिंगानुपात कम होने का कारण प्राकृतिक नही है और ना ही इसका संबंध अमीरी या गरीबी से है. यह एक मानव निर्मत समस्या है जो  कमोबेश देश के सभी हिस्सों,जातियों,वर्गो और समुदायों में व्याप्त है. भारतीय समाज में गहरायी तक व्याप्त लड़कियों के प्रति नजरिया, पितृसत्तात्मक सोच, सांस्कृतिक व्यवहार, पूर्वागृह, सामाजिक-आर्थिक दबाव, असुरक्षा, आधुनिक तकनीक का गलत इस्तेमाल इस समस्या के प्रमुख कारण हैं.

मौजूदा समय में लिंगानुपात के घटने के प्रमुख कारणों में से एक कारण चयनात्मसक गर्भपात के आसान विकल्प के रूप में उपलब्धता भी है . वैसे तो अल्ट्रासाउंड,एम्नियोसिंटेसिस इत्यादि तकनीकों की खोज गर्भ में भ्रुण की विकृतियों की जांच के लिए की गयी थी लेकिन समाज के पितृसत्तात्मक सोच के चलते धीरे धीरे इसका इस्तेमाल भ्रूण का लिंग पता करने तथा अगर लड़की हो तो उसका गर्भपात करने में किया जाने लगा. इस आधुनिक तकनीक से पहले भी बालिकाओं को अन्य पारम्परिक तरीकों जैसे जहर देना,गला घोटना, जमीन में गाड़ देना, नमक-अफीम-पुराना गुड़ या पपीते के बीज देकर इत्यादि का उपयोग कर मार दिया जाता था.


साल 2003 में  समाज में घटती महिलाओं की  घटती संख्या पर संख्या पर मातृभूमि: ए नेशन विदाउट वूमेन नाम से एक फिम आई थी इसमें एक ऐसे भविष्य के गाँव को दर्शाया गया था जहाँ सालों  से चली महिला शिशु हत्या के चलते अब यहाँ एक भी लड़की या महिला ज़िंदा नहीं है. दरअस्ल यह भविष्य की चेतावनी देने वाली फिल्म  थी जिसमें बताया गया था कि बेटियों के प्रति अनचाहे रुख से स्थिति कितनी भयावह हो सकती है. आज इस फिल्म की कई चेतावनियाँ हकीकत बन कर हमारे सामने हैं. हमारे देश के कई हिस्सों में  लड़कियों की लगातार गिरती संख्या  के कारण दुल्हनों का खरीद-फरोख्त हो रहा है, बड़ी संख्या में लड़कों को कुंवारा रहना पड़ रहा है और दुसरे राज्यों से बहुएं लानी पड़ रही है.

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लिंगानुपात को बढ़ाने के लिए अनेको प्रयास किये गये है लेकिन स्थिति सुधरने बिगड़ती ही गयी है. सुप्रीमकोर्ट द्वारा  भी इस दिशा में लगातार चिंता जतायी जाती रही है पिछले दिनों सुप्रीमकोर्ट ने  भ्रूणलिंग जांच से जुड़े विज्ञापन और कंटेंट दिखाने पर सुप्रीम कोर्ट ने गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट जैसी सर्च इंजन कंपनियों को यह कहते हुए फटकार लगाई “गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां मुनाफा कमाना तो जानती हैं, लेकिन भारतीय कानून की कद्र नहीं करतीं.’ कोर्ट ने तीनों सर्च इंजन को अपने यहां आंतरिक विशेषज्ञ समिति बनाने के निर्देश दिए हैं जो समिति भ्रूण लिंग जांच से जुड़े आपत्तिजनक शब्द पहचानकर उससे जुड़े कंटेंट ब्लॉक करेगी.

लेकिन अनुभव बताते है कि कानून,योजना और सुप्रीमकोर्ट के प्रयास जरूरी तो हैं लेकिन सिर्फ यहीं काफी नहीं हैं  इस समस्या के कारण सामाजिक स्तर के हैं जैसे समाज का पितृसत्तात्मक मानसिकता, लड़के की चाह, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, लिंग आधारित गर्भपात, कन्या शिशु की देखभाल ना करना,दहेज इत्यादी. यह जटिल और चुनौतीपूर्ण समस्यायें है. लेकिन समाज और सरकार को इन समस्याओं पर प्राथमिकता के साथ चोट करने की जरुरत है.

सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

नीलेश  झाल्टे 


 महाराष्ट्र में आदिवासियों के बीच उनकी लड़ाई में शामिल प्रतिभाताई शिंदे से महिला-नेतृत्व सीरीज के तहत  परिचित करा रहे हैं  नीलेश  झाल्टे : 



आदिवासी समाज  मूलभूत सुविधाओं से हमेशा से ही वंचित रहा है. गैर-आदिवासी लोगों ने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक संसाधनों का दोहन करने के लिए घुसना शुरू कर दिया, जिसके कारण आदिवासी लोगों की पारंपरिक अर्थव्यवस्था और समाज को भारी क्षति हुई है. यही आलम महाराष्ट्र में भी है. खासकर विदर्भ और खानदेश में आदिवासियों की संस्कृति और समाज की क्षति बड़े पैमाने में हुई है. खानदेश में सतपुड़ा की गोद में आदिवासियों का निवास बड़े पैमाने में है. वहां पर भी समस्याओं और अन्याय-अत्याचारों की घटनाओं की कमी नहीं है.

आदिवासी समूह में सामूहिक खेती का प्रचलन था, लेकिन जमींदारों, सूदखोरों और ठेकेदारों ने सामूहिक खेती की परंपरा पर हमला किया है. उनके जीने में संघर्ष भरा पड़ा है. ऐसी स्थिति में आदिवासियों के लिए सतपुड़ा की वादियों में रचनात्मक संघर्ष की एक ‘प्रतिभा’ उभर आई, जिन्होंने आदिवासियों के आन्दोलन को रचनात्मक रूप से लड़कर उन्हें अपने हक और अधिकारों के प्रति सजग किया है. इतना ही नहीं उनकी सुविधाओं और हजारो एकड़ जमीन आदिवासियों को देकर उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए प्रयासरत है.

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप
 

आज इन वादियों में प्रतिभाताई शिंदे का नाम लोकसंघर्ष का चेहरा बन चुका है. किसी भी प्रकार की राजनीतिक, आर्थिक स्वार्थ न रखते हुए आदिवासी, श्रमिक समूह के जीने के संघर्ष में शामिल होकर उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास प्रतिभाताई ने लगन के साथ किया है. यही कारण है कि ‘लोकसंघर्ष मोर्चा’ का नाम आज सतपुडा की वादियों में तूफ़ान की तरह फैला है.

पढ़ें: पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

प्रतिभाताई लोकसंघर्ष मोर्चा के बैनर तले आदिवासी, दलित, ग्रामीण, मजदूर वर्ग के लिए रचनात्मक संघर्ष किया है. महाराष्ट्र के नंदुरबार, जळगाव, धुलिया के साथ-साथ गुजरात के सूरत, भरूच, नर्मदा आदि जिलों में भी प्रतिभा ताई ने आदिवासी पिछड़े समूह के लिए संघर्ष किया है. पारिवारिक ऐशो आराम की जिन्दगी छोड़कर प्रतिभाताई ने लोकसंघर्ष मोर्चा के बैनर तले नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर प्रकल्प पीडितो के अन्यायपूर्ण विस्थापन के विरोध में पुनर्वास संघर्ष समिति के रूप में 1997 से लडाई आरंभ की. इस समय इन प्रकल्पपीडितो के लिए न्याय व संपूर्ण पुनर्वास की माग केंद्र में जरुर थी, लेकिन संगठन के काम का मुख्य लक्ष्य पिछड़े इलाकों के आदिवासी समूह को उनकी संस्कृति, परम्परा और उनकी अस्मिता की रक्षा कर विकास के राष्ट्रीय प्रवाह में शामिल होने के लिए संगठित करना था. यहाँ और मूल मुद्दा विकास का भले ही था लेकिन विकास की कल्पना पर ही प्रश्नचिन्ह था. क्योंकि, विकास का जो मुख्य प्रवाह था वह समाज के सभी घटकों को समान अवसर देनेवाला, सबको साथ में लेकर चलनेवाला नहीं था. बल्कि मुठ्ठीभर तथाकथित विकास के लिए समाज के बहुजन, शोषित समूह का शोषण और विषमता के लक्षण इस प्रवाह में निरंतर दिखाई देते है. इसलिए यहाँ पर इस तबके के विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रथम मानवी विकास और मानवी अधिकारों का आग्रह करना आवश्यक था. यहीं बात ध्यान में लेकर प्रतिभा ताई लोकसंघर्ष मोर्चा को अपने आंदोलन का मुख्य हाथियार बनाकर आदिवासियों के लिए रचनात्मक संघर्ष की भूमिका लेकर अपना काम शुरू किया.



सरदार सरोवर परियोजना में नंदुरबार जिले के 33 आदिवासी गाँव डूब रहे थे. उनके अन्यायपूर्वक विस्थापन के खिलाफ परियोजना से पीडितो की लड़ाई आरंभ हुई. इन 33 गाँवों के पुनर्वास के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 4200 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर 5 बसाहटों का निर्माण किया. कभी झांसा देकर तो कभी डरा-धमकाकर इन पांच बसाहटो में पुनर्वास के नाम पर पटक दिया गया. नये पुनर्वास के बदले आदिवासियों को पूरी तरह से फंसाया गया था. जिन बसाहटो में 200 परिवारों का पुनर्वास हो सकता है, वहां पर 400 से 500 परिवारों को रखा गया. यहाँ तक की, एक ही खेत पर या भूखंडपर दो प्रकल्पपीडितो के नाम डाले गए थे. तो कईयों को केवल कागज़ पर ही जमीन दी गयी थी. ऐसी कई विपरीत स्थितियों का सामना परियोजना पीडितो को करना पड़ा.

 :दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

 इन सभी पीडितो के अधिकार के लिए ‘पुनर्वसन संघर्ष समिति’  बैनर के तले उनकी मांगों के लिए और विकसित पुनर्वास के लिए सरकार के विरोध में आन्दोलन खडा किया. लोकसंघर्ष मोर्चा के बैनर तले प्रतिभा ताई के प्रयासों से सरदार सरोवर प्रकल्प के विस्थापितों का तलोदा और अक्कलकुआ तहसील में 9 वसाहटों में नया पुनर्वसन हुआ है. अंबाबारी तहया देहली प्रकल्पपीड़ितों का अन्यायपूर्ण विस्थापन पर रोक लगाकर उनके पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू है.

पीढ़ी दर पीढ़ी जंगल की जमीन पर खेती करनेवाले आदिवासियों को उनकी जमीन का हक मिलने के लिए तथा गाँव के सामूहिक प्राकृतिक संसाधनों का हिस्सा उन्हें मिले , इस उद्देश्य से वनों का अधिकार कानून 2005 लागू किया. इसके लिए प्रतिभाताई ने 4 हजार आदिवासियों की पदयात्रा जलगाँव से मुंबई निकाली थी. तब जाकर यह कानून मंजूर हुआ. इस कानून का उचित अमल करने के लिए वे प्रयासरत हैं. वे पेशा क़ानून बनाने के लिए क़ानून मंजूर कर उसके अमल के लिए भी प्रयासरत हैं. वे वनविभाग के समन्वय से आदिवासी क्षेत्र में आरक्षित वनक्षेत्र तथा जंगल का सुचारु विकास प्रकल्प बने इसकी भी कोशिश कर रही हैं.

बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर 

जल-जंगल-जमीन आदि प्राकृतिक संसाधनों के अधिकार मिले इसलिए आदिवासी स्वशासन कानून को नए सिरे से त्रुटीरहित बनाने और आदिवासियों में रोजगार के लिए होनेवाले मायग्रेशन को रोक लगाने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रतिभाताई काम कर रही हैं. साथ ही कुपोषण सहित आदिवासियों की अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए भी लोकसंघर्ष मोर्चा परिसर में कार्यरत है.

लोकसंघर्ष मोर्चा की इस लडाई में आदिवासी महिलाओं का नेतृत्व और सहभागिता भी महत्वपूर्ण है. झिलाबाई, भांगीबाई, सिताबाई, यमुनाबाई, सुगरीबाई जैसे कई नाम हैं, जो संगठन की नींव है. जो मुद्दे आदिवासियों के प्रतिरोध के केंद्र में रहे, उनका संबंध मुख्यत: उनकी परम्परागत जीवन पद्धति पर होने वाले हमलों से है,  तथा  जंगलों पर राज्य के एकाधिकार और उनके व्यापारिक दोहन व उनके प्रयोग पर कर लगाने से.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी लोगों के आगमन तथा उनके द्वारा आदिवासी किसानों के शोषण ने भी आदिवासी विद्रोहों को उत्पन्न किया. इस विद्रोह को आन्दोलन की आग में परिवर्तित कर प्रतिभाताई ने ‘लोकसंघर्ष’ को व्यापक बनाया है.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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नीलेश झाल्टे  जलगाँव  स्थित  पत्रकार हैं  और  दैनिक  लोकमत  समाचार  से  जुड़े  हैं  . संपर्क: 9822721292


शंखमुखी शिखरों का कवि : लीलाधर जगूड़ी

रविता कुमारी

हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय
हरिद्वार, उत्तराखण्ड
ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in



साहित्य में विचारधारा को उत्तराधुनिकता के नाम से जाना जा रहा है. आजकल इसकी चर्चा जोरों पर है. केन्द्रीय वर्चस्व को अंगूठा दिखाकर यह स्थानीयता और उसकी विभिन्नताओं पर यह बल देती है. उत्तर आधुनिकतावाद अब बहुसंस्कृतिवाद या बहुलतावाद पर आधारित नया विमर्श है.आज के लिखे को समझने के लिए एक पूरी व्यवस्था पर नजर डालनी होगी. यह एक ऐसी अलग वैश्विक व्यवस्था है जिसमें छोटे से छाटे शहर की सीमाओं को अपने  पाश में जकड लिया है. इसमें चीजे बहुत सरल नहीं है, इसे कुछ ऐसे समझा जा सकता है कि आधुनिकता में उच्च तथा सुसंस्कृत वर्ग राजनीतिक जीवन पद्धति और कला संस्कृति का नियामक था. उत्तराधुनिकता ने इस को भी समाप्त कर दिया. यह केंद्र के लोगों को परिधि पर ले आया और परिधि के लोगों को केंद्र में लाकर समय के पहिये को पलट दिया. जहाँ उपेक्षितों, शोषितों, दलितों, स्त्रियों, समलैंगिकों को प्रमुखता दी जाने लगी. उत्तराधुनिकता ने लेखक कि महत्ता को नकार दिया. यहाँ पाठक का महत्व बढ़ गया. इसने यह भी मानने से इनकार कर दिया कि विज्ञान के पास सब समस्याओं का हल मौजूद है.

यह वही समय है जब बहुजन और समाजवादी राजनीति का चरम, शिक्षा मध्यम जातियों की ओर आती है. यह वही दशक है जब इस दसक में विद्रोही स्वर कवितायेँ लिखी गईं. यह वही समय है जब कविता में सबाल्टर्न स्टडीज, आइडेंटिटी पॉलिटिक्स, उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तरमार्क्सवाद,  उत्तर उपनिवेशवाद आदि से कवि गहरे प्रभावित होते हैं और यही समय है जब मध्यवर्गीय अवसरवादी (कथित वामपंथी) की मौका परस्ती और दोमुहँपन कविता में खुलता है. यदि इसे जनभाषा में कहा जाय तो यह वही समय है जब ‘साहित्य के पटवारी’ अपनी चकबंदी करते हैं और विचारधारा से आक्रांत सगा-सौतेला, चचाजात, भाई-विरादर है या नहीं कि ठीक ठीक पहचान भी. १९९० के बाद साम्प्रदायिक फासीवाद और पूंजीवाद भारत में उभरा है जिसमें छोटे बडा़ नौकरशाह, लुटेर डॉक्टर, ठग वकील, पूंजी के दलाल, मीडिया, एनजीओ और मिल बांट खाने और चुप रहने वाली संस्कृति के रहनुमा एक अलग अर्थ में विस्तार पाते हैं.
पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रघुवीर सहाय सम्मान आदि से सम्मानित तथा ‘शंखमुखी शिखरों पर’, ‘नाटक जारी है’, ‘इस यात्रा में’, ‘रात अब भी मौजूद है’, ‘बची हुई पृथ्वी’, ‘घबराए हुए शब्द’, ‘भय भी शक्ति देता है’, ‘अनुभव के आकाश में चाँद’, ‘महाकाव्य के बिना’, ‘ईश्वर की अध्यक्षता में’, ‘खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है’ आदि ग्यारह से अधिक कविता संग्रहों के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी आज 75वें वर्ष में प्रवेश कर गए. लीलाधर जगूड़ी उसी समय और सन्दर्भ के ऐसे सशक्त रचनाकार हैं जो भाषा और अनुभव के बीच एक ऐसा वितान रचते हैं जो अन्य कवियों में दुर्लभ है. भाषा में उन्होंने एक नया सौन्दर्यशास्त्र गढ़ा है. उनकी कविता का विराट जीवन और प्रतिबद्ध रचनात्मकता उनकी कविता में एक साथ देखी जा सकती है जो उन्हीं के समय के कवियों में विरल है. लीलाधर लिखते हैं :
पुलिस लाइन में आज क्या हो गया
पुलिस लाइन में पुलिस पर पुलिस हँस रही है.

उनकी कविता सिर्फ स्फीति नहीं है परन्तु विचार्रों का संकुल है. वह शुरू होकर कभी खत्म नहीं हुआ करती. अनुभव के आकाश में उनकी कविता चाँद है. उनकी रचनात्मकता सृजनशीलता के अनुभव से जन्मती है. अपनी भाषा से वे सर्जनात्मकता को नया टूल देते हैं. वे बार-बार दुहराई गई बातों को नए कथ्य और शिल्प के साथ प्रस्तुत कर अचंभित कर देते हैं. वे भोगी हुई तल्लीनता और तार्किकता को अपनी कविताओं का विषय बनाते हैं. सरलता और सहजता के हामी शायद ही कभी जान पायें कि कठिन को सरल रूप में कह पाना कितना कठिन होता है. अनुभव, भाषा और संवेदना के वैविध्य के लिए उन्होंने स्वयं ही कहा है-‘भाषाएं भी अलग-अलग रौनकों वाले पेड़ों की तरह हैं. सबका अपना अपना हरापन है, कुछ उन्हें काट कर उनकी छवियों का एक ही जगह बुरादा बना देते हैं.’

चार्वाकी संस्कृति में आज का मनुष्य सुख और चैन से नहीं रह सकता. पहले कर्ज को बुरा माना जाता था परन्तु आज का मनुष्य है जो आधे से अधिक कर्ज में डूबा हुआ है. आज कर्जा उसकी आर्थिक समृद्धि का परिचायक है. ‘अनुभव का सामाजिक अन्वय’ नामक अपने वृहद् आलेख में ओम निश्चल उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता के बारे में लिखते हैं कि :
‘जगूड़ी की कविता न तो पारंपरिक कविता की लीक और लय पर चलती है न आजमाए हुए बिम्ब-प्रतीकों का अवलंब ग्रहण करती है. यह कवित-विवेक के अपने खोजे-रचे प्रतिमानों और सौदर्यधायी मानदंडों फर टिकी है. रीति, रस,छंद और अलंकरण के दिखावटी सौष्ठव से परे यह आधुनिक जन-जीवन में खिलती प्रवॄत्तियों, उदारताओं, मिथ्या मान्यताओं, व्याऔधियों, किंवदन्तियों, क्रूरताओं का  खाका खीचती है. इसमें बरते गए शब्द आधुनिकता के स्वप्न और संघर्ष की पारस्प रिक रगड़ से उपजे हैं. पर्यावरण को ये कविताऍं चिंताओं और सरोकारों के नए धरातल से देखती हैं. इनमें सब कुछ के लुट जाने का और लुटते हुए को बचा लेने का हाहाकारी शोर और रोर नहीं है.

कितना कुछ बदला है. शक्तिशाली लोग सारे संसाधनों को अपना इलाका मान चुके हैं. वे सब कुछ लूट लेना चाहते हैं. इक्कीसवीं शताब्दी सूअरों की शताब्दी है. डा. कृष्णदत्त पालीवाल अपने एक आलेख में लिखते हैं कि ‘मिलेनियम ईयर’ का भूत मेरे ऊपर सवार है. यह कौन है जो मुझे हर जगह हर अवसर पर अकेला पाकर पकड़ लेता है और फिर कहता है-‘सुनो हजरत! इक्कीसवीं शताब्दी खाते पीते सूअरों की शताब्दी होगी.’ हालाँकि जीवन का संघर्ष चलता रहता है. यह लड़ाई कभी खत्म नहीं होती है. अपनी ‘लड़ाई’ कविता में हम देखते हैं :
दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई आज भी एक बच्चा लड़ता है
पेट के बल, कोहनियों के बल और घुटनों के बल
लेकिन जो लोग उस लड़ाई की मार्फत बड़े हो चुके
मैदान के बीचों-बीच उनसे पूछता हूं
कि घरों को भी खंदकों में क्यों बदल रहे हो?
जानते हो यह उस बच्चे के खेल का मैदान है
जो आज भी दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ता है
इस शताब्दी में आदमी की ‘आदमियत’ का कोई अर्थ नहीं बचेगा. आदमी का सूअर की जीवन पद्धति से जीना- मुक्त यौनवाद को गह लेगा.
लीलाधर जगूड़ी अपनी ‘अंतर्देशीय’ कविता में समाज के इसी के अंतर्द्वंद्व को व्यक्त करते हैं:
इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए / न अपने विचार. न अपनी यादें
इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए / न अपने संबंधों की छाप
न दुख, न शिकायतें / न अगली मुलाकात का वादा
न सक्रांमक बीमारियाँ / न पारिवारिक प्रलाप
न अपने हस्ताक्षर / वरना यह पत्र पकड़ा जा सकता है

उत्तर आधुनिकता को समझे बिना हम अपने समय को नहीं समझ सकते . आधुनिकता ने ईश्वर और प्रकृति के बीच मनुष्य को देखा. हमें यह समझना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि बिना इस बोध के हम समकालीन समाज और उसके सरोकारों को ठीक से नहीं समझ पायेंगे . उत्तर आधुनिकता विचारों, प्रवृत्तियों, बौद्धिक रुचियों का समुच्चय है. उत्तर आधुनिकता सुचना युग, बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद के वर्तमान पात्र के उस संस्कृति का नाम है जिसमें केन्द्रवाद नहीं है. इसमें वह प्रवृत्तियां घर कर रहीं है जहाँ हासिये के लोग अब केंद्र की तरफ बढ़ पा रहे हैं. इसके अर्थ बहुत व्यापक हैं और इन्हें सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता. सब कुछ माल में परिवर्तित हो गया है.
प्रकृति के अपार संहार से रिश्ते घावों का मवाद बन चुके है. सूचना संक्रांति का ड्रैगन अपना जाल फैला रहा है. नव अर्थशास्त्र की हवा निकल चुकी है. नारीवाद, गे-कल्चर, मुक्त यौनवाद सभी को स्वीकृति कर दुनिया कचरे के ढेर में परिवर्तित होती जा रही है. इसी के साथ जहाँ आधुनिकता का अवसान और उत्तर आधुनिकता का शिगूफा नए अर्थों में जन्मता है. अब यह समय कुंठित राष्ट्रवाद की तरफ लौटने का भी है. भले ही यह माना जाय आधुनिकता के बाद उत्तराधुनिकता पश्चिम के समाज और दर्शन की एक ऐतिहासिक यात्रा है.
साहित्य और समाज में मीडिया और मार्केट की मित्रता और गहरी हुई है. हर अनुभव सूचना बन रहा है और अर्थ की स्थिरता नहीं बची रही. वर्ग जाति में बदल गया है. दलित, स्त्री, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्तियों को और उनकी अस्मिताओं को स्वीकृति मिल रही है. उपभोक्तावाद ने सत्ता के खिलाफ हिंसा बढा दी है. लेकिन ऐसी मीठी सड़ांध कि सब अच्छा लगता है. मंद गति से होने वाले इस सांस्कृतिक संक्रमण से संस्कृतियों की पहचान को भी कोई खास नुकसान नहीं होता. ”मेरी आत्माद लोहार है’ में लीलाधर लिखते हैं कि :
ज़िन्दागी से रोज लोहा लेती है /मेरी आत्माह धोबी है
मन का मैल ऑंसुओं से धोती है/ मेरी आत्मात कुम्हाबर है
सपनों की मिट्टी से आकार बनाती है / मेरी आत्मा  बढ़ई है
रोज़ कोई न कोई विचार खराद देती है.

सन् साठ आजादी के बाद के मोहभंग का एक ऐसा मोड़ है जिसने केवल राजनीति की दिशा ही नहीं बदली, साहिात्यिक विधाओं के कथ्य और फैब्रिक को भी दूर तक प्रभावित किया. कविताओं को देखें तो साठोत्तर पद इसी मोड़ का परिचायक है. अकविता के उन्माद को चीर कर आगे बढ़ना वाकई कठिन था. पर धूमिल और जगूड़ी ने एक रास्ता बनाया. विक्षोभ और मोहभंग को तार्किकता में रूपायित करने की चेष्टा की. समाज के सन्दर्भ को उन्होंने कविता में ढाला. सारा ईंट-गारा अपने समय और सन्दर्भ से लिया. संसद से सड़क तक में यदि धूमिल अपने समय को रूपायित करते हैं तो नाटक जारी है में जगूड़ी अपने समय को. लीलाधर लिखते हैं कि बाद के दिनों में प्रकाशित रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक़्ति देता है–उस वक़्त की राजनैतिक, आार्थिक और सामाजिक हलचलों, अन्तर्ध्वृनियों का ही काव्याुत्मक विस्फोट हैं.
भोगवादी संस्कृति ही सब पर हावी है. गत सदी के अंतिम दो दशकों में हुई संचार क्रांति से पहले हालात दूसरी तरह के थे. विकसित संचार माध्यमों के अभाव में पहले सांस्कृतिक संक्रमण से होने वाले प्रतिरोध और आत्मसातीकरण में अक्सर समाज के सभी तबके शामिल नहीं होते थे. अक्सर समाज के कुछ तबकों में परिवर्तन हो जाते,  धीरे-धीरे उन्हें स्वीकृति भी मिल जाती और मामूली प्रतिरोध के बाद उन्हें संस्कृति का हिस्सा भी मान लिया जाता है .

भय भी शक्ति  देता है, अनुभव के आकाश में चाँद और ईश्वर की अध्यक्षता में जैसे बेहतरीन संग्रह जगूड़ी ने दिए.भय भी शक्तिक देता है की दर्जनों कविताऍं आधुनिक अर्थतंत्र, बाजारवाद और भूमंडलीकरण की आगत आहट को लेकर लिखी गयी थीं, जब उदारीकरण और भूमंडलीकरण की चर्चाऍं भी शुरू नहीं हुई थीं और अब उनके नवीनतम संग्रह खबर का मुँह विज्ञापन से ढका है—को देखें तो यह संग्रह न तो पुराने संग्रहों की जूठन से रचा गया है न पुराने अनुभवों का नवीन विस्तार है. यहॉ पुरानी सारी प्रविधियों को अलग रखते हुए सर्वथा नए ढंग से बात कहने की कोशिश है.

लीलाधर जगूड़ी की कविता विपत्ति में भी एक पुल का निर्माण करती है. वे बेहद तात्कालिक सामाजिक विषयों को जीवन-पद्धति से अदृश्य कारणों तक ले जाते हैं जहाँ चीजें भी मनुष्यों के बारे में सोच रही होती हैं. इसीलिए कवि कहता है कि चीजों के बारे में सोचना अब सरल नहीं रह गया है. जगूड़ी की प्रत्येक कविता का कथ्य और विन्यास देख कर लगता है कि अब कविता खुद अपने नए औजार पैदा कर रही है. उन्हें  पुराने औजारों से नहीं जाँचा जा सकता. संसाधन किसी का नहीं होता. कविता की यह सीढ़ी, नामक कविता मेंकवि कहता है कि दुनिया मुझे रोज बनानी पड़ती है. वे अपनी पेड़ कविता में लिखते हैं:
नदियाँ कहीं भी नागरिक नहीं होतीं / और पानी से यादा कठोर और काटनेवाला
कोई दूसरा औजार नहीं होता / फिर भी जो इस भयंकर बाढ़ में अपनी बगलों तक डूब कर खड़ा रहा
वह अतीत के जबड़े से छीन कर अपने टूटे हाथों को फिर से उगा रहा है
इस सपाट जगह के बाद उस कोने पर
जहाँ ढाल करीब-करीब बाईं ओर के अँधेरे में पड़ गया है

मुझे कुर्सी से उठ कर उससे मिलना चाहिए आलोचक या समीक्षक ही अपनी पुरानी नसैनी से यहाँ कैसे चढ़ सकता है—पहाड़ों पर खाइयों में नदियों में रास्ते-सी सीढि़याँ गिरी पड़ी दिखती हैं/ फिर भी जिस-जिस रास्ते से जाना होता है/उसे वह सीढ़ी खुद बनानी होती है/ एक एक कदम कविता में जैसे छोटे-छोटे वाक़्य/ हर नए कदम फर नए डंडे बिठाने पड़ते हैं–हवा में/….तब कहीं एक कविता उतर पाती है पृथ्वी पर…और चढ़ पाती है बिना शीर्षक के शीर्ष पर भी.—यही सीढ़ी उस रास्ते तक पहुँचाती है जो एक मजदूर दम्पीति के जीवन में जाता है लेकिन जिस रास्ते से वे बिल्कुल किनारा किए रहते हैं. उसी तकलीफ को समझने से पत्रकारिता की भाषा में वह कविता लिखी जा सकी जो एक रिपोर्ट जैसी है और जिसका उद्देश्य न प्रथमतः, न अंततः कविता होना नहीं था. भाषा, हालत का साथ नहीं दे रही है. जैसे रखे-रखे उड़ गया हो पानी का बोझ और गुस्सा.
लीलाधर अपने एक निबंध में लिखते हैं कि ‘जब भी मैं कविता के बारे में सोचता हूँ, मैं उन छूटी हुई घटनाओं की ओर चला जाता हूँ जो अतीत होकर भी व्ययतीत नहीं हो पाती हैं. वे हर नये मौसम के बादलों की तरह आपस में मिल जाती हैं और छा जाती हैं. भाषा वही होते हुए भी, वह हर अनुभव की अभिव्य क्ति में कोई न कोई सहज बदलाव प्राप्तह कर लेती है. ‘जाने-बूझे’ में भी एक अनजानापन पैदा हो जाता है. क्या  है जो कहा नहीं गया है फिर भी कविता कुछ नया ले आती है. यह संवेदना और भाषा का नया रिश्ताे भले ही कठिन और अटपटा लगता हो, लेकिन उसकी मनसा अपने समय में सरल और बोधगम्य  होने की ही रहती है.
बी.ए.पास रिक्शावाले की कविता
उस जगह को याद रखे हुए जिसे छोड़ आया हूँ / पहाड़ की चोटी पर
श्रम और पूँजी और विनिमय के बीच में
गमछे भर आधी करवट लेटने की जगह ढूँढ़ता हूँ मैं
शहर के कूड़े से बने रपटे में / सैकड़ों दिन की कड़ी मेहनत कठिन बचत से
उलझे हुए अपार जगत व्यापार में क्या-क्या पा सकता हूँ मैं
एक तो तिरछा ढाल जिस पर से मेढ़क भी गिर पड़े
चिड़िया भी रपट जाए

हर बार कलफदार भाषा कविता की पहचान नहीं होती है. आज का कवि केवल कल्पना का कवि नहीं रहा है. वह जीवन के कटु यथार्थ को बड़ी संजीदगी से साध रहा है. वह तुकें और अन्त्यानुप्रास भिड़ाने वाला प्राणी नहीं है. सूखे समाज में लहरें पैदा करने वाली विज्ञापन टीम फर उसकी पैनी नज़र है. आज की कविता केवल वही कविता नहीं है जिसमें वैश्विक परिदृश्य हों बल्कि आज की कविता वह कविता है जो ग्लोबल होने से पहले है. भारतीय समाज के यथार्थ से हटकर हम आज की कविता को नहीं देख सकते. अस्सी के बाद कविता की भाषा और संवेदना में जिस तरह का बदलाव आया है उसी का एक नमूना मात्र हैं जगूड़ी की कवितायें. वे बदलाव, विकास, आधुनिकता, तकनीकि संचार और नवाचारों का विरोध नहीं करते बल्कि उसे नोटिस में लेकर उससे लगातार जूझते हैं. उनकी कविता सम्पूर्ण मानवता की कविता हो जाती है. वे जंगल, पहाड़, नदी, नाले और अभिवंचित वर्ग की पीड़ा को अपनी कविता में उड़ेल देते हैं.

1. https://samalochan.blogspot.com/2015/07/blog-post.html
2.  खाते पीते सूअर की शताब्दी, उत्तर-आधुनिकता और दलित साहित्य, कृष्णदत्त पालीवाल, पेज-277
3.http://www.hindisamay.com/writer/leeladhar

ज़िंदा जलती होलिका

  बाल गंगाधर‘बाग़ी’

शोधार्थी जे.एन.यू. नई दिल्ली संपर्क : 09718976402 Email. bagijnu@gmail.com

अलग आस्वाद और बिंबों के साथ कवि बाल गंगाधर  बागी अपनी कविताओं के लय से न सिर्फ श्रोताओं को झुमाते हैं, बल्कि सामजिक क्रान्ति के सन्देश भी देते हैं. बागी को नीले आकाश और आंबेडकरी आकांक्षाओं का कवि कहा जा सकता है. आइये पढ़ते हैं उनकी कविता ‘ज़िंदा जलती होलिका.’  

 

अग्नि कुण्ड में जला-जलाकर, राखों में ढकने वाले
सती प्रथा में महिलाओं को जलाये हैं ये मतवाले
ज़िंदा जलती चीख-चीख कर, खून की बहती धारें
जलती नारी देख पर इनके आँख में पड़े नहीं छाले

नारी का सम्मान न करते, ज़िंदा उसे जलाते हैं
हत्याओं का जश्न मानकर, होली वही मनाते हैं

साल हज़ारों सदियाँ कितनी, खूनों में हैं डूब चुकी
आँखों से खूनों की धारा, नदियाँ बनकर सूख चुकी
नंगा बदन घुमाये कितने, गाँव शहर चौराहों पर
सामूहिक दुष्कर्म कर टाँगे, हैं खम्भे ‘औ’ पेड़ों पर

देवदासी बनाकर रात-दिन, रास रचाया करते हैं
धर्म नाम पर मंदिर के, कोठे में बिठाया करते हैं
सास बहू को क़ैद किये जो, घूंघट में अकुलाती हैं
भरे समाज बोले गर तो, वे शर्मसार की जाती हैं
दीन-दलित की महिलायें,उनसे बेईज़्ज़त की जाती हैं
अगर विरोध कर दें वे कुछ,तो नीलाम की जाती हैं

जन-मन का गीत गाकर,वो माँ का राग सुनाते हैं
जो बहू ठूस घर में अपने,आज़ाद नहीं कर पाते हैं

गाँव में दलित पिछड़ों के घर, होली में झोंके जाते हैं
फिर चारो ओर घूम-घूमकर, डण्डा लट्ठ बचाते हैं
वे अपने घर से पाँच-पाँच, खण्डे के टुकड़े लाते हैं
डाल होलिका में उसे फिर, फगुआ रास सुनाते हैं

दलित पिछड़ों के घर में घुस,बहुओं को रंग लगाते हैं
वे इसी बहाने छेड़छाड़ कर, दुष्कर्म भी कर जाते हैं

छेड़-छाड़ आतंक मचाती, हर रंगों की टोली है
ऊपर से ये कहते यारों, बुरा न मानो होली है
रंग लगाते घर में घुस, सामान चुरा ले जाते हैं
पानी कीचड़ रंग अवीर, कपड़े फाड़ चिल्लाते हैं

दहेज न मिलने पर, बहुओं को जिंदा जलाते हैं
मार पीट जिंदा जला, होलिका सी हाल बनाते हैं

हत्याओं का पर्व छिपाने, रंग गुलाल उड़ाते हैं
याद खून की होली को, वे रंगों से भर जाते हैं
दारु गांजा चरस अफीम, भांग संस्कृति फैलाते हैं
नशाखोरी में फंसा समाज, दलदल में ले जाते हैं

समझौता करने वाले, इन रंगों में खो जाते हैं
इतिहास भूल होली का,  पकवान बनाकर खाते हैं

कविता कृष्णपल्लवी की कविताएँ

कविता कृष्णपल्लवी ड़ी


कवियत्री-लेखक, सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यकर्ता , विशेषकर स्त्री-मजदूरों के बीच सक्रिय। संपर्क :kavita.krishnapallavi@gmail.com

कविताई का हुनर 

वह कठिन समय का जलता सच था.
गंध चिरांयध फैल रही थी
लाशों की बदबू फैली थी
आसपास उन्मादी नारे गूँज रहे थे.
मैंने इस सच को कविता में रखना चाहा.
हृदय व्यग्र था, उत्तेजित था.
कविता बनी, मगर कविता में
कविता कम थी, सच्चाई का
सीधे-सीधे कथन अधिक था.
कवि ने देखा, मुँह बिचकाया
धिक्कारा उसने, ”ऐसे कैसे सुकवि बनोगी?
तुम सब गुड़गोबर कर दोगी.”
कवि ने फिर कविताई का जौहर दिखलाया
झालर-फुँदनों से सच को ही ढँक डाला.
बोली मैं, ”कवि जी, यह कविता पास रखो तुम
काम आयेगी, चर्चा होगी और
बहुत सम्मान मिलेगा.
समय मिला तो हम भी माँजेंगे कविताई
लेकिन अभी ज़रूरत जैसी,
कम कविता और ज्यादा सच से
अपना काम चला लेंगे हम.”
अच्छी होती है कविताई,
दुर्लभ गुण है, लेकिन ऐसे कठिन समय में
सच्चाई और कविताई में चुनना ही हो
अगर हमें तो
सच्चाई को हम चुन लेंगे.
समय मिलेगा अगर कभी तो
कविता की बहुरंगी चादर भी बुन लेंगे.

नालन्दा के गिद्ध 

गिद्धों ने
नालन्दा के परिसर में स्थायी बसेरा बना लिया है.
पुस्तकालय में गिद्ध,
अध्ययन कक्षों और सभागारों में गिद्ध,
छापाखानों में गिद्ध, सूचना केन्द्रों में गिद्ध,
नाट्यशालाओं और कला-वीथिकाओं में गिद्ध.
गिद्ध नालन्दा से उड़ते हैं
बस्तियों की ओर
वहाँ वे जीवित संवेदनाओं, विश्वासों और आशाओं
को लाशों की तरह चीथते हैं,
पराजित घायलों और मृत योद्धाओं पर टूट पड़ते हैं.
फिर गिद्ध मार्क्सवाद से लेकर गाँधीवाद तक की भाषा में
मानवीय सरोकारों के प्रति गहरी चिन्ता जाहिर करते हैं
और तमाम बस्तियों को
अफ़वाहों, शक़-सन्देहों और तोहमतों की
बीट से भरते हुए
नालन्दा की खोहों में वापस लौट जाते हैं.

मेरी मां

मेरी मां
इक माटी का दियना
दिप-दिप जलती बाती.
लंबी रात में
दुख ही साथी
दुख ही सदा संघाती.

मेरी मां
बस दुख की दुल्हनियां
दुख से गांठ जुड़ाती.
दुख का चंदोवा
दुख का मंड़वा
दुखिया सभी बराती.

मेरी मां
इक घायल हारिल
सपन देस की बासी
कनक दीप का
सपना देखे
अनगिन बरत उपासी

मेरी मां
मौसम की मारी
पगली नदी बरसाती.
सावन-भादो
उमड़कर बहती
फिर सूखी रह जाती.

मेरी मां
इक खोई गइया
चौंरे बीच रंभाती.
बिछुड़ गये सब
बछड़े-बछिया
दूध बहाती जाती.

मेरी मां
एक प्यासी गगरिया
नदिया को लिखती पाती.
कोने बैठ
टकटकी बांधे
यादों को दुलराती.

मेरी मां
इक आंसू का कतरा
आंखे जिसे पी जातीं.
जलती-बुझती
रात-अंधेरे
भोर हुए झंप जाती.

मेरी मां
इक अकथ कहानी
सोच फटे यह छाती.
लिख ना सके
कोई बांच न पाये
अनबूझी रह जाती.

गाज़ा के एक बच्चे की कविता 

बाबा! मैं दौड़ नहीं पा रहा हूँ.
ख़ून सनी मिट्टी से लथपथ
मेरे जूते बहुत भारी हो गये हैं.
मेरी आँखें अंधी होती जा रही हैं
आसमान से बरसती आग की चकाचौंध से.
बाबा! मेरे हाथ अभी पत्थर
बहुत दूर तक नहीं फेंक पाते
और मेरे पंख भी अभी बहुत छोटे हैं.

बाबा! गलियों में बिखरे मलबे के बीच
छुपम-छुपाई खेलते
कहाँ चले गये मेरे तीनों भाई?
और वे तीन छोटे-छोटे ताबूत उठाये
दोस्तों और पड़ोसियों के साथ तुम कहाँ गये थे?
मैं डर गया था बाबा कि तुम्हें
पकड़ लिया गया होगा
और कहीं किसी गुमनाम अँधेरी जगह में
बंद कर दिया गया होगा
जैसा हुआ अहमद, माजिद और सफ़ी के
अब्बाओं के साथ.
मैं डर गया था बाबा कि
मुझे तुम्हारे बिना ही जीना पड़ेगा
जैसे मैं जीता हूँ अम्मी के बिना
उनके दुपट्टे के दूध सने साये और लोरियों की
यादों के साथ.

मैं नहीं जानता बाबा कि वे लोग
क्यों जला देते हैं जैतून के बागों को,
नहीं जानता कि हमारी बस्तियों का मलबा
हटाया क्यों नहीं गया अबतक
और नये घर बनाये क्यों नहीं गये अब तक!
बाबा! इस बहुत बड़ी दुनिया में
बहुत सारे बच्चे होंगे हमारे ही जैसे
और उनके भी वालिदैन होंगे.
जो उन्हें ढेरों प्यार देते होंगे.
बाबा! क्या कभी वे हमारे बारे में भी सोचते होंगे?

बाबा! मैं समंदर किनारे जा रहा हूँ
फुटबाल खेलने.
अगर मुझे बहुत देर हो जाये
तो तुम लेने ज़रूर आ जाना.
तुम मुझे गोद में उठाकर लाना
और एक बड़े से ताबूत में सुलाना
ताकि मैं उसमें बड़ा होता रहूँ.
तुम मुझे अमन-चैन के दिनों का
एक पुरसुक़ून नग्मा सुनाना,
जैतून के एक पौधे को दरख्‍़त बनते
देखते रहना
और धरती की गोद में
मेरे बड़े होने का इंतज़ार करना.

पूँजी 

कारखानों में खेतों में करती है श्रमशक्ति की चोरी
वह मिट्टी में ज़हर घोलती है
हवा से प्राणवायु सोखती है
ओजोन परत में छेद करती है
और आर्कटिक की बर्फीली टोपी को सिकोड़ती जाती है.
वह इंसान को अकेला करती है
माहौल में अवसाद भरती है
मंडी के जच्चाघर में राष्ट्रवाद का उन्माद पैदा करती है
स्‍वर्ग के तलघर में नर्क का अँधेरा रचती है.
आत्‍मसंवर्धन के लिए वह पूरी पृथ्वी पर
कृत्‍या राक्षसी की भाँति भागती है
वह अनचीते पलों में
दिमाग पर चोट करती है
युद्धों की भट्ठी में मनुष्यता को झोंकती है.
वह कभी मादक चाहत तो कभी
आत्मघाती इच्छा की तरह दिमाग में बसती है
युद्ध के दिनों में हिरोशिमा
और शान्ति के दिनों में
भोपाल रचती है.

झाड़ू पुराण

झाड़ू से बुहारी नहीं जा सकती हैं लाशें.
झाड़ू दामन पर लगे
खून के धब्बों को साफ नहीं कर सकता.
झाड़ू जली हुई वीरान बस्तियों को
आबाद नहीं कर सकता.
झाड़ू खण्डहरों को रौशन नहीं कर पाता.
और हाँ, झाड़ू स्मृतियों को
बुहार नहीं सकता,
न ही इतिहास को
कूड़ेदान के हवाले कर सकता है.
झाड़ू बदलाव के जज़्बे को
ठिकाने नहीं लगा पाता.
झाड़ू पर सवार जादूगरनी
हमेशा ही एक बच्चे के हाथों
मात खाती रही है.


विरासत

मेरे पास है
एक बीमार गुलाब.
मेरे पास है
एक काला पत्थर
पितरों की विरासत
और नग्न यक्षिणी की एक प्रतिमा.
मेरे पास है सुई-धागा,
कीलें अलग-अलग नापों की,
हथौड़ी, छेनी, निहाई, खुरपी, दरांती
और घंटी और डायरियां और झोले
और गर्भ की स्मृतियाँ
और शरीर पर जले-कटे के निशान
और आत्मा में
कोयला खदानों का अंधेरा
और उमस और टार्चों की रोशनी.
उपेक्षा ने सिखाया मुझे
सुलगते रहना.
दर्द से सीखा मैंने हुनर
भभककर जल उठने का.
आज़ादी चाहिए थी मुझे शुभचिंतकों से
मनमुआफिक विद्रोह के लिए
और मेरे पास वह कायरता भी थी
युगों से संचित
कि इतना समय लग गया ऐसा करने में.

युग नायिका सावित्री बाई फुले

रजनी तिलक


सावित्रीबाई फुले स्मृति दिवस पर विशेष 

सावित्री बाई फुले कोई साधारण महिला नहीं थी, जिन्हें इतिहास के गर्भ में छुपा दिया जाए और वे गुमनामी के अंधेरों में छुप जाये। उन्नीसवीं शताब्दी की वह वह सुनहरी किरण थी जिसमें ब्रिटिश उपनिवेशवाद के भीतर अपनी न केवल आभा बिखेरी बल्कि अंधविश्वास, पाखंड, ढोंग धार्मिक कर्मकांडों को चीर कर ज्ञान के स्रोत को अछूतों व स्त्रियों के लिये रेखांकित किया। तत्कालीन बीहड़ परिस्थितियों में समाज सुधारक क्रांतिज्योति सावित्री बाई फुले युग नायिका बनकर उभरी। अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, निर्भीक व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकारो से ओत-प्रोत ज्योतिबा फुले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दकियानूसी समाज को बदलने हेतु इन्होंने अपने तर्कों के आधार पर बहस किया। स्त्री जीवन को गौरवान्वित किया एवं सामाजिक न्याय को लक्षित किया।

भारत की प्रथम प्रशिक्षित शिक्षिका होने का गौरव उन्हें ही प्राप्त है। ऐसे समय में उन्होंने शिक्षा पर कार्य करना शुरू किया, जब शिक्षा के सारे द्वार स्त्रियों के लिए प्रायः बंद थे। स्त्रियों  को पैरों की जूती वाचाल, नर्क का द्वार कहा जाता था। उनका जीवन चूल्हे चैके और बच्चे पैदा करने, पति की सेवा करने तक ही सीमित था। उनकी इच्छा, रुचि, अभिरुचि व मान-सम्मान का कोई मूल्य नहीं था। किसी भी जाति की महिलाओं का जीवन निकृष्टतम था। वे स्वयं ये भी भूल चुकी थीं कि वे एक इंसान हैं। उच्च जाति के समुदायों की स्त्रियों  की स्थिति बेशक सोचनीय थी परन्तु दलित व पिछड़ी महिलाओं की स्थिति और अत्यधिक विकराल थी। उन पर उच्च जातियों के पुरुष-स्त्रियों के साथ-साथ अपने समाज के नियंत्राण का शिकंजा भी कसा हुआ था। अंग्रेज शासकों के आगमन पर उन्हें अपने प्रशासकीय कार्यों के लिए अंग्रेजी शिक्षा के जानकारों की जरूरत को समझते हुए अंग्रेजी शिक्षा के प्रबंध किये। उनकेआगमन से भारत के सुप्त जनमानस में सुगबुगाहट पैदा हुई। क्योंकि अंग्रेजों को अपने शासन-प्रशासन चलाने के लिए अंग्रेजी कर्मचारियों की जरूरत जो पड़ गयी थी, अतः इसीलिए उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा के विशेष प्रबंध किए हालांकि इससे भी उच्च जातियों का प्रभुत्व बढ़ गया, फिर भी यह नहीं नकारा जा सकता है कि अंग्रेजी शिक्षा के आरम्भ से ज्ञान और जानकारी के रास्ते खुले। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से सामाजिक सुधार लाने हेतु समाज सुधारकों के प्रयास शुरू हुए। इन सुधारों के जागरण में स्त्रिायां भी अछूती न रह सकी। भारत की स्त्रियों  की स्थिति में सुधार व उनमें जागरण लाने के कार्य में विभिन्न समाज सुधारकों में से ‘सावित्री बाई फुले’ ताराबाई शिंदे व पंडिता रमाबाई, का नाम अग्रणीय है। हम भारतीय स्त्री आंदोलन को समझना चाहते हैं तो हमें सावित्री बाई फुले के जीवन को, उनके कार्य को तत्कालीन समाज के समक्ष रखकर आंकना चाहिए। सावित्री बाई फुले हमारे देश की वह पहली औरत थी, जो दबे-पिछड़े समाज माली जाति में पैदा हुई। नौ वर्ष की अल्पायु में विवाह के बाद घर गृहस्थी के साथ-साथ कठोर परिश्रम करके स्वयं पढ़ी और गांव-गांव जाकर दीन-हीन दुखी दलित और स्त्रियों के लिए पाठशाला खोलने में अग्रसर हुई।

सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को नायगांव में हुआ, जब वे नौ वर्ष की अल्पायु में थीं। उनका विवाह महान क्रांतिकारी ज्योतिबा फुले (तेरह वर्ष) से 1840 में हुआ। ज्योतिबा फुले उनके जीवन में शिक्षक बनकर आए। 1841 में पढ़ने-लिखने का प्रशिक्षण उन्हें ज्योतिबा फुले से ही मिला। पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी नारी शिक्षा की पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी नारी शिक्षा की पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी नारी शिक्षा की पक्षधर थी। अतः नार्मल स्कूल द्वारा सावित्री बाई फुले को अध्यापिका प्रशिक्षण दिया गया। अंग्रेजी ज्ञान होने के बाद सावित्री बाई फुले ने 1855 में टामसन क्लार्कसन टामसन क्लार्कसन की जीवनी पढ़ी। टामसन क्लार्कसन नीग्रो टामसन क्लार्कसन नीग्रो पर हुए जुल्मों के विरुद्ध न केवल लड़े थे बल्कि कानून बनाने में सफल हुए थे। उनकी जीवनी पढ़कर सावित्री बाई फुले बहुत प्रभावित हुई। वह भारत के नीग्रो (अछूत और स्त्रियों ) की गुलामी के प्रति चिंतित थी। उन्होंने भारतीय गुलामों के शोषण का मुख्य कारण ‘अशिक्षा’ को खोजा। उदाहरणतः शिक्षा संबंधी कविताएं-

शूद्रों की चेतना जगाने के लिए
है सर्वोत्तम शिक्षा का मार्ग
शिक्षा से मिले ज्ञान,
ज्ञान से प्राप्त होवे इंसानियत
और पशुता होती है समाप्त।
                                                                              (शूद्रों का दर्द : पीड़ा )
                                                                      
जो करे खेती और करे सम्पादन विद्या
वे होवे ज्ञानी, और सुखी-समृद्ध
                                                                              ( सर्वश्रेष्ठ खेती )
विद्या है सच्ची धन-दौलत
है सभी दौलत से श्रेष्ठ
जिसके पास है ज्ञान का संचय
ज्ञानी वही सच्चा दुनिया में।
                                                                               ( सच्ची धन-दौलत) 
अनुवाद शेखर पवार अनुवाद शेखर पवार

1 जनवरी 1848 में बुधवार पेठ (पूना में) पहला स्कूल खोला गया जिसमें सावित्री बाई फुले अध्यापिका हुई। उनके शिक्षिका बनने पर समाज में प्रखर विरोध हुआ। उन्हें धर्म को डुबाने वाली एवं अश्लील गालियां देकर उनको प्रताड़ित किया गया। गाली-गलौच, पत्थर, गोबर फेंकने पर भी सावित्री बाई फुले ने जब अपना काम बंद नहीं किया तो ससुर द्वारा दबाव डलवाया गया कि यदि सावित्री बाई फुले ने अछूतों को पढ़ाना बंद नहीं किया तो उनकी बयालीस पीढ़ियां नरक में जाएंगी। सावित्री बाई फुले के साथ-साथ फातिमा शेख व सगुणा भी ज्योतिबा की छात्राएं थीं। फुले दम्पति ने शूद्रों-अतिशूद्रों और औरतों के बीच शिक्षा की ज्योति जलाकर गुलामी से मुक्ति की राह दिखाई। गांव-गांव में जाकर विद्यालय खोले। एक ओर ऊंची जातियों में बाल-विवाह से हुई विधवाएं बलात्कृत होती और गर्भवती होने पर भ्रूण हत्या करती या शर्म से स्वयं आत्महत्या कर लेती। दूसरी ओर अछूत औरतें एक बूंद पानी के लिए भी सवर्णों की दया पर जीती। सामाजिक बहिष्करण की शिकार होती। एक दिन जब सावित्री बाई फुले बच्चों को पढ़ाने पाठशाला जा रही थी तो उन्होंने देखा कि रास्ते में कुएं के पास कुछ औरतें फटे-पुराने कपड़े पहनकर धनी औरतों से मिन्नतें कर रही हैं ‘‘हमें मार लो, पीट लो, हमारी मार-मार कर खाल उधेड़ लो, परन्तु हमें दो लोटे पानी दे दो।’’ चिलचिलाती धूप में कुएं से दूर खड़ी इन औरतों को देखकर ऊंची जाति की औरतें हंस रही थीं और हंसते-हंसते डोल भर-भर कर पानी उनके ऊपर फेंक देती। सावित्री बाई फुले यह कृत्य सहन न कर सकीं। वे उन अछूत औरतों के पास गईं और उन्हें अपने घर लिवा लाईं। अपना तालाब दिखाते हुए बोली, ‘‘जितना चाहे पानी भर लो, आज से यह तालाब तुम सबके लिए है।’’ कहते हुए उन्होंने 1868 में अपना तालाब अस्पृश्यों के लिए खोल दिया। अंततः शिक्षा एवं अछूतों का साथ न छोड़ने पर उन्हें उनके पति के साथ घर से निकाल दिया गया।

1848 में एक तरफ इंग्लैंड में स्त्री  शिक्षा की मांग हो रही थी तो दूसरी ओर फ्रांस में मानव अधिकार के लिए संघर्ष चल रहा था। भारत में सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले ने शूद्रों अतिशूद्रों व स्त्री  शिक्षा एवं सामाजिक आधार की नींव रखकर नए युग का सूत्रापात किया। 1849 में पूना में उस्मान शेख के यहां उन्होंने प्रौढ़ शिक्षा आरंभ की 1849 में ही पूना, सतारा व अहमदनगर जिले में अन्य पाठशाला खोली। स्कूली शिक्षा के साथ-साथ ही सावित्री बाई फुले ने महसूस किया स्त्रियों  की स्थिति सुधारने के लिए स्त्रियों को संगठित करना चाहिए। 1842 में उन्होंने ‘महिला मंडल’ का गठन किया और बाल-विवाह के तहत हुई विधवाओं के साथ हो रहे जुल्म व शारीरिक शोषण का विरोध किया। स्त्रियों  के बाल काटने के विरुद्ध नाइयों से अनुरोध किया तथा इसमें सफलता हासिल की। ‘भ्रूण  हत्या’, ‘बाल हत्या’ के विरुद्ध विधवा मांओं को शरण देना शुरू किया। अंततः उनके लिए 1852 में बाल-हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की। 1864 में अनाथाश्रम की स्थापना की। छुआछूत उस समय बहुत ज्यादा थी। शूद्र सामाजिक जीवन से केवल बहिष्कृत ही नहीं थे, प्रताड़ित भी किये जाते थे। उनका खाना-पीना, रहना सब दूसरों की दया पर था, अतः उनका जीवन पशु समान था। अछूत महिलाएं घंटों दया की भीख मांगती, बदले में थोड़ा-सा पीने का पानी मिलता। उस्मान शेख की बहन फातिमा शेख भी स्त्री शिक्षा में सावित्री बाई फुले के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही थी। 24 सितम्बर 1873 में ‘‘सत्यशोधक समाज’’ की स्थापना कर सैकड़ों विवाह साधारण तरीके से कम खर्च किये कराए। 1875 से 1877 तक महाराष्ट्र में अकाल पीड़ित लोगों की मदद के लिए सरकार पर दबाव डालकर अनेक रिलीफ केन्द्र एवं भोजन केन्द्र शुरू करवाए।

सावित्री बाई फुले दंपति को अपना कोई बच्चा नहीं था। अतः उन्होंने एक काशीबाई नामक ब्राह्मण विधवा से हुए बच्चे को गोद लेकर उसे पढ़ाया-लिखाया व डाॅक्टर के रूप में अपने जैसा अच्छा इंसान बनाया। अपने पति की मृत्यु के बाद वे सत्य शोधक समाज की अध्यक्ष बनीं। उनकी अध्यक्षता में अनेक सुधारात्मक काम हुए। सत्य शोधक समाज की स्थापना 24 सितम्बर 1873 को हुई थी। जीवन के अंतिम दिनों में पुणे में प्लेग के प्रकोप से अछूत बस्तियों में लोगों की सेवा करती हुई निर्वाण को प्राप्त हुई।

आज से एक सौ पिच्चासी वर्ष पहले समाज में अंधविश्वास कुरीति-रूढ़ि परम्पराओं के विरुद्ध शिक्षा, ज्ञान, समता और नारी समानता के लिए लड़ने वाली भारत की पहली शिक्षिका, समाज सुधारने वाली पहली क्रांतिकारी नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता को इतिहास ने, मीडिया ने यहां तक की वर्तमान नारी मुक्ति आंदोलन ने भुला दिया।  आज मजबूरन उनको याद करने के लिए उनके स्मृति दिवस पर ब्राह्मणवाद, मनुवाद व हिन्दुत्व के विरुद्ध आंदोलित हुई हैं। हमारी सरकार ने प्रौढ़ शिक्षा, अध्यापक प्रशिक्षण सरकारी पाठ्यक्रम में उनका नामोनिशां तक नहीं रखा। उनके नाम के न तो कोई संस्थान हैं, न विद्यालय, न विश्वविद्यालय। इतिहास में ऐसी नारी को भुला दिया, जिसका जीवन स्वयं एक युग बोध है। आज हम नारीवादी आंदोलन और सावित्री बाई फुले के समय की नारी आंदोलन की समीक्षा करें तो पाएंगे कि वर्तमान मुद्दों पर नारी आंदोलन ठहर गया है। वे मुद्दे जो तत्कालीन समाज में सावित्री बाई फुले के नेतृत्व में बखूबी लड़े गए।

आज महानगरों में दहेज, भ्रूण-हत्या, यौन शोषण, बलात्कार के इर्द-गिर्द के मुद्दों पर ही नारी आंदोलन सक्रिय है, लेकिन एक सौ पिचहत्तर वर्ष के इतिहास में स्त्री  का दोयम दर्जा पूर्ववत है। शहरीकरण के चलते व पूंजीवाद के विकास ने औरतों को घर से बाहर निकलने का अवसर जरूर दिया है, पर मोटे तौर पर उसकी स्थिति नहीं बदली है।

सावित्री बाई फुले ने समाज के भीतरी ढांचे में छेद किया। उन्होंने पितृसत्तात्मक समाज का मूल स्रोत ब्राह्मणवाद में ढूंढ़ा, उन्होंने ब्राह्मणवाद से लड़ने का हल शिक्षा और समाज के ढांचे में परिवर्तन को माना। उनकी कार्य शैली में सादगी थी। वे सादा जीवन, वर बहु पक्ष को एकत्रित कर ब्राह्मणी आडम्बरी को छोड़ सामूहिक विवाह करने की प्रेरणा देती तो व शादी कराती। सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा पंडों व ब्राह्मणों का पर्दाफाश करती। बाल विधवाओं के केश काट देने पर वे नाइयों के पास गईं, उनसे बातचीत की कि वे ये मुंडन का काम अपने हाथों से न करें। उनके समझाने से पूरे नाई समाज ने उनकी बात मानी। उनके काम को जहां उच्च जातीय वर्ग का विरोध मिला वहां निचले समाज का खुलकर साथ मिला।

आज के नारी आंदोलन का हम गहन अध्ययन करें तो पाएंगे कि उनकी सभाओं में स्लम झुग्गी झोपड़ी की औरतें जरूर दिखेंगी लेकिन मुद्दों में गरीबी, आवास, आवश्यक नागरिक सुविधाएं, सरकारी शिक्षा, शौचालय, स्वास्थ्य इत्यादि के सवालों पर आंदोलन पर रुख उपेक्षित है। संगठनों के तौर तरीके, रहन-सहन व बैठकों से पूर्ण सुविधा वर्ग की झलक मिलती है। इन आंदोलनों के प्रति समाज के पूर्वाग्रह है तो संगठनों के तौर तरीके भी समाज से कटे हुए है। सावित्री बाई फुले का काम वर्ग और जातिविहीन नजर आता है। उनका अपना सब कुछ आंदोलन के लिए था, और वह स्वयं आंदोलन के लिए थी। 185 वर्ष पूर्व जब छुआछूत, नारी विरोध अपनी चरम सीमा पर था उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण, घर के सब साधन अछूतों व महिलाओं के लिए समर्पित कर दिये थे। पति के देहांत पर स्वयं क्रिया में शामिल हुई। आज भी इतनी महान क्रांतिकारी जननायिका ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगी। वह थी भारत के प्रथम क्रांतिकारी महिला नेता व शिक्षिका जिसके जीवन ने कोटि-कोटि औरतों को शिक्षा का मार्ग दिखाया। वह वास्तव में नारी आंदोलन की रीढ़ थी जबकि, 19वीं शदी, तत्कालीन सामाजिक प्रभाव ही संकुचित था। प्राचीन अंध परम्पराओं तथा नवीन विचारों के द्वंद जड़ मूर्ति पूजा से लेकर छुआछूत जैसी अनगिनत रीति रिवाज, परम्पराओं की विषमता तथा कूपमंडूकता से समाज ग्रस्त था। एक ही मानव समूह सैकड़ों और हजारों जातियों तथा उप-जातियों में बंटा हुआ था। हर जाति के अपने संस्कार थे। स्त्रियों  का जीवन शूद्रों की भांति घरेलू गुलामी का शिकार था। उसमें बदलाव लाने का काम सावित्री  बाई ने किया।

संपूर्ण देश में कुछेक जातियों को छोड़कर कुछ जातियों का जीवन अशिक्षा, आर्थिक विपन्नता, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा हुआ था। सामाजिक कुरीतियां, धार्मिक पाखंड अपने चर्म शिखर पर था। सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा बाल मुंडन, बलि प्रथा, विधवा विद्रोह के प्रतीक बनकर उभर रहे थे। पर्दा, देवदासी छुआछूत जैसे कृत्य समाज में बेरोकटोक अपना अस्तित्व बनाये हुए थे। इन कुरीतियों का फायदा उठाकर पुरोहित व ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्रों का वास्ता देकर समाज में अन्याय, शोषण, अंधविश्वास व गैर बराबरी को बरकरार रखने का षड्यंत्रा करता रहा। इसका प्रभाव समस्त स्त्रियों  के साथ विशेषतः शूद्रों और उनकी स्त्रियों  पर ज्यादा अन्यायमूलक, दमनात्मक शोषणकारी था। फुले दंपति ने ऐसी शिक्षा की कल्पना की जिसमें जाति, लिंग व वर्ग के वर्चस्व के कारण समुदाय में समायी गहरीखाई को पाटा जा सके। शिक्षा ही वह पहला संस्कार है जो मनुष्य मात्रा के बौद्धिक विकास को लक्षित करता है। अंग्रेजों के देश में आगमन से पारम्परिक शिक्षा में कुछ बदलाव शुरू हुए। फुले दंपति ब्राह्मणवादी विचारधारा पोषक शिक्षा के विरुद्ध थे। वे वर्ण-जाति-वर्ग आधारित शिक्षा के प्रचार-प्रसार के खिलाफ थे। उनके अनुसार- ‘‘विद्या बिना मति गयी, मति बिना गति गई’’ ‘‘विद्या बिना मति गयी, मति बिना गति गई’’ जीवन की गति सम्यक शिक्षा निर्धारित करती है।

सावित्री बाई फुले न केवल सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षिका थीं बल्कि वे कोमल हृदय चेतनाशील, कवयित्री  भी थीं। ‘काव्य फुले’ नाम की उनकी कविता संग्रह में उन्होंने अनेक मार्मिक एवं मारक कविताएं लिखीं। उनका यह कविता संग्रह 1854 में छपा तथा दूसरा कविता संग्रह ‘बाबन्न कशी सुबोध रत्नाकर’ 1891 में अपने पति ज्योतिबा फुले को याद करते हुए आया। वे प्रखर लेखिका व तार्किक विदुषी थीं, जब भी कोई समस्या आती वे उस पर गंभीरता से विचार करके सटीक जवाब देतीं। इतिहास और आंदोलनकारियों की उपेक्षा से भी सावित्री बाई फुले छुपी न रह सकी। दलित व पिछड़े समुदायों के आंदोलन की नायिका सावित्री बाई फुले आज अपने समूचे अस्तित्व के साथ उनमें स्थापित हो चुकी हैं।

सावित्री बाई फुले के बारे में 1990 में थोड़ी सी भनक शेखर पवार जो नागपुर महाराष्ट्र से आकर दिल्ली में बस चुके थे से मिली। 3 जनवरी 1993 में शेखर और यशवंत निकोसे ने मिलकर मंडी हाउस पर पहली बार सावित्री बाई फुले की जयंती मनाई थी। और इस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में तत्कालीन उप-सभापति नजमा हेपतुल्ला जी आई थीं। 10 मार्च 1991 में पचकुइंया रोड वाल्मीकि बस्ती में कदम संस्था ने सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस मनाया। जिसमें एडवोकेट भगवान दास, पत्राकार सुश्री मणिमाला जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज की। 10 मार्च 1992 में संगम पार्क में पुनः महिला दिवस मनाया गया। उत्तर भारत में एक समय था जब सावित्री बाई फुले को प्रायः ज्योतिबा फुले की पत्नी के रूप में ही स्वीकारा जाता था।

1995 में नागपुर में पहला अ.मा. दलित लेखिका सम्मेलन प्रो. कुमुद पावड़े के संयोजन में बुलाया गया। जिसमें सेंटर फॉर  आल्टरनेटिव दलित मीडिया (कदम) के संस्थापकों में अशोक भारती, राजीव सिंह के साथ साथ कुछ और लोगों  को जाने का मौका मिला। हम अपने दल बल के साथ शम्भू प्रसाद कोईराला, अनीता गुजराती, अनीता भारती, पुष्पा भारती, ज्योति एवं शेखर पवार, एन.आर. सागर, रजनी तिलक, विपला डिकुना भी पहुंचे। कार्यक्रम की समाप्ति पर प्रो. कुमुद पावडे के घर पर बातचीत के दौरान 1995 में दिल्ली में लेखिका सम्मेलन की जिम्मेदारी ‘कदम’ को सौंप दी गयी। साथ ही तय हुआ कि 2-3 जनवरी सावित्री बाई फुले के जन्म दिवस पर ही यह कार्यक्रम रहे। अगले वर्ष 1996 में अ.भा. दलित लेखिका सम्मेलन ने उत्तर भारत में इस कार्यक्रम ने अपने कीर्तिमान स्थापित किये। पांच भाषाओं की लेखिकाएं उपस्थित हुई। जनसत्ता ने 3 जनवरी को हेडलाइन में दलित लेखिकाओं की दस्तक को जगह दी। 1997 में ही झोड़गेबाई की मराठी में लिखी सावित्री बाई फुले जीवन की जीवनी ‘शलभ और शेखर ने अनुवाद की। अनुवाद की भाषा हिन्दी में पठनीय काबिल न होने हेतु इसका पुनर्लेखन रजनी तिलक द्वारा किया गया। कदम टीम ने सावित्री बाई फुले पर हिन्दी की पहली किताब लाने का दुस्साहस किया। दो हजार कापियांहाथों हाथ बंट गयी। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार तक किताबों को भेज दिया गया। लोगों को बहुत पसंद आयी। दूसरे, तीसरे एडिसन भी निकाले गये। आज उत्तर भारत का सामाजिक आंदोलन एवं दलित पिछड़े समुदायों के आंदोलन सावित्री बाई फुले के कार्यों और शौर्य को अपने समुदायों की महिलाओं के बीच ले जाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। परन्तु स्त्री  मुक्ति आंदोलन में जागोरी ने दलित महिला विशेषांक में सावित्री बाई फुले पर रोशनी डाली परन्तु संदर्भ देना भूल गये। मीडिया ने अभी तक सावित्री बाई फुले के कामों को पहचाना नहीं गया है। किसी भी दैनिक अखबार ने सावित्री बाई फुले, ज्योतिबा फुले पर कोई विशेष पेज नहीं निकाला।

2007 में नेशरल फेडरेशन ऑफ़ दलित वूमेन के प्रयास से सावित्री बाई फुले पर एक डाक टिकिट नेहरू युवा केन्द्र चाणक्यपुरी में रिलीज हुआ। इतिहास ने करवट ली। राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन ने सावित्री बाई फुले के जीवन को आदर्श मानकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, झारखंड मंे सावित्री बाई फुले के कामों को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया। इसी क्रम में सावित्री बाई फुले के जन्म दिन को भारतीय महिला दिवस 3 जनवरी 2014 से मनाना शुरू हुआ। राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन ने ग्रास रूट की 50 महिलाओं को सम्मानित किया। गुजरात से भारूलता काम्बले, पूणे से पुण्यनगरी  की चीफ एडिटर राही भीड़े, दिल्ली से रजनी तिलक व उनका संगठन राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन ने दिल्ली में भारतीय महिला दिवस मनाने का आह्वान किया। 3 जनवरी 2015 को इस कार्यक्रम में राही भीड़े मुख्य अतिथि रही। सहेली, जागोरी, बामसेफ से दलित लेखक संघ, सी.फार की प्रतिनिधि महिलाएं शामिल रहीं तथा पहली चीफ एडिटर राही भीड़े एवं उमा चक्रवर्ती, भारूलता कांबले को उनके कार्यों के लिए सम्मानित किया।

2016 में एससी, एसटी एम्पलाइज एसोसिएशन, आंध्र प्रदेश एवं आंध्र सरकार के साथ मिलकर आंध्र प्रदेश के भवन में मनाया गया। जिसमें पुनः राही भीड़े, राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य, संसद एवं भारतीय महिला जाागृति परिषद, यू वी डी एम आर के प्रतिनिधि शामिल रहे। ए.पी. भवन से आनंद राव के साथ सह आंदोलन में अनेक प्रस्ताव पारित हुए। 3 जनवरी 2017 को पहली बार मेवात में मुस्लिम आबादी में भारतीय महिला दिवस मनाया गया। जहां लगभग एक हजार स्त्री -पुरुष शामिल हुए। मेवात कारवां से डा. अफ्फाक, जफरूद्दीन, सरपंच बाला के सह आयोजन में बीसियों कार्यकर्ता महिला पुरुषों को सम्मानित किया गया। जागोरी ने पहली बार अजीम प्रेम जी के वित्तीय सहयोग से सावित्री बाई फुले पर छोटी सी कामिक्स बुक प्रकाशित की। पूना में क्रांतिज्योति सावित्री बाई फुले वूमेन स्टडी केन्द्र में महिलाओं को स्वाबलंबी बनाने हेतु अध्ययन व शोध कराये जाते हैं।

बिहार, उत्तर प्रदेश में आज सावित्री बाई फुले के नाम से सेल्फ हैल्प ग्रूप बनाये जा रहे हैं। संस्थाओं के नाम सावित्री बाई फुले न्याय मंच, महिला मंडल आदि रखने से प्रतीत होता है कि वे स्वयं आदर्श बनकर लोगों के जीवन में उतर आयी हैं। जाति और पितृसत्ता को नकारने वाले संगठनों ने फुले दंपति के दर्शन और उनके बताये रास्ते को अपनाना शुरू किया। इसी महत्वपूर्ण कार्यों में मा. हरीनरके, प्रो. विमल कीर्ति, कौशल्या बैसंत्री , शर्मिला रेगे एवं उत्तर भारत से कन्हैया लाल चंचरिक, मोहनदास नैमिशराय एवं ‘कदम’ संस्था ने उनके कामों को आगे बढ़ाया है एवं सावित्री बाई फुले के जन्म दिवस को भारतीय महिला दिवस मनाने की श्रृंखला शुरू की।
शेखर पवार जो महाराष्ट्र से दिल्ली आकर बसे उनकी पैरवी एवं अनुवाद के कारण सावित्री बाई फुले की कविताएं हिन्दी में अनुदित होकर आयी जिसका संपादन अनीता भारती ने किया जो स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित हुई।

सावित्री बाई फुले समग्र का अनुवार शेखर पवार कर चुके हैं, जो शीघ्र ही द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन ( स्त्रीकाल का अनुसंगी प्रकाशन) से लोगों  के बीच पहुंच जायेगा। सावित्री बाई फुले का जीवन न केवल दलित पिछड़ी अल्पसंख्यक आदिवासी, घुमन्तु जातियों के लिए प्रेरणादायी है बल्कि हमारे देश के लिए गौरव और सम्मान की पहचान है।

सावित्रीबाई की कवितायें: 

अंग्रेजी पढ़ो अंग्रेजी पढ़ो अंग्रेजी पढ़ो
स्वाबलंबन का उद्योग, ज्ञान धन का संच करो निरंतर।
विद्या के बिना व्यर्थ जीवन पशु जैसा, आलसी बन चुप ना बैठो।।
विद्या प्राप्त करे शद्रों-अतिशूद्रों के दुःख निवारण हेतु।
अंग्रेजी का ज्ञान हासिल करने का शुभ अवसर हाथ आया।
अंग्रजी लिखकर पढ़कर जात-पात की दीवारों को ढहा दो।
भट-बामणों के षड्यत्रों के पिटारों को दूर फेंककर।।

बालक को उपदेश 
काम करना है जो आज, उसे अब कर तत्काल।।
जो करना है दुपहरी में, उसे कर अब जाकर।।
कुछ क्षणों के बाद का कार्य, इसी वक्त करो पूरा जोर लगाकर।।
हो गया समाप्त कार्य या नहीं, न मौत पूछती है कारण।।

श्रेष्ठ धन दौलत
प्रातः काल में जाग जाओ बेटे। हाथ-मंुह धोकर बनो चुस्त।।
नहा धोकर बन तरो ताजा। करो माता-पिता को वंदन।।
स्मरण कर गुरुजनों को। पढ़ाई में लगाओ मन।।
समय बरबाद ना करो। बड़ा ही कीमती है दिन।।
करो हासिल ज्ञान। विद्या को देवता जान।।
लीजिए विद्या का लाभ। दृढ़ निश्चय कर।।
विद्या धन है बच्चे। सभी दौलत से बढ़कर।।
धन का संचय जिसके पास। ज्ञानी मानते हैं उसे सब जन।।

संत
जो वाणी से उच्चार करे,
वैसा ही बर्ताव करे,
वे ही नरनारी पूजनीय।
सेवा परमार्थ,
पालन करे व्रत यथार्थ, और
होवे कृतार्थ, वे सब वंदनीय।।
सुख हो या दुख,
कुछ स्वार्थ नहीं,
जो जतन से कर अन्यों का हित।
वे ही ऊंचे,
मानवता का रिश्ता जो जानते हैं वे सब,
सावित्री  कहे, सच्चे संत।।

संदर्भ:
भारत की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले संपादन: रजनी तिलक, अनुवाद: शेखर एवं शलभ।
सावित्री बाई फुले समग्र वाड्.मय, संपादक: डा. सारनाथ सादडकर, सारनाथ प्रकाशन बुक डिपो, परभणी।
महात्मा फुले का उत्तर भारत मंे प्रभाव – मोहन दास नैमिसराय, महात्मा फुले: साहित्य और विचार, संपादक: हरिनरके।
क्रांतिज्योति सावित्री बाई फुले: डी.के. खापर्डे, महात्मा फुले: साहित्य और विचार, संपादक: हरिनरके।

राजनीतिलक साहित्यकार, दलित स्त्रीवादी विचारक और एक्टिविस्ट हैं. संपर्क : rdmaindia@gmail.com 

सम्मानित होंगे रवीश कुमार

मनीषा कुमारी 


इस वर्ष पत्रकारिता जगत में एक प्रतिष्ठित पुरस्कार योजना की शुरुआत गांधी शान्ति प्रतिष्ठान और कुलदीप नैयर के सहयोग से हुई है. इस वर्ष यह पुरस्कार एनडीवी टीवी के रवीश कुमार को दिया जाएगा.

 प्रथम कुलदीप नैयर पत्रकारिता पुरस्कार चर्चित पत्रकार रवीश कुमार को दिया जाएगा. सम्मान समारोह का आयोजन 19 मार्चए 2017 को नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शाम 6 बजे आयोजित होगा. इस पत्रकारिता पुरस्कार की शुरूआत गांधी शांति प्रतिष्ठान व प्रतिष्ठित पत्रकार कुलदीप नैयर ने संयुक्त रूप से की है.

पुस्कार के लिए गठित संचालन समिति में  कुलदीप नैयर के अतिरिक्त गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत, राजनीतिशास्त्री आशीष नंदी, जनसत्ता के पूर्व संपादक ओम थानवी, वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी, संजय पारीख, रिजवान कैसर, प्रियदर्शन, अशोक कुमार, जयशंकर गुप्त, विजय प्रताप व फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन शामिल थे.

गांधी शान्ति प्रतिष्ठान और इस पुरस्कार योजना के सचिव अशोक कुमार ने बताया कि इस पुरस्कार योजना के तहत हर वर्ष भारतीय भाषाओं में काम करने वाले स्वतंत्रचेता, लोकतांत्रिक मूल्य व नागरिक अधिकार के लिए अपनी पत्रकारिता का इस्तेमाल करने वाले एक पत्रकार को हर वर्ष 1 लाख रुपये का पुरस्कार दिया जायेगा. कुलदीप नैयर ने इसके लिए बीज राशि दी है. उन्होंने कहा कि यह पुस्कार इस कारण विशिष्ट है क्योंकि इसे पत्रकारों द्वारा पत्रकारों को दिया जा जाएगा. इस मामले में यह पुरस्कार नया, अलग और अकेला है. गौरतलब है कि कुलदीप नैयर भारतीय पत्रकारिता के स्तंभों में से रहे हैं. वे इस सम्मान योजना के अगुआ रहे हैं तथा उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान को इस पुस्कार योजना के संयोजन-संचालन से जोड़ा तथा उसके बाद कई पत्रकार-लेखक मित्रों के सहयोग से यह योजना साकार हुई है.

उन्होंने बताया कि इस पुरस्कार के लिए भारतीय भाषा की पत्रकारिता के किसी भी माध्यम के पत्रकार पर विचार किया जा सकेगा.

चलो नागपुर! मनुवाद और हिन्दुत्व के खिलाफ महिलाओं का संर्धषषील कदम

यह रोज-रोज नहीं होता कि दलित, मुसलमान, आदिवासी, बहुजन, अल्पसंख्यक,समलैंगिक महिलायें, किन्नर (ट्रांसजेण्डर), सेक्स वर्कर, खाना बदोस, जनजातियों की महिलायें, छात्र छात्रायें और वह तमाम लोग जिनके साथ जाति वर्ग धर्म समुदाय यौनिकता, जेण्डर,अक्षमता, व्यवसाय या उम्र की वजह से भेद भाव किया जाये वो एक साथ एक जुट होकर उन समप्रदायिक ब्राहम्णवादी, सामन्ती, जातिवादी, पूंजीवादी, पितृसत्तात्मक ताकतों के खिलाफ आवाज उठायें। यह भी रोज-रोज नही होता कि तमाम प्रकार के लोग एक जगह एकत्रित होकर क्रान्तिज्योति सावित्री बाई फुले का  स्मृति दिवस मनायें और इसलिये हम रोज-रोज चलो नागपुर भी नहीं कहते।

10 मार्च 2017 को करीब 5 हजार महिलायें जोकि महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, उ0प्र0, गुजरात, आन्ध्रा, तेलांगाना, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल और बिहार से तालुक रखती हैं नागपुर में सावित्री बाई फुले की 120वीं स्मृति दिवस पर एकजुट होकर नफरत, अन्याय और प्रभुत्ववादी ताकतों के खिलाफ एक जोरदार प्रदर्शन करेंगीं। गीत, नृत्य, कला, कविता और रंगमंच जैसे माध्यमों से हम फैली असमानता और असहिसुणता गांव शहरों युनिवरसिटी कैम्पसों में, कार्यस्थलों पर, घरों से सड़कों पर, जहां हमें खामोश कर देने की कोशिशें हैं, ताकतें हैं, उनसे मोर्चा लेंगें। हम उठेंगे अपने आवाज के लिये, अपने हकों के लिये, अपनी सुरक्षा के लिये, जो इस देश का संविधान हमारे लिये निधार्रित करता है। हम मिलकर दोहरायेंगें कि एक धर्म निरपेक्ष व एक प्रजा तांत्रिक देश में किसी को  यह हक नही है कि वहकिसी व्यक्ति समुदाय की बेईज्जती करे, भेदभाव करे, हनन करे या किसी भी प्रकार से उसकी पहचान के आधार पर उस पर जुल्म-ज्यादती करे।

हम आलोचना करते हैं, नकारते हैं, एैसी सभी ताकतों को  चाहे वह प्रभुत्ववादी जातियां हों या स्वयं राज्य जिनकी वजह से सुरेखा भोतमांगे खैरलांजी से, राजस्थान से देलटा मेधवाल, केरला से मेधना, जीशा जैसी दलित महिलायें सोनी सोरी जैसी आदिवासी महिलायें, भगाना से नवयुवतियां, बीजापुर की महिलायें, मेवाल और मुज्जफरनगर की मुस्लिम महिलायें व अन्य तमाम एैसी महिलायें इस उतेजित हिन्दुत्व राजनीति की आग में झुलस गयी हैं। हम न्याय और जवावदेही की मांग करते हैं इन महिलालों  के लिये व इनके जैसी हजारो महिलाओं  के लिये जो  हर साल इन जुल्मों का शिकार होती हैं। साथ ही यह मांग भी करते हैं कि तुरंत राज्य इन अपराधी प्रवत्ति के लोगों को, जो  इन अपराधों को बेधडक करते हैं, पर रियायत वढील को खत्म करें। हम चारो ओर फैली असमानताओं हिंसा अत्याचार और क्रूरता को जड़ से  खत्म करने की मांग करते हैं।

महिला आन्दोलन के नेतृत्व में  बतौर कार्यक्रम हमसब अपनी विभिन्न पहचानो के साथ संधर्ष की इस नई राह पर अग्रसर है। हम उस सावित्रीबाई फुले से प्रेरित हैं जो पहली महिला शिक्षक थी, कवित्री थी, लेखिका थी और महिला अधिकारों  पर नेतृत्व की मिशाल थीं जिसने 19वीं शताब्दी में ब्राहम्णवादी, पितृसत्तात्मक ढॉचे को चुनौती दी और साथ ही शूद्रों  और महिलाओ को  जाग्रत कर मनुस्मृति, धार्मिक  लेखों और ब्राहम्णवादी तौर तरीकों को कड़ी चुनौती दी। वह सावित्री बाई फुले ही  थी, जिसने पराम्परागत रूप से चली आ रही महिलाओं पर रोक-टोक व नियंत्रण का बायकाट किया था और हमें आज़ादी की राह लेने का रास्ता दिखाया था।

इसलिये चलो नागपुर, जो सावित्री बाई फुले का सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन का केन्द्र है। यह वह शहर है जहॉं बाबा साहेब ने आज तक की सबसे बड़ी महिला गोष्ठी शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के बैनर तले आयोजित की थी, जिसमें 30 हजार महिलाओं ने एक साथ आकर पितृसत्ता के बत्तर तरीकों को चोट पहुंचायी और हमारी नारी वादी नजरिये औरएक्टीविज़म को प्रेरित किया।

एक एैतिहासिक दिन जब 5000 लोग एक जुट होकर कविताओं, नृत्य, गानों और परफामेन्स के जरिये खुद को अभिव्यक्त करेंगी । चलो नागपुर की कल्पना इसका आयोजन जिसका खर्च कई सौ महिलाओं द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया है।
चलो कि मनुवाद और  हिन्दुत्व के खिलाफ –
चलो कि ब्राहम्ण बाद और  पितृसत्ता के खिलाफ
चलो कि मिल कर चलें।
हजारो  सलाम; जय सावित्री, जय फातिमा, जय भीम, जय वीरसा

स्थान – इन्दौरा मैदान, इन्दौरा
चौक,  कामटी रोड, नागपुर
समय – 10.00 सुबह से 4.00 बजे शाम

आयोजकों की तरफ से

अभिन्यां कांवले, अजिता राय, अनिता घई, बिटटू कोर्तिक कोनडिटा, छाया खोब्रागडे, दुर्गा झा, एलिना हारो, हसिना खान, जया शर्मा, किरन देशमुख, लता प्रतिभा, मुधुकर, माधवी कुकरेजा, मनिशा बंगाड, मंनजुला प्रदीप, मारिया सेशू, मोनिशा बहल, निषा शिडें, निवेदितामेनन, प्रदन्य बागडे, रजनी तिलक, रिनुपरना, संगीता मनोजी, संदयाली अरूना

रजनीश आनंद की कविताएं

रजनीश आनंद


कॉपी राइटर, प्रभात खबर, रांची, झारखंड
संपर्क : 9835933669, 8083119988

महिला दिवस पर कुछ कविताएं


मैं नहीं छिनने दूंगी अपनी पहचान…

ऐ सुनो पितृसत्तामक समाज
मैं तुमसे पूछना चाहती हूं एक सवाल?
क्यों मेरी पहचान छिनना चाहते हो तुम?
मैंने तो तुमसे कभी नहीं कहा
भूल जाओ, अपनी जड़ों को
मां-बाप, परिजनों को
उन गलियों को जहां हम जीते हैं
अपना बचपन, जहां होती है जिंदगी जवां
कैसे भूलूं मैं मां की लोरियों को
पापा के लाड़ को,
भैया-दीदी, दोस्तों के साथ की मस्ती को
मैं तो अपनी जड़ों से बिछड़कर
लहलहाती हूं तुम्हारे आंगन में
हां सही है मेरा नाम जुड़ा है तुमसे
संग कटेंगे अब जीवन के शेष अध्याय
लेकिन इसके माने ये तो नहीं
कि तुमसे जुड़ते ही जीवन की किताब के
मिट गये सारे पुराने पन्ने.
इस समाज ने हमेशा छिनी औरतों से उसकी पहचान
लेकिन मैं अपनी मां की तरह
नहीं करूंगी त्याग, नहीं फटने दूंगी
अपने जीवन से प्रारंभिक पन्नों को
तुम मेरे जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय हो
किंतु मेरी बुनियाद प्रारंभिक पन्ने हैं
उन पन्नों के बिना गिर जायेगी
मेरी जीवनरूपी इमारत
इसलिए मैं सफल नहीं होने दूंगी
इस साजिश को,
मैं तुम्हारे साथ हूं खड़ी
लेकिन तब ही, जब तुम
स्वीकारो मेरी पहचान को
क्योंकि मैंने तो तुमसे
कभी नहीं छिनी तुम्हारी पहचान…
रजनीश आनंद

मात्र देह होने का एहसास…

मैं औरत हूं, लेकिन
बार-बार होता है एहसास
मात्र देह होने का
आईने के सामने खड़े होकर
जब भी टटोला है खुद को
साफ उभर आयीं, वो वहशी नजरें
जो बचपन से आज तक
मुझे लील जाने को आतुर थीं
जिन्होंने बार-बार कराया मुझे
मात्र देह होने का एहसास
घर के परिचित, जो मां के सामने
पुचकारते थे मुझे, वही
मां के जाते ही, खूंखार लगने लगते थे
उनकी तेज होतीं सांसें, आज भी
डरा जातीं हैं मुझे

मां के जाते ही वे जकड़ना चाहते थे मुझे
अपनी वासना के जाल में
मैं भागकर छुप जाती थी मां के आंचल में
ऐसी ललचाती नजरों से कभी नहीं बच पायी मैं
घर-बाहर हर जगह मौजूद हैं ऐसी नजरें
तभी तो हर शाम जब आफिस से घर आती हूं
ऐसी घूरती, निगलने को आतुर नजरों से भिड़कर
औरत नहीं मात्र देह होने का
एहसास घर कर जाता है मन में…

अब इच्छाओं पर नहीं लगेगा ताला

क्यों मेरी हर इच्छा पर
ताला लगा दिया जाता है?
और चाबी नहीं दी जाती मुझे
मरती इच्छाओं के बंद कमरे में
घुटन सी महसूस होती है
पसीने से तर-बतर शरीर
लेकिन फिर भी मैं
जद्दोजहद करती हूं
कोई झरोखा मिल जाये
जहां से झांकू मैं
अपनी इच्छाओं का बालपन निहारूं
उसकी अल्हड़ जवानी का लुत्फ उठाऊं
लेकिन नहीं, मैंने तो हमेशा
अपनी इच्छाओं को अर्थीं पर देखा
हां, उसे कांधा देने समाज के कई ठेकेदार आ जाते थे
लेकिन बस अब और नहीं
तय कर लिया है मैंने
तोड़ दूंगी हर दीवार
नहीं सजने दूंगी
अपनी इच्छाओं की अर्थी
औरत हूं मैं, सृजन कर सकती हूं
तो जन्म दूंगी अपनी
इच्छाओं के मधुर जीवन को
मासूम बालपन से गंभीर वृद्धावस्था
तक संवारूंगी उसे, क्योंकि अब कोई
ताला नहीं लगा सकेगा मेरी इच्छाओं पर…

ताकि सुंदर बने स्त्री-पुरुष संबंध…

बस बहुत हुआ अब,रूक जाओ कि
मैं अब नहीं सह पाऊंगी
कब तक तुम रहोगे
मेरे तारणहार की भूमिका में
अरे! मैं निर्णय ले सकती हूं
यह जीवन मेरा है, मैं इसे
अपने तरह से जीना चाहती हूं
हमेशा मेरे लिए निर्णय लेकर
क्यों  पंगु बनाकर रखना चाहते हो मुझे
हमेशा मैं छली जाती हूं
प्यार, अधिकार से ना मानूं
तो ताकत का जोर दिखाते हो तुम
उसपर भी ना मानूं तो
रस्मो-रिवाज की पाबंदी लगाते हो तुम?
तुम भी तो इसी समाज का हिस्सा हो
तो तुम क्यों नहीं मानते उन रिवाजों को?
मैं अकेली क्यों पिसती रहूं परंपरा की चक्की में
जब से मानव सभ्य हुआ, उसने औरतों पर

कसा अपना शिकंजा, बनाया उसे वस्तु
जो या तो बिस्तर पर शोभा देती है
या फिर घरेलू कामकाज में पिसती है
घर के बाहर जाकर काम करके भी
वो नहीं थकती, तुम थकते हो
तभी तो जब आफिस से दोनों आते हैं
तुम हुक्म बजाते हो, वो बांदी बन जाती है
कब समझोगे तुम भला
एक ही सिक्के के दो पहलू हैं हम
जीवन की नैया अगर तुम,तो पतवार हूं मै नहीं चल सकता दोनों के सामंजस्य
बिना यह सुंदर जीवन
तुम्हारी चाहते हैं, तो क्या मेरी नहीं हैं
तुम कह सकते हो अपनी बात
मैं कहूं तो बदचलन कहलाती हूं
लेकिन बस अब और नहीं
मुझे नहीं चाहिए, तुम्हारी दया
हां, मैं तुम्हें दोस्त के रूप में चाहती हूं
जो चले मेरे साथ, मुझे ऊर्जा दे
मेरी ऊर्जा को, मेरे जीवन को निस्तेज ना करे
तो आओ निर्णयकर्ता नहीं मित्र बनो तुम
ताकि सुंदर बने स्त्री-पुरुष संबंध…

देह और प्रज्ञा के बीच: अलका प्रकाश की कविताएं

अलका प्रकाश


स्त्री -विमर्श से संबंधित तीन पुस्तकें ,” नारी चेतना के आयाम “,”तंद्रा टूटने तक”एवं “सत्ता प्रतिष्ठान और स्त्री अस्मिता “.’सिर्फ सवाल नहीं’कविता संग्रह
संपर्क : alka.prakash12@gmail.com

महिला दिवस पर 


देह और प्रज्ञा के बीच

बिखर गई मेधा
देेह के आगे
दिखती नहीं प्रज्ञा
एक  जोड़ी जांघों के समक्ष

जाना केवल
आदिम रसना ने
देह का मादक स्वाद

अन्य मनस का बोध
होने न दिया अहंकार ने
प्रकृति,   पुरूष से हारी
क्या करती वह बेचारी

ले आती घोर बवडंर
कभी अंधड़ कभी तूफान
फिर भी एहसास
कहाँ करा पाती

शिव-शक्ति का संमन्वय
मात्र, मिथ एक कल्पना
अहा! देवी देह से परे
तुम हो क्या ?

पंच कन्याओं से पूँछू
उत्तर देंगी क्या वे?

सुमित्रा महाजन से पूँछू
शायद कुछ बतला सकें
स्मृति इरानी या सुजाता सिंह
एक बार स्पष्ट कर दें

देह मुक्त छवि होती है क्या स्त्री की?
या वंचना हैं ये सब!

फरेब

जब बनी मैं माँ
तब समझा महानता का छद्म
गरिमा और मर्यादा का विद्रूप

आज चेहरे की झुर्रियाँ और एकाकीपन
मिला यही सेवा का प्रदाय
सारा जीवन सब में बीता
कहाँ गये वे सब

मातृत्व महान तब क्यों नहीं
जब अनब्याही बनती है माँ
प्रेम पाप कैसे हो गया?

समर्पण का वह पल तो पावन था
कुछ हंसी कुछ वक्र निगाहों के साये
सब कुछ पितृसत्ता की सहूलियत
उस दायरे के बाहर सब पाप

फरेब ऐसा रचा कि
समझ न सके हम



सोलह  दिसंबर के बाद रफू होती आत्मा

शाम बहुत उदास है आज
मन कहीं गहरे में असहज

आता है बार-बार ख्याल
कि कैसे होगी वह

हो रही है रात
आ रही होगीे आॅफिस से अकेले

कभी-कभी उचट जाती नींद
उन सब स्त्रियों के लिए
जो अपनी आँखो से
देख रही है सपने
बुन रही हैं भविष्य के नीड़

बना रहता है डर
कर लेती हूँ फोन
हो पाती हूँ किन्तु
कुछ ही देर के लिए निश्ंिचत

लगता है सब तरफ से
चीख रहीं है न लड़कियाॅं
आशंकाएं आशंकाए आशंकाए
कि कहीं एक्सीडेंट न हो जाय
हो जाय बलात्कार
कर दी जाय हत्या

दरिंदे बी.बी.सी. पर कह रहे हैं
न जाने क्या क्या ….

नहीं फूट रही है
अब प्रेम की कोपलें
उग रहे हैं जगह-जगह
विष वृक्ष कांटेदार

निर्भया का जाना
दे गया है भय
चीर गयी है आत्मा अभागी
सभी स्त्रियां कर रहीं हैं प्रार्थनाएं
कि वह पुनः जन्म न ले इस धरती पर कभी .
कि मिले मिले उसको शांति

लड़ रहे है हम लड़ाई
हमें क्षमा कर देना निर्भया
तंद्रा का टूटना जरूरी था

प्रश्नाकुल भाव जगत
और ये आँखे सदानीरा
कि रक्त संबंध भी तो कभी-कभी
दे जाते हैं धोखा
और जब उन्होंने कहा
‘‘कि यह स्पर आॅफ मोमेंट था’’ …

तो लगा कि यह देह का टैबू
आत्मा से बहुत बड़ा हो गया जैसे दैत्याकार

अब तो नहीं होता किसी भी पुरूष पर
विश्वास करने को जी

‘‘वासांसि जीर्णानि,’’
पढ़ते-पढ़ते सोचती हूँ…
नये वस्त्र के अचानक
तार – तार हो जाने पर
रफू से काम चल जायेगा क्या?

मन का चेहरा

जो तेजाब तुम्हारे चेहरे
पर फेंका गया था
उसके कुछ छींटे
हम सबकी आत्मा पर भी पड़े है लक्ष्मी
हरा है वह घाव अब भी

वो चेहरे बिगाड़ने वालों !
देखो आत्मा कितनी उजली हैं हमारी

देखो कैसे हंस रही है तुम पर
मर्मांतक पीड़ा झेलती
जी गई अनन्या फिर भी

सोचा क्या था सनातन पुरूष तुमने
मेरी न हुई तो नष्ट कर दूंगा?

मेरी औरत/तेरी औरत /उसकी औरत
ज्यादा दिन सुख नहीं लूट पाओगे तुम
साध यौनिकता पर नियंत्रण
डाल मानसिक गुलामी और दासता की बेड़ियां
अब कुछ उखाड़ नहीं पाओगे तुम

तुम्हारा जो खूंटा है न
हो गया है बहुत जर्जर
पहले उसे तो उखड़ने से बचा लो!

बेघर 

लड़की का कोई घर नहीं होता
कोई जाति नहीं होती:मिसेज मिश्रा……
यह घर तुम्हारा नहीं
फिर तुम कौन हो इस घर में
जो बार-बार अन्दर-बाहर,
की जाती हो

रात दिन क्यों सजा रही हो इसे
इजाज़त लेती हो हर काम की
जो कभी मिलती, कभी नहीं मिलती

कोई नया कदम उठाते
तुम्हें याद आता है
कभी पापा का चेहरा
कभी मां की आंखें
कभी बच्चे की किलकारी
कभी उसकी तुमसे जुड़ी जरूरतें

सब खोने का भय तुम्हें
बहुत-बहुत डराता है
कुछ पाने के एवज में!

तुम आश्चर्य से देखती हो
हंसते हुए लोग
विवाह की पच्चीसवीं वर्षगांठ
मनाते हुए लोग
ज़ेवर से लदी खुशहाल औरतें
पति के साथ सैर करती औरतें
समझौता दर समझौता करती औरतें

तुम क्यों नहीं कर पाती समझौता
जो घर तुम्हारा नहीं है
फिर भी जिसका सबसे अधिक मोह है

औरत हूँ न

घर में पर्याप्त खाना है
पर  खा नहीं पा रही हूँ
मेरा श्रृंगारदान  प्रसाधनों से अंटा है

पर सज नहीं पा रही हूँ
अपने लंबे केशों को संवारने का मन नही करता
कल  मैं इन्हें कटवा दूँगी
बोलने का मन नहीं करता
लोग मेरी बड़-बड़ पर हँसते

कुछ है जो बहुत तंग करता
यह बेचैनी जीने नहीं देती
भाव में अभाव नहीं खोजती
कुछ है मेरी बनावट में कमी
असफलताओ की लंबी श्रंृखला ने

निराशा भर दी
किसी का दोष नहीं
उनको हाथ पीला करने की जल्दी थी
इनको सब परफ्ेक्शन में चाहिये था
सब सज गया है घर-आँगन–फुलवारी
पर मन रो रहा है

अब अमिधा और व्यंजना का नहीं प्रश्न
बात-सीधे-सीधे कहती हूँं
सपाट बयानी मेरी आदत

कला तो उलझाती है
उसका अन्त करती है

एक लड़की की उधेड़बुन

लोकल बस में सफर करते
अक्सर उसकी देह
रगड़ जाती है मर्दों से

सकुचाती वह बैठी रहती
कभी घूरती निगाहों से बचने के लिए
दुपट्टा सिर से बाँध लेती

कभी उसके सहयोगी कहते
चलिए घर छोड़ दें
वह मना कर देती

उसने सुने हैं उनके कह-कहे
‘यार सीट गरम हो गयी’
ऐसी-जैसी बहुत सी बातों को
प्रायः वह अनसुना कर देती

सुबह की आपा-धापी में
जब सारे काम निपटा कर
वह दफ्तर पहुँचती
एक कड़वा स्वर गूँजता
‘कमरे में गरमी आ गयी यार’
अब काॅफी की जरूरत नहीं
‘भोला जाओ कोलड्रिंक लाओ’

उसे पता है-
इसी ‘हाॅट’ शब्द के चक्कर में
विज्ञापन सुंदरियाँ अनवरत्
वक्षों और नितंबो की
शल्य क्रिया करा रही हैं
घर पर कुछ बोले तो
एक रटा-रटाया वाक्य
किसने कहा था, बाहर निकलने को
घर पर पड़ी रहो
क्या वहाॅ खतरे कम हैं

अगर रो कर दुख बाहर करे तो
तमाम कंधे हैं मौके की तलाश में
ऊँगली से हाथ पकड़ने का सफर

उसके कानों में गूंजते हैं रहीम के दोहे
‘रहिमन निज मन की व्यथा’…….
दूसरी ओर से एक नारा-

‘साइलेंस इज वायलेंस’
उसी उधेड़बुन में
उसका सिर चकरा जाता

बाॅस के चैंबर में कैसे जाय
जो टैब पर पोर्न देख
कुर्सी पर टाॅग फैलाए
ढूंढ रहा है अगला शिकार

कहाॅ जा कर फरियाद करे
नौकरी जाने का भय
नारीवाद तो सिखा रहा है
‘देह को मुक्त करो’

उसका प्रश्न है किसके लिए

इन ड्रेकुलाओ के लिए
कोई दार्शनिक की भंगिमा में
कह रहा है, देखो!
औरत की देह हथियार है

इस बाजारवाद के दौर में
तुम्हारे पास देह है
तुम कुछ भी खरीद सकती हो

वह उत्तर देती है-
मेरी देह में एक आत्मा भी है
इसका मैं क्या करूं?