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चंद्रकांत देवताले की याद में उनकी कविताएं : बाई दरद ले ले और अन्य

साठोत्तरी हिन्दी हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर चंद्रकांत देवताले नहीं रहे. उन्हें आदरांजलि देते हुए उनकी कुछ स्त्रीवादी कविताएं: 

माँ पर नहीं लिख सकता कविता 

माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा

घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता!

मैं अभी-अभी माँ से मिलकर आया हूँ 

वहाँ जैसे सभी कुछ आइने के भीतर बसा था
मै वहीं से अभी-अभी माँ के पास से आया हूँ
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे
और वह वैसी परेशान-खटकरम में जुटी हुई नहीं थी
जैसी हम लोगों को बड़ा करते
इस दुनिया के उस चार कमरों वाले घर में ताज़िन्दगी रही

उसने मुझसे कुछ भी जानने की कोशिश नहीं की
जैसे उसे पता था सब कुछ
उसने मुझे उन निगाहों से भी देखा
जो सारे अपराधों को मुआफ़ी देती है

एक बार मर चुकने के बाद वह अमर हो गई थी
मैं उसके लिए सिर्फ़ एक भुक्ति हुई गूँज था
जो कभी उसके अतीत की धड़कन थी
उस थोड़े से बेआवाज़ वक़्त में
पत्थर का एक घोड़ा और दो कुत्ते ज़रूर दिखे
कुत्तों के प्रति अपने प्रेम के कारण
हाथ फेरा एक के माथे पर
तो उसका उतना हिस्सा रेत की तरह बिखर गया

चाहते हुए भी माँ को नहीं छुआ मैंने
पता नहीं किन-किन दुखों-स्मृतियों से भरी थी उसकी देह
मैंने चाहा किसी भी तरह मै देख पाऊँ
उन स्तनों को चूसते हुए अपने होंठ
कैसे युद्ध, मंदी और फाका-मस्ती के उन दिनों में
चिपटे हुए उसके पेड़ का पक्षी बन जाता था मैं

मैं उसे नहीं बता पाया
की कसाईख़ाने में काम करते शाकाहारी की तरह
मै ज़िन्दा हूँ इस दुनिया में
और शामिल हूँ उन्ही में जो
अपनी करुणा की तबाही और
अपने साहस की हत्या के लिए
दूसरों को अपराधी समझ रहे हैं

मै अभी-अभी माँ से मिलकर आया हूँ
और पुरखों की प्यास को चाट रहा हूँ
माँ से अपने ढंग की इस अकेली-अधूरी मुलाक़ात के बारे में

कोई सबूत देना संभव नहीं
यह न तो सपने में हुई
और न इसके लिए मुझे मृतकों में शामिल होना पड़ा ।

बाई दरद ले ले 

तेरे पास और नसीब में जो नहीं था
और थे जो पत्थर तोड़ने वाले दिन उस सबके बाद
इस वक़्त तेरे बदन में धरती की हलचल है
घास की ज़मीन पर लेटी
तू एक भरी पूरी औरत आंखों को मींच कर
काया को चट्टान क्यों बना रही है

बाई तुझे दरद लेना हैं
जिन्दगी भर पहाड़ ढोए तूने
मुश्किल नहीं है तेरे लिए दरद लेना

जल्दी कर होश में आ वरना उसके सिर पर जोर पड़ेगा
पता नहीं कितनी देर बाद रोए या ना भी रोए
फटी आंख से मत देख
भूल जा जोर जबरदस्ती की रात
अँधेरे के हमले को भूल जा बाई

याद कर खेत और पानी का रिश्ता
सब कुछ सहते रहने के बाद भी
कितना दरद लेती है धरती
किस किस हिस्से में कहॉ कहॉ
तभी तो जनम लेती हैं फसलें
नहीं लेती तो सूख जाती सारी हरियाली
कोयला हो जाते जंगल
पत्थर हो जाता कोख तक का पानी

याद मत कर अपने दुखों को
आने को बेचैन है धरती पर जीव
आकाश पाताल में भी अट नहीं सकता
इतना है औरत जात का दुःख
धरती का सारा पानी भी
धो नहीं सकता
इतने हैं आंसुओं के सूखे धब्बे

सीता ने कहा था – फट जा धरती
ना जाने कब से चल रही है ये कहानी
फिर भी रुकी नहीं है दुनिया
बाई दरद ले!
सुन बहते पानी की आवाज़
हाँ ! ऐसे ही देख ऊपर हरी पत्तियां
सुन ले उसके रोने की आवाज़
जो अभी होने को है
जिंदा हो जायेगी तेरी देह
झरने लगेगा दूध दो नन्हें होंठों के लिए

बाई! दरद ले

बेटी के घर लौटना।

बहुत जरूरी है पहुँचना
सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता
बेटी जिद करती
एक दिन और रुक जाओ न पापा
एक दिन

पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहते कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज

वापस लौटते में
बादल बेटी के कहे के घुमड़ते
होती बारीश आँखो से टकराती नमी
भीतर कंठ रूँध जाता थके कबूतर का

सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते
दुनिया में सबसे कठिन है शायद
बेटी के घर लौटना।

दो लड़कियों का पिता होने से 

पपीते के पेड़ की तरह मेरी पत्नी

मैं पिता हूँ

दो चिड़ियाओं का जो चोंच में धान के कनके दबाए

पपीते की गोद में बैठी हैं

सिर्फ़ बेटियों का पिता होने से भर से ही

कितनी हया भर जाती है

शब्दों में

मेरे देश में होता तो है ऐसा

कि फिर धरती को बाँचती हैं

पिता की कवि-आंखें…….

बेटियों को गुड़ियों की तरह गोद में खिलाते हैं हाथ

बेटियों का भविष्य सोच बादलों से भर जाता है

कवि का हृदय

एक सुबह पहाड़-सी दिखती हैं बेटियाँ

कलेजा कवि का चट्टान-सा होकर भी थर्राता है

पत्तियों की तरह

और अचानक डर जाता है कवि चिड़ियाओं से

चाहते हुए उन्हें इतना

करते हुए बेहद प्यार।

वह औरत 

वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है,

पछीट रही है शताब्दिशें से
धूप के तार पर सुखा रही है,
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूंध रही है?
गूंध रही है मानों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है,

एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है
एक औरत
वक़्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गईं
एड़ी घिस रही है,

एक औरत अनंत पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है,
एक औरत अपने सिर पर
घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को
नापती ही जा रही है,

एक औरत अँधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसर जागती
शताब्दियों से सोयी है,

एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से
सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं

घर में अकेली औरत के लिए 

तुम्हें भूल जाना होगा समुद्र की मित्रता
और जाड़े के दिनों को
जिन्हें छल्ले की तरह अंगुली में पहनकर
तुमने हवा और आकाश में उछाला था
पंखों में बसन्त को बांधकर
उड़ने वाली चिडिया को पहचानने से
मुकर जाना ही अच्छा होगा……

तुम्हारा पति अभी बाहर है तुम नहाओ जी भर कर
आइने के सामने कपड़े उतारो
आइने के सामने पहनो
फिर आइने को देखो इतना कि वह तड़कने को हो जाए
पर तड़कने के पहले अपनी परछाई हटा लो
घर की शान्ति के लिए यह ज़रूरी है
क्योंकि वह हमेशा के लिए नहीं
सिर्फ़ शाम तक के लिए बाहर है
फिर याद करते हुए सो जाओ या चाहो तो अपनी पेटी को
उलट दो बीचोंबीच फ़र्श पर
फिर एक-एक चीज़ को देखते हुए सोचो
और उन्हें जमाओ अपनी-अपनी जगह पर

अब वह आएगा
तुम्हें कुछ बना लेना चाहिए
खाने के लिए और ठीक से
हो जाना होगा सुथरे घर की तरह
तुम्हारा पति
एक पालतू आदमी है या नहीं
यह बात बेमानी है
पर वह शक्की हो सकता है
इसलिए उसकी प्रतीक्षा करो
पर छज्जे पर खड़े होकर नहीं
कमरे के भीतर वक्त का ठीक हिसाब रखते हुए
उसके आने के पहले
प्याज मत काटो
प्याज काटने से शक की सुरसुराहट हो सकती है
बिस्तर पर अच्छी किताबें पटक दो
जिन्हें पढ़ना कतई आवश्यक नहीं होगा
पर यह विचार पैदा करना अच्छा है
कि अकेले में तुम इन्हें पढ़ती हो…….

बालम  ककड़ी बेचने वाली लडकियां

कोई लय नहीं थिरकती उनके होंठों पर

नहीं चमकती आंखों में

ज़रा-सी भी कोई चीज़

गठरी-सी बनी बैठी हैं सटकर

लड़कियाँ सात सयानी और कच्ची उमर की

फैलाकर चीथड़े पर

अपने-अपने आगे सैलाना वाली मशहूर

बालम ककड़ियों की ढीग

सैलाना की बालम ककड़ियाँ केसरिया और खट्टी-मीठी नरम

– जैसा कुछ नहीं कहती

फ़क़त भयभीत चिड़ियों-सी देखती रहती हैं

वे लड़कियाँ सात

बड़ी फ़जर से आकर बैठ गई हैं पत्थर के घोड़े के पास

बैठी होंगी डाट की पुलिया के पीछे

चौमुखी पुल के पास

होंगी अभी भी सड़क नापती बाजना वाली

चाँदी के कड़े ज़रूर कीचड़ में सने

पाँवों में पुश्तैनी चमक वाले

होंगी और भी दूर-दूर

समुद्र के किनारे पहाड़ों पर

बस्तर के शाल-वनों की छाया में

माँडू-धार की सड़क पर

झाबुआ की झोपड़ियों से निकलती हुई

पीले फूल के ख़यालों के साथ

होंगी अंधेरे के कई-कई मोड़ पर इस वक्त

मेरे देश की

कितनी ही आदिवासी बेटियाँ

शहर-क़स्बों के घरों में

पसरी है अभी तक

अन्तिम पहर के बाद की नींद

बस शुरू होने को है थोड़ी ही देर में

कप-बसी की आवाज़ों के साथ दिन

लोटा भर चाय पीकर आवेंगे धोती खोंसते

अंगोछा फटकारते

खरीदने ककड़ी

उम्रदराज़ सेठ-साहूकार

बनिया-बक्काल

आंखों से तोलते-भाँपते ककड़ियाँ

बंडी की जेबों से खनकाते रेजगी

ककड़ियों को नहीं पर लड़कियों को मुग्ध कर देगी

रेजगी की खनक आवाज़

कवि लोग अख़बार ही पढ़ते लेटे होंगे

अभी भी कुढ़ते ख़बरों पर

दुनिया पर हँसते चिलम भर रहे होंगे सन्त

शुरू हो गया होगा मस्तिष्क में हाकिमों के

दिन भर की बैठकों-मुलाक़ातों

और शाम के क्लब-डिनर का हिसाब

सनसनीख़ेज ख़बरों की दाढ़ी बनाने का कमाल

सोच विहँस रहे होंगे मुग्ध पत्रकार

धोती पकड़ फहराती कार पर चढ़ने से पहले

किधर देखते होंगे मंत्री

सर्किट हाउस के बाद दो बत्ती फिर घोड़ा

पर नहीं मुसकाकर पढ़ने लगता है मंत्री काग़ज़

काग़ज़ के बीचोंबीच गढ़ने लगता है अपना कोई फ़ोटू चिंन्तातुर

नहीं दिखती उसे कभी नहीं दिखतीं

बिजली के तार पर बैठी हुई चिड़ियाएँ सात

मैं सवारी के इन्तज़ार में खड़ा हूं

और

ये ग्राहक के इन्तज़ार में बैठी हैं

सोचता हूँ

बैठी रह सकेंगी क्या ये अंतिम ककड़ी बिकने तक भी

ये भेड़ो-सी खदेड़ी जाएंगी

थोड़ा-सा दिन चलने के बाद फोकट में ले जाएगा ककड़ी

संतरी

एक से एक नहीं सातों से एक-एक कुल सात

फिर पहुँचा देगा कहीं-कहीं कुल पाँच

बीवी खाएगी थानेदार की

हँसते हुए

छोटे थानेदार ख़ुद काटेंगे

फोकट की ककड़ी

कितना रौब गाँठेंगी

घर-भर में

आस-पड़ोस तक महकेगा सैलाना की ककड़ी का स्वाद

याद नहीं आएंगी किसी को

लड़कियाँ सात

कित्ते अंधेरे उठी होंगी

चली होंगे कित्ते कोस

ये ही ककड़ियाँ पहुँचती होंगी संभाग से भी आगे

रजधानी तक भूपाल

पीठवाले हिस्से के चमकते काँच से

कभी-कभी देख सकते हैं

इन ककड़ियों का भाग्य

जो कारों की मुसाफ़िर बन पहुँच जाती हैं कहाँ-कहाँ

राजभवन में भी पहुँची होंगी कभी न कभी

जगा होगा इनका भाग

सातों लड़कियाँ ये

सात सिर्फ़ यहाँ अभी इत्ती सुबह

दोपहर तक भिंडी, तोरू के ढीग के साथ हो जाएगी इनकी

लम्बी क़तार

कहीं गोल झुंड

ये सपने की तरह देखती रहेंगी

सब कुछ बीच-बीच में

ओढ़नी को कसती हँसती आपस में

गिनती रहेंगी खुदरा

सोचतीं मिट्टी का तेल गुड़

इनकी ज़ुबान पर नहीं आएगा कभी

शक्कर का नाम

बीस पैसे में पूरी ढीग भिंडी की

दस पैसे में तोरू की

हज़ारपती-लखपती करेंगे इनसे मोल-तोल

ककड़ी तीस से पचास पैसे के बीच ऐंठकर

ख़ुश-ख़ुश जाएंगे घर

जैसे जीता जहान

साँझ के झुटपुटे के पहले लौट चलेंगे इनके पाँव

उसी रास्ते

इतनी स्वतंत्रता में यहाँ शेष नहीं रहेगा

दुख की परछाई का झीना निशान

गंध डोचरा-ककड़ी की

देह के साथ

लय किसी गीत की के टुकड़े की होंठों पर

पहुँच मकई के आटे को गूँधेंगे इनके हाथ

आग के हिस्से जलेंगे

यहाँ-वहाँ कुछ-कुछ दूरी पर

अंधेरा फटेगा उतनी आग भर

फिर सन्नाटा गूँजेगा थोड़ी देर बाद

फिर जंगलों के झोपड़ी-भर अंधेरे में

धरती का इतना जीवन सो जाएगा गठरी बनकर

बाहर रोते रहेंगे सियार

मैं भी लौट आऊँगा देर रात तक

सोते वक्त भी

क्या काँटों की तरह मुझमें चुभती रहेंगी

अभी इत्ती सुबह की

ये लड़कियाँ सात

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कविता में स्त्री और स्त्रियों की कविता

प्रकाश चंद्र

महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं. संपर्क :9657062744
Prakashupretti@gmail.com

कविता में स्त्री की उपस्थिति के बारे में चर्चा करना कोई नई बात नहीं है । आदिकाल से लेकर आज तक की कविता में स्त्री की उपस्थिति तो दर्ज़ है लेकिन उसका स्वरूप भिन्न-भिन्न है । इसलिए महत्वपूर्ण प्रश्न भी यही है कि पहले की कविताओं में स्त्री की उपस्थिति किस रूप में है और आज जब स्वयं स्त्रियाँ लिख रही हैं तो उनकी उपस्थिति किस रूप में है ? आदिकालीन कविता में स्त्री का चित्रण युद्ध की प्रेरक तथा जीतने और भोग की वस्तु के रूप में है तो वहीं भक्तिकालीन कविता में वह प्रेमिका व दैवीय रूप में नज़र आती है । कविता में स्त्री की उपस्थिति के लिहाज़ से रीतिकाल की बड़ी निर्मम आलोचना हुई है । रीतिकाल में स्त्री को भोग विलास और सौंदर्य की प्रतिमा के रूप चित्रित किया गया । बिहारी की नायिका से लेकर घनानंद की सुजान तक में स्त्री का अपना अस्तित्व कहीं नज़र नहीं आता है । लेकिन स्त्री का ऐसा चित्रण करने वाले सभी पुरुष रचनाकार थे ।

आदिकाल में किसी स्त्री रचनाकार का पता नहीं चलता है लेकिन मध्यकाल में मीरा और अंडाल के अतिरिक्त कुछ लेखिकाओं की सूची भक्तमाल (नाभादास) में मिलती है पर साहित्य में उनका अस्तित्व नदारद है । वहीं रीतिकाल में भी स्त्री लेखन सिरे से गायब है जबकि सावित्री सिन्हा ने अपने शोध ‘मध्यकालीन हिंदी कवयित्रियाँ’ में इस काल की कवयित्रियों की लंबी सूची दी है । लेकिन साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में इनका उल्लेख कहीं-कहीं ‘फिलर’ के तौर पर दिखाई देता है । इसलिए साहित्य में स्त्री की उपस्थिति और उसमें भी कविता में स्त्री की उपस्थिति पर विचार करते हुए साहित्य के इतिहास ग्रन्थों की पड़ताल करना और उनके मर्दवादी नज़रिए को भी देखना समीचीन होगा ।अनुराधा अपने एक लेख ‘हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन पर एक स्त्री के नोट्स’ में लिखती हैं कि- “रामचन्द्र शुक्ल से पहले के इतिहास ग्रंथ भले ही तथ्यों के संकलन भर हों, पर ‘स्त्री’ के नजरिए से सोचते समय ये ग्रंथ भी महत्व रखते हैं, क्योंकि स्त्री भी एक तथ्य है। आचार्य द्विवेदी तक के अधिकतर इतिहास ग्रंथ स्त्री को पहचानने के सम्बन्ध में एक साफ-सुथरा-सा गणित रखते हैं।


वे जब किसी पुरुष कवि या लेखक को पहचानते हैं तो उसकी जाति और उपजातियों में बात करते दिखते हैं, वहीं एक स्त्री लेखक को पहचानते समय पुरुषों के साथ उसके सम्बन्धों में बात करते हैं : अमुक लेखिका अमुक की पत्नी थी, अमुक की उपपत्नी थी, अमुक की बेटी या बहन या शिष्या थी (और अपने आप में कुछ नहीं थी)। जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के जटिल समीकरण का यह खेल बहुत गहरे पैठ कर खेला गया जिसने आधी आबादी की प्रतिभा, ज्ञान, अनुभव और क्षमता को या तो हड़प कर लिया या नष्ट होने के लिए अँधेरे में छोड़ दिया। गार्सां द तासी अकेले इतिहासकार हैं जो इन मामलों में सजग हैं। अपने ‘इस्त्वार’ की भूमिका में ही वे रजिया सुल्तान को भारत के देशवासियों की प्रिय सुल्ताना कहकर स्त्री की भूमिका और इतिहास लेखन में उसके स्थान की जरूरत को रेखांकित कर जाते हैं। इन्होंने ‘इस्त्वार’ में अच्छी संख्या में स्त्रियों को जगह दी है, जबकि अधिकतर इतिहासकारों ने स्त्रियों को अधिक से अधिक किसी काल की अन्य प्रवृत्तियों में स्थान दिया है” । हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की इन जटिलताओं और चतुराइयों से भी स्त्री की उपस्थिति को समझा जा सकता है । वैसे हिंदी में मृदुवाणी (1905) शीर्षक से मुंशी देवी प्रसाद ने आरंभिक 35 कवयित्रियों की कविताओं का संकलन निकाला था । इन कवयित्रियों की कविताओं को देखें तो उसमें सामाजिक रूढ़ियों पर गहरी चोट और पितृसत्तात्मक व्यवस्था से मुक्ति की आकांक्षा दिखाई देती है ।

आधुनिक काल की कविता में स्त्री का एक स्वरूप बनता हुआ दिखाई देता है । स्त्री को उसके अंग-प्रत्यंग से हटकर संपूर्णता में देखने की कोशिश की जाती है । इसलिए आधुनिक कविता ने स्त्री की मध्यकालीन छवि को भी तोड़ा । स्त्री ‘कविता का by product’ नहीं है बल्कि उसकी अपनी स्वतंत्र छवि है । मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा’ , दिनकर की ‘उर्वशी’  निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’ आदि कविताओं  में स्त्री का अस्तित्व दिखाई देता है । स्त्री इन कविताओं  में ‘मैं’  के साथ है । यही ‘मैं’ या ‘सेल्फ’ आधुनिक हिंदी कविता में स्त्री की पहचान है । आधुनिक काल की कविता में स्त्री ‘केवल श्रद्धा’, ‘अबला’ और ‘नीर भरी दुख की बदली’ नहीं है, अब वह पितृसत्ता के ‘दुर्ग द्वार पर दस्तक’ देती हुई अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही है। अब उसे पुरुषों की कविताओं में से झाँकने की जरूरत नहीं है बल्कि वह अब स्वयं रच  रही हैं । अनामिका ने  ‘कहती हैं औरतें’ किताब की भूमिका में लिखा है कि “एक जमाना था जब पुरुष कविताएँ लिखते थे और औरतें उन कविताओं के अनंत छिद्रों से अच्छी बच्ची की तरह झाँकती मंद-मंद मुस्काया करती थीं । उन औरतों के खास लक्षण होते थे – 1.वे सर्वदा सुंदर होती थीं, सर्वांग सुंदर, पर उन्हें डर बना रहता था कि उनसे उनका यौवन और सौंदर्य छिन न जाए, 2. अक्सर वे असमय ही भगवान को प्यारी हो जाती थीं और 3. आजीवन, जीवन के बाद भी उनका इकलौता काम होता था अपने प्रिय में प्रेरणा पम्प करना किंतु अपनी सुध-बुध बिसराए रखना” । स्त्री स्वयं को रच रही हैं और साहित्य में बराबरी का दख़ल दे रही हैं साथ ही सवाल भी कर रही हैं – मैं किसकी औरत हूँ / कौन है मेरा परमेश्वर/ किसके पाँव दबाती हूँ / किसका दिया खाती हूँ / किसकी मार सहती हूँ  । ये पंक्तियाँ हमसे इतनी सरल भाषा में वे प्रश्न पूछती हैं जो पहले कभी नहीं पूछे गए । क्या पितृसत्तात्मक समाज के पास इन ‘अबोध’ सवालों का कोई जवाब है? यदि बात समकालीन हिंदी कविता की कि जाए तो उसमें स्त्री न बिहारी की नायिका है न छायावादियों की एकान्त प्रणयिनी है बल्कि अपनी पूरी साधारणता, कमजोरियों और विशिष्टताओं के साथ विद्यमान है। वह न अब ‘अबला’ और न ही ‘प्रेयसी’  है वह अपने अस्तित्व के साथ नज़र आती है । समकालीन कविता के फलक को देखें तो कई कवयित्रियाँ कविता लेखन में सक्रिय रूप से दिखलाई पड़ती हैं । स्त्रियाँ अपनी कविताओं में स्वयं को रच रही हैं और पुंसवादी समाज के द्वारा स्त्रियों का जो मिथ गढ़ा गया था उसे भी तोड़ रही हैं । गगन गिल का कविता संग्रह ‘एक दिन लौटेगी लड़की’ में पुराने मिथ को तोड़कर उस नई लड़की की तस्वीर है जो न तो मात्र देह है और न देवी बल्कि अपनी पूरी इयत्ता और चेतना के साथ मौजूद है।

स्त्री कविता में स्त्री 

समकालीन स्त्री कविता में स्त्री की
उपस्थिति देखें तो उसके कई आयाम दिखाई देते हैं । सदियों के दासत्व से मुक्ति की झटपटाहट, मैं भी हूँ का भाव और सामाजिक रूढ़ियों से टकराती हुई स्त्री दिखाई देती है । स्त्री ने जब स्वयं को रचा तो उस मध्यकालीन स्त्री की छवि को तोड़ा जो उसे भोग की वस्तु और शृंगार की प्रतिमा के रूप में चित्रित कर रहा था । रीतिकालीन कवियों ने जो नायिकाओं के कई भेद बतलाए और श्रेष्ठ स्त्री के गुणों को निर्धारित किया स्त्री कवयित्रियों ने उस पर भी चोट की । हमारे रीतिकालीन कवियों ने स्त्री यानि नायिका के कई भेद और उभेद बताए । नायिका भेद पर लगभग दो सौ ग्रंथ हमारे आचार्यों ने लिख डाले । मतिराम का ‘रसराज’ या फिर पद्माकर के ग्रन्थों में नायिका की आयु, गंध , सौंदर्य आदि के हिसाब से कई भेद हैं । एक सम्पूर्ण स्त्री जो अपने अस्तित्व और चेतना के साथ हो वह कहीं नज़र नहीं आती है । अनामिका स्त्री की इस छवि के खिलाफ लिखती हैं कि -आचार्य, हम इनमें कोई नहीं-/कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं-/मुग्धा, प्रगल्भा, विदग्धा या सुरतिगर्विता/परकीया भी नहीं, न स्वकीया ही!/मुग्धाएं जब थीं हम/देनी थी हमको परीक्षाएं/बोर्ड के सिवा भी कई,/संस्थानों में प्रवेश की परीक्षाएं देते हुए/हमें फुर्सत ही नहीं मिली / मध्यकाल में स्त्री एक ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में चित्रित है जो कविता का ‘बाय प्रॉडक्ट’ भी है जिसका काम अपनी यौनिकता, सुंदरता से पुरुष यानि नायक को रिझाना है । अनामिका और अन्य कवयित्रियों ने स्त्री की इसी छवि को तोड़ा है । यही नई स्त्री गगन गिल के वहाँ भी है । स्त्री की जो विरहव्याप्त छवि गढ़ी गई है दरअसल वह स्त्री है ही नहीं । स्त्री को कविता में विरहिणी के रूप में ज्यादा चित्रित किया वह राधा से लेकर बिहारी की नायिकाओं तक में देखा जा सकता है । बिहारी की नायिका विरह में इतनी दुबली हो गई है कि साँस छोड़ने में छ: सात हाथ पीछे चली जाती है और सांस लेने में आगे आ जाती है – इत आवति चलि जात उत चली छः सातक हाथ/ चढ़ी हिंडोरे सी रहै लगी उसासन हाथ । दरअसल स्त्री की जो ये आरोपित छवि है इसे कवयित्रियों ने चुनौती दी । साथ ही संस्कृति के गौरव के नाम पर जो स्त्री शोषण सदियों से चला आ रहा है उसकी भी पहचान की । शुभा अपनी कविता ‘गौरवमय संस्कृति’ में स्त्री की इसी छवि पर चोट करती हैं – हमने ही लिखे हैं / स्त्रियों के विरह गीत / खंडिताओं और पतिकाओं के चित्र / कितने मनमोहक !/ …युद्धों के बीच / पिता और पुत्र के लिए विलाप करती स्त्रियाँ / कैसी नदी बहाती हैं करुण रस की / हमें आदत है इनमें स्नान करने की / हमारी भुजाएँ जब फड़कती हैं / वीर रस के ज्वालामुखी फूटते हैं / और स्त्रियाँ करुण रस की / आलंबन बनती हैं।

हमारे समाज और साहित्य ने स्त्री के लिए कुछ खांचे बनाए जिसके तहत ‘आदर्श’ स्त्री और ‘बिगड़ी’ स्त्री जैसे मिथ भी तैयार किए गए । एक स्त्री को कैसा होना चाहिए?  कैसे हँसना, बोलना, बैठना, खाना और क्या पहनना चाहिए वह सब कुछ पितृसत्तात्मक समाज ने निर्धारित कर लिए और कोई स्त्री उन नियमों से बाहर आचरण करती है तो उसके लिए बिगड़ी, बदचलन जैसे कई विशेषण भी गढ़ डाले गए । स्त्री हो / कम बोलना /कम काटना बात औरों की / मत उलझना / मत हँसना पेट पकड़ / चुप चुप गुजर जाना / उन शान –मेले से / स्त्री हो / उसी होने को होना । स्त्री की इस आचरण मूलक भूमिका को बनाने में हमारे महान साहित्य ने बड़ा योगदान दिया । समाज के इन सांचों पर साहित्य ने प्रश्न लगाने के बजाए अपनी मुहर लगाई ।  एक स्त्री के लिए इन बेड़ियों को तोड़ना और खुद को रचना कभी भी आसान नहीं रहा । स्त्री को कभी ‘मर्यादा’  (यानि जो मर्द की मर्जी हो) के नाम पर तो कभी इज्जत के नाम पर उसके सपने, उसकी ज़िंदगी, उसकी उड़ान, को कैद करने की कोशिश हमेशा से रही है  । रंजना जयसवाल इस ‘मर्यादा’ रूपी जंज़ीर में जकड़ी स्त्री के बहाने कहती हैं- मैं स्त्री हूँ और जब मैं स्त्री हूँ/तो मुझे दिखना भी चाहिए स्त्री की तरह/मसलन मेरे केश लम्बे,/स्तन पुष्ट और कटि क्षीण हो/देह हो तुली इतनी कि इंच कम न छटाँक ज्यादा/बिल्कुल खूबसूरत डस्टबिन की तरह/जिसमें/डाल सकें वे/देह, मन, दिमाग का सारा कचरा और वह/मुस्कुराता रहे-‘प्लीज यूज मी’।/मैं स्त्री हूँ और जब मैं स्त्री हूँ/तो मेरे वस्त्र भी ड्रेस कोड के/ हिसाब से होने चाहिए जरा भी कम न महीन/भले ही हो कार्यक्षेत्र कोई / आखिर मर्यादा से जरूरी क्या है / स्त्री के लिए और मर्यादा वस्त्रों में होती है ।  जिस मर्यादित और कैद स्त्री की छवि हमारे समाज और साहित्य ने गढ़ी उसे स्त्री कवयित्रियों ने तोड़ा । लेकिन समाज को इस नई स्त्री की छवि आज भी पूर्ण रूप से स्वीकार्य नहीं है- गणित पढ़ती है ये लड़की / हिंदी में विवाद करती / अँग्रेजी में लिखती है / मुस्कराती है / जब भी मिलती है /गलत बातों पर / तन कर अड़ती / खुला दिमाग लिए / जिंदगी से निकलती है ये लड़की । यह ‘खुले दिमाग वाली लड़की’ है जो स्त्री कविता में उन पुरानी रूढ़ियों को धत्ता बताते हुए आ धमकती है साथ ही कविता में स्त्री की बनी बनाई छवि को तोड़ती है । कात्यायनी की ‘हॉकी खेलती लड़कियाँ’ कविता भी इस नए बनते समाज में स्त्री संघर्ष की प्रतीक हैं । ये लड़कियाँ ‘स्त्री’ की कमजोर छवि, अबला की छवि विलाप करती हुई छवि, पुरुष संरक्षण की आकांक्षी छवि को तोड़ रही हैं । समकालीन स्त्री कविता की यह एक बड़ी खूबी है।

समकालीन स्त्री कविता में परंपरागत स्त्री छवि को तोड़ने वाली स्त्री है तो वहीं नई राह खोजने, आत्मनिर्भर और स्वतंत्र स्त्री भी है। लेकिन इसी ‘बाइनरी’ के बीच जहाँ ‘हॉकी खेलती लड़कियाँ’ हैं तो वहीं आदिवासी ‘मुर्मू’ और ‘सुगिया’ भी हैं । सुगिया के बहाने जब निर्मला पुतुल इस ‘सभ्य’ और ‘आधुनिक समाज’ से प्रश्न करती हैं कि यहाँ हर पाँचवाँ आदमी उससे/ उसकी देह कि भाषा में क्यों बतियाता है? ।  तो यह समाज मौन हो जाता है । इसलिए कई बार स्त्री की उस स्वतंत्रता पर सोचने के लिए मजबूर हो जाता हूँ जो महानगर की कवयित्रियाँ की कविताओं में दिखाई देती है । सविता सिंह जब यह कहती हैं कि -मैं किसी की औरत नही हूँ,/ मै अपनी औरत हूँ,/ अपना खाती हूँ,/ जब जी चाहता है तब खाती हूँ,/ मैं किसी की मार नहीं सहती / और मेरा परमेश्वर कोई नहीं  । तो एक पल के लिए सुकून मिलता है कि स्त्री अब पुरुष सत्ता को चुनौती दे रही है और वह उसके अधीनस्थ नहीं है । लेकिन दूसरे पल सोचता हूँ की क्या सुगिया कभी ऐसा कह पाएगी ? अच्छा लगता है पढ़कर जब सुधा अरोड़ा अपनी कविता ‘अकेली औरत’ में लिखती हैं कि इक्कीसवी सदी की यह औरत/हांड मास की नहीं रह जाती/ इस्पात में ढल जाती है/ और समाज का सदियों पुराना/शोषण का इतिहास बदल डालती है । लेकिन अगले ही पल ‘मुर्मू’ और ‘सुगिया’ की इक्कीसवी सदी के बारे में सोचने लगता हूँ, वह कब  इस्पात में ढलकर अपने शोषणकारी इतिहास को बदलेगी?



कुल मिलाकर देखें तो स्त्री को गढ़ने का काम हमारा समाज आरंभ से ही करता है । सिमोन की यह उक्ति कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है’ से टकराए बिना सामाजिक जटिलताओं के बीच जूझती स्त्री को समझना थोड़ा मुश्किल है । सिमोन कि यह उक्ति बार-बार सोचने को मजबूर करती है । स्त्री का अपना क्या है? स्त्री ही क्या है ? स्त्री की देह के अतिरिक्त भी, स्त्री का कोई अस्तित्व है ? क्यों आज भी स्त्री एक अदद घर की तलाश में भटक रही है- राम, देख यह तेरा कमरा है !/‘और मेरा ?’/‘ओ पगली,’/लड़कियां हवा, धूप, मिट्टी होती हैं/उनका कोई घर नहीं होता है  । क्यों स्त्री को एक मुकम्मल रूप में समझने की कोशिश नहीं होती है?  क्यों स्त्री पिता और पति रूपी दो छोरों के बीच झूलती रहती है? उसकी अपनी जमीन और ठिकाना कहाँ है ? उसे जाना है आज शाम चार बजे रेलगाड़ी से /  जाना है पति के घर से इस बार पिता के घर / एक घर से दूसरे घर जाते हैं वही / नहीं होता जिनका अपना कोई घर  । क्या विमला की यह यात्रा खत्म होगी?


इस तरह देखें तो कविता में स्त्री की छवि आरंभ से ही दोयम दर्ज़े की रही है । हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों की पड़ताल करने पर यह बात सामने आती है कि कविता में स्त्री की स्थिति आधुनिक काल से पहले चेतना विहीन मात्र एक शरीर के रूप में थी । उन कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि सुंदरता को बचाए रखना और पुरुषों को रिझाना ही स्त्री का काम था । स्त्री के लिए युद्ध होते थे ‘जेहि घर देखी सुंदर नार तिह घर धरी जाए तलवार’ और उन्हें जीतना पौरुष का प्रमाण था । क्योंकि उनके लिए स्त्री मात्र ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ थी । स्त्री की इस छवि को आधुनिक काल की कविता ने कुछ हद तक तोड़ा ।आधुनिक कविता ने स्त्री को ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ के रूप में देखने की प्रवृति पर चोट की लेकिन यहाँ भी स्त्री एक ‘कमोडिटी’ और पितृसत्ता के कैद में नज़र आती है । यानि स्त्री की  स्वतंत्र छवि यहाँ भी नहीं है, वह पत्नी है, माता है, दासी है, बहन है यानि की देह है लेकिन एक स्वतंत्र चेतनाशील स्त्री नहीं है । स्वतंत्र, चेतनासम्पन, संघर्षरत और मैं यानि ‘सेल्फ’ के साथ मौजूद स्त्री हमें समकालीन स्त्री कविता में दिखाई देती है । स्त्री ने जब स्वयं को रचा तो उन श्र्ंगार की प्रतिमाओं को भी खंडित किया जो मध्यकाल में खड़ी की गई थी । समकालीन स्त्री कविता ने मध्यकालीन जड़ताओं  को तोड़ा, नायिका भेद से लेकर स्त्री के दोयम होने के भाव तक को खंडित किया । अनामिका की एक कविता है ‘मरने की फुर्सत’ जरा सोचिए इसके बारे में और समझिए कविता में स्त्री और ‘स्त्री की कविता’ की ताकत को –
ईसा मसीह
औरत नहीं थे
वरना मासिक
धर्म ग्यारह बरस की उम्र से
उनको ठिठकाए ही रखता
देवालय के बाहर….. !

संदर्भ सूची
1.http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=720&pageno=1
  2. अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.11 
  3.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.137 
  4.अनामिका, (2012), पचास कविताएं, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृ.109 
  5.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.80 
  6.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.43 
  7.रंजना जयसवाल, (2009), जब मैं स्त्री हूँ, नई किताब प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 5    
  8.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.55 
  9.निर्मला पुतुल, (2012), नगाड़े की तरह बजते शब्द, ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 81     
 10.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.137 
 11. सुधा अरोड़ा, अकेली औरत, वागर्थ पत्रिका  
 12.अनामिका, (2012), पचास कविताएं, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 40  
 13. अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 139     
 14.अनामिका, (2012), पचास कविताएं, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 93     

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हृदयहीन शासकों, सुनो बच्चों की चीख और माओं की आहें !

गोरखपुर ज़िले के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई बंद हो जाने से लगभग 60 बच्चों के मरने की ख़बर है. हालांकि योगी सरकार सरकार इन मौतों को अलग-अलग कारणों से बाताती है तो कथन की क्रूरता की हदें पार करते हुए इसे अगस्त की नियमित और सालाना  मौत भी बता रही है. गोरखपुर से आई तस्वीरें हृदय विदारक हैं. फटी-पथराई आँखों के साथ मृत-अर्ध मृत बच्चों की लाश लिये माँ की तस्वीरें. ऑक्सीजन की कमी के बावजूद डा कफील अहमद ने तत्परता से कुछ बच्चों की जानें बचाई अन्यथा मारे गए बच्चों की संख्या और भी अधिक होती. इन तस्वीरों का यह कोलाज ताकि सनद रहे. 
डा. कफील अहमद एक माँ के बच्चे को बचाने की कोशिश करते हुए
गाय के बच्चों को दुलारते सीएम योगी और उनके राज्य और उनके संसदीय क्षेत्र में बच्चे की जान बचाते डा. कफील

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रात को सड़कों पर उतरी लडकियां : मेरी रात मेरी सड़क

वे पब्लिक स्पेस को क्लेम करने उतरीं थीं, वे उतरी थीं पुरुष प्रायोजित उन अंधेरों से लड़ने जो सड़क पर देर रात औरतों को डराने के लिए आहूत की जाती हैं. वे वर्णिका के पक्ष में उतरीं, निर्भया के लिए उतरीं. वे उनसब के लिए रात को सडकों पर उतरीं, जिन्हें मर्दवादी सत्ता लील ले गई इस अपराध के लिए कि वे शाम के बाद घर से निकलती ही क्यों हैं? तस्वीरों में #मेरीरातमेरीसडक 

12 अगस्त, 2017 की रात  देश भर में लडकियां अपने-अपने शहरों की सड़कों पर उतरीं…. 


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स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त तीन)

रेखा सेठी

  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित
संपर्क:reksethi@gmail.com



स्त्री-कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार
स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त दो)


माँ, कविता और स्त्री….
समाज के जेंडर ढाँचे का पहला अहसास मुझे माँ के बचपन के किस्से-कहानियों में हुआ था। समकालीन स्त्री-कविता की तह में उतरते हुए मैं अपनी माँ के परिवेश और उनके पारिवारिक वातावरण में लौट गयी। माँ ने ज़िंदगी की कटु सच्चाईयों से रूबरू होते हुए भी ज़्यादा सवाल नहीं किये। उन्हें अपनी छोटी-सी गृहस्थी में ही खुश रहना था लेकिन उनकी कहानियाँ जब मुझ तक पहुँचती तो मेरे भीतर बड़ा बवंडर मचातीं । मैं अपनी माँ की बातों को उधेड़कर, उनमें छिपे अर्थ-आशयों को कपास की तरह धुनतीऔर उनकी मार्फ़त अपने होने के सिरे सिरजती। माँ एक रईस परिवार के जन्मी थीं । संयुक्त परिवार में, भाई-बहनों की हँसी-ठिठोलियों से चहकते हुए जिस बंद गली के आखिरी मकान में वे रहती थीं,वहीं से मुझे जीवन के कई पाठ और अंतर-पाठ सीखने को मिले। माँ अपनी ज़िंदगी के जो किस्से सुनाया करतीं, वे उस समय किसी रहस्यमयी कहानी से कम नहीं थे। बचपन में तो माँ के किस्से सुनाने के लहज़े से उत्सुकता ही जागती थी लेकिन बहुत बाद  में जब सोचने-समझने की उम्र हुई तब जाकर ही माँ के उन किस्सों की रहस्यमयता की कलई धीरे-धीरे खुलने लगी। समाज में स्त्री का परंपरागत स्थान और स्त्री जीवन की कई उधड़ी हुई सच्चाईयों को मैं समय के साथ ही समझ पाई।


खानदान में बेटियों की जगह निश्चित थी। उनकी पढ़ाई को लेकर कोई चिंता न थी। हाँ, भाइयों को पढ़ाने के लिये ज़रूर एक मास्टर जी घर पर आया करते थे। वे जब भाइयों को पढ़ाते, माँ खेलने के इंतज़ार में, खम्भे के पीछे से झाँकती-उचकती बहुत कुछ सीखने लगी। 1935-40 के आस-पास स्त्री-शिक्षा को लेकर कुछ जागृति बढ़ी, माँ में भी, सीखने-समझने का  हौंसला बढ़ता गया। वह धीरे-धीरे अपने घर-परिवार से बिलकुल अलग, एक नयी राह पर चलने लगी। यह ज़रूर था कि उनके आस-पास से पितृसत्ता का कड़ा पहरा तो नहीं हटा, मगर फिर भी कुछ संयोग और कुछ सहयोग से माँ ने मैट्रिक, प्रभाकर, फिर बी.ए. और बी.टी. की पढ़ाई पूरी कर ली। माँ के पक्ष में यह एक बड़ी जीत रही।


माँ का जीवन, स्त्री की शक्ति और सीमा का गज़ब पाठ था। मेरे आस-पास जितनी भी स्त्रियाँ थी उनमें से मेरी माँ सबसे अधिक शिक्षित थीं । यह बिलकुल सच है कि उनकी शिक्षा ने ही उनके प्रति, घर और सामाजिक इज्ज़त में इजाफ़ा किया। अध्यापिका का पद, उन्हें प्रतिष्ठा देता लेकिन साथ ही उनका नौकरी करना आश्चर्यजनक ढंग से आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में चर्चा का विषय होता । नौकरी के साथ-साथ घर की पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने बिना किसी शिकायत के संभाल रखी थी। पति की अनुगामिनी बन, उन्होंने अपनी स्वतंत्र इच्छा-अनिच्छा को कभी प्राथमिकता नहीं दी। माँ ने अपनी गृहस्थी, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, सब मिला-जुला कर एक आदर्श परिवार का ढाँचा तैयार किया। उनके इस आदर्श परिवार में किसी प्रकार की कोई टकराहट न थी क्योंकि माँ के भीतर की स्त्री ने स्वयं को नेपथ्य में रखना, सहज ही स्वीकार किया था और अपने सामने वाले पुरुष की सत्ता को किसी प्रकार की कोई चुनौती नहीं दी थी। पलटकर उनके जीवन को देखने पर मेरे भीतर एकबारगी यह विचार भी आया कि क्या शिक्षा, प्रतिगामी बेड़ियों को पिघलाने में अक्षम रही है और फिर इसके साथ ही स्त्री-जीवन से जुड़े कई दूसरे प्रश्न भी चले आते हैं।माँ के आँचल की गाँठ में बंधी इन कहानियों की तासीर स्त्री रचनाकारों की कविताओं से मेल खाती थी। इसके अलावा जैसे-जैसे मैं इन कविताओं के करीब आती गई वैसे-वैसे मेरे अपने जीवन की यात्रा भी इन कविताओं के नज़दीक जाती हुई दिखाई देने लगी। अब मुझे इन कविताओं के शब्दों और पंक्तियों के पार की सच्चाइयाँ  बार-बार असहज करने लगीं। कविता और ज़िन्दगी का यह रिश्ता स्त्री-कविता की पड़ताल करने को बाध्य कर रहा था।

जागरूक होने की उम्र में आने पर अपनी पारिवारिक परवरिश ने जेंडर के सवालों को समझने की अलग दृष्टि दी। अपने परिवार में हम दो बहनें ही हैं तो बहन-भाई के अंतर की बात रही नहीं। आस-पास के परिवेश पर नज़र डालते हुए भी अक्सर यह अहसास होता, कि हम कुछ ख़ास हैं। लिंग आधारित अपमान या हिंसा का हमने सीधा सामना कभी नहीं किया। इसके अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, समान-वेतन, सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी भागीदारी को लेकर हमें कभी दूसरे दर्जे पर होने का अनुभव नहीं हुआ। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण रोज़मर्रा के कई छोटे-बड़े संघर्ष, हमारी जीवन-परिधि से बाहर रहे। यही कारण था कि हमारी जद्दोजहद, स्त्री-अस्मिता पर केन्द्रित न होकर व्यक्ति-अस्मिता के सवालों से जूझ रही थी।

स्त्री का जीवन, विविधवर्णी है, जिसमें चाहे कितने ही धूसर रंग क्यों न हों, स्त्री का उन सभी रंगों से लगाव है, वह सभी को अपनी संवेदना से सींचती है और अपनी अभिव्यक्ति में इस्तेमाल करती है। यही कारण है कि जो संवेदनाएँ मुझे अपने जीवन में बेचैन करती रहीं वही स्त्री रचनाकारों की कविताओं में भी प्रतिध्वनित होती थीं | स्त्री-कविता, अपने सुख-दुःख के जो प्रतिमान रचती हुई जिस काव्यानुभव को प्रतिबिंबित कर रही थी उसमें स्त्री-अनुभव की विशिष्टता एवं स्त्री-दृष्टिकी प्रमुख भूमिका है। स्त्री जीवन को, स्त्री-दृष्टि से देखने की कोशिश उनकी कविताओं को अतिरिक्त आयाम देती है। ऐसा करना महत्वपूर्ण इसलिये भी है क्योंकि स्त्री ने खुद को स्त्री-दृष्टि से कभी नहीं देखा। वह खुद को पुरुषों द्वारा गढ़ी गयी परिपाटी के भीतर ही देखती रही।

स्त्री-कविता पर अपने अध्ययन के लिये मैंने जिन सात कवयित्रियों का चयन किया, वे समकालीन होते हुये भी स्त्री-अस्मिता के अलग-अलग मायनों के साथ कविता रच रही हैं। इन कवयित्रियों में एक ओर गगन गिल हैं, जिन्होंने अपनी साहित्यिक पहचान, कभी भी अपने स्त्रीत्व के साथ नहीं जोड़ी। जिस तरह रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रशंसा में वे उन्हें ‘ए ग्रेट ह्युमूनाइज्ड माइंड’ कहती हैं, उनके अपने साहित्य की धुरी भी उसी मानवीय विवेक पर टिकी हुई है, जिसे स्त्री-पुरुष के लिंगाधारित चौखटों में बाँधना मुश्किल है। गगन के ही दूसरे छोर पर कात्यायनी हैं, जिनकी चिंता के केंद्र में व्यक्ति और व्यवस्था का द्वन्द्वपूर्ण संबंध देखने को मिलता है। उनकी कविताएँ स्त्री जीवन से आगे बढ़कर गहरे अर्थों में राजनीतिक कविताएँ हैं जो भारतीय लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों की चेतना को प्राथमिक मानती हैं। स्वार्थ लिप्सा से चरमराती व्यवस्था में छले गए जन साधारण की पक्षधरता में आवाज़ उठाती हैं। इनके बाद का दौर, अवश्य ही अनामिका और सविता सिंह के नाम रहा जिनकी कविताओं ने, कविता की दुनिया में स्त्री-स्वर को विशिष्ट पहचान दी लेकिन यह भी सच है कि इन दोनों कवयित्रियों द्वारा रचित कविताओं को भी आलोचना के सीमित साँचे का शिकार होना पड़ा, जबकि इनकी कविताओं में पितृसत्ता के विरोध के साथ-साथ मानव मुक्ति का बड़ा कैनवास उभरता है। अनामिका के यहाँ लोक-संस्कृति का ठाट है जिसमें परंपरा, श्रुति-स्मृति जीवंत होकर वर्तमान और अतीत को एक धागे में बाँधते हैं। सविता सिंह की स्त्री अपनी सीमाओं को लाँघती हुई प्रकृति से एकमेक हो जाती है जिसकी साझेदारी दुनिया के समस्त दमित-वंचित समाजों से है। कविता-भाषा के स्तर भी इन कवित्रियों की रचनाएँ नए इलाके की ओर गतिशील होती हैं।

इनके अलावा नीलेश रघुवंशी, सुशीला टाकभौरे और निर्मला पुतुल इस परियोजना में शामिल हैं जो अलग-अलग पृष्ठभूमि से आती हैं। उनकी कविताओं में स्त्री-अस्मिता, एकांगी न होकर, सामाजिक भेद-भाव की अनेक परतों से जुड़ी हुई है, जिससे उनकी कविताओं में स्त्रीवाद के मायने बदल जाते हैं। स्त्री जीवन के विडंबनात्मकचित्र उनकी कविताओं में भी भरपूर मात्रा में देखने को मिलते हैं किन्तु उनकी प्रवृति, वर्ग और जाति के पदानुक्रम से निर्मित, सामाजिक वर्ग-विभेद को केंद्र में रखने की रही है। नीलेश की निम्न-मध्यमवर्गीय चेतना ने उन्हें समाज को देखने-परखने का अलग नज़रिया दिया। उनकी कविता उस शिक्षित युवा मन की सकारात्मक अंतर्ध्वनि है जो अपने साहस से एक नये समाज की संकल्पना करता है। सुशीला टाकभौरे, अपनी पहचान मात्र स्त्री के रूप में न कर, दलित अस्मिता से जोड़कर करती हैं। उनके अनुसार, ‘एक दलित स्त्री अपने जीवन में सबसे अधिक पीड़ा झेलती है’। आदिवासी अस्मिता की मुखर अभिव्यक्ति, निर्मला पुतुल की कविताओं में देखने को मिलती है। उनकी कविताएँ, आदिवासी स्त्री के संघर्षों की दर्दनाक कथाएँ रचती हैं लेकिन उनसे यह पूछने पर कि स्त्री और आदिवासी होने की पीड़ा में किसकी पीड़ा बड़ी है, उन्होंने इन दोनों वर्गों के बीच जिस साम्य-सूत्र की बात रखी उसे सुनकर मैं एकबारगी चौंकी। उन्होंने कहा कि अंतर केवल इतना है कि ‘उच्च वर्ग की स्त्री, रसोई या बेडरूम में प्रताड़ित होती है जबकि आदिवासी स्त्री, फुटपाथ पर मार खाती है।’ उनका यह कथन, स्त्री-जीवन की विडंबना की पुष्टि करता है कि अपमान की पीड़ा का अंत:सूत्र, संभवतः सभी स्त्रियों को एकसाथ जोड़ता है।

इस तरह, इन सभी कवयित्रियों के अपने विशिष्ट अनुभव, उनके कविता-संसार में स्पष्टता से झाँक रहे थे।उनकी कविता की परछाईयाँ, एक दूसरे को छू भी रही थीं और स्त्री-अस्मिता के मुद्दे पर अलग-अलग हैं। संभवत: मेरी ही तरह, इन रचनाकारों की पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा की विभिन्नताओं ने भी उनकी सोच को अलग-अलग साँचे में ढाला जिससे अपने अस्तित्व पर जिरह करने की ताकत को अलग-अलग धार मिली और अपनी सामाजिक स्थितियों की पड़ताल करने का उनका नज़रिया भी एक-दूसरे से अलग रहा। अपने इसी ओब्ज़रवेशन को अधिक विस्तार देने के लिये, मैंने इन सातों कवयित्रियों से बातचीत करके यह समझने का प्रयास किया कि, उनके लिये स्त्री-कविता का क्या अर्थ-आशय है।सबकी काव्य-प्रेरणा से लेकर, उनके काव्य-जगत और उनके सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों को लेकर महत्वपूर्ण सवाल समाहित हैं, जिससे यह पहचान बने कि उनकी रची इस समानान्तर दुनिया का क्षितिज कितना विस्तृत या सीमित है।

गहरी आत्मीयता के साथ, मैंने इन रचनाकारों के मन की भीतरी तह में उतरने की और उनके रचना जगत के लिये कच्चे माल की उपलब्धि जैसे अनेकों पहलुओं तक पहुँचने की हर संभव कोशिश की है। अधिकांश प्रश्नों का दायरा, स्त्री-पक्ष के साथ-साथ, कविता की रचना-प्रक्रिया को सलीके से समझने तक फैला हुआ है। इसके अलावा सभी कवयित्रियों के रचना-विधान के सृजनात्मक उपकरणों पर भी विस्तार से चर्चा की गयी है। स्त्री-कविता के पृथक अभिधान से लेकर उसकी सामाजिक भूमिका, स्त्री-विमर्श की सीमा-सम्भावना व साहित्यिक आलोचना का स्त्री-कविता के प्रति रवैय्या आदि अनेक प्रश्नों पर सातों कवयित्रियों के उत्तर एक-दूसरे से भिन्न धरातल पर अवस्थित थे जिनसे इस कविता की गतिशीलता व विविध-धर्मिता का परिचय मिलता है।यह एक अनजाने क्षितिज की तलाश थी जिसे पहचानने में इन रचनाकारों की सूक्ष्म संवेदनशील दृष्टि ने मेरी सहायता की।अगली किश्तों में इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ प्रस्तुत होंगी ।

स्त्री-कविता और सामाजिक परिवर्तन

आज भी हम ऐसे समाज में जी
रहे हैं जिसकी आधी आबादी बहुत दारुण स्थिति में जीवन-यापन कर रही है, जिन्हें अपने स्त्रीत्व की पहचान नहीं है। वह नहीं जानती कि एक स्त्री के रूप में उसकी शक्ति क्या है और उसे किस तरह अधिक धारदार बनाया जा सकता है, उसका जीवन रोज़ी-रोटी की जिस भाग-दौड़ में उलझा है, बौद्धिक विमर्श में उसके लिए कोई जगह नहीं है। स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों के विरोध की अपेक्षा झेलने की विवशता अधिक दिखाई पड़ती है। जब तक स्त्री-मुक्ति का अभियान मानव मुक्ति के अभियान में रूपांतरित नहीं होता, समाज में वह संतुलन नहीं बनता जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों को एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक के रूप में बराबर का दर्ज़ा मिले, तब तक समतापूर्ण समाज की संकल्पना अधूरी रहेगी। कविता और साहित्य, इस संभावना को कैसे जगा सकेंगे, यह एक महत्वपूर्ण विषय है।

स्त्री-कविता, मुक्ति की जिस चेतना को अपनाती है, वह मानव-मुक्ति की परिकल्पना है जिसमें संभवतः स्त्रियों के बीच वर्ग-भेद भी मिट जायेंगे और स्त्री-पुरुष के बीच सत्ता और ताकत के संबंधों की भी पुनर्व्याख्या होगी। सविता सिंह, ऐसे समाज की कल्पना करते हुये कहती हैं कि “ऐसी समानान्तर सभ्यता का विकास संभव होगा, जिसमें सामूहिक सहवास संभव होगा। एक विनम्र, विश्व-समुदाय बनाने में हमारी कविताओं का भी योगदान होगा।” स्त्री-कविता की यह आधारभूमि, अपने सुख-दुःख में आत्मलिप्त न होकर, एक नई सभ्यता का विकास करने की आकांक्षा रखती है, जो अधिक विनम्र, मानवीय व समतापूर्ण होगी।

“आधी आबादी की सक्रिय भागीदारी व समर्थन के बिना कोई भी सामाजिक बदलाव संभव नहीं…जिस कविता में यथार्थ की इंदराज़ी मुक्तिकामी स्त्री के नज़रिए से की जाती है, उस प्रगतिशील स्त्री-कविता की सामाजिक परिवर्तन में अहं भूमिका है।”कात्यायनी के इन शब्दों में कविता और सामाजिक परिवर्तन का संबंध, सूत्र बनकर झलकता है। यह निश्चित है कि साहित्य अपनी गति से धीरे-धीरे-धीरे ही सही, हमारी चेतना के निर्माण या उसके परिवर्तन में विशेष भूमिका निभाता है। उसकी गति इतनी धीमी, इतनी महीन हो सकती है कि ऊपर से देखने पर भले ही कोई हलचल दिखाई न दे लेकिन वह सदा सक्रिय रहती है। स्त्री-कविता, स्त्री के हक में, हमारी चेतना को निरंतर आंदोलित करती रहती है। उसकी सर्वोदयी करुणामयी दृष्टि सबके लिये न्याय की माँग करती है। उसमें मानवता का सन्देश निहित है।


अपनी कविता के लिये स्त्री-रचनाकार जो भी शब्द चुनती हैं, वे शब्द या पक्तियाँ, बीच के अंतरालों को पाटने की कोशिश करते हैं, क्योंकि उन शब्दों और पंक्तियों में, स्त्री की परिवर्तनकामी चेतना व भूमिका की खास जगह होती है।समकालीन कविता की दुनिया में, स्त्री हों या पुरुष, सभी कवियों के सरोकार समान रहे हैं। अपनी विशेष अभिरुचियों के बावजूद वे साझे यथार्थ के साक्षी हैं। अनामिका कहती हैं, “स्त्री कवि हों या अन्य कवि, सब अपने-अपने वर्ण, नस्ल, लिंग के लेंस से, साझा यथार्थ देखते-परखते हैं। यह अवश्य है कि आज जितनी महिलाएँ, एक-साथ साहित्यिक परिदृश्य पर सक्रिय हैं, वह पहले कभी नहीं हुआ और उनके होने से कविता या साहित्य के बृहत् संसार में कुछ खलबली तो ज़रूर मची है, उनकी अपनी एक आवाज़ बनी है, जो पहले नहीं थी”स्त्री-कविता, सामाजिक परिवर्तन में जो भूमिका निभा रही है और उससे आगे बढ़कर निभाने की आकांक्षा रखती है।

आज के पुरुष आलोचकों ने स्त्री रचनाकारों को नई संवेदनशीलता से पढ़ा है और उनके साहित्य में आने वाली नवीन अभिव्यक्तियों को रेखांकित किया हैं। प्रबुद्ध समाज की प्रवक्ता के रूप में इन कवयित्रियों के सामाजिक-राजनीतिक विचारों व उनकी पक्षधरता का भी विशेष महत्व है।इन कवयित्रियों ने राजनीति, समाज, साम्प्रदायिकता, भूमंडलीकरण की चुनौतियों आदि पर गंभीर, महत्वपूर्ण कवितायें लिखीं है। इसके साथ-साथ कविता की रचना-प्रक्रिया पर भी उन्होंने गहराई से विचार किया है। इसी तरह जीवन के कोमल बिम्ब, प्रकृति से उनकी अभिन्नता, भाव-भाषा के विविध प्रयोग, स्त्री-कविता की इन उपलब्धियों की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। स्त्री व स्त्रीत्व की आवाज़ पकड़ते हुए, यह सब छूट रहा था जिससे उनके मूल्यांकन की पहल, स्वागत-योग्य होते हुये भी, अधूरी रही है।काव्य रचना के ये सभी पक्ष समकालीन कविता धारा में स्त्रियों तथा स्त्री-कविता की सम्पूर्ण उपस्थिति को दर्ज करते हैं।

क्रमशः जारी 

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ऐसी पोशाकें पहनने वाली लडकियां नंगी घूमें: हरियाणा सीएम

हमारा देश कितना घोषित पितृसत्तात्मक देश है ! 


 ‘#मेरीरातमेरीसड़क अभियान के तहत आज लडकियां (12 अगस्त) 12 बजे रात को सड़कों पर  निकलकर अपने स्पेस पर क्लेम कर रही हैं.  आइये समझते हैं लड़कियों की मोबिलिटी से कैसे घबडाते हैं पुरुष शासक. प्रधानमंत्री से लेकर सभी दलों के नेताओं के सेक्सिस्ट बयानों की एक लम्बी फेहरिश्त है.
महिलाओं पर दिए गए ऐसे फूहड़ बयान बड़े बड़े राजनेताओं के मुंह से कितनी आसानी से झरते हैं

1. लड़की बारह बजे के बाद बाहर क्यों थी ! — रामवीर भाटी ( हरियाणा, भाजपा )
2. अगर उनको ऐसी पोशाक ही पहननी है तो फिर वे नंगी घूमें – मनोहरलाल खट्टर ( मुख्य मंत्री , हरियाणा )
3. महिला आरक्षण बिल पास करवाकर ,परकटी महिलाओं को सदन में लाना चाहते हैं आप ? – शरद यादव (जेडीयू)
4. डेंटेड-पेंटेड महिलाएं सड़कों पर विरोध कर रही हैं। दिन में विरोध करेंगी रात में डिस्को जाएँगी। – अभिजीत मुखर्जी    (सांसद और राष्ट्रपति के बेटे)

5. 90 फीसदी मामलों में रेप नहीं बल्कि लड़कियां सहमति से सम्बन्ध बनाती हैं। – धर्मवीर गोयल (हरियाणा कांग्रेस प्रवक्ता)
6. लड़कियों को इतना ऐडवेंचर्स नहीं होना चाहिए कि देर रात को अकेले घर से बाहर निकलें। – शीला दीक्षित (पूर्व सीएम, दिल्ली)
7. ये महिलाएं लिपस्टिक पाउडर लगाकर क्या विरोध करेंगी ? – मुख़्तार अब्बास नक़वी (केंद्रीय कैबिनेट मंत्री)
8. लड़कियों को फिगर की ज्यादा चिन्ता होती हैं इसलिए कम खाती हैं। कुपोषण का यही कारण है। – नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री)
9. महिला आरक्षण विधेयक पास होने से ऐसी महिलाएं सदन में आएँगी जिन्हें देखकर लोग सीटियां मारेंगे। – मुलायम सिंह यादव (सपा प्रमुख)
10. रेप के लिए लड़कियां भी जिम्मेदार हैं क्योंकि हर रोज उनकी स्कर्ट का साइज़ छोटा होता जा रहा है। फ़िल्म में विलेन का होना जरूरी है वरना फ़िल्म कैसे चलेगी? – चिरंजीत चक्रवर्ती (टीएमसी MLA)
11. ममता बनर्जी रेप के लिए कितना चार्ज करेंगी ? – अनीसुर दास ( CPM के सीनियर नेता और पूर्व मंत्री)
12. जब मर्यादा का उल्लंघन होता है तो सीताहरण होता ही है। औरतों को लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघना चाहिये। – कैलाश विजयवर्गीय (बीजेपी नेता, एमपी)
13. मैं अपने कार्यकर्ताओं को माकपा की महिलाओं के रेप करने के लिए भेजूंगा। – तापस पाल (टीएमसी सांसद)
14. वेस्टर्न कल्चर की वजह से रेप हो रहे हैं। भारतीय संस्कृति तो महान है। – मुरली मनोहर जोशी (भाजपा के सीनियर लीडर)
15. कोई बताकर तो रेप नहीं करता…अगर बताकर जाता तो हम पकड़ लेते। – बाबूलाल गौर (ग्रह मंत्री, एमपी)
16. कोई जानबूझकर रेप नहीं करता… धोखे से हो जाते हैं। – राम सेवक पैकरा (ग्रह मंत्री, छत्तीसगढ़)
17. आपको तो खतरा नहीं हुआ ना? गूगल करके देखिये और भी जगह रेप हो रहे हैं। (बदायूं रेप पर पत्रकार के सवाल पर)- अखिलेश यादव (सीएम, यूपी)
18. रेप सिर्फ इंडिया में होते हैं भारत में नहीं। – मोहन भागवत, (प्रमुख, आरआरएस)
19. अगर मुसलमान तुम्हारी एक बेटी को ले जाते हैं तो तुम उनकी सौ महिलाओं को ले आओ। – योगी आदित्यनाथ (सांसद, बीजेपी)

20. रेप के लिए फांसी की सजा न हो। लडके हैं ! जवानी में गलती हो जाती है। लड़कियां भी झूठे आरोप लगाती हैं। – मुलायम सिंह यादव (प्रमुख, समाजवादी पार्टी)
21. लड़कियों को मोबाइल नहीं देने चाहिए। जब मोबाइल नहीं था तो क्या हमारी माताएं बहनें मर गई थी। – राजपाल सैनी (सांसद, बीएसपी)
22. जो महिलाएं शादी से पहले और शादी के बाहर सेक्स करती हैं उन्हें फांसी दे देनी चाहिए।- अबु आज़मी (विधायक और नेता, समाजवादी पार्टी)
23. ऐसी रिपोर्ट्स आ रही हैं  कि 20-25 हजार के सरकारी मुआवजे के लिए लड़कियां खुद को रेप विक्टिम बता रही हैं। – अम्बिका चौधरी (पिछड़ा एवं विकलांग कल्याण मंत्री, यूपी)
24. लड़के-लड़कियों को माँ-बाप द्वारा दी गई आज़ादी ही रेप का कारण हैं। – ममता बनर्जी (सीएम, प. बंगाल)
25. अगर मैं अपने घर की लड़की को किसी दूसरे लड़के के साथ देखूंगा तो अपने फार्म हाउस में उसको जिन्दा जला दूंगा। – ए पी सिंह ( निर्भया रेप के दोषियों का वकील)
26. मैडम आप जरा सुनिए ये कोई फ़िल्मी इशू नहीं है। — जया बच्चन से सुशील कुमार शिंदे (पूर्व ग्रह मंत्री)

प्रस्तुति : सुधा अरोड़ा 

मेधा पाटकर का सरकारी उत्पीड़न जारी

  नर्मदा बचाओ आंदोलन 

1.मेधा पाटकर को इंदौर के बॉम्बे हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के चार घंटे बाद, इंदौर से बड़वानी जाने के क्रम में  गिरफ्तार कर शाम 7:30 बजे धार जेल ले जाया गया, शाम तक नहीं पेश किया कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने 

2.नर्मदा घाटी के हज़ारों की संख्या में लोगो ने किया धार जेल का घेराव, कहा गैर कानूनी गिरफ्तारी और  सरकार का दमन नही सहेंगे 


3.सैकड़ों नर्मदा के विस्थापितों ने दी गिरफ्तारी, सांकेतिक गिरफ्तारी के बाद सबको रिहा किया धार पुलिस ने 


 4.इंदौर हाई कोर्ट, नर्मदा विस्थापितों की याचिका पर अगली सुनवाई 21 अगस्त 2017 के दिन करेगी 


5.27 जुलाई से चल रहा अनिश्चितकालीन उपवास आज भी जारी, 7 अगस्त के दिन मेधा पाटकर व 9 अन्य          अनशनकारियों के गिरफ्तारी के बाद जुड़े 10 अन्य साथी 
  
6.27 जुलाई से अनशन पर बैठी भगवती बहन और रुकमनी बहन के साथ अनशन में जुड़े 10 साथियों का आज    चौथा  दिन 


बड़वानी, मध्य प्रदेश, 11 अगस्त 2017 

9 अगस्त को दोपहर  में अस्पताल से रिहाई के 4 घंटे बाद मेधा पाटकर को दुबारा पुलिस ने इंदौर बड़वानी रास्ते पर घेरा और इसबार धाराओं की सूची के साथ उनको धार जेल में शाम 7:30 बजे बंद कर दिया। जिसके खिलाफ  पूरे गाँव गाँव से अहिंसक उदगार आया और हजारों की संख्या में लोग अपना विरोध प्रदर्शन करने धार जेल पहुंचे। घंटों बातचीत के बाद कोई समाधान ना होता देख घाटी के सैकड़ों लोगों ने मेधा पाटकर व अपने चार अन्य लोगों के गिरफ्तारी के विरोध में 10 अगस्त को सामूहिक गिरफ्तारी दी।

पुलिस ने सभी की सांकेतिक गिरफ़्तारी लेते हुए उन्हें शाम में रिहा कर दिया। आज शाम तक मेधा पाटकर को कोर्ट में उपस्थित नहीं किया गया था, और पहले से अलग अलग झूठे आरोपों में गिरफ्तार करने के बाद कई अन्य धाराएं जोड़ दी गयी है। पिछले 10 दिन भारत के इतिहास में नर्मदा घाटी के लोगों की जलहत्या के लिए सरकारी नियोजन की तरह याद रखा जाएगा। इसी के साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन पुलिस के आरोपों का खंडन करते हुए जाहिर करना चाहती है कि नर्मदा घाटी के लोग पिछले 32 सालों से अहिंसक सत्याग्रही मार्ग पर चलते आ रहे हैं और शासन को उसकी गलतियों और चूक से अवगत कराते आये है। नर्मदा बचाओ आंदोलन हमेशा नर्मदा घाटी के लोगों के हक़ के लिए संघर्ष करता आया है और करता रहेगा। हिंसा करना सरकारों का रवैया रहा है जैसा कि हम इस बार ही नही इससे पहले भी कई बार देख चुके हैं। कोई भी सरकार सेहत को चिंतित होकर कील लगे डंडे लेकर पुलिस नही भेजती अगर उनकी मंशा हिंसा के इतर होती। सरकार लोगों के ऊपर दमन कर रही है और जब नर्मदा घाटी के लोगों ने सरकार के झूठ को दुनिया के सामने उजागर कर दिया तो वो बौखलाहट में मेधा बहन और अन्य साथियों पर हिंसक दमन करने को उतारू हो गयी है। हमारा आज भी कहना है और हम यह साबित कर चुके है कि घाटी में लाखों लोग पुनर्वास से वंचित है अभी भी, लाखो पेड़ डूब में आ रहे है, मंदिर, मस्जिद, शालाएं, स्थापित गांव, लाखों मवेशी व कई अन्य जीव डूबने वाले हैं। ऐसी त्रासदी पर कौन सा उत्सव मनाना चाहती है मध्य प्रदेश, गुजरात और केंद्र सरकार। क्या सिर्फ भारत में अब सत्ता की राजनीति रह गयी है? क्या कभी ग्राम सभा की लोकनीति और वास्तविक न्याय की पराकाष्ठा स्थापित हो पाएगी? आज भी नर्मदा घाटी के लोग महात्मा गांधी, अंबेडकर के सपनों और उसूलों पर चलते हुए देखना चाहते है। ऐसे समय में सरकार को झूठे आरोप लगाने से बाज आना चाहिए और 32 सालों के अहिंसक सत्याग्रही आंदोलन के सामने नतमस्तक होकर प्रेरणा लेते हुए लोगों की भलाई के बारे में सोचना चाहिए। हम यह सरकार की बेशर्मी भरे कदमों के बाद भी उनसे मांग करते हैं कि फौरन मेधा पाटकर व अन्य गिरफ्तार किये गए साथियों को बिना किसी शर्त के रिहा किया जाए और बांध के गेट्स फौरन खोलकर मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी की जनता का सम्पूर्ण और न्यायपूर्ण पुनर्वास किया जाए। इसी दौरान आज इंदौर हाई कोर्ट के समक्ष सुनवाई को आई विस्थापितों की याचिका की अगली सुनवाई 21 अगस्त के दिन तय की गयी।

कैलाश अवस्या, मुकेश भगोरिया, श्यामा बहन, केसर बहन, मोहन भाई
 संपर्क : 9179617513 / 9867348307

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
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‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

मेरी रात मेरी सड़क आखिर क्यों?



बहुत कम ऐसे मौके आते हैं जब हिन्दी स्फीअर की लडकियां सोशल मीडिया या मीडिया में कोई मुद्दा ट्रेंड करा ले जाती हों. आज भी ट्वीटर और फेसबुक में अंग्रेजी ट्रेंड को पर लग जाते हैं. लेकिन श्वेता यादव, गीता यथार्थ और अन्य लडकियां इस मामले में उल्लेखनीय हैं जिन्होंने कई मुद्दे सोशल मीडिया और मीडिया में ट्रेंड कराये. सेल्फ़ी विदाउट मेकअप की मुहीम हो या अमेजन का स्त्री की योनि में सिगरेट बुझाने की प्रतीक वाला ऐश ट्रे का विज्ञापन और उसकी बिक्री वापस लेना, यह सब इन लड़कियों ने सफलता पूर्वक अंजाम दिया. और अब 12अगस्त को ‘अगस्त क्रान्ति दिवस’ के तीन दिन बाद और आजादी के दिन के तीन दिन पूर्व की आधी रात को #मेरीरातमेरीसड़क का आह्वान किया है-उस रात लड़कियों को अपने-अपने शहरों में सड़क पर निकलने का आह्वान. श्वेता बता रही हैं इस अभियान को शुरू करने के पीछे का मकसद: 
संपादक

फेसबुक पर लिखने के बाद बहुत सारे लोगों ने पूछा कि #मेरीरातमेरीसड़क आखिर क्यों? क्या यह वर्णिका के साथ जो हुआ उसके विरोध में है? ज्यादातर ने बिना कहे खुद से कयास लगा लिया कि यह वर्णिका केस के विरोध में ही है, जिसमें एक राजनेता ने विवादित बयान देते हुए कहा कि “लड़कियों को देर रात में घर से बाहर निकलना नहीं चाहिए”|

पर रुकिए जरा सोचिये क्या सिर्फ यह एक अकेली घटना है? जहाँ किसी घटना के बाद ऐसा बयान आया? क्या ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी लड़की को इस तरह के अपमान से गुजरना पड़ा? क्या समाज में, घर-परिवार में आये दिन यह सुनना नहीं पड़ता कि घर से निकलो तो भाई को लेकर निकलो, आधी रात में मत जाओ, ऐसे मत बोलो, वैसे मत उठो, वैसे मत बैठो ऐसी न जाने कितनी बातें हैं जो सिर्फ लड़कियों के लिए है|  न जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हैं जिनके बाद हमने कितने उल-जलूल बातें लड़की के मत्थे आती सुनी हैं|

उन तमाम बातों के विरोध में यह कैम्पेन है, एक छोटी सी गह्तना से आपको बताती हूँ शायद आपके लिए समझना आसन हो जाए कि हम लड़कियां आधी रात को भी सड़क अपने लिए सुरक्षित क्यों चाहती हैं|

यूँ तो आधी रात को घर से निकलने के बहुत वाकये हैं जहाँ झेलना पड़ा लेकिन कुछ वाकये ऐसे हैं जो आज भी नहीं भूलते उनमें से एक यह भी है……

दिसंबर 2015 हमारे पूरे परिवार के लिए आज भी क़यामत ही है. 7 दिसंबर रविवार सुबह अचानक दी का फोन आया उसने बताया कि पापा को ब्रेन हैमरेज हो गया है| तमाम उठा-पठक में पापा को लखनऊ सुषमा हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया| पिता कोमा में और हम सब बदहवास, मैं आनन्-फानन में दिल्ली से लखनऊ पहुंची| होस्पिटल में माँ और भाई थे उनके अलावा तीसरी मैं| चूँकि दिमाग बिलकुल सुन्न पड़ गया था पापा का सुनकर तो जो कपड़े पहन रखे थे उन्हीं में जनरल से भागी थी दिल्ली से, लिहाजा पास में कुछ नहीं था| तीन दिन बाद भईया ने कहा हम तीनों में से किसी एक को घर जाना होगा, चूँकि तुम्हारे पास कपड़े वगैरह भी नहीं है एक काम करो तुम घर चली जाओ, वहां का सारा इंतज़ाम भी देख लेना और अपने कपड़े भी लेना आना| मैं घर चली गई, लखनऊ से हमारे घर की दूरी लगभग 220 किलोमीटर है| सब कुछ जल्दी -जल्दी निपटाते भी दुसरे दिन शाम हो गई, सर्दियों में सूरज यूँ भी घर जाने की जल्दी में होता है| दीदी और भाभी दोनों ने कहा कि रुक जाओ मत जाओ, लेकिन हालात रुकने वाले नहीं थे सो मैंने लखनऊ का रूख किया एक तो वैसे ही लेट हो गया था दूसरे कोई बस नहीं और कोहरा उसकी तो पूछिये मत इतना भयानक था उस दिन की हाथ को हाथ न दिखे .. समझ लीजिये  बस रेंग रही थी| भईया के चाचा ससुर उस समय हर पल साथ खड़े थे, हमारे लिए पिता समान| उनका मुझे फोन आया और उन्होंने कहा बेटा बस अड्डे तक मत जाना बेवजह की दूरी जायेगी और समय भी| चाचू ने मुझसे कहा बेटा तुम शहर में प्रवेश करने से पहले ही जो फ्लाई ओवर पड़ता है वहां उतर जाना मैं वही रहूँगा तुम्हें रिसीव कर लूँगा| खैर वह बेहद जिम्मेदार हैं आज तक कभी अपनी जिम्मेदारियों से नहीं चूके| लेकिन एक कहावत है न कि जब समय ही बुरा चल रहा हो तो फिर सारे सितारे उलटे पड़ जाते हैं|

अभी तक रॉड, तेज़ाब, मोमबत्ती और अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी: सोशल मीडिया में आक्रोश

बस फ़्लाइओवर पर पहुंची और मैं उतर गई , एक तो कुहरे की वजह से सही जगह का अंदाजा न लग पाने के कारण मैं चाचू को सही समय का आइडिया नहीं दे पाई दूसरी मार यह पड़ी की कुहरे की वजह से चाचू मिस गाइड हो गए और गलत रूट ले लिया| अब कुछ नहीं हो सकता था सिवाय इंतज़ार के| मुझे याद है उसी फ़्लाइओवर से हाइवे शुरू होने के चलते गाड़ियों जिनमे ज्यादातर ट्रकों का ताता लगा हुआ था, बराबर आ जा रही थी या यूँ कह लीजिये रेंग रही थी| मैं डर और ठंढ के मारे लगभग सुनना पड़ चुकी थी क्योंकि मुझे अंदाजा हो गया था कि मैं बहुत गलत जगह फंस गई हूँ|

मैंने हुड उठाया सिर को ऐसे ढका की ठीक से बाल ढँक जाए आधे चेहरे को रूमाल से बाँधा पर शायद फिर भी मैं अपना लड़की होना छुपा नहीं पाई| जहाँ मैं थी वहां एक ट्रक आकर रुकी मैंने अपने आपको भरसक छिपाने की कोशिश की लेकिन मैं नाकाम थी| उस ट्रक में तीन लोग थे उन्होंने मुझे कैसे देखा, क्या सोचा मुझे नहीं पता लेकिन वह मेरी तरफ बढ़ रहे थे| मैंने इस बात को कन्फर्म करने के लिए अपनी जगह छोड़ा और थोड़ी अलर्ट होते हुए आगे की तरफ बढ़ गई| वे अब और तेजी से मेरी तरफ बढ़ने लगे मेरे पास सोचने का समय नहीं था बस बचाना था खुद को| पीठ पर सामान से लदा बैग और डरी सहमी मैं अपने आपको चाचा के आने से बिलकुल उलटी दिशा में भागी जा रही थी| मैं आगे और वो मेरे पीछे, मैं मार्शल आर्ट जानती हूँ पर मैं जानती थी कि मैं अकेली और डरी हुई हूँ और वे तीन मैं लड़ नहीं पाउंगी तो भागकर बचाना उचित लगा| भागते-भागते कुछ छोटी गुमटियां दिखी उन्ही में छिप कर खुद को बचाया| वह रात तो बीत गई लेकिन उस भयानक रात का जिक्र मैं अपने घर में किसी से नहीं कर पाई आज तक नहीं| पर जब भी सोचती हूँ सिहर उठती हूँ अगर उस रात मैं उनके हाथ लग गई होती तो क्या हुआ होता? क्या करते वे मेरे साथ?


कुछ हो जाने पर कौन ये मानता कि उस दिन और उसके बाद भी कई रातें मुझे देर रात घर से बाहर निकलना पड़ा अपनी इच्छा या घूमने के शौक के चलते नहीं अपनी जरूरत के चलते| ऐसी ही न जाने कितनी लड़कियां हैं जिन्हें अकेले निकलना होता है रात में जरूरत के वक्त, उन्मन कुछ अकेली रहती हैं, कुछ नौकरी करती हैं, कुछ सिंगल मदर हैं| सबके पास अपने-अपने कारन है पर इसका यह मतलब कत्तई नहीं होना चाहिए कि कोई लडकी रात को घर से निकले तो वह रेप कर दी जाए, मार दी जाए और उस पर यह आधे तिरछे बयान आएं| बस अब बहुत हुआ इनका विरोध करना ही होगा| लोगों को यह बताना ही होगा कि यह सड़क जितनी किसी आदमी के लिए सुरक्षित है उतनी ही किसी महिला के लिए भी होनी चाहिए| यह कैम्पेन उसी के विरोध में उठाया गया छोटा सा कदम है| शुरू में हम कुछ लड़कियां थी अब तो लगभग देश का हर कोना जुड़ चुका है|

मान लीजिये कि हम लड़कियां खुरापाती हो गई हैं .. आपके हिसाब से बहुत भयानक आइडिया हम लड़कियों के दिमाग में घूम रहा है.. जल्द ही हम आधी रात को सडको पर निकलेंगी .. नहीं नहीं हमारा इरादा किसी भी सरकार को चुनौती देना नहीं है.. बस इस समाज को समझाना चाहते हैं कि सड़कें हमारे लिए भी सुरक्षित कर दीजिये .. मैं यह मानती हूँ कि हम अपराध युक्त समाज का हिस्सा बन चुके हैं इसलिए आधी रात को सड़कें किसी के लिए भी सुरक्षित नहीं है फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष.

नैचुरल सेल्फी की मुहीम: सौन्दर्य बाजार को लड़कियों की चुनौती

लेकिन जानते हैं आधी रात में निकलने पर पुरुष और महिला के डर में बड़ा अजीब अंतर है| अगर अपनी कहूँ तो मैं बिना वजह खुद रात को निकलने से बचती हूँ| लेकिन जब जरूरत होती है तो निकलने से घबराती भी नहीं बिना हिचक निकल जाती हूँ| हजारों अनुभव हैं मेरे पास ऐसे जब आधी रात को घर से बाहर निकलना पड़ा है वो भी अकेले.. आप जानते हैं क्या होता? नहीं ?? रुकिए बताती हूँ हाँथ, पैर कांपते हैं एक अनजाना डर दिमाग में भरा रहता है और वह डर बहुत वाहियात है क्योंकि वह डर सिर्फ लड़की होने से उपजता है.. रेप कर दिए जाने का डर, मार दिए जाने का डर, मोलेस्ट किये जाने का डर| और इस सब के साथ अगर आपके साथ कुछ गलत हो जाए तो लोगों की नसीहत निकली ही क्यों थी आधी रात को .. इन सब वर्जनाओं को तोडना है .. फिलहाल हम कुछ लड़कियां मन बना चुकी हैं .. आप सब का भी मन करे तो आ जाइए साथ …

कई लोगों का यह सवाल भी आया कि एक दिन से क्या होगा क्या बदलेगा| उनसे मेरा एक सवाल कुछ नहीं किया तो भी क्या बदलेगा? आज नहीं तो कल कुछ न कुछ तो करना होगा| बड़ी नहीं तो छोटी ही सही शुरुआत तो होनी चाहिए| तो बस समझ लीजिये यह शुरुआत ही है


श्वेता यादव  टेढ़ी  उंगली वेब पोर्टल के संपादक है.
संपर्क :yasweta@gmail.com


स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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क्यों खबर ली स्मृति ईरानी ने ‘पहरेदार पिया की’: बंद हो सकता है प्रसारण !

सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने महिलाओं द्वारा चलाये गये ऑनलाइन कैम्पेन का संज्ञान लेते हुए ब्रॉडकास्टिंरग कंटेंट कप्लेंट्स काउंसिल (BCCC) को पत्र लिखा है. इस धारवाहिक को स्त्री विरोधी बताते हुए मानसी जैन ने आनलाइन कैम्पेन चलाया था, जिसपर लगभग 1 लाख से अधिक हस्ताक्षर किये गये. इसे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के शिकायत विभाग में बाज्बता दर्ज भी करवाया गया .

सोनी टीवी पर 17 जुलाई 2017 से साढ़े आठ बजे से प्रसारित होनेवाला यह धारावाहिक अपने शुरुआत से ही सुर्ख़ियों में है. बेमेल विवाह और बाल विवाह पर बने धारावाहिकों से तो हम सब परिचित हैं, “बालिका बधु” ने दर्शको की प्रसंशा भी बटोरी थी, लेकिन इस धारावाहिक ने लोगो को अपने अटपटे कथानक से आहत कर रखा है.  9 वर्ष के लडके और अपने से दुगनी उम्र की लड़की के बीच प्रेम और विवाह के अवगुंठन से गुम्फित यह कहानी किसी को भी बेचैन कर रही है.

राजे-रजवाड़ों के ठसक और राजस्थान के पारिवारिक पृष्ठभूमि में निर्मित यह धारावाहिक सैकड़ो आम टीवी धारावाहिकों की तरह ही होता यदि पुरुष प्रेमी बच्चा न होता और प्रेमिका उससे दुगने उम्र की ना होती. सामंतवाद की रस्सी जल जाने के बाद भी उसके ऐंठन के हैंगोवर को दर्शाती पृष्ठभूमि में बने इस धारावाहिक को हर तरफ से आलोचना झेलनी पड रही है. 11 साल का बाल कलाकार अफाक खान 9 साल के राजकुमार की भूमिका में है और 25 वर्षीया तेज़स्वीसाल की दीया की भूमिका में है जो राजकुमार रतन के सपनों की परी जैसी आकर्षक और खुबसूरत है. राजकुमार रतन को दीया के प्रेम में पड़कर उसका पीछा करता हुआ और छुपकर तस्वीरें  लेता हुआ दिखाया गया है. दर्शक इस प्रेम के अतिरंगी रूप को नहीं पचा पा रहे हैं और बाल विवाह तथा  सामाजिक नैतिकता के विपरीत देख रहे हैं.



दर्शकों के गुस्से को आवाज देते हुए मानसी जैन ने change.org पर ऑनलाइन पिटीशन के माध्यम से  सूचना एवं प्रसारण मंत्री को लिखा है, जिसपर एक लाख से भी ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर हैं. पिटीशन में कहा गया है कि यह धारावाहिक गन्दी और विकृत मानसिकता को बढ़ावा देनेवाला है और इसे तत्काल बंद कर दिया जाना चाहिए. नौ साल के बच्चे का 19 साल की लड़की की मांग में सिन्दूर के नाटकीय और सुहागरात और हनीमून के दृश्यों से कुत्सित इस धारावाहिक ने बाल विवाह के दुष्परिणामों को दिखने के विपरीत रहस्य-रोमांच और रोमांस को परोस रही है. पिटीशन में कहा गया है कि इस तरह के कुत्सित दृश्य हमारे बच्चो के कोमल मानस पर स्थायी प्रभाव डाल सकते हैं. हम नहीं चाहते कि  हमारे बच्चे इस बीमार मानसिकता से ग्रसित हों.

दीया (तेजस्वी प्रकाश) ने सफाई देते हुए कहा है कि नाहक ही लोग इसे मुद्दा बना रहे हैं, यह धारावाहिक वास्तव में कुरीतियों के खिलाफ है और किसी भी तरह से बाल विवाह को बढ़ावा नहीं देती, न ही इसमे कोई आपत्तिजनक दृश्य हैं. जिस शादी के दृश्य को देखकर जनता विरोध कर रही है (नाबालिग राजकुमार रतन द्वारा मांग में सिन्दूर भरे जाने का) वह शादी किसी कारण से हुई है ना कि दाम्पत्य सुख के आनंद के लिए. इस धारावाहिक से ‘जिम्मेदारी” का स्पष्ट सन्देश समाज में देना चाहते हैं पर लोग बेकार में ही यह पिटीशन कर रहे हैं. यह पूरी तरह अनावश्यक और अन्यायपूर्ण है. हालांकि यह समाजिक जिम्मेवारी क्या है.

धारावाहिक में मुख्य किरदार की भूमिका तेजस्वी प्रकाश (दीया), अफान खान(रतन), सुय्याश राय(अभय), परमीत सेठी(हर्षवर्धन मान सिंह) और किशोरी शहाने(पद्मा सिंह) आदि निभा रहे हैं. धारावाहिक के लेखक नीरज आयंगर हैं और शशि सुमित प्रोडक्शन द्वारा निर्मित है.
राजीव सुमन स्त्रीकाल के संपादन मंडल के सदस्य है.
संपर्क :9650164016

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प्रधानमंत्री जी, राखी को लफ्फाजी न बनायें: बहनों को बलात्कारी भाजपाइयों से बचायें

खुला पत्र 

आदरणीय प्रधानमंत्री जी 


आज जब देर रात आपको बड़ी व्यथा के साथ पत्र लिखने बैठी तो सोशल मीडिया में आपको राखी बांधती कुछ बहनों की तस्वीर भी देख रही हूँ. मोदी जी एक ओर आपकी पार्टी की महिला नेता सायना एनसी आपकी पार्टी के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष के बेटे की लम्पटता का शिकार बनी लडकी का ही डॉक्टरड फोटो के जरिये उसे  बदनाम करने में लगी है, और आपकी पार्टी के अन्य भाई लोग उसका साथ दे रहे हैं तब आपकी पार्टी की कुछ बहनें आपको राखी बांधती दिखीं. सोचा शायद आपके भीतर एक-आध छटांक भाई ही बचा हो. बेटा तो आप अच्छे होने के सबूत देते रहते हैं. इसीलिए आपको यह पत्र लिख रही हूँ.


अब देखिये न आप कितने व्यस्त रहते हैं. आपको सारी बातों का पता तो नहीं होता है न. आपको पता होता तो गुजरात में एक लडकी की जान और इज्जत बचाने के लिए आपने जिस तरह अपने गृहमंत्री से लेकर पूरे राज्य की पुलिस मशीनरी को लगा दिया था, उसका फोन टेप होने लगा था  वैसे ही इधर भी चंडीगढ़ में आपने वैसे ही सुरक्षा पीडिता लड़की को दे दी होती. उसे और उसके आईएएस पिता को क्यों भला फेसबुक पर आना पड़ता, आ भी नहीं पाते पुलिस वाले उन्हें इतनी सुरक्षा दे चुकी होती  कि …

आजतक पर जारी वीडियो



घटना के बारे में 


अरे हाँ, आप तो व्यस्त बहुत रहते हैं. लगता है आपको हरियाणा में आपकी पार्टी अध्यक्ष के बेटे की करतूत की किसी ने खबर न दी होगी. देता भी भला कौन अमितशाह भाई जिन्होंने गुजरात वाली लडकी को पूरी सुरक्षा मुहैया कराई थी वे अभी गुजरात में ही राज्यसभा चुनाव में चाणक्य वाली भूमिका निभा रहे हैं. एक अकेली जान,  क्या करें बेचारा अमित भाई तो लीजिये ये पत्र आपको मिले तब आप जान जायेंगे, मैं ही बता देती हूँ तफसील से.


मामला बीते शुक्रवार की आधी रात का है। जगह चंडीगढ़, जिसे कुर्बुज़ियर ने नियोजित शक्ल और कमाल की सूरत दी। आधी रात को जब आईएएस अधीकारी वीरेन्द्र कुंडू की बेटी वर्णिका कुंडू कार से ड्राइविंग करते हुए अपने गंतव्य पर जा रही थी उसी समय हरियाणा क्षेत्र के भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष सुभाष बराला का बेटा विकास बराला अपने एक दोस्त के साथ उन्हें तंग करते हुए उनका पीछा कर रहा था। लड़की ने अपनी फेसबुक पोस्ट द्वारा इस घटना का ब्यौरा दिया है। आपकी सुविधा के लिए एक वीडियो लिंक दे देती हूँ ताकि घटना उसकी ज़ुबानी ही सुन लें. यह वीडियो आपके प्रिय चैनल जी न्यूज का है :

वास्तव में यह वर्णन बहुत खौफ़नाक है। लडकी हूँ न मोदी सर तो पढ़ते हुए एक डर अंदर घुस आता है। वर्णिका का पीछा बहुत देर तक किया जाता रहा। इतना ही नहीं उनका अपहरण करने की भी कोशिश की गई। मौक़े पर पहुंची पुलिस ने फौरी कार्रवाई करते हुए दोनों लड़कों को गिरफ़्तार कर लिया। वर्णिका  ने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि शायद पुलिस न आती तो वह बच न पाती।


मोदी जी सोचिये वर्णिका एक आइएएस अधिकारी की बेटी नहीं होती तो उसे क्या पुलिस की मदद इतनी आसानी से मिल जाती? नहीं न, वैसे इस लडकी को भी कोई ख़ास न्याय नहीं मिला. घटना के चौबीस घंटे के भीतर आरोपियों को जमानत पर रिहा भी कर दिया गया है। आम लड़की या महिला का तो थानों में एफ़ आई आर (FIR) भी दर्ज़ नहीं होता। लड़का आपकी पार्टी के अध्यक्ष का बेटा है इसलिए कुछ ही देर में जेल से जमानत पर रिहा भी हो गया।



वर्णिका ने एक सवाल भी आपसे, हमसब से पूछा है कि जब चंडीगढ़ जैसी सेफ सिटी का यह हाल है तो ग्रामीण इलाकों में क्या होता होगा। उसने यह भी कहा कि वह एक अच्छे घर से ताल्लुक रखती है इसलिए इस केस को इतना कवरेज़ मिल रहा है जबकि एक आम लड़की का क्या हाल होता होगा !


मोदी जी आपको क्या याद दिलाना, फिर भी दिला देती हूँ, चंडीगढ़ एक केंद्र शासित शहर है न. यानी पुलिस आपके गृह मंत्रालय के सीधे अधीन है. समझती हूँ कि अमितशाह भाई साहब उधर गुजरात में व्यस्त हैं, लेकिन यह कैसे हो गया कि आपकी खोजी पुलिस को उस रास्ते के सीसीटीवी फुटेज  पहले मिले नहीं, फिर पता नहीं कहाँ से मिल भी गये. खबरों के मुताबिक़ जिन रास्तों पर यह घटना घटी उन रास्तों पर 9 सीसी टीवी कैमरे लगे थे जिनमें 5 खराब हैं। बचे हुए 4 कैमरे की फुटेज़ में भी गड़बड़ी की बात सामने आ रही है।  ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा दोनों आरोपियों का घटना के कुछ समय बाद मामूली कानूनी धारा लगाकर छोड़ दिया जाना भी सरकार व पुलिस पर उंगली उठाने की वजह देता है।


सच में आज आपकी कलाई पर राखी बंधी देखकर बहुत खुशी हुई कि इस देश की बहनें आपको कितना मान देती हैं. आप जरूर कार्रवाई करेंगे. मुझे पक्का यकीन है कि अमितशाह भाई आपकी व्यस्तता देखते हुए यह नहीं बता पाते होंगे कि दिन-ब-दिन आपकी पार्टी के लोग सेक्स रैकेट चलाने से लेकर न जाने कितने आरोपों से घिर रहे हैं. और अबकी बार आपके राज्य हरियाणा में, ‘कहाँ बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ का नारा दिया गया है वहाँ आपके राज्य के पार्टी अध्यक्ष ही अपने लम्पट बेटे को बचाने में लगे हैं. उधर आपके प्रिय संगठन संघ में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त मुख्यमंत्री पीडिता को ही उपदेश दे रहे हैं.


आपको भाजपा की बहनों द्वारा बांधी गई राखी की कसम आप थोड़ा समय निकालकर मेरे इस पत्र के माध्यम से जान सकेंगे कि हरियाणा में आपकी पार्टी कैसे बेटी बचा रही है.


घटना के बाद आए बयानों और प्रतिक्रियाओं पर नज़र डालने पर भाजपा के ही हरियाणा प्रदेश उपाध्यक्ष ने टिप्पणी या फरमान सुनाया कि लड़की रात को बाहर क्यों घूम रही थी?…लड़कियों को बाहर नहीं जाना चाहिए…! ऐसे में बहुत हैरत होती है इस तरह के बयानों को सुनकर। जहां आज देश में रक्षा और सुरक्षा के नाम पर रक्षाबंधन मनाया जा रह है वहीं नेता इस तरह का बयान दे रहे हैं। जब रजीनीति के लोगों को जिन्हें मतदान देकर चुना गया है, ऐसे बयान दें तब इस देश की आधी आबादी को अपने मत को डालने से पहले ज़रूर एक बार सोच लेना चाहिए। मत देने के समय हम एक मूल्यवान मतदाता होती  हैं लेकिन घर से बाहर निकलने के नाम पर कैसे एक पीड़ित और बेशर्म लड़की में तब्दील हो जाती हैं, इन राजनेताओं को यह बात सोचनी ही चाहिए।

आरोपी विकास बारला और पीडिता वर्णिका



आपको एक और दर्दनाक खबर देती हूँ. आज ही के नवभारत टाइम्स (हिन्दी) में यह खबर पढी कि दिल्ली के मंगोलपुरी इलाक़े में शनिवार देर शाम एक महिला को चलती कार में अगवा कर बलात्कार करने की कोशिश की गई।


सच कहूं मोदी भाई जान, लडकी होने के नाते बहुत डर लगता है कि छोटी बच्चियों से लेकर बुज़ुर्ग महिलाएं तक लम्पटों से पीड़ित हैं और जब लम्पट आपकी पार्टी के होते हैं तो हमारी चुनी हुई सरकारें (अधिकाँश राज्यों में अब आपकी पार्टी राज कर रही है) अपने ही लोगों को बचाने में जुटी है। कब तक 70 साल के जुमले में अपनी बहनों को आप बहला पायेंगे भाई जान.


आपका विकास कहीं विकास बारला ही तो नहीं है 


सच कहूं तो आज आपसे पूछने का मन हो रहा है कि क्या ‘विकास बराला’ नामक ‘विकास’ की ही बात आप करते रहे हैं? क्या विकास का रूप अपराधियों की शक्ल वाला है? क्या विकास असुरक्षित माहौल को बनाने वाला है? क्या विकास ‘देर रात घर से बाहर न निकलने’ या ‘संस्कारी कपड़े’ पहनने के सुझाव वाला है? क्या विकास निरंतर महिलाओं के शोषण और हिंसक हमलों का है? क्या विकास का मतलब आपकी पार्टी में लम्पटों को मिलने वाली सुरक्षा और संरक्षण का विकास है?


देखिये न, आपकी कलाई में राखी कितनी फब रही है. लेकिन यह तब और फबेगी जब आप वाकई पीडिता को न्याय दिलवाएंगे. उसे उसकी बहादुरी के लिए अपने यहाँ बुलाकर सम्मानित करेंगे. बहादुरी का जज़्बा दिखाने वाली उस लड़की ने अपनी सूझबूझ से काम लिया और अपने को बचाया। सबसे बेहतरीन बात यह भी रही कि उसने एक लंबी फेसबुक पोस्ट लिखकर इस हादसे के बारे में ब्यौरा दिया जिसे मिनटों में हजारों लोगों ने बिना मीडिया के चटखारे वाली खबरों के जाना। उसने इस सोशल साइट के जरिये अपने अनुभव और डर को रखा और साथ ही अपील भी की कि कैसे इन हमलों में खुद को सुरक्षित रखा जा सकता है। यह ज़रूरी भी है कि लाज-शर्म और बिना डर के अपने साथ हुए हादसों को साझा किया जाये। डर या चुप्पी हमलों का जवाब कतई नहीं होते।


आप इस राखी की लाज रखिये जो बीजेपी की बहनों ने आपकी कलाई पर बांधी है. आप विकास बारला को अपहरण की कोशिश के लिए गिफ्तार करवाइए, जेल भिजवाइये, पुलिस आपकी है. उसके पिता और आपकी पार्टी के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष को तत्काल पार्टी से बर्खास्त कर पुलिस पर दवाब लाने के लिए जेल भेजिये, आखिर पार्टी आपकी है. और भाजपा की नेता सायना एनसी जो पीड़िता को फर्जी तस्वीरों के जरिये बदनाम कर रही है उसे पार्टी से बर्खास्त करिये तथा ट्वीटर पर आपको फ़ॉलो करने वाले उन लम्पटों पर भी कारवाई करिये जो पीडिता को ही बदनाम कर रहे हैं.

सच में मोदी जी इस राखी की लाज रखिये, इसे लफ्फाजी न बनाइये और बेटियों को सबसे पहले बलात्कारी भाजपाइयों से बचाइये. घर के अंदर सफाई अभियान से ही सूरत बदलेगी . पत्र अनाम लिख रही हूँ क्योंकि डर है कि आपके भाजपा के सायना एनसी जैसी  नेता  या आपको ट्वीटर पर फॉलो करने वाले या आप जिन्हें फॉलो करते हैं वैसे भक्त मुझे भी न टार्गेट कर  लें
 आपकी बहन  
अच्छे दिन की बाट जोहती 
चंडीगढ़ 

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