क्या आप जानते हैं कि पुरुषों के अस्तित्व पर खतरा आने वाला है ! मैं भी कहाँ जानती थी ये तो हमारे गूगल बाबा हैं तो बहुत-सी सूचनाएँ बिखेर दिया करते हैं, बस हम कुछ चुन लेते हैं। एक नए शोध अध्ययन के अनुसार USA की कैंसर स्टेट यूनिवर्सिटी की लेटेस्ट स्टडी में पाया गया कि Y क्रोमोसोम जो पुरुषों में पाया जाता है उसका जेनेटिक डाटा यानी जो DNA कोड उस क्रोमोसोम में निहित रहती हैं वे हर आने वाली पीढ़ी के साथ कम होते जा रही हैं जिसमें उसने 97 प्रतिशत डीएनए कोड खो दियें हैं। आपको बता दूँ कि कोई 30 करोड़ साल पहले जब मैमल्स का जन्म हुआ तो X और Y क्रोमोसोम का आकार बराबर था जबकि आज Y अपनी जोड़ीदार X से 3 गुना छोटा हो चुका है, उसने अपने 1438 में से 1393 जींस खो दिए हैं और अब मात्र 3-4% बचे हैं! तो क्या महिलाओं के X गुणसूत्र के जींस में भी ऐसा कोई घातक बदलाव आया है,जी नहीं, बल्कि उनका डीएनए पहले से अधिक मजबूत,दृढ़,स्वस्थ हो रहा है,यानी स्त्रियाँ भी अपने आप को पहले से और बेहतर तरीके से विकसित कर रही है । मैंने पहली और शायद आखिरी बार नौवीं-दसवीं में पढ़ा था कि X और Y गुणसूत्र स्त्री और पुरुष के निर्धारण कारक होते हैं, स्त्री में दो XX जबकि पुरुष में XY यानी एक अतिरिक्त गुणसूत्र Y उसे विशिष्ट बनाता है।आज के शोध बता रहे हैं कि यही Y गुणसूत्र जो पुरुषों के लिंग निर्धारण का कारण बनता है, धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है,और आने वाले कुछ हज़ार या लाखों वर्षों में इसके विलुप्त होने की संभावना है ! जी हाँ संभावना? प्रश्न उठता है कि जिस तरह से Y गुणसूत्र का धीरे-धीरे यह क्षरण हो रहा है तो क्या पुरुष प्रजाति भी विलुप्त हो जाएगी? क्योंकि इस स्टडी का दावा है कि आने वाले 11 मिलियन वर्षों में Y की समाप्ति के बाद सिर्फ लड़कियां पैदा होंगी ! लड़कियों को यह खबर ख़ुशी दे रही है तो लड़कों में हमेशा की तरह इसमें कोई चिंता नजर नहीं आई । ऐसा मुझे कुछ यूट्यूब वीडियोज की टिप्पणियों से समझ आया, हालाँकि मुझे यह चिंता का विषय इस रूप में लगा कि यदि इस खबर के बाद विज्ञान और तकनीक प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने लगेंगी क्योंकि इस क्षेत्र में आज भी पुरुषों का दबदबा है, क्योंकि डरा हुआ असुरक्षित पुरुष जब युद्ध करता है तो सबसे अधिक नुकसान स्त्रियों को ही होता है, इस सन्दर्भ में भी वह किसी भी हद तक जा सकता है, अत: इस शोध के परिणामस्वरूप वास्तविक खतरा पुरुषों के लिए नहीं बल्कि स्त्रियों के लिए है।
इस खबर पर एक जबरदस्त टिप्पणी मिली कि At least feminism won genetically “एट लिस्ट फेमिनिस्ट विन जेनेटिकली” और इसके विरोध में जो उत्तर आए हैं वे आप खुद खोज कर पढ़िए, हालाँकि अगर मैं नहीं लिख रही हूं, तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि “स्त्री विरोधी” ये कमेंट किस हद तक निम्न स्तर तक गए होंगे जिसमें तमाम माँ बहन को विविध कु-विशेषणों से सुशोभित किया गया है। एक टिप्पणी कि ‘तो प्रकृति ने अपना खेल शुरू कर दिया है यानी न्याय ! सदियों से जो X गुणसूत्र को दबाया जा रहा था प्रकृति ने अब Y गुणसूत्र को डराना धमकाना शुरू कर दिया है’। किसी ने मजाक में लिखा है ‘जब तक पुरुष आयोग नहीं बनेगा तब तक Y क्रोमोसोम डर से सिकुड़ता रहेगा’ स्त्री सशक्तिकरण से परेशान एक लड़का लिख रहा है कि ‘चलो अच्छा है भाई लड़कियों की इस मतलबी दुनिया से हमें मुक्ति मिल जाएगी यह एक अच्छी खबर है, क्योंकि पुरुषों की दुर्दशा न सरकार को दिख रही है ना समाज को’। एक अन्य ने लिखा कि यह अच्छी खबर इसलिए भी है क्योंकि लड़कों में हमेशा सबको आज बुराई दिख रही है जब लड़के कम हो जाएंगे तब उन्हें उनका महत्व पता लगेगा’। एक लड़की लिखती है ‘मैं यह कल्पना करती रही हूँ कि इन पुरुषों को स्त्रियों के प्रति बर्बर कुकर्मों की ऐसी सजा मिले, कि इनका विनाश हो, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी, पुरुष न होंगे तो स्त्रियाँ डर में नहीं जियेंगी, लेकिन उसे विश्वास नहीं हो रहा एक अन्य टिप्पणी कि ‘इस कमी को पूरा करने के लिए Y गुणसूत्र लैब में बनने लगेंगे धंधा खूब फलेगा-फूलेगा वे पशुओं तक के Y से मिलावट कर देंगे और जैविक मिलावट… अपराध… विमर्श भी जबर्दस्त होंगें’ इस सन्दर्भ में एक धार्मिक टिप्पणी भी आई कि यह क़यामत के दिन का संकेत है जैसा कि हदीस शरीफ की भविष्यवाणी में बताया है, विज्ञान यह अब बता रहा है लेकिन इस्लाम में 14000 साल ईश्वर के दूत नबी अकरम ने बता दिया था पहले ‘बुक-003-hadith-number-081’ में लिखा गया कि महिलाओं की संख्या में वृद्धि होगी और पुरुषों की संख्या में इतनी कमी आएगी कि एक पुरुष पचास महिलाओं की देखभाल करेगा।मैं गूगल बाबा की शरण में गई तो यह मिला- https://hadithcollection.com/sahihbukhari/sahih-bukhari-book-03-knowledge/sahih-bukhari-volume-001-book-003-hadith-number-081 गीता का उदाहरण देते हुए एक ने लिखा कि ‘यानी लाखो वर्ष बाद न ! तो उस समय कलयुग खत्म होने का समय आ ही जायेगा, तब ईश्वर नई सृष्टि रचेंगे’
हालाँकि मैं इसे इस रूप में समझ पाई कि ‘विशेष होने’ की जो कीमत Y क्रोमोसोम को चुकानी पड़ रही है वहाँ इसे आप उस प्रिविलेज/ विशेषाधिकार के रूप में देखिए जहाँ पुरुष अपने इन अधिकारों का दुरपयोग करता रहा है। मुझे यही समझ आया कि अपने अहंकार, प्रभुत्व की महत्वकांक्षा, लालसा और लालच में अपने डर को छिपाए-दबाए पितृसत्ता सिकुड़ तो रही है लेकिन स्वीकार नहीं कर रही। वास्तव में प्रकृति में जब-जब असंतुलन आता है तो वह विनाश लेकर आती है, लेकिन यह असंतुलन पैदा कौन करता है, हम मनुष्य ही न! पुरुष कहना ज्यादा ठीक होगा। तब प्रकृति खुद-ब-खुद संतुलन बनाने की प्रक्रिया करती है । प्रकृति में बदलावों को आप रोक नहीं सकते , आप बनाते रहिए स्त्री-पुरुष, हिंदू-मुसलमान, वर्णों की तालिका जिसमें ‘हर जाति अपने से छोटी जाति खोज ही लेती है’ । यहाँ हर किसी का अस्तित्व क्षणभंगुर है,जो जन्म लेता है वह मरता भी है उसी का अस्तित्व बचता है जो खुद को विकसित करता है । स्त्री बढ़ रही है, खुद को विकसित कर बेहतर बना रही है जबकि पुरुष स्त्री को बढ़ता और विकसित होता देख द्वेष में कमजोर ही हो रहा है, विज्ञान की यह खोज भी इसी ओर संकेत कर रही है।
अब प्रश्न उठता है कि यह क्षरण X स्त्री के गुणसूत्रों के साथ क्यों नहीं हो रहा,प्रकृति ये भेदभाव क्यों कर रही है? कारण X सिर्फ़ ‘सेक्स-सम्बन्धित’ गुणसूत्र नहीं है X एक सामान्य लेकिन विशेष गुणयुक्त क्रोमोसोम है । स्त्री चाहती भी तो यही है, उसे ‘मानव’ माना जाये सिर्फ सेक्स के आधार पर जेंडर भेद न हो। मेरे लिए यह जानना दिलचस्प था कि हर शिशु पहले X के रूप में ही जन्म लेता है जो Y क्रोमोसोम द्वारा टेस्टोस्टेरोन हार्मोन दिए जाने के बाद में XY पुरुष के रूप में विकसित होता है। इसे इस तरह देखा जा सकता है कि स्त्रियाँ आज घरों से निकलकर हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं अपना विकास कर रही हैं । X जब X के साथ जुड़ते हैं तो वह अपनी जेनेटिक डायवर्सिटी को बढ़ाते हैं इसलिए इवोल्यूशन के साथ अपने को बेहतर अपडेट करते जाते हैं, सम्भवत: इसलिए स्त्रियों में विविधता, बहुरूपता, कुशलता का विकास हो रहा है जबकि Y क्रोमोसोम में जब किसी भी तरह की कोई जेनिटिव खराबी आती है तो वह उसको ठीक न करके बल्कि उतना हिस्सा काट कर, अलग कर देता है। पितृसत्ता की शुद्धतावादी सोच इससे अलग नहीं,जाति बाहर प्रेम करने पर अपने ही बच्चों को मार-काट डालतें है, Y क्रोमोसोम भी उसे अपनी मेमोरी से डिलीट या इरेज़ कर देता है जिसका परिणाम है कि आज Y के पास मात्र 45 एक्टिव जींस रह गए हैं।यानी एक ओर X और स्त्री ने खुद को निरंतर अपडेट किया विकसित किया, Y पुरुष ने अपने को ‘विशेष’ मानकर खुद को अलग-थलग करके न तो खुद अपडेट किया बल्कि सदियों से बनी रूढ़िवादी धारणाओं पर आज तक अड़ा हुआ है,यानी पुरुष के रूप में दादा,पिता बीटा भाई ठीक वही जींस के साथ हमारे सामने आ रहें है बिना किसी नए विचार या नई भावभूमि के जिस पर कुछ नवीन सृजित किया जा सके।
एक जानकारी के अनुसार XY क्रोमोजोम का सिस्टम सभी मैमल्स पर लागू होता है तो क्या सभी मेम्लस प्रजातियों के मर्दों का अस्तित्व खतरे में है? प्रकृति जिसे हम मदर नेचर कह रहे हैं उसे मेल्स से क्या प्रॉब्लम है? क्यों मेमल्स का सॉफ्टवेयर करप्ट हो रहा है? नहीं, यह राहत की बात है कि जापान के स्पिनी रेट्स चूहे और ईस्टर्न यूरोप के माल वाल्स चूहों में एक विशिष्ट विकास देखने को मिला हैं जहाँ Y के विलुप्त होने पर भी उनकी प्रजाति कायम है, लेकिन ठीक वही प्रक्रिया क्या मनुष्य यानी पुरुष प्रजाति पर लागू होगी ? दूसरे शोध बताते हैं कि वास्तव में Y क्रोमोसोम किसी दूसरे गुणसूत्र में विलीन होकर, अपना नया रूप विकसित कर रहा है, अत: ये अनिश्चित काल तक रहने वाला है। पुरुष का Y गुणसूत्र नया पुरुष निर्धारण जीन विकसित कर लेगा तो उसका अस्तित्व बना रहेगा लेकिन जो नया गुणसूत्र विकसित होगा उसमें मर्दानगी जैसा कुछ नहीं बचेगा उसका रूप-स्वरूप बिलकुल भिन्न होगा । मनुष्य की प्रजाति में एक नया मानव यानी जो पुरुष तो होगा लेकिन वह शायद जिसे हम स्त्रैण कहते हैं वही होगा! तो स्त्रीवाद भी यही तो चाहता है ।
उफ़्फ़ उफ़्फ़ उर्फ़ी जावेद से ‘साहित्य’ को बचा लिए जाने पर शिवानी सिद्धी की टिप्पणी
हां, तो फिर साहित्य के साहिबान या कहें साहित्य पर मेहरबान और हमारे साहित्य के कद्रदान हज़रात आप सभी को जानकर बड़ी खुशी होगी कि आखिरकार साहित्य को बचा लिया गया! उफ्फ़ जान ही अटकी हुई थी इस उर्फी में तो! पल-पल की ख़बर देने वाले आजतक का प्रभाव कुछ था यूं था कि हर कोई अपनी वाल पर टीका टिप्पणी से चिंता का ‘रेड-कार्ड’ फहराए हुए था, लाज़िमी भी है। तभी तो ऊर्फी जावेद जैसे गैंग्रीन से हमारा हिन्दी साहित्य बच गया अब वह ‘साहित्यतक’ के ओटीटी प्लेटफॉर्म मंच पर आ रही है। यह बात अलग है कि हमारा हिंदी साहित्य दुःखरन मास्टरों द्वारा जाने कब से “घुन खाए शहतीरों” पर लिखा जा रहा था, पढ़ाया जा रहा था, लेकिन पढ़ा भी जा रहा था? इसका कोई रिकॉर्ड मेरे पास नहीं है। महादेवीजी का एक पुराना इंटरव्यू कई समय तक घूमा, जिसमें वे चिंता जता रही हैं कि “इतना लिखा गया… इतना लिखा गया… मानवीयता पर लेकिन मानवीयता सिरे से गायब है”! और आज जबकि डिजिटल युग में जब चारों ओर सेल्फी देवता, हां जी देवी भी पर अभी पितृसत्ता की जड़े बाकी जो हैं, खैर सेल्फियों का बोलबाला है, हमारा साहित्य भी स्क्रीन का सहारा ले रहा है , एक समय था जब साहित्य समाज का दर्पण था लेकिन आज नहीं है घोषणा नहीं कर रही! आईना देखता ही कौन है, आप किसी को आईना दिखा भी नहीं सकते, धर लिए जाओगे वैसे पहले भी आईना देखना पसंद नहीं था किसी को । अब सब खुद को कैमरा में देखते हैं, यह जानते हुए भी कि कैमरा झूठ बोलता है । आईने की तरह कैमरा सच बोल ही नहीं सकता। हाँ तो, बात तो उर्फी की चल रही है, तो अभी कुछ समय पहले ‘पाठक क्या पसंद करते हैं ‘ मैं एक बड़े इतिहासकार लेखक ने हिंदी साहित्यकारों पर ‘एलिट’ होने का (सही ) आरोप लगाया और इसका जीता जागता उदाहरण प्रस्तुत किया उन्हीं के बग़ल में बैठे साथी ‘प्रोफेशनल लेखक’ (उन्होंने खुद को कहा था) वे पीयूष मिश्रा से निजी मुलाक़ात के अनुभव पर एक सार्वजनिक टिप्पणी करते हैं- उनके अनुसार क्योंकि ‘पीयूष मिश्रा एक एक्टर है (कलाकार नहीं) इसलिए उनकी पुस्तक ज्यादा बिकती हैं’। हो सकता है, अब आप कहें मैं तो शब्द पकड़ रही हूं। पर हिंदी लेखक जब कलाकार या अभिनेता के स्थान पर ‘एक्टर’ शब्द का इस्तेमाल कर रहा है तो कहीं ना कहीं वह उसे निकृष्ट घोषित करने में लगा है। फिर उर्फ़ी जावेद तो ‘एक्टर’ भी नहीं मानी जाती, हमारी मीडिया उसे ‘सड़कछाप छपरी’ कहती है! अब आप जावेद अख़्तर के साथ फ़ोटो खिंचवाएंगे तो क्या उनके समकक्ष हो जायेंगे।
वास्तव में इसमें कोई दो राय नहीं कि शुद्धतावादी का आग्रह लिए हुए हिंदी पट्टी का लेखक आज भी साहित्य-समाज को अपनी ही तरह बौद्धिक मान कर चलता है जैसे कि हमारे सुप्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, आदरणीय आचार्य आलोचक ने कहा था कि ‘मैं अपने पाठकों से कुछ अतिरिक्त बौद्धिकता की उम्मीद करता हूँ’। एक तो इन हिंदी विभागों के आलोचकों ने साहित्य को इतना सजा-धजा कर (काव्य-शैली कलात्मक सौंदर्य शास्त्र छंद, अलंकार ) प्रस्तुत किया कि आम पाठक वहाँ झाँकने से भी डरता है जैसे कि ऊँचे-ऊँचे शोरूम में एक गरीब(आप हाशिए के लोग पढ़ सकते हैं) आदमी झाँकने से भी डरता है कि उन्हें खुद का “सौंदर्य शास्त्र” लिखना पड़ा! वैसे ऊर्फी जावेद की भी क्या गलती? वो तो अपनी राह चली जा रही है! ये एलीट वर्ग जहाँ थोड़ा-सा अपने से विशेष लोगों को देखता हैं तो चौंक जाता है, उसे स्वीकार नहीं कर पाते बेचारे नहीं (मैं इसे कदापि हीनता-ग्रंथि नहीं कहुंगी ) फिर चाहे पीयूष मिश्रा हो या फिर कुमार विश्वास। इन्होंने तो आज तक दिन-रात गुनगुनाते रहने के बावजूद फ़िल्मों के खूबसूरत गीतों को कभी भी साहित्य के अंतर्गत नहीं माना ।
आज तक से याद आया कि बात तो “आजतक” पर होनी चाहिए थी, गाज़ गिरी उर्फी पर,गिरनी ही थी उसके पास दो-दो विशेषताएँ हैं- एक तो वह उर्फी नामक स्त्री है ; हाल ही में एक बहुत प्रसिद्ध पत्रिका के संपादक ने गार्जियन के हवाले से लिखा था कि ‘स्त्रियों की रचनाओं को सिर्फ 19% लेखक पुरुष पढ़ते हैं’। जबकि राजेंद्र बाला के जमाने से ही हमारे भीतर स्त्री रचनाशीलता को समझने की बुद्धि ही विकसित नहीं हुई अरे, हिन्दी साहित्य के कई कई इतिहास गवाह है कि वहाँ स्त्रियों को कितनी जगह मिली है? दूसरे उर्फ़ी के नाम के आगे ‘जावेद’ लिखा हुआ है ,करेला और नीम चढ़ा! चलो, खैर मानाओ कि अब वह आजतक में नहीं आ रही बल्कि आजतक के ओटीटी प्लेटफॉर्म मंच पर आ रही है, पर क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म का कोई यथार्थ नहीं है ? जी नहीं ,नहीं ही है शायद (?) वह तो आभासी दुनिया है वहां तो कैमरा अपनी आँख से दुनिया दिखाएगा न, कैमरा जो सच नहीं बोलता? पर क्या सचमुच?
हमने ‘वैशाली की नगरवधू’ आम्रपाली के विषय बहुत बार सुना है और पढ़ा भी है; लेकिन जब मैंने आम्रपाली के तथागत बुद्ध के शरणागत होने के एपीसोड को पहली बार यू-ट्यूब पर सुना तो कई सवालों ने मेरे मन-मस्तिष्क पर दस्तक दी; जैसे किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध ‘नगर वधू’ कैसे बनाया जा सकता है? उसे सार्वजनिक उपभोग की वस्तु यानी एक वेश्या बनाकर उसकी जिंदगी से खिलवाड़ कैसे किया जा सकता है?’ ऐसे अनेक सवालों ने मुझे बेचैन किया और यह निर्णय लेने पर बाध्य किया—‘क्यों न समय संज्ञान के अपने अंतिम संपादकीय (समय संज्ञान फाउंडेशन की कार्यकारिणी और संपादक का कार्यकाल दो वर्ष है) को आधी आबादी यानी स्त्री अस्मिता पर केंद्रित किया जाए? इसलिए हफ्तों की वैचारिक जद्दोजहद के बाद मेरा प्रतिरोध ‘गिद्ध संस्कृति के विरुद्ध गौरैया की गुहार’ शीर्षक से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।
जब मैंने सरसरी तौर पर गूगल को खंगाला तो पाया—प्राचीन काल से आज तक चली आ रही स्त्री दोहन की परंपरा के लिए किसी न किसी रूप में मंदिर/धर्म व शाही दरबारों का वर्चस्व व अय्याशी जिम्मेदार है। वैशाली की नगर वधु ‘आम्रपाली’ इसकी एक कड़ी मात्र है। इस ‘गिद्ध संस्कृति के चलते गौरैया, मौजूदा संदर्भ में ‘आम्रपाली’ को अपनी खूबसूरती की कीमत वैशाली की नगरवधू यानी वेश्या बनकर चुकानी पड़ती है। गौरतलब है—साधारण जन इस संस्कृति में वर्चस्ववादी समूह/समाज के इशारों पर नाचने वाली कठपुतली जैसा रहा हैऔर आज भी ऐसा ही कुछ है इसलिए आम्रपाली को नगर वधू बनाया जाना बाध्यकारी था। इसके प्रतिरोध में आम्रपाली ने राज-पुरुषों के सामने उसे वैशाली की नगर वधू बनाने वाले कानून को ‘धिक्कृत’ कहा। ऐसा कहकर उसने सिद्ध कर दिया कि वह सुन्दर और साहसी ही नहीं, बुद्धिमती भी थी।’ गौरतलब है, सुंदरता, साहस और बुद्धिमता एक ऐसा कॉकटेल है, जो स्त्री और दलित-शोषित समाज के लिए हमेशा से जीवन-मरण का प्रश्न रहा है। स्त्री का जींस पहन लेना, अंतर्जातीय विवाह की बात करना, छोटा-मोटा सौंदर्य-प्रसाधन का प्रयोग आदि भी उसके लिए बवाल-ए-जान हो सकता है। ऐसे ही दलित समाज के पुरुषों का शादी के वक्त घोड़ी पर बैठना,मूँछ रख लेना, घोड़े पर बैठना वगैरा-वगैरा आज भी गिद्ध संस्कृति के चलते उनकी ‘छाती पर सांप लोटने’ जैसी श्रेणी में आता है।
‘वैशाली की नगरवधू’ के लेखक आचार्य चतुरसेन ने अपनी सारी रचनाओं को रद्द करते हुए अपनी इस रचना को एकमात्र घोषित करते हुए इसकी भूमिका में लिखा है—’इस उपन्यास का उद्देश्य ‘‘आर्यों के धर्म,साहित्य, राजसत्ता और संस्कृति की पराजय और मिश्रित जातियों की प्रगतिशील संस्कृति जिसका प्रतिनिधित्व वैशाली करती है, जिसमें गणतंत्र है, चुनी हुई राज्य-परिषद का मत उसके लिए कानून है, की विजय दिखाना है, जिसे छिपाया जाता रहा है।’ दूसरे वे बताते हैं—मगध आर्य जाति का प्रतीक है, साम्राज्य (वादी) है। उसमें राजतंत्र है। राजा की इच्छा ही वहाँ का कानून है।…यह आर्यों की पुरानी नीचता है। सभी धूर्त कामुक आर्य अपनी काम वासना-पूर्ति के लिए इतर जातियों की स्त्रियों के रेवड़ों को घर में भर कर रखते हैं। लालच-लोभ देकर कुमारियों को ख़रीद लेना, छल-बल से उन्हें वश में कर लेना, रोती-कलपती कन्याओं का बलात हरण करना, मूर्च्छिता-मदबेहोशों का कौमार्य भंग करना, यह सब धूर्त आर्यों ने विवाहों में सम्मिलित कर लिया। फिर बिना ही विवाह के दासी रखने में भी बाधा नहीं। इस कड़ी में अति तो तब हो जाती है जब हम उस समय के उपलब्ध साहित्य में अजातशत्रु को आम्रपाली के प्रेमियों और अजातशत्रु के पिता बिंबिसार को भी गुप्त रूप से उसके प्रणयार्थी के रूप में पाते हैं। कुछ रचनाओं में ये भी वर्णित है कि अजातशत्रु के पुत्र और बिंबिसार के पौत्र उदयभद्र को भी आम्रपाली से प्रणय करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।’
इसके विपरीत आचार्य चतुरसेन अनार्यों की श्रेष्ठता के बारे में बताते हैं—’महावीर और शाक्य पुत्र गौतम ने आर्यों के धर्म का समूल नाश प्रारम्भ कर दिया है। उन्होंने नया धर्म-चक्र प्रवर्तन किया है जहाँ वेद नहीं हैं, वेद का कर्त्ता ईश्वर नहीं है, बड़ी-बड़ी दक्षिणा लेकर राजाओं के पापों का समर्थन करने वाले ब्राह्मण नहीं हैं। ब्रह्म और आत्मा का पाखण्ड नहीं है। उन्होंने जीवन का सत्य देखा है, वे इसी का लोक में प्रचार कर रहे हैं। ’हमारा सवाल आज भी वहीं खड़ा है, जहां आम्रपाली निराश, हताश और बेबस खड़ी थी। वह अपने देश से प्यार करती थी। वह अपने प्रेमी हर्ष देव (कई जगह हम पुष्पक कुमार लिखा पाते हैं) के साथ शादी करना चाहती थी। किसी सार्वजनिक संपत्ति बनाए जाने और भौतिक संपदा के सम्मोहन से दूर वह एक सीधा-सादा जीवन जीना चाहती थी।यथोक्त के आलोक में देखा जाए तो आज आम्रपाली की जगह दिल्ली से मणिपुर तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक, न जाने कितनी गौरैया मौजूद हैं जो गिद्ध संस्कृति की शिकार हैं; और सामान्य जीवन जीने से महरूम हैं। हमारा सवाल है कि ये गिद्ध संस्कृति के संवाहक कौन हैं-आर्य, अनार्य, दोनों या कोई और? क्या गणतंत्र को रोंदने वालों की पहचान नहीं होनी चाहिए?
चलिए! अब थोड़ा पीछे महाभारत काल की ओर चलते हैं। अगर हम महाभारत में गिद्ध संस्कृति के पोषक तथाकथित ऋषि-मुनियों के सैंकड़ोंकामुक उद्धरणों और पशुओं से इनके अप्राकृतिक यौन संबंधों को दरकिनार कर सिर्फ भीष्म, कौरवों, पांडवों से जुड़े कुछ प्रकरणों तक सीमित रहें तो हर स्तर पर गिद्ध संस्कृति ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की संवाहक नजर आती है। भीष्म द्वारा जबरन हरण करके लाई गई काशी नरेश की तीनों पुत्रियों में से दो पुत्रियों अम्बिका और अम्बालिका (अम्बा वापस चली जाती है) का विचित्रवीर्य से विवाह करा दिया जाता है। गौरतलब है—’न तो विचित्रवीर्य ने उन्हें स्वयंवर में जीता था और न ही उन्होंने विचित्रवीर्य से स्वेच्छा से शादी ही की थी। यानी भीष्म इन दोनों बहनों को जबरन व एक प्रकार से खैरात में अपने अयोग्य व पौरुष विहीन भाई विचित्रवीर्य को दे देते हैं। परिणामस्वरूप, अम्बिका और अम्बालिका के साथ ‘सात वर्ष तक विषय सेवन करते रहने के कारण भरी जवानी में विचित्रवीर्य को क्षय हो जाता है और बहुत चिकित्सा करने पर भी वह चल बसता है।’ यहां भीष्म महान के कारण तीन मासूम राजकुमारियां गिद्ध संस्कृति का शिकार हो जाती हैं।
महाभारत में कुंती और पांडु के पुत्र स्वाभाविक शारीरिक संबंधों से नहीं होते। इनका कोई पुत्र वायु से, कोई सूर्य से, कोई चन्द्र से, तो कोई इन्द्र से पैदा होता है। इसी प्रक्रिया के अनुकरण के तहत माद्री को अश्विनी कुमारों को याद करना पड़ता है और नकुल और सहदेव पैदा हो जाते हैं। गिद्ध संस्कृति के चलते महाभारत में कई-कई पत्नियां रखने का रिवाज रहा है। उदाहरण के लिए ‘विचित्रवीर्य की दो, पांडु की दो, अर्जुन की चार (द्रोपदी, उलूपी, चित्रांगदा और सुभद्रा) और कृष्ण की सोलह हजार।’ इसके विपरीत द्रोपदी के पांच पति होने की विद्रूपता और उसे जुए में दांव पर लगाना इस संस्कृति के विचित्र प्रमाण हैं। दासियों को भोगना भी इस संस्कृति की विशेषता रही है। बानगी के लिए ‘जिन दिनों गांधारी गर्भवती थी उन्हीं दिनों एक वैश्य कन्या उनकी सेवा में रहती थी और उसी के गर्भ से धृतराष्ट्र के यहां युयुत्सु नाम का पुत्र हुआ था।’विदुर का जन्म और सुदेष्णा द्वारा द्रोपदी को कीचक के पास भेजा जाना, सब इसी संस्कृति के पोषक हैं, जहां स्त्री इंसान नहीं, सिर्फ उपभोग की वस्तु है।
इस कड़ी में ‘धडिचा प्रथा’ पर भी विचार किया जा सकता है। सैमुअल दास के अनुसार—‘पढ़ने-सुनने में भले ही यह अजीब और चौंकाने वाला लगे, लेकिन शिवपुरी में आज भी महिलाएं वस्तुओं की तरह खरीदी-बेची जाती हैं। पहले यहां बरसों शिवपुरी में ‘धड़ीचा प्रथा’ रही है, जिसमें स्टाम्प पर लिखा-पढ़ी से युवतियों-महिलाओं का सौदा होता था। हालांकि अब यह कुप्रथा काफी हद तक बंद हो गई है, लेकिन युवतियों को खरीद कर घर बसाने की कुरीति जारी है। जिले के करीब 30 फीसदी लोगों की अघोषित ससुराल ओडिशा, बिहार और महाराष्ट्र हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की बेटियों को दलाल के माध्यम से लोग यहां खरीद कर लाते हैं। फिर इन महिलाओं के साथ जुल्म और दर्द की दास्तां शुरू होती है। जिम्मेदार ऐसे मामलों में जानकर भी अनजान बने हुए हैं।’ इस मेले को ‘सिद्धेश्वर बाण गंगा मेला’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह हर साल फरवरी महीने में इन दो मंदिरों के आसपास आयोजित किया जाता है। आनंद सोलंकी इसे ‘द्रोपदी प्रथा’ कहते हैं जो भारत के कुछ जगहों में अब भी है, जैसाकि हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले और उत्तराखंड के कुछ इलाकों में। इस प्रथा को लेकर विचार विभिन्न हैं, लेकिन कुछ लोग इसे परिवार में एकता और सामंजस्य बनाने के रूप में देखते हैं।इस संस्कृति को समझने के लिए एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार—‘युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ’ नामक शीर्षक के तहत उपलब्ध दिल दहला देने वाली जानकारी पर गौर करें तो पाते हैं—’…मुख्य रानी ने राजा की साथी पत्नियों से दया की भीख माँगी। रानियाँ मृत घोड़े के चारों ओर मंत्र पढ़ते हुए और पुजारियों के साथ अश्लील संवाद करते हुए घूमती रहीं। फिर मुख्य रानी को मृत घोड़े के पास संभोग की नकल करते हुए रात बितानी पड़ी और उसे कंबल से ढक दिया गया। अगली सुबह, पुजारियों ने रानी को उस स्थान से उठाया।’ इस संबंध में ठीक से कुछ कहा नहीं जा सकता कि ऐसे प्रकरण कितने प्रतीकात्मक हैं और कितने यथार्थपरक; लेकिन अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख रामायण में भी मिलता है, जो स्त्री को गिद्ध संस्कृति के पंजों में कैद गौरैया को तड़पने के लिए छोड़ देता है।
जब रामायण का जिक्र आ ही गया है तो यह मुद्दा भी विचारणीय हो जाता है कि दशरथ की भी तीन रानियां थी। यहां पुत्रों का जन्म किसी सूर्य या चंद्र देव से न होकर फल खाने से हो जाता है; और रघुकुल वंश और इसकी रीत ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ इतनी प्रबलता से आगे बढ़ जाते हैं कि इक्कीसवीं सदी के टीवी सीरियलों, फिल्मों, प्रवचनों और संसद तक में इनकी गूंज बार-बार सुनाई देती है। लेकिन जहां तक मेरी समझ है, कैकेयी ने अपने वचन के तहत दशरथ से राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा था और राम ने उसे पूरा भी किया था। लेकिन चौदह साल बाद दशरथ और रानी कैकेई एक साथ मौजूद नहीं थे जो राम के लिए पुन: किसी नए वचन की रूपरेखा बनाकर राम को राजा बना पाते1 लेकिन राम फिर भी राजा बने। ऐसे में राम का पुन: राजा हो जाना, वचन का पालन करने की नहीं,वचन तोड़ने की श्रेणी में आता है। जहां तक भरत का सवाल है, वह अपनी नैतिकता व भाई के प्रति सम्मान के चलते राम को राज्य लौटाने की कितनी भी जबरदस्त पेशकश कर सकता है,लेकिन राम का राजा बनना, भले ही यह रघुकुल ही क्यों न हो,यह किसी भी कुल की रीत की श्रेणी में नहीं आता है। ऐसी परिस्थितियों के चलते शूर्पणखा के साथ लक्ष्मण का प्रकरण और सीता का त्याग यानी वनवास, क्या गिद्ध संस्कृति के प्रतिमान नहीं हैं?कहने की जरूरत नहीं,जिस प्रकार आम्रपाली की तबाही के पीछे मंदिर/धर्म और शाही दरबारों से जुड़ा वर्चस्ववादी वर्ग गिद्ध संस्कृति का संवाहक रहा है, वही वर्चस्ववादी वर्ग रामायण व महाभारत में स्त्री की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है, क्या नहीं?
गिद्ध संस्कृति की पोषक एक अन्य प्राचीन प्रथा ‘देवदासी’ प्रथा है। धर्म और आस्था के नाम पर एक प्रकार से स्त्री को वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेला गया। पुजारी द्वारा इनसे शारीरिक संबंध बनाने के पीछे तर्क है कि इससे उनके और भगवान के बीच संपर्क स्थापित होता है।’ नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU), मुंबई और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ (TISS), बेंगलुरु ने ‘देवदासी प्रथा’ पर दो नए अध्ययन किए, इनके अनुसार—’देवी/देवताओं को प्रसन्न करने के लिये सेवक के रूप में युवा लड़कियों को मंदिरों में समर्पित करने की यह कुप्रथा न केवल कर्नाटक में बनी हुई है, बल्कि पड़ोसी राज्य गोवा में भी फैलती जा रही है। नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) के अध्ययन की हिस्सा रहीं पाँच देवदासियों में से एक, ऐसी ही किसी कमज़ोरी से पीड़ित पाई गई। NLSIU के शोधकर्ताओं ने पाया कि सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिए पर स्थित समुदायों की लड़कियाँ इस कुप्रथा की शिकार बनती रहीं हैं, जिसके बाद उन्हें देह व्यापार के दल-दल में झोंक दिया जाता है।’
देह व्यापार के दलदल में झोंकना, इन्हें आम्रपाली से भी बुरे हालात में झोंकना है, क्योंकि आम्रपाली को उसकी तबाही के बदले असीम भौतिक सुख-सुविधाओं का जिक्र मिलता है। लेकिन देवदासियों का न सुंदरता से संबंध नजर आता है और न ही यह प्रतीत होता है कि उनकी अस्मिता के लुटेरे ऐसे रईसजादे होते हैं, जो उनपर अकूत संपत्ति लुटाते हैं। इन अध्ययनों में देवदासी कुप्रथा के खत्म न होने के कारणों के बारे में बताया गया है—’यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 और किशोर न्याय (JJ) अधिनियम, 2015 में बच्चों के यौन शोषण के रूप में इस कुप्रथा का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है। भारत के अनैतिक तस्करी रोकथाम कानून या व्यक्तियों की तस्करी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2018 में भी देवदासियों को यौन उद्देश्यों हेतु तस्करी के शिकार के रूप में चिह्नित नहीं किया गया है। अध्ययन ने रेखांकित किया है कि समाज के कमज़ोर वर्गों के लिये आजीविका के स्रोतों को बढ़ाने में राज्य की विफलता भी इस प्रथा की निरंतरता को बढ़ावा दे रही है।’ ऐसे में देवदासी प्रथा की मौजूदगी पुख्ता करती है—’इक्कीसवीं सदी भी गिद्ध संस्कृति के समर्थन में है और गौरैया की पीड़ा का निवारण उसकी प्राथमिकता नहीं है, क्या है?
इस कड़ी में प्राचीन काल से चली आ रही सती प्रथा को भी गिद्ध संस्कृति की रोशनी में परखने की जरूरत महसूस हो रही है। इस संबंध में एक तर्क यह दिया जाता है कि जब हिन्दू राजा इस्लामिक आक्रमणकारियों से हार जाते या मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे तो रानियां अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए अपने आपको पति की चिता में झोंक देती थी। इस संबंध में एक बड़ा उदाहरण चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी का आता है। इस संबंध में एक उदाहरण शिव और सती के संबंध में भी आता है। सती के पिता दक्ष अपनी पुत्री सती और शिव से विवाह से प्रसन्न नहीं थे; इसलिए उनके निरादर का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे। इस तिरस्कार से आहत सती ने एक दिन यज्ञ की अग्नि में कूद कर आत्मदाह कर लिया था। ’गौरतलब है—’पहले यह स्वैच्छिक बताया जाता था लेकिन कालांतर में यह एक प्रथा और रिवाज बन गया।’ इस प्रथा को लेकर मेरे मन-मस्तिष्क पर एक प्रश्न दस्तक देता है—‘पति की मृत्यु के बाद जब पत्नी सती हो जाती थी तो उनकी संतान के भविष्य के बारे में इस प्रथा के ठेकेदारों ने कभी सोचा या नहीं? अगर मृतक दंपति की संतान पुत्री है, तो आक्रमणकारी से उसकी सुरक्षा कैसे होती थी? पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाने के बावजूद स्त्री के सती होने का बवेला यदा कदा आज भी क्योंउठ खड़ा होता है? मुझे इसमें ‘गिद्ध संस्कृति’ की खुराफात की बू आती है; जाहिर है यह प्रथा अलग से शोध व इसके निवारण के लिए अतिरिक्त कदम की मांग करती है।
मुझे लगता है सती प्रथा की जुड़वां बहन यानी दुल्हन के आत्मदाह या जबरन दाह पर भी दृष्टिपात किए जाने की जरूरत है। इसके मूल में दहेज प्रथा गौरैया की जान की दुश्मन बनी है। दुल्हन को जलाने के प्रचलन को समझने के लिए अवनीतालखानी की ‘कमरे में हाथी नियंत्रण से बाहर है’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट बताती है—’भारत जैसे अत्यधिक पितृसत्तात्मक समाज में, एक महिला की भूमिका उसके जन्म से पहले ही परिभाषित हो जाती है, जो अंततः उसे पुरुषों से कमतर बनाती है; क्योंकि उसे एक बोझ और ‘खाने के लिए एक अतिरिक्त मुंह’ के रूप में देखा जाता है, एक आर्थिक दायित्व के रूप में उसकी स्थिति इस विचार को बढ़ावा देती है कि पुरुष, जिन्हें भौतिक संपत्ति माना जाता है, महिलाओं के साथ अधीनस्थ का व्यवहार कर सकते हैं। एक बार जब एक महिला शादी कर लेती है, तो वह अपने पति और उसकी इच्छा से बंध जाती है; क्योंकि ‘समाज अपने पति की आज्ञाकारिता को अनिवार्य करता है’।…उपभोक्तावाद ने भारत जैसे देशों को लालची बना दिया है। इस वजह से, दहेज का उपयोग उच्च सामाजिक-आर्थिक स्थिति प्राप्त करने के साधन के रूप में किया जाता है। जैसे-जैसे स्थिति लगातार बढ़ती जाती है, सामाजिक सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने के लिए दुल्हन के दहेज की मांग बढ़ती जाती है।’ कह सकते हैं गिद्ध संस्कृति का पोषक ‘दहेज’ ही गौरैया की सांसों की संख्या या स्थाई सुकून तय करता है।
अपने विश्वगुरु भारत में डायन-शिकार भी एक प्राचीन प्रथा है, जिसका उल्लेख प्रारंभिक संस्कृत ग्रंथों में डायन (चुड़ैलों) के रूप में मिलता है। एक आंकड़े के अनुसार 2000 से 2021 के बीच डायन के नाम पर जो हत्याएं हुई हैं, उनकी संख्या 3077 बताई गई है। इन हत्याओं के पीछे जो एक सामान्य पैटर्न नजर आता है, उसके अनुसार जादू-टोना से आरोपित यानी डायन के नाम पर बेहद क्रूर यातनाओं (इरादतन यहां यातनाओं का उल्लेख नहीं किया जा रहा है) व हत्या की शिकार स्त्रियां आमतौर पर बुजुर्ग हैं, निचली जाति व आर्थिक रूप से कमजोर यानी हाशियाकृत समाज से आती हैं। अक्सर ‘चुड़ैल’ बनाने के पीछे केकुछ हिडन कारणों में प्रमुख, ज़मीन व संपत्ति हड़पना, निजी रंजिश का प्रतिशोध, यौन संबंधों को ठुकराए जाना आदि हैं। इन हत्याओं के पीछे शिक्षा, सामाजिक लाभ व स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव आदि अंतर्निहित कारणों में शुमार हैं।
एक जानकारी के अनुसार ‘कुछ नारीवादी शिक्षाविदों ने तर्क दिया है कि ग्रामीण भारतीय समाजों की पितृसत्तात्मक संरचना के लिए खतरा पैदा करने वाली महिलाओं को अपने अधीन करने की अंतर्निहित इच्छा आधुनिक समय में डायन-शिकार के अस्तित्व का एक प्रमुख कारक है। उदाहरण के लिए, तन्वी यादव का तर्क है कि आरोपी चुड़ैलों के लिए शारीरिक और मानसिक दंड के क्रूर तरीके, जैसे कि पिटाई, नग्न परेड और लिंचिंग का इस्तेमाल जानबूझकर उन महिलाओं को आतंकित करने और चुप कराने के लिए किया जाता है, जिन्होंने अन्यथा पितृसत्तात्मक मानदंडों को चुनौती दी हो या उनके खिलाफ आवाज उठाई हो। शिखा दास ने यह भी नोट किया कि युवा, स्वतंत्र और दृढ़ इच्छा शक्ति वाली विधवाओं को उनकी स्थिति की महिलाओं के लिए पारंपरिक अपेक्षाओं से बाहर कदम रखने के लिए दंडित करने के तरीके के रूप में चुड़ैल करार दिए जाने की अधिक संभावना है।’ भले ही आज गिद्ध हमारे आसपास से विलुप्त नजर आते हैं लेकिन उनकी संस्कृति प्राचीन काल से लेकर इक्कीसवीं सदी के हर पड़ाव पर बराबर मौजूद हैं; और गौरैया को हलाल करने का कोई अवसर नहीं छोड़ती।
गिद्ध संस्कृति की प्राचीनता से एक कदम और वर्तमान की ओर बढ़ाते हैं तो हमें स्तन न ढकने देने का क्रूर नियम सामने आता है। स्तन ढकने के लिए स्तन-टैक्स के भुगतान की नंगई सामने आती है और सामने आती है नंगेली जैसी वीरांगना। बात उस समय की है जब केरल के बड़े हिस्से में त्रावणकोर के राजा का शासन था, जिसमें जातीय दबंगई के चलते उनके समाज की स्त्रियां अपने स्तन ढक सकती थी; मगर हाशियाकृत समाज की स्त्रियों को यह अधिकार नहीं था। इसके पीछे गिद्ध संस्कृति की मानसिकता बताती है कि दलित-शोषित समाज की स्त्रियों के साथ खुलेआम नंगी आंखों से सामूहिक बलात्कार, बच्चे से लेकर बूढ़े तक, कोई भी और कभी भी कर सकता था। जाहिर है, ऐसे बलात्कार छिपकर जबरन किए जाने वाले अन्य बलात्कारों की पुख्ता जमीन भी तैयार करते रहे होंगे। इसे नंगई, बेशर्मी और पशुता की पराकाष्ठा न कहें तो क्या कहें?
जुर्म सहने की कोई न कोई सीमा होती है और अंतत: प्रतिरोध होना भी तय होता है। आखिर एडवा जाति की स्त्री नंगेली ने स्तन ढककर क्रूर व संवेदनहीन सिस्टम को चुनौती दी। उससे टैक्स की मांग की गई; लेकिन नंगेली ने इसे ठुकराते हुए कहा—’अपने शरीर की इज्जत करना, उसे ढकना या खुला रखना, यह उसका निजी मसला है। जब अन्य वर्ग की महिलाओं को यह अधिकार है कि वे खुद को अपने हिसाब से सहेजें तो फिर हमें यह अधिकार क्यों नहीं?’ इस साधारण से तर्क यानी एक स्वाभाविक अधिकार की मांग को कुचलने के लिए नंगेली पर टैक्स बढ़ा दिया गया और सजा देने की चेतावनी भी दी। बात आगे बढ़ गई और अंतत: नंगेली घर के अंदर गई और फ़रसे से अपने स्तन काट कर अधिकारी को दे दिए। इस संबंध में मणियन कहते हैं—’नंगेली के इस बलिदान से तत्काल तो कुछ नहीं बदला, यह एक घटना थी और उसे घटना के तौर पर ही देखा गया, पर जब अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर कब्जा किया तो स्तन-कर को समाप्त कर दिया और फिर हर वर्ग की महिला को स्तन ढकने का अधिकार मिल गया।’ अगर अंग्रेजी सरकार ऐसा नहीं करती—गिद्ध संस्कृति के संवाहकों की नैतिकता व संवेदनशीलता कभी नहीं जागती क्या? इस प्रश्न के जवाब में ‘हां’ कहना आसान नहीं है; क्योंकि यह संस्कृति अपनी दबंगई व संवेदनहीनता के दम पर किसी न किसी रूप में आज भी जिंदा है।
नंगेली के बरअक्स यदि हम पर्दा प्रथा को देखें तो गिद्ध संस्कृति की कुछ अलग ही तस्वीर सामने आती है। एक मत के अनुसार—’इस प्रथा की शुरुआत भारत में 12वीँ सदी से मानी जाती है। इसका ज्यादातर विस्तार राजस्थान के राजपूत जाति में था।’इस संबंध एक अन्य मत है—’कुछ विद्वानों का मानना है, महिलाओं को उत्पीड़न से बचाने के लिए पर्दा अस्तित्व में आया। लेकिन बाद में इसने स्त्री की गतिशीलता और स्वतंत्रता को सीमित कर अपने आधीन बनाए रखने के षडयंत्र का रूप ले लिया; और इसे धर्म का संरक्षण भी हासिल हो गया। इस्लाम के आगमन के पश्चात 19वीं शताब्दी में पर्दा प्रथा पूरे भारत में वर्चस्ववादी जातियों को गहना हो गई। इस प्रथा का नकारात्मक पक्ष जो इसे गिद्ध संस्कृति के शरणागत करता है, वह है—’यह प्रथा स्त्री की मूल चेतना को अवरुद्ध करती है। यह उसे गुलामों जैसा अहसास कराती है। जो स्त्रियां इस प्रथा से बंध जाती हैं। वे कई बार इतना संकोच करने लगती हैं कि बीमारी में भी अपनी सही से जांच नहीं कराती और जान से हाथ तक धोना पड़ता हैं।’
जहां तक पर्दा प्रथा की जकड़न के ढीले होने का प्रश्न है, इसके पीछे भूमंडलीकरण का बढ़ता प्रभाव है; न कि पितृसत्ता की सोच का लचीलापन। जिस हरियाणा में स्त्री को परंपरागत पोशाक पहनने के लिए मजबूर किया जाता था, वहां परिस्थितियों का दबाव इतना हावी हुआ कि हरियाणा की अग्रणी महिलाओं में आजकल जींस, स्लीवलेस कुर्ती/टी-शर्ट, मिनी स्कर्ट व स्पोर्ट्स ब्रा आदि का चलन काफी बढ़ गया है। महिलाओं के खेलों में भाग लेने की प्राथमिकता ने घूंघट प्रथा को हतोत्साहित किया है। लेकिन ऐसा नहीं है कि तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। गिद्ध संस्कृति के पैरोकार आज भी महिलाओं की अस्मिता पर होने वाले हमलों के लिए गाहे-बगाहे महिलाओं के परिधानों पर उंगली उठाते हैं; और इसके खिलाफ मुहिम चलाते हैं। आज भी इसके पीछे का हिडन ऐजेंडा नारी की गतिशीलता और स्वतंत्रता को बाधित करना है, जो गिद्ध संस्कृति के वर्चस्व को सुनिश्चित करता है। लेकिन स्त्री की नजर में यह ऐजेंडा अब हिडन नहीं रह गया है और इसके विरुद्ध प्रतिरोध बराबर जारी है।
गौरैया की गरिमा को तार-तार करने वाली गिद्ध संस्कृति की एक अन्य प्रथा ‘बहू जुठाई’ के रूप में जानी जाती है, जो रमणिका गुप्ता के एक कहानी संग्रह का नाम भी है। ‘बहू जुठाई’ कहानी के संबंध में एक समीक्षात्मक टिप्पणी सामने आती है, इसके अनुसार—’नई नवेली दुल्हन को बहू जुठाई की रस्म निभानी पड़ती है। उसे अपनी पहली रात ठाकुर के घर में बितानी पड़ती है। यह स्थिति उस देश में है, जहाँ नारी की पूजा होती है। यदि कोई विरोध करता है, तो ठाकुर द्वारा उसका बुरा हाल किया जाता है। कहानी की ‘भाभी’ जब ठाकुर के घर जाने को नकारती है, तो उसका इतना बुरा हाल किया जाता है कि पूछो मत- भाभी को झोट से पकड़ के खींचता बराहिल पठान ऐसे ले गया जैसे द्रोपदी को दुशासन। वहीं भाभी को नाचने गाने का हुक्म दे दिया। नारी दोहरे शोषण की शिकार हुई है। असलियत तो यह है कि दलित महिलाओं का अपने जिस्म पर अपना कोई अधिकार नहीं है।’
बेला भाटिया इस बहु-जुठाई या डोली प्रथा को दलित-शोषित समाज की सामाजिक-आर्थिक दशा को एक साथ जोड़कर इसकी विद्रूपता का आईना दिखाते हुए बताती है—’दलित खेत-मजदूरों को आर्थिक शोषण के साथ-साथ जघन्य सामंती शोषण का शिकार भी होना पड़ता था।…बीसवीं सदी की शुरुआत में भी शाहाबाद के इलाके (आज के भोजपुर और रोहतास जिले) में सामंतों ने ‘डोली प्रथा’ चला रखी थी जिसके तहत गरीब मजदूरों की नई बहु को पहली रात जमींदार के साथ गुजारनी पड़ती थी। मजदूर महिलाओं के साथ राजपूत और भूमिहार जमींदारों, उनके कारिंदों और लठैतों द्वारा बलात्कार करना आम बात थी।’ बेला भाटिया सवाल उठाती हैं—‘मौजूद तथ्यों को देखकर तथाकथित बड़े-बड़े अभिजनों की तो बिसात ही क्या, अच्छे-अच्छे बाहुबलियों के रोंगटे खड़े हो जाने चाहिए कि किस प्रकार एक तथाकथित विश्व-विख्यात लोकतांत्रिक देश में रात-दिन जानवरों की तरह काम करने के बावजूद, इंसानों को चूहे व जानवरों का चारा खाने को विवश होना पड़ता है। इस तथाकथित सवर्ण समाज का जब इतने शोषण-उत्पीड़न से भी पेट नहीं भरता तो ये इन दलितों की नई-नवेली दुलहनों को सामंत व उनके लठैतों साथ पहली रात गुजारने और बलात्कार करने देने के लिए मजबूर करते हैं।’
ऐसा नहीं है कि दलित-शोषित समाज निरा मुर्दा समाज है। बेला भाटिया बताती है—’अगर दलितों का अपना कोई स्वाभिमान अपनी दुल्हन को पहली रात सामंत और उसके लठैतों के बलात्कार से बचाने के लिए हथियार उठा लेता है, तो विधान सभाओं और संसद द्वारा इन सामंती व बलात्कारी कारनामों का विरोध करने के गुनाह के एवज में इन हथियार उठाने वालों पर टाडा से भी सख्त कोई कानून बनाकर, इनके लिए कठोर से कठोर दण्ड की व्यवस्था की जाती है, क्योंकि ये सारे मामले सनातनी हिन्दूवादी व्यवस्था का घोर उलंघन जो हैं।’सनातन का राग अलापने वाले एक बार सिर्फ कल्पना मात्र करके देखें कि उनकी दुल्हन को यदि पहली रात किसी दलित-शोषित व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह या किसी सवर्ण के साथ रात गुजारने के लिए बाध्य होना पड़े तो उन्हें और उनके घर-परिवार वालों को कैसी पीड़ा की अनुभूति होगी। लेकिन यह संवेदनहीनता और पशुता की पराकाष्ठा ही है, जो सारे कुकर्म तथाकथित सनातन संस्कृति के बैनर तले बिना किसी लाज-शर्म के चलते रहते हैं। जाहिर है, हमारा सिस्टम दबंगों के आधीन है और मूल रूप से उनके हितों की पूर्ति करता है। यहां ठीक-गलत, नैतिकता व मानवीयता के लिए कोई स्पेस नहीं है।
गिद्ध संस्कृति की पड़ताल के अगले पड़ाव पर हमें फूलन देवी गिद्धों से दो-दो हाथ करती नजर आती है। वह सीधी-साधी फूलन देवी जिसका जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा के पुरवा गाँव में हुआ था, जिसका परिवार छोले, सूरजमुखी और मोती बाजरा उगाता था। वह अपनी बहनों के साथ गोबर के उपले बनाती थी और गुजर बसर करती थी। उसके चाचा और उसके चचेरे भाई मैयादीन ने फूलन के पिता की जमीन कब्जा ली। एक विवाद के दौरान दस वर्षीय फूलन ने विरोधियों पर पत्थर फेंके और उन्हें चोट पहुंचाई। फूलन की गिरफ्तारी हुई और उसने माला सेन को पुलिस के कारनामों के बारे में बताया—’उन्होंने मेरे साथ खूब मौज-मस्ती की और मुझे बहुत पीटा भी।’ यहां से फूलन की बर्बादी का दौर शुरु होता है और फिर बाबू गुज्जर के गिरोह द्वारा फूलन के परिवार को अगुआ किया जाना, बाद में उसका श्रीराम की कैदी बनाया जाना, फिर उसे बेहमई ले जाकर ठाकुरों द्वार बार-बार बलात्कार किया जाना और अंत में उसे पूरे गांव के सामने नग्नावस्था में कुएं से पानी भर कर लाने के लिए मजबूर करना, बैंडिट क्वीन फिल्म में दिखाए गए ये वे दृश्य हैं जिन्हें देखने भर से रूह कांप उठती है। जिसने इसे झेला, उसकी पीड़ा का वैसा एहसास भुक्तभोगी और उसके परिवार के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं हो सकता, क्या हो सकता है?
यह इतिहास की एक अनूठी दास्तान है कि यह गौरैया यानी फूलन देवी आत्मसमर्पण व आत्महत्या करने की अपेक्षा डाकू मान सिंह के साथ मिलकर राम सिंह और उसके भाई से प्रतिशोध लेना चाहती है; मगर गांव वालों द्वारा उसकी बात न माने जाने की हालत में वह यमुना नदी के किनारे बाईस ठाकुरों की गोली मार कर हत्या कर देती है। बाद में वह आत्मसमर्पण भी करती है और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के सहयोग से संसद तक भी पहुंच जाती है। लेकिन फिर शेर सिंह राणा नामक एक युवक द्वारा उसके घर के बाहर उसकी हत्या कर दी जाती है। मौजूदा घटनाक्रम की चर्चा से हमारा लक्ष्य घटना की बर्बरता के उल्लेख की अपेक्षा उस पैटर्न को रेखांकित करना है, जो दर्शाता है कि गिद्ध संस्कृति का सत्ता-संरक्षित वर्चस्ववादी पैटर्न प्राचीन काल से लेकर आज तक कमोबेश एक जैसा ही चला आ रहा है, जो बताता है कि भले ही सदियां बदल गई हैं लेकिन गिद्ध संस्कृति निर्विवादित रूप से लगभग एक ही ढर्रे पर चलती आ रही है।
मौजूदा कड़ी में राजस्थान राज्य के अजमेर जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली भंवरी देवी का शारीरिक शोषण भी कमोबेश गिद्ध संस्कृति की परिधि के अंदर ही आता है। भंवरी देवी जो राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग में सहायक नर्स दाई की नौकरी पर कार्यरत थी, वह उस समय की सत्ता पर काबिज कुछ जातीय दबंगई के अहं में चूर लोगों के संपर्क में आई। खुलकर उसके शारीरिक शोषण-उत्पीड़न और ब्लैकमेलिंग के एपीसोड्स हुए और अंतत: भंवरी दर्दनाक मृत्यु का प्राप्त हुई। केस काफी उछला, सीबीआई जांच हुई और आरोपपत्र दाखिल किए जाने के समय तक महिपालमदेरणा, मलखान सिंह बिश्नोई, सहीरामबिश्नोई, सोहनलालबिश्नोई, शहाबुद्दीन, बलिया, बिशनारामबिश्नोई, ओम प्रकाश बिश्नोई, कैलाश जाखड़, परसराबिश्नोई, मलखान सिंह का भाई, उमेशरामबिश्नोई, सहीरामबिश्नोई और भंवरी का पति अमरचंद के सहयोगी, ये 12 सदस्य जेल में थे। मौजूदा संदर्भ में हमारी मंशा किसी को दोषी या निर्दोष साबित करने की नहीं, बल्कि इन जातीय दबंगों के नामों की सूची से यह समझने की है कि मौजूदा ऐपीसोड में भी जातीय दबंगई का तात्कालिक सत्ता का नेक्सस ही गिद्ध संस्कृति का पोषक था और गौरैया की मौत का जिम्मेदार भी।
इस कड़ी में के सन 2002 के दंगों से जुड़ा बिलकिस बानो का केस भी गिद्ध संस्कृति का ही प्रतिमान है। माना कि भीड़ का कोई चरित्र व पहचान नहीं होती। जाहिर है, भीड़ के इसी चरित्र के चलते बिलकिस बानो के घर में घुसकर एक बच्ची समेत सात लोगों की निर्मम हत्या कर दी जाती है और बिलकिस बानो के साथ गैंग रेप भी होता है। अपराधियों को सजा भी हो जाती है लेकिन जब इस जघन्य कांड के ग्यारह दोषियों को रिहा कर दिया जाता है, मिठाइयां बांट कर जश्न मनाया जाता है और अपराधियों को संस्कारी ब्राह्मण जैसे विशेषणों से नवाजा जाता है तो फिर गिद्ध संस्कृति का कुरूप चेहरा सामने आ जाता है, जो जातीय दबंगई और इसके सत्ता के साथ इसके गठजोड़ को गौरैया की अस्मिता से खिलवाड़ पर निरंकुशता की मुहर लगाता है। यह अलग मसला है कि लम्बी जद्दोजहद के बाद इस मसले में सुप्रीम कोर्ट जैसे-तैसे गौरैया के आंसू पोंछने में कामयाब रहा। अगर इस मामले में त्वरित न्याय मिल गया होता तो बहुत संभव है—‘देश को जनवरी 2018 के जम्मू-कश्मीर के ‘कठुआ बलात्कार’ के नाम से शर्मसार न होना पड़ता। न एक आठ वर्षीय बालिका का अपहरण होता, न उससे छह-छह पुरुषों द्वारा बलात्कार होता और दुष्कर्म को छिपाने के लिए न उसकी निर्मम हत्या होती। अगर इंसानियत जरा भी जिंदा होती तो इस अपहरण, सामूहिक बलात्कार और निर्मम हत्या के समर्थन में प्रदर्शन नहीं होते। लेकिन हमारे देश में धर्म और जाति की खाल में छिपे ऐसे अनेक गिद्ध मौजूद हैं जिन्हें समाज और सत्ता की दबंगई (इसे नंगई भी कह सकते हैं) का संरक्षण प्राप्त है।
‘कास्टिंग काउच’ गिद्ध संस्कृति के एक अलग संस्करण के रूप में हमारे सामने समय-समय पर उद्योग जगत की महिलाओं के गुस्से और प्रतिरोध के ज्वालामुखी यानी #Times Up और #Me-too के रूप में फट पड़ता है और फिर वर्चस्ववाद की धूल भरी आंधी में कही विलुप्त प्रायः हो जाता है। हम मौजूद संदर्भ में जानबूझकर #Times Up और #MeToo से जुड़े किस्सों का उल्लेख नहीं कर रहे हैं, हम सिर्फ संकेत देने तक सीमित रहने के पक्षधर हैं। कुछ अरसे पहले भारतीय फिल्म उद्योग में इस ज्वालामुखी ने काफी उष्मा पैदा की। इसकी आंच समुद्री ‘ज्वार’ की तरह तथाकथित बड़ी-बड़ी फिल्मी हस्तियों के दामन तक पहुंची और फिर ‘भाटा’ की तरह वापस लौट आई। इसी दौरान #Me-too ज्वालामुखी की एक धारा पत्रकारिता जगत की एक बेहद लोकप्रिय व प्रभावशाली शख्सियत एमजे अकबर, जो उस दौरान देश के विदेश राज्य मंत्री के पद पर आसीन थे, के वर्तमान व भविष्य को लील गई। हमारे पास उन गौरैयाओं के वर्तमान और भविष्य के लील जाने का डाटा नहीं है, जिनके प्रतिरोध की ज्वाला उन्हें खुद को दफन करने के लिए प्रज्वलित होती है।
मुझे लगता है नारी उत्पीड़न की यात्रा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक इसमें यशपाल के उपन्यास ‘दिव्या’को शामिल नहीं कर लिया जाता। घटनाक्रम मल्लिका द्वारा अपनी उत्तराधिकारिणी के दर्शन कराने का है। जब वह दिव्या का परिचय कराती है तो अभिजात वर्ग की पंक्तियों से अस्पष्ट अस्फुट गुंजन-सा उठने लगा—‘‘तात धर्मस्थ की प्रपौत्री!…दिव्या! विष्णु शर्मा की पौत्री! दिव्या! द्विज कन्या! दिव्या! कुल कन्या दिव्या! विप्र कन्या दिव्या!’’…मल्लिका ने देखा—सामंत वर्ग और अभिजात समाज की पंक्तियां विश्रृखल हो रही थी। क्षण भर में एक ललकार सुनाई दी—‘‘मद्र की द्विज कन्या वेश्या के आसन पर बैठकर, जन के लिए भोग्या बनकर वर्णाश्रम को अपमानित नहीं कर सकती!’’ आचार्य भृगु उर्ध्वभाहू खड़े होकर आवेश में कांप रहे थे।’’…अब दिव्या का स्वर सुनाई देता है—‘‘जन, समाज और कुल वर्ग सुनें, मैं इस विषय में धर्म व्यवस्थापक, नीतिविद, महा पंडित आचार्य रुद्रधीर का निर्णय जानना चाहती हूं।’’
दिव्या आचार्य रुद्रधीर से कहती है—‘‘कुलवधु, कुलमाता और कुल महादेवी के आसन दुर्लभ सम्मान हैं लेकिन आचार्य कुलवधु, कुलमाता और कुलमहादेवी निरादृत वेश्या के समान स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं हैं। वह आगे कहती है—‘‘ज्ञानी आचार्य कुलवधु का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुलमहादेवी का अधिकार आर्य पुरुष का प्रश्रय मात्र हैं। वह नारी का सम्मान नहीं, उसे भोग करने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है। आर्य, अपने स्वत्व का त्याग करके ही नारी वह सम्मान प्राप्त कर सकती है।’’
दिव्या आगे स्पष्ट करती है—‘‘ज्ञानी आर्य, जिसने अपना स्वत्व ही त्याग दिया, वह क्या पा सकेगी? आचार्य दासी को क्षमा करें। दासी हीन होकर भी आत्मनिर्भर रहेगी। स्वत्व हीन होकर वह जीवित नहीं रहेगी!’’
अब तक हम मान कर चल रहे थे कि आमतौर पर हाशियाकृत समाज की महिलाएं की गिद्ध संस्कृति की क्रूरता का शिकार होती हैं लेकिन यशपाल के उपन्यास की ‘दिव्या’ने तथाकथित कुलवधु, कुलमाता और कुलमहादेवी को स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की कसौटी पर एक वेश्या से भी निम्न स्तर की साबित कर दिया तो कहा जा सकता है गौरैया चाहे महलों में हो या खेल-खलिहान या जंगलों में गिद्ध संस्कृति की पहुंच से बाहर नहीं है। यह स्थिति भारतीय समाज की सारी श्रेष्ठता, सभ्यता और सुसंस्कृतता को कठघरे में खड़ा करती हैं, शासन-प्रशासन और सभी संवैधानिक संस्थाओं के मुखौटों की नाकामी या उदासीनता को बेनकाब करती है।
इस कड़ी में निर्भया कांड, हाथरस की गुडि़या कांड और नारी अस्मिता को तार-तार कर देने वाले मणिपुर के अनेक एपीसोड्स को शामिल किया जा सकता है। कुश्ती जगत से जुड़ी गौरैयाओं के संघर्ष के घटनाक्रम पर भी बात हो सकती है। लेकिन इस कड़ी में इनके अलावा हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में कदम-दर-कदम आने वाले ऐसे अनेक कारनामे हैं जो गौरैया की बेबसी और गिद्ध संस्कृति की निरंकुशता पर प्रतिरोध की मांग करते हैं। जैसाकि हम पहले जिक्र कर चुके हैं कि गिद्ध संस्कृति को लेकर हम घटनाओं की चर्चा की अपेक्षा उन प्रवृत्तियों पर बात करना चाहते थे जो प्राचीन काल से गौरैया की अस्मत लूटने के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल की एक ट्रेनी डाक्टर की हत्या के ऐपीसोड ने हमें इस विषय पर विचार करने के लिए विवश कर दिया है। इस हत्या की पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पुष्टि हुई है कि लेड़ी डाक्टर की हत्या हुई है, हत्या के बाद उससे दुष्कर्म हुआ है और उसकी कई हड्डियां टूटी हुई पाई गई हैं। इसके विरोध में पूरे देश के डाक्टर आंदोलित हैं। राजनीति अपनी बेशर्मी के नए-नए कीर्तिमान स्थापित करने से बाज नहीं आ रही है। लेकिन दुखद है कि धर्म, जाति, क्षेत्र और अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को दरकिनार कर देश अपनी भारतीयता का परिचय नहीं दे रहा है। जाहिर है, ऐसी अराजकता के माहौल में गिद्धों के होंसले बुलंद हो रहे हैं और गौरैया की अस्मत प्राचीन काल के भी भयावह दौर से गुजर रही है। ऐसे माहौल के चलते वह दिन दूर नहीं जब घृणा, स्वार्थ, अवसरवाद व अनैतिकता की आग हम सब को निगल जाएगी और न गिद्ध बचेंगे और न ही गौरैया। अगर कुछ बचेगा भी तो वह होगा—’बार-बार खुद को दोहराने वाला अपना गुलामी का इतिहास।’इस सबके बावजूद सुकरात की तर्ज पर हमारा फोकस व्यक्तियों और घटनाओं के चित्रण पर नहीं है। हमारा फोकस समाज को समस्या के प्रति जागरुक करने और इसके सामूहिक निदान के विकल्प तलाशने पर है, न कि समाज में असंतोष व अराजकता पैदा करने पर।
चलिए अब हम प्राचीन काल से चले आ रहे गौरैया की अस्मिता से खिलवाड़ करने वाले यानी गिद्ध संस्कृति से जुड़े घटनाक्रमों का वर्तमान की रोशनी में पोस्टमार्टम और आत्ममंथन करने का प्रयास करते हैं। गौरतलब है, काफी समय से हाशियाकृत समाज निरंतर जय भीम, नमो बुद्धाय के साथ-साथ जय संविधान! का प्रयोग अपने संबोधन में प्रमुखता से करता आ रहा है। वह जय संविधान का नारा बाबा साहब की वजह से लगा रहा है या वह संविधान के होने के असली मकसद की दृष्टि से लगा रहा है, इस संबंध में निश्चित तौर कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता पंजी) और सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) के आंदोलन ने संविधान को इंसानी जागरूकता के केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया और अब 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान यही संविधान राजनीति के केन्द्र में विराजमान हो गया।
राजनीतिक मंच से व संसद में संविधान का लहराया जाना क्या वैसा कुछ है, जैसा अयोध्या में श्रीराम की प्राण प्रतिष्ठा का एपीसोड? क्या संविधान व श्रीराम की प्राण प्रतिष्ठा दोनों का मकसद सिर्फ राजनीति की रोटी सेंकना है, सार्वभौमिक नैतिकता की ओर ले जाना है या कुछ और? निस्संदेह, श्रीराम का अस्तित्व प्राचीन काल से है और ऊपर वर्णित उदाहरणों से स्पष्ट हैं कि नारी उत्पीड़न का प्रचलन भी प्राचीन काल से लेकर आज तक अलग-अलग रूप में इसके समानांतर चलता आ रहा है। हमारा प्रश्न है—नारी अस्मिता से खिलवाड़ के लिए जिम्मेदार कौन, श्रीराम या उनका अनुसरण करने वाले तथाकथित सनातन के दावेदार? अगर जिम्मेदार श्रीराम हैं तो आज उनकी प्राण प्रतिष्ठा के मायने ही क्या रह जाते हैं? यदि श्रीराम जिम्मेदार नहीं हैं तो फिर क्या सनातन के दावेदार इसके जिम्मेदार हैं? यदि ऐसा है तो श्रीराम के नारे लगाने वाले उनकी प्राण प्रतिष्ठा के दावेदार कैसे हैं? उन्हें दंडित क्यों नहीं किया जाना चाहिए? अगर दंड देना अनुचित है तो क्या सनातन में स्त्री की भूमिका सिर्फ भोग की वस्तु तक सीमित है? यदि ये दोनों जिम्मेदार नहीं हैं तो नारी अस्मिता को रोंदने वाले कौन हैं, वे कहां से आते हैं और वे इतने निरंकुश कैसे हो गए है? कहीं ये वे आर्य तो नहीं जिन्हें आचार्य चतुरसेन अपने उपन्यास ‘वैशाली की नगर वधू’ में कठघरे में खड़ा करते हैं; और इनके विरुद्ध अनार्य संस्कृति का समर्थन करते हैं? ये सवाल आत्ममंथन व नारी अस्मिता के सवाल को हल करने के लिए हम सब की प्राथमिकता होने चाहिए। श्रीराम के बाद चलिए अब संविधान की अचानक बढ़ गई लोकप्रियता के सवाल से दो-चार होते हैं। सर्वविदित है, भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। जाहिर है, इससे पहले भी कोई संविधान था और श्रीराम अपने आप में एक मुकम्मल संविधान के रूप में सदियों से मौजूद रहे हैं, क्या नहीं? भारतीय संविधान ऊपर उल्लिखित गिद्ध संस्कृति का समर्थन नहीं करता लेकिन प्राचीन काल से चला आ रहा गौरैया का उत्पीड़न रुकने का नाम ही नहीं ले रहा, क्यों?निस्संदेह, देश में संविधान है, विस्तृत कायदे-कानून हैं, इसे लागू कराने के लिए पुलिस-प्रशासन है, विभिन्न आयोग हैं, अदालतें हैं और चौबीसों घंटे जनता की सेवा में समर्पित जन-प्रतिनिधि हैं। नारी अस्मिता पर हमलों की निरंतरता के मद्देनजर सवाल बनता है-इनमें से कौन हैं वे, जो अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभा रहे हैं?कौन हैं वे जो गिद्ध संस्कृति को जिंदा रखने का मोह नहीं त्याग पा रहे हैं?
इस सवाल का जवाब पाने के लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है। जानते सब हैं, मगर उत्तर वे देते हैं जो पीडि़त हैं। जाहिर है, समस्या से निपटने के लिए पीडि़तों के पास न रणनीति है और न ही उपयुक्त शक्ति और विकल्प। इसलिए इनके पास जवाब होने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। इसलिए गिद्ध संस्कृति आज भी बखूबी जिंदा है। सवाल का उत्तर वे भी जानते हैं जो उत्पीड़क हैं और इसके लिए जिम्मेदार भी हैं, मगर वे इसका जवाब देना जरूरी नहीं समझते। गौरतलब है, जब भी वे जवाब देने पर आते हैं तो जवाब में अपनी दबंगई व निरंकुशता का ही परिचय देते हैं, अर्थात पंचों की बात सिर माथे लेकिन पतनाला वहीं गिरेगा। ये वे लोग हैं, जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व धार्मिक सत्ता पर आपसी नेक्सस के दम पर समाज व सिस्टम पर काबिज हैं। इनके लिए लोकतंत्र और संविधान ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ जैसे हैं; यानी ये निरंकुश राजा और जनसाधारण इनकी निरीह प्रजा, बाकी सब फालतू की बात है। अगर इस राजा और प्रजा के विभेद को हवाई यात्रा के संबंध में समझें—’ये खुद को बिजनेस क्लास और अन्य को कैटल क्लास कह कर संबोधित करते हैं।’
हमारा सवाल संविधान लहराने वालों से भी है—‘क्या वे वर्चस्ववादी नेक्सस तोड़ने और सार्वभौमिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए संविधान का राग अलाप रहे हैं; या विशुद्ध राजनीति की रोटियां सेंकने के लिए? एक सवाल संविधान की जय जयकार वाले हाशियाकृत समाज से भी है—‘क्या उनका संविधान की जय जयकार करना आरक्षण बचाने व निजी लाभ तक सीमित है या इसका संबंध इसे व्यापक अर्थों में अपनाए जाने से भी है? यही सवाल अल्पसंख्यक समाज से भी है—‘क्या उनका संविधान के प्रति मोह एनआरसी और सीएए के छोटे संकट से मुक्ति तक सीमित है या जिम्मेदार नागरिक हो जाने के लिए किसी सीमा के पार जाने तक? इसलिए हमें वैशाली के दौर जैसा गणतंत्र नहीं चाहिए जो किसी महिला को उसकी खूबसूरती की सजा उसे ‘वैशाली की नगर वधू’ या वेश्या बनाकर देता है। हमें ऐसा गणतंत्र चाहिए जिसमें देश का संविधान सर्वोपरिराष्ट्रीय गौरव का सर्वोत्तम प्रतीकहो।
अंत में साझा करना जरूरी महसूस हो रहा है कि अभी देश ने 78वां जश्न-ए–आजादी मनाया हैं। आजादी को लेकर मेरी अपनी एक पीड़ादायक दुविधा है, जिसे मैंने मेरे मन-मस्तिष्क में उलझे कुछ शब्दों को आजाद कर एक कविता का स्वरूप देने का प्रयास किया है, जिसका शीर्षक है—’क्या करूं’। बहुत संभव है यह मेरे जैसे देश के अनेक नागरिकों का दर्द हो और हम सबकी मुखरता के चलते यह किसी सकारात्मक अंजाम तक पहुंचने का सबब बन सके।
मेरे देश का संविधान/देश के हर नागरिक की/’मूलभूत आजादी’ को/थाली में परोसकर ऐसा देता है/जैसे बाबुल/अपनी लाड़ली को/डोली में बिठा, अपनी जिम्मेदारी से/मुक्ति का सपना संजोता है**वह अपनी लाड़ली को गहने,/तन ढंकने के कपड़े और/हर मौसम कामुकाबला करने केलिए/ कवच-कुंडलदेता है/वहसोने को खटिया और/ओढ़ने के लिए रज़ाई भीदेता है/यानी संविधान के नागरिकजैसी/चाकचौबंद सुरक्षा करता है**लेकिन इतने सारे/बंदोबस्त के बाद भी/बाबुल की लाड़ली ‘आजादी’/सड़क पर नग्न घुमाई जाती है और/बलात्कार की रस्म निभाई जाती है/सफेदपोश गिद्ध हो जाते हैं और/अदालती तराजू के बेबस पैरोकार/अपना वजूद बचाते नजर आते हैं**देश में ‘आजादी’ का डंका/आज वो लोग पीट रहे हैं,/जो आजादी को बंधुआ बना/एक रेप के बाद, दूसरे नए/रेप के कीर्तिमान की मुहिम चलाए हैं/आवाम निरंतर छटपटा रहा है मगर/अभी पांव नहीं जमा पा रहा है/**मैं भी दिल से चाहता हूं/ अपनी’आजादी’ का डंका बजाऊं/इसकी शान में नए-नए गीत गुनगुनाऊँ/इसे प्रेयसी-सा प्यार करूं और/इसके लिए आसमान से तारे तोड़ लाऊं/लेकिन मेरे दिलोदिमाग को/मुखौटा संस्कृति का रंग नहीं भाता है/क्या करूं,मुझे झूठ नहीं सुहाता है?
23 जून, 2023 को पटना में इंडिया गठबंधन की पहली बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में लालू प्रसाद ने कहा कि ‘ नल,नील,कोल,भील सब आए साथ। मेरे सामने सवाल था कि ” कहां हैं फिर ‘ शंबूक, निषादराज!’ इस सवाल के साथ ही यह सवाल भी कि बिना विश्वसनीय नेतृत्व के क्या दलित मतदाताओं को अपने साथ लाया जा सकता है? बड़ा प्रश्न है कि किसी भी पक्ष में न खड़े होकर अपनी राजनीति और अपने राजनीतिक आधार या लक्ष्य के लिए अलग खड़े होने को, अलग निर्णय को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कैसे देखें? अपने समय के प्रचलित नैरेटिव की बायनरी से, द्विपक्षीय माहौल से अलग स्टैंड क्या महात्मा फुले से लेकर डा. अम्बेडकर तक की एक परंपरा नहीं रही है ?
मायावती के प्रसंग से :
नीतीश कुमार ने जब इण्डिया गठबंधन को स्वरूप देने की मुहीम शुरू की थी तब उन्होंने देश के कई नेताओं से मुलाकात की,लखनऊ में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव से मिले,लेकिन बसपा प्रमुख मायावती से नहीं। और तो और बिहार में कुछ ऐसी स्थितियां पैदा की गयीं, या हुईं कि सरकार में शामिल एक मात्र दलित नेतृत्व की पार्टी जीतन राम मांझी की पार्टी हम (सेक्यूलर )अलग हो गयी। जब इण्डिया और एनडीए गठबंधन अपने आखिरी स्वरुप में आया तो लगभग सभी दलित नेतृत्व की पार्टियां या तो एनडीए के साथ दिखाई पड़ीं या इण्डिया और एनडीए से अलग।
दलित नेताओं के फैसलों पर अक्सर इंडिया गठबंधन के लोग अथवा उनके समर्थक, खासकर कांग्रेस के समर्थक पत्रकार,विश्लेषक सवाल खड़ा करते हुए उनकी विश्वसनीयता को ही कटघरे में ले लिया करते हैं। जैसे, मायावती के लिए कहा जाने लगा कि ‘ वे ईडी, सीबीआई से डर कर भाजपा की बी टीम बन गई हैं।’ जीतन राम मांझी को तो खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गवर्नर बनने का लालची तक बता डाला था, वह भी विधान सभा के पटल पर। उन्हें कई अपशब्द भी कहे थे। मैं अपनी गवाही से जानता हूँ कि जीतन राम मांझी का कोई अंतिम इरादा एनडीए गठबंधन की ओर जाने का नहीं था। उनके साथ एक किताब के सिलसिले में मैं उन दिनों कई घंटे बैठकर उनका इंटरव्यू कर रहा था, इसलिए भी जानता हूँ। विडंबना यह कि खुद नीतीश कुमार अंततः इण्डिया गठबंधन से बाहर हो गए।
मान्यवर कांशीराम की राजनीति
1992 में बाबरी मस्जिद को आपराधिक घटना ( सुप्रीम कोर्ट के अनुसार भी ) के तौर पर गिरा दिया गया था। तब भाजपा के खिलाफ एक माहौल था। उस वक्त मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने मिलकर 1993 का चुनाव लडा। नारा लगा ‘ मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम ‘। मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने। उसके दो साल के भीतर लखनऊ का ‘गेस्ट हॉउस कांड’ हुआ। मायावती पर हमले की उस घटना का आरोप समाजवादी वेटरन मुलायम सिंह यादव पर भी रहा है।उसके तुरत बाद ही कांशीराम जी अलग हुए और और भाजपा के समर्थन से बसपा की सरकार बनवाई। मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। तब से ही बसपा की राजनीति के वर्चस्व वादी नैरेटिव में अवसरवादी बताया जाने लगा था। उस वक्त में भी साम्प्रदायिक राजनीति और गैर साम्प्रदायिक राजनीति के खांचे बन गए थे।
1997 में एक बार फिर भाजपा और बसपा के गठबंधन से सरकार बनी। मार्च 1997 में मायावती मुख्यमंत्री बनीं। छः महीने के चर्चित फॉर्मूले की इस सरकार में बाद में कल्याण सिंह ने शपथ लिया लेकिन उसके एक महीने के भीतर ही बसपा ने समर्थन वापस ले लिया। 2001 में मायावती के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद 2002 में भी सरकार भाजपा के समर्थन से बनी। इन अवसरों पर कांशीराम पार्टी के सक्रिय निर्णयकर्ता थे।
कांशीराम पर अवसरवाद के आरोप लगते रहे हैं, जबकि अलग अलग अवसर के अलग अलग राजनीतिक फैसले लगभग सभी दलों के खाते में है। कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाले अनेक दल आज कांग्रेस के साथ इंडिया गठबंधन बना चुके हैं। 1989 में वीपी सिंह की सरकार में शामिल या बाहर से समर्थन कर रहे दलों में वाम और दक्षिण धारा के दल सम्मिलित रूप से साथ थे।
डॉक्टर अम्बेडकर की अलग राह
1942 में कांग्रेस जब भारत छोड़ो आंदोलन में कूदी और उस वक्त वायसराय के मंत्रिमंडल से खुद को अलग करने का निर्णय लिया तब मुस्लिम लीग ने इसे ‘ मुक्ति प्रसंग ‘ माना था। डॉक्टर अंबेडकर भी लीग के साथ-साथ मंत्रिमंडल में बने रहे। उस दौर में उन्होंने श्रम मंत्री के रूप में बड़े बड़े काम किए। महिलाओं, हाशिए के समाजों के लिए, भारत के विकास के लिए कई निर्णय लिए और मंत्री मंडल से लागू करवाए। उनमें से दूरगामी थी तत्कालीन बिहार के मैथन में दामोदर वैली कारपोरेशन की परिकल्पना। उनके श्रम मंत्री रहते उसकी योजना साकार हुई। उस दौर में भी डॉक्टर अंबेडकर को काफी निंदा और हमले झेलने पड़े। कांग्रेस समर्थक अखबार उन्हें अंग्रेजों का पिट्ठू बता रहे थे। कांग्रेसी उनके खिलाफ उबल रहे थे इसलिए वे बॉम्बे में अपने घर में रह रहे अपने बेटे भतीजे की सुरक्षा के लिए चिंतित रहते थे।
महात्मा फुले प्रचलित नैरेटिव से
भीमा कोरेगांव में पेशवाओं की हार में अंग्रेजों के साथ महार सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी (500 सैनिक) की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1 जनवरी 1818 को लड़ी गयी इस लड़ाई ने पेशवा राज को समाप्त किया। उसके 7 साल बाद पैदा हुए (महात्मा) जोतीराव फुले। 1857 में जब सिपाही विद्रोह हुआ तब उस वक्त के पेशवा नाना साहेब को सिपाहियों ने कानपुर में पेशवा घोषित किया,तात्या टोपे उनके सेनापति थे। उस वक्त की प्रचलित नैरेटिव कम्पनी राज के खिलाफ संघर्ष था, वही देशहित था। महात्मा फुले ने उसके विपरीत पेशवाओं के खिलाफ अपने लेखन और आंदोलन को केंद्रित रखा। उस दौर में फुले दम्पति ( जोतीराव और सावित्रीबाई फुले ) लड़कियों के लिए स्कूल खोल रहे थे,गर्भवती ब्राह्मण विधवाओं के लिए आश्रम खोल रहे थे। उन्हें अंग्रेजी राज का लाभ मिला,उन्होंने अंग्रेजों के साथ संवाद और दलितों-किसानों के खिलाफ पेशवा नीति का विरोध की नीति अपनाई। कोरेगांव और महत्मा फुले की नजर से राष्ट्रवाद का नजरिया ही उलट जाता है। नाना साहेब पेशवा का नायकत्व खंडित होता है।
स्वतंत्र दलित राजनीति का संघर्ष
लन्दन में 7 दिसंबर, 1931 को द्वितीय गोलमेज सम्मलेन के पहले से ही भारत में दलितों के पृथक निर्वाचन की बहस डा. आंबेडकर ने छेड़ रखी थी। गोलमेज सम्मलेन के बाद पृथक निर्वाचन क्षेत्र के खिलाफ महात्मा गांधी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। 1932 में डा. अम्बेडकर को दवाब में समझौता करना पड़ा, जिसे पुणे पैक्ट के तौर पर जाना जाता है। इसके बाद संसदीय आरक्षण की नीव पड़ी। लेकिन डा. अम्बेडकर और बाद में बहुत से दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों ने स्वतंत्र दलित राजनीति की राह में इस समझौते को एक रोड़ा माना।
आरक्षित सीटों पर चुनकर आये उम्मीदवारों को लालच या अन्य तरीकों से अपने साथ ले आने की नीति कांग्रेस ने बनायी। 20 दिसंबर 1945 को कांग्रेस के नेता और सीपी बेरार यानी आधुनिक मध्य प्रदेश और विदर्भ के प्रीमियर रहे रविशंकर शुक्ल ने सरदार पटेल को यह पत्र लिखकर कहा कि ‘अंबेडकर,गवई,तथा खांडेकर के हरिजन उम्मीदवारों को कांग्रेस हरा नहीं सकती है,इसलिए चुनाव के बाद वह जीते हुए उम्मीद वारों को अपने साथ ले लेगी। ‘इसे डॉक्टर अंबेडकर ने लोभ,लालच और घूस की नीति कहा था।
बसपा के खिलाफ प्रचलित नैरेटिव के बीच लोग यह तथ्य क्यों भूल जाते हैं कि 2018 में बसपा ने राजस्थान सहित कई राज्यों में कांग्रेस को समर्थन दिया, लेकिन अपनी सरकार की सहयोगी पार्टी के ही विधायको को कांग्रेस ने तोड़ लिया। इसपर मायावती का आग बबूला होना स्वाभाविक था।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि कैसे केंद्र में रामविलास पासवान की पहल की तर्ज पर राज्य में सभी पार्टियों के दलित विधायकों का एक असोसिएशन बनाने की उनकी पहल को राजद नेतृत्व ने विफल कर दिया था।
जाति समाज के विश्वसनीय चेहरों, विश्वसनीय व्यक्तियों और विश्वसनीय विचारों के बरक्स अपने द्वारा निर्धारित किसी नेता को दलित प्रश्न का चैंपियन बनाने की रणनीति पहले भी रही है। कभी दलितों को अस्वच्छ रहने के कारण स्कूलों में अलग बैठाने की बात करने वाली एनी बेसेंट को या कभी स्वयं महात्मा गांधी को, जो गोलमेज सम्मेलन में डाक्टर अंबेडकर सहित किसी दूसरे को दलित नेता मानने से इनकार कर देते हैं।
विश्वसनीय चेहरों/ नेतृत्व की भूमिका:
भारत जैसे जाति विभाजित समाज में अपना दाय मांगती जातियां सत्ता में अपना चेहरा भी खोजती हैं। चेहरों का, प्रतिनिधित्व का फर्क पड़ता है। बिहार या केंद्र के स्तर पर कई बार पिछड़ों, दलितों के हक के फैसलों के खिलाफ संघ परिवार और वामपंथी पार्टियों के लोगों का एका देखा गया। दलितों, पिछड़ों को ताकत देने वाली वामपंथी पार्टियां जन समर्थन खोती चली गई और लालू प्रसाद व नीतीश कुमार में अपने समाज का चेहरा देखते हुए 30 सालों से अभी तक जनता ने विश्वास बनाए रखा। लेकिन अब अति पिछड़ी जातियां और दलित जातियां इस बहुजन स्पेस में भी अपना हिस्सा, अपना चेहरा, अपना नेतृत्व खोज रही हैं।
स्वतंत्र दलित नेतृत्व की पार्टियां अपनी न्यूनतम प्रभाव क्षमता के बावजूद सत्तासीन पार्टियों पर दवाब का काम करती हैं। उनके होने से किसी भी रूप में, चाहे सोशल इंजीनियरिंग, चाहे प्रतिनिधित्व के नाम पर अपने यहां अलग अलग जाति समूहों का नेतृत्व खड़ा करने के लिए अथवा उनके मुद्दों को संबोधित करने के लिए बाध्य होती हैं। बसपा की यह ऐतिहासिक भूमिका है और अपनी सीमाओं में यही हम ( सेक्यूलर), रालोजपा अथवा लोजपा ( रामविलास), आरपीआई, बहुजन रिपब्लिकन आदि पार्टियों की। बिहार के मामले में जीतन राम मांझी, पशुपति पारस अथवा चिराग पासवान की पार्टियां दलित राजनीति में यद्यपि वैसी ही उपस्थिति नहीं हैं, जैसी पैन इंडिया पार्टी के तौर पर बसपा अथवा महाराष्ट्र में रामदास आठवले या प्रकाश अंबेडकर के नेतृत्व की पार्टी।
यदि बसपा है तो सत्तासीन पार्टियों के भीतर दलित नेताओं की अहमियत है। यदि डॉक्टर अंबेडकर थे तो कांग्रेस के भीतर बाबूजी जगजीवन राम का बढ़ता महत्व था। प्रचलित नैरेटिव की बायनरी से अलग दलित नेताओं या राजनीति की राह को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। इतिहास बोध आपको पूर्वग्रह मुक्त करता है।
इस चुनाव में कांग्रेस की राजनीति का हश्र
लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद देश भर से कांग्रेस के समर्थक बुद्धिजीवी दलित नेताओं को कोस रहे हैं। दुखद है कि कांग्रेस के नैरेटिव के प्रभाव में कई फुले-अम्बेडकरवादी साथी भी आ जाते रहे हैं। आ जाते हैं। 100 से नीचे सिमट गयी कांग्रेस के नेता की लोग वाहवाही कर रहे हैं और मायावती, प्रकाश अम्बेडकर, रामदास आठवले, जीतन राम मांझी, चिराग पासवान पर इण्डिया गठबंधन की हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं। इण्डिया गठबंधन और खासकर कांग्रेस के सामाजिक न्याय के प्रलाप व संविधान खतरे में है कि चेतावनियों के जरिये महाराष्ट्र में जो परिणाम उपस्थित हुआ वह यह कि राज्य के 48 संसदीय क्षेत्रों से कुल चुनकर आये सांसदों में 26 मराठे ( 54%) 9 ओबीसी (19 %) 6 अनुसूचित जाति ( 13 %) 4 अनुसूचित जनजाति (8 %) और 3 ( 6 %) सामान्य वर्ग से आते हैं। इस आईने में बायनरी नैरेटिव में फंसने पर दलित राजनीति का हश्र समझा जा सकता है।
वे लोग बड़े भोले हैं जिन्हें लगता है कि राहुल गांधी सामाजिक न्याय की बात कर बीजेपी से लड़ रहे थे।बीजेपी से लड़ने के लिए उनके पास सॉफ्ट हिंदुत्व का हथियार था, जो बुरी तरह हारा। सामाजिक न्याय, जाति गणना का जुबानी जमा खर्च वे मूलतः बिहार, यूपी और अन्य राज्यों में सामाजिक न्याय की भूमि से लीडरशिप वाली पार्टियों के खिलाफ कर रहे हैं। अभी परजीवी होकर, बाद में आंख दिखाकर कांग्रेस इन पार्टियों की जमीन लेना चाहती है। जबकि इन्होंने ही 240 पर लाया भाजपा को। सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन 2014 में ए के एंटनी समिति ने दी थी कांग्रेस को। शशि थरूर ने सिद्धांत दिया। पुरुषोत्तम अग्रवाल आदि हिंदी में उसके वाहक बने।जबतक यूपी में बसपा -सपा का शासन था, यानी 2007 से 2017 तक, राहुल गांधी दलित घरों में ‘ खाना इवेंट’ करते थे। सामाजिक न्याय का यह ‘हरिजन स्टाइल ‘ था। 2017 के बाद जनेऊ दिखाने लगे।
देश भर में सॉफ्ट हिंदुत्व का नतीजा यह रहा कि कांग्रेस को मिला दलित वोट 2019 की तुलना में 1 प्रतिशत घटा और मुसलमान वोट बमुश्किल 5% बढ़ा। इसके विपरीत आज भी उनके सहयोगी दलों को दलित वोट ज्यादा बढ़ा और मुसलमान वोट भी। क्योंकि उन पर यकीन ज्यादा था।
नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव ने जब बिहार से सामाजिक न्याय के भविष्य की राजनीति तय की तो राहुल ने उनका नाम लिए बिना एकतरफा जाति गणना बोलना शुरू किया। यह ऐसा ही था, जैसा गांधी किया करते थे, वे दलित नेता के तौर पर डॉ. अंबेडकर को और मुसलमान नेता के तौर पर जिन्ना को खारिज करते थे। खुद को नेता बताते थे। पता करिए ओबीसी सांसदों की संख्या में थोड़ा इजाफा जरूर हुआ है लेकिन कांग्रेस के कोटे से नहीं। उसने तो योगदान किया है 10% सवर्णों से 25% सांसदों को संसद भेजने में।
चुनाव में कांग्रेस की कथनी और करनी का फर्क यह था कि महाराष्ट्र में कांग्रेस सहित महा विकास अघाड़ी ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया।
बिहार में एक भी महिला को टिकट नहीं दिया कांग्रेस ने? बिहार, यूपी, झारखंड आदि राज्यों में कांग्रेस ने सवर्ण अध्यक्षों के साथ चुनाव लड़ा । बड़े पदाधिकारियों में इन राज्यों में एक भी ओबीसी नहीं है।
इन सच्चाइयों को दलित राजनीति के ऐतिहासिक आईने में देखिये। नैरेटिव युद्ध से बाहर काम कर रहे नेताओं की प्रेरणा देखिये। 2024 के चुनाव में इण्डिया गठबंधन से स्वत्रन्त्र दलित राजनीति को बाहर करने के आग्रहों की पहचान करिये। इण्डिया गठबंधन की रचना से ही दलित नेताओं को बहार रखना और फिर ठीकरा फोड़ना नैरेटिव युद्ध का ही हिस्सा है। यह युद्ध ख़त्म नहीं हुआ जारी है।
दक्षिण कोरिया की लेखिका हान कांग ने 2024 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतकर विश्व साहित्य जगत में एक नया अध्याय लिखा है। उनके गहरे और काव्यपूर्ण गद्य ने न केवल कोरियाई साहित्य बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। हान कांग की अभिनव शैली काव्यपूर्ण और प्रयोगात्मक दोनों है, जिससे वे समकालीन गद्य में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गई हैं। वे 30 से अधिक वर्षों से प्रकाशित लेखिका रही हैं, जो उनके साहित्य में लंबे समय से योगदान को बताता है। उनके साहित्यिक कार्य विभिन्न विधाओं में फैले हुए हैं, जो विभिन्न प्रकार के विषयों और शैलियों को दर्शाते हैं।
10 अक्टूबर 2024 को नोबेल फाउंडेशन ने 5 प्रमुख क्षेत्रों में नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की। यह पुरस्कार प्रत्येक वर्ष स्वीडिश रसायनज्ञ और उद्योगपति अल्फ्रेड नोबेल की 1890 की वसीयत के आधार पर दिया जाता है, जिसके तहत उन लोगों को सम्मानित किया जाता है जिन्होंने पिछले वर्ष मानवता के लिए सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ये पुरस्कार भौतिकी, रसायन, चिकित्सा और शारीरिक विज्ञान, साहित्य, शांति, और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में दिए जाते हैं (अर्थशास्त्र का पुरस्कार 1968 से शुरू हुआ)। इस बार साहित्य में दिया गया नोबेल पुरस्कार विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहली बार दक्षिण कोरिया की लेखिका हान कांग को यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला है। इसके साथ ही वह एशिया की पहली महिला भी हैं जिन्होंने यह पुरस्कार जीता है।
हान कांग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान उनके 2007 के उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ से मिली। नॉबेल सम्मान के बाद इसने दुनिया भर के पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया है। यह उपन्यास तीन भागों में लिखा गया है और इसका अनुवाद 2015 में देबओरा स्मिथ ने अंग्रेजी में किया, जिसके बाद इसे 2016 में इंटरनेशनल बुकर प्राइज का सम्मान प्राप्त हुआ। यह उपन्यास एक महिला की कहानी है जो मांस खाना बंद कर देती है और उसके इस निर्णय से उसके परिवार और समाज में तनाव उत्पन्न हो जाता है। यह कृति मानवीय स्वतंत्रता, पहचान, और सामाजिक दबावों के विषयों को बखूबी उठाती है।
हान कांग के गद्य को तीव्र, गीतात्मक, क्रूर, कोमल और कभी-कभी थोड़ा असत्यवादी के रूप में वर्णित किया जाता है। अकादमी के उद्धरण में उनके लेखन में जीवित और मृत के प्रति उनकी अनूठी जागरूकता पर जोर दिया गया है। उनके कार्यों को पढ़ने में रोमांचक माना जाता है, जो व्यापक दर्शकों के लिए अपील करता है। 1970 में जन्मी हान कांग ने पहले ही साहित्यिक दुनिया पर गहरा प्रभाव डाला है। उनकी रचनाओं में मानवीय संघर्षों, जीवन की नाजुकता और समाज की जटिलताओं को बेहद खूबसूरती से चित्रित किया गया है। हान का बचपन चुनौतियों से भरा रहा। उन्होंने एक कठिन जीवन का सामना किया, लेकिन उनकी लेखन प्रतिभा ने उन्हें जीवन के उतार-चढ़ावों से उबरने में मदद की। उनकी रचनाओं में उनके जीवन के अनुभवों का प्रतिबिंब दिखाई देता है।
2016 में प्रकाशित उनके एक और उपन्यास ‘द व्हाइट बुक’ को एक दुख का दस्तावेज़ माना जाता है। यह पुस्तक उनके काव्यात्मक शैली को दर्शाती है और उनकी रचनाएँ अक्सर मानव शरीर, मनोदशा, पीड़ा, और मृत्यु के इर्द-गिर्द घूमती हैं। उन्होंने कई अन्य महत्वपूर्ण कृतियों का सृजन किया है, जिनमें शामिल हैं ‘कान्वलेसन्स’ (2013), ‘यूमन ऐक्ट’ (2014), और 2021 में आई ‘वी डू नॉट पार्ट’।’द व्हाइट बुक’ का अंग्रेजी अनुवाद भी किया गया है। पुस्तक की एक प्रसिद्ध पंक्ति, “सफेद रंग में सारे रंग समाहित होते हैं… सफेद रंग और शांति का कोई रिश्ता नहीं”, ने गहराई से प्रभावित किया है।
हान कांग ने साहित्य में 1993 में कदम रखा जब उनकी पहली रचना, पाँच कविताओं का एक संग्रह, दक्षिण कोरियाई पत्रिका ‘साहित्य और समाज’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद, 1995 में उनकी पहली कहानी संग्रह ‘लव ऑफ एवसू’ प्रकाशित हुई। हान के साहित्यिक योगदान का सिलसिला निरंतर जारी रहा। उनकी पहली उपन्यास ‘योर कोल्ड हैंड्स’ 2002 में प्रकाशित हुई, जिसमें एक मूर्तिकार की कहानी है जो कला और वासना के बीच फंसा हुआ है। यह उपन्यास पश्चिमी साहित्य जगत में बहुचर्चित हुआ।
हन कांग की रचनाओं का मुख्य विषय मानवीय संघर्ष है। उन्होंने प्यार, नफरत, खोने का दर्द और जीने की इच्छा जैसे भावनाओं को शब्दों में पिरोकर एक अद्वितीय अनुभव प्रदान किया है। उनके पात्रों में पाठक खुद को ढूंढ लेते हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति ‘द वेजिटेरियन’ है। इस उपन्यास में एक महिला की कहानी है जो अचानक मांस खाना बंद कर देती है और इसके परिणामस्वरूप उसके परिवार और समाज में तनाव पैदा हो जाता है। यह उपन्यास मानवीय स्वतंत्रता, पहचान और समाज के दबाव जैसे विषयों को उठाता है। साहित्य का नोबेल पुरस्कार विश्व साहित्य का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। हान को यह पुरस्कार मिलना न केवल उनके लिए बल्कि पूरे दक्षिण कोरिया के लिए गर्व का विषय है। यह पुरस्कार उनके साहित्यिक योगदान को मान्यता देता है और उन्हें विश्व स्तर पर प्रसिद्धि दिलाता है।
दक्षिण कोरिया में नोबेल पुरस्कार जीतने के बाद देश में उनके लेखन के प्रति उत्साह और रुचि में जबरदस्त उछाल आया है। पुस्तक भंडारों में उनकी रचनाओं की मांग इतनी बढ़ गई है कि कई किताबें बिक गई हैं और ग्राहकों को ऑर्डर देना पड़ रहा है। नोंबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद से पुस्तक भंडारों में हन कांग की रचनाओं की बिक्री में कई गुना वृद्धि हुई है। एक दिन में ही लाखों प्रतियां बिक गईं। पुस्तक भंडारों ने हन कांग की रचनाओं को प्रदर्शित करने के लिए विशेष स्थान बनाए हैं और ग्राहकों को उनकी तस्वीरें खिंचवाने के लिए जगह भी दी जा रही है। ग्राहक हन कांग की उपलब्धियों पर गर्व महसूस कर रहे हैं और उनकी रचनाओं से खुद को जोड़ रहे हैं। कई लोगों ने कहा कि उनके जीवन के अनुभव हन कांग की रचनाओं में चित्रित अनुभवों से जुड़े हुए हैं। कई पुस्तक भंडारों में हन कांग की रचनाएं खत्म हो गई हैं, जिससे ग्राहकों को ऑनलाइन ऑर्डर देना पड़ रहा है। हालांकि, यह अभी अनिश्चित है कि किताबें कब फिर से उपलब्ध होंगी। हन कांग के साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने से उनके लेखन के प्रति देश में एक नई लहर पैदा हो गई है।
अधूरी शाम का अधूरा किस्सा हूँ मैं, जो पढ़ा न गया वो किताब हूँ मैं जाने क्यों मुझे लगता रहा है कि अभिनेत्री रेखा का जीवन एक खुली किताब है,बिल्कुल उनके नाम की तरह, सीधी स्पष्ट रेखा। पर जैसे-जैसे उनके जीवन से जुड़े वक्तव्यों, साक्षात्कारों का अनुभव मिला, ख़ुद रेखा के महत्वपूर्ण वक्तव्य देखे तो समझ में आने लगा कि यह ‘रेखा’ उतनी भी सरल और सीधी नहीं,तिस पर अफवाहों की हलचल, विवादों के झंझावत और नियति के सागर के बीच उनके जीवन के विविध उतार-चढ़ाव, जानने-समझने के लिए बहुत धैर्य चाहिये था। वे कहतीं हैं“मेरी भावनाएं कभी मेरी अभियक्ति में नहीं झलकती आवाज़ से भी नहीं कि भीतर क्या चल रहा है,मैंने लोगों से कभी अपने भावों को व्यक्त किया भी नहीं,और आज भी नहीं कर पाती” पर उनकी इच्छा ज़रूर रही होगी कि कोई तो बिन कहे उनका मन समझ ले! मैंने महसूस किया कि अपने साक्षात्कारों में वे दिल से बोलतीं है- एक संवेदनशील मन, मजबूत विनम्र व्यक्तित्व, आँखों में सिमटा दर्द आपको भीतर तक भिगोता जाता है, हो सकता है आप कहें वो भी अभिनय ही है तो मैं कहूँगी कि आप फ़िल्मों से सिर्फ मसाला और चटपटा मनोरंजन ही चाहतें हैं आपकी संवेदना फ़िल्मी कलाकार के ‘मनुष्य से’ नहीं जुड़ पाती। रेखा के लिए अभिनय उनका बच्चा है,‘मैं माँ नहीं बनी लेकिन सृजन को समझती हूँ, फ़िल्मों में हम अपने निजी इमोशन भी व्यक्त करतें हैं, इस माध्यम के ज़रिये हम अपनी थोड़ी खुशियाँ और आँसू बाँट लेतें हैं’ फेवरेट किरदार पर जब वे कहतीं हैं, माँ को उसका हर बच्चा प्यारा होता है, तो माँ न बनने की कसक झलक ही जाती है, भले ही वे कितना छिपा लें। इसी प्रकार उमराव जान में सर्वश्रेष्ठ अभिनय के सन्दर्भ में कहतीं हैं ‘जिन मरहमों से निजी जिन्दगी में गुज़र रही होती हूँ वो मेरी पर्फोर्मेंसस में रिफ्लेक्ट करता है’ रेखा ने हर किरदार को प्रसाद समझ कर लिया बस एक बार को वो क्लिक करना चाहिए कि हाँ, इसमें कुछ बात है! जिस प्रकार कहानी के संवाद कथानक, देशकाल और चरित्र आदि को विश्लेषित करने में सहायक होते हैं उसी प्रकार मैंने रेखा के साक्षात्कारों के माध्यम से रेखा को समझने का प्रयास किया है । ‘घर’ उनके जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकल्पना है, जिसे वे परिपूर्ण न कर पाई बावजूद इसके उनका जीवन अपने आप में पूर्ण है।
मीरा-सी साधिका या राधिका बात करें पितृसत्ता से संचालित समाज की तो ‘घर’ आज भी स्त्री के लिए चार दीवारी ही है,जिसमें उसकी इच्छाओं की उन्मुक्त उड़ान सम्भव नहीं,सशक्त-सबल-स्वतंत्र होती स्त्री के लिए भी नहीं। फिर भी उसके सुखों को जिस सीमा में परिभाषित किया गया उसने सहज स्वीकार किया और पारिवारिक संबंधों पत्नी, माँ, बहु आदि डोर से बंधी वह बंधन में भी सुख का अनुभव करती आई है। आज जबकि ‘विवाह-संस्था’ प्रश्नांकित हैं, परिवार के नाम पर गिने-चुने सदस्य हैं तो ‘घर’ का अस्तित्व भी प्रश्नों के घेरे में हैं। यद्यपि प्रेमी-युगल के लिए ‘घर’ आज भी सबसे ख़ूबसूरत सपना है,फिल्मों ने तो इसे हमेशा रोमानियत के साथ ‘हैंडल विद केयर’ प्रस्तुत किया है। फ़िल्मी हस्तियों में जब माँग में सिन्दूर सजाये ‘लिविंग लीजेंड’ रेखा की बात आती है तो उनके जीवन और व्यक्तित्व के कई विरोधी पक्ष पितृसत्ता को मुँह चिढ़ाते नज़र आतें हैं, इस सदा सुहागन की माँग का सिन्दूर, भले ही उनके अनुसार श्रृंगार का एक हिस्सा है पर यह उनकी हसरतों को भी रेखांकित करता है। ऐसे में प्रश्न आता है कि हर लड़की की तरह ख़ूबसूरत रेखा ने भी तो सपनों का ‘घर’ सजाया ही होगा! लेकिन एक प्रलय में सब कुछ बह गया और बची रह गई मीरा-सी साधिका या राधिका रेखा जिसके ह्रदय में प्रेम-अमृत्व और आँखों में खारा समुद्र समाया है जो न छलकता है,न झलकता है चाहे कितना ही आलोड़ित हो । रेखा एक परिचय – रेखा का परिचय विवादों के साथ ही मिलता है जो उनके जन्म से पूर्व ही शुरू हो जाता है .
पितृसत्तात्मक समाज और नैतिक मर्यादाओं को तोड़,वे बिन ब्याही माँ की सन्तान के रूप में जन्म लेतीं हैं ‘बिन ब्याहे पुरुष की संतान’ तो कोई कहता भी नहीं। तथाकथित पिता जैमिनी गणेशन के उपनाम और घर के लिए उनकी माँ पुष्पवल्ली अंत तक तरसती रहीं, माँ के दर्द और घर की कसक को देखते-समझते-महसूसते रेखा बड़ी हुई। आर्थिक तंगी के कारण मात्र 3 वर्ष की आयु से भानुरेखा ने फिल्मों में काम करना आरम्भ कर दिया वे संतान कम बाल-श्रमिक हो चुकी थी। दक्षिण के सुपर स्टारों की यह लड़की महज़ 13 साल आयु में बॉलीवुड में प्रवेश करती है पर उन्हें आज के सन्दर्भों में नेपोटिज्म या नेपो-किड-स्टार नहीं कह सकतें, वे एक्ट्रेस नहीं बल्कि पढ़ना चाहती थी‘मुझे तो मार-मार कर हिरोइन बनाया गया है’। हालाँकि वे ओवर नाईट स्टार बन गई। ‘जबरदस्ती किस-सीन’ को जब लोकप्रियता मिली तो उन्होंने गॉसिप, विवाद या अफवाहों का सकारात्मक प्रयोग जाना-समझा तभी शशि कपूर या सावन भादों में उनके के हीरो नवीन निश्चल द्वारा उन्हें मोटी, काली, भद्दी, फूहड़ कहने पर उन्होंने कोई प्रतिरोध नहीं किया, उस अपमान के दर्द को अपने भीतर जज़्ब कर लिया और ‘घर’ फिल्म की सफलता के बाद वे जान गई थी ‘मुझे स्टार नहीं कलाकार बनना है’।
परिवार और कैरियर का संघर्ष – जीवन और फ़िल्म दोनों ही क्षेत्रों में रेखा ने स्टीरियोटाइप्ड परम्परागत रूढ़ियों को तोड़ने की हिम्मत दिखाई, हिंदी फिल्मों में गोरी,पतली-दुबली नायिकाओं की छवि के विपरीत गहरे रंग और 33 इंच कमर के साथ शुरुआत की और धूम मचा दी। हिंदी नहीं आती थी, पर संवाद रट कर पूरे हाव-भाव के साथ उन्हें अभिनय में व्यक्त करती थी। पहली फ़िल्म की शूटिंग के दौरान टीम के लोग उनके रंग-रूप आकार का उपहास बनाते जिसे आज हम बॉडी शेमिंग के रूप में जानतें हैं, उन्हें लेकर अश्लील बातें करतें, रेखा बताती हैं भले ही उस समय भाषा न समझ आती हो लेकिन उनके हाव-भाव खूब पढ़ लिया करती कि वे मेरे लिए बहुत गलत सोच रखते थे, इंडस्ट्री में एक स्त्री के रूप में अपने सम्मान को बनाए रखने का उनका संघर्ष कम नहीं था। जैमिनी गणेशन यद्यपि परिवार को आर्थिक मदद दिया करते थे, पुष्पावल्ली को भी अपने प्रेमी से कोई शिकायत न थी,रेखा के अनुसार वे उनके प्रेम में पागल-सी थी उन्हें दुनियां की परवाह नहीं थी लेकिन जब जैमिनी ने सावित्री से दूसरी शादी की तो पुष्पावल्ली का दिल टूट गया, इसी दर्दनाक पृष्ठभूमि ने रेखा के जीवन की दिशा निर्धारित की, एक संकोची, सीधी, सरल रेखा को समय और परिस्थितयों ने अत्यंत जटिल बना दिया ।
जैमिनी गणेशन ने उनकी माँ का विश्वास तोड़ा,पिता-स्नेह की छत्र छाया से वंचित रखा,पिता शब्द से जुड़े प्रेम या पिता के एहसास पर वो कहती है कि ‘मुझे उसका अर्थ नहीं पता जब तक आप खुद कोई चीज टेस्ट नहीं करते, (अस्वाद नहीं लेते) अंतर नहीं समझ सकते’ स्कूल के दिनों को याद करते हुए वे भावुक होकर कहतीं हैं, एक पिता और तीन माओं के दर्ज़न भर बच्चे एक ही स्कूल में जाया करते थे,वो कभी-कभी अपने बच्चों को छोड़ने आया करते थे तब वे देखा करती थी अच्छा ये पापा है ,पर उन्होंने कभी रेखा को स्कूल नहीं छोड़ा ,क्योंकि ‘आई डोंट हैव अ चॉइस’ मुझे कभी यह मौका नही मिला कि वे मुझे स्कूल छोड़ने आते’, जैसा वे अन्य परिवारों में भी देखतीं रही पर अपनी माँ को पति के बिना स्वयं को पिता बिना देखा, इसलिए भानुरेखा का सपना था कि एक ‘घर’ होगा जिसमें ‘पति’ और ढेर सारे बच्चे होंगें, वे शबाना आज़मी का उदाहरण देती है कि ‘उन्हें एक सुरक्षित पारिवारिक माहौल मिला और वे जिस तरह पुरुषों से आत्मविश्वास से बात करतीं हैं, मैं हैरान होती हूँ, उन्हें फर्क नहीं पड़ता, आदमी है या औरत पर मैं सेल्फ कॉन्शियस हो जाती हूँ क्योंकि पिता के अभाव ने मुझे पुरुषों के प्रति सहज नहीं रहने दिया’ उनके अनुसार ‘पिता के बिना जीवन की यात्रा ऐसी है कि बिना नक़्शे के यात्रा करना’ एक पिता के माध्यम से आप पुरुष के मंतव्य को समझते हैं आप पुरुषों से डील करना सीखतें हैं पर ‘पिता यानी फादर का मेरे लिए अर्थ था चर्च वाले फादर’ पिता के लिए एक शब्द भी गलत बोले बिना अपने खालीपन को खूबसूरती से छिपा जाती हैं। पर उन्होंने पिता के उपनाम को त्याग दिया वे ‘अकेली’ रेखा रह गई और अपने परिवार, जिसमें उनकी माँ के अतिरिक्त उनके भाई बहन थे उनके लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया उनकी एक फ़िल्म ‘जीवन धारा’ उनके ममतामयी रूप को व्यक्त करने वाली महत्वपूर्ण फिल्म है जिसमें नायिका विवाह नहीं करती वहाँ ‘घर बसाने की कसक’ साफ़ दिखाई देती है।
जब रेखा का विवाह नहीं हुआ था तब भी और पति की मृत्यु के भी बाद उन्होंने अपनी माँग को हमेशा सिन्दूर से सजाया जो किसी ‘व्यक्ति विशेष’ के नाम की मोहताज़ नहीं थी, विवाह पूर्व एक दफे नीतूसिंह ऋषि कपूर की शादी में वे सिन्दूर लगा कर पहुँची तो सभी को चकित कर दिया लेकिन रेखा ने कोई भी स्पष्टीकरण देना जरूरी नहीं समझा सभी अटकलें लगातें रहे और रेखा को कभी इस बात की परवाह नहीं थी कि लोग क्या कहेंगे? अपने एक इंटरव्यू में वे कहतीं हैं कि ‘उनकी मांग में किसी के नाम का सिन्दूर नहीं, बस मेरी माँग में सिंदूर जँचता है इसलिए लगाती हूँ’। यानी फ़िल्मी हस्ती होते हुए भी ‘सजना है मुझे सजना के लिए’ की धारणा को वे झटका देतीं हैं।
‘घर’ की तलाश में ‘सदा सुहागन’ ‘ख़ूबसूरत’ ‘उमराव जान’ – ‘घर’ को वे अपनी पसंदीदा फिल्मों में मानती है, इसके पूर्व अमिताभ के साथ ‘दो अनजाने’ के दौरान उनकी कार्यशैली और अनुशासन से वे प्रभावित हो चुकी थी उनके व्यक्तित्व में भी गंभीरता आई। ‘घर’ फ़िल्म का कथानक जिसमें एक स्त्री का दर्द कहीं न कही उन्हें बैचैन कर गया था उन्होंने माना कि ‘पहली बार लगा कि फिल्में मनोरंजन के अतिरिक्त समाज को सन्देश देने का उपयुक्त माध्यम है इसका सदुपयोग करना चाहिए’ सिम्मी ग्रेवाल अपने शो में एक 20 साल पहले के इन्टरव्यू की झलक दिखातीं हैं जहाँ वे उनसे पूछ रहीं है कि ‘20 साल बाद आप ख़ुद को कहाँ और कैसा देखती हैं? वो बिना सोचे बिंदास बोलतीं हैं ‘फैट!’ यानी एक मोटी महिला, यानी शादी के बाद एक भारी शरीर लिए वे अपने घर-परिवार की देखभाल कर रहीं होंगी। फ़िल्म ‘घर’ घर-परिवार की इस तलाश की बैचैनी को बहुत संजीदगी से दिखातीं हैं। फिल्म में नव दम्पत्ति के लिए घर सिर्फ़ एक चार दीवारों की छत भर नहीं है, फ़िल्म में दोनों का प्रेम, स्नेह, समर्पण अंत तक बांधें रखता है लेकिन बलात्कार के बाद नैतिकता की जंजीरों से बंधी सामाजिक सोच इस सुंदर, सुदृढ़ ‘घर’ की नींव हिला देती है, 70 के दशक के रोमानियत भरे माहौल में यह एक यथार्थवादी फ़िल्म है, जो बलात्कार के बाद लड़की के मनोविज्ञान के साथ-साथ उसके पति की मानसिक यन्त्रणा, बिखरे हुए घर को समेटने की जद्दोजहद, जिस आघात से नायिका जूझ रही है तो नायक भी उस दर्द से गुजर रहा है; उसे तथा समाज मनोविज्ञान को स्पष्ट करती है। फिल्म में बलात्कार का दृश्य किसी भी फ़िल्मी दृश्य की तरह उत्तेजित नहीं करता बल्कि करुणा का भाव उपजाता है।
विनोद मेहरा और रेखा ने इस फिल्म के बाद शादी कर ली थी पर विनोद की माँ ने इस रिश्ते को स्वीकार नहीं किया कारण रेखा की पारिवारिक पृष्ठभूमि।लेकिन सिमी के शो में वे पहली बार इस बात का खंडन करते हुए कहती हैं कि ‘वे एक बहुत अच्छे मित्र थे’। आज उनका कहना है कि ‘अब तो उन्होंने अपने काम से ही विवाह कर लिया है’, उनका यह वक्तव्य भी पितृसमाज से टक्कर लेता है।उनके जीवन की विडम्बना को उनके आइटम सॉंग जो उन्होंने ‘परीणिता’ फ़िल्म में परफॉर्म किया से जोड़ा जा सकता है- नई नहीं ये बातें, ये बातें हैं पुरानी…कैसी पहेली है ये, कैसी पहेली जिंदगानी… थामा, हाँ रोका इसको, किसने हां, ये तो है बहता पानी …पल में हँसाएँ पल में रुलाये ये कहानी… कैसी पहेली है ये जिंदगानी ये है बहता पानी।’ इस बहते पानी को एक घर की चार दीवारी में कैसे बाँधा जा सकता है!
सौन्दर्य और शक्ति का ‘खबूसूरत’ मिलन ‘खूबसूरत’ (1980) फ़िल्म में रेखा एक ‘टॉम बॉय छवि’ के नये रूप के साथ अवतरित होतीं हैं, रेखा कहती है ‘वह रोल मेरे व्यक्तित्व के बहुत करीब था मैं वैसे ही थी, अपने घर-परिवार में बिंदास, बेफालतू में बोलने वाली, सभी से सभी तरह बेझिझक बात कर लिया करती थी लेकिन सामने वाला मेरे इस खुलेपन या अंग्रेजी में कहें फ्रैंक व्यवहार को गलत अर्थ में लेकर मेरे लिए गलत भी सोचते, शुरू में तो फर्क नहीं पड़ता पर धीरे-धीरे समझ आया कि अपने इस व्यवहार को रिज़र्व करना होगा’ फ़िल्म की नायिका जो सारे नियम तोड़, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाती है, खिलखिला कर हँसती है, पूरे परिवार यहाँ तक कि होने वाली सास के भी विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन करती है लेकिन चंचल, बिंदास हाजिर जवाब नायिका का पर्यवसान ‘एक अच्छी बहु बनाने’ की प्रक्रिया के साथ ही होता है,फिल्म का लक्ष्य ही था कि लड़कों की तरह खुली बिंदास लड़कियां घर भी संभाल सकती हैं! ‘घर’ जहाँ वह सबकी सेवा सुश्रुषा करे लेकिन वास्तव में यह रेखा का भी सपना रहा है कि अपने घर में वे किसी भी समर्पित भारतीय नारी की तरह एक सुंदर सफल जीवन का निर्वाह कर सकें। इसलिए 1986 में ‘सदा सुहागन’ की कर्तव्य परायण, त्याग, बलिदान की प्रतिमूर्ति गृहलक्ष्मी का महिमामंडन करने वाली रेखा नजर आई है, जो सुबह उठकर पति के पैर छूती है, शेविंग किट से लेकर टूथ ब्रश जूते पॉलिश सभी करती है, बच्चों को तैयार करके प्रसन्नचित्त गीत गाती है ‘मेरा घर स्वर्ग जैसा है और मेरे पति मेरे स्वामी हैं’ मुझे लगता है यह यह रेखा के सपनों का घर था ।
उमराव जान – आँखों में शराब दिखी सबको,आकाश नहीं देखा कोई, सावन भादों तो दिखे मगर,क्या दर्द नहीं देखा कोई (गुलज़ार) उमराव जान की मस्त आँखों के हजारों मस्ताने हैं उनकी एक-एक अदा पर फ़िदा भी हजारों लाखों होंगे, लेकिन उमराव की जुस्तुजू से कौन वाबस्त है,ये आँखे किसे खोज रहीं हैं इस फ़िल्म में भी वे ‘घर की कसक लिए’ जी रही है। फिल्म में वे अपनी बचपन की साथी को वे कहती हैं कि यदि मेरा रंग तुमसे साफ़ होता तो आज तुम्हारी जगह मैं विवाहित होती। जब संयोग से वापस अपने घर लौटती हैं तो उमराव का भाई कहता है, तुम मर क्यों न गई और तब वे गीत में अपना दरद बयान करतीं है – ‘ये क्या जगह है दोस्तों ये कौन सा दयार है ..तमाम उम्र का हिसाब मांगती है जिन्दगी …ये मेरा दिल कहे तो क्या, ये खुद से शर्मशार है…न जिसकी शक्ल है कोई,न जिसका नाम है कोई इक ऐसी शै का क्यों हमें अज़ल से इंतज़ार है’ । ‘उमराव जान फ़िल्म किसी भी स्त्री के जीवन की आकांक्षाओं और उसके दमन की व्यथा, दर्द और जीवन की विडंबनाओं को संवेदनशीलता से पर्दे पर उतारती है जिसमें रेखा सर्वोपरि हैं तो अतिशयोक्ति न होगा, उनके अनुसार फ़िल्म में उन्होंने ‘अपने उस समय के अच्छे बुरे-दौर से गुजरने वाले अनुभवों को ही इस्तेमाल किया है,उनके व्यक्तिगत अनुभव प्रतिकूल समय-परिस्थितियाँ, सामाजिक मनोविज्ञान अथवा उनकी निजी अभिव्यक्ति और अपने जीवन से जुडी त्रासदियों को अपनी आँखों के माध्यम से उड़ेल कर रख दिया’ इस सन्दर्भ में जब फ़िल्म निर्देशक मुजफ्फर अली पूछा गया कि स्मिता पाटिल जैसी बेहतरीन अभिनेत्री के होते हुए रेखा क्यों तो उनका जवाब था कि ‘उसकी आँखे टूट जाने और फिर खुद को एक साथ खींच लेने के अनुभव बताती हैं,उसके पास वह ताकत और आकर्षण है जो उसे अपने अतीत के अनुभवों से मिले हैं’।
गठबंधन के बदसूरत निशान घर बसाने की उनकी तीव्र इच्छा पूर्ण हुई भी पर उसमें ग्रहण लग गया। जब उनका विवाह हुआ तो उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि स्वार्थ से बंधा यह संबंध टिक नहीं सकता साक्षात्कारों से अप्रत्यक्षतः समझ आया कि उनके पति उन्हें अपने बिजनेस से जोड़ना चाहते थे लेकिन रेखा तो मूलत: ‘घरेलू प्रवृति’ की हैं बस बिंदास लड़की का सुरक्षा कवच ओढ़े रहतीं हैं, उनके इनकार ने उनके पति को कमजोर कर दिया। जब मुकेश अग्रवाल ने आत्महत्या की तो रेखा सभी की दृष्टि में एकाएक खलनायिका बन गई जबकि हम जानते हैं आज भी घरेलु हिंसा के चलते सबसे ज्यादा महिलायें आत्महत्या करती हैं, जिन पर समाज बात नहीं करता, मुकेश की माँ ने कहा कि ‘वो डायन मेरे बेटे को खा गई’ पर यह लांछन तो हर उस बहू को सुनना पड़ता है जिसका पति उसके पहले मर जाता है ‘सदा सुहागन’ के आशीर्वाद का क्या अर्थ है बताने की जरूरत नहीं। फ़िल्मी हस्तियों ने भी रेखा के व्यक्तित्व पर नकारात्मक टिप्पणियाँ की किसी ने कहा कि रेखा ने एक ऐसे व्यक्ति को खोया है जिसने उसे उसके अतीत के साथ स्वीकार किया जो उसे सबसे ज्यादा प्यार करता था जैसा पहले कभी किसी ने नहीं किया जबकि मुकेश का कहना था उनके जीवन में भी एक एबी(AB) है। पति की आत्महत्या के बाद रेखा के जीवन और फ़िल्मी करियर दोनों को झटका लगा पर रेखा के अनुसार ‘उस समयावधि में मेरे मित्रों, अपनों, सभी ने इस सम्बन्ध पर जो प्रतिक्रियाएं दी उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा, मैंने बहुत कुछ अपने भीतर जज़्ब कर लिया, उन क्षणों ने मुझे और भी मजबूत बनाया आज मुझे खुद पर गर्व है कि मैं अपना वजूद बना पाई’ बड़ी मार्मिकता से कह उठती हैं “पति शब्द मेरे लिए पिता के समान पराया है” जबकि वे सदा सुहागन बनाना चाहती थी।
असीमित प्रेम की रेखा ‘जज्बात कहते हैं खामोशी से बसर हो जाए दर्द की जिद है कि दुनिया को खबर हो जाए’ अनेक रोमांटिक फ़िल्म करने वाली फिल्मों में रेखा को ‘सिलसिला’ पसंद है।आर्ट फिल्मों के यथार्थ पर वे त्वरित टिप्पणी करती हैं कि ‘इस तरह सिलसिला भी आर्ट फिल्म है क्योंकि यह एक रियलिस्टक फिल्म है’ इस फ़िल्म में उन्होंने अपने यथार्थ को उतारने का जोखिम उठाया ये जानते हुए कि पुरुष प्रधान समाज में बदनाम स्त्री ही होगी, विवाहेतर सम्बन्ध और पूर्व प्रेमिका की कसक से दर्शकों को बैचैन किया तभी दर्शक फिल्म के अंत से सहमत न हुए कि यह तो फ़िल्म थी इसमें दोनों का मिलन होना चाहिए था, शायद इसलिए फ़िल्म नहीं चली। सिमी ग्रेवाल के शो में रेखा ने अपने प्रेम से जुड़े कई पहलुओं पर खुलकर बात की इस बात का सिमी ने अतिरिक्त लाभ लिया इसलिए एक वक्त पर रेखा को कहना पड़ा कि ‘बाई द वे यह शो मेरे बारे में है या मिस्टर बच्चन का’ और जब ये कहा उनके बैठने का अंदाज़ बिलकुल अमिताभ की तरह था और यही सवाल जब सिमी ने अमिताभ से किया तो उन्होंने कहा ये अफवाहें जिस मीडिया ने फैलाई है आपको उन्हीं से पूछना चाहिए जबकि रेखा ने बहुत ईमानदारी से जवाब दिया वे कहतीं हैं ‘यह प्रश्न ही मूर्खता पूर्ण है’ इस तरह का प्रश्न किसी के भी जीवन का अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है जबकि हमारे लिए, यह गपशप, और मसालेदार खबर है। रेखा के अनुसार ‘ये तो कोई दूसरे ही तरह का प्रेम है माँ का, बहन का प्रेम, दुनियां भर के प्रेम रूपों को आप ले लीजिये और भी उसमें कुछ और प्यार मिला दे वह प्रेम उनके प्रति है दिल की गहराइयों से’ कुछ और प्यार ही बहुत कुछ कह जाता है। अदर वीमेन का कलंक वे अपनी माँ की तरह ‘अदर वीमन’ नहीं होना चाहती थी न ही किसी का ‘घर’ तोड़ना चाहती थी वे उदाहरण देती है ‘रोज़ यानी गुलाब अगर मैं गुलाब से प्यार करती हूँ तो वो जिस डाली पर है वहीँ करूगीं उसे तोड़ थोड़ी दूँगी’ फिर कहतीं हैं जैसे धर्म का आवरण है, कोई हिन्दू है मुसलमान है,(आप जोड़ सकते हैं जैसे कोई विवाहित हैं) तो सिर्फ इसलिए आप उसे प्यार करना नहीं छोड़ देंगे न! वह एक इंसान पहले है। ‘माइंड हार्ट एंड सोल’ से आप किसी व्यक्ति से जुड़ जातें हैं, मिलना ही जरूरी नहीं, सब चुनाव पर निर्भर करता है आप जो चुनते हैं वही आपके जीवन की दिशा निर्धारित करता है शायद यही कारण है उन्हें फिल्मों की मीरा भी कहा जाता हैं जिसने घर बार त्याग कर अपनी ही धुन में कृष्ण से टूट कर प्रेम किया। वैसे भी इस समाज में प्रेम के दो ही रूप स्वीकार्य है या तो दाम्पत्य प्रेम अथवा सूफियाना अथवा मीरा का-सा प्रेम। दाम्पत्य प्रेम में वे दोनों बार असफल रही।
सिंगल वीमेन का सम्मानजनक जीवन यह सोचना कि रेखा उदास, त्रासद, दर्द में है क्योंकि वह सिंगल है? क्योंकि उनके बच्चे नहीं हैं? तो क्या एक महिला के लिए शादी और बच्चे सबसे महत्वपूर्ण चीज है? नहीं वह एक बेहद सफल, बहुत प्रतिभाशाली सफ़ल व्यक्तित्व हैं। आज रेखा भले ही एकाकी जीवन जीती है लेकिन उसमें अकेलापन नहीं है, जब जब जीवन में भूकंप आया हर बार मजबूत क़दमों के साथ नया सफ़र आरम्भ किया घर की संकल्पना पर वो कहती है “मैंने खुद से शादी की, अपने प्रोफेशन से शादी की, लड़के से नहीं, ये जरूरी भी नहीं है…मैं अकेली नहीं हूँ अकेलापन नहीं फील करती, अपनी मर्जी से स्वतंत्र जीवन बिता रही हूँ जहाँ जाना होता है, जाती हूँ जहाँ नहीं जाना होता नहीं जाती’ और ‘ये बस होता गया अगर एक भी मित्र है तो आप लकी हो माँ कहती थी’ शायद फरजाना वह एकमात्र उनकी मित्र है जो 1986 से उनके साथ है जिसके पास रेखा खुद को सबसे अधिक सहज, सुरक्षित और स्वच्छन्द महसूस कर पातीं हैं । बीबीसी पर वे एक गज़ल से अपना साक्षात्कार आरम्भ करती हैं जिसे मैं लेख का अंत करना चाहती हूँ ‘मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो मुझे तुम कभी भी भुला ना सकोगे ना जाने मुझे क्यों यक़ीं हो चला है मेरे प्यार को तुम मिटा ना सकोगे’ ये अडिग रेखा कभी भी मिट नहीं सकती ।
प्रत्येक वर्ष अमेरिकी मैकआर्थर फाउंडेशन द्वारा अपने मैक आर्थर फेलोशिप प्रोग्राम के तहत 20 से 30 वैसे व्यक्ति विशेष को जो अपने रचनात्मक कार्यक्षमता से किसी भी क्षेत्र मे अद्भुत कार्य कर रहे है, प्रतिष्ठित मैक आर्थर जीनियस ग्रांट से नवाजा जाता है।
इस वर्ष 2024 के विजेताओं की घोषणा हो चुकी है, जिसमें 22 मैक आर्थर फ़ेलो में पुणे-महाराष्ट्र की शैलजा पाइक का नाम शामिल है, भारतीय मूल की अमेरिकी इतिहासकार और लेखिका शैलजा पाइक को यह खिताब प्राप्त करने वाली भारत की पहली दलित महिला होने का भी गौरव प्राप्त हुआ। पाइक का जन्म पुणे के एक दलित परिवार मे हुआ, जहां उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद सवित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय से स्नातक तथा स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। “द प्रिन्ट” के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि वे आईएएस बनना चाहती थी,परंतु अपने पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान दलित महिलाओ के जीवन पर शोध मे ही लगाया। इसी दौरान उन्हें फोर्ड फाउंडेशन की ग्रांट मिली, जिसकी मदद से उन्होंने वारविक विश्वविद्यालाय, यूके से अपनी पीएचडी पूरी की। अब वे सिनसिनाटी विश्वविद्यालाय अमेरिका में ‘ वुमन, जेंडर और सेक्सुअलिटी अध्ययन एवं एशियाई अध्ययन पढ़ाती हैं।
बीबीसी मराठी से अपने और अपने परिवार के संघर्ष पर बात करते हुए शैलजा कहती हैं, “हमारे पास न तो पीने के पानी की सुविधा थी, न ही शौचालय. यह सच है कि मैं कचरे और यहां तक कि गंदगी से घिरे इलाके, जहां सूअर घूमते रहते थे, वहां बड़ी हुई, सार्वजनिक शौचलायों की वो यादें, मुझे आज भी परेशान करती हैं.” बस्ती में सार्वजनिक नल का पानी ही घर में खाना पकाने या सफाई जैसे कामों का आधार था’
बीबीसी से बात करते हुए वे कहती हैं, “ऐतिहासिक रूप से इतनी बड़ी आबादी को किसी भी प्रकार की शिक्षा, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक जल निकायों या कुओं के इस्तेमाल की अनुमति नहीं थी, चप्पल या नए कपड़े पहनने की तो बात ही छोड़ दें, भले ही कोई उनका ख़र्च उठाने की स्थिति में ही क्यों न हो.”
“दलित महिलाएं निस्संदेह सबसे अधिक वंचित और उत्पीड़ित हैं. दलितों में उनकी स्थिति ‘दलित’ जैसी है. यही वह समाज है जहां से मैं आती हूं. यही कारण है कि पिछले 25 वर्षों से मेरे अध्ययन, शोध और लेखन का विषय यही रहा है.”
वे आगे कहती हैं, “सामाजिक, शैक्षिक, भावनात्मक और मानसिक सभी स्तरों पर, इन सबका निश्चित रूप से गहरा प्रभाव पड़ता है. इतना मुश्किल जीवन जीने और येरवडा जैसे इलाके़ में रहने के बाद भी इन हालात से बाहर निकलने में शिक्षा के महत्व को मेरे माता-पिता देवराम और सरिता ने पहचाना और मुझे इसके लिए प्रोत्साहित किया. यही कारण है कि मैं ख़ुद को पढ़ाई के लिए समर्पित कर पायी.
मैक आर्थर फाउंडेशन ने अपनी औपचारिक वेबसाईट मे यह बताया कि “शैलजा पाइक, जाति वर्चस्व के इतिहास पर नई अंतर्दृष्टि प्रदान करती है और उन तरीकों का पता लगाती है जिसमें जेन्डर और सेक्सुअलिटी का उपयोग दलित महिलाओ को सम्मान तथा उनके व्यक्तित्व से वंचित करने के लिए किया जाता है।” शैलजापाइक का प्रारम्भिक शोध आधुनिक भारत में दलित अध्ययन, जेन्डर तथा सेक्सुअलिटी के इन्टरसेक्शन पर केंद्रित है। उनकी पहली पुस्तक, ‘आधुनिक भारत में दलित महिला शिक्षा: दोहरा भेदभाव’, 20वीं सदी में शिक्षा तक पहुँच के विषय में महाराष्ट्र की दलित महिलाओं के अनुभवों को बयां करती है।इसी प्रकार उनकी दूसरी पुस्तक,”द वल्गारिटि ऑफ कास्ट”, पितृसत्तात्मक ताकतों और राज्य की नज़र के बीच तनाव को उजागर करती है। उनके काम ने दलित नारीवादी विचार के अध्ययन को व्यापक और गहरा किया है। शैलजा पाइक ने NPR (नैशनल पब्लिक रेडियो) से संवाद के दौरान कहा कि “मुझे पहले कभी जीन्यस नहीं कहा गया था। लेकिन जब मैं सोचती हूँ कि मैं यहाँ कैसी पहुंची, एक कठिन यात्रा से , तो मैं इसे कृतज्ञता के साथ स्वीकार करती हूँ।“
बीबीसी को वे बताती हैं कि “भारत की कुल आबादी में दलित 17 प्रतिशत हैं. मैंने देखा कि दलित महिलाओं की शिक्षा पर बहुत काम नहीं किया गया है. आंकड़े तो हैं लेकिन सटीक स्थिति के बारे में कोई गुणात्मक शोध नहीं है. इन दलित महिलाओं का इतिहास किसी ने ठीक से नहीं लिखा इसलिए मैंने तय किया कि मुझे ये काम करना है.” फ़ैलोशिप के बारे में बात करते हुए वह कहती हैं, “मुझे उम्मीद है कि यह फेलोशिप दक्षिण एशिया और उसके बाहर दलितों और गैर-दलितों दोनों के लिए जातिवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई को मज़बूत करेगी.”
1981 मे आरंभ हुई इस फेलोशिप प्राप्तकर्ताओं में में अब तक 1153 रचनात्मक कलाकारों, विद्वानों, शोधार्थी आदि शामिल हैं। जिसमें विजित प्रत्येक फ़ेलो को 800,000 अमेरिकी डॉलर यानि भारतीय मुद्रा मे लगभग 6.72 करोड़ रुपये पाँच वर्षों मे दिए जाएंगे। “द न्यूयार्क टाइम्स ” मे छपे एक लेख मे मैक आर्थर फ़ेलो जिम कॉलिन्स कहते है कि “इसमें किसी प्रकार की आवेदन की व्यवस्था नहीं है। इसे एक अज्ञात समिति द्वारा विभिन्न क्षेत्रों से विद्वानों को चुना जाता है।”
झारखंड की शान सलीमा टेटे को हॉकी इंडिया ने इस साल की शुरुआत में 2023 की सर्वश्रेष्ठ महिला खिलाड़ी चुना। इसके बाद मई 2024 में उन्हें भारतीय महिला हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया। उन्होंने सविता पुनिया की जगह ली।
सलीमा, झारखंड के एक दूरदराज़ गांव से आती हैं,उन्होंने एक साधारण जीवन से भारतीय महिला हॉकी टीम की एक स्टार खिलाड़ी बनने तक का सफर तय किया है। बचपन में,वह अपने परिवार के लिए भोजन जीतने की उम्मीद से बांस की छड़ी से हॉकी खेलती थीं।सलीमा के परिवार ने अपने आर्थिक संघर्षों के बावजूद उनके हॉकी खेलने के सपने का समर्थन किया-अपनी पास की थोड़ी से भी संपत्ति बेचकर, कर्ज लेकर। टूर्नामेंट में जाने में मदद करने के लिए पैसा उधर लिया। सलीमा के दृढ़ संकल्प और उनके परिवार के अटूट समर्थन का फल तब मिला, जब उन्होंने 2019 में युवा ओलंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम को रजत पदक दिलाया। इसके साथ ही वे देश की महिला खिलाडियों की प्रेरणा बन गयीं। वह भारत की एक सच्ची युवा आइकन बन गई।
राजधानी रांची से 165 किलोमीटर दूर सिमडेगा जिले के उनके छापर गांव में पानी की मुकम्मल सुविधा तक नहीं है| सलीमा टेटे की माँ पीने के पानी के लिए घर से 4 किलोमीटर दूर कुएं तक जाती हैं। सलीमा के घर वाले बताते हैं कि ‘गांव में हैंड पंप है, पानी की सरकारी टंकी भी है, लेकिन उसका पानी कोई पी नहीं सकता , उस पानी से दाल तक नहीं गलती है| गांव के दूसरे छोर पर एक पुराना कुआं है, पीने और खाना बनाने के लिए उसी कुएं से पानी लाया जाता है। छापर गांव में मुंडा और खरिया जनजाति के 65 आदिवासी परिवार में से महज चार के घर पीएम आवास योजना के तहत बने हैं, बाकी सारे घर खपरैल हैं| पूरा गांव खेती पर निर्भर है, लेकिन बरसात के अलावा सिंचाई का कोई दूसरा साधन नहीं है| पक्की सड़क गांव तक पहुंचती है, लेकिन गांव में घुसने के बाद कच्ची सड़क से वास्ता पड़ता है, जिस पर बारिश के दिनों में चलना दूभर हो जाता है |’107 इंटरनेशनल मैच खेल चुकी सलीमा की ज़िंदगी बादल गयी है ,जिंदगी तो परिवार और उनके समाज की भी बदली है, लेकिन नहीं बदले हैं हालत पानी पीने के लिए दूर कुएं तक जाने के ।
2023 में दिए एक इंटरव्यू में खुद सलीमा गांव के हालात बताती हैं, ” गांव जाती हूं तो मैं भी कभी-कभी पानी लाने जाती हूं। पानी लाना एक संघर्ष है। मतलब अगर यहां पर कुछ चापाकल हो जाते , कुछ आवास मिल जाते तो बहुत अच्छा होता, पर मैं भी क्या कर सकती हूं ? ‘ झारखंड सरकार ने कई सारे वादे किए थे। आवास देने को कहा था, 4-5 साल हो गये अभी तक नहीं हुआ है कुछ भी ।’ आज भी 2024 में सरकार की संस्थाएं घोषणा कर रही हैं। झारखंड राज्य आवास बोर्ड ने पिछले अगस्त में झारखंड की दो खिलाडियों निक्की प्रधान और सलीमा टेटे को हरमू में आवास देने की घोषणा की।
सलीमा अपने गांव के बारे में बताती हैं, ‘ यहाँ पानी की बहुत दिक्कत होती है, बिजली की भी। यहाँ कोई नेटवर्क भी नहीं है।कभी- कभी मैं गांव जाती हूं तो नेटवर्क का प्रॉब्लम बहुत ज्यादा होता है। मेल या कुछ भी मैसेज आया तो मैं देख नहीं पाती। बाहर रहने पर मम्मी-पापा से भी अच्छे से बात नहीं हो पाती ‘ वे सरकारी योजनाओं के तहत बनने वाले घर का मुद्दा भी उठाती हैं। उनके अनुसार इसमें धर्म का एंगल भी दिखता है, जैसे क्रिश्चियन परिवारों के साथ भेदभाव होता है।
खिलाडियों को वादे और वादों को धरातल पर उतारने में काफी फर्क है। सीनियर टीम में ही डिफेंडर पोजीशन पर खेलने वाली रोपनी कुमारी इसी जिले के जाम बहार मांझी टोली गांव की हैं, उन्हें अभी तक पीएम आवास नहीं मिला है। उनका परिवार दो कमरों वाले खपरैल घर में रहता है झारखंड का सिमडेगा जिला हॉकी के खिलाड़ियों की खान है। फिलहाल इस जिले के चार खिलाड़ी, सीनियर और तीन जूनियर नेशनल टीम में हैं-झारखंड से पांच-पांच खिलाड़ी सीनियर और जूनियर टीम में हैं। इस राज्य से अब तक 100 से ज्यादा खिलाड़ी नेशनल टीम के लिए खेल चुके हैं, सात खिलाड़ी ओलंपिक भी खेल चुके हैं। राज्य की तीन खिलाड़ी भारतीय महिला टीम की कप्तानी भी कर चुकी है, लेकिन हॉकी टीम को समृद्ध बनाने वाली खिलाड़ियों का गांव खस्ताहाल है। वैसे सरकार सलीमा के गांव में कुछ कुछ काम कर रही है । उसने वहां पर एक मैदान भी बनाया है और अभी उपायुक्त महोदय खुद उस गांव को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत दिखे लेकिन सवाल है कि सिर्फ बिजली या पानी पहुंचा देने से ही आसान नहीं होंगी राहें, सलीमा का हो या कोई भी गांव उसे ऐसा बनाया जाए कि वहां सारी सुविधा उपलब्ध हो। खिलाडियों के लिए यह प्राथमिकता से करना चाहिए।
गांव के अंदर सड़क हो, नाली हो, पीसीसी पथ हो और सजावट हो। यदि जगह हो तो आसपास पार्क ही बना दिया जाए। हॉकी इंडिया के उपाध्यक्ष भोलानाथ सिंह कहते हैं कि ‘छापर गांव के हालात बेहद खराब थे, लेकिन प्रशासन ने उसे ठीक करने की पहल की है। सिमडेगा के डीएम अजय कुमार भी इसे स्वीकार करते हैं कि ‘मोबाइल नेटवर्क की समस्या बड़की छापर ही नहीं पूरे सिमडेगा में है, बीएसएनएल अभी तक ४जी है, प्राइवेट कंपनियां कहती हैं कि क्लाइंट ज्यादा होने पर ही टावर लगा पाएंगे। पानी की समस्या भूजल स्तर के ऊपर नीचे होने से आती है। बिजली की समस्या के स्थायी समाधान के लिए पूरे गांव में सोलर लाइट लगवाने के लिए एक प्राइवेट कंपनी को बजट बनाकर भेजा गया है।
हॉकी स्टिक पकड़कर बॉल को विरोधी खेमे के गोल पोस्ट तक पहुंचाने वाली ये लड़कियां और इनके परिजन असुविधा की मार झेल रहे हैं | डिजिटल इंडिया का शोर है लेकिन गांव में मोबाइल नेटवर्क नहीं है, हर घर नल से जल पहुंचाने की योजना पर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन यहां पीने के पानी के लिए कुएं का मुंह ताकना पड़ता है, सिर पर छत से लेकर पैर तले अच्छी सड़क खस्ता हाल है। खिलाड़ियों को उम्मीद है कि इन मुश्किलों के खिलाफ किसी दिन जीत दर्ज होगी, जैसे हॉकी के ग्राउंड में होती है। इसी तरह की तसल्ली से भरी हुई |
दीवारों में उकेरी गई आकर्षक पेंटिंग,स्मार्ट क्लास,कंप्यूटर क्लास,और किचन गार्डेन विद्यालय को दिला रहे हैं अलग पहचान
सिमडेगा शहरी क्षेत्र से करीब 30 किमी की दूरी पर केरसई प्रखंड अंतर्गत बासेन बखरी टोली में राजकीयकृत मध्य विद्यालय बासेन स्थित है। करीब 600 जनसंख्या वाले इस गाँव में स्थित यह विद्यालय अपने शैक्षणिक क्रियाकलापों और गतिविधियों के कारण चर्चा में है। रास्ते से गुजरते वक्त जब आप विद्यालय को देखेंगे तो भौचक रह जायेंगे। कतारबद्ध खड़े लंबे अशोक पेड़, चारदिवारी में उकेरी गई शिक्षावर्धक पेंटिंग, बागवानी, फुलवारी आदि देख लगेगा किसी प्राइवेट विद्यालय को देख रहे हैं। जब आप विद्यालय में प्रवेश करेंगे तो दीवारों में सजाई गई विद्यार्थियों की पेंटिंग, स्वच्छ परिसर और महापुरुषों के नाम पर अध्ययन कक्ष जिसमें उकेरी गई स्लोगन विद्यालय की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं।
विद्यालय को 2022 में स्वच्छता में पूरे जिले में 98 अंकों के साथ द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है। यहाँ के ग्राम शिक्षा समिति को राज्य सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा उत्कृष्ट पुरस्कार मिला है। सातवीं कक्षा के पाठ्यपुस्तक सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था-2, पेज नंबर 04 में इस विद्यालय की फोटो जगह दी गई है, जो जिले के लिए गौरव की बात है। विद्यालय में ड्रॉपआउट विगत कई वर्षों से शून्य के बराबर है। विद्यालय को उनके प्रदर्शन और संसाधन उपलब्धि के आधार पर 5 स्टार श्रेमिला है। इसे अब पीएम श्री स्कूल के तर्ज पर विकसित किया जा रहा है।
विद्यालय के प्रधानाध्यापक कमलेश्वर मांझी हैं। यह सब उन्हीं की दूरदर्शिता,सोच और लगन के कारण संभव हो सका है। कमलेश्वर मांझी की पहल से विद्यालय में प्रत्येक सप्ताह हेडमास्टर बदलते रहते हैं। प्रत्येक सप्ताह विद्यालय की कार्यप्रणाली, स्वच्छता, शैक्षणिक गतिविधि और निर्णय लेने का दायित्व अलग- अलग शिक्षक को होता है। उस एक सप्ताह के हेडमास्टर के नेतृत्व में ही विद्यालय के सभी कार्य संचालित किये जाते हैं। विद्यार्थियों को भी एक सप्ताह का हेडमास्टर बनने का अवसर मिलता है। इससे सभी शिक्षकों में जिम्मेदारी और कर्तव्य का बंटवारा हुआ है। शिक्षकों के साथ विद्यार्थी और अभिभावकों में भी विद्यालय के प्रति जवाबदेही और आकर्षण बढ़ा है जिसके कारण सभी कार्य समय पर होने लगे हैं।
राष्ट्रीय मेधा छात्रवृत्ति, राज्य मेधा छात्रवृत्ति, निर्धनता सह मेधा छात्रवृत्ति सहित नवोदय प्रवेश परीक्षा में प्रत्येक वर्ष यहाँ के बच्चे चयनित हो रहे हैं। 2022 ई. में आयोजित इंदिरा गांधी आवासीय विद्यालय प्रवेश परीक्षा यहाँ की छात्रा आहना प्रेरणा मांझी राज्य स्तर में द्वितीय स्थान प्राप्त कर चयनित हुई थी। राज्य स्तरीय भाषण प्रतियोगिता में उमेश मेहर को उत्कृष्ट पुरस्कार मिला है। इसी वर्ष पब्लिक स्पीकिंग में सतमी कुमारी जिला स्तर पर द्वितीय स्थान प्राप्त की है। विगत वर्ष सत्र 2019-20 में विद्यालय से सबीता कुमारी, शिल्पा टेटे, मनिता कुमारी (बिरहोर आदिम जनजाति), जुलेता कुमारी सत्र 2020-21 में योगेंद्र साय, महेश मेहर, पीकेन्द्र माँझी, शशिकांत माँझी, राजू धुर्वा सत्र 2021-22 में छोटू मांझी, अजय बिरहोर, महिंद्र मांझी, आहना प्रेरणा मांझी (टॉप-3 रेंक) सत्र 2022-23 में द्रोपदी कुमारी, मनीष बेहरा, अनिमा कुमारी, प्रभाकर साय, अंजली कुमारी का चयन इस विद्यालय से नवोदय विद्यालय में नामांकन हेतु हुआ है। कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय, एकलव्य विद्यालय, सुभाषचंद्र बोस विद्यालय, मॉडल विद्यालय के लिए भी यहाँ के विद्यार्थी चयनित होकर अध्ययन कर रहे हैं।
इसके अलावा विद्यालय का अपना किचन गार्डेन है, जहाँ शिक्षकों की अगवाई में विद्यार्थी खेतीबारी भी सीखते हैं। किचन गार्डेन में बच्चों द्वारा स्वयं के खाने के लिए तरह-तरह की सब्जियां उगायी जाती हैं। विद्यार्थी संग शिक्षक भी यहाँ गहरी रुचि दिखाते दिख जायेंगे। बालक-बालिकाओं के लिए अलग-अलग स्वच्छ शौचालय की व्यवस्था है। मिड डे मिल के वक्त परेशानी न हो इसके लिए कतार में कई नल लगाए गए हैं जो बच्चों के लिए सुविधाजनक हैं। स्मार्ट बोर्ड में विद्यार्थियों की कक्षा संचालित होती है। विद्यालय में कंप्यूटर क्लास कीभी सुविधा है। कंप्यूटर शिक्षक के द्वारा ग्रुप बनाकर कंप्यूटर सिखाया जाता है। विद्यार्थी कंप्यूटर सीखने में काफी रुचि दिखाते हैं। विद्यालय के प्रधानाध्यापक कमलेश्वर मांझी कहते हैं जो कुछ भी उपलब्धि विद्यालय ने प्राप्त की है उसका श्रेय समूह वर्क को जाता है। यहाँ के सभी शिक्षक,विद्यार्थी और अभिभावक सपोर्टिव हैं। मेरा यही उद्देश्य है कि विद्यालय के बच्चे यहाँ से शिक्षा प्राप्त कर अच्छे- अच्छे संस्थानों तक जाएं और विद्यालय का नाम रोशन करें। विद्यालय में वर्तमान प्रधानाध्यापक कमलेश्वर मांझी के अलावा राधा बड़ाईक,अशोक मांझी,सुषमा सोरेंग,अंतोनी टोप्पो, किशोर नायक,संगीता कुमारी और अभिलाष मिंज सेवारत हैं।
आलो दास, नेहा कुमारी, सरिता डे और रेशमा मुर्मू की रिपोर्ट
भारत के केंद्र शासित प्रदेशों सहित 18 राज्यों में आदिवासियों के 75 ऐसे समूह की पहचान की गई है जिन्हें विशेष रूप से ‘कमजोर जनजातीय समूह’ (PVTG ) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह आदिवासी विकास निधि का एक बड़ा हिस्सा लेता है, कारण यह कि पीवीटीजी (PVTG) को अपने विकास के लिए अधिक धन की आवश्यकता होती है। इस संदर्भ में, भारत सरकार ने 1975 में सबसे कमजोर जनजाति समूहों को पीवीटीजी नामक एक अलग श्रेणी के रूप में पहचानने की पहल की और 52 ऐसे समूहों की घोषणा की जबकि 1993 में इस श्रेणी में 23 समूह और जोड़े गए, जिससे यह कुल 75 हो गए। ये समुदाय उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ ,झारखंड इत्यादि जगहों पर बसे हुए हैं।झारखड में पाए जाने वाले PVGTs असरु,बिरहोर, बिरजिया ,पहाडी ,खारिया, कोनवास, माल पहाड़िया,परहिया, सौदा पहाड़िया, सवार है।
हमने झारखंड राज्य के पलामू जिले के अंतर्गत डाल्टनगंज थाना में स्थित पीवीटीजी गांव कुंभी खुर्द (सोढ़ महुआ टोला) का भ्रमण किया। हमने परहिया समुदाय की जीवन शैली, परंपरा, रीति-रिवाज आदि को करीब से देखा। इस गाँव में लगभग 34 घरों की 400 से 500 आबादी वाले जनसंख्या निवास करते हैं जिनका बसाव पहाड़ व जंगल से सटे क्षेत्रों में है, जो उनकी अपनी पसंदीदा जगह है, वे स्वयं को सदैव पहाड़ ,जंगल ,प्रकृति के करीब रखना पसंद करते हैं।
परहिया समुदाय के लोग विश्वास करते हैं कि-” खेतों में जो पुतला बनाकर रखा जाता है, उस पर एक दिन माता पार्वती की नजर पड़ी थी,तब कुछ ठहर कर उन्होंने अहसास किया कि यह तो बिल्कुल मनुष्य के समान है तो उन्होंने अपनी उँगली काटकर उसमें जान डाल दी। इसी तरह परहिया लोगों की उत्पत्ति हुई और इनका वंश आगे बढ़ता गया और वे पहाड़ों के करीब बसते गए। “यह लोग पार्वती माता, शंकर, कृष्णा, ब्रह्मा , विष्णु भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं साथ ही उनके अपने पारंपरिक आस्था के भगवान है जिनकी वह विशेष रूप से पूजा करते हैं। इनकी आस्था काफी हद तक हिंदू रिवाजों से मेल खाती है। रोजगार के आयामों में जब उनकी खेती का समय खत्म होता है तो काफ़ी लोग पलायन करते हैं जिसमें अधिक संख्या पुरुषों की होती है। यह अवधि अधिकतम में 5-6 महीनों का होता है , जिसमें वे आस-पास के राज्यों के अलावा गुजरात, दिल्ली, मुंबई आदि जगहों पर भी जाते हैं, वहाँ से वापस आकर स्त्रियां अपने पति या भाई आदि को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं तथा घर प्रवेश करते वक्त पैर धोकर उनका सम्मान करती हैं। इनका निवास स्थान पहाड़ी क्षेत्र में होने के कारण वहाँ चावल की खेती बहुत कम होती है। वर्तमान स्थिति यह है कि पिछले 1.5 सालों से नियमित रूप से बारिश नहीं होने के कारण चावल की खेती बिल्कुल भी नहीं हुई । इसके अलावा वे कांधा, गेठी, मन, लाहड़ दाल , मसूर दाल, खेसारी,भटूरे,मकई इत्यादि की खेती करते हैं ।
ये लोग प्रकृति प्रेमी होते हैं, जंगलों से इनका जुड़ाव वंशजों से चलते आया है और इन्हें उम्मीद है कि उनकी आने वाली पीढ़ी सदैव ऐसे ही प्रकृति से जुड़ाव बनाए रखेगी इस बातचीत पर एक पुरुष ने कहा — “बाहर से लोग आते हैं और जंगल के पेड़ों को काटते हैं, मना करने पर जलाने पर भी उतर आते हैं, इसलिए मैंने कड़ी मेहनत से जंगल के और करीब अपना घर बना लिया है। ” इसी वार्तालाप के क्रम में पालतू पशुओं के विषय में उन्होंने अपनी आप बीती सुनाई कि व्यापारी उनके पशुओं को खरीदने आते हैं, जिस पर उन्हें उनके मनमानी मूल्य पर ही मजबूरन पशुओं ( बैल,बकरी) बेचना पड़ता है, हमारे मना करने पर वे दूसरे व्यापारियों से गठजोड़ बनाकर उसके काम में दखलंदाजी करते हैं और दूसरे व्यापार लोग भी उसके पशुओं को तब तक नहीं खरीदते जब तक उनके बोले हुए कम दाम पर ना मिले। बाजार बहुत दूर है, आने जाने का साधन भी सीमित है, इसलिए बाजार से खरीद बिक्री या लेनदेन बहुत कम करते हैं।
इसके अलावा हमने सिर्फ महिलाओं के समूह से बातचीत की , जिससे महिलाओं के समस्याओं का आकलन कर सके तो हमने पाया कि वहां के महिलाओं की स्थिति बहुत ही दयनीय है उस गांव में या उनके टोला में पुरुषों के अपेक्षा महिलाओं की संख्या ज्यादा थी क्योंकि अधिकतर पुरुष काम करने के लिए घर से बाहर थे ।
महिलाएं ही घर संभालती हैं वहाँ पानी की बहुत समस्या है, आस पास कही पानी नहीं था उन्हें गर्मी, धूप,में 1-2 km चलकर पानी लाना पड़ता था वो भी एक ऐसे कुएँ से जिसका पानी साफ नहीं है , वही पानी घर के सारे काम और पीने के लिए वो लोग इस्तेमाल करते हैं। वहाँ की महिलाएं जंगल से बांस लाकर उसके टोकरियां तथा तरह-तरह का सामान बनाती थी लेकिन वहां सड़क की स्थिति भी बहुत खराब थी जिस वजह से वहाँ तक कोई यातायात साधन भी नही होता जिससे वो अपना सामान बाहर बेचने जा सके इसलिए या वो पैदल चलकर या आसपास के जगह में बेचते थे। उनके पास भर पेट खाने के लिए 2 वक्त का खाना भी पर्याप्त नहीं वो बस 2-3 बार चावल खाते हैं, जो सरकारी राशन में मिलता है आता हैं, उसमें भी उन्हें पूरा पूरा राशन नहीं मिलता 35kg के जगह बस कभी 20 तो 22 ही मिलता हैं। शिकायत करने पर वे राशन ना देने का धमकी देते थे । वहाँ 10- 20km के दायरे में कहीं हॉस्पिटल भी नही था ,गर्भवती महिलाओं के लिए तो बहुत समस्याएं हैं, हॉस्पिटल जाते जाते कई बार तो या तो माँ की मृत्यु हो जाती या बच्चे की।
लोगों के पास पैसा न होने के कारण और कोई चिकित्सा सुविधा न होने के कारण महिलाएं जंगल से जड़ी बूटियां लाकर औषधि बनाती हैं, जैसे कि :-
● छीठ दवा- मलेरिया और बुखार के लिए ● नवजात शिशु के जन्म के पश्चात माता के स्तन से दूध लाने के निदान के लिए जड़ी-बूटी से ही दावा तैयार करते हैं। ● जड़ी में तले मिलाकर (विशषे प्रकार के घास में) गठिया रोग के लिए उपयोग की जाती है। ● करम एक घरेलू औषधि है, पेट दर्द और बुखार में प्रयोग किया जाता है ● आम की छाल पीली जॉन्डिस में इस्तेमाल होती है। ● नीम की पत्तियों को उबालकर चेचक के इलाज के लिए उपयोग किया जाता है ।
रोजमर्रा की जिंदगी में महिलाओं का संघर्ष वर्तमान समय में वहाँ रह रहे गांव के लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जिसमें पानी की समस्या सबसे मुख्य है । बारिश न होने के कारण वहाँ के कुएं ,तालाब सब सूख चुके हैं, पीने का पानी लाने के लिए वहां की महिलाओं को दूर तक पैदल जाना पड़ता है। उस पर भी दूर एक तालाब है। जिसमें पानी भी साफ नहीं है, वही पानी उसे गांव के लोग पीने के लिए उपयोग करते हैं।
रस्सी से खींच- खींच कर पानी उठाने और खेत खलियान होते हुए घर तक ले आना उनके लिए एक सघंर्ष है। गांव में एक ही स्कूल है, जिसमें आठवीं तक की कक्षाएं हैं, जहाँ दो ही शिक्षक हैं, जिनमें से एक ही आते हैं और एक ही पढ़ाते भी हैं। उनकी समस्या यह है कि एक शिक्षक होने के कारण वह सब पर ध्यान नहीं दे पाते हैं और पाँचवी तक की पढ़ाई हो पाती है। वहाँ के बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए उसे गाँव से दूर शहर तक जाना पड़ता है परंतु लड़कियां पाँचवी के बाद पढ़ाई नहीं कर पाती है, क्योंकि कम उम्र में ही लड़कियों की शादी करवा दी जाती है। वहां के पुरुष परिवार के भरण पोषण के लिए कामकाज की तलाश में गांव से बाहर ही रहते हैं और महिलाएं गांव में रहकर ही अपने बच्चों का और घर के बुजुर्गों का ध्यान रखती हैं। अपने दैनिक जीवन यापन के लिए महिलाएं छोटे-मोटे काम भी करती हैं। जैसे :-
● खाने पीने की चीज घर पर बनाकर दूर गांव में जाकर बेचना जिसमें जलेबी, पकौड़ी ,नमकीन आदि है। ● खेती के समय दूसरे गांव के लोगों के खेतों में काम करना। ● आसपास के गांव में मजदूरी करना जहाँ वह अपने बच्चों को भी अपने ही साथ रखती है। ● महिलाएं एक साथ जंगल से बांस लाकर टोकरी या चटाई और तरह-तरह का सामान बनाती है। ● महिलाओं के साथ-साथ घर की लड़कियां भी कामकाज में मदद करती है जैसे कि महुआ के फूल को सूखा कर उससे नशीली सामग्री बनाकर बेचना तथा महुआ के बीज से तेल निकाल कर उसको बेचना और अपने परिवार का भरण पोषण करना।
घर में ही गर्भवती महिलाओं के बच्चों का जन्म होता है, जिसमें घर की महिलाएं और आसपास की महिलाओं से सहायता ली जाती है, क्योंकि अस्पताल गांव से काफी दूर है और वहां के रास्ते भी बहुत ही ख़राब है, अस्पताल तक जाने का कोई भी साधन उपलब्ध नहीं है पहले बजुर्गु दाई माँ हुआ करती थी जो महिलाओं के बच्चों को जन्म देने, महिला शरीर की जुड़ी बीमारियों का इलाज या नुस्ख़े उनके पास होते थे, पर बदलते समय के प्रभाव में उसे गांव में कोई दाई मां मौजदू नहीं है कई बार ऐसा हुआ भी है कि गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाते ले जाते या तो महिला की मृत्यु हो गई या फिर बच्चों की। वहाँ की सड़के इतनी ज्यादा टूटी-फूटी और खराब है की कोई पदैल भी ठीक से ना चल सके। गर्मियों के समय में उन्हें पानी की बहुत ही ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता है,हर जगह पानी सखू जाता है पीने का पानी तक नहीं मिल पाता ठीक से
2 वर्ष से ठीक-ठाक बारिश न होने के कारण बहुत से लोगों को गांव छोड़कर बाहर काम करने या मजदूरी करने जाना पड़ता है क्योंकि वहां के लोग मुख्य रूप से खेती पर ही निर्भर रहते है .