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सेक्सिस्ट बयानों और ट्रोलिंग के खिलाफ आगे आये लेखक: जारी किया वक्तव्य

वक्तव्य / Statement

हिन्दी जगत में साहित्यिक पुरस्कारों पर विवाद कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ समय से भारतभूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार (जो 35 वर्ष से कम अायु के कवि द्वारा लिखी गई वर्ष की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कविता के लिए दिया जाता है) विवाद के केन्द्र में रहा है अौर कविता के चयन पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। लेकिन सोशल मीडिया अौर दूसरे मंचों पर कुछ पुरुष लेखकों ने, जिनमें युवा और प्रौढ़ दोनों तरह के लोग हैं, जिस भद्दे और अाक्रामक स्त्री-विरोधी रवैये और अश्लील भाषा का प्रदर्शन किया है, उससे हम स्तब्ध हैं। दुःख की बात यह है कि इनमें से अनेक लोग अपने को लोकतांत्रिक, उदारमना और कुछ तो वाम रुझान वाला मानते हैं।

पिछले साल पुरस्कार के लिए चयनित कवि शुभमश्री और उनकी कविता पर अशोभनीय अौर अपमानजनक ढंग से हमले किये गये थे। इस वर्ष अश्लील हमले का निशाना चयनकर्ता अनामिका को बनाया गया है। हमें डर है कि इससे एक ऐसी अस्वस्थ परम्परा की नींव पड़ रही है जिसके तहत हर तरह के स्त्रीद्वेषी, मर्दवादी विमर्श, सामन्ती मानसिकता के खुले प्रदर्शन और साहित्य जगत में लफ़ंगेपन को वैधता मिलेगी। दूसरी तरफ़ इसी समय अति-दक्षिणपंथी विचारों के नैतिक-प्रहरी और ट्रॉल भी सक्रिय हैं जो अपनी ज़हरीली भाषा के साथ, छद्मवेश में तरह तरह के भ्रम और दुष्प्रचार फैलाने, और चरित्रहनन करने में मशग़ूल हैं।

हम सभी लेखकों और साहित्यप्रेमियों की चिंताओं के भागीदार हैं जो इस वस्तुस्थिति से परेशान हैं, और उन लेखकों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हैं जिन्हें हाल ही में असभ्य और प्रतिक्रियावादी हमलों का निशाना बनाया गया है। समकालीन हिन्दी साहित्य सांस्कृतिक गुंडों, उनके भटके हुए अनुयायियों और प्रच्छन्न क़िस्म के फ़ासीवादी दस्तों के लिए कोई खुला मैदान नहीं है।
शुभा
प्रशांत चक्रवर्ती
मंगलेश डबराल
मनमोहन
दूधनाथ सिंह
नरेश सक्सेना
असद ज़ैदी
राजेश जोशी
अली जावेद
अमिताभ
अनीता वर्मा
अपर्णा अनेकवर्णा
अरुण माहेश्वरी
चंदन पांडेय
चमनलाल
देश निर्मोही
धीरेश सैनी
जवरीमल पारख
किरण शाहीन
कुलदीप कुमार
कुमार अंबुज
कुमार विक्रम
लाल्टू
लीना मल्होत्रा
महरुद्दीन ख़ाँ
महेश वर्मा
मुकुल सरल
निर्मला गर्ग
नूर ज़हीर
पल्लव
पंकज चतुर्वेदी
पंकज श्रीवास्तव
प्रत्यक्षा
अार चेतनक्रांति
रंजीत वर्मा
रवीन्द्र त्रिपाठी
संजीव कुमार
समर्थ वशिष्ठ
सरला माहेश्वरी
शालिनी जोशी
सुमन केशरी
शिवप्रसाद जोशी
शीबा असलम फ़हमी
शेफ़ाली फ़्रॉस्ट
सुषमा नैथानी
तरुण भारतीय
त्रिभुवन
वंदना राग
विनोद दास
वीरेन्द्र यादव
संजीव चंदन
निवेदिता
नासिरुद्दीन
फारूक शाह
रेखा सेठी
पूजा पाठक
रमेश ऋतंभर
डा. सुनीता
गुलज़ार हुसैन
हेमलता माहिश्वर
हेमलता यादव
अनिता भारती
श्वेता यादव
अरुण कुमार
मृदुला शुक्ला
कविता
इंद्र मणि उपाध्याय
इश्वर शून्य
राजेश चंद्र
जितेन्द्र श्रीवास्तव
स्मिता सिन्हा
रश्मि  भारद्वाज
चरण सिंह पथिक
संदीप मील
रितुपर्ना मुद्राराक्षस
कमलेश वर्मा
कैलास वानखेड़े
आशीष अनचिन्हार
आभा दुबे
विजेंद्र मसीजीवी
प्रमोद धीताल
राजेश राज
संजीवनी पी संजीवनी
कुसुम राय
राजीव कार्तिकेय
दीपक मिश्रा
सीमा आज़ाद
रणजीत कुमार सिन्हा
एम नय्यर उमर
भरत प्रसाद
अरुणाभ सौरभ
अशोक पाण्डेय
रुचि भल्ला
रेशमा प्रसाद
रेखा चमोली
मंजू शर्मा
मनीषा जैन
मनीषा कुमारी
राजीव सुमन
नवनीत पांडेय
जीवेश प्रभाकर
जीतेंद्र विसारिया

STATEMENT

“Events like announcement of a literary award often cause a stir in Hindi literary circles. Lately the Bharatbhooshan Agrawal Award (given for the best Hindi poem of the year written by a poet from the age group under 35) has been the focus of controversy, provoking a variety of reactions questioning the validity of the decision. We are especially distressed at the ugly display of aggressive misogyny and intemperate language from a number of men, young and old, in social media and print journalism, some of them profess to be liberal, democratic, and few of them like to call themselves left-leaning.

“Last year the awarded poem and its author, Shubham Shree, were the target of a barrage of derogatory and abusive attacks. Interestingly, this year it was the turn of the selector, Anamika, who is facing scurrilous attacks. This sets an unhealthy precedent whereby the openly sexist discourse, assertion of feudal mindset and lumpenisation of literary universe is being given legitimacy. In addition, the literary vigilante of ultra right persuasion are contributing their own bit in poisoning the atmosphere by generating a miasma of confusion, character assassination, impersonation, fakery and vile speech.

“We share our concern with all the writers and readers who have been dismayed at these developments, and express our solidarity with the writers who have been targets of these uncivil and reactionary assaults. The domain of contemporary Hindi literature is not yet ready to be taken over by the cultural brutes, their misguided followers and crypto-fascist militias.”
Shubha
Prasanta Chakravarty
Mangalesh Dabral
Manmohan
Doodhnath Singh
Naresh Saxena
Asad Zaidi
Rajesh Joshi
Ali Javed
Amitabh
Anita Verma
Aparna Anekvarna
Arun Maheshwari
Chaman Lal
Chandan Pandey
Desh Nirmohi
Dheeresh Saini
Jawari Mal Parakh
Kiran Shaheen
Kuldeep Kumar
Kumar Ambuj
Kumar Vikram
Laltu
Leena Malhotra
Maheruddin Khan
Mahesh Verma
Mukul Saral
Nirmala Garg
Noor Zaheer
Pallav
Pankaj Chaturvedi
Pankaj Srivastava
Pratyaksha
R Chetankranti
Ranjeet Verma
Ravindra Tripathi
Samartha Vashishtha
Sanjeev Kumar
Sarla Maheshwari
Shalini Joshi
Sheeba Aslam Fehmi
Shephali Frost
Shivprasad Joshi
Suman Keshri
Sushma Naithani
Tarun Bhartiya
Tribhuvan
Vandana Rag
Vinod Das
Virendra Yadav
Sanjeev Chandan
Nivedita
Nasiruddin
Faruk shah
Rekha Sethi
Pooja Pathak
Ramesh Ritambhar
Dr. Sunita
Gulzar Hussain
Hemlata Maihshwar
Hemlata Yadav
anita Bharti
Shweta Yadav
Arun Kumar
Mridula Shukla
Kavita
Indra Mani Upadhyay
Ishwar Shunya
Rajesh Chandra
Jitendra Shrivastav
Smita Sinha
Charan Singh Pathik
Sandeep Meel
Rituparna Mudrarakshas
Kamlesh Verma
Kailash Vankhede
Ashish Anchinhar
Abha Dubey
Vijendra Masijiwee
Pramod Dhital
Rajesh Raj
Sanjeevani P Sanjeevani
Kusum Rai
Rajeev Karteekey
Deepak Mishra
Sima Azad
Ranjeet Kumar Sinha
M. Nayyar Umar
Bharat Prasad
Arunabh Saurabh
Ashok Pandey
Roochi Bhalla
Reshma Prasad
Rekha Chamoli
Manju Sharma
Manisha Jain
Manisha Kumari
Rajeev Suman
Navneet Pandey
Jeevesh Prabhkar
Jitendra Visaira

स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त दो)

रेखा सेठी

  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित
संपर्क:reksethi@gmail.com


पहली क़िस्त से आगे 



स्त्री-कविता और जेंडर

पिछले कुछ दशकों में स्त्रीवादी दृष्टि को जो प्रमुखता मिली और स्त्री-विमर्श के बल पर स्त्री लेखन को जिस अलग नज़रिये से पढ़ने की पहल हुई, उससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या स्त्री–कविता, स्त्रीवाद या स्त्रीवादी कविता का पर्याय है ? हमें इस अंतर को बहुत सावधानी से पहचानना चाहिए कि स्त्री लेखन केवल स्त्रीवाद के घेरे तक सीमित नहीं है। एक समाज में रहते हुए स्त्री-पुरुष, व्यक्ति-रूप में एक ही यथार्थ के साझीदार हैं।ऐसे में, स्त्री-कविता के अंतर्गत पढ़ी जाने वाली स्त्री रचनाकारों की कविताओं के मूल्यांकन का आधार मात्र स्त्रीवाद की कसौटियाँ नहीं हो सकती ।स्त्री-पक्ष के पार एक साधारण अनुभव की बात की जानी चाहिए । समकालीन कविता का मूल्यांकन, साहित्य की जिस अविरल धारा के रूप में होता है उसमें क्या कविता या साहित्य का ‘जेंडर न्यूट्रल’ रूप उभर सकता है ?

‘जेंडर न्यूट्रल’ होने का तर्क यह है कि जन-क्षेत्र में दाखिल होने के बाद लैंगिक अस्मिता विलुप्त हो जानी चाहिए। आप स्त्री हैं या पुरुष इस बात से कोई अंतर क्यों आना चाहिए। न किसी के विशेषाधिकार हों, न संरक्षणवादी नीतियाँ। दोनों को एक जैसा समतल मैदान मिले किंतु इसके कुछ ऋणात्मक पहलू हैं और रहेंगे, यह आशंका इस स्थिति को समस्या ग्रस्त करती है।


स्त्री-अस्मिता, कविता और जेंडर के आपसी संबंध उस साहित्यिक अधिरचना के संकेतक हैं, जहाँ स्त्री के स्त्री करण की सामाजिक प्रक्रिया को कमोबेश उसी रूप में स्वीकार कर लिया गया है।धर्म, दर्शन, इतिहास स्त्री के जिस सांस्कृतिक रूप की निर्मिति करते हैं,वह परिवार से लेकर आर्थिक-राजनीतिक क्षेत्रों तक स्त्री-पुरुष के बीच पदानुक्रम उपस्थित करती है ।साहित्य के क्षेत्र में भी यह बँटवारा अनुपस्थित और अदृश्य नहीं हैं। दूसरा सप्तक की कवयित्री शकुंत माथुर के साक्ष्य से हम जान पाते हैं कि उदार संरचनाएँ भी जेंडर की विषमताओं को झुठला नहीं पाती। शकुंत माथुर हिंदी के प्रसिद्ध कवि गिरिजाकुमार माथुर की पत्नी हैं। उन्होंने यह स्वीकार किया कि पति की छाया में वे अपने कवित्व के प्रति कभी आश्वस्त नहीं हो पायी। यह आकरण नहीं है कि कविता के इतिहास का स्त्री-स्वर इतना विरल है।अधिकांश स्त्री रचनाकार यह भी महसूस करती हैं कि हिंदी की मठवादी आलोचना ने स्त्री-स्वरों को उचित स्थान नहीं दिया । उनकी हशियाकृत स्थिति संभवतः इसी उपक्रम का परिणाम है।

एक और ज़रूरी सवाल यह भी है कि क्या हमारा जेंडर हमारे अनुभव व अभिव्यक्ति को प्रभावित करता है? इसका पक्ष-विपक्ष बराबर ढंग से मज़बूत हो सकता है।इस बात पर बहुत बल दिया गया है कि जब एक स्त्री लिखती है तब उसका स्त्रीत्व उस अनुभव में शामिल रहता है। ‘जेंडर न्यूट्रल’ होने की प्रक्रिया स्त्रीत्व की इन परतों को खोकर किसी अंजाम तक नहीं पहुँच सकती क्योंकि उसमें स्त्री जीवन के इतिहास व संस्कृति के अनेक शब्दहीन सिलसिले जुड़े हुए हैं। स्त्री की दृष्टि और उसकी भाषा उसे यह अवसर देते हैंकिंतु यही उसका सीमित दायरा नहीं।ऐसा नहीं है कि पुरुष कवियों ने स्त्रियों पर मार्मिक रचनाएँ नहीं लिखी।‘आंचल में दूध और आँखों में पानी’ की स्त्री छवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा हिंदी साहित्य में अविस्मरणीय बना दी गई।इसी तरह समकालीन कविता में कितने ही नाम है––उदयप्रकाश, लीलाधर मंडलोई, मंगलेश डबराल, पवनकारण, मदनकश्यप, जितेन्द्र श्रीवास्तव….जिन्होंने स्त्री जीवन की विडम्बनाओं को समान सहानुभूति से स्पर्श किया है ।इस फेहरिस्त में अभी और भी बहुत से नाम जोड़े जा सकते हैं किंतु दृष्टि बोध का बारीक़ अंतर फिर भी बना रहता है।वहाँ स्त्री की पीड़ा की टीस की समझ तो है लेकिन मुक्ति की वह छटपटाहट नहीं जिससे असमान सामाजिक व्यवहार वाली व्यवस्था के लैंडस्केप में परिवेर्तन किया जा सके।

इसके साथ-साथ, स्त्री रचनाकारों ने इस विशिष्टता की ओर भी संकेत किया है कि स्त्री-रचनाधर्मिता की अपनी विविधता है।उनका आग्रह, जीवन को खंड-खंड परखने का नहीं,वे उसे समग्रता से ही पहचानना और अपनाना चाहती हैं। स्त्री-कविता एक तरह से शब्दों के बीच की खाली जगह को भरने की कोशिश है।भविष्य की दिशा जेंडर विलोम की अपेक्षा जेंडर सहयोग की ओर संकेत कर रही है। स्त्री रचनाकार केवल स्त्रीवाद की ही बात नहीं करतीं, स्त्री अनुभवों की मार्फ़त दुनिया के तमाम वंचित समाजों से साझेदारी की कोशिश करती हैं। ऐसी ही भावना से प्रेरित होकर संभवतः पुरुष रचनाकार भी अपने भीतर स्त्री की तलाश कर रहे हैं। जेंडर और कविता के संबंधों में यह एक नई शुरुआत की पहल है।ये सभी दृष्टि बिंदु समान चिंता और चिंतन के पड़ाव हैं। देखना यह है कि उसमें स्त्री-कविता को कैसे लोकेट किया जा सकता है।

स्त्री-कविता और स्त्री-अस्मिता

कैद कई तरह की होती है….संबंधों
में स्त्री का मन घुटता है तो देह में आत्मा। स्त्री अस्मिता की पहचान इन बेड़ियों के पिघलने का अहसास है।  आज की कविता जिस मानव मुक्ति के अभियान को नयी ऊर्जा देने में तत्पर है स्त्री-चेतना उसका अभिन्न अंग है। मर्यादाओं के फ्रेम में जकड़ी स्त्री को समाज ने इतने अवसर भी नहीं दिए कि वह अपने भीतर की धड़कनें ठीक से सुन पाती।जब कभी उसने अपने मानवीय अस्तित्व को आवाज़ दी तब समाज में उस पर सब ओर से हमले होने लगे। इसी पीड़ा के एहसास ने उसके स्त्रीत्व और स्त्री रूप में उसकी अस्मिता को तीव्रतर किया है। ऐसे में स्त्री-अस्मिता की तलाश, ऐतिहासिक टकराहटों की पड़ताल बन जाती है।



स्त्री-कविता,  स्त्री अस्मिता के रास्ते में आने वाले अनेक संकटों और स्त्री जीवन की भीतरी और बाहरी टकराहटों को दर्ज करती है। उनकी लिखी कविताएँ उनके निजी अनुभवों के ताप से निखरी हैं। ये कविताएँ अपने आप से और अपने समाज से संवाद का ज़रिया हैं। समाज की चिंतनशील मनीषी इकाई के रूप में, उसकी संवेदनशीलता, सामाजिक ताने-बाने में जब उसे अपनी सही जगह तलाशने को प्रेरित करती हैतो उसका अस्मिता-बोध उसी में रूप ग्रहण करता है। इसके साथ-साथ परिवार, समाज, राजनीति, अर्थतंत्र, पर्यावरण—अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिन पर स्त्री की निजी राय हो सकती है। उन सबसे वह स्वयं को कैसे जुड़ा हुआ महसूस करती है यह सब भी उसके अस्मिता-बोध में शामिल है। स्त्री की देह, मन, मस्तिष्क एक ही इकाई हैं, इससे उसकी पहचान सबको साथ मिलाकर बनती है, खंड-खंड नहीं। स्त्री-अस्मिता के नाम पर बहुत बार उसके किसी एक ही पक्ष को देखा गया है जिससे कुछ अलग तरह के साँचे निर्मित होने लगते हैं और स्त्री का व्यक्तित्व बंद दराज़ों में बँटा-बँटा-सा दिखाई पड़ने लगता है। स्त्री मुक्ति का सपना इन सभी दायरों से मुक्त होने का सपना है…अपने भरे-पूरे होने का एहसास…सब कुछ साथ लाकर, साथ पाकर जीने का एहसास। इसी परिकल्पना में स्त्री-अस्मिता का पूर्णत्व छिपा है।

स्त्री-अस्मिता के इस स्वर को स्त्री रचनाकारों ने अपने साहित्य में सशक्त अभिव्यक्ति दी है लेकिन उनका यह प्रयत्न भी अजब षड्यंत्र का शिकार हुआ। ‘स्त्रीत्व’ का नया फ्रेम उसके इर्द-गिर्द जड़ दिया गया। स्त्री-रचनाकारों के लिए कविता लिखने का अनुभव, अपने स्त्रीत्व की नियति बदल देने जैसा रहा है लेकिन इस प्रक्रिया में सिर्फ वे ही नहीं बदलती सामाजिक मर्यादाओं के मानक साँचे भी बदल जाते हैं। इस तरह से ये कविताएँ नई सामाजिक संरचना में, स्त्री-दखल की प्रमाण हैं। यह भीड़ के बीच से गुज़रते हुये अपने एकांत का साक्षात्कार है जहाँ अपने आप से सिर्फ सच ही कहा जाता है।स्त्री-कविता की चिंता के घेरे में, सिर्फ उसके स्त्रीत्व का संकट ही नहीं है। उसका सरोकार क्षत-विक्षत मानवीयता को बचाने से जुड़ा है। वह सहभागिता चाहती है, नियंत्रण नहीं। यही स्त्री-स्वरों का समवेत स्वर है।

स्त्री-चेतना के प्रति सजगता ने, हमें अपनी साहित्यक परंपरा को फिर से देखने के लिये प्रेरित किया। हालाँकि ऐसा दौर काफी देर से आया। हमने मीरा के काव्य और महादेवी के गद्य में, स्त्री चेतना के प्रखर स्वर को पहचाना। सोलहवीं शताब्दी में रचे मीरा के पद और उनका जीवन, तत्कालीन पारंपरिक समाज को चुनौती देते हुये लगे। उनके सामाजिक विद्रोह की उर्जस्विता को प्रतिष्ठित करते हुये समाजशास्त्रियों ने उनकी कविता के नए भाष्य किये। उसके बाद ही समाज की दूषित और लादी गयी परम्पराओं के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाली स्त्री कवयित्रियों के साथ, स्त्री-कविता को अलग पहचान मिली।इस दृष्टि से इस अध्ययन में हिंदी की स्त्री-कविता के इतिहास को अलग स्थान दिया गया है।भारत में ईसा के ढाई-सौ वर्ष पूर्व जो संगम कविता लिखी गई,  उसमें स्त्री-कवियों की बड़ी संख्या है, उस कविता का संबंध, स्त्री के अंतर्जगत तथा बाह्य-जगत, दोनों से है। उसके बाद थेरी-गाथाएँ, भक्तिकाल में ललदेद, मीरा और अन्य संत कवयित्रियों तथा आधुनिक युग में मज़दूर, स्त्री-संघर्ष से जुड़ी आवाज़ों पर भी ध्यान देना होगा।



दरअसल, स्त्री-कविता स्त्री के जीवन के सारे घटना-क्रमों को अपने-अपने शिल्प के मुहावरों में कुछ इस तरह रच रही है कि उससे स्त्री-अस्मिता के विस्तृत परिदृश्य का ठीक-ठीक पता मिलता है|जब हम इन सातों कवयित्रियों की कविताओं को नज़दीक से जा कर पढ़ते और महसूसते हैं तो हमें उनकी अस्मिता की न जाने कितने ही रंग-रूप दिखाई देते हैं जिसमें वह समूचे संसार की स्त्रियों में शामिल हो कर अपने अस्तित्व को हर कोने को देखती हैं ।स्त्री-कविता के साथ, जो शब्द अभिन्न रूप से जुड़ा है, वह है–बहनापा। विश्व-भर की स्त्रियों ने अपनी मुक्ति के लिये एक दूसरे का हाथ पकड़ना स्वीकार किया है। इसमें केवल पश्चिमी देशों की स्त्रियाँ ही शामिल नहीं हैं बल्कि अपने पास-पड़ोस के देशों, चीन, कोरिया, जापान जैसे पूर्वी देश तथा अफ़्रीकी देशों की महिलाएँ, उनके सुख-दुःख सभी से एक साझेदारी का अनुभव शामिल है। इस दृष्टि से स्त्री-कविता की सामाजिक परिवर्तन में विश्व-स्तरीय भूमिका है। एक सुखद मानवीय समाज की परिकल्पना इसके माध्यम से नया स्वर ग्रहण कर रही है.
क्रमशः 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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मानवता के प्रति अपराध है बाल पोर्नोग्राफी

कादम्बरी

फ्रीलांस पत्रकार.स्त्री मुद्दों पर केन्द्रित पत्रकारिता करती है. सम्पर्क : kadambari1992@gmail.com



पोर्नोग्राफ़ी यौन अंग या गतिविधि का एक चित्रण या प्रदर्शन है। यह कामोत्तेजना  को प्रोत्साहित करता है। आम तौर पर, पोर्नोग्राफ़ी वयस्कों (18 वर्ष या उससे अधिक की उम्र के व्यक्ति) द्वारा, वयस्कों का उपयोग कर,  और वयस्कों के उपभोग के लिए बनाई जाती है। लेकिन यह प्रवृत्ति बदल रही है। अब, पोर्नोग्राफ़ी के क्षेत्र में, न केवल वयस्क परन्तु अधिक से अधिक किशोर और बच्चे जबरदस्ती अथवा स्वेच्छा से लिप्त हो रहे हैं। भारत में, निजी तौर पर अश्लील सामग्री को डाउनलोड करना और देखना कानूनी है, लेकिन  इसका  उत्पादन या वितरण अवैध है।


लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पोक्सो)


इस अधिनियम के तहत एक बच्चे का यौन उत्पीड़न, शोषण और  पोर्नोग्राफ़ी बनाना  दंडनीय अपराध हैं और इसमें कारावास का दंड अपराध के स्तर के आधार पर 3 साल से लेकर उम्रक़ैद तक  हो सकता है। यह अधिनियम प्रत्येक प्रक्रम पर बच्चों के सर्वोत्तम हित और कल्याण को सुनिश्चित करता है।


एक बालक के यौन शोषण में निम्न व्यवहार और दृश्य शामिल हैं : किसी भी शब्द को बोलना या ध्वनि निकलना, किसी भी प्रकार का इशारा करना या शरीर के किसी भी वस्तु या भाग का प्रदर्शन करना जिससे कि एक बच्चे को उसके शरीर या उसके शरीर के किसी भाग को प्रदर्शित कराया जा सके, बच्चे के शरीर के किसी भी भाग की या किसी यौन कृत्य में बच्चे की भागीदारी को किसी भी रूप या मीडिया में पोर्नोग्राफ़िक के लिए ऑब्जेक्ट् बनाना, पोर्नोग्राफ़ी उद्देश्यों के लिए एक बच्चे को मोहित करना।

माता-पिता के लिए ज़रूरी है कि वह अपने बच्चों को सही और गलत स्पर्श तथा सही और गलत दृष्टि के बारे में बताएं। उन्हें इसके बारे में जागरूक करें और प्रोत्साहित करें कि वे अपने माता-पिता और अपने शिक्षकों पर भरोसा करें। तथा यदि कुछ गलत लगता है या गलत महसूस होता है तो उसे तत्काल अपने माता-पिता अथवा शिक्षकों को बताएं चाहे ग़लती करने वाला व्यक्ति कोई पारिवारिक  सदस्य या मित्र से भी जानकारी दें। तथा उन्हें सिखाएं की वे डरें नहीं।

बाल पोर्नोग्राफी के प्रकार
1.  सेक्स व्यापार उद्योग
2. स्व-रचित पोर्नोग्राफी

1. सेक्स व्यापार उद्योग : ये उद्योग डिजिटल मध्याम जैसे फ़ोटो, कार्टून, एनीमेशन, ध्वनि रिकॉर्डिंग(ऑडियो), एम,एम,इस, वीडियो गेम , ऑनलाइन अभिलेख, फ़िल्म, तथा प्रिंट मध्याम जैसे कॉमिक्स, कार्ड, पोस्टर, किताबें, पत्रिकाएं, चित्रकला के द्वारा बाल पोर्नोग्राफी का व्यापार करतीं हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के एक अध्ययन में पाया गया कि ये उद्योग पोर्नोग्राफी के लिए ज्यादा-से-ज्यादा किशोरों के इस्तेमाल कर रहे हैं।

बाल पोर्नोग्राफी का वर्तमान दृश्य बहुत ही भयानक और चिंताजनक है। 2007 में, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने बाल शोषण पर एक अध्ययन किया था। इस अध्ययन के अनुसार, 12,446 बच्चों में से, 4.46% का नग्न फोटोग्राफ लिए गये। और इन बच्चों में 52.01% लड़के थे और 47.9 9% लड़कियां थीं।

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार

2011 में गृह मंत्री राज्य मंत्री एम. रामचंद्रन ने लोकसभा में  राज्यानुसार उन बच्चों का प्रतिशत बताया जिनकी नग्न फोटो ली गयी थी। देश भर में दर्ज मामलों की संख्या 2007, 2008, और 2009 में क्रमशः 99, 105 और 139 थी। महाराष्ट्र में आंकड़े क्रमश: 27, 17 और 25 थे। केरल में, आंकड़े इसी अवधि के लिए 20, 39 और 44 थे।

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार -2

बच्चों के व्यवसायिक यौन शोषण (सीएसईसी)


किसी तृतीय पक्ष द्वारा नकदी या वस्तु के वित्तीय लाभ के लिए तस्करी, बिक्री और बाल विवाह जैसी व्यवस्थाएं बच्चों को यौन साथी के रूप में पेश करती हैं। आगरा-दिल्ली-जयपुर के त्रिभुज बेल्ट पर पारंपरिक मनोरंजन समूह में कई समुदाय शामिल हैं। इन समुदायों की लड़कियों अपनी देह व्यापर से परिवार का लालन-पालन करती हैं। ये समुदाय अपनी बेटियों को यौन मनोरंजन से कमाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं और उन्हें यह विश्वास दिलाते हैं कि यही उनका एकमात्र व्यवसाय है।



2. स्व-रचित (बाल) पोर्नोग्राफी : बच्चों द्वारा स्व-निर्मित खुद का अश्लील चित्र। मुखर यौन चैट, सेक्सटिंग तथा खुद से या खुद की नग्न तस्वीरों का वयारल वितरण करना जिसे साइबर तांक-झांक कहते हैं, शामिल है।
नई तकनीक के आगमन और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच के साथ-साथ जोखिम के कारकों में वृद्धि हुई है। दुर्व्यवहार करने वाले और पीडोफाइल इंटरनेट की ओर बढ़ रहे हैं। और वे बच्चों को मेनिप्यूलेट, प्रभावित और फुसला रहे हैं। यह प्रवृत्ति बहुत अधिक हानिकारक है क्योंकि बच्चों को उनकी इच्छा के खिलाफ मजबूर नहीं किया जाता है, बल्कि स्वेच्छा से भाग लेने के लिए ब्रेनवॉश किया जाता है। क्योंकि उनकी अपरिपक्वता के कारण वे अपने कर्मों के परिणामों को समझने में असमर्थ हैं और छल साधने इस का लाभ उठाते हैं। इंटरनेट उद्योग ने माता-पिता को कई फ़िल्टरिंग सिस्टम प्रदान किए हैं जैसे साइबर वॉच, नेट नेनी और साइबर नेनी आदि।  लेकिन ये सिस्टम कोई भी वास्तविक समाधान को प्रदान नहीं करती हैं, बल्कि ये केवल शॉर्टकट हैं जो बड़ी समस्या को अनदेखा कर रहे हैं।

वे लाइव पोर्न में प्रदर्शन के पूर्व ईश्वर को प्रणाम करती हैं !


सेक्सटिंग:
सेक्सटिंग एक हाल ही में बढ़ती हुई प्रथा को दर्शाती है जिसमें लोग सेल फोन या कंप्यूटर और मैसेजिंग एप्लिकेशन का उपयोग करके  स्वयं की नग्न या अर्द्ध-नग्न छवियों दूसरों को (जैसे मित्र या डेटिंग साथी) भेजते हैं। इसमें स्वयं खिंची फोटो, लिखित यौन संदेश, एमएमएस, वीडियो, ऑडियो आदि शामिल हैं।

लोग पोर्न क्यों देखते हैं? (पोर्नोग्राफी की खपत)


पोर्नोग्राफी कल्पनाओं (प्रकृति), श्रेणियों और क्रूरता से भरा हुआ है,  पोर्नोग्राफी कल्पनाओं (प्रकृति), श्रेणियों और क्रूरता से भरा हुआ है जो देखने वाले के पशु पक्ष को प्रज्वलित करता है, और धीरे धीरे एक लत में बदल जाता है। पोर्न कई प्रकार की शैली, विधि और कल्पनाओं को दिखाती है और यह मानसिकता विकसित करती है कि पोर्न ही सबसे अच्छा तथा बहुत बढ़िया सेक्स है। यह खुद को व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने वाले एक शिक्षक में बदलती है। यह हताशा से बचने के लिए यौन ऊर्जा को निकालने के लिए कहती है; किशोरावस्था में बच्चों को यौन शिक्षा सीखने का दावा करती है, जानकरी देने का दावा करती है जो यौन रिश्ते बनाने में क्या करना है और कैसे करना है।लेकिन दुर्भाग्यवश, इसमें कोई आत्मीयता और प्रेम शामिल नहीं होता है बल्कि यह निष्कपट, कल्पना-आधारित विषयों को प्रस्तुत करती है जो सेक्स को संदर्भ के बाहर कर देती है और दर्शकों के मनोरंजन के लिए फूहड़ता दिखती है।

लोग पोर्न क्यों बनाते हैं? (पोर्नोग्राफी का निर्माण)


बच्चों के बहुत कम उम्र में यौन सामग्रियों से अवगत होने के कारण वे कम उम्र में ही परिपक्व होते जा रहे हैं। इस कारण, बच्चों को अश्लील देखने की आदत के दुष्प्रभाव और नतीजे नहीं पता होते हैं, और कुछ समय बाद वे इसके आदी हो जाते हैं। बच्चे वयस्कों की नकल करते हैं, चाहे वे उनके माता-पिता हों, पड़ोसी हों, रिश्तेदार हों, फिल्म नायक-नायिका हों, या पोर्न अभिनेता हों। ठीक उसी तरह बच्चे बड़ो की कार्यों तथा उनके क्रियाओं की भी नकल करते हैं। नकल की शुरूआत होती है पोर्न देखने से होती है, फिर पोर्न का तथा उसकी क्रियाओं का अनुकरण होता है, और समय के साथ यह अधिक तीव्र होती जाती है। पोर्न का यह निर्विवाद शिक्षण बच्चों को असंवेदनशील बनाता है, और दुनिया व् समाज का ज्ञान न होने के कारण, वे शोषण करने वालों की चपेट में आ जाते हैं। एक समय के बाद बच्चों में पोर्नोग्राफ़ी की लत, उसकी नकल और असंवेदनशीलता उन्हें सरेआम कामुक व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती है। इस वजह से, वे सामाजिक रूप से व्याकुल हो जाते हैं, कमजोर हो जाते हैं, आत्म नियंत्रण खो देते हैं और अलग महसूस करते हैं।

निष्कर्ष (वास्तविक समाधान):


बाल पोर्नोग्राफी दिन-प्रतिदिन बढती जा रही है। इस समस्या को इसकी जड़ों से बाहर निकालना ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। हमें वास्तविक समस्या और कारणों पर ध्यान देने की जरूरत है जहां से यह सब शुरू होता है; और वह बचपन से है, एक व्यक्ति की परवरिश से है। माता-पिता को न केवल अपने बच्चों को उन पर विश्वास करने के लिए करना चाहिए हैं, बल्कि उनके साथ समय भी बिताना चाहिए। उन्हें अपनी किशोरावस्था की परेशानियों और चुनौतियों के बारे में बताएं, उन्हें उनके शारीरिक परिवर्तनों के बारे में सूचित करें और उन परिवर्तनों के बारे में सहज महसूस करायें। जब बच्चे अपने माता-पिता पर भरोसा करते हैं, सही और गलत के बीच का अंतर पहचानते हैं, तब उनमें आत्मविश्वास भर जाता है और वे अप्राकृतिक अभिलाषाओं से नहीं घिरते हैं ना ही पर्नोग्राफ़ी में लीन होते हैं, न किशोरावस्था में ना बढे होने के बाद। उनकी गलतियों में सहायता करना और उनके फैसले पर भरोसा करना इस बड़ी समस्या को हल कर सकता है और पोर्नोग्राफी को जड़ से उखाड़ सकता है।

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स्त्री-कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार

रेखा सेठी

  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित
संपर्क:reksethi@gmail.com

कविता हमेशा से ही मेरे लिए, अपने भीतरी अंतरद्वंद्वों और उस दुनिया की बीहड़ तल्खियों-टटकी उमंगों की हज़ारों बानगियों को नज़दीक से, समझने-जानने का बेहद खूबसूरत ज़रिया रही है। कविता की दुनिया अपने सच को पा जाने की दुनिया है। एक बड़बोले समय में जीवन के आतंरिक सच का अनुभव। दुनिया-भर के कवियों ने आक्रामक और हिंसक समय में अपनी स्वाधीनता व सृजनशीलता को बचाए रखने के लिए कई खतरे उठाये हैं। स्त्री रचनाकारों की कविताएँ भी इस जोखिम से अछूती नहीं हैं। उनका संघर्ष और भी विकट है क्योंकि वहाँ दुनिया के इस भूगोल के साथ-साथ स्त्री-चेतना का वह आतंरिक भूगोल भी है, जिसका मानचित्र हर पल उसकी कलम से गढ़ा जाता है।

स्त्री-कविता के इस संसार में अनेक प्रश्न हैं जिनका संबंध, स्त्री-अस्मिता तथा कविता और जेंडर के आपसी संबंधों से है। मेरे ज़ेहन में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कविताओं में उनके भीतर की स्त्री, अपने व्यक्तित्व की कितनी परतें खोल पाती है ? इन रचनाकारों का स्त्रीत्व उनकी कविताओं को कितनी दूर तक प्रभावित करता है ? अपनी अभिव्यक्ति को औज़ार की तरह इस्तेमाल करने वाली स्त्री-कविता का कितना हिस्सा अभी भी नेपथ्य की ओटमें है ? स्त्री रचनाकारों का रचना-धर्म, स्त्री-विमर्श की उठती लहरों, साहित्यिक आलोचना के स्थापित मानदंडों से कैसे टकराता है? ऐसे अनेक सवाल मन को लम्बे समय से घेरे रहे हैं। इन्हीं के समकक्ष रहे स्त्री-जीवन के अंतर्विरोधों से जुड़े वे यक्ष-प्रश्न जिनका सामना हर स्त्री को कभी न कभी करना पड़ता है।

साहित्य की दुनिया में नब्बे के बाद से अस्मितावादी साहित्य के उभार के साथ स्त्री-कविता अपने लिए नयी ज़मीन तैयार करती दिखाई पड़ती है। स्त्री-विमर्श ने इसे अलग ढंग से पोषित करते हुए पैनी धार दी।इसके बावजूद, ऐसा नहीं है कि इस कविता का भाव जगत इतना सीमित रहा हो लेकिन चर्चा के केंद्र में यही सरोकार रहे। ज़ाहिर तौर पर इसके दो प्रभाव हुए। कुछ स्त्री रचनाकारों ने अपने लिए यह दायरा चुन लिया और दूसरा, औरों ने भी इस कविता को सीमित नज़र से देखना शुरू किया। तब मन में यह जिज्ञासा जगी कि यदि इस साहित्य को अस्मिता के लेंस से न देखकर, साहित्य की अविरल परंपरा में देखा जाये तो उसके परिणाम क्या होंगे ?

इसी विचार से प्रेरित हो मैंने वर्ष 2015 में ‘स्त्री-कविता की पहचान’ शीर्षक से एक प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया।मेरा यह मानना है कि अब तक सभी स्त्री-रचनाकारों की कविताओं को केवल, स्त्री विमर्श के फ्रेम में देखा गया है। उनकी कविताएँ अक्सर स्त्री विमर्श की प्रपत्तियों में उदाहरण-स्वरुप रखी गई हैं और उन कविताओं के परिदृश्य से बाकी सरोकारों को गायब कर दिया गया। इसलिए स्त्री-कविता में अपनी पुख्ता पहचान बनाने की स्पर्धा रही है। कविता के वजूद और अंतर्विरोधों से सीधे मुठभेड़ करने का यह मौका, मुझे उन गहराइयों तक ले गया जिनके होने का अहसास मुझे पहले नहीं था।

सबसे पहली दुविधा स्त्री-कविता, पदबंध के चुनाव को लेकर रही। मैंने स्त्री रचनाकारों की कविताओं पर अपने अध्ययन को केंद्रित करने के कारण ही इसे स्त्री-कविता कहना उपयुक्तसमझा लेकिन यह शंका बनी रही कि क्या ‘स्त्री’ कविता के विशेषण रूप में इस्तेमाल हो सकता है ? इसमें मतभेद हो सकते हैं क्योंकि स्त्री-कविता का आशय निश्चित नहीं है। यह स्त्रियों की कविता है, स्त्री-मन की कविता या फिर स्त्री के प्रति सहानुभूतिपूर्ण स्वर की कविता, इस पर एकमत नहीं हुआ जा सकता। प्रत्येक पाठक का अपना व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है, हालाँकि ये सभी अंतर्ध्वनियाँ इस पदबंध में समाहित हैं।इस सन्दर्भ में मैंने समकालीन सात कवयित्रियों से बातचीत की।गगन गिल, कात्यायनी, अनामिका, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, सुशीला टाकभौरे और निर्मला पुतुल—हमारे युग की प्रतिनिधि रचनाकार हैं। संवेदना के धरातल पर अपने युग-यथार्थ से जुड़ने की उनकी दृष्टि एक-दूसरे से भिन्न है। इसलिए सबके विचारों के समवेत से एक मुक्कमल तस्वीर बन सकेगी ऐसा मेरा विश्वास है।

अपने अध्ययन में मेरे सामने, ये सात कवयित्रियाँ अपने काव्य-जगत के साथ मौजूद रही हैं। मेरे लिये यह देखना बहुत दिलचस्प रहा कि इन सातों कवयित्रियों की कविताओं की परछाईयाँ, एक दूसरे को छूती हुई भी जान पड़ती हैं और स्त्री-अस्मिता के मुद्दे पर एक दूसरे से बिलकुल अलग भी हैं। जाति और वर्ग के बदलते समीकरणों में अस्मिता का स्वरुप व प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। एक और सवाल जो परेशान करता रहा है वह हमारी सामाजिक संरचनाओं में जेंडर की लगभग अलंघ्य स्थिति को लेकर है, ‘क्या यह समाज, जेंडर सेंसेटिव से बढ़कर जेंडर न्यूट्रल हो सकता है ?’ सब चाहते हैं कि, ‘समाज और कविता, दोनों जेंडर न्यूट्रल हों’ लेकिन कविता और साहित्य, इस संभावना को कैसे जगा सकेंगे, यह महत्वपूर्ण है।

क्रमश:


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ग्रामीण सामूहिकता में अकेला रोता हंस



मनीषा कुमारी 


मैं कहानियों  और साहित्य की बिलकुल नई पाठक हूँ. मनोविज्ञान की विद्यार्थी रही हूँ, 12 वीं तक विज्ञान की किताबों  से साबका रहा उसके बाद  मनोविज्ञान की किताबों से . यह संयोग ही है कि पहली साहित्यिक समीक्षा भी जिस लेखिका की कहानियों पर अपनी बात कह रही हूँ, वह भी मनोविज्ञान की छात्रा रही हैं. स्वाभाविक है लेखिका  सिनीवाली की कहानियों में मनोविज्ञान एक विशेष पहलू है  और मैं भी वहाँ पात्रों के मनोविज्ञान को ही समझती रही.  कहानी संग्रह ‘ हंस अकेला रोया’ कुल 8 कहानियां हैं, लगभग सभी कहानियां ग्रामीण परिवेश में घटित हैं.

शीर्षक कहानी ‘हंस अकेला रोया में’  लेखिका ने समाजिक दवाब के साथ -साथ मनोवैज्ञानिक मनोदशा को भी बखूबी दर्शाया है.किस तरह से लोग समाज के बनाये भवंर जाल में फंसते जाते है.. विपिन के पिता के देहांत के बाद विपिन पर सामाजिक दवाब बनाया जा रहे है .दान-दक्षिणा से लेकर पंडित  के गौ दान और  फलाहार तक में कर्मकांड के पाखंड हैं.  इस लम्बी  कहानी का नायक बिपिन न चाहते हुए भी सामाजिक दवाब के आगे झुकता जाता है. होता यही है एक व्यक्ति के मानोविज्ञान को तय करने ,में समाज की बड़ी भूमिका होती है और यदि वह इस सामाजिक दवाब के खिलाफ अड़ जाता है तो उसकी इच्छाशक्ति महत्वपूर्ण हो जाती है, मजबूत इच्छाशक्ति है तो ठीक अन्यथा मनुष्य पराजित होता है. कहानी के अनुसार , ‘ विपिन कर्ज लेकर और पत्नी के गहने बेच कर इस सामाजिक कुप्रथा का निर्वाह करता है -पशु -पक्षी से लेकर आदमी तृप्त हो गया भोज खाकर. पर इस तृप्ति , प्रशंसा से क्या उसके परिवार का कर्ज उतर जाएगा या उसके परिवार को भूखा नही रहना पड़ेगा ? श्राद्ध के बाद उसकी सबसे बड़ी चिंता है कि कैसे चुकायेगा वह कर्ज’. मुझे यह कहानी पढ़ते हुए लगा कि एक ओर तो  कहानी का नायक सामाजिक मनोविज्ञान और दवाब के आगे घुटने टेक देता है, दूसरी ओर कहानी भी उसके जद्दोजहद को दिखाने के अलावा कोई  ख़ास आदर्श स्थापित नहीं कर पाती हैं, कहानी के अंत में श्राद्ध  का विरोध नहीं होता है बल्कि शास्त्र की दलील देकर श्राद्ध की अनिवार्यता ही सिद्ध करती है. कहानी का अंत है, ‘ जबकि शास्त्र भी कहता है कि कर्ज लेकर श्राद्ध नही करनी चाहिये पर धर्म के नाम पर ही कहाँ सुनता है समाज, शास्त्र और रामायण की बाते और बिपिन के आंसू….’

‘उस पार ‘  कहानी में लेखिका ने बिहार के ग्रामीण परिवेश को बखूबी दर्शाया है. एक पिता किस तरह आर्थिक तंगी के कारण पैसे के अभाव में अपनी बेटी का  विवाह वित्तरहित किरानी से कर देते हैं  हमारे समाज में बेटी को बोलने का अधिकार नही दिया गया है.बेटी को सिर्फ सुनना ही है बोलना कुछ भी नही. खास कर  विवाह उपरान्त बेटी को मायके में बोलने का अधिकार ख़त्म हो जाता है इस कहानी में एक पिता के जीवन की असफलता ,आर्थिक स्थिति ,नीरसता को भी दर्शाया  गया है, साथ ही पिता के सम्पति में बेटी का कोई अधिकार नही होता है उसका न सिर्फ परिवार से गाँव समाज सबसे नाता टूटता है वो सबके लिए पराई हो जाती है.

पेंडुलम

‘सिकडी कहानी’  में लेखिका ने स्त्री के आभुषण प्रेम के साथ – साथ सोना और सुखी जीवन के गठजोड़ को भी बखूबी बताया है स्त्री के लिए विपत्ति के समय जेवर ही सबसे बड़ा सहारा होता है . सिकडी कहानी में सिकडी को लेकर शक की सुई कई लोगों पर घूमती है और सोचने की प्रक्रिया शुरू होती है लेकिन अंत में इस बात पर आकर अटक जाती है कि आखिर सिकडी गई तो कहाँ गई .

‘नियती’ कहानी में लेखिका ने स्त्री के सामाजिक और मानसिक मनोदशा को बताया है इस कहानी में उन्होंने एक स्त्री के अपने पति के खो देने  का डर ,समाज  और संस्कार का डर और किसी  भी हाल में अपने पति की प्रतिष्ठा पर आंच न आने देने का डर ने सबकुछ जानते हुए  भी अपनी बहु के लिए न्याय के पक्ष में खडी नही होती  है और एक हद तक इन्ही सब कारणों ने विमला को भी मानसिक उत्पीडन सहते हुए  चुप रहने को विवश किया  है,  वही दूसरी ओर विमला जो एक ग्रामीण स्त्री है उसके  साहस को भी दर्शाता है कि किस तरह जब उसके गर्भ में पल रहे अनचाहे बच्ची को गिराने की बात जब उसकी  सास कहती है तो इस जुल्म के खिलाफ खड़ी हो जाती है.  खुद को दैहिक शोषण से बचा नहीं पाती है लेकिन अपनी बच्ची को किसी भी हद तक जाकर बचाना चाहती है.   इस समाज की झूठी मायाजाल ,कूरीतियाँ ,रीतिरिवाज के कारण बलात्कृत पुरुष( ससुर )के पक्ष में लोग खड़े हो जाते है और शोषित बहु (विमला) को झूठी ,पगली और मानसिक विक्ष्प्ता समझाता जाता है

‘चलिये’ अब कहानी में लेखिका  ने भौतिकवादी परिस्थितियों के आगे इंसान को घुटने टेकते हुए दिखाया है आज  व्यक्ति   पैसे के लालच में इस कदर अंधा हो गया है कि हर रिश्ते से विश्वास उठ गया है परमानंद बाबु की पत्नी के देहांत के बाद हर लोग उन्हें अपने साथ ले जाना चाहते है किन्तु जैसे ही पता चला कि उनके पास देने के लिए कुछ नहीं है सबने अपना-अपना रिश्ता तोड़ लिया अर्थात् व्यक्ति की  जैसे जैसे परिस्थितियों बदलती है व्यक्ति के साथ रह रहे लोगों के व्यवहार में परिवर्तन होते जाता है इसके अलावा इस कहानी में पत्नी-पति के प्रेम और बिछड़ने की मनोदशा को अच्छे तरह से दर्शाया है.उनके निश्छल प्रेम को बयाँ किया है परिवार के लोगों  द्वारा  अपमानित होनो के बाद भी घर छोड़ कर जाना नही चाहते है. उनको लगता है कि अगर वो चले गए तो उनकी पत्नी कहीं आकर उनका इन्तजार करेगी और उनके न रहने पर वे परेशान होंगी



घर कहानी में लेखिका ने आज के बदलते दौर में एकल परिवार के बढ़ते प्रचलन को दर्शाया है आज संयुक्त परिवार का दौर ख़त्म हो गया है अब बच्चे जैसे बड़े होते है वैसे ही घर की बंटवारे  की बात करते है. लोग अब हम से अलग होकर अपना घर बनाना चाहते है.

संग्रह पठनीय है. ग्रामीण भारत की कहानियों से जोड़ता है. बिना किसी नोस्टेल्जिया के गाँव के यथार्थ से जोडती है.

कहानी संग्रह : हंस अकेला रोका
लेखिका : सिनीवाली
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, 0141 2503989, 9829018087
प्रकाशन: 2016

समीक्षक मनोविज्ञान पढ़ाती हैं: संपर्क: manishamishra5559@gmail.com

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वासना नाजायज नहीं होती: लिपिस्टिक अंडर बुर्का बनाम बुर्के का सच

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

‘लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का’ स्त्री जीवन की सच्चाइयों को कई पर्तों में हमारे सामने रखती है। यह फिल्म परंपरा और आधुनिकता की उलझन में उलझी स्त्रियों की ज़िंदगी की दासतान है। जो न तो पूरी तरह से आधुनिक बन पाती हैं और न ही पूरी तरह से परंपरा को खारिज कर पाती हैं। ‘लिपिस्टिक’ आधुनिकता,रंगीन ख्वाइश और बाज़ार का प्रतीक है जबकि ‘बुर्का’ परंपरा और स्त्रियों पर लगाए गए पितृसत्तात्मक पहरे का। यहां अपने सपनों को पूरा करने की लालसा में परंपरा और आधुनिकता का मिलन दिखता है पर चोरी-चोरी। चोरी-चोरी इसलिए क्योंकि हमारे समाज को खुलापन पसंद है लेकिन स्त्रियों के संदर्भ में नहीं। चार स्त्रियों की ज़िदगी बुर्के के अंदर कैद है जिससे बाहर निकलने की छटपटाहट उन्हें चोरी छिपे वह सबकुछ करने को मजबूर करती है जो समाज के नज़र में गलत है।

बुआजी (रत्ना साह) की कहानी फिल्म में ऐसी औरत के रूप में सामने आई है जो परिवार की मुखिया है। साहसी है लेकिन साहस उसके व्यापार और परिवार तक है जहां वह हवाई महल की मालकिन के रूप में सामने आती है। उसकी बौद्धिकता और परिपक्वता के सामने बड़े-बड़े बिल्डर भी खुद को हारा हुआ मानते हैं। चौकाने वाली बात यह है कि बात जब उनके सपने की आती है तो वे खुद को इतना कमजोर क्यों समझती हैं। एक लड़का सामने से उनकी इज्जत उछाल कर चला जाता है और बदले में वे उसे कुछ नहीं कहती। क्या बड़े उम्र की औरत का मन भी बूढ़ा हो जाता है? उम्र तो शरीर की बढ़ती है मन की नहीं। जवानी में विधवा हो गई बुआजी  का कसूर क्या था कि उनसे उनके सपने देखने का अधिकार छीन लिया जाता है। कृष्णा सेबती ने ‘मत्रों मरजानी’ में भी इस अहम प्रश्न को उठाया था। गौर करने वाली बात यह है कि बुआजी को स्वीमिंग सिखाने वाले उस लड़के में ऐसा क्या दिखता है कि वे उम्र का लिहाज भूल जाती हैं। क्या वे व्यभिचारी थीं, क्या उन्होंने कभी किसी और के साथ संबंध स्थापित किया था , नहीं बिल्कूल नहीं। वे अपनी उम्र और कायदे को जानती थीं। उन्हें सभी (बच्चे, बूढ़े,जवान) बुआजी के नाम से ही बुलाते थे जिसमें सिर्फ बड़ा हाने का अहसास और रिश्ता है। पर जब वे स्वीमिंग पूल में डूबती हैं और बचाने वाला युवक उनका नाम पूछता है तो थोड़ी देर वे सोचने लगती हैं फिर अचानक कहती हैं ‘बुआजी’ जबकि यह उनका नाम नहीं । युवक के फिर से पूछने पर वे अपना नाम बताती हैं ‘उषा’। उषा नाम में पहली बार उन्हें अपनी पहचान का अहसास होता है। यह नाम एक महिला का है जो कि सिर्फ एक स्त्री है किसी की बुआ नहीं। इसलिए सिर्फ एक स्त्री के रूप में वह अपने अरमानों के अहसास में बहने लगती हैं। एक स्त्री मन जिसे सपने देखने की आज़ादी नहीं वह बुर्के के अंदर लिपिस्टिक लगा कर रंगीन जीवन के सपने देखने लगती है। उसने सामने से उस लड़के को कभी अपनी सच्चाई नहीं बताई क्योंकि अपनी उम्र का लिहाज उसे है। लेकिन क्या करे उस मन का जो बिन पानी सफरी सी छटपटाता है। ऊपर से परंपराओं का इतना सख्त पहरा। इसमें बुआजी परंपरा नहीं तोड़ती न ही युवक के सामने कोई अपील करती हैं। परंपरा से बिना टकराए अपने रंगीन पंख से ख्वाइशों  की दुनियां में उड़ना चाहती हैं।

शीरीन अस्लम(कोनकोना सेन) के माध्यम से ऐसी स्त्री चरित्र को सामने लाया गया है जो हमारे समाज में भरी पड़ी हैं। जिन्हाने अपने शरीर का मालिक अपने शौहर कों बना रखा है। धूमिल की एक प्रसिद्ध पंति इस संदर्भ में याद आती है कि ‘हर तीसरे गर्भपात के बाद , औरत धर्मशाला हो जाती है।’ शीरीन अस्लम एक सेल्स गर्ल होते हुए भी बच्चा पैदा करने की मशीन के रूप में जानी जाती है। वह सिर्फ शरीर बनकर पति के साथ रहती है। छिप कर काम करती है। नौकरी करना कोई बुरी बात नहीं लेकिन पति की पितृसत्तात्मक सोंच के आगे वह मजबूर है। नौकरी करके वह अपनी ख्वाइश और सपने तो पूरी करती है लेकिन पति को पता चलते ही हार मान लेती है। ये एक ऐसी औरत है जो पितृसत्ता और परंपरा का विरोध नहीं करती, ज़िंदगी तो जीती है लेकिन अपनी शर्तों पर नहीं। हमारे समाज की सच्चाई यही है क्योंकि शर्तों की ज़िंदगी जीने के लिए जो अधिकार उसे चाहिए वो उसके पास नहीं है।



लीला (अहाना कुमरा) परंपराओं को चुनौती देकर अपने सपनों को पूरा करना चाहती है लेकिन सपनों तक पहुंचने के लिए जो सीढ़ी वह चुनती है वह बीच में ही उसे गिरा देता है। वह परंपरा की नहीं परिस्थिति की गुलाम बन कर रह जाती हैं। दो नांव पर सवार यात्री की तरह वह बीच भंवर में ही फंस जाती है।

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का : क़त्ल किए गए सपनों का एक झरोखा

रेहाना अबीदी (प्लाबिता बोर्थाकुर) एक ऐसी नौजवान लड़की है जो निहायत परंपरावादी परिवार से है। इसके परिवार में पढ़ने की छूट है पर विाचारों में बदलाव की कोई गुंजाइश  नहीं। आधुनिकता से इस परिवार का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं इसलिए शीरीन बुर्का पहनकर कॉलेज के लिए निकलती है जबकि बुर्के के अंदर की सच्चाई कुछ और है। संगीत में रचा बसा  उनका मन उसे वो सबकुछ करने की इजाजत देता है जो उसकी परंपरा के खिलाफ है। वह अपने को आधुनिक भी दिखाती है और अपने सपनों को भी पूरा करना चाहती है इसलिए वह सिगरेट, शराब भी पीती है। म्यूजिक बैंड में षामिल होने के लिए खुद को मार्डन लड़की के रूप में पेश भी करती है और सारी हदे पार करके चोरी तक करती है। आज कल स्कूल-कॉलेज में भी कई छात्र-छात्राएं आधुनिकता की चकाचौंध  में शामिल होने के लिए गलत रास्ता अपना लेते हैं जैसा कि रेहाना अबीदी करती है। इसके पीछे उसका कोई गलत इरादा नहीं होता क्योंकि उसे सिर्फ अपने सपने दिखते हैं जो उसके अब्बू-अम्मी कभी पूरे नहीं होने देते।

अतः हम कह सकते हैं कि ये चारों स्त्रियां बिना परंपरा से पंगा लिए अपनी-अपनी सपनों की दुनियां में निकल पड़ती हैं लेकिन सपना टूटते ही जब वे हकीकत की दुनियां में आती हैं तो इस समाज की जिल्लत झेलती हैं। बंद कमरे में जीने के लिए बेबस सिगरेट के धूएं में अपनी परेशानियां उड़ाती नज़र आती हैं। कहीं न कहीं पितृसत्तात्मक समाज मुंह उठाए उन्हें चुनौती देता है कि हमारी बनाई दुनियां में तुम्हें बुर्के में ही जीना होगा। तुम्हारी कामना, तुम्हारा लस्ट, तुम्हारी वासना नाजायज है. यह सच है कि वासना नाजायज नहीं एक व्यक्ति की देह का जायज सच है, लेकिन जीना हकीकत  की दुनियां में है जहां परंपरा, आदर्श और नैतिकता का दावेदार पुरुष है। हां ये सच है कि ये औरतें खुला विद्रोह नहीं करती लेकिन औरत और उसके जीवन की जमीनी सच्चाई को पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तूत करती हैं। फिल्में समाज का आइना होती हैं वे हमें आइना दिखाती हैं। निर्णय हमें करना होता है। इस अर्थ में ये स्त्रियां स्त्री संसार की सच्चाइयों का आइना प्रस्तुत  करती हैं।

सावधान ! यहाँ बुर्के में लिपस्टिक भी है और जन्नत के लिप्स का आनंद लेती उषा की अधेड़ जवानी भी

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जेंडर और विज्ञान: एक नारीवादी परिप्रेक्ष्य

अतुल कुमार मिश्र

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा  में शोधार्थी है. सम्पर्क :  atulmishra.mediagroup@gmail.com

Representation of the world like the world itself is the work of men; they describe it from their own point of view, which they confuse with the absolute truth. : Simone de Beauvoir


Science, it would seem, is not sexless: he is a man, a father and infected too. : Virginia Woolf

ज्ञान को एक सत्ता के रूप में व्याख्यायित करते हुए (Knowledge is power) मिशेल फूको जब समाज में व्याप्त श्रेणीबद्ध ज्ञानात्मक विभाजन की बात करते हैं, तो ज्ञान की प्रभुत्वशाली सत्ता-संरचना और इससे निर्मित भेदभावपूर्ण सत्ता-संबंधों का यह सैद्धांतिक विश्लेषण अब तक शाश्वत माने जाते रहे मुख्यधारा के ज्ञान-विज्ञान को अचानक से कुछ मूलभूत सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है। मसलन ‘किसका ज्ञान’ और ‘किसके बारे में ज्ञान’ जैसे सवाल हाशिए के नए विमर्शों द्वारा बड़े पैमाने पर सामने आते हैं और इन सवालों की रोशनी में ही हाशिए के विमर्शों का नया ज्ञानशास्त्र आकार लेता है। क्योंकि ज्ञान अगर ‘जानने’ और ‘न जानने’ वाले के बीच एक भेदभाव पूर्ण फर्क पैदा करता है तो एक ज्ञानमूलक समाज अपनी आधारभूत निर्मिति में ही ऊंच-नीच के भेद पर आधारित (hierarchical) समाज होगा और चूंकि सभ्यता की ‘तथाकथित’ विकास-यात्रा ज्ञान की ही यात्रा रही है, इसलिए ज्ञान के विकास के साथ ज्ञानात्मक समाज में अंतर्व्याप्त यह विभाजन और भी गहरा होता जाएगा, खासकर तब अगर सभी को ‘ज्ञान’ तक पहुँच के समान अवसर न मिलें या फिर कुछ खास तरह के ‘ज्ञान’ को ही वैधता दी जाए और शेष लोगों/समूहों के ज्ञान को ‘ज्ञान’ के बतौर मान्यता ही न मिले। इस प्रकार फूको के मुताबिक ‘ज्ञान’, एक ताकत के रूप में सामाजिक संरचना की श्रेणीबद्धता को निर्धारित करता है और एक सत्ता संरचना के बतौर सामाजिक विभेदों को जन्म देने या उन्हें समयानुसार नए सिरे से अनुकूलित करने का काम भी करता है। अब चूंकि विज्ञान; हर तरह के ज्ञान का चरम है, इसलिए वस्तुनिष्ठता एवं सार्वभौमिकता के अपने दावों और विशिष्टता एवं प्रायोगिकता की अपनी क्षमताओं के चलते यह विज्ञान, ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक के रूप में  हमारे सामने आता है और आधुनिकता के साथ हम इस ‘वैज्ञानिक ज्ञान’ के ‘आभामण्डल’ को हर तरफ फैलते हुए भी देख सकते हैं। इसके अंतर्गत जहां एक तरफ ‘ज्ञान-संस्थानों’ के जरिए ज्ञान-समाज (नॉलेज सोसाइटी) बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है तो वहीं ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में भी खुद को ज्यादा से ज्यादा ‘वैज्ञानिक’ साबित करने की एक होड़ सी दिखती है। इस दौरान ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक के बतौर विज्ञान की चकाचौंध से व्यापक समाज की आक्रान्तता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता हैकि धर्म को अफीम कहने वाले मार्क्स भी, मार्क्सवाद को वैज्ञानिक दर्शन (वस्तुनिष्ठ एवं एकमात्र सत्य) कहने के मोह से ख़ुद को बचा नहीं पाते। वैज्ञानिक ज्ञान का यह आभामण्डल इतना विशाल था कि इसके चलते विज्ञान के अपने (इनबिल्ड) सत्तात्मक संबंधों, जो शासन सत्ता पर किसी वर्ग के कब्जे से अधिक गहरे हैं, को नहीं देखा जा सका। दूसरी तरफ आगे चलकर दो विरोधी चरित्रों के बावजूद धर्म और विज्ञान का अद्भुत गठजोड़ अगर इतनी आसानी से सर्वस्वीकार्य हो गया तो इसके पीछे सिर्फ़ पूंजीवादी शासन सत्ता की ज़रूरत भर नहीं थी, बल्कि विज्ञान का यह आभामंडल भी था जिसकी चकाचौंध में तमाम अंतर्विरोधों का छिप जाना स्वाभाविक था।


आधुनिकता की संरचना में विज्ञान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह यथार्थ की प्रकृति और वस्तुगत ज्ञान की सम्भावना पर जैसी रोशनी डालता है,वह इससे पहले सम्भव नहीं थी। यह न केवल प्रकृति का ज्ञान सम्भव बनाता है,बल्कि ज्ञान-मीमांसा (Epistemology) में भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है और समूचे मानव-ज्ञान के लिए एक प्रतिमान प्रस्तुत करता है और यह सब होता है,उसकी विशिष्ट प्रविधि (Methodology) के बल पर। विज्ञान ज्ञान प्राप्त करने की एक निश्चित प्रणाली निर्धारित करता है जिसमें प्रेक्षण,प्रयोग,सिद्धांत निर्माण,निगमन (Deduction) पूर्वानुमान (Prediction) और जांच का व्यवस्थित इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिक प्रणाली वस्तुगत ज्ञान का निश्चित साधन बनती है और यथार्थ की प्रकृति के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।  प्राकृतिक विज्ञान से पैदा हुई यह प्रणाली कुछ संशोधनों और नये तत्वों के साथ सामाजिक विज्ञान की प्रणाली का भी आधार बनती है। यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि विज्ञान इसलिए विज्ञान है, क्योंकि यह मानव समाज की प्रकृति के साथ अंतर्क्रिया में पैदा होता है। बाकी सभी क्रियाएं-प्रक्रियाएं मानव समाज की आंतरिक क्रियाएं-प्रक्रियाएं हैं, जहाँ समाज ही कर्ता (subject) है और समाज ही वस्तु (object) है। प्राकृतिक विज्ञान में प्रकृति वस्तु है और मानव समाज इस वस्तु पर कार्य करता है,जिससे ‘वस्तुगत ज्ञान’का सुनिश्चित मॉडल बनता है और प्रकृति पर नियंत्रण और उसके योजनाबद्ध इस्तेमाल की परिस्थिति पैदा होती है ,जिसका अगला चरण तकनीकी के उत्तरोत्तर विकास द्वारा प्रकृति पर नियंत्रण और उसके इस्तेमाल की क्षमता में वृद्धि के रूप में सामने आता है।

लेकिन विज्ञान के क्रमिक इतिहास ने आज यह साबित कर दिया है कि विज्ञान सामाजिक परिप्रेक्ष्यों से मुक्त नहीं है,बल्कि सामाजिक (जरूरी नहीं कि समाज के सारे हिस्से इसमें शामिल हो) आवश्यकताओं के क्रम में और तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के दायरे में ही विज्ञान का सम्पूर्ण विकास देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में डी.डी. कोसंबी अपने एक लेख ‘विज्ञान समाज और स्वतंत्रता’ में सवालिया लहजे में कहते हैं कि,“सोचने की बात है कि क्या यह मात्र संयोग था कि उस शताब्दी ने जिसमें कि दो क्रांतियाँ हुईं,इंग्लैण्ड में बुर्जुआजी को सत्तारूढ़ किया,न्यूटन को जन्म दिया?यह कैसे है कि फ्रांसीसी क्रांति ने जिसने कि फ्रांस में सामंतवाद के कूड़े को साफ किया,फ्रांस और यूरोप के महानतम वैज्ञानिकों जैसे कि लांग्राज,लाप्लास, एंपरे,बर्थलो को देखा?वे बुर्जुआजी के साथ आगे बढे और नेपोलियन के बाद भी बने रहे। जर्मनी के विज्ञान का महान नाम गाउस लगभग उसी समय अवतरित होता है जब कि उस देश में बुर्जुआजी वास्तविक ताकत बन जाते हैं;और वह अकेला नहीं है। अगर हम इन को मात्र संयोग कह कर दरकिनार कर दें तो हम विज्ञान की उत्पत्ति को वैज्ञानिक आधार की संभावना से वंचित कर विज्ञान के इतिहास को सौभाग्यशाली संयोगों की श्रृंखला मान कर हास्यास्पद स्थिति में पहुँच जायेगें,जबकि विज्ञान स्वयं अपना इतिहास है और यह सदा संदेहास्पद संयोगों के पीछ तर्क खोजता हुआ आगे बढ़ा है”।

इस प्रकार यह नहीं माना जा सकता कि विज्ञान ऐसे प्रतिभाशाली लोगों की रचना है,जो कि विशुद्ध वैज्ञानिक कारणों पर उन समस्याओं के साथ सोचते रहते हैं जो उनके दिमाग के किसी कोने से उपजती हैं। यद्यपि हर युग और समाज में कुछ प्रतिभाशाली लोग होते हैं,लेकिन वे किस तरह अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करेंगें, यह उनके वातावरण परिवेश, परिस्थितियों एवं उस भाषा पर निर्भर करता है, जिसे वे विचार के लिए चुनते हैं। मस्तिष्क के लिए बिना विचार के बने रहना उतना ही असम्भव है,जितना कि शरीर के लिए बिना गति के बने रहना ,लेकिन विचार भाषा के बग़ैर सम्भव नहीं है और न ही भाषा अपनी सामाजिक बुनावट एवं सांस्कृतिक राजनीति से मुक्त है। नारीवादी सिद्धांतकार एवलेन फॉक्स केलर (Evelyn Fox Keller) पियाजे एवं अन्य मनोविश्लेषकों के आधार पर कहती हैं कि मनुष्य के रूप में एक बच्चे के बड़े होने की पूरी प्रक्रिया न केवल सामाजिक वरन् संज्ञानात्मक स्तर पर भी,सांस्कृतिक रूप से भाषा और परिवेश द्वारा निर्देशित होती है  और इस तरह सिमोन की प्रसिद्ध उक्ति “स्त्री पैदा नहीं होती,बनायी जाती है”और भी व्यापक स्तर पर मनुष्य मात्र के अपने सांस्कृतिक परिवेश के मुताबिक गढ़े जाने की इस नई बात तक पहुँचती है कि “मनुष्य पैदा नहीं होता,गढ़ा जाता है”।चूंकि किसी विशिष्ट सामाजिक परिवेश के अन्तर्गत जन्मा कोई भी ज्ञान उस परिवेश से परे नहीं हो सकता,विज्ञान भी इसका अपवाद नहीं है। चौदहवीं से उन्नीसवीं सदी के बीच यूरोपियन रेनेसां के साथ जिस आधुनिक विज्ञान की नींव पड़ी,वह कोई अचानक से पैदा हुई चीज नहीं थी बल्कि उससे पहले के वैज्ञानिक विकासों के साथ उसकी घनिष्ठ सम्बद्धता थी। आधुनिक विज्ञान की खास बात सिर्फ़ यह थी कि उसके पास अपनी एक विशिष्ट प्रविधि थी जिसके बल पर वह प्रकृति के नियमों की ‘तथाकथित’ वस्तुनिष्ठ व्याख्या कर सकने में सक्षम था। आधुनिक विज्ञान द्वारा वस्तुनिष्ठता एवं सार्वभौमिकता के दावों के पीछे छिपे सत्ता सम्बधों और वर्ग चरित्र को आधार (Base) और अधिसंरचना (Superstructure) के आधार पर व्याख्यायित करने और दुनिया के सामने लाने का काम सबसे पहले मार्क्स ने किया,लेकिन मार्क्स ने सत्ताधारी वर्ग के हथियार के रूप में विज्ञान की निरपेक्षता पर सवाल नहीं उठाया बल्कि सब कुछ प्रयोगकर्ता (वर्ग के रूप में) की नीयत पर छोड़ दिया,पर दरअसल बात इतनी आसान नहीं थी –



अपनी किताब ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में एंगेल्स बताते हैं कि दुनिया का पहला वर्ग विभाजन स्त्री और पुरूष के बीच हुआ, लेकिन यह नहीं बताते कि उत्पादन पद्धतियों में हुए बदलावों और शोषक-शोषित के बदलते संबंधों के बावजूद स्त्री और पुरुष का यह जेंडरगत विभाजन, जहाँ पुरुष शासक और स्त्री शासित के रूप में थी, लगातार कैसे कायम बना रहा? सहमतिमूलक वर्चस्व पर आधारित पुरुष की यह सत्ता इतिहास की क्रांतियों,समाज में हुए आमूलचूल परिवर्तनों और विज्ञान में पैराडाइमों के ‘शिफ्ट’होने के बावजूद नहीं बदली बल्कि इसने लगातार परिस्थितियों के हिसाब से ख़ुद को ढाला और मजबूत किया। मार्क्सवाद की सीमा यही रही  कि स्त्री और पुरुष के बीच वर्ग विभाजन को स्वीकार करने के बावजूद यह शोषक एवं शोषित दोनों ही वर्गों के भीतर शासित स्त्री के परिप्रेक्ष्य को नजरंदाज कर देता है और शासक वर्ग के साथ हितबद्ध विज्ञान के सत्ता संबंधों को व्याख्यायित करने के बावजूद अधिक व्यापक स्तर एवं अधिक गहरे तक जड़ जमाये पितृसत्ता एवं पुरुष श्रेष्ठताबोध की धारणा के विज्ञान पर पड़े प्रभाव और इस तरह निर्मित ‘पुरुषीय विज्ञान’ (MasculineScience) की समझ को भी नहीं पकड़ पाता। ज्ञानशास्त्रीय स्तर पर यह विज्ञान को निरपेक्ष एवं अंतिम सत्य मान लेता है और प्रकृति के निश्चित नियमों की अपने परिप्रेक्ष्य से गढ़ी गई हितबद्ध व्याख्या में ‘कर्ता’ (बुर्जुआ या सर्वहारा के अतिरिक्त स्त्री या पुरुष,श्वेत या अश्वेत, उपनिवेशक या उपनिवेशित,सवर्ण या अवर्ण) की सचेतन अथवा अचेतन भूमिका पर ध्यान नहीं देता जबकि आधुनिक विज्ञान यदि बुर्जुआ के लिए एक हथियार था जिसे उसने अपने फायदे के लिए एक काल विशेष (रेनेसां) में गढ़ा था तो यह पितृसत्ता के लिए भी खु़द को वैध ठहराने का (मनगढन्त व्याख्याओं द्वारा) एक ज़रिया था जैसे कि धर्म।

विज्ञान की वस्तुनिष्ठता,सार्वभौमिकता एवं निरपेक्षता की धारणाएं इसीलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये उसे अंतिम,प्रमाणिक एवं एकमेव सत्य की उसी परम स्थिति में पहुँचा देती हैं,जो धर्म के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचती थी और जिसे प्रश्नांकित कर सकना उस समय सम्भव नहीं था। इस प्रकार जिस तरह एक लम्बे समय तक धर्म अपने नैतिक नियमों एवं मूल्यों के माध्यम से पितृसत्ता को मजबूत करता रहा था,उसी तरह विज्ञान भी अपने नियमों एवं सिद्धांतों की आड़ में पितृसत्ता को लगातार बनाये और बढ़ाये रहने की कोशिशे जारी रखता है। विज्ञान की श्रेष्ठता को लेकर एक आम धारणा यह है कि प्रबोधन की परियोजना में विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण गुण आत्मप्रश्नेयता (Reflexivity) का है।  विज्ञान और तर्कबुद्धि दोनों की प्रकृति अपने आप को हमेशा कठघरे में खड़े रखने की है। विज्ञान अपने आप को गलत सिद्ध करने के प्रयास में आगे बढता है और अधिक व्यापक और अधिक गहरे सिद्धांतों तक पहुँचता है लेकिन विज्ञान में आत्मप्रश्नेयता का यह गुण जो उसे धर्म से अलग करता है,इसलिए सम्भव है क्योंकि आधुनिकता (जो आधुनिक विज्ञान के साथ अंतर्गुम्फित है) में आत्मप्रश्नेयता का तत्व अपने सतत परिमाणात्मक रूपान्तरण के लिए जरूरी है। मार्क्स के शब्दों में कहें तो “बुर्जुआ,तकनीक और अर्थव्यवस्था में लगातार परिवर्तन किए बिना जिंदा नहीं रह सकता”।अर्थात आधुनिकता, मध्ययुग से व्यतिक्रमिक और उसके साथ अर्थ व तकनीक स्तर पर तो आलोचनात्मक रवैये पर ही आधारित विकास है,लेकिन दार्शनिक स्तर पर स्वयं की अपनी संरचनात्मक प्रक्रिया या कमियों की ओर आलोचनात्मक होने के बजाय आत्ममुग्ध ही नज़र आती है।  रविन्द्र कौत्सायन कहते हैं कि यदि प्रबोधन या आधुनिकता की अन्तर्भूत दार्शनिक बनावट में आत्मप्रश्नेयता का तत्व समाहित होता तो फिर प्रबोधन की कथित सबसे अग्रणी समाजवादी संरचनाएं क्यों आत्मप्रश्नेयता के संदर्भ में लगातार विकसित होने के बजाय या कि स्वयं को प्रश्नों के घेरे में रखने के बजाय प्रश्नाकुलता से नाता तोड़ आस्थावादी बंद संरचनाओं में तब्दील होकर अंततः ढह जातीं?दरअसल यह धर्म या विश्वास की तरह बंद छोर वाली संरचनात्मक प्रक्रिया में तब्दील होने से ही सम्बंधित मसला है,जहाँ आत्म प्रश्नेयता के सर्व अन्वेषी खुले छोर वाले चरित्र का नकार हो जाता है।



इस प्रकार हम पाते हैं कि जिस तरह धर्म,पूर्व आधुनिक समाज की सत्ता संरचना से हितबद्ध था,उसी तरह विज्ञान आधुनिक सामाजिक संरचना का मूल आधार बनता है। अपने आप में धर्म का मूल एजेण्डा ईश्वर को स्थापित करना भले ही नज़र आता हो,लेकिन उसका असली और छिपा हुआ एजेण्डा आचार संहिता को स्थापित कर लोगों के आचार-व्यवहार को तय करना है ,जो कि ईश्वरीय कथनों और धार्मिक मूल्यों के नाम पर तर्कातीत,निरपेक्ष, सार्वभौमिक और परम सत्य घोषित किया जाता है। विज्ञान भी आधुनिकता के साथ नई आचार संहिता गढता है और प्रायोगिक,वस्तुनिष्ठ,सार्वभौमिक एवं वैज्ञानिक सत्य के रूप में धार्मिक मूल्यों पर वैज्ञानिक मूल्यों की विजय और उनके स्थानापन्न के बतौर सामने आता है। यह कुछ वैसा ही था, जैसा कि इब्राहिम लोदी को हराकर बाबर का दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा कर लेना,जिसका शासकों, सल्तनतों और वंशों का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों की नज़र में तो बड़ा महत्व था,लेकिन आम उत्पीड़ित जनता (प्रजा) के लिए,यह कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं थी। धर्म और विज्ञान दोनों ही अपनी संरचना में एक ख़ास वर्ग (बुर्जुआ), ख़ास नस्ल (श्वेत यूरोपियन) और ख़ास जेंडर (पुरुष) के द्वारा एक ख़ास समय में निर्मित हुए और दोनों का ही घोषित उद्देश्य मनुष्य मात्र का कल्याण और विकास था लेकिन इन घोषित उद्देश्यों के पीछे सत्ता संरचना में अन्तर्निहित कुछ अघोषित लक्ष्य भी थे। नारीवादी परिप्रेक्ष्य से कहें तो ‘ईश्वरीय सत्य’एवं ‘वैज्ञानिक ज्ञान’दोनों ही पुरुष के नज़रिए से पुरुष का देखा हुआ ‘यथार्थ’था और स्त्री का ‘सच’ इस पूरे परिदृश्य से बाहर था। चूंकि ज्ञान-विज्ञान की धारणाएं और उनकी विकास प्रक्रिया सामाजिक संरचनाओं से मुक्त नहीं हो सकती और प्राकृतिक दर्शन से लेकर आधुनिक विज्ञान के उद्भव तक स्त्री और पुरुष के बीच जेंडरगत विभाजन और स्त्री पर पुरुष की सत्ता लगातार बरकरार रही है, इसलिए जैसाकि केलर कहती हैं कि तथाकथित निरपेक्ष आधुनिक विज्ञान जन्म के साथ ही पुरुष के पक्ष में ‘जेंडराइज्ड विज्ञान’रहा। केलर इस जेंडराइज्ड विज्ञान को ‘मैस्कुलिन साइंस’ (पुरुषीय विज्ञान) कहती हैं, जो सामाजिक संरचना में अंतर्व्याप्त विश्वासों (systemofbeliefs) से जन्मता है और ये विश्वास उस सांस्कृतिक बनावट का हिस्सा होते हैं जो भाषा,विचार एवं परिवेश से किसी मनुष्य को गढ़ती है। सामाजिक संरचना में पुरुष की श्रेष्ठता जहाँ धर्म के अन्तर्गत ईश्वर को पुरुष साबित करती है, वहीं विज्ञान भी ‘वस्तुनिष्ठ’ होने के कारण पुरुषीय सिद्ध होता है जबकि पेंटिंग,लेखन या मानविकी के अन्य विषय स्त्रैण घोषित कर दिए जाते हैं।

अपने-अपने समय में धर्म और विज्ञान दोनो ही अंतिम सत्य के रूप में ख़ुद का जो आभामण्डल रचते हैं, उसकी आक्रान्तक चकाचौंध से बच सकना आसान नहीं होता। विशेषतया उनके शुद्ध एवं आदर्श रूपों में उनकी सत्ता संरचना एवं हितबद्धता को समझना (विशेष रूप से विज्ञान की) एक मुश्किल काम है,लेकिन सैद्धांतिक नियमों के व्यवहारिक अनुप्रयोग अपेक्षाकृत अधिक स्पष्टता के साथ हमें एक नए परिप्रेक्ष्य से नया सच दिखाते हैं। जैसे कि धर्म के मूल पाठ (टेक्स्ट) की परिस्थितियाँनूकूल विभिन्न व्याख्याओं के बजाय धार्मिक कर्मकांड,मिथक,मान्यताएं और क्रियाकलाप उसकी संरचना में निहित तत्वों को खोजने में अधिक आसान विकल्प होंगें। इसी तरह तकनीकी विकास के जेंडर विश्लेषण के आधार पर विज्ञान के जेंडराइज्ड एवं मैस्कुलिन होने की बात अधिक आसानी से कही जा सकती है। केलर के अनुसार विज्ञान के ‘जेंडराइजेशन’का आधार सिर्फ वे तरीके नहीं हैं,जिन्हें वह प्रयोग करता है बल्कि ‘यथार्थ’की वे व्याख्याएं है,जो विज्ञान देता है और जिसके साथ वैज्ञानिक की निर्मिति का घनिष्ठ अन्तर्सम्बंध होता है। विज्ञान दुनिया को समझने के क्रम में उसे दो भागों में बांटता है- पहला Known (Mind) यानि ज्ञाता और दूसरा Knower (Nature) यानि जानने योग्य। स्वयं को ज्ञाता (कर्ता) की स्थिति में रखते हुए वह प्रकृति को ‘जाने जा सकने वाले’एक ‘ऑब्जेक्ट’ की तरह देखता है। प्रकृति एक स्त्री है,जिसके रहस्यों (नियमों) को जानना विज्ञान (पुरुष) का अधिकार है ताकि उस पर नियंत्रण कायम किया जा सके। प्रकृति और विज्ञान के बीच का सम्बंध स्त्री-पुरुष के पारम्परिक संबंधों की तरह ही है जहाँ प्रकृति (स्त्री) नियंत्रित एवं विज्ञान (पुरुष) नियंत्रक की भूमिका में है और यह पितृसत्ता की मजबूती के साथ लगातार और भी दृढ़ हुआ है जैसे कि अपनी प्रारम्भिक अवस्था से आज के आधुनिक विज्ञान तक पूरा विकास प्रकृति के साथ सामंजस्य से शुरू होकर उस पर अधिकाधिक नियंत्रण हासिल करने की महत्वाकांक्षा तक पहुँचा हैं। उन देशज समुदायों में जहाँ पितृसत्ता की जड़ें बहुत मजबूत नहीं है विज्ञान आज भी प्रकृति पर नियंत्रण की बजाय,प्रकृति के साथ समन्वयवादी संबंधों पर आधारित दिखता है।



फ्रायड,पियाजे एवं अन्य मनोविश्लेषकों के कामों के आधार पर जहाँ केलर वस्तुनिष्ठता एवं जेंडर के विकास का संज्ञानात्मक स्तर पर विश्लेषण करते हुए विज्ञान को पुरुषीय (मैस्कुलिन) साबित करती हैं,वहीं सैन्ड्रा हार्डिंग ऑब्जेक्टिविटी (वस्तुनिष्ठता) के विरूद्ध सब्जेक्टिविटी (विषयनिष्ठता) को “स्ट्रांग ऑब्जेक्टिविटी”के बतौर पेश करती है और ‘मेथडोलॉजी’के बल पर खुद को श्रेष्ठ साबित करते विज्ञान के ‘मेथड्स’पर ही सवाल उठाते हुए फेमिनिस्ट स्टैंडप्वांइट की अवधारणा देती हैं, लेकिन न तो फेमिनिस्ट आंदोलन कोई एक दिन की बात थी और न ही विज्ञान के जेंडर विश्लेषण के अन्तर्गत सैन्ड्रा हार्डिंग और केलर द्वारा वैज्ञानिक ज्ञान की वस्तुनिष्ठता एवं निरपेक्षता को चुनौती कोई आकस्मिक घटना थी। यह सब एक क्रमिक विकास प्रक्रिया के अन्तर्गत ही था। यह अनायास नहीं था कि ‘मैरी वोल्ट्सनक्राफ्ट’और ‘जे. एस. मिल’ जब स्त्रियों की मुक्ति और उनकी स्थितियों में सुधार की आवाज उठा रहे थे,उस समय औद्योगिक क्रांति और पूंजीवाद को अपने विकास के लिए स्त्री को घर की चारदीवारी से बाहर निकालना आवश्यक था। इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रकृति,समाज,विज्ञान औरसामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाएं एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से अंतर्संबंधित हैं और एक-दूसरे के विकास को प्रभावित करती और उससे प्रभावित होती हुई आगे बढ़ती हैं और यह प्रक्रिया सिर्फ चेतन स्तर पर ही नहीं, बल्कि अचेतन/अवचेतन स्तर पर भी चलती है। कई जटिल एवं संश्लिष्ट चरणों में सम्पन्न यह प्रक्रिया कई बार अनेक अन्तर्विरोधों को जन्म देती है,जिसके अप्रत्याशित परिणाम सामने आते हैं। उदाहरण के लिए धर्म और आधुनिकता की बात की जा सकती है। यद्यपि धर्म और आधुनिकता का सम्बंध विरोधी नज़र आता है क्योंकि आधुनिक मूल्य, धार्मिक एवं रूढ़िवादी बंधनों को तोड़कर ही पैदा होते हैं,लेकिन आधुनिकतावादी राज्य से औपचारिक सम्बंध विच्छेद के बावजूद यह “निजी मामले”की आचार-संहितापरक ‘छूत’की तरह परिवार से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना तक गहन रूप से मौजूद रहता है और इस तरह शीघ्र ही आधुनिकता के साथ नया अधिसंरचनात्मक सम्बंध स्थापित कर लेता है। महत्वपूर्ण यह है कि आधुनिकता एवं धर्म के गठजोड़ की यह प्रक्रिया सिर्फ़ कोई राजनैतिक प्रक्रिया नहीं है,बल्कि यह सांस्कृतिक वर्चस्व की जटिल संरचनात्मक प्रक्रिया है,जो कि रोजमर्रा के क्रियाकलापों, मूल्यों आदि के साथ-साथ मानसिक बनावट से भी सम्बंधित है।  इस प्रक्रिया में कई रोचक अन्तर्विर्रोध भी सामने आते हैं,जिसके अन्तर्गत आधुनिक भौतिकी के महान नाम आइजेक न्यूटन जितना समय विज्ञान और गणित के सिद्धांतों पर लगाते हैं,उससे कई गुना ज्यादा बाइबिल की व्याख्या और अंधविश्वास से प्रेरित अलकीमियाई (alchemist) प्रयोगों पर खर्च करते हैं। अल्बर्ट आइंसटीन ईश्वर की दुहाई देने से बाज नहीं आते और कई भारतीय वैज्ञानिक व्रत एवं उपवास रखते हुए प्रयोगशालाओं में काम करते हैं।  इसका कारण वह संस्कृति-परम्परा है,जिसका व्यक्ति की बनावट में महत्वपूर्ण योगदान होता है किसी निश्चित संस्कृति से निर्मिति व्यक्ति उस संस्कृति का वाहक भी होता है और इस प्रकार उस संस्कृति का पुनरूत्पादन होता रहता है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि सब कुछ यथास्थित बना रहता है। वर्चस्व के भीतर से ही वर्चस्व के विरूद्ध प्रतिरोधी स्वर भी सामने आते है जिनका उद्देश्य नये सांस्कृतिक मूल्यों की रचना करना होता है। इन नये सांस्कृतिकमूल्यों की स्थापना की कोशिशें अन्य सामाजिक-आर्थिक अन्तर्प्रभावों के साथ मिलकर नया ज्ञान-विज्ञान रचती हैं। उदाहरण स्वरूप धर्म और विज्ञान दोनों के ही सांस्कृतिक वर्चस्व का जरिया होने के बावजूद पूर्व आधुनिक धार्मिक मूल्यों से आधुनिक वैज्ञानिक चेतना का विकास इसी रूप में हुआ है। बुर्जुआ आधुनिकता की आवश्यकता के रूप में ही सही,आधुनिक विज्ञान का आत्मप्रश्नेयता का गुण,उसे धर्म के आगे का कदम तो साबित करता ही है। नारीवाद और सबाल्टर्न के अन्य विमर्श यदि विज्ञान की सांस्कृतिक वर्चस्वता को चुनौती दे सके तो इसके पीछे विज्ञान की आत्मप्रश्नेयता का वह गुण ही था,जिसने पहले तो स्त्री-पुरुष के बीच की धर्म द्वारा गढी असमानता का वैज्ञानिक आधारों पर खंडन किया,जिसके फलस्वरूप नारीवादी आंदोलन का शुरूआती आधार खड़ा हुआ और आगे चलकर वस्तुनिष्ठता,निरपेक्षता एवं सार्वभौमिकता के अपने ही दावों का खंडन किया (सापेक्षता सिद्धांत) जिसने नारीवादी ज्ञानशास्त्र का आधार तैयार किया। इसी क्रम में वह अपनी प्रविधि पर सवाल उठाते हुए किसी ‘निश्चित’एवं ‘निर्धारित’एकमेव सत्य से ‘अनिश्चित’एवं ‘अनिर्धारित’‘बहुल सत्यों’तक पहुँचा,  (क्वांटम भौतिकी की नील्स बोर द्वारा की गई अर्थ-व्याख्या) ,जिससे ज्ञान-विज्ञान शक्ति संबंधों (ज्ञान ही शक्ति है) को समझते एवं सामने लाते उत्तर आधुनिक विमर्शों से लेकर सबाल्टर्न तक का वैज्ञानिक आधार तैयार होता है। चूंकि सामाजिक एवं वैज्ञानिक विकासों के मध्य एक घनिष्ठ अन्तर्सम्बंध होता है,इसलिए वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता एवं निरपेक्षता का खंडन करता सापेक्षता सिद्धांत नारीवादी ज्ञानशास्त्र में फेमिनिस्ट स्टैंडप्वांइट का आधार देता है, जो आगे चलकर नारीवाद के भीतर ही अलग-अलग धाराओं के रूप में विकेन्द्रित स्टैंडप्वांइट्स अख्तियार करता है।



विज्ञान और सबाल्टर्न के बीच वस्तुगतता और विषयगतता की पूरी बहस का मूल आधार विज्ञान की उस आत्मप्रश्नेयता से ही जन्मता है,जो सापेक्षता सिद्धांत के अन्तर्गत अपनी ही ‘वस्तुगतता’को नकारता है। यद्यपि विज्ञान की इस आत्मप्रश्नेयता का यदि व्यापक सामाजिक प्रभाव नहीं दिखता तो इसका कारण आधुनिक विज्ञानवाद की वे विश्लेषणात्मक और विखंडित सीमाएं हैं,जिसके कारण कथित सामाजिक विज्ञान प्राकृतिक सरोकारों से बेगाने नज़र आते हैं  और जिसके पीछे आर्थिक,राजनीतिक सांस्कृतिक सत्ता संरचनाओं की एक जटिल प्रक्रिया काम करती है। विज्ञान की आत्मप्रश्नेयता विज्ञान तक ही सिमट कर रह जाती है और उसके दार्शनिक सामाजिक पहलुओं को नज़र अंदाज कर दिया जाता है। लेकिन सापेक्षता सिद्धांत इस मामले में अपवाद साबित होता है,क्योंकि सापेक्षता की धारणा के व्यापक सामाजिक निहितार्थ तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में स्पष्टतया दृष्टिगोचर होते हैं। चूंकि यह दौर उपनिवेशवादी मुक्ति आंदोलनों एवं समाजवादी क्रांति के सर्वहारा संघर्षों का थाऔर मार्क्स इसके पहले विज्ञान की वर्ग सापेक्षता को सिद्ध कर चुके हैं,ऐसे में सापेक्षता सिद्धांत दरअसल मार्क्स की वर्ग-सापेक्ष सैद्धांतिक अवधारणा की वैज्ञानिक पुष्टि की तरह ही सामने आता है और 20 वीं सदी की क्रांतिकारी परिस्थितियों में नये ज्ञानशास्त्र के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण सैद्धांतिक आधार देता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि प्राकृतिक विज्ञान और समाज एवं सामाजिक परिस्थितियों के बीच अंतर्संबंधों को लगातार नज़रअंदाज़ किया गया है और चीजों को उनकी सम्पूर्णता में देखने के बजाय बंद दायरों में ही देखने की कोशिशें हुई हैं। स्वाभाविक है कि इसके पीछे भी सत्ता संबंधों की अपनी संरचना है,जिसके अन्तर्गत पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष का सच ही सार्वभौमिक बना दिया जाता है। आज जब हम ‘फेमिनिस्ट साइंस’की बात कर रहे हैं तो इसका तात्पर्य पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना से गुंथे इस विज्ञान के बरक्स एक ऐसे वैकल्पिक विज्ञान का ख़ाक़ा ख़ींचना है,जो विभिन्न सत्ता संरचनाओं के तहत निर्मित भेदभावपूर्ण ज्ञानात्मक संबंधों से मुक्त हो। मानव समाज और प्रकृति की अंतर्क्रिया के संदर्भ में आधुनिक विज्ञान कितने खरे उतरे हैं,इस बात की आलोचनात्मक पड़ताल आज महत्वपूर्ण है। साथ ही मानवीय या सांस्कृतिक-सामाजिक सरोकारों से विज्ञान की निर्लिप्तता के चलते सामाजिकता और वैज्ञानिकता के बीच भौतिक-सांस्कृतिक अंतर्संबंधों की पड़ताल आज वर्तमान विज्ञान की मूल समस्या और उसका मुख्य कार्यभार है। फेमिनिस्ट साइंस इसी दिशा में एक प्रयास है।


संदर्भ सूची 


1. .Keller,Evelyn Fox.(1985). Reflections on Gender and Science. New Haven and London: Yale          University Press. P-3.
 2.Harding,Sandra.(1986). Science Question in Feminism. Ithaca and London: Cornell University      Press. P-135.
 3.सिन्हा, रवि. (2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता और आधुनिकताएं. संधान. (लाल बहादुर वर्मा,          सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.15.
 4. वही, पृ.16. 
 5. कोसंबी, डी.डी. (2004, फरवरी). विज्ञान, समाज और स्वतंत्रता. (पंकज बिष्ट, अनु). समयान्तर. पृ.18 
  6.  वही,
  7.   Keller,Evelyn Fox.(1985). Reflections on Gender and Science. New Haven and London: Yale             University Press. P-92.
  8.  चूंकि कोई भी सिद्धांत या दर्शन अपने देश-काल की सीमाओं से परे नहीं हो सकता, अतः मार्क्सवाद        भी  उसका अपवाद नहीं हैं। मार्क्सवाद की सीमा दरअसल उस स्थान-काल की सीमा है, जब यह              पैदा हो रहा है। स्त्री या अन्य उत्पीड़ित समुदायों के दृष्टिकोण से दुनिया तब तक नहीं देखी जा                 सकती थी जब तक संरचनावाद और उसके अगले चरण के रूप में उत्तर संरचनावाद का अविर्भाव            ना होता।
   9.   सिन्हा, रवि. (2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता और आधुनिकताएं. संधान. (लाल बहादुर वर्मा,          सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.9 
   10. कौत्सायन, रविंद्र.(2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता: प्रबोधन की अपरिपक्वता. संधान. (लाल          बहादुर वर्मा एवं सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.182.
   11.  वही.
   12.  वही, पृ.183. 
   13. Keller,Evelyn Fox.(1985). Reflections on Gender and Science. New Haven and London:                 Yale University Press. P-79.
  14. वही,
  15.   सिन्हा, रवि. (2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता और आधुनिकताएं. संधान. (लाल बहादुर                       वर्मा, सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.10 
  16.  हॉब्सबॉम, एरिक (2009). अतिरेकों का युग. मेरठ: संवाद प्रकाशन. पृ.373
  17. बोर ने ‘संपूरकता सिद्धांत’ के अन्तर्गत बताया कि प्रकृति की समग्रता की व्याख्या एकमात्र विवरण                 से  अभिव्यक्त करने का कोई मार्ग नहीं है क्योंकि मनुष्य अलग-अलग भाषाओं में बोलता है। एक ही                प्रत्यक्षतः सम्पूर्ण प्रादर्श संभव नहीं है। यथार्थ को पकड़ने का एकमात्र तरीका यह है कि विवरण                        भिन्न-भिन्न तरीकों से दिया जाए और उन्हें एक-दूसरे के पूरक के रूप में एक स्थान पर रख कर देखा                जाए।
 18. कौत्सायन, रविंद्र.(2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता: प्रबोधन की अपरिपक्वता. संधान. (लाल                बहादुर वर्मा एवं सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.84.

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सावधान ! यहाँ बुर्के में लिपस्टिक भी है और जन्नत के लिप्स का आनंद लेती उषा की अधेड़ जवानी भी

संजीव चंदन 

पुरुषों के मुकाबले हमारी यौनिकता अधिक दमित है. हमपर आचरण के जितने कड़े नियम आरोपित किये गये हैं उतने कभी भी पुरुषों पर आरोपित नहीं रहे.
केट मिलेट, सेक्सुअल पॉलिटिक्स
We’re more sexually repressed than men, having been given a much more strict puritanical code of behavior than men ever have.

“हमारी सामाजिक परिस्थितियों के कारण, पुरुष और महिला वास्तव में दो संस्कृतियां हैं और उनके जीवन के अनुभव बिल्कुल अलग हैं- और यह महत्वपूर्ण है. अंतर्निहित ”
केट मिलेट, सेक्सुअल पॉलिटिक्स
“Because of our social circumstances, male and female are really two cultures and their life experiences are utterly different—and this is crucial. Implicit”
― Kate Millett, Sexual Politics

निदेशक अलंकृता श्रीवास्तव और निर्माता प्रकाश झा की फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ स्त्री के यौन-अधिकार को केंद्र में रखकर बनी फिल्म है. फिल्म की कहानी एक समग्र स्त्री ‘रोजी’ की कहानी है- अपने लस्ट, अपनी यौन-कामनाओं से लबरेज स्त्री. वह काल्पनिक है, वह हर स्त्री में है, वह इस कहानी की हर पात्र के भीतर है, खुद एक पात्र नहीं है. वह किसी कामुक किताब की नायिका है, लेकिन कहानी की नैरेटर, एक फीमेल आवाज, कुछ अंतराल पर रोजी की कहानी सुनाती है, उसकी कामना, वासना की कहानी, जिसे दृश्य पात्रों के  जीवन में घटित होते  हैं.

ऊपर के दो कथनों में  सत्तर के दशक की रैडिकल स्त्रीवादी केट मिलेट अपनी किताब ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ में स्पष्ट हैं कि स्त्री के ऊपर व्यवहार और आचरण के कड़े नियम आरोपित किये गये हैं, जो उसे समान्य मनुष्य की तरह सहज नहीं रहने देते इच्छाओं का दमन और पेश आने के प्रति सम्पूर्ण सजगता उसकी सहजता के मार्ग की हैं. फिल्म की काल्पनिक नायिका रोजी इन बाधाओं से मुक्त है इसलिए अपनी कामुकता का उत्सव मनाने में सक्षम है, लेकिन जब उसका व्यवहार वास्तविक रूप में सामने आता है, वह फिल्म की अधेड़ नायिका बुआजी (रत्ना पाठक) के रूप में वास्तविक रूप से घटित होती है  तो सामाजिक विस्फोट होता है, उसे छिनाल, कुल्टा, चरित्रहीन सिद्ध कर दिया जाता है.

जन्नत के लिप्स का चुंबन बनाम यौन-आनंद का चरम और वह सीमा जहां से चरित्र शुरू होता है 


बुआजी उस पुरानी इमारत की मालकिन हैं, जहां फिल्म की पात्र रहती हैं. एक दबंग, निर्णयों के मामले में सक्षम, आर्थिक रूप से मजबूत और उदार अकेली स्त्री के पुरुष-स्त्री सभी किरायदारों के बीच रुआब है. वह म्युनिसपल काउन्सिल के अधिकारियों और बिल्डिंग पर नजर गड़ाये बिल्डरों से निपटना जानती हैं- साम-दाम हर कला में निपुण. लेकिन वह अधेड़ स्त्री जब अपनी कामनाओं को जीना चाहती है, तो उसकी सारी छवि एक ‘चरित्रहीन’ में सिमट जाती है. रोजी उसकी प्रिय कामुक नायिका है, जिसे वह फुर्सत के क्षणों में अपने पास पाती है. छिपाकर कामुक किताबें पढ़ते हुए उसके भीतर रोजी के रूप में कामनाओं का एक सोता फूटता है. और फिर वह अपने ऊपर केन्द्रित होती है. इन कामनाओं की पूर्ती के लिए वह तैराकी सीखने पहुँच जाती है और तैराकी के ट्रेनर से फोन पर रोजी बनकर कामुक बातचीत करती है. प्रत्यक्ष में वह बुआजी है तैराक भी बुआजी को जानता है, वह नहीं जानता कि बुआजी और रोजी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, कि बुआ ही रोजी  बनकर उससे कामुक बातचीत करती हैं. तैराक उसे उसके नाम (उषा) से पुकारकर बुआजी के भीतर सुप्त स्त्री को जाग्रत तो कर देता है, लेकिन एक सम्पूर्ण जाग्रत स्त्री के खिलाफ वह खुद भी कार्रवाई का दूत और गवाह बन जाता है. प्रत्यक्षतः वह बुआजी को अपनी पारंपरिक साड़ी वाली वेशभूषा से तैराकी की वेशभूषा में आकर तैरने के साहस से भर देता है और अनजाने में फोन पर कामुक बातचीत करते हुए उसके कपड़े उतरता हुआ उसे नंगा कर देता है. उसके स्तनों से खेलते हुए पूरे शरीर पर कोमल फूल उगाते हुए उसके जन्नत के लिप्स (योनि, जिसे कामुक बातचीत के आख़िरी हिस्से में वह नाम देता है) तक आते-आते आनंद और उन्माद से भर देता है. इस रूप में बुआजी समग्र रूप से रोजी हो जाती हैं. लेकिन तभी विस्फोट घटित होता है. उसपर यह जाहिर हो जाता है कि रोजी और बुआजी एक ही हैं. वहीं उसका पूर्ण पुरुष खुद को आहत समझता है और बदले में  वह बुआजी को सार्वजनिक रूप से जलील करता है, करवाता है.

पढ़ें : लिपस्टिक अंडर माय बुर्का: क़त्ल किये गये सपनों का एक झरोखा 

कामनाओं की ‘चोरी’ : लिपस्टिक जब बुर्के के अंदर घुटने से मना कर देती  है
रोजी न सिर्फ बुआजी के भीतर  की हकीकत है, वह थोड़ी-थोड़ी हर स्त्री पात्र में घटित होती है. दुहरा दें कि नैरेटर (स्त्री आवाज) कहानी में अलग-अलग पात्रों की कहानियों के दृश्यों से दर्शकों को  रोजी की कहानी के सूत्र से ही जोड़ता है. युवा लडकी रेहाना अबीदी (प्लाबिता ठाकुर ) के भीतर भी रोजी है, जो एक ऐसी मुस्लिम लडकी है जिसका पिता ईमानपरस्त, खुदा से खौफ खाने वाला लेकिन शख्त पैट्रिआर्क है. अबीदी पर भी उतनी ही पाबंदियां हैं, जितनी ऐसे  किसी भी पितृसत्ताक पुरुष द्वारा शासित घर और सम्पूर्णता में स्त्रीविरोधी परिवेश की लडकी पर हो सकती हैं. लेकिन रोजी जैसी कामनाएं इन पाबंदियों के भीतर कितनी देर कैद रह सकती हैं, इसलिए विद्रोह करती हैं. इतनी कि वह अपनी इच्छाओं की पूर्ती के लिए फैशन की वस्तुएं भी चुरा लेती है. लेकिन अंततः उसे युवा सपनों के लिए कीमत चुकानी पड़ती है, वह फिर से कैद कर ली जाती है. उसे कैद करने में न सिर्फ उसके पितृसत्ताक पिता की भूमिका है, बल्कि उसके आजाद ख्याल दोस्तों का भी है. यहीं फिल्म की अपनी कमजोरी भी है, जिसपर आगे बात करते हैं.

ऐसी ही एक रोजी लीला (आहना) और उसकी विधवा मां ( सोनल झा) के भीतर भी है. लीला  पेंटिंग्स के न्यूड मॉडल का काम 17 वर्षों से कर रही है. मां-बेटी आजाद ख्याल हैं तभी देह और सेक्स उनके लिए बहुत हाय-तौबा का विषय नहीं है. मां का भी प्रेमी है, जो उसे फ़्लैट खरीदकर देने वाला है और बेटी भी किसी से प्रेम करती है, सेक्स भी करती है, कई बार अविश्वसनीय मौकों पर भी. मां जब उसे अपने प्रेमी के साथ सेक्स करते हुए देखती है, तो वह उसके लिए कोई अर्थ संदर्भ नहीं रखता, फिल्म के दृश्य इसे स्पष्ट कर देते हैं, जब देखकर वह उसे डांटते हुए नीचे आ गई पैंटी थोड़ा ऊपरकर अपने साथ खीच ले जाती है, क्योंकि बाहर उसकी सगाई हो रही थी. यह घटना बेटी को उसके लिए न तो बदचलन बनाती है और न ही कोई आपात प्रसंग, वह चिंतित है तो सिर्फ उसके भविष्य के लिए ताकि वह एक आर्थिक रूप से सुदृढ़ जीवनसाथी के साथ सुरक्षित हो सके. बेटी को भी अपनी न्यूड मॉडल मां और उसका प्रेम सहज स्वीकार्य है. बेटी अपने प्रेमी और  मंगेतर के बीच फंस बखूबी मैनेज तो कर ले रही है लेकिन वह आखिर तक संभव नहीं हो पाता.  इसपर आगे बात करते हैं.

और एक रोजी घुटती है शीरीन असलम (कोंकना सेन) के भीतर. वह अपने पति से आतंकित है. अपनी इच्छा के विपरीत उससे सेक्स करने को बाध्य है. पति बलात संबंध बनाता है, अप्राकृतिक भी. कंडोम का इस्तेमाल नहीं करता, उसके तीन बच्चे हैं. यह सब सहते हुए पति से छिपाकर नौकरी करती है. एक सफल सेल्स गर्ल है. हर बार बेहतरीन सेल्स गर्ल का सम्मान उसे ही देती है उसकी कंपनी. पति उसके साथ सिर्फ सेक्स करता है और प्रेम दूसरी औरत के साथ. वह अपने होठों पर चुम्बन भी नहीं जानती, छुअन का अहसास भी नहीं, जो दूसरी औरत को सहज हासिल है. जब वह अपने पति के जीवन में दूसरी स्त्री के बारे में जान जाती है तो अपने तरीके से उसपर नियन्त्रण भी चाहती है और अपनी नौकरी के बारे में जाहिर भी करा देती है. जिसका आख़िरी हस्र है पति का यह बताना कि तुम बीबी हो शौहर मत बन और नौकरी भी छूट जाती है.

इन चारो ही शक्लों में रोजी का यथार्थ यही है कि वह कैद कर ली जाती है, उसके ख्वाहिशों के पर काट दिये जाते हैं.

कामनाओं के सोतों के आगे इर्ष्या का दरिया.. सेक्स का क्लाइमेक्स

अपनी कहानी और क्राफ्ट के साथ फिल्म स्त्रीवादी है और उसका विषय स्त्रियों के यौन आनंद  तक सीमित है, इसलिए उससे अधिक मुद्दों की अपेक्षा फिल्म के साथ बेमानी होगी और आलोचना का अतिरेक भी. लेकिन इस सीमित कहानी के भीतर ही ज़रा गौर करते हैं कि किन स्थितियों से बचा जाना अनिवार्य था और कौन सी स्थतियों से बचा जा सकता था, जो सिर्फ दृश्य-रोचकता और उद्दीपन के लिए निश्चित की गई हैं. लीला को  फोटोग्राफर से  प्रेम है, दैहिक प्रेम भी शामिल है, वह और उसकी मां सहज हैं इसे लेकर. जबकि उसका प्रेमी सहज नहीं है एक मर्द की तरह पजेसिव. वह उससे लड़ता है, तब जब वह सेक्स के प्रसंग में ऐसा कुछ कहती है, जिससे वह खुद को आहत महसूस करता है.  गालियाँ देता है, जलील करता है. उसके बाद भी वह उसके पास जाती है, सेक्स करती है  और आख़िरी तौर पर जलील होती है. बाहर उसका मंगेतर  गाड़ी में है, जो उसे बहुत प्यार करता है, सम्मान देता है.

दृश्य का चमत्कार पैदा करने के लिए  शायद एक सेक्स दृश्य उसकी सगाई के दौरान भी है. वह सगाई के लिए अपने मंगेतर के साथ मंच पर है, छोटे से चालनुमा  घर में थोड़ी देर के लिए लाईट चली जाती है और वह अपने प्रेमी के साथ सेक्स करने पहुँच जाती है. क्या किसी लडकी के भीतर ऐसी रोजी हो सकती है, जो अपने परिवेश के भीतर कुछ ऐसा कर जाये. न यह संभव है न और सगाई करती लडकी के पास इतना समय है. लेकिन यह होता है, शायद दृश्यांकन और दृश्यों से प्रभाव की मजबूरियाँ होती होंगी.

पढ़ें: जाघों से परे पार्च्ड की कहानी: योनि नहीं है नारी 

सवाल इससे  आगे भी है और फिल्म की अपनी राजनीति पर सवाल खड़ा करता हुआ भी कि कामानाओं के सोतों के फूटने के बाद आखिर क्या? जींस की आजादी के लिए संघर्ष करती लडकियां, आजाद ख्याल लडकियां, बिंदास म्यूजिक बैंड में गाती और पबों में घूमती लडकियां इस आजादी के बाद भी क्या पितृसत्ता द्वारा सहज बना दिये गये भावों से मुक्त हैं, या वे दूसरी लड़कियों से वैसे ही बदला लेती हैं, जैसे दूसरी सामान्य स्त्रियाँ या लोग. रेहाना के आजादख्याल दोस्त को जब पता चलता है कि वह उसके ही बॉयफ्रेंड के साथ आशिकी में है तो वह उसे बेनकाब करा देती है और सार्वजनिक रूप से जलील करती है. उसका गुस्सा अपने बॉयफ्रेंड पर कम, उसके अनुसार जिसने उसे प्रेग्नेंट कर दिया है, रेहाना पर अधिक है. इसके बाद रेहाना की जिन्दगी समाप्त हो जाती है. शीरीन भी अपने पति को ठीक करने की जगह दूसरी औरत को अपराधी के रूप में देखती है और उसे जलील करती है (मेरा चीज तो तुम अपने मुंह में नहीं ले सकती हो न के व्यंग्य के साथ). एक ओर लीला के साथ कहानी दर्शकों को सहज करती है, इंगेजमेंट के समय सेक्स के उसके अधिकार के प्रति,  प्रेमी और मंगेतर को एक साथ मैनेज करने के प्रति और दूसरी ओर अपने स्त्री पात्रों को  प्रेमी या पति के संबंधों के प्रति पारंपरिक व्यवहार करते हुए दिखाती है. सवाल यही है कि आखिर कामानाओं की आजादी क्या इन्हीं सीमाओ पर जाकर खत्म होगी? क्या कामनाओं के सोतों से आगे आग का दरिया है या शीना बोहरा का हस्र ( शीना बोहरा जेल में हैं, जिनके प्रेम संबंधों की कहानियां टीवी चैनलों की सुर्खियाँ बनी थीं.)

सवाल और भी हैं.  शीरीन असलम रोज प्रताड़ित हो बलात सेक्स झेलते हुए भी एक छुअन, एक मीठे अहसास, प्रेम और सम्मान की भूखी है. दूसरी और लीला का मंगेतर, जो कहानी में एक सीधा-सादा पात्र है अपनी होने वाली पत्नी के साथ पहला यौन संबंध इन्ही अहसासों के साथ बनाना चाहता है. वह पारंपरिक रूप से सुहागरात को यादगार अहसास देना चाहता है और अपनी मंगेतर को पूरा सम्मान भी देता है,  उसके स्वतंत्र व्यवहार के प्रति भी सम्मान. उसके साथ सुनिश्चित जीवन के बावजूद लीला अपने उद्धत जलील करते प्रेमी के साथ सेक्स करने पहुँच जाती है.  तो सवाल यही है कि कामनाओं के विस्फोट का आख़िरी हासिल क्या हो- क्या जेंडर जस्ट आचरण, व्यवहार या……

यह यथार्थ की कहानी नहीं है यह एक स्त्रीवादी स्टेटमेंट के लिए बनी कहानी है, सपनों की रोजी को यथार्ततः घटित होने की कल्पना से बनी कहानी. निश्चित तौर पर स्त्रियों के लिए रूढ़ आचरण संहिता को चुनौती देती कहानी. ऐसी कहानियां हमने और भी पढ़ी होंगी. मैंने तो जरूर पढ़ी-सुनी है. यथार्थतः भी  इस समाज में घटित होती हैं और कहानियों में भी. मैत्रेयी पुष्पा की चाक की अधेढ़ चाची कलावती खुद को अक्षम मानते पहलवान दामाद के साथ सेक्स कर उसकी मनोवैज्ञानिक ग्रंथी तोडती है. एक कहानी पढी थी, पंजाबी की, अंग्रेजी में अनूदित. नियत 15 दिन में मरने वाले देवर की आँखों में मरने के पहले एक बार सेक्स का अनुभव की मांग देखकर भाभी  खुद को ही प्रस्तुत करती है, एक कुंठा रहित निर्णय. रोजियाँ हमारे इर्द-गिर्द भी हैं, उषा बुआ हमारे आस-पास भी.

चेतावनी: संघी उन्माद में फंसे हिन्दू इन गलियों में न फटकें, यहां बुर्के की लड़कियों के अलावा लीला भी हैं और उषा बुआ भी


फिल्म के आख़िरी दृश्य में एक ही इमारत के नीचे जीने वाली नायिकाएं एक कमरे में इकट्ठे मिलती हैं. उषा बुआ जलील हो चुकी हैं. सार्वजनिक रूप से अपमानित शीरीन को नौकरी छोड़ देने का फरमान उसके पति द्वारा दिया जा चुका है. रेहाना के अब्बू ने उसकी पढाई छुड़ा उसे घर बैठा दिया है और लीला का मंगेतर इस बात पर बिफरकर उससे अलग हुआ है कि उसके मोबाइल से वह यह भी जान गया है कि लीला सगाई के दिन भी मौक़ा मिलते ही प्रेमी के पास सेक्स के लिए पहुँच गई थी.  और आख़िरी दृश्य में सारी नायिकाएं एक साथ कमरे में सिगरेट के धुंए में हर फ़िक्र उडाये जा रही हैं. निस्संदेह सिगरेट पीना आजादी नहीं है, लेकिन हाँ यहाँ सिगरेट आजादी के अहसास को जाहिर करने का जरिया जरूर है.

पढ़ें: क्यों स्त्री विरोधी है अति नाटकीय फिल्म पिंक 
चेतावनी इसलिए कि सोशल मीडिया में शायद बिना फिल्म देखे संघी उन्माद में फंसे हिन्दू नाम ‘लिपस्टिक अंडर बुर्का’ के आधार पर यहाँ अपने शत्रुओं की स्त्रियों  के कुछ सीक्रेट जाहिर होने के अंदाज में फिल्म का स्वागत कर रहे हैं. वे सावधान हो जाएं उन्हें यहाँ उषा बुआ ‘जन्नत के लिप्स’ पर चूमे जाने के अहसास से ही आनंद-अतिरेक में दिखेंगी और लीला और उसकी विधवा मां सच्चरित्र स्त्रियों के सारे नियम-बंधन तोड़ती दिखेंगी.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं. 

लिव-इन- संबंध एवं जातीय संरचना

विकाश सिंह मौर्य

दुनिया भर के मुल्कों के बाशिंदों के लिए इक्कीसवीं सदी की शुरुआत भारी झंझावातों के साथ हुई है. इन झंझावातों की पूर्वपीठिका बीसवीं सदी के आखिरी दो दशकों की बौद्धिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक घटनाक्रमों में निहित कही जा सकती है. इक्कीसवीं सदी के प्रारंभिक प्रघटनाओं  का विश्लेषण करने का प्रयास करें तो पाते हैं कि तीसरी दुनिया के परिधीय देशों का आर्थिक-सांस्कृतिक शोषण बहुआयामी स्वरुप में बढ़ा है. इस बीच दक्षिण एशियाई राष्ट्र-राज्यों के अन्दर कुछ ऐसी परिघटनाएं बहुत स्पष्टता के साथ परिलक्षित हुई हैं, जिन्हें ‘नया’ और ‘विघटनकारी’ की संज्ञा से संज्ञायित किया जा रहा है.

प्रस्तुत शोधपत्र में इन्ही सामाजिक-सांस्कृतिक झंझावातों से उत्पन्न परिघटना (जैसा कि अधिकांश विद्वान मानते हैं) ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ का ‘जातीय संरचना’ के साथ अंतर्क्रियात्मक संबंधों का समाज वैज्ञानिक अध्ययन ऐतिहासिक पूर्वपीठिका में किया गया है. इसका अध्ययन क्षेत्र बनारस लिया गया है. बनारस को अध्ययन क्षेत्र के रूप में चुनने का मेरा प्रमुख कारण यहाँ की जीवंत प्राचीन संस्कृति है, जिसने प्राचीन काल से मध्य काल तक के बौद्धिक एवं आधुनिक भारत के राजनीतिक बुद्धिजीवी वर्ग को खासतौर पर हिंदुत्व कि राजनीति को एक शसक्त नेतृत्व प्रदान किया है. इस नेतृत्व में शामिल हैं, महाकारुणिक तथागत गौतम बुद्ध, पार्श्वनाथ एवं मध्यकाल में सन्त कबीर, रविदास और ब्राम्हणवादी चेतना के जड़त्व के घोर अंधकार के दौर में मीरा बाई का आन्दोलन और उनका प्रेरणास्रोत बनारस के एक फ़क़ीर रविदास का होना. इतना ही नहीं ब्राम्हणों के सत्ता के साथ समझौतों के परंपरा का विस्तृत प्रचार-प्रसार जिस तुलसीदास ने किया, उसकी शुरुआत भी बनारस से ही हुई है. आधुनिक भारतीय समाज, कम से कम हिंदी पट्टी का समाज और यहाँ कि राजनीति (राष्ट्रीय राजनीति सहित) तो इन्ही मान्यताओं, पूर्व मान्यताओं के वशीभूत अपने जीवन दर्शन को भ्रमित आधुनिकताबोध के साये में संचालित कर रहा है.

अवधारणात्मक स्पष्टीकरण

लिव-इन-सम्बन्ध पर कुछ भी लिखने व कहने से पहले इसको अवधारणात्मक स्तर पर समझ लेना आवश्यक है. लिव-इन-सम्बन्ध को लेकर अवधारणा के स्तर पर कतिपय भ्रांतियां हैं, इनके मध्य समन्वय स्थापित करते हुए मैं अपना विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयास करूँगा. पहली भ्रान्ति तो इसी सवाल को लेकर है कि लिव-इन-सम्बन्ध कहा किसे जाय? इस मुद्दे पर तीन दृष्टियाँ हैं-
1. ऐसे अविवाहित या कोई एक अविवाहित युवक-युवती/स्त्री-पुरुष जो एक साथ एक ही घर में रहते हों तथा उनके मध्य यौन सम्बन्ध हों.
2. ऐसे अविवाहित जोड़े जो एक साथ एक ही आवास में निवास करते हों, परन्तु उनके मध्य यौन सम्बन्ध स्थापित न हों.
3. ऐसे अविवाहित या विवाहेत्तर युवक-युवती/स्त्री-पुरुष जिनके बीच यौन सम्बन्ध सहमति पूर्वक स्थापित हों परन्तु वे साथ में रहते न हों.

इस तरह से हम पाते हैं कि इन तीन दृष्टियों के अलावा कुछ मुद्दों पर सामान्य सहमति भी पाई गयी है. इनमे से भावनात्मक सहयोग, विवाहेत्तर सम्बन्ध, स्थापित सामाजिक संरचना में स्त्री-पुरुष संबंधों में बिखराव, यौन इच्छा की तृप्ति, परस्पर सहयोग, अस्थाई सम्बन्ध होना आदि.

लिव-इन-संबंधों की ऐतिहासिकता का सामान्य विश्लेषण


लिव-इन-सम्बन्ध पारंपरिक भारतीय समाज के लिए अतिसंवेदनशील प्रघटना है जिसे विद्वानों (बौद्धिक कहे जाने वाले भारतीय) ने सामान्य जन के सामने एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया है. यहाँ पर मैं लिव-इन-संबंधों की ऐतिहासिकता का आलोचनात्मक अध्ययन करना चाहूँगा.

हिन्दुत्ववादी वैचारिकी के समर्थक विद्वान लिव-इन-संबधों को पश्चिमी संस्कृति का उत्पाद मानते हैं तथा इसके भारत में प्रवेश करने के पीछे पश्चिमी सांस्कृतिक मूल्यों का भारत में अविच्छिन्न प्रवाह को कारण मानते हैं. ये विद्वान् लिव-इन-संबधों को भारतीय समाज के लिए नकारात्मक प्रभाव वाली विघटनकारी प्रघटना मानते हैं. किन्तु ऐसे राष्ट्रवादी तथा हिन्दुत्वादी विद्वानों के साथ समस्या यह है कि यह विद्वत मंडली ब्राम्हणवादी परंपरा के श्रेष्ठताबोध से ग्रसित है. ये विद्वान् प्रत्येक उस ज्ञान, वस्तु, परंपरा, संस्था आदि का विरोध करते हैं जो इनकी पारंपरिक सत्ता संरचना को चुनौती प्रस्तुत करता हुआ प्रतीत होता है.  संरक्षणवादी तथा पारंपरिक यथास्थितिवादी ये विद्वान् अपने वर्गहित के लिए कई बार तथ्यों का निर्माण खुद कर लेते हैं तो कई बार तथ्यों को ऐसे तरीके से प्रस्तुत करते हैं कि उन तथ्यों का मूल मंतव्य ही ओझिल हो जाता है. ऐसे में जियाउद्दीन के शब्दों में कई बार बहस (संवाद नहीं) का स्वरूप झूठ बनाम झूठ का हो जाता है और भारतीय समाज का कराहता हुआ सच समूचे बौद्धिक परिदृश्य से सुनियोजित तरीके से बाहर कर दिया जाता है. इसका सामाजिक परिणाम भी घोर नकारात्मक होता है. अतः भारत के इस पारंपरिक सत्ताधारी वर्ग द्वारा प्रत्येक असफलता का जिम्मेदार पश्चिमी संस्कृति को या किसी किसी और को बताना इनके इरादों के प्रति संदेह पैदा करता है.

लिव-इन-संबधों की ऐतिहासिकता की चर्चा में आदिवासी समुदायों में पाए जाने वाले युवागृह काफी प्रासंगिक हैं. आदिवासी समाज के इन युवागृहों में एक निश्चित आयु के बाद युवक-युवतियों को एक विशेष निवास स्थान (यह प्रायः मुख्य बस्ती से दूर होता है) में एक साथ रात्रि विश्राम करने की सामजिक व्यवस्था थी.  इस संस्था के बहुत से कारणों तथा उद्देश्यों में एक प्रमुख उद्देश्य युवक-युवतियों को यौन प्रशिक्षण प्रदान करना होता था. इससे उन युवक-युवतियों को अपना जीवन साथी चुनने तथा साथ रहने की वैवाहिक स्वतंत्रता मिलती थी. ऐसे युवागृह लगभग सभी आदिवासी समाजों में पाए जाते थे. आदिवासी समाजों में महिलाओं की प्रस्थिति तथा महिला उत्पीड़न, बलात्कार आदि के अमानवीय मामलों का सभ्य समाज की तुलना में काफी कम पाया जाने का प्रधान कारण उनके युवागृहों की व्यवस्था को माना जाना चाहिए.

अब हम कुछ उद्धरण शास्त्रीय  ब्राम्हण ग्रंथों से भी लेते हैं, जहाँ पर विवाह को एक संस्कार के रूप में व्याख्यायित किया गया है. ब्राम्हण धर्मशास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों के की चर्चा मिलती है, जिसमे से एक प्रकार गन्धर्व विवाह का भी है. गन्धर्व विवाह के अंतर्गत स्त्री-पुरुष/ युवक-युवती स्वेच्छापूर्वक अपने जीवन साथी का चुनाव करने को स्वतंत्र थे. इसके अलावा महाभारत में कुंती और सूर्य की प्रेम कहानी और उससे जन्मा कर्ण, कुंती का वायु, इंद्र आदि के साथ संबंधों के अलोक में भी लिव-इन-संबंधों की ऐतिहासिकता परखी जा सकती है.

औद्योगिकीकरण और लिव-इन-सम्बन्ध
भारत में औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों एवं सांस्कृतिक संक्रमण के कारण लिव-इन-सम्बन्ध के स्वरूप तथा संख्या में मात्रात्मक एवं गुणात्मक रूप से वृद्धि हुई है. इसे कार्य-कारणत्व स्वरूप में इस तरह से देखा जा सकता है.
औद्योगिकीकरण तथा शिक्षा व्यवस्था में परस्पर सम्पूरकता का सकारात्मक सम्बन्ध है. आधुनिक शिक्षा तथा औद्योगीकरण की प्रक्रियाएं आवश्यक रूप से एक दूसरे की पूरक हैं. शिक्षा और औद्योगीकरण स्वतंत्र तथा गैर पारंपरिक (कई बार तो परम्परा-विरोधी) विचारों तथा प्रक्रियाओं के साथ घनिष्ठ रूप में अंतर्संबंधित हैं. औद्योगीकरण के स्पष्ट परिलक्षित होने वाले परिणामों में औद्योगिक विस्थापन, शैक्षणिक विस्थापन तथा व्यावसायिक विस्थापन प्रमुख हैं. लिव-इन-संबंधों का इन प्रक्रियागत मूल्यों के साथ सकारात्मक सम्बन्ध है.

औद्योगीकरण के ही एक परिणाम के रूप में औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में युवक-युवतियों/ स्त्री पुरुषों का एक साथ काम करना है. शिक्षा संस्थानों  में भी युवक-युवतियां एक साथ अध्ययन करते हैं. ऐसे विद्यार्थी तथा औद्योगिक, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कार्य करने करने वाले व्यक्ति सामान्यतौर पर अपने पैतृक आवासों से विस्थापित होते हैं. ऐसे में एक साथ काम करते हुए मनोभावनात्मक अलगाव से उत्पन्न भावनात्मक सहयोग की इच्छा (विस्थापित व्यक्तियों में भावनात्मक विषाद से ग्रसित होने की सम्भावना हमेशा ही बनी रहती है) के अलावा विपरीत सेक्स के प्रति सहज आकर्षण इनमें परस्पर प्रेम पैदा होने की प्रधान वजहों के रूप में चिन्हित की जा सकती हैं. यह प्रेम समय के साथ-साथ लिव-इन-संबंधों के रूप में परिणति को प्राप्त होता है.

लिव-इन-संबंधों की स्वीकार्यता एवं पुरुष सत्तात्मक मनोग्रंथि


इन दिनों भारतीय सामाजिक विमर्श का एक प्रमुख मुद्दा लिव-इन-संबंधों की स्वीकार्यता का है. अधिकांश मामलों में यह पाया गया है कि लिव-इन-संबंधों की सामाजिक स्वीकार्यता बहुत क्षीण होती है. काढ़ में खोज तो तब होता है जब ये सम्बन्ध जाति और धर्म की जकड़बंदी को स्वीकार करने से नकार रहे होते हैं. जाति-धर्म की दीवारों को तोड़ते हुए बनाये गए लिव-इन-संबंधों की पारिवारिक स्वीकार्यता भी लगभग असंभव हो जाती है. जाति का वर्चस्व पुरुष सत्ता की जकड़बंदी और क्रमिक असमानता की प्रक्रियाओं को बढ़ावा देने वाले प्रकार्यों कि संरचना को निरंतरता में मजबूती से पूरक रूप में सम्बंधित है .

यहां पर मैं लिव-इन-संबंधों के सन्दर्भ में पुरुष सत्तात्मक मनोग्रंथि को भी समझना चाहूँगा. भारतीय सामाजिक संरचना में पुरुष सत्तावादी मानसिकता व्यापक रूप से बहुआयामी स्वरूप में विस्तारित है. स्थिति यह है कि लिव-इन सम्बन्ध में रहने वाला या रहने की इक्षा रखने वाला एक पुरुष तो लिव-इन में रहने को अपने स्वाभिमान से जोड़कर देखता है, वहीं दूसरी तरफ इसी मामले में वह अपने घर की महिलाओं (बहन, पत्नी, बेटी) के प्रति ठीक विपरीत मनोवृत्ति से ग्रस्त रहता है. बहुत कम ऐसे अपवाद मिले हैं जहाँ परिवार के सदस्य इसे पारिवारिक और वैचारिक लोकतंत्र मानते हुए स्त्री-पुरुषों के समान पारिवारिक-सामाजिक नियमावली को स्वीकार करते हैं. उम्मीद की जानी चाहिये कि जैसे व्यक्तियों के अन्दर ‘जनतंत्रीय पवित्रता बोध’ बढ़ता जायेगा, ‘विवेकशील शिक्षा’ का स्तर बढ़ेगा तथा इन जीवन मूल्यों की व्यापकता बढ़ेगी; भारतीयों सहित दक्षिण एशियाई समाज के विचारों तथा व्यवहार में सकारात्मक जनतंत्रीय परिवर्तन उद्घाटित होंगे.

भारतीय समाज में विवाह संस्था प्रकार्यात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण रही है. विवाह का महत्व बच्चों के समाजीकरण, पारिवारिक प्रकार्यों का निर्वहन, अंतर-पीढ़ीगत संबंधों से लेकर वैयक्तिक व पारिवारिक विघटन को रोकने तक रहा है. विवाह संस्था हिन्दू समाज के संयुक्त परिवार की रीढ़ रही है. स्वतंत्रता पश्चात् हुए आद्योगीकरण के बाद से विवाह संस्था के प्रकार्यों तथा उसकी प्राथमिकताओं में संरचनात्मक परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं. तलाक की दरों में भी प्रतिवर्ष वृद्धि दर्ज की जा रही है. मुस्लिम समुदाय से अधिक तलाक हिन्दू परिवारों में हो रहे हैं. इसे स्वतंत्रता और जनतंत्रीय मूल्यों के साथ भी जोड़ने के प्रयास किये जा रहे हैं.

इक्कीसवीं सदी में उच्च शिक्षित युवाओं की संख्या में आशातीत वृद्धि दर्ज की गयी है. यहां पर शिक्षा के मूल्यों तथा शिक्षा पर एक बड़ा सवाल यह है कि, यदि जनतंत्रीय मूल्यों का स्पष्ट सम्बन्ध शिक्षा के साथ है; यदि सामाजिक व व्यक्तिगत जागरूकता के स्तर को तय करने का पैमाना भी शिक्षा है, तब घरेलू हिंसा, दहेज़ प्रताड़ना आदि अमानवीय मामलों में वृद्धि तथा स्त्री शोषण के बढ़ते नए आयामों के सन्दर्भ में इन सभी मूल्यों, मानदंडों का परीक्षण किये जाने की पुरजोर आवश्यकता है. इस आवश्यकता का एक प्रमुख कारण यह भी है कि स्त्री-शोषण के विभिन्न स्तर तथा विभिन्न आयाम उच्च शिक्षित और जागरूक समझे जाने वाले तबके के अन्दर अपनी विशिष्ट उपस्थिति प्रदर्शित कर रहे हैं.

उपरोक्त मुद्दे को लेकर विवाह के स्थानापन्न व्यवस्था के रूप में लिव-इन-संबधों के बारे में कुछ विचारकों तथा एक्टिविस्टों ने कार्य प्रारंभ कर दिया है. इनमें से कुछ नाम इस प्रकार से हैं- राजेन्द्र यादव, तसलीमा नसरीन, अरुंधती रॉय, अनिल यादव, शोभा डे आदि.

लिव-इन-सम्बन्धों के बाद प्रादुर्भूत समस्याएं

लिव-इन-संबंधों के स्थायित्व का विश्लेषण करने का प्रयास करें तो पाते हैं कि, अधिकांश स्वजातीय लिव-इन-सम्बन्ध कालान्तर में विवाह के रूप में परिणत हो जाते हैं, परन्तु इसके अतिरिक्त अन्य लिव-इन-सम्बन्धियों के सम्बन्ध प्रायः अस्थायी होते हैं. प्रायः यह देखने में आया है कि लिव-इन-संबंधों के ख़त्म होने के बाद की जिंदगी पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण होती है. संभवतः इसका कारण वर्तमान समाज में भी ‘समाज व परिवार की इज्जत को नारी की योनि में कैद माना जाता है.’ कोई भी महिला या युवती अपनी मर्जी से किसी पुरुष के साथ सम्बन्ध स्थापित कर ले तो वह परिवार और समाज के लिए बहिष्कृत सी हो जाती है. भारतीय समाज की ऐसी ही अस्वीकार्यता तथा असंवेदनशीलता बलात्कार पीड़ित युवतियों/बच्चियों के समक्ष भीषण संत्रासजनक चुनौती के रूप में प्रस्तुत होता है, जब तथाकथित सभ्य समाज ऐसी पीड़ित महिलाओं तथा बच्चियों को अपनी कर्कश तथा व्यंग-मिश्रित टिप्पणियों से मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है.

यह प्रवृत्ति भी देखने में आयी है कि यदि लिव-इन-सम्बन्ध में रह रहे युगलों में एक बार यौन सम्बन्ध स्थापित हो गया तो उसके बाद पुरुष वर्ग स्त्री पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास प्रारंभ कर देता है. इस मानसिक-सांस्कृतिक मनोवृत्ति का कारण भी पुरुष सत्तात्मक मनोग्रंथि में ढूढ़ा जा सकता है.

एक समस्या लिव-इन-संबंधों के बाद पैदा हुए बच्चों को लेकर आती है. यदि स्त्री-पुरुष दोनों ही कामकाजी हैं (अक्सर ऐसा ही होता है) तो बच्चे के समाजीकरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की सम्भावना प्रबल हो जाती है. बचपन में उस बच्चे/बच्ची को पड़ोसियों तथा अन्य जान-पहचान के व्यक्तियों के ताने, अश्लील गालियां सुनने को विवश होना पड़ता है. ऐसे में कई बार तो बच्चे के अन्दर विघटनकारी प्रवृत्तियां घर कर जाती हैं. अनाथालयों में अवैध बच्चों की बढ़ती हुई संख्या भी इसी असंवेदनशीलता का परिणाम है.

एक और समस्या तब आती है जब बच्चा पैदा होने के बाद उसके माँ-बाप अलग हो जायें. ऐसे बच्चों के पालन-पोषण की समस्या तो आती ही है, बच्चे का संरक्षकत्व तय करने में भी मुश्किल होती है. उस बच्चे की शिक्षा पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की पूरी सम्भावना होती है, क्योंकि उस बच्चे से उसके पिता नाम पूछा जाता है, एक अदृश्य मगर बहुत मजबूत मानसिक भय से बच्चा ग्रसित हो जाता है. यह परेशानी उस बच्चे को युवावस्था के बाद तक झेलनी पड़ती है. लावारिस बच्चों के पाए जाने की प्रधान वजह के रूप में ऐसे माँ-बाप का अलग हो जाना है.

समीक्षात्मक टिप्पणी 
स्वतंत्रता के सत्तर वर्ष बीत जाने के बाद भी भारतीय समाज की सबसे बड़ी कटु सच्चाई जाति व्यवस्था का समय के साथ-साथ अपने स्वरूपों तथा संप्रत्ययों को बदलते हुए अपनी संकीर्णता एवं सामाजिक समता, ममता के विध्वंसक स्वरुप में अपनी अनवरत उपस्थिति को बनाये रखना है. समकालीन भारतीय समाज का दूसरा बड़ा और खतरनाक सच यहां की राजनीतिक-धार्मिक प्रणाली से उत्पन्न साम्प्रदायिक गुटबंदियों को आधार बनाकर नित नए समाज विरोधी प्रयोग किये जाना है.

इन जातीय तथा धार्मिक बाड़ेबंदी से मुक्ति के रूप में भी लिव-इन-संबंधों पर विचार किया जा रहा है. जाति और लिव-इन-संबंधों पर एक दिलचस्प पहलू यह है कि यदि ये सम्बन्ध एक ही जाति के स्त्री-पुरुषों के मध्य बनते हैं तो, उन्हें पारिवारिक व सामाजिक स्वीकार्यता कदाचित आसानी से प्राप्त हो जाती है, किन्तु अन्तर्जातीय संबंधों के मामलों में सामाजिक स्वीकार्यता हासिल कर पाना बहुत मुस्किल होता है. अन्तरधार्मिक सम्बन्ध होने पर स्वीकार्यता का स्तर सर्वाधिक मुश्किल होता है. इस तरह के मामलों में बहुत बार प्रेमियों की हत्या तक कर दी जाती है. लिव-इन-संबंधों के मध्य आर्थिक स्तरों का विभेद और उससे प्रदत्त समस्याएं प्रायः बहुत कम पाई गयी हैं. अतः जातीय व धार्मिक विभाजन के खतरनाक गठजोड़ और लिव-इन-सम्बन्ध के सन्दर्भ में हमारा उद्देश्य ‘जाति विहीन समाज की स्थापना में लिव-इन-संबंधों के कारकतत्व को समझना है.

एक समस्या भारतीय शिक्षितों में आधुनिकता की समझ तथा तत्संबंधित व्यव्हार को लेकर भी आती है, जिस देश में लगभग सत्तर फीसदी आबादी को मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का अवसर नहीं मिल सका है. ऐसे में आधुनिकता की इस अधकचरी समझ ने स्त्रियों, महिलाओं, बच्चियों को उपभोग की एक वस्तु के रूप में देखे जाने तथा तदनुरूप व्यवहार के मूल्य के मात्रात्मक तथा गुणात्मक विस्तार के दायरे को बढ़ाया है. विस्तार इस दृष्टि से कि तथाकथित सभ्य समाज से अलग, आदिवासी समाज की स्त्रियों को मानवीय अस्मिता तथा मानवीय गरिमा को सुरक्षित रखते हुए जीवन यापन करना उनके आदिवासी जीवन-संस्कृति का अटूट हिस्सा था. उपभोक्तावाद से ग्रसित वर्तमान बाजारवादी समाजव्यवस्था ने आदिवासी स्त्री को भी बाजारू बना दिया है. हिमालय के तलहट में बसे थारु, झारखण्ड के संथाल, मुंडा तथा अन्य आदिवासी जातियों से लेकर उत्तर-पूर्वी भारत की गारो, खासी आदि आदिवासी जातियों के साथ (आधुनिक जीवन मूल्यों से संचालित होने का दावा करने वाले समाज ने) अभी तक उपभोग की एक वस्तु के अनुरूप ही व्यवहार करता रहा है. इन भोले-भाले आदिवासी समाज की युवतियों, बच्चियों को यौन शोषण के साथ-साथ मानसिक, शारीरिक उत्पीड़न का तोहफा हमारे इस सभ्य समाज ने दिया है

ऐसी विषम परिस्थितियों की मारी महिलाओं को यदि किसी युवक/पुरुष की तरफ से सम्मान तथा भावनात्मक सहयोग का भरोसा मिलता है ऐसे में एक सम्भावना बनती है कि उनके बीच का सम्बन्ध लिव-इन-सम्बन्ध के रूप में परिणत हो जायेगा. क्योंकि यह सहज मानवीय स्वभाव है कि जब किसी व्यक्ति को चहुतरफा शोषण का शिकार बनाया गया हो, वह अनेक आयामी वंचनाओं, शोषण, उत्पीड़न, दमन का दैनिक आहार लेने को विवश हो और ऐसे में उसे कहीं से भी अपनापे तथा संवेदनात्मक सहानुभूति मिले और उसको भावनात्मक संबल प्रदान करने वाला सहयोगी मिल जाये जो उसे तमाम तरह की अमानवीय वंचनाओं, शोषण, उत्पीड़न आदि की कष्टदायी यादों से उबरने में उसका मददगार बनता है, तो उनके बीच सहज ही प्रेम, सौहार्द्र तथा अपनेपन की भावना जन्म ले लेती है. और ऐसे में यदि वो विपरीत सेक्स के हुए तो उनमें एक खास तरह का संज्ञानात्मक लगाव विकसित हो जाता है, जो कई बार लिव-इन-सम्बन्ध का रूप ले लेता है.

सन्दर्भ सूची-
*पुस्तकें-
1. ओशो; सम्भोग से समाधि की ओर, डायमंड प्रकाशन, दिल्ली, 2006
2. ज्ञानभेद, स्वामी; ओशो: एक फक्कड़ मसीहा, भाग 2, 4, डायमंड प्रकाशन, दिल्ली, 2001, 2003
3. यादव, राजेन्द्र; आदमी की निगाह में औरत, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2006
4. शास्त्री, सोहनलाल; डॉ. आंबेडकर और हिन्दू कोड बिल, सम्यक प्रकाशन, दिल्ली, 2008
5. दोषी, एस. एल.; आधुनिक समाजशास्त्रीय विचारक, रावत प्रकाशन, जयपुर, 2011
**वैयक्तिक साक्षात्कार तथा परिचर्चायें-
1. सरिता के साथ संवाद, समाजशास्त्र विभाग, बी.एच.यू., अक्टूबर 2014 से अप्रैल 2015.
2. सुबोध कान्त के साथ संवाद, राजा राम मोहन रॉय छात्रावास बी.एच.यू., सितम्बर-अक्टूबर 2016.
3. जियाउद्दीन के साथ संवाद, डॉ. भगवानदास छात्रावास बी.एच.यू., नवम्बर 2016.
5. रामायण पटेल के साथ संवाद, केन्द्रीय ग्रंथालय, बी.एच.यू., नवम्बर 2016.

शोधार्थी, 
इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज, 
बी.एच.यू. वाराणसी
इमेल: vikashasaeem@gmail.com

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का : क़त्ल किए गए सपनों का एक झरोखा

ज्योति प्रसाद
सुनिए, कहानी की शुरुआत पर ध्यान दीजिये। यह किसी लड़की के जीवन में वहीं से शुरू हो जाती है जब दाई या नर्स क्या हुआ है पूछने पर यह बताती है कि लड़की हुई है तभी, ठीक उसी समय से ‘नियम व शर्तें लागू’ हो जाती हैं उस नवजात बच्ची पर। लेकिन वह लड़की तो कुदरत के दिये लक्षणों को अपने अंदर लेकर पैदा होती है। इसलिए उसके अंदर मौजूद उसकी अंदरूनी और रोमानी-रूहानी तमन्नाएँ अपने को ज़ाहिर कर जीने की कोशिश करती है। जैसे ही यह मौक़ापरस्त चाहत बाहर आने को होती है तभी ‘टर्म एंड कंडिशन्स’ लागू हो जाते हैं। निदेशक अलंकृता श्रीवास्तव  की यह फिल्म इसी बिन्दु को पकड़ने की ठीक-ठाक कोशिश है।

स्त्री की यौन इच्छाओं और शुचिता का पूरा अध्याय ही दवाब, शंकाओं और संघर्षों के दायरे में आता है। स्त्री चिंतन को समझने के लिए उन सभी ‘पवित्र शर्तों’ को एक बार देख व सूंघ लेना चाहिए जिन्हें बहुत ऊंचा मुकाम दिया गया। गंदी औरत, बदचलन औरत, बेशर्म औरत, इज्जत मिट्टी में मिला देने वाली औरत…आदि विशेषणों के पीछे की उन सभी तस्वीरों की पड़ताल करने की कोशिश के रूप में यह फिल्म कदम भी उठाती हुई दिखती है।

कुछ दिनों पहले बैंडीट क्वीन फिल्म के बारे में लिखे लेख को पढ़ते हुए मुझे वह क़िस्सा याद आ गया जो हमारे बगल की पड़ोसन सिनेमा हॉल से समेटकर लाई थी। वह फिल्म के फूलन देवी पर फिल्माए गए उस दृश्य को थूक घोट-घोट कर गाली दे रही थीं, जिसमें उनके कपड़े उतार कर घड़ा थमाया जाता है। उन्हों ने मेरी माँ को झँझोड़ झँझोड़ कर कहा- ‘न जाने कैसे लोग पैसे की ख़ातिर नंगे हो जाते हैं। शर्म भी नहीं आती। पैसा ही नहीं होता सब कुछ। इज्जत नाम की भी चीज़ होती है दुनिया में।… जाने क्या मिलता है अपनी इज्जत देकर…ऐसी ही फिल्म देखकर लड़कियां बिगड़ जाती हैं..!’ वह उस दिन काफी बोलीं।

स्त्री शरीर और उससे जुड़ी उसकी बातों और इच्छाओं को हमेशा से ही शर्म और पवित्रता के आवरण में सहेज कर रखने की कोशिश की गई है। राजा एक से अधिक शादियाँ करने के बाद या फिर हरम में एक से अधिक औरतों को रखने के बावजूद गंदा आदमी, बदचलन आदमी बेशर्म आदमी क़रार नहीं दिया जाता। इसके अलावा उस आदमी पर सामाजिक और परंपरा वाला प्रतिबंध भी नहीं होता। ठीक इसके उलट औरत का कृत्रिम चरित्र ही उसके पूरे के पूरे अस्तित्व से जोड़ दिया गया है। इसलिए जब जैसे ही वह अपनी इच्छाओं को ज़ाहिर करती है, ठीक वैसे ही उस पर हमले होते हैं और मिनटों में वह हाशिये पर पड़ी नज़र आती है। इस फिल्म से इस बात को समझा जा सकता है।

बैन की मार झेल चुकी फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ के साथ एक बहस तो छिड़ ही गई है। फिल्म रिलीज़ हो चुकी है और तारीफ़/तीखे हमले दोनों ही बटोर रही है। फिल्म के बैन को अगर एक तरफ रख कर फिल्म के किरदारों और कथा पर नज़र डाली जाये तब दर्शकों की ज़िम्मेदारी और समझ किस दिशा में जाएगी, जैसा सवाल उभरता है। चारों किरदारों को अपने ध्यान का विषय बनाया जाना चाहिए। चारों औरतों की उम्र अलग अलग है। चारों का ताल्लुक (निम्न) मध्यम वर्ग का ही मालूम होता है। वास्तव में वे चारों औरतें प्रतीक के रूप में उभरती हुई नज़र आती हैं।

उनकी ज़िंदगी के दो पहलू हैं। एक वह जो उनके परिवार ने उन्हें निश्चित फ्रेम के तौर पर दिया है। दूसरा, जो उन्हों ने खुद को देखने की तमन्ना के साथ विकसित किया है। इसी दूसरे फ्रेम को वे छुपाती फिरती हैं। गौर से देखेंगे तब यह अनुभव होता है कि सारा झगड़ा समाज और परिवार द्वारा दी जाने वाली औरतों को आदर्श और चुप रहने वाली गुड़िया में तब्दील कर देने या फिर उन्हें पालतू बना देने वाली पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया को न मानने की वजह से है। फिल्म में इन औरतों ने अपनी खुद की शैली ईजाद करते हुए उस परंपरा को धता बंधा दिया है जो उन्हें आदर्श बने रहने के तरीके थोपती है। जैसे ही वह इस चाकू मार विरासत को धक्का देती हैं और अपने बारे में सोचती हैं वैसे ही समाज और परिवार के धड़े उन्हें धमकाते हुए दिखाई देते हैं।

भोपाल का छोटा मोहल्ला और उसकी ये चारों रंगीन सपने लेकर जीने वाली औरतों में जितना आक्रोश है उतना ही आज़ादी और मनमर्ज़ी को करने की ज़िद्द भी है। सबसे युवा रेहाना अपने को बुर्के  की दम घोंटू ज़िंदगी से आज़ादी की ख़ातिर जोख़िम उठाती है। चाहे वे जूतों, लिपस्टिक या फिर आधुनिक कपड़ों की चाहत (चोरी) हो या फिर देर रात पार्टी में जाने की इच्छा। वह बुर्के सिलने का काम करती है। जो प्रतीक है एक ही ढर्रे की आज़ादी छीनने वाली परवरिश की और माहौल की। वह युवा है और हर उस फल को चखना चाहती है जिसकी उसे सख़्त मनाही है। रेहाना मुस्लिम परिवार से है। इसलिए यहाँ इस बात से बचा जाना चाहिए कि ऐसा केवल मुस्लिम परिवार में होता है। जबकि ऐसा हर धर्म और परिवार में होता है।

आमतौर पर घरों में लड़कियों को परवरिश के साथ ही बचाव वाले गलियारे में ठूँसा जाता है। अपने को कैसे बचा कर रखना है, अपने शरीर को ढक कर रखने की सीख, सुंदर दिखने से परहेज, नाच गाने से दूर रहने के आदेश आदि, यही सिखायेजाते हैं। और यह एक महत्वपूर्ण वजह है जिसके कारण वे बहुत बड़ी संख्या में हिंसा और अपराध की शिकार बनती हैं। रेहाना को कॉलेज में इस उम्मीद से दाखिल करवाया गया है कि वह उससे जुड़ी आशाओं को पूरा कर पाये। लेकिन इसके साथ ही क़ायदा उसके सामने रख दिया गया है कि वह कौन से सपने देख सकती है और कौन से नहीं। जो यह ‘नियम व शर्तें लागू’ वाली दशा है, वह उसे चुभती है और वह इससे बाहर निकलने के लिए कुछ रास्ते अपनाती है।

दूसरा किरदार ब्युटिशियन लीला का है। जो अपने अंदर की तीव्र इच्छा को तो पूरा करना ही चाहती है साथ ही शादी से ही जुड़ी बड़ी प्लानर-व्यवसायिका बनना चाहती है, प्रेमी अरशद के साथ। पर अपनी माँ के चुने हुए लड़के से शादी करना, उसको एक दूसरे किनारे पर ले जाता है। दोनों माँ बेटी के चरित्रों में उन स्त्री विडम्बना को देखा जा सकता है जो उन्हें जीवन में सामाजिक व पारिवारिक स्ट्रक्चर से मिली है। विधवा माँ और बेटी के जोड़े में, माँ ने भी उतने ही ग़म उठाए हैं पर फिर भी वह अपनी बेटी को उसी रूप में देखना चाहती है जिसमें वह विधवा बनने से पहले थी। उसके मुताबिक शादीशुदा होना अहम है।

तीसरी किरदार शिरीन अपने शरीर को अपनी ही मर्ज़ी के विरुद्ध जाकर, पति के हवाले करती एक पत्नी के किरदार में दबी हुई औरत है। वह हर तरह से दबती है। पारिवारिक जिम्मेदारियों के सवाल पर, घरेलू काम को लेकर, पति के दूसरी औरत से संबंध को लेकर, निरंतर होते अबॉर्शन से शरीर में होती परेशानियों के कारण, तीन बच्चों की परवरिश को लेकर और नौकरी की बात को छुपाते हुए। शिरीन इन सब बातों से पल पल जूझ रही है तो दूसरी तरफ उसका पति बिना किसी दबाव के जी रहा है और पत्नी की लगाम हर तरह से कस रहा है, फिर चाहे शारीरिक स्तर पर हो या मानसिक स्तर पर। शिरीन की कहानी लगभग हर भारतीय औरत की ही कहानी है।

घर के अंदर जिसे नितांत निजी ज़िंदगी कहा जाता है, वह वास्तव में शोषण के साथ दिखाई पड़ता है। अपने ही शरीर पर हक़ न होना आज भी एक बहुत बड़ा बहस का मुद्दा भी है। कब सेक्स करना है कब नहीं करना है, पत्नी की मर्ज़ी है भी अथवा नहीं, उसे किन शारीरिक और मानसिक दिक़्क़तों से गुज़रना पड़ रहा है, क्या वह बच्चे को जन्म देना छाती है अथवा नहीं, क्या वह अपने शरीर से जुड़े फैसले ले सकती है या नहीं.., सुध लेने वाला कोई नहीं दिखता। दूसरी तरफ लीला, रेहाना और उषा का किरदार सेक्स संबंधी चाहतों को पूरा करने की कोशिश में दिखते हैं, जिन्हें लोग हरगिज़ स्वीकार नहीं करते।

चौथा और एक और महत्वपूर्ण किरदार उषा जी का है जो ‘हवाई मंजिल’ में बुआ जी ही बन कर रह गई हैं। पति की मृत्यु के बाद एक लंबा सफर अकेलेपन में गुज़ार चुकने वाली उषा जी के मन में आज भी वही ताज़ा तरंगें मौजूद हैं जो किसी भी औरत में होती हैं। उनके इर्द गिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा है जिन्हों ने बुआ जी को एक औरत की नज़र से देखने की कभी कोशिश नहीं की। उन्हें वृद्ध और धार्मिक महिला का लिबाज़ पहना दिया गया है। पर कमरे के भीतर वह एक ऐसी औरत का चरित्र जीती हैं जो आज भी इच्छाएं रखती हैं। अपनी तृप्ति को वह प्रेम और रस से भरे हुए उपन्यास पढ़कर और अपने ही जिम ट्रेनर से फोन पर इश्क़िया बातें कर के पूरा करती हैं। औरत के मन में क्या चल रहा है, यह जानने की कभी कोशिश नहीं की जाती। उसे खुद के लिए उस चुनाव से महरूम कर दिया जाता है, जिसे वह चाहती है। उससे वह जिंदगी जीने की उम्मीद की जाती है जो हजारों साल से उसके लिए निर्धारित की गई है। लेकिन उषा, इस निर्धारित भूमिका को न सिर्फ तोड़ती है, बल्कि वह वैसे ही जीती हैं जैसे उनका मन कहता है।
इस फिल्म पर बवाल आख़िर क्यों?

थोड़ी देर के लिए यदि महिला मिथक कहानियों की यात्रा की जाये तब हमारे सामने पंचकन्याओं और अप्सराओं की छवियाँ उभरती हैं, जिन्हें धार्मिक, सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त नहीं हो पाई कभी। अपनी यौनिक इच्छाओं की पूर्ति उनको इतनी महंगी पड़ी कि उन्हें पत्थर में तब्दील होते दिखाया गया। उद्धारकर्ता भी एक पुरुष ही बना। अप्सराओं का पूरा स्केच ही परिवार और समाज के बनाए गए संस्थानों के खिलाफत में खड़े हुए दिखते हैं। उनकी शक्ति, यौनिकता, रूप-सौन्दर्य और रिश्तों से परे जीवन की परिकल्पना उनके चरित्रों की ख़ूबी है जिसे रह रह कोसा गया, पाप द्वार, माया, मोहिनी, तपस्या भंग कर देने वाली आदि नामों से नवाजा गया। लेकिन फिर भी उनके नामों को मिटाया नहीं जा सका। ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का ’ के चरित्रों में इन्हीं मिथकों की हल्की छवियाँ देखी जा सकती हैं। ये सभी छवियाँ आकर्षित तो करती ही हैं साथ ही साथ उस जमे हुए पैटर्न को तोड़ती भी हैं जो उनके लिए तय किए जाने की कोशिश की जा रही है। इसलिए यह फिल्म सेंसर और समाज के तथाकथित तबको की आँखों में सुई की तरह चुभ रही है।

चरित्रों में आत्मविश्वास का स्रोत
इन आम स्त्री चरित्रों की बुनावट में एक दिलचस्प आयाम को जोड़ा गया है, उसे रेखांकित करना जरूरी भी होगा। रेहाना का कॉलेज गोइंग लड़की होना, उसकी स्कूल के बाद की शिक्षा की तरफ एक संकेत है। इसके अतिरिक्त उसका बुर्खें सीने के काम को उसके इनकम के स्रोत के रूप में देखा जा सकता है। शिक्षा और उसका खुद के लिए देखे गए सपने उसे एक रोज़ पूरी तरह से दकियानूस पम्परा के विरोध में खड़ा कर देने की संभावना भी दिखाते हैं। वह अंग्रेज़ी गीतों को पसंद करने वाली भावी आर्थिक रूप से स्वतंत्र लड़की की संभावना का वहन करने वाली चरित्र है। इससे अलग लीला और शिरीन पहले से ही कामगार हैं और आर्थिक क्षेत्र में अच्छा कर रही हैं। उषा उर्फ़ बुआ जी भी इसी तरह काम से जुड़े सारे निर्णय लेती हैं और चाभियों का गुच्छा अपने पास रखती हैं। उनके द्वारा लिए गए फैसले आखिरी होते हैं और उनकी राय के बिना कोई भी कदम नहीं उठाया जा सकता। यह सभी विशेषताएँ इन औरतों की आर्थिक मजबूती की तरफ तो इशारा करते ही हैं साथ ही उनके आत्मविश्वास को उजागर भी करते हैं।

फिल्म का कमजोर पक्ष
फिल्म के अंत में यदि चारों किरदार दस मिनट के लिए सिगरेट पीने की बजाय एक बेमिसाल प्रतिक्रिया देते तो फिल्म अपने लक्ष्य को पूरा करने में सफ़ल हो जाती। सिगरेट आज़ादी का प्रतीक नहीं है। इस बात को खुद सिगरेट भी जानती है जो एक चेतावनी देती है- ‘सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।’ आदमी सिगरेट पीता है इसलिए औरतें भी पी सकती हैं, वाला मामला स्त्री विमर्श को कमजोर ही करता है। महिला सशक्त किरदारों की विशेषता आदमी की बराबरी या उससे तुलना करने में नहीं है। आठ मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक हिन्दी अखबार हर बार बाइक रैली का आयोजन यह कह कर करता है कि दुनिया (आदमियों) को दिखा दो कि औरतें भी बाइक चला सकती हैं। यह केवल एक संदर्भ है। असली सशक्तिकरण हर तरह के शोषण से मुक्त पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक माहौल, मानसिक और शारीरिक स्वस्थता, बराबर की आय समान कामों के अंतर्गत, अपने को अभिव्यक्त करने की आज़ादी, सुरक्षित, बराबरी के मौकें, काम करने व जीने के लिए उचित माहौल…आदि आदि है। हजारों साल से जमी सत्ता को सिगरेट पी कर चुनौती नहीं दी जा सकती। इसलिए फिल्म का अंत थोड़ा खटकता भी है।

यौन सम्बन्धों पर बनी महिला प्रधान फिल्मों को क्यों शिकार किया जाता है?
फिल्म फायर, बैंडिट क्वीन, कामसूत्र, डर्टी पिक्चर, इंडियाज़ डॉटर, वॉटर आदि फिल्मों को सेंसर और सरकार ने अपना निशाना बनाया है। सभी फिल्मों में महिलाओं से जुड़े मुद्दे हैं।  इस फिल्म के साथ भी ऐसा ही है। यह फिल्म भी महिला प्रधान फिल्म है। सभी के विषय में स्त्री देह, उसकी यौनिकता व उनके शोषण के विभिन्न पहलू हैं। सेक्स आज भी बंद कमरे का मुद्दा है। समाज और उसकी प्रणाली में औरत-मर्द-बराबरी की बात हवा में तैरती है जबकि वास्तविक स्तर पर ऐसा नहीं है। औरत को अपनी अभिव्यक्ति की क़ीमत आज भी चुकानी पड़ती है। रात को घूमती औरत, जीन्स पहनने वाली औरत, बियर या शराब पीने वाली औरत, सेक्स की चाहत रखने वाली औरत इत्यादि श्रेणी में रख दी जाती हैं जो आदर्श औरत के सांचें में नहीं आतीं। ये सभी समाज को चुनौती देने वाली लगती हैं। इसलिए इन पर भरसक हमले किए जाते हैं।

परंपराओं पर सवाल कर देने वाली ‘वॉटर’ फिल्म की चुहिया सभी को पचाये नहीं पचती, क्योंकि वह सीधा सवाल करती है कि आदमी क्यों नहीं विधवा होता? अजीबो गरीब यह भी है कि ‘इंडियाज़ डॉटर’ जैसी डॉक्युमेंट्री फिल्म जो निर्भया घटना की जड़ की पड़ताल की कोशिश पर बनी फिल्म थी, उसे लेकर सरकार को देश की छवि की चिंता हो गई और उस पर आनन-फानन पररोक लगा दी गई। पर यू-ट्यूब के ज़माने में इसका फायदा सरकार को हो नहीं पाया। ठीक इसी तरह अन्य महिला प्रधान फ़िल्मों के साथ भी किया गया।

दिलचस्प यह भी है कि जो इसका विरोध करते हैं वे ही सरकारी खर्चे और ‘हॉलिडेज़’ में स-परिवार सहित खजुराहो की मूर्तिकला देखने जाते हैं। संभव हुआ तो वहीं से या फिर लौटकर फेसबुक पर अमेज़िंग ट्रिप इन अ अमेज़िंग प्लेस की हैडिंग के साथ फ़ोटो साझा करते हैं। ऐसे लोगों की मानसिकता को बॉलीवुड ने बखूबी कैश भी किया है। इन्हीं के लिए आदर्श माँ, प्रेमिका, बहन, बेटी, बहू की छवियों को गढ़ा गया। ये सभी लोकप्रिय चरित्रों की श्रेणी में आते हैं। लेकिन लिपस्टिक अंडर माय बुर्का  की चारों किरदार आदर्श-परिधान से परहेज़ करती हैं इसलिए वह सम्भ्रात जमाने के निशाने पर आ जाती हैं।
लेखिका , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधरत हैं. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com