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हिंदी रंगमंच में महिला रंगकर्मियों का योगदान

पूजा कुमारी

सारांश:-

हिंदी रंगमंच में स्त्री रंगकर्मी का आगमन 20वीं सदी के अंतिम चरण में हुआ। ‘देर आई पर दुरुस्त आई’ कहावत महिला रंगकर्मियों को चरित्रार्थ करता है। कला की अभिव्यक्ति में रंगमंच का स्थान उत्कृष्ट माना जाता है। उत्कृष्ट दृश्यात्मक कला प्रस्तुति में महिला रंगकर्मियों के द्वारा नए प्रयोग का लोहा सभी मानते हैं। तथाकथित नेपथ्य में जीवन निर्वाह करती स्त्री, अब रंगमंच पर अपनी कुशल बुद्धि का परिचय दे रही है। शुरुआत में रंगमंच पर महिलाओं का योगदान महज नृत्य, गान और संगीत तक ही सीमित था। समय के बदलते दौर को महिलाओं ने समझा और अपनी प्रतिभा का परिचय देना प्रारंभ किया। पितृसत्तात्मक व्यवस्था की कठपुतली के दायरे से बाहर निकलकर महिलाओं ने स्वयं के लिए नई जमीन तैयार किया। रंगमंच पर अभिनेत्री, नाटककार का सफर तय करते हुए वर्तमान में महिलाएं मंचसज्जा के प्रत्येक घटक निर्देशन, पटकथा लेखन और प्रोडक्शन का निर्वाह कुशलता पूर्वक कर रही है।

बीज शब्द :- रंगमंच, रंगकर्मी, निर्देशिका, मूर्त-अमूर्त, रंगसज्जा।

भूमिका 

दृश्यात्मक कला प्रस्तुति हेतु एक विशेष क्षेत्र या स्थान को रंगमंच कहा जा सकता है। जहां मानव जीवन की गतिविधियों का पुनः क्रियात्मक रूप दिखाता है। वर्तमान में रंगमंच का परिष्कृत रूप हमारे समक्ष मौजूद है। आज इस विशेष स्थान को अनेक प्रकार के तकनीकी सुविधाओं के साथ सजाया जा रहा है। परंतु हम वैसी प्रत्येक स्थान को रंगमंच कह सकते हैं, जहां मानव गतिविधियों को कलात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। परंतु कला की गरिमा बनाए रखने के लिए इसकी सीमा तय की गई है। जिसे नाट्य प्रस्तुति के साथ देखा जा सकता है। जैसा कि हम सभी जानते है। नाटक और रंगमंच के बीच अत्यंत प्रगाढ़ संबंध स्थापित है। कोई भी नाटक रंगमंच पर मंचित हुए बिना अधूरा समझा जाता है। वैसे ही बिना नाटक का रंगमंच अस्तित्वहीन जान पड़ता है। रंगमंच और नाटक के अन्नोन्याश्रित संबंध को इंगित करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं “रंगमंच पर अभिनीत होकर ही नाटक पूर्ण अभिव्यक्ति को प्राप्त हो सकता है। पुस्तकों में वह अंटता नहीं। नाटक का नाम सुनते ही स्वभावत:  स्टेज का स्मरण हो आता है। इसलिए नाटककार और समालोचक दोनों के लिए स्टेज की जानकारी आवश्यक होती है।”¹

यह आलेख हिंदी रंगमंच में महिला रंगकर्मियों के योगदान के बारे में है। जिसे सदैव पुरुष अधिकृत सत्ता ने हाशिये पर रखा है। नाटक और रंगमंच की चली आ रही पुरुषत्व परंपरा को प्रश्नीकृत करती हुई कलविद् महिलाओं ने रंगमंच को विकासोन्मुख बनाया है। बहुमुखी प्रतिभा की धनी महिलाएं उम्दा अभिनेत्री और संवेदनशील नाटककार के साथ-साथ मंच सज्जा का संचालन भी कुशलतापूर्वक किया है। मंच सज्जा के अंतर्गत कलाप्रिय स्त्रियां प्रकाश योजना, ध्वनि योजना, मंच व्यवस्था, वेशभूषा इत्यादि रंगमांचीय तत्वों का सफल निर्वाह कर रही है। नाटक और रंगमंच को सार्थकता प्रदान करने वाला प्रमुख रंगकर्मी में निर्देशक या निर्देशिका होते हैं। सार्थकता की इस कड़ी में महिलाओं की भूमिका और योगदान पर यह शोध आलेख प्रकाश डालता है। अर्थात् निर्देशिका के रूप में मंच सज्जा में प्रस्तुत स्त्रियों की प्रतिभा का विवेचन।

निर्देशन कार्य 

निर्देशन कार्य अमूर्त को मूर्त बनाने का द्योतक है। नाटककार द्वारा प्रस्तुत अमूर्त वस्तु यानी लिखित नाट्य प्रति को मूर्त बनाने का कार्य निर्देशक/निर्देशिका करते हैं। अर्थात अमूर्त नाट्यालेख को रंगालेख में परिवर्तित करना, निर्देशन का प्राथमिक कार्य है। रंगमंच विधान में सबसे क्लिष्ट कार्य निर्देशन का होता है। निर्देशक या निर्देशिका नाटक का प्रगाढ़ अध्ययन करने के बाद रंगमंच के अनुरूप नाटक के शब्दों के भीतर दृश्यबंध, रंगसज्जा, ध्वनि प्रभाव आदि रंगशिल्प के तत्व का संधान करता है। कभी-कभी निर्देशन कार्य में नाटककार द्वारा रचित नाट्यालेख को आवश्यकता अनुसार परिवर्तित भी कर दिता जाता है। यह परिवर्तन का सफल होना दर्शकगण पर निर्भर करता है। नाटक में निहीत मूलभाव का सधारणीकरण निर्देशन कार्य की सफलता का परिचायक है। एक अच्छा निर्देशन कार्य नाटक को प्रसिद्धि प्रदान करा सकता है। ठीक इसके विपरीत खराब निर्देशन कार्य नाटक को प्रतीत बना सकता है। इस बात की पुष्टि डॉक्टर मांधाता ओझा और डॉ शशि सरदारनी ने किया है “निर्देशक नाटक की प्रस्तुति के लिए अपेक्षित रंगमंच के विभिन्न अवयवों का संघटक ही नहीं है अपितु सहृदय रूप से नाटक के आवेदन की अनुभूति भी करता है। इसलिए वह प्रस्तुतीकरण को जीवंत बना सकता है।”²

महिलाओं का निर्देशन कार्य 

हिंदी रंगमंच में स्त्रियों की स्थिति बदलती रही है। स्त्रियों के योगदान से यह मंच कभी अछूता नहीं रहा है। रंगमंच का एक काल ऐसा था, जब स्त्रियां प्रत्यक्ष रूप से रंगमंच पर मौजूद नहीं थी। परंतु अप्रत्यक्ष रूप से स्त्रियां हमेशा रंगमंच पर रही।(स्त्री वेशभूषा में पुरुष कलाकार)। समय बदलता गया और रंगमंच पर स्त्रियां प्रत्यक्ष रूप से नजर आने लगी। अभिनेत्री, नाटककार की सफल भूमिका के  बाद महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन निर्देशन कार्यों में भी सफलतापूर्वक दे रही हैं। महिलाओं के सफल सृजनात्मक हस्तक्षेप को इंगित करते हुए अपर्णा वेणु ने लिखा है। “किसी भी नाट्य प्रस्तुति के मूलभूत तीन प्रमुख तत्व होते हैं— अंतर्वस्तु, रूप संरचना एवं दर्शकीय अनुभूति। इन तीनों तत्वों के परिपेक्ष में स्त्री पक्षीय रंगकर्म पर विचार किया जाए तो जरूर कहा जा सकता है कि महिला रंगकर्मियों ने भारतीय रंगमंच के परिदृश्य को ज्यादा व्यापक, संवेदनशील और मानवीय बनाया है।”³ हिंदी रंगजगत में निर्देशन कार्य में पहली नारी शांता गांधी है। लोकनाट्य परंपरा में इनका निर्देशन कार्य प्रारंभ हुआ। हालांकि इन्होंने रंगमंच में अपनी शुरुआत नृत्य कार्य से किया था। परंतु रंगमंच की दुनिया को समझते जानते हुए इन्होंने निर्देशन कार्य का भी श्री गणेश किया। लोकरंग मंच पर शांता गांधी का निर्देशन नवीन अनुभूति का साक्षात्कार करता है। भवई शैली में ‘जसमा ओडन’ नौटंकी शैली में ‘अमर सिंह राठौर’ की प्रस्तुति इनके कार्यों की प्रतिष्ठा रंग जगत के लिए विस्मरणीय है। शांता गांधी का यह प्रयास आधुनिक हिंदी रंगमंच में लोक शैलियों की संभावनाओं के नए आयाम प्रस्तुत किए। जिससे आगे आने वाले रंगकर्मी काफी प्रभावित हुए। इन्होंने लोकनाट्य में निर्देशन कार्य कर, रंगमंच में महिलाओं के लिए एक नया राह प्रशस्त की हैं। हालांकि बाद में इन्होंने संस्कृत नाटक ‘स्वप्नवासवदत्ता’, ‘मध्यम वियोग’, ‘भगवद्ज्जुकम्’ इत्यादि नाटकों की प्रस्तुति में निर्देशन कौशल दिखाया। आधुनिक हिंदी रंगमंच पर सशक्त निर्देशिका के रूप में पहला नाम उषा गांगुली का लिया जाता है। प्रतिभाशाली उषा गांगुली अच्छी अभिनेत्री, नाटककार, रूपांतरकार रही हैं। परंतु उनकी प्रसिद्धि रंगमंच पर विशेषतः निर्देशिका के रूप में हुआ। इनके द्वारा निर्देशित पहला नाटक मन्नू भंडारी कृत ‘महाभोज’ है। इन्होंने लगभग 25-30 पात्रों को मंच पर अत्यंत सहजता से प्रस्तुत किया है। उनके निर्देशन में अधिक पात्रों द्वारा मंचित यह नाटक अपनी मूल संवेदनाओं की सटीक प्रस्तुति किया। तत्पश्चात नाटक ‘रूदाली’ का निर्देशन, इनकी निर्देशकीय क्षमता को रंगजगत में प्रतिष्ठित किया। उषा गांगुली के निर्देशन में महाश्वेता देवी की कहानी पर आधारित ‘रुदाली’ (1993) नाटक रंगमंच पर मंचित हुआ। यहां जीवन संघर्षों एवं अनुभवों का स्त्रीवादी दृष्टि से अभिव्यक्त किया गया है।नाटक का नवीन विषय-वस्तु और मानव जीवन की विषमताओं का मार्मिक चित्रण प्रेक्षकों को अपनी ओर आकृष्ट किया। उषा गांगुली ने पर पीड़ा पर दुखित होने या रोने की विवशता को नितांत मर्मस्पर्शी तरीके से प्रस्तुत किया। जीवन की इस घटना का अत्यंत जीवंत प्रस्तुति दर्शकों के मानस पटल पर अमिट छाप छोड़ा। नाटक में प्रस्तुत स्त्री पात्र सनिचरी अपने आत्मसम्मान के लिए समाज के ठेकेदारों से लड़ती है। नारी जीवन विभीषिका की प्रस्तुति उषा जी ने किया है। पूरे नाटक के जरिए उषा जी दो बातों को दर्शकों के सम्मुख स्पष्ट करती है। पहली, स्त्री की सुरक्षा पुरुष के हाथों में नहीं है और दूसरी, स्त्री चाहे इस सामाजिक व्यवस्था में गरीब हो या अमीर हमेशा यौन संबंध के लिए उपयुक्त केवल वस्तु होती है। ऐसे अनुठे विषय वस्तु की प्रस्तुति एवं उषा गांगुली का निर्देशन कार्य ही इन्हें रंगमंच की सशक्त निर्देशिका के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उषा गांगुली की समसामायिक निर्देशिका गिरीश रस्तोगी का योगदान रंगजगत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अपनी बहुमुखी प्रतिभा से इन्होंने रंगजगत को समृद्ध और संपन्न बनाया है। इन्होंने ‘ध्रुवस्वामिनी’ और ‘नहुष’ नाटक की प्रस्तुति का निर्देशन किया है। इन्होंने स्त्रीत्व पक्षीय भावों का प्रदर्शन कर प्रेक्षकों को स्त्री संवेदना से जोड़ने का सफल प्रयास किया है। इन दो नाटकों की प्रस्तुति भी स्त्री संवेदनाओं, समस्याओं, जटिलताओं आदि को प्रस्तुत करती है। निर्देशन कार्य के दौरान इन्होंने ध्रुवस्वामिनी के चारित्रिक गुणवत्ता को मंच पर पूरे सटीकता से प्रस्तुत किया हैं। ध्रुवस्वामिनी एक सशक्त स्त्री के रूप में नाटक में मौजूद है, जो अपने इच्छाओं और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करती है। ध्रुवस्वामिनी के माध्यम से भारतीय महिलावर्ग को सजग करने की चेष्टा किया है। कमजोर और डब्बू राजा राम गुप्त को त्याग कर साहसी योद्धा चंद्रगुप्त को अपने पति के रूप में स्वीकार करती है प्रस्तुतीकरण का सही तरीका ध्रुवस्वामिनी को समझ में अच्छी स्त्री के रूप में स्थापित करता है। क्योंकि भारतीय समाज में महिलाओं को स्वयं के लिए सुयोग्य वर जुड़ने की स्वतंत्रता  नहीं थी। गिरीश रस्तोगी का निर्देशन कार्य महिलाओं को स्वयं के लिए सही चुनाव का राह दिखाता है। आधुनिक नारियों की समस्या के संदर्भ में उनकी प्रस्तुति नाटक का मूल भाव ‘ऐतिहासिक प्रसंग’ को भी सुरक्षित रखता है। यह प्रस्तुति सशक्त महिला ध्रुवस्वामिनी के रूप में वर्तमान नारियों के लिए एक संदेश छोड़ता है। महिलाएं स्वतंत्र भाव से अपने निजी जीवन से जुड़ी हरेक संदर्भ का सही चुनाव करें। है। इन्होंने महिला नाट्य लेखन और रंगकर्मी होने के विषय में लिखा- “निश्चय ही यहां महिला-व्यक्तित्व, उसकी शारीरिक-मानसिक, बौद्धिक संरचना को, स्त्री संवेदना को भी समझ कर चलना, उसके ‘निजीपन’ के अहसास और ‘सृजन’ के नित नए रास्ते निकालने की कोशिश और क्षमता को सामाजिक ‘सामाजिक संघर्ष’ को समझकर चलना होगा, वहीं स्त्री-सृजन कर्म है। विविधताओं में संतुलन-क्षमता पुरुष की अपेक्षा, स्त्री में ज्यादा होती है और बेहद सूक्ष्म स्तर पर। वह घर, समाज, परिवार, बाहर संबंधों और अंतर्बाह्य द्वंदों से, कला-प्रयोजन के प्रश्नों से टकराती है।”⁴  रस्तोगी जी को स्त्री संवेदनाओं और मानवीय संवेदनाओं की अच्छी समझ थी। जिस कारण वह प्रेक्षकों के समक्ष स्त्री पक्षीय विचारों को व्यक्त करने में सफल हुई। अच्छी निर्देशिका के रूप में दर्शक वर्ग तक संवेदनाओं और समस्याओं को किस तरीके से परोसा जाए, उसकी अच्छी समझ थी। एक निर्देशिका के रूप में दर्शक वर्ग को आकर्षित करने हेतु मंच पर कब, कैसे और कहां चीजों को प्रस्तुत किया जाए वह बखूबी जानती थी। जिससे पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को उठाया जा सके। गिरीश रस्तोगी एक प्रयोगवादी निर्देशिका सिद्ध हुई है। इन्होंने अद्वितीय नाटकालेख ‘कितना कुछ एक साथ’ भी तैयार किया। जिसमें मोहन राकेश के तीनों नाटक  की प्रमुख स्त्री पात्र मल्लिका, सुंदरी और सावित्री के पक्ष में बाते कही गई हैं।

रंगमंच को समृद्ध करने की इस कड़ी में कई महिला रंगकर्मियों ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। नाटक को निर्देशित कर नाटक के मूल विषय-वस्तु को प्राणवान बनाने का कार्य महिलाओं ने किया है। जिसमें से प्रमुख नाम है:-कीर्ति जैन (और कितने टुकड़े), रसिक अगाशो(म्यूजियम का स्पीशीज इन डेंजर), बी जयश्री (अग्निपथ), सुरभि (घोरराक्षस), सुषमा देशपांडे (व्हय मि सावित्रीवाई), अनुराधा कपूर (जीवित या मृत), त्रिपुरारी शर्मा (बहू), नादिरा जाहीर बब्बर (सकुबाई) इत्यादि। संवेदनशील निर्देशिकाओं के रूप में इन सभी ने स्त्री जीवन से संबंधित नाटकों का मंचन करवाया है। साथ ही भारतीय रंग परंपरा में चली आ रही पुरुषवादी व्यवस्था को भी तोड़ा है। रंग परंपरा को नया आयाम दिलाने हेतु महिलाओं ने वर्जित दृश्यों का भी मंचन करवाया। वर्जित दृश्यों की परिपाटी में अधिकांशतः महिला समस्याओं की प्रस्तुति में बाधा पहुंचती थी। उदाहरणस्वरूप मृत्यु, उच्च स्वर में आवाहन करना, रक्तपात, दांत काटना, यौनिकता संबंधित मार्मिक दृश्यों का चित्रण आदि शामिल है। निर्देशिकाओं ने वर्जित दृश्यों की दीवार गिराकर स्त्री जीवन से जुड़ी समस्याओं की प्रस्तुति खुले तौर पर किया। इन्होंने ऐसे ऐसे नाटकों का मंचन करवाया जिसके केंद्र में स्त्री समस्याएं उपलब्ध थी। साथ ही जन चेतना को सजग करने और स्त्रियों के प्रति सहानुभूति और सच्ची संवेदना प्रकट करने का प्रयास निरंतर करती रहीं। स्त्री जीवन की त्रासदी को रेखांकित करते हुए निर्देशिकाओं ने मंच पर उन समस्याओं से निजात पाने की राह भी प्रशस्त किया। भारतीय समाज में स्त्रियों को सही स्थान दिलाने हेतु रंगमंच पर स्त्री विमर्श की शुरुआत इन निर्देशिकाओं के जरिए प्रारंभ हुआ। इस प्रयोजन के बारे में रवि चतुर्वेदी ने लिखा है- “21 सदी महिलाओं के बहुआयामी उभार, जागरूकता और दावेदारी की सदी है। आदिवासियों, दलितों, स्त्रियों और वंचितों की धमक से यह सदी उद्वेलित है और समाज, राजनीति व कला सहित जीवन का कोई भी क्षेत्र इस उभार से अछूता नहीं रह गया है। रंगमंच और नाटकों में भी इस महिला विमर्श का धमक को साफ तौर पर महसूसा जा सकता है।”⁵

इस कड़ी में 2024की सशक्त निर्देशिका प्रो रमा यादव के द्वारा किया गया प्रयोग रंगमंचीय दुनिया में ऐतिहासिक पहल सिद्ध होता हुआ नजर आया है। इन्होंने मोहन राकेश के तीन नाटको को मिश्रित कर एक अनूठा रंग-प्रयोग किया। रमा यादव दिल्ली विश्वविद्यालय के मेरिंडा हाउस कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका हैं। प्राध्यापन के साथ इन्होंने नाटक निर्देशन कार्य भी कर रहीं हैं।गिरीश रस्तोगी ने एक नाट्यालेख तैयार किया था। उसी संदर्भ में रंगालेख की प्रस्तुति प्रो रमा यादव ने किया है।

मोहन राकेश आधुनिक हिन्दी रंगमंच के सुप्रसिद्ध नाटककार हैं l उन्होंने तीन नाटक लिखे – ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ और ‘आधे-अधूरे’ l यूँ उनका एक अपूर्ण नाटक ‘पैर तले की जमीन’ भी था। जिसे राकेश के मरणोपरांत कमलेश्वर ने पूरा किया, किन्तु वह अपनी कोई ख़ास पहचान बना नहीं पाया l अपने सशक्त कथ्य और शिल्प के बूते राकेश के तीनों नाटक रंगकर्मियों को गाहे-बगाहे आकर्षित करते रहते हैं l इसी आकर्षण का ताजा उदाहरण है, रमा यादव के निर्देशन में हुई प्रस्तुति ‘मोहन राकेश के तीन नाटक’ l यह प्रस्तुति अपने-आप में अनूठी इसलिए थी कि इसमें राकेश के तीनों नाटकों के चुनिन्दा अंशों के साथ उनके ‘विजन’ को दर्शाने की कोशिश की गयी l प्रस्तुति गत 23 सितम्बर 2024 को मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर के प्रेक्षागृह में हुई l

मोहन राकेश आज़ाद हिन्दुस्तान की उस हवा में नाट्य-लेखन शुरू करते हैं जिसमें सम्बन्धों में तेजी से बदलाव हो रहा था l आत्ममुग्धता बढ़ रही थी, विज्ञान-तकनीक के अविष्कार, औद्योगिकीकरण, टूटते संयुक्त परिवार, गाँव से शहर की ओर पलायन – सब मिलकर इंसान के स्वभाव को बदल रहे थे l संवेदना कुछेक खण्डित अनुभूतियों में तब्दील हो रही थी जिन्हें अभिव्यक्त करने के लिए साहित्य में ‘द्वन्द्व’, ‘तनाव’, ‘अजनबीपन’, ‘असंतोष’, ‘उलझन’ जैसे शब्दों का आगमन हुआ l मोहन राकेश समकालीन जीवन और हिन्दी के रंग-परिदृश्य – दोनों की ही चुनौतियों और समस्याओं से अच्छी तरह परिचित थे l उनके तीनों नाटक नये परिवेश से उपजी नयी और खण्डित अनुभूतियों को सम्पूर्णता में व्यक्त करने का सफल प्रयास करते हैं l

‘द्वन्द्व’ राकेश के नाटकों की केन्द्रीय विशेषता है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ कलाकार और राजसत्ता के साथ भावना और यथार्थ का द्वन्द्व दिखलाता है l ‘लहरों के राजहंस’ में आध्यात्म और भौतिक सुख का द्वन्द्व और चयन न कर पाने की दुविधा है तो ‘आधे-अधूरे’ में आधुनिक महानगरीय परिवार के सदस्यों में तल्ख़ और कटु सम्बन्धों से उपजा तनाव है l ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘लहरों के राजहंस’ का देश-काल भले ही कालिदास और महात्मा बुद्ध से जुड़ा हो लेकिन इन दोनों ही नाटकों का कथ्य आधुनिक मनुष्य के मानसिक संघर्ष और दुविधा से भी जुड़ा है l कारण और परिस्थितियाँ अलग-अलग होने पर भी ‘द्वन्द्व’ आधुनिक मनुष्य के जीवन की नियति बन चुका है l रमा यादव के निर्देशन में हुई प्रस्तुति तीनों नाटकों में निहित इसी विविध-आयामी द्वन्द्व को पकड़ने की कोशिश करती दिखी l प्रस्तुति की शुरुआत ‘आधे-अधूरे’ की शुरुआत में ‘काले सूट वाले आदमी’ के वक्तव्य से हुई जो जीवन की ‘अनिश्चितता’ को रेखांकित करने वाली थी l ‘आधे-अधूरे’ के दृश्यों के लिए आधुनिक घर के ड्राइंग रूम के सेट का प्रयोग किया गया जो कमोबेश मोहन राकेश के रंग-निर्देशानुसार ही था l ‘आषाढ़ का एक दिन’ और लहरों के राजहंस’ के दृश्यों का परिवेश निर्माण छुट-पुट रंग-सामग्री के साथ रिकार्डिड ध्वनि से हुआ जिसमें क्रमशः मेघ गर्जन व वर्षा और ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ काफ़ी प्रभावशाली रहे l मल्लिका, सावित्री, महेन्द्रनाथ, बिन्नी की भूमिकाएँ एक से अधिक अभिनेता-अभिनेत्रियों ने की l चरित्र की उम्र और स्वभाव में आये बदलाव के अनुरूप यह रंग-युक्ति संतुलित और उपयुक्त रही l मल्लिका के ‘भावना में भावना का वरण’, कालिदास को उज्जैनी भेजने के आग्रह, सुन्दरी द्वारा कामोत्सव का आयोजन, नन्द में अदम्य सुन्दरी-पत्नी और गौतम बुद्ध के प्रति खिंचाव से उपजे द्वन्द्व, सावित्री के घर छोड़ने का निश्चय, महेन्द्रनाथ और अशोक के साथ हुई बहस, बिन्नी द्वारा उस ‘चीज’ को ढूँढने की व्यर्थ कोशिश वाले दृश्य असरदार बन पड़े l दृश्य नाटकों के अनुसार क्रमवार न होकर आपस में गुंथे-मिले थे l सारा कार्य-व्यापार, गतियाँ, मुद्राएँ, वेशभूषा, प्रकाश आदि ‘द्वंद्व’ को ही घनीभूत करते दिखे l मोहन राकेश अपने नाटकों में सुचिंतित रंग-निर्देशों के लिए भी जाने जाते हैं l इस प्रस्तुति में ‘आधे-अधूरे’ के कुछ रंग-निर्देशों का वाचन करने के साथ उन्हें हरकत की भाषा में तब्दील किया गया l राकेश ने रंगभाषा पर चिंतन करते समय उपयुक्त शब्द के चयन के साथ ही प्रदर्शन में उच्चारण की लय पर काफी बल दिया है, जो अभिनय करने वाले कलाकार के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण है। इस प्रस्तुति में कई कलाकार इस चुनौती से जूझते दिखे l डॉ राम यादव के प्रयोगशीलता ने रंगमंच को एक नई जमीन प्रदान की है। 

निष्कर्ष

हिंदी रंगमंच पर स्त्रियों की भूमिका उच्चतम श्रेणी की मानी गई है। रंगकर्मी के रूप में महिलाओं ने रूढ सामाजिक व्यवस्था से संघर्ष करती हुई स्वयं को रंगमंच पर स्थापित करने का कार्य किया है। स्त्री-पुरुष की जटिल समीकरण रंगकर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्त्रियां इस समीकरण की बंदिशों को लांगती हुई अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही है। रंगकर्म के नित्य नए प्रयोग में महिलाओं का स्थान शीर्ष पर है। निर्देशिकाओं का सफलतापूर्वक नवीन रंग प्रयोग का आयोजन वर्तमान में रंगमंच को समृद्ध बना रहा है। निर्देशिकाओं ने अपने कर्मयोग से रंगमंच को अपनी अलग पहचान बनाती हुई नजर आ रही है। वे न सिर्फ स्त्रियों से संबंधित मुद्दों को प्रस्तुत करती हैं, बल्कि समाज में व्याप्त हरेक छोटे-बड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर पूरे मानव समाज को अच्छे से जीवन जीने की संदेश देती है। साथ ही उनमें नई संभावनाओं की तलाश में दर्शकों के लिए उचित स्पेस भी छोड़ रही हैं। अपनी प्रयोगधर्मिता से महिलाओं ने भारतीय रंगमंच को समृद्ध करने के साथ इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में भी सफलता हासिल की है। हिंदी रंगमंच में महिला रंगकर्मी का कार्य रंगमंच को अधिक मजबूत और प्रभावोत्पादक बना रही हैं।

संदर्भ ग्रंथ

1) द्विवेदी, हजारी प्रसाद- हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1952, पृष्ठ संख्या 154

2) ओझा, डॉ मांधाता, सरदाना डॉ शशि-नाटक नाटक चिंतन और रंग प्रयोग, कला मंदिर, नई सड़क, दिल्ली 2003, पृष्ठ संख्या 9

3) वेणु, अपर्णा-भारतीय रंग मंच की महिला परंपरा, लोक भारती प्रकाशन, 1-बी,नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2023, पृष्ठ संख्या 96

पूजा कुमारी (शोधार्थी) 

 हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय 

poojadasskpskp@gmail.com

मुस्लिम महिलाओं के अधिकार, इस्लामी कानून, परंपराएँ और सामाजिक सुधार 

अहमद अली

शोध सार – इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। और इन अधिकारों को धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट रूप से सम्मानित किया गया है। इस्लामी कानून (शरीयत) के तहत महिलाओं को विवाह तलाक विरासत शिक्षा और पारिवारिक जीवन में समान अधिकार प्राप्त हैं। इस्लाम महिलाओं को उनके चयन के अनुसार विवाह करने तलाक के मामलों में सुरक्षा प्राप्त करने और पारिवारिक निर्णयों में स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। विशेष रूप से तलाक की प्रक्रिया में महिलाओं को कुछ अधिकार प्राप्त हैं। जैसे कि “खुला” के माध्यम से महिलाएं अपने पति से तलाक प्राप्त कर सकती हैं। “हलाला” जैसी प्रथाएँ इस्लाम में आलोचना का विषय रही हैं। और इन पर कानूनी कदम उठाए गए हैं। महिलाओं को शिक्षा का अधिकार भी प्रदान किया गया है। जिसे इस्लामी समाज में अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि समाज में पारंपरिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ कभी-कभी महिलाओं के अधिकारों के रास्ते में बाधाएं उत्पन्न करती हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में कानून और सामाजिक सुधारों ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को सुदृढ़ करने में मदद की है। विशेष रूप से विभिन्न मुस्लिम देशों ने तलाक तीन तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं को समाप्त करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जो इस्लामी पारिवारिक कानूनों के पालन और प्रचार का कार्य करता है इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बोर्ड मुस्लिम समुदाय के बीच शरीयत के नियमों के पालन को सुनिश्चित करने की कोशिश करता है। हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर समय-समय पर आलोचनाएँ भी उठती रही हैं। क्योंकि यह कुछ प्रथाओं को बदलने या समाप्त करने में अनिच्छुक दिखाई देता है जो महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित करती हैं। इस्लाम महिलाओं के अधिकारों में समानता और सम्मान का समर्थन करता है लेकिन समाज में सुधार की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है। विशेष रूप से पारिवारिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को चुनौती देने शिक्षा के अवसर बढ़ाने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए अधिक कानूनी और सामाजिक प्रयासों की आवश्यकता है। इस्लाम महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करता है लेकिन समाज में सुधार और जागरूकता की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है ताकि महिलाएं अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों का पूर्ण रूप से लाभ उठा सकें।

बीज शब्द :विरासत, साहित्,  इतिहास, संस्कृति, तलाक ,हलाला,  परंपरा,खुला  सुधार, मानवाधिकार, सांस्कृतिक, मान्यताएँ 

मूल आलेख : मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर शरीयत (इस्लामी कानून) में कई पहलू हैं । ये अधिकार उनकी  समाजिक स्थिति विवाह तलाक, विरासत और पारिवारिक  संबंधों के संदर्भ में विभिन्न हो सकते हैं । कुछ मुख्य अधिकारो  जैसे विवाह और तलाक शरीयत में महिलाओं को अपने चयन से विवाह करने का अधिकार होता है। वे विवाह की शर्तों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती हैं । तलाक के मामले में भी उन्हें कुछ सुरक्षा और अधिकार प्राप्त हैं। इतना ही नहीं शरीयत में महिलाओं को विरासत का अधिकार भी मिला हुआ है। जिसके तहत उन्हें उनके परिवार की  संपत्ति में हिस्सा मिल सकता है । मुस्लिम महिलाओं के विवाह और तलाक से जुड़े अधिकार मुख्य रूप से मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से तय होते है।

पारिवारिक जीवन में भी जैसे शरीयत में महिलाओं को अपने परिवार के संबंधों को सम्भालने का अधिकार दिया गया है। जिसमें उनकी संतानों के पालन-पोषण शिक्षा आदि शामिल है। कई मुस्लिम देशों में महिलाओं को शिक्षा और काम करने का अधिकार है। जो शरीयत के मानकों और स्थानीय कानूनों के अनुसार अनुकूल होता है। यहां यह भी ध्यान देना चाहिए की अलग-अलग मुस्लिम समुदायों और देशों में शरीयत के अलग अलग रूप हो सकते हैं जिससे अधिकारों में भिन्नताएँ भी हो सकती हैं। जैसे तीन तलाक विशेषतः इस्लामी शारीयत के माध्यम से अधिकार किए जाते हैं । इस प्रकार की तलाक के प्रवृत्ति को विभिन्न इस्लामी देशों और समुदायों में अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा गया है। कुछ देशों ने तीन तलाक को कानूनी रूप से मान्यता दी है जबकि कुछ ने इसे प्रतिबंधित किया है। यह देशों और समुदायों के कानूनी प्रणाली धार्मिक मान्यताओं और समाजिक संदर्भों पर निर्भर करती है। भारत में 2019 में पारित हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ एक्ट के तहत तीन तलाक प्रतिबंधित किया गया है। इसके अनुसार तलाक देने के लिए अब मुस्लिम पुरुष को कोर्ट के पास जाना होता है। पाकिस्तान में 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को गैर-कानूनी ठहराया था। बांग्लादेश में 2017 में तीन तलाक को अवैध घोषित किया गया है। मलेशिया में तीन तलाक को गैर-कानूनी ठहराया गया है और वहां पर इसे प्रयोग में लाने पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाती है। इंडोनेशिया में तलाक तीन बार देने की प्रथा है लेकिन यहां पर भी कई कानूनी और सामाजिक प्रतिबंध हैं। इसी प्रकार शरीयत मे महिलाओं को शादी के लिए भी विशेष अधिकार दिए है जिसमे लड़की की पसंद भी शामिल है अगर लड़की अपनी पसंद से निकाह करना चाहती है तो उसके लिए शरीयत ने मंजूरी दी है। और परिवार वाले जहा भी अपनी लड़की के लिए लड़का देखे तो उन्हे चाहिए की वो पहले अपनी लड़की से उसकी पसंद जान ले या उस्से रिश्ते के बारे मे बात करे । हदीस मे मशवरा करना सुन्नत बताया गया है। पेगम्बर हजरत मोहम्मद (स.अ.) ने अपनी बेटी हजरत फातिमा (र.त.) का निकाह जब हजरत अली से करना चाहा तो पहले अपनी बेटी से उसकी पसंद जानी की उन्हे ये रिश्ता कुबूल है या नही। यही से पता चलता है अपनी बेटियों से उनकी मर्जी के बगेर शादी तय करना सुन्नते रसूल के खिलाफ है ।

इसी लिए निकाह के वक्त लड़का लड़की की मंजूरी जरूरी होती है जब तक दोनों निकाह के समय  गवाहों के सामने तीन बार कुबूल है नहीं बोलते तब तक निकाह नहीं होता है। इस्लाम  इस बात का स्पष्ट प्रमाण देता है कि ईश्वर की दृष्टि में महिला अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के मामले में पूरी तरह से पुरुष के बराबर है। इस्लाम  में कहा गया है “हर आत्मा अपने कर्मों के लिए बंधक होगी” अतः उनके रब ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली कहामैं तुममें से किसी के काम को व्यर्थ नहीं जाने दूँगा चाहे वह पुरुष हो या महिला तुम एक दूसरे से उत्पन्न हुए हो जो कोई भी नेक काम करेगा चाहे वह पुरुष हो या महिला और ईमान लाएगा उसे हम एक नया जीवन देंगे जो अच्छा और शुद्ध होगा और हम ऐसे लोगों को उनके कार्यों के अनुसार पुरस्कार प्रदान करेंगे ।

धर्मिक शिक्षा और समाज मे मुस्लिम महिलाओं के लिए उपलब्ध धर्मिक शिक्षा और समझ महत्वपूर्ण है। यह उन्हें अपने धर्म के नियम मान्यताओं और महत्वपूर्ण सिद्धांतों को समझने और उन्हें अपने जीवन में अनुसरण करने में मदद करती है। हदीस (सहीह बुखारी) महिलाएं पुरुषों से कम नहीं हैं वे हमारे समाज का अहम हिस्सा हैं।

मुस्लिम महिलाओं की स्थिति और परंपरागत समाजिक संरचना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रभाव डाल सकती है। विभिन्न समाजों और संदर्भों में धार्मिक स्वतंत्रता के संदर्भ में विभिन्न मान्यताएं और अनुसंधान की आवश्यकता होती है। धार्मिक स्वतंत्रता का अनुसरण करते हुए महिलाओं को अपनी स्थानीय और व्यक्तिगत परंपराओं संस्कारों और प्रथाओं के अनुसार अपने धार्मिक कार्यों को निष्क्रिय या सक्रिय रूप से निष्पादित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता का व्यापक समर्थन महत्वपूर्ण है। समाज और सामाजिक संगठनों की भूमिका यहाँ महत्वपूर्ण है जो महिलाओं को उनके धार्मिक अधिकारों के प्रति जागरूक करते हैं और उन्हें समर्थन प्रदान करते हैं। इन पहलुओं को मिलाकर मुस्लिम महिलाओं की धार्मिक स्वतंत्रता के विभिन्न आयामों को समझाना और समर्थन करना आवश्यक है ताकि वे अपने धार्मिक और व्यक्तिगत जीवन को समृद्ध और सामंजस्यपूर्ण बना सकें। और कुछ एसे कानून जिनपर खुलकर कभी बात नहीं हुई या समाज मे इन विषयों पर केवल ज्यादा चर्चा नहीं हुई। इस्लामी में मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा का अधिकार बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस्लामी कानून में शिक्षा के अधिकार को व्यापक रूप से समर्थन दिया गया है और इसे धार्मिक दायरे में एक महत्वपूर्ण अधिकार माना गया है। हदीस (सहीह मुस्लिम) “हर मुसलमान पुरुष और महिला पर ज्ञान प्राप्त करना फर्ज है।”

इस्लामी कानून के अनुसार महिलाओं को शिक्षा की प्राप्ति का पूरा अधिकार है। यहां तक कि इस्लामी शरीयत में शिक्षा को बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक माना गया है जो एक व्यक्ति के धार्मिक सामाजिक और व्यक्तिगत विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। कुरान और हदीस शरीफ में भी महिलाओं को शिक्षा के अधिकार की प्रतिष्ठा दी गई है। इस्लामी कानून के तहत हर मुस्लिम महिला को शिक्षा के लिए पूरी तरह से समर्थित किया जाता है और उन्हें इस अधिकार का पालन करने की स्वतंत्रता दी जाती है । इस्लामी कानून के अंतर्गत महिलाओं को शिक्षा के समान अधिकार के लिए जागरूक किया जाता है और उन्हें इसे प्राप्त करने के लिए सही माध्यमों की प्राप्ति के लिए प्रोत्साहित किया जाता है । इसके अलावा इस्लामी समाजों में शिक्षा के लिए महिलाओं की पहुंच को बढ़ाने के लिए कई प्रमोटिंग और एजुकेशनल इनीशिएटिव्स हैं।हदीस (सहीह मुस्लिम) “ज्ञान प्राप्त करना हर मुसलमान पर फर्ज है, चाहे वह पुरुष हो या महिला।”

खुला शरीयत मे इसे महिलाओं को तलाक के लिए दिया गया एक कानून है जिसके अंतरगत कोई भी मुस्लिम महिला जो शादीशुदा हो और अपने शौहर से ना खुश हो और उस्से अलग होना चाहती है तो वह अपने शौहर से खुला की मांग कर सकती है। महिला को खुला की मांग करने के लिए कारण बताने की आवश्यकता होती है। जैसे कि विवाह में असहमति दुराचार या किसी भी अन्य कारण जो उसे अपने पति के साथ रहने में कठिनाई पैदा करता है।  खुला की प्रक्रिया में महिला को अपनी सहमति से अपने पति से तलाक लेना होता है। यह उसकी स्वेच्छा और समझदारी से किया जाता है खुला की प्रक्रिया में महिला को अपने पति को वह धन या संपत्ति लौटानी पड़ती है जो उसने निकाह के समय (महर) के रूप में प्राप्त की थी । यह एक शर्त है ताकि पुरुष को कोई नुकसान न हो। कई मामलों में खुला की प्रक्रिया को शरई अदालत या धार्मिक प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है जहां अदालत महिला के कारणों की जांच करती है और फैसला सुनाती है । खुला के बाद महिला को एक निर्दिष्ट अवधि (इद्दत) का पालन करना पड़ता है जो आमतौर पर तीन मासिक धर्म चक्र होती है। इस अवधि के दौरान वह किसी अन्य पुरुष से विवाह नहीं कर सकती।हदीस (सहीह मुस्लिम) “फातिमा बिन्त क़ैस ने नबी (स.अ.व.) के पास जाकर शिकायत की कि उसका पति उसे तलाक देने के बाद घर से बाहर कर चुका है। नबी (स.अ.व.) ने उसे खुला लेने का विकल्प दिया और कहा कि वह खुद को स्वतंत्र कर सकती है।” 

हलाला एक एसा कानून है जो महिलाओं के लिए हमेशा से विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दा रहा है जो इस्लामी कानून के तहत आता है। यह एक प्रथा है जो तलाक के बाद पति-पत्नी को पुनः विवाह करने की अनुमति देने से संबंधित है जब एक मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तीन बार तलाक देता है तो यह तलाक अंतिम और अपरिवर्तनीय हो जाता है। इसे तलाक-ए-बिद्दत कहा जाता है । इसके बाद वे दोनों एक-दूसरे से पुनः विवाह नहीं कर सकते । यदि पति-पत्नी पुनः विवाह करना चाहते हैं । तो इस्लामी कानून के तहत पत्नी को पहले किसी अन्य पुरुष से विवाह करना होगा (शारीरिक संबंध सहित) और फिर दूसरे पति से तलाक लेना होगा । इस प्रक्रिया को हलाला कहते हैं। हलाला की प्रथा की व्यापक आलोचना की जाती है। आलोचकों का मानना है कि यह महिलाओं का शोषण है और उनकी गरिमा के खिलाफ है। कई लोग इस प्रथा को अवैध और अनैतिक मानते हैं। कुछ मामलों में हलाला को व्यवस्थित और व्यावसायिक रूप से भी अंजाम दिया जाता है जिसमें महिला को मजबूर या धोखे में रखा जाता है। इस्लामी विद्वानों में हलाला के बारे में मतभेद हैं। कुछ विद्वान इसे एक वैध इस्लामी प्रथा मानते हैं। जबकि अन्य इसे अनैतिक और इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ मानते हैं । कुछ मुस्लिम देशों ने हलाला की प्रथा को अवैध घोषित कर दिया है या इसे सीमित करने के उपाय किए हैं।हदीस (सहीह मुस्लिम) “तलाक केवल तीन बार किया जा सकता है, और तीसरी बार के बाद कोई पुनर्विवाह नहीं हो सकता, जब तक कि महिला किसी अन्य व्यक्ति से विवाह न कर ले और वह तलाक न ले”  यह हदीस यह बताती है कि तलाक तीन बार तक किया जा सकता है, और तीसरी बार के बाद यदि पत्नी और पति फिर से एक साथ रहना चाहते हैं तो महिला को पहले किसी अन्य व्यक्ति से विवाह करके तलाक लेना होगा।

आधुनिक समय में कई मुस्लिम समुदाय और देश हलाला की प्रथा के खिलाफ जागरूकता फैला रहे हैं और इसे समाप्त करने के लिए कानूनी और सामाजिक सुधारों की मांग कर रहे हैं। महिलाओं के अधिकारों के समर्थक और मानवाधिकार संगठन भी हलाला की प्रथा के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं ।

निष्कर्ष – मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और कानून एक व्यापक और महत्वपूर्ण विषय है जो धार्मिक सामाजिक और कानूनी संदर्भों में कई पहलुओं को समेटता है। इस्लाम में महिलाओं के अधिकार इस्लाम  और हदीस पर आधारित हैं। इन धार्मिक ग्रंथों में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और सम्मान का स्पष्ट उल्लेख है। महिलाओं को शिक्षा संपत्ति और विवाह के मामलों में स्वतंत्रता दी गई है। विभिन्न मुस्लिम बहुल देशों में महिलाओं के अधिकारों के लिए अलग-अलग कानूनी ढांचे हैं। इन कानूनों में तलाक संपत्ति और विरासत के मामलों में महिलाओं के अधिकार निर्धारित किए गए हैं। हालाँकि कई बार इन कानूनों का पालन ठीक से नहीं होता जिससे महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। कई मुस्लिम समाजों में पारंपरिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ महिलाओं के अधिकारों पर प्रभाव डालती हैं। हाल के दशकों में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। विभिन्न देशों में कानूनी और सामाजिक सुधार हुए हैं जिनसे महिलाओं के अधिकारों की स्थिति में सुधार हुआ है। वैश्विक स्तर पर भी मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस दिशा में काम करने वाली संस्थाओं ने महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और सुधारात्मक कदम उठाने में मदद की है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. मंजु आर्य  साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे   साखी प्रकाशन 

2.   भगवान दास मोरवाल “हलाला”   पृ.सं 36

3. आचार्य श्री चतुरसेन शास्त्री “इस्लाम का विष-व्रक्ष”  हिन्दी साहित्य प्राकशन मंडल बाजार सीताराम दिल्ली

4. वीश्वम्भरनाथ “हजरत मोहम्मद और इस्लाम”  साउथ मलाला इलाहबाद   

5. (सहीह बुखारी) हदीस 

6. (सहीह मुस्लिम) हदीस 

                                    सहायक वेबसाइट 

7 .        https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/11564/2/H2019-20.pdf

8.                                 https://hindi.lawrato.com/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A8/%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A4%E0%A4%B9%E0%A4%A4-%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-2875

अहमद अली

पीएचडी शोधार्थी इ ऍफ़ एल यूनिवर्सिटी हैदराबाद

क्षमा करें अंकिता, यह भारत है,आम महिलाओं की जिंदगी मायने नहीं रखती!

उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस की चिट्ठी सोशल मीडिया में वायरल हो रही है। पढ़ें;

अंकिता हमें अफ़सोस है अंकिता भंडारी हत्याकांड में सीबीआई जांच की मांग के बाद, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस का एक बहुत ही भावुक पत्र, जो अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे थे, मामले के मुख्य आरोपी “वीआईपी” को पकड़े बिना याचिका का निपटारा कर दिया गया…. मुझे खेद है, अंकिता मुझे खेद है, अंकिता कि आपकी हत्या की सीबीआई जांच की मांग करने वाले सुप्रीम कोर्ट में आपके मामले का निपटारा कर दिया गया और हम अभी तक मुख्य अपराधी को पकड़ने में कामयाब नहीं हुए हैं। मुझे खेद है सोनी देवी, आपकी प्यारी बेटी की हत्या के लिए एक वीआईपी ने होटल में काम करने वाली एक छोटी लड़की अंकिता से “विशेष सेवाएं” मांगी। उसके इनकार के कारण उसकी हत्या हो गई। मुझे इस बात का भी दुख है कि हमारी पुलिस बल राजनेताओं के सामने इतनी झुक गई है कि वे किसी भी अपराध को छुपाने के लिए तैयार हो जाती है।

सबसे पहले, अंकिता और उसके दोस्त पुष्पदीप के बीच व्हाट्सएप चैट जिसमें उसने शिकायत की थी कि एक वीआईपी उसके होटल में आ रहा था और उससे विशेष सेवाओं की मांग कर रहा था, उसे उत्तराखंड पुलिस ने चार्जशीट से हटा दिया। उन चैट में उसने अपने दोस्त से तुरंत आने और उसे बाहर ले जाने के लिए कहा। दूसरे, उसके दोस्त पुष्पदीप और वीआईपी के सहयोगी के बीच स्विमिंग पूल में हुई बातचीत का चार्जशीट में उल्लेख नहीं किया गया, जबकि पुष्पदीप ने पुलिस द्वारा दिखाए गए फोटो के आधार पर सहयोगी की पहचान की थी। तीसरे, सहयोगी अपने बैग में नकदी और हथियार लेकर जा रहा था और फिर भी उसे न तो आरोपी बनाया गया और न ही पुलिस ने उससे पूछताछ की। चौथे, होटल कर्मी अभिनव का यह बयान कि अंकिता को जबरन बाहर निकालकर हत्या करने से पहले वह अपने कमरे में रो रही थी, चार्जशीट में उल्लेख नहीं किया गया। पांचवें, जिस कमरे में अंकिता रुकी थी, उसकी प्रयोगशाला की फोरेंसिक रिपोर्ट को कभी भी चार्जशीट में संलग्न नहीं किया गया। छठा, अपराध स्थल यानी जिस कमरे में वह रुकी थी, उसे स्थानीय विधायक और मुख्यमंत्री के आदेश पर तुरंत ध्वस्त कर दिया गया। सातवां, वीआईपी से बातचीत कर रहे होटल के कर्मचारियों का मोबाइल फोन कभी जब्त नहीं किया गया। आठवां, होटल का सीसीटीवी फुटेज, जिससे वीआईपी और उनके साथियों की पहचान स्पष्ट रूप से पता चलती, कभी भी इस सुविधाजनक बहाने से पेश नहीं किया गया कि कैमरे काम नहीं कर रहे थे। नौवां, जिन गवाहों ने गवाही दी कि अंकिता अपनी मौत से पहले परेशान थी, उनकी कभी ठीक से जांच नहीं की गई। दसवां, उत्तराखंड पुलिस द्वारा दिया गया बयान कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच की गई थी और कुछ भी अप्रिय नहीं दिखाया गया था, भ्रामक था क्योंकि रिकॉर्ड केवल मृतक की चैट के संबंध में था, होटल कर्मचारियों के बारे में नहीं। अंत में, एक आरोपी के साथ मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी अंकिता को दिखाने वाले वीडियो का अभियोजन पक्ष द्वारा गलत उल्लेख किया गया था, जो यह दर्शाता है कि उसकी हत्या और नहर में शव फेंकने से पहले वह किसी भी तरह की परेशानी में नहीं दिख रही थी।

हालांकि, पुष्पदीप ने अदालत में पेश किए गए साक्ष्य में कहा कि मोटरसाइकिल पर बैठी अंकिता ने उसे फोन किया और कहा कि वह बहुत डरी हुई है क्योंकि वह लोगों से घिरी हुई है और बात नहीं कर पा रही है। मुख्य आरोपी पुलकित आर्य ने अब ट्रायल कोर्ट से खुद का नार्को विश्लेषण करने का अनुरोध किया है, जिससे संकेत मिलता है कि वे घटनाओं के बारे में साफ-साफ बताने के लिए तैयार हैं, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को खारिज करके समय से पहले ही मामले को खत्म कर दिया। आरोपियों द्वारा खुद की ऐसी गवाही से वीआईपी की पहचान और भूमिका सामने आ जाती। पुलिस ने वीआईपी की पहचान छिपाई है। सीबीआई को जांच अपने हाथ में लेने और आगे की जांच करने का निर्देश देकर इस बाधा को दूर किया जा सकता था। मां ने अधिकारियों को लिखे पत्र में आरोप लगाया कि वह एक उच्च पदस्थ राजनीतिक पदाधिकारी थे जो अक्सर अपनी पार्टी के सदस्यों के साथ होटल में आते थे। सीसीटीवी फुटेज या कर्मचारियों के मोबाइल फोन प्राप्त करने के लिए उठाए गए प्राथमिक कदम भी मुख्य अपराधी की पहचान उजागर कर देंगे। क्षमा करें अंकिता। यह भारत है। आम महिलाओं की जिंदगी मायने नहीं रखती। और उच्च और शक्तिशाली लोग बार-बार बच निकलेंगे।

कॉलिन गोंसाल्वेस वरिष्ठ अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट

‘स्त्री स्वास्थ्य और जेंडर : प्रसूति रोग से परे 

पटना, ‘स्त्री स्वास्थ्य और जेंडर : प्रसूति रोग से परे विषय पर संवाद

स्त्रियों के एक ही शारीरिक तंत्र /सिस्टम ने उनकी समूची ज़िन्दगी का दायरा तय कर रखा है: और वह है उनका प्रजनन तंत्र।उनका पालन पोषण,सुरक्षा,शिक्षा,व्यवसाय,संपत्ति,शौक,घर-समाज में जगह,उनकी खुशियों और चिंताओं की वजहें, वंचनाएँ,शोषण सब इसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं। खासकर उनके लिए स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा भी इसी एक तंत्र में सिमट जाता है: मातृ-शिशु विभाग।’ उपर्युक्त बातें महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज, वर्धा, महाराष्ट्र  की प्रोफेसर डा. अनुपमा गुप्ता ने कही।  डा. गुप्ता पटना के आरा गार्डन में  ‘स्त्रीकाल की ड्योढ़ी’ में आयोजित एक ‘संवाद कार्यक्रम’ में   ‘स्त्री स्वास्थ्य और जेंडर : प्रसूति रोग से परे ‘ विषय पर बोल रही थीं।  वे स्त्रीकाल पत्रिका और डिजिटल प्लेटफॉर्म के संस्थापक सम्पादकों में हैं । 
उन्होंने कहा कि ‘नीतियों, शोध, बजट और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच, में इन दूसरे स्वास्थ्य आयाम से, जो प्रजनन से इतर हैं, नज़र हटा ली जाती है. ये सही है कि स्त्री हॉर्मोन उसे  50 वर्ष की उम्र तक कुछ हद तक कई अन्य शारीरिक रोगों से बचाये रहते हैं। और इस उम्र में स्त्रियों के प्रजनन सम्बन्धी रोग ही परिवार-समाज-दुनिया के सरोकारों में सबसे बड़ी जगह घेरे रहते हैं. लेकिन यह देखा ही जाना चाहिए कि स्त्री देह-मन दूसरी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से पुरुषों की तरह ही जूझते हैं. ‘ उन्होंने विस्तार से बात करते हुए स्त्री स्वास्थ्य से गहरे जुड़े कुछ विरोधाभाषों के बारे में बताया:

 1. desmenorrhea/पीरियड पेन (60-80% महिलाओं में) पर गहन शोध तथा सुचारु उपचार की कमी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि प्रजनन से इतर स्त्री-रोग भी बड़ी लापरवाही के  शिकार हैं. 

2. एक और बड़ा विरोधाभास सुंदरता के क्षेत्र में निवेश है:  एक पुरुष में 1500 स्पर्म प्रति सेकंड बनते हैं, जबकि स्त्रियों में अंडाणु एक महीने में एक।  पूरी जिंदगी में 500 अंडाणु बनते हैं।  लेकिन सामाजिक संरचना में मांग पुरुषों की ज्यादा है।  पुरुषों के लिए एक झूठी मांग बनाई गई है।  यहाँ तक कि  प्राणियों की अन्य जातियों में ‘रिझाना’  नर का काम होता है. सिर्फ इंसानों में ही रिझाना स्त्री का काम बना दिया गया। इसीलिए शरीर के प्रति अतिरिक्त आग्रह  body image issues अक्सर लड़कियों में अवसाद का पहला कारण बन जाते हैं, और ज़िंदगी भर बने रहते हैं।  दुनिया में महज चार प्रतिशत महिलाएं खुद को खूबसूरत मानती हैं। 

  1. लैंगिक हिंसा से बचाने के लिए लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है, और जिसके बाद फिर उन्हें अलग तरह की तमाम हिंसा का शिकार बनना पड़ता है. स्वास्थ्य के तमाम मुद्दे उठ खडे होते हैं. 
  2. धारणा है कि  स्त्रियाँ पहली वैद्य होती हैं।  किताबें भी दादी-नानी के नुस्खे के नाम से छपती हैं। स्वास्थय सेवा में सबसे अधिक श्रम और कम वेतन के मामले में स्त्रियां काम करती है।  100 प्रतिशत आशा वर्कर, 80 % नर्स और 28 % डाक्टर स्त्रियां हैं।  लेकिन चिकित्सा क्षेत्र में नेतृत्व पुरुषों के हाथ में है।  
  3. हमारा विज्ञान उतना ही तटस्थ हो पाता है, जितनी हमारी समझ है. तो सारी दवाओं के प्रयोग पुरुषों पर किये जाते हैं, और उनके परिणाम स्त्रियों पर थोप दिये जाते हैं. जबकि शरीर तो कम से कम पितृसत्ता में भी अलग ही माना गया है.
  4. स्त्रियां अन्नपूर्णा कहलाती है।  विरोधाभाष यह कि अन्नपूर्णाओं में एनीमिया करीब 40- 50% है. और शारीरिक श्रम ज्यादा होने पर भी उन्हें कैलरी  कम मिल रही है. 
    डा. अनुपमा ने कहा कि ”स्वास्थ्य के शोध के संदर्भ में अभी तो हम  दो ही लिंगों पर बात करते हैं -स्त्री और पुरुष। ट्रांसजेंडर की तो बात भी नहीं होती।  हम स्वास्थ्य बजट के मामले में बहुत गरीब देशों से भी गरीब हैं. 25-26 के बजट में GDP के मात्र 1.9% तक पहुंच सके हैं (इसमें से करीब 33% बच्चों और माओं के स्वस्थ्य के लिए आवंटित होता है।  सपष्ट है  प्रजनन से संबंधित स्वास्थ्य सेवा के लिए।  2025 तक के लक्ष्यों में बजट 2.5% और TB मुक्त भारत था, जिसे 2017 में निर्धारित किया गया था और  जो लक्ष्य पूरा नहीं हो सका ।  अब भी  हमारे यहाँ जरूरत के हिसाब से 50 % स्वास्थ्य कर्मी कम हैं।  अभी तक माताओं और बच्चों की संक्रामक रोगों से मौतें दुनिया के स्तर तक कम नहीं हो पाई हैं और गैर-संक्रामक, जीवनशैली रोग दुनिया के स्तर से ज्यादा बढ़ चुके हैं। ‘
    विषय और विशेषज्ञ से परिचित कराते हुए स्त्रीकाल के संस्थापक संपादक संजीव चंदन ने कहा कि डा. अनुपमा आज बिहार में स्त्री स्वास्थ्य और जेंडर पर बोल रही हैं जहां देश में पहली बार लालू प्रसाद के समय में स्त्रियों को दो दिनों का ‘ माहवारी छुट्टी ‘ जिसे स्पेशल लीव कहा जाता है, मिला था। इसके लिए वाम संगठनों से जुड़ी महिलाओं की मांग काफी समय से थी ।
    उपस्थित सभी साथियों ने स्त्री स्वास्थ्य के विविध पहलुओं पर बात की।  गुंजन उपाध्याय पाठक, प्रतिमा दास, लीना, कृष्ण समिध, श्वेता सागर, साकिब अशरफी ने कविताएं भी सुनाई। उपस्थित लोगों में सेवाग्राम मेडिकल कॉलेज में ही  प्रोफेसर एवं सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डा. दिलीप गुप्ता, अरुण नारायण, अंशुमान, अनिकेत, अरविंद, दिव्या गौतम आदि भी उपस्थित थे। स्त्रीकाल का एक अंक और संजीव चंदन की किताब ‘ गांधी लाठी पर हिंदी, हिंदी साहित्य और समाज की एक षड्यंत्र कथा ‘ सभी भागीदारों को भेंट की गई।

दादी नानी की परीक्षा 

चित्र साभार गूगल

बच्चे भी कई प्रकार की आवाज़ें निकाल कर रोते हैं और हर बच्चे के रोने की अवाज उनकी माएँ बखूबी पहचानती है। यह मुझे इस बार  समझने का मौक़ा मिला। एक माँ की छटपटाहट ने तो मात्र एक घंटे में पेपर जमा करवा दिया। दूजे  माँ का भी लिखना डेढ़ घंटे में हड़बड़- हड़बड़ किसी तरह पूरा करके अपने नन्हे की ओर  दौड़ पड़ा। इन तमाम बातों को अपने अंदर  महसूसते हुए बतौर शिक्षक मुझे परीक्षा और इस व्यवस्था से घृणा बढ़ती जा रही थी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू हो चुका था । 2021 के रजिस्टर्ड विद्यार्थियों को 2025 में जेनेरिक की अतिरिक्त परीक्षाओं का एग्जाम लिखने का नोटिस आ चुका था।  जबकि इनके फाइनल रिज़ल्ट्स  कई महीने पीछे इनके हाथों में आ चुके थे। बहुत सारे विद्यार्थियों ने अपने वैवाहिक जीवन तक को साकार कर लिया था। ग्रामीण और कस्बाई इलाक़े में स्थित इस कॉलेज में ऐसे विद्यार्थी कई होते थे। कई विद्यार्थी तो अब मातृत्व का सुख भी भोग रही थीं। उन्हें क्या पता था कि ग्रेजुएट हो चुकने के बाद भी देश की शिक्षा नीतियों के तहत उनको फ़ाइनल रिज़ल्ट्स हाथ में होने के बाद भी एग्जाम्स के लिये बुलाया जा सकता है!  उनके नन्हे कॉलेज परिसर में, दादी नानी की गोद  में उफड़ते, कांदते रोते हुए अपनी माँओं की परीक्षाओं को कठिन बना रहे थे। उनके रोने की आवाज़ हर किसी को परेशान कर रही थी। मैंने  इनविजिलेटर होने के नाते परीक्षा में कोई बाधा उत्पन्न ना हो इसलिए विद्यार्थियों के हित  में उन्हें दूर ले जाने का आग्रह किया। गार्ड ने उन्हें खुले मैदान से दूर करते हुए गर्ल्स कॉमन रूम में बैठने का रास्ता दिखा दिया । मैंने ना चाहते हुए भी उनसे इस सर्द में धूप को छीनते  हुए उन्हें एक काल कोठरी में बैठवा दिया था। मुझे गिल्ट भी महसूस हो रहा था लेकिन मेरे लिये और परीक्षा देने वालों के लिए यही सही निर्णय था।

 उन नन्हों के रोने की आवाज़ें पूरी तरह से  तो कम नहीं हो सकी लेकिन कुछ कम ज़रूर हुई। बीच-बीच में नाना प्रकार की आवाज़ें लिए वह अपने माँ की चलती कलमों पर जल्द लिखने का दबाव बना रहे थे। दादी और नानी अपनी सुखी छातियों से लिपटाये इन नन्हों को अपना समग्र देने की चेष्टा कर  रही थी। फिर भी यह निरीह सी  नन्ही जानों को माँ के स्पर्श और जीवनामृत दूध के बिना चैन कहाँ? दादी नानी आपस में बातें करती हुई सुनाई पड़ती हैं – “ परीक्षा मात्र उनकी कहाँ? यह परीक्षा तो हम सबके बीच  है; तीन पीढ़ियाँ इस परीक्षा  में शामिल हैं (दादी,बहू, नाती) ! बिटिया, बहू जो भी अंदर में पेपर देने की कोशिश  कर रही उनका दिमाग़ लिखने में कम और अपने सुनने की सक्षमता को और गौर से सुनने में प्रायसरत दिखी। अपने नन्हों की बिलखने की अवाज उन्हें कितना ही पेपर लिखने दे रही होंगी यह एक मातृ हृदय ही समझ सकता  है। जब मैं एक अविवाहित को इन बच्चों की रूलायी गहरे  घाव और दर्द से भर रही थी तो उन माँओं का सोचो जरा जो इन्हें अपने खून से सींच कर उन्हें इस दुनिया में हज़ार दर्द सहकार दुनिया में लाती हैं। उनका हस्र तो जाने क्या ही हो रहा होगा?

बच्चे भी कई प्रकार की आवाज़ें निकाल कर रोते हैं और हर बच्चे के रोने की अवाज उनकी माएँ बखूबी पहचानती है। यह मुझे इस बार  समझने का मौक़ा मिला। एक माँ की छटपटाहट ने तो मात्र एक घंटे में पेपर जमा करवा दिया। दूजे  माँ का भी लिखना डेढ़ घंटे में हड़बड़- हड़बड़ किसी तरह पूरा करके अपने नन्हे की ओर  दौड़ पड़ा। इन तमाम बातों को अपने अंदर  महसूसते हुए बतौर शिक्षक मुझे परीक्षा और इस व्यवस्था से घृणा बढ़ती जा रही थी।

दूर झारखंड के सबसे बड़े डैम जिन्हें कभी ‘विकास का मंदिर’ कहा गया वहाँ पिकनिक मनाने वालों का ताँता और हाई बेस में बजते डीजे दिल की धड़कनों को कम्पित  कर डरा रहे थे। तनाव  परिवेश का, दिल और मस्तिष्क का, बढ़ता जा रहा था। परीक्षा का होना हर हाल में, हर परिस्थिति में अपनी उपयोगिता पर सवाल खड़े कर रहा था।

दूर कहीं कुछ गीत के बोल बज रहे थे-

 “ हम किस गली जा रहे हैं,

हम किस गली जा रहे हैं,

अपना कोई ठिकाना नहीं?

अपना कोई ठिकाना नहीं? ”

शिक्षा! रोज़गार! परिवार! मातृत्व! मानसिक हिंसा! बुजुर्ग! ध्वनि प्रदूषण! बड़े बांध! विस्थापन! अमानवीय तंत्र! आदि आदि। शब्दों के बादल गहरे घने और डरावने  बनते जा रहे थे। ‘ वर्ड क्लाउड ‘ की तरह सुगढ़, सुंदर  नहीं बल्कि बिखरा हुआ, छितराया हुआ, कुरूप। जिसे चाह कर भी संभालना मुश्किल।

दिमाग़ में  सब चीज़ों में  आपस में गुथमगुथा होना  प्रारंभ हो चुका था। और नानियाँ, दादियाँ कितने अपने अपने परीक्षाओं में पास हो सकी इसका मूल्यांकन किसके हिस्से था यह तय करना अभी भी बाक़ी था। एक तेज़ धमाका  बूम।।।।।।। एक शून्य में विस्तार लेती ‘स्तब्ध प्रश्चिह्न’ व  व्याकुलताएँ ।   ?????????

नीतिशा खलखो

विभागाध्यक्ष, बी एस के कॉलेज

मैथन,  धनबाद ,  बृहत झारखंड, 

(neetishakhalkho@gmail.com)

वर्तमान के दो अंतहीन युद्ध

साभार गूगल

(1)कुछ वैसा ही होगा 

आग की लपटों 

और खंडहरों मे तब्दील होते घरों के बीच 

बंकरों में छुपकर बचने की जद्दोजहद के बाद भी 

नहीं टूटती उम्मीदों की वजह से 

तनकर खड़ हो जाते हैं 

बख्तरबंद वाहनों के सामने 

ध्वस्त हो जाने के बाद भी 

फिर से बसे हैं अनगिनत शहर 

बचे रह गए हैं पेड़-पर्वत और 

बची रह गई है कुछ फूलों की रंगत भी 

हिरोशिमा पर बमबारी के बाद भी 

बची रह गई थी दुनिया 

फिर से आबाद होने के लिए 

कुछ वैसा ही होगा 

पर साम्राज्यवाद के खत्म होने और 

मनुष्यता और प्रेम के बचे होने 

पर लगे प्रश्न चिन्हों के साथ  ?

(संदर्भ-रूस यूक्रेन युद्ध)

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(2) युद्ध और औरतें

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गाजापट्टी में बासठ फ़ीसदी बच्चे और औरते मरीं

युद्ध बच्चो और औरतों ने शुरु नही किया था

बच्चे तो मांओं  के ईद- गिर्द मडरा रहे होंगे

मांएं  युद्ध के बीच भी बच्चों और मर्दों के भूख मिटाने की चिंता मे भयातुर जी  रहीं होगीं 

ये उन मर्दो में निश्चिंत ही नही होंगी , जिन्होने राकेट दागे

ये उनमे भी नही थी जिन्होने शत्रुओं की बस्ती में घुसकर  नरसंहार किया 

जिन्होने  शत्रु पक्ष की औरतों को टार्गेट किया

उन्हें निर्वस्त्र किया और उनके सर को धड़ से अलग किया

दोनो तरफ सर्वाधिक विनाश उनका ही होता है 

 दोनो विश्व युद्धों में सामूहिक बलात्कार और हत्या से लेकर 

तालीबानी बर्बरता और म्यांमार में सैन्य अत्याचार तक

सब जगह वे आसान टार्गेट होती हैं

और बच्चो का तो कोई नही बचता,

बेसहारा वे शरणार्थी बन असमय बूढ़े हो जाते है।

क्यों और कबतक औरतें और बच्चे निस्सहाय रहेंगे 

कबतक युद्धों में नोचे -खसोंटे जाते रहेगे 

(आखिर कब तक…)

उन पर रहम करो 

उनसे लड़ो जिनने तुमपर बम बरसाए हैं 

रॉकेट दागे हैं , और तुम्हारा सर कलम किया है।

(संदर्भ – इजराइल और फिलिस्तीन युद्ध)

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(3 ) मुझे चिड़िया बनना था 

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मुझे पंखों वाली चिड़िया बनना था 

पर बना दिया गया आदमी 

चिड़िया बनता तो सीमाएं नहीं रहती 

उड़ जाता दूर ,बहुत दूर 

अपने गांव-शहर से दूर 

अपने प्रदेश से भी दूर 

चला जाता दूसरे देश भी 

सरहद क्या कर लेता मेरा ?

मैं नदी नहीं बनता 

जिसके निर्बाध बहने की इच्छा को 

रोक दिया जाता बांध बनाकर 

मैं घने उंचे पेड़-पर्वत बनकर भी 

बाड़ लगाकर बाधित किया जा सकता था 

और आदमी बनकर तो 

वर्ण और संप्रदाय की जंजीरों में 

जकड़ ही दिया जाता।

इसीलिए मुझे चिड़िया बनना था।

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(4)) देख सकूं होते यह सब 

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सोचता हूं पानी बन जाउं 

जिससे रह सकूं हर घर और देह में 

और विचरण करूं नभ में बनकर मेघ 

सोचता हूं बनूं आकाश 

जिसमें उड़े पाखी निर्विघ्न 

करते हुए कलरव और अट्टहास 

हवा भी चाहता हूं बनना 

जिसमें उड़े पतंग बच्चों की 

और देखूं उनकी किलकारियां 

 पर धरती बनना भी ज़रूरी 

जहां टिक सके पैर 

और देख सकूं होते यहसब। 

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(5) नियति 

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हम मजमा जुटाते हैं 

और दूसरों के मजमों में

 हंगामा मचाते हैं 

हम शब्द थूकते हैं 

और अपने लिए उसे 

घोंट भी लिया करते हैं।

हम जब नई लीक पर चलते हैं 

तो खड़ होकर सशंकित 

चली हुई लीकों को देखते भी हैं-

आज यही हमारी नियति है।

अनिल किशोर सहाय 

दिनमान, वागर्थ , कथाक्रम,  कृति बहुमत, समय सुरभि अनन्त, पाखी, सबलोग, ककसाड़, प्रेरणा अंशु, व्यंग्य यात्रा,  प्रणाम पर्यटन, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान, शुभम संदेश, दैनिक प्रदीप, लघुकथा कलश,  पत्रकारिता बीते कल से आजतक – सहित  पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं ,लेख,संस्मरण,कहानी,लघुकथा ,व्यंग्य, प्रतिक्रिया आदि प्रकाशित। संपादन– “सप्तम स्वर, ” भागलपुर का सच ” “स्वर्ण तरंग ”

सम्प्रति – स्वतंत्र लेखन 

फोनसंपर्क-9709869180/9470122778)

ईमेल- anilkishoresahay@admin


क्या एक मिथ (फातिमा शेख) के बरक्स सच कहना साम्प्रदायिकता है ?

2016 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक सभागार में ‘स्त्रीकाल’ ने वरिष्ठ अम्बेडकरवादी लेखिका अनिता भारती को सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान से सम्मानित किया। उस दौरान अनिता जी ने मुझसे कहा था कि ‘ इन दिनों 3 जनवरी को सावित्रीबाई फुले के साथ फातिमा शेख की चर्चा शुरू हो जाती है। चर्चा करने वालों ने उनकी जन्म तिथि पर भी शोध करना ठीक नहीं समझा। ये वे लोग हैं, जिन्होंने अकेले सावित्री बाई फुले को कभी याद नहीं किया। ‘

फातिमा शेख : एक पोस्ट ट्रुथ 

फातिमा शेख सावित्रीबाई फुले द्वारा महात्मा फुले को लिखे एक पत्र में उल्लिखित हैं, एक वाक्य में। 1856 में माहत्मा फुले को लिखे अपने पत्र में ‘फातिमा’ का जिक्र किया है उन्होंने। लगभग एक दशक से फातिमा शेख की जयंती सावित्री बाई फुले की जयंती, 3 जनवरी, के साथ मनाई जाने लगी थी, या वे इसी दिन याद की जाने लगी थीं।  इसे लेकर सवाल भी एक छोटे दायरे में उठने लगे कि फातिमा की जयंती उनके अपने जन्मदिन पर क्यों नहीं? कोई उनके जन्मदिन के ऊपर कोई शोध क्यों नहीं करता।  जल्द ही दो से तीन साल के भीतर फातिमा शेख का जन्मदिन 9 जनवरी और जन्मवर्ष 1831 निर्धारित हो गया। 1831 ही सावित्रीबाई फुले का जन्मवर्ष है। यह जन्म वर्ष और एक इंतकाल का दिनांक और वर्ष भी विकिपीडिया और गूगल में दर्ज हो गया। गूगल ने 2022  में उन्हें अपना डूडल भी बनाया। उनके 9 जनवरी वाले जन्मदिन पर।

यह सब संघ परिवार के बढ़ते प्रभाव के कथित जवाब के लिए किया गया -कथित ‘दलित-मुस्लिम’ एकता के लिए। 20वीं सदी के तीसरे दशक में सावित्रीबाई फुले के साथ उनकी एक कथित फोटो एक पत्रिका में छपी थी, वह भी उनके नाम के साथ स्थापित हो गया। 2022  में 9 जनवरी को जब गूगल ने डूडल बनाया तो सत्यशोधक आंदोलन और महात्मा फुले एवं सावित्रीबाई फुले काल के अधिकारी विद्वान हरी नरके ने आपत्ति की और अपने सोशल मीडिया पेज पर व्यंग्य्त्मक टिप्पणी की  कि ‘ मजा आ गया। आज गूगल ने अपना डूडल फातिमा शेख के नाम पर बनाया।’ उन्होंने सवाल  किया कि ‘लेकिन यह जन्मदिन किसने खोजा ? किस दतस्तावेज में यह लिखा है ? ‘ उसके पूर्व  वरिष्ठ दलित लेखिका अनिता भारती ने भी द प्रिंट को दिए इंटरव्यू में जन्मदिन पर सार्वजनिक सवाल उठाया था। 

इस वर्ष   8 जनवरी को अनिता भारती ने अपने फेसबुक पेज पर फातिमा शेख की तस्वीर को शगुना बाई की तस्वीर बताई।  9 जनवरी को दिलीप मंडल ने 2019 में द प्रिंट के लिए लिए गए अपने इंटरव्यू के हवाले से अनिता भारती को कोट कर फातिमा शेख को अपना क्रिएशन बता दिया। बहुजन स्पेस पर काम करते हुए सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर दिलीप मंडल भाजपा सरकार से वेतन और सुविधाएं लेकर घोर साम्प्रदायिक खेमे में जाने के बाद इन दिनों राजनीति के हेमंत बिस्वा सरमा ( आसाम के मुख्यमंत्री)  जैसी गतिविधियां कर रहे हैं। इसके बाद इस मुद्दे पर जाहिर है कि व्यापक चर्चा हो गई और दिलीप मंडल की ‘झूठ’ को पर्दाफाश किया गया। अनिता भारती ने दिलीप मंडल के साम्प्रदायिक इरादे से खुद को अलग बताते हुए एक नोट जारी किया लेकिन इतिहास बनते मिथ के खिलाफ अपने स्टैंड पर कायम रहीं। 

 दिलीप हालांकि अर्द्ध सत्य बोल रहे थे। यह सच है कि फातिमा की चर्चा उनीसवीं सदी के तीसरे दशक से हो रही थी। लेकिन किसी भी स्रोत से उनकी कोई जन्मतिथि और उनकी वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आई है अबतक। उनके योगदानों का कोई प्राथमिक प्रमाण नहीं है।  उस दौर की पढ़ी लिखी स्त्रियां लेखन कर रही थीं, कोई लेखन भी सामने नहीं आया है, जबकि सावित्री बाई फुले के स्कूल में पढ़ने वाली दलित छात्रा मुक्ता सालवे का एक लेख मिलता है। दो तीन दिनों तक चली बहस में इंडियन एक्सप्रेस, बीबीसी हिंदी या अन्य स्रोतों की बाढ़ से आ गई।  कोई गूगल का डूडल सामने ला रहा था, कोई एक-दो विश्ववविद्यालयों में किया गया रिसर्च।  लेकिन सारी कवायदों के बाद  

तय हुआ कि 

1. फातिमा थीं लेकिन वे शेख थीं  और उस्मान शेख परिवार की थीं, जहाँ सावित्रीबाई फुले ने आश्रय लिया था 11 दिनों तक ,यह पूरी तरह सिद्ध नहीं है।
2. फातिमा का फोटो अपने अंतिम और उपलब्ध पहले स्रोत में सावित्रीबाई फुले के ग्रुप फोटो से निर्धारित किया गया है। मूल फोटो में ग्रुप में से किसी का नाम नहीं था। यह सिद्ध किया जाना बाकी है कि वह फोटो फातिमा का ही है, या किसी और का। किसी और का होने पर ,उसे भी सिद्ध करना होगा कि किसी और का है। जैसे साड़ी पहनने के ढंग और आदि के आधार पर उनके मुसलमान होने पर कुछ लोग संदेह कर रहे हैं। 
3. फातिमा की जन्मतिथि, माह और उनका निधन प्राथमिक स्रोत से सिद्ध नहीं है।
4. फातिमा पर लिखा गया है कुछ -कुछ लेकिन सबका आरम्भ और अंत सावित्री बाई फुले की एक पंक्ति है। शेष कल्पना और अफवाह है। यह प्रमाणिकता से तय किया जाना शेष  है कि उनके जीवन काल में उन्होंने क्या-क्या योगदान किए।
5.  उनके इंतकाल की तिथि ( 9 अक्टूबर 1900)  भी प्रमाणित नहीं है। अभी खोजा जाना शेष है कि क्या वे सच में सावित्रीबाई फुले की मृत्यु के बाद तक थीं और यदि थीं तो इतनी महत्वपूर्ण सखी और शख्सियत ने उनके बारे में क्या कुछ लिखा या कहा?
6 . विश्वविद्यलयों में उनपर किये गए सारे शोध, जो सामने लाये जा रहे हैं पिछले 5-7 सालों के हैं।

फुले-अम्बेडकरवादी चिंताओं का सच होना

फातिमा शेख पर इतिहासकरों की राय बंटी हुई है।  कुछ शोध और कुछ शोधपत्र बीएचयू और जामिया मिलिया इस्लामिया में हैं, जो पिछले 5 सालों में ही हुए हैं, जिनके पास भी कोई प्राथमिक आधार नहीं हैं, लेकिन पोस्ट ट्रुथ की रचना हो गई और फातिमा सावित्रीबाई फुले के साथ पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका के रूप में स्थापित होती गई हैं।  पिछले 5 सालों में हुए शोधों या लिखे गए शोधपत्रों के आधार पर यह लेख लिखे जाने तक विकिपीडिया में फातिमा को लेकर की जा रही इंट्री के एडिट के खेल जारी हैं। शोधकर्ता स्वयं कह रहे हैं कि हमें कोई प्राथमिक स्रोत नहीं मिला। हद तो यह हो गई कि विकिपीडिया ने फातिमा शेख को मदरसों से पढ़ा हुआ बता दिया, जिसका संदर्भ जामिया मिलिया के एक शोधपत्र के  कयास को बनाया गया।  यह एक सत्य की तरह  यदि स्थापित हुआ तो स्त्रीशिक्षा के लिए 1848 में सावित्रीबाई फुले द्वारा खोली गयी पहली ‘स्त्री पाठशाला’ के इतिहास को भी चुनौती मिल जायेगी।  उनके द्वारा स्त्री शिक्षा की अलख का इतिहास ध्वस्त हो जायेगा। इस तरह बहुजन स्पेस का एक इतिहास ध्वस्त होगा और इतिहास का पोस्ट ट्रुथ सिद्ध करेगा कि भारत में स्त्री शिक्षा का केंद्र भारत के मदरसे रहे हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवादी धाराएं पहले से ही सिद्ध कर रही हैं कि भारत के गुरुकुलों में पढ़ी थीं वैदिक ऋषि गार्गी, लोपा, मुद्रा, घोषा, मैत्रेयी आदि। 






वामपंथी विद्वान और आलोचक जगदीश्वर चतुर्वेदी ने सावित्रीबाई फुले  की जयंती 3 जनवरी को लिखा, ‘भगवती देवी को हम भूल गए  !ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के चरित्र निर्माण में उनकी माँ की महत्वपूर्ण भूमिका थी।खासकर दया-भावना और गरीबों की सेवा के संस्कार उन्होंने अपनी माँ से ग्रहण किए।उनकी माँ का नाम भगवती देवी था।आमतौर पर विद्यासागर की चर्चा होती है लेकिन उनकी माँ की चर्चा नहीं होती,यहां तक कि सावित्रीबाई फुले को याद करते हैं लेकिन भगवती देवी को भूल जाते हैं। ‘ उसी समय सोशल मीडिया पर एक ‘कथित वामपंथी’ खेमे से महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले और बाबा साहेब आंबेडकर के योगदानों को खारिज करते हुए, उन्हें राष्ट्रविरोधी बताते हुए लेख और वीडियो घूमे। ये सारे  प्रसंग अंततः बहुजन स्पेस के, फुले-अम्बेडकरी स्पेस के लोगों की चिंताओं के अनुरूप ही घटित होते गए हैं। वाम और दक्षिण खेमे ने मिलकर परम्परावाद को ही पुष्ट किया। भारत की स्त्री शिक्षा को कोई मदरसों तक पहुंचा रहा  है तो कोई गुरुकुलों तक। सावित्रीबाई फुले के श्रेय को छीनने की यह कोशिश बड़ी मुश्किल से खड़े बहुजन प्रतीकों को ध्वस्त कर देता है।

तो क्या एक मिथ के बरक्स सच कहना साम्प्रदायिकता है ?

बहुजन वृत्त से देश की नायिका,हम सबकी माई, शिक्षिका सावित्रीबाई क्यों नहीं पूरे भारत की नायिका हो सकती है? एक वास्तविक व्यक्तित्व के साथ या बरक्स एक  काल्पनिक कथा रचकर, जो महज एक वाक्य के  रेफरेंस से रची गई है, एक मुस्लिम महिला शिक्षिका खोजना क्यों जरूरी है? क्यों उन्हें भिड़ाना?  यह साम्प्रदायिकता है, जो लोग ऐसा कर रहे, कर पाने में सफल हो रहे हैं, वे साम्प्रदायिकता को ही बढ़ावा दे रहे हैं। संघ परिवार 6 दिसंबर को विजय दिवस मनाता रहा, तो दूसरे काला दिवस, वह बाबा साहेब के निर्वाण का दिवस है। यह एक सिलसिला है, प्रवृत्ति, जो दोनों खेमे में है, और उसका उद्भव व प्रेरक ब्राह्मणवाद है।

साम्प्रदायिकता का एक ही इलाज है। नायिका सबकी हो, नायक सबका हो, सावित्री सबकी हों, तो बेगम एजाज रसूल ( संविधान सभा में सदस्य ) या  इकबाल सबके हों। और संसदीय राजनीति में नेता अपना हो, अपनी जमात का। यानी मुसलमानों का नायक सबका नायक, बहुजन नायक सबका नायक, लेकिन वर्तमान संसदीय राजनीति में  मुसलमानों का अपना नेता हो। उसका अपना नेतृत्व हो। प्रतिनिधित्व हो। जो घट रहा है। सेक्यूलर जीवन होता है हर संभव स्पेस पर अपने से दूसरे/other, मुसलमानों को शामिल करने से। अपने विभागों में जहां आप नियुक्तियां प्राभावित करते हैं वहां उन्हें लाएं, अपने एनजीओ में, अपने द्वारा प्रभावित शोध संस्थानों में,अपने दैनंदिन में लाएं। सवाल है कि कथित ‘दलित -मुस्लिम एकता लक्ष्य’ के लोग कंपार्टमेंट बना रहे हैं कि सेक्युलरिज्म कर रहे हैं। पहली शिक्षिका, पहली मुस्लिम शिक्षिका, फिर पहली का कई और सिलसिला बनता है, बनेगा।

पोस्ट ट्रुथ से मुकाबला और फासीवाद का डर

फासीवाद का एक बड़ा हथियार पोस्ट ट्रुथ है।  उससे समय रहते मुकाबला होना चाहिए।  फातिमा शेख पर बायनरी में संघर्षों  के बीच अनिता भारती या हम जैसे लोग जो वास्तविक चिंता कर रहे हैं उनके सामने दुविधा है कि इस वक्त सच कहा जाये या नहीं।  सच कहने का कोई वक्त नहीं होता। फासीवाद चुप्पियों से ही आता है। हमारे ही समय में कोई इतिहास भ्रामक रूप ले रहा है कहना पड़ेगा। संघ परिवार और भाजपा के तंत्र ने पोस्ट ट्रुथ के इसी षड्यंत्र के साथ तो अयोध्या परिघटना को खड़ा किया या बाबा साहेब जैसे हिंदुत्व विरोधी व्यक्तित्व को भी अपने पाले में लेने या उनकी विरासत को कुंद करने की कोशिश की। दूसरी ओर जो कथित लिबरल धारा है वह भी इसी पोस्ट ट्रुथ के खेल में शामिल है। 

सवाल उठता है कि जो जमातें दशकों से, फुले-अंबेडकर इतिहास पर चुप थीं, वह अचानक से भ्रमपूर्ण माहौल बनाकर शोर कर रही हैं और जिन्होंने वास्तविक इतिहास का उत्खनन किया, उनसे  चुप्पी मांग रही हैं। बहुजन धारा ‘मुसलमान और हिंदू युग्म  में नहीं सोचता। पसमांदा और अशरफ की पदावलियों में सोचता है, या बहुजन और सवर्ण,दलित और सवर्ण। किसी सांप्रदायिक उन्मादी हेमंत बिस्व सरमा या दिलीप मंडल के उन्मादी इरादे का जवाब सच की चुप्पी नहीं, सच को उसकी सम्पूर्ण जटिलता के साथ कहने में है। कई बार वह जटिल पक्ष ही सरल पक्ष होता है। 

यह आलेख Theमूकनायक में प्रकाशित है। साभार

डॉ पूरन सिंह की पाँच लघु कथाएँ

नीची जाति
गांव में जहाँ मेरा घर था वहाँ मुसलमान भी रहते थे। हिंदूओं मे सवर्ण जातियां हमें, हमेशा घृणा और तिरस्कार की नजर से ही देखते थे सो मुसलमानों से प्यार होने लगा। वे लोग अच्छी तरह बात करते थे। थोड़ा बहुत लगाव भी था उनमें हमारे लिए।
धीरे-धीरे बड़ा हुआ। पढ़ा-लिखा भी और नौकरी लगी दिल्ली में। जिस ऑफिस में काम करता था वहाँ सवर्णों का वर्चस्व था। वे मुझे पीठ पीछे चमार या चमट्टा ही कहते थे। चूंकि मैं अच्छे पद पर था इसलिए मुँह पर कहने का साहस उनमें नहीं था। मेरा पीउन भी समाज में हाशिए पर फेंका गया व्यक्ति था सो मेरी पीठ पीछे होने वाली बातों को समय मिलने पर बता देता था। सवर्णों के मन में अगर मेरे लिए घृणा और द्वेष था तो प्‍यार तो मेरे मन में भी नहीं था उनके लिए।
मेरे ऑफिस में ही अकरम भाईजान भी काम करते थे। मुझसे जूनियर थे और उम्रदराज भी। मुझे बहुत मान देते थे। उनसे मुझे लगाव हो गया। मुसलमानों के साथ गांववाला प्यार याद आता उन्हें देखकर।
एक दिन वे मुझे अपने घर ले गए। अपने अब्बू और अम्मी से मिलवाया। मुझे अच्छा लगा।
फिर वे घर में अंदर चले गए यह कहकर कि अभी आता हूँ तब तक मैं उनके अब्बू से बात करूं।
उनके अब्बू मुझसे बहुत प्यार से बातें करते रहे और बातों ही बातों में मुझसे उन्होंने पूछा, ‘आप नाम के आगे कुछ नहीं लगाते.. मसलन शर्मा, वर्मा, चौहान, श्रीवास्तव’।
‘जी नहीं।’
‘आप हिन्दुओं में नीची जातियों से हैं क्या।’ उन्होंने एक ही सांस में पूछ लिया था।
‘मैं नीची जातियों में से हूँ या नहीं, ये दीगर सवाल है बाबूजी लेकिन क्या मुसलमान अर्थात् आप भी मुझे नीची जाति का मानते हैं यह जरूरी सवाल है।’ मैंने पूछा था अकरम के अब्बू से तो वे कुछ नहीं बता पा रहे थे।

लूडो
उन दिनों ऑफिस नहीं जाते थे वे दोनों और न ही उनके बच्चे अपने-अपने स्कूल जाते। करोना काल था। खाली समय में वे चारों लूडो खेला करते। सुमद्रा अपने पति और बच्चों से रोज जीतती। बच्चे तो मजे लेते लेकिन सुमद्रा का पति उखड़ जाता। कई बार कहता, ‘हर रोज तुम्हीं कैसे जीत जाती हो। कहीं बेईमानी तो नहीं कर लेती।’
‘ हे सुनो, हम औरतें बेईमान नहीं होती। बेईमान तो तु….म….लोग.।’ मजाक-मजाक में पुरुष का यथार्थ परोस देती थी सुमद्रा अपने पति से। सुमद्रा का पति तिलमिला जाता। सुमद्रा सब समझ जाती। फिर उसने एक तरीका निकाला। वह जानबूझकर गलत चालें चलने लगी और उसका पति जीतने लगा। स्थिति यहाँ तक आयी कि वह बच्चों से भी हारने लगी। हारना ही तो स्‍त्री ने अपनी नियति बना ली है। उसका पति अब बहुत खुश रहता। वह, उसे देखकर कई बार सोचती, ‘ये खुश हैं इससे ज्यादा मुझे और क्या चाहिए।’
तभी……
तभी एक दिन, सुमद्रा के पति ने सुमद्रा से पूछ ही लिया था ‘क्या बात है आजकल तो तुम रोज ही हार जाती हो, लगता है……… लूडो खेलना भूल गई हो। मुझे देखो मैं रोज जीतता हूँ।’
‘ और मुझे जो लगता है वह यह है कि अगर ज्यादा दिन तक मैं जीतती रहती तो लूडो तो मैं जीत लेती लेकिन बहुत संभव है कि तुम्हें हार जाती।’ न जाने कब उसके मुंह से निकल गया था।

जहर की पौध

चुन्नू अपने मम्मी पापा के साथ जब माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए गया तो बहुत खुश था। लेकिन जब वहाँ जाकर देखा कि मंदिर तो बहुत ऊँचाई पर है तो थोड़ा सा दुखी हुआ। चुन्नू के पापा मुकेश शर्मा ने जब अपने चुन्नू को निराश देखा तो कहा, ‘कोई बात नहीं चुन्नू…… हम, तुम्हें पिट्ठू पर बैठाकर ऊपर ले चलेंगे और माता के दर्शन करवाएंगे।’ चुन्नू खुश हो गया। तभी उसके पापा ने पिट्ठू को बुलाया। पिट्ठू एक मुसलमान था। चुन्नू के पापा ने उससे मोलभाव किया तो बात आठ सौ रुपए में बन गई अर्थात् चुन्नू को पिट्ठू ऊपर पहाड़ी पर ले जाएगा और लाएगा।
पिट्ठू बहुत ही विनम्र और सज्जन था। जब चुन्नू के पापा ने पिट्ठू के कंधों पर बैठने के लिए चुन्नू से कहा तो पहले तो चुन्नू ने नानुकुर की बाद में रोने लगा।
पिट्ठू सहम गया और उसने चुन्नू से पूछा, ‘क्यों बेटा, मुझसे कैसा डर। मैं आपको बिल्कुल परेशान नहीं होने दूंगा। तुम मुझे घोड़ा-घोड़ा कहना और मैं दौड़ता हुआ चलूंगा।’
लेकिन चुन्नू पिट्ठू के कंधे पर बैठने को बिल्कुल राजी नहीं हुआ बल्कि रोने और लगा।
चुन्नू के मम्मी पापा परेशान होने लगे। भीड़ इकट्ठी हो गई थी।
चुन्नू को चुप करते हुए चुन्नू के पापा ने बहुत प्यार से जब चुन्नू से कारण पूछा तो चुन्नू ने बताया, ‘पापा ये पिट्ठू आतंकवादी है….ये……..ये न………पापा……..ये मुसलमान है……….सब मुसलमान आतंकवादी होते हैं………ये पाजामा भी ऊँचा सा पहने है…………..पापा………..पापा….. इसके पास जरूर कहीं न कहीं वेपन भी होगा। ये मुझे रास्ते में मार देगा।’
पिट्ठू और जुड़ आई भीड़ सन्न रह गई थी चुन्नू की बात सुनकर। मासूम बच्चा इतनी गहरी बात कैसे जानता है। भीड़ में से निकलकर एक महिला ने चुन्नू से आखिरकार पूछ ही लिया, “बाबू, आपको ये बातें किसने बताई।”
चुन्नू ने अपने पापा अर्थात् मुकेश शर्मा की ओर अंगुली उठा दी थी।

शर्म

लड़की रोज कॉलेज जाती और अपने घर लौटकर आती। लड़की पढ़ने में जितनी होशियार और बुद्धिमान थी उससे भी ज्यादा सुंदर थी। गांव था इसलिए दबंगई भी चरम पर थी। सो कुछ दबंग लड़कों की नजर में चढ़ गई। लड़कों ने पहले तो नाजायज़ कोशिश की लेकिन जब दाल न गली तो अपने असली रूप में आ गए। और एक दिन कॉलेज से लौटते समय गोधूली के वक्त लड़की को पकड़ लिया और सभी ने मिलकर उसका सामूहिक बलात्कार किया। बाद में उसे छोड़कर भाग गए।
लड़की ने हिम्मत की और अपने घर लौट आई। पूरी बात अपने परिवार-वालों को बताई। परिवार-वालों ने थाने में रिपोर्ट लिखवाई।
मीडिया वालों को पता चला तो एक मीडियाकर्मी भी आ धमकी और लड़की से बोली, ‘एक बाइट दे दो।’ लड़की ने हाँ में सिर हिला दिया था।
मीडियाकर्मी ने लड़की की पहचान छुपाने के लिए उसे अपना स्कार्फ दे दिया जिसे वह अपने गले में लटकाए हुए थी।
लड़की ने पूछा, ‘ये क्यों।’
‘ इसे अपने चेहरे पर डाल लो या लपेट लो ताकि लोग आपको पहचान न पाएं। आपको भी शर्म न महशूश हो।’ मीडियाकर्मी का तर्क था।
लड़की ने स्कार्फ गोल घुमाकर हवा में लहरा दिया और बोली थी, ‘मैं ऐसे ही इंटरव्यू दूंगी। रही बात शर्म की तो शर्म मुझे नहीं बलात्कारियों को आनी चाहिए।’
और उसने चेहरे को माइक के सामने कर दिया था।

गद्दार

भंते जी अपनी पूरी अश्वशक्ति से चीख रहे थे, ‘इन हिंदुओं ने हमारे मठों को ढहाया है। हमारे तथागत की मूर्तियों को तोड़ा है। ये विनाशक हैं। इन्हें तो सबक सिखाना ही होगा। इन्हें हम बौद्ध अनुयायी कभी स्वीकार नहीं करेंगे। ये हमारे दुश्मन हैं। वक्त आ गया है
इनसे सीधे और आमने-सामने लड़ा जाए।’ और लगभग हाँफते हुए शांत हो गए थे।
ये एक सादा समारोह था। अन्य लोगों के बोलने के पश्चात भंते जी बोल रहे थे। मैं भी इस कार्यक्रम का हिस्सा था। नहीं रहा गया मुझसे सो मैं बोला था, ‘भंते जी।’
‘जी’
‘एक बात पूछनी थी आपसे।’
‘निःसंदेह पूछो।’ वे बोले थे।
‘क्या भगवान बुद्ध ने कभी किसी को बुरा कहा। हिंसा, युद्ध की बात कही। किसी का अपमान किया। मुझे लगता है आपको भी नहीं करनी चाहिए। आपको मैत्री और शांति फैलानी चाहिए और तथागत को हर घर- हर देहरी तक ले जाना चाहिए।’ जितना जानता था सो मैंने कह दिया था।
भंते जी ने पहले तो मुझे घूरा फिर लोगों की ओर देखा, फिर चीखे थे, ‘ये आदमी तुम्हारे समाज का नहीं हो सकता। ये गद्दार है। इसे निकालो।’
इसके पहले कि लोग मुझे भगाते, मैं वहाँ से चल दिया था।

सभी तस्वीरें गूगल से साभार

डॉ0 पूरन सिंह
संप्रति : भारत सरकार में संयुक्त निदेशक के पद से सेवानिवृत
संपर्क :  9868846388

रॉंग नंबर

रुचि की सहेली दिव्या ब्रिटेन से लौटी तब से मिलने के लिए बेचैन थी। बेचैन होने का कारण था रुचि का फोन पर अपनी शादी तय होने की बात शेयर करना। रुचि की एक ही तो बचपन की सहेली है दिव्या, जिससे वह अपने मन की हर बात शेयर करती है। खुद रुचि भी तो बहुत बेचैन थी दिव्या मिलने को। जब दिव्या की शादी हुई तब भी वह कहाँ जा पाई थी उसकी शादी में! तब उसका पीएचडी का वायवा जो था। जिंदगी का, पढ़ाई का आखिरी पड़ाव और सहेली की शादी। बहुत पीड़ित हुई थी रुचि उस वक़्त। उसने गिफ्ट जरूर भिजवा दिया था लेकिन मन उसका सहेली की शादी में ही लगा रहा था। शादी हुई तो दिव्या का पति उसे ब्रिटेन ले गया। दरअसल वह ब्रिटेन में ही जॉब कर रहा था। हालाँकि बीच में वीजा के चलते दिव्या एक बार वापिस आयी भी लेकिन समय की कमी और ससुराल की व्यस्त जिंदगी के चलते रुचि से नहीं मिल पाई थी।
इस बीच रुचि का पीएचडी का रिजल्ट भी निकल चुका था और उसने इधर-उधर अप्लाई करना भी शुरू कर दिया था। जॉब का अभी कुछ संयोग नहीं बन पाया था। रुचि थोड़ी परेशान जरूर थी लेकिन विचलित नहीं हुई थी। इस बीच रुचि के लेखन की चर्चा भी खूब हुई। उसकी पहचान एक बेहतरीन रचनाकार के रूप में होने लगी। लेखन की कोई विधा उससे अछूती नहीं रही। काव्य की कोई विधा हो या कथा-कहानी की, वह लगभग हर विधा का ज्ञान रखती। पीएचडी का विषय भी बहुत अलग था। उपन्यासों में शैक्षणिक विमर्श को लेकर विस्तृत अध्ययन । लेख भी सामयिक लिखती, जिनकी चर्चा समीक्षकों-आलोचकों के बीच खूब होती। मुख्य पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं छपती तो उसे आत्मिक सुख मिलता।
पिता को शादी की चिंता और रुचि को नौकरी की लगन। इधर उसकी रुचि लेखन में बढ़ती गयी और अलग-अलग संस्थाओं से निमंत्रण आते। प्रगतिशील विचारों के वाहक पिता ने कभी उसके कार्यक्रमो में आने-जाने पर कोई पाबंदी नहीं लगाई। अब रुचि एक चर्चित नाम हो चुका था।
सुबह ही दिव्या का फोन आया-“हेल्लो, रुचि कहाँ है तू?”
“घर पर ही हूँ। बता, आ गयी तू ब्रिटेन से, मिलने आ रही है या अभी भी…..।”
“हाँ बाबा, आ रही हूँ मिलने। कब से नहीं मिले हम, कितनी बातें हैं जो तुझसे शेयर करनी है। और तुझे भी तो बहुत कुछ शेयर करना है ना।”
“हाँ सखी, बस अब तू जल्दी से हवा बनकर आ जा।”
“आती हूँ , बस जितने समय गाड़ी ड्राइव करने और सड़क पर लगेगा उतना ही इंतज़ार कराऊंगी।”-कहकर दिव्या ने फोन रख दिया था।
रुचि दिव्या का इंतज़ार करने लगी। वह ड्राईंग रूम से आपने रूम मे गयी तो उसे उदासी ने जकड़ लिया।
पिताजी ने घर आकर सूचना दी थी कि रूपेश की फैमिली इंदौर से पटना आ रही है । शाम को यहाँ आएंगे रुचि को देखने। रुचि अगर उन्हें पसंद आ गयी तो वे लोग इसी साल शादी के लिए तैयार हैं। बस एक बार रुचि से मिल लें।

रूपेश और उसका परिवार शाम को करीब पांच बजे रुचि को देखने उनके पटेल नगर स्थित फ्लैट पर पहुँच गया था। प्रथम तल पर था उनका फ्लैट। घुसते ही एक बड़ा सा ड्राइंग रूम। उसके साथ ही डायनिंग हॉल जिससे लगता हुआ कमरानुमा किचेन और किचेन के अगल बगल में दो बैडरूम। एक बैडरूम रुचि का और दूसरा माँ-पिताजी का। आधुनिक जमाने में भी रुचि ने कभी माँ-पिताजी को मम्मा- पापा या डैड सब नहीं कहा था।
रुचि परिवार में इकलौती थी। कोई भाई-बहन नहीं जिससे मित्रवत बातचीत कर सके। या अपने मन की बातें कर सके। रुचि कितनी ही बार खुद को अकेला महसूस करती। जब स्नातक के प्रथम वर्ष में एक क्लासमेट ने उसका रास्ता रोक तंग करना शुरू किया था तब भी उसे बहुत महसूस हुआ कि काश कोई भाई या बड़ी बहन होती तो उसकी इस नाजुक वक़्त में जरूर मदद होती। कितने ही दिन वह वेदना सहती रही थी लेकिन उसकी हिम्मत उस वक़्त माँ-पिताजी से कहने की नहीं हुई । जब पानी सिर से जाने लगा और उसने लगातार कॉलेज की छुट्टी की तो पिताजी ने ही पूछा था -” बेटा, क्या बात है आजकल कॉलेज की छुट्टियाँ हैं या तबियत ठीक नहीं है?”
फूट पड़ी थी रुचि, उसने पिताजी को सुबकते हुए सारी बात कह दी थी। तब पिताजी स्वयं उसके साथ कॉलेज गए थे और उस लड़के को बड़ी नसीहते देकर रुचि से कहा था-“रुचि बेटा, अपनी लड़ाई यहाँ खुद लड़नी पड़ती हैं। अब स्नातक कर रही हो। अब नहीं तो कब बोल्ड बनोगी?”
उस दिन रुचि ने मन में निर्णय लिया कि जीवन में कभी ऐसा दिन नहीं आने देगी जब वह खुद को असहाय समझे और इस तरह उसे पिताजी के सहारे की जरूरत इस तरह पड़े।
रूपेश और उसका परिवार पहुँचा तो उन्हें ड्राइंग रूम में बैठाया गया। पिताजी आधुनिक विचारों वाले व्यक्ति हैं, उन्होंने रुचि को आवाज लगाई। रुचि अंदर से ड्राइंग रूम में आई तो पिताजी ने परिचय कराते हुए कहा-” रुचि बैठो, देखो ये रूपेश हैं, और ये इनके मम्मी और पापा। और ये रूपेश की छोटी बहन विजया। रूपेश के पापा बोले-” अरे हरिमोहन जी आप भी कहाँ इतने औपचारिक हुए जाते हैं, कितनी छोटी थी रुचि तब से हम दोनो परिवारों का मिलना-जुलना है, बस रूपेश और रुचि ही नहीं मिले कभी एक-दूसरे से।”

रुचि ने देखा रुपेश का आकर्षक चेहरा है, साँवल रंग लेकिन नयन-नक्श बहुत ही तीखे। हीरो स्टाइल बाल, लंबे और घुंघराले। ऐसी ही एक छवि तो रुचि ने अपने होने वाले लाइफ पार्टनर की बना रखी थी। जाने क्यों उसे गौर वर्ण लड़के कभी पंसद नहीं आते थे। उसे लगता कि गेंहुआ या साँवला रंग लड़को का कितना मनभावन होता है। एक नजर में ही उसे रूपेश पसन्द आ गया था। उसकी ऑंखें देख रुचि मानो दीवानी हो गयी थी। रुचि को उसकी आँखों में एक आत्मविश्वास दिखा था, एक सच्चाई थी। साथ ही एक गंभीर व्यतित्व नजर आया रुचि को रूपेश के अंदर।

उसने मन ही मन निर्णय कर लिया की ये ही मिले मुझे जीवन साथी के रूप में। रुचि की तंद्रा तब टूटी जब पिताजी ने कहा-” रुचि नौकर चाय रख गया है, प्यालियों में डालकर सर्व करो।”
रुचि उस पल झेंप सी गयी थी-जी” बस इतना ही कह पाई-” जी पिताजी।”
उसे कुछ अंदाजा हुआ जब सबने जोर का ठहाका लगाया। रुचि ने ये देखना जरूरी समझा कि रूपेश भी तो उसकी चोरी पकड़े जाने पर मुस्कुरा तो नहीं रहा। वह रूपेश के चेहरे को देख संतुष्ट हुई कि वह शांत है। चाय का दौर खत्म हुआ तो पिताजी ने कहा-” अरे रुचि जाओ रूपेश को अपना कमरा दिखाओ।”
रुचि ने पुनः मात्र जी पिताजी कहा और रूपेश को उठने का इशारा कर खुद सोफे से उठ खड़ी हुई।
रूपेश रुचि के पीछे-पीछे चल पड़ा। अंदर दाखिल हुआ तो उसकी निगाहें किताबो की रेक पर जाकर स्थिर हो गयी। उसके मुँह से अनायास ही निकल पड़ा- ” पढ़ी हैं ये सब किताबे?”
“जी एकदम पढ़ी हैं, तभी यहाँ रखी भी हैं।”
रूपेश अगले पल निरुत्तर था, आगे क्या बात करें नहीं सूझा था।रुचि का कमरा बड़े करीने से सजा था। एक दीवार पर गिटार टंगा हुआ तो दूसरी दीवार पर हाथ से पेंटिंग की हुई। रूपेश को अंदाजा हो गया जरूर ये पेंटिंग भी रुचि ने खुद बनाई होगी। पूछना चाहता था लेकिन अब पूछने की हिम्मत न जुटा पाया।
रुचि ने कहा-” बैठिए रूपेश बाबु।“
“जी।”- कहकर रूपेश ने कमरे में चारो तरफ नजर दौड़ाई। बेड के साथ एक आरामकुर्सी और एक छोटी रीडिंग टेबल के साथ लकड़ी की आकर्षक कुर्सी। उसने कुर्सी को खींचा और उस पर बैठ गया।
दोनों ने एक दूसरे के डेट ऑफ बर्थ से लेकर हॉबी और न जाने क्या-क्या पूछ डाला। साहित्य राजनीति, फ़िल्म उद्द्योग, सब विषयों पर बात हुई। कुछ ही पलों में दोनों को लगा ही नहीं था कि ये पहली मुलाकात है। और वह शादी के लिए एक-दूसरे को पसंद/नापसन्द के लिए एक दूसरे के आमने-सामने बैठे हैं।

रूपेश ने अपनी पसन्दगी उसके सामने जाहिर की तो उसने भी अपने इरादों से अवगत करा दिया।
रुचि की बात करने के अंदाज और उसकी साहित्य की समझ को देखकर रूपेश दंग हुए बिना न रहा। सिर्फ भारतीय साहित्यकारों पर ही नहीं विदेशी साहित्यकारों पर भी वह गहरी समझ रखती थी। रुपेश खुश था कि उसका विवाह ऐसी लड़की से होगा जो मात्र घरेलू नहीं है, न ही सास- बहू सीरियल तक उसका ज्ञान सीमित है। उसे लगा कि रुचि के साथ देश-विदेश की राजनीति से लेकर समाज में घटित घटनाओं आदि पर खूब चर्चा हो सकेगी। उसे लगा कि एक परफेक्ट पत्नी की तलाश आज खत्म हुई।
अभी बाते हो ही रही थी कि पिताजी का बुलावा आया गया। डिनर का समय था। नौकर सारा खाना तैयार कर चुका था। डिनर टेबल पर ही शादी की रजामंदी की बात होने लगी। रूपेश के परिवार ने शगुन के तौर पर इक्यावन सौ रुपये देकर अपनात की रस्म पूरी की। डिनर के बाद वह लोग चले गए।

रुचि की चेतना डोर बेल बजने से लौटी। वह दरवाजा खोलने के लिए मेन गेट पर पहुँच दरवाजे को खोलती है। सामने दिव्या खड़ी है। दिव्या को देख रुचि दौड़कर गले लगा लेती है। दोनो सहेलियां अंदर आती हैं। दिव्या से दोस्ताना इस कदर घना है कि उसके साथ ड्राइंग रूम में बैठने की बाध्यता एकदम नहीं है। रुचि और दिव्या सीधे बैडरूम का रुख करते हैं।
चाय पानी की औपचारिकता के बाद रुचि ड्राई फ्रूट्स का डिब्बा खोल दिव्या के सामने रख देती है। दिव्या काफी देर तक अपनी और पति हिमांशु की बाते सुनाती रही। ब्रिटेन की बातें। टेम्स नदी के किनारे टहलने की बाते और हिमांशु के साथ करीब होने की बातें। साथ ही आने वाली खुशखबरी के अहसास की बातें। दिव्या अपनी भावनाओं में इतना बह गई कि उसे अहसास ही नहीं रहा कि रुचि भी बहुत कुछ अपने अंदर छुपाये है जो वह कहना चाहती है। जैसे ही उसे अहसास हुआ उसने कहा-“रुचि ये सब तो हुई मेरी कहानी अब अपना बता मेरी जान।,”

रुचि ने दिव्या से कहा-” दिव्या तुम्हें तो मालूम ही है कि मुझे साहित्य से कितना प्रेम है और अब तो रुचि भट्टाचार्य साहित्य की दुनिया में एक स्थापित नाम है। देश के कोने-कोने से इनविटेशन आते हैं। ये तय करने में भी कई बार परेशानी होती है कि किस कार्यक्रम में शिरकत करूँ और किसमें न आ पाने असमर्थता प्रकट करूँ।”
“ये सब बातें जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। मुझे ख़ुशी है कि मेरी सहेली आज साहित्य में एक चर्चित नाम है।“
“हाँ दिव्या ये सच है लेकिन एक सच और भी है, इस समाज का सच, इस पुरुषसत्ता में जकड़े समाज का सच, आधुनिक होती दुनिया के दकियानूसी होने का सच।“-कहते-कहते रूचि का चेहरा गंभीर हो गया। दिव्या उसे ध्यान से सुन रही थी।
रूचि ने कहना शुरू किया-“मेरी प्रसिद्धि का असर पूरे पटना में ये है कि यहाँ का हर चर्चित साहित्यकार रूचि भट्टाचार्य को नाम से जानता है, यहाँ की हर छोटी बड़ी संस्था के कार्यक्रम का इनविटेशन मुझे होता है, या फिर इवेंट ऑर्गनाइज करने का दायित्व मुझ पर होता है, नवहदित लेखकों में कोई ऐसा नहीं जो तुम्हारी इस सखी से परिचित न हो और उससे सलाह न लेता हो।“
ये सब सुन मुझे फक्र हो रहा है रूचि, लेकिन इन सब बातों से तेरी परेशानी का क्या सम्बन्ध?”
“सम्बन्ध है सखी, मेरी प्रसिद्धि की ही वजह से पिछले हफ्ते मुझे देश की सर्वव्यापी और सत्तारूढ़ पार्टी की तरफ से एक बड़ी इवेंट ऑर्गेनाइज करने का मौका मिला, उस पूरी इवेंट को डिजाईन करने, आगंतुकों के चयन से लेकर साहित्यकारों के नाम तक चयन करने का अधिकार मुझे दिया गया। दिव्या ये इवेंट मेरी लाइफ का सबसे बेहतरीन मौका है। इस एक इवेंट से मैं राज्य स्तर से अन्तर्देशीय स्तर पर चर्चित हो जाऊँगी।“
“ये तो ख़ुशी की बात है लेकिन मुझे तेरी सब बातें अभी भी पहेलीनुमा लग रही हैं।“
नौकर चाय रखकर चला गया, रूचि ने कहा-“पहले तू चाय पी फिर मैं तुझे बताती हूँ कि मैं किस जद्दोजहद से गुजर रही हूँ?”
दोनों सहेली चाय के कप उठा चुस्कियां लेने लगी थी। सर्द शाम में चाय की गर्मी भी रूचि के दिमाग के सुन्न पड़े तारों को गर्माहट नहीं दे पा रही थी। रूचि फिर विचारों के अंधड़ में घिर गयी।
पीएचडी के दौरान वह डाटा इकठ्ठा करने के सिलसिले में एक संगठन के लोगो को इंटरव्यू करने गयी तो उसे पता चला कि इस संगठन की एक इकाई सवर्जन राजनीतिक दल के नाम से रजिस्टर्ड है जिसका उद्देश्य सामाजिक और राजनैतिक जागरूकता फैलाना है। संगठन के कार्य करने के तरीके और उद्देश्यों से वह इतना प्रभावित हुई कि वह खुद उसकी सक्रिय सदस्य बन गयी।
पंचायत चुनाव के समय उन्होंने एक इवेंट पर काम करना शुरू किया, घर-घर जाकर प्रचार करना कि किसे वहट करें, किसे नहीं करें? और वहट क्यों करें? रूचि का विचार था कि हमें नोटा का प्रचार करना चाहिए। संगठन में काम करते हुए उसकी दिलचस्पी महिलाओं के विचार जानने की हुई, उसने महिलाओं से जब किसी व्यक्ति या पार्टी के लिए वहट करने के विचार जानने चाहे तो उसे जानकर आश्चर्य हुआ कि अधिकतर महिलाओं का कहना था कि जिसे उनके परिवार के पुरुष चाहेंगे वे उसी को वहट करेंगी। उसने आश्चर्य जताया-“ अरे वहट आपका निजी अधिकार है और गोपनीयता उसकी जरुरी शर्त है, आप इसे कैसे किसी के कहने से वहट कर सकते हो? ये सही नहीं है।“
लेकिन उन महिलाओं का तर्क था कि हमारे परिवारों में यही होता आया है यहाँ हर निर्णय पुरुष ही लेते हैं। बड़ा आश्चर्य ये कि पढ़ी लिखी बेटियां-बहुएं भी इसे सही ही मान समर्थन में थी। तब रूचि ने अपने प्रयासों से पढ़ी लिखी लड़कियों को समझाना शुरू किया कि कैसे चुनी हुई सरकार की नीतियों से हमारा जीवन प्रभावित होता है? उसकी मेहनत धीरे-धीरे असर लायी और अमुख चुनाव में नोटा ने रिकॉर्ड बना सबको चौंका दिया था, इस एक प्रयास से रूचि का रुतबा इतना बढ़ा कि उसे पार्टी-संगठन में बड़े पद दिए जाने की वकालत होने लगी। रूचि संगठन की सबसे सशक्त कार्यकर्त्ता थी। उसको किसी बड़े चुनाव में बतौर प्रत्याशी उतारने के कयास भी लगाये जाने लगे थे। हर मीटिंग, मार्च में उसी की चर्चा होती। अचानक हुई एक घटना के चलते उसने खुद को संगठन से अलग कर लिया था, किसी वरिष्ठ साथी के साथ उसका नाम जुड़ने से वह आहत हुई थी, अंततः उसने खुद को सब चीजों से अलग कर लिया था।
चाय का कप ख़त्म कर दिव्या ने देखा रूचि कहीं खो गयी है। उसने कहा-“रूचि तुम्हारी चाय ठंडी हो गयी, तुम कहाँ खोयी हो?”
रूचि जैसे तन्द्रा से बाहर आई और उसने कहा-“ दिव्या चाय के साथ-साथ मेरे कितने अरमान यूँ ही ठन्डे हो गए। सत्तारूढ़ दल द्वारा दिए गए इस मौके को मैंने रुपेश से शेयर किया, मुझे लगा कि रुपेश इस बात से बहुत खुश होगा, मैं अपनी सी ख़ुशी को रुपेश से बांटे बिना खुद को नहीं रोक पाई थी।“
“रुपेश खुश ही हुआ होगा, इस बात को सुन?” -दिव्या ने कहा।
“काश ऐसा हो पाता, उसने जो कहा उसे सुन मेरे हृदय को बड़ा आघात पहुँचा। उसने कहा, रूचि जिस पार्टी ने तुम्हें इवेंट ऑर्गेनाइज करने का जिमा सौंपा है, व्यक्तिगत रूप से मुझे वह पार्टी पसंद नहीं है इसलिए तुम उस इवेंट को नहीं कराओगी।“
“लेकिन वह ऐसा कैसे कह सकता है”-दिव्य ने कहा।
“बस दिव्या यही एक बात है, जिसके चलते मुझे झटका लगा, मैं उम्मीद नहीं कर सकती थी, जो मेरा जीवनसाथी बनने जा रहा है वह मुझे मेरे जीवन के एक बड़े इवेंट के लिए मात्र इसलिए मना कर सकता है क्योंकि उसे अमुख पार्टी पसंद नहीं है।“
“फिर तुमने की सोचा तुम इस इवेंट को करोगी?”-दिव्या ने आगे पूछा।
“इवेंट तो मुझे करनी ही है लेकिन उससे पहले मैंने एक बड़ा फैसला लिया…” ।
“क्या?”
“मैंने कल ही रुपेश को फोन करके बोला-रुपेश मैं तुमसे शादी नहीं कर सकती, और मैंने उसे साफ-साफ शब्दों में स्पष्ट वजह भी बताई कि पढाई-लिखाई से मॉडर्न, कपड़ों से मॉडर्न लेकिन सोच से इतने रुढ़िवादी व्यक्ति को मैं अपना जीवनसाथी नहीं चुन सकती जो अपने विचार अपने पार्टनर पर थोपे, मैंने उसे कहा कि अच्छा हुआ शादी से पहले तुम्हारे विचारों का पता चल गया, वर्ना मेरी तो दुनिया ही तवाह हो जाती।बता दिव्य मैंने सही किया न?“
“जब निर्णय हो ही गया तो अब ये क्या सोचना कि निर्णय सही हुआ या गलत? घर में सब लोगो की क्या राय है?”
“पिताजी और माँ कभी अपने फैसले मुझ पर थोपते नहीं, उन्हें मेरा ये निर्णय भी सहज रूप से स्वीकार है।“
अभी दोनों सहेलियाँ बात ही कर रही थी कि रूचि के मोबाइल की घंटी बजी, उसने कॉल को पिक किया। उधर से आवाज आई-“ रुपेश हियर।“
रूचि के होठो ने बुदबुदाया रॉंग नंबर। कॉल डिस्कनेक्ट हो चुकी थी।

सन्दीप तोमर
पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखन।
gangdhari.sandy@gmail.com

प्रधानमंत्री का ‘अधूरा सच’ व संवैधानिक इतिहास, संवैधानिकता और भारतीय संविधान

26 जनवरी को हमारे संविधान को लागू हुए 75 वर्ष पूरे होने जा रहे है। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि 26 जनवरी के दिन ही 1950 को भारतीय संविधान लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या था।

दिसंबर 1928 में कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने एक प्रस्ताव पेश किया,जिसमें कहा गया कि अंग्रेज दो साल के भीतर भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान करें। सुभाष चंद्र बोस और पंडित नेहरू ने अंग्रेजों को दिए गए समय पर आपत्ति जताई और पंडित नेहरू पूर्ण स्वतंत्रता की मांग के पक्षधर थे। परिणामस्वरूप दिसंबर 1928 के अधिवेशन में कांग्रेस ने आम सहमति से निर्णय लेते हुए ब्रिटिश सरकार को अल्टीमेटम दिया कि यदि सरकार 31 दिसंबर 1929 तक डोमिनियन स्टेटस को स्वीकार नहीं करती है, तो कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित करेगी। इसके एक साल बाद दिसंबर, 1929 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। ‘पूर्ण स्वराज’ को भारतीयों के लिए एकमात्र सम्मानजनक लक्ष्य घोषित करने का सम्मान पंडित जवाहरलाल नेहरू को मिला, जिन्होंने इस विचार को लोकप्रिय बनाने के लिए सबसे ज्यादा काम किया था। कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 31 दिसंबर 1929 की आधी रात को भारी भीड़ के सामने रावी के तट पर पूर्ण स्वतंत्रता का झंडा फहराया। साथ ही कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वतंत्रता या पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। इसके बाद से ही 26 जनवरी को भारत में हर वर्ष पूर्ण स्वतंत्रता या पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाने लगा था। आजादी के बाद 26 नवंबर, 1949 में संविधान बन जाने के बाद भी देश ने 2 महीने का लंबा इंतजार करके 26 जनवरी 1950 को ही संविधान इसलिए लागू किया, ताकि भारतीय संविधान और भारतीय सवतंत्रता आंदोलन के मध्य संबंध को सदैव जीवित रखा जा सके।

संविधान-निर्माण: इतिहास और प्रक्रिया

भारतीय संविधान का निर्माण मात्र 2 साल, 11 महीने और 18 दिन में नहीं हुआ, बल्कि यह एक लम्बी प्रक्रिया थी जो सदियों से चली आ रही थी। इसकी शुरुआत उस दिन हो गयी थी जिस दिन भारत को अंग्रेजों से मुक्त करने के लिए और भारत के नागरिकों को एक संवैधानिक व उत्तरदायी सरकार देने के लिए भारतीयों ने संधर्ष शुरू किया था। उसी संघर्ष के अंदर संविधान निर्माण की प्रक्रिया छिपी हुई है। 19 वीं सदी के आरम्भ में सामाज और धर्म सुधार आंदोलनों में सामाजिक न्याय व बराबरी के विचार स्पष्ट देखने को मिलते हैं। आगे चलकर जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जब जन्म हुआ तो भी इसकी पहचान की जा सकती है। कांग्रेस शब्द में एक राजनीतिक चेतना छिपी है, क्योंकि अमेरिकी संसद का निचला सदन कांग्रेस के नाम से जाना जाता है। 1920 में गाँधी जी द्वारा कांग्रेस के संविधान में संशोधन के बाद से पार्टी का संगठन चुनाव के सिद्धांत पर चलने लगा। अगर देखा जाये तो प्रदेश कांग्रेस समितियों द्वारा चुनी गयी अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी लोकसभा के सामान थी, तो कार्यसमिति मंत्रिपरिषद के सामान और कांग्रेस अध्यक्ष प्रधानमंत्री के सामान। अत: संविधान में भारत सरकार का संसदीय स्वरुप ब्रिटिश संसद की नक़ल नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रिय आंदोलन की परम्परा को नियमित करने वाला था।

संविधान सभा

ब्रिटिश प्रकाशकों और नव साम्राज्य्वादियो द्वारा सफलतापूर्वक इस झूठ को गढ़ा गया कि भारत का संविधान और संवैधानिक सरकार अंग्रेजों द्वारा 1861 से 1935 तक किये गए संवैधानिक पहलों की परिणीति थे। परन्तु यह एकतरफा पक्ष होगा। जैसा कि गाँधी जी ने कहा था की “स्वतंत्रता मुफ्त में नहीं मिलती, उसे आपको अपने स्रवश्रेष्ठ रक्त से खरीदना पड़ता है।” और सत्यता भी यह है कि राष्ट्रवादियों की मांगे और अपेक्षाएं अंग्रेजों के संवैधानिक सुधारों से कहीं आगे थी। 1895 में एक होमरूल बिल आया था। इसकी रचना किसने की इसके पर्याप्त प्रमाण नहीं है। परन्तु यह माना जाता है कि एनी बेसेंट के विचार और तिलक की प्रेरणा से यह निर्मित हुआ था, जिसमें बहुत से मानव-अधिकारों, जैसे कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता , कानून के समक्ष समानता, संपत्ति का अधिकार आदि की मांगों को रखा गया था। अंग्रेज इन मांगो को अपने आखरी सुधार, अर्थात 1935 के एक्ट, में भी पूरा नहीं कर पाए। असल में भारतीय संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रिय आंदोलन की विरासत को ही भारतीय संविधान का आधार बनाया। उदाहरण के लिए न सिर्फ नेहरू रिपोर्ट में दिए गए 19 अधिकारों मे से 10 अधिकार संविधान में शामिल किये गए, बल्कि भाषायी आधार पर प्रदेशों के पुनर्गठन की दी गयी सलाह को भी मान लिया गया।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने भारतीय राष्ट्र को विश्व स्तर पर अद्वितीय ढंग से परिभाषित किया। 17वीं और 18वीं शताब्दी के बाद से यूरोप में उभरे सभी आधुनिक राष्ट्र- राज्य एक भाषा और एक धर्म पर आधारित थे,इसीलिए अंग्रेजों ने कहा कि भारत कभी भी इतनी सारी भाषाओं और धर्मों वाला राष्ट्र नहीं हो सकता। हमारे राष्ट्रवादी नेताओं या स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिभा एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना करना था जो विविधता का जश्न मनाता हो न कि इसे समस्या के रूप में देखता हो।यह वह अनूठी उपलब्धि है जिसे कुछ सत्तालोलुप लोग अपने राजनीतिक लाभ के लिए तथाकथित हिंदू राष्ट्र के नाम पर नष्ट करने का अधर्म कर रहे हैं। वो इस बात को नकारने की कुचेष्टा कर रहे है कि भारत का राष्ट्र के रूप में निर्माण, भाषा या धर्म के आधार पर पाश्चात्य जगत में हो रहे राष्ट्र निर्माण की अवधारणा से भिन्न था, जो कि हमें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के चरित्र में भी दिखाई देता है।
अगर सवाल उठे कि क्या भगत सिंह सिर्फ सिखों या पंजाब की आजादी के लिए फांसी के फंदे पर झूले थे? क्या अशफाक उल्हा खान की शहादत ओर मौलाना आजाद का संघर्ष सिर्फ मुसलमानो या उत्तर प्रदेश के लिए था? पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने सारी जवानी जेल में संघर्ष करते हुये गुजारी तो क्या सिर्फ पंडितों या कश्मीरियों के लिए? सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का निर्माण क्या सिर्फ कायस्थों या बंगालियों की आजादी के लिए किया था? और सबसे महत्वपूरण महात्मा गाँधी क्या सिर्फ गुजराती अस्मिता की बात कर रहे थे? नहीं, ये सभी अटक से लेकर कटक तक, कश्मीर से लेकर कन्यान्कुमारी तक रहने वाले हर भारतवासी के संवैधानिक मानवीय अधिकारों के लिए लड़े थे।उनकी यही विरासत भारत को एक राष्ट्र के रूप में विविधता में एकता के सूत्र में पिरोती है।

यही विविधता में एकता संविधान निर्माण के दौरान संविधान सभा में देखने को भी मिली थी। 1947 में बंटवारे के बाद संविधान सभा में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों से 229 सदस्य तथा रियासतों से 70 प्रतिनिधि थे। जिनमें महिला सदस्यों की संख्या 15, अनुसूचित जाति के 26, अनुसूचित जनजाति के 33 सदस्य थे। हालाँकि सभा में कांग्रेस के सदस्य बहुमत में थे, लेकिन कांग्रेस पार्टी के भीतर भी बहुत वैचारिक विविधता थी। यही बात पूरी संविधान सभा के बारे में भी कही जा सकती है। जिसमें के.टी. शाह समाजवादी और वामपंथी थे, तो वहीँ इसमें हिंदू महासभा के अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी, ठाकुर दास भार्गव, के.एम. मुंशी जैसे दक्षिणपंथी और मीनू मसानी जैसे उदारवादी भी थे। प्रधानमंत्री जी अपने भाषण में तथ्यों को रखने की बात कर रहे थे। पंडित नेहरू ने भी कहा था कि “तथ्य, तथ्य हैं और आपके नापसंद करने से गायब नहीं हो जाएंगे।” और तथ्य यह है कि इस विविधता में एकता का आधार कांग्रेस को मानते हुए डॉ अम्बेडकर ने संविधान सभा के अपने समापन भाषण में कहा था कि “यदि संविधान सभा भानुमति का कुनबा होती, … और उसमे प्रत्येक सदस्य और गुट अपनी मनमानी करता तो प्रारूप समिति का कार्य बहुत बाधित हो जाता। तब अव्यवस्था के अतिरिक्त कुछ न होता। अव्यवस्था की संभावना सभा के भीतर कांग्रेस की उपस्तिथि से शून्य हो गई, जिसने उसकी कार्यवाईयों में व्यवस्था और अनुसाशन पैदा कर दिया। इसलिए सभा में संविधान के सुगमता से पारित हो जाने का श्रेय कांग्रेस पार्टी को जाता है। “

संविधान का ड्राफ्ट संविधान सभा के अध्यक्ष को सौपते हुए बाबा साहेब डा. अम्बेडकर

यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि धर्म के आधार पर बने पाकिस्तान को आजादी भारत के साथ बंटवारे की नीव पर मिली थी। जब पाकिस्तान ने 1971 में एक बार फिर बंटवारे को झेला तो इसने धर्म की आधारशिला पर बने राष्ट्र की अवधारणा को गलत सिद्ध किया। इसके साथ ही पाकिस्तान को सैनिक तख्तापलट व मार्शल लॉ झेलते हुए संविधान बनाने में 26 साल लग गए। जिसने पुन: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की समावेशी विरासत को सही साबित किया। प्रधानमत्री जी को इतिहास के इस पहलु को भी याद रखना चाहिए कि इसी समावेशी लोकतांत्रिक मूल्य का परिचय देते हुए ही कांग्रेस से वैचारिक मतभेद रखने वाले डॉ अंबेडकर का निर्वाचन क्षेत्र विभाजन के बाद पाकिस्तान में चले जाने पर, कांग्रेस ने अपने सदस्य एम आर जयशंकर से इस्तिफा दिलवा कर, डॉ. अंबेडकर के लिए सीट खाली की। जिससे वो बॉम्बे निर्वाचन क्षेत्र से सदस्य चुन कर पुनः संविधान सभा में पहुंचे। संविधान सभा ने आंबेडकर को मसौदा समिति का अध्यक्ष भी बनाया। डॉ अम्बेडकर ने स्वयं इस पर कहा था कि “संविधान सभा में अनुसूचित जातियों के हितों की रक्षा कराने के अतिरिक्त मैं किसी अन्य महानतर आकांक्षा को लेकर नहीं आया था। मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि मुझे और भी बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी। इस कारण जब मुझे मसौदा समिति में निमंत्रित किया गया तो बड़ा आश्चर्य हुआ। जब इसका सभापति चुना गया तो और भी आश्चर्य हुआ।”

स्त्रियों की भागीदारी के मामले में भारत सबसे आगे

संविधान पर बोलते हुए प्रधानमंत्री अपने भाषण में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने वाला अहम कदम बताकर अपनी पीठ थपथपा रहे थे। पर उन्हें समझना होगा कि महिलाओं की भागीदारी से नहीं, वरन उनकी हिस्सेदारी से बराबरी सुनिश्चित होती है। अपनी स्थापना के मात्र चार वर्ष पश्चात् 1889 ईस्वी के कांग्रेस अधिवेशन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गयी थी। 1889 की कांग्रेस की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि ‘सभा को सुशोभित करने वाली महिला प्रतिनिधियों की संख्या दस से कम नहीं है’। इनमें से एक महिला सार्वजनिक बैठक में पुरुषों द्वारा चुनी गई, जबकि अन्य महिलाएं विभिन्न महिला संघों- ईसाई धर्म संघ, बंगाल लेडीज एसोसिएशन, और महिला आर्य समाज, से सम्मिलित हुई। 1890 के कांग्रेस अधिवेशन के दौरान एक महिला को सम्बोधित करने या अध्यक्ष को धन्यवाद ज्ञापित करने की अनुमति दी गई थी। इस प्रकार कांग्रेस के संगठन तथा आंदोलनों में आरम्भ से ही हर स्तर पर महिलाओं ने न सिर्फ सक्रीय भागीदारी थी, बल्कि आजादी से पूर्व कांग्रेस संगठन में तीन महिलाओं को राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व का अधिकार मिलना लोकतांत्रिक सघर्ष में उनकी मजबूत हिस्सेदारी को भी दिखता है। गौरतलब है कि पश्चिमी देशों की महिलायें जब मताधिकार के लिए लड़ रहीं थी तब कांग्रेस ने एनी बेसेंट को पहली महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में चुना। 1925 में, सरोजिनी नायडू कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी जाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं, जिसमे गांधीजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही,तब ब्रिटेन,अमेरिका जैसे स्वयं को लोकतंत्र का रक्षक कहने वाले देशो की ब्रिटिश लेबर पार्टी,अमेरिकन डेमोक्रेटिक पार्टी जैसे तथाकथित प्रगतिशील दलों में भी महिलाओं को नेतृत्व करने का अधिकार नहीं था।

1942 में नागपुर के अधिवेशन में डा.अम्बेडकर अखिल भारतीय अनुसूचित जाति महिला सम्मलेन की नेताओं के साथ


नारी शक्ति वंदन की बात करने वाले प्रधानमंत्री की पार्टी भाजपा हो या उनकी पुरानी पार्टी जनसंघ,आजादी के बाद से लेकर संविधान की 75 वीं वर्षगांठ तक एक भी महिला को राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में हिस्सेदारी देने में पूर्णतया नाकामयाब रही है, और तो और उनका संरक्षक व पैतृक संगठन आर आर एस में तो आज भी महिलाओं को सदस्य तक बनने की अनुमति नहीं है। यही नहीं पुरुषों के लिए जहाँ राष्ट्रीय ‘स्वयं सेवक’ संघ, वहीँ महिलाओं के लिए राष्ट्रिय ‘स्वयं सेविका’ नहीं बल्कि ‘सेविका’ समिति है। इस अंतर के पीछे क्या सोच है, वो भी स्पष्ट होनी चाहिए। यहाँ यह भी जान लें कि कांग्रेस ने स्वतंत्रता संघर्ष में आधी आबादी को ही नहीं बल्कि अन्तोदय के विचार ने देश के गरीबों को और महात्मा गाँधी के जनांदोलनों ने लाखों अनपढ़ों को भी राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा और हिस्सेदारी दी। इस प्रकार संविधान का मूल आधार बनी जनतंत्र की भावना का संचार कांग्रेस के इसी राष्ट्रीय आंदोलन ने ही किया और परिणामस्वरूप सार्वभौम व्यस्क मताधिकार को बिना किसी बहस के संविधान में जगह मिली। संविधान में दिए गए अभिवक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का मूल भी आजादी के संघर्ष के दौरान भारतीय नेताओं द्वारा प्रेस की आजादी के लिए चलाया गया संघर्ष ही है। जिसमे विशेष रूप से कांग्रेस नेता बाल गंगाधर तिलक का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने अपनी पत्र-पत्रिकाओं के जुझारूपन की भारी कीमत चुकाई।

प्रधानमंत्री का झूठा-सच

प्रधानमंत्री ने देश के संविधान की नींव का समावेशी मूल्य पर होने की बात तो की, पर आज उनके नेतृत्व में देश में चुनावों के दौरान धार्मिक ध्रवीकरण के नारों का नंगा नाच देखने को मिलता है उसे वो कैसे भूल जाते है? डॉ अम्बेडकर का यह चिंता बोध आज प्रासंगिक लगता है, जिसमे उन्होंने कहा था कि, “क्या भारतीय अपने देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे या वे देश के ऊपर पंथ स्थापित करेंगे? मुझे नहीं पता। लेकिन यह बहुत निश्चित है कि यदि इन राजनैतिक दलों ने देश से ऊपर पंथ रखा, तो हमारी स्वतंत्रता को दूसरी बार संकट में डाल दिया जाएगा और संभवत: यह हमेशा के लिए खो जाएगी। इस परिस्थिति में हम सभी को दृढ़ता से हमारे रक्त की आख़िरी बूँद के साथ हमारी स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए।” फिलहाल तो इतना ही कहा जा सकता है कि भारत में आज जो लोकतान्त्रिक मूल्यों का विकृत चेहरा उभर रहा है, उससे हमारे वे मूल्य मर रहे हैं जो गांधी, नेहरू अम्बेडकर और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत ने इस देश को दिए थे। उनके विचार,उनके मूल्य और उनके उद्देश्यों के विपरीत हमारा लोकतंत्र कुछ अंतरविरोधों, कुछ विरोधाभासों और कुछ छद्म नारों तक सिमटता हुआ दिख रहा है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान भारत सरकार इसी समावेशी लोकतांत्रिक विचार पर लगातार आघात कर रही है। आज सरकार विपक्षी दल के नेता राहुल गाँधी जी की आवाज दबाने के लिए बिना प्रयाप्त क़ानूनी अवसर दिए आनन फानन में सदस्यता भंग करने से नहीं चुकती है। किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी एक सशक्त विपक्ष होता है। जहाँ विपक्ष का दायित्व है कि वह जनता की आवाज को सरकार तक पहुचाये, वहीँ सरकार का संवैधानिक दायित्व होता है कि वह विपक्ष के माध्यम से जनता की आवाज को सुने। परतु आज चाहे भारत चीन के बॉर्डर का मुद्दा हो, लद्दाख का मुद्दा हो, मणिपुर का मुद्दा हो, किसानों का मुद्दा हो, महिला पहलवानो का मुद्दा हो, EVM का मुद्दा हो, अडानी का का मुद्दा हो, सरकार खुली बहस तो छोड़िये विपक्ष की आवाज तक दबा देना चाहती है। पिछले दिनों कांग्रेस ने ट्वीट आरोप लगाया कि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्य सभा के सभापति महोदय के सामने कहा कि “जब तक आप लोकसभा में अदानी का मुद्दा उठाएंगे, हम राज्यसभा को चलाने नहीं देंगे और इसमें सभापति महोदय भी शामिल हैं, सभापति महोदय को इसमें अडिग रहना चाहिए।” ऐसे बयान न सिर्फ संवैधानिक पदों की गरिमा पर चोट करते है बल्कि संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति से सदन का भरोसा भी टूटता है और विपक्ष राज्यसभा के सभापति के विरुद्ध पहली बार अविश्वास प्रस्ताव पेश करने को विवश होते है। लोकतांत्रिक संस्थाओं के ऐसे संवैधानिक पदों के प्रति अपेक्षित निष्पक्षता का दरकता भरोसा एवं टूटती मर्यादायें चिंताजनक है ।

प्रधानमंत्री कांग्रेस के राज में विपक्ष की सरकारों के साथ व्यवहार पर जब अंगुली उठा रहे थे, तब भूल गए कि आज विपक्ष दलों की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकारों को राजनीतिक दलों की तोड़-फोड़ जैसे घोर अलोकतांत्रिक तरीकों से विपक्षी सरकारें गिराने का नंगा नाच कांग्रेस शासित कथित 55 साल के राज में कभी नहीं देखा गया। एक दौर वह भी था जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वाजपेयी के नेतृत्व में जनसंघ संसदीय दल के चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग मानते हुए संसद का विशेष सत्र 8 नवंबर को बुलाया, जबकि युद्ध अभी भी जारी था और चीनी भारतीय क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे थे। उस समय वाजपेयी 36 वर्ष क युवा थे, और नेहरू की उम्र उनसे ठीक दोगुनी यानी 72 वर्ष थी। यही नहीं संसद में वाजपेयी की पार्टी सबसे छोटी पार्टियों में से एक थी और नेहरू सरकार को दो-तिहाई बहुमत प्राप्त था।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में यह भी कहा कि कांग्रेस ने करीब छह दशक में 75 बार संविधान बदला गया। वॉट्सअप यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट किसी साधारण व्यक्ति ने यह कहा होता तो बात समझ आती, पर देश के प्रधानमंत्री के मुख से यह बात सुनकर दुखद आश्चर्य हुआ। क्या देश के प्रधानमंत्री इतनी सी बात भी नहीं जानते कि संविधान संशोधन और संविधान बदलना दो अलग बातें हैं? समय की मांग के मुताबिक संशोधन प्रक्रिया से संविधान का सतत विकास होता है और इसके लिए संविधान का अनुच्छेद 368 में संसद को इसमें संशोधन करने का अधिकार भी देता है। संविधान के मूल ढांचें में परिवर्तन को संविधान बदलना कहते है, जिसके लिये लोग ‘चार सौ पार’ मांगते हैं। भारत की जनता ने जहाँ भाजपा 400 पार के नारे पर साधारण बहुमत से भी दूर कर दिया, पर उसी जनता ने बिना 400 पार के नारे के 1985 में श्री राजीव गाँधी को 404 सीटें दे दी थी। राजीव गाँधी ने तब सविधान नहीं बदला, बल्कि पंचायती राज जैसे महत्वपूर्ण संशोधन के साथ संविधान के लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव और मजबूत की थी।

नेहरू-इंदिरा द्वारा संविधान संशोधनों का सच

हमारे प्रधानमत्री का भाषण हो और उसमे पंडित नेहरू न हो ऐसा बड़ा विरले ही होता है। इस बार उन्होंने पंडित नेहरू की चिट्ठी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश के सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था। उनके अनुसार पत्र में कहा गया था, ‘स्थिति अब असहनीय हो गई है। हमें इसका समाधान खोजना होगा, भले ही इसके लिए संविधान बदलना पड़े।’ हालाँकि मैंने जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड द्वारा प्रकाशित मुख्यमंत्रियों को पत्र, खंड 2 (नेहरू, जवाहरलाल, 1889-1964, प्रकाशन तिथि 1986, विषय हिंद स्वराज, नेहरू पत्र) उस पत्र खोजने की कोशिश की। पर पत्र संख्या 46 (पृष्ठ 382) और 47 (पृष्ठ 391) में पहले संशोधन मुद्दे पर चर्चा तो की गई है, लेकिन मैं उस विशिष्ट पंक्ति को नहीं खोज पाई जिसका प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उल्लेख किया था। अब प्रधानमंत्री ने जिस चिट्टी का जिक्र किया, उसे अगर मान भी लें तो भी वो बड़ी ही चालाकी से बात के सन्दर्भ का जिक्र दबा गए। उनकी अधूरी कहानी का अगला अध्याय यह है कि संविधान के लागू होने होने के कुछ महीनों के अंदर ही नए संविधान का हवाला देते हुए ज़मीदारों ने बार-बार केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को अदालत के कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया। संविधान लागू होने के 14 महीनों के अंदर ही अदालतों ने सरकार के ख़िलाफ़ कई फ़ैसले सुना दिए थे। वस्तुतः यह बात अगर कही भी गयी, तो तत्कालीन परिस्थिति में कही गयी और प्रथम संविधान संशोधन 31 (क) व 31(ख) पंडित जवाहरलाल नेहरू सरकार द्वारा जमींदारी प्रथा उन्मूलन के विरोध को समाप्त करने तथा भूमि संबंधी सुधार में आने वाली अड़चनों को दूर करने हेतु किया गया। क्या जमींदारी प्रथा के उन्मूलन को वैधानिकता प्रदान कर देश के आम नागरिक को अधिकार देना प्रधानमंत्री की नज़रों में गलत कदम था? अनुच्छेद 15(4) को जोड़कर सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े लोगो के सम्बन्ध में विशेष कानून निर्माण हेतु राज्य को अधिकार दिया जाना क्या संविधान की सामाजिक न्याय व बराबरी के प्रति प्रतिबद्धता को नहीं दर्शाता है? प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा कि इसी सविधान की देन है कि वे प्रधानमंत्री हैं और यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि गरीबों, पिछड़ों, असशक्त जनता के अधिकारों को बचाये रखने के लिए व संविधान के लोकतान्त्रिक व समावेशी मूल्यों को मजबूत करने के लिए तत्कालीन सरकारों ने आवश्यक संशोधन किये। इसीलिए जो भारतीय संविधान को मानते हैं वे जवाहर लाल नेहरू को माने बगैर नही रह सकते, और जो नेहरू का विरोध करते है वे संविधान को मानने का सिर्फ ढोंग करते है।

जब पत्र का जिक्र चला है, तो एक पत्र महात्मा गांधी की हत्या के बाद 8 जुलाई, 1948 को सरदार पटेल ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी लिखा था। जिसमे उन्होंने लिखा कि – “गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है, इसलिए आरएसएस और हिंदू महासभा का इसमें हाथ है या नहीं, इस बारे में मैं कुछ भी नहीं कहना चाहता। मगर मेरे पहले के बयान इस बात का समर्थन करते हैं कि इन दो संस्थाओं, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के कारण देश में ऐसा वातावरण बना, जिसकी वजह से ऐसी करुण घटना घटी।” गांधी की हत्या के करीब डेढ़ साल बाद तक संघ पर चले प्रतिबंध को सरदार पटेल ने कुछ शर्तों के साथ खत्म कर दिया। प्रोफेसर राजमोहन गांधी ने अपनी पुस्तक ‘सरदार: एक समर्पित जीवन’ में इन शर्तों का जिक्र किया है- “संघ अपना संविधान बनाए और उसे प्रकाशित करे। सांस्कृतिक गतिविधियों में ही संघ काम करे. हिंसा और गोपनीयता का त्याग करे। भारत के ध्वज और संविधान के प्रति वफ़ादार रहने की शपथ ले और लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाए।” ऐसे में सवाल यह भी है कि संघ ने इनमें से कितनी शर्तों का यथावत पालन किया है, यह देखने के लिए “यदि” सरदार जिंदा होते तो क्या करते?

प्रधानमंत्री ने आपातकाल की भी बात की, पर आप यह भूल गए कि भारत के संविधान में 26वें संशोधन के ज़रिए, साल 1971 में ‘प्रिवी पर्स’ को खत्म कर राजशाही की आखरी निशानी को धवस्त करने वाली तत्कालीन प्रधानमंत्री शहीद इंदिरा गांधी ही थी। आपातकाल समाप्त कर फिर से चुनाव करने का निर्णय भी तत्कालीन प्रधानमंत्री शहीद इंदिरा गांधी का ही था। उन्होंने आपातकाल के बाद चुनावी हार को भी गरिमापूर्वक स्वीकार किया। पंडित नेहरू ने, या इंदिरा गांधी ने या राजीव गांधी ने संसद में प्रचंड बहुमत रखते हुए भी कभी विपक्षी दलों से देश को मुक्त करने की मंशा रखने वाला “कांग्रेस मुक्त भारत जैसा” घोर अलोकतांत्रिक नारा नहीं दिया। क्यूंकि विपक्ष के बिना लोकतंत्र नहीं, सिर्फ और सिर्फ तानाशाही ही हो सकती है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 42वां संविधान संशोधन, जिसके तहत प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े गए, विगत कुछ वर्षों में सबसे विवादास्पद रहा। परन्तु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान की प्रस्तावना से धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी शब्द को निरसित करने की याचिकाओं को खारिज करने के फैसले एवं उसके साथ संविधान को लेकर बुनियादी महत्व की टिप्पणियों ने इस अनावशयक विवाद को विराम दे दिया है। बेशक फैसले से संविधान की दार्शनिकता के प्रति आज तक की अपनी राजनीति शास्त्रीय समझ एवं विश्वास की पुष्टि हुई है कि इस संविधान में धर्मनिरपेक्षता, उसका मूल ढांचा है, जो सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के मुताबिक अपरिवर्तनीय है और लोकतंत्र के साथ साथ समाजवाद के अस्तित्व का एकमात्र अर्थ यही है कि हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की शासन व्यवस्था एक लोक कल्याणकारी राज्य व्यवस्था है।

2008 में भी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन, न्यायमूर्ति आर. वी. रविचन्द्रन एवं न्यायमूर्ति जे. एम. पांचाल की पीठ ने एक गैर-सरकारी संगठन की उस मांग को खारिज कर दिया था, जिसमें चाहा गया था कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29 ए(5) से समाजवाद के प्रति निष्ठा की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया जाए। न्यायालय ने तब भी अपने फैसले में कहा कि समाजवाद को वामपंथ की सीमित परिभाषा में रखकर नहीं देखना चाहिए, यह लोकतंत्र का एक पहलू है जो आम लोगों की भलाई से जुड़ा है। सर्वोच्च न्ययायलय के फैसले से संविधान के इन मूल संस्कारों पर सवालिया निशान का स्याह साया फैलाते रहने वाली वह समूची सोच एवं विभाजनकारी विचारधारा फिर से खारिज हुई है, जो डंके की चोट पर धर्मनिरपेक्षता व समाजवाद को हमारे लोकतंत्र में गाली जैसा अवांछनीय विचार बताने के साथ साथ विविधता से युक्त भारत में समावेशी राष्ट्रवाद के स्थापित स्वरूप को नकारते हुए धर्म विशेष के वर्चस्व को ही नहीं, बल्कि पदपादशाही के राष्ट्र निर्माण की वकालत करती रही है।

शपथ लेते हुए बाबा साहेब डा.अम्बेडकर, सामने प्रधानमंत्री नेहरू एवं शपथ दिलाते डा.राजेंद्र प्रसाद

आज जब हम संविधान की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या 1. हम संविधान की प्रस्तावना में निहित सिद्धांतों और मूल्यों का अक्षरशः पालन करते हैं 2. क्या हम संविधान के विभिन्न प्रावधानों का ईमानदारी से पालन कर रहे हैं 3. संविधान द्वारा सृजित पदों के बारे में क्या? क्या वे सभी संविधान में वर्णित अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं? और 4. महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों से जिन प्रथाओं का पालन करने की अपेक्षा की जाती है, उनके बारे में क्या? इस सवालों का निष्पक्ष जवाब ही सविधाननिर्मातों को सच्ची श्रद्धांजलि व सावधानिक मूल्यों के लिए सच्ची निष्ठा व प्रतिबद्धता होगी।

साथ ही हमें नवंबर, 1949 को संविधान सभा में डॉ अंबेडकर ने कहा इस बात को आत्मसात करना होगा, “26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी और सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमारे पास असमानता होगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट और एक वोट एक मूल्य के सिद्धांत को मान्यता देंगे। हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में, हम अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण, एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को नकारते रहेंगे। हम कब तक विरोधाभासों का यह जीवन जीते रहेंगे? हम कब तक अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे? अगर हम इसे लंबे समय तक नकारते रहे, तो हम ऐसा केवल अपने राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डालकर करेंगे। हमें इस विरोधाभास को जल्द से जल्द खत्म करना होगा अन्यथा असमानता से पीड़ित लोग राजनीतिक लोकतंत्र की संरचना को नष्ट कर देंगे जिसे इस सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है।”
(यह आलेख the Mooknayak और स्त्रीकाल पर संयुक्त रूप से प्रकाशित है)