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भारतीय स्त्रीवाद जाति,वर्ग,नस्ल,रंग और विषमलैंगिकता के साथ जुड़ा है

स्त्रीवाद,पुरुष वर्चस्व समाज में स्त्रियों के समान अधिकार और समान अवसर की मांग के साथ अस्तित्व में आया। समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव व विविधता देखने को मिलें। परंतु क्या यह स्त्रीवाद सबके लिय समान है क्योंकि जब स्त्रीवाद की बात की जाती  है या महिलाओं के अधिकारों की बात की जाती है तो इसका संदर्भ केवल विषमलैंगिक, सिसजेंडर, सवर्ण व अभिजात वर्ग की महिलाओं से होता है। अखबारों में यौन शोषण और रेप की घटनाओं में भी ज्यादातर जिक्र छोटे शहरों में भी सवर्ण महिलाओं की होती है वही वंचित वर्ग की महिलाओ (दलित व आदिवासी) की यौन उत्पीड़न और शोषण  की घटनाओं को अनदेखा किया जाता है। अगर जेन्डर की बात की जाए तो इसे पुरुष और महिला की बाइनरी तक सीमित रखी जाती है, ट्रांसजेन्डर और इंटरसेक्स लोगों को इसमें शामिल नहीं किया जाता है।

    “इंटरसेक्शनैलिटी” शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कानूनी विद्वान किम्बर्ले क्रेंशॉ द्वारा 1989 में किया गया था, जो 80 के दशक की अस्पष्ट अवधारणा थी, जिसके तहत मुख्य तौर पर क्रेंशॉ ने विश्लेषण किया और स्पष्ट किया कि अमेरिका में किस प्रकार श्वेत महिलाओं की तुलना में काली महिलाएं ज्यादा शोषित होती है तथा उन पर हो रहे उत्पीड़न को कानून के द्वारा कैसे नजरअंदाज किया जा रहा। कैसे किसी समाज की अलग-अलग शक्ति-संरचना वहां के अल्पसंख्यकों खासकर काले रंग की महिलाओं के साथ किस तरह व्यवहार करती हैं| यह सिद्धांत मूलत: काले स्त्रीवाद की उपज है| इसकी शुरुआत ही यह समझने के लिए की गयी कि आखिर क्यों और कैसे किसी भी समाज के अल्पसंख्यक पिछड़े लोगों को किताबों, सिद्धांतों, इतिहास के पन्नों, आंदोलनों और स्त्रीवाद के अलग रखा गया?

क्रेंशा के अनुसार, इंटरसेक्शनैलिटी एक ढांचा है जिसके माध्यम से यह समझने का प्रयास  किया जाता है कि जातिवाद, नस्लवाद, वर्गवाद, धर्म, लिंग और अन्य मुद्दे कैसे एक दूसरे के साथ ओवरलैप हो सकते हैं और लोगों को विभिन्न तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं। अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों के अनुभव अलग-अलग होते हैं।  इंटरसेक्शनैलिटी यह स्पष्ट करती है कि हमारे पास कई पहचानें होती हैं जो हमें बनाने के लिए एक-दूसरे से जुड़ती हैं और हमारी पहचान के प्रत्येक हिस्से किस प्रकार एक साथ आते हैं और यह निर्धारित करते हैं कि समाज में किसके पास शक्ति है और किसके पास नहीं है। यह हमें उन उत्पीड़नों और विशेषाधिकारों के बारे में बात करने का एक तरीका भी देती है जो एक-दूसरे को ओवरलैप और सुदृढ़ करते हैं। हमारी पहचान और अनुभवों के तैयार होने में भी कई कारक योगदान करते हैं। किसी भी विषय के एक हिस्से को देख कर निष्कर्ष नहीं निकाल सकते हैं ,हमें पूरी तस्वीर को देखनी  होगा और उन सभी कारकों को ध्यान में रखना होगा जो हमारी पहचान और समाज में हमारे अनुभव को प्रभावित करते हैं। सामाजिक पहचान और उससे जुड़ी संरचनाओं के आधार पर होने वाले वर्चस्व, दमन, और भेदभाव को समझता है। इस सिद्धांत के अनुसार, महिलाएं समाज में विभिन्न आधारों पर दमन और भेदभाव का शिकार होती हैं, और यह संरचनाएं न केवल एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं बल्कि लगातार एक-दूसरे को प्रभावित भी करती हैं।

साधारण शब्दों में कह सकते हैं कि इन्टरसेक्शनल स्त्रीवाद इस बात की पुष्टि करता है कि एक स्त्री को कितना शोषण सहना पड़ सकता है यह उसकी सामाजिक पहचान पर अर्थात, जाति, धर्म, वर्ग या नस्ल के द्वारा तय होता है । कोई भी दो स्त्रियों के हालात एक जैसे नहीं होते है भलें ही वो दोनों स्त्री ही हों। भारतीय संदर्भ में इसे देखें तो कह सकते हैं कि इंटरसेक्शनल स्त्रीवाद का अर्थ इस बात को स्वीकारना है कि एक संभ्रांत, सक्षम, सिसजेन्डर्ड   विषमलैंगिक और  सवर्ण हिंदू महिला के पास ज्यादा अधिकार व शक्ति है उन महिलाओं की तुलना में जो इन पैमानों में खरी नहीं उतरती।  इनमें शामिल दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, एलजीबीटीक्यू और विकलांग महिलायें, जिन्हें महिला होने के अलावा भी अलग तरह का सामाजिक शोषण सहना पड़ता है क्योंकि उनके पास विशेषाधिकार कम हैं। अतः जाति, नस्ल असमानता, लिंग, वर्ग, सेक्सुअलिटी के आधार पर असमानताओं को अलग-अलग देखने की बजाय यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक इन सभी का अनुभव कैसे करते हैं।

इंटरसेक्शनल स्त्रीवाद विभिन्न तत्वों को ध्यान में रखकर स्त्रीवाद से लेकर शोषण के अलग-अलग कारकों व तत्वों का विश्लेषण करता है| यह स्त्रीवाद के उस प्रमुख विचार को चुनौती देता है जिसने साफतौर पर स्त्रीवाद को समाज के श्वेत, उच्च वर्ग व जाति, या सक्षम, योग्य लोगों तक सीमित कर इसे समाज के हाशिये में रहने वालों तक पहुंचने में रोड़े का काम किया है| इंटरसेक्शनल स्त्रीवाद , समाज की सभी महिलाओं की बजाय केवल हाशिए पर होने वाली महिला-संबंधित मुद्दों को रेखांकित करता है| इस सिद्धांत में इस चुनौती का सामना किया जाता है कि किस तरह सामाजिक संरचना में अलग-अलग आधारों पर महिलाओं के साथ भेदभाव के समावेशन को आकार देकर उन्हें लागू किया जाता है| महिला और अल्पसंख्यक पिछड़े वर्गों के संबंध में वे अलग-अलग आधारों पर स्वयं को परिभाषित करते हैं और ये आधार एक दूसरे से पूरी तरह अलग होते हैं| इन्हीं ‘आधारों’ का अध्ययन स्त्रीवादी विश्लेषण में किया जाता है| इंटरसेक्शनल स्त्रीवाद को उन सभी आधारों पर लागू किया जा सकता है जो एक-दूसरे से जुड़कर शोषण को प्रभावित करते और उन्हें बनाये रखने में सहायक होते है, क्योंकि उनमें से एक भी कारक स्वतंत्र रूप से काम नहीं करता है|

1980 में इसे अश्वेत महिलाओं के संदर्भ में देखा गया कि किस प्रकार अश्वेत महिलाओं के अनुभव अश्वेत पुरुषों और श्वेत महिलाओं के अनुभवों से कैसे अलग हैं। और कैसे अश्वेत महिलाएं दोनों लिंग भेदभाव और नस्लीय भेदभाव सहन करती हैं। वहीं भारत में 1990 के दौरान इसे दलित महिलाओं के संदर्भ में मुख्यधारा के स्त्रीवाद के आलोचनात्मक स्वरूप में आया।

भारत के संदर्भ में इंटरसेक्शनल स्त्रीवाद  

भारतीय स्त्रीवाद बेहद नजदीकी रूप से जाति, वर्ग, नस्ल, रंग और विषमलैंगिकता के साथ अंतरसंबंधित् है। एक सक्षम, शिक्षित और सवर्ण महिला की तुलना वंचित समूह की महिलायें, दलित महिलायें व आदिवासी महिलायें ज्यादा शोषित होती है।

एक दलित महिला न केवल महिला होने की वजह से शोषित होती है बल्कि इसलिय भी शोषित होती हैं कि वह दलित है साथ ही वह गरीब है। वह अपनी सामाजिक परिस्थिति की वजह से तीन कारणों से शोषित होती हैं। उदाहरण के लिए भवरीं देवी का केस  (1992) का विश्लेषण किया जा सकता है,जिसमें भवरीं देवी पर यौन हिंसा सिर्फ उसके महिला होने की वजह से सिर्फ नहीं हुआ था बल्कि उसके दलित होने व नीचे जाति की होने की वजह  पूरे दलित समुदाय पर उच्च वर्ग द्वारा अपना वर्चस्व व शक्ति स्थापित करने के लिए किया गया था। 

जाति, लिंग और अन्य पहचान श्रेणियों को अक्सर मुख्यधारा के उदारवादी डिसकोर्स  में पूर्वाग्रह या प्रभुत्व के अवशेषों के रूप में देखा जाता है- अर्थात, ऐसे अंतर्निहित नकारात्मक ढाँचे जिनमें सामाजिक शक्ति उन लोगों को बाहर निकालने या हाशिए पर डालने के लिए काम करती है जो भिन्न होते हैं। पहचान राजनीति को मुख्यधारा के उदारवादी प्रवचन में सामाजिक न्याय की प्रचलित अवधारणाओं के साथ तनाव में देखा गया है। फिर भी, कुछ स्त्रीवादी और नस्लीय मुक्ति आंदोलनों की कुछ धाराओं में यह विचार निहित है कि अंतर को चिह्नित करने में सामाजिक शक्ति प्रभुत्व की शक्ति नहीं होनी चाहिए; यह राजनीतिक सशक्तिकरण और सामाजिक पुनर्निर्माण का स्रोत हो सकती है।

कई महिलाओं का अनुभव की जाने वाली हिंसा उनके पहचान के अन्य आयामों, जैसे कि जाति और वर्ग, से आकार लेती है अंततः महिलाओं के खिलाफ हिंसा के संदर्भ में, यह अंतर का नजरअंदाज करना समस्याग्रस्त है।  इसके अलावा, समूहों के भीतर अंतर को नजरअंदाज करना अक्सर समूहों के बीच तनाव में योगदान देता है, जो पहचान राजनीति की एक और समस्या है जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा को राजनीतिक बनाने के प्रयासों को निराश करती है।

महिलाओं के अनुभवों को राजनीतिक बनाने के स्त्रीवादी प्रयास और रंग के लोगों के अनुभवों को राजनीतिक बनाने के विरोधी नस्लवादी प्रयास अक्सर इस तरह से चलते हैं जैसे कि वे मुद्दे और अनुभव एक दूसरे के अनन्य क्षेत्र पर होते हैं। हालाँकि नस्लवाद और लिंगवाद वास्तविक लोगों के जीवन में आसानी से जुड़ जाते हैं, जैसा  वे स्त्रीवादी और विरोधी नस्लवादी प्रथाओं में शायद ही जुड़ते हैं। और इसलिए, जब ये प्रथाएं पहचान को “महिला” या “रंग का व्यक्ति” के रूप में एक या दूसरे प्रस्ताव के रूप में पेश करती हैं, तो वे रंग की महिलाओं की पहचान को एक ऐसी स्थिति में डाल देती हैं जो बताने के खिलाफ प्रतिरोध करती है।

विभिन्न श्रेणियों के बीच का इंटरसेक्शन से तात्पर्य है लिंग (जेन्डर) का जाति, वर्ग, पहचान और अन्य कई श्रेणियों के साथ प्रतिच्छेदन। यह व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक प्रथाओं, संस्थागत व्यवस्थाओं और सांस्कृतिक विचारधाराओं में शक्ति के परिणामों को कैसे आकार देता है, कैसे यह हमारे अनुभवों, समुदायों और महिलाओं के अनुभवों को कैसे आकार देता है, इस पर केंद्रित होता है। कैसे महिलाओं के जीवन में विभिन्न और बहुस्तरीय भेदभाव होते हैं। इंटरसेक्शनालिटी को इस प्रकार समझा जा सकता है कि विभिन्न शक्ति संरचनाएं, जैसे जाति और पहचान, कैसे परतदार और बहुस्तरीय भेदभाव उत्पन्न करती हैं। कैसे विभिन्न पहचान जैसे जाति, वर्ग और लिंग महिलाओं के सशक्तिकरण के संघर्ष को प्रभावित करते हैं। उत्तर-आधुनिक सैद्धांतिक दृष्टिकोण से प्रेरित होकर, यह महिलाओं के अनुभवों और उत्पीड़न को समझने में द्विआधारी विरोध और यह मानता है कि वंचित समूहों के भीतर भी, शक्ति और अनुभव के विभिन्न स्तर हो सकते हैं।

यह विचार इस बात को नहीं नकारता कि केवल सामूहिक रूप से हाशिए पर रहने वाले समुदायों के साथ हो रहे भेदभाव महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह भी समझाता है कि इन समुदायों के भीतर भी कई और भिन्न-भिन्न अनुभव और उत्पीड़न होते हैं, जो एक महिला को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, एक शिक्षित शहरी महिला और एक आदिवासी महिला बिना भूमि के अलग-अलग प्रकार के अनुभव और चुनौतियों का सामना करती हैं।

लिंग और इंटरसेक्शनालिटी को एक एकीकृत दृष्टिकोण के रूप में समझा जा सकता है, जो कई प्रकार के भेदभावों की पहचान और विश्लेषण करता है। यह केवल विभिन्न पहचानों या भेदभावों का योग नहीं है, बल्कि उनके संयोजन से अधिक जटिल और बहुस्तरीय भेदभाव उत्पन्न होते हैं।

इंटरसेक्शनालिटी हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को कई दिखाई देने और अदृश्य भेदभावों का अनुभव करने के रूप में पहचानती है। उदाहरण के लिए, कई आदिवासी आंदोलनों में महिलाओं की स्थिति के बारे में बात नहीं की जाती है क्योंकि समुदाय पहले से ही सामूहिक रूप से हाशिए पर है और महिलाओं के भेदभाव के मुद्दे को उठाने से आंदोलन में विभाजन हो सकता है।

इस प्रकार, इंटरसेक्शनालिटी सिद्धांत महिलाओं के अनुभवों को समझने और उनके साथ होने वाले भेदभाव को देखने के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है। यह लिंग, जाति, वर्ग और अन्य पहचान श्रेणियों के बीच के संबंधों को समझने में मदद करता है और यह दिखाता है कि कैसे ये संबंध महिलाओं के जीवन को प्रभावित करते हैं।

मीरा का काव्य और स्त्री अस्मिता का प्रश्न

वर्तमान समय में स्त्री अस्मिता का प्रश्न चिंतन के केन्द्र में है। युगों से संघर्षरत नारी अपने हिस्से की ज़मीन और अपने हिस्से के आकाश को तलाश रही है और आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता का शंखनाद कर रही है। किंतु अभी भी बहुत सारी गाँठें हैं जिनका खुलना बाकी है, तभी इस पितृसत्तात्मक समाज में नारी सफल, सक्षम और सुरक्षित हो पाएगी। एक स्त्री द्वारा स्त्री अस्मिता की, उसकी दृष्टि, सोच, मनःस्थिति एवं समस्याओं की पड़ताल और विश्लेषण है स्त्री विमर्श। स्त्री विमर्श के प्रवाह में संत कवयित्रि मीरा पर चर्चा करते हुए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भक्तिकालीन मीरा का काव्य आधुनिक स्त्री विमर्श का अंग हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर हमें भक्ति आंदोलन के उद्भव तथा विकास की पृष्ठभूमि और स्वयं मीरा के काव्य से मिल जाता है। भक्त मीरा का काव्य केवल भक्तिभाव की अभिव्यक्ति नहीं है। उनके काव्य में भक्ति की गहनता के साथ ही तत्कालीन दमनकारी सामंती व्यवस्था में घिरी एक स्वतंत्रचेता  नारी के प्रतिरोध के तीखे स्वर हर कदम पर विद्यमान हैं।

भक्ति युग को व्यापक लोक जागरण का युग कहा जाता है। भक्तिकाव्य में मध्ययुगीन सामंती जड़ताओं के विरोध के साथ-साथ समाज और संस्कृति के पुनर्निमाण की चेतना विद्यमान है। भक्त कवियों की सबसे बड़ी शक्ति ईश्वर की सर्वव्यापकता व सर्वसुलभता की प्रतिष्ठा कर सामान्य जनता में आत्मगौरव बोध जगाना है। इसके लिए उन्होंने जनता को सामंती समाज के धार्मिक-सामाजिक अन्तर्विरोधों के प्रति सचेत किया। उनके द्वारा निरूपित ईश्वर के स्वरूप में सामान्य जन के विषमतापूर्ण जीवन के प्रति गहरी करुणा और इससे मुक्ति का प्रयत्न था। यही कारण है कि समाज के दलित-वंचित वर्गों की भक्ति-आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मीरा के काव्य को पढ़ते हुए हमें इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना अनिवार्य है। मीरा-काव्य में निहित परिवार, कुलकानि, राजसत्ता के विरुद्ध विद्रोह की प्रवृत्ति को अनदेखा कर अलौकिक ईश्वरीय सत्ता से जुड़ने की अभिलाषा के रूप में उनके काव्य को पढ़ा गया, जबकि यह मीरा के काव्य का केन्द्रीय स्वर नहीं है। मीरा के भीतर की स्वतंत्रचेता स्त्री उनके काव्य के केन्द्र में है, जो पितृसत्तात्मक समाज की चौकस दृष्टि तथा दबाव से मुक्त होना चाहती है। इस संबंध में प्रख्यात आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी पुस्तक “मीरा का काव्य” में लिखते हैं-

“मीराबाई की कविता भी भक्ति आंदोलन, उसकी विचारधारा और तत्कालीन समाज में नारीस्थिति से उनकी टकराहट का प्रतिफलन है।… भारत में मानवीयता और दलितोध्दार का संबंध वर्णव्यवस्था और नारी पराधीनता से रहा है। इसीलिए भारत में जब-जब कोई मानवीय विचारधारा लोकप्रिय और व्यापक आंदोलन को जन्म देती है, तब-तब उससे प्रेरित साहित्य वर्णव्यवस्था और नारी पराधीनता पर प्रहार करता है।…भारत की आधुनिकता वस्तुतः मध्यकालीनता का विरोध करने वाली मध्यकालीन प्रवृतियों का विकास है।“1.

भक्ति आंदोलन की विशेषता यह थी कि यह भावना के धरातल पर सबको समान मानता था। इस आंदोलन के रूढ़िविरोधी रूप को समझने के लिए इस बात पर गौर करना ज़रूरी है कि विश्व भर में जहाँ भी सामंती व्यवस्था रही वहाँ शूद्र और नारी हाशिए पर रहे हैं, उत्पीड़ित रहे हैं। डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है-

“सामंती व्यवस्था जहाँ ज़्यादा पुरानी और मज़बूत होगी वहाँ जाति-पांति के भेद-भाव की तरह स्त्री और पुरुष में छोटे-बड़े का भेद भी ज़्यादा होगा।2.

भक्ति आंदोलन नारी को भी घर से उसी तरह बाहर आने का निमंत्रण देता था जिस प्रकार पुरुष को। लेकिन सामंती व्यवस्था नारी को विशेषतः-उच्च वर्ग की नारी को घर से बाहर निकलने की आज्ञा नहीं दे सकती थी। मीरा के भक्त जीवन का यही मूल भौतिक संघर्ष था। मीरा की कविता का परिवेश सीमित और व्यक्तिगत है। लेकिन वह इस व्यक्तिगत और सीमित परिवेश को तोड़‌कर बाहर आना चाहती हैं, बाहर आने से रोकी जाती हैं- बाहर न आ पाने की व्यथा का वर्णन -चित्रण करती हैं, तो परिवेश अपनी विषमता से युक्त बाह्य समाज का भी संकेत कर देता है। मीरा के काव्य में सर्वाधिक मुखर है, विवाह संस्था के प्रति असन्तोष का भाव, जो राणाजी के जानलेवा षड्यन्त्र और सास-ननद के उत्पीड़न के जरिए उभरता है। सास लड़ती है, ननद खिजाती है, पहरा लगा दिया है, ताला जड़ दिया है-

“हेली म्हासूं हरि बिन रह्यो न जाय।

सास लड़े मेरी ननद खिजावै राणा रह्या रिसाय।3.

पहरो भी राख्यो चौकी बिठार्यो, तालो दियो जड़ाय।“

मीरा घर की चारदीवारी में रहकर सामान्य विधवा जीवन नहीं बिताना चाहती थीं। वह साधु संगति तथा कृष्णगुण कीर्तन द्वारा भावजगत में कृष्ण मिलन चाहती हैं और यही समाज में उनकी निंदा तथा राणा के कुपित होने का कारण है। आ. रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं-

“मीरा का काव्य उन विरल उदाहरणों में है जहाँ रचनाकार का जीवन और काव्य एक-दूसरे में घुल-मिल गए हैं, परस्पर संपर्क से वे एक-दूसरे को समृद्ध करते हैं।…… उनका काव्य सूर द्वारा विस्तार में चित्रित गोपियों की विरहोन्मुखता का ‘डिटेल’’ या ब्यौरा है।“4.

मीरा का समूचा काव्य उत्पीड़ित स्त्री के आर्त्तनाद और विरहिणी प्रिया के करुण हाहाकार का प्रामाणिक दस्तावेज है। मीरा का अपना कोई नहीं, केवल गिरधर गोपाल हैं। मीरा ने भाई बंधु, सगे-साथी सबको छोड़ा। साधुओं के साथ बैठे-बैठ कर लोकलाज खो दी। मीरा को लगन लग गई, अब जो होना है, हो :

“भाया छांड्‌या बन्धा छांड्‌या छांड्‌या सगा सूयां।

साधा ढिग बैठ-बैठ, लोकलाज खूयां।

……………………………….

मीरा री लगण लग्यां होणा हो जो हूयां ।“.5

इस पद में मीरा ने बाह्यांतर स्थितियों का सम्यक् परिचय दिया है। वे इस जगत में अकेली हैं। कोई उनका नहीं है, पति मृत हो चुका है। विधवा स्त्री के साथ नाते-रिश्तेदारों का व्यवहार सर्वविदित है। हरि के प्रति समर्पित हृदय ने बहुत वेदना सहकर प्रेम को पल्लवित किया है। वह प्रेम में हैं, उनका साधन साधुसंगति है, राणा का महल नहीं। अस्मिता को तलाश के क्रम में ही इस प्रकार का प्रेम और समर्पण घटित होता है, एक ऐसे प्रकाश-बिंदु से जो आदर्श जान पड़ता है और एक लम्बे संघर्ष तथा साधना के बाद मिलता है। अपनी पुस्तक “कहती हैं औरतें” में अनामिका जी ने इस बात को बड़े सुलझे हुए तरीके से बताया है-

“सिमिऑटिक स्तर वाला यह समर्पण ‘सिंबॉलिक’ व्यवस्था के कोमल-सहिष्णु-लज्जालु-कांतासम्मत समर्पण से बिलकुल भिन्न होता है क्योंकि इसमें एक (आदर्श) के स्वीकार में पूरी व्यवस्था का निषेध शामिल होता है। एक प्रेमी/भक्त और मिस्टिक की आत्मा इसी अर्थ में बागी होती है। जब मीरा कहती है- ‘मेरो तो गिरिधर गोपाल/दूसरो न कोय ‘तो एक के स्वीकार में पूरी व्यवस्था के निषेध का क्रांतिकारी दर्शन घटित होता दिखाई देता है।“6.

मीरा को अपनी असहायता का तीव्र बोध है। यह बोध जितना तीव्र है उतना ही हरि के प्रति समर्पण की भावना भी। पति की मृत्यु, सास-ननद की ताड़ना, पिता की मृत्यु, देवर राणां के षड्यंत्र और दुर्जनों की निंदा-इन सबने निश्चित ही मीरा को बहुत मानसिक यातना दी होगी। मीरा अनायास ही राजसत्ता, पितृसत्ता, कुलकानि को ठोकर मारती विद्रोहिणी नहीं बनी हैं। तिरस्कार से अधिक दमन और उत्पीड़न ने उनके भीतर की कोमलता और मनुष्यता को आहत किया है। इसलिए वो पूरी निर्भीकता से कहती हैं। “जो कोउ मोको एक कहोगो, एक की लाख कहोंगी।“ वे पूरी स्थिति का विश्लेषण कर सोचती हैं कि क्या अपने उत्पीड़क के साथ संबंध निर्वाह करना चाहिए? यदि नहीं तो क्या उसके भौतिक-सामाजिक संरक्षण में रहना चाहिए? आत्माभिमान से भरी मीरा आधुनिक विद्रोहिणी नारी से कम नहीं। “खीर खांड”, ‘दखणी चीर’, ‘माणक माती’ का परित्याग तो उन्होंने कब का कर दिया, फिर दो मुठ्ठी अन्न के लिए राणा की क्या धौंस। लोक में घुलने-मिलने, साधुसंगति करने तथा अपनी अस्मिता की रक्षा हेतु उन्होंने सामंती वैभव का परित्याग किया। राणा के देश में सब कुछ था–गहना, गांठी, हाथ का चूड़ा, काजल, महल, अटारी नहीं थे तो साधु। इसीलिए मीरा ने सब कुछ छोड़कर भगवा चादर पहन ली-

“महल अटारी हम सब त्यागे, त्याग्यो थारो बसनों सहर

काजल टीकी राणा हम त्यागा भगवी चादर पहर।“ 7.

अपने इस चुनाव के लिए मीरा को भारी लोकनिंदा सहनी पड़ी। असहिष्णु भारतीय समाज ने उन्हें क्या कुछ न कहा होगा, किन्तु अपनी धुन की पक्की मीरा पूरी ठसक के साथ कहती हैं-

“राणा जी म्हाने या बदनामी लगे मीठी। 8.

कोई निंदो कोई बिंदो मैं चलूंगी चाल अनूठी।“

वैराग्य मीरा को लोक और जगत दोनों से जोड़ता है। उन्हें सामाजिक पदानुक्रम में सबसे छोटे व्यक्ति के साथ संवाद की स्वतंत्रता देता है और वे पाती हैं कि दोनों के सुख-दुःख कितने समान हैं, तभी वे कहती हैं ‘घायल की गति घायल जाने।‘ वैराग्य ने मीरा के विद्रोह को नया आयाम देकर घर से बाहर स्त्री की अस्मिता और प्रतिष्ठा को स्वीकृति दी है। मीरा के काल तक स्त्रियों के लिए धर्मपरायणता का अर्थ था पति की सेवा, ग्रहस्थिक दायित्वों की पूर्ति, धार्मिक अनुष्ठानों में यथानिर्दिष्ट भागीदारी और साधु-सेवा। अध्यात्म से जुड़े दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करने की छूट उसे नहीं थी। तीर्थाटन, संन्यास आदि को स्त्रियोचित धर्म के प्रतिकूल माना जाता था। मीरा इस वर्जना को तोड़ती हैं। आज की स्त्री विमर्शकारों की तरह मीरा जानती हैं कि स्त्री-मुक्ति का रहस्य उसकी स्वतंत्र निर्णय क्षमता में निहित है। निर्णय लेना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण और जोखिम भरा है उस निर्णय की जवाबदेही के लिए स्वयं को तैयार करना। मीरा अपने हर निर्णय के लिए जवाबदेह हैं। साधु संगति की लालसा में वृन्दावन और काशी की गलियों में विचरती मीरा को साधु नहीं पुरुष मिले। यही कारण है कि मोहभंग के पश्चात मीरा साधुओं के संबंध में चुप्पी साध लेती हैं और बस इतना भर कहती हैं “कासी को लोग बड़ो बिसवासी, मुख मैं राम बगल मैं फाँसी।“

वस्तुतः मीरा मध्यकालीन वर्जनापूर्ण सामंती व्यवस्था की पीड़ित नारी, भक्त कवयित्री हैं। इस पीड़ित नारीत्व को भूलकर उनकी कविता को हृदयंगम नहीं किया जा सकता। यह उस बंधनग्रस्त नारीमन की अभिव्यक्ति है जिसके विषय में तुलसी ने लिखा था-

“कतविधि सृजी नारि जग माहीं 9.

पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।।“

निस्संदेह मीरा ने आत्मनिवेदन किया है। लेकिन उनका आत्म सामाजिकता और संघर्ष युक्त है। इसीलिए वह इतना प्रभावशाली है। सच्चाई की बहुत बड़ी पहचान यह है कि वह संघर्ष और विरोध आमंत्रित करती है। मीरा एक आत्माभिमानिनी, संवेदनशील, जागरूक स्त्री की तरह इस संघर्ष और विरोध का सामना करती हैं और स्त्री अस्मिता से जुड़े तमाम पक्षों को भक्ति, प्रेम, रहस्य आदि की अनुभूति के साथ अपने काव्य में अभिव्यक्त करती हैं। मीरा का व्यक्तित्व अपने समय का सबसे क्रांतिकारी व्यक्तित्व था। उनका काव्य और उसमें निहित स्त्री अस्मिता के प्रश्न आज के स्त्री विमर्श के लिए प्रेरणास्त्रोत और अनिवार्य कड़ी का काम करते हैं।

संदर्भ:-

1. मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन, 2021, प्राक्कथन, विश्वनाथ त्रिपाठी

2. निराला की साहित्य साधना, खण्ड 2, प्रथम संस्करण, पृ.सं 34-5, रामविलास शर्मा

3. मीराबाई की पदावली सं. परशुराम चतुर्वेदी, पद 42

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, 1994, पृ.सं.59, रामस्वरूप चतुर्वेदी

5. मीराबाई की पदावली, सं परशुराम चतुर्वेदी, पद 18

6. कहती हैं औरतें, वाणी प्रकाशन 2022, पृ.सं 13, अनामिका

7. मीराबाई की पदावली, सं. परशुराम चतुर्वेदी, पद 34

8. वही

9. रामचरितमानस, बालकांड, पृ.सं-66

डॉ. शगुन अग्रवाल

एसोसिएट प्रोफेसर

श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय

ई-मेल shagagar945@gmail.Com

अनुराधा ओस की कविताएँ

  1. यहाँ तालिबान नहीं बसता

    मुझे काबुल की सड़क
    की तरह
    नहीं इंतजार रौंदे जाने का,
    मैं हिज़रत नहीं चाहती
    मुझे इंतजार की सड़क पर
    अकेले ही चलना होगा।
    हमारे हाथों में बंदूकें हों
    या प्रेम के पत्र,
    ये कौन तय करेगा?
    मैं इंतजार करूंगी
    आखिरी दम तक
    उम्मीद की लौ जलने तक।
    प्रेम के आरण्यक में
    हाथ कुछ भी नही,
    साथ बहुत कुछ है
    यहां तालिबान नहीं बसता।

    2. कलपती स्मृतियाँ

    जबकि तमाम गाड़ियाँ
    गुज़र गई होंगी,
    तमाम पाँव उन सड़कों
    पर चल चुके होंगे,
    बुहार दी गई होगी सड़क पर बिखरी धूल और पत्तियाँ
    उस शहर की सड़क आज भी
    बाट जोह रही होगी,
    कालिदास की नायिका-सी!
    आषाढ़ के उस दिन कि

जब दो अनजान हाथ
एक दूसरे को स्पर्श कर रहे थे,
तमाम फूलों को खिलने की जमीन
तैयार हो रही थी
चिकनी सड़क पर हवा के साथ हिलती
कोई सूखी पत्ती,
उस स्पर्श को याद कर आज भी
इंतज़ार कर रही होगी।
और हम
समय के प्रवाह में बहकर,
न जाने कहाँ की यात्रा पर निकल चुके होंगे
अलग-अलग दिशाओं में
फिर न मिलने के लिए।
हम अपनी यात्राओं में
न जाने कहां चले जाते हैं,
अपनी स्मृतियों में गुम हुई
तमाम गुजरते दिनों के बीच
कोई तस्वीर ढूँढने ।


3.एक स्त्री की रात

अभी अभी सोई ही थी कि
दो हाथ झंझोड़कर जागते हैं
तब जब
आँखें किसी सपने की आगोश में
खोने ही वाली होती हैं ।
उन सपनों की चमक
आंखों में रंग भरने ही वाली होती हैं
तुम्हें चाहिए
सुख,चरम सुख
औरतें की रात की
परिभाषा बदल जाती है अक्सर,
तमाम जुड़े हाथ
उनकी प्रार्थनाओं को नेस्तनाबूत करने की कोशिश करते हैं ।
मेरी हथेलियां कितनी पपड़ाई हैं
मेरे बदन में कितना दर्द है
क्या तुम जानते हो?
मेरे मना करने पर तुम्हारी गद्दी
फिसलती नज़र आती है तुम्हें
रात आँखों का काजल नहीं  बनती
बल्कि कभी-कभी
मुर्दाघरों की शहतीर बन जाती है।।

4 .सबका कहना है
सबका कहना है कि
आपकी बोली से टपकती है
आपके शहर की गंध
सुधारिए मैडम!
लेकिन मेरे अंदर बसी
उस गाँव की गंध,उस गांव की हवा
रंग,पानी,मिट्टी सब-
एक साथ हमला कर देते हैं मुझ पर
मैं मोह में पड़ जाती हूँ ,
जैसे मिट्टी के ढेले पर गिरे
महुआ फूल अपनी सुगंध दे देते हैं उसे
कहीं न कहीं बची रह जाती है
आदिम गंध
मैं निखालिस शहरी नहीं हो पाती।  
मैं चाहती हूं
ये गंध बची रहे सबके अंदर
पहचान पत्र की तरह।

5. तुम वहीं रहना

सुनो तुम वहीं रहना
जहाँ खड़े रहना
जहाँ तुम हो
आगे बढ़ोगे तो
मेरा वज़ूद
पिघलकर तुम में
समा जाएगा ।
फिर कैसे निकलोगे मुझे खुद से
मैं नही चाहती तुम
मैं हो जाओ
मैं तुम हो जाऊं।


6. बुलाना
 
बुलाना
जितना आसान
विदा करना
उतना ही मुश्किल
बुलाने और विदा
के बीच में जो
रिक्ति है-
वही स्मृतियों के
कंधे पर टिका
 रहता है।


7.छिली हुई हथेलियाँ

जो औरतें
छिली हुई हथेलियों से
सहला रहीं हैं
अपनी ही पीठ
उन्हें समय की आँच
सिंझाती है
उनकी शिराओं में जमा नमक
उन्हें जीवन का
स्वाद बढ़ाने में उर्जा देता है
और अंगुलियों में
कातने और सीने के गुन
दुख को कातना
सीखा देता है
अपने लहू की आंच से
जीवित करती स्त्रियां
धरती से न जाने कहाँ चली गयी हैं
अपनी छिली हुई पीठ को
ढंक कर आँचल से
सहला रहीं हैं
शिलाओं का दुःख।

अनुराधा ओस

प्रकाशन : विविध पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित – हंस, वागर्थ, आजकल, लमही,समकाल,बनास जन ,स्त्री लेखा,दोआबा, पाखी,समय संज्ञान, पंजाबी पत्रिका:राग,समय साक्ष्य,भाषा,
संपादित किताब आँचलिक विवाह गीतों के संग्रह ‘मड़वा की छाँव में’



आलोक आज़ाद की ‘ईश्वर के बच्चे’ और अन्य कविताएं

  1. ईश्वर के बच्चे

क्या आपने,
ईश्वर के बच्चों को देखा है?

ये अक्सर
सीरिया और अफ्रीका के खुले मैदानों में
धरती से क्षितिज की ओर
दौड़ लगा रहे होते हैं

ये अपनी माँ की कोख़ से ही मज़दूर हैं
और अपने पिता के पहले स्पर्श से ही युद्धरत हैं

ये किसी चमत्कार की तरह
युद्ध में गिराये जा रहे खाने के
थैलों के पास प्रकट हो जाते हैं
और किसी चमत्कार की तरह ही अदृश्य हो जाते हैं

ये संसद और देवताओं के
सामूहिक मंथन से निकली हुई संतानें हैं
जो ईश्वर के हवाले कर दी गयी हैं

ईश्वर की संतानों को जब भूख लगती है
तो ये आस्था से सर उठा कर
ऊपर आकाश में देखते हैं
और पश्चिम से आए देवदूतों के हाथों मारे जाते हैं

ईश्वर की संतानें
उसे बहुत प्रिय हैं
वो उनकी अस्थियों पर लोकतंत्र के
नए शिल्प रचता है
और उनके लहू से जगमगाते बाज़ारों में रंग भरता है

मैं अक्सर
जब पश्चिम की शोख चमकती रात को
और उसके उगते सूरज के रंग को देखता हूं
मुझे उसका रंग इंसानी लहू- सा
ख़ालिस लाल दिखाई देता है।

2- राष्ट्रहित में

वो जंगल में
लकड़ी बटोरती है

वो नहीं डरती शेर के दहाड़ से
खूंखार भेड़िया उसे रत्ती भर नहीं डराता

पर उसे डर लगता है
मेरे मुल्क के पुलिसिया तंत्र से
सरकारी आदमी और सरकार से

वो खौफ़जदा है
इस ख़्याल से
कि उसकी नदियाँ, उसके पहाड़
और वो खुद

एक दिन मार दिये जायेंगे
“राष्ट्रहित” में

3- प्रेम कथाओं के खिलाफ़

ये प्रेम में
अपना सर्वस्व सौंपने
वाली कथाओं के
खंडन का वक़्त है

तुम अपने हिस्से का
सूरज और चाँद
बचाए रखना

मेरे और तुम्हारे
एक हो जाने में

तुम्हारी मृत्यु की
अपार संभावनाएँ हैं

तुम जीना मेरे साथ
जैसे जीती है
एक समूची देह
अपनी आत्मा बचाए हुए।

4- आधुनिकता

मैं इक्कीसवीं सदी के
आधुनिक सभ्यता का आदमी हूँ

जो बर्बरता और जंगल
पीछे छोड़ आया है

मैं सभ्य समाज में
बेचता हूँ अपना सस्ता श्रम
और दो वक़्त की रोटी के बदले में
मैंने हस्ताक्षर किया है

आधुनिक लोकतंत्र के उस मसौदे पे
जहाँ विरोध और बगावत
दोनों ही सभ्यता का उल्लंघन है

इस नए दौर में
सब ठीक हो चूका है
हत्याओं के आंकड़े शुन्य हैं
और मेरे ऑफिस में लगी टीवी में
हताश चेहरे अब नज़र नहीं आते हैं

पर ये बात
मैं उस आदमी को नहीं समझा पाता
जिसे कोसो दूर जंगल में
लोकतांत्रिक राज्य की
लोकतांत्रिक पुलिस की गोलियों से
छलनी कर दिया गया है

मैं
एक सभ्य नागरिक हूं
जिसमें पीड़ाएं यात्रा नहीं करती
वो घड़ी की सुइयों की भांति
अनुशासन से चलती रहती हैं

और मैं भी
भागता रहता हूँ
सुबह से शाम

जैसे लहराती हो
कोई लाश
अपने जिन्दा होने के भ्रम में ।

5- डायन और बुद्ध

कुछ औरतें
अपने पतियों
और बच्चों को सोते हुए
अकेला छोड़ चली गईं,
ऐसी औरतें
डायन हो गईं,

कुछ पुरुष
अपने बच्चों और बीवियों
को सोते हुए
अकेला छोड़ चले गए,
ऐसे पुरुष
बुद्ध हो गए,

कहानियों में
डायनों के हिस्से आएं
उल्टे पैर
और बच्चे खा जाने वाले
लंबे, नुकीले दांत,

और बुद्ध के
हिस्से आया
त्याग, प्रेम,
दया, देश,
और ईश्वर हो जाना।

मां का प्रेम

मेरी माँ ने कभी,
प्रेम किया होगा,
लेकिन ब्याही गयी,
वो मेरे पिता से,

कभी -कभी याद आता होगा,
उसे उसका प्रेमी,
कभी -कभी वो पत्नी नहीं,
प्रेमिका होती होगी।

आलोक आज़ाद . अलोक आज़ाद के दो काव्यसंग्रह प्रकाशित हैं।
‘दमन के खिलाफ’, ‘ईश्वर के बच्चे’। कुछ कविताएँ मराठी भाषा में अनुवादित हुई हैं।
संपर्क : 8826761692

‘कुतों के रूपक’ में इंसानियत का प्रतिबिम्ब

नासिरा शर्मा के उपन्यास अल्फ़ा बीटा गामा की समीक्षा कर रही हैं शिवानी सिद्धि।

लेखक का अवलोकन और पर्यवेक्षण अभिव्यक्ति और विश्लेषण में कितना सूक्ष्म, गहन और विस्तार पा सकती है, इसका अद्भुत उदाहरण है, नासिरा शर्मा का उपन्यास अल्फ़ा बीटा गामा शीर्षक कथानक के साथ अपनी बुनावट में कई परतों में खूबसूरती से गुँथा हुआ, संवेदना के स्तर पर बहुआयामी है । जबकि अभिव्यक्ति पर पहरे हो, घुटन से चीख भी न पायें तो साहित्यकार ही ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे’ उठाने का जोखिम ले सकता है! फ्लैप पर वे लिखतीं हैं-“जीवन अधिकार की विभिन्न श्रेणियों के प्रति बड़ी काग़ज़ी जागरूकता के बावजूद जीवन के अनेक पहलू आज भी हमारी संवेदनहीनता के शिकार है। कोरोना की पृष्ठभूमि में रचा यह उपन्यास भूखे,लाचार, बेघर (आवारा नहीं ) जानवरों पर हुए अत्याचारों के साथ ही एक झटके में बेघर हुए गरीब मजदूरों, वंचित-शोषितों की दुर्दशा को बताता है। इसके साथ ही हाशिये पर जाते मुस्लिम समाज की दशा पर भी चिंता व्यक्त करता है कि किस तरह धर्म के आधार पर इन्हें      अलग-सा महसूस करवाया जा रहा है, उनके अधिकारों में सेंध लगाईं जा रही है। क्यों उन्हें ही देश के प्रति ईमानदार होने का बार-बार प्रमाण देना पड़ता है? इन सबके बीच विश्व के ज्वलंत मुद्दे पर्यावरण और प्रकृति को भी रेखांकित करती हैं । शीर्षक किसी साइंस फिक्शन की तरह लग सकता है लेकिन यह अनोखे ढंग का ‘सोशल-फिक्शन’ है जो बेजुबान जानवरों के माध्यम से‘समाजवैज्ञानिक दृष्टिकोण’ सामने रखता है। कोरोना काल और उसके बाद तमाम आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, और धार्मिक यथार्थ की विकृत तस्वीर अधिक स्पष्ट होती गई जिसमें भूख, भय, असुरक्षित जीवन, संवेदनाओं का निरंतर पतन सांस्कृतिक ह्रास और महत्वाकांक्षाओं ने युद्ध का स्थायी वातावरण बना दिया।बस सारा मामला जीने के संघर्ष का है।’ इस संघर्ष के भीतर से जीवन अमृत खोज लाने का सुंदर प्रयास यह उपन्यास है।

मनुष्य के पास पाँच प्रकार की ब्रेन वेव्स होती है अल्फा, बीटा,थीटा, डेल्टा और गामा। ये ब्रेन-वेव्स ही जीवन निर्धारित करती हैं, जिंदगी बदल सकती हैं, बेहतर, बेहतरीन या बर्बाद कर सकती हैं, इसमें सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर है, ‘गामा वेव्स’ लेकिन इसे अर्जित करना आसान नहीं। हमेशा क्रियाशील हमारे मस्तिष्क में कुछ रिद्म या पैटर्न पैदा होते हैं, इस प्रक्रिया में  डेल्टा और थीटा हमारे गहन अवचेतन में बैठी रहती हैं यानी गहरी नींद के समय हमारे शरीर को आराम देती हैं। जब ‘अल्फा वेव्स’ मस्तिष्क को प्रभावित कर रही होती हैं तो इमेजिनेशन और क्रिएटिविटी पावर अच्छी हो जाती है, ‘बीटा वेव’ से जुड़ने के बाद इसमें लॉजिक या तर्क-वितर्क क्षमता भी जुड़ जाती है। अल्फा और बीटा में तमाम सकारात्मक, नकारात्मक ऊर्जा शक्तियाँ निहित रहती हैं, इन शक्तियों का सही इस्तेमाल कैसे किया जाए इसकी जिम्मेदारी ‘गामा वेव’ के पास है। उपन्यास की यात्रा इन्हीं ‘गामा वेव्स’ को पकड़ने के उपक्रम में इंसानियत की खोज करती है जो कुत्तों की कथा में साकार होती है।     

उपन्यास विविध घटनाओं, दृश्यों,वर्तमान परिप्रेक्ष्य-परिदृश्यों को कुत्तों के माध्यम से, मनुष्य की प्रतिक्रियाओं के साथ जोड़कर वाईस-वरसा प्रस्तुत करता है। मनुष्य जीवन से जुड़ी विविध घटनाएँ, इन  पशुओं के जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं, जिस पर हमारी नज़र नहीं जाती अथवा हम नजरंदाज़ कर देते हैं, इसका उल्लेख नासिरा जी ने आरम्भ में ही कर दिया। जिस घूरे या कूड़ेदान पर कितने ही जानवरों का जीवन निर्भर है, चुनावों के चलते ‘स्वच्छता अभियान’ ने छिन्न-भिन्न कर दिया, सभी जगह बड़े-बड़े लाल-नीले कूड़ेदान रख दिए गए, परिणामत: कुत्तों की भीड़ बाजारों में लगी हुई है, गायों का हाल अच्छा नहीं था, पहले वे कूड़े के ढेर पर खड़ी मिल जाती थी, अब सड़कों पर भटकती हैं, यही हाल सुअरों का है। नासिरा जी का यह सूक्ष्म विश्लेषण विचारोत्तेजक है कि सफाई बेसहारा (आवारा नहीं) जानवरों के लिए अनजाने ही भुखमरी ले आई तिस पर जब भूख से ये जानवर रात में रोते हैं कहा जाता है कुत्ते-बिल्ली का रोना अपशकुन माना जाता है। तिवारी जी ने सर्दी में ठंडा पानी और सारी बर्फ इन कुत्तों पर फेंक दी” सुरक्षा के नाम पर अपनी सहूलियत के लिए जानवरों को मार देना मनुष्य की फितरत है। 216 पृष्ठों में समाया उपन्यास जितना फैला हुआ दीखता है, उससे कहीं अधिक गहन अर्थ देता है। पढ़ते हुए परत-दर-परत आप जीवन से जुड़े कई पक्षों पर विचार करने को विवश होते हैं। ऐसे ही पृष्ठ संख्या 42 से लेकर 44 तक कुत्तों की तमाम जातियों का विस्तार से वर्णन है, और उनकी तुलना लड़कियों या आदमियों से करना भी इस बाद की पुष्टि करता है कि कथा कई परतों में गुँथी हुई है, जैसे मोती जो स्वतंत्रता प्रेमी है, बाकी कुत्तों से अलग-अलग रहता था, उसकी नज़र में पालतू कुत्ते अपने सम्मान को गिरवी रखने वाले, हरेक के पीछे दुम हिलाने वाले चापलूस होते हैं, इंसानों में भी ऐसी प्रजातियाँ बहुतायत में है ।

‘भय’ जानवर को ही नहीं, इंसान को भी मारने-काटने पर मजबूर कर देता है वे बताती हैं कि 2015 में पड़ोसी देश ने एक साथ हज़ार कुत्ते मारे थे, इसी गद्यांश का अंतिम वाक्य है कि जबर्दस्ती लादे गए युद्धों में सैकड़ों जवान मारे जाते हैं या एक साथ दफना दिए जाते हैं,कोरोना में अज्ञानवश कहे या पूर्वाग्रह के चलते अथवा हमेशा से कुत्तों के प्रति एक घृणा रखने वाले लोग कुत्तों को जहर का खाना दे रहे थे, क्योंकि वे जाने क्यों मान बैठे थे कि कुत्ते कोरोना फैला रहे हैं। यहाँ हमें कोरोना टाइम में मार्च 2024 में तबलीगी समाज के प्रति घृणा भाव और सोशल मीडिया पर फैलाये गई नफ़रत का ज़हर याद आ गया वे संकेत करती है कि ये वही समय है जबकि विश्व में कोरोना दस्तक दे चुका था उसी कोरोना काल में  20 फरवरी 2024 में राष्ट्रपति ट्रम्प भी तो भारत आये थे। वस्तुत: कोरोना ने आम जनता को उदासीन बनाया, पस्त हो चुकी जनता रील्स देखने में मस्त है, नासिरा जी इन स्थितियों को कुत्तों की कथा के माध्यम सत्ता या शक्ति के विकेंद्रीकरण या ध्रुवीकरण को भी रेखांकित करती हैं । मुठ्ठी भर लोग गली के कुत्तों के पक्ष में हैं लेकिन अधिकतर उन्हें जहर देकर मार देना चाहते हैं, देश में भी नफरत का ज़हर   फैला हुआ है जिससे कोई भी बच नहीं पा रहा, धर्म का झुनझुना आम आदमी के हाथ में दे दिया और पूँजी पूँजीपतियों को, राजनीतिक चेतना का अभाव धार्मिक उन्माद में बदल चुका है, एक व्यवस्था ने जनता को पहले भीड़ में तब्दील किया यही भीड़ अब भेड़िए में तब्दील हो चुकी है, जो एक दूसरे की खून की प्यासी है ।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता ‘भेड़िये’ अगर आम जनता को भेड़ियों जैसे हिंसक, क्रूर, स्वार्थान्ध लोगों से लड़ने का साहस जगाती है तो आज की व्यवस्था में आपको भेड़िया बनाया जा रहा है, जहाँ भेड़ियों को जंगल की ओर खदेड़ने की बात होनी चाहिए थी, समाज में जंगलराज पनप रहा है । भूख, बेइज्जती, फटकार, मारपीट, भोजन का अधिक भाग ताकतवर के पास चले जाना और कई पूर्वाग्रह के चलते एक उग्रवादी कुत्ता’ मोहल्ले के मासूम बच्चे पर हमला कर देता है जबकि वह बच्चा एक नन्हें पिल्ले को प्यार कर रहा था लेकिन उसकी दुष्टता का भुगतान गली के बाकी कुत्तों को उठाना पड़ा। उनकी जमकर पिटाई हुई, कुत्तों की चीखम-धाड़ में पूरे मोहल्ले की चाम-चाम शामिल हो गए। सभी कुत्तों की मॉब लिंचिंग हुई। मॉब लिंचिंग पर पुलिस का लापरवाह नजरिया देखिए पेट्रोलिंग पुलिस की गाड़ी गुजरी, सारी बात सुनकर पुलिस ने इधर-उधर देखा… यहाँ तो कुछ नजर नहीं आ रहा कहकर हँसा और आगे बढ़ गया जनता नहीं जान पा रही कि यही नियति उनकी भी हो सकती है।कितना दुखद है कि मॉब लिंचिंग करते हुए जनता नहीं मानती कि हम हत्या कर रहे हैं, सत्ता नीतियों ने व्यवस्था को कमजोर, जनता को बेरोजगार, बेबस और हत्यारों में परिवर्तित कर संवेदनहीन, क्रूर, हिंसात्मक और बदले की भावना से पोषित किया है ये किसी से छिपा नहीं । पुलिस-न्याय का बेपरवाह रवैया सत्ता की निरंकुशता को नज़रन्दाज करता है ।

 नासिरा जी लिखती हैं “अपने समाज को दो फाँको में बँटा देखकर कुछ कुत्तेहरदम ताव में रहते।…कुछ चौकीदार कुत्ते हाशिए पर पड़े कुत्तों को मुँह नहीं लगाते थे” तोये संदर्भ हमारे समाज से अलग नहीं,  हमारा समाज कई फाँकों में बंटा हुआ है। यहाँ सड़कों पर सोने वाले लोग भी हैं तो महलों में रहने वाले भी, जिनकी छत पर हेलिकॉप्टर उतरतें हैं।यहाँ खाना फेंकने वाले भी हैं और उसी फेंके हुए खाने को खाने वाले भी। ये समाज का वो वर्ग है जो किसी भी हाशिये के विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाया। शादियों, त्योहारों, उत्सवों तथा होटलों में कितना ‘जूठन’ कूड़े में फेंक दिया जाता है, जो किसी भूखे का पेट भर सकता है लेकिन वे कूड़े से खाना बीनकर खाते हैं। वे लिखती हैं भूख से बड़ा ना कोई सच है ना कोई दर्शन  इसी ‘जूठन’ पर आत्मकथात्मक उपन्यास हमारे सामने है। नासिरा जी भूख, अपमान और उपेक्षा की कहानी ‘कफ़न’ का सन्दर्भ देती हैं जब मोती गरम-गरम समोसे निगल जाता है, उसे क्या पता था कि कहानी सम्राट प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘कफन’ में गरम-गरम भुने आलुओं को कितनी तेजी से बाप बेटे से निगलवाया था, सच तो यह है कि ‘भूख’ न तो मृत पत्नी को याद रख पाती है ना प्रेयसी-सी की याद भूख मार सकती है’। कोरोना ने बेरोजगारी और भुखमरी में इजाफा किया एक ओर सोशल मीडिया पर हर पल व्यंजनों की रेसिपी के वीडियो बढ़ रहे थे दूसरी ओर दो रोटी के जुगाड़ न कर पाने वाला मजदूर पैदल ही गाँव की ओर लौट रहे थे, मर रहे थे, कोरोना से नहीं भूख से । भूख ने देसी कुत्तों के तेवर को गिरा कर रख दिया था। आज उनके अंदर का क्रांतिकारी मर चुका था मरता क्या न करता इस तरह आरंभ से ही समझ में आने लगता है कि उपन्यास सिर्फ कुत्तों की बात नहीं करने वाला बल्कि कुत्तों के समानांतर मनुष्य और मनुष्यता की भी बात करेगा इसलिए पढ़ते हुए अतिरिक्त सावधानी की माँग करता है। मजदूरों,कामगारों से घर खाली करवा किये गए और सरकार कह रही थी घरों में रहो लेकिन घर है कहाँ?  

उपन्यास में कार्तिक कहता है किकहने को हमारे यहाँ कुत्तों और इंसानों के लिए बेहतरीन क्लीनिक व महँगे हॉस्पिटल मौजूद है मगर किस ‘वर्ग’ के लिए?  खुद को ‘डॉग लवर्स’ कहने वालों में अधिकतर के लिए कुत्ता पालना शौक है, शौक महँगे होते हैं, आम आदमी किसी भी कुत्ते को लेकर इन महँगे क्लीनिक या हॉस्पिटल में फटक भी नहीं सकते। इसी तरह फाइव स्टार होटल्स की-सी सुविधाओं से लैस स्कूल और सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों की महँगी सेवा भी पैसे वाले लोग ही लेते हैं। स्लम कॉलोनी में झुग्गी झोपड़ियों में, गंदे नालों के आसपास इन जानवरों की लाश सड़ रही होती है झोपड़-पट्टी और तंग गलियों के लोग इसके आदी हो जाते हैं” यानी गंदगी का आदत में शुमार हो जाना जीवन संघर्ष का हिस्सा बना जाता हैं जहाँ ‘मौत हादसे की तरह’ आकर चली जाती है। गाहे-बगाहे असंवेदनीयता की आदत भी तो विकसित की जा रही है ।

मोती नामक कुत्ता जो आज भी फेंके हुए टुकड़े नहीं खाता’आपको बरबस एंग्री यंग मैन की याद दिलाएगा जो फेंके हुए पैसे नहीं उठाता था, व्यवस्था के प्रति उसका विद्रोह मोती को एंग्री यंग मैन समकक्ष ला खड़ा करता है । प्रेमचंद के दो बैलों में से  विद्रोही प्रवृति का ‘मोती’ है जिसकी वजह से अंत में आज़ादी भी मिलती है। कहानी में मूक पशु मोती और हीरा आपस में बतियातें हैं और दुनिया जहान के मानवीय जीवन से जुड़ी नैतिकताओं या मूल्यों की बात करतें हैं, पशु मनोविज्ञान को समझते हुए उसे मानवीय सरोकारों से भी खूबसूरती से पिरोया है । इस उपन्यास के चिरकुट, लेंडी, उग्रवादी कुत्ते या अन्य बेचारे बीमार, डरे हुए कुत्ते भी वर्तमान परिदृश्य के साक्षी बनते हैं, जो कई स्थलों पर स्पष्ट मुखर है      अथवा मुख्य कथा के भीतर गूँथकर वे उस पक्ष को सामने रखती है जिसे कहना संभवत: आज के परिवेश में आसान नहीं था। “सड़क पर और भी आवारा जानवर गायें, साँड़,सूअर, बिल्ली घूमते फिरते हैं पर उनकी इतनी बेइज्जती नहीं होती जितनी हम ‘कुत्तों’ की होती है, मोती बड़बड़ाता है यह वाक्य    मुस्लिम समाज के दर्द को भी सूक्ष्म संकेतों में समझाता है। जहाँ गायों की सुरक्षा को लेकर लिए इतना संघर्ष हो रहा है, मारकाट, मॉब लिंचिंग हो रही है फिर भी वे कूड़े में मुँह मारती फिरती है, सड़कों के बीच परेशान होती हैं, सड़क पर पड़ा घिन्नाता गोबर क्या ‘गोबरधन’ बन सकता हैं? जो भारत सरकार की एक योजना है जिसमें जैविक कचरे मवेशियों के गोबर कृषि अवशेषों से बायोगैस, सीबीजी, बायो सीएनजी में बदला जाता है, पर ये गायें खेतों में न होकर खुली सड़कों पर घूम रही हैं, जब इनके लिए कोई प्रावधान नहीं तो इन गलियों के कुत्तों के पर कौन ही बात करेगा? नासिरा शर्मा पूरे तर्क के साथ उनके दुःख दर्द को मार्मिकता से उड़ेल कर रख देती हैं । जिस तरह गायें हमारे लिए एक पवित्र पशु है उसी प्रकार से इन कुत्तों से जुड़ी हिन्दू माईथोलोजी की कथाएँ हमारे सामने रखती हैं, जैसे काले कुत्ते को भयानक देवताओं के रूपक के रूप में देखा जाता है, भैरव लोर्ड शिव के अवतार हैं उनकी सवारी है कुत्ता, दीवाली के एक दिन पहले नेपाली कूकुर त्योहार मनाते दार्जलिंग सिक्किम और पूर्वी बंगाल में भी लोग कुत्तों की पूजा करते हैं,यम के पास चार कुत्ते रहते हैं तो युधिष्ठिर ने अपने कुत्ते के साथ स्वर्ग का रुख किया इसलिए धारणा है कि कुत्तों की सेवा से स्वर्ग-मार्ग मिल जाता है,चीन में ड्रैगन डॉग इंसान का रूप धारण कर लेता है हमारे यहाँ तो लड़कियों की शादी की जाती है ताकि बुरे ग्रह बदल जाएँ, बाइबल और दूसरे पवित्र ग्रंथों में भी नूह नामक पैगम्बर का जिक्र है नूह के सामने घायल कुत्ता और उसकी गन्दगी को देखकर जब नूह ने उसे दुत्कारा तब कुते ने कहा कि मैं न अपनी मर्ज़ी से कुत्ता हूँ,न तुम अपनी पसंद से इंसान हो बनाने वाला तो सबका वही एक है नूह उसकी बात सुनकर मुद्दतों रोते रहे, किस्सा रसूल ने खुद फरमाया कि अगर पानी कम हो और कुत्ता प्यासा हो तो वजू का आधा पानी कुत्ते को देकर उसकी प्यास बुझाओ मगर देखता हूं लोगों के दिलों में बेजुबानो के लिए रहम नहीं है कुल मिलाकर इस कुत्ते नाम के जंतु से हमार पुराना अटूट और गहरा रिश्ता है बातचीत में ब्रिगेडियर का संवाद ‘मेरा तो मानना है कि हम इंसानों ने विकास के चलते अपना संतुलन,अनुशासन एवं मानवीय संवेदना खोई है’ वास्तव में भारतीय समाज के विविध धर्म, जाति और समुदायों की ऐतिहासिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को संकेतित करता है कि वे इस देश में आकर यहीं के हो गए,इस देश की संस्कृति को समृद्ध किया है वे  पराये नहीं है, उनके प्रति असंवेदनशील क्यों?   

इन्हीं कुत्तों की बढ़ती जनसंख्या से परेशान मोहल्ले वाले इन्हें ज़हर देकर मामला खत्म’ की बात भी करते हैं तो हमारे सामने वह तथ्य सामने आता है जबकि मुस्लिमों की तथाकथित बढ़ती जनसँख्या से चिंतित मुट्ठी भर नेता हिन्दू महिलाओं से ज्यादा बच्चे पैदा करने की गुहार लगते हैं, गोया कि महिलाएँ ‘बच्चे पैदा करने की मशीन हों! इसी के समानांतर यह प्रश्न भी उठता है कि ‘जनसंख्या विस्फोट’ मनुष्य की देन या कुत्तों की ? लेकिन अफ़सोस तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार दर्जन भर कुत्तों को पटाखों की आवाज के साथ एनकाउंटर कर दिया, लाशों को टैम्पों में भरकर जंगल में फिंकवा दिया, मोहल्ले के लोगों की फैमिली सेफ हो गई सुरक्षित हो गई आगे उग्रवादी कुत्तों के सन्दर्भ में लिखती हैं “नई पीढ़ी के कुत्तों में संकीर्णता एवं उग्रता बढ़ी है तबसे माहौल बदल गया हैन उग्रवादियों की दोस्ती अच्छी न दुश्मनीउग्रवादियों का कोई धर्म या जाति नहीं होती तो यहाँ उपेक्षा और असंतोष से पनपती उग्रता, असुरक्षा और असहनशीलता के माहौल में युवाओं की दयनीय मानसिक स्थिति की ओर भी इशारा है। ऐसे लोगों को हुनर देने की जरूरत है, शेख सदी अपनी हिकायत में कह चुके हैं – “बेहुनर हुनरमंदों को सहन नहीं कर सकते।’  भारत में अलग-अलग कई देशों के शरणार्थी आते रहें हैं जिनके लिए ‘शेल्टर होम’ (जैसे ‘बुलेट शेल्टर होम’)  बनाना जरूरी है यदि आप उन्हें दुत्कारेंगे, मारेंगे तो उनकी प्रतिक्रिया ‘उग्रता’ में बदलेगी ही। 

असलम उसकी पत्नी, सफ़ेदपोश बुज़ुर्ग, खान साहब और उनका मासूम बिल्ला ‘शाहज़ादा’ (जिसे प्रेम के नाम पर शहीद होना पड़ा,) बीबीजान और रिज़वान जैसे किरदार जाति, धर्म संप्रदाय आदि के नाम पर टुकड़े-टुकड़े हो रहे वर्तमान समाज के परिप्रेक्ष्य को गहनता से उभारते हैं। कब तक धैर्य रखा जा सकता है वे लिखती है- जबान पर पहरे बिठाने का अंजाम बड़ा भयानक होता है, ठीक जमीन के नीचे खदबदाते लावे की तरह।” सत्ता और वर्चस्व के मद में इनके खिलाफ ‘पाठ’ या पृष्ठभूमि तैयार करना, उनकी संस्कृति पर प्रहार करना, जिससे आने वाली कई पीढ़ियाँ मुक्त नहीं हो पायेगी, विभाजन की त्रासदी से ही मुक्त नहीं हो पाए कि जख्म कुरेदे जा रहे हैं, उस टीस और पीड़ा को समझना आसान नहीं। हम आज भी देख रहे हैं कि यहूदियों पर हिटलर के अत्याचारों ने उन्हें फिलीस्तीन के प्रति अति क्रूर बना दिया ‘जैतून के साये’ नामक कहानी का यह वाक्य सरहदों के विभाजन में पीढ़ियों के दर्द को रेखांकित करता है धर्मयुद्ध…क्या सचमुच पुराने को मिटाकर नया कुछ आता है और हर इन्कलाब अपने ही बच्चों को निगलने लगता है” भारत के सन्दर्भ में विभाजन के कारणों के लिए एक कौम पर कब तक बार-बार इल्जाम लगेंगे ? विभाजन के बावजूद जिन्होंने हिन्दुस्तान के प्रति प्रेम को भीतर बसाये रखा और यहाँ रहने का फैसला किया उनका क्या कसूर था? विभाजन और साम्प्रदायिकता जैसे संवेदनशील विषयों को उठाने से आज का साहित्यकार बचकर निकल जाता है लेकिन बतौर नासिरा जी जब अभिव्यक्ति न कर पायें हों तो घुट कर नहीं जिया जा सकता’,अल्फ़ा बीटा गामा उपन्यास इस घुटन की भी प्रखर अभिव्यक्ति है। इसलिए अंत में लिखतीं भी हैं अगर अहसास को पढ़नेवाला कोई दार्शनिक दोपाया वहाँ मौजूद होता तो वह ज़रूर लिख देता कि दुःख इंसान और जानवर में फ़र्क नहीं करता।  

‘कुतों के रूपक’ में समाज का प्रतिबिम्ब झाँक रहा है, कुत्ते प्रतीकात्मक और यथार्थवादी दोनों रूप में चित्रित हुए हैं पहला गद्यांश ही है उनकी हैसियत तो सड़क छाप थी, मगर रगों में बहने वाला खून विलायती मिश्रण का था, उनकी चाल-ढाल और शक्ल सूरत अलग तरह की थी। उन्होंने आजादी की कीमत पर गुलामी का पट्टा पहन रखा है”। मोहल्ले के देसी कुत्तों के लिए ‘क्रॉसब्रीड’ शब्द के तार कहाँ जुड़े हैं, अलग-अलग दृश्यों और संवादों से जुड़कर समझ आते हैं– ‘कुछ लोगों का शक असलम ड्राइवर की तरफ गया, जिसका कुत्ता कुछ दिन पहले एक हाजी को काट चुका था ’ इसलिए मोहल्ले वाले असलम को भला-बुरा कहते हैं, असलम तो नर्म स्वर में कहता है ध्यान रखेंगे लेकिन उसकी पत्नी कहती है “शक के नाम पर हमारे कुत्ते पर झूठ-मूठ इल्ज़ाम मत लगाना… सब कुत्ते की मौत मरेंगे! पति के कहने पर कि चुप रह अल्लाह की बंदी वह कहती  है – ‘चुप तो हम हैं यह सारा इलाका हमारे दादा का था, आज हम किरायेदार बने हुए है,लेकिन अब हम नहीं सुनेंगे किसी कुत्ते की बात’!   इस दृश्य में वे अपने ही देश में अपने ही लोगों के बीच बेगाने कर दिए गए लोगों की व्यथा कहती हैं। यहाँ रघुवीर सहाय की कविता याद हो आती है-

20 वर्ष हो गए भरमे, उपदेश में

एक पूरी पीढ़ी जन्मी पली पुसी

बेगानी हो गई अपने ही देश में’ 

मोहल्ले में कुत्तों को मार-मारकर भगा दिया गया, दूसरी ओर असलम की पत्नी का अपने अधिकारों की बात करना शाहीन बाग की जागरूक दृढ़ संकल्प महिलाओं की याद दिलाता है। महिलाओं के नेतृत्व में शाहीन बाग़ अहिंसक के आन्दोलन को कैसे भूला जा सकता है, जो नागरिकता संशोधन अधिनियम CAA के पारित होने के ख़िलाफ़ शुरू हुआ। नासिरा जी समाज में बढ़ते दहशत और आतंक को बड़ी सूक्ष्मता से पकड़ती है । विडम्बना यह भी है कि जो भीड़ पहले ‘तमाशबीन बन’ रामदास की हत्या चुपचाप देख रही थी आज भेड़िये बन वे हत्या में शामिल हो चुकी है। जिसे सत्ता का अघोषित आपातकाल कहा गया, अफ़सोस जनता का एक वर्ग इसे एन्जॉय कर रही है, भेड़िया-धसान चरित्र सत्ता गर्त में धकेल रही है । यह है आज का परिदृश्य इसलिए वे कुत्ते का ‘विशिष्ट रूपक’ रचती हैं, विशिष्ट इसलिए कि मानवीयता के गुण-धर्म आपको कुत्तों में भी मिलेंगे जो सदियों से मानव मित्र है, तो उग्रवादी कुत्ते भी लेकिन नासिरा जी इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि इन्हीं के बीच से हमें मानवीयता के बीज मिलेंगे, वे बड़ी संजीदगी से समाज की नब्ज़ को पकड़ रही है जिसे आज युवा पीढ़ी के लेखक नजरअंदाज कर आगे निकलने की होड़ में लगे हैं, जबकि उपन्यास शिद्दत से चित्रित करता हैं कि किस तरह बिना हत्या के बेमौत मारा जा रहा है, महत्वपूर्ण शब्दों की संकल्पनाओं को नष्ट-भ्रष्ट कर, नए शब्द और अर्थ नई नस्ल को नई जबान दी जा रही है जनता अभिव्यक्ति छीनी जा रही है उन्हें बेरोजगार कर, अनुशासन के नाम पर उनके भीतर इस तरह से डर बैठा दिया गया कि अपने अधिकारों के लिए कभी खड़े ना हो पा रहे हैं ।

ब्रिगेडियर साहब जिन्हें गली के लड़के श्रीमान अनुशासन प्रिय कहकर मज़ाक बनाया करते,सत्ता के प्रतीक हैं क्योंकि इनका ही ह्रदय परिवर्तन होना है,कथानक के साथ-साथ उनके चरित्र में सकारात्मक विकास होता भी है। अनुशासन उनके लिए सर्वोपरि है, वे कहतें हैं- ये सिविलियनस- न अनुशासन है इनमें ,न सफाई से रहते हैं… जिधर देखो ढेरों घूमते कुत्ते…सड़क के बीचों-बीच इस तरह तनकर खड़े हो जाते हैं जैसे शत्रुओं के सामने तोप हों! लेकिन भूख का अनुशासन से क्या लेना देना? ‘प्रेम’ का भी अनुशासन से कुछ लेना-देना नहीं वो किसी भी दायरे को नहीं मानता । घूरे या कूड़ाघर को “डॉग होटल” कहने में हास्य से अधिक विडंबना है कि इस ‘डॉग होटल’ में हमें कई भिखमंगे बच्चे भी दिख जाते हैं, जो इनसे खाना छीनकर खा रहे होते हैं। यह वही समाज है जिसे शुरू में दो फाँको में बंटा’ समाज कहा है लेकिन इस डॉग होटल में कितना कुछ जहरीला होता है, घरों से जो खाना फेंका जाता है, वह सड़ कर जहरीला हो जाता है,गायें-माता पॉलिथीन खा जाती है। ‘भूख’ से बौराएँ कुत्तें गुस्से और उत्तेजना में आने-जाने वालों को काट लिया करतें हैं। जब चौकीदार कुत्तों ने बुलेट पर हमला किया तो ब्रिगेडियर साहब ने अपनी छड़ी कुत्तों पर बरसा दी, उनकी दर्दनाक दशा देखकर कोई आगे नहीं बड़ा इंसान ना जानवरजब आपके पास छड़ी हो, ताकत हो, अनुशासन हो तो आप किसी पर भी अत्याचार कर सकते हैं ! भले ही यह अत्याचार अपने बचाव में क्यों ना हो?  सुरक्षा भाव से किया गया अत्याचार क्या अत्याचार नहीं कहलाएगा?  उधर मौका मिलते ही चौकीदार कुत्तों ने पुनः ब्रिगेडियर लाल के बुलेट पर हमला करना शुरू किया वे भूख से बेचैन थे, ईर्ष्या से वशीभूत थे, और कहीं ना कहीं बदले की भावना तो थी ही”। कुत्तों को मार कर उनके चेहरे पर विजय नहीं खीज भरा अफसोस था, ठीक उस नरम दिल फौजी अफसर की तरह जो जीत गया मगर जमीन पर बिछी असंख्य लाशों को देखकर दहल गया ’। यहाँ एक फ़ौजी के माध्यम से युद्दों की त्रासदी का मार्मिक चित्रण भी मिलता है जब वे अपने बेटे को याद करते हैं जो युद्ध में मारा गया।

ब्रिगेडियर लाल का अनुशासन के प्रति अतिरिक्त आग्रह वास्तव में आत्म-नियंत्रण के रूप में विकसित होता है, कार्तिक के अनुसार अनुशासन सुविधाओं से आता है बाद में ब्रिगेडियर कुत्तों के लिए बुलेट शेल्टर होम बनवाते है अर्थात वंचितों को सुविधाएं देनी होगी तभी आत्म नियंत्रण की स्थितियां पैदा होगी, भूख आपको नियंत्रित नहीं रहने वास्तव में भीतर बैठे भेड़िए या जानवर शैतान कुछ की कहिये उसे नियंत्रित करना है जब आप इस उपन्यास के कुछ दर्दनाक मार्मिक दृश्यों से गुजरेंगे आया होगा कोई कुत्ता, बिल्ली या बच्चा ट्रक के नीचे ” या “यह कैसे हुआ खान साहब? कुत्तों ने हमला कर दिया था क्या?…खान साहब  भर्राई आवाज़ में बोले” इंसानों ने हम कैसे, क्योंकर इतने संवेदनहीन हो चुके हैं!  याद कीजिये सोशल मीडिया जिसके तमाम तरह के वीडियोज़ आपको कुछेक भाव भय, हास्य, अश्लील-फूहड़ता तक सीमित कर रहे हैं या तो आपको डराया जा रहा है या हँसाया ! विडंबना यह कि रोमांच के लिए आप खोज-खोज कर और अधिक रोने वाले, डरने वाले और हँसाने वाले वीडियो खोजते हैं,आपकी संवेदनशीलता और आपके अन्य स्थायी भाव कहीं अंत:स्थल में चले गए हैं! कोरोना में और उसके बाद हालात बद से बदतर होते चले गये । काम धंधे खत्म है, बेरोजगारी अपने चरम पर है, लेकिन मोबाइल सबके हाथों में है, लोग रील बना रहे हैं, रील देख रहे हैं लेकिन रियल लाइफ़ से कहीं कोई नाता नहीं है। खाने के लिए रोटी नहीं लेकिन मोबाइल में पैसा चाहिए। नासिरा जी यहाँ ड्रग एडिक्शन की तरह ख़तरनाक डिजिटल एडिक्शन को रेखांकित कर रही हैं। कई मार्मिक वाक्य जिनके गहन अर्थ समझ आते हैं सरकार आखिर क्या-क्या देखें ? जब पूरी जनता मोबाइल पर दुनिया देखने में लगी हो तो वह अपने आसपास की परेशानियों को कितनी गहराई से भांप पाएगी’ शुरू मेंफ्री में डाटा उपलब्ध करवा कर डिजिटल एडिक्ट बनाया गया है,   उपन्यास में ड्रग एडिक्शन से जूझ रहे व्यक्ति की मौत का दर्दनाक दृश्य हमें देखने को मिलता है, वह दिन दूर नहीं जब हम डिजिटल एडिक्शन के चलते रियल लाइफ में बर्बाद हो चुके होंगे लेकिन तब तक देर हो जाएगी।

इंसानियत की दुहाई देने वाले ब्रिगेडियर साहब को जहाँ इंसानियत का धर्म निभाना होता है, वे देखता है, छोटे-छोटे पिल्लों को नाली में गिरा देखकर उनकी मदद नहीं करता और मदद के लिए आगे आता है, एक बुज़ुर्ग सफेदपोश सफ़ेद कुरता और ऊँचा पाजामा पहने,जालीदार टोपी, दाढ़ी के साथ अधेड़ व्यक्ति उनकी गुहार सुन वहीँ खड़े हो गये थे, …उन्होंने घिनाती हुई नाली में हाथ डाल कर एक के बाद एक पिल्लै को कान से पकड़ बाहर निकाला’ अफ़सोस इस नेक काम के बावजूद जब उसने हाथ धोने के लिए पानी माँगा तो एक औरत उसे देखकर क्यों ठिठकी? वास्तव में वह नफ़रत भरे पूर्वाग्रह की प्रतिक्रिया है जो राजनीतिक मंचों से फैलाई जा रही है कि इन्हें आप इनके कपड़ों से पहचान सकते हैं यहाँ नासिरा जी इसी पूर्वाग्रह को तोड़ती है जबकि कपड़ों की पहचान से उन्हें आतंकवादी घोषित किया जाता है, उसी हुलिए का व्यक्ति इंसानियत बचाने को तत्पर है। सफेदपोश कहता है- अल्लाह सबका पालनहार है’ संकेत कर रहा है, यहाँ कोई किसी को नहीं पाल रहा।

मानव ने प्रकृति को नोंच खाया, अपने बरसों के साथी पशु-पक्षियों पर हिंसात्मक व्यवहार किया,उसकी सुरक्षा में किसी की सेंध ना लगे, जंगली जानवरों को मौत की नींद सुला दिया तिसपर युद्धों की विभिषिका ने भी मानवीयता का हनन किया उपन्यास का केन्द्रीय बिंदु मानव को पुन: सुन्दरतम की ओर ले जाना है।जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी” ये जुमला राजनीतिक गलियारों में गूँज रहा है जिसे कार्तिक के संवाद के माध्यम से नासिरा शर्मा ने एक विशिष्ट सामाजिक संदर्भ दिया है जिन शिकारी कुत्तों को हम जंगल और खेतों से अपने शहर की तरफ लाते हैं, उनके बारे में हम सोचते ही नहीं कि हमारे विकास में उनके हिस्सेदारी का ख्याल रखना चाहिए’।क्या हम हमारे जीवन में शहरों में आने वाले मजदूरों कामगारों की ओर ध्यान देंगे जिन्होंने हमारे मकान बनाए ये प्लंबर, सब्जी-फल बेचने वाले क्या ये हमारे विकास के लिए जिम्मेदार नहीं है तो भागीदार क्यों नहीं है? जिन्हें आगे भी रेखांकित किया गया है। बावजूद इसके कि ये कुत्ते रात भर भौंक-भौंककर पहरा देते हैं ‘अपनी सुविधा और सुरक्षा की खातिर किसी ने एमसीडी को फोन कर दिया…चौकीदार कुत्ते पिटे थे, कुत्ता सभा बंद हो गई, कुत्ते इधर-उधर गलियों में छुपते-छुपाते घूम रहे थे’। इंसानों की बस्ती में भी तो बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों के आसपास जो स्लम्स, झुग्गी झोपड़ियां बनी होती है उन्हें भी जब-तब उजाड़ दिया जाता है, (बुलडोजर कांड ) यह सोचे समझे बगैर कि ये उनके घर हैं!  मानव के कुकृत्यों जिसमें जानवरों के प्रति उसकी हिंसा के चरम रुप को नासिरा जी कई हृदय विदारक दृश्यों में चित्रित करती हैं। इंसान-इंसान में भाईचारा नहीं बचा जबकि इन कुत्तों में इंसानियत है। घूरे पर खाना देखकर चिरकुट ने कहा “क्या ही अच्छा होता हम आवाज़ देकर औरों को बुला लेते, इस बारिश में घूरे पर कौन गया होगा क्या पता! और भौंक भौंक उन्होंने संदेश पहुंचा दिया। चिरकुट और लेंडी जैसे कुत्ते बिन माँ के पिल्लों को एक दूसरी कुतिया के पास पहुँचा देते हैं। जहाँ वे दोनों पिल्ले भरपेट दूध पीते हैं तो कुतिया के चेहरे पर भी सुखद अनुभूति है। मनुष्य भी तो जानवर ही है पर  नफ़रत और घृणा के बीज उसने खुद बोयें हैं, जानवर-जानवर में और इंसान-इंसान के इस भेदभाव को नासिरा जी ने पल-पल रेखांकित किया है जैसे पालतू विदेशी कुत्ते जिन्हें भरपेट खाना मिलता है, ढेर प्यार भी पर अगर इन कुत्तों से इतना ही प्यार है तो इन बेचारों को उनकी माँ से जुदा क्यों किया, पिल्लों की माँ बेचारी कितना तड़पती होगी। दूसरी ओर गली के कुत्तों की जनसंख्या कम करने के लिए ऑपरेशन किए जाते हैं जिससे अक्सर कुतियाओं की मौत हो जाती है, विदेशी नस्ल का एक-एक पिल्ला लाखों में बिकता है। इंसान की ‘यूज़ एंड थ्रो’ प्रवृत्ति मनुष्य, पशु और सामान में कोई फर्क नहीं करती, बहुत शौक, लाड़-चोंचलें या प्रेस्टीज स्टेट्स के लिए महँगे कुत्तों को पालकर सड़क पर फेंक भी दिया जाता है। पलाश को मिलने वाला जर्मन शेफर्ड कुत्ता, जिसे चलती गाड़ी से कोई सड़क पर फेंक गया उसे ब्रेन ट्यूमर था। मोती कहता है कि ‘अगर मैं इंसान होता तो बे-जुबान जानवरों के प्रति बहुत रहम दिल होता है अपनी रसोई में से उनका भी हिस्सा निकलवाता’। हमारी परम्परा में ये होता रहा है लेकिन आज दोनों कूड़ा खाते हैं”…

उपन्यास उन बेजुबान जानवरों और समाज के उस वर्ग समुदाय को अभिव्यक्ति देता है जो चुप रहने  को विवश है, साहित्यकार का काम ही है बेजुबान को अभिव्यक्ति देना एक घटना लड़कियों के प्रति समाज का दोगला व्यवहार घृणा और भ्रूण हत्या से जुड़ी है। यह 2018 की सच्ची घटना है जब कूड़े के ढेर में नवजात शिशु लड़की मिली, कुत्ते देखकर दंग रह गए, सूँघते है तो पता चला शिशु जीवित है लेकिन इसका करना क्या है वह नहीं जानते बच्चा कूड़े के ढेर पर रो रहा था बूढ़ी  कुतिया उसे अपनी तरह से उठाना चाहा लेकिन वह कर नहीं पा रही थी और दूसरी तरफ जो चौकीदार  कटखने कुत्ते थे वह उसे बच्ची को मार डालना चाहते थे, उनके जीवन का उद्देश्य था इंसानों से बदला लेना वे इस मुलायम से गोल मटोल नवजात शिशु को नोंच नोंच कर खाना चाहते थे। बड़ी समझदारी से  कुत्ते को ‘एनिमल फर्स्ट’ के द्वार पर छोड़ आए यह घटना हमें आरंभ की उस घटना से जोड़ती है जबकि बुज़ुर्ग ने नाली में से पिल्लों को बचाया था यानी ये दोनों तरफ की इंसानियत का तकाज़ा है कि एक दूसरे की मदद करे सहयोग करें।

अँधा युग में धर्मवीर भारती लिखते हैं “शासन बदले स्थितियाँ वही रही” लेकिन समय के साथ-साथ जब जब शासक बदलते है, स्थितियाँ बद से बद्तर होती हैं, उपन्यास में अच्छे दिन’ का जुमला भी नासिरा जी दो बार याद दिलाती हैं अच्छे दिन  किसके आए? इतिहास में नये नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं और जनता इन गौरव गाथाओं को सुनकर फूल के कुप्पा हो रही है संभवत: इसलिए ही वे किस्सागोई के दृश्य रचती हैं। इन किस्सों को गढ़ने के लिए वे युवा पीढ़ी का आह्वान करती है कि अपने किस्से अपने यथार्थ अनुभवों के आधार पर गढ़ें जो वर्तमान के दस्तावेज़ बन सके ताकि आने वाली पीढ़ी आज के कटु यथार्थ को जान सकें। मोती की प्रियसी भूरी का आगमन और फिर उसके किस्से बड़े महत्वपूर्ण है। जो इंसान और कुत्तों के जीवन पर अपनी टिप्पणियां कर रहे हैं “किसी ने सच ही कहा है कुछ कुत्ते बोले मित्रों हम पुरानी दस्ताने सुन ली कुछ हमें नहीं कहानी भी सुनो ताकि आने वाली पीढ़ी जान सके कि हम आज कैसे और किस दौर में जीते हैं”। आज के दौर में कमजोर वंचित शोषित और अल्पसंख्यक मनुष्य की क्या स्थिति है? इस पर साहित्यकार को कलम चलानी चाहिए अंत तक आते-आते किस्सागो नासिरा शर्मा कुत्तों की कथा के समांतर मनुष्यता के विनाश को संकेतों में, संवादों से दृश्य-घटनाओं से उसे स्पष्ट करती हैं नए किस्सागों को तो आना ही पड़ेगा,तभी नए अनुभव के साथ आस-पास होती घटनाओं और कुत्तों के दुःख दर्द को हम समझ सकतें है’ यहाँ वे युवा लेखकों को नए विषयों के लिए भी प्रेरित कर रही हैं जिसमें मूक जानवर भी शामिल है और वंचित शोषित समाज जिन पर बात करना जोखिम उठाने की तरह है कुछ न बचेगा लेकिन किस्से रह जायेगे उपन्यास में गीतों का रचनात्मक प्रयोग हुआ है जो मोती गाता है

सब मेरे अपने,

एक-एक करके मुझसे जुदा हुए,

मुझे डर है कि कहीं मैं इस पुरखों के मोहल्ले और

सुनसान पड़ी गलियों में तनहा आखिरी साँस न लूँ

तब, मेरे लिए कोई न रोयेगा, कोई न रोयेगा

वे मानती हैं कि मनुष्यता कहीं न कहीं जीवित रह जाती है इसलिए मोती,चिरकुट लेंडी ब्रिगेडियर,रिज़वान सफ़ेदपोश कार्तिक आदि जो बराबरी के आदर्श को मानते हैं जबकि अभिव्यक्ति पर पहरे है समाज बेबस और हर क्षेत्र में मानसिक तौर पर भी पंगु असमर्थ किया जा रहा है, ये सभी सहिष्णुता और पारस्परिक सहयोग सद्भावना की अवधारणा का बिम्ब प्रस्तुत कर लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति आस्था बनाए रखते हैं, यहाँ कुत्तों में इंसानियत का ज़ज्बा बहुत कुछ सिखाता है कि हम तो हैं ही मनुष्य योनि में हैं लेकिन हमारी इंसानियत विलुप्त हो गई, किस्सागो कुत्तों के माध्यम से वे बहुत महत्वपूर्ण बात कहतीं है जिसका सार है कि कुत्तों की शक्ल में इंसान हैं तो इंसान की शक्ल में कुत्ते हैं जो कहानी का केंद्रीय तत्व है इसका मतलब हम में से इंसानों की नस्ल के भी कुत्ते मौजूद हैं? बिल्कुल, किस्सागो कुत्ते ने कहा तो फिर हम कुत्ते भी इंसानी नस्ल में जरूर मौजूद होंगे यानी कुत्ते की शक्ल में इंसान और इंसान की शक्ल खुदा ने मूसा की शिकायत को ध्यान से सुना और शरारती मुरीदों को कुत्ता बना दिया आज इन्ही इंनसनी कुत्तों की नस्ल हम असली कुत्तों के बीच घुल मिल गई है जिसके कारण हमारे कमजोर दिमाग कुत्ते उनके बहकावे में आकर अपनी विरासत से दूर चले जाते हैं। समाज में कमजोर व्यक्ति का गलत रास्ते पकड़ लेना इसी तरह तो है । हमें मनुष्यता को बचाए रखने के लिए भीड़ या भेड़िये नहीं ‘समाज’ चाहिए जो राजनीतिक चेतना से संपन्न हो, राजनीतिक चेतना का अभिप्राय जनता अपने अस्तित्व, मर्यादा और अपनी रचनात्मक अधिकारों के प्रति जागरूक रहे दलीय या गुटबाजी राजनीति नहीं कि विचारधारा के नाम पर हिंसक हो उठे मारपीट मॉब लिंचिग करे एक मुहावरा है कि ‘क्या कुत्तों की तरह लड़ रहे हो’ उपन्यास में एक वाक्य देखिये“दोनों तरफ के कुत्तों ने शहादत का जाम पी रखा था, अपनी अपनी विचारधारा को लेकर मर मिटने को तैयार थे” हमारे देश में आज विचारधाराओं की टकराहट हिंसक रूप धारण कर चुकी है  कथा में कुत्ते और मनुष्यों की जो तारतम्यता है, आरंभ से अंत तक बनी हुई है आरंभ में जबकि इन गली के कुत्तों से मोहल्ला परेशान है लेकिन अंत तक आते-आते कोरोना से उत्पन्न विकट परिस्थितियों ने, सत्ता के उदासीन तानाशाह रवैये ने और खुद मनुष्य जिसने प्रकृति को नोंच खाया प्राणीमात्र को एक बिंदु-स्थल पर ला खड़ा कर दिया, हम देखते हैं कि कुत्ता और मनुष्य एक ही जगह सो रहे हैं यह दृश्य किसी भी कला फ़िल्म के महत्त्वपूर्ण दृश्य की तरह बहुत कुछ कहता है जिसमें दोनों एक दूसरे को अपनी गर्माहट दे रहे हैं,दोनों परस्पर निर्भर, एक दूसरे के सहयोगी। निस्संदेह आने वाले समय में नासिरा जी के इस उपन्यास का महत्व निरंतर बढ़ता चला जाएगा तो आज भी इस उपन्यास को नज़रंदाज़ नही किया जा सकता क्योंकि यह वर्तमान समाज के विविध आयामों को हमारे सामने रखता है। भाषिक अभिव्यक्ति में निहित विविध रूपक,प्रतिकार्थ प्रतिबिंब अर्थ छवियाँ उपन्यास को विशिष्ट बना रही हैं।

अंत में, मोहन जी का लूडो खेल का बोर्ड जो उन्होंने खुद बनाया है वास्तव में दस्तावेज़ है,जो समय या सिर्फ नियति का खेल नहीं, इसमें साँप की तरह जब चाहे डसने वाले क्या यह अज्ञेय की कविता के  सभ्य साँप है? नहीं, वास्तव सत्ता के ये वे अजदहे हैं जिन्होंने कोरोना का लाभ उठाया, शाहीन बाग आन्दोलन, किसान आन्दोलन को निगल लिया, जिन्होंने अपनी ज़हरीली दुर्गन्ध नफ़रत और दंगों के रूप में फैलाई ‘दंगा समाप्त’ का अर्थ है कि खेल शुरू किया था, जो मकसद पूरा होने पर समाप्त हो गया परिणाम- बेरोजगारी, जीरो आमदनी, घरों में स्त्रियों का दोहरा शोषण, रिज़वान जब किसान आन्दोलन पर टिप्पणी करता है तो तिवारी जी से कहलवाना कि जब से ये नए नए कानून ला रहे हैं जनता सुख की नींद नहीं सो पा रही’कुल मिलाकर कोई धर्म, जाति-विशेष नहीं आम जनता त्रस्त है,दुःख झेल रही है जिसे सत्ताधारियों ने बांट दिया नासिरा जी बेजुबान जानवर कुत्तों के किस्सागो के माध्यम से व्यक्त करती हैं“जब समय नेकी और इबादत का होना चाहिए था तब सियासत के खेल बड़ी मुस्तादी मुस्तैदी से खेले जा रहे थे, सोच विचार के स्तर पर ऑक्सीजन कम होती गई”तब हमारे मस्तिष्क को गामा वेव्स की सर्वाधिक आवश्यकता है जो हकीम लुकमान के अनुसार मोहब्बत से मज़बूत होगीसख्ती का ज़वाब नर्मी से,कडवाहट का जवाब मिठास से ,बदतमीजी का जवाब अदब से,गाली का जवाब धैर्य से!

शिवानी सिद्धि स्वतंत्र लेखक हैं।

गुंजन उपाध्याय पाठक की पाँच कविताएँ

1.धूर्त जून


सारी इच्छाएं कामनाएं
धूर्त जून के हाथों ठगी गई हैं
इक बूंद के लिए तरसती जमीं पर
ख्वाबों के बादल मंडराते हैं
मगर बरसते नही हैं
दो क्षत विक्षत शव
गवाही बन चुके हैं कि अंधेरों की साजिश से ख्वाबों की नाजुक डाल पर
बिजली सी गिर पड़ी है

यह उजाड़ वक्त और हम तुम
अपनी झुलसी हुई हसरतों के साथ जिंदा हैं

टूट पड़े कांच के ग्लास का रंग
धच से गड़ पड़ता है तलुवों में और
चोटिल हो पड़े लम्हों की
करते हैं शिकायत
तुम तक पहुंचने वाले सारे रास्ते

आकाश गायब हो गया हो
आंखो में इंतजार की जगह मवाद भर गए हैं

अर्धविक्षिप्त सी ढूंढती है उस देहगंध को
कि नाक से खून टपकने लगे हैं

लकीरों से गायब है वो जगह
जहां पल दो पल को
इस सफर से थके हुए सुस्ता सकें हम

गाहे बगाहे हथेलियों में ढूंढती है
तसल्लियो की वो नदी ,
दो घूंट जिसकी
रूह की तपिश को कम कर सके

कुछ धुएं ज़रूरी रहे जिंदगी में
अरमानों की भट्टी में
खौलते ताप को
देह की ताप से
मुक्त करने को

2.एक और दिन


माघ की किसी रात जब बरसता है मेह
इक टीस सी उठती है
अश्रु और आकांक्षाएं थमती नही हैं
पूरा पलंग जैसे एक ग्लोब हो
देशांतरो के अंतर को वह
करवटो से नापती है

दूर कहीं टिटहरी
छन्न छन्न बरसते मेह के दुख से भींझती है
और सबकुछ शांत और अक्षुण्ण दिखता हुआ भी
कहीं न कहीं सकपकाया हुआ सा
तड़पता रहता है
कितनी निरीह हैं ये बूंद

जो सावन भादों की तरह नही करती है क्लेम कि
पिया लौट आए परदेश से
या फिर बाबुल का बुलावा आए झूलों के लिए

ये सिसकती हैं
और उन्मादित ज्वार को
रूमाल से भींगाकर
भुलाने के जतन करते हुए
गिनती हैं अभी और कितने दिन बाकी है फरवरी के
इस बार निर्मोही ने
एक और दिन की सौगात दी है
बिसूरने के लिए
या सचमुच बसंत ने अपनी
मूड स्विंग के भरोसे
रख छोड़ा है एक दिन

इस बार लौट आया है प्रेम
और ठूंठ पड़े पेड़ पर सेमल के फूल भी
कल हम तुम चांद फूल सब गवाही बने थे
हमारे सर्वश्रेष्ठ अभिनय के
जब हम बेसबब से लिपट जाना चाहते थे एक दूसरे से और मुस्कुराते हुए कर दिया था विदा

रात ने अपने अंदाज से
धुल दिया था सबकुछ पारदर्शी रंगो में
और कुम्हलाती चाहनाए पकड़ी गई थीं
माघ की किसी रात जब
बरसता है मेह
इक टीस सी उठती है

3.चौरासी


इस बेतुके जीवन के
अंत के ठीक पहले
इश्क की इनायतें
शायद लुका छिपी से हार कर
उमड़ पड़ी हैं मन के आंगन में
छीजती दीवारों पर अल्पनाएं उभर आई हों

सांझ की बेहयाई में
कोई उतारता है अपना खोल
दिन और रात दहलीज पर ठिठके खड़े रहे हैं

चांद की कुबड़ पर तड़प की
नर्गिसी खिल उठी है
समर्पण का यह अंदाज
ऐसा कुछ है कि जानते हुए भी कि
इन चौरासी सिद्ध कलाओं का
जोग नही है मेरी हथेलियों में
मैं बाट जोहती हूं उस बेला की जब
धड़कनों में उन्माद की लय बहे

इश्क का धुंआ कुछ ऐसे उतरे धमनियों में कि
वैद्य तक को गुमान न हो
अप्सराएं रश्क करें

सारे झूठ सारे भरम
तुम्हारे स्नेहसिक्त शब्दों में परिवर्तित
वास्तविकता की तरह मेरे भाग पर टपके
अवांछनीयता की चोट पर
तुम्हारे शब्द छलकते रहे किसी मरहम की तरह

जानते हो
जेठ की दुपहरी में
इश्क की अठखेलियां तपती नही हैं
बरसती हैं

4.सिलेक्टिव गड़बड़ी
————————-
उसकी देह में यूं सिमट गई थी
अलबेली हसरतो की झांस
कि अलग होने पर भी
वह साथ उसके भीतर करवट लेता रहा
कितनी ही बार तो
बिल्कुल पास का धोखा सा हो गया
जबकि पास में खड़ी वास्तविकता
अजगर की तरह साबुत निगल लेना चाहती थी
उसका वजूद

वह वहीं कहीं छूट गई थी
जहां ब्रेड के कुछ टुकड़ों को
कुतरे जाने का इंतजार था
जहां दो घड़ी वक्त भी
बियर को होठों से छू कर रश्क कर रहा था
सिलवटो में प्रेम खिलखिला पड़ा था

निकटवर्ती नदी
उन लम्हों के दरमियान तैरती रही
और दो लोग मानचित्र से गायब हो गए थे
किसी को कानोकान इसकी कोई खबर तक नहीं
यह मुहब्बत की क़िस्सागोई भर नही थी
यह बेयकीनी का यकीं के रंग में बदलना सा था

जिसे चूमा गया छूआ गया और
वह लम्हा सुहागन हुआ था

ग्रह नक्षत्रों की आंखे जितनी देर में मिचमिचाती
या फलक देता सूचना
किसी भी तरह की सिलेक्टिव गड़बड़ी का

यह फरवरी था
या सिर्फ एक अलसाया हुआ दिन
याकि जिंदगी से एक दिन चुराया हुआ
या फिर यह जिंदगी ऋणी हुई थी तुम्हारी
तुम्हारी पीठ की तिल की गिनती में
आर्यभट तक चौंक गया था
या कि इनकी तिलिस्म से चांद जल गया था
यह अंकगणित और चांदनी की शर्तो में बंधे
नियमों को मुंह चिढ़ाता हुआ सा सोफे पर पड़ा था

अब रात अपनी बेरहमी पर शर्मिन्दा थी
जोगी !
तुम्हारी हथेलियों का हरहराता हुआ स्पर्श
मोक्ष की कामनाओं को रद्द करता हुआ
मांग लेना चाहता है फिर से
कोई ऐसा ही बेखुद लम्हा

5.पटना
————-

भागती दौड़ती सड़कों का जुनून
अब मेरी नसों में धड़कता है
“पटना”अब कोई बस एक शहर भर नही
मेरे जुनूं का सबब बन गया है
गांधी मैदान कहते ही एक रोमांच खिंचता है सांसों में

और बोरिंग रोड में बसी एक कॉफी शॉप में
मेरा दिल पहलू बदलता रहता है
बेली रोड की लंबी जाम में
बेसबब भटकता रहता है
अशोकराजपथ में
पुरानी मुहब्बत की अज़ान गूंजती है
कंकड़बाग में हृदयगति का आरोह अवरोह सिमटा है
राजा बाजार के एक हॉस्पिटल में
कितनी रातें बिखरी पड़ी हैं

कई कश बेसबब है
होठों पर खिलने के लिए
तुम्हारा नाम सुनते ही पार्श्व में छिपे अवसाद के
कानों तक में एक हंसी घुलती है

इश्क की बिल्लियां घात लगाए बैठी हैं
चांद बार बार मेरी खिड़कियों पर दस्तक देता है
सितारों ने मेरी चुगली लगाई है
रक्तवाहिकाओं की मद्धिम चाल में
फंसती नही है आकांक्षाएं
देह में नीले पीले फूल उतर आए हैं
इश्क की अठखेलियों में बरामदी हुई है
कुछ मुड़े तुड़े ख्वाबों की, चॉकलेट के रैपर की, कुछ
मुरझा चुके फूलों की पखुड़ी और सिगरेट के धुंए की
कुछ पैबंद लगे नींद की, कुछ मोच पड़े जाग की

बेकसी में ख्वाहिशों का घुंघरू बांध कर
नाचती हैं अब रात
विक्षिप्त सा धंसा हुआ संताप
धीरे धीरे पिघलता है तुम्हारी गंध में डूबकर
मेरी जां
कैसे तो पुकारता है यह शहर मुझे
कि धड़कन एक बिट स्किप कर जाती है
अब जब इस शहर के हर मायने
नए अंदाज में टोकते हैं मुझे फिर भी यह पटना
मेरे घिसे तलवों में अब वह
गीत नही रच सकता है

गुंजन उपाध्याय पाठक

गुंजन उपाध्याय पाठक की रचनाओं का सदानीरा, समकालीन जनमत, इंद्रधनुष , दोआबा ,हिन्दवी, पोएम्स इण्डिया आदि में भी प्रकाशन हुआ है।
संपर्क : gunji.sophie@gmail.com

प्रश्नचिह्न

अहा! कैसा मनहर दृश्य है, चलो उस शहरी कलौंछ से कुछ क्षण का तो छोह हुआ। देखो तो कैसी निरभ्र मुंडेर है इस गांव की, इस अछोर आकाश पर  कपास की चटकीं कलियों सी नन्ही-नन्ही सफेद बदलियां छिटकी पड़ी हैं। इन बदलियों की ओट में मानो सैकड़ों रजत घण्टिकायें अपनी वेणी से छिटककर किसी स्पंदन से छिपी फिर रही हैं। पर किससे? चंदा मामा से क्या? पर वह तो  करवट लिये सोया सा लगता है। चलो देखूं तो! अरे इस सौंधी सी उसास में ऐसा उतराया कि  स्वयं से मिलाना तो बिसर ही गया। मैं हूं न्याय! आज इस गांव में मेरी ज्योंनार है । देखो  वोऽऽऽ वहाँ….जहाँ प्रश्नचिह्न-सा दिखाई पड़ रहा है वही मैं हूं। सब कुछ यहां कितना निश्छल सा है पर न जाने यह कैसा नाड़ी तत्व है जो मुझे इस प्रश्नचिह्न में बांध रहा है? धरती से देखने में ये भले सुहावना लगता हो लेकिन मेरी धमनियां इसी धरती पर निश्चेष्ट न हों। आज शायद मैं यहाँ स्वयं के अस्तित्व की गहराई मापने आया हूँ। इस स्पंदन को भी जानता हूं ! चलिये आप लोग मुझे अपनी-अपनी दृष्टि से निहारिये अथवा परखिये लेकिन आज तो मेरा रूप यही प्रश्नचिह्न है, मेरे लिये भी और आपके लिये भी।  चलिये उस स्पंदन को भी देख लूं जिसने मुझे इस प्रश्न में बांधा है। वोऽऽ…रही…. वहाँ पृथ्वी पर माँ के आँचल में दुबकी सोई ये नन्ही सी बिटिया है बिरदा। अभी ही मिला हूँ इससे बिल्कुल हमारे माखनचोर सी श्यामल दिखती है, शरारती है, पर इसकी शैतानियों पर कोई नहीं रीझता। बिरदा को छाती में छुपाये आकाश ताकती ये है बिरदा की माँ बिन्नो, और वहाँ आँगन के दूसरे छोर पर जो करवट बदल रहे हैं वो हैं बिरदा के पिता किसुन। किसुन और बिन्नो के बीच की तीन खाटों पर बिरदा की चार बहनें और दादी सोई हैं। 

सभी सो रहे हैं, झींगुरों के खर्राटे बिल्कुल साफ सुनाई पड़ रहे हैं, हवा की बातें भी समझ आ रहीं हैं  लेकिन हम तीनों जाग रहे हैं बिन्नो, किसुन और मैं! शायद हमारे भीतर का कोलाहाल इस रात पर भी भारी है। मैं प्रश्नचिन्ह बना यहाँ बादलों से झांक रहा हूँ और मेरी परछाई बिन्नो की आँँखों में दिख रही है, उसके बुदबुदाते होंठ सोते चांद की टहनियों पर अपनी मनोतियों के काले-काले धागे बांध रहे हैं, और पूछ रहे हैं कि  ‘हे कान्हा! तुमने तो ब्रज की कितनी ही मटकियां नहीं फोड़ीं, कितना माखन चुराया पर जरा बताओ तो तुम्हारे बिरज में तुम पर भी कभी पंचायत बैठी थी क्या?’

भुनसारे से इस पांच बरस की बिरदा पर पंचायत बैठने वाली है। पंचायत में मुझे परिभाषित किया जाना है, मेरे ही नाम की बेडि़यों में शायद बिरदा को जकड़ा जाना है या शायद नहीं पर फिर भी बिरदा के पाप पर न्याय तो होना ही है। पाप…कितना भारी शब्द है ना, ये नौनिहाल क्या इस शब्द के लायक है? क्या ये नन्ही बालिका इसे वहन कर सकेगी? बिरदा की माँ की दशा तो ऐसी है जैसे कोई उसे रेत रहा हो, उसकी आँखें पिघलकर बही जा रही हैं। बिन्नो का बस चलता तो अपनी बिटिया को छाती के भीतर ऐसे छुपा लेती जैसे रात ने चांद को छुपा लिया है लेकिन अब वो भी तो पांच बरस की हो गई है माँ के आँचल की कसावट से छटपटाकर दुनिया की दौड़ के साथ भागना चाहती है, चहकना चाहती है लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं हुई कि न्याय और पाप जैसे शब्दों का बोझ उठा सके उसे तो दुनिया का शोर झुनझने सा लगता है जिसकी तरफ खिंचती चली जाती है पर सच तो यह है कि बिरदा के इस झुनझुने के भीतर इसे बनाने वाले ने कितने सारे आडम्बरों की पथरियां भर रखी हैं। वो नहीं जानती कि वो जरा सा जोर से इसे झटकेगी तो पथरियां झुनझुने से छिटककर सीधे उसी पर वार करेंगी। 

अरे! देखो ना ईश्वर से मनुहार और शिकायतों में लिपटी रात बीत चली है और मुझे पता ही नहीं चला, बिन्नो को शायद लग रहा होगा कि काश! ये रात ऐसे ही ठहर जाती, मुझे भी ऐसा ही लग रहा है, पर भोर तो स्वर्णाभूषित होकर निखर आई है लेकिन ये स्वर्णाभा ऐसा मृग बनकर आई है जिसकी प्रतीक्षा में आखेटक घात लगाये बैठा है। 

बिन्नो ने चाय का गिलास किसुन के हाथ में दिया और चूल्हे पर बैठ गई, कभी कढ़ाई गिरती है, कभी थाली, कभी लोटा, ऐसा लगता है ये बेजान बर्तन भी विद्रोही हो रहे हैं पर सच तो ये है कि भय ने बिन्नो के हाथों से शक्ति निचोड़ ली है। हर एक बर्तन की खनक पर ऐसे चौंक उठती है जैसे किसी ने अचानक वार कर दिया हो। दीवार से टिका किसुन बिन्नो को एकटक देख रहा है चाय के गिलास से उठकर धुआँँ किसुन के चश्मे से लिपट रहा है, चश्मे पर लिपटे घने धुएं को तो वह अपने अंगौछे से पोंछ लेता है लेकिन मस्तिष्क की उधेड़बुन पर छाई घनी धुंध किस विध हटाये ये सोच-सोचकर हारने लगा है। भय उसकी कनपटियों पर पसीना बनकर बह रहा है। बिन्नो की सिसकियां जैसे किसी पिघले शीशे की तरह किसुन के कानों में पड़ रहीं हैं, स्टील के गिलास को हाथों से खरोंचते हुये देर तक अपने क्रोध को दांतो से मीसकर चबा जाना चाहता था लेकिन इस क्रोध के वेग ने उसकी शक्ति का बंध तोड़ डाला। किसुन चाय का गिलास दीवार पर फेंकते हुये चिल्लाया –

‘बिसूर ले जित्तो बिसूरने हैं, इन टसुअन से पंचायत टर जाती तो मैं नदी नारे भर देतो।’

माला जपतीं किसुन की अम्मा भी नाराज हो पड़ीं- ‘ऐसे बासन भांड़े फेंके से बिटिया घर में आ जाये तो जे सब भीतें फोर डारो और बिरदा की महतारी तैं अपने अंसुअन में जो घर घोर डार’

सच ही तो है समस्याओं पर चीखने से वे कभी रास्ता तो नहीं बदलतीं उनके सामने तनकर खड़े होना ही एकमात्र मार्ग होता है। सुबह के नौ बज चुके हैं, मौसम कुछ तल्ख है। मुखिया के बाड़े में गाँव भर इकट्ठा हो गया है, रंग-बिरंगी मोर, चिडि़यों और बिलइयों के चित्रों से सजे बरामदे में तीन तखत हैं  जिस पर पंच बैठे हैं, बाकी चार तो कुछ ठीक-ठाक से डीलडौल वाले दिखते हैं, बाल मूछें सब अधखिचड़े हैं लेकिन जो खिजाब रंगे बालों वाले बीचों-बीच पांव पर पांव चढ़ायेे बैठे हैं वे हैं मुखिया, डीलडौल में पहलवान से लगते हैं उम्र ढल रही है लेकिन उम्र की भी इतनी औकात नहीं जो सामने झलक पड़े, लकड़ी से दांत ऐसे कुरेद रहे हैं जैसे मसूड़ों में कोई खदान मे गड़ा सोना खोजते हों, बीच-बीच में डकारें भी ले रहे हैं, कुर्ता और लुंगी एकदम भकभके हैं जैसे बगुलों के पर नोंचकर चिपका लिये हों लेकिन मन…पता नहीं!

 बीचों-बीच नीम का बड़ा पेड़ है, टिटिहरियां, गौरइयां, कउवे, कोयलें सब के सब चुपचाप बैठे हैं पता नहीं वादी हैं, प्रतिवादी हैं, समर्थक हैं या फिर दर्शक खैर जो भी हों। हवा कुछ गर्म है, लोगों की फुसफुसाहट मिलकर एक अजीब सा शोर गढ़ रही है। बिन्नो बिरदा को चपेटे एक कोने में सिकुड़ी बैठी है, पेट में कुछ खौल रहा है जिसकी तमतमाहट उसके चेहरे पर साफ झलक रही है, चारों ओर से उसकी बेटियां जैसे कोई सुरक्षा घेरा ताने बैठी हैं किसुन और उसकी अम्मा मुखिया के सामने हैं। किसुन की अम्मा न्याय अन्याय का संशय गुटकते हुये हथेलियों में छोर दबाये बोलीं-

‘मुखिया जी! जो भी पाप भओ हम सब भोगें के लाने तैयार हैं, जीवन भर चाहें अपने बच्चन खें भूखों राखें लेकिन चुनइयां मुनइयां चुनवा हैं, कहो तो हम सब एक बेरा को उपास कर लै हैं, भगवान के दरी खाने में रोट चढ़ा हैं, जो कछु कहो सब प्रासचित कर हैं, बस बिटिया की दया बिचारो अभे महताई की ओली से नईं उतरी उको काहे को पाप पुण्य बताओ तो।’ 

 बऊ – ‘जो कहतीं हो सब ठीक है लेकिन तनक सोचो जैसें तुमाई सन्तान है वैसई तो ऊ जीव की हती, ऊ पे का बीती हो है, ऊको दरद बटा सकतीं हो का, बोलो?’

कहीं से कोई आवाज नहीं, देर तक सन्नाटा छाया रहा बस कुछ सिसकियां अकेली यहाँ से वहाँ दस्तक देती दौड़ रही हैं, कि तभी सफेद लम्बी मूछों के बीच से मुखिया की खरखराती आवाज फिर गूंजी- 

‘किशन की मौड़ी बिरदा आज से जात बाहर है, गाँव बाहर है, जिस किसी ने इसे छत दी यहाँ तक कि छुआ भी तो वो भी गाँव और बिरादरी से बाहर होगा’

पंचायत ने फैसला सुना दिया, सारा गाँव मौन है, लेकिन पेड़ बैठीं सारी चिडि़यां एकसाथ फरफराकर उड़ीं तो ये मौन टूटा पर बिरदा कहाँ उड़ जाती वो तो सहमी सी माँ से लिपटी न्याय की कुर्सियों पर बैठे न्यायाधीशों को देख रही है, इस न्याय-अन्याय के पतेली में क्या खौला उसे कुछ नहीं समझ आया, सुनाई दिया है तो बस अपना नाम – ‘अम्मा! दद्दा बुलाते हैं?’ बिन्नो ने उसे अपने बाजूओं में कसकर चपेट लिया है, उसकी देह थरथर कांप रही है। ऐसा लगता है जैसे उसकी सारी धारणायें मौन हो गईं हैं, विचार सुन्न पड़ गये हैं। अब तक बिन्नो अपने भय और पीड़ा को गले में ही रौंदे डाल रही थी लेकिन अब वो भय उसके बंध की मर्यादायें तोड़कर बाहर आया तो बिन्नो फफक पड़ी, और बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ी, बिरदा माँ की छाती से चिपकी जोर-जोर से अम्मा…अम्मा…करके बिलख रही है, सबेरे उसके माथे पर माँ ने जो नजर का डठूला लगाया था वो मिटने लगा है, काजल आँखों से निकलकर गालों पर पनीली धारें बनकर बह रहा है।  बिरदा को रोते देख वहाँ खड़ी महिलाओं ने घूंघटों में आँसूओं को छुपाकर बिरदा को उसकी माँ से अलग कर बिन्नो को सम्हाला।

 पुरुषों के समूह में किसुन के अलावा कोई ऐसा नहीं, जिसके मुख से एक शब्द भी फूटा हो। चारों तरफ छाये सन्नाटे से बस बिरदा के आँसू लड़ाई लड़ रहे हैं। मैं यानि न्याय कोने में खड़ा थरथरा रहा हूँ। कैसे इस नन्ही सी बच्ची से जाकर लिपट जाऊं, जिसके लिये अभी मेरा शाब्दिक अर्थ भी कुछ नहीं, जी चाहता है छोड़ जाऊं इस सभा को पर कैसे? मैं न्याय होकर भी इस सभा का बन्दी हूँ, इन न्यायाधीशों की सफेद चादरों तले दबा पड़ा हूँ। क्या यहाँ बैठे किसी जीव में इतनी हिम्मत नहीं जो मेरे थरथराते हाथों को पकड़कर झटक दे और इस स्वयं को परमेश्वर समझने वाले इन मिट्टी के जीवों से कह दे कि ‘नहीं ये अन्याय है, ये चिरइयां भी अपनी भाषा में विरोध कर रही हैं पर जब ये इंसान इंसानी भाषा नहीं समझता तो तुमको कौन सुनेगा, पर मैं जानता हूँ इस न्यायादेश को सुनकर माँ कभी मौन नहीं हो सकती, वो जरूर कुछ बोलेगी क्योंकि जब पीड़ायें सन्तान का वरण करने आई हों और महतारी मौन हो जाये, ऐसा तो सम्भव नहीं आखिर सन्तान की पीरें केवल जन्म के समय नहीं होतीं वे तो उम्र भर के लिये माँ की गठौटी में बांध दी जाती हैं। पर ये बिरदा की माँ क्यों कुछ नहीं बोलती? ये कैसे सुन्न हो गई? नहीं…नहीं…ये संभव नहीं! शायद इसके प्राणों से निकलकर कोई ईश्वर मुख के रास्ते बाहर आना चाहता था लेकिन इन कमबख्त दांतों की सख्त पहरेदारी ने उसे भीतर ही रोक दिया है। बिरदा की अम्मा…ओ बिरदा की अम्मा…उठ तुझे यूं बेसुध होने का अधिकार नहीं है।’ 

गाँव कि महिलाओं ने उसके मुंह में लकड़ी डालकर भींचे दांतों को खुलवाया, पानी छिड़का तो बिन्नो धीरे-धीरे होश में आई। उसने देखा बिरदा छाती से चिपकी बिलख रही है। बेटी को बेसुध रोते देख जैसे उसके भीतर किसी ने शक्ति संधान कर दिया हो। झटके से उठी घूंघट सम्हालते हुये बेटी को चिपकाये आगे बढ़ी और बोली – ‘मुखिया जी राई भरी मौड़ी खें इतनी बड़ी सजा, ऐसो बड़ो पाप कर दओ का, इसें बड़े-बड़े पाप रोज गली चलत करत गाँव भर।’

इससे आगे कुछ कहती मुखिया चीख पड़े – ‘ऐ…मरजादा में रह…घूंघट को मान बनायें राख किसुन की दुलैन इसें आगे एक सबद भी बोली तो मौड़ी संगे सब घर गाँव बाहर कर दओ जैहे।’

बिन्नो कुछ कहती उससे पहले किसुन ने आकर उसे आँखें दिखाईं और बोला – ‘जादा फौजदारी को कछोटो ना खेंच, मैं अभे मर नहीं गओ।’

बिन्नो दांत मीसकर रह गई उसने बिरदा को इस तरह छाती से जकड़ लिया जैसे उसकी बाहों के घेरा कोई व्यूह रचना हो जिसके भीतर मानव तो क्या देव भी प्रवेश ना कर सकेंगे।

अब मैं बिन्नो के आँचल से छुटककर किसुन के कांधे पर सवार हो गया हूँ , इस आशा के साथ कि ये मेरे नाम पर होने वाला यह प्रपंच रोक लेगा।  

 किसुन पंचो के आगे अपना अंगौछा पसारे रोते हुये गिड़गिड़ाया – ‘हा हा… बिनती करत हों महराज, ऐसो ना करो, तुम औरें पंच परमेसुर कहाउत हो इतने कठोर नईं हो सकत तनक सी मौड़ी खें इतनी कड़ी सजा ना सुनाओ, कहाँ जैहे बिटिया, ऐसो ना करो…ऐसो ना करो…’

‘देख किसुन बाल बच्चा दुसमन हमाये भी नईयां लेकिन न्याय तो न्याय है बो कोऊ के लानें दो नईं हो सकत, न्याय खें पालबो बहुत कठोर होत, राम तक नें बिधाता होत भये हत्या को पाप भुगतो हतो कि नईं, अगर मौड़ी के पाप खें छोड़ दओ और गाँव पे कौनऊ बिपत आई तो को जिम्मेदार हो है, और फिर जो भी बता फिर तो हर दिन कोऊ ना कोऊ काण्ड कर है, ऐईसें सजा तो मिल है।’

न्याय थरथराते हुये बोला – ‘क्या कहते हो मुखिया! मैं कब इतना कठोर हुआ जिसने नन्हें फूलों को रौंदने का फल दिया हो, अपने स्वार्थ की पूर्ति का पत्थर फेंकने के लिये तुमने मुझे अस्त्र बना रखा है। इस नन्हें फूल से जो हुआ अनजाने में हुआ पर तुम तो जानबूझकर पाप कर रहे हो। अरे! मैं तो सिर्फ निर्दयी और निर्ममों के लिये अस्त्र बनाया गया था तुम जो कर रहे हो वो क्या है? देखो उस मासूम नौनिहाल की ओर उसे दण्ड देने में तो ईश्वर के हाथ भी ठहर जायेंगे। इस बाप को देखो जो एक वक्त भूखा रहता है लेकिन कभी अपने बच्चों को भीख मांगना नहीं सिखाता आज उसे न्याय की अनदेखी वेदी पर होमने जा रहे हो। उस माँ ने क्या बिगाड़ा है, उसके उन पाँच बच्चों ने क्या बिगाड़ा है जो इतने वज्र हुये जाते हो। याद रखना वो वज्र भी त्याग की हड्डियों से मिलकर ही बन पाया था जिस दिन वह अन्याय करता उसी दिन पिघलकर बह जाता।’ 

किसुन, बिन्नो और उनके बच्चे मुखिया के पैरों तले पड़े दया की गुहार लगा रहे थे, इस करुण क्रन्दन पर क्रूर की आत्मा भी विद्रोह कर उठती लेकिन मानवी आत्मा पर लोभ और कलुषता का ऐसा खोल चढ़ाया गया है कि हर लहर उससे टकराकर लौट आती है।

‘फैसला अभी से लागू होता है, मेंढ़ बाहर मौड़ी को ले जाओ रे लौंडो’ – मुखिया ने ऐंठते हुये कहा

हाथ कांपे भी तो क्या लड़कों ने माँ की कमर से लिपटी बिरदा को छुड़ाया तो सारे बच्चे और बिन्नो उससे लिपटकर चीखने लगे लेकिन इस क्रन्दन की तीव्रता इतनी नहीं थी जो यहाँ खड़े किसी एक के हृदय में भी घाव कर सके।

मुखिया हट्कारते हुये बोला – ‘रे किसुन! छोड़ दो मौड़ी खें नईं तो तुम सब भी अभईं निकार दये जै हो।’

‘हा…हा…बिनती मुखिया ना करो ऐसो ना करो मौड़ी कहाँ जैहे’- किसुन गिड़गिड़ाया

‘जैसी तेरी इच्छा गाँव बाले समझा लें ई किसुना खें नईं तो ईकी जात के सब गाँव बाहर कर दये जै हैं’

इस एक वाक्य ने जैसे किसी मरे में जी डाल दिया हो, डाले भी क्यूं ना आखिर हम सब हैं तो स्वार्थ की पुतरियां ही, जब तक स्वयं तक आँच ना पहुँचे तब तक कौन बोले। लेकिन अब ये धुआँ उड़कर जब उनके आँगन की तरफ मुड़ने लगा तो बोल पड़े हैं – 

‘किसुन! हम सबके बाल बच्चा हैं, अभे मौड़ी खें जान दे फिर सोच हैं का करने तोरे हाथ जोरत भइया मान जा’

एक साथ जैसे सैकड़ों अस्त्र किसुन पर चला दिये गये हैं। बिन्नो धरती पर गिर पड़ी रोते-रोते चिल्लाई- ‘जाओ जीखें जहां जानें मैं अपनी मौड़ी खें नईं छोड़ सकत, दद्दा अपनी दुधमुंही मौड़ी खें नईं छोड़ सकत, ऐसो कौनऊ पाप नईं करो मोरी मौड़ी नें, नईं छोड़ सकत…..’ कहते-कहते बिन्नो फिर बेहोश हो गई।

किसुन ने थरथराते हाथों से बिरदा को उठाया तो वो सहमी सी पिता के गले से कसकर चिपक गई। किसुन उसे उठाये लम्बे-लम्बे डगों से रोता हुआ निकल गया पीछे-पीछे मुखिया के आदमी, गाँव वाले और उसकी अपनी बच्चियां दौड़ी जा रही हैं – ना पापा! ना ले जाओ हम कसम खात कभऊं इस्कूल की देहरी पे ना चढ़ हैं, छोड़ दो…छोड़ दो पापा’

गाँव के बाहर वाले मन्दिर पर खटिया बिछा दी गई, बिरदा को किसुन ने उस पर बैठाना चाहा तो किसुन के गले से किसी सख्त लता सी लिपट गई, नन्ही-नन्ही हथेलियों की जकड़न इतनी सख्त तो नहीं थी लेकिन पिता के हाथों का बल शायद इस फैसले के तले दबकर मर गया था। बिन्नो भी धूल में सनी दौड़ती आई और बिरदा को अपनी गोद में लेकर चीखी-

‘भग जाओ! सब इते सें ऐसे गाँव ऐसे इंसानन से अच्छे हम गाँव बाहर ही हैं, चले जाओ सब’ बिन्नो बेतहाशा चीख रही है कि किसुन ने उसे सम्हाला- ‘मैं अकेले में बात कर हों मुखिया सें तनक चिन्ता ना कर, अभईं जात हों, बस थोड़ी धीरज रख, देख मौड़ी हमें देख-देख सीझी जा रही।’ बिन्नो चुप होकर सहमी सी पीपल तले बिरदा को चपेटे बैठ गई। किसुन मुखिया के घर की तरफ दौड़ गया। 

इधर पंचायत विसर्जित होने के बाद तमाखू बीड़ी रगड़ी जा रही थी।

‘महाराज निरनय तो सुना दओ लेकिन मौड़ी जैहे कहाँ?’

‘सरग में जाय लेकिन गाँव बिरादरी के सामने छोड़ तो नईं सकत ते बताओ’

‘बो सब तो ठीक है लेकिन फिरऊं एक बार किसुना की तरफ सें भी सोचो चहिये हतो, अकेलो आदमी पांच-पांच बिटियां लुगाई और महतारी खें कहाँ डुरयायें फिर है, इते तो उकी पुरखयांत है तो मजूरी धतूरी करके चला लेत बाहर कहाँ जैहै? और सोचो कहूं कुआ-बहर कर गओ तो थाना तसीली को चक्कर ना फंस जाये।’

‘इतनी हिम्मत अभे नईयां कोऊ की कि हमाये खिलाप थाना तसीली कर डारे, रही बात किसुना की तो अभे झक मार खें नाक रगड़न आ है, जाये के लाने माया रची है, बस अपने हिसाब को निपटारो कर लैबी, काये महाराज का कहत हो, है कि नईं, पंचायत की गद्दी खुरखुरा रही बहुत दिना सें’ आँख दबाकर मुखिया बोला, इतना सुनते ही पंचों का जोर का ठहाका गूंज उठा।

‘इन ठहाकों के बीच सिसकियां पता नहीं कौन सुनेगा, पर फिर भी मैं फरियादी बना किसुन के कांधों पर सवार होकर दोबारा इस देहरी पर चला आया हूँ।’ 

‘मुखिया जी! कौनऊ तो रास्ता हो है, जो कहो बो कर हैं बस अपनो फैसला रोक दो’ किसुना गिड़गिड़ाते हुये बोला 

‘हमें पता हतो कि तू जरूर आ है, पर भई देख किसुन! और कौनऊ जात होतो तो कछु सोचते पर तुम तो…. तुम्हाओ पाप तो दसगुना भओ कि नईं, अब बता भाई का करें?’

‘मुखिया जी! तुम जो कहो सब ठीक लेकिन थोड़ी तो दया बिचारो कहाँ जै हैं हम सब, तनक-तनक से बच्चा हैं, बूढ़ी महतारी है।’ 

मुखिया ने तुनकते हुये मूछों पे हाथ फेरा, कांधे पर रखा गमछा फटकारा और बोला – ‘पूरो गाँव हतो मौजूद कि नईं, पर एक जीभ पंचायत के बिरोध में डुली, मतलब का है ई बात को, समझ में आई कछु कि नईं?’

किसुन हाथों को रगड़ता हुआ सुनता रहा, फिर माथा जमीन पर रखते हुये बोला – ‘कौनऊ तो मारग हो है, जो है सो कहो प्राण दे के पूरो कर हों, पर ई फैसला सें उबार दो, बा मौड़ी भी तो हमाये खेंजुला की चिरैया है, उके प्रानन को पाप न चढ़ है का?’

‘अच्छा अब तू हमें पाप पुण्य को पिरबचन दै है, हम प्रान ले रहे का मौड़ी के, हम हत्यारे नईयां, ऐसे ठनगन करने होवे तो भग जा यहां सें’

‘ना…ना…बाल बच्चन खें बिलखत देख मति फिर गई कछु भी बकत जात, माफी देओ तुम जो कहो सो करों, मैं कछु नईं कहत’ किसुन अपने गालों पर थपडि़यां देते हुये बोला  

‘हम्म…ठीक है..देख तू भी हमाये लरका बच्चा सम है ऐईसें बतायें दे रहे, चुपचाप एक रास्ता है अगर कर सके तो?’ मुखिया कान में आके बुदबुदाया

किसुन की बुझती आंखों में एकाएक जैसे किरणें फूट निकलीं – ‘जो कहो बो कर हों मुखिया जी’ 

‘तो सुन चुपचाप ग्यारा हजार रुपैया हमाई देहरी पे धर जा, रही बात गाँव वालन की तो कह दे हैं कि नये खेंजुला धरवाये हैं किसुन ने, और हां कछु बीड़ी पानी को इन्तजाम कर, अपने चूल्हे पे बढि़या मटन को इन्तजाम कर तो कछु सोच सकत।’

आकाश कि चिडि़यां चिचियाती हुई मंडरा रहीं थीं, ना जाने हंसती थीं या रोती थीं, ग्यारह हजार रुपये इतनी कीमत तो कभी सोच की देहरी पर भी नहीं आई थी, और उस चूल्हे पे मटन जिस पर कभी चिटिया भी मर जाये तो चार दिन तक पीपल के नीचे चून बिछा दिया जाता है। ये सब सुनकर किसुन की धमनियों का रक्त जैसे रेत बनकर भरभराकर गिर गया हो, सारी देह में जैसे ग्लेशियर बन गये हों, चेहरे पर फक्क सफेद बादल बैठ गया हो। कुछ देर बाद मुखिया ने उसे झकझोरकर अपनी बात फिर दोहराई तो किसुन एकटक मुखिया को देखता रह गया, फिर धीरे से उठा और बिना कुछ कहे पांव घसीटता हुआ बिरदा की खाट के पास लौट आया, पीला पड़ा चेहरा और बोझ भरे पांवों को देखकर बिन्नो कुछ सहमी लेकिन अपनी आशंका को गुटककर उसने पूछा – ‘का हुआ? का कहा मुखिया ने?’

किसुन पहले तो डबडबाई आँखों से उसे देखता रहा फिर बोला- प्राण मांगे हैं!

प्राण?

‘का कहते हो साफ-साफ काहे नहीं कहते?’ 

किसुन चीख पड़ा- ‘का साफ-साफ कहूं जो मांगा है वो हम सब बजार में बिक जायें तभऊं नहीं चुका सकत, हम सूखे हाड़ मांस वालन को मोल भी ककरा पथरा सें गओ बीतो होत, ग्यारह हजार और मटन चिकन वो भी हमाये चूल्हे…..’ 

बिन्नो किसी स्तम्भ सी जड़ हो गई, जी तो चाहा कि अभी अपनी हड्डियों में गांठें बांध ऐसा बज्र बना डाले जो इन खिजाबी पंचों को न्याय और अन्याय का अर्थ बता दे, चेहरे की मांसपेशियां किसी लाल जलते कोयले सी हो गई थीं, थरथराती खाल जैसे कोई प्रज्वलित अग्नि हो, आँखें ऐसे सूख गई थीं जैसे  आँँसू वापस अपने क्षीरसागर में लौट गये हों। बिन्नो क्रोध में डूबी हंसी हंस दी और जोर से हथेलियां भींचकर – ‘बाह रे ईसुर, का न्याय है, एक अजन्मे पक्षी को इतनो मोल और सांस लेत जान इतनी सस्ती?’ 

‘हाँ तुम ही सही कहती हो बिन्नो मुझे न्याय नहीं कहा जाना चाहिये, पर मैं क्या कहूं, मैं भी तो तुम्हारी ही खाट पर बेडि़यों में जकड़ा बैठा हूँ, शिकायत किससे करती हो बिन्नो, काश! मैं भी अपने पर हुये अन्याय के खिलाफ कोई पंचायत बैठा सकता।’

रात हो चुकी है, मन्दिर की मढि़या से एक छोटा सा दिया अब भी टिमटिमा रहा है, किसुन और मैं कुछ दूरी पर धरती पर पड़े एकटक उस दिये को जलता देख रहे हैं। बिन्नो बिरदा को लिये खाट पर पड़ी आकाश ताक रही है, शायद वो दिन ढूंढकर मिटाने की कोशिश कर रही है जिसने आज की इबारत लिखी थी। उस दिन की इबारत को पढ़ते हुये बिन्नो धीरे-धीरे बुदबुदा रही है- ‘आखिर काये मति मारी गई थी मेरी जो मौड़ी को ऊ नासमिटे इस्कूल में भेजा, ना भेजती ना जे सब होता। अरे दुनिया भर में जो दूध नहीं पीयत वे मर थोड़ी जात हैं, छटाँक भर दूध को लोभ इतनो भारी पड़ है पता होतो तो जीवन भर ना दूध की शक्ल देखती ना ऊ इस्कूल की।’

उस रोज गुरुवार का दिन था बिरदा की बड़ी बहन घर से खाना लेकर आई तो देखा स्कूल में दूध बंट रहा है। वो दौड़ी-दौड़ी आई और हांफते हुये बोली- अम्मा ओ अम्मा…आज इस्कूल में दूध और केला मिल रहो।

कण्डे पाथती बिन्नो के हाथ एकाएक ठहर गये – दूध…केला…

बिरदा ने इतना सुना ही था कि डब्बा उठाकर स्कूल की तरफ भाग खड़ी हुई। बिन्नो पीछे से चिल्लाई पर फिर सोचा चलो बिटिया को दूध केला मिल जायेगा। 

स्कूल में बच्चे अपने-अपने ग्लास, कटोरे, डब्बे लिये कतारबद्ध खड़े थे, एक हेडमास्टर कुर्सी पर छड़ी लिये बैठे मुंह में पान लिरबिराते हुये बोले- ‘जे देखो खाने-पीने की बेरा ऐसो लगत है मच्छों के छत्ता में पथरा दे मारो होय, और पढ़ाई की बिरियां सबके सब ऐसें गायब होत जैसें कोऊ ने मछरियन खें सिल्फास सुंघा दओ होवे, पूरे कुटुम्ब के संगे लैकें भगे चले आते हैं, अरे ए किसुना की मौड़ी तेरा नाम नईं लिखा इस्कूल में फिर कैसें यहाँ आई, भग यहाँ से नईं तो छटइया उठाऊं’

मास्टर ने बिरदा की बांह पकड़कर लाइन से बाहर धकेल दिया लेकिन इस समय बिरदा को कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। दूध का बड़ा भगौना देख उसकी आँखों में जैसे क्षीर सागर उमड़ आया था, केले जैसे किसी अमृत फल से जान पड़ते थे, लाइन के बगल में चार पेड़ों का गुच्छा था जिनके बीच में कुछ-कुछ जगह थी। बिरदा ने जुगत लगाई और पेड़ों के बीच से निकलने को हुई कि तभी टिटहरी के चिचियाने की आवाज के साथ-साथ पंछियों का बड़ा सा गुच्छा फरफरा कर बच्चों के बीच से उड़ पड़ा। अचानक इतने पंछियों को उड़ते देख सबकी निगाह पेड़ों के बीच पहुंची तो देखा बिरदा सहमी खड़ी थी। मास्टर दांत किटकिटाते आगे आये और उसका कान खींचते हुये गाल पर एक तमाचा जड़ दिया- 

‘अरे ओ किसुन की मौड़ी भगाया था ना तुझे और जे का किया तूने जानती है?’ मास्टर चिल्लाया

बिरदा की बहनों ने कसके जकड़ लिया – ना मास्टर जी ना मारो, अब कभऊं ना आयेगी बस ई बार छोड़ दो, गलती हो गई।

लेकिन मास्टर ने कुछ नहीं सुना बिरदा का श्यामवर्णी चेहरा थरथराकर लाल हो गया, मास्टर उसकी कलाई पकड़कर खींचकर सीधे मुखिया के द्वारे ले गया- ‘अरे मुखिया जी! बहुत बड़ो अनरथ कर दओ ई किसुन की मौड़ी ने’

का करो?

हमाये इस्कूल के पीपरा तरें टिटिहरियन को खेंजुला हते उमें कम से कम छह अण्डा हते, जा मौड़ी सीधे-सीधे उनपे पांव धर के चढ़ गई, बिचारीं चिरईयां रोउत किलपत उड़ गईं।’

पीछे से किसुन, बिन्नो भी दौड़े आये- मास्टर के पास से बिरदा को छुड़ाया तो मुखिया झिड़कते हुये बोले – ‘जानता है रे तू, तेरी बिटिया का कर आई, जीव हत्या का पाप किया है इसने, टिटिहरियन के अण्डा फोड़ डारे हैं, ई बात को तो कल पंचायत में ही फैसला हो है?’

‘टिटहरी के अण्डन में ना पता जीवन परो तो कि नईं कोऊ नई जानत पर उनके फूट जाबे पे पंचात बैठ है, पर ई चिरैया में तो जीवन है इखें कछु भओ तो कौन पंचात में फैसला हो है जो भी बता दो मुखिया जी!’ बिन्नो घूंघट के भीतर से बुदबुदाई

‘देखो तो मुखिया जी अब तो जा किसुना की लुगाई भी मुखियायिन हो रही है अब तुमाई जरूरत नईयां ई गांव बिरादरी में’ – मास्टर व्यंग्य भरी हंसी हंसते हुये बोला

मुखिया की आंखें चौड़ी हो चलीं थीं और यही काफी था ये बताने के लिये कि किसुना को क्या करना है। जब प्रश्न का उचित उत्तर नहीं होता तब अक्सर ऐसा ही होता है।

रात का चौकीदार डण्डा ठोंकता निकला तो बिन्नो आकाश में उबरते डूबते पिछले दिन के दृश्य से बाहर आई और बुदबुदाते हुये बोली – जीव हत्या, वाह रे ईसुर का दोहरे जीव बनाये हैं तुमने भी, जो खुद अभी माँ की गोद में पनप रही है उसके लिये जीवहत्या के पाप में गांव निकाला और उनके लिये क्या जो कल आँँतों की तृप्ति करेंगे….उनके लिये न्याय कहाँ है? कौन करेगा?

‘सच ही तो है मैं न्याय हूँ, पर क्या सच में मैं हूँ यहां? आज मैं इस नौनिहाल की छाती से लिपटा औंधा पड़ा स्वयं का विश्लेषण कर रहा हूँ कि मेरी वास्तविक आवश्यकता कहाँ है? पर नहीं मैं अपनी शक्ति कम कैसे आँँक सकता हूँ , कहीं ना कहीं तो अब भी मुझमें जीवन की कोई ज्योति तो होगी ना? आखिर मैं न्याय हूँ , इस तरह मेरी हत्या तो नहीं हो सकती।’

भोर गूंज उठी थी, एक टिटहरी बिरदा की खटिया के पाट पर आकर मौन बैठ गई है। उसकी मूक भाषा भले इन इंसानों को समझ ना आई हो पर मैं जानता हूँ कि वह क्या कह रही है, वो बिरदा को दुलारने आई है उससे कहने आई है कि ‘तुम मेरी पंचायत में दोषी थी ही नहीं, इसलिये तुम्हारी सजा में मैं भी बंध गई हूँ।’

लेकिन मेरा न्याय कौन करेगा, मैं स्वयं न्याय किसके दरवाजे पर जाऊं, अब किसके कांधों पर बैठूं, ईश्वर के दरवाजे बंदी बना बैठा हूँ। आरती की घण्टियां बज रहीं हैं, शंख घडि़याल सब बजाये जा रहे हैं। प्रकृति की इस वन्दना में एक और सुर शामिल हो रहा है, वो है मेरा! मैं निराश हो सकता हूँ पर मेरी उम्मीद सदैव सांस लेती रहती है उसी सांस की डोर थामे फिर मैं अपनी ही राह देख रहा हूँ।’ 

कीर्ति दीक्षित की लहरिया और जनेऊ उपन्यास सहित कई रचनाएं प्रकाशित हैं।

सुनीता अबाबील की कविताएं

सुनीता अबाबील की कविताएं स्त्रीकाल के ताजा अंक में प्रकाशित हुई हैं तथा इनका पाठ सुनीता ने स्त्रीकाल यूट्यूब पर भी किया है।

  1. काश माँ पढ़ पाती

 मैंने मां को हमेशा मां की तरह देखा

मैंने कभी सोचा ही नहीं

कि मां की भी साथी संघाती सहेलियां हो सकती हैं

या रही होंगी

अपने पिता को मैंने हमेशा

दरवाजे के बाहर की दुनिया को फैलता देखा

माँ को हमेशा चूल्हा चौका के आस-पास

पिता हिसाब-किताब में कच्चे थे

हमेशा कर्ज में डूबे रहते

माँ हिसाब की एक दम पक्की

पर माँ की चलती नहीं थी

हम लोगों को स्कूल भेजना

सबके लिए खाना पकाना

बीच-बीच में सुट्टा (बीड़ी) लगाना

मेरी मां को पान खाना बहुत पसंद था

जब मैं बच्ची थी

मुझे ही पान लाने दुकान भेजती

मैं बता नहीं पाती मसाले में क्या डालना है

पर मां बोलती थी जाओ पान वाला जानता है

क्या डालना है

मुझे देखते ही पानवाला

मां के स्वाद का पान बना देता था

और मैं आज भी सोचती हूं क्या सच में

पान वाला मेरी मां के स्वाद को जानता था?

मेरी मां के चेहरे पर हंसी बहुत सुंदर लगती थी

जब वह हस्ती थी पान खाए हुए दांत चमक उठते

मैंने कई बार पूछा था

यह दांत काले कैसे हो गए?

बोली मिस्सी लगाया था

तब की औरतें दाँतों में मिस्सी लगाती थी

ये तबका चलन था

हम बच्चों को खेलता देख अक्सर कहती

पढ़ लो पढ़ने से ही कुछ होता है जीवन में

मेरी माँ को काम करना बहुत पसंद था

पता नहीं वो कहां-कहां से

कैसे-कैसे काम ढूंढ लेती थी

वो दिन भर काम में व्यस्त रहती थी

मैंने हजार दफे कहा थोड़ा आराम भी कर लिया करो दिन भर काम-काम करती रहती हो

कहती समय नहीं कटता है

तुम लोग की तरह पढ़ी लिखी होती

तो मैं भी कुछ किताबें पढ़ती

मां के पास इतना काम होने के बाद भी उसे हमेशा उसका खालीपन चालता रहा

और मुझसे अक्सर कहती है कि काला अक्षर भैंस बराबर

हमारे दस्तावेजों को संभाल कर रखती

आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र

बिना पढ़े ही दस्तावेजों को देखकर

पूरे आत्मविश्वास से कहती थी

यह तुम्हारा है ये उसका है

हम कई बार बोलते कि ये मेरा नहीं है

मां कहती अच्छे से पढ़ो देखो

ठीक से देखो यह तुम्हारा ही है

और माँ बिल्कुल दुरुस्त होती

जिसका बोलती उसका ही होता

माँ की याददाश्त बहुत जबरदस्त थी

उसने रंगों और संकेतों को मिलाकर

सबके चीजों को संभालने का

तरीका इजाद कर लिया था

काश माँ पढ़ पाती

सामाज से अपने हिस्से हक़ मांग पाती

क्या पता?

सावित्री बाई फुले, अम्बेडकर

मदर इंडिया की कैथरीन मेयो

ऐनी फ्रैंक, गोर्की की माँ से

आगे की दुनिया रचती।

और दुनिया को बदलने में

अपनी दुनिया को सुंदर बनाने में

उसका बहुत योगदान हो सकता था

हालांकि उसकी दुनिया हम बच्चे थे

और हम बच्चों की दुनिया किताबों में

इन सबके बीच माँ

जो पहले एक औरत है

कही छूट गई

अपनी दुनिया बनाने से!!

2

नयी सड़क

एक बहुत पुरानी सड़क है

उसके किनारे एक घर है

जिसमें कुछ लडकियाँ रहती हैं

और कुछ औरतें भी

पर वे दिखती बहुत कम हैं

खिड़की और दरवाजे अक्सर बंद ही रहते हैं

कभी-कभार रात में खुल जाया करते हैं

उन औरतों को सड़क की तरफ देखने की मनाही है

घर से बाहर जाने की भी

सभी लड़कियों को हमेशा सिखाया जाता है

बाहर जाना ठीक नहीं होता

और निज दोपहरिया में तो बिल्कुल भी नहीं

सड़क कभी वीरान नहीं होती है

लोगों को आते-जाते देखना

किसे अच्छा नहीं लगता है

लड़कियों, औरतों को मौका मिलते ही

घण्टों सड़क के तरफ देखा करती

लड़कियों को सलीका सिखाया जाता है

सड़क के नियम नहीं

नजरें झुका कर चलना

बेहद खामोशी से चलना

इधर-उधर मत देखना

लड़कों को भी क्यों नहीं सिखाया जाता है?

वे अक्सर साइकिल उड़ाते हुए दिख जाएंगे

बहुत बार तो साईकिल का हैंडल छोड़कर

छोड़कर सब निकल जाना चाहती हैं

वे औरतें, लडकियाँ नई सड़क पर

जिनके दाएं-बाए कोई मन्दिर

मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे मठ न हों

जहाँ दिन-रात की कोई पाबंदी न हो

एक ऐसी सड़क

जिसके होने से उम्मीदों के फूल खिलें

सड़क हमेशा घर का पता नहीं बताती

सड़क अवारा भी होती है

बेपरवाह और बेमरुअत भी

सड़क पहाड़ से नदी तक आती है

पहाड़ गड्ढों से होते हुए

यूनिवर्सिटी तक

सड़क दुनिया में गुम करने का हुनर जानती है

पुरानी सड़क से होते हुए

वहीं औरतें

नई सड़क पर मिली

घर के चूल्हे में 

ताले-चाभियाँ गाड़ के आयीं

अपने साथ वही बन्द दरवाजे

और खिड़कियाँ साथ लिए यूनिवर्सिटी पहुँची

यूनिवर्सिटी को उन्होंने

नए सिरे से बनाया

पुराने खिड़की, दरवाजे लगाए

उनको खोल दिया हमेशा के लिए

और सबके लिए भी

एक और नई सड़क बनाई

उस नई सड़क से खुलती हैं

और कई नई सड़कें

जो उन गाँवों कस्बों से मिलती हैं

जहाँ से औरतें और लडकियाँ बाहर नहीं जातीं

और फिर एक दिन वे सब औरतें और लडकियाँ  

अपने बन्द खिड़की दरवाजे लेके

पहुँच जाएगीं यूनिवर्सिटी

और वो भी एक और नई यूनिवर्सिटी बनाएंगी

और फिर बनायेगीं एक और नई सड़क।

कंचन कुमारी की कविताएं

        

कंचन कुमारी की कविताएं स्त्रीकाल के ताजा अंक में प्रकाशित हुई हैं तथा इनका पाठ कंचन ने स्त्रीकाल यूट्यूब पर भी किया है।

1. बंदूक की गोली

पत्थर होना नहीं चाहती                                

नहीं चाहती फूल होना

नहीं चाहती

गुल होना

गुलदान होना

नहीं चाहती कोई

मृगनयनी ,चंद्रमुखी कहे

लाल अधर रसाल या

खंजन कटारी नैन कहे

आनंद की निधि कहे

केवल श्रद्धा कहे

कलगी बाजरे की

या कहे जूही की कली

इन आवरणों से उतारों मुझे

मनुष्य हूँ

मनुष्य की तरह स्वीकारों मुझे ।

नहीं चाहती

आब-ए-तल्ख़

बनकर गिर जाना

घर का गहना

बनकर  रह जाना

नहीं चाहती

गंगा मईया

नीम देवी

गाय माता

होना

नहीं चाहती

घर की दाई

पुरुषों की जुबान होना

पापा की पगड़ी और

भाई की आबरू होना

चाहती हूँ

आग होना

पहाड़ होना

पखेरू होना

जानती हूँ

अधिकार अपना

पहचानती हूँ

अपनी अस्मिता

होना चाहती हूँ

मूक इतिहास की बोली

ज़रूरत पड़े तो

बंदूक की गोली….

2.हिसाब मांगती है

जिसे कल तक

वे सब चाहते थे

बिस्तर और स्टेटस सिंबल बनाकर रखना

अब  वह

हिसाब मांगती है

अपने लिए एक मुकम्मल जगह

और अपने सवालों का

जवाब  मांगती  है

इतिहास में हुए अन्याय  के लिए

न्याय चाहती है

जाति-धर्म  के नाम पर

हो रहे शोषण से

मुक्ति चाहती है

उसने तोड़ दिया है

तुम्हारे बनाए पिंजरे को

अब वह

लोगों को जुटा रही है

उसकी दबी हुई आग को सुलगा रही है

तुम्हारे साजिशों के ख़िलाफ़

आवाज उठा रही है

हमेशा से

सहजीविता का

पक्षधर रही है

आज वह

चुप नहीं बैठेगी …

जगह, जाति,धर्म व जेंडर का

भेद मिटाकर

मनुष्य व मनुष्यता के लिए

लड़ेगी वह

अब  वह

दृश्य-अदृश्य गुलामी की

साजिशों के खिलाफ

एकजुट होकर

लड़ाई लड़ रहे लोगों के साथ  मिलकर

सहजीविता व साझेदारी की

एक नई दुनिया बसा रही है….

         

सीमा सिंह की कविताएं

सीमा सिंह की कविताएं स्त्रीकाल के ताजा अंक में प्रकाशित हुई हैं तथा इनका पाठ सीमा सिंह ने स्त्रीकाल यूट्यूब पर भी किया है।

  1. संभावित उत्तरों की तलाश में 

चिड़िया को देखने से भी पहले 

नहीं थी कोई कल्पना उनके समक्ष 

आकाश हो जाने की

पंखों के अभाव में जाना ही नहीं 

कि उड़ना आख़िर कैसा होता है 

मछलियों को देखने के बाद 

पाल ली थी इच्छा पानी पर चलने की 

जबकि बिना आधार चलने में गिरना तय था ,

किसी ने नहीं बताया कि पानी में उतरने से पहले 

करना होता है खुद को पानी के हवाले 

पानी में सिर्फ़ पानी का हो जाना होता है 

भरोसा ऐसा कि आख़िरी हिचकी भी 

इस यक़ीन में आए कि पानी ने ही किया होगा याद ,

किसी ने नहीं दिखाए रास्ते धूप में निकलने के 

जिस वक्त देखने चाहिए थे हमें अपने पैर 

और नापना चाहिए था दुनिया को नाप के जूतों के साथ 

हमें जान के दूर रखा गया रास्तों की तपिश से 

कि कोमल चेहरों को उनकी आँखों के लिए 

बचाया जाना ज़्यादा ज़रूरी था ,

पहरों भटकने के बाद आख़िर जाना 

धूप का स्वाद ज़बान पर कसैला नहीं 

बल्कि आत्मविश्वासी होता है 

टकीं हों जेबें कपड़ों में तो चेहरे की चमक 

यूँ ही बढ़ जाती है 

नहीं पड़ती ज़रूरत किसी फ़ेयर एंड लवली की 

सौन्दर्य के भार से दबी हम सीख रहीं थीं 

पहचानना अपने वास्तविक रंग 

जबकि किसी ने नहीं बताया कि हमारे प्रश्नों के 

संभावित उत्तर आख़िर क्या होंगे !

सहेजने की आनुवांशिकता में 

कहीं न पहुँचने की निरर्थकता में 

हम हमेशा स्वयं को चलते हुए पाते हैं 

जानते हुए कि चलना एक भ्रम है 

और कहीं न पहुँचना यथार्थ ,

दिशाओं के ज्ञान से अनभिज्ञ 

कर रहें हैं पीछा सूरज उगने वाली दिशा का 

प्रकाश से हमारा संबंध भले ही सदियों पुराना हो 

पर अपनी ही परछाई से हार जाना नियति ,

हम हांक दी गई बकरियों की तरह झुंड में 

चर रहे समय पर गिरी पत्तियों को 

यह जानते हुए कि हवा उड़ा ले जायेगी 

किसी रोज़ अनिश्चित दिशा में जहाँ 

हम खुद को पायेंगे निरीह अकेला ,

जिनके हिस्से नहीं आती कोई निश्चित जगहें 

वे यूँ ही भटकती रहती हैं तमाम उम्र 

और एक रोज़ अंतिम आंसू की तरह गिर कर 

मिट्टी हो जाती हैं 

हम ढूँढते रहते हैं आदिम रास्ते 

और चाही गई मंज़िलों के पते 

बारिश में भीगने की चाह और 

जंगल के उस पार खुद में डूबी एक नदी ,

टेढ़े मेढ़े रास्तों को पार करने की इच्छा 

किसी बच्चे के ज़िद जैसी 

जो रोता है लगातार चाही गई वस्तु के लिए 

हमें जीवन की तलाश में भटकने दिया जाये

निश्चित है कोई न कोई द्वीप 

एक दिन हमसे ज़रूर टकरायेगा 

और तुम्हारा आसमान भरभरा के ढह जायेगा 

हमारे खुले बालों पर

हम सफ़ेद फूल टाँक आसमान को सहेज लेंगी 

जैसे सहेजती हैं जूड़ों में अपने बिखरे बाल !