प्यार पर न चढाओ हैवानियत की चादर

इति शरण 

"मैं तुमसे प्यार करता हूँ, यह तुम्हारी सज़ा हैं। तुमने मुझसे प्यार नहीं किया यह तुम्हारी गलती हैं। तुम्हें मेरी होना होगा वरना मैं तुम्हें बर्बाद कर दूंगा।"

एक तरफ़ा प्यार में पड़े सिरफिरे आशिक की यही सोच आज कई लड़कियों की ज़िन्दगी बर्बाद कर रहा हैं। पटना के पीएमसीएच अस्पताल में ऐसे ही सिरफिरे आशिक की हैवानियत की शिकार 15 वर्षीय सोनी अपनी ज़िन्दगी और मौत की लड़ाई लड़ रही हैं। मनचले मोहम्मद एहसान के प्यार को इनकार करने की सज़ा के रूप में उस आशिक ने सोनी पर तेज़ाब का हमला कर दिया। सोनी का चेहरा पूरी तरह जल चुका है। उसकी आँखों की रौशनी भी लगभग जा चुकी हैं। इस हमले के बाद उसे मिले शारीरिक कष्ट की तो शायद ही हम कभी कल्पना कर सकते हैं, इसके साथ ही उसके अस्तित्व और उसकी पहचान पर हुए हमले के दर्द को भी शायद ही बयां किया जा सकता हैं। इस घटना में सोनी की बहन की जांघ पर तेज़ाब का कुछ हिस्सा गिरने से वह भी ज़ख़्मी हो गई हैं।





2012 में बिहार में ही सोनी जैसी ही एक और घटना को अंजाम दिया गया था। बिहार की चंचल को भी एकतरफा प्यार का शिकार होना पड़ा था। मनचले आशिक की दरिंदगी को चंचल और उसकी बहन आज तक झेल रही हैं। उस घटना के बाद चंचल और उसकी बहन का जीवन किसी संघर्ष से कम नहीं रह गया हैं।

इन घटनाओं से एक सवाल तो जरूर उठता हैं। क्या हमला करने वाला व्यक्ति सच में उस लड़की से प्यार करता था ? प्यार में तो कहा जाता हैं कि लोग अपने प्यार के लिए जान देने को तैयार रहते हैं, मगर यहाँ प्यार में जान लेने से भी ज्यादा बड़ी दरिंदगी को अंजाम दिया जा रहा हैं। चंचल का कहना भी हैं कि वह मुझसे प्यार नहीं करता था, अगर प्यार करता तो मेरे साथ ऐसा नहीं करता।

दरअसल ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाला व्यक्ति प्यार में नहीं होता बल्कि एक मानसिक परिस्थिति से गुज़र रहा होता हैं। जिसे “डील्यूशन आॅफ लव" भी कहा जा सकता हैं। डिल्यूशन आॅफ लव एक ऐसी मानसिक परिस्थति होती है, जिसमें व्यक्ति को यह विश्वास हो जाता है कि वह सामने वाले को जिस रूप में प्यार करता है सामने वाला भी उसे उसी रूप में प्यार कर रहा है। जबकि सच्चाई बिलकुल भिन्न होती है। वह एकतरफा प्यार में डूबा रहता है।

डिल्यूशन आॅफ लव की परिस्थिति में इंसान सामने वाले के लिए इस हद तक अपने को बंधा हुआ पाता है कि उसके अलावा उसके मन में और कोई बात होती ही नहीं है। लेकिन जब उसे सामने वाले से कोई अनुकूल संकेत या इज़हार नहीं मिलता तो वह बौखला उठता हैं। फिर तो वह उसके अस्तित्व, उसकी पहचान तक मिटा देने की हैवानीयत पर उतर आता है। “साइकोपैथीक डीसआर्डर“ भी इसका एक कारण माना जा सकता है। इसके अनुसार व्यक्ति के भीतर कई स्तर की नकरात्मक सोच अपना घर बना लेती हैं। किसी भी गलत काम को अंजाम देने से लेकर सामने वाले के अस्तित्व तक को मिटा देने के एक अमानवीय भाव से भर उठना उसके व्यक्तिव में शामिल हो जाता है।  मगर किसी भी तरह की मानसिक परिस्थिति कहीं न कहीं सामाजिक परिस्थिति की ही अभिव्यक्ति होती है। स्वभावतः इन घटनाओं में सामाजिक परिस्थिति का एक बहुत बड़ा हाथ होता है। शिक्षा का स्तर, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश, आस-पास का वातावरण ही किसी व्यक्ति की मानसिकता के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है।

इन सबसे अलग एक और पहलू भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में एसिड अटैक की घटना के कारण बनते है। वो है हमारा पाॅपुलर सिनेमा। दरअसल हमारे भारतीय सिनेमा में अक्सर यह दिखाया जाता है कि एक लड़का किसी लड़की को पटाने की बहुत कोशिश करता है। पहले तो लड़की थोड़े नख़रे दिखाती हैं मगर लड़के के लाख कोशिशों और मिन्नतों के बाद लड़की अंत में मान जाती है। एक हैप्पी एंडिग। यानि लड़की तो अंत में पटनी ही है। यह है हमारे हिन्दी सिनेमा का निहितार्थ। हालांकि अब फिल्मों में कुछ बदलाव आए हैं मगर 90 के दशकों में बनी अधिकांश फिल्मों में इस तरह की छाप ज्यादा देेखने को मिलती थी। हमारे समाज में युवाओं को अगर सबसे ज्यादा कोई माध्यम प्रभावित करता हैं तो वह है हमारा फिल्म जगत। फिल्म को देखकर युवाओं के दिमाग में यह  बात पैठ जाती है कि अंत में लड़की को उसे तो हां कहनी ही है। मगर वह  फिल्मी दुनिया और वास्तविक दुनिया के बीच के अंतर को भूल जाता है।

और अंत में आती है मर्दो के वर्चस्व वाली इस समाज की बनावट। सैकड़ो साल से चली आ रही इस समाज की पुरूषवादी सोच की जड़ें काफी गहरी हैं। समाज का अधिकांश पुरूष प्रछन्न रूप से प्रायः इसी अंहकारी सोच से लैश रहता है। और प्यार के व्यापार में तो यह प्रायः अपनी पूरी आक्रामकता के साथ प्रकट हो जाती है। प्यार में डूबा कई पुरुष  यह कतई बर्दाश्त नहीं  कर पाता कि उसकी प्रेमिका उसके प्यार की तौहीनी करने की जुर्रत करे। और जब ऐसा होता है तो उसे सीधे अपनी मर्दानगी पर चोट पहुंचने सा लगता हैं। फिर क्या, उसके प्यार की सारी कोमल भावनाओं पर मर्दानगी का अमानवीय अंहकार हावी हो जाता है। वो क्रूरता की सारी हदें तोड़ देने पर अमादा हो जाता है। 'जब मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं' इस सोच के तहत वह प्रेमिका के वजूद को ही मिटा देने की खातिर कुचक्र में लग जाता हैं।

 एसिड अटैक उनमें से सबसे विकृत कारवाई है। कई बार यह सोच अपनी प्रेमिका की हत्या भी करने के लिए प्रेरित कर बैठती है। इस तरह के अपराध को रोकने के लिए जरुरी हैं कि क़ानूनी कार्यवाही के साथ ही समाजिक और मानसिक बदलाव की भी। तभी शायद प्यार जैसे अनमोल शब्द को हैवानियत की चादर से बचाया जा सकेगा।

फिलहाल हम सभी को सोनी के इलाज़ के लिए आगे आने की जरूरत हैं।  एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने के कारण उसके इलाज़ में पैसा रोड़ा बन रहा हैं। स्टॉप एसिड अटैक कैम्पेनर्स की कोशिश से सोनी को बिहार सरकार से 3 लाख मुआवज़ा मिलने की बात हुई हैं। मगर मुआवज़े की रकम मिलने में अभी कुछ समय लग सकता हैं। इसलिए कैम्पेनर्स आम जनता से उसके लिए मदद माग रहे हैं ।

युवा पत्रकार और रंगकर्मी इति शरण से संपर्क: itisharan@gmail.com
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