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पंडिता रमाबाई की स्मृति में शुरू होगी व्याख्यानमाला

प्रेस विज्ञप्ति

भारत में महिला अधिकारों की प्रबल प्रवक्ता  रही हैं पंडिता रमाबाई. प्रयास संस्थान प्रतिवर्ष उनके नाम पर आयोजित व्याख्यानमाला के वक्ताओं को देगा एक लाख रुपये मानदेय

साहित्य, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों के लिए राजस्थान के चुरू जिले में  काम कर रहा  प्रयास संस्थान भारत में स्त्री अधिकारों की प्रबल प्रवक्ता  रही पंडिता रमाबाई की स्मृति में वर्ष 2018 से व्याख्यानमाला शुरू करेगा। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने बताया कि प्रतिवर्ष देश-दुनिया के किसी एक चुनिंदा वक्ता को व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया जाएगा और पंडिता रमाबाई के काम को प्रकाश में लाते हुए उनके महिला-उत्थान तथा शिक्षा के प्रति संकल्प से जुड़े विषय पर व्याख्यान करवाया जाएगा।

प्रयास संस्थान के सचिव कमल शर्मा ने बताया कि संस्थान व्याख्यान के मानदेय के रूप में व्याख्यान देने आए विद्वान को एक लाख रुपये प्रदान करेगा। प्रयास संस्थान को यह राशि शिक्षाविद प्रो. घासीराम वर्मा द्वारा संस्थान के नाम करवाई जा रही इक्कीस लाख रुपये की सावधि जमा राशि के ब्याज से प्राप्त होगा। शर्मा ने बताया कि संस्थान यह व्याख्यान प्रतिवर्ष चूरू जिला मुख्यालय पर करवाएगा और प्रथम व्याख्यान वर्ष 2018 के अगस्त माह में होगा।

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कौन काट रहा उनकी चोटियाँ: एक तथ्यपरक पड़ताल

रजनीतिलक 


आजकल एक खबर ने पूरे देश में दहशत फैला दी है वह है रात के समय सोती हुई महिलाओं की उनके ही घर में चोटी का कट जाना. पिछले कई दिनों से अखबारों से लेकर टीवी चैनल में इस पर लम्बी बहसें चल रही है और महिलायें सहमी हुई सी इन खबरों को लगातार देख रही है, हम भी इस खबर की तह तक पहुंचना चाहते थे अतः पांच सदस्यों  का एक दल- संजीव चंदन भिखुनी  समांदीक्की, मनीषा कुमारी एवं रजनी तिलक- रविवार 6 अगस्त को दिल्ली देहात के रणहोला, तिलंगपुर कोटला (नजफगढ़) पहुंचा,यह जानने के लिए कि इन गावों में
जिन महिलाओं की चोटी काटी गयी है उनका सत्य क्या है?

हम लोगों  ने गाँव के बाहर एक चाय की दुकान पर बैठ कर चाय पी और वही से जानने की कोशिश की चोटी काटने की घटना कहाँ हुई है? हमारी बात को लापरवाही से उड़ाते हुए चाय वाले ने कहा हमें तो नहीं पता, बार बार पूछने पर उसने हाथ का इशारा गाँव की और किया और हम लोग कार में बैठ कर गावं की ओर गये फिर वहाँ किसी आदमी से पूछा कि चोटी वाली घटना कहाँ  हुई है उसने भी मुस्कुरा कर कहा हमें तो नहीं पता कहाँ हुई है .

गावं से निकलते हुए हमने एक औरत से पूछा तो उसने हमें सहजता से बताया कि गाँव में नया हनुमान मंदिर बन रहा है उसके पीछे एक औरत की चोटी कटी है. हम खोजते-खोजते हनुमान मंदिर पहुंचे, उस हनुमान मंदिर में पहले से ही छठ पूजा स्थल को तोड़ने के विरुद्ध कोई बैठक हो रही थी. 15-20  आदमी बैठ कर विचार कर रहे थे. संजीव चन्दन और मैं  हम दोनों पहले मंदिर में गए और उनसे चोटी काटने की घटना पर बात की तो उन्होंने कहा कि उससे भी बड़ा हमारा मुद्दा है पहले हमारी बात सुनें. उन्होंने बताया कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने हमारे छठ पूजा स्थल तोड़ दिया है और उसे स्कूल के लिए दे दिया है, जबकि यहाँ पहले से ही दो स्कूल है.

उन्होंने बताया कि यहाँ टोटल वोट 1800 हैं हम बिहारियों के 1350 वोट हैं और इस बार हमने अपने वोट भाजपा को दे दिए हैं इसलिए हमारा छट स्थल तोड़ दिया है, आप हमारी बात मिडिया तक पहुंचायें. हालांकि उनकी बात में आंशिक सत्यता थी. दरअसल आम आदमी पार्टी पूरी दिल्ली में व्यवस्थित छठ घाट बना रही है और जमीनें जो स्कूल या डिस्पेंसरी से लगकर हैं, उसे उन्हें दे दे रही है. लगा की यहाँ भाजपा बिहारी मतदाताओं की धार्मिक भावनाओं को सहला रही है. हमने उनसे फिर चोटी काटने वाली बात पूछी तो उन्होंने  किसी को फोन करके बुलाया. एक दुबला पतला लड़का मोटर साईकिल पर एक दुबली पतली लड़की को बैठा कर लाया. लड़की गर्भवती थी उसका चेहरा उतरा हुआ था. हमने जब उनसे पूछा कि आपकी चोटी कैसे कटी? तो उसने बताया मैं सो रही थी रात को साढ़े तीन बजे मेरे भाई को सपने में बिल्ली दिखी तो वह घबरा कर उठा तो उसने लाईट जलाई तो देखा मेरी चोटी के बालों की लट कटी पड़ी है उसने ही मुझे बताया.’ हमने पूछा घर बंद था तो उसने बताया कि दरवाजा थोडा सा खुला हुआ था. हमने पूछा कि क्या हम आपका घर चल सकते है ओ वे हमें अपने घर ले गये. इस घटना की विक्टिम का नाम सुनीता था (बदला हुआ नाम)जिसकी उम्र 27 वर्ष थी. अपनी जाति उन्होंने राजपूत बतायी और ये लोग यूपी के रहने वाले थे. घर में एक कोने में एक छोटा सा मंदिर भी था. इस  छोटे से कमरे में पति पत्नी और उनके दो बच्चे व पत्नी का भाई रहता था. सुनीता के चेहरे पर दोनों गालो पर आयरन की कमी के निशान काफी गहरे थे. संजीव चन्दन ने उनसे सवाल करने शुरू किये कि क्या आपको पता चला कि बाल कटे है? तो उसने कहा कि नहीं मैं तो सो रही थी. हमने पूछा ‘तो क्या आपने पुलिस में शिकायत की?’ पति पत्नी दोनों ने कहा, ‘नहीं क्या फायदा? अब जो हो गया सो हो गया पुलिस इसमें क्या करेगी? मनीषा ने पूछा ‘क्या आपको पहले से पता था कि महिलाओ की चोटी कटी जा रही है?’ सुनीता ने कहा, ‘हाँ कल ही तीन नम्बर गली में एक औरत की चोटी कटी थी मैं और मेरी पड़ोसन हम दोनों देखने गये थे.’ संजीव ने फिर पूछा ‘क्या आप लोग टीवी पर ये खबर देख रही हो ? दोनों औरतो ने कहा कि हम ये खबरें टीवी पर देख रहे है और डर भी लगता है.’ हमने पड़ोसन से भी कुछ बात करने की कोशिश की तो उसने जबाब देने से इनकार कर दिया. हमने सुनीता की कटी चोटी देखी तो हमें थोडा अजीब लगा कि एक लट तो उसकी थी पर दूसरी लट दोनों तरफ से मूछों जैसी पैनी थी, जैसे यह लट बाहर  से ला कर मिला दी गयी हो, क्योंकि बालो की ये लट उसके बालो से मिल नहीं रही थी और कटे बाल दोनो ओर से नुकीले नहीं हो सकते. यह बात सही है कि बहार का दरवाजा बंद था, परन्तु इस मकान में तीन चार किरायेदार रहते थे सबके दरवाजे सटते हुए थे. इस परिवार ने पुलिस में शिकायत तो दर्ज नहीं करायी लेकिन हैरानी की बात है कि मीडिया में खबर पहुँचाने की उत्सुकता उनमे देखी गयी.

सुनीता को पीर बाबा का झाडा लगवाया गया ताकि कोई बुरी शक्ति से उसका बचाव हो सके. सुनीता का भाई हमें घर पर नहीं मिला. सुनीता ने यह भी बताया कि किसी बूढ़े  आदमी की झलक उसे सपने में दिखी हम जब लौट रहे थे तो हमने सीढियों पर एक बूढ़े आदमी को खड़ा देखा था. सुनीता के घर से निकल कर हम दूसरे केस तीन नम्बर वाली गली के पास गये. घर कच्ची ईंटो  का बना था और लोहे का गेट लगा था. हमने गेट थपथपाया तो एक छोटे से लड़के ने गेट खोला और हमने कहा कि आपकी मम्मी से मिलना है. उसकी मम्मी कमरे से बाहर आई और हम आँगन में जा कर खड़े हुए तो वह एक कुत्ता था जिसके बारे में हमने कहा पहले इसे बाँध दो, उन्होंने कुत्ते को बाँध कर हमारे लिए खाट बिछा दी. यह परिवार पाल जाति से था इनके दो बच्चे थे एक लड़का जो सातवी में पढता था और लड़की नौवीं में थी. रेखा (बदला हुआ नाम) के पति राज मिस्त्री का काम करते हैं,  बल्कि ठेकेदारी भी करते हैं. इनके घर में बालाजी भगवान पूजे जाते हैं. हमारे पूछने पर कि चोटी कैसे कटी, रेखा ने बताया कि ‘रात एक बजे तक मियां बीबी जागे हुए थे और चाय बना कर पी. एक खाट पर बेटा और पति सो गये और एक पर हम माँ-बेटी सो गयीं. सुबह पांच बजे मैं पेशाब के लिए उठी तब तक भी सब ठीक था. सुबह उठी तो देखा मैंने सर पर हाथ फेरा तो एक लट हाथ में आ गयी, मैंने अपने बच्चों को ही बताया था. बच्चों  ने बच्चों को बताया तो लोगो को पता चला. हम उस दिन किसी काम से गये थे शाम को चार बजे आये तो लोगो ने समझा हम पुलिस में शिकायत करने गये है .हमने कहा कि पुलिस में क्यों नहीं शिकायत दर्ज करायी? रेखा ने कहा क्या फायदा पुलिस के चक्कर में? हमारा बचाव तो हमारे बालाजी बाबा ने कर दिया वो हम पर आंच नहीं आने देता. हमने बाल की लट देखनी चाही तो उसने बताया, ‘हमने आज कूड़े में फेक दिये.’ रेखा बड़ी दबंग टाईप औरत थी उसके थोड़े से ही बाल नुचे थे. कुत्ता भी उसकी खाट के नीचे ही बंधा हुआ था. उससे पूछा क्या आपक सर में दर्द है या आपको डर लग रहा है उसने कहा न मुझे डर लगता न सर में दर्द है.

इस केस के बाद हम श्यामवती (बदला हुआ नाम) का घर खोजते हुए उसके घर पहुंचे तो पता चला कि वो अपने भाई के घर राखी बंधने गयी है है. घटना का ब्यौरा इस प्रकार था कि इनके घर में जन्मदिन था. जन्मदिन के बाद श्यामवती बाथरूम में गयी फ्रेस होने तो वह  वहा बेहोश हो गयी और उसकी चोटी कटी हुई थी उसके सर में दर्द था और उसे उल्टियां हो रही थीं. इस मामले में केस दर्ज करवाया गया. हमने आसपास बात की तो लोगो ने कहा पता नहीं क्या बात है , विश्वास तो नहीं होता पर केस बढ़ तो रहे हैं. पुलिस जांच क्यों नहीं कर रही.  यहाँ से निकल कर हम पुलिस स्टेशन पहुंचे.

 वहां हमे ए.एस.आई संदीप से मिलना था. वे हमें वहाँ नहीं मिले.  हमने उनके ही चैंबर के बगल में दूसरे चैम्बर में बैठे एक अन्य पुलिस अधिकारी से इस मुद्दे पर बातचीत की तो उसने कहा, ‘ये कोई भ्रम है या कोई मानसिक दबाब द्वारा होने वाली घटनाए हैं. उन्होंने शिवनगरी में एक अन्य केस के बारे में बताया कि एक 18 वर्ष की लड़की की चोटी उसके घर में ही कटी, घर चारो तरफ से बंद था. जब हमने तलाशी ली तो बहुत सारी  छोटी-छोटी कैंची हमें मिली. हमने लड़की से बात की उससे बार-बार पूछा उसके सही जबाब न देने पर झूठ बोलने की मशीन पर ले जाने की बात की तो उसने हमारे साथ आने से मना कर दिया.’

जादू टोने की बात मैंने अपने बचपन से अपने आसपास की महिलाओं से खूब सुनी थी. मुझे याद है कि औरतें कभी कभी जिनको बच्चे नहीं होते थे उन्हें तांत्रिक यह सुझाव देते थे कि कि किसी की चोटी काट लाओ मैं पूजा कर दूंगा तुम्हारे बच्चे हो जाएंगे. कभी-कभी औरतें  किसी का बुरा करने के लिए भी ऐसे टोटको का सहारा लेती थी. बेबसी, अनपढ़ता, उपेक्षा, प्रताड़ना, इच्छा पूरी करने की जिद्द, अंधविश्वास, मिथ्या विश्वास, इर्ष्या, भावनात्मक ठेस, कुंठा के साथ-साथ अतृप्त इच्छाए भी मनोविकार बन जाती है. महिलाओं के शारीर हार्मोन परिवर्तित होने पर भी हिस्टीरिया के दौरे पड़ते हैं, कुछ मामलों में महिलायें अपने प्रति बरती जा रही उपेक्षा को दूर करने के लिए, सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए भी कुछ ऐसे कृत्य कर बैठती हैं कि न केवल परिवार का बल्कि आसपास के लोगों का ध्यान भी उसकी तरफ खीचा चला आता है.


चोटी काटने के पूरे देश में 100 से ज्यादा केस हुए, उनमें ज्यादातर 40 से उपर की महिलायें हैं, कुछ नवयुवतियां और किशोरियां. एसा अचानक क्या हुआ जो रातो रात सोते सोते स्त्रियों की चोटियों को काटे जाने की घटनाए बढ़ने  लगी? सबसे पहला केस जोधपुर में हुआ उसके बाद हरियाणा- मेवात, पलवल,फरीदाबाद ,नुहू. महेंदरगढ,रेवाड़ी, उतरप्रदेश- आगरा, नौएडा, बुलंदशहर, कुशी नगर,खुर्जा हापुड़ ,मोदी नगर, मध्यप्रदेश में छतरपुर. बुंदेलखंड,और दिल्ली के देहातों में ऐसी घटनाओं के कारण महिलाओ में भय और दहशत फैल रहा है वे घर से बाहर निकलना बंद कर रही है. आगरा में चोटी काटने के शक में एक वृद्ध महिला की ह्त्या भी कर दी गई. हैरानी की बात ये है कि ये सब घटनाए भाजपा शासित राज्यों में ही क्यों सर उठा रही है ? क्या ये सुनियोजित षड्यंत्र है या प्रायोजित ड्रामा ?

या हम ये मान ले ये कोई वायरस है जो सोती हुई औरतो की चोटियों को काट रही है और उनेह बेहोश करके उनके दिमागों को त्रस्त कर रही है ?

समय पर ऐसे डरावने और शोक संतप्त करने वाले कृत्य समाज में आते हैं और नागरिकों  को डराते हैं. उनके साथ लूट खसोट करते हैं.  परन्तु इस बार महिलाओं पर इस तरह का हमला उन्हें नियंत्रण में लेने की कोशिश की कोई सुनियोजित कार्यवाई है. हमारा समाज अंधविश्वास में जल्दी ही फँस जाता है क्योंकि हमारी धार्मिक शिक्षायें ही इसका स्रोत है.


पैटर्न:
इस फैक्ट फाइंडिंग प्रक्रम के दौरान कुछ ख़ास पैटर्न हमें दिखे, जिससे इस घटना के पीछे काम कर रही मानसिकता को समझा जा सकता है.


1. लगभग सारे मर्द इस घटना के प्रति उपेक्षा भाव रख रहे हैं, वे कायदे से इसके बारे में बात करने के प्रति भी          उदासीन दिखे. महिलाओं और बच्चों के बीच इसकी चर्चा है और बात फैलने के माध्यम भी वही हैं.
2. जिन महिलाओं की चोटियाँ कट रही हैं वे मीडिया को सबसे पहले खोजती हैं. पुलिस को इस मामले में नकारा      मानती हैं.
3. पीड़ित महिलायें प्रायः निम्न मध्यवर्ग की घरेलू कामकाजी महिलायें हैं.
4. प्रायः सभी टीवी, इन्टरनेट पर चोटी कटने की घटनाओं को लगातार देख रही हैं और ऐसा खुद के साथ होने        को  लेकर आशंकित  रही हैं.
5. प्रायः सभी पीड़िता आस्थावान और तांत्रिकों, बाबाओं या किसी ख़ास देवता को मानने वाली हैं.
6. पुलिस इसे मॉस साइको समस्या के रूप में देख रही है और यह मान कर चल रही है कि वे स्वयं ऐसा कर रही        हैं इसलिए पुलिस का जूरिसडिक्शन नहीं बनता. 

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मेधा का आंदोलन अभी भी जारी है, सरकार ने उन्हें नजरबंद कर रखा है

कामायनी स्वामी/आशीष रंजन 


7 अगस्त की शाम को जब देश के अलग-अलग इलाकों में लोग राखी की खुशियाँ मना रहे थे और भाई बहन एक दुसरे का मुंह मीठा कर रहे थे, मध्य प्रदेश के सुदूरचिखल्दा गाँव में पिछले 12 दिनों से अनशन पर बैठे नर्मदा बचाओ आन्दोलन के 12  साथियों को करीब 2000 की संख्या में पहुंचे पुलिस बल ने घेर लिया | हजारों समर्थकों के बीच से उनके विरोध के बावजूद पुलिस मेधा पाटकर और अन्य साथियों को जबरन उठा कर ले गयी | धरनास्थल को तोड़ा गया और स्थल पर मौजूद दर्जनों लोग घायल हुए | मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आन्दोलन के साथी 27 जुलाई से अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे थे | वह सरकार से मांग कर रहे थे कि हजारों परिवार जिनका पुनर्वास नहीं हुआ है उनका सुप्रीम कोर्ट के आदेशनुसार सम्पूर्ण पुनर्वास किया जाए और सरदार सरोवर बाँध के फाटक को खोल दिया जाए – फाटक बंद होने से बाँध की लम्बाई 138 मीटरहै, जिसके चलते मध्य प्रदेश में दर्जनों गाँव डूब जायेंगेऔरडूब क्षेत्र में बसे हजारों लोगों की जल ह्त्या होगी |

सुप्रीम कोर्ट ने 08.02.2017 केअपने आदेश में सरकार को निर्देश दिया था कि विस्थापित हो रहे लोगों का पुनर्वास किया जाय| कोर्ट ने यह भी कहा था कि सभी विस्थापित 31.07.2017 तक गाँव खाली कर दें नहीं तो उन्हें जबरन हटाया जाएगा | कोर्ट के इस निर्णय की आड़ में प्रशासन गाँव- गाँव जाकर बिना पुनर्वास की व्यवस्था किये गाँव खाली करने का नोटिस दे रहा है और जबरन गाँव खाली करने की पूरी तैयारी चल रही है | सरकार की नीति को देखते हुए मेधा पाटकर और अन्य साथी आमरण अनशन पर बैठे | उनका कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने गेट बंद करके पूरे क्षेत्र को डुबोने के लिए नहीं कहा तो सरकारनेगेट बंद क्यूँ कर दिया ? वह भी ऐसे समय में जब गुजरात में बाढ़ आयी है वहगुजरात में पानी पहुंचाने के नाम पर मध्य प्रदेश के लाखों लोगों को क्यूँ डुबोना चाहती है ?

नर्मदा बचाओ आन्दोलन का तीन दशक से अधिक का संघर्षशील इतिहास रहा है | पूरी तरह शांतिपूर्ण और अहिंसक आन्लोदन ने पूरी दुनिया में विकास केमॉडल पर बहस छेड़ दी| यहप्रश्न कि विकास किसके लिए और किसके कंधे पर हो एक बड़ा सवाल बन कर लोगों के बीच उभरा | बड़े बांधों द्वारा हो रहे विस्थापन और पर्यावरण कीअपूरणीय क्षति पर पूरे विश्व के लोगों का ध्यान आकृष्ट किया गया | पूरे विश्व में बड़े बांधों के खिलाफ एक वातावरण बना और तमाम सरकारों ने अपनी नीति में परिवर्तन किया | आन्दोलन के चलते 90 के दशक में विश्व बैंक, जिसके पैसे से सरदार सरोवर बाँध बनाना था, ने पैसा देने से मना कर दिया था | इस आन्दोलन ने भारत सरकार को पुनर्वास को लेकर कानून बनाने पर बाध्य किया और जमीन अधिग्रहण में लोगों की सहमति एवंअन्य जनपक्षी  प्रावधानों (जैसे सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट का प्रावधान)को कानून में लाने में सफल रही| करीब 15 हजार विस्थापित परिवारों को जमीन के बदले जमीन मिली |

तीस साल से भी अधिक से चल रहे इस आन्दोलन ने कई विपरीत परिस्थिति को भी झेला है | सुप्रीम कोर्ट का बाँध को मंजूरी देना, और उसके बाद बाँध के गेट बनने की स्वीकृति ने इस आन्दोलन के लिए बहुत मुश्किल हालात पैदा किये हैं | हालांकि आन्दोलन की सफलता रही है कि दोनों हाई कोर्ट और सुप्रीमकोर्ट ने बार-बार पुनर्वास पूरा करने का निर्देश दिया है और अभी भी मध्य प्रदेश की हाई कोर्ट प्रदेश में पुनर्वास को मॉनिटर कर रही है |मध्य प्रदेश सरकार झूठे आंकड़े दिखाकर कोर्ट को अपने पक्ष में कामयाब करने में बहुत हद तक सफल रही है | न्याय की इस लड़ाई ने पूरे तंत्र, जिसमे कोर्ट भी शामिल है, की सीमा को बखूबी उजागर कर दिया है | हमारे गाँव में किसका राज होगा ? ग्राम सभा का या किसी और का ? लोगों की बात सही है या सरकारी आंकड़ों की? असलियत की जांच कैसे होगी जैसे सवालों ने सभी को परेशान किया है | अगर पुनर्वास हो गया है तो हजारों लोगों के पास पुनर्वास की जमीन क्यूँ नहीं ?

सरकार ने मेधा पाटकर को इंदौर  के अस्पताल में कैद कर रखा है | उन्हें किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा है | सरकार का कहना है कि मेधा पाटकर के बिगड़ते स्वास्थ को देखते हुए यह कदम उठाया गया और उनका इलाज किया जा रहा है | सरकार संवाद करने में रूचि नहीं दिखा रही | 12 अगस्त को प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी भाजपा के 12 मुख्यमंत्रियों एवं 2000 पुजारियों के समक्ष सरदार सरोवर बाँध का उद्घाटन करने वाले हैं | वहीँ देश-विदेश के नामी गिरामी बुद्धिजीवी जिसमें नोम चोमस्की शामिल हैं ने मेधा पाटकर और आन्दोलन के समर्थन में वक्तव्य जारी किया है | देश भर के बीस से भी अधिक शहरों में आन्दोलन के समर्थकों ने अलग अलग तरीके से अपना समर्थन जाहिर किया है | उधरचिखल्दा में अनशन टूटा नहीं नहीं, दस साथी अनशन पर बैठ गए हैं|

लेखकद्वय जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम )से जुड़े हैं . सम्पर्क: ashish.ranjanjha@gmail.com

स्लीपिंग पार्टनर

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

शताब्दी अपनी रफ्तार से भागी जा रही थी। मैं सारे रास्ते जाने क्या-क्या सोचता समझता रहा और समीक्षा, सामने सीट पर पैर पसारे ‘कैट स्केनिंग’ करती रही।


 मेरे दिमाग में सालों पीछे छूटा गाँव, घर, खेत, खलिहान और गुरुकुल बसते-उजड़ते रहे, लहंगा-ओढ़नी पहने नानी माँ किस्से-कहानियाँ सुनाती रही और बहुत से नंग-धडंग बच्चे दूर जंगल में भेड़-बकारियाँ चराते रहे।


बीच-बीच में ऐसा लगता जैसे बिना बताए डाकिया, बंद दरवाजे के नीचे से कोना फटा पोस्टकार्ड सरका कर चला गया हो। हर बार कोना फटा पोस्टकार्ड। उस समय ममता, करुणा, स्नेह, प्रेरणा, प्रतिभा और स्मृति के शवों और शवों की स्मृतियों में चौतरफा घिरा मैं,   शमशान सा उदास और अकेला हो जाता। बता नहीं सकता कितना बैचैन…. कितना परेशान।

अनुवाद


समीक्षा-कोई मिथक, कल्पना या सपना नहीं, हाड़-मास की जीती-जागती, हँसती-खेलती और घूमती-फिरती लड़की है। लेकिन पता नहीं क्यों कभी लगता कल्पना या सपना भी हाड़- मांस की जिन्दा लड़की हो सकती हैं और कभी लड़की भी मिथक, कल्पना या सपना सी लगने लगती। ‘मेकअप’ में वह मुझे भी ऐसी जासूस लगती जो मेरी क्या मेरे महाजनक तक की जन्मपत्री बांचे हुए हो और कभी जादुई काहानियों वाली साक्षात् जादूगरनी, चुडैल या डायन जो मौका लगते ही मुझे तोता, बुलबुल, मैना या कबूतर बना कर सोने के पिंजरे में बन्द कर देगी। ऐसे में मुझे उस खतरनाक लड़की से बेहद डर लगता ओर बार-बार मन करता कि सब कुछ छोड़-छाड़ कर कहीं दूर पहाड़ी जंगलों में जा साधु-संन्यासी बन जाऊँ, घोर तपस्या करुँ, और मोक्ष प्राप्त करके जीवन जीवन-मरण के दुष्चक्र से सदा-सदा के लिए छुटृी पाऊं। लेकिन ‘किन्तु-परन्तु’ और ‘अगर-मगर” ने  मुझे पूजा साधना या अराधना में ही उलझाए रखा और कभी कुछ करने ही नहीं दिया।

समीक्षा की भाषा में मैं अपने पिता और वह अपनी मम्मी की कार्बन-कॉपी हैं।  मुझे नहीं मालूम माँ कब, कहाँ, कैसे और क्यूँ मरी या मार दी गयी हैं। हाँ! जब भी कोई पूछता, ‘‘आपका नाम, बाप का नाम?’’ तो मैं बिना सोचे-समझे बता लिखा देता वाही नाम जो मेरे स्कूल सर्टिफिकेट में लिख लिखा दिया गया था। मम्मी-पापा के प्रेत, हर समय हमारे आस-पास मंडराते रहते और पता नहीं हम कभी इनसे मुक्त हो भी पाएंगे या नहीं।
मैं अक्सर कहता-काश! हम मम्मी-पापा होते।


नानी माँ के जाने के बाद कई-कई बार सोचना पड़ता स्थायी अता-पता और सोचते-सोचते आकाश बयां के घोसलों सा लटका नजर आता। उजाड़ और सुनसान। ऐसे समय में सुबह से शाम तक मैं हर कुछ देर बाद माचिस की एक तिल्ली जलाता और रोज यह फैसला करके सोता या सो जाता कि कल पूरी माचिस में ही आग लगा दूँगा, …. आग। लेकिन कह नहीं सकता क्यों?  समीक्षा जब भी चश्मा उतार लाड़ से कहती, ‘‘तुम बिल्कुल पापा जैसे लगते हो।’’ तो मुझे महसूस होता कि या तो उसके पापा ही मेरे पिता होंगे या फिर मेरे पिता उसके भी पापा। मैं अनुमान लगाता- ‘हो सकता है उसकी मम्मी ने मरते समय सच बता दिया हो’ और कान में नानी माँ कहने लगती, ‘‘कोई भी आदमी या औरत, मरते समय झूठ नहीं बोलता।’’ मुझे नहीं मालूम उसकी ‘मेम साहब’ सी मम्मी ने सच बोला या झूठ । मुझमें जब पालतू पिल्ले से पापा नहीं मिलते तो वह अक्सर ‘स्माइल प्लीज’ जैसी हँसी दिखाते हुए कहती, ‘‘ यू सन् ऑफ ए गन’’ और बिलियर्ड खेलने लगती। कई बार जीती जाती तो उसे शक होता  कि मैं उसे जानबूझ कर जीतने देता हूँ। शायद इसलिए उसने एक दिन झल्ला कर कहा भी, ‘‘हाई यू आलवेज गिव ए मिस?’’ मैं सिर्फ ‘‘ ओह नो… मिस…. नो’ कह कर टालने की कोशिश करता रहा।


वह दुधिया रोशनी में दुनिया भर के चमड़ा उघोग के शेयरों के भाव बताते-बताते अचानक अपना पर्स उठाती और यह कह कर ठक…. ठक…. ठक… करती मेरी समझ से बाहर चली जाती- ‘‘यू आर ट्राइंग टू किस ए गनर्ज डॉटर।’’

मैं दुधिया रोशनी में गालियाँ देता, कार्टून बनाता, प्रेम कविताएँ लिखता, इन्द्रजाल फैलता, सफेद कमीज को लाल-काली  करता, और सारा दिन बू…बू… करता प्याज के छिलके उतारता रहता। अपने को “वाईज” और उसे “अदरवाईज” समझता मैं, कभी गिटार बजाता ओर कभी जोर-जोर से गाता‘‘इट… इज ए मैड… मैड मैड वर्ल्ड…..’’



होश आता तो समीक्षा….. समीक्षा प्लीज समीक्षा करने लगता। वह जितना पढ़ाती- समझाती- रिझाती मैं अपने पिताजी की तरह उतना ही उलझता ऐंठता चला जाता। उस समय वह एकदम मम्मी सी लगती। हर बार वह ब्रह्माण्ड सुन्दरी सी हँसती हुई आती मगर जाते-जाते बच्चों की तरह रोने लगती। कई दिनों तक वह मन में गुलाबी मछली सी तैरती रहती और मैं ऑइस बॉकस से बेडरुम में पड़ा-पड़ा ‘शो पीस’ देखता रहता। नींद में चूल्हे पर चाय का पानी रख शान्ति की तलाश में निकल पड़ता। हाथी दांत से बने द्वार तक पहुँचते-पहुँचते ऐसा लगता जैसे धरती से अम्बर तक आग लगी है…. आग लगी है इस कोने से उस कोने तक दुनिया भर में। चारों ओर चंदन वन में विष वृक्षों पर फन फैलाये सांप, टहनियों से लटके लिपे-पुते भयावाह चेहरे और आगे-पीछे टहलते हाथियारबन्द शिकारी नजर आते।


सुबह-सुबह अखबार सी समीक्षा आ दरवाजा खटखटाती तो मैं हड़बड़ा कर उठता। दरवाजा खोलता ओर देखता कि कमरे में धुआँ ही धुँआ भरा है। चौखट पर खड़ी समीक्षा काफी देर तक दमें के मरीज की तरह खांसती रही और मैं ग्रर्भग्रह से बाहर निकल सड़क पर जहर खाकर मरे चूहों की शवयात्रा में शमिल हो कहने लगता- ‘‘ राम नाम सत है, सत बोलो गत है..’’

यस पापा


शवयात्राओं से लौटता तो “घर सूना बिन कामिनी’ के आदेश- उपदेश देते ‘हैंड लैटर्स’ पढते- पढ़ाते मन में मिट्टी के घरौंदे बनाते- तोड़ते बच्चे खेलने लगते और आँखों में सजा शामियाना धूँ… धूँ कर जलने लगता। सामने शीशे में बणी – ठणी सी समीक्षा आ खड़ी होती और मैं जाने- अनजाने नाखून चबाते-चबाते अंगूठा चूसने लगता। दोनों आमने-सामने अड़े टिक…. टिक सुनते रहते और चुपके-चुपके हवाई जहाज बनाते – उड़ाते शाम हो जाती।
‘ड्राईक्लीन’ कर बाहर निकलता और बस स्टॉप पर पहुँचकर घंटों  सोचता- ‘कहाँ चला जाए? घूम-फिर कर क्लब पहुँचाता और रात देर गए टैक्सी पकड़ वापस आ जाता। नशे में कभी-कभी लगता बिस्तर में बेसिर -पैर की समीक्षा सोई पड़ी है- अँधेरे में सिर पैर ढूँढते-ढूँढते बेहद भयभीत और आतांकित हो चीखने की कोशिश करता लेकिन गले से आवाज नहीं निकलती। आँख खुलती तो पता लगता कि फर्श पर रजाई में दुबका पड़ा हूँ। बहुत देर तक समझ ही नहीं आता कि ऐसा कैसे हुआ? फिर सोचता शायद रात कुछ ज्यादा हो ही गई और रजाई उठा पलंग पर सोने की कोशिश करता लेकिन नींद न आती। सिरहाने रखे ‘मार्निंग गिफ्ट’ को बार-बार उलट-पुल्ट कर देखता और फिर से पैक करके रख देता। मैं करवटें बदलता गिनता-गिनाता रहता दिन, महीने, साल और हर साल अपने आपको समझाता- ‘ जो होगा, देखा जाएगा’ पर बार-बार ख्याल आता बचपन में बिछुड़े बसन्त से न जाने कब मिलना होगा?’’ होगा… नहीं होगा’…. शायद हो… शायद नहीं। सोकर उठता तो बहुत देर तक सिर पकड़ कर बैठा रहता। ‘हैंग औवर’में पानी पीते-पीते याद आता- ऐसे ही एक रात वह भी पीकर आई थी। न जाने कहाँ से और कितनी ।  सुबह हुई तो पता चला वह नहा-धोकर कब की चली गई और मैं उल्टियों से गन्धाते बिस्तर में पड़ा सपने देखता रह गया…. सपने।’


उस दिन के बाद सालों मेरे दिमाग में सारी-सारी रात वह भेष बदल-बदल कर फेरे  लगा  रही। कभी सार्थक के साथ ठहका लगा हँसती हुई, कभी वैभव और समर्थ के साथ रोती-पीटती हुई और कभी मोहित या प्रतीक की बाँहो में बेहोश। मैं नशे मैं बड़बडाता । चीखता-चिल्लाता और अमावस की रात में उसका पीछा करता लेकिन वह बहुत तेजी से भूरी- जंगली बिल्ली की तरह छलांग लगाते-लगाते सारी दीवारें तोड़ती, सरहद के उस पार भाग जाती और मैं बरामदे में पड़ी बैसाखियाँ समटेते-समटेते अपने बाल नोचने लगा।



लोग कहते-सुनते रहते। मैं गमले तोड़ता, फूल नोचता, किताबें फैंकता, नंग-धडंग, नाचता, लड़ता-झगड़ता, तितलियाँ पकड़ता, बारुद बिछाता और आग लगाता- लगाता पागलखाने पहुँच जाता। महीनों तक डाक्टर विद्याधर दिमाग ठीक करते मगर ऐसे दौर पड़ते ही रहे। शायद सिर्फ कारण बदलते रहते। कभी कुछ….. कभी कुछ।


समीक्षा पागलपन का पोस्ट…. पोस्ट….पोस्टमार्टम करती रहती और मैं बोर्डरुम में बैठे-बैठे एक भरी-पूरी और खेली खाई औरत का कच्चा चिट्ठा तैयार करते-करते सपनो की परिभाषा में उलझ जाता । मैं अक्सर चाय-कॉफी के साथ सिगरेट, कभी सिगार और और कभी पाइप पीते-पीते विरासत में मिले किसी पुराने प्लॉट पर ‘मल्टी स्टोरी” का नक्शा बनाने लगता। मालूम नहीं कितनी बार हवादार हवेली सा मन्दिर, किले की मजिस्द , शानदार कोठी या चर्च और एयरकंडिशंड बंगले सा गुरुद्वारा बनाता‘- मिटाता रहा या हवेली को किले और कोठी को बंगले में अदलता- बदलता या खरीदता-बेचता रहा।


समीक्षा मिलती तो खेलकूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक पर शास्त्रार्थ करने लगती ओर मैं किले सी कोठी के ड्राईंगरुम में सिगरेट सुलगाता और लम्बा कश खींच धुँआ उंडेलते मन ही मन आत्मसर्मप्ण कर सोचता- छोड़ो! अभी बहस में पडूँगा तो सारा मामला और उलझ जाएगा। लेकिन आहत और अपमानित इतना कि ठांय! ठांय !! हवा में बन्दूक दागता रहता।


कभी वह समाजशास्त्र पढ़ाने- समझाने लगती और कभी भ्रूणहत्या से सती तक का इतिहास। बलात्कार हत्या और आत्महत्याओं के आंकड़े बताते-गिनाते उसका मुहँ गुस्से में लाल हो जाता। मैं दो घूँट  ले समझता- पगाल है…. पागल। जब देखो पता नहीं क्या- क्या पढ़ती लिखती बोलती रहती है।


सुलगती सिगरेट को ऐशट्रे में मसलता और उठकर धूमने- घुमाने चला जाता। घंटों गोल गुम्बद के नीचे बैठा-बैठा योजनाएँ बनाता- बिगाड़ता  रहता। समीक्षा किताबों की धूल झाड़ती या फटी- पुरानी धुन लगी पोथियों पर नरम और चिकने चमड़े का ‘कवर’ चढाती रहती। लौटने के बाद मैं  पड़ोस में गीता और मनु के साथ उनके लॉन मैं बैठा शतरंज खेलता- खिलाता रहता।

समीक्षा एक दिन भी नहीं मिलती तो मैं बैचेन हो जाता। वह नहीं आती तो मैं उसके यहाँ जा पहुँचता। जब कभी नहीं मिलती और दरवाजे पर ताला लगा होता तो मैं आशंकित हो अन्दाज लगाता- सार्थक…. समर्थ…. प्रतीक… वैभव … मोहित। सब जगह चक्कर काटकर वापस आता तो वह बाहर सीढियों पर बैठी ‘वॉर अगेंस्ट विमेन’ या भविष्य फल पढ़ रही होती। एक दूजे को देख मेरी सांस में सांस आती और उसके सांवले चेहरे पर मोर नाचने लगते। ताला खोलने के लिए चाबियाँ ढूँढते- ढूँढते ध्यान आता- अरे। आज तो ‘यहाँ’ जाना था… आज तो “वहाँ” जाना था… समीक्षा को देख मन कहता, ‘ नहीं…. आज कहीं नहीं जाना था।’ इसके बाद मुझे कुछ भी याद नहीं रहता या मैं खुद ही जानबूझ कर सब भूल जाता। कभी समीक्षा मुझे ‘ आत्महत्या के विरुद्ध ’ कविता जैसी लगती और कभी हत्या होने से बची कथा – नायिका सी।


कई बार सोचा कह दूँ ‘लेट अस गो टू द वर्ल्ड’ लेकिन कभी अध्यादेश जारी करते पापा सामने आ खड़े होते और कभी डॉलर, पाउंड या दीनार उछालती प्रतीक एण्ड कम्पनी। उस दिन समीक्षा का जन्म दिन था (पता नहीं कौन सा? ) और रात को  चौराहे पर खड़े-खड़े बहुत हिम्मत बटोर मैंने ही कहा था, ‘‘ सभी …. क्षा… आज मेरे साथ चलो ना! ….. क्या हम लाइफ पार्टनर नहीं बन सकते?’ सोचा एक बार ‘हाँ’कह दे, फिर तो मैं देख लूँगा अच्छी तरह।
समीक्षा ने गौर से सुना…. थोड़ा सोचा और शब्दों को तौलते हुए बोली ‘‘ आज से तुम्हारा मतलब? … मैं रोज किसी न किसी….’’
मैं सकपकाया और ‘‘नो प्लीज… नो करता रहा।


कुछ क्षणों के बाद उसने कहा, सॉरी डियर… मैं तुम्हारे साथ चलती … सात जन्म तक चलती…. अगर तुमने ‘आज’ न कहा होता। तुम हमेशा पार्टनरशिप की बात करते हो….. बात। मुझे लगता हैं तुम्हें लाइफ पार्टनर नहीं, ‘स्लीपिंग पार्टनर’ चाहिए…. स्लीपिंग पार्टनर’ चाहिए…. हर जगह स्…लीपि. ग…. पार्ट…. नर,’’ उसने काँपती आवाज और भेदती नजर से मेरी और घूर कर देखा तो मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे लाल-पीली बत्तियाँ उसकी आँखों में जल-बुझ रही थीं। इससे पहले कि मैं कुछ कहता वह ‘पोनी टेल’ हिलाती हुई सड़क के उस पार जा चुकी थी।


मैंने सोचा ‘ उसका पीछा’ करने या समझाने – बुझाने से कोई फायदा नहीं’ और पंचर हुए पिछले पहिए को उतार ‘स्टेपनी’ बदलने लगा। कहना मुश्किल है कब तक, ‘स्टेपनी’ बदलता रहा… ‘स्टेपनी’। सुबह आँगन से सड़क तक- सिन्दुर, काँच की चूडियाँ, लाल-साड़ी, मंगल सूत्र और ‘मार्निंग गिफ्ट’ बिखरे पड़े थे।
और शताब्दी अपनी रफ्तार से भागी जा रही थी।

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सुनो पुरुष: असुंदर और वेश्यायें भी लेखिका हो सकती हैं, कवि, आलोचक और निर्णायक भी

Literary sexism has been wreaking havoc on the self-esteem of women writers for centuries — even in our seemingly more enlightened times. And now, suddenly, it’s become fashionable to openly dismiss notions of gender inequality and brand complainants as “privileged whingers”.
Jane Sullivan


साहित्यिक लिंगवाद सदियों से महिला लेखकों के आत्मसम्मान पर कहर बरपा रहे हैं – यहां तक कि हमारे प्रबुद्ध रूप से अधिक प्रबुद्ध समय में। और अब लैंगिक असमानता और ब्रांड शिकायतकर्ताओं को “विशेषाधिकार प्राप्त कातिल” के रूप में खारिज करना फैशन हो गया है

मंटों वेश्याओं की कहानियां लिखते थे, महान कथाकार थे. पुरुष साहित्यकार प्रेम की कथाएं पढ़ते, रचते हैं वे महान हैं. वे सब महान हैं जो पुरुष हैं और महिलाओं के साथ विशेषाधिकार प्राप्त प्रेमी का आचरण करते रहे हैं. ये सब अपनी रचनाओं से मूल्यांकित होंगे. लेकिन जब स्त्री लिखेगी तो उसके निजी रिश्ते किससे कैसे रहे, वह दिखती कैसी है, उसके सेक्स आचरण कैसे हैं, आदि उसके मूल्यांकन के आधार होंगे.

यह कोई नया सिलसिला नहीं है, लेकिन उस समय में जब सनी लियोन के लेखन का हमसब स्वागत कर रहे हैं लेखिकाओं के खिलाफ पुरुष साहित्यकारों, आलोचकों के एक खेमे से, जिनकी प्रगतिशील दावेदारी भी है, मूल्यांकन और आलोचना के सेक्सिस्ट हमले हो रहे हैं. एक बार फिर हिन्दी साहित्य के महारथियों ने सिद्ध कर दिया है कि मूलरूप से जातिवादी और स्त्रीविरोधी हैं-हाई कास्ट मेल हैं.


पिछले तीन दिन से हिन्दी साहित्य की दुनिया सोशल मीडिया पर स्वयं अपनी परतें खोल रही है. हालांकि सोशल मीडिया में सक्रिय लेखिकाओं ने जब जमकर प्रतिरोध किया तो परदे के पीछे भी डैमेज कंट्रोल की कवायाद शुरू हो गई है. इस दशक की शुरुआत में ही हिन्दी के एक लेखक और बड़े मठाधीश के रूप में तब उभरे और हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायाण राय ने लेखिकाओं को छिनाल और कामदग्ध कुतिया कहा था. काफी विरोध हुआ उनका. तब भी डैमेज कंट्रोल के खेल शुरू हो गये थे. अभी भी उनकी साम्रदायिकता विरोधी चैम्पियन की छवि से उनके इस सेक्सिस्ट आचरण का डैमेज कंट्रोल होता है. तब जो पर्दे के पीछे सक्रिय लोग थे उनमें से कुछ अभी भी हैं, लेकिन चूकी  मठ बड़ा नहीं है, गिरोह बड़ा नहीं है इसलिए उसकी संख्या भी उतनी बड़ी नहीं है. हालांकि विरोध भी उतना बड़ा नहीं है.

कवि कृष्ण कल्पित ने एक सम्मान में निर्णय के बहाने निर्णायक अनामिका के खिलाफ एक निहायत आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिसका स्वाभाविक रूप से विरोध हुआ. विरोध के जवाब में कल्पित विरोध करने वाली लेखिकाओं के खिलाफ भी उसी अंदाज में हमलावर हुए. शुरू में उनसे माफी की मांग भी उठी जो धीरे-धीरे उनके अपने गिरोह की सक्रियता के असर से कमजोर भी होने लगी है. कल्पित के हमले न सिर्फ सेक्सिस्ट हैं उनकी प्रशंसाएं भी उतनी ही सेक्सिस्ट हैं. मसलन उनके तीन पोस्ट की बानगी है:

अनामिका के खिलाफ: 

अनामिका पिछले एक वर्ष से बहुत से युवा कवियों को अपनी कविता के साथ घर बुलाती रही हैं । उन्होंने उनमें से एक जवान कवि का चुनाव किया है । इसमें किसी को क्यों ऐतराज़ हो रहा है ? यह उनका व्यक्तिगत फ़ैसला है, जिसका हमें सम्मान करना चाहिये !
#भारतभूषणअग्रवालपुरस्कार_2017 १.
किसी को दाढ़ी वाला पसन्द आता है तो किसी को सफाचट – अपनी-अपनी सौंदर्याभिरुचि है !

लेखिका गीता श्री के खिलाफ: 

अपने छोटे से जीवन में मेरा सामना विकट औरतों से हुआ है, लेकिन गीताश्री जैसी फूहड़, बदतमीज, और गंवार औरत, जिसको लेखिका होने का भरम भी है; दूसरी नहीं देखी.
सुबह से यह औरत मुझे कुंजडियों की तरह गालियाँ दिये जा रही है. कुंजडी सुंदर हो तो गालियाँ भी मीठी लगती है, लेकिन यहाँ तो दीवार से सिर मारना ठहरा……

और लेखिका वंदना राग की प्रशंसा में: 


वंदना राग जी मैं आपके लिखे का कायल हूँ, आपको ध्यान से पढ़ता रहता हूँ. आपकी संवेदना, पारदर्शी गद्य, आपकी मुस्कराहट और घुंघराले बालों का मैं प्रशंसक हूँ.
……………………………………………………………..मेरी स्त्री सम्मान को कम करने की मंशा नहीं थी. कुछ बदमाश औरतों और मेरे दुश्मनों ने बात का बतंगड बना दिया.

ये तीनो ही उद्धरण भाषा और समझ के स्तर पर लेखक के स्त्रीविरोधी और जातिवादी मानसकिता को सामने लाते हैं. और तुर्रा यह कि वे अपने बचाव में या फिर उनके बचाव में दूसरे लोग यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भले मानुष का यह आशय नहीं था. आशय यदि पुरस्कार के चयन का विरोध ही था यदि मान लिया जाये तो क्या पुरस्कारों के निर्णायकों का विरोध इसी भाषा के साथ अब तक होता रहा है. पिछले साल इसी भारतभूषण अग्रवाल सम्मान के निर्णायक उदय प्रकाश थे, उनके निर्णय का भी विरोध हुआ, लेकिन विरोध की भाषा वह क्यों नहीं थी जो अनामिका के प्रसंग में है. क्या कल्पित या दूसरे लोग  पुरुष रचनाकारों के लेखन की प्रशंसा करते हैं तो उसके रूप सौन्दर्य, मुस्कान और घुंघराले बालों की प्रशंसा करते हैं, या अपनी प्रशंसा की कसौटी बनाते हैं. वंदना राग की प्रशंसा की भाषा क्या कल्पित जी के पद्य-गद्य की प्रशंसा की भाषा हो सकती है. क्या मुस्कराहट और बिना घुंघराले बालों के वंदना राग के गद्य की पारदर्शिता और उनकी संवेदना कुछ कम जाती हैं ?

समर्थन की भाषा और भंगिमा भी सेक्सिस्ट


यह तो हुई विरोध की भाषा और भंगिमा अनामिका के समर्थन में भी सोशल मीडिया में जो पोस्ट हो रहे हैं वे भी अंततः स्त्रीविरोधी वक्तव्य और भंगिमा ही हैं. कोई उन्हें स्नेहिल बहन बता रहा है, कोई ममतालू माँ. यदि वे ये दोनों ही नहीं होतीं तो उससे उनके लेखन का क्या संबंध होने वाला है या उनके उस निर्णय से. अनामिका इन रिश्तों के अलावा किसी की पत्नी, किसी की प्रेमिका या किसी की दोस्त भी हो सकती हैं. इन सबसे बढ़कर वे किसी की कुछ भी नहीं हो सकती हैं वे सिर्फ अनामिका हो सकती हैं तो इस होने से लेखन और आलोचना का क्या संबंध है?

समर्थन और विरोध की इस भाषा और भंगिमा में हमारी लेखिकाएं भी पीछे नहीं हैं. उषा किरण खान ने लिखा:

कृष्ण कल्पित जी,मैं एक प्रगल्भ माँ थी और आप बीए में पढ़ने वाले किशोर ।मेरी कहानी और आपकी कालजयी कविता “बेटा इकलौता” आदरणीय भारती जी ने बड़े विज्ञापन करके छापा था। तबले आपकी प्रतिभा की मैं क़ायल हूँ । आपने भी सदा बड़ी बहन वाला आदर दिया है।आप हमारे शहर में दो बार अधिकारी बन दूरदर्शन में आये जो साहित्यकारों के विचरण का स्थल है ज़ाहिर है हम मिलते रहे। कभी आपको अभद्र नहीं पाया। आपने यहाँ परिश्रम किया यह हम देखते रहे। आपने कई बार जिसे पसन्द नहीं किया उसे भी बुलाते रहे ।आपकी छवि मेरे मन में सदा एक किशोर की रही। साहित्य आपका ओढ़ना बिछाना है । उसके सहित को लेकर चलने में क्या हर्ज है? मुझे पता है आपकी मात्र एक बिटिया है ,क्या उसे महिलाओं के सम्बन्ध में आपके ये विचार (जिसे अपशब्द कहे और जिसका नखशिख वर्णन किया)रुचेंगे?
आपने विराट अध्ययन किया है उसका मान रखें। कुछदिन मौन रहकर मनन करें। आप शेखावटी के हैं , राखी के समय का ध्यान रखें।
मैं यात्री काका(नागार्जुन ) से भी कहती और रोकने में सफल होती थी.

हिन्दी साहित्य और समाज का लिटमस 


उषा किरण खान अपने पोस्ट में कुछ यूं लिख रही हैं मानो कल्पित कोई एक ऐसा पीडित गुट हों, जिनसे दूसरा गुट लड़ रहा है. मैं इस पोस्ट  के साथ दांग रह गया कि क्या हमारी सम्मानित लेखिकाएं भी इसे एक साहित्यिक संघर्ष के रूप में देख रही हैं? क्या मामला इतना भर है. नहीं. यह प्रसंग साहित्य के भीतर हाई कास्ट मेल की दृष्टि का है. इसकी आलोचना होनी चाहिए थी और इसे एक हिन्दी साहित्य और समाज के लिटमस की तरह देखा जाना चाहिए था.

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सेक्सिस्ट बयानों और ट्रोलिंग के खिलाफ आगे आये लेखक: जारी किया वक्तव्य

वक्तव्य / Statement

हिन्दी जगत में साहित्यिक पुरस्कारों पर विवाद कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ समय से भारतभूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार (जो 35 वर्ष से कम अायु के कवि द्वारा लिखी गई वर्ष की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कविता के लिए दिया जाता है) विवाद के केन्द्र में रहा है अौर कविता के चयन पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। लेकिन सोशल मीडिया अौर दूसरे मंचों पर कुछ पुरुष लेखकों ने, जिनमें युवा और प्रौढ़ दोनों तरह के लोग हैं, जिस भद्दे और अाक्रामक स्त्री-विरोधी रवैये और अश्लील भाषा का प्रदर्शन किया है, उससे हम स्तब्ध हैं। दुःख की बात यह है कि इनमें से अनेक लोग अपने को लोकतांत्रिक, उदारमना और कुछ तो वाम रुझान वाला मानते हैं।

पिछले साल पुरस्कार के लिए चयनित कवि शुभमश्री और उनकी कविता पर अशोभनीय अौर अपमानजनक ढंग से हमले किये गये थे। इस वर्ष अश्लील हमले का निशाना चयनकर्ता अनामिका को बनाया गया है। हमें डर है कि इससे एक ऐसी अस्वस्थ परम्परा की नींव पड़ रही है जिसके तहत हर तरह के स्त्रीद्वेषी, मर्दवादी विमर्श, सामन्ती मानसिकता के खुले प्रदर्शन और साहित्य जगत में लफ़ंगेपन को वैधता मिलेगी। दूसरी तरफ़ इसी समय अति-दक्षिणपंथी विचारों के नैतिक-प्रहरी और ट्रॉल भी सक्रिय हैं जो अपनी ज़हरीली भाषा के साथ, छद्मवेश में तरह तरह के भ्रम और दुष्प्रचार फैलाने, और चरित्रहनन करने में मशग़ूल हैं।

हम सभी लेखकों और साहित्यप्रेमियों की चिंताओं के भागीदार हैं जो इस वस्तुस्थिति से परेशान हैं, और उन लेखकों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हैं जिन्हें हाल ही में असभ्य और प्रतिक्रियावादी हमलों का निशाना बनाया गया है। समकालीन हिन्दी साहित्य सांस्कृतिक गुंडों, उनके भटके हुए अनुयायियों और प्रच्छन्न क़िस्म के फ़ासीवादी दस्तों के लिए कोई खुला मैदान नहीं है।
शुभा
प्रशांत चक्रवर्ती
मंगलेश डबराल
मनमोहन
दूधनाथ सिंह
नरेश सक्सेना
असद ज़ैदी
राजेश जोशी
अली जावेद
अमिताभ
अनीता वर्मा
अपर्णा अनेकवर्णा
अरुण माहेश्वरी
चंदन पांडेय
चमनलाल
देश निर्मोही
धीरेश सैनी
जवरीमल पारख
किरण शाहीन
कुलदीप कुमार
कुमार अंबुज
कुमार विक्रम
लाल्टू
लीना मल्होत्रा
महरुद्दीन ख़ाँ
महेश वर्मा
मुकुल सरल
निर्मला गर्ग
नूर ज़हीर
पल्लव
पंकज चतुर्वेदी
पंकज श्रीवास्तव
प्रत्यक्षा
अार चेतनक्रांति
रंजीत वर्मा
रवीन्द्र त्रिपाठी
संजीव कुमार
समर्थ वशिष्ठ
सरला माहेश्वरी
शालिनी जोशी
सुमन केशरी
शिवप्रसाद जोशी
शीबा असलम फ़हमी
शेफ़ाली फ़्रॉस्ट
सुषमा नैथानी
तरुण भारतीय
त्रिभुवन
वंदना राग
विनोद दास
वीरेन्द्र यादव
संजीव चंदन
निवेदिता
नासिरुद्दीन
फारूक शाह
रेखा सेठी
पूजा पाठक
रमेश ऋतंभर
डा. सुनीता
गुलज़ार हुसैन
हेमलता माहिश्वर
हेमलता यादव
अनिता भारती
श्वेता यादव
अरुण कुमार
मृदुला शुक्ला
कविता
इंद्र मणि उपाध्याय
इश्वर शून्य
राजेश चंद्र
जितेन्द्र श्रीवास्तव
स्मिता सिन्हा
रश्मि  भारद्वाज
चरण सिंह पथिक
संदीप मील
रितुपर्ना मुद्राराक्षस
कमलेश वर्मा
कैलास वानखेड़े
आशीष अनचिन्हार
आभा दुबे
विजेंद्र मसीजीवी
प्रमोद धीताल
राजेश राज
संजीवनी पी संजीवनी
कुसुम राय
राजीव कार्तिकेय
दीपक मिश्रा
सीमा आज़ाद
रणजीत कुमार सिन्हा
एम नय्यर उमर
भरत प्रसाद
अरुणाभ सौरभ
अशोक पाण्डेय
रुचि भल्ला
रेशमा प्रसाद
रेखा चमोली
मंजू शर्मा
मनीषा जैन
मनीषा कुमारी
राजीव सुमन
नवनीत पांडेय
जीवेश प्रभाकर
जीतेंद्र विसारिया

STATEMENT

“Events like announcement of a literary award often cause a stir in Hindi literary circles. Lately the Bharatbhooshan Agrawal Award (given for the best Hindi poem of the year written by a poet from the age group under 35) has been the focus of controversy, provoking a variety of reactions questioning the validity of the decision. We are especially distressed at the ugly display of aggressive misogyny and intemperate language from a number of men, young and old, in social media and print journalism, some of them profess to be liberal, democratic, and few of them like to call themselves left-leaning.

“Last year the awarded poem and its author, Shubham Shree, were the target of a barrage of derogatory and abusive attacks. Interestingly, this year it was the turn of the selector, Anamika, who is facing scurrilous attacks. This sets an unhealthy precedent whereby the openly sexist discourse, assertion of feudal mindset and lumpenisation of literary universe is being given legitimacy. In addition, the literary vigilante of ultra right persuasion are contributing their own bit in poisoning the atmosphere by generating a miasma of confusion, character assassination, impersonation, fakery and vile speech.

“We share our concern with all the writers and readers who have been dismayed at these developments, and express our solidarity with the writers who have been targets of these uncivil and reactionary assaults. The domain of contemporary Hindi literature is not yet ready to be taken over by the cultural brutes, their misguided followers and crypto-fascist militias.”
Shubha
Prasanta Chakravarty
Mangalesh Dabral
Manmohan
Doodhnath Singh
Naresh Saxena
Asad Zaidi
Rajesh Joshi
Ali Javed
Amitabh
Anita Verma
Aparna Anekvarna
Arun Maheshwari
Chaman Lal
Chandan Pandey
Desh Nirmohi
Dheeresh Saini
Jawari Mal Parakh
Kiran Shaheen
Kuldeep Kumar
Kumar Ambuj
Kumar Vikram
Laltu
Leena Malhotra
Maheruddin Khan
Mahesh Verma
Mukul Saral
Nirmala Garg
Noor Zaheer
Pallav
Pankaj Chaturvedi
Pankaj Srivastava
Pratyaksha
R Chetankranti
Ranjeet Verma
Ravindra Tripathi
Samartha Vashishtha
Sanjeev Kumar
Sarla Maheshwari
Shalini Joshi
Sheeba Aslam Fehmi
Shephali Frost
Shivprasad Joshi
Suman Keshri
Sushma Naithani
Tarun Bhartiya
Tribhuvan
Vandana Rag
Vinod Das
Virendra Yadav
Sanjeev Chandan
Nivedita
Nasiruddin
Faruk shah
Rekha Sethi
Pooja Pathak
Ramesh Ritambhar
Dr. Sunita
Gulzar Hussain
Hemlata Maihshwar
Hemlata Yadav
anita Bharti
Shweta Yadav
Arun Kumar
Mridula Shukla
Kavita
Indra Mani Upadhyay
Ishwar Shunya
Rajesh Chandra
Jitendra Shrivastav
Smita Sinha
Charan Singh Pathik
Sandeep Meel
Rituparna Mudrarakshas
Kamlesh Verma
Kailash Vankhede
Ashish Anchinhar
Abha Dubey
Vijendra Masijiwee
Pramod Dhital
Rajesh Raj
Sanjeevani P Sanjeevani
Kusum Rai
Rajeev Karteekey
Deepak Mishra
Sima Azad
Ranjeet Kumar Sinha
M. Nayyar Umar
Bharat Prasad
Arunabh Saurabh
Ashok Pandey
Roochi Bhalla
Reshma Prasad
Rekha Chamoli
Manju Sharma
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Jitendra Visaira

स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त दो)

रेखा सेठी

  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित
संपर्क:reksethi@gmail.com


पहली क़िस्त से आगे 



स्त्री-कविता और जेंडर

पिछले कुछ दशकों में स्त्रीवादी दृष्टि को जो प्रमुखता मिली और स्त्री-विमर्श के बल पर स्त्री लेखन को जिस अलग नज़रिये से पढ़ने की पहल हुई, उससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या स्त्री–कविता, स्त्रीवाद या स्त्रीवादी कविता का पर्याय है ? हमें इस अंतर को बहुत सावधानी से पहचानना चाहिए कि स्त्री लेखन केवल स्त्रीवाद के घेरे तक सीमित नहीं है। एक समाज में रहते हुए स्त्री-पुरुष, व्यक्ति-रूप में एक ही यथार्थ के साझीदार हैं।ऐसे में, स्त्री-कविता के अंतर्गत पढ़ी जाने वाली स्त्री रचनाकारों की कविताओं के मूल्यांकन का आधार मात्र स्त्रीवाद की कसौटियाँ नहीं हो सकती ।स्त्री-पक्ष के पार एक साधारण अनुभव की बात की जानी चाहिए । समकालीन कविता का मूल्यांकन, साहित्य की जिस अविरल धारा के रूप में होता है उसमें क्या कविता या साहित्य का ‘जेंडर न्यूट्रल’ रूप उभर सकता है ?

‘जेंडर न्यूट्रल’ होने का तर्क यह है कि जन-क्षेत्र में दाखिल होने के बाद लैंगिक अस्मिता विलुप्त हो जानी चाहिए। आप स्त्री हैं या पुरुष इस बात से कोई अंतर क्यों आना चाहिए। न किसी के विशेषाधिकार हों, न संरक्षणवादी नीतियाँ। दोनों को एक जैसा समतल मैदान मिले किंतु इसके कुछ ऋणात्मक पहलू हैं और रहेंगे, यह आशंका इस स्थिति को समस्या ग्रस्त करती है।


स्त्री-अस्मिता, कविता और जेंडर के आपसी संबंध उस साहित्यिक अधिरचना के संकेतक हैं, जहाँ स्त्री के स्त्री करण की सामाजिक प्रक्रिया को कमोबेश उसी रूप में स्वीकार कर लिया गया है।धर्म, दर्शन, इतिहास स्त्री के जिस सांस्कृतिक रूप की निर्मिति करते हैं,वह परिवार से लेकर आर्थिक-राजनीतिक क्षेत्रों तक स्त्री-पुरुष के बीच पदानुक्रम उपस्थित करती है ।साहित्य के क्षेत्र में भी यह बँटवारा अनुपस्थित और अदृश्य नहीं हैं। दूसरा सप्तक की कवयित्री शकुंत माथुर के साक्ष्य से हम जान पाते हैं कि उदार संरचनाएँ भी जेंडर की विषमताओं को झुठला नहीं पाती। शकुंत माथुर हिंदी के प्रसिद्ध कवि गिरिजाकुमार माथुर की पत्नी हैं। उन्होंने यह स्वीकार किया कि पति की छाया में वे अपने कवित्व के प्रति कभी आश्वस्त नहीं हो पायी। यह आकरण नहीं है कि कविता के इतिहास का स्त्री-स्वर इतना विरल है।अधिकांश स्त्री रचनाकार यह भी महसूस करती हैं कि हिंदी की मठवादी आलोचना ने स्त्री-स्वरों को उचित स्थान नहीं दिया । उनकी हशियाकृत स्थिति संभवतः इसी उपक्रम का परिणाम है।

एक और ज़रूरी सवाल यह भी है कि क्या हमारा जेंडर हमारे अनुभव व अभिव्यक्ति को प्रभावित करता है? इसका पक्ष-विपक्ष बराबर ढंग से मज़बूत हो सकता है।इस बात पर बहुत बल दिया गया है कि जब एक स्त्री लिखती है तब उसका स्त्रीत्व उस अनुभव में शामिल रहता है। ‘जेंडर न्यूट्रल’ होने की प्रक्रिया स्त्रीत्व की इन परतों को खोकर किसी अंजाम तक नहीं पहुँच सकती क्योंकि उसमें स्त्री जीवन के इतिहास व संस्कृति के अनेक शब्दहीन सिलसिले जुड़े हुए हैं। स्त्री की दृष्टि और उसकी भाषा उसे यह अवसर देते हैंकिंतु यही उसका सीमित दायरा नहीं।ऐसा नहीं है कि पुरुष कवियों ने स्त्रियों पर मार्मिक रचनाएँ नहीं लिखी।‘आंचल में दूध और आँखों में पानी’ की स्त्री छवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा हिंदी साहित्य में अविस्मरणीय बना दी गई।इसी तरह समकालीन कविता में कितने ही नाम है––उदयप्रकाश, लीलाधर मंडलोई, मंगलेश डबराल, पवनकारण, मदनकश्यप, जितेन्द्र श्रीवास्तव….जिन्होंने स्त्री जीवन की विडम्बनाओं को समान सहानुभूति से स्पर्श किया है ।इस फेहरिस्त में अभी और भी बहुत से नाम जोड़े जा सकते हैं किंतु दृष्टि बोध का बारीक़ अंतर फिर भी बना रहता है।वहाँ स्त्री की पीड़ा की टीस की समझ तो है लेकिन मुक्ति की वह छटपटाहट नहीं जिससे असमान सामाजिक व्यवहार वाली व्यवस्था के लैंडस्केप में परिवेर्तन किया जा सके।

इसके साथ-साथ, स्त्री रचनाकारों ने इस विशिष्टता की ओर भी संकेत किया है कि स्त्री-रचनाधर्मिता की अपनी विविधता है।उनका आग्रह, जीवन को खंड-खंड परखने का नहीं,वे उसे समग्रता से ही पहचानना और अपनाना चाहती हैं। स्त्री-कविता एक तरह से शब्दों के बीच की खाली जगह को भरने की कोशिश है।भविष्य की दिशा जेंडर विलोम की अपेक्षा जेंडर सहयोग की ओर संकेत कर रही है। स्त्री रचनाकार केवल स्त्रीवाद की ही बात नहीं करतीं, स्त्री अनुभवों की मार्फ़त दुनिया के तमाम वंचित समाजों से साझेदारी की कोशिश करती हैं। ऐसी ही भावना से प्रेरित होकर संभवतः पुरुष रचनाकार भी अपने भीतर स्त्री की तलाश कर रहे हैं। जेंडर और कविता के संबंधों में यह एक नई शुरुआत की पहल है।ये सभी दृष्टि बिंदु समान चिंता और चिंतन के पड़ाव हैं। देखना यह है कि उसमें स्त्री-कविता को कैसे लोकेट किया जा सकता है।

स्त्री-कविता और स्त्री-अस्मिता

कैद कई तरह की होती है….संबंधों
में स्त्री का मन घुटता है तो देह में आत्मा। स्त्री अस्मिता की पहचान इन बेड़ियों के पिघलने का अहसास है।  आज की कविता जिस मानव मुक्ति के अभियान को नयी ऊर्जा देने में तत्पर है स्त्री-चेतना उसका अभिन्न अंग है। मर्यादाओं के फ्रेम में जकड़ी स्त्री को समाज ने इतने अवसर भी नहीं दिए कि वह अपने भीतर की धड़कनें ठीक से सुन पाती।जब कभी उसने अपने मानवीय अस्तित्व को आवाज़ दी तब समाज में उस पर सब ओर से हमले होने लगे। इसी पीड़ा के एहसास ने उसके स्त्रीत्व और स्त्री रूप में उसकी अस्मिता को तीव्रतर किया है। ऐसे में स्त्री-अस्मिता की तलाश, ऐतिहासिक टकराहटों की पड़ताल बन जाती है।



स्त्री-कविता,  स्त्री अस्मिता के रास्ते में आने वाले अनेक संकटों और स्त्री जीवन की भीतरी और बाहरी टकराहटों को दर्ज करती है। उनकी लिखी कविताएँ उनके निजी अनुभवों के ताप से निखरी हैं। ये कविताएँ अपने आप से और अपने समाज से संवाद का ज़रिया हैं। समाज की चिंतनशील मनीषी इकाई के रूप में, उसकी संवेदनशीलता, सामाजिक ताने-बाने में जब उसे अपनी सही जगह तलाशने को प्रेरित करती हैतो उसका अस्मिता-बोध उसी में रूप ग्रहण करता है। इसके साथ-साथ परिवार, समाज, राजनीति, अर्थतंत्र, पर्यावरण—अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिन पर स्त्री की निजी राय हो सकती है। उन सबसे वह स्वयं को कैसे जुड़ा हुआ महसूस करती है यह सब भी उसके अस्मिता-बोध में शामिल है। स्त्री की देह, मन, मस्तिष्क एक ही इकाई हैं, इससे उसकी पहचान सबको साथ मिलाकर बनती है, खंड-खंड नहीं। स्त्री-अस्मिता के नाम पर बहुत बार उसके किसी एक ही पक्ष को देखा गया है जिससे कुछ अलग तरह के साँचे निर्मित होने लगते हैं और स्त्री का व्यक्तित्व बंद दराज़ों में बँटा-बँटा-सा दिखाई पड़ने लगता है। स्त्री मुक्ति का सपना इन सभी दायरों से मुक्त होने का सपना है…अपने भरे-पूरे होने का एहसास…सब कुछ साथ लाकर, साथ पाकर जीने का एहसास। इसी परिकल्पना में स्त्री-अस्मिता का पूर्णत्व छिपा है।

स्त्री-अस्मिता के इस स्वर को स्त्री रचनाकारों ने अपने साहित्य में सशक्त अभिव्यक्ति दी है लेकिन उनका यह प्रयत्न भी अजब षड्यंत्र का शिकार हुआ। ‘स्त्रीत्व’ का नया फ्रेम उसके इर्द-गिर्द जड़ दिया गया। स्त्री-रचनाकारों के लिए कविता लिखने का अनुभव, अपने स्त्रीत्व की नियति बदल देने जैसा रहा है लेकिन इस प्रक्रिया में सिर्फ वे ही नहीं बदलती सामाजिक मर्यादाओं के मानक साँचे भी बदल जाते हैं। इस तरह से ये कविताएँ नई सामाजिक संरचना में, स्त्री-दखल की प्रमाण हैं। यह भीड़ के बीच से गुज़रते हुये अपने एकांत का साक्षात्कार है जहाँ अपने आप से सिर्फ सच ही कहा जाता है।स्त्री-कविता की चिंता के घेरे में, सिर्फ उसके स्त्रीत्व का संकट ही नहीं है। उसका सरोकार क्षत-विक्षत मानवीयता को बचाने से जुड़ा है। वह सहभागिता चाहती है, नियंत्रण नहीं। यही स्त्री-स्वरों का समवेत स्वर है।

स्त्री-चेतना के प्रति सजगता ने, हमें अपनी साहित्यक परंपरा को फिर से देखने के लिये प्रेरित किया। हालाँकि ऐसा दौर काफी देर से आया। हमने मीरा के काव्य और महादेवी के गद्य में, स्त्री चेतना के प्रखर स्वर को पहचाना। सोलहवीं शताब्दी में रचे मीरा के पद और उनका जीवन, तत्कालीन पारंपरिक समाज को चुनौती देते हुये लगे। उनके सामाजिक विद्रोह की उर्जस्विता को प्रतिष्ठित करते हुये समाजशास्त्रियों ने उनकी कविता के नए भाष्य किये। उसके बाद ही समाज की दूषित और लादी गयी परम्पराओं के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाली स्त्री कवयित्रियों के साथ, स्त्री-कविता को अलग पहचान मिली।इस दृष्टि से इस अध्ययन में हिंदी की स्त्री-कविता के इतिहास को अलग स्थान दिया गया है।भारत में ईसा के ढाई-सौ वर्ष पूर्व जो संगम कविता लिखी गई,  उसमें स्त्री-कवियों की बड़ी संख्या है, उस कविता का संबंध, स्त्री के अंतर्जगत तथा बाह्य-जगत, दोनों से है। उसके बाद थेरी-गाथाएँ, भक्तिकाल में ललदेद, मीरा और अन्य संत कवयित्रियों तथा आधुनिक युग में मज़दूर, स्त्री-संघर्ष से जुड़ी आवाज़ों पर भी ध्यान देना होगा।



दरअसल, स्त्री-कविता स्त्री के जीवन के सारे घटना-क्रमों को अपने-अपने शिल्प के मुहावरों में कुछ इस तरह रच रही है कि उससे स्त्री-अस्मिता के विस्तृत परिदृश्य का ठीक-ठीक पता मिलता है|जब हम इन सातों कवयित्रियों की कविताओं को नज़दीक से जा कर पढ़ते और महसूसते हैं तो हमें उनकी अस्मिता की न जाने कितने ही रंग-रूप दिखाई देते हैं जिसमें वह समूचे संसार की स्त्रियों में शामिल हो कर अपने अस्तित्व को हर कोने को देखती हैं ।स्त्री-कविता के साथ, जो शब्द अभिन्न रूप से जुड़ा है, वह है–बहनापा। विश्व-भर की स्त्रियों ने अपनी मुक्ति के लिये एक दूसरे का हाथ पकड़ना स्वीकार किया है। इसमें केवल पश्चिमी देशों की स्त्रियाँ ही शामिल नहीं हैं बल्कि अपने पास-पड़ोस के देशों, चीन, कोरिया, जापान जैसे पूर्वी देश तथा अफ़्रीकी देशों की महिलाएँ, उनके सुख-दुःख सभी से एक साझेदारी का अनुभव शामिल है। इस दृष्टि से स्त्री-कविता की सामाजिक परिवर्तन में विश्व-स्तरीय भूमिका है। एक सुखद मानवीय समाज की परिकल्पना इसके माध्यम से नया स्वर ग्रहण कर रही है.
क्रमशः 

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मानवता के प्रति अपराध है बाल पोर्नोग्राफी

कादम्बरी

फ्रीलांस पत्रकार.स्त्री मुद्दों पर केन्द्रित पत्रकारिता करती है. सम्पर्क : kadambari1992@gmail.com



पोर्नोग्राफ़ी यौन अंग या गतिविधि का एक चित्रण या प्रदर्शन है। यह कामोत्तेजना  को प्रोत्साहित करता है। आम तौर पर, पोर्नोग्राफ़ी वयस्कों (18 वर्ष या उससे अधिक की उम्र के व्यक्ति) द्वारा, वयस्कों का उपयोग कर,  और वयस्कों के उपभोग के लिए बनाई जाती है। लेकिन यह प्रवृत्ति बदल रही है। अब, पोर्नोग्राफ़ी के क्षेत्र में, न केवल वयस्क परन्तु अधिक से अधिक किशोर और बच्चे जबरदस्ती अथवा स्वेच्छा से लिप्त हो रहे हैं। भारत में, निजी तौर पर अश्लील सामग्री को डाउनलोड करना और देखना कानूनी है, लेकिन  इसका  उत्पादन या वितरण अवैध है।


लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पोक्सो)


इस अधिनियम के तहत एक बच्चे का यौन उत्पीड़न, शोषण और  पोर्नोग्राफ़ी बनाना  दंडनीय अपराध हैं और इसमें कारावास का दंड अपराध के स्तर के आधार पर 3 साल से लेकर उम्रक़ैद तक  हो सकता है। यह अधिनियम प्रत्येक प्रक्रम पर बच्चों के सर्वोत्तम हित और कल्याण को सुनिश्चित करता है।


एक बालक के यौन शोषण में निम्न व्यवहार और दृश्य शामिल हैं : किसी भी शब्द को बोलना या ध्वनि निकलना, किसी भी प्रकार का इशारा करना या शरीर के किसी भी वस्तु या भाग का प्रदर्शन करना जिससे कि एक बच्चे को उसके शरीर या उसके शरीर के किसी भाग को प्रदर्शित कराया जा सके, बच्चे के शरीर के किसी भी भाग की या किसी यौन कृत्य में बच्चे की भागीदारी को किसी भी रूप या मीडिया में पोर्नोग्राफ़िक के लिए ऑब्जेक्ट् बनाना, पोर्नोग्राफ़ी उद्देश्यों के लिए एक बच्चे को मोहित करना।

माता-पिता के लिए ज़रूरी है कि वह अपने बच्चों को सही और गलत स्पर्श तथा सही और गलत दृष्टि के बारे में बताएं। उन्हें इसके बारे में जागरूक करें और प्रोत्साहित करें कि वे अपने माता-पिता और अपने शिक्षकों पर भरोसा करें। तथा यदि कुछ गलत लगता है या गलत महसूस होता है तो उसे तत्काल अपने माता-पिता अथवा शिक्षकों को बताएं चाहे ग़लती करने वाला व्यक्ति कोई पारिवारिक  सदस्य या मित्र से भी जानकारी दें। तथा उन्हें सिखाएं की वे डरें नहीं।

बाल पोर्नोग्राफी के प्रकार
1.  सेक्स व्यापार उद्योग
2. स्व-रचित पोर्नोग्राफी

1. सेक्स व्यापार उद्योग : ये उद्योग डिजिटल मध्याम जैसे फ़ोटो, कार्टून, एनीमेशन, ध्वनि रिकॉर्डिंग(ऑडियो), एम,एम,इस, वीडियो गेम , ऑनलाइन अभिलेख, फ़िल्म, तथा प्रिंट मध्याम जैसे कॉमिक्स, कार्ड, पोस्टर, किताबें, पत्रिकाएं, चित्रकला के द्वारा बाल पोर्नोग्राफी का व्यापार करतीं हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के एक अध्ययन में पाया गया कि ये उद्योग पोर्नोग्राफी के लिए ज्यादा-से-ज्यादा किशोरों के इस्तेमाल कर रहे हैं।

बाल पोर्नोग्राफी का वर्तमान दृश्य बहुत ही भयानक और चिंताजनक है। 2007 में, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने बाल शोषण पर एक अध्ययन किया था। इस अध्ययन के अनुसार, 12,446 बच्चों में से, 4.46% का नग्न फोटोग्राफ लिए गये। और इन बच्चों में 52.01% लड़के थे और 47.9 9% लड़कियां थीं।

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार

2011 में गृह मंत्री राज्य मंत्री एम. रामचंद्रन ने लोकसभा में  राज्यानुसार उन बच्चों का प्रतिशत बताया जिनकी नग्न फोटो ली गयी थी। देश भर में दर्ज मामलों की संख्या 2007, 2008, और 2009 में क्रमशः 99, 105 और 139 थी। महाराष्ट्र में आंकड़े क्रमश: 27, 17 और 25 थे। केरल में, आंकड़े इसी अवधि के लिए 20, 39 और 44 थे।

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार -2

बच्चों के व्यवसायिक यौन शोषण (सीएसईसी)


किसी तृतीय पक्ष द्वारा नकदी या वस्तु के वित्तीय लाभ के लिए तस्करी, बिक्री और बाल विवाह जैसी व्यवस्थाएं बच्चों को यौन साथी के रूप में पेश करती हैं। आगरा-दिल्ली-जयपुर के त्रिभुज बेल्ट पर पारंपरिक मनोरंजन समूह में कई समुदाय शामिल हैं। इन समुदायों की लड़कियों अपनी देह व्यापर से परिवार का लालन-पालन करती हैं। ये समुदाय अपनी बेटियों को यौन मनोरंजन से कमाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं और उन्हें यह विश्वास दिलाते हैं कि यही उनका एकमात्र व्यवसाय है।



2. स्व-रचित (बाल) पोर्नोग्राफी : बच्चों द्वारा स्व-निर्मित खुद का अश्लील चित्र। मुखर यौन चैट, सेक्सटिंग तथा खुद से या खुद की नग्न तस्वीरों का वयारल वितरण करना जिसे साइबर तांक-झांक कहते हैं, शामिल है।
नई तकनीक के आगमन और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच के साथ-साथ जोखिम के कारकों में वृद्धि हुई है। दुर्व्यवहार करने वाले और पीडोफाइल इंटरनेट की ओर बढ़ रहे हैं। और वे बच्चों को मेनिप्यूलेट, प्रभावित और फुसला रहे हैं। यह प्रवृत्ति बहुत अधिक हानिकारक है क्योंकि बच्चों को उनकी इच्छा के खिलाफ मजबूर नहीं किया जाता है, बल्कि स्वेच्छा से भाग लेने के लिए ब्रेनवॉश किया जाता है। क्योंकि उनकी अपरिपक्वता के कारण वे अपने कर्मों के परिणामों को समझने में असमर्थ हैं और छल साधने इस का लाभ उठाते हैं। इंटरनेट उद्योग ने माता-पिता को कई फ़िल्टरिंग सिस्टम प्रदान किए हैं जैसे साइबर वॉच, नेट नेनी और साइबर नेनी आदि।  लेकिन ये सिस्टम कोई भी वास्तविक समाधान को प्रदान नहीं करती हैं, बल्कि ये केवल शॉर्टकट हैं जो बड़ी समस्या को अनदेखा कर रहे हैं।

वे लाइव पोर्न में प्रदर्शन के पूर्व ईश्वर को प्रणाम करती हैं !


सेक्सटिंग:
सेक्सटिंग एक हाल ही में बढ़ती हुई प्रथा को दर्शाती है जिसमें लोग सेल फोन या कंप्यूटर और मैसेजिंग एप्लिकेशन का उपयोग करके  स्वयं की नग्न या अर्द्ध-नग्न छवियों दूसरों को (जैसे मित्र या डेटिंग साथी) भेजते हैं। इसमें स्वयं खिंची फोटो, लिखित यौन संदेश, एमएमएस, वीडियो, ऑडियो आदि शामिल हैं।

लोग पोर्न क्यों देखते हैं? (पोर्नोग्राफी की खपत)


पोर्नोग्राफी कल्पनाओं (प्रकृति), श्रेणियों और क्रूरता से भरा हुआ है,  पोर्नोग्राफी कल्पनाओं (प्रकृति), श्रेणियों और क्रूरता से भरा हुआ है जो देखने वाले के पशु पक्ष को प्रज्वलित करता है, और धीरे धीरे एक लत में बदल जाता है। पोर्न कई प्रकार की शैली, विधि और कल्पनाओं को दिखाती है और यह मानसिकता विकसित करती है कि पोर्न ही सबसे अच्छा तथा बहुत बढ़िया सेक्स है। यह खुद को व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने वाले एक शिक्षक में बदलती है। यह हताशा से बचने के लिए यौन ऊर्जा को निकालने के लिए कहती है; किशोरावस्था में बच्चों को यौन शिक्षा सीखने का दावा करती है, जानकरी देने का दावा करती है जो यौन रिश्ते बनाने में क्या करना है और कैसे करना है।लेकिन दुर्भाग्यवश, इसमें कोई आत्मीयता और प्रेम शामिल नहीं होता है बल्कि यह निष्कपट, कल्पना-आधारित विषयों को प्रस्तुत करती है जो सेक्स को संदर्भ के बाहर कर देती है और दर्शकों के मनोरंजन के लिए फूहड़ता दिखती है।

लोग पोर्न क्यों बनाते हैं? (पोर्नोग्राफी का निर्माण)


बच्चों के बहुत कम उम्र में यौन सामग्रियों से अवगत होने के कारण वे कम उम्र में ही परिपक्व होते जा रहे हैं। इस कारण, बच्चों को अश्लील देखने की आदत के दुष्प्रभाव और नतीजे नहीं पता होते हैं, और कुछ समय बाद वे इसके आदी हो जाते हैं। बच्चे वयस्कों की नकल करते हैं, चाहे वे उनके माता-पिता हों, पड़ोसी हों, रिश्तेदार हों, फिल्म नायक-नायिका हों, या पोर्न अभिनेता हों। ठीक उसी तरह बच्चे बड़ो की कार्यों तथा उनके क्रियाओं की भी नकल करते हैं। नकल की शुरूआत होती है पोर्न देखने से होती है, फिर पोर्न का तथा उसकी क्रियाओं का अनुकरण होता है, और समय के साथ यह अधिक तीव्र होती जाती है। पोर्न का यह निर्विवाद शिक्षण बच्चों को असंवेदनशील बनाता है, और दुनिया व् समाज का ज्ञान न होने के कारण, वे शोषण करने वालों की चपेट में आ जाते हैं। एक समय के बाद बच्चों में पोर्नोग्राफ़ी की लत, उसकी नकल और असंवेदनशीलता उन्हें सरेआम कामुक व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती है। इस वजह से, वे सामाजिक रूप से व्याकुल हो जाते हैं, कमजोर हो जाते हैं, आत्म नियंत्रण खो देते हैं और अलग महसूस करते हैं।

निष्कर्ष (वास्तविक समाधान):


बाल पोर्नोग्राफी दिन-प्रतिदिन बढती जा रही है। इस समस्या को इसकी जड़ों से बाहर निकालना ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। हमें वास्तविक समस्या और कारणों पर ध्यान देने की जरूरत है जहां से यह सब शुरू होता है; और वह बचपन से है, एक व्यक्ति की परवरिश से है। माता-पिता को न केवल अपने बच्चों को उन पर विश्वास करने के लिए करना चाहिए हैं, बल्कि उनके साथ समय भी बिताना चाहिए। उन्हें अपनी किशोरावस्था की परेशानियों और चुनौतियों के बारे में बताएं, उन्हें उनके शारीरिक परिवर्तनों के बारे में सूचित करें और उन परिवर्तनों के बारे में सहज महसूस करायें। जब बच्चे अपने माता-पिता पर भरोसा करते हैं, सही और गलत के बीच का अंतर पहचानते हैं, तब उनमें आत्मविश्वास भर जाता है और वे अप्राकृतिक अभिलाषाओं से नहीं घिरते हैं ना ही पर्नोग्राफ़ी में लीन होते हैं, न किशोरावस्था में ना बढे होने के बाद। उनकी गलतियों में सहायता करना और उनके फैसले पर भरोसा करना इस बड़ी समस्या को हल कर सकता है और पोर्नोग्राफी को जड़ से उखाड़ सकता है।

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स्त्री-कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार

रेखा सेठी

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कविता हमेशा से ही मेरे लिए, अपने भीतरी अंतरद्वंद्वों और उस दुनिया की बीहड़ तल्खियों-टटकी उमंगों की हज़ारों बानगियों को नज़दीक से, समझने-जानने का बेहद खूबसूरत ज़रिया रही है। कविता की दुनिया अपने सच को पा जाने की दुनिया है। एक बड़बोले समय में जीवन के आतंरिक सच का अनुभव। दुनिया-भर के कवियों ने आक्रामक और हिंसक समय में अपनी स्वाधीनता व सृजनशीलता को बचाए रखने के लिए कई खतरे उठाये हैं। स्त्री रचनाकारों की कविताएँ भी इस जोखिम से अछूती नहीं हैं। उनका संघर्ष और भी विकट है क्योंकि वहाँ दुनिया के इस भूगोल के साथ-साथ स्त्री-चेतना का वह आतंरिक भूगोल भी है, जिसका मानचित्र हर पल उसकी कलम से गढ़ा जाता है।

स्त्री-कविता के इस संसार में अनेक प्रश्न हैं जिनका संबंध, स्त्री-अस्मिता तथा कविता और जेंडर के आपसी संबंधों से है। मेरे ज़ेहन में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कविताओं में उनके भीतर की स्त्री, अपने व्यक्तित्व की कितनी परतें खोल पाती है ? इन रचनाकारों का स्त्रीत्व उनकी कविताओं को कितनी दूर तक प्रभावित करता है ? अपनी अभिव्यक्ति को औज़ार की तरह इस्तेमाल करने वाली स्त्री-कविता का कितना हिस्सा अभी भी नेपथ्य की ओटमें है ? स्त्री रचनाकारों का रचना-धर्म, स्त्री-विमर्श की उठती लहरों, साहित्यिक आलोचना के स्थापित मानदंडों से कैसे टकराता है? ऐसे अनेक सवाल मन को लम्बे समय से घेरे रहे हैं। इन्हीं के समकक्ष रहे स्त्री-जीवन के अंतर्विरोधों से जुड़े वे यक्ष-प्रश्न जिनका सामना हर स्त्री को कभी न कभी करना पड़ता है।

साहित्य की दुनिया में नब्बे के बाद से अस्मितावादी साहित्य के उभार के साथ स्त्री-कविता अपने लिए नयी ज़मीन तैयार करती दिखाई पड़ती है। स्त्री-विमर्श ने इसे अलग ढंग से पोषित करते हुए पैनी धार दी।इसके बावजूद, ऐसा नहीं है कि इस कविता का भाव जगत इतना सीमित रहा हो लेकिन चर्चा के केंद्र में यही सरोकार रहे। ज़ाहिर तौर पर इसके दो प्रभाव हुए। कुछ स्त्री रचनाकारों ने अपने लिए यह दायरा चुन लिया और दूसरा, औरों ने भी इस कविता को सीमित नज़र से देखना शुरू किया। तब मन में यह जिज्ञासा जगी कि यदि इस साहित्य को अस्मिता के लेंस से न देखकर, साहित्य की अविरल परंपरा में देखा जाये तो उसके परिणाम क्या होंगे ?

इसी विचार से प्रेरित हो मैंने वर्ष 2015 में ‘स्त्री-कविता की पहचान’ शीर्षक से एक प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया।मेरा यह मानना है कि अब तक सभी स्त्री-रचनाकारों की कविताओं को केवल, स्त्री विमर्श के फ्रेम में देखा गया है। उनकी कविताएँ अक्सर स्त्री विमर्श की प्रपत्तियों में उदाहरण-स्वरुप रखी गई हैं और उन कविताओं के परिदृश्य से बाकी सरोकारों को गायब कर दिया गया। इसलिए स्त्री-कविता में अपनी पुख्ता पहचान बनाने की स्पर्धा रही है। कविता के वजूद और अंतर्विरोधों से सीधे मुठभेड़ करने का यह मौका, मुझे उन गहराइयों तक ले गया जिनके होने का अहसास मुझे पहले नहीं था।

सबसे पहली दुविधा स्त्री-कविता, पदबंध के चुनाव को लेकर रही। मैंने स्त्री रचनाकारों की कविताओं पर अपने अध्ययन को केंद्रित करने के कारण ही इसे स्त्री-कविता कहना उपयुक्तसमझा लेकिन यह शंका बनी रही कि क्या ‘स्त्री’ कविता के विशेषण रूप में इस्तेमाल हो सकता है ? इसमें मतभेद हो सकते हैं क्योंकि स्त्री-कविता का आशय निश्चित नहीं है। यह स्त्रियों की कविता है, स्त्री-मन की कविता या फिर स्त्री के प्रति सहानुभूतिपूर्ण स्वर की कविता, इस पर एकमत नहीं हुआ जा सकता। प्रत्येक पाठक का अपना व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है, हालाँकि ये सभी अंतर्ध्वनियाँ इस पदबंध में समाहित हैं।इस सन्दर्भ में मैंने समकालीन सात कवयित्रियों से बातचीत की।गगन गिल, कात्यायनी, अनामिका, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, सुशीला टाकभौरे और निर्मला पुतुल—हमारे युग की प्रतिनिधि रचनाकार हैं। संवेदना के धरातल पर अपने युग-यथार्थ से जुड़ने की उनकी दृष्टि एक-दूसरे से भिन्न है। इसलिए सबके विचारों के समवेत से एक मुक्कमल तस्वीर बन सकेगी ऐसा मेरा विश्वास है।

अपने अध्ययन में मेरे सामने, ये सात कवयित्रियाँ अपने काव्य-जगत के साथ मौजूद रही हैं। मेरे लिये यह देखना बहुत दिलचस्प रहा कि इन सातों कवयित्रियों की कविताओं की परछाईयाँ, एक दूसरे को छूती हुई भी जान पड़ती हैं और स्त्री-अस्मिता के मुद्दे पर एक दूसरे से बिलकुल अलग भी हैं। जाति और वर्ग के बदलते समीकरणों में अस्मिता का स्वरुप व प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। एक और सवाल जो परेशान करता रहा है वह हमारी सामाजिक संरचनाओं में जेंडर की लगभग अलंघ्य स्थिति को लेकर है, ‘क्या यह समाज, जेंडर सेंसेटिव से बढ़कर जेंडर न्यूट्रल हो सकता है ?’ सब चाहते हैं कि, ‘समाज और कविता, दोनों जेंडर न्यूट्रल हों’ लेकिन कविता और साहित्य, इस संभावना को कैसे जगा सकेंगे, यह महत्वपूर्ण है।

क्रमश:


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ग्रामीण सामूहिकता में अकेला रोता हंस



मनीषा कुमारी 


मैं कहानियों  और साहित्य की बिलकुल नई पाठक हूँ. मनोविज्ञान की विद्यार्थी रही हूँ, 12 वीं तक विज्ञान की किताबों  से साबका रहा उसके बाद  मनोविज्ञान की किताबों से . यह संयोग ही है कि पहली साहित्यिक समीक्षा भी जिस लेखिका की कहानियों पर अपनी बात कह रही हूँ, वह भी मनोविज्ञान की छात्रा रही हैं. स्वाभाविक है लेखिका  सिनीवाली की कहानियों में मनोविज्ञान एक विशेष पहलू है  और मैं भी वहाँ पात्रों के मनोविज्ञान को ही समझती रही.  कहानी संग्रह ‘ हंस अकेला रोया’ कुल 8 कहानियां हैं, लगभग सभी कहानियां ग्रामीण परिवेश में घटित हैं.

शीर्षक कहानी ‘हंस अकेला रोया में’  लेखिका ने समाजिक दवाब के साथ -साथ मनोवैज्ञानिक मनोदशा को भी बखूबी दर्शाया है.किस तरह से लोग समाज के बनाये भवंर जाल में फंसते जाते है.. विपिन के पिता के देहांत के बाद विपिन पर सामाजिक दवाब बनाया जा रहे है .दान-दक्षिणा से लेकर पंडित  के गौ दान और  फलाहार तक में कर्मकांड के पाखंड हैं.  इस लम्बी  कहानी का नायक बिपिन न चाहते हुए भी सामाजिक दवाब के आगे झुकता जाता है. होता यही है एक व्यक्ति के मानोविज्ञान को तय करने ,में समाज की बड़ी भूमिका होती है और यदि वह इस सामाजिक दवाब के खिलाफ अड़ जाता है तो उसकी इच्छाशक्ति महत्वपूर्ण हो जाती है, मजबूत इच्छाशक्ति है तो ठीक अन्यथा मनुष्य पराजित होता है. कहानी के अनुसार , ‘ विपिन कर्ज लेकर और पत्नी के गहने बेच कर इस सामाजिक कुप्रथा का निर्वाह करता है -पशु -पक्षी से लेकर आदमी तृप्त हो गया भोज खाकर. पर इस तृप्ति , प्रशंसा से क्या उसके परिवार का कर्ज उतर जाएगा या उसके परिवार को भूखा नही रहना पड़ेगा ? श्राद्ध के बाद उसकी सबसे बड़ी चिंता है कि कैसे चुकायेगा वह कर्ज’. मुझे यह कहानी पढ़ते हुए लगा कि एक ओर तो  कहानी का नायक सामाजिक मनोविज्ञान और दवाब के आगे घुटने टेक देता है, दूसरी ओर कहानी भी उसके जद्दोजहद को दिखाने के अलावा कोई  ख़ास आदर्श स्थापित नहीं कर पाती हैं, कहानी के अंत में श्राद्ध  का विरोध नहीं होता है बल्कि शास्त्र की दलील देकर श्राद्ध की अनिवार्यता ही सिद्ध करती है. कहानी का अंत है, ‘ जबकि शास्त्र भी कहता है कि कर्ज लेकर श्राद्ध नही करनी चाहिये पर धर्म के नाम पर ही कहाँ सुनता है समाज, शास्त्र और रामायण की बाते और बिपिन के आंसू….’

‘उस पार ‘  कहानी में लेखिका ने बिहार के ग्रामीण परिवेश को बखूबी दर्शाया है. एक पिता किस तरह आर्थिक तंगी के कारण पैसे के अभाव में अपनी बेटी का  विवाह वित्तरहित किरानी से कर देते हैं  हमारे समाज में बेटी को बोलने का अधिकार नही दिया गया है.बेटी को सिर्फ सुनना ही है बोलना कुछ भी नही. खास कर  विवाह उपरान्त बेटी को मायके में बोलने का अधिकार ख़त्म हो जाता है इस कहानी में एक पिता के जीवन की असफलता ,आर्थिक स्थिति ,नीरसता को भी दर्शाया  गया है, साथ ही पिता के सम्पति में बेटी का कोई अधिकार नही होता है उसका न सिर्फ परिवार से गाँव समाज सबसे नाता टूटता है वो सबके लिए पराई हो जाती है.

पेंडुलम

‘सिकडी कहानी’  में लेखिका ने स्त्री के आभुषण प्रेम के साथ – साथ सोना और सुखी जीवन के गठजोड़ को भी बखूबी बताया है स्त्री के लिए विपत्ति के समय जेवर ही सबसे बड़ा सहारा होता है . सिकडी कहानी में सिकडी को लेकर शक की सुई कई लोगों पर घूमती है और सोचने की प्रक्रिया शुरू होती है लेकिन अंत में इस बात पर आकर अटक जाती है कि आखिर सिकडी गई तो कहाँ गई .

‘नियती’ कहानी में लेखिका ने स्त्री के सामाजिक और मानसिक मनोदशा को बताया है इस कहानी में उन्होंने एक स्त्री के अपने पति के खो देने  का डर ,समाज  और संस्कार का डर और किसी  भी हाल में अपने पति की प्रतिष्ठा पर आंच न आने देने का डर ने सबकुछ जानते हुए  भी अपनी बहु के लिए न्याय के पक्ष में खडी नही होती  है और एक हद तक इन्ही सब कारणों ने विमला को भी मानसिक उत्पीडन सहते हुए  चुप रहने को विवश किया  है,  वही दूसरी ओर विमला जो एक ग्रामीण स्त्री है उसके  साहस को भी दर्शाता है कि किस तरह जब उसके गर्भ में पल रहे अनचाहे बच्ची को गिराने की बात जब उसकी  सास कहती है तो इस जुल्म के खिलाफ खड़ी हो जाती है.  खुद को दैहिक शोषण से बचा नहीं पाती है लेकिन अपनी बच्ची को किसी भी हद तक जाकर बचाना चाहती है.   इस समाज की झूठी मायाजाल ,कूरीतियाँ ,रीतिरिवाज के कारण बलात्कृत पुरुष( ससुर )के पक्ष में लोग खड़े हो जाते है और शोषित बहु (विमला) को झूठी ,पगली और मानसिक विक्ष्प्ता समझाता जाता है

‘चलिये’ अब कहानी में लेखिका  ने भौतिकवादी परिस्थितियों के आगे इंसान को घुटने टेकते हुए दिखाया है आज  व्यक्ति   पैसे के लालच में इस कदर अंधा हो गया है कि हर रिश्ते से विश्वास उठ गया है परमानंद बाबु की पत्नी के देहांत के बाद हर लोग उन्हें अपने साथ ले जाना चाहते है किन्तु जैसे ही पता चला कि उनके पास देने के लिए कुछ नहीं है सबने अपना-अपना रिश्ता तोड़ लिया अर्थात् व्यक्ति की  जैसे जैसे परिस्थितियों बदलती है व्यक्ति के साथ रह रहे लोगों के व्यवहार में परिवर्तन होते जाता है इसके अलावा इस कहानी में पत्नी-पति के प्रेम और बिछड़ने की मनोदशा को अच्छे तरह से दर्शाया है.उनके निश्छल प्रेम को बयाँ किया है परिवार के लोगों  द्वारा  अपमानित होनो के बाद भी घर छोड़ कर जाना नही चाहते है. उनको लगता है कि अगर वो चले गए तो उनकी पत्नी कहीं आकर उनका इन्तजार करेगी और उनके न रहने पर वे परेशान होंगी



घर कहानी में लेखिका ने आज के बदलते दौर में एकल परिवार के बढ़ते प्रचलन को दर्शाया है आज संयुक्त परिवार का दौर ख़त्म हो गया है अब बच्चे जैसे बड़े होते है वैसे ही घर की बंटवारे  की बात करते है. लोग अब हम से अलग होकर अपना घर बनाना चाहते है.

संग्रह पठनीय है. ग्रामीण भारत की कहानियों से जोड़ता है. बिना किसी नोस्टेल्जिया के गाँव के यथार्थ से जोडती है.

कहानी संग्रह : हंस अकेला रोका
लेखिका : सिनीवाली
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, 0141 2503989, 9829018087
प्रकाशन: 2016

समीक्षक मनोविज्ञान पढ़ाती हैं: संपर्क: manishamishra5559@gmail.com

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