यहाँ सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है: बदनाम नहीं, ये मर्दों की गलियाँ हैं

संजीव चंदन
यह समाज की पितृसत्तात्मक संरचना ही है, जो यह सुनिश्चित करता है कि सेक्स और सेक्स की संभावनाएं, दोनो ही बिकती हैं. यह महज संयोग नहीं है कि जब आम आदमी पार्टी के मंत्री संदीप कुमार के तथाकथित सेक्स स्कैंडल ने राजनीति में भूचाल ला दिया है, सोशल मीडिया में यह स्कैंडल तैर रहा है, तभी सोशल मीडिया में ही एक लेखिका और उनके बहाने कई लेखिकाओं की अनिवार्य ‘पुरुष-सम्बद्धता’ बताई जा रही है- एक से अधिक पुरुष मित्रों से दोस्ती का विवरण ‘संभावनाओं के गद्य’ के साथ पेश किया जा रहा है.



सवाल है कि आखिर संदीप कुमार की कहानी में ऐसा क्या है, जो एक राजनेता की ‘अलविदा-पटकथा’ लिखी जा रही है. किसी महिला ने कोई शिकायत नहीं की है, कोई उत्पीडन का प्रसंग नहीं है, कोई जांच भी नहीं कि उस सीडी में दिख रही महिला कौन है. इस पूरे प्रकरण में संदीप कुमार और वह महिला दोनो ही उत्पीडित हैं, न कि उत्पीड़क. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब फेसबुक पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की तस्वीरें किसी महिला के साथ घुमाई जा रही थी, जिसमें वे उसे चूमने की कोशिश कर रहे हैं, वह महिला कोई और नहीं बल्कि उनकी पत्नी थीं- लेकिन तस्वीर पर सनसनी बनाने वाले लोग भाजपा नेता की ऐसी–तैसी कर रहे थे.

संदीप कुमार के मामले की तुलना राजनीति के दूसरे सेक्स स्कैंडल के साथ की जा रही है. सवाल है कि क्या यह तुलना ठीक है, उन स्कैंडलों से जिसमें किसी उत्पीडित महिला ने शिकायत की थी-उत्पीडन या बलात्कार की. इस सीडी की तुलना कांग्रेस के वेटरन नेता नारायण दत्त तिवारी से भी नहीं की जा सकती, जो राजभवन में दो महिलाओं के साथ सेक्स करते हुए देखे गये थे- अभिषेक मनु सिंघवी से भी नहीं, जो एक सार्वजनिक स्थल- लायर्स चैंबर में सेक्स करते हुए देखे गये थे. संदीप के मामले में घटना है, लेकिन कोई पीड़ित पक्ष नहीं. इस घटना की तुलना सिर्फ और सिर्फ पूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम की घटना से की जा सकती है, जिनकी तस्वीरें एक महिला के साथ सार्वजनिक की गई थीं. यह महज संयोग नहीं है कि इन दोनो ही प्रसंगों में राजनेता दलित हैं.

भारत में दलित राजनीति के बडे नाम बाबू जगजीवन राम भारत के पहले दलित प्रधानमंत्री होते अगर उनके बेटे सुरेश राम का नाम सेक्स स्कैंडल में नहीं फंसता। 1977 में जनता पार्टी की लहर में जब इंदिरा गांधी की हार हुई तो जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद के लिए पहली पसंद थे। उसी समय एक पत्रिका में उनके बेटे के कुछ अश्लील तस्वीरें प्रकाशित हुई। जगजीवन राम के 46 साल के बेटे सुरेश राम के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में पढऩे वाली सुषमा चौधरी नाम की 21 साल की लडक़ी की कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें एक पत्रिका में छपी थीं। इस तस्वीर को सार्वजनिक करने में कहा जाता है कि उनकी पार्टी के बाहर-भीतर  के लोग शामिल थे, जो जगजीवन बाबू को प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते थे.



और जैसा कि होता आया है, इस मामले में भी वही हुआ, भारतीय समाज के ‘टॉम पीपिंग’ जमात को एक मसाला मिल गया. वैसा भारतीय समाज, जो अपने किसी क्वांरे प्रधानमंत्री (अटल बिहारी वाजपयी) की इस घोषणा पर संभावनाओं के आनंद से झूम उठता है कि ‘मैं क्वांरा हूँ ब्रह्मचारी नहीं.’ यह वही भारतीय समाज है, जिसके चौपालों पर इंदिरा गांधी का स्त्री होना अलग –अलग रूपों में कहानियों का सृजन करता था. हाँ, इस मर्दवादी समाज में सेक्स बिकता है. अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ, जब इस देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने क़तर की राजकुमारी की काल्पनिक सेक्स कथा (सात मर्दों के साथ सेक्स) का निर्लज्ज प्रकाशन किया. इस काल्पनिक कथा के साथ देश का हिन्दू मर्दवादी जमात अपनी फंतासियों और अपने एजेंडे का एक सुखद संयोग देख रहा था, एक मुस्लिम राजकुमारी की अनियंत्रित कामुकता  की फंतासी. खबर झूठी निकली, तो कुछ संपादकों ने माफी मांग ली और कुछ निर्लज्जता के साथ जमे हुए हैं. भारतीय मीडिया इस ‘टॉम पीपिंग’ समाज का प्रतिनिधि चरित्र है, उसे क़तर के बाद और उससे ज्यादा बिकने वाली सीडी मिल गई है. टीआरपी की तरह हिट्स की भूखी मीडिया घरानों के वेब संस्करणों में खबरों के शीर्षक से एक शोध किया जा सकता है कि इस मर्दवादी समाज में सेक्स कैसे बिकता है.

यह भी गौरतलब है कि आप सोशल मीडिया के ट्रेंड से ही एक सर्वे करें तो देखेंगे कि संदीप कुमार के मामले में नैतिकता की छाती कूटने वाले ज्यादातर मर्द हैं. स्त्रियों के लिए यह ठीक वैसा ही विषय नहीं है, जैसा मर्दों के लिए. सोशल मीडिया के ही एक व्यवहार को देखेंगे तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसी सीडी यदि किसी भाजपा नेता के प्रसंग में आई होती पक्ष –विपक्ष का स्वर पोजीशन के हिसाब से बदला हुआ होता. सच में राजनीति सहित यह पूरा समाज मर्दों की गलियाँ हैं, जहां सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है. रही बात केजरीवाल सरकार की, तो इसे अपने स्टिंग ऑपरेशनों की राजनीति के और भी परिणाम देखने बाकी हैं, वैसे क्या पता इस बार का स्टिंग किसने करवाया- भीतर से या बाहर से.
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