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स्त्री लेखन का स्त्रीवादी पाठ

सर्वेश पांडेय


सर्वेश पांडेय ने स्त्री अध्ययन में शोध किया है , अभी महिला आयोग में कार्यरत हैं . संपर्क : मोबाइल न.- 08756754651

हिन्दी साहित्य में 60-70 के दशक के दौरान लेखिकाओं  का आगमन स्त्री-प्रश्नों  पर सार्वजनिक बहस छेड़ देता है। इन लेखिकाओं द्वारा स्त्री पर आरोपित सामाजिक मर्यादाएँ, यौन वर्जना इत्यादि की आलोचना करते हुए स्त्री के व्यक्ति प्रदत्त अधिकारों को बड़ी संजीदगी से उठाया गया है। यह दौर स्वाधीनता के बाद स्वाधीनता के सपनो से मोहभंग का दौर था। स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं ने सक्रिय भागीदारी की थी। इन्हें यह आशा थी कि देश  की स्वतंत्रता के पश्चात वह अपनी उपेक्षित स्थिति से निजात पा सकेगी। परंतु भारत की स्वतंत्रता उपरांत उन्हे वापस घरों में भेज दिया गया। यद्यपि शिक्षित महिलाओं का एक वर्ग अभी-भी समाजसेवी संस्थाओं व अध्यापन जैसे कार्यों  में लगा हुआ था।

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के भारत के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक ढ़ांचे तथा सांस्कृतिक परिवेश पर पितृसत्तात्मक का प्रभुत्व था। जो कि आज भी पूर्ववत् स्वरूप के साथ-साथ कुछ अन्य नये रूपों में अपने को पुनर्संगठित कर चुका है। स्वतंत्रता उपरांत देश की कानून-व्यवस्था एवं न्यायपालिका ने भी स्त्री की स्थिति को लेकर कोई परिवर्तनगामी रूख नही दिया। स्त्री-पुरूष समानता के सवाल पर संविधान की स्थिति भी असंगत रही। जैसे कि अनुच्छेद 15 द्वारा समानता के सिद्धांत को स्वीकारा गया, मगर साथ ही धर्म के आधार पर बने परिवारिक कानूनों को मान्यता देकर स्त्री-पुरूष समानता के सिद्धांत का विरोध किया गया, ये कानून विवाह, परिवार तथा संपत्ति मे स्त्रियों को पुरूषो से कमतर व भेदभाव पूर्ण अधिकार देते हैं। हिंदू कोड बिल पर हुए विरोध पर गौर करें तो देखेंगे कि यह विरोध मूलरूप से इस बात पर केंद्रित था कि हिंदू परिवारिक कानून मे सुधार करके स्त्रियों के अधिकारों को बेहतर करने से हिंदू परिवार के टूटने का खतरा पैदा होगा। यह भी कहा गया कि इस प्रकार के परिवर्तन पाश्चात्य सोच से प्रेरित है क्योकि हिंदू सोच में स्त्री-पुरूष समानता का अर्थ एक जैसे अधिकार न होकर अलग-अलग प्रकार के अधिकार है। इसकी वजह परिवार में स्त्रियों और पुरूषो  की जिम्मेवारियाँ अलग-अलग होना है। अर्थात् यह सारा विरोध स्थापित परिवार के ढांचे में बदलाव से उत्पन्न खतरों से था। स्त्रियों और पुरूषो की अलग-अलग भूमिकाओं और अधिकारों पर आधारित परिवार की यह छवि स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत की विकास की सोच और नीति पर छाई रही। पचंवर्षीय योजनाओं (1950-75) में स्त्रियो के लिए प्रस्तावित शिक्षा और रोजगार कार्यक्रम महिलाओं को केवल उनकी पारिवारिक भूमिकाओं में सीमित करते है। इस दृष्टिकोण के अनुसार स्त्रियाँ अर्थिक रूप से पुरूषों  पर निर्भर है और सरकारी नीतियों और कार्यक्रम का उदेश्य औरत को इस तरह की सेवाएँ उपलब्ध करवाना, जिससे वे इन परिवारिक भूमिकाओं को और अधिक कुशलता से पूरा कर सके। वैचारिक स्तर पर इससे स्त्री की एक ऐसी छवि बनी जो कि घर व बाहर दोनो जगहों के कार्यों को समुचित ढंग से संपादित करे। औरतों की इसी छवि को मीडिया पाठयक्रमों द्वारा बहुत जोर-शोर से आगे बढ़ाया गया। अभी तक की चर्चा मे सरकारी तंत्र की स्त्री के प्रति दृष्टि को उजागर किया गया। लेकिन समाज में स्त्री की कौन सी भूमिका को मान्यता दी जा रही थी, उसको रखने की जरूरत जान पड़ती है। परंपरागत मध्यवर्गीय मान्यवर्गीय मान्यताओं से थोड़ा भिन्न होकर अब मध्यवर्ग में स्त्रियों का नौकरी करना असम्मानजनक नहीं समझा जा रहा था। (भले ही आर्थिक आवश्यकताओ के जगह से यह सम्भव हुआ हो) आर्थिक लाभ की भावना ही सही पति पत्नियो से नौकरी बुरा नहीं समझते। किन्तु पत्नी में यह अपराध बोध की पैदा किया जाता कि वह पारिवारिक दायित्वों को निर्वाहन ठीक से नहीं कर रही हैं। सीमाओ के बावजूद सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों ने स्त्री को एक स्पेस तो उपलब्ध कराया। 60-70 के दशक में शिक्षित स्त्रियों का एक बड़ा वर्ग निकला, जो कि मुख्यता अध्यापन, नर्सिग, जैसे कार्यो में शामिल हुआ। फलत: उनमें आत्मविश्वास भी पनपा।

60-70 के दशक  के स्त्री लेखन में भी इसी मध्यवर्गीय शिक्षित व कामकाजी स्त्रियों का अक्स साफ तौर पर दिखाई पड़ता है। परिवार, विवाह जिसे समाज में प्राकृतिक रूप में देखा जाता हैं । जबकि यह मानव निर्मित कृत्रिम संस्थाए है। जिसके उत्पत्ति के इतिहास को एंगेल्स  ने अपनी पुस्तक ‘परिवार, व्यक्तिगत संपत्ति व राज्य का उदय ’ द्वारा हमारे सामने लाते है। विवाह व परिवार दोनों महिलाओं के लिए बेहद उत्पीड़नकारी रहे हैं। परिवार वह संस्था है जिसके द्वारा शासक वर्ग पुरुषों के बीच में अपनी पितृसत्तात्मक विचारधारा के लिए समर्थन हासिल करते हैं । वर्ग उत्पीड़न के समाज में जाति उत्पीड़न से भरे समाज में पितृसत्तात्मक एकनिष्ठ विवाह उत्पीड़ित वर्गीय पुरूषो को जो विशेष अधिकार देता है, वही शासक वर्गों के लिए पितृसत्ता को संस्था को जिन्दा और बरकरार रखता है। आज के उत्पीड़नकारी परिवारिक ढ़ांचे के बिना, ऐसे परिवारों को बांधनेवाली शादियों के ढकोसलों के बिना शासक वर्गों के पितृसत्तात्मक विचारों के लिए सामाजिक मान्यता नहीं मिल सकती थी। एक लड़की होने के नाते वह परिवार में दबना सीख जाती है और परिवार में लड़का होने के नाते वह दबाव डालना सीख जाता है। स्त्री को पितृसत्ता ने रिशतो से व्याख्यायित किया। वह मां, बहन, बेटी व पत्नी से जानी जाने लगी, लेकिन व्यक्ति के रूप उसकी कोई पहचान नहीं स्वीकारी गई। वहीं 60-70 के दशक के कई स्त्री कथाकारों द्वारा रचित कहानियाँ व उपन्यास स्त्री के स्वतंत्र पहचान व उनके अधिकारों को सार्वजनिक पटल पर लाते है। विशेष संदर्भित उपन्यासो के क्रम में ‘पचपन खम्भे लाल दीवारें’ है उषा प्रियवंदा की काफी चर्चित कृति है। इसमें उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र सुषमा समाज के इन धारणा को तोड़ती है कि लड़की घर नही चला सकती। पुत्र का दर्जा समाज में इस कारण से भी उच्च माना जाता है कि वह ही परिवार को आर्थिक आधार मुहैया कराता है। (इसके अतिरिक्त कि पुरूष को पितृवंशात्मक समाज व्यवस्था का संवाहक माना जाता है।) इस उपन्यास में सुषमा न केवल आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर है बल्कि अपाहिज बाप, माँ, भाई-बहनों के दैनिक जीवन के खर्चों व उसकी शिक्षा का खर्च भी वहन करती है।1 भारतीय परिदृश्य  बढ़ती जरूरतों ने पुरूष की मानसिकता में परिवर्तन किया और स्त्री हेतु असम्मानजनक समझी जाने वाली नौकरी ही परिवार की पद, प्रतिष्ठा व इज्जत बढ़ाने लगी। विवाह व नौकरी समानांतर संभव हो सकी।1 माताओं-पिताओ ने भी आर्थिक सहयोग हेतु बेटी के कामकाजी होने को प्रोत्साहित किया। इस उपन्यास के संदर्भ में देखा जायें, तो सुषमा की नौकरी केवल अपने परिवार के दायित्व का निर्वहन करने के लिए है। यहां वह घर कि जिम्मेदारी को उठाते हुए यानि यह सिद्ध करते हुए कि इस घर में पुत्र की भूमिका वह भी निभा रही है। जैसा कि सुषमा कहती है ‘‘अगर मैं सबसे बड़ा लड़का होती तो क्या न करती? उसी तरह मैं अब भी करती हूँ’’.2 लेकिन कहीं न कहीं सुषमा का अपना भी मन है, स्त्री के अपने भी तो कोने हैं। उसको लगता है कि यह घर जिसके लिए वह समर्पित है, वह उसके बारे में क्यों नहीं सोचता है। वह सोचती है कि यदि मेरे जगह बेटा होता तो माँ बेटे के लिए स्वप्न तो देखती है कि बहू घर लाना है।

परिवार के लिए कमाऊ बेटी होने की वजह से उसके माँ-बाप ने कभी चाहा ही नही उसकी शादी हो। ‘‘यदि पिताजी चाहते तो क्या उसका विवाह नहीं कर सकते थे। लोग लाख प्रयत्न कर बेटी के ब्याह का सामान जुटाते है। क्या उसी के पिता अनोखे थे? बात असल यह थी कि उन्होंने यह चाहा ही नहीं कि सुषमा की शादी हो, उनके अंतर्मन में यह बात अवश्य होगी कि सुषमा से उन्हें सहारा मिलेगा।3  वैसे सुषमा का विवाह न करना उसके माँ बाप की विवशता भी है। क्योंकि भारतीय समाज में विवाहोपरान्त लड़की को पति के निर्णयों के हिसाब से चलना पड़ता है। और जहाँ हिन्दू विवाह पद्धति में कन्यादान की प्रथा हो, वहाँ दान की गई वस्तु पर माँ-बाप का क्या अधिकार, और उस वस्तु को स्वयं क्या अधिकार है। वह तो पति की संपत्ति होती है। और पति ही उसके जीवन का निर्धारक होता है। जैसा कि उसका प्रेमी नील बोलता है, ‘‘मुझे लगता है सुषमा कि तुम्हारा परिवार तुम्हारा अनड्यू एडवांटेज लेता है। तुम्हारे भाई बहन तुम्हारे माता-पिता की जिम्मेदारी है। तुम्हारी नही।’’ 4   वही सुषमा की माँ उसके इतनी उम्र में भी विवाह न होने पर कहती है कि ‘‘अब मैं क्या करूं? सयानी लड़की है, कोई बच्चा तो है नहीं जो समझाने-बुझाने से मान जाएगी। वह शादी करने को राजी ही नहीं होती तो मैं क्या करूं? और मुहल्ले-पडोसवाले उनकी बात मान जाते। पर अम्मा भी जानती थी और सुषमा भी, इसलिए ऐसे मौकों पर एक-दूसरे से आँखे चुरा जाती थी। इस घर की मुख्य आय सुषमा का वेतन था।’’ 5

परिवार के दायित्वों को निभाते हुए वह अपना जीवन कहाँ जी सकी। उसका जीवन उपेक्षित व एकाकी ही बना हुआ है। उसके विषय में न तो उसकी माँ सोचती और न परिवार के अन्य सदस्य। ‘‘अपने परिवार का सारा बोझ अपने ऊपर लिए सुषमा कांपने लगती। तब वह चाह उठती कि दो बाँहे उसे भी सहारा देने को हों, इस नीरवता के कुछ अस्फुट शब्द उसे भी संबोधन करे।’’ 6   उसके जीवन के 19 वें वर्ष में जब उसका प्रेम नारायण के लिए प्रस्फुटित भी हुआ था तो विवाह की स्थिति तक न पहुँच पाया। दहेज इसके आड़े गया। दहेज का उदेश्य बेटी को घर में रखने के लिए रिशवत के तौर पर दिया जाता है। ‘‘वकील साहब की बहुत प्रतिश्ठा थी। वह नारायण की शादी बड़े ऊचे घर में करना चाहते थे। उनकी पत्नी ने सुषमा के लिए बहुत हठ किया पर वकील साहब ने नरायण की शादी कहीं और तय कर दी। सुना नारायण को भी वह लड़की पसंद थी। सुना उस लड़की के पिता सिविल सर्जन थे और दहेज से घर आगन भर गया।’’7  और उसका निम्न आर्थिक पृष्ठभूमि का परिवार दहेज देने में अक्षम होने के कारण पुत्री का विवाह न कर पाया। आज तो दहेज प्रथा समाज में अपनी व्याप्ति पहले से भी कही ज्यादा फैला चुका है। यद्यपि दहेज विरोधी ऐक्ट 1961 में ही पारित हो चुका है, लेकिन इस कुप्रथा को समाज की वैधता मिली होने के कारण यह निषेधित होने के बजाय और विस्तारित होती हुई ही दिखती है। वर पक्ष में यह दहेज एक मानी हुई बात मानी जाती है और आज के सामाजिक परिवेश में दहेज की मात्रा ही ससुराल पक्ष की प्रतिष्ठा का निर्धारक बन गया है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों को और पल्लिवित पुष्पित ही किया है।

मृदुला गर्ग

उसकी जिंदगी में आगे चलकर उससे उम्र में 5 वर्ष छोटा नील आता है, नील उससे प्रेम करता है और सुषमा भी। वह उससे देह संबंध भी बनाती है। उसमें नील से अपने देह संबंध को लेकर किसी तरह का कोई अपराध बोध नहीं है। लेकिन सुषमा यौन शुचिता की मनोग्रंथि से नहीं निकली हुई है। वह नील से कहती है कि ‘‘तुमने कभी यह भी सोचा नील, कि मैं तैतीस साल के बाद भी अछूती और बेदाग तुम्हारी ही बाँहो में कैसे आई?’’8  लेकिन जिस वक्त नील उससे विवाह का प्रस्ताव रखता हैं, सुशमा के आड़े एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि पहले तो अपने कुटुंब को छोड़ने का तो दूसरी ओर अपने लिए भी सपने है। लेकिन यह सब होते हुए भी सुषमा कहीं से कमजोर पड़ती है, और अनिर्णय की स्थिति को बनाये रखकर कहीं अंत में नील को चले जाने देती है। इस उपन्यास में दिखता है कि स्त्री अभी किस दुविधा में जी रही है, वह आत्मनिर्भर हो गई है और साबित कर रही है कि वह परिवार का दायित्व निभा सकती है। लेकिन कहीं-न-कहीं रूढ़ियों से जकड़ी हुई है। यहां लेखिका की conditioning हुई दिखती है। लेखिका के भीतर भी परंपरायें एवं रूढ़िया बैठी हुई है, जो उपन्यास का अंत लिखते हुए बाहर आ जाती है।

‘पचपन खम्भे लाल दीवारे’ के उपरान्त ‘मित्रो मरजानी’ और ‘सुरजमुखी अंधरे के’ स्त्री विषयक चिन्ता व चिंतन का केन्द्र बिंदु है। ये दोनों कृतियां प्रख्यात लेखिका कृष्णा सोबती की है। उनका अनुभव संसार बहुत व्यापक है तथा इस संसार का अनुभव करने के लिए उनके पास नारी माध्यम है। स्वभावतः वंचना और पीड़ा के प्रति उनके कथा साहित्य में सहज झुकाव है। अपने साहसी विषय चुनाव और उद्दाम चरित्रों के लिए भी कृश्णाजी पहचानी जाती हैं। खासकर स्त्री चरित्रों के लिए और स्त्री जीवन की अछूती समस्याएं उठाने के कारण। मित्रो मरजानी के रूप में जो अविस्मरणीय चरित्र उन्होंने हिंदी को दिया, वह उनके सृजनात्मक साहस का प्रमाण है जो समूचे अनुभव और जीवन को सृजन की सामग्री बनाकर हर निषेध से इंकार करता है। मित्रो का चरित्र लेखिका ने बहुत ही जटिल ताने-बाने से बुना है। वह पारंपरिक मूल्यों को जीते हुए मध्यवर्गीय परिवार से एक युवती के विद्रोह की कथा है। मित्रो मरजानी की नायिका मित्रो का ब्याह होता है और वह ससुराल आती है। सास, जिठानी, उसके तेवर से सहमकर भी उससे प्रेम करते है। उसके यौवन कामना को उसका पति कोई तरजीह नही देता है वह ससुराल में खुलेआम इसके खिलाफ बगावत पर उतर जाती है। इस बगावत में उसकी पीड़ा स्पष्ट है। मित्रों के इसी अधिकार पर केंद्रित कर लिखी गई कथावृत्ति है। मित्रों जब अपने पति से यौन सुख नही पाती तो अपने सास से कहती है कि ‘‘अम्मा अपने बेटे को किसी नीम-हकीम के यहां जाकर दिखा दो। ‘‘मित्रों का यह वक्तव्य स्त्री के उन अधिकारों का पैरवी करता है कि यौन संबंधो में संतुष्टि  का हक उसे भी मिलना चाहिए।

मन्नू भंडारी

‘मित्रो’ स्त्री के यौन अधिकार का प्रश्न  उठाकर दाम्पत्य जीवन की पितृसत्ताक धारणाओं को कटघरे में रख देती है। हालांकि मित्रो विद्रोह करके माँ के घर चली जाती है। लेकिन अंत में वह ससुराल वापस लौटती है और इस नुक्ते के साथ उपन्यास खत्म होता है कि यौन सुख ही सब कुछ जीवन में नहीं है। बहुत सी अन्य बाते हैं, जोकि बेहद जरूरी है। आपसी समझ यौन सुख से कही ज्यादा महत्वपूर्ण है और दाम्पत्य इस तरह टूटने से बच सकता है। पति के घर वापस लौटकर मित्रो दाम्पत्य जीवन को टूटने से बचाती है। इस तरह स्त्री यौन अधिकार विषयक यह प्रशन भी अंतत परिवार व विवाह (यानि पितृसत्ताक व्यवस्था के मूल आधार) को बचाने के प्रयास में तिरोहित हो जाता है।

कृष्णा सोबती की ही प्रसिद्ध रचना ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ (1972 ई.) बचपन में बलात्कार की त्रासदी को झेली स्त्री पात्र ‘रत्ती’ की जीवन गाथा है। रत्ती उन सभी लड़कियों, स्त्रियों की प्रतिनिधी चरित्र है जो कि बलात्कार की त्रासदी तो झेलती ही है और साथ ही साथ सामाजिक लांछनाएं भी इन्हे ही झेलती पड़ती है। समाज के कोण से देखे तो बलात्कार ही मात्र ऐसा अपराध है, जिसमें समाज की दृष्टि बलात्कार करनेवाले अपराधी के स्थान पर बलात्कार की शिकार स्त्री की ओर टिकती है, स्त्री दोषी भी ठहराई जाती है, सामाजिक लाँछना, अपमान स्त्री के हिस्से में आता है। जिस अपराध की जिम्मेदार रत्ती नहीं है, उसकी सजा उसे मिलती है। यह पुरूष वर्चस्व का ‘संभ्रांत’ संस्कार है।

उसके स्कूल के बच्चे तक उसे गंदी लड़की कहकर चिढ़ाते रहते है। उसके बारे में तरह-तरह की झूठी अफवाहें फैलाते रहते हैं। जैसे कि ‘‘लड़कियों को पीटती हो और लड़को से चाकलेट खाती हो। उनके सामने अपना फ्राक उठाती हो।…..तुम बुरी लड़की हो।’’ 9 इस तरह की बातें सुनकर रत्ती को गुस्सा आता है, और वह किसी न किसी की जमकर पिटाई कर देती है। वह बचाव के लिए आक्रमण का इस्तेमाल करती है। रत्ती मानो न सुन रही हो न देख रही हो। देखते-देखते दोनों हाथ श्यामली के कंधो पर जा जमे। छोड़ दो रत्ती छोड़ो मुझे…‘‘रत्ती के हाथ कुछ ऐसे हिले झटके से श्यामली औंधे मुँह जा गिरी।’ 10 बलात्कार का प्रशन अब यद्यपि सौ पर्दों में छिपाने का विषय नही रह गया है। रिपोर्ट की जा रही है, प्रकरण सामने आ रहे है परंतु समाज की मानसिकता में अधिक फर्क नहीं आया है ‘सब कुछ लुटा जाने’ का अहसास स्त्री को पुरूषवादी व्यवस्था द्वारा दिया जाता है। ‘आवा’ में बचपन में मौसा द्वारा किया गया यौन दुराचार दस वर्ष की नमिता को जड़ करता है किंतु माँ कि प्रतिक्रिया उसे अधिक तोड़ती है कि चुप रह जाए। बलात्कार को यदि चुपचाप सहा गया तो सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा, वह ‘इदन्नमम्’ की सगुना की शक्ल में या तो शव में बदल जायेगा अथवा सुन्नर पांडेय की पतोह को बेघर करता रहेगा।

बलात्कार भारत में स्त्री के प्रति होने वाले अपराधों में सबसे बड़ा अपराध है। जिसके आकड़े प्रतिबर्ष बढ़ ही रहे हैं बावजूद इसके कि स्त्री के मन में बैठाए गए अपराध बोध के कारण अधिकांशतः अपराधों की रिपोर्ट नही की जाती। एक बार का बलात्कार स्त्री को जीवन ‘‘खराब’ होने का अपराध बोध देता है। नारीवादियों का मानना है कि बलात्कार एक राजनैतिक कृत्य होता है। जिसमें सेक्स का नजरिया कम होता हैं जबकि जेन्डर राजनीति अधिक होती है। इस तरह बलात्कार पुरूषवादी प्रभुत्व दिखाने का माध्यम है। पूँजीवादी देशो में बलात्कार को शारीरिक मानसिक  trauma के रूप में माना जाता है। वहीं भारत में सामंतवादी मूल्यों के कारण अभी भी इसको इज्जत मर्यादा के लूट जाने के रूप में देखा जाता है। समाज में बलात्कृत स्त्री को  पीड़ित के रूप में देखा ही नहीं जाता है, बल्कि उसके प्रति ऐसी लिंग विभेदी धारणा बना दी जाती है जैसे कि स्त्री द्वारा पुरूष को ऐसा कृत्य करने हेतु प्रेरित किया गया होगा या उसका चाल-चलन ही ऐसा है इत्यादि। पितृसत्तात्मक स्त्री को यौन वस्तु के रूप में ही परिभाषित का विशिष्ट  हो। चूँकि सामाजिक संरचना में स्त्री की अवस्थिति वंचित, उपेक्षित व अधीनस्थ की है। इस कारण पुरूष स्त्री देह पर अपना मालिकाना हक समझता है। और मानता है कि स्त्री समाज में अपनी गुलाम परक व वंचित स्थिति के कारण उसको दण्डित नहीं करवा सकती है। फलस्वरूप पितृसत्ताक पुरूष  उन्हें अपना शिकार बनाता है। सुसान ग्रिफिथ लिखती हैं ‘‘कानून की निगाह से देखा जाए तो बलात्कार को शारीरिक अपराध के पहलू के रूप में ही समझा जाता है। इसके बजाय, यह एक इन्सान के रूप में महिला के वजूद को मिटाने वाला अपराध होता है।’’ कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ की रत्ती बचपन में हुए बलात्कार का दंश  युवावस्था में देह संबंधो के मध्यफ्रीज्ड होने में और गन्दी लड़की समझे जाने में भोगती है। वह बलात्कार को स्त्री के इज्जत लुट जाने व सर्वस्व समाप्त हो जाने की मनोग्रंथि में ही जीती हुई स्त्रीपात्र है। हिंदी लेखिका उषा  महाजन लिखती है कि ‘‘बचपन में घटी दुःसह्य घटनाएं स्त्री के भीतर की सारी प्रतिरोधात्मक शक्ति नष्ट  कर देती है, अनेक मामलों में उन्होंने पाया है कि बचपन में अथवा विवाहपूर्व अत्याचार (इनसेस्ट ) उन्हें भविष्य जीवन नहीं जीने देता। 11

रत्ती के जीवन में उसके सभी मित्र जगतधर, रंजन, रोहित, बाली, डेविड, भानुराव, सुब्रामनियम, राजन, श्रीपत उसे षरीर से पाना चाहते है और सफल न होने पर उसके स्त्रीत्व को अपमानित करते है। जिसे वह चीज की तरह इस्तेमाल करना चाहते है। जबकि वही रत्ती की दृष्टि ‘‘पाने के लिए दोनों को एक दूसरे को चाहना होता है रोहित’’12 रत्ती के जीवन में (असद व दिवाकर को छोड़कर) जितने पुरूष  मित्र आते हैं उनके लिए रत्ती देह ही है जो कि आसानी से प्राप्त हो सकती है। और जब रत्ती की अपनी ंहमदबल उन्हें दिखती है तो, वह उसे लांछित करने का पितृसत्तात्मक हथियार इस्तेमाल करते हुए दिखाई देते हैं। ‘सूरजमुँखी अंधेरे के’ पितृसत्ताक पुरूष में स्त्री के प्रति दैहिक मनोवृत्ति की धारणा को और स्त्री के लिए संबंध की परिधि में मात्र दैहिजरूरत ही नहीं बल्कि उससे बढ़कर भावनात्मक व मानसिक संसर्ग होने की सोच को बहुत माकूल तरीके से रखा गया है।
इस दौरे में कृष्णा सोबती के रचना कर्म के पश्चात् मन्नु भण्डारी की प्रसिद्ध कृति ‘आपका बंटी’ का नारीवादी दृष्ठि से अवलोकन करते है। मन्नू  भण्डारी ने स्वंय को सृजन-सक्रिय व्यक्तित्व के रूप में परिभाषित किया, उन बहुत सी सीमाओं को फैलाया और लांघा है जो स्त्री के सृजन के साथ जुड़ी है और जिसके कारण उसका यह कर्म बाधा-दौड़ का पर्याय है। उस दौर के स्त्री की कथा साहित्य की उभरती स्वतंत्र पहचान, उसके व्यक्तिगत सोच और व्यक्तित्व संबंधी उपलब्धियों के आधार पर बनी है। इस नई स्त्री की पहचान ही स्त्री के लेखन की एक अलग कोटि हमें दिखाई पड़ती है। अर्थोपार्जन स्त्री के लिए स्वायत्त व्यक्तित्व के विकास की सीढ़ी व साधन है। महादेवी वर्मा भारतीय समाज में स्त्री की पुरूषों पर आर्थिक निर्भरता को उल्लिखित करते हुए कहती हैं कि ‘‘समाज ने स्त्री को निर्भर कर दिया है कि उसके सारे त्याग, सारा स्नेह, संपूर्ण आत्म-समपर्ण बंदी के विवश कर्तव्य के समान है।’’ 13 महादेवी भी स्त्री की आर्थिक स्वाधीनता को उसकी सामाजिक स्वाधीनता के लिए आवश्यक मानती है। आर्थिक स्वतंत्रता के बगैर स्त्री कोई भी लड़ाई नहीं लड़ सकती। आजादी के बाद मध्यवर्ग का तेजी से विस्तार हुआ, जिसने अपनी जरूरतों के मुताबिक कामकाजी व शिक्षित स्त्री की नई भूमिका को स्वीकार्यता दी। यद्यपि बाहरी दायरे में भी स्त्री के स्वतंत्र इयत्ता को मान्यता नही दी गई लेकिन इसके बावजूद भी इस दायरे में उसे स्वयं का नाम और आर्थिक व सामाजिक भूमिका तो निश्चय ही मिली। जिससें वह अपनी स्थिति को मूल्यांकित भी करने लगी, और अपनी आकांक्षाओं की प्राप्ति की दिशा में प्रयास भी करने लगी। उसमें संघर्षशीलता का विकास भी हुआ। नतीजन एकल परिवारों में भी ‘विघटन’ की घुसपैठ हो गई। ‘आपका बंटी’ (1971 ई.) शिक्षित आत्मनिर्भर स्त्री के संघर्शषील तेवर और एकल परिवारों के टूटन को रेखांकित करता हुआ उपन्यास है। इस उपन्यास का महत्व इसलिए भी है कि इस कथ्य को आधार बनाकर कोई कृति इससे पहले हिंदी में नहीं रची गई थी। इस उपन्यास में अजय और शकुन पति-पत्नी है। शकुन कॉलेज में प्रिंसिपल है। अजय भी अच्छे पद पर कार्यरत है। उनका छोटा सा बेटा बंटी है। अजय-शकुन के बीच के तनावों के कारण दोनो अलग-अलग रहते है। अजय मीरा नाम की स्त्री से प्रेम करने लगता है। अजय मीरा से विवाह करना चाहता है। फलतः अजय व शगुन में तलाक हो जाता है। ‘आपका बंटी’ में अजय व शकुन में एक दूसरे के प्रति प्रेम की रिक्तता की वजह पर तो चर्चा नहीं की गई है। लेकिन यदि उस दौर की सामाजिक स्थितियों का दृश्टिगत रखे तो मिलता है कि शहरों में शिक्षित नौकरीशुदा स्त्री का एक अच्छा खासा तबका अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगा था। और यह स्त्री सार्वजनिक दुनिया में अपनी दखल बनाने लगी थी, तो यह भी बहुत संभव नहीं था कि वह भीतरी दुनिया की अपनी निर्धारित अवस्थिति को यथावत स्वीकार कर लेती। वही पुरूश भीतरी दुनिया में स्त्री की पारंपरिक छवि को इस में भी रखना चाहता था और यही परिवार में उनकी टकराहट का कारण भी बनी है।

आपका बंटी में शकुन व अजय के तनाव का यही कारण मुझे प्रतीत होता है। संभवत् यही कारण है कि शकुन से तलाक लेने के पश्चात् वह मीरा (जोकि कामकाजी महिला नहीं है) से विवाह करता है।
घर बाहर दोहरे कार्यभार और नैतिकता के दोहरे मापदण्डों ने स्त्री के शरीर व मन को तोड़कर रख दिया है और परंपरागत सहिष्णुता वाली उसकी छवि मन्नू जी के ‘आपका बंटी’ में बिल्कुल चरमरा गई है। आप देख सकते है कि शकुन परंपरागत छवि वाली नारी नहीं है। उसका अस्तित्व पूरी तरह समानता और प्रतिस्पर्धा की भावना से भरा हुआ है। वह ऐसा कर सकता है तो मैं क्यों नहीं? की सहज इच्छा में जीती हुई वह औरत जिस छवि का निर्माण करती है वह औरत के बदलते रूप का प्रमाणिक इतिहास है। शकुन इस निर्णय पर पहुंच जाती है कि मैं उस व्यक्ति के साथ रहूँगी, जिससे मैं प्रेम करती हूँ। उससे मैं ब्याह करूंगी। अर्थात स्त्री अपने को केन्द्र में रखकर निर्णय लेती हुई ‘आपका बंटी’ में व्यक्त होती है। यहां शकुन के इस निर्णय में बंटी भी कोई बाधा नहीं बन पाता अर्थात् मातृत्व की त्यागमयी, पारंपारिक मान्यता से मुक्त होते हुए वह अपने जीवन का निर्णय स्व-केन्द्रियता के आधार पर लेती हुई दिखती है। यह इस उपन्यास का सबसे सशक्त पक्ष है। वहीं यह उपन्यास समाज में अकेली तलाकशुदा स्त्री के प्रति संकीर्ण धारणाओं को उल्लिखित करता है। जहाँ स्त्री की स्वतंत्र भूमिका न तो समाज को स्वीकार्य है और न ही नियोक्ता या संस्थानों को। स्वतंत्र स्त्री के प्रति समाज में सदैव भय की धारणा रही है। पितृसत्तामक व्यवस्था इन्हें विद्रोहिणी के रूप में इंगित कर उनके चरित्र पर सदैव लांछन ही लगाता रहा है ताकि इस बहिश्करण व उपेक्षा से भयभीत होकर वह पुनः परिवार व विवाह यानि पितृसत्ता की मूल धूरी में आ जाये। यह भी एक कारण बन जाता है कि शकुन डा. जोशी से अपने प्रेम संबंध को अंततः पति-पत्नी संबंध में परिवर्तित करने को विवश हो जाती है। अर्थात् वह एक सुरंग से निकलकर दूसरे सुरंग में चली जाती है।

अनामिका

विवाह स्त्री-जीवन की नियति रहीं है। विवाह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की निरन्तरता को कायम रखने हेतु अनिवार्य होता है। इसी कारण विवाहित को समाज में सम्मान का दर्जा दिया गया है वहीं तलाकशुदा स्वतंत्र स्त्री के सम्मान पर सदैव प्रश्न  चिन्ह लगाया जाता है। विवाह संस्था के ढ़ाँचे में पुरूष वर्चस्वता के रेशे इतने सघन रूप व विवाह जैसी संस्थाओं के द्वारा स्त्री-पुरूष के बीच पदानुक्रम व असमानता को कायम रखा जाता है। जिसमें महिलाओं की श्रम-शक्ति, यौनता व प्रजनन शक्ति आदि पर पुरूषों  का नियंत्रण होता है।
मन्नू भण्डारी की यह कृति भारतीय कानून के पितृसत्तात्मक झुकाव को सामने लाती है। जैसे कि बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक उसका पिता माना गया है न कि उसकी माता। शकुन के मन में सदैव यह भय है कि अजय उसके जीवन के एकमात्र सहारे ‘बंटी’ को भी कभी भी उससे छीन सकता है। यह कानून का क्रूर स्त्री-विरोधी पहलू है जो स्त्री संतान को जन्म दे, और पालन पोषण कर उसको पढ़ा लिखा रही हो (वह भी बिना पति के सहारे के) उसी स्त्री को ही अपने संतान पर कोई अधिकार नहीं मिलता है। अर्थात यह राज्य के पुरूषवादी चरित्र को परिलक्षित करता है। जहां राज्य परिवार के भीतर पुरूश की उच्च स्थिति को मान्यता प्रदान करता हुआ दिखता है। गर्डा लर्नर ने मानव सभ्यता के प्रारंभिक कानूनी व्यवस्थाओं के पितृसत्तात्मक पक्ष को उजागार किया है। 14 जिनसे आधुनिकता के साथ उद्भूत हुए ‘राष्ट्र-राज्य’ भी मुक्त न हो सके है।

मन्नू भण्डारी, कृश्णा सोबती, उषा प्रियंवदा के साथ-साथ ममता कालिया भी 60-70 के दशक की सशक्त हिंदी लेखिका है। जिन्होंने लेखन में स्त्री जीवन के विभिन्न पहलुओं को अपना विषय-वस्तु बनाया। फिलहाल उनके सबसे चर्चित उपन्यास ‘बेघर’ को विचार चिंतन का केंद्र बिंदु बनाकर उनमें स्त्री-परिप्रेक्ष्य की जाँच पड़ताल करते है। यह उपन्यास 1971 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास का मूल कथ्य स्त्री हेतु पुरूष वर्चस्वषाली समाज में स्त्री की ‘यौन शुचिता’ के मिथ को चुनौती देता है। पितृसत्तात्मक समाज में कौमार्य का एक नैतिक, धार्मिक और रहस्यात्मक महत्व रहा है और आज भी है। वस्तुतः प्राचीन काल से लेकर आज तक यौन संबंधो के नियमन में जितनी सतर्कता और चिंता जताई गई है। उतना किसी और कार्य में नहीं .अभद्र दैहिक व्यवहार और यौन कुंठाए स्त्री-पुरूष के जीवन संबंध को प्रारंभ से ही विकृत करते रहे है। स्त्रियां कालक्रम में अगर घरों की चार दिवारी में कैद हुई तथा आर्थिक परिस्थितियों में शरीक होने से वंचित रह गई तो यह मूलतः योनि शुचिता तथा शरीर और नस्ल की शुद्धता के बोझिल मूल्य बोध का परिणाम है।

राजनीतिलक

भारतीय परिदृश्य में देखे तो यहाँ ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के स्वरूप ने स्त्री की यौन शुचिता की धारणा को और ज्यादा मजबूती दी है। फलतः हम यौन शुचिता के मिथकीय मनोग्रंथि को इस उपन्यास के नायक परमजीत में देख सकते है।’ पहला न होने की निराशा के सन्नाटे के साथ-साथ उसे अपनी जिन्दगी का सारा नक्शा  मुचड़ा हुआ दिखायी दे रहा था।….वह दुर्घटनाग्रस्त आदमी की तरह सन्न बैठा रहा। संजीवनी को देखकर वह चकित हो रहा था। वही लड़की थी, बिल्कुल वही पर कितनी अलग लग रही थी। इतनी थोड़ी दूर पर बैठे हुए भी वह मीलों दूर जो पड़ी थी।’’15 परमजीत ने संजीवनी के साथ विवाह कर एक सुन्दर सा घर बसाने को जो स्वप्न देखा था, वह एक पल में चकनाचूर हो गया। कौमार्य भंग स्त्री को वह अपनी पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर सकता था। परमजीत के प्रेमाभिव्यक्ति में स्त्री देह दृष्ठि ही ज्यादा दिखाई देती है। इसके कई संदर्भ उपन्यास में दिखाई पड़ते है। ‘अकेले मे तुम्हारे तलुवे सहलाकर, तुम्हारे बाल खोलकर, ……….तुम्हे एक ही पल में लड़की से औरत बना दूँगा संजी।’’ 16 ‘‘ये ओठ भी मेरे हैं , आँखे भी मेरी हैं , ठोढी भी मेरी है।’’17 ‘‘हमें इतना पास बैठना चाहिए कि मैं तुम्हे गोद में डाल तुम्हारे ऊपर हाथ फेर सकूँ कही भी।’’18 यह निश्चित रूप से किसी प्रेमी के वाक्य नहीं हो सकते, बल्कि यह तो पुरूश वर्चस्वपरक व्यवस्था के किसी प्रतिनिधि चरित्र के ही वाक्य हो सकते हैं जो कि स्त्री देह को अपनी संपत्ति के रूप में प्राप्त करना चाहता है।

इस तरह से ये पांचो उपन्यास ‘बेघर’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘आपका बंटी’ व ‘पचपन खम्भे लाल दीवारे’ स्वतंत्रोपरान्त भारत में स्त्री की अधीनस्थता के विभिन्न पहलुओं व स्त्री विरोधी धारणाओं को प्रश्नांकित करते हुए स्त्री-जीवन के अनुभव खण्ड को लाकर हिंदी सृजन संसार में सशक्त पदार्पण करते हुए स्त्री लेखन की एक प्रवाहमान धारा विकसित करते हैं। ये उपन्यास इसलिए भी अपनी महत्ता रखते हैं क्योंकि यह लगभग 10 बर्षो के भीतर की ही प्रकाशित रचनाएँ हैं और विशेषकर हिंदी पट्टी के सामाजिक परिवेश को केन्द्रित करके बुनी गई हैं और संबोधित भी हिंदी पट्टी समाज को ही की गई हैं। इस प्रकार यह रचनाएं तत्कालीन परिवेश में स्त्री की उपेक्षित अवस्थित को अभिव्यक्ति देते हुए स्त्री सरोकारो से पाठक को जोड़ने वाले पुल की भूमिका में आती है।

संदर्भः
1   प्रमिला कपूर, कामकाजी भारतीय नारी, पृ. 52
2  पचपन खम्भे लाल दीवारे , उशा प्रियवंदा, पृ.11, संस्क-1991, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली।
3   वही, पृ.33
4   वही, पृ.48
5    वही, पृ.11
6   वही, पृ.26
7   वही, पृ.36
8    वही, पृ.55
9   सूरजमुखी अंधेरे के,कृष्णा सोबती, पृ. 50, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि. नई दिल्ली
10    वही, पृ.50
11  उषा महाजन, उठो अन्नपूर्णा साथ चलें, हिमालय पुस्तक भण्डार, 1998. पृ.117
12    सूरजमुखी अंधेरे के, कृष्णा सोबती, पृ.70
13   श्रृखला की कड़ियां, महादेवी वर्मा.
14  नारीवादी राजनीति संघर्ष एवं मुद्दे, संपा-साधन आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, पृ.3 संस्करण 2001, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विशवविद्यालय।
15    बेघर, पृ.72
16   वही, पृ.63
17    वही, पृ.79
18   वही, पृ.59

बलात्कार को सिर्फ परिचर्चा का विषय नहीं बनायें

कुमारी ज्योति गुप्ता 

बलात्कार सिर्फ एक स्त्री के खिलाफअपराध नहीं बल्कि यह पूरी मानव सभ्यता और इंसानियत के खिलाफ अपराध है। कुछ दिनों पहले शिमला की गुड़िया के साथ जो हुआ  वह कुछ नया नहीं है।अब तो ऐसा लगता है हमारे कानों को इस तरह की खबर  सुनने की आदत सी हो गई है। मैंने सोशल मीडिया पर देखा भी और सुना भी। एक संगीनअपराध को महज बहस बनाया जा रहा है। गनीमत है कि बहस का मुद्दा बलात्कार रखा जाता है। भले ही वह अपने उद्देश्य  से भटका हो।बहस का मुद्दा बलात्कार तो है लेकिन इसमें न्याय दिलाने की बात या स्त्रियों के खिलाफ इस अमानवीयता की शिकायत कम,अपने पक्ष को कितने कलात्मक ढ़ंग से हम पेश कर रहे हैं यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है।

जब इस तरह की कोई बहस होती है सोशल मीडिया पर तो बोलने के लिए जितने भीमहानुभाव आते हैं उनका सिर्फ यही ध्यान होता है कि हम बेहतर बोलें, टी.वी पर सुन्दर दिखे और किसी बात पर श्रोताओं ने ताली बजा दी तब तो कहना ही क्या। समझो आना सार्थक हो गया भले ही सार्थक बोले या न बोले। मुद्दे की गंभीरता पर चर्चा हो या न हो । भई हमने तो बात रख दी । बहस के दौरान अगर कोई महत्त्वपूर्ण बात निकलती है तो उसे तुरंत  रोककर ‘ब्रेक’ ले लिया जाता है।ब्रेक के बाद लौटते ही महत्त्व पूर्ण बात दब जातीहैऔर बहस सिर्फ बहस रह जाती है।पूरा मीडिया व्यापार बन कर रह गया है।कहीं किसी का बलात्कार हो जाता है तो यह गंभीर मुद्दा कम होता है। खुले शब्दों में कहें तो मीडिया को अपनी कमाई के लिए मसाला मिल जाताहै। दो-चार दिन बाद चर्चा बिल्कुल बंद हो जाती है।जनता का आक्रोश भीधीरे-धीरे दब जाता है।आक्रोश  खत्म हो जाता है यह तो नहीं कहूंगी क्योंकि यही दबा हुआ आक्रोश इसी तरह की किसी और घटना पर उभर आता है। जनताअपनाआक्रोश ही व्यक्त कर सकती है क्योंकि सारे नियम कनून किसीऔर के हाथमें है।जनता में कानून का डर है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अपराधी को कानून का कोई डर नहीं क्योंकि उसका गॉडफादर उसेबचाने के लिए मौजूद है।इसलिए वह डर की सारी सीमा पार कर चुका है।

हमारे देश में जो इस तरह की घटनाए हो रही हैं इसके लिए दोषी कौनहै? क्या कानून व्यवस्था दोषी है? अगर हां तो फिर क्या नया कानून बनाने की जरूरत है।प्रश्न महत्त्वपूर्ण है क्योंकि  कानून का डर आम सीधी-साधी जनता में हैअपराधियों में नहीं है।इस तरह तो डरे हुए कोऔर डराया जा रहा है।सुरेन्द्र वर्मा नेआ मजनता की स्थिति परअपने एक वक्तव्य में कहा था-
‘‘ कोई फर्क नहीं पड़ता राजा राम है कि रावण,
जनता तो सीता है
राजा राम हुआ तो वनवास दी जाएगी
राजा रावण हुआ तो हरण की जाएगी।’’

अखबारों में रोज़ किसी न किसी जगह एक -दो बलात्कार की खबर पढ़ने को मिल जाती है। यह कोई खबर मात्र नहीं जिसे इतने हल्के में डेली रूटीन की तरह छाप दिया जाता है।यह स्त्री की संपूर्ण मनोभावना को ध्वस्त कर देने वाला संगीनअपराध है जो पीड़िता से उसके जीने काअधिकार छीन लेता है। यह वह अमानवीय अपराध है जो हैवानियत की सारी हद पार कर देता है।हमारे समाज की संरचना कुछ इस प्रकार की है कि यहां हर हाल में स्त्री को ही दोषी माना जाता है।इसलिए अरविंद जैन नेअपनी पुस्तक‘औरत होने की सज़ा’में लिखा है ‘‘समाज, सत्ता, संसद और न्यायपालिका पर पुरुषों काअधिकार रहने की वजह से सारे  कानून और उनकी व्याख्याएं इस प्रकार से की गई हैं कि आदमी के बच निकलने के हजा़रों चोर दरवाजे मौजूद हैं जबकिऔरत के लिए कानूनी  चक्रव्यूह से निकल पाना एकदम असंभव’’ इसलिए पीड़िता खुद को दोषी मानकर सम्मानपूर्ण जीवन नहीं जी पाती।

इस तरह के अपराध को कैसे रोका जाए।कई संस्थाए हैं जो इस तरह के अपराध के खिलाफ आवाज उठाने का काम कर रही है, जागरूकता अभियान भी चला रही है जो कि सराहनीय है। कई संस्थाएं स्कूल, कालेज और सामाजिक स्तर पर बहस का भीआयोजन करती है मगर दुर्भाग्यवश  ये बहस इस बात पर सिमट जाती है कि पीड़िता सुनसान जगह परअकेले क्या कर रही थी, अगर जाना जरूरी था तो अपने साथ अपने भाई या पिता को साथ लेकर क्यों नहीं गई, उसने क्या पहन रखा था , उसका आचरण कैसा हैआदि-आदि. ये प्रश्न पीड़िता को दोषी साबित करने के लिए र्प्याप्त होते हैं।क्या हमारा समाज एक स्त्री को शरीर और भोग से ऊपर नहीं देखना चाहता या फिर अपनी ओछी सोंच की गुलामी से ऊपर नहीं उठना चाहता।

एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि नागरिक कहीं की भी हो उसे राजनीतिक इस्तेमाल का  मुद्दा न बनाया जाए। जरूरी यह है कि  उसे उसके मौलिक अधिकारों के तहत न्याय मिलना चाहिए। घटना किसी भी शहर, प्रदेश ,नगर ,गांव की हो, जगह महत्त्वपूर्णन हीं जो हुआ , जो हो रहा है उसका रूकना जरूरी है।

डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली के  हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

यस पापा

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com



महाज्ञान बाबू का इकलौता बेटा चेतन अप्पूघर-पप्पूघर ही नहीं, स्कूल, कॉलेज और दफ्तर से वापस घर तक सारी उम्र पापा की उगँली पकड़े-पकड़े गाता रहा ‘‘यस पापा, यस पापा, पापा-पापा, यस पापा,।’’ इस बीच लीलाओं, नाटकों और नौटंकियों में सीता, राधा और द्रौपदी का पात्र जीते-जीते, चेतन न जाने कब चेतना बन गया था।


चेतना को घर बेगाना किला लगता था और उस पर हर समय पापा का पहरा, पापा की अध्यक्षता में सारा दिन पंचायत और मीटिंग चलती ही रहती थी। चेतना महसूसती कि रात-दिन चेतन का आतंक उसका पीछा कर रहा है। उसे चेतन की छाया छूने से भी डर लगने लगता था। इसलिए ज्यादातर वह अपने कमरे में बंद ही रहती। देखते-देखते कमरा कैमरे में बदल जाता और कैमरे में चेतना को चूहे कुतरने लगते। अँधेरे में चीखती, चिल्लाती, भागती, भटकती, चेतना बेहोशी के बिस्तर में बड़बडाती रहती- ‘‘ नो पापा- नो पापा, प्लीज पापा – नो पापा।’’

होश आता तो ‘रिहर्सल’ खत्म हो चुकी होती। सामने पत्थरों की दीवार पर, चंदन की चौखट में शीशे के दरवाजे और जाली के बीचों-बीच एक सिन्दूरी छिपकली, कोने में हल्दी पुता चाँद और काले धुएँ के बादलों से ढका आकाश नजर आता। कभी- कभी, कुछ भी नजर नहीं  आता।

चेतना अपने माँसल बिस्तर से उठती और नहा धोकर किले से बाहर निकलती, तो हवा में हवन की गंध सी महसूस होती। उसका कम्पयूंटर  बताता, ‘‘ अरे! आज तो शूटिंग पर जाना था।’’ वह खटाखट पाँवों में पहिए लगती और स्टूडियों पहुँचती, तो बाहर चक्कर काटता चेतन डाँटने की मुद्रा में झिड़कता, ‘‘ऐसे तो ‘मॉडल क्या टाइपिस्ट’ भी नहीं बन पाओगी। समझी कुछ।“

चेतना अन्दर जाती, बुर्का उतारती, पैंट शर्ट बदलती, जादुई रंगरोगन लेपती और गोली खाते  ही, किसी बेहद सुन्दर गुड़िया में बदल जाती। गुडि़या गाती ‘‘ शूट मी… शूट मी… प्लीज’’ और उसकी उत्तेजक भाव भंगिमाओं को पकड़ते-पकड़ते, लैंस की लार टपकने लगती। सबसे ऊपर ‘क्रेन’ पर लटके पापा कांट-छांट करते रहते। वह जब थक जाती, तो ‘गुड़िया’ को वहीं किसी अनाथ कोने में छुपा कर, किले में लौट आती।

रास्ते में उसे एक बार लगता ‘कहीं जंगली कुत्ते गुडि़या को फाड़ ना खाएं’ और पलक झपकते ही शान्त हो जाती- “शायद इसलिए तो छोड़ आई हूँ। कुत्ते ढूँढते फिरेंगे गुडि़या को….. गुडि़या चेतन को….. चेतन अपने पापा को…. पापा मुझे… ओर मैं… हा…. हा…. हा।“


चेतन सन्नाटे में संवाद बोलता, ‘‘गुडि़या सुन्दर है….. सुन्दरी है….. विश्व सुन्दरी है। जिस ‘ब्रांड’ को भी छुएगी, सोना बन जाएगा।’’ गूंगी-बहरी गुडि़या चुपचाप लेटी रहती। चेतना हँसती, ‘‘माँस का खिलौना है…है नहीं दिखती है। खेलोगे तो गुडि़या है…. खाओगे तो मिटृी।“


सुबह सवेरे ‘देवी-देवतओं’ को मनाने जाते-जाते पापा समझाते, ‘‘ न गुडि़या है…. न खिलौना है। मूर्ति है माँ की…. देवी माँ की। कुछ धर्म, दर्शन, इतिहास, गीता, रामायण, वेद, पुराण, कुरान पढो, तो पता लगे। सारा दिन टी.वी फिल्में और वाहियात नॉवल पढ़ोगे तो यहीं होगा।’’ श्लोक सुनते-सुनते चेतन हुँकार भरता रहता, ‘यस पापा, यस पापा’ और चेतना जब तक जोर से चीखती, ‘नो पापा, नो’, तब तक पापा अयोध्या पहुँच चुके होते।



चेतना के शहर में शिकारी ‘ठाँय.. ठाँय’ करते और कुछ दिन कर्फ्यू रहता। अखबारो में कभी घोटालों और कभी सेंसर फैल जाता। रोज कुछ ‘स्टेनगनें’ पकड़ी जाती; सिरफिरे पुलिस मुठभेड़ में मारे जाते और शाम को कुछ लाल-सफेद टोपियाँ मंत्री पद की शपथ लेती दिखाई पड़ती। अफवाहें गशत पर घूमती रहती…. संस्कृति खतरे में… विदेशी प्रचार-तंत्र से सावधान। खतरे का सयारन बजता, तो पापा मौन व्रत धारण कर आमरण उपवास पर बैठ जाते।


चेतन की दुनिया सुबह से शाम तक गुड़ियों भरी गाड़ी लेकर, कोठियों से कोठो तक घूमती रहती। कभी-कभी कुछ गाडि़यों को कुत्ते उइा ले जाते और कुछ खुद ही भाग जाती। वह घर से धोती-कुर्ता पहन कर निकलता। मगर देर रात तक गए नशे में धुत्त झूमता-झामता लौटता, तो सूट-बूट और टाई पहने होता। पापा पूछते, ‘‘ आ गए बेटा,’’ तो वह कभी हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी, अरबी में या कभी फ्रेंच, जर्मन या जापानी वगैरा-वगैरा में ‘यस पापा’ कहकर अपने कमरे में घुस जाता।


पापा सुबह तक सोने के सिक्के तौलते, शेयर गिनते और बजट बनाते रहते। लाईफ पढ़ते-पढते, वसीयत लिखने लगते और आत्म-कथा लिखते-लिखते, पड़ोसी की पत्नी संग हनीमून पर चले जाते। उनका हनीमून कभी खतम नहीं होता।


चेतन नींद में फुसफुसाता ‘‘ फॉदर – फॉदर… गॉड फादर।’
चेतना झल्लाती, ‘‘ फ्रॉयड नहीं, फ्रॉड।’’
चेतना संवदेना का संगीत सुनते-सुनते, न जाने कब समाधि में चली जाती। तीर्थयात्रियों से लौटती, तो चंदन की चौखट में शीशे और जाली के बीच लटके ‘मंगल-सूत्र’ और पृष्ठभूमि में रेतीले अंधड़ नज़र आते।
नींद में चेतना के चारों ओर बम-पटाखों की धड़ाम….. धड़ाम और बारुदी धुँआ भर जाता। ऐसा लगता जैसे सारी रात शरीर पर साँप रेंगते रहे और सुबह अपनी केंचुलियाँ कमरे में ही भूल गए।

एक दिन पापा को खोजते- खोजते, चेतना ने खोज निकाली महाज्ञान बाबू की जन्म कुण्डली। किसी अनाम चीनी ज्यातिषी ने वर्षों पहले लिखा था- “जातक बंदर की तरह बुद्द्धीमान, चालाक, हाजिर जवाब, रंगीन मिजाज और शरारती स्वभाव का होगा। ज्ञान की तीव्र जिज्ञासा में देश-विदेश की यात्राँए निश्चित हैं। शास्त्रार्थ में सदा विजयी रहेगा। अधिकांश लोग तो बालक की घुड़की भर से भयभीत रहेंगे। बहुमुखी प्रतिभा के बल पर, हर क्षेत्र में सफलता मिलेगी। कला, साहित्य, दलाली, सटृा, राजनिती या वकालत में अनेको सम्मान, अपार सम्पति और अजेय सत्ता  का अनंत सुख हासिल होगा।’’

भविष्यवाणी पढ़कर चेतना बहुत देर तक गुदगुदाती रहीं और मन ही मन गुनगुनाती रही, ‘‘ मोंकी-मोंकी  यस पापा…… डोंकी-डोंकी, यस पापा।’’

चेतन के कान बजबजाए तो खीझ कर बोला, ‘‘पापा इज ए मोंक, नॉट ए मोंकी….. ब्ल्डीफूल।’’
चेतना ने शीतयुद्ध छोड़, मोर्चा सम्भाल हमला किया, ‘‘चेतन! तू चूहा है चूहा…. और चूहे से ज्यादा अवसरवादी और घिनौना और कोई नहीं होता।


चेतन के चेहरे पर अपराध बोध सा प्लेग फैलने लगा और अपमानित चेतन ने पाँव पटकते हुए अखिरी हथियार चलाया, ‘‘इफ आई एम ए रैट, यू आर ए कैट एण्ड मेयरली ए स्टिकिंग होल।’’
चेतना को ऐसा लगा जैसे चेतन ने तेजाब छिड़क दिया हो। लेकिन दूसरे ही क्षण झपटृा मार नोंचते हूए बोली, ‘‘ सुनो मिस्टर यस पापा, यू नो… दि कैट कैंन कैच एंड किल दि रैट।’’



चेतन डर के मारे, “पापा-पापा, ओ पापा, कैट बिल किल मी ओ पापा,’’ गाते-गाते चिल्लाने लगा।
आँख खुली तो चेतना की एक मुटृी में भरा चूहा और दूसरी में चेतन का चेहरा था। सामने चंदन की टूटी चौखट पर बैठे बंदर को जैसे लकवा मर गया था। लेकिन अभी भी वह खों…. खों करता खोपड़ी खुजला रहा था। खु….ज…. ला…. र….. हा….. है……!

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और मैं फूलनदेवी से जुड़ गई

श्वेता यादव

सामाजिक कार्यकर्ता, समसामयिक विषयों पर लिखती हैं. संपर्क :yasweta@gmail.com

2002- 04 के आसपास की बात है| यह समय मेरा हाईस्कूल-इंटर का है| शुरू से ही स्वभाव मेरा काफी अक्खड़ है| किसी भी गलत बात पर चुप नहीं रहना, किसी से भी भीड जाना चाहे वह बात मेरी हो या किसी और की ये मेरा स्वभाव था, जो आज भी बदस्तूर जारी है| मेरे स्कूल में सवर्ण लड़के (जी हाँ पूरी जिम्मेदारी से कह रही हूँ, सवर्ण लड़के, जिसमें ज्यादातर ठाकुर थे|) मुझे फूलन देवी बुलाते थे| सोशल मीडिया में उस समय की एक ही दोस्त दिखती है, प्रिया जयसवाल, शायद उसे याद हो!

 तब मैं भी छोटी थी और फूलन को ज्यादा नहीं जानती थी लिहाजा बुरा लगना लाज़मी था| क्योंकि फूलन देवी को लेकर जिस तरह की छवि बना दी गई है उससे जानने वालों को भले ही फूलन देवी संबोधन अच्छा लगे लेकिन ना समझने वालों को और गलत तरीके से जानने वालों को तो अच्छा नहीं ही लगेगा| एक बार कि बात है इन लड़कों से कुछ बहस हो गई बहस क्या हम दो लड़कियों ने मिलकर बड़ा काण्ड कर दिया| हुआ यूँ कि ये बदतमीज  लड़के क्लास में भी बहुत हुल्लड़ करते थे और किसी भी टीचर को पढ़ाने नहीं देते थे| चूँकि वह दौर था कि अगर टीचर ने कुछ भी बोल दिया या क्लास के बाहर कर दिया तो, स्कूल के बाहर तेचार का पीटना तय| इस डर के चलते कोई भी टीचर इन बच्चों से पंगा नहीं लेता था| हमारे फिजिक्स के सर दुर्गा प्रसाद मिश्र जो की बहुत ही सीधे थे लेकिन पढ़ाते बहुत अच्छा थे, उन्हें ये लड़के क्लास ही नहीं लेने देते थे| हम दो लड़कियों ने इन्हें सबक सिखाने की सोची और केवाछ खरीद कर लाये (केवाछ एक ऐसी दवा जो अगर शरीर को कहीं छू जाए तो बहुत भयानक खुजली होती है, कहते हैं केवाछ से उत्पन्न खुजली सिर्फ एक ही चीज से रूकती है वह है गोबर)| जब सब प्रार्थना सभा में इकट्ठे हो कर प्रार्थना कर रहे थे तब मैं और ज्योति इनके बैग, सीट हर जगह पर केवाच छिडक रहे थे| थोड़ी देर बाद ही क्लास शुरू हुई अमूमन यह आदत होती है कि सीट पर बैठते वक्त हम सब आगे की तरफ झुकते हैं और बैग पर हाथ रख कर बैठ जाते हैं, यही हुआ उस दिन भी, उसके थोड़ी देर बाद जो हुआ वो मंज़र आज भी आँखों के सामने आता है तो हंसी छूट जाती है| लड़कों का पूरा शरीर खुजला खुजला कर बुरा हाल| इधर हम दो लड़कियां भी इसी हालत में थी .. चूँकि तमाम सुरक्षा लेने के बाद भी केवाच हमें भी छु गई थी तो बुरा हाल होना लाज़मी था| अच्छा भी हुआ इससे मैनेजमेंट की नज़र में लड़कियां भी बरी हो गई कि लड़कियां तो खुद खुजली से परेशान से परेशान हैं इसलिए यह ये शैतानी नहीं कर सकती| स्कूल शुरू होते ही हम लोग अपना अपना बैग लेक्कर घर वापस|

खैर लड़के घर गए और उस दिन और उसके बाद लगभग हमेशा के लिए क्लास शांत हो गई| मुझे आज भी याद है दुर्गा सर समझ गए थे क्योंकि उनकी आँखों में झलक रहा संतोष का भाव बहुत कुछ समझा गया था| मुझे नहीं पता कि लड़कों को यह बात कैसे पता चली कि यह काण्ड मैंने किया था| जिस दिन वे लौट कर स्कूल आये उस पूरे दिन मुझे बहुत परेशान किया स्कूल से बस स्टॉप जाते वक्त पूरे रास्ते उन्होंने मेरा पीछा किया और रास्ते भर जोर-जोर से आवाज़ लगाते रहे फूलन देवी- फूलन देवी| उस दिन मैं वापस घर लौट कर बहुत ही दुखी होकर बैठी थी तो पापा ने वजह पूछी मैंने सब बताया और कहा ” सब ठीक है लेकिन जब कोई मुझे फूलन देवी बुलाता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता”…
‘पापा ने पूछा क्यों?’ क्यों अच्छा नहीं लगता?
मेरा जवाब था- ‘क्योंकि वह अच्छी नहीं थी’ तभी तो लड़के मुझे फूलन बुलाते हैं!
पापा ने कहा- तुम्हें पता है फूलन कौन थीं? और उनकी हत्या क्यों हुई?

अत्याचार का अस्वीकार है फूलन की क्रांति गाथा 


मैंने कहा- मुझे नहीं पता बस मैं इतना जानती हूँ वह अच्छी नहीं थी, इसलिए मुझे फूलन बुलाया जाना पसंद नहीं!
पूरी बात सुनकर पापा हँसे और काफी समझाया लेकिन मैं जस की तस स्कूल तक जाने तक को तैयार नहीं| पता नहीं पापा को क्या सूझा और कहा ‘अच्छा रुको तुम्हें कुछ सुनाता हूँ|’ और पापा एक कैसेट खरीद कर ले आए. जहाँ तक मुझे याद है आवाज ‘बेचन राम राजभर’ (जो बिरहा सम्राट के नाम से भी जाने जाते हैं) की  ही थी| बिरहा एक बहुत ही फेमस विधा जिसमें विस्तृत रूप में किसी घटना का जिक्र गीत के माध्यम से करते हैं| बिरहा विधा में ज्यादातर वीर रस का प्रयोग होता है| बेचन अपने बिरहा में फूलनदेवी के बचपन से लेकर संसद तक की कहानी गाते थे. बाद  के दिनों में मैंने इसे विजय लाल यादव की आवाज़ में भी सुना जो मुझे ज्यादा अच्छा लगा|

बेचैन जी का बिरहा:


खैर पापा बेचन की आवाज़ वाली कैसेट ही लाये थे और कैसेट लगाते हुए कहा आओ सुनते हैं| कुछ कहने से पहले पूरा सुनना जरूर फिर बात करेंगे| उसके बाद मेरे घर में डीवीडी आई फूलन पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन जो तब के दौर में एक बड़ी घटना कह सकते हैं आप कि इस फिल्म को पहली बार मैंने अपने घर में देखा| उसको देखा मैंने कहीं न कहीं मन की धुंध साफ़ हुई पूरी तरह से तो नहीं पर हाँ इतना जरूर हो गया कि अब कोई फूलन कह कर आवाज लगता तो पलट कर देखती जरूर और मुस्कुरा कर कहती हाँ बोलो… आज जब फूलन को अच्छे से जान गई हूँ तब ख़ुशी होती है कि लोग किसी ज़माने में मुझे फूलन बुलाते थे| फूलन आपको नमन!

मोदी जी, लहू का लगान आपकी लुटिया न डुबो दे !

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

कुछ समय पहले टीवी और अखबारों में औरत और उसकी माहवारी को एक खास चित्र से पेश किया जाता था। चित्र में दो महिलायें होती थीं। एक महिला दूसरी के कान में फुसफुसा कर कहती थी। इससे अपने आप एक समझ बन जाती थी कि बात पीरियड्स की हो रही है। हाल के वर्षों तक यही हाल था और आजकल भी ऐसा ही हाल है। देश में ऐसे पूजा-पाठ के स्थान हैं जहां माहवारी के दौरान कोई भी महिला प्रवेश नहीं कर सकती। भगवान अ-पवित्र हो जायेंगे, ऐसा ख़तरा लगातार इस महान संस्कृति के महान रक्षकों को सताता रहता है। बाज़ार ने औरत को कुछ इस तरह से पेश किया है जो एक अदना सेंट को सूंघकर मर्द के साथ हो लेती है। कुछ देशभक्ति का दावा करने वाले अभिनेता तो चड्डी और बनियान के विज्ञापन से भी औरतों को प्रभावित कर लेते हैं। समाज, संस्कृति, बाज़ार आदि-आदि तो औरतों को ठग ही रहे हैं साथ ही साथ सरकार भी अपने नए नियम के साथ ठगने के लिए तैयार बैठी है। पीरियड के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले नैप्किन्स पर 12 प्रतिशत का कर लगाया जा रहा है। इसके बाद ये महंगे तो होंगे ही, साथ ही साथ बहुत सी महिलाओं की पहुँच से दूर हो जाएंगे।

औरतें महीने के कुछ खास दिन असहनीय दर्द और एक महक में गुजारती हैं। इससे वे चाह कर भी पीछा नहीं छुड़ा सकतीं। इससे उन्हें बेहद तकलीफ़ होती है। वे हैं- ‘महीने के उन दिनों में शरीर से रिसते खून की महकऔर अंदरूनी हिस्सों में उपजने वाला दर्द!’महिलाओं के अनुभवों से पता चलता है कि कई सालों से पैड के इस्तेमाल से दर्द व महक से तकलीफ़ थोड़ी बहुत कम हो गई है क्योंकि पैड साफ और सुरक्षित होने के साथ साथ खुशबू वाले होते हैं। इस्तेमाल में भी आसान। यह मामूली सी वस्तु लगने वाला और खून सोखने वाला स्पंज नहीं बल्कि हम आधी दुनिया के लिए अनिवार्य वस्तु है जो बहुत हदतक हमारे उन दिनों को हमारे लिए साफ और बेहतर बनाता है।

शुरू में सेनिटरी पैड पर 12%का कर लगा है उसे सोचकर मैं बहुत हद तक हैरान नहीं हुईथी। पर जब यह मालूम पड़ा कि टिकुली और सेनूर (बिंदी-सिंदूर) पर कर नहीं है तब मुझे दोनों की तुलना करने के बाद अव्वल दर्जे की हैरानी हुई कि लोगों का दिमाग पितृसत्ता के ढांचे में कैसे अनुकूलित हो चुका है! कैसे पढ़ी लिखी सरकार को परंपरा के माम्बा साँप ने डंस लिया है। हाल के वर्षों में हुई कई तरह की घटनाओं को देखते हुए मुझे सरकारों से बहुत उम्मीदें नहीं हुआ करतीं।क्या कर निर्धारण करने वाली सलाहकार टीम में महिलाएं नहीं थीं?उस समूह में औरतों की संख्या कितनी रही होगी? क्या वे एक-दो संख्या में थीं जिस कारण उनकी आवाज़ दबा दी गई? क्या उन्हों ने महिला होने के नाते इस पर कोई आपत्ति नहीं दर्ज़ की? क्या सरकार को नहीं मालूम कि पैड पर कर बढ़ाने के बजाय कम करना चाहिए या फिर कर मुक्त करना चाहिए? क्या टीम में शामिल लोगों ने इस पर तनिक भी बहस नहीं की? क्या सरकार महिलाओं के कल्याण और विकास में उनके शरीर को नहीं जोड़ती? सरकार महिलाओं के लिए किस तरह के विकास की कल्पना करती है? क्या सरकार महिलाओं को हर मोर्चे पर ठगने के लिए योजनाबद्ध है.., कुछ ऐसे ही सवाल ज़ेहन में रह-रह कर आ रहे हैं।

इसी के बहाने मौजूदा दौर में ‘महीने के उन दिनों’ के बारे में बहस होते देख अच्छा भी लग रहा है। जिस महत्वपूर्ण विषय की चर्चा फुसफुसा कर हुआ करती थी अब उस पर सार्वजनिक बहस की जा रही है। इसके चलते माहवारी से जुड़े अहम पक्ष उभर कर सामने आ रहे हैं। लोगों की झिझक में कमी आ रही है। इसके अलावा इस विषय से जुड़ी परेशानियों को गंभीरता से समझने की कोशिश शुरू हो चुकी है। हाल ही में आई एक हिन्दी फिल्म ‘फुल्लू’इसका अच्छा उदाहरण है जिसने इस विषय को बहुत से लोगों तक आसानी से पहुंचाया है।

सबरीमाला के भगवान अय्यप्पा के मंदिर,हाजीअली दरगाह आदि जगहोंपर औरतों कोमाहवारी के दौरान घुसने नहीं दिया जाता। इसका कारण उनके इस समय अ-पवित्र होने को बताया जाता है। जबकि गौर करने पर पता चलता है कि पवित्रता और अपवित्रता की पूरी पृष्ठभूमि ही एक मनगढ़ंत, मनमाने औरतानाशाही रवैये का एक रूप है।जो प्रक्रिया शरीर के अंदर प्राकृतिक रूप से हर महीने होती है वह किस प्रकार से अ-पवित्र हो जाती है? जबकि अ-पवित्रता की श्रेणी में तो किसी का शोषण करना ही आता है। आधी आबादी का शोषण कोई दस या बीस बरस पुराना नहीं है, बल्कि इतिहास के अंदर दबी-घुटी कहानियों में कितने ही भयंकर शोषण के सबूत मिल जाते हैं। क़ायदे से किसी का भी शोषण ही सबसे बड़ी अ-पवित्रता है। औरतों कापारिवारिक,सामाजिक, पारंपरिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदिधड़ों ने बखूबी शोषण किया है साथ ही साथ एक अरसे तक उनकी शारीरिक शक्ति जो नए जीवन का कारण है,को अपवित्र घोषित कर बरसों तक पेश किया है।वास्तव में ये व्यवस्थाएँ उनको कमजोर बनाए रखने के नुकीले औज़ार भी रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब बंद हो चुका है। यह इक्कीसवीं सदी में भी जारी है। यहां अभी भी आधी दुनिया की परेशानियाँ कुछ कम तो बिल्कुल नहीं हैं।

इस सब से परे मैं उस 14 या 15 बरस की लड़की की जगह खुद को रखकर सोच रही हूँ जिसे पहली बार महीने के दिन शुरू हुए हैं। सरकार को नहीं मालूम कि जब 15 साल की उम्र में (अब 10 या 12 से पीरियड शुरू हो जाते हैं) एक गर्मी की सुबह आप सो कर उठे हों और आपके पैरों के बीच गीलेपन का अहसास होता है, तब वह बच्ची जो ताज़ा-ताज़ा बड़ी हुई है,अपने को मजबूर पाती है। वह नौजवानी की दहलीज़ पर कब खड़ी हो जाती है उसे इसका तनिक भी अहसास नहीं होता। उस समय उसका शारीरिक और मानसिक स्तर निचले दर्जे पर आ जाता है। यह मानसिक धक्का भी होता है। इससे बाहर आने में उसे कई बरस लग जाते हैं।

वह उस रात से पहले बच्ची ही थी। न जाने रात के कौन से पहर में शरीर यकायक बदल जाता है। सही वक़्त का पता रात की सोई हुई दीवार घड़ी की सुइयां जानती हैं और शरीर के अंदरूनी अंग। किसी गैर लिंग या फिर सरकार को क्या मालूम 14-15 बरस में आपके शरीर का वह अंग जो सबसे अधिक रहस्यमयता लेकर संग जीता है वह अचानक से खून के थूक कैसे उगलने लगता है? कैसे बताया जाये कि खून किसी छोटी गुठली की शक्ल लिए धक से बाहर गिरने लगता है तब मन में कितनी अजीब सी बातें आने लगती हैं! यही चिढ़ में बदल जाती है।डियर सरकार, आपको नहीं मालूम यह चिड़चिड़ाहट कितनी खराब होती है जो हर महीने निश्चित समय पर आ धमकती है।

सरकार को यह भी नहीं पता कि किसी आमफहम परिवार से ताल्लुक रखने वाली लड़कियों के माहवारी के शुरुआती दिन कैसे होते हैं? अगर परिवार में तीन या चार बेटियां होती हैं तब तो और भी मुश्किल हो जाती है, क्योंकि इसमें माँ को मिलाकर माहवारी के दिन बिताने वाली औरतों की संख्या बढ़ जाती है। अकेले पिता के ऊपर ख़र्च का जिम्मा होता है। वह मासूम पिता तो ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ के नारे को सच मानकर उन्हें पढ़ाना ही चाहता है। उसे कई बार यह ख़यालभीनहीं आता कि उसकी सबसे छोटी बिटिया भी अब महीने के उन दिनों वाली दशा में प्रवेश कर चुकी है। दूसरी तरफ माँ जिसे विरासत में ही छुपाने की कला सिखाई जा चुकी है वह पिता से भरसक इस बात को छिपाने की कोशिश करने में व्यस्त रहती है कि छोटी बिटिया भी अब बड़ी हो चली है। यही कला वह मासूम पालतू माँ अपनी बेटियों में भी डालना शुरू कर देती है कि कैसे ‘यह न करना और वह न करना’ आदि आदि। अब हर बार वह अपने हिस्से का पैड अपनी सबसे छोटी बेटी को दे देती है क्योंकि अभी उसे इसे समझना और संभालना नहीं आया है। सरकार को नहीं मालूम कि ‘भारत-माता’ कितनी कुर्बानी देती है। खुद पुरानी सूती साड़ी का इस्तेमाल करती है और बड़ी और अनुभवी हो चुकी बेटियों को भी सूती साड़ी को चिथड़ों में काटकर इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करती है।माँ को ऐसा कर यह लगता है कि कुछ तो बचत होगी ही।

वस्तु एवं सेवा कर उर्फ़ जीएसटी की टीम और वित्त मंत्री को नहीं पता कि किसी युवा होती लड़कियों की कक्षा में वे लड़कियां छुट्टी कर घर में बैठ जाती हैं क्योंकि पहले दिन पेट के निचले हिस्से में दर्द बहुत होता है और बहाव भी तेज़ होता है। इतना तेज़ कि एक पैड बहुत जल्दी ही गीला हो जाता है। एक ही दिन में कई पैड लग जाते हैं। न बदलो तो दाग लगने या फिर अंदरूनी कपड़े खराब होने का भय मन में तैरने लगता है। क्या वित्त मंत्री को पता है कि 32, 34,…(बढ़ते क्रम में),आदि आदि रुपयों की रेंज में मिलने वाले नैप्किंस के पैकेट में 8, 10 या 12 ही संख्या होती है। कुछ औरतों व लड़कियों का खून इतना बहता है कि वे पूरा दिन साफ सफाई और पैड बदलने में बीत जाता है। कई बार एक ही महीने में कई पैकेट ख़रीदने पड़ जाते हैं। तिस पर घर के काम जो कभी अपने में परिवर्तन नहीं लाते मुंह बाए खड़े रहते हैं। घर के काम की कभी छुट्टी नहीं होती मंत्री जी!

रोजाना सफर तय करने वाली लड़कियों के बारे में क्या आपको मालूम है मंत्री जी? कीजिये सिटी बसों में सफर। आपको मालूम चल जाएगा कि बसों में उन दिनों में खड़े होकर सफर करना क्या होता है! बस में धक्के लगने के साथ साथ दर्द को झेलना और बहाव का तेज़ होना, भला एक बेचारा मामूली सा पैड कितना सोख पाएगा। स्कूल, कॉलेज,दफ्तर या कहीं भी काम पर जाने की जल्दी कि कब टॉयलेट मिले कि पैड बदला जाये। सुकून मिले।बसों में इतनी भीड़ होती है कि खड़े होने की जगह भी नहीं मिल पाती। दूर कहाँ जायें, दिल्ली की डीटीसी बसों में ही इतनी भीड़ हो जाती है कि दो सीटों के बीच घुस कर लड़कियां खड़ी होकर अपने को गंदी हरकतों से बचाती हैं और चैन पाती है। सोचिए मंत्री जी उस समय एक पैड कितना सुकून देता है कि खून बाहर नहीं आएगा। दाग नहीं लगेगा। दफ्तर या अन्य जगह पहुँचने तक पैड यह भरोसा देता है कि इत्मीनान रखो, काम चल जाएगा।

आपको नहीं मालूम की 6या 8रुपये के अंतर में ‘पंख वाले पैड’मिल जाते हैं जिसे टीवी पर ‘विंग्स वाले पैड’ बताकर विज्ञापन दिया जाता है। मुझे बताना होगा आपको कि क्या मतलब होता है इन पंख वाले-पैडों का। पंख वाले पैड, पेंटी के दोनों ओर चिपकाए जाते हैं जिससे पेंटी के किनारे पर खून के धब्बे लगने का डर नहीं होता। क्योंकि खून तो निकल कर बहना जानता है इसलिए वह कपड़ों में यहाँ वहाँ छितर जाता है। कसम से बहुत बदबू भी आती है कभी-कभी। लेकिन पंख वाले पैड खुशबू के साथ सुरक्षा देते हैं। दाग लगने के भय से मुक्ति देते हैं। वो पेंटी के साथ चिपके रहते हैं और सोखते हैं हमारी परेशानी को,डर को,असुरक्षा के भय को, शर्म से बचाते हैं।आपको क्या इस बात की खबर है मंत्री जी?

आपको बताऊँ कि पेंटी में कपड़ा नहीं चिपकाया जा सकता। उसके हिलने का या खुल्ली सलवार से गिर जाने का भय बना रहता है। कपड़े को जितना भी धो के इस्तेमाल किया जाये, उसमें एक अ-सुरक्षाऔर अ-स्वस्थता बनी रहती है। लेकिन पैड के साथ ये सब नहीं है। एक अ-साधन सम्पन्न लड़की ने मुझे एक बार अपने साथ घटी घटना साझा की थी। उसने बताया था- ‘दीदी, उस दिन तो मुझे लगा था कि मैं कहीं जाकर मर जाऊँ! नया नया शुरू हुआ था ये। घर में खाने को नहीं था तो पैड-सेड कहाँ से आता! माँ ने कपड़ा दिया था अपनी पुरानी सूती साड़ी में से ‘फाड़कर’…वही लगा लिया था। कहीं जा रही थी उस दिन शाम को। कुछ सामान लाना था। मेरा मन नहीं था। दर्द था। जाना पड़ा। दीदी, मैं क्या बतलाऊँ कि क्या हुआ…दीदी कपड़ा ढीली कच्छी में से गिर गया। … हे भगवान…! मैं घर वापस भाग आई। एक तो दर्द था ही दूसरा यह हुआ कि शर्म से मैं मर गई। सब लोग घूरने लगे थे। माँ ने बहुत पीटा कि शर्म नहीं आती तुझे। इत्ती बड़ी हो गई संभल कर चलना नहीं सीखा। हिरनी बन रही थी।कई दिनों तक मैं घर से नहीं निकली। आज भी सोचकर सहम जाती हूँ।’ मंत्री जी बताइये आपने इसकी कल्पना की है कभी?

स्कूली जीवन के दौरान कक्षा में देखा था कई लड़कियों को दर्द से डेस्क पर ही गिर जाने का दृश्य। कई बार वह रहस्यमयी अंग गंदे कपड़े के इस्तेमाल से संक्रमित हो जाता है जिसका इलाज़ कोई लड़की या स्त्री करवा ही नहीं पाती। जब पैड के रुपये नहीं तो उस नाजुक अंग के इलाज़ के रुपये कहाँ से आएंगे? सर्वेक्षण हो तो पता चल जाएगा कि हर माह कितनी ही लड़कियों और औरतों को संक्रमण हो जाता है। कई तो मर भी जाती हैं। इस संक्रमण से उनकी दशा बहुत ही दयनीय हो जाती हैं। वे दर्द से रोती हैं बिना किसी शिकायत के, कि प्रकृति माँ आपने हमें यह वरदान या अभिशाप क्यों दिया? उन्हें इसके बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं होती।

आंकड़ों पर नज़र डाली जाये तब पता चलता है कि महिलाओं की बहुत बड़ी संख्या ताउम्र संक्रमण से जूझती है। इसके पीछे के कारण गंदे कपड़ों का माहवारी के समय इस्तेमाल करना या फिर कम गुणवत्ता वाले नैप्किंस का इस्तेमाल करना अन्य कारणों के साथ शामिल है। इसके साथ ही सरकार के महिला-हितैषी कार्यक्रर्मों पर सवालिया निशान खुद-ब-खुद लग जाता है। ‘महिला-कल्याण’ में स्लोगन वाली राजनीतिक योजनाएँ क्यों हवा में ही रह जाती हैं, वे जमीनी स्तर तक क्यों कार्यान्वित नहीं हो पातीं, वे योजनाएँ महज़ कागज़ों तक ही क्यों सिमट जाती हैं, ऐसे सवाल सरकार को बार-बार कठघरे में खड़ा करते हैं। माहवारी नैप्किंस पर 12% का कर सरकार की महिला कल्याणकारी छवि को धुंधला ही कर रहा है। इस निर्णय से ऐसा भी आभास होता है कि इस कर का  निर्धारण करने वाली टीम में अवश्य ही महिलाओं की बहुत कम संख्या होगी। इसलिए राजनीतिक हिस्सेदारी में 33% प्रतिशत महिला आरक्षण का हक़ मांगना इस तरह के राजनीतिक-पितृसतात्मक रवैये के खिलाफ़ मोर्चा खोलने के लिए अहम क़दम भी है। आज भी महिला केन्द्रित नीतियों एवं योजनाओं को उभयलिंगी दिमाग अंजाम नहीं देते। केवल और केवल पुरुष सत्तात्मकता की ही बू आती है।

मंत्री जी को कहाँ तो इस अनिवार्य वस्तु को सस्ता करना चाहिए था पर वह तो मुंह में जीएसटी का जाप करते हुए ‘एक कर’ की बात कर के दौड़े जा रहे हैं। आइये आपको दिल्ली से बाहर किसी बस्ती या गाँव का हाल बताया जाये। महोदय, आपको नहीं मालूम कि जब जांघों के दरम्यान कपड़े की मोटी तहें रहती हैं तो वह जांघों के दोनों ओर के हिस्सों को घिस कर छील देता है। जी हाँ, ऐसे छील देता है कि उसमें बेतहाशा जलन होती है और कई दिनों तक चलने में परेशानी और दर्द होता है। बच्चे के जन्म के बाद जच्चा को कई दिनों तक और कभी कभी पूरे एक महीने तक खून का बहाव होता है। सोचिए एक साधारण से परिवार की वह जच्चा कैसे उन दिनों को बावजूद घर को कुछ ही दिन में संभाल लेती है। वह बोलती नहीं तो इसका यह मतलब नहीं कि आपको न बताया जाये कि उसके जांघों के अंदरूनी हिस्से छिल जाते हैं, कपड़े के इस्तेमाल से।पैड के इस्तेमाल से ऐसा कम होता है और बहुत हद तक इससे जूझा जाता है। पर मंत्री जी, कई बार वह जच्चा संक्रमण की चपेट में आकर मर भी जाती है। उसे उचित इलाज़ भी नहीं मिल पाता।ठीक इसी तरह आपने किसान महिला के बारे में भी सुना होगा। ग्रामीण महिलाएं और शहरी हाशिये पर रहने वाली महिलाओं को संक्रमण का खतरा हर पल बना रहता है। सोचिए इनके बारे में!

महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए सरकार न जाने कितनी ही योजना रोज़ ही नए नाम से निकालती रहती है। लेकिन वे सब योजना टेबल पर पड़े कागज़ पर दम तोड़ देती हैं। हाल ही के वर्षों में प्रकाश में आए शोधों और लेखों से यह पता चलता है कि सेनीटरी नैप्किंस से भी कुछ बीमारियों के ख़तरे उभर आए हैं। क्या सरकार को इसकी निगरानी नहीं करनी चाहिए? क्या सरकार को इस दिशा में कुछ कठोर कदम नहीं उठाने चाहिए ताकि महिलाओं के स्वास्थ्य को हानिकारक बीमारियों से बचाया जाये। हैरत तो इस बात की है कि हम एक बार में अन्तरिक्ष में कई सैटेलाइट्स का प्रक्षेपण तो कर सकते हैं पर औरतों के सम्मान की खोज रसोईघर के सिलेन्डर से जोड़ने में पाते हैं। आज भी सम्मान रसोईघर की सीमा नहीं लांघ पाया है। नीतियों और योजनाओं के मामले में औरतों की बारी सूची में बहुत बाद में आती है। उन्हें उतनी प्राथमिकता नहीं दी जाती जितनी कि उसे एक नागरिक के नाते मिलनी चाहिए। फिर भी औरतें हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं। इसकी वजह उनमें मौजूद जिजीविषा है।

महोदय, अगर आप ऐसे अनुभवों से कभी रूबरू हुए हों तो आपको 12 प्रतिशत कर के बारे में हज़ार बार सोचना चाहिए। आपने कर भले ही महावारी नैप्किंस पर लगाया है पर यह आपकी नकारात्मक राजनीति का कदम बनकर रहेगा जो डिजिटल मीडिया में दर्ज़ हो रहा है। बरसों आपकी सरकार को खून पर कर लगाने वाली सरकार के नाम से न सिर्फ जाना जाएगा बल्कि आपको कोट किया जाएगा उदाहरण के साथ। आप अपने अनोखे फैसले से इतिहास में दर्ज़ हो चुके हैं। लेकिन आप यह अभी भी तय कर सकते हैं कि आप अपने को कैसे याद करवाना चाहेंगे? और यह भी कि लहू का लगान आपकी लुटिया न डुबो दे.

कांशीराम से मायावती तक: दलित राजनीति और दलित स्त्री-प्रश्न

प्रियंका सोनकर

 प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर
दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in



दलित राजनीति में महिलाओं की संख्या कम है । दलित राजनीति में कुल मिलाकर तीन-चार ही चेहरे हैं जिनका नाम लिया जा सकता है । सुश्री मायावती जी, उमा भारती, भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, शैलजा । दलित महिलाओं की जो स्थिति है उससे लगता है कि इन दलित महिला नेताओं का कोई सरोकार नहीं है । दलित राजनीति के लिए दलित महिलाओं के मुद्दे हाशिए पर क्यों हैं ? जबकि बाबासाहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने दलित महिला आन्दोलन की शुरूआत कर दलित महिलाओं को विभिन्न आन्दोलनों में नेतृत्व प्रदान किया । उनका मानना था कि महिलाओं की प्रगति से ही किसी भी समाज की प्रगति तय है । दलित बहुजन नेता के रूप में अपनी श्रेष्ठ छवि बनाने वाले माननीय कांशीराम जी भी अपने शासन-काल में एक दलित महिला को नेतृत्व देकर दलित राजनीति में सराहनीय काम किया । किन्तु ऐसा क्यों है कि उनके बाद ऐसा कोई भी दलित पुरुष या महिला नेता दलित राजनीति में दलित स्त्रियों की भागीदारी के विषय में अपनी चिन्ता नहीं जताता । यह सवाल एक महत्वपूर्ण सवाल है । खासतौर से तब जब पूरी दलित राजनीति डॉ.अम्बेडकर  के सिद्धान्तों पर आधारित हो । पिछले कुछ दशकों से दलित राजनीति की दशा अत्यन्त खराब हुई है । यह अपने सिद्धान्तों से दिग्भ्रमित भी हुई है । इसी सन्दर्भ को लेते हुए मैं दलित राजनीति में दलित स्त्री-प्रश्न पर प्रकाश डालना चाहूंगी ।

कांशीराम : दलित राजनीति तथा राजनैतिक पटल पर दलितों के नेता 

बाबासाहेब अम्बेडकर के बाद अगर दलितों के नेता के रूप में कोई दूसरा व्यक्तित्व दिखायी देता है तो वह हैं कांशीराम । कांशीराम दलितों के मसीहा के रूप में जाने जाते थे । वे बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक, अध्यक्ष और दलितों के सामाजिक-राजनीतिक अधिकार के लिए लगातार संघर्ष करने वाले जुझारू नेता थे “आधुनिक भारत के इतिहास में कांशीराम ही वह प्रथम महान व्यक्ति हैं, जिन्होंने दलित शक्ति को संगठित कर शासन और सत्ता के सिंहासन पर बिठाया । इस अद्भुत संगठनकर्ता ने पहले पढ़े-लिखे कार्यरत लोगों को संगठित कर ‘बामसेफ’ और डी.एस.फोर जैसे गैर-राजनीतिक संगठनों का गठन किया और फिर ‘बसपा’ जैसी राजनीतिक पार्टी का गठन कर देश में दलित शक्ति का नया इतिहास रचा । संगठन क्षमता के जादूगर कांशीराम ने ब्राह्मणवादी चेतना के सबसे बड़े क्षेत्र उत्तर-प्रदेश को ही अपना कार्यक्षेत्र चुना और सफलता पायी ।’’

कांशीराम ने अपने मिशन को सफल बनाने के लिए वैचारिक स्तर पर तैयारी आरम्भ की । ज्योतिबा फुले, पेरियार और डॉ.अम्बेडकर के साहित्य का उन्होंने गहरा अध्ययन किया तथा उसके अनुसार ‘भारतीय समाज की जातिवादी संरचना’ (ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था)  तोड़कर बहुजन समाज की मुक्ति’ को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया । यह ‘बहुजन समाज’ और कोई नहीं बल्कि देश की दलित पिछड़ी और अल्पसंख्यक जनता थी जिसका ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था ने सदियों से शोषण किया है । कांशीराम ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए 1964 में नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया ।

नौकरी छोड़ने के बाद  1964 में  कांशीराम ‘रिपब्लिकन पार्टी’   में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे थे । ‘रिपब्लिकन पार्टी’ का हश्र और कांग्रेस के साथ उसकी घालमेल से वे काफी निराश थे तथा ‘दलित पैंथर’  छह घटकों में बंट चुका था । इसके अलावा ‘मॉस मूवमेंट’ नाम से एक और संगठन बन चुका था । शीघ्र ही उससे उनका मोहभंग हो गया । दरअसल, कांशीराम की नजर में आर.पी.आई., दलित पैंथर और अन्य दलित संगठन, दलित अस्मिता और चेतना को ठीक से परिभाषित नहीं कर पाए । साथ ही उन्होंने कांग्रेस के साथ उनकी घालमेल से चिढ़कर इस समय को ‘चमचा युग’ की संज्ञा दी । वे ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक आंदोलन से निकली बहुजन थीसिस तथा डॉ.अम्बेडकर की ‘ऐनीहिलेशन ऑफ कॉस्ट’ को पढ़कर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि डॉ.अम्बेडकर का कहना ठीक है कि एक जाति के आधार पर बनाया गया संगठन नष्ट हो जाएगा । इसलिए वे न केवल मजदूरों के संघर्ष से परिचित थे बल्कि नवबौद्धों की समस्याओं को भी जानते थे । दलितों पिछड़ों और सरकारी कर्मचारियों की पीड़ा का अहसास भी उन्हें था किन्तु इस समझ  के पीछे एक दलित आंदोलन की तैयारी थी ।

अस्सी का दशक दलित राजनीति के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण था । जिस समकालीन दलित विमर्श की चर्चा जोरों पर थी, उसका उदय इसी काल में हुआ । इसी अस्सी के दशक में दलित राजनीति को अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाने का अवसर मिला । 1980 में कांशीराम ‘बामसेफ’ (बैकवर्ड एंड मायनारिटीज शेड्यूल्ड कास्ट इंप्लाई फेडरेशन) के माध्यम से भारतीय समाज में एक नया दलित विमर्श लेकर अवतरित हुए । ‘रिपब्लिकन पार्टी’ के पतन के बाद कांशीराम ने दलित वर्गों को लामबंद करना शुरू किया । इसके तहत उन्होंने सबसे पहले दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों का फेडरेशन (बामसेफ) कायम किया, जिसकी स्थापना तो यद्यपि 1978 में ही उन्होंने कर ली थी पर उसका व्यापक असर 1980 में देश में दिखाई दिया । इस नए दलित विमर्श ने दलित वर्गों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया ।

कांशीराम ने 6 दिसम्बर 1981 को डी.एस.फोर. संगठन बनाया अर्थात ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति’ । इसके अन्तर्गत उन्होंने दलितों के छोटे-मोटे क्षेत्रीय स्तर के अधिकारों के लिए संघर्ष किया । यह आन्दोलन का वह प्लेटफार्म था, जिसने आगे चलकर राजनैतिक संघर्ष का रूप धारण किया । यह एक क्रान्तिकारी संगठन सिद्ध हुआ । इसी का विवादास्पद और प्रतिक्रियावादी नारा था-“तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार ।” देश की दलित राजनीति की दिशा तय करने में इस संगठन ने अपनी महान भूमिका निभाई । इस संगठन के बैनर तले कांशीराम ने लाखों स्वयंसेवकों के साथ देश भर में यात्राएं कीं ।

1982 में कांशीराम ने विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक प्रयोग के लिए डी.एस.फोर. को एक सीमित कार्यवाही के लिए उतारा जिसमें उन्हें अप्रत्याशित जीत भी हासिल हुई । किन्तु इस सीमित राजनितिक कार्यवाही का उद्देश्य चुनाव जीतना नहीं था बल्कि दलित वर्गों के लोग अपने अधिकारों के प्रति कितने जागरूक हैं? यह देखना था । 1984 में कांशीराम ने डी.एस.फोर. की राजनीतिक कार्यवाही से उत्साहित होकर ‘बहुजन समाज पार्टी’ की स्थापना की । इसी वर्ष उन्होंने लोकसभा का भी चुनाव लड़ा । कांशीराम ने 1988 तक अस्पृश्यता, अन्याय, असुरक्षा और असमानता के विरूद्ध एक सघन सामाजिक कार्यक्रम चलाया । 1990 तक उन्होंने पूरे देश में सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति का आन्दोलन चलाया ।

14 अप्रैल 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के बाद की लोकसभाओं और राज्य की अनेक विधानसभाओं में अपने उम्मीदवार खड़े किये और विजयी भी हुए । इसका प्रभाव बढ़ता ही रहा । मायावती जैसी जुझारू युवा महिला सहयोगी के कारण इस दल को और महत्व मिला । इस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल की, जिसमें मायावती उसकी मुख्यमन्त्री बनीं।

सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति के ये दोनों कार्यक्रम भारतीय राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात थे । ये कार्यक्रम क्रांतिकारी थे, क्योंकि इन्होंने दलित विमर्श को ही नहीं, दलित राजनीति को भी नया आयाम दिया था । बसपा के इन कार्यक्रमों ने दलित समाज में जबरदस्त ध्रुवीकरण पैदा किया और वे हजारों वर्षों से असमानता पर टिकी व्यवस्था को बदलने के कार्यक्रम पर बसपा से जुड़ते चले गये ।

‘बहुजन समाज पार्टी, की वैचारिक जड़ें भारतीय समाज की जन्म आधारित वर्ण-व्यवस्था (जाति-प्रथा) के अन्दर है । इसलिए कांशीराम की विचारधारा सदियों से भारतीय समाज में होने वाले जातीय भेदभाव, शोषण-उत्पीड़न और सामाजिक अत्याचार की नकारात्मक प्रतिक्रिया है ।’ स्वयं कांशीराम कहते हैं कि “मैं सामाजिक न्याय से ज्यादा सामाजिक अन्याय को बसपा के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण मानता हूं । जितना ही सामाजिक अन्याय बढ़ेगा, बहुजन समाज में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ़ आक्रोश बढ़ेगा और सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया तेज होगी ।”(दिल्ली में ‘प्रेस से मिलिए’ कार्यक्रम में) कंवल भारती कांशीराम के संबंध में लिखते हैं…“अस्सी का दशक दलित विमर्श के उदय और राजनीति पटल पर दलित नेता कांशीराम का उभरना, याद किया जायेगा । भारतीय राजनीति में सामाजिक परिवर्तन की दस्तक देने का श्रेय उन्हीं को जाता है । यह समय दलितों की राजनीतिक चेतना के लिए भी जाना जायेगा ।”

दलित राजनीति में कांशीराम ने जाति के प्रश्न को जोर-शोर से उठाया, और उसे धारदार बनाया, जबकि पूर्व के नेताओं ने वर्ग की समस्या पर ही अपना सर्वाधिक ध्यान दिया था । यहां तक कि जगजीवन राम भी गरीबी के विरूद्ध आन्दोलन चाहते थे, जाति के विरूद्ध नहीं । किन्तु यह कांशीराम ही थे, जिन्होंने कहा था- “गरीब ब्राह्मण भी चमार के हाथ का छुआ पानी नहीं पीते । दोनों ही गरीब हैं, लेकिन उनके बीच जाति की खाई है, जो गरीब-गरीब को एक नहीं होने देती । इसलिए मैं कभी वर्ग-संघर्ष का पक्षधर नहीं रहा । मैं तो जाति-संघर्ष चाहता हूं  । कांशीराम के इन विचारों में डॉ.अम्बेडकर ही बोलते थे ।”

कांशीराम के लिए वर्ग-संघर्ष नहीं जाति-संघर्ष ज्यादा विचारणीय था । उनके अनुसार भारत का सम्पूर्ण इतिहास ही जातीय संघर्ष का इतिहास है । भारत जाति प्रधान समाज है और इस मायने में विश्व का एकमात्र विरल व विचित्र समाज है । लेकिन सिर से पैर तक एक जाति समाज होने के बावजूद इसकी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक तथा सांस्कृतिक इत्यादि समस्याओं के पीछे जाति ही प्रधान कारक है, यह तथ्य कांशीराम से पहले और डॉ. अम्बेडकर के बाद किसी राष्ट्र नायक ने प्रमुखता से नहीं उभारा । हर समस्या के पीछे जाति की भूमिका उजागर होने के साथ ही जहां कांशीराम के सौजन्य से भारत में यह बौद्धिक विमर्श का प्रधान मुद्दा बनी, वहीं जाति ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समाज विज्ञानियों को अभूतपूर्व रूप से आकर्षित किया । दलित राजनीति में कांशीराम का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा ।
   

       
मायावती : दलित राजनीति के बीच से उभरी एक सशक्त राजनीतिक दलित महिला 


‘आज के समय में दलित मुक्ति का राजनीतिक रास्ता दलित समुदाय की सर्वाधिक ठोस और दृश्यमान अभिव्यक्ति है । दलित समुदाय के एक व्यक्ति का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचना और दलित समुदाय की एक महिला का हिन्दी प्रदेश के एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होना पिछले दशक के बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सूचक है । देश की आजादी के बाद दलित चेतना का ऐसा प्रदर्शन इससे पहले नहीं हुआ था । दलित राजनीति, जिसका प्रारंभिक रूप हमें डॉ.अम्बेडकर के नेतृत्व में चले आंदोलनों में दिखाई देता है आज एक नए दौर में पहुंच चुकी है ।”

राजनीति में दलितों को स्थापित करने के लिए कांशीराम ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया । उन्होंने बसपा के नेतृत्व में मायावती और अन्य प्रतिनिधियों को उतारा । पहली बार राजनैतिक पटल पर एक दलित स्त्री का आना, सम्पूर्ण दलित समाज के लिए यह महत्वपूर्ण घटना थी । बद्रीनारायण लिखते हैं कि “1980 के दशक के अन्त में उत्तर-प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत देते हुए कांशीराम ने एक दलित स्त्री, मायावती को एक जननेत्री के रूप में प्रस्तुत किया और लोगों से उनका समर्थन करने का अनुरोध किया । यह दिखाने के लिए कि उन्हें मायावती की योग्यताओं पर कितना विश्वास था, उन्होंने अपने कार्यालय में मायावती के तीन बड़े-बड़े चित्र भी टंगवा दिए ।”

 कांशीराम ने मायावती के हरसंभव विकास के लिए अपना सहयोग दिया । कांशीराम का राजनीतिक आंदोलन तीन सिद्धांतों पर आधारित था पहला जातीय सम्मान, दूसरा भागीदारी और तीसरा वोट को लुटने और बिकने से बचाना । उन्होंने जाति के उभार को अपनी राजनीति के केन्द्र में रखा ।समकालीन परिदृश्य में मायावती एकमात्र ऐसी सशक्त दलित महिला हैं, जिन्होंने सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का नया सूत्र गढ़ा । वह ऐसी पहली दलित मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने सत्ता में आने के बाद दलितों का ब्राह्मणों के साथ गठबंधन के लिए सोचा । किन्तु ऐसा करने से सपा और बसपा में दरारें उत्पन्न होने लगीं । इसे भाजपा की चाल कहें या उसकी महानता की, उसने सपा और बसपा में दरार का बीज बोकर बसपा के साथ हाथ मिलाने की सोची । सरकार बनने के बाद से ही सपा-बसपा गठबंधन को तोड़ने की कोशिश शुरू हो गई थीं । भाजपा ने मायावती को मुख्यमंत्री बनाने का लोभ दे कर सत्ता का सूत्र अपने हाथों में रखने में सफलता हासिल कर ली । 1993 से मई 1995 तक सपा-बसपा में भाजपा द्वारा अनर्गल टिप्पणियों की वजह से राजनीतिक तनाव पैदा किया गया । परिणामस्वरूप गठबंधन टूट गया और जून 1995 में मायावती भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गईं । दूसरी बार 1997 में रामविलास पासवान को हराकर और 2002 में मायावती भाजपा के सहयोग और समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं । इन चुनावों के माध्यम से बहुजन समाज, एस.सी., एस.टी.ओबीसी, गरीब, मजदूर, अल्पसंख्यक और अन्य सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के अधिकारों और उनको राजसत्ता प्राप्त कराने का प्रयास किया । आरंभ में उन्होंने आर्थिक मुद्दे को भी उठाया तथा दलितों पर होने वाले अत्याचारों और आरक्षण के मुद्दों पर भी संघर्ष किया किन्तु जल्दी ही ये सब राजनीतिक सत्ता के आगे गौड़ हो गये । इस सन्दर्भ में प्रफुल्ल कोल्ख्यान लिखते हैं कि- ‘‘संसदीय लोकतन्त्र के रास्ते (जिस पर डॉ.अम्बेडकर बार-बार जोर देते थे) जाति-उन्मूलन तथा समता की स्थापना का यही एकमात्र रास्ता उन्हें लगता था । लेकिन उनके अनुयायियों ने उनके बताए रास्ते को छोड़कर व्यक्तिगत स्वार्थों को साधने का रास्ता अपनाया । रिपब्लिकन पार्टी के आधा दर्जन धड़े इसलिए हुए कि हर नेता अपनी शक्ति और अपना वैभव बढ़ाने की कोशिश में लगा रहा ।  इस उद्देश्य के लिए वे कभी कांग्रेस की गोद में खेलते रहे, कभी भाजपा और कभी शिव सेना जैसी रूढ़िवादी और सांप्रदायिक पार्टियों का खिलौना बने  रहे । उत्तर भारत की दलित राजनीति में भी यही हुआ ।’’


बसपा दलितों के उत्थान के लिए जिन सिद्धान्तों को लेकर चल रही थी, सत्ता प्राप्ति के उद्देश्य के चलते वह उन सिद्धान्तों से बाद में मुंह मोड़ती भी दिखाई दी । सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक न्याय की बात करने वाले कांशीराम जी भी तथा उनके बाद आये दलित नेताओं ने सामाजिक न्याय और परिवर्तन का लक्ष्य भूलकर केवल सत्ता की प्राप्ति के लिए जुट गये । इस संबंध में प्रफुल्ल कोल्ख्यान का मत देखने योग्य है- ‘‘बसपा के संस्थापक कांशीराम जो कभी खड़ी व्यवस्था को पड़ी व्यवस्था बनाने की बात करते थे और तिलक तराजू और तलवार के खिलाफ़ मोर्चा लेने का संकल्प व्यक्त करते थे, सिद्धान्तहीन और बेमेल समझौतों के रास्ते सिर्फ सत्ता हथियाने की राजनीति का समर्थन करने लगे । उनके अनुयायी उन्हें अम्बेडकर से भी बड़ा दलित नेता सिद्ध करने के लिए यह तर्क देने लगे किए अम्बेडकर जो काम नहीं कर सके (अर्थात दलित सरकार नहीं  बना सके) यह उन्होंने कर दिखाया । मायावती ने सोचा कि यदि वे राजसी ठाटबाट में वसुंधरा राजे जैसी महारानियों को मात दे देंगी तो दलित समाज अपने आप उठ जाएगा । इसलिए उन्होंने पार्टी के पद और टिकट बेचकर अपने लिए धन संपत्ति जुटाने तथा भाजपा एवं कांग्रेस जैसी रूढ़िवादी पार्टियों से समझौता कर सत्ता में आने का जुगाड़ ही किया । इन पार्टियों द्वारा बार-बार दुत्कारे जाने पर भी उन्होंने अपना रास्ता नहीं बदला ।”

इस प्रकार बीएसपी का प्राथमिक उद्देश्य सत्ता प्राप्ति रह गया । इसके लिए उसने कई बार अपनी विचारधारा के विरूद्ध जाकर ऐसी पार्टियों से समझौता किया जिन्होंने हमेशा दलितों के अधिकारों की अनदेखी की । दलित राजनीति की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि दलित आन्दोलन जिस अम्बेडकरवादी विचारधारा को लेकर चला क्या दलित राजनीति डॉ.अम्बेडकर के उसी विचारों और सिद्धान्तों के पथ पर चला या उसकी दिशा में भटकाव दिखायी देता है ? इसके अतिरिक्त मायावती के बाद दलित राजनीति में कोई अन्य सशक्त दलित महिला क्यों नहीं दिखायी देती है ? क्या मायावती के तानाशाही रवैये से दलित स्त्रियां राजनीति में आने से हिचकती हैं ? दलित राजनीति में दलित महिलाओं की कितनी भागीदारी है ? प्रश्न यहां यह भी है कि जिस दलित स्त्री विमर्श की शुरूआत और लेखन की चर्चा अभी तक होती रही है उनके लेखन में मायावती का उल्लेख तक नहीं दिखायी देता है ? इसके पीछे क्या कारण है ? दलित राजनीति में मायावती ही एकमात्र सशक्त दलित नेता के रूप में दिखायी देती हैं फिर दलित स्त्रियां उन्हें अपना आइकन क्यों नहीं मानतीं ? सवाल यह भी है कि मायावती जिनका हाथ पकड़ कर राजनीति में आयी क्या उन्हीं के कदमों पर चलीं ? दलित नायकों की मूर्तियों का निर्माण कराकर उनके सिद्धान्तों को प्रतिफलित करने और उन्हीं के आदर्शों पर वे चली या नहीं ? दलित समाज के लिए मायावती ने क्या किया ? दलित समाज की महिलाओं की वह प्रेरणा क्यों नहीं बन पायीं । अपने राज्य (उत्तर-प्रदेश) में दलित महिलाओं की समस्या का वे कितना समाधान कर पायीं ? बदायूं में दलित महिला के बलात्कार पर उनकी चुप्पी क्यों रही ? मैला प्रथा जैसी सामाजिक बुराई आज भी उत्तर-प्रदेश राज्य में उसी तरीके से मौजूद है इसके उन्मूलन के लिए उन्होंने क्या किया ?  आदि प्रश्नों को सामने रखकर सही मूल्यांकन का प्रयास किया जाएगा ।
मायावती ने दलितों और दलित महिलाओं के लिए क्या किया?


आज किसी भी राजनीतिक दल के लिए दलितों की खुले रूप में उपेक्षा करना संभव नहीं है । दलित राजनीति के लिए यह एक नया युग ही था जब उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने सत्ता हासिल की थी । ‘एक दलित महिला के मुख्यमंत्री बनने से यह आशा की जा रही थी कि अब जातिवाद के विरूद्ध एक नए आंदोलन का सूत्रपात होगा, परन्तु डॉ.अम्बेडकर के नाम पर भव्य उद्यान और स्वमूर्तियां स्थापित करने के अतिरिक्त दलित समुदाय की प्रगति और उत्थान की दिशा में कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो सका । ऐसे भी आरोप लगाये गये कि मायावती केवल चमार जातियों के उत्थान के बारे में सोचती हैं । आश्चर्य की बात यह थी कि बाद में मायावती ने धुर दक्षिणपंथी भाजपा का समर्थन लेना स्वीकार किया, जबकि उत्तर प्रदेश ही नहीं, संपूर्ण देश भर में जातिवादी वर्ण व्यवस्था के जरिए दलितों के और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जरिए अल्पसंख्यकों के अलगाव की व्यवस्था भी यही पार्टी कर रही थी ।’इस प्रकार बीएसपी और कांशीराम-मायावती का नेतृत्व अम्बेडकरवादी विचारधारा ‘समता, स्वतन्त्रता और बंधुता’ से भटककर सत्ता प्राप्ति का पर्याय बनकर रह गया ।

अपने स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद विशेषांक के एक साक्षात्कार में तुलसीराम जी ‘मायावती और दलित स्त्री राजनीति’ में दलित लेखिकाओं की नगण्य भूमिका को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ‘ब्राह्मणवाद को मायावती ने स्थापित किया । उसने ‘हाथी नहीं, गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ का नारा दिया । वह दलित राजनीति की भटकी हुई दिशा पर अपनी चिन्ता व्यक्त करते हैं । इस तरह की राजनीति से दलितों की मुक्ति संभव नहीं है । उनका मानना है कि यह दलित आंदोलन नहीं है बल्कि दलित सत्ता का आंदोलन है, जो दलित आंदोलन से भिन्न है । सामाजिक आंदोलन का हमेशा राजनीतिक आंदोलन पर वर्चस्व होना चाहिए ।

आज के दलित आन्दोलन की उल्टी धारा पर निराशा व्यक्त करते हुए तुलसीराम जी कहते हैं कि “आज लोग पहले सत्ता की चिन्ता करते हैं फिर सामाजिक बदलाव की बात करते हैं । बिना सामाजिक जागरूकता ना सत्ता मिलती है और ना ही सामाजिक बदलाव आता है । सामाजिक जागरूकता का ही परिणाम था कि दलितों को सत्ता मिली और सत्ता मिलते ही सामाजिक जागरूकता का अभियान बन्द कर दिया । मायावती का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि ‘दलित स्त्री सत्ता में चार बार मुख्यमंत्री बनी परन्तु एक भी दलित महिला को किसी भी मंच पर नहीं आने दिया । नेता के रूप में भी किसी को मंच पर नहीं आने दिया । दलित राजनीति में अगर स्त्री सत्ता में है तो वह सबसे अधिक नुकसान दलित स्त्री का करती है ।’

दलित स्त्री आंदोलन कोई विशिष्ट राजनीतिक पहल नहीं कर रहा है, उसे सिर्फ लेखन तक ही सीमित मान कर देखा जाता रहा है कुछ लोगों का ऐसा मानना है । जिस तरह से विभिन्न साहित्यिक और सामाजिक आन्दोलन किसी न किसी राजनीतिक विचारधारा या राजनीति से जुड़े हुए हैं वैसा दलित स्त्री आन्दोलन क्यों नहीं है? दलित स्त्री आन्दोलन राजनीति जैसे विषय पर चुप्पी क्यों साधे हुए है ? प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय का मानना है कि “भारत जैसे देश में राजनीति में महिलाओं ने अपने कदम रखें हैं । किन्तु वे किसी न किसी पार्टी से जुड़े रहकर ही अपना स्थान बना पाई हैं खासतौर से जो पुरुषों द्वारा बनायी गयी पार्टियां हैं । उनके अनुसार स्त्रियों से राजनीतिक पहल की उम्मीद करना इसलिए ज्यादती होगी क्योंकि जो स्त्रियां राजनीति और सत्ता में हैं उन्हें स्त्रियों की कितनी चिन्ता है ? मायावती हो या ममता बनर्जी, स्त्रियों की यातना की चिन्ता तो है नहीं, फिर राजनीतिक पहलकदमी की चिन्ता क्यों होगी ।”   तुलसीराम और मैनेजर पाण्डेय के विचारों से यह स्पष्ट है कि मायावती हो या और कोई महिला राजनीतिज्ञ किसी ने भी दलित महिलाओं के उत्थान के लिए न तो कोई विशेष योजना बनाई और नहीं कोई ठोस कदम उठाया ।

मायावती  ने अपने शासन काल में दलित महिलाओं के मुद्दों पर कितना ध्यान दिया यह दलित स्त्री लेखन और दलित स्त्री विमर्श के लिए गहन-चिंतन का विषय है । दलित महिलाएं गांवों में अभी भी खेतों में शौच के लिए जाती हैं । मैला प्रथा तबसे लेकर अब तक जारी है । दलित महिलाओं को अभी भी डायन और चुड़ैल करार देकर बस्तियों में नंगा घुमाया जाता है । वे गांव और शहर में बलात्कार की शिकार हैं । स्वच्छ पानी की समस्या, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, समान वेतन, रोजगार आदि समस्याओं से दलित स्त्री निरन्तर जूझती है, इन महिलाओं के लिए मायावती ने एक दलित राजनीतिक नेता होने के नाते अपने शासन काल में कितनी योजनाएं लागू कीं ? समानता, स्वतन्त्रता और बंधुता के राह पर क्या उनमें राजनीतिक चेतना दिखायी देती है?
दलित राजनीति में मायावती  का ऐसा ही चेहरा दिखायी देता है जो ब्राह्मणवाद के गठबंधन से सरकार चला रही थीं जबकि डॉ.अम्बेडकर ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को दलितों का शत्रु मानते थे । अम्बेडकरवादी विचारधारा से ओत-प्रोत दलित स्त्री विमर्श मायावती को किसी भी राजनैतिक नेता के रूप में अपना प्रेरणा स्रोत नहीं मानता है । दलित स्त्री लेखन में शायद ही कहीं  मायावती की चर्चा सकारात्मक रूप में की जाती हो ।

2011 में रजनी तिलक और रजनी अनुरागी के संपादन में आयी पुस्तक ‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’ में एक अध्याय ‘मेरे जीवन का संक्षिप्त सफरनामा : कु.मायावती’ के नाम से सम्मिलित है, जिसमें उनके निजी जीवन के अनुभव तथा राजनीतिक जीवन में उनका प्रवेश पर, चर्चा की गयी है । जबकि इसके अलावा अनिता भारती की पुस्तक ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ में कहीं भी राजनीतिक महिला के रूप में मायावती पर एक पृष्ठ भी नहीं है । सम्यक प्रकाशन से मंजू सुमन के संपादन में ‘दलित महिलाएं और दलित नारी: एक विमर्श’ पर दो पुस्तकें आईं, इनमें से एक पुस्तक में एच.एल.दुसाध का केवल एक लेख मायावती पर है वो भी एक पुरुष लेखक का है कारण यह है कि लेखक बहुजन पार्टी से प्रभावित हैं । यह साफ है कि दलित महिलाएं मायावती को अपना आदर्श नहीं मानती । इसीलिए मायावती दलित स्त्री विमर्श और लेखन में उतनी जगह नहीं घेर पाती जितनी उन्हें अपनी जगह बनानी चाहिए थी ।

प्रश्न यह है कि वर्षों से दलित महिलाओं के साथ अवमानना की घटना घटती रही । मायावती सरीखी अन्य दलित महिला नेता दलित महिलाओं की बजबजाती जिन्दगी से उन्हें मुक्ति दिलाने में क्यों सफल नहीं हुईं ? दलित पुरुष नेताओं द्वारा दलित महिलाओं के नारकीय जीवन का संज्ञान न लेना एक हद तक उनकी पितृसत्तात्मक सोच की तरफ इशारा करती है किन्तु जब दलित महिला नेता ही दलित स्त्रियों की दशा की खबर न लें तो उनकी इस प्रकार की उपेक्षा का दोष हम किसी और पर नहीं डाल सकते हैं ।

आजादी के 68 वर्ष बाद भी देश के विभिन्न राज्यों में मैला प्रथा अभी भी जीवित है और इस घृणित कार्य को मजबूरन दलित महिलायें ही अपने सिर पर उठाये घूम रही हैं, जिनके बेहतर रोजगार तथा आर्थिक स्थिति की जिम्मेदारी सरकार नहीं उठा रही है । दलित स्त्री विमर्श को सामाजिक-आर्थिक पहलुओं के अतिरिक्त राजनीतिक पहलू पर विचार करने की अधिक आवश्यकता है, तभी उसकी राजनीतिक चेतना विकसित हो पायेगी । मीरा कुमार लोकसभा अध्यक्ष पद को सुशोभित करने वाली देश की पहली दलित महिला नेता के रूप में जानी जाती हैं । दलित महिला राजनेता मीरा कुमार ने अपने कार्यकाल में दलित स्त्री मुद्दों पर न तो अपनी चिन्ता जतायी और न ही देश भर में गैर-कानूनी ही रूप से चल रहे मैला प्रथा और इसमें मजबूरन लगी दलित महिलाओं का संज्ञान लिया । हरियाणा के अम्बाला शहर से सांसद दलित चेहरा शैलजा कुमारी ने भी इस मुद्दे पर कुछ न करने की मजबूरी जता दी । उमा भारती जो सत्ता में बी.जे.पी. की तरफ से केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हैं । जिनके ऊपर गंगा जैसी पवित्र नदी की स्वच्छता का भार 2014 में सौंपा गया । किन्तु दलित महिलाओं के मैला प्रथा, उनके मुद्दे, पानी की समस्या के विषय में उन्होंने कोई योजना नहीं बनाई है । मैला-प्रथा को हटाना इनका प्रथम मुद्दा न होकर गंगा नदी की सफाई इनके लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है । यह साफ है कि दलित महिला नेताओं ने अपनी कुर्सी के लालच में दलित महिलाओं का वोट तो लिया है किन्तु उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दशा तथा उनके सामाजिक विकास में कोई योगदान नहीं दिया ।

निष्कर्ष रूप में हम देख सकते हैं कि दलित राजनीति में जो भी दलित महिला नेता हैं उनमें दलित स्त्री के प्रश्नों को लेकर कोई खास चिन्ता नहीं दिखायी देती है । सब अपनी ढपली-अपना राग अलापते नज़र आ रहे हैं । दलित राजनीति आज डॉ.अम्बेडकर के सिद्धान्तों को छोड़कर अपने हितों की पूर्ति के लिए दांवपेंच खेल रहा है । निजस्वार्थ ही दलित राजनीति का मकसद बनता जा रहा है । उत्पीड़ित, शोषित, दमित, दलित स्त्रियों की समस्याएं हाशिए पर रख दिये गये हैं । आज भी दलित स्त्रियों को कहीं-कहीं चुनाव में खड़ा होने पर उनके साथ बलात्कार किया जाता है, कहीं सरपंच बनने पर उनको नंगा कर पूरे गांव-मोहल्ले में घुमाया जाता है । तिरंगा झंडा फहराने पर उनको अश्लील गालियां दी जाती हैं, पंचायती चुनाओं में यौन-शोषण का शिकार हो रही हैं इत्यादि समस्याओं से निरन्तर दलित महिलाएं जूझ रही हैं । इसलिए जब-तक दुनिया की आधी आबादी में सबसे उत्पीड़ित और निम्न मानी जाने वाली दलित स्त्री को मुक्ति नहीं मिलती तब तक विकास के सभी दावे झूठे सिद्ध होंगे । आप उन्हें प्रलोभन देकर और झूठे वायदे करके दलित राजनीति का स्तम्भ नहीं खड़ा कर सकते ।

संदर्भ सूची
1. दलित विमर्श की भूमिका, पेज नं.87-91
2.डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने क्लास और कॉस्ट मॉडल का समन्वय कर एक नई राजनैतिक पार्टी ‘भारतीय  रिपब्लिकन पार्टी’ की स्थापना का विचार किया था । यह दुःखद था कि उनका सपना पूरा नहीं हो पाया और    उनकी मृत्यु हो गई । अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने भारतीय जनता के नाम एक खुला पत्र लिखा जिसमें उन्होंने  रिपब्लिकन पार्टी की संकल्पना, समानता, बंधुत्व और स्वतन्त्रता के मूल्यों को बुलंद करने वाले संगठन के रूप  में की । अपनी मृत्यु से पहले डॉ.अम्बेडकर ने एक बड़ी पार्टी को स्थापित करने की इच्छा जाहिर की जिसे  ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है । ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ का पहला सत्र  अक्टूबर 1957 नागपुर में हुआ था; दूसरा औरंगाबाद में 1959 में; तीसरा अलीगढ़ में 1961 में, चौथा  अहमदाबाद में 1963  में, पांचवां दिल्ली में 1966 में, छठा नागपुर में 1969 में, तथा सातवां पुणे में 1975 में  हुआ था । ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ भारतीय संविधान के न्याय, स्वतन्त्रता, समानता तथा भाईचारा  जैसे सिद्धांतों को मानती थी । वह इस अभिप्राय को भी स्वीकार करती थी कि संविधान का उद्देश्य इन प्रयोजनों  को संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से स्थापित करना है ।
3. भारत की यथास्थित व्यवस्था के विरोध स्वरूप जिस आन्दोलन का उदय हुआ वह ‘दलित पैंथर आन्दोलन’ था । यह सामन्तवादी हिन्दू राजशाही का कट्टर विरोधी था जो यथास्थिति के स्थान पर क्रान्ति या समग्र क्रान्ति द्वारा सामाजिक न्याय स्थापित करना चाहता था जिसमें अम्बेडकर और मार्क्स विचारधारा की झलक थी । जिस समय 1971 में आर.पी.आई. में टूट-फूट चल रही थी उस समय युवाओं का एक नया संगठन ‘दलित पैंथर’ तेजी से राजनैतिक पटल पर उभर रहा था । राजा ढाले और नामदेव ढसाल इसके नेता थे । यह आन्दोलन अमेरिका के ‘ब्लैक पैंथर’ आन्दोलन से प्रभावित था । इस संगठन का अमेरिका के ‘ब्लैक पैंथर’ आन्दोलन से केवल नाम ही नहीं लिया गया बल्कि जिस प्रकार से ब्लैक पैन्थर ने ऑफिस के पद धारण किए थे वैसे ही इस संगठन ने भी धारण किये । ये लोग अपने को पैंथर कहते थे । क्योंकि उनका मानना था कि अपने अधिकारों के लिए पैंथर की भांति लड़ा जाए तथा अब वे अत्याचारियों की शक्ति तथा ताकत से नहीं दबेंगे । राजा ढाले के लेख ‘काला स्वतन्त्रता दिन’ जो 15 अगस्त 1972 को साधना के विशेष अंक में प्रकाशित हुआ था, ने अत्यधिक जागरूकता पैदा की तथा पूरे महाराष्ट्र में दलित पैन्थर को सार्वजनिक कर दिया ।  दलित पैंथर आन्दोलन ने दलित साहित्य आंदोलन की भी नींव रखी । बाबू राव बागुल, पी.ई.सोनकांबले आदि ने कविता, कथा साहित्य,     आत्मकथा के माध्यम से दलित राजनीति को एक दिशा दी और इन पैंथरों ने जातिवाद व ब्राह्मणवाद के          खिलाफ़ जुझारू संघर्ष का ऐलान किया ।
4. दलित विमर्श की भूमिका, पेज नं.87-91
5. कांशीराम के दो चेहरे, पेज नं.8
6. सं. राजकिशोर-आज के प्रश्न (18) दलित राजनीति की समस्याएं, लेख –दलित मुक्ति के रास्ते- राकेश              कुमार, वाणी प्रकाशन 2012, पेज नं.145
7.  दलित वीरांगनाएं एवं मुक्ति की चाह, पेज नं.178
8. दलित राजनीति की समस्याएं, उद्धृत, लेख –प्रफुल्ल कोलख्यान-दलित राजनीति की समस्याएं, पेज नं.34
9  वही, पेज नं.34
10. वही, पेज नं.146
11. सं.संजीव चंदन, स्त्रीकाल, दलित स्त्रीवाद पर केन्द्रित, अंक-9, सितम्बर, 2013 पेज नं.65
12. वही, पेज नं.79
13. ‘दलितों के लिए आयरन लेडी (लौह महिला तथा मसीहा) माने जाने वाली, बहुजन से सर्वजन तक का सफर     करने वाली उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का मैला प्रथा के मुद्दे के विषय में कुछ न कहना कम से कम    यह तो बता देता ही है कि उनके दलित एजेण्डे में मैला उन्मूलन कभी शामिल नहीं रहा । जबकि उत्तर प्रदेश      एक ऐसा तबका है जहां बहुत से इलाकों में यह प्रथा अभी जीवित है ।’ (भाषा सिंह: अदृश्य भारत)
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और आप हमें पुरस्कार समारोह में दिल्ली आमंत्रित कर रहे हैं: हिन्दी अकादमी से कहा शिमला सामूहिक बलात्कार मामले से आक्रोशित लेखक ने

स्त्रीकाल डेस्क 


हिमाचल की राजधानी शिमला में जनता सडक पर है. शिमला जिले के एक गाँव में एक लडकी के बीभत्स बलात्कार के आरोपियों को पुलिस ने जब बचाना शुरू किया तो लोगों में आक्रोश फ़ैल गया.  4 जुलाई को हुए इस सामूहिक बलात्कार के मामले में पहले तो लोगों को लगा कि पुलिस जांच करेगी. लेकिन जब उन्होंने देखा कि पुलिस आरोपियों को बचाने में लगी है तो लोग सडक पर आ गये. पुलिस ने इस मामले में मुख्य आरोपी,  जो सेब व्यापारी का बेटा और प्रभावशाली परिवार से बताया जाता है,  के साथ कुछ नेपालियों को भी पकड़ा. मुख्य आरोपी को बचाने के लिए उन नेपालियों में से एक की ह्त्या लॉक अप में हो गई. ह्त्या के आरोप में दूसरे नेपाली पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया. पुलिस का यह एक अनूठा कदम था कि हाजत में मौत के बावजूद पुलिस वालों पर मुकदमा नहीं हुआ. लगभग दो रूम के एक छोटे से थाने में पुलिस वालों के अलावा किसी आरोपी को कौन मार सकता है भला. यह सब मुख्य आरोपी को बचाने के लिए किया जा रहा है. इसके खिलाफ लोगों ने जगह-जगह हिंसक प्रदर्शन किया है, थाने को जलाने की भी खबर है.

आगत चुनाव और बढ़ते आक्रोश को देखकर अब बीजेपी भी मैदान में उतर चुकी है. परसो लोकसभा में अनुराग ठाकुर ने मुद्दा उठाया.

इस घटना से उद्वेलित और अपने लेखक बिरादरी की  चुप्पी पर व्यथित शिमला निवासी प्रसिद्द कहानीकार  राजकुमार राकेश ने अपने फेसबुक पेज पर दो आक्रोश भरे पोस्ट लिखे. गौरतलब है कि कल 20 जुलाई  हिन्दी अकादमी दिल्ली ने कुछ साहित्यकारों को सम्मानित किया था. इस अवसर पर राजकुमार राकेश को भी दिल्ली आमंत्रित किया गया था. राजकुमार राकेश ने  21 जुलाई को अपने पोस्ट में लिखा:

हिन्दी के लेखक मित्रो! मेरा मन उद्वेलित है। इसलिए खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। वर्ना मैं कभी किसी को चुनौती नहीं देता। पर आज का दिन मेरे अवसाद का सबसे भयानक दिन है। इसलिए खुद को रोक पाना संभव नहीं रहा है।
#पिछले कल पूरा हिमाचल आंदोलित था। जनता सड़कों पर थी। बाज़ार और ट्रैफिक पूरी तरह बंद। मैं शिमला में हूँ। कल जो यहाँ हुआ, वैसे दृश्य मैंने इस शहर में पहली बार देखे। पिछले बीस दिन से जनता आंदोलित थी, तो भाजपा ने उसका फायदा उठाकर 20 अप्रैल को हिमाचल-बंध का ऐलान कर दिया था। लेकिन जनता के आक्रोश के आगे किसी राजनैतिक दल की कोई हैसियत नहीं होती। कल के आंदोलन में माकपा, कालेजों के विद्यार्थी और अनेक समाजसेवी व महिला संगठन पूरी सक्रियता के साथ शामिल थे। शासक पार्टी के नेता कहाँ दुबके पड़े हैं। पता नहीं।

#कल पता चला, शिमला सिर्फ एक सैरगाह नहीं है। यहाँ भी जीते जागते लोग बसते हैं। वैसे यह शहर हर किसी आने वाले का स्वागत करता है। अपने लेखकों का तो अभूतपूर्व स्वागत करता है। फिर चाहे कुछ बड़े लेखकगण अपनी आपसी बातचीत में अपना स्वागत करने वालों को ‘यजमान’ ही क्यों न कहते हों। हालांकि उसका भी यहाँ कोई बुरा नहीं मानता।
#लेकिन पिछले कल जब शिमला जल रहा था तब सुना है, दिल्ली की हिन्दी अकादमी कुछ लेखकों को पुरस्कार देने का भव्य समारोह आयोजित कर रही थी। अब आयोजन था, तो जरूर कुछ लेखक बंधु पुरस्कार ले भी रहे होंगे। मुझे नहीं मालूम वे कौन-कौन थे, लेकिन आज मैं उन्हें बधाई नहीं दे सकता।
#आज सुबह याद आया 2015 में जब पुरस्कार वापसी अभियान चल रहा था, तब मुझ जैसे नाचीज ने भी उसमें अपना योगदान देने के लिए अपना एक राज्यस्तरीय पुरस्कार वापस कर दिया था। मेरे पास वही था और मैं वही वापस कर सकता था। इससे बड़ा होता तो उसे भी जरूर कर देता। वह हाथियों के साथ एक चींटी भर का योगदान रहा हो, इसे मान लेने में भी मुझे कोई गुरेज नहीं है।
#किन्तु क्या दिल्ली में सम्मान देने वाली कोई सरकारी संस्था और उन सम्मानों को लेने वाले लेखकगण महज़ एक रोज़ के लिए उस समारोह को टाल नहीं सकते थे? क्या दिल्ली से बाहर एक लड़की का बलात्कार और हत्या हुई, एक आरोपी को पुलिस की कस्टडी में मार दिया गया, उससे आपके कोई सरोकार नहीं जुड़े हैं?
#मैं जानता हूँ, हमेशा की तरह आप इस पोस्ट को पढ़ चुकने के बाद भी आगे निकल जाएंगे, यही दिखाने को, मानो आपने इसे पढ़ा ही न हो! इस बात की मुझे कोई फिक्र नहीं है। बल्कि मुझे यही आशा है, कि यही होगा। यही होना चाहिए।
#दिल्ली में पुरस्कार देने और लेने वालों को यही करना चाहिए भी।

20 जुलाई  का पोस्ट 

एक पखवाड़ा पहले शिमला ज़िला के कोटखाई के एक गाँव में 14 साल की लड़की का जो भयावह रेप और हत्या हुई है, वह कांड दिल्ली के निर्भया कांड से भी ज्यादा डरावना, जघन्य, क्रूर और अमानवीय है।
क्या दिल्ली तक ये खबर पहुंची है? जंतर मंतर पर किसी ने प्रदर्शन किया हो कृपया बताएं? पुरस्कार बाद में लिए दिये जा सकते हैं।

गत रात इस कांड के एक आरोपी की कोटखाई पुलिस थाने में हत्या हो गई है।
जनता भड़की हुई है।
आज पूरा शिमला बंद है। दूध, ब्रैड कुछ नहीं। दूरस्थ कालोनियों तक की छोटी छोटी दुकानें तक बंद हैं। कहीं कोई रेहड़ी वाला भी नजर नहीं आ रहा।
जनता सड़कों पर है।
और आज सुबह ही मित्र सुरेश शांडिल्य Suresh Shandilya ने सूचित किया है, रामपुर में एक बस दुर्घटना में 30 लोग मारे गए हैं।
इतनी आग!
और आप हमें पुरस्कार समारोह में दिल्ली आमंत्रित कर रहे हैं?

बीभत्स था यह काण्ड 

4 जुलाई को  10वीं में पढ़ने वाली छात्रा गुड़िया को देखकर आरोपियों ने गाड़ी रोकी और  उसे घर तक लिफ्ट देने की बात कही. गुड़िया इलाके में नई आई थी और बीते मई ही उसने स्कूल में दाखिला लिया था. गुड़िया एक आरोपी  को जानती थी, लिहाजा वह उसके साथ गाड़ी में बैठ गई.  वह आरोपी अक्सर स्कूली बच्चों को ले जाता था, जिससे गुड़िया को भी उस पर शक नहीं हुआ.

पुलिस के अनुसार सारे आरोपी  दोस्त शराब के नशे में धुत थे. इसी दौरान उनकी नीयत बदली और उन्होंने बीच जंगल में सामान उतारने का बहाना बनाते हुए गाड़ी रोक दी. जिसके बाद उन्होंने मासूम के साथ गैंगरेप किया. आरोपियों ने अपने तीन साथियों को भी वहां बुला लिया और फिर गुड़िया की बेरहमी से हत्या कर उसकी लाश को जंगलों में फेंक दिया. गैंगरेप के दौरान दरिंदों ने मासूम गुड़िया के साथ हैवानियत की इंतेहा कर दी थी.

गुड़िया के शरीर पर मिले दांतों के निशान

दरअसल गैंगरेप के दौरान उन्होंने गुड़िया को कंटीली झाड़ियों पर फेंक दिया था. गुड़िया की पीठ पर कांटों के कई निशान मिले हैं. गुड़िया के शरीर पर तीन जगह दांतों से काटने के निशान मिले हैं. सभी आरोपियों ने मासूम के साथ बारी-बारी से रेप किया था. इस दौरान उन्होंने गुड़िया का मुंह दबाए रखा, जिससे उसकी मौत हो गई. आशंका जताई जा रही है कि आरोपियों ने गुड़िया की मौत के बाद भी उसकी लाश के साथ रेप किया. इसके बाद वह लोग उसे वहीं नग्न हालत में फेंककर फरार हो गए.

उठ रहे कई सवाल 

1- जब 4 जुलाई को गुड़िया की हत्या कर दी गई थी, तो आखिर 6 जुलाई तक खूंखार जंगली-जानवरों वाले इस इलाके में उसकी लाश कैसे बची रही?

2- अगर दो दिन तक लाश वहां पड़ी थी तो उसके हाथ-पैर और पूरा शरीर बिल्कुल साफ-सुथरा कैसे बचा रहा?

3- शव के पास अगर उसके कपड़े पड़े थे तो वे बारिश होने के बावजूद वहीं पर सही सलामत कैसे थे? बारिश या तूफान का इन पर कोई असर नहीं पड़ा. कपड़े खराब तक नहीं हुए.

4- गैंगरेप के दौरान छटपटाहट की वजह से गुड़िया के हाथों और शरीर पर मिट्टी क्यों नहीं लगी? पुलिस को मौका-ए-वारदात से कोई निशान क्यों नहीं मिले? पहले खुद पुलिस भी घर या गाड़ी में गैंगरेप की बात कह रही थी.

5- आमतौर पर इतनी बड़ी वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी भाग जाते हैं, लेकिन इस केस में आरोपी कहीं नहीं भागे.

6- जो दो नेपाली युवक पकड़े गए, उनके निवास से घटनास्थल की दूरी करीब 200 मीटर है. यह सवाल उठता है कि अगर उन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया होता तो वह अपने घर के पास ही शव क्यों फेंकते?

7. थाने में बंद एक आरोपी की हत्या कैसे हो गई. और हुई तो फिर थाने के पुलिसकर्मियों पर कोई एफआईआर क्यों नहीं हुआ?

‘दर्दजा‘: हव्वा को पता होता तो वह बेऔलाद रह जाती

प्रो. चन्द्रकला त्रिपाठी

प्रोफेसर, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस. वरिष्ठ आलोचक. सम्पर्क :
मो.9415618813

दर्दजा’ पढ़ते हुए आप हर्फ ब हर्फ़ खुद को स्त्री पर हमलावर यातनाओं को जिंदा अनुभवों की शिद्दत में भोगने से रोक नहीं सकते। ऐसी ही एक और किताब थी तहमीना दुर्रानी की कुफ्र। ‘दर्दजा’ और ‘कुफ्र’ दोनों का संबंध ‘धर्म की स्त्री दमन वाली फितरत’ से है। दोनों जगह स्त्री नापाक़ है। वह भोगा जाने वाला ही नहीं शैतानियत के साथ जिब़ह किया जाने वाला शरीर है। धर्म के भीतर घुसी हुई पाशविकताओं का अट्टाहास आपको सकते में डाल सकता है। तुर्रा, यह है कि औपन्यासिक पाठ में बदल कर आया यह सब कुछ असली है। किरदार, देशकाल, घटनाएँ सबके सब असली। वे आपको अपनी नसों में बहते खून की धड़कती सिफ़त के साथ महसूस होंगे । ‘दर्दजा’ पढ़ी गई और खूब पढ़ी गई। हर पाठक ने अपनी विचलित स्तब्ध स्थिति का बयान किया।

जयश्री राय के इस उपन्यास ने लेखिका के परिपक्व होते रचनात्मक विस्तार का पता दिया। समाजशास्त्रीय शोध यू.एन.ए., एन.जी.ओज, विश्व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं या स्त्री संगठनों द्वारा अफ्रीकी, दक्षिण अमेरिकी, मध्य-पूर्व में कुछ देशों में कबीलाई क्रूरता के साथ घटित होने वाली स्त्रियों की सुन्नत के मामलों पर जाहिर सामग्री भरपुर है। चाहने पर आप उन स्थितियों  और उनके  विश्लेषणों  को जान सकते हैं। आधुनिक से अत्याधुनिक होते विश्व के हिस्सों में बची हुई आपसी बर्बरता विश्लेषणों का यथार्थ देख सुन सकते हैं, मगर उपन्यास में इस यथार्थ का असर बहुत दारुण होकर आता है। ये स्त्री के दर्द और यातना की जिंदा गवाहियाँ हैं। स्त्री होने के गुनाह की मिसालें परत-दर-परत उघड़ कर उसकी देह को ही नहीं मन औ र आत्मा की लहूलुहान स्थितियों का बयान करती हैं।

 ‘दर्दजा’ में आपको ‘माहरा’ मिलेगी। सोमालिया (अफ्रीका) की घुमंतू जाति की ‘माहरा’ जिसका संबंध इस कबीलाई बनजारा जाति की ‘समाल’ जनजाति से है। इस प्रजाति के भीतर भी श्रेष्ठता सिद्धांत के बंटवारे हैं औ र ये बड़े कट्टर रूपों में हैं। माहरा अपनी कहानी मेअपनी उम्र के तेरहवें वर्ष में है। माहरा के भीतर अपने समाज की अमानुषिक परिपाटियों से बगावत और संघर्ष के साथ-साथ दुनिया के विकसित विधान के ज्ञान से प्राप्त आलोचना दृष्टि का अक्स देख कर हम चकित हो सकते हैं कि सुदूर आदिम इलाके में अपने बेठीहेपन के साथ घूमती जनजातियों की उस लड़की में ऐसा रूपांतरण कैसे संभव हुआ। क्रमशः जाहिर होता है कि ‘माहरा’ खुद को दुनिया के बदलावों से जुडे ज्ञान के साथ सशक्त करने का निरंतर संघर्ष करती है। माहिरा के आत्मसंघर्ष का अक्स देखिए-‘एक तरफ मेरे संस्कार थे, परवरिश थी, दूसरी तरफ मेरे सवाल, मेरे संशय…. बीच में मैं परेशान, भ्रमित। कहाँ जाउँ, किससे बात करूँ, समझ नहीं पाती थी। अंदर ही अंदर घुटती रहती थी। कभी-कभी सोचती थी, खुदा ने मुझे भी औ रों की तरह क्यों नहीं बनाया। क्यों मैं अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों की तरह निश्चिंत खुश नहीं रह पाती। काश मैं भी दूसरों की तरह यह मान पाती कि दुख हम औरतों की नियति है, कि हमें इसी में जीना और इसी में मरना है………..’(पृ0 45)

हव्वा की बेटी: उपन्यास अंश 

उसे बताया जाता है कि बेटियों पर, औरतों पर हव्वा के गुनाह की सजा टूटेगी ही टूटेगी उसे भुलाया नहीं जा सकता। साबीला की दादी अक्सर औरत के गुनाह और उस पर कहर की अच्छाइयां बताने के लिए सामने आ
जाती हैं। वे उसके दोजख  को ही उसका स्वर्ग बताने से बाज नहीं आतीं।‘स्त्री’ उनके लिए ‘ख़ता की पुतली’ है। गुनाह उसकी फितरत है।साबीला की दादी ही उन तीन दुखों के बारे में बताती हैं जिन्हें भोगना हर औरत पर फर्ज है, इसमें पहला सुन्नत है। स्त्री योनि का ऐसा विरूपीकरण कि उसका प्रसव के अलावा कोई काम न बचे। दूसरा विवाह के बाद संभोग के लिए उसकी योनि चीर दी जाती है और प्रसव के लिए उसे फिर काटा-पीटा जाता है।

योनि का ऐसे क्षत-विक्षत किया जाना स्त्री के लिए सबाब का काम है। माहरा साबीला की दादी से कैसा भी इत्तेफाक नहीं रखती है। उसे मालूम है कि उसमें वफा है, प्यार है, सच्चाई है। उसे लगता है कि उसका स्त्री होना गुनाहनहीं है। वह अपनी माँ के सामने ऐसा बोल जाती है। माँ को लगता है कि वह कुफ्र बोल रही है। माहरा का ऐसा रूपांतरण, इन आमनुषिकता विश्लेषणों के विरोध का संघर्ष उस ‘मेम’ से घुलने-मिलने से हो रहा है। मेम ही उसकी दूसरी बड़ी दुनिया की ओर खुली खिड़की है।

इन देशों में सुन्नत की प्रथा की शिकार अकेली माहरा नहीं है किंतु इस यातना से लड़ने के भरपूर संघर्ष की जिंदा आवाज वही है। उसके जरिए कई-कई दबी हुई जुबानें फूट पड़ती हैं। उपन्यास में सुन्नत की प्रथा के अफ्रीकी, एशियाई खाड़ी देशों में प्रचलित रूपों के प्रामाणिक हवाले हैं। ये वो दुनियाएं हैं जहाँ औ रत के लिए एक अंध्¨री खत्म दुनिया तय है। इन दुनियाओं में स्त्री के बचपन की मियाद बहुत छोटी है, जवानी को छूने भर की मोहलत नहीं कि उस तंग दुनियाँ के अंधेरे में वह रक्त और मवाद से भर कर रेंगने के लिए छोड़ दी जाती है। जयश्री राय ने इन कबीलाई समाजों में धर्म के बर्बर पितृसत्तात्मक चलना को उजागर किया है। स्त्री के प्रति घृणा से भरे इस धर्म में जरा सी भी कोई मानवीय फाँक नहीं है। ‘स्त्री’ यहाँ यदि शिकार है तो पुरूष, पिता, पति और भाई हो भी क्रूरताओं की वैधता स्थापित करने वाली सत्ता। ‘माहरा’ का इलाका रेगिस्तान के नैसर्गिक सौन्दर्य से भरपूर है। यह सूखा, गर्म उन्मुक्त और सुंदर है। इसे कुदरत की गर्म कोंख कहा जा सकता है। स्त्री में भी यह कुदरत समूची ढ़ल कर इतनी ही सुंदरतम है। काले  बलिष्ठ शरीर भरे-भरे होंठ, घुंघराली लटें, निष्पाप आँखें और प्रकृति के प्रकृत से घुल-मिल कर कटता हुआ जीवन। बारिशें, नदियाँ, हरियालियों के कई-कई रंग, वनस्पतियाँ, भूरे पहाड़, घने जंगल पशुओं औ र जानवरों की अनेक प्रजातियाँ, चमकती बिजली और छोटा से बड़ा होता चांद, अंधेरी रातों में सरकते रेत के ढूहे, पक्षी और जीवन के हंसमुख कलरव चारों ओर। माहरा के चारों ओर ऐसी ही प्रकृति है। बंजारापन के चलते वे ‘पानी’ के हिसाब से अपनी रिहाइशें बदलते चलते हैं मगर जहाँ जाते हैं अपने समाज के साथ जाते हैं। झोपड़ियाँ बनाते हैं, पशु पालते हैं, व्यापार भी करते हैं औ र उसी के भीतर अमीर-ग़रीब, ऊँच-नीच भी होते हैं । इसी के भीतर औरत अपनी परछाईं की तरह बिना जिस्म और रूह के जीना सीख लेती है। प्रकृति की अपार ऊर्जा और संपदा के बहुत करीब बसे इन इलाकों में ‘स्त्री’ सिर्फ प्रजनन के काम की उस देह में बदल जाती है जिसके लिए ‘देह’ को यौनेच्छा और यौन समागम के लिए महसूस करना गुनाह है। इनकी गृहस्थियाँ कितनी भी चलायमान क्यों न हों इनके सामाजिक उसूल और मान्यताएं पत्थर की लकीर हैं। समूचीदुनिया का शिक्षित सुसंस्कृत सभ्य स्वरूप इनकी बंद पद्धतियों के बीच कहीं से प्रवेश नहीं कर सकता।

 हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

‘इस्लाम’ का ये अपना एक बर्बर मनचाहा पाठ कर लेते हैं। ‘स्त्री’ को बरतने में उनकी क्रूरताएं उन आदिम रूपों में करीब हैं। एक तरफ निसर्ग का प्रकृत अपने संुदरतम उर्वर रूपों में बहता रहता है दूसरी तरफ उसी के भीतर अपने समाजों के कठिन बंद रूपों को वे सख्त करते जाते हैं। स्त्री की सुन्नत के तरीकों में इस प्रकृत की ही सबसे ज्यादा पैठ है। स्त्री को यौनसुख देने वाली चीज़ के लिए उन औ रतों का धिक्कार पढ़ें, यह अपनी ही देह के प्रति घृणा और हिंसा का जटिलतम रूप है जिसे पितृसत्तात्मक स्त्री विरोधी मूल्यों के अनुकूलन ने निर्मित किया है। उनके हिसाब से योनि की वह दो अंगुल चीज स्त्री की भी है ही नहीं क्योंकि कामनावासना विषयक आनंद का अधिकार केवल पुरुष को है। इसीलिए सुन्नत के जरिए उस ‘दो अंगुल’ चीज को काट कर निकाल दिया जाता है। इसे निकालने के औज़ार सब आदिम हैं। पुराना ब्लेड, चाकू औ र पत्थर ही नहीं उसे निकालने वाली स्त्री के गंदे नाखून भरे हाथ भी योनि के भीतर पूरी क्रूरता के साथ घूमते हैं । ‘माहरा’  अपने इस हश्र को शब्दशः कहती है और उस यातना का सारा ऐन्द्रिक अपनी भीषण पीड़ा समेत पाठक की नसों में धँस जाता है-
‘‘उस समय आग की सलाइयों सी मेरे जांघों के बीच चल रही थी। लग रहा था ढेर सारी विषैली चीटियां मेरे अंदर घुस गई हैं  औ र मुझे खोद-खोद कर खा रही हैं। या फिर कोई बिच्छू लगातार डंक मार रहा है। तेज जलन हो रही है। मेरे दोनों  पैर बुरी तरह थरथरा रहे हैं, पूरा शरीर पसीने से भींग गया है। ……….. मेरे मुडेहुए हाँथ शायद टूट गए हैं और कमर के नीचे का शरीर शून्य पड़ गया है।’’ (पृ0 16)

‘स्त्री’ को वहाँ ऐसी ही जघन्यता के साथ बरता गया है। उसके शरीर का यह हश्र ऐसा प्रचलित अनुष्ठान है कि उसे बदलने पर आमादा यू.एन.ओ समेत अनेक वैश्विक संगठनों की लगातार कोशिशों के बाद भी इस सुन्नत प्रथा के प्रचलन में आई कमी का प्रतिशत बेहद कम है। अपने कबीलाई रिवाजों में बंधी हुई ऐसी प्रजातियाँ इसे बाहरी समाजों का हस्तक्षेप मानती हैं और यह उन्हें कतई गवारा नहीं। माहरा का जनना अंग उस भोथरी मरणांतक प्रक्रिया के बाद पूरा बदल दिया जाता है। उसकी जगह अब एक ज़रा सा सूराख है जिससे पेशाब तक अपने प्रवाह में नहीं बह सकती। माहवारी के दिनों की यातना और दुसह है। तमाम औ रतें इस जंगली तरीके के कारण एड्स, टिटनेस जैसी बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। कितनी ही युवतियों को ऐसे भयानक इंफैक्शन्स हो चुके हैं कि वे शव की तरह सड़ती और बदबू करती हैं।

 ‘सबा’ ऐसी ही एक चुलबली युवती है। बातूनी सबा खुशदिल और उन्मुक्त है मगर सुन्नत से उसकी जिंदगी बदल जाती है। रिसते हुए पेशाब की गंध से घिरी सबा के नज़दीक कोई नहीं बैठता। ये औरतें ख़त्म होने की राह पर हैं। माहरा के करीब की सबा, मासा माहरू फातिमा बीबी, खाला माहरा का माँ जैसी कितनी ही औरतें इस दोजख में सड़ते हुए जीने के लिए अमिशप्रत हैं। माहरा के  संघर्ष में बाहरी दुनिया से मिली रोशनी शामिल होती है और वह इन औ रतों के लिए नई दुनिया खोजने के संघर्ष की राह पकड़ लेती है। उसकी तफसीलों में
उन देशों के हवाले आते हैं  जहाँ यह नृशंसता अलग-अलग तरीके से प्रचलित है और जिसे लेकर उन समाजों का रवैया अडिग है। माहरा बताती है कि केन्या, इथियोपिया, सोमालिया समेत विश्व के 28 देशों में स्त्री में ऐसे वक्षस्थल धर्म के नाम पर जारी हैं जिनसे 14 करोड़ औरतें प्रभावित हैं और इनमें अफ्रीकी औरतों का अनुपात सबसे ज्यादा है।

‘मासा’ का भी वही हश्र होता है। माहरा के विरोध को देखते हुए उसका परिवार मासा को बचपन में ही उसी तरह कुचल देता है। मेम जो मासा को गोद लेना चाहती थीं स्तब्ध रह जाती हैं। मासा बीमार रहने लगती है। माहरा
लाचार हुई सी- ‘‘मासा की चमकीली आँखों को बुझते हुए, गालों के प्यारे गड्ढों में मुस्कराहट की नर्म कलियों को कुम्हलाते हुए …………… एक शरीर तितली का रेंगता हुआ कीड़ा बन जाना…………………’’ देखती है। मासा ख़त्म होती ‘दर्द की गांठ’ बन चुकी ह ै। मेम मासा को ले जाती है। वे उसका इलाज भी करते हैं मगर उस नन्हीं सी जान में एड्स फल-फूल कर कैंसर हो चुका है। सितारे देखना चाहने वाली और लंबी उम्र में हंसते-खेलते जीना चाहनेवाली मासा मर जाती है। माहरा ‘मासा’ को अपने वजूद में बचाकर बंद कर लेती है। वह पुनर्जन्म पर विश्वास करना चाहती है और अपनी ‘बेटी’ को वही नाम देती है- ‘मासा’। उस मासा को वह पूरी नर्मी से अपने गर्भ में संभालती है।

‘दर्दजा’ की कथा का प्रवाह इस ‘मासा’ की मुक्ति के रास्ते उन्हीं रक्त रंजित पैरों से बढ़ता है। ज़हीर से ब्याही गई माहरा की जिंदगी में यौन संबंध उसी जिबह की यंत्रणा की पुनरावृत्ति है। पन्द्रह वर्ष के कच्चे शरीर वाली माहरा को उसका प्राैढ़ पति अपनी पाशविक उत्तेजना में रौंद डालता है। उसकी योनि को चाकू से खोलकर संभोग के लायक बनाया जाता है-’तेज भयानक पीड़ा के साथ मैने इतना ही समझा था, माँ मेरे जननांग के लगभग  बंद पड़ गए छेद को उस भोथरे चाकू से काट कर खोलने का प्रयास कर रही हैं ………….’’ (पृ. 85)
फिर वही ‘जंग खाया भोथरा चाकू’। जहीर इसके बावजूद सम्भोग में सफल नहीं हो पाता। माहरा का जीवन- ‘नरक से बदतर’ हो चुका था। अथक परिश्रम, पीड़ा औ र आतंक……… बस यही और इतना ही’ (पृ. 90) माहरा
जहीर की फातिमा की तरह ही एक गुलाम थी। फातिमा अपंग हो चुकी थी। माहरा के प्रतिहिंसा से भरी फातमा के चरित्र की बारीकियों को लेखिका ने बखूबी उद्घाटित किया है। फातिमा के जख़्मी तन-मन को पहचानने में माहरादेर नहीं लगाती और उनके बीच एक यकीन भरी मानवीय दुनिया दमक उठती है। खासकर खाला के साथ माहरा के रिश्ते यकीन के उस चरम तक पहुँचते हैं कि खाला ही उसे उस नरक से मुक्त होने में मदद करती है। खाला का अपना एक निस्संग एकांत है। बारह वर्ष की उम्र में उनकी शादी हुई थी, चौदह साल की उम्र में वे बेवा हो गईं। उस छोटे से विवाहित जीवन में दो मरे हुए बच्चे भी हुए। जहीर का घर ही उनका आसरा बचा था। घर-बाहर का संसार खाला को कहीं नहीं जोड़ता। वे काम करती हैं, थकती हैं , अपनापन खोजती हैं। ‘उसकी दोस्ती किसी से नहीं, बस दोस्ती न होने का मलाल है’। (पृ. 92)

खाला पेड़ों से वनस्पतियों से, जीव जंतु विश्लेषणों और चिड़ियों तक से बात करती हैं। इस तरह लेखिका स्त्री के सामाजिक अलगाव के कठिन मर्म को उजागर करती है। यह एक बहिष्कृत स्थिति है, सम्बन्धों की उदासीनता से बना हुआ अकेलापन। माहरा ने उस एकांत में प्रवेश कर लिया तो वहाँ जैसे सख्त पत्थरों के भीतर का स्वाभाविक वेग से बह निकला। माहरा के लिए ये रूहानी रिश्ते महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। उन बंदिशों और यातना विश्लेषणों के बीच आजादी के सपने के साथ जूझती माहरा स्त्री सख्य का एक विरल रूप पा लेती है। इस सखीपन में सभी जुड़ती है, माहरा की माँ भी अपनी मौत से पहले उन यातनाओं के संदर्भ में अपना विवशताओं पर बिलखती है। अपनी मजबूरियों का बयान करती है। जहीर से मिलती जिबह की सी यातनाओं की सारी तफसीलें नृशंसता की पराकाष्ठा है। माहरा औरत के लिए ऐसी नियति तय करने वाली पाक किताबों को खुद देखना चाहती है। उसे कतई यकीन नहीं  कि खुदा अपने ही सृजन के साथ ऐसी क्रूरता बरतने वाले रिवाज बना सकता है। माहरा को ऐसे कई सवाल घेरते हैं और हर सवाल का टेक यही है कि- ‘यहाँ सबठीक नहीं है, कुछ बहुत गल़त है। औरतों के जीवन में दुख ही दुख है और ये सारे दुख केवल कुदरत के दिए हुए नहीं हैं । जैसा कि मेम कहती थी, हमारे अधिकतर दुख इंसानों  के खुद के बनाए हुए दुख हैं और जिस दिन हम चाहेंगे.हमारे आधे से अधिक दुख खत्म हो जाएंगे। ……..मनुष्य ने अपने लिए ये नर्क खुद रचे हैं। जब मैं रेतों के सुनहरे टीले देखती हूँ, उनके पीछे निकलता चाँद और कैक्टस पर खिले तरह-तरह के फूलों को देखती हूँ, मुझे ख्याल आता है कि इन खूबसूरत चीज़ों को बनाने वाला मालिक बहुत उदार और दयालु होगा।’’ (पृ. 102-103)

‘दर्दजा’ का यह विपर्यय बड़ा ही सधा हुआ है। सृजनात्मक क्षमता से भरपूर दो चीजें आमने-सामने हैं। उन्मुक्त उदात्त भरी पूरी और उर्वर प्रकृति और सड़ जाने की हद तक बांधा गया स्त्री जीवन। प्रकृति की निर्मल अकृत्रिमता उस समाज की आंतरिक रचना में कहीं दाखिल नहीं। यहाँ तक कि पवित्र किताबों का मानवीय भाष्य भी उनके यहाँ उलट कर क्रूरतम हो उठा है। हज करने गए ज़हीर की मौत की अफवाह माहरा का सुकून बन जाती है, उसके भीतर इन यातनाओं से निजात चाहने वाली औरत करवटे बदलने लगती है। ज़हीर की मौत पर रोने के लिए गाँव उमड़ आता है मगर माहरा को रुलाने के लिए खाला को बार-बार चिकोटी काटनी पड़ती है। इस ग़म में उसके भीतर का कोई भाव शामिल होना नहीं चाहता। इन तीन औरतों का बहनापा अपनी मुक्ति के सुख को सकते की तरह सहने के लिए मजबूर है। माहरा की भूख में स्वाद की ललक जाग जाती है औ र बहुत दिनों बाद वह स्वाभाविक नींद सोती है- ‘बहुत गहरी नींद। ऐसी नींद जिसमें सपने नहीं होते, दरारें होतीं। होता है तो बस एक सपाट मुलायम अंधेरा। जाने कितने समय बाद में इस तरह से सोई थी। मृत्यु की तरह सुखद थी यह। (पृ. 105)

माहरा मातम पुर्सी करने आई अपनी माँ के सामने खाला के बहुत बार चिकोटी काटने पर भी नहीं रोती। अपने भीतर वह एक ‘जलती हुई अंगीठी’ महसूस करती है। माँ के आगे न रोना ही जैसे उसका सबसे मजबूत विरोध है। उसे जैसे अपने भीतर बची हुई आग का पता मिलता है। इस तरह उपन्यास के भीतर स्त्री मुक्ति चेतना के स्वाभाविक स्पंदित हिस्सों को लेखिका स्पर्श करती है। तकलीफों के समंदर में अनवरत डुबाये जाने के बावजूद‘माहरा’ में बचे संघर्ष के जीवित हिस्से को वह उद्घाटित करती है। माहरा वैधव्य के शाप को वरदान की तरह जीने के सुख में है कि ज़हीर लौट आता है। गर्भवती माहरा से ज़हीर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाता है। इस तरह उपन्यास स्त्री यौनिकता के अपमान के सारे सिलसिलों को उधेड़ कर रख देता है। हर बार यह संबंध चीरने वाली वह आरी है जिससे देह ही नहीं आत्मा भी क्षत-विक्षत है।

‘जिस्म का हर जोड़ घाव की तरह दुखता-टीसता और सूरज के डूबते ही रात का काला लबादा ओढ़े किसी प्रेतात्मा की तरह ज़हीर मेरे सीने पर उतर आता। चूँकि मैं बच्चे की वजह से पेट के बल बिल्कुल लेट नहीं पाती थी, वह मुझे हमेशा दीवार के सहारे खड़ी करके अत्याचार करता’। (पृ. 110) इस तरह देखें तो इन समाजों  में स्त्री जितनी गुलाम और उत्पीड़ित है पुरुष उतना ही पाशविक है। पुरुष की ऐसी नृशंसता के लिए उस पवित्र किताब में या तो कोई रोक है ही नहीं या फिर उस ‘भाष्य’ में से ऐसे हिस्से निकाल दिये गये हैं। धर्म और संस्कृति की गतिशीलता के पक्ष यहाँ नदारद हैं। इन उत्पीड़नों से प्रताड़ित माहरा को मरा हुआ बच्चा पैदा होता है। दुबारा  हमला होने पर वह अपनी बहन मासा का पुनर्जन्म अपनी कोख में महसूसकरती है। ‘मासा’ के रूप में बेटी का जन्म उसकी जिंदगी में सुख की जगह बनाता है मगर ‘मासा’ की सुन्नत का भय उसे जीने नहीं देता। ज़हीर अशक्त औ र बूढ़ा हो चला था मगर ज़हीर का बेटा उसकी क्रूरताओं का ही अवतार साबित होता है। ज़हीर की जगह अब उस कय्यूम की निगरानियाँ हैं। बेटी बड़ी हो रही है, उस पर कय्यूम के अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। कय्यूम मासा का विवाह एक बूढ़े के साथ करने पर आमादा होता है। मासा के भीतर अपनीमाँ की सारी आग है। माहरा मासा को लेकर वहाँ से भागने में कामयाब तो होती है, मेम के ठिकाने पर आकर उसके जीवन में नये रंग भी दाखिल होते हैं, मगर फिर धोखे से बुला ली जाती है। खाला फिर उस नरक से उन दोनों माँ-बेटी को भगाने में कामयाब तो होती है किंतु ‘मासा’ को उसके मुक्त भविष्य की ओर भागने की शक्ति देकर माहरा लगभग ‘मौत’ के लिए छूट जाती है।

इस तरह यह उपन्यास हिंदी के औपन्यासिक संसार का महत्वपूर्ण विस्तार साबित होता है। स्वयं लेखिका की परिपक्व रचनात्मकता की भी यह एक सुखद उपलब्धि है। उपन्यास में जयश्री राय ने अनुभवों का निजी लगतासास्पंदित प्रवाह संभव किया है और यह वाकई बेजोड़ है। किसी भी उपन्यासकार के लिए उपन्यास का महाकाव्यात्मक शिल्प एक सम्मोहन की तरह होता है। यथार्थवाद की रूढ़ियाँ इस महाकाव्यात्मकता से ही टूटती हैं।दरअसल महाकाव्यात्मकता गहरे अर्थ में एक रूढ़ गढ़न भर नहीं है और न ही यह यथार्थ विरोधी संरचना है। इसके जरिये जीवनानुभवों का वे खूबियाँ निखरती हैं जिनकी संवेद्यता असरदार होती है। कला की चमक का तो कहना ही क्या है। जयश्री राय ने इस उपन्यास में यथार्थ को ऐसी ही खूबियों के साथ निर्मित किया है। इस उपन्यास में दर्ज जीवन भारतीय अनुभवों की दृष्टि से नितांत सुदूर और अपरिचित है। स्त्रियों की सुन्नत का यथार्थ बहुतायत  सामान्य रूप से बहुत जाना-समझा गया यथार्थ नहीं है। उससे जुड़ी हुई कुछेक जिंदा दास्तानें आई जरूर हैं किंतु ऐसी सुन्नत की प्रथा वाले देशों का स्त्री के प्रति दरिंदगी की भयानकताओं का यथार्थ सूचना की सपाटता को तोड़  कर ऐन्द्रिक तफसीलों के साथ यहाँ व्यक्त होता है और माहरा के जरिए कहा जाता है। कथा में लेखिका का स्त्रीपक्षधरता का विवेक भी उसी गहराई के साथ सक्रिय दिखाई देता है। लेखिका माहरा के संघर्ष में स्त्री की सचेत दृष्टिवानता का निर्वाह बड़ी खूबी के साथ करती है। कहना न होगा कि ‘दर्दजा’ की कथाभूमि चौकाने की हद तक नई मौलिक और विचारोत्तेजक  है।

स्त्री विमर्श  के सांचे में आये ग़म और सहनशीलता के कितने ही भाववादी पैटर्न यहाँ ध्वस्त होते दिखाई देते हैं । ‘माहरा’ को पढ़ते हुए स्पष्ट होता जाता है कि स्त्री सशक्तता की असली परीक्षा दरअसल क्या है? माहरा को  दिशाऔर शक्ति देने वाले स्रोत उसके अपने समाज में अनुपस्थित हैं। वहाँ हर स्त्री अपनी यातना में निहत्थी और अकेली है किंतु ज्ञान और बुद्धि के लिए माहरा की ललक उसके आलोचनात्मक विवेक की धार बनती है और वह अपने समाज की इन जड़ताओं के विरूद्ध तनती चली जाती है। वह ईश्वर, ईश्वरीय किताब, कानून, रीति-रिवाज सबको अपने प्रश्नों के दायरे में ले आती है। इस तरह लेखिका बड़ी स्वाभाविकता से इस उपन्यास की संघर्ष भरी गतिशीलता का पक्ष रचती है। यह मानना पड़ेगा कि नरक को खोलने के लिए उसके अनुभवों के प्रकृत में उतरना ही पड़ता है, लेखिका ने इसीलिए स्त्रीदमन के समूचे यथार्थ में ऐन्द्रिक वर्णन का उपयोग किया है। उसे समूचा उसी प्रकृत रूप में उधेड़ देना उसे सही लगा है। यौन प्रसंगों की जघन्यताएं यहाँ इस तरह जाहिर होती हैं कि वहाँ सिर्फ यातना विश्लेषणों को समूचा समझने का आस्वाद बनता है, इसके अतिरिक्त किसी विलासिता या उपभोगपरक अर्थ की गुंजाइश कतई नहीं बनती। कहना न होगा कि यह बहुत ही सधी हुई कलम का ही कमाल है।

‘दर्दजा’ के लिए जयश्री राय नयी सौन्दर्य दृष्टि के लिए संघर्ष करती है। इस दृष्टि का संबंध केवल अश्वेत प्रजाति के रूप रंग व्यवहार से मान लेना ठीक नहीं होगा। उस जीवन की पतनोन्मुखता विश्लेषणों के बीच से श्रम से सँवरते मामूली जीवन की अनेक छवियों  को रचते हुए लेखिका उस पूरे परिवेश को हमारे परिचित आत्मीय क्षेत्र में बदल देती है। खानाबदोश जीवन की विशेषताएं वैसी ही सहजता के साथ यहाँ दर्ज है। ….. वह पूरा जीवन अपनेस्वाद सौन्दर्य औ र असर के साथ बुना जाकर दर्द की उस दास्तान को हमारे लिए जिंदा कर देता है जिसे पढ़कर शेक्सपीयर वहाँ से याद आते हैं कि ‘नरक खाली हो गया है और सभी शैतान इसी लोक में आ गए हैं।’’

पितृसत्ता की निरंकुशताएं वहाँ ऐसी हैवानियत को जारी रखती हैं जिसे चुनौती देना आज भी कठिन है। जयश्री राय ने माहरा के व्यक्तित्व ¨ उस सबलता को रचा है जिसका संबंध केवल स्त्री से ही नहीं बल्कि स्त्री की  अस्मिता विहीन समझने वाल्¨ उन समूचे बर्बर समाजों से है। स्त्री मुक्ति के इस पाठ में संवेद्यता का वह ताप मौजूद है जिसके चलते वे सारे सुदूर अनुभव हमारे मन और चेतना मे प्रवेश कर नये ढंग की दखलंदाजियों के लिए चुनौती बनते हैं  जिसमें जघन्यताओं को  जाहिर करने के लिए सारी कलाओं ने बड़ी कठिन परीक्षा दी है। यहाँ अर्थ की समग्रता को  रचने की लेखिका की कला अपना सामर्थ्य साबित करती है।

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नैचुरल सेल्फी की मुहीम: सौन्दर्य बाजार को लड़कियों की चुनौती



सोशल मीडिया पर आईआईएमसी की पूर्व छात्रा गीता यथार्थ यादव ने एक मुहीम शुरू की है #NaturalSelfi नाम से. अपने किस्म से यह ख़ास मुहीम है बाजार द्वारा प्रायोजित सौन्दर्य बोध और उसे बने मुनाफे के अर्थशास्त्र के खिलाफ. गीता की मुहीम में कई महिलायें  शामिल हो गई हैं.

इसकी शुरुआत गीता ने इन पंक्तियों के साथ अपनी सेल्फी डालकर की और साथियों को आमंत्रित किया. जिसके बाद एक सिलसिला सा दिख रहा है.
बिना मेकअप
बिना काजल कुंडल
बिना लिपस्टिक
चिपके तेल लगे बालों में
हम ऐसे दिखते है.
बाज़ारवाद तेरा क्या होगा अब…!!
‘ब्यूटी विद ब्रेन’ महिलाओं को छलने के लिए बनाया गया कॉन्सेप्ट था, ब्रेन है ब्रेनी है, अलग से ब्यूटी का भार क्यों डाल दिया पेट्रिआर्कि ने लड़कियों के ऊपर.

गीता यथार्थ यादव

2016 की शुरुआत में एक ऐसा ही कैम्पेन  ‘अनफेयर एंड लवली’ नाम से सोशल मीडिया पर चालाया गया था , जिसे  टेक्सास विश्वविद्यालय, ऑस्टिन के  तीन विद्यार्थियों ने शुरू किया था. इसका भारतीय संस्करण था  ‘हां, हम खूबसूरत हैं, क्योंकि हम सांवले हैं’ इस स्लोगन के साथ यह कैम्पेन भारत में भी तेजी से आगे बढ़ा.  और अब गीता द्वारा शुरू किया गया यह मुहीम भी लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहा है.

अनफेयर एंड लवली: गोरेपन की सनक का जवाब 

रजनी शैल चौधरी  ने लिखा : 
बाजारवाद हमारे अंदर हीनता को भरता है
लिपस्टिक से होंट, काजल से आँखों को भर हमे अहसास दिलाया जाता है की अब हम खुबसूरत है
लम्बी हिल्स, लॉन्ग, स्मूथ ,सिल्की बाल हो तो हम कॉन्फिडेंट है
हमे रोज अपने चेहरे को क्रीम बराबर पोतना है नही तो हम काले हो जायेंगे और काला होना बुरा है
यह बाज़ारवाद हमसे हमारी प्राकृतिक पहचान और अस्तित्व को छीन कर हमे एक अजीब सा प्राणी बनाये जा रही है
जरूरत है की इसके खिलाफ लड़ा जाये
और नस्लवाद को मुंह तोड़ जबाब दिया जाये

रजनी शैल चौधरी

साक्षी मिताक्षरा  ने तंज के साथ के सेल्फी पोस्ट की, ‘ मुझे लगा, इससे पहले कि कोई शक़्ल को ही हराम घोषित कर दे मुझे अपनी शक़्ल वाली फोटू लगा लेनी चाहिए, साथ ही मैंने Geeta Yatharth Yadav जी के लिए भी इस फोटू में मेकअप को हराम मानते हुए इसे प्रोफ़ाइल फोटू बना लिया…दो काम एक साथ हो गये.

साक्षी मिताक्षरा

नीलिमा चौहान ने लिखा जिस मुल्क में नैचुरल का अर्थ बुरा होता हो ।सादी का अर्थ भोंदू और भद्दी होता हो । सीधी का मतलब त्रिया का एक पैंतरा होता हो । हुस्न का अर्थ सजधज होता हो । जलवे का अर्थ नई तकनीक वाला एयर ब्रश मेकअप , सुनहले बालों के लच्छे और ऊटपटांग काट के कपड़े होता हो । तरोताज़ा का मतलब इत्र डियो के झोंके मारना होता हो । चुस्त का मतलब बनी ठनी तनी होता हो ।निखरी का मतलब उजली गोरी ,बेदाग फ्लॉलेस होता हो ….
… उस मुल्क की स्त्रियों को वक्त वक्त पर अपनी छविभंजक तस्वीरें पेश करते रहना चाहिए ।
और हां नेचुरल छवि भी कहीं हमारा स्टीरियोटाइप न बन जाए । बाज़ार और जमात के लिए एक और औज़ार न बन जाए । इसलिए वक्त वक्त पर नेचुरल छवि के खिलाफ भी आइकोनोक़लास्टिक छवियों से चौंकाते रहना होगा न ।

पहाड़ से लौटी हूँ ।ठीक ठीक टैन हुई हूँ ।पर कमबख्त आजकल के फोनों की सेल्फियां बाज़ार का ही साथ देती हैं सच का नहीं ।
यूं भी सेल्फी खुद में बाज़ार का एक प्रोडक्ट मात्र ही है और बारास्ता सेल्फी हर चेहरा एक ब्रांड है। तो लीजिए नैचुरल को ब्रांड बनाती मेरी एक सेल्फी ।

नीलिमा चौहान

तजीन खान

सच पूछो तो हमको सेल्फ़ी लेना भी नही आता और हम वैसे भी कभी मेकअप नहीं करते फिर भी Geeta तुम्हारे कहने से !

तजीन खान

और यह भी..  हम भी आ गए… एक दमे सादा बालो में कंघी तक न फेरी…

अगर सांवली रात खूबसूरत है 

श्वेता यादव