माँ तुम्हारे कॉमरेड

अंजली  काजल
युवा लेखिका अंजली  काजल का  पहला कहानी -संग्रह शीघ्र प्रकाश्य . हंस , ज्ञानोदय , वागर्थ आदि पत्रिकाओं  में कहानियां प्रकाशित.  संपर्क : anjalikgautam@gmail.com
 

 अंजली काजल की कहानी 

 यह उस समय की बात है जब मोबाइल फोन का आविष्कार नहीं हुआ था और तार वाला टेलीफ़ोन सिर्फ रईसों के घरों में पहुँचा था।उस शाम माँ ने रसोई की खिड़की से बाहर झाँका और देखा अभी साढ़े छह हुए हैं और बाहर अंधेरा हर दिखने वाली चीज़ को निगल गया है। उसने सोचा मौसम बदल रहा है। दिन छोटे हो रहे हैं और काली रातें और लंबी। बाहर हल्का अंधेरा होते ही दोनों बच्चे माँ के पास रसोई में ही आ बैठते। उन्हें माँ के आस पास रहना अच्छा लगता। माँ अगर आँगन में हैंडपंप पर कपड़े धो रही होती तो वे वहीं अमरूद के नीचे खेलने लगते। माँ घर के अंदर काम करती तो वे भी घर के अंदर खेलने लगते। उनका घर एक कमरा, एक रसोई के अलावा बहुत बड़ा बिना चारदीवारी का आँगन था। यह घर शहर की सीमा पर उभरती एक बस्ती में था जहाँ अभी आबादी बहुत कम थी और घर बहुत दूर दूर बने हुए थे।


 छोटी सोनू ढाई साल की थी और भोलू चार साल का होने वाला था। माँ ने रसोई में ज़मीन पर बोरी बिछा दी और दोनों बच्चे वहीं बैठ गए। माँ आज आलू मटर पका रही थी। माँ ने दोनों बच्चों को दो छोटी कटोरियों में मटर के दाने निकालकर दिए । दोनों बच्चे मटर खाने लगे। रसोई की हल्की गरमाहट अच्छी लग रही थी जबकि बाहर आज ठंडी हवा का बोलबाला था। 
भोलू माँ से पूछता है, “मम्मी पापा कब आएँगे?”
सोनू सवाल को दुहराती है, “मम्मी पापा तब आएन्दे?”
 अंधेरा होते ही दोनों बच्चे माँ से बारी बारी यही सवाल पूछते रहते। माँ ने दोनों को स्नेहभरी आँखों से देखा और जवाब दिया,
“पापा आ रहे होंगे बेटा।"

माँ रोज़ इसी तरह झूठ बोलकर दोनों बच्चों को बहलाती। इससे वे दोनों कुछ देर के लिए शांत हो जाते। माँ ने स्टोव पर सब्जी बना ली और बच्चों के लिए रोटी भी सेंक दी। अब वो आटे वाले हाथ धोकर बच्चों को खाना खिलाने ज़मीन पर बैठ गई। बच्चे अभी खाना खा ही रहे थे जब बाहर तेज़ हवा चलने लगी। उसने सोचा उसे बाहर से कुछ सामान उठा लेना होगा क्योंकि अगर तेज़ हवा चली तो बिना चारदीवारी के घर में, सामान हवा में उड़कर पता नहीं कहाँ पहुँच जाए। वो बच्चों के खाना खा लेने का इंतज़ार कर रही थी। उसने आखिरी कौर बच्चों के मुह में डाला ही था कि तेज़ हवा आँधी में बदल गई। खिड़कियां-दरवाजे भाड़-भाड़ बजने लगे। छोटी सोनू डरकर रोने लगी। माँ समझ नहीं पा रही थी खिड़कियां बंद करे या सोनू को चुप कराए। भोलू भी डर गया और रोने लगा। वो सोनू का हाथ ज़ोर से पकड़े हुये था। माँ बातों से उन्हें दिलासा देती रही, डरने की कोई बात नहीं कहती रही और जल्दी से दरवाजे खिड़कियां बंद करने लगी ताकि और धूल-हवा घर में न घुसे। खिड़कियां बंद करके उसने दोनों बच्चो को गले से लगा लिया और उन्हें कमरे में ले आई। अचानक झमाझम बारिश होने लगी पर हवा भी उसी रफ्तार से चलती रही। तेज़ बिजली कड़की और एक क्षण के लिए दिन की तरह रोशनी हुई। बच्चे डरकर और ज़ोर से रोने लगे। माँ ने उन्हें कसकर अपने साथ चिपका लिया। एक पल के लिए वो खुद भी डरकर कांप गई पर फिरभी बच्चों को लगातार कहती जा रही थी, “बेटा मम्मी है न आपके पास। कुछ नहीं हुआ है। डरने की कोई बात नहीं। बारिश हो रही है। अभी बंद हो जाएगी” । बच्चे कुछ देर के लिए चुप हो गए। उन्हें लगता माँ कहेगी और बारिश बंद हो जाएगी।

 बाहर पड़े सामान के बारे में कुछ करने का उसे समय ही नहीं मिला था। अब तक तो सामान उड़कर कहीं का कहीं पहुँच गया होगा, उसने सोचा। फिर दूसरे पल सोचा, भाड़ में जाए सामान। बच्चों को संभालना ही जरूरी था। तेज़ हवा और बिजली से सहमे बच्चों के लिए माँ कितना बड़ा सहारा थी।  वो बच्चों को देखती रही और सोचती रही। एक बच्चा किस कदर जुड़ा होता है माँ से! उसकी दुनिया माँ से शुरू होती है और माँ पर ख़त्म होती है। भूख, प्यास, नींद हर बात के लिए माँ पर निर्भर ! अचानक माँ को लगा वो कितनी अहम है ! बच्चे अभी भी उसकी गोद में दुबके पड़े थे। बारिश अभी भी उसी तरह हो रही थी। बिजली उसी तरह थोड़ी-थोड़ी देर में चमकती। उसे पति की चिंता भी सता रही थी। कहीं ऐसे तूफान में वे रास्ते में ही तो नहीं फंस गए होंगे? उसने समय देखा। दस बजने वाले थे। कई बार वो ग्यारह- बारह बजे तक घर लौटते। और किसी-किसी रात तो लौटते ही नहीं। वो रातें जागकर ही निकलती। बुरे-बुरे ख्याल मंडराते रहते।

 ख़यालों में डूबी माँ देख नहीं पाई सोनू सो गई थी। उसकी गरदन माँ की बाजू पर ही लुढ़क रही थी। भोलू भी उनींदा लग रहा था। माँ की बाहें दर्द करने लगी। उसके सोनू को बिस्तर पर लेटा दिया और भोलू को सुलाने की कोशिश करने लगी। बारिश थी कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थी ! चिंता में डूबी माँ को भूख महसूस हुई। भूख कई बार लगी पर उसका ध्यान इस ओर जा ही नहीं रहा था। वो दिनभर घर के काम और बच्चों की देखभाल में दौड़ती रहती थी इसलिए बच्चों को खिला कर थोड़ा बहुत खा लेती थी। आज सबकुछ यूँ हुआ वो भूल ही गई। अब भी वो बच्चों को अकेला छोडकर रसोईघर में नहीं जाना चाहती थी। पति की चिंता उसे अंदर अंदर काट रही थी। दफ्तर घर से पंद्रह किलोमीटर दूर था जहाँ पापा साइकल चला के जाते।

भोलू के पापा अक्सर देर से आते। कई बार तो बच्चे इंतज़ार करके सो जाते। माँ को कभी कभी गुस्सा आता, वो पूछती तो जवाब मिलता, यूनियन की मीटिंग थी। यूनियन क्या है भोलू की माँ को ज्यादा समझ में नहीं आता। पापा के कई दोस्त घर पर भी आते जो एक दूसरे को कॉमरेड कहकर बुलाते। माँ इतना समझ पाती थी कि कॉमरेड कहलाने वाले ये लोग किसी यूनियन का हिस्सा हैं और बड़े अफसरों के साथ अक्सर इन लोगों का कुछ न कुछ चलता रहता। पर उसे यह समझ नहीं आता था कि सब कॉमरेड शाम को बैठकर दारू पीकर ही मीटिंग क्यों करते थे?

भोलू के पापा एक सरकारी महकमें में क्लर्क थे। उनकी शादी को आठ साल हो चुके थे। भोलू की माँ के सास-ससुर नहीं थे। भोलू के पापा घर में सबसे छोटे थे। वो केवल आठवीं में पढ़ते थे जब उनके पिता चल बसे। दो साल बाद माँ भी। बड़े भैया और भाभी के साथ रहते हुये वो गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। गाँव में उनका परिवार ज़मींदार के खेतों में काम करके गुज़ारा करता था। भोलू के पापा भी दिन भर खेत में काम करते और रात को दीये की रोशनी में पढ़ाई करते। वो पढ़ाई में अच्छे थे। दसवीं कक्षा उन्होने पहले दर्जे में पास की। उसके बाद और पढ़ा पाना बड़े भैया के बस में नहीं था। उन्होने डाक खाने में नौकरी कर ली। उसी नौकरी के साथ साथ उन्होने आगे की पढ़ाई जारी रखी और बीए भी कर ली। दूसरी तरफ भोलू की माँ को कक्षा पाँच के बाद स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। जब शादी हुई थी तब भोलू के पापा पढ़ ही रहे थे। वो बी.ए. कर चुके थे और एम.ए. राजनीति शास्त्र में करना चाहते थे। उन दिनो उनकी तनख़ाह बहुत कम थी, उन्होने माँ से उनका गहना माँगा और माँ ने दे दिया। उन्होने यूनिवर्सिटी से प्राइवेट पढ़ाई करने के लिए दाखिला भरा, किताबें खरीदीं और पढ़ना शुरू कर दिया। पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। परीक्षा के दिनो में पापा बहुत बीमार पड़ गए और परीक्षा नहीं दे पाये। शायद तभी कुछ टूटा होगा उनके अंदर। उन्होने फिर कभी पढ़ने की नहीं सोची। पापा जो हमेंशा एक जिम्मेदार पिता और पति थे, उन दिनो अजीब से लापरवाह हो गए जीवन के प्रति। उनके दोस्तों का दायरा बढ़ने लगा। वामपंथी विचारधारा के तो वो तब से ही थे जब गाँव में ज़मींदारों के खेतों में काम किया करते थे। गाँव में उन्ही के नेत्रत्व में उनके गाँव में दलितों ने ज़मींदारों के खेतों में बेगार करने से माना किया था। उन लोगों ने ज़मींदारों के घर से मिलने वाला खाना और गेहूँ लेने से इंकार कर दिया और काम के बदले में मजदूरी मांगी थी। यह युवा लोगों का कदम था जिसको बाद में बड़ों का समर्थन मिला। वो पापा ही थे जो सब दलितों को उनके ढ़ोर-डँगरों समेत जिला अधिकारी के दफ्तर के बाहर धरना देने के लिए लेकर गए थे। वे लोग कई दिन तक वहीं बैठे रहे थे और आखिर ज़मींदारों को झुकना पड़ा था।

 पापा को  अब कुछ पाना नहीं था, कुछ खोना नहीं था। उन्होने मित्रों के साथ समय बिताना शुरू किया। यही वो दौर था जब उन्होने पीना शुरू किया। रोज़ शाम को कहीं न कहीं मित्रों का जमघट लगता। कभी यूनियन की मीटिंग के बहाने कभी बिना मीटिंग के भी। वो पापा का एक नया रूप था। हमेंशा बहुत नम्र रहने वाले पापा का उग्र रूप। वे दूसरों के अधिकारों के लिए बड़े अफसरों से लड़ जाते। कभी किसी मृतक साथी की विधवा को नौकरी या पेंशन दिलाने का मामला होता, कभी किसी भ्रष्ट या मनमानी करने वाले बड़े अफसर को ठीक करने का मामला होता। पापा और उनके मित्र भिड़ जाते। इसके बावजूद भी पापा, औरतों और ईमानदार अफसरों के प्रति सम्मान दिखाना नहीं भूलते। पारिवारिक जीवन कहीं पीछे छूट रहा था। देर रात को घर आने का सिलसिला तभी शुरू हुआ। 

उस डरावनी रात के बाद थका-थका सा दिन शुरू हुआ। पापा रात भर घर नहीं आए। माँ कुछ कर भी नहीं सकती थी। ऐसा अक्सर होता था। उस दोपहर में भोलू स्कूल से आया तो उसका बदन बुखार से तप रहा था। उसने खुद ही उसे डॉक्टर के पास ले जाने का फैसला किया। डॉक्टर उसी बस्ती में कोई 2-3 किलोमीटर दूर था। माँ ने सोनू को गोदी उठाया और भोलू की उंगली पकड़ मेन सड़क तक पहुँचने के लिए पैदल चलने लगी। वहाँ से उसने रिक्शा की सवारी ली और डॉक्टर के पास पहुँच गई। डॉक्टर के पास बहुत से मरीज इंतज़ार कर रहे थे। माँ को एक घंटा लगा दवा लेने में और फिर वो रिक्शा पर सवार होकर घर की तरफ चल पड़ी। माँ को आज खुद अपनी सेहत भी ठीक नहीं लग रही थी। सुबह से ही मन घबरा रहा था। ऊपर से अगर किसी भी बच्चे को कुछ बीमारी आती तो वो और घबरा जाती थी। रिक्शा वाले बस्ती के अंदर गली में नहीं छोडते थे। माँ मेन सड़क से पैदल चलकर घर आने लगी। सोनू को उठाकर चलना उसे मुश्किल लगने लगा। उसने सोनू को भी दूसरी हाथ की उंगली पकड़ाई और पैदल चलाना शुरू किया। उसका जी घबराना बढ़ता गया।

अचानक माँ का गला सूखने लगा। उसे तेज़ प्यास महसूस हुई। घर बस पास ही था। वो अपनी गली में ही थी। उसने गली में पापड़ बेचने वाले को साइकल पर पापड़ बेचते देखा। दोनों बच्चे पापड़ खाने की ज़िद्द करने लगे। पापड़ वाला घर के सामने ही खड़ा था । माँ ने अपने आप को संभालते हुए हिम्मत बनाकर रखी यह सोचकर कि अब तो घर पहुँच गई थी। माँ ने अपने बटुए से पचास पैसे का सिक्का निकाल कर पापड़ वाले को दिया, ताकि वो बच्चों को पापड़ दे दे। माँ जल्दी से घर के आँगन में दाखिल हुई । इतने में बच्चों ने पापड़ ले लिए थे और वे पापड़ पकड़े आँगन में माँ के पीछे आ रहे थे। पापड़ वाला चल पड़ा। माँ ने कमरे के दरवाजे खोलने की बजाए आँगन में लगे हैंडपंप की तरफ बढ़ना शुरू किया जो कि कोई दस-बारह कदम की दूरी पर था। माँ ने भरसक कोशिश की कि वो जल्दी से पहुँचकर हैंडपंप से थोड़ा पानी पी ले पर अचानक उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया, सब कुछ काला पड़ता गया और वो बेहोश हो गई।

शायद दस बारह मिनट तक माँ को होश आया। उसकी आँखें अभी भी खुल नहीं रही थीं जैसे कोई गहरी नींद में हो और उठने की कोशिश कर रहा हो। उसे कानों में किरच-किरच की आवाज़ सुनाई दे रही थी। वो इस आवाज़ को समझ नहीं पा रही थी। सिर में भारीपन के साथ भीषण दर्द था। एक बाजू में भी दर्द था। शायद बेहोश होकर वो इसी बाजू के बल गिरी थी। उसने बहुत कोशिश के साथ अपना सिर उठाया और आँखें खोली। किरच किरच की आवाज़ अभी भी आ रही थी। देखा तो दोनों बच्चे उसके पास बैठे पापड़ खा रहे थे। माँ की आँखों से पानी उसी तरह बरस पड़ा जैसे उस काली रात में आसमान दहाड़कर रोया था !

माँ की आँख जब खुली तो दो साल बीत चुके थे। हाँ वह आँख खुलना ही था,  जब माँ को एहसास हुआ उन बेपरवाह दिनों और काली रातों का अंत होना ही चाहिए। इन दो सालों में उसके कानों में वो किरच-किरच की आवाज़ सुनाई देती रही। यह बात अलग है कि वो आवाज़ जीवन भर उसके कानों को याद रही। उन दिनो की गूँज उन लोगों के जीवन से कभी नहीं गई। वे उदासी और अंधेरे से भरे दिन थे। उन सब की स्मृतियों में लगा काला धब्बा ! बच्चे जब भी शाम ढलते गुरद्वारे से आती पाठ की आवाज़ सुनते, उन उदास शामों में जा पहुँचते, जब पिता का इंतज़ार करना उनकी शामों का हिस्सा था।माँ को याद है उन बेपरवाही भरे पागल दिनो में भी पापा, घर और बच्चों के लिए सब कुछ लाकर देते थे। माँ ने कभी सब्जी, राशन नहीं खरीदा। पर यह काफी नहीं था। माँ ने कई बार जानना चाहा आखिर क्या कारण थे पापा के खुद को यूँ शराब में डूबो देने के। कुछ समझ नहीं आता था। जब समझने की सब कोशिशें नाकाम हो जाती तब दोनों में झगड़े होने लगते। बच्चे सहम जाते।
पापा को धीरे-धीरे समझ आने लगा कि यूनियन में ऊपर के औहदे संभाले बैठे लोग ईमानदार नहीं रह गए। उनकी सांठ-गाँठ ऊपर वालों के साथ हो गई थी। उनकी पहुँच राजनीतिक पार्टियों के बड़े राजनेताओं तक बन रही थी। उन्हें भी एकदिन नेता बनना था, बड़ा वाला। बाहर नारे लगाए जाते और अंदर कुछ और चलता। चोरी की कमाई में उनका भी हिस्सा मिलना शुरू हो गया था। यह कुछ ऐसा ही था जैसे कुत्ता चोर के साथ मिल जाए और चोरी के वक्त भौंके ही नहीं। पर पापा हार नहीं माने थे। उन्होने अपनी यूनियन तक नहीं बदली। अपनी यूनियन छोडकर किसी दूसरी यूनियन में नहीं गए। अपनी ही यूनियन में रहकर अपने ही लोगों से लड़ते रहे। उनको गाली देते रहे और यह भी कहते रहे कि ये मत सोचना मैं छोड़ दूंगा यूनियन। आप लोगों के बीच रहके ही आप लोगों के गलत कामों पर सवाल उठाता रहूँगा। उनकी लड़ाई में कमी नहीं आयी थी। पर कहीं कोई अपराधबोध था, जो पल रहा था अंदर ही अंदर।

 उन्हीं दिनों कि बात है। भोलू रोज़ सुबह आँखें खोलता और पता चलता पापा दफ्तर जा चुके हैं या बस जाने के लिए निकल ही रहे हैं। वो निराश हो जाता। कल और जल्दी उठने के बारे में सोचता।एक दिन वो सुबह सुबह सपना देखता है कि पापा दफ्तर जा रहे हैं और आज फिर वो जल्दी जग नहीं पाया। इस सपने के साथ ही उसकी आँख खुल गई। उसने बिस्तर से उठकर तुरंत बाहर जाके देखा। पापा आँगन में खड़े थे। आज वो जल्दी उठ पाया था। उसने तुरंत चप्पल पहनी और बाहर आँगन में निकल आया। पापा उसे देखकर मुस्कुराए। माँ रसोई में खाना पका रही थी। भोलू एक बार माँ के पास रसोई में गया। इतनी देर में उसने देखा पापा दांत वाला ब्रश लेके आँगन में हैंडपंप के पास बैठकर ब्रश करने लगे। वो चुपचाप पापा के पास जाकर खड़ा हो गया। पापा ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। वो वहीं पापा के पास ज़मीन पर बैठ गया। आखिर उसने कहना शुरू किया,
“पापा मैं कई दिन से आपसे बात करना चाह रहा था...”
पापा ने ब्रश करना जारी रखा और कहा, “हाँ बोलो बेटा”
भोलू हल्का सा झिझका। फिर उसने उसी तरह बोलना शुरू किया। उसकी उम्र उस समय छः-सात साल रही होगी। उसकी आवाज़ अभी भी बच्चे की मासूम आवाज़ ही थी,
“पापा मैं आपसे बात करना चाह रहा हूँ कई दिन से... पर आप मुझे बताओ वह कौन सा समय है जब आपसे बात की जा सकती है???”
“......”
“रात में आप देर से आते हैं ...वो भी शराब पीकर। और सुबह आप जल्दी चले जाते हैं दफ्तर के लिए। हम कब आपसे बात करें पापा?”
सवाल अंदर धँस रहा था कहीं गहरे में। पापा अभी भी चुप थे। वे मुँह साफ करके बहुत मुश्किल से बोले,
“क्या पूछना चाहते हो बेटा? पूछो?”
भोलू की छोटी आँखों में गुस्सा था। उसने शायद अंदर के गुस्से को बहुत कोशिश करके, रोकते हुए पूछा था,
“पापा आप शराब क्यों पीते हैं?”

पापा उन सवालों का जवाब दे ही नहीं पाये थे। माँ ने उन्हें बड़ी-बड़ी बहसें करते सुना था, अपने कॉमरेड दोस्तों के बीच बैठे हुए। उस दिन भोलू की वो मासूम शिकायतें, उन बेपरवाह और अंधे दिनों पर भारी पड़ी थीं। पापा ने उस दिन के बाद कभी शराब नहीं पी।

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