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नई माँ

मैं दिल्ली जाने के लिये बिल्हौर स्टेशन पर खड़ी थी। पलटकर स्टेशन के प्रवेश द्वार को देखा तो बीते दिनों की कौंधी यादों के साथ ही रोना आ गया। सबको बचाते हुए, आँखों से झरते आँसू झट पोछ लिये! आज समझ आ रहा था कि मायके का छूटना क्या होता है! शायद ऐसा ही महसूस करती होगी वो लड़की, जो विवाह के समय अपनी माँ का आँचल छोड़ती होगी। मैंने अपनी शादी में माँ से बिछुड़ने के दुःख और कसक को जाना ही नहीं था।
परन्तु आज, आज मायके की यादों को आँखों मे समेट रही थी कि…
‘ट्रेन आ गई… ट्रेन आ गई…’ का शोरगुल मच गया! एक-एक समान सम्हालते-सहेजते हुये मैं और अनुभव बच्चों के हाथ थाम कर डिब्बे की तरफ बढ़े। पहले बच्चों को चढ़ाया,फिर मैं भी ट्रेन में चढ़ गयी। अनुभव ने सीट के नीचे सारा सामान व्यवस्थित किया। साढ़े 8 बजे आने वाली जयपुर एक्सप्रेस रात के साढ़े 9 बजे स्टेशन पहुँची थी। हम खा-पीकर ही घर से निकले थे, सो सब अपनी-अपनी सीट पर लेट गये, मैं भी।ट्रेन आगे की ओर चल पड़ी, और मैं आँखे मूँदकर पूरे 25 साल पीछे…।
स्मृतियाँ सदैव आँसुओं की पोटली होती हैं। अच्छी हों, चाहे ख़राब; यादें आँखें नम कर ही देती हैं। आँखें मूँदते ही मुझे अपने घर का बड़ा-सा आँगन दिखा। मेरा घर! विकास के इस दौर में भी जिसने अपना अस्तित्व बचाये रखा था । बड़े से आँगन के बीच में बनी वेदी और तीन तरफ बरामदा और एक तरफ सीढियां, जो छत पर जाती थीं। सीढ़ियों के बराबर में सामने चाँदनी का पेड़। बरामदों के साथ तीनों तरफ कमरे थे। एक तरफ बैठक, एक तरफ रसोई, एक तरफ सोने का कमरा; उसे बड़ा कमरा कहते थे।
रसोई के सामने बरामदे में अपनी खाट पर लेटी 65 वर्षीय मेरी दादी ने माँ को आवाज़ लगायी।
“बहूऊऊ… जरा इधर तो आ।”
“हाँ अम्मा जी, जल्दी बताइये क्या काम है, तनु के कपड़े प्रेस करने हैं।”
“आ इधर, दम भर मेरे पास बैठ तो सही।”
“लो बैठ गयी, अब बताओ क्या है?” “रसोई बना ली?”
“हाँ अम्मा, तुलसीदल (भोजन) ले आऊँ तुम्हारे लिये?”
“नहीं रे, अभी तो कलेवा का स्वाद भी मेरे मुँह से नहीं गया है।
“हम्म… तो?”
“जरा-सा आटे का हलवा खाने का मन था, दो कौर बना देती।”
“ठीक है अम्मा, खाना खाओगी तभी बना दूँगी।”
“मुन्ना ने खा लिया?”
“हाँ सबने खा लिया, बस हम-तुम दो जने ही बचे हैं; हमारा बुधवार का उपवास है।”
“तो फिर तू ले ही आ मेरे लिये।”
“ठीक है अम्मा।”
थोड़ी देर बाद माँ ने, दादी को कांसे की थाली में खाना लाकर दिया। पर दादी तो आग बबूला हो गयीं और माँ को खरी-खोटी सुनाने लगीं।
“इत्ता ज़रा-सा कोई बनाता है? बनाया क्या है,बस नाम कर दिया कसम खाने के लिये। घर में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है, आटा बोरी भर रखा है, घी का कनस्तर पिछले महीने ही आया है। इफरात से बनाती क्यों नहीं…? अकाजली कहीं की।” इस पर माँ मुस्कुराते हुये बोली, “कुल इतना ही बनाये हैं अम्मा, खा लीजिये। जो तनु आ गई तो इतना भी नही मिलेगा।”
“मुझ बुढ़िया को हर चीज के लिये तरसाती रहती हो। आने दे आज मुन्ना को एक-एक बात कहूँगी तेरी।”
“ठीक है अम्मा, कह लेना, पर अभी तो खा लो, नहीं फिर हलवा ठंडा हो जायेगा।”
“कान में डालने जोग तो हलवा है! इतना तो दाँतों में ही चिपक जायेगा, नटई तक पहुँचेगा भी नही।”
माँ मुस्कुराते हुए बोली- “और कुछ चाहिये हो तो आवाज़ लगाना अम्मा, हम कपड़ा प्रेस करने जा रहे हैं।”
“हम्म… मेरी टेरीवायल वाली दोनों साड़ी भी प्रेस कर देना, अब से रोज वही पहनेंगे। बक्सा में धरे-धरे कौन से अंडा दे रही हैं।”
“ठीक है अम्मा, अब जाऊँ।”
“हओ… मैंने कौन-सा पकड़ रख्खा है।”
दादी की बड़बड़ाहट अब भी जारी थी, हलवे की कम मात्रा को लेकर।

तभी मोबाइल की घण्टी बजी, नई माँ… नहीं-नहीं माँ की कॉल थी। पूछ रही थीं- “सामान चेन से बंधा है न?
“ताला जाँच लिया था, ठीक से लगा है या नही?”
“सुबह का अलार्म लगा लिया न?”
मैंने मुस्कुराते हुए उनकी हर फिक्र के जवाब ‘हाँ माँ’ कहके दिये और उनसे कहा- “माँ, आप भी अपना ख्याल रखियेगा, हाँ। फिर फोन काट दिया। एक नज़र सामने सोये हुये बच्चों और पतिदेव पर डालकर मैं फिर अपनी अतीत-यात्रा पर चल पड़ी।
गुरुवार की सुबह 7 बजे पापा के जगाने पर जब मैं स्कूल जाने के लिये उठी तो देखा,सुबह साढ़े 5 बजे तक नहा लेने वाली माँ बाथरूम में हैं। वो नहा रही थीं। मैंने कहा-“माँ, मुझे ब्रश करना है।”मैं नहा ही चुकी हूँ। जा, जाकर अलगनी पर से मेरी एक साड़ी उठा ला।”
मैं जब साड़ी लेने कमरे में गयी तो मुझे प्रेस किये हुये कपड़े दिखे, उन्ही में से दादी की धानी रंग की साड़ी उठाकर माँ को दे आई। तब वो कुछ बोल तो रही थीं, पर मैंने सुना ही नहीं। वापिस कमरे में आकर टाइम टेबल के हिसाब से अपना बस्ता ठीक करने लगी।
तभी माँ ने आकर कहा- “जाओ ब्रश कर लो, नहा लो।”
“माँ आज टिफिन के लिये आलू- पराठा बना रही हो न? कल कहा था तुमने!” उनकी बात अनसुनी करते हुए मैंने कहा।
“अच्छा! न बनाऊँ तो?”
“माँ…. बनाओ….,नहीं तो मैं स्कूल ही नही’ जाऊँगी।” कहते हुए मैं ठुनकने लगी।
“हाँ बाबा बना रही हूँ, सब तैयार है। बस, परांठे सेकने बाकी हैं।”
मैं जब नहाकर लौटी तो स्कूल ड्रेस प्रेस की हुई पलँग पर रखी थी। तैयार होकर टिफिन लेने रसोई में पहुँची तो देखा- माँ, दादी को नाश्ते में आलू की रोटी (परांठे का स्वादिष्ट विकल्प) परोस रही थीं। यह हमेशा ही दादी का मनपसंद नाश्ता था। मैंने सुना, उन्होंने खुश होकर माँ से कहा, “दुलहिन,ये साड़ी तुम पर खिल रही है, इसे तुम ही पहनो अब।”
“अरे नही अम्मा, आज कुत्ता ने द्वार पर गन्दगी कर दी थी न, तो इसीलिये बाल धोकर फिर से नहाना पड़ गया। तनु से मंगाये तो वो यही पकड़ा गयी तो पहननी पड़ी।”

मैं ‘माँ-माँ’ कहती हुई उनसे ऐसी लिपट गई कि ‘त नू उ ऊ ऊ ऊ का मानो आर्तनाद उनके कण्ठ से फूट पड़ा! अब न वह मुझे छोड़ रही थी, न मैं उन्हें छोड़ पा रही थी! ‘माँ’ क्या होती है? ‘मायका’ क्या होता है? यह सब अब मेरे भीतर उतरता जा रहा था! अब न उन्हें छोड़ने का मन हो रहा था और न ही मायके के इस घर से मेरे पाँव ही जाने के लिये उठ रहे थे! आज अब मुझे पता चल रहा था कि कितने दिनों तक माँ के इस प्रेम रुपी अमृत से मैं अपने आप को वंचित किये रही हूँ…


“हुँह, इतनी रात गए कौन चाय पियेगा।” खुद से ही बोली मैं, मोबाइल पर्स में रखा और करवट लेकर लेट गयी।
माँ जब ये दुनिया और मुझे छोड़ कर गयी तो मैं सिर्फ छह साल की थी। स्कूल में पाँचवाँ पीरियड चल रहा था कि मास्टर जी आये और कहा- “तुम्हारे ताऊजी तुम्हें लेने आये हैं।”
मैं खुश हो गयी! सोचा शायद कहीं जाने का या पूजा-पाठ का प्रोग्राम होगा। मैं खुशी-खुशी ताऊजी के साथ उनकी साइकिल पर बैठकर घर आ गयी। दरवाजे के बाहर भीड़ देखकर मन में अनजाना-सा डर लगा। जब अन्दर आँगन में आयी तो देखा कि माँ को ज़मीन पर लिटाया गया है। उन्होंने दादी की वही धानी रंग की साड़ी पहन रखी थी। उसे हटाकर उन्हें लाल साड़ी पहनाई गयी। बुआ, ताई, चाची उन्हें सजा रहीं थीं और दहाडें मार-मारकर रो भी रहीं थीं। मैने जब पूछा- “क्या हुआ मम्मा को?” तो उनका रुदन और प्रचण्ड हो गया। मुझे शायद पता था कि माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर पता नहीं क्यों? उस समय मुझे इतना बुरा नहीं लगा!
माँ के जाने के 15 दिन बाद शुरू हुआ जीवन जीने का संघर्ष। पानी भरना, खाना बनाना, कपड़े धोना, सूखने पर समय से उठाना, तह बनाकर रखना, झाड़ू-बुहारी और भी न जाने कितने काम, जो अब तक अदृश्य थे कि अचानक विकराल-रूप में सामने आ खड़े हुए। कामवाली लगाने पर कुछ राहत हुई, पर गाड़ी पटरी पर नहीं आयी।
अभी छह महीने भी नहीं हुए और कई सारे रिश्तेदार; पापा और दादी को दूसरी शादी के लिये कहने लगे। उनका कहना ग़लत भी नही था। पैंसठ साल की दादी आखि़र कितना करती? घर का काम और मुझे भी सम्हालना बहुत मुश्किल था उनके लिये। पापा प्राइवेट नौकरी करते थे। वह भी घर पर अधिक समय नहीं दे सकते थे। माँ के जाने से घर रीढ़विहीन हो गया था। जीवन का नाम नही था, बस हर समय मनहूसियत-सी ही महसूस होती।
एक दिन जब स्कूल से लौटी तो देखा घर पर गुड्डी बुआ आयी हैं और बैठक में कुछ मेहमान भी बैठे हैं। मुझे अच्छे से याद है कि जाते समय उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरकर प्यार किया था और सौ रुपये भी दिये थे।
फिर खाना खाते समय बुआ ने बताया कि अब तेरी ‘नई माँ’ आने वाली है।
मेरा हाथ रुक गया! माँ के न रहने के बाद से ही सौतेली माँ के बारे में जाने क्या-क्या सुनती रहती थी।
आखिर सबके कहने पर पापा ने दूसरी शादी कर ही ली। मुझे यही बताया गया कि ‘नई माँ’ मुझे सम्हालने के लिये आयी है। वो मेरा ख्याल भी बहुत रखती थीं, पर मैने कभी उन्हें ‘माँ’ नहीं माना। वो मुझे बहुत प्यार करती थीं लेकिन; वो जो भी करतीं, मुझे वह सब सिर्फ़ एक ढोंग लगता, बिल्कुल दिखावा! उन्हें बहुत शौक था कि मैं उन्हें ‘माँ’ कहूँ, पर मैं हमेशा उनको ‘नई माँ’ कहकर ही बुलाती। उन्होंने कई जतन किये कि मैं उन्हें ‘माँ’ कहूँ। पापा से और दादी से पूछ-पूछकर मेरी पसन्दीदा रसोई बनाई। कपड़े भी हमेशा वही खरीदतीं, जो मैं कह दूँ। मेरा टिफिन, स्कूल-ड्रेस वो माँ से भी अधिक व्यवस्थित रखतीं थीं! मेरी कॉपी और किताब पर वह खू़ब सुन्दर-सुन्दर कवर चढ़ातीं। जब कभी स्कूल से उदास घर लौटती तो सहेलियों से कारण पता लगातीं और मेरी ग़लती होने पर समझातीं। मेरी ग़लती न होती तो जाकर मास्टर से लड़ पड़तीं। फिर भी मेरा मन नहीं पसीजा तो नहीं ही पसीजा। जाने क्या मेरे मन में नई माँ को लेकर मैल था कि चित्त से उतरा ही नहीं!
दो साल बीतते न बीतते उनकी काया में अजब बदलाव दिखा मुझे। कभी-कभी वह सुस्त भी हो जाती, पर मेरा ध्यान रखना, मेरा टिफिन, मेरी स्कूल-ड्रेस वगैरह में उनसे कभी कोई कोताही नहीं पा सकी मैं।
एक रात ‘नई माँ’ को पेट में बहुत दर्द हुआ। वो हॉस्पिटल ले जायी गयी तो 4-5 दिन बाद लौटीं। मुझसे बोली-तनु बेटी! ले, मैं तेरे लिये छोटा भाई लेकर आईं हूँ!”
और फिर मेरी गोदी में उस देते हुए कहने लगीं- “मेरी तनु अकेली बोर हो जाती है न! तो आज मैं उसके लिये डॉक्टर से एक बाबू माँग लाई हूँ।”
सच पूछो तो मेरे अन्दर वात्सल्य की एक हिलोर उठी भी कि झट से मैंने उस नन्हें गोलगोथने का मुँह बरबस ही चूम लिया।
फिर जाने क्या हुआ, भीतर के पूर्वाग्रहों ने मेरे उस उमडे़ हुए प्रेम को दबा दिया!
परन्तु दादी बहुत खुश थीं। दस – पंद्रह दिन के लिये गुड्डी बुआ भी आ गयीं। अब ‘नई माँ’ ने नये सिरे से गृहस्थी सम्हाल ली थी। लेकिन अब उनके लिये बहुत सारे नये काम भी बढ़ गये थे। उन्हें काफी श्रम करना पड़ता था।
अब ‘नई माँ’ सचमुच बहुत ही व्यस्त रहती थीं। परन्तु पूरे मन से मेरा ख्याल रखने में उन्होंने हार नहीं मानी थी। मुझे रिझाने-दिखाने या जो भी कह लिया जाय, के लिये नहीं, अन्तर्मन से वह अब भी मेरे सारे काम पहले जितने ही मनोयोग से करती थीं। लेकिन हाँ, पहले की तरह पूरे दिन मेरे आगे-पीछे नहीं डोलतीं थीं।
भाई अब छह साल का हो गया। मैं उससे पूरे आठ साल बड़ी थी। फिर भी मैं छोटे भाई को हमेशा डाँट दिया करती! परन्तु न कभी भाई ने बुरा माना न ‘नई माँ’ ने।
एक बार उसको पढ़ाने बैठी तो ‘च’ से चम्मच पढ़ाते हुए खीझकर उसे इतनी तेज मारा कि उसके कान से खून बहने लगा। पिताजी ने मुझे इस पर बुरी तरह डाँटा, पर ‘नई माँ’ ने मेरा बचाव करते हुये कहा कि वो मारेगी नही’ तो ये पढ़ेगा कैसे! मगर उस दिन पापा की हिदायत के बाद अबीर का गृहकार्य ‘नई माँ’ ही करवाने लगीं।
अब मेरा ज्यादातर समय दादी के पास ही गुजरता, लेकिन शायद भगवान को यह पसन्द नही आ रहा था। 15 दिन के डेंगू-बुखार से हारकर एक दिन वो भी हम सब को छोड़कर ‘माँ’ के पास चली गयीं।
दादी के गुज़र जाने के बाद अब मैं अकेला महसूस करने लगी, अपने अकेलेपन से परेशान होने लगी। यही नहीं, अब मुझे माँ की कमी जितनी शिद्दत से महसूस होती, मेरा व्यवहार ‘नई माँ’ के प्रति उतना ही रूखा होता जा रहा था। ऐसा नहीं कि बाबू होने के बाद से नई माँ मेरा ख्याल न रखती हों या फिर मेरी उपेक्षा करतीं हों; यहाँ तक मुझे लेकर कोई टाल-मटोल भी वह नहीं करती थीं। फिर भी,न जाने क्यों मैंने, हम दोनों के बीच एक ऐसी ढलान बना रखी थी, जिसके ऊपरी सिरे पर नई माँ थी और निचले सिरे पर मैं। इससे उनका प्रेम मेरे पास तो आ जाता था, पर मेरी तरफ से उन तक प्रेम पहुँचने की कोई गुंजाइश नहीं थी। मेरा ऐसा व्यवहार देखकर पिताजी ने मुझे 9वीं से होस्टल में डाल दिया। मेरा कभी घर जाने का मन ही नही होता था। सब लड़कियाँ जब घर जाने की योजना बना रही होती, मैं अखबार में हॉबी वाले क्लासेज़ खोज रही होती। कभी घर जाती भी तो बस 2-4 दिनों के लिये ही। और जल्द ही वापस होस्टल आ जाती।
अब पापा से भी बात औपचारिक ही होती, प्रायः फ़ीस को लेकर, बस। बी.टेक. द्वितीय वर्ष में अनुभव से दोस्ती हुई तो दो साल में गहरे प्रेम में बदल गयी और फिर जल्दी ही शादी में। अनुभव के माँ-बाप नहीं थे, शादी साधारण मन्दिर में और कोर्ट में हो गयी! मैने उस समय भी किसी से पूछना जरूरी नहीं समझा, सिर्फ पापा को बताया था। फिर भी शादी में पापा और अबीर आये और शगुन के तौर पर मेरी माँ के जेवर दे सौंप गये।

“तो क्या हुआ, लाती भी तो तुम्हीं हो, एक और ले आना। अब मायके-ससुरे से तो मिलने से रहीं।”
अचानक झटके से ट्रेन रुकी! शायद कोई बड़ा स्टेशन था।तभी तो रात को 11 बजे भी खूब चहल-पहल थी। मोबाइल निकाल कर मैंने कुछ नोटिफिकेशन चेक किये, गैलरी में फोटो देखने लगी, जो एलबम से खींची थी। एक फोटो को देखा- उसमें मैंने अबीर को बड़े प्यार से गोद में ले रखा था।
अबीर मुझसे 8 साल छोटा है, पर मुझे अच्छे से याद है कि कभी भी मैंने बड़प्पन नही दिखाया। हर चीज़ उससे पहले ही मुझे चाहिये होती थी,चाहे वो खाने की हो या खेलने की। वैसे वह बहुत सीधा था, पर कभी-कभी जि़द करता था। तब नई माँ उसे बहला-फुसलाकर या डाँट-मारकर चुप करा देतीं।
‘चॉय चॉय चॉय…’ की आवाज़ सुनायी दी।

अब मुझे माँ की कमी जितनी शिद्दत से महसूस होती, मेरा व्यवहार ‘नई माँ’ के प्रति उतना ही रूखा होता जा रहा था। ऐसा नहीं कि बाबू होने के बाद से नई माँ मेरा ख्याल न रखती हों या फिर मेरी उपेक्षा करतीं हों; यहाँ तक मुझे लेकर कोई टाल-मटोल भी वह नहीं करती थीं। फिर भी,न जाने क्यों मैंने, हम दोनों के बीच एक ऐसी ढलान बना रखी थी, जिसके ऊपरी सिरे पर नई माँ थी और निचले सिरे पर मैं।


शादी के बाद मैंने घर से लगभग सब सम्बन्ध खत्म ही कर लिये। हाँ, अधिक दूरियाँ नहीं आयीं बीच में। पापा और अबीर साल-दो साल में मिलने आते ही रहे।
अभी पन्द्रह दिन पहले अबीर ने फोन पर बताया- “पापा नहीं रहे दीदी!”
मैं अवसन्न! मुझे कुछ समझ नही आ रहा था! मैंने रोते-रोते अनुभव के ऑफिस फोन लगाया- “हेलो.., अनुभव! जल्दी घर आ जाओ, अभी-अभी अबीर का फोन आया है… पापा… मेरे पापा अब इस दुनिया में….।” आगे के शब्द मेरी हिचकियों में गुम हो गये थे।
अनुभव ने कहा- “तुम बच्चों और सामान के साथ तैयार रहो। मैं कैब लेकर आ रहा हूँ।अभी तो 6 ही बजे हैं। 9 बजे ट्रेन है, समय से स्टेशन की दूरी तय हो जायेगी! घबराओ नहीं, ट्रेन मिल जायेगी।”
अनुभव ने टीटी को अतिरिक्त पैसे देकर दो सीट कन्फर्म करवाई और मुझसे बोले -“एक में दोनों बच्चे और एक में तुम बैठो, सफर आराम से कट जायेगा, सुबह तो पहुँच ही जाना है। भले ही सब होंगे, पर अब तो माँ को तुम्हें ही देखना और सम्हालना है। 13वीं में समय से और पक्का मैं पहुँचूँगा!”
अबीर का दोस्त मुझे स्टेशन लेने आया। घर पहुँची तो देखते ही ‘नई माँ’ मुझसे लिपट गयी! मैं भी उनको अँकवार में भींचकर जोर-जोर से रोने लगी। अब न आँसू रुक रहे थे, न मुझसे ‘नई माँ’ को छोड़ा ही जा रहा था। बुआ ही बहुत मुश्किलों से ‘नई माँ’ को मुझसे अलग कर पायीं। आज ‘नई माँ’ को निरुपाय देख-देख मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था। अगले दिन पिता की अंत्येष्टि हो गयी, होनी ही थी… पर सूनी-माँग, सूनी कलाई और बिछुए बिना ‘नई माँ’ के पैरों को देखना मुझे रह-रहकर अपराध-बोध से भरता जा रहा था कि ‘नई माँ’ जैसे सम्बोधन के बावजूद जिन्होंने बेटी की तरह से हमेशा मेरा ध्यान रखा, दादी के बाद अब मेरे पापा के बिना वह यहाँ कैसे रह पायेंगी! मेरे मन से यह चिन्ता उतर ही नहीं रही थी!
दो-चार दिन तो बहुत रिश्तेदार थे, उसके बाद मैने देखा कि माँ अब भी मेरा ध्यान वैसे ही रख रहीं थी, जैसा कि 25 साल पहले रखा करती थीं। परन्तु अब भी कहीं मेरे मन में यह क्यों पैठा हुआ था कि दिखावा होगा, कुछ रिश्तेदार बचे जो हैं न?
13वीं तक सभी जा चुके थे। 13वीं के दो दिन बाद मेरे लौटने का रिजर्वेशन था। मैने देखा कि ‘नई माँ’ पन्नी की कई पोटलियाँ और प्लास्टिक के डिब्बे एक बैग में रख रही हैं और बीच-बीच में साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछती जा रही हैं। सहसा मेरी 8 वर्षीया बेटी ने उत्सुकतावश पूछ लिया-
“नानी ये क्या है?”
“अरे जब बिटिया विदा होती है तो ये सब दिया जाता है, तू ना समझेगी अभी, छोटी है।”
अब माँ विधवा हैं तो कुंकुम-महावर नहीं छू सकतीं, इसलिए विदाई से पहले पड़ोस की भाभी को बुलाकर टीका, महावर और गाँठ बाँधने की रस्म करवाई।
मेरे और इनके पैर छुए, बच्चों पर हजारों चुम्बन और आशीष लुटाये। चलने को हुई ही कि वह मुझसे भेंटने लगीं तो उनका चेहरा देख करके मेरे अन्तस्तल से प्रेम की ऐसी हिलोर आयी कि पूर्वाग्रहों के सारे बाँध टूट गये और मैं ‘माँ-माँ’ कहती हुई उनसे ऐसी लिपट गई कि ‘त नू उ ऊ ऊ ऊ का मानो आर्तनाद उनके कण्ठ से फूट पड़ा! अब न वह मुझे छोड़ रही थी, न मैं उन्हें छोड़ पा रही थी! ‘माँ’ क्या होती है? ‘मायका’ क्या होता है? यह सब अब मेरे भीतर उतरता जा रहा था! अब न उन्हें छोड़ने का मन हो रहा था और न ही मायके के इस घर से मेरे पाँव ही जाने के लिये उठ रहे थे! आज अब मुझे पता चल रहा था कि कितने दिनों तक माँ के इस प्रेम रुपी अमृत से मैं अपने आप को वंचित किये रही हूँ… कि अबीर हमारे बीच आकर बोला -“माँ! दीदी!! गाड़ी छूट जाएगी… स्तब्ध बच्चों के हाथ पकड़ अबीर का दोस्त कार की ओर बढा़ तो हम भी बेमन से अलग हुए। तब माँ से और अपने आप से भी जल्दी ही आने के वायदे के साथ, भरे-हृदय और भारी पैर से मैं भी गाड़ी की तरफ चल पड़ी। माँ मुझे गाड़ी में बैठते देख उदास मुख खड़ी हो गयीं कि कुछ बोलना चाहती हों। मैंने अपना माथा उनके एक काँधे पर टिका दिया, जिसे वह अपने हाथों सहलाने लगीं। मैं बमुश्किल बोल पाईं-
“माँ! मैं लौट-लौटकर और भरसक जल्दी-जल्दी अपनी इस देहरी पर आऊँगी। अब आप, अबीर और यह देहरी ही तो है माँ, जो जीते जी नहीं छूटेगी…।

अन्ततः अबीर और उसका दोस्त कार में बिठाकर हमें स्टेशन की ओर चल पडे़। परन्तु पीछे दूर से कहीं अवचेतन में गूँज रहा था; “बाबुल मोरा नैहर छूटा जाय…।”

*चित्र गूगल से साभार


पूजा अग्निहोत्री
(कवयित्री, कहानीकार)

ईमेल – agnihotrypooja71@gmail.com

अपनी पहचान

पटना की भीड़-भाड़ वाली अदालत में एक महत्वपूर्ण केस चल रहा था। पिछले चार बार से इस मुकदमे की सुनवाई होने के बजाय अगली तारीख दे दी जा रही थी। पिछली बार जज साहब उत्तराखंड की वादियों की ठंडी हवा खाने चले गए थे, उसके पूर्व वे बीमार थे। कृति का दिल आज भी अनिष्ट की आशंका से भरा था लेकिन उसकी तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं और जज साहब आज पधारे थे। कृति कठघरे में खड़ी थी। अदालत में मौजूद हर व्यक्ति, जिनकी आँखों में एक सवाल था, के विपरीत कृति की आँखों में आत्मविश्वास था।

“आप कहना चाहती हैं कि आपकी पहचान गलत दर्ज की गई है?” जज साहब ने पूछा। ‘मी लार्ड’ के स्वर में तनिक रोष था। सिर्फ इस मुकदमे की तारीख होने के कारण ‘मी लार्ड’ को अपना पारिवारिक उत्सव स्थगित कर पटना आना पड़ा था। दरअसल बात यह थी कि विशिष्ट प्रकृति का मुकदमा होने के कारण इसने सुर्खियां बटोर ली। क्षेत्रीय मीडिया भी इस मामले में रुचि लेने लगा। जब इस मुकदमे को एक के बाद एक चार अगली तारीखें दे दी गई तब मीडिया ने इस मामले को उछाल दिया। ‘माय लॉर्डशिप’ इस बार भी बाहर थे पर उन्हें आना पड़ा। एक बार फिर से उन्होंने अपना सवाल दुहराया- “आप कहना चाहती हैं कि आपकी पहचान गलत दर्ज की गई है?”

कृति ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “नहीं, मी लॉर्ड। मेरी पहचान को इस समाज ने कभी स्वीकारा ही नहीं।”

पूरा कोर्ट खामोश था और इसी खामोशी में कृति की कहानी शुरू होती है।

……. ……. ……. ……

दरअसल बात यह थी कि विशिष्ट प्रकृति का मुकदमा होने के कारण इसने सुर्खियां बटोर ली। क्षेत्रीय मीडिया भी इस मामले में रुचि लेने लगा। जब इस मुकदमे को एक के बाद एक चार अगली तारीखें दे दी गई तब मीडिया ने इस मामले को उछाल दिया।

फल्गु नदी के तट पर बसा शहर-गया। कहते हैं यह शहर गयासुर नामक राक्षस के शरीर पर बसा है। जलविहीन नदी, वृक्षविहीन पहाड़ और अभक्ष्य भक्षण करती गायें इस शहर की विशिष्ट पहचान है। मिथक इसे माता सीता का शाप बतलाते हैं। इसी गया शहर में जन्मा था कृतिनंदन। जब माँ ने पहली बार उसे गोद में लिया, तो उनकी आँखें खुशी से भर आईं। लेकिन जैसे-जैसे कृतिनंदन बड़ा होने लगा उसके भीतर एक अलग ही दुनिया बसने लगी। वह माँ की साड़ियों से खेलता, चूड़ियाँ पहनकर आईने में खुद को निहारता।

पहले तो सबने इसे बालसुलभ लीला मानकर इस पर ध्यान नहीं दिया।

“सभी बच्चे ऐसा करते हैं। बड़ा होकर ठीक हो जाएगा।” माँ अपने मन को समझाती किंतु 14 वर्ष की अवस्था होने पर भी कृतिनंदन की ये हरकतें जब जारी रही तो माँ की आंखों में चिंता के मोटे-मोटे धागे तैरने लगे। उसने अनब्याही माँ के गर्भ के समान इस राज को छुपाना चाहा किंतु असफल रही। सबसे पहले उसके पिता को इस राज का पता चला। हुआ कुछ यूँ कि एक बार पिता किसी कार्य से बाहर गए थे और शाम को अचानक आ गए। थके-हारे आराम करने के उद्देश्य से जब वह अपने कमरे में घुसे तो देखा कि आईने के सामने कृतिनंदन की माँ सजी-धजी बैठी है। कमरे में किसी और की आहट पाकर आईने में खुद को निहार रही आकृति पीछे मुड़ी। पिता सकते में आ गए। उनकी पत्नी की साड़ी में स्त्री वेशभूषा में उनका इकलौता पुत्र कृतिनंदन बैठा था। 

धीरे-धीरे इस बात का पता पड़ोसियों को भी चल गया।

“यह लड़का है या लड़की?” पड़ोसियों ने तानें मारना शुरू कर दिया था। वहीं कुछ पड़ोसी हमदर्दी की आड़ में कृति के विषय में बातें कर-करके उसकी माँ का दिल दुखाते रहते।

“इसे ठीक करना होगा!” इन तानों से परेशान होकर जब कभी पिता का गुस्सा फूट पड़ता तब वह कहते।

लेकिन इन सब झमेलों से दूर कृति अपनी ही दुनिया में मस्त रहती। उसके लिए यह सब ‘सही’ या ‘गलत’ का मामला नहीं था। वह बस खुद को जानना चाहती थी।

कृति को अपनी पहचान को लेकर पहला ज़ख्म तब मिला जब वह लगभग सोलह की हो गयी थी। एक दिन उसकी ही उम्र के लड़कों ने उसका मजाक उड़ाया और उसे बेरहमी से पीटा। कितना रोयी थी वह उस दिन और तब पहली बार उसकी माँ ने उसे समझाया था — “बेटा, दुनिया से लड़कर जीतना मुश्किल है। जो जैसा है, वैसा ही स्वीकार कर लो।”

“जो जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार लो। तो फिर दुनिया हमें क्यों नहीं स्वीकार करती?” कृति ने पूछना चाहा था।

जब चाचा को पता चला था कि कृति किन्नर है, तो घर में बवाल मच गया था। चाचा को सबसे बड़ा डर अपनी बेटियों की शादी का था। आए दिन घर में कलह होता रहता। ऐसे ही बहस के दौरान उस दिन उन्होंने साफ-साफ कह दिया-

“अगर लोगों को पता चल गया कि हमारे घर में एक हिजड़ा है, तो मेरी बेटियों की शादी कैसे होगी?”

पिता ने चाचा को शांत करने की कोशिश की, “ये भी हमारा खून है। हम इसे ठुकरा नहीं सकते।”

“खून?” चाचा व्यंग्य से बोले, “हमारी इज्जत का खून कर दिया इसने! कोई हमारे घर में अपना रिश्ता नहीं करेगा। यह जितनी जल्दी घर से निकल जाए, उतना अच्छा होगा!”

कमरे में दरवाजे की ओट में खड़ी कृति यह सब सुन रही थी। उसे यह सुनकर गहरा धक्का लगा।

“क्या मैं सिर्फ एक बदनामी हूँ? क्या मेरा अस्तित्व ही एक अभिशाप है?” कृति पूरी रात जाग कर सोचती रही। मोटी और सांवली होने के कारण उसकी चचेरी बहन शिवानी दीदी की शादी ऐसे ही तय नहीं हो पा रही थी। उनके उम्र का यह तीसरा दशक चल रहा था। उनके लिए कई जगह बात चलायी गयी, पर हर जगह उनका सांवलापन बाधा बन जाता। ऐसे में वह अपनी बड़ी बहन के लिए एक और बाधा नहीं बनना चाहती थी। पौ फटने से पूर्व ही कृति बिना किसी को बताए घर से निकल गई। स्टेशन घर के पास ही था। कृति चुपचाप एक ट्रेन में सवार होकर एक अनजान मंजिल के लिए चल पड़ी।

कृति जिस ट्रेन में बैठी थी वह गया- पटना लोकल ट्रेन थी। ट्रेन खुले घंटा भर बीत चुका था। सुबह होने को आई थी। परिवेश में फैला कुहासा कृति के भीतर घनीभूत होकर पीड़ा रूप में उतर गया था। वह न जाने और कितनी देर अपने विचारों में खोई रहती कि एक बेहद कर्कश आवाज से उसकी विचार श्रृंखला टूटी- “दे न रे बाबा। भगवान तुझे सदा सुखी रखेगा रे।” ताली बजाती कर्कश और फटी आवाज में एक किन्नर उससे पैसे माँग रही थी। “जिनके हिस्से में सुख का एक कतरा तक नसीब नहीं, वे भी सुख का आशीर्वाद लूटा रहीं।” कृति ने सोचते हुए उसे पैसे देने के लिए अपने पर्स को टटोला और विस्मय से भर गई।

“कल शाम तक तो इसमें चंद रुपए ही थे। अब यह पर्स रुपयों से भरा कैसे है?”

तब तक वह किन्नर भी शायद कृति को समझ गई थी। वह बिना पैसे लिए ढेरों आशीर्वाद देकर चली गई।

कृति गया-पटना लोकल ट्रेन से उतरकर स्टेशन के बाहर निकली, मन में अनजाने भविष्य की उथल-पुथल थी। यह पहला अनुभव था जब वह अकेले घर से बाहर इतनी दूर निकली थी। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। सुबह का धुंधला वातावरण और भीड़ उसे और अकेला कर रहे थे। मन का भय उसके शरीर को कमजोर कर रहा था। स्टेशन के पास एक व्यस्त सड़क पर, जल्दबाजी में रास्ता पार करते वक्त एक रिक्शा उसे टक्कर मार गया। वह सड़क पर गिर पड़ी और उसकी कोहनी और घुटनों से खून बहने लगा। दर्द से कराहती कृति को देखकर भीड़ जमा हो गई, पर कोई आगे नहीं बढ़ा। तभी एक अधेड़ उम्र की किन्नर भीड़ को चीरकर आई। उसने कृति को सहारा देकर उठाया और पास की एक छोटी सी दुकान पर ले जाकर उसका घाव साफ किया। कृति की आँखों में डर और आभार मिश्रित था। उस किन्नर ने कहा, “बेटा, इस शहर में अकेले नहीं चलते, चल मेरे साथ।” वह कृति को उस जगह पर ले गयी जहाँ उसके जैसे और भी कई लोग रहते थे। जहाँ गुरुमाँ, एक बुजुर्ग किन्नर, ने उसका स्वागत किया और उसकी कहानी सुनकर उसे गले लगाकर बोली, “बेटा, दुनिया हमें ताली बजाने और भीख माँगने तक सीमित रखना चाहती है। लेकिन अगर तुम खुद को बदलना चाहती हो, तो तुम्हें अपनी पहचान के लिए लड़ना होगा।”

“क्या मैं सिर्फ एक बदनामी हूँ? क्या मेरा अस्तित्व ही एक अभिशाप है?” कृति पूरी रात जाग कर सोचती रही। मोटी और सांवली होने के कारण उसकी चचेरी बहन शिवानी दीदी की शादी ऐसे ही तय नहीं हो पा रही थी। उनके उम्र का यह तीसरा दशक चल रहा था। उनके लिए कई जगह बात चलायी गयी, पर हर जगह उनका सांवलापन बाधा बन जाता। ऐसे में वह अपनी बड़ी बहन के लिए एक और बाधा नहीं बनना चाहती थी। पौ फटने से पूर्व ही कृति बिना किसी को बताए घर से निकल गई। स्टेशन घर के पास ही था। कृति चुपचाप एक ट्रेन में सवार होकर एक अनजान मंजिल के लिए चल पड़ी।

कृति को यह समझ आ गया था—”सिर्फ समाज की स्वीकृति माँगने से कुछ नहीं होगा, मुझे अपने अस्तित्व को खुद साबित करना होगा।”

किन्नरों के साथ रहते हुए कृति ने अपनी पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया और लॉ कॉलेज में नामांकन ले लिया। पर यह आसान नहीं था। यहाँ भी उसकी पहचान ने उसके लिए रास्ते में काँटे बो दिए थे। कॉलेज के पहले दिन जब कृति ने घबराते हुए क्लास में प्रवेश किया, तो सबकी नजरें उसे घूरने लगीं। कानाफूसी शुरू हो गई—कुछ फुसफुसा रहे थे, कुछ हँस रहे थे। कृति के कदम ठिठक गए। तभी सुकेश ने आगे बढ़कर कहा, “क्लास शुरू हो चुकी है, बैठ जाओ।” उसकी आवाज में एक सहज आत्मीयता थी, जिसने कृति को कुछ राहत दी।

धीरे-धीरे, सुकेश और कृति की दोस्ती गहरी होती गई। जब कृति के खिलाफ छात्रों ने प्रिंसिपल से शिकायत की कि ‘किन्नर’ को कॉलेज में पढ़ने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए, तब सुकेश अकेला था जिसने प्रिंसिपल के सामने जाकर कहा, “अगर संविधान में सभी को शिक्षा का अधिकार है, तो इसे इससे वंचित क्यों किया जाए?”

एक दिन जब कृति अकेली बैठी थी, सुकेश ने उससे पूछा, “तुम्हें सबसे ज्यादा डर किस चीज से लगता है?” कृति ने कहा, “खुद से।” 

“मैं नहीं चाहता कि तुम खुद से डरती रहो,” सुकेश ने कहा, “तुम जैसी भी हो, अपने लिए गर्व महसूस करो।”

अब कृति के जीवन में केवल कांटे ही नहीं थे। सुकेश उसके जीवन में मखमली मुलायम हरियाली बनकर आया था।

जब ऐसा लगने लगा कि सब कुछ सही चल रहा है तभी वह घटना घट गयी। पढ़ाई के दौरान कृति को पैसों की जरूरत होती थी। वह दिन में कॉलेज जाती और शाम को अपने समुदाय के साथ नाच-गाकर पैसे कमाने निकलती। एक दिन शाम को वह सड़क के किनारे नाच रही थी। अचानक उसकी नजर सुकेश पर पड़ी। वह वहीं खड़ा था और कृति को एकटक देख रहा था।

अब तक सुकेश ने केवल कृति के नृत्य के बारे में सुना था, लेकिन आज पहली बार उसने कृति को किन्नर के वेश में चंद पैसों के लिए नाचते देखा। सुकेश और कृति की आँखें मिलीं। कृति ने उन आँखों में पढ़ लिया—संवेदना का यह अंतिम सिरा भी टूट गया।

तभी एक अधेड़ उम्र का लंपट आदमी उसके पास आया और उसकी कुर्ती में जबरदस्ती ₹100 का नोट ठूँसने लगा। कृति के मन में आया कि वह अपना कलेजा फाड़कर चिल्लाए—”मैं कोई वस्तु नहीं हूँ! मैं भी इंसान हूँ!” लेकिन शब्द उसके आँसुओं में घुट कर रह गए। उस रात वह बहुत रोई।

पर उसने खुद से वादा किया—” दुनिया मुझे इसी रूप में देखना चाहती है लेकिन मैं इसे बदलूँगी।”

लॉ की डिग्री मिलने के बाद, कृति का पहला केस खुद का ही था। सरकार ने उसे अब भी ‘पुरुष’ के रूप में पहचान दी थी, जबकि वह खुद को महिला मानती थी। जब उसने सरकारी दफ्तर में जाकर बदलाव की माँग की, तो अधिकारी हँस पड़े। 

“अरे, तुम लोगों के बारे में तो विधाता भी नहीं जानता कि तुम क्या हो!” पान के पिक को पिच्च से थूकते हुए बड़ा बाबू ने कहा था। कृति को ऐसा लगा मानो वह पिक दीवार पर नहीं बल्कि उसकी आत्मा पर थूकी गयी हो।

इस ताने ने कृति को झकझोर दिया। उसने कोर्ट में केस ठोक दिया। अदालत में जब वह पहली बार पहुँची थी, तो लोग उसे देखकर फुसफुसाने लगे थे। कृति को आज भी वह दिन अच्छे से याद है।

वकील साहब ने व्यंग्य किया था, “तो अब किन्नर भी कानून की परिभाषा तय करेंगे?”

लेकिन कृति ने आत्मविश्वास के साथ कहा—

“हमें कानून से बाहर रखना ही असली अन्याय है। अगर इंसान को अपनी जाति और धर्म चुनने का हक है, तो अपनी पहचान चुनने का हक क्यों नहीं?”

पूरे कोर्ट में सन्नाटा छा गया था ।

महीनों की लड़ाई के बाद, अदालत ने फैसला सुनाया—

“कृति को महिला के रूप में सरकारी दस्तावेजों में दर्ज किया जाएगा। साथ ही प्रत्येक सरकारी फॉर्म में एक ‘थर्ड जेंडर’ का कॉलम भी जोड़ा जाए। यह अधिकार सिर्फ कृति का नहीं, बल्कि पूरे ट्रांसजेंडर समुदाय का है कि वह अपनी पहचान किस रूप में रखना चाहते हैं।”

उस दिन कृति ने जीत ही नहीं हासिल की थी, उसने एक नई राह बना दी थी। अब वह सिर्फ एक वकील नहीं थी, वह एक पहचान थी—उन हजारों लोगों की, जिन्हें समाज ने नकार दिया था।

जब वह कोर्ट से बाहर आई, तो पत्रकारों ने पूछा, “आज आपको कैसा लग रहा है?” कृति मुस्कुराई, उसकी आँखों में चमक थी। उसने धीरे से कहा— “आज मैंने खुद को पा लिया है।”

पत्रकार उससे कुछ और भी पूछना चाहते थे लेकिन कृति बड़ी तेजी से उस महिला की ओर लपकी जो कृति के मुकदमे की हर सुनवाई के दौरान कोर्ट के कोने में बैठी रहती थी।

“तुम्हें अंदाजा हो गया था माँ कि मैं घर छोड़कर चली जाऊंगी। सो तुमने मेरे पर्स में अपने प्यार के प्रतीक रुपए रख दिए थे। जैसे तुम्हें पता चल गया था, क्या उसी तरह तुम्हारी अंश, तुम्हारी बेटी को पता नहीं होगा कि यह तुम ही हो।” महिला के पीछे भागती कृति बुदबुदाई।

डॉ अमित रंजन
सहायक आचार्य, हिंदी जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा।
निबंध कौशल(अमेज़न किंडल पर बेस्ट सेलर में शामिल)
प्रकाशन: हिंदुस्तान, प्रभात खबर, दोआबा, साहित्य कुंज, प्रश्न चिह्न, देशबंधु, विश्वगाथा, प्रेरणा अंशु, भारत दर्शन(न्यूजीलैंड से प्रकाशित ई पत्रिका) समेत विविध पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित। चौदह शोध-पत्र प्रकाशित।amitranjanth1989@gmail.com

9798021736

संबंधों के सैलाब की त्रासदी: कहानी संग्रह ‘एक और सैलाब’  मेहरुन्निसा परवेज़            

मेहरुन्निसा जी के कहानी संग्रह ‘एक और सैलाब’  की कहानियाँ घर और पारिवारिक सम्बन्धों के सैलाब में स्त्री के बह जाने की त्रासदी और उसके बाद खुद को समेटने के जद्दोजहद की मार्मिक अभिव्यंजना है। पितृसत्तात्मक समाज द्वारा निर्धारित संबंधों में स्त्री का अपना ‘अस्तित्व’ समाज में विस्मृत कर दिया जाता है। यथार्थ में उनकी भूमिकाओं का महिमामंडन कर यथास्थिति में हाशिये पर ही धकेला जाता है। मेहरुन्निसा जी ने स्त्री जीवन के यथार्थ बोध और जीवन मूल्यों को कथानक में पिरोकर बड़ी ही सहजता से उनकी स्थितियों को गहराई से अभिव्यक्त किया है। पितृसत्तात्मक समाज में विवाह संस्था और परिवार स्त्री के लिए सर्वाधिक सुरक्षित स्थान माने जाते हैं लेकिन इनके भीतर झाँका जाए तो बहुत भयानक यथार्थ का सामना करना पड़ता है। घर परिवारों में बच्चियों ,स्त्रियों माताओं के साथ जो भेदभाव व अत्याचार होते हैं, उन्हें परिवार की ‘लोक मर्यादा’ और ‘इज्ज़त’ के नाम पर घर में ही दबाने के प्रयास होतें है। मेहरुन्निसा जी की कहानियां इन दबी कुचली स्त्रियों की आवाज़ हैं,जहाँ सम्बन्धों के नाम पर उनका शोषण होता है। संग्रह के आरम्भ में संबंधों पर मेहरुन्निसा जी एक कविता लिखतीं हैं- 

 संबंध को मैंने कबूतर की तरह पाला था
क्योंकि,कहते हैं कबूतर अपना घर,पता नहीं भूलते,
पर मेरे सारे कबूतर उड़ गए। लौटकर नहीं आए ।
मैं उनकी प्रतीक्षा करती रही,
खाली घोंसलों को हसरतों से देखती रही 
कि- कभी तो वे लौटेंगे!
पर वे कभी नहीं लौटे!

हिंदी के पाठक(वैसे कहानीकार आलोचक भी ) जब ‘बानो मुश्ताक ‘ को अंग्रेजी में पढ़ने की ज़हमत सिर्फ इसलिए उठा -पा रहे हैं कि वे जानना चाहते हैं कि आखिर उसमें क्या ख़ास है जो हमारी हिंदी कहानियों में नहीं ? बानो मुश्ताक़ कन्नड़ लेखक वो भी स्त्री ! वे मेहरुन्निसा परवेज़ को भी पढ़े हिंदी में ही है यह लेख 3 साल पहले लिखा था

संबंधों के लिए मेहरून्निसा परवेज जी ‘कबूतर’ को चुना, वे ये भी जानती रहीं होंगीं कि कबूतर घोंसला बनाना नहीं जानता कबूतरों के घोंसलें बड़े ही बेढंगे और कच्चे-से होतें हैं। एक लोक कथा के अनुसार (पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति) लापरवाह, कबूतर ने घोंसला बनाना सीखा ही नहीं, लेकिन अंडे देना और चूजों को अपने डैनों में छिपाकर दाना देना ‘कबूतरी’ की ममता है या विवशता होती है। स्वतंत्र विचरण के लिए कबूतर के पास खुला आकाश होता है, जो उसे दाने के लिए पुकारतें है वह उसी झुण्ड में मिल जाता है और लौटता नहीं, और बाकी बचतें हैं बीट के भद्दें निशान और असहनीय दुर्गन्ध। इसलिए भूमिका में मेहरुन्निसा जी एक चिड़िया का भी  जिक्र करती है,जिसका घोंसला घूरे पर फेंक दिया जाता है पर वह ‘कुछ नहीं कहती एक शब्द भी नहीं और घोंसला बुनने लगती है। ‘मैंने हमेशा इस चिड़िया से प्रेरणा ली है बार-बार टूट कर फिर खड़े होने की शिद्दत से कोशिश की है, यही आत्मबल मैंने अपने पात्रों को देना चाहा’\ यह चिड़िया बाहर की नहीं उनके भीतर की है जो उन्हें शक्ति देती है नये सिरे से तिनके बीनकर घोंसला बनाने की। संग्रह की सभी कहानियाँ ‘स्त्री रुपी चिड़िया’ के संघर्ष को प्रतिबिम्बित करती है जो अपने घर-परिवार विशेषकर बच्चों को लेकर चिंतित है,पल-पल समेटने में सदियाँ बीत गई लेकिन स्त्री आज भी पितृसत्तात्मक समाज की बनाई गई रूढ़ियों और बन्धनों में छटपटा रही है। स्त्री की सुरक्षा उसका अस्तित्व पिता के खूँटे से निकलकर पति तक सिमटा हुआ है पिता के घर फिर भी उसकी इच्छा अनिच्छा को थोड़ा बहुत तवज्जो दी जाती है लेकिन ब्याह के बाद उसका वज़ूद पति के घर (उसका नहीं) तक सीमित हो जाता है। उसकी दिनचर्या में वही गिने चुने काम हैं जिन्हें उसकी माँ और माँ की माँ, सभी स्त्रियाँ करती आई हैं,विडंबना ही है कि सृजन करने वाली माँ की तमाम सृजनात्मकता अवरुद्ध व कुंठित हो जाती है या कहें कर दी जातीं है। ये कहानियाँ स्त्री को नव-सृजन की भूमिका के लिए तैयार करतीं हैं जहाँ वह आगे की राह अभी वह खोज रही है।

एक और सैलाब कहानी’ आधुनिकता के दौर में भीड़ के सैलाब में संवेदनशीलता के बह जाने की निर्मम दास्ताँ है। जिंदगी की भीड़ में जब अपना ही चेहरा गुम हो जाए यानी ‘संबंधो में शून्यता’ आ जाए, जिसे ‘भर पाने’ में भी भय लगता , नीलू की जिंदगी उसी दौर से गुजर रही है जीवन के थपेड़े उसे निरंतर कठोर बना रहें है। पति को एक साथ चार पांच बीमारियों ने आ घेरा अकेली तीन बच्चों की देखभाल और अस्पताल की भागदौड़ करती है, ‘उमेश, मन में किसी प्रकार का विचार नहीं करना, दुख सहने के लिए आदमी को कठोर बना देता है फिर यदि पति अकस्मात मर जाते हैं तो क्या कर लेती? पल-पल कर मौत इसलिए पास आ रही है ताकि मैं कठोर हो जाऊं और बाद की स्थिति को बर्दाश्त कर सकूँ’। और फिर जब वो कहती है- ‘मैंने ही उन्हें नींद की गोलियां ज्यादा दे दी थी… मैं बहुत मजबूर हो गई थी उमेश! भागदौड़ करते-करते मैं थक गई थी, बस इसके आगे प्रश्न ना करना’ उसकी कठोरता जिन पारिवेशिक विवशताओं के चलते क्रूरता में बदल जाती है, वह अविश्वसनीय लग सकता है,लेकिन स्त्रियों की परवरिश ही बेल की भांति होती है या तो जमीन पर पड़ी रहे पाँवो तले कुचलती रहे या किसी दीवार,पेड़ के सहारे ही चढ़ सकती है और यदि सहारा छूट जाए तो औंधे मुंह गिरती है ‘पति का सहारा था वह भी रेत पर बने गीली लकीर के समान किसी ने पैर रख दिया मिट गई ‘भगवान ने मुंह दिया है तो खाने को भी देगा कुछ करते नहीं बना तो शरीर तो बेच ही सकती है मरने के बाद भी तो शरीर नष्ट हो ही जाता है’ नीलू कह रही थी’ लेकिन उमेश ? सड़क पर वही भीड़ का सैलाब उमड़ आया था अपने आसपास इतनी भीड़ देखकर उसे अच्छा लगा मन आया, अच्छा हुआ नीलू इस भीड़ में खो गई’। सच तो यही है कि समाज के इस संवेदनहीन सैलाब में जाने कितनी नीलू खो चुकी हैं जिसे कोई खोजना नहीं चाहता, पाना भले ही चाहे, पर निभाना कोई नहीं चाहता । उमेश जान रहा है कि नीलू अंदर ही अंदर अपने से लड़ रही है उसकी आंखों में उसे व्याकुलता साफ छटपटाती लग रही है लेकिन फिर भी उमेश अनजान बनकर सुकून की सांस लेता है। कहानी के दृष्टांत बहुत ही मारक हैं जो भीतर तक झकझोर देतें है जैसे‘ के भीड़ भरे सैलाब में अपना जाना पहचाना चेहरा खोज पाना मुश्किल होता है…जोर-जोर से पहाड़े रटने वाले बच्चे की तरह बौखलाई-सी जिंदगी’बरामदे में एक भिखमंगा बैठा सूखी रोटी के टुकड़े चबा रहा था उसकी दोनों आंखें भूख से बाहर निकल पड़ने को हो रही थी, दोनों उसके आगे से बढ़ गयें उसे अपनी पीठ पर उसकी आंखें गड़ती-सी लग रही थी… दोनों की दृष्टि नाली के पास बड़ी कुत्तिया पर पड़ी जिसने शायद उन्हें बच्चे को जन्म दिया था और खुद प्रसूति बीमारी में फंस गई थी उसके मुंह में कड़वा सा स्वाद उतर आया। प्रसूति-बीमारी एक संकेत दे रही हैं माँ बनने के कष्ट को जिस तरह महिमामंडित किया जाता है कि वो अपना दुःख तक बयां नहीं कर पाती क्योंकि प्रसूति संबंधी बीमारियां समाज में बीमारियां नहीं मानी ही नहीं गई। 

मेहरुन्निसा परवेज़ जी ने हिंदी में खूब लिखा लेकिन उन पर चर्चा कितनी हुई? मैं नहीं जानती कि उनकी कहनियों को अंग्रेजी में अनुदित किया गया या नहीं?

संवादों में निहित उक्तियां जीवन के यथार्थ प्रस्तुत करतीं हैं ‘उमेश कोई कब तक एहसान करेगा पहली बार किया उपकार होता है, दूसरी बार का एहसान होता है और तीसरी बार उपेक्षा होती है…बात क्या करें पापा तो बोल नहीं सकते चुपचाप देखते हैं उनकी आंखों से पानी बहता है अच्छा पानी बहता है या रोते हैं… “हट पापा लोग रोते थोड़ी हैं मम्मी कहती है आंख से पानी बहता है”  ‘मर्द को दर्द नहीं होताएक ऐसा मुहावरा है जो पुरुष को वास्तव में पत्थर बना देता है,तुम एक ऐसी  पत्नी के बारे में कल्पना कर सकते हो जो पति की मौत के पहले ही उदासी में जी रही हो और उस छोटी सी बच्ची का वक्तव्य (संवाद नहीं) मम्मी नहीं है पापा मर गए आप चौंक जातें हैं बच्चे के शब्दों में इतनी जड़ता ये संवेदन हीनता है अथवा अभाव जनित भावहीनता! कहनी का पूरा परिदृश्य संवेदनहीन समाज का यथार्थ उजागर करता है ।

‘सिर्फ एक आदमी’ कहानी ‘सिर्फ एक आदमी की नहीं है यह एक ‘पिता’ है जो पितृसत्तात्मक ढाँचे का प्रतिनिधित्व कर रहा है जिसमें वह समस्त समाज को अपने हिसाब से फिट करना करना चाहता है,जो विशेषकर स्त्री पर वह अपना नियंत्रण रखता है और स्वयं जब-तब अनियंत्रित हो सकता है अपनी बेटी सुमी की पीठ पर बेल्ट के निशान सूखने भी न पायेंगे कि  उन्हें फिर लाल कर देगा, परिवार में मुखिया होने का दम्भ उसके हर शोषण को जायज़ ठहराता है ऐसे घर में स्त्री के लिए कोई स्पेस नहीं  ‘25 बाई 50 के प्लाट पर करीब 15 फैमिली जी रही थी मकान देख लगता है जैसे उन्होंने हवा निकालने की भी जगह नहीं छोड़ी जैसे बरसाती पुलिया के नीचे ढेरों सूअर भरे हों…रसोई के छोटे से कमरे में घर का सामान भरा था एक खिड़की को ड्रेसिंग रूम बनाया गया था दूसरी में लॉ के कोर्स की पुस्तकें जमी थी तीसरी में मौसी ने पूजा का सामान सजा रखा था’। मौसा मिस्त्री का काम खुद कर रहे हैं ‘अरे अतुल यह दीवार कहीं तिरछी तो नहीं हुई घर में तो साले सब नमकहराम है’ ‍‍अपनी पत्नी और बेटियों के साथ न बैठना उस पिता का  अहंकार है अथवा कुंठा अथवा दोनों वह अतुल से कहता है – ‘नीचे क्या रखा है सिवा बकरियों के राज के’ वास्तविकता है कि वे जितना हाय-हाय करते हैं उतनी फिकर दूर करने की कोशिश नहीं करते यह पांच-पांच लड़कियों के विवाह का दबाब ही है,जब रुपया जोड़ना चाहिए था तब तो नहीं जोड़ा, अब ब्याह के लिए पैसा नहीं बन पड़ रहा है तो बौरा गये हैं, चारों  लड़कियों को लॉ पढ़ा रहे हैं परम्परागत विचारों की माँ अलग पगला चुकी है- कि ‘लॉ पास करवाकर लड़कियों का क्या करना है’ दहेज़ प्रथा की विद्रूपताओंके लक्षण इस पोरे परिवार पर देख सकतें हैं ,वास्तव में वे लड़के वालों की मांग पूरी ही नहीं कर सकते इसलिए सुमी के लिए कितने रिश्ते आते हैं पर उन्हें कोई पसंद नहीं आता।और अपनी कुंठा जवान लड़कियों को पीटकर निकालते हैं, पहले भी कहाँ धैर्य था ‘पहले अपने बच्चे के रोने पर मुझे रात को दरवाजे के बाहर कर देते थे’।… सारे घर में उनका आतंक छाया रहता है अब तो मैं हर सुबह जब उठती हूं तो डर लगता है कि कहीं माँ ने आत्महत्या कर ली’ सिर्फ एक आदमीका वर्चस्व परिवार को खोखला कर रहा है जबकि उसकी भीतरी जड़े वास्तव में कमजोर हो चुकी है, उस पितृसत्ता को माँ बेटियां सभी मौन स्वीकृति दे रहीं हैं। सुमी कहती है – ‘लगता ही नहीं किसी का घर है लगता है किसी अस्पताल का जनरल वार्ड हो’। यह वाक्य परिवार-संस्था के बीमार होने की व्याख्या कर रहा है और इसका चरम तब होता है जब अंत में वह कह उठती है- ‘अतुल क्या तुम बप्पा  की मौत तक इंतजार नहीं कर सकते जिस दिन बप्पा मरेंगे मैं तुम्हारे पास चली जाऊंगी’ सड़क की बत्ती अचानक चली गई’ और अंधेरे में डूबा माहौल संकेत है कि दूर-दूर तक कहीं कोई रौशनी नहीं जो परिवार में एक लड़की को स्वतंत्र परिवेश दे सके। पिता के लिए सुमी की सोच किसी को भी स्तब्ध कर सकती है लेकिन इस वाक्य की पीड़ा को सम्भवत: वही समझ सकता है जिसे उस तरह भीड़ भरे घर में जानवरों की तरह रहना पड़ा हो, जहाँ बैठकर वे अपने भविष्य, अपने सुखद सपनों के बारे में भी न सोच पाए आपसे आपके विचार आपकी आजादी छीन ली गई हो सुमी की माँ कहती है– ठाकुर जी की मूर्ति भी थोड़ी जगह में आ जाती है तो तुम लोग क्यों इतना जी जलाती हो … माँ को कौन समझाए ठाकुर जी को हमारी तरह चलना फिरना नहीं होता उन्हें सपने नहीं आते , उनके मन में कोई इच्छा नहीं जागती ,पर हम इंसान हैं ,हमें पूरा हम मिलना चाहिए ना! इंसान होकर जीना बहुत मुश्किल है’ सुमी के संस्कार,पारिवारिक नैतिक मूल्य असंतोष के बावजूद विद्रोह नहीं कर पाते,पर उसके संवाद पितृसत्ता को चुनौती देने के लिए लेकिन तत्पर है और यही कहानी की सफलता भी है।

त्योहार, मेहरुन्निसा जी की कहानी ‘त्योहार’ पढ़ने के बाद प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ कहानी गुलाब के फूल-सी आकर्षक प्रतीत होगी, जिसमें हमें गुलाबी रंग और उसकी खूबसूरती ही दिखाई पड़ती है, कांटे दिखते भी हैं तो चुभते नहीं। ईदगाह में ‘ईद’ पर सभी खुश थे और लड़के सबसे ज्यादा ख़ुश’ प्रेमचंद का हामिद एक तरफ अत्यंत भोला और सरल है और दूसरी तरफ उसकी बुद्धि में परिपक्वता का विलक्षणता है जो लेखक की सोच, आदर्श और धारणा को ही अधिक दर्शाता है। जबकि मेहरुन्निसा जी कहानी ‘त्योहार’ की शानो का अल्लहड़पन,उसकी ज़िद और बिल्लियों के साथ उसकी बालसुलभ शरारतें अत्यंत स्वाभाविक लगती हैं, ईद पर जब माँ के दूर के रिश्ते के भाई  जकात में पीले साटन का फूलों वाला कपड़ा भेजता हैं,तो साटन का वह कपड़ा अम्मा की नज़रों में चुभने-सा लगता है तो पाठकों का ह्रदय द्रवित हए बिना नहीं रहता, अम्मा जो अब तीज- त्योहार से चिढ़ने लगी थी उनका कहना था ‘त्योहार में दूसरों के सामने नंगा करने चले आते हैं’। ‘त्योहारों की उदासी को कहानी के साथ जुड़कर ही महसूस किया जा सकता है।जब शानो बार बार अम्मा को झंझोड़ती कि आखिर हमारे घर नए कपडे क्यों न आये तो अम्मा चिढ़ जाती ‘आखिर ईद में नए कपडे पहनना क्या ज़रूरी है लोग क्यों बार-बार पूछते हैं हम किसी की ढकी हांड़ी खोलने नहीं जाती ?..जैसे जैसे ईद नजदीक आती उनके चेहरे की चिढ़चिढ़ाहट में बदल जाती’ पहले कितनी बेसब्री से ईद का इंतजार होता है और अब ईद के नाम पर जैसे घर में खामोशी आ जाती है ‘ईद’ शब्द डरावना लगने लगता है। तब अम्मा को उतनी नहीं जितनी मरे हुए बेटे सलीम की याद आती है शायद यही कारण है कि मोहल्ले के रमजानी का नाम आते ही वह चिढ़-सी जाती है रमजानी जिसने पिता के मरने के बाद घर को इतना संभाल लिया था  कि मोहल्ले के रईसों में उसका नाम होता है तो क्या लड़की होने के कारण अम्मा को शानो के भविष्य से उसे कोई उम्मीद नहीं,वास्तव में ये उसकी पितृसत्तात्मक सोच भी ही है। त्योहार उत्सव सुविधओं के होने पर ही भले लगते हैं पर यदि स्त्री के तथाकथित आश्रयदाता पति की असामयिक मृत्य हो जाए तो उसके लिए परिवार का पालन-पोषण अत्यंत कठिन हो जाता है,   सहानुभूति के स्थान पर ’विधवा’ का सामाजिक कलंक, पुरुषों की कुदृष्टि तिसपर शिक्षा का अभाव ,बाहरी दुनिया से बेख़बर क्योंकि कभी बाहर अकेले भेजा ही नहीं गया, बिना आर्थिक सुरक्षा के भला कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दुनिया का मुकाबला कर पाएगी। ‘भविष्य के सैंकड़ों प्रश्न मुँह फाड़े खड़े हो जाते हैं’ अंडे वाली खाला के शौहर मरे तो उन्होंने अंडे खरीद कर बेचने का धंधा शुरू कर दिया अम्मा खाला के लिए कहती है-.… मरद के मरते ही जाने ये कैसे ये फकीरों में शामिल हो गई..इसे जरा शर्म नहीं है जकात के कपडे पहनती है और खाला भी किसी दूसरी विधवा पर लांछन लगाने से बाज़ नहीं आती ‘देखो ऐसे होती हैं, बड़े घर की पोल ,मुझ गरीबनी को सब नाम रखते हैं करीम की छम्मक छल्लो स्कूल में मास्टरनी हो गई!  तब अम्मा कहती है … बहन मरद मर गया, तीन तीन बच्चों को छाती पर खूंटे की तरह गाढ़ गाया, नौकरी करके नहीं खिलाएगी तो किस टूकने में ढांकेगी तीनों को।

कहानी त्योहारों के धार्मिक परिप्रेक्ष्य और गरीबी पर मेहरुन्निसा जी खाला के माध्यम से टिपण्णी करती है- ‘हर घर घूमने वाली ठिगने कद की खाला रोजे नमाज़ से दूर ही रहती है कोई टोकता तो साफ सुना देती भाई बिना झूठ बोले हमारे रोजगार नहीं चलता दिन में 25 झूठ बोलने पड़ते हैं ऐसे में क्या रोजा रखे हम गरीबों का तो हर दिन रोजा है’। अंत में जब खाला थैले से कपड़ा निकालती है, लालटेन के उजाले में खाला ने कपड़े को फैला दिया तो लालटेन के उजाले में अम्मा की परछाई कांपती सी लगी अम्मा की पीली पीली आंखें बरसाती डबरा की तरह भर गई थी जैसे उन्होंने गरीब होना कुबूल कर लिया था और पहली बार जकात लेने वालों की लाइन में अपने आप को खड़ा पा रही थी।

‘तीसरा पेंच’ कहानी स्त्री पुरुष के सनातन संबंधों से इतर समलैंगिक संबंधों की ओर संकेत करती है। कहानी के अंत में बड़े ही रहस्यमय ढंग से होता है और जितना समझ आता है कि  जाफरी समलैंगिक है।आरम्भ में उसका कहना – बार-बार दरवाजा खटखटाने पर भी दरवाज़ा न खोलना और खोलने पर असहज प्रतीत होना, खोलने से पहले भीतर बहुत भीतर हलचल हुई और रबड़ के स्लीपर का फर्श पर रगड़ खाने का आभास मानो कुछ जल्दबाजी में किया जा रहा है। ‘उसके’ आने से जाफ़री चेहरे पर प्रसन्नता के कोई लक्षण नहीं दिखे थे। और ये कहना कि एक लंबे समय के बाद में अपने घर में किसी स्त्री को देख रहा हूं तो फिर बाथरूम में वो वह लहंगा ?  रंग-बिरंगे जोकर जैसे पायजामे पहनना, प्रश्न करने पर कि तुम रंग-बिरंगे पजामे क्यों पहनते हो उसने कोई उत्तर नहीं दिया बल्कि ऐसा प्रतीत हुआ कि उसको यह प्रश्न करना अच्छा नहीं लगा। अंत में जब स्त्री लहंगे को देखती हैं तो पहले उसे हंसी आती है कि ये लहंगा भी पहनता है फिर अचानक एक विचार उसके मन में कौंधा और वह आश्चर्य में पड़ गई बाथरूम से तुरंत निकल आई । लौटने लगी तो पहली बार उसके मन तो फटे आंचल कर दुख घेरे था।

जाफरी की  दूसरी पत्नी शीला के किसी और से संबंध थे सुनने में आया उसके प्रेमी ने ही उसकी हत्या की थी पहली पत्नी से तलाक ले चुका था। बच्चों को मां पाल रह थी तो वह माँ और बच्चों को अपने साथ क्यों नहीं रखता ? शायद उसने इसका उत्तर नहीं खोजा था, मां बूढ़ी है तो बच्चों की वहां अकेले कैसे देखभाल कर रही है, आंखों के सामने बच्चे और माँ दोनों रहेंगे तो देखभाल ज्यादा अच्छी होगी न? स्त्री के कहने पर कि ‘क्या तुम भी समाज के बनाए बंधन को संबंध कहते हो’ तब देव प्रसन्न लग रहा था। ‘तीसरी गली’ पर अब अपना आखिरी मकान बनेगा,जिस जीवन साथी की तलाश है वह जल्दी ‘आने वाला’ है कहनी संकेतों के माध्यम से स्पष्ट कर रही है कि जाफरी अपने संबंधो को समाज में उजागर नहीं कर पा रहा, जो वास्तव में उसकी कमी नहीं सामजिक मानसिकता का प्रभाव है,पर उसके लिए वह दूसरों की जिंदगियों   से क्यों खेल रहा है?वह पढ़ा-लिखा है सरकारी नौकरी कर रहा है पर सामाजिक दबाब के कारण अपने संबंधों के यथार्थ को छिपाना उसकी विवशता है क़ानून बन जाने के बावजूद समलैंगिक संबंधों को आज भी सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिली है ।

क्रमश:(इसी संग्रह की बाकी कहानियों पर रविवार को )

सभी चित्र गूगल से साभार

 ‘पाक’ की ‘सफाई’ पर प्रार्थना पत्र

हे प्रभु !
दयानिधान,
दया के सागर,
मुझ पर कृपा करें!

विषय: ‘खतरे में अस्तित्व’ के सन्दर्भ में

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं बहुत ही आशा के साथ आपके पास एक प्रार्थना लेकर आया हूँ , भारतीय ज्ञान परंपरा के समय से मैं इस देश का अभिन्न अंग रहा हूँ लेकिन अज्ञानता अथवा अहंकार के वशीभूत आपके कुछ भक्तलोग मुझे ‘देश-निकाला’ देने का उपक्रम आरम्भ कर चुके हैं। अत: मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूँ कि इसी देश की उत्पति होकर भी, मुझ पर विदेशी होने का आरोप लगाया जा रहा है, मुझे हिकारत की नज़रों से देखा जा रहा है ।आपको बताते हुए अत्यंत कष्ट हो रहा है कि आज मेरा अस्तित्व खतरे में है। जी जानता हूँ , अस्तित्व तो बहुत लोगों का खतरे में है, लेकिन मैं अपनी बात कहता हूँ कि मेरा दोष क्या है ? मुझ निर्दोष को बचा लिया गया तो इसमें आपका भी लाभ ही है क्योंकि ‘मैं’ नहीं रहा तो आपके ‘भक्त’ लोग भूखों मर जाएंगे। क्योंकि जो ‘छप्पन भोग पकवान’आपको अर्पित किये जाते हैं प्रसाद स्वरुप को आपके भक्त ही ग्रहण करते हैं ना । पाककला ने तो हमेशा से ‘भारतीय रसोईघर’ की कलात्मकता में बढ़ोत्तरी ही की है फिर ये देश निकाला की सज़ा क्यों?

अब मैं आपको अपना परिचय देता हूँ, जी मैं हूँ ‘पाक’ भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग । आपसे क्या ही छिपा है कि भारत की ‘पाक विरासत’ हज़ारो वर्ष पुरानी है इसे आप भारतीय संस्कृति की वेबसाइट पर जाकर पुख्ता कर सकते हैं जहाँ पाकशास्त्र के कई महत्वपूर्ण तथ्य प्राप्त हो सकेगे । मेरे कई जोड़ीदार जो मुझसे भारतीय ज्ञान परंपरा के समय से जुड़े हुए हैं, अब मुझसे बिछड़ने का सोच कर भी हैरान परेशान है। जी कला, शास्त्र,और शाला तीनों स्तब्ध हैं कि इतने वर्षों का साथ एक अज्ञान के कारण झटके में कैसे छूट सकता है! उन्होंने जब से खबर सुनी कि मेरे नाम ‘पाक’ पर झाड़ू फेर कर कुछ  श्रीशास्त्री (पाकशास्त्री) वहाँ पर ‘श्री’ को स्थापित कर रहे हैं, वह भी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के नाम पर? रो-रो कर उनका बुरा हाल है ।  जी, आपकी जानकारी हेतु मैं बता देना चाहता हूँ कि एक खबर के अनुसार जयपुर शहर की मिठाइयों के नाम से दुकानदारों ने ‘पाक’ शब्द हटाया। ‘मोती पाक बना अब मोती श्री’ दुकानों पर मोती पाक, आम पाक, गोंद पाक, मैसूर पाक, जैसे नाम लिखे होते थे वहीं अब कई शॉप्स में बदलाव किया जा रहा है, मोती श्री आम श्री गोंदश्री मैसूर श्री नाम दिए जा रहे हैं। आप ही बताएं कि क्या यह विडंबनापूर्ण ( बल्कि हास्यास्पद या बचकाना) नहीं कि मीडिया इसे ऑपरेशन सिंदूर का असर बता रही हैं। बतलाइए (तथाकथित)’युद्ध’ जीतने के बाद लोग मिठाईयाँ खाएंगे या मिठाइयाँ पढ़ेंगे ? कृपया इसका संज्ञान अवश्य लें कि मीडिया ने इस प्रकार का भ्रम क्यों फैलाया।

आशा करता हूँ कि मेरे इस हृदय विदारक कष्ट को समझते हुए आप अब यह कहकर मुझे फुसलाने की कोशिश नहीं करेगें कि छोड़ो भई ‘नाम में क्या रखा है’ वैसे अगर आप कहेंगे भी तो कौन ही रोक सकता है आपको? लेकिन ‘नाम में क्या रखा है?’ यह तो किसी अंग्रेज का कहना था ना! वह क्या जाने भारत में ‘नाम-नाम’ की महिमा यहाँ तो नाम, उपनाम, जाति, उपजाति, और धर्म सभी मायने रखते हैं। प्रभु आप तो विश्व गुरु हैं और अधिकतर विश्व भ्रमण में इतने व्यस्त रहते हैं, कहाँ ही याद रहती होंगी हम जैसो की छोटी-छोटी बातें। तो मैं आपको पुन: याद दिलाने का प्रयास करता हूँ कि मैं ‘पाक’ पूर्णतया शुद्ध भारतीय हूँ यहीं मेरा जन्म हुआ यही मेरा जन्मस्थल है। मैं  म्लेच्छ कदापि नहीं हूं। संस्कृत में विद्यमान ‘पाक’ शब्द  पच् धातु से बना है, पच् धातु का अर्थ है, पकाना या सिद्ध करना इसी से ‘पाक’ शब्द बना है जिसका अर्थ है पकाने की क्रिया या भोजन संस्कृत में पच् धातु से कई शब्द बने जिसमें पाक, पाचन , पक्का आदि शामिल है। मैं आपको विशवास दिलाता हूँ कि पड़ोसी देश से मेरा कुछ लेना देना नहीं मुझे फँसाया जा रहा है। इसी कारण ‘पाक’ से जुड़ा हमारा भरा-पूरा परिवार भी खतरे में है जैसे कि ‘पकवान’ ये भी तो हमारे ही परिवार का है। कम से कम पकवानों के सांस्कृतिक महत्त्व को समझते हुए तो आपको एक बार पुनर्विचार करना ही होगा अन्यथा ‘छप्पनभोग के अंतर्गत सभी ‘पकवान’ भी हवा हो जाएंगे ?

हे ईश्वर! आपकी सत्ता को प्रणाम करते हुए ये सभी ‘पकवान’ भी आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं कि हमारा बहिष्कार न किया जाए। आप ही भूखे रहेंगे तो भक्तगण को तो कहने का मौका ही मिल जाएगा ‘भूखे भजन न होय गोपाला’ और ये पकवान न रहेंगे तो क्या आपको कच्ची रसोई का भोग लगाया जाएगा प्रभु! हे दया के सागर आखिर आपके भक्त इतनी मूर्खता कैसे कर सकते हैं कि प्राचीन ज्ञान परंपरा के अंतर्गत आने वाले ‘पाकशास्त्र’ जैसा ज्ञान का पेटेंट बैठे-बिठाए अपने पड़ोसी के नाम से जोड़ दिया,  मने काहे को दुश्मन के आगे सरेंडर कर दिया।

हम जानते हैं कि बहिष्कार, बायकॉट या बैन आपके भक्तों की आदत बन चुकी है लेकिन किसी की ख़राब आदत का भुगतान पाकशास्त्र क्यों भुगते ?  ‘पाकशास्त्र’ तो भोजन बनाने या पकाने की कला और विज्ञान है लेकिन आस्था के पुजारी ये भक्त तो विज्ञान और तर्क से कोसों दूर भागते हैं । और हाँ, “पाकशास्त्र” वो तो 1947 की देन तो नहीं है! इसलिए कह रहा हूँ , प्रभुता और सत्ता का सही उपयोग करते हुए अखंडता के नाम पर मेरी इतनी प्राचीन परंपरा और अस्तित्व को खंडित न होने दें।  जानता हूँ, कोई सुनने वाला नहीं पर आस्था के युग में आपसे आशा लगाए बैठा हूँ कि मेरे पाक नाम का अनर्थ न किया जाये। हां,अगर ‘श्री’ लगाने भर से हम ‘पकवानों’ को नकली खोये,केमिकल्स या जहरीले रंगों से अगर छुटकारा मिलने वाला है तो मन मारकर नए नाम की मंजूरी के लिए मेरे जोड़ीदार तैयार हैं।

पुनश्च: वैसे कुछ 5 -6 सालों पहले भी इस तरह की कोशिश हुई थी एक खाद्य प्रेमी ने ट्वीट किया और कहा कि कर्नाटक की मुख्य मिठाई ‘मैसूर पाक’ का नाम बदलकर ‘मैसूर इंडिया’ कर दो लेकिन तब तक रौशनी थोड़ी बाकी थी शायद इसलिए उनको ट्रोल करते हुए लताड़ा गया कि मिठाई में ‘पाक’ शब्द कन्नड़ शब्द ‘पाका’ से संबंधित है जिसका अर्थ ‘चीनी की चाशनी होता है’ न कि पाकिस्तान देश से इसका कोई संबंध है। तब बहस रुक गई थी। लेकिन अब स्थितियाँ जटिल हैं कुछ (पाकशास्त्री) हलवाई स्वयं आगे आ गए हैं। आशा करता हूँ कि इस सन्दर्भ में कुछ कार्यवाई कर मुझ पर अवश्य कृपा करेंगे।

धन्यवाद    
सादर
आपका ही “अपना”
स्वीट-स्ट्राइक में शहीद होने की प्रक्रिया में
‘कला’, ‘शास्त्र’ और ‘शाला’ का गाढ़ा मित्रसभी चित्र साभार गूगल
शिवानी सिद्धि
स्वतंत्र लेखिका

‘फेंकने दो उन्हें गोबर’: फुले दम्पति की संघर्ष गाथा  

‘फेंकने दो उन्हें गोबर, देखते हैं पहले कौन थकता है वो या हम’ फुले’ फ़िल्म का यह संवाद जाने कब तक प्रासंगिक रहने वाला है। बात हिंदी सिनेमा की करें तो उसमें निहित ब्राह्मणवादी-पितृसत्तात्मक मानसिकता और वर्चस्व ने हमेशा ‘जाति के सवालों’ को हल्केपन में चित्रित किया या पूर्णतया नज़रंदाज़ ही किया । वैसे भी मनोरंजन और व्यवसाय से ऊपर हिंदी सिनेमा कभी-कभार ही सोचता है।  अब जबकि हाशिये का समाज फ़िल्म निर्माण के व अन्य विविध क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक भूमिका निभा रहा है तो बहुजन समाज,उनके मुद्दे और उनका जागरण केंद्र में आ रहे हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि यह भले ही कोई सौ वर्षों के बाद हो रहा है , अब मुख्य धारा से जुड़े सवर्ण भी हाशिये के लोगों को सिनेमा के केंद्र में लाने को उत्साहित हैं। इसे उनकी विवशता भी मान सकते हैं क्योंकि ‘बॉक्स ऑफिस कलेक्शन’ में बहुजन समाज का योगदान तभी मिलेगा जबकि उनसे जुड़े मुद्दे उठाए जायेंगे । हाल ही में रिलीज़ ‘फुले’ फ़िल्म ने यह प्रमाणित कर दिया है कि विषय के अनुकूल होने पर आप दर्शकों को सपरिवार सिनेमाघरों की ओर लाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं । फ़िल्म के निर्देशक भी निश्चित तौर पर जानते रहे होंगे कि वंचित और बहुजन समाज के नायक-नायिका ‘फुले दम्पति’ पर फ़िल्म बनाना घाटे का सौदा नहीं रहेगा, इसलिए ‘फुले’ फ़िल्म अगर आज एक आन्दोलन का रूप ले चुकी है तो इसका श्रेय सिर्फ निर्देशक या कलाकारों को कतई नहीं दिया जाना चाहिए । इस आन्दोलन की मशाल तो ‘फुले-दम्पति’ ने 1848 में ही प्रज्जवलित कर दी थी जब उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए पाठशाला खोली । बाबा भीमराव अम्बेडकर जी ने संविधान के माध्यम से इस मशाल को जिलाए रखा। साहित्यिक विमर्शों और सिनेमा के फलक ने भी शिक्षा के अधिकारों के प्रति बहुजन समाज को जागरूक किया ।

भारत की प्रथम स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले जी ने ‘अंग्रेजी भाषा’ को मैया कहते हुए उस पर कविता इसलिए लिखी थी क्योंकि अंग्रेजी भेदभाव नहीं करती बल्कि ‘मातृभाषा’ की तरह ही शूद्रों-दलितों और वंचितों को पालती- पोसती है –   

अंग्रेजी मैया,
तूने तोड़ डाली जंजीर पशुता की
और दी मानवता की भेंट
सारे शूद्र लोक को’

इस सन्दर्भ में फ़िल्म पर प्रश्न उठाना बनता है कि निर्देशक ने किसी भी दृश्य में अथवा पृष्ठभूमि में भी  उनकी किसी भी कविता का पाठ क्यों नहीं दिखाया? इसके विपरीत शिक्षा के महत्व पर एक गीत को  हटवा दिया गया । अगर अपने हर साक्षात्कार में निर्देशक को यह सफाई देनी पड़ रही है कि हमने तो यह भी दिखाया है कि ब्राह्मणों ने फुले दम्पति का साथ दिया, उन्होंने ही उनका हाथ भी थामा तो क्यों न इसे उसी पुरानी मानसिकता से जोड़ा जाए कि शूद्र या दलितों का उद्धारक कोई सवर्ण ही हो सकता है,जैसा कि हिंदी फ़िल्मों दिखाया जाता रहा है। वास्तव में निर्देशक पर सेंसर का नहीं बल्कि वर्चस्ववादी सवर्ण मानसिकता का दबाब था। निर्देशक ये भी जानते थे कि एक महत्वपूर्ण विषय पर बनी फ़िल्म अगर कहीं डिब्बे में बंद रह गई तो आर्थिक नुकसान होगा और जो सामजिक जागरण व आन्दोलन हमें आज दिखाई पड़ रहा है वह भी कमजोर पड़ जाता । अत:निर्देशक ने इसका प्रतिरोध नहीं किया अपितु सेंसर द्वारा दिए गये 16 कट्स को ‘कट’ माना ही नहीं और सेंसर बोर्ड की सिफारिश और सुझाव कहकर स्वीकार कर लिया । यह भी विचित्र विडंबना ही है कि जो फ़िल्म आन्दोलन में परिवर्तित हो चुकी है, उसके प्रचार-प्रसार के लिए ‘न्यूज़ हिन्दुस्तान’ के प्लेटफोर्म से निर्देशक को देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जी से आग्रह करना पड़ रहा है कि वे ‘फुले’ फ़िल्म देखें और अपने अमूल्य विचार पूरे देश और विश्व के साथ शेयर करें । फ़िल्म के केंद्र में स्त्री शिक्षा है पर इसके विरोध ने स्पष्ट कर दिया है कि उच्च जातीय दंभ, श्रेष्ठ होने के अहंकार से आज भी सवर्ण संकीर्ण मानसिकता ग्रस्त हैं। यह पाखंड की चरम पराकाष्ठा ही है कि जो पहले ही से इतिहास में दर्ज है उसके फ़िल्मांकन का विरोध हो रहा है, महिलाओं के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए भी फ़िल्म टैक्स फ्री क्यों नहीं हो पाई यह भी सोचने वाली बात है।

एक लुका-छिपा विरोध तो इस बात का भी है कि सवर्ण मानने को तैयार नहीं कि सावित्री बाई फुले देश की पहली महिला शिक्षिका हैं, तभी उस दृश्य को भी हटाने की माँग की गई कि जब सावित्री बाई फुले स्कूल जाती हैं और उन पर गोबर फेंका जाता है, जबकि यह ऐतिहासिक तथ्य है । दूरदर्शन पर प्रसारित  ‘भारत एक खोज’ के ‘फुले’ एपिसोड में भी यह दृश्य है । तब क्या इस फ़िल्म का बहिष्कार सवर्णों द्वारा दलितों के अधिकार की माँग का बहिष्कार समझा जाए? अब ‘मुगले-आज़म’ के जोधा-अकबर के सन्दर्भ में सिनेमा का त्वरित और दूरगामी प्रभाव समझते हैं, यानी भारतीय आम दर्शक आज भी असमंजस में हैं, जोधा-अकबर का रिश्ता क्या है? जबकि उससे जुड़ा इतिहास कोई नहीं पढ़ना चाहता । अर्थात् इसी सन्दर्भ में ‘फुले’ फ़िल्म के निर्देशक की प्रगतिशील सोच पर एक प्रश्न यह भी उठता है कि बिना किसी आधार-ग्रन्थ के फ़िल्म में जोतिबा फुले के मुख से क्यों कहलवाया गया है कि ‘आज मुझे यह कहते हए गर्व हो रहा है कि मेरी पहली शिष्या और मेरी पत्नी तथा मेरे दोस्त उस्मान शेख की बहन इस भारत वर्ष की पहली अध्यापिकाएँ हों’।  जबकि ‘फातिमा शेख’ पर अभी शोध होने बाकी हैं। यदि यह संवाद जोतिबा फुले के मुख से न कहलवाकर दर्शकों को ही समझने का मौका दिया गया होता कि पहली शिक्षका कौन है? सावित्री बाई अथवा दोनों! तो सम्भवत: ज्यादा बेहतर होता। आम दर्शक कहीं न कहीं इस दृश्य के आधार पर महात्मा फुले के संवाद को ही सत्य मानकर, इतिहास की खोज शायद ही करे । यूट्यूब पर मैंने फ़िल्म निर्देशक के कई साक्षात्कार देखे; इस ऐतिहासिक विषय पर फ़िल्म बनाने से पूर्व शोध के सन्दर्भ में निर्देशक ने जोतिबा फुले की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक ‘गुलामगिरी’ का जिक्र तक नहीं किया! किया भी हो, तो सम्भवत: वही साक्षात्कार मुझसे छूट गया हो! उनका कहना था कि हमने इतनी सामग्री इकट्ठी कर ली थी कि पाँच घंटे की फ़िल्म बन सकती थी । ‘फुले दम्पति’ पर होने वाले शोध पुस्तकों पर उनकी टिप्पणी थी- ‘चाहे वे मराठी में हो इंग्लिश में हो या हिन्दी में भी हों ऑलमोस्ट 90 % मेटेरियल कोमन है बाकी जिन विवादित 10% को हमने टच नहीं किया है हालाँकि हमें ‘फ़िल्टर’ करना पड़ा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बातों को शामिल किया गया है’। फ़िल्टर का क्राइटेरिया क्या रहा होगा? ‘भविष्योन्मुखी भविष्यवादी दृष्टिकोण लिए हुए इस कपल की कहानी को पिरोने में संतुलन बनाने की कोशिश की गई है’ यानी सबको खुश करना! समाज का एक संतुलित चित्र प्रस्तुत करना! फिर तो यह ‘फिल्टर्ड इतिहास’ आधा-अधूरा है । ‘फुले’ के लेखक मुअज्जम बेग के अनुसार कहानी के लिए मुख्यत: ‘धनंजय कीर’ की पुस्तक को आधार बनाया है । फिल्टर्ड के विषय में निर्देशक का कहना कि ‘जनता किताबों के माध्यम से सच जानती है आप वहाँ कैसे सत्य को मिटा सकते हो’? अपने वक्तव्य को वे स्वयं विरोधभासी मान रहे थे ।  

क्रूर यथार्थ तो यही है कि सवर्ण मानसिकता अभी बदलने को तैयार नहीं है, क्योंकि वर्चस्व के विशेषधिकार छोड़ना आसान नहीं । भले ही भौतिक रूप से गले में झाड़ू नहीं लटका हुआ है लेकिन जाति  (सरनेम) के नाम का मटका अभी भी गले में पड़ा है। सवर्ण जातियाँ उन्हें पहचानकर हेय दृष्टि से देखती हैं, उन्हें छोटा महसूस करवाया जाता हैं, बड़े बड़े संस्थानों में पढ़े-लिखे लोगों द्वारा भी दलितों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है । रोजमर्रा की ख़बरों हम देख-पढ़ रहे हैं कि ‘फुले-युग’ का क्रूर यथार्थ आज भी रंग-रूप बदल कर खड़ा है, जिसे वर्ण-व्यवस्था और सामाजिक संरचना का आश्रय प्राप्त है, जहाँ तथाकथित शूद्र-दलित जातियाँ और बहुजन समाज निम्न माने जाते हैं । हमारा समाज आज भी जातिगत भेदभाव के चंगुल में फँसा हुआ है, आज भी दलित समाज शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाते हैं। महात्मा जोतिबा के अनुसार शिक्षा के अभाव में ‘मति और नीति का ह्रास होता है,जो जीवन की गति उसके विकास को अवरुद्ध कर देता है, तब वित्त यानी सम्पन्नता और समृद्धि भी नहीं आती और इसलिए शूद्र वंचित रह जाता है, फ़िल्म में यह संवाद मराठी में है ।

हाँ,इस बात को भी स्वीकार करना होगा कि विशेषकर उत्तर भारतीय दर्शक फुले-दम्पति के कार्यों व संघर्षों से कम परिचित है, फुले दम्पति का अवदान और संघर्ष जो कहीं पुस्तकों में दब कर रह गया था, फ़िल्म ने उसमें नयी जान फूँकी है। इस फ़िल्म ने यह महत्वपूर्ण कार्य किया कि उनके संघर्ष-गाथा घर-घर तक पहुँचा दी फ़िल्म देखकर नम आँखों से लोग सिनेमाघरों से निकल रहे हैं और उनके विषय में अधिक जानने के लिए पुस्तकें पढ़ने की बात कह रहे हैं, वे जानना समझना चाहते हैं कि उन कट्स में क्या रहा होगा जो छिपाया जा रहा है? यह अच्छा संकेत है । फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद यह भी खुलकर सामने आया कि सोशल मीडिया ने दलित पत्रकारिता को न केवल अभिव्यक्ति दी,बेहतरीन मंच दिया बल्कि बड़ी ही निडरता से वे समाज को जागरूक कर रहे हैं। यूट्यूब पर 10-20 मिनट के अनगिनत वीडियो मिल जायेंगे जो इस फ़िल्म का न केवल खुलकर समर्थन कर रहे हैं बल्कि लोगों को प्रेरित भी कर रहे हैं कि वे सपरिवार यह फ़िल्म देखें । यह भी कहा जा रहा है कि इस फ़िल्म को स्कूलों में दिखाया जाना चाहिए। जहाँ प्राचार्य और अध्यापक सहित कई स्कूल विद्यार्थियों के साथ फ़िल्म देखने पहुँचे वहीँ सवर्ण समुदायों ने फ़िल्म का ट्रेलर देखकर इसका विरोध किया, वे विविध मंचों से फ़िल्म के बायकाट की माँग कर रहे थे, बायकाट का कारण पूछने के लिए दलित पत्रकारों ने भी बेहतरीन भूमिका निभाई वे अत्यंत प्रखरता से तर्कसंगत ढंग से प्रश्न कर रहे हैं और विरोधियों से जवाब देते नहीं बन रहा । आप इन वीडियो को ‘फुले फ़िल्म विवाद’ लिखकर सर्च कर सकते हैं ।

दलित विषयों पर बनने वाली फ़िल्मों के विरोध ,बहिष्कार,और बैन जैसी स्थितियों के बीच एक सुखद खबर है कि Cannes 2025 में ‘मसान’ फ़िल्म के निर्देशक नीरज घायवान की फ़िल्म ‘होमबाउंड’ देखकर दर्शकों ने लगातार 9 मिनट तालियाँ बजाई और रोने लगे यह उत्तर प्रदेश के गाँव की पृष्ठभूमि पर बनी यह फ़िल्म एक दलित और मुसलमान दोस्त के संघर्षों की कहानी है ।देखना होगा कि भारत में उसका स्वागत कैसे होता है ? महात्मा फुले के संवाद को याद रखना होगा कि- “फेंकने दो उन्हें गोबर,देखते हैं पहले कौन थकता है वो या हम”

सभी चित्र गूगल से साभार
शिवानी सिद्धि
स्वतंत्र लेखिका

मेरा प्रथम पुरुष मित्र

संदीप तोमर

जब से कला की समझ पैदा हुई अमूमन तब से ही कूची हाथ में पकड़ कैनवास पर अपनी कल्पनाओं को आकार देना मेरी सबसे बड़ी हॉबी बन गया। मुझे लगता कि चित्रकार का कूची से रंग भरना और पेंटिंग को जीवंत बना देना बिलकुल वैसा ही है जैसे कोई कहानीकार किसी कथानक को अपनी संवाद कला से मुकम्मल बना देता है। हाँ! कौतुभ भी तो कहानीकार ही था- कहानियाँ लिखना, उन्हें अमरत्व तक ले जाना उसका शगल था, कहानियाँ लिखते-लिखते  वह उन्हें जीने लगता था, उसकी कहानियाँ मस्तिष्क को इतना उद्वेलित कर देती हैं कि उन्हें पढ़ खुद-ब-खुद कोई नया पोर्ट्रेट बनने लगता, मुझे लगता जैसे उसका कहानी लिखना और मेरा कूची चलाना दोनों ही प्रकृति द्वारा तय था, उसकी कलम और मेरे ब्रश का जैसे कोई पुराना नाता था। वह अपनी कहानियों में प्रेम को जीता, मेरे रंग भी प्रेम को ही उकेरते प्रतीत होते, जब कभी कोई प्रदर्शनी होती, पेंटिंग को चाहने वाले, दार्शनिक उनमें प्रेम को ही व्याख्यायित कर रहे होते, तब मुझे सुनकर अच्छा लगता, कौतुभ भी तो कितनी ही बार मेरी पेंटिंग की प्रदर्शनी में आता, मुझे एक संबल मिलता उसके उपस्थित होने मात्र से।

जब कभी कौतुभ को याद करती हूँ, तब उसके चेहरे की रंगिनीयत, उसके बेतरतीब बिखरे घुँघराले बाल, और उसके सुर्ख गहरे गुलाबी मुस्कान से भरपूर होंठ मेरे जहन में एक आकृति से घूमने लगते हैं और अनायास ही मेरे होंठो पर मुस्कान फैल जाती है, कभी-कभी वह मुस्कान कानों तक को छूने लगती है।

आज फिर उसका चेहरा आँखों के सामने हैं, मानो कल ही की बात है, जब वह मेरे शहर झाँसी आया था। झाँसी यूँ तो कोई बड़ा शहर नहीं है लेकिन साहित्य-प्रेमी इस नगरी में इतने हैं कि महानगर से तुलना करें तो इधर की संख्या कहीं अधिक होगी। झाँसी की चर्चित लेखिका निधि जयसवाल की नयी किताब की रिलीज़ पर कौतुभ मुख्य वक्ता था। कार्यक्रम कक्ष के मंच के ठीक पीछे लगे पोस्टर पर कौतुभ की तस्वीर को देख कोई भी अंदाज नहीं लगा सकता था कि चिरयुवा दिखने वाला शख्स कोई गंभीर चिंतक भी हो सकता है, चित्र से ही उसका आभामंडल किसी को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त था, मैंने खुद को किसी भी पूर्वाग्रह से अलग करने की कोशिश की। अभी मंच खाली था, उद्घोषक ने अतिथियों के स्वागत के लिए माइक से घोषणा करनी शुरू की, मेरे हृदय की गति सामान्य से कुछ अधिक थी, शायद आँखें उस शख्स को देखने को लालायित हुई, मैंने खुद को नियंत्रित करने की कोशिश की, मेरे होंठ उस पल बुदबुदाये थे, “दीपशिखा! तुममे तो ये उतावलापन कभी नहीं रहा फिर आज …..?” 

कुछ सोच पाती उससे पहले ही उद्घोषक ने कहा- “हमारे समय के बड़े आलोचक, कथाकार कौतुभ हमारे बीच उपस्थित हैं, हम उनका हृदय की अतल गहराइयों से स्वागत करते हैं।“

सबकी निगाहें कौतुभ को देखने को हाल में घूमने लगी, दायी तरफ की तीसरी पंक्ति से एक सख्श उठा, हाथ में छड़ी लिए, शायद सहारे के लिए छड़ी को लिए हो, एक बारगी मन में आया- “कौन है ये शख्स ?” अगले ही पल मन में विचार उठा- “कहीं ये कौतुभ तो नहीं?” मेरा मन एक अजीब सी आशंका से घिर गया, कुछ पल पहले मन में बनी कितनी ही आकृतियाँ ध्वस्त होने लगी। वह मंच की ओर बढ़ रहे थे, मन में विचार आया- “खड़ी होकर उनके पास जाकर उन्हें सहारा दूँ, अगले ही पल खुद के विचार को खुद ही ध्वस्त भी कर दिया- “नहीं, शिखा, इस मुकाम तक पहुँचने वाला व्यक्ति कितना स्वाभिमानी रहा होगा, तुम कैसे उनके स्वाभिमान को ठेस पहुँचा सकती हो?”

कौतुभ छड़ी के सहारे धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़ रहे थे, इतने आदर-सत्कार से शायद उनका मन भी रोमांचित हो, ऐसा मैंने सोचा, अगले ही पल लगा- ऐसे मौके तो उनकी ज़िंदगी में अक्सर आते होंगे। अब वे मंच पर अपनी निर्धारित सीट पर बैठ गए। उनकी बारी आने तक मैं टकटकी लगाए उन्हें देखती रही थी। इस बीच मैंने भी एक रचना पढ़ी थी। कौतुभ ने अपने वक्तव्य में मेरे रचना पाठ का जिक्र करते हुए कहा-“ मंच पर कैसे पढ़ा जाता है ये दीपशिखा से सीखा जाना चाहिए। सुनकर मेरी आँखों से आँसू ही टपक गए, आँसू पोंछते हुए मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी। इतनी महान शख्सियत से खुद की तारीफ सुन मैं गदगद हुई थी। लगा कि मजाक कर रहे होंगे, लेकिन कोई ऐसे मंच पर भला क्योंकर मज़ाक करेगा और वो भी तब जब कोई औपचारिक परिचय भी न हो। हृदय की धड़कने भी कुछ तेज अवशय ही हुई थी। मैं उनके हर शब्द को ध्यान से सुनती रही थी। कोई मुझसे पूछता तो कह देती- “पूरे कार्यक्रम को एक पलड़े में रखूँ और दूसरे में कौतुभ सर को, दूसरा पलड़ा ही भरी होगा।“

कार्यक्रम खत्म हुआ, कौतुभ मंच से उतरे, एक भीड़ उनके इर्दगिर्द जमा हो गयी, ऑटोग्राफ लेने में लगभग नए लोग थे तो कुछ पुराने से पुराने लेखक भी उन्हें किताबें भेंट कर रहे थे, मेरे कानो में शब्द पड़े- “सर, आप बड़े आलोचक हैं, कुछ मेरी किताब पर भी लिखिएयगा।“ कौतुभ सिर्फ मुस्कुरा रहे थे, उनका सेक्रेटरी किताबें उनके हाथ से पकड़ लेता और डिनर हॉल तक जाने के लिए रास्ता बनाने की कोशिश करता।

अगले पल सब डिनर हॉल में जमा थे, अब सबका ध्यान खाने पर था, कौतुभ के पास इक्का-दुक्का लोग अभी भी थे, मन में ख्याल आया- अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जाये, मेरे कदम उनकी तरफ चल दिये।

“सर, कुछ लाऊँ आपके लिए?”-बिना औपचारिक हुए मैंने कहा।

“ओह, दीपशिखा, तुम!”

उनका नाम से सम्बोधन मन के कोर छू गया।

“जी, क्या लेना पसंद करेंगे आप?”

“सेक्रेटरी है साथ में, यूँ तो उसे मेरी चॉइस का अंदाजा है लेकिन अगर आप चाहती ही हैं कुछ खिलाना , तो आपकी प्लेट काफी है,इजाजत दो तो इसमें भी खा ही सकते हैं।“

उनका सादगी में बोला वाक्य सुन मुझे महसूस हुआ कि कुछ वेव हैं जिनमें मैं उड़ी चली जाती हूँ, मैं कुछ सोच पाती या रिप्लाई कर पाती, उन्होंने सलाद के दो पीस प्लेट से उठा लिए। बड़े लोग दिल से भी बड़े होते होते हैं, विचारों से भी, यह कथन मुझे सच होता प्रतीत हुआ।

कौतुभ को देख मेरी जुबान तालु से चिपक गयी, कुछ पल मौन रहा, उन्होंने चुप्पी को तोड़ा- “दीपशिखा! तुम्हारी आवाज़ में एक खनक है, एक रवानगी है, कुछ अच्छी कहानियाँ रिसाइट कीजिये, किसी बड़े प्लेटफॉर्म के लिए।“

मैं मौन हो गयी थी। उस दिन घर आकर मैंने डायरी में लिखा था- “आज एक कार्यक्रम में एक शख्सियत से मिली, जिसके शब्दों में सम्मोहन था, जिसने मेरे खुद की ज़िंदगी के लिए बनाए मेरे ही नियमों को ध्वस्त कर दिया, जिसकी बातों से मन में एक अजीब सी बेचैनी है। वह शख्स बड़ा अजीब है, बोलता है तो उसका प्रवाह भावुक से भावुक और दृढ़ से दृढ़ इंसान को अपने ही रौ बहा ले जाए, जो चिराग की तरह दैदीप्यवान है।“ उस दिन घण्टों मैं कौतुभ के बारे में ही सोचती रही थी, मैंने डायरी के एक कोने में लिखा -“मेरे प्रथम पुरुष मित्र”।

संयोग से दो दिन बाद आर्ट गैलरी में मेरी पेंटिंग्स की एग्जीबिशन थी, मैं गेट पर ही कुछ मित्रों के आने का इंतज़ार करते हुए टहल रही थी, किसी स्टिक की ठक-ठक से मैं चौंक उठी- “कौतुभ!”

हाँ ये कौतुभ ही थे, कदम उनकी ओर चल पड़े, उन तक पहुँची भी नहीं थी कि उन्होंने ही आवाज लगाई – “दीपशिक्षा! तुम यहाँ, आर्ट गैलरी में?”

“जी, आज मेरी पेंटिंग्स की एग्जीबिशन है, आओ! मैं आपको दिखाती हूँ।“ हम दोनों हॉल की ओर बढ़ गए, मैंने कहा- “आपसे यहाँ दोबारा मुलाक़ात होगी, सोचा भी न था।

कौतुभ पेंटिंग्स को बड़े ध्यान से देख रहे थे, एक पेंटिंग पर जाकर उनकी निगाह थम गयी। कुछ देर ध्यानमग्न से देखते रहे, फिर बोले- “दीप! ये इस पेंटिंग में तुमने जो रंग इस्तेमाल किए हैं, ऐसे ही रंग  लिओनार्दो दा विंची भी इस्तेमाल किया करते थे, मोना लिसा या ला गियोकोंडा बनाते हुए उन्होने ऐसे ही रंगों को इस्तेमाल किया था।“ कहते हुए वे आगे बढ़ गए। एक और पेंटिंग पर आकर फिर रुके, बड़े ध्यान से निरीक्षण करते हुए बोले- “यह जो विचारमग्न स्त्री का चित्रण तुमने किया है, इसकी अत्यन्त हल्की मुस्कान इसे जीवंत करती है, इसकी तुलना पोट्रेट ऑफ मैडम रेकमेयर से की जा सकती है। वह भी संसार की सम्भवत:  प्रसिद्ध पेंटिंग्स में से एक  है, जिसे दृश्य -कला की पर्याय कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस पेंटिंग में जैक्स ने जूलियट को नोकलोसिस फैशन में बैठे हुए दिखाया था, जिसके छोटे बाल पेंटिंग में चार चाँद लगा रहे थे, इस पेंटिंग में भी वैसा ही आकर्षण है, वैसा ही सम्मोहन है। क्रिमज़न लहराते दुपट्टे और साथ में सिएना की जरी की किनारी ने इसे और बेहतरीन बना दिया।“

पेंटिंग बनाते हुए मेरा अपना नजरिया था लेकिन आज कौतुभ के नजरिए से देखा तो महसूस हुआ कि वाकई कोई पेंटिंग तब तक मौन ही रहती है जब तक कि कोई कौतुभ जैसा पारखी उससे रूबरू हो गुफ्तगू न करे। मुझे हैरानी भी हुई कि साहित्य का एक आलोचक पेंटिंग्स पर भी कितनी गहरी समझ रखता है। कौतुभ रंगो के समायोजन, सेड्स, कलर एफ़ेक्ट्स, सब तरह की गहरी समझ रखते हैं, ये मुझे धीरे-धीरे पता चल रहा था।

“रंगों में हमें सम्मोहित करने की अद्भुद क्षमता होती है, स्केच का अपना महत्व है, लेकिन रंग हर आकृति को शब्द देते हैं, रंगो के समायोजन से पेंटिंग्स जीवंत हो उठती है, एक उपन्यास, कहानी, कविता, नज़्म सब कुछ उसमें समाहित होता जाता है, मानो रंग खुद एक-एक हिस्से की व्याख्या कर उठते हों।“

मैं मंत्रमुग्ध हो कौतुभ को सुन रही थी, मुझे लगा मानो चित्रकार मैं नहीं, स्वयं वे हैं जो पेंटिंग की व्याख्या कर रहे हैं, मुझे अहसास हुआ, साहित्य, कला, इतिहास, प्रकृति, कोई विषय भी तो उनसे अछूता नहीं था।

 पेंटिंग्स देखने के बाद हम आर्ट गैलरी के दाहिने ओर बने कैफीटेरिया में आ गए। ग्रिल्ड संडविच और कॉफी के साथ बातचीत का एक और दौर शुरू हुआ।

“उस दिन और फिर आज, अच्छा लगा आपसे मिलकर।“ -मैंने औपचारिकतावश कहा।

“कार्यक्रमो की अच्छी बात होती है नए मित्रों से मिलना और खराब ये कि कम बात हो पाना।“

“जी, अच्छा ही देखें, संचार क्रांति चरम पर है, पूरी दुनिया एक पटल पर सिमट आई है, बातें तो कभी भी कहीं भी हो सकती हैं, उस कार्यक्रम में आप बहुत अच्छा बोले, मैं हर शब्द को बड़ी तन्मय हो सुन रही थी, गुण रही थी।“

“मेरे शहर के लोगो ने मुझे सुना, स्टेज के बाद मुझे सराहा। अच्छा अनुभव मिला।“

“मेरे पास शब्द नहीं आपकी प्रशंसा में, आपकी निष्पक्षता की तो कायम हूँ ही, लेकिन इधर सब लोगों को मीठे की लत लग गयी, भले ही मधुमेह क्यों न हुई हो, वैसे  मुझे नीम पसंद है।“

“वही समस्या है। इससे साहित्य और आलोचना विधा दोनो का नुकसान है। आपने उस दिन सुना- कैसे कीर्तिसुमन ने मेरी बात के उलट बात कहनी चाही, कि पुस्तकों पर चर्चा में आलोचनात्मक बात न हो, उनकी बातों से मैं रत्तीभर सहमत नहीं हो सकता। आलोचक किसी लेखक को कैफे में ले जाकर तो नहीं कहेगा कि किताब में इन-इन बातों पर विचार करना, सब कुछ अच्छा कहा जायेगा तो दुर्बल पक्ष से नवलेखक कैसे आत्मसात होंगे?”

“निंदक नियरे रखने का माद्दा ही न रह गया, आत्ममुग्धता का युग है।“

“कहानी कविता से अधिक मुश्किल विधा है। मैं अक्सर कहता हूँ- हर घटना कहानी नहीं हो सकती। बतौर आलोचक मैं आलोचना के दायित्व का निर्वहन भी करता हूँ। हमें दूसरो के कारण अपना निज नहीं छोड़ना चाहिए। मैं तो अपने मूल स्वभाव में रहता हूँ।“

कॉफी की गर्माहट और बातों में समय ने मुझे कुछ ज्यादा ही रोमांचित कर दिया था। कौतुभ एक पल मेरे चेहरे पर टकटकी लगाए हुए विषयांतर हुए- “हाँ, एक बात है एक फोटो साथ मे होनी चाहिये थी उस दिन यादगार के लिए।“

“कोई नहीं…, ये आखिरी बार तो न था, फिर आ जाइएगा कभी, दिल्ली दूर तो नहीं।“

“अभी गया ही कहाँ हूँ, यहीं तो हूँ- आपके शहर में, अपने शहर में।“- मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ, चेहरे पर झेंप को कौतुभ पढ़ पा रहे थे।

“जब-जब आप लोग बुलायेंगे। मैं चला आऊँगा, अपना मुल्क (शहर) पुकारता है तो कदम खुद-ब-खुद चल पड़ते हैं।“ -कौतुभ ने मेरी गलती को नजरंदाज करते हुए कहा। 

“जी, अवश्य, यूँ भी माटी की पुकार मूक होती है। झाँसी की माटी ने ख़ूब दिया है देश को… स्वतंत्रता सेनानी भी, साहित्यकार भी।“

“और बातों का मिठास भी…।“ -कौतुभ ने मेरा चेहरा निहारा।

“जी, वो तो आपके शब्दों में भरपूर हैं, मानो मिश्री घोलकर चलते हैं आप।“

“आप मेरी आत्मकथा ‘कुछ दर्द कुछ मिठास’ पढ़ें। आपको एक नया फ्लेवर मिलेगा और आप सहज ही जान पाएँगी- इस मिश्री घुले शब्दों के जादूगर की ज़िंदगी में कितनी कड़वाहट है?” -कौतुभ कुछ गम्भीर हो गए थे। उन्होने कॉफी का अंतिम घूंट ऐसे भरा मानो जीवन की सब कड़वाहट एक ही घूंट में नीचे ले जाना चाहते हों।

कौतुभ को जाना था, मैं उन्हें आर्ट गैलरी के बाहर तक छोडने साथ में जाना चाहती थी, उनका सेक्रेटरी हाथ में दो-तीन पैक्ड पेंटिंग्स लिए आ गया था। मैंने औपचारिक अभिवादन कर उन्हें विदा किया।

कौतुभ के व्यक्तित्व का आकर्षण ही था कि उन्हें हर सोशल साइटस पर खोजने लगी, उनके व्यक्तित्व के हर पहलू को जानने की आकांक्षा मन में पल रही थी, फेसबुक, इन्स्टा, सब जगह उन्हें खोजकर पढ़ने की, जानने की, समझने की कोशिश की। इतमीनान हुआ कि जिसे पहले पुरुष मित्र होने का दर्जा दिया, वह उसके बेहद उपयुक्त हैं। अभी इन्स्टा पर कौतुभ की तस्वीरें देख ही रही थी, मोबाइल पर उनका नाम डिस्प्ले हुआ, ये व्हाट्सप मैसेज था-“कल का वार्तालाप अपने आप में कुछ नए साहित्य की दस्तक था।“

“आपको बधाई, हमारा सौभाग्य है कि इतनी नामीगिरामी हस्ती यूँ हौसला बढ़ाए।“

“एक चित्रकार के पहले पुरूष मित्र होने का लाभ भी सौभाग्य ही है।“

“जान लेकर रहेंगे… आप भी और मेरी सहेलियाँ भी…।“

“नहीं, लम्बा चलना है, मीलों लम्बा…, जान ले ली तो हत्या का पाप और आरोप दोनों हमारे माथे का कलंक न बन जाएंगे?”

“…..”

“हर पल का आनन्द लेना ही जिंदगी का फ़लसफ़ा हो। कौन क्या करेगा उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए। इतनी छोटी सी जिंदगी में लोगों की ही परवाह कर हम अपनी जिंदगी जीना अक्सर भूल जाते हैं। कहाँ, क्या और कितना छूटा इसकी भी क्यों परवाह करना?

“कितना, कहाँ छूटे…?”- मैंने चुटकी ली।

“बात ज़िंदगी का सफ़र कम करने की है, अपना मन पॉकेट में रहता है तो कहीं छूट नहीं पाया। वरना तो बहुत कुछ छूट जाता।“- मालूम हुआ कि कौतुभ हास्य, विनोद में भी निपुण हैं। अब कौतुभ से बातों का सिलसिला आम हो गया। झाँसी से लौटने तक कुल जमा तीन मुलाकातें हुई। उनके बारे में जितना जान पाई उसे शब्दों में कहूँ तो कहना होगा- “आदि, अनादि से अनंत अंत तक तारीखों के भंवर में है…, चल रहे हैं लक्षित, अलक्षित… बस सफ़र में है।“

कौतुभ की छड़ी की ठकठक कभी भी कानों मे गूंज उठती। ऐसा ही उस शाम हुआ था, ये भी एक इत्तेफाक की रात थी, मैं खाना बनाने में व्यस्त थी, खीर बनाते हुए कौतुभ की याद आई, कौतुभ को खीर पसंद है, ऐसा उन्होने कई मर्तबा बताया। पिस्ता डालते हुए याद आया उन्हें पिस्ते के साथ केसर का स्वाद भी चाहिए होता है, मन से एक आवाज आई- “काश! कौतुभ यहाँ होते, उन्हें खीर खिलाती। ख्यालों में खोई थी कि डोरबेल बजी, दरवाजा खोलने गयी तो देखा- कौतुभ ही थे, एकदम वही, मेरे प्रथम पुरुष मित्र, मेरे सखा- कौतुभ। आश्चर्य इतना कि उन्हें अंदर आने तक को न कह पाई, वे ही बोले- “दीप! दरवाजे से हटो तो अंदर आऊँ।“

“मैं दरवाजे से साइड हुई तो वह छड़ी की ठकठक के साथ अंदर कदम रखते हुए बोले-“वाह! केसर की खुशबू! लगता है आज केसर, पिस्ता की खीर बनी है।“ -मैं सोचती रही-“प्रकृति आखिर कैसे-कैसे संयोग करती है, इधर मन से उन्हें याद किया और वो इधर हाजिर?” 

कौतुभ को मैंने मीठे के साथ पानी दिया और उनके नाश्ते की प्लेट सजाने किचेन में चली गयी। नाश्ता करते हुए वे शांत थे, मानों किसी सरोवर का जल हों, जिसमें हवा का झोंका ही हलचल कर सकता है। उस पल मेरे पास भी मानो शब्द शब्द न रहे। उन्हें नाश्ता करते देखती रही थी एकटक। कई बार बस एक मौन… एक चुप्पी बहुत कुछ कहने को पर्याप्त होती है। मौन अच्छा है… जीवन के उद्देश्य की ओर ले जाने वाला…।

कौतुभ ने कहा- “दीप! आज ही ट्रेन से वापिस दिल्ली जाना है, चाहता तो था कुछ दिन यहाँ रुकना लेकिन कल एक छोटी सी सर्जरी है, पहले से डॉक्टर से एप्पोइंटमेंट फिक्स है।“

सर्जरी के नाम से थोड़ी घबराहट हुई लेकिन कौतुभ ने बताया- “एक माइनर सा ऑपरेशन है, ये चश्मा बहुत तंग करता था, अब इससे हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा। जाते-जाते वे मेरे हाथ में अपनी आत्मकथा “कुछ दर्द कुछ मिठास” की प्रति दे गए। जाते हुए बोले, जब कभी इस दोस्त की याद आए- इसके पन्ने खोलकर पढ़ लिया करना। लगेगा- मुझसे ही बतिया रही हो।

कौतुभ चले गए, जाते हुए भी उनकी छड़ी की आवाज मेरे कानों में देर तक गूँजती रही थी। मन था कि उनसे कहूँ- “कर दिए हैं, मोह के सब दरवाजे बंद, दिल ने, दु:खों के सिवा देते भी क्या थे!” अगले पल लगा कि अपने दुखों से नहीं बल्कि दोस्ती को सुखों से सींचना होता है।

जाने क्यों कौतुभ के जाने के बाद मेरा मन अजीब से अवसाद में घिरने लगा, रात के करीब ग्यारह बजने को थे। मैं सुबह जल्दी उठने के चलते रोज ही जल्दी सो जाती, आज आँखों से नींद कोसो दूर थी, आँखें बरबस ही गीलेपन का अहसास दे रही थी, मुझे लगा, ज्यादा मोबाइल के प्रयोग से भी ऐसा होता है। मोबाइल को साइलेंट मोड पर करके सोने की कोशिश करने लगी। जाने कब आँख लगी। सुबह उठी तो हर रोज की तरह मोबाइल हाथ में उठाया, देखा- कौतुभ की कई मिस्सड काल्स थी, इधर से कॉल की तो मोबाइल स्विच ऑफ था। मुझे लगा शायद बैटरी खत्म हुई हो। व्हाट्स्सप खोला तो कौतुभ का मैसेज था। पढ़ने से अंदाजा हुआ, ये मैसेज कौतुभ ने नहीं भेजा, किसी और ने लिखा था। पढ़कर मेरी आँखों से आँसू बह निकले।

अस्त-व्यस्त हालत में मैं बिना बालों को कंघा किए, सड़क पर आई। छोटे शहरों में सुबह के वक़्त ऑटो भी कम ही मिलते हैं, जैसे-तैसे एक रिक्शा मिला, मैंने रिक्शे वाले को कहा-“जिला अस्पताल।“ 

रिक्शा जिला अस्पताल पहुँचा तो मैं रिश्ता से उतर पैसे चुकता कर पूछताछ काउंटर पहुँची। कौतुभ को ऑपरेशन थियेटर ले जाया जा चुका था। यहाँ आकर पता चला कि मोबाइल से स्थानीय नंबर देखकर अस्पताल से ही मुझे कॉल और मैसेज किए गए थे। सड़क एक्सिडेंट में कौतुभ को काफी चोट आई थी।

ऑपरेशन थियेटर के बाहर बैठ इंतजार के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता था। चित्त एकदम अशांत… मानसिक रूप से खुद को नितंत्रित करना भी जरूरी था, उनकी टाइमलाइन पर उन्हें पढ़ने लगी। उनके फोटोज देखते हुए एक फोटो पर निगाह टिक गयी- ये एक दाढ़ी वाली  फोटो थी, कौतुभ के बाल बेतरतीब बढ़ें और बिखरे थे, उस पर सुंदर औरतों के कमेंट्स भी थे, कौतुभ उसमें बहुत ही मासूम और प्यारे लग रहे हैं। इस प्यारी सी फोटो के साथ दिये कैप्शन पर निगाह गयी- प्रेम की गलियां थी / बहुत संकरी / रास्ता भी मगर था कठिन / यात्री तो न थका / सहयात्री मगर हो लिया वापिस  / बीच रास्ते…

एक एक फोटो के साथ कैप्शन था- रिश्ते यहाँ निभाता कौन है? मेरी अंगुलियाँ लगातार स्क्रीन को स्क्रोल करने लगी। एक फोटो में कौतुभ नेवी ब्लू कलर के कोट में खड़े थे, छड़ी हाथ में लिए, ये पहली फोटो थी, जिसमें उनकी पूरी तस्वीर थी, कैप्शन था- वह किसी विकलांग से प्रेम तो कर सकती हैं लेकिन पति रूप में वह प्रेमी उसे स्वीकार नहीं। पागल ही हैं वे जो कहते हैं- शरीर से विकलांग होना कोई अपराध तो नहीं। पढ़कर मेरा सिर घूम गया। कितना दर्द छुपाकर दुनिया के दर्द मिटाता फिरता है मेरा प्यारा दोस्त, आज वह ऑपरेशन थियेटर में टेबल पर ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ रहा है। मुझे उनके साथ हुई बातें याद आ रही थी, मैंने उनसे निजी ज़िंदगी के बारें में पूछा था, उन्होने -लंबी दास्तान है ये… फिर कभी सुनाऊँगा… फुर्सत के पलों में, कहकर टाल दिया था। उनका कहना था- जीवन वह जो निर्बाध बहता है… कह लें, किश्तों में ही  सही लेकिन बहता निर्बाध ही है।

कौतुभ की टाइमलाइन पर एक नोट पर निगाहें टिक गई, तारीख वही लिखी थी, जिस दिन पहली बार वे झाँसी आए थे- आज एक कार्यक्रम में बोलना था, वहाँ लंच के समय किसी ने मुझे कहा था कि कैसे विश्व गुरु हैं हम, जहाँ विकलांगो के लिये कोई सुविधा नहीं। दिल मे जगह नहीं, मैंने तब इस विषय पर बात करना उचित नहीं समझा, लेकिन ये सत्य है कि ये जीवन भी एक भंवर ही है जहाँ सब सपने धूमिल होने लगते हैं, इस भंवर से बाहर आना ही होगा… हरेक विकलांग को, खुद को साबित करना होगा, जैसे मैंने किया है, अब मेरे जीवन में कोई भवंर नहीं।, बस अलग-अलग मंजिलें हैं और बढ़ते जाना ही मकसद है। ऐसे जीवन को मैं नीरस समझता हूँ संघर्ष के अभाव में। मुझे लगा कौतुभ की बातों में एक मैगनेट है। लेकिन अध्रुवीय मग्नेटिज़्म। मानों वे एक सर्कुलर मैगनेट हों, महान लेखक जो ठहरे, कोई सामान्य व्यक्ति कहाँ ऐसी गूढ बातें लिख सकता है? 

कौतुभ के साथ बैठकर की गयी बातें एक-एक कर याद आती रही, उन्होने खूब कहानियाँ, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, रेखाचित्र लिखे, उन्हें लगातर बुलंदियों पर जाते देख मैंने एक बार कहा था- कितने कीर्तिमान स्थापित करेंगे…? अगली पीढ़ी के लिए भी कुछ रहने दीजिए।“

“दीप! जानती हो, जो आज लिखा, कल उसे पीढ़ियाँ पढ़ेंगी, पीढ़ियाँ उससे सीखेंगी। वह सब ही तो पीढ़ियों के लिए सहेजा जाएगा।“

“कौतुभ! पहली बार किसी से तर्क में हार स्वीकार करती हूँ।“

“मित्रता हार-जीत से ऊपर की अवधारणा है। फिर वो जीत भी तो जीत नहीं जिसमें किसी मित्र की हार छुपी हो। ऐसी जीत से तो मेरा हारना बेहतर।“ और ये कहकर उन्होने  फिर से मेरा दिल जीत लिया था।

क्या-क्या नहीं याद आया उस पल- एक समय कौतुभ भी झाँसी रहकर गुजर-बसर कर रहे थे, साहित्य का लगाव उन्हें झाँसी से दिल्ली ले गया। उनका कहना था- दिल्ली में एक फायदा है, यहाँ बड़े रचनाकारों से मिलना आसान है, अब दिल्ली साहित्य का केंद्र है, जो कभी इलाहबाद था, वह सब अब दिल्ली है, कह सकते हैं- दिल्ली अब इलाहबाद हुआ जाता है। कौतुभ ने एक बार बोला था- “दिल्ली के लेखक बहुत सहज हैं, अब देखो न ये कौतुभ भी तो आसानी से उपलब्ध है।“

कितना कुछ सीखा था मैंने कौतुभ से, वे न होते, उनकी मुलाकातें न होती तो पेंटिंग्स के साथ-साथ मेरा साहित्य में पदार्पण न होता। मेरी कितनी ही टूटी-फूटी रचनाएँ उन्होने सुधारी, जिन्हें बाद में सराहना और प्रतिष्ठा दोनों मिली। मैं जब कभी आभार व्यक्त करती तो वे कहते-“शब्द वहीं हैं, बस कीमियागिरी की है थोड़ी सी, शब्दानुक्रम ही तो बदला है। मुझे लगता- शब्दानुक्रम ही तो कविता है, तब मेरे पास उनकी तारीफ में कहने को कुछ नहीं बचता, मानो सब शब्द बौने हो जाते।  उनके बारें में जब भी सोचती शब्द कुछ इस तरह बनते-

शांत, प्रशांत पोखर में

फेंक पत्थर

चुप हो देखना हलचल

हो तुम्हारे लिए

बालसुलभ क्रीड़ा कोई, 

शांति भंग हुई है पोखर की

दर्ज होगा यह अपराध भी

अपराध की श्रेणी में

शांति को पढ़िए और शीतल रहिए…। कौतुभ तब इतना भर कहते- “मेरी सखी की कलम में कहीं गहरे शब्द क्रीडारत हैं।“

मैं खुद के जीवन और कौतुभ के साथ अंतरंगता को देखती तो कई बार सिहर जाती, दिमाग कहता -“एक ही मन है मेरे  पास!” कौतुभ से जो रिश्ता बन रहा था, उसे किसी नाम, किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता था। वह बस मेरे लिए कौतुभ है, मेरा पहला पुरुष मित्र और शायद अंतिम भी।

मेरी नजरों के सामने एक-एक दृश्य चलचित्र की तरह आ-जा रहा है।

ऑपरेशन थियेटर के सामने बैठे-बैठे मुझसे अब इंतजार करना मुश्किल होने लगा। दरवाजा खुला तो डॉ. बाहर निकले, मैंने पूछा-” क्या हुआ कौतुभ को?”

“देखिये, हमने उनका ऑपरेशन कर दिया है सिर में चोट थी, होश में आने पर ही असल स्थिति पता चलेगी।”-कहकर डॉ अपने केबिन की ओर बढ़ गए।

शुक्र था कि कौतुभ जल्दी भी स्वस्थ हो गए थे, उनके स्वस्थ होने तक उन्हें अपने यहाँ से जाने ही कब दिया मैंने, वे कहते-“ दीप! बोझ बन गया हूँ मैं।“

मैं इतना भर कहती,”भगवान ने मुझे आपके साथ रहने का मौका दिया है, ताकि मैं सीख सकूँ, यह सीख सकूँ कि संघर्ष में जीने वाले कैसे हर मुश्किल को आसान बना लेते हैं।

कौतुभ को उस हादसे से निकलने में जितना वक़्त लगा उनकी तस्वीर बनाने में मुझे भी उतना ही वक़्त लगा। कौतुभ को अस्पताल से अपने घर तक लौटा लाना भी तो कम मुश्किल नहीं था, वह विवाह की अनुमति ही नहीं दे रहे थे, कहते-“दीप! तुम्हें मेरी छड़ी की ठकठक क्योंकर पसंद है, जबकि लोग तो इसे भी जीवन का एक कलंक ही समझते हैं।“

अस्सी वर्ष की इस उम्र तक के सफर में कितने बसंत आए, कितने पतझड़ कुछ अंदाज भी नहीं लगा सकती हूँ।

आज फिर साहित्यिक मंच है, साहित्य के बड़े-बड़े दिग्गजों का जमावड़ा है, बस कुछ नहीं है तो ये कि आज यहाँ कौतुभ नहीं है, उनकी जगह पर उनकी तस्वीर है। हवा के झोंकों से उड़ते कौतुभ के बेतरतीब बिखरे घुँघराले बाल उसकी तस्वीर में देखकर लगता है मानों तस्वीर बोल उठेगी, और वह कहेंगे- “हर कहानी एक अनुभव होती है, लेखक पूरे समाज का विश्लेषण करता है, नोट्स लेता है, कुछ मिटाता है, कुछ ऐड करता है, तब जाकर एक रचना जन्म लेती है, पाठक लेखक के टूटने-जुड़ने, गिरने-उठने के उपक्रम से कभी बावस्ता नहीं हो पाता।“-

उद्घोषिका मेरा नाम पुकार रही है, मेरी आँखें नम हैं उतनी ही नम जितनी ऑपरेशन थियेटर के सामने थी। माइक पर मैंने इतना ही कहा-“कौतुभ के जीवन पर सबसे शानदार कृति मेरे कौतुभ, मेरे प्रथम पुरुष मित्र। मेरे जीवन की अनूठी कृति। कौतुभ जितने शानदार लेखक थे, आलोचक थे, उससे कहीं शानदार एक पति, एक पिता थे। काश आज कौतुभ इस नायाब कृति का विमोचन करने के लिए यहाँ खुद उपस्थित होते, लेकिन हाँ, कौतुभ हम सबके बीच न होकर भी यहाँ मौजूद हैं।”

मेरी नजरों के सामने एक-एक दृश्य चलचित्र की तरह आ-जा रहा है। मैंने कहा-“आज मेरा सपना पूरा हुआ, कौतुभ भी तो यही चाहते थे कि उनका प्रेम इतिहास में दर्ज हो, वे हमेशा कहते थे-दीप, इस वैवाहिक जीवन में तुमने मुझे दिया ही दिया है, लिया कुछ भी नहीं, तब मैं कहती- कौतुभ, आप मेरे बच्चों के पिता ही नहीं, मेरे गुरु भी हैं, लिखने का हुनर मैंने आपसे ही सीखा है।“- कहते हुए मेरी निगाहें कौतुभ की तस्वीर पर टिक गयी हैं। मानो वे कह रहे हों-दीप! बधाई हो, इस प्रेम-उपन्यास के लिए।“ अश्रुधारा लुढ़क कर गालों को गीला किए है, उनको रोकने का मन नहीं है। 

सन्दीप तोमर

D2/1 जीवन पार्क
उत्तम नगर नई दिल्ली 110059

gangdhari.sandy@gmail.com

सत्यजीत राय के वाजिद अली शाह

 “कलाकार कायर नहीं हो सकता”

सत्यजीत राय के वाजिद अली शाह का मानना है कि “सिर्फ मौसिकी और शायरी ही मर्द की आँखों में आँसू ला सकते है”आँखों में आँसू होने का अर्थ है ह्रदय में करुणा,प्रेम संवेदना और वे तमाम कोमल भाव जो मूलत: स्त्रियोचित गुण माने जाते हैं । एक बादशाह जो पुरुष ही होगा जिसे शासन भी करना है उसे कठोर होना ही होगा, लेकिन एक कोमल ह्रदय, कलाकार वाजिद अली शासक कैसे हो सकता था उनके किरदार के विषय में अंग्रेज़ रेजिडेंट जेम्स ओउट्राम का एक संवाद में आया है कि वो विरोधाभासों का बण्डल है’निश्चय ही चरित्र के उन विरोधी रंगों को चित्रित करना राय के लिए आसान नहीं रहा होगा। चुनौती तो यह भी थी कि फिल्म शतरंज के खिलाड़ी जिस कहानी का रूपान्तरण है उसमें वाजिद अली शाह किरदार के तौर पर आये ही नहीं,फिर क्या कारण रहा होगा कि फिल्म में राय ने न केवल वाजिद अली का किरदार गढ़ा, बल्क़ि उसे पूरा मौका दिया कि वह केंद्र में आ गया है जबकि कहानी में दो शतरंज के खिलाड़ी मुख्य पात्र है । जब कहानी और फ़िल्म का अध्ययन करते हैं तो दोनों की मूल संवेदना का अंतर समझ आता है और राय की दृष्टि भी समझ आ सकती है, वास्तव में यह फ़िल्म कहानी का विस्तार है, जो किरदार की माँग करता है, जिसके बिंदु मेरी समझ में सत्यजीत राय को कहानी के संवादों से मिले। कहानी में वाजिद अली के काल का विलासितापूर्ण परिवेश आया है जिसके लिए सीधे-सीधे वाजिद अली को जिम्मेदार ठहराया “वाजिद अली शाह का समय था लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था छोटे-बड़े अमीर-गरीब…सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही थी…सभी की आँखों में विलासिता का मद छाया हुआ था” और अंत में एक कायर बादशाह के राजनीतिक अध:पतन की बात है  आज तक किसी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शांति से,इस तरह खून बहाये बिना, न हुई होगी यह वह अहिंसा न थी जिस पर देवगन प्रसन्न होते हैं यह कायरपन था, जिस पर बड़े कायर आँसू बहाते हैं’ जिसे प्रेमचंद विलासिता कह रहे है,अंग्रेज़ रेजिडेंट जेम्स ओउट्राम ने बादशाह के कला-प्रेम पर विलासिता का रंग देकर उसे अयोग्य साबित कर पदच्युत करने के लिए नई संधि बनाई । कहानी के प्रसंग में विलासिता और कायरता इन दोनों विशेषणों को सत्यजीत राय की फ़िल्म चुनौती देती है और वाजिद अली के किरदार की जो छवि निर्मित होती है उससे आपको सहानुभूति होती है। पितृसत्ता में आँसू बहाना स्त्रियों का गुण है जबकि पुरुषों के लिए वही कायरता है,सत्यजीत राय वाजिद अली शाह के लोक प्रचलित छवि से विपरीत उनका वास्तविक किरदार प्रस्तुत करना चाहते हैं और उन्होंने किया भी ।

किरदार कथा को विश्वसनीय बनाते हैं, किरदार का विश्वसनीय होना भी ज़रूरी है,तभी वह यादगार बन पायेगा, ऐतिहासिक किरदार का चरित्रांकन और भी सावधानीपूर्वक करना होता है फिर वाजिद अली के ऐतिहासिक और विवादित व्यक्तित्व को चित्रित करना एक श्रमसाध्य कार्य था जिसमें अतिरिक्त छूट नहीं ली जा सकती थी, वैसे भी बॉलीवुड पर ऐतिहासिक चरित्रों के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगता रहता है जैसे अकबर-जोधा अथवा सलीम की अनारकली,पद्मावत  अत: सत्यजीत राय ने इस किरदार पर गहन शोध किये। परिवेश किरदार को रूपाकार प्रदान करता है जिसके अनुकूल वह क्रिया-प्रतिक्रिया करता है सिनेमा में किरदार लिखने बाद अभिनयेता उसमे जान फूँकता है किरदार की संवाद अदायगी,उठने बैठने के अंदाज शारीरिक चेष्टाओं में भी नजर आता है। आवाज में होने वाले उतार-चढ़ाव उसकी मनोदशा मन:स्थिति को प्रकट करते हैं।कहानी बेहतरीन हो लेकिन किरदार दमदार ना हो तो ना कहानी याद रहती है ना किरदार। इसलिए कई दफा नायक नायिका भुला दिए जाते हैं लेकिन सहायक किरदार याद रह जाते है भिनेता को अपना मूल चोला उतार फेंक किरदार में घुसना होता है तभी वह उसके साथ न्याय कर पाता है।

‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर सत्यजीत राय के इस वक्तव्य को जानकार हम वाजिद अली के किरदार के गढ़ने की वजह को समझ सकते हैं- “आसान लक्ष्य मुझे बहुत ज़्यादा पसंद नहीं आते। निंदा तो होती ही है, लेकिन उस तक पहुँचने की प्रक्रिया अलग होती है। मैं दो नकारात्मक शक्तियों, सामंतवाद और उपनिवेशवाद को चित्रित कर रहा था। आपको वाजिद और डलहौजी दोनों की निंदा करनी थी। यही चुनौती थी। मैं दोनों पक्षों की कुछ सकारात्मक बातों को सामने लाकर, उनके प्रतिनिधियों में कुछ मानवीय गुण भरकर इस निंदा को रोचक बनाना चाहता था। ये विशेषताएं काल्पनिक नहीं हैं बल्कि ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित हैं। मुझे पता था कि इससे रवैया में कुछ दुविधा पैदा हो सकती है, लेकिन मैंने शतरंज को ऐसी कहानी के रूप में नहीं देखा जिसमें कोई खुले तौर पर पक्ष ले और अपना पक्ष रखे। मैंने इसे दो संस्कृतियों के टकराव का एक चिंतनशील, यद्यपि निर्मम दृष्टिकोण माना – एक अप्रभावी और प्रभावहीन तथा दूसरी सशक्त और घातक। मैंने स्पेक्ट्रम के इन दो चरम सीमाओं के बीच स्थित कई अर्ध-छायाओं को भी ध्यान में रखा…आपको इस फिल्म को उसकी पंक्तियों के बीच पढ़ना होगा।”– सत्यजीत रे, 1978  https://www.arthousecinema.in/2021/07/shatranj-ke-khilari-1977/ यानी वाजिद अली के किरदार पर जो कथाएँ जनता के बीच लोकप्रिय रही उन्हें ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर सकारात्मक व मानवीय गुणों के साथ पिरोना था, जिसे वे दो संस्कृतियों के टकराव के आईने में देख रहे थे। 

किरदार रचने के बाद उन्हें उसे निभाने के लिए कलाकार खोजना था, खोज अमज़द खान पर आकर खत्म हुई। यह जानना दिलचस्प है कि ‘शोले’ हिट हो चुकी थी और धन्नो सहित उसका हर छोटा-बड़ा किरदार आज भी ज़हन में चस्पां है फिर गब्बरसिंह तो अमर किरदार हो चुका था, उसकी भयंकर आवाज़, वीभत्स चेहरा बात-बात पर थूकना, क्रोध की चरम सीमा, कमर में लटकी बन्दूक की गोलियों के बेल्ट। बॉलीवुड में कलाकारों को स्टीरियोटाइप करने का चलन हमेशा से रहा है फिर गब्बरसिंह की क्रूरता को धो-पोछकर नए सिरे से तैयार करना आसान नहीं था कहते हैं कि सत्यजीत राय के पास तीसरी आँख है उन्होंने अमज़द खान को गब्बरसिंह से बिलकुल विपरीत वाजिद अली शाह के किरदार के रूप में देख लिया था  वाजिद अली शाह जो राजगद्दी पर बैठे हुए, फरियादी की गुहार सुनकर द्रवित हो कविता रच सकता है,   जो अपनी रियाया पर किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं देख पाता,इसलिए अपने अंतिम समय में चुपचाप गद्दी छोड़ देता है लेकिन खून खराब नहीं होने देता।शूटिंग के समय ही जब अमज़द खान का कार एक्सीडेंट हुआ तो राय ने कहा कि यदि अमज़द नहीं होंगे तो फ़िल्म भी नहीं बनेगी, यह वाजिद अली के प्रति के किरदार के लिए प्रतिबद्धता ही थी जिसे अमज़द खान ने भी शिद्धत से निभाया।   शतरंज के खिलाड़ी कहानी अगर सज्जाद अली और मिर्जा के किरदारों की वजह से याद आती है, और हमें नवाबों की अकर्मण्यता पर क्रोध आता है तो फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी फिल्म वाजिद अली शाह की विलक्षण भूमिका की वजह से महत्वपूर्ण हो जाती है जब वाजिद अली शाह का किरदार के प्रति हमारे मन में सहानुभूति उभर कर आती है जो सिर्फ सत्यजीत राय के द्वारा ही संभव हो सकता था।

फ़िल्म का आरंभ में वे प्रस्तावना देते हैं जहाँ वे संकेत करते हैं कि यहाँ पर कोई जंग नहीं लड़ी जा रही बल्कि खेल खेला जा रहा है ,अंग्रेजों के द्वारा और मोहरा है वाजिद अली शाह। खेल यानी फ़िल्म शुरू होती है शंख-नगाड़ों से नहीं अपितु बल्कि ढोलक की थाप और शहनाई के साथ जो वाजिद के कला प्रेमी होने की ओर संकेत करता है शतरंज के खेल में बादशाह गया तो खेल खत्म! प्रस्तावना देने का अर्थ ही यही है कि फिल्म के कांसेप्ट को दर्शकों तक पहुँचाया जाए, तत्कालीन उपनिवेशिक राजनीतिक परिदृश्य को दिखाकर वे स्पष्ट करते हैं कि इनमें ही वाजिद अली का किरदार विकसित हुआ है। संवाद लेखक जावेद सिद्धिकी ने साक्षात्कार में बताया कि ‘राय ने एक गुरु मन्त्र दिया कि संवाद वहीं लिखना जहाँ पिक्चर बोलना बंद कर दे अगर तस्वीर खुद बता रही है कि वहाँ क्या हो रहा है तो वहाँ अलफ़ाज़ की कोई ज़रुरत नहीं’। अमिताभ के वोइस ओवर ने प्रस्तावना को दिलचस्प बनाया और किरदार की रूपरेखा को रेखांकित करता है- ‘इस शौकीन रिआया के सरताज हैं ‘वाजिद अली शाह’ जिन्हें राजकाज के अलावा हर तरह का शौक है।’ जिसे प्रेमचंद ने विलासिता कहा था यहाँ उसके लिए शौक़ीन शब्द का इस्तेमाल हुआ है, वे वाजिद अली शाह का बड़ा ही कलात्मक ढंग से फिल्मांकन करते हैं जहाँ संवाद नहीं है।  सबसे पहले वे कृष्ण बने गोपियों के साथ नृत्य कर रहे हैं, गीत के बोल हैं- ” जाने-आलम दरस मुबारक, जुग जुग जीवो सदा विराजो”  उनका यह स्वरूप हिन्दू मुस्लिम दोनों जनता को मोहित करता है वाजिद के राज में साझी विरासत को दर्शाता है, दूसरे दृश्य में मोहर्रम पर वाजिद स्वयं नगाड़े बजा रहे हैं रजा प्रजा में कोई भेद नहीं स्पष्ट है ‘यथा राजा तथा प्रजा’। तीसरे दृश्य में अपनी रानियों के साथ शाही और रसिक अंदाज में बैठे हैं रानियाँ उन्हें पंखा झल रहीं हैं सभी के प्रति प्रेम का समभाव, पृष्ठभूमि में प्रेम का प्रतीक बांसुरी बज रही है । अंत में उनके सिंहासन पर कैमरा जिसका डिजाइन भी केक की तरह है बीचों बीच वाजिद अली चेरी की तरह बैठे है केक जिसके पीस काटकर अंग्रेज़ हड़प रहे हैं अब चेरी बाकी है, यह भी किरदार को चित्रित करने का खूबसूरत अंदाज़ है । सूत्रधार व्यंग्यात्मक ढंग से कहतें हैं – “कभी-कभी वाजिद अली शाह दरबार भी सजा लिया करते हैं …उन्हें हुकूमत करना पसंद ना हो लेकिन अपना ताज बेहद पसंद था, 5 साल पहले शौक-शौक में इस ताज को बड़े शान से लंदन की नुमाइश में भेजा था, तब एक अंग्रेज ने जानते हैं क्या फिकरा कसा था, अवध के सरताज का सिर  चेरी की तरह हड़प लिया जाए?  यह अल्फाज हिंदुस्तान के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के थे जो पिछले 10 साल में जाने कितनी ‘चेरिया’ साफ कर चुका है पंजाब, बर्मा, नागपुर, सतारा, झांसी। और अब एक ही चेरी बाकी है। ‘अवध’! ‘काश तुम जान पाते वाजिद अली शाह अंग्रेज रेजिडेंस जनरल उट्रम तुम्हारे लिए क्या मंसूबे बना रहा है जो इस समय वाजिद अली शाह की दिनचर्या पढ़ रहा है’ केक जिस पर अवध लिखा है जिसे गाहे-बगाहे अंग्रेज हड़पते चले जा रहे हैं निगलते चले जा रहे हैं यानी ऐसा बचा-कुचा अवध वाजिद अली शाह को मिला था जिसे किसी भी बादशाह के लिए  बचाए रखना कभी भी आसान नहीं था वाजिद अली इससे बखूबी जानता था लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनके शासन काल में विविध कलाओं और हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतिओं का आदान प्रदान बेहतरीन ढंग से हुआ था। फ़िल्म में भाषा के साझे प्रयोग पर सत्यजीत राय कहते हैं- हिन्दी  जिसे हिन्दुस्तान का एक बहुत बड़ा हिस्सा जनता समझता है वास्तव में ‘ स्ट्रिक्टली  हिंदी’ नहीं इट्स उर्दू , क्लासिकल फॉर्म ऑफ़ हिन्दी ’ ये इसलिए ज़रूरी था क्योंकि यही भाषा उस समयकाल में फल-फूल रही थी एक अन्य स्थल वे बताते है कि “जबान कोई हो शब्दों की अपनी लय होती है यह लय सही होनी चाहिए अगर एक सुर गलत लग जाए तो तो पूरा सुर बेमानी हो जाता है। ”

फ़िल्म के एक दृश्य में अंग्रेजों की कूटनीति शतरंज के खेल में आये बदलावों के माध्यम से बताई गई  है, मुंशी साहब कह रहे हैं कि “बादशाहों का खेल है खेलों का बादशाह…दोनों बेगम आमने-सामने रहती है, प्यादा पहली चाल में एक साथ दो घर चल सकता है और प्यादा अगर दूसरे के खाने में पहुँच जाए तो वह मल्लिका बन सकता है, फ़ायदा? बाजी झटपट खत्म हो जाती है”। यह संकेत है कि विक्टोरिया की कंपनी प्यादे अब अवध पर कब्ज़ा करने वाली है, जिसका सीधा अर्थ है कि यहाँ बादशाह की कोई हैसियत नहीं बल्क़ि वजीर जो रानी है विक्टोरिया रानी का प्रतीक बन चुकी है अब बादशाह को उसके प्यादे भी मात दे सकते है।और फिर जनरल उट्रम का संदेश आता है- “पिछले 10 साल में सुल्तान-ए-आलम ने मुल्क-ए-इंतजाम को सुधारने की कोई कोशिश नहीं की जिसकी वजह से आवाम में बदहाली और बेचैनी फैली हुई है इसलिए हमारी सरकार ने फैसला किया है कि तमाम मामलात फैसले को अपने हाथ में ले लेगी”। लेकिन यह उस संधि के विरुद्ध था जो सिराज़ुद्धौला ने की थी इसलिए वाजिद अली कहता है – सुल्तान- ए- आलम बादशाह-ए-अवध मालिक-ए- मैरूस-ए-अवध पर कंपनी बहादुर के कब्जे की अफवाह उड़ाने वाले को अपराध घोषित किया जाएगा सजा दी जाएगी’ यह संदेश भी प्रकारांतर से अंग्रेजो के लिए था ऐसा मुझे लगा“क्या बात है और प्रधानमंत्री मदार-रु-दौला रोने लगा संभालो अपने आप को रेसिडेंट साहब ने अपनी कोई गज़ल सुना दी क्या?” फिर पर अगले ही पल गंभीर होते हुए व्यंग्य भी करता ‘सिर्फ मौसिकी और शायरी ही मर्द की आँखों में आँसू ला सकता है’ यह संवाद वाजिद अली शाह के किरदार का केन्द्रीय बिंदु है जिसके बाद वाजिद अली का एक लम्बा मोनोलॉग जो उसके किरदार की मौलिक छवि को उभारता है- ‘आप सब ने हमें धोखा दिया है, हमने अपने रिश्तेदारों से ज्यादा पर भरोसा किया, हुकूमत की तमाम जिम्मेदारियाँ आपको दी और आपने क्या किया सिवाय अपनी जेब भरने के क्या किया! क्या किया आपने! कुछ नहीं किया…’ यहाँ वाजिद अली के सहज विश्वास करनेवाले किर्दासर तो है ही साथ ही आगे का संवाद यह भी सप्शत करता है कि वो अपनी कमियों को जानते थे गलती तो हमारी ही है अगर तख्त पर बैठने से इंकार कर देते तो बेहतर होता, पृष्ठभूमि  पीछे बांसुरी बज रही है लेकिन लड़कपन था हीरे जवाहरात की चमकदमक शाही शानो शौकत यह सब हमारा मन लुभा गए’। चमक-दमक के पीछे की स्याह तस्वीर को एक किशोर लड़का क्या ही समझ पाता, जो समझौते पूर्व में राजाओं ने किये उसकी भरपाई आने वाली पीढ़ियों को चुकानी होती है जबकि अंग्रेज़ कई रियासते हड़प चुके थे अवध-केक का अंतिम पीस बचा था । प्रधानमंत्री मदार-रु-दौला का इस षड्यंत्र में हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता था जिसे वजिस अली के इस संवाद से जान सकते हैं  ‘सलीमन साहब…सच कहते थे आपके बारे में भी, जो उन्होंने कहा था वह गलत नहीं था। मदार-रु-दौला! यह कागज का टुकड़ा आपने रेसिडेंस साहब के मुँह पर क्यों ना मार दिया!!! यह आप हमसे पूछ रहे हैं, अपने उनसे क्यों न पूछा कि उन्हें वह एहतराम तोड़ने का क्या हक था जिसमें साफ-साफ लिखा था कि कंपनी मुल्क की हिमाकत को अपने हाथ में ले सकती है लेकिन हमारी मसनद हमसे हरगिज़ नहीं छीन सकती’ वाजिद अली का गुस्सा और गुरुर झलकता है यहाँ। एक कला-प्रेमी राजगद्दी पर बैठकर किस रूप में शासन करता है सेनाओं का निर्माण करता है लेकिन अंग्रेजों की चाल के आगे विवश हो जाता है अगला संवाद वाजिद अली की बेबसी को दर्शाता है-  ‘जब हम तख्तनशीं हुए हमने एक हकीकी बादशाह बनने की कोशिश और एक हद तक बादशाहत निभा भी गए…     आपको हमारी बहुत फौज याद है दीवाने बहादुर ? रोज किस तरह मश्के हुआ करते थे, कितने दिलकश नाम रखे थे हमने अपनी पलटन के बांका, तिरछा, अख्तरी, लादरी, घनघोर और हमारी ‘जनाना फौजें’.. हसीना, माशूक, सर बख्त के लिबास… कितना सुंदर मंजर हुआ करता था… कितना खूबसूरत’ ।सेनाओं के नाम तक में कलात्मकता ! लेकिन ‘रिचमंड साहबकी चालाकी देखिये ‘इस फौज की क्या जरूरत है, सरहदों की हिफाजत के लिए अंग्रेजी फ़ौज मौजूद है और उसकी तनख्वाह भी तो आप ही देते हैं तो बेकार में यह परेशानी लेने की क्या जरूरत है’? वाजिद इस चालाकी को खूब समझ पा रहा है‘बहुत बेहतर, रेजिमेंट साहब… आपका हुकुम सर आंखों पर यह परेशानी भी दूर किए देते हैं अब क्या करें…! हम क्या करते, बादशाह अपनी रिआया के लिए परेशान ना हो तो क्या करें, एक बादशाह बादशाहत ना करे तो क्या करें’ ? और उदास हो वह उस दिन को याद करता है जब एक फरियादी के सामने होने पर वो एक गीत उनके मन में तरंगित होने लगा था- 

तरप तरप सगरी रैन गुजरी,

कौन देस गए हो सांवरिया।

भर आई अखियां मदमारी सरक सरक गई चुनरिया,

तुमरे घोरन मोरे द्वार से जो निकसे,

सुध भूल गई मैं बावरिया

तरप तरप सगरी रैन गुजरी कौन देश गयो सांवरिया

आप जानते हैं यह गीत हमने कब और कहाँ रचा था? सारा मंजर तस्वीर की तरह हमारे सामने है !!! यह गीत हमने इसी तख्त पर, भरे दरबार में रचा था। एक आदमी हमारे सामने हाथ बंधे खड़ा है उसकी फरियाद सुनी जा रही है और तब अचानक एक अनोखी बात होती है हमारे कानों में उसकी आवाज आना बंद हो जाती है और उसकी बजाय यह गीत गूंजने लगता है’। बादशाह जबकि उसे न्याय करना है, कविता रच रहा है फरियादी के दुःख उसे गीत लिखने को विवश करते हैं,उसकी करुणा सृजनात्मक हो उठती है अभिव्यक्ति भी तुरंत प्रस्फुटित होती है उससे आप युद्ध की उम्मीद कैसे कर सकते हैं ‘मदार-रु-दौला जरा रेसिडेंट साहब से जाकर मालूम तो कीजिए इंग्लिशतान के कौन-कौन से बादशाह गीत लिखा करते थे,और उनकी मलिका-ए-विक्टोरिया या की रिआया उनके कितने गीत गाया करती है’ शासक कवि ह्रदय नहीं हो सकता अथवा कहे कि कवि ह्रदय शासक नहीं बन सकता फिर एक कन्फेशन इस मलाल के साथ कि उसके और उसकी रिआया के साथ अन्याय हो रहा है – ‘हम जानतें हैं हम बादशाहत के लायक नहीं थे, पर अगर हमारे रिआया आकर हमसे शिकायत करती कहती  जाने आलम आप गद्दी छोड़ दीजिए, हम आपको नहीं चाहते हैं, आपके राज में हम दुखी हैं, बेजार हैं’ तो बाखुदा हम उसी वक्त है ताज और तख्त से दस्त- बदजार हो जाते। लेकिन मदार-रु-दौला कोई आया नहीं ये कहने, और आप जानते हैं क्यों नहीं कहा इसलिए नहीं कहा क्योंकि हमने उनसे कभी असलियत नहीं छुपाई उन्हें मालूम तो हम कैसे बादशाह और उस पर भी उस पर भी उन्होंने हमें चाहा आज 10 बरस के बाद भी हमें उनकी आंखों में प्यार दिखाई देता है हर गली कूचे में वे हमारे गीत गाते हैं’  सरकार बहादुर फौज क्यों भेज रही है इसका भी इल्म है वाजिद अली को ‘उन्हें मालूम है कि अवध वाले लड़ना भी जानते हैं। हमारी मजलूम रिआया में से ही कंपनी फौज के बेहतरीन सिपाही भर्ती हुआ करते हैं…है ना यह अजीब सी बात में मदारुद्दौला!! हमारी भूखी सताई हुई मजलूम रिआया में से ही कंपनी फौज के बेहतरीन सिपाही भर्ती हुआ करते थे”। इसी बात को रेज़ीडेंट साहब भी कहता है- क्या हम शांतिपूर्ण ढंग से गद्दी ले सकते हैं! नहीं तो हमें हमारे ही सैनिकों को उनके ही भाइयों पर गोली चलने का आदेश देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा’ फिर वाजिद अली शाह अपनी गद्दी की मूठ को कसकर पकड़ते हुए कहता है कि कह दो कि ‘इस तरह माँगने से हम मसनद नहीं देगे इसे हासिल करने के लिए हमसे मुकाबला करना होगा तुम इस सिर से ताज तो छीन लेगा लेकिन हमारे इस सिर को झुकाएगा कैसे ?  पृष्ठभूमि में डंके और युद्ध संगीत बज रहा है ।वो अंग्रेजों की फ़ौज का मुकाबला करने को तैयार भी है लेकिन अब तक समझ चुका था कि इन्हीं में से दगा करने वाले लोग भी हैं क्योंकि युद्ध का अंजाम जानता है तब गीत गाता  है जब छोड़ चले लखनऊ नगरी, कहे हाल के क्या हम पे गुजारी    

अँगरेज़ भी जानते हैं कि वाजिद अली शाहएक धर्मनिष्ट व्यक्ति है दिन में पाँच बार नवाज़ पढ़ता है, शराब नहीं पीता, हरम इतना बड़ा की रेजिमेंट समां जाए, ये राजा नाचता है, गाता है जाने कितनी पत्नियों के साथ रहता है छत पर पतंग उड़ाता है,लड़कियों के साथ नाचता है वह उन्हें कोई नुकसान नही पहुंचा सकता, उसे विरोधाभासों का बण्डल कहता है । इसलिए वाजिद की माँ बेगम साहिबा का भी तर्क है ‘अगर वह अच्छा शासक नहीं था तो उसे पहले ही तख्त से क्यों न उतारा गया 10 साल बाद अचानक क्यों उसे गद्दी से उतरने के लिए संधि पर हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं…हमें मुआवजा नहीं चाहिए हमें इन्साफ चाहिए हम विक्टोरिया से गुहार करेगे’ ।

वाजिद अली रेजिमेंट साहब को खुद आमंत्रित करता है लेकिन इस शर्त के साथ कि आने से पहले सारी सेनाओं के मोर्चो पर रोक लगा दी जाये, तोपे उतार ली जाये, हथियार ले लिए जाए और एलान करवा दिए जाते है  जब अंगेज फ़ौज आये रियाया उनका मुकाबला न करे, इस सीन के बाद शहनाई बजती है शहनाई जो दुःख-दर्द को और भी गहन बना देती है वाजिद अली एक एक आम जनता की हैसियत से वजीफा का शुक्रिया अदा करता है रेजिडेंट उसकी सराहना करता है कि आपने सेना के हथियारों को इस्तेमाल होने से बचा लिया ताकि शांतिपूर्ण वार्ता हो सके तो यह था बादशाह का ना किसी खून खराबे के अपनी गद्दी सौंप देना जो कायरता नहीं  क्योंकि संधि पर वाजिद अली शाह ने दस्तखत नहीं किये –‘आप सिंहासन तो ले सकते हो दस्तखत नहीं ले सकते’  सूत्रधार का अंतिम संवाद ‘न कोई गोली चलेगी न खून खराबा होगा वाजिद अली शाह अपना वादा पूरा करेंगे आज से तीन दिन बाद 7 फरवरी 1856 को अवध पर अंग्रेजी कब्ज़ा हो जाएगा जाने आलम अपनी महबूब नगरी लखनऊ को हमेशा के लिए छोड़ देगे…लार्ड डल हौजी आखिरी चेरी हडप कर चुका होगा मल्लिका विक्टोरिया तशरीफ़ ला आ रही हैं’ यानी यह युद्ध नहीं था इसलिए इसे जीता या हारा नहीं गया बल्कि अंगेजों द्वारा अवध हड़पा गया जिसे राय ने आरम्भ में बता दिया, जिसे प्रेमचंद ने कायरता कहा वह सत्यजीत राय के अनुसार परिवेश की उपज थी एक कलाकार कायर नहीं हो सकता यही वह वाजिद अली शाह के किरदार का महत्वपूर्ण पक्ष है जिसे सत्यजीत राय ने उपनिवेशिक काल से शोध के माध्यम से निष्कर्ष के रूप में स्थापित किया है । शमा जैदी के अनुसार उन्होंने राय को वाजिद अली की पुस्तक ‘परीखाना’ पुस्तक के कुछ अंश पढ़ने को कहा थ लेकिन उन्होंने मन क्र दिया कि संभवत: फिर मैं फिल्म न बना पाऊं क्योंकि उनका उद्देश्य वाजिद का सकारात्मक पक्ष जनता के समक्ष रखना था जिसमे वाजिद दयनीय विवश नजर आ सके यह किरदार  प्रेमचंद की कहानी के प्रतिरोध में गढ़ा गया तो कहाँ ग़लत न होगा।

एक गीत जो मैंने फ़िल्म में मिस किया, जिसके लिए कहा जाता है कि वह लखनऊ छोड़ने के दौरान गया था “बाबुल मोरे नैहर छूटो ही जाए’ इसका इस्तेमाल सत्यजीत राय ने क्यों न किया ? खैर, ‘छोड़ चले लखनऊ नगरी’ गीत जो अमजद खान की आवाज़ में हैं उसमें वाजिद का दर्द झलकता है ये गीत वाजिद अली के अंतिम दिनों में लखनऊ की समृद्ध परम्परा और संस्कृति के ढहते मंजर के दुःख को चित्रित करता है । अमज़द खान ने वाजिद अली शाह के किरदार में खुद को ढालने के लिए खूब मेहनत की कि आपको गब्बरसिंह को याद नहीं आयेंगे,उनका शारीरिक गठन, हाव-भाव उठने बैठने का तरीका,संवाद अदायगी के साथ गीत गाना,नृत्य करना अभी लाज़वाब है । अंतिम वार्ता में जेम्स आउट्राम के समक्ष बड़ी दृढ़ता से वाजिद का मुकुट उतार कर रेजिमेंट को देना और शर्म से दोनों की आँखे झुक जाना, बिना संवाद के अमज़द खान ने कमाल कर दिया यहाँ शासक हारा नहीं बल्कि एक कलाकार आज़ाद हुआ ।

सभी चित्र गूगल से साभार

रक्षा गीता

फिल्म विशेषज्ञ

सहायक आचार्य

दिल्ली विश्विद्यालय  

Rakshageet@kalindi.du.ac.in

अलविदा “रोज दीदी” (डॉ. रोज केरकेट्टा )

अनुज बेसरा

अपनी कृतियों से “रोज दीदी” बनना डॉ. रोज केरकेट्टा की सबसे बड़ी उपलब्धि है। डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची में आयोजित डॉ. रोज केरकेट्टा के भावांजलि, श्रद्धांजलि और शब्दांजलि कार्यक्रम में सम्मिलित होने का अवसर मिला। खचाखच भरे सभागार में विद्वानों और युवाओं की उपस्थिति देखकर भाव विभोर होना स्वाभाविक था। मंच पर महिलाओं और पुरुषों की समान भागीदारी, रोज दीदी की सबसे बड़ी उपलब्धि का प्रतीक प्रतीत हो रही थी। लोग एक-एक कर मंच पर आ रहे थे और रोज दीदी के साथ बिताए अनमोल पलों की स्मृतियों को ताजा कर रहे थे।रोज केरकेट्टा से “डॉ. रोज केरकेट्टा” बनना और फिर अपने कृतित्व व व्यवहार से सर्वसामान्य होकर “रोज दीदी” बन जाना कोई आसान कार्य नहीं था। सिमडेगा जैसे सुदूर जिले की संख नदी के किनारे जन्म लेना और फिर राष्ट्रीय पटल पर छा जाना तथा 1970 के दशक में, जब अधिकांश लोग दो जून की रोटी के लिए संघर्षरत थे, उस दौर में आदिवासी महिलाओं के बौद्धिक आंदोलन का नेतृत्व करना डॉ. रोज केरकेट्टा की एक महान उपलब्धि थी, जो आज भी लोगों को गहन स्तर पर प्रभावित करती है।

5 दिसंबर 1940 ई. में सिमडेगा जिले के संख नदी के किनारे स्थित कइसरा सुंदरा टोली नामक आदिवासी गाँव में जन्मी, डॉ. रोज केरकेट्टा का देहावसान 17 अप्रैल 2025 को रांची स्थित अपने आवास में हुआ। उनके पिता डॉ. प्यार केरकेट्टा स्वयं भी एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे, जिनसे लेखन का संस्कार रोज दीदी को विरासत में मिला। मात्र 25 वर्ष की उम्र से ही वे झारखंड की भूमि और यहाँ की आवाम के प्रति समर्पित हो गई थीं। उस समय, जब जयपाल सिंह मुंडा राजनीतिक स्तर पर झारखंड आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, रोज केरकेट्टा भी अपने लेखों के माध्यम से आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान करने लगी थीं।

सभागार में भावांजलि और शब्दांजलि अर्पित करते हुए निम्न रूप से डॉ. रोज केरकेट्टा को विद्वान याद कर रहे थे:- 

“जंगल मेरा घर है
नदी मेरी मां
धरती मेरा शरीर
फिर क्यों कोई कहता है
कि मैं सभ्य नहीं हूँ?”

रोज दीदी की उपरोक्त कविता को याद करते हुए महाश्वेता देवी के समकक्ष लाकर रविभूषण कहते हैं – “मेरे जीवन में केवल दो व्यक्तित्व ऐसे हैं जो मेरे लिए ‘दीदी’ बन पाईं। उनमें से एक थीं डॉ. रोज केरकेट्टा। शांत, सौम्य, निश्छल, उन्मुख और बहुआयामी व्यक्तित्व वाली डॉ. रोज केरकेट्टा का जाना साहित्य जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। वे स्थानीय होकर भी राष्ट्रीय स्वर की पर्याय थीं।”

रोज दीदी की उपरोक्त कविता को याद करते हुए महाश्वेता देवी के समकक्ष लाकर रविभूषण कहते हैं – “मेरे जीवन में केवल दो व्यक्तित्व ऐसे हैं जो मेरे लिए ‘दीदी’ बन पाईं। उनमें से एक थीं डॉ. रोज केरकेट्टा। शांत, सौम्य, निश्छल, उन्मुख और बहुआयामी व्यक्तित्व वाली डॉ. रोज केरकेट्टा का जाना साहित्य जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। वे स्थानीय होकर भी राष्ट्रीय स्वर की पर्याय थीं।”

“सिमडेगा की संख नदी के किनारे जन्मी और सिसई (गुमला) की कोयल नदी के किनारे से अध्यापन की शुरुआत कर रांची की स्वर्णरेखा नदी तक का सफर तय करते हुए, रोज फुआ स्थानीयता और राष्ट्रीयता के बीच एक सेतु बन गईं। वे स्थानीय भाषा को हिंदी में जगह देकर हिंदी को समृद्धि प्रदान की”.- सावित्री बड़ाईक

“1970 के दशक में झारखंड अलग राज्य की मांग को लेकर चले बौद्धिक आंदोलन में डॉ. रामदयाल मुंडा और बी. पी. केशरी के बाद यदि कोई सबसे प्रसिद्ध नाम था, तो वह था डॉ. रोज केरकेट्टा। वे दर्जनों संगठनों की पदेन अध्यक्ष भी रहीं”. – रणेंद्र

“पढ़ाई, लड़ाई और लिखाई – तीनों को साथ लेकर चलती थीं रोज दीदी”.- मिथिलेश

झारखंड की प्रमाणिक आवाज थीं रोज दीदी। अपने व्यापक दृष्टिकोण के कारण वे सर्वव्यापी हो गई थीं.- पंकज मित्र

1970 के दशक में आयोजित कई महिला सम्मेलनों के माध्यम से रोज दीदी ने झारखंड आंदोलन में महिलाओं की बौद्धिक भागीदारी को सामने रखा। वे महिलाओं को लिखित और वैधानिक अधिकार दिलाने की प्रबल पक्षधर थीं.- दामोदर

आदिवासी भाषा-साहित्य, संस्कृति और स्त्री सवालों पर रोज दीदी ने कई देशों की यात्राएं की और राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी हुई. खड़िया लोक कथाओं का साहित्यिक और सांस्कृतिक अध्ययन (शोध ग्रंथ), प्रेमचंदाअ लुङकोय (प्रेमचंद की कहानियों का खड़िया अनुवाद), सिंकोय सुलोओ (खड़िया कहानी संग्रह), हेपड़ अवकडिञ बेर (खड़िया कविता एवं लोक कथा संग्रह), पगहा जोरी-जोरी रे घाटो (हिंदी कहानी संग्रह), सेंभो रो डकई (खड़िया लोकगाथा) खड़िया विश्वास के मंत्र, अबसिब मुरडअ (खड़िया कविता संग्रह) और स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ रही हैं. इसके अलावे भी कई पत्र- पत्रिकाओं में लगातार आलेख और विचार छपते रहे. पगहा जोरी- जोरी रे घाटो रोज दीदी की प्रमुख रचनाओं में से एक थी इस कहानी किताब में उन्होंने आदिवासी समाज की महिलाओं की समस्या, विस्थापन और चुनौतियों जैसे मुद्दों पर कहानी रच कर राष्ट्रीय स्तर पर विषयों को लेकर आई और विख्यात हो गई. किताब को पढ़ने के बाद समझ आता है “कम कहकर सब कुछ कह देना” रोज दीदी की लेखनी की पहचान थी. स्थानीय मुद्दों को सहजता और व्यापक रूप से साहित्यिक रूप देकर लोगों के लिए पाठ्य बनाना और उसे चर्चा का केंद्र बनाना रोज दीदी की शोषित समाज को भेंट है. जिस विषय पर आज भी चर्चा गहनता से हो पा रही है. प्रेमचंद की कहानियों का खड़िया भाषा में अनुवाद करना खड़िया भाषा को राष्ट्रीय पटल पर खड़ा कर दिया. यह कृति स्थानीय भाषा को राष्ट्रीय पर लाने के लिए एक सेतु का काम किया. निश्चित रूप से अन्य स्थानीय लेखक भी इससे प्रभावित हुए.

स्थानीय भाषा के प्रति उनका लगाव इस बात से समझ आता  है कि जब 2022 में धनबाद और बोकारो के इलाकों में झारखंडी भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए आंदोलन चल रहा था तो वे उस आंदोलन का न सिर्फ समर्थन किये बल्कि बाहरी भाषा का विरोध करते हुए विश्वम्भर फाउंडेशन द्वारा दिए जा रहे विश्वम्भर साहित्य भारती सम्मान- 2022 को यह कहते हुए लेने से मना कर दिया कि “जिस भाषा में मैं जीती हूँ, अगर उसे सम्मान नहीं दिया गया, तो मुझे सम्मान लेकर क्या करना.”

अपने जीवन काल अपनी विद्वता और लगन के बल पर सिमडेगा जैसे पिछड़े जिले में सिमडेगा कॉलेज, सिमडेगा और एस. एस. उच्च विद्यालय सिमडेगा जैसे आज के समय में प्रतिष्ठित संस्थानों का नींव रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

रोज दीदी की याददाश्त जीवन के अंतिम पड़ाव में भी बहुत मजबूत रही. वे व्यक्ति को देखकर ही नाम से पहचान लेती थी. अपने जीवन में उन्हें ब्रेस्ट कैंसर जैसे बीमारी का सामना करना पड़ा लेकिन वे मजबूती से जनमानस के लिए खड़े रहे. घर में ही एक दुर्घटना के दौरान उनका पैर टूट गया था. लेकिन वे अपनी मजबूत इरादों और हौसलों के कारण पुनः ठीक हो गई. बाद में एक बार पुनः वे गिरे जिसमें उनका कमर टूट गया. इस घटना के बाद वे अपने हजारों किताबों की कलेक्शन के साथ बिस्तर में आ गए लेकिन उनका साहित्य प्रेम और शोषण के खिलाफ बुलंद आवाज कम नहीं हुआ.

डॉ. रोज केरकेट्टा को जो विरासत अपने पिता से मिला था उसे अपने तक ही सीमित नहीं रखी. उस लेखनी कला को अपनी अगली पीढ़ी पुत्री वंदना टेटे को सौंप कर अपनी कर्तव्य का निर्वहन भी किया. आज वंदना टेटे भी अपनी मां के समकक्ष होकर आदिवासी समाज, विस्थापन मुद्दे, जेंडर संवेदनशीलता, शोषण, अत्याचार और संघर्ष जैसे विषयों पर बखूबी सशक्त लेखन कर प्रसिद्धि हासिल कर चुकी है. इसीलिए तो प्रसिद्ध आलोचक और साहित्यकार श्री रविभूषण जी कहते हैं जिस प्रकार महाश्वेता देवी अपने चार पीढ़ी की बौद्धिक- साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम की उसी प्रकार डॉ. रोज केरकेट्टा की भी जीवन है. वे भी तीन पीढ़ी तक बौद्धिकतावाद और साहित्यवाद को आगे बढ़ाने का काम की हैं.

आज रोज दीदी अपने कृतियों से साहित्यिक और संघर्षात्मक पौध रोपण कर गई हैं जिसका पेड़ बनना और फल देना बाकी है. सरकार और जनप्रतिनिधियों को भी आवश्यकता है कि उनके कारवाँ को आगे बढ़ाएं और उन्हें उचित सम्मान से सुशोभित कर एक आदर्श प्रस्तुत किया जाए.

सभी चित्र गूगल से

अनुज बेसरा
विद्यार्थी, अर्थशास्त्र विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची
ईमेल: anuj002besra@gmail.com

अतिपिछड़ों के नेतृत्व में हो सामाजिक न्याय 

रिपोर्ट : साकिब 

 

पटना, 18 अप्रैल — राष्ट्रीय अति पिछड़ा संघर्ष मोर्चा के तत्वावधान में पटना स्थित जगजीवन राम शोध संस्थान में “अति पिछड़ा वर्ग के नेतृत्व में सामाजिक न्याय” विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री विजय कुमार चौधरी ने की और संचालन प्रो. दिलीप कुमार पाल ने किया। सेमिनार के मुख्य वक्ताओं में संजीव चंदन (संपादक, स्त्रीकाल), अली अनवर (पूर्व सांसद), प्रो. कामेश्वर पंडित, प्रो. नागेन्द्र प्रसाद वर्मा, ललन भक्त, तथा ई. अजय कुमार आज़ाद शामिल थे।

 अध्यक्षीय वक्तव्य:
संस्थान के अध्यक्ष श्री विजय कुमार चौधरी ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि बिहार में अति पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ा जनसमूह है, और सामाजिक न्याय आंदोलन से सर्वाधिक लाभ भी इसी वर्ग को मिलना है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि यह वर्ग स्वयं नेतृत्व करते हुए आंदोलन को आगे बढ़ाए। वर्तमान में यह आंदोलन जाति, धर्म और व्यक्तिगत स्वार्थों में सिमट गया है और केवल आरक्षण तक सीमित रह गया है। उन्होंने आंदोलन के उद्देश्यों को व्यापक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया —
जातिविहीन समाज की परिकल्पना, समान शिक्षा एवं चिकित्सा व्यवस्था, न्यायिक प्रणाली में आमूलचूल सुधारअंधाधुंध निजीकरण का विरोध, और हर प्रकार के शोषण के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करना। उन्होंने संविधान की रक्षा को इस समय की सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया।

 वक्ताओं के विचार:
अली अनवर ने सभी सात मुद्दों का समर्थन करते हुए कहा कि अति पिछड़ा वर्ग अब तक एक संगठित वर्ग के रूप में उभर नहीं पाया है, क्योंकि जातिगत प्राथमिकता के कारण वर्गीय एकता नहीं बन पाई है। उन्होंने संगठित संघर्ष की आवश्यकता पर बल दिया। संजीव चंदन ने पैक्स चुनाव का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां आरक्षण नहीं है, वहां पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और आदिवासी समुदायों का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य है। इसलिए आंदोलन को अब उन क्षेत्रों पर केंद्रित करना चाहिए जहां आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। ललन भक्त ने शिक्षा के निजीकरण पर चिंता जताई और शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का आह्वान किया।अन्य वक्ताओं—प्रो. नागेन्द्र प्रसाद वर्मा, प्रो. कामेश्वर पंडित, ई. अजय कुमार आज़ाद, सुरेश शर्मा, प्रो. अनिल कुमार सहनी, डॉ. बिनोद पाल, कर्नल डॉ. ज़ेड अंसारी, प्रभुनाथ ठाकुर और प्रत्युष—ने मिलकर सुझाव दिया कि अति पिछड़ा वर्ग समाज के अन्य शोषित वर्गों के साथ मिलकर आंदोलन को नए नेतृत्व में आगे ले जाए। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन ललन भक्त द्वारा किया गया।

राष्ट्रीय अति पिछड़ा संघर्ष मोर्चा का प्रस्ताव
मंडल आयोग की रिपोर्ट के पेश होने और उसकी कुछ सिफारिशों के लागू होने के दशकों बाद सामाजिक न्याय के एजेंडे की क्या स्थिति है? बेशक, इसके ज़्यादातर एजेंडे आधे-अधूरे हैं। एक ओर वर्चस्ववादी ताकतों द्वारा इस पर हमले बढ़े हैं, वहीं कुछ नई बहसों ने ज़ोर पकड़ा है। जाति जनगणना, आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा में वृद्धि और निजी क्षेत्र में विस्तार तथा राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर उपवर्गीकरण जैसे मुद्दों ने नया आवेग पकड़ा है।

बिहार की जाति आधारित गणना से यह उद्घाटित हुआ कि अति पिछड़ा वर्ग आबादी का सबसे बड़ा तबका है और वास्तव में यह “किंगमेकर” नहीं, बल्कि “किंग” बनने की राह पर निकल पड़ा है।
सामाजिक न्याय की वैचारिकी एवं उन्हें धरातल पर उतारने का कार्य हमारे पूर्वजों — जैसे महात्मा बुद्ध, कबीर, रैदास, नानक, महात्मा फुले, डॉ. भीमराव अंबेडकर, पेरियार, जननायक कर्पूरी ठाकुर एवं जगदेव प्रसाद आदि महापुरुषों — ने भरपूर किया था। उनका बहुत सारा परिणाम समाज को मिला भी, तो दूसरी ओर वर्चस्ववादी (मनुवादी) ताकतें इस आंदोलन को ख़त्म या कमज़ोर करने की हमेशा कोशिश और साज़िश करती रही हैं। अतः हम बहुजनों का कर्तव्य है कि सामाजिक न्याय आंदोलन को मज़बूत करें।
अभी सामाजिक न्याय आंदोलन जाति, धर्म एवं क्षणिक लाभ व स्वार्थ के चलते मंद पड़ गया है। हम जाति और धर्म से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। सामाजिक न्याय को शत-प्रतिशत ज़मीन पर उतारने के लिए हमें एक शोषित-वंचित वर्ग के रूप में संगठित होना होगा, क्योंकि हम सब एक ही तरह की शोषक व्यवस्था से ग्रस्त हैं।सामाजिक न्याय आंदोलन को अभी सिर्फ आरक्षण तक ही सीमित कर दिया गया है।

इस आंदोलन का उद्देश्य यह होना चाहिए कि भारत के सभी नागरिकों में समानता, बंधुता, स्वतंत्रता एवं न्याय की व्यवस्था कैसे कायम की जाए। सामाजिक न्याय आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए हमें समग्र रूप से निम्न मुद्दों पर अपना आंदोलन खड़ा करना होगा:
जातिविहीन समाज बनाने का संकल्प
एक समान शिक्षा व्यवस्था
एक समान चिकित्सा व्यवस्था
न्याय प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन
शिक्षा, चिकित्सा, बिजली, पानी, सड़क एवं अन्य जन उपयोगी संस्थाओं के निजीकरण को रोकना
ऐतिहासिक कारणों से पिछड़े गए तबकों को विशेष अवसर देने की प्रतिबद्धता, यथा —
शिक्षा (सरकारी एवं गैरसरकारी),
नौकरी (सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थाओं में),
ठेका, पट्टा, लीज एवं अन्य आर्थिक संसाधनों पर जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण

समाज के किसी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो, अमीर हो या ग़रीब, यदि वह शोषण या दमन का शिकार हो रहा हो, तो उसके साथ खड़े रहकर मिलकर संघर्ष करना।
चूंकि अति पिछड़ा वर्ग बहुजन समाज का सबसे अधिक आबादी वाला वर्ग है, इसलिए इस वर्ग का दायित्व है कि समाज के सभी वंचित वर्गों का साथ लेकर इस आंदोलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे। दूसरी तरफ, इस आंदोलन की सफलता का सबसे अधिक लाभ इसी वर्ग को होगा। इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम इस आंदोलन में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका निभाएं। अब तक इस आंदोलन में अति पिछड़ा वर्ग की भूमिका सहयोगी के रूप में रही है।

इतिहास गवाह है कि इस वर्ग से आए अनेकों महापुरुषों ने सामाजिक न्याय एवं वैचारिक आंदोलन को न्यायप्रिय ढंग से मज़बूती प्रदान की थी। उन्होंने सामाजिक न्याय की वैचारिकी को उच्चतम शिखर तक पहुँचाया था। अभी 21वीं सदी में अति पिछड़ा वर्ग में भी संविधान एवं शिक्षा के चलते एक निम्न मध्यम वर्ग पैदा हो गया है। यह वर्ग स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व एवं न्याय के आदर्शों को समझने लगा है। इसलिए इस वर्ग में एक हलचल पैदा हो गई है — वह भी अपना मान-सम्मान खोजने लगा है।

यदि अति पिछड़ा वर्ग के सामाजिक एवं राजनीतिक समझ रखने वाले लोग एकजुट होकर इस आंदोलन में अपनी महती भूमिका निभाते हैं, तो यह आंदोलन निश्चित ही सफल होगा। इसी आशा और विश्वास के साथ इस सेमिनार का आयोजन किया गया है। आप सभी से अनुरोध है कि हज़ारों-हज़ार की संख्या में आकर इस आंदोलन को सफल बनाएं।

हिंदी सिनेमा में बाबा साहेब अम्बेडकर की वैचारिकी

गूगल से साभार

रक्षा गीता

लगभग 1900 ईसवीं के आसपास समाज सुधार की संकल्पना के साथ सामाजिक जड़ता को उखाड़ फेंकने हेतु बौद्धिक चिंतक जागरण की मशाल थामे साहित्य में आधुनिक काल आ चुका था जबकि 1913 में सिनेमा तकनीक के सहारे जाने अनजाने ईश्वरीय-चमत्कार और आस्था का पुन: बीजवपन कर भारत में अतार्किक मानसिकता तैयार कर रहा था। हालाँकि अपने जन्म से ही सिनेमा विशुद्ध मनोरंजन का महंगा साधन रहा है जिसके उपभोक्ता रईस उच्च वर्ण के रहते थे लेकिन सामाजिक परिवर्तन की शक्ति को पहचानते हुए ही प्रेमचंद जी ने 1934 में फिल्मों से जुड़ने का फैसला किया पर फिल्म उद्योग पर हावी व्यावसायिक मानसिकता वैचारिक शून्यता तथा बॉक्स ऑफिस पर असफल होने के कारण शीघ्र ही उनका मोह-भंग हो गया। तब प्रेमचंद जी के प्रगतिशील विचार सिनेमा को रास न आये।

सामाजिक समस्याओं पर फ़िल्में बनती रहीं जिनमें भारतीय समाज की रूढ़ परम्पराओं, जातिप्रथा,धार्मिक साम्प्रदायिक सौहार्द्र को फ़िल्मी परदे पर उतारा जाता रहा जो आज भी जारी है लेकिन अछूत कन्या, दहेज़, धर्मपुत्र फ़िल्में सामजिक सन्देश से लेकर आती रहीं हैं फिर क्या कारण रहे कि समाज में आज भी छुआछूत, दहेजप्रथा और धार्मिक उन्माद ज्यों के त्यों है, कारण स्पष्ट है कि इन समस्याओं का निदान ‘बॉक्स ऑफिस’ की खिड़की के अनुकूल ही किया गया फ़िल्मी रूमानियत में सन्देश और समस्या हाशिये पर रह जाते। अत: वहाँ कोई वैचारिक फलक हमें वहाँ नहीं दिखाई पड़ता है, फिल्म समीक्षक भी फिल्मों की समीक्षा बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर ही किया करते रहें हैं सबसे महत्वपूर्ण तथ्य कि सामंतवादी पितृसत्तात्मक से परिपक्व भारतीय मानस इन रूढ़ कमज़ोरियों का सामना कर सकने में आड़े आता रहा हैं।

एक समय वह भी आया जबकि हमारे महान विचारकों को फिल्मों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्थान मिलना आरम्भ हुआ गाँधी, नेहरु, पटेल, सुभाष, विवेकानंद जैसे विचारक और उनसे प्रभावित चरित्र गढ़े जाने लगे एक आदर्शवादी सोच के साथ फ़िल्में आने लगी और बॉक्स ऑफिस पर सफल भी हुई। पर दलित समाज के उत्पीड़न के प्रति विरोध दर्ज करवाने वाले विचारक बाबा भीमराव अम्बेडकर जी से सिनेमा बचता रहा, ‘अछूत कन्या’ फ़िल्म के समीक्षकों ने इसे   गाँधी जी के अछूतोद्धार से जोड़ा जबकि बाबा साहेब अछूतों में फैले अज्ञान को दूर करने के लिए ज्ञान की मशाल प्रज्जवलित कर चुके थे लेकिन फिल्म में उनका कहीं कोई संकेत नहीं मिलता कारण कि बाबा साहेब तथाकथित निम्न वर्ण के थे जबकि ऊपर जितने भी नाम हैं वे सवर्ण जाति के हैं जिन्हें ब्राह्मणवादी मानसिकता सहज स्वीकार कर लेती है जबकि बाबा को उन्होंने अस्पृश्य ही माना यदि फ़िल्म में उनके विचारों को विशेष समर्थन मिलता तो सवर्ण मानसिकता फिल्म को अप्रोच नहीं करती। वास्तव में हिंदी सिनेमा में अंबेडकरवादी विचारधारा या उनके विचारों से प्रभावित चरित्रों का हमेशा ही अभाव रहा है, अथवा कहें कि प्रभाव और वैचारिकी तो नज़र आती रही है लेकिन उसके लिए उन्हें कभी श्रेय नहीं दिया गया। देश की प्रगति को महिला शिक्षा से आँकने वाले बाबा अम्बेडकर 5 फ़रवरी 1951 में हिन्दू कोड बिल भी पेश करतें हैं जो स्त्रियों के हित में हैं लेकिन जब 1962 में विवाह से पूर्व स्त्री शिक्षा के महत्व पर बात करने वाली फिल्म ‘अनपढ़’ आती है तो वहां भी अम्बेडकरवादी विचारधारा के प्रभाव के कोई संकेत मिलते। इसी प्रकार 1972 में तपन सिन्हा निर्देशित फिल्म ‘जिंदगी जिंदगी’ आती है जिसके मूल में जातिवाद ही है, वहाँ भी बाबा को कहीं कोई श्रेय नहीं दिया जाता। क्या यह अजीब नहीं लगता कि 1982 में जब वैश्विक फलक पर शांतिदूत ‘गाँधी’ पर फिल्म बनती है तो पृष्ठभूमि पर भी अम्बेडकर कहीं नजर नहीं आते।

संविधान निर्माता, पहले कानून मंत्री और दबे कुचले शोषित वर्गों तथा स्त्री के अधिकारों के समर्थक अंबेडकर का फिल्मों में कहीं कोई अस्तित्व नज़र नहीं आता। सरकारी दफ्तरों कोर्ट स्कूल संस्थानों के दृश्य में लगी तस्वीरों में भी हमें बाबा दिखाई नही देते कारण ; क्योंकि बॉलीवुड ना ही स्त्री अधिकारों की बात कर सकता है ना ही शोषित वर्गों के लिए न्याय की बात कर सकता है तो फिर उनके अधिकारों के लिए खड़े होने वाले अंबेडकर जी को कैसे फिल्मों में स्थान दे सकता था। 80 के दशक में समानांतर सिनेमा के अंतर्गत दलित चेतना ने फिल्मों को नया विषय और स्वर दिया लेकिन समानांतर कहकर भी इन्हें हाशिये पर ही रखा गया।  इन फिल्मों हमें बाबा साहेब अम्बेडकर की वैचारिकी के प्रति कोई श्रद्धा या सिद्धांत भी नहीं मिलते। वस्तुत: दलित चेतना और अम्बेडकर जी की वैचारिकी के अंतर को इस तरह समझ सकतें हैं कि शोषित और पीड़ितों को आवाज देने वाले भीमराव अंबेडकर स्वयं शोषित समाज से थे और आज उनके विचारों को मानने वाला पढ़ा-लिखा प्रबुद्ध समाज का दलित व्यक्ति हैं। जबकि इन फिल्मों में निहित दलित चेतना उनकी यथास्थिति को दिखने भर तक थी यहाँ के पात्र दीनहीन, दबे-कुचले और निराशा का संचार करने वाले अधिक थे जिनमे कहीं कोई संघर्ष या विद्रोह नहीं मिलता। दामुल,पार, आक्रोश,अंकुर सद्गति जैसी फ़िल्मों में कहीं न गाँधीवाद समाजवाद या मार्क्सवाद का प्रभाव अधिक रहा उनकी दृष्टि आंबेडकर तक गई ही नहीं लेकिन शोषित व पीड़ित समाज के यथार्थ चित्रण की बेहतरीन शुरुआत करने में इन फिल्मों का योगदान अविस्मरणीय है इन फ़िल्मों का बौद्धिक दर्शक वर्ग बॉक्स ऑफिस पर भी सफलता नहीं दिला पाया इसलिए फिल्म फेस्टिवलों की शान ये फ़िल्में दर्शक न जुटा पाई जबकि सिनेमा तो बॉक्स ऑफिस पर निर्भर करता है।

  

  महाराष्ट्र अम्बेडकरवादी विचारधारा का जन्म स्थली होने पर भी मुंबई फ़िल्में बाबा से परिचित न होगी इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता लेकिन पिछले दशकों में हम भारतीय सिनेमा के परम्परागत ढाँचे में बदलाव देख रहें हैं। बाबा साहेब की वैचारिकी से प्रभावित फिल्मों ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवानी आरंभ कर दी है क्षेत्रीय सिनेमा में विशेषकर मराठी और दक्षिण भारतीय फ़िल्में बाबा साहब के सामाजिक राजनीतिक अवदान को महत्व देतें हुए उन्हें प्रचारित प्रसारित भी कर रहें हैं। अब समय आ रहा है कि इस तरह के चरित्र सामने आ रहें हैं जो ‘जय भीम’ बोलकर बाबा साहब अंबेडकर की विचारधारा को सिर्फ दलितों के उत्थान के लिए नहीं है बल्कि हर एक वर्ग के लिए महत्वपूर्ण मानतें है।इसके विपरीत हिंदी में ‘आरक्षण’ शब्द का लाभ लेते हुए जब इस नाम से फिल्म बनती है तो फ़िल्म में बाबा को कहीं नहीं दिखया गया जबकि शिक्षा पर बाबा ने सबसे ज्यादा जोर दिया, नायक दलित है पर बावजूद इसके उसके हाथ में बाबा की कोई पुस्तक कमरे में कोई तस्वीर या संवादों में कही बाबा की विचारधारा नहीं मिलती जबकि दक्षिण में अम्बेडकर जी के ‘जय भीम’ नारे के शीर्षक से फिल्म बन जाती है। रजनीकांत जब काला और कबाली में दलित की भूमिका में आतें है तो नीले रंग, बाबा की तस्वीरें आपको उनकी वैचारिकी की उपस्थिति का लगातार अहसास कराती हैं। कबाली फिल्म के बात करें तो हम देखेंगे कि उसमें ज्यादा से ज्यादा क्रू मेंबर दलितों की संख्या से है।फिल्म निर्माण के दौरान अधिकतर ऐसी खबरें गढ़ी जाती कि कि डायरेक्टर पा रंजीत, सिनेमैटोग्राफर जी. मुरली ,आर्ट एंड कास्टयूम डायरेक्टर थ.लिंगम गीतकार उमा देवी अरुण रजा कामराज और एम् बालमुरुगन सभी दलित समाज से हैं अत: फिल्म नहीं चलेगी लेकिन इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाई जो इस बात का संकेत थे कि बाबा साहेब की वैचारिकी को जानने समझने और देखने वाला एक बड़ा वर्ग तैयार हो चुका है पर हिंदी नायक नायिका जय भीम जैसे नारे लगाते अभी भी नहीं दीखते हाँ, आर्टिकल 15 जैसी फिल्मों में वे दलितों के उद्धारक के रूप में खुद को प्रस्तुत करतें हैं ।  

काला, कबाली, जय भीम से भी पूर्व मराठी फिल्म निर्देशक नागराज मंजुले फैन्दरी और सैराट फिल्में बनातें हैं   फैन्दरी में दलितों के विद्रोह को पहली बार दिखाया गया है,यह फिल्म सबक देती है संघर्ष ही यथास्थिति से मुक्ति दिलवा सकता है विद्रोह करना बहुत जरूरी है। नागराज स्वयं अम्बेडकरवादी विचारक हैं और दलितों में अम्बेडकरवादी विचारधारा को फिल्मों के माध्यम से प्रसारित प्रचारित करने का लक्ष्य रखतें हैं उनकी फ़िल्मों का दलित दबा कुचला नहीं बल्कि अम्बेडकर विचारधारा से सम्पन्न अपने आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करने वाला है । अम्बेडकर साहेब की वैचारिकी कहें अथवा बॉक्स ऑफिस का आकर्षण जब विजय बोराड़े के जीवन पर आधारित झुंड फिल्म के लिए उन्होंने दिग्गज अमिताभ बच्चन को कास्ट किया तो वे इनकार न कर सके । वैसे दक्षिण के रजनीकांत और बॉलीवुड के अमिताभ की लोकप्रियता और फिल्म बिकने की विश्वसनीयता को भी हम झुठला नहीं सकते। लेकिन इस फिल्म की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि फिल्म से जुड़े कलाकार झुग्गी झोपड़ी से जुड़े हैं जिन्हें अमिताभ के साथ काम करने का अवसर नागराज ने दिया और सिद्ध किया कि फिल्म इंडस्ट्री में अभिनय किसी की बपौती नहीं बस एक बार मौका मिलने की देर है कोई भी कलाकार बन सकता है कहानी सभी को एकसमान मौका देने का सन्देश देती है । हिंदी फिल्मों में हर धर्म के तीज त्योहार मनाने के दृश्य गीत संगीत आते रहतें हैं यह पहली फिल्म है जिसमें हमें ‘भीम जयंती’ एक उत्सव की तरह देखने को मिलती है।

‘जय भीम’ शीर्षक से बनी फिल्म नाम में ही बाबासाहेब आंबेडकर का आह्वान है। एक दृश्य में छोटी बच्ची वकील की नकल पर अखबार पढ़ने की जो कोशिश कर रहे हैं वह बाबा भीमराव अंबेडकर के ही विचार है कि शिक्षा ही आपको तमाम समस्याओं से मुक्त कर सकती है चाहे वह किसी जाति हो धर्म संप्रदाय हो।जय भीम फिल्म हाई कोर्ट के जज जस्टिस चंद्रा के वास्तविक जीवन के एक केस पर आधारित है जो उन्होंने अपने वकालत के दिनों में जो ‘कुरवा’ जनजाति के लिए लड़ा और जीता था। नायक वह टिप्पणी करता दिखता है स्कूलों में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताओं में कोई बच्चा अंबेडकर का रोल क्यों नहीं निभाता। आज जय भीम सिर्फ नारा नहीं रह गया है या अभिवादन का शब्द नहीं रह गया है बल्कि यह एक ऐसा शब्द हो गया है जो भीमराव अंबेडकर के विचारों के प्रति एक स्वाभिमान और सम्मान और क्रांति को हमारे सामने लेकर आता है।

इनके अतिरिक्त तमिल फिल्म ‘असुरन’ का नायक जब कहता है कि ‘अगर हम खेत रखेंगे तो वह उन्हें हड़प के लिए अगर हमारे पास पैसा होगा तो उसे छीन लेंगे लेकिन अगर हमारे पास शिक्षा है उसे कोई नहीं छीन सकता’ सीधे तौर पर यह संवाद शिक्षा पर बाबा साहब का ही तो वक्तव्य नजर आता है। इसी तरह ‘कर्णन’ फिल्म सवर्ण समाज की संकुचित मानसिकता की पोल खोलती है कि हमारे समाज में नाम और सरनेम का क्या महत्त्व है क्योंकि सरनेम बताते ही हम निर्णय लेतें हैं कि इस व्यक्ति को उठा बैठा या खाया पिया जा सकता है या नहीं फिल्म में पुलिसवाला कहता है कि ‘तुम लोग अपना नाम दुर्योधन, द्रौपदी कर लोगी तो क्या वैसे हो जाओगे…कैसे हो जाओगे?इसलिए बाबा साहब की वैचारिकी सिखाती है ‘जो हो’ उस पर ही गर्व करो। इसलिए अम्बेडकरवादी  अभिमान से जय भीम कहतें हैं। अम्बेडकर जी की वैचारिकी से संपन्न पा रंजीत की सरपट्टा परंबराई का दलित नायक दलितों के मनोबल को बढ़ाता है। नवम्बर 2021 में थिएटर में आई मराठी फ़िल्म जयंती फिल्म अम्बेडकरवादी  अभिव्यक्ति की पहली ऐसी फिल्म बन गई है जहाँ कोई सवर्ण उनका उद्धारक नहीं। हम जानतें है सिनेमा में समाजशात्र से अधिक अर्थशास्त्र का महत्व रहता है जहाँ एससी, ओबसी,एसटी, आदिवासी दलित कमजोर वंचित बहुजन समाज के लिए कोई केन्द्रीय स्थान न था लेकिन इस फ़िल्म ने प्रमाणित कर दिया कि आज यह समाज सिनेमा के माध्यम से खुद अपनी कहानी कहने में समर्थ है। फ़िल्म अपने हीरोज़ का खोखला महिमामंडित करने में यकीन नहीं करती जैसे कि पिछले कुछ वर्षों से नए-नए महानायक ख़ोज उनकी बायोपिक बनाने का चलन बढ़ चुका है। निर्देशक स्थापित करना चाहता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज, महात्मा फुले, डॉ अम्बेडकर जैसे महामानव किसी एक जाति या धर्म के उत्थान की बात नहीं करते थे बल्कि वे सबके हैं उनके विचार आज भी सभी के विकास के लिए हैं। इन महामानवों को श्रद्धांजलि देनी हैं तो स्मारक या जयंती पूजन से कहीं अधिक बेहतर है इनकी पुस्तकें पढ़े और इनके बताएं मार्गों पर चलें। इस संदर्भ में ‘जयंती’ फिल्म पूर्णतया जातीय विमर्शों का एक्स्टेन्शन है जहाँ ‘जय भीम’ सिर्फ नारा नहीं, उनकी तस्वीर या मूर्ति या जयंती एक दिन का त्यौहार भर नहीं कि ऐतिहासिक गौरव से ही खुश होकर बैठ जायें! बल्कि हर परिस्थिति में उनके विचारों को पढ़े-समझे जीवन में उतारें स्वयं भी आगे बढ़े और सबका सहयोग करें ताकि समाज के लिए उनके कार्य सिद्ध हो सकें। फिल्म में पहली बार ‘हू वेयर शुद्राज? गुलामगिरी, शाहू महाराज की जीवनी,और शिवाजी कौन थे? नामक किताबें अपने संघर्ष की गाथा बताती हैं जिनसे नायक की कायाकल्प होती है। फ़िल्म में इनके लिए महामानव शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य है कि इन्हें भगवान न बनाएं,हम मूर्ति के गले में फूल हार डाल देने से इनका महत्व निर्धारित नहीं कर सकते, जरूरत है इनके विचारों को अपने कार्यों द्वारा आगे बढ़ाना। स्वतंत्रता मिल गई, संविधान में अधिकार मिल गये लेकिन उसके जश्न को जयंती के रूप में कब तक बनाते रहेंगे। फिल्म में मास्टरजी जयंती पर चंदा नहीं देता और नायक संत्या से कहता है “मैं किसी भी जयंती के लिए चंदा नहीं देता, क्या जो चंदा नहीं देते वे बाबा साहब को नहीं मानते, और नेता ने पैसा दिया तो क्या बाबा साहब को मानता है क्या?” हाँ कहने पर मास्टरजी कहतें हैं “थोड़ा सोच कर बोलेगा तो एहसान होगा शिवाजी महाराज पर,स्कूल का विरोध करने वाला महाराज शिवाजी का सिपाही कैसे हो सकता है?”  फिल्म का गीत अपने उद्देश्य को प्रकट करता है ‘जयंती का मकसद निभा नहीं पाया, कर्ज जय भीम का चुका नहीं पाया, कैसे बन जाता मैं तेरा तेरा अनुयायी… अभी काबिल नहीं हूं कि करूं, तेरी आराधना”। यानी  महामानवों के कर्मक्षेत्र को अपने जीवन का कर्मक्षेत्र बनाकर ही जय भीम कहने के अधिकारी हो,यही उनका वास्तविक सम्मान है। मराठी फिल्म जयंती’ का सन्देश है कि महापुरुषों की जयंती पर दिया जलाकर पूजा करके बनाने से बेहतर है उनके विचारों को अपने जीवन में उतारना, परिवर्तन और जागरूकता अम्बेडकर की वैचारिकता से ही आएगी,इस फिल्म में दिखाया गया है।हिंदी फिल्मों में अम्बेडकर की वैचारिकी अभी भी स्वीकार्य नहीं है 200 हल्ला हो नामक फिल्म के प्रमोशन के दौरान अमोल पालेकर कहते हैं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ब्राह्मणवादी मानसिकता से बाहर नहीं आना चाहती है, हिंदी फिल्में आज भी जाति के सवालों से बचती है क्योंकि ये फ़िल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि वे आपको विचलित करती हैं और बॉक्स ऑफिस पर कुछ कमाई करके नहीं दे सकती ।

“कोट” फ़िल्म बताती है कि सपने देखना कितना ज़रूरी है फिल्म के आरम्भ में नसीरुद्दीन शाह की आवाज़ में कहा गया है- यह कहानी बिहार एक छोटे से गाँव में रहने वाले माधव की है । माधो की कहानी भी हर आशिक की तरह है, खाने को पैसे नहीं और चलें है इश्क लड़ाने, चूहा भूनकर खाने वाले इस आशिक की कहानी के अंत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं ।नायिका उसे देखकर कहती  है- मुंह देखा है…नीच कहीं का यहाँ जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल बाहुत सावधानी पूर्वक नहीं किया गया अन्यथा कई स्थलों पर समझ में आ रहा है कि वह किस समाज से है जबकि लड़की का नाम के साथ साक्षी मिश्रा है । दलित, वंचित, शोषित और स्त्रियों के भी पक्षधर बाबा भीमराव अंबेडकर की तमाम तस्वीरें आपको ‘कोट’ फ़िल्म में हीं दिखाई पड़ेंगी। कोट फिल्म का कोट प्रतीक हैजो बाबा साहब की हर तस्वीर में दिखाई देता है वास्तव में एक दलित के सपनों का प्रतीक है। एक पिता को भले ही लगे कि उसका बेटा कोट पहनने के सपने देख रहा है तो मानो उस पर किसी भूत का साया पड़ गया है। एक संवाद में   कहता है कोट का भूत गया नहीं… तो वह कहता है, जाएगा भी नहीं…। और सपने देखने के कारण ही फिल्म में कहानी का पात्र माधव प्रेमचंद की कहानी कफ़न के माधव का विलोम बन जाता है। कोट की प्रेरणा ही है कि घीसू-माधव के विपरीत यह माधव धैर्य नहीं भीतर क्रोध भरे हुए है घीसु- माधव की तरह फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को जीने वाला संतोषी जीव नहीं। इसलिए ‘मरनी भोज’ पर वह ₹500 की माँग करता है। क्योंकि वह जानता है ‘शादी पर बुलाता ही कौन है मरने पर बुलाते हैं लोग, वह भी दूसरों की शांति के लिए।’ प्रेमचंद का घीसू कहता है कि अब शादी ब्याह में कौन बुलाता अब तो सबको किफायत सूझती है। काम करने का जुनून उससे कहा जाता खाना खा ले पर वह कहता काम जरूरी है जबकि प्रेमचंद का माधव के लिए खाना ज्यादा जरूरी है,शराबी बाबू का भंगेड़ी बेटा लेकिन माधव के बदले हुए रूप को देखकर माधव का पिता भी बदलता है, हमेशा टूटने वाला पिता भी अब उसको बोलता है कि तुम संभाल लोगे बेटा।

हम जानतें हैं कि सिनेमा लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा है और पॉपुलर कल्चर ‘मास’ के सहारे आगे बढ़ता है आज का शिक्षित दलित अम्बेडकरवादी ‘मास’ अंबेडकर को सिनेमा में देखना चाहता है तो सिनेमा इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता क्योंकि इन फिल्मों की बॉक्स ऑफिस सफलता ने सिद्ध कर दिया है कि दलित अंबेडकर विचारधारा को सिनेमा में जगह देनी ही पड़ेगी। आज राष्ट्रभक्ति को केंद्र में रखकर एक ख़ास एजेंडे के तहत हिंदी सिनेमा बन रहा है तो दूसरी ओर चिन्तक पढ़ा लिखा दलित दर्शक अंबेडकरवादी विचारधारा की फिल्मों को देखना चाहता है इसका एक नकारात्मक पक्ष यह भी है कि जब फ़िल्म में दलितों पर शोषण होता है तो उसे देखकर जाने अनजाने दलित दर्शकों में शोषकों के प्रति नफरत या घृणा का बीज पनपने लगता है। दूसरी ओर यूपी-बिहार हिंदी पट्टी जैसे छोटे शहरों की कहानियों को परोसने वाली फिल्मों के नायक नायिका के उच्चवर्णीय सरनेम पर भी हम गौर कर सकते हैं जो जातिवाद को मजबूती से स्थापित करने का प्रयास कर रही है। दर्शक वर्ग बंट गया है, यहां तक कि समीक्षकों के भी, एक और दलित अंबेडकरवादी समीक्षक दूसरा सवर्ण वर्ग। कला और कलाकार का कोई धर्म या जाति नहीं होती उसकी एकमात्र पहचान उसकी प्रतिभा ही है जिसे बॉलीवुड को स्वीकार करना होगा झुण्ड से अमिताभजी ने इसका आरम्भ कर दिया है और सबसे महत्वपूर्ण बात बॉक्स ऑफिस का पिटारा भी अम्बेडकर जी की वैचारिकी से कोई परहेज़ नहीं कर रहा।

वेब सीरीज दहाड़ हो या पंचायत अथवा कटहल ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर अब जातिगत बंदिशे समाप्त हो चुकी है 190 से अधिक देशों में जाने वाले ये ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म अब बिना किसी पूर्वाग्रह के भारतीय समाज के बदलते परिदृश्य को खूब विस्तार से बिना किसी संकोच के प्रदर्शित कर रहें है जिससे जनता में जागरूकता बढ़ रही है ये चेतना सवर्ण समाज में भी आ रही है अभी हाल ही में शोर्ट फिल्म ‘यस सर’ जो अजय नावरिया की कहानी पर आधारित है को कई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया। यस सर भूमिका उलट कहानी इस बारे में है कि कैसे तिवारी की पदोन्नति की आवश्यकता, और अधिकारी के प्रति उनका जातिगत पूर्वाग्रह, अवरुद्ध नाली की समस्या को हल करने के लिए एक-दूसरे को संतुलित करते हैं।“जात न पूछो साधू की पूछ लीजिये ज्ञान” के भाव को पुष्ट करने वाली लघु फ़िल्म ‘यस सर’ भारतीय समाज की बदलती मानसिकता को सामने रखती है, सामाजिक विसंगतियों व विडम्बनाओं को हास्य-व्यंग्य में पिरोना आसान नहीं। व्यक्ति की विद्वता, ज्ञान, पद-प्रतिष्ठा जात-पात के बंधनों से मुक्त होनी चाहिए जैसे गंभीर मुद्दे को हास्यरस में प्रस्तुत करना इस फिल्म की विशेषता है। फ़िल्म बाबासाहब अम्बेडकर के कथन को प्रमाणित करती है कि भारत में जाति व्यवस्था एक ऐसी जड़ मानसिकता है जिसे शिक्षित हुए बिना आसानी से उखाड़ा नहीं जा सकता, आज इस तुच्छ मानसिकता की जड़ें कमज़ोर हो रहीं हैं। पहले सरकारी दफ्तरों में गाँधी-नेहरु की तस्वीरें हुआ करती थी वहीं आज बाबासाहब की तस्वीर होना संकेत करता है कि संविधान ने देश और समाज की मानसिकता को बदलने का काम किया है। फ़िल्म मुख्यत: यह संदेश देती है,‘पद-प्रतिष्ठा’ किसी जाति-वर्ण की मोहताज़ नहीं तो दूसरे ‘दलित-चेतना’ सिर्फ दलितों में ही नहीं बल्कि सवर्ण जातियों में भी जाग्रत होनी चाहिए तभी संतुलित और समावेशी समाज तैयार हो पायेगा। फ़िल्म में सबसे महत्वपूर्ण दृश्य तिवारी का लंबित ‘प्रमोशन लेटर’ है नरोत्तम के मन में ‘तिवारी’ की जाति को लेकर कोई पूर्वाग्रह, दुराग्रह अथवा बदले या विद्रोह की भावना नहीं, नरोत्तमदास एक संयमित स्वभाव का व्यक्ति है, नरों में उत्तम है, उसकी कुर्सी के ठीक पीछे बाबा साहब की फोटो पर लगा चश्में का-सा फ्रेम नरोत्तम ने भी पहना है जो संविधान निर्माता के जीवन दर्शन को अपने जीवन में उतारने का संकेत है, पीछे लगी ट्रोफ़ी बता रही है कि वह प्रतिभावान है, बी.ए. में कम डिवीज़न होने पर एम.बी.ए. की डिग्री लेना उसके अथक मेहनत का प्रयास थी। लैटर देने पर तिवारी उसकी तुलना रामजी से करता है,पीछे नाटकीय अंदाज़ में मंदिर की घंटिया बजने लगती हैं ‘आप जुग जुग जियो आपकी पद प्रतिष्ठा बढ़े…सर एकदम भगवान राम जैसे दिखते आप’ पृष्ठभूमि में सितार बज रहा है, तिवारी के संस्कार ही है कि अपना उद्धार करने वाले को वह भगवान मान लेता है पर इसे हम ‘रामराज्य’ संकल्पना से नहीं जोड़ पाते, जहाँ सभी बराबर हैं न ही इसे हमें गाँधी के’ हृदय परिवर्तन’ से जोड़ सकतें हैं बल्कि इस मानसिक बदलाव को ‘परिस्थितिजन्य अनुकूलन’ के रूप में देखना चाहिए खुद को बदलो अन्यथा लुप्त हो जाओगे तभी तिवारी को नाली साफ़ करने में संकोच नहीं हो रहा । अंतिम संवाद भी महत्त्वपूर्ण है दो तीन बार डंडा डालूँगा, हो जाएगा… पानी उतर रहा है…हाँ धीरे धीरे उतर रहा है’ सर …’ यानी झूठी मान मर्यादा का गन्दा पानी अब उतर रहा है, धीरे धीरे ही सही! जैसे कहावत भी है- ‘उसका पानी उतर गया’ झूठी मान-मर्यादा का पानी अब उतर रहा है। हाल ही में एक नेता ने ‘ठाकुर का कुआँ’ कविता पढ़ने पर स्पष्टीकरण दिया कि यह समझना मुश्किल नहीं है कि ‘ठाकुर’ का इस्तेमाल ‘उच्च जाति के वर्चस्व के रूपक में किया गया है “मेरे कहने का मतलब यह था कि जब तक ‘हम’ इस प्रवृति से उबर नहीं जाते,तब तक हम निम्न वर्ग के कल्याण के बारे में नहीं सोच सकते” इसी तथ्य को कहानी (2012) और फिल्म अपने अंदाज़ में कहती है। यहाँ साहित्य (और सिनेमा भी) राजनीति के आगे चलने वाली मशाल (प्रेमचंद) के रूप में ‘यस सर’ कहानी बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करती है।

इसी तरह चंपारण मटन नामक फिल्म को ऑस्कर के लिए नामित किया गया दोनों फिल्मे अपने अपने दृष्टिकोण से दलित विमर्श के नए आयाम रचती है और अम्बेडकर की वैचारिकी के नए सन्दर्भों से जोड़ती है। लघु फ़िल्म ‘चम्पारण मटन’ ने ऑस्कर की शाखा स्टूडेंट अकादमी के सेमीफाइनल में अपना नाम दर्ज़ करवा कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। फ़िल्म एंड टेलीवीजन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया FTII के छात्रों द्वारा बनाई गई इस टीम में दो लड़कियाँ भी शामिल हैं। 200 देशों के 600 संस्थानों की लगभग ढाई हजार फिल्मों से प्रतिस्पर्धा कर फ़िल्म ने ‘नैरेटिव कैटेगरी’ में 16 फ़िल्मों के बीच अपने लिए सेमीफाइनल में जगह बनाई। मात्र 24 मिनट की फ़िल्म सदियों पुरानी वर्ण व्यवस्था पर मनोरंजक ढंग में कुठाराघात करती है। “सबकी छाया एक ही जैसी क्या गोरा क्या काला रे” गीत के बोल के साथ फिल्म का अंत कंटेंट को और पुख्ता करता है कि सभी एक ही मिटटी के बने है फिर भेदभाव क्यों?

सभी चित्र गूगल से साभार

रक्षा गीता

फिल्म समीक्षक